| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
නමො තස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला माझा नमस्कार असो. සංයුත්තනිකායො संयुत्तनिकाय සළායතනවග්ගො सळायतनवग्ग 1. සළායතනසංයුත්තං १. सळायतनसंयुत्त 1. අනිච්චවග්ගො १. अनिच्चवग्ग 1. අජ්ඣත්තානිච්චසුත්තං १. अज्झत्तानिच्चसुत्त 1. එවං [Pg.236] මෙ සුතං. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති. ‘‘භදන්තෙ’’ති තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – १. असे मी ऐकले आहे. एका समयी भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेथे भगवानांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूहो!” ते भिक्खू भगवानांना प्रत्युत्तर देत म्हणाले, “भदंत!” भगवानांनी हे सांगितले – ‘‘චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං. යදනිච්චං තං දුක්ඛං; යං දුක්ඛං තදනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. සොතං අනිච්චං. යදනිච්චං…පෙ… ඝානං අනිච්චං. යදනිච්චං…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා. යදනිච්චං තං දුක්ඛං; යං දුක්ඛං තදනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. කායො අනිච්චො. යදනිච්චං…පෙ… මනො අනිච්චො. යදනිච්චං තං දුක්ඛං; යං දුක්ඛං තදනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, සොතස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ඝානස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ජිව්හායපි නිබ්බින්දති, කායස්මිම්පි නිබ්බින්දති[Pg.237], මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. පඨමං. “भिक्खूहो, चक्षू (डोळा) अनिच्च (अनित्य) आहे. जे अनिच्च आहे, ते दुःख आहे; जे दुःख आहे, ते अनत्ता (अनात्मा) आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. श्रोत (कान) अनिच्च आहे. जे अनिच्च आहे...पे... घ्राण (नाक) अनिच्च आहे. जे अनिच्च आहे...पे... जिव्हा (जीभ) अनिच्च आहे. जे अनिच्च आहे, ते दुःख आहे; जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. काय (शरीर) अनिच्च आहे. जे अनिच्च आहे...पे... मन अनिच्च आहे. जे अनिच्च आहे, ते दुःख आहे; जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षूविषयीही निर्वेद (उदासीनता) पावतो, श्रोताविषयीही निर्वेद पावतो, घ्राणाविषयीही निर्वेद पावतो, जिव्हेविषयीही निर्वेद पावतो, कायेविषयीही निर्वेद पावतो, मनाविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरागामुळे तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर ‘(मी) विमुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” पहिले. 2. අජ්ඣත්තදුක්ඛසුත්තං २. अज्झत्तदुक्खसुत्त 2. ‘‘චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං. යං දුක්ඛං තදනත්තා; යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. සොතං දුක්ඛං…පෙ… ඝානං දුක්ඛං… ජිව්හා දුක්ඛා… කායො දුක්ඛො… මනො දුක්ඛො. යං දුක්ඛං තදනත්තා; යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. දුතියං. २. “भिक्खूहो, चक्षू दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे; जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. श्रोत दुःख आहे...पे... घ्राण दुःख आहे... जिव्हा दुःख आहे... काय दुःख आहे... मन दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे; जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... ‘आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” दुसरे. 3. අජ්ඣත්තානත්තසුත්තං ३. अज्झत्तानत्तसुत्त 3. ‘‘චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, අනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. සොතං අනත්තා…පෙ… ඝානං අනත්තා… ජිව්හා අනත්තා… කායො අනත්තා… මනො අනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. තතියං. ३. “भिक्खूहो, चक्षू अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. श्रोत अनत्ता आहे...पे... घ्राण अनत्ता आहे... जिव्हा अनत्ता आहे... काय अनत्ता आहे... मन अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... ‘आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” तिसरे. 4. බාහිරානිච්චසුත්තං ४. बाहिरानिच्चसुत्त 4. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනිච්චා. යදනිච්චං තං දුක්ඛං; යං දුක්ඛං තදනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනිච්චා. යදනිච්චං තං දුක්ඛං; යං දුක්ඛං තදනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, සද්දෙසුපි නිබ්බින්දති, ගන්ධෙසුපි නිබ්බින්දති, රසෙසුපි නිබ්බින්දති, ඵොට්ඨබ්බෙසුපි නිබ්බින්දති, ධම්මෙසුපි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. චතුත්ථං. ४. “भिक्खूहो, रूप अनिच्च आहेत. जे अनिच्च आहे, ते दुःख आहे; जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनिच्च आहेत. जे अनिच्च आहे, ते दुःख आहे; जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक रूपांविषयीही निर्वेद पावतो, शब्दांविषयीही निर्वेद पावतो, गंधांविषयीही निर्वेद पावतो, रसांविषयीही निर्वेद पावतो, स्पर्शांविषयीही निर्वेद पावतो, धम्मांविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरागामुळे तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर ‘(मी) विमुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” चौथे. 5. බාහිරදුක්ඛසුත්තං ५. बाहिरदुक्खसुत्त 5. ‘‘රූපා[Pg.238], භික්ඛවෙ, දුක්ඛා. යං දුක්ඛං තදනත්තා; යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා දුක්ඛා. යං දුක්ඛං තදනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. පඤ්චමං. ५. “भिक्खूहो, रूप दुःख आहेत. जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे; जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म दुःख आहेत. जे दुःख आहे, ते अनत्ता आहे. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... ‘आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” पाचवे. 6. බාහිරානත්තසුත්තං ६. बाहिरानत्तसुत्त 6. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. ඡට්ඨං. ६. “भिक्खूहो, रूप अनत्ता आहेत. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनत्ता आहेत. जे अनत्ता आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... ‘आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही’ असे तो जाणतो.” सहावे. 7. අජ්ඣත්තානිච්චාතීතානාගතසුත්තං ७. अज्झत्तानिच्चातीतानागतसुत्त 7. ‘‘චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං අතීතානාගතං; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නස්ස! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතස්මිං චක්ඛුස්මිං අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතං චක්ඛුං නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නස්ස චක්ඛුස්ස නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොති. සොතං අනිච්චං… ඝානං අනිච්චං… ජිව්හා අනිච්චා අතීතානාගතා; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නාය! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතාය ජිව්හාය අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතං ජිව්හං නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නාය ජිව්හාය නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොති. කායො අනිච්චො…පෙ… මනො අනිච්චො අතීතානාගතො; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නස්ස! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතස්මිං මනස්මිං අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතං මනං නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නස්ස මනස්ස නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොතී’’ති. සත්තමං. ७. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील चक्षू अनिच्च आहे; मग वर्तमानकाळातील चक्षूविषयी काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील चक्षूविषयी आसक्तीरहित असतो; भविष्यकाळातील चक्षूचे अभिनंदन करत नाही (त्याची आकांक्षा धरत नाही); आणि वर्तमानकाळातील चक्षूच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी प्रतिपन्न (मार्गस्थ) होतो. श्रोत अनिच्च आहे... घ्राण अनिच्च आहे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील जिव्हा अनिच्च आहे; मग वर्तमानकाळातील जिव्हेविषयी काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील जिव्हेविषयी आसक्तीरहित असतो; भविष्यकाळातील जिव्हेचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील जिव्हेच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी प्रतिपन्न होतो. काय अनिच्च आहे...पे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील मन अनिच्च आहे; मग वर्तमानकाळातील मनाविषयी काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील मनाविषयी आसक्तीरहित असतो; भविष्यकाळातील मनाचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील मनाच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी प्रतिपन्न होतो.” सातवे. 8. අජ්ඣත්තදුක්ඛාතීතානාගතසුත්තං ८. अज्झत्तदुक्खातीतानागतसुत्त 8. ‘‘චක්ඛුං[Pg.239], භික්ඛවෙ, දුක්ඛං අතීතානාගතං; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නස්ස! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතස්මිං චක්ඛුස්මිං අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතං චක්ඛුං නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නස්ස චක්ඛුස්ස නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොති. සොතං දුක්ඛං…පෙ… ඝානං දුක්ඛං…පෙ… ජිව්හා දුක්ඛා අතීතානාගතා; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නාය! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතාය ජිව්හාය අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතං ජිව්හං නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නාය ජිව්හාය නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොති. කායො දුක්ඛො…පෙ… මනො දුක්ඛො අතීතානාගතො; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නස්ස! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතස්මිං මනස්මිං අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතං මනං නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නස්ස මනස්ස නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොතී’’ති. අට්ඨමං. ८. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील चक्षू (डोळा) दुःखकारक आहे; मग वर्तमानकाळातील चक्षूबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील चक्षूविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील चक्षूचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील चक्षूच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. कान दुःखकारक आहे... नाक दुःखकारक आहे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील जिव्हा दुःखकारक आहे; मग वर्तमानकाळातील जिव्हेबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील जिव्हेविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील जिव्हेचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील जिव्हेच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. काया दुःखकारक आहे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील मन दुःखकारक आहे; मग वर्तमानकाळातील मनाबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील मनाविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील मनाचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील मनाच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो.” आठवे. 9. අජ්ඣත්තානත්තාතීතානාගතසුත්තං ९. अध्यात्म-अनत्ता-अतीत-अनागत सुत्त 9. ‘‘චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, අනත්තා අතීතානාගතං; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නස්ස! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතස්මිං චක්ඛුස්මිං අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතං චක්ඛුං නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නස්ස චක්ඛුස්ස නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොති. සොතං අනත්තා…පෙ… ඝානං අනත්තා…පෙ… ජිව්හා අනත්තා අතීතානාගතා; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නාය! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතාය ජිව්හාය අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතං ජිව්හං නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නාය ජිව්හාය නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොති. කායො අනත්තා…පෙ… මනො අනත්තා අතීතානාගතො; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නස්ස! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතස්මිං මනස්මිං අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතං මනං නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නස්ස මනස්ස නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොතී’’ති. නවමං. ९. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील चक्षू अनात्म आहे; मग वर्तमानकाळातील चक्षूबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील चक्षूविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील चक्षूचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील चक्षूच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. कान अनात्म आहे... नाक अनात्म आहे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील जिव्हा अनात्म आहे; मग वर्तमानकाळातील जिव्हेबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील जिव्हेविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील जिव्हेचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील जिव्हेच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. काया अनात्म आहे... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील मन अनात्म आहे; मग वर्तमानकाळातील मनाबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील मनाविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील मनाचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील मनाच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो.” नववे. 10. බාහිරානිච්චාතීතානාගතසුත්තං १०. बाह्य-अनिच्च-अतीत-अनागत सुत्त 10. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනිච්චා අතීතානාගතා; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නානං! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතෙසු රූපෙසු [Pg.240] අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතෙ රූපෙ නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නානං රූපානං නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොති. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනිච්චා අතීතානාගතා; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නානං! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතෙසු ධම්මෙසු අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතෙ ධම්මෙ නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නානං ධම්මානං නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොතී’’ති. දසමං. १०. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील रूपे अनित्य आहेत; मग वर्तमानकाळातील रूपांबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील रूपांविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील रूपांचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील रूपांच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील धम्म अनित्य आहेत; मग वर्तमानकाळातील धम्मांबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील धम्मांविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील धम्मांचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील धम्मांच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो.” दहावे. 11. බාහිරදුක්ඛාතීතානාගතසුත්තං ११. बाह्य-दुःख-अतीत-अनागत सुत्त 11. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, දුක්ඛා අතීතානාගතා; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නානං! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතෙසු රූපෙසු අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතෙ රූපෙ නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නානං රූපානං නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොතී’’ති…පෙ. …. එකාදසමං. ११. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील रूपे दुःखकारक आहेत; मग वर्तमानकाळातील रूपांबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील रूपांविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील रूपांचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील रूपांच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो.” ...इत्यादी... अकरावे. 12. බාහිරානත්තාතීතානාගතසුත්තං १२. बाह्य-अनत्ता-अतीत-अनागत सुत्त 12. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනත්තා අතීතානාගතා; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නානං! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතෙසු රූපෙසු අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතෙ රූපෙ නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නානං රූපානං නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොති. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනත්තා අතීතානාගතා; කො පන වාදො පච්චුප්පන්නානං! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අතීතෙසු ධම්මෙසු අනපෙක්ඛො හොති; අනාගතෙ ධම්මෙ නාභිනන්දති; පච්චුප්පන්නානං ධම්මානං නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොතී’’ති. ද්වාදසමං. १२. “भिक्खूहो, भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील रूपे अनात्म आहेत; मग वर्तमानकाळातील रूपांबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील रूपांविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील रूपांचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील रूपांच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळ आणि भविष्यकाळातील धम्म अनात्म आहेत; मग वर्तमानकाळातील धम्मांबद्दल काय सांगावे! भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक भूतकाळातील धम्मांविषयी अनासक्त असतो; भविष्यकाळातील धम्मांचे अभिनंदन करत नाही; आणि वर्तमानकाळातील धम्मांच्या निर्वेदासाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी मार्गस्थ होतो.” बारावे. අනිච්චවග්ගො පඨමො. पहिला अनित्य वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) खालीलप्रमाणे आहे – අනිච්චං දුක්ඛං අනත්තා ච, තයො අජ්ඣත්තබාහිරා; යදනිච්චෙන තයො වුත්තා, තෙ තෙ අජ්ඣත්තබාහිරාති. अनित्य, दुःख आणि अनात्म; हे तीन अध्यात्मिक (अंतर्गत) आणि बाह्य आयतनांविषयी आहेत. 'यदनित्य' (जे अनित्य आहे) या सूत्राने तीन सुत्ते सांगितली आहेत, ती अध्यात्मिक आणि बाह्य आयतनांविषयी आहेत. 2. යමකවග්ගො २. यमक वर्ग 1. පඨමපුබ්බෙසම්බොධසුත්තං १. प्रथम पुब्बेसंबोध सुत्त 13. සාවත්ථිනිදානං[Pg.241]. ‘‘පුබ්බෙව මෙ, භික්ඛවෙ, සම්බොධා අනභිසම්බුද්ධස්ස බොධිසත්තස්සෙව සතො එතදහොසි – ‘කො නු ඛො චක්ඛුස්ස අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණං? කො සොතස්ස…පෙ… කො ඝානස්ස… කො ජිව්හාය… කො කායස්ස… කො මනස්ස අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණ’න්ති? තස්ස මය්හං, භික්ඛවෙ, එතදහොසි – ‘යං ඛො චක්ඛුං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං, අයං චක්ඛුස්ස අස්සාදො. යං චක්ඛුං අනිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, අයං චක්ඛුස්ස ආදීනවො. යො චක්ඛුස්මිං ඡන්දරාගවිනයො ඡන්දරාගප්පහානං, ඉදං චක්ඛුස්ස නිස්සරණං. යං සොතං…පෙ… යං ඝානං…පෙ… යං ජිව්හං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං, අයං ජිව්හාය අස්සාදො. යං ජිව්හා අනිච්චා දුක්ඛා විපරිණාමධම්මා, අයං ජිව්හාය ආදීනවො. යො ජිව්හාය ඡන්දරාගවිනයො ඡන්දරාගප්පහානං, ඉදං ජිව්හාය නිස්සරණං. යං කායං…පෙ… යං මනං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං, අයං මනස්ස අස්සාදො. යං මනො අනිච්චො දුක්ඛො විපරිණාමධම්මො, අයං මනස්ස ආදීනවො. යො මනස්මිං ඡන්දරාගවිනයො ඡන්දරාගප්පහානං, ඉදං මනස්ස නිස්සරණ’’’න්ති. १३. श्रावस्ती येथील निदान. “भिक्खूहो, संबोधी प्राप्त होण्यापूर्वी, मी जेव्हा केवळ एक अबोध बोधिसत्व होतो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – ‘चक्षूचा आस्वाद काय आहे? त्याचा आदीनव काय आहे? आणि त्याचे निस्सरण काय आहे? श्रोताचा... घ्राणाचा... जिव्हेचा... कायेचा... मनाचा आस्वाद काय आहे, आदीनव काय आहे आणि निस्सरण काय आहे?’ भिक्खूहो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – ‘चक्षूवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, हा चक्षूचा आस्वाद आहे. चक्षू जो अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचा आहे, हा चक्षूचा आदीनव आहे. चक्षूविषयीच्या छंदरागाचा जो विनय आणि प्रहाण आहे, हे चक्षूचे निस्सरण आहे. श्रोतावर अवलंबून... घ्राणावर अवलंबून... जिव्हेवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, हा जिव्हेचा आस्वाद आहे. जिव्हा जी अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहे, हा जिव्हेचा आदीनव आहे. जिव्हेविषयीच्या छंदरागाचा जो विनय आणि प्रहाण आहे, हे जिव्हेचे निस्सरण आहे. कायेवर अवलंबून... मनावर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, हा मनाचा आस्वाद आहे. मन जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, हा मनाचा आदीनव आहे. मनाविषयीच्या छंदरागाचा जो विनय आणि प्रहाण आहे, हे मनाचे निस्सरण आहे.’” ‘‘යාවකීවඤ්චාහං, භික්ඛවෙ, ඉමෙසං ඡන්නං අජ්ඣත්තිකානං ආයතනානං එවං අස්සාදඤ්ච අස්සාදතො, ආදීනවඤ්ච ආදීනවතො, නිස්සරණඤ්ච නිස්සරණතො යථාභූතං නාබ්භඤ්ඤාසිං, නෙව තාවාහං, භික්ඛවෙ, සදෙවකෙ ලොකෙ සමාරකෙ සබ්රහ්මකෙ සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය ‘අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධො’ති පච්චඤ්ඤාසිං. යතො ච ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, ඉමෙසං ඡන්නං අජ්ඣත්තිකානං ආයතනානං එවං අස්සාදඤ්ච අස්සාදතො, ආදීනවඤ්ච ආදීනවතො, නිස්සරණඤ්ච නිස්සරණතො යථාභූතං අබ්භඤ්ඤාසිං, අථාහං, භික්ඛවෙ, සදෙවකෙ ලොකෙ සමාරකෙ සබ්රහ්මකෙ සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය ‘අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධො’ති පච්චඤ්ඤාසිං. ඤාණඤ්ච පන මෙ දස්සනං උදපාදි – ‘අකුප්පා මෙ විමුත්ති, අයමන්තිමා ජාති, නත්ථි දානි පුනබ්භවො’’’ති. පඨමං. “भिक्खूहो, जोपर्यंत मी या सहा आध्यात्मिक (अंतर्गत) आयतनांचे अशा प्रकारे आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथार्थपणे जाणले नव्हते, तोपर्यंत, भिक्खूहो, मी देव, मार आणि ब्रह्मासह असणाऱ्या या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह असणाऱ्या या प्रजेमध्ये ‘अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे’ असे घोषित केले नाही. परंतु, भिक्खूहो, जेव्हा मी या सहा आध्यात्मिक आयतनांचे अशा प्रकारे आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथार्थपणे जाणले, तेव्हाच, भिक्खूहो, मी देव, मार आणि ब्रह्मासह असणाऱ्या या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह असणाऱ्या या प्रजेमध्ये ‘अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे’ असे घोषित केले. माझ्यामध्ये हे ज्ञान आणि दर्शन उत्पन्न झाले – ‘माझी विमुक्ती अढळ आहे, हा माझा अंतिम जन्म आहे, आता पुनर्भव नाही.’” पहिले. 2. දුතියපුබ්බෙසම්බොධසුත්තං २. दुसरे पुब्बेसंबोध सुत्त 14. ‘‘පුබ්බෙව [Pg.242] මෙ, භික්ඛවෙ, සම්බොධා අනභිසම්බුද්ධස්ස බොධිසත්තස්සෙව සතො එතදහොසි – ‘කො නු ඛො රූපානං අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණං? කො සද්දානං…පෙ… කො ගන්ධානං… කො රසානං… කො ඵොට්ඨබ්බානං… කො ධම්මානං අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණ’න්ති? තස්ස මය්හං, භික්ඛවෙ, එතදහොසි – ‘යං ඛො රූපෙ පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං, අයං රූපානං අස්සාදො. යං රූපා අනිච්චා දුක්ඛා විපරිණාමධම්මා, අයං රූපානං ආදීනවො. යො රූපෙසු ඡන්දරාගවිනයො ඡන්දරාගප්පහානං, ඉදං රූපානං නිස්සරණං. යං සද්දෙ… ගන්ධෙ… රසෙ… ඵොට්ඨබ්බෙ… යං ධම්මෙ පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං, අයං ධම්මානං අස්සාදො. යං ධම්මා අනිච්චා දුක්ඛා විපරිණාමධම්මා, අයං ධම්මානං ආදීනවො. යො ධම්මෙසු ඡන්දරාගවිනයො ඡන්දරාගප්පහානං, ඉදං ධම්මානං නිස්සරණ’’’න්ති. १४. “भिक्खूहो, संबोधी प्राप्त होण्यापूर्वी, मी अनुत्तर बुद्ध नसताना, केवळ बोधिसत्त्व असताना माझ्या मनात असा विचार आला – ‘रूपांचा आस्वाद काय आहे? आदीनव (दोष) काय आहे? निस्सरण (मुक्ती) काय आहे? शब्दांचा... पे... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धर्मांचा आस्वाद काय आहे? आदीनव काय आहे? निस्सरण काय आहे?’ भिक्खूहो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – ‘रूपांवर अवलंबून जे सुख आणि सोमनस्य (आनंद) उत्पन्न होते, हा रूपांचा आस्वाद आहे. रूपे जी अनित्य, दुःखद आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहेत, हा रूपांचा आदीनव आहे. रूपांविषयीच्या छंदरागाचा (इच्छा आणि आसक्तीचा) जो विनय (संयम) आणि प्रहाण (त्याग) आहे, हे रूपांचे निस्सरण आहे. शब्दांवर... गंधांवर... रसांवर... स्पर्शांवर... धर्मांवर अवलंबून जे सुख आणि सोमनस्य उत्पन्न होते, हा धर्मांचा आस्वाद आहे. धर्म जे अनित्य, दुःखद आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहेत, हा धर्मांचा आदीनव आहे. धर्मांविषयीच्या छंदरागाचा जो विनय आणि प्रहाण आहे, हे धर्मांचे निस्सरण आहे.’” ‘‘යාවකීවඤ්චාහං, භික්ඛවෙ, ඉමෙසං ඡන්නං බාහිරානං ආයතනානං එවං අස්සාදඤ්ච අස්සාදතො, ආදීනවඤ්ච ආදීනවතො, නිස්සරණඤ්ච නිස්සරණතො යථාභූතං නාබ්භඤ්ඤාසිං, නෙව තාවාහං, භික්ඛවෙ, සදෙවකෙ ලොකෙ සමාරකෙ සබ්රහ්මකෙ සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය ‘අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධො’ති පච්චඤ්ඤාසිං. යතො ච ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, ඉමෙසං ඡන්නං බාහිරානං ආයතනානං එවං අස්සාදඤ්ච අස්සාදතො, ආදීනවඤ්ච ආදීනවතො, නිස්සරණඤ්ච නිස්සරණතො යථාභූතං අබ්භඤ්ඤාසිං, අථාහං, භික්ඛවෙ, සදෙවකෙ ලොකෙ සමාරකෙ සබ්රහ්මකෙ සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය ‘අනුත්තරං සම්මාසම්බොධිං අභිසම්බුද්ධො’ති පච්චඤ්ඤාසිං. ඤාණඤ්ච පන මෙ දස්සනං උදපාදි – ‘අකුප්පා මෙ විමුත්ති, අයමන්තිමා ජාති, නත්ථි දානි පුනබ්භවො’’’ති. දුතියං. “भिक्खूहो, जोपर्यंत मी या सहा बाह्य आयतनांचे अशा प्रकारे आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथार्थपणे जाणले नव्हते, तोपर्यंत, भिक्खूहो, मी देव, मार आणि ब्रह्मासह असणाऱ्या या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह असणाऱ्या या प्रजेमध्ये ‘अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे’ असे घोषित केले नाही. परंतु, भिक्खूहो, जेव्हा मी या सहा बाह्य आयतनांचे अशा प्रकारे आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथार्थपणे जाणले, तेव्हाच, भिक्खूहो, मी देव, मार आणि ब्रह्मासह असणाऱ्या या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह असणाऱ्या या प्रजेमध्ये ‘अनुत्तर सम्यक्संबोधी प्राप्त केली आहे’ असे घोषित केले. माझ्यामध्ये हे ज्ञान आणि दर्शन उत्पन्न झाले – ‘माझी विमुक्ती अढळ आहे, हा माझा अंतिम जन्म आहे, आता पुनर्भव नाही.’” दुसरे. 3. පඨමඅස්සාදපරියෙසනසුත්තං ३. पहिले आस्वादपरियेसन सुत्त 15. ‘‘චක්ඛුස්සාහං, භික්ඛවෙ, අස්සාදපරියෙසනං අචරිං. යො චක්ඛුස්ස අස්සාදො තදජ්ඣගමං. යාවතා චක්ඛුස්ස අස්සාදො පඤ්ඤාය මෙ සො සුදිට්ඨො. චක්ඛුස්සාහං, භික්ඛවෙ, ආදීනවපරියෙසනං අචරිං. යො චක්ඛුස්ස ආදීනවො තදජ්ඣගමං. යාවතා චක්ඛුස්ස ආදීනවො පඤ්ඤාය මෙ සො සුදිට්ඨො. චක්ඛුස්සාහං, භික්ඛවෙ, නිස්සරණපරියෙසනං අචරිං. යං චක්ඛුස්ස නිස්සරණං තදජ්ඣගමං. යාවතා චක්ඛුස්ස නිස්සරණං, පඤ්ඤාය මෙ තං සුදිට්ඨං. සොතස්සාහං[Pg.243], භික්ඛවෙ… ඝානස්සාහං, භික්ඛවෙ… ජිව්හායාහං භික්ඛවෙ, අස්සාදපරියෙසනං අචරිං. යො ජිව්හාය අස්සාදො තදජ්ඣගමං. යාවතා ජිව්හාය අස්සාදො පඤ්ඤාය මෙ සො සුදිට්ඨො. ජිව්හායාහං, භික්ඛවෙ, ආදීනවපරියෙසනං අචරිං. යො ජිව්හාය ආදීනවො තදජ්ඣගමං. යාවතා ජිව්හාය ආදීනවො පඤ්ඤාය මෙ සො සුදිට්ඨො. ජිව්හායාහං, භික්ඛවෙ, නිස්සරණපරියෙසනං අචරිං. යං ජිව්හාය නිස්සරණං තදජ්ඣගමං. යාවතා ජිව්හාය නිස්සරණං, පඤ්ඤාය මෙ තං සුදිට්ඨං. මනස්සාහං, භික්ඛවෙ, අස්සාදපරියෙසනං අචරිං. යො මනස්ස අස්සාදො තදජ්ඣගමං. යාවතා මනස්ස අස්සාදො පඤ්ඤාය මෙ සො සුදිට්ඨො. මනස්සාහං, භික්ඛවෙ, ආදීනවපරියෙසනං අචරිං. යො මනස්ස ආදීනවො තදජ්ඣගමං. යාවතා මනස්ස ආදීනවො පඤ්ඤාය මෙ සො සුදිට්ඨො. මනස්සාහං, භික්ඛවෙ, නිස්සරණපරියෙසනං අචරිං. යං මනස්ස නිස්සරණං තදජ්ඣගමං. යාවතා මනස්ස නිස්සරණං, පඤ්ඤාය මෙ තං සුදිට්ඨං. १५. “भिक्खूहो, मी डोळ्याच्या (चक्षूच्या) आस्वादाचा शोध घेतला. डोळ्याचा जो आस्वाद आहे, तो मी प्राप्त केला. डोळ्याचा जितका आस्वाद आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी डोळ्याच्या आदीनवाचा (दोषाचा) शोध घेतला. डोळ्याचा जो आदीनव आहे, तो मी प्राप्त केला. डोळ्याचा जितका आदीनव आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी डोळ्याच्या निस्सरणाचा (मुक्तीचा) शोध घेतला. डोळ्याचे जे निस्सरण आहे, ते मी प्राप्त केले. डोळ्याचे जितके निस्सरण आहे, ते मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिले. भिक्खूहो, कानाच्या... नाकाच्या... जिभेच्या आस्वादाचा मी शोध घेतला. जिभेचा जो आस्वाद आहे, तो मी प्राप्त केला. जिभेचा जितका आस्वाद आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी जिभेच्या आदीनवाचा शोध घेतला. जिभेचा जो आदीनव आहे, तो मी प्राप्त केला. जिभेचा जितका आदीनव आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी जिभेच्या निस्सरणाचा शोध घेतला. जिभेचे जे निस्सरण आहे, ते मी प्राप्त केले. जिभेचे जितके निस्सरण आहे, ते मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिले. भिक्खूहो, मी मनाच्या आस्वादाचा शोध घेतला. मनाचा जो आस्वाद आहे, तो मी प्राप्त केला. मनाचा जितका आस्वाद आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी मनाच्या आदीनवाचा शोध घेतला. मनाचा जो आदीनव आहे, तो मी प्राप्त केला. मनाचा जितका आदीनव आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला. भिक्खूहो, मी मनाच्या निस्सरणाचा शोध घेतला. मनाचे जे निस्सरण आहे, ते मी प्राप्त केले. मनाचे जितके निस्सरण आहे, ते मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिले.” ‘‘යාවකීවඤ්චාහං, භික්ඛවෙ, ඉමෙසං ඡන්නං අජ්ඣත්තිකානං ආයතනානං අස්සාදඤ්ච අස්සාදතො, ආදීනවඤ්ච ආදීනවතො, නිස්සරණඤ්ච නිස්සරණතො යථාභූතං නාබ්භඤ්ඤාසිං…පෙ… පච්චඤ්ඤාසිං. ඤාණඤ්ච පන මෙ දස්සනං උදපාදි – ‘අකුප්පා මෙ විමුත්ති, අයමන්තිමා ජාති, නත්ථි දානි පුනබ්භවො’’’ති. තතියං. “भिक्खूहो, जोपर्यंत मी या सहा आध्यात्मिक आयतनांचे आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथार्थपणे जाणले नव्हते... पे... घोषित केले. माझ्यामध्ये हे ज्ञान आणि दर्शन उत्पन्न झाले – ‘माझी विमुक्ती अढळ आहे, हा माझा अंतिम जन्म आहे, आता पुनर्भव नाही.’” तिसरे. 4. දුතියඅස්සාදපරියෙසනසුත්තං ४. दुसरे आस्वादपरियेसन सुत्त 16. ‘‘රූපානාහං, භික්ඛවෙ, අස්සාදපරියෙසනං අචරිං. යො රූපානං අස්සාදො තදජ්ඣගමං. යාවතා රූපානං අස්සාදො පඤ්ඤාය මෙ සො සුදිට්ඨො. රූපානාහං, භික්ඛවෙ, ආදීනවපරියෙසනං අචරිං. යො රූපානං ආදීනවො තදජ්ඣගමං. යාවතා රූපානං ආදීනවො පඤ්ඤාය මෙ සො සුදිට්ඨො. රූපානාහං, භික්ඛවෙ, නිස්සරණපරියෙසනං අචරිං. යං රූපානං නිස්සරණං තදජ්ඣගමං. යාවතා රූපානං නිස්සරණං, පඤ්ඤාය මෙ තං සුදිට්ඨං. සද්දානාහං, භික්ඛවෙ… ගන්ධානාහං, භික්ඛවෙ… රසානාහං, භික්ඛවෙ… ඵොට්ඨබ්බානාහං, භික්ඛවෙ… ධම්මානාහං, භික්ඛවෙ, අස්සාදපරියෙසනං අචරිං. යො ධම්මානං අස්සාදො තදජ්ඣගමං. යාවතා ධම්මානං අස්සාදො පඤ්ඤාය මෙ සො සුදිට්ඨො. ධම්මානාහං, භික්ඛවෙ, ආදීනවපරියෙසනං අචරිං. යො ධම්මානං ආදීනවො තදජ්ඣගමං. යාවතා ධම්මානං ආදීනවො පඤ්ඤාය මෙ සො සුදිට්ඨො. ධම්මානාහං, භික්ඛවෙ, නිස්සරණපරියෙසනං අචරිං. යං ධම්මානං නිස්සරණං තදජ්ඣගමං. යාවතා ධම්මානං නිස්සරණං, පඤ්ඤාය [Pg.244] මෙ තං සුදිට්ඨං. १६. “भिक्षूंनो, मी रूपांच्या आस्वादाचा (सुखाचा) शोध घेत विहार केला. रूपांमध्ये जो काही आस्वाद आहे, तो मी प्राप्त केला. रूपांमध्ये जितका काही आस्वाद आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला आहे. भिक्षूंनो, मी रूपांमधील दोषांचा (धोक्याचा) शोध घेत विहार केला. रूपांमध्ये जो काही दोष आहे, तो मी प्राप्त केला. रूपांमध्ये जितका काही दोष आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला आहे. भिक्षूंनो, मी रूपांमधून सुटकेचा (मुक्तीचा) शोध घेत विहार केला. रूपांमधून जी काही सुटका आहे, ती मी प्राप्त केली. रूपांमधून जितकी काही सुटका आहे, ती मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिली आहे. शब्दांच्या... गंधांच्या... रसांच्या... स्पर्शांच्या... भिक्षूंनो, मी धर्मांच्या (मानसिक विषयांच्या) आस्वादाचा शोध घेत विहार केला. धर्मांमध्ये जो काही आस्वाद आहे, तो मी प्राप्त केला. धर्मांमध्ये जितका काही आस्वाद आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला आहे. भिक्षूंनो, मी धर्मांमधील दोषांचा शोध घेत विहार केला. धर्मांमध्ये जो काही दोष आहे, तो मी प्राप्त केला. धर्मांमध्ये जितका काही दोष आहे, तो मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिला आहे. भिक्षूंनो, मी धर्मांमधून सुटकेचा शोध घेत विहार केला. धर्मांमधून जी काही सुटका आहे, ती मी प्राप्त केली. धर्मांमधून जितकी काही सुटका आहे, ती मी प्रज्ञेने चांगल्या प्रकारे पाहिली आहे.” ‘‘යාවකීවඤ්චාහං, භික්ඛවෙ, ඉමෙසං ඡන්නං බාහිරානං ආයතනානං අස්සාදඤ්ච අස්සාදතො, ආදීනවඤ්ච ආදීනවතො, නිස්සරණඤ්ච නිස්සරණතො යථාභූතං නාබ්භඤ්ඤාසිං…පෙ… පච්චඤ්ඤාසිං. ඤාණඤ්ච පන මෙ දස්සනං උදපාදි – ‘අකුප්පා මෙ විමුත්ති, අයමන්තිමා ජාති, නත්ථි දානි පුනබ්භවො’’’ති. චතුත්ථං. “भिक्षूंनो, जोपर्यंत मी या सहा बाह्य आयतनांचा आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, दोष दोषाच्या रूपाने आणि सुटका सुटकेच्या रूपाने यथार्थपणे जाणली नव्हती... तोपर्यंत... पण जेव्हा मी ती यथार्थपणे जाणली, तेव्हा मी (संबोधी प्राप्त केल्याचे) घोषित केले. माझ्यामध्ये ज्ञान आणि दर्शन उत्पन्न झाले – ‘माझी विमुक्ती अढळ आहे, हा अंतिम जन्म आहे, आता पुनर्जन्म नाही.’” चौथे. 5. පඨමනොචෙඅස්සාදසුත්තං ५. प्रथम नोचेअस्साद सुत्त 17. ‘‘නො චෙදං, භික්ඛවෙ, චක්ඛුස්ස අස්සාදො අභවිස්ස, නයිදං සත්තා චක්ඛුස්මිං සාරජ්ජෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි චක්ඛුස්ස අස්සාදො තස්මා සත්තා චක්ඛුස්මිං සාරජ්ජන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, චක්ඛුස්ස ආදීනවො අභවිස්ස, නයිදං සත්තා චක්ඛුස්මිං නිබ්බින්දෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි චක්ඛුස්ස ආදීනවො තස්මා සත්තා චක්ඛුස්මිං නිබ්බින්දන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, චක්ඛුස්ස නිස්සරණං අභවිස්ස, නයිදං සත්තා චක්ඛුස්මා නිස්සරෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි චක්ඛුස්ස නිස්සරණං තස්මා සත්තා චක්ඛුස්මා නිස්සරන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, සොතස්ස අස්සාදො අභවිස්ස… නො චෙදං, භික්ඛවෙ, ඝානස්ස අස්සාදො අභවිස්ස… නො චෙදං, භික්ඛවෙ, ජිව්හාය අස්සාදො අභවිස්ස, නයිදං සත්තා ජිව්හාය සාරජ්ජෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි ජිව්හාය අස්සාදො, තස්මා සත්තා ජිව්හාය සාරජ්ජන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, ජිව්හාය ආදීනවො අභවිස්ස, නයිදං සත්තා ජිව්හාය නිබ්බින්දෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි ජිව්හාය ආදීනවො, තස්මා සත්තා ජිව්හාය නිබ්බින්දන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, ජිව්හාය නිස්සරණං අභවිස්ස, නයිදං සත්තා ජිව්හාය නිස්සරෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි ජිව්හාය නිස්සරණං, තස්මා සත්තා ජිව්හාය නිස්සරන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, කායස්ස අස්සාදො අභවිස්ස… නො චෙදං, භික්ඛවෙ, මනස්ස අස්සාදො අභවිස්ස, නයිදං සත්තා මනස්මිං සාරජ්ජෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි මනස්ස අස්සාදො, තස්මා සත්තා මනස්මිං සාරජ්ජන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, මනස්ස ආදීනවො අභවිස්ස, නයිදං සත්තා මනස්මිං නිබ්බින්දෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි මනස්ස ආදීනවො, තස්මා සත්තා මනස්මිං නිබ්බින්දන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, මනස්ස නිස්සරණං අභවිස්ස, නයිදං සත්තා මනස්මා නිස්සරෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි මනස්ස නිස්සරණං, තස්මා සත්තා මනස්මා නිස්සරන්ති. १७. “भिक्षूंनो, जर डोळ्यांमध्ये आस्वाद नसता, तर प्राणी डोळ्यांवर आसक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, डोळ्यांमध्ये आस्वाद आहे, म्हणूनच प्राणी डोळ्यांवर आसक्त होतात. जर डोळ्यांमध्ये दोष नसता, तर प्राणी डोळ्यांविषयी विरक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, डोळ्यांमध्ये दोष आहे, म्हणूनच प्राणी डोळ्यांविषयी विरक्त होतात. जर डोळ्यांमधून सुटका नसती, तर प्राणी डोळ्यांमधून मुक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, डोळ्यांमधून सुटका आहे, म्हणूनच प्राणी डोळ्यांमधून मुक्त होतात. भिक्षूंनो, जर कानांमध्ये आस्वाद नसता... जर नाकामध्ये आस्वाद नसता... जर जिभेमध्ये आस्वाद नसता, तर प्राणी जिभेवर आसक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, जिभेमध्ये आस्वाद आहे, म्हणूनच प्राणी जिभेवर आसक्त होतात. जर जिभेमध्ये दोष नसता, तर प्राणी जिभेविषयी विरक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, जिभेमध्ये दोष आहे, म्हणूनच प्राणी जिभेविषयी विरक्त होतात. जर जिभेतून सुटका नसती, तर प्राणी जिभेतून मुक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, जिभेतून सुटका आहे, म्हणूनच प्राणी जिभेतून मुक्त होतात. भिक्षूंनो, जर शरीरामध्ये आस्वाद नसता... जर मनामध्ये आस्वाद नसता, तर प्राणी मनावर आसक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, मनामध्ये आस्वाद आहे, म्हणूनच प्राणी मनावर आसक्त होतात. जर मनामध्ये दोष नसता, तर प्राणी मनाविषयी विरक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, मनामध्ये दोष आहे, म्हणूनच प्राणी मनाविषयी विरक्त होतात. जर मनामधून सुटका नसती, तर प्राणी मनामधून मुक्त झाले नसते. परंतु, भिक्षूंनो, मनामधून सुटका आहे, म्हणूनच प्राणी मनामधून मुक्त होतात.” ‘‘යාවකීවඤ්ච, භික්ඛවෙ, සත්තා ඉමෙසං ඡන්නං අජ්ඣත්තිකානං ආයතනානං [Pg.245] අස්සාදඤ්ච අස්සාදතො, ආදීනවඤ්ච ආදීනවතො, නිස්සරණඤ්ච නිස්සරණතො යථාභූතං නාබ්භඤ්ඤංසු, නෙව තාව, භික්ඛවෙ, සත්තා සදෙවකා ලොකා සමාරකා සබ්රහ්මකා සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය නිස්සටා විසඤ්ඤුත්තා විප්පමුත්තා විමරියාදීකතෙන චෙතසා විහරිංසු. යතො ච ඛො, භික්ඛවෙ, සත්තා ඉමෙසං ඡන්නං අජ්ඣත්තිකානං ආයතනානං අස්සාදඤ්ච අස්සාදතො, ආදීනවඤ්ච ආදීනවතො, නිස්සරණඤ්ච නිස්සරණතො යථාභූතං අබ්භඤ්ඤංසු, අථ, භික්ඛවෙ, සත්තා සදෙවකා ලොකා සමාරකා සබ්රහ්මකා සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය නිස්සටා විසඤ්ඤුත්තා විප්පමුත්තා විමරියාදීකතෙන චෙතසා විහරන්තී’’ති. පඤ්චමං. “भिक्षूंनो, जोपर्यंत प्राण्यांनी या सहा आध्यात्मिक आयतनांचा आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, दोष दोषाच्या रूपाने आणि सुटका सुटकेच्या रूपाने यथार्थपणे जाणली नव्हती, तोपर्यंत भिक्षूंनो, देव, मार आणि ब्रह्मासहित या जगातून, तसेच श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह या प्रजेमधून प्राणी बाहेर पडले नव्हते, अलिप्त झाले नव्हते, मुक्त झाले नव्हते आणि मर्यादामुक्त चित्ताने विहार करत नव्हते. परंतु भिक्षूंनो, जेव्हा प्राण्यांनी या सहा आध्यात्मिक आयतनांचा आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, दोष दोषाच्या रूपाने आणि सुटका सुटकेच्या रूपाने यथार्थपणे जाणली, तेव्हा भिक्षूंनो, देव, मार आणि ब्रह्मासहित या जगातून, तसेच श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह या प्रजेमधून प्राणी बाहेर पडले आहेत, अलिप्त झाले आहेत, मुक्त झाले आहेत आणि मर्यादामुक्त चित्ताने विहार करतात.” पाचवे. 6. දුතියනොචෙඅස්සාදසුත්තං ६. द्वितीय नोचेअस्साद सुत्त 18. ‘‘නො චෙදං, භික්ඛවෙ, රූපානං අස්සාදො අභවිස්ස, නයිදං සත්තා රූපෙසු සාරජ්ජෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි රූපානං අස්සාදො, තස්මා සත්තා රූපෙසු සාරජ්ජන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, රූපානං ආදීනවො අභවිස්ස, නයිදං සත්තා රූපෙසු නිබ්බින්දෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි රූපානං ආදීනවො, තස්මා සත්තා රූපෙසු නිබ්බින්දන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, රූපානං නිස්සරණං අභවිස්ස, නයිදං සත්තා රූපෙහි නිස්සරෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි රූපානං නිස්සරණං, තස්මා සත්තා රූපෙහි නිස්සරන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, සද්දානං… ගන්ධානං… රසානං… ඵොට්ඨබ්බානං… ධම්මානං අස්සාදො අභවිස්ස, නයිදං සත්තා ධම්මෙසු සාරජ්ජෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි ධම්මානං අස්සාදො, තස්මා සත්තා ධම්මෙසු සාරජ්ජන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, ධම්මානං ආදීනවො අභවිස්ස, නයිදං සත්තා ධම්මෙසු නිබ්බින්දෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි ධම්මානං ආදීනවො, තස්මා සත්තා ධම්මෙසු නිබ්බින්දන්ති. නො චෙදං, භික්ඛවෙ, ධම්මානං නිස්සරණං අභවිස්ස, නයිදං සත්තා ධම්මෙහි නිස්සරෙය්යුං. යස්මා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අත්ථි ධම්මානං නිස්සරණං, තස්මා සත්තා ධම්මෙහි නිස්සරන්ති. १८. “भिक्खूंनो, जर रूपांचा आस्वाद नसता, तर प्राणी रूपांमध्ये आसक्त झाले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, रूपांचा आस्वाद आहे, म्हणूनच प्राणी रूपांमध्ये आसक्त होतात. भिक्खूंनो, जर रूपांचा आदीनव नसता, तर प्राणी रूपांविषयी निर्वेद पावले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, रूपांचा आदीनव आहे, म्हणूनच प्राणी रूपांविषयी निर्वेद पावतात. भिक्खूंनो, जर रूपांचे निस्सरण नसती, तर प्राणी रूपांमधून मुक्त झाले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, रूपांचे निस्सरण आहे, म्हणूनच प्राणी रूपांमधून मुक्त होतात. भिक्खूंनो, जर शब्दांचा... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धम्मांचा आस्वाद नसता, तर प्राणी धम्मांमध्ये आसक्त झाले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, धम्मांचा आस्वाद आहे, म्हणूनच प्राणी धम्मांमध्ये आसक्त होतात. भिक्खूंनो, जर धम्मांचा आदीनव नसता, तर प्राणी धम्मांविषयी निर्वेद पावले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, धम्मांचा आदीनव आहे, म्हणूनच प्राणी धम्मांविषयी निर्वेद पावतात. भिक्खूंनो, जर धम्मांचे निस्सरण नसती, तर प्राणी धम्मांमधून मुक्त झाले नसते. परंतु, भिक्खूंनो, धम्मांचे निस्सरण आहे, म्हणूनच प्राणी धम्मांमधून मुक्त होतात.” ‘‘යාවකීවඤ්ච, භික්ඛවෙ, සත්තා ඉමෙසං ඡන්නං බාහිරානං ආයතනානං අස්සාදඤ්ච අස්සාදතො, ආදීනවඤ්ච ආදීනවතො, නිස්සරණඤ්ච නිස්සරණතො යථාභූතං නාබ්භඤ්ඤංසු, නෙව තාව, භික්ඛවෙ, සත්තා සදෙවකා ලොකා සමාරකා සබ්රහ්මකා සස්සමණබ්රාහ්මණියා [Pg.246] පජාය සදෙවමනුස්සාය නිස්සටා විසඤ්ඤුත්තා විප්පමුත්තා විමරියාදීකතෙන චෙතසා විහරිංසු. යතො ච ඛො, භික්ඛවෙ, සත්තා ඉමෙසං ඡන්නං බාහිරානං ආයතනානං අස්සාදඤ්ච අස්සාදතො, ආදීනවඤ්ච ආදීනවතො, නිස්සරණඤ්ච නිස්සරණතො යථාභූතං අබ්භඤ්ඤංසු, අථ, භික්ඛවෙ, සත්තා සදෙවකා ලොකා සමාරකා සබ්රහ්මකා සස්සමණබ්රාහ්මණියා පජාය සදෙවමනුස්සාය නිස්සටා විසඤ්ඤුත්තා විප්පමුත්තා විමරියාදීකතෙන චෙතසා විහරන්තී’’ති. ඡට්ඨං. “भिक्खूंनो, जोपर्यंत प्राण्यांनी या सहा बाह्य आयतनांचा आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथाभूत (आहे तसे) जाणले नव्हते, तोपर्यंत, भिक्खूंनो, देव, मार आणि ब्रह्मासह या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह या प्रजेमध्ये प्राणी मुक्त, विसंयुक्त, विप्रमुक्त आणि अमर्याद चित्ताने विहरत नव्हते. परंतु, भिक्खूंनो, जेव्हा प्राण्यांनी या सहा बाह्य आयतनांचा आस्वाद आस्वादाच्या रूपाने, आदीनव आदीनवाच्या रूपाने आणि निस्सरण निस्सरणाच्या रूपाने यथाभूत जाणले, तेव्हा, भिक्खूंनो, देव, मार आणि ब्रह्मासह या लोकात, श्रमण-ब्राह्मण, देव आणि मनुष्यांसह या प्रजेमध्ये प्राणी मुक्त, विसंयुक्त, विप्रमुक्त आणि अमर्याद चित्ताने विहरतात.” सहावे. 7. පඨමාභිනන්දසුත්තං ७. पठम अभिनंद सुत्त 19. ‘‘යො, භික්ඛවෙ, චක්ඛුං අභිනන්දති, දුක්ඛං සො අභිනන්දති. යො දුක්ඛං අභිනන්දති, අපරිමුත්තො සො දුක්ඛස්මාති වදාමි. යො සොතං…පෙ… යො ඝානං…පෙ… යො ජිව්හං අභිනන්දති, දුක්ඛං සො අභිනන්දති. යො දුක්ඛං අභිනන්දති, අපරිමුත්තො සො දුක්ඛස්මාති වදාමි. යො කායං…පෙ… යො මනං අභිනන්දති, දුක්ඛං සො අභිනන්දති. යො දුක්ඛං අභිනන්දති, අපරිමුත්තො සො දුක්ඛස්මා’’ති වදාමි. १९. “भिक्खूंनो, जो डोळ्याचे अभिनंदन करतो, तो दुःखाचे अभिनंदन करतो. जो दुःखाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखातून मुक्त झालेला नाही, असे मी म्हणतो. जो कानाचे... जो नाकाचे... जो जिभेचे अभिनंदन करतो, तो दुःखाचे अभिनंदन करतो. जो दुःखाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखातून मुक्त झालेला नाही, असे मी म्हणतो. जो शरीराचे... जो मनाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखाचे अभिनंदन करतो. जो दुःखाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखातून मुक्त झालेला नाही, असे मी म्हणतो.” ‘‘යො ච ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛුං නාභිනන්දති, දුක්ඛං සො නාභිනන්දති. යො දුක්ඛං නාභිනන්දති, පරිමුත්තො සො දුක්ඛස්මාති වදාමි. යො සොතං…පෙ… යො ඝානං…පෙ… යො ජිව්හං නාභිනන්දති, දුක්ඛං සො නාභිනන්දති. යො දුක්ඛං නාභිනන්දති, පරිමුත්තො සො දුක්ඛස්මාති වදාමි. යො කායං…පෙ… යො මනං නාභිනන්දති, දුක්ඛං සො නාභිනන්දති. යො දුක්ඛං නාභිනන්දති, පරිමුත්තො සො දුක්ඛස්මා’’ති වදාමි. සත්තමං. “परंतु भिक्खूंनो, जो डोळ्याचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही. जो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखातून मुक्त झाला आहे, असे मी म्हणतो. जो कानाचे... जो नाकाचे... जो जिभेचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही. जो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखातून मुक्त झाला आहे, असे मी म्हणतो. जो शरीराचे... जो मनाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही. जो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखातून मुक्त झाला आहे, असे मी म्हणतो.” सातवे. 8. දුතියාභිනන්දසුත්තං ८. दुतिय अभिनंद सुत्त 20. ‘‘යො, භික්ඛවෙ, රූපෙ අභිනන්දති, දුක්ඛං සො අභිනන්දති. යො දුක්ඛං අභිනන්දති, අපරිමුත්තො සො දුක්ඛස්මාති වදාමි. යො සද්දෙ…පෙ… ගන්ධෙ… රසෙ… ඵොට්ඨබ්බෙ… ධම්මෙ අභිනන්දති, දුක්ඛං සො අභිනන්දති. යො දුක්ඛං අභිනන්දති, අපරිමුත්තො සො දුක්ඛස්මා’’ති වදාමි. २०. “भिक्खूंनो, जो रूपांचे अभिनंदन करतो, तो दुःखाचे अभिनंदन करतो. जो दुःखाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखातून मुक्त झालेला नाही, असे मी म्हणतो. जो शब्दांचे... गंधांचे... रसांचे... स्पर्शांचे... धम्मांचे अभिनंदन करतो, तो दुःखाचे अभिनंदन करतो. जो दुःखाचे अभिनंदन करतो, तो दुःखातून मुक्त झालेला नाही, असे मी म्हणतो.” ‘‘යො ච ඛො, භික්ඛවෙ, රූපෙ නාභිනන්දති, දුක්ඛං සො නාභිනන්දති. යො දුක්ඛං නාභිනන්දති, පරිමුත්තො සො දුක්ඛස්මාති වදාමි. යො සද්දෙ…පෙ… ගන්ධෙ… රසෙ… ඵොට්ඨබ්බෙ… ධම්මෙ නාභිනන්දති, දුක්ඛං සො නාභිනන්දති. යො දුක්ඛං නාභිනන්දති, පරිමුත්තො සො දුක්ඛස්මා’’ති වදාමි. අට්ඨමං. “परंतु भिक्खूंनो, जो रूपांचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही. जो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखातून मुक्त झाला आहे, असे मी म्हणतो. जो शब्दांचे... गंधांचे... रसांचे... स्पर्शांचे... धम्मांचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही. जो दुःखाचे अभिनंदन करत नाही, तो दुःखातून मुक्त झाला आहे, असे मी म्हणतो.” आठवे. 9. පඨමදුක්ඛුප්පාදසුත්තං ९. पठम दुक्खुप्पाद सुत्त 21. ‘‘යො[Pg.247], භික්ඛවෙ, චක්ඛුස්ස උප්පාදො ඨිති අභිනිබ්බත්ති පාතුභාවො, දුක්ඛස්සෙසො උප්පාදො, රොගානං ඨිති, ජරාමරණස්ස පාතුභාවො. යො සොතස්ස…පෙ… යො ඝානස්ස… යො ජිව්හාය… යො කායස්ස… යො මනස්ස උප්පාදො ඨිති අභිනිබ්බත්ති පාතුභාවො, දුක්ඛස්සෙසො උප්පාදො, රොගානං ඨිති, ජරාමරණස්ස පාතුභාවො. २१. “भिक्खूंनो, डोळ्याचा जो उत्पाद, स्थिती, अभिनिर्वृत्ती आणि प्रादुर्भाव आहे, तो दुःखाचा उत्पाद आहे, रोगांची स्थिती आहे आणि जरामरणाचा प्रादुर्भाव आहे. कानाचा... नाकाचा... जिभेचा... शरीराचा... मनाचा जो उत्पाद, स्थिती, अभिनिर्वृत्ती आणि प्रादुर्भाव आहे, तो दुःखाचा उत्पाद आहे, रोगांची स्थिती आहे आणि जरामरणाचा प्रादुर्भाव आहे.” ‘‘යො ච ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛුස්ස නිරොධො වූපසමො අත්ථඞ්ගමො, දුක්ඛස්සෙසො නිරොධො, රොගානං වූපසමො, ජරාමරණස්ස අත්ථඞ්ගමො. යො සොතස්ස… යො ඝානස්ස… යො ජිව්හාය… යො කායස්ස… යො මනස්ස නිරොධො වූපසමො අත්ථඞ්ගමො, දුක්ඛස්සෙසො නිරොධො, රොගානං වූපසමො, ජරාමරණස්ස අත්ථඞ්ගමො’’ති. නවමං. “परंतु भिक्खूंनो, डोळ्याचा जो निरोध, उपशम आणि अस्त आहे, तो दुःखाचा निरोध आहे, रोगांचा उपशम आहे आणि जरामरणाचा अस्त आहे. कानाचा... नाकाचा... जिभेचा... शरीराचा... मनाचा जो निरोध, उपशम आणि अस्त आहे, तो दुःखाचा निरोध आहे, रोगांचा उपशम आहे आणि जरामरणाचा अस्त आहे.” नववे. 10. දුතියදුක්ඛුප්පාදසුත්තං १०. दुतिय दुक्खुप्पाद सुत्त 22. ‘‘යො, භික්ඛවෙ, රූපානං උප්පාදො ඨිති අභිනිබ්බත්ති පාතුභාවො, දුක්ඛස්සෙසො උප්පාදො, රොගානං ඨිති, ජරාමරණස්ස පාතුභාවො. යො සද්දානං…පෙ… යො ගන්ධානං… යො රසානං… යො ඵොට්ඨබ්බානං… යො ධම්මානං උප්පාදො ඨිති අභිනිබ්බත්ති පාතුභාවො, දුක්ඛස්සෙසො උප්පාදො, රොගානං ඨිති, ජරාමරණස්ස පාතුභාවො. २२. “भिक्खूंनो, रूपांचा जो उत्पाद, स्थिती, अभिनिर्वृत्ती आणि प्रादुर्भाव आहे, तो दुःखाचा उत्पाद आहे, रोगांची स्थिती आहे आणि जरामरणाचा प्रादुर्भाव आहे. शब्दांचा... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धम्मांचा जो उत्पाद, स्थिती, अभिनिर्वृत्ती आणि प्रादुर्भाव आहे, तो दुःखाचा उत्पाद आहे, रोगांची स्थिती आहे आणि जरामरणाचा प्रादुर्भाव आहे.” ‘‘යො ච ඛො, භික්ඛවෙ, රූපානං නිරොධො වූපසමො අත්ථඞ්ගමො, දුක්ඛස්සෙසො නිරොධො, රොගානං වූපසමො, ජරාමරණස්ස අත්ථඞ්ගමො. යො සද්දානං…පෙ… යො ගන්ධානං… යො රසානං… යො ඵොට්ඨබ්බානං… යො ධම්මානං නිරොධො වූපසමො අත්ථඞ්ගමො, දුක්ඛස්සෙසො නිරොධො, රොගානං වූපසමො, ජරාමරණස්ස අත්ථඞ්ගමො’’ති. දසමං. “परंतु भिक्खूंनो, रूपांचा जो निरोध, उपशम आणि अस्त आहे, तो दुःखाचा निरोध आहे, रोगांचा उपशम आहे आणि जरामरणाचा अस्त आहे. शब्दांचा... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धम्मांचा जो निरोध, उपशम आणि अस्त आहे, तो दुःखाचा निरोध आहे, रोगांचा उपशम आहे आणि जरामरणाचा अस्त आहे.” दहावे. යමකවග්ගො දුතියො. दुसरा यमकवग्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची उद्दान (अनुक्रमणिका) - සම්බොධෙන දුවෙ වුත්තා, අස්සාදෙන අපරෙ දුවෙ; නො චෙතෙන දුවෙ වුත්තා, අභිනන්දෙන අපරෙ දුවෙ; උප්පාදෙන දුවෙ වුත්තා, වග්ගො තෙන පවුච්චතීති. संबोधीविषयी दोन सुत्ते सांगितले आहेत, आस्वादाविषयी इतर दोन; 'नो चेत' (जर नसता) याविषयी दोन सांगितले आहेत, अभिनंदनाविषयी इतर दोन; उत्पादाविषयी दोन सांगितले आहेत, म्हणूनच याला वग्ग (वर्ग) म्हटले जाते. 3. සබ්බවග්ගො ३. सब्बवग्ग 1. සබ්බසුත්තං १. सब्बसुत्त 23. සාවත්ථිනිදානං[Pg.248]. ‘‘සබ්බං වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, සබ්බං? චක්ඛුඤ්චෙව රූපා ච, සොතඤ්ච සද්දා ච, ඝානඤ්ච ගන්ධා ච, ජිව්හා ච රසා ච, කායො ච ඵොට්ඨබ්බා ච, මනො ච ධම්මා ච – ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, සබ්බං. යො, භික්ඛවෙ, එවං වදෙය්ය – ‘අහමෙතං සබ්බං පච්චක්ඛාය අඤ්ඤං සබ්බං පඤ්ඤාපෙස්සාමී’ති, තස්ස වාචාවත්ථුකමෙවස්ස ; පුට්ඨො ච න සම්පායෙය්ය, උත්තරිඤ්ච විඝාතං ආපජ්ජෙය්ය. තං කිස්ස හෙතු? යථා තං, භික්ඛවෙ, අවිසයස්මි’’න්ති. පඨමං. २३. श्रावस्ती येथील प्रसंग. “भिक्खून्नों, मी तुम्हांला 'सर्व' उपदेशीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खून्नों, 'सर्व' म्हणजे काय? डोळा आणि रूपे, कान आणि शब्द, नाक आणि गंध, जीभ आणि रस, शरीर आणि स्पर्श, मन आणि धम्म (मानसिक विषय) – भिक्खून्नों, यालाच 'सर्व' असे म्हटले जाते. भिक्खून्नों, जर कोणी असे म्हणेल की—'मी या सर्वाचा त्याग करून दुसऱ्या एखाद्या 'सर्वा'ची प्रज्ञापना (घोषणा) करीन', तर त्याचे ते बोलणे केवळ पोकळ बडबड ठरेल; आणि विचारले असता तो त्याचे स्पष्टीकरण देऊ शकणार नाही, उलट अधिकच संभ्रमात पडेल. असे का? कारण, भिक्खून्नों, ते त्याच्या कक्षेबाहेरचे आहे.” पहिले सुत्त. 2. පහානසුත්තං २. प्रहाण सुत्त 24. ‘‘සබ්බප්පහානාය වො, භික්ඛවෙ, ධම්මං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, සබ්බප්පහානාය ධම්මො? චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, පහාතබ්බං, රූපා පහාතබ්බා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං පහාතබ්බං, චක්ඛුසම්ඵස්සො පහාතබ්බො, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි පහාතබ්බං…පෙ… යම්පිදං සොතසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි පහාතබ්බං… යම්පිදං ඝානසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි පහාතබ්බං. ජිව්හා පහාතබ්බා, රසා පහාතබ්බා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං පහාතබ්බං, ජිව්හාසම්ඵස්සො පහාතබ්බො, යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි පහාතබ්බං. කායො පහාතබ්බො… මනො පහාතබ්බො, ධම්මා පහාතබ්බා, මනොවිඤ්ඤාණං පහාතබ්බං, මනොසම්ඵස්සො පහාතබ්බො, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි පහාතබ්බං. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, සබ්බප්පහානාය ධම්මො’’ති. දුතියං. २४. “भिक्खून्नों, सर्वाच्या प्रहाणासाठी (त्यागासाठी) मी तुम्हांला धम्माचा उपदेश करीन. तो ऐका. आणि भिक्खून्नों, सर्वाच्या प्रहाणासाठी असलेला धम्म कोणता? भिक्खून्नों, डोळ्याचा त्याग केला पाहिजे, रूपांचा त्याग केला पाहिजे, चक्षु-विज्ञानाचा त्याग केला पाहिजे, चक्षु-स्पर्शाचा त्याग केला पाहिजे; आणि चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिचाही त्याग केला पाहिजे...पे... श्रोत-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिचाही त्याग केला पाहिजे... घ्राण-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिचाही त्याग केला पाहिजे. जिभेचा त्याग केला पाहिजे, रसांचा त्याग केला पाहिजे, जिव्हा-विज्ञानाचा त्याग केला पाहिजे, जिव्हा-स्पर्शाचा त्याग केला पाहिजे; आणि जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिचाही त्याग केला पाहिजे. शरीराचा त्याग केला पाहिजे... मनाचा त्याग केला पाहिजे, धम्मांचा त्याग केला पाहिजे, मनो-विज्ञानाचा त्याग केला पाहिजे, मनो-स्पर्शाचा त्याग केला पाहिजे; आणि मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिचाही त्याग केला पाहिजे. भिक्खून्नों, हाच सर्वाच्या प्रहाणासाठी असलेला धम्म आहे.” दुसरे सुत्त. 3. අභිඤ්ඤාපරිඤ්ඤාපහානසුත්තං ३. अभिज्ञा-परिज्ञा-प्रहाण सुत्त 25. ‘‘සබ්බං අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහානාය වො, භික්ඛවෙ, ධම්මං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, සබ්බං අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහානාය ධම්මො? චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බං, රූපා අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බා[Pg.249], චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බං, චක්ඛුසම්ඵස්සො අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බො, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බං…පෙ… ජිව්හා අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බා, රසා අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බං, ජිව්හාසම්ඵස්සො අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බො, යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බං. කායො අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බො… මනො අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බො, ධම්මා අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බා, මනොවිඤ්ඤාණං අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බං, මනොසම්ඵස්සො අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බො, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහාතබ්බං. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, සබ්බං අභිඤ්ඤා පරිඤ්ඤා පහානාය ධම්මො’’ති. තතියං. २५. “भिक्खून्नों, सर्वांना विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून आणि त्यांचा त्याग करण्यासाठी मी तुम्हांला धम्माचा उपदेश करीन. तो ऐका. आणि भिक्खून्नों, सर्वांना विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून आणि त्यांचा त्याग करण्यासाठी असलेला धम्म कोणता? भिक्खून्नों, डोळा विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागला पाहिजे; रूपे विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागली पाहिजेत; चक्षु-विज्ञान विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागले पाहिजे; चक्षु-स्पर्श विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागला पाहिजे; आणि चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तीही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागली पाहिजे...पे... जिभेचा विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्याग केला पाहिजे; रसांचा विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्याग केला पाहिजे; जिव्हा-विज्ञान विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागले पाहिजे; जिव्हा-स्पर्श विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागला पाहिजे; आणि जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तीही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागली पाहिजे. शरीराचा विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्याग केला पाहिजे... मन विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागले पाहिजे; धम्म विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागले पाहिजेत; मनो-विज्ञान विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागले पाहिजे; मनो-स्पर्श विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागला पाहिजे; आणि मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तीही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून त्यागली पाहिजे. भिक्खून्नों, हाच सर्वांना विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून आणि त्यांचा त्याग करण्यासाठी असलेला धम्म आहे.” तिसरे सुत्त. 4. පඨමඅපරිජානනසුත්තං ४. प्रथम अपरिज्ञान सुत्त 26. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය? චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. රූපෙ අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. චක්ඛුසම්ඵස්සං අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය…පෙ… ජිව්හං අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. රසෙ…පෙ… ජිව්හාවිඤ්ඤාණං…පෙ… ජිව්හාසම්ඵස්සං…පෙ… යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. කායං…පෙ… මනං අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. ධම්මෙ…පෙ… මනොවිඤ්ඤාණං…පෙ… මනොසම්ඵස්සං…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං [Pg.250] අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. ඉදං ඛො, භික්ඛවෙ, සබ්බං අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. २६. “भिक्खून्नों, सर्वांना विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यांच्याविषयी वैराग्य न बाळगता आणि त्यांचा त्याग न करता, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. आणि भिक्खून्नों, असे कोणते 'सर्व' आहे, ज्याला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो? भिक्खून्नों, डोळ्याला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. रूपांना विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्यांचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. चक्षु-विज्ञानाला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. चक्षु-स्पर्शाला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. आणि चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि तिचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो...पे... जिभेला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि तिचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. रसांना...पे... जिव्हा-विज्ञानाला... जिव्हा-स्पर्शाला... आणि जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि तिचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. शरीराला... मनाला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-स्पर्शाला... आणि मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि तिचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो. भिक्खून्नों, हेच ते 'सर्व' आहे, ज्याला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, वैराग्य न बाळगता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ असतो.” ‘‘සබ්බඤ්ච ඛො, භික්ඛවෙ, අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, සබ්බං අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය? චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. රූපෙ අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. චක්ඛුසම්ඵස්සං අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය…පෙ… ජිව්හං අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. රසෙ…පෙ… ජිව්හාවිඤ්ඤාණං…පෙ… ජිව්හාසම්ඵස්සං…පෙ… යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. කායං…පෙ… මනං අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. ධම්මෙ…පෙ… මනොවිඤ්ඤාණං…පෙ… මනොසම්ඵස්සං…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. ඉදං ඛො, භික්ඛවෙ, සබ්බං අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයායා’’ති. චතුත්ථං. "भिक्खूहो, सर्व गोष्टींना विशेष ज्ञानाने जाणून (अभिज्ञान), पूर्णपणे समजून (परिज्ञान), त्यावरील आसक्ती दूर करून (विराग) आणि त्यांचा त्याग करूनच मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. आणि भिक्खूहो, ते सर्व काय आहे, ज्याला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो? भिक्खूहो, डोळ्याला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. रूपांना... चक्खू-विज्ञानाला... चक्खू-संस्पर्शाला... आणि चक्खू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो...पे... जिभेला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि तिचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. रसांना... जिव्हा-विज्ञानाला... जिव्हा-संस्पर्शाला... आणि जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. शरीराला (कायेला)... मनाला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. धर्मांना (मानसिक विषयांना)... मनो-विज्ञानाला... मनो-संस्पर्शाला... आणि मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. भिक्खूहो, हेच ते सर्व आहे ज्याला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो." चौथे. 5. දුතියඅපරිජානනසුත්තං ५. "दुसरे अपरिज्ञान सुत्त" 27. ‘‘සබ්බං[Pg.251], භික්ඛවෙ, අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, සබ්බං අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය? යඤ්ච, භික්ඛවෙ, චක්ඛු, යෙ ච රූපා, යඤ්ච චක්ඛුවිඤ්ඤාණං, යෙ ච චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා…පෙ… යා ච ජිව්හා, යෙ ච රසා, යඤ්ච ජිව්හාවිඤ්ඤාණං, යෙ ච ජිව්හාවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා; යො ච කායො, යෙ ච ඵොට්ඨබ්බා, යඤ්ච කායවිඤ්ඤාණං, යෙ ච කායවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා; යො ච මනො, යෙ ච ධම්මා, යඤ්ච මනොවිඤ්ඤාණං, යෙ ච මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා – ඉදං ඛො, භික්ඛවෙ, සබ්බං අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. २७. "भिक्खूहो, सर्व गोष्टींना विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यावरील आसक्ती दूर न करता आणि त्यांचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास अपात्र ठरतो. आणि भिक्खूहो, ते सर्व काय आहे, ज्याला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यावरील आसक्ती दूर न करता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास अपात्र ठरतो? भिक्खूहो, जो डोळा, जे रूप, जे चक्खू-विज्ञान आणि चक्खू-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत...पे... जी जीभ, जे रस, जे जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत; जे शरीर, जे स्पर्श, जे काय-विज्ञान आणि काय-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत; जे मन, जे धर्म, जे मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत – भिक्खूहो, हेच ते सर्व आहे ज्याला विशेष ज्ञानाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यावरील आसक्ती दूर न करता आणि त्याचा त्याग न करता मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास अपात्र ठरतो." ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, සබ්බං අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය? යඤ්ච, භික්ඛවෙ, චක්ඛු, යෙ ච රූපා, යඤ්ච චක්ඛුවිඤ්ඤාණං, යෙ ච චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා…පෙ… යා ච ජිව්හා, යෙ ච රසා, යඤ්ච ජිව්හාවිඤ්ඤාණං, යෙ ච ජිව්හාවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා; යො ච කායො, යෙ ච ඵොට්ඨබ්බා, යඤ්ච කායවිඤ්ඤාණං, යෙ ච කායවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා; යො ච මනො, යෙ ච ධම්මා, යඤ්ච මනොවිඤ්ඤාණං, යෙ ච මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා – ඉදං ඛො, භික්ඛවෙ, සබ්බං අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයායා’’ති. පඤ්චමං. "भिक्खूहो, सर्व गोष्टींना विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्यांचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो. आणि भिक्खूहो, ते सर्व काय आहे, ज्याला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो? भिक्खूहो, जो डोळा, जे रूप, जे चक्खू-विज्ञान आणि चक्खू-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत...पे... जी जीभ, जे रस, जे जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत; जे शरीर, जे स्पर्श, जे काय-विज्ञान आणि काय-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत; जे मन, जे धर्म, जे मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे जे धर्म आहेत – भिक्खूहो, हेच ते सर्व आहे ज्याला विशेष ज्ञानाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यावरील आसक्ती दूर करून आणि त्याचा त्याग करून मनुष्य दुःखाचा नाश करण्यास पात्र ठरतो." पाचवे. 6. ආදිත්තසුත්තං ६. "आदित्तसुत्त" 28. එකං සමයං භගවා ගයායං විහරති ගයාසීසෙ සද්ධිං භික්ඛුසහස්සෙන. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, ආදිත්තං. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, සබ්බං ආදිත්තං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, ආදිත්තං, රූපා ආදිත්තා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං ආදිත්තං, චක්ඛුසම්ඵස්සො ආදිත්තො. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි ආදිත්තං. කෙන ආදිත්තං? ‘රාගග්ගිනා, දොසග්ගිනා, මොහග්ගිනා ආදිත්තං, ජාතියා ජරාය මරණෙන සොකෙහි පරිදෙවෙහි දුක්ඛෙහි දොමනස්සෙහි උපායාසෙහි ආදිත්ත’න්ති වදාමි…පෙ… ජිව්හා ආදිත්තා, රසා ආදිත්තා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං ආදිත්තං, ජිව්හාසම්ඵස්සො ආදිත්තො. යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි ආදිත්තං. කෙන ආදිත්තං? ‘රාගග්ගිනා, දොසග්ගිනා, මොහග්ගිනා ආදිත්තං, ජාතියා ජරාය මරණෙන සොකෙහි පරිදෙවෙහි දුක්ඛෙහි දොමනස්සෙහි උපායාසෙහි ආදිත්ත’න්ති වදාමි…පෙ… මනො ආදිත්තො, ධම්මා ආදිත්තා, මනොවිඤ්ඤාණං ආදිත්තං, මනොසම්ඵස්සො ආදිත්තො. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි ආදිත්තං. කෙන ආදිත්තං? ‘රාගග්ගිනා, දොසග්ගිනා, මොහග්ගිනා ආදිත්තං, ජාතියා ජරාය මරණෙන සොකෙහි පරිදෙවෙහි දුක්ඛෙහි දොමනස්සෙහි උපායාසෙහි ආදිත්ත’න්ති වදාමි. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති [Pg.252] වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති …පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. ඉදමවොච භගවා. අත්තමනා තෙ භික්ඛූ භගවතො භාසිතං අභිනන්දුං. ඉමස්මිඤ්ච පන වෙය්යාකරණස්මිං භඤ්ඤමානෙ තස්ස භික්ඛුසහස්සස්ස අනුපාදාය ආසවෙහි චිත්තානි විමුච්චිංසූති. ඡට්ඨං. २८. "एकदा भगवान गया येथे गयासीस डोंगरावर एक हजार भिक्खूंच्या संघासह विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूहो, सर्व काही जळत आहे. आणि भिक्खूहो, ते सर्व काय आहे जे जळत आहे? भिक्खूहो, डोळा जळत आहे, रूपे जळत आहेत, चक्खू-विज्ञान जळत आहे, चक्खू-संस्पर्श जळत आहे. आणि चक्खू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, तेही जळत आहे. ते कशाने जळत आहे? मी सांगतो की, ते ‘राग-अग्नीने, द्वेष-अग्नीने, मोह-अग्नीने जळत आहे; जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्स आणि उपायासाने जळत आहे’...पे... जीभ जळत आहे, रस जळत आहेत, जिव्हा-विज्ञान जळत आहे, जिव्हा-संस्पर्श जळत आहे. आणि जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, तेही जळत आहे. ते कशाने जळत आहे? मी सांगतो की, ते ‘राग-अग्नीने, द्वेष-अग्नीने, मोह-अग्नीने जळत आहे; जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्स आणि उपायासाने जळत आहे’...पे... मन जळत आहे, धर्म जळत आहेत, मनो-विज्ञान जळत आहे, मनो-संस्पर्श जळत आहे. आणि मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, तेही जळत आहे. ते कशाने जळत आहे? मी सांगतो की, ते ‘राग-अग्नीने, द्वेष-अग्नीने, मोह-अग्नीने जळत आहे; जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्स आणि उपायासाने जळत आहे’. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयीही निर्वेद पावतो, रूपांविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खू-विज्ञानाविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खू-संस्पर्शाविषयीही निर्वेद पावतो, आणि चक्खू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही निर्वेद पावतो...पे... आणि मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्त झाल्याने तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर ‘मी मुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान त्याला होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे तो जाणतो.” भगवंत असे म्हणाले. संतुष्ट होऊन त्या भिक्खूंनी भगवंतांच्या भाषणाचे मनापासून अभिनंदन केले. आणि हे प्रवचन दिले जात असतानाच, त्या एक हजार भिक्खूंची चित्ते उपादानरहित होऊन आसवांपासून मुक्त झाली." सहावे. 7. අද්ධභූතසුත්තං ७. "अद्धभूतसुत्त" 29. එවං මෙ සුතං – එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, අද්ධභූතං. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, සබ්බං අද්ධභූතං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අද්ධභූතං, රූපා අද්ධභූතා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අද්ධභූතං, චක්ඛුසම්ඵස්සො අද්ධභූතො, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අද්ධභූතං. කෙන අද්ධභූතං? ‘ජාතියා ජරාය මරණෙන සොකෙහි පරිදෙවෙහි දුක්ඛෙහි දොමනස්සෙහි උපායාසෙහි අද්ධභූත’න්ති වදාමි…පෙ… ජිව්හා අද්ධභූතා, රසා අද්ධභූතා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං අද්ධභූතං, ජිව්හාසම්ඵස්සො අද්ධභූතො, යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අද්ධභූතං. කෙන අද්ධභූතං? ‘ජාතියා ජරාය මරණෙන සොකෙහි පරිදෙවෙහි දුක්ඛෙහි දොමනස්සෙහි උපායාසෙහි අද්ධභූත’න්ති වදාමි. කායො අද්ධභූතො…පෙ… මනො අද්ධභූතො, ධම්මා අද්ධභූතා, මනොවිඤ්ඤාණං අද්ධභූතං, මනොසම්ඵස්සො අද්ධභූතො, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අද්ධභූතං. කෙන අද්ධභූතං? ‘ජාතියා ජරාය මරණෙන සොකෙහි පරිදෙවෙහි දුක්ඛෙහි දොමනස්සෙහි උපායාසෙහි අද්ධභූත’න්ති වදාමි. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති[Pg.253], විරාගා විමුච්චති, විමුත්තස්මිං ‘විමුත්ත’මිති ඤාණං හොති, ‘ඛීණා ජාති වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. සත්තමං. २९. असे मी ऐकले आहे - एका वेळी भगवान राजगृहात वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले - "भिक्खूंनो, सर्व काही आक्रांत आहे. आणि भिक्खूंनो, सर्व काही कशाने आक्रांत आहे? भिक्खूंनो, चक्षु आक्रांत आहे, रूप आक्रांत आहेत, चक्षु-विज्ञाण आक्रांत आहे, चक्षु-संस्पर्श आक्रांत आहे, आणि चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, ती देखील आक्रांत आहे. ती कशाने आक्रांत आहे? 'ती जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास यांनी आक्रांत आहे,' असे मी म्हणतो... पे... जिव्हा आक्रांत आहे, रस आक्रांत आहेत, जिव्हा-विज्ञाण आक्रांत आहे, जिव्हा-संस्पर्श आक्रांत आहे, आणि जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, ती देखील आक्रांत आहे. ती कशाने आक्रांत आहे? 'ती जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायासाने आक्रांत आहे,' असे मी म्हणतो. काय आक्रांत आहे... पे... मन आक्रांत आहे, धम्म आक्रांत आहेत, मनो-विज्ञाण आक्रांत आहे, मनो-संस्पर्श आक्रांत आहे, आणि मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, ती देखील आक्रांत आहे. ती कशाने आक्रांत आहे? 'ती जन्म, जरा, मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायासाने आक्रांत आहे,' असे मी म्हणतो. भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी निर्वेद पावतो, रूपांविषयी निर्वेद पावतो, चक्षु-विज्ञाणाविषयी निर्वेद पावतो, चक्षु-संस्पर्शाविषयी निर्वेद पावतो... पे... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिच्याविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्त झाल्यामुळे तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर 'मी मुक्त झालो आहे' असे ज्ञान होते. 'जन्म क्षीण झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,' असे तो जाणतो." सातवे सूत्र. 8. සමුග්ඝාතසාරුප්පසුත්තං ८. समुग्घातसारुप्प सुत्त 30. ‘‘සබ්බමඤ්ඤිතසමුග්ඝාතසාරුප්පං වො, භික්ඛවෙ, පටිපදං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ, සාධුකං මනසි කරොථ; භාසිස්සාමීති. කතමා ච සා, භික්ඛවෙ, සබ්බමඤ්ඤිතසමුග්ඝාතසාරුප්පා පටිපදා? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුං න මඤ්ඤති, චක්ඛුස්මිං න මඤ්ඤති, චක්ඛුතො න මඤ්ඤති, චක්ඛුං මෙති න මඤ්ඤති. රූපෙ න මඤ්ඤති, රූපෙසු න මඤ්ඤති, රූපතො න මඤ්ඤති, රූපා මෙති න මඤ්ඤති. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං න මඤ්ඤති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණස්මිං න මඤ්ඤති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණතො න මඤ්ඤති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං මෙති න මඤ්ඤති. චක්ඛුසම්ඵස්සං න මඤ්ඤති, චක්ඛුසම්ඵස්සස්මිං න මඤ්ඤති, චක්ඛුසම්ඵස්සතො න මඤ්ඤති, චක්ඛුසම්ඵස්සො මෙති න මඤ්ඤති. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤති, තස්මිම්පි න මඤ්ඤති, තතොපි න මඤ්ඤති, තං මෙති න මඤ්ඤති…පෙ… ජිව්හං න මඤ්ඤති, ජිව්හාය න මඤ්ඤති, ජිව්හාතො න මඤ්ඤති, ජිව්හා මෙති න මඤ්ඤති. රසෙ න මඤ්ඤති, රසෙසු න මඤ්ඤති, රසතො න මඤ්ඤති, රසා මෙති න මඤ්ඤති. ජිව්හාවිඤ්ඤාණං න මඤ්ඤති, ජිව්හාවිඤ්ඤාණස්මිං න මඤ්ඤති, ජිව්හාවිඤ්ඤාණතො න මඤ්ඤති, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං මෙති න මඤ්ඤති. ජිව්හාසම්ඵස්සං න මඤ්ඤති, ජිව්හාසම්ඵස්සස්මිං න මඤ්ඤති, ජිව්හාසම්ඵස්සතො න මඤ්ඤති, ජිව්හාසම්ඵස්සො මෙති න මඤ්ඤති. යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤති, තස්මිම්පි න මඤ්ඤති, තතොපි න මඤ්ඤති, තං මෙති න මඤ්ඤති…පෙ… මනං න මඤ්ඤති, මනස්මිං න මඤ්ඤති, මනතො න මඤ්ඤති, මනො මෙති න මඤ්ඤති. ධම්මෙ න මඤ්ඤති, ධම්මෙසු න මඤ්ඤති, ධම්මතො න මඤ්ඤති, ධම්මා මෙති න මඤ්ඤති. මනොවිඤ්ඤාණං න මඤ්ඤති, මනොවිඤ්ඤාණස්මිං න මඤ්ඤති, මනොවිඤ්ඤාණතො න මඤ්ඤති, මනොවිඤ්ඤාණං මෙති න මඤ්ඤති. මනොසම්ඵස්සං න මඤ්ඤති, මනොසම්ඵස්සස්මිං න මඤ්ඤති, මනොසම්ඵස්සතො න මඤ්ඤති, මනොසම්ඵස්සො මෙති න මඤ්ඤති. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤති, තස්මිම්පි න මඤ්ඤති, තතොපි න මඤ්ඤති, තං මෙති න මඤ්ඤති. සබ්බං න මඤ්ඤති, සබ්බස්මිං න මඤ්ඤති, සබ්බතො න මඤ්ඤති, සබ්බං මෙති න මඤ්ඤති. සො එවං අමඤ්ඤමානො [Pg.254] න ච කිඤ්චි ලොකෙ උපාදියති. අනුපාදියං න පරිතස්සති. අපරිතස්සං පච්චත්තඤ්ඤෙව පරිනිබ්බායති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාති. අයං ඛො සා, භික්ඛවෙ, සබ්බමඤ්ඤිතසමුග්ඝාතසාරුප්පා පටිපදා’’ති. අට්ඨමං. ३०. "भिक्खूंनो, मी तुम्हाला सर्व कल्पनांचे समूळ उच्चाटन करण्यास अनुकूल असणारी प्रतिपदा सांगेन. ती लक्षपूर्वक ऐका, नीट मनात ठेवा; मी बोलेन." "आणि भिक्खूंनो, सर्व कल्पनांचे समूळ उच्चाटन करण्यास अनुकूल असणारी ती प्रतिपदा कोणती? भिक्खूंनो, या शासनात भिक्खू चक्षूला कल्पित नाही, चक्षूमध्ये कल्पना करत नाही, चक्षूपासून कल्पना करत नाही, 'चक्षू माझा आहे' अशी कल्पना करत नाही. रूपांना कल्पित नाही, रूपांमध्ये कल्पना करत नाही, रूपांपासून कल्पना करत नाही, 'रूपे माझी आहेत' अशी कल्पना करत नाही. चक्षु-विज्ञाणाला कल्पित नाही, चक्षु-विज्ञाणामध्ये कल्पना करत नाही, चक्षु-विज्ञाणापासून कल्पना करत नाही, 'चक्षु-विज्ञाण माझे आहे' अशी कल्पना करत नाही. चक्षु-संस्पर्शाला कल्पित नाही, चक्षु-संस्पर्शामध्ये कल्पना करत नाही, चक्षु-संस्पर्शापासून कल्पना करत नाही, 'चक्षु-संस्पर्श माझा आहे' अशी कल्पना करत नाही. आणि चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही तो कल्पित नाही, तिच्यामध्ये कल्पना करत नाही, तिच्यापासून कल्पना करत नाही, 'ती माझी आहे' अशी कल्पना करत नाही... पे... जिव्हेला कल्पित नाही, जिव्हेमध्ये कल्पना करत नाही, जिव्हेपासून कल्पना करत नाही, 'जिव्हा माझी आहे' अशी कल्पना करत नाही. रसांना कल्पित नाही, रसांमध्ये कल्पना करत नाही, रसांपासून कल्पना करत नाही, 'रस माझे आहेत' अशी कल्पना करत नाही. जिव्हा-विज्ञाणाला कल्पित नाही, जिव्हा-विज्ञाणामध्ये कल्पना करत नाही, जिव्हा-विज्ञाणापासून कल्पना करत नाही, 'जिव्हा-विज्ञाण माझे आहे' अशी कल्पना करत नाही. जिव्हा-संस्पर्शाला कल्पित नाही, जिव्हा-संस्पर्शामध्ये कल्पना करत नाही, जिव्हा-संस्पर्शापासून कल्पना करत नाही, 'जिव्हा-संस्पर्श माझा आहे' अशी कल्पना करत नाही. आणि जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही तो कल्पित नाही, तिच्यामध्ये कल्पना करत नाही, तिच्यापासून कल्पना करत नाही, 'ती माझी आहे' अशी कल्पना करत नाही... पे... मनाला कल्पित नाही, मनामध्ये कल्पना करत नाही, मनापासून कल्पना करत नाही, 'मन माझे आहे' अशी कल्पना करत नाही. धम्मांना कल्पित नाही, धम्मांमध्ये कल्पना करत नाही, धम्मांपासून कल्पना करत नाही, 'धम्म माझे आहेत' अशी कल्पना करत नाही. मनो-विज्ञाणाला कल्पित नाही, मनो-विज्ञाणामध्ये कल्पना करत नाही, मनो-विज्ञाणापासून कल्पना करत नाही, 'मनो-विज्ञाण माझे आहे' अशी कल्पना करत नाही. मनो-संस्पर्शाला कल्पित नाही, मनो-संस्पर्शामध्ये कल्पना करत नाही, मनो-संस्पर्शापासून कल्पना करत नाही, 'मनो-संस्पर्श माझा आहे' अशी कल्पना करत नाही. आणि मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना उत्पन्न होते, तिलाही तो कल्पित नाही, तिच्यामध्ये कल्पना करत नाही, तिच्यापासून कल्पना करत नाही, 'ती माझी आहे' अशी कल्पना करत नाही. सर्वाला कल्पित नाही, सर्वामध्ये कल्पना करत नाही, सर्वापासून कल्पना करत नाही, 'सर्व माझे आहे' अशी कल्पना करत नाही. तो अशा प्रकारे कल्पना न करणारा या लोकात कशाचेही उपादान करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो व्याकुळ होत नाही. व्याकुळ न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. 'जन्म क्षीण झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,' असे तो जाणतो. भिक्खूंनो, हीच ती सर्व कल्पनांचे समूळ उच्चाटन करण्यास अनुकूल असणारी प्रतिपदा होय." आठवे सूत्र. 9. පඨමසමුග්ඝාතසප්පායසුත්තං ९. पठमसमुग्घातसप्पाय सुत्त 31. ‘‘සබ්බමඤ්ඤිතසමුග්ඝාතසප්පායං වො, භික්ඛවෙ, පටිපදං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමා ච සා, භික්ඛවෙ, සබ්බමඤ්ඤිතසමුග්ඝාතසප්පායා පටිපදා? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුං න මඤ්ඤති, චක්ඛුස්මිං න මඤ්ඤති, චක්ඛුතො න මඤ්ඤති, චක්ඛුං මෙති න මඤ්ඤති. රූපෙ න මඤ්ඤති…පෙ… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං න මඤ්ඤති, චක්ඛුසම්ඵස්සං න මඤ්ඤති, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤති, තස්මිම්පි න මඤ්ඤති, තතොපි න මඤ්ඤති, තං මෙති න මඤ්ඤති. යඤ්හි, භික්ඛවෙ, මඤ්ඤති, යස්මිං මඤ්ඤති, යතො මඤ්ඤති, යං මෙති මඤ්ඤති, තතො තං හොති අඤ්ඤථා. අඤ්ඤථාභාවී භවසත්තො ලොකො භවමෙවාභිනන්දති…පෙ… ජිව්හං න මඤ්ඤති, ජිව්හාය න මඤ්ඤති, ජිව්හාතො න මඤ්ඤති, ජිව්හා මෙති න මඤ්ඤති. රසෙ න මඤ්ඤති…පෙ… ජිව්හාවිඤ්ඤාණං න මඤ්ඤති, ජිව්හාසම්ඵස්සං න මඤ්ඤති. යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤති, තස්මිම්පි න මඤ්ඤති, තතොපි න මඤ්ඤති, තං මෙති න මඤ්ඤති. යඤ්හි, භික්ඛවෙ, මඤ්ඤති, යස්මිං මඤ්ඤති, යතො මඤ්ඤති, යං මෙති මඤ්ඤති, තතො තං හොති අඤ්ඤථා. අඤ්ඤථාභාවී භවසත්තො ලොකො භවමෙවාභිනන්දති…පෙ… මනං න මඤ්ඤති, මනස්මිං න මඤ්ඤති, මනතො න මඤ්ඤති, මනො මෙති න මඤ්ඤති. ධම්මෙ න මඤ්ඤති…පෙ… මනොවිඤ්ඤාණං න මඤ්ඤති, මනොසම්ඵස්සං න මඤ්ඤති. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤති, තස්මිම්පි න මඤ්ඤති, තතොපි න මඤ්ඤති, තං මෙති න මඤ්ඤති. යඤ්හි, භික්ඛවෙ, මඤ්ඤති, යස්මිං මඤ්ඤති, යතො මඤ්ඤති, යං මෙති මඤ්ඤති, තතො තං හොති අඤ්ඤථා. අඤ්ඤථාභාවී භවසත්තො ලොකො භවමෙවාභිනන්දති. යාවතා, භික්ඛවෙ, ඛන්ධධාතුආයතනං තම්පි න මඤ්ඤති, තස්මිම්පි න මඤ්ඤති, තතොපි න මඤ්ඤති, තං මෙති න මඤ්ඤති. සො එවං අමඤ්ඤමානො න ච කිඤ්චි ලොකෙ උපාදියති. අනුපාදියං න පරිතස්සති. අපරිතස්සං පච්චත්තඤ්ඤෙව පරිනිබ්බායති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාති[Pg.255]. අයං ඛො සා, භික්ඛවෙ, සබ්බමඤ්ඤිතසමුග්ඝාතසප්පායා පටිපදා’’ති. නවමං. ३१. भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे (अहंकार-ममकाराचे) उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला मार्ग मी तुम्हांला उपदेशेन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला तो मार्ग कोणता आहे? इथे, भिक्षूंनो, भिक्षू डोळ्याविषयी कल्पनाविलास करत नाही, डोळ्यामध्ये कल्पनाविलास करत नाही, डोळ्यापासून कल्पनाविलास करत नाही, 'डोळा माझा आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. रूपांविषयी कल्पनाविलास करत नाही... पे... चक्षु-विज्ञानाविषयी कल्पनाविलास करत नाही, चक्षु-स्पर्शाविषयी कल्पनाविलास करत नाही. चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो कल्पनाविलास करत नाही, त्यामध्ये कल्पनाविलास करत नाही, त्यापासून कल्पनाविलास करत नाही, 'ते माझे आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. कारण, भिक्षूंनो, मनुष्य ज्या गोष्टीविषयी कल्पनाविलास करतो, ज्यामध्ये कल्पनाविलास करतो, ज्यापासून कल्पनाविलास करतो, किंवा 'हे माझे आहे' असा कल्पनाविलास करतो, ती गोष्ट त्या कल्पनेपेक्षा वेगळीच होते. हा संसार बदलणारा असूनही, अस्तित्वाशी आसक्त असलेला हा लोक भवामध्येच (पुनर्जन्मातच) आनंद मानतो... पे... जिभेविषयी कल्पनाविलास करत नाही, जिभेमध्ये कल्पनाविलास करत नाही, जिभेपासून कल्पनाविलास करत नाही, 'जीभ माझी आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. रसांविषयी कल्पनाविलास करत नाही... पे... जिव्हा-विज्ञानाविषयी कल्पनाविलास करत नाही, जिव्हा-स्पर्शाविषयी कल्पनाविलास करत नाही. जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो कल्पनाविलास करत नाही, त्यामध्ये कल्पनाविलास करत नाही, त्यापासून कल्पनाविलास करत नाही, 'ते माझे आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. कारण, भिक्षूंनो, मनुष्य ज्या गोष्टीविषयी कल्पनाविलास करतो, ज्यामध्ये कल्पनाविलास करतो, ज्यापासून कल्पनाविलास करतो, किंवा 'हे माझे आहे' असा कल्पनाविलास करतो, ती गोष्ट त्या कल्पनेपेक्षा वेगळीच होते. हा संसार बदलणारा असूनही, अस्तित्वाशी आसक्त असलेला हा लोक भवामध्येच आनंद मानतो... पे... मनाविषयी कल्पनाविलास करत नाही, मनामध्ये कल्पनाविलास करत नाही, मनापासून कल्पनाविलास करत नाही, 'मन माझे आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. धर्मांविषयी कल्पनाविलास करत नाही... पे... मनो-विज्ञानाविषयी कल्पनाविलास करत नाही, मनो-स्पर्शाविषयी कल्पनाविलास करत नाही. मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो कल्पनाविलास करत नाही, त्यामध्ये कल्पनाविलास करत नाही, त्यापासून कल्पनाविलास करत नाही, 'ते माझे आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. कारण, भिक्षूंनो, मनुष्य ज्या गोष्टीविषयी कल्पनाविलास करतो, ज्यामध्ये कल्पनाविलास करतो, ज्यापासून कल्पनाविलास करतो, किंवा 'हे माझे आहे' असा कल्पनाविलास करतो, ती गोष्ट त्या कल्पनेपेक्षा वेगळीच होते. हा संसार बदलणारा असूनही, अस्तित्वाशी आसक्त असलेला हा लोक भवामध्येच आनंद मानतो. भिक्षूंनो, जितके काही स्कंध, धातू आणि आयतने आहेत, त्या सर्वांविषयी तो कल्पनाविलास करत नाही, त्यांमध्ये कल्पनाविलास करत नाही, त्यांपासून कल्पनाविलास करत नाही, 'ते माझे आहे' असा कल्पनाविलास करत नाही. अशा प्रकारे कल्पनाविलास न करणारा तो भिक्षू या जगात कशाचेही उपादान (आसक्तीने ग्रहण) करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो उद्विग्न होत नाही. उद्विग्न न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला हाच तो मार्ग होय. नववे सूक्त समाप्त. 10. දුතියසමුග්ඝාතසප්පායසුත්තං १०. द्वितीय समुग्घातसप्पाय सुत्त (दुसरे समूळ उच्चाटन अनुकूल सूक्त) 32. ‘‘සබ්බමඤ්ඤිතසමුග්ඝාතසප්පායං වො, භික්ඛවෙ, පටිපදං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමා ච සා, භික්ඛවෙ, සබ්බමඤ්ඤිතසමුග්ඝාතසප්පායා පටිපදා? ३२. भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला मार्ग मी तुम्हांला उपदेशेन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला तो मार्ग कोणता आहे? ‘‘තං කිං මඤ්ඤථ, භික්ඛවෙ, චක්ඛුං නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? भिक्षूंनो, तुम्हांला काय वाटते, डोळा नित्य आहे की अनित्य? ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. अनित्य आहे, भंते. ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक? ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. दुःखकारक आहे, भंते. ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? तर मग जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे मानणे योग्य आहे का? ‘‘නො හෙතං භන්තෙ’’. नक्कीच नाही, भंते. ‘‘රූපා…පෙ… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? रूपे... पे... चक्षु-विज्ञान... चक्षु-स्पर्श नित्य आहे की अनित्य? ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’…පෙ…. अनित्य आहे, भंते... पे... ‘‘යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य? ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. अनित्य आहे, भंते. ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक? ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. दुःखकारक आहे, भंते. ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? तर मग जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे मानणे योग्य आहे का? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’…පෙ…. नक्कीच नाही, भंते... पे... ‘‘ජිව්හා නිච්චා වා අනිච්චා වා’’ති? जीभ नित्य आहे की अनित्य? ‘‘අනිච්චා භන්තෙ’’…පෙ…. अनित्य आहे, भंते... पे... ‘‘රසා… ජිව්හාවිඤ්ඤාණං… ජිව්හාසම්ඵස්සො…පෙ… යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? रस... जिव्हा-विज्ञान... जिव्हा-स्पर्श... पे... जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य? ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’…පෙ… ධම්මා… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සො නිච්චො වා අනිච්චො වාති? अनित्य आहे, भंते... पे... धर्म... मनो-विज्ञान... मनो-स्पर्श नित्य आहे की अनित्य? ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’. अनित्य आहे, भंते. ‘‘යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य? ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. अनित्य आहे, भंते. ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक? ‘‘දුක්ඛං භන්තෙ’’. दुःखकारक आहे, भंते. ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? तर मग जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे मानणे योग्य आहे का? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. नक्कीच नाही, भंते. ‘‘එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… ජිව්හායපි නිබ්බින්දති, රසෙසුපි…පෙ… යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ධම්මෙසුපි නිබ්බින්දති, මනොවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, මනොසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාති[Pg.256]. අයං ඛො සා, භික්ඛවෙ, සබ්බමඤ්ඤිතසමුග්ඝාතසප්පායා පටිපදා’’ති. දසමං. भिक्षूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयी विरक्त होतो, रूपांविषयी विरक्त होतो, चक्षु-विज्ञानाविषयी विरक्त होतो, चक्षु-स्पर्शाविषयी विरक्त होतो. चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो... पे... जिभेविषयी विरक्त होतो, रसांविषयी... पे... जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो. मनाविषयी विरक्त होतो, धर्मांविषयी विरक्त होतो, मनो-विज्ञानाविषयी विरक्त होतो, मनो-स्पर्शाविषयी विरक्त होतो. मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो. विरक्त झाल्यामुळे तो रागरहित होतो; वैराग्यामुळे तो मुक्त होतो; मुक्त झाल्यावर 'मी मुक्त झालो आहे' असे ज्ञान त्याला होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,' असे तो स्पष्टपणे जाणतो. भिक्षूंनो, सर्व कल्पनाविलासांचे उच्चाटन करण्यासाठी अनुकूल असलेला हाच तो मार्ग होय. दहावे सूक्त समाप्त. සබ්බවග්ගො තතියො. तिसरा सर्व-वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उदान) - සබ්බඤ්ච ද්වෙපි පහානා, පරිජානාපරෙ දුවෙ; ආදිත්තං අද්ධභූතඤ්ච, සාරුප්පා ද්වෙ ච සප්පායා; වග්ගො තෙන පවුච්චතීති. सब्ब (सर्व) सुत्त, दोन पहाण (प्रहाण) सुत्ते, इतर दोन परिजानन (परिज्ञान) सुत्ते, आदिच्च (आदीप्त) सुत्त, अद्धभूत (अध्वभूत) सुत्त, सारुप्प सुत्त आणि दोन सप्पाय (सप्राय) सुत्ते; यामुळे याला वग्ग (वर्ग) म्हटले जाते. हा (या वग्गाचा) संग्रह (उदान) आहे. 4. ජාතිධම්මවග්ගො ४. जातिधम्म वग्ग 1-10. ජාතිධම්මාදිසුත්තදසකං १-१०. जातिधम्म आदि दहा सुत्ते 33. සාවත්ථිනිදානං. තත්ර ඛො…පෙ… ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, ජාතිධම්මං. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, සබ්බං ජාතිධම්මං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, ජාතිධම්මං. රූපා… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සො ජාතිධම්මො. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි ජාතිධම්මං…පෙ… ජිව්හා… රසා… ජිව්හාවිඤ්ඤාණං… ජිව්හාසම්ඵස්සො… යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි ජාතිධම්මං. කායො…පෙ... මනො ජාතිධම්මො, ධම්මා ජාතිධම්මා, මනොවිඤ්ඤාණං ජාතිධම්මං, මනොසම්ඵස්සො ජාතිධම්මො. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි ජාතිධම්මං. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි… චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි… චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. පඨමං. ३३. श्रावस्ती येथील निदान. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'भिक्खूहो, सर्व काही जन्म-स्वभावाचे (उत्पत्ति-धर्मी) आहे. आणि भिक्खूहो, जन्म-स्वभावाचे सर्व काही कोणते आहे? भिक्खूहो, चक्षु (डोळा) जन्म-स्वभावाचा आहे. रूप... चक्षु-विज्ञाण... चक्षु-सम्फस्स (चक्षु-स्पर्श) जन्म-स्वभावाचा आहे. चक्षु-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील जन्म-स्वभावाचे आहे...पे... जिव्हा... रस... जिव्हा-विज्ञाण... जिव्हा-सम्फस्स... जिव्हा-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील जन्म-स्वभावाचे आहे. काय...पे... मन जन्म-स्वभावाचे आहे, धम्म जन्म-स्वभावाचे आहेत, मनो-विज्ञाण जन्म-स्वभावाचे आहे, मनो-सम्फस्स जन्म-स्वभावाचा आहे. मनो-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील जन्म-स्वभावाचे आहे. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी देखील कंटाळतो, रूपांविषयी देखील... चक्षु-विज्ञाणाविषयी देखील... चक्षु-सम्फस्साविषयी देखील...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही उरलेले नाही, असे तो जाणतो.' पहिले. 34. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, ජරාධම්මං…පෙ… සංඛිත්තං. දුතියං. ३४. 'भिक्खूहो, सर्व काही जरा-स्वभावाचे (वृद्धत्व-धर्मी) आहे...' (संक्षिप्त). दुसरे. 35. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, බ්යාධිධම්මං…පෙ…. තතියං. ३५. 'भिक्खूहो, सर्व काही व्याधी-स्वभावाचे (रोग-धर्मी) आहे...' (संक्षिप्त). तिसरे. 36. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, මරණධම්මං…පෙ…. චතුත්ථං. ३६. 'भिक्खूहो, सर्व काही मरण-स्वभावाचे (मृत्यू-धर्मी) आहे...' (संक्षिप्त). चौथे. 37. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, සොකධම්මං…පෙ…. පඤ්චමං. ३७. 'भिक्खूहो, सर्व काही शोक-स्वभावाचे आहे...' (संक्षिप्त). पाचवे. 38. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, සංකිලෙසිකධම්මං…පෙ…. ඡට්ඨං. ३८. 'भिक्खूहो, सर्व काही संक्लेशिक-स्वभावाचे (मलीन होणाऱ्या स्वभावाचे) आहे...' (संक्षिप्त). सहावे. 39. ‘‘සබ්බං[Pg.257], භික්ඛවෙ, ඛයධම්මං…පෙ…. සත්තමං. ३९. 'भिक्खूहो, सर्व काही क्षय-स्वभावाचे (नष्ट होणाऱ्या स्वभावाचे) आहे...' (संक्षिप्त). सातवे. 40. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, වයධම්මං…පෙ…. අට්ඨමං. ४०. 'भिक्खूहो, सर्व काही व्यय-स्वभावाचे (ऱ्हास पावणाऱ्या स्वभावाचे) आहे...' (संक्षिप्त). आठवे. 41. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, සමුදයධම්මං…පෙ…. නවමං. ४१. 'भिक्खूहो, सर्व काही उदय-स्वभावाचे (उत्पत्ती-धर्मी) आहे...' (संक्षिप्त). नववे. 42. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, නිරොධධම්මං…පෙ…. දසමං. ४२. 'भिक्खूहो, सर्व काही निरोध-स्वभावाचे (लय-धर्मी) आहे...' (संक्षिप्त). दहावे. ජාතිධම්මවග්ගො චතුත්ථො. चौथा जातिधम्म वग्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा संग्रह (उदान) - ජාතිජරාබ්යාධිමරණං, සොකො ච සංකිලෙසිකං; ඛයවයසමුදයං, නිරොධධම්මෙන තෙ දසාති. जाति, जरा, व्याधी, मरण, शोक, संक्लेशिक, क्षय, व्यय, उदय आणि निरोधधम्म - ही दहा सुत्ते आहेत. 5. සබ්බඅනිච්චවග්ගො ५. सब्बअनिच्च वग्ग (सर्व-अनित्य वर्ग) 1-9. අනිච්චාදිසුත්තනවකං १-९. अनित्य आदि नऊ सुत्ते 43. සාවත්ථිනිදානං. තත්ර ඛො…පෙ… ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, සබ්බං අනිච්චං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනිච්චං, රූපා අනිච්චා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනිච්චං, චක්ඛුසම්ඵස්සො අනිච්චො. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා, රසා අනිච්චා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං අනිච්චං, ජිව්හාසම්ඵස්සො අනිච්චො. යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං. කායො අනිච්චො…පෙ… මනො අනිච්චො, ධම්මා අනිච්චා, මනොවිඤ්ඤාණං අනිච්චං, මනොසම්ඵස්සො අනිච්චො. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ධම්මෙසුපි නිබ්බින්දති, මනොවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, මනොසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති [Pg.258] ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. පඨමං. ४३. श्रावस्ती येथील निदान. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – 'भिक्खूहो, सर्व काही अनित्य आहे. आणि भिक्खूहो, अनित्य असणारे सर्व काही कोणते आहे? भिक्खूहो, चक्षु अनित्य आहे, रूप अनित्य आहेत, चक्षु-विज्ञाण अनित्य आहे, चक्षु-सम्फस्स अनित्य आहे. चक्षु-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे...पे... जिव्हा अनित्य आहे, रस अनित्य आहेत, जिव्हा-विज्ञाण अनित्य आहे, जिव्हा-सम्फस्स अनित्य आहे. जिव्हा-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे. काय अनित्य आहे...पे... मन अनित्य आहे, धम्म अनित्य आहेत, मनो-विज्ञाण अनित्य आहे, मनो-सम्फस्स अनित्य आहे. मनो-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी देखील कंटाळतो, रूपांविषयी देखील कंटाळतो, चक्षु-विज्ञाणाविषयी देखील कंटाळतो, चक्षु-सम्फस्साविषयी देखील कंटाळतो. चक्षु-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील कंटाळतो...पे... मनाविषयी देखील कंटाळतो, धम्मांविषयी देखील कंटाळतो, मनो-विज्ञाणाविषयी देखील कंटाळतो, मनो-सम्फस्साविषयी देखील कंटाळतो. मनो-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील कंटाळतो. कंटाळल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर 'मी विमुक्त झालो आहे' असे ज्ञान त्याला होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,' असे तो जाणतो.' पहिले. 44. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං…පෙ…. දුතියං. ४४. 'भिक्खूहो, सर्व काही दुःख आहे...' (संक्षिप्त). दुसरे. 45. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, අනත්තා…පෙ…. තතියං. ४५. 'भिक्खूहो, सर्व काही अनात्मा (अनत्ता) आहे...' (संक्षिप्त). तिसरे. 46. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, අභිඤ්ඤෙය්යං…පෙ…. චතුත්ථං. ४६. 'भिक्खूहो, सर्व काही अभिज्ञेय (विशेष ज्ञानाने जाणण्याजोगे) आहे...' (संक्षिप्त). चौथे. 47. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, පරිඤ්ඤෙය්යං…පෙ…. පඤ්චමං. ४७. 'भिक्खूहो, सर्व काही परिज्ञेय (पूर्णपणे समजून घेण्याजोगे) आहे...' (संक्षिप्त). पाचवे. 48. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, පහාතබ්බං…පෙ…. ඡට්ඨං. ४८. 'भिक्खूहो, सर्व काही प्रहातव्य (त्याग करण्याजोगे) आहे...' (संक्षिप्त). सहावे. 49. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, සච්ඡිකාතබ්බං…පෙ…. සත්තමං. ४९. 'भिक्खूहो, सर्व काही साक्षात्करणीय (प्रत्यक्ष अनुभवण्याजोगे) आहे...' (संक्षिप्त). सातवे. 50. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, අභිඤ්ඤාපරිඤ්ඤෙය්යං…පෙ…. අට්ඨමං. ५०. 'भिक्खूहो, सर्व काही विशेष ज्ञानाने पूर्णपणे समजून घेण्याजोगे आहे...' (संक्षिप्त). आठवे. 51. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, උපද්දුතං…පෙ…. නවමං. ५१. 'भिक्खूहो, सर्व काही उपद्रुत (पीडित) आहे...' (संक्षिप्त). नववे. 10. උපස්සට්ඨසුත්තං १०. उपस्सट्ठ सुत्त 52. ‘‘සබ්බං, භික්ඛවෙ, උපස්සට්ඨං. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, සබ්බං උපස්සට්ඨං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, උපස්සට්ඨං, රූපා උපස්සට්ඨා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං උපස්සට්ඨං, චක්ඛුසම්ඵස්සො උපස්සට්ඨො. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි උපස්සට්ඨං…පෙ… ජිව්හා උපස්සට්ඨා, රසා උපස්සට්ඨා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං උපස්සට්ඨං, ජිව්හාසම්ඵස්සො උපස්සට්ඨො. යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි උපස්සට්ඨං. කායො උපස්සට්ඨො… මනො උපස්සට්ඨො, ධම්මා උපස්සට්ඨා, මනොවිඤ්ඤාණං උපස්සට්ඨං, මනොසම්ඵස්සො උපස්සට්ඨො. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි උපස්සට්ඨං. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ධම්මෙසුපි නිබ්බින්දති, මනොවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, මනොසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති[Pg.259]. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. දසමං. ५२. “भिक्षूंनो, सर्व काही पीडित (ग्रस्त) आहे. आणि भिक्षूंनो, सर्व काही काय पीडित आहे? भिक्षूंनो, चक्षू पीडित आहे, रूप पीडित आहेत, चक्षू-विज्ञान पीडित आहे, चक्षू-संस्पर्श पीडित आहे. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील पीडित आहे... पे... जिव्हा पीडित आहे, रस पीडित आहेत, जिव्हा-विज्ञान पीडित आहे, जिव्हा-संस्पर्श पीडित आहे. जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील पीडित आहे. काय (शरीर) पीडित आहे... मन पीडित आहे, धम्म पीडित आहेत, मनो-विज्ञान पीडित आहे, मनो-संस्पर्श पीडित आहे. मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील पीडित आहे. भिक्षूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षूविषयी देखील निर्वेद पावतो, रूपांविषयी देखील निर्वेद पावतो, चक्षू-विज्ञानाविषयी देखील निर्वेद पावतो, चक्षू-संस्पर्शाविषयी देखील निर्वेद पावतो. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील तो निर्वेद पावतो... पे... मनाविषयी देखील निर्वेद पावतो, धम्मांविषयी देखील निर्वेद पावतो, मनो-विज्ञानाविषयी देखील निर्वेद पावतो, मनो-संस्पर्शाविषयी देखील निर्वेद पावतो. मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील तो निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरागामुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर 'मी विमुक्त झालो आहे' असे ज्ञान होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही' असे तो जाणतो.” दहावे सूत्र. සබ්බඅනිච්චවග්ගො පඤ්චමො. पाचवा सर्व-अनित्य वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा संग्रह (उद्दान) - අනිච්චං දුක්ඛං අනත්තා, අභිඤ්ඤෙය්යං පරිඤ්ඤෙය්යං; පහාතබ්බං සච්ඡිකාතබ්බං, අභිඤ්ඤෙය්යපරිඤ්ඤෙය්යං ; උපද්දුතං උපස්සට්ඨං, වග්ගො තෙන පවුච්චතීති. अनित्य, दुःख, अनात्मा, अभिज्ञेय, परिज्ञेय, प्रहातव्य, साक्षात्करणीय, अभिज्ञेय-परिज्ञेय, उपद्रुत आणि उपसृष्ट (पीडित) - या सूत्रांमुळे हा वर्ग म्हटला जातो. සළායතනවග්ගෙ පඨමපණ්ණාසකො සමත්තො. सळायतन वर्गातील पहिला पन्नास सूत्रांचा समूह (प्रथम पण्णासक) समाप्त झाला. තස්ස වග්ගුද්දානං – त्या वर्गांचा संग्रह (उद्दान) - අනිච්චවග්ගං යමකං, සබ්බං වග්ගං ජාතිධම්මං; අනිච්චවග්ගෙන පඤ්ඤාසං, පඤ්චමො තෙන පවුච්චතීති. अनित्यवर्ग, यमकवर्ग, सर्ववर्ग, जातिधम्मवर्ग आणि अनित्यवर्गासह पन्नास सूत्रांचा समूह होतो, म्हणून याला पाचवा (पण्णासक) म्हटले जाते. 6. අවිජ්ජාවග්ගො ६. अविद्या वर्ग 1. අවිජ්ජාපහානසුත්තං १. अविद्या प्रहाण सूत्र 53. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො සො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කථං නු ඛො, භන්තෙ, ජානතො කථං පස්සතො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති? ५३. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा एक भिक्षू जेथे भगवान होते तेथे गेला; जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तो भिक्षू भगवंतांना म्हणाला – “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्या व्यक्तीची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते?” ‘‘චක්ඛුං ඛො, භික්ඛු, අනිච්චතො ජානතො පස්සතො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජති. රූපෙ අනිච්චතො ජානතො පස්සතො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජති. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සං… යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චතො ජානතො පස්සතො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජති. සොතං… ඝානං… ජිව්හං… කායං… මනං අනිච්චතො ජානතො පස්සතො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජති. ධම්මෙ [Pg.260]… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සං… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චතො ජානතො පස්සතො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජති. එවං ඛො, භික්ඛු, ජානතො එවං පස්සතො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති. පඨමං. “भिक्षू, चक्षूला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. रूपांना अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. चक्षू-विज्ञान... चक्षू-संस्पर्श... चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. श्रोत्र (कान)... घ्राण (नाक)... जिव्हा... काय (शरीर)... मनाला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-संस्पर्शाला... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते. भिक्षू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याची अविद्या नष्ट होते आणि विद्या उत्पन्न होते.” पहिले सूत्र. 2. සංයොජනපහානසුත්තං २. संयोजन प्रहाण सूत्र 54. ‘‘කථං නු ඛො, භන්තෙ, ජානතො, කථං පස්සතො, සංයොජනා පහීයන්තී’’ති? ‘‘චක්ඛුං ඛො, භික්ඛු, අනිච්චතො ජානතො පස්සතො සංයොජනා පහීයන්ති. රූපෙ… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සං… යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චතො ජානතො පස්සතො සංයොජනා පහීයන්ති. සොතං… ඝානං… ජිව්හං… කායං… මනං… ධම්මෙ… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සං… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චතො ජානතො පස්සතො සංයොජනා පහීයන්ති. එවං ඛො, භික්ඛු, ජානතො එවං පස්සතො සංයොජනා පහීයන්තී’’ති. දුතියං. ५४. “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्याची संयोजने (बंधने) नष्ट होतात?” “भिक्षू, चक्षूला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने नष्ट होतात. रूपांना... चक्षू-विज्ञानाला... चक्षू-संस्पर्शाला... चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने नष्ट होतात. श्रोत्र... घ्राण... जिव्हा... काय... मनाला... धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-संस्पर्शाला... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने नष्ट होतात. भिक्षू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याची संयोजने नष्ट होतात.” दुसरे सूत्र. 3. සංයොජනසමුග්ඝාතසුත්තං ३. संयोजन समुद्घात सूत्र 55. ‘‘කථං නු ඛො, භන්තෙ, ජානතො, කථං පස්සතො සංයොජනා සමුග්ඝාතං ගච්ඡන්තී’’ති? ‘‘චක්ඛුං ඛො, භික්ඛු, අනත්තතො ජානතො පස්සතො සංයොජනා සමුග්ඝාතං ගච්ඡන්ති. රූපෙ අනත්තතො… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සං… යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනත්තතො ජානතො පස්සතො සංයොජනා සමුග්ඝාතං ගච්ඡන්ති. සොතං… ඝානං… ජිව්හං… කායං… මනං… ධම්මෙ… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සං… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනත්තතො ජානතො පස්සතො සංයොජනා සමුග්ඝාතං ගච්ඡන්ති. එවං ඛො, භික්ඛු, ජානතො එවං පස්සතො සංයොජනා සමුග්ඝාතං ගච්ඡන්තී’’ති. තතියං. ५५. “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्याची संयोजने समूळ नष्ट (समुद्घात) होतात?” “भिक्षू, चक्षूला अनात्मा (अनत्त) म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने समूळ नष्ट होतात. रूपांना अनात्मा म्हणून... चक्षू-विज्ञानाला... चक्षू-संस्पर्शाला... चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनात्मा म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने समूळ नष्ट होतात. श्रोत्र... घ्राण... जिव्हा... काय... मनाला... धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-संस्पर्शाला... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनात्मा म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची संयोजने समूळ नष्ट होतात. भिक्षू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याची संयोजने समूळ नष्ट होतात.” तिसरे सूत्र. 4. ආසවපහානසුත්තං ४. आसव प्रहाण सूत्र 56. ‘‘කථං නු ඛො, භන්තෙ, ජානතො, කථං පස්සතො ආසවා පහීයන්තී’’ති…පෙ…. චතුත්ථං. ५६. “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्याचे आसव नष्ट होतात?”... पे... चौथे सूत्र. 5. ආසවසමුග්ඝාතසුත්තං ५. आसव समुद्घात सूत्र 57. ‘‘කථං [Pg.261] නු ඛො, භන්තෙ, ජානතො, කථං පස්සතො ආසවා සමුග්ඝාතං ගච්ඡන්තී’’ති…පෙ…. පඤ්චමං. ५७. “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्याचे आसव समूळ नष्ट होतात?”... पे... पाचवे सूत्र. 6. අනුසයපහානසුත්තං ६. अनुशय प्रहाण सूत्र 58. ‘‘කථං නු ඛො…පෙ… අනුසයා පහීයන්තී’’ති…පෙ…. ඡට්ඨං. ५८. “भंते, कशा प्रकारे... पे... अनुशय नष्ट होतात?”... पे... सहावे सूत्र. 7. අනුසයසමුග්ඝාතසුත්තං ७. अनुशय समुद्घात सूत्र 59. ‘‘කථං නු ඛො…පෙ… අනුසයා සමුග්ඝාතං ගච්ඡන්තී’’ති? ‘‘චක්ඛුං ඛො, භික්ඛු, අනත්තතො ජානතො පස්සතො අනුසයා සමුග්ඝාතං ගච්ඡන්ති…පෙ… සොතං… ඝානං… ජිව්හං… කායං… මනං… ධම්මෙ… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සං… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනත්තතො ජානතො පස්සතො අනුසයා සමුග්ඝාතං ගච්ඡන්ති. එවං ඛො, භික්ඛු, ජානතො එවං පස්සතො අනුසයා සමුග්ඝාතං ගච්ඡන්තී’’ති. සත්තමං. ५९. “कशा प्रकारे... (पे)... अनुसय समूळ नष्ट होतात?” “भिक्खू, डोळ्याला अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याचे अनुसय समूळ नष्ट होतात... कान... नाक... जीभ... शरीर... मन... धम्म... मनोविज्ञाण... मनोसंफस्स... आणि मनोसंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, तिलाही अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याचे अनुसय समूळ नष्ट होतात. भिक्खू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याचे अनुसय समूळ नष्ट होतात.” सातवे. 8. සබ්බුපාදානපරිඤ්ඤාසුත්තං ८. सब्बुपादानपरिञ्ञासुत्त 60. ‘‘සබ්බුපාදානපරිඤ්ඤාය වො, භික්ඛවෙ, ධම්මං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, සබ්බුපාදානපරිඤ්ඤාය ධම්මො? චක්ඛුඤ්ච පටිච්ච රූපෙ ච උප්පජ්ජති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති, වෙදනායපි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමොක්ඛා ‘පරිඤ්ඤාතං මෙ උපාදාන’න්ති පජානාති. සොතඤ්ච පටිච්ච සද්දෙ ච උප්පජ්ජති… ඝානඤ්ච පටිච්ච ගන්ධෙ ච… ජිව්හඤ්ච පටිච්ච රසෙ ච… කායඤ්ච පටිච්ච ඵොට්ඨබ්බෙ ච… මනඤ්ච පටිච්ච ධම්මෙ ච උප්පජ්ජති මනොවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ධම්මෙසුපි නිබ්බින්දති, මනොවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, මනොසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති, වෙදනායපි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමොක්ඛා ‘පරිඤ්ඤාතං මෙ උපාදාන’න්ති [Pg.262] පජානාති. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, සබ්බුපාදානපරිඤ්ඤාය ධම්මො’’ති. අට්ඨමං. ६०. “भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या परिज्ञेसाठी (परिपूर्ण ज्ञानासाठी) मी तुम्हांला धम्म उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या परिज्ञेसाठी असलेला धम्म कोणता? डोळा आणि रूपे यांच्यावर अवलंबून चक्खुविज्ञाण उत्पन्न होते. या तिन्हींचा संयोग म्हणजे संफस्स होय. संफस्साच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते. भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयीही निर्वेद पावतो, रूपांविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो, वेदनेविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर ‘माझे उपादान परिपूर्ण जाणले गेले आहे’ असे तो प्रजाणतो. कान आणि शब्द यांच्यावर अवलंबून... नाक आणि गंध यांच्यावर अवलंबून... जीभ आणि रस यांच्यावर अवलंबून... शरीर आणि फोट्ठब्ब (स्पर्शविषय) यांच्यावर अवलंबून... मन आणि धम्म यांच्यावर अवलंबून मनोविज्ञाण उत्पन्न होते. या तिन्हींचा संयोग म्हणजे संफस्स होय. संफस्साच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते. भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक मनाविषयीही निर्वेद पावतो, धम्मांविषयीही निर्वेद पावतो, मनोविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, मनोसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो, वेदनेविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर ‘माझे उपादान परिपूर्ण जाणले गेले आहे’ असे तो प्रजाणतो. भिक्खूंनो, हाच सर्व उपादानांच्या परिज्ञेसाठी असलेला धम्म होय.” आठवे. 9. පඨමසබ්බුපාදානපරියාදානසුත්තං ९. पठमसब्बुपादानपरियादानसुत्त 61. ‘‘සබ්බුපාදානපරියාදානාය වො, භික්ඛවෙ, ධම්මං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, සබ්බුපාදානපරියාදානාය ධම්මො? චක්ඛුඤ්ච පටිච්ච රූපෙ ච උප්පජ්ජති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති, වෙදනායපි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමොක්ඛා ‘පරියාදින්නං මෙ උපාදාන’න්ති පජානාති…පෙ… ජිව්හඤ්ච පටිච්ච රසෙ ච උප්පජ්ජති ජිව්හාවිඤ්ඤාණං…පෙ… මනඤ්ච පටිච්ච ධම්මෙ ච උප්පජ්ජති මනොවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ධම්මෙසුපි නිබ්බින්දති, මනොවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති මනොසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති, වෙදනායපි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමොක්ඛා ‘පරියාදින්නං මෙ උපාදාන’න්ති පජානාති. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, සබ්බුපාදානපරියාදානාය ධම්මො’’ති. නවමං. ६१. “भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी (परियादानासाठी) मी तुम्हांला धम्म उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी असलेला धम्म कोणता? डोळा आणि रूपे यांच्यावर अवलंबून चक्खुविज्ञाण उत्पन्न होते. या तिन्हींचा संयोग म्हणजे संफस्स होय. संफस्साच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते. भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयीही निर्वेद पावतो, रूपांविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो, वेदनेविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर ‘माझे उपादान क्षीण झाले आहे’ असे तो प्रजाणतो... (पे)... जीभ आणि रस यांच्यावर अवलंबून जिव्हाविज्ञाण उत्पन्न होते... (पे)... मन आणि धम्म यांच्यावर अवलंबून मनोविज्ञाण उत्पन्न होते. या तिन्हींचा संयोग म्हणजे संफस्स होय. संफस्साच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते. भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक मनाविषयीही निर्वेद पावतो, धम्मांविषयीही निर्वेद पावतो, मनोविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, मनोसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो, वेदनेविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर ‘माझे उपादान क्षीण झाले आहे’ असे तो प्रजाणतो. भिक्खूंनो, हाच सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी असलेला धम्म होय.” नववे. 10. දුතියසබ්බුපාදානපරියාදානසුත්තං १०. दुतियसब्बुपादानपरियादानसुत्त 62. ‘‘සබ්බුපාදානපරියාදානාය වො, භික්ඛවෙ, ධම්මං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, සබ්බුපාදානපරියාදානාය ධම්මො’’? ६२. “भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी मी तुम्हांला धम्म उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्खूंनो, सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी असलेला धम्म कोणता?” ‘‘තං කිං මඤ්ඤථ, භික්ඛවෙ, චක්ඛු නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “भिक्खूंनो, तुम्हांला काय वाटते, डोळा नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भंते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भंते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भंते.” ‘‘රූපා…පෙ… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “रूपे... (पे)... चक्खुविज्ञाण नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भंते.”... (पे)... ‘‘චක්ඛුසම්ඵස්සො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? “चक्खुसंफस्स नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भंते.”... (पे)... ‘‘යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “आणि चक्खुसंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, ती नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भंते.”... (पे)... ‘‘සොතං… ඝානං… ජිව්හා… කායො… මනො… ධම්මා… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සො… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා, තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “कान... नाक... जीभ... शरीर... मन... धम्म... मनोविज्ञाण... मनोसंफस्स... आणि मनोसंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, ती नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං[Pg.263], භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भंते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भंते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भंते.” ‘‘එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… ජිව්හායපි නිබ්බින්දති, රසෙසුපි නිබ්බින්දති, ජිව්හාවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, ජිව්හාසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති, යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති…පෙ… මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ධම්මෙසුපි නිබ්බින්දති, මනොවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, මනොසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාති. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, සබ්බුපාදානපරියාදානාය ධම්මො’’ති. දසමං. “भिक्खूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयीही निर्वेद पावतो, रूपांविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, चक्खुसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो. आणि चक्खुसंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, तिच्याविषयीही निर्वेद पावतो... (पे)... जिभेविषयीही निर्वेद पावतो, रसांविषयीही निर्वेद पावतो, जिव्हाविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, जिव्हासंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो, जिव्हासंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणाऱ्या... (पे)... मनाविषयीही निर्वेद पावतो, धम्मांविषयीही निर्वेद पावतो, मनोविज्ञाणाविषयीही निर्वेद पावतो, मनोसंफस्साविषयीही निर्वेद पावतो. आणि मनोसंफस्साच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, तिच्याविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो; विमुक्त झाल्यावर ‘मी विमुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान त्याला होते. ‘जन्म संपुष्टात आला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर काहीही कर्तव्य उरलेले नाही’ असे तो प्रजाणतो. भिक्खूंनो, हाच सर्व उपादानांच्या क्षयासाठी असलेला धम्म होय.” दहावे. අවිජ්ජාවග්ගො ඡට්ඨො. सहावा अविद्या वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची उद्दाने - අවිජ්ජා සංයොජනා ද්වෙ, ආසවෙන දුවෙ වුත්තා; අනුසයා අපරෙ ද්වෙ, පරිඤ්ඤා ද්වෙ පරියාදින්නං; වග්ගො තෙන පවුච්චතීති. अविद्या (संयोजन) दोन, आसवासह दोन सांगितले आहेत; इतर दोन अनुसय, दोन परिञ्ञा आणि परियादिन्न सांगितले आहे; म्हणून याला वग्ग (वर्ग) म्हटले जाते. 7. මිගජාලවග්ගො ७. मिगजाल वग्ग 1. පඨමමිගජාලසුත්තං १. प्रथम मिगजाल सुत्त 63. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො ආයස්මා මිගජාලො යෙන භගවා…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා මිගජාලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘‘එකවිහාරී, එකවිහාරී’ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, එකවිහාරී හොති, කිත්තාවතා ච පන සදුතියවිහාරී හොතී’’ති? ६३. श्रावस्ती येथील निदान (प्रसंग). तेव्हा आयुष्यमान मिगजाल जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान मिगजालने भगवंतांना असे म्हटले – 'भन्ते, ‘एकविहारी, एकविहारी’ असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात मनुष्य एकविहारी होतो आणि किती प्रमाणात तो सदुतीयविहारी होतो?' ‘‘සන්ති ඛො, මිගජාල, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය [Pg.264] තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො උප්පජ්ජති නන්දී. නන්දියා සති සාරාගො හොති; සාරාගෙ සති සංයොගො හොති. නන්දිසංයොජනසංයුත්තො ඛො, මිගජාල, භික්ඛු සදුතියවිහාරීති වුච්චති. සන්ති…පෙ… සන්ති ඛො, මිගජාල, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො උප්පජ්ජති නන්දී. නන්දියා සති සාරාගො හොති; සාරාගෙ සති සංයොගො හොති. නන්දිසංයොජනසංයුත්තො ඛො, මිගජාල, භික්ඛු සදුතියවිහාරීති වුච්චති. එවංවිහාරී ච, මිගජාල, භික්ඛු කිඤ්චාපි අරඤ්ඤවනපත්ථානි පන්තානි සෙනාසනානි පටිසෙවති අප්පසද්දානි අප්පනිග්ඝොසානි විජනවාතානි මනුස්සරාහස්සෙය්යකානි පටිසල්ලානසාරුප්පානි; අථ ඛො සදුතියවිහාරීති වුච්චති. තං කිස්ස හෙතු? තණ්හා හිස්ස දුතියා, සාස්ස අප්පහීනා. තස්මා සදුතියවිහාරී’’ති වුච්චති. “मिगजाल, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्याच्यामध्ये नंदी (तृष्णा) उत्पन्न होते. नंदी असल्यावर तीव्र राग उत्पन्न होतो; तीव्र राग असल्यावर संयोग निर्माण होतो. मिगजाल, अशा नंदी-संयोजनाने बद्ध असलेल्या भिक्खूला ‘सदुतीयविहारी’ असे म्हटले जाते. ... मिगजाल, जिभेने जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रस आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्याच्यामध्ये नंदी उत्पन्न होते. नंदी असल्यावर तीव्र राग उत्पन्न होतो; तीव्र राग असल्यावर संयोग निर्माण होतो. मिगजाल, अशा नंदी-संयोजनाने बद्ध असलेल्या भिक्खूला ‘सदुतीयविहारी’ असे म्हटले जाते. मिगजाल, असा राहणारा भिक्खू जरी अरण्य, वनप्रस्थ यांसारख्या निर्जन, शांत, मानवी कोलाहलापासून दूर, एकांतात ध्यान करण्यास योग्य अशा दूरवरच्या सेनासनांचा (निवासस्थानांचा) आश्रय घेत असला, तरीही त्याला ‘सदुतीयविहारी’ असेच म्हटले जाते. त्याचे कारण काय? कारण तृष्णा हीच त्याची सोबती आहे आणि ती त्याने नष्ट केलेली नाही. म्हणूनच त्याला ‘सदुतीयविहारी’ असे म्हटले जाते।” ‘‘සන්ති ච ඛො, මිගජාල, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො නන්දී නිරුජ්ඣති. නන්දියා අසති සාරාගො න හොති; සාරාගෙ අසති සංයොගො න හොති. නන්දිසංයොජනවිසංයුත්තො ඛො, මිගජාල, භික්ඛු එකවිහාරීති වුච්චති…පෙ… සන්ති ච ඛො, මිගජාල, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති ච ඛො, මිගජාල, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො නන්දී නිරුජ්ඣති. නන්දියා අසති සාරාගො න හොති; සාරාගෙ අසති සංයොගො න හොති. නන්දිසංයොජනවිප්පයුත්තො ඛො, මිගජාල, භික්ඛු එකවිහාරීති වුච්චති. එවංවිහාරී ච, මිගජාල, භික්ඛු කිඤ්චාපි ගාමන්තෙ විහරති ආකිණ්ණො භික්ඛූහි භික්ඛුනීහි උපාසකෙහි උපාසිකාහි රාජූහි රාජමහාමත්තෙහි තිත්ථියෙහි තිත්ථියසාවකෙහි. අථ ඛො එකවිහාරීති වුච්චති. තං කිස්ස හෙතු? තණ්හා හිස්ස දුතියා, සාස්ස පහීනා. තස්මා එකවිහාරීති වුච්චතී’’ති. පඨමං. “परंतु मिगजाल, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्याच्यामध्ये नंदी निरुद्ध होते. नंदी नसल्यावर तीव्र राग उत्पन्न होत नाही; तीव्र राग नसल्यावर संयोग निर्माण होत नाही. मिगजाल, अशा नंदी-संयोजनापासून मुक्त असलेल्या भिक्खूला ‘एकविहारी’ असे म्हटले जाते. ... मिगजाल, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... मिगजाल, मनाने जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे धम्म आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्याच्यामध्ये नंदी निरुद्ध होते. नंदी नसल्यावर तीव्र राग उत्पन्न होत नाही; तीव्र राग नसल्यावर संयोग निर्माण होत नाही. मिगजाल, अशा नंदी-संयोजनापासून मुक्त असलेल्या भिक्खूला ‘एकविहारी’ असे म्हटले जाते. मिगजाल, असा राहणारा भिक्खू जरी गावाच्या सीमेवर राहत असला आणि भिक्खू, भिक्खुणी, उपासक, उपासिका, राजे, राजमहामात्र, इतर पंथांचे आचार्य आणि त्यांचे शिष्य यांच्या गर्दीत राहत असला, तरीही त्याला ‘एकविहारी’ असेच म्हटले जाते. त्याचे कारण काय? कारण तृष्णा हीच त्याची सोबती होती आणि ती त्याने नष्ट केली आहे. म्हणूनच त्याला ‘एकविहारी’ असे म्हटले जाते.” प्रथम सुत्त समाप्त. 2. දුතියමිගජාලසුත්තං २. द्वितीय मिगजाल सुत्त 64. අථ [Pg.265] ඛො ආයස්මා මිගජාලො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා මිගජාලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන ධම්මං දෙසෙතු, යමහං භගවතො ධම්මං සුත්වා එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරෙය්ය’’න්ති. ६४. तेव्हा आयुष्यमान मिगजाल जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान मिगजालने भगवंतांना असे म्हटले – 'भन्ते, हे चांगले होईल जर भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्म उपदेश करावा, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकटा, एकांतात, अप्रमत्त, आतापी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू शकेन.' ‘‘සන්ති ඛො, මිගජාල, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො උප්පජ්ජති නන්දී. නන්දිසමුදයා දුක්ඛසමුදයො, මිගජාලාති වදාමි…පෙ… සන්ති ච ඛො, මිගජාල, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති ච ඛො, මිගජාල, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො උප්පජ්ජති නන්දී. නන්දිසමුදයා දුක්ඛසමුදයො, මිගජාලාති වදාමි. “मिगजाल, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्याच्यामध्ये नंदी (तृष्णा) उत्पन्न होते. मिगजाल, मी असे सांगतो की, नंदीच्या उदयामुळे दुःखाचा उदय होतो. ... मिगजाल, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... मिगजाल, मनाने जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे धम्म आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्याच्यामध्ये नंदी उत्पन्न होते. मिगजाल, मी असे सांगतो की, नंदीच्या उदयामुळे दुःखाचा उदय होतो.” ‘‘සන්ති ච ඛො, මිගජාල, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො නන්දී නිරුජ්ඣති. නන්දිනිරොධා දුක්ඛනිරොධො, මිගජාලාති වදාමි…පෙ… සන්ති ච ඛො, මිගජාල, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා ඉට්ඨා කන්තා…පෙ… සන්ති ච ඛො, මිගජාල, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො නන්දී නිරුජ්ඣති. නන්දිනිරොධා දුක්ඛනිරොධො, මිගජාලාති වදාමී’’ති. “परंतु मिगजाल, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्याच्यामध्ये नंदी निरुद्ध होते. मिगजाल, मी असे सांगतो की, नंदीच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो. ... मिगजाल, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... मिगजाल, मनाने जाणता येण्याजोगे असे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे धम्म आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्याच्यामध्ये नंदी निरुद्ध होते. मिगजाल, मी असे सांगतो की, नंदीच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो.” අථ ඛො ආයස්මා මිගජාලො භගවතො භාසිතං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා උට්ඨායාසනා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමි. අථ ඛො ආයස්මා මිගජාලො එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරතො නචිරස්සෙව – යස්සත්ථාය කුලපුත්තා සම්මදෙව අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජන්ති තදනුත්තරං – බ්රහ්මචරියපරියොසානං දිට්ඨෙව [Pg.266] ධම්මෙ සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහාසි. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා මිගජාලො අරහතං අහොසීති. දුතියං. तेव्हा आयुष्यमान मिगजाल भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून व त्याचा मनापासून स्वीकार करून आसनावरून उठला, भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि निघून गेला. त्यानंतर आयुष्यमान मिगजाल एकटा, एकांतात, अप्रमत्त, आतापी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना, फार काळ न जाता – ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य प्रकारे घराचा त्याग करून अनगारिक (गृहहीन) प्रव्रज्या घेतात, ते अनुत्तर ब्रह्मचर्याचे अंतिम ध्येय (अर्हतपद) याच जन्मात स्वतः उच्च ज्ञानाने जाणून, साक्षात करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहार करू लागला. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर काहीही उरलेले नाही,' असे त्याने प्रत्यक्ष जाणले. आणि आयुष्यमान मिगजाल अर्हतांपैकी एक झाला. द्वितीय सुत्त समाप्त. 3. පඨමසමිද්ධිමාරපඤ්හාසුත්තං ३. प्रथम समिद्धि मारपञ्ह सुत्त 65. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අථ ඛො ආයස්මා සමිද්ධි යෙන භගවා…පෙ… භගවන්තං එතදවොච – ‘‘‘මාරො, මාරො’ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, මාරො වා අස්ස මාරපඤ්ඤත්ති වා’’ති? ६५. एकदा भगवान राजगृहात वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान समिद्धी जेथे भगवान होते तेथे गेले... आणि भगवंतांना असे म्हणाले – “भन्ते, ‘मार, मार’ असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती (संकल्पना) असू शकते?” ‘‘යත්ථ ඛො, සමිද්ධි, අත්ථි චක්ඛු, අත්ථි රූපා, අත්ථි චක්ඛුවිඤ්ඤාණං, අත්ථි චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, අත්ථි තත්ථ මාරො වා මාරපඤ්ඤත්ති වා. අත්ථි සොතං, අත්ථි සද්දා, අත්ථි සොතවිඤ්ඤාණං, අත්ථි සොතවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, අත්ථි තත්ථ මාරො වා මාරපඤ්ඤත්ති වා. අත්ථි ඝානං, අත්ථි ගන්ධා, අත්ථි ඝානවිඤ්ඤාණං, අත්ථි ඝානවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, අත්ථි තත්ථ මාරො වා මාරපඤ්ඤත්ති වා. අත්ථි ජිව්හා, අත්ථි රසා, අත්ථි ජිව්හාවිඤ්ඤාණං, අත්ථි ජිව්හාවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, අත්ථි තත්ථ මාරො වා මාරපඤ්ඤත්ති වා. අත්ථි කායො, අත්ථි ඵොට්ඨබ්බා, අත්ථි කායවිඤ්ඤාණං, අත්ථි කායවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, අත්ථි තත්ථ මාරො වා මාරපඤ්ඤත්ති වා. අත්ථි මනො, අත්ථි ධම්මා, අත්ථි මනොවිඤ්ඤාණං, අත්ථි මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, අත්ථි තත්ථ මාරො වා මාරපඤ්ඤත්ති වා. “समिद्धी, जेथे डोळा आहे, रूपे आहेत, चक्षु-विज्ञान आहे, चक्षु-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते. जेथे कान आहे, शब्द आहेत, श्रोत-विज्ञान आहे, श्रोत-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते. जेथे नाक आहे, गंध आहेत, घ्राण-विज्ञान आहे, घ्राण-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते. जेथे जीभ आहे, रस आहेत, जिव्हा-विज्ञान आहे, जिव्हा-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते. जेथे शरीर आहे, स्पर्श आहेत, काय-विज्ञान आहे, काय-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते. जेथे मन आहे, धर्म आहेत, मनो-विज्ञान आहे, मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती असते.” ‘‘යත්ථ ච ඛො, සමිද්ධි, නත්ථි චක්ඛු, නත්ථි රූපා, නත්ථි චක්ඛුවිඤ්ඤාණං, නත්ථි චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, නත්ථි තත්ථ මාරො වා මාරපඤ්ඤත්ති වා. නත්ථි සොතං…පෙ… නත්ථි ඝානං…පෙ… නත්ථි ජිව්හා, නත්ථි රසා, නත්ථි ජිව්හාවිඤ්ඤාණං, නත්ථි ජිව්හාවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, නත්ථි තත්ථ මාරො වා මාරපඤ්ඤත්ති වා. නත්ථි කායො…පෙ…. නත්ථි මනො, නත්ථි ධම්මා, නත්ථි මනොවිඤ්ඤාණං, නත්ථි මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, නත්ථි තත්ථ මාරො වා මාරපඤ්ඤත්ති වා’’ති. තතියං. “परंतु समिद्धी, जेथे डोळा नाही, रूपे नाहीत, चक्षु-विज्ञान नाही, चक्षु-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म नाहीत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती नसते. जेथे कान नाही... नाक नाही... जीभ नाही, रस नाहीत, जिव्हा-विज्ञान नाही, जिव्हा-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म नाहीत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती नसते. जेथे शरीर नाही... जेथे मन नाही, धर्म नाहीत, मनो-विज्ञान नाही, मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म नाहीत, तेथे मार किंवा माराची प्रज्ञप्ती नसते.” (तिसरे सूत्र समाप्त) 4. සමිද්ධිසත්තපඤ්හාසුත්තං ४. समिद्धिसत्तपञ्हसुत्त (समिद्धी प्राणी-प्रश्न सूत्र) 66. ‘‘‘සත්තො, සත්තො’ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, සත්තො වා අස්ස සත්තපඤ්ඤත්ති වා’’ති…පෙ…. චතුත්ථං. ६६. “भन्ते, ‘सत्त (प्राणी), सत्त’ असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात सत्त किंवा सत्ताची प्रज्ञप्ती असू शकते?”... (चौथे सूत्र समाप्त) 5. සමිද්ධිදුක්ඛපඤ්හාසුත්තං ५. समिद्धिदुक्खपञ्हसुत्त (समिद्धी दुःख-प्रश्न सूत्र) 67. ‘‘‘දුක්ඛං[Pg.267], දුක්ඛ’න්ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, දුක්ඛං වා අස්ස දුක්ඛපඤ්ඤත්ති වා’’ති…පෙ…. පඤ්චමං. ६७. “भन्ते, ‘दुःख, दुःख’ असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात दुःख किंवा दुःखाची प्रज्ञप्ती असू शकते?”... (पाचवे सूत्र समाप्त) 6. සමිද්ධිලොකපඤ්හාසුත්තං ६. समिद्धिलोकपञ्हसुत्त (समिद्धी लोक-प्रश्न सूत्र) 68. ‘‘‘ලොකො, ලොකො’ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, ලොකො වා අස්ස ලොකපඤ්ඤත්ති වා’’ති? යත්ථ ඛො, සමිද්ධි, අත්ථි චක්ඛු, අත්ථි රූපා, අත්ථි චක්ඛුවිඤ්ඤාණං, අත්ථි චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, අත්ථි තත්ථ ලොකො වා ලොකපඤ්ඤත්ති වාති…පෙ… අත්ථි ජිව්හා…පෙ… අත්ථි මනො, අත්ථි ධම්මා, අත්ථි මනොවිඤ්ඤාණං, අත්ථි මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, අත්ථි තත්ථ ලොකො වා ලොකපඤ්ඤත්ති වා. ६८. “भन्ते, ‘लोक, लोक’ असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात लोक किंवा लोकाची प्रज्ञप्ती असू शकते?” “समिद्धी, जेथे डोळा आहे, रूपे आहेत, चक्षु-विज्ञान आहे, चक्षु-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे लोक किंवा लोकाची प्रज्ञप्ती असते... जेथे जीभ आहे... जेथे मन आहे, धर्म आहेत, मनो-विज्ञान आहे, मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म आहेत, तेथे लोक किंवा लोकाची प्रज्ञप्ती असते.” ‘‘යත්ථ ච ඛො, සමිද්ධි, නත්ථි චක්ඛු, නත්ථි රූපා, නත්ථි චක්ඛුවිඤ්ඤාණං, නත්ථි චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, නත්ථි තත්ථ ලොකො වා ලොකපඤ්ඤත්ති වා…පෙ… නත්ථි ජිව්හා…පෙ… නත්ථි මනො, නත්ථි ධම්මා, නත්ථි මනොවිඤ්ඤාණං, නත්ථි මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බා ධම්මා, නත්ථි තත්ථ ලොකො වා ලොකපඤ්ඤත්ති වා’’ති. ඡට්ඨං. “परंतु समिद्धी, जेथे डोळा नाही, रूपे नाहीत, चक्षु-विज्ञान नाही, चक्षु-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म नाहीत, तेथे लोक किंवा लोकाची प्रज्ञप्ती नसते... जेथे जीभ नाही... जेथे मन नाही, धर्म नाहीत, मनो-विज्ञान नाही, मनो-विज्ञानाने जाणले जाणारे धर्म नाहीत, तेथे लोक किंवा लोकाची प्रज्ञप्ती नसते.” (सहावे सूत्र समाप्त) 7. උපසෙනආසීවිසසුත්තං ७. उपसेनआसीविससुत्त (उपसेन आणि विषारी साप सूत्र) 69. එකං සමයං ආයස්මා ච සාරිපුත්තො ආයස්මා ච උපසෙනො රාජගහෙ විහරන්ති සීතවනෙ සප්පසොණ්ඩිකපබ්භාරෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මතො උපසෙනස්ස කායෙ ආසීවිසො පතිතො හොති. අථ ඛො ආයස්මා උපසෙනො භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘එථ මෙ, ආවුසො, ඉමං කායං මඤ්චකං ආරොපෙත්වා බහිද්ධා නීහරථ. පුරායං කායො ඉධෙව විකිරති; සෙය්යථාපි භුසමුට්ඨී’’ති. ६९. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान उपसेन राजगृहातील शीतवनात सप्पसोंडिक कपारीत विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान उपसेन यांच्या शरीरावर एक विषारी साप पडला. तेव्हा आयुष्यमान उपसेन यांनी भिक्खूंना बोलावले – “या, आवुसो, माझ्या या शरीराला खाटेवर ठेवून बाहेर घेऊन जा. हे शरीर येथेच कोंड्याच्या मुठीसारखे विखुरण्यापूर्वी याला बाहेर काढा.” එවං වුත්තෙ, ආයස්මා සාරිපුත්තො ආයස්මන්තං උපසෙනං එතදවොච – ‘‘න ඛො පන මයං පස්සාම ආයස්මතො උපසෙනස්ස කායස්ස වා අඤ්ඤථත්තං ඉන්ද්රියානං වා විපරිණාමං. අථ ච පනායස්මා උපසෙනො එවමාහ – ‘එථ මෙ, ආවුසො, ඉමං කායං මඤ්චකං ආරොපෙත්වා බහිද්ධා නීහරථ. පුරායං කායො ඉධෙව විකිරති; සෙය්යථාපි භුසමුට්ඨී’’’ති. ‘‘යස්ස නූන, ආවුසො සාරිපුත්ත, එවමස්ස – ‘අහං චක්ඛූති වා මම චක්ඛූති වා…පෙ… අහං ජිව්හාති වා මම [Pg.268] ජිව්හාති වා… අහං මනොති වා මම මනොති වා’. තස්ස, ආවුසො සාරිපුත්ත, සියා කායස්ස වා අඤ්ඤථත්තං ඉන්ද්රියානං වා විපරිණාමො. මය්හඤ්ච ඛො, ආවුසො සාරිපුත්ත, න එවං හොති – ‘අහං චක්ඛූති වා මම චක්ඛූති වා…පෙ… අහං ජිව්හාති වා මම ජිව්හාති වා…පෙ… අහං මනොති වා මම මනොති වා’. තස්ස මය්හඤ්ච ඛො, ආවුසො සාරිපුත්ත, කිං කායස්ස වා අඤ්ඤථත්තං භවිස්සති, ඉන්ද්රියානං වා විපරිණාමො’’ති! असे म्हटले असता, आयुष्यमान सारिपुत्त आयुष्यमान उपसेन यांना म्हणाले – “आम्हाला तर आयुष्यमान उपसेन यांच्या शरीरात कोणताही बदल किंवा त्यांच्या इंद्रियांमध्ये कोणतीही विकृती दिसत नाही. तरीही आयुष्यमान उपसेन असे म्हणत आहेत – ‘या, आवुसो, माझ्या या शरीराला खाटेवर ठेवून बाहेर घेऊन जा. हे शरीर येथेच कोंड्याच्या मुठीसारखे विखुरण्यापूर्वी याला बाहेर काढा.’” “आवुसो सारिपुत्त, ज्याच्या मनात खरोखर असा विचार असेल – ‘मी डोळा आहे’ किंवा ‘डोळा माझा आहे’... ‘मी जीभ आहे’ किंवा ‘जीभ माझी आहे’... ‘मी मन आहे’ किंवा ‘मन माझे आहे’, आवुसो सारिपुत्त, त्याच्या शरीरात बदल किंवा इंद्रियांमध्ये विकृती घडून येईल. परंतु, आवुसो सारिपुत्त, माझ्या मनात असा विचार येत नाही – ‘मी डोळा आहे’ किंवा ‘डोळा माझा आहे’... ‘मी जीभ आहे’ किंवा ‘जीभ माझी आहे’... ‘मी मन आहे’ किंवा ‘मन माझे आहे’. मग, आवुसो सारिपुत्त, माझ्या शरीरात बदल किंवा इंद्रियांमध्ये विकृती कशी काय घडून येईल?” ‘‘තථා හි පනායස්මතො උපසෙනස්ස දීඝරත්තං අහඞ්කාරමමඞ්කාරමානානුසයො සුසමූහතො. තස්මා ආයස්මතො උපසෙනස්ස න එවං හොති – ‘අහං චක්ඛූති වා මම චක්ඛූති වා…පෙ… අහං ජිව්හාති වා මම ජිව්හාති වා…පෙ… අහං මනොති වා මම මනොති වා’’’ති. අථ ඛො තෙ භික්ඛූ ආයස්මතො උපසෙනස්ස කායං මඤ්චකං ආරොපෙත්වා බහිද්ධා නීහරිංසු. අථ ඛො ආයස්මතො උපසෙනස්ස කායො තත්ථෙව විකිරි; සෙය්යථාපි භුසමුට්ඨීති. සත්තමං. “हे अगदी योग्य आहे, कारण आयुष्यमान उपसेन यांनी दीर्घकाळापासून अहंकार (मी-पणा), ममाकार (माझे-पणा) आणि मानानुशय (अभिमानाची सुप्त प्रवृत्ती) पूर्णपणे मुळासकट नष्ट केली आहे. म्हणूनच आयुष्यमान उपसेन यांच्या मनात असा विचार येत नाही – ‘मी डोळा आहे’ किंवा ‘डोळा माझा आहे’... ‘मी जीभ आहे’ किंवा ‘जीभ माझी आहे’... ‘मी मन आहे’ किंवा ‘मन माझे आहे’.” त्यानंतर त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान उपसेन यांचे शरीर खाटेवर ठेवून बाहेर काढले. तेव्हा आयुष्यमान उपसेन यांचे शरीर तेथेच कोंड्याच्या मुठीसारखे विखुरले. (सातवे सूत्र समाप्त) 8. උපවාණසන්දිට්ඨිකසුත්තං ८. उपवाणसन्दिट्ठिकसुत्त (उपवाण आणि प्रत्यक्ष दिसणारा धर्म सूत्र) 70. අථ ඛො ආයස්මා උපවාණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා උපවාණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘‘සන්දිට්ඨිකො ධම්මො, සන්දිට්ඨිකො ධම්මො’ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, සන්දිට්ඨිකො ධම්මො හොති, අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’ති? ७०. तेव्हा आयुष्यमान उपवाण जेथे भगवान होते तेथे गेले... एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान उपवाण भगवंतांना असे म्हणाले – “भन्ते, ‘सन्दिट्ठिक धम्म (प्रत्यक्ष अनुभवता येणारा धर्म), सन्दिट्ठिक धम्म’ असे म्हटले जाते. भन्ते, धर्म कोणत्या मर्यादेपर्यंत सन्दिट्ठिक (प्रत्यक्ष अनुभवता येणारा), अकालिक (तात्काळ फळ देणारा), एहिपस्सिक (या आणि पहा असे म्हणण्यास योग्य), ओपनेय्यिक (हृदयात धारण करण्यास योग्य) आणि विद्वानांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्यास योग्य असा होतो?” ‘‘ඉධ පන, උපවාණ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා රූපප්පටිසංවෙදී ච හොති රූපරාගප්පටිසංවෙදී ච. සන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං රූපෙසු රාගං ‘අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රූපෙසු රාගො’ති පජානාති. යං තං, උපවාණ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා රූපප්පටිසංවෙදී ච හොති රූපරාගප්පටිසංවෙදී ච. සන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං රූපෙසු රාගං ‘අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රූපෙසු රාගො’ති පජානාති. එවම්පි ඛො, උපවාණ, සන්දිට්ඨිකො ධම්මො හොති අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’ති…පෙ…. “हे उपवाण, या शासनात (धम्मात) भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून रूपाचा अनुभव घेतो आणि रूपावरील रागाचा (आसक्तीचा) देखील अनुभव घेतो. आपल्यामध्ये रूपाविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये रूपाविषयी राग आहे’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून रूपाचा अनुभव घेतो आणि रूपावरील रागाचा अनुभव घेतो; आणि आपल्यामध्ये रूपाविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये रूपाविषयी राग आहे’ असे स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, अशा प्रकारे धम्म हा संदिट्ठिको (प्रत्यक्ष पाहण्याजोगा), अकालिको (तात्काळ फळ देणारा), एहिपस्सिको (या आणि पहा असे म्हणण्यास योग्य), ओपनेय्यिको (स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य) आणि विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी स्वतःच अनुभवण्याजोगा असतो.” ...पे... ‘‘පුන චපරං, උපවාණ, භික්ඛු ජිව්හාය රසං සායිත්වා රසප්පටිසංවෙදී ච හොති රසරාගප්පටිසංවෙදී ච. සන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං රසෙසු රාගං ‘අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රසෙසු රාගො’ති පජානාති. යං තං, උපවාණ, භික්ඛු ජිව්හාය රසං සායිත්වා රසප්පටිසංවෙදී ච හොති රසරාගප්පටිසංවෙදී ච. සන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං රසෙසු [Pg.269] රාගං ‘අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රසෙසු රාගො’ති පජානාති. එවම්පි ඛො, උපවාණ, සන්දිට්ඨිකො ධම්මො හොති අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’ති…පෙ…. “पुन्हा दुसरे असे की, हे उपवाण, भिक्खू जिभेने रसाची चव घेऊन रसाचा अनुभव घेतो आणि रसावरील रागाचा (आसक्तीचा) देखील अनुभव घेतो. आपल्यामध्ये रसांविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये रसांविषयी राग आहे’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, भिक्खू जिभेने रसाची चव घेऊन रसाचा अनुभव घेतो आणि रसावरील रागाचा अनुभव घेतो; आणि आपल्यामध्ये रसांविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये रसांविषयी राग आहे’ असे स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, अशा प्रकारे धम्म हा संदिट्ठिको, अकालिको, एहिपस्सिको, ओपनेय्यिको आणि विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी स्वतःच अनुभवण्याजोगा असतो.” ...पे... ‘‘පුන චපරං, උපවාණ, භික්ඛු මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය ධම්මප්පටිසංවෙදී ච හොති ධම්මරාගප්පටිසංවෙදී ච. සන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු රාගං ‘අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු රාගො’ති පජානාති. යං තං, උපවාණ, භික්ඛු මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය ධම්මප්පටිසංවෙදී ච හොති ධම්මරාගප්පටිසංවෙදී ච. සන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු රාගං ‘අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු රාගො’ති පජානාති. එවම්පි ඛො, උපවාණ, සන්දිට්ඨිකො ධම්මො හොති…පෙ… පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’ති…පෙ…. “पुन्हा दुसरे असे की, हे उपवाण, भिक्खू मनाने धर्माला (मानसिक विषयाला) जाणून धर्माचा अनुभव घेतो आणि धर्मावरील रागाचा (आसक्तीचा) देखील अनुभव घेतो. आपल्यामध्ये धर्मांविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये धर्मांविषयी राग आहे’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, भिक्खू मनाने धर्माला जाणून धर्माचा अनुभव घेतो आणि धर्मावरील रागाचा अनुभव घेतो; आणि आपल्यामध्ये धर्मांविषयी राग विद्यमान असताना, ‘माझ्यामध्ये धर्मांविषयी राग आहे’ असे स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, अशा प्रकारे धम्म हा संदिट्ठिको असतो... ...विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी स्वतःच अनुभवण्याजोगा असतो.” ...पे... ‘‘ඉධ පන, උපවාණ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා රූපප්පටිසංවෙදී ච හොති, නො ච රූපරාගප්පටිසංවෙදී. අසන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං රූපෙසු රාගං ‘නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රූපෙසු රාගො’ති පජානාති. යං තං, උපවාණ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා රූපප්පටිසංවෙදීහි ඛො හොති, නො ච රූපරාගප්පටිසංවෙදී. අසන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං රූපෙසු රාගං ‘නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රූපෙසු රාගො’ති පජානාති. එවම්පි ඛො, උපවාණ, සන්දිට්ඨිකො ධම්මො හොති, අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’ති…පෙ…. “परंतु हे उपवाण, या शासनात भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून रूपाचा अनुभव तर घेतो, पण रूपावरील रागाचा (आसक्तीचा) अनुभव घेत नाही. आपल्यामध्ये रूपाविषयी राग विद्यमान नसताना, ‘माझ्यामध्ये रूपाविषयी राग नाही’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून केवळ रूपाचाच अनुभव घेतो, रूपावरील रागाचा अनुभव घेत नाही; आणि आपल्यामध्ये रूपाविषयी राग विद्यमान नसताना, ‘माझ्यामध्ये रूपाविषयी राग नाही’ असे स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, अशा प्रकारे धम्म हा संदिट्ठिको, अकालिको, एहिपस्सिको, ओपनेय्यिको आणि विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी स्वतःच अनुभवण्याजोगा असतो.” ...पे... ‘‘පුන චපරං, උපවාණ, භික්ඛු ජිව්හාය රසං සායිත්වා රසප්පටිසංවෙදීහි ඛො හොති, නො ච රසරාගප්පටිසංවෙදී. අසන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං රසෙසු රාගං ‘නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රසෙසු රාගො’ති පජානාති…පෙ…. “पुन्हा दुसरे असे की, हे उपवाण, भिक्खू जिभेने रसाची चव घेऊन केवळ रसाचाच अनुभव घेतो, रसावरील रागाचा अनुभव घेत नाही. आपल्यामध्ये रसांविषयी राग विद्यमान नसताना, ‘माझ्यामध्ये रसांविषयी राग नाही’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो...” ...पे... ‘‘පුන චපරං, උපවාණ, භික්ඛු මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය ධම්මප්පටිසංවෙදීහි ඛො හොති, නො ච ධම්මරාගප්පටිසංවෙදී. අසන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු රාගං ‘නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු රාගො’ති පජානාති. යං තං, උපවාණ, භික්ඛු මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය ධම්මප්පටිසංවෙදීහි ඛො හොති, නො ච ධම්මරාගප්පටිසංවෙදී. අසන්තඤ්ච අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු රාගං ‘නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං ධම්මෙසු රාගො’ති පජානාති. එවම්පි ඛො, උපවාණ, සන්දිට්ඨිකො ධම්මො හොති, අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’’ති. අට්ඨමං. “पुन्हा दुसरे असे की, हे उपवाण, भिक्खू मनाने धर्माला जाणून केवळ धर्माचाच अनुभव घेतो, धर्मावरील रागाचा अनुभव घेत नाही. आपल्यामध्ये धर्मांविषयी राग विद्यमान नसताना, ‘माझ्यामध्ये धर्मांविषयी राग नाही’ असे तो स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, भिक्खू मनाने धर्माला जाणून केवळ धर्माचाच अनुभव घेतो, धर्मावरील रागाचा अनुभव घेत नाही; आणि आपल्यामध्ये धर्मांविषयी राग विद्यमान नसताना, ‘माझ्यामध्ये धर्मांविषयी राग नाही’ असे स्पष्टपणे जाणतो. हे उपवाण, अशा प्रकारे धम्म हा संदिट्ठिको, अकालिको, एहिपस्सिको, ओपनेय्यिको आणि विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी स्वतःच अनुभवण्याजोगा असतो.” आठवे. 9. පඨමඡඵස්සායතනසුත්තං ९. प्रथम छफस्सायतन सुत्त 71. ‘‘යො හි කොචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං නප්පජානාති. අවුසිතං [Pg.270] තෙන බ්රහ්මචරියං, ආරකා සො ඉමස්මා ධම්මවිනයා’’ති. ७१. “भिक्खूंनो, जो कोणी भिक्खू सहा स्पर्शायतनांचा (स्पर्शाच्या सहा आधारांचा) उदय (उत्पत्ती), अस्त (लय), आस्वाद (सुखद अनुभव), आदीनव (दोष/धोका) आणि निस्सरण (मुक्ती/सुटका) हे जसे आहे तसे (यथाभूत) जाणत नाही; त्याने ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेले नाही, तो या धम्म-विनयापासून खूप दूर आहे.” එවං වුත්තෙ, අඤ්ඤතරො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘එත්ථාහං, භන්තෙ, අනස්සසං. අහඤ්හි, භන්තෙ, ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං නප්පජානාමී’’ති. असे म्हटले असता, एका भिक्खूने भगवंतांना असे म्हटले— “भंते, या बाबतीत मी नष्ट झालो आहे (माझे नुकसान झाले आहे). कारण भंते, मी सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणत नाही.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, භික්ඛු, චක්ඛුං ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සසී’’ති? “भिक्खू, तुला काय वाटते? तू डोळ्याकडे ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ अशा दृष्टीने पाहतोस का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नाही, भंते.” ‘‘සාධු, භික්ඛු, එත්ථ ච තෙ, භික්ඛු, චක්ඛු ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය සුදිට්ඨං භවිස්සති. එසෙවන්තො දුක්ඛස්ස…පෙ… ජිව්හං ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සසී’’ති? “उत्तम, भिक्खू! आणि या बाबतीत, भिक्खू, तू डोळ्याकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे योग्य प्रज्ञेने जसे आहे तसे (यथाभूत) चांगल्या प्रकारे पाहिले पाहिजेस. हाच दुःखाचा अंत आहे. ...पे... तू जिभेकडे ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ अशा दृष्टीने पाहतोस का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नाही, भंते.” ‘‘සාධු, භික්ඛු, එත්ථ ච තෙ, භික්ඛු, ජිව්හා ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය සුදිට්ඨං භවිස්සති. එසෙවන්තො දුක්ඛස්ස…පෙ… මනං ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සසී’’ති? “उत्तम, भिक्खू! आणि या बाबतीत, भिक्खू, तू जिभेकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे योग्य प्रज्ञेने जसे आहे तसे चांगल्या प्रकारे पाहिले पाहिजेस. हाच दुःखाचा अंत आहे. ...पे... तू मनाकडे ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ अशा दृष्टीने पाहतोस का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नाही, भंते.” ‘‘සාධු, භික්ඛු, එත්ථ ච තෙ, භික්ඛු, මනො ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය සුදිට්ඨං භවිස්සති. එසෙවන්තො දුක්ඛස්සා’’ති. නවමං. “उत्तम, भिक्खू! आणि या बाबतीत, भिक्खू, तू मनाकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे योग्य प्रज्ञेने जसे आहे तसे चांगल्या प्रकारे पाहिले पाहिजेस. हाच दुःखाचा अंत आहे.” नववे. 10. දුතියඡඵස්සායතනසුත්තං १०. द्वितीय छफस्सायतन सुत्त 72. ‘‘යො හි කොචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං නප්පජානාති. අවුසිතං තෙන බ්රහ්මචරියං, ආරකා සො ඉමස්මා ධම්මවිනයා’’ති. ७२. “भिक्खूंनो, जो कोणी भिक्खू सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणत नाही; त्याने ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेले नाही, तो या धम्म-विनयापासून खूप दूर आहे.” එවං වුත්තෙ, අඤ්ඤතරො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘එත්ථාහං, භන්තෙ, අනස්සසං පනස්සසං. අහඤ්හි, භන්තෙ, ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං නප්පජානාමී’’ති. असे म्हटले असता, एका भिक्खूने भगवंतांना असे म्हटले— “भंते, या बाबतीत मी पूर्णपणे नष्ट झालो आहे (माझे मोठे नुकसान झाले आहे). कारण भंते, मी सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणत नाही.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, භික්ඛු, චක්ඛුං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සසී’’ති? “भिक्खू, तुला काय वाटते? तू डोळ्याकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा दृष्टीने पाहतोस का?” ‘‘එවං, භන්තෙ’’. “होय, भंते.” ‘‘සාධු, භික්ඛු, එත්ථ ච තෙ, භික්ඛු, චක්ඛු ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය සුදිට්ඨං භවිස්සති. එවං තෙ එතං පඨමං ඵස්සායතනං පහීනං භවිස්සති [Pg.271] ආයතිං අපුනබ්භවාය…පෙ…. “साधू, भिक्खू! आणि येथे, भिक्खू, तू चक्षूकडे (डोळ्याकडे) ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. अशा प्रकारे, भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्यासाठी तुझ्याकडून हे पहिले स्पर्शायतन प्रहीन (नष्ट) केले जाईल...” ‘‘ජිව්හං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සසී’’ති? “तू जिव्हेकडे (जिभेकडे) ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे पाहतोस का?” ‘‘එවං, භන්තෙ’’. “होय, भन्ते.” ‘‘සාධු, භික්ඛු, එත්ථ ච තෙ, භික්ඛු, ජිව්හා ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය සුදිට්ඨං භවිස්සති. එවං තෙ එතං චතුත්ථං ඵස්සායතනං පහීනං භවිස්සති ආයතිං අපුනබ්භවාය…පෙ…. “साधू, भिक्खू! आणि येथे, भिक्खू, तू जिव्हेकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. अशा प्रकारे, भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्यासाठी तुझ्याकडून हे चौथे स्पर्शायतन प्रहीन (नष्ट) केले जाईल...” ‘‘මනං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සසී’’ති? “तू मनाकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे पाहतोस का?” ‘‘එවං, භන්තෙ’’. “होय, भन्ते.” ‘‘සාධු, භික්ඛු, එත්ථ ච තෙ, භික්ඛු, මනො ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය සුදිට්ඨං භවිස්සති. එවං තෙ එතං ඡට්ඨං ඵස්සායතනං පහීනං භවිස්සති ආයතිං අපුනබ්භවායා’’ති. දසමං. “साधू, भिक्खू! आणि येथे, भिक्खू, तू मनाकडे ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. अशा प्रकारे, भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्यासाठी तुझ्याकडून हे सहावे स्पर्शायतन प्रहीन (नष्ट) केले जाईल.” (दहावे सूत्र समाप्त.) 11. තතියඡඵස්සායතනසුත්තං ११. तिसरे छफस्सायतन सूत्र 73. ‘‘යො හි කොචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං නප්පජානාති. අවුසිතං තෙන බ්රහ්මචරියං, ආරකා සො ඉමස්මා ධම්මවිනයා’’ති. ७३. “भिक्खूंनो, जो कोणी भिक्खू या सहा स्पर्शायतनांचा उदय (उत्पत्ती), अस्त (लय), आस्वाद (सुखद अनुभव), आदीनव (दोष) आणि निस्सरण (मुक्ती) यथार्थपणे जाणत नाही; त्याने ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेले नाही, तो या धम्म-विनयापासून दूर आहे.” එවං වුත්තෙ, අඤ්ඤතරො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘එත්ථාහං, භන්තෙ, අනස්සසං පනස්සසං. අහඤ්හි, භන්තෙ, ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං නප්පජානාමී’’ති. असे म्हटले असता, एक भिक्खू भगवंतांना म्हणाला, “भन्ते, येथे मी पूर्णपणे नष्ट झालो आहे, अत्यंत नष्ट झालो आहे. कारण, भन्ते, मी या सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण यथार्थपणे जाणत नाही.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, භික්ඛු, චක්ඛු නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “भिक्खू, तुला काय वाटते, चक्षू (डोळा) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील (विपरिणामधर्मी) आहे, त्याकडे ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ अशा प्रकारे पाहणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘සොතං… ඝානං… ජිව්හා… කායො… මනො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? “श्रोत (कान)... घ्राण (नाक)... जिव्हा (जीभ)... काय (शरीर)... मन नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’. “अनित्य, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याकडे ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ अशा प्रकारे पाहणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘එවං පස්සං, භික්ඛු, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, සොතස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ඝානස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ජිව්හායපි නිබ්බින්දති, කායස්මිම්පි නිබ්බින්දති, මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. එකාදසමං. “असे पाहणारा, भिक्खू, श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षूविषयीही निर्वेद (उदासीनता) पावतो, श्रोताविषयीही निर्वेद पावतो, घ्राणाविषयीही निर्वेद पावतो, जिव्हेविषयीही निर्वेद पावतो, कायेविषयीही निर्वेद पावतो, मनाविषयीही निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरागामुळे तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर ‘मी मुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ हे तो जाणतो.” (अकरावे सूत्र समाप्त.) මිගජාලවග්ගො සත්තමො. मिगजाल वर्ग सातवा समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचे उद्दान (अनुक्रमणिका) – මිගජාලෙන [Pg.272] ද්වෙ වුත්තා, චත්තාරො ච සමිද්ධිනා; උපසෙනො උපවාණො, ඡඵස්සායතනිකා තයොති. मिगजालाने दोन (सूत्रे) सांगितली, आणि समिद्धीने चार; उपसेन, उपवाण आणि तीन छफस्सायतनिक सूत्रे आहेत. 8. ගිලානවග්ගො ८. गिलाण वर्ग 1. පඨමගිලානසුත්තං १. पहिले गिलाण सूत्र 74. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො සො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අමුකස්මිං, භන්තෙ, විහාරෙ අඤ්ඤතරො භික්ඛු නවො අප්පඤ්ඤාතො ආබාධිකො දුක්ඛිතො බාළ්හගිලානො. සාධු, භන්තෙ, භගවා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමතු අනුකම්පං උපාදායා’’ති. ७४. श्रावस्ती येथील घटना. तेव्हा एक भिक्खू भगवंतांकडे गेला... (इत्यादी)... एका बाजूला बसल्यावर तो भिक्खू भगवंतांना म्हणाला, “भन्ते, अमुक एका विहारात एक नवदीक्षित, अपरिचित भिक्खू आजारी, पीडित आणि गंभीरपणे आजारी (गिलाण) आहे. भन्ते, भगवंतांनी अनुकंपा करून त्या भिक्खूकडे जावे, ही विनंती.” අථ ඛො භගවා නවවාදඤ්ච සුත්වා ගිලානවාදඤ්ච, ‘‘අප්පඤ්ඤාතො භික්ඛූ’’ති ඉති විදිත්වා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි. අද්දසා ඛො සො භික්ඛු භගවන්තං දූරතොව ආගච්ඡන්තං. දිස්වාන මඤ්චකෙ සමධොසි. අථ ඛො භගවා තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘අලං, භික්ඛු, මා ත්වං මඤ්චකෙ සමධොසි. සන්තිමානි ආසනානි පඤ්ඤත්තානි, තත්ථාහං නිසීදිස්සාමී’’ති. නිසීදි භගවා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ. නිසජ්ජ ඛො භගවා තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘කච්චි තෙ, භික්ඛු, ඛමනීයං, කච්චි යාපනීයං, කච්චි දුක්ඛා වෙදනා පටික්කමන්ති නො අභික්කමන්ති, පටික්කමොසානං පඤ්ඤායති නො අභික්කමො’’ති? तेव्हा भगवंतांनी तो ‘नवदीक्षित’ आणि ‘आजारी’ असल्याचे ऐकून, आणि तो एक अपरिचित भिक्खू आहे हे जाणून, ते त्या भिक्खूकडे गेले. त्या भिक्खूने भगवंतांना दुरूनच येत असताना पाहिले. त्यांना पाहून तो आपल्या खाटेवरून उठण्याचा प्रयत्न करू लागला. तेव्हा भगवंत त्याला म्हणाले, “नको, भिक्खू, तू खाटेवरून उठू नकोस. ही आसने तयार आहेत, मी तिथेच बसेन.” भगवंत तयार केलेल्या आसनावर बसले. बसल्यावर भगवंत त्या भिक्खूला म्हणाले, “भिक्खू, तुझी प्रकृती ठीक आहे ना? तुला सहन होत आहे ना? तुझ्या वेदना कमी होत आहेत ना, की वाढत आहेत? वेदना कमी होत असल्याचे जाणवते आहे ना, की वाढत असल्याचे?” ‘‘න මෙ, භන්තෙ, ඛමනීයං, න යාපනීයං, බාළ්හා මෙ දුක්ඛා වෙදනා අභික්කමන්ති නො පටික්කමන්ති, අභික්කමොසානං පඤ්ඤායති නො පටික්කමො’’ති. “भन्ते, माझी प्रकृती ठीक नाही, मला सहन होत नाही. माझ्या तीव्र वेदना वाढतच आहेत, कमी होत नाहीत; वेदना वाढत असल्याचेच जाणवते आहे, कमी होत असल्याचे नाही.” ‘‘කච්චි තෙ, භික්ඛු, න කිඤ්චි කුක්කුච්චං, න කොචි විප්පටිසාරො’’ති? “भिक्खू, तुला काही पश्चात्ताप (कुकुच्च) किंवा मनस्ताप (विप्पटिसार) तर होत नाही ना?” ‘‘තග්ඝ මෙ, භන්තෙ, අනප්පකං කුක්කුච්චං, අනප්පකො විප්පටිසාරො’’ති. “नक्कीच, भन्ते, मला खूप पश्चात्ताप आणि मोठा मनस्ताप होत आहे.” ‘‘කච්චි පන තං, භික්ඛු, අත්තා සීලතො උපවදතී’’ති? “भिक्खू, तुझा आत्मा (मन) तुला शीलाच्या बाबतीत दोष देतो का?” ‘‘න ඛො මං, භන්තෙ, අත්තා සීලතො උපවදතී’’ති. “नाही, भन्ते, माझे मन मला शीलाच्या बाबतीत दोष देत नाही.” ‘‘නො චෙ කිර තෙ, භික්ඛු, අත්තා සීලතො උපවදති, අථ කිඤ්ච තෙ කුක්කුච්චං කො ච විප්පටිසාරො’’ති? “भिक्खू, जर तुझे मन तुला शीलाच्या बाबतीत दोष देत नाही, तर मग तुला कसला पश्चात्ताप आणि कसला मनस्ताप होत आहे?” ‘‘න ඛ්වාහං, භන්තෙ, සීලවිසුද්ධත්ථං භගවතා ධම්මං දෙසිතං ආජානාමී’’ති[Pg.273]. “भन्ते, भगवंतांनी केवळ शील-विशुद्धीसाठीच धम्म देशना दिली आहे, असे मी मानत नाही.” ‘‘නො චෙ කිර ත්වං, භික්ඛු, සීලවිසුද්ධත්ථං මයා ධම්මං දෙසිතං ආජානාසි, අථ කිමත්ථං චරහි ත්වං, භික්ඛු, මයා ධම්මං දෙසිතං ආජානාසී’’ති? “भिक्खू, जर मी केवळ शील-विशुद्धीसाठीच धम्म देशना दिली आहे असे तू मानत नाहीस, तर मग मी कोणत्या हेतूने धम्म देशना दिली आहे असे तू मानतोस?” ‘‘රාගවිරාගත්ථං ඛ්වාහං, භන්තෙ, භගවතා ධම්මං දෙසිතං ආජානාමී’’ති. “भन्ते, भगवंतांनी राग-विरागासाठी (आसक्ती नष्ट करण्यासाठी) धम्म देशना दिली आहे, असे मी मानतो.” ‘‘සාධු සාධු, භික්ඛු! සාධු ඛො ත්වං, භික්ඛු, රාගවිරාගත්ථං මයා ධම්මං දෙසිතං ආජානාසි. රාගවිරාගත්ථො හි, භික්ඛු, මයා ධම්මො දෙසිතො. තං කිං මඤ්ඤසි භික්ඛු, චක්ඛු නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “साधू, साधू, भिक्खू! भिक्खू, तू खूप चांगल्या प्रकारे जाणतोस की मी राग-विरागासाठी धम्म देशना दिली आहे. कारण, भिक्खू, राग-विरागासाठीच माझ्याकडून धम्म देशना दिली गेली आहे. भिक्खू, तुला काय वाटते, चक्षू (डोळा) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං…පෙ… සොතං… ඝානං… ජිව්හා… කායො… මනො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? “... कान... नाक... जीभ... शरीर... मन नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘එවං පස්සං, භික්ඛු, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, සොතස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. “हे भिक्षू, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्यांविषयीही विरक्त होतो, कानांविषयीही विरक्त होतो... मनाविषयीही विरक्त होतो. विरक्त झाल्यामुळे तो रागरहित होतो; वैराग्यामुळे तो मुक्त होतो; मुक्त झाल्यावर ‘मी मुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान त्याला होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरे काहीही करायचे उरलेले नाही’ असे तो जाणतो.” ඉදමවොච භගවා. අත්තමනො සො භික්ඛු භගවතො භාසිතං අභිනන්දි. ඉමස්මිඤ්ච පන වෙය්යාකරණස්මිං භඤ්ඤමානෙ තස්ස භික්ඛුනො විරජං වීතමලං ධම්මචක්ඛුං උදපාදි – ‘‘යං කිඤ්චි සමුදයධම්මං, සබ්බං තං නිරොධධම්ම’’න්ති. පඨමං. भगवान असे म्हणाले. तो भिक्षू आनंदी झाला आणि त्याने भगवंतांच्या भाषणाची मनापासून प्रशंसा केली. आणि हे प्रवचन दिले जात असताना, त्या भिक्षूच्या मनात निर्मळ, निष्कलंक धम्मचक्षू उत्पन्न झाले: “जे काही उत्पन्न होण्याच्या स्वभावाचे आहे, ते सर्व नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे आहे.” पहिले. 2. දුතියගිලානසුත්තං २. दुसरे गिळाणसुत्त 75. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු…පෙ… භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අමුකස්මිං, භන්තෙ, විහාරෙ අඤ්ඤතරො භික්ඛු නවො අප්පඤ්ඤාතො ආබාධිකො දුක්ඛිතො බාළ්හගිලානො. සාධු, භන්තෙ, භගවා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමතු අනුකම්පං උපාදායා’’ති. ७५. तेव्हा एक भिक्षू... भगवंतांना असे म्हणाला – “भन्ते, अमुक एका विहारात एक नवीन, अपरिचित भिक्षू आजारी, दुःखी आणि अत्यंत गंभीरपणे आजारी आहे. भन्ते, जर भगवंतांनी अनुकंपा करून त्या भिक्षूपाशी जावे, तर फार चांगले होईल.” අථ ඛො භගවා නවවාදඤ්ච සුත්වා ගිලානවාදඤ්ච, ‘‘අප්පඤ්ඤාතො භික්ඛූ’’ති ඉති විදිත්වා යෙන සො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි. අද්දසා ඛො සො භික්ඛු භගවන්තං දූරතොව ආගච්ඡන්තං. දිස්වාන මඤ්චකෙ සමධොසි. අථ ඛො භගවා තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘අලං, භික්ඛු, මා ත්වං මඤ්චකෙ සමධොසි. සන්තිමානි ආසනානි පඤ්ඤත්තානි, තත්ථාහං නිසීදිස්සාමී’’ති. නිසීදි භගවා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ. නිසජ්ජ ඛො භගවා තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘කච්චි තෙ, භික්ඛු, ඛමනීයං, කච්චි යාපනීයං, කච්චි දුක්ඛා වෙදනා පටික්කමන්ති නො අභික්කමන්ති, පටික්කමොසානං [Pg.274] පඤ්ඤායති නො අභික්කමො’’ති? तेव्हा भगवंतांनी तो नवीन भिक्षू आहे आणि आजारी आहे असे ऐकून, आणि तो अपरिचित भिक्षू आहे हे जाणून, ते त्या भिक्षूपाशी गेले. त्या भिक्षूने भगवंतांना दुरूनच येत असताना पाहिले. पाहून तो आपल्या खाटेवरून उठण्याचा प्रयत्न करू लागला. तेव्हा भगवान त्या भिक्षूला म्हणाले – “असू दे, भिक्षू, तू खाटेवरून उठू नकोस. ही आसने मांडलेली आहेत, तिथे मी बसेन.” भगवान मांडलेल्या आसनावर बसले. बसल्यावर भगवान त्या भिक्षूला म्हणाले – “भिक्षू, तुला सहन होत आहे ना? तुझा जीव थारावर आहे ना? तुझ्या वेदना कमी होत आहेत ना, वाढत तर नाहीत ना? वेदना कमी होत असल्याचे जाणवत आहे ना, वाढताना तर दिसत नाहीत ना?” ‘‘න මෙ, භන්තෙ, ඛමනීයං, න යාපනීයං…පෙ… න ඛො මං, භන්තෙ, අත්තා සීලතො උපවදතී’’ති. “भन्ते, मला सहन होत नाहीये, माझा जीव थारावर नाहीये... पण भन्ते, माझे मन मला शील पालनाच्या बाबतीत दोष देत नाही.” ‘‘නො චෙ කිර තෙ, භික්ඛු, අත්තා සීලතො උපවදති, අථ කිඤ්ච තෙ කුක්කුච්චං කො ච විප්පටිසාරො’’ති? “भिक्षू, जर तुझे मन तुला शील पालनाच्या बाबतीत दोष देत नाही, तर मग तुला कसली चिंता आणि कसला पश्चात्ताप होत आहे?” ‘‘න ඛ්වාහං, භන්තෙ, සීලවිසුද්ධත්ථං භගවතා ධම්මං දෙසිතං ආජානාමී’’ති. “भन्ते, भगवंतांनी केवळ शीलाच्या शुद्धतेसाठीच धम्माचा उपदेश केला आहे, असे मी समजत नाही.” ‘‘නො චෙ කිර ත්වං, භික්ඛු, සීලවිසුද්ධත්ථං මයා ධම්මං දෙසිතං ආජානාසි, අථ කිමත්ථං චරහි ත්වං, භික්ඛු, මයා ධම්මං දෙසිතං ආජානාසී’’ති? “भिक्षू, जर मी केवळ शीलाच्या शुद्धतेसाठी धम्माचा उपदेश केला आहे असे तू समजत नाहीस, तर मग मी कोणत्या हेतूने धम्माचा उपदेश केला आहे असे तू समजतोस?” ‘‘අනුපාදාපරිනිබ්බානත්ථං ඛ්වාහං, භන්තෙ, භගවතා ධම්මං දෙසිතං ආජානාමී’’ති. “भन्ते, भगवंतांनी आसक्तीशिवाय परिनिर्वाण प्राप्त करण्यासाठी धम्माचा उपदेश केला आहे, असे मी समजतो.” ‘‘සාධු සාධු, භික්ඛු! සාධු ඛො ත්වං, භික්ඛු, අනුපාදාපරිනිබ්බානත්ථං මයා ධම්මං දෙසිතං ආජානාසි. අනුපාදාපරිනිබ්බානත්ථො හි, භික්ඛු, මයා ධම්මො දෙසිතො. “साधू, साधू, भिक्षू! भिक्षू, मी आसक्तीशिवाय परिनिर्वाण प्राप्त करण्यासाठी धम्माचा उपदेश केला आहे, हे तू अगदी योग्य समजलास. कारण भिक्षू, माझ्याकडून धम्माचा उपदेश आसक्तीशिवाय परिनिर्वाण प्राप्त करण्यासाठीच केला गेला आहे.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, භික්ඛු, චක්ඛු නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “तुला काय वाटते, भिक्षू, डोळा नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං…පෙ… සොතං… ඝානං… ජිව්හා… කායො… මනො… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සො… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “... कान... नाक... जीभ... शरीर... मन... मनोविज्ञान... मन-स्पर्श... आणि मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद अशी जी काही वेदना आहे, ती नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘එවං පස්සං, භික්ඛු, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… මනස්මිම්පි… මනොවිඤ්ඤාණෙපි… මනොසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. “हे भिक्षू, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्यांविषयीही विरक्त होतो... मनाविषयीही... मनोविज्ञानाविषयीही... मन-स्पर्शाविषयीही विरक्त होतो. आणि मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद अशी जी काही वेदना आहे, तिच्याविषयीही विरक्त होतो. विरक्त झाल्यामुळे तो रागरहित होतो; वैराग्यामुळे तो मुक्त होतो; मुक्त झाल्यावर ‘मी मुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान त्याला होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरे काहीही करायचे उरलेले नाही’ असे तो जाणतो.” ඉදමවොච භගවා. අත්තමනො සො භික්ඛු භගවතො භාසිතං අභිනන්දි. ඉමස්මිඤ්ච පන වෙය්යාකරණස්මිං භඤ්ඤමානෙ තස්ස භික්ඛුස්ස අනුපාදාය ආසවෙහි චිත්තං විමුච්චීති. දුතියං. भगवान असे म्हणाले. तो भिक्षू आनंदी झाला आणि त्याने भगवंतांच्या भाषणाची मनापासून प्रशंसा केली. आणि हे प्रवचन दिले जात असताना, त्या भिक्षूचे चित्त आसक्तीशिवाय आसवांपासून मुक्त झाले. दुसरे. 3. රාධඅනිච්චසුත්තං ३. राध अनित्य सुत्त 76. අථ ඛො ආයස්මා රාධො…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා රාධො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන ධම්මං දෙසෙතු[Pg.275], යමහං භගවතො ධම්මං සුත්වා එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරෙය්ය’’න්ති. ‘‘යං ඛො, රාධ, අනිච්චං තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. කිඤ්ච, රාධ, අනිච්චං තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො? චක්ඛු අනිච්චං, රූපා අනිච්චා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සො… යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං. තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො…පෙ… ජිව්හා… කායො… මනො අනිච්චො. තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. ධම්මා… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සො… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං. තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යං ඛො, රාධ, අනිච්චං තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො’’ති. තතියං. ७६. तेव्हा आयुष्यमान राध... एका बाजूला बसले आणि आयुष्यमान राध भगवंतांना असे म्हणाले – “भन्ते, जर भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्माचा उपदेश केला, तर फार चांगले होईल, जेणेकरून मी भगवंतांकडून धम्म ऐकून एकटा, एकांतात, अप्रमत्त, प्रयत्नशील आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरेन.” “राध, जे अनित्य आहे, त्याविषयीची तुझी इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस. आणि राध, काय अनित्य आहे, ज्याविषयीची इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस? डोळा अनित्य आहे, रूपे अनित्य आहेत, चक्षुविज्ञान... चक्षुस्पर्श... आणि चक्षुस्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद अशी जी काही वेदना आहे, तीही अनित्य आहे. त्याविषयीची तुझी इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस... जीभ... शरीर... मन अनित्य आहे. त्याविषयीची तुझी इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस. धम्म... मनोविज्ञान... मन-स्पर्श... आणि मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद अशी जी काही वेदना आहे, तीही अनित्य आहे. त्याविषयीची तुझी इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस. राध, जे काही अनित्य आहे, त्याविषयीची तुझी इच्छा तू सोडून दिली पाहिजेस.” तिसरे. 4. රාධදුක්ඛසුත්තං ४. राध दुःख सुत्त 77. ‘‘යං ඛො, රාධ, දුක්ඛං තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. කිඤ්ච, රාධ, දුක්ඛං? චක්ඛු ඛො, රාධ, දුක්ඛං. තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. රූපා… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සො… යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්ස…පෙ… අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි දුක්ඛං. තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො…පෙ… මනො දුක්ඛො… ධම්මා… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සො… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි දුක්ඛං. තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යං ඛො, රාධ, දුක්ඛං තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො’’ති. චතුත්ථං. ७७. “हे राधा, जे दुःख आहे, त्यावरील तुझी इच्छा (छंद) तू त्यागली पाहिजे. आणि राधा, दुःख काय आहे? राधा, चक्षू (डोळा) हे दुःख आहे. त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे. रूपे... चक्षू-विज्ञान... चक्षू-स्पर्श... चक्षू-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने... जे काही अदुःख-असुख (उदासीन) वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःखच आहे. त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे... मन हे दुःख आहे... धम्म (मानसिक विषय)... मनो-विज्ञान... मनो-स्पर्श... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःखच आहे. त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे. हे राधा, जे दुःख आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे.” चौथे. 5. රාධඅනත්තසුත්තං ५. राधा अनत्त सुत्त 78. ‘‘යො ඛො, රාධ, අනත්තා තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. කො ච, රාධ, අනත්තා? චක්ඛු ඛො, රාධ, අනත්තා. තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. රූපා… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සො… යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා…පෙ… මනො අනත්තා… ධම්මා… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සො… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනත්තා. තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යො ඛො, රාධ, අනත්තා තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො’’ති. පඤ්චමං. ७८. “हे राधा, जे अनत्त (अनात्म) आहे, त्यावरील तुझी इच्छा (छंद) तू त्यागली पाहिजे. आणि राधा, अनत्त काय आहे? राधा, चक्षू हे अनत्त आहे. त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे. रूपे... चक्षू-विज्ञान... चक्षू-स्पर्श... चक्षू-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने... मन हे अनत्त आहे... धम्म... मनो-विज्ञान... मनो-स्पर्श... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनत्त आहे. त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे. हे राधा, जे अनत्त आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजे.” पाचवे. 6. පඨමඅවිජ්ජාපහානසුත්තං ६. प्रथम अविज्जापहाण सुत्त 79. අථ [Pg.276] ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො සො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අත්ථි නු ඛො, භන්තෙ, එකො ධම්මො යස්ස පහානා භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති? ७९. तेव्हा एक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसून तो भिक्खू भगवंतांना म्हणाला, “भन्ते, असा एखादा धम्म आहे का, ज्याच्या प्रहाणाने (त्यागाने) भिक्खूची अविज्जा (अविद्या) नष्ट होते आणि विज्जा (विद्या) उत्पन्न होते?” ‘‘අත්ථි ඛො, භික්ඛු, එකො ධම්මො යස්ස පහානා භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති. “भिक्खू, असा एक धम्म आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” ‘‘කතමො පන, භන්තෙ, එකො ධම්මො යස්ස පහානා භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති? “पण भन्ते, तो एक धम्म कोणता आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते?” ‘‘අවිජ්ජා ඛො, භික්ඛු, එකො ධම්මො යස්ස පහානා භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති. “भिक्खू, अविज्जा हाच तो एक धम्म आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” ‘‘කථං පන, භන්තෙ, ජානතො, කථං පස්සතො භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති? “पण भन्ते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते?” ‘‘චක්ඛුං ඛො, භික්ඛු, අනිච්චතො ජානතො පස්සතො භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජති. රූපෙ… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සං… යම්පිදං, චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චතො ජානතො පස්සතො භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජති…පෙ… මනං අනිච්චතො ජානතො පස්සතො භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජති. ධම්මෙ… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සං… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චතො ජානතො පස්සතො භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජති. එවං ඛො, භික්ඛු, ජානතො එවං පස්සතො භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති. ඡට්ඨං. “भिक्खू, चक्षूला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते. रूपांना... चक्षू-विज्ञानाला... चक्षू-स्पर्शाला... चक्षू-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते... मनाला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते. धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-स्पर्शाला... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते. भिक्खू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” सहावे. 7. දුතියඅවිජ්ජාපහානසුත්තං ७. द्वितीय अविज्जापहाण सुत्त 80. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු…පෙ… එතදවොච – ‘‘අත්ථි නු ඛො, භන්තෙ, එකො ධම්මො යස්ස පහානා භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති? ८०. तेव्हा एक भिक्खू... भगवंतांना म्हणाला, “भन्ते, असा एखादा धम्म आहे का, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते?” ‘‘අත්ථි ඛො, භික්ඛු, එකො ධම්මො යස්ස පහානා භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති. “भिक्खू, असा एक धम्म आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” ‘‘කතමො පන, භන්තෙ, එකො ධම්මො යස්ස පහානා භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති? “पण भन्ते, तो एक धम्म कोणता आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते?” ‘‘අවිජ්ජා ඛො, භික්ඛු, එකො ධම්මො යස්ස පහානා භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති. “भिक्खू, अविज्जा हाच तो एक धम्म आहे, ज्याच्या प्रहाणाने भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” ‘‘කථං පන, භන්තෙ, ජානතො, කථං පස්සතො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති? “पण भन्ते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते?” ‘‘ඉධ, භික්ඛු, භික්ඛුනො සුතං හොති – ‘සබ්බෙ ධම්මා නාලං අභිනිවෙසායා’ති. එවඤ්චෙතං, භික්ඛු, භික්ඛුනො සුතං හොති – ‘සබ්බෙ ධම්මා [Pg.277] නාලං අභිනිවෙසායා’ති. සො සබ්බං ධම්මං අභිජානාති, සබ්බං ධම්මං අභිඤ්ඤාය සබ්බං ධම්මං පරිජානාති, සබ්බං ධම්මං පරිඤ්ඤාය සබ්බනිමිත්තානි අඤ්ඤතො පස්සති, චක්ඛුං අඤ්ඤතො පස්සති, රූපෙ… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සං… යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අඤ්ඤතො පස්සති…පෙ… මනං අඤ්ඤතො පස්සති, ධම්මෙ… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සං… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අඤ්ඤතො පස්සති. එවං ඛො, භික්ඛු, ජානතො එවං පස්සතො භික්ඛුනො අවිජ්ජා පහීයති, විජ්ජා උප්පජ්ජතී’’ති. සත්තමං. “भिक्खू, या शासनात भिक्खूने असे ऐकलेले असते की, 'सर्व धम्म अभिनिवेश (आसक्तीने धरून ठेवण्यास) योग्य नाहीत.' आणि भिक्खू, जेव्हा भिक्खूने असे ऐकलेले असते की, 'सर्व धम्म अभिनिवेश ठेवण्यास योग्य नाहीत,' तेव्हा तो सर्व धम्मांना विशिष्ट ज्ञानाने (अभिज्ञाने) जाणतो. सर्व धम्मांना विशिष्ट ज्ञानाने जाणून तो सर्व धम्मांना पूर्णपणे (परिज्ञाने) जाणतो. सर्व धम्मांना पूर्णपणे जाणून तो सर्व निमित्तांना अन्य रूपाने (अनात्म रूपाने) पाहतो. तो चक्षूला अन्य रूपाने पाहतो, रूपांना... चक्षू-विज्ञानाला... चक्षू-स्पर्शाला... चक्षू-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही अन्य रूपाने पाहतो... मनाला अन्य रूपाने पाहतो, धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-स्पर्शाला... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुख वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही अन्य रूपाने पाहतो. भिक्खू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्या भिक्खूची अविज्जा नष्ट होते आणि विज्जा उत्पन्न होते.” सातवे. 8. සම්බහුලභික්ඛුසුත්තං ८. संबहुलभिक्खू सुत्त 81. අථ ඛො සම්බහුලා භික්ඛූ යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු…පෙ… එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘ඉධ නො, භන්තෙ, අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා අම්හෙ එවං පුච්ඡන්ති – ‘කිමත්ථියං, ආවුසො, සමණෙ ගොතමෙ බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’ති? එවං පුට්ඨා මයං, භන්තෙ, තෙසං අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං බ්යාකරොම – ‘දුක්ඛස්ස ඛො, ආවුසො, පරිඤ්ඤත්ථං භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’ති. කච්චි මයං, භන්තෙ, එවං පුට්ඨා එවං බ්යාකරමානා වුත්තවාදිනො චෙව භගවතො හොම, න ච භගවන්තං අභූතෙන අබ්භාචික්ඛාම, ධම්මස්ස චානුධම්මං බ්යාකරොම, න ච කොචි සහධම්මිකො වාදානුවාදො ගාරය්හං ඨානං ආගච්ඡතී’’ති? ८१. तेव्हा अनेक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे गेले... आणि एका बाजूला बसून ते भिक्खू भगवंतांना म्हणाले, “भन्ते, येथे अन्यतीर्थीय (इतर पंथांचे) परिव्राजक आम्हाला असे विचारतात, 'मित्रांनो, श्रमण गोतमांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य कशासाठी पाळले जाते?' भन्ते, असे विचारले असता आम्ही त्या अन्यतीर्थीय परिव्राजकांना असे उत्तर देतो, 'मित्रांनो, दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी (पूर्ण आकलनासाठी) भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते.' भन्ते, असे विचारले असता असे उत्तर देणारे आम्ही भगवंतांच्या वचनांचेच प्रतिपादन करतो ना? आम्ही भगवंतांवर असत्य आरोप तर करत नाही ना? आम्ही धम्माला अनुसरूनच उत्तर देतो ना? आणि आमच्या या विधानाचा कोणताही तर्कसंगत निष्कर्ष निंदेला पात्र ठरणार नाही ना?” ‘‘තග්ඝ තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, එවං පුට්ඨා එවං බ්යාකරමානා වුත්තවාදිනො චෙව මෙ හොථ, න ච මං අභූතෙන අබ්භාචික්ඛථ, ධම්මස්ස චානුධම්මං බ්යාකරොථ, න ච කොචි සහධම්මිකො වාදානුවාදො ගාරය්හං ඨානං ආගච්ඡති. දුක්ඛස්ස හි, භික්ඛවෙ, පරිඤ්ඤත්ථං මයි බ්රහ්මචරියං වුස්සති. සචෙ පන වො, භික්ඛවෙ, අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා එවං පුච්ඡෙය්යුං – ‘කතමං පන තං, ආවුසො, දුක්ඛං, යස්ස පරිඤ්ඤාය සමණෙ ගොතමෙ බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’ති? එවං පුට්ඨා තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, තෙසං අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං බ්යාකරෙය්යාථ – ‘චක්ඛු ඛො, ආවුසො, දුක්ඛං, තස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සති. රූපා…පෙ… යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි දුක්ඛං. තස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සති…පෙ… මනො දුක්ඛො…පෙ… යම්පිදං [Pg.278] මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි දුක්ඛං. තස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සති. ඉදං ඛො තං, ආවුසො, දුක්ඛං, තස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’ති. එවං පුට්ඨා තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, තෙසං අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං බ්යාකරෙය්යාථා’’ති. අට්ඨමං. “भिक्खूंनो, खरोखरच अशा प्रकारे विचारले असता आणि असे उत्तर दिले असता, तुम्ही माझ्याच वचनांचे पुनरुच्चार करता, माझ्यावर असत्य आरोप करत नाही, धर्माला अनुसरूनच उत्तर देता आणि तुमच्या या विधानावरून कोणताही तर्कसंगत आक्षेप घेण्यास वाव राहत नाही. कारण, भिक्खूंनो, दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी (पूर्ण आकलनासाठी) माझ्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. पण जर, भिक्खूंनो, इतर पंथांचे परिव्राजक तुम्हाला असे विचारतील की—'मित्रांनो, ते दुःख कोणते आहे, ज्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी श्रमण गोतमांच्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते?' तर असे विचारले असता, भिक्खूंनो, तुम्ही त्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे उत्तर दिले पाहिजे—'मित्रांनो, चक्षु (डोळा) हे दुःख आहे; त्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी भगवंतांच्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. रूप... पे... चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद (उदासीन) वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःखच आहे. त्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी भगवंतांच्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते... पे... मन हे दुःख आहे... पे... मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःखच आहे. त्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी भगवंतांच्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. मित्रांनो, हेच ते दुःख आहे, ज्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी भगवंतांच्या हाताखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते.' भिक्खूंनो, असे विचारले असता तुम्ही त्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना अशा प्रकारे उत्तर दिले पाहिजे.” आठवे. 9. ලොකපඤ්හාසුත්තං ९. लोकपञ्हा सुत्त (लोकप्रश्न सुत्त) 82. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙන භගවා…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො සො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ८२. तेव्हा एक भिक्खू जेथे भगवंत होते... पे... एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूने भगवंतांना असे म्हटले— ‘‘‘ලොකො, ලොකො’ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, ලොකොති වුච්චතී’’ති? ‘‘‘ලුජ්ජතී’ති ඛො, භික්ඛු, තස්මා ලොකොති වුච්චති. කිඤ්ච ලුජ්ජති? චක්ඛු ඛො, භික්ඛු, ලුජ්ජති. රූපා ලුජ්ජන්ති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං ලුජ්ජති, චක්ඛුසම්ඵස්සො ලුජ්ජති, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි ලුජ්ජති…පෙ… ජිව්හා ලුජ්ජති…පෙ… මනො ලුජ්ජති, ධම්මා ලුජ්ජන්ති, මනොවිඤ්ඤාණං ලුජ්ජති, මනොසම්ඵස්සො ලුජ්ජති, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි ලුජ්ජති. ලුජ්ජතීති ඛො, භික්ඛු, තස්මා ලොකොති වුච්චතී’’ති. නවමං. “‘भन्ते, लोक, लोक’ असे म्हटले जाते. भन्ते, कोणत्या कारणाने याला ‘लोक’ म्हटले जाते?” “‘नाश पावतो’ (लुज्जति) म्हणून, भिक्खू, याला ‘लोक’ म्हटले जाते. आणि काय नाश पावते? भिक्खू, चक्षु नाश पावतो, रूपे नाश पावतात, चक्षु-विज्ञान नाश पावते, चक्षु-संस्पर्श नाश पावतो, आणि चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील नाश पावते... पे... जिव्हा नाश पावते... पे... मन नाश पावते, धम्म (मानसिक विषय) नाश पावतात, मनो-विज्ञान नाश पावते, मन-संस्पर्श नाश पावतो, आणि मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील नाश पावते. भिक्खू, नाश पावतो म्हणून याला ‘लोक’ म्हटले जाते.” नववे. 10. ඵග්ගුනපඤ්හාසුත්තං १०. फग्गुनपञ्हा सुत्त (फग्गुनप्रश्न सुत्त) 83. අථ ඛො ආයස්මා ඵග්ගුනො…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා ඵග්ගුනො භගවන්තං එතදවොච – ८३. तेव्हा आयुष्यमान फग्गुन... पे... एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान फग्गुन यांनी भगवंतांना असे म्हटले— ‘‘අත්ථි නු ඛො, භන්තෙ, තං චක්ඛු, යෙන චක්ඛුනා අතීතෙ බුද්ධෙ පරිනිබ්බුතෙ ඡින්නපපඤ්චෙ ඡින්නවටුමෙ පරියාදින්නවට්ටෙ සබ්බදුක්ඛවීතිවට්ටෙ පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය…පෙ… අත්ථි නු ඛො, භන්තෙ, සා ජිව්හා, යාය ජිව්හාය අතීතෙ බුද්ධෙ පරිනිබ්බුතෙ ඡින්නපපඤ්චෙ ඡින්නවටුමෙ පරියාදින්නවට්ටෙ සබ්බදුක්ඛවීතිවට්ටෙ පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය…පෙ… අත්ථි නු ඛො සො, භන්තෙ, මනො, යෙන මනෙන අතීතෙ බුද්ධෙ පරිනිබ්බුතෙ ඡින්නපපඤ්චෙ ඡින්නවටුමෙ පරියාදින්නවට්ටෙ සබ්බදුක්ඛවීතිවට්ටෙ පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්යා’’ති? “भन्ते, असा काही चक्षु आहे का, ज्या चक्षुद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा (तण्हा, मान, दिट्ठीचा) छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल? ...पे... भन्ते, अशी काही जिव्हा आहे का, ज्या जिव्हेद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल? ...पे... भन्ते, असे काही मन आहे का, ज्या मनाद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल?” ‘‘නත්ථි ඛො තං, ඵග්ගුන, චක්ඛු, යෙන චක්ඛුනා අතීතෙ බුද්ධෙ පරිනිබ්බුතෙ ඡින්නපපඤ්චෙ ඡින්නවටුමෙ පරියාදින්නවට්ටෙ සබ්බදුක්ඛවීතිවට්ටෙ පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය [Pg.279] …පෙ… නත්ථි ඛො සා, ඵග්ගුන, ජිව්හා, යාය ජිව්හාය අතීතෙ බුද්ධෙ පරිනිබ්බුතෙ ඡින්නපපඤ්චෙ ඡින්නවටුමෙ පරියාදින්නවට්ටෙ සබ්බදුක්ඛවීතිවට්ටෙ පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය…පෙ… නත්ථි ඛො සො, ඵග්ගුන, මනො, යෙන මනෙන අතීතෙ බුද්ධෙ පරිනිබ්බුතෙ ඡින්නපපඤ්චෙ ඡින්නවටුමෙ පරියාදින්නවට්ටෙ සබ්බදුක්ඛවීතිවට්ටෙ පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්යා’’ති. දසමං. “फग्गुन, असा कोणताही चक्षु नाही, ज्या चक्षुद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल. ...पे... फग्गुन, अशी कोणतीही जिव्हा नाही, ज्या जिव्हेद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल. ...पे... फग्गुन, असे कोणतेही मन नाही, ज्या मनाद्वारे भूतकाळातील, परिनिर्वाण पावलेल्या, प्रपंचाचा छेद केलेल्या, संसाराचा मार्ग खंडित केलेल्या, जन्म-मरणाचे चक्र संपुष्टात आणलेल्या आणि सर्व दुःखांच्या पलीकडे गेलेल्या बुद्धांचे वर्णन करू इच्छिणारा त्यांचे वर्णन करू शकेल.” दहावे. ගිලානවග්ගො අට්ඨමො. आठवा गिलाणवर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा संग्रह (उद्दान) पुढीलप्रमाणे आहे— ගිලානෙන දුවෙ වුත්තා, රාධෙන අපරෙ තයො; අවිජ්ජාය ච ද්වෙ වුත්තා, භික්ඛු ලොකො ච ඵග්ගුනොති. गिलाण सूत्रात दोन सांगितले आहेत, राध सूत्रात इतर तीन; अविज्जा सूत्रात दोन सांगितले आहेत, भिक्खू, लोक आणि फग्गुन सूत्र. 9. ඡන්නවග්ගො ९. छन्नवर्ग 1. පලොකධම්මසුත්තං १. पलोकधम्म सुत्त (नाशवंत स्वभाव सुत्त) 84. සාවත්ථිනිදානං. අථ ඛො ආයස්මා ආනන්දො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා ආනන්දො භගවන්තං එතදවොච – ८४. श्रावस्ती येथील प्रसंग. तेव्हा आयुष्यमान आनंद जेथे भगवंत होते तेथे गेले... पे... एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदांनी भगवंतांना असे म्हटले— ‘‘‘ලොකො, ලොකො’ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, ලොකොති වුච්චතී’’ති? ‘‘යං ඛො, ආනන්ද, පලොකධම්මං, අයං වුච්චති අරියස්ස විනයෙ ලොකො. කිඤ්ච, ආනන්ද, පලොකධම්මං? චක්ඛු ඛො, ආනන්ද, පලොකධම්මං, රූපා පලොකධම්මා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං පලොකධම්මං, චක්ඛුසම්ඵස්සො පලොකධම්මො, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා…පෙ… තම්පි පලොකධම්මං…පෙ… ජිව්හා පලොකධම්මා, රසා පලොකධම්මා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං පලොකධම්මං, ජිව්හාසම්ඵස්සො පලොකධම්මො, යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා…පෙ… තම්පි පලොකධම්මං…පෙ… මනො පලොකධම්මො, ධම්මා පලොකධම්මා, මනොවිඤ්ඤාණං පලොකධම්මං, මනොසම්ඵස්සො පලොකධම්මො, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි පලොකධම්මං. යං ඛො, ආනන්ද, පලොකධම්මං, අයං වුච්චති අරියස්ස විනයෙ ලොකො’’ති. පඨමං. “‘भन्ते, लोक, लोक’ असे म्हटले जाते. भन्ते, कोणत्या कारणाने याला ‘लोक’ म्हटले जाते?” “आनंदा, जे काही नाशवंत स्वभावाचे (पलोकधम्म) आहे, त्याला आर्यांच्या विनयात ‘लोक’ म्हटले जाते. आणि आनंदा, नाशवंत स्वभावाचे काय आहे? आनंदा, चक्षु नाशवंत स्वभावाचा आहे, रूपे नाशवंत स्वभावाची आहेत, चक्षु-विज्ञान नाशवंत स्वभावाचे आहे, चक्षु-संस्पर्श नाशवंत स्वभावाचा आहे, आणि चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने... पे... जे काही वेदन उत्पन्न होते, ते देखील नाशवंत स्वभावाचे आहे... पे... जिव्हा नाशवंत स्वभावाची आहे, रस नाशवंत स्वभावाचे आहेत, जिव्हा-विज्ञान नाशवंत स्वभावाचे आहे, जिव्हा-संस्पर्श नाशवंत स्वभावाचा आहे, आणि जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने... पे... जे काही वेदन उत्पन्न होते, ते देखील नाशवंत स्वभावाचे आहे... पे... मन नाशवंत स्वभावाचे आहे, धम्म नाशवंत स्वभावाचे आहेत, मनो-विज्ञान नाशवंत स्वभावाचे आहे, मन-संस्पर्श नाशवंत स्वभावाचा आहे, आणि मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील नाशवंत स्वभावाचे आहे. आनंदा, जे काही नाशवंत स्वभावाचे आहे, त्याला आर्यांच्या विनयात ‘लोक’ म्हटले जाते.” पहिले. 2. සුඤ්ඤතලොකසුත්තං २. सुञ्ञतलोक सुत्त (शून्यलोक सुत्त) 85. අථ [Pg.280] ඛො ආයස්මා ආනන්දො…පෙ… භගවන්තං එතදවොච – ‘‘‘සුඤ්ඤො ලොකො, සුඤ්ඤො ලොකො’ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, සුඤ්ඤො ලොකොති වුච්චතී’’ති? ‘‘යස්මා ච ඛො, ආනන්ද, සුඤ්ඤං අත්තෙන වා අත්තනියෙන වා තස්මා සුඤ්ඤො ලොකොති වුච්චති. කිඤ්ච, ආනන්ද, සුඤ්ඤං අත්තෙන වා අත්තනියෙන වා? චක්ඛු ඛො, ආනන්ද, සුඤ්ඤං අත්තෙන වා අත්තනියෙන වා. රූපා සුඤ්ඤා අත්තෙන වා අත්තනියෙන වා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං සුඤ්ඤං අත්තෙන වා අත්තනියෙන වා, චක්ඛුසම්ඵස්සො සුඤ්ඤො අත්තෙන වා අත්තනියෙන වා…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි සුඤ්ඤං අත්තෙන වා අත්තනියෙන වා. යස්මා ච ඛො, ආනන්ද, සුඤ්ඤං අත්තෙන වා අත්තනියෙන වා, තස්මා සුඤ්ඤො ලොකොති වුච්චතී’’ති. දුතියං. ८५. तेव्हा आयुष्यमान आनंद... भगवंतांना असे म्हणाले— 'भन्ते, “शून्य लोक, शून्य लोक” असे म्हटले जाते. भन्ते, कोणत्या कारणाने “शून्य लोक” असे म्हटले जाते?' 'आनंदा, ज्याअर्थी (हा लोक) आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे, म्हणूनच याला “शून्य लोक” असे म्हटले जाते. आणि आनंदा, काय आहे जे आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे? आनंदा, चक्षु (डोळा) आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे. रूपे आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहेत. चक्षु-विज्ञान आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे. चक्षु-स्पर्श आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे... तसेच मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-म-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे. आनंदा, ज्याअर्थी हे आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे, म्हणूनच याला “शून्य लोक” असे म्हटले जाते.' 3. සංඛිත්තධම්මසුත්තං ३. संखित्तधम्मसुत्त (संक्षिप्त धम्म सुत्त) 86. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා ආනන්දො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන ධම්මං දෙසෙතු, යමහං භගවතො ධම්මං සුත්වා එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරෙය්ය’’න්ති. ८६. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान आनंद भगवंतांना असे म्हणाले— 'भन्ते, बरे होईल जर भगवंत मला संक्षेपाने धम्म उपदेश करतील, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकटा, एकांतात, अप्रमत्त (जागरूक), उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरेन.' ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ආනන්ද, චක්ඛු නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? 'आनंदा, तुला काय वाटते, चक्षु नित्य आहे की अनित्य?' ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. 'अनित्य आहे, भन्ते.' ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? 'आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?' ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. 'दुःखकारक आहे, भन्ते.' ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? 'आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी “हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे” असे मानणे योग्य आहे का?' ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. 'नक्कीच नाही, भन्ते.' ‘‘රූපා නිච්චා වා අනිච්චා වා’’ති? 'रूपे नित्य आहेत की अनित्य?' ‘‘අනිච්චා, භන්තෙ’’…පෙ…. 'अनित्य आहेत, भन्ते.'... ‘‘චක්ඛුවිඤ්ඤාණං…පෙ… යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? 'चक्षु-विज्ञान... चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-म-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?' ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. 'अनित्य आहे, भन्ते.' ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? 'आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?' ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. 'दुःखकारक आहे, भन्ते.' ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො [Pg.281] මෙ අත්තා’’’ති? 'आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी “हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे” असे मानणे योग्य आहे का?' ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’…පෙ…. 'नक्कीच नाही, भन्ते.'... ‘‘ජිව්හා නිච්චා වා අනිච්චා වා’’ති? 'जिव्हा नित्य आहे की अनित्य?' ‘‘අනිච්චා, භන්තෙ’’…පෙ…. 'अनित्य आहे, भन्ते.'... ‘‘ජිව්හාවිඤ්ඤාණං… ජිව්හාසම්ඵස්සො…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? 'जिव्हा-विज्ञान... जिव्हा-स्पर्श... मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-म-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?' ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. 'अनित्य आहे, भन्ते.' ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? 'आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?' ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. 'दुःखकारक आहे, भन्ते.' ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? 'आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी “हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे” असे मानणे योग्य आहे का?' ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’…පෙ…. 'नक्कीच नाही, भन्ते.'... ‘‘එවං පස්සං, ආනන්ද, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. තතියං. 'आनंदा, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी देखील निर्वेद पावतो... चक्षु-स्पर्शाविषयी देखील निर्वेद पावतो... मन-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-म-सुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर “मी मुक्त झालो आहे” असे ज्ञान होते. “जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर काहीही कर्तव्य उरलेले नाही” असे तो जाणतो.' 4. ඡන්නසුත්තං ४. छन्नसुत्त 87. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා ච සාරිපුත්තො ආයස්මා ච මහාචුන්දො ආයස්මා ච ඡන්නො ගිජ්ඣකූටෙ පබ්බතෙ විහරන්ති. තෙන ඛො පන සමයෙන යෙන ආයස්මා ඡන්නො ආබාධිකො හොති දුක්ඛිතො බාළ්හගිලානො. අථ ඛො ආයස්මා සාරිපුත්තො සායන්හසමයං පටිසල්ලානා වුට්ඨිතො යෙනායස්මා මහාචුන්දො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහාචුන්දං එතදවොච – ‘‘ආයාමාවුසො චුන්ද, යෙනායස්මා ඡන්නො තෙනුපසඞ්කමිස්සාම ගිලානපුච්ඡකා’’ති. ‘‘එවමාවුසො’’ති ඛො ආයස්මා මහාචුන්දො ආයස්මතො සාරිපුත්තස්ස පච්චස්සොසි. ८७. एका वेळी भगवान बुद्ध राजगृह येथील वेळुवनातील कलंदकनिवाप येथे विहरत होते. त्या वेळी आयुष्यमान सारिपुत्त, आयुष्यमान महाचुन्द आणि आयुष्यमान छन्न हे गिद्धकूट पर्वतावर विहरत होते. त्या वेळी आयुष्यमान छन्न हे आजारी, अत्यंत कष्टी आणि गंभीरपणे आजारी होते. तेव्हा आयुष्यमान सारिपुत्त संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे आयुष्यमान महाचुन्द होते तेथे गेले; आणि आयुष्यमान महाचुन्दांना असे म्हणाले— 'चला, आवुसो चुन्द, आपण आयुष्यमान छन्नांच्या प्रकृतीची विचारपूस करण्यासाठी त्यांच्याकडे जाऊ या.' आयुष्यमान महाचुन्दांनी आयुष्यमान सारिपुत्तांना संमती दिली— 'होय, आवुसो.' අථ ඛො ආයස්මා ච සාරිපුත්තො ආයස්මා ච මහාචුන්දො යෙනායස්මා ඡන්නො තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදිංසු. නිසජ්ජ ඛො ආයස්මා සාරිපුත්තො ආයස්මන්තං ඡන්නං එතදවොච – ‘‘කච්චි තෙ, ආවුසො ඡන්න, ඛමනීයං, කච්චි යාපනීයං, කච්චි දුක්ඛා වෙදනා පටික්කමන්ති නො අභික්කමන්ති, පටික්කමොසානං පඤ්ඤායති නො අභික්කමො’’ති? त्यानंतर आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाचुन्द जेथे आयुष्यमान छन्न होते तेथे गेले; आणि तेथे मांडलेल्या आसनांवर बसले. बसल्यावर आयुष्यमान सारिपुत्त आयुष्यमान छन्नांना म्हणाले— 'आवुसो छन्न, तुमची प्रकृती ठीक आहे ना? तुम्हाला सहन होत आहे ना? तुमच्या वेदना कमी होत आहेत की वाढत आहेत? वेदना कमी होत असल्याचे जाणवत आहे की वाढत असल्याचे?' ‘‘න මෙ, ආවුසො සාරිපුත්ත, ඛමනීයං න යාපනීයං, බාළ්හා මෙ දුක්ඛා වෙදනා අභික්කමන්ති නො පටික්කමන්ති, අභික්කමොසානං පඤ්ඤායති නො පටික්කමො. සෙය්යථාපි, ආවුසො, බලවා පුරිසො තිණ්හෙන සිඛරෙන මුද්ධනි අභිමත්ථෙය්ය ; එවමෙව ඛො, ආවුසො, අධිමත්තා වාතා මුද්ධනි ඌහනන්ති. න මෙ, ආවුසො, ඛමනීයං, න යාපනීයං…පෙ… නො පටික්කමො. සෙය්යථාපි[Pg.282], ආවුසො, බලවා පුරිසො දළ්හෙන වරත්තක්ඛණ්ඩෙන සීසෙ සීසවෙඨං දදෙය්ය; එවමෙව ඛො, ආවුසො, අධිමත්තා සීසෙ සීසවෙදනා. න මෙ, ආවුසො, ඛමනීයං, න යාපනීයං…පෙ… නො පටික්කමො. සෙය්යථාපි, ආවුසො, දක්ඛො ගොඝාතකො වා ගොඝාතකන්තෙවාසී වා තිණ්හෙන ගොවිකන්තනෙන කුච්ඡිං පරිකන්තෙය්ය; එවමෙව ඛො අධිමත්තා වාතා කුච්ඡිං පරිකන්තන්ති. න මෙ, ආවුසො, ඛමනීයං, න යාපනීයං…පෙ… නො පටික්කමො. සෙය්යථාපි, ආවුසො, ද්වෙ බලවන්තො පුරිසා දුබ්බලතරං පුරිසං නානාබාහාසු ගහෙත්වා අඞ්ගාරකාසුයා සන්තාපෙය්යුං සම්පරිතාපෙය්යුං; එවමෙව ඛො, ආවුසො, අධිමත්තො කායස්මිං ඩාහො. න මෙ, ආවුසො, ඛමනීයං, න යාපනීයං, බාළ්හා මෙ දුක්ඛා වෙදනා අභික්කමන්ති නො පටික්කමන්ති, අභික්කමොසානං පඤ්ඤායති නො පටික්කමො. සත්ථං, ආවුසො සාරිපුත්ත, ආහරිස්සාමි, නාවකඞ්ඛාමි ජීවිත’’න්ති. 'आवुसो सारिपुत्त, मला सहन होत नाहीये, माझी प्रकृती ठीक नाहीये. माझ्या तीव्र वेदना वाढतच आहेत, कमी होत नाहीयेत; त्या वाढत असल्याचेच जाणवत आहे, कमी होत असल्याचे नाही. आवुसो, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान माणूस तीक्ष्ण तलवारीने डोक्यावर प्रहार करतो, त्याचप्रमाणे माझ्या डोक्यात तीव्र वायूचे झटके डोक्याला भेदत आहेत. आवुसो, मला सहन होत नाहीये, माझी प्रकृती ठीक नाहीये... वेदना कमी होत नाहीयेत. आवुसो, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान माणूस मजबूत चामड्याच्या पट्ट्याने डोक्याला घट्ट आवळून टाकेल, त्याचप्रमाणे माझ्या डोक्यात तीव्र वेदना होत आहेत. आवुसो, मला सहन होत नाहीये, माझी प्रकृती ठीक नाहीये... वेदना कमी होत नाहीयेत. आवुसो, ज्याप्रमाणे एखादा कुशल कसाई किंवा त्याचा शिकाऊ साहाय्यक तीक्ष्ण सुरीने बैलाचे पोट कापून काढेल, त्याचप्रमाणे माझ्या पोटात तीव्र वायूचे झटके पोट कापून काढत आहेत. आवुसो, मला सहन होत नाहीये, माझी प्रकृती ठीक नाहीये... वेदना कमी होत नाहीयेत. आवुसो, ज्याप्रमाणे दोन बलवान माणसे एखाद्या दुर्बल माणसाला दोन्ही हातांनी पकडून धगधगत्या कोळशाच्या कुंडात भाजून काढतील, त्याचप्रमाणे माझ्या शरीरात तीव्र जळजळ होत आहे. आवुसो, मला सहन होत नाहीये, माझी प्रकृती ठीक नाहीये. माझ्या तीव्र वेदना वाढतच आहेत, कमी होत नाहीयेत; त्या वाढत असल्याचेच जाणवत आहे, कमी होत असल्याचे नाही. आवुसो सारिपुत्त, मी शस्त्राचा वापर करीन, मला आता जगण्याची इच्छा नाही.' ‘‘මා ආයස්මා ඡන්නො සත්ථං ආහරෙසි. යාපෙතායස්මා ඡන්නො, යාපෙන්තං මයං ආයස්මන්තං ඡන්නං ඉච්ඡාම. සචෙ ආයස්මතො ඡන්නස්ස නත්ථි සප්පායානි භොජනානි, අහං ආයස්මතො ඡන්නස්ස සප්පායානි භොජනානි පරියෙසිස්සාමි. සචෙ ආයස්මතො ඡන්නස්ස නත්ථි සප්පායානි භෙසජ්ජානි, අහං ආයස්මතො ඡන්නස්ස සප්පායානි භෙසජ්ජානි පරියෙසිස්සාමි. සචෙ ආයස්මතො ඡන්නස්ස නත්ථි පතිරූපා උපට්ඨාකා, අහං ආයස්මන්තං ඡන්නං උපට්ඨහිස්සාමි. මා ආයස්මා ඡන්නො සත්ථං ආහරෙසි. යාපෙතායස්මා ඡන්නො, යාපෙන්තං මයං ආයස්මන්තං ඡන්නං ඉච්ඡාමා’’ති. "आयुष्यमान छन्नांनी शस्त्राचा वापर करू नये. आयुष्यमान छन्नांनी जीवन कंठावे; आयुष्यमान छन्नांनी जिवंत राहावे अशी आमची इच्छा आहे. जर आयुष्यमान छन्नांकडे अनुकूल भोजन नसेल, तर मी आयुष्यमान छन्नांसाठी अनुकूल भोजन शोधून आणीन. जर आयुष्यमान छन्नांकडे अनुकूल औषध नसेल, तर मी आयुष्यमान छन्नांसाठी अनुकूल औषध शोधून आणीन. जर आयुष्यमान छन्नांकडे योग्य परिचारक नसतील, तर मी आयुष्यमान छन्नांची सेवा-शुश्रूषा करीन. आयुष्यमान छन्नांनी शस्त्राचा वापर करू नये. आयुष्यमान छन्नांनी जगावे; आयुष्यमान छन्नांनी जिवंत राहावे अशी आमची इच्छा आहे." ‘‘න මෙ, ආවුසො සාරිපුත්ත, නත්ථි සප්පායානි භොජනානි; අත්ථි මෙ සප්පායානි භොජනානි. නපි මෙ නත්ථි සප්පායානි භෙසජ්ජානි; අත්ථි මෙ සප්පායානි භෙසජ්ජානි. නපි මෙ නත්ථි පතිරූපා උපට්ඨාකා; අත්ථි මෙ පතිරූපා උපට්ඨාකා. අපි ච මෙ, ආවුසො, සත්ථා පරිචිණ්ණො දීඝරත්තං මනාපෙනෙව, නො අමනාපෙන. එතඤ්හි, ආවුසො, සාවකස්ස පතිරූපං යං සත්ථාරං පරිචරෙය්ය මනාපෙනෙව, නො අමනාපෙන. ‘අනුපවජ්ජං ඡන්නො භික්ඛු සත්ථං ආහරිස්සතී’ති – එවමෙතං, ආවුසො සාරිපුත්ත, ධාරෙහී’’ති. "आवुसो सारिपुत्त, माझ्याकडे अनुकूल भोजन नाही असे नाही; माझ्याकडे अनुकूल भोजन आहे. माझ्याकडे अनुकूल औषध नाही असेही नाही; माझ्याकडे अनुकूल औषध आहे. माझ्याकडे योग्य परिचारक नाहीत असेही नाही; माझ्याकडे योग्य परिचारक आहेत. शिवाय, आवुसो, मी दीर्घकाळापासून शास्त्यांची (बुद्धांची) अनुकूल पद्धतीनेच सेवा केली आहे, प्रतिकूल पद्धतीने नाही. कारण शिष्यासाठी हेच योग्य आहे की त्याने शास्त्यांची अनुकूल पद्धतीनेच सेवा करावी, प्रतिकूल पद्धतीने नाही. 'भिक्खू छन्न हे दोषरहितपणे शस्त्राचा वापर करतील' – आवुसो सारिपुत्त, हे तुम्ही असेच लक्षात ठेवावे." ‘‘පුච්ඡෙය්යාම [Pg.283] මයං ආයස්මන්තං ඡන්නං කඤ්චිදෙව දෙසං, සචෙ ආයස්මා ඡන්නො ඔකාසං කරොති පඤ්හස්ස වෙය්යාකරණායා’’ති. ‘‘පුච්ඡාවුසො සාරිපුත්ත, සුත්වා වෙදිස්සාමා’’ති. "जर आयुष्यमान छन्न प्रश्नाचे उत्तर देण्यासाठी सवड देणार असतील, तर आम्ही आयुष्यमान छन्नांना एखाद्या विषयाबद्दल काही विचारू इच्छितो." "विचारा, आवुसो सारिपुत्त! ऐकल्यानंतर मला समजेल." ‘‘චක්ඛුං, ආවුසො ඡන්න, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සසි…පෙ… ජිව්හං, ආවුසො ඡන්න, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං ජිව්හාවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සසි…පෙ… මනං, ආවුසො ඡන්න, මනොවිඤ්ඤාණං මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සසී’’ති? "आवुसो छन्न, तुम्ही डोळा, चक्षू-विज्ञान आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे पाहता का? ...पे... आवुसो छन्न, तुम्ही जीभ, जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे पाहता का? ...पे... आवुसो छन्न, तुम्ही मन, मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे पाहता का?" ‘‘චක්ඛුං, ආවුසො සාරිපුත්ත, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සාමි…පෙ… ජිව්හං, ආවුසො සාරිපුත්ත, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං ජිව්හාවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සාමි…පෙ… මනං, ආවුසො සාරිපුත්ත, මනොවිඤ්ඤාණං මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සාමී’’ති. "आवुसो सारिपुत्त, मी डोळा, चक्षू-विज्ञान आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो. ...पे... आवुसो सारिपुत्त, मी जीभ, जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो. ...पे... आवुसो सारिपुत्त, मी मन, मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणारे धर्म यांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो." ‘‘චක්ඛුස්මිං, ආවුසො ඡන්න, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙ චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙසු ධම්මෙසු කිං දිස්වා කිං අභිඤ්ඤාය චක්ඛුං චක්ඛුවිඤ්ඤාණං චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සසි… ජිව්හාය, ආවුසො ඡන්න, ජිව්හාවිඤ්ඤාණෙ ජිව්හාවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙසු ධම්මෙසු කිං දිස්වා කිං අභිඤ්ඤාය ජිව්හං ජිව්හාවිඤ්ඤාණං ජිව්හාවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සසි… මනස්මිං, ආවුසො ඡන්න, මනොවිඤ්ඤාණෙ මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙසු ධම්මෙසු කිං දිස්වා කිං අභිඤ්ඤාය මනං මනොවිඤ්ඤාණං මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සසී’’ති? "आवुसो छन्न, डोळ्यामध्ये, चक्षू-विज्ञानामध्ये आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये काय पाहून आणि काय विशेष रूपाने जाणून तुम्ही डोळा, चक्षू-विज्ञान आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहता? आवुसो छन्न, जिभेमध्ये, जिव्हा-विज्ञानामध्ये आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये काय पाहून आणि काय विशेष रूपाने जाणून तुम्ही जीभ, जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहता? आवुसो छन्न, मनामध्ये, मनो-विज्ञानामध्ये आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये काय पाहून आणि काय विशेष रूपाने जाणून तुम्ही मन, मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहता?" ‘‘චක්ඛුස්මිං, ආවුසො සාරිපුත්ත, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙ චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙසු ධම්මෙසු නිරොධං දිස්වා නිරොධං අභිඤ්ඤාය චක්ඛුං චක්ඛුවිඤ්ඤාණං චක්ඛුවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති [Pg.284] සමනුපස්සාමි…පෙ… ජිව්හාය, ආවුසො සාරිපුත්ත, ජිව්හාවිඤ්ඤාණෙ ජිව්හාවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙසු ධම්මෙසු නිරොධං දිස්වා නිරොධං අභිඤ්ඤාය ජිව්හං ජිව්හාවිඤ්ඤාණං ජිව්හාවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සාමි…පෙ… මනස්මිං, ආවුසො සාරිපුත්ත, මනොවිඤ්ඤාණෙ මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙසු ධම්මෙසු නිරොධං දිස්වා නිරොධං අභිඤ්ඤාය මනං මනොවිඤ්ඤාණං මනොවිඤ්ඤාණවිඤ්ඤාතබ්බෙ ධම්මෙ ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සාමී’’ති. "आवुसो सारिपुत्त, डोळ्यामध्ये, चक्षू-विज्ञानामध्ये आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये निरोध पाहून आणि निरोध विशेष रूपाने जाणून मी डोळा, चक्षू-विज्ञान आणि चक्षू-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो. ...पे... आवुसो सारिपुत्त, जिभेमध्ये, जिव्हा-विज्ञानामध्ये आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये निरोध पाहून आणि निरोध विशेष रूपाने जाणून मी जीभ, जिव्हा-विज्ञान आणि जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो. ...पे... आवुसो सारिपुत्त, मनामध्ये, मनो-विज्ञानामध्ये आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये निरोध पाहून आणि निरोध विशेष रूपाने जाणून मी मन, मनो-विज्ञान आणि मनो-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या धर्मांकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' अशा प्रकारे पाहतो." එවං වුත්තෙ, ආයස්මා මහාචුන්දො ආයස්මන්තං ඡන්නං එතදවොච – ‘‘තස්මාතිහ, ආවුසො ඡන්න, ඉදම්පි තස්ස භගවතො සාසනං නිච්චකප්පං සාධුකං මනසි කාතබ්බං – ‘නිස්සිතස්ස චලිතං, අනිස්සිතස්ස චලිතං නත්ථි. චලිතෙ අසති පස්සද්ධි හොති. පස්සද්ධියා සති නති න හොති. නතියා අසති ආගතිගති න හොති. ආගතිගතියා අසති චුතූපපාතො න හොති. චුතූපපාතෙ අසති නෙවිධ න හුරං න උභයමන්තරෙන. එසෙවන්තො දුක්ඛස්සා’’’ති. असे म्हटले असता, आयुष्यमान महाचुंदांनी आयुष्यमान छन्नांना असे म्हटले – "म्हणूनच, आवुसो छन्न, भगवंतांच्या याही उपदेशाचे नेहमी चांगल्या प्रकारे मनन केले पाहिजे – 'जो आश्रित आहे, त्याचे मन विचलित होते; जो अनाश्रित आहे, त्याचे मन विचलित होत नाही. विचलन नसताना शांतता लाभते. शांतता असताना कल नसतो. कल नसताना येणे-जाणे नसते. येणे-जाणे नसताना च्युती आणि उत्पत्ती नसते. च्युती आणि उत्पत्ती नसताना, ना या लोकात, ना परलोकात, ना या दोन्हीच्या मध्ये काही उरते. हाच दुःखाचा अंत आहे.'" අථ ඛො ආයස්මා ච සාරිපුත්තො ආයස්මා ච මහාචුන්දො ආයස්මන්තං ඡන්නං ඉමිනා ඔවාදෙන ඔවදිත්වා උට්ඨායාසනා පක්කමිංසු. අථ ඛො ආයස්මා ඡන්නො අචිරපක්කන්තෙසු තෙසු ආයස්මන්තෙසු සත්ථං ආහරෙසි. त्यानंतर, आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाचुंद आयुष्यमान छन्नांना हा उपदेश देऊन आपापल्या आसनांवरून उठले आणि निघून गेले. त्यानंतर, ते आयुष्यमान निघून गेल्यानंतर लवकरच आयुष्यमान छन्नांनी शस्त्राचा वापर केला. අථ ඛො ආයස්මා සාරිපුත්තො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා සාරිපුත්තො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ආයස්මතා, භන්තෙ, ඡන්නෙන සත්ථං ආහරිතං. තස්ස කා ගති කො අභිසම්පරායො’’ති? ‘‘නනු තෙ, සාරිපුත්ත, ඡන්නෙන භික්ඛුනා සම්මුඛායෙව අනුපවජ්ජතා බ්යාකතා’’ති? ‘‘අත්ථි, භන්තෙ, පුබ්බවිජ්ජනං නාම වජ්ජිගාමො. තත්ථායස්මතො ඡන්නස්ස මිත්තකුලානි සුහජ්ජකුලානි උපවජ්ජකුලානී’’ති. ‘‘හොන්ති හෙතෙ, සාරිපුත්ත, ඡන්නස්ස භික්ඛුනො මිත්තකුලානි සුහජ්ජකුලානි උපවජ්ජකුලානි. න ඛො පනාහං, සාරිපුත්ත, එත්තාවතා සඋපවජ්ජොති වදාමි. යො ඛො, සාරිපුත්ත, තඤ්ච කායං නික්ඛිපති, අඤ්ඤඤ්ච කායං උපාදියති, තමහං සඋපවජ්ජොති වදාමි. තං ඡන්නස්ස භික්ඛුනො නත්ථි. ‘අනුපවජ්ජං ඡන්නෙන භික්ඛුනා සත්ථං ආහරිත’න්ති – එවමෙතං, සාරිපුත්ත, ධාරෙහී’’ති. චතුත්ථං. तेव्हा आयुष्यमान सारिपुत्त जेथे भगवान होते तेथे गेले; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान सारिपुत्त भगवंतांना असे म्हणाले – “भन्ते, आयुष्यमान छन्नाने शस्त्राचा वापर केला आहे (स्वतःचा जीव घेतला आहे). त्याची गती काय आहे, त्याचा परलोक काय आहे?” “सारिपुत्त, भिक्खू छन्नाने तुझ्यासमोरच स्वतःच्या निर्दोषतेची (पुनर्जन्म न घेण्याची) घोषणा केली नव्हती का?” “भन्ते, पुब्बविज्जन नावाचे एक वज्जींचे गाव आहे. तिथे आयुष्यमान छन्नाचे मित्रकुळ, सुहृदकुळ आणि आदरातिथ्य करणारे कुळ आहेत.” “सारिपुत्त, भिक्खू छन्नाचे मित्रकुळ, सुहृदकुळ आणि आदरातिथ्य करणारे कुळ आहेत हे खरे आहे. परंतु, सारिपुत्त, केवळ एवढ्यावरूनच मी कोणाला 'दोषयुक्त' म्हणत नाही. सारिपुत्त, जो कोणी या शरीराचा त्याग करतो आणि दुसऱ्या शरीराचा स्वीकार करतो, त्याला मी 'दोषयुक्त' म्हणतो. भिक्खू छन्नाच्या बाबतीत असे घडलेले नाही. भिक्खू छन्नाने दोषरहितपणे शस्त्राचा वापर केला आहे – सारिपुत्त, तू हे असेच लक्षात ठेव.” चौथे. 5. පුණ්ණසුත්තං ५. पुण्ण सुत्त 88. අථ [Pg.285] ඛො ආයස්මා පුණ්ණො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා පුණ්ණො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන ධම්මං දෙසෙතු, යමහං භගවතො ධම්මං සුත්වා එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරෙය්ය’’න්ති. ८८. तेव्हा आयुष्यमान पुण्ण जेथे भगवान होते तेथे गेले; जवळ जाऊन...पे... एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान पुण्ण भगवंतांना असे म्हणाले – “भन्ते, हे चांगले होईल जर भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्माचा उपदेश केला, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकटा, एकांतात, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरेन.” ‘‘සන්ති ඛො, පුණ්ණ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො උප්පජ්ජති නන්දී. ‘නන්දිසමුදයා දුක්ඛසමුදයො, පුණ්ණා’ති වදාමි…පෙ… සන්ති ඛො, පුණ්ණ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති ඛො, පුණ්ණ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො උප්පජ්ජති නන්දී. ‘නන්දිසමුදයා දුක්ඛසමුදයො, පුණ්ණා’ති වදාමි. “पुण्ण, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत (प्रिय), मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यात आनंद घेतो, त्याचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्यात आनंद घेणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि गुंतून राहणाऱ्या त्या भिक्खूमध्ये नंदी (तृष्णा) उत्पन्न होते. ‘नंदीच्या उत्पत्तीमुळे दुःखाची उत्पत्ती होते, पुण्ण,’ असे मी म्हणतो...पे... पुण्ण, जिभेने जाणता येण्याजोगे असे रस आहेत...पे... पुण्ण, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म (विषय) आहेत जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यात आनंद घेतो, त्याचे स्वागत करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्यात आनंद घेणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि गुंतून राहणाऱ्या त्या भिक्खूमध्ये नंदी उत्पन्न होते. ‘नंदीच्या उत्पत्तीमुळे दुःखाची उत्पत्ती होते, पुण्ण,’ असे मी म्हणतो.” ‘‘සන්ති ඛො, පුණ්ණ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති, තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො නිරුජ්ඣති නන්දී. ‘නන්දිනිරොධා දුක්ඛනිරොධො, පුණ්ණා’ති වදාමි…පෙ… සන්ති ඛො, පුණ්ණ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති, තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො නිරුජ්ඣති නන්දී. ‘නන්දිනිරොධා දුක්ඛනිරොධො, පුණ්ණා’ති වදාමි. “पुण्ण, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यात आनंद घेत नाही, त्याचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्यात आनंद न घेणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि गुंतून न राहणाऱ्या त्या भिक्खूमध्ये नंदी निरुद्ध होते (नष्ट होते). ‘नंदीच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो, पुण्ण,’ असे मी म्हणतो...पे... पुण्ण, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यात आनंद घेत नाही, त्याचे स्वागत करत नाही आणि त्यात गुंतून राहत नाही, तर त्यात आनंद न घेणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि गुंतून न राहणाऱ्या त्या भिक्खूमध्ये नंदी निरुद्ध होते. ‘नंदीच्या निरोधाने दुःखाचा निरोध होतो, पुण्ण,’ असे मी म्हणतो.” ‘‘ඉමිනා ත්වං, පුණ්ණ, මයා සංඛිත්තෙන ඔවාදෙන ඔවදිතො කතමස්මිං ජනපදෙ විහරිස්සසී’’ති? ‘‘අත්ථි, භන්තෙ, සුනාපරන්තො නාම ජනපදො, තත්ථාහං විහරිස්සාමී’’ති. “पुण्ण, माझ्याकडून या संक्षिप्त उपदेशाने उपदेशित झाल्यावर तू कोणत्या जनपदात विहरशील?” “भन्ते, सुनापरंत नावाचा एक जनपद आहे, तिथे मी विहरेन.” ‘‘චණ්ඩා ඛො, පුණ්ණ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා; ඵරුසා ඛො, පුණ්ණ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා. සචෙ තං, පුණ්ණ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා අක්කොසිස්සන්ති පරිභාසිස්සන්ති, තත්ර තෙ, පුණ්ණ, කින්ති භවිස්සතී’’ති? “पुण्ण, सुनापरंतचे लोक क्रूर आहेत; पुण्ण, सुनापरंतचे लोक कठोर आहेत. पुण्ण, जर सुनापरंतच्या लोकांनी तुला शिवीगाळ केली, तुझा अपमान केला, तर पुण्ण, तिथे तुला काय वाटेल?” ‘‘සචෙ මං, භන්තෙ, සුනාපරන්තකා [Pg.286] මනුස්සා අක්කොසිස්සන්ති පරිභාසිස්සන්ති, තත්ර මෙ එවං භවිස්සති – ‘භද්දකා වතිමෙ සුනාපරන්තකා මනුස්සා, සුභද්දකා වතිමෙ සුනාපරන්තකා මනුස්සා, යං මෙ නයිමෙ පාණිනා පහාරං දෙන්තී’ති. එවමෙත්ථ, භගවා, භවිස්සති; එවමෙත්ථ, සුගත, භවිස්සතී’’ති. “भन्ते, जर सुनापरंतच्या लोकांनी मला शिवीगाळ केली, माझा अपमान केला, तर तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल – ‘हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते मला हाताने मारत नाहीत.’ हे भगवंता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल.” ‘‘සචෙ පන තෙ, පුණ්ණ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා පාණිනා පහාරං දස්සන්ති, තත්ර පන තෙ, පුණ්ණ, කින්ති භවිස්සතී’’ති? “पण पुण्ण, जर सुनापरंतच्या लोकांनी तुला हाताने मारले, तर तिथे तुला काय वाटेल?” ‘‘සචෙ මෙ, භන්තෙ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා පාණිනා පහාරං දස්සන්ති, තත්ර මෙ එවං භවිස්සති – ‘භද්දකා වතිමෙ සුනාපරන්තකා මනුස්සා, සුභද්දකා වතිමෙ සුනාපරන්තකා මනුස්සා, යං මෙ නයිමෙ ලෙඩ්ඩුනා පහාරං දෙන්තී’ති. එවමෙත්ථ, භගවා, භවිස්සති; එවමෙත්ථ, සුගත, භවිස්සතී’’ති. “भन्ते, जर सुनापरंतच्या लोकांनी मला हाताने मारले, तर तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल – ‘हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते मला दगडाने मारत नाहीत.’ हे भगवंता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल.” ‘‘සචෙ පන තෙ, පුණ්ණ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා ලෙඩ්ඩුනා පහාරං දස්සන්ති, තත්ර පන තෙ, පුණ්ණ, කින්ති භවිස්සතී’’ති? “पण पुण्ण, जर सुनापरंतच्या लोकांनी तुला दगडाने मारले, तर तिथे तुला काय वाटेल?” ‘‘සචෙ මෙ, භන්තෙ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා ලෙඩ්ඩුනා පහාරං දස්සන්ති, තත්ර මෙ එවං භවිස්සති – ‘භද්දකා වතිමෙ සුනාපරන්තකා මනුස්සා, සුභද්දකා වතිමෙ සුනාපරන්තකා මනුස්සා, යං මෙ නයිමෙ දණ්ඩෙන පහාරං දෙන්තී’ති. එවමෙත්ථ, භගවා, භවිස්සති; එවමෙත්ථ, සුගත, භවිස්සතී’’ති. “भन्ते, जर सुनापरंतच्या लोकांनी मला दगडाने मारले, तर तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल – ‘हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते मला लाठीने मारत नाहीत.’ हे भगवंता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल.” ‘‘සචෙ පන පුණ්ණ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා දණ්ඩෙන පහාරං දස්සන්ති, තත්ර පන තෙ, පුණ්ණ, කින්ති භවිස්සතී’’ති? “पण पुण्ण, जर सुनापरंतच्या लोकांनी तुला लाठीने मारले, तर तिथे तुला काय वाटेल?” ‘‘සචෙ මෙ, භන්තෙ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා දණ්ඩෙන පහාරං දස්සන්ති, තත්ර මෙ එවං භවිස්සති – ‘භද්දකා වතිමෙ සුනාපරන්තකා මනුස්සා, සුභද්දකා වතිමෙ සුනාපරන්තකා මනුස්සා, යං මෙ නයිමෙ සත්ථෙන පහාරං දෙන්තී’ති. එවමෙත්ථ, භගවා, භවිස්සති; එවමෙත්ථ, සුගත, භවිස්සතී’’ති. “भन्ते, जर सुनापरंतच्या लोकांनी मला लाठीने मारले, तर तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल – ‘हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते मला शस्त्राने मारत नाहीत.’ हे भगवंता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल.” ‘‘සචෙ පන තෙ, පුණ්ණ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා සත්ථෙන පහාරං දස්සන්ති, තත්ර පන තෙ, පුණ්ණ, කින්ති භවිස්සතී’’ති? “पण पुण्ण, जर सुनापरंतच्या लोकांनी तुला शस्त्राने मारले, तर तिथे तुला काय वाटेल?” ‘‘සචෙ මෙ, භන්තෙ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා සත්ථෙන පහාරං දස්සන්ති, තත්ර මෙ එවං භවිස්සති – ‘භද්දකා වතිමෙ සුනාපරන්තකා මනුස්සා, සුභද්දකා වතිමෙ සුනාපරන්තකා මනුස්සා, යං මං නයිමෙ තිණ්හෙන සත්ථෙන ජීවිතා වොරොපෙන්තී’ති. එවමෙත්ථ, භගවා, භවිස්සති; එවමෙත්ථ, සුගත, භවිස්සතී’’ති. “भन्ते, जर सुनापरंतच्या लोकांनी मला शस्त्राने मारले, तर तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल – ‘हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच चांगले आहेत, हे सुनापरंतचे लोक खरोखरच खूप चांगले आहेत, कारण ते धारदार शस्त्राने माझा जीव घेत नाहीत.’ हे भगवंता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, तिथे माझ्या मनात असा विचार येईल.” ‘‘සචෙ [Pg.287] පන තං, පුණ්ණ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා තිණ්හෙන සත්ථෙන ජීවිතා වොරොපෙස්සන්ති, තත්ර පන තෙ, පුණ්ණ, කින්ති භවිස්සතී’’ති? "पण पुण्णा, जर सुनापरान्त देशातील लोकांनी धारदार शस्त्राने तुझा प्राण घेतला, तर त्या प्रसंगी तुला काय वाटेल?" ‘‘සචෙ මං, භන්තෙ, සුනාපරන්තකා මනුස්සා තිණ්හෙන සත්ථෙන ජීවිතා වොරොපෙස්සන්ති, තත්ර මෙ එවං භවිස්සති – ‘සන්ති ඛො තස්ස භගවතො සාවකා කායෙන ච ජීවිතෙන ච අට්ටීයමානා හරායමානා ජිගුච්ඡමානා සත්ථහාරකං පරියෙසන්ති, තං මෙ ඉදං අපරියිට්ඨඤ්ඤෙව සත්ථහාරකං ලද්ධ’න්ති. එවමෙත්ථ, භගවා, භවිස්සති; එවමෙත්ථ, සුගත, භවිස්සතී’’ති. "भन्ते, जर सुनापरान्त देशातील लोकांनी धारदार शस्त्राने माझा प्राण घेतला, तर माझ्या मनात असा विचार येईल— 'भगवंतांचे असेही श्रावक आहेत जे शरीराचा आणि जीवाचा कंटाळा आल्यामुळे, लज्जित झाल्यामुळे आणि वीट आल्यामुळे स्वतःचा प्राण घेण्यासाठी शस्त्र शोधत फिरतात; परंतु मला तर न शोधताच हे प्राण घेणारे शस्त्र मिळाले आहे.' हे भगवंता, त्या प्रसंगी माझ्या मनात असा विचार येईल; हे सुगता, त्या प्रसंगी माझ्या मनात असा विचार येईल." ‘‘සාධු සාධු, පුණ්ණ! සක්ඛිස්සසි ඛො ත්වං, පුණ්ණ, ඉමිනා දමූපසමෙන සමන්නාගතො සුනාපරන්තස්මිං ජනපදෙ වත්ථුං. යස්ස දානි ත්වං, පුණ්ණ, කාලං මඤ්ඤසී’’ති. "साधू, साधू पुण्णा! अशा संयम आणि शांततेने युक्त असलेला तू सुनापरान्त जनपदात राहण्यास समर्थ होशील. पुण्णा, आता तुला जी योग्य वेळ वाटेल, ती तू ठरव." අථ ඛො ආයස්මා පුණ්ණො භගවතො වචනං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා උට්ඨායාසනා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා සෙනාසනං සංසාමෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන සුනාපරන්තො ජනපදො තෙන චාරිකං පක්කාමි. අනුපුබ්බෙන චාරිකං චරමානො යෙන සුනාපරන්තො ජනපදො තදවසරි. තත්ර සුදං ආයස්මා පුණ්ණො සුනාපරන්තස්මිං ජනපදෙ විහරති. අථ ඛො ආයස්මා පුණ්ණො තෙනෙවන්තරවස්සෙන පඤ්චමත්තානි උපාසකසතානි පටිවෙදෙසි. තෙනෙවන්තරවස්සෙන පඤ්චමත්තානි උපාසිකාසතානි පටිවෙදෙසි. තෙනෙවන්තරවස්සෙන තිස්සො විජ්ජා සච්ඡාකාසි. තෙනෙවන්තරවස්සෙන පරිනිබ්බායි. "त्यानंतर आयुष्मान पुण्ण भगवंतांच्या वचनाचे अभिनंदन व कौतुक करून, आसनावरून उठले, भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि आपले बिछाने व निवासस्थान आवरून, पात्र व चीवर घेऊन सुनापरान्त जनपदाच्या देशाने चारिकेसाठी निघाले. क्रमशः चारिका करत ते सुनापरान्त जनपदात पोहोचले. तिथे आयुष्मान पुण्ण सुनापरान्त जनपदात राहू लागले. त्यानंतर आयुष्मान पुण्ण यांनी त्याच वर्षावासात सुमारे पाचशे उपासकांना धर्मात प्रस्थापित केले, त्याच वर्षावासात सुमारे पाचशे उपासिकांना धर्मात प्रस्थापित केले, त्याच वर्षावासात तीन विद्या साक्षात केल्या आणि त्याच वर्षावासात ते परिनिर्वाण पावले." අථ ඛො සම්බහුලා භික්ඛූ යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු…පෙ… එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘යො සො, භන්තෙ, පුණ්ණො නාම කුලපුත්තො භගවතා සංඛිත්තෙන ඔවාදෙන ඔවදිතො, සො කාලඞ්කතො. තස්ස කා ගති කො අභිසම්පරායො’’ති? "त्यानंतर अनेक भिक्खू भगवंतांकडे आले... आणि एका बाजूला बसून त्या भिक्खूंनी भगवंतांना विचारले— 'भन्ते, पुण्ण नावाचे जे कुलपुत्र होते, ज्यांना भगवंतांनी संक्षिप्त उपदेश केला होता, त्यांचे निधन झाले आहे. त्यांची गती काय आहे आणि परलोकातील पुनर्जन्म कोणता आहे?'" ‘‘පණ්ඩිතො, භික්ඛවෙ, පුණ්ණො කුලපුත්තො, පච්චපාදි ධම්මස්සානුධම්මං, න ච මං ධම්මාධිකරණං විහෙසෙසි. පරිනිබ්බුතො, භික්ඛවෙ, පුණ්ණො කුලපුත්තො’’ති. පඤ්චමං. "भिक्खूंनो, पुण्ण कुलपुत्र हा बुद्धिमान होता. त्याने धर्माला अनुसरून आचरण केले आणि धर्माच्या बाबतीत मला कधीही त्रास दिला नाही. भिक्खूंनो, पुण्ण कुलपुत्र परिनिर्वाण पावला आहे." 6. බාහියසුත්තං ६. "बाहिय सुत्त" 89. අථ [Pg.288] ඛො ආයස්මා බාහියො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා බාහියො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන ධම්මං දෙසෙතු, යමහං භගවතො ධම්මං සුත්වා එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරෙය්ය’’න්ති. ८९. "त्यानंतर आयुष्मान बाहिय भगवंतांकडे आले... आणि एका बाजूला बसून आयुष्मान बाहिय भगवंतांना म्हणाले— 'भन्ते, बरे होईल जर भगवंत मला संक्षेपात धम्म उपदेश करतील, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकटा, एकांतात, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू शकेन.'" ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, බාහිය, චක්ඛු නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? "बाहिय, तुला काय वाटते, चक्षु नित्य आहे की अनित्य?" ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. "अनित्य, भन्ते." ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? "आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?" ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. "दुःखकारक, भन्ते." ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? "आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे पाहणे योग्य आहे का?" ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. "नक्कीच नाही, भन्ते." ‘‘රූපා නිච්චා වා අනිච්චා වා’’ති? "रूपे नित्य आहेत की अनित्य?" ‘‘අනිච්චා, භන්තෙ’’…පෙ… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං…පෙ… චක්ඛුසම්ඵස්සො…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? "अनित्य, भन्ते... चक्षु-विज्ञाण... चक्षु-सम्फस्स... मनो-सम्फस्सच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?" ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. "अनित्य, भन्ते." ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? "आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?" ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. "दुःखकारक, भन्ते." ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? "आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' अशा प्रकारे पाहणे योग्य आहे का?" ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. "नक्कीच नाही, भन्ते." ‘‘එවං පස්සං, බාහිය, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. "असे पाहणारा, बाहिय, श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी विरक्त होतो, रूपांविषयी विरक्त होतो, चक्षु-विज्ञाणाविषयी विरक्त होतो, चक्षु-सम्फस्साविषयी विरक्त होतो... आणि मनो-सम्फस्सच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही विरक्त होतो. विरक्त झाल्याने तो रागरहित होतो; रागरहित झाल्याने तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर 'मी विमुक्त झालो आहे' असे ज्ञान होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मासाठी काहीही उरलेले नाही' हे तो जाणतो." අථ ඛො ආයස්මා බාහියො භගවතො භාසිතං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා උට්ඨායාසනා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමි. අථ ඛො ආයස්මා බාහියො එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො නචිරස්සෙව – යස්සත්ථාය කුලපුත්තා සම්මදෙව අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජන්ති තදනුත්තරං – බ්රහ්මචරියපරියොසානං දිට්ඨෙව ධම්මෙ සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහාසි. ‘‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’’ති අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා බාහියො අරහතං අහොසීති. ඡට්ඨං. "त्यानंतर आयुष्मान बाहिय भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन व कौतुक करून, आसनावरून उठले, भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि निघून गेले. त्यानंतर आयुष्मान बाहिय एकटे, एकांतात, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करत असताना, फार काळ न लागताच— ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य प्रकारे घराबाहेर पडून अनगारिक प्रव्रज्या ग्रहण करतात, ते सर्वोत्तम ब्रह्मचर्याचे अंतिम ध्येय याच जन्मात स्वतः उच्च ज्ञानाने साक्षात करून, प्राप्त करून विहरू लागले. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मासाठी काहीही उरलेले नाही' हे त्यांनी जाणले. आणि आयुष्मान बाहिय अर्हतांपैकी एक झाले." 7. පඨමඑජාසුත්තං ७. "प्रथम एजा सुत्त" 90. ‘‘එජා[Pg.289], භික්ඛවෙ, රොගො, එජා ගණ්ඩො, එජා සල්ලං. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, තථාගතො අනෙජො විහරති වීතසල්ලො. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චෙපි ආකඞ්ඛෙය්ය ‘අනෙජො විහරෙය්යං වීතසල්ලො’ති, චක්ඛුං න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛුස්මිං න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛුතො න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛු මෙති න මඤ්ඤෙය්ය; රූපෙ න මඤ්ඤෙය්ය, රූපෙසු න මඤ්ඤෙය්ය, රූපතො න මඤ්ඤෙය්ය, රූපා මෙති න මඤ්ඤෙය්ය; චක්ඛුවිඤ්ඤාණං න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛුවිඤ්ඤාණස්මිං න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛුවිඤ්ඤාණතො න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං මෙති න මඤ්ඤෙය්ය; චක්ඛුසම්ඵස්සං න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛුසම්ඵස්සස්මිං න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛුසම්ඵස්සතො න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛුසම්ඵස්සො මෙති න මඤ්ඤෙය්ය. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තස්මිම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තතොපි න මඤ්ඤෙය්ය, තං මෙති න මඤ්ඤෙය්ය. ९०. "भिक्खूंनो, एजा (तृष्णा) हा रोग आहे, एजा हा गंड (गळू) आहे, एजा हा शल्य (काटा) आहे. म्हणून, भिक्खूंनो, तथागत एजा-रहित आणि शल्य-रहित होऊन विहार करतात. म्हणून, भिक्खूंनो, जर भिक्खूची अशी इच्छा असेल की 'मी एजा-रहित आणि शल्य-रहित होऊन विहार करावा', तर त्याने चक्षूला 'मी' मानू नये, चक्षूमध्ये 'मी' मानू नये, चक्षूपासून 'मी' मानू नये, 'चक्षू माझा आहे' असे मानू नये; रूपांना 'मी' मानू नये, रूपांमध्ये 'मी' मानू नये, रूपांपासून 'मी' मानू नये, 'रूपे माझी आहेत' असे मानू नये; चक्षु-विज्ञाणाला 'मी' मानू नये, चक्षु-विज्ञाणामध्ये 'मी' मानू नये, चक्षु-विज्ञाणापासून 'मी' मानू नये, 'चक्षु-विज्ञाण माझे आहे' असे मानू नये; चक्षु-सम्फस्साला 'मी' मानू नये, चक्षु-सम्फस्सामध्ये 'मी' मानू नये, चक्षु-सम्फस्सापासून 'मी' मानू नये, 'चक्षु-सम्फस्स माझा आहे' असे मानू नये. चक्षु-सम्फस्साच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही 'मी' मानू नये, त्यामध्ये 'मी' मानू नये, त्यापासून 'मी' मानू नये, 'ते माझे आहे' असे मानू नये." ‘‘සොතං න මඤ්ඤෙය්ය…පෙ… ඝානං න මඤ්ඤෙය්ය…පෙ… ජිව්හං න මඤ්ඤෙය්ය, ජිව්හාය න මඤ්ඤෙය්ය, ජිව්හාතො න මඤ්ඤෙය්ය, ජිව්හා මෙති න මඤ්ඤෙය්ය; රසෙ න මඤ්ඤෙය්ය…පෙ… ජිව්හාවිඤ්ඤාණං න මඤ්ඤෙය්ය…පෙ… ජිව්හාසම්ඵස්සං න මඤ්ඤෙය්ය…පෙ… යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තස්මිම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තතොපි න මඤ්ඤෙය්ය, තං මෙති න මඤ්ඤෙය්ය. “कानाविषयी कल्पना करू नये... तसेच... नाकाविषयी कल्पना करू नये... तसेच... जिभेविषयी कल्पना करू नये, जिभेच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, जिभेपासून कल्पना करू नये, 'जीभ माझी आहे' अशी कल्पना करू नये; रसांविषयी कल्पना करू नये... तसेच... जिव्हा-विज्ञानाविषयी कल्पना करू नये... तसेच... जिव्हा-स्पर्शाविषयी कल्पना करू नये... तसेच... जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही कल्पना करू नये, त्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये.” ‘‘කායං න මඤ්ඤෙය්ය…පෙ… මනං න මඤ්ඤෙය්ය, මනස්මිං න මඤ්ඤෙය්ය, මනතො න මඤ්ඤෙය්ය, මනො මෙති න මඤ්ඤෙය්ය; ධම්මෙ න මඤ්ඤෙය්ය…පෙ… මනො විඤ්ඤාණං…පෙ… මනොසම්ඵස්සං…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තස්මිම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තතොපි න මඤ්ඤෙය්ය, තං මෙති න මඤ්ඤෙය්ය; සබ්බං න මඤ්ඤෙය්ය, සබ්බස්මිං න මඤ්ඤෙය්ය, සබ්බතො න මඤ්ඤෙය්ය, සබ්බං මෙති න මඤ්ඤෙය්ය. “शरिराविषयी कल्पना करू नये... तसेच... मनाविषयी कल्पना करू नये, मनाच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, मनापासून कल्पना करू नये, 'मन माझे आहे' अशी कल्पना करू नये; धम्मांविषयी कल्पना करू नये... तसेच... मनो-विज्ञानाविषयी... तसेच... मनो-स्पर्शाविषयी... तसेच... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही कल्पना करू नये, त्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये; सर्व गोष्टींविषयी कल्पना करू नये, सर्वांच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, सर्वांपासून कल्पना करू नये, 'सर्व माझे आहे' अशी कल्पना करू नये.” ‘‘සො එවං අමඤ්ඤමානො න කිඤ්චිපි ලොකෙ උපාදියති. අනුපාදියං න පරිතස්සති. අපරිතස්සං පච්චත්තඤ්ඤෙව පරිනිබ්බායති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. සත්තමං. “अशा प्रकारे कल्पना न करणारा तो (भिक्खू) लोकात कशाचेही उपादान करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो उद्विग्न होत नाही. उद्विग्न न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही,' असे तो जाणतो.” सातवे. 8. දුතියඑජාසුත්තං ८. दुसरे एजा सुत्त 91. ‘‘එජා[Pg.290], භික්ඛවෙ, රොගො, එජා ගණ්ඩො, එජා සල්ලං. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, තථාගතො අනෙජො විහරති වීතසල්ලො. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චෙපි ආකඞ්ඛෙය්ය ‘අනෙජො විහරෙය්යං වීතසල්ලො’ති, චක්ඛුං න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛුස්මිං න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛුතො න මඤ්ඤෙය්ය, චක්ඛු මෙති න මඤ්ඤෙය්ය; රූපෙ න මඤ්ඤෙය්ය… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සං… යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තස්මිම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තතොපි න මඤ්ඤෙය්ය, තං මෙති න මඤ්ඤෙය්ය. යඤ්හි, භික්ඛවෙ, මඤ්ඤති, යස්මිං මඤ්ඤති, යතො මඤ්ඤති, යං මෙති මඤ්ඤති, තතො තං හොති අඤ්ඤථා. අඤ්ඤථාභාවී භවසත්තො ලොකො භවමෙව අභිනන්දති…පෙ…. ९१. “भिक्खूंनो, एजा (तृष्णा) हा रोग आहे, एजा हा गंड (गळू) आहे, एजा हा शल्य (काटा) आहे. म्हणूनच, भिक्खूंनो, तथागत एजा-रहित आणि शल्य-रहित होऊन विहरतात. म्हणूनच, भिक्खूंनो, जर एखाद्या भिक्खूला 'मी एजा-रहित आणि शल्य-रहित होऊन विहरावे' अशी इच्छा असेल, तर त्याने डोळ्याविषयी कल्पना करू नये, डोळ्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, डोळ्यापासून कल्पना करू नये, 'डोळा माझा आहे' अशी कल्पना करू नये; रूपांविषयी कल्पना करू नये... चक्षु-विज्ञानाविषयी... चक्षु-स्पर्शाविषयी... चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही कल्पना करू नये, त्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये. कारण, भिक्खूंनो, मनुष्य ज्या कशाची कल्पना करतो, ज्याच्या ठिकाणी कल्पना करतो, ज्याच्यापासून कल्पना करतो, ज्याला 'माझे' म्हणून कल्पितो, ते त्या कल्पनेपेक्षा वेगळे (अन्यथा) होते. अन्यथा होणारा आणि अस्तित्वाला चिकटलेला हा लोक अस्तित्वाचाच आनंद घेतो... तसेच...” ‘‘ජිව්හං න මඤ්ඤෙය්ය, ජිව්හාය න මඤ්ඤෙය්ය, ජිව්හාතො න මඤ්ඤෙය්ය, ජිව්හා මෙති න මඤ්ඤෙය්ය; රසෙ න මඤ්ඤෙය්ය… ජිව්හාවිඤ්ඤාණං… ජිව්හාසම්ඵස්සං… යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තස්මිම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තතොපි න මඤ්ඤෙය්ය, තං මෙති න මඤ්ඤෙය්ය. යඤ්හි, භික්ඛවෙ, මඤ්ඤති, යස්මිං මඤ්ඤති, යතො මඤ්ඤති, යං මෙති මඤ්ඤති, තතො තං හොති අඤ්ඤථා. අඤ්ඤථාභාවී භවසත්තො ලොකො භවමෙව අභිනන්දති…පෙ…. “जिभेविषयी कल्पना करू नये, जिभेच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, जिभेपासून कल्पना करू नये, 'जीभ माझी आहे' अशी कल्पना करू नये; रसांविषयी कल्पना करू नये... जिव्हा-विज्ञानाविषयी... जिव्हा-स्पर्शाविषयी... जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही कल्पना करू नये, त्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये. कारण, भिक्खूंनो, मनुष्य ज्या कशाची कल्पना करतो, ज्याच्या ठिकाणी कल्पना करतो, ज्याच्यापासून कल्पना करतो, ज्याला 'माझे' म्हणून कल्पितो, ते त्या कल्पनेपेक्षा वेगळे (अन्यथा) होते. अन्यथा होणारा आणि अस्तित्वाला चिकटलेला हा लोक अस्तित्वाचाच आनंद घेतो... तसेच...” ‘‘මනං න මඤ්ඤෙය්ය, මනස්මිං න මඤ්ඤෙය්ය, මනතො න මඤ්ඤෙය්ය, මනො මෙති න මඤ්ඤෙය්ය… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සං… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තස්මිම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තතොපි න මඤ්ඤෙය්ය, තං මෙති න මඤ්ඤෙය්ය. යඤ්හි, භික්ඛවෙ, මඤ්ඤති, යස්මිං මඤ්ඤති, යතො මඤ්ඤති, යං මෙති මඤ්ඤති, තතො තං හොති අඤ්ඤථා. අඤ්ඤථාභාවී භවසත්තො ලොකො භවමෙව අභිනන්දති. “मनाविषयी कल्पना करू नये, मनाच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, मनापासून कल्पना करू नये, 'मन माझे आहे' अशी कल्पना करू नये... मनो-विज्ञानाविषयी... मनो-स्पर्शाविषयी... मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयीही कल्पना करू नये, त्याच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये. कारण, भिक्खूंनो, मनुष्य ज्या कशाची कल्पना करतो, ज्याच्या ठिकाणी कल्पना करतो, ज्याच्यापासून कल्पना करतो, ज्याला 'माझे' म्हणून कल्पितो, ते त्या कल्पनेपेक्षा वेगळे (अन्यथा) होते. अन्यथा होणारा आणि अस्तित्वाला चिकटलेला हा लोक अस्तित्वाचाच आनंद घेतो.” ‘‘යාවතා, භික්ඛවෙ, ඛන්ධධාතුආයතනා තම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තස්මිම්පි න මඤ්ඤෙය්ය, තතොපි න මඤ්ඤෙය්ය, තං මෙති න මඤ්ඤෙය්ය. සො එවං අමඤ්ඤමානො න කිඤ්චි ලොකෙ උපාදියති. අනුපාදියං න පරිතස්සති. අපරිතස්සං පච්චත්තඤ්ඤෙව පරිනිබ්බායති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. අට්ඨමං. “भिक्खूंनो, जितके काही स्कंध, धातू आणि आयतने आहेत, त्यांविषयीही कल्पना करू नये, त्यांच्या ठिकाणी कल्पना करू नये, त्यांच्यापासून कल्पना करू नये, 'ते माझे आहे' अशी कल्पना करू नये. अशा प्रकारे कल्पना न करणारा तो (भिक्खू) लोकात कशाचेही उपादान करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो उद्विग्न होत नाही. उद्विग्न न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही शेष राहिलेले नाही,' असे तो जाणतो.” आठवे. 9. පඨමද්වයසුත්තං ९. पहिले द्वय सुत्त 92. ‘‘ද්වයං [Pg.291] වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, ද්වයං? චක්ඛුඤ්චෙව රූපා ච, සොතඤ්චෙව සද්දා ච, ඝානඤ්චෙව ගන්ධා ච, ජිව්හා චෙව රසා ච, කායො චෙව ඵොට්ඨබ්බා ච, මනො චෙව ධම්මා ච – ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, ද්වයං. ९२. “भिक्खूंनो, मी तुम्हाला द्वय (दोन गोष्टींचा समूह) उपदेशीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूंनो, द्वय म्हणजे काय? डोळा आणि रूपे, कान आणि शब्द, नाक आणि गंध, जीभ आणि रस, शरीर आणि स्पर्श, मन आणि धम्म (मानसिक विषय) – भिक्खूंनो, याला द्वय असे म्हणतात.” ‘‘යො, භික්ඛවෙ, එවං වදෙය්ය – ‘අහමෙතං ද්වයං පච්චක්ඛාය අඤ්ඤං ද්වයං පඤ්ඤපෙස්සාමී’ති, තස්ස වාචාවත්ථුකමෙවස්ස. පුට්ඨො ච න සම්පායෙය්ය. උත්තරිඤ්ච විඝාතං ආපජ්ජෙය්ය. තං කිස්ස හෙතු? යථා තං, භික්ඛවෙ, අවිසයස්මි’’න්ති. නවමං. “भिक्खूंनो, जर कोणी असे म्हणाला की – 'मी या द्वयाचा त्याग करून दुसऱ्या एखाद्या द्वयाची प्रज्ञापना (स्थापना) करीन,' तर त्याचे बोलणे केवळ पोकळ शब्दच ठरेल. विचारले असता तो उत्तर देऊ शकणार नाही आणि उलटपक्षी तो त्रासाला (व्याकुळतेला) प्राप्त होईल. त्याचे कारण काय? कारण, भिक्खूंनो, ते त्याच्या विषयात (कक्षेत) नाही.” नववे. 10. දුතියද්වයසුත්තං १०. दुसरे द्वय सुत्त 93. ‘‘ද්වයං, භික්ඛවෙ, පටිච්ච විඤ්ඤාණං සම්භොති. කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, ද්වයං පටිච්ච විඤ්ඤාණං සම්භොති? චක්ඛුඤ්ච පටිච්ච රූපෙ ච උප්පජ්ජති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං. චක්ඛු අනිච්චං විපරිණාමි අඤ්ඤථාභාවි. රූපා අනිච්චා විපරිණාමිනො අඤ්ඤථාභාවිනො. ඉත්ථෙතං ද්වයං චලඤ්චෙව බ්යථඤ්ච අනිච්චං විපරිණාමි අඤ්ඤථාභාවි. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනිච්චං විපරිණාමි අඤ්ඤථාභාවි. යොපි හෙතු යොපි පච්චයො චක්ඛුවිඤ්ඤාණස්ස උප්පාදාය, සොපි හෙතු සොපි පච්චයො අනිච්චො විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. අනිච්චං ඛො පන, භික්ඛවෙ, පච්චයං පටිච්ච උප්පන්නං චක්ඛුවිඤ්ඤාණං කුතො නිච්චං භවිස්සති! යා ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමෙසං තිණ්ණං ධම්මානං සඞ්ගති සන්නිපාතො සමවායො, අයං වුච්චති චක්ඛුසම්ඵස්සො. චක්ඛුසම්ඵස්සොපි අනිච්චො විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. යොපි හෙතු යොපි පච්චයො චක්ඛුසම්ඵස්සස්ස උප්පාදාය, සොපි හෙතු සොපි පච්චයො අනිච්චො විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. අනිච්චං ඛො පන, භික්ඛවෙ, පච්චයං පටිච්ච උප්පන්නො චක්ඛුසම්ඵස්සො කුතො නිච්චො භවිස්සති! ඵුට්ඨො, භික්ඛවෙ, වෙදෙති, ඵුට්ඨො චෙතෙති, ඵුට්ඨො සඤ්ජානාති. ඉත්ථෙතෙපි ධම්මා චලා චෙව බ්යථා ච අනිච්චා විපරිණාමිනො අඤ්ඤථාභාවිනො. සොතං…පෙ…. ९३. “भिक्खूंनो, द्वयावर अवलंबून विज्ञान उत्पन्न होते. आणि भिक्खूंनो, द्वयावर अवलंबून विज्ञान कसे उत्पन्न होते? डोळा आणि रूपांवर अवलंबून चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होते. डोळा अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारा (बदलणारा) आहे. रूपे अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारी आहेत. अशा प्रकारे हे द्वय चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारे आहे. चक्षु-विज्ञान अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारे आहे. चक्षु-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय (कारण) आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारा आहे. भिक्खूंनो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेले चक्षु-विज्ञान नित्य कसे असू शकेल! भिक्खूंनो, या तीन गोष्टींचा जो संयोग, संनिपात (एकत्र येणे) आणि समवाय आहे, त्याला चक्षु-स्पर्श असे म्हणतात. चक्षु-स्पर्श देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारा आहे. चक्षु-स्पर्शाच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारा आहे. भिक्खूंनो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेला चक्षु-स्पर्श नित्य कसा असू शकेल! भिक्खूंनो, स्पर्शाने युक्त झालेला मनुष्य वेदन करतो (अनुभवतो), स्पर्शाने युक्त झालेला चेतना करतो, स्पर्शाने युक्त झालेला संज्ञा करतो (जाणतो). अशा प्रकारे हे धम्म देखील चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथा होणारे आहेत. कान... तसेच...” ‘‘ජිව්හඤ්ච පටිච්ච රසෙ ච උප්පජ්ජති ජිව්හාවිඤ්ඤාණං. ජිව්හා අනිච්චා විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. රසා අනිච්චා විපරිණාමිනො අඤ්ඤථාභාවිනො. ඉත්ථෙතං ද්වයං චලඤ්චෙව බ්යථඤ්ච අනිච්චං විපරිණාමි අඤ්ඤථාභාවි. ජිව්හාවිඤ්ඤාණං අනිච්චං විපරිණාමි අඤ්ඤථාභාවි. යොපි හෙතු යොපි පච්චයො ජිව්හාවිඤ්ඤාණස්ස උප්පාදාය[Pg.292], සොපි හෙතු සොපි පච්චයො අනිච්චො විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. අනිච්චං ඛො පන, භික්ඛවෙ, පච්චයං පටිච්ච උප්පන්නං ජිව්හාවිඤ්ඤාණං, කුතො නිච්චං භවිස්සති! යා ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමෙසං තිණ්ණං ධම්මානං සඞ්ගති සන්නිපාතො සමවායො, අයං වුච්චති ජිව්හාසම්ඵස්සො. ජිව්හාසම්ඵස්සොපි අනිච්චො විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. යොපි හෙතු යොපි පච්චයො ජිව්හාසම්ඵස්සස්ස උප්පාදාය, සොපි හෙතු සොපි පච්චයො අනිච්චො විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. අනිච්චං ඛො පන, භික්ඛවෙ, පච්චයං පටිච්ච උප්පන්නො ජිව්හාසම්ඵස්සො, කුතො නිච්චො භවිස්සති! ඵුට්ඨො, භික්ඛවෙ, වෙදෙති, ඵුට්ඨො චෙතෙති, ඵුට්ඨො සඤ්ජානාති. ඉත්ථෙතෙපි ධම්මා චලා චෙව බ්යථා ච අනිච්චා විපරිණාමිනො අඤ්ඤථාභාවිනො. කායං…පෙ…. “जिभ आणि रसांवर (चवींवर) अवलंबून जिव्हा-विज्ञान उत्पन्न होते. जीभ अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी (बदलणाऱ्या स्वभावाची) आहे. रस अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहेत. अशा प्रकारे हे द्वय चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. जिव्हा-विज्ञान अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. जिव्हा-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय (कारण) आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. हे भिक्खूहो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेले जिव्हा-विज्ञान नित्य कसे बरे असेल! हे भिक्खूहो, या तीन धर्मांचा जो संयोग, संनिपात आणि समवाय आहे, त्याला 'जिव्हा-सम्फस्स' (जिभेचा स्पर्श) असे म्हणतात. जिव्हा-सम्फस्स देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. जिव्हा-सम्फस्साच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. हे भिक्खूहो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेला जिव्हा-सम्फस्स नित्य कसा बरे असेल! हे भिक्खूहो, स्पर्शाने युक्त होऊन मनुष्य वेदन करतो, स्पर्शाने युक्त होऊन चेतना करतो, स्पर्शाने युक्त होऊन संज्ञा करतो. अशा प्रकारे हे धर्म देखील चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहेत. काया (शरीर)... आणि तद्वतच...” ‘‘මනඤ්ච පටිච්ච ධම්මෙ ච උප්පජ්ජති මනොවිඤ්ඤාණං. මනො අනිච්චො විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. ධම්මා අනිච්චා විපරිණාමිනො අඤ්ඤථාභාවිනො. ඉත්ථෙතං ද්වයං චලඤ්චෙව බ්යථඤ්ච අනිච්චං විපරිණාමි අඤ්ඤථාභාවි. මනොවිඤ්ඤාණං අනිච්චං විපරිණාමි අඤ්ඤථාභාවි. යොපි හෙතු යොපි පච්චයො මනොවිඤ්ඤාණස්ස උප්පාදාය, සොපි හෙතු සොපි පච්චයො අනිච්චො විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. අනිච්චං ඛො පන, භික්ඛවෙ, පච්චයං පටිච්ච උප්පන්නං මනොවිඤ්ඤාණං, කුතො නිච්චං භවිස්සති! යා ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමෙසං තිණ්ණං ධම්මානං සඞ්ගති සන්නිපාතො සමවායො, අයං වුච්චති මනොසම්ඵස්සො. මනොසම්ඵස්සොපි අනිච්චො විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. යොපි හෙතු යොපි පච්චයො මනොසම්ඵස්සස්ස උප්පාදාය, සොපි හෙතු සොපි පච්චයො අනිච්චො විපරිණාමී අඤ්ඤථාභාවී. අනිච්චං ඛො පන, භික්ඛවෙ, පච්චයං පටිච්ච උප්පන්නො මනොසම්ඵස්සො, කුතො නිච්චො භවිස්සති! ඵුට්ඨො, භික්ඛවෙ, වෙදෙති, ඵුට්ඨො චෙතෙති, ඵුට්ඨො සඤ්ජානාති. ඉත්ථෙතෙපි ධම්මා චලා චෙව බ්යථා ච අනිච්චා විපරිණාමිනො අඤ්ඤථාභාවිනො. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, ද්වයං පටිච්ච විඤ්ඤාණං සම්භොතී’’ති. දසමං. “मन आणि धम्मांवर (मानसिक विषयांवर) अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते. मन अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. धम्म अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहेत. अशा प्रकारे हे द्वय चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. मनो-विज्ञान अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. मनो-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. हे भिक्खूहो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेले मनो-विज्ञान नित्य कसे बरे असेल! हे भिक्खूहो, या तीन धर्मांचा जो संयोग, संनिपात आणि समवाय आहे, त्याला 'मनो-सम्फस्स' (मनाचा स्पर्श) असे म्हणतात. मनो-सम्फस्स देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. मनो-सम्फस्साच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय देखील अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहे. हे भिक्खूहो, अनित्य प्रत्ययावर अवलंबून उत्पन्न झालेला मनो-सम्फस्स नित्य कसा बरे असेल! हे भिक्खूहो, स्पर्शाने युक्त होऊन मनुष्य वेदन करतो, स्पर्शाने युक्त होऊन चेतना करतो, स्पर्शाने युक्त होऊन संज्ञा करतो. अशा प्रकारे हे धर्म देखील चंचल, अस्थिर, अनित्य, परिवर्तनशील आणि अन्यथाभावी आहेत. हे भिक्खूहो, अशा प्रकारे द्वयावर अवलंबून विज्ञान उत्पन्न होते.” दहावे (सुत्त समाप्त). ඡන්නවග්ගො නවමො. नववा छन्नवग्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची उद्दान (अनुक्रमणिका) - පලොකසුඤ්ඤා සංඛිත්තං, ඡන්නො පුණ්ණො ච බාහියො; එජෙන ච දුවෙ වුත්තා, ද්වයෙහි අපරෙ දුවෙති. पलोक (पलोकसुत्त), सुञ्ञ (सुञ्ञलोकतथा सुत्त), संखित्त (संखित्तसुत्त), छन्न (छन्नसुत्त), पुण्ण (पुण्णसुत्त) आणि बाहिय (बाहियसुत्त); एजेन (तृष्णेसंबंधी) दोन सुत्ते आणि द्वयावर (दोन गोष्टींवर) आधारित इतर दोन सुत्ते सांगितली आहेत. 10. සළවග්ගො १०. सळवग्ग 1. අදන්තඅගුත්තසුත්තං १. अदन्त-अगुत्त सुत्त 94. සාවත්ථිනිදානං[Pg.293]. ‘‘ඡයිමෙ, භික්ඛවෙ, ඵස්සායතනා අදන්තා අගුත්තා අරක්ඛිතා අසංවුතා දුක්ඛාධිවාහා හොන්ති. කතමෙ ඡ? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, ඵස්සායතනං අදන්තං අගුත්තං අරක්ඛිතං අසංවුතං දුක්ඛාධිවාහං හොති…පෙ… ජිව්හා, භික්ඛවෙ, ඵස්සායතනං අදන්තං අගුත්තං අරක්ඛිතං අසංවුතං දුක්ඛාධිවාහං හොති…පෙ… මනො, භික්ඛවෙ, ඵස්සායතනං අදන්තං අගුත්තං අරක්ඛිතං අසංවුතං දුක්ඛාධිවාහං හොති. ඉමෙ ඛො, භික්ඛවෙ, ඡ ඵස්සායතනා අදන්තා අගුත්තා අරක්ඛිතා අසංවුතා දුක්ඛාධිවාහා හොන්ති’’. ९४. श्रावस्ती येथील निदान. 'हे भिक्खूहो, ही सहा स्पर्शायतने जर अदमित, अरक्षित, असुरक्षित आणि असंवृत राहिली, तर ती तीव्र दुःख वाहून आणणारी ठरतात. कोणती सहा? हे भिक्खूहो, चक्षु (डोळा) हे स्पर्शायतन जर अदमित, अरक्षित, असुरक्षित आणि असंवृत राहिले, तर ते तीव्र दुःख वाहून आणणारे ठरते... पे... जीभ हे स्पर्शायतन जर अदमित, अरक्षित, असुरक्षित आणि असंवृत राहिले, तर ते तीव्र दुःख वाहून आणणारे ठरते... पे... मन हे स्पर्शायतन जर अदमित, अरक्षित, असुरक्षित आणि असंवृत राहिले, तर ते तीव्र दुःख वाहून आणणारे ठरते. हे भिक्खूहो, ही सहा स्पर्शायतने जर अदमित, अरक्षित, असुरक्षित आणि असंवृत राहिली, तर ती तीव्र दुःख वाहून आणणारी ठरतात.' ‘‘ඡයිමෙ, භික්ඛවෙ, ඵස්සායතනා සුදන්තා සුගුත්තා සුරක්ඛිතා සුසංවුතා සුඛාධිවාහා හොන්ති. කතමෙ ඡ? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, ඵස්සායතනං සුදන්තං සුගුත්තං සුරක්ඛිතං සුසංවුතං සුඛාධිවාහං හොති…පෙ… ජිව්හා, භික්ඛවෙ, ඵස්සායතනං සුදන්තං සුගුත්තං සුරක්ඛිතං සුසංවුතං සුඛාධිවාහං හොති…පෙ… මනො, භික්ඛවෙ, ඵස්සායතනං සුදන්තං සුගුත්තං සුරක්ඛිතං සුසංවුතං සුඛාධිවාහං හොති. ඉමෙ ඛො, භික්ඛවෙ, ඡ ඵස්සායතනා සුදන්තා සුගුත්තා සුරක්ඛිතා සුසංවුතා සුඛාධිවාහා හොන්තී’’ති. ඉදමවොච භගවා…පෙ… එතදවොච සත්ථා – 'हे भिक्खूहो, ही सहा स्पर्शायतने जर सुदमित, सुरक्षित, सुसंरक्षित आणि सुसंवृत राहिली, तर ती सुख वाहून आणणारी ठरतात. कोणती सहा? हे भिक्खूहो, चक्षु हे स्पर्शायतन जर सुदमित, सुरक्षित, सुसंरक्षित आणि सुसंवृत राहिले, तर ते सुख वाहून आणणारे ठरते... पे... जीभ हे स्पर्शायतन जर सुदमित, सुरक्षित, सुसंरक्षित आणि सुसंवृत राहिले, तर ते सुख वाहून आणणारे ठरते... पे... मन हे स्पर्शायतन जर सुदमित, सुरक्षित, सुसंरक्षित आणि सुसंवृत राहिले, तर ते सुख वाहून आणणारे ठरते. हे भिक्खूहो, ही सहा स्पर्शायतने जर सुदमित, सुरक्षित, सुसंरक्षित आणि सुसंवृत राहिली, तर ती सुख वाहून आणणारी ठरतात.' भगवान असे म्हणाले... पे... शास्त्यांनी पुढे असे म्हटले - ‘‘සළෙව ඵස්සායතනානි භික්ඛවො,අසංවුතො යත්ථ දුක්ඛං නිගච්ඡති; තෙසඤ්ච යෙ සංවරණං අවෙදිසුං,සද්ධාදුතියා විහරන්තානවස්සුතා. हे भिक्खूहो, स्पर्शायतने केवळ सहाच आहेत, जिथे असंवृत मनुष्य दुःखाला प्राप्त होतो; परंतु ज्यांनी त्यांच्या संवराचा मार्ग जाणला आहे, ते श्रद्धेला सोबती बनवून, अनासक्त होऊन विहरतात. ‘‘දිස්වාන රූපානි මනොරමානි,අථොපි දිස්වාන අමනොරමානි; මනොරමෙ රාගපථං විනොදයෙ,න චාප්පියං මෙති මනං පදොසයෙ. मनोरम रूपे पाहून, तसेच अमनोरम रूपे पाहूनही; मनोरम रूपांविषयीचा रागाचा मार्ग दूर करावा, आणि 'हे मला अप्रिय आहे' असे म्हणून मनाला दूषित करू नये. ‘‘සද්දඤ්ච සුත්වා දුභයං පියාප්පියං,පියම්හි සද්දෙ න සමුච්ඡිතො සියා; අථොප්පියෙ දොසගතං විනොදයෙ,න චාප්පියං මෙති මනං පදොසයෙ. प्रिय आणि अप्रिय असे दोन्ही प्रकारचे शब्द ऐकून, प्रिय शब्दांमध्ये अति-आसक्त होऊ नये; तसेच अप्रिय शब्दांविषयीचा द्वेष दूर करावा, आणि 'हे मला अप्रिय आहे' असे म्हणून मनाला दूषित करू नये. ‘‘ගන්ධඤ්ච [Pg.294] ඝත්වා සුරභිං මනොරමං,අථොපි ඝත්වා අසුචිං අකන්තියං; අකන්තියස්මිං පටිඝං විනොදයෙ,ඡන්දානුනීතො න ච කන්තියෙ සියා. सुगंधी व मनोरम गंध घेऊन, तसेच अशुद्ध व अप्रिय गंध घेऊनही; अप्रिय गंधाविषयीचा प्रतिघ दूर करावा, आणि प्रिय गंधाच्या इच्छेच्या आहारी जाऊ नये. ‘‘රසඤ්ච භොත්වාන අසාදිතඤ්ච සාදුං,අථොපි භොත්වාන අසාදුමෙකදා; සාදුං රසං නාජ්ඣොසාය භුඤ්ජෙ,විරොධමාසාදුසු නොපදංසයෙ. स्वादिष्ट व मधुर रसाचे सेवन करून, तसेच कधीतरी अस्वादिष्ट रसाचे सेवन करूनही; मधुर रसाचा अति-आसक्तीने उपभोग घेऊ नये, आणि अस्वादिष्ट रसाविषयी विरोध दर्शवू नये. ‘‘ඵස්සෙන ඵුට්ඨො න සුඛෙන මජ්ජෙ,දුක්ඛෙන ඵුට්ඨොපි න සම්පවෙධෙ; ඵස්සද්වයං සුඛදුක්ඛෙ උපෙක්ඛෙ,අනානුරුද්ධො අවිරුද්ධ කෙනචි. सुखद स्पर्शाने स्पर्शित झाल्यावर उन्मत्त होऊ नये, आणि दुःखद स्पर्शाने स्पर्शित झाल्यावर कंपायमान होऊ नये; सुख आणि दुःख या दोन्ही स्पर्शांकडे उपेक्षेने पाहावे, कोणाशीही अनुनय किंवा विरोध न बाळगता. ‘‘පපඤ්චසඤ්ඤා ඉතරීතරා නරා,පපඤ්චයන්තා උපයන්ති සඤ්ඤිනො; මනොමයං ගෙහසිතඤ්ච සබ්බං,පනුජ්ජ නෙක්ඛම්මසිතං ඉරීයති. प्रपंच-संज्ञेने युक्त असलेले सामान्य लोक, प्रपंच करत आसक्त होतात; परंतु गृहजीवनाशी संबंधित सर्व मनोमय विचारांचा त्याग करून, मनुष्य नैष्क्रम्यावर आधारित आचरण करतो. ‘‘එවං මනො ඡස්සු යදා සුභාවිතො,ඵුට්ඨස්ස චිත්තං න විකම්පතෙ ක්වචි; තෙ රාගදොසෙ අභිභුය්ය භික්ඛවො,භවත්ථ ජාතිමරණස්ස පාරගා’’ති. පඨමං; अशा प्रकारे जेव्हा मन या सहा आयतनांमध्ये चांगल्या प्रकारे भावित होते, तेव्हा कोणत्याही स्पर्शाने त्याचे चित्त कधीही विचलित होत नाही; हे भिक्खूहो, राग आणि द्वेषावर विजय मिळवून, तुम्ही जन्म-मरणाच्या पलीकडच्या तीरावर पोहोचणारे व्हा! पहिले (सुत्त समाप्त). 2. මාලුක්යපුත්තසුත්තං २. मालुक्यपुत्त सुत्त 95. අථ ඛො ආයස්මා මාලුක්යපුත්තො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා මාලුක්යපුත්තො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන ධම්මං දෙසෙතු, යමහං භගවතො ධම්මං සුත්වා එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරෙය්ය’’න්ති. ९५. त्यानंतर आयुष्यमान मालुक्यपुत्त जेथे भगवान होते तेथे गेले... पे... एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान मालुक्यपुत्तांनी भगवंतांना असे म्हटले – 'भंते! जर भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्म उपदेश केला तर बरे होईल, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकांतात, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरू शकेन.' ‘‘එත්ථ [Pg.295] දානි, මාලුක්යපුත්ත, කිං දහරෙ භික්ඛූ වක්ඛාම! යත්ර හි නාම ත්වං, භික්ඛු, ජිණ්ණො වුද්ධො මහල්ලකො අද්ධගතො වයොඅනුප්පත්තො සංඛිත්තෙන ඔවාදං යාචසී’’ති. "हे मालुक्यपुत्त, आता अशा वेळी मी तरुण भिक्खूंना काय सांगावे? जेव्हा तुझ्यासारखा वृद्ध, वयोवृद्ध, म्हातारा, आयुष्याचा मोठा टप्पा पार केलेला आणि अंतिम वयात पोहोचलेला भिक्खू मला संक्षेपात उपदेश मागत आहे!" ‘‘කිඤ්චාපාහං, භන්තෙ, ජිණ්ණො වුද්ධො මහල්ලකො අද්ධගතො වයොඅනුප්පත්තො. දෙසෙතු මෙ, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන ධම්මං, දෙසෙතු සුගතො සංඛිත්තෙන ධම්මං, අප්පෙව නාමාහං භගවතො භාසිතස්ස අත්ථං ආජානෙය්යං. අප්පෙව නාමාහං භගවතො භාසිතස්ස දායාදො අස්ස’’න්ති. "भन्ते, जरी मी वृद्ध, वयोवृद्ध, म्हातारा, आयुष्याचा मोठा टप्पा पार केलेला आणि अंतिम वयात पोहोचलेला असलो, तरीही भन्ते, भगवंतांनी मला संक्षेपात धम्म उपदेश करावा, सुगतांनी मला संक्षेपात धम्म उपदेश करावा. कदाचित मी भगवंतांच्या वचनाचा अर्थ समजून घेईन, कदाचित मी भगवंतांच्या वचनाचा वारसदार बनेन." ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, මාලුක්යපුත්ත, යෙ තෙ චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා අදිට්ඨා අදිට්ඨපුබ්බා, න ච පස්සසි, න ච තෙ හොති පස්සෙය්යන්ති? අත්ථි තෙ තත්ථ ඡන්දො වා රාගො වා පෙමං වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. "मालुक्यपुत्त, तुला काय वाटते? डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे जे रूप तू पाहिलेले नाहीस, पूर्वी कधीही पाहिलेले नाहीस, जे तू आता पाहत नाहीस आणि 'ते पाहावे' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा रूपांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा (छंद), राग (आसक्ती) किंवा प्रेम (जिव्हाळा) उत्पन्न होतो का?" "नाही, भन्ते." ‘‘යෙ තෙ සොතවිඤ්ඤෙය්යා සද්දා අස්සුතා අස්සුතපුබ්බා, න ච සුණාසි, න ච තෙ හොති සුණෙය්යන්ති? අත්ථි තෙ තත්ථ ඡන්දො වා රාගො වා පෙමං වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. "कानांनी जाणता येण्याजोगे जे शब्द तू ऐकलेले नाहीत, पूर्वी कधीही ऐकलेले नाहीत, जे तू आता ऐकत नाहीस आणि 'ते ऐकावे' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा शब्दांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा, राग किंवा प्रेम उत्पन्न होते का?" "नाही, भन्ते." ‘‘යෙ තෙ ඝානවිඤ්ඤෙය්යා ගන්ධා අඝායිතා අඝායිතපුබ්බා, න ච ඝායසි, න ච තෙ හොති ඝායෙය්යන්ති? අත්ථි තෙ තත්ථ ඡන්දො වා රාගො වා පෙමං වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. "नाकाने जाणता येण्याजोगे जे गंध तू घेतलेले नाहीत, पूर्वी कधीही घेतलेले नाहीत, जे तू आता घेत नाहीस आणि 'ते घ्यावेत' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा गंधांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा, राग किंवा प्रेम उत्पन्न होते का?" "नाही, भन्ते." ‘‘යෙ තෙ ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා අසායිතා අසායිතපුබ්බා, න ච සායසි, න ච තෙ හොති සායෙය්යන්ති? අත්ථි තෙ තත්ථ ඡන්දො වා රාගො වා පෙමං වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. "जिभेने जाणता येण्याजोगे जे रस तू चाखलेले नाहीत, पूर्वी कधीही चाखलेले नाहीत, जे तू आता चाखत नाहीस आणि 'ते चाखावेत' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा रसांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा, राग किंवा प्रेम उत्पन्न होते का?" "नाही, भन्ते." ‘‘යෙ තෙ කායවිඤ්ඤෙය්යා ඵොට්ඨබ්බා අසම්ඵුට්ඨා අසම්ඵුට්ඨපුබ්බා, න ච ඵුසසි, න ච තෙ හොති ඵුසෙය්යන්ති? අත්ථි තෙ තත්ථ ඡන්දො වා රාගො වා පෙමං වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. "शरीराने जाणता येण्याजोगे जे स्पर्श तू अनुभवलेले नाहीत, पूर्वी कधीही अनुभवलेले नाहीत, जे तू आता अनुभवत नाहीस आणि 'ते अनुभवावेत' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा स्पर्शांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा, राग किंवा प्रेम उत्पन्न होते का?" "नाही, भन्ते." ‘‘යෙ තෙ මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා අවිඤ්ඤාතා අවිඤ්ඤාතපුබ්බා, න ච විජානාසි, න ච තෙ හොති විජානෙය්යන්ති? අත්ථි තෙ තත්ථ ඡන්දො වා රාගො වා පෙමං වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. "मनाने जाणता येण्याजोगे जे धम्म तू जाणलेले नाहीत, पूर्वी कधीही जाणलेले नाहीत, जे तू आता जाणत नाहीस आणि 'ते जाणावेत' अशी इच्छाही तुला होत नाही; अशा धम्मांविषयी तुझ्या मनात काही इच्छा, राग किंवा प्रेम उत्पन्न होते का?" "नाही, भन्ते." ‘‘එත්ථ ච තෙ, මාලුක්යපුත්ත, දිට්ඨසුතමුතවිඤ්ඤාතබ්බෙසු ධම්මෙසු දිට්ඨෙ දිට්ඨමත්තං භවිස්සති, සුතෙ සුතමත්තං භවිස්සති, මුතෙ මුතමත්තං භවිස්සති, විඤ්ඤාතෙ විඤ්ඤාතමත්තං භවිස්සති. යතො ඛො තෙ, මාලුක්යපුත්ත, දිට්ඨසුතමුතවිඤ්ඤාතබ්බෙසු ධම්මෙසු දිට්ඨෙ දිට්ඨමත්තං භවිස්සති, සුතෙ සුතමත්තං භවිස්සති[Pg.296], මුතෙ මුතමත්තං භවිස්සති, විඤ්ඤාතෙ විඤ්ඤාතමත්තං භවිස්සති; තතො ත්වං, මාලුක්යපුත්ත, න තෙන. යතො ත්වං, මාලුක්යපුත්ත, න තෙන; තතො ත්වං, මාලුක්යපුත්ත, න තත්ථ. යතො ත්වං, මාලුක්යපුත්ත, න තත්ථ; තතො ත්වං, මාලුක්යපුත්ත, නෙවිධ, න හුරං, න උභයමන්තරෙන. එසෙවන්තො දුක්ඛස්සා’’ති. "मालुक्यपुत्त, अशा प्रकारे पाहिलेल्या, ऐकलेल्या, स्पर्श केलेल्या आणि जाणलेल्या धम्मांच्या बाबतीत: जे पाहिले आहे त्यात केवळ पाहणेच असेल; जे ऐकले आहे त्यात केवळ ऐकणेच असेल; जे स्पर्श केले आहे त्यात केवळ स्पर्श करणेच असेल; जे जाणले आहे त्यात केवळ जाणणेच असेल. मालुक्यपुत्त, जेव्हा तुझ्यासाठी पाहिलेल्या, ऐकलेल्या, स्पर्श केलेल्या आणि जाणलेल्या धम्मांच्या बाबतीत: पाहिलेल्यात केवळ पाहणेच असेल, ऐकलेल्यात केवळ ऐकणेच असेल, स्पर्श केलेल्यात केवळ स्पर्श करणेच असेल, जाणलेल्यात केवळ जाणणेच असेल; तेव्हा, मालुक्यपुत्त, तू 'त्याद्वारे' प्रभावित होणार नाहीस. मालुक्यपुत्त, जेव्हा तू 'त्याद्वारे' प्रभावित होणार नाहीस, तेव्हा तू 'त्यात' अडकणार नाहीस. मालुक्यपुत्त, जेव्हा तू 'त्यात' अडकणार नाहीस, तेव्हा तू न इथे असशील, न तिथे असशील, न दोन्हीच्या मध्ये असशील. हाच दुःखाचा अंत आहे." ‘‘ඉමස්ස ඛ්වාහං, භන්තෙ, භගවතා සංඛිත්තෙන භාසිතස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාමි – "भन्ते, भगवंतांनी संक्षेपात सांगितलेल्या या धम्मवचनाचा सविस्तर अर्थ मी अशा प्रकारे समजतो –" ‘‘රූපං දිස්වා සති මුට්ඨා, පියං නිමිත්තං මනසි කරොතො; සාරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච අජ්ඣොස තිට්ඨති. "एखादे रूप पाहून, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘තස්ස වඩ්ඪන්ති වෙදනා, අනෙකා රූපසම්භවා; අභිජ්ඣා ච විහෙසා ච, චිත්තමස්සූපහඤ්ඤති; එවං ආචිනතො දුක්ඛං, ආරා නිබ්බානමුච්චති. "त्या रूपापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘සද්දං සුත්වා සති මුට්ඨා, පියං නිමිත්තං මනසි කරොතො; සාරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච අජ්ඣොස තිට්ඨති. "एखादा शब्द ऐकून, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘තස්ස වඩ්ඪන්ති වෙදනා, අනෙකා සද්දසම්භවා; අභිජ්ඣා ච විහෙසා ච, චිත්තමස්සූපහඤ්ඤති; එවං ආචිනතො දුක්ඛං, ආරා නිබ්බානමුච්චති. "त्या शब्दापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘ගන්ධං ඝත්වා සති මුට්ඨා, පියං නිමිත්තං මනසි කරොතො; සාරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච අජ්ඣොස තිට්ඨති. "एखादा गंध घेऊन, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘තස්ස වඩ්ඪන්ති වෙදනා, අනෙකා ගන්ධසම්භවා; අභිජ්ඣා ච විහෙසා ච, චිත්තමස්සූපහඤ්ඤති; එවං ආචිනතො දුක්ඛං, ආරා නිබ්බානමුච්චති. "त्या गंधापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘රසං භොත්වා සති මුට්ඨා, පියං නිමිත්තං මනසි කරොතො; සාරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච අජ්ඣොස තිට්ඨති. "एखादा रस चाखून, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘තස්ස වඩ්ඪන්ති වෙදනා, අනෙකා රසසම්භවා; අභිජ්ඣා ච විහෙසා ච, චිත්තමස්සූපහඤ්ඤති; එවං ආචිනතො දුක්ඛං, ආරා නිබ්බානමුච්චති. "त्या रसापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘ඵස්සං [Pg.297] ඵුස්ස සති මුට්ඨා, පියං නිමිත්තං මනසි කරොතො; සාරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච අජ්ඣොස තිට්ඨති. "एखादा स्पर्श अनुभवून, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘තස්ස වඩ්ඪන්ති වෙදනා, අනෙකා ඵස්සසම්භවා; අභිජ්ඣා ච විහෙසා ච, චිත්තමස්සූපහඤ්ඤති; එවං ආචිනතො දුක්ඛං, ආරා නිබ්බානමුච්චති. "त्या स्पर्शापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘ධම්මං ඤත්වා සති මුට්ඨා, පියං නිමිත්තං මනසි කරොතො; සාරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච අජ්ඣොස තිට්ඨති. "एखादा धम्म जाणून, स्मृती नष्ट झाल्यामुळे, जो केवळ प्रिय लक्षणावरच मन केंद्रित करतो; तो आसक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यातच अडकून राहतो." ‘‘තස්ස වඩ්ඪන්ති වෙදනා, අනෙකා ධම්මසම්භවා; අභිජ්ඣා ච විහෙසා ච, චිත්තමස්සූපහඤ්ඤති; එවං ආචිනතො දුක්ඛං, ආරා නිබ්බානමුච්චති. "त्या धम्मापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या वेदना त्याच्यामध्ये वाढत जातात; अभिज्झा आणि विहेसा यामुळे त्याचे चित्त व्याकुळ होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीपासून निर्वाण दूर आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘න සො රජ්ජති රූපෙසු, රූපං දිස්වා පටිස්සතො; විරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච නාජ්ඣොස තිට්ඨති. "तो रूपांमध्ये आसक्त होत नाही. रूप पाहून जो जागरूक राहतो, तो विरक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यात अडकून राहत नाही." ‘‘යථාස්ස පස්සතො රූපං, සෙවතො චාපි වෙදනං; ඛීයති නොපචීයති, එවං සො චරතී සතො; එවං අපචිනතො දුක්ඛං, සන්තිකෙ නිබ්බානමුච්චති. "ज्या प्रकारे रूप पाहताना आणि वेदनेचा अनुभव घेताना त्याचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो जागरूक राहून आचरण करतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीच्या जवळ निर्वाण आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘න සො රජ්ජති සද්දෙසු, සද්දං සුත්වා පටිස්සතො; විරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච නාජ්ඣොස තිට්ඨති. "तो शब्दांमध्ये आसक्त होत नाही. शब्द ऐकून जो जागरूक राहतो, तो विरक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यात अडकून राहत नाही." ‘‘යථාස්ස සුණතො සද්දං, සෙවතො චාපි වෙදනං; ඛීයති නොපචීයති, එවං සො චරතී සතො; එවං අපචිනතො දුක්ඛං, සන්තිකෙ නිබ්බානමුච්චති. "ज्या प्रकारे शब्द ऐकताना आणि वेदनेचा अनुभव घेताना त्याचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो जागरूक राहून आचरण करतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीच्या जवळ निर्वाण आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘න සො රජ්ජති ගන්ධෙසු, ගන්ධං ඝත්වා පටිස්සතො; විරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච නාජ්ඣොස තිට්ඨති. "तो गंधांमध्ये आसक्त होत नाही. गंध घेऊन जो जागरूक राहतो, तो विरक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यात अडकून राहत नाही." ‘‘යථාස්ස ඝායතො ගන්ධං, සෙවතො චාපි වෙදනං; ඛීයති නොපචීයති, එවං සො චරතී සතො; එවං අපචිනතො දුක්ඛං, සන්තිකෙ නිබ්බානමුච්චති. "ज्या प्रकारे गंध घेताना आणि वेदनेचा अनुभव घेताना त्याचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो जागरूक राहून आचरण करतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीच्या जवळ निर्वाण आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘න සො රජ්ජති රසෙසු, රසං භොත්වා පටිස්සතො; විරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච නාජ්ඣොස තිට්ඨති. "तो रसांमध्ये आसक्त होत नाही. रस चाखून जो जागरूक राहतो, तो विरक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यात अडकून राहत नाही." ‘‘යථාස්ස [Pg.298] සායතො රසං, සෙවතො චාපි වෙදනං; ඛීයති නොපචීයති, එවං සො චරතී සතො; එවං අපචිනතො දුක්ඛං, සන්තිකෙ නිබ්බානමුච්චති. "ज्या प्रकारे रस चाखताना आणि वेदनेचा अनुभव घेताना त्याचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो जागरूक राहून आचरण करतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीच्या जवळ निर्वाण आहे, असे म्हटले जाते." ‘‘න සො රජ්ජති ඵස්සෙසු, ඵස්සං ඵුස්ස පටිස්සතො; විරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච නාජ්ඣොස තිට්ඨති. "तो स्पर्शांमध्ये आसक्त होत नाही. स्पर्श अनुभवून जो जागरूक राहतो, तो विरक्त चित्ताने त्याचा अनुभव घेतो आणि त्यात अडकून राहत नाही." ‘‘යථාස්ස ඵුසතො ඵස්සං, සෙවතො චාපි වෙදනං; ඛීයති නොපචීයති, එවං සො චරතී සතො; එවං අපචිනතො දුක්ඛං, සන්තිකෙ නිබ්බානමුච්චති. “ज्या प्रकारे स्पर्शाचा अनुभव घेताना आणि वेदनेचे सेवन करताना त्या व्यक्तीचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो स्मृतिमान होऊन जगतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीसाठी निर्वाण जवळच आहे असे म्हटले जाते.” ‘‘න සො රජ්ජති ධම්මෙසු, ධම්මං ඤත්වා පටිස්සතො; විරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච නාජ්ඣොස තිට්ඨති. “तो धम्मांना जाणून स्मृतिमान राहतो आणि धम्मांमध्ये आसक्त होत नाही. विरक्त चित्ताने तो वेदना अनुभवतो आणि त्यात गुंतून राहत नाही.” ‘‘යථාස්ස ජානතො ධම්මං, සෙවතො චාපි වෙදනං; ඛීයති නොපචීයති, එවං සො චරතී සතො; එවං අපචිනතො දුක්ඛං, සන්තිකෙ නිබ්බානමුච්චතී’’ති. “ज्या प्रकारे धम्माला जाणताना आणि वेदनेचे सेवन करताना त्या व्यक्तीचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो स्मृतिमान होऊन जगतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीसाठी निर्वाण जवळच आहे असे म्हटले जाते.” ‘‘ඉමස්ස ඛ්වාහං, භන්තෙ, භගවතා සංඛිත්තෙන භාසිතස්ස එවං විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාමී’’ති. ‘‘සාධු සාධු, මාලුක්යපුත්ත! සාධු ඛො ත්වං, මාලුක්යපුත්ත, මයා සංඛිත්තෙන භාසිතස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාසි – “भंते, भगवंतांनी संक्षेपात सांगितलेल्या या उपदेशाचा अर्थ मी अशा प्रकारे सविस्तरपणे समजतो.” “साधू, साधू, मालुक्यपुत्त! मालुक्यपुत्त, मी संक्षेपात सांगितलेल्या उपदेशाचा अर्थ तू सविस्तरपणे चांगल्या प्रकारे समजलास –” ‘‘රූපං දිස්වා සති මුට්ඨා, පියං නිමිත්තං මනසි කරොතො; සාරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච අජ්ඣොස තිට්ඨති. “रूप पाहून, प्रिय निमित्ताचे मनन करणाऱ्या व्यक्तीची स्मृती नष्ट होते; तो अत्यंत आसक्त चित्ताने वेदना अनुभवतो आणि त्यातच गुंतून राहतो.” ‘‘තස්ස වඩ්ඪන්ති වෙදනා, අනෙකා රූපසම්භවා; අභිජ්ඣා ච විහෙසා ච, චිත්තමස්සූපහඤ්ඤති; එවං ආචිනතො දුක්ඛං, ආරා නිබ්බානමුච්චති.…පෙ…. “त्याच्या ठिकाणी रूपापासून उत्पन्न होणाऱ्या अनेक वेदना वाढतात; अभिज्झा (लोभ) आणि विहेसा (हिंसा/पीडा) यामुळे त्याचे चित्त दूषित होते. अशा प्रकारे दुःखाचा संचय करणाऱ्या व्यक्तीसाठी निर्वाण दूर आहे असे म्हटले जाते... इ.” ‘‘න සො රජ්ජති ධම්මෙසු, ධම්මං ඤත්වා පටිස්සතො; විරත්තචිත්තො වෙදෙති, තඤ්ච නාජ්ඣොස තිට්ඨති. “तो धम्मांना जाणून स्मृतिमान राहतो आणि धम्मांमध्ये आसक्त होत नाही. विरक्त चित्ताने तो वेदना अनुभवतो आणि त्यात गुंतून राहत नाही.” ‘‘යථාස්ස විජානතො ධම්මං, සෙවතො චාපි වෙදනං; ඛීයති නොපචීයති, එවං සො චරතී සතො; එවං අපචිනතො දුක්ඛං, සන්තිකෙ නිබ්බානමුච්චතී’’ති. “ज्या प्रकारे धम्माला विशेष रूपाने जाणताना आणि वेदनेचे सेवन करताना त्या व्यक्तीचे दुःख क्षीण होते, वाढत नाही; अशा प्रकारे तो स्मृतिमान होऊन जगतो. अशा प्रकारे दुःखाचा क्षय करणाऱ्या व्यक्तीसाठी निर्वाण जवळच आहे असे म्हटले जाते.” ‘‘ඉමස්ස ඛො, මාලුක්යපුත්ත, මයා සංඛිත්තෙන භාසිතස්ස එවං විත්ථාරෙන අත්ථො දට්ඨබ්බො’’ති. “मालुक्यपुत्त, माझ्याद्वारे संक्षेपात सांगितलेल्या या उपदेशाचा अर्थ अशा प्रकारे सविस्तरपणे समजून घेतला पाहिजे.” අථ [Pg.299] ඛො ආයස්මා මාලුක්යපුත්තො භගවතො භාසිතං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා උට්ඨායාසනා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමි. අථ ඛො ආයස්මා මාලුක්යපුත්තො එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො නචිරස්සෙව – යස්සත්ථාය කුලපුත්තා සම්මදෙව අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජන්ති තදනුත්තරං බ්රහ්මචරියපරියොසානං දිට්ඨෙව ධම්මෙ සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහාසි. ‘‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’’ති අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා මාලුක්යපුත්තො අරහතං අහොසීති. දුතියං. त्यानंतर आयुष्यमान मालुक्यपुत्त भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून व आनंद व्यक्त करून आसनावरून उठले, भगवंतांना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा घालून निघून गेले. त्यानंतर आयुष्यमान मालुक्यपुत्त एकांतात, विलग राहून, अप्रमादी, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू लागले. ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य प्रकारे घराचा त्याग करून अनगारिक प्रव्रज्या ग्रहण करतात, ते ब्रह्मचर्याचे सर्वश्रेष्ठ अंतिम ध्येय त्यांनी लवकरच याच जन्मात स्वतःच्या अभिज्ञाने साक्षात करून प्राप्त केले. “जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर पुन्हा जन्म नाही,” असे त्यांनी प्रत्यक्ष जाणले. आणि आयुष्यमान मालुक्यपुत्त अर्हतांपैकी एक झाले. दुसरे (सुत्त समाप्त). 3. පරිහානධම්මසුත්තං ३. परिहानधम्मसुत्त 96. ‘‘පරිහානධම්මඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අපරිහානධම්මඤ්ච ඡ ච අභිභායතනානි. තං සුණාථ. කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, පරිහානධම්මො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො චක්ඛුනා රූපං දිස්වා උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. තඤ්චෙ භික්ඛු අධිවාසෙති නප්පජහති න විනොදෙති න බ්යන්තීකරොති න අනභාවං ගමෙති, වෙදිතබ්බමෙතං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනා – ‘පරිහායාමි කුසලෙහි ධම්මෙහි’. පරිහානඤ්හෙතං වුත්තං භගවතාති…පෙ…. ९६. “भिक्खूहो, मी तुम्हांला ऱ्हास होण्याचा स्वभाव असलेला धम्म (परिहानधम्म), ऱ्हास न होण्याचा स्वभाव असलेला धम्म (अपरिहानधम्म) आणि सहा अभिभायतने उपदेशीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, ऱ्हास होण्याचा स्वभाव कसा असतो? भिक्खूहो, या शासनात जेव्हा एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होतात. जर तो भिक्खू त्यांचा स्वीकार करतो, त्यांचा त्याग करत नाही, त्यांचे निवारण करत नाही, त्यांचा अंत करत नाही आणि त्यांना पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवत नाही, तर भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘मी कुशल धम्मांपासून घसरत आहे.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘ऱ्हास’ म्हटले आहे... इ.” ‘‘පුන චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො ජිව්හාය රසං සායිත්වා උප්පජ්ජන්ති…පෙ… පුන චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. තඤ්චෙ භික්ඛු අධිවාසෙති නප්පජහති න විනොදෙති න බ්යන්තීකරොති න අනභාවං ගමෙති, වෙදිතබ්බමෙතං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනා – ‘පරිහායාමි කුසලෙහි ධම්මෙහි’. පරිහානඤ්හෙතං වුත්තං භගවතාති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, පරිහානධම්මො හොති. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू जिभेने रसाची चव घेतो, तेव्हा... इ... पुन्हा दुसरे असे की, भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू मनाने धम्माला जाणून घेतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होतात. जर तो भिक्खू त्यांचा स्वीकार करतो, त्यांचा त्याग करत नाही, त्यांचे निवारण करत नाही, त्यांचा अंत करत नाही आणि त्यांना पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवत नाही, तर भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘मी कुशल धम्मांपासून घसरत आहे.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘ऱ्हास’ म्हटले आहे. भिक्खूहो, अशा प्रकारे ऱ्हास होण्याचा स्वभाव असतो.” ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, අපරිහානධම්මො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො චක්ඛුනා රූපං දිස්වා උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාධිවාසෙති පජහති විනොදෙති බ්යන්තීකරොති අනභාවං ගමෙති, වෙදිතබ්බමෙතං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනා – ‘න පරිහායාමි කුසලෙහි ධම්මෙහි’. අපරිහානඤ්හෙතං වුත්තං භගවතාති…පෙ…. “आणि भिक्खूहो, ऱ्हास न होण्याचा स्वभाव कसा असतो? भिक्खूहो, या शासनात जेव्हा एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होतात. जर तो भिक्खू त्यांचा स्वीकार करत नाही, त्यांचा त्याग करतो, त्यांचे निवारण करतो, त्यांचा अंत करतो आणि त्यांना पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवतो, तर भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘मी कुशल धम्मांपासून घसरत नाही.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘ऱ्हास न होणे’ म्हटले आहे... इ.” ‘‘පුන [Pg.300] චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො ජිව්හාය රසං සායිත්වා උප්පජ්ජන්ති…පෙ… පුන චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාධිවාසෙති පජහති විනොදෙති බ්යන්තීකරොති අනභාවං ගමෙති, වෙදිතබ්බමෙතං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනා – ‘න පරිහායාමි කුසලෙහි ධම්මෙහි’. අපරිහානඤ්හෙතං වුත්තං භගවතාති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, අපරිහානධම්මො හොති. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू जिभेने रसाची चव घेतो, तेव्हा... इ... पुन्हा दुसरे असे की, भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू मनाने धम्माला जाणून घेतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होतात. जर तो भिक्खू त्यांचा स्वीकार करत नाही, त्यांचा त्याग करतो, त्यांचे निवारण करतो, त्यांचा अंत करतो आणि त्यांना पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवतो, तर भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘मी कुशल धम्मांपासून घसरत नाही.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘ऱ्हास न होणे’ म्हटले आहे. भिक्खूहो, अशा प्रकारे ऱ्हास न होण्याचा स्वभाव असतो.” ‘‘කතමානි ච, භික්ඛවෙ, ඡ අභිභායතනානි? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො චක්ඛුනා රූපං දිස්වා නුප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. වෙදිතබ්බමෙතං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනා – ‘අභිභූතමෙතං ආයතනං’. අභිභායතනඤ්හෙතං වුත්තං භගවතාති…පෙ… පුන චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය නුප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. වෙදිතබ්බමෙතං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනා – ‘අභිභූතමෙතං ආයතනං’. අභිභායතනඤ්හෙතං වුත්තං භගවතාති. ඉමානි වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, ඡ අභිභායතනානී’’ති. තතියං. “आणि भिक्खूहो, ती सहा अभिभायतने कोणती आहेत? भिक्खूहो, या शासनात जेव्हा एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होत नाहीत. भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘हे आयतन माझ्याद्वारे जिंकले गेले आहे.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘अभिभायतन’ म्हटले आहे... इ... पुन्हा दुसरे असे की, भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू मनाने धम्माला जाणून घेतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल, आसक्ती निर्माण करणारे आणि संयोजनांना कारणीभूत ठरणारे विचार उत्पन्न होत नाहीत. भिक्खूहो, त्या भिक्खूने हे समजून घेतले पाहिजे की—‘हे आयतन माझ्याद्वारे जिंकले गेले आहे.’ कारण भगवंतांनी यालाच ‘अभिभायतन’ म्हटले आहे. भिक्खूहो, यांनाच ‘सहा अभिभायतने’ असे म्हटले जाते. तिसरे (सुत्त समाप्त).” 4. පමාදවිහාරීසුත්තං ४. पमादविहारीसुत्त 97. ‘‘පමාදවිහාරිඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අප්පමාදවිහාරිඤ්ච. තං සුණාථ. කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, පමාදවිහාරී හොති? චක්ඛුන්ද්රියං අසංවුතස්ස, භික්ඛවෙ, විහරතො චිත්තං බ්යාසිඤ්චති. චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු තස්ස බ්යාසිත්තචිත්තස්ස පාමොජ්ජං න හොති. පාමොජ්ජෙ අසති පීති න හොති. පීතියා අසති පස්සද්ධි න හොති. පස්සද්ධියා අසති දුක්ඛං හොති. දුක්ඛිනො චිත්තං න සමාධියති. අසමාහිතෙ චිත්තෙ ධම්මා න පාතුභවන්ති. ධම්මානං අපාතුභාවා පමාදවිහාරී ත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති…පෙ… ජිව්හින්ද්රියං අසංවුතස්ස, භික්ඛවෙ, විහරතො චිත්තං බ්යාසිඤ්චති ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යෙසු රසෙසු, තස්ස බ්යාසිත්තචිත්තස්ස…පෙ… පමාදවිහාරී ත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති…පෙ… මනින්ද්රියං අසංවුතස්ස, භික්ඛවෙ, විහරතො චිත්තං බ්යාසිඤ්චති මනොවිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු, තස්ස බ්යාසිත්තචිත්තස්ස පාමොජ්ජං න හොති. පාමොජ්ජෙ අසති පීති න හොති. පීතියා අසති පස්සද්ධි න හොති. පස්සද්ධියා අසති දුක්ඛං හොති. දුක්ඛිනො චිත්තං න සමාධියති. අසමාහිතෙ චිත්තෙ ධම්මා න පාතුභවන්ති[Pg.301]. ධම්මානං අපාතුභාවා පමාදවිහාරී ත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, පමාදවිහාරී හොති. ९७. भिक्षूंनो, मी तुम्हांला प्रमादविहारी (मळमळीतपणे किंवा मूर्च्छितपणे जगणारा) आणि अप्रमादविहारी (जागरूकपणे जगणारा) यांविषयी उपदेश करीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, मनुष्य प्रमादविहारी कसा होतो? भिक्षूंनो, चक्षुरिंद्रियावर संयम न ठेवता विहरणाऱ्याचे चित्त चक्षूने जाणता येणाऱ्या रूपांमध्ये क्लेशांनी माखते. त्याचे चित्त क्लेशांनी माखल्यामुळे त्याला प्रमोद (आनंद) लाभत नाही. प्रमोद नसताना प्रीती लाभत नाही. प्रीती नसताना प्रस्सद्धी (शांतता) लाभत नाही. प्रस्सद्धी नसताना दुःख होते. दुःखी माणसाचे चित्त समाहित (एकाग्र) होत नाही. चित्त समाहित नसताना धर्म प्रकट होत नाहीत. धर्म प्रकट न झाल्यामुळे त्याला 'प्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. ...पे... भिक्षूंनो, जिव्हेरेंद्रियावर संयम न ठेवता विहरणाऱ्याचे चित्त जिव्हेने जाणता येणाऱ्या रसांमध्ये क्लेशांनी माखते...पे... त्याला 'प्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. ...पे... भिक्षूंनो, मनेंद्रियावर संयम न ठेवता विहरणाऱ्याचे चित्त मनाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये क्लेशांनी माखते. त्याचे चित्त क्लेशांनी माखल्यामुळे त्याला प्रमोद लाभत नाही. प्रमोद नसताना प्रीती लाभत नाही. प्रीती नसताना प्रस्सद्धी लाभत नाही. प्रस्सद्धी नसताना दुःख होते. दुःखी माणसाचे चित्त समाहित होत नाही. चित्त समाहित नसताना धर्म प्रकट होत नाहीत. धर्म प्रकट न झाल्यामुळे त्याला 'प्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे मनुष्य प्रमादविहारी होतो. ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, අප්පමාදවිහාරී හොති? චක්ඛුන්ද්රියං සංවුතස්ස, භික්ඛවෙ, විහරතො චිත්තං න බ්යාසිඤ්චති චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු, තස්ස අබ්යාසිත්තචිත්තස්ස පාමොජ්ජං ජායති. පමුදිතස්ස පීති ජායති. පීතිමනස්ස කායො පස්සම්භති. පස්සද්ධකායො සුඛං විහරති. සුඛිනො චිත්තං සමාධියති. සමාහිතෙ චිත්තෙ ධම්මා පාතුභවන්ති. ධම්මානං පාතුභාවා අප්පමාදවිහාරී ත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති…පෙ… ජිව්හින්ද්රියං සංවුතස්ස, භික්ඛවෙ, විහරතො චිත්තං න බ්යාසිඤ්චති…පෙ… අප්පමාදවිහාරී ත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. මනින්ද්රියං සංවුතස්ස, භික්ඛවෙ, විහරතො චිත්තං න බ්යාසිඤ්චති, මනොවිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු, තස්ස අබ්යාසිත්තචිත්තස්ස පාමොජ්ජං ජායති. පමුදිතස්ස පීති ජායති. පීතිමනස්ස කායො පස්සම්භති. පස්සද්ධකායො සුඛං විහරති. සුඛිනො චිත්තං සමාධියති. සමාහිතෙ චිත්තෙ ධම්මා පාතුභවන්ති. ධම්මානං පාතුභාවා අප්පමාදවිහාරී ත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, අප්පමාදවිහාරී හොතී’’ති. චතුත්ථං. आणि भिक्षूंनो, मनुष्य अप्रमादविहारी कसा होतो? भिक्षूंनो, चक्षुरिंद्रियावर संयम ठेवून विहरणाऱ्याचे चित्त चक्षूने जाणता येणाऱ्या रूपांमध्ये क्लेशांनी माखत नाही. ज्याचे चित्त क्लेशांनी माखलेले नसते, त्याला प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमोद लाभलेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला मनुष्य सुखाने विहरतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. चित्त समाहित असताना धर्म प्रकट होतात. धर्म प्रकट झाल्यामुळे त्याला 'अप्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. ...पे... भिक्षूंनो, जिव्हेरेंद्रियावर संयम ठेवून विहरणाऱ्याचे चित्त क्लेशांनी माखत नाही...पे... त्याला 'अप्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. भिक्षूंनो, मनेंद्रियावर संयम ठेवून विहरणाऱ्याचे चित्त मनाने जाणता येणाऱ्या धर्मांमध्ये क्लेशांनी माखत नाही. ज्याचे चित्त क्लेशांनी माखलेले नसते, त्याला प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमोद लाभलेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला मनुष्य सुखाने विहरतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. चित्त समाहित असताना धर्म प्रकट होतात. धर्म प्रकट झाल्यामुळे त्याला 'अप्रमादविहारी' असेच म्हटले जाते. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे मनुष्य अप्रमादविहारी होतो. चौथे. 5. සංවරසුත්තං ५. संवरसुत्त (संयम सुत्त) 98. ‘‘සංවරඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි, අසංවරඤ්ච. තං සුණාථ. කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, අසංවරො හොති? සන්ති, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති, වෙදිතබ්බමෙතං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනා – ‘පරිහායාමි කුසලෙහි ධම්මෙහි’. පරිහානඤ්හෙතං වුත්තං භගවතාති…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති, වෙදිතබ්බමෙතං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනා – ‘පරිහායාමි කුසලෙහි ධම්මෙහි’. පරිහානඤ්හෙතං වුත්තං භගවතාති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, අසංවරො හොති. ९८. भिक्षूंनो, मी तुम्हांला संवर (संयम) आणि असंवर (असंयम) यांविषयी उपदेश करीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, असंवर कसा होतो? भिक्षूंनो, चक्षूने जाणता येणारी अशी रूपे आहेत जी इष्ट (इच्छित), कांत (मनोहर), मनाप (मनोरम), प्रियरूप (प्रिय वाटणारी), कामोपसंहित (कामोत्तेजक) आणि रजनीय (राग उत्पन्न करणारी) असतात. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूने हे जाणावे की—'मी कुशल धर्मांपासून घसरत आहे.' कारण भगवंतांनी यालाच 'ऱ्हास' असे म्हटले आहे. ...पे... भिक्षूंनो, जिव्हेने जाणता येणारे असे रस आहेत...पे... भिक्षूंनो, मनाने जाणता येणारे असे धर्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित आणि रजनीय असतात. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूने हे जाणावे की—'मी कुशल धर्मांपासून घसरत आहे.' कारण भगवंतांनी यालाच 'ऱ्हास' असे म्हटले आहे. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे असंवर होतो. ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, සංවරො හොති? සන්ති, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති, වෙදිතබ්බමෙතං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනා – ‘න පරිහායාමි කුසලෙහි ධම්මෙහි’. අපරිහානඤ්හෙතං වුත්තං භගවතාති [Pg.302] …පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති, වෙදිතබ්බමෙතං භික්ඛුනා – ‘න පරිහායාමි කුසලෙහි ධම්මෙහි’. අපරිහානඤ්හෙතං වුත්තං භගවතාති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, සංවරො හොතී’’ති. පඤ්චමං. आणि भिक्षूंनो, संवर कसा होतो? भिक्षूंनो, चक्षूने जाणता येणारी अशी रूपे आहेत जी इष्ट, कांत, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित आणि रजनीय असतात. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूने हे जाणावे की—'मी कुशल धर्मांपासून घसरत नाही.' कारण भगवंतांनी यालाच 'अ-ऱ्हास' (ऱ्हास न होणे) असे म्हटले आहे. ...पे... भिक्षूंनो, जिव्हेने जाणता येणारे असे रस आहेत...पे... भिक्षूंनो, मनाने जाणता येणारे असे धर्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाप, प्रियरूप, कामोपसंहित आणि रजनीय असतात. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूने हे जाणावे की—'मी कुशल धर्मांपासून घसरत नाही.' कारण भगवंतांनी यालाच 'अ-ऱ्हास' असे म्हटले आहे. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे संवर होतो. पाचवे. 6. සමාධිසුත්තං ६. समाधिसुत्त (समाधी सुत्त) 99. ‘‘සමාධිං, භික්ඛවෙ, භාවෙථ. සමාහිතො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු යථාභූතං පජානාති. කිඤ්ච යථාභූතං පජානාති? ‘චක්ඛු අනිච්ච’න්ති යථාභූතං පජානාති; ‘රූපා අනිච්චා’ති යථාභූතං පජානාති; ‘චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනිච්ච’න්ති යථාභූතං පජානාති; ‘චක්ඛුසම්ඵස්සො අනිච්චො’ති යථාභූතං පජානාති. ‘යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්ච’න්ති යථාභූතං පජානාති…පෙ… ‘මනො අනිච්ච’න්ති යථාභූතං පජානාති. ධම්මා… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සො… ‘යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්ච’න්ති යථාභූතං පජානාති. සමාධිං, භික්ඛවෙ, භාවෙථ. සමාහිතො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු යථාභූතං පජානාතී’’ති. ඡට්ඨං. ९९. भिक्षूंनो, समाधीची भावना करा. भिक्षूंनो, समाहित झालेला भिक्षू यथाभूत जाणतो. आणि तो यथाभूत काय जाणतो? 'चक्षू अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो; 'रूपे अनित्य आहेत' असे तो यथाभूत जाणतो; 'चक्षूविज्ञान अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो; 'चक्षूस्पर्श अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. 'चक्षूस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, तेही अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. ...पे... 'मन अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. 'धर्म... मनोविज्ञान... मनःस्पर्श... मनःस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, तेही अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. भिक्षूंनो, समाधीची भावना करा. भिक्षूंनो, समाहित झालेला भिक्षू यथाभूत जाणतो. सहावे. 7. පටිසල්ලානසුත්තං ७. पटिसल्लानसुत्त (एकांतवास सुत्त) 100. ‘‘පටිසල්ලානෙ, භික්ඛවෙ, යොගමාපජ්ජථ. පටිසල්ලීනො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු යථාභූතං පජානාති. කිඤ්ච යථාභූතං පජානාති? ‘චක්ඛු අනිච්ච’න්ති යථාභූතං පජානාති; ‘රූපා අනිච්චා’ති යථාභූතං පජානාති; ‘චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනිච්ච’න්ති යථාභූතං පජානාති; ‘චක්ඛුසම්ඵස්සො අනිච්චො’ති යථාභූතං පජානාති. ‘යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්ච’න්ති යථාභූතං පජානාති…පෙ… ‘යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්ච’න්ති යථාභූතං පජානාති. පටිසල්ලානෙ, භික්ඛවෙ, යොගමාපජ්ජථ. පටිසල්ලීනො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු යථාභූතං පජානාතී’’ති. සත්තමං. १००. "भिक्षूंनो, एकांतवासात (प्रतिसल्लाणात) उद्योग करा. भिक्षूंनो, एकांतवासात असलेला भिक्षू जसे आहे तसे (यथाभूत) जाणतो. आणि तो जसे आहे तसे काय जाणतो? 'चक्षू (डोळा) अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो; 'रूपे अनित्य आहेत' असे तो यथाभूत जाणतो; 'चक्षू-विज्ञान अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो; 'चक्षू-संस्पर्श अनित्य आहे' असे तो यथाभूत जाणतो. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे, असे तो यथाभूत जाणतो... पे... मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे, असे तो यथाभूत जाणतो. भिक्षूंनो, एकांतवासात (प्रतिसल्लाणात) उद्योग करा. भिक्षूंनो, एकांतवासात असलेला भिक्षू जसे आहे तसे (यथाभूत) जाणतो." सातवे. 8. පඨමනතුම්හාකංසුත්තං ८. पहिले न-तुम्हाकं सुत्त 101. ‘‘යං, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං, තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං[Pg.303]. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. රූපා න තුම්හාකං. තෙ පජහථ. තෙ වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සන්ති. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. චක්ඛුසම්ඵස්සො න තුම්හාකං. තං පජහථ. සො වො පහීනො හිතාය සුඛාය භවිස්සති. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. සොතං න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. සද්දා න තුම්හාකං. තෙ පජහථ. තෙ වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සන්ති. සොතවිඤ්ඤාණං න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. සොතසම්ඵස්සො න තුම්හාකං. තං පජහථ. සො වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සති. යම්පිදං සොතසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. ඝානං න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. ගන්ධා න තුම්හාකං. තෙ පජහථ. තෙ වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සන්ති. ඝානවිඤ්ඤාණං න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. ඝානසම්ඵස්සො න තුම්හාකං. තං පජහථ. සො වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සති. යම්පිදං ඝානසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. १०१. "भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. आणि भिक्षूंनो, तुमचे काय नाही? भिक्षूंनो, चक्षू (डोळा) तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. रूपे तुमची नाहीत. त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. चक्षू-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. चक्षू-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. कान (श्रोत) तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. शब्द तुमचे नाहीत. त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. श्रोत-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. श्रोत-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. श्रोत-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. नाक (घ्राण) तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. गंध तुमचे नाहीत. त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. घ्राण-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. घ्राण-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. घ्राण-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." ජිව්හා න තුම්හාකං. තං පජහථ. සා වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සති. රසා න තුම්හාකං. තෙ පජහථ. තෙ වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සන්ති. ජිව්හාවිඤ්ඤාණං න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. ජිව්හාසම්ඵස්සො න තුම්හාකං. තං පජහථ. සො වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සති. යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති …පෙ…. "जीभ (जिव्हा) तुमची नाही. तिचा त्याग करा. तिचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. रस (चव) तुमचे नाहीत. त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. जिव्हा-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. जिव्हा-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल... पे..." මනො න තුම්හාකං. තං පජහථ. සො වො පහීනො හිතාය සුඛාය භවිස්සති. ධම්මා න තුම්හාකං. තෙ පජහථ. තෙ වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සන්ති. මනොවිඤ්ඤාණං න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. මනොසම්ඵස්සො න තුම්හාකං. තං පජහථ. සො වො පහීනො හිතාය සුඛාය භවිස්සති. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. "मन तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. धम्म (मानसिक विषय) तुमचे नाहीत. त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. मनो-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. मनो-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, යං ඉමස්මිං ජෙතවනෙ තිණකට්ඨසාඛාපලාසං තං ජනො හරෙය්ය වා ඩහෙය්ය වා යථාපච්චයං වා කරෙය්ය, අපි නු තුම්හාකං එවමස්ස – ‘අම්හෙ ජනො හරති වා ඩහති වා යථාපච්චයං වා කරොතී’’’ති? "भिक्षूंनो, जसे या जेतवनातील जे काही गवत, लाकूड, फांद्या आणि पाने आहेत, ते जर लोकांनी नेले, किंवा जाळले, किंवा त्यांच्या इच्छेनुसार (प्रत्ययानुसार) काहीही केले, तर तुम्हाला असे वाटेल का की—'लोक आम्हाला घेऊन जात आहेत, किंवा जाळत आहेत, किंवा त्यांच्या इच्छेनुसार आमच्याशी वागत आहेत'?" ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. "नाही, भंते!" ‘‘තං කිස්ස හෙතු’’? "ते कोणत्या कारणाने?" ‘‘න හි නො එතං, භන්තෙ, අත්තා වා අත්තනියං වා’’ති. "कारण, भंते, ते आमचा आत्मा (स्व) नाही आणि आमच्या आत्म्याचे (स्वतःचे) काही नाही." ‘‘එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛු න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. රූපා න තුම්හාකං… චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සො…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සතී’’ති. අට්ඨමං. "तसेच, भिक्षूंनो, चक्षू तुमचा नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. रूपे तुमची नाहीत... चक्षू-विज्ञान... चक्षू-संस्पर्श... पे... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील तुमचे नाही. त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." आठवे. 9. දුතියනතුම්හාකංසුත්තං ९. दुसरे न-तुम्हाकं सुत्त 102. ‘‘යං[Pg.304], භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. රූපා න තුම්හාකං. තෙ පජහථ. තෙ වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සන්ති. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. චක්ඛුසම්ඵස්සො න තුම්හාකං. තං පජහථ. සො වො පහීනො හිතාය සුඛාය භවිස්සති…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි න තුම්හාකං. තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. යම්පි, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං, තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සතී’’ති. නවමං. १०२. "भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा तुम्ही त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल. आणि भिक्षूंनो, तुमचे काय नाही? भिक्षूंनो, चक्षु (डोळा) तुमचा नाही. त्याचा तुम्ही त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल. रूपे तुमची नाहीत. त्यांचा तुम्ही त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल. चक्षु-विज्ञान तुमचे नाही. त्याचा तुम्ही त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल. चक्षु-संस्पर्श तुमचा नाही. त्याचा तुम्ही त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल... तसेच... मन-संस्पर्शामुळे उत्पन्न होणारी जी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदना आहे, तीही तुमची नाही. तिचा तुम्ही त्याग करा. तिचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल. भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा तुम्ही त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी व सुखासाठी होईल." नववे सूत्र। 10. උදකසුත්තං १०. उदक सूत्र 103. ‘‘උදකො සුදං, භික්ඛවෙ, රාමපුත්තො එවං වාචං භාසති – ‘ඉදං ජාතු වෙදගූ, ඉදං ජාතු සබ්බජී, ඉදං ජාතු අපලිඛතං ගණ්ඩමූලං පලිඛණි’න්ති. තං ඛො පනෙතං, භික්ඛවෙ, උදකො රාමපුත්තො අවෙදගූයෙව සමානො ‘වෙදගූස්මී’ති භාසති, අසබ්බජීයෙව සමානො ‘සබ්බජීස්මී’ති භාසති, අපලිඛතංයෙව ගණ්ඩමූලං පලිඛතං මෙ ‘ගණ්ඩමූල’න්ති භාසති. ඉධ ඛො තං, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්මා වදමානො වදෙය්ය – ‘ඉදං ජාතු වෙදගූ, ඉදං ජාතු සබ්බජී, ඉදං ජාතු අපලිඛතං ගණ්ඩමූලං පලිඛණි’’’න්ති. १०३. "भिक्षूंनो, रामपुत्र उदक खरोखर असे बोलत असे – 'मी निश्चितच वेदगू (ज्ञान-पारंगत) आहे, मी निश्चितच सर्वजयी आहे, मी निश्चितच न उपटलेले गंडमूळ (गळवाचे मूळ) उपटून टाकले आहे.' परंतु, भिक्षूंनो, रामपुत्र उदक स्वतः वेदगू नसतानाही 'मी वेदगू आहे' असे म्हणत असे; स्वतः सर्वजयी नसतानाही 'मी सर्वजयी आहे' असे म्हणत असे; आणि गंडमूळ उपटलेले नसतानाही 'मी गंडमूळ उपटून टाकले आहे' असे म्हणत असे. भिक्षूंनो, या शासनात एखादा भिक्षूच योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हणू शकतो – 'मी निश्चितच वेदगू आहे, मी निश्चितच सर्वजयी आहे, मी निश्चितच न उपटलेले गंडमूळ उपटून टाकले आहे.'" ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, වෙදගූ හොති? යතො ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං පජානාති; එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු වෙදගූ හොති. "आणि भिक्षूंनो, भिक्षू कसा वेदगू होतो? जेव्हा भिक्षूंनो, भिक्षू सहा स्पर्शायतनांचा (स्पर्शाच्या आयतनांचा) उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव (दोष) आणि निस्सरण (मुक्ती) यथाभूत (आहे तसे) जाणतो; अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, भिक्षू वेदगू होतो." ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සබ්බජී හොති? යතො ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං විදිත්වා අනුපාදාවිමුත්තො හොති; එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සබ්බජී හොති. "आणि भिक्षूंनो, भिक्षू कसा सर्वजयी होतो? जेव्हा भिक्षूंनो, भिक्षू सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण यथाभूत जाणून, उपादानरहित होऊन विमुक्त होतो; अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, भिक्षू सर्वजयी होतो." ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො අපලිඛතං ගණ්ඩමූලං පලිඛතං හොති? ගණ්ඩොති ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමස්සෙතං චාතුමහාභූතිකස්ස කායස්ස අධිවචනං [Pg.305] මාතාපෙත්තිකසම්භවස්ස ඔදනකුම්මාසූපචයස්ස අනිච්චුච්ඡාදනපරිමද්දනභෙදනවිද්ධංසනධම්මස්ස. ගණ්ඩමූලන්ති ඛො, භික්ඛවෙ, තණ්හායෙතං අධිවචනං. යතො ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො තණ්හා පහීනා හොති උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා; එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො අපලිඛතං ගණ්ඩමූලං පලිඛතං හොති. "आणि भिक्षूंनो, भिक्षूने न उपटलेले गंडमूळ कसे उपटून टाकलेले असते? भिक्षूंनो, 'गंड' (गळू) हे चार महाभूतांनी बनलेल्या, माता-पित्यांच्या संयोगातून उत्पन्न झालेल्या, भात आणि लापशी यावर पोसलेल्या, अनित्य, उटणे लावणे, मर्दन करणे, भेद पावणे आणि नष्ट होणे हा स्वभाव असलेल्या या शरीराचे नाव आहे. भिक्षूंनो, 'गंडमूळ' हे तृष्णेचे नाव आहे. जेव्हा भिक्षूंनो, भिक्षूची तृष्णा नष्ट झालेली असते, मुळासकट उपटून टाकलेली असते, ताडाच्या बुंध्यासारखी केलेली असते, समूळ नष्ट केलेली असते आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाची झालेली असते; अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, भिक्षूने न उपटलेले गंडमूळ उपटून टाकलेले असते." ‘‘උදකො සුදං, භික්ඛවෙ, රාමපුත්තො එවං වාචං භාසති – ‘ඉදං ජාතු වෙදගූ, ඉදං ජාතු සබ්බජී, ඉදං ජාතු අපලිඛතං ගණ්ඩමූලං පලිඛණි’න්ති. තං ඛො පනෙතං, භික්ඛවෙ, උදකො රාමපුත්තො අවෙදගූයෙව සමානො ‘වෙදගූස්මී’ති භාසති, අසබ්බජීයෙව සමානො ‘සබ්බජීස්මී’ති භාසති; අපලිඛතංයෙව ගණ්ඩමූලං ‘පලිඛතං මෙ ගණ්ඩමූල’න්ති භාසති. ඉධ ඛො තං, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්මා වදමානො වදෙය්ය – ‘ඉදං ජාතු වෙදගූ, ඉදං ජාතු සබ්බජී, ඉදං ජාතු අපලිඛතං ගණ්ඩමූලං පලිඛණි’’’න්ති. දසමං. "भिक्षूंनो, रामपुत्र उदक खरोखर असे बोलत असे – 'मी निश्चितच वेदगू आहे, मी निश्चितच सर्वजयी आहे, मी निश्चितच न उपटलेले गंडमूळ उपटून टाकले आहे.' परंतु, भिक्षूंनो, रामपुत्र उदक स्वतः वेदगू नसतानाही 'मी वेदगू आहे' असे म्हणत असे; स्वतः सर्वजयी नसतानाही 'मी सर्वजयी आहे' असे म्हणत असे; आणि गंडमूळ उपटलेले नसतानाही 'मी गंडमूळ उपटून टाकले आहे' असे म्हणत असे. भिक्षूंनो, या शासनात एखादा भिक्षूच योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हणू शकतो – 'मी निश्चितच वेदगू आहे, मी निश्चितच सर्वजयी आहे, मी निश्चितच न उपटलेले गंडमूळ उपटून टाकले आहे.'" दहावे सूत्र। සළවග්ගො දසමො. दहावा सळ-वर्ग समाप्त। තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका – ද්වෙ සංගය්හා පරිහානං, පමාදවිහාරී ච සංවරො; සමාධි පටිසල්ලානං, ද්වෙ නතුම්හාකෙන උද්දකොති. दोन संगय्ह सूत्रे, परिहान सूत्र, प्रमादविहारी सूत्र, संवर सूत्र, समाधी सूत्र, पटिसल्लान सूत्र, दोन 'न तुम्हाकं' सूत्रे आणि उदक सूत्र; ही या वर्गाची अनुक्रमणिका आहे। සළායතනවග්ගෙ දුතියපණ්ණාසකො සමත්තො. सळायतन-वर्गातील दुसरा पण्णासक समाप्त झाला। තස්ස වග්ගුද්දානං – त्याची वर्ग-अनुक्रमणिका अशी – අවිජ්ජා මිගජාලඤ්ච, ගිලානං ඡන්නං චතුත්ථකං; සළවග්ගෙන පඤ්ඤාසං, දුතියො පණ්ණාසකො අයන්ති. अविद्या वर्ग, मिगजाल वर्ग, ग्लान वर्ग, चौथा छन्न वर्ग आणि सळ-वर्गासह पन्नास सूत्रांचा हा दुसरा पण्णासक आहे। පඨමසතකං. पहिले शतक (समाप्त)। 11. යොගක්ඛෙමිවග්ගො ११. (११) योगक्खेमी वर्ग 1. යොගක්ඛෙමිසුත්තං १. योगक्खेमी सूत्र 104. සාවත්ථිනිදානං. ‘‘යොගක්ඛෙමිපරියායං වො, භික්ඛවෙ, ධම්මපරියායං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, යොගක්ඛෙමිපරියායො ධම්මපරියායො? සන්ති, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා [Pg.306] පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තෙ තථාගතස්ස පහීනා උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා. තෙසඤ්ච පහානාය අක්ඛාසි යොගං, තස්මා තථාගතො ‘යොගක්ඛෙමී’ති වුච්චති…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තෙ තථාගතස්ස පහීනා උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා. තෙසඤ්ච පහානාය අක්ඛාසි යොගං, තස්මා තථාගතො ‘යොගක්ඛෙමී’ති වුච්චති. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, යොගක්ඛෙමිපරියායො ධම්මපරියායො’’ති. පඨමං. १०४. श्रावस्ती येथील निदान. "भिक्षूंनो, मी तुम्हाला योगक्षेम-पर्याय (योगबंधनांपासून मुक्तीचा मार्ग) सांगणारी धम्मदेशना देईन. ती लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, योगक्षेम-पर्याय सांगणारी धम्मदेशना कोणती आहे? भिक्षूंनो, चक्षु-विज्ञेय अशी रूपे आहेत, जी इष्ट, कांत, मनाजोगती, प्रिय वाटणारी, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारी आहेत. तथागतांनी त्यांचा त्याग केला आहे, ती मुळासकट उपटून टाकली आहेत, ताडाच्या बुंध्यासारखी केली आहेत, समूळ नष्ट केली आहेत आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाची केली आहेत. आणि त्यांच्या त्यागासाठी त्यांनी प्रयत्नाचा उपदेश केला आहे, म्हणूनच तथागतांना 'योगक्षेमी' म्हटले जाते... तसेच... भिक्षूंनो, मन-विज्ञेय असे धम्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगते, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. तथागतांनी त्यांचा त्याग केला आहे, ती मुळासकट उपटून टाकली आहेत, ताडाच्या बुंध्यासारखी केली आहेत, समूळ नष्ट केली आहेत आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाची केली आहेत. आणि त्यांच्या त्यागासाठी त्यांनी प्रयत्नाचा उपदेश केला आहे, म्हणूनच तथागतांना 'योगक्षेमी' म्हटले जाते. भिक्षूंनो, हाच तो योगक्षेम-पर्याय सांगणारी धम्मदेशना आहे." पहिले सूत्र। 2. උපාදායසුත්තං २. उपादाय सूत्र 105. ‘‘කිස්මිං නු ඛො, භික්ඛවෙ, සති කිං උපාදාය උප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛ’’න්ති? १०५. "भिक्षूंनो, काय अस्तित्वात असताना, कशाचे उपादान करून अंतर्गत सुख आणि दुःख उत्पन्न होते?" ‘‘භගවංමූලකා නො, භන්තෙ, ධම්මා…පෙ…. "भंते, आमचे धम्म भगवंतांच्या मुळाशी आहेत..." ‘‘චක්ඛුස්මිං ඛො, භික්ඛවෙ, සති චක්ඛුං උපාදාය උප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛං…පෙ… මනස්මිං සති මනං උපාදාය උප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛං. තං කිං මඤ්ඤථ, භික්ඛවෙ, චක්ඛු නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? "भिक्षूंनो, चक्षु अस्तित्वात असताना, चक्षूचे उपादान करून अंतर्गत सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... तसेच... मन अस्तित्वात असताना, मनाचे उपादान करून अंतर्गत सुख आणि दुःख उत्पन्न होते. भिक्षूंनो, तुम्हाला काय वाटते? चक्षु नित्य आहे की अनित्य?" ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. "अनित्य आहे, भंते." ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? "आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?" ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. "दुःखकारक आहे, भंते." ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, අපි නු තං අනුපාදාය උප්පජ්ජෙය්ය අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛ’’න්ති? "आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याचे उपादान न करता काय अंतर्गत सुख आणि दुःख उत्पन्न होऊ शकते का?" ‘‘නො හෙතං භන්තෙ’’…පෙ…. "नाही, भंते." ... ‘‘ජිව්හා නිච්චා වා අනිච්චා වා’’ති? "जिव्हा नित्य आहे की अनित्य?" ‘‘අනිච්චා, භන්තෙ’’. "अनित्य आहे, भंते." ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? "आणि जी अनित्य आहे, ती दुःखकारक आहे की सुखकारक?" ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. "दुःखकारक आहे, भंते." ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, අපි නු තං අනුපාදාය උප්පජ්ජෙය්ය අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛ’’න්ති? "आणि जी अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहे, तिचे उपादान न करता काय अंतर्गत सुख आणि दुःख उत्पन्न होऊ शकते का?" ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’…පෙ…. "नाही, भंते." ... ‘‘මනො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? "मन नित्य आहे की अनित्य?" ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, අපි නු තං අනුපාදාය උප්පජ්ජෙය්ය අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛ’’න්ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याला न धरून ठेवता (त्याच्याविषयी आसक्ती न बाळगता), अंतर्मनात सुख किंवा दुःख उत्पन्न होऊ शकते का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. දුතියං. “भिक्षूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान (ज्ञानी) आर्यश्रावक चक्षूविषयीही (डोळ्यांविषयीही) कंटाळा (निर्वेद) अनुभवतो... पे... मनाविषयीही कंटाळा अनुभवतो. कंटाळा आल्यावर तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर 'मुक्त झाले' असे ज्ञान होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही' हे तो जाणतो.” दुसरे. 3. දුක්ඛසමුදයසුත්තං ३. दुःखसमुदय सुत्त 106. ‘‘දුක්ඛස්ස, භික්ඛවෙ, සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, දුක්ඛස්ස සමුදයො? චක්ඛුඤ්ච පටිච්ච රූපෙ ච උප්පජ්ජති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං[Pg.307]. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා. අයං දුක්ඛස්ස සමුදයො…පෙ… ජිව්හඤ්ච පටිච්ච රසෙ ච උප්පජ්ජති ජිව්හාවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා. අයං දුක්ඛස්ස සමුදයො…පෙ… මනඤ්ච පටිච්ච ධම්මෙ ච උප්පජ්ජති මනොවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, දුක්ඛස්ස සමුදයො. १०६. “भिक्षूंनो, मी तुम्हाला दुःखाचा उदय (उत्पत्ती) आणि अस्त (निरोध) शिकवणार आहे. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, दुःखाचा उदय कोणता आहे? चक्षू (डोळा) आणि रूप यांच्यावर अवलंबून चक्षू-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श (फस्स) म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. हा दुःखाचा उदय आहे... पे... जिव्हा (जीभ) आणि रस यांच्यावर अवलंबून जिव्हा-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. हा दुःखाचा उदय आहे... पे... मन आणि धम्म (मानसिक विषय) यांच्यावर अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. भिक्षूंनो, हाच दुःखाचा उदय आहे.” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, දුක්ඛස්ස අත්ථඞ්ගමො? චක්ඛුඤ්ච පටිච්ච රූපෙ ච උප්පජ්ජති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා. තස්සායෙව තණ්හාය අසෙසවිරාගනිරොධා උපාදානනිරොධො; උපාදානනිරොධා භවනිරොධො; භවනිරොධා ජාතිනිරොධො; ජාතිනිරොධා ජරාමරණං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා නිරුජ්ඣන්ති. එවමෙතස්ස කෙවලස්ස දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස නිරොධො හොති. අයං දුක්ඛස්ස අත්ථඞ්ගමො…පෙ… ජිව්හඤ්ච පටිච්ච රසෙ ච උප්පජ්ජති ජිව්හාවිඤ්ඤාණං…පෙ… මනඤ්ච පටිච්ච ධම්මෙ ච උප්පජ්ජති මනොවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා. තස්සායෙව තණ්හාය අසෙසවිරාගනිරොධා උපාදානනිරොධො; උපාදානනිරොධා භවනිරොධො; භවනිරොධා ජාතිනිරොධො; ජාතිනිරොධා ජරාමරණං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා නිරුජ්ඣන්ති. එවමෙතස්ස කෙවලස්ස දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස නිරොධො හොති. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, දුක්ඛස්ස අත්ථඞ්ගමො’’ති. තතියං. “आणि भिक्षूंनो, दुःखाचा अस्त (निरोध) कोणता आहे? चक्षू आणि रूप यांच्यावर अवलंबून चक्षू-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागाने आणि निरोधाने उपादान (आसक्ती) निरोध होतो; उपादान निरोधाने भव निरोध होतो; भव निरोधाने जाती (जन्म) निरोध होतो; जाती निरोधाने जरा-मरण, शोक, परिदेव (आक्रोश), दुःख, डोमनस्य (मानसिक दुःख) आणि उपायास (हताशपणा) नष्ट होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो. हा दुःखाचा अस्त आहे... पे... जिव्हा आणि रस यांच्यावर अवलंबून जिव्हा-विज्ञान उत्पन्न होते... पे... मन आणि धम्म यांच्यावर अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागाने आणि निरोधाने उपादान निरोध होतो; उपादान निरोधाने भव निरोध होतो; भव निरोधाने जाती निरोध होतो; जाती निरोधाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास नष्ट होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो. भिक्षूंनो, हाच दुःखाचा अस्त आहे.” तिसरे. 4. ලොකසමුදයසුත්තං ४. लोकसमुदय सुत्त 107. ‘‘ලොකස්ස, භික්ඛවෙ, සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, ලොකස්ස සමුදයො? චක්ඛුඤ්ච පටිච්ච රූපෙ ච උප්පජ්ජති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා; තණ්හාපච්චයා උපාදානං; උපාදානපච්චයා භවො; භවපච්චයා ජාති; ජාතිපච්චයා ජරාමරණං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා සම්භවන්ති. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, ලොකස්ස සමුදයො …පෙ… ජිව්හඤ්ච පටිච්ච රසෙ ච උප්පජ්ජති ජිව්හාවිඤ්ඤාණං…පෙ… මනඤ්ච පටිච්ච ධම්මෙ ච උප්පජ්ජති මනොවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා; තණ්හාපච්චයා උපාදානං; උපාදානපච්චයා භවො[Pg.308]; භවපච්චයා ජාති; ජාතිපච්චයා ජරාමරණං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා සම්භවන්ති. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, ලොකස්ස සමුදයො. १०७. “भिक्षूंनो, मी तुम्हाला लोकाचा उदय (उत्पत्ती) आणि अस्त (निरोध) शिकवणार आहे. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, लोकाचा उदय कोणता आहे? चक्षू आणि रूप यांच्यावर अवलंबून चक्षू-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा; तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान; उपादानाच्या प्रत्ययाने भव; भवाच्या प्रत्ययाने जाती; जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास संभवतात (उत्पन्न होतात). भिक्षूंनो, हाच लोकाचा उदय आहे... पे... जिव्हा आणि रस यांच्यावर अवलंबून जिव्हा-विज्ञान उत्पन्न होते... पे... मन आणि धम्म यांच्यावर अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा; तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान; उपादानाच्या प्रत्ययाने भव; भवाच्या प्रत्ययाने जाती; जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास संभवतात. भिक्षूंनो, हाच लोकाचा उदय आहे.” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, ලොකස්ස අත්ථඞ්ගමො? චක්ඛුඤ්ච පටිච්ච රූපෙ ච උප්පජ්ජති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා. තස්සායෙව තණ්හාය අසෙසවිරාගනිරොධා උපාදානනිරොධො; උපාදානනිරොධා භවනිරොධො; භවනිරොධා ජාතිනිරොධො; ජාතිනිරොධා ජරාමරණං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා නිරුජ්ඣන්ති. එවමෙතස්ස කෙවලස්ස දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස නිරොධො හොති. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, ලොකස්ස අත්ථඞ්ගමො…පෙ… ජිව්හඤ්ච පටිච්ච රසෙ ච උප්පජ්ජති…පෙ… මනඤ්ච පටිච්ච ධම්මෙ ච උප්පජ්ජති මනොවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා. තස්සායෙව තණ්හාය අසෙසවිරාගනිරොධා උපාදානනිරොධො; උපාදානනිරොධා…පෙ… එවමෙතස්ස කෙවලස්ස දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස නිරොධො හොති. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, ලොකස්ස අත්ථඞ්ගමො’’ති. චතුත්ථං. “आणि भिक्षूंनो, लोकाचा अस्त (निरोध) कोणता आहे? चक्षू आणि रूप यांच्यावर अवलंबून चक्षू-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागाने आणि निरोधाने उपादान निरोध होतो; उपादान निरोधाने भव निरोध होतो; भव निरोधाने जाती निरोध होतो; जाती निरोधाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास नष्ट होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो. भिक्षूंनो, हाच लोकाचा अस्त आहे... पे... जिव्हा आणि रस यांच्यावर अवलंबून उत्पन्न होते... पे... मन आणि धम्म यांच्यावर अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या एकत्र येण्याला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागाने आणि निरोधाने उपादान निरोध होतो; उपादान निरोधाने... पे... अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो. भिक्षूंनो, हाच लोकाचा अस्त आहे.” चौथे. 5. සෙය්යොහමස්මිසුත්තං ५. सेय्योहमस्मि सुत्त 108. ‘‘කිස්මිං නු ඛො, භික්ඛවෙ, සති කිං උපාදාය කිං අභිනිවිස්ස සෙය්යොහමස්මීති වා හොති, සදිසොහමස්මීති වා හොති, හීනොහමස්මීති වා හොතී’’ති? १०८. “भिक्षूंनो, काय अस्तित्वात असताना, कशाला धरून ठेवल्याने (कशाचे उपादान केल्याने), कशाचा अभिनिवेश (आग्रह) धरल्याने ‘मी श्रेष्ठ आहे’ किंवा ‘मी समान आहे’ किंवा ‘मी कनिष्ठ आहे’ असा विचार मनात येतो?” ‘‘භගවංමූලකා නො, භන්තෙ, ධම්මා. “भन्ते, आमचे धम्म (शिकवणी) भगवंतांवरच आधारित (मूळ असलेले) आहेत.” ‘‘චක්ඛුස්මිං ඛො, භික්ඛවෙ, සති චක්ඛුං උපාදාය චක්ඛුං අභිනිවිස්ස සෙය්යොහමස්මීති වා හොති, සදිසොහමස්මීති වා හොති, හීනොහමස්මීති වා හොති…පෙ… ජිව්හාය සති…පෙ… මනස්මිං සති මනං උපාදාය මනං අභිනිවිස්ස සෙය්යොහමස්මීති වා හොති, සදිසොහමස්මීති වා හොති, හීනොහමස්මීති වා හොති. තං කිං මඤ්ඤථ, භික්ඛවෙ, චක්ඛු නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “भिक्षूंनो, चक्षू (डोळा) अस्तित्वात असताना, चक्षूला धरून ठेवल्याने, चक्षूचा अभिनिवेश धरल्याने ‘मी श्रेष्ठ आहे’ किंवा ‘मी समान आहे’ किंवा ‘मी कनिष्ठ आहे’ असा विचार मनात येतो... पे... जिव्हा अस्तित्वात असताना... पे... मन अस्तित्वात असताना, मनाला धरून ठेवल्याने, मनाचा अभिनिवेश धरल्याने ‘मी श्रेष्ठ आहे’ किंवा ‘मी समान आहे’ किंवा ‘मी कनिष्ठ आहे’ असा विचार मनात येतो. भिक्षूंनो, तुम्हाला काय वाटते, चक्षू नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, අපි නු තං අනුපාදාය සෙය්යොහමස්මීති වා අස්ස, සදිසොහමස්මීති වා අස්ස, හීනොහමස්මීති වා අස්සා’’ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याला न धरून ठेवता (त्याच्याविषयी आसक्ती न बाळगता) ‘मी श्रेष्ठ आहे’ किंवा ‘मी समान आहे’ किंवा ‘मी कनिष्ठ आहे’ असा विचार मनात येऊ शकतो का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’…පෙ… ජිව්හා… කායො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? “नक्कीच नाही, भन्ते.”... पे... “जिव्हा... काय (शरीर) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... पे... ‘‘මනො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? “मन नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා [Pg.309] තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, අපි නු තං අනුපාදාය සෙය්යොහමස්මීති වා අස්ස, සදිසොහමස්මීති වා අස්ස, හීනොහමස්මීති වා අස්සා’’ති? पण जे अनित्य, दुःखमय आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याला न चिकटता (त्याचे उपादान न करता) 'मी श्रेष्ठ आहे' किंवा 'मी समान आहे' किंवा 'मी कनिष्ठ आहे' असा विचार (अभिमान) निर्माण होऊ शकतो का? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. असे नाही, भन्ते! ‘‘එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. පඤ්චමං. भिक्षूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षूविषयी निर्वेद पावतो (कंटाळतो)...पे०... मनाविषयी निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर 'मी विमुक्त झालो आहे' असे ज्ञान त्याला होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही' असे तो जाणतो. पाचवे. 6. සංයොජනියසුත්තං ६. संयोजनीय सुत्त 109. ‘‘සංයොජනියෙ ච, භික්ඛවෙ, ධම්මෙ දෙසෙස්සාමි සංයොජනඤ්ච. තං සුණාථ. කතමෙ ච, භික්ඛවෙ, සංයොජනියා ධම්මා, කතමඤ්ච සංයොජනං? චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, සංයොජනියො ධම්මො. යො තත්ථ ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං…පෙ… ජිව්හා සංයොජනියො ධම්මො…පෙ… මනො සංයොජනියො ධම්මො. යො තත්ථ ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං. ඉමෙ වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, සංයොජනියා ධම්මා, ඉදං සංයොජන’’න්ති. ඡට්ඨං. १०९. भिक्षूंनो, मी तुम्हाला संयोजनीय (बंधनात टाकणारे) धर्म आणि संयोजन (बंधन) शिकवीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, संयोजनीय धर्म कोणते आहेत आणि संयोजन कोणते आहे? भिक्षूंनो, चक्षू हा संयोजनीय धर्म आहे. तेथे जो छंदराग (इच्छा आणि आसक्ती) आहे, ते तेथील संयोजन आहे...पे०... जिव्हा हा संयोजनीय धर्म आहे...पे०... मन हा संयोजनीय धर्म आहे. तेथे जो छंदराग आहे, ते तेथील संयोजन आहे. भिक्षूंनो, यांना संयोजनीय धर्म म्हटले जाते आणि याला संयोजन म्हटले जाते. सहावे. 7. උපාදානියසුත්තං ७. उपादानीय सुत्त 110. ‘‘උපාදානියෙ ච, භික්ඛවෙ, ධම්මෙ දෙසෙස්සාමි උපාදානඤ්ච. තං සුණාථ. කතමෙ ච, භික්ඛවෙ, උපාදානියා ධම්මා, කතමඤ්ච උපාදානං? චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, උපාදානියො ධම්මො. යො තත්ථ ඡන්දරාගො, තං තත්ථ උපාදානං…පෙ… ජිව්හා උපාදානියො ධම්මො…පෙ… මනො උපාදානියො ධම්මො. යො තත්ථ ඡන්දරාගො, තං තත්ථ උපාදානං. ඉමෙ වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, උපාදානියා ධම්මා, ඉදං උපාදාන’’න්ති. සත්තමං. ११०. भिक्षूंनो, मी तुम्हाला उपादानीय (आसक्ती निर्माण करणारे) धर्म आणि उपादान (आसक्ती) शिकवीन. ते लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्षूंनो, उपादानीय धर्म कोणते आहेत आणि उपादान कोणते आहे? भिक्षूंनो, चक्षू हा उपादानीय धर्म आहे. तेथे जो छंदराग आहे, ते तेथील उपादान आहे...पे०... जिव्हा हा उपादानीय धर्म आहे...पे०... मन हा उपादानीय धर्म आहे. तेथे जो छंदराग आहे, ते तेथील उपादान आहे. भिक्षूंनो, यांना उपादानीय धर्म म्हटले जाते आणि याला उपादान म्हटले जाते. सातवे. 8. අජ්ඣත්තිකායතනපරිජානනසුත්තං ८. अज्झत्तिकायतनपरिज्ञान सुत्त 111. ‘‘චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. සොතං… ඝානං… ජිව්හං… කායං… මනං අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. චක්ඛුඤ්ච ඛො, භික්ඛවෙ, අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය…පෙ… ජිව්හං… කායං… මනං අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයායා’’ති. අට්ඨමං. १११. भिक्षूंनो, चक्षूला विशेष रूपाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्याविषयी विरक्त न होता आणि त्याचा त्याग न करता, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ ठरतो. श्रोत्र... घ्राण... जिव्हा... काया... मन विशेष रूपाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्याविषयी विरक्त न होता आणि त्याचा त्याग न करता, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ ठरतो. परंतु, भिक्षूंनो, चक्षूला विशेष रूपाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्याविषयी विरक्त होऊन आणि त्याचा त्याग करून, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास समर्थ ठरतो...पे०... जिव्हा... काया... मन विशेष रूपाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्याविषयी विरक्त होऊन आणि त्याचा त्याग करून, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास समर्थ ठरतो. आठवे. 9. බාහිරායතනපරිජානනසුත්තං ९. बाहिरायतनपरिज्ञान सुत्त 112. ‘‘රූපෙ[Pg.310], භික්ඛවෙ, අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. සද්දෙ… ගන්ධෙ… රසෙ… ඵොට්ඨබ්බෙ… ධම්මෙ අනභිජානං අපරිජානං අවිරාජයං අප්පජහං අභබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. රූපෙ ච ඛො, භික්ඛවෙ, අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයාය. සද්දෙ… ගන්ධෙ… රසෙ… ඵොට්ඨබ්බෙ… ධම්මෙ අභිජානං පරිජානං විරාජයං පජහං භබ්බො දුක්ඛක්ඛයායා’’ති. නවමං. ११२. भिक्षूंनो, रूपांना विशेष रूपाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यांविषयी विरक्त न होता आणि त्यांचा त्याग न करता, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ ठरतो. शब्दांना... गंधांना... रसांना... स्पर्शांना... धर्मांना विशेष रूपाने न जाणता, पूर्णपणे न समजता, त्यांविषयी विरक्त न होता आणि त्यांचा त्याग न करता, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास असमर्थ ठरतो. परंतु, भिक्षूंनो, रूपांना विशेष रूपाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यांविषयी विरक्त होऊन आणि त्यांचा त्याग करून, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास समर्थ ठरतो. शब्दांना... गंधांना... रसांना... स्पर्शांना... धर्मांना विशेष रूपाने जाणून, पूर्णपणे समजून, त्यांविषयी विरक्त होऊन आणि त्यांचा त्याग करून, मनुष्य दुःखाचा क्षय करण्यास समर्थ ठरतो. नववे. 10. උපස්සුතිසුත්තං १०. उपस्सुति सुत्त 113. එකං සමයං භගවා නාතිකෙ විහරති ගිඤ්ජකාවසථෙ. අථ ඛො භගවා රහොගතො පටිසල්ලීනො ඉමං ධම්මපරියායං අභාසි – ‘‘චක්ඛුඤ්ච පටිච්ච රූපෙ ච උප්පජ්ජති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා; තණ්හාපච්චයා උපාදානං; උපාදානපච්චයා භවො; භවපච්චයා ජාති; ජාතිපච්චයා ජරාමරණං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා සම්භවන්ති. එවමෙතස්ස කෙවලස්ස දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස සමුදයො හොති. ජිව්හඤ්ච පටිච්ච රසෙ ච උප්පජ්ජති…පෙ… මනඤ්ච පටිච්ච ධම්මෙ ච උප්පජ්ජති මනොවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා; තණ්හාපච්චයා උපාදානං; උපාදානපච්චයා භවො; භවපච්චයා ජාති; ජාතිපච්චයා ජරාමරණං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා සම්භවන්ති. එවමෙතස්ස කෙවලස්ස දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස සමුදයො හොති’’. ११३. एकदा भगवान नातिक येथे विटांच्या घरात (गिंजकावसथ येथे) विहार करत होते. तेव्हा भगवान एकांतात ध्यानस्थ बसले असताना त्यांनी या धर्मपर्यायाचे प्रवचन केले – 'चक्षू आणि रूपांवर अवलंबून चक्षूविज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या संयोगाला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा; तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान; उपादानाच्या प्रत्ययाने भव; भवाच्या प्रत्ययाने जाती (जन्म); जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण, शोक, परिदेव (क्रंदन), दुःख, डोमनस्य (मानसिक दुःख) आणि उपायास (निराशा) संभवतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा उदय होतो. जिव्हा आणि रसांवर अवलंबून...पे०... मन आणि धर्मांवर अवलंबून मनोविज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या संयोगाला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा; तृष्णेच्या प्रत्ययाने उपादान; उपादानाच्या प्रत्ययाने भव; भवाच्या प्रत्ययाने जाती; जातीच्या प्रत्ययाने जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास संभवतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा उदय होतो.' ‘‘චක්ඛුඤ්ච පටිච්ච රූපෙ ච උප්පජ්ජති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා. තස්සායෙව තණ්හාය අසෙසවිරාගනිරොධා උපාදානනිරොධො; උපාදානනිරොධා භවනිරොධො; භවනිරොධා ජාතිනිරොධො; ජාතිනිරොධා ජරාමරණං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා නිරුජ්ඣන්ති. එවමෙතස්ස කෙවලස්ස දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස නිරොධො හොති…පෙ… ජිව්හඤ්ච පටිච්ච රසෙ ච උප්පජ්ජති…පෙ… මනඤ්ච පටිච්ච ධම්මෙ ච උප්පජ්ජති මනොවිඤ්ඤාණං. තිණ්ණං සඞ්ගති ඵස්සො. ඵස්සපච්චයා වෙදනා; වෙදනාපච්චයා තණ්හා. තස්සායෙව තණ්හාය අසෙසවිරාගනිරොධා උපාදානනිරොධො[Pg.311]; උපාදානනිරොධා…පෙ… එවමෙතස්ස කෙවලස්ස දුක්ඛක්ඛන්ධස්ස නිරොධො හොතී’’ති. 'चक्षू आणि रूपांवर अवलंबून चक्षूविज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या संयोगाला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागामुळे आणि निरोधामुळे उपादानाचा निरोध होतो; उपादाननिरोधामुळे भवानिरोध होतो; भवानिरोधामुळे जातीनिरोध होतो; जातीनिरोधामुळे जरा-मरण, शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास निरुद्ध होतात. अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो...पे०... जिव्हा आणि रसांवर अवलंबून...पे०... मन आणि धर्मांवर अवलंबून मनोविज्ञान उत्पन्न होते. या तिन्हींच्या संयोगाला स्पर्श म्हणतात. स्पर्शाच्या प्रत्ययाने वेदना उत्पन्न होते; वेदनेच्या प्रत्ययाने तृष्णा उत्पन्न होते. त्याच तृष्णेच्या संपूर्ण विरागामुळे आणि निरोधामुळे उपादानाचा निरोध होतो; उपादाननिरोधामुळे...पे०... अशा प्रकारे या संपूर्ण दुःखसमूहाचा निरोध होतो.' තෙන ඛො පන සමයෙන අඤ්ඤතරො භික්ඛු භගවතො උපස්සුති ඨිතො හොති. අද්දසා ඛො භගවා තං භික්ඛුං උපස්සුති ඨිතං. දිස්වාන තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘අස්සොසි නො ත්වං, භික්ඛු, ඉමං ධම්මපරියාය’’න්ති? ‘‘එවං, භන්තෙ’’. ‘‘උග්ගණ්හාහි ත්වං, භික්ඛු, ඉමං ධම්මපරියායං. පරියාපුණාහි ත්වං, භික්ඛු, ඉමං ධම්මපරියායං. ධාරෙහි ත්වං, භික්ඛු, ඉමං ධම්මපරියායං. අත්ථසංහිතොයං, භික්ඛු, ධම්මපරියායො ආදිබ්රහ්මචරියකො’’ති. දසමං. त्या वेळी एक भिक्षू भगवंतांच्या जवळच (त्यांचे बोलणे ऐकण्याच्या अंतरावर) उभा होता. भगवंतांनी त्या भिक्षूला जवळ उभे असलेले पाहिले. त्याला पाहून भगवान त्याला म्हणाले – 'भिक्षू, तू हा धर्मपर्याय ऐकलास का?' 'होय, भन्ते!' 'भिक्षू, तू हा धर्मपर्याय ग्रहण कर. भिक्षू, तू हा धर्मपर्याय चांगल्या प्रकारे शिकून घे. भिक्षू, तू हा धर्मपर्याय मनात धारण कर. भिक्षू, हा धर्मपर्याय कल्याणकारी आहे आणि श्रेष्ठ आचरणाचा (ब्रह्मचर्याचा) प्रारंभ आहे.' दहावे. යොගක්ඛෙමිවග්ගො එකාදසමො. अकरावा योगक्खेमी वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उदान) – යොගක්ඛෙමි උපාදාය, දුක්ඛං ලොකො ච සෙය්යො ච; සංයොජනං උපාදානං, ද්වෙ පරිජානං උපස්සුතීති. योगक्खेमी, उपादाय, दुःख, लोक, आणि सेय्यो; संयोजन, उपादान, दोन परिज्ञान आणि उपस्सुति. 12. ලොකකාමගුණවග්ගො १२. लोककामगुण वर्ग 1. පඨමමාරපාසසුත්තං १. प्रथम मारपास सुत्त 114. ‘‘සන්ති, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ, භික්ඛු, අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ආවාසගතො මාරස්ස, මාරස්ස වසං ගතො, පටිමුක්කස්ස මාරපාසො. බද්ධො සො මාරබන්ධනෙන යථාකාමකරණීයො පාපිමතො…පෙ…. ११४. भिक्षूंनो, चक्षूने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत (प्रिय), मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो (त्यात आनंद मानतो), त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांना घट्ट धरून राहतो – तर भिक्षूंनो, अशा भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानात गेलेला', 'माराच्या वशमध्ये गेलेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यात माराचा फास अडकला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनाने बांधला गेला आहे आणि त्या पापी माराच्या इच्छेनुसार वागण्यास भाग पडला आहे...पे०... ‘‘සන්ති, භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ආවාසගතො මාරස්ස, මාරස්ස වසං ගතො, පටිමුක්කස්ස මාරපාසො. බද්ධො සො මාරබන්ධනෙන…පෙ…. “भिक्षूंनो, जिभेने जाणता येण्याजोगे (जिव्हाविज्ञेय) असे रस आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानी गेलेला', 'माराच्या अधीन झालेला' आणि 'ज्याच्यावर माराचा पाश पडला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनाने बांधला गेला आहे... (पे)...” ‘‘සන්ති[Pg.312], භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ආවාසගතො මාරස්ස, මාරස්ස වසං ගතො, පටිමුක්කස්ස මාරපාසො. බද්ධො සො මාරබන්ධනෙන යථාකාමකරණීයො පාපිමතො. “भिक्षूंनो, मनाने जाणता येण्याजोगे (मनोविज्ञेय) असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानी गेलेला', 'माराच्या अधीन झालेला' आणि 'ज्याच्यावर माराचा पाश पडला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनाने बांधला गेला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकतो.” ‘‘සන්ති ච ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු නාවාසගතො මාරස්ස, න මාරස්ස වසං ගතො, උම්මුක්කස්ස මාරපාසො. මුත්තො සො මාරබන්ධනෙන න යථාකාමකරණීයො පාපිමතො…පෙ…. “भिक्षूंनो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे (चक्षुविज्ञेय) असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानी न गेलेला', 'माराच्या अधीन न झालेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यातील माराचा पाश सुटला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनातून मुक्त झाला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकत नाही... (पे)...” ‘‘සන්ති, භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු නාවාසගතො මාරස්ස, න මාරස්ස වසං ගතො, උම්මුක්කස්ස මාරපාසො. මුත්තො සො මාරබන්ධනෙන න යථාකාමකරණීයො පාපිමතො…පෙ…. “भिक्षूंनो, जिभेने जाणता येण्याजोगे (जिव्हाविज्ञेय) असे रस आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानी न गेलेला', 'माराच्या अधीन न झालेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यातील माराचा पाश सुटला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनातून मुक्त झाला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकत नाही... (पे)...” ‘‘සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු නාවාසගතො මාරස්ස, න මාරස්ස වසං ගතො, උම්මුක්කස්ස මාරපාසො. මුත්තො සො මාරබන්ධනෙන න යථාකාමකරණීයො පාපිමතො’’ති. පඨමං. “भिक्षूंनो, मनाने जाणता येण्याजोगे (मनोविज्ञेय) असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'माराच्या निवासस्थानी न गेलेला', 'माराच्या अधीन न झालेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यातील माराचा पाश सुटला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनातून मुक्त झाला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकत नाही.” पहिले (सुत्त समाप्त). 2. දුතියමාරපාසසුත්තං २. दुसरे मारपाश सुत्त 115. ‘‘සන්ති, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු බද්ධො චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු, ආවාසගතො මාරස්ස, මාරස්ස වසං ගතො, පටිමුක්කස්ස මාරපාසො. බද්ධො සො මාරබන්ධනෙන යථාකාමකරණීයො පාපිමතො…පෙ…. ११५. “भिक्षूंनो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे (चक्षुविज्ञेय) असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'चक्षुविज्ञेय रूपांमध्ये बांधला गेलेला', 'माराच्या निवासस्थानी गेलेला', 'माराच्या अधीन झालेला' आणि 'ज्याच्यावर माराचा पाश पडला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनाने बांधला गेला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकतो... (पे)...” ‘‘සන්ති, භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති [Pg.313] අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු බද්ධො මනොවිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු, ආවාසගතො මාරස්ස, මාරස්ස වසං ගතො, පටිමුක්කස්ස මාරපාසො. බද්ධො සො මාරබන්ධනෙන යථාකාමකරණීයො පාපිමතො…පෙ…. “भिक्षूंनो, जिभेने जाणता येण्याजोगे (जिव्हाविज्ञेय) असे रस आहेत... (पे)... भिक्षूंनो, मनाने जाणता येण्याजोगे (मनोविज्ञेय) असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'मनोविज्ञेय धर्मांमध्ये बांधला गेलेला', 'माराच्या निवासस्थानी गेलेला', 'माराच्या अधीन झालेला' आणि 'ज्याच्यावर माराचा पाश पडला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनाने बांधला गेला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकतो... (पे)...” ‘‘සන්ති ච ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු මුත්තො චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙහි රූපෙහි, නාවාසගතො මාරස්ස, න මාරස්ස වසං ගතො, උම්මුක්කස්ස මාරපාසො. මුත්තො සො මාරබන්ධනෙන න යථාකාමකරණීයො පාපිමතො…පෙ…. “भिक्षूंनो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे (चक्षुविज्ञेय) असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'चक्षुविज्ञेय रूपांमधून मुक्त झालेला', 'माराच्या निवासस्थानी न गेलेला', 'माराच्या अधीन न झालेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यातील माराचा पाश सुटला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनातून मुक्त झाला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकत नाही... (पे)...” ‘‘සන්ති, භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු මුත්තො මනොවිඤ්ඤෙය්යෙහි ධම්මෙහි, නාවාසගතො මාරස්ස, න මාරස්ස වසං ගතො, උම්මුක්කස්ස මාරපාසො. මුත්තො සො මාරබන්ධනෙන න යථාකාමකරණීයො පාපිමතො’’ති. දුතියං. “भिक्षूंनो, जिभेने जाणता येण्याजोगे (जिव्हाविज्ञेय) असे रस आहेत... (पे)... भिक्षूंनो, मनाने जाणता येण्याजोगे (मनोविज्ञेय) असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रियस्वरूप, कामोपसंहित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूंनो, त्या भिक्षूला 'मनोविज्ञेय धर्मांमधून मुक्त झालेला', 'माराच्या निवासस्थानी न गेलेला', 'माराच्या अधीन न झालेला' आणि 'ज्याच्या गळ्यातील माराचा पाश सुटला आहे' असे म्हटले जाते. तो माराच्या बंधनातून मुक्त झाला असून पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वर्तन करू शकत नाही.” दुसरे (सुत्त समाप्त). 3. ලොකන්තගමනසුත්තං ३. लोकंतगमन सुत्त 116. ‘‘නාහං, භික්ඛවෙ, ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං, දට්ඨෙය්යං, පත්තෙය්යන්ති වදාමි. න ච පනාහං, භික්ඛවෙ, අප්පත්වා ලොකස්ස අන්තං දුක්ඛස්ස අන්තකිරියං වදාමී’’ති. ඉදං වත්වා භගවා උට්ඨායාසනා විහාරං පාවිසි. අථ ඛො තෙසං භික්ඛූනං අචිරපක්කන්තස්ස භගවතො එතදහොසි – ‘‘ඉදං ඛො නො, ආවුසො, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – ‘නාහං, භික්ඛවෙ, ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං, දට්ඨෙය්යං, පත්තෙය්යන්ති වදාමි. න ච පනාහං, භික්ඛවෙ, අප්පත්වා ලොකස්ස අන්තං දුක්ඛස්ස අන්තකිරියං වදාමී’ති. කො නු ඛො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජෙය්යා’’ති? ११६. “भिक्षूंनो, केवळ चालत जाऊन (प्रवास करून) लोकाचा (विश्वाचा) अंत जाणता येतो, पाहता येतो किंवा तिथे पोहोचता येते, असे मी म्हणत नाही. परंतु, भिक्षूंनो, लोकाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत (दुःखमुक्ती) करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.” असे बोलून भगवान आसनावरून उठले आणि विहारात गेले. भगवान निघून गेल्यावर काही वेळातच त्या भिक्षूंच्या मनात असा विचार आला— “आयुष्यमानहो, भगवान आपल्याला संक्षेपात हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करताच आसनावरून उठून विहारात गेले आहेत— ‘भिक्षूंनो, केवळ चालत जाऊन लोकाचा अंत जाणता येतो, पाहता येतो किंवा तिथे पोहोचता येते, असे मी म्हणत नाही. परंतु, भिक्षूंनो, लोकाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.’ आता भगवंतांनी संक्षेपात सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण स्पष्ट करू शकेल?” අථ [Pg.314] ඛො තෙසං භික්ඛූනං එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො ආයස්මා ආනන්දො සත්ථු චෙව සංවණ්ණිතො, සම්භාවිතො ච විඤ්ඤූනං සබ්රහ්මචාරීනං. පහොති චායස්මා ආනන්දො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජිතුං. යංනූන මයං යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමෙය්යාම; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං ආනන්දං එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාමා’’ති. नंतर त्या भिक्षूंच्या मनात असा विचार आला— “हे आयुष्यमान आनंद तर शास्त्यांद्वारे (बुद्धांद्वारे) प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे (सहकाऱ्यांद्वारे) सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपात सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांच्याकडे जाऊन त्यांना या विषयाचा अर्थ विचारावा.” අථ ඛො තෙ භික්ඛූ යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා ආනන්දෙන සද්ධිං සම්මොදිංසු. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ ආයස්මන්තං ආනන්දං එතදවොචුං – नंतर ते भिक्षू आयुष्यमान आनंदांकडे गेले. तिथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान आनंदांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर त्या भिक्षूंनी आयुष्यमान आनंदांना असे म्हटले— ‘‘ඉදං ඛො නො, ආවුසො ආනන්ද, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – ‘නාහං, භික්ඛවෙ, ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං, දට්ඨෙය්යං, පත්තෙය්යන්ති වදාමි. න ච පනාහං, භික්ඛවෙ, අප්පත්වා ලොකස්ස අන්තං දුක්ඛස්ස අන්තකිරියං වදාමී’ති. තෙසං නො, ආවුසො, අම්හාකං අචිරපක්කන්තස්ස භගවතො එතදහොසි – ‘ඉදං ඛො නො, ආවුසො, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – නාහං, භික්ඛවෙ, ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං, දට්ඨෙය්යං, පත්තෙය්යන්ති වදාමි. න ච පනාහං, භික්ඛවෙ, අප්පත්වා ලොකස්ස අන්තං දුක්ඛස්ස අන්තකිරියං වදාමීති. කො නු ඛො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජෙය්යා’ති? තෙසං නො, ආවුසො, අම්හාකං එතදහොසි – ‘අයං ඛො, ආවුසො, ආයස්මා ආනන්දො සත්ථු චෙව සංවණ්ණිතො, සම්භාවිතො ච විඤ්ඤූනං සබ්රහ්මචාරීනං. පහොති චායස්මා ආනන්දො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජිතුං. යංනූන මයං යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමෙය්යාම; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං ආනන්දං එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාමා’ති. විභජතායස්මා ආනන්දො’’ති. "आवुसो आनंदा, भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – 'भिक्खूंनो, मी असे म्हणत नाही की प्रवासाने जगाचा अंत जाणता येतो, पाहता येतो किंवा तिथे पोहोचता येते. परंतु, भिक्खूंनो, जगाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.' आवुसो, भगवंत निघून गेल्यावर काही वेळातच आमच्या मनात असा विचार आला – 'भगवंतांनी संक्षेपाने हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे... तर मग भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण स्पष्ट करू शकेल?' आवुसो, मग आमच्या मनात असा विचार आला – 'हे आयुष्यमान आनंद तर शास्त्यांद्वारे प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांना याविषयी विचारावे.' आयुष्यमान आनंदांनी याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करावा." ‘‘සෙය්යථාපි, ආවුසො, පුරිසො සාරත්ථිකො සාරගවෙසී සාරපරියෙසනං චරමානො මහතො රුක්ඛස්ස තිට්ඨතො සාරවතො අතික්කම්මෙව, මූලං අතික්කම්මෙව, ඛන්ධං සාඛාපලාසෙ සාරං පරියෙසිතබ්බං මඤ්ඤෙය්ය; එවං සම්පදමිදං ආයස්මන්තානං සත්ථරි සම්මුඛීභූතෙ තං භගවන්තං අතිසිත්වා [Pg.315] අම්හෙ එතමත්ථං පටිපුච්ඡිතබ්බං මඤ්ඤථ. සො හාවුසො, භගවා ජානං ජානාති, පස්සං පස්සති – චක්ඛුභූතො, ඤාණභූතො, ධම්මභූතො, බ්රහ්මභූතො, වත්තා, පවත්තා, අත්ථස්ස නින්නෙතා, අමතස්ස දාතා, ධම්මස්සාමී, තථාගතො. සො චෙව පනෙතස්ස කාලො අහොසි යං භගවන්තංයෙව එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාථ. යථා වො භගවා බ්යාකරෙය්ය තථා වො ධාරෙය්යාථා’’ති. "आवुसो, ज्याप्रमाणे एखादा मनुष्य वृक्षाचा गाभा (सार) शोधणारा, गाभ्याच्या शोधात फिरणारा, गाभ्याची इच्छा करणारा असेल, आणि तो एका मोठ्या, भक्कम, गाभा असलेल्या वृक्षाचे मूळ आणि खोड सोडून देऊन, त्याच्या फांद्या आणि पानांमध्ये गाभा शोधण्याचा विचार करेल; त्याचप्रमाणे आयुष्यमानांचे हे वागणे आहे की, शास्ते प्रत्यक्ष समोर असताना, त्या भगवंतांना सोडून तुम्ही आम्हाला या अर्थाविषयी विचारणे योग्य समजत आहात. आवुसो, ते भगवंत जाणण्याजोगे जाणतात, पाहण्याजोगे पाहतात – ते चक्षुभूत, ज्ञानभूत, धम्मभूत, ब्रह्मभूत आहेत; ते वक्ता, प्रवक्ता, अर्थाचे प्रकटीकरण करणारे, अमृताचे दाते, धम्मस्वामी आणि तथागत आहेत. भगवंतांनाच या अर्थाविषयी विचारण्याची तीच योग्य वेळ होती. भगवंत तुम्हाला जसे स्पष्ट करून सांगतील, तसेच तुम्ही ते लक्षात ठेवायला हवे होते." ‘‘අද්ධාවුසො ආනන්ද, භගවා ජානං ජානාති, පස්සං පස්සති – චක්ඛුභූතො, ඤාණභූතො, ධම්මභූතො, බ්රහ්මභූතො, වත්තා, පවත්තා, අත්ථස්ස නින්නෙතා, අමතස්ස දාතා, ධම්මස්සාමී, තථාගතො. සො චෙව පනෙතස්ස කාලො අහොසි යං භගවන්තංයෙව එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාම. යථා නො භගවා බ්යාකරෙය්ය තථා නං ධාරෙය්යාම. අපි චායස්මා ආනන්දො සත්ථු චෙව සංවණ්ණිතො, සම්භාවිතො ච විඤ්ඤූනං සබ්රහ්මචාරීනං. පහොති චායස්මා ආනන්දො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජිතුං. විභජතායස්මා ආනන්දො අගරුං කරිත්වා’’ති. "नक्कीच, आवुसो आनंदा, भगवंत जाणण्याजोगे जाणतात, पाहण्याजोगे पाहतात – ते चक्षुभूत, ज्ञानभूत, धम्मभूत, ब्रह्मभूत आहेत; ते वक्ता, प्रवक्ता, अर्थाचे प्रकटीकरण करणारे, अमृताचे दाते, धम्मस्वामी आणि तथागत आहेत. भगवंतांनाच या अर्थाविषयी विचारण्याची तीच योग्य वेळ होती आणि भगवंत आम्हाला जसे स्पष्ट करून सांगतील, तसेच आम्ही ते लक्षात ठेवले असते. तरीही, आयुष्यमान आनंद हे शास्त्यांद्वारे प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. म्हणून आयुष्यमान आनंदांनी कोणताही संकोच न बाळगता याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करावा." ‘‘තෙනහාවුසො, සුණාථ, සාධුකං මනසි කරොථ; භාසිස්සාමී’’ති. ‘‘එවමාවුසො’’ති ඛො තෙ භික්ඛූ ආයස්මතො ආනන්දස්ස පච්චස්සොසුං. ආයස්මා ආනන්දො එතදවොච – "तर मग आवुसो, ऐका, चांगल्या प्रकारे मनात धारण करा; मी सांगेन." "होय, आवुसो," असे म्हणून त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांना प्रतिसाद दिला. आयुष्यमान आनंद म्हणाले – ‘‘යං ඛො වො, ආවුසො, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – ‘නාහං, භික්ඛවෙ, ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං, දට්ඨෙය්යං, පත්තෙය්යන්ති වදාමි. න ච පනාහං, භික්ඛවෙ, අප්පත්වා ලොකස්ස අන්තං දුක්ඛස්ස අන්තකිරියං වදාමී’ති, ඉමස්ස ඛ්වාහං, ආවුසො, භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාමි. යෙන ඛො, ආවුසො, ලොකස්මිං ලොකසඤ්ඤී හොති ලොකමානී – අයං වුච්චති අරියස්ස විනයෙ ලොකො. කෙන චාවුසො, ලොකස්මිං ලොකසඤ්ඤී හොති ලොකමානී? චක්ඛුනා ඛො, ආවුසො, ලොකස්මිං ලොකසඤ්ඤී හොති ලොකමානී. සොතෙන ඛො, ආවුසො… ඝානෙන ඛො, ආවුසො… ජිව්හාය ඛො, ආවුසො, ලොකස්මිං ලොකසඤ්ඤී හොති ලොකමානී[Pg.316]. කායෙන ඛො, ආවුසො… මනෙන ඛො, ආවුසො, ලොකස්මිං ලොකසඤ්ඤී හොති ලොකමානී. යෙන ඛො, ආවුසො, ලොකස්මිං ලොකසඤ්ඤී හොති ලොකමානී – අයං වුච්චති අරියස්ස විනයෙ ලොකො. යං ඛො වො, ආවුසො, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – ‘නාහං, භික්ඛවෙ, ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං, දට්ඨෙය්යං, පත්තෙය්යන්ති වදාමි. න ච පනාහං, භික්ඛවෙ, අප්පත්වා ලොකස්ස අන්තං දුක්ඛස්ස අන්තකිරියං වදාමී’ති, ඉමස්ස ඛ්වාහං, ආවුසො, භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස එවං විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාමි. ආකඞ්ඛමානා ච පන තුම්හෙ ආයස්මන්තො භගවන්තංයෙව උපසඞ්කමිත්වා එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාථ. යථා වො භගවා බ්යාකරොති තථා නං ධාරෙය්යාථා’’ති. "आवुसो, भगवंतांनी तुम्हाला संक्षेपाने जो उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – 'भिक्खूंनो, मी असे म्हणत नाही की प्रवासाने जगाचा अंत जाणता येतो, पाहता येतो किंवा तिथे पोहोचता येते. परंतु, भिक्खूंनो, जगाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.' आवुसो, भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मी या प्रकारे जाणतो: आवुसो, ज्याच्याद्वारे या जगात 'जगाची संज्ञा' (लोकसंज्ञा) होते आणि 'जगाची धारणा' (लोकमानी) होते – त्यालाच आर्यांच्या विनयात 'जग' (लोक) म्हटले जाते. आणि आवुसो, कशामुळे या जगात 'जगाची संज्ञा' होते आणि 'जगाची धारणा' होते? आवुसो, डोळ्यामुळे या जगात 'जगाची संज्ञा' होते आणि 'जगाची धारणा' होते. कानामुळे... नाकामुळे... जिभेमुळे या जगात 'जगाची संज्ञा' होते आणि 'जगाची धारणा' होते. शरीरामुळे... मनामुळे या जगात 'जगाची संज्ञा' होते आणि 'जगाची धारणा' होते. आवुसो, ज्याच्याद्वारे या जगात 'जगाची संज्ञा' होते आणि 'जगाची धारणा' होते – त्यालाच आर्यांच्या विनयात 'जग' म्हटले जाते. आवुसो, भगवंतांनी तुम्हाला संक्षेपाने जो उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – 'भिक्खूंनो, मी असे म्हणत नाही की प्रवासाने जगाचा अंत जाणता येतो, पाहता येतो किंवा तिथे पोहोचता येते. परंतु, भिक्खूंनो, जगाच्या अंतापर्यंत न पोहोचता दुःखाचा अंत करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.' या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मी अशा प्रकारे जाणतो. आता, आयुष्यमानांनो, जर तुमची इच्छा असेल, तर तुम्ही स्वतः भगवंतांकडे जावे आणि त्यांना या अर्थाविषयी विचारावे. भगवंत तुम्हाला जसे स्पष्ट करून सांगतील, तसेच तुम्ही ते लक्षात ठेवावे." ‘‘එවමාවුසො’’ති ඛො තෙ භික්ඛූ ආයස්මතො ආනන්දස්ස පටිස්සුත්වා උට්ඨායාසනා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – "होय, आवुसो," असे म्हणून त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांचे म्हणणे मान्य केले आणि आसनावरून उठून जेथे भगवंत होते तेथे ते गेले. तेथे पोहोचून त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूंनी भगवंतांना असे म्हटले – ‘‘යං ඛො නො, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – ‘නාහං, භික්ඛවෙ, ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං, දට්ඨෙය්යං, පත්තෙය්යන්ති වදාමි. න ච පනාහං, භික්ඛවෙ, අප්පත්වා ලොකස්ස අන්තං දුක්ඛස්ස අන්තකිරියං වදාමී’ති. තෙසං නො, භන්තෙ, අම්හාකං අචිරපක්කන්තස්ස භගවතො එතදහොසි – ‘ඉදං ඛො නො, ආවුසො, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – නාහං, භික්ඛවෙ, ගමනෙන ලොකස්ස අන්තං ඤාතෙය්යං, දට්ඨෙය්යං, පත්තෙය්යන්ති වදාමි. න ච පනාහං, භික්ඛවෙ, අප්පත්වා ලොකස්ස අන්තං දුක්ඛස්ස අන්තකිරියං වදාමී’ති. කො නු ඛො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජෙය්යාති? තෙසං නො, භන්තෙ, අම්හාකං එතදහොසි – ‘අයං ඛො ආයස්මා ආනන්දො සත්ථු චෙව සංවණ්ණිතො, සම්භාවිතො ච විඤ්ඤූනං සබ්රහ්මචාරීනං. පහොති චායස්මා ආනන්දො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජිතුං. යංනූන මයං යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමෙය්යාම; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං ආනන්දං එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාමා’ති. අථ ඛො මයං[Pg.317], භන්තෙ, යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමිම්හ; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං ආනන්දං එතමත්ථං පටිපුච්ඡිම්හ. තෙසං නො, භන්තෙ, ආයස්මතා ආනන්දෙන ඉමෙහි ආකාරෙහි ඉමෙහි පදෙහි ඉමෙහි බ්යඤ්ජනෙහි අත්ථො විභත්තො’’ති. “भन्ते, भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला - ‘भिक्खूहो, मी असे म्हणत नाही की (शारीरिक) गमनाने (चालून) लोकाच्या (विश्वाच्या) अंताला जाणता येते, पाहता येते किंवा पोहोचता येते. परंतु, भिक्खूहो, लोकाच्या अंताला न पोहोचता दुःखाचा अंत (दुःखमुक्ती) करता येतो, असेही मी म्हणत नाही.’ भगवंतांच्या निघून गेल्यानंतर लवकरच आमच्या मनात असा विचार आला - ‘आयुष्यांनो, भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला - ... आता भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण स्पष्ट करू शकेल?’ भन्ते, तेव्हा आमच्या मनात असा विचार आला - ‘हे आयुष्यमान आनंद शास्त्यांद्वारे (बुद्धांद्वारे) प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांना या उपदेशाचा अर्थ विचारावा.’ भन्ते, त्यानंतर आम्ही आयुष्यमान आनंदांकडे गेलो आणि त्यांना या उपदेशाचा अर्थ विचारला. भन्ते, आयुष्यमान आनंदांनी या कारणांनी, या पदांनी आणि या व्यंजनांनी (शब्दांनी) आम्हाला याचा अर्थ सविस्तर स्पष्ट करून सांगितला आहे.” ‘‘පණ්ඩිතො, භික්ඛවෙ, ආනන්දො; මහාපඤ්ඤො, භික්ඛවෙ, ආනන්දො! මං චෙපි තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාථ, අහම්පි තං එවමෙවං බ්යාකරෙය්යං යථා තං ආනන්දෙන බ්යාකතං. එසො චෙවෙතස්ස අත්ථො, එවඤ්ච නං ධාරෙය්යාථා’’ති. තතියං. “भिक्खूहो, आनंद पंडित आहे; भिक्खूहो, आनंद महाप्रज्ञ आहे! भिक्खूहो, जर तुम्ही मलाही हाच अर्थ विचारला असता, तर मीसुद्धा त्याचे तसेच स्पष्टीकरण दिले असते जसे आनंदाने दिले आहे. हाच याचा खरा अर्थ आहे आणि तुम्ही तो असाच लक्षात ठेवावा.” (तिसरे सूत्र समाप्त.) 4. කාමගුණසුත්තං ४. कामगुणसुत्त 117. ‘‘පුබ්බෙව මෙ, භික්ඛවෙ, සම්බොධා අනභිසම්බුද්ධස්ස බොධිසත්තස්සෙව සතො එතදහොසි – ‘යෙමෙ පඤ්ච කාමගුණා චෙතසො සම්ඵුට්ඨපුබ්බා අතීතා නිරුද්ධා විපරිණතා, තත්ර මෙ චිත්තං බහුලං ගච්ඡමානං ගච්ඡෙය්ය පච්චුප්පන්නෙසු වා අප්පං වා අනාගතෙසු’. තස්ස මය්හං, භික්ඛවෙ, එතදහොසි – ‘යෙමෙ පඤ්ච කාමගුණා චෙතසො සම්ඵුට්ඨපුබ්බා අතීතා නිරුද්ධා විපරිණතා, තත්ර මෙ අත්තරූපෙන අප්පමාදො සති චෙතසො ආරක්ඛො කරණීයො’. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, තුම්හාකම්පි යෙ තෙ පඤ්ච කාමගුණා චෙතසො සම්ඵුට්ඨපුබ්බා අතීතා නිරුද්ධා විපරිණතා, තත්ර වො චිත්තං බහුලං ගච්ඡමානං ගච්ඡෙය්ය පච්චුප්පන්නෙසු වා අප්පං වා අනාගතෙසු. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, තුම්හාකම්පි යෙ තෙ පඤ්ච කාමගුණා චෙතසො සම්ඵුට්ඨපුබ්බා අතීතා නිරුද්ධා විපරිණතා, තත්ර වො අත්තරූපෙහි අප්පමාදො සති චෙතසො ආරක්ඛො කරණීයො. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ යත්ථ චක්ඛු ච නිරුජ්ඣති, රූපසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ ජිව්හා ච නිරුජ්ඣති, රසසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ මනො ච නිරුජ්ඣති, ධම්මසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ’’ති. ඉදං වත්වා භගවා උට්ඨායාසනා විහාරං පාවිසි. ११७. “भिक्खूहो, संबोधी प्राप्त होण्यापूर्वी, मी जेव्हा अनुत्पन्नज्ञान बोधिसत्वच होतो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला - ‘माझ्या चित्ताने पूर्वी अनुभवलेले, जे आता भूतकाळात जमा झाले आहेत, निरुद्ध झाले आहेत आणि बदलून गेले आहेत, अशा पाच कामगुणांकडे माझे चित्त वारंवार धाव घेईल, किंवा वर्तमानकाळातील कामगुणांकडे धाव घेईल, अथवा भविष्यकाळातील कामगुणांकडे थोडेफार धाव घेईल.’ भिक्खूहो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला - ‘माझ्या चित्ताने पूर्वी अनुभवलेले, जे आता भूतकाळात जमा झाले आहेत, निरुद्ध झाले आहेत आणि बदलून गेले आहेत, अशा पाच कामगुणांच्या बाबतीत मी स्वतःच्या कल्याणासाठी अप्रमाद (जागरूकता), स्मृती (सती) ठेवून चित्ताचे रक्षण केले पाहिजे.’ म्हणून, भिक्खूहो, तुमच्या बाबतीतही, तुमच्या चित्ताने पूर्वी अनुभवलेले, जे आता भूतकाळात जमा झाले आहेत, निरुद्ध झाले आहेत आणि बदलून गेले आहेत, अशा पाच कामगुणांकडे तुमचे चित्त वारंवार धाव घेईल, किंवा वर्तमानकाळातील कामगुणांकडे धाव घेईल, अथवा भविष्यकाळातील कामगुणांकडे थोडेफार धाव घेईल. म्हणून, भिक्खूहो, तुमच्या चित्ताने पूर्वी अनुभवलेले, जे आता भूतकाळात जमा झाले आहेत, निरुद्ध झाले आहेत आणि बदलून गेले आहेत, अशा पाच कामगुणांच्या बाबतीत तुम्ही स्वतःच्या कल्याणासाठी अप्रमाद (जागरूकता), स्मृती (सती) ठेवून चित्ताचे रक्षण केले पाहिजे. म्हणून, भिक्खूहो, ते आयतन (स्थान) जाणले पाहिजे, जिथे चक्षू (डोळा) निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते; ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जिथे जिव्हा (जीभ) निरुद्ध होते आणि रससंज्ञा निरुद्ध होते; ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जिथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.” असे बोलून भगवंत आसनावरून उठले आणि विहारात गेले. අථ ඛො තෙසං භික්ඛූනං අචිරපක්කන්තස්ස භගවතො එතදහොසි – ‘‘ඉදං ඛො නො, ආවුසො, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – ‘තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ යත්ථ චක්ඛු ච නිරුජ්ඣති, රූපසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ ජිව්හා ච නිරුජ්ඣති, රසසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ [Pg.318] ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ මනො ච නිරුජ්ඣති, ධම්මසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ’ති. කො නු ඛො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජෙය්යා’’ති? त्यानंतर, भगवंतांच्या निघून गेल्यानंतर लवकरच त्या भिक्खूंच्या मनात असा विचार आला - “आयुष्यांनो, भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला - ‘म्हणून, भिक्खूहो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जिथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते; ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जिथे जिव्हा निरुद्ध होते आणि रससंज्ञा निरुद्ध होते; ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जिथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ आता भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण स्पष्ट करू शकेल?” අථ ඛො තෙසං භික්ඛූනං එතදහොසි – ‘‘අයං ඛො ආයස්මා ආනන්දො සත්ථු චෙව සංවණ්ණිතො, සම්භාවිතො ච විඤ්ඤූනං සබ්රහ්මචාරීනං. පහොති චායස්මා ආනන්දො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජිතුං. යංනූන මයං යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමෙය්යාම; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං ආනන්දං එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාමා’’ති. त्यानंतर त्या भिक्खूंच्या मनात असा विचार आला - “हे आयुष्यमान आनंद शास्त्यांद्वारे प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांना या उपदेशाचा अर्थ विचारावा.” අථ ඛො තෙ භික්ඛූ යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා ආනන්දෙන සද්ධිං සම්මොදිංසු. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ ආයස්මන්තං ආනන්දං එතදවොචුං – त्यानंतर ते भिक्खू आयुष्यमान आनंदांकडे गेले. तिथे पोहोचून त्यांनी आयुष्यमान आनंदांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण आटोपून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यानंतर त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांना असे म्हटले - ‘‘ඉදං ඛො නො, ආවුසො ආනන්ද, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – ‘තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ යත්ථ චක්ඛු ච නිරුජ්ඣති, රූපසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ ජිව්හා ච නිරුජ්ඣති, රසසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ මනො ච නිරුජ්ඣති, ධම්මසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ’ති. තෙසං නො, ආවුසො, අම්හාකං අචිරපක්කන්තස්ස භගවතො එතදහොසි – ‘ඉදං ඛො නො, ආවුසො, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ යත්ථ චක්ඛු ච නිරුජ්ඣති, රූපසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ ජිව්හා ච නිරුජ්ඣති, රසසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ මනො ච නිරුජ්ඣති, ධම්මසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ’ති. කො නු ඛො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජෙය්යාති? තෙසං නො, ආවුසො, අම්හාකං එතදහොසි – ‘අයං ඛො ආයස්මා ආනන්දො සත්ථු චෙව සංවණ්ණිතො, සම්භාවිතො ච විඤ්ඤූනං සබ්රහ්මචාරීනං. පහොති චායස්මා ආනන්දො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන [Pg.319] උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජිතුං. යංනූන මයං යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමෙය්යාම; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං ආනන්දං එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාමා’ති. විභජතායස්මා ආනන්දො’’ති. “हे आवुसो आनंद, भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – ‘म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे जिव्हा निरुद्ध होते आणि रससंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ आवुसो, भगवंतांच्या निघून गेल्यानंतर लवकरच आमच्या मनात असा विचार आला – ‘भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे जिव्हा निरुद्ध होते आणि रससंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण बरे स्पष्ट करू शकेल? मग आवुसो, आमच्या मनात असा विचार आला – ‘हे आयुष्यमान आनंद शास्त्यांद्वारे प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांना याविषयी विचारावे.’ आयुष्यमान आनंदांनी याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करावा.” ‘‘සෙය්යථාපි, ආවුසො, පුරිසො සාරත්ථිකො සාරගවෙසී සාරපරියෙසනං චරමානො මහතො රුක්ඛස්ස…පෙ… විභජතායස්මා ආනන්දො අගරුං කරිත්වාති. “ज्याप्रमाणे, आवुसो, एखादा साराची इच्छा करणारा, साराचा शोध घेणारा आणि साराच्या शोधात फिरणारा मनुष्य एखाद्या मोठ्या वृक्षाच्या... पे... आयुष्यमान आनंदांनी संकोच न बाळगता याचा अर्थ स्पष्ट करावा.” ‘‘තෙනහාවුසො, සුණාථ, සාධුකං මනසි කරොථ; භාසිස්සාමී’’ති. ‘‘එවමාවුසො’’ති ඛො තෙ භික්ඛූ ආයස්මතො ආනන්දස්ස පච්චස්සොසුං. ආයස්මා ආනන්දො එතදවොච – “तर मग आवुसो, ऐका, नीट मनन करा; मी सांगेन.” “तसेच आवुसो,” असे म्हणून त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांना प्रतिसाद दिला. आयुष्यमान आनंद म्हणाले – ‘‘යං ඛො වො, ආවුසො, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – ‘තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ යත්ථ චක්ඛු ච නිරුජ්ඣති, රූපසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ මනො ච නිරුජ්ඣති, ධම්මසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ’ති. ඉමස්ස ඛ්වාහං, ආවුසො, භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාමි. සළායතනනිරොධං නො එතං, ආවුසො, භගවතා සන්ධාය භාසිතං – ‘තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ, යත්ථ චක්ඛු ච නිරුජ්ඣති, රූපසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ මනො ච නිරුජ්ඣති, ධම්මසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ’ති. අයං ඛො, ආවුසො, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – ‘තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ යත්ථ චක්ඛු ච නිරුජ්ඣති, රූපසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ මනො ච නිරුජ්ඣති, ධම්මසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ’ති. ඉමස්ස ඛ්වාහං, ආවුසො, භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස එවං විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාමි. ආකඞ්ඛමානා ච පන තුම්හෙ ආයස්මන්තො භගවන්තංයෙව උපසඞ්කමථ; උපසඞ්කමිත්වා එතමත්ථං පුච්ඡෙය්යාථ. යථා වො භගවා බ්යාකරොති තථා නං ධාරෙය්යාථා’’ති. “आवुसो, भगवंतांनी तुम्हाला संक्षेपाने जो उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – ‘म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ आवुसो, भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मी या प्रकारे समजतो. आवुसो, भगवंतांनी हे षडायतन-निरोधाला उद्देशून म्हटले आहे – ‘म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ आवुसो, भगवंतांनी संक्षेपाने हा उपदेश देऊन, त्याचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट न करता, आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला आहे – ‘म्हणूनच, भिक्खूंनो, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षू निरुद्ध होतो आणि रूपसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे... पे... जेथे मन निरुद्ध होते आणि धम्मसंज्ञा निरुद्ध होते, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ मी अशा प्रकारे समजतो. परंतु, आयुष्यमान हो, जर तुमची इच्छा असेल, तर तुम्ही भगवंतांकडेच जावे आणि त्यांना याविषयी विचारावे. भगवंत तुम्हाला जसे स्पष्ट करून सांगतील, तसेच तुम्ही ते लक्षात ठेवावे.” ‘‘එවමාවුසො’’ති [Pg.320] ඛො තෙ භික්ඛූ ආයස්මතො ආනන්දස්ස පටිස්සුත්වා උට්ඨායාසනා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – “तसेच आवुसो,” असे म्हणून त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान आनंदांचे म्हणणे मान्य केले आणि आसनावरून उठून जेथे भगवंत होते तेथे गेले. तेथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूंनी भगवंतांना असे म्हटले – ‘‘යං ඛො නො, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – ‘තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ යත්ථ චක්ඛු ච නිරුජ්ඣති, රූපසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ ජිව්හා ච නිරුජ්ඣති, රසසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ මනො ච නිරුජ්ඣති, ධම්මසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ’ති, තෙසං නො, භන්තෙ, අම්හාකං අචිරපක්කන්තස්ස භගවතො එතදහොසි – ‘ඉදං ඛො නො, ආවුසො, භගවා සංඛිත්තෙන උද්දෙසං උද්දිසිත්වා විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභජිත්වා උට්ඨායාසනා විහාරං පවිට්ඨො – තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ යත්ථ චක්ඛු ච නිරුජ්ඣති, රූපසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ…පෙ… යත්ථ මනො ච නිරුජ්ඣති, ධම්මසඤ්ඤා ච නිරුජ්ඣති, සෙ ආයතනෙ වෙදිතබ්බෙ’ති. ‘කො නු ඛො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජෙය්යා’ති? තෙසං නො, භන්තෙ, අම්හාකං එතදහොසි – ‘අයං ඛො ආයස්මා ආනන්දො සත්ථු චෙව සංවණ්ණිතො, සම්භාවිතො ච විඤ්ඤූනං සබ්රහ්මචාරීනං. පහොති චායස්මා ආනන්දො ඉමස්ස භගවතා සංඛිත්තෙන උද්දෙසස්ස උද්දිට්ඨස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං අවිභත්තස්ස විත්ථාරෙන අත්ථං විභජිතුං. යංනූන මයං යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමෙය්යාම; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං ආනන්දං එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාමා’ති. අථ ඛො මයං, භන්තෙ, යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමිම්හ; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං ආනන්දං එතමත්ථං පටිපුච්ඡිම්හ. තෙසං නො, භන්තෙ, ආයස්මතා ආනන්දෙන ඉමෙහි ආකාරෙහි, ඉමෙහි පදෙහි, ඉමෙහි බ්යඤ්ජනෙහි අත්ථො විභත්තො’’ති. “भन्ते! भगवंतांनी आम्हाला संक्षेपाने जो उपदेश केला आणि त्याचा सविस्तर अर्थ न सांगता आपल्या आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला – ‘म्हणूनच, भिक्खून्नों, ते आयतन जाणले पाहिजे, जेथे चक्षूचा निरोध होतो आणि रूपसंज्ञेचा निरोध होतो; ते आयतन जाणले पाहिजे...पे... जेथे जिव्हेचा निरोध होतो आणि रससंज्ञेचा निरोध होतो; ते आयतन जाणले पाहिजे...पे... जेथे मनाचा निरोध होतो आणि धम्मसंज्ञेचा निरोध होतो, ते आयतन जाणले पाहिजे’ – भन्ते, भगवंतांच्या निघून गेल्यानंतर लगेचच आमच्या मनात असा विचार आला – ‘आयुष्यमानांनो! भगवंतांनी संक्षेपाने उपदेश केला आणि त्याचा सविस्तर अर्थ न सांगता आसनावरून उठून विहारात प्रवेश केला – म्हणूनच, भिक्खून्नों, ते आयतन जाणले पाहिजे जेथे चक्षूचा निरोध होतो आणि रूपसंज्ञेचा निरोध होतो...पे... जेथे मनाचा निरोध होतो आणि धम्मसंज्ञेचा निरोध होतो, ते आयतन जाणले पाहिजे.’ ‘भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ कोण बरे स्पष्ट करू शकेल?’ भन्ते, तेव्हा आमच्या मनात असा विचार आला – ‘हे आयुष्यमान आनंद शास्त्यांद्वारे प्रशंसित आहेत आणि सुज्ञ सब्रह्मचाऱ्यांद्वारे सन्मानित आहेत. आयुष्यमान आनंद भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या आणि सविस्तर अर्थ स्पष्ट न केलेल्या या उपदेशाचा सविस्तर अर्थ स्पष्ट करण्यास समर्थ आहेत. तर मग आपण आयुष्यमान आनंदांकडे जावे आणि त्यांना याविषयी विचारावे.’ त्यानंतर, भन्ते, आम्ही आयुष्यमान आनंदांकडे गेलो आणि त्यांना या अर्थाविषयी विचारले. भन्ते, आयुष्यमान आनंदांनी या प्रकारांनी, या पदांनी आणि या व्यंजनांनी आम्हाला हा अर्थ सविस्तर स्पष्ट करून सांगितला.” ‘‘පණ්ඩිතො, භික්ඛවෙ, ආනන්දො; මහාපඤ්ඤො, භික්ඛවෙ, ආනන්දො! මං චෙපි තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, එතමත්ථං පටිපුච්ඡෙය්යාථ, අහම්පි තං එවමෙවං බ්යාකරෙය්යං යථා තං ආනන්දෙන බ්යාකතං. එසො චෙවෙතස්ස අත්ථො. එවඤ්ච නං ධාරෙය්යාථා’’ති. චතුත්ථං. “भिक्खून्नों, आनंद पंडित आहे; भिक्खून्नों, आनंद महाप्रज्ञ आहे! जर तुम्ही मलाही या अर्थाविषयी विचारले असते, तर मीसुद्धा त्याचे तसेच स्पष्टीकरण दिले असते जसे आनंदाने दिले आहे. हाच याचा खरा अर्थ आहे. आणि तुम्ही तो असाच लक्षात ठेवावा.” चौथे. 5. සක්කපඤ්හසුත්තං ५. सक्कपञ्हसुत्त 118. එකං [Pg.321] සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති ගිජ්ඣකූටෙ පබ්බතෙ. අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො සක්කො දෙවානමින්දො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කො නු ඛො, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති? කො පන, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති? ११८. एकदा भगवान राजगृह येथे गिज्झकूट पर्वतावर विहार करत होते. तेव्हा देवांचा राजा सक्क जेथे भगवान होते तेथे आला; आल्यानंतर भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला देवांचा राजा सक्क भगवंतांना म्हणाला – “भन्ते! असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाहीत? आणि भन्ते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?” ‘‘සන්ති ඛො, දෙවානමින්ද, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති තදුපාදානං. සඋපාදානො, දෙවානමින්ද, භික්ඛු නො පරිනිබ්බායති…පෙ…. “देवेन्द्रा! चक्षूने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर त्या आनंद मानणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि आसक्त होऊन राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होते आणि त्याचे उपादान बनते. देवेन्द्रा! उपादानयुक्त भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाही...पे... ‘‘සන්ති ඛො, දෙවානමින්ද, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති ඛො, දෙවානමින්ද, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති තදුපාදානං. සඋපාදානො, දෙවානමින්ද, භික්ඛු නො පරිනිබ්බායති. අයං ඛො, දෙවානමින්ද, හෙතු, අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති. “देवेन्द्रा! जिव्हेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत...पे... देवेन्द्रा! मनाने जाणता येण्याजोगे धम्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर त्या आनंद मानणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि आसक्त होऊन राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होते आणि त्याचे उपादान बनते. देवेन्द्रा! उपादानयुक्त भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाही. देवेन्द्रा! हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाहीत. ‘‘සන්ති ච ඛො, දෙවානමින්ද, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො න තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති, න තදුපාදානං. අනුපාදානො, දෙවානමින්ද, භික්ඛු පරිනිබ්බායති…පෙ…. “परंतु देवेन्द्रा! चक्षूने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर त्या आनंद न मानणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि आसक्त न राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होत नाही आणि त्याचे उपादानही होत नाही. देवेन्द्रा! उपादानरहित भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो...पे... ‘‘සන්ති ඛො, දෙවානමින්ද, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති ඛො, දෙවානමින්ද, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො න තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති න තදුපාදානං. අනුපාදානො, දෙවානමින්ද, භික්ඛු [Pg.322] පරිනිබ්බායති. අයං ඛො, දෙවානමින්ද, හෙතු, අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති. පඤ්චමං. “देवेन्द्रा! जिव्हेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत...पे... देवेन्द्रा! मनाने जाणता येण्याजोगे धम्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर त्या आनंद न मानणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि आसक्त न राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होत नाही आणि त्याचे उपादानही होत नाही. देवेन्द्रा! उपादानरहित भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो. देवेन्द्रा! हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात.” पाचवे. 6. පඤ්චසිඛසුත්තං ६. पञ्चसिखसुत्त 119. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති ගිජ්ඣකූටෙ පබ්බතෙ. අථ ඛො පඤ්චසිඛො ගන්ධබ්බදෙවපුත්තො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතො ඛො පඤ්චසිඛො ගන්ධබ්බදෙවපුත්තො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කො නු ඛො, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති? කො පන, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති? ‘‘සන්ති ඛො, පඤ්චසිඛ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා…පෙ… සන්ති ඛො, පඤ්චසිඛ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති තදුපාදානං. සඋපාදානො, පඤ්චසිඛ, භික්ඛු නො පරිනිබ්බායති. අයං ඛො, පඤ්චසිඛ, හෙතු, අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති’’. ११९. एकदा भगवान राजगृह येथे गृध्रकूट पर्वतावर विहार करत होते. तेव्हा पंचशिख नावाचा गंधर्वदेवपुत्र जेथे भगवान होते तेथे आला; जवळ येऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभा राहिलेला पंचशिख गंधर्वदेवपुत्र भगवंतांना म्हणाला – "भन्ते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत? आणि भन्ते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?" "पंचशिख, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत... तसेच पंचशिख, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यातच आसक्त होऊन राहतो, तर त्या अभिनंदन करणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि आसक्त होऊन राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावरच आश्रित होते आणि त्याचे उपादान बनते. पंचशिख, उपादानयुक्त असलेला भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करत नाही. पंचशिख, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत." ‘‘සන්ති ච ඛො, පඤ්චසිඛ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා…පෙ… සන්ති ඛො, පඤ්චසිඛ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති, තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො න තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති, න තදුපාදානං. අනුපාදානො, පඤ්චසිඛ, භික්ඛු පරිනිබ්බායති. අයං ඛො, පඤ්චසිඛ, හෙතු, අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති. ඡට්ඨං. "परंतु पंचशिख, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाजोगे आहेत... तसेच पंचशिख, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर त्या अभिनंदन न करणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि आसक्त न होऊन राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होत नाही आणि त्याचे उपादानही होत नाही. पंचशिख, उपादानरहित भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो. पंचशिख, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात." (सहावे सुत्त समाप्त.) 7. සාරිපුත්තසද්ධිවිහාරිකසුත්තං ७. सारिपुत्तसद्धिविहारिक सुत्त 120. එකං සමයං ආයස්මා සාරිපුත්තො සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙනායස්මා සාරිපුත්තො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා සාරිපුත්තෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො සො භික්ඛු ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං එතදවොච – ‘‘සද්ධිවිහාරිකො[Pg.323], ආවුසො සාරිපුත්ත, භික්ඛු සික්ඛං පච්චක්ඛාය හීනායාවත්තො’’ති. १२०. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त सावत्थी येथे अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा एक भिक्खू जेथे आयुष्यमान सारिपुत्त होते तेथे आला; जवळ येऊन त्याने आयुष्यमान सारिपुत्तांशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तो भिक्खू आयुष्यमान सारिपुत्तांना म्हणाला – "आवुसो सारिपुत्त, तुमचा सद्धिविहारिक भिक्खू शिक्षेचा (शील-नियमांचा) त्याग करून हीन गृहस्थाश्रमात परतला आहे." ‘‘එවමෙතං, ආවුසො, හොති ඉන්ද්රියෙසු අගුත්තද්වාරස්ස, භොජනෙ අමත්තඤ්ඤුනො, ජාගරියං අනනුයුත්තස්ස. ‘සො වතාවුසො, භික්ඛු ඉන්ද්රියෙසු අගුත්තද්වාරො භොජනෙ අමත්තඤ්ඤූ ජාගරියං අනනුයුත්තො යාවජීවං පරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං සන්තානෙස්සතී’ති නෙතං ඨානං විජ්ජති. ‘සො වතාවුසො, භික්ඛු ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරො, භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ, ජාගරියං අනුයුත්තො යාවජීවං පරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං සන්තානෙස්සතී’ති ඨානමෙතං විජ්ජති. "आवुसो, ज्याचे इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित नाही, जो भोजनात मात्रा (प्रमाण) जाणत नाही आणि जो जागृत राहण्यात तत्पर नाही, त्याच्या बाबतीत असेच घडते. 'आवुसो, जो भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित न ठेवणारा, भोजनात प्रमाण न जाणणारा आणि जागृत राहण्यात तत्पर नसलेला आहे, तो आयुष्यभर परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे पालन करू शकेल' – हे शक्य नाही. परंतु, 'आवुसो, जो भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा, भोजनात प्रमाण जाणणारा आणि जागृत राहण्यात तत्पर असलेला आहे, तो आयुष्यभर परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे पालन करू शकेल' – हे शक्य आहे." ‘‘කථඤ්චාවුසො, ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරො හොති? ඉධාවුසො, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා න නිමිත්තග්ගාහී හොති නානුබ්යඤ්ජනග්ගාහී. යත්වාධිකරණමෙනං චක්ඛුන්ද්රියං අසංවුතං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා අන්වාස්සවෙය්යුං තස්ස සංවරාය පටිපජ්ජති, රක්ඛති චක්ඛුන්ද්රියං, චක්ඛුන්ද්රියෙ සංවරං ආපජ්ජති. සොතෙන සද්දං සුත්වා… ඝානෙන ගන්ධං ඝායිත්වා… ජිව්හාය රසං සායිත්වා… කායෙන ඵොට්ඨබ්බං ඵුසිත්වා… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය න නිමිත්තග්ගාහී හොති නානුබ්යඤ්ජනග්ගාහී. යත්වාධිකරණමෙනං මනින්ද්රියං අසංවුතං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා අන්වාස්සවෙය්යුං, තස්ස සංවරාය පටිපජ්ජති, රක්ඛති මනින්ද්රියං, මනින්ද්රියෙ සංවරං ආපජ්ජති. එවං ඛො, ආවුසො, ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරො හොති. "आणि आवुसो, भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा कसा होतो? आवुसो, या शासनात भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून त्याच्या बाह्य लक्षणांचे ग्रहण करत नाही आणि त्याच्या उप-लक्षणांचेही ग्रहण करत नाही. कारण जर त्याने चक्षुरिंद्रिय असंयत (असुरक्षित) ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य/दुःख) हे पापी अकुशल धर्म त्याच्यावर प्रभाव पाडू शकतील; म्हणून तो त्याच्या संवरासाठी प्रयत्न करतो, चक्षुरिंद्रियाचे रक्षण करतो आणि चक्षुरिंद्रियाचा संवर प्राप्त करतो. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धर्म (विचार) जाणून तो बाह्य लक्षणांचे ग्रहण करत नाही आणि उप-लक्षणांचेही ग्रहण करत नाही. कारण जर त्याने मनेंद्रिय असंयत ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धर्म त्याच्यावर प्रभाव पाडू शकतील; म्हणून तो त्याच्या संवरासाठी प्रयत्न करतो, मनेंद्रियाचे रक्षण करतो आणि मनेंद्रियाचा संवर प्राप्त करतो. आवुसो, अशा प्रकारे भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा होतो." ‘‘කථඤ්චාවුසො, භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ හොති? ඉධාවුසො, භික්ඛු පටිසඞ්ඛා යොනිසො ආහාරං ආහාරෙති – ‘නෙව දවාය, න මදාය, න මණ්ඩනාය, න විභූසනාය, යාවදෙව ඉමස්ස කායස්ස ඨිතියා යාපනාය, විහිංසූපරතියා, බ්රහ්මචරියානුග්ගහාය. ඉති පුරාණඤ්ච වෙදනං පටිහඞ්ඛාමි, නවඤ්ච වෙදනං න උප්පාදෙස්සාමි, යාත්රා ච මෙ භවිස්සති, අනවජ්ජතා ච ඵාසුවිහාරො චා’ති. එවං ඛො, ආවුසො, භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ හොති. "आणि आवुसो, भिक्खू भोजनात प्रमाण जाणणारा कसा होतो? आवुसो, या शासनात भिक्खू विचारपूर्वक आणि योग्य प्रकारे विचार करून भोजन ग्रहण करतो – 'खेळ-मजेसाठी नाही, मदासाठी नाही, शरीराच्या सुशोभीकरणासाठी नाही, केवळ या शरीराच्या स्थितीसाठी, त्याच्या रक्षणासाठी, भुकेची पीडा शांत करण्यासाठी आणि ब्रह्मचर्याला साहाय्य करण्यासाठी. अशा प्रकारे मी जुन्या वेदनेचा (भुकेचा) नाश करीन आणि नवीन वेदना (अतिभोजनाची पीडा) उत्पन्न होऊ देणार नाही; माझी जीवनयात्रा सुरळीत चालेल, मी निर्दोष राहीन आणि सुखाने विहार करीन.' आवुसो, अशा प्रकारे भिक्खू भोजनात प्रमाण जाणणारा होतो." ‘‘කථඤ්චාවුසො, ජාගරියං අනුයුත්තො හොති? ඉධාවුසො, භික්ඛු දිවසං චඞ්කමෙන නිසජ්ජාය ආවරණීයෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙති. රත්තියා පඨමං යාමං චඞ්කමෙන නිසජ්ජාය ආවරණීයෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙති. රත්තියා මජ්ඣිමං යාමං දක්ඛිණෙන පස්සෙන සීහසෙය්යං කප්පෙති පාදෙ පාදං අච්චාධාය සතො සම්පජානො, උට්ඨානසඤ්ඤං මනසි කරිත්වා. රත්තියා පච්ඡිමං යාමං පච්චුට්ඨාය චඞ්කමෙන නිසජ්ජාය ආවරණීයෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙති. එවං ඛො, ආවුසො, ජාගරියං [Pg.324] අනුයුත්තො හොති. තස්මාතිහාවුසො, එවං සික්ඛිතබ්බං – ‘ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරා භවිස්සාම, භොජනෙ මත්තඤ්ඤුනො, ජාගරියං අනුයුත්තා’ති. එවඤ්හි වො, ආවුසො, සික්ඛිතබ්බ’’න්ති. සත්තමං. "आणि आवुसो, भिक्खू जागृत राहण्यात तत्पर कसा होतो? आवुसो, या शासनात भिक्खू दिवसा चंक्रमण (चालणे) आणि बसून राहण्याद्वारे मनाला अडथळा आणणाऱ्या (आवरणीय) धर्मांपासून शुद्ध करतो. रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात चंक्रमण आणि बसून राहण्याद्वारे मनाला अडथळा आणणाऱ्या धर्मांपासून शुद्ध करतो. रात्रीच्या मध्यम प्रहरात उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, स्मृती आणि संप्रजन्य (जागरूकता) ठेवून, उठण्याची संज्ञा मनात ठेवून सिंहशय्या धारण करतो. रात्रीच्या अंतिम प्रहरात लवकर उठून चंक्रमण आणि बसून राहण्याद्वारे मनाला अडथळा आणणाऱ्या धर्मांपासून शुद्ध करतो. आवुसो, अशा प्रकारे भिक्खू जागृत राहण्यात तत्पर होतो. म्हणूनच आवुसो, तुम्ही असेच शिकले पाहिजे – 'आम्ही इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारे बनू, भोजनात प्रमाण जाणणारे बनू आणि जागृत राहण्यात तत्पर बनू.' आवुसो, तुम्ही असेच शिकले पाहिजे." (सातवे सुत्त समाप्त.) 8. රාහුලොවාදසුත්තං ८. राहुलोवाद सुत्त 121. එකං සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. අථ ඛො භගවතො රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘‘පරිපක්කා ඛො රාහුලස්ස විමුත්තිපරිපාචනියා ධම්මා; යංනූනාහං රාහුලං උත්තරිං ආසවානං ඛයෙ විනෙය්ය’’න්ති. අථ ඛො භගවා පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සාවත්ථියං පිණ්ඩාය චරිත්වා පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තො ආයස්මන්තං රාහුලං ආමන්තෙසි – ‘‘ගණ්හාහි, රාහුල, නිසීදනං. යෙන අන්ධවනං තෙනුපසඞ්කමිස්සාම දිවාවිහාරායා’’ති. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො ආයස්මා රාහුලො භගවතො පටිස්සුත්වා නිසීදනං ආදාය භගවන්තං පිට්ඨිතො පිට්ඨිතො අනුබන්ධි. १२१. एकदा भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेव्हा एकांतात ध्यानस्थ बसलेल्या भगवंतांच्या मनात असा विचार आला – “राहुलचे विमुक्ती परिपक्व करणारे (विमुत्तिपारिपचनिया) धर्म आता परिपक्व झाले आहेत. मी राहुलला आसवांच्या क्षयासाठी (आसवांचा नाश करण्यासाठी) आणखी पुढे मार्गदर्शन केले तर किती बरे होईल!” त्यानंतर भगवान सकाळच्या वेळी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन श्रावस्तीमध्ये भिक्षेसाठी गेले. भिक्षाटनाहून परत आल्यावर, भोजनोत्तर त्यांनी आयुष्यमान राहुलला बोलावले आणि म्हणाले – “राहुल, आसन (निसीदन) घे. आपण दिवसाच्या विश्रांतीसाठी अंधवनाकडे जाऊया.” आयुष्यमान राहुलने “तसेच असो, भन्ते!” असे म्हणून भगवंतांच्या शब्दाचा स्वीकार केला आणि आसन घेऊन ते भगवंतांच्या मागेमागे चालू लागले. තෙන ඛො පන සමයෙන අනෙකානි දෙවතාසහස්සානි භගවන්තං අනුබන්ධානි හොන්ති – ‘‘අජ්ජ භගවා ආයස්මන්තං රාහුලං උත්තරිං ආසවානං ඛයෙ විනෙස්සතී’’ති. අථ ඛො භගවා අන්ධවනං අජ්ඣොගාහෙත්වා අඤ්ඤතරස්මිං රුක්ඛමූලෙ පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදි. ආයස්මාපි ඛො රාහුලො භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො ආයස්මන්තං රාහුලං භගවා එතදවොච – त्या वेळी हजारो देवपुत्र (देवता) भगवंतांच्या मागेमागे जात होते. ते विचार करत होते – “आज भगवान आयुष्यमान राहुलला आसवांच्या क्षयासाठी आणखी पुढे उपदेश करतील.” त्यानंतर भगवान अंधवनात प्रवेश करून एका वृक्षाच्या खाली तयार केलेल्या आसनावर बसले. आयुष्यमान राहुलनेही भगवंतांना अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान राहुलला भगवान असे म्हणाले – ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, රාහුල, චක්ඛු නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “राहुल, तुला काय वाटते? चक्षू (डोळा) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील (विपरिणामधम्म) आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा (अत्ता) आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ( ) “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘රූපා නිච්චා වා අනිච්චා වා’’ති? “रूपे नित्य आहेत की अनित्य?” ‘‘අනිච්චා, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहेत, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘චක්ඛුවිඤ්ඤාණං නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “चक्षु-विज्ञान नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘චක්ඛුසම්ඵස්සො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? “चक्षु-संस्पर्श नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදනාගතං, සඤ්ඤාගතං, සඞ්ඛාරගතං, විඤ්ඤාණගතං, තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी वेदना, संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञान उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි[Pg.325], එසො මෙ අත්තා’’’ති? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’…පෙ…. “नक्कीच नाही, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘ජිව්හා නිච්චා වා අනිච්චා වා’’ති? “जिव्हा (जीभ) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චා, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘ජිව්හාවිඤ්ඤාණං නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “जिव्हा-विज्ञान नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘ජිව්හාසම්ඵස්සො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? “जिव्हा-संस्पर्श नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදනාගතං, සඤ්ඤාගතං, සඞ්ඛාරගතං, විඤ්ඤාණගතං, තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी वेदना, संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञान उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’…පෙ…. “नक्कीच नाही, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘මනො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? “मन नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වාති? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘ධම්මා නිච්චා වා අනිච්චා වා’’ති? “धम्म (मानसिक विषय) नित्य आहेत की अनित्य?” ‘‘අනිච්චා, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहेत, भन्ते.”... (तसेच पुढे)... ‘‘මනොවිඤ්ඤාණං නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “मनोविज्ञान नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘මනොසම්ඵස්සො නිච්චො වා අනිච්චො වා’’ති? “मनोसंस्पर्श नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චො, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදනාගතං, සඤ්ඤාගතං, සඞ්ඛාරගතං, විඤ්ඤාණගතං, තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “आणि मनोसंस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदनारूप, संज्ञारूप, संस्काररूप किंवा विज्ञानरूप उत्पन्न होते, ते नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याला ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “असे नाही, भन्ते.” ‘‘එවං පස්සං, රාහුල, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදනාගතං සඤ්ඤාගතං සඞ්ඛාරගතං විඤ්ඤාණගතං තස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… ජිව්හායපි නිබ්බින්දති, රසෙසුපි නිබ්බින්දති, ජිව්හාවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, ජිව්හාසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති, යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදනාගතං සඤ්ඤාගතං සඞ්ඛාරගතං විඤ්ඤාණගතං තස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ…. “हे राहुल, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षूविषयी विरक्त होतो, रूपांविषयी विरक्त होतो, चक्षुविज्ञानाविषयी विरक्त होतो, चक्षुसंस्पर्शाविषयी विरक्त होतो; आणि चक्षुसंस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदनारूप, संज्ञारूप, संस्काररूप किंवा विज्ञानरूप उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो... जिभेविषयी विरक्त होतो, रसांविषयी विरक्त होतो, जिव्हाविज्ञानाविषयी विरक्त होतो, जिव्हासंस्पर्शाविषयी विरक्त होतो; आणि जिव्हासंस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदनारूप, संज्ञारूप, संस्काररूप किंवा विज्ञानरूप उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो...” ‘‘මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති, ධම්මෙසුපි නිබ්බින්දති, මනොවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, මනොසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදනාගතං සඤ්ඤාගතං සඞ්ඛාරගතං විඤ්ඤාණගතං තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. “मनाविषयी विरक्त होतो, धम्मांविषयी विरक्त होतो, मनोविज्ञानाविषयी विरक्त होतो, मनोसंस्पर्शाविषयी विरक्त होतो; आणि मनोसंस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदनारूप, संज्ञारूप, संस्काररूप किंवा विज्ञानरूप उत्पन्न होते, त्याविषयीही तो विरक्त होतो. विरक्त झाल्याने तो वैराग्य प्राप्त करतो; वैराग्यामुळे तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर ‘मी विमुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ हे तो जाणतो.” ඉදමවොච භගවා. අත්තමනො ආයස්මා රාහුලො භගවතො භාසිතං අභිනන්දි. ඉමස්මිඤ්ච පන වෙය්යාකරණස්මිං භඤ්ඤමානෙ ආයස්මතො රාහුලස්ස අනුපාදාය ආසවෙහි චිත්තං විමුච්චි. අනෙකානඤ්ච [Pg.326] දෙවතාසහස්සානං විරජං වීතමලං ධම්මචක්ඛුං උදපාදි – ‘‘යං කිඤ්චි සමුදයධම්මං, සබ්බං තං නිරොධධම්ම’’න්ති. අට්ඨමං. भगवान असे म्हणाले. आयुष्यमान राहुल यांनी भगवंतांच्या भाषणाचे आनंदाने स्वागत केले आणि त्याचे अभिनंदन केले. हे प्रवचन दिले जात असताना, आयुष्यमान राहुल यांचे चित्त उपादानरहित होऊन आसवांपासून विमुक्त झाले. तसेच, अनेक हजारो देवतांमध्ये विरज, विमल धम्मचक्षू उत्पन्न झाला की, ‘जे काही उत्पन्न होण्याच्या स्वभावाचे आहे, ते सर्व नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे आहे.’ आठवे सुत्त समाप्त. 9. සංයොජනියධම්මසුත්තං ९. संयोजनीयधम्मसुत्त 122. ‘‘සංයොජනියෙ ච, භික්ඛවෙ, ධම්මෙ දෙසෙස්සාමි සංයොජනඤ්ච. තං සුණාථ. කතමෙ ච, භික්ඛවෙ, සංයොජනියා ධම්මා, කතමඤ්ච සංයොජනං? සන්ති, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. ඉමෙ වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, සංයොජනියා ධම්මා. යො තත්ථ ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. ඉමෙ වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, සංයොජනියා ධම්මා. යො තත්ථ ඡන්දරාගො තං තත්ථ සංයොජන’’න්ති. නවමං. १२२. “भगवंतांनी सांगितले, ‘भिक्षूंनो, मी तुम्हाला संयोजनीय धम्म आणि संयोजन शिकवणार आहे. ते लक्षपूर्वक ऐका. भिक्षूंनो, संयोजनीय धम्म कोणते आहेत आणि संयोजन कोणते आहे? भिक्षूंनो, चक्षुविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. भिक्षूंनो, यांना संयोजनीय धम्म म्हणतात. तेथे जो छंदराग आहे, तेच तेथील संयोजन आहे... भिक्षूंनो, जिव्हाविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... भिक्षूंनो, मनोविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. भिक्षूंनो, यांना संयोजनीय धम्म म्हणतात. तेथे जो छंदराग आहे, तेच तेथील संयोजन आहे.’ नववे सुत्त समाप्त.” 10. උපාදානියධම්මසුත්තං १०. उपादानीयधम्मसुत्त 123. ‘‘උපාදානියෙ ච, භික්ඛවෙ, ධම්මෙ දෙසෙස්සාමි උපාදානඤ්ච. තං සුණාථ. කතමෙ ච, භික්ඛවෙ, උපාදානියා ධම්මා, කතමඤ්ච උපාදානං? සන්ති, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. ඉමෙ වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, උපාදානියා ධම්මා. යො තත්ථ ඡන්දරාගො, තං තත්ථ උපාදානං…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. ඉමෙ වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, උපාදානියා ධම්මා. යො තත්ථ ඡන්දරාගො තං තත්ථ උපාදාන’’න්ති. දසමං. १२३. “भगवंतांनी सांगितले, ‘भिक्षूंनो, मी तुम्हाला उपादानीय धम्म आणि उपादान शिकवणार आहे. ते लक्षपूर्वक ऐका. भिक्षूंनो, उपादानीय धम्म कोणते आहेत आणि उपादान कोणते आहे? भिक्षूंनो, चक्षुविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. भिक्षूंनो, यांना उपादानीय धम्म म्हणतात. तेथे जो छंदराग आहे, तेच तेथील उपादान आहे... भिक्षूंनो, जिव्हाविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... भिक्षूंनो, मनोविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. भिक्षूंनो, यांना उपादानीय धम्म म्हणतात. तेथे जो छंदराग आहे, तेच तेथील उपादान आहे.’ दहावे सुत्त समाप्त.” ලොකකාමගුණවග්ගො ද්වාදසමො. लोककामगुणवर्ग (बारावा वर्ग) समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) खालीलप्रमाणे आहे – මාරපාසෙන ද්වෙ වුත්තා, ලොකකාමගුණෙන ච; සක්කො පඤ්චසිඛො චෙව, සාරිපුත්තො ච රාහුලො; සංයොජනං උපාදානං, වග්ගො තෙන පවුච්චතීති. मारपास सुत्तासह दोन सुत्ते आणि लोककामगुण सुत्तासह दोन सुत्ते सांगितली आहेत; तसेच सक्क सुत्त, पंचसिख सुत्त, सारिपुत्त सुत्त, राहुल सुत्त, संयोजन सुत्त आणि उपादान सुत्त; यांमुळे याला वर्ग म्हटले जाते. 13. ගහපතිවග්ගො १३. गृहपती वर्ग 1. වෙසාලීසුත්තං १. वैशाली सुत्त 124. එකං [Pg.327] සමයං භගවා වෙසාලියං විහරති මහාවනෙ කූටාගාරසාලායං. අථ ඛො උග්ගො ගහපති වෙසාලිකො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො උග්ගො ගහපති වෙසාලිකො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කො නු ඛො, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති? කො පන, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති? १२४. एकदा भगवान वैशाली येथील महावनातील कुटागारशाळेत विहार करत होते. तेव्हा वैशालीचा उग्ग गृहपती भगवंतांकडे गेला; जवळ जाऊन त्याने भगवंतांना वंदन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या उग्ग गृहपतीने भगवंतांना विचारले – ‘भन्ते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाहीत? आणि भन्ते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करू शकतात?’ ‘‘සන්ති ඛො, ගහපති, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති තදුපාදානං. සඋපාදානො, ගහපති, භික්ඛු නො පරිනිබ්බායති…පෙ… සන්ති ඛො, ගහපති, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති ඛො, ගහපති, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති තදුපාදානං. සඋපාදානො, ගහපති, භික්ඛු නො පරිනිබ්බායති. අයං ඛො, ගහපති, හෙතු, අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති. “भगवंतांनी उत्तर दिले, ‘गृहपती, चक्षुविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात गुंतून राहतो, तर अशा प्रकारे आनंद घेणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि गुंतून राहणाऱ्या भिक्षूचे विज्ञान त्यावर आधारित होते आणि ते त्याचे उपादान बनते. गृहपती, उपादानयुक्त भिक्षू परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाही... गृहपती, जिव्हाविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... गृहपती, मनोविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यांच्यात गुंतून राहतो, तर अशा प्रकारे आनंद घेणाऱ्या, स्वागत करणाऱ्या आणि गुंतून राहणाऱ्या भिक्षूचे विज्ञान त्यावर आधारित होते आणि ते त्याचे उपादान बनते. गृहपती, उपादानयुक्त भिक्षू परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाही. गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करू शकत नाहीत.’” ‘‘සන්ති ච ඛො, ගහපති, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා, ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො න තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති, න තදුපාදානං. අනුපාදානො, ගහපති, භික්ඛු පරිනිබ්බායති…පෙ… සන්ති ඛො, ගහපති, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති ඛො, ගහපති, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති, තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො. න තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති, න තදුපාදානං. අනුපාදානො[Pg.328], ගහපති, භික්ඛු පරිනිබ්බායති. අයං ඛො, ගහපති, හෙතු අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති. පඨමං. गृहपती, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत, जे इष्ट, कांत (मनोहर), मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही (त्यात आनंद मानत नाही), त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर त्या भिक्खूचे, जो अभिनंदन करत नाही, स्वागत करत नाही आणि आसक्त होऊन राहत नाही, विज्ञान त्यावर आश्रित राहत नाही आणि त्याचे उपादान होत नाही. हे गृहपती, उपादानरहित झालेला भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो... (तसेच) गृहपती, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... (तसेच) गृहपती, मनाने जाणता येण्याजोगे धर्म आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाजोगे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर त्या भिक्खूचे, जो अभिनंदन करत नाही, स्वागत करत नाही आणि आसक्त होऊन राहत नाही, विज्ञान त्यावर आश्रित राहत नाही आणि त्याचे उपादान होत नाही. हे गृहपती, उपादानरहित झालेला भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो. हे गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात (दृष्टधर्मात) परिनिर्वाण प्राप्त करतात. पहिले. 2. වජ්ජීසුත්තං २. वज्जी सुत्त 125. එකං සමයං භගවා වජ්ජීසු විහරති හත්ථිගාමෙ. අථ ඛො උග්ගො ගහපති හත්ථිගාමකො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො උග්ගො ගහපති හත්ථිගාමකො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කො නු ඛො, භන්තෙ, හෙතු කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති? කො පන, භන්තෙ හෙතු කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති? (යථා පුරිමසුත්තන්තං, එවං විත්ථාරෙතබ්බං). අයං ඛො, ගහපති, හෙතු අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තීති. දුතියං. १२५. एकदा भगवान वज्जी देशातील हत्थिगाम येथे विहार करत होते. तेव्हा हत्थिगामचा रहिवासी उग्ग गृहपती जेथे भगवान होते तेथे गेला; आणि भगवंतांजवळ जाऊन एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला उग्ग गृहपती भगवंतांना म्हणाला – 'भंते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात (दृष्टधर्मात) परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत? आणि भंते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?' (मागील सुत्ताप्रमाणेच सविस्तर वर्णन करावे). 'गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात.' दुसरे. 3. නාළන්දසුත්තං ३. नाळंदा सुत्त 126. එකං සමයං භගවා නාළන්දායං විහරති පාවාරිකම්බවනෙ. අථ ඛො, උපාලි ගහපති, යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො, උපාලි ගහපති, භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කො නු ඛො, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති? කො පන, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති? (යථා පුරිමසුත්තන්තං, එවං විත්ථාරෙතබ්බං). අයං ඛො, ගහපති, හෙතු අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තීති. තතියං. १२६. एकदा भगवान नाळंदा येथील पावारिकाच्या आंबराईत (पावारिकम्बवनात) विहार करत होते. तेव्हा उपाली गृहपती जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि भगवंतांजवळ जाऊन एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला उपाली गृहपती भगवंतांना म्हणाला – 'भंते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात (दृष्टधर्मात) परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत? आणि भंते, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?' (मागील सुत्ताप्रमाणेच सविस्तर वर्णन करावे). 'गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात.' तिसरे. 4. භාරද්වාජසුත්තං ४. भारद्वाज सुत्त 127. එකං සමයං ආයස්මා පිණ්ඩොලභාරද්වාජො කොසම්බියං විහරති ඝොසිතාරාමෙ. අථ ඛො රාජා උදෙනො යෙනායස්මා පිණ්ඩොලභාරද්වාජො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා පිණ්ඩොලභාරද්වාජෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා උදෙනො ආයස්මන්තං පිණ්ඩොලභාරද්වාජං එතදවොච – ‘‘කො නු ඛො, භො භාරද්වාජ, හෙතු [Pg.329] කො පච්චයො යෙනිමෙ දහරා භික්ඛූ සුසූ කාළකෙසා භද්රෙන යොබ්බනෙන සමන්නාගතා පඨමෙන වයසා අනිකීළිතාවිනො කාමෙසු යාවජීවං පරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං චරන්ති, අද්ධානඤ්ච ආපාදෙන්තී’’ති? ‘‘වුත්තං ඛො එතං, මහාරාජ, තෙන භගවතා ජානතා පස්සතා අරහතා සම්මාසම්බුද්ධෙන – ‘එථ තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, මාතුමත්තීසු මාතුචිත්තං උපට්ඨපෙථ, භගිනිමත්තීසු භගිනිචිත්තං උපට්ඨපෙථ, ධීතුමත්තීසු ධීතුචිත්තං උපට්ඨපෙථා’ති. අයං ඛො, මහාරාජ, හෙතු, අයං පච්චයො යෙනිමෙ දහරා භික්ඛූ සුසූ කාළකෙසා භද්රෙන යොබ්බනෙන සමන්නාගතා පඨමෙන වයසා අනිකීළිතාවිනො කාමෙසු යාවජීවං පරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං චරන්ති, අද්ධානඤ්ච ආපාදෙන්තී’’ති. १२७. एकदा आयुष्यमान पिंडोल भारद्वाज कौशाम्बी येथील घोषितारामात विहार करत होते. तेव्हा राजा उदेन जेथे आयुष्यमान पिंडोल भारद्वाज होते तेथे गेला; आणि त्यांच्याजवळ जाऊन त्याने आयुष्यमान पिंडोल भारद्वाज यांच्याशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला राजा उदेन आयुष्यमान पिंडोल भारद्वाज यांना म्हणाला – 'हे भारद्वाज, असे कोणते कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे हे तरुण, कोवळे, काळे केस असलेले, सुंदर तारुण्याने युक्त, प्रथम वयातील भिक्खू, ज्यांनी कामभोगांचा कधी उपभोग घेतलेला नाही, ते आयुष्यभर परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे पालन करतात आणि ते दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात?' 'महाराज, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी असे म्हटले आहे – 'या, भिक्खूंनो! तुम्ही आपल्या आईच्या वयाच्या स्त्रियांच्या ठिकाणी मातृभाव (आईची भावना) ठेवा, बहिणीच्या वयाच्या स्त्रियांच्या ठिकाणी भगिनीभाव (बहिणीची भावना) ठेवा आणि मुलीच्या वयाच्या स्त्रियांच्या ठिकाणी पुत्रीभाव (मुलीची भावना) ठेवा.' महाराज, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे हे तरुण, कोवळे, काळे केस असलेले, सुंदर तारुण्याने युक्त, प्रथम वयातील भिक्खू, ज्यांनी कामभोगांचा कधी उपभोग घेतलेला नाही, ते आयुष्यभर परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे पालन करतात आणि ते दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात.' ‘‘ලොලං ඛො, භො භාරද්වාජ, චිත්තං. අප්පෙකදා මාතුමත්තීසුපි ලොභධම්මා උප්පජ්ජන්ති, භගිනිමත්තීසුපි ලොභධම්මා උප්පජ්ජන්ති, ධීතුමත්තීසුපි ලොභධම්මා උප්පජ්ජන්ති. අත්ථි නු ඛො, භො භාරද්වාජ, අඤ්ඤො ච හෙතු, අඤ්ඤො ච පච්චයො යෙනිමෙ දහරා භික්ඛූ සුසූ කාළකෙසා…පෙ… අද්ධානඤ්ච ආපාදෙන්තී’’ති? 'हे भारद्वाज, चित्त (मन) अत्यंत चंचल असते. कधीकधी आईच्या वयाच्या स्त्रियांच्या बाबतीतही लोभ उत्पन्न होतो, बहिणीच्या वयाच्या स्त्रियांच्या बाबतीतही लोभ उत्पन्न होतो आणि मुलीच्या वयाच्या स्त्रियांच्या बाबतीतही लोभ उत्पन्न होतो. हे भारद्वाज, असे दुसरे काही कारण किंवा दुसरा काही प्रत्यय आहे का, ज्यामुळे हे तरुण, कोवळे, काळे केस असलेले भिक्खू... ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात?' ‘‘වුත්තං ඛො එතං, මහාරාජ, තෙන භගවතා ජානතා පස්සතා අරහතා සම්මාසම්බුද්ධෙන – ‘එථ තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, ඉමමෙව කායං උද්ධං පාදතලා අධො කෙසමත්ථකා තචපරියන්තං පූරං නානප්පකාරස්ස අසුචිනො පච්චවෙක්ඛථ – අත්ථි ඉමස්මිං කායෙ කෙසා ලොමා නඛා දන්තා තචො මංසං න්හාරු අට්ඨි අට්ඨිමිඤ්ජං වක්කං හදයං යකනං කිලොමකං පිහකං පප්ඵාසං අන්තං අන්තගුණං උදරියං කරීසං පිත්තං සෙම්හං පුබ්බො ලොහිතං සෙදො මෙදො අස්සු වසා ඛෙළො සිඞ්ඝාණිකා ලසිකා මුත්ත’න්ති. අයම්පි ඛො, මහාරාජ, හෙතු, අයං පච්චයො යෙනිමෙ දහරා භික්ඛූ සුසූ කාළකෙසා…පෙ… අද්ධානඤ්ච ආපාදෙන්තී’’ති. ‘‘යෙ තෙ, භො භාරද්වාජ, භික්ඛූ භාවිතකායා භාවිතසීලා භාවිතචිත්තා භාවිතපඤ්ඤා, තෙසං තං සුකරං හොති. යෙ ච ඛො තෙ, භො භාරද්වාජ, භික්ඛූ අභාවිතකායා අභාවිතසීලා අභාවිතචිත්තා අභාවිතපඤ්ඤා, තෙසං තං දුක්කරං හොති. අප්පෙකදා, භො භාරද්වාජ, අසුභතො මනසි [Pg.330] කරිස්සාමීති සුභතොව ආගච්ඡති. අත්ථි නු ඛො, භො භාරද්වාජ, අඤ්ඤො ච ඛො හෙතු අඤ්ඤො ච පච්චයො යෙනිමෙ දහරා භික්ඛූ සුසූ කාළකෙසා…පෙ… අද්ධානඤ්ච ආපාදෙන්තී’’ති? 'महाराज, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी असे म्हटले आहे – 'या, भिक्खूंनो! तुम्ही पायाच्या तळव्यापासून वर आणि केसांच्या टोकापासून खाली, त्वचेने वेढलेल्या आणि विविध प्रकारच्या अशुद्धीने भरलेल्या या शरीराचेच असे निरीक्षण करा – या शरीरात केस (डोक्यावरील), रोम (अंगावरील केस), नखे, दात, त्वचा, मांस, शिरा, हाडे, अस्थिमज्जा, वृक्क, हृदय, यकृत, क्लोमक, प्लीहा, फुफ्फुस, मोठे आतडे, लहान आतडे, जठरातील अन्न, विष्ठा, पित्त, कफ, पू, रक्त, घाम, मेद, अश्रू, वसा, लाळ, शेंबूड, सांध्यांमधील वंगण आणि मूत्र आहे.' महाराज, हेसुद्धा ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे हे तरुण, कोवळे, काळे केस असलेले भिक्खू... ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात.' 'हे भारद्वाज, जे भिक्खू भावितकाय (शरीरावर नियंत्रण मिळवलेले), भावितशील (शील विकसित केलेले), भावितचित्त (चित्त विकसित केलेले) आणि भावितप्रज्ञ (प्रज्ञा विकसित केलेले) आहेत, त्यांच्यासाठी हे करणे सोपे असते. परंतु, हे भारद्वाज, जे भिक्खू अभावितकाय, अभावितशील, अभावितचित्त आणि अभावितप्रज्ञ आहेत, त्यांच्यासाठी हे करणे कठीण असते. कधीकधी, हे भारद्वाज, 'मी शरीराचा अशुद्ध (अशुभ) म्हणून विचार करेन' असे मनात आणले तरी ते शुभ (सुंदर) म्हणूनच समोर येते. हे भारद्वाज, असे दुसरे काही कारण किंवा दुसरा काही प्रत्यय आहे का, ज्यामुळे हे तरुण, कोवळे, काळे केस असलेले भिक्खू... ब्रह्मचर्य दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात?' ‘‘වුත්තං ඛො එතං, මහාරාජ, තෙන භගවතා ජානතා පස්සතා අරහතා සම්මාසම්බුද්ධෙන – ‘එථ තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරා විහරථ. චක්ඛුනා රූපං දිස්වා මා නිමිත්තග්ගාහිනො අහුවත්ථ, මානුබ්යඤ්ජනග්ගාහිනො. යත්වාධිකරණමෙනං චක්ඛුන්ද්රියං අසංවුතං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා අන්වාස්සවෙය්යුං, තස්ස සංවරාය පටිපජ්ජථ. රක්ඛථ චක්ඛුන්ද්රියං; චක්ඛුන්ද්රියෙ සංවරං ආපජ්ජථ. සොතෙන සද්දං සුත්වා…පෙ… ඝානෙන ගන්ධං ඝායිත්වා… ජිව්හාය රසං සායිත්වා… කායෙන ඵොට්ඨබ්බං ඵුසිත්වා… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය මා නිමිත්තග්ගාහිනො අහුවත්ථ, මානුබ්යඤ්ජනග්ගාහිනො. යත්වාධිකරණමෙනං මනින්ද්රියං අසංවුතං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා අන්වාස්සවෙය්යුං, තස්ස සංවරාය පටිපජ්ජථ. රක්ඛථ මනින්ද්රියං; මනින්ද්රියෙ සංවරං ආපජ්ජථා’ති. අයම්පි ඛො, මහාරාජ, හෙතු අයං පච්චයො යෙනිමෙ දහරා භික්ඛූ සුසූ කාළකෙසා භද්රෙන යොබ්බනෙන සමන්නාගතා පඨමෙන වයසා අනිකීළිතාවිනො කාමෙසු යාවජීවං පරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං චරන්ති, අද්ධානඤ්ච ආපාදෙන්තී’’ති. “महाराज, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी हेच सांगितले आहे – ‘या, भिक्खूंनो, तुम्ही इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवून (संयम राखून) विहार करा. डोळ्यांनी रूप पाहून (स्त्री-पुरुष इत्यादींचे) बाह्य रूप (निमित्त) ग्रहण करू नका, तसेच त्यांचे अवयव किंवा हावभाव (अनुव्यंजन) ग्रहण करू नका. कारण, जर चक्षुरिंद्रिय असंयत ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (खिन्नता/द्वेष) हे पापी अकुशल धर्म तुमच्यावर स्वार होतील. म्हणून त्याच्या संवरासाठी (संयमासाठी) प्रयत्न करा. चक्षुरिंद्रियाचे रक्षण करा, चक्षुरिंद्रियाचा संवर प्राप्त करा. कानांनी शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धर्माचे (विचारांचे) ज्ञान करून घेऊन बाह्य रूप (निमित्त) ग्रहण करू नका, तसेच त्यांचे अवयव किंवा हावभाव (अनुव्यंजन) ग्रहण करू नका. कारण, जर मनेंद्रिय असंयत ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धर्म तुमच्यावर स्वार होतील. म्हणून त्याच्या संवरासाठी प्रयत्न करा. मनेंद्रियाचे रक्षण करा, मनेंद्रियाचा संवर प्राप्त करा.’ महाराज, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे हे तरुण, नवोदित, काळेभोर केस असलेले, सुंदर तारुण्याने युक्त, प्रथम वयातील आणि कामभोगांमध्ये कधीही न रमलेले भिक्खू आयुष्यभर परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे आचरण करतात आणि दीर्घकाळपर्यंत ते टिकवून ठेवतात.” ‘‘අච්ඡරියං, භො භාරද්වාජ; අබ්භුතං, භො භාරද්වාජ! යාව සුභාසිතං චිදං, භො භාරද්වාජ, තෙන භගවතා ජානතා පස්සතා අරහතා සම්මාසම්බුද්ධෙන. එසොව ඛො, භො භාරද්වාජ, හෙතු, එස පච්චයො යෙනිමෙ දහරා භික්ඛූ සුසූ කාළකෙසා භද්රෙන යොබ්බනෙන සමන්නාගතා පඨමෙන වයසා අනිකීළිතාවිනො කාමෙසු යාවජීවං පරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං චරන්ති, අද්ධානඤ්ච ආපාදෙන්තීති. අහම්පි ඛො, භො භාරද්වාජ, යස්මිං සමයෙ අරක්ඛිතෙනෙව කායෙන, අරක්ඛිතාය වාචාය, අරක්ඛිතෙන චිත්තෙන, අනුපට්ඨිතාය සතියා, අසංවුතෙහි ඉන්ද්රියෙහි අන්තෙපුරං පවිසාමි, අතිවිය මං තස්මිං සමයෙ ලොභධම්මා පරිසහන්ති. යස්මිඤ්ච ඛ්වාහං, භො භාරද්වාජ, සමයෙ රක්ඛිතෙනෙව කායෙන, රක්ඛිතාය වාචාය, රක්ඛිතෙන චිත්තෙන, උපට්ඨිතාය සතියා, සංවුතෙහි ඉන්ද්රියෙහි අන්තෙපුරං පවිසාමි, න මං තථා [Pg.331] තස්මිං සමයෙ ලොභධම්මා පරිසහන්ති. අභික්කන්තං, භො භාරද්වාජ; අභික්කන්තං, භො භාරද්වාජ! සෙය්යථාපි, භො භාරද්වාජ, නික්කුජ්ජිතං වා උක්කුජ්ජෙය්ය, පටිච්ඡන්නං වා විවරෙය්ය, මූළ්හස්ස වා මග්ගං ආචික්ඛෙය්ය, අන්ධකාරෙ වා තෙලපජ්ජොතං ධාරෙය්ය, චක්ඛුමන්තො රූපානි දක්ඛන්තීති; එවමෙවං භොතා භාරද්වාජෙන අනෙකපරියායෙන ධම්මො පකාසිතො. එසාහං, භො භාරද්වාජ, තං භගවන්තං සරණං ගච්ඡාමි, ධම්මඤ්ච, භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. උපාසකං මං භවං භාරද්වාජො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. චතුත්ථං. “आश्चर्यकारक आहे, हे भारद्वाज! अद्भुत आहे, हे भारद्वाज! हे भारद्वाज, जाणणाऱ्या, पाहणाऱ्या, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध अशा त्या भगवंतांनी हे वचन किती सुभाषित (उत्कृष्टपणे) सांगितले आहे! हे भारद्वाज, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे हे तरुण, नवोदित, काळेभोर केस असलेले, सुंदर तारुण्याने युक्त, प्रथम वयातील आणि कामभोगांमध्ये कधीही न रमलेले भिक्खू आयुष्यभर परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध ब्रह्मचर्याचे आचरण करतात आणि दीर्घकाळपर्यंत ते टिकवून ठेवतात. हे भारद्वाज, मी स्वतः सुद्धा जेव्हा अरक्षित शरीराने, अरक्षित वाणीने, अरक्षित चित्ताने, स्मृती जागृत न ठेवता, असंयत इंद्रियांनी अंतःपुरात (राजवाड्यात) प्रवेश करतो, तेव्हा मला त्या वेळी लोभ उत्पन्न करणारे विचार (लोभधर्म) अत्यंत पीडित करतात. परंतु हे भारद्वाज, जेव्हा मी रक्षित शरीराने, रक्षित वाणीने, रक्षित चित्ताने, स्मृती जागृत ठेवून, संयत इंद्रियांनी अंतःपुरात प्रवेश करतो, तेव्हा मला त्या वेळी लोभ उत्पन्न करणारे विचार तशा प्रकारे पीडित करत नाहीत. अतिशय सुंदर, हे भारद्वाज! अतिशय सुंदर, हे भारद्वाज! जसे, हे भारद्वाज, कोणी पालथे घातलेले उताणे करावे, झाकलेले उघडे करावे, वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी किंवा अंधारात तेलाचा दिवा लावावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसावीत; त्याचप्रमाणे आदरणीय भारद्वाजांनी अनेक प्रकारे धम्म प्रकाशित केला आहे. मी, हे भारद्वाज, त्या भगवंतांना शरण जातो, धम्माला शरण जातो आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. आदरणीय भारद्वाजांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.” (चौथे सूत्र समाप्त.) 5. සොණසුත්තං ५. सोण सुत्त 128. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අථ ඛො සොණො ගහපතිපුත්තො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො සොණො ගහපතිපුත්තො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කො නු ඛො, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති? කො පන, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති? (යථා පුරිමසුත්තන්තං, එවං විත්ථාරෙතබ්බං). අයං ඛො, සොණ, හෙතු, අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තීති. පඤ්චමං. १२८. एका वेळी भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवाप (खारुतांना अन्न देण्याची जागा) येथे विहार करत होते. तेव्हा सोण गृहपतीपुत्र जेथे भगवान होते तेथे गेला. तेथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला सोण गृहपतीपुत्र भगवंतांना म्हणाला – “भंते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात (दृष्टधर्मात) परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत? आणि भंते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?” (मागील सूत्राप्रमाणेच याचा विस्तार करावा.) “सोण, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात.” (पाचवे सूत्र समाप्त.) 6. ඝොසිතසුත්තං ६. घोषित सुत्त 129. එකං සමයං ආයස්මා ආනන්දො කොසම්බියං විහරති ඝොසිතාරාමෙ. අථ ඛො ඝොසිතො ගහපති යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ඝොසිතො ගහපති ආයස්මන්තං ආනන්දං එතදවොච – ‘‘‘ධාතුනානත්තං, ධාතුනානත්ත’න්ති, භන්තෙ ආනන්ද, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, ධාතුනානත්තං වුත්තං භගවතා’’ති? ‘‘සංවිජ්ජති ඛො, ගහපති, චක්ඛුධාතු, රූපා ච මනාපා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණඤ්ච සුඛවෙදනියං. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛා වෙදනා. සංවිජ්ජති ඛො, ගහපති, චක්ඛුධාතු, රූපා ච අමනාපා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණඤ්ච දුක්ඛවෙදනියං. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති දුක්ඛා වෙදනා. සංවිජ්ජති ඛො, ගහපති, චක්ඛුධාතු, රූපා ච මනාපා උපෙක්ඛාවෙදනියා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණඤ්ච අදුක්ඛමසුඛවෙදනියං. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති අදුක්ඛමසුඛා [Pg.332] වෙදනා…පෙ… සංවිජ්ජති ඛො, ගහපති, ජිව්හාධාතු, රසා ච මනාපා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණඤ්ච සුඛවෙදනියං. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛා වෙදනා. සංවිජ්ජති ඛො, ගහපති, ජිව්හාධාතු, රසා ච අමනාපා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණඤ්ච දුක්ඛවෙදනියං. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති දුක්ඛා වෙදනා. සංවිජ්ජති ඛො, ගහපති, ජිව්හාධාතු, රසා ච උපෙක්ඛාවෙදනියා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණඤ්ච අදුක්ඛමසුඛවෙදනියං. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා…පෙ… සංවිජ්ජති ඛො, ගහපති, මනොධාතු, ධම්මා ච මනාපා, මනොවිඤ්ඤාණඤ්ච සුඛවෙදනියං. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛා වෙදනා. සංවිජ්ජති ඛො, ගහපති, මනොධාතු, ධම්මා ච අමනාපා, මනොවිඤ්ඤාණඤ්ච දුක්ඛවෙදනියං. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති දුක්ඛා වෙදනා. සංවිජ්ජති ඛො, ගහපති, මනොධාතු, ධම්මා ච උපෙක්ඛාවෙදනියා, මනොවිඤ්ඤාණඤ්ච අදුක්ඛමසුඛවෙදනියං. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. එත්තාවතා ඛො, ගහපති, ධාතුනානත්තං වුත්තං භගවතා’’ති. ඡට්ඨං. १२९. एकदा आयुष्यमान आनंद कोसंबी येथे घोसितारामात विहार करत होते. तेव्हा घोसित गृहपती जेथे आयुष्यमान आनंद होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या घोसित गृहपतीने आयुष्यमान आनंदांना असे म्हटले – 'भन्ते आनंद, 'धातूंची विविधता, धातूंची विविधता' असे म्हटले जाते. भन्ते, भगवंतांनी कोणत्या मर्यादेपर्यंत धातूंची विविधता सांगितली आहे?' 'गृहपती, चक्षु-धातू अस्तित्वात आहे, मनपसंत रूपे अस्तित्वात आहेत आणि चक्षु-विज्ञान अस्तित्वात आहे. सुखकारक स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, चक्षु-धातू अस्तित्वात आहे, नापसंत रूपे अस्तित्वात आहेत आणि चक्षु-विज्ञान अस्तित्वात आहे. दुःखकारक स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, चक्षु-धातू अस्तित्वात आहे, उपेक्षा-वेदनेस कारणीभूत असणारी रूपे अस्तित्वात आहेत आणि चक्षु-विज्ञान अस्तित्वात आहे. अदुःख-असुखकारक स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. ...तसेच गृहपती, जिव्हा-धातू अस्तित्वात आहे, मनपसंत रस अस्तित्वात आहेत आणि जिव्हा-विज्ञान अस्तित्वात आहे. सुखकारक स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, जिव्हा-धातू अस्तित्वात आहे, नापसंत रस अस्तित्वात आहेत आणि जिव्हा-विज्ञान अस्तित्वात आहे. दुःखकारक स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, जिव्हा-धातू अस्तित्वात आहे, उपेक्षा-वेदनेस कारणीभूत असणारे रस अस्तित्वात आहेत आणि जिव्हा-विज्ञान अस्तित्वात आहे. अदुःख-असुखकारक स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. ...तसेच गृहपती, मनो-धातू अस्तित्वात आहे, मनपसंत धम्म अस्तित्वात आहेत आणि मनो-विज्ञान अस्तित्वात आहे. सुखकारक स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, मनो-धातू अस्तित्वात आहे, नापसंत धम्म अस्तित्वात आहेत आणि मनो-विज्ञान अस्तित्वात आहे. दुःखकारक स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, मनो-धातू अस्तित्वात आहे, उपेक्षा-वेदनेस कारणीभूत असणारे धम्म अस्तित्वात आहेत आणि मनो-विज्ञान अस्तित्वात आहे. अदुःख-असुखकारक स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. गृहपती, एवढ्या मर्यादेपर्यंत भगवंतांनी धातूंची विविधता सांगितली आहे.' सहावे सूत्र. 7. හාලිද්දිකානිසුත්තං ७. हालिद्दिकानि सुत्त 130. එකං සමයං ආයස්මා මහාකච්චානො අවන්තීසු විහරති කුරරඝරෙ පපාතෙ පබ්බතෙ. අථ ඛො හාලිද්දිකානි ගහපති යෙනායස්මා මහාකච්චානො තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො හාලිද්දිකානි ගහපති ආයස්මන්තං මහාකච්චානං එතදවොච – ‘‘වුත්තමිදං, භන්තෙ, භගවතා – ‘ධාතුනානත්තං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඵස්සනානත්තං; ඵස්සනානත්තං පටිච්ච උප්පජ්ජති වෙදනානානත්ත’න්ති. කථං නු ඛො, භන්තෙ, ධාතුනානත්තං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඵස්සනානත්තං; ඵස්සනානත්තං පටිච්ච උප්පජ්ජති වෙදනානානත්ත’’න්ති? ‘‘ඉධ, ගහපති, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා ‘මනාපං ඉත්ථෙත’න්ති පජානාති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං සුඛවෙදනියඤ්ච. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛා වෙදනා. චක්ඛුනා ඛො පනෙව රූපං දිස්වා ‘අමනාපං ඉත්ථෙත’න්ති පජානාති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං දුක්ඛවෙදනියඤ්ච. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති දුක්ඛා වෙදනා. චක්ඛුනා ඛො පනෙව රූපං දිස්වා ‘උපෙක්ඛාට්ඨානියං [Pg.333] ඉත්ථෙත’න්ති පජානාති චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අදුක්ඛමසුඛවෙදනියඤ්ච. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. १३०. एकदा आयुष्यमान महाकच्चान अवंती देशात कुररघर येथील पपात पर्वतावर विहार करत होते. तेव्हा हालिद्दिकानि गृहपती जेथे आयुष्यमान महाकच्चान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या हालिद्दिकानि गृहपतीने आयुष्यमान महाकच्चानांना असे म्हटले – 'भन्ते, भगवंतांनी असे म्हटले आहे – धातूंच्या विविधतेवर अवलंबून स्पर्शाची विविधता उत्पन्न होते; स्पर्शाच्या विविधतेवर अवलंबून वेदनेची विविधता उत्पन्न होते. भन्ते, धातूंच्या विविधतेवर अवलंबून स्पर्शाची विविधता कशी उत्पन्न होते आणि स्पर्शाच्या विविधतेवर अवलंबून वेदनेची विविधता कशी उत्पन्न होते?' 'गृहपती, येथे भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून, 'हे मनपसंत आहे' असे जाणतो. चक्षु-विज्ञान आणि सुखकारक स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. डोळ्याने रूप पाहून, 'हे नापसंत आहे' असे जाणतो. चक्षु-विज्ञान आणि दुःखकारक स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. डोळ्याने रूप पाहून, 'हे उपेक्षेचे स्थान आहे' असे जाणतो. चक्षु-विज्ञान आणि अदुःख-असुखकारक स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. ‘‘පුන චපරං, ගහපති, භික්ඛු සොතෙන සද්දං සුත්වා…පෙ… ඝානෙන ගන්ධං ඝායිත්වා…පෙ… ජිව්හාය රසං සායිත්වා…පෙ… කායෙන ඵොට්ඨබ්බං ඵුසිත්වා…පෙ… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය ‘මනාපං ඉත්ථෙත’න්ති පජානාති මනොවිඤ්ඤාණං සුඛවෙදනියඤ්ච. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛා වෙදනා. මනසා ඛො පනෙව ධම්මං විඤ්ඤාය ‘අමනාපං ඉත්ථෙත’න්ති පජානාති මනොවිඤ්ඤාණං දුක්ඛවෙදනියඤ්ච. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති දුක්ඛා වෙදනා. මනසා ඛො පනෙව ධම්මං විඤ්ඤාය ‘උපෙක්ඛාට්ඨානියං ඉත්ථෙත’න්ති පජානාති මනොවිඤ්ඤාණං අදුක්ඛමසුඛවෙදනියඤ්ච. ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. එවං ඛො, ගහපති, ධාතුනානත්තං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඵස්සනානත්තං; ඵස්සනානත්තං පටිච්ච උප්පජ්ජති වෙදනානානත්ත’’න්ති. සත්තමං. 'पुन्हा, गृहपती, भिक्खू कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श स्पर्शून... मनाने धम्म जाणून, 'हे मनपसंत आहे' असे जाणतो. मनो-विज्ञान आणि सुखकारक स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. मनाने धम्म जाणून, 'हे नापसंत आहे' असे जाणतो. मनो-विज्ञान आणि दुःखकारक स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. मनाने धम्म जाणून, 'हे उपेक्षेचे स्थान आहे' असे जाणतो. मनो-विज्ञान आणि अदुःख-असुखकारक स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. अशा प्रकारे, गृहपती, धातूंच्या विविधतेवर अवलंबून स्पर्शाची विविधता उत्पन्न होते; आणि स्पर्शाच्या विविधतेवर अवलंबून वेदनेची विविधता उत्पन्न होते.' सातवे सूत्र. 8. නකුලපිතුසුත්තං ८. नकुलपितु सुत्त 131. එකං සමයං භගවා භග්ගෙසු විහරති සුසුමාරගිරෙ භෙසකළාවනෙ මිගදායෙ. අථ ඛො නකුලපිතා ගහපති යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො නකුලපිතා ගහපති භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කො නු ඛො, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති? කො පන, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති? ‘‘සන්ති ඛො, ගහපති, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති තදුපාදානං. සඋපාදානො, ගහපති, භික්ඛු නො පරිනිබ්බායති…පෙ… සන්ති ඛො, ගහපති, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති ඛො, ගහපති, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අභිනන්දතො අභිවදතො අජ්ඣොසාය තිට්ඨතො තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති තදුපාදානං. සඋපාදානො, ගහපති, භික්ඛු නො පරිනිබ්බායති[Pg.334]. අයං ඛො, ගහපති, හෙතු අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ නො පරිනිබ්බායන්ති’’. १३१. एकदा भगवान भग्ग देशात सुसुमारगिरि येथील भेसकळावनातील मृगदायात विहार करत होते. तेव्हा नकुलपिता गृहपती जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या नकुलपिता गृहपतीने भगवंतांना असे म्हटले – 'भन्ते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत? आणि भन्ते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करतात?' 'गृहपती, चक्षु-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगी अशी रूपे आहेत जी इष्ट, कांत, मनपसंत, प्रिय वाटणारी, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारी आहेत. जर भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे कौतुक करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्यांचे अभिनंदन करणाऱ्या, कौतुक करणाऱ्या आणि त्यात गुंतून राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होते आणि त्याचे उपादान बनते. उपादानयुक्त भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करत नाही. ...तसेच गृहपती, जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... ...तसेच गृहपती, मनो-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनपसंत, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे कौतुक करतो आणि त्यात गुंतून राहतो, तर त्यांचे अभिनंदन करणाऱ्या, कौतुक करणाऱ्या आणि त्यात गुंतून राहणाऱ्या भिक्खूचे विज्ञान त्यावर आश्रित होते आणि त्याचे उपादान बनते. उपादानयुक्त भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करत नाही. गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात परिनिर्वाण प्राप्त करत नाहीत.' ‘‘සන්ති ච ඛො, ගහපති, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛුනාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං අනභිනන්දතො අනභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො න තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති, න තදුපාදානං. අනුපාදානො, ගහපති, භික්ඛු පරිනිබ්බායති…පෙ… සන්ති ඛො, ගහපති, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති ඛො, ගහපති, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති. තස්ස තං නාභිනන්දතො නාභිවදතො අනජ්ඣොසාය තිට්ඨතො න තන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං හොති න තදුපාදානං. අනුපාදානො, ගහපති, භික්ඛු පරිනිබ්බායති. අයං ඛො, ගහපති, හෙතු, අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චෙ සත්තා දිට්ඨෙව ධම්මෙ පරිනිබ්බායන්තී’’ති. අට්ඨමං. “गृहपती, चक्षुविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत (प्रिय), मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात गुंतून राहत नाही, तर त्या रूपांचे अभिनंदन न करणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि त्यात न गुंतणाऱ्या भिक्खूचे त्या रूपांवर आश्रित असणारे विज्ञान निर्माण होत नाही आणि उपादानही (आसक्ती) होत नाही. हे गृहपती, उपादानरहित (आसक्तीरहित) भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो... तसेच... गृहपती, जिव्हाविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... तसेच... गृहपती, मनोविज्ञानाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म (विचार/विषय) आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामयुक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्खू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यांच्यात गुंतून राहत नाही, तर त्या धम्मांचे अभिनंदन न करणाऱ्या, स्वागत न करणाऱ्या आणि त्यात न गुंतणाऱ्या भिक्खूचे त्या धम्मांवर आश्रित असणारे विज्ञान निर्माण होत नाही आणि उपादानही होत नाही. हे गृहपती, उपादानरहित भिक्खू परिनिर्वाण प्राप्त करतो. हे गृहपती, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे या जगात काही प्राणी याच जन्मात (दृष्टधर्मात) परिनिर्वाण प्राप्त करतात.” आठवे सूत्र. 9. ලොහිච්චසුත්තං ९. लोहिच्च सुत्त 132. එකං සමයං ආයස්මා මහාකච්චානො අවන්තීසු විහරති මක්කරකතෙ අරඤ්ඤකුටිකායං. අථ ඛො ලොහිච්චස්ස බ්රාහ්මණස්ස සම්බහුලා අන්තෙවාසිකා කට්ඨහාරකා මාණවකා යෙනායස්මතො මහාකච්චානස්ස අරඤ්ඤකුටිකා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා පරිතො පරිතො කුටිකාය අනුචඞ්කමන්ති අනුවිචරන්ති උච්චාසද්දා මහාසද්දා කානිචි කානිචි සෙලෙය්යකානි කරොන්ති – ‘‘ඉමෙ පන මුණ්ඩකා සමණකා ඉබ්භා කණ්හා බන්ධුපාදාපච්චා, ඉමෙසං භරතකානං සක්කතා ගරුකතා මානිතා පූජිතා අපචිතා’’ති. අථ ඛො ආයස්මා මහාකච්චානො විහාරා නික්ඛමිත්වා තෙ මාණවකෙ එතදවොච – ‘‘මා මාණවකා සද්දමකත්ථ; ධම්මං වො භාසිස්සාමී’’ති. එවං වුත්තෙ, තෙ මාණවකා තුණ්හී අහෙසුං. අථ ඛො ආයස්මා මහාකච්චානො තෙ මාණවකෙ ගාථාහි අජ්ඣභාසි – १३२. एकदा आयुष्यमान महाकच्चान अवंती देशातील मक्करकट येथील एका अरण्यकुटीत (वनातील कुटीत) विहार करत होते. तेव्हा लोहिच्च ब्राह्मणाचे अनेक लाकडे गोळा करणारे तरुण शिष्य (माणवक) आयुष्यमान महाकच्चान यांच्या अरण्यकुटीजवळ आले. तिथे आल्यावर ते कुटीच्या सभोवताली ये-जा करू लागले, फिरू लागले आणि मोठ्या आवाजात गोंगाट करत एकमेकांच्या पाठीवर उड्या मारण्याचे खेळ खेळू लागले. ते म्हणाले, “हे मुंडक (बोडके), हीन श्रमण, शूद्र, काळे आणि ब्रह्मदेवाच्या पायापासून उत्पन्न झालेले आहेत. या हीन श्रमणांचा (लोकांकडून) सत्कार, आदर, सन्मान, पूजा आणि गौरव केला जातो.” तेव्हा आयुष्यमान महाकच्चान कुटीतून बाहेर आले आणि त्या तरुणांना म्हणाले, “तरुणांनो, गोंगाट करू नका; मी तुम्हाला धम्म शिकवतो.” असे म्हटल्यावर ते तरुण शांत झाले. त्यानंतर आयुष्यमान महाकच्चान यांनी त्या तरुणांना गाथांद्वारे संबोधित केले— ‘‘සීලුත්තමා පුබ්බතරා අහෙසුං,තෙ බ්රාහ්මණා යෙ පුරාණං සරන්ති; ගුත්තානි ද්වාරානි සුරක්ඛිතානි,අහෙසුං තෙසං අභිභුය්ය කොධං. “जे प्राचीन ब्राह्मणांच्या आचरणाचे स्मरण करतात, ते प्राचीन काळातील ब्राह्मण शीलालाच सर्वश्रेष्ठ मानत असत. त्यांनी आपल्या क्रोधावर विजय मिळवून आपल्या इंद्रिय-द्वारांचे उत्तम प्रकारे रक्षण केले होते. ‘‘ධම්මෙ [Pg.335] ච ඣානෙ ච රතා අහෙසුං,තෙ බ්රාහ්මණා යෙ පුරාණං සරන්ති; ඉමෙ ච වොක්කම්ම ජපාමසෙති,ගොත්තෙන මත්තා විසමං චරන්ති. ते प्राचीन ब्राह्मणांच्या आचरणाचे स्मरण करणारे ब्राह्मण धम्मामध्ये आणि ध्यानामध्ये रममाण असत. परंतु आजचे हे तरुण मात्र त्या गुणांपासून दूर जाऊन, ‘आम्ही वेदांचे पठण करतो’ असे म्हणत आपल्या गोत्राच्या (कुळाच्या) अभिमानाने उन्मत्त होऊन अधर्माने वागतात. ‘‘කොධාභිභූතා පුථුඅත්තදණ්ඩා,විරජ්ජමානා සතණ්හාතණ්හෙසු; අගුත්තද්වාරස්ස භවන්ති මොඝා,සුපිනෙව ලද්ධං පුරිසස්ස විත්තං. क्रोधाने ग्रासलेले, हातात विविध प्रकारचे दंड (काठ्या) घेतलेले, आणि तृष्णा असलेल्या व नसलेल्या लोकांवर अन्याय करणारे हे noble लोक आहेत. ज्याची इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नाहीत, त्याचे सर्व व्रत-नियम तसेच व्यर्थ ठरतात, जसे एखाद्या माणसाला स्वप्नात मिळालेले धन जागे झाल्यावर व्यर्थ ठरते. ‘‘අනාසකා ථණ්ඩිලසායිකා ච; පාතො සිනානඤ්ච තයො ච වෙදා. उपवास करणे, उघड्या जमिनीवर झोपणे, पहाटेच स्नान करणे आणि तीन वेदांचे अध्ययन करणे; ‘‘ඛරාජිනං ජටාපඞ්කො, මන්තා සීලබ්බතං තපො; කුහනා වඞ්කදණ්ඩා ච, උදකාචමනානි ච. खरखरीत काळवीटाचे चामडे पांघरणे, जटा वाढवणे, शरीरावर मळ साचू देणे, मंत्रपठण करणे, व्रत-नियम व तप आचरणे, ढोंगीपणा करणे, वाकडी काठी बाळगणे आणि पाण्याने आचमन करणे (तोंड धुणे); ‘‘වණ්ණා එතෙ බ්රාහ්මණානං, කතා කිඤ්චික්ඛභාවනා; චිත්තඤ්ච සුසමාහිතං, විප්පසන්නමනාවිලං; අඛිලං සබ්බභූතෙසු, සො මග්ගො බ්රහ්මපත්තියා’’ති. ब्राह्मणांची ही बाह्य लक्षणे केवळ ऐहिक लाभ मिळवण्यासाठीच केली जातात. परंतु (प्राचीन ब्राह्मणांचे) चित्त सुसमाहित (एकाग्र), अत्यंत प्रसन्न आणि निर्मळ होते. सर्व प्राणिमात्रांबद्दल त्यांच्या मनात कोणताही द्वेष (कठोरता) नव्हता; हाच ब्रह्मलोकाची प्राप्ती करण्याचा खरा मार्ग आहे.” අථ ඛො තෙ මාණවකා කුපිතා අනත්තමනා යෙන ලොහිච්චො බ්රාහ්මණො තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා ලොහිච්චං බ්රාහ්මණං එතදවොචුං – ‘‘යග්ඝෙ! භවං ජානෙය්ය, සමණො මහාකච්චානො බ්රාහ්මණානං මන්තෙ එකංසෙන අපවදති, පටික්කොසතී’’ති? එවං වුත්තෙ, ලොහිච්චො බ්රාහ්මණො කුපිතො අහොසි අනත්තමනො. අථ ඛො ලොහිච්චස්ස බ්රාහ්මණස්ස එතදහොසි – ‘‘න ඛො පන මෙතං පතිරූපං යොහං අඤ්ඤදත්ථු මාණවකානංයෙව සුත්වා සමණං මහාකච්චානං අක්කොසෙය්යං පරිභාසෙය්යං. යංනූනාහං උපසඞ්කමිත්වා පුච්ඡෙය්ය’’න්ති. तेव्हा ते तरुण क्रोधीत व अप्रसन्न होऊन लोहिच्च ब्राह्मणाकडे गेले. तिथे जाऊन त्यांनी लोहिच्च ब्राह्मणाला म्हटले, “महाराज, आपल्याला माहीत असावे की, श्रमण महाकच्चान ब्राह्मणांच्या मंत्रांची (वेदांची) पूर्णपणे निंदा करतात आणि त्यांचा निषेध करतात.” असे म्हटल्यावर लोहिच्च ब्राह्मण क्रोधीत व अप्रसन्न झाला. परंतु लोहिच्च ब्राह्मणाच्या मनात असा विचार आला, “केवळ या तरुणांचे ऐकून मी श्रमण महाकच्चान यांना शिवीगाळ करणे किंवा त्यांच्याशी विरोध करणे मला योग्य वाटत नाही. मी स्वतः त्यांच्याकडे जाऊन विचारले तर बरे होईल.” අථ ඛො ලොහිච්චො බ්රාහ්මණො තෙහි මාණවකෙහි සද්ධිං යෙනායස්මා මහාකච්චානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා මහාකච්චානෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ලොහිච්චො බ්රාහ්මණො [Pg.336] ආයස්මන්තං මහාකච්චානං එතදවොච – ‘‘ආගමංසු නු ඛ්විධ, භො කච්චාන, අම්හාකං සම්බහුලා අන්තෙවාසිකා කට්ඨහාරකා මාණවකා’’ති? ‘‘ආගමංසු ඛ්විධ තෙ, බ්රාහ්මණ, සම්බහුලා අන්තෙවාසිකා කට්ඨහාරකා මාණවකා’’ති. ‘‘අහු පන භොතො කච්චානස්ස තෙහි මාණවකෙහි සද්ධිං කොචිදෙව කථාසල්ලාපො’’ති? ‘‘අහු ඛො මෙ, බ්රාහ්මණ, තෙහි මාණවකෙහි සද්ධිං කොචිදෙව කථාසල්ලාපො’’ති. ‘‘යථා කථං පන භොතො කච්චානස්ස තෙහි මාණවකෙහි සද්ධිං අහොසි කථාසල්ලාපො’’ති? ‘‘එවං ඛො මෙ, බ්රාහ්මණ, තෙහි මාණවකෙහි සද්ධිං අහොසි කථාසල්ලාපො – त्यानंतर लोहिच्च ब्राह्मण त्या तरुणांसह आयुष्यमान महाकच्चान यांच्याकडे गेला. तिथे गेल्यावर त्याने आयुष्यमान महाकच्चान यांच्याशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या लोहिच्च ब्राह्मणाने आयुष्यमान महाकच्चान यांना विचारले, “हे कच्चान, आमचे अनेक लाकडे गोळा करणारे तरुण शिष्य इथे आले होते का?” “होय ब्राह्मणा, तुझे अनेक लाकडे गोळा करणारे तरुण शिष्य इथे आले होते.” “पूजनीय कच्चान यांचे त्या तरुणांशी काही संभाषण झाले का?” “होय ब्राह्मणा, माझे त्या तरुणांशी काही संभाषण झाले.” “पूजनीय कच्चान यांचे त्या तरुणांशी कशा प्रकारचे संभाषण झाले?” “हे ब्राह्मणा, माझे त्या तरुणांशी अशा प्रकारचे संभाषण झाले— ‘‘සීලුත්තමා පුබ්බතරා අහෙසුං,තෙ බ්රාහ්මණා යෙ පුරාණං සරන්ති; …පෙ…; අඛිලං සබ්බභූතෙසු,සො මග්ගො බ්රහ්මපත්තියා’’ති. “‘जे प्राचीन ब्राह्मणांच्या आचरणाचे स्मरण करतात, ते प्राचीन काळातील ब्राह्मण शीलालाच सर्वश्रेष्ठ मानत असत... (तसेच)... सर्व प्राणिमात्रांबद्दल त्यांच्या मनात कोणताही द्वेष नव्हता; हाच ब्रह्मलोकाची प्राप्ती करण्याचा खरा मार्ग आहे.’ ‘‘එවං ඛො මෙ, බ්රාහ්මණ, තෙහි මාණවකෙහි සද්ධිං අහොසි කථාසල්ලාපො’’ති. “हे ब्राह्मणा, माझे त्या तरुणांशी अशा प्रकारचे संभाषण झाले.” ‘‘‘අගුත්තද්වාරො’ති භවං කච්චානො ආහ. කිත්තාවතා නු ඛො, භො කච්චාන, අගුත්තද්වාරො හොතී’’ති? ‘‘ඉධ, බ්රාහ්මණ, එකච්චො චක්ඛුනා රූපං දිස්වා පියරූපෙ රූපෙ අධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ රූපෙ බ්යාපජ්ජති, අනුපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති, පරිත්තචෙතසො තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං නප්පජානාති යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. සොතෙන සද්දං සුත්වා… ඝානෙන ගන්ධං ඝායිත්වා… ජිව්හාය රසං සායිත්වා… කායෙන ඵොට්ඨබ්බං ඵුසිත්වා… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය පියරූපෙ ධම්මෙ අධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ ච ධම්මෙ බ්යාපජ්ජති, අනුපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති, පරිත්තචෙතසො තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං නප්පජානාති යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. එවං ඛො, බ්රාහ්මණ, අගුත්තද්වාරො හොතී’’ති. ‘‘අච්ඡරියං, භො කච්චාන; අබ්භුතං, භො කච්චාන! යාවඤ්චිදං භොතා කච්චානෙන අගුත්තද්වාරොව සමානො අගුත්තද්වාරොති අක්ඛාතො. “पूजनीय कच्चान यांनी ‘इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नसलेला’ (अगुप्तद्वार) असे म्हटले. हे कच्चान, कोणत्या अर्थाने माणूस ‘इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नसलेला’ होतो?” “हे ब्राह्मणा, या जगात एखादा मनुष्य डोळ्यांनी रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपाचा द्वेष करतो. तो शरीराची स्मृती (कायानुस्मृती) न ठेवता, संकुचित चित्ताने जगतो. ज्या विमुक्तीमध्ये (चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती) त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धम्म पूर्णपणे नष्ट होतात, त्या चित्तविमुक्तीला आणि प्रज्ञाविमुक्तीला तो यथार्थपणे जाणत नाही. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धम्म (विचार) जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धम्माचा द्वेष करतो. तो शरीराची स्मृती न ठेवता, संकुचित चित्ताने जगतो. ज्या विमुक्तीमध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धम्म पूर्णपणे नष्ट होतात, त्या चित्तविमुक्तीला आणि प्रज्ञाविमुक्तीला तो यथार्थपणे जाणत नाही. हे ब्राह्मणा, अशा प्रकारे माणूस ‘इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नसलेला’ होतो.” “आश्चर्यकारक आहे, हे कच्चान! अद्भुत आहे, हे कच्चान! पूजनीय कच्चान यांनी खरोखरच ज्याची इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नाहीत, त्यालाच ‘इंद्रिय-द्वारे सुरक्षित नसलेला’ असे योग्य प्रकारे सांगितले आहे.” ‘‘‘ගුත්තද්වාරො’ති [Pg.337] භවං කච්චානො ආහ. කිත්තාවතා නු ඛො, භො කච්චාන, ගුත්තද්වාරො හොතී’’ති? ‘‘ඉධ, බ්රාහ්මණ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා පියරූපෙ රූපෙ නාධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ රූපෙ න බ්යාපජ්ජති, උපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති, අප්පමාණචෙතසො තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං පජානාති යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. සොතෙන සද්දං සුත්වා… ඝානෙන ගන්ධං ඝායිත්වා… ජිව්හාය රසං සායිත්වා… කායෙන ඵොට්ඨබ්බං ඵුසිත්වා… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය පියරූපෙ ධම්මෙ නාධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ ධම්මෙ න බ්යාපජ්ජති, උපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති, අප්පමාණචෙතසො තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං පජානාති, යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. එවං ඛො, බ්රාහ්මණ, ගුත්තද්වාරො හොතී’’ති. “‘इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित असलेला’ असे आदरणीय कच्चायन म्हणतात. हे आदरणीय कच्चायन, मनुष्य कोणत्या प्रकारे इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित असलेला होतो?” “ब्राह्मणा, येथे भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित करून, अमर्याद चित्ताने विहार करतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, त्या चेतोविमुक्तीला आणि प्रज्ञाविमुक्तीला तो यथार्थपणे जाणतो. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धर्म जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धर्मावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धर्मावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित करून, अमर्याद चित्ताने विहार करतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, त्या चेतोविमुक्तीला आणि प्रज्ञाविमुक्तीला तो यथार्थपणे जाणतो. ब्राह्मणा, अशा प्रकारे मनुष्य इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित असलेला होतो.” ‘‘අච්ඡරියං, භො කච්චාන; අබ්භුතං, භො කච්චාන! යාවඤ්චිදං භොතා කච්චානෙන ගුත්තද්වාරොව සමානො ගුත්තද්වාරොති අක්ඛාතො. අභික්කන්තං, භො කච්චාන; අභික්කන්තං, භො කච්චාන! සෙය්යථාපි, භො කච්චාන, නික්කුජ්ජිතං වා උක්කුජ්ජෙය්ය, පටිච්ඡන්නං වා විවරෙය්ය, මූළ්හස්ස වා මග්ගං ආචික්ඛෙය්ය, අන්ධකාරෙ වා තෙලපජ්ජොතං ධාරෙය්ය, චක්ඛුමන්තො රූපානි දක්ඛන්තීති; එවමෙවං භොතා කච්චානෙන අනෙකපරියායෙන ධම්මො පකාසිතො. එසාහං, භො කච්චාන, තං භගවන්තං සරණං ගච්ඡාමි, ධම්මඤ්ච, භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. උපාසකං මං භවං කච්චානො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගතං. යථා ච භවං කච්චානො මක්කරකතෙ උපාසකකුලානි උපසඞ්කමති; එවමෙව ලොහිච්චකුලං උපසඞ්කමතු. තත්ථ යෙ මාණවකා වා මාණවිකා වා භවන්තං කච්චානං අභිවාදෙස්සන්ති පච්චුට්ඨිස්සන්ති ආසනං වා උදකං වා දස්සන්ති, තෙසං තං භවිස්සති දීඝරත්තං හිතාය සුඛායා’’ති. නවමං. “आश्चर्यकारक आहे, हे आदरणीय कच्चायन! अद्भुत आहे, हे आदरणीय कच्चायन! आदरणीय कच्चायन यांनी खरोखरच इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित असलेल्यालाच ‘इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित असलेला’ असे म्हटले आहे. अतिशय सुंदर, हे आदरणीय कच्चायन! अतिशय सुंदर, हे आदरणीय कच्चायन! ज्याप्रमाणे, हे आदरणीय कच्चायन, कोणी पालथे घातलेले भांडे उताणे करावे, झाकलेले उघडे करावे, वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे आदरणीय कच्चायन यांनी अनेक मार्गांनी धर्म प्रकाशित केला आहे. हे आदरणीय कच्चायन, मी त्या भगवंतांना, धर्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. आदरणीय कच्चायन यांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे. ज्याप्रमाणे आदरणीय कच्चायन मक्करकट येथील उपासकांच्या कुळांमध्ये जातात, त्याचप्रमाणे त्यांनी लोहिच्च कुळातही जावे. तेथे जे तरुण किंवा तरुणी आदरणीय कच्चायन यांना अभिवादन करतील, त्यांच्या स्वागतासाठी उठून उभे राहतील, त्यांना आसन किंवा पाणी देतील, ते त्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी ठरेल.” नववे सुत्त समाप्त. 10. වෙරහච්චානිසුත්තං १०. वेराहच्चानि सुत्त 133. එකං සමයං ආයස්මා උදායී කාමණ්ඩායං විහරති තොදෙය්යස්ස බ්රාහ්මණස්ස අම්බවනෙ. අථ ඛො වෙරහච්චානිගොත්තාය බ්රාහ්මණියා අන්තෙවාසී මාණවකො යෙනායස්මා උදායී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා උදායිනා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො තං මාණවකං [Pg.338] ආයස්මා උදායී ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙසි සමාදපෙසි සමුත්තෙජෙසි සම්පහංසෙසි. අථ ඛො සො මාණවකො ආයස්මතා උදායිනා ධම්මියා කථාය සන්දස්සිතො සමාදපිතො සමුත්තෙජිතො සම්පහංසිතො උට්ඨායාසනා යෙන වෙරහච්චානිගොත්තා බ්රාහ්මණී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා වෙරහච්චානිගොත්තං බ්රාහ්මණිං එතදවොච – ‘‘යග්ඝෙ, භොති, ජානෙය්යාසි ! සමණො උදායී ධම්මං දෙසෙති ආදිකල්යාණං මජ්ඣෙකල්යාණං පරියොසානකල්යාණං, සාත්ථං සබ්යඤ්ජනං කෙවලපරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං පකාසෙතී’’ති. १३३. एका वेळी आदरणीय उदायी कामंडा येथे तोदेय्य ब्राह्मणाच्या आम्रवनात विहार करत होते. तेव्हा वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीचा एक तरुण शिष्य जेथे आदरणीय उदायी होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने आदरणीय उदायी यांच्याशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या त्या तरुणाला आदरणीय उदायी यांनी धम्मचर्चेने उपदेश केला, प्रोत्साहित केले, उत्साहित केले आणि आनंदित केले. तेव्हा तो तरुण आदरणीय उदायी यांच्या धम्मचर्चेने उपदेशित, प्रोत्साहित, उत्साहित आणि आनंदित होऊन आपल्या आसनावरून उठला आणि जेथे वेराहच्चानि गोत्राची ब्राह्मणी होती तेथे गेला. तेथे जाऊन तो वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीला म्हणाला— “बाईसाहेब, आपल्याला माहीत असावे! श्रमण उदायी असा धर्म उपदेशितात जो सुरुवातीला कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी आणि शेवटी कल्याणकारी आहे; जो अर्थपूर्ण आणि सुस्पष्ट शब्दांनी युक्त आहे; ते पूर्णपणे परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचा प्रकाश पसरवितात.” ‘‘තෙන හි ත්වං, මාණවක, මම වචනෙන සමණං උදායිං නිමන්තෙහි ස්වාතනාය භත්තෙනා’’ති. ‘‘එවං භොතී’’ති ඛො සො මාණවකො වෙරහච්චානිගොත්තාය බ්රාහ්මණියා පටිස්සුත්වා යෙනායස්මා උදායී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං උදායිං එතදවොච – ‘‘අධිවාසෙතු කිර, භවං, උදායි, අම්හාකං ආචරියභරියාය වෙරහච්චානිගොත්තාය බ්රාහ්මණියා ස්වාතනාය භත්ත’’න්ති. අධිවාසෙසි ඛො ආයස්මා උදායී තුණ්හීභාවෙන. අථ ඛො ආයස්මා උදායී තස්සා රත්තියා අච්චයෙන පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන වෙරහච්චානිගොත්තාය බ්රාහ්මණියා නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදි. අථ ඛො වෙරහච්චානිගොත්තා බ්රාහ්මණී ආයස්මන්තං උදායිං පණීතෙන ඛාදනීයෙන භොජනීයෙන සහත්ථා සන්තප්පෙසි සම්පවාරෙසි. අථ ඛො වෙරහච්චානිගොත්තා බ්රාහ්මණී ආයස්මන්තං උදායිං භුත්තාවිං ඔනීතපත්තපාණිං පාදුකා ආරොහිත්වා උච්චෙ ආසනෙ නිසීදිත්වා සීසං ඔගුණ්ඨිත්වා ආයස්මන්තං උදායිං එතදවොච – ‘‘භණ, සමණ, ධම්ම’’න්ති. ‘‘භවිස්සති, භගිනි, සමයො’’ති වත්වා උට්ඨායාසනා පක්කමි. “‘तर मग, तरुणा, माझ्या सांगण्यावरून श्रमण उदायी यांना उद्याच्या भोजनासाठी आमंत्रित कर.’ ‘तसेच असो, बाईसाहेब,’ असे म्हणून तो तरुण वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीच्या आज्ञेचे पालन करून जेथे आदरणीय उदायी होते तेथे गेला. तेथे जाऊन तो आदरणीय उदायी यांना म्हणाला— ‘आदरणीय उदायी यांनी आमच्या आचार्यांच्या पत्नी वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीचे उद्याच्या भोजनाचे आमंत्रण स्वीकारावे.’ आदरणीय उदायी यांनी मौन बाळगून ते स्वीकारले. त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर, सकाळी आदरणीय उदायी यांनी वस्त्रे परिधान केली आणि पात्र व चीवर घेऊन जेथे वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीचे घर होते तेथे गेले. तेथे जाऊन ते तयार केलेल्या आसनावर बसले. तेव्हा वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीने आदरणीय उदायी यांना उत्तम अन्न व खाद्यपदार्थांनी स्वतःच्या हाताने तृप्त केले आणि आग्रहपूर्वक वाढले. जेव्हा आदरणीय उदायी यांचे भोजन झाले आणि त्यांनी पात्रातून हात काढून घेतला, तेव्हा वेराहच्चानि गोत्राची ब्राह्मणी पादत्राणे घालून, एका उंच आसनावर बसली आणि आपले डोके झाकून आदरणीय उदायी यांना म्हणाली— ‘श्रमणा, धर्माचा उपदेश करा.’ ‘भगिनी, त्यासाठी योग्य वेळ येईल,’ असे सांगून ते आसनावरून उठले आणि निघून गेले.” දුතියම්පි ඛො සො මාණවකො යෙනායස්මා උදායී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා උදායිනා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො තං මාණවකං ආයස්මා උදායී ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙසි සමාදපෙසි සමුත්තෙජෙසි සම්පහංසෙසි. දුතියම්පි ඛො සො මාණවකො ආයස්මතා උදායිනා ධම්මියා කථාය සන්දස්සිතො සමාදපිතො සමුත්තෙජිතො සම්පහංසිතො උට්ඨායාසනා යෙන වෙරහච්චානිගොත්තා බ්රාහ්මණී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා [Pg.339] වෙරහච්චානිගොත්තං බ්රාහ්මණිං එතදවොච – ‘‘යග්ඝෙ, භොති, ජානෙය්යාසි! සමණො උදායී ධම්මං දෙසෙති ආදිකල්යාණං මජ්ඣෙකල්යාණං පරියොසානකල්යාණං, සාත්ථං සබ්යඤ්ජනං කෙවලපරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං පකාසෙතී’’ති. “दुसऱ्यांदाही तो तरुण जेथे आदरणीय उदायी होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने आदरणीय उदायी यांच्याशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या त्या तरुणाला आदरणीय उदायी यांनी धम्मचर्चेने उपदेश केला, प्रोत्साहित केले, उत्साहित केले आणि आनंदित केले. दुसऱ्यांदाही तो तरुण आदरणीय उदायी यांच्या धम्मचर्चेने उपदेशित, प्रोत्साहित, उत्साहित आणि आनंदित होऊन आपल्या आसनावरून उठला आणि जेथे वेराहच्चानि गोत्राची ब्राह्मणी होती तेथे गेला. तेथे जाऊन तो वेराहच्चानि गोत्राच्या ब्राह्मणीला म्हणाला— ‘बाईसाहेब, आपल्याला माहीत असावे! श्रमण उदायी असा धर्म उपदेशितात जो सुरुवातीला कल्याणकारी, मध्ये कल्याणकारी आणि शेवटी कल्याणकारी आहे; जो अर्थपूर्ण आणि सुस्पष्ट शब्दांनी युक्त आहे; ते पूर्णपणे परिपूर्ण आणि अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचा प्रकाश पसरवितात.’” ‘‘එවමෙවං පන ත්වං, මාණවක, සමණස්ස උදායිස්ස වණ්ණං භාසසි. සමණො පනුදායී ‘භණ, සමණ, ධම්ම’න්ති වුත්තො සමානො ‘භවිස්සති, භගිනි, සමයො’ති වත්වා උට්ඨායාසනා පක්කන්තො’’ති. ‘‘තථා හි පන ත්වං, භොති, පාදුකා ආරොහිත්වා උච්චෙ ආසනෙ නිසීදිත්වා සීසං ඔගුණ්ඨිත්වා එතදවොච – ‘භණ, සමණ, ධම්ම’න්ති. ධම්මගරුනො හි තෙ භවන්තො ධම්මගාරවා’’ති. ‘‘තෙන හි ත්වං, මාණවක, මම වචනෙන සමණං උදායිං නිමන්තෙහි ස්වාතනාය භත්තෙනා’’ති. ‘‘එවං, භොතී’’ති ඛො සො මාණවකො වෙරහච්චානිගොත්තාය බ්රාහ්මණියා පටිස්සුත්වා යෙනායස්මා උදායී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං උදායිං එතදවොච – ‘‘අධිවාසෙතු කිර භවං උදායී අම්හාකං ආචරියභරියාය වෙරහච්චානිගොත්තාය බ්රාහ්මණියා ස්වාතනාය භත්ත’’න්ති. අධිවාසෙසි ඛො ආයස්මා උදායී තුණ්හීභාවෙන. “हे तरुण माणसा (माणवका), तू तर श्रमण उदायींची अशीच प्रशंसा करतोस. परंतु जेव्हा मी त्यांना म्हणाले, ‘श्रमणा, धम्म उपदेश करा,’ तेव्हा ते ‘भगिनी, यासाठी योग्य वेळ येईल’ असे सांगून आसनावरून उठून निघून गेले.” “आदरणीय बाई, ते यासाठी की आपण पादत्राणे घालून, उच्च आसनावर बसून आणि आपले डोके झाकून त्यांना म्हणालात—‘श्रमणा, धम्म उपदेश करा.’ कारण ते पूजनीय लोक धम्माचा आदर करतात आणि धम्माविषयी गौरव बाळगतात.” “तसे असेल तर, हे तरुण माणसा, माझ्या वतीने श्रमण उदायींना उद्याच्या भोजनासाठी आमंत्रित कर.” “होय, आदरणीय बाई,” असे म्हणून तो तरुण वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीला वचन देऊन जिथे आयुष्यमान उदायी होते तिथे गेला. तिथे जाऊन त्याने आयुष्यमान उदायींना असे म्हटले—“पूजनीय उदायींनी आमच्या आचार्यांच्या पत्नी वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीचे उद्याच्या भोजनाचे आमंत्रण स्वीकारावे.” आयुष्यमान उदायींनी मौन बाळगून ते आमंत्रण स्वीकारले. අථ ඛො ආයස්මා උදායී තස්සා රත්තියා අච්චයෙන පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන වෙරහච්චානිගොත්තාය බ්රාහ්මණියා නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදි. අථ ඛො වෙරහච්චානිගොත්තා බ්රාහ්මණී ආයස්මන්තං උදායිං පණීතෙන ඛාදනීයෙන භොජනීයෙන සහත්ථා සන්තප්පෙසි සම්පවාරෙසි. අථ ඛො වෙරහච්චානිගොත්තා බ්රාහ්මණී ආයස්මන්තං උදායිං භුත්තාවිං ඔනීතපත්තපාණිං පාදුකා ඔරොහිත්වා නීචෙ ආසනෙ නිසීදිත්වා සීසං විවරිත්වා ආයස්මන්තං උදායිං එතදවොච – ‘‘කිස්මිං නු ඛො, භන්තෙ, සති අරහන්තො සුඛදුක්ඛං පඤ්ඤපෙන්ති, කිස්මිං අසති අරහන්තො සුඛදුක්ඛං න පඤ්ඤපෙන්තී’’ති? त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर, आयुष्यमान उदायींनी सकाळी चीवर परिधान केले आणि पात्र व चीवर घेऊन जिथे वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीचे घर होते तिथे गेले. तिथे जाऊन ते मांडलेल्या आसनावर बसले. त्यानंतर वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीने आयुष्यमान उदायींना उत्तम खाद्यान्न आणि भोजनाने स्वतःच्या हाताने तृप्त केले व आग्रहपूर्वक वाढले. त्यानंतर, आयुष्यमान उदायींनी भोजन आटोपून पात्रातून हात काढून घेतल्यावर, वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीने आपली पादत्राणे काढून, एका सखल आसनावर बसून, आपले डोके उघडे करून आयुष्यमान उदायींना असे विचारले—“भंते, काय अस्तित्वात असताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करतात, आणि काय अस्तित्वात नसताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करत नाहीत?” ‘‘චක්ඛුස්මිං ඛො, භගිනි, සති අරහන්තො සුඛදුක්ඛං පඤ්ඤපෙන්ති, චක්ඛුස්මිං අසති අරහන්තො සුඛදුක්ඛං න පඤ්ඤපෙන්ති…පෙ… ජිව්හාය සති අරහන්තො සුඛදුක්ඛං පඤ්ඤපෙන්ති, ජිව්හාය අසති අරහන්තො සුඛදුක්ඛං න පඤ්ඤපෙන්ති…පෙ…. මනස්මිං සති අරහන්තො සුඛදුක්ඛං පඤ්ඤපෙන්ති, මනස්මිං අසති අරහන්තො සුඛදුක්ඛං න පඤ්ඤපෙන්තී’’ති. “भगिनी, डोळे (चक्षू) अस्तित्वात असताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करतात, डोळे अस्तित्वात नसताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करत नाहीत...पे... जीभ (जिव्हा) अस्तित्वात असताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करतात, जीभ अस्तित्वात नसताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करत नाहीत...पे... मन अस्तित्वात असताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करतात, मन अस्तित्वात नसताना अराहंत सुख-दुःखाची प्रज्ञप्ती करत नाहीत.” එවං වුත්තෙ, වෙරහච්චානිගොත්තා බ්රාහ්මණී ආයස්මන්තං උදායිං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ; අභික්කන්තං, භන්තෙ! සෙය්යථාපි, භන්තෙ, නික්කුජ්ජිතං වා උක්කුජ්ජෙය්ය[Pg.340], පටිච්ඡන්නං වා විවරෙය්ය, මූළ්හස්ස වා මග්ගං ආචික්ඛෙය්ය, අන්ධකාරෙ වා තෙලපජ්ජොතං ධාරෙය්ය, චක්ඛුමන්තො රූපානි දක්ඛන්තීති; එවමෙවං අය්යෙන උදායිනා අනෙකපරියායෙන ධම්මො පකාසිතො. එසාහං, අය්ය උදායි, තං භගවන්තං සරණං ගච්ඡාමි, ධම්මඤ්ච, භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. උපාසිකං මං අය්යො උදායී ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. දසමං. असे म्हटल्यावर, वेराहच्चानी गोत्राच्या ब्राह्मण स्त्रीने आयुष्यमान उदायींना असे म्हटले—“अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! जसे काही, भंते, उपडे ठेवलेले उताणे करावे, झाकलेले उघडे करावे, वाट चुकलेल्याला वाट दाखवावी, किंवा अंधारात तेलाचा दिवा धरावा जेणेकरून डोळस व्यक्तींना रूपे दिसू शकतील; त्याचप्रमाणे आदरणीय उदायींनी अनेक पर्यायांनी धम्म प्रकाशित केला आहे. मी, आदरणीय उदायी, त्या भगवंतांना शरण जाते, धम्माला शरण जाते आणि भिक्खू संघाला शरण जाते. आदरणीय उदायींनी मला आजपासून जन्मभर शरण गेलेली उपासिका म्हणून स्वीकारावे.” दहावे (सुत्त समाप्त). ගහපතිවග්ගො තෙරසමො. गृहपती वर्ग तेरावा (समाप्त). තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) — වෙසාලී වජ්ජි නාළන්දා, භාරද්වාජ සොණො ච ඝොසිතො; හාලිද්දිකො නකුලපිතා, ලොහිච්චො වෙරහච්චානීති. वेसाली, वज्जी, नाळंदा, भारद्वाज, सोण, घोसित, हालिद्दिक, नकुलपिता, लोहिच्च आणि वेराहच्चानी. 14. දෙවදහවග්ගො १४. देवदह वर्ग 1. දෙවදහසුත්තං १. देवदह सुत्त 134. එකං සමයං භගවා සක්කෙසු විහරති දෙවදහං නාම සක්යානං නිගමො. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘නාහං, භික්ඛවෙ, සබ්බෙසංයෙව භික්ඛූනං ඡසු ඵස්සායතනෙසු අප්පමාදෙන කරණීයන්ති වදාමි, න ච පනාහං, භික්ඛවෙ, සබ්බෙසංයෙව භික්ඛූනං ඡසු ඵස්සායතනෙසු නාප්පමාදෙන කරණීයන්ති වදාමි. යෙ තෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛූ අරහන්තො ඛීණාසවා වුසිතවන්තො කතකරණීයා ඔහිතභාරා අනුප්පත්තසදත්ථා පරික්ඛීණභවසංයොජනා සම්මදඤ්ඤා විමුත්තා, තෙසාහං, භික්ඛවෙ, භික්ඛූනං ඡසු ඵස්සායතනෙසු නාප්පමාදෙන කරණීයන්ති වදාමි. තං කිස්ස හෙතු? කතං තෙසං අප්පමාදෙන, අභබ්බා තෙ පමජ්ජිතුං. යෙ ච ඛො තෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛූ සෙක්ඛා අප්පත්තමානසා අනුත්තරං යොගක්ඛෙමං පත්ථයමානා විහරන්ති, තෙසාහං, භික්ඛවෙ, භික්ඛූනං ඡසු ඵස්සායතනෙසු අප්පමාදෙන කරණීයන්ති වදාමි. තං කිස්ස හෙතු? සන්ති, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා මනොරමාපි, අමනොරමාපි. ත්යාස්ස ඵුස්ස ඵුස්ස චිත්තං න පරියාදාය තිට්ඨන්ති. චෙතසො අපරියාදානා ආරද්ධං හොති වීරියං අසල්ලීනං, උපට්ඨිතා සති අසම්මුට්ඨා, පස්සද්ධො කායො අසාරද්ධො, සමාහිතං චිත්තං එකග්ගං. ඉමං ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, අප්පමාදඵලං [Pg.341] සම්පස්සමානො තෙසං භික්ඛූනං ඡසු ඵස්සායතනෙසු අප්පමාදෙන කරණීයන්ති වදාමි…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා මනොරමාපි අමනොරමාපි. ත්යාස්ස ඵුස්ස ඵුස්ස චිත්තං න පරියාදාය තිට්ඨන්ති. චෙතසො අපරියාදානා ආරද්ධං හොති වීරියං අසල්ලීනං, උපට්ඨිතා සති අසම්මුට්ඨා, පස්සද්ධො කායො අසාරද්ධො, සමාහිතං චිත්තං එකග්ගං. ඉමං ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, අප්පමාදඵලං සම්පස්සමානො තෙසං භික්ඛූනං ඡසු ඵස්සායතනෙසු අප්පමාදෙන කරණීයන්ති වදාමී’’ති. පඨමං. १३४. एकदा भगवान शाक्यांच्या देशात ‘देवदह’ नावाच्या शाक्यांच्या नगरात विहार करत होते. तिथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले—“भिक्खूंनो, मी सर्वच भिक्खूंना सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने (जागरूकतेने) साधना केली पाहिजे असे म्हणत नाही; आणि भिक्खूंनो, मी सर्वच भिक्खूंना सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने साधना करण्याची गरज नाही असेही म्हणत नाही. भिक्खूंनो, जे भिक्खू अराहंत आहेत, ज्यांचे आसव नष्ट झाले आहेत, ज्यांनी ब्रह्मचर्य पूर्ण केले आहे, ज्यांचे कर्तव्य पूर्ण झाले आहे, ज्यांनी ओझे उतरवून ठेवले आहे, ज्यांनी आपले ध्येय गाठले आहे, ज्यांचे भव-संयोजन पूर्णपणे नष्ट झाले आहे आणि जे सम्यक ज्ञानाने विमुक्त झाले आहेत, अशा भिक्खूंना मी सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने साधना करण्याची गरज आहे असे म्हणत नाही. त्याचे कारण काय? त्यांनी अप्रमादाने आपले कार्य पूर्ण केले आहे, ते आता प्रमाद करण्यास असमर्थ आहेत. परंतु भिक्खूंनो, जे भिक्खू शैक्ष आहेत, ज्यांनी अद्याप अंतिम ध्येय प्राप्त केलेले नाही, आणि जे अनुत्तर योगक्षेम प्राप्त करण्याची आकांक्षा बाळगून विहार करत आहेत, अशा भिक्खूंना मी सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने साधना केली पाहिजे असे सांगतो. त्याचे कारण काय? भिक्खूंनो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगी अशी रूपे असतात जी मनोरम असतात आणि काही अमनोरम असतात. ती रूपे वारंवार स्पर्श करूनही त्या भिक्खूच्या चित्तावर ताबा मिळवून राहू शकत नाहीत. चित्तावर ताबा न मिळाल्यामुळे, त्याचे वीर्य दृढ आणि न खचणारे असते, त्याची स्मृती जागृत आणि संभ्रमरहित असते, शरीर शांत आणि व्याकुळतारहित असते, आणि चित्त एकाग्र व समाहित असते. भिक्खूंनो, अप्रमादाचे हे फळ पाहूनच मी त्या भिक्खूंना सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने साधना केली पाहिजे असे सांगतो...पे... भिक्खूंनो, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म असतात जे मनोरम असतात आणि काही अमनोरम असतात. ते वारंवार स्पर्श करूनही त्या भिक्खूच्या चित्तावर ताबा मिळवून राहू शकत नाहीत. चित्तावर ताबा न मिळाल्यामुळे, त्याचे वीर्य दृढ आणि न खचणारे असते, त्याची स्मृती जागृत आणि संभ्रमरहित असते, शरीर शांत आणि व्याकुळतारहित असते, आणि चित्त एकाग्र व समाहित असते. भिक्खूंनो, अप्रमादाचे हे फळ पाहूनच मी त्या भिक्खूंना सहा स्पर्श-आयतनांच्या बाबतीत अप्रमादाने साधना केली पाहिजे असे सांगतो.” पहिले (सुत्त समाप्त). 2. ඛණසුත්තං २. क्षण सुत्त 135. ‘‘ලාභා වො, භික්ඛවෙ, සුලද්ධං වො, භික්ඛවෙ, ඛණො වො පටිලද්ධො බ්රහ්මචරියවාසාය. දිට්ඨා මයා, භික්ඛවෙ, ඡඵස්සායතනිකා නාම නිරයා. තත්ථ යං කිඤ්චි චක්ඛුනා රූපං පස්සති අනිට්ඨරූපංයෙව පස්සති, නො ඉට්ඨරූපං; අකන්තරූපංයෙව පස්සති, නො කන්තරූපං; අමනාපරූපංයෙව පස්සති, නො මනාපරූපං. යං කිඤ්චි සොතෙන සද්දං සුණාති…පෙ… යං කිඤ්චි ඝානෙන ගන්ධං ඝායති…පෙ… යං කිඤ්චි ජිව්හාය රසං සායති…පෙ… යං කිඤ්චි කායෙන ඵොට්ඨබ්බං ඵුසති…පෙ… යං කිඤ්චි මනසා ධම්මං විජානාති අනිට්ඨරූපංයෙව විජානාති, නො ඉට්ඨරූපං; අකන්තරූපංයෙව විජානාති, නො කන්තරූපං; අමනාපරූපංයෙව විජානාති, නො මනාපරූපං. ලාභා වො, භික්ඛවෙ, සුලද්ධං වො, භික්ඛවෙ, ඛණො වො පටිලද්ධො බ්රහ්මචරියවාසාය. දිට්ඨා මයා, භික්ඛවෙ, ඡඵස්සායතනිකා නාම සග්ගා. තත්ථ යං කිඤ්චි චක්ඛුනා රූපං පස්සති ඉට්ඨරූපංයෙව පස්සති, නො අනිට්ඨරූපං; කන්තරූපංයෙව පස්සති, නො අකන්තරූපං; මනාපරූපංයෙව පස්සති, නො අමනාපරූපං…පෙ… යං කිඤ්චි ජිව්හාය රසං සායති…පෙ… යං කිඤ්චි මනසා ධම්මං විජානාති ඉට්ඨරූපංයෙව විජානාති, නො අනිට්ඨරූපං; කන්තරූපංයෙව විජානාති, නො අකන්තරූපං; මනාපරූපංයෙව විජානාති, නො අමනාපරූපං. ලාභා වො, භික්ඛවෙ, සුලද්ධං වො, භික්ඛවෙ, ඛණො වො පටිලද්ධො බ්රහ්මචරියවාසායා’’ති. දුතියං. १३५. “भिक्खूहो, हा तुमचा लाभ आहे, भिक्खूहो, हे तुम्हाला सुदैवाने लाभले आहे, की तुम्हाला ब्रह्मचर्यवासासाठी सुवर्णसंधी प्राप्त झाली आहे. भिक्खूहो, मी 'सहा स्पर्शायतने' नावाचे नरक पाहिले आहेत. तिथे डोळ्यांनी जे काही रूप पाहिले जाते, ते केवळ अनिष्टच असते, इष्ट नाही; केवळ अकांतच असते, कांत नाही; केवळ अमनापच असते, मनाप नाही. कानाने जो काही शब्द ऐकला जातो... नाकाने जो काही गंध घेतला जातो... जिभेने जो काही रस चाखला जातो... शरीराने ज्या काही स्पर्शाचा अनुभव घेतला जातो... मनाने ज्या काही धर्माचे (मनोविषयाचे) ज्ञान होते, ते केवळ अनिष्टच असते, इष्ट नाही; केवळ अकांतच असते, कांत नाही; केवळ अमनापच असते, मनाप नाही. भिक्खूहो, हा तुमचा लाभ आहे, भिक्खूहो, हे तुम्हाला सुदैवाने लाभले आहे, की तुम्हाला ब्रह्मचर्यवासासाठी सुवर्णसंधी प्राप्त झाली आहे. भिक्खूहो, मी 'सहा स्पर्शायतने' नावाचे स्वर्ग पाहिले आहेत. तिथे डोळ्यांनी जे काही रूप पाहिले जाते, ते केवळ इष्टच असते, अनिष्ट नाही; केवळ कांतच असते, अकांत नाही; केवळ मनापच असते, अमनाप नाही... जिभेने जो काही रस चाखला जातो... मनाने ज्या काही धर्माचे ज्ञान होते, ते केवळ इष्टच असते, अनिष्ट नाही; केवळ कांतच असते, अकांत नाही; केवळ मनापच असते, अमनाप नाही. भिक्खूहो, हा तुमचा लाभ आहे, भिक्खूहो, हे तुम्हाला सुदैवाने लाभले आहे, की तुम्हाला ब्रह्मचर्यवासासाठी सुवर्णसंधी प्राप्त झाली आहे।” (दुसरे सूत्र समाप्त.) 3. පඨමරූපාරාමසුත්තං ३. प्रथम रूपाराम सूत्र 136. ‘‘රූපාරාමා, භික්ඛවෙ, දෙවමනුස්සා රූපරතා රූපසම්මුදිතා. රූපවිපරිණාමවිරාගනිරොධා දුක්ඛා, භික්ඛවෙ, දෙවමනුස්සා විහරන්ති. සද්දාරාමා, භික්ඛවෙ[Pg.342], දෙවමනුස්සා සද්දරතා සද්දසම්මුදිතා. සද්දවිපරිණාමවිරාගනිරොධා දුක්ඛා, භික්ඛවෙ, දෙවමනුස්සා විහරන්ති. ගන්ධාරාමා… රසාරාමා… ඵොට්ඨබ්බාරාමා… ධම්මාරාමා, භික්ඛවෙ, දෙවමනුස්සා ධම්මරතා ධම්මසම්මුදිතා. ධම්මවිපරිණාමවිරාගනිරොධා දුක්ඛා, භික්ඛවෙ, දෙවමනුස්සා විහරන්ති. තථාගතො ච ඛො, භික්ඛවෙ, අරහං සම්මාසම්බුද්ධො රූපානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවං ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං විදිත්වා න රූපාරාමො න රූපරතො න රූපසම්මුදිතො. රූපවිපරිණාමවිරාගනිරොධා සුඛො, භික්ඛවෙ, තථාගතො විහරති. සද්දානං… ගන්ධානං… රසානං… ඵොට්ඨබ්බානං… ධම්මානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං විදිත්වා න ධම්මාරාමො, න ධම්මරතො, න ධම්මසම්මුදිතො. ධම්මවිපරිණාමවිරාගනිරොධා සුඛො, භික්ඛවෙ, තථාගතො විහරති’’. ඉදමවොච භගවා. ඉදං වත්වාන සුගතො අථාපරං එතදවොච සත්ථා – १३६. “भिक्खूहो, देव आणि मनुष्य रूपांमध्ये रमणारे, रूपांमध्ये आसक्त असणारे आणि रूपांमध्येच आनंद मानणारे आहेत. रूपांच्या विपरिणामामुळे (बदलामुळे), विरागामुळे (नाशाने) आणि निरोधाने (अंताने) देव आणि मनुष्य दुःखात जगतात. भिक्खूहो, देव आणि मनुष्य शब्दांमध्ये रमणारे, शब्दांमध्ये आसक्त असणारे आणि शब्दांमध्येच आनंद मानणारे आहेत. शब्दांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने देव आणि मनुष्य दुःखात जगतात. गंधांमध्ये रमणारे... रसांमध्ये रमणारे... स्पर्शांमध्ये रमणारे... भिक्खूहो, देव आणि मनुष्य धर्मांमध्ये (मनोविषयांमध्ये) रमणारे, धर्मांमध्ये आसक्त असणारे आणि धर्मांमध्येच आनंद मानणारे आहेत. धर्मांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने देव आणि मनुष्य दुःखात जगतात. परंतु भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागतांनी रूपांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव (दोष) आणि निस्सरण (मुक्ती) हे जसे आहे तसे (यथाभूत) जाणून घेतल्यामुळे, ते रूपांमध्ये रमत नाहीत, रूपांमध्ये आसक्त होत नाहीत आणि रूपांमध्ये आनंद मानत नाहीत. रूपांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने तथागत सुखाने विहरतात. शब्दांचा... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धर्मांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणून घेतल्यामुळे, ते धर्मांमध्ये रमत नाहीत, धर्मांमध्ये आसक्त होत नाहीत आणि धर्मांमध्ये आनंद मानत नाहीत. धर्मांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने तथागत सुखाने विहरतात.” भगवान असे म्हणाले. हे बोलून सुगतांनी, शास्त्यांनी पुढे हे म्हटले – ‘‘රූපා සද්දා රසා ගන්ධා, ඵස්සා ධම්මා ච කෙවලා; ඉට්ඨා කන්තා මනාපා ච, යාවතත්ථීති වුච්චති. “रूप, शब्द, रस, गंध, स्पर्श आणि सर्व धर्म (मनोविषय), जे काही इष्ट, कांत (प्रिय) आणि मनाप (मनोरम) आहेत असे म्हटले जाते; ‘‘සදෙවකස්ස ලොකස්ස, එතෙ වො සුඛසම්මතා; යත්ථ චෙතෙ නිරුජ්ඣන්ති, තං තෙසං දුක්ඛසම්මතං. “देवांसह संपूर्ण जगासाठी हेच सुखाचे साधन मानले गेले आहे. परंतु जिथे यांचा निरोध (नाश) होतो, त्याला ते दुःख मानतात. ‘‘සුඛං දිට්ඨමරියෙභි, සක්කායස්ස නිරොධනං; පච්චනීකමිදං හොති, සබ්බලොකෙන පස්සතං. “आर्यांनी (सत्पुरुषांनी) सक्काय-निरोध (अस्तित्वाच्या मोहाचा निरोध) हेच सुख म्हणून पाहिले आहे. हे स्पष्ट पाहणाऱ्यांचे दर्शन संपूर्ण जगाच्या अगदी विरुद्ध आहे. ‘‘යං පරෙ සුඛතො ආහු, තදරියා ආහු දුක්ඛතො; යං පරෙ දුක්ඛතො ආහු, තදරියා සුඛතො විදූ. “ज्याला इतर लोक सुख म्हणतात, त्याला आर्य दुःख म्हणतात; ज्याला इतर लोक दुःख म्हणतात, त्याला आर्य सुख म्हणून जाणतात. ‘‘පස්ස ධම්මං දුරාජානං, සම්මූළ්හෙත්ථ අවිද්දසු; නිවුතානං තමො හොති, අන්ධකාරො අපස්සතං. “हा समजण्यास कठीण असलेला धर्म पहा, जिथे अज्ञानी लोक मोहित होतात. ज्यांचे मन झाकलेले आहे त्यांच्यासाठी हा अंधकार आहे, आणि जे पाहत नाहीत त्यांच्यासाठी हा काळोख आहे. ‘‘සතඤ්ච විවටං හොති, ආලොකො පස්සතාමි; සන්තිකෙ න විජානන්ති, මග්ගා ධම්මස්ස අකොවිදා. “परंतु सत्पुरुषांसाठी हा उघडलेला आहे, पाहणाऱ्यांसाठी हा प्रकाशासारखा आहे. जे मूर्ख धर्मात अकुशल आहेत, ते जवळ असूनही याला जाणत नाहीत. ‘‘භවරාගපරෙතෙභි, භවරාගානුසාරීභි ; මාරධෙය්යානුපන්නෙහි, නායං ධම්මො සුසම්බුධො. “जे भवरागाने (अस्तित्वाच्या तृष्णेने) ग्रस्त आहेत, जे भवरागाचे अनुकरण करतात, जे मारच्या साम्राज्यात अडकलेले आहेत, त्यांच्यासाठी हा धर्म सहज समजण्याजोगा नाही. ‘‘කො [Pg.343] නු අඤ්ඤත්ර මරියෙභි, පදං සම්බුද්ධුමරහති; යං පදං සම්මදඤ්ඤාය, පරිනිබ්බන්ති අනාසවා’’ති. තතියං; “आर्यांशिवाय दुसरा कोण या पदाला (निर्वाणाला) पूर्णपणे जाणण्यास पात्र आहे? ज्या पदाला योग्य प्रकारे जाणून, आस्रव-रहित (अनास्रव) होऊन ते परिनिर्वाण प्राप्त करतात.” (तिसरे सूत्र समाप्त.) 4. දුතියරූපාරාමසුත්තං ४. द्वितीय रूपाराम सूत्र 137. ‘‘රූපාරාමා, භික්ඛවෙ, දෙවමනුස්සා රූපරතා රූපසම්මුදිතා. රූපවිපරිණාමවිරාගනිරොධා දුක්ඛා, භික්ඛවෙ, දෙවමනුස්සා විහරන්ති. සද්දාරාමා… ගන්ධාරාමා… රසාරාමා … ඵොට්ඨබ්බාරාමා… ධම්මාරාමා, භික්ඛවෙ, දෙවමනුස්සා ධම්මරතා ධම්මසම්මුදිතා. ධම්මවිපරිණාමවිරාගනිරොධා දුක්ඛා, භික්ඛවෙ, දෙවමනුස්සා විහරන්ති. තථාගතො ච, භික්ඛවෙ, අරහං සම්මාසම්බුද්ධො රූපානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං විදිත්වා න රූපාරාමො න රූපරතො න රූපසම්මුදිතො. රූපවිපරිණාමවිරාගනිරොධා සුඛො, භික්ඛවෙ, තථාගතො විහරති. සද්දානං… ගන්ධානං… රසානං… ඵොට්ඨබ්බානං… ධම්මානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං විදිත්වා න ධම්මාරාමො න ධම්මරතො න ධම්මසම්මුදිතො. ධම්මවිපරිණාමවිරාගනිරොධා සුඛො, භික්ඛවෙ, තථාගතො විහරතී’’ති. චතුත්ථං. १३७. “भिक्खूहो, देव आणि मनुष्य रूपांमध्ये रमणारे, रूपांमध्ये आसक्त असणारे आणि रूपांमध्येच आनंद मानणारे आहेत. रूपांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने देव आणि मनुष्य दुःखात जगतात. शब्दांमध्ये रमणारे... गंधांमध्ये रमणारे... रसांमध्ये रमणारे... स्पर्शांमध्ये रमणारे... भिक्खूहो, देव आणि मनुष्य धर्मांमध्ये रमणारे, धर्मांमध्ये आसक्त असणारे आणि धर्मांमध्येच आनंद मानणारे आहेत. धर्मांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने देव आणि मनुष्य दुःखात जगतात. भिक्खूहो, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागतांनी रूपांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणून घेतल्यामुळे, ते रूपांमध्ये रमत नाहीत, रूपांमध्ये आसक्त होत नाहीत आणि रूपांमध्ये आनंद मानत नाहीत. रूपांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने तथागत सुखाने विहरतात. शब्दांचा... गंधांचा... रसांचा... स्पर्शांचा... धर्मांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे जसे आहे तसे जाणून घेतल्यामुळे, ते धर्मांमध्ये रमत नाहीत, धर्मांमध्ये आसक्त होत नाहीत आणि धर्मांमध्ये आनंद मानत नाहीत. धर्मांच्या विपरिणामामुळे, विरागामुळे आणि निरोधाने तथागत सुखाने विहरतात.” (चौथे सूत्र समाप्त.) 5. පඨමනතුම්හාකංසුත්තං ५. प्रथम न तुम्हाक सूत्र 138. ‘‘යං, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං; තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති…පෙ… ජිව්හා න තුම්හාකං; තං පජහථ. සා වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සති…පෙ… මනො න තුම්හාකං; තං පජහථ. සො වො පහීනො හිතාය සුඛාය භවිස්සති. සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, යං ඉමස්මිං ජෙතවනෙ තිණකට්ඨසාඛාපලාසං තං ජනො හරෙය්ය වා ඩහෙය්ය වා යථාපච්චයං වා කරෙය්ය, අපි නු තුම්හාකං එවමස්ස – ‘අම්හෙ ජනො හරති වා ඩහති වා යථාපච්චයං වා කරොතී’’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘තං කිස්ස හෙතු’’? ‘‘න හි නො එතං, භන්තෙ, අත්තා වා අත්තනියං වා’’ති. ‘‘එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛු න තුම්හාකං; තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති…පෙ… ජිව්හා න තුම්හාකං; තං පජහථ. සා වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සති…පෙ… මනො න තුම්හාකං[Pg.344]; තං පජහථ. සො වො පහීනො හිතාය සුඛාය භවිස්සතී’’ති. පඤ්චමං. १३८. “भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. आणि भिक्षूंनो, तुमचे काय नाही? भिक्षूंनो, डोळा (चक्षू) तुमचा नाही; त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल... तसेच... जीभ (जिव्हा) तुमची नाही; तिचा त्याग करा. तिचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल... तसेच... मन तुमचे नाही; त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. भिक्षूंनो, समजा या जेतवनात जे काही गवत, लाकूड, फांद्या आणि पाने आहेत, ती लोकांनी नेली किंवा जाळली किंवा त्यांच्या इच्छेनुसार त्यांची विल्हेवाट लावली, तर तुम्हाला असे वाटेल का की—‘लोक आपल्याला घेऊन जात आहेत, किंवा जाळत आहेत, किंवा आपल्या इच्छेनुसार आपली विल्हेवाट लावत आहेत’?” “नाही, भन्ते.” “ते कशामुळे?” “कारण, भन्ते, हे आमचा आत्मा (स्व) नाही आणि आमच्या आत्म्याचे (स्वतःचे) काही नाही.” “तसेच, भिक्षूंनो, डोळा तुमचा नाही; त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल... तसेच... जीभ तुमची नाही; तिचा त्याग करा. तिचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल... तसेच... मन तुमचे नाही; त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल.” पाचवे. 6. දුතියනතුම්හාකංසුත්තං ६. दुसरे न-तुम्हाकं सुत्त (तुमचे नसलेले सुत्त) 139. ‘‘යං, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං, තං පජහථ. තං වො පහීනං හිතාය සුඛාය භවිස්සති. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං? රූපා, භික්ඛවෙ, න තුම්හාකං; තෙ පජහථ. තෙ වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සන්ති. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා න තුම්හාකං; තෙ පජහථ. තෙ වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සන්ති. සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, යං ඉමස්මිං ජෙතවනෙ…පෙ… එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, රූපා න තුම්හාකං; තෙ පජහථ. තෙ වො පහීනා හිතාය සුඛාය භවිස්සන්තී’’ති. ඡට්ඨං. १३९. “भिक्षूंनो, जे तुमचे नाही, त्याचा त्याग करा. त्याचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. आणि भिक्षूंनो, तुमचे काय नाही? भिक्षूंनो, रूपे (दृश्य वस्तू) तुमची नाहीत; त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. शब्द... गंध... रस... स्पर्श (फोठ्ठब्ब)... विचार/धम्म तुमचे नाहीत; त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल. भिक्षूंनो, समजा या जेतवनात... तसेच... तसेच, भिक्षूंनो, रूपे तुमची नाहीत; त्यांचा त्याग करा. त्यांचा त्याग करणे तुमच्या हितासाठी आणि सुखासाठी होईल.” सहावे. 7. අජ්ඣත්තානිච්චහෙතුසුත්තං ७. अज्झत्त-अनिच्च-हेतू सुत्त (अंतर्गत अनित्यतेचे कारण सुत्त) 140. ‘‘චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං. යොපි හෙතු, යොපි පච්චයො චක්ඛුස්ස උප්පාදාය, සොපි අනිච්චො. අනිච්චසම්භූතං, භික්ඛවෙ, චක්ඛු කුතො නිච්චං භවිස්සති…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා. යොපි හෙතු, යොපි පච්චයො ජිව්හාය උප්පාදාය සොපි අනිච්චො. අනිච්චසම්භූතා, භික්ඛවෙ, ජිව්හා කුතො නිච්චා භවිස්සති…පෙ… මනො අනිච්චො. යොපි, භික්ඛවෙ, හෙතු යොපි පච්චයො මනස්ස උප්පාදාය, සොපි අනිච්චො. අනිච්චසම්භූතො, භික්ඛවෙ, මනො කුතො නිච්චො භවිස්සති! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… ජිව්හායපි නිබ්බින්දති…පෙ… නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. සත්තමං. १४०. “भिक्षूंनो, डोळा (चक्षू) अनित्य आहे. डोळ्याच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय (अनुकूल परिस्थिती) आहे, ते देखील अनित्य आहे. भिक्षूंनो, अनित्यापासून उत्पन्न झालेला डोळा नित्य कसा असू शकेल?... तसेच... जीभ अनित्य आहे. जिभेच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनित्य आहे. भिक्षूंनो, अनित्यापासून उत्पन्न झालेली जीभ नित्य कशी असू शकेल?... तसेच... मन अनित्य आहे. भिक्षूंनो, मनाच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनित्य आहे. भिक्षूंनो, अनित्यापासून उत्पन्न झालेले मन नित्य कसे असू शकेल! असे पाहणारा, भिक्षूंनो, सुतवान (श्रुतवान) आर्यश्रावक डोळ्याविषयी देखील विरक्त होतो... तसेच... जिभेविषयी देखील विरक्त होतो... तसेच... मनाविषयी देखील विरक्त होतो. विरक्त होऊन तो रागरहित होतो; वैराग्यामुळे तो मुक्त होतो; मुक्त झाल्यावर ‘मुक्त झाले’ असे ज्ञान होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,’ असे तो जाणतो.” सातवे. 8. අජ්ඣත්තදුක්ඛහෙතුසුත්තං ८. अज्झत्त-दुक्ख-हेतू सुत्त (अंतर्गत दुःखाचे कारण सुत्त) 141. ‘‘චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං. යොපි හෙතු යොපි පච්චයො චක්ඛුස්ස උප්පාදාය, සොපි දුක්ඛො. දුක්ඛසම්භූතං, භික්ඛවෙ, චක්ඛු කුතො සුඛං භවිස්සති…පෙ… ජිව්හා දුක්ඛා. යොපි හෙතු, යොපි පච්චයො ජිව්හාය උප්පාදාය, සොපි දුක්ඛො. දුක්ඛසම්භූතා, භික්ඛවෙ, ජිව්හා කුතො සුඛා භවිස්සති…පෙ… මනො දුක්ඛො. යොපි හෙතු යොපි පච්චයො මනස්ස උප්පාදාය, සොපි දුක්ඛො. දුක්ඛසම්භූතො, භික්ඛවෙ, මනො කුතො සුඛො භවිස්සති! එවං පස්සං…පෙ… ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. අට්ඨමං. १४१. “भिक्षूंनो, डोळा दुःख आहे. डोळ्याच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील दुःखकारक आहे. भिक्षूंनो, दुःखापासून उत्पन्न झालेला डोळा सुखकारक कसा असू शकेल?... तसेच... जीभ दुःख आहे. जिभेच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील दुःखकारक आहे. भिक्षूंनो, दुःखापासून उत्पन्न झालेली जीभ सुखकारक कशी असू शकेल?... तसेच... मन दुःख आहे. मनाच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील दुःखकारक आहे. भिक्षूंनो, दुःखापासून उत्पन्न झालेले मन सुखकारक कसे असू शकेल! असे पाहणारा... तसेच... ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,’ असे तो जाणतो.” आठवे. 9. අජ්ඣත්තානත්තහෙතුසුත්තං ९. अज्झत्त-अनत्ता-हेतू सुत्त (अंतर्गत अनात्मतेचे कारण सुत्त) 142. ‘‘චක්ඛුං[Pg.345], භික්ඛවෙ, අනත්තා. යොපි හෙතු, යොපි පච්චයො චක්ඛුස්ස උප්පාදාය, සොපි අනත්තා. අනත්තසම්භූතං, භික්ඛවෙ, චක්ඛු කුතො අත්තා භවිස්සති…පෙ… ජිව්හා අනත්තා. යොපි හෙතු යොපි පච්චයො ජිව්හාය උප්පාදාය, සොපි අනත්තා. අනත්තසම්භූතා, භික්ඛවෙ, ජිව්හා කුතො අත්තා භවිස්සති…පෙ… මනො අනත්තා. යොපි හෙතු යොපි පච්චයො මනස්ස උප්පාදාය, සොපි අනත්තා. අනත්තසම්භූතො, භික්ඛවෙ, මනො කුතො අත්තා භවිස්සති! එවං පස්සං…පෙ… ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. නවමං. १४२. “भिक्षूंनो, डोळा अनात्मा (अनात्ता) आहे. डोळ्याच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनात्मा आहे. भिक्षूंनो, अनात्म्यापासून उत्पन्न झालेला डोळा आत्मा कसा असू शकेल?... तसेच... जीभ अनात्मा आहे. जिभेच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनात्मा आहे. भिक्षूंनो, अनात्म्यापासून उत्पन्न झालेली जीभ आत्मा कशी असू शकेल?... तसेच... मन अनात्मा आहे. मनाच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनात्मा आहे. भिक्षूंनो, अनात्म्यापासून उत्पन्न झालेले मन आत्मा कसे असू शकेल! असे पाहणारा... तसेच... ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,’ असे तो जाणतो.” नववे. 10. බාහිරානිච්චහෙතුසුත්තං १०. बाहिर-अनिच्च-हेतू सुत्त (बाह्य अनित्यतेचे कारण सुत्त) 143. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනිච්චා. යොපි හෙතු, යොපි පච්චයො රූපානං උප්පාදාය, සොපි අනිච්චො. අනිච්චසම්භූතා, භික්ඛවෙ, රූපා කුතො නිච්චා භවිස්සන්ති! සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනිච්චා. යොපි හෙතු, යොපි පච්චයො ධම්මානං උප්පාදාය, සොපි අනිච්චො. අනිච්චසම්භූතා, භික්ඛවෙ, ධම්මා කුතො නිච්චා භවිස්සන්ති! එවං පස්සං…පෙ… ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. දසමං. १४३. “भिक्षूंनो, रूपे अनित्य आहेत. रूपांच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनित्य आहे. भिक्षूंनो, अनित्यापासून उत्पन्न झालेली रूपे नित्य कशी असू शकतील! शब्द... गंध... रस... स्पर्श... विचार/धम्म अनित्य आहेत. धम्मांच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील अनित्य आहे. भिक्षूंनो, अनित्यापासून उत्पन्न झालेले धम्म नित्य कसे असू शकतील! असे पाहणारा... तसेच... ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,’ असे तो जाणतो.” दहावे. 11. බාහිරදුක්ඛහෙතුසුත්තං ११. बाहिर-दुक्ख-हेतू सुत्त (बाह्य दुःखाचे कारण सुत्त) 144. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, දුක්ඛා. යොපි හෙතු, යොපි පච්චයො රූපානං උප්පාදාය, සොපි දුක්ඛො. දුක්ඛසම්භූතා, භික්ඛවෙ, රූපා කුතො සුඛා භවිස්සන්ති! සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා දුක්ඛා. යොපි හෙතු, යොපි පච්චයො ධම්මානං උප්පාදාය, සොපි දුක්ඛො. දුක්ඛසම්භූතා, භික්ඛවෙ, ධම්මා කුතො සුඛා භවිස්සන්ති! එවං පස්සං…පෙ… ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. එකාදසමං. १४४. “भिक्षूंनो, रूपे दुःख आहेत. रूपांच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील दुःखकारक आहे. भिक्षूंनो, दुःखापासून उत्पन्न झालेली रूपे सुखकारक कशी असू शकतील! शब्द... गंध... रस... स्पर्श... विचार/धम्म दुःख आहेत. धम्मांच्या उत्पत्तीसाठी जे काही कारण आणि जे काही प्रत्यय आहे, ते देखील दुःखकारक आहे. भिक्षूंनो, दुःखापासून उत्पन्न झालेले धम्म सुखकारक कसे असू शकतील! असे पाहणारा... तसेच... ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही,’ असे तो जाणतो.” अकरावे. 12. බාහිරානත්තහෙතුසුත්තං १२. बाहिर-अनत्ता-हेतू सुत्त (बाह्य अनात्मतेचे कारण सुत्त) 145. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනත්තා. යොපි හෙතු, යොපි පච්චයො රූපානං උප්පාදාය, සොපි අනත්තා. අනත්තසම්භූතා, භික්ඛවෙ, රූපා කුතො අත්තා භවිස්සන්ති! සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනත්තා. යොපි හෙතු, යොපි පච්චයො ධම්මානං උප්පාදාය, සොපි අනත්තා. අනත්තසම්භූතා, භික්ඛවෙ, ධම්මා [Pg.346] කුතො අත්තා භවිස්සන්ති! එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, සද්දෙසුපි… ගන්ධෙසුපි… රසෙසුපි… ඵොට්ඨබ්බෙසුපි… ධම්මෙසුපි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. ද්වාදසමං. १४५. भिक्खूहो, रूप अनात्म आहेत. रूपांच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो देखील अनात्मच आहे. भिक्खूहो, अनात्मापासून उत्पन्न झालेले रूप कसे बरे आत्म असू शकतील? शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनात्म आहेत. धम्मांच्या उत्पत्तीसाठी जो काही हेतू आणि जो काही प्रत्यय आहे, तो देखील अनात्मच आहे. भिक्खूहो, अनात्मापासून उत्पन्न झालेले धम्म कसे बरे आत्म असू शकतील? भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक रूपांविषयी देखील निर्वेद पावतो, शब्दांविषयी देखील... गंधांविषयी... रसांविषयी... स्पर्शांविषयी... धम्मांविषयी देखील निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्याने तो विरक्त होतो; विरक्तीमुळे तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर 'मी मुक्त झालो आहे' असे ज्ञान होते. 'जन्म क्षीण झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे कर्तव्य होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरे काही करायचे उरले नाही' असे तो जाणतो. बारावे. දෙවදහවග්ගො චුද්දසමො. देवदहवग्गो चौदावा समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा संग्रह (उद्दान) पुढीलप्रमाणे – දෙවදහො ඛණො රූපා, ද්වෙ නතුම්හාකමෙව ච; හෙතුනාපි තයො වුත්තා, දුවෙ අජ්ඣත්තබාහිරාති. देवदह, खण, रूप, दोन 'न तुम्हाकं' (तुमचे नाही), हेतूने देखील तीन सांगितले आहेत, आणि दोन 'अध्यात्म-बाह्य' सांगितले आहेत. 15. නවපුරාණවග්ගො १५. नवपुराणवग्गो 1. කම්මනිරොධසුත්තං १. कम्मनिरोधसुत्त 146. ‘‘නවපුරාණානි, භික්ඛවෙ, කම්මානි දෙසෙස්සාමි කම්මනිරොධං කම්මනිරොධගාමිනිඤ්ච පටිපදං. තං සුණාථ, සාධුකං මනසි කරොථ; භාසිස්සාමීති. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, පුරාණකම්මං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, පුරාණකම්මං අභිසඞ්ඛතං අභිසඤ්චෙතයිතං වෙදනියං දට්ඨබ්බං…පෙ… ජිව්හා පුරාණකම්මා අභිසඞ්ඛතා අභිසඤ්චෙතයිතා වෙදනියා දට්ඨබ්බා…පෙ… මනො පුරාණකම්මො අභිසඞ්ඛතො අභිසඤ්චෙතයිතො වෙදනියො දට්ඨබ්බො. ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, පුරාණකම්මං. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, නවකම්මං? යං ඛො, භික්ඛවෙ, එතරහි කම්මං කරොති කායෙන වාචාය මනසා, ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, නවකම්මං. කතමො ච, භික්ඛවෙ, කම්මනිරොධො? යො ඛො, භික්ඛවෙ, කායකම්මවචීකම්මමනොකම්මස්ස නිරොධා විමුත්තිං ඵුසති, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, කම්මනිරොධො. කතමා ච, භික්ඛවෙ, කම්මනිරොධගාමිනී පටිපදා? අයමෙව අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි, සම්මාසඞ්කප්පො, සම්මාවාචා, සම්මාකම්මන්තො, සම්මාආජීවො, සම්මාවායාමො, සම්මාසති, සම්මාසමාධි – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, කම්මනිරොධගාමිනී පටිපදා. ඉති ඛො, භික්ඛවෙ, දෙසිතං මයා පුරාණකම්මං, දෙසිතං [Pg.347] නවකම්මං, දෙසිතො කම්මනිරොධො, දෙසිතා කම්මනිරොධගාමිනී පටිපදා. යං ඛො, භික්ඛවෙ, සත්ථාරා කරණීයං සාවකානං හිතෙසිනා අනුකම්පකෙන අනුකම්පං උපාදාය, කතං වො තං මයා. එතානි, භික්ඛවෙ, රුක්ඛමූලානි, එතානි සුඤ්ඤාගාරානි. ඣායථ, භික්ඛවෙ, මා පමාදත්ථ; මා පච්ඡාවිප්පටිසාරිනො අහුවත්ථ. අයං වො අම්හාකං අනුසාසනී’’ති. පඨමං. १४६. भिक्खूहो, मी तुम्हाला नवीन आणि जुने कर्म, कर्मनिरोध आणि कर्मनिरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा शिकवीन. ते ऐका, नीट मनन करा; मी सांगेन. भिक्खूहो, जुने कर्म कोणते? भिक्खूहो, चक्षु हे जुने कर्म आहे, जे संस्कारित, चेतनेने निर्माण केलेले आणि वेदनिय (अनुभव घेण्यास योग्य) म्हणून पाहिले पाहिजे... पे... जिव्हा हे जुने कर्म आहे, जे संस्कारित, चेतनेने निर्माण केलेले आणि वेदनिय म्हणून पाहिले पाहिजे... पे... मन हे जुने कर्म आहे, जे संस्कारित, चेतनेने निर्माण केलेले आणि वेदनिय म्हणून पाहिले पाहिजे. भिक्खूहो, याला जुने कर्म असे म्हणतात. आणि भिक्खूहो, नवीन कर्म कोणते? भिक्खूहो, सध्याच्या काळात मनुष्य काया, वाचा किंवा मनाने जे काही कर्म करतो, भिक्खूहो, याला नवीन कर्म असे म्हणतात. आणि भिक्खूहो, कर्मनिरोध म्हणजे काय? भिक्खूहो, कायकर्म, वचीकर्म आणि मनोकर्म यांच्या निरोधाने जो विमुक्ती प्राप्त करतो, भिक्खूहो, याला कर्मनिरोध असे म्हणतात. आणि भिक्खूहो, कर्मनिरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा कोणती? हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग होय, जसे की – सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृती, सम्यक समाधी. भिक्खूहो, याला कर्मनिरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा असे म्हणतात. अशा प्रकारे, भिक्खूहो, मी तुम्हाला जुने कर्म शिकवले आहे, नवीन कर्म शिकवले आहे, कर्मनिरोध शिकवला आहे आणि कर्मनिरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा शिकवली आहे. भिक्खूहो, शिष्यांचे कल्याण इच्छिणाऱ्या, त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगणाऱ्या कारुणिक शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करायला हवे, ते मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्खूहो, ही वृक्षमूळे आहेत, ही शून्यगृहे आहेत. भिक्खूहो, ध्यान करा, प्रमाद करू नका; नंतर पश्चात्ताप करणारे होऊ नका. हाच आमचा तुम्हाला उपदेश आहे. पहिले. 2. අනිච්චනිබ්බානසප්පායසුත්තං २. अनिच्चनिब्बानसप्पायसुत्त 147. ‘‘නිබ්බානසප්පායං වො, භික්ඛවෙ, පටිපදං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ…පෙ… කතමා ච සා, භික්ඛවෙ, නිබ්බානසප්පායා පටිපදා? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුං අනිච්චන්ති පස්සති, රූපා අනිච්චාති පස්සති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනිච්චන්ති පස්සති, චක්ඛුසම්ඵස්සො අනිච්චොති පස්සති. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චන්ති පස්සති…පෙ… ජිව්හා අනිච්චාති පස්සති, රසා අනිච්චාති පස්සති, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං අනිච්චන්ති පස්සති, ජිව්හාසම්ඵස්සො අනිච්චොති පස්සති, යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චන්ති පස්සති…පෙ… මනො අනිච්චොති පස්සති, ධම්මා අනිච්චාති පස්සති, මනොවිඤ්ඤාණං අනිච්චන්ති පස්සති, මනොසම්ඵස්සො අනිච්චොති පස්සති, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චන්ති පස්සති. අයං ඛො සා, භික්ඛවෙ, නිබ්බානසප්පායා පටිපදා’’ති. දුතියං. १४७. भिक्खूहो, मी तुम्हाला निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा शिकवीन. ती ऐका... पे... आणि भिक्खूहो, निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली ती प्रतिपदा कोणती? भिक्खूहो, या शासनात भिक्खू चक्षूला अनित्य म्हणून पाहतो, रूपांना अनित्य म्हणून पाहतो, चक्षु-विज्ञानाला अनित्य म्हणून पाहतो, चक्षु-स्पर्शाला अनित्य म्हणून पाहतो. चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो अनित्य म्हणून पाहतो... पे... जिव्हेला अनित्य म्हणून पाहतो, रसांना अनित्य म्हणून पाहतो, जिव्हा-विज्ञानाला अनित्य म्हणून पाहतो, जिव्हा-स्पर्शाला अनित्य म्हणून पाहतो, जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो अनित्य म्हणून पाहतो... पे... मनाला अनित्य म्हणून पाहतो, धम्मांना अनित्य म्हणून पाहतो, मनो-विज्ञानाला अनित्य म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाला अनित्य म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो अनित्य म्हणून पाहतो. भिक्खूहो, हीच ती निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा होय. दुसरे. 3. දුක්ඛනිබ්බානසප්පායසුත්තං ३. दुक्खनिब्बानसप्पायसुत्त 148. ‘‘නිබ්බානසප්පායං වො, භික්ඛවෙ, පටිපදං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ…පෙ… කතමා ච සා, භික්ඛවෙ, නිබ්බානසප්පායා පටිපදා? ඉධ, භික්ඛවෙ, චක්ඛුං දුක්ඛන්ති පස්සති, රූපා දුක්ඛාති පස්සති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං දුක්ඛන්ති පස්සති, චක්ඛුසම්ඵස්සො දුක්ඛොති පස්සති, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි දුක්ඛන්ති පස්සති…පෙ… ජිව්හා දුක්ඛාති පස්සති…පෙ… මනො දුක්ඛොති පස්සති, ධම්මා දුක්ඛාති පස්සති, මනොවිඤ්ඤාණං දුක්ඛන්ති පස්සති, මනොසම්ඵස්සො දුක්ඛොති පස්සති, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි [Pg.348] දුක්ඛන්ති පස්සති. අයං ඛො සා, භික්ඛවෙ, නිබ්බානසප්පායා පටිපදා’’ති. තතියං. १४८. भिक्खूहो, मी तुम्हाला निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा शिकवीन. ती ऐका... पे... आणि भिक्खूहो, निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली ती प्रतिपदा कोणती? भिक्खूहो, या शासनात भिक्खू चक्षूला दुःख म्हणून पाहतो, रूपांना दुःख म्हणून पाहतो, चक्षु-विज्ञानाला दुःख म्हणून पाहतो, चक्षु-स्पर्शाला दुःख म्हणून पाहतो. चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो दुःख म्हणून पाहतो... पे... जिव्हेला दुःख म्हणून पाहतो... पे... मनाला दुःख म्हणून पाहतो, धम्मांना दुःख म्हणून पाहतो, मनो-विज्ञानाला दुःख म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाला दुःख म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो दुःख म्हणून पाहतो. भिक्खूहो, हीच ती निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा होय. तिसरे. 4. අනත්තනිබ්බානසප්පායසුත්තං ४. अनत्तनिब्बानसप्पायसुत्त 149. ‘‘නිබ්බානසප්පායං වො, භික්ඛවෙ, පටිපදං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ…පෙ… කතමා ච සා, භික්ඛවෙ, නිබ්බානසප්පායා පටිපදා? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුං අනත්තාති පස්සති, රූපා අනත්තාති පස්සති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනත්තාති පස්සති, චක්ඛුසම්ඵස්සො අනත්තාති පස්සති, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනත්තාති පස්සති…පෙ… මනො අනත්තාති පස්සති, ධම්මා අනත්තාති පස්සති, මනොවිඤ්ඤාණං අනත්තාති පස්සති, මනොසම්ඵස්සො අනත්තාති පස්සති, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනත්තාති පස්සති. අයං ඛො සා, භික්ඛවෙ, නිබ්බානසප්පායා පටිපදා’’ති. චතුත්ථං. १४९. भिक्खूहो, मी तुम्हाला निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा शिकवीन. ती ऐका... पे... आणि भिक्खूहो, निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली ती प्रतिपदा कोणती? भिक्खूहो, या शासनात भिक्खू चक्षूला अनात्म म्हणून पाहतो, रूपांना अनात्म म्हणून पाहतो, चक्षु-विज्ञानाला अनात्म म्हणून पाहतो, चक्षु-स्पर्शाला अनात्म म्हणून पाहतो. चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो अनात्म म्हणून पाहतो... पे... मनाला अनात्म म्हणून पाहतो, धम्मांना अनात्म म्हणून पाहतो, मनो-विज्ञानाला अनात्म म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाला अनात्म म्हणून पाहतो, मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील तो अनात्म म्हणून पाहतो. भिक्खूहो, हीच ती निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा होय. चौथे. 5. නිබ්බානසප්පායපටිපදාසුත්තං ५. निर्वाणसप्पायपटिपदा सुत्त 150. ‘‘නිබ්බානසප්පායං වො, භික්ඛවෙ, පටිපදං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ…පෙ… කතමා ච සා, භික්ඛවෙ, නිබ්බානසප්පායා පටිපදා? තං කිං මඤ්ඤථ, භික්ඛවෙ, චක්ඛු නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? १५०. “भिक्षूंनो, मी तुम्हांला निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा (मार्ग) देशना करीन. ती ऐका... आणि भिक्षूंनो, निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली ती प्रतिपदा कोणती? भिक्षूंनो, तुम्हांला काय वाटते, चक्षु (डोळा) नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील (विपरिणामधम्म) आहे, त्याविषयी 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘රූපා නිච්චා වා අනිච්චා වා’’ති? “रूपे नित्य आहेत की अनित्य?” ‘‘අනිච්චා, භන්තෙ’’…පෙ…. “अनित्य आहेत, भन्ते.” ...पे... ‘‘චක්ඛුවිඤ්ඤාණං… චක්ඛුසම්ඵස්සො…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “चक्षुविज्ञान... चक्षुसंस्पर्श... पे... मनःसंस्पर्शामुळे उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद (उदासीन) अशी जी काही वेदना आहे, ती नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “आणि जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “आणि जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील आहे, त्याविषयी 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති …පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාති. අයං ඛො සා, භික්ඛවෙ, නිබ්බානසප්පායා පටිපදා’’ති. පඤ්චමං. “भिक्षूंनो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयीही विरक्त होतो, रूपांविषयीही विरक्त होतो, चक्षुविज्ञानाविषयीही विरक्त होतो, चक्षुसंस्पर्शाविषयीही विरक्त होतो... पे... मनःसंस्पर्शामुळे उत्पन्न होणारी सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद अशी जी काही वेदना आहे, तिच्याविषयीही विरक्त होतो. विरक्त झाल्यामुळे तो रागरहित होतो; विरागामुळे तो विमुक्त होतो... पे... 'आता या जन्मानंतर काही कर्तव्य उरले नाही' हे तो जाणतो. भिक्षूंनो, हीच ती निर्वाणासाठी अनुकूल असलेली प्रतिपदा होय.” पाचवे. 6. අන්තෙවාසිකසුත්තං ६. अंतेवासिक सुत्त 151. ‘‘අනන්තෙවාසිකමිදං[Pg.349], භික්ඛවෙ, බ්රහ්මචරියං වුස්සති අනාචරියකං. සන්තෙවාසිකො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සාචරියකො දුක්ඛං න ඵාසු විහරති. අනන්තෙවාසිකො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අනාචරියකො සුඛං ඵාසු විහරති. කථඤ්ච, භික්ඛු, සන්තෙවාසිකො සාචරියකො දුක්ඛං න ඵාසු විහරති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො චක්ඛුනා රූපං දිස්වා උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. ත්යාස්ස අන්තො වසන්ති, අන්තස්ස වසන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා සන්තෙවාසිකොති වුච්චති. තෙ නං සමුදාචරන්ති, සමුදාචරන්ති නං පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා සාචරියකොති වුච්චති…පෙ…. १५१. “भिक्षूंनो, हे ब्रह्मचर्य अंतेवासिकाशिवाय (शिष्याशिवाय) आणि आचार्याशिवाय (गुरूशिवाय) जगले जाते. भिक्षूंनो, जो भिक्षू अंतेवासिकासह आणि आचार्यासह राहतो, तो दुःखात राहतो, सुखाने राहत नाही. भिक्षूंनो, जो भिक्षू अंतेवासिकाशिवाय आणि आचार्याशिवाय राहतो, तो सुखाने आणि आरामात राहतो. आणि भिक्षूंनो, अंतेवासिकासह आणि आचार्यासह राहणारा भिक्षू दुःखात आणि असुखात कसा राहतो? भिक्षूंनो, येथे जेव्हा भिक्षू डोळ्याने रूप पाहतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला (बंधनाला) कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होतात. ते त्याच्या आत राहतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत असल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिक असलेला' (शिष्य असलेला) असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत असल्यामुळे त्याला 'साचारिक' (आचार्य असलेला) असे म्हणतात... पे... ‘‘පුන චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො ජිව්හාය රසං සායිත්වා උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. ත්යාස්ස අන්තො වසන්ති, අන්තස්ස වසන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා සන්තෙවාසිකොති වුච්චති. තෙ නං සමුදාචරන්ති, සමුදාචරන්ති නං පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා සාචරියකොති වුච්චති…පෙ…. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्षूंनो, भिक्षूने जिभेने रसाची चव घेतली असता, त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होतात. ते त्याच्या आत राहतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत असल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिक असलेला' असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत असल्यामुळे त्याला 'साचारिक' असे म्हणतात... पे... ‘‘පුන චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. ත්යාස්ස අන්තො වසන්ති, අන්තස්ස වසන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා සන්තෙවාසිකොති වුච්චති. තෙ නං සමුදාචරන්ති, සමුදාචරන්ති නං පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා සාචරියකොති වුච්චති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සන්තෙවාසිකො සාචරියකො දුක්ඛං, න ඵාසු විහරති. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्षूंनो, भिक्षूने मनाने धर्माला (विचाराला) जाणले असता, त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होतात. ते त्याच्या आत राहतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत असल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिक असलेला' असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवतात; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत असल्यामुळे त्याला 'साचारिक' असे म्हणतात. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे अंतेवासिकासह आणि आचार्यासह राहणारा भिक्षू दुःखात राहतो, सुखाने राहत नाही.” ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අනන්තෙවාසිකො අනාචරියකො සුඛං ඵාසු විහරති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො චක්ඛුනා රූපං දිස්වා න උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. ත්යාස්ස න අන්තො වසන්ති, නාස්ස අන්තො වසන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා අනන්තෙවාසිකොති වුච්චති. තෙ නං න සමුදාචරන්ති, න සමුදාචරන්ති නං පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා අනාචරියකොති වුච්චති…පෙ…. “आणि भिक्षूंनो, अंतेवासिकाशिवाय आणि आचार्याशिवाय राहणारा भिक्षू सुखाने आणि आरामात कसा राहतो? भिक्षूंनो, येथे जेव्हा भिक्षू डोळ्याने रूप पाहतो, तेव्हा त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होत नाहीत. ते त्याच्या आत राहत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत नसल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिकाशिवाय असलेला' (शिष्याशिवाय असलेला) असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत नसल्यामुळे त्याला 'आचार्याशिवाय असलेला' (गुरूशिवाय असलेला) असे म्हणतात... पे...” ‘‘පුන චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො ජිව්හාය රසං සායිත්වා න උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. ත්යාස්ස න අන්තො වසන්ති, නාස්ස [Pg.350] අන්තො වසන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා අනන්තෙවාසිකොති වුච්චති. තෙ නං න සමුදාචරන්ති, න සමුදාචරන්ති නං පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා අනාචරියකොති වුච්චති…පෙ…. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्षूंनो, भिक्षूने जिभेने रसाची चव घेतली असता, त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होत नाहीत. ते त्याच्या आत राहत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत नसल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिकाशिवाय असलेला' असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत नसल्यामुळे त्याला 'आचार्याशिवाय असलेला' असे म्हणतात... पे...” ‘‘පුන චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය න උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා. ත්යාස්ස න අන්තො වසන්ති, නාස්ස අන්තො වසන්ති පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා අනන්තෙවාසිකොති වුච්චති. තෙ නං න සමුදාචරන්ති, න සමුදාචරන්ති නං පාපකා අකුසලා ධම්මාති. තස්මා අනාචරියකොති වුච්චති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අනන්තෙවාසිකො අනාචරියකො සුඛං ඵාසු විහරති. අනන්තෙවාසිකමිදං, භික්ඛවෙ, බ්රහ්මචරියං වුස්සති. අනාචරියකං සන්තෙවාසිකො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සාචරියකො දුක්ඛං, න ඵාසු විහරති. අනන්තෙවාසිකො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අනාචරියකො සුඛං ඵාසු විහරතී’’ති. ඡට්ඨං. “पुन्हा दुसरे असे की, भिक्षूंनो, भिक्षूने मनाने धर्माला जाणले असता, त्याच्यामध्ये पापी, अकुशल धर्म, आसक्तीयुक्त विचार आणि संयोजनाला कारणीभूत असणारे विचार उत्पन्न होत नाहीत. ते त्याच्या आत राहत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्या आत राहत नसल्यामुळे त्याला 'अंतेवासिकाशिवाय असलेला' असे म्हणतात. ते त्याच्यावर ताबा मिळवत नाहीत; पापी आणि अकुशल धर्म त्याच्यावर ताबा मिळवत नसल्यामुळे त्याला 'आचार्याशिवाय असलेला' असे म्हणतात. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे अंतेवासिकाशिवाय आणि आचार्याशिवाय राहणारा भिक्षू सुखाने आणि आरामात राहतो. भिक्षूंनो, हे ब्रह्मचर्य अंतेवासिकाशिवाय आणि आचार्याशिवाय जगले जाते. भिक्षूंनो, जो भिक्षू अंतेवासिकासह आणि आचार्यासह राहतो, तो दुःखात राहतो, सुखाने राहत नाही. जो भिक्षू अंतेवासिकाशिवाय आणि आचार्याशिवाय राहतो, तो सुखाने आणि आरामात राहतो.” सहावे. 7. කිමත්ථියබ්රහ්මචරියසුත්තං ७. किमत्थियब्रह्मचर्य सुत्त 152. ‘‘සචෙ වො, භික්ඛවෙ, අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා එවං පුච්ඡෙය්යුං – ‘කිමත්ථියං, ආවුසො, සමණෙ ගොතමෙ බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’ති? එවං පුට්ඨා තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, තෙසං අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං බ්යාකරෙය්යාථ – ‘දුක්ඛස්ස ඛො, ආවුසො, පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’ති. සචෙ පන වො, භික්ඛවෙ, අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා එවං පුච්ඡෙය්යුං – ‘කතමං පනාවුසො, දුක්ඛං, යස්ස පරිඤ්ඤාය සමණෙ ගොතමෙ බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’ති? එවං පුට්ඨා තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, තෙසං අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං බ්යාකරෙය්යාථ – १५२. “भिक्षूंनो, जर इतर पंथांचे (अन्यतीर्थीय) परिव्राजक तुम्हांला असे विचारतील की—'मित्रांनो, श्रमण गोतमांच्या सान्निध्यात ब्रह्मचर्य कशासाठी जगले जाते?'—तर भिक्षूंनो, असे विचारले असता तुम्ही त्या अन्यतीर्थीय परिव्राजकांना असे उत्तर द्यावे—'मित्रांनो, दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी (पूर्ण आकलनासाठी) भगवंतांच्या सान्निध्यात ब्रह्मचर्य जगले जाते.' पण भिक्षूंनो, जर ते अन्यतीर्थीय परिव्राजक तुम्हांला असे विचारतील की—'पण मित्रांनो, ते दुःख कोणते, ज्याच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी श्रमण गोतमांच्या सान्निध्यात ब्रह्मचर्य जगले जाते?'—तर भिक्षूंनो, असे विचारले असता तुम्ही त्या अन्यतीर्थीय परिव्राजकांना असे उत्तर द्यावे—” ‘‘චක්ඛු ඛො, ආවුසො, දුක්ඛං; තස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සති. රූපා දුක්ඛා; තෙසං පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සති. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං දුක්ඛං; තස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සති. චක්ඛුසම්ඵස්සො දුක්ඛො; තස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සති. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි දුක්ඛං; තස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සති…පෙ… ජිව්හා දුක්ඛා… මනො දුක්ඛො; තස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සති…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි දුක්ඛං; තස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සති. ඉදං ඛො, ආවුසො[Pg.351], දුක්ඛං; යස්ස පරිඤ්ඤාය භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’ති. එවං පුට්ඨා තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, තෙසං අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං බ්යාකරෙය්යාථා’’ති. සත්තමං. “मित्रांनो, डोळा दुःखकारक आहे; त्याच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. रूपे दुःखकारक आहेत; त्यांच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. चक्षू-विज्ञान दुःखकारक आहे; त्याच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. चक्षू-संस्पर्श दुःखकारक आहे; त्याच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःखद-अ-सुखद वेदना उत्पन्न होते, ती देखील दुःखकारक आहे; तिच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते...पे०... जीभ दुःखकारक आहे... मन दुःखकारक आहे; त्याच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते...पे०... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जी काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःखद-अ-सुखद वेदना उत्पन्न होते, ती देखील दुःखकारक आहे; तिच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. मित्रांनो, हेच ते दुःख आहे, ज्याच्या परिपूर्ण ज्ञानासाठी भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते. भिक्षूंनो, असे विचारले असता, तुम्ही त्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे उत्तर दिले पाहिजे.” सातवे सुत्त। 8. අත්ථිනුඛොපරියායසුත්තං ८. अत्थिनुखोपरियायसुत्त 153. ‘‘අත්ථි නු ඛො, භික්ඛවෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම භික්ඛු අඤ්ඤත්රෙව සද්ධාය, අඤ්ඤත්ර රුචියා, අඤ්ඤත්ර අනුස්සවා, අඤ්ඤත්ර ආකාරපරිවිතක්කා, අඤ්ඤත්ර දිට්ඨිනිජ්ඣානක්ඛන්තියා අඤ්ඤං බ්යාකරෙය්ය – ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාමී’’ති ? ‘‘භගවංමූලකා නො, භන්තෙ, ධම්මා, භගවංනෙත්තිකා භගවංපටිසරණා. සාධු වත, භන්තෙ, භගවන්තංයෙව පටිභාතු එතස්ස භාසිතස්ස අත්ථො. භගවතො සුත්වා භික්ඛූ ධාරෙස්සන්තී’’ති. ‘‘තෙන හි, භික්ඛවෙ, සුණාථ, සාධුකං මනසි කරොථ; භාසිස්සාමී’’ති. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො තෙ භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං. භගවා එතදවොච – ‘‘අත්ථි, භික්ඛවෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම භික්ඛු අඤ්ඤත්රෙව සද්ධාය, අඤ්ඤත්ර රුචියා, අඤ්ඤත්ර අනුස්සවා, අඤ්ඤත්ර ආකාරපරිවිතක්කා, අඤ්ඤත්ර දිට්ඨිනිජ්ඣානක්ඛන්තියා අඤ්ඤං බ්යාකරෙය්ය – ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාමී’’ති. १५३. “भिक्षूंनो, अशी एखादी पद्धत आहे का, जिचा अवलंब करून एखादा भिक्षू—श्रद्धेशिवाय, वैयक्तिक आवडीशिवाय, परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीशिवाय, तार्किक विचाराशिवाय, आणि एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय—अंतिम ज्ञान घोषित करू शकेल की: ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे मी जाणतो?” “भन्ते, आमची शिकवण भगवंतांवर आधारित आहे, भगवंतच आमचे मार्गदर्शक आहेत आणि भगवंतच आमचे आश्रयस्थान आहेत. भन्ते, हे फार चांगले होईल जर भगवंतांनीच या विधानाचा अर्थ स्पष्ट केला. भगवंतांकडून ऐकून भिक्षू ते लक्षात ठेवतील.” “तसे असेल तर, भिक्षूंनो, लक्षपूर्वक ऐका आणि नीट मनन करा; मी सांगेन.” “होय, भन्ते,” असे म्हणून त्या भिक्षूंनी भगवंतांना प्रतिसाद दिला. भगवंत म्हणाले: “भिक्षूंनो, अशी एक पद्धत आहे, जिचा अवलंब करून एखादा भिक्षू—श्रद्धेशिवाय, वैयक्तिक आवडीशिवाय, परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीशिवाय, तार्किक विचाराशिवाय, आणि एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय—अंतिम ज्ञान घोषित करू शकतो की: ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे मी जाणतो.” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, පරියායො, යං පරියායං ආගම්ම භික්ඛු අඤ්ඤත්රෙව සද්ධාය…පෙ… අඤ්ඤත්ර දිට්ඨිනිජ්ඣානක්ඛන්තියා අඤ්ඤං බ්යාකරොති – ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාමී’ති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා සන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති; අසන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති. යං තං, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා සන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති; අසන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති. අපි නුමෙ, භික්ඛවෙ, ධම්මා සද්ධාය වා වෙදිතබ්බා, රුචියා වා වෙදිතබ්බා, අනුස්සවෙන වා වෙදිතබ්බා, ආකාරපරිවිතක්කෙන වා වෙදිතබ්බා, දිට්ඨිනිජ්ඣානක්ඛන්තියා වා වෙදිතබ්බා’’ති? ‘‘නො හෙතං[Pg.352], භන්තෙ’’. ‘‘නනුමෙ, භික්ඛවෙ, ධම්මා පඤ්ඤාය දිස්වා වෙදිතබ්බා’’ති? ‘‘එවං, භන්තෙ’’. ‘‘අයං ඛො, භික්ඛවෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම භික්ඛු අඤ්ඤත්රෙව සද්ධාය, අඤ්ඤත්ර රුචියා, අඤ්ඤත්ර අනුස්සවා, අඤ්ඤත්ර ආකාරපරිවිතක්කා, අඤ්ඤත්ර දිට්ඨිනිජ්ඣානක්ඛන්තියා අඤ්ඤං බ්යාකරොති – ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාමී’’ති…පෙ…. “आणि भिक्षूंनो, ती कोणती पद्धत आहे, जिचा अवलंब करून भिक्षू श्रद्धेशिवाय...पे०... मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय अंतिम ज्ञान घोषित करतो की—‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे मी जाणतो? इथे, भिक्षूंनो, एखादा भिक्षू डोळ्याने रूप पाहून, जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह आहे’; किंवा जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नाही’. भिक्षूंनो, जेव्हा एखादा भिक्षू डोळ्याने रूप पाहून, जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह आहे’; किंवा जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नाही’. भिक्षूंनो, या गोष्टी काय केवळ श्रद्धेने जाणायच्या आहेत, किंवा आवडीने, किंवा परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीने, किंवा तार्किक विचाराने, किंवा एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याने जाणायच्या आहेत का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “भिक्षूंनो, या गोष्टी प्रज्ञेने पाहून जाणायच्या नाहीत का?” “होय, भन्ते.” “भिक्षूंनो, हीच ती पद्धत आहे, जिचा अवलंब करून भिक्षू केवळ श्रद्धेशिवाय, वैयक्तिक आवडीशिवाय, परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीशिवाय, तार्किक विचाराशिवाय, आणि एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय अंतिम ज्ञान घोषित करतो की: ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे मी जाणतो.”...पे०... ‘‘පුන චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ජිව්හාය රසං සායිත්වා සන්තං වා අජ්ඣත්තං…පෙ… රාගදොසමොහොති පජානාති; අසන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති. යං තං, භික්ඛවෙ, ජිව්හාය රසං සායිත්වා සන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති; අසන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති; අපි නුමෙ, භික්ඛවෙ, ධම්මා සද්ධාය වා වෙදිතබ්බා, රුචියා වා වෙදිතබ්බා, අනුස්සවෙන වා වෙදිතබ්බා, ආකාරපරිවිතක්කෙන වා වෙදිතබ්බා, දිට්ඨිනිජ්ඣානක්ඛන්තියා වා වෙදිතබ්බා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘නනුමෙ, භික්ඛවෙ, ධම්මා පඤ්ඤාය දිස්වා වෙදිතබ්බා’’ති? ‘‘එවං, භන්තෙ’’. ‘‘අයම්පි ඛො, භික්ඛවෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම භික්ඛු අඤ්ඤත්රෙව සද්ධාය, අඤ්ඤත්ර රුචියා, අඤ්ඤත්ර අනුස්සවා, අඤ්ඤත්ර ආකාරපරිවිතක්කා, අඤ්ඤත්ර දිට්ඨිනිජ්ඣානක්ඛන්තියා අඤ්ඤං බ්යාකරොති – ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාමී’’ති …පෙ…. “पुन्हा पुढे, भिक्षूंनो, एखादा भिक्षू जिभेने चव घेऊन, जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत...पे०... राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह आहे’; किंवा जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नाही’. भिक्षूंनो, जेव्हा एखादा भिक्षू जिभेने चव घेऊन, जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह आहे’; किंवा जर त्याच्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: ‘माझ्यामध्ये अंतर्गत राग, द्वेष किंवा मोह नाही’. भिक्षूंनो, या गोष्टी काय केवळ श्रद्धेने जाणायच्या आहेत, किंवा आवडीने, किंवा परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीने, किंवा तार्किक विचाराने, किंवा एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याने जाणायच्या आहेत का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “भिक्षूंनो, या गोष्टी प्रज्ञेने पाहून जाणायच्या नाहीत का?” “होय, भन्ते.” “भिक्षूंनो, ही देखील ती पद्धत आहे, जिचा अवलंब करून भिक्षू केवळ श्रद्धेशिवाय, वैयक्तिक आवडीशिवाय, परंपरेने ऐकलेल्या गोष्टीशिवाय, तार्किक विचाराशिवाय, आणि एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय अंतिम ज्ञान घोषित करतो की: ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही’ असे मी जाणतो.”...पे०... ‘‘පුන චපරං, භික්ඛවෙ, භික්ඛු මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය සන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති; අසන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති. යං තං, භික්ඛවෙ, භික්ඛු මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය සන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, අත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති; අසන්තං වා අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහං, නත්ථි මෙ අජ්ඣත්තං රාගදොසමොහොති පජානාති; අපි නුමෙ, භික්ඛවෙ, ධම්මා සද්ධාය වා වෙදිතබ්බා, රුචියා වා වෙදිතබ්බා, අනුස්සවෙන වා වෙදිතබ්බා, ආකාරපරිවිතක්කෙන වා වෙදිතබ්බා, දිට්ඨිනිජ්ඣානක්ඛන්තියා වා වෙදිතබ්බා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘නනුමෙ, භික්ඛවෙ, ධම්මා පඤ්ඤාය දිස්වා වෙදිතබ්බා’’ති? ‘‘එවං, භන්තෙ’’. ‘‘අයම්පි ඛො, භික්ඛවෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම භික්ඛු [Pg.353] අඤ්ඤත්රෙව සද්ධාය, අඤ්ඤත්ර රුචියා, අඤ්ඤත්ර අනුස්සවා, අඤ්ඤත්ර ආකාරපරිවිතක්කා, අඤ්ඤත්ර දිට්ඨිනිජ්ඣානක්ඛන්තියා අඤ්ඤං බ්යාකරොති – ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාමී’’ති. අට්ඨමං. "पुन्हा आणखी, भिक्षूंनो, जेव्हा एखादा भिक्षू मनाने धम्माला (मानसिक विषयाला) जाणून, जर त्याच्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: 'माझ्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह आहे'; किंवा जर त्याच्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: 'माझ्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह नाही.' भिक्षूंनो, जो भिक्षू मनाने धम्माला जाणून, जर त्याच्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह असेल, तर तो जाणतो: 'माझ्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह आहे'; किंवा जर त्याच्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह नसेल, तर तो जाणतो: 'माझ्यामध्ये आंतरिक राग, द्वेष किंवा मोह नाही'; तर मग, भिक्षूंनो, हे धम्म केवळ श्रद्धेने जाणले पाहिजेत का, किंवा आवडीने (रुचीने) जाणले पाहिजेत का, किंवा परंपरेने (ऐकीव माहितीने) जाणले पाहिजेत का, किंवा तार्किक विचाराने (आकारपरिवितर्काने) जाणले पाहिजेत का, किंवा एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याने (दृष्टिनिझानखंतीने) जाणले पाहिजेत का?" "नाही, भन्ते." "भिक्षूंनो, हे धम्म प्रज्ञेने पाहून जाणले पाहिजेत की नाही?" "होय, भन्ते." "भिक्षूंनो, हीच ती पद्धत (पर्याय) आहे, ज्याचा आश्रय घेऊन भिक्षू—श्रद्धेशिवाय, आवडीशिवाय, परंपरेशिवाय, तार्किक विचाराशिवाय, एखाद्या मताचा विचार करून स्वीकार करण्याशिवाय—अंतिम ज्ञान (अर्हत्त्व) घोषित करतो की: 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही' असे मी जाणतो." आठवे. 9. ඉන්ද්රියසම්පන්නසුත්තං ९. इंद्रियसंपन्न सुत्त 154. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො සො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘‘ඉන්ද්රියසම්පන්නො, ඉන්ද්රියසම්පන්නො’ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, ඉන්ද්රියසම්පන්නො හොතී’’ති? १५४. तेव्हा एक भिक्षू जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसून तो भिक्षू भगवंतांना म्हणाला— "भन्ते, 'इंद्रियसंपन्न, इंद्रियसंपन्न' असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात मनुष्य इंद्रियसंपन्न होतो?" ‘‘චක්ඛුන්ද්රියෙ චෙ, භික්ඛු, උදයබ්බයානුපස්සී විහරන්තො චක්ඛුන්ද්රියෙ නිබ්බින්දති…පෙ… ජිව්හින්ද්රියෙ චෙ, භික්ඛු, උදයබ්බයානුපස්සී විහරන්තො ජිව්හින්ද්රියෙ නිබ්බින්දති…පෙ… මනින්ද්රියෙ චෙ, භික්ඛු, උදයබ්බයානුපස්සී විහරන්තො මනින්ද්රියෙ නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති…පෙ… විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාති. එත්තාවතා ඛො, භික්ඛු, ඉන්ද්රියසම්පන්නො හොතී’’ති. නවමං. "भिक्षू, जर एखादा भिक्षू चक्षुरिंद्रियाच्या (डोळ्याच्या इंद्रियाच्या) उत्पत्ती आणि विनाशाचे वारंवार अनुदर्शन करत विहरतो, तेव्हा तो चक्षुरिंद्रियाविषयी विरक्त (निर्विण्ण) होतो... जिव्हा-इंद्रियाच्या (जिभेच्या इंद्रियाच्या) उत्पत्ती आणि विनाशाचे वारंवार अनुदर्शन करत विहरतो, तेव्हा तो जिव्हा-इंद्रियाविषयी विरक्त होतो... मन-इंद्रियाच्या उत्पत्ती आणि विनाशाचे वारंवार अनुदर्शन करत विहरतो, तेव्हा तो मन-इंद्रियाविषयी विरक्त होतो. विरक्त होऊन तो रागरहित होतो... चित्त विमुक्त झाल्यावर 'ते विमुक्त झाले आहे' असे ज्ञान होते. तो जाणतो: 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही.' भिक्षू, एवढ्या प्रमाणात मनुष्य इंद्रियसंपन्न होतो." नववे. 10. ධම්මකථිකපුච්ඡසුත්තං १०. धम्मकथिकपुच्छा सुत्त 155. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො සො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘‘ධම්මකථිකො, ධම්මකථිකො’ති, භන්තෙ, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, ධම්මකථිකො හොතී’’ති? १५५. तेव्हा एक भिक्षू जेथे भगवान होते तेथे गेला... आणि एका बाजूला बसून तो भिक्षू भगवंतांना म्हणाला— "भन्ते, 'धम्मकथिक (धम्म प्रवचनकार), धम्मकथिक' असे म्हटले जाते. भन्ते, किती प्रमाणात मनुष्य धम्मकथिक होतो?" ‘‘චක්ඛුස්ස චෙ, භික්ඛු නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය ධම්මං දෙසෙති, ‘ධම්මකථිකො භික්ඛූ’ති අලංවචනාය. චක්ඛුස්ස චෙ, භික්ඛු, නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොති, ‘ධම්මානුධම්මප්පටිපන්නො භික්ඛූ’ති අලංවචනාය. චක්ඛුස්ස චෙ, භික්ඛු, නිබ්බිදා විරාගා නිරොධා අනුපාදාවිමුත්තො හොති, ‘දිට්ඨධම්මනිබ්බානප්පත්තො භික්ඛූ’ති අලංවචනාය…පෙ… ජිව්හාය චෙ, භික්ඛු, නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය ධම්මං දෙසෙති, ‘ධම්මකථිකො භික්ඛූ’ති අලංවචනාය…පෙ… මනස්ස චෙ, භික්ඛු, නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය ධම්මං දෙසෙති, ‘ධම්මකථිකො භික්ඛූ’ති අලංවචනාය. මනස්ස චෙ, භික්ඛු, නිබ්බිදාය විරාගාය නිරොධාය පටිපන්නො හොති, ‘ධම්මානුධම්මප්පටිපන්නො භික්ඛූ’ති අලංවචනාය. මනස්ස [Pg.354] චෙ, භික්ඛු, නිබ්බිදා විරාගා නිරොධා අනුපාදාවිමුත්තො හොති, ‘දිට්ඨධම්මනිබ්බානප්පත්තො භික්ඛූ’ති අලංවචනායා’’ති. දසමං. "भिक्षू, जर एखादा भिक्षू चक्षूच्या (डोळ्याच्या) विरक्तीसाठी (निर्वेदासाठी), विरागासाठी आणि निरोधासाठी धम्माचा उपदेश करतो, तर त्याला 'धम्मकथिक भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे. जर एखादा भिक्षू चक्षूच्या विरक्तीसाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी प्रतिपन्न (साधना करत) असतो, तर त्याला 'धम्मानुधम्मप्रतिपन्न भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे. जर एखादा भिक्षू चक्षूच्या विरक्तीमुळे, विरागामुळे आणि निरोधामुळे उपादानरहित होऊन विमुक्त होतो, तर त्याला 'दृष्टधम्मनिर्वाणप्राप्त भिक्षू' (याच जन्मात निर्वाण प्राप्त केलेला भिक्षू) म्हणणे योग्य आहे... जिभेच्या विरक्तीसाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी धम्माचा उपदेश करतो, तर त्याला 'धम्मकथिक भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे... मनाच्या विरक्तीसाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी धम्माचा उपदेश करतो, तर त्याला 'धम्मकथिक भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे. जर एखादा भिक्षू मनाच्या विरक्तीसाठी, विरागासाठी आणि निरोधासाठी प्रतिपन्न असतो, तर त्याला 'धम्मानुधम्मप्रतिपन्न भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे. जर एखादा भिक्षू मनाच्या विरक्तीमुळे, विरागामुळे आणि निरोधामुळे उपादानरहित होऊन विमुक्त होतो, तर त्याला 'दृष्टधम्मनिर्वाणप्राप्त भिक्षू' म्हणणे योग्य आहे." दहावे. නවපුරාණවග්ගො පඤ්චදසමො. नवपुराणवर्ग पंधरावा समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचे उद्दान (विषयसूची) – කම්මං චත්තාරි සප්පායා, අනන්තෙවාසි කිමත්ථියා; අත්ථි නු ඛො පරියායො, ඉන්ද්රියකථිකෙන චාති. कम्म सुत्त, चार सप्पाय सुत्ते, अनन्तेवासी सुत्त, किमत्थिय सुत्त, अत्थि नु खो परियाय सुत्त, इंद्रिय सुत्त आणि धम्मकथिक सुत्त; हे दहा सुत्ते आहेत. සළායතනවග්ගෙ තතියපණ්ණාසකො සමත්තො. सळायतनवर्गातील तिसरा पन्नासक (पन्नास सुत्तांचा समूह) समाप्त झाला. තස්ස වග්ගුද්දානං – त्याचे वर्ग-उद्दान – යොගක්ඛෙමි ච ලොකො ච, ගහපති දෙවදහෙන ච; නවපුරාණෙන පණ්ණාසො, තතියො තෙන වුච්චතීති. योगक्खेमी वर्ग, लोक वर्ग, गृहपती वर्ग, देवदह वर्ग आणि नवपुराण वर्ग; यामुळे याला तिसरा पन्नासक म्हटले जाते. 16. නන්දික්ඛයවග්ගො १६. नंदिक्षय वर्ग 1. අජ්ඣත්තනන්දික්ඛයසුත්තං १. अज्झत्त नन्दिक्खय सुत्त (आध्यात्मिक नंदिक्षय सुत्त) 156. ‘‘අනිච්චංයෙව, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුං අනිච්චන්ති පස්සති, සාස්ස හොති සම්මාදිට්ඨි. සම්මා පස්සං නිබ්බින්දති. නන්දික්ඛයා රාගක්ඛයො; රාගක්ඛයා නන්දික්ඛයො. නන්දිරාගක්ඛයා චිත්තං සුවිමුත්තන්ති වුච්චති…පෙ… අනිච්චංයෙව, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ජිව්හං අනිච්චන්ති පස්සති, සාස්ස හොති සම්මාදිට්ඨි. සම්මා පස්සං නිබ්බින්දති. නන්දික්ඛයා රාගක්ඛයො; රාගක්ඛයා…පෙ… චිත්තං සුවිමුත්තන්ති වුච්චති…පෙ… අනිච්චංයෙව, භික්ඛවෙ, භික්ඛු මනං අනිච්චන්ති පස්සති, සාස්ස හොති සම්මාදිට්ඨි. සම්මා පස්සං නිබ්බින්දති. නන්දික්ඛයා රාගක්ඛයො; රාගක්ඛයා නන්දික්ඛයො. නන්දිරාගක්ඛයා චිත්තං සුවිමුත්තන්ති වුච්චතී’’ති. පඨමං. १५६. "भिक्षूंनो, जो खरोखर अनित्य असलेल्या चक्षूला (डोळ्याला) 'अनित्य' म्हणून पाहतो, ती त्याची सम्यक् दृष्टी असते. सम्यक् प्रकारे पाहणारा विरक्त होतो. नंदीच्या (आनंदाच्या/आसक्तीच्या) क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त 'सुविमुक्त' (उत्तम प्रकारे विमुक्त) झाले आहे असे म्हटले जाते... भिक्षूंनो, जो खरोखर अनित्य असलेल्या जिभेला 'अनित्य' म्हणून पाहतो, ती त्याची सम्यक् दृष्टी असते. सम्यक् प्रकारे पाहणारा विरक्त होतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे... चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते... भिक्षूंनो, जो खरोखर अनित्य असलेल्या मनाला 'अनित्य' म्हणून पाहतो, ती त्याची सम्यक् दृष्टी असते. सम्यक् प्रकारे पाहणारा विरक्त होतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते." पहिले. 2. බාහිරනන්දික්ඛයසුත්තං २. बाहिर नन्दिक्खय सुत्त (बाह्य नंदिक्षय सुत्त) 157. ‘‘අනිච්චෙයෙව, භික්ඛවෙ, භික්ඛු රූපෙ අනිච්චාති පස්සති, සාස්ස හොති සම්මාදිට්ඨි. සම්මා පස්සං නිබ්බින්දති. නන්දික්ඛයා රාගක්ඛයො; රාගක්ඛයා නන්දික්ඛයො[Pg.355]. නන්දිරාගක්ඛයා චිත්තං සුවිමුත්තන්ති වුච්චති. අනිච්චෙයෙව, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සද්දෙ… ගන්ධෙ… රසෙ… ඵොට්ඨබ්බෙ… ධම්මෙ අනිච්චාති පස්සති, සාස්ස හොති සම්මාදිට්ඨි. සම්මා පස්සං නිබ්බින්දති. නන්දික්ඛයා රාගක්ඛයො; රාගක්ඛයා නන්දික්ඛයො. නන්දිරාගක්ඛයා චිත්තං සුවිමුත්තන්ති වුච්චතී’’ති. දුතියං. १५७. "भिक्षूंनो, जो खरोखर अनित्य असलेल्या रूपांना 'अनित्य' म्हणून पाहतो, ती त्याची सम्यक् दृष्टी असते. सम्यक् प्रकारे पाहणारा विरक्त होतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते. भिक्षूंनो, जो खरोखर अनित्य असलेल्या शब्दांना... गंधांना... रसांना... स्पर्शांना... धम्मांना (मानसिक विषयांना) 'अनित्य' म्हणून पाहतो, ती त्याची सम्यक् दृष्टी असते. सम्यक् प्रकारे पाहणारा विरक्त होतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते." दुसरे. 3. අජ්ඣත්තඅනිච්චනන්දික්ඛයසුත්තං ३. अज्झत्त अनित्य नन्दिक्खय सुत्त (आध्यात्मिक अनित्य नंदिक्षय सुत्त) 158. ‘‘චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, යොනිසො මනසි කරොථ; චක්ඛානිච්චතඤ්ච යථාභූතං සමනුපස්සථ. චක්ඛුං, භික්ඛවෙ, භික්ඛු යොනිසො මනසිකරොන්තො, චක්ඛානිච්චතඤ්ච යථාභූතං සමනුපස්සන්තො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නන්දික්ඛයා රාගක්ඛයො; රාගක්ඛයා නන්දික්ඛයො. නන්දිරාගක්ඛයා චිත්තං සුවිමුත්තන්ති වුච්චති. සොතං, භික්ඛවෙ, යොනිසො මනසි කරොථ… ඝානං… ජිව්හං, භික්ඛවෙ, යොනිසො මනසි කරොථ; ජිව්හානිච්චතඤ්ච යථාභූතං සමනුපස්සථ. ජිව්හං, භික්ඛවෙ, භික්ඛු යොනිසො මනසිකරොන්තො, ජිව්හානිච්චතඤ්ච යථාභූතං සමනුපස්සන්තො ජිව්හායපි නිබ්බින්දති. නන්දික්ඛයා රාගක්ඛයො; රාගක්ඛයා නන්දික්ඛයො. නන්දිරාගක්ඛයා චිත්තං සුවිමුත්තන්ති වුච්චති. කායං… මනං, භික්ඛවෙ, යොනිසො මනසි කරොථ; මනානිච්චතඤ්ච යථාභූතං සමනුපස්සථ. මනං, භික්ඛවෙ, භික්ඛු යොනිසො මනසිකරොන්තො, මනානිච්චතඤ්ච යථාභූතං සමනුපස්සන්තො මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නන්දික්ඛයා රාගක්ඛයො; රාගක්ඛයා නන්දික්ඛයො. නන්දිරාගක්ඛයා චිත්තං සුවිමුත්තන්ති වුච්චතී’’ති. තතියං. १५८. “भिक्खूंनो, चक्षूवर योनिशो मनसिकार करा; आणि चक्षूच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घ्या. भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू चक्षूवर योनिशो मनसिकार करतो आणि चक्षूच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घेतो, तेव्हा तो चक्षूविषयी निर्वेद प्राप्त करतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते. भिक्खूंनो, श्रोत्रावर योनिशो मनसिकार करा... घाणावर... भिक्खूंनो, जिव्हेवर योनिशो मनसिकार करा; आणि जिव्हेच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घ्या. भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू जिव्हेवर योनिशो मनसिकार करतो आणि जिव्हेच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घेतो, तेव्हा तो जिव्हेविषयी निर्वेद प्राप्त करतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते. काया... भिक्खूंनो, मनावर योनिशो मनसिकार करा; आणि मनाच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घ्या. भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू मनावर योनिशो मनसिकार करतो आणि मनाच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घेतो, तेव्हा तो मनाविषयी निर्वेद प्राप्त करतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते.” हे तिसरे. 4. බාහිරඅනිච්චනන්දික්ඛයසුත්තං ४. बाहिर-अनित्य-नंदी-क्षय सुत्त 159. ‘‘රූපෙ, භික්ඛවෙ, යොනිසො මනසි කරොථ; රූපානිච්චතඤ්ච යථාභූතං සමනුපස්සථ. රූපෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු යොනිසො මනසිකරොන්තො, රූපානිච්චතඤ්ච යථාභූතං සමනුපස්සන්තො රූපෙසුපි නිබ්බින්දති. නන්දික්ඛයා රාගක්ඛයො; රාගක්ඛයා නන්දික්ඛයො. නන්දිරාගක්ඛයා චිත්තං සුවිමුත්තන්ති වුච්චති. සද්දෙ… ගන්ධෙ… රසෙ… ඵොට්ඨබ්බෙ… ධම්මෙ, භික්ඛවෙ, යොනිසො මනසි කරොථ; ධම්මානිච්චතඤ්ච යථාභූතං සමනුපස්සථ. ධම්මෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු යොනිසො මනසිකරොන්තො, ධම්මානිච්චතඤ්ච යථාභූතං සමනුපස්සන්තො ධම්මෙසුපි නිබ්බින්දති. නන්දික්ඛයා රාගක්ඛයො; රාගක්ඛයා නන්දික්ඛයො. නන්දිරාගක්ඛයා චිත්තං සුවිමුත්තන්ති වුච්චතී’’ති. චතුත්ථං. १५९. “भिक्खूंनो, रूपांवर योनिशो मनसिकार करा; आणि रूपांच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घ्या. भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू रूपांवर योनिशो मनसिकार करतो आणि रूपांच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घेतो, तेव्हा तो रूपांविषयी निर्वेद प्राप्त करतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते. शब्दांवर... गंधांवर... रसांवर... स्पर्शांवर... भिक्खूंनो, धम्मांवर योनिशो मनसिकार करा; आणि धम्मांच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घ्या. भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू धम्मांवर योनिशो मनसिकार करतो आणि धम्मांच्या अनित्यतेचे यथाभूत दर्शन घेतो, तेव्हा तो धम्मांविषयी निर्वेद प्राप्त करतो. नंदीच्या क्षयामुळे रागाचा क्षय होतो; रागाच्या क्षयामुळे नंदीचा क्षय होतो. नंदी आणि रागाच्या क्षयामुळे चित्त सुविमुक्त झाले आहे असे म्हटले जाते.” हे चौथे. 5. ජීවකම්බවනසමාධිසුත්තං ५. जीवक-अम्बवन-समाधी सुत्त 160. එකං [Pg.356] සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති ජීවකම්බවනෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘භික්ඛවො’’ති…පෙ… ‘‘සමාධිං, භික්ඛවෙ, භාවෙථ. සමාහිතස්ස, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො යථාභූතං ඔක්ඛායති. කිඤ්ච යථාභූතං ඔක්ඛායති? චක්ඛුං අනිච්චන්ති යථාභූතං ඔක්ඛායති, රූපා අනිච්චාති යථාභූතං ඔක්ඛායති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනිච්චන්ති යථාභූතං ඔක්ඛායති, චක්ඛුසම්ඵස්සො අනිච්චොති යථාභූතං ඔක්ඛායති, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චන්ති යථාභූතං ඔක්ඛායති…පෙ… ජිව්හා අනිච්චාති යථාභූතං ඔක්ඛායති…පෙ… මනො අනිච්චොති යථාභූතං ඔක්ඛායති, ධම්මා අනිච්චාති යථාභූතං ඔක්ඛායති…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චන්ති යථාභූතං ඔක්ඛායති. සමාධිං, භික්ඛවෙ, භාවෙථ. සමාහිතස්ස, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො යථාභූතං ඔක්ඛායතී’’ති. පඤ්චමං. १६०. एकदा भगवान राजगृह येथे जीवकाच्या आंबराईत विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “भिक्खूंनो!” ...पे... “भिक्खूंनो, समाधीची भावना करा. भिक्खूंनो, समाहित झालेल्या भिक्खूला गोष्टी जशा आहेत तशा (यथाभूत) स्पष्ट दिसतात. आणि काय यथाभूत स्पष्ट दिसते? ‘चक्षू अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘रूपे अनित्य आहेत’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘चक्षू-विज्ञान अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘चक्षू-संस्पर्श अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; आणि चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील ‘अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते...पे... ‘जिव्हा अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते...पे... ‘मन अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘धम्म अनित्य आहेत’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते...पे... आणि मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील ‘अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते. भिक्खूंनो, समाधीची भावना करा. समाहित झालेल्या भिक्खूला गोष्टी यथाभूत स्पष्ट दिसतात.” हे पाचवे. 6. ජීවකම්බවනපටිසල්ලානසුත්තං ६. जीवक-अम्बवन-प्रतिसल्लान सुत्त 161. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති ජීවකම්බවනෙ. තත්ර ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි…පෙ… ‘‘පටිසල්ලානෙ, භික්ඛවෙ, යොගමාපජ්ජථ. පටිසල්ලීනස්ස, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො යථාභූතං ඔක්ඛායති. කිඤ්ච යථාභූතං ඔක්ඛායති? චක්ඛුං අනිච්චන්ති යථාභූතං ඔක්ඛායති, රූපා අනිච්චාති යථාභූතං ඔක්ඛායති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනිච්චන්ති යථාභූතං ඔක්ඛායති, චක්ඛුසම්ඵස්සො අනිච්චොති යථාභූතං ඔක්ඛායති, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චන්ති යථාභූතං ඔක්ඛායති…පෙ… මනො අනිච්චොති යථාභූතං ඔක්ඛායති, ධම්මා… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සො… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චන්ති යථාභූතං ඔක්ඛායති. පටිසල්ලානෙ භික්ඛවෙ, යොගමාපජ්ජථ. පටිසල්ලීනස්ස, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො යථාභූතං ඔක්ඛායතී’’ති. ඡට්ඨං. १६१. एकदा भगवान राजगृह येथे जीवकाच्या आंबराईत विहार करत होते. तेथे भगवंतांनी भिक्खूंना संबोधित केले...पे... “भिक्खूंनो, प्रतिसल्लानात (एकांतवासात) उद्योग करा. भिक्खूंनो, प्रतिसल्लीन झालेल्या भिक्खूला गोष्टी जशा आहेत तशा (यथाभूत) स्पष्ट दिसतात. आणि काय यथाभूत स्पष्ट दिसते? ‘चक्षू अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘रूपे अनित्य आहेत’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘चक्षू-विज्ञान अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘चक्षू-संस्पर्श अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; आणि चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील ‘अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते...पे... ‘मन अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते; ‘धम्म... मन-विज्ञान... मन-संस्पर्श... आणि मन-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील ‘अनित्य आहे’ हे यथाभूत स्पष्ट दिसते. भिक्खूंनो, प्रतिसल्लानात उद्योग करा. प्रतिसल्लीन झालेल्या भिक्खूला गोष्टी यथाभूत स्पष्ट दिसतात.” हे सहावे. 7. කොට්ඨිකඅනිච්චසුත්තං ७. कोठ्ठिक-अनित्य सुत्त 162. අථ ඛො ආයස්මා මහාකොට්ඨිකො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා කොට්ඨිකො භගවන්තං එතදවොච [Pg.357] – ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා සංඛිත්තෙන ධම්මං දෙසෙතු, යමහං භගවතො ධම්මං සුත්වා එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරෙය්ය’’න්ති. १६२. तेव्हा आयुष्यमान महाकोठ्ठिक जेथे भगवान होते तेथे गेले...पे... एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान कोठ्ठिक भगवंतांना म्हणाले – “भन्ते! मला भगवंतांनी संक्षेपात धम्म उपदेश करावा, जेणेकरून भगवंतांकडून धम्म ऐकून मी एकांतात, जनसमुदायापासून दूर, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू शकेन.” ‘‘යං ඛො, කොට්ඨික, අනිච්චං තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. කිඤ්ච, කොට්ඨික, අනිච්චං? චක්ඛු ඛො, කොට්ඨික, අනිච්චං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. රූපා අනිච්චා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනිච්චං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. චක්ඛුසම්ඵස්සො අනිච්චො; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. රසා අනිච්චා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. ජිව්හාවිඤ්ඤාණං අනිච්චං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. ජිව්හාසම්ඵස්සො අනිච්චො; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො…පෙ… මනො අනිච්චො; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. ධම්මා අනිච්චා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. මනොවිඤ්ඤාණං අනිච්චං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. මනොසම්ඵස්සො අනිච්චො; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යං ඛො, කොට්ඨික, අනිච්චං තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො’’ති. සත්තමං. “हे कोट्ठिक, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुझी इच्छा (छंद) तू त्यागली पाहिजेस. आणि कोट्ठिक, अनित्य काय आहे? कोट्ठिक, चक्षू (डोळा) अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. रूपे अनित्य आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-विज्ञान अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्श अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... जिव्हा (जीभ) अनित्य आहे; तिच्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. रस अनित्य आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. जिव्हा-विज्ञान अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. जिव्हा-संस्पर्श अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. जिव्हा-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... मन अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. धम्म अनित्य आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-विज्ञान अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-संस्पर्श अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. हे कोट्ठिक, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस.” सातवे. 8. කොට්ඨිකදුක්ඛසුත්තං ८. कोट्ठिक दुःख सुत्त 163. අථ ඛො ආයස්මා මහාකොට්ඨිකො…පෙ… භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ…පෙ… විහරෙය්ය’’න්ති. ‘‘යං ඛො, කොට්ඨික, දුක්ඛං තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. කිඤ්ච, කොට්ඨික, දුක්ඛං? චක්ඛු ඛො, කොට්ඨික, දුක්ඛං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. රූපා දුක්ඛා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං දුක්ඛං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. චක්ඛුසම්ඵස්සො දුක්ඛො; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි දුක්ඛං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො…පෙ… ජිව්හා දුක්ඛා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො…පෙ… මනො දුක්ඛො; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. ධම්මා දුක්ඛා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. මනොවිඤ්ඤාණං දුක්ඛං[Pg.358]; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. මනොසම්ඵස්සො දුක්ඛො; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි දුක්ඛං; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යං ඛො, කොට්ඨික, දුක්ඛං තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො’’ති. අට්ඨමං. १६३. तेव्हा आयुष्यमान महाकोट्ठिक... पे... भगवंतांना असे म्हणाले – “भंते, मला असे (थोडक्यात धम्म शिकवा)... पे... जेणेकरून मी विहरत राहीन.” “हे कोट्ठिक, जे दुःख आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. आणि कोट्ठिक, दुःख काय आहे? कोट्ठिक, चक्षू दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. रूपे दुःख आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-विज्ञान दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्श दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... जिव्हा दुःख आहे; तिच्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... मन दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. धम्म दुःख आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-विज्ञान दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-संस्पर्श दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील दुःख आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. हे कोट्ठिक, जे दुःख आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस.” आठवे. 9. කොට්ඨිකඅනත්තසුත්තං ९. कोट्ठिक अनत्त सुत्त 164. එකමන්තං…පෙ… විහරෙය්යන්ති. ‘‘යො ඛො, කොට්ඨික, අනත්තා තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. කො ච, කොට්ඨික, අනත්තා? චක්ඛු ඛො, කොට්ඨික, අනත්තා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. රූපා අනත්තා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනත්තා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. චක්ඛුසම්ඵස්සො අනත්තා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනත්තා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො …පෙ… ජිව්හා අනත්තා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො…පෙ… මනො අනත්තා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. ධම්මා අනත්තා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සො… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනත්තා; තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො. යො ඛො, කොට්ඨික, අනත්තා, තත්ර තෙ ඡන්දො පහාතබ්බො’’ති. නවමං. १६४. एका बाजूला... पे... विहरत राहीन. “हे कोट्ठिक, जे अनात्म आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. आणि कोट्ठिक, अनात्म काय आहे? कोट्ठिक, चक्षू अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. रूपे अनात्म आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-विज्ञान अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्श अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. चक्षू-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... जिव्हा अनात्म आहे; तिच्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस... पे... मन अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. धम्म अनात्म आहेत; त्यांवरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. मनो-विज्ञान... मनो-संस्पर्श... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनात्म आहे; त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस. हे कोट्ठिक, जे अनात्म आहे, त्यावरील तुझी इच्छा तू त्यागली पाहिजेस.” नववे. 10. මිච්ඡාදිට්ඨිපහානසුත්තං १०. मिच्छादिट्ठि पहाण सुत्त 165. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො සො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කථං නු ඛො, භන්තෙ, ජානතො කථං පස්සතො මිච්ඡාදිට්ඨි පහීයතී’’ති? १६५. तेव्हा एक भिक्खू जेथे भगवंत होते तेथे आला... पे... एका बाजूला बसून त्या भिक्खूने भगवंतांना असे विचारले – “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्या व्यक्तीची मिथ्यादृष्टी (मिच्छादिट्ठि) नष्ट होते?” ‘‘චක්ඛුං ඛො, භික්ඛු, අනිච්චතො ජානතො පස්සතො මිච්ඡාදිට්ඨි පහීයති. රූපෙ අනිච්චතො ජානතො පස්සතො මිච්ඡාදිට්ඨි පහීයති. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනිච්චතො ජානතො පස්සතො මිච්ඡාදිට්ඨි පහීයති. චක්ඛුසම්ඵස්සං අනිච්චතො ජානතො පස්සතො මිච්ඡාදිට්ඨි පහීයති…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චතො ජානතො පස්සතො මිච්ඡාදිට්ඨි පහීයති. එවං ඛො, භික්ඛු, ජානතො එවං පස්සතො මිච්ඡාදිට්ඨි පහීයතී’’ති. දසමං. “भिक्खू, चक्षूला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते. रूपांना अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते. चक्षू-विज्ञानाला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते. चक्षू-संस्पर्शाला अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते... पे... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील अनित्य म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते. भिक्खू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याची मिथ्यादृष्टी नष्ट होते.” दहावे. 11. සක්කායදිට්ඨිපහානසුත්තං ११. सक्कायदिट्ठि पहाण सुत्त 166. අථ [Pg.359] ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු…පෙ… එතදවොච – ‘‘කථං නු ඛො, භන්තෙ, ජානතො කථං පස්සතො සක්කායදිට්ඨි පහීයතී’’ති? ‘‘චක්ඛුං ඛො, භික්ඛු, දුක්ඛතො ජානතො පස්සතො සක්කායදිට්ඨි පහීයති. රූපෙ දුක්ඛතො ජානතො පස්සතො සක්කායදිට්ඨි පහීයති. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං දුක්ඛතො ජානතො පස්සතො සක්කායදිට්ඨි පහීයති. චක්ඛුසම්ඵස්සං දුක්ඛතො ජානතො පස්සතො සක්කායදිට්ඨි පහීයති…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි දුක්ඛතො ජානතො පස්සතො සක්කායදිට්ඨි පහීයති. එවං ඛො, භික්ඛු, ජානතො එවං පස්සතො සක්කායදිට්ඨි පහීයතී’’ති. එකාදසමං. १६६. तेव्हा एक भिक्खू... पे... असे म्हणाला – “भंते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्या व्यक्तीची सत्कायदृष्टी (सक्कायदिट्ठि) नष्ट होते?” “भिक्खू, चक्षूला दुःख म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते. रूपांना दुःख म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते. चक्षू-विज्ञानाला दुःख म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते. चक्षू-संस्पर्शाला दुःख म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते... पे... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याला देखील दुःख म्हणून जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते. भिक्खू, अशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि अशा प्रकारे पाहणाऱ्याची सत्कायदृष्टी नष्ट होते.” अकरावे. 12. අත්තානුදිට්ඨිපහානසුත්තං १२. अत्तानुदिट्ठि पहाण सुत्त 167. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු…පෙ… එතදවොච – ‘‘කථං නු ඛො, භන්තෙ, ජානතො කථං පස්සතො අත්තානුදිට්ඨි පහීයතී’’ති? ‘‘චක්ඛුං ඛො, භික්ඛු, අනත්තතො ජානතො පස්සතො අත්තානුදිට්ඨි පහීයති. රූපෙ අනත්තතො ජානතො පස්සතො අත්තානුදිට්ඨි පහීයති. චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනත්තතො ජානතො පස්සතො අත්තානුදිට්ඨි පහීයති. චක්ඛුසම්ඵස්සං අනත්තතො ජානතො පස්සතො අත්තානුදිට්ඨි පහීයති. යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනත්තතො ජානතො පස්සතො අත්තානුදිට්ඨි පහීයති…පෙ… ජිව්හං අනත්තතො ජානතො පස්සතො අත්තානුදිට්ඨි පහීයති…පෙ… මනං අනත්තතො ජානතො පස්සතො අත්තානුදිට්ඨි පහීයති. ධම්මෙ… මනොවිඤ්ඤාණං… මනොසම්ඵස්සං… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනත්තතො ජානතො පස්සතො අත්තානුදිට්ඨි පහීයතී’’ති. ද්වාදසමං. १६७. तेव्हा एक भिक्खू... पे... भगवंतांना असे म्हणाला – “भन्ते, कशा प्रकारे जाणणाऱ्या आणि कशा प्रकारे पाहणाऱ्याची 'अत्तानुदिट्ठी' (आत्म-दृष्टी) नष्ट होते?” “भिक्खू, चक्षूला (डोळ्याला) अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते. रूपांना अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते. चक्षु-विज्ञानाला अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते. चक्षु-संस्पर्शाला अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते. चक्षु-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने (कारणाने) जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन (अनुभूती) उत्पन्न होते, त्यालाही अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते... पे... जिव्हेला (जिभेला) अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते... पे... मनाला अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते. धम्मांना... मनो-विज्ञानाला... मनो-संस्पर्शाला... मनो-संस्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अदुःख-असुखद वेदन उत्पन्न होते, त्यालाही अनात्म रूपाने जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्याची अत्तानुदिट्ठी नष्ट होते.” बारावे सूत्र. නන්දික්ඛයවග්ගො සොළසමො. सोळावा नन्दिक्खय वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची उद्दान (अनुक्रमणिका) – නන්දික්ඛයෙන චත්තාරො, ජීවකම්බවනෙ දුවෙ; කොට්ඨිකෙන තයො වුත්තා, මිච්ඡා සක්කාය අත්තනොති. नन्दिक्खय सूत्रांचे चार, जीवक-अंबवनातील दोन, कोट्ठिक सूत्रांचे तीन, आणि मिच्छा, सक्काय व अत्तानुदिट्ठी अशी (सूत्रे) सांगितली आहेत. 17. සට්ඨිපෙය්යාලවග්ගො १७. सट्ठिपेय्याल वर्ग 1. අජ්ඣත්තඅනිච්චඡන්දසුත්තං १. अज्झत्त-अनिच्च-छन्द सूत्र 168. ‘‘යං[Pg.360], භික්ඛවෙ, අනිච්චං, තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, අනිච්චං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනිච්චං; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො…පෙ… මනො අනිච්චො; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො. යං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං, තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො’’ති. १६८. “भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा (छंद) तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनित्य काय आहे? भिक्खूंनो, चक्षू (डोळा) अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... जिव्हा (जीभ) अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... मन अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे.” 2. අජ්ඣත්තඅනිච්චරාගසුත්තං २. अज्झत्त-अनिच्च-राग सूत्र 169. ‘‘යං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං, තත්ර වො රාගො පහාතබ්බො. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, අනිච්චං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනිච්චං; තත්ර වො රාගො පහාතබ්බො…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා; තත්ර වො රාගො පහාතබ්බො…පෙ… මනො අනිච්චො; තත්ර වො රාගො පහාතබ්බො. යං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං, තත්ර වො රාගො පහාතබ්බො’’ති. १६९. “भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची आसक्ती (राग) तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनित्य काय आहे? भिक्खूंनो, चक्षू अनित्य आहे; त्यावरील तुमची आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... जिव्हा अनित्य आहे; त्यावरील तुमची आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... मन अनित्य आहे; त्यावरील तुमची आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे.” 3. අජ්ඣත්තඅනිච්චඡන්දරාගසුත්තං ३. अज्झत्त-अनिच्च-छन्दराग सूत्र 170. ‘‘යං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං, තත්ර වො ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, අනිච්චං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනිච්චං; තත්ර වො ඡන්දරාගො පහාතබ්බො…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා; තත්ර වො ඡන්දරාගො පහාතබ්බො…පෙ… මනො අනිච්චො; තත්ර වො ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. යං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං, තත්ර වො ඡන්දරාගො පහාතබ්බො’’ති. १७०. “भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा आणि आसक्ती (छंदराग) तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनित्य काय आहे? भिक्खूंनो, चक्षू अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा आणि आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... जिव्हा अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा आणि आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे... पे... मन अनित्य आहे; त्यावरील तुमची इच्छा आणि आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा आणि आसक्ती तुम्ही सोडून दिली पाहिजे.” 4-6. දුක්ඛඡන්දාදිසුත්තං ४-६. दुक्ख-छन्दादि सूत्र 171-173. ‘‘යං, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං, තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො…පෙ… ජිව්හා දුක්ඛා…පෙ… මනො දුක්ඛො; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. යං, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො’’ති. १७१-१७३. “भिक्खूंनो, जे दुःख आहे, त्यावरील तुमची इच्छा (छंद) तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती (राग) सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती (छंदराग) सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, दुःख काय आहे? भिक्खूंनो, चक्षू दुःख आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे... पे... जिव्हा दुःख आहे... पे... मन दुःख आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे दुःख आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे.” 7-9. අනත්තඡන්දාදිසුත්තං ७-९. अनात्त-छन्दादि सूत्र 174-176. ‘‘යො[Pg.361], භික්ඛවෙ, අනත්තා, තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. කො ච, භික්ඛවෙ, අනත්තා? චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනත්තා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො…පෙ… ජිව්හා අනත්තා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො…පෙ… මනො අනත්තා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. යො, භික්ඛවෙ, අනත්තා තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො’’ති. १७४-१७६. “भिक्खूंनो, जे अनात्म (अनात्ता) आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनात्म काय आहे? भिक्खूंनो, चक्षू अनात्म आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे... पे... जिव्हा अनात्म आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे... पे... मन अनात्म आहे; त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनात्म आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे.” 10-12. බාහිරානිච්චඡන්දාදිසුත්තං १०-१२. बाहिर-अनिच्च-छन्दादि सूत्र 177-179. ‘‘යං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං, තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, අනිච්චං? රූපා, භික්ඛවෙ, අනිච්චා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. සද්දා අනිච්චා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. ගන්ධා අනිච්චා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. රසා අනිච්චා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. ඵොට්ඨබ්බා අනිච්චා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. ධම්මා අනිච්චා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. යං, භික්ඛවෙ, අනිච්චං තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො’’ති. १७७-१७९. “भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनित्य काय आहे? भिक्खूंनो, रूप अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. शब्द अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. गंध अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. रस अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. स्पर्श (फोट्ठब्ब) अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. धम्म अनित्य आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनित्य आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे.” 13-15. බාහිරදුක්ඛඡන්දාදිසුත්තං १३-१५. बाहिर-दुक्ख-छन्दादि सूत्र 180-182. ‘‘යං, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං, තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. කිඤ්ච, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං? රූපා, භික්ඛවෙ, දුක්ඛා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා දුක්ඛා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. යං, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං, තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො’’ති. १८०-१८२. “भिक्खूंनो, जे दुःख आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, दुःख काय आहे? भिक्खूंनो, रूप दुःख आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म दुःख आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे दुःख आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे.” 16-18. බාහිරානත්තඡන්දාදිසුත්තං १६-१८. बाहिर-अनात्त-छन्दादि सूत्र 183-185. ‘‘යො[Pg.362], භික්ඛවෙ, අනත්තා, තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. කො ච, භික්ඛවෙ, අනත්තා? රූපා, භික්ඛවෙ, අනත්තා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනත්තා; තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො. යො, භික්ඛවෙ, අනත්තා තත්ර වො ඡන්දො පහාතබ්බො, රාගො පහාතබ්බො, ඡන්දරාගො පහාතබ්බො’’ති. १८३-१८५. “भिक्खूंनो, जे अनात्म आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. आणि भिक्खूंनो, अनात्म काय आहे? भिक्खूंनो, रूप अनात्म आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनात्म आहेत; त्यांवरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे. भिक्खूंनो, जे अनात्म आहे, त्यावरील तुमची इच्छा तुम्ही सोडून दिली पाहिजे, आसक्ती सोडून दिली पाहिजे, इच्छा आणि आसक्ती सोडून दिली पाहिजे.” 19. අජ්ඣත්තාතීතානිච්චසුත්තං १९. अज्झत्त-अतीत-अनिच्च सूत्र 186. ‘‘චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනිච්චං අතීතං…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා අතීතා…පෙ… මනො අනිච්චො අතීතො. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති…පෙ… ජිව්හායපි නිබ්බින්දති…පෙ… මනස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. १८६. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील चक्षु अनित्य आहे... जिव्हा अनित्य आहे... मन अनित्य आहे. भिक्खूंनो, असे पाहणारा, श्रुतवान आर्यश्रावक चक्षुविषयी निर्वेद पावतो... जिव्हेविषयी निर्वेद पावतो... मनाविषयी निर्वेद पावतो. निर्वेद पावल्यामुळे तो विरक्त होतो; विरागामुळे विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर 'विमुक्त झाले' असे ज्ञान होते. 'जन्म क्षीण झाला, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले, जे करायचे होते ते केले गेले, आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे तो जाणतो.” 20. අජ්ඣත්තානාගතානිච්චසුත්තං २०. अध्यात्म-अनागत-अनित्य सुत्त 187. ‘‘චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනිච්චං අනාගතං…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා අනාගතා…පෙ… මනො අනිච්චො අනාගතො. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. १८७. “भिक्खूंनो, भविष्यकाळातील चक्षु अनित्य आहे... जिव्हा अनित्य आहे... मन अनित्य आहे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 21. අජ්ඣත්තපච්චුප්පන්නානිච්චසුත්තං २१. अध्यात्म-पच्चुप्पन्न-अनित्य सुत्त 188. ‘‘චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනිච්චං පච්චුප්පන්නං…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා පච්චුප්පන්නා…පෙ… මනො අනිච්චො පච්චුප්පන්නො. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. १८८. “भिक्खूंनो, वर्तमानकाळातील चक्षु अनित्य आहे... जिव्हा अनित्य आहे... मन अनित्य आहे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 22-24. අජ්ඣත්තාතීතාදිදුක්ඛසුත්තං २२-२४. अध्यात्म-अतीतादि-दुःख सुत्त 189-191. ‘‘චක්ඛු, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං අතීතං අනාගතං පච්චුප්පන්නං…පෙ… ජිව්හා දුක්ඛා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා…පෙ… මනො දුක්ඛො අතීතො අනාගතො පච්චුප්පන්නො. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. १८९-१९१. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील चक्षु दुःखकारक आहे... जिव्हा दुःखकारक आहे... मन दुःखकारक आहे. भिक्खूंनो, असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 25-27. අජ්ඣත්තාතීතාදිඅනත්තසුත්තං २५-२७. अध्यात्म-अतीतादि-अनत्त सुत्त 192-194. ‘‘චක්ඛු[Pg.363], භික්ඛවෙ, අනත්තා අතීතං අනාගතං පච්චුප්පන්නං…පෙ… ජිව්හා අනත්තා…පෙ… මනො අනත්තා අතීතො අනාගතො පච්චුප්පන්නො. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. १९२-१९४. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील चक्षु अनात्म आहे... जिव्हा अनात्म आहे... मन अनात्म आहे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 28-30. බාහිරාතීතාදිඅනිච්චසුත්තං २८-३०. बाहिर-अतीतादि-अनित्य सुत्त 195-197. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනිච්චා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනිච්චා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. १९५-१९७. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील रूपे अनित्य आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील धम्म अनित्य आहेत. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 31-33. බාහිරාතීතාදිදුක්ඛසුත්තං ३१-३३. बाहिर-अतीतादि-दुःख सुत्त 198-200. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, දුක්ඛා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා දුක්ඛා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. १९८-२००. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील रूपे दुःखकारक आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील धम्म दुःखकारक आहेत. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 34-36. බාහිරාතීතාදිඅනත්තසුත්තං ३४-३६. बाहिर-अतीतादि-अनत्त सुत्त 201-203. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනත්තා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනත්තා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २०१-२०३. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील रूपे अनात्म आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील धम्म अनात्म आहेत. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 37. අජ්ඣත්තාතීතයදනිච්චසුත්තං ३७. अध्यात्म-अतीत-यदनिच्च सुत्त 204. ‘‘චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනිච්චං අතීතං. යදනිච්චං, තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා අතීතා. යදනිච්චං, තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං…පෙ… මනො අනිච්චො අතීතො. යදනිච්චං, තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २०४. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील चक्षु अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... भूतकाळातील जिव्हा अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... भूतकाळातील मन अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 38. අජ්ඣත්තානාගතයදනිච්චසුත්තං ३८. अध्यात्म-अनागत-यदनिच्च सुत्त 205. ‘‘චක්ඛු[Pg.364], භික්ඛවෙ, අනිච්චං අනාගතං. යදනිච්චං, තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා අනාගතා. යදනිච්චං, තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං…පෙ… මනො අනිච්චො අනාගතො. යදනිච්චං, තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං, භික්ඛවෙ…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २०५. “भिक्खूंनो, भविष्यकाळातील चक्षु अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... भविष्यकाळातील जिव्हा अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... भविष्यकाळातील मन अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. भिक्खूंनो, असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 39. අජ්ඣත්තපච්චුප්පන්නයදනිච්චසුත්තං ३९. अध्यात्म-पच्चुप्पन्न-यदनिच्च सुत्त 206. ‘‘චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනිච්චං පච්චුප්පන්නං. යදනිච්චං, තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා පච්චුප්පන්නා. යදනිච්චං, තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං…පෙ… මනො අනිච්චො පච්චුප්පන්නො. යදනිච්චං තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २०६. “भिक्खूंनो, वर्तमानकाळातील चक्षु अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... वर्तमानकाळातील जिव्हा अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... वर्तमानकाळातील मन अनित्य आहे. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 40-42. අජ්ඣත්තාතීතාදියංදුක්ඛසුත්තං ४०-४२. अध्यात्म-अतीतादि-यं दुःख सुत्त 207-209. ‘‘චක්ඛු, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං අතීතං අනාගතං පච්චුප්පන්නං. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං…පෙ… ජිව්හා දුක්ඛා…පෙ… මනො දුක්ඛො අතීතො අනාගතො පච්චුප්පන්නො. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २०७-२०९. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील चक्षु दुःखकारक आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... जिव्हा दुःखकारक आहे... भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील मन दुःखकारक आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 43-45. අජ්ඣත්තාතීතාදියදනත්තසුත්තං ४३-४५. अध्यात्म-अतीतादि-यदनत्त सुत्त 210-212. ‘‘චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනත්තා අතීතං අනාගතං පච්චුප්පන්නං. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං [Pg.365] යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං…පෙ… ජිව්හා අනත්තා…පෙ… මනො අනත්තා අතීතො අනාගතො පච්චුප්පන්නො. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २१०-२१२. “भिक्खूंनो, भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील चक्षु अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे... जिव्हा अनात्म आहे... भूतकाळातील, भविष्यकाळातील आणि वर्तमानकाळातील मन अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा... 'आता यानंतर काहीही कर्तव्य उरले नाही' असे जाणतो.” 46-48. බාහිරාතීතාදියදනිච්චසුත්තං ४६-४८. बाहिर-अतीतादि-यदनिच्च सुत्त 213-215. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනිච්චා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. යදනිච්චං, තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනිච්චා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. යදනිච්චං තං දුක්ඛං. යං දුක්ඛං තදනත්තා. යදනත්තා තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २१३-२१५. “भिक्खूहो, भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील रूपे अनित्य आहेत. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील धम्म (मानसिक विषय) अनित्य आहेत. जे अनित्य आहे, ते दुःख आहे. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” 49-51. බාහිරාතීතාදියංදුක්ඛසුත්තං ४९-५१. बाह्य अतीत आदि दुःख सुत्त 216-218. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, දුක්ඛා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා දුක්ඛා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. යං දුක්ඛං, තදනත්තා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २१६-२१८. “भिक्खूहो, भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील रूपे दुःखकारक आहेत. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील धम्म दुःखकारक आहेत. जे दुःख आहे, ते अनात्म आहे. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” 52-54. බාහිරාතීතාදියදනත්තසුත්තං ५२-५४. बाह्य अतीत आदि अनात्म सुत्त 219-221. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනත්තා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනත්තා අතීතා අනාගතා පච්චුප්පන්නා. යදනත්තා, තං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २१९-२२१. “भिक्खूहो, भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील रूपे अनात्म आहेत. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... भूतकाळ, भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळातील धम्म अनात्म आहेत. जे अनात्म आहे, त्याविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” 55. අජ්ඣත්තායතනඅනිච්චසුත්තං ५५. आध्यात्मिक आयतन अनित्य सुत्त 222. ‘‘චක්ඛු[Pg.366], භික්ඛවෙ, අනිච්චං…පෙ… ජිව්හා අනිච්චා…පෙ… මනො අනිච්චො. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २२२. “भिक्खूहो, चक्षु (डोळे) अनित्य आहेत...पे... जिव्हा (जीभ) अनित्य आहे...पे... मन अनित्य आहे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” 56. අජ්ඣත්තායතනදුක්ඛසුත්තං ५६. आध्यात्मिक आयतन दुःख सुत्त 223. ‘‘චක්ඛු, භික්ඛවෙ, දුක්ඛං…පෙ… ජිව්හා දුක්ඛා…පෙ… මනො දුක්ඛො. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २२३. “भिक्खूहो, चक्षु दुःखकारक आहेत...पे... जिव्हा दुःखकारक आहे...पे... मन दुःखकारक आहे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” 57. අජ්ඣත්තායතනඅනත්තසුත්තං ५७. आध्यात्मिक आयतन अनात्म सुत्त 224. ‘‘චක්ඛු, භික්ඛවෙ, අනත්තා…පෙ… ජිව්හා අනත්තා…පෙ… මනො අනත්තා. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २२४. “भिक्खूहो, चक्षु अनात्म आहेत...पे... जिव्हा अनात्म आहे...पे... मन अनात्म आहे. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” 58. බාහිරායතනඅනිච්චසුත්තං ५८. बाह्य आयतन अनित्य सुत्त 225. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනිච්චා. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනිච්චා. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २२५. “भिक्खूहो, रूपे अनित्य आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनित्य आहेत. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” 59. බාහිරායතනදුක්ඛසුත්තං ५९. बाह्य आयतन दुःख सुत्त 226. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, දුක්ඛා. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා දුක්ඛා. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २२६. “भिक्खूहो, रूपे दुःखकारक आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म दुःखकारक आहेत. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” 60. බාහිරායතනඅනත්තසුත්තං ६०. बाह्य आयतन अनात्म सुत्त 227. ‘‘රූපා, භික්ඛවෙ, අනත්තා. සද්දා… ගන්ධා… රසා… ඵොට්ඨබ්බා… ධම්මා අනත්තා. එවං පස්සං…පෙ… නාපරං ඉත්ථත්තායාති පජානාතී’’ති. २२७. “भिक्खूहो, रूपे अनात्म आहेत. शब्द... गंध... रस... स्पर्श... धम्म अनात्म आहेत. असे पाहणारा...पे... या अस्तित्वासाठी आता काहीही कर्तव्य उरलेले नाही, असे तो जाणतो.” සට්ඨිපෙය්යාලවග්ගො සත්තරසමො. सट्ठिपेय्यालवग्गो (साठ सुत्तांचा संक्षेप वर्ग) समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचे उद्दान (अनुक्रमणिका) – ඡන්දෙනට්ඨාරස හොන්ති, අතීතෙන ච ද්වෙ නව; යදනිච්චාට්ඨාරස වුත්තා, තයො අජ්ඣත්තබාහිරා; පෙය්යාලො සට්ඨිකො වුත්තො, බුද්ධෙනාදිච්චබන්ධුනාති. “छंद (इच्छा) सुत्तांचे अठरा आहेत, अतीत सुत्तांचे दोन नऊ (अठरा) आहेत; यदनिच्च सुत्तांचे अठरा सांगितले आहेत, आणि आध्यात्मिक व बाह्य मिळून तीन आहेत; अशा प्रकारे आदित्यबंधू (सूर्याचे वंशज) असलेल्या बुद्धांनी साठ सुत्तांचा हा पेय्याल (संक्षेप) सांगितला आहे.” සුත්තන්තානි සට්ඨි. एकूण साठ सुत्ते आहेत. 18. සමුද්දවග්ගො १८. समुद्रवग्गो (समुद्र वर्ग) 1. පඨමසමුද්දසුත්තං १. प्रथम समुद्र सुत्त 228. ‘‘‘සමුද්දො[Pg.367], සමුද්දො’ති, භික්ඛවෙ, අස්සුතවා පුථුජ්ජනො භාසති. නෙසො, භික්ඛවෙ, අරියස්ස විනයෙ සමුද්දො. මහා එසො, භික්ඛවෙ, උදකරාසි මහාඋදකණ්ණවො. චක්ඛු, භික්ඛවෙ, පුරිසස්ස සමුද්දො; තස්ස රූපමයො වෙගො. යො තං රූපමයං වෙගං සහති, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අතරි චක්ඛුසමුද්දං සඌමිං සාවට්ටං සගාහං සරක්ඛසං; තිණ්ණො පාරඞ්ගතො ථලෙ තිට්ඨති බ්රාහ්මණො…පෙ… ජිව්හා, භික්ඛවෙ, පුරිසස්ස සමුද්දො; තස්ස රසමයො වෙගො. යො තං රසමයං වෙගං සහති, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අතරි ජිව්හාසමුද්දං සඌමිං සාවට්ටං සගාහං සරක්ඛසං; තිණ්ණො පාරඞ්ගතො ථලෙ තිට්ඨති බ්රාහ්මණො…පෙ… මනො, භික්ඛවෙ, පුරිසස්ස සමුද්දො; තස්ස ධම්මමයො වෙගො. යො තං ධම්මමයං වෙගං සහති, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අතරි මනොසමුද්දං සඌමිං සාවට්ටං සගාහං සරක්ඛසං; තිණ්ණො පාරඞ්ගතො ථලෙ තිට්ඨති බ්රාහ්මණො’’ති. ඉදමවොච…පෙ… සත්ථා – २२८. “‘समुद्र, समुद्र’ असे, भिक्खूहो, अश्रुतवान (अज्ञानी) पृथग्जन म्हणतो. परंतु, भिक्खूहो, आर्यांच्या विनयामध्ये (शासनात) हा समुद्र नाही. हा तर केवळ पाण्याचा मोठा साठा, पाण्याचा विशाल विस्तार आहे. भिक्खूहो, मनुष्यासाठी चक्षु (डोळा) हाच समुद्र आहे; त्याचा वेग रूपमय (रूपांनी बनलेला) असतो. जो मनुष्य त्या रूपमय वेगाला सहन करतो (त्यावर नियंत्रण ठेवतो), त्याला, भिक्खूहो, असे म्हटले जाते की त्याने लाटा, भोवरे, सुसरी (जलचर प्राणी) आणि राक्षसांनी युक्त अशा चक्षु-समुद्राला पार केले आहे; तो पार गेलेला, पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला आणि कोरड्या जमिनीवर उभा असलेला ब्राह्मण (अर्हत) आहे...पे... भिक्खूहो, मनुष्यासाठी जिव्हा (जीभ) हा समुद्र आहे; तिचा वेग रसमय असतो. जो मनुष्य त्या रसमय वेगाला सहन करतो, त्याला, भिक्खूहो, असे म्हटले जाते की त्याने लाटा, भोवरे, सुसरी आणि राक्षसांनी युक्त अशा जिव्हा-समुद्राला पार केले आहे; तो पार गेलेला, पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला आणि कोरड्या जमिनीवर उभा असलेला ब्राह्मण आहे...पे... भिक्खूहो, मनुष्यासाठी मन हा समुद्र आहे; त्याचा वेग धम्ममय (विचारांनी बनलेला) असतो. जो मनुष्य त्या धम्ममय वेगाला सहन करतो, त्याला, भिक्खूहो, असे म्हटले जाते की त्याने लाटा, भोवरे, सुसरी आणि राक्षसांनी युक्त अशा मन-समुद्राला पार केले आहे; तो पार गेलेला, पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला आणि कोरड्या जमिनीवर उभा असलेला ब्राह्मण आहे.” भगवान असे म्हणाले...पे... शास्त्यांनी (बुद्धांनी) पुढे असे म्हटले – ‘‘යො ඉමං සමුද්දං සගාහං සරක්ඛසං,සඌමිං සාවට්ටං සභයං දුත්තරං අච්චතරි; ස වෙදගූ වුසිතබ්රහ්මචරියො,ලොකන්තගූ පාරගතොති වුච්චතී’’ති. පඨමං; “ज्याने सुसरी, राक्षस, लाटा, भोवरे आणि भयाने युक्त असलेल्या, पार करण्यास अत्यंत कठीण अशा या समुद्राला पार केले आहे; तो वेदगू (ज्ञानी), ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेला, लोकाचा अंत गाठलेला आणि पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला भिक्खू (अर्हत) म्हटला जातो.” पहिले सुत्त समाप्त. 2. දුතියසමුද්දසුත්තං २. द्वितीय समुद्र सुत्त 229. ‘‘සමුද්දො, සමුද්දො’ති, භික්ඛවෙ, අස්සුතවා පුථුජ්ජනො භාසති. නෙසො, භික්ඛවෙ, අරියස්ස විනයෙ සමුද්දො. මහා එසො, භික්ඛවෙ, උදකරාසි මහාඋදකණ්ණවො. සන්ති, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අරියස්ස විනයෙ සමුද්දො. එත්ථායං සදෙවකො ලොකො සමාරකො සබ්රහ්මකො සස්සමණබ්රාහ්මණී පජා සදෙවමනුස්සා යෙභුය්යෙන සමුන්නා තන්තාකුලකජාතා කුලගණ්ඨිකජාතා මුඤ්ජපබ්බජභූතා, අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං සංසාරං නාතිවත්තති…පෙ…. २२९. “‘समुद्र, समुद्र’ असे, भिक्खूहो, अश्रुतवान पृथग्जन म्हणतो. परंतु, भिक्खूहो, आर्यांच्या विनयामध्ये हा समुद्र नाही. हा तर केवळ पाण्याचा मोठा साठा, पाण्याचा विशाल विस्तार आहे. भिक्खूहो, चक्षु-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगी अशी रूपे आहेत, जी इष्ट, कांत (प्रिय), मनाला आनंद देणारी, प्रिय वाटणारी, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारी आहेत. भिक्खूहो, आर्यांच्या विनयामध्ये यालाच ‘समुद्र’ म्हटले जाते. या रूपमय समुद्रात देव, मार आणि ब्रह्मासह हा देवलोक, तसेच श्रमण, ब्राह्मण, राजे आणि मनुष्यांसह ही प्रजा बहुतांश करून बुडून गेली आहे; ती गुंफलेल्या सुताच्या गोळ्यासारखी, गाठी पडलेल्या सुतासारखी, मुंज आणि बब्बज गवतासारखी गुंतागुंतीची झाली आहे. ती अपाय (दुर्गती), विनाश आणि संसाराला पार करू शकत नाही...पे...” ‘‘සන්ති[Pg.368], භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අරියස්ස විනයෙ සමුද්දො. එත්ථායං සදෙවකො ලොකො සමාරකො සබ්රහ්මකො සස්සමණබ්රාහ්මණී පජා සදෙවමනුස්සා යෙභුය්යෙන සමුන්නා තන්තාකුලකජාතා කුලගණ්ඨිකජාතා මුඤ්ජපබ්බජභූතා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං සංසාරං නාතිවත්තතී’’ති. “भिक्खूहो, जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगे रस आहेत...पे... भिक्खूहो, मनो-विज्ञानाने जाणता येण्याजोगे धम्म (मानसिक विषय) आहेत, जे इष्ट, कांत, मनाला आनंद देणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. भिक्खूहो, आर्यांच्या विनयामध्ये यालाच ‘समुद्र’ म्हटले जाते. या धम्ममय समुद्रात देव, मार आणि ब्रह्मासह हा देवलोक, तसेच श्रमण, ब्राह्मण, राजे आणि मनुष्यांसह ही प्रजा बहुतांश करून बुडून गेली आहे; ती गुंफलेल्या सुताच्या गोळ्यासारखी, गाठी पडलेल्या सुतासारखी, मुंज आणि बब्बज गवतासारखी गुंतागुंतीची झाली आहे. ती अपाय, दुर्गती, विनाश आणि संसाराला पार करू शकत नाही.” ‘‘යස්ස රාගො ච දොසො ච, අවිජ්ජා ච විරාජිතා; සො ඉමං සමුද්දං සගාහං සරක්ඛසං, සඌමිභයං දුත්තරං අච්චතරි. “ज्याची आसक्ती (राग), द्वेष आणि अविद्या नष्ट झाली आहे; त्याने सुसरी, राक्षस, लाटांच्या भयाने युक्त असलेल्या, पार करण्यास अत्यंत कठीण अशा या समुद्राला पार केले आहे.” ‘‘සඞ්ගාතිගො මච්චුජහො නිරුපධි, පහාසි දුක්ඛං අපුනබ්භවාය; අත්ථඞ්ගතො සො න පුනෙති, අමොහයී, මච්චුරාජන්ති බ්රූමී’’ති. දුතියං; जो आसक्तीच्या पलीकडे गेला आहे, ज्याने मृत्यूचा त्याग केला आहे, जो उपाधिरहित आहे, ज्याने पुनर्जन्म न होण्यासाठी दुःखाचा त्याग केला आहे; तो अस्तंगत झाला आहे, तो पुन्हा परत येत नाही, त्याने मृत्यूच्या राजाला (मारराजाला) भ्रमित केले आहे, असे मी म्हणतो. दुसरे. 3. බාළිසිකොපමසුත්තං ३. बाळिसिकोपम सुत्त 230. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, බාළිසිකො ආමිසගතබළිසං ගම්භීරෙ උදකරහදෙ පක්ඛිපෙය්ය. තමෙනං අඤ්ඤතරො ආමිසචක්ඛු මච්ඡො ගිලෙය්ය. එවඤ්හි සො, භික්ඛවෙ, මච්ඡො ගිලිතබළිසො බාළිසිකස්ස අනයං ආපන්නො බ්යසනං ආපන්නො යථාකාමකරණීයො බාළිසිකස්ස. २३०. भिक्षूहो, ज्याप्रमाणे एखादा कोळी आमिष (चारा) लावलेला गळ एका खोल जलाशयात टाकेल आणि आमिषावर डोळा असलेला एखादा मासा तो गळ गिळेल. भिक्षूहो, अशा प्रकारे तो गळ गिळलेला मासा कोळ्याच्या तावडीत सापडून अनर्थाला प्राप्त होतो, विनाशाला प्राप्त होतो आणि कोळ्याच्या इच्छेनुसार वागविण्यास पात्र ठरतो. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, ඡයිමෙ බළිසා ලොකස්මිං අනයාය සත්තානං වධාය පාණිනං. කතමෙ ඡ? සන්ති, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ, භික්ඛු, අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ගිලිතබළිසො, මාරස්ස අනයං ආපන්නො බ්යසනං ආපන්නො යථාකාමකරණීයො පාපිමතො…පෙ… සන්ති, භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ…. तसेच, भिक्षूहो, या जगात प्राण्यांच्या अनर्थासाठी आणि जीवांच्या विनाशासाठी हे सहा गळ आहेत. कोणते सहा? भिक्षूहो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेने युक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूहो, त्या भिक्षूला 'माराचा गळ गिळलेला भिक्षू' असे म्हटले जाते. तो अनर्थाला प्राप्त झाला आहे, विनाशाला प्राप्त झाला आहे आणि पापी माराच्या इच्छेनुसार वागविण्यास पात्र ठरला आहे... तसेच, भिक्षूहो, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ, භික්ඛු, අභිනන්දති අභිවදති අජ්ඣොසාය තිට්ඨති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ගිලිතබළිසො මාරස්ස අනයං ආපන්නො බ්යසනං ආපන්නො යථාකාමකරණීයො පාපිමතො. भिक्षूहो, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेने युक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करतो, त्यांचे स्वागत करतो आणि त्यात आसक्त होऊन राहतो, तर भिक्षूहो, त्या भिक्षूला 'माराचा गळ गिळलेला भिक्षू' असे म्हटले जाते. तो अनर्थाला प्राप्त झाला आहे, विनाशाला प्राप्त झाला आहे आणि पापी माराच्या इच्छेनुसार वागविण्यास पात्र ठरला आहे. ‘‘සන්ති [Pg.369] ච, භික්ඛවෙ, චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු න ගිලිතබළිසො මාරස්ස අභෙදි බළිසං පරිභෙදි බළිසං න අනයං ආපන්නො න බ්යසනං ආපන්නො න යථාකාමකරණීයො පාපිමතො…පෙ…. भिक्षूहो, डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे असे रूप आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेने युक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूहो, त्या भिक्षूला 'माराचा गळ न गिळलेला भिक्षू' असे म्हटले जाते. त्याने तो गळ तोडला आहे, तो गळ नष्ट केला आहे. तो अनर्थाला प्राप्त झालेला नाही, विनाशाला प्राप्त झालेला नाही आणि पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वागू शकत नाही... तसेच... ‘‘සන්ති, භික්ඛවෙ, ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යා රසා…පෙ…. සන්ති, භික්ඛවෙ, මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. තඤ්චෙ භික්ඛු නාභිනන්දති නාභිවදති නාජ්ඣොසාය තිට්ඨති, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, භික්ඛු න ගිලිතබළිසො මාරස්ස අභෙදි බළිසං පරිභෙදි බළිසං න අනයං ආපන්නො න බ්යසනං ආපන්නො න යථාකාමකරණීයො පාපිමතො’’ති. තතියං. भिक्षूहो, जिभेने जाणता येण्याजोगे रस आहेत... तसेच, भिक्षूहो, मनाने जाणता येण्याजोगे असे धम्म आहेत जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेने युक्त आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. जर एखादा भिक्षू त्यांचे अभिनंदन करत नाही, त्यांचे स्वागत करत नाही आणि त्यात आसक्त होऊन राहत नाही, तर भिक्षूहो, त्या भिक्षूला 'माराचा गळ न गिळलेला भिक्षू' असे म्हटले जाते. त्याने तो गळ तोडला आहे, तो गळ नष्ट केला आहे. तो अनर्थाला प्राप्त झालेला नाही, विनाशाला प्राप्त झालेला नाही आणि पापी मार त्याच्याशी आपल्या इच्छेनुसार वागू शकत नाही. तिसरे. 4. ඛීරරුක්ඛොපමසුත්තං ४. खीररुक्खोपम सुत्त 231. ‘‘යස්ස කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු යො රාගො සො අත්ථි, යො දොසො සො අත්ථි, යො මොහො සො අත්ථි, යො රාගො සො අප්පහීනො, යො දොසො සො අප්පහීනො, යො මොහො සො අප්පහීනො තස්ස පරිත්තා චෙපි චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා චක්ඛුස්ස ආපාථං ආගච්ඡන්ති පරියාදියන්තෙවස්ස චිත්තං; කො පන වාදො අධිමත්තානං! තං කිස්ස හෙතු? යො, භික්ඛවෙ, රාගො, සො අත්ථි, යො දොසො සො අත්ථි, යො මොහො සො අත්ථි, යො රාගො සො අප්පහීනො, යො දොසො සො අප්පහීනො, යො මොහො සො අප්පහීනො…පෙ…. २३१. भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये डोळ्यांनी जाणता येण्याजोग्या रूपांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल, जो द्वेष आहे तो तसाच असेल, जो मोह आहे तो तसाच असेल; आणि तो राग नष्ट केलेला नसेल, तो द्वेष नष्ट केलेला नसेल, तो मोह नष्ट केलेला नसेल; तर डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे अगदी थोडे रूप जरी त्यांच्या डोळ्यांसमोर आले, तरी ते त्यांच्या चित्ताला व्यापून टाकतात; मग मोठ्या रूपांविषयी तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूहो, कारण जो राग आहे तो तसाच आहे, जो द्वेष आहे तो तसाच आहे, जो मोह आहे तो तसाच आहे; आणि तो राग नष्ट केलेला नाही, तो द्वेष नष्ट केलेला नाही, तो मोह नष्ट केलेला नाही... तसेच... ‘‘යස්ස කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යෙසු රසෙසු යො රාගො සො අත්ථි…පෙ…. भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये जिभेने जाणता येण्याजोग्या रसांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल... तसेच... ‘‘යස්ස කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා මනොවිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු යො රාගො සො අත්ථි, යො දොසො සො අත්ථි, යො මොහො සො අත්ථි, යො රාගො සො අප්පහීනො, යො දොසො සො අප්පහීනො, යො මොහො සො අප්පහීනො, තස්ස පරිත්තා චෙපි මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා මනස්ස ආපාථං ආගච්ඡන්ති පරියාදියන්තෙවස්ස චිත්තං; කො පන වාදො අධිමත්තානං! තං කිස්ස හෙතු? යො, භික්ඛවෙ, රාගො, සො අත්ථි, යො දොසො සො අත්ථි, යො මොහො සො [Pg.370] අත්ථි, යො රාගො සො අප්පහීනො, යො දොසො සො අප්පහීනො, යො මොහො සො අප්පහීනො. भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये मनाने जाणता येण्याजोग्या धम्मांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल, जो द्वेष आहे तो तसाच असेल, जो मोह आहे तो तसाच असेल; आणि तो राग नष्ट केलेला नसेल, तो द्वेष नष्ट केलेला नसेल, तो मोह नष्ट केलेला नसेल; तर मनाने जाणता येण्याजोगे अगदी थोडे जरी धम्म त्यांच्या मनासमोर आले, तरी ते त्यांच्या चित्ताला व्यापून टाकतात; मग मोठ्या धम्मांविषयी तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूहो, कारण जो राग आहे तो तसाच आहे, जो द्वेष आहे तो तसाच आहे, जो मोह आहे तो तसाच आहे; आणि तो राग नष्ट केलेला नाही, तो द्वेष नष्ट केलेला नाही, तो मोह नष्ट केलेला नाही. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, ඛීරරුක්ඛො අස්සත්ථො වා නිග්රොධො වා පිලක්ඛො වා උදුම්බරො වා දහරො තරුණො කොමාරකො. තමෙනං පුරිසො තිණ්හාය කුඨාරියා යතො යතො ආභින්දෙය්ය ආගච්ඡෙය්ය ඛීර’’න්ති? ‘‘එවං, භන්තෙ’’. ‘‘තං කිස්ස හෙතු’’? ‘‘යඤ්හි, භන්තෙ, ඛීරං තං අත්ථී’’ති. भिक्षूहो, ज्याप्रमाणे समजा एखादे दूध किंवा चीक असणारे झाड असेल—पिंपळ, वटवृक्ष, पिळ्ळख किंवा उदुंबर—जे लहान, कोवळे आणि तरुण आहे. जर एखाद्या माणसाने त्यावर तीक्ष्ण कुऱ्हाडीने जिथे जिथे घाव घातला, तिथे तिथे चीक बाहेर येईल का? 'होय, भंते.' 'त्याचे कारण काय?' 'कारण, भंते, त्या झाडामध्ये चीक आहे.' ‘‘එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, යස්ස කස්සචි භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු යො රාගො සො අත්ථි, යො දොසො සො අත්ථි, යො මොහො සො අත්ථි, යො රාගො සො අප්පහීනො, යො දොසො සො අප්පහීනො, යො මොහො සො අප්පහීනො, තස්ස පරිත්තා චෙපි චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා චක්ඛුස්ස ආපාථං ආගච්ඡන්ති පරියාදියන්තෙවස්ස චිත්තං; කො පන වාදො අධිමත්තානං! තං කිස්ස හෙතු? යො, භික්ඛවෙ, රාගො සො අත්ථි, යො දොසො සො අත්ථි, යො මොහො සො අත්ථි, යො රාගො සො අප්පහීනො, යො දොසො සො අප්පහීනො, යො මොහො සො අප්පහීනො…පෙ…. तशाच प्रकारे, भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये डोळ्यांनी जाणता येण्याजोग्या रूपांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल, जो द्वेष आहे तो तसाच असेल, जो मोह आहे तो तसाच असेल; आणि तो राग नष्ट केलेला नसेल, तो द्वेष नष्ट केलेला नसेल, तो मोह नष्ट केलेला नसेल; तर डोळ्यांनी जाणता येण्याजोगे अगदी थोडे रूप जरी त्यांच्या डोळ्यांसमोर आले, तरी ते त्यांच्या चित्ताला व्यापून टाकतात; मग मोठ्या रूपांविषयी तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूहो, कारण जो राग आहे तो तसाच आहे, जो द्वेष आहे तो तसाच आहे, जो मोह आहे तो तसाच आहे; आणि तो राग नष्ट केलेला नाही, तो द्वेष नष्ट केलेला नाही, तो मोह नष्ट केलेला नाही... तसेच... ‘‘යස්ස කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යෙසු රසෙසු යො රාගො සො අත්ථි…පෙ…. भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये जिभेने जाणता येण्याजोग्या रसांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल... तसेच... ‘‘යස්ස කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා මනොවිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු යො රාගො සො අත්ථි, යො දොසො සො අත්ථි, යො මොහො සො අත්ථි, යො රාගො සො අප්පහීනො, යො දොසො සො අප්පහීනො, යො මොහො සො අප්පහීනො, තස්ස පරිත්තා චෙපි මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා මනස්ස ආපාථං ආගච්ඡන්ති පරියාදියන්තෙවස්ස චිත්තං; කො පන වාදො අධිමත්තානං! තං කිස්ස හෙතු? යො, භික්ඛවෙ, රාගො සො අත්ථි, යො දොසො සො අත්ථි, යො මොහො සො අත්ථි, යො රාගො සො අප්පහීනො, යො දොසො සො අප්පහීනො, යො මොහො සො අප්පහීනො. भिक्षूहो, ज्या कोणा भिक्षूमध्ये किंवा भिक्षुणीमध्ये मनाने जाणता येण्याजोग्या धम्मांविषयी जो राग आहे तो तसाच असेल, जो द्वेष आहे तो तसाच असेल, जो मोह आहे तो तसाच असेल; आणि तो राग नष्ट केलेला नसेल, तो द्वेष नष्ट केलेला नसेल, तो मोह नष्ट केलेला नसेल; तर मनाने जाणता येण्याजोगे अगदी थोडे जरी धम्म त्यांच्या मनासमोर आले, तरी ते त्यांच्या चित्ताला व्यापून टाकतात; मग मोठ्या धम्मांविषयी तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूहो, कारण जो राग आहे तो तसाच आहे, जो द्वेष आहे तो तसाच आहे, जो मोह आहे तो तसाच आहे; आणि तो राग नष्ट केलेला नाही, तो द्वेष नष्ट केलेला नाही, तो मोह नष्ट केलेला नाही. ‘‘යස්ස කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු යො රාගො සො නත්ථි, යො දොසො සො නත්ථි, යො මොහො සො නත්ථි, යො රාගො සො පහීනො, යො දොසො සො පහීනො, යො මොහො සො [Pg.371] පහීනො, තස්ස අධිමත්තා චෙපි චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා චක්ඛුස්ස ආපාථං ආගච්ඡන්ති නෙවස්ස චිත්තං පරියාදියන්ති; කො පන වාදො පරිත්තානං! තං කිස්ස හෙතු? යො, භික්ඛවෙ, රාගො සො නත්ථි, යො දොසො සො නත්ථි, යො මොහො සො නත්ථි, යො රාගො සො පහීනො, යො දොසො සො පහීනො, යො මොහො සො පහීනො…පෙ…. “भिक्षूंनो, ज्या कोणा भिक्षूच्या किंवा भिक्षुणीच्या बाबतीत, डोळ्याने जाणता येणाऱ्या रूपांविषयी जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो; तर डोळ्याने जाणता येणारी अत्यंत प्रबळ रूपे जरी त्याच्या डोळ्यांच्या टप्प्यात आली, तरी ती त्याच्या चित्ताला वश करू शकत नाहीत; मग क्षुल्लक रूपांबद्दल तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूंनो, जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो... पे...” ‘‘යස්ස කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යෙසු රසෙසු…පෙ… මනොවිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු යො රාගො සො නත්ථි, යො දොසො සො නත්ථි, යො මොහො සො නත්ථි, යො රාගො සො පහීනො, යො දොසො සො පහීනො, යො මොහො සො පහීනො, තස්ස අධිමත්තා චෙපි මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා මනස්ස ආපාථං ආගච්ඡන්ති නෙවස්ස චිත්තං පරියාදියන්ති; කො පන වාදො පරිත්තානං! තං කිස්ස හෙතු? යො, භික්ඛවෙ, රාගො සො නත්ථි, යො දොසො සො නත්ථි, යො මොහො සො නත්ථි, යො රාගො සො පහීනො, යො දොසො සො පහීනො, යො මොහො සො පහීනො. සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, ඛීරරුක්ඛො අස්සත්ථො වා නිග්රොධො වා පිලක්ඛො වා උදුම්බරො වා සුක්ඛො කොලාපො තෙරොවස්සිකො. තමෙනං පුරිසො තිණ්හාය කුඨාරියා යතො යතො ආභින්දෙය්ය ආගච්ඡෙය්ය ඛීර’’න්ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘තං කිස්ස හෙතු’’? ‘‘යඤ්හි, භන්තෙ, ඛීරං තං නත්ථී’’ති. “भिक्षूंनो, ज्या कोणा भिक्षूच्या किंवा भिक्षुणीच्या बाबतीत, जिभेने जाणता येणाऱ्या रसांविषयी... पे... मनाद्वारे जाणता येणाऱ्या मनोविषयांबद्दल जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो; तर मनाद्वारे जाणता येणारे अत्यंत प्रबळ मनोविषय जरी त्याच्या मनाच्या टप्प्यात आले, तरी ती त्याच्या चित्ताला वश करू शकत नाहीत; मग क्षुल्लक मनोविषयांबद्दल तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूंनो, जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो. भिक्षूंनो, समजा एखादा चिकाचा वृक्ष असेल—पिंपळ, वटवृक्ष, पिंपरी किंवा उंबर—जो वाळलेला, कुजलेला आणि जुना झालेला आहे. जर एखाद्या माणसाने धारदार कुऱ्हाडीने त्याला ठिकठिकाणी तोडले, तर त्यातून चीक बाहेर पडेल का?” “नाही, भन्ते.” “त्याचे कारण काय?” “कारण, भन्ते, त्यात जो चीक असायला हवा होता, तो आता नाहीच.” ‘‘එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, යස්ස කස්සචි භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු යො රාගො සො නත්ථි, යො දොසො සො නත්ථි, යො මොහො සො නත්ථි, යො රාගො සො පහීනො, යො දොසො සො පහීනො, යො මොහො සො පහීනො, තස්ස අධිමත්තා චෙපි චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා චක්ඛුස්ස ආපාථං ආගච්ඡන්ති නෙවස්ස චිත්තං පරියාදියන්ති; කො පන වාදො පරිත්තානං! තං කිස්ස හෙතු? යො, භික්ඛවෙ, රාගො සො නත්ථි, යො දොසො සො නත්ථි, යො මොහො සො නත්ථි, යො රාගො සො පහීනො, යො දොසො සො පහීනො, යො මොහො සො පහීනො…පෙ…. “त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो, ज्या कोणा भिक्षूच्या किंवा भिक्षुणीच्या बाबतीत, डोळ्याने जाणता येणाऱ्या रूपांविषयी जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो; तर डोळ्याने जाणता येणारी अत्यंत प्रबळ रूपे जरी त्याच्या डोळ्यांच्या टप्प्यात आली, तरी ती त्याच्या चित्ताला वश करू शकत नाहीत; मग क्षुल्लक रूपांबद्दल तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूंनो, जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो... पे...” ‘‘යස්ස කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යෙසු රසෙසු…පෙ…. “भिक्षूंनो, ज्या कोणा भिक्षूच्या किंवा भिक्षुणीच्या बाबतीत, जिभेने जाणता येणाऱ्या रसांविषयी... पे...” ‘‘යස්ස [Pg.372] කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා මනොවිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු යො රාගො සො නත්ථි, යො දොසො සො නත්ථි, යො මොහො සො නත්ථි, යො රාගො සො පහීනො, යො දොසො සො පහීනො, යො මොහො සො පහීනො, තස්ස අධිමත්තා චෙපි මනොවිඤ්ඤෙය්යා ධම්මා මනස්ස ආපාථං ආගච්ඡන්ති, නෙවස්ස චිත්තං පරියාදියන්ති; කො පන වාදො පරිත්තානං! තං කිස්ස හෙතු? යො, භික්ඛවෙ, රාගො සො නත්ථි, යො දොසො සො නත්ථි, යො මොහො සො නත්ථි, යො රාගො සො පහීනො, යො දොසො සො පහීනො, යො මොහො සො පහීනො’’ති. චතුත්ථං. “भिक्षूंनो, ज्या कोणा भिक्षूच्या किंवा भिक्षुणीच्या बाबतीत, मनाद्वारे जाणता येणाऱ्या मनोविषयांबद्दल जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो; तर मनाद्वारे जाणता येणारे अत्यंत प्रबळ मनोविषय जरी त्याच्या मनाच्या टप्प्यात आले, तरी ती त्याच्या चित्ताला वश करू शकत नाहीत; मग क्षुल्लक मनोविषयांबद्दल तर काय सांगावे! त्याचे कारण काय? भिक्षूंनो, जो राग असतो तो नसतो, जो द्वेष असतो तो नसतो, जो मोह असतो तो नसतो; जो राग असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो द्वेष असतो तो नष्ट केलेला असतो, जो मोह असतो तो नष्ट केलेला असतो.” चौथे सुत्त. 5. කොට්ඨිකසුත්තං ५. कोट्ठिक सुत्त 232. එකං සමයං ආයස්මා ච සාරිපුත්තො ආයස්මා ච මහාකොට්ඨිකො බාරාණසියං විහරන්ති ඉසිපතනෙ මිගදායෙ. අථ ඛො ආයස්මා මහාකොට්ඨිකො සායන්හසමයං පටිසල්ලානා වුට්ඨිතො යෙනායස්මා සාරිපුත්තො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා සාරිපුත්තෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා මහාකොට්ඨිකො ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං එතදවොච – २३२. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाकोट्ठिक वाराणसी येथील इसिपतन येथील मृगदावात विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान महाकोट्ठिक संध्याकाळच्या वेळी एकांतातून उठून जेथे आयुष्यमान सारिपुत्त होते तेथे गेले; तेथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान सारिपुत्त यांच्याशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण आटोपून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान महाकोट्ठिक आयुष्यमान सारिपुत्त यांना असे म्हणाले – ‘‘කිං නු ඛො, ආවුසො සාරිපුත්ත, චක්ඛු රූපානං සංයොජනං, රූපා චක්ඛුස්ස සංයොජනං…පෙ… ජිව්හා රසානං සංයොජනං, රසා ජිව්හාය සංයොජනං …පෙ… මනො ධම්මානං සංයොජනං, ධම්මා මනස්ස සංයොජන’’න්ති? “मित्र सारिपुत्त, डोळा हा रूपांचे बंधन आहे की रूपे ही डोळ्याचे बंधन आहेत? ...पे... जीभ ही रसांचे बंधन आहे की रस हे जिभेचे बंधन आहेत? ...पे... मन हे मनोविषयांचे बंधन आहे की मनोविषय हे मनाचे बंधन आहेत?” ‘‘න ඛො, ආවුසො කොට්ඨික, චක්ඛු රූපානං සංයොජනං, න රූපා චක්ඛුස්ස සංයොජනං. යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො තං තත්ථ සංයොජනං…පෙ… න ජිව්හා රසානං සංයොජනං, න රසා ජිව්හාය සංයොජනං. යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො තං තත්ථ සංයොජනං…පෙ… න මනො ධම්මානං සංයොජනං, න ධම්මා මනස්ස සංයොජනං. යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො තං තත්ථ සංයොජනං. “मित्र कोट्ठिक, डोळा हा रूपांचे बंधन नाही आणि रूपेही डोळ्याचे बंधन नाहीत. परंतु त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे. ...पे... जीभ ही रसांचे बंधन नाही आणि रसही जिभेचे बंधन नाहीत. परंतु त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे. ...पे... मन हे मनोविषयांचे बंधन नाही आणि मनोविषयही मनाचे बंधन नाहीत. परंतु त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे.” ‘‘සෙය්යථාපි, ආවුසො, කාළො ච බලීබද්දො ඔදාතො ච බලීබද්දො එකෙන දාමෙන වා යොත්තෙන වා සංයුත්තා අස්සු. යො නු ඛො එවං [Pg.373] වදෙය්ය – ‘කාළො බලීබද්දො ඔදාතස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජනං, ඔදාතො බලීබද්දො කාළස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජන’න්ති, සම්මා නු ඛො සො වදමානො වදෙය්යා’’ති? ‘‘නො හෙතං, ආවුසො’’. ‘‘න ඛො, ආවුසො, කාළො බලීබද්දො ඔදාතස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජනං, න ඔදාතො බලීබද්දො කාළස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජනං. යෙන ච ඛො තෙ එකෙන දාමෙන වා යොත්තෙන වා සංයුත්තා තං තත්ථ සංයොජනං. “मित्रा, समजा एक काळा बैल आणि एक पांढरा बैल एकाच दोरीने किंवा जोताने एकत्र बांधलेले असतील. जर कोणी असे म्हणाला की—‘काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे बंधन आहे, आणि पांढरा बैल हा काळ्या बैलाचे बंधन आहे’, तर त्याचे असे बोलणे योग्य ठरेल का?’ ‘नाही, मित्रा.’ ‘मित्रा, काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे बंधन नाही आणि पांढरा बैल हा काळ्या बैलाचे बंधन नाही. परंतु ज्या एका दोरीने किंवा जोताने ते एकत्र बांधलेले आहेत, तेच तेथे बंधन आहे.’” ‘‘එවමෙව ඛො, ආවුසො, න චක්ඛු රූපානං සංයොජනං, න රූපා චක්ඛුස්ස සංයොජනං. යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො තං තත්ථ සංයොජනං…පෙ… න ජිව්හා රසානං සංයොජනං…පෙ… න මනො ධම්මානං සංයොජනං, න ධම්මා මනස්ස සංයොජනං. යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං. “त्याचप्रमाणे, मित्रा, डोळा हा रूपांचे बंधन नाही आणि रूपेही डोळ्याचे बंधन नाहीत. परंतु त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे. ...पे... जीभ ही रसांचे बंधन नाही... पे... मन हे मनोविषयांचे बंधन नाही आणि मनोविषयही मनाचे बंधन नाहीत. परंतु त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे.” ‘‘චක්ඛු වා, ආවුසො, රූපානං සංයොජනං අභවිස්ස, රූපා වා චක්ඛුස්ස සංයොජනං, නයිදං බ්රහ්මචරියවාසො පඤ්ඤායෙථ සම්මා දුක්ඛක්ඛයාය. යස්මා ච ඛො, ආවුසො, න චක්ඛු රූපානං සංයොජනං, න රූපා චක්ඛුස්ස සංයොජනං; යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං, තස්මා බ්රහ්මචරියවාසො පඤ්ඤායති සම්මා දුක්ඛක්ඛයාය…පෙ…. “मित्रा, जर डोळा हा रूपांचे बंधन असता किंवा रूपे ही डोळ्याचे बंधन असती, तर दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी या ब्रह्मचर्यवासाचे प्रयोजन दिसले नसते. परंतु मित्रा, डोळा हा रूपांचे बंधन नाही आणि रूपेही डोळ्याचे बंधन नाहीत; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथे बंधन आहे, म्हणूनच दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी ब्रह्मचर्यवासाचे प्रयोजन दिसून येते... पे...” ‘‘ජිව්හා, ආවුසො, රසානං සංයොජනං අභවිස්ස, රසා වා ජිව්හාය සංයොජනං, නයිදං බ්රහ්මචරියවාසො පඤ්ඤායෙථ සම්මා දුක්ඛක්ඛයාය. යස්මා ච ඛො, ආවුසො, න ජිව්හා රසානං සංයොජනං, න රසා ජිව්හාය සංයොජනං; යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං, තස්මා බ්රහ්මචරියවාසො පඤ්ඤායති සම්මා දුක්ඛක්ඛයාය…පෙ…. “हे आवुसो, जर जीभ ही रसांचे संयोजन (बंधन) असती किंवा रस हे जिभेचे संयोजन असते, तर दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी हे ब्रह्मचर्यवास योग्य प्रकारे दिसून आले नसते. परंतु, हे आवुसो, जीभ ही रसांचे संयोजन नाही आणि रस हे जिभेचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे. म्हणूनच, दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी हे ब्रह्मचर्यवास योग्य प्रकारे दिसून येते... (पे)...” ‘‘මනො වා, ආවුසො, ධම්මානං සංයොජනං අභවිස්ස, ධම්මා වා මනස්ස සංයොජනං, නයිදං බ්රහ්මචරියවාසො පඤ්ඤායෙථ සම්මා දුක්ඛක්ඛයාය. යස්මා ච ඛො, ආවුසො, න මනො ධම්මානං සංයොජනං, න ධම්මා මනස්ස සංයොජනං; යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං, තස්මා බ්රහ්මචරියවාසො පඤ්ඤායති සම්මා දුක්ඛක්ඛයාය. “हे आवुसो, जर मन हे धम्मांचे (मानसिक विषयांचे) संयोजन असते किंवा धम्म हे मनाचे संयोजन असते, तर दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी हे ब्रह्मचर्यवास योग्य प्रकारे दिसून आले नसते. परंतु, हे आवुसो, मन हे धम्मांचे संयोजन नाही आणि धम्म हे मनाचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे. म्हणूनच, दुःखाच्या पूर्ण नाशासाठी हे ब्रह्मचर्यवास योग्य प्रकारे दिसून येते.” ‘‘ඉමිනාපෙතං[Pg.374], ආවුසො, පරියායෙන වෙදිතබ්බං යථා න චක්ඛු රූපානං සංයොජනං, න රූපා චක්ඛුස්ස සංයොජනං. යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං…පෙ… න ජිව්හා රසානං සංයොජනං…පෙ… න මනො ධම්මානං සංයොජනං, න ධම්මා මනස්ස සංයොජනං. යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං. “हे आवुसो, या पर्यायाने देखील हे समजून घेतले पाहिजे की, डोळे हे रूपांचे संयोजन नाही आणि रूपे हे डोळ्यांचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे... (पे)... जीभ ही रसांचे संयोजन नाही... (पे)... मन हे धम्मांचे संयोजन नाही आणि धम्म हे मनाचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे.” ‘‘සංවිජ්ජති ඛො, ආවුසො, භගවතො චක්ඛු. පස්සති භගවා චක්ඛුනා රූපං. ඡන්දරාගො භගවතො නත්ථි. සුවිමුත්තචිත්තො භගවා. සංවිජ්ජති ඛො, ආවුසො, භගවතො සොතං. සුණාති භගවා සොතෙන සද්දං. ඡන්දරාගො භගවතො නත්ථි. සුවිමුත්තචිත්තො භගවා. සංවිජ්ජති ඛො, ආවුසො, භගවතො ඝානං. ඝායති භගවා ඝානෙන ගන්ධං. ඡන්දරාගො භගවතො නත්ථි. සුවිමුත්තචිත්තො භගවා. සංවිජ්ජති ඛො, ආවුසො, භගවතො ජිව්හා. සායති භගවා ජිව්හාය රසං. ඡන්දරාගො භගවතො නත්ථි. සුවිමුත්තචිත්තො භගවා. සංවිජ්ජති ඛො, ආවුසො, භගවතො කායො. ඵුසති භගවා කායෙන ඵොට්ඨබ්බං. ඡන්දරාගො භගවතො නත්ථි. සුවිමුත්තචිත්තො භගවා. සංවිජ්ජති ඛො, ආවුසො, භගවතො මනො. විජානාති භගවා මනසා ධම්මං. ඡන්දරාගො භගවතො නත්ථි. සුවිමුත්තචිත්තො භගවා. “हे आवुसो, भगवंतांकडे डोळे आहेत. भगवंत डोळ्यांनी रूप पाहतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त (पूर्णपणे मुक्त चित्त असलेले) आहेत. हे आवुसो, भगवंतांकडे कान आहेत. भगवंत कानांनी शब्द ऐकतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त आहेत. हे आवुसो, भगवंतांकडे नाक आहे. भगवंत नाकाने गंध घेतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त आहेत. हे आवुसो, भगवंतांकडे जीभ आहे. भगवंत जिभेने रसाची चव घेतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त आहेत. हे आवुसो, भगवंतांकडे शरीर आहे. भगवंत शरीराने स्पर्शाचा अनुभव घेतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त आहेत. हे आवुसो, भगवंतांकडे मन आहे. भगवंत मनाने धम्म जाणतात, परंतु भगवंतांमध्ये छंदराग नाही; भगवंत सुविमुक्तचित्त आहेत.” ‘‘ඉමිනා ඛො එතං, ආවුසො, පරියායෙන වෙදිතබ්බං යථා න චක්ඛු රූපානං සංයොජනං, න රූපා චක්ඛුස්ස සංයොජනං; යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං. න සොතං… න ඝානං… න ජිව්හා රසානං සංයොජනං, න රසා ජිව්හාය සංයොජනං; යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො තං තත්ථ සංයොජනං. න කායො… න මනො ධම්මානං සංයොජනං, න ධම්මා මනස්ස සංයොජනං; යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජන’’න්ති. පඤ්චමං. “हे आवुसो, या पर्यायाने हे समजून घेतले पाहिजे की, डोळे हे रूपांचे संयोजन नाही आणि रूपे हे डोळ्यांचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे. कान नाही... नाक नाही... जीभ ही रसांचे संयोजन नाही आणि रस हे जिभेचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे. शरीर नाही... मन हे धम्मांचे संयोजन नाही आणि धम्म हे मनाचे संयोजन नाही; तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे.” पाचवे. 6. කාමභූසුත්තං ६. कामभू सुत्त 233. එකං සමයං ආයස්මා ච ආනන්දො ආයස්මා ච කාමභූ කොසම්බියං විහරන්ති ඝොසිතාරාමෙ. අථ ඛො ආයස්මා කාමභූ සායන්හසමයං පටිසල්ලානා වුට්ඨිතො යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා ආනන්දෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං [Pg.375] කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා කාමභූ ආයස්මන්තං ආනන්දං එතදවොච – २३३. एकदा आयुष्यमान आनंद आणि आयुष्यमान कामभू कोसंबी येथील घोषिताराम विहारामध्ये विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान कामभू संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे आयुष्यमान आनंद होते तेथे गेले; तेथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान आनंदांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान कामभू आयुष्यमान आनंदांना असे म्हणाले – ‘‘කිං නු ඛො, ආවුසො ආනන්ද, චක්ඛු රූපානං සංයොජනං, රූපා චක්ඛුස්ස සංයොජනං…පෙ… ජිව්හා රසානං සංයොජනං, රසා ජිව්හාය සංයොජනං…පෙ… මනො ධම්මානං සංයොජනං, ධම්මා මනස්ස සංයොජන’’න්ති? “हे आवुसो आनंद, डोळे हे रूपांचे संयोजन आहे की रूपे हे डोळ्यांचे संयोजन आहे? ... जीभ ही रसांचे संयोजन आहे की रस हे जिभेचे संयोजन आहे? ... मन हे धम्मांचे संयोजन आहे की धम्म हे मनाचे संयोजन आहे?” ‘‘න ඛො, ආවුසො කාමභූ, චක්ඛු රූපානං සංයොජනං, න රූපා චක්ඛුස්ස සංයොජනං. යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජනං…පෙ… න ජිව්හා රසානං සංයොජනං, න රසා ජිව්හාය සංයොජනං…පෙ… න මනො ධම්මානං සංයොජනං, න ධම්මා මනස්ස සංයොජනං. යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො තං තත්ථ සංයොජනං. “हे आवुसो कामभू, डोळे हे रूपांचे संयोजन नाही आणि रूपे हे डोळ्यांचे संयोजन नाही. तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे... (पे)... जीभ ही रसांचे संयोजन नाही आणि रस हे जिभेचे संयोजन नाही... (पे)... मन हे धम्मांचे संयोजन नाही आणि धम्म हे मनाचे संयोजन नाही. तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे.” ‘‘සෙය්යථාපි, ආවුසො, කාළො ච බලීබද්දො ඔදාතො ච බලීබද්දො එකෙන දාමෙන වා යොත්තෙන වා සංයුත්තා අස්සු. යො නු ඛො එවං වදෙය්ය – ‘කාළො බලීබද්දො ඔදාතස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජනං, ඔදාතො බලීබද්දො කාළස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජන’න්ති, සම්මා නු ඛො සො වදමානො වදෙය්යා’’ති? ‘‘නො හෙතං, ආවුසො’’. ‘‘න ඛො, ආවුසො, කාළො බලීබද්දො ඔදාතස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජනං, නපි ඔදාතො බලීබද්දො කාළස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජනං. යෙන ච ඛො තෙ එකෙන දාමෙන වා යොත්තෙන වා සංයුත්තා, තං තත්ථ සංයොජනං. එවමෙව ඛො, ආවුසො, න චක්ඛු රූපානං සංයොජනං, න රූපා චක්ඛුස්ස සංයොජනං…පෙ… න ජිව්හා…පෙ… න මනො…පෙ… යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො, තං තත්ථ සංයොජන’’න්ති. ඡට්ඨං. “हे आवुसो, समजा एक काळा बैल आणि एक पांढरा बैल एकाच दोरीने किंवा जोताने एकत्र बांधलेले असतील. जर कोणी असे म्हणाला की, ‘काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे संयोजन आहे, आणि पांढरा बैल हा काळ्या बैलाचे संयोजन आहे,’ तर त्याचे हे बोलणे योग्य ठरेल का?” “नाही, आवुसो.” “हे आवुसो, काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे संयोजन नाही आणि पांढरा बैल हा काळ्या बैलाचे संयोजन नाही. तर ज्या एका दोरीने किंवा जोताने ते दोन्ही बांधलेले आहेत, तेच तेथे संयोजन आहे. तसेच, हे आवुसो, डोळे हे रूपांचे संयोजन नाही आणि रूपे हे डोळ्यांचे संयोजन नाही... (पे)... जीभ नाही... (पे)... मन नाही... (पे)... तर त्या दोन्हीवर अवलंबून जो छंदराग उत्पन्न होतो, तेच तेथे संयोजन आहे.” सहावे. 7. උදායීසුත්තං ७. उदायी सुत्त 234. එකං සමයං ආයස්මා ච ආනන්දො ආයස්මා ච උදායී කොසම්බියං විහරන්ති ඝොසිතාරාමෙ. අථ ඛො ආයස්මා උදායී සායන්හසමයං පටිසල්ලානා වුට්ඨිතො යෙනායස්මා ආනන්දො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා ආනන්දෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා උදායී ආයස්මන්තං ආනන්දං එතදවොච – २३४. एकदा आयुष्यमान आनंद आणि आयुष्यमान उदायी कोसंबी येथील घोषिताराम विहारामध्ये विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान उदायी संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे आयुष्यमान आनंद होते तेथे गेले; तेथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान आनंदांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान उदायी आयुष्यमान आनंदांना असे म्हणाले – ‘‘යථෙව [Pg.376] නු ඛො, ආවුසො ආනන්ද, අයං කායො භගවතා අනෙකපරියායෙන අක්ඛාතො විවටො පකාසිතො – ‘ඉතිපායං කායො අනත්තා’ති, සක්කා එවමෙව විඤ්ඤාණං පිදං ආචික්ඛිතුං දෙසෙතුං පඤ්ඤපෙතුං පට්ඨපෙතුං විවරිතුං විභජිතුං උත්තානීකාතුං – ‘ඉතිපිදං විඤ්ඤාණං අනත්තා’’’ති? “हे आवुसो आनंद, ज्याप्रमाणे भगवंतांनी या शरीराचे अनेक पर्यायांनी वर्णन केले आहे, ते उघड केले आहे आणि प्रकाशित केले आहे की—‘या कारणाने हे शरीर अनात्मा आहे,’ त्याचप्रमाणे या विज्ञानाचे देखील स्पष्टीकरण देणे, उपदेश करणे, प्रज्ञापित करणे, प्रस्थापित करणे, उघड करणे, विश्लेषण करणे आणि स्पष्ट करणे शक्य आहे का की—‘या कारणाने हे विज्ञान अनात्मा आहे’?” ‘‘යථෙව ඛො, ආවුසො උදායී, අයං කායො භගවතා අනෙකපරියායෙන අක්ඛාතො විවටො පකාසිතො – ‘ඉතිපායං කායො අනත්තා’ති, සක්කා එවමෙව විඤ්ඤාණං පිදං ආචික්ඛිතුං දෙසෙතුං පඤ්ඤපෙතුං පට්ඨපෙතුං විවරිතුං විභජිතුං උත්තානීකාතුං – ‘ඉතිපිදං විඤ්ඤාණං අනත්තා’’’ති. "हे आवुसो उदायी, ज्याप्रमाणे भगवंतांनी या शरीराला अनेक पर्यायांनी स्पष्ट केले आहे, उघड केले आहे आणि प्रकाशित केले आहे की—'या कारणाने हे शरीर अनात्मा आहे', त्याचप्रमाणे या विज्ञानालाही सांगणे, उपदेशिणे, प्रज्ञापित करणे, प्रस्थापित करणे, उघड करणे, विभाजित करणे आणि स्पष्ट करणे शक्य आहे की—'या कारणाने हे विज्ञान अनात्मा आहे'." ‘‘චක්ඛුඤ්ච, ආවුසො, පටිච්ච රූපෙ ච උප්පජ්ජති චක්ඛුවිඤ්ඤාණ’’න්ති? ‘‘එවමාවුසො’’ති. ‘‘යො චාවුසො, හෙතු, යො ච පච්චයො චක්ඛුවිඤ්ඤාණස්ස උප්පාදාය, සො ච හෙතු, සො ච පච්චයො සබ්බෙන සබ්බං සබ්බථා සබ්බං අපරිසෙසං නිරුජ්ඣෙය්ය. අපි නු ඛො චක්ඛුවිඤ්ඤාණං පඤ්ඤායෙථා’’ති? ‘‘නො හෙතං, ආවුසො’’. ‘‘ඉමිනාපි ඛො එතං, ආවුසො, පරියායෙන භගවතා අක්ඛාතං විවටං පකාසිතං – ‘ඉතිපිදං විඤ්ඤාණං අනත්තා’’’ති…පෙ…. "हे आवुसो, डोळा आणि रूपांवर अवलंबून चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होते का?" "होय, आवुसो." "हे आवुसो, चक्षु-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो हेतू आणि जो प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय जर पूर्णपणे, सर्व प्रकारे, निरवशेषपणे निरुद्ध झाला, तर चक्षु-विज्ञान जाणवले जाईल का?" "नाही, आवुसो." "हे आवुसो, याही पर्यायाने भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे, उघड केले आहे आणि प्रकाशित केले आहे की—'या कारणाने हे विज्ञान अनात्मा आहे'..." ‘‘ජිව්හඤ්චාවුසො, පටිච්ච රසෙ ච උප්පජ්ජති ජිව්හාවිඤ්ඤාණ’’න්ති? ‘‘එවමාවුසො’’ති. ‘‘යො චාවුසො, හෙතු යො ච පච්චයො ජිව්හාවිඤ්ඤාණස්ස උප්පාදාය, සො ච හෙතු, සො ච පච්චයො සබ්බෙන සබ්බං සබ්බථා සබ්බං අපරිසෙසං නිරුජ්ඣෙය්ය, අපි නු ඛො ජිව්හාවිඤ්ඤාණං පඤ්ඤායෙථා’’ති? ‘‘නො හෙතං, ආවුසො’’. ‘‘ඉමිනාපි ඛො එතං, ආවුසො, පරියායෙන භගවතා අක්ඛාතං විවටං පකාසිතං – ‘ඉතිපිදං විඤ්ඤාණං අනත්තා’’’ති…පෙ…. "हे आवुसो, जीभ आणि रसांवर अवलंबून जिव्हा-विज्ञान उत्पन्न होते का?" "होय, आवुसो." "हे आवुसो, जिव्हा-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो हेतू आणि जो प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय जर पूर्णपणे, सर्व प्रकारे, निरवशेषपणे निरुद्ध झाला, तर जिव्हा-विज्ञान जाणवले जाईल का?" "नाही, आवुसो." "हे आवुसो, याही पर्यायाने भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे, उघड केले आहे आणि प्रकाशित केले आहे की—'या कारणाने हे विज्ञान अनात्मा आहे'..." ‘‘මනඤ්චාවුසො, පටිච්ච ධම්මෙ ච උප්පජ්ජති මනොවිඤ්ඤාණ’’න්ති? ‘‘එවමාවුසො’’ති. ‘‘යො චාවුසො, හෙතු, යො ච පච්චයො මනොවිඤ්ඤාණස්ස උප්පාදාය, සො ච හෙතු, සො ච පච්චයො සබ්බෙන සබ්බං සබ්බථා සබ්බං අපරිසෙසං නිරුජ්ඣෙය්ය, අපි නු ඛො මනොවිඤ්ඤාණං පඤ්ඤායෙථා’’ති? ‘‘නො හෙතං, ආවුසො’’. ‘‘ඉමිනාපි ඛො එතං, ආවුසො, පරියායෙන භගවතා අක්ඛාතං විවටං පකාසිතං – ‘ඉතිපිදං විඤ්ඤාණං අනත්තා’’’ති. "हे आवुसो, मन आणि धम्मांवर अवलंबून मनो-विज्ञान उत्पन्न होते का?" "होय, आवुसो." "हे आवुसो, मनो-विज्ञानाच्या उत्पत्तीसाठी जो हेतू आणि जो प्रत्यय आहे, तो हेतू आणि तो प्रत्यय जर पूर्णपणे, सर्व प्रकारे, निरवशेषपणे निरुद्ध झाला, तर मनो-विज्ञान जाणवले जाईल का?" "नाही, आवुसो." "हे आवुसो, याही पर्यायाने भगवंतांनी हे स्पष्ट केले आहे, उघड केले आहे आणि प्रकाशित केले आहे की—'या कारणाने हे विज्ञान अनात्मा आहे'." ‘‘සෙය්යථාපි, ආවුසො, පුරිසො සාරත්ථිකො සාරගවෙසී සාරපරියෙසනං චරමානො තිණ්හං කුඨාරිං ආදාය වනං පවිසෙය්ය. සො තත්ථ [Pg.377] පස්සෙය්ය මහන්තං කදලික්ඛන්ධං උජුං නවං අකුක්කුකජාතං. තමෙනං මූලෙ ඡින්දෙය්ය; මූලෙ ඡෙත්වා අග්ගෙ ඡින්දෙය්ය; අග්ගෙ ඡෙත්වා පත්තවට්ටිං විනිබ්භුජෙය්ය. සො තත්ථ ඵෙග්ගුම්පි නාධිගච්ඡෙය්ය, කුතො සාරං! එවමෙව ඛො, ආවුසො, භික්ඛු ඡසු ඵස්සායතනෙසු නෙවත්තානං න අත්තනියං සමනුපස්සති. සො එවං අසමනුපස්සන්තො න කිඤ්චි ලොකෙ උපාදියති. අනුපාදියං න පරිතස්සති. අපරිතස්සං පච්චත්තඤ්ඤෙව පරිනිබ්බායති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාතී’’ති. සත්තමං. "हे आवुसो, समजा एखादा माणूस ज्याला गाभ्याची गरज आहे, जो गाभ्याच्या शोधात आहे, गाभा शोधत फिरत असताना, एक धारदार कुऱ्हाड घेऊन जंगलात प्रवेश करतो. तिथे त्याला केळीचे एक मोठे, सरळ, नवीन आणि न कुजलेले खोड दिसते. तो ते मुळापासून कापतो; मुळापासून कापून त्याचे शेंडे कापतो; शेंडे कापून पानांचे वेढे सोलून काढतो. त्याला तिथे भुसा देखील सापडणार नाही, मग गाभा कुठून मिळणार! तसेच, हे आवुसो, भिक्खू सहा स्पर्शायतनांमध्ये स्वतःला पाहत नाही आणि स्वतःचे असे काही पाहत नाही. तो असे न पाहिल्यामुळे जगात कशाचेही उपादान करत नाही. उपादान न केल्यामुळे तो उद्विग्न होत नाही. उद्विग्न न झाल्यामुळे तो स्वतःच परिनिर्वाण प्राप्त करतो. तो जाणतो: 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या अस्तित्वासाठी काहीही उरलेले नाही'." हे सातवे (सुत्त) आहे. 8. ආදිත්තපරියායසුත්තං ८. "आदित्यपर्यायसुत्त" 235. ‘‘ආදිත්තපරියායං වො, භික්ඛවෙ, ධම්මපරියායං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, ආදිත්තපරියායො, ධම්මපරියායො? වරං, භික්ඛවෙ, තත්තාය අයොසලාකාය ආදිත්තාය සම්පජ්ජලිතාය සජොතිභූතාය චක්ඛුන්ද්රියං සම්පලිමට්ඨං, න ත්වෙව චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු අනුබ්යඤ්ජනසො නිමිත්තග්ගාහො. නිමිත්තස්සාදගථිතං වා, භික්ඛවෙ, විඤ්ඤාණං තිට්ඨමානං තිට්ඨෙය්ය, අනුබ්යඤ්ජනස්සාදගථිතං වා තස්මිඤ්චෙ සමයෙ කාලං කරෙය්ය, ඨානමෙතං විජ්ජති, යං ද්වින්නං ගතීනං අඤ්ඤතරං ගතිං ගච්ඡෙය්ය – නිරයං වා, තිරච්ඡානයොනිං වා. ඉමං ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, ආදීනවං දිස්වා එවං වදාමි. २३५. "भिक्खूंनो, मी तुम्हांला 'आदित्यपर्याय' नावाचा धम्मपर्याय उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूंनो, आदित्यपर्याय धम्मपर्याय कोणता आहे? भिक्खूंनो, लालभडक, पेटलेल्या, धगधगत्या आणि ज्वाळांनी युक्त अशा लोखंडी सळईने चक्षुरिंद्रिय फोडून टाकणे अधिक श्रेयस्कर आहे, परंतु चक्षु-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या रूपांच्या लक्षणांचे व अवयवांचे ग्रहण करणे श्रेयस्कर नाही. भिक्खूंनो, जर विज्ञान त्या लक्षणांच्या आस्वादात किंवा अवयवांच्या आस्वादात अडकून राहिले आणि त्या स्थितीत जर एखाद्याचा मृत्यू झाला, तर अशी शक्यता आहे की तो दोन गतींपैकी एका गतीला प्राप्त होईल—नरकात किंवा प्राण्यांच्या योनीत. भिक्खूंनो, हा दोष पाहूनच मी असे सांगतो." ‘‘වරං, භික්ඛවෙ, තිණ්හෙන අයොසඞ්කුනා ආදිත්තෙන සම්පජ්ජලිතෙන සජොතිභූතෙන සොතින්ද්රියං සම්පලිමට්ඨං, න ත්වෙව සොතවිඤ්ඤෙය්යෙසු සද්දෙසු අනුබ්යඤ්ජනසො නිමිත්තග්ගාහො. නිමිත්තස්සාදගථිතං වා, භික්ඛවෙ, විඤ්ඤාණං තිට්ඨමානං තිට්ඨෙය්ය, අනුබ්යඤ්ජනස්සාදගථිතං වා තස්මිඤ්චෙ සමයෙ කාලඞ්කරෙය්ය, ඨානමෙතං විජ්ජති, යං ද්වින්නං ගතීනං අඤ්ඤතරං ගතිං ගච්ඡෙය්ය – නිරයං වා තිරච්ඡානයොනිං වා. ඉමං ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, ආදීනවං දිස්වා එවං වදාමි. "भिक्खूंनो, धारदार, लालभडक, पेटलेल्या आणि धगधगत्या लोखंडी सुळक्याने श्रोत्रेंद्रिय विद्ध करणे अधिक श्रेयस्कर आहे, परंतु श्रोत्र-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या शब्दांच्या लक्षणांचे व अवयवांचे ग्रहण करणे श्रेयस्कर नाही. भिक्खूंनो, जर विज्ञान त्या लक्षणांच्या आस्वादात किंवा अवयवांच्या आस्वादात अडकून राहिले आणि त्या स्थितीत जर एखाद्याचा मृत्यू झाला, तर अशी शक्यता आहे की तो दोन गतींपैकी एका गतीला प्राप्त होईल—नरकात किंवा प्राण्यांच्या योनीत. भिक्खूंनो, हा दोष पाहूनच मी असे सांगतो." ‘‘වරං[Pg.378], භික්ඛවෙ, තිණ්හෙන නඛච්ඡෙදනෙන ආදිත්තෙන සම්පජ්ජලිතෙන සජොතිභූතෙන ඝානින්ද්රියං සම්පලිමට්ඨං, න ත්වෙව ඝානවිඤ්ඤෙය්යෙසු ගන්ධෙසු අනුබ්යඤ්ජනසො නිමිත්තග්ගාහො. නිමිත්තස්සාදගථිතං වා, භික්ඛවෙ, විඤ්ඤාණං තිට්ඨමානං තිට්ඨෙය්ය, අනුබ්යඤ්ජනස්සාදගථිතං වා තස්මිඤ්චෙ සමයෙ කාලං කරෙය්ය. ඨානමෙතං විජ්ජති, යං ද්වින්නං ගතීනං අඤ්ඤතරං ගතිං ගච්ඡෙය්ය – නිරයං වා තිරච්ඡානයොනිං වා. ඉමං ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, ආදීනවං දිස්වා එවං වදාමි. "भिक्खूंनो, धारदार, लालभडक, पेटलेल्या आणि धगधगत्या नख-कातरणीने घ्राणेंद्रिय विद्ध करणे अधिक श्रेयस्कर आहे, परंतु घ्राण-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या गंधांच्या लक्षणांचे व अवयवांचे ग्रहण करणे श्रेयस्कर नाही. भिक्खूंनो, जर विज्ञान त्या लक्षणांच्या आस्वादात किंवा अवयवांच्या आस्वादात अडकून राहिले आणि त्या स्थितीत जर एखाद्याचा मृत्यू झाला, तर अशी शक्यता आहे की तो दोन गतींपैकी एका गतीला प्राप्त होईल—नरकात किंवा प्राण्यांच्या योनीत. भिक्खूंनो, हा दोष पाहूनच मी असे सांगतो." ‘‘වරං, භික්ඛවෙ, තිණ්හෙන ඛුරෙන ආදිත්තෙන සම්පජ්ජලිතෙන සජොතිභූතෙන ජිව්හින්ද්රියං සම්පලිමට්ඨං, න ත්වෙව ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යෙසු රසෙසු අනුබ්යඤ්ජනසො නිමිත්තග්ගාහො. නිමිත්තස්සාදගථිතං වා, භික්ඛවෙ, විඤ්ඤාණං තිට්ඨමානං තිට්ඨෙය්ය, අනුබ්යඤ්ජනස්සාදගථිතං වා තස්මිඤ්චෙ සමයෙ කාලං කරෙය්ය. ඨානමෙතං විජ්ජති, යං ද්වින්නං ගතීනං අඤ්ඤතරං ගතිං ගච්ඡෙය්ය – නිරයං වා තිරච්ඡානයොනිං වා. ඉමං ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, ආදීනවං දිස්වා එවං වදාමි. "भिक्खूंनो, धारदार, लालभडक, पेटलेल्या आणि धगधगत्या वस्तऱ्याने जिव्हेंद्रिय कापून टाकणे अधिक श्रेयस्कर आहे, परंतु जिव्हा-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या रसांच्या लक्षणांचे व अवयवांचे ग्रहण करणे श्रेयस्कर नाही. भिक्खूंनो, जर विज्ञान त्या लक्षणांच्या आस्वादात किंवा अवयवांच्या आस्वादात अडकून राहिले आणि त्या स्थितीत जर एखाद्याचा मृत्यू झाला, तर अशी शक्यता आहे की तो दोन गतींपैकी एका गतीला प्राप्त होईल—नरकात किंवा प्राण्यांच्या योनीत. भिक्खूंनो, हा दोष पाहूनच मी असे सांगतो." ‘‘වරං, භික්ඛවෙ, තිණ්හාය සත්තියා ආදිත්තාය සම්පජ්ජලිතාය සජොතිභූතාය කායින්ද්රියං සම්පලිමට්ඨං, න ත්වෙව කායවිඤ්ඤෙය්යෙසු ඵොට්ඨබ්බෙසු අනුබ්යඤ්ජනසො නිමිත්තග්ගාහො. නිමිත්තස්සාදගථිතං වා, භික්ඛවෙ, විඤ්ඤාණං තිට්ඨමානං තිට්ඨෙය්ය, අනුබ්යඤ්ජනස්සාදගථිතං වා තස්මිඤ්චෙ සමයෙ කාලං කරෙය්ය. ඨානමෙතං විජ්ජති, යං ද්වින්නං ගතීනං අඤ්ඤතරං ගතිං ගච්ඡෙය්ය – නිරයං වා තිරච්ඡානයොනිං වා. ඉමං ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, ආදීනවං දිස්වා එවං වදාමි. "भिक्खूंनो, धारदार, लालभडक, पेटलेल्या आणि धगधगत्या भाल्याने कायेंद्रिय विद्ध करणे अधिक श्रेयस्कर आहे, परंतु काय-विज्ञानाने जाणता येणाऱ्या स्पर्शांच्या लक्षणांचे व अवयवांचे ग्रहण करणे श्रेयस्कर नाही. भिक्खूंनो, जर विज्ञान त्या लक्षणांच्या आस्वादात किंवा अवयवांच्या आस्वादात अडकून राहिले आणि त्या स्थितीत जर एखाद्याचा मृत्यू झाला, तर अशी शक्यता आहे की तो दोन गतींपैकी एका गतीला प्राप्त होईल—नरकात किंवा प्राण्यांच्या योनीत. भिक्खूंनो, हा दोष पाहूनच मी असे सांगतो." ‘‘වරං, භික්ඛවෙ, සොත්තං. සොත්තං ඛො පනාහං, භික්ඛවෙ, වඤ්ඣං ජීවිතානං වදාමි, අඵලං ජීවිතානං වදාමි, මොමූහං ජීවිතානං වදාමි, න ත්වෙව තථාරූපෙ විතක්කෙ විතක්කෙය්ය යථාරූපානං විතක්කානං වසං ගතො සඞ්ඝං භින්දෙය්ය. ඉමං ඛ්වාහං, භික්ඛවෙ, වඤ්ඣං ජීවිතානං ආදීනවං දිස්වා එවං වදාමි. भिक्खूहो, झोपणे अधिक चांगले आहे. परंतु भिक्खूहो, मी जिवंत लोकांसाठी झोपण्याला व्यर्थ (वांझ), निष्फळ आणि अत्यंत अज्ञानाचे (मोहग्रस्त) मानतो. परंतु माणसाने अशा विचारांचा विचार करू नये, ज्यांच्या आहारी जाऊन तो संघात फूट पाडेल. भिक्खूहो, जिवंत लोकांसाठी हा दोष पाहूनच मी असे म्हणतो। ‘‘තත්ථ, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘තිට්ඨතු තාව තත්තාය අයොසලාකාය ආදිත්තාය සම්පජ්ජලිතාය සජොතිභූතාය චක්ඛුන්ද්රියං සම්පලිමට්ඨං. හන්දාහං ඉදමෙව මනසි කරොමි – ඉති චක්ඛු අනිච්චං, රූපා අනිච්චා, චක්ඛුවිඤ්ඤාණං අනිච්චං, චක්ඛුසම්ඵස්සො අනිච්චො, යම්පිදං චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං’’’. तेथे, भिक्खूहो, श्रुतवान आर्यश्रावक असा विचार करतो – 'तप्त, प्रज्वलित, धगधगत्या आणि लालभडक लोखंडी सळईने चक्षुरिंद्रियाला (डोळ्याला) छिन्नभिन्न करणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – डोळा अनित्य आहे, रूपे अनित्य आहेत, चक्षु-विज्ञान अनित्य आहे, चक्षु-स्पर्श अनित्य आहे, आणि चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-अ-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘තිට්ඨතු [Pg.379] තාව තිණ්හෙන අයොසඞ්කුනා ආදිත්තෙන සම්පජ්ජලිතෙන සජොතිභූතෙන සොතින්ද්රියං සම්පලිමට්ඨං. හන්දාහං ඉදමෙව මනසි කරොමි – ඉති සොතං අනිච්චං, සද්දා අනිච්චා, සොතවිඤ්ඤාණං අනිච්චං, සොතසම්ඵස්සො අනිච්චො, යම්පිදං සොතසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං. 'तीक्ष्ण, तप्त, प्रज्वलित, धगधगत्या आणि लालभडक लोखंडी सुळाने श्रोत्रेंद्रियाला (कानाला) छिन्नभिन्न करणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – कान अनित्य आहे, शब्द अनित्य आहेत, श्रोत्र-विज्ञान अनित्य आहे, श्रोत्र-स्पर्श अनित्य आहे, आणि श्रोत्र-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-अ-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘තිට්ඨතු තාව තිණ්හෙන නඛච්ඡෙදනෙන ආදිත්තෙන සම්පජ්ජලිතෙන සජොතිභූතෙන ඝානින්ද්රියං සම්පලිමට්ඨං. හන්දාහං ඉදමෙව මනසි කරොමි – ඉති ඝානං අනිච්චං, ගන්ධා අනිච්චා, ඝානවිඤ්ඤාණං අනිච්චං, ඝානසම්ඵස්සො අනිච්චො, යම්පිදං ඝානසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං…පෙ… තම්පි අනිච්චං. 'तीक्ष्ण, तप्त, प्रज्वलित, धगधगत्या आणि लालभडक नख कापण्याच्या हत्याराने घ्राणेंद्रियाला (नाकाला) छिन्नभिन्न करणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – नाक अनित्य आहे, गंध अनित्य आहेत, घ्राण-विज्ञान अनित्य आहे, घ्राण-स्पर्श अनित्य आहे, आणि घ्राण-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदन उत्पन्न होते... ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘තිට්ඨතු තාව තිණ්හෙන ඛුරෙන ආදිත්තෙන සම්පජ්ජලිතෙන සජොතිභූතෙන ජිව්හින්ද්රියං සම්පලිමට්ඨං. හන්දාහං ඉදමෙව මනසි කරොමි – ඉති ජිව්හා අනිච්චා, රසා අනිච්චා, ජිව්හාවිඤ්ඤාණං අනිච්චං, ජිව්හාසම්ඵස්සො අනිච්චො, යම්පිදං ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති…පෙ… තම්පි අනිච්චං. 'तीक्ष्ण, तप्त, प्रज्वलित, धगधगत्या आणि लालभडक वस्तऱ्याने जिव्हाइंद्रियाला (जिभेला) छिन्नभिन्न करणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – जीभ अनित्य आहे, रस अनित्य आहेत, जिव्हा-विज्ञान अनित्य आहे, जिव्हा-स्पर्श अनित्य आहे, आणि जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही उत्पन्न होते... ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘තිට්ඨතු තාව තිණ්හාය සත්තියා ආදිත්තාය සම්පජ්ජලිතාය සජොතිභූතාය කායින්ද්රියං සම්පලිමට්ඨං. හන්දාහං ඉදමෙව මනසි කරොමි – ඉති කායො අනිච්චො, ඵොට්ඨබ්බා අනිච්චා, කායවිඤ්ඤාණං අනිච්චං, කායසම්ඵස්සො අනිච්චො, යම්පිදං කායසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං…පෙ… තම්පි අනිච්චං. 'तीक्ष्ण, तप्त, प्रज्वलित, धगधगत्या आणि लालभडक भाल्याने कायेंद्रियाला (शरीराला) छिन्नभिन्न करणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – शरीर अनित्य आहे, स्पर्श अनित्य आहेत, काय-विज्ञान अनित्य आहे, काय-स्पर्श अनित्य आहे, आणि काय-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही वेदन उत्पन्न होते... ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘තිට්ඨතු තාව සොත්තං. හන්දාහං ඉදමෙව මනසි කරොමි – ඉති මනො අනිච්චො, ධම්මා අනිච්චා, මනොවිඤ්ඤාණං අනිච්චං, මනොසම්ඵස්සො අනිච්චො, යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තම්පි අනිච්චං’’. 'झोपणे बाजूलाच राहो. चला, मी याच गोष्टीचे मनन करतो – मन अनित्य आहे, धम्म अनित्य आहेत, मनो-विज्ञान अनित्य आहे, मनो-स्पर्श अनित्य आहे, आणि मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-अ-सुखद वेदन उत्पन्न होते, ते देखील अनित्य आहे।' ‘‘එවං පස්සං, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො චක්ඛුස්මිම්පි නිබ්බින්දති, රූපෙසුපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුවිඤ්ඤාණෙපි නිබ්බින්දති, චක්ඛුසම්ඵස්සෙපි නිබ්බින්දති…පෙ… යම්පිදං මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති වෙදයිතං සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා තස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාති. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, ආදිත්තපරියායො, ධම්මපරියායො’’ති. අට්ඨමං. भिक्खूहो, असे पाहणारा श्रुतवान आर्यश्रावक डोळ्याविषयी विरक्त होतो, रूपांविषयी विरक्त होतो, चक्षु-विज्ञानाविषयी विरक्त होतो, चक्षु-स्पर्शाविषयी विरक्त होतो... आणि मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने जे काही सुखद, दुःखद किंवा अ-दुःख-अ-सुखद वेदन उत्पन्न होते, त्याविषयी देखील विरक्त होतो. विरक्त झाल्याने तो रागरहित होतो; रागरहित झाल्याने तो विमुक्त होतो. विमुक्त झाल्यावर 'मी विमुक्त झालो आहे' असे ज्ञान होते. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरे काही करायचे उरलेले नाही,' असे तो जाणतो. भिक्खूहो, हाच 'आदित्तपर्याय' (प्रज्वलित उपदेश) नावाचा धम्मपर्याय आहे. आठवे सूत्र समाप्त. 9. පඨමහත්ථපාදොපමසුත්තං ९. प्रथम हस्तपाद उपमा सूत्र 236. ‘‘හත්ථෙසු[Pg.380], භික්ඛවෙ, සති ආදානනික්ඛෙපනං පඤ්ඤායති; පාදෙසු සති අභික්කමපටික්කමො පඤ්ඤායති; පබ්බෙසු සති සමිඤ්ජනපසාරණං පඤ්ඤායති; කුච්ඡිස්මිං සති ජිඝච්ඡා පිපාසා පඤ්ඤායති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛුස්මිං සති චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛං…පෙ… ජිව්හාය සති ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛං…පෙ… මනස්මිං සති මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛං…පෙ…. २३६. भिक्खूहो, हात असताना वस्तू घेणे व ठेवणे दिसून येते; पाय असताना पुढे जाणे व मागे येणे दिसून येते; सांधे असताना आकुंचन व प्रसरण दिसून येते; पोट असताना भूक व तहान दिसून येते. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, डोळा असताना चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... जीभ असताना जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... मन असताना मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... ‘‘හත්ථෙසු, භික්ඛවෙ, අසති ආදානනික්ඛෙපනං න පඤ්ඤායති; පාදෙසු අසති අභික්කමපටික්කමො න පඤ්ඤායති; පබ්බෙසු අසති සමිඤ්ජනපසාරණං න පඤ්ඤායති; කුච්ඡිස්මිං අසති ජිඝච්ඡා පිපාසා න පඤ්ඤායති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛුස්මිං අසති චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා නුප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛං…පෙ… ජිව්හාය අසති ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා නුප්පජ්ජති…පෙ… මනස්මිං අසති මනොසම්ඵස්සපච්චයා නුප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛ’’න්ති. නවමං. भिक्खूहो, हात नसताना वस्तू घेणे व ठेवणे दिसून येत नाही; पाय नसताना पुढे जाणे व मागे येणे दिसून येत नाही; सांधे नसताना आकुंचन व प्रसरण दिसून येत नाही; पोट नसताना भूक व तहान दिसून येत नाही. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, डोळा नसताना चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होत नाही... जीभ नसताना जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होत नाही... मन नसताना मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होत नाही. नववे सूत्र समाप्त. 10. දුතියහත්ථපාදොපමසුත්තං १०. द्वितीय हस्तपाद उपमा सूत्र 237. ‘‘හත්ථෙසු, භික්ඛවෙ, සති ආදානනික්ඛෙපනං හොති; පාදෙසු සති අභික්කමපටික්කමො හොති; පබ්බෙසු සති සමිඤ්ජනපසාරණං හොති; කුච්ඡිස්මිං සති ජිඝච්ඡා පිපාසා හොති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛුස්මිං සති චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛං…පෙ… ජිව්හාය සති…පෙ… මනස්මිං සති මනොසම්ඵස්සපච්චයා උප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛං…පෙ…. २३७. भिक्खूहो, हात असताना वस्तू घेणे व ठेवणे होते; पाय असताना पुढे जाणे व मागे येणे होते; सांधे असताना आकुंचन व प्रसरण होते; पोट असताना भूक व तहान होते. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, डोळा असताना चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... जीभ असताना... मन असताना मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होते... ‘‘හත්ථෙසු, භික්ඛවෙ, අසති ආදානනික්ඛෙපනං න හොති; පාදෙසු අසති අභික්කමපටික්කමො න හොති; පබ්බෙසු අසති සමිඤ්ජනපසාරණං න හොති; කුච්ඡිස්මිං අසති ජිඝච්ඡා පිපාසා න හොති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, චක්ඛුස්මිං අසති චක්ඛුසම්ඵස්සපච්චයා නුප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛං…පෙ… ජිව්හාය අසති ජිව්හාසම්ඵස්සපච්චයා නුප්පජ්ජති…පෙ… මනස්මිං අසති මනොසම්ඵස්සපච්චයා නුප්පජ්ජති අජ්ඣත්තං සුඛං දුක්ඛ’’න්ති. දසමං. भिक्खूहो, हात नसताना वस्तू घेणे व ठेवणे होत नाही; पाय नसताना पुढे जाणे व मागे येणे होत नाही; सांधे नसताना आकुंचन व प्रसरण होत नाही; पोट नसताना भूक व तहान होत नाही. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, डोळा नसताना चक्षु-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होत नाही... जीभ नसताना जिव्हा-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने उत्पन्न होत नाही... मन नसताना मनो-स्पर्शाच्या प्रत्ययाने अध्यात्मिक सुख आणि दुःख उत्पन्न होत नाही. दहावे सूत्र समाप्त. සමුද්දවග්ගො අට්ඨරසමො. समुद्रवर्ग अठरावा समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उदान) – ද්වෙ [Pg.381] සමුද්දා බාළිසිකො, ඛීරරුක්ඛෙන කොට්ඨිකො; කාමභූ උදායී චෙව, ආදිත්තෙන ච අට්ඨමං; හත්ථපාදූපමා ද්වෙති, වග්ගො තෙන පවුච්චතීති. दोन समुद्र सूत्रे, बाळिसिक सूत्र, खीररुक्ख सूत्र, कोठ्ठिक सूत्र, कामभू सूत्र, उदायी सूत्र, आठवे आदित्त सूत्र आणि दोन हस्तपाद उपमा सूत्रे; या सूत्रांमुळे याला वर्ग म्हटले जाते. 19. ආසීවිසවග්ගො १९. आसीविसवर्ग (सर्पवर्ग) 1. ආසීවිසොපමසුත්තං १. आसीविसोपमसूत्र (सर्प उपमा सूत्र) 238. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, චත්තාරො ආසීවිසා උග්ගතෙජා ඝොරවිසා. අථ පුරිසො ආගච්ඡෙය්ය ජීවිතුකාමො අමරිතුකාමො සුඛකාමො දුක්ඛප්පටිකූලො. තමෙනං එවං වදෙය්යුං – ‘ඉමෙ තෙ, අම්භො පුරිස, චත්තාරො ආසීවිසා උග්ගතෙජා ඝොරවිසා කාලෙන කාලං වුට්ඨාපෙතබ්බා, කාලෙන කාලං න්හාපෙතබ්බා, කාලෙන කාලං භොජෙතබ්බා, කාලෙන කාලං සංවෙසෙතබ්බා. යදා ච ඛො තෙ, අම්භො පුරිස, ඉමෙසං චතුන්නං ආසීවිසානං උග්ගතෙජානං ඝොරවිසානං අඤ්ඤතරො වා අඤ්ඤතරො වා කුප්පිස්සති, තතො ත්වං, අම්භො පුරිස, මරණං වා නිගච්ඡසි, මරණමත්තං වා දුක්ඛං. යං තෙ, අම්භො පුරිස, කරණීයං තං කරොහී’’’ති. २३८. भिक्षूंनो, समजा अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी असे चार सर्प आहेत. तेव्हा एखादा माणूस, ज्याला जगण्याची इच्छा आहे, मरण्याची इच्छा नाही, जो सुखाचा आकांक्षी आहे आणि दुःखाचा तिरस्कार करतो, तिथे येईल. लोक त्याला असे म्हणतील— 'हे माणसा, हे अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी असे चार सर्प आहेत. तुला वेळोवेळी त्यांना उठवावे लागेल, वेळोवेळी त्यांना आंघोळ घालावी लागेल, वेळोवेळी त्यांना खायला द्यावे लागेल आणि वेळोवेळी त्यांना झोपवावे लागेल. आणि हे माणसा, जेव्हा या अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्पांपैकी कोणताही एक सर्प तुझ्यावर क्रुद्ध होईल, तेव्हा हे माणसा, तू मृत्यूला प्राप्त होशील किंवा मृत्यूतुल्य दुःखाला प्राप्त होशील. म्हणून हे माणसा, तुला जे काही करायचे आहे, ते तू कर!' ‘‘අථ ඛො සො, භික්ඛවෙ, පුරිසො භීතො චතුන්නං ආසීවිසානං උග්ගතෙජානං ඝොරවිසානං යෙන වා තෙන වා පලායෙථ. තමෙනං එවං වදෙය්යුං – ‘ඉමෙ ඛො, අම්භො පුරිස, පඤ්ච වධකා පච්චත්ථිකා පිට්ඨිතො පිට්ඨිතො අනුබන්ධා, යත්ථෙව නං පස්සිස්සාම තත්ථෙව ජීවිතා වොරොපෙස්සාමාති. යං තෙ, අම්භො පුරිස, කරණීයං තං කරොහී’’’ති. भिक्षूंनो, त्यानंतर तो माणूस त्या अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्पांच्या भयाने सैरावैरा पळू लागेल. लोक त्याला असे म्हणतील— 'हे माणसा, हे पाच मारेकरी शत्रू तुझ्या पाठीवर लागलेले आहेत, जे असा विचार करत आहेत की, "आम्ही याला जिथे कुठे पाहू, तिथेच याचा जीव घेऊ." हे माणसा, तुला जे काही करायचे आहे, ते तू कर!' ‘‘අථ ඛො සො, භික්ඛවෙ, පුරිසො භීතො චතුන්නං ආසීවිසානං උග්ගතෙජානං ඝොරවිසානං, භීතො පඤ්චන්නං වධකානං පච්චත්ථිකානං යෙන වා තෙන වා පලායෙථ. තමෙනං එවං වදෙය්යුං – ‘අයං තෙ, අම්භො පුරිස, ඡට්ඨො අන්තරචරො වධකො උක්ඛිත්තාසිකො පිට්ඨිතො පිට්ඨිතො අනුබන්ධො යත්ථෙව නං පස්සිස්සාමි තත්ථෙව සිරො පාතෙස්සාමීති. යං තෙ, අම්භො පුරිස, කරණීයං තං කරොහී’’’ති. भिक्षूंनो, त्यानंतर तो माणूस त्या अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्पांच्या भयाने आणि त्या पाच मारेकरी शत्रूंच्या भयाने सैरावैरा पळू लागेल. लोक त्याला असे म्हणतील— 'हे माणसा, हा तुझा सहावा मारेकरी, जो तुझा अंतर्गत गुप्तचर आहे, उपसलेली तलवार घेऊन तुझ्या पाठीवर लागला आहे, आणि विचार करत आहे की, "मी याला जिथे कुठे पाहीन, तिथेच याचे डोके उडवीन." हे माणसा, तुला जे काही करायचे आहे, ते तू कर!' ‘‘අථ [Pg.382] ඛො සො, භික්ඛවෙ, පුරිසො භීතො චතුන්නං ආසීවිසානං උග්ගතෙජානං ඝොරවිසානං, භීතො පඤ්චන්නං වධකානං පච්චත්ථිකානං, භීතො ඡට්ඨස්ස අන්තරචරස්ස වධකස්ස උක්ඛිත්තාසිකස්ස යෙන වා තෙන වා පලායෙථ. සො පස්සෙය්ය සුඤ්ඤං ගාමං. යඤ්ඤදෙව ඝරං පවිසෙය්ය රිත්තකඤ්ඤෙව පවිසෙය්ය තුච්ඡකඤ්ඤෙව පවිසෙය්ය සුඤ්ඤකඤ්ඤෙව පවිසෙය්ය. යඤ්ඤදෙව භාජනං පරිමසෙය්ය රිත්තකඤ්ඤෙව පරිමසෙය්ය තුච්ඡකඤ්ඤෙව පරිමසෙය්ය සුඤ්ඤකඤ්ඤෙව පරිමසෙය්ය. තමෙනං එවං වදෙය්යුං – ‘ඉදානි, අම්භො පුරිස, ඉමං සුඤ්ඤං ගාමං චොරා ගාමඝාතකා පවිසන්ති. යං තෙ, අම්භො පුරිස, කරණීයං තං කරොහී’’’ති. भिक्षूंनो, त्यानंतर तो माणूस त्या अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्पांच्या भयाने, त्या पाच मारेकरी शत्रूंच्या भयाने आणि उपसलेली तलवार घेतलेल्या त्या सहाव्या अंतर्गत मारेकऱ्याच्या भयाने सैरावैरा पळू लागेल. त्याला एक ओसाड गाव दिसेल. तो ज्या ज्या घरात प्रवेश करेल, ते घर त्याला रिकामेच, तुच्छ आणि ओसाडच आढळेल. तो ज्या ज्या पात्राला स्पर्श करेल, ते पात्र त्याला रिकामेच, पोकळ आणि ओसाडच आढळेल. लोक त्याला असे म्हणतील— 'हे माणसा, आता या ओसाड गावात गावे लुटणारे दरोडेखोर प्रवेश करत आहेत. हे माणसा, तुला जे काही करायचे आहे, ते तू कर!' ‘‘අථ ඛො සො, භික්ඛවෙ, පුරිසො භීතො චතුන්නං ආසීවිසානං උග්ගතෙජානං ඝොරවිසානං, භීතො පඤ්චන්නං වධකානං පච්චත්ථිකානං, භීතො ඡට්ඨස්ස අන්තරචරස්ස වධකස්ස උක්ඛිත්තාසිකස්ස, භීතො චොරානං ගාමඝාතකානං යෙන වා තෙන වා පලායෙථ. සො පස්සෙය්ය මහන්තං උදකණ්ණවං ඔරිමං තීරං සාසඞ්කං සප්පටිභයං, පාරිමං තීරං ඛෙමං අප්පටිභයං. න චස්ස නාවා සන්තාරණී උත්තරසෙතු වා අපාරා පාරං ගමනාය. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, තස්ස පුරිසස්ස එවමස්ස – ‘අයං ඛො මහාඋදකණ්ණවො ඔරිමං තීරං සාසඞ්කං සප්පටිභයං, පාරිමං තීරං ඛෙමං අප්පටිභයං, නත්ථි ච නාවා සන්තාරණී උත්තරසෙතු වා අපාරා පාරං ගමනාය. යංනූනාහං තිණකට්ඨසාඛාපලාසං සංකඩ්ඪිත්වා කුල්ලං බන්ධිත්වා තං කුල්ලං නිස්සාය හත්ථෙහි ච පාදෙහි ච වායමමානො සොත්ථිනා පාරං ගච්ඡෙය්ය’’’න්ති. भिक्षूंनो, त्यानंतर तो माणूस त्या अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्पांच्या भयाने, त्या पाच मारेकरी शत्रूंच्या भयाने, उपसलेली तलवार घेतलेल्या त्या सहाव्या अंतर्गत मारेकऱ्याच्या भयाने आणि गावे लुटणाऱ्या दरोडेखोरांच्या भयाने सैरावैरा पळू लागेल. त्याला पाण्याचा एक विशाल जलाशय दिसेल, ज्याचा अलीकडचा काठ अत्यंत शंकास्पद आणि भययुक्त असेल, तर पलीकडचा काठ सुरक्षित आणि भयरहित असेल. परंतु पलीकडच्या काठावर जाण्यासाठी कोणतीही बोट किंवा पूल नसेल. भिक्षूंनो, तेव्हा त्या माणसाच्या मनात असा विचार येईल— 'हा पाण्याचा विशाल जलाशय आहे, ज्याचा अलीकडचा काठ भययुक्त व शंकास्पद आहे आणि पलीकडचा काठ सुरक्षित व भयरहित आहे; परंतु पलीकडे जाण्यासाठी कोणतीही बोट किंवा पूल नाही. मग मी गवत, लाकडे, फांद्या आणि पाने गोळा करून एक तराफा का बांधू नये? आणि त्या तराफ्याचा आश्रय घेऊन, आपल्या हातापायांनी प्रयत्न करत सुरक्षितपणे पलीकडच्या काठावर का जाऊ नये?' ‘‘අථ ඛො සො, භික්ඛවෙ, පුරිසො තිණකට්ඨසාඛාපලාසං සංකඩ්ඪිත්වා කුල්ලං බන්ධිත්වා තං කුල්ලං නිස්සාය හත්ථෙහි ච පාදෙහි ච වායමමානො සොත්ථිනා පාරං ගච්ඡෙය්ය, තිණ්ණො පාරඞ්ගතො ථලෙ තිට්ඨති බ්රාහ්මණො. भिक्षूंनो, त्यानंतर तो माणूस गवत, लाकडे, फांद्या आणि पाने गोळा करून, एक तराफा बांधून आणि त्या तराफ्याचा आश्रय घेऊन, आपल्या हातापायांनी प्रयत्न करत सुरक्षितपणे पलीकडच्या काठावर जाईल. तो पार गेलेला, पलीकडच्या तीरावर पोहोचलेला तो ब्राह्मण कोरड्या जमिनीवर उभा राहील. ‘‘උපමා ඛො ම්යායං, භික්ඛවෙ, කතා අත්ථස්ස විඤ්ඤාපනාය. අයඤ්චෙත්ථ අත්ථො – චත්තාරො ආසීවිසා උග්ගතෙජා ඝොරවිසාති ඛො, භික්ඛවෙ, චතුන්නෙතං මහාභූතානං අධිවචනං – පථවීධාතුයා, ආපොධාතුයා, තෙජොධාතුයා, වායොධාතුයා. भिक्षूंनो, अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी मी ही उपमा दिली आहे. आणि याचा अर्थ असा आहे— 'अत्यंत जहाल आणि भयंकर विषारी चार सर्प' हे, भिक्षूंनो, चार महाभूतांचे नाव आहे— पृथ्वीधातू, आपधातू, तेजोधातू आणि वायोधातू. ‘‘පඤ්ච [Pg.383] වධකා පච්චත්ථිකාති ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චන්නෙතං උපාදානක්ඛන්ධානං අධිවචනං, සෙය්යථිදං – රූපුපාදානක්ඛන්ධස්ස, වෙදනුපාදානක්ඛන්ධස්ස, සඤ්ඤුපාදානක්ඛන්ධස්ස, සඞ්ඛාරුපාදානක්ඛන්ධස්ස, විඤ්ඤාණුපාදානක්ඛන්ධස්ස. भिक्षूंनो, 'पाच मारेकरी शत्रू' हे पाच उपादानस्कंधांचे नाव आहे, ते म्हणजे— रूप-उपादानस्कंध, वेदना-उपादानस्कंध, संज्ञा-उपादानस्कंध, संस्कार-उपादानस्कंध आणि विज्ञान-उपादानस्कंध. ‘‘ඡට්ඨො අන්තරචරො වධකො උක්ඛිත්තාසිකොති ඛො, භික්ඛවෙ, නන්දීරාගස්සෙතං අධිවචනං. भिक्षूंनो, 'उपसलेली तलवार घेतलेला सहावा अंतर्गत मारेकरी' हे नंदीराग (आसक्ती आणि तृष्णा) याचे नाव आहे. ‘‘සුඤ්ඤො ගාමොති ඛො, භික්ඛවෙ, ඡන්නෙතං අජ්ඣත්තිකානං ආයතනානං අධිවචනං. චක්ඛුතො චෙපි නං, භික්ඛවෙ, පණ්ඩිතො බ්යත්තො මෙධාවී උපපරික්ඛති රිත්තකඤ්ඤෙව ඛායති, තුච්ඡකඤ්ඤෙව ඛායති, සුඤ්ඤකඤ්ඤෙව ඛායති…පෙ… ජිව්හාතො චෙපි නං, භික්ඛවෙ…පෙ… මනතො චෙපි නං, භික්ඛවෙ, පණ්ඩිතො බ්යත්තො මෙධාවී උපපරික්ඛති රිත්තකඤ්ඤෙව ඛායති, තුච්ඡකඤ්ඤෙව ඛායති, සුඤ්ඤකඤ්ඤෙව ඛායති. भिक्षूंनो, 'ओसाड गाव' हे सहा अंतर्गत आयतनांचे नाव आहे. भिक्षूंनो, जर एखादा बुद्धिमान, चतुर आणि प्रज्ञावान भिक्षू डोळ्याच्या दृष्टीने त्याचे परीक्षण करेल, तर ते त्याला रिकामेच वाटेल, तुच्छच वाटेल, ओसाडच वाटेल... तसेच जिभेच्या दृष्टीने... भिक्षूंनो, जर एखादा बुद्धिमान, चतुर आणि प्रज्ञावान भिक्षू मनाच्या दृष्टीने त्याचे परीक्षण करेल, तर ते त्याला रिकामेच वाटेल, तुच्छच वाटेल, ओसाडच वाटेल. ‘‘චොරා ගාමඝාතකාති ඛො, භික්ඛවෙ, ඡන්නෙතං බාහිරානං ආයතනානං අධිවචනං. චක්ඛු, භික්ඛවෙ, හඤ්ඤති මනාපාමනාපෙසු රූපෙසු; සොතං, භික්ඛවෙ…පෙ… ඝානං, භික්ඛවෙ…පෙ… ජිව්හා, භික්ඛවෙ, හඤ්ඤති මනාපාමනාපෙසු රසෙසු; කායො, භික්ඛවෙ…පෙ… මනො, භික්ඛවෙ, හඤ්ඤති මනාපාමනාපෙසු ධම්මෙසු. भिक्षूंनो, 'गावे लुटणारे दरोडेखोर' हे सहा बाह्य आयतनांचे नाव आहे. भिक्षूंनो, डोळा हा प्रिय आणि अप्रिय रूपांमुळे आहत होतो; कान... नाक... भिक्षूंनो, जीभ ही प्रिय आणि अप्रिय रसांमुळे आहत होते; शरीर... भिक्षूंनो, मन हे प्रिय आणि अप्रिय धर्मांमुळे आहत होते. ‘‘මහා උදකණ්ණවොති ඛො, භික්ඛවෙ, චතුන්නෙතං ඔඝානං අධිවචනං – කාමොඝස්ස, භවොඝස්ස, දිට්ඨොඝස්ස, අවිජ්ජොඝස්ස. भिक्षूंनो, 'पाण्याचा विशाल जलाशय' हे चार ओघांचे नाव आहे— कामौघ, भवौघ, दिठ्ठौघ आणि अविज्जौघ. ‘‘ඔරිමං තීරං සාසඞ්කං සප්පටිභයන්ති ඛො, භික්ඛවෙ, සක්කායස්සෙතං අධිවචනං. भिक्षूंनो, 'भययुक्त आणि शंकास्पद अलीकडचा काठ' हे सक्काय याचे नाव आहे. ‘‘පාරිමං තීරං ඛෙමං අප්පටිභයන්ති ඛො, භික්ඛවෙ, නිබ්බානස්සෙතං අධිවචනං. भिक्षूंनो, 'सुरक्षित आणि भयरहित पलीकडचा काठ' हे निब्बान याचे नाव आहे. ‘‘කුල්ලන්ති ඛො, භික්ඛවෙ, අරියස්සෙතං අට්ඨඞ්ගිකස්ස මග්ගස්ස අධිවචනං, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි…පෙ… සම්මාසමාධි. भिक्षूंनो, 'तराफा' हे आर्य अष्टांगिक मार्गाचे नाव आहे, जसे की— सम्यक दृष्टी... सम्यक समाधी. ‘‘තස්ස හත්ථෙහි ච පාදෙහි ච වායාමොති ඛො, භික්ඛවෙ, වීරියාරම්භස්සෙතං අධිවචනං. भिक्षूंनो, 'त्या तराफ्यासाठी हातापायांनी केलेला प्रयत्न' हे वीर्यारंभ याचे नाव आहे. ‘‘තිණ්ණො පාරඞ්ගතො ථලෙ තිට්ඨති බ්රාහ්මණොති ඛො, භික්ඛවෙ, අරහතො එතං අධිවචන’’න්ති. පඨමං. "हे भिक्खूंनो, 'जो पार झाला आहे, पलीकडच्या तीरावर पोहोचला आहे आणि कोरड्या जमिनीवर उभा आहे असा ब्राह्मण' हे अर्हताचेच एक नाव आहे." पहिले. 2. රථොපමසුත්තං २. रथोपम सुत्त 239. ‘‘තීහි[Pg.384], භික්ඛවෙ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො භික්ඛු දිට්ඨෙව ධම්මෙ සුඛසොමනස්සබහුලො විහරති, යොනි චස්ස ආරද්ධා හොති ආසවානං ඛයාය. කතමෙහි තීහි? ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරො හොති, භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ, ජාගරියං අනුයුත්තො. २३९. "हे भिक्खूंनो, तीन धम्मांनी युक्त असलेला भिक्खू याच जन्मात अत्यंत सुख आणि सोमनस्याने विहरतो आणि आसवांच्या क्षयासाठी त्याचा योग्य प्रयत्न आरंभलेला असतो. कोणत्या तीन धम्मांनी? इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा असतो, भोजनात प्रमाण जाणणारा असतो आणि जागृततेत तत्पर असतो. ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා න නිමිත්තග්ගාහී හොති, නානුබ්යඤ්ජනග්ගාහී; යත්වාධිකරණමෙනං චක්ඛුන්ද්රියං අසංවුතං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා අන්වාස්සවෙය්යුං. තස්ස සංවරාය පටිපජ්ජති; රක්ඛති චක්ඛුන්ද්රියං; චක්ඛුන්ද්රියෙ සංවරං ආපජ්ජති. සොතෙන සද්දං සුත්වා… ඝානෙන ගන්ධං ඝායිත්වා… ජිව්හාය රසං සායිත්වා… කායෙන ඵොට්ඨබ්බං ඵුසිත්වා… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය න නිමිත්තග්ගාහී හොති නානුබ්යඤ්ජනග්ගාහී; යත්වාධිකරණමෙනං මනින්ද්රියං අසංවුතං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා අන්වාස්සවෙය්යුං, තස්ස සංවරාය පටිපජ්ජති; රක්ඛති මනින්ද්රියං; මනින්ද්රියෙ සංවරං ආපජ්ජති. සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, සුභූමියං චාතුමහාපථෙ ආජඤ්ඤරථො යුත්තො අස්ස ඨිතො ඔධස්තපතොදො. තමෙනං දක්ඛො යොග්ගාචරියො අස්සදම්මසාරථි අභිරුහිත්වා වාමෙන හත්ථෙන රස්මියො ගහෙත්වා, දක්ඛිණෙන හත්ථෙන පතොදං ගහෙත්වා, යෙනිච්ඡකං යදිච්ඡකං සාරෙය්යපි පච්චාසාරෙය්යපි. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ඉමෙසං ඡන්නං ඉන්ද්රියානං ආරක්ඛාය සික්ඛති, සංයමාය සික්ඛති, දමාය සික්ඛති, උපසමාය සික්ඛති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරො හොති. "आणि हे भिक्खूंनो, भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा कसा होतो? येथे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून त्याच्या बाह्य रूपाचे ग्रहण करत नाही, किंवा त्याच्या तपशीलांचे ग्रहण करत नाही. कारण, जर त्याने चक्षुरिंद्रिय असंयत ठेवले, तर अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धम्म त्याच्यावर आक्रमण करतील. म्हणून तो त्याच्या संवरासाठी प्रयत्न करतो; चक्षुरिंद्रियाचे रक्षण करतो; चक्षुरिंद्रियाचा संवर करतो. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने धम्म जाणून तो त्याच्या बाह्य रूपाचे ग्रहण करत नाही, किंवा त्याच्या तपशीलांचे ग्रहण करत नाही. कारण, जर त्याने मनेंद्रिय असंयत ठेवले, तर अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धम्म त्याच्यावर आक्रमण करतील. म्हणून तो त्याच्या संवरासाठी प्रयत्न करतो; मनेंद्रियाचे रक्षण करतो; मनेंद्रियाचा संवर करतो. जसे की, हे भिक्खूंनो, एखाद्या सपाट जमिनीवर, चौकात, उत्तम जातीच्या घोड्यांचा रथ जोडलेला उभा असेल आणि चाबूक तयार असेल. मग एखादा कुशल सारथी, घोड्यांना वश करणारा प्रशिक्षक, त्यावर आरूढ होऊन डाव्या हाताने लगाम पकडेल आणि उजव्या हाताने चाबूक धरून, त्याला पाहिजे तिथे, पाहिजे त्या मार्गाने तो रथ पुढे नेईल किंवा मागे आणेल. त्याचप्रमाणे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू या सहा इंद्रियांच्या रक्षणासाठी शिकतो, संयमासाठी शिकतो, दमनासाठी शिकतो, उपशमासाठी शिकतो. अशा प्रकारे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू इंद्रियांचे द्वार सुरक्षित ठेवणारा होतो." ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු පටිසඞ්ඛා යොනිසො ආහාරං ආහාරෙති – ‘නෙව දවාය, න මදාය, න මණ්ඩනාය, න විභූසනාය, යාවදෙව ඉමස්ස කායස්ස ඨිතියා, යාපනාය, විහිංසූපරතියා, බ්රහ්මචරියානුග්ගහාය, ඉති පුරාණඤ්ච වෙදනං පටිහඞ්ඛාමි, නවඤ්ච වෙදනං න උප්පාදෙස්සාමි, යාත්රා ච මෙ භවිස්සති, අනවජ්ජතා ච ඵාසුවිහාරො චා’ති. සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, පුරිසො වණං ආලිම්පෙය්ය [Pg.385] යාවදෙව රොහනත්ථාය, සෙය්යථා වා පන අක්ඛං අබ්භඤ්ජෙය්ය යාවදෙව භාරස්ස නිත්ථරණත්ථාය; එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු පටිසඞ්ඛා යොනිසො ආහාරං ආහාරෙති – ‘නෙව දවාය, න මදාය, න මණ්ඩනාය, න විභූසනාය, යාවදෙව ඉමස්ස කායස්ස ඨිතියා, යාපනාය, විහිංසූපරතියා, බ්රහ්මචරියානුග්ගහාය, ඉති පුරාණඤ්ච වෙදනං පටිහඞ්ඛාමි, නවඤ්ච වෙදනං න උප්පාදෙස්සාමි, යාත්රා ච මෙ භවිස්සති, අනවජ්ජතා ච ඵාසුවිහාරො චා’ති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු භොජනෙ මත්තඤ්ඤූ හොති. "आणि हे भिक्खूंनो, भिक्खू भोजनात प्रमाण जाणणारा कसा होतो? येथे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू शहाणपणाने विचार करून भोजन ग्रहण करतो – 'मजेसाठी नाही, मदासाठी नाही, शरीराच्या सुशोभीकरणासाठी नाही, सौंदर्यासाठी नाही; तर केवळ या शरीराच्या स्थितीसाठी, त्याच्या रक्षणासाठी, भुकेची पीडा शांत करण्यासाठी आणि ब्रह्मचर्याला साहाय्य करण्यासाठी. अशा प्रकारे मी जुन्या वेदनेचा नाश करीन आणि नवीन वेदना उत्पन्न होऊ देणार नाही. माझी जीवनयात्रा सुरळीत चालेल, मी निर्दोष राहीन आणि सुखाने विहरेन.' जसे की, हे भिक्खूंनो, एखादा माणूस जखमेवर केवळ ती बरी व्हावी म्हणून मलम लावतो, किंवा जसे गाडीच्या कण्याला केवळ भार वाहून नेण्यासाठी तेल लावतो; त्याचप्रमाणे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू शहाणपणाने विचार करून भोजन ग्रहण करतो – 'मजेसाठी नाही, मदासाठी नाही, शरीराच्या सुशोभीकरणासाठी नाही, सौंदर्यासाठी नाही; तर केवळ या शरीराच्या स्थितीसाठी, त्याच्या रक्षणासाठी, भुकेची पीडा शांत करण्यासाठी आणि ब्रह्मचर्याला साहाय्य करण्यासाठी. अशा प्रकारे मी जुन्या वेदनेचा नाश करीन आणि नवीन वेदना उत्पन्न होऊ देणार नाही. माझी जीवनयात्रा सुरळीत चालेल, मी निर्दोष राहीन आणि सुखाने विहरेन.' अशा प्रकारे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू भोजनात प्रमाण जाणणारा होतो." ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ජාගරියං අනුයුත්තො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු දිවසං චඞ්කමෙන නිසජ්ජාය ආවරණීයෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙති. රත්තියා පඨමං යාමං චඞ්කමෙන නිසජ්ජාය ආවරණීයෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙති. රත්තියා මජ්ඣිමං යාමං දක්ඛිණෙන පස්සෙන සීහසෙය්යං කප්පෙති පාදෙ පාදං අච්චාධාය සතො සම්පජානො උට්ඨානසඤ්ඤං මනසි කරිත්වා. රත්තියා පච්ඡිමං යාමං පච්චුට්ඨාය චඞ්කමෙන නිසජ්ජාය ආවරණීයෙහි ධම්මෙහි චිත්තං පරිසොධෙති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ජාගරියං අනුයුත්තො හොති. ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, තීහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො භික්ඛු දිට්ඨෙව ධම්මෙ සුඛසොමනස්සබහුලො විහරති, යොනි චස්ස ආරද්ධා හොති ආසවානං ඛයායා’’ති. දුතියං. "आणि हे भिक्खूंनो, भिक्खू जागृततेत तत्पर कसा होतो? येथे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू दिवसा चंक्रमणाने आणि बसण्याने मनाला अडथळा आणणाऱ्या धम्मांपासून शुद्ध करतो. रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात चंक्रमणाने आणि बसण्याने मनाला अडथळा आणणाऱ्या धम्मांपासून शुद्ध करतो. रात्रीच्या मध्यम प्रहरात उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, स्मृती आणि संप्रजन्य ठेवून, उठण्याची संज्ञा मनात ठेवून सिंहशयन करतो. रात्रीच्या अंतिम प्रहरात लवकर उठून चंक्रमणाने आणि बसण्याने मनाला अडथळा आणणाऱ्या धम्मांपासून शुद्ध करतो. अशा प्रकारे, हे भिक्खूंनो, भिक्खू जागृततेत तत्पर होतो. हे भिक्खूंनो, या तीन धम्मांनी युक्त असलेला भिक्खू याच जन्मात अत्यंत सुख आणि सोमनस्याने विहरतो आणि आसवांच्या क्षयासाठी त्याचा योग्य प्रयत्न आरंभलेला असतो." दुसरे. 3. කුම්මොපමසුත්තං ३. कुम्मोपम सुत्त 240. ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, කුම්මො කච්ඡපො සායන්හසමයං අනුනදීතීරෙ ගොචරපසුතො අහොසි. සිඞ්ගාලොපි ඛො, භික්ඛවෙ, සායන්හසමයං අනුනදීතීරෙ ගොචරපසුතො අහොසි. අද්දසා ඛො, භික්ඛවෙ, කුම්මො කච්ඡපො සිඞ්ගාලං දූරතොව ගොචරපසුතං. දිස්වාන සොණ්ඩිපඤ්චමානි අඞ්ගානි සකෙ කපාලෙ සමොදහිත්වා අප්පොස්සුක්කො තුණ්හීභූතො සඞ්කසායති. සිඞ්ගාලොපි ඛො, භික්ඛවෙ, අද්දස කුම්මං කච්ඡපං දූරතොව ගොචරපසුතං. දිස්වාන යෙන කුම්මො කච්ඡපො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා කුම්මං කච්ඡපං පච්චුපට්ඨිතො අහොසි – ‘යදායං කුම්මො කච්ඡපො සොණ්ඩිපඤ්චමානං අඞ්ගානං අඤ්ඤතරං වා අඤ්ඤතරං වා අඞ්ගං අභිනින්නාමෙස්සති, තත්ථෙව නං ගහෙත්වා උද්දාලිත්වා ඛාදිස්සාමී’ති. යදා ඛො, භික්ඛවෙ, කුම්මො කච්ඡපො [Pg.386] සොණ්ඩිපඤ්චමානං අඞ්ගානං අඤ්ඤතරං වා අඤ්ඤතරං වා අඞ්ගං න අභිනින්නාමි, අථ සිඞ්ගාලො කුම්මම්හා නිබ්බිජ්ජ පක්කාමි, ඔතාරං අලභමානො. २४०. "पूर्वीची गोष्ट आहे, हे भिक्खूंनो, एक कासव संध्याकाळच्या वेळी नदीकाठी चारा शोधण्यात मग्न होते. हे भिक्खूंनो, एक कोल्हा देखील संध्याकाळच्या वेळी त्याच नदीकाठी भक्ष्य शोधण्यात मग्न होता. त्या कासवाने भक्ष्य शोधणाऱ्या कोल्ह्याला दुरूनच पाहिले. त्याला पाहून त्याने आपली चार पावले आणि पाचवे डोके आपल्या पाठीच्या कवचात ओढून घेतले आणि तो निश्चिंत व शांत होऊन बसून राहिला. हे भिक्खूंनो, कोल्ह्यानेही त्या कासवाला दुरूनच पाहिले होते. त्याला पाहून तो कासवाजवळ आला आणि तिथेच दबा धरून बसला – 'जेव्हा हे कासव आपल्या पाच अवयवांपैकी एखादा अवयव बाहेर काढेल, तेव्हा मी त्याला तिथेच पकडून, त्याचे कवच सोलून खाऊन टाकीन.' पण हे भिक्खूंनो, जेव्हा त्या कासवाने आपल्या पाच अवयवांपैकी कोणताही अवयव बाहेर काढला नाही, तेव्हा तो कोल्हा कासवाकडून कोणतीही संधी न मिळाल्यामुळे निराश होऊन निघून गेला." ‘‘එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, තුම්හෙපි මාරො පාපිමා සතතං සමිතං පච්චුපට්ඨිතො – ‘අප්පෙව නාමාහං ඉමෙසං චක්ඛුතො වා ඔතාරං ලභෙය්යං…පෙ… ජිව්හාතො වා ඔතාරං ලභෙය්යං…පෙ… මනතො වා ඔතාරං ලභෙය්ය’න්ති. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරා විහරථ. චක්ඛුනා රූපං දිස්වා මා නිමිත්තග්ගාහිනො අහුවත්ථ, මා අනුබ්යඤ්ජනග්ගාහිනො. යත්වාධිකරණමෙනං චක්ඛුන්ද්රියං අසංවුතං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා අන්වාස්සවෙය්යුං, තස්ස සංවරාය පටිපජ්ජථ, රක්ඛථ චක්ඛුන්ද්රියං, චක්ඛුන්ද්රියෙ සංවරං ආපජ්ජථ. සොතෙන සද්දං සුත්වා… ඝානෙන ගන්ධං ඝායිත්වා… ජිව්හාය රසං සායිත්වා… කායෙන ඵොට්ඨබ්බං ඵුසිත්වා… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය මා නිමිත්තග්ගාහිනො අහුවත්ථ, මා අනුබ්යඤ්ජනග්ගාහිනො. යත්වාධිකරණමෙනං මනින්ද්රියං අසංවුතං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා අන්වාස්සවෙය්යුං, තස්ස සංවරාය පටිපජ්ජථ, රක්ඛථ මනින්ද්රියං, මනින්ද්රියෙ සංවරං ආපජ්ජථ. යතො තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරා විහරිස්සථ, අථ තුම්හෙහිපි මාරො පාපිමා නිබ්බිජ්ජ පක්කමිස්සති, ඔතාරං අලභමානො – කුම්මම්හාව සිඞ්ගාලො’’ති. “त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो! पापी मार तुमच्यावर सतत आणि निरंतर पाळत ठेवून असतो की, ‘कदाचित मला यांच्या डोळ्यांद्वारे संधी मिळेल... किंवा जिभेद्वारे संधी मिळेल... किंवा मनाद्वारे संधी मिळेल.’ म्हणून, भिक्षूंनो! तुम्ही आपल्या इंद्रियांचे दरवाजे सुरक्षित ठेवून (इंद्रिय संवर करून) विहार करा. डोळ्यांनी रूप पाहून त्याच्या बाह्य लक्षणांचे (निमित्त) ग्रहण करू नका, त्याच्या उप-लक्षणांचे (अनुव्यंजन) ग्रहण करू नका. कारण, जर तुम्ही चक्षुरिंद्रिय असंयत ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (खिन्नता) हे पापी अकुशल धर्म तुमच्यावर आक्रमण करतील. म्हणून, त्याच्या संवरासाठी (संयमासाठी) प्रतिपन्न व्हा (प्रयत्न करा), चक्षुरिंद्रियाचे रक्षण करा, चक्षुरिंद्रियाचा संवर प्राप्त करा. कानाने शब्द ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... कायेने स्पर्श अनुभवून... मनाने धर्माचे (विचारांचे) ज्ञान करून घेऊन बाह्य लक्षणांचे ग्रहण करू नका, उप-लक्षणांचे ग्रहण करू नका. कारण, जर तुम्ही मनेंद्रिय असंयत ठेवून विहार केला, तर अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धर्म तुमच्यावर आक्रमण करतील. म्हणून, त्याच्या संवरासाठी प्रतिपन्न व्हा, मनेंद्रियाचे रक्षण करा, मनेंद्रियाचा संवर प्राप्त करा. भिक्षूंनो! जेव्हा तुम्ही इंद्रियांचे दरवाजे सुरक्षित ठेवून विहार कराल, तेव्हा पापी मार तुमच्यामध्ये संधी मिळवण्यास असमर्थ ठरून, निराश होऊन निघून जाईल; ज्याप्रमाणे कोल्हा कासवापासून दूर निघून गेला होता.” ‘‘කුම්මො අඞ්ගානි සකෙ කපාලෙ,සමොදහං භික්ඛු මනොවිතක්කෙ; අනිස්සිතො අඤ්ඤමහෙඨයානො,පරිනිබ්බුතො නූපවදෙය්ය කඤ්චී’’ති. තතියං; “ज्याप्रमाणे कासव आपले अवयव स्वतःच्या पाठीच्या कवचात सामावून घेते, त्याचप्रमाणे भिक्षूने आपल्या मनातील विचारांना (मनोवितर्क) आवरून धरावे. कशावरही आश्रित न राहता (तृष्णा व दृष्टीपासून अलिप्त राहून), इतरांना त्रास न देता, पूर्णपणे शांत (परिनिर्वृत) होऊन त्याने कोणाचीही निंदा करू नये.” (तिसरे) 4. පඨමදාරුක්ඛන්ධොපමසුත්තං ४. प्रथम दारुक्खन्धोपम सुत्त (मोठ्या लाकडाच्या ओंडक्याच्या उपमेचे पहिले सुत्त) 241. එකං සමයං භගවා කොසම්බියං විහරති ගඞ්ගාය නදියා තීරෙ. අද්දසා ඛො භගවා මහන්තං දාරුක්ඛන්ධං ගඞ්ගාය නදියා සොතෙන වුය්හමානං. දිස්වාන භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘පස්සථ නො තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, අමුං මහන්තං දාරුක්ඛන්ධං ගඞ්ගාය නදියා සොතෙන වුය්හමාන’’න්ති? ‘‘එවං, භන්තෙ’’. ‘‘සචෙ සො, භික්ඛවෙ, දාරුක්ඛන්ධො න ඔරිමං තීරං උපගච්ඡති, න පාරිමං තීරං උපගච්ඡති, න මජ්ඣෙ සංසීදිස්සති, න ථලෙ උස්සීදිස්සති, න මනුස්සග්ගාහො ගහෙස්සති, න [Pg.387] අමනුස්සග්ගාහො ගහෙස්සති, න ආවට්ටග්ගාහො ගහෙස්සති, න අන්තොපූති භවිස්සති; එවඤ්හි සො, භික්ඛවෙ, දාරුක්ඛන්ධො සමුද්දනින්නො භවිස්සති සමුද්දපොණො සමුද්දපබ්භාරො. තං කිස්ස හෙතු? සමුද්දනින්නො, භික්ඛවෙ, ගඞ්ගාය නදියා සොතො සමුද්දපොණො සමුද්දපබ්භාරො. २४१. एकदा भगवान कोसंबी येथे गंगा नदीच्या तीरावर विहार करत होते. भगवंतांनी गंगेच्या प्रवाहाबरोबर वाहून जाणारा एक मोठा लाकडाचा ओंडका पाहिला. तो पाहून त्यांनी भिक्षूंना संबोधित केले— “भिक्षूंनो! गंगेच्या प्रवाहाबरोबर वाहून जाणारा तो मोठा लाकडाचा ओंडका तुम्हाला दिसतो आहे का?” “होय, भंते!” “भिक्षूंनो! जर तो लाकडाचा ओंडका या काठाला (अलीकडच्या तीराला) लागला नाही, पलीकडच्या तीराला लागला नाही, मध्यप्रवाहात बुडाला नाही, कोरड्या जमिनीवर अडकला नाही, माणसांनी पकडला नाही, अमानुषांनी (देव-यक्षांनी) पकडला नाही, पाण्याच्या भोवऱ्यात अडकला नाही आणि आतून सडला नाही; तर भिक्षूंनो, तो लाकडाचा ओंडका समुद्राकडेच झुकेल, समुद्राकडेच वळेल आणि समुद्राकडेच प्रवाही होईल. याचे कारण काय? भिक्षूंनो, कारण गंगा नदीचा प्रवाह समुद्राकडेच झुकणारा, समुद्राकडेच वळणारा आणि समुद्राकडेच प्रवाही असणारा आहे.” ‘‘එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, සචෙ තුම්හෙපි න ඔරිමං තීරං උපගච්ඡථ, න පාරිමං තීරං උපගච්ඡථ; න මජ්ඣෙ සංසීදිස්සථ, න ථලෙ උස්සීදිස්සථ, න මනුස්සග්ගාහො ගහෙස්සති, න අමනුස්සග්ගාහො ගහෙස්සති, න ආවට්ටග්ගාහො ගහෙස්සති, න අන්තොපූතී භවිස්සථ; එවං තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, නිබ්බානනින්නා භවිස්සථ නිබ්බානපොණා නිබ්බානපබ්භාරා. තං කිස්ස හෙතු? නිබ්බානනින්නා, භික්ඛවෙ, සම්මාදිට්ඨි නිබ්බානපොණා නිබ්බානපබ්භාරා’’ති. එවං වුත්තෙ, අඤ්ඤතරො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කිං නු ඛො, භන්තෙ, ඔරිමං තීරං, කිං පාරිමං තීරං, කො මජ්ඣෙ සංසාදො, කො ථලෙ උස්සාදො, කො මනුස්සග්ගාහො, කො අමනුස්සග්ගාහො, කො ආවට්ටග්ගාහො, කො අන්තොපූතිභාවො’’ති? “त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो! जर तुम्हीही अलीकडच्या तीराला लागला नाहीत, पलीकडच्या तीराला लागला नाहीत; मध्यप्रवाहात बुडाला नाहीत, कोरड्या जमिनीवर अडकला नाहीत, माणसांनी पकडले नाही, अमानुषांनी पकडले नाही, पाण्याच्या भोवऱ्यात अडकला नाहीत आणि आतून सडला नाहीत; तर भिक्षूंनो, तुम्ही निर्वाणाकडेच झुकाल, निर्वाणाकडेच वळाल आणि निर्वाणाकडेच प्रवाही व्हाल. याचे कारण काय? भिक्षूंनो, कारण सम्यक् दृष्टी ही निर्वाणाकडेच झुकणारी, निर्वाणाकडेच वळणारी आणि निर्वाणाकडेच प्रवाही असणारी आहे.” असे विचारले असता, एका भिक्षूने भगवंतांना विचारले— “भंते! अलीकडचे तीर म्हणजे काय? पलीकडचे तीर म्हणजे काय? मध्यप्रवाहात बुडणे म्हणजे काय? कोरड्या जमिनीवर अडकणे म्हणजे काय? माणसांनी पकडणे म्हणजे काय? अमानुषांनी पकडणे म्हणजे काय? पाण्याच्या भोवऱ्यात अडकणे म्हणजे काय? आणि आतून सडणे म्हणजे काय?” ‘‘‘ඔරිමං තීර’න්ති ඛො, භික්ඛු, ඡන්නෙතං අජ්ඣත්තිකානං ආයතනානං අධිවචනං. ‘පාරිමං තීර’න්ති ඛො, භික්ඛු, ඡන්නෙතං බාහිරානං ආයතනානං අධිවචනං. ‘මජ්ඣෙ සංසාදො’ති ඛො, භික්ඛු, නන්දීරාගස්සෙතං අධිවචනං. ‘ථලෙ උස්සාදො’ති ඛො, භික්ඛු, අස්මිමානස්සෙතං අධිවචනං. “भिक्षू! ‘अलीकडचे तीर’ हे सहा आध्यात्मिक (अंतर्गत) आयतनांचे (अज्झत्तिक आयतन) नाव आहे. ‘पलीकडचे तीर’ हे सहा बाह्य आयतनांचे (बाहिर आयतन) नाव आहे. ‘मध्यप्रवाहात बुडणे’ हे नंदीराग (आसक्ती आणि अभिलाषा) याचे नाव आहे. ‘कोरड्या जमिनीवर अडकणे’ हे अस्मिमान (अहंकार/‘मी आहे’ हा भाव) याचे नाव आहे.” ‘‘කතමො ච, භික්ඛු, මනුස්සග්ගාහො? ඉධ, භික්ඛු, ගිහීහි සංසට්ඨො විහරති, සහනන්දී සහසොකී, සුඛිතෙසු සුඛිතො, දුක්ඛිතෙසු දුක්ඛිතො, උප්පන්නෙසු කිච්චකරණීයෙසු අත්තනා තෙසු යොගං ආපජ්ජති. අයං වුච්චති, භික්ඛු, මනුස්සග්ගාහො. “आणि भिक्षू! ‘माणसांनी पकडणे’ म्हणजे काय? येथे एखादा भिक्षू गृहस्थांच्या (लोकांच्या) संसर्गात राहतो; त्यांच्यासोबतच आनंदित होतो आणि त्यांच्यासोबतच दुःखी होतो, ते सुखी असताना सुखी होतो आणि ते दुःखी असताना दुःखी होतो, आणि त्यांची कामे किंवा कर्तव्ये उद्भवली असता स्वतः त्यात गुंतवून घेतो. भिक्षू! याला ‘माणसांनी पकडणे’ असे म्हणतात.” ‘‘කතමො ච, භික්ඛු, අමනුස්සග්ගාහො? ඉධ, භික්ඛු, එකච්චො අඤ්ඤතරං දෙවනිකායං පණිධාය බ්රහ්මචරියං චරති – ‘ඉමිනාහං සීලෙන වා වතෙන වා තපෙන වා බ්රහ්මචරියෙන වා දෙවො වා භවිස්සාමි දෙවඤ්ඤතරො වා’ති. අයං වුච්චති, භික්ඛු, අමනුස්සග්ගාහො. ‘ආවට්ටග්ගාහො’ති ඛො, භික්ඛු, පඤ්චන්නෙතං කාමගුණානං අධිවචනං. “आणि भिक्षू! ‘अमानुषांनी पकडणे’ म्हणजे काय? येथे एखादा भिक्षू एखाद्या देवलोकात जन्म घेण्याच्या आकांक्षेने ब्रह्मचर्य पाळतो— ‘मी या शीलाने, व्रताने, तपाने किंवा ब्रह्मचर्याने देव किंवा देवांपैकी एक होईन.’ भिक्षू! याला ‘अमानुषांनी पकडणे’ असे म्हणतात. ‘पाण्याच्या भोवऱ्यात अडकणे’ हे पाच कामगुणांचे नाव आहे.” ‘‘කතමො ච, භික්ඛු, අන්තොපූතිභාවො? ඉධ, භික්ඛු, එකච්චො දුස්සීලො හොති පාපධම්මො අසුචිසඞ්කස්සරසමාචාරො පටිච්ඡන්නකම්මන්තො අස්සමණො [Pg.388] සමණපටිඤ්ඤො අබ්රහ්මචාරී බ්රහ්මචාරිපටිඤ්ඤො අන්තොපූති අවස්සුතො කසම්බුජාතො. අයං වුච්චති, භික්ඛු, ‘අන්තොපූතිභාවො’’’ති. “आणि भिक्षू! ‘आतून सडणे’ म्हणजे काय? येथे एखादा भिक्षू दुःशील असतो, पापधर्मी असतो, अपवित्र व संशयास्पद आचरण करणारा असतो, आपली दुष्कृत्ये लपवणारा असतो, श्रमण नसतानाही स्वतःला श्रमण म्हणवून घेणारा असतो, ब्रह्मचारी नसतानाही स्वतःला ब्रह्मचारी म्हणवून घेणारा असतो, आतून सडलेला, वासनांनी ओला झालेला (क्लेशयुक्त) आणि कचऱ्यासारखा झालेला असतो. भिक्षू! याला ‘आतून सडणे’ असे म्हणतात.” තෙන ඛො පන සමයෙන නන්දො ගොපාලකො භගවතො අවිදූරෙ ඨිතො හොති. අථ ඛො නන්දො ගොපාලකො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අහං ඛො, භන්තෙ, න ඔරිමං තීරං උපගච්ඡාමි, න පාරිමං තීරං උපගච්ඡාමි, න මජ්ඣෙ සංසීදිස්සාමි, න ථලෙ උස්සීදිස්සාමි, න මං මනුස්සග්ගාහො ගහෙස්සති, න අමනුස්සග්ගාහො ගහෙස්සති, න ආවට්ටග්ගාහො ගහෙස්සති, න අන්තොපූති භවිස්සාමි. ලභෙය්යාහං, භන්තෙ, භගවතො සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, ලභෙය්යං උපසම්පද’’න්ති. ‘‘තෙන හි ත්වං, නන්ද, සාමිකානං ගාවො නිය්යාතෙහී’’ති. ‘‘ගමිස්සන්ති, භන්තෙ, ගාවො වච්ඡගිද්ධිනියො’’ති. ‘‘නිය්යාතෙහෙව ත්වං, නන්ද, සාමිකානං ගාවො’’ති. අථ ඛො නන්දො ගොපාලකො සාමිකානං ගාවො නිය්යාතෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘නිය්යාතිතා, භන්තෙ, සාමිකානං ගාවො. ලභෙය්යාහං, භන්තෙ, භගවතො සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, ලභෙය්යං උපසම්පද’’න්ති. අලත්ථ ඛො නන්දො ගොපාලකො භගවතො සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, අලත්ථ උපසම්පදං. අචිරූපසම්පන්නො ච පනායස්මා නන්දො එකො වූපකට්ඨො…පෙ… අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා නන්දො අරහතං අහොසීති. චතුත්ථං. त्या वेळी नन्द नावाचा गोपाळ भगवंतांच्या जवळच उभा होता. तेव्हा नन्द गोपाळ भगवंतांना म्हणाला – "भंते, मी अलीकडच्या तीरावर जाणार नाही, पलीकडच्या तीरावर जाणार नाही, मध्येच बुडणार नाही, कोरड्या जमिनीवर अडकणार नाही, मला मनुष्य पकडणार नाही, अमानुष पकडणार नाही, पाण्याचा भोवरा पकडणार नाही आणि मी आतून सडणार नाही. भंते, मला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा (दीक्षा) मिळावी, उपसंपदा मिळावी." "नन्द, असे असेल तर तू गाई त्यांच्या मालकांना परत कर." "भंते, गाई आपल्या वासरांच्या ओढीने स्वतःच परत जातील." "नन्द, तू गाई त्यांच्या मालकांना परतच कर." त्यानंतर नन्द गोपाळाने गाई त्यांच्या मालकांना परत केल्या आणि तो भगवंतांकडे आला. आल्यानंतर तो भगवंतांना म्हणाला – "भंते, गाई त्यांच्या मालकांना परत केल्या आहेत. भंते, मला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळावी, उपसंपदा मिळावी." नन्द गोपाळाला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळाली, उपसंपदा मिळाली. उपसंपदा मिळाल्यानंतर लवकरच आयुष्यमान नन्द एकटे, एकांतात राहून... (पे)... आयुष्यमान नन्द अर्हंतांपैकी एक झाले. चौथे (सुत्त). 5. දුතියදාරුක්ඛන්ධොපමසුත්තං ५. दुसरे दारुक्खन्धोपम सुत्त. 242. එකං සමයං භගවා කිමිලායං විහරති ගඞ්ගාය නදියා තීරෙ. අද්දසා ඛො භගවා මහන්තං දාරුක්ඛන්ධං ගඞ්ගාය නදියා සොතෙන වුය්හමානං. දිස්වාන භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘පස්සථ නො තුම්හෙ, භික්ඛවෙ, අමුං මහන්තං දාරුක්ඛන්ධං ගඞ්ගාය නදියා සොතෙන වුය්හමාන’’න්ති? ‘‘එවං භන්තෙ’’…පෙ… එවං වුත්තෙ, ආයස්මා කිමිලො භගවන්තං එතදවොච – කිං නු ඛො, භන්තෙ, ඔරිමං තීරං…පෙ… කතමො ච, කිමිල, අන්තොපූතිභාවො. ඉධ, කිමිල, භික්ඛු අඤ්ඤතරං සංකිලිට්ඨං ආපත්තිං ආපන්නො හොති යථාරූපාය ආපත්තියා න වුට්ඨානං පඤ්ඤායති. අයං වුච්චති, කිමිල, අන්තොපූතිභාවොති. පඤ්චමං. २४२. एकदा भगवान किमिला येथे गंगा नदीच्या तीरावर विहार करत होते. भगवंतांनी गंगेच्या प्रवाहात वाहून जाणारा एक मोठा लाकडाचा ओंडका पाहिला. तो पाहून त्यांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "भिक्खूंनो, गंगेच्या प्रवाहात वाहून जाणारा तो मोठा लाकडाचा ओंडका तुम्हाला दिसतोय का?" "होय, भंते!" ... (पे) ... असे म्हटल्यावर आयुष्यमान किमिल भगवंतांना म्हणाले – "भंते, अलीकडचे तीर म्हणजे काय? ... (पे) ... आणि किमिल, 'आतून सडणे' म्हणजे काय?" "किमिल, येथे एखादा भिक्खू अशा प्रकारच्या मलीन आपत्तीला (नियमाच्या उल्लंघनाला) प्राप्त होतो, ज्या आपत्तीतून बाहेर पडण्याचा मार्ग दिसत नाही. किमिल, यालाच 'आतून सडणे' असे म्हणतात." पाचवे (सुत्त). 6. අවස්සුතපරියායසුත්තං ६. अवस्सुतपरियाय सुत्त. 243. එකං [Pg.389] සමයං භගවා සක්කෙසු විහරති කපිලවත්ථුස්මිං නිග්රොධාරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන කාපිලවත්ථවානං සක්යානං නවං සන්ථාගාරං අචිරකාරිතං හොති අනජ්ඣාවුට්ඨං සමණෙන වා බ්රාහ්මණෙන වා කෙනචි වා මනුස්සභූතෙන. අථ ඛො කාපිලවත්ථවා සක්යා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො කාපිලවත්ථවා සක්යා භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘ඉධ, භන්තෙ, කාපිලවත්ථවානං සක්යානං නවං සන්ථාගාරං අචිරකාරිතං අනජ්ඣාවුට්ඨං සමණෙන වා බ්රාහ්මණෙන වා කෙනචි වා මනුස්සභූතෙන. තං, භන්තෙ, භගවා පඨමං පරිභුඤ්ජතු. භගවතා පඨමං පරිභුත්තං පච්ඡා කාපිලවත්ථවා සක්යා පරිභුඤ්ජිස්සන්ති. තදස්ස කාපිලවත්ථවානං සක්යානං දීඝරත්තං හිතාය සුඛායා’’ති. අධිවාසෙසි භගවා තුණ්හීභාවෙන. २४३. एकदा भगवान शाक्य देशात कपिलवस्तू येथील निग्रोधाराम विहारामध्ये राहत होते. त्या वेळी कपिलवस्तूच्या शाक्यांचे एक नवीन संथागार (सभागृह) नुकतेच बांधून पूर्ण झाले होते, ज्यामध्ये अद्याप कोणताही श्रमण, ब्राह्मण किंवा कोणताही मनुष्य राहिला नव्हता. तेव्हा कपिलवस्तूचे शाक्य भगवंतांकडे आले. आल्यानंतर त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले आणि ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले कपिलवस्तूचे शाक्य भगवंतांना म्हणाले – "भंते, येथे कपिलवस्तूच्या शाक्यांचे एक नवीन संथागार नुकतेच बांधून पूर्ण झाले आहे, ज्यामध्ये अद्याप कोणताही श्रमण, ब्राह्मण किंवा कोणताही मनुष्य राहिला नाही. भंते, भगवंतांनी सर्वप्रथम त्याचा वापर करावा. भगवंतांनी सर्वप्रथम वापर केल्यानंतर, कपिलवस्तूचे शाक्य त्याचा वापर करतील. ते कपिलवस्तूच्या शाक्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." भगवंतांनी मौन बाळगून संमती दिली. අථ ඛො කාපිලවත්ථවා සක්යා භගවතො අධිවාසනං විදිත්වා උට්ඨායාසනා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා යෙන නවං සන්ථාගාරං තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා සබ්බසන්ථරිං සන්ථාගාරං සන්ථරිත්වා ආසනානි පඤ්ඤාපෙත්වා උදකමණිකං පතිට්ඨාපෙත්වා තෙලප්පදීපං ආරොපෙත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘සබ්බසන්ථරිසන්ථතං, භන්තෙ, සන්ථාගාරං, ආසනානි පඤ්ඤත්තානි, උදකමණිකො පතිට්ඨාපිතො, තෙලප්පදීපො ආරොපිතො. යස්ස දානි, භන්තෙ, භගවා කාලං මඤ්ඤතී’’ති. අථ ඛො භගවා නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය සද්ධිං භික්ඛුසඞ්ඝෙන යෙන නවං සන්ථාගාරං තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා පාදෙ පක්ඛාලෙත්වා සන්ථාගාරං පවිසිත්වා මජ්ඣිමං ථම්භං නිස්සාය පුරත්ථාභිමුඛො නිසීදි. භික්ඛුසඞ්ඝොපි ඛො පාදෙ පක්ඛාලෙත්වා සන්ථාගාරං පවිසිත්වා පච්ඡිමං භිත්තිං නිස්සාය පුරත්ථාභිමුඛො නිසීදි භගවන්තංයෙව පුරක්ඛත්වා. කාපිලවත්ථවා සක්යා පාදෙ පක්ඛාලෙත්වා සන්ථාගාරං පවිසිත්වා පුරත්ථිමං භිත්තිං නිස්සාය පච්ඡිමාභිමුඛා නිසීදිංසු භගවන්තංයෙව පුරක්ඛත්වා. අථ ඛො භගවා කාපිලවත්ථවෙ සක්යෙ බහුදෙව රත්තිං ධම්මියා කථාය සන්දස්සෙත්වා සමාදපෙත්වා සමුත්තෙජෙත්වා සම්පහංසෙත්වා උය්යොජෙසි – ‘‘අභික්කන්තා ඛො, ගොතමා, රත්ති. යස්ස දානි කාලං මඤ්ඤථා’’ති[Pg.390]. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො කාපිලවත්ථවා සක්යා භගවතො පටිස්සුත්වා උට්ඨායාසනා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කමිංසු. तेव्हा कपिलवस्तूच्या शाक्यांनी भगवंतांची संमती जाणून घेतली आणि ते आपापल्या आसनांवरून उठले. त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि ते नवीन संथागाराकडे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी संथागारात सर्व बाजूंनी आसने पसरवली, आसने मांडली, पाण्याचा मोठा घडा ठेवला आणि तेलाचा दिवा लावला. त्यानंतर ते पुन्हा भगवंतांकडे आले. आल्यानंतर त्यांनी भगवंतांना म्हटले – "भंते, संथागारात सर्व बाजूंनी आसने पसरवली आहेत, आसने मांडली आहेत, पाण्याचा घडा ठेवला आहे आणि तेलाचा दिवा लावला आहे. आता भगवंतांना जशी वेळ योग्य वाटेल तसे करावे." त्यानंतर भगवंतांनी वस्त्रे परिधान केली, पात्र आणि चीवर घेऊन ते भिक्खू संघासह नवीन संथागाराकडे गेले. तेथे पोहोचून त्यांनी आपले पाय धुतले, संथागारात प्रवेश केला आणि मधल्या खांबाला टेकून पूर्वेकडे तोंड करून ते बसले. भिक्खू संघानेही आपले पाय धुतले, संथागारात प्रवेश केला आणि पश्चिमेकडील भिंतीला टेकून, भगवंतांना समोर ठेवून पूर्वेकडे तोंड करून ते बसले. कपिलवस्तूचे शाक्यही आपले पाय धुवून संथागारात आले आणि पूर्वेकडील भिंतीला टेकून, भगवंतांना समोर ठेवून पश्चिमेकडे तोंड करून बसले. त्यानंतर भगवंतांनी कपिलवस्तूच्या शाक्यांना रात्रीच्या बऱ्याच वेळेपर्यंत धम्म उपदेशाने (धम्मकथेने) संबोधिले, प्रेरित केले, उत्साहित केले आणि आनंदित केले. त्यानंतर त्यांनी त्यांना निरोप दिला – "हे गोतमांनो, रात्र बरीच उलटून गेली आहे. आता तुम्हाला जशी वेळ योग्य वाटेल तसे करावे." "तसेच असो, भंते!" असे म्हणून कपिलवस्तूच्या शाक्यांनी भगवंतांच्या वचनाचा स्वीकार केला, ते आसनावरून उठले, त्यांनी भगवंतांना अभिवादन केले, प्रदक्षिणा घातली आणि ते निघून गेले. අථ ඛො භගවා අචිරපක්කන්තෙසු කාපිලවත්ථවෙසු සක්යෙසු ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං ආමන්තෙසි – ‘‘විගතථිනමිද්ධො ඛො, මොග්ගල්ලාන, භික්ඛුසඞ්ඝො. පටිභාතු තං, මොග්ගල්ලාන, භික්ඛූනං ධම්මී කථා. පිට්ඨි මෙ ආගිලායති; තමහං ආයමිස්සාමී’’ති. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො භගවතො පච්චස්සොසි. අථ ඛො භගවා චතුග්ගුණං සඞ්ඝාටිං පඤ්ඤපෙත්වා දක්ඛිණෙන පස්සෙන සීහසෙය්යං කප්පෙසි, පාදෙ පාදං අච්චාධාය, සතො සම්පජානො උට්ඨානසඤ්ඤං මනසි කරිත්වා. තත්ර ඛො ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘ආවුසො භික්ඛවෙ’’ති. ‘‘ආවුසො’’ති ඛො තෙ භික්ඛූ ආයස්මතො මහාමොග්ගල්ලානස්ස පච්චස්සොසුං. ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – ‘‘අවස්සුතපරියායඤ්ච වො, ආවුසො, දෙසෙස්සාමි, අනවස්සුතපරියායඤ්ච. තං සුණාථ, සාධුකං මනසි කරොථ; භාසිස්සාමී’’ති. ‘‘එවමාවුසො’’ති ඛො තෙ භික්ඛූ ආයස්මතො මහාමොග්ගල්ලානස්ස පච්චස්සොසුං. ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – त्यानंतर, कपिलवस्तूचे शाक्य निघून गेल्यानंतर फार वेळ झाला नव्हता, तेव्हा भगवंतांनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना संबोधित केले – “मोग्गल्लाना, भिक्खू संघ आळस आणि सुस्ती (थिन-मिद्ध) पासून मुक्त झाला आहे. मोग्गल्लाना, तू भिक्खूंना धम्म उपदेश कर. माझी पाठ दुखत आहे, म्हणून मी ती सरळ करतो (विश्रांती घेतो).” “तसेच असो, भन्ते,” असे आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी भगवंतांना उत्तर दिले. त्यानंतर भगवंतांनी आपली दुप्पट केलेली संघाटी चार पदरी करून अंथरली आणि उजव्या कुशीवर, एका पायावर दुसरा पाय ठेवून, स्मृती व संप्रजन्य राखून, उठण्याची संज्ञा मनात ठेवून सिंहशय्या ग्रहण केली. तेव्हा आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी भिक्खूंना संबोधित केले – “आवुसो भिक्खू!” “आवुसो,” असे त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना उत्तर दिले. आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी हे सांगितले – “आवुसो, मी तुम्हाला क्लेशांच्या पावसाने ओले होणे (अवस्सुत पर्याय) आणि क्लेशांच्या पावसाने ओले न होणे (अनवस्सुत पर्याय) याविषयी धम्म उपदेश करीन. तो नीट ऐका, मनावर नीट बिंबवा; मी बोलतो.” “तसेच असो, आवुसो,” असे त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना उत्तर दिले. आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी हे सांगितले – ‘‘කථං, ආවුසො, අවස්සුතො හොති? ඉධාවුසො, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා පියරූපෙ රූපෙ අධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ රූපෙ බ්යාපජ්ජති, අනුපට්ඨිතකායස්සති විහරති පරිත්තචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං නප්පජානාති යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති …පෙ… ජිව්හාය රසං සායිත්වා…පෙ… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය පියරූපෙ ධම්මෙ අධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ ධම්මෙ බ්යාපජ්ජති, අනුපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති පරිත්තචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං නප්පජානාති යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. අයං වුච්චති, ආවුසො, භික්ඛු අවස්සුතො චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු…පෙ… අවස්සුතො ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යෙසු රසෙසු…පෙ… අවස්සුතො මනොවිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු. එවංවිහාරිඤ්චාවුසො, භික්ඛුං චක්ඛුතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති ලභතෙව මාරො ඔතාරං, ලභති මාරො ආරම්මණං…පෙ… ජිව්හාතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති, ලභතෙව මාරො ඔතාරං[Pg.391], ලභති මාරො ආරම්මණං…පෙ… මනතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති, ලභතෙව මාරො ඔතාරං, ලභති මාරො ආරම්මණං. “आवुसो, मनुष्य क्लेशांच्या पावसाने ओला कसा होतो? आवुसो, येथे एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपाचा द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती (कायानुस्मृती) प्रस्थापित न करता, संकुचित मनाने राहतो. आणि ज्या चित्तविमुक्ती व प्रज्ञाविमुक्तीमध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो यथार्थपणे जाणत नाही... तसेच... जिभेने रसाची चव घेऊन... मनाद्वारे धम्माला (विचाराला) जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धम्माचा द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित न करता, संकुचित मनाने राहतो. आणि ज्या चित्तविमुक्ती व प्रज्ञाविमुक्तीमध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो यथार्थपणे जाणत नाही. आवुसो, अशा भिक्खूला डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपांमध्ये क्लेशांच्या पावसाने ओला झालेला... जिभेने जाणता येणाऱ्या रसांमध्ये क्लेशांच्या पावसाने ओला झालेला... मनाद्वारे जाणता येणाऱ्या धम्मांमध्ये क्लेशांच्या पावसाने ओला झालेला भिक्खू असे म्हणतात. आवुसो, अशा प्रकारे राहणाऱ्या भिक्खूजवळ जर मार डोळ्यांच्या मार्गाने आला, तर माराला त्याच्यात प्रवेश करण्याची संधी मिळते, माराला आधार मिळतो... जर मार जिभेच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळते, माराला आधार मिळतो... जर मार मनाच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळते, माराला आधार मिळतो. ‘‘සෙය්යථාපි, ආවුසො, නළාගාරං වා තිණාගාරං වා සුක්ඛං කොලාපං තෙරොවස්සිකං. පුරත්ථිමාය චෙපි නං දිසාය පුරිසො ආදිත්තාය තිණුක්කාය උපසඞ්කමෙය්ය, ලභෙථෙව අග්ගි ඔතාරං, ලභෙථ අග්ගි ආරම්මණං; පච්ඡිමාය චෙපි නං දිසාය පුරිසො ආදිත්තාය තිණුක්කාය උපසඞ්කමෙය්ය…පෙ… උත්තරාය චෙපි නං දිසාය…පෙ… දක්ඛිණාය චෙපි නං දිසාය…පෙ… හෙට්ඨිමතො චෙපි නං…පෙ… උපරිමතො චෙපි නං… යතො කුතොචි චෙපි නං පුරිසො ආදිත්තාය තිණුක්කාය උපසඞ්කමෙය්ය, ලභෙථෙව අග්ගි ඔතාරං ලභෙථ අග්ගි ආරම්මණං. එවමෙව ඛො, ආවුසො, එවංවිහාරිං භික්ඛුං චක්ඛුතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති, ලභතෙව මාරො ඔතාරං, ලභති මාරො ආරම්මණං…පෙ… ජිව්හාතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති…පෙ… මනතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති, ලභතෙව මාරො ඔතාරං, ලභති මාරො ආරම්මණං. එවංවිහාරිඤ්චාවුසො, භික්ඛුං රූපා අධිභංසු, න භික්ඛු රූපෙ අධිභොසි; සද්දා භික්ඛුං අධිභංසු, න භික්ඛු සද්දෙ අධිභොසි; ගන්ධා භික්ඛුං අධිභංසු, න භික්ඛු ගන්ධෙ අධිභොසි; රසා භික්ඛුං අධිභංසු, න භික්ඛු රසෙ අධිභොසි; ඵොට්ඨබ්බා භික්ඛුං අධිභංසු, න භික්ඛු ඵොට්ඨබ්බෙ අධිභොසි; ධම්මා භික්ඛුං අධිභංසු, න භික්ඛු ධම්මෙ අධිභොසි. අයං වුච්චතාවුසො, භික්ඛු රූපාධිභූතො, සද්දාධිභූතො, ගන්ධාධිභූතො, රසාධිභූතො, ඵොට්ඨබ්බාධිභූතො, ධම්මාධිභූතො, අධිභූතො, අනධිභූ, අධිභංසු නං පාපකා අකුසලා ධම්මා සංකිලෙසිකා පොනොබ්භවිකා සදරා දුක්ඛවිපාකා ආයතිං ජාතිජරාමරණියා. එවං ඛො, ආවුසො, අවස්සුතො හොති. “आवुसो, समजा एखादे लव्हाळ्यांचे किंवा गवताचे घर असेल, जे सुकलेले, कुजलेले आणि अनेक पावसाळे जुने असेल. जर एखाद्या माणसाने पेटती गवताची मशाल घेऊन पूर्व दिशेकडून त्या घराकडे प्रवेश केला, तर अग्नीला त्यात प्रवेश करण्याची संधी मिळते, अग्नीला आधार मिळतो. जर पश्चिमेकडून... उत्तरेकडून... दक्षिणेकडून... खालून... वरून... किंवा कोणत्याही बाजूने एखाद्या माणसाने पेटती गवताची मशाल घेऊन त्या घराकडे प्रवेश केला, तर अग्नीला त्यात प्रवेश करण्याची संधी मिळते, अग्नीला आधार मिळतो. तसेच, आवुसो, अशा प्रकारे राहणाऱ्या भिक्खूजवळ जर मार डोळ्यांच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळते, माराला आधार मिळतो... जिभेच्या मार्गाने... मनाच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळते, माराला आधार मिळतो. आवुसो, अशा प्रकारे राहणाऱ्या भिक्खूला रूपे पराभूत करतात, भिक्खू रूपांवर विजय मिळवू शकत नाही; शब्द भिक्खूला पराभूत करतात, भिक्खू शब्दांवर विजय मिळवू शकत नाही; गंध भिक्खूला पराभूत करतात, भिक्खू गंधांवर विजय मिळवू शकत नाही; रस भिक्खूला पराभूत करतात, भिक्खू रसांवर विजय मिळवू शकत नाही; स्पर्श भिक्खूला पराभूत करतात, भिक्खू स्पर्शांवर विजय मिळवू शकत नाही; धम्म (विचार) भिक्खूला पराभूत करतात, भिक्खू धम्मांवर विजय मिळवू शकत नाही. आवुसो, अशा भिक्खूला रूपांनी पराभूत केलेला, शब्दांनी पराभूत केलेला, गंधांनी पराभूत केलेला, रसांनी पराभूत केलेला, स्पर्शांनी पराभूत केलेला, धम्मांनी पराभूत केलेला – पराभूत झालेला आणि स्वतः विजय न मिळवू शकणारा असे म्हणतात. त्याला क्लेशकारक, पुनर्जन्म देणारे, त्रासदायक, दुःखद परिणाम देणारे आणि भविष्यात जन्म, जरा व मृत्यूकडे नेणारे पापी अकुशल धर्म पराभूत करतात. आवुसो, अशा प्रकारे मनुष्य क्लेशांच्या पावसाने ओला होतो. ‘‘කථඤ්චාවුසො, අනවස්සුතො හොති? ඉධාවුසො, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා පියරූපෙ රූපෙ නාධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ රූපෙ න බ්යාපජ්ජති, උපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති අප්පමාණචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං පජානාති යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති…පෙ… ජිව්හාය රසං සායිත්වා…පෙ… මනසා [Pg.392] ධම්මං විඤ්ඤාය පියරූපෙ ධම්මෙ නාධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ ධම්මෙ න බ්යාපජ්ජති, උපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති අප්පමාණචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං පජානාති යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. අයං වුච්චතාවුසො, භික්ඛු අනවස්සුතො චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු…පෙ… අනවස්සුතො මනොවිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු. එවංවිහාරිඤ්චාවුසො, භික්ඛුං චක්ඛුතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති, නෙව ලභති මාරො ඔතාරං, න ලභති මාරො ආරම්මණං…පෙ… ජිව්හාතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති…පෙ… මනතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති, නෙව ලභති මාරො ඔතාරං, න ලභති මාරො ආරම්මණං. “आणि आवुसो, मनुष्य क्लेशांच्या पावसाने ओला न झालेला कसा होतो? आवुसो, येथे एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपाचा द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती (कायानुस्मृती) प्रस्थापित करून, अमर्याद मनाने राहतो. आणि ज्या चित्तविमुक्ती व प्रज्ञाविमुक्तीमध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो यथार्थपणे जाणतो... तसेच... जिभेने रसाची चव घेऊन... मनाद्वारे धम्माला (विचाराला) जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धम्माचा द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित करून, अमर्याद मनाने राहतो. आणि ज्या चित्तविमुक्ती व प्रज्ञाविमुक्तीमध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चित्तविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो यथार्थपणे जाणतो. आवुसो, अशा भिक्खूला डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपांमध्ये क्लेशांच्या पावसाने ओला न झालेला... मनाद्वारे जाणता येणाऱ्या धम्मांमध्ये क्लेशांच्या पावसाने ओला न झालेला भिक्खू असे म्हणतात. आवुसो, अशा प्रकारे राहणाऱ्या भिक्खूजवळ जर मार डोळ्यांच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची कोणतीही संधी मिळत नाही, माराला आधार मिळत नाही... जिभेच्या मार्गाने... मनाच्या मार्गाने आला, तर माराला प्रवेश करण्याची कोणतीही संधी मिळत नाही, माराला आधार मिळत नाही.” ‘‘සෙය්යථාපි, ආවුසො, කූටාගාරං වා සාලා වා බහලමත්තිකා අද්දාවලෙපනා. පුරත්ථිමාය චෙපි නං දිසාය පුරිසො ආදිත්තාය තිණුක්කාය උපසඞ්කමෙය්ය, නෙව ලභෙථ අග්ගි ඔතාරං, න ලභෙථ අග්ගි ආරම්මණං…පෙ… පච්ඡිමාය චෙපි නං… උත්තරාය චෙපි නං… දක්ඛිණාය චෙපි නං… හෙට්ඨිමතො චෙපි නං… උපරිමතො චෙපි නං… යතො කුතොචි චෙපි නං පුරිසො ආදිත්තාය තිණුක්කාය උපසඞ්කමෙය්ය, නෙව ලභෙථ අග්ගි ඔතාරං, න ලභෙථ අග්ගි ආරම්මණං. එවමෙව ඛො, ආවුසො, එවංවිහාරිං භික්ඛුං චක්ඛුතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති, නෙව ලභති මාරො ඔතාරං, න ලභති මාරො ආරම්මණං…පෙ… මනතො චෙපි නං මාරො උපසඞ්කමති, නෙව ලභති මාරො ඔතාරං, න ලභති මාරො ආරම්මණං. එවංවිහාරී චාවුසො, භික්ඛු රූපෙ අධිභොසි, න රූපා භික්ඛුං අධිභංසු; සද්දෙ භික්ඛු අධිභොසි, න සද්දා භික්ඛුං අධිභංසු; ගන්ධෙ භික්ඛු අධිභොසි, න ගන්ධා භික්ඛුං අධිභංසු; රසෙ භික්ඛු අධිභොසි, න රසා භික්ඛුං අධිභංසු; ඵොට්ඨබ්බෙ භික්ඛු අධිභොසි, න ඵොට්ඨබ්බා භික්ඛුං අධිභංසු; ධම්මෙ භික්ඛු අධිභොසි, න ධම්මා භික්ඛුං අධිභංසු. අයං වුච්චතාවුසො, භික්ඛු රූපාධිභූ, සද්දාධිභූ, ගන්ධාධිභූ, රසාධිභූ, ඵොට්ඨබ්බාධිභූ, ධම්මාධිභූ, අධිභූ, අනධිභූතො, අධිභොසි තෙ පාපකෙ අකුසලෙ ධම්මෙ සංකිලෙසිකෙ පොනොබ්භවිකෙ සදරෙ දුක්ඛවිපාකෙ ආයතිං ජාතිජරාමරණියෙ. එවං ඛො, ආවුසො, අනවස්සුතො හොතී’’ති. “मित्रांनो, समजा एखादे शिखरयुक्त घर किंवा सभागृह असेल, जे जाड मातीने बनवलेले आणि ओल्या गाराने लिंपलेले असेल. जर एखादा माणूस पेटती गवताची मशाल घेऊन पूर्व दिशेकडून त्याजवळ आला, तर अग्नीला त्यात प्रवेश करण्याची संधी मिळणार नाही, अग्नीला त्यात आधार मिळणार नाही... तसेच पश्चिम दिशेकडून... उत्तर दिशेकडून... दक्षिण दिशेकडून... खालून... वरून... किंवा कोणत्याही बाजूने जर एखादा माणूस पेटती गवताची मशाल घेऊन त्याजवळ आला, तर अग्नीला त्यात प्रवेश करण्याची संधी मिळणार नाही, अग्नीला त्यात आधार मिळणार नाही. त्याचप्रमाणे, मित्रांनो, अशा प्रकारे विहार करणाऱ्या भिक्खूजवळ जर मार डोळ्याच्या माध्यमातून आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळणार नाही, माराला आधार मिळणार नाही... तसेच मनाच्या माध्यमातून जर मार आला, तर माराला प्रवेश करण्याची संधी मिळणार नाही, माराला आधार मिळणार नाही. मित्रांनो, अशा प्रकारे विहार करणारा भिक्खू रूपांवर विजय मिळवतो, रूपे भिक्खूला पराभूत करत नाहीत; तो शब्दांवर विजय मिळवतो, शब्द भिक्खूला पराभूत करत नाहीत; तो गंधांवर विजय मिळवतो, गंध भिक्खूला पराभूत करत नाहीत; तो रसांवर विजय मिळवतो, रस भिक्खूला पराभूत करत नाहीत; तो स्पर्शांवर विजय मिळवतो, स्पर्श भिक्खूला पराभूत करत नाहीत; तो धम्मांवर विजय मिळवतो, धम्म भिक्खूला पराभूत करत नाहीत. मित्रांनो, अशा भिक्खूला 'रूपांवर विजय मिळवणारा', 'शब्दांवर विजय मिळवणारा', 'गंधांवर विजय मिळवणारा', 'रसांवर विजय मिळवणारा', 'स्पर्शांवर विजय मिळवणारा', 'धम्मांवर विजय मिळवणारा' असे म्हटले जाते; तो सर्वांवर विजय मिळवणारा आहे, कोणाकडूनही पराभूत न होणारा आहे. त्याने त्या क्लेशकारक, पुनर्जन्म देणाऱ्या, संतापजनक, दुःखद विपाक देणाऱ्या आणि भविष्यात जन्म, जरा व मरणाकडे नेणाऱ्या पापी अकुशल धम्मांवर विजय मिळवला आहे. मित्रांनो, अशा प्रकारे भिक्खू हा अनास्रव (क्लेशांनी ओला न होणारा) होतो.” අථ [Pg.393] ඛො භගවා වුට්ඨහිත්වා ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං ආමන්තෙසි – ‘‘සාධු සාධු, මොග්ගල්ලාන! සාධු ඛො ත්වං, මොග්ගල්ලාන, භික්ඛූනං අවස්සුතපරියායඤ්ච අනවස්සුතපරියායඤ්ච අභාසී’’ති. त्यानंतर भगवान (आपल्या आसनावरून) उठले आणि त्यांनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना संबोधित केले— “साधू, साधू, मोग्गल्लान! मोग्गल्लान, तू भिक्खूंना आस्रवयुक्त स्थिती आणि अनास्रव स्थिती खूप चांगल्या प्रकारे सांगितलीस.” ඉදමවොච ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො. සමනුඤ්ඤො සත්ථා අහොසි. අත්තමනා තෙ භික්ඛූ ආයස්මතො මහාමොග්ගල්ලානස්ස භාසිතං අභිනන්දුන්ති. ඡට්ඨං. आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले. शास्त्यांनी (बुद्धांनी) याला संमती दिली. ते भिक्खू आनंदी झाले आणि त्यांनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांच्या भाषणाचे मनापासून स्वागत केले. सहावे सूत्र समाप्त. 7. දුක්ඛධම්මසුත්තං ७. दुक्खधम्म सुत्त (दुःखकारक धम्मांचे सूत्र) 244. යතො ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සබ්බෙසංයෙව දුක්ඛධම්මානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච යථාභූතං පජානාති. තථා ඛො පනස්ස කාමා දිට්ඨා හොන්ති, යථාස්ස කාමෙ පස්සතො, යො කාමෙසු කාමච්ඡන්දො කාමස්නෙහො කාමමුච්ඡා කාමපරිළාහො, සො නානුසෙති. තථා ඛො පනස්ස චාරො ච විහාරො ච අනුබුද්ධො හොති, යථා චරන්තං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා නානුසෙන්ති. २४४. “भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खू सर्व दुःखकारक धम्मांचा उदय आणि अस्त यथार्थपणे जाणतो, तेव्हा त्याने कामभोगांना अशा प्रकारे पाहिलेले असते की, कामभोगांकडे पाहताना त्याच्यामध्ये कामभोगांविषयी जो कामच्छंद, कामस्नेह, काममुच्छा आणि कामपरिळाह असतो, तो सुप्त राहत नाही. तसेच, त्याचे आचरण आणि विहार अशा प्रकारे योग्य रीतीने समजलेले असते की, तसे आचरण व विहार करणाऱ्या भिक्खूमध्ये अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धम्म सुप्त राहत नाहीत.” ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සබ්බෙසංයෙව දුක්ඛධම්මානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච යථාභූතං පජානාති? ‘ඉති රූපං, ඉති රූපස්ස සමුදයො, ඉති රූපස්ස අත්ථඞ්ගමො; ඉති වෙදනා… ඉති සඤ්ඤා… ඉති සඞ්ඛාරා… ඉති විඤ්ඤාණං, ඉති විඤ්ඤාණස්ස සමුදයො, ඉති විඤ්ඤාණස්ස අත්ථඞ්ගමො’ති – එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සබ්බෙසංයෙව දුක්ඛධම්මානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච යථාභූතං පජානාති. “आणि भिक्खूंनो, भिक्खू सर्व दुःखकारक धम्मांचा उदय आणि अस्त यथार्थपणे कसा जाणतो? 'असे रूप आहे, असा रूपाचा उदय आहे, असा रूपाचा अस्त आहे; अशी वेदना आहे... अशी संज्ञा आहे... असे संस्कार आहेत... असे विज्ञान आहे, असा विज्ञानाचा उदय आहे, असा विज्ञानाचा अस्त आहे'— अशा प्रकारे, भिक्खूंनो, भिक्खू सर्व दुःखकारक धम्मांचा उदय आणि अस्त यथार्थपणे जाणतो.” ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො කාමා දිට්ඨා හොන්ති? යථාස්ස කාමෙ පස්සතො, යො කාමෙසු කාමච්ඡන්දො කාමස්නෙහො කාමමුච්ඡා කාමපරිළාහො, සො නානුසෙති. සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, අඞ්ගාරකාසු සාධිකපොරිසා පුණ්ණා අඞ්ගාරානං වීතච්චිකානං වීතධූමානං. අථ පුරිසො ආගච්ඡෙය්ය ජීවිතුකාමො අමරිතුකාමො සුඛකාමො දුක්ඛපටිකූලො. තමෙනං ද්වෙ බලවන්තො පුරිසා නානාබාහාසු ගහෙත්වා, තං අඞ්ගාරකාසුං උපකඩ්ඪෙය්යුං. සො ඉතිචීතිචෙව කායං සන්නාමෙය්ය. තං කිස්ස හෙතු? ඤාත ඤ්හි, භික්ඛවෙ, තස්ස පුරිසස්ස ඉමං චාහං අඞ්ගාරකාසුං පපතිස්සාමි, තතොනිදානං මරණං වා නිගච්ඡිස්සාමි මරණමත්තං වා දුක්ඛන්ති. එවමෙව ඛො[Pg.394], භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො අඞ්ගාරකාසූපමා කාමා දිට්ඨා හොන්ති, යථාස්ස කාමෙ පස්සතො, යො කාමෙසු කාමච්ඡන්දො කාමස්නෙහො කාමමුච්ඡා කාමපරිළාහො, සො නානුසෙති. “आणि भिक्खूंनो, भिक्खूने कामभोगांना कशा प्रकारे पाहिलेले असते? जेणेकरून कामभोगांकडे पाहताना त्याच्यामध्ये कामभोगांविषयी जो कामच्छंद, कामस्नेह, काममुच्छा आणि कामपरिळाह असतो, तो सुप्त राहत नाही. भिक्खूंनो, समजा माणसाच्या उंचीपेक्षा खोल अशी कोळशांची खाण असेल, जी ज्वाला नसलेल्या आणि धूर नसलेल्या धगधगत्या कोळशांनी पूर्ण भरलेली असेल. तेव्हा एखादा माणूस तिथे येईल, ज्याला जगण्याची इच्छा आहे, मरण्याची इच्छा नाही, जो सुखाची आकांक्षा बाळगतो आणि दुःखाचा तिरस्कार करतो. मग दोन बलवान पुरुष त्याला दोन्ही हातांना धरून त्या कोळशाच्या खाणीकडे ओढू लागतील. तो माणूस इकडे-तिकडे आपले शरीर मागे खेचण्याचा प्रयत्न करेल. त्याचे कारण काय? भिक्खूंनो, कारण त्या माणसाला ठाऊक असते की, 'जर मी या कोळशाच्या खाणीत पडलो, तर त्यामुळे माझा मृत्यू होईल किंवा मृत्यूतुल्य तीव्र दुःख मला सहन करावे लागेल.' त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खूने कामभोगांना कोळशाच्या खाणीसारखे पाहिलेले असते, तेव्हा कामभोगांकडे पाहताना त्याच्यामध्ये कामभोगांविषयी जो कामच्छंद, कामस्नेह, काममुच्छा आणि कामपरिळाह असतो, तो सुप्त राहत नाही.” ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො චාරො ච විහාරො ච අනුබුද්ධො හොති, යථා චරන්තං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා නානුස්සවන්ති ? සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, පුරිසො බහුකණ්ටකං දායං පවිසෙය්ය. තස්ස පුරතොපි කණ්ටකො, පච්ඡතොපි කණ්ටකො, උත්තරතොපි කණ්ටකො, දක්ඛිණතොපි කණ්ටකො, හෙට්ඨතොපි කණ්ටකො, උපරිතොපි කණ්ටකො. සො සතොව අභික්කමෙය්ය, සතොව පටික්කමෙය්ය – ‘මා මං කණ්ටකො’ති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, යං ලොකෙ පියරූපං සාතරූපං, අයං වුච්චති අරියස්ස විනයෙ කණ්ටකො’’ති. ඉති විදිත්වා සංවරො ච අසංවරො ච වෙදිතබ්බො. “आणि भिक्खूंनो, भिक्खूचे आचरण आणि विहार कशा प्रकारे योग्य रीतीने समजलेले असते, जेणेकरून तसे आचरण व विहार करणाऱ्या भिक्खूमध्ये अभिज्झा आणि दोमनस्स हे पापी अकुशल धम्म पाझरत नाहीत? भिक्खूंनो, समजा एखादा माणूस अनेक काटे असलेल्या जंगलात प्रवेश करेल. त्याच्या समोरही काटा असेल, मागेही काटा असेल, डावीकडेही काटा असेल, उजवीकडेही काटा असेल, खालीही काटा असेल आणि वरही काटा असेल. तो अत्यंत सजग राहूनच पुढे पाऊल टाकेल आणि सजग राहूनच मागे पाऊल घेईल— 'मला काटा टोचू नये' या विचाराने. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, या जगात जे काही प्रिय वाटणारे आणि सुखद वाटणारे आहे, त्याला अरियांच्या विनयामध्ये 'काटा' म्हटले जाते. हे अशा प्रकारे जाणून संवर आणि असंवर समजून घेतले पाहिजे.” ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, අසංවරො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා පියරූපෙ රූපෙ අධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ රූපෙ බ්යාපජ්ජති, අනුපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති පරිත්තචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං නප්පජානාති, යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති…පෙ… ජිව්හාය රසං සායිත්වා…පෙ… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය පියරූපෙ ධම්මෙ අධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ ධම්මෙ බ්යාපජ්ජති, අනුපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති පරිත්තචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං නප්පජානාති යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, අසංවරො හොති. “आणि भिक्खूंनो, असंवर कसा होतो? भिक्खूंनो, या शासनात एखादा भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपावर द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित न करता, संकुचित चित्ताने विहार करतो. आणि ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धम्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि प्रज्ञाविमुत्ती तो यथार्थपणे जाणत नाही... जिभेने रसाची चव घेऊन... मनाद्वारे धम्म जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर आसक्त होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित न करता, संकुचित चित्ताने विहार करतो. आणि ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी अकुशल धम्म पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि प्रज्ञाविमुत्ती तो यथार्थपणे जाणत नाही. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे असंवर होतो.” ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, සංවරො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා පියරූපෙ රූපෙ නාධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ රූපෙ න බ්යාපජ්ජති, උපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති අප්පමාණචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං පජානාති, යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති…පෙ… ජිව්හා රසං සායිත්වා…පෙ… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය පියරූපෙ ධම්මෙ නාධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ ධම්මෙ න බ්යාපජ්ජති, උපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති අප්පමාණචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං පජානාති, යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා [Pg.395] අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, සංවරො හොති. भिक्खूहो, संवर (इंद्रिय-संयम) कसा होतो? येथे, भिक्खूहो, भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयी जागृत राहून (कायगतासती प्रस्थापित करून) आणि अमर्याद चित्ताने विहार करतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि पञ्ञाविमुत्ती तो यथार्थपणे जाणतो... तसेच... जिभेने रसाची चव घेऊन... तसेच... मनाने धम्माला (विचाराला) जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धम्मावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयी जागृत राहून आणि अमर्याद चित्ताने विहार करतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि पञ्ञाविमुत्ती तो यथार्थपणे जाणतो. भिक्खूहो, अशा प्रकारे संवर होतो. ‘‘තස්ස චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො එවං චරතො එවං විහරතො කදාචි කරහචි සතිසම්මොසා උප්පජ්ජන්ති, පාපකා අකුසලා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා, දන්ධො, භික්ඛවෙ, සතුප්පාදො. අථ ඛො නං ඛිප්පමෙව පජහති විනොදෙති බ්යන්තීකරොති අනභාවං ගමෙති. भिक्खूहो, अशा प्रकारे आचरण करणाऱ्या आणि अशा प्रकारे विहार करणाऱ्या त्या भिक्खूच्या मनात कधीतरी स्मृतीच्या विस्मरणामुळे जर संयोजनाला (बंधनाला) कारणीभूत असणारे पापी, अकुशल विचार आणि संकल्प उत्पन्न झाले, तर भिक्खूहो, स्मृतीचा उदय जरी मंद असला, तरी तो त्यांना त्वरित सोडून देतो, दूर करतो, नष्ट करतो आणि पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवतो. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, පුරිසො දිවසංසන්තත්තෙ අයොකටාහෙ ද්වෙ වා තීණි වා උදකඵුසිතානි නිපාතෙය්ය. දන්ධො, භික්ඛවෙ, උදකඵුසිතානං නිපාතො, අථ ඛො නං ඛිප්පමෙව පරික්ඛයං පරියාදානං ගච්ඡෙය්ය. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, තස්ස චෙ භික්ඛුනො එවං චරතො, එවං විහරතො කදාචි කරහචි සතිසම්මොසා උප්පජ්ජන්ති පාපකා අකුසලා සරසඞ්කප්පා සංයොජනියා, දන්ධො, භික්ඛවෙ, සතුප්පාදො. අථ ඛො නං ඛිප්පමෙව පජහති විනොදෙති බ්යන්තීකරොති අනභාවං ගමෙති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො චාරො ච විහාරො ච අනුබුද්ධො හොති; යථා චරන්තං විහරන්තං අභිජ්ඣාදොමනස්සා පාපකා අකුසලා ධම්මා නානුස්සවන්ති. තඤ්චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුං එවං චරන්තං එවං විහරන්තං රාජානො වා රාජමහාමත්තා වා මිත්තා වා අමච්චා වා ඤාතී වා සාලොහිතා වා, භොගෙහි අභිහට්ඨුං පවාරෙය්යුං – ‘එහි, භො පුරිස, කිං තෙ ඉමෙ කාසාවා අනුදහන්ති, කිං මුණ්ඩො කපාලමනුචරසි, එහි හීනායාවත්තිත්වා භොගෙ ච භුඤ්ජස්සු, පුඤ්ඤානි ච කරොහී’ති. සො වත, භික්ඛවෙ, භික්ඛු එවං චරන්තො එවං විහරන්තො සික්ඛං පච්චක්ඛාය හීනායාවත්තිස්සතීති නෙතං ඨානං විජ්ජති. भिक्खूहो, जसे एखाद्या माणसाने दिवसभर तापलेल्या लोखंडाच्या कढईवर पाण्याचे दोन किंवा तीन थेंब टाकले, तर भिक्खूहो, पाण्याचे थेंब पडणे जरी मंद असले, तरी ते त्वरित नष्ट आणि लुप्त होऊन जातील. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, अशा प्रकारे आचरण करणाऱ्या आणि अशा प्रकारे विहार करणाऱ्या त्या भिक्खूच्या मनात कधीतरी स्मृतीच्या विस्मरणामुळे जर संयोजनाला कारणीभूत असणारे पापी, अकुशल विचार आणि संकल्प उत्पन्न झाले, तर भिक्खूहो, स्मृतीचा उदय जरी मंद असला, तरी तो त्यांना त्वरित सोडून देतो, दूर करतो, नष्ट करतो आणि पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्थितीला पोहोचवतो. भिक्खूहो, अशा प्रकारे भिक्खूचे आचरण आणि विहार सुविदित (अनुकूल) असतो; अशा प्रकारे आचरण आणि विहार करणाऱ्या भिक्खूच्या मागे अभिज्झा (लोभ) आणि दोमनस्स (दौर्मनस्य/खिन्नता) हे पापी, अकुशल धर्म लागत नाहीत. भिक्खूहो, अशा प्रकारे आचरण आणि विहार करणाऱ्या त्या भिक्खूला जर राजे, राजमहामात्र (राजमंत्री), मित्र, अमात्य, नातेवाईक किंवा सगेसोयरे यांनी संपत्तीचे प्रलोभन दाखवून आमंत्रित केले की—'या, गृहस्थ! ही काषाय वस्त्रे तुम्हाला का त्रास देत आहेत? डोके मुंडवून हातात भिक्षापात्र घेऊन का फिरत आहात? या, गृहस्थधर्मात (हीन जीवनात) परत या, संपत्तीचा उपभोग घ्या आणि पुण्यकर्मे करा.' तर भिक्खूहो, तो भिक्खू अशा प्रकारे आचरण आणि विहार करत असताना, शिक्षेचा (शील-नियमांचा) त्याग करून गृहस्थधर्मात परत जाईल, हे अशक्य आहे (अशी कोणतीही शक्यता नाही). ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, ගඞ්ගා නදී පාචීනනින්නා පාචීනපොණා පාචීනපබ්භාරා. අථ මහාජනකායො ආගච්ඡෙය්ය කුද්දාල-පිටකං ආදාය – ‘මයං ඉමං ගඞ්ගං නදිං පච්ඡානින්නං කරිස්සාම පච්ඡාපොණං පච්ඡාපබ්භාර’න්ති. තං කිං මඤ්ඤථ, භික්ඛවෙ, අපි නු ඛො සො මහාජනකායො ගඞ්ගං නදිං පච්ඡානින්නං කරෙය්ය පච්ඡාපොණං පච්ඡාපබ්භාර’’න්ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘තං කිස්ස හෙතු’’? ‘‘ගඞ්ගා, භන්තෙ, නදී පාචීනනින්නා පාචීනපොණා පාචීනපබ්භාරා; සා න සුකරා පච්ඡානින්නා කාතුං පච්ඡාපොණා පච්ඡාපබ්භාරා. යාවදෙව ච පන සො මහාජනකායො කිලමථස්ස විඝාතස්ස භාගී අස්සා’’ති. ‘‘එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, තඤ්චෙ භික්ඛුං එවං චරන්තං එවං විහරන්තං රාජානො වා රාජමහාමත්තා [Pg.396] වා මිත්තා වා අමච්චා වා ඤාතී වා සාලොහිතා වා භොගෙහි අභිහට්ඨුං පවාරෙය්යුං – ‘එහි, භො පුරිස, කිං තෙ ඉමෙ කාසාවා අනුදහන්ති, කිං මුණ්ඩො කපාලමනුචරසි, එහි හීනායාවත්තිත්වා භොගෙ ච භුඤ්ජස්සු, පුඤ්ඤානි ච කරොහී’ති. සො වත, භික්ඛවෙ, භික්ඛු එවං චරන්තො එවං විහරන්තො සික්ඛං පච්චක්ඛාය හීනායාවත්තිස්සතීති නෙතං ඨානං විජ්ජති. තං කිස්ස හෙතු? යඤ්හි තං, භික්ඛවෙ, චිත්තං දීඝරත්තං විවෙකනින්නං විවෙකපොණං විවෙකපබ්භාරං, තථා හීනායාවත්තිස්සතීති නෙතං ඨානං විජ්ජතී’’ති. සත්තමං. भिक्खूहो, जसे गंगा नदी पूर्वेकडे वाहणारी, पूर्वेकडे झुकलेली आणि पूर्वेकडे उतार असणारी आहे. तेव्हा जर लोकांचा मोठा समूह कुदळ आणि टोपली घेऊन आला आणि म्हणाला—'आम्ही या गंगा नदीला पश्चिमेकडे वाहणारी, पश्चिमेकडे झुकलेली आणि पश्चिमेकडे उतार असणारी करू.' भिक्खूहो, तुम्हाला काय वाटते? तो लोकांचा मोठा समूह गंगा नदीला पश्चिमेकडे वाहणारी, पश्चिमेकडे झुकलेली आणि पश्चिमेकडे उतार असणारी करू शकेल का? 'नाही, भन्ते.' 'ते कशामुळे?' 'भन्ते, गंगा नदी पूर्वेकडे वाहणारी, पूर्वेकडे झुकलेली आणि पूर्वेकडे उतार असणारी आहे; तिला पश्चिमेकडे वाहणारी, पश्चिमेकडे झुकलेली आणि पश्चिमेकडे उतार असणारी करणे सोपे नाही. तो लोकांचा समूह केवळ थकवा आणि त्रासाचाच धनी होईल.' तसेच, भिक्खूहो, अशा प्रकारे आचरण आणि विहार करणाऱ्या त्या भिक्खूला जर राजे, राजमहामात्र, मित्र, अमात्य, नातेवाईक किंवा सगेसोयरे यांनी संपत्तीचे प्रलोभन दाखवून आमंत्रित केले की—'या, गृहस्थ! ही काषाय वस्त्रे तुम्हाला का त्रास देत आहेत? डोके मुंडवून हातात भिक्षापात्र घेऊन का फिरत आहात? या, गृहस्थधर्मात परत या, संपत्तीचा उपभोग घ्या आणि पुण्यकर्मे करा.' तर भिक्खूहो, तो भिक्खू अशा प्रकारे आचरण आणि विहार करत असताना, शिक्षेचा त्याग करून गृहस्थधर्मात परत जाईल, हे अशक्य आहे. ते कशामुळे? कारण, भिक्खूहो, ज्याचे चित्त दीर्घकाळापासून विवेकाकडे (एकांतात/प्रविवेक) झुकलेले, विवेकाकडे वळलेले आणि विवेकाकडे उतार असणारे झाले आहे, ते पुन्हा गृहस्थधर्मात परत जाईल, हे अशक्य आहे. 8. කිංසුකොපමසුත්තං ८. किंसुकोपम सुत्त 245. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙනඤ්ඤතරො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘කිත්තාවතා නු ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’’ති? ‘‘යතො ඛො, ආවුසො, භික්ඛු ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච යථාභූතං පජානාති, එත්තාවතා ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’’ති. २४५. त्यानंतर एक भिक्खू दुसऱ्या एका भिक्खूपाशी गेला; आणि जवळ जाऊन त्या भिक्खूला म्हणाला—'आवुसो, किती मर्यादेपर्यंत भिक्खूचे दर्शन (ज्ञानदृष्टी) सुविशुद्ध होते?' 'आवुसो, जेव्हा भिक्खू सहा स्पर्शायतनांचा (इंद्रिय-संस्पर्शाच्या स्थानांचा) उदय आणि अस्त यथार्थपणे जाणतो, आवुसो, एवढ्या मर्यादेने भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.' අථ ඛො සො භික්ඛු අසන්තුට්ඨො තස්ස භික්ඛුස්ස පඤ්හවෙය්යාකරණෙන, යෙනඤ්ඤතරො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘කිත්තාවතා නු ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’’ති? ‘‘යතො ඛො, ආවුසො, භික්ඛු පඤ්චන්නං උපාදානක්ඛන්ධානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච යථාභූතං පජානාති, එත්තාවතා ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’’ති. त्यानंतर तो भिक्खू त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट राहून, दुसऱ्या एका भिक्खूपाशी गेला; आणि जवळ जाऊन त्या भिक्खूला म्हणाला—'आवुसो, किती मर्यादेपर्यंत भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते?' 'आवुसो, जेव्हा भिक्खू पाच उपादानस्कंधांचा उदय आणि अस्त यथार्थपणे जाणतो, आवुसो, एवढ्या मर्यादेने भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.' අථ ඛො සො භික්ඛු අසන්තුට්ඨො තස්ස භික්ඛුස්ස පඤ්හවෙය්යාකරණෙන, යෙනඤ්ඤතරො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘කිත්තාවතා නු ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’’ති? ‘‘යතො ඛො, ආවුසො, භික්ඛු චතුන්නං මහාභූතානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච යථාභූතං පජානාති, එත්තාවතා ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’’ති. त्यानंतर तो भिक्खू त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट राहून, दुसऱ्या एका भिक्खूपाशी गेला; आणि जवळ जाऊन त्या भिक्खूला म्हणाला—'आवुसो, किती मर्यादेपर्यंत भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते?' 'आवुसो, जेव्हा भिक्खू चार महाभूतांचा उदय आणि अस्त यथार्थपणे जाणतो, आवुसो, एवढ्या मर्यादेने भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.' අථ ඛො සො භික්ඛු අසන්තුට්ඨො තස්ස භික්ඛුස්ස පඤ්හවෙය්යාකරණෙන, යෙනඤ්ඤතරො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං එතදවොච – ‘‘කිත්තාවතා [Pg.397] නු ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’’ති? ‘‘යතො ඛො, ආවුසො, භික්ඛු යං කිඤ්චි සමුදයධම්මං, සබ්බං තං නිරොධධම්මන්ති යථාභූතං පජානාති, එත්තාවතා, ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’’ති. त्यानंतर तो भिक्खू त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट राहून, दुसऱ्या एका भिक्खूपाशी गेला; आणि जवळ जाऊन त्या भिक्खूला म्हणाला—'आवुसो, किती मर्यादेपर्यंत भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते?' 'आवुसो, जेव्हा भिक्खू हे यथार्थपणे जाणतो की—जे काही उदय पावणारे (उत्पत्तीचे स्वभाव असणारे) आहे, ते सर्व निरोध पावणारे (नष्ट होण्याच्या स्वभावाचे) आहे, आवुसो, एवढ्या मर्यादेने भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.' අථ ඛො සො භික්ඛු අසන්තුට්ඨො තස්ස භික්ඛුස්ස පඤ්හවෙය්යාකරණෙන, යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධාහං, භන්තෙ, යෙනඤ්ඤතරො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමිං; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං එතදවොචං – කිත්තාවතා නු ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’ති? එවං වුත්තෙ, භන්තෙ, සො භික්ඛු මං එතදවොච – ‘යතො ඛො, ආවුසො, භික්ඛු ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච යථාභූතං පජානාති, එත්තාවතා ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’ති. අථ ඛ්වාහං, භන්තෙ, අසන්තුට්ඨො තස්ස භික්ඛුස්ස පඤ්හවෙය්යාකරණෙන, යෙනඤ්ඤතරො භික්ඛු තෙනුපසඞ්කමිං; උපසඞ්කමිත්වා තං භික්ඛුං එතදවොචං – ‘කිත්තාවතා නු ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’ති? එවං වුත්තෙ, භන්තෙ, සො භික්ඛු මං එතදවොච – ‘යතො ඛො, ආවුසො, භික්ඛු පඤ්චන්නං උපාදානක්ඛන්ධානං…පෙ… චතුන්නං මහාභූතානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච යථාභූතං පජානාති…පෙ… යං කිඤ්චි සමුදයධම්මං, සබ්බං තං නිරොධධම්මන්ති යථාභූතං පජානාති, එත්තාවතා ඛො, ආවුසො, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’ති. අථ ඛ්වාහං, භන්තෙ, අසන්තුට්ඨො තස්ස භික්ඛුස්ස පඤ්හවෙය්යාකරණෙන යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිං ( ). කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, භික්ඛුනො දස්සනං සුවිසුද්ධං හොතී’’ති? तेव्हा तो भिक्खू त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन जेथे भगवान होते तेथे गेला; आणि भगवंतांजवळ जाऊन भगवंतांना असे म्हणाला – “भंते, मी येथे एका दुसऱ्या भिक्खूपाशी गेलो; आणि त्या भिक्खूपाशी जाऊन त्याला असे विचारले – ‘आवुसो, भिक्खूचे दर्शन किती प्रमाणात सुविशुद्ध होते?’ असे विचारल्यावर, भंते, तो भिक्खू मला म्हणाला – ‘आवुसो, जेव्हा भिक्खू सहा स्पर्शायतनांचा उदय आणि अस्त यथाभूत जाणतो, तेव्हा, आवुसो, भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.’ त्यावर, भंते, मी त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन दुसऱ्या एका भिक्खूपाशी गेलो; आणि त्या भिक्खूपाशी जाऊन त्याला असे विचारले – ‘आवुसो, भिक्खूचे दर्शन किती प्रमाणात सुविशुद्ध होते?’ असे विचारल्यावर, भंते, तो भिक्खू मला म्हणाला – ‘आवुसो, जेव्हा भिक्खू पाच उपादानस्कंधांचा...पे... चार महाभूतांचा उदय आणि अस्त यथाभूत जाणतो...पे... जे काही उदय पावणारे आहे, ते सर्व निरोध पावणारे आहे, असे यथाभूत जाणतो, तेव्हा, आवुसो, भिक्खूचे दर्शन सुविशुद्ध होते.’ त्यावर, भंते, मी त्या भिक्खूच्या प्रश्नाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन जेथे भगवान होते तेथे आलो. भंते, भिक्खूचे दर्शन किती प्रमाणात सुविशुद्ध होते?” ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛු, පුරිසස්ස කිංසුකො අදිට්ඨපුබ්බො අස්ස. සො යෙනඤ්ඤතරො පුරිසො කිංසුකස්ස දස්සාවී තෙනුපසඞ්කමෙය්ය. උපසඞ්කමිත්වා තං පුරිසං එවං වදෙය්ය – ‘කීදිසො, භො පුරිස, කිංසුකො’ති? සො එවං වදෙය්ය – ‘කාළකො ඛො, අම්භො පුරිස, කිංසුකො – සෙය්යථාපි ඣාමඛාණූ’ති. තෙන ඛො පන, භික්ඛු, සමයෙන තාදිසොවස්ස කිංසුකො යථාපි තස්ස පුරිසස්ස දස්සනං. අථ ඛො, සො භික්ඛු, පුරිසො අසන්තුට්ඨො තස්ස පුරිසස්ස පඤ්හවෙය්යාකරණෙන, යෙනඤ්ඤතරො පුරිසො කිංසුකස්ස දස්සාවී තෙනුපසඞ්කමෙය්ය; උපසඞ්කමිත්වා තං පුරිසං එවං වදෙය්ය – ‘කීදිසො[Pg.398], භො පුරිස, කිංසුකො’ති? සො එවං වදෙය්ය – ‘ලොහිතකො ඛො, අම්භො පුරිස, කිංසුකො – සෙය්යථාපි මංසපෙසී’ති. තෙන ඛො පන, භික්ඛු, සමයෙන තාදිසොවස්ස කිංසුකො යථාපි තස්ස පුරිසස්ස දස්සනං. අථ ඛො සො භික්ඛු පුරිසො අසන්තුට්ඨො තස්ස පුරිසස්ස පඤ්හවෙය්යාකරණෙන, යෙනඤ්ඤතරො පුරිසො කිංසුකස්ස දස්සාවී තෙනුපසඞ්කමෙය්ය; උපසඞ්කමිත්වා තං පුරිසං එවං වදෙය්ය – ‘කීදිසො, භො පුරිස, කිංසුකො’ති? සො එවං වදෙය්ය – ‘ඔචීරකජාතො ඛො, අම්භො පුරිස, කිංසුකො ආදින්නසිපාටිකො – සෙය්යථාපි සිරීසො’ති. තෙන ඛො පන, භික්ඛු, සමයෙන තාදිසොවස්ස කිංසුකො, යථාපි තස්ස පුරිසස්ස දස්සනං. අථ ඛො සො භික්ඛු පුරිසො අසන්තුට්ඨො තස්ස පුරිසස්ස පඤ්හවෙය්යාකරණෙන, යෙනඤ්ඤතරො පුරිසො කිංසුකස්ස දස්සාවී තෙනුපසඞ්කමෙය්ය; උපසඞ්කමිත්වා තං පුරිසං එවං වදෙය්ය – ‘කීදිසො, භො පුරිස, කිංසුකො’ති? සො එවං වදෙය්ය – ‘බහලපත්තපලාසො සන්දච්ඡායො ඛො, අම්භො පුරිස, කිංසුකො – සෙය්යථාපි නිග්රොධො’ති. තෙන ඛො පන, භික්ඛු, සමයෙන තාදිසොවස්ස කිංසුකො, යථාපි තස්ස පුරිසස්ස දස්සනං. එවමෙව ඛො, භික්ඛු, යථා යථා අධිමුත්තානං තෙසං සප්පුරිසානං දස්සනං සුවිසුද්ධං හොති, තථා තථා ඛො තෙහි සප්පුරිසෙහි බ්යාකතං. “हे भिक्खू, समजा एखाद्या माणसाने पूर्वी कधीही किंशुक (पळसाचे) झाड पाहिलेले नसेल. तो अशा एका माणसाकडे गेला ज्याने किंशुक झाड पाहिले आहे. त्याच्याकडे जाऊन तो त्याला असे विचारेल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड कसे असते?’ तो त्याला असे उत्तर देईल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड जळलेल्या खुंटासारखे काळेकुट्ट असते.’ हे भिक्खू, त्या वेळी त्या माणसाच्या दृष्टीने किंशुक झाड अगदी तसेच असेल जसे त्याने पाहिले होते. त्यानंतर, हे भिक्खू, तो माणूस त्या माणसाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन, किंशुक झाड पाहिलेल्या दुसऱ्या एका माणसाकडे गेला. त्याच्याकडे जाऊन तो त्याला असे विचारेल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड कसे असते?’ तो त्याला असे उत्तर देईल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड मांसाच्या तुकड्यासारखे लालभडक असते.’ हे भिक्खू, त्या वेळी त्या माणसाच्या दृष्टीने किंशुक झाड अगदी तसेच असेल जसे त्याने पाहिले होते. त्यानंतर, हे भिक्खू, तो माणूस त्या माणसाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन, किंशुक झाड पाहिलेल्या आणखी एका माणसाकडे गेला. त्याच्याकडे जाऊन तो त्याला असे विचारेल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड कसे असते?’ तो त्याला असे उत्तर देईल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड शिरीषाच्या झाडासारखे लोंबकळणाऱ्या सालीचे आणि लटकणाऱ्या शेंगांचे असते.’ हे भिक्खू, त्या वेळी त्या माणसाच्या दृष्टीने किंशुक झाड अगदी तसेच असेल जसे त्याने पाहिले होते. त्यानंतर, हे भिक्खू, तो माणूस त्या माणसाच्या उत्तराने असंतुष्ट होऊन, किंशुक झाड पाहिलेल्या आणखी एका माणसाकडे गेला. त्याच्याकडे जाऊन तो त्याला असे विचारेल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड कसे असते?’ तो त्याला असे उत्तर देईल – ‘हे गृहस्था, किंशुक झाड वडाच्या झाडासारखे दाट पानांनी आणि फांद्यांनी युक्त असून थंडगार सावली देणारे असते.’ हे भिक्खू, त्या वेळी त्या माणसाच्या दृष्टीने किंशुक झाड अगदी तसेच असेल जसे त्याने पाहिले होते. त्याचप्रमाणे, हे भिक्खू, ज्या ज्या प्रकारे त्या सत्पुरुषांचे दर्शन सुविशुद्ध झाले होते, त्या त्या प्रकारेच त्यांनी उत्तर दिले.” ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛු, රඤ්ඤො පච්චන්තිමං නගරං දළ්හුද්ධාපං දළ්හපාකාරතොරණං ඡද්වාරං. තත්රස්ස දොවාරිකො පණ්ඩිතො බ්යත්තො මෙධාවී, අඤ්ඤාතානං නිවාරෙතා, ඤාතානං පවෙසෙතා. පුරත්ථිමාය දිසාය ආගන්ත්වා සීඝං දූතයුගං තං දොවාරිකං එවං වදෙය්ය – ‘කහං, භො පුරිස, ඉමස්ස නගරස්ස නගරස්සාමී’ති? සො එවං වදෙය්ය – ‘එසො, භන්තෙ, මජ්ඣෙ සිඞ්ඝාටකෙ නිසින්නො’ති. අථ ඛො තං සීඝං දූතයුගං නගරස්සාමිකස්ස යථාභූතං වචනං නිය්යාතෙත්වා යථාගතමග්ගං පටිපජ්ජෙය්ය. පච්ඡිමාය දිසාය ආගන්ත්වා සීඝං දූතයුගං…පෙ… උත්තරාය දිසාය… දක්ඛිණාය දිසාය ආගන්ත්වා සීඝං දූතයුගං තං දොවාරිකං එවං වදෙය්ය – ‘කහං, භො පුරිස, ඉමස්ස නගරස්සාමී’ති? සො එවං වදෙය්ය – ‘එසො, භන්තෙ, මජ්ඣෙ සිඞ්ඝාටකෙ නිසින්නො’ති. අථ ඛො තං සීඝං දූතයුගං නගරස්සාමිකස්ස යථාභූතං වචනං නිය්යාතෙත්වා යථාගතමග්ගං පටිපජ්ජෙය්ය. “हे भिक्खू, समजा एखाद्या राजाचे मजबूत पाया असलेले, मजबूत तटबंदी व वेशी असलेले आणि सहा वेशी (द्वारे) असलेले एखादे सीमावर्ती नगर आहे. तेथे एक चतुर, कुशल आणि बुद्धिमान द्वारपाल आहे, जो अनोळखी लोकांना आत येण्यापासून रोखतो आणि ओळखीच्या लोकांनाच आत प्रवेश देतो. पूर्व दिशेकडून वेगाने येणारे दोन दूत त्या द्वारपालाल असे विचारतील – ‘हे गृहस्था, या नगराचा स्वामी कुठे आहे?’ तो द्वारपाल असे उत्तर देईल – ‘भंते, ते मध्यभागी असलेल्या चौकात बसले आहेत.’ त्यानंतर ते वेगवान दूत नगराच्या स्वामीला जसा आहे तसा संदेश देऊन ज्या मार्गाने आले होते त्याच मार्गाने परत जातील. पश्चिम दिशेकडून वेगाने येणारे दोन दूत...पे... उत्तर दिशेकडून... दक्षिण दिशेकडून वेगाने येणारे दोन दूत त्या द्वारपालाल असे विचारतील – ‘हे गृहस्था, या नगराचा स्वामी कुठे आहे?’ तो द्वारपाल असे उत्तर देईल – ‘भंते, ते मध्यभागी असलेल्या चौकात बसले आहेत.’ त्यानंतर ते वेगवान दूत नगराच्या स्वामीला जसा आहे तसा संदेश देऊन ज्या मार्गाने आले होते त्याच मार्गाने परत जातील।” ‘‘උපමා [Pg.399] ඛො ම්යායං, භික්ඛු, කතා අත්ථස්ස විඤ්ඤාපනාය. අයඤ්චෙත්ථ අත්ථො – ‘නගර’න්ති ඛො, භික්ඛු, ඉමස්සෙතං චාතුමහාභූතිකස්ස කායස්ස අධිවචනං මාතාපෙත්තිකසම්භවස්ස ඔදනකුම්මාසූපචයස්ස අනිච්චුච්ඡාදනපරිමද්දනභෙදනවිද්ධංසනධම්මස්ස. ‘ඡ ද්වාරා’ති ඛො, භික්ඛු, ඡන්නෙතං අජ්ඣත්තිකානං ආයතනානං අධිවචනං. ‘දොවාරිකො’ති ඛො, භික්ඛු, සතියා එතං අධිවචනං. ‘සීඝං දූතයුග’න්ති ඛො, භික්ඛු, සමථවිපස්සනානෙතං අධිවචනං. ‘නගරස්සාමී’ති ඛො, භික්ඛු, විඤ්ඤාණස්සෙතං අධිවචනං. ‘මජ්ඣෙ සිඞ්ඝාටකො’ති ඛො, භික්ඛු, චතුන්නෙතං මහාභූතානං අධිවචනං – පථවීධාතුයා, ආපොධාතුයා, තෙජොධාතුයා, වායොධාතුයා. ‘යථාභූතං වචන’න්ති ඛො, භික්ඛු, නිබ්බානස්සෙතං අධිවචනං. ‘යථාගතමග්ගො’ති ඛො, භික්ඛු, අරියස්සෙතං අට්ඨඞ්ගිකස්ස මග්ගස්ස අධිවචනං, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨියා…පෙ… සම්මාසමාධිස්සා’’ති. අට්ඨමං. “हे भिक्खू, अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी मी ही उपमा दिली आहे. आणि याचा अर्थ असा आहे – ‘नगर’ हे भिक्खू, चार महाभूतांनी बनलेल्या, माता-पित्यांपासून उत्पन्न झालेल्या, भात आणि पेज याने पुष्ट झालेल्या, अनित्य असणाऱ्या, उटणे लावणे, चोळणे, विखुरणे आणि नष्ट होणे हा स्वभाव असणाऱ्या या शरीराचे नाव आहे. ‘सहा द्वारे’ हे भिक्खू, सहा आध्यात्मिक आयतनांचे नाव आहे. ‘द्वारपाल’ हे भिक्खू, सतीचे (स्मृतीचे) नाव आहे. ‘वेगवान दूतांची जोडी’ हे भिक्खू, समथ आणि विपस्सनेचे नाव आहे. ‘नगराचा स्वामी’ हे भिक्खू, विज्ञानाचे नाव आहे. ‘मध्यभागी असलेला चौक’ हे भिक्खू, चार महाभूतांचे नाव आहे – पृथ्वीधातू, आपधातू, तेजोधातू आणि वायोधातू. ‘यथाभूत वचन’ हे भिक्खू, निर्वाणाचे नाव आहे. ‘ज्या मार्गाने ते आले तो मार्ग’ हे भिक्खू, आर्य अष्टांगिक मार्गाचे नाव आहे, म्हणजेच – सम्यक दृष्टी... पे... सम्यक समाधी.” आठवे. 9. වීණොපමසුත්තං ९. वीणोपम सुत्त 246. ‘‘යස්ස කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙසු රූපෙසු උප්පජ්ජෙය්ය ඡන්දො වා රාගො වා දොසො වා මොහො වා පටිඝං වාපි චෙතසො, තතො චිත්තං නිවාරෙය්ය. සභයො චෙසො මග්ගො සප්පටිභයො ච සකණ්ටකො ච සගහනො ච උම්මග්ගො ච කුම්මග්ගො ච දුහිතිකො ච. අසප්පුරිසසෙවිතො චෙසො මග්ගො, න චෙසො මග්ගො සප්පුරිසෙහි සෙවිතො. න ත්වං එතං අරහසීති. තතො චිත්තං නිවාරයෙ චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යෙහි රූපෙහි…පෙ… යස්ස කස්සචි, භික්ඛවෙ, භික්ඛුස්ස වා භික්ඛුනියා වා ජිව්හාවිඤ්ඤෙය්යෙසු රසෙසු…පෙ… මනොවිඤ්ඤෙය්යෙසු ධම්මෙසු උප්පජ්ජෙය්ය ඡන්දො වා රාගො වා දොසො වා මොහො වා පටිඝං වාපි චෙතසො තතො චිත්තං නිවාරෙය්ය. සභයො චෙසො මග්ගො සප්පටිභයො ච සකණ්ටකො ච සගහනො ච උම්මග්ගො ච කුම්මග්ගො ච දුහිතිකො ච. අසප්පුරිසසෙවිතො චෙසො මග්ගො, න චෙසො මග්ගො සප්පුරිසෙහි සෙවිතො. න ත්වං එතං අරහසීති. තතො චිත්තං නිවාරයෙ මනොවිඤ්ඤෙය්යෙහි ධම්මෙහි. २४६. “भिक्खूंनो, जर कोणत्याही भिक्खू किंवा भिक्खुणीच्या मनात डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपांविषयी छंद (इच्छा), राग (आसक्ती), द्वेष, मोह किंवा मनाचा प्रतिघात उत्पन्न झाला, तर त्याने त्यापासून आपले चित्त परावृत्त करावे. ‘हा मार्ग भययुक्त आहे, संकटमय आहे, काट्यांनी भरलेला आहे, झाडी-झुडपांनी वेढलेला आहे, चुकीचा मार्ग आहे, कुमार्ग आहे आणि अत्यंत कष्टदायक आहे. हा असत्पुरुषांनी आचरलेला मार्ग आहे, सत्पुरुषांनी आचरलेला मार्ग नाही. तू या मार्गावर चालण्यास योग्य नाहीस.’ अशा प्रकारे, डोळ्यांनी जाणता येणाऱ्या रूपांपासून चित्त परावृत्त करावे... पे... भिक्खूंनो, जर कोणत्याही भिक्खू किंवा भिक्खुणीच्या मनात जिभेने जाणता येणाऱ्या रसांविषयी... पे... मनाने जाणता येणाऱ्या धर्मांविषयी छंद, राग, द्वेष, मोह किंवा मनाचा प्रतिघात उत्पन्न झाला, तर त्याने त्यापासून आपले चित्त परावृत्त करावे. ‘हा मार्ग भययुक्त आहे, संकटमय आहे, काट्यांनी भरलेला आहे, झाडी-झुडपांनी वेढलेला आहे, चुकीचा मार्ग आहे, कुमार्ग आहे आणि अत्यंत कष्टदायक आहे. हा असत्पुरुषांनी आचरलेला मार्ग आहे, सत्पुरुषांनी आचरलेला मार्ग नाही. तू या मार्गावर चालण्यास योग्य नाहीस.’ अशा प्रकारे, मनाने जाणता येणाऱ्या धर्मांपासून चित्त परावृत्त करावे.” ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, කිට්ඨං සම්පන්නං. කිට්ඨාරක්ඛො ච පමත්තො, ගොණො ච කිට්ඨාදො අදුං කිට්ඨං ඔතරිත්වා යාවදත්ථං මදං ආපජ්ජෙය්ය පමාදං ආපජ්ජෙය්ය[Pg.400]; එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, අස්සුතවා පුථුජ්ජනො ඡසු ඵස්සායතනෙසු අසංවුතකාරී පඤ්චසු කාමගුණෙසු යාවදත්ථං මදං ආපජ්ජති පමාදං ආපජ්ජති. “भिक्खूंनो, समजा जसे एखादे पीक पिकून तयार झाले आहे आणि पिकाचा राखणदार गाफील आहे. पीक खाणारा एखादा बैल त्या पिकात शिरून आपल्या इच्छेनुसार तृप्त होईपर्यंत खाऊन उन्मत्त होईल आणि गाफील होईल; त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, अश्रुतवान पृथग्जन सहा स्पर्शायतनांवर संयम न ठेवता, पाच कामगुणांमध्ये आपल्या इच्छेनुसार आकंठ बुडून उन्मत्त होतो आणि गाफील होतो.” ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, කිට්ඨං සම්පන්නං කිට්ඨාරක්ඛො ච අප්පමත්තො ගොණො ච කිට්ඨාදො අදුං කිට්ඨං ඔතරෙය්ය. තමෙනං කිට්ඨාරක්ඛො නාසායං සුග්ගහිතං ගණ්හෙය්ය. නාසායං සුග්ගහිතං ගහෙත්වා උපරිඝටායං සුනිග්ගහිතං නිග්ගණ්හෙය්ය. උපරිඝටායං සුනිග්ගහිතං නිග්ගහෙත්වා දණ්ඩෙන සුතාළිතං තාළෙය්ය. දණ්ඩෙන සුතාළිතං තාළෙත්වා ඔසජ්ජෙය්ය. දුතියම්පි ඛො, භික්ඛවෙ …පෙ… තතියම්පි ඛො, භික්ඛවෙ, ගොණො කිට්ඨාදො අදුං කිට්ඨං ඔතරෙය්ය. තමෙනං කිට්ඨාරක්ඛො නාසායං සුග්ගහිතං ගණ්හෙය්ය. නාසායං සුග්ගහිතං ගහෙත්වා උපරිඝටායං සුනිග්ගහිතං නිග්ගණ්හෙය්ය. උපරිඝටායං සුනිග්ගහිතං නිග්ගහෙත්වා දණ්ඩෙන සුතාළිතං තාළෙය්ය. දණ්ඩෙන සුතාළිතං තාළෙත්වා ඔසජ්ජෙය්ය. එවඤ්හි සො, භික්ඛවෙ, ගොණො කිට්ඨාදො ගාමගතො වා අරඤ්ඤගතො වා, ඨානබහුලො වා අස්ස නිසජ්ජබහුලො වා න තං කිට්ඨං පුන ඔතරෙය්ය – තමෙව පුරිමං දණ්ඩසම්ඵස්සං සමනුස්සරන්තො. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, යතො ඛො භික්ඛුනො ඡසු ඵස්සායතනෙසු චිත්තං උදුජිතං හොති සුදුජිතං, අජ්ඣත්තමෙව සන්තිට්ඨති, සන්නිසීදති, එකොදි හොති, සමාධියති. “भिक्खूंनो, समजा जसे एखादे पीक पिकून तयार झाले आहे आणि पिकाचा राखणदार जागरूक आहे. पीक खाणारा तो बैल त्या पिकात शिरला, तर पिकाचा राखणदार त्याला नाकातून घट्ट पकडेल. नाकातून घट्ट पकडल्यानंतर, त्याच्या शिंगांच्या मधल्या भागावर घट्ट दाबून त्याला नियंत्रणात आणेल. शिंगांच्या मधल्या भागावर घट्ट दाबून नियंत्रणात आणल्यानंतर, तो त्याला काठीने चांगला चोप देईल. काठीने चांगला चोप दिल्यानंतर तो त्याला सोडून देईल. दुसऱ्यांदाही, भिक्खूंनो... पे... तिसऱ्यांदाही, भिक्खूंनो, पीक खाणारा तो बैल त्या पिकात शिरला, तर पिकाचा राखणदार त्याला नाकातून घट्ट पकडेल. नाकातून घट्ट पकडल्यानंतर, त्याच्या शिंगांच्या मधल्या भागावर घट्ट दाबून त्याला नियंत्रणात आणेल. शिंगांच्या मधल्या भागावर घट्ट दाबून नियंत्रणात आणल्यानंतर, तो त्याला काठीने चांगला चोप देईल. काठीने चांगला चोप दिल्यानंतर तो त्याला सोडून देईल. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे तो पीक खाणारा बैल गावात गेला असो वा जंगलात गेला असो, उभा असो वा बसलेला असो, पूर्वी मिळालेल्या काठीच्या प्रहाराचे स्मरण करून तो पुन्हा त्या पिकात शिरणार नाही. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, जेव्हा भिक्खूचे चित्त सहा स्पर्शायतनांच्या बाबतीत दमन केले जाते, चांगल्या प्रकारे दमन केले जाते, तेव्हा ते केवळ अंतरातच स्थिर होते, शांत होते, एकाग्र होते आणि समाधीत लीन होते.” ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, රඤ්ඤො වා රාජමහාමත්තස්ස වා වීණාය සද්දො අස්සුතපුබ්බො අස්ස. සො වීණාසද්දං සුණෙය්ය. සො එවං වදෙය්ය – ‘අම්භො, කස්ස නු ඛො එසො සද්දො එවංරජනීයො එවංකමනීයො එවංමදනීයො එවංමුච්ඡනීයො එවංබන්ධනීයො’ති? තමෙනං එවං වදෙය්යුං – ‘එසා, ඛො, භන්තෙ, වීණා නාම, යස්සා එසො සද්දො එවංරජනීයො එවංකමනීයො එවංමදනීයො එවංමුච්ඡනීයො එවංබන්ධනීයො’ති. සො එවං වදෙය්ය – ‘ගච්ඡථ මෙ, භො, තං වීණං ආහරථා’ති. තස්ස තං වීණං ආහරෙය්යුං. තමෙනං එවං වදෙය්යුං – ‘අයං ඛො සා, භන්තෙ, වීණා යස්සා එසො සද්දො එවංරජනීයො එවංකමනීයො එවංමදනීයො එවංමුච්ඡනීයො එවංබන්ධනීයො’ති. සො එවං වදෙය්ය – ‘අලං මෙ, භො, තාය වීණාය, තමෙව මෙ සද්දං ආහරථා’ති. තමෙනං එවං වදෙය්යුං – ‘අයං ඛො, භන්තෙ, වීණා නාම අනෙකසම්භාරා මහාසම්භාරා. අනෙකෙහි සම්භාරෙහි සමාරද්ධා වදති[Pg.401], සෙය්යථිදං – දොණිඤ්ච පටිච්ච චම්මඤ්ච පටිච්ච දණ්ඩඤ්ච පටිච්ච උපධාරණෙ ච පටිච්ච තන්තියො ච පටිච්ච කොණඤ්ච පටිච්ච පුරිසස්ස ච තජ්ජං වායාමං පටිච්ච එවායං, භන්තෙ, වීණා නාම අනෙකසම්භාරා මහාසම්භාරා. අනෙකෙහි සම්භාරෙහි සමාරද්ධා වදතී’ති. සො තං වීණං දසධා වා සතධා වා ඵාලෙය්ය, දසධා වා සතධා වා තං ඵාලෙත්වා සකලිකං සකලිකං කරෙය්ය. සකලිකං සකලිකං කරිත්වා අග්ගිනා ඩහෙය්ය, අග්ගිනා ඩහිත්වා මසිං කරෙය්ය. මසිං කරිත්වා මහාවාතෙ වා ඔඵුනෙය්ය, නදියා වා සීඝසොතාය පවාහෙය්ය. සො එවං වදෙය්ය – ‘අසතී කිරායං, භො, වීණා නාම, යථෙවං යං කිඤ්චි වීණා නාම එත්ථ ච පනායං ජනො අතිවෙලං පමත්තො පලළිතො’ති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු රූපං සමන්වෙසති යාවතා රූපස්ස ගති, වෙදනං සමන්වෙසති යාවතා වෙදනාය ගති, සඤ්ඤං සමන්වෙසති යාවතා සඤ්ඤාය ගති, සඞ්ඛාරෙ සමන්වෙසති යාවතා සඞ්ඛාරානං ගති, විඤ්ඤාණං සමන්වෙසති යාවතා විඤ්ඤාණස්ස ගති. තස්ස රූපං සමන්වෙසතො යාවතා රූපස්ස ගති, වෙදනං සමන්වෙසතො…පෙ… සඤ්ඤං… සඞ්ඛාරෙ… විඤ්ඤාණං සමන්වෙසතො යාවතා විඤ්ඤාණස්ස ගති. යම්පිස්ස තං හොති අහන්ති වා මමන්ති වා අස්මීති වා තම්පි තස්ස න හොතී’’ති. නවමං. “भिक्खूंनो, समजा एखाद्या राजाने किंवा राजअमात्याने पूर्वी कधीही विणेचा आवाज ऐकला नसेल. त्याने विणेचा आवाज ऐकला आणि तो म्हणाला, 'अहो माणसा, हा कोणाचा आवाज आहे जो इतका मोहक, इतका सुंदर, इतका मादक, इतका भुरळ पाडणारा आणि इतका बांधून ठेवणारा आहे?' त्यावर लोक त्याला म्हणतील, 'महाराज, ही विणा नावाची वस्तू आहे, जिचा हा आवाज इतका मोहक, इतका सुंदर, इतका मादक, इतका भुरळ पाडणारा आणि इतका बांधून ठेवणारा आहे.' तो राजा म्हणेल, 'जा, माझ्यासाठी ती विणा घेऊन या.' मग ते लोक त्याच्यासाठी ती विणा घेऊन येतील. ते त्याला म्हणतील, 'महाराज, हीच ती विणा आहे, जिचा हा आवाज इतका मोहक, सुंदर, मादक, भुरळ पाडणारा आणि बांधून ठेवणारा आहे.' तो राजा म्हणेल, 'अहो, मला या विणेचे काही काम नाही, मला फक्त तो आवाजच आणून द्या.' त्यावर ते लोक त्याला म्हणतील, 'महाराज, विणा ही अनेक घटकांनी, अनेक भागांनी मिळून बनलेली असते. अनेक घटकांच्या एकत्र येण्याने ती वाजते; जसे की— विणेचे भांडे (खोलगट भाग), चामडे, दांडी, आधार देणारे भाग, तारा, कोन (वाजवण्याची काठी) आणि माणसाचे योग्य प्रयत्न यावर अवलंबून ती वाजते. महाराज, अशा प्रकारे ही विणा अनेक घटकांनी बनलेली असून, अनेक भागांच्या साहाय्याने वाजते.' मग तो राजा त्या विणेचे दहा किंवा शंभर तुकडे करेल. तिचे दहा किंवा शंभर तुकडे करून तिचे बारीक बारीक कपचे करेल. बारीक तुकडे करून तो ते आगीत जाळून टाकेल, आगीत जाळून त्याची राख करेल. राख करून तो ती मोठ्या वाऱ्यात उडवून देईल किंवा वेगवान प्रवाहाच्या नदीत वाहून देईल. मग तो राजा असे म्हणेल, 'अहो, ही विणा नावाची वस्तू खरोखरच निरर्थक आहे, आणि विणा नावाची कोणतीही वस्तू अशीच निरर्थक असते. परंतु, सामान्य लोक मात्र तिच्यामध्ये अत्यंत बेसावध आणि आसक्त होतात.' भिक्खूंनो, याचप्रमाणे भिक्खू रूपाचा शोध घेतो, जिथपर्यंत रूपाची गती आहे; वेदनेचा शोध घेतो, जिथपर्यंत वेदनेची गती आहे; संज्ञेचा शोध घेतो, जिथपर्यंत संज्ञेची गती आहे; संस्कारांचा शोध घेतो, जिथपर्यंत संस्कारांची गती आहे; विज्ञानाचा शोध घेतो, जिथपर्यंत विज्ञानाची गती आहे. जेव्हा तो रूपाचा शोध घेतो जिथपर्यंत रूपाची गती आहे, वेदनेचा शोध घेतो... संज्ञेचा... संस्कारांचा... विज्ञानाचा शोध घेतो जिथपर्यंत विज्ञानाची गती आहे, तेव्हा त्याच्या मनात पूर्वी निर्माण होणारे 'मी', 'माझे' किंवा 'मी आहे' असे जे काही अहंकारयुक्त विचार होते, ते नष्ट होतात.” नववे सूत्र समाप्त. 10. ඡප්පාණකොපමසුත්තං १०. छप्पाणकोपम सुत्त (सहा प्राण्यांच्या उपमेचे सूत्र) 247. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, පුරිසො අරුගත්තො පක්කගත්තො සරවනං පවිසෙය්ය. තස්ස කුසකණ්ටකා චෙව පාදෙ විජ්ඣෙය්යුං, සරපත්තානි ච ගත්තානි විලෙඛෙය්යුං. එවඤ්හි සො, භික්ඛවෙ, පුරිසො භිය්යොසොමත්තාය තතොනිදානං දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදියෙථ. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, ඉධෙකච්චො භික්ඛු ගාමගතො වා අරඤ්ඤගතො වා ලභති වත්තාරං – ‘අයඤ්ච සො ආයස්මා එවංකාරී එවංසමාචාරො අසුචිගාමකණ්ටකො’ති. තං කණ්ටකොති ඉති විදිත්වා සංවරො ච අසංවරො ච වෙදිතබ්බො. २४७. “भिक्खूंनो, समजा एखादा माणूस ज्याच्या अंगावर जखमा झाल्या आहेत आणि त्या पिकल्या आहेत, तो काट्यांच्या जंगलात शिरला. तिथे कुसळांचे काटे त्याच्या पायात रुतले आणि गवताची पाती त्याच्या जखम झालेल्या अंगाला ओरखडू लागली. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे तो माणूस त्या काट्यांमुळे अत्यंत तीव्र दुःख आणि मनस्ताप सहन करेल. भिक्खूंनो, याचप्रमाणे या धम्मात एखादा भिक्खू गावात किंवा जंगलात गेला असता, त्याला असे बोलणारे लोक भेटतात की, 'हा आयुष्यमान अशा प्रकारची कृत्ये करणारा, असे आचरण करणारा, अपवित्र आणि गावाचा काटा आहे.' त्याला 'काटा' असे जाणून, संयम (संवर) आणि असंयम (असंवर) काय आहे हे समजून घेतले पाहिजे.” ‘‘කථඤ්ච[Pg.402], භික්ඛවෙ, අසංවරො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා පියරූපෙ රූපෙ අධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ රූපෙ බ්යාපජ්ජති, අනුපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති පරිත්තචෙතසො. තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං නප්පජානාති, යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. සොතෙන සද්දං සුත්වා… ඝානෙන ගන්ධං ඝායිත්වා… ජිව්හාය රසං සායිත්වා… කායෙන ඵොට්ඨබ්බං ඵුසිත්වා… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය පියරූපෙ ධම්මෙ අධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ ධම්මෙ බ්යාපජ්ජති, අනුපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති පරිත්තචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං නප්පජානාති, යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. “आणि भिक्खूंनो, असंयम (असंवर) कसा असतो? येथे एखादा भिक्खू डोळ्यांनी रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपाकडे आकर्षित होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपाबद्दल द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती (कायगतासती) प्रस्थापित न करता, संकुचित चित्ताने राहतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल विचार पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो जशी आहे तशी (यथाभूत) जाणत नाही. कानाने आवाज ऐकून... नाकाने गंध घेऊन... जिभेने रस चाखून... शरीराने स्पर्श अनुभवून... मनाने विचार जाणून तो प्रिय वाटणाऱ्या विचारांकडे आकर्षित होतो आणि अप्रिय वाटणाऱ्या विचारांबद्दल द्वेष करतो. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित न करता, संकुचित चित्ताने राहतो. ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले पापी, अकुशल विचार पूर्णपणे नष्ट होतात, ती चेतोविमुक्ती आणि प्रज्ञाविमुक्ती तो जशी आहे तशी जाणत नाही.” ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, පුරිසො ඡප්පාණකෙ ගහෙත්වා නානාවිසයෙ නානාගොචරෙ දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. අහිං ගහෙත්වා දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. සුසුමාරං ගහෙත්වා දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. පක්ඛිං ගහෙත්වා දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. කුක්කුරං ගහෙත්වා දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. සිඞ්ගාලං ගහෙත්වා දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. මක්කටං ගහෙත්වා දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධිත්වා මජ්ඣෙ ගණ්ඨිං කරිත්වා ඔස්සජ්ජෙය්ය. අථ ඛො, තෙ, භික්ඛවෙ, ඡප්පාණකා නානාවිසයා නානාගොචරා සකං සකං ගොචරවිසයං ආවිඤ්ඡෙය්යුං – අහි ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘වම්මිකං පවෙක්ඛාමී’ති, සුසුමාරො ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘උදකං පවෙක්ඛාමී’ති, පක්ඛී ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘ආකාසං ඩෙස්සාමී’ති, කුක්කුරො ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘ගාමං පවෙක්ඛාමී’ති, සිඞ්ගාලො ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘සීවථිකං පවෙක්ඛාමී’ති, මක්කටො ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘වනං පවෙක්ඛාමී’ති. යදා ඛො තෙ, භික්ඛවෙ, ඡප්පාණකා ඣත්තා අස්සු කිලන්තා, අථ ඛො යො නෙසං පාණකානං බලවතරො අස්ස තස්ස තෙ අනුවත්තෙය්යුං, අනුවිධායෙය්යුං වසං ගච්ඡෙය්යුං. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, යස්ස කස්සචි භික්ඛුනො කායගතාසති අභාවිතා අබහුලීකතා, තං චක්ඛු ආවිඤ්ඡති මනාපියෙසු රූපෙසු, අමනාපියා රූපා පටිකූලා හොන්ති…පෙ… මනො ආවිඤ්ඡති මනාපියෙසු ධම්මෙසු, අමනාපියා ධම්මා පටිකූලා හොන්ති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, අසංවරො හොති. “भिक्खूंनो, समजा एखाद्या माणसाने वेगवेगळ्या अधिवासातील आणि वेगवेगळ्या खाद्याच्या शोधात असणाऱ्या सहा प्राण्यांना पकडले आणि त्यांना मजबूत दोरीने बांधले. त्याने साप पकडून मजबूत दोरीने बांधला, मगर पकडून मजबूत दोरीने बांधली, पक्षी पकडून मजबूत दोरीने बांधला, कुत्रा पकडून मजबूत दोरीने बांधला, कोल्हा पकडून मजबूत दोरीने बांधला आणि माकड पकडून मजबूत दोरीने बांधले. त्यांना मजबूत दोरीने बांधून, मध्यभागी एक गाठ मारून सोडून दिले. भिक्खूंनो, त्यानंतर ते वेगवेगळ्या अधिवासातील आणि वेगवेगळ्या खाद्याच्या शोधात असणारे सहा प्राणी आपापल्या क्षेत्राकडे खेचू लागतील— साप 'मी वारुळात शिरेन' म्हणून खेचेल, मगर 'मी पाण्यात शिरेन' म्हणून खेचेल, पक्षी 'मी आकाशात उडेन' म्हणून खेचेल, कुत्रा 'मी गावात शिरेन' म्हणून खेचेल, कोल्हा 'मी स्मशानात शिरेन' म्हणून खेचेल आणि माकड 'मी जंगलात शिरेन' म्हणून खेचेल. भिक्खूंनो, जेव्हा ते सहाही प्राणी भुकेले आणि थकलेले असतील, तेव्हा त्यांच्यापैकी जो प्राणी सर्वात बलवान असेल, इतर सर्व प्राणी त्याच्या मागे जातील, त्याचे अनुकरण करतील आणि त्याच्या नियंत्रणाखाली येतील. भिक्खूंनो, याचप्रमाणे ज्या कोणत्याही भिक्खूने शरीराविषयीची स्मृती (कायगतासती) विकसित केलेली नसते आणि तिचा वारंवार सराव केलेला नसतो, त्याला डोळे प्रिय वाटणाऱ्या रूपांकडे खेचतात आणि अप्रिय रूपे त्याला प्रतिकूल वाटतात... तसेच कान, नाक, जीभ, त्वचा आणि मन त्याला प्रिय वाटणाऱ्या विचारांकडे खेचते आणि अप्रिय विचार त्याला प्रतिकूल वाटतात. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे असंयम (असंवर) होतो.” ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, සංවරො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චක්ඛුනා රූපං දිස්වා පියරූපෙ රූපෙ නාධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ රූපෙ න බ්යාපජ්ජති, උපට්ඨිතකායස්සති ච [Pg.403] විහරති අප්පමාණචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං පජානාති, යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති…පෙ… ජිව්හා රසං සායිත්වා…පෙ… මනසා ධම්මං විඤ්ඤාය පියරූපෙ ධම්මෙ නාධිමුච්චති, අප්පියරූපෙ ධම්මෙ න බ්යාපජ්ජති, උපට්ඨිතකායස්සති ච විහරති අප්පමාණචෙතසො, තඤ්ච චෙතොවිමුත්තිං පඤ්ඤාවිමුත්තිං යථාභූතං පජානාති යත්ථස්ස තෙ උප්පන්නා පාපකා අකුසලා ධම්මා අපරිසෙසා නිරුජ්ඣන්ති. भिक्खूंनो, संवर (संयम) कसा होतो? येथे, भिक्खूंनो, भिक्खू डोळ्याने रूप पाहून प्रिय वाटणाऱ्या रूपावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या रूपावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती (कायागतासती) प्रस्थापित करून, अमर्याद चित्ताने विहार करतो. आणि ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले ते पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि प्रज्ञाविमुत्ती तो यथाभूत (जशी आहे तशी) जाणतो... पे... जिभेने रसाची चव घेऊन... पे... मनाने धर्माला (विचाराला) जाणून प्रिय वाटणाऱ्या धर्मावर आसक्त होत नाही आणि अप्रिय वाटणाऱ्या धर्मावर द्वेष करत नाही. तो शरीराविषयीची स्मृती प्रस्थापित करून, अमर्याद चित्ताने विहार करतो. आणि ज्यामध्ये त्याचे उत्पन्न झालेले ते पापी अकुशल धर्म पूर्णपणे निरुद्ध होतात, ती चेतोविमुत्ती आणि प्रज्ञाविमुत्ती तो यथाभूत जाणतो. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, පුරිසො ඡප්පාණකෙ ගහෙත්වා නානාවිසයෙ නානාගොචරෙ දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. අහිං ගහෙත්වා දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. සුසුමාරං ගහෙත්වා දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. පක්ඛිං ගහෙත්වා…පෙ… කුක්කුරං ගහෙත්වා… සිඞ්ගාලං ගහෙත්වා… මක්කටං ගහෙත්වා දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධෙය්ය. දළ්හාය රජ්ජුයා බන්ධිත්වා දළ්හෙ ඛීලෙ වා ථම්භෙ වා උපනිබන්ධෙය්ය. අථ ඛො තෙ, භික්ඛවෙ, ඡප්පාණකා නානාවිසයා නානාගොචරා සකං සකං ගොචරවිසයං ආවිඤ්ඡෙය්යුං – අහි ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘වම්මිකං පවෙක්ඛාමී’ති, සුසුමාරො ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘උදකං පවෙක්ඛාමී’ති, පක්ඛී ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘ආකාසං ඩෙස්සාමී’ති, කුක්කුරො ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘ගාමං පවෙක්ඛාමී’ති, සිඞ්ගාලො ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘සීවථිකං පවෙක්ඛාමී’ති, මක්කටො ආවිඤ්ඡෙය්ය ‘වනං පවෙක්ඛාමී’ති. යදා ඛො තෙ, භික්ඛවෙ, ඡප්පාණකා ඣත්තා අස්සු කිලන්තා, අථ තමෙව ඛීලං වා ථම්භං වා උපතිට්ඨෙය්යුං, උපනිසීදෙය්යුං, උපනිපජ්ජෙය්යුං. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, යස්ස කස්සචි භික්ඛුනො කායගතාසති භාවිතා බහුලීකතා, තං චක්ඛු නාවිඤ්ඡති මනාපියෙසු රූපෙසු, අමනාපියා රූපා නප්පටිකූලා හොන්ති…පෙ… ජිව්හා නාවිඤ්ඡති මනාපියෙසු රසෙසු…පෙ… මනො නාවිඤ්ඡති මනාපියෙසු ධම්මෙසු, අමනාපියා ධම්මා නප්පටිකූලා හොන්ති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, සංවරො හොති. भिक्खूंनो, जसे एखाद्या माणसाने वेगवेगळ्या क्षेत्रांतील आणि वेगवेगळ्या विहारक्षेत्रांतील सहा प्राण्यांना पकडून मजबूत दोरीने बांधावे. त्याने साप पकडून मजबूत दोरीने बांधावा, मगर पकडून मजबूत दोरीने बांधावी, पक्षी पकडून... पे... कुत्रा पकडून... कोल्हा पकडून... माकड पकडून मजबूत दोरीने बांधावे. मजबूत दोरीने बांधून त्यांना एका मजबूत खुंट्याला किंवा खांबाला बांधावे. मग, भिक्खूंनो, ते वेगवेगळ्या क्षेत्रांतील व वेगवेगळ्या विहारक्षेत्रांतील सहा प्राणी आपापल्या विहारक्षेत्राकडे खेचू लागतील – साप 'मी वारुळात शिरेन' असे म्हणून खेचेल, मगर 'मी पाण्यात शिरेन' असे म्हणून खेचेल, पक्षी 'मी आकाशात उडेन' असे म्हणून खेचेल, कुत्रा 'मी गावात शिरेन' असे म्हणून खेचेल, कोल्हा 'मी स्मशानात शिरेन' असे म्हणून खेचेल, माकड 'मी जंगलात शिरेन' असे म्हणून खेचेल. भिक्खूंनो, जेव्हा ते सहा प्राणी भुकेले, तान्हेले आणि थकलेले होतील, तेव्हा ते त्याच खुंट्यापाशी किंवा खांबापाशी उभे राहतील, तिथेच बसतील, तिथेच झोपतील. याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, ज्या कोणत्याही भिक्खूने कायागतासती (शरीराविषयीची स्मृती) विकसित केली आहे, बहुलीकृत (वारंवार सराव) केली आहे, त्याला डोळा प्रिय रूपांकडे खेचत नाही आणि अप्रिय रूपे प्रतिकूल वाटत नाहीत... पे... जीभ प्रिय रसांकडे खेचत नाही... पे... मन प्रिय धर्मांकडे खेचत नाही आणि अप्रिय धर्म प्रतिकूल वाटत नाहीत. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे संवर होतो. ‘‘‘දළ්හෙ ඛීලෙ වා ථම්භෙ වා’ති ඛො, භික්ඛවෙ, කායගතාය සතියා එතං අධිවචනං. තස්මාතිහ වො, භික්ඛවෙ, එවං සික්ඛිතබ්බං – ‘කායගතා නො සති භාවිතා භවිස්සති බහුලීකතා යානීකතා වත්ථුකතා අනුට්ඨිතා පරිචිතා සුසමාරද්ධා’ති. එවඤ්හි ඛො, භික්ඛවෙ, සික්ඛිතබ්බ’’න්ති. දසමං. भिक्खूंनो, 'मजबूत खुंटा किंवा खांब' हे शरीराविषयीच्या स्मृतीचे (कायागतासतीचे) नाव (अधिवचन) आहे. म्हणून, भिक्खूंनो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे – 'आमची कायागतासती विकसित केली जाईल, बहुलीकृत केली जाईल, वाहनासारखी केली जाईल, आधारासारखी केली जाईल, प्रस्थापित केली जाईल, तिचा सराव केला जाईल आणि ती चांगल्या प्रकारे आरंभिली जाईल.' भिक्खूंनो, तुम्ही स्वतःला असेच प्रशिक्षित केले पाहिजे. दहावे (सुत्त समाप्त). 11. යවකලාපිසුත්තං ११. यवकलापि सुत्त (सातूच्या पेंढीचे सुत्त) 248. ‘‘සෙය්යථාපි[Pg.404], භික්ඛවෙ, යවකලාපී චාතුමහාපථෙ නික්ඛිත්තා අස්ස. අථ ඡ පුරිසා ආගච්ඡෙය්යුං බ්යාභඞ්ගිහත්ථා. තෙ යවකලාපිං ඡහි බ්යාභඞ්ගීහි හනෙය්යුං. එවඤ්හි සා, භික්ඛවෙ, යවකලාපී සුහතා අස්ස ඡහි බ්යාභඞ්ගීහි හඤ්ඤමානා. අථ සත්තමො පුරිසො ආගච්ඡෙය්ය බ්යාභඞ්ගිහත්ථො. සො තං යවකලාපිං සත්තමාය බ්යාභඞ්ගියා හනෙය්ය. එවඤ්හි සා භික්ඛවෙ, යවකලාපී සුහතතරා අස්ස, සත්තමාය බ්යාභඞ්ගියා හඤ්ඤමානා. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, අස්සුතවා පුථුජ්ජනො චක්ඛුස්මිං හඤ්ඤති මනාපාමනාපෙහි රූපෙහි…පෙ… ජිව්හාය හඤ්ඤති මනාපාමනාපෙහි රසෙහි…පෙ… මනස්මිං හඤ්ඤති මනාපාමනාපෙහි ධම්මෙහි. සචෙ සො, භික්ඛවෙ, අස්සුතවා පුථුජ්ජනො ආයතිං පුනබ්භවාය චෙතෙති, එවඤ්හි සො, භික්ඛවෙ, මොඝපුරිසො සුහතතරො හොති, සෙය්යථාපි සා යවකලාපී සත්තමාය බ්යාභඞ්ගියා හඤ්ඤමානා. २४८. भिक्खूंनो, जसे चौकामध्ये (चार रस्त्यांच्या संगमावर) सातूची (जवाची) एक पेंढी ठेवली असावी. नंतर हातात बडविण्याचे दांडे (सोटे) घेतलेले सहा पुरुष तिथे यावेत. त्यांनी त्या सातूच्या पेंढीला त्या सहा सोट्यांनी बडवावे. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे ती सातूची पेंढी सहा सोट्यांनी बडवली गेल्यामुळे चांगलीच बडवली जाईल. नंतर हातात सोटा घेतलेला सातवा पुरुष तिथे यावा. त्याने त्या सातूच्या पेंढीला सातव्या सोट्याने बडवावे. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे ती सातूची पेंढी सातव्या सोट्याने बडवली गेल्यामुळे आणखीनच जास्त बडवली जाईल. याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, अश्रुतवान पृथग्जन डोळ्यामध्ये अनुकूल आणि प्रतिकूल रूपांद्वारे बडवला जातो... पे... जिभेमध्ये अनुकूल आणि प्रतिकूल रसांद्वारे बडवला जातो... पे... मनामध्ये अनुकूल आणि प्रतिकूल धर्मांद्वारे बडवला जातो. भिक्खूंनो, जर तो अश्रुतवान पृथग्जन भविष्यात पुन्हा जन्म घेण्यासाठी (पुनर्जन्मासाठी) संकल्प करतो, तर तो मोघपुरुष सातव्या सोट्याने बडवल्या गेलेल्या सातूच्या पेंढीप्रमाणे आणखीनच जास्त बडवला जातो. ‘‘භූතපුබ්බං, භික්ඛවෙ, දෙවාසුරසඞ්ගාමො සමුපබ්යූළ්හො අහොසි. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො අසුරෙ ආමන්තෙසි – ‘සචෙ, මාරිසා, දෙවාසුරසඞ්ගාමෙ සමුපබ්යූළ්හෙ අසුරා ජිනෙය්යුං දෙවා පරාජිනෙය්යුං, යෙන නං සක්කං දෙවානමින්දං කණ්ඨපඤ්චමෙහි බන්ධනෙහි බන්ධිත්වා මම සන්තිකෙ ආනෙය්යාථ අසුරපුර’න්ති. සක්කොපි ඛො, භික්ඛවෙ, දෙවානමින්දො දෙවෙ තාවතිංසෙ ආමන්තෙසි – ‘සචෙ, මාරිසා, දෙවාසුරසඞ්ගාමෙ සමුපබ්යූළ්හෙ දෙවා ජිනෙය්යුං අසුරා පරාජිනෙය්යුං, යෙන නං වෙපචිත්තිං අසුරින්දං කණ්ඨපඤ්චමෙහි බන්ධනෙහි බන්ධිත්වා මම සන්තිකෙ ආනෙය්යාථ සුධම්මං දෙවසභ’න්ති. තස්මිං ඛො පන, භික්ඛවෙ, සඞ්ගාමෙ දෙවා ජිනිංසු, අසුරා පරාජිනිංසු. අථ ඛො, භික්ඛවෙ, දෙවා තාවතිංසා වෙපචිත්තිං අසුරින්දං කණ්ඨපඤ්චමෙහි බන්ධනෙහි බන්ධිත්වා සක්කස්ස දෙවානමින්දස්ස සන්තිකෙ ආනෙසුං සුධම්මං දෙවසභං. තත්ර සුදං, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්ති අසුරින්දො කණ්ඨපඤ්චමෙහි බන්ධනෙහි බද්ධො හොති. යදා ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්තිස්ස අසුරින්දස්ස එවං හොති – ‘ධම්මිකා ඛො දෙවා, අධම්මිකා අසුරා[Pg.405], ඉධෙව දානාහං දෙවපුරං ගච්ඡාමී’ති. අථ කණ්ඨපඤ්චමෙහි බන්ධනෙහි මුත්තං අත්තානං සමනුපස්සති, දිබ්බෙහි ච පඤ්චහි කාමගුණෙහි සමප්පිතො සමඞ්ගීභූතො පරිචාරෙති. යදා ච ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්තිස්ස අසුරින්දස්ස එවං හොති – ‘ධම්මිකා ඛො අසුරා, අධම්මිකා දෙවා, තත්ථෙව දානාහං අසුරපුරං ගමිස්සාමී’ති, අථ කණ්ඨපඤ්චමෙහි බන්ධනෙහි බද්ධං අත්තානං සමනුපස්සති. දිබ්බෙහි ච පඤ්චහි කාමගුණෙහි පරිහායති. එවං සුඛුමං ඛො, භික්ඛවෙ, වෙපචිත්තිබන්ධනං. තතො සුඛුමතරං මාරබන්ධනං. මඤ්ඤමානො ඛො, භික්ඛවෙ, බද්ධො මාරස්ස, අමඤ්ඤමානො මුත්තො පාපිමතො. भिक्खूंनो, पूर्वी देव आणि असूर यांच्यात मोठे युद्ध पेटले होते. तेव्हा, भिक्खूंनो, असुरांचा राजा वेपचित्ती असुरांना म्हणाला – 'मित्रांनो, जर या युद्धात असूर जिंकले आणि देवांचा पराभव झाला, तर देवांचा राजा सक्क (शक्र) याला चार हातपाय आणि मान अशा पाच ठिकाणी बांधून माझ्याकडे असुरपुरात घेऊन या.' भिक्खूंनो, देवांचा राजा सक्क यानेही तावतिंस देवांना सांगितले – 'मित्रांनो, जर या युद्धात देव जिंकले आणि असूर पराभूत झाले, तर असुरांचा राजा वेपचित्ती याला चार हातपाय आणि मान अशा पाच ठिकाणी बांधून माझ्याकडे सुधम्मा देवसभेत घेऊन या.' भिक्खूंनो, त्या युद्धात देव जिंकले आणि असूर पराभूत झाले. तेव्हा, भिक्खूंनो, तावतिंस देवांनी असुरांचा राजा वेपचित्ती याला पाच ठिकाणी बांधून देवांचा राजा सक्क याच्याकडे सुधम्मा देवसभेत आणले. तिथे, भिक्खूंनो, असुरांचा राजा वेपचित्ती पाच ठिकाणी बांधलेला होता. भिक्खूंनो, जेव्हा वेपचित्ती असुराच्या मनात असा विचार आला – 'देवच धार्मिक (न्यायी) आहेत, असूर अधार्मिक आहेत; आता मी याच देवपुरात राहीन,' तेव्हा तो स्वतःला त्या पाच बंधनांतून मुक्त झालेला पाहत असे आणि पाच दिव्य कामगुणांनी युक्त होऊन आनंद उपभोगत असे. पण भिक्खूंनो, जेव्हा वेपचित्ती असुराच्या मनात असा विचार आला – 'असूरच धार्मिक आहेत, देव अधार्मिक आहेत; आता मी माझ्या असुरपुरातच जाईन,' तेव्हा तो स्वतःला त्या पाच बंधनांनी बांधलेला पाहत असे आणि दिव्य पाच कामगुणांपासून वंचित होत असे. भिक्खूंनो, वेपचित्तीचे बंधन इतके सूक्ष्म होते. परंतु, त्याहूनही अधिक सूक्ष्म माराचे बंधन आहे. भिक्खूंनो, जो कल्पना करतो (अहंकार करतो), तो माराच्या बंधनात पडतो; जो कल्पना करत नाही, तो त्या पापी मारापासून मुक्त होतो. ‘‘‘අස්මී’ති, භික්ඛවෙ, මඤ්ඤිතමෙතං, ‘අයමහමස්මී’ති මඤ්ඤිතමෙතං, ‘භවිස්ස’න්ති මඤ්ඤිතමෙතං, ‘න භවිස්ස’න්ති මඤ්ඤිතමෙතං, ‘රූපී භවිස්ස’න්ති මඤ්ඤිතමෙතං, ‘අරූපී භවිස්ස’න්ති මඤ්ඤිතමෙතං, ‘සඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති මඤ්ඤිතමෙතං, ‘අසඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති මඤ්ඤිතමෙතං, ‘නෙවසඤ්ඤීනාසඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති මඤ්ඤිතමෙතං. මඤ්ඤිතං, භික්ඛවෙ, රොගො, මඤ්ඤිතං ගණ්ඩො, මඤ්ඤිතං සල්ලං. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, ‘අමඤ්ඤමානෙන චෙතසා විහරිස්සාමා’ති – එවඤ්හි වො, භික්ඛවෙ, සික්ඛිතබ්බං. “भिक्खूहो, 'मी आहे' ही एक कल्पना (अहंकारयुक्त विचार) आहे; 'मी असा आहे' ही एक कल्पना आहे; 'मी होईन' ही एक कल्पना आहे; 'मी होणार नाही' ही एक कल्पना आहे; 'मी रूपवान (भौतिक रूप असलेला) होईन' ही एक कल्पना आहे; 'मी अरूप (अमूर्त) होईन' ही एक कल्पना आहे; 'मी संज्ञायुक्त (सचेतन) होईन' ही एक कल्पना आहे; 'मी असंज्ञायुक्त (अचेतन) होईन' ही एक कल्पना आहे; 'मी नैवसंज्ञानासंज्ञायुक्त (संज्ञायुक्तही नाही आणि असंज्ञायुक्तही नाही असा) होईन' ही एक कल्पना आहे. भिक्खूहो, कल्पना हा एक रोग आहे, कल्पना हा एक गंड (गळू) आहे, कल्पना हा एक शल्य (बाण) आहे. म्हणून, भिक्खूहो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे: 'आम्ही कल्पनाविरहित चित्ताने विहार करू.' भिक्खूहो, तुम्ही असेच स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे.” ‘‘‘අස්මී’ති, භික්ඛවෙ, ඉඤ්ජිතමෙතං, ‘අයමහමස්මී’ති ඉඤ්ජිතමෙතං, ‘භවිස්ස’න්ති ඉඤ්ජිතමෙතං, ‘න භවිස්ස’න්ති ඉඤ්ජිතමෙතං, ‘රූපී භවිස්ස’න්ති ඉඤ්ජිතමෙතං, ‘අරූපී භවිස්ස’න්ති ඉඤ්ජිතමෙතං, ‘සඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති ඉඤ්ජිතමෙතං, ‘අසඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති ඉඤ්ජිතමෙතං, ‘නෙවසඤ්ඤීනාසඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති ඉඤ්ජිතමෙතං. ඉඤ්ජිතං, භික්ඛවෙ, රොගො, ඉඤ්ජිතං ගණ්ඩො, ඉඤ්ජිතං සල්ලං. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, ‘අනිඤ්ජමානෙන චෙතසා විහරිස්සාමා’ති – එවඤ්හි වො, භික්ඛවෙ, සික්ඛිතබ්බං. “भिक्खूहो, 'मी आहे' हे एक विचलन (कंपन) आहे; 'मी असा आहे' हे एक विचलन आहे; 'मी होईन' हे एक विचलन आहे; 'मी होणार नाही' हे एक विचलन आहे; 'मी रूपवान होईन' हे एक विचलन आहे; 'मी अरूप होईन' हे एक विचलन आहे; 'मी संज्ञायुक्त होईन' हे एक विचलन आहे; 'मी असंज्ञायुक्त होईन' हे एक विचलन आहे; 'मी नैवसंज्ञानासंज्ञायुक्त होईन' हे एक विचलन आहे. भिक्खूहो, विचलन हा एक रोग आहे, विचलन हा एक गंड आहे, विचलन हा एक शल्य आहे. म्हणून, भिक्खूहो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे: 'आम्ही अविचलित चित्ताने विहार करू.' भिक्खूहो, तुम्ही असेच स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे.” ‘‘‘අස්මී’ති, භික්ඛවෙ, ඵන්දිතමෙතං, ‘අයමහමස්මී’ති ඵන්දිතමෙතං, ‘භවිස්ස’න්ති…පෙ… ‘න භවිස්ස’න්ති… ‘රූපී භවිස්ස’න්ති… ‘අරූපී භවිස්ස’න්ති… ‘සඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති… ‘අසඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති… ‘නෙවසඤ්ඤීනාසඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති ඵන්දිතමෙතං. ඵන්දිතං, භික්ඛවෙ, රොගො, ඵන්දිතං ගණ්ඩො, ඵන්දිතං සල්ලං. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, ‘අඵන්දමානෙන චෙතසා විහරිස්සාමා’ති – එවඤ්හි වො, භික්ඛවෙ, සික්ඛිතබ්බං. “भिक्खूहो, 'मी आहे' हे एक स्पंदन (थरथराट) आहे; 'मी असा आहे' हे एक स्पंदन आहे; 'मी होईन'... 'मी होणार नाही'... 'मी रूपवान होईन'... 'मी अरूप होईन'... 'मी संज्ञायुक्त होईन'... 'मी असंज्ञायुक्त होईन'... 'मी नैवसंज्ञानासंज्ञायुक्त होईन' हे एक स्पंदन आहे. भिक्खूहो, स्पंदन हा एक रोग आहे, स्पंदन हा एक गंड आहे, स्पंदन हा एक शल्य आहे. म्हणून, भिक्खूहो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे: 'आम्ही स्पंदनरहित चित्ताने विहार करू.' भिक्खूहो, तुम्ही असेच स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे.” ‘‘‘අස්මී’ති, භික්ඛවෙ, පපඤ්චිතමෙතං, ‘අයමහමස්මී’ති පපඤ්චිතමෙතං, ‘භවිස්ස’න්ති…පෙ… ‘න භවිස්ස’න්ති… ‘රූපී භවිස්ස’න්ති… ‘අරූපී භවිස්ස’න්ති… ‘සඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති… ‘අසඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති… ‘නෙවසඤ්ඤීනාසඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති පපඤ්චිතමෙතං[Pg.406]. පපඤ්චිතං, භික්ඛවෙ, රොගො, පපඤ්චිතං ගණ්ඩො, පපඤ්චිතං සල්ලං. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, ‘නිප්පපඤ්චෙන චෙතසා විහරිස්සාමා’ති – එවඤ්හි වො, භික්ඛවෙ, සික්ඛිතබ්බං. “भिक्खूहो, 'मी आहे' हा एक प्रपंच (मानसिक विस्तार) आहे; 'मी असा आहे' हा एक प्रपंच आहे; 'मी होईन'... 'मी होणार नाही'... 'मी रूपवान होईन'... 'मी अरूप होईन'... 'मी संज्ञायुक्त होईन'... 'मी असंज्ञायुक्त होईन'... 'मी नैवसंज्ञानासंज्ञायुक्त होईन' हा एक प्रपंच आहे. भिक्खूहो, प्रपंच हा एक रोग आहे, प्रपंच हा एक गंड आहे, प्रपंच हा एक शल्य आहे. म्हणून, भिक्खूहो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे: 'आम्ही प्रपंचरहित चित्ताने विहार करू.' भिक्खूहो, तुम्ही असेच स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे.” ‘‘‘අස්මී’ති, භික්ඛවෙ, මානගතමෙතං, ‘අයමහමස්මී’ති මානගතමෙතං, ‘භවිස්ස’න්ති මානගතමෙතං, ‘න භවිස්ස’න්ති මානගතමෙතං, ‘රූපී භවිස්ස’න්ති මානගතමෙතං, ‘අරූපී භවිස්ස’න්ති මානගතමෙතං, ‘සඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති මානගතමෙතං, ‘අසඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති මානගතමෙතං, ‘නෙවසඤ්ඤීනාසඤ්ඤී භවිස්ස’න්ති මානගතමෙතං. මානගතං, භික්ඛවෙ, රොගො, මානගතං ගණ්ඩො, මානගතං සල්ලං. තස්මාතිහ, භික්ඛවෙ, ‘නිහතමානෙන චෙතසා විහරිස්සාමා’ති – එවඤ්හි වො, භික්ඛවෙ, සික්ඛිතබ්බ’’න්ති. එකාදසමං. “भिक्खूहो, 'मी आहे' हा एक मान (अहंकार) आहे; 'मी असा आहे' हा एक मान आहे; 'मी होईन' हा एक मान आहे; 'मी होणार नाही' हा एक मान आहे; 'मी रूपवान होईन' हा एक मान आहे; 'मी अरूप होईन' हा एक मान आहे; 'मी संज्ञायुक्त होईन' हा एक मान आहे; 'मी असंज्ञायुक्त होईन' हा एक मान आहे; 'मी नैवसंज्ञानासंज्ञायुक्त होईन' हा एक मान आहे. भिक्खूहो, मान हा एक रोग आहे, मान हा एक गंड आहे, मान हा एक शल्य आहे. म्हणून, भिक्खूहो, तुम्ही स्वतःला असे प्रशिक्षित केले पाहिजे: 'आम्ही मान नष्ट केलेल्या चित्ताने विहार करू.' भिक्खूहो, तुम्ही असेच स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे.” हे अकरावे (सुत्त) समाप्त. ආසීවිසවග්ගො එකූනවීසතිමො. आसीविसवर्ग एकोणिसावा समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा सारांश (उद्दान) पुढीलप्रमाणे – ආසීවිසො රථො කුම්මො, ද්වෙ දාරුක්ඛන්ධා අවස්සුතො; දුක්ඛධම්මා කිංසුකා වීණා, ඡප්පාණා යවකලාපීති. आसीविस, रथ, कुम्म (कासव), दोन दारुक्खन्ध (लाकडाचे ओंडके), अवस्सुत, दुक्खधम्म, किंसुक, वीणा, छप्पाण आणि यवकलापी. සළායතනවග්ගෙ චතුත්ථපණ්ණාසකො සමත්තො. सळायतनवर्गातील चौथा पण्णासक समाप्त झाला. තස්ස වග්ගුද්දානං – त्याचा वर्ग-सारांश (वग्गुद्दान) पुढीलप्रमाणे – නන්දික්ඛයො සට්ඨිනයො, සමුද්දො උරගෙන ච; චතුපණ්ණාසකා එතෙ, නිපාතෙසු පකාසිතාති. नन्दिक्खय, सट्ठिनय, समुद्र आणि उरग (आसीविस); हे चार पण्णासक निपातांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले आहेत. සළායතනසංයුත්තං සමත්තං. सळायतनसंयुत्त समाप्त झाले. 2. වෙදනාසංයුත්තං २. वेदनासंयुत्त 1. සගාථාවග්ගො १. सगाथावर्ग 1. සමාධිසුත්තං १. समाधिसुत्त 249. ‘‘තිස්සො [Pg.407] ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා. කතමා තිස්සො? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා ඛො, භික්ඛවෙ, තිස්සො වෙදනාති. २४९. “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुखद वेदना. भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत.” ‘‘සමාහිතො සම්පජානො, සතො බුද්ධස්ස සාවකො; වෙදනා ච පජානාති, වෙදනානඤ්ච සම්භවං. “समाहित (एकाग्रचित्त), संप्रजन्ययुक्त (जागरूक) आणि सजग असलेला बुद्धांचा श्रावक वेदनांना जाणतो आणि वेदनांच्या उत्पत्तीलाही जाणतो.” ‘‘යත්ථ චෙතා නිරුජ්ඣන්ති, මග්ගඤ්ච ඛයගාමිනං; වෙදනානං ඛයා භික්ඛු, නිච්ඡාතො පරිනිබ්බුතො’’ති. පඨමං; “ज्या ठिकाणी या वेदना निरुद्ध होतात (नष्ट होतात) ते स्थान आणि त्यांच्या क्षयाकडे नेणारा मार्गही तो जाणतो. वेदनांच्या क्षयामुळे तो भिक्खू तृष्णारहित होऊन पूर्णपणे परिनिर्वाण प्राप्त करतो.” पहिले (सुत्त) समाप्त. 2. සුඛසුත්තං २. सुखसुत्त 250. ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා. කතමා තිස්සො? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා ඛො, භික්ඛවෙ, තිස්සො වෙදනාති. २५०. “भिक्खूहो, या three वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुखद वेदना. भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत.” ‘‘සුඛං වා යදි වා දුක්ඛං, අදුක්ඛමසුඛං සහ; අජ්ඣත්තඤ්ච බහිද්ධා ච, යං කිඤ්චි අත්ථි වෙදිතං. “सुखद असो वा दुःखद असो, किंवा अदुःख-असुखद असो; अध्यात्मिक (अंतर्गत) असो वा बाह्य असो, जे काही अनुभवले जाते,” ‘‘එතං දුක්ඛන්ති ඤත්වාන, මොසධම්මං පලොකිනං; ඵුස්ස ඵුස්ස වයං පස්සං, එවං තත්ථ විරජ්ජතී’’ති. දුතියං; “ते सर्व विनाशी आणि नाशवंत असून 'हे दुःख आहे' असे जाणून, वारंवार स्पर्श करून (अनुभवून) त्यांचा व्यय (नाश) पाहणारा भिक्खू अशा प्रकारे त्या वेदनांविषयी विरक्त होतो.” दुसरे (सुत्त) समाप्त. 3. පහානසුත්තං ३. पहाणसुत्त 251. ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා. කතමා තිස්සො? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. සුඛාය, භික්ඛවෙ, වෙදනාය රාගානුසයො පහාතබ්බො, දුක්ඛාය වෙදනාය පටිඝානුසයො පහාතබ්බො, අදුක්ඛමසුඛාය වෙදනාය අවිජ්ජානුසයො පහාතබ්බො. යතො ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො සුඛාය වෙදනාය රාගානුසයො පහීනො හොති, දුක්ඛාය වෙදනාය පටිඝානුසයො පහීනො හොති, අදුක්ඛමසුඛාය [Pg.408] වෙදනාය අවිජ්ජානුසයො පහීනො හොති, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, ‘භික්ඛු නිරනුසයො සම්මද්දසො අච්ඡෙච්ඡි තණ්හං, විවත්තයි සංයොජනං, සම්මා මානාභිසමයා අන්තමකාසි දුක්ඛස්සා’’’ති. २५१. “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुखद वेदना. भिक्खूहो, सुखद वेदनेतील रागानुशय (आसक्तीची सुप्त प्रवृत्ती) नष्ट केला पाहिजे, दुःखद वेदनेतील प्रतिघानुशय (द्वेषाची सुप्त प्रवृत्ती) नष्ट केला पाहिजे, आणि अदुःख-असुखद वेदनेतील अविद्यानुशय (अज्ञानाची सुप्त प्रवृत्ती) नष्ट केला पाहिजे. भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खूचा सुखद वेदनेतील रागानुशय नष्ट होतो, दुःखद वेदनेतील प्रतिघानुशय नष्ट होतो, आणि अदुःख-असुखद वेदनेतील अविद्यानुशय नष्ट होतो, तेव्हा, भिक्खूहो, त्या भिक्खूला 'अनुशयरहित, सम्यक दृष्टी असलेला, तृष्णा तोडलेला, संयोजने (बंधने) नष्ट केलेला आणि मानाचा सम्यक प्रकारे नाश करून दुःखाचा अंत केलेला भिक्खू' असे म्हटले जाते.” ‘‘සුඛං වෙදයමානස්ස, වෙදනං අප්පජානතො; සො රාගානුසයො හොති, අනිස්සරණදස්සිනො. “सुखाचा अनुभव घेताना, जो वेदनेला यथार्थपणे जाणत नाही आणि तिच्यातून मुक्त होण्याचा मार्ग पाहत नाही, त्याच्यामध्ये रागानुशय निर्माण होतो.” ‘‘දුක්ඛං වෙදයමානස්ස, වෙදනං අප්පජානතො; පටිඝානුසයො හොති, අනිස්සරණදස්සිනො. “दुःखाचा अनुभव घेताना, जो वेदनेला यथार्थपणे जाणत नाही आणि तिच्यातून मुक्त होण्याचा मार्ग पाहत नाही, त्याच्यामध्ये प्रतिघानुशय निर्माण होतो.” ‘‘අදුක්ඛමසුඛං සන්තං, භූරිපඤ්ඤෙන දෙසිතං; තඤ්චාපි අභිනන්දති, නෙව දුක්ඛා පමුච්චති. “विशाल प्रज्ञा असलेल्या बुद्धांनी ज्या अदुःख-असुखद वेदनेला शांत म्हटले आहे, जर कोणी तिचाही आनंद घेत राहिला, तर तो दुःखातून मुक्त होऊ शकत नाही.” ‘‘යතො ච භික්ඛු ආතාපී, සම්පජඤ්ඤං න රිඤ්චති; තතො සො වෙදනා සබ්බා, පරිජානාති පණ්ඩිතො. “परंतु जेव्हा उद्योगी (प्रयत्नशील) भिक्खू संप्रजन्य (जागरूकता) सोडत नाही, तेव्हा तो प्रज्ञावान भिक्खू सर्व वेदनांना पूर्णपणे जाणतो.” ‘‘සො වෙදනා පරිඤ්ඤාය, දිට්ඨෙ ධම්මෙ අනාසවො; කායස්ස භෙදා ධම්මට්ඨො, සඞ්ඛ්යං නොපෙති වෙදගූ’’ති. තතියං; “तो वेदनांना पूर्णपणे जाणून याच जन्मात अनास्रव (आसवरहित) होतो. धर्मात स्थित असलेला तो वेदज्ञ (ज्ञानी) शरीराच्या भेदानंतर (मृत्य्यूनंतर) कोणत्याही संज्ञेला (पुनर्जन्माला) प्राप्त होत नाही.” तिसरे (सुत्त) समाप्त. 4. පාතාලසුත්තං ४. पातालसुत्त 252. ‘‘අස්සුතවා, භික්ඛවෙ, පුථුජ්ජනො යං වාචං භාසති – ‘අත්ථි මහාසමුද්දෙ පාතාලො’ති. තං ඛො පනෙතං, භික්ඛවෙ, අස්සුතවා පුථුජ්ජනො අසන්තං අවිජ්ජමානං එවං වාචං භාසති – ‘අත්ථි මහාසමුද්දෙ පාතාලො’ති. සාරීරිකානං ඛො එතං, භික්ඛවෙ, දුක්ඛානං වෙදනානං අධිවචනං යදිදං ‘පාතාලො’ති. අස්සුතවා, භික්ඛවෙ, පුථුජ්ජනො සාරීරිකාය දුක්ඛාය වෙදනාය ඵුට්ඨො සමානො සොචති කිලමති පරිදෙවති උරත්තාළිං කන්දති සම්මොහං ආපජ්ජති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, ‘අස්සුතවා පුථුජ්ජනො පාතාලෙ න පච්චුට්ඨාසි, ගාධඤ්ච නාජ්ඣගා’. සුතවා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අරියසාවකො සාරීරිකාය දුක්ඛාය වෙදනාය ඵුට්ඨො සමානො නෙව සොචති, න කිලමති, න පරිදෙවති, න උරත්තාළිං කන්දති, න සම්මොහං ආපජ්ජති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, ‘සුතවා අරියසාවකො පාතාලෙ පච්චුට්ඨාසි, ගාධඤ්ච අජ්ඣගා’’’ති. २५२. भिक्खूहो, अश्रुतवान पृथग्जन असे म्हणतो की, 'महासागरात एक अथांग पाताळ आहे.' परंतु, भिक्खूहो, तो अश्रुतवान पृथग्जन जे अस्तित्वात नाही, जे विद्यमान नाही, अशा गोष्टीबद्दल असे म्हणतो की, 'महासागरात अथांग पाताळ आहे.' भिक्खूहो, हे 'पाताळ' शरीरात उत्पन्न होणाऱ्या दुःखद वेदनांचेच नाव आहे. भिक्खूहो, जेव्हा अश्रुतवान पृथग्जन शारीरिक दुःखद वेदनेने पीडित होतो, तेव्हा तो शोक करतो, कष्टी होतो, रडतो, छाती बडवून घेतो आणि संभ्रमात पडतो. भिक्खूहो, यालाच 'अश्रुतवान पृथग्जन जो अथांग पाताळात उभा राहू शकला नाही आणि ज्याला कोणताही आधार सापडला नाही' असे म्हणतात. परंतु, भिक्खूहो, जेव्हा श्रुतवान आर्यश्रावक शारीरिक दुःखद वेदनेने पीडित होतो, तेव्हा तो शोक करत नाही, कष्टी होत नाही, रडत नाही, छाती बडवून घेत नाही आणि संभ्रमात पडत नाही. भिक्खूहो, यालाच 'श्रुतवान आर्यश्रावक जो अथांग पाताळात उभा राहू शकला आणि ज्याला आधार सापडला' असे म्हणतात. ‘‘යො [Pg.409] එතා නාධිවාසෙති, උප්පන්නා වෙදනා දුඛා; සාරීරිකා පාණහරා, යාහි ඵුට්ඨො පවෙධති. जो मनुष्य शरीरात उत्पन्न झालेल्या, प्राणांतिक असणाऱ्या या दुःखद वेदना सहन करू शकत नाही आणि ज्यांच्यामुळे पीडित होऊन तो थरथर कापतो, ‘‘අක්කන්දති පරොදති, දුබ්බලො අප්පථාමකො; න සො පාතාලෙ පච්චුට්ඨාසි, අථො ගාධම්පි නාජ්ඣගා. तो दुर्बल आणि अल्प सामर्थ्य असलेला मनुष्य आक्रोश करतो, रडतो; तो त्या अथांग पाताळात उभा राहू शकत नाही आणि त्याला कोणताही आधारही मिळत नाही. ‘‘යො චෙතා අධිවාසෙති, උප්පන්නා වෙදනා දුඛා; සාරීරිකා පාණහරා, යාහි ඵුට්ඨො න වෙධති; ස වෙ පාතාලෙ පච්චුට්ඨාසි, අථො ගාධම්පි අජ්ඣගා’’ති. චතුත්ථං; परंतु जो मनुष्य शरीरात उत्पन्न झालेल्या, प्राणांतिक असणाऱ्या या दुःखद वेदना सहन करतो आणि ज्यांच्यामुळे पीडित होऊनही तो थरथर कापत नाही; तो खरोखरच त्या अथांग पाताळात उभा राहू शकतो आणि त्याला आधारही मिळतो. (चौथे सूत्र समाप्त) 5. දට්ඨබ්බසුත්තං ५. दट्ठब्ब सुत्त (पाहण्यायोग्य सुत्त) 253. ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා. කතමා තිස්සො? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. සුඛා, භික්ඛවෙ, වෙදනා දුක්ඛතො දට්ඨබ්බා, දුක්ඛා වෙදනා සල්ලතො දට්ඨබ්බා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා අනිච්චතො දට්ඨබ්බා. යතො ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො සුඛා වෙදනා දුක්ඛතො දිට්ඨා හොති, දුක්ඛා වෙදනා සල්ලතො දිට්ඨා හොති, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා අනිච්චතො දිට්ඨා හොති – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, ‘භික්ඛු සම්මද්දසො අච්ඡෙච්ඡි තණ්හං, විවත්තයි සංයොජනං, සම්මා මානාභිසමයා අන්තමකාසි දුක්ඛස්සා’’’ති. २५३. भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या three? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भिक्खूहो, सुखद वेदनेकडे दुःख म्हणून पाहिले पाहिजे, दुःखद वेदनेकडे शल्यासारखे (बाणासारखे) पाहिले पाहिजे आणि अदुःख-असुख वेदनेकडे अनित्य म्हणून पाहिले पाहिजे. भिक्खूहो, जेव्हा भिक्खू सुखद वेदनेला दुःख म्हणून पाहतो, दुःखद वेदनेला शल्यासारखे पाहतो आणि अदुःख-असुख वेदनेला अनित्य म्हणून पाहतो – तेव्हा, भिक्खूहो, त्या भिक्खूला 'सम्यक दृष्टी असलेला, ज्याने तृष्णा नष्ट केली आहे, संयोजनांना (बंधनांना) तोडले आहे आणि मानाचे (अहंकाराचे) सम्यक आकलन करून दुःखाचा अंत केला आहे' असे म्हटले जाते. ‘‘යො සුඛං දුක්ඛතො අද්ද, දුක්ඛමද්දක්ඛි සල්ලතො; අදුක්ඛමසුඛං සන්තං, අද්දක්ඛි නං අනිච්චතො. ज्याने सुखाला दुःख म्हणून पाहिले, दुःखाला शल्यासारखे (बाणासारखे) पाहिले आणि शांत असलेल्या अदुःख-असुख वेदनेला अनित्य म्हणून पाहिले, ‘‘ස වෙ සම්මද්දසො භික්ඛු, පරිජානාති වෙදනා; සො වෙදනා පරිඤ්ඤාය, දිට්ඨෙ ධම්මෙ අනාසවො; කායස්ස භෙදා ධම්මට්ඨො, සඞ්ඛ්යං නොපෙති වෙදගූ’’ති. පඤ්චමං; तो सम्यक दृष्टी असलेला भिक्खू खरोखरच वेदनांना पूर्णपणे जाणतो. वेदनांचे पूर्ण ज्ञान प्राप्त करून तो याच जन्मात आसवमुक्त (अनास्रव) होतो. धर्मात प्रतिष्ठित असलेला आणि वेदपारंगत (परम ज्ञानी) असलेला तो भिक्खू, शरीराच्या विघटनानंतर कोणत्याही संज्ञेला (पुनर्जन्माला) प्राप्त होत नाही. (पाचवे सूत्र समाप्त) 6. සල්ලසුත්තං ६. सल्ल सुत्त (शल्य सुत्त) 254. ‘‘අස්සුතවා, භික්ඛවෙ, පුථුජ්ජනො සුඛම්පි වෙදනං වෙදයති, දුක්ඛම්පි වෙදනං වෙදයති, අදුක්ඛමසුඛම්පි වෙදනං වෙදයති. සුතවා, භික්ඛවෙ, අරියසාවකො සුඛම්පි වෙදනං වෙදයති, දුක්ඛම්පි වෙදනං වෙදයති, අදුක්ඛමසුඛම්පි [Pg.410] වෙදනං වෙදයති. තත්ර, භික්ඛවෙ, කො විසෙසො කො අධිප්පයාසො කිං නානාකරණං සුතවතො අරියසාවකස්ස අස්සුතවතා පුථුජ්ජනෙනා’’ති? භගවංමූලකා නො, භන්තෙ, ධම්මා…පෙ… අස්සුතවා. භික්ඛවෙ, පුථුජ්ජනො දුක්ඛාය වෙදනාය ඵුට්ඨො සමානො සොචති කිලමති පරිදෙවති උරත්තාළිං කන්දති සම්මොහං ආපජ්ජති. සො ද්වෙ වෙදනා වෙදයති – කායිකඤ්ච, චෙතසිකඤ්ච. සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, පුරිසං සල්ලෙන විජ්ඣෙය්ය. තමෙනං දුතියෙන සල්ලෙන අනුවෙධං විජ්ඣෙය්ය. එවඤ්හි සො, භික්ඛවෙ, පුරිසො ද්විසල්ලෙන වෙදනං වෙදයති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, අස්සුතවා පුථුජ්ජනො දුක්ඛාය වෙදනාය ඵුට්ඨො සමානො සොචති කිලමති පරිදෙවති උරත්තාළිං කන්දති සම්මොහං ආපජ්ජති. සො ද්වෙ වෙදනා වෙදයති – කායිකඤ්ච, චෙතසිකඤ්ච. තස්සායෙව ඛො පන දුක්ඛාය වෙදනාය ඵුට්ඨො සමානො පටිඝවා හොති. තමෙනං දුක්ඛාය වෙදනාය පටිඝවන්තං, යො දුක්ඛාය වෙදනාය පටිඝානුසයො, සො අනුසෙති. සො දුක්ඛාය වෙදනාය ඵුට්ඨො සමානො කාමසුඛං අභිනන්දති. තං කිස්ස හෙතු? න හි සො, භික්ඛවෙ, පජානාති අස්සුතවා පුථුජ්ජනො අඤ්ඤත්ර කාමසුඛා දුක්ඛාය වෙදනාය නිස්සරණං, තස්ස කාමසුඛඤ්ච අභිනන්දතො, යො සුඛාය වෙදනාය රාගානුසයො, සො අනුසෙති. සො තාසං වෙදනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං නප්පජානාති. තස්ස තාසං වෙදනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං අප්පජානතො, යො අදුක්ඛමසුඛාය වෙදනාය අවිජ්ජානුසයො, සො අනුසෙති. සො සුඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, සඤ්ඤුත්තො නං වෙදයති. දුක්ඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, සඤ්ඤුත්තො නං වෙදයති. අදුක්ඛමසුඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, සඤ්ඤුත්තො නං වෙදයති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, ‘අස්සුතවා පුථුජ්ජනො සඤ්ඤුත්තො ජාතියා ජරාය මරණෙන සොකෙහි පරිදෙවෙහි දුක්ඛෙහි දොමනස්සෙහි උපායාසෙහි, සඤ්ඤුත්තො දුක්ඛස්මා’ති වදාමි. २५४. भिक्खूहो, अश्रुतवान पृथग्जन सुखद वेदनाही अनुभवतो, दुःखद वेदनाही अनुभवतो आणि अदुःख-असुख वेदनाही अनुभवतो. भिक्खूहो, श्रुतवान आर्यश्रावकही सुखद वेदना अनुभवतो, दुःखद वेदना अनुभवतो आणि अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो. मग, भिक्खूहो, श्रुतवान आर्यश्रावक आणि अश्रुतवान पृथग्जन यांच्यात काय फरक आहे, काय वैशिष्ट्य आहे, काय भिन्नता आहे? भंते, आमचे धर्म भगवंतांवरच आधारित आहेत... (इत्यादी)... भिक्खूहो, जेव्हा अश्रुतवान पृथग्जन दुःखद वेदनेने पीडित होतो, तेव्हा तो शोक करतो, कष्टी होतो, रडतो, छाती बडवून घेतो आणि संभ्रमात पडतो. तो दोन प्रकारच्या वेदना अनुभवतो – शारीरिक आणि मानसिक. भिक्खूहो, हे अगदी तसेच आहे, जसे एखाद्या माणसाला एका बाणाने (शल्याने) विंधावे आणि त्यानंतर लगेचच त्याला दुसऱ्या बाणाने विंधावे; अशा प्रकारे तो माणूस दोन बाणांच्या वेदना अनुभवतो. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, अश्रुतवान पृथग्जन जेव्हा दुःखद वेदनेने पीडित होतो... तो दोन प्रकारच्या वेदना अनुभवतो – शारीरिक आणि मानसिक. त्याच दुःखद वेदनेने पीडित झाल्यावर तो तिच्याबद्दल द्वेष (प्रतिघ) बाळगतो. दुःखद वेदनेबद्दल द्वेष बाळगणाऱ्या त्या पृथग्जनाच्या मनात दुःखद वेदनेविषयीचा द्वेषाचा सुप्त कल (प्रतिघानुशय) जागृत राहतो. दुःखद वेदनेने पीडित झाल्यावर तो कामसुखाची इच्छा करतो. असे का? कारण, भिक्खूहो, त्या अश्रुतवान पृथग्जनाला कामसुखाशिवाय दुःखद वेदनेतून मुक्त होण्याचा दुसरा कोणताही मार्ग माहीत नसतो. जेव्हा तो कामसुखाची इच्छा करतो, तेव्हा सुखद वेदनेविषयीचा त्याचा रागाचा सुप्त कल (रागानुशय) जागृत राहतो. तो या वेदनांची उत्पत्ती, त्यांचा अस्त, त्यांचे आस्वादन, त्यांचे दुष्परिणाम आणि त्यांच्यापासून मिळणारी मुक्ती हे जसे आहे तसे (यथाभूत) जाणत नाही. या वेदनांची उत्पत्ती, अस्त, आस्वादन, दुष्परिणाम आणि मुक्ती यथाभूत न जाणणाऱ्या त्या पृथग्जनाच्या मनात अदुःख-असुख वेदनेविषयीचा अज्ञानाचा सुप्त कल (अविद्यानुशय) जागृत राहतो. तो जर सुखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीने (क्लेशांनी युक्त होऊन) अनुभवतो. जर दुःखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीने अनुभवतो. जर अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीने अनुभवतो. भिक्खूहो, यालाच 'अश्रुतवान पृथग्जन जो जन्म, जरा, मरण, शोक, आक्रोश, दुःख, दौर्मनस्य आणि नैराश्याशी बांधलेला आहे, तो दुःखाशीच बांधलेला आहे' असे मी म्हणतो. ‘‘සුතවා ච ඛො, භික්ඛවෙ, අරියසාවකො දුක්ඛාය වෙදනාය ඵුට්ඨො සමානො න සොචති, න කිලමති, න පරිදෙවති, න උරත්තාළිං කන්දති, න [Pg.411] සම්මොහං ආපජ්ජති. සො එකං වෙදනං වෙදයති – කායිකං, න චෙතසිකං. परंतु, भिक्खूहो, जेव्हा श्रुतवान आर्यश्रावक दुःखद वेदनेने पीडित होतो, तेव्हा तो शोक करत नाही, कष्टी होत नाही, रडत नाही, छाती बडवून घेत नाही आणि संभ्रमात पडत नाही. तो केवळ एकच वेदना अनुभवतो – शारीरिक, मानसिक नाही. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, පුරිසං සල්ලෙන විජ්ඣෙය්ය. තමෙනං දුතියෙන සල්ලෙන අනුවෙධං න විජ්ඣෙය්ය. එවඤ්හි සො, භික්ඛවෙ, පුරිසො එකසල්ලෙන වෙදනං වෙදයති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො දුක්ඛාය වෙදනාය ඵුට්ඨො සමානො න සොචති, න කිලමති, න පරිදෙවති, න උරත්තාළිං කන්දති, න සම්මොහං ආපජ්ජති. සො එකං වෙදනං වෙදයති – කායිකං, න චෙතසිකං. තස්සායෙව ඛො පන දුක්ඛාය වෙදනාය ඵුට්ඨො සමානො පටිඝවා න හොති. තමෙනං දුක්ඛාය වෙදනාය අප්පටිඝවන්තං, යො දුක්ඛාය වෙදනාය පටිඝානුසයො, සො නානුසෙති. සො දුක්ඛාය වෙදනාය ඵුට්ඨො සමානො කාමසුඛං නාභිනන්දති. තං කිස්ස හෙතු? පජානාති හි සො, භික්ඛවෙ, සුතවා අරියසාවකො අඤ්ඤත්ර කාමසුඛා දුක්ඛාය වෙදනාය නිස්සරණං. තස්ස කාමසුඛං නාභිනන්දතො යො සුඛාය වෙදනාය රාගානුසයො, සො නානුසෙති. සො තාසං වෙදනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවං ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං පජානාති. තස්ස තාසං වෙදනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං පජානතො, යො අදුක්ඛමසුඛාය වෙදනාය අවිජ්ජානුසයො, සො නානුසෙති. සො සුඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, විසඤ්ඤුත්තො නං වෙදයති. දුක්ඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, විසඤ්ඤුත්තො නං වෙදයති. අදුක්ඛමසුඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, විසඤ්ඤුත්තො නං වෙදයති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, ‘සුතවා අරියසාවකො විසඤ්ඤුත්තො ජාතියා ජරාය මරණෙන සොකෙහි පරිදෙවෙහි දුක්ඛෙහි දොමනස්සෙහි උපායාසෙහි, විසඤ්ඤුත්තො දුක්ඛස්මා’ති වදාමි. අයං ඛො, භික්ඛවෙ, විසෙසො, අයං අධිප්පයාසො, ඉදං නානාකරණං සුතවතො අරියසාවකස්ස අස්සුතවතා පුථුජ්ජනෙනා’’ති. भिक्षूंनो, समजा एखाद्या माणसाला बाणाने विंधले गेले. परंतु त्याला लगेचच दुसऱ्या बाणाने विंधले गेले नाही, तर तो माणूस केवळ एकाच बाणामुळे होणारी वेदना अनुभवतो. त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो, जेव्हा सुतवान (श्रुतवान) आर्यश्रावक दुःखद वेदनेने स्पर्शित होतो, तेव्हा तो शोक करत नाही, खिन्न होत नाही, रडत-कढत नाही, छाती बडवून घेत आक्रोश करत नाही आणि संमोहित होत नाही. तो केवळ एकाच प्रकारची वेदना अनुभवतो – जी शारीरिक असते, मानसिक नव्हे. त्या दुःखद वेदनेने स्पर्शित झाल्यावरही तो तिच्याबद्दल द्वेष (प्रतिघ) बाळगत नाही. दुःखद वेदनेबद्दल द्वेष न बाळगणाऱ्या त्या सुतवान आर्यश्रावकामध्ये दुःखद वेदनेशी संबंधित असलेला प्रतिघानुशय (द्वेषाची सुप्त प्रवृत्ती) सुप्त राहत नाही. दुःखद वेदनेने स्पर्शित झाल्यावर तो कामसुखाची अभिलाषा धरत नाही. त्याचे कारण काय? कारण, भिक्षूंनो, तो सुतवान आर्यश्रावक कामसुखाव्यतिरिक्त दुःखद वेदनेतून मुक्त होण्याचा मार्ग (निस्सरण) जाणतो. कामसुखाची अभिलाषा न धरणाऱ्या त्या श्रावकामध्ये सुखद वेदनेशी संबंधित असलेला रागानुशय (आसक्तीची सुप्त प्रवृत्ती) सुप्त राहत नाही. तो त्या वेदनांचा उदय (उत्पत्ती), अस्त (लय), आस्वाद (गोडी), आदीनव (दोष) आणि निस्सरण (मुक्ती) यथाभूत (आहे तसे) जाणतो. त्या वेदनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण यथाभूत जाणणाऱ्या त्या श्रावकामध्ये अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदनेशी संबंधित असलेला अविद्यानुशय (अज्ञानाची सुप्त प्रवृत्ती) सुप्त राहत नाही. जर तो सुखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित (विसंयुक्त) होऊन अनुभवतो. जर तो दुःखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित होऊन अनुभवतो. जर तो अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित होऊन अनुभवतो. भिक्षूंनो, अशा सुतवान आर्यश्रावकाला 'जन्म, जरा, मरण, शोक, रडणे-कढणे, दुःख, दौर्मनस्य आणि उपायास यांपासून विसंयुक्त (मुक्त) झालेला' असे म्हटले जाते; तो दुःखापासून विसंयुक्त झाला आहे, असे मी सांगतो. भिक्षूंनो, सुतवान आर्यश्रावक आणि अश्रुतवान पृथग्जनामधील हाच तो विशेष, हाच अभिप्राय आणि हाच भेद आहे. ‘‘න වෙදනං වෙදයති සපඤ්ඤො,සුඛම්පි දුක්ඛම්පි බහුස්සුතොපි; අයඤ්ච ධීරස්ස පුථුජ්ජනෙන,මහා විසෙසො කුසලස්ස හොති. प्रज्ञावान आणि बहुश्रुत पुरुष सुख किंवा दुःख या वेदनांनी (आसक्त होऊन) प्रभावित होत नाही. प्रज्ञावान, कुशल अशा धीर पुरुषाचा आणि सामान्य पृथग्जनाचा हाच मोठा विशेष (फरक) आहे. ‘‘සඞ්ඛාතධම්මස්ස [Pg.412] බහුස්සුතස්ස,විපස්සතො ලොකමිමං පරඤ්ච; ඉට්ඨස්ස ධම්මා න මථෙන්ති චිත්තං,අනිට්ඨතො නො පටිඝාතමෙති. ज्याने धर्माचे आकलन केले आहे, जो बहुश्रुत आहे आणि जो या लोकाला व परलोकाला विपश्यनेने (यथार्थतेने) पाहतो, अशा आर्यश्रावकाचे चित्त इष्ट (अनुकूल) गोष्टींनी विचलित होत नाही आणि अनिष्ट (प्रतिकूल) गोष्टींमुळे तो प्रतिघाला (द्वेषाला) प्राप्त होत नाही. ‘‘තස්සානුරොධා අථවා විරොධා,විධූපිතා අත්ථගතා න සන්ති; පදඤ්ච ඤත්වා විරජං අසොකං,සම්මා පජානාති භවස්ස පාරගූ’’ති. ඡට්ඨං; त्याच्यामधील अनुनय (आसक्ती) आणि विरोध (द्वेष) पूर्णपणे नष्ट झाले आहेत, अस्त पावले आहेत, आता ते अस्तित्वात नाहीत. तो विरज (मळरहित) आणि अशोक (शोकरहित) अशा पदाला (निर्वाणाला) जाणून, भवसागराच्या पलीकडे गेलेला असून, सम्यक प्रकारे प्रज्ञावान बनतो. 7. පඨමගෙලඤ්ඤසුත්තං ७. प्रथम गेलञ्ञ सुत्त (पहिले आजारपण विषयक सूत्र) 255. එකං සමයං භගවා වෙසාලියං විහරති මහාවනෙ කූටාගාරසාලායං. අථ ඛො භගවා සායන්හසමයං පටිසල්ලානා වුට්ඨිතො යෙන ගිලානසාලා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදි. නිසජ්ජ ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – २५५. एकदा भगवान वैशाली येथील महावनातील कूटागारशाळेत विहार करत होते. तेव्हा भगवान संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे रुग्णालय (गिलाणशाळा) होते, तेथे गेले. तेथे गेल्यावर ते तयार केलेल्या आसनावर बसले. बसल्यावर भगवंतांनी भिक्षूंना संबोधित केले – ‘‘සතො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්පජානො කාලං ආගමෙය්ය. අයං වො අම්හාකං අනුසාසනී. भिक्षूंनो, भिक्षूने स्मृतीवान आणि संप्रजन्यवान राहून काळाची वाट पाहावी. हाच आमचा तुम्हासाठी उपदेश आहे. ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සතො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු කායෙ කායානුපස්සී විහරති ආතාපී සම්පජානො සතිමා, විනෙය්ය ලොකෙ අභිජ්ඣාදොමනස්සං; වෙදනාසු වෙදනානුපස්සී විහරති…පෙ… චිත්තෙ චිත්තානුපස්සී විහරති…පෙ… ධම්මෙසු ධම්මානුපස්සී විහරති ආතාපී සම්පජානො සතිමා, විනෙය්ය ලොකෙ අභිජ්ඣාදොමනස්සං. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සතො හොති. आणि भिक्षूंनो, भिक्षू स्मृतीवान कसा होतो? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू शरीरामध्ये शरीराचे सतत अवलोकन करत (कायानुपस्सी), उद्योगी (आतापी), संप्रजन्यवान आणि स्मृतीवान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा (लोभ) आणि दौर्मनस्य (खिन्नता) दूर करून विहार करतो. वेदनांमध्ये वेदनांचे सतत अवलोकन करत (वेदनानुपस्सी) विहार करतो... चित्तामध्ये चित्ताचे सतत अवलोकन करत (चित्तानुपस्सी) विहार करतो... धर्मांमध्ये धर्मांचे सतत अवलोकन करत (धम्मानुपस्सी), उद्योगी, संप्रजन्यवान आणि स्मृतीवान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि दौर्मनस्य दूर करून विहार करतो. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे भिक्षू स्मृतीवान होतो. ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්පජානො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අභික්කන්තෙ පටික්කන්තෙ සම්පජානකාරී හොති, ආලොකිතෙ විලොකිතෙ සම්පජානකාරී හොති, සමිඤ්ජිතෙ පසාරිතෙ සම්පජානකාරී හොති, සඞ්ඝාටිපත්තචීවරධාරණෙ සම්පජානකාරී හොති, අසිතෙ පීතෙ ඛායිතෙ සායිතෙ සම්පජානකාරී හොති, උච්චාරපස්සාවකම්මෙ සම්පජානකාරී හොති, ගතෙ ඨිතෙ නිසින්නෙ සුත්තෙ ජාගරිතෙ භාසිතෙ තුණ්හීභාවෙ [Pg.413] සම්පජානකාරී හොති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්පජානකාරී හොති. සතො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්පජානො කාලං ආගමෙය්ය. අයං වො අම්හාකං අනුසාසනී. आणि भिक्षूंनो, भिक्षू संप्रजन्यवान कसा होतो? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू पुढे जाताना आणि मागे वळताना सजगतेने कृती करतो; समोर पाहताना आणि आजूबाजूला पाहताना सजगतेने कृती करतो; हात-पाय आखडताना आणि पसरताना सजगतेने कृती करतो; संघात, पात्र आणि चीवर धारण करताना सजगतेने कृती करतो; खाताना, पिताना, चावताना आणि चव घेताना सजगतेने कृती करतो; मलमूत्र विसर्जन करताना सजगतेने कृती करतो; चालताना, उभे राहताना, बसताना, झोपताना, जागत असताना, बोलताना आणि मौन बाळगताना सजगतेने कृती करतो. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे भिक्षू संप्रजन्यवान होतो. भिक्षूंनो, भिक्षूने स्मृतीवान आणि संप्रजन्यवान राहून काळाची वाट पाहावी. हाच आमचा तुम्हासाठी उपदेश आहे. ‘‘තස්ස චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො එවං සතස්ස සම්පජානස්ස අප්පමත්තස්ස ආතාපිනො පහිතත්තස්ස විහරතො උප්පජ්ජති සුඛා වෙදනා, සො එවං පජානාති – ‘උප්පන්නා ඛො ම්යායං සුඛා වෙදනා. සා ච ඛො පටිච්ච, නො අප්පටිච්ච. කිං පටිච්ච? ඉමමෙව කායං පටිච්ච. අයං ඛො පන කායො අනිච්චො සඞ්ඛතො පටිච්චසමුප්පන්නො. අනිච්චං ඛො පන සඞ්ඛතං පටිච්චසමුප්පන්නං කායං පටිච්ච උප්පන්නා සුඛා වෙදනා කුතො නිච්චා භවිස්සතී’ති! සො කායෙ ච සුඛාය ච වෙදනාය අනිච්චානුපස්සී විහරති, වයානුපස්සී විහරති, විරාගානුපස්සී විහරති, නිරොධානුපස්සී විහරති, පටිනිස්සග්ගානුපස්සී විහරති. තස්ස කායෙ ච සුඛාය ච වෙදනාය අනිච්චානුපස්සිනො විහරතො, වයානුපස්සිනො විහරතො, විරාගානුපස්සිනො විහරතො, නිරොධානුපස්සිනො විහරතො, පටිනිස්සග්ගානුපස්සිනො විහරතො, යො කායෙ ච සුඛාය ච වෙදනාය රාගානුසයො, සො පහීයති. भिक्षूंनो, अशा प्रकारे स्मृतीवान, संप्रजन्यवान, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करणाऱ्या भिक्षूमध्ये जर सुखद वेदना उत्पन्न झाली, तर तो हे चांगल्या प्रकारे जाणतो – 'माझ्यामध्ये ही सुखद वेदना उत्पन्न झाली आहे. ती कारणावर अवलंबून उत्पन्न झाली आहे, कारणाशिवाय नाही. कशावर अवलंबून? याच शरीरावर अवलंबून. परंतु हे शरीर अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे. मग अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न शरीरावर अवलंबून उत्पन्न झालेली सुखद वेदना नित्य कशी असू शकेल!' तो शरीरात आणि सुखद वेदनेत अनित्याचे सतत अवलोकन करत विहार करतो, व्ययाचे (नाशाचे) सतत अवलोकन करत विहार करतो, विरागाचे (आसक्तीमुक्तीचे) सतत अवलोकन करत विहार करतो, निरोधाचे (लय पावणारे) सतत अवलोकन करत विहार करतो, प्रतिनिसर्गाचे (त्यागाचे) सतत अवलोकन करत विहार करतो. शरीरात आणि सुखद वेदनेत अनित्याचे, व्ययाचे, विरागाचे, निरोधाचे आणि प्रतिनिसर्गाचे सतत अवलोकन करत विहार करणाऱ्या त्या भिक्षूचा, शरीराशी आणि सुखद वेदनेशी संबंधित असलेला जो रागानुशय आहे, तो नष्ट होतो. ‘‘තස්ස චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො එවං සතස්ස සම්පජානස්ස අප්පමත්තස්ස ආතාපිනො පහිතත්තස්ස විහරතො උප්පජ්ජති දුක්ඛා වෙදනා. සො එවං පජානාති – ‘උප්පන්නා ඛො ම්යායං දුක්ඛා වෙදනා. සා ච ඛො පටිච්ච, නො අප්පටිච්ච. කිං පටිච්ච? ඉමමෙව කායං පටිච්ච. අයං ඛො පන කායො අනිච්චො සඞ්ඛතො පටිච්චසමුප්පන්නො. අනිච්චං ඛො පන සඞ්ඛතං පටිච්චසමුප්පන්නං කායං පටිච්ච උප්පන්නා දුක්ඛා වෙදනා කුතො නිච්චා භවිස්සතී’ති! සො කායෙ ච දුක්ඛාය වෙදනාය අනිච්චානුපස්සී විහරති, වයානුපස්සී විහරති, විරාගානුපස්සී විහරති, නිරොධානුපස්සී විහරති, පටිනිස්සග්ගානුපස්සී විහරති. තස්ස කායෙ ච දුක්ඛාය ච වෙදනාය අනිච්චානුපස්සිනො විහරතො…පෙ… පටිනිස්සග්ගානුපස්සිනො විහරතො, යො කායෙ ච දුක්ඛාය ච වෙදනාය පටිඝානුසයො, සො පහීයති. भिक्षूंनो, जर अशा प्रकारे स्मृतिमान, संप्रजन्ययुक्त, अप्रमादी, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरणाऱ्या भिक्षूला दुःखद वेदना उत्पन्न झाली, तर तो हे अशा प्रकारे जाणतो – 'मला ही दुःखद वेदना उत्पन्न झाली आहे. ती अवलंबून उत्पन्न झाली आहे, कारणाशिवाय नाही. कशावर अवलंबून? याच शरीरावर अवलंबून. पण हे शरीर तर अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे. मग अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न शरीरावर अवलंबून उत्पन्न झालेली दुःखद वेदना नित्य कशी असू शकेल?' तो शरीरामध्ये आणि दुःखद वेदनेमध्ये अनित्यानुपश्यी होऊन विहरतो, वयानुपश्यी होऊन विहरतो, विरागानुपश्यी होऊन विहरतो, निरोधानुपश्यी होऊन विहरतो, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरतो. शरीरामध्ये आणि दुःखद वेदनेमध्ये अनित्यानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या... पे... प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या त्या भिक्षूचा शरीराविषयी आणि दुःखद वेदनेविषयी जो प्रतिघानुशय असतो, तो नष्ट होतो. ‘‘තස්ස චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො එවං සතස්ස සම්පජානස්ස අප්පමත්තස්ස ආතාපිනො පහිතත්තස්ස විහරතො උප්පජ්ජති අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා, සො එවං පජානාති – ‘උප්පන්නා ඛො ම්යායං අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. සා ච ඛො පටිච්ච, නො අප්පටිච්ච. කිං පටිච්ච? ඉමමෙව කායං පටිච්ච. අයං ඛො පන කායො අනිච්චො සඞ්ඛතො පටිච්චසමුප්පන්නො. අනිච්චං ඛො පන සඞ්ඛතං පටිච්චසමුප්පන්නං කායං [Pg.414] පටිච්ච උප්පන්නා අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා කුතො නිච්චා භවිස්සතී’ති! සො කායෙ ච අදුක්ඛමසුඛාය ච වෙදනාය අනිච්චානුපස්සී විහරති, වයානුපස්සී විහරති, විරාගානුපස්සී විහරති, නිරොධානුපස්සී විහරති, පටිනිස්සග්ගානුපස්සී විහරති. තස්ස කායෙ ච අදුක්ඛමසුඛාය ච වෙදනාය අනිච්චානුපස්සිනො විහරතො…පෙ… පටිනිස්සග්ගානුපස්සිනො විහරතො, යො කායෙ ච අදුක්ඛමසුඛාය ච වෙදනාය අවිජ්ජානුසයො, සො පහීයති. भिक्षूंनो, जर अशा प्रकारे स्मृतिमान, संप्रजन्ययुक्त, अप्रमादी, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरणाऱ्या भिक्षूला अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न झाली, तर तो हे अशा प्रकारे जाणतो – 'मला ही अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न झाली आहे. ती अवलंबून उत्पन्न झाली आहे, कारणाशिवाय नाही. कशावर अवलंबून? याच शरीरावर अवलंबून. पण हे शरीर तर अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे. मग अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न शरीरावर अवलंबून उत्पन्न झालेली अदुःख-असुख वेदना नित्य कशी असू शकेल?' तो शरीरामध्ये आणि अदुःख-असुख वेदनेमध्ये अनित्यानुपश्यी होऊन विहरतो, वयानुपश्यी होऊन विहरतो, विरागानुपश्यी होऊन विहरतो, निरोधानुपश्यी होऊन विहरतो, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरतो. शरीरामध्ये आणि अदुःख-असुख वेदनेमध्ये अनित्यानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या... पे... प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या त्या भिक्षूचा शरीराविषयी आणि अदुःख-असुख वेदनेविषयी जो अविद्यानुशय असतो, तो नष्ट होतो. ‘‘සො සුඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, සා අනිච්චාති පජානාති, අනජ්ඣොසිතාති පජානාති, අනභිනන්දිතාති පජානාති; දුක්ඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, සා අනිච්චාති පජානාති, අනජ්ඣොසිතාති පජානාති, අනභිනන්දිතාති පජානාති; අදුක්ඛමසුඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, සා අනිච්චාති පජානාති, අනජ්ඣොසිතාති පජානාති, අනභිනන්දිතාති පජානාති. සො සුඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, විසඤ්ඤුත්තො නං වෙදයති; දුක්ඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, විසඤ්ඤුත්තො නං වෙදයති; අදුක්ඛමසුඛඤ්චෙ වෙදනං වෙදයති, විසඤ්ඤුත්තො නං වෙදයති. සො කායපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයමානො ‘කායපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයාමී’ති පජානාති, ජීවිතපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයමානො ‘ජීවිතපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයාමී’ති පජානාති. ‘කායස්ස භෙදා උද්ධං ජීවිතපරියාදානා ඉධෙව සබ්බවෙදයිතානි අනභිනන්දිතානි සීතීභවිස්සන්තී’ති පජානාති. तो जर सुखद वेदना अनुभवतो, तेव्हा 'ती अनित्य आहे' असे जाणतो, 'ती आसक्ती निर्माण करणारी नाही' असे जाणतो, 'ती अभिनंदनीय नाही' असे जाणतो. जर तो दुःखद वेदना अनुभवतो, तेव्हा 'ती अनित्य आहे' असे जाणतो, 'ती आसक्ती निर्माण करणारी नाही' असे जाणतो, 'ती अभिनंदनीय नाही' असे जाणतो. जर तो अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, तेव्हा 'ती अनित्य आहे' असे जाणतो, 'ती आसक्ती निर्माण करणारी नाही' असे जाणतो, 'ती अभिनंदनीय नाही' असे जाणतो. जर तो सुखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित होऊन अनुभवतो. जर तो दुःखद वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित होऊन अनुभवतो. जर तो अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, तर ती आसक्तीरहित होऊन अनुभवतो. शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवताना तो 'मी शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे' असे जाणतो. जीवनाच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवताना तो 'मी जीवनाच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे' असे जाणतो. 'शरीर नष्ट झाल्यानंतर आणि जीवन संपल्यानंतर, याच जन्मात सर्व अनुभवलेल्या वेदना अभिनंदित न होता शांत होतील' असे तो जाणतो. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, තෙලඤ්ච පටිච්ච වට්ටිඤ්ච පටිච්ච තෙලප්පදීපො ඣායෙය්ය, තස්සෙව තෙලස්ස ච වට්ටියා ච පරියාදානා අනාහාරො නිබ්බායෙය්ය; එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු කායපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයමානො ‘කායපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයාමී’ති පජානාති. ජීවිතපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයමානො ‘ජීවිතපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයාමී’ති පජානාති. ‘කායස්ස භෙදා උද්ධං ජීවිතපරියාදානා ඉධෙව සබ්බවෙදයිතානි අනභිනන්දිතානි සීතීභවිස්සන්තී’ති පජානාතී’’ති. සත්තමං. भिक्षूंनो, ज्याप्रमाणे तेल आणि वात यांवर अवलंबून तेलाचा दिवा जळतो, आणि तेल व वात संपल्यामुळे इंधन न मिळाल्याने तो विझून जातो; त्याचप्रमाणे, भिक्षूंनो, भिक्षू शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवताना 'मी शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे' असे जाणतो. जीवनाच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवताना 'मी जीवनाच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे' असे जाणतो. 'शरीर नष्ट झाल्यानंतर आणि जीवन संपल्यानंतर, याच जन्मात सर्व अनुभवलेल्या वेदना अभिनंदित न होता शांत होतील' असे तो जाणतो. 8. දුතියගෙලඤ්ඤසුත්තං ८. दुसरे गेलञ्ञ सुत्त 256. එකං සමයං භගවා වෙසාලියං විහරති මහාවනෙ කූටාගාරසාලායං. අථ ඛො භගවා සායන්හසමයං පටිසල්ලානා වුට්ඨිතො යෙන ගිලානසාලා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදි. නිසජ්ජ ඛො භගවා භික්ඛූ ආමන්තෙසි – २५६. एकदा भगवान वैशाली येथील महावनात कूटागारशाळेत विहरत होते. तेव्हा भगवान संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे रुग्णालय होते, तेथे गेले. तेथे जाऊन ते मांडलेल्या आसनावर बसले. बसल्यानंतर भगवंतांनी भिक्षूंना संबोधित केले – ‘‘සතො[Pg.415], භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්පජානො කාලං ආගමෙය්ය. අයං වො අම්හාකං අනුසාසනී. भिक्षूंनो, भिक्षूने स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन काळाची वाट पाहावी. हाच आमचा तुम्हासाठी उपदेश आहे. ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සතො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු කායෙ කායානුපස්සී විහරති ආතාපී සම්පජානො සතිමා, විනෙය්ය ලොකෙ අභිජ්ඣාදොමනස්සං; වෙදනාසු වෙදනානුපස්සී විහරති… චිත්තෙ චිත්තානුපස්සී විහරති… ධම්මෙසු ධම්මානුපස්සී විහරති ආතාපී සම්පජානො සතිමා, විනෙය්ය ලොකෙ අභිජ්ඣාදොමනස්සං. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සතො හොති. आणि भिक्षूंनो, भिक्षू स्मृतिमान कसा होतो? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू शरीरात शरीराचे सतत दर्शन घेत (कायानुपश्यी होऊन), उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन विहरतो, आणि जगातील अभिज्झा व डोमनस्स दूर करतो. वेदनांमध्ये वेदनेचे सतत दर्शन घेत विहरतो... चित्तात चित्ताचे सतत दर्शन घेत विहरतो... धर्मांमध्ये धर्माचे सतत दर्शन घेत (धर्मानुपश्यी होऊन), उद्योगी, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन विहरतो, आणि जगातील अभिज्झा व डोमनस्स दूर करतो. अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, भिक्षू स्मृतिमान होतो. ‘‘කථඤ්ච, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්පජානො හොති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අභික්කන්තෙ පටික්කන්තෙ සම්පජානකාරී හොති…පෙ… භාසිතෙ තුණ්හීභාවෙ සම්පජානකාරී හොති. එවං ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්පජානො හොති. සතො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්පජානො කාලං ආගමෙය්ය. අයං වො අම්හාකං අනුසාසනී. आणि भिक्षूंनो, भिक्षू संप्रजन्ययुक्त कसा होतो? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू पुढे जाताना आणि मागे वळताना सजगतेने कृती करतो... पे... बोलताना आणि मौन बाळगताना सजगतेने कृती करतो. अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, भिक्षू संप्रजन्ययुक्त होतो. भिक्षूंनो, भिक्षूने स्मृतिमान आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन काळाची वाट पाहावी. हाच आमचा तुम्हासाठी उपदेश आहे. ‘‘තස්ස චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො එවං සතස්ස සම්පජානස්ස අප්පමත්තස්ස ආතාපිනො පහිතත්තස්ස විහරතො උප්පජ්ජති සුඛා වෙදනා. සො එවං පජානාති – ‘උප්පන්නා ඛො ම්යායං සුඛා වෙදනා; සා ච ඛො පටිච්ච, නො අප්පටිච්ච. කිං පටිච්ච? ඉමමෙව ඵස්සං පටිච්ච. අයං ඛො පන ඵස්සො අනිච්චො සඞ්ඛතො පටිච්චසමුප්පන්නො. අනිච්චං ඛො පන සඞ්ඛතං පටිච්චසමුප්පන්නං ඵස්සං පටිච්ච උප්පන්නා සුඛා වෙදනා කුතො නිච්චා භවිස්සතී’ති! සො ඵස්සෙ ච සුඛාය ච වෙදනාය අනිච්චානුපස්සී විහරති, වයානුපස්සී විහරති, විරාගානුපස්සී විහරති, නිරොධානුපස්සී විහරති, පටිනිස්සග්ගානුපස්සී විහරති. තස්ස ඵස්සෙ ච සුඛාය ච වෙදනාය අනිච්චානුපස්සිනො විහරතො, වයානුපස්සිනො විහරතො, විරාගානුපස්සිනො විහරතො, නිරොධානුපස්සිනො විහරතො, පටිනිස්සග්ගානුපස්සිනො විහරතො යො ඵස්සෙ ච සුඛාය ච වෙදනාය රාගානුසයො, සො පහීයති. भिक्षूंनो, जर अशा प्रकारे स्मृतिमान, संप्रजन्ययुक्त, अप्रमादी, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहरणाऱ्या भिक्षूला सुखद वेदना उत्पन्न झाली, तर तो हे अशा प्रकारे जाणतो – 'मला ही सुखद वेदना उत्पन्न झाली आहे. ती अवलंबून उत्पन्न झाली आहे, कारणाशिवाय नाही. कशावर अवलंबून? याच स्पर्शावर अवलंबून. पण हा स्पर्श तर अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न आहे. मग अनित्य, संस्कृत आणि प्रतीत्यसमुत्पन्न स्पर्शावर अवलंबून उत्पन्न झालेली सुखद वेदना नित्य कशी असू शकेल?' तो स्पर्शात आणि सुखद वेदनेत अनित्यानुपश्यी होऊन विहरतो, वयानुपश्यी होऊन विहरतो, विरागानुपश्यी होऊन विहरतो, निरोधानुपश्यी होऊन विहरतो, प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरतो. स्पर्शात आणि सुखद वेदनेत अनित्यानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या, वयानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या, विरागानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या, nirodhānupassino (निरोधानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या), प्रतिनिसर्गानुपश्यी होऊन विहरणाऱ्या त्या भिक्षूचा स्पर्शाविषयी आणि सुखद वेदनेविषयी जो रागानुशय असतो, तो नष्ट होतो. ‘‘තස්ස චෙ, භික්ඛවෙ, භික්ඛුනො එවං සතස්ස…පෙ… විහරතො උප්පජ්ජති දුක්ඛා වෙදනා…පෙ… උප්පජ්ජති අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. සො එවං පජානාති – ‘උප්පන්නා ඛො ම්යායං අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා; සා ච ඛො පටිච්ච, නො අප්පටිච්ච. කිං පටිච්ච? ඉමමෙව ඵස්සං පටිච්ච…පෙ… කායස්ස [Pg.416] භෙදා උද්ධං ජීවිතපරියාදානා ඉධෙව සබ්බවෙදයිතානි අනභිනන්දිතානි සීතීභවිස්සන්තී’ති පජානාති’’. “भिक्खूहो, अशा प्रकारे स्मृतिमान (सतीमान) आणि संप्रजन्ययुक्त होऊन... विहार करणाऱ्या त्या भिक्खूला जर दुःखद वेदना उत्पन्न झाली... किंवा अदुःख-असुख (उपेक्षा) वेदना उत्पन्न झाली, तर तो असे जाणतो – ‘मला ही अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न झाली आहे; आणि ती प्रत्यय (कारण) अवलंबून उत्पन्न झाली आहे, कारणाशिवाय नाही. कशावर अवलंबून? याच स्पर्शावर अवलंबून... शरीराच्या भेदानंतर (मृत्यूनंतर), आयुष्याच्या समाप्तीनंतर, याच जन्मात सर्व वेदना, ज्यांचे अभिनंदन केले गेले नाही (ज्यांच्याविषयी आसक्ती नाही), त्या शांत (शीतळ) होतील,’ असे तो जाणतो.” ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, තෙලඤ්ච පටිච්ච වට්ටිඤ්ච පටිච්ච තෙලප්පදීපො ඣායෙය්ය, තස්සෙව තෙලස්ස ච වට්ටියා ච පරියාදානා අනාහාරො නිබ්බායෙය්ය; එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, භික්ඛු කායපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයමානො ‘කායපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයාමී’ති පජානාති. ජීවිතපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයමානො ‘ජීවිතපරියන්තිකං වෙදනං වෙදයාමී’ති පජානාති. ‘කායස්ස භෙදා උද්ධං ජීවිතපරියාදානා ඉධෙව සබ්බවෙදයිතානි අනභිනන්දිතානි සීතීභවිස්සන්තී’ති පජානාතී’’ති. අට්ඨමං. “भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे तेल आणि वात यांच्यावर अवलंबून तेलाचा दिवा जळतो, आणि त्या तेलाच्या व वातीच्या संपण्याने, इंधन न मिळाल्यामुळे तो विझून जातो; त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, भिक्खू शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत असताना ‘मी शरीराच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे’ असे जाणतो. आयुष्याच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत असताना ‘मी आयुष्याच्या मर्यादेपर्यंतची वेदना अनुभवत आहे’ असे जाणतो. ‘शरीराच्या भेदानंतर, आयुष्याच्या समाप्तीनंतर, याच जन्मात सर्व वेदना, ज्यांचे अभिनंदन केले गेले नाही, त्या शांत होतील,’ असे तो जाणतो.” हे आठवे. 9. අනිච්චසුත්තං ९. अनिच्चसुत्त (अनित्य सूत्र) 257. ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා අනිච්චා සඞ්ඛතා පටිච්චසමුප්පන්නා ඛයධම්මා වයධම්මා විරාගධම්මා නිරොධධම්මා. කතමා තිස්සො? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා ඛො, භික්ඛවෙ, තිස්සො වෙදනා අනිච්චා සඞ්ඛතා පටිච්චසමුප්පන්නා ඛයධම්මා වයධම්මා විරාගධම්මා නිරොධධම්මා’’ති. නවමං. २५७. “भिक्खूहो, या तीन वेदना अनित्य आहेत, संस्कृत (संस्कारित) आहेत, प्रतीत्यसमुत्पन्न आहेत, क्षयधर्म (नष्ट होण्याचा स्वभाव असणाऱ्या) आहेत, वयधर्म (ऱ्हास पावणारा स्वभाव असणाऱ्या) आहेत, विरागधर्म (आसक्ती नष्ट होण्याचा स्वभाव असणाऱ्या) आहेत, निरोधधर्म (लय पावणारा स्वभाव असणाऱ्या) आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भिक्खूहो, या तीन वेदना अनित्य, संस्कृत, प्रतीत्यसमुत्पन्न, क्षयधर्म, वयधर्म, विरागधर्म आणि निरोधधर्म आहेत.” हे नववे. 10. ඵස්සමූලකසුත්තං १०. फस्समूलकसुत्त (स्पर्शमूलक सूत्र) 258. ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා ඵස්සජා ඵස්සමූලකා ඵස්සනිදානා ඵස්සපච්චයා. කතමා තිස්සො? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. සුඛවෙදනියං, භික්ඛවෙ, ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛා වෙදනා. තස්සෙව සුඛවෙදනියස්ස ඵස්සස්ස නිරොධා, යං තජ්ජං වෙදයිතං සුඛවෙදනියං ඵස්සං පටිච්ච උප්පන්නා සුඛා වෙදනා, සා නිරුජ්ඣති, සා වූපසම්මති. දුක්ඛවෙදනියං, භික්ඛවෙ, ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති දුක්ඛා වෙදනා. තස්සෙව දුක්ඛවෙදනියස්ස ඵස්සස්ස නිරොධා, යං තජ්ජං වෙදයිතං දුක්ඛවෙදනියං ඵස්සං පටිච්ච උප්පන්නා දුක්ඛා වෙදනා, සා නිරුජ්ඣති, සා වූපසම්මති. අදුක්ඛමසුඛවෙදනියං, භික්ඛවෙ, ඵස්සං පටිච්ච උප්පජ්ජති අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. තස්සෙව අදුක්ඛමසුඛවෙදනියස්ස ඵස්සස්ස නිරොධා, යං තජ්ජං වෙදයිතං අදුක්ඛමසුඛවෙදනියං ඵස්සං පටිච්ච උප්පන්නා අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා, සා නිරුජ්ඣති, සා වූපසම්මති. සෙය්යථාපි[Pg.417], භික්ඛවෙ, ද්වින්නං කට්ඨානං සඞ්ඝට්ටනසමොධානා උස්මා ජායති, තෙජො අභිනිබ්බත්තති. තෙසංයෙව කට්ඨානං නානාභාවා විනික්ඛෙපා, යා තජ්ජා උස්මා, සා නිරුජ්ඣති, සා වූපසම්මති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමා තිස්සො වෙදනා ඵස්සජා ඵස්සමූලකා ඵස්සනිදානා ඵස්සපච්චයා. තජ්ජං ඵස්සං පටිච්ච තජ්ජා වෙදනා උප්පජ්ජන්ති. තජ්ජස්ස ඵස්සස්ස නිරොධා තජ්ජා වෙදනා නිරුජ්ඣන්තී’’ති. දසමං. २५८. “भिक्खूहो, या तीन वेदना स्पर्शापासून उत्पन्न होणाऱ्या (स्पर्शज), स्पर्शमूलक, स्पर्श हेच ज्यांचे निदान (कारण) आहे अशा आणि स्पर्शप्रत्ययी (स्पर्शावर अवलंबून असणाऱ्या) आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भिक्खूहो, सुखद वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शावर अवलंबून सुखद वेदना उत्पन्न होते. त्या सुखद वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शाच्या निरोधाने (नष्ट होण्याने), त्या स्पर्शावर अवलंबून उत्पन्न झालेली जी सुखद वेदना आहे, ती निरुद्ध होते, ती शांत होते. भिक्खूहो, दुःखद वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शावर अवलंबून दुःखद वेदना उत्पन्न होते. त्या दुःखद वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शाच्या निरोधाने, त्या स्पर्शावर अवलंबून उत्पन्न झालेली जी दुःखद वेदना आहे, ती निरुद्ध होते, ती शांत होते. भिक्खूहो, अदुःख-असुख वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शावर अवलंबून अदुःख-असुख वेदना उत्पन्न होते. त्या अदुःख-असुख वेदनेला कारणीभूत असणाऱ्या स्पर्शाच्या निरोधाने, त्या स्पर्शावर अवलंबून उत्पन्न झालेली जी अदुःख-असुख वेदना आहे, ती निरुद्ध होते, ती शांत होते. भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे दोन लाकडांच्या घर्षणामुळे व एकत्र येण्यामुळे उष्णता निर्माण होते, अग्नी प्रज्वलित होतो; परंतु तीच लाकडे वेगळी केल्याने व दूर ठेवल्याने त्यापासून निर्माण झालेली उष्णता निरुद्ध होते, शांत होते. त्याचप्रमाणे, भिक्खूहो, या तीन वेदना स्पर्शज, स्पर्शमूलक, स्पर्श हेच ज्यांचे निदान आहे अशा आणि स्पर्शप्रत्ययी आहेत. योग्य स्पर्शावर अवलंबून तशाच वेदना उत्पन्न होतात आणि त्या योग्य स्पर्शाच्या निरोधाने तशा वेदना निरुद्ध होतात.” हे दहावे. සගාථාවග්ගො පඨමො. सगाथावग्गो पठमो (गाथांसह असलेला पहिला वर्ग समाप्त). තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – සමාධි සුඛං පහානෙන, පාතාලං දට්ඨබ්බෙන ච; සල්ලෙන චෙව ගෙලඤ්ඤා, අනිච්ච ඵස්සමූලකාති. समाधी, सुख, प्रहाण, पाताल, द्रष्टव्य, शल्य, गेलञ्ञ (आजारपण), अनित्य आणि फस्समूलक (स्पर्शमूलक). 2. රහොගතවග්ගො २. रहोगतवग्गो (एकांतात जाण्याचा वर्ग) 1. රහොගතසුත්තං १. रहोगतसुत्त (एकांत सूत्र) 259. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො සො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධ මය්හං, භන්තෙ, රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘තිස්සො වෙදනා වුත්තා භගවතා. සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා තිස්සො වෙදනා වුත්තා භගවතා. වුත්තං ඛො පනෙතං භගවතා – ‘යං කිඤ්චි වෙදයිතං තං දුක්ඛස්මි’න්ති. කිං නු ඛො එතං භගවතා සන්ධාය භාසිතං – ‘යං කිඤ්චි වෙදයිතං තං දුක්ඛස්මි’’’න්ති? २५९. तेव्हा एक भिक्खू भगवंतांकडे गेला; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूने भगवंतांना असे विचारले – “भंते, येथे मी एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला – ‘भगवंतांनी तीन वेदना सांगितल्या आहेत: सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भगवंतांनी या तीन वेदना सांगितल्या आहेत. परंतु भगवंतांनी असेही म्हटले आहे – “जे काही अनुभवले जाते, ते सर्व दुःखात समाविष्ट आहे.” भगवंतांनी नेमके काय लक्षात घेऊन (कशाचा संदर्भ देऊन) असे म्हटले आहे की, “जे काही अनुभवले जाते, ते सर्व दुःखात समाविष्ट आहे”?’” ‘‘සාධු සාධු, භික්ඛු! තිස්සො ඉමා, භික්ඛු, වෙදනා වුත්තා මයා. සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා තිස්සො වෙදනා වුත්තා මයා. වුත්තං ඛො පනෙතං, භික්ඛු, මයා – ‘යං කිඤ්චි වෙදයිතං, තං දුක්ඛස්මි’න්ති. තං ඛො පනෙතං, භික්ඛු, මයා සඞ්ඛාරානංයෙව අනිච්චතං සන්ධාය භාසිතං – ‘යං කිඤ්චි වෙදයිතං තං දුක්ඛස්මි’න්ති[Pg.418]. තං ඛො පනෙතං, භික්ඛු, මයා සඞ්ඛාරානංයෙව ඛයධම්මතං…පෙ… වයධම්මතං…පෙ… විරාගධම්මතං …පෙ… නිරොධධම්මතං…පෙ… විපරිණාමධම්මතං සන්ධාය භාසිතං – ‘යං කිඤ්චි වෙදයිතං තං දුක්ඛස්මි’න්ති. අථ ඛො පන, භික්ඛු, මයා අනුපුබ්බසඞ්ඛාරානං නිරොධො අක්ඛාතො. පඨමං ඣානං සමාපන්නස්ස වාචා නිරුද්ධා හොති. දුතියං ඣානං සමාපන්නස්ස විතක්කවිචාරා නිරුද්ධා හොන්ති. තතියං ඣානං සමාපන්නස්ස පීති නිරුද්ධා හොති. චතුත්ථං ඣානං සමාපන්නස්ස අස්සාසපස්සාසා නිරුද්ධා හොන්ති. ආකාසානඤ්චායතනං සමාපන්නස්ස රූපසඤ්ඤා නිරුද්ධා හොති. විඤ්ඤාණඤ්චායතනං සමාපන්නස්ස ආකාසානඤ්චායතනසඤ්ඤා නිරුද්ධා හොති. ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං සමාපන්නස්ස විඤ්ඤාණඤ්චායතනසඤ්ඤා නිරුද්ධා හොති. නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං සමාපන්නස්ස ආකිඤ්චඤ්ඤායතනසඤ්ඤා නිරුද්ධා හොති. සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නස්ස සඤ්ඤා ච වෙදනා ච නිරුද්ධා හොන්ති. ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගො නිරුද්ධො හොති, දොසො නිරුද්ධො හොති, මොහො නිරුද්ධො හොති. අථ ඛො, භික්ඛු, මයා අනුපුබ්බසඞ්ඛාරානං වූපසමො අක්ඛාතො. පඨමං ඣානං සමාපන්නස්ස වාචා වූපසන්තා හොති. දුතියං ඣානං සමාපන්නස්ස විතක්කවිචාරා වූපසන්තා හොන්ති…පෙ… සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නස්ස සඤ්ඤා ච වෙදනා ච වූපසන්තා හොන්ති. ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගො වූපසන්තො හොති, දොසො වූපසන්තො හොති, මොහො වූපසන්තො හොති. ඡයිමා, භික්ඛු, පස්සද්ධියො. පඨමං ඣානං සමාපන්නස්ස වාචා පටිප්පස්සද්ධා හොති. දුතියං ඣානං සමාපන්නස්ස විතක්කවිචාරා පටිප්පස්සද්ධා හොන්ති. තතියං ඣානං සමාපන්නස්ස පීති පටිප්පස්සද්ධා හොති. චතුත්ථං ඣානං සමාපන්නස්ස අස්සාසපස්සාසා පටිප්පස්සද්ධා හොන්ති. සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නස්ස සඤ්ඤා ච වෙදනා ච පටිප්පස්සද්ධා හොන්ති. ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගො පටිප්පස්සද්ධො හොති, දොසො පටිප්පස්සද්ධො හොති, මොහො පටිප්පස්සද්ධො හොතී’’ති. පඨමං. “साधू, साधू, भिक्खू! हे भिक्खू, मी तीन प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत. सुखद वेदना (सुखा वेदना), दुःखद वेदना (दुक्खा वेदना) आणि अदुःख-असुख वेदना (अदुक्खमसुखा वेदना) - या तीन वेदना मी सांगितल्या आहेत. परंतु, हे भिक्खू, मी असेही म्हटले आहे की—'जे काही अनुभवले जाते, ते सर्व दुःखात समाविष्ट आहे.' हे मी संस्कारांच्या (संखारांच्या) अनित्यतेचा (अणिच्चता) विचार करूनच म्हटले आहे की—'जे काही अनुभवले जाते, ते दुःखात समाविष्ट आहे.' हे मी संस्कारांच्या क्षयधर्मतेचा (खयधम्मता)... पे... व्ययधर्मतेचा (वयधम्मता)... पे... विरागधर्मतेचा (विरागधम्मता)... पे... निरोधधर्मतेचा (निरोधधम्मता)... पे... विपरिणामधर्मतेचा (विपरिणामधम्मता) विचार करूनच म्हटले आहे की—'जे काही अनुभवले जाते, ते दुःखात समाविष्ट आहे.' शिवाय, हे भिक्खू, मी संस्कारांचा अनुक्रमिक निरोध (अनुपुब्बसंखारानं निरोधो) सांगितला आहे. प्रथम ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची वाणी निरुद्ध होते. द्वितीय ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे वितर्क आणि विचार निरुद्ध होतात. तृतीय ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची प्रीती निरुद्ध होते. चतुर्थ ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे श्वासोच्छ्वास (अस्सास-पस्सासा) निरुद्ध होतात. आकासानञ्चायतन प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची रूपसंज्ञा निरुद्ध होते. विञ्ञाणञ्चायतन प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची आकासानञ्चायतनसंज्ञा निरुद्ध होते. आकिञ्चञ्ञायतन प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची विञ्ञाणञ्चायतनसंज्ञा निरुद्ध होते. नेवसंञ्ञानासंञ्ञायतन प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची आकिञ्चञ्ञायतनसंज्ञा निरुद्ध होते. संज्ञा-वेदयित-निरोध (संञ्ञावेदयितनिरोध) प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना दोन्ही निरुद्ध होतात. क्षीणास्रव (खीणासव) भिक्खूचा राग निरुद्ध होतो, द्वेष (दोसो) निरुद्ध होतो, मोह निरुद्ध होतो. तसेच, हे भिक्खू, मी संस्कारांचे अनुक्रमिक शांत होणे (अनुपुब्बसंखारानं वूपसमो) सांगितले आहे. प्रथम ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची वाणी शांत होते. द्वितीय ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे वितर्क आणि विचार शांत होतात... पे... संज्ञा-वेदयित-निरोध प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना शांत होतात. क्षीणास्रव भिक्खूचा राग शांत होतो, द्वेष शांत होतो, मोह शांत होतो. हे भिक्खू, या सहा प्रकारच्या शांतता (पस्सद्धियो) आहेत. प्रथम ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची वाणी शांत (प्रश्रब्ध) होते. द्वितीय ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे वितर्क आणि विचार शांत होतात. तृतीय ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची प्रीती शांत होते. चतुर्थ ध्यान प्राप्त झालेल्या व्यक्तीचे श्वासोच्छ्वास शांत होतात. संज्ञा-वेदयित-निरोध प्राप्त झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना शांत होतात. क्षीणास्रव भिक्खूचा राग शांत होतो, द्वेष शांत होतो, मोह शांत होतो.” पहिले. 2. පඨමආකාසසුත්තං २. प्रथम आकास सुत्त 260. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, ආකාසෙ විවිධා වාතා වායන්ති. පුරත්ථිමාපි වාතා වායන්ති, පච්ඡිමාපි වාතා වායන්ති, උත්තරාපි වාතා වායන්ති, දක්ඛිණාපි වාතා වායන්ති, සරජාපි වාතා වායන්ති, අරජාපි වාතා වායන්ති, සීතාපි වාතා වායන්ති, උණ්හාපි වාතා වායන්ති, පරිත්තාපි වාතා වායන්ති, අධිමත්තාපි වාතා [Pg.419] වායන්ති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමස්මිං කායස්මිං විවිධා වෙදනා උප්පජ්ජන්ති, සුඛාපි වෙදනා උප්පජ්ජති, දුක්ඛාපි වෙදනා උප්පජ්ජති, අදුක්ඛමසුඛාපි වෙදනා උප්පජ්ජතී’’ති. २६०. “भिक्खूंनो, ज्याप्रमाणे आकाशात विविध वारे वाहतात: पूर्वेकडचे वारे वाहतात, पश्चिमेकडचे वारे वाहतात, उत्तरेकडचे वारे वाहतात, दक्षिणेकडचे वारे वाहतात; धुळीने भरलेले वारे वाहतात, धुळीशिवायचे वारे वाहतात; थंड वारे वाहतात, उष्ण वारे वाहतात; मंद वारे वाहतात आणि अतिशय वेगवान वारे वाहतात. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, या शरीरात विविध वेदना उत्पन्न होतात: सुखद वेदनाही उत्पन्न होते, दुःखद वेदनाही उत्पन्न होते आणि अदुःख-असुख वेदनाही उत्पन्न होते.” ‘‘යථාපි වාතා ආකාසෙ, වායන්ති විවිධා පුථූ; පුරත්ථිමා පච්ඡිමා චාපි, උත්තරා අථ දක්ඛිණා. “ज्याप्रमाणे आकाशात अनेक प्रकारचे विविध वारे वाहतात; पूर्वेकडचे आणि पश्चिमेकडचे, तसेच उत्तरेकडचे आणि दक्षिणेकडचे वारे, ‘‘සරජා අරජා චපි, සීතා උණ්හා ච එකදා; අධිමත්තා පරිත්තා ච, පුථූ වායන්ති මාලුතා. धुळीने भरलेले आणि धुळीशिवायचे, कधी थंड तर कधी उष्ण, अतिशय वेगवान आणि मंद—असे अनेक प्रकारचे वारे वाहतात; ‘‘තථෙවිමස්මිං කායස්මිං, සමුප්පජ්ජන්ති වෙදනා; සුඛදුක්ඛසමුප්පත්ති, අදුක්ඛමසුඛා ච යා. त्याचप्रमाणे या शरीरातही विविध वेदना उत्पन्न होतात; सुख आणि दुःखाची उत्पत्ती होते, तसेच जी अदुःख-असुख वेदना आहे तीही उत्पन्न होते. ‘‘යතො ච භික්ඛු ආතාපී, සම්පජඤ්ඤං න රිඤ්චති ; තතො සො වෙදනා සබ්බා, පරිජානාති පණ්ඩිතො. परंतु जेव्हा भिक्खू उद्योगी (आतापी) असतो आणि संप्रजन्य (स्पष्ट आकलन) सोडत नाही, तेव्हा तो ज्ञानी भिक्खू सर्व वेदना पूर्णपणे जाणतो. ‘‘සො වෙදනා පරිඤ්ඤාය, දිට්ඨෙ ධම්මෙ අනාසවො; කායස්ස භෙදා ධම්මට්ඨො, සඞ්ඛ්යං නොපෙති වෙදගූ’’ති. දුතියං; तो वेदनांना पूर्णपणे जाणून घेऊन, याच जन्मात (दिट्ठे धम्मे) आस्रवरहित (अनास्रव) होतो. धर्मात स्थित असलेला तो वेदपारंगत (वेदगू) भिक्खू, शरीराच्या भेदानंतर (मृत्यूनंतर) कोणत्याही संज्ञेला (पुनर्जन्माच्या गणनेला) प्राप्त होत नाही.” दुसरे. 3. දුතියආකාසසුත්තං ३. दुसरे आकास सुत्त 261. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, ආකාසෙ විවිධා වාතා වායන්ති. පුරත්ථිමාපි වාතා වායන්ති…පෙ… අධිමත්තාපි වාතා වායන්ති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමස්මිං කායස්මිං විවිධා වෙදනා උප්පජ්ජන්ති, සුඛාපි වෙදනා උප්පජ්ජති, දුක්ඛාපි වෙදනා උප්පජ්ජති, අදුක්ඛමසුඛාපි වෙදනා උප්පජ්ජතී’’ති. තතියං. २६१. “भिक्खूंनो, ज्याप्रमाणे आकाशात विविध वारे वाहतात: पूर्वेकडचे वारे वाहतात... पे... अतिशय वेगवान वारे वाहतात. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, या शरीरात विविध वेदना उत्पन्न होतात: सुखद वेदनाही उत्पन्न होते, दुःखद वेदनाही उत्पन्न होते आणि अदुःख-असुख वेदनाही उत्पन्न होते.” तिसरे. 4. අගාරසුත්තං ४. अगार सुत्त 262. ‘‘සෙය්යථාපි, භික්ඛවෙ, ආගන්තුකාගාරං. තත්ථ පුරත්ථිමායපි දිසාය ආගන්ත්වා වාසං කප්පෙන්ති, පච්ඡිමායපි දිසාය ආගන්ත්වා වාසං කප්පෙන්ති, උත්තරායපි දිසාය ආගන්ත්වා වාසං කප්පෙන්ති, දක්ඛිණායපි දිසාය ආගන්ත්වා වාසං කප්පෙන්ති. ඛත්තියාපි ආගන්ත්වා වාසං කප්පෙන්ති, බ්රාහ්මණාපි ආගන්ත්වා වාසං කප්පෙන්ති, වෙස්සාපි ආගන්ත්වා වාසං කප්පෙන්ති, සුද්දාපි ආගන්ත්වා වාසං කප්පෙන්ති. එවමෙව ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමස්මිං කායස්මිං විවිධා වෙදනා [Pg.420] උප්පජ්ජන්ති. සුඛාපි වෙදනා උප්පජ්ජති, දුක්ඛාපි වෙදනා උප්පජ්ජති, අදුක්ඛමසුඛාපි වෙදනා උප්පජ්ජති. සාමිසාපි සුඛා වෙදනා උප්පජ්ජති, සාමිසාපි දුක්ඛා වෙදනා උප්පජ්ජති, සාමිසාපි අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා උප්පජ්ජති. නිරාමිසාපි සුඛා වෙදනා උප්පජ්ජති, නිරාමිසාපි දුක්ඛා වෙදනා උප්පජ්ජති, නිරාමිසාපි අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා උප්පජ්ජතී’’ති. චතුත්ථං. २६२. “भिक्खूंनो, समजा एखादी धर्मशाळा (आगंतुकागार - पाहुण्यांचे विश्रामगृह) आहे. तिथे पूर्वेकडून येऊन लोक मुक्काम करतात, पश्चिमेकडून येऊन मुक्काम करतात, उत्तरेकडून येऊन मुक्काम करतात, दक्षिणेकडून येऊन मुक्काम करतात. क्षत्रियही येऊन मुक्काम करतात, ब्राह्मणही येऊन मुक्काम करतात, वैश्यही येऊन मुक्काम करतात आणि शूद्रही येऊन मुक्काम करतात. त्याचप्रमाणे, भिक्खूंनो, या शरीरात विविध वेदना उत्पन्न होतात: सुखद वेदनाही उत्पन्न होते, दुःखद वेदनाही उत्पन्न होते आणि अदुःख-असुख वेदनाही उत्पन्न होते. सामिष (भौतिक सुखांशी संबंधित) सुखद वेदनाही उत्पन्न होते, सामिष दुःखद वेदनाही उत्पन्न होते, सामिष अदुःख-असुख वेदनाही उत्पन्न होते. निरामिक्ष (भौतिक सुखांशी संबंधित नसलेली) सुखद वेदनाही उत्पन्न होते, निरामिक्ष दुःखद वेदनाही उत्पन्न होते, निरामिक्ष अदुःख-असुख वेदनाही उत्पन्न होते.” चौथे. 5. පඨමආනන්දසුත්තං ५. प्रथम आनंद सुत्त 263. අථ ඛො ආයස්මා ආනන්දො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං නිසීදි, එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා ආනන්දො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කතමා නු ඛො, භන්තෙ, වෙදනා, කතමො වෙදනාසමුදයො, කතමො වෙදනානිරොධො, කතමා වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා? කො වෙදනාය අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණන්ති? තිස්සො ඉමා, ආනන්ද, වෙදනා – සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා වුච්චන්ති, ආනන්ද, වෙදනා. ඵස්සසමුදයා වෙදනාසමුදයො; ඵස්සනිරොධා වෙදනානිරොධො. අයමෙව අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි…පෙ… සම්මාසමාධි. යං වෙදනං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං, අයං වෙදනාය අස්සාදො. යා වෙදනා අනිච්චා දුක්ඛා විපරිණාමධම්මා, අයං වෙදනාය ආදීනවො. යො වෙදනාය ඡන්දරාගවිනයො ඡන්දරාගප්පහානං, ඉදං වෙදනාය නිස්සරණං. අථ ඛො පනානන්ද, මයා අනුපුබ්බසඞ්ඛාරානං නිරොධො අක්ඛාතො. පඨමං ඣානං සමාපන්නස්ස වාචා නිරුද්ධා හොති…පෙ… සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නස්ස සඤ්ඤා ච වෙදනා ච නිරුද්ධා හොන්ති. ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගො නිරුද්ධො හොති, දොසො නිරුද්ධො හොති, මොහො නිරුද්ධො හොති. අථ ඛො පනානන්ද, මයා අනුපුබ්බසඞ්ඛාරානං වූපසමො අක්ඛාතො. පඨමං ඣානං සමාපන්නස්ස වාචා වූපසන්තා හොති…පෙ… සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නස්ස සඤ්ඤා ච වෙදනා ච වූපසන්තා හොන්ති. ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගො වූපසන්තො හොති, දොසො වූපසන්තො හොති, මොහො වූපසන්තො හොති. අථ ඛො පනානන්ද, මයා අනුපුබ්බසඞ්ඛාරානං පටිප්පස්සද්ධි අක්ඛාතා. පඨමං ඣානං සමාපන්නස්ස වාචා පටිප්පස්සද්ධා හොති…පෙ… ආකාසානඤ්චායතනං සමාපන්නස්ස රූපසඤ්ඤා පටිප්පස්සද්ධා හොති. විඤ්ඤාණඤ්චායතනං සමාපන්නස්ස ආකාසානඤ්චායතනසඤ්ඤා පටිප්පස්සද්ධා හොති. ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං සමාපන්නස්ස [Pg.421] විඤ්ඤාණඤ්චායතනසඤ්ඤා පටිප්පස්සද්ධා හොති. නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං සමාපන්නස්ස ආකිඤ්චඤ්ඤායතනසඤ්ඤා පටිප්පස්සද්ධා හොති. සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නස්ස සඤ්ඤා ච වෙදනා ච පටිප්පස්සද්ධා හොන්ති. ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගො පටිප්පස්සද්ධො හොති, දොසො පටිප්පස්සද්ධො හොති, මොහො පටිප්පස්සද්ධො හොතී’’ති. පඤ්චමං. २६३. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद जेथे भगवान होते तेथे गेले; आणि पोहोचल्यावर एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान आनंद भगवानांना म्हणाले – “भन्ते, वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम (समुदय) काय? वेदनेचा निरोध काय? आणि वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग (प्रतिपदा) कोणता? वेदनेचा आस्वाद (आनंद) काय? तिचा दोष (आदीनव) काय? आणि तिच्यातून सुटका (निस्सरण) काय?” “आनंदा, या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना (सुखा वेदना), दुःखद वेदना (दुःखा वेदना) आणि अदुःख-असुख वेदना (उदासीन वेदना). आनंदा, यांनाच वेदना असे म्हणतात. स्पर्शाच्या (फस्स) उगमामुळे वेदनेचा उगम होतो; स्पर्शाच्या निरोधामुळे वेदनेचा निरोध होतो. हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग आहे, जसे की – सम्यक दृष्टी...पे... सम्यक समाधी. वेदनेवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य (आनंद) उत्पन्न होते, हा वेदनेचा आस्वाद आहे. जी वेदना अनित्य, दुःखद आणि परिवर्तनशील स्वभावाची (विपरिणामधम्मा) आहे, हा वेदनेचा दोष आहे. वेदनेविषयीच्या इच्छा-रागाचा (छंदराग) जो विनय (दूर करणे) आणि प्रहाण (त्याग) आहे, हे वेदनेतून सुटका (निस्सरण) आहे. परंतु आनंदा, मी संस्कारांच्या क्रमिक निरोधाविषयी (अनुपूर्व-संस्कार-निरोध) सांगितले आहे. प्रथम ध्यानात (झान) समापन्न झालेल्या व्यक्तीची वाणी निरुद्ध होते...पे... संज्ञा-वेदयित-निरोधात (निरोध समापत्ती) समापन्न झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना दोन्ही निरुद्ध होतात. आसवांचा क्षय झालेल्या (क्षीणासव) भिक्खूचा राग निरुद्ध होतो, द्वेष निरुद्ध होतो, मोह निरुद्ध होतो. परंतु आनंदा, मी संस्कारांच्या क्रमिक उपशमाविषयी (शांतीविषयी) सांगितले आहे. प्रथम ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची वाणी उपशमित (शांत) होते...पे... संज्ञा-वेदयित-निरोधात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना दोन्ही उपशमित होतात. आसवांचा क्षय झालेल्या भिक्खूचा राग उपशमित होतो, द्वेष उपशमित होतो, मोह उपशमित होतो. परंतु आनंदा, मी संस्कारांच्या क्रमिक प्रतिप्रश्रब्धीविषयी (पूर्ण शांततेविषयी) सांगितले आहे. प्रथम ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची वाणी प्रतिप्रश्रब्ध (शांत) होते...पे... आकाशांनंत्यायतन ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची रूपसंज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध होते. विज्ञाणांनंत्यायतन ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची आकाशांनंत्यायतनसंज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध होते. आकिंचन्यायतन ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची विज्ञाणांनंत्यायतनसंज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध होते. नैवसंज्ञानासंज्ञायतन ध्यानात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची आकिंचन्यायतनसंज्ञा प्रतिप्रश्रब्ध होते. संज्ञा-वेदयित-निरोधात समापन्न झालेल्या व्यक्तीची संज्ञा आणि वेदना दोन्ही प्रतिप्रश्रब्ध होतात. आसवांचा क्षय झालेल्या भिक्खूचा राग प्रतिप्रश्रब्ध होतो, द्वेष प्रतिप्रश्रब्ध होतो, मोह प्रतिप्रश्रब्ध होतो.” पाचवे. 6. දුතියආනන්දසුත්තං ६. दुसरे आनंद सुत्त 264. අථ ඛො ආයස්මා ආනන්දො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො ආයස්මන්තං ආනන්දං භගවා එතදවොච – ‘‘කතමා නු ඛො, ආනන්ද, වෙදනා, කතමො වෙදනාසමුදයො, කතමො වෙදනානිරොධො, කතමා වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා? කො වෙදනාය අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණ’’න්ති? ‘‘භගවංමූලකා නො, භන්තෙ, ධම්මා භගවන්නෙත්තිකා භගවම්පටිසරණා. සාධු, භන්තෙ, භගවන්තඤ්ඤෙව පටිභාතු එතස්ස භාසිතස්ස අත්ථො. භගවතො සුත්වා භික්ඛූ ධාරෙස්සන්තී’’ති. ‘‘තෙන හි, ආනන්ද, සුණොහි, සාධුකං මනසි කරොහි; භාසිස්සාමී’’ති. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො ආයස්මා ආනන්දො භගවතො පච්චස්සොසි. භගවා එතදවොච – ‘‘තිස්සො ඉමා, ආනන්ද, වෙදනා – සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා වුච්චන්ති, ආනන්ද, වෙදනා…පෙ… ඵස්සසමුදයා…පෙ… ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගො පටිප්පස්සද්ධො හොති, දොසො පටිප්පස්සද්ධො හොති, මොහො පටිප්පස්සද්ධො හොතී’’ති. ඡට්ඨං. २६४. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद जेथे भगवान होते तेथे गेले; आणि पोहोचल्यावर भगवानांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदांना भगवान म्हणाले – “आनंदा, वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम काय? वेदनेचा निरोध काय? आणि वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा आस्वाद काय? तिचा दोष काय? आणि तिच्यातून सुटका काय?” “भन्ते, आमचे धर्म (शिकवण) भगवन्-मूलक (भगवानांवर आधारित) आहेत, भगवन्-नेत्रिक (भगवानांच्या मार्गदर्शनाखाली) आहेत आणि भगवन्-प्रतिशरण (भगवानांचा आश्रय घेणारे) आहेत. भन्ते, हे उत्तम होईल जर भगवानांनीच या भाषणाचा अर्थ स्पष्ट करावा. भगवानांकडून ऐकून भिक्खू त्याचे स्मरण ठेवतील.” “तसे असेल तर आनंदा, ऐक, नीट मनन कर; मी सांगेन.” “होय, भन्ते,” असे म्हणून आयुष्यमान आनंदांनी भगवानांना प्रतिसाद दिला. भगवान म्हणाले – “आनंदा, या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. आनंदा, यांनाच वेदना असे म्हणतात...पे... स्पर्शाच्या उगमामुळे...पे... आसवांचा क्षय झालेल्या भिक्खूचा राग प्रतिप्रश्रब्ध होतो, द्वेष प्रतिप्रश्रब्ध होतो, मोह प्रतिप्रश्रब्ध होतो.” सहावे. 7. පඨමසම්බහුලසුත්තං ७. पहिले संबहुल सुत्त 265. අථ ඛො සම්බහුලා භික්ඛූ යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘කතමා නු ඛො, භන්තෙ, වෙදනා, කතමො වෙදනාසමුදයො, කතමො වෙදනානිරොධො, කතමා වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා? කො වෙදනාය අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණ’’න්ති? ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා – සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, වෙදනා. ඵස්සසමුදයා [Pg.422] වෙදනාසමුදයො; ඵස්සනිරොධා වෙදනානිරොධො. අයමෙව අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි…පෙ… සම්මාසමාධි. යං වෙදනං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං, අයං වෙදනාය අස්සාදො. යා වෙදනා අනිච්චා දුක්ඛා විපරිණාමධම්මා, අයං වෙදනාය ආදීනවො. යො වෙදනාය ඡන්දරාගවිනයො ඡන්දරාගප්පහානං, ඉදං වෙදනාය නිස්සරණං. २६५. त्यानंतर अनेक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे गेले; आणि पोहोचल्यावर भगवानांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले ते भिक्खू भगवानांना म्हणाले – “भन्ते, वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम काय? वेदनेचा निरोध काय? आणि वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा आस्वाद काय? तिचा दोष काय? आणि तिच्यातून सुटका काय?” “भिक्खूंनो, या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भिक्खूंनो, यांनाच वेदना असे म्हणतात. स्पर्शाच्या उगमामुळे वेदनेचा उगम होतो; स्पर्शाच्या निरोधामुळे वेदनेचा निरोध होतो. हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग आहे, जसे की – सम्यक दृष्टी...पे... सम्यक समाधी. वेदनेवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, हा वेदनेचा आस्वाद आहे. जी वेदना अनित्य, दुःखद आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहे, हा वेदनेचा दोष आहे. वेदनेविषयीच्या इच्छा-रागाचा जो विनय आणि प्रहाण आहे, हे वेदनेतून सुटका आहे.” ‘‘අථ ඛො පන, භික්ඛවෙ, මයා අනුපුබ්බසඞ්ඛාරානං නිරොධො අක්ඛාතො. පඨමං ඣානං සමාපන්නස්ස වාචා නිරුද්ධා හොති…පෙ… ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගො නිරුද්ධො හොති, දොසො නිරුද්ධො හොති, මොහො නිරුද්ධො හොති. අථ ඛො පන, භික්ඛවෙ, මයා අනුපුබ්බසඞ්ඛාරානං වූපසමො අක්ඛාතො. පඨමං ඣානං සමාපන්නස්ස වාචා වූපසන්තා හොති…පෙ… ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගො වූපසන්තො හොති, දොසො වූපසන්තො හොති, මොහො වූපසන්තො හොති. ඡයිමා, භික්ඛවෙ, පස්සද්ධියො. පඨමං ඣානං සමාපන්නස්ස වාචා පටිප්පස්සද්ධා හොති. දුතියං ඣානං සමාපන්නස්ස විතක්කවිචාරා පටිප්පස්සද්ධා හොන්ති. තතියං ඣානං සමාපන්නස්ස පීති පටිප්පස්සද්ධා හොති. චතුත්ථං ඣානං සමාපන්නස්ස අස්සාසපස්සාසා පටිප්පස්සද්ධා හොන්ති. සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නස්ස සඤ්ඤා ච වෙදනා ච පටිප්පස්සද්ධා හොන්ති. ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගො පටිප්පස්සද්ධො හොති, දොසො පටිප්පස්සද්ධො හොති, මොහො පටිප්පස්සද්ධො හොතී’’ති. සත්තමං. “भिक्खूहो, मी अनुक्रमे संस्कारांचा निरोध सांगितला आहे. प्रथम ध्यानात समापन्न झालेल्याची वाणी निरुद्ध होते...पे... क्षीणास्रव भिक्खूचा राग निरुद्ध होतो, द्वेष निरुद्ध होतो, मोह निरुद्ध होतो. भिक्खूहो, मी अनुक्रमे संस्कारांचे उपशमन सांगितले आहे. प्रथम ध्यानात समापन्न झालेल्याची वाणी उपशमित होते...पे... क्षीणास्रव भिक्खूचा राग उपशमित होतो, द्वेष उपशमित होतो, मोह उपशमित होतो. भिक्खूहो, या सहा प्रस्रब्धी आहेत. प्रथम ध्यानात समापन्न झालेल्याची वाणी प्रस्रब्ध होते. द्वितीय ध्यानात समापन्न झालेल्याचे वितर्क आणि विचार प्रस्रब्ध होतात. तृतीय ध्यानात समापन्न झालेल्याची प्रीती प्रस्रब्ध होते. चतुर्थ ध्यानात समापन्न झालेल्याचे श्वासोच्छ्वास प्रस्रब्ध होतात. संज्ञा-वेदना-निरोध समापन्न झालेल्याची संज्ञा आणि वेदना प्रस्रब्ध होतात. क्षीणास्रव भिक्खूचा राग प्रस्रब्ध होतो, द्वेष प्रस्रब्ध होतो, मोह प्रस्रब्ध होतो.” सातवे (सुत्त). 8. දුතියසම්බහුලසුත්තං ८. दुसरे संबहुल सुत्त 266. අථ ඛො සම්බහුලා භික්ඛූ යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු…පෙ… එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවා එතදවොච – ‘‘කතමා නු ඛො, භික්ඛවෙ, වෙදනා, කතමො වෙදනාසමුදයො, කතමො වෙදනානිරොධො, කතමා වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා? කො වෙදනාය අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණ’’න්ති? ‘‘භගවංමූලකා නො, භන්තෙ, ධම්මා…පෙ…’’ ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා – සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, වෙදනා…පෙ… ඵස්සසමුදයා…පෙ…. (යථා පුරිමසුත්තන්තෙ, තථා විත්ථාරෙතබ්බො.) අට්ඨමං. २६६. त्यानंतर अनेक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे गेले...पे... एका बाजूला बसलेल्या त्या भिक्खूंना भगवान म्हणाले – “भिक्खूहो, वेदना कोणती आहे? वेदनेचा उगम (समुदय) कोणता? वेदनेचा निरोध कोणता? वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारी प्रतिपदा (मार्ग) कोणती? वेदनेचा आस्वाद कोणता? तिचा दोष (आदीनव) कोणता? आणि तिचे निःसरण कोणते?” “भंते, आमचे धर्म भगवन्-मूलक आहेत...पे...” “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना. भिक्खूहो, यांना वेदना म्हटले जाते...पे... स्पर्शाच्या उगमामुळे (समुदयामुळे)...पे... (जसे मागील सुत्तात आहे, तसेच सविस्तर सांगावे.)” आठवे (सुत्त). 9. පඤ්චකඞ්ගසුත්තං ९. पंचकंग सुत्त 267. අථ [Pg.423] ඛො පඤ්චකඞ්ගො ථපති යෙනායස්මා උදායී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං උදායිං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො පඤ්චකඞ්ගො ථපති ආයස්මන්තං උදායිං එතදවොච – ‘‘කති නු ඛො, භන්තෙ උදායි, වෙදනා වුත්තා භගවතා’’ති? ‘‘තිස්සො ඛො, ථපති, වෙදනා වුත්තා භගවතා. සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා ඛො, ථපති, තිස්සො වෙදනා වුත්තා භගවතා’’ති. එවං වුත්තෙ, පඤ්චකඞ්ගො ථපති ආයස්මන්තං උදායිං එතදවොච – ‘‘න ඛො, භන්තෙ උදායි, තිස්සො වෙදනා වුත්තා භගවතා. ද්වෙ වෙදනා වුත්තා භගවතා – සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා. යායං, භන්තෙ, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා, සන්තස්මිං එසා පණීතෙ සුඛෙ වුත්තා භගවතා’’ති. දුතියම්පි ඛො ආයස්මා උදායී පඤ්චකඞ්ගං ථපතිං එතදවොච – ‘‘න ඛො, ථපති, ද්වෙ වෙදනා වුත්තා භගවතා. තිස්සො වෙදනා වුත්තා භගවතා. සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා තිස්සො වෙදනා වුත්තා භගවතා’’ති. දුතියම්පි ඛො පඤ්චකඞ්ගො ථපති ආයස්මන්තං උදායිං එතදවොච – ‘‘න ඛො, භන්තෙ උදායි, තිස්සො වෙදනා වුත්තා භගවතා. ද්වෙ වෙදනා වුත්තා භගවතා – සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා. යායං, භන්තෙ, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා, සන්තස්මිං එසා පණීතෙ සුඛෙ වුත්තා භගවතා’’ති. තතියම්පි ඛො ආයස්මා උදායී පඤ්චකඞ්ගං ථපතිං එතදවොච – ‘‘න ඛො, ථපති, ද්වෙ වෙදනා වුත්තා භගවතා. තිස්සො වෙදනා වුත්තා භගවතා. සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා තිස්සො වෙදනා වුත්තා භගවතා’’ති. තතියම්පි ඛො පඤ්චකඞ්ගො ථපති ආයස්මන්තං උදායිං එතදවොච – ‘‘න ඛො, භන්තෙ උදායි, තිස්සො වෙදනා වුත්තා භගවතා. ද්වෙ වෙදනා වුත්තා භගවතා – සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා. යායං, භන්තෙ, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා, සන්තස්මිං එසා පණීතෙ සුඛෙ වුත්තා භගවතා’’ති. නෙව සක්ඛි ආයස්මා උදායී පඤ්චකඞ්ගං ථපතිං සඤ්ඤාපෙතුං, න පනාසක්ඛි පඤ්චකඞ්ගො ථපති ආයස්මන්තං උදායිං සඤ්ඤාපෙතුං. අස්සොසි ඛො ආයස්මා ආනන්දො ආයස්මතො උදායිස්ස පඤ්චකඞ්ගෙන ථපතිනා සද්ධිං ඉමං කථාසල්ලාපං. २६७. त्यानंतर पंचकंग थपती जेथे आयुष्यमान उदायी होते तेथे गेला; जाऊन आयुष्यमान उदायींना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला पंचकंग थपती आयुष्यमान उदायींना म्हणाला – “भंते उदायी, भगवंतांनी किती प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत?” “थपती, भगवंतांनी तीन प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत. सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना – थपती, भगवंतांनी या तीन वेदना सांगितल्या आहेत.” असे म्हटले असता, पंचकंग थपती आयुष्यमान उदायींना म्हणाला – “भंते उदायी, भगवंतांनी तीन वेदना सांगितलेल्या नाहीत. भगवंतांनी दोनच वेदना सांगितल्या आहेत – सुखद वेदना आणि दुःखद वेदना. भंते, जी ही अदुःख-असुख वेदना आहे, ती भगवंतांनी शांत आणि प्रणीत सुखात सांगितली आहे.” दुसऱ्यांदाही आयुष्यमान उदायी पंचकंग थपतीला म्हणाले – “थपती, भगवंतांनी दोन वेदना सांगितलेल्या नाहीत. भगवंतांनी तीन वेदना सांगितल्या आहेत. सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना – या तीन वेदना भगवंतांनी सांगितल्या आहेत.” दुसऱ्यांदाही पंचकंग थपती आयुष्यमान उदायींना म्हणाला – “भंते उदायी, भगवंतांनी तीन वेदना सांगितलेल्या नाहीत. भगवंतांनी दोनच वेदना सांगितल्या आहेत – सुखद वेदना आणि दुःखद वेदना. भंते, जी ही अदुःख-असुख वेदना आहे, ती भगवंतांनी शांत आणि प्रणीत सुखात सांगितली आहे.” तिसऱ्यांदाही आयुष्यमान उदायी पंचकंग थपतीला म्हणाले – “थपती, भगवंतांनी दोन वेदना सांगितलेल्या नाहीत. भगवंतांनी तीन वेदना सांगितल्या आहेत. सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना – या तीन वेदना भगवंतांनी सांगितल्या आहेत.” तिसऱ्यांदाही पंचकंग थपती आयुष्यमान उदायींना म्हणाला – “भंते उदायी, भगवंतांनी तीन वेदना सांगितलेल्या नाहीत. भगवंतांनी दोनच वेदना सांगितल्या आहेत – सुखद वेदना आणि दुःखद वेदना. भंते, जी ही अदुःख-असुख वेदना आहे, ती भगवंतांनी शांत आणि प्रणीत सुखात सांगितली आहे.” आयुष्यमान उदायी पंचकंग थपतीला पटवून देऊ शकले नाहीत, आणि पंचकंग थपतीही आयुष्यमान उदायींना पटवून देऊ शकला नाही. आयुष्यमान आनंदांनी आयुष्यमान उदायींचा पंचकंग थपतीसोबतचा हा संवाद ऐकला. අථ ඛො ආයස්මා ආනන්දො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා ආනන්දො යාවතකො [Pg.424] ආයස්මතො උදායිස්ස පඤ්චකඞ්ගෙන ථපතිනා සද්ධිං අහොසි කථාසල්ලාපො තං සබ්බං භගවතො ආරොචෙසි. त्यानंतर आयुष्यमान आनंद जेथे भगवान होते तेथे गेले; जाऊन एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान आनंदांनी आयुष्यमान उदायींचा पंचकंग थपतीसोबत जेवढा काही संवाद झाला होता, तो सर्व भगवंतांना सांगितला. ‘‘සන්තමෙව, ආනන්ද, පරියායං පඤ්චකඞ්ගො ථපති උදායිස්ස භික්ඛුනො නාබ්භනුමොදි; සන්තඤ්ච පනානන්ද, පරියායං උදායී භික්ඛු පඤ්චකඞ්ගස්ස ථපතිනො නාබ්භනුමොදි. ද්වෙපි මයා, ආනන්ද, වෙදනා වුත්තා පරියායෙන. තිස්සොපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන. පඤ්චපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන. ඡපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන. අට්ඨාරසාපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන. ඡත්තිංසාපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන. අට්ඨසතම්පි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන. එවං පරියායදෙසිතො ඛො, ආනන්ද, මයා ධම්මො. එවං පරියායදෙසිතෙ ඛො, ආනන්ද, මයා ධම්මෙ යෙ අඤ්ඤමඤ්ඤස්ස සුභාසිතං සුලපිතං, න සමනුමඤ්ඤිස්සන්ති, න සමනුජානිස්සන්ති, න සමනුමොදිස්සන්ති, තෙසං එතං පාටිකඞ්ඛං – භණ්ඩනජාතා කලහජාතා විවාදාපන්නා අඤ්ඤමඤ්ඤං මුඛසත්තීහි විතුදන්තා විහරිස්සන්තීති. එවං පරියායදෙසිතො ඛො, ආනන්ද, මයා ධම්මො. එවං පරියායදෙසිතෙ ඛො, ආනන්ද, මයා ධම්මෙ යෙ අඤ්ඤමඤ්ඤස්ස සුභාසිතං සුලපිතං සමනුමඤ්ඤිස්සන්ති සමනුජානිස්සන්ති සමනුමොදිස්සන්ති, තෙසං එතං පාටිකඞ්ඛං – සමග්ගා සම්මොදමානා අවිවදමානා ඛීරොදකීභූතා අඤ්ඤමඤ්ඤං පියචක්ඛූහි සම්පස්සන්තා විහරිස්සන්තී’’ති. “आनंदा, सुतार पंचकंगने भिक्खू उदायीच्या अगदी योग्य अशा स्पष्टीकरणाचा स्वीकार केला नाही; आणि आनंदा, भिक्खू उदायीनेही सुतार पंचकंगच्या अगदी योग्य अशा स्पष्टीकरणाचा स्वीकार केला नाही. आनंदा, माझ्याद्वारे एका पद्धतीने दोन प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे दुसऱ्या पद्धतीने तीन प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे पाच प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे सहा प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे अठरा प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे छत्तीस प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. माझ्याद्वारे एकशे आठ प्रकारच्या वेदनाही सांगितल्या गेल्या आहेत. आनंदा, अशा प्रकारे माझ्याद्वारे वेगवेगळ्या पद्धतींनी धम्माचा उपदेश केला गेला आहे. आनंदा, जेव्हा माझ्याद्वारे अशा प्रकारे वेगवेगळ्या पद्धतींनी धम्माचा उपदेश केला गेला आहे, तेव्हा जे लोक एकमेकांनी चांगल्या प्रकारे मांडलेल्या आणि चांगल्या प्रकारे बोललेल्या गोष्टी मान्य करणार नाहीत, संमती देणार नाहीत आणि त्यांचा स्वीकार करणार नाहीत, त्यांच्याकडून अशीच अपेक्षा केली जाऊ शकते की—ते भांडणखोर, कलहप्रिय आणि वादात पडणारे बनून एकमेकांवर शब्दांचे भाले फेकत जगतील. परंतु आनंदा, जेव्हा माझ्याद्वारे अशा प्रकारे वेगवेगळ्या पद्धतींनी धम्माचा उपदेश केला गेला आहे, तेव्हा जे लोक एकमेकांनी चांगल्या प्रकारे मांडलेल्या आणि चांगल्या प्रकारे बोललेल्या गोष्टी मान्य करतील, संमती देतील आणि त्यांचा स्वीकार करतील, त्यांच्याकडून अशी अपेक्षा केली जाऊ शकते की—ते ऐक्याने, आनंदाने, वाद न घालता, दुधात पाणी मिळावे तसे एकरूप होऊन, एकमेकांकडे प्रेमाच्या नजरेने पाहत राहतील.” ‘‘පඤ්චිමෙ, ආනන්ද, කාමගුණා. කතමෙ පඤ්ච? චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා…පෙ… කායවිඤ්ඤෙය්යා ඵොට්ඨබ්බා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. ඉමෙ ඛො, ආනන්ද, පඤ්ච කාමගුණා. යං ඛො, ආනන්ද, ඉමෙ පඤ්ච කාමගුණෙ පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං – ඉදං වුච්චති කාමසුඛං. යෙ ඛො, ආනන්ද, එවං වදෙය්යුං – ‘එතංපරමං සන්තං සුඛං සොමනස්සං පටිසංවෙදෙන්තී’ති – ඉදං නෙසාහං නානුජානාමි. තං කිස්ස හෙතු? අත්ථානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. “आनंदा, हे पाच कामगुण आहेत. कोणते पाच? डोळ्यांनी जाणता येणारे रूप, जे इष्ट, प्रिय, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत... तसेच शरीराने जाणता येणारे स्पर्श, जे इष्ट, प्रिय, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे आहेत. आनंदा, हेच ते पाच कामगुण आहेत. आनंदा, या पाच कामगुणांवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, त्याला 'कामसुख' असे म्हणतात. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘කතමඤ්චානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච? ඉධානන්ද, භික්ඛු විවිච්චෙව කාමෙහි විවිච්ච අකුසලෙහි ධම්මෙහි සවිතක්කං සවිචාරං විවෙකජං පීතිසුඛං පඨමං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං ඛො, ආනන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. යෙ ඛො, ආනන්ද, එවං [Pg.425] වදෙය්යුං – ‘එතංපරමං සන්තං සුඛං සොමනස්සං පටිසංවෙදෙන්තී’ති – ඉදං නෙසාහං නානුජානාමි. තං කිස්ස හෙතු? අත්ථානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते आहे? आनंदा, येथे भिक्खू कामभोगांपासून अलिप्त राहून, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त राहून, वितर्क आणि विचारांसह असणाऱ्या, अलिप्ततेपासून उत्पन्न झालेल्या प्रीती आणि सुखाने युक्त अशा पहिल्या ध्यानाचा लाभ घेऊन विहरतो. आनंदा, हेच ते या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘කතමඤ්චානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච? ඉධානන්ද, භික්ඛු, විතක්කවිචාරානං වූපසමා අජ්ඣත්තං සම්පසාදනං චෙතසො එකොදිභාවං අවිතක්කං අවිචාරං සමාධිජං පීතිසුඛං දුතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං ඛො, ආනන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. යෙ ඛො, ආනන්ද, එවං වදෙය්යුං – ‘එතංපරමං සන්තං සුඛං සොමනස්සං පටිසංවෙදෙන්තී’ති – ඉදං නෙසාහං නානුජානාමි. තං කිස්ස හෙතු? අත්ථානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते आहे? आनंदा, येथे भिक्खू वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्यामुळे, चित्ताच्या अंतर्गत प्रसन्नतेने आणि एकाग्रतेने युक्त असणाऱ्या, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीपासून उत्पन्न झालेल्या प्रीती आणि सुखाने युक्त अशा दुसऱ्या ध्यानाचा लाभ घेऊन विहरतो. आनंदा, हेच ते या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘කතමඤ්චානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච? ඉධානන්ද, භික්ඛු පීතියා ච විරාගා උපෙක්ඛකො ච විහරති සතො ච සම්පජානො, සුඛඤ්ච කායෙන පටිසංවෙදෙති, යං තං අරියා ආචික්ඛන්ති – ‘උපෙක්ඛකො සතිමා සුඛවිහාරී’ති තතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං ඛො, ආනන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. යෙ ඛො, ආනන්ද, එවං වදෙය්යුං – ‘එතංපරමං සන්තං සුඛං සොමනස්සං පටිසංවෙදෙන්තී’ති – ඉදං නෙසාහං නානුජානාමි. තං කිස්ස හෙතු? අත්ථානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते आहे? आनंदा, येथे भिक्खू प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे उपेक्षक राहून विहरतो, तसेच तो स्मृतिमान आणि प्रज्ञावान असतो, आणि शरीराने सुखाचा अनुभव घेतो; ज्याच्याविषयी आर्य लोक असे म्हणतात की—'तो उपेक्षक, स्मृतिमान आणि सुखविहारी आहे'—अशा तिसऱ्या ध्यानाचा लाभ घेऊन विहरतो. आनंदा, हेच ते या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘කතමඤ්චානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච? ඉධානන්ද, භික්ඛු සුඛස්ස ච පහානා දුක්ඛස්ස ච පහානා පුබ්බෙව සොමනස්සදොමනස්සානං අත්ථඞ්ගමා අදුක්ඛමසුඛං උපෙක්ඛාසතිපාරිසුද්ධිං චතුත්ථං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං ඛො, ආනන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. යෙ ඛො, ආනන්ද, එවං වදෙය්යුං – ‘එතංපරමං සන්තං සුඛං සොමනස්සං පටිසංවෙදෙන්තී’ති – ඉදං නෙසාහං නානුජානාමි. තං කිස්ස හෙතු? අත්ථානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते आहे? आनंदा, येथे भिक्खू सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच आधीच सौमनस्य आणि दौर्मनस्य नष्ट झाल्यामुळे, जे दुःखही नाही आणि सुखही नाही अशा उपेक्षेमुळे स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त असणाऱ्या चौथ्या ध्यानाचा लाभ घेऊन विहरतो. आनंदा, हेच ते या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘කතමඤ්චානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච? ඉධානන්ද, භික්ඛු සබ්බසො රූපසඤ්ඤානං සමතික්කමා, පටිඝසඤ්ඤානං අත්ථඞ්ගමා, නානත්තසඤ්ඤානං අමනසිකාරා, ‘අනන්තො ආකාසො’ති ආකාසානඤ්චායතනං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං ඛො, ආනන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. යෙ ඛො, ආනන්ද, එවං වදෙය්යුං – ‘එතංපරමං සන්තං [Pg.426] සුඛං සොමනස්සං පටිසංවෙදෙන්තී’ති – ඉදං නෙසාහං නානුජානාමි. තං කිස්ස හෙතු? අත්ථානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते आहे? आनंदा, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांचे पूर्णपणे उल्लंघन करून, प्रतिघसंज्ञांच्या अस्त होण्यामुळे, नानात्वसंज्ञांकडे मन न दिल्यामुळे, 'आकाश अनंत आहे' अशा भावनेने आकाशानंत्यायतनाचा लाभ घेऊन विहरतो. आनंदा, हेच ते या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे लोक असे म्हणतील की—'प्राणी ज्याचा अनुभव घेतात ते हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे'—त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे.” ‘‘කතමඤ්චානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච? ඉධානන්ද, භික්ඛු සබ්බසො ආකාසානඤ්චායතනං සමතික්කම්ම, ‘අනන්තං විඤ්ඤාණ’න්ති විඤ්ඤාණඤ්චායතනං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං ඛො, ආනන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. යෙ ඛො, ආනන්ද, එවං වදෙය්යුං – ‘එතංපරමං සන්තං සුඛං සොමනස්සං පටිසංවෙදෙන්තී’ති – ඉදං නෙසාහං නානුජානාමි. තං කිස්ස හෙතු? අත්ථානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते? आनंदा, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे आकासानञ्चायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'विज्ञान अनंत आहे' असे जाणत विञ्ञाणञ्चायतनात प्रवेश करून विहरतो. आनंदा, हेच त्या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे कोणी असे म्हणतील की—'हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे ज्याचा ते अनुभव घेतात'—तर त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे।” ‘‘කතමඤ්චානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච? ඉධානන්ද, භික්ඛු සබ්බසො විඤ්ඤාණඤ්චායතනං සමතික්කම්ම, ‘නත්ථි කිඤ්චී’ති ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං ඛො, ආනන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. යෙ ඛො, ආනන්ද, එවං වදෙය්යුං – ‘එතංපරමං සන්තං සුඛං සොමනස්සං පටිසංවෙදෙන්තී’ති – ඉදං නෙසාහං නානුජානාමි. තං කිස්ස හෙතු? අත්ථානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते? आनंदा, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे विञ्ञाणञ्चायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'काहीही नाही' असे जाणत आकिञ्चञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. आनंदा, हेच त्या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे कोणी असे म्हणतील की—'हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे ज्याचा ते अनुभव घेतात'—तर त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे।” ‘‘කතමඤ්චානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච? ඉධානන්ද, භික්ඛු සබ්බසො ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං සමතික්කම්ම නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං ඛො, ආනන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. යෙ ඛො, ආනන්ද, එවං වදෙය්යුං – ‘එතංපරමං සන්තං සුඛං සොමනස්සං පටිසංවෙදෙන්තී’ති – ඉදං නෙසාහං නානුජානාමි. තං කිස්ස හෙතු? අත්ථානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते? आनंदा, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे आकिञ्चञ्ञायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. आनंदा, हेच त्या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे. आनंदा, जे कोणी असे म्हणतील की—'हेच परम शांत सुख आणि सौमनस्य आहे ज्याचा ते अनुभव घेतात'—तर त्यांचे हे म्हणणे मी मान्य करत नाही. त्याचे कारण काय? आनंदा, कारण या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख अस्तित्वात आहे।” ‘‘කතමඤ්චානන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච? ඉධානන්ද, භික්ඛු සබ්බසො නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං සමතික්කම්ම සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං ඛො, ආනන්ද, එතම්හා සුඛා අඤ්ඤං සුඛං අභික්කන්තතරඤ්ච පණීතතරඤ්ච. “आणि आनंदा, या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख कोणते? आनंदा, येथे भिक्खू सर्व प्रकारे नेवसञ्ञानासञ्ञायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून सञ्ञावेदयितनिरोधात प्रवेश करून विहरतो. आनंदा, हेच त्या सुखापेक्षा अधिक उत्कृष्ट आणि अधिक श्रेष्ठ असे दुसरे सुख आहे।” ‘‘ඨානං ඛො පනෙතං, ආනන්ද, විජ්ජති යං අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා එවං වදෙය්යුං – ‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමණො ගොතමො ආහ, තඤ්ච සුඛස්මිං [Pg.427] පඤ්ඤපෙති. තයිදං කිංසු, තයිදං කථංසූ’ති? එවංවාදිනො, ආනන්ද, අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා එවමස්සු වචනීයා – ‘න ඛො, ආවුසො, භගවා සුඛඤ්ඤෙව වෙදනං සන්ධාය සුඛස්මිං පඤ්ඤපෙති. යත්ථ යත්ථ, ආවුසො, සුඛං උපලබ්භති, යහිං යහිං, තං තං තථාගතො සුඛස්මිං පඤ්ඤපෙතී’’’ති. නවමං. “आनंदा, अशी शक्यता आहे की इतर पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—'श्रमण गौतम संज्ञा आणि वेदनांच्या निरोधाविषयी बोलतात आणि त्याला सुखात समाविष्ट करतात. हे काय आहे? हे कसे काय?' आनंदा, असे बोलणाऱ्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे उत्तर दिले पाहिजे—'मित्रांनो, भगवान केवळ सुखद वेदनेचा संदर्भ देऊनच त्याला सुखात समाविष्ट करत नाहीत. तर मित्रांनो, जिथे जिथे आणि ज्या ज्या प्रकारे सुख प्राप्त होते, तथागत त्याला सुखात समाविष्ट करतात (सुख म्हणून घोषित करतात).'” नववे. 10. භික්ඛුසුත්තං १०. भिक्खू सुत्त 268. ‘‘ද්වෙපි මයා, භික්ඛවෙ, වෙදනා වුත්තා පරියායෙන, තිස්සොපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන, පඤ්චපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන, ඡපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන, අට්ඨාරසාපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන, ඡත්තිංසාපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන, අට්ඨසතම්පි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන. එවං පරියායදෙසිතො, භික්ඛවෙ, මයා ධම්මො. එවං පරියායදෙසිතෙ ඛො, භික්ඛවෙ, මයා ධම්මෙ යෙ අඤ්ඤමඤ්ඤස්ස සුභාසිතං සුලපිතං න සමනුමඤ්ඤිස්සන්ති, න සමනුජානිස්සන්ති, න සමනුමොදිස්සන්ති, තෙසං එතං පාටිකඞ්ඛං – භණ්ඩනජාතා කලහජාතා විවාදාපන්නා අඤ්ඤමඤ්ඤං මුඛසත්තීහි විතුදන්තා විහරිස්සන්තීති. එවං පරියායදෙසිතො, භික්ඛවෙ, මයා ධම්මො. එවං පරියායදෙසිතෙ ඛො, භික්ඛවෙ, මයා ධම්මෙ යෙ අඤ්ඤමඤ්ඤස්ස සුභාසිතං සුලපිතං සමනුමඤ්ඤිස්සන්ති සමනුජානිස්සන්ති සමනුමොදිස්සන්ති, තෙසං එතං පාටිකඞ්ඛං – සමග්ගා සම්මොදමානා අවිවදමානා ඛීරොදකීභූතා අඤ්ඤමඤ්ඤං පියචක්ඛූහි සම්පස්සන්තා විහරිස්සන්තීති. २६८. “भिक्खूंनो, मी वेगवेगळ्या पद्धतीने (पर्यायाने) दोन वेदना सांगितल्या आहेत, तीन वेदना सांगितल्या आहेत, पाच वेदना सांगितल्या आहेत, सहा वेदना सांगितल्या आहेत, अठरा वेदना सांगितल्या आहेत, छत्तीस वेदना सांगितल्या आहेत आणि एकशे आठ वेदना देखील वेगवेगळ्या पद्धतीने सांगितल्या आहेत. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे मी वेगवेगळ्या पद्धतीने धम्माचा उपदेश केला आहे. भिक्खूंनो, माझ्याद्वारे अशा प्रकारे वेगवेगळ्या पद्धतीने धम्माचा उपदेश केला गेला असताना, जे एकमेकांच्या सुभाषित आणि सुभाषित वचनांना संमती देणार नाहीत, मान्यता देणार नाहीत आणि आनंद व्यक्त करणार नाहीत, त्यांच्याकडून अशीच अपेक्षा केली जाऊ शकते की—ते भांडण, कलह आणि वादात पडून एकमेकांवर शब्दांचे भाले (मुखरूपी शस्त्रे) चालवत राहतील. भिक्खूंनो, अशा प्रकारे मी वेगवेगळ्या पद्धतीने धम्माचा उपदेश केला आहे. भिक्खूंनो, माझ्याद्वारे अशा प्रकारे वेगवेगळ्या पद्धतीने धम्माचा उपदेश केला गेला असताना, जे एकमेकांच्या सुभाषित आणि सुभाषित वचनांना संमती देतील, मान्यता देतील आणि आनंद व्यक्त करतील, त्यांच्याकडून अशी अपेक्षा केली जाऊ शकते की—ते ऐक्याने, आनंदाने, वाद न घालता, दुधात पाणी मिळावे तसे एकरूप होऊन, एकमेकांकडे प्रेमळ नजरेने पाहत विहरतील।” ‘‘පඤ්චිමෙ, භික්ඛවෙ, කාමගුණා…පෙ… ඨානං ඛො පනෙතං, භික්ඛවෙ, විජ්ජති යං අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා එවං වදෙය්යුං – ‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමණො ගොතමො ආහ, තඤ්ච සුඛස්මිං පඤ්ඤපෙති. තයිදං කිංසු, තයිදං කථංසූ’ති? එවංවාදිනො, භික්ඛවෙ, අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා එවමස්සු වචනීයා – ‘න ඛො, ආවුසො, භගවා සුඛඤ්ඤෙව වෙදනං සන්ධාය සුඛස්මිං පඤ්ඤපෙති. යත්ථ යත්ථ, ආවුසො, සුඛං උපලබ්භති යහිං යහිං, තං තං තථාගතො සුඛස්මිං පඤ්ඤපෙතී’’ති. දසමං. “भिक्खूंनो, हे पाच कामगुण आहेत... (पेय्याल)... भिक्खूंनो, अशी शक्यता आहे की इतर पंथांचे परिव्राजक असे म्हणतील—'श्रमण गौतम संज्ञा आणि वेदनांच्या निरोधाविषयी बोलतात आणि त्याला सुखात समाविष्ट करतात. हे काय आहे? हे कसे काय?' भिक्खूंनो, असे बोलणाऱ्या इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे उत्तर दिले पाहिजे—'मित्रांनो, भगवान केवळ सुखद वेदनेचा संदर्भ देऊनच त्याला सुखात समाविष्ट करत नाहीत. तर मित्रांनो, जिथे जिथे आणि ज्या ज्या प्रकारे सुख प्राप्त होते, तथागत त्याला सुखात समाविष्ट करतात (सुख म्हणून घोषित करतात).'” दहावे. රහොගතවග්ගො දුතියො. दुसरा रहुगतवर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा संग्रह (उद्दान) — රහොගතං [Pg.428] ද්වෙ ආකාසං, අගාරං ද්වෙ ච ආනන්දා; සම්බහුලා දුවෙ වුත්තා, පඤ්චකඞ්ගො ච භික්ඛුනාති. रहुगत, दोन आकास, अगार, दोन आनंद, दोन संबहुला, पञ्चकङ्ग आणि भिक्खू. 3. අට්ඨසතපරියායවග්ගො ३. अट्ठसतपरियायवर्ग (एकशे आठ प्रकारांचा वर्ग) 1. සීවකසුත්තං १. सीवक सुत्त 269. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අථ ඛො මොළියසීවකො පරිබ්බාජකො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො මොළියසීවකො පරිබ්බාජකො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සන්ති, භො ගොතම, එකෙ සමණබ්රාහ්මණා එවංවාදිනො එවංදිට්ඨිනො – ‘යං කිඤ්චායං පුරිසපුග්ගලො පටිසංවෙදෙති සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා සබ්බං තං පුබ්බෙකතහෙතූ’ති. ඉධ භවං ගොතමො කිමාහා’’ති? २६९. एकदा भगवान राजगृहातील वेळुवनात कलन्दकनिवाप येथे विहरत होते. तेव्हा मोळियसीवक परिव्राजक भगवंतांकडे आला; जवळ येऊन त्याने भगवंतांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या मोळियसीवक परिव्राजकाने भगवंतांना असे म्हटले—'हे गौतम, काही श्रमण आणि ब्राह्मण असे मानणारे व अशी दृष्टी असणारे आहेत की—हा मनुष्य जे काही सुख, दुःख किंवा अदुःख-असुख (उदासीन) वेदना अनुभवतो, ते सर्व त्याच्या पूर्वकर्माच्या प्रभावामुळे (पूर्वकृत हेतूने) होते. यावर आदरणीय गौतम काय म्हणतात?' ‘‘පිත්තසමුට්ඨානානිපි ඛො, සීවක, ඉධෙකච්චානි වෙදයිතානි උප්පජ්ජන්ති. සාමම්පි ඛො එතං, සීවක, වෙදිතබ්බං යථා පිත්තසමුට්ඨානානිපි ඉධෙකච්චානි වෙදයිතානි උප්පජ්ජන්ති; ලොකස්සපි ඛො එතං, සීවක, සච්චසම්මතං යථා පිත්තසමුට්ඨානානිපි ඉධෙකච්චානි වෙදයිතානි උප්පජ්ජන්ති. තත්ර, සීවක, යෙ තෙ සමණබ්රාහ්මණා එවංවාදිනො එවංදිට්ඨිනො – ‘යං කිඤ්චායං පුරිසපුග්ගලො පටිසංවෙදෙති සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා සබ්බං තං පුබ්බෙකතහෙතූ’ති. යඤ්ච සාමං ඤාතං තඤ්ච අතිධාවන්ති, යඤ්ච ලොකෙ සච්චසම්මතං තඤ්ච අතිධාවන්ති. තස්මා තෙසං සමණබ්රාහ්මණානං මිච්ඡාති වදාමි. हे सीवक, या जगात पित्तप्रकोपामुळे उत्पन्न होणाऱ्या काही वेदना खरोखरच उत्पन्न होतात. हे सीवक, पित्तप्रकोपामुळे या जगात काही वेदना उत्पन्न होतात, हे स्वतःच्या अनुभवाने देखील जाणता येते; आणि हे सीवक, पित्तप्रकोपामुळे या जगात काही वेदना उत्पन्न होतात, हे जगामध्ये देखील सत्य मानले जाते. तेथे, हे सीवक, जे श्रमण आणि ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की—'हा पुरुष-पुद्गल जे काही सुख, दुःख किंवा अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, ते सर्व पूर्वकर्माच्या हेतूमुळेच होते.' ते स्वतःच्या अनुभवाने जाणलेल्या गोष्टीचेही उल्लंघन करतात आणि जगात जे सत्य मानले गेले आहे त्याचेही उल्लंघन करतात. म्हणूनच, त्या श्रमण-ब्राह्मणांचे हे मत चुकीचे आहे, असे मी म्हणतो. ‘‘සෙම්හසමුට්ඨානානිපි ඛො, සීවක…පෙ… වාතසමුට්ඨානානිපි ඛො, සීවක…පෙ… සන්නිපාතිකානිපි ඛො, සීවක…පෙ… උතුපරිණාමජානිපි ඛො, සීවක…පෙ… විසමපරිහාරජානිපි ඛො, සීවක…පෙ… ඔපක්කමිකානිපි ඛො, සීවක…පෙ… කම්මවිපාකජානිපි ඛො, සීවක, ඉධෙකච්චානි වෙදයිතානි උප්පජ්ජන්ති. සාමම්පි ඛො එතං, සීවක, වෙදිතබ්බං. යථා කම්මවිපාකජානිපි ඉධෙකච්චානි [Pg.429] වෙදයිතානි උප්පජ්ජන්ති; ලොකස්සපි ඛො එතං, සීවක, සච්චසම්මතං. යථා කම්මවිපාකජානිපි ඉධෙකච්චානි වෙදයිතානි උප්පජ්ජන්ති; තත්ර, සීවක, යෙ තෙ සමණබ්රාහ්මණා එවංවාදිනො එවංදිට්ඨිනො – ‘යං කිඤ්චායං පුරිසපුග්ගලො පටිසංවෙදෙති සුඛං වා දුක්ඛං වා අදුක්ඛමසුඛං වා සබ්බං තං පුබ්බෙකතහෙතූ’ති. යඤ්ච සාමං ඤාතං තඤ්ච අතිධාවන්ති යඤ්ච ලොකෙ සච්චසම්මතං තඤ්ච අතිධාවන්ති. තස්මා තෙසං සමණබ්රාහ්මණානං මිච්ඡාති වදාමීති. එවං වුත්තෙ, මොළියසීවකො පරිබ්බාජකො භගවන්තං එතදවොච – ‘අභික්කන්තං, භො ගොතම, අභික්කන්තං, භො ගොතම …පෙ… උපාසකං මං භවං ගොතමො ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’’න්ති. हे सीवक, कफप्रकोपामुळे उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, वातप्रकोपामुळे उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, तिन्ही दोषांच्या एकत्र येण्यामुळे (सन्निपात) उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, ऋतूंच्या परिवर्तनामुळे उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, अयोग्य वागणुकीमुळे उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, बाह्य उपक्रमांमुळे उत्पन्न होणाऱ्या... हे सीवक, कर्मविपाकामुळे उत्पन्न होणाऱ्या काही वेदना या जगात खरोखरच उत्पन्न होतात. हे सीवक, कर्मविपाकामुळे काही वेदना उत्पन्न होतात, हे स्वतःच्या अनुभवाने देखील जाणता येते; आणि हे सीवक, कर्मविपाकामुळे काही वेदना उत्पन्न होतात, हे जगामध्ये देखील सत्य मानले जाते. तेथे, हे सीवक, जे श्रमण आणि ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे व अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की—'हा पुरुष-पुद्गल जे काही सुख, दुःख किंवा अदुःख-असुख वेदना अनुभवतो, ते सर्व पूर्वकर्माच्या हेतूमुळेच होते.' ते स्वतःच्या अनुभवाने जाणलेल्या गोष्टीचेही उल्लंघन करतात आणि जगात जे सत्य मानले गेले आहे त्याचेही उल्लंघन करतात. म्हणूनच, त्या श्रमण-ब्राह्मणांचे हे मत चुकीचे आहे, असे मी म्हणतो. असे म्हटले असता, मोळियसीवक परिव्राजक भगवंतांना म्हणाला—'अतिशय सुंदर, हे गौतम! अतिशय सुंदर, हे गौतम! ... आजपासून मला भगवंत गौतमांनी जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.' ‘‘පිත්තං සෙම්හඤ්ච වාතො ච, සන්නිපාතා උතූනි ච; විසමං ඔපක්කමිකං, කම්මවිපාකෙන අට්ඨමී’’ති. පඨමං; पित्त, कफ आणि वात, तिन्ही दोषांचे एकत्र येणे (सन्निपात), ऋतूंचे परिवर्तन, अयोग्य वागणूक, बाह्य उपक्रम आणि आठवे कारण म्हणजे कर्मविपाक. (पहिले सुत्त समाप्त) 2. අට්ඨසතසුත්තං २. अट्ठसत सुत्त (एकशे आठ प्रकारच्या वेदनांचे सुत्त) 270. ‘‘අට්ඨසතපරියායං වො, භික්ඛවෙ, ධම්මපරියායං දෙසෙස්සාමි. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, අට්ඨසතපරියායො, ධම්මපරියායො? ද්වෙපි මයා, භික්ඛවෙ, වෙදනා වුත්තා පරියායෙන; තිස්සොපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන; පඤ්චපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන; ඡපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන; අට්ඨාරසාපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන; ඡත්තිංසාපි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන; අට්ඨසතම්පි මයා වෙදනා වුත්තා පරියායෙන. ‘‘කතමා ච, භික්ඛවෙ, ද්වෙ වෙදනා? කායිකා ච චෙතසිකා ච – ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, ද්වෙ වෙදනා. කතමා ච, භික්ඛවෙ, තිස්සො වෙදනා? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, තිස්සො වෙදනා. කතමා ච, භික්ඛවෙ, පඤ්ච වෙදනා? සුඛින්ද්රියං, දුක්ඛින්ද්රියං, සොමනස්සින්ද්රියං, දොමනස්සින්ද්රියං, උපෙක්ඛින්ද්රියං – ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, පඤ්ච වෙදනා. කතමා ච, භික්ඛවෙ, ඡ වෙදනා? චක්ඛුසම්ඵස්සජා වෙදනා…පෙ… මනොසම්ඵස්සජා වෙදනා – ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, ඡ වෙදනා. කතමා ච, භික්ඛවෙ, අට්ඨාරස වෙදනා? ඡ සොමනස්සූපවිචාරා, ඡ දොමනස්සූපවිචාරා, ඡ උපෙක්ඛූපවිචාරා – ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, අට්ඨාරස වෙදනා. කතමා ච, භික්ඛවෙ, ඡත්තිංස වෙදනා? ඡ ගෙහසිතානි සොමනස්සානි, ඡ නෙක්ඛම්මසිතානි සොමනස්සානි, ඡ ගෙහසිතානි දොමනස්සානි, ඡ නෙක්ඛම්මසිතානි [Pg.430] දොමනස්සානි, ඡ ගෙහසිතා උපෙක්ඛා, ඡ නෙක්ඛම්මසිතා උපෙක්ඛා – ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, ඡත්තිංස වෙදනා. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අට්ඨසතං වෙදනා? අතීතා ඡත්තිංස වෙදනා, අනාගතා ඡත්තිංස වෙදනා, පච්චුප්පන්නා ඡත්තිංස වෙදනා – ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, අට්ඨසතං වෙදනා. අයං, භික්ඛවෙ, අට්ඨසතපරියායො ධම්මපරියායො’’ති. දුතියං. २७०. भिक्खूूंनो, मी तुम्हांला एकशे आठ प्रकारच्या वेदनांच्या विश्लेषणाची धम्मदेशना देईन. ती लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूूंनो, एकशे आठ प्रकारच्या वेदनांचे विश्लेषण करणारी धम्मदेशना कोणती आहे? भिक्खूूंनो, मी एका पद्धतीने दोन प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; दुसऱ्या पद्धतीने तीन प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; पाच प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; सहा प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; अठरा प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; छत्तीस प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत; आणि एका पद्धतीने एकशे आठ प्रकारच्या वेदना सांगितल्या आहेत. आणि भिक्खूूंनो, दोन प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? शारीरिक आणि मानसिक—भिक्खूूंनो, यांना दोन प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, तीन प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख (उदासीन) वेदना—भिक्खूूंनो, यांना तीन प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, पाच प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? सुखेंद्रिय, दुःखेंद्रिय, सौमनस्येंद्रिय, दौर्मनस्येंद्रिय आणि उपेक्षेंद्रिय—भिक्खूूंनो, यांना पाच प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, सहा प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? चक्षु-संस्पर्शजन्य वेदना... आणि मन-संस्पर्शजन्य वेदना—भिक्खूूंनो, यांना सहा प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, अठरा प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? सहा सौमनस्य-उपविचार, सहा दौर्मनस्य-उपविचार आणि सहा उपेक्षा-उपविचार—भिक्खूूंनो, यांना अठरा प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, छत्तीस प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? गृहस्थजीवनावर आधारित सहा सौमनस्य वेदना, नैष्क्रम्यावर आधारित सहा सौमनस्य वेदना; गृहस्थजीवनावर आधारित सहा दौर्मनस्य वेदना, नैष्क्रम्यावर आधारित सहा दौर्मनस्य वेदना; गृहस्थजीवनावर आधारित सहा उपेक्षा वेदना, नैष्क्रम्यावर आधारित सहा उपेक्षा वेदना—भिक्खूूंनो, यांना छत्तीस प्रकारच्या वेदना म्हणतात. आणि भिक्खूूंनो, एकशे आठ प्रकारच्या वेदना कोणत्या आहेत? भूतकाळातील छत्तीस वेदना, भविष्यकाळातील छत्तीस वेदना आणि वर्तमानकाळातील छत्तीस वेदना—भिक्खूूंनो, यांना एकशे आठ प्रकारच्या वेदना म्हणतात. भिक्खूूंनो, हाच एकशे आठ प्रकारच्या वेदनांच्या विश्लेषणाचा धम्मपर्याय आहे. (दुसरे सुत्त समाप्त) 3. අඤ්ඤතරභික්ඛුසුත්තං ३. अञ्ञतरभिक्खू सुत्त (एका भिक्खूचे सुत्त) 271. අථ ඛො අඤ්ඤතරො භික්ඛු යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො සො භික්ඛු භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කතමා නු ඛො, භන්තෙ, වෙදනා, කතමො වෙදනාසමුදයො, කතමා වෙදනාසමුදයගාමිනී පටිපදා? කතමො වෙදනානිරොධො, කතමා වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා? කො වෙදනාය අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණ’’න්ති? २७१. त्यानंतर एक भिक्खू भगवंतांकडे गेला; तिथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तो भिक्खू भगवंतांना म्हणाला—'भंते, वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम (समुदय) कसा होतो? वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा निरोध कसा होतो? वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा आस्वाद (आकर्षण) काय आहे? तिचा दोष (आदीनव) काय आहे? आणि तिच्यातून सुटका (निःसरण) कशी होते?' ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛු, වෙදනා – සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛු, වෙදනා. ඵස්සසමුදයා වෙදනාසමුදයො. තණ්හා වෙදනාසමුදයගාමිනී පටිපදා. ඵස්සනිරොධා වෙදනානිරොධො. අයමෙව අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි…පෙ… සම්මාසමාධි. යං වෙදනං පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං, අයං වෙදනාය අස්සාදො; යා වෙදනා අනිච්චා දුක්ඛා විපරිණාමධම්මා, අයං වෙදනාය ආදීනවො; යො වෙදනාය ඡන්දරාගවිනයො ඡන්දරාගප්පහානං, ඉදං වෙදනාය නිස්සරණ’’න්ති. තතියං. भिक्खू, या तीन वेदना आहेत—सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख (उदासीन) वेदना. भिक्खू, यांनाच वेदना म्हणतात. स्पर्शाच्या उगमामुळे वेदनेचा उगम होतो. तृष्णा हा वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग आहे. स्पर्शाच्या निरोधामुळे वेदनेचा निरोध होतो. हाच आर्य अष्टांगिक मार्ग वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग आहे, म्हणजेच—सम्यक दृष्टी... सम्यक समाधी. वेदनेवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य (आनंद) उत्पन्न होते, तो वेदनेचा आस्वाद आहे; जी वेदना अनित्य, दुःखद आणि परिवर्तनशील स्वभावाची आहे, तो वेदनेचा दोष आहे; वेदनेविषयीच्या इच्छा-रागाचे (छंदराग) नियंत्रण करणे आणि इच्छा-रागाचा त्याग करणे, हे वेदनेतून सुटका (निःसरण) मिळवणे आहे. (तिसरे सुत्त समाप्त) 4. පුබ්බසුත්තං ४. पुब्ब सुत्त (पूर्वीचे सुत्त) 272. ‘‘පුබ්බෙව මෙ, භික්ඛවෙ, සම්බොධා අනභිසම්බුද්ධස්ස බොධිසත්තස්සෙව සතො එතදහොසි – ‘කතමා නු ඛො වෙදනා, කතමො වෙදනාසමුදයො, කතමා වෙදනාසමුදයගාමිනී පටිපදා, කතමො වෙදනානිරොධො, කතමා වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා? කො වෙදනාය අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණ’න්ති? තස්ස මය්හං, භික්ඛවෙ, එතදහොසි – ‘තිස්සො ඉමා වෙදනා – සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. ඉමා වුච්චන්ති වෙදනා. ඵස්සසමුදයා වෙදනාසමුදයො. තණ්හා වෙදනාසමුදයගාමිනී පටිපදා…පෙ… යො වෙදනාය ඡන්දරාගවිනයො ඡන්දරාගප්පහානං. ඉදං වෙදනාය නිස්සරණ’’’න්ති. චතුත්ථං. २७२. “भिक्खूहो, संबोधीच्या (पूर्ण ज्ञानाच्या) पूर्वी, मी अजून पूर्णपणे संबुद्ध नसताना, केवळ एक बोधिसत्व असताना माझ्या मनात असा विचार आला – ‘वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम (समुदय) काय? वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा निरोध काय? वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेतील आस्वाद (सुखदता) काय? तिचा दोष (आदीनव) काय? आणि तिच्यातून सुटका (निस्सरण) काय?’ भिक्खूहो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – ‘या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना (सुखा वेदना), दुःखद वेदना (दुःखा वेदना) आणि सुखदही नसलेली व दुःखदही नसलेली वेदना (अदुक्खमसुखा वेदना). यांना वेदना असे म्हणतात. स्पर्शाच्या उगमामुळे (फस्ससमुदया) वेदनेचा उगम होतो. तृष्णा (तण्हा) हा वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग आहे... पे... वेदनेतील जो इच्छा-राग दूर करणे (छंदरागविनय) व इच्छा-रागाचा त्याग करणे (छंदरागप्पहान) आहे, हेच वेदनेतून सुटका (निस्सरण) आहे.’” चौथे. 5. ඤාණසුත්තං ५. ज्ञानसुत्त 273. ‘‘‘ඉමා [Pg.431] වෙදනා’ති මෙ, භික්ඛවෙ, පුබ්බෙ අනනුස්සුතෙසු ධම්මෙසු චක්ඛුං උදපාදි, ඤාණං උදපාදි, පඤ්ඤා උදපාදි, විජ්ජා උදපාදි, ආලොකො උදපාදි. ‘අයං වෙදනාසමුදයො’ති මෙ, භික්ඛවෙ, පුබ්බෙ අනනුස්සුතෙසු ධම්මෙසු චක්ඛුං උදපාදි…පෙ… ආලොකො උදපාදි. ‘අයං වෙදනාසමුදයගාමිනී පටිපදා’ති මෙ, භික්ඛවෙ, පුබ්බෙ අනනුස්සුතෙසු ධම්මෙසු චක්ඛුං උදපාදි…පෙ… ‘අයං වෙදනානිරොධො’ති මෙ, භික්ඛවෙ, පුබ්බෙ අනනුස්සුතෙසු ධම්මෙසු චක්ඛුං උදපාදි …පෙ… ‘අයං වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා’ති මෙ, භික්ඛවෙ, පුබ්බෙ අනනුස්සුතෙසු ධම්මෙසු චක්ඛුං උදපාදි…පෙ… ‘අයං වෙදනාය අස්සාදො’ති මෙ, භික්ඛවෙ, පුබ්බෙ අනනුස්සුතෙසු ධම්මෙසු…පෙ… ‘අයං වෙදනාය ආදීනවො’ති මෙ, භික්ඛවෙ, පුබ්බෙ අනනුස්සුතෙසු ධම්මෙසු…පෙ… ‘ඉදං ඛො නිස්සරණ’න්ති මෙ, භික්ඛවෙ, පුබ්බෙ අනනුස්සුතෙසු ධම්මෙසු චක්ඛුං උදපාදි, ඤාණං උදපාදි, පඤ්ඤා උදපාදි, විජ්ජා උදපාදි, ආලොකො උදපාදී’’ති. පඤ්චමං. २७३. “‘ह्या वेदना आहेत’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू (दृष्टी) उत्पन्न झाला, ज्ञान उत्पन्न झाले, प्रज्ञा उत्पन्न झाली, विद्या उत्पन्न झाली, प्रकाश उत्पन्न झाला. ‘हा वेदनेचा उगम आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू उत्पन्न झाला... पे... प्रकाश उत्पन्न झाला. ‘हा वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू उत्पन्न झाला... पे... ‘हा वेदनेचा निरोध आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू उत्पन्न झाला... पे... ‘हा वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू उत्पन्न झाला... पे... ‘हा वेदनेतील आस्वाद आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये... पे... ‘हा वेदनेतील दोष आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये... पे... ‘हीच वेदनेतून सुटका आहे’ – भिक्खूहो, पूर्वी कधीही न ऐकलेल्या धर्मांमध्ये माझ्यामध्ये चक्षू उत्पन्न झाला, ज्ञान उत्पन्न झाले, प्रज्ञा उत्पन्न झाली, विद्या उत्पन्न झाली, प्रकाश उत्पन्न झाला.” पाचवे. 6. සම්බහුලභික්ඛුසුත්තං ६. संबहुलभिक्खुसुत्त 274. අථ ඛො සම්බහුලා භික්ඛූ යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා…පෙ… එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ භික්ඛූ භගවන්තං එතදවොචුං – ‘‘කතමා නු ඛො, භන්තෙ, වෙදනා, කතමො වෙදනාසමුදයො, කතමා වෙදනාසමුදයගාමිනී පටිපදා? කතමො වෙදනානිරොධො, කතමා වෙදනානිරොධගාමිනී පටිපදා? කො වෙදනාය අස්සාදො, කො ආදීනවො, කිං නිස්සරණ’’න්ති? ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා – සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. ඉමා වුච්චන්ති, භික්ඛවෙ, වෙදනා. ඵස්සසමුදයා වෙදනාසමුදයො. තණ්හා වෙදනාසමුදයගාමිනී පටිපදා. ඵස්සනිරොධා…පෙ… යො වෙදනාය ඡන්දරාගවිනයො ඡන්දරාගප්පහානං. ඉදං වෙදනාය නිස්සරණ’’න්ති. ඡට්ඨං. २७४. तेव्हा अनेक भिक्खू जेथे भगवान होते तेथे आले; आल्यानंतर... पे... एका बाजूला बसून त्या भिक्खूंनी भगवंतांना विचारले – “भंते, वेदना म्हणजे काय? वेदनेचा उगम काय? वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेचा निरोध काय? वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग कोणता? वेदनेतील आस्वाद काय? तिचा दोष काय? आणि तिच्यातून सुटका काय?” “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत – सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि सुखदही नसलेली व दुःखदही नसलेली वेदना. भिक्खूहो, यांना वेदना असे म्हणतात. स्पर्शाच्या उगमामुळे वेदनेचा उगम होतो. तृष्णा हा वेदनेच्या उगमाकडे नेणारा मार्ग आहे. स्पर्शाच्या निरोधामुळे... पे... वेदनेतील जो इच्छा-राग दूर करणे व इच्छा-रागाचा त्याग करणे आहे, हेच वेदनेतून सुटका आहे.” सहावे. 7. පඨමසමණබ්රාහ්මණසුත්තං ७. पठमसमणब्राह्मणसुत्त 275. ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා. කතමා තිස්සො? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. යෙ හි කෙචි, භික්ඛවෙ, සමණා [Pg.432] වා බ්රාහ්මණා වා ඉමාසං තිස්සන්නං වෙදනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං නප්පජානන්ති. න මෙ තෙ, භික්ඛවෙ, සමණා වා බ්රාහ්මණා වා සමණෙසු වා සමණසම්මතා බ්රාහ්මණෙසු වා බ්රාහ්මණසම්මතා, න ච පන තෙ ආයස්මන්තො සාමඤ්ඤත්ථං වා බ්රහ්මඤ්ඤත්ථං වා දිට්ඨෙව ධම්මෙ සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහරන්ති. යෙ ච ඛො කෙචි, භික්ඛවෙ, සමණා වා බ්රාහ්මණා වා ඉමාසං තිස්සන්නං වෙදනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවං ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං පජානන්ති. තෙ ඛො මෙ, භික්ඛවෙ, සමණා වා බ්රාහ්මණා වා සමණෙසු චෙව සමණසම්මතා බ්රාහ්මණෙසු ච බ්රාහ්මණසම්මතා. තෙ ච පනායස්මන්තො සාමඤ්ඤත්ථඤ්ච බ්රහ්මඤ්ඤත්ථඤ්ච, දිට්ඨෙව ධම්මෙ සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහරන්තී’’ති. සත්තමං. २७५. “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि सुखदही नसलेली व दुःखदही नसलेली वेदना. भिक्खूहो, जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण या तीन वेदनांचा उगम, त्यांचा अस्त (निरोध), त्यांचा आस्वाद, त्यांचा दोष आणि त्यांच्यातून सुटका यथाभूत (आहे तशी) जाणत नाहीत; भिक्खूहो, ते श्रमण किंवा ब्राह्मण माझ्या मते श्रमणांमध्ये श्रमण म्हणून मानले जात नाहीत किंवा ब्राह्मणांमध्ये ब्राह्मण म्हणून मानले जात नाहीत. तसेच ते आयुष्यमान याच जन्मात (दृष्टधर्मात) स्वतः उच्च ज्ञानाने (अभिज्ञा) साक्षात करून, प्राप्त करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहरत नाहीत. परंतु, भिक्खूहो, जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण या तीन वेदनांचा उगम, त्यांचा अस्त, त्यांचा आस्वाद, त्यांचा दोष आणि त्यांच्यातून सुटका यथाभूत जाणतात; भिक्खूहो, ते श्रमण किंवा ब्राह्मण माझ्या मते श्रमणांमध्ये श्रमण म्हणून मानले जातात आणि ब्राह्मणांमध्ये ब्राह्मण म्हणून मानले जातात. तसेच ते आयुष्यमान याच जन्मात स्वतः उच्च ज्ञानाने साक्षात करून, प्राप्त करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहरतात.” सातवे. 8. දුතියසමණබ්රාහ්මණසුත්තං ८. दुतियसमणब्राह्मणसुत्त 276. ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා. කතමා තිස්සො? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා. යෙ හි කෙචි, භික්ඛවෙ, සමණා වා බ්රාහ්මණා වා ඉමාසං තිස්සන්නං වෙදනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං නප්පජානන්ති…පෙ… පජානන්ති…පෙ… සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහරන්තී’’ති. අට්ඨමං. २७६. “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि सुखदही नसलेली व दुःखदही नसलेली वेदना. भिक्खूहो, जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण या तीन वेदनांचा उगम, त्यांचा अस्त, त्यांचा आस्वाद, त्यांचा दोष आणि त्यांच्यातून सुटका यथाभूत जाणत नाहीत... पे... जाणतात... पे... स्वतः उच्च ज्ञानाने साक्षात करून, प्राप्त करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहरतात.” आठवे. 9. තතියසමණබ්රාහ්මණසුත්තං ९. ततियसमणब्राह्मणसुत्त 277. ‘‘යෙ හි කෙචි, භික්ඛවෙ, සමණා වා බ්රාහ්මණා වා වෙදනං නප්පජානන්ති, වෙදනාසමුදයං නප්පජානන්ති, වෙදනානිරොධං නප්පජානන්ති, වෙදනානිරොධගාමිනිං පටිපදං නප්පජානන්ති…පෙ… පජානන්ති…පෙ… සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහරන්තී’’ති. නවමං. २७७. “भिक्खूहो, जे कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण वेदना जाणत नाहीत, वेदनेचा उगम जाणत नाहीत, वेदनेचा निरोध जाणत नाहीत, वेदनेच्या निरोधाकडे नेणारा मार्ग जाणत नाहीत... पे... जाणतात... पे... स्वतः उच्च ज्ञानाने साक्षात करून, प्राप्त करून आणि त्यात प्रतिष्ठित होऊन विहरतात.” नववे. 10. සුද්ධිකසුත්තං १०. सुद्धिकसुत्त 278. ‘‘තිස්සො ඉමා, භික්ඛවෙ, වෙදනා. කතමා තිස්සො? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා ඛො, භික්ඛවෙ, තිස්සො වෙදනා’’ති. දසමං. २७८. “भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि सुखदही नसलेली व दुःखदही नसलेली वेदना – भिक्खूहो, या तीन वेदना आहेत.” दहावे. 11. නිරාමිසසුත්තං ११. निरामीससुत्त 279. ‘‘අත්ථි[Pg.433], භික්ඛවෙ, සාමිසා පීති, අත්ථි නිරාමිසා පීති, අත්ථි නිරාමිසා නිරාමිසතරා පීති; අත්ථි සාමිසං සුඛං, අත්ථි නිරාමිසං සුඛං, අත්ථි නිරාමිසා නිරාමිසතරං සුඛං; අත්ථි සාමිසා උපෙක්ඛා, අත්ථි නිරාමිසා උපෙක්ඛා, අත්ථි නිරාමිසා නිරාමිසතරා උපෙක්ඛා; අත්ථි සාමිසො විමොක්ඛො, අත්ථි නිරාමිසො විමොක්ඛො, අත්ථි නිරාමිසා නිරාමිසතරො විමොක්ඛො. කතමා ච, භික්ඛවෙ, සාමිසා පීති? පඤ්චිමෙ, භික්ඛවෙ, කාමගුණා. කතමෙ පඤ්ච? චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා…පෙ… කායවිඤ්ඤෙය්යා ඵොට්ඨබ්බා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. ඉමෙ ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච කාමගුණා. යා ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමෙ පඤ්ච කාමගුණෙ පටිච්ච උප්පජ්ජති පීති, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, සාමිසා පීති. २७९. “भिक्खूहो, सामीस (भौतिक/आमिषयुक्त) प्रीती आहे, निरामीस (आमिषरहित/आध्यात्मिक) प्रीती आहे आणि निरामीसपेक्षाही अधिक निरामीस प्रीती आहे; सामीस सुख आहे, निरामीस सुख आहे आणि निरामीसपेक्षाही अधिक निरामीस सुख आहे; सामीस उपेक्षा आहे, निरामीस उपेक्षा आहे आणि निरामीसपेक्षाही अधिक निरामीस उपेक्षा आहे; सामीस विमोक्ष (मुक्ती) आहे, निरामीस विमोक्ष आहे आणि निरामीसपेक्षाही अधिक निरामीस विमोक्ष आहे. आणि भिक्खूहो, सामीस प्रीती कोणती? भिक्खूहो, हे पाच कामगुण आहेत. कोणते पाच? चक्षूने जाणता येणारे (चक्खुविञ्ञेय्य) रूप – जे इष्ट, कांत (प्रिय), मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे असतात... पे... कायेने (स्पर्शाने) जाणता येणारे (कायविञ्ञेय्य) स्प्रष्टव्य (फोट्ठब्ब) – जे इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय वाटणारे, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे असतात. भिक्खूहो, हे पाच कामगुण आहेत. भिक्खूहो, या पाच कामगुणांवर अवलंबून जी प्रीती उत्पन्न होते, तिला ‘सामीस प्रीती’ असे म्हणतात.” ‘‘කතමා ච, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා පීති? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු විවිච්චෙව කාමෙහි විවිච්ච අකුසලෙහි ධම්මෙහි සවිතක්කං සවිචාරං විවෙකජං පීතිසුඛං පඨමං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. විතක්කවිචාරානං වූපසමා අජ්ඣත්තං සම්පසාදනං චෙතසො එකොදිභාවං අවිතක්කං අවිචාරං සමාධිජං පීතිසුඛං දුතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා පීති. भिक्षूंनो, निरामिश प्रीती कोणती? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क व विचारांसह असलेल्या, विवेकजन्य प्रीती व सुखाने युक्त अशा पहिल्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. वितर्क व विचारांच्या शांत होण्यामुळे, चित्ताच्या अंतर्गत प्रसन्नतेने युक्त, चित्ताची एकाग्रता साधणाऱ्या, वितर्कविरहित, विचारविरहित, समाधीजन्य प्रीती व सुखाने युक्त अशा दुसऱ्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. भिक्षूंनो, याला निरामिश प्रीती असे म्हणतात. ‘‘කතමා ච, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා නිරාමිසතරා පීති? යා ඛො, භික්ඛවෙ, ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො, දොසා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො, මොහා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො උප්පජ්ජති පීති, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා නිරාමිසතරා පීති. भिक्षूंनो, निरामिशाहूनही अधिक निरामिश प्रीती कोणती? भिक्षूंनो, जेव्हा आसवमुक्त भिक्षू आपले चित्त रागापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त द्वेषापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त मोहापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, तेव्हा जी प्रीती उत्पन्न होते; भिक्षूंनो, याला निरामिशाहूनही अधिक निरामिश प्रीती असे म्हणतात. ‘‘කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, සාමිසං සුඛං? පඤ්චිමෙ, භික්ඛවෙ, කාමගුණා. කතමෙ පඤ්ච? චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා…පෙ… කායවිඤ්ඤෙය්යා ඵොට්ඨබ්බා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. ඉමෙ ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච කාමගුණා. යං ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමෙ පඤ්ච කාමගුණෙ පටිච්ච උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං, ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, සාමිසං සුඛං. भिक्षूंनो, सामिष सुख कोणते? भिक्षूंनो, हे पाच कामगुण आहेत. कोणते पाच? डोळ्यांनी जाणता येणारे, इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असलेले, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप... तसेच... शरीराने जाणता येणारे, इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असलेले, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे स्पर्श. भिक्षूंनो, हे पाच कामगुण आहेत. भिक्षूंनो, या पाच कामगुणांवर अवलंबून जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते, भिक्षूंनो, याला सामिष सुख असे म्हणतात. ‘‘කතමඤ්ච[Pg.434], භික්ඛවෙ, නිරාමිසං සුඛං? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු විවිච්චෙව කාමෙහි විවිච්ච අකුසලෙහි ධම්මෙහි සවිතක්කං සවිචාරං විවෙකජං පීතිසුඛං පඨමං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. විතක්කවිචාරානං වූපසමා අජ්ඣත්තං සම්පසාදනං චෙතසො එකොදිභාවං අවිතක්කං අවිචාරං සමාධිජං පීතිසුඛං දුතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. පීතියා ච විරාගා උපෙක්ඛකො ච විහරති සතො ච සම්පජානො සුඛඤ්ච කායෙන පටිසංවෙදෙති, යං තං අරියා ආචික්ඛන්ති – ‘උපෙක්ඛකො සතිමා සුඛවිහාරී’ති තතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, නිරාමිසං සුඛං. भिक्षूंनो, निरामिश सुख कोणते? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क व विचारांसह असलेल्या, विवेकजन्य प्रीती व सुखाने युक्त अशा पहिल्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. वितर्क व विचारांच्या शांत होण्यामुळे, चित्ताच्या अंतर्गत प्रसन्नतेने युक्त, चित्ताची एकाग्रता साधणाऱ्या, वितर्कविरहित, विचारविरहित, समाधीजन्य प्रीती व सुखाने युक्त अशा दुसऱ्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे तो उपेक्षक होऊन विहरतो, स्मृतीवान आणि प्रज्ञावान राहतो आणि शरीराने सुखाचा अनुभव घेतो, ज्याविषयी आर्य म्हणतात की—'तो उपेक्षक, स्मृतीवान आणि सुखविहारी आहे'—अशा तिसऱ्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. भिक्षूंनो, याला निरामिश सुख असे म्हणतात. ‘‘කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා නිරාමිසතරං සුඛං? යං ඛො, භික්ඛවෙ, ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො, දොසා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො, මොහා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො උප්පජ්ජති සුඛං සොමනස්සං, ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා නිරාමිසතරං සුඛං. भिक्षूंनो, निरामिशाहूनही अधिक निरामिश सुख कोणते? भिक्षूंनो, जेव्हा आसवमुक्त भिक्षू आपले चित्त रागापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त द्वेषापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त मोहापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, तेव्हा जे सुख आणि सौमनस्य उत्पन्न होते; भिक्षूंनो, याला निरामिशाहूनही अधिक निरामिश सुख असे म्हणतात. ‘‘කතමා ච, භික්ඛවෙ, සාමිසා උපෙක්ඛා? පඤ්චිමෙ, භික්ඛවෙ, කාමගුණා. කතමෙ පඤ්ච? චක්ඛුවිඤ්ඤෙය්යා රූපා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා…පෙ… කායවිඤ්ඤෙය්යා ඵොට්ඨබ්බා ඉට්ඨා කන්තා මනාපා පියරූපා කාමූපසංහිතා රජනීයා. ඉමෙ ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච කාමගුණා. යා ඛො, භික්ඛවෙ, ඉමෙ පඤ්ච කාමගුණෙ පටිච්ච උප්පජ්ජති උපෙක්ඛා, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, සාමිසා උපෙක්ඛා. भिक्षूंनो, सामिष उपेक्षा कोणती? भिक्षूंनो, हे पाच कामगुण आहेत. कोणते पाच? डोळ्यांनी जाणता येणारे, इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असलेले, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे रूप... तसेच... शरीराने जाणता येणारे, इष्ट, कांत, मनाला आवडणारे, प्रिय रूप असलेले, कामवासनेशी संबंधित आणि आसक्ती निर्माण करणारे स्पर्श. भिक्षूंनो, हे पाच कामगुण आहेत. भिक्षूंनो, या पाच कामगुणांवर अवलंबून जी उपेक्षा उत्पन्न होते, भिक्षूंनो, याला सामिष उपेक्षा असे म्हणतात. ‘‘කතමා ච, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා උපෙක්ඛා? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සුඛස්ස ච පහානා, දුක්ඛස්ස ච පහානා, පුබ්බෙව සොමනස්සදොමනස්සානං අත්ථඞ්ගමා, අදුක්ඛමසුඛං උපෙක්ඛාසතිපාරිසුද්ධිං චතුත්ථං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා උපෙක්ඛා. भिक्षूंनो, निरामिश उपेक्षा कोणती? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सौमनस्य आणि दोमनस्य नष्ट झाल्यामुळे, दुःखही नाही आणि सुखही नाही अशा, उपेक्षेमुळे स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त अशा चौथ्या ध्यानाचे संपादन करून विहरतो. भिक्षूंनो, याला निरामिश उपेक्षा असे म्हणतात. ‘‘කතමා ච, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා නිරාමිසතරා උපෙක්ඛා? යා ඛො, භික්ඛවෙ, ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො, දොසා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො, මොහා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො උප්පජ්ජති උපෙක්ඛා, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා නිරාමිසතරා උපෙක්ඛා. भिक्षूंनो, निरामिशाहूनही अधिक निरामिश उपेक्षा कोणती? भिक्षूंनो, जेव्हा आसवमुक्त भिक्षू आपले चित्त रागापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त द्वेषापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त मोहापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, तेव्हा जी उपेक्षा उत्पन्न होते; भिक्षूंनो, याला निरामिशाहूनही अधिक निरामिश उपेक्षा असे म्हणतात. ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, සාමිසො විමොක්ඛො? රූපප්පටිසංයුත්තො විමොක්ඛො සාමිසො විමොක්ඛො. भिक्षूंनो, सामिष विमोक्ष कोणता? रूपाशी संबंधित असलेला विमोक्ष हा सामिष विमोक्ष होय. ‘‘කතමො [Pg.435] ච, භික්ඛවෙ, නිරාමිසො විමොක්ඛො? අරූපප්පටිසංයුත්තො විමොක්ඛො නිරාමිසො විමොක්ඛො. भिक्षूंनो, निरामिश विमोक्ष कोणता? अरूपाशी संबंधित असलेला विमोक्ष हा निरामिश विमोक्ष होय. ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා නිරාමිසතරො විමොක්ඛො? යො ඛො, භික්ඛවෙ, ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො රාගා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො, දොසා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො, මොහා චිත්තං විමුත්තං පච්චවෙක්ඛතො උප්පජ්ජති විමොක්ඛො, අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, නිරාමිසා නිරාමිසතරො විමොක්ඛො’’ති. එකාදසමං. भिक्षूंनो, निरामिशाहूनही अधिक निरामिश विमोक्ष कोणता? भिक्षूंनो, जेव्हा आसवमुक्त भिक्षू आपले चित्त रागापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त द्वेषापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, चित्त मोहापासून विमुक्त झाल्याचे पाहतो, तेव्हा जो विमोक्ष उत्पन्न होतो; भिक्षूंनो, याला निरामिशाहूनही अधिक निरामिश विमोक्ष असे म्हणतात. අට්ඨසතපරියායවග්ගො තතියො. अठ्ठसतपरियाय वर्ग तिसरा समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका — සීවකඅට්ඨසතං භික්ඛු, පුබ්බෙ ඤාණඤ්ච භික්ඛුනා; සමණබ්රාහ්මණා තීණි, සුද්ධිකඤ්ච නිරාමිසන්ති. सीवक, अठ्ठसत, भिक्खू, पुब्बे ज्ञान आणि भिक्खुना; तीन समणब्राह्मण, सुद्धिक आणि निरामिस. වෙදනාසංයුත්තං සමත්තං. वेदनासंयुक्त समाप्त. 3. මාතුගාමසංයුත්තං ३. मातुगामसंयुक्त 1. පඨමපෙය්යාලවග්ගො १. प्रथम पेय्याल वर्ग 1. මාතුගාමසුත්තං १. मातुगाम सुत्त 280. ‘‘පඤ්චහි[Pg.436], භික්ඛවෙ, අඞ්ගෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො එකන්තඅමනාපො හොති පුරිසස්ස. කතමෙහි පඤ්චහි? න ච රූපවා හොති, න ච භොගවා හොති, න ච සීලවා හොති, අලසො ච හොති, පජඤ්චස්ස න ලභති – ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චහි අඞ්ගෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො එකන්තඅමනාපො හොති පුරිසස්ස. පඤ්චහි, භික්ඛවෙ, අඞ්ගෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො එකන්තමනාපො හොති පුරිසස්ස. කතමෙහි පඤ්චහි? රූපවා ච හොති, භොගවා ච හොති, සීලවා ච හොති, දක්ඛො ච හොති අනලසො, පජඤ්චස්ස ලභති – ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චහි අඞ්ගෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො එකන්තමනාපො හොති පුරිසස්සා’’ති. පඨමං. २८०. भिक्षूंनो, पाच अंगांनी युक्त असलेली स्त्री पुरुषाला अत्यंत नावडती असते. कोणत्या पाच अंगांनी? ती रूपवान नसते, ती धनवान नसते, ती शीलवान नसते, ती आळशी असते आणि तिला संतती प्राप्त होत नाही — भिक्षूंनो, या पाच अंगांनी युक्त असलेली स्त्री पुरुषाला अत्यंत नावडती असते. भिक्षूंनो, पाच अंगांनी युक्त असलेली स्त्री पुरुषाला अत्यंत आवडती असते. कोणत्या पाच अंगांनी? ती रूपवान असते, ती धनवान नसते, ती शीलवान नसते, ती चतुर व अनळशी असते आणि तिला संतती प्राप्त होते — भिक्षूंनो, या पाच अंगांनी युक्त असलेली स्त्री पुरुषाला अत्यंत आवडती असते. 2. පුරිසසුත්තං २. पुरिस सुत्त 281. ‘‘පඤ්චහි, භික්ඛවෙ, අඞ්ගෙහි සමන්නාගතො පුරිසො එකන්තඅමනාපො හොති මාතුගාමස්ස. කතමෙහි පඤ්චහි? න ච රූපවා හොති, න ච භොගවා හොති, න ච සීලවා හොති, අලසො ච හොති, පජඤ්චස්ස න ලභති – ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චහි අඞ්ගෙහි සමන්නාගතො පුරිසො එකන්තඅමනාපො හොති මාතුගාමස්ස. පඤ්චහි, භික්ඛවෙ, අඞ්ගෙහි සමන්නාගතො පුරිසො එකන්තමනාපො හොති මාතුගාමස්ස. කතමෙහි පඤ්චහි? රූපවා ච හොති, භොගවා ච හොති, සීලවා ච හොති, දක්ඛො ච හොති අනලසො, පජඤ්චස්ස ලභති – ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චහි අඞ්ගෙහි සමන්නාගතො පුරිසො එකන්තමනාපො හොති මාතුගාමස්සා’’ති. දුතියං. २८१. “भिक्षूंनो, पाच अंगांनी युक्त असलेला पुरुष स्त्रीला अत्यंत नापसंत असतो. कोणत्या पाच? तो रूपवान नसतो, धनवान नसतो, शीलवान नसतो, आळशी असतो आणि त्याला संतती प्राप्त होत नाही – भिक्षूंनो, या पाच अंगांनी युक्त असलेला पुरुष स्त्रीला अत्यंत नापसंत असतो. भिक्षूंनो, पाच अंगांनी युक्त असलेला पुरुष स्त्रीला अत्यंत प्रिय असतो. कोणत्या पाच? तो रूपवान असतो, धनवान असतो, शीलवान असतो, चतुर व उद्योगी असतो आणि त्याला संतती प्राप्त होते – भिक्षूंनो, या पाच अंगांनी युक्त असलेला पुरुष स्त्रीला अत्यंत प्रिय असतो.” हे दुसरे. 3. ආවෙණිකදුක්ඛසුත්තං ३. आवेणिकदुक्खसुत्तं 282. ‘‘පඤ්චිමානි, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස ආවෙණිකානි දුක්ඛානි, යානි මාතුගාමො පච්චනුභොති, අඤ්ඤත්රෙව පුරිසෙහි. කතමානි පඤ්ච? ඉධ, භික්ඛවෙ[Pg.437], මාතුගාමො දහරොව සමානො පතිකුලං ගච්ඡති, ඤාතකෙහි විනා හොති. ඉදං, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස පඨමං ආවෙණිකං දුක්ඛං, යං මාතුගාමො පච්චනුභොති, අඤ්ඤත්රෙව පුරිසෙහි. පුන චපරං, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො උතුනී හොති. ඉදං, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස දුතියං ආවෙණිකං දුක්ඛං, යං මාතුගාමො පච්චනුභොති, අඤ්ඤත්රෙව පුරිසෙහි. පුන චපරං, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො ගබ්භිනී හොති. ඉදං, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස තතියං ආවෙණිකං දුක්ඛං, යං මාතුගාමො පච්චනුභොති, අඤ්ඤත්රෙව පුරිසෙහි. පුන චපරං, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො විජායති. ඉදං, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස චතුත්ථං ආවෙණිකං දුක්ඛං, යං මාතුගාමො පච්චනුභොති, අඤ්ඤත්රෙව පුරිසෙහි. පුන චපරං, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො පුරිසස්ස පාරිචරියං උපෙති. ඉදං ඛො, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස පඤ්චමං ආවෙණිකං දුක්ඛං, යං මාතුගාමො පච්චනුභොති, අඤ්ඤත්රෙව පුරිසෙහි. ඉමානි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච මාතුගාමස්ස ආවෙණිකානි දුක්ඛානි, යානි මාතුගාමො පච්චනුභොති, අඤ්ඤත්රෙව පුරිසෙහී’’ති. තතියං. २८२. “भिक्षूंनो, स्त्रीची पाच अशी विशिष्ट दुःखे आहेत, जी केवळ स्त्रीच भोगते, पुरुष नाही. कोणती पाच? इथे, भिक्षूंनो, स्त्री अगदी तरुण वयातच पतीच्या घरी जाते आणि आपल्या नातेवाईकांपासून विभक्त होते. भिक्षूंनो, हे स्त्रीचे पहिले विशिष्ट दुःख आहे, जे ती पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते. पुन्हा दुसरे म्हणजे, भिक्षूंनो, स्त्री ऋतुमती होते. भिक्षूंनो, हे स्त्रीचे दुसरे विशिष्ट दुःख आहे, जे ती पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते. पुन्हा तिसरे म्हणजे, भिक्षूंनो, स्त्री गर्भवती होते. भिक्षूंनो, हे स्त्रीचे तिसरे विशिष्ट दुःख आहे, जे ती पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते. पुन्हा चौथे म्हणजे, भिक्षूंनो, स्त्री प्रसूती होते. भिक्षूंनो, हे स्त्रीचे चौथे विशिष्ट दुःख आहे, जे ती पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते. पुन्हा पाचवे म्हणजे, भिक्षूंनो, स्त्रीला पुरुषाची सेवा करावी लागते. भिक्षूंनो, हे स्त्रीचे पाचवे विशिष्ट दुःख आहे, जे ती पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते. भिक्षूंनो, ही स्त्रीची पाच विशिष्ट दुःखे आहेत, जी स्त्री पुरुषांशिवाय स्वतःच भोगते.” हे तिसरे. 4. තීහිධම්මෙහිසුත්තං ४. तीहिधम्मेहिसुत्तं 283. ‘‘තීහි, භික්ඛවෙ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො යෙභුය්යෙන කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි තීහි? ඉධ, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො පුබ්බණ්හසමයං මච්ඡෙරමලපරියුට්ඨිතෙන චෙතසා අගාරං අජ්ඣාවසති. මජ්ඣන්හිකසමයං ඉස්සාපරියුට්ඨිතෙන චෙතසා අගාරං අජ්ඣාවසති. සායන්හසමයං කාමරාගපරියුට්ඨිතෙන චෙතසා අගාරං අජ්ඣාවසති. ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, තීහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො යෙභුය්යෙන කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතී’’ති. චතුත්ථං. २८३. “भिक्षूंनो, तीन धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री बहुधा शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या तीन? इथे, भिक्षूंनो, स्त्री सकाळच्या वेळी कृपणतेच्या मळाने ग्रासलेल्या चित्ताने घरात राहते. दुपारच्या वेळी ईर्षेने ग्रासलेल्या चित्ताने घरात राहते. संध्याकाळच्या वेळी कामरागाने ग्रासलेल्या चित्ताने घरात राहते. भिक्षूंनो, या तीन धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री बहुधा शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते.” हे चौथे. 5. කොධනසුත්තං ५. कोधनसुत्तं 284. අථ ඛො ආයස්මා අනුරුද්ධො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා අනුරුද්ධො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධාහං, භන්තෙ, මාතුගාමං පස්සාමි දිබ්බෙන චක්ඛුනා විසුද්ධෙන අතික්කන්තමානුසකෙන කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජන්තං. කතීහි නු ඛො, භන්තෙ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො [Pg.438] කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතී’’ති? २८४. तेव्हा आयुष्यमान अनुरुद्ध जेथे भगवान होते तेथे गेले. जाऊन एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान अनुरुद्धांनी भगवंतांना असे म्हटले – “भंते, मी मानवी दृष्टीच्या पलीकडच्या, अत्यंत शुद्ध अशा दिव्य चक्षूंनी स्त्रियांना शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होताना पाहतो. भंते, किती धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते?” ‘‘පඤ්චහි ඛො, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? අස්සද්ධො ච හොති, අහිරිකො ච හොති, අනොත්තප්පී ච හොති, කොධනො ච හොති, දුප්පඤ්ඤො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතී’’ති. පඤ්චමං. “अनुरुद्धा, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, पापभीरू नसलेली असते, क्रोधी असते आणि प्रज्ञाहीन असते – अनुरुद्धा, या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते.” हे पाचवे. 6. උපනාහීසුත්තං ६. उपनाहीसुत्तं 285. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? අස්සද්ධො ච හොති, අහිරිකො ච හොති, අනොත්තප්පී ච හොති, උපනාහී ච හොති, දුප්පඤ්ඤො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතී’’ති. ඡට්ඨං. २८५. “अनुरुद्धा, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, पापभीरू नसलेली असते, वैर बाळगणारी असते आणि प्रज्ञाहीन असते – अनुरुद्धा, या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते.” हे सहावे. 7. ඉස්සුකීසුත්තං ७. इस्सुकीसुत्तं 286. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? අස්සද්ධො ච හොති, අහිරිකො ච හොති, අනොත්තප්පී ච හොති, ඉස්සුකී ච හොති, දුප්පඤ්ඤො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතී’’ති. සත්තමං. २८६. “अनुरुद्धा, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, पापभीरू नसलेली असते, ईर्ष्याळू असते आणि प्रज्ञाहीन असते – अनुरुद्धा, या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते.” हे सातवे. 8. මච්ඡරීසුත්තං ८. मच्छरीसुत्तं 287. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? අස්සද්ධො ච හොති, අහිරිකො ච හොති, අනොත්තප්පී ච හොති, මච්ඡරී ච හොති, දුප්පඤ්ඤො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි [Pg.439] ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතී’’ති. අට්ඨමං. २८७. “अनुरुद्धा, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर, अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, पापभीरू नसलेली असते, कंजूष असते आणि प्रज्ञाहीन असते – अनुरुद्धा, या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री... पे... अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते.” हे आठवे. 9. අතිචාරීසුත්තං ९. अतिचारीसुत्तं 288. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? අස්සද්ධො ච හොති, අහිරිකො ච හොති, අනොත්තප්පී ච හොති, අතිචාරී ච හොති, දුප්පඤ්ඤො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… උපපජ්ජතී’’ති. නවමං. २८८. “अनुरुद्धा, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री... पे... अपाय, दुर्गती, विनिपात अशा नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, पापभीरू नसलेली असते, व्यभिचारी असते आणि प्रज्ञाहीन असते – अनुरुद्धा, या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री... पे... उत्पन्न होते.” हे नववे. 10. දුස්සීලසුත්තං १०. दुस्सीलासुत्तं 289. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? අස්සද්ධො ච හොති, අහිරිකො ච හොති, අනොත්තප්පී ච හොති, දුස්සීලො ච හොති, දුප්පඤ්ඤො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… නිරයං උපපජ්ජතී’’ති. දසමං. २८९. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, भीतीरहित असते, दुःशील असते आणि दुर्बुद्धी असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते.” दहावे. 11. අප්පස්සුතසුත්තං ११. अप्पस्सुत सुत्त 290. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? අස්සද්ධො ච හොති, අහිරිකො ච හොති, අනොත්තප්පී ච හොති, අප්පස්සුතො ච හොති, දුප්පඤ්ඤො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… නිරයං උපපජ්ජතී’’ති. එකාදසමං. २९०. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, भीतीरहित असते, अल्पश्रुत असते आणि दुर्बुद्धी असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते.” अकरावे. 12. කුසීතසුත්තං १२. कुसीत सुत्त 291. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? අස්සද්ධො ච හොති, අහිරිකො ච හොති, අනොත්තප්පී ච හොති, කුසීතො ච හොති, දුප්පඤ්ඤො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතී’’ති. ද්වාදසමං. २९१. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, भीतीरहित असते, आळशी असते आणि दुर्बुद्धी असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होते.” बारावे. 13. මුට්ඨස්සතිසුත්තං १३. मुट्ठस्सति सुत्त 292. ‘‘පඤ්චහි[Pg.440], අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? අස්සද්ධො ච හොති, අහිරිකො ච හොති, අනොත්තප්පී ච හොති, මුට්ඨස්සති ච හොති, දුප්පඤ්ඤො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… නිරයං උපපජ්ජතී’’ති. තෙරසමං. २९२. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती अश्रद्ध असते, निर्लज्ज असते, भीतीरहित असते, स्मृतिभ्रष्ट असते आणि दुर्बुद्धी असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते.” तेरावे. 14. පඤ්චවෙරසුත්තං १४. पंचवेर सुत्त 293. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො…පෙ… නිරයං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? පාණාතිපාතී ච හොති, අදින්නාදායී ච හොති, කාමෙසුමිච්ඡාචාරී ච හොති, මුසාවාදී ච හොති, සුරාමෙරයමජ්ජප්පමාදට්ඨායී ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතී’’ති. චුද්දසමං. २९३. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री...पे... नरकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती प्राणातिपाती (जीवहत्या करणारी) असते, अदिन्नादायी (चोरी करणारी) असते, कामेसू मिच्छाचारी (व्यभिचारी) असते, मुसावादी (असत्य बोलणारी) असते आणि सुरा-मेरय-मज्ज-पमादठायी (मद्य व मादक द्रव्यांचे सेवन करून प्रमाद करणारी) असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होते.” चौदावे. පඨමපෙය්යාලවග්ගො. पहिला पेयाळ वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा संग्रह (उद्दान) - මාතුගාමො පුරිසො ච, ආවෙණිකා තිධම්මො ච ; කොධනො උපනාහී ච, ඉස්සුකී මච්ඡරෙන ච; අතිචාරී ච දුස්සීලො, අප්පස්සුතො ච කුසීතො; මුට්ඨස්සති පඤ්චවෙරං, කණ්හපක්ඛෙ පකාසිතො. स्त्री आणि पुरुष, आवेणिक (असाधारण दुःख), तीन धर्म; क्रोधी, उपनाही (वैर धरणारी), ईर्ष्याळू आणि मत्सर करणारी; अतिचारी (व्यभिचारी), दुःशील, अल्पश्रुत आणि आळशी; स्मृतिभ्रष्ट आणि पाच वैर - हे कृष्णपक्षात (अंधकारमय बाजूत) प्रकाशित केले आहेत. 2. දුතියපෙය්යාලවග්ගො २. दुसरा पेयाळ वर्ग 1. අක්කොධනසුත්තං १. अक्कोधन सुत्त 294. අථ ඛො ආයස්මා අනුරුද්ධො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා අනුරුද්ධො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධාහං, භන්තෙ, මාතුගාමං පස්සාමි දිබ්බෙන චක්ඛුනා විසුද්ධෙන අතික්කන්තමානුසකෙන [Pg.441] කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්තං. කතීහි නු ඛො, භන්තෙ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජතී’’ති? २९४. तेव्हा आयुष्यमान अनुरुद्ध जेथे भगवान होते तेथे गेले. जाऊन... एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान अनुरुद्धांनी भगवंतांना असे म्हटले – “भंते, मी येथे मानवी दृष्टीपलीकडच्या, विशुद्ध अशा दिव्य चक्षूंनी स्त्रियांना कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होताना पाहत आहे. भंते, किती धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते?” ‘‘පඤ්චහි ඛො, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? සද්ධො ච හොති, හිරිමා ච හොති, ඔත්තප්පී ච හොති, අක්කොධනො ච හොති, පඤ්ඤවා ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජතී’’ති. පඨමං. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती श्रद्धावान असते, लज्जावान असते, भय बाळगणारी असते, अक्रोधी असते आणि प्रज्ञावान असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते.” पहिले. 2. අනුපනාහීසුත්තං २. अनुपनाही सुत्त 295. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? සද්ධො ච හොති, හිරිමා ච හොති, ඔත්තප්පී ච හොති, අනුපනාහී ච හොති, පඤ්ඤවා ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජතී’’ති. දුතියං. २९५. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती श्रद्धावान असते, लज्जावान असते, भय बाळगणारी असते, वैर न धरणारी असते आणि प्रज्ञावान असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते.” दुसरे. 3. අනිස්සුකීසුත්තං ३. अनिस्सुकी सुत्त 296. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? සද්ධො ච හොති, හිරිමා ච හොති, ඔත්තප්පී ච හොති, අනිස්සුකී ච හොති, පඤ්ඤවා ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජතී’’ති. තතියං. २९६. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती श्रद्धावान असते, लज्जावान असते, भय बाळगणारी असते, ईर्ष्या न करणारी असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...।” तिसरे. 4. අමච්ඡරීසුත්තං ४. अमच्छरी सुत्त 297. අමච්ඡරී ච හොති, පඤ්ඤවා ච හොති…පෙ…. චතුත්ථං. २९७. ती कंजूषपणा नसलेली असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...। चौथे. 5. අනතිචාරීසුත්තං ५. अनतिचारी सुत्त 298. අනතිචාරී ච හොති, පඤ්ඤවා ච හොති…පෙ…. පඤ්චමං. २९८. ती व्यभिचार न करणारी असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...। पाचवे. 6. සුසීලසුත්තං ६. सुशील सुत्त 299. සීලවා ච හොති, පඤ්ඤවා ච හොති…පෙ…. ඡට්ඨං. २९९. ती शीलवान असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...। सहावे. 7. බහුස්සුතසුත්තං ७. बहुस्सुत सुत्त 300. බහුස්සුතො [Pg.442] ච හොති, පඤ්ඤවා ච හොති…පෙ…. සත්තමං. ३००. ती बहुश्रुत असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...। सातवे. 8. ආරද්ධවීරියසුත්තං ८. आरद्धवीरिय सुत्त 301. ආරද්ධවීරියො ච හොති, පඤ්ඤවා ච හොති…පෙ…. අට්ඨමං. ३०१. ती प्रयत्नशील असते आणि प्रज्ञावान असते...पे...। आठवे. 9. උපට්ඨිතස්සතිසුත්තං ९. उपट्ठितस्सति सुत्त 302. ‘‘උපට්ඨිතස්සති ච හොති, පඤ්ඤවා ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජතී’’ති. නවමං. ३०२. “ती जागरूक स्मृती असलेली असते आणि प्रज्ञावान असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते.” नववे. ඉමෙ අට්ඨ සුත්තන්තසඞ්ඛෙපා. हे आठ संक्षिप्त सुत्त आहेत. 10. පඤ්චසීලසුත්තං १०. पंचशील सुत्त 303. ‘‘පඤ්චහි, අනුරුද්ධ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජති. කතමෙහි පඤ්චහි? පාණාතිපාතා පටිවිරතො ච හොති, අදින්නාදානා පටිවිරතො ච හොති, කාමෙසුමිච්ඡාචාරා පටිවිරතො ච හොති, මුසාවාදා පටිවිරතො ච හොති, සුරාමෙරයමජ්ජප්පමාදට්ඨානා පටිවිරතො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, අනුරුද්ධ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජතී’’ති. දසමං. ३०३. “हे अनुरुद्ध, पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. कोणत्या पाच? ती प्राणातिपातापासून विरत असते, अदिन्नादानापासून विरत असते, कामेसू मिच्छाचारापासून विरत असते, मुसावादापासून विरत असते आणि सुरा-मेरय-मज्ज-पमादठ्ठानापासून विरत असते. हे अनुरुद्ध, खरोखर या पाच धर्मांनी युक्त असलेली स्त्री कायाच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती, स्वर्गलोकात उत्पन्न होते.” दहावे. දුතියපෙය්යාලවග්ගො. दुसरा पेयाळ वर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याचा संग्रह (उद्दान) - දුතියෙ ච අක්කොධනො, අනුපනාහී අනිස්සුකී; අමච්ඡරී අනතිචාරී, සීලවා ච බහුස්සුතො; වීරියං සති සීලඤ්ච, සුක්කපක්ඛෙ පකාසිතො. दुसऱ्या वर्गात अक्रोधी, वैर न धरणारी, ईर्ष्या न करणारी; कंजूषपणा नसलेली, व्यभिचार न करणारी, शीलवान आणि बहुश्रुत; वीर्य (प्रयत्नशीलता), स्मृती आणि शील - हे शुक्लपक्षात (उज्ज्वल बाजूत) प्रकाशित केले आहेत. 3. බලවග්ගො ३. बल वर्ग 1. විසාරදසුත්තං १. विसारद सुत्त 304. ‘‘පඤ්චිමානි[Pg.443], භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස බලානි. කතමානි පඤ්ච? රූපබලං, භොගබලං, ඤාතිබලං, පුත්තබලං, සීලබලං – ඉමානි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච මාතුගාමස්ස බලානි. ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චහි බලෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො විසාරදො අගාරං අජ්ඣාවසතී’’ති. පඨමං. ३०४. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल (सौंदर्याचे बल), भोगबल (संपत्तीचे बल), ज्ञातिबल (नातेवाइकांचे बल), पुत्रबल (पुत्रांचे बल) आणि शीलबल (शीलाचे बल) – भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत. भिक्खूहो, या पाच बलांनी युक्त असलेली स्त्री आत्मविश्वासाने घरात राहते.” पहिले. 2. පසය්හසුත්තං २. पसय्ह सुत्त 305. ‘‘පඤ්චිමානි, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස බලානි. කතමානි පඤ්ච? රූපබලං, භොගබලං, ඤාතිබලං, පුත්තබලං, සීලබලං – ඉමානි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච මාතුගාමස්ස බලානි. ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චහි බලෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො සාමිකං පසය්හ අගාරං අජ්ඣාවසතී’’ති. දුතියං. ३०५. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल, भोगबल, ज्ञातिबल, पुत्रबल आणि शीलबल – भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत. भिक्खूहो, या पाच बलांनी युक्त असलेली स्त्री पतीवर वर्चस्व गाजवून घरात राहते.” दुसरे. 3. අභිභුය්යසුත්තං ३. अभिभूय सुत्त 306. ‘‘පඤ්චිමානි, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස බලානි. කතමානි පඤ්ච? රූපබලං, භොගබලං, ඤාතිබලං, පුත්තබලං, සීලබලං – ඉමානි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච මාතුගාමස්ස බලානි. ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චහි බලෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො සාමිකං අභිභුය්ය වත්තතී’’ති. තතියං. ३०६. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल, भोगबल, ज्ञातिबल, पुत्रबल आणि शीलबल – भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत. भिक्खूहो, या पाच बलांनी युक्त असलेली स्त्री पतीवर नियंत्रण ठेवून वावरते.” तिसरे. 4. එකසුත්තං ४. एक सुत्त 307. ‘‘එකෙන ච ඛො, භික්ඛවෙ, බලෙන සමන්නාගතො පුරිසො මාතුගාමං අභිභුය්ය වත්තති. කතමෙන එකෙන බලෙන? ඉස්සරියබලෙන අභිභූතං මාතුගාමං නෙව රූපබලං තායති, න භොගබලං තායති, න ඤාතිබලං තායති, න පුත්තබලං තායති, න සීලබලං තායතී’’ති. චතුත්ථං. ३०७. “भिक्खूहो, एकाच बलाने युक्त असलेला पुरुष स्त्रीवर वर्चस्व गाजवून वावरतो. कोणत्या एका बलाने? अधिकारबलाने (प्रभुत्वबलाने). अधिकारबलाने पराभूत झालेल्या स्त्रीचे ना रूपबल रक्षण करू शकते, ना भोगबल रक्षण करू शकते, ना ज्ञातिबल रक्षण करू शकते, ना पुत्रबल रक्षण करू शकते, ना शीलबल रक्षण करू शकते.” चौथे. 5. අඞ්ගසුත්තං ५. अंग सुत्त 308. ‘‘පඤ්චිමානි, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස බලානි. කතමානි පඤ්ච? රූපබලං, භොගබලං, ඤාතිබලං, පුත්තබලං, සීලබලං. රූපබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, න ච භොගබලෙන – එවං සො තෙනඞ්ගෙන අපරිපූරො හොති. යතො ච ඛො, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො රූපබලෙන ච සමන්නාගතො හොති, භොගබලෙන ච – එවං සො තෙනඞ්ගෙන පරිපූරො හොති. රූපබලෙන [Pg.444] ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, භොගබලෙන ච, න ච ඤාතිබලෙන – එවං සො තෙනඞ්ගෙන අපරිපූරො හොති. යතො ච ඛො, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො රූපබලෙන ච සමන්නාගතො හොති, භොගබලෙන ච, ඤාතිබලෙන ච – එවං සො තෙනඞ්ගෙන පරිපූරො හොති. රූපබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, භොගබලෙන ච, ඤාතිබලෙන ච, න ච පුත්තබලෙන – එවං සො තෙනඞ්ගෙන අපරිපූරො හොති. යතො ච ඛො, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො රූපබලෙන ච සමන්නාගතො හොති, භොගබලෙන ච, ඤාතිබලෙන ච, පුත්තබලෙන ච – එවං සො තෙනඞ්ගෙන පරිපූරො හොති. රූපබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, භොගබලෙන ච, ඤාතිබලෙන ච, පුත්තබලෙන ච, න ච සීලබලෙන – එවං සො තෙනඞ්ගෙන අපරිපූරො හොති. යතො ච ඛො, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො රූපබලෙන ච සමන්නාගතො හොති, භොගබලෙන ච, ඤාතිබලෙන ච, පුත්තබලෙන ච, සීලබලෙන ච – එවං සො තෙනඞ්ගෙන පරිපූරො හොති. ඉමානි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච මාතුගාමස්ස බලානී’’ති. පඤ්චමං. ३०८. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल, भोगबल, ज्ञातिबल, पुत्रबल आणि शीलबल. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने युक्त असेल, पण भोगबलाने युक्त नसेल, तर ती त्या अंगाने अपूर्ण असते. परंतु भिक्खूहो, जेव्हा स्त्री रूपबलाने आणि भोगबलानेही युक्त असते, तेव्हा ती त्या अंगाने पूर्ण असते. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने आणि भोगबलाने युक्त असेल, पण ज्ञातिबलाने युक्त नसेल, तर ती त्या अंगाने अपूर्ण असते. परंतु भिक्खूहो, जेव्हा स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने आणि ज्ञातिबलानेही युक्त असते, तेव्हा ती त्या अंगाने पूर्ण असते. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने आणि ज्ञातिबलाने युक्त असेल, पण पुत्रबलाने युक्त नसेल, तर ती त्या अंगाने अपूर्ण असते. परंतु भिक्खूहो, जेव्हा स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने, ज्ञातिबलाने आणि पुत्रबलानेही युक्त असते, तेव्हा ती त्या अंगाने पूर्ण असते. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने, ज्ञातिबलाने आणि पुत्रबलाने युक्त असेल, पण शीलबलाने युक्त नसेल, तर ती त्या अंगाने अपूर्ण असते. परंतु भिक्खूहो, जेव्हा स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने, ज्ञातिबलाने, पुत्रबलाने आणि शीलबलानेही युक्त असते, तेव्हा ती त्या अंगाने पूर्ण असते. भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत.” पाचवे. 6. නාසෙන්තිසුත්තං ६. नासेन्ति सुत्त 309. ‘‘පඤ්චිමානි, භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස බලානි. කතමානි පඤ්ච? රූපබලං, භොගබලං, ඤාතිබලං, පුත්තබලං, සීලබලං. රූපබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, න ච සීලබලෙන, නාසෙන්තෙව නං, කුලෙ න වාසෙන්ති. රූපබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, භොගබලෙන ච, න ච සීලබලෙන, නාසෙන්තෙව නං, කුලෙ න වාසෙන්ති. රූපබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, භොගබලෙන ච, ඤාතිබලෙන ච, න ච සීලබලෙන, නාසෙන්තෙව නං, කුලෙ න වාසෙන්ති. රූපබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, භොගබලෙන ච, ඤාතිබලෙන ච, පුත්තබලෙන ච, න ච සීලබලෙන, නාසෙන්තෙව නං, කුලෙ න වාසෙන්ති. සීලබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, න ච රූපබලෙන, වාසෙන්තෙව නං, කුලෙ න නාසෙන්ති. සීලබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, න ච භොගබලෙන, වාසෙන්තෙව නං, කුලෙ න නාසෙන්ති. සීලබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, න ච ඤාතිබලෙන, වාසෙන්තෙව නං, කුලෙ න නාසෙන්ති. සීලබලෙන ච, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො සමන්නාගතො හොති, න ච පුත්තබලෙන, වාසෙන්තෙව නං, කුලෙ න නාසෙන්ති. ඉමානි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච මාතුගාමස්ස බලානී’’ති. ඡට්ඨං. ३०९. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल, भोगबल, ज्ञातिबल, पुत्रबल आणि शीलबल. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने युक्त असेल, पण शीलबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जाते, तिला कुटुंबात राहू दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने आणि भोगबलाने युक्त असेल, पण शीलबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जाते, तिला कुटुंबात राहू दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने आणि ज्ञातिबलाने युक्त असेल, पण शीलबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जाते, तिला कुटुंबात राहू दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री रूपबलाने, भोगबलाने, ज्ञातिबलाने आणि पुत्रबलाने युक्त असेल, पण शीलबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जाते, तिला कुटुंबात राहू दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री शीलबलाने युक्त असेल, पण रूपबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबात राहू दिले जाते, तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री शीलबलाने युक्त असेल, पण भोगबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबात राहू दिले जाते, तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री शीलबलाने युक्त असेल, पण ज्ञातिबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबात राहू दिले जाते, तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जात नाही. भिक्खूहो, जर एखादी स्त्री शीलबलाने युक्त असेल, पण पुत्रबलाने युक्त नसेल, तर तिला कुटुंबात राहू दिले जाते, तिला कुटुंबातून हाकलून दिले जात नाही. भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत.” सहावे. 7. හෙතුසුත්තං ७. हेतु सुत्त 310. ‘‘පඤ්චිමානි[Pg.445], භික්ඛවෙ, මාතුගාමස්ස බලානි. කතමානි පඤ්ච? රූපබලං, භොගබලං, ඤාතිබලං, පුත්තබලං, සීලබලං. න, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො රූපබලහෙතු වා භොගබලහෙතු වා ඤාතිබලහෙතු වා පුත්තබලහෙතු වා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජති. සීලබලහෙතු ඛො, භික්ඛවෙ, මාතුගාමො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජති. ඉමානි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච මාතුගාමස්ස බලානී’’ති. සත්තමං. ३१०. “भिक्खूहो, स्त्रीची ही पाच बले आहेत. कोणती पाच? रूपबल, भोगबल, ज्ञातिबल, पुत्रबल आणि शीलबल. भिक्खूहो, रूपबलामुळे, भोगबलामुळे, ज्ञातिबलामुळे किंवा पुत्रबलामुळे स्त्री शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होत नाही. परंतु भिक्खूहो, शीलबलामुळेच स्त्री शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होते. भिक्खूहो, हीच स्त्रीची पाच बले आहेत.” सातवे. 8. ඨානසුත්තං ८. ठाण सुत्त 311. ‘‘පඤ්චිමානි, භික්ඛවෙ, ඨානානි දුල්ලභානි අකතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. කතමානි පඤ්ච? පතිරූපෙ කුලෙ ජායෙය්යන්ති – ඉදං, භික්ඛවෙ, පඨමං ඨානං දුල්ලභං අකතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. පතිරූපෙ කුලෙ ජායිත්වා පතිරූපං කුලං ගච්ඡෙය්යන්ති – ඉදං, භික්ඛවෙ, දුතියං ඨානං දුල්ලභං අකතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. පතිරූපෙ කුලෙ ජායිත්වා, පතිරූපං කුලං ගන්ත්වා, අසපත්ති අගාරං අජ්ඣාවසෙය්යන්ති – ඉදං, භික්ඛවෙ, තතියං ඨානං දුල්ලභං අකතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. පතිරූපෙ කුලෙ ජායිත්වා, පතිරූපං කුලං ගන්ත්වා, අසපත්ති අගාරං අජ්ඣාවසන්තී පුත්තවතී අස්සන්ති – ඉදං, භික්ඛවෙ, චතුත්ථං ඨානං දුල්ලභං අකතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. පතිරූපෙ කුලෙ ජායිත්වා, පතිරූපං කුලං ගන්ත්වා, අසපත්ති අගාරං අජ්ඣාවසන්තී පුත්තවතී සමානා සාමිකං අභිභුය්ය වත්තෙය්යන්ති – ඉදං, භික්ඛවෙ, පඤ්චමං ඨානං දුල්ලභං අකතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. ඉමානි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච ඨානානි දුල්ලභානි අකතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙනාති. ३११. “भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी ही पाच स्थाने (गोष्टी) मिळणे कठीण असते. कोणती पाच? 'माझा जन्म योग्य कुळात व्हावा' – भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी हे पहिले स्थान मिळणे कठीण असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन मी योग्य कुळात जावे (विवाह करावा)' – भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी हे दुसरे स्थान मिळणे कठीण असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन आणि योग्य कुळात जाऊन मी सवतीशिवाय (शत्रूशिवाय) घरात राहावे' – भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी हे तिसरे स्थान मिळणे कठीण असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन, योग्य कुळात जाऊन आणि सवतीशिवाय घरात राहून मी पुत्रवती (संतती असणारी) व्हावे' – भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी हे चौथे स्थान मिळणे कठीण असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन, योग्य कुळात जाऊन, सवतीशिवाय घरात राहून आणि पुत्रवती होऊन मी पतीवर नियंत्रण ठेवून (पतीला वश करून) राहावे' – भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी हे पाचवे स्थान मिळणे कठीण असते. भिक्खूहो, पुण्य न केलेल्या स्त्रीसाठी ही पाच स्थाने मिळणे कठीण असते.” ‘‘පඤ්චිමානි, භික්ඛවෙ, ඨානානි සුලභානි කතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. කතමානි පඤ්ච? පතිරූපෙ කුලෙ ජායෙය්යන්ති – ඉදං, භික්ඛවෙ, පඨමං ඨානං සුලභං කතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. පතිරූපෙ කුලෙ ජායිත්වා පතිරූපං කුලං ගච්ඡෙය්යන්ති – ඉදං, භික්ඛවෙ, දුතියං ඨානං සුලභං කතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. පතිරූපෙ කුලෙ ජායිත්වා පතිරූපං කුලං ගන්ත්වා අසපත්ති අගාරං අජ්ඣාවසෙය්යන්ති – ඉදං, භික්ඛවෙ, තතියං ඨානං සුලභං කතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. පතිරූපෙ කුලෙ ජායිත්වා පතිරූපං කුලං ගන්ත්වා අසපත්ති අගාරං අජ්ඣාවසන්තී පුත්තවතී අස්සන්ති – ඉදං, භික්ඛවෙ, චතුත්ථං ඨානං සුලභං කතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. පතිරූපෙ කුලෙ ජායිත්වා පතිරූපං කුලං ගන්ත්වා අසපත්ති අගාරං අජ්ඣාවසන්තී [Pg.446] පුත්තවතී සමානා සාමිකං අභිභුය්ය වත්තෙය්යන්ති – ඉදං, භික්ඛවෙ, පඤ්චමං ඨානං සුලභං කතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙන. ඉමානි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්ච ඨානානි සුලභානි කතපුඤ්ඤෙන මාතුගාමෙනා’’ති. අට්ඨමං. “भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी ही पाच स्थाने मिळणे सुलभ (सहज) असते. कोणती पाच? 'माझा जन्म योग्य कुळात व्हावा' – भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी हे पहिले स्थान मिळणे सुलभ असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन मी योग्य कुळात जावे' – भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी हे दुसरे स्थान मिळणे सुलभ असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन आणि योग्य कुळात जाऊन मी सवतीशिवाय घरात राहावे' – भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी हे तिसरे स्थान मिळणे सुलभ असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन, योग्य कुळात जाऊन आणि सवतीशिवाय घरात राहून मी पुत्रवती व्हावे' – भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी हे चौथे स्थान मिळणे सुलभ असते. 'योग्य कुळात जन्म घेऊन, योग्य कुळात जाऊन, सवतीशिवाय घरात राहून आणि पुत्रवती होऊन मी पतीवर नियंत्रण ठेवून राहावे' – भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी हे पाचवे स्थान मिळणे सुलभ असते. भिक्खूहो, पुण्य केलेल्या स्त्रीसाठी ही पाच स्थाने मिळणे सुलभ असते.” आठवे. 9. පඤ්චසීලවිසාරදසුත්තං ९. पंचशीलविशारद सुत्त 312. ‘‘පඤ්චහි, භික්ඛවෙ, ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො විසාරදො අගාරං අජ්ඣාවසති. කතමෙහි පඤ්චහි? පාණාතිපාතා පටිවිරතො ච හොති, අදින්නාදානා පටිවිරතො ච හොති, කාමෙසුමිච්ඡාචාරා පටිවිරතො ච හොති, මුසාවාදා පටිවිරතො ච හොති, සුරාමෙරයමජ්ජප්පමාදට්ඨානා පටිවිරතො ච හොති – ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චහි ධම්මෙහි සමන්නාගතො මාතුගාමො විසාරදො අගාරං අජ්ඣාවසතී’’ති. නවමං. ३१२. “भिक्खूहो, पाच गुणांनी युक्त असलेली स्त्री आत्मविश्वासाने (निर्भयपणे) घरात राहते. कोणत्या पाच गुणांनी? ती प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) अलिप्त असते, अदत्तादानापासून (चोरी करण्यापासून) अलिप्त असते, कामेसू मिच्छाचारापासून (व्यभिचारापासून) अलिप्त असते, मुसावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) अलिप्त असते आणि सुरा-मेरय-मज्ज-पमादठ्ठानापासून (मद्य व मादक पदार्थांच्या सेवनापासून) अलिप्त असते. भिक्खूहो, या पाच गुणांनी युक्त असलेली स्त्री आत्मविश्वासाने घरात राहते.” नववे. 10. වඩ්ඪීසුත්තං १०. वड्ढी सुत्त (वृद्धी सुत्त) 313. ‘‘පඤ්චහි, භික්ඛවෙ, වඩ්ඪීහි වඩ්ඪමානා අරියසාවිකා අරියාය වඩ්ඪියා වඩ්ඪති සාරාදායිනී ච හොති වරාදායිනී ච කායස්ස. කතමෙහි පඤ්චහි? සද්ධාය වඩ්ඪති, සීලෙන වඩ්ඪති, සුතෙන වඩ්ඪති, චාගෙන වඩ්ඪති, පඤ්ඤාය වඩ්ඪති – ඉමෙහි ඛො, භික්ඛවෙ, පඤ්චහි වඩ්ඪීහි වඩ්ඪමානා අරියසාවිකා අරියාය වඩ්ඪියා වඩ්ඪති, සාරාදායිනී ච හොති, වරාදායිනී ච කායස්සා’’ති. ३१३. “भिक्खूहो, पाच प्रकारच्या वृद्धीने (प्रगतीने) प्रगती करणारी आर्य श्राविका ही आर्यांच्या वृद्धीने वृद्धिंगत होते आणि ती या शरीराचे (जीवनाचे) सार ग्रहण करणारी व श्रेष्ठ गोष्टी प्राप्त करणारी ठरते. कोणत्या पाच प्रकारच्या? ती श्रद्धेने वृद्धिंगत होते, शीलाने वृद्धिंगत होते, सुताने (ज्ञानाने/श्रवणाने) वृद्धिंगत होते, त्यागाने (दानाने) वृद्धिंगत होते आणि प्रज्ञेने वृद्धिंगत होते. भिक्खूहो, या पाच प्रकारच्या वृद्धीने प्रगती करणारी आर्य श्राविका ही आर्यांच्या वृद्धीने वृद्धिंगत होते आणि ती या शरीराचे सार ग्रहण करणारी व श्रेष्ठ गोष्टी प्राप्त करणारी ठरते.” ‘‘සද්ධාය සීලෙන ච යාධ වඩ්ඪති,පඤ්ඤාය චාගෙන සුතෙන චූභයං; සා තාදිසී සීලවතී උපාසිකා,ආදීයති සාරමිධෙව අත්තනො’’ති. දසමං; “जी स्त्री येथे श्रद्धा आणि शीलाने, तसेच प्रज्ञा, त्याग आणि सुताने (श्रुताने) वृद्धिंगत होते; अशी ती शीलवान उपासिका या लोकातच स्वतःसाठी जीवनाचे खरे सार प्राप्त करून घेते.” दहावे. බලවග්ගො තතියො. तिसरा बलवर्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) - විසාරදා පසය්හ අභිභුය්ය, එකං අඞ්ගෙන පඤ්චමං; නාසෙන්ති හෙතු ඨානඤ්ච, විසාරදො වඩ්ඪිනා දසාති. विशारदा, पसय्ह (बळजबरीने), अभिभुय्य (पतीवर नियंत्रण), एक अंग (पाचवे अंग), नासेंति (नाश करणे), हेतू, ठाण (स्थान), विशारद आणि वड्ढी (वृद्धी) – अशी ही दहा सुत्ते आहेत. මාතුගාමසංයුත්තං සමත්තං. मातुगाम संयुत्त समाप्त. 4. ජම්බුඛාදකසංයුත්තං ४. जम्बुखादक संयुत्त 1. නිබ්බානපඤ්හාසුත්තං १. निब्बानपञ्ह सुत्त (निर्वाणप्रश्न सुत्त) 314. එකං [Pg.447] සමයං ආයස්මා සාරිපුත්තො මගධෙසු විහරති නාලකගාමකෙ. අථ ඛො ජම්බුඛාදකො පරිබ්බාජකො යෙනායස්මා සාරිපුත්තො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා සාරිපුත්තෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ජම්බුඛාදකො පරිබ්බාජකො ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං එතදවොච – ३१४. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त मगध देशातील नालक गावात राहत होते. तेव्हा जम्बुखादक नावाचा परिव्राजक जेथे आयुष्यमान सारिपुत्त होते तेथे आला. आल्यानंतर त्याने आयुष्यमान सारिपुत्तांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या जम्बुखादक परिव्राजकाने आयुष्यमान सारिपुत्तांना असे म्हटले - ‘‘‘නිබ්බානං, නිබ්බාන’න්ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමං නු ඛො, ආවුසො, නිබ්බාන’’න්ති? ‘‘යො ඛො, ආවුසො, රාගක්ඛයො දොසක්ඛයො මොහක්ඛයො – ඉදං වුච්චති නිබ්බාන’’න්ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. පඨමං. “'मित्र सारिपुत्त, 'निब्बान, निब्बान' (निर्वाण, निर्वाण) असे म्हटले जाते. हे निब्बान म्हणजे नेमके काय?' 'मित्रा, रागाचा (आसक्तीचा) क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय – यालाच निब्बान असे म्हणतात.' 'पण मित्रा, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी काही मार्ग किंवा काही प्रतिपदा (साधना) आहे का?' 'होय मित्रा, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.' 'पण मित्रा, या निब्बानाच्या साक्षात्कारासाठी कोणता मार्ग आणि कोणती प्रतिपदा आहे?' 'मित्रा, या निब्बानाच्या साक्षात्कारासाठी हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे; जसे की – सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक सती (स्मृती) आणि सम्यक समाधी. मित्रा, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे जी निब्बानाच्या साक्षात्कारासाठी आहे.' 'मित्रा सारिपुत्त, या निब्बानाच्या साक्षात्कारासाठी हा मार्ग उत्तम आहे, ही प्रतिपदा उत्तम आहे. आणि मित्रा सारिपुत्त, अप्रमादासाठी (जागरूक राहण्यासाठी) हे पुरेसे व योग्यच आहे.'” पहिले. 2. අරහත්තපඤ්හාසුත්තං २. अरहत्तपञ्ह सुत्त (अर्हत्वप्रश्न सुत्त) 315. ‘‘‘අරහත්තං, අරහත්ත’න්ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමං නු ඛො, ආවුසො, අරහත්ත’’න්ති? ‘‘යො ඛො, ආවුසො, රාගක්ඛයො දොසක්ඛයො මොහක්ඛයො – ඉදං වුච්චති අරහත්ත’’න්ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා එතස්ස අරහත්තස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා එතස්ස අරහත්තස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. ‘‘කතමො [Pg.448] පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා එතස්ස අරහත්තස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො එතස්ස අරහත්තස්ස සච්ඡිකිරියාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො ආවුසො, මග්ගො, අයං පටිපදා එතස්ස අරහත්තස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා එතස්ස අරහත්තස්ස සච්ඡිකිරියාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. දුතියං. ३१५. “आवुसो सारिपुत्त, ‘अरहंतपद, अरहंतपद’ असे म्हटले जाते. आवुसो, अरहंतपद म्हणजे नेमके काय?” “आवुसो, रागाचा क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय; यालाच ‘अरहंतपद’ असे म्हटले जाते.” “पण आवुसो, या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा (साधना) आहे का?” “आवुसो, या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?” “आवुसो, या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे; जसे की— सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती आणि सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी आहे.” “आवुसो, या अरहंतपदाच्या साक्षात्कारासाठी असलेला मार्ग कल्याणकारी आहे, प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी (जागरूकतेसाठी) हे पुरेसे व योग्यच आहे.” दुसरे. 3. ධම්මවාදීපඤ්හාසුත්තං ३. धम्मवादीपञ्हा सुत्त 316. ‘‘කෙ නු ඛො, ආවුසො සාරිපුත්ත, ලොකෙ ධම්මවාදිනො, කෙ ලොකෙ සුප්පටිපන්නා, කෙ ලොකෙ සුගතා’’ති? ‘‘යෙ ඛො, ආවුසො, රාගප්පහානාය ධම්මං දෙසෙන්ති, දොසප්පහානාය ධම්මං දෙසෙන්ති, මොහප්පහානාය ධම්මං දෙසෙන්ති, තෙ ලොකෙ ධම්මවාදිනො. යෙ ඛො, ආවුසො, රාගස්ස පහානාය පටිපන්නා, දොසස්ස පහානාය පටිපන්නා, මොහස්ස පහානාය පටිපන්නා, තෙ ලොකෙ සුප්පටිපන්නා. යෙසං ඛො, ආවුසො, රාගො පහීනො උච්ඡින්නමූලො තාලාවත්ථුකතො අනභාවඞ්කතො ආයතිං අනුප්පාදධම්මො, දොසො පහීනො උච්ඡින්නමූලො තාලාවත්ථුකතො අනභාවඞ්කතො ආයතිං අනුප්පාදධම්මො, මොහො පහීනො උච්ඡින්නමූලො තාලාවත්ථුකතො අනභාවඞ්කතො ආයතිං අනුප්පාදධම්මො, තෙ ලොකෙ සුගතා’’ති. ३१६. “आवुसो सारिपुत्त, या जगात धम्मवादी (धर्माचे प्रवक्ते) कोण आहेत? जगात सुप्रतिपन्न (योग्य प्रकारे आचरण करणारे) कोण आहेत? आणि जगात सुगत (कल्याणप्रत पोहोचलेले) कोण आहेत?” “आवुसो, जे रागाच्या प्रहाणासाठी धम्म उपदेशितात, द्वेषाच्या प्रहाणासाठी धम्म उपदेशितात, मोहाच्या प्रहाणासाठी धम्म उपदेशितात; ते जगात ‘धम्मवादी’ आहेत. आवुसो, जे रागाच्या प्रहाणासाठी आचरण करतात, द्वेषाच्या प्रहाणासाठी आचरण करतात, मोहाच्या प्रहाणासाठी आचरण करतात; ते जगात ‘सुप्रतिपन्न’ आहेत. आवुसो, ज्यांचा राग नष्ट झाला आहे, मुळासकट उपटून टाकला गेला आहे, ताडाच्या झाडासारखा समूळ नष्ट केला गेला आहे, अस्तित्वातून नाहीसा केला गेला आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे; ज्यांचा द्वेष नष्ट झाला आहे, मुळासकट उपटून टाकला गेला आहे, ताडाच्या झाडासारखा समूळ नष्ट केला गेला आहे, अस्तित्वातून नाहीसा केला गेला आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे; ज्यांचा मोह नष्ट झाला आहे, मुळासकट उपटून टाकला गेला आहे, ताडाच्या झाडासारखा समूळ नष्ट केला गेला आहे, अस्तित्वातून नाहीसा केला गेला आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचा झाला आहे; ते जगात ‘सुगत’ आहेत.” ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා එතස්ස රාගස්ස දොසස්ස මොහස්ස පහානායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා එතස්ස රාගස්ස දොසස්ස මොහස්ස පහානායා’’ති. ‘‘කතමො, පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා එතස්ස රාගස්ස දොසස්ස මොහස්ස පහානායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො එතස්ස රාගස්ස දොසස්ස මොහස්ස පහානාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා එතස්ස රාගස්ස දොසස්ස මොහස්ස පහානායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතස්ස රාගස්ස දොසස්ස මොහස්ස පහානාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. තතියං. “पण आवुसो, या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?” “आवुसो, या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे; जसे की— सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती आणि सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी आहे.” “आवुसो, या रागाच्या, द्वेषाच्या आणि मोहाच्या प्रहाणासाठी असलेला मार्ग कल्याणकारी आहे, प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” तिसरे. 4. කිමත්ථියසුත්තං ४. किमत्थिय सुत्त 317. ‘‘කිමත්ථියං[Pg.449], ආවුසො සාරිපුත්ත, සමණෙ ගොතමෙ බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’’ති? ‘‘දුක්ඛස්ස ඛො, ආවුසො, පරිඤ්ඤත්ථං භගවති බ්රහ්මචරියං වුස්සතී’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා එතස්ස දුක්ඛස්ස පරිඤ්ඤායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතස්ස දුක්ඛස්ස පරිඤ්ඤායා’’ති? ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතස්ස දුක්ඛස්ස පරිඤ්ඤායා’’ති? ३१७. “आवुसो सारिपुत्त, श्रमण गोतमांच्या मार्गदर्शनाखाली कोणत्या उद्देशाने ब्रह्मचर्य पाळले जाते?” “आवुसो, दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी (पूर्ण आकलनासाठी) भगवंतांच्या मार्गदर्शनाखाली ब्रह्मचर्य पाळले जाते.” “पण आवुसो, या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?” ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, එතස්ස දුක්ඛස්ස පරිඤ්ඤාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා එතස්ස දුක්ඛස්ස පරිඤ්ඤායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතස්ස දුක්ඛස්ස පරිඤ්ඤාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. චතුත්ථං. “आवुसो, या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे; जसे की— सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती आणि सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी आहे.” “आवुसो, या दुःखाच्या पूर्ण परिज्ञानासाठी असलेला मार्ग कल्याणकारी आहे, प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” चौथे. 5. අස්සාසප්පත්තසුත්තං ५. अस्सासपत्त सुत्त 318. ‘‘‘අස්සාසප්පත්තො, අස්සාසප්පත්තො’ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, ආවුසො, අස්සාසප්පත්තො හොතී’’ති? ‘‘යතො ඛො, ආවුසො, භික්ඛු ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං පජානාති, එත්තාවතා ඛො, ආවුසො, අස්සාසප්පත්තො හොතී’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතස්ස අස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතස්ස අස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතස්ස අස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො එතස්ස අස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතස්ස අස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතස්ස අස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. පඤ්චමං. ३१८. “आवुसो सारिपुत्त, ‘आश्वासनास प्राप्त झालेला, आश्वासनास प्राप्त झालेला’ असे म्हटले जाते. आवुसो, किती प्रमाणात मनुष्य आश्वासनास प्राप्त झालेला होतो?” “आवुसो, जेव्हा एखादा भिक्षू सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, दोष आणि त्यातून सुटका (निःसरण) यथाभूत (जसे आहे तसे) जाणतो; आवुसो, एवढ्या प्रमाणात तो आश्वासनास प्राप्त झालेला होतो.” “पण आवुसो, या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?” “आवुसो, या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे; जसे की— सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती आणि सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी आहे.” “आवुसो, या आश्वासनाच्या साक्षात्कारासाठी असलेला मार्ग कल्याणकारी आहे, प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” पाचवे. 6. පරමස්සාසප්පත්තසුත්තං ६. परमस्सासपत्त सुत्त 319. ‘‘‘පරමස්සාසප්පත්තො, පරමස්සාසප්පත්තො’ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, ආවුසො, පරමස්සාසප්පත්තො හොතී’’ති? ‘‘යතො [Pg.450] ඛො, ආවුසො, භික්ඛු ඡන්නං ඵස්සායතනානං සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච අස්සාදඤ්ච ආදීනවඤ්ච නිස්සරණඤ්ච යථාභූතං විදිත්වා අනුපාදාවිමුත්තො හොති, එත්තාවතා ඛො, ආවුසො, පරමස්සාසප්පත්තො හොතී’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතස්ස පරමස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතස්ස පරමස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. ‘‘කතමො පන, ආවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතස්ස පරමස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො එතස්ස පරමස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතස්ස පරමස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතස්ස පරමස්සාසස්ස සච්ඡිකිරියාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. ඡට්ඨං. ३१९. “‘परम आश्वासप्राप्त, परम आश्वासप्राप्त’ असे, आवुसो सारिपुत्त, म्हटले जाते. आवुसो, कोणत्या मर्यादेपर्यंत मनुष्य परम आश्वासप्राप्त होतो?” “आवुसो, जेव्हा एखादा भिक्खू सहा स्पर्शायतनांचा उदय, अस्त, आस्वाद, आदीनव आणि निस्सरण हे यथाभूत जाणून, अनासक्त होऊन विमुक्त होतो; आवुसो, एवढ्यानेच तो परम आश्वासप्राप्त होतो.” “पण आवुसो, या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती, जी या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी आहे?” “आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी आहे; जसे की – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी आहे.” “आवुसो, हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे, जी या परम आश्वासाच्या साक्षात्कारासाठी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” सहावे. 7. වෙදනාපඤ්හාසුත්තං ७. वेदनापञ्हा सुत्त 320. ‘‘‘වෙදනා, වෙදනා’ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමා නු ඛො, ආවුසො, වෙදනා’’ති? ‘‘තිස්සො ඉමාවුසො, වෙදනා. කතමා තිස්සො? සුඛා වෙදනා, දුක්ඛා වෙදනා, අදුක්ඛමසුඛා වෙදනා – ඉමා ඛො, ආවුසො, තිස්සො වෙදනා’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතාසං තිස්සන්නං වෙදනානං පරිඤ්ඤායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතාසං තිස්සන්නං වෙදනානං පරිඤ්ඤායා’’ති. ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතාසං තිස්සන්නං වෙදනානං පරිඤ්ඤායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, එතාසං තිස්සන්නං වෙදනානං පරිඤ්ඤාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතාසං තිස්සන්නං වෙදනානං පරිඤ්ඤායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතාසං තිස්සන්නං වෙදනානං පරිඤ්ඤාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. සත්තමං. ३२०. “‘वेदना, वेदना’ असे, आवुसो सारिपुत्त, म्हटले जाते. आवुसो, वेदना म्हणजे काय?” “आवुसो, या तीन वेदना आहेत. कोणत्या तीन? सुखद वेदना, दुःखद वेदना आणि अदुःख-असुख वेदना – आवुसो, या तीन वेदना आहेत.” “पण आवुसो, या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती, जी या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी आहे?” “आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी आहे; जसे की – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी आहे.” “आवुसो, हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे, जी या तिन्ही वेदनांच्या परिज्ञानासाठी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” सातवे. 8. ආසවපඤ්හාසුත්තං ८. आसवपञ्हा सुत्त 321. ‘‘‘ආසවො, ආසවො’ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමො නු ඛො, ආවුසො, ආසවො’’ති? ‘‘තයො මෙ, ආවුසො, ආසවා[Pg.451]. කාමාසවො, භවාසවො, අවිජ්ජාසවො – ඉමෙ ඛො, ආවුසො, තයො ආසවා’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා එතෙසං ආසවානං පහානායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා එතෙසං ආසවානං පහානායා’’ති. ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා එතෙසං ආසවානං පහානායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො එතෙසං ආසවානං පහානාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතෙසං ආසවානං පහානායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතෙසං ආසවානං පහානාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. අට්ඨමං. ३२१. “‘आसव, आसव’ असे, आवुसो सारिपुत्त, म्हटले जाते. आवुसो, आसव म्हणजे काय?” “आवुसो, हे तीन आसव आहेत. कामासव, भवासव आणि अविद्यासव – आवुसो, हे तीन आसव आहेत.” “पण आवुसो, या आसवांच्या प्रहाणासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या आसवांच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती, जी या आसवांच्या प्रहाणासाठी आहे?” “आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो या आसवांच्या प्रहाणासाठी आहे; जसे की – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या आसवांच्या प्रहाणासाठी आहे.” “आवुसो, हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे, जी या आसवांच्या प्रहाणासाठी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” आठवे. 9. අවිජ්ජාපඤ්හාසුත්තං ९. अविद्यापञ्हा सुत्त 322. ‘‘‘අවිජ්ජා, අවිජ්ජා’ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමා නු ඛො, ආවුසො, අවිජ්ජා’’ති? ‘‘යං ඛො, ආවුසො, දුක්ඛෙ අඤ්ඤාණං, දුක්ඛසමුදයෙ අඤ්ඤාණං, දුක්ඛනිරොධෙ අඤ්ඤාණං, දුක්ඛනිරොධගාමිනියා පටිපදාය අඤ්ඤාණං – අයං වුච්චතාවුසො, අවිජ්ජා’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතිස්සා අවිජ්ජාය පහානායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතිස්සා අවිජ්ජාය පහානායා’’ති. ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතිස්සා අවිජ්ජාය පහානායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, එතිස්සා අවිජ්ජාය පහානාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතිස්සා අවිජ්ජාය පහානායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතිස්සා අවිජ්ජාය පහානාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. නවමං. ३२२. “‘अविद्या, अविद्या’ असे, आवुसो सारिपुत्त, म्हटले जाते. आवुसो, अविद्या म्हणजे काय?” “आवुसो, दुःखाविषयीचे अज्ञान, दुःखसमुदयाविषयीचे अज्ञान, दुःखनिरोधाविषयीचे अज्ञान आणि दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदेविषयीचे अज्ञान – आवुसो, याला अविद्या म्हटले जाते.” “पण आवुसो, या अविद्येच्या प्रहाणासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या अविद्येच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती, जी या अविद्येच्या प्रहाणासाठी आहे?” “आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो या अविद्येच्या प्रहाणासाठी आहे; जसे की – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या अविद्येच्या प्रहाणासाठी आहे.” “आवुसो, हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे, जी या अविद्येच्या प्रहाणासाठी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” नववे. 10. තණ්හාපඤ්හාසුත්තං १०. तण्हापञ्हा सुत्त 323. ‘‘‘තණ්හා, තණ්හා’ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමා නු ඛො, ආවුසො, තණ්හා’’ති? ‘‘තිස්සො ඉමා, ආවුසො, තණ්හා. කාමතණ්හා, භවතණ්හා, විභවතණ්හා – ඉමා ඛො, ආවුසො, තිස්සො තණ්හා’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතාසං තණ්හානං පහානායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතාසං තණ්හානං පහානායා’’ති. ‘‘කතමො [Pg.452] පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතාසං තණ්හානං පහානායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, එතාසං තණ්හානං පහානාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතාසං තණ්හානං පහානායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතාසං තණ්හානං පහානාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. දසමං. ३२३. “‘तण्हा, tण्हा’ असे, आवुसो सारिपुत्त, म्हटले जाते. आवुसो, तण्हा म्हणजे काय?” “आवुसो, या तीन प्रकारच्या तण्हा आहेत. कामतण्हा, भवतण्हा आणि विभवतण्हा – आवुसो, या तीन प्रकारच्या तण्हा आहेत.” “पण आवुसो, या तण्हांच्या प्रहाणासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?” “आवुसो, या तण्हांच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे.” “पण आवुसो, तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती, जी या तण्हांच्या प्रहाणासाठी आहे?” “आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे जो या तण्हांच्या प्रहाणासाठी आहे; जसे की – सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या तण्हांच्या प्रहाणासाठी आहे.” “आवुसो, हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे, जी या तण्हांच्या प्रहाणासाठी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्त, अप्रमादासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे.” दहावे. 11. ඔඝපඤ්හාසුත්තං ११. ओघपञ्हा सुत्त 324. ‘‘‘ඔඝො, ඔඝො’ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමො නු ඛො, ආවුසො, ඔඝො’’ති? ‘‘චත්තාරොමෙ, ආවුසො, ඔඝා. කාමොඝො, භවොඝො, දිට්ඨොඝො, අවිජ්ජොඝො – ඉමෙ ඛො, ආවුසො, චත්තාරො ඔඝා’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතෙසං ඔඝානං පහානායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතෙසං ඔඝානං පහානායා’’ති. ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතෙසං ඔඝානං පහානායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, එතෙසං ඔඝානං පහානාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතෙසං ඔඝානං පහානායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතෙසං ඔඝානං පහානාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. එකාදසමං. ३२४. "आवुसो सारिपुत्ता, 'ओघ, ओघ' (पूर) असे म्हटले जाते. आवुसो, ओघ म्हणजे काय?" "आवुसो, हे चार ओघ आहेत: कामोघ, भवोघ, दिट्ठोघ आणि अविज्जोघ. आवुसो, हेच चार ओघ आहेत." "पण आवुसो, या ओघांच्या प्रहाणासाठी (त्याग करण्यासाठी) काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा (आचरण) आहे का?" "आहे आवुसो, या ओघांच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे." "पण आवुसो, या ओघांच्या प्रहाणासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?" "आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या ओघांच्या प्रहाणासाठी आहे; जसे की - सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, या ओघांच्या प्रहाणासाठी." "आवुसो, या ओघांच्या प्रहाणासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्ता, अप्रमादासाठी (जागरूक राहण्यासाठी) हे योग्यच आहे." अकरावे. 12. උපාදානපඤ්හාසුත්තං १२. उपादानप्रश्नसुत्त 325. ‘‘‘උපාදානං, උපාදාන’න්ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමං නු ඛො, ආවුසො, උපාදාන’’න්ති? ‘‘චත්තාරිමානි, ආවුසො, උපාදානානි. කාමුපාදානං, දිට්ඨුපාදානං සීලබ්බතුපාදානං, අත්තවාදුපාදානං – ඉමානි ඛො, ආවුසො, චත්තාරි උපාදානානී’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතෙසං උපාදානානං පහානායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතෙසං උපාදානානං පහානායා’’ති. ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතෙසං උපාදානානං පහානායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, එතෙසං උපාදානානං පහානාය, සෙය්යථිදං [Pg.453] – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතෙසං උපාදානානං පහානායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතෙසං උපාදානානං පහානාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. ද්වාදසමං. ३२५. "आवुसो सारिपुत्ता, 'उपादान, उपादान' असे म्हटले जाते. आवुसो, उपादान म्हणजे काय?" "आवुसो, ही चार उपादाने आहेत: कामुपादान, दिट्ठुपादान, सीलब्बतुपादान आणि अत्तवादुपादान. आवुसो, हीच चार उपादाने आहेत." "पण आवुसो, या उपादानांच्या प्रहाणासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?" "आहे आवुसो, या उपादानांच्या प्रहाणासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे." "पण आवुसो, या उपादानांच्या प्रहाणासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?" "आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या उपादानांच्या प्रहाणासाठी आहे; जसे की - सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, या उपादानांच्या प्रहाणासाठी." "आवुसो, या उपादानांच्या प्रहाणासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्ता, अप्रमादासाठी हे योग्यच आहे." बारावे. 13. භවපඤ්හාසුත්තං १३. भवप्रश्नसुत्त 326. ‘‘‘භවො, භවො’ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමො නු ඛො, ආවුසො, භවො’’ති? ‘‘තයො මෙ, ආවුසො, භවා. කාමභවො, රූපභවො, අරූපභවො – ඉමෙ ඛො, ආවුසො, තයො භවා’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතෙසං භවානං පරිඤ්ඤායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතෙසං භවානං පරිඤ්ඤායා’’ති. ‘‘කතමො, පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතෙසං භවානං පරිඤ්ඤායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, එතෙසං භවානං පරිඤ්ඤාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතෙසං භවානං පරිඤ්ඤායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතෙසං භවානං පරිඤ්ඤාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. තෙරසමං. ३२६. "आवुसो सारिपुत्ता, 'भव, भव' असे म्हटले जाते. आवुसो, भव म्हणजे काय?" "आवुसो, हे तीन भव आहेत: कामभव, रूपभव आणि अरूपभव. आवुसो, हेच तीन भव आहेत." "पण आवुसो, या भवांच्या परिज्ञानासाठी (पूर्ण आकलनासाठी) काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?" "आहे आवुसो, या भवांच्या परिज्ञानासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे." "पण आवुसो, या भवांच्या परिज्ञानासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?" "आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या भवांच्या परिज्ञानासाठी आहे; जसे की - सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, या भवांच्या परिज्ञानासाठी." "आवुसो, या भवांच्या परिज्ञानासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्ता, अप्रमादासाठी हे योग्यच आहे." तेरावे. 14. දුක්ඛපඤ්හාසුත්තං १४. दुःखप्रश्नसुत्त 327. ‘‘‘දුක්ඛං, දුක්ඛ’න්ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමං නු ඛො, ආවුසො, දුක්ඛ’’න්ති? ‘‘තිස්සො ඉමා, ආවුසො, දුක්ඛතා. දුක්ඛදුක්ඛතා, සඞ්ඛාරදුක්ඛතා, විපරිණාමදුක්ඛතා – ඉමා ඛො, ආවුසො, තිස්සො දුක්ඛතා’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතාසං දුක්ඛතානං පරිඤ්ඤායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතාසං දුක්ඛතානං පරිඤ්ඤායා’’ති. ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතාසං දුක්ඛතානං පරිඤ්ඤායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, එතාසං දුක්ඛතානං පරිඤ්ඤාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතාසං දුක්ඛතානං පරිඤ්ඤායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතාසං දුක්ඛතානං පරිඤ්ඤාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. චුද්දසමං. ३२७. "आवुसो सारिपुत्ता, 'दुःख, दुःख' असे म्हटले जाते. आवुसो, दुःख म्हणजे काय?" "आवुसो, या तीन दुःखता (दुःखाचे प्रकार) आहेत: दुःख-दुःखता, संस्कार-दुःखता आणि विपरिणाम-दुःखता. आवुसो, या तीन दुःखता आहेत." "पण आवुसो, या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?" "आहे आवुसो, या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे." "पण आवुसो, या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?" "आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी आहे; जसे की - सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी." "आवुसो, या दुःखतांच्या परिज्ञानासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्ता, अप्रमादासाठी हे योग्यच आहे." चौदावे. 15. සක්කායපඤ්හාසුත්තං १५. सक्कायप्रश्नसुत्त 328. ‘‘‘සක්කායො[Pg.454], සක්කායො’ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමො නු ඛො, ආවුසො, සක්කායො’’ති? ‘‘පඤ්චිමෙ, ආවුසො, උපාදානක්ඛන්ධා සක්කායො වුත්තො භගවතා, සෙය්යථිදං – රූපුපාදානක්ඛන්ධො, වෙදනුපාදානක්ඛන්ධො, සඤ්ඤුපාදානක්ඛන්ධො, සඞ්ඛාරුපාදානක්ඛන්ධො, විඤ්ඤාණුපාදානක්ඛන්ධො. ඉමෙ ඛො, ආවුසො, පඤ්චුපාදානක්ඛන්ධා සක්කායො වුත්තො භගවතා’’ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතස්ස සක්කායස්ස පරිඤ්ඤායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතස්ස සක්කායස්ස පරිඤ්ඤායා’’ති. ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා, එතස්ස සක්කායස්ස පරිඤ්ඤායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, එතස්ස සක්කායස්ස පරිඤ්ඤාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතස්ස සක්කායස්ස පරිඤ්ඤායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතස්ස සක්කායස්ස පරිඤ්ඤාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. පන්නරසමං. ३२८. "आवुसो सारिपुत्ता, 'सक्काय, सक्काय' असे म्हटले जाते. आवुसो, सक्काय म्हणजे काय?" "आवुसो, भगवंतांनी या पाच उपादानस्कंधांना 'सक्काय' म्हटले आहे; जसे की - रूपोपादानस्कंध, वेदनोपादानस्कंध, संज्ञोपादानस्कंध, संस्कारोपादानस्कंध आणि विज्ञानोपादानस्कंध. आवुसो, भगवंतांनी या पाच उपादानस्कंधांना 'सक्काय' म्हटले आहे." "पण आवुसो, या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी काही मार्ग आहे का, काही प्रतिपदा आहे का?" "आहे आवुसो, या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी मार्ग आहे, प्रतिपदा आहे." "पण आवुसो, या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी कोणता मार्ग आहे, कोणती प्रतिपदा आहे?" "आवुसो, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी आहे; जसे की - सम्यक् दृष्टी, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृती, सम्यक् समाधी. आवुसो, हाच तो मार्ग आहे, हीच ती प्रतिपदा आहे, या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी." "आवुसो, या सक्कायाच्या परिज्ञानासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे, ही प्रतिपदा कल्याणकारी आहे. आणि आवुसो सारिपुत्ता, अप्रमादासाठी हे योग्यच आहे." पंधरावे. 16. දුක්කරපඤ්හාසුත්තං १६. दुक्करप्रश्नसुत्त 329. ‘‘කිං නු ඛො, ආවුසො සාරිපුත්ත, ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ දුක්කර’’න්ති? ‘‘පබ්බජ්ජා ඛො, ආවුසො, ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ දුක්කරා’’ති. ‘‘පබ්බජිතෙන පනාවුසො, කිං දුක්කර’’න්ති? ‘‘පබ්බජිතෙන ඛො, ආවුසො, අභිරති දුක්කරා’’ති. ‘‘අභිරතෙන පනාවුසො, කිං දුක්කර’’න්ති? ‘‘අභිරතෙන ඛො, ආවුසො, ධම්මානුධම්මප්පටිපත්ති දුක්කරා’’ති. ‘‘කීවචිරං පනාවුසො, ධම්මානුධම්මප්පටිපන්නො භික්ඛු අරහං අස්සා’’ති? ‘‘නචිරං, ආවුසො’’ති. සොළසමං. ३२९. "आदरणीय सारिपुत्त, या धम्म-विनयात काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, या धम्म-विनयात प्रव्रज्या (दीक्षा) घेणे कठीण आहे." "पण मित्रा, प्रव्रजित झालेल्या व्यक्तीला काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, प्रव्रजित झालेल्या व्यक्तीला (प्रव्रज्येत) रममाण होणे कठीण आहे." "पण मित्रा, रममाण झालेल्या व्यक्तीला काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, रममाण झालेल्या व्यक्तीला धम्मानुकूल आचरण (धम्मानुधम्मपटिपत्ती) करणे कठीण आहे." "पण मित्रा, धम्मानुकूल आचरण करणाऱ्या भिक्खूला अर्हत होण्यासाठी किती वेळ लागतो?" "मित्रा, फार काळ लागत नाही (लवकरच तो अर्हत होतो)." सोळावे (सुत्त)." ජම්බුඛාදකසංයුත්තං සමත්තං. जम्बुखादक संयुत्त समाप्त झाले. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – නිබ්බානං අරහත්තඤ්ච, ධම්මවාදී කිමත්ථියං; අස්සාසො පරමස්සාසො, වෙදනා ආසවාවිජ්ජා; තණ්හා ඔඝා උපාදානං, භවො දුක්ඛඤ්ච සක්කායො.ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ දුක්කරන්ති. निब्बान आणि अरहत्तत्व, धम्मवादी, किमत्थिय (काय उद्देशाने); अस्सास (आश्वास), परमस्सास, वेदना, आसव, अविज्जा; तण्हा (तृष्णा), ओघ, उपादान, भव, दुक्ख आणि सक्काय; आणि या धम्म-विनयात कठीण काय आहे, हे या उद्दानातील विषय आहेत. 5. සාමණ්ඩකසංයුත්තං ५. सामण्डक संयुत्त 1. සාමණ්ඩකසුත්තං १. सामण्डक सुत्त 330. එකං [Pg.455] සමයං ආයස්මා සාරිපුත්තො වජ්ජීසු විහරති උක්කචෙලායං ගඞ්ගාය නදියා තීරෙ. අථ ඛො සාමණ්ඩකො පරිබ්බාජකො යෙනායස්මා සාරිපුත්තො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා සාරිපුත්තෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො සාමණ්ඩකො පරිබ්බාජකො ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං එතදවොච – ३३०. एका वेळी आयुष्यमान सारिपुत्त वज्जी देशात, गंगा नदीच्या तीरावर असलेल्या उक्कचेला येथे विहार करत होते. तेव्हा सामण्डक नावाचा परिव्राजक जेथे आयुष्यमान सारिपुत्त होते तेथे आला; आल्यानंतर त्याने आयुष्यमान सारिपुत्तांशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण आटोपून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या सामण्डक परिव्राजकाने आयुष्यमान सारिपुत्तांना असे म्हटले – ‘‘‘නිබ්බානං, නිබ්බාන’න්ති, ආවුසො සාරිපුත්ත, වුච්චති. කතමං නු ඛො, ආවුසො, නිබ්බාන’’න්ති? ‘‘යො ඛො, ආවුසො, රාගක්ඛයො දොසක්ඛයො මොහක්ඛයො – ඉදං වුච්චති නිබ්බාන’’න්ති. ‘‘අත්ථි පනාවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති? ‘‘අත්ථි ඛො, ආවුසො, මග්ගො අත්ථි පටිපදා, එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. "‘निब्बान, निब्बान’ असे म्हटले जाते, आदरणीय सारिपुत्त. मित्रा, निब्बान म्हणजे नेमके काय?" "मित्रा, जो राग-क्षय (लोभाचा नाश), दोस-क्षय (द्वेषाचा नाश) आणि मोह-क्षय (मोहाचा नाश) आहे – यालाच निब्बान असे म्हणतात." "पण मित्रा, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी काही मार्ग किंवा काही प्रतिपदा (आचरण) आहे का?" "मित्रा, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी मार्ग आहे आणि प्रतिपदा देखील आहे." ‘‘කතමො පනාවුසො, මග්ගො කතමා පටිපදා එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති? ‘‘අයමෙව ඛො, ආවුසො, අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියාය, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි සම්මාසඞ්කප්පො සම්මාවාචා සම්මාකම්මන්තො සම්මාආජීවො සම්මාවායාමො සම්මාසති සම්මාසමාධි. අයං ඛො, ආවුසො, මග්ගො අයං පටිපදා, එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියායා’’ති. ‘‘භද්දකො, ආවුසො, මග්ගො භද්දිකා පටිපදා, එතස්ස නිබ්බානස්ස සච්ඡිකිරියාය. අලඤ්ච පනාවුසො සාරිපුත්ත, අප්පමාදායා’’ති. පඨමං. "पण मित्रा, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी तो मार्ग कोणता आणि ती प्रतिपदा कोणती?" "मित्रा, हाच तो आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जो या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी आहे; जसे की – सम्यक दृष्टी, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृती आणि सम्यक समाधी. मित्रा, हाच तो मार्ग आहे आणि हीच ती प्रतिपदा आहे, जी या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी आहे." "मित्रा सारिपुत्त, या निब्बानाचा साक्षात्कार करण्यासाठी हा मार्ग कल्याणकारी आहे आणि ही प्रतिपदा देखील कल्याणकारी आहे. आणि मित्रा, अप्रमादाने (जागरूकतेने) प्रयत्न करण्यासाठी हे पुरेसे व योग्यच आहे." पहिले (सुत्त). (යථා ජම්බුඛාදකසංයුත්තං, තථා විත්ථාරෙතබ්බං). (ज्याप्रमाणे जम्बुखादक संयुत्त आहे, त्याचप्रमाणे याचा विस्तार करावा). 2. දුක්කරසුත්තං २. दुक्कर सुत्त 331. ‘‘කිං [Pg.456] නු ඛො, ආවුසො සාරිපුත්ත, ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ දුක්කර’’න්ති? ‘‘පබ්බජ්ජා ඛො, ආවුසො, ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ දුක්කරා’’ති. ‘‘පබ්බජිතෙන පනාවුසො, කිං දුක්කර’’න්ති? ‘‘පබ්බජිතෙන ඛො, ආවුසො, අභිරති දුක්කරා’’ති. ‘‘අභිරතෙන පනාවුසො, කිං දුක්කර’’න්ති? ‘‘අභිරතෙන ඛො, ආවුසො, ධම්මානුධම්මප්පටිපත්ති දුක්කරා’’ති. ‘‘කීවචිරං පනාවුසො, ධම්මානුධම්මප්පටිපන්නො භික්ඛු අරහං අස්සා’’ති? ‘‘නචිරං, ආවුසො’’ති. සොළසමං. ३३१. "आदरणीय सारिपुत्त, या धम्म-विनयात काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, या धम्म-विनयात प्रव्रज्या घेणे कठीण आहे." "पण मित्रा, प्रव्रजित झालेल्या व्यक्तीला काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, प्रव्रजित झालेल्या व्यक्तीला (प्रव्रज्येत) रममाण होणे कठीण आहे." "पण मित्रा, रममाण झालेल्या व्यक्तीला काय करणे कठीण आहे?" "मित्रा, रममाण झालेल्या व्यक्तीला धम्मानुकूल आचरण करणे कठीण आहे." "पण मित्रा, धम्मानुकूल आचरण करणाऱ्या भिक्खूला अर्हत होण्यासाठी किती वेळ लागतो?" "मित्रा, फार काळ लागत नाही." सोळावे (सुत्त). (පුරිමකසදිසං උද්දානං.) (पूर्वीप्रमाणेच उद्दान समजावे.) සාමණ්ඩකසංයුත්තං සමත්තං. सामण्डक संयुत्त समाप्त झाले. 6. මොග්ගල්ලානසංයුත්තං ६. मोग्गल्लान संयुत्त 1. පඨමඣානපඤ්හාසුත්තං १. पठमझानपञ्हा सुत्त 332. එකං [Pg.457] සමයං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තත්ර ඛො ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො භික්ඛූ ආමන්තෙසි – ‘‘ආවුසො, භික්ඛවෙ’’ති. ‘‘ආවුසො’’ති ඛො තෙ භික්ඛූ ආයස්මතො මහාමොග්ගල්ලානස්ස පච්චස්සොසුං. ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – ३३२. एका वेळी आयुष्यमान महामोग्गल्लान सावत्थी येथे अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. तेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लानांनी भिक्खूंना संबोधित केले – "मित्रांनो, भिक्खूंनो!" "मित्रा!" असे म्हणून त्या भिक्खूंनी आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना प्रतिसाद दिला. आयुष्यमान महामोग्गल्लान यांनी पुढीलप्रमाणे म्हटले – ‘‘ඉධ මය්හං, ආවුසො, රහොගතස්ස පටිසල්ලීනස්ස එවං චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි – ‘පඨමං ඣානං, පඨමං ඣාන’න්ති වුච්චති. කතමං නු ඛො පඨමං ඣානන්ති? තස්ස මය්හං, ආවුසො, එතදහොසි – ‘ඉධ භික්ඛු විවිච්චෙව කාමෙහි විවිච්ච අකුසලෙහි ධම්මෙහි සවිතක්කං සවිචාරං විවෙකජං පීතිසුඛං පඨමං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං වුච්චති පඨමං ඣාන’න්ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, විවිච්චෙව කාමෙහි විවිච්ච අකුසලෙහි ධම්මෙහි සවිතක්කං සවිචාරං විවෙකජං පීතිසුඛං පඨමං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. තස්ස මය්හං, ආවුසො, ඉමිනා විහාරෙන විහරතො කාමසහගතා සඤ්ඤාමනසිකාරා සමුදාචරන්ති. "मित्रांनो, येथे एकांतात ध्यानस्थ बसलो असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'प्रथम ध्यान, प्रथम ध्यान' असे म्हटले जाते. पण प्रथम ध्यान म्हणजे नेमके काय? मित्रांनो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – 'येथे भिक्खू कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह, विवेकापासून (अलिप्ततेपासून) उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे प्रथम ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. याला प्रथम ध्यान असे म्हणतात.' मित्रांनो, मी देखील कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह, विवेकापासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे प्रथम ध्यान प्राप्त करून विहार करत होतो. मित्रांनो, या विहारात विहार करत असताना, माझ्या मनात कामभोगांशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार (विचार) उत्पन्न होऊ लागले." ‘‘අථ ඛො මං, ආවුසො, භගවා ඉද්ධියා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘මොග්ගල්ලාන, මොග්ගල්ලාන! මා, බ්රාහ්මණ, පඨමං ඣානං පමාදො, පඨමෙ ඣානෙ චිත්තං සණ්ඨපෙහි, පඨමෙ ඣානෙ චිත්තං එකොදිං කරොහි, පඨමෙ ඣානෙ චිත්තං සමාදහා’ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, අපරෙන සමයෙන විවිච්චෙව කාමෙහි විවිච්ච අකුසලෙහි ධම්මෙහි සවිතක්කං සවිචාරං විවෙකජං පීතිසුඛං පඨමං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහාසිං. යඤ්හි තං, ආවුසො, සම්මා වදමානො වදෙය්ය – ‘සත්ථාරානුග්ගහිතො සාවකො මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’ති, මමං තං සම්මා වදමානො වදෙය්ය – ‘සත්ථාරානුග්ගහිතො සාවකො මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’’’ති. පඨමං. "तेव्हा मित्रांनो, भगवंतांनी आपल्या ऋद्धीबलाने माझ्याजवळ येऊन मला असे म्हटले – 'मोग्गल्लान, moggallāna! हे ब्राह्मणा, प्रथम ध्यानाबाबत गाफील (प्रमादी) राहू नकोस. प्रथम ध्यानात चित्त स्थिर कर, प्रथम ध्यानात चित्त एकाग्र कर, प्रथम ध्यानात चित्त समाहित कर.' त्यानंतर मित्रांनो, मी कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह, विवेकापासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे प्रथम ध्यान प्राप्त करून विहार केला. मित्रांनो, ज्याच्याविषयी योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की – 'हा शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) अनुग्रहाने महा-अभिज्ञा प्राप्त झालेला श्रावक आहे', माझ्याविषयीच योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की – 'हा शास्त्यांच्या अनुग्रहाने महा-अभिज्ञा प्राप्त झालेला श्रावक आहे'." पहिले (सुत्त). 2. දුතියඣානපඤ්හාසුත්තං २. दुतियझानपञ्हा सुत्त 333. ‘‘‘දුතියං [Pg.458] ඣානං, දුතියං ඣාන’න්ති වුච්චති. කතමං නු ඛො දුතියං ඣානන්ති? තස්ස මය්හං, ආවුසො, එතදහොසි – ‘ඉධ භික්ඛු විතක්කවිචාරානං වූපසමා අජ්ඣත්තං සම්පසාදනං චෙතසො එකොදිභාවං අවිතක්කං අවිචාරං සමාධිජං පීතිසුඛං දුතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං වුච්චති දුතියං ඣාන’න්ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, විතක්කවිචාරානං වූපසමා අජ්ඣත්තං සම්පසාදනං චෙතසො එකොදිභාවං අවිතක්කං අවිචාරං සමාධිජං පීතිසුඛං දුතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. තස්ස මය්හං, ආවුසො, ඉමිනා විහාරෙන විහරතො විතක්කසහගතා සඤ්ඤාමනසිකාරා සමුදාචරන්ති. ३३३. "‘द्वितीय ध्यान, द्वितीय ध्यान’ असे म्हटले जाते. पण द्वितीय ध्यान म्हणजे नेमके काय? मित्रांनो, तेव्हा माझ्या मनात असा विचार आला – ‘येथे भिक्खू वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्यामुळे, अध्यात्मिक प्रसन्नता आणि चित्ताची एकाग्रता असणारे, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीपासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे द्वितीय ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. याला द्वितीय ध्यान असे म्हणतात.’ मित्रांनो, मी देखील वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्यामुळे, अध्यात्मिक प्रसन्नता आणि चित्ताची एकाग्रता असणारे, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीपासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे द्वितीय ध्यान प्राप्त करून विहार करत होतो. मित्रांनो, या विहारात विहार करत असताना, माझ्या मनात वितर्कांशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार उत्पन्न होऊ लागले." ‘‘අථ ඛො මං, ආවුසො, භගවා ඉද්ධියා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘මොග්ගල්ලාන, මොග්ගල්ලාන! මා, බ්රාහ්මණ, දුතියං ඣානං පමාදො, දුතියෙ ඣානෙ චිත්තං සණ්ඨපෙහි, දුතියෙ ඣානෙ චිත්තං එකොදිං කරොහි, දුතියෙ ඣානෙ චිත්තං සමාදහා’ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, අපරෙන සමයෙන විතක්කවිචාරානං වූපසමා අජ්ඣත්තං සම්පසාදනං චෙතසො එකොදිභාවං අවිතක්කං අවිචාරං සමාධිජං පීතිසුඛං දුතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහාසිං. යඤ්හි තං, ආවුසො, සම්මා වදමානො වදෙය්ය – ‘සත්ථාරානුග්ගහිතො සාවකො මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’ති, මමං තං සම්මා වදමානො වදෙය්ය – ‘සත්ථාරානුග්ගහිතො සාවකො මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’’’ති. දුතියං. “तेव्हा, मित्रांनो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले— ‘मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, दुसऱ्या ध्यानाबाबत प्रमाद करू नकोस. दुसऱ्या ध्यानात चित्त स्थिर कर, दुसऱ्या ध्यानात चित्त एकाग्र कर, दुसऱ्या ध्यानात चित्त समाहित कर.’ त्यानंतर, मित्रांनो, काही काळानंतर वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्याने, आंतरिक प्रसन्नता आणि चित्ताची एकाग्रता असलेल्या, वितर्करहित, विचाररहित, समाधीतून उत्पन्न झालेल्या प्रीती आणि सुखाने युक्त अशा दुसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून मी विहरलो. मित्रांनो, जर कोणी योग्य रीतीने बोलताना असे म्हणू शकेल की— ‘शास्त्यांच्या अनुग्रहाने शिष्याने महान अभिज्ञा प्राप्त केली आहे,’ तर माझ्याविषयीच योग्य रीतीने बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की— ‘शास्त्यांच्या अनुग्रहाने शिष्याने महान अभिज्ञा प्राप्त केली आहे.’” (दुसरे) 3. තතියඣානපඤ්හාසුත්තං ३. तृतीयझानपञ्हसुत्त (तिसऱ्या ध्यानाविषयीच्या प्रश्नाचे सूत्र) 334. ‘‘‘තතියං ඣානං, තතියං ඣාන’න්ති වුච්චති. කතමං නු ඛො තතියං ඣානන්ති? තස්ස මය්හං, ආවුසො, එතදහොසි – ඉධ භික්ඛු පීතියා ච විරාගා උපෙක්ඛකො ච විහරති සතො ච සම්පජානො සුඛඤ්ච කායෙන පටිසංවෙදෙති, යං තං අරියා ආචික්ඛන්ති – ‘උපෙක්ඛකො සතිමා සුඛවිහාරී’ති තතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං වුච්චති තතියං ඣානන්ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, පීතියා ච විරාගා උපෙක්ඛකො ච විහරාමි සතො ච සම්පජානො සුඛඤ්ච කායෙන පටිසංවෙදෙමි. යං තං අරියා ආචික්ඛන්ති – ‘උපෙක්ඛකො සතිමා සුඛවිහාරී’ති තතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. තස්ස මය්හං, ආවුසො, ඉමිනා විහාරෙන විහරතො පීතිසහගතා සඤ්ඤාමනසිකාරා සමුදාචරන්ති. ३३४. “‘तिसरे ध्यान, तिसरे ध्यान’ असे म्हटले जाते. तिसरे ध्यान म्हणजे काय? मित्रांनो, माझ्या मनात असा विचार आला— ‘येथे भिक्खू प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे उपेक्षक राहून विहरतो, आणि स्मृतीवान व प्रज्ञावान होऊन शरीराने सुखाचा अनुभव घेतो, ज्याविषयी आर्य पुरुष सांगतात की— “तो उपेक्षक, स्मृतीवान आणि सुखविहारी आहे”, अशा तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून तो विहरतो. याला तिसरे ध्यान असे म्हणतात.’ मित्रांनो, मी प्रीतीचा विराग झाल्यामुळे उपेक्षक राहून विहरलो, आणि स्मृतीवान व प्रज्ञावान होऊन शरीराने सुखाचा अनुभव घेतला. ज्याविषयी आर्य पुरुष सांगतात की— ‘तो उपेक्षक, स्मृतीवान आणि सुखविहारी आहे’, अशा तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून मी विहरलो. मित्रांनो, या विहारात विहरत असताना माझ्या मनात प्रीतीशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार वारंवार उद्भवू लागले.” ‘‘අථ [Pg.459] ඛො මං, ආවුසො, භගවා ඉද්ධියා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘මොග්ගල්ලාන, මොග්ගල්ලාන! මා, බ්රාහ්මණ, තතියං ඣානං පමාදො, තතියෙ ඣානෙ චිත්තං සණ්ඨපෙහි, තතියෙ ඣානෙ චිත්තං එකොදිං කරොහි, තතියෙ ඣානෙ චිත්තං සමාදහා’ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, අපරෙන සමයෙන පීතියා ච විරාගා උපෙක්ඛකො ච විහරාමි සතො ච සම්පජානො සුඛඤ්ච කායෙන පටිසංවෙදෙමි, යං තං අරියා ආචික්ඛන්ති – ‘උපෙක්ඛකො සතිමා සුඛවිහාරී’ති තතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහාසිං. යඤ්හි තං ආවුසො සම්මා වදමානො වදෙය්ය…පෙ… මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’’ති. තතියං. “तेव्हा, मित्रांनो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले— ‘मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, तिसऱ्या ध्यानाबाबत प्रमाद करू नकोस. तिसऱ्या ध्यानात चित्त स्थिर कर, तिसऱ्या ध्यानात चित्त एकाग्र कर, तिसऱ्या ध्यानात चित्त समाहित कर.’ त्यानंतर, मित्रांनो, काही काळानंतर प्रीतीचा विराग झाल्यामुळे मी उपेक्षक राहून विहरलो, आणि स्मृतीवान व प्रज्ञावान होऊन शरीराने सुखाचा अनुभव घेतला. ज्याविषयी आर्य पुरुष सांगतात की— ‘तो उपेक्षक, स्मृतीवान आणि सुखविहारी आहे’, अशा तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून मी विहरलो. मित्रांनो, जर कोणी योग्य रीतीने बोलताना असे म्हणू शकेल की... (पे)... ‘शास्त्यांच्या अनुग्रहाने शिष्याने महान अभिज्ञा प्राप्त केली आहे,’ तर माझ्याविषयीच योग्य रीतीने बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते.” (तिसरे) 4. චතුත්ථඣානපඤ්හාසුත්තං ४. चतुत्थझानपञ्हसुत्त (चौथ्या ध्यानाविषयीच्या प्रश्नाचे सूत्र) 335. ‘‘‘චතුත්ථං ඣානං, චතුත්ථං ඣාන’න්ති වුච්චති. කතමං නු ඛො චතුත්ථං ඣානන්ති? තස්ස මය්හං, ආවුසො, එතදහොසි – ‘ඉධ භික්ඛු සුඛස්ස ච පහානා දුක්ඛස්ස ච පහානා පුබ්බෙව සොමනස්සදොමනස්සානං අත්ථඞ්ගමා අදුක්ඛමසුඛං උපෙක්ඛාසතිපාරිසුද්ධිං චතුත්ථං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං වුච්චති චතුත්ථං ඣාන’න්ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, සුඛස්ස ච පහානා දුක්ඛස්ස ච පහානා පුබ්බෙව සොමනස්සදොමනස්සානං අත්ථඞ්ගමා අදුක්ඛමසුඛං උපෙක්ඛාසතිපාරිසුද්ධිං චතුත්ථං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. තස්ස මය්හං, ආවුසො, ඉමිනා විහාරෙන විහරතො සුඛසහගතා සඤ්ඤාමනසිකාරා සමුදාචරන්ති. ३३५. “‘चौथे ध्यान, चौथे ध्यान’ असे म्हटले जाते. चौथे ध्यान म्हणजे काय? मित्रांनो, माझ्या मनात असा विचार आला— ‘येथे भिक्खू सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सोमनस्य आणि डोमनस्य नष्ट झाल्यामुळे, जे दुःखही नाही आणि सुखही नाही, आणि जे उपेक्षेमुळे स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त आहे, अशा चौथ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. याला चौथे ध्यान असे म्हणतात.’ मित्रांनो, मी सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सोमनस्य आणि डोमनस्य नष्ट झाल्यामुळे, जे दुःखही नाही आणि सुखही नाही, आणि जे उपेक्षेमुळे स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त आहे, अशा चौथ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरलो. मित्रांनो, या विहारात विहरत असताना माझ्या मनात सुखाशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार वारंवार उद्भवू लागले.” ‘‘අථ ඛො මං, ආවුසො, භගවා ඉද්ධියා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘මොග්ගල්ලාන, මොග්ගල්ලාන! මා, බ්රාහ්මණ, චතුත්ථං ඣානං පමාදො, චතුත්ථෙ ඣානෙ චිත්තං සණ්ඨපෙහි, චතුත්ථෙ ඣානෙ චිත්තං එකොදිං කරොහි, චතුත්ථෙ ඣානෙ චිත්තං සමාදහා’ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, අපරෙන සමයෙන සුඛස්ස ච පහානා දුක්ඛස්ස ච පහානා පුබ්බෙව සොමනස්සදොමනස්සානං අත්ථඞ්ගමා අදුක්ඛමසුඛං උපෙක්ඛාසතිපාරිසුද්ධිං චතුත්ථං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහාසිං. යඤ්හි තං, ආවුසො, සම්මා වදමානො වදෙය්ය…පෙ… මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’’ති. චතුත්ථං. “तेव्हा, मित्रांनो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले— ‘मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, चौथ्या ध्यानाबाबत प्रमाद करू नकोस. चौथ्या ध्यानात चित्त स्थिर कर, चौथ्या ध्यानात चित्त एकाग्र कर, चौथ्या ध्यानात चित्त समाहित कर.’ त्यानंतर, मित्रांनो, काही काळानंतर सुखाचा त्याग केल्यामुळे आणि दुःखाचा त्याग केल्यामुळे, तसेच पूर्वीच सोमनस्य आणि डोमनस्य नष्ट झाल्यामुळे, जे दुःखही नाही आणि सुखही नाही, आणि जे उपेक्षेमुळे स्मृतीच्या शुद्धतेने युक्त आहे, अशा चौथ्या ध्यानात प्रवेश करून मी विहरलो. मित्रांनो, जर कोणी योग्य रीतीने बोलताना असे म्हणू शकेल की... (पे)... ‘शास्त्यांच्या अनुग्रहाने शिष्याने महान अभिज्ञा प्राप्त केली आहे,’ तर माझ्याविषयीच योग्य रीतीने बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते.” (चौथे) 5. ආකාසානඤ්චායතනපඤ්හාසුත්තං ५. आकासानञ्चायतनपञ्हसुत्त (आकासानंचायतनाविषयीच्या प्रश्नाचे सूत्र) 336. ‘‘‘ආකාසානඤ්චායතනං, ආකාසානඤ්චායතන’න්ති වුච්චති. කතමං නු ඛො ආකාසානඤ්චායතනන්ති? තස්ස මය්හං, ආවුසො, එතදහොසි – ‘ඉධ [Pg.460] භික්ඛු සබ්බසො රූපසඤ්ඤානං සමතික්කමා පටිඝසඤ්ඤානං අත්ථඞ්ගමා නානත්තසඤ්ඤානං අමනසිකාරා අනන්තො ආකාසොති ආකාසානඤ්චායතනං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං වුච්චති ආකාසානඤ්චායතන’න්ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, සබ්බසො රූපසඤ්ඤානං සමතික්කමා පටිඝසඤ්ඤානං අත්ථඞ්ගමා නානත්තසඤ්ඤානං අමනසිකාරා අනන්තො ආකාසොති ආකාසානඤ්චායතනං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. තස්ස මය්හං, ආවුසො, ඉමිනා විහාරෙන විහරතො රූපසහගතා සඤ්ඤාමනසිකාරා සමුදාචරන්ති. ३३६. “‘आकासानंचायतन, आकासानंचायतन’ असे म्हटले जाते. आकासानंचायतन म्हणजे काय? मित्रांनो, माझ्या मनात असा विचार आला— ‘येथे भिक्खू सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांच्या पलीकडे गेल्यामुळे, प्रतिघसंज्ञांच्या अस्त होण्यामुळे, आणि नानात्वसंज्ञांकडे मनसिकार न केल्यामुळे, “आकाश अनंत आहे” असे जाणत आकासानंचायतनात प्रवेश करून विहरतो. याला आकासानंचायतन असे म्हणतात.’ मित्रांनो, मी सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांच्या पलीकडे गेल्यामुळे, प्रतिघसंज्ञांच्या अस्त होण्यामुळे, आणि नानात्वसंज्ञांकडे मनसिकार न केल्यामुळे, ‘आकाश अनंत आहे’ असे जाणत आकासानंचायतनात प्रवेश करून विहरलो. मित्रांनो, या विहारात विहरत असताना माझ्या मनात रूपाशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार वारंवार उद्भवू लागले.” ‘‘අථ ඛො මං, ආවුසො, භගවා ඉද්ධියා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘මොග්ගල්ලාන, මොග්ගල්ලාන! මා, බ්රාහ්මණ, ආකාසානඤ්චායතනං පමාදො, ආකාසානඤ්චායතනෙ චිත්තං සණ්ඨපෙහි, ආකාසානඤ්චායතනෙ චිත්තං එකොදිං කරොහි, ආකාසානඤ්චායතනෙ චිත්තං සමාදහා’ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, අපරෙන සමයෙන සබ්බසො රූපසඤ්ඤානං සමතික්කමා පටිඝසඤ්ඤානං අත්ථඞ්ගමා නානත්තසඤ්ඤානං අමනසිකාරා අනන්තො ආකාසොති ආකාසානඤ්චායතනං උපසම්පජ්ජ විහාසිං. යඤ්හි තං, ආවුසො, සම්මා වදමානො වදෙය්ය…පෙ… මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’’ති. පඤ්චමං. “तेव्हा, मित्रांनो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले— ‘मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, आकासानंचायतनाबाबत प्रमाद करू नकोस. आकासानंचायतनात चित्त स्थिर कर, आकासानंचायतनात चित्त एकाग्र कर, आकासानंचायतनात चित्त समाहित कर.’ त्यानंतर, मित्रांनो, काही काळानंतर मी सर्व प्रकारे रूपसंज्ञांच्या पलीकडे गेल्यामुळे, प्रतिघसंज्ञांच्या अस्त होण्यामुळे, आणि नानात्वसंज्ञांकडे मनसिकार न केल्यामुळे, ‘आकाश अनंत आहे’ असे जाणत आकासानंचायतनात प्रवेश करून विहरलो. मित्रांनो, जर कोणी योग्य रीतीने बोलताना असे म्हणू शकेल की... (पे)... ‘शास्त्यांच्या अनुग्रहाने शिष्याने महान अभिज्ञा प्राप्त केली आहे,’ तर माझ्याविषयीच योग्य रीतीने बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते.” (पाचवे) 6. විඤ්ඤාණඤ්චායතනපඤ්හාසුත්තං ६. विञ्ञाणञ्चायतनपञ्हसुत्त (विज्ञाणंचायतनाविषयीच्या प्रश्नाचे सूत्र) 337. ‘‘‘විඤ්ඤාණඤ්චායතනං, විඤ්ඤාණඤ්චායතන’න්ති වුච්චති. කතමං නු ඛො විඤ්ඤාණඤ්චායතනන්ති? තස්ස මය්හං, ආවුසො, එතදහොසි – ‘ඉධ භික්ඛු සබ්බසො ආකාසානඤ්චායතනං සමතික්කම්ම අනන්තං විඤ්ඤාණන්ති විඤ්ඤාණඤ්චායතනං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං වුච්චති විඤ්ඤාණඤ්චායතන’න්ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, සබ්බසො ආකාසානඤ්චායතනං සමතික්කම්ම අනන්තං විඤ්ඤාණන්ති විඤ්ඤාණඤ්චායතනං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. තස්ස මය්හං, ආවුසො, ඉමිනා විහාරෙන විහරතො ආකාසානඤ්චායතනසහගතා සඤ්ඤාමනසිකාරා සමුදාචරන්ති. ३३७. “‘विज्ञाणंचायतन, विज्ञाणंचायतन’ असे म्हटले जाते. विज्ञाणंचायतन म्हणजे काय? मित्रांनो, माझ्या मनात असा विचार आला— ‘येथे भिक्खू सर्व प्रकारे आकासानंचायतनाच्या पलीकडे जाऊन, “विज्ञान अनंत आहे” असे जाणत विज्ञाणंचायतनात प्रवेश करून विहरतो. याला विज्ञाणंचायतन असे म्हणतात.’ मित्रांनो, मी सर्व प्रकारे आकासानंचायतनाच्या पलीकडे जाऊन, ‘विज्ञान अनंत आहे’ असे जाणत विज्ञाणंचायतनात प्रवेश करून विहरलो. मित्रांनो, या विहारात विहरत असताना माझ्या मनात आकासानंचायतनाशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार वारंवार उद्भवू लागले.” ‘‘අථ ඛො මං, ආවුසො, භගවා ඉද්ධියා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘මොග්ගල්ලාන, මොග්ගල්ලාන! මා, බ්රාහ්මණ, විඤ්ඤාණඤ්චායතනං පමාදො, විඤ්ඤාණඤ්චායතනෙ චිත්තං සණ්ඨපෙහි, විඤ්ඤාණඤ්චායතනෙ චිත්තං එකොදිං කරොහි, විඤ්ඤාණඤ්චායතනෙ චිත්තං සමාදහා’ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, අපරෙන සමයෙන සබ්බසො ආකාසානඤ්චායතනං සමතික්කම්ම අනන්තං විඤ්ඤාණන්ති [Pg.461] විඤ්ඤාණඤ්චායතනං උපසම්පජ්ජ විහාසිං. යඤ්හි තං, ආවුසො, සම්මා වදමානො වදෙය්ය…පෙ… මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’’ති. ඡට්ඨං. तेव्हा, आवुसो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले – 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, विज्ञाणंचायतनाबाबत प्रमाद करू नकोस. विज्ञाणंचायतनात चित्त स्थिर कर, विज्ञाणंचायतनात चित्त एकाग्र कर, विज्ञाणंचायतनात चित्त समाहित कर.' त्यानंतर, आवुसो, काही काळानंतर मी सर्व प्रकारे आकासानंचायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'विज्ञान अनंत आहे' असे जाणत विज्ञाणंचायतनात प्रवेश करून विहरलो. आवुसो, ज्याच्याबद्दल योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की... पे... 'तो महान अभिज्ञेला प्राप्त झालेला श्रावक आहे', ते माझ्याच बाबतीत योग्य प्रकारे म्हटले जाऊ शकते." सहावे. 7. ආකිඤ්චඤ්ඤායතනපඤ්හාසුත්තං ७. आकिंचञ्ञायतनपञ्हसुत्त 338. ‘‘‘ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං, ආකිඤ්චඤ්ඤායතන’න්ති වුච්චති. කතමං නු ඛො ආකිඤ්චඤ්ඤායතනන්ති? තස්ස මය්හං, ආවුසො, එතදහොසි – ‘ඉධ භික්ඛු සබ්බසො විඤ්ඤාණඤ්චායතනං සමතික්කම්ම නත්ථි කිඤ්චීති ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං වුච්චති ආකිඤ්චඤ්ඤායතන’න්ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, සබ්බසො විඤ්ඤාණඤ්චායතනං සමතික්කම්ම නත්ථි කිඤ්චීති ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. තස්ස මය්හං, ආවුසො, ඉමිනා විහාරෙන විහරතො විඤ්ඤාණඤ්චායතනසහගතා සඤ්ඤාමනසිකාරා සමුදාචරන්ති. ३३८. "'आकिंचञ्ञायतन, आकिंचञ्ञायतन' असे म्हटले जाते. हे आकिंचञ्ञायतन म्हणजे काय? आवुसो, एकांतात असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'येथे भिक्खू सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'काहीही नाही' असे जाणत आकिंचञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. याला आकिंचञ्ञायतन असे म्हणतात.' तेव्हा, आवुसो, मी सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'काहीही नाही' असे जाणत आकिंचञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरत होतो. आवुसो, या विहारात विहरत असताना, मला विज्ञाणंचायतनाशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार सतावत होते." ‘‘අථ ඛො මං, ආවුසො, භගවා ඉද්ධියා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘මොග්ගල්ලාන, මොග්ගල්ලාන! මා, බ්රාහ්මණ, ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං පමාදො, ආකිඤ්චඤ්ඤායතනෙ චිත්තං සණ්ඨපෙහි, ආකිඤ්චඤ්ඤායතනෙ චිත්තං එකොදිං කරොහි, ආකිඤ්චඤ්ඤායතනෙ චිත්තං සමාදහා’ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, අපරෙන සමයෙන සබ්බසො විඤ්ඤාණඤ්චායතනං සමතික්කම්ම නත්ථි කිඤ්චීති ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං උපසම්පජ්ජ විහාසිං. යඤ්හි තං, ආවුසො, සම්මා වදමානො වදෙය්ය…පෙ… මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’’ති. සත්තමං. तेव्हा, आवुसो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले – 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, आकिंचञ्ञायतनाबाबत प्रमाद करू नकोस. आकिंचञ्ञायतनात चित्त स्थिर कर, आकिंचञ्ञायतनात चित्त एकाग्र कर, आकिंचञ्ञायतनात चित्त समाहित कर.' त्यानंतर, आवुसो, काही काळानंतर मी सर्व प्रकारे विज्ञाणंचायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून, 'काहीही नाही' असे जाणत आकिंचञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरलो. आवुसो, ज्याच्याबद्दल योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की... पे... 'तो महान अभिज्ञेला प्राप्त झालेला श्रावक आहे', ते माझ्याच बाबतीत योग्य प्रकारे म्हटले जाऊ शकते." सातवे. 8. නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනපඤ්හාසුත්තං ८. नेवसञ्ञानासञ्ञायतनपञ्हsuत्त 339. ‘‘‘නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං, නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතන’න්ති වුච්චති. කතමං නු ඛො නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනන්ති? තස්ස මය්හං, ආවුසො, එතදහොසි – ‘ඉධ භික්ඛු සබ්බසො ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං සමතික්කම්ම නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං උපසම්පජ්ජ විහරති. ඉදං වුච්චති නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතන’න්ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, සබ්බසො ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං සමතික්කම්ම නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. තස්ස මය්හං, ආවුසො, ඉමිනා විහාරෙන විහරතො ආකිඤ්චඤ්ඤායතනසහගතා සඤ්ඤාමනසිකාරා සමුදාචරන්ති. ३३९. "'नेवसञ्ञानासञ्ञायतन, नेवसञ्ञानासञ्ञायतन' असे म्हटले जाते. हे नेवसञ्ञानासञ्ञायतन म्हणजे काय? आवुसो, एकांतात असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'येथे भिक्खू सर्व प्रकारे आकिंचञ्ञायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरतो. याला नेवसञ्ञानासञ्ञायतन असे म्हणतात.' तेव्हा, आवुसो, मी सर्व प्रकारे आकिंचञ्ञायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरत होतो. आवुसो, या विहारात विहरत असताना, मला आकिंचञ्ञायतनाशी संबंधित संज्ञा आणि मनसिकार सतावत होते." ‘‘අථ [Pg.462] ඛො මං, ආවුසො, භගවා ඉද්ධියා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘මොග්ගල්ලාන, මොග්ගල්ලාන! මා, බ්රාහ්මණ, නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං පමාදො, නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනෙ චිත්තං සණ්ඨපෙහි, නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනෙ චිත්තං එකොදිං කරොහි, නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනෙ චිත්තං සමාදහා’ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, අපරෙන සමයෙන සබ්බසො ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං සමතික්කම්ම නෙවසඤ්ඤානාසඤ්ඤායතනං උපසම්පජ්ජ විහාසිං. යඤ්හි තං, ආවුසො, සම්මා වදමානො වදෙය්ය…පෙ… මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’’ති. අට්ඨමං. तेव्हा, आवुसो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले – 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, नेवसञ्ञानासञ्ञायतनाबाबत प्रमाद करू नकोस. नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात चित्त स्थिर कर, नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात चित्त एकाग्र कर, नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात चित्त समाहित कर.' त्यानंतर, आवुसो, काही काळानंतर मी सर्व प्रकारे आकिंचञ्ञायतनाचा पूर्णपणे अतिक्रम करून नेवसञ्ञानासञ्ञायतनात प्रवेश करून विहरलो. आवुसो, ज्याच्याबद्दल योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की... पे... 'तो महान अभिज्ञेला प्राप्त झालेला श्रावक आहे', ते माझ्याच बाबतीत योग्य प्रकारे म्हटले जाऊ शकते." आठवे. 9. අනිමිත්තපඤ්හාසුත්තං ९. अनिमित्तपञ्हसुत्त 340. ‘‘‘අනිමිත්තො චෙතොසමාධි, අනිමිත්තො චෙතොසමාධී’ති වුච්චති. කතමො නු ඛො අනිමිත්තො චෙතොසමාධීති? තස්ස මය්හං, ආවුසො, එතදහොසි – ‘ඉධ භික්ඛු සබ්බනිමිත්තානං අමනසිකාරා අනිමිත්තං චෙතොසමාධිං උපසම්පජ්ජ විහරති. අයං වුච්චති අනිමිත්තො චෙතොසමාධී’ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, සබ්බනිමිත්තානං අමනසිකාරා අනිමිත්තං චෙතොසමාධිං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. තස්ස මය්හං, ආවුසො, ඉමිනා විහාරෙන විහරතො නිමිත්තානුසාරි විඤ්ඤාණං හොති. ३४०. "'अनिमित्त चेतोसमाधी, अनिमित्त चेतोसमाधी' असे म्हटले जाते. ही अनिमित्त चेतोसमाधी म्हणजे काय? आवुसो, एकांतात असताना माझ्या मनात असा विचार आला – 'येथे भिक्खू सर्व निमित्तांना मनात न आणल्यामुळे अनिमित्त चेतोसमाधीत प्रवेश करून विहरतो. याला अनिमित्त चेतोसमाधी असे म्हणतात.' तेव्हा, आवुसो, मी सर्व निमित्तांना मनात न आणल्यामुळे अनिमित्त चेतोसमाधीत प्रवेश करून विहरत होतो. आवुसो, या विहारात विहरत असताना, माझे विज्ञान निमित्तांचे अनुसरण करणारे होत होते." ‘‘අථ ඛො මං, ආවුසො, භගවා ඉද්ධියා උපසඞ්කමිත්වා එතදවොච – ‘මොග්ගල්ලාන, මොග්ගල්ලාන! මා, බ්රාහ්මණ, අනිමිත්තං චෙතොසමාධිං පමාදො, අනිමිත්තෙ චෙතොසමාධිස්මිං චිත්තං සණ්ඨපෙහි, අනිමිත්තෙ චෙතොසමාධිස්මිං චිත්තං එකොදිං කරොහි, අනිමිත්තෙ චෙතොසමාධිස්මිං චිත්තං සමාදහා’ති. සො ඛ්වාහං, ආවුසො, අපරෙන සමයෙන සබ්බනිමිත්තානං අමනසිකාරා අනිමිත්තං චෙතොසමාධිං උපසම්පජ්ජ විහාසිං. යඤ්හි තං, ආවුසො, සම්මා වදමානො වදෙය්ය – ‘සත්ථාරානුග්ගහිතො සාවකො මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’ති, මමං තං සම්මා වදමානො වදෙය්ය – ‘සත්ථාරානුග්ගහිතො සාවකො මහාභිඤ්ඤතං පත්තො’’’ති. නවමං. तेव्हा, आवुसो, भगवान आपल्या ऋद्धीने माझ्याकडे आले आणि मला म्हणाले – 'मोग्गल्लान, मोग्गल्लान! हे ब्राह्मणा, अनिमित्त चेतोसमाधीबाबत प्रमाद करू नकोस. अनिमित्त चेतोसमाधीत चित्त स्थिर कर, अनिमित्त चेतोसमाधीत चित्त एकाग्र कर, अनिमित्त चेतोसमाधीत चित्त समाहित कर.' त्यानंतर, आवुसो, काही काळानंतर मी सर्व निमित्तांना मनात न आणल्यामुळे अनिमित्त चेतोसमाधीत प्रवेश करून विहरलो. आवुसो, ज्याच्याबद्दल योग्य प्रकारे बोलताना असे म्हटले जाऊ शकते की – 'तो शास्त्यांच्या अनुग्रहाने महान अभिज्ञेला प्राप्त झालेला श्रावक आहे', ते माझ्याच बाबतीत योग्य प्रकारे बोलताना म्हटले जाईल की – 'तो शास्त्यांच्या अनुग्रहाने महान अभिज्ञेला प्राप्त झालेला श्रावक आहे'." नववे. 10. සක්කසුත්තං १०. सक्कसुत्त 341. අථ ඛො ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො – සෙය්යථාපි නාම බලවා පුරිසො සමිඤ්ජිතං වා බාහං පසාරෙය්ය, පසාරිතං වා බාහං සමිඤ්ජෙය්ය; එවමෙව – ජෙතවනෙ අන්තරහිතො දෙවෙසු තාවතිංසෙසු පාතුරහොසි[Pg.463]. අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො පඤ්චහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතං ඛො සක්කං දෙවානමින්දං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – ३४१. तेव्हा आयुष्यमान महामोग्गल्लान – जसे एखाद्या बलवान माणसाने आपला दुमडलेला हात पसरावा किंवा पसरलेला हात दुमडावा; त्याचप्रमाणे – जेतवनातून अंतर्धान पावून तावतिंस देवलोकात प्रकट झाले. तेव्हा देवांचा राजा सक्क पाचशे देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे आला; जवळ येऊन त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लान यांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांचा राजा सक्क याला आयुष्यमान महामोग्गल्लान म्हणाले – ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, බුද්ධසරණගමනං හොති. බුද්ධසරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, ධම්මසරණගමනං හොති. ධම්මසරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, සඞ්ඝසරණගමනං හොති. සඞ්ඝසරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්තී’’ති. "हे देवांच्या राजा सक्क, बुद्ध सरण जाणे हे कल्याणकारीच आहे. हे देवांच्या राजा सक्क, बुद्ध सरण गेल्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. हे देवांच्या राजा सक्क, धम्म सरण जाणे हे कल्याणकारीच आहे. हे देवांच्या राजा सक्क, धम्म सरण गेल्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. हे देवांच्या राजा सक्क, संघ सरण जाणे हे कल्याणकारीच आहे. हे देवांच्या राजा सक्क, संघ सरण गेल्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात." ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, බුද්ධසරණගමනං හොති. බුද්ධසරණගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, ධම්මසරණගමනං හොති. ධම්මසරණගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, සඞ්ඝ…පෙ… සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්තී’’ති. “हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, बुद्धाला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. बुद्धाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, धम्माला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. धम्माला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, संघाला... पे... सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො ඡහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ… අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො සත්තහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ… අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො අට්ඨහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ… අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො අසීතියා දෙවතාසහස්සෙහි සද්ධිං යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතං ඛො සක්කං දෙවානමින්දං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सहाशे देवतांसह... पे... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सातशे देवतांसह... पे... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र आठशे देवतांसह... पे... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र ऐंशी हजार देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते, तेथे गेला; तिथे जाऊन आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांच्या राजा शक्राला आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले – ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, බුද්ධසරණගමනං හොති. බුද්ධසරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, ධම්මසරණගමනං හොති. ධම්මසරණගමනහෙතු [Pg.464] ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, සඞ්ඝසරණගමනං හොති. සඞ්ඝසරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්තී’’ති. “हे देवांच्या राजा शक्रा, बुद्धाला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. बुद्धाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. हे देवांच्या राजा शक्रा, धम्माला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. धम्माला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. हे देवांच्या राजा शक्रा, संघाला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. संघाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, බුද්ධසරණගමනං හොති. බුද්ධසරණගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, ධම්මසරණගමනං හොති…පෙ… සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, සඞ්ඝසරණගමනං හොති. සඞ්ඝසරණගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්තී’’ති. “हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, बुद्धाला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. बुद्धाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, धम्माला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे... पे... हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, संघाला शरण जाणे हे खरोखरच उत्तम आहे. संघाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො පඤ්චහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතං ඛො සක්කං දෙවානමින්දං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र पाचशे देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते, तेथे गेला; तिथे जाऊन आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांच्या राजा शक्राला आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले – ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ඉතිපි සො භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො විජ්ජාචරණසම්පන්නො සුගතො ලොකවිදූ අනුත්තරො පුරිසදම්මසාරථි සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා’ති. බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे देवांच्या राजा शक्रा, बुद्धावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘ते भगवान खरोखरच अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत.’ बुद्धावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො සන්දිට්ඨිකො අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे देवांच्या राजा शक्रा, धम्मावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘धम्म भगवंतांद्वारे सुविख्यात आहे, तो प्रत्यक्ष पाहण्याजोगा, तात्काळ फळ देणारा, ‘ये आणि पाहा’ असे म्हणण्यास योग्य, स्वतःच्या अंतकरणात धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.’ धम्मावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘සුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, උජුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො[Pg.465], ඤායප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, සාමීචිප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, යදිදං චත්තාරි පුරිසයුගානි අට්ඨ පුරිසපුග්ගලා එස භගවතො සාවකසඞ්ඝො ආහුනෙය්යො පාහුනෙය්යො දක්ඛිණෙය්යො අඤ්ජලිකරණීයො අනුත්තරං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං ලොකස්සා’ති. සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे देवांच्या राजा शक्रा, संघावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ ऋजुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ न्यायप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ सामीचीप्रतिपन्न आहे; म्हणजेच पुरुषांच्या चार जोड्या आणि आठ पुरुष-पुद्गल, हा भगवंतांचा श्रावकसंघ आहुनेय, पाहुनेय, दक्खिणेय, अंजलिकरणीय आणि जगाचे अनुत्तर पुण्यक्षेत्र आहे.’ संघावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනං හොති අඛණ්ඩෙහි අච්ඡිද්දෙහි අසබලෙහි අකම්මාසෙහි භුජිස්සෙහි විඤ්ඤුප්පසත්ථෙහි අපරාමට්ඨෙහි සමාධිසංවත්තනිකෙහි. අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්තී’’ති. “हे देवांच्या राजा शक्रा, आर्यांना प्रिय असलेल्या शीलांनी संपन्न असणे हे खरोखरच उत्तम आहे, जे अखंड, अछिद्र, डाग नसलेले, मळरहित, स्वतंत्र, विद्वानांनी प्रशंसिलेले, चुकीच्या दृष्टीने न स्पर्श केलेले आणि समाधीला पोषक असणारे आहेत. आर्यांना प्रिय असलेल्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणानेच, हे देवांच्या राजा शक्रा, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ඉතිපි සො…පෙ… සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා’ති. බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, बुद्धावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘ते भगवान खरोखरच... पे... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत.’ बुद्धावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො…පෙ… පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, धम्मावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘धम्म भगवंतांद्वारे सुविख्यात आहे... पे... सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.’ धम्मावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘සුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො…පෙ… අනුත්තරං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං ලොකස්සා’ති. සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, संघावर अचल श्रद्धा असणे हे खरोखरच उत्तम आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... पे... जगाचे अनुत्तर पुण्यक्षेत्र आहे.’ संघावर अचल श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, हे सन्माननीय मोग्गल्लाना, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනං හොති අඛණ්ඩෙහි…පෙ… සමාධිසංවත්තනිකෙහි. අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්තී’’ති. “हे मित्र मोग्गल्लान, अखंडित... समाधीला पोषक असणाऱ्या, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असणे खरोखरच उत्तम आहे. हे मित्र मोग्गल्लान, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” අථ [Pg.466] ඛො සක්කො දෙවානමින්දො ඡහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ…. අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො සත්තහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ…. අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො අට්ඨහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ…. අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො අසීතියා දෙවතාසහස්සෙහි සද්ධිං යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතං ඛො සක්කං දෙවානමින්දං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सहाशे देवतांसह... सातशे देवतांसह... आठशे देवतांसह... ऐंशी हजार देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे आला. तेथे येऊन त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांचा राजा शक्र याला आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले – ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ඉතිපි සො භගවා…පෙ… සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා’ති. බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे देवाधिपती शक्र, बुद्धांवर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'ते भगवान असे आहेत... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध, भगवान.' हे देवाधिपती शक्र, बुद्धांवरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො…පෙ… පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे देवाधिपती शक्र, धम्मावर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'भगवंतांनी धम्माचे सुंदर प्रकारे आख्यान केले आहे... विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी तो स्वतः जाणून घेण्याजोगा आहे.' हे देवाधिपती शक्र, धम्मावरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘සුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො…පෙ… අනුත්තරං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං ලොකස්සා’ති. සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे देवाधिपती शक्र, संघावर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.' हे देवाधिपती शक्र, संघावरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනං හොති අඛණ්ඩෙහි…පෙ… සමාධිසංවත්තනිකෙහි. අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්තී’’ති. “हे देवाधिपती शक्र, अखंडित... समाधीला पोषक असणाऱ्या, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असणे खरोखरच उत्तम आहे. हे देवाधिपती शक्र, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ඉතිපි සො භගවා…පෙ… සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා’ති. බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धांवर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'ते भगवान असे आहेत... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध, भगवान.' हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धांवरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු [Pg.467] ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො…පෙ… පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे मित्र मोग्गल्लान, धम्मावर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'भगवंतांनी धम्माचे सुंदर प्रकारे आख्यान केले आहे... विद्वानांनी आपापल्या ठिकाणी तो स्वतः जाणून घेण्याजोगा आहे.' हे मित्र मोग्गल्लान, धम्मावरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘සුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො…පෙ… අනුත්තරං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං ලොකස්සා’ති. සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. “हे मित्र मोग्गल्लान, संघावर अचल श्रद्धा असणे खरोखरच उत्तम आहे – 'भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.' हे मित्र मोग्गल्लान, संघावरील अचल श्रद्धेमुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනං හොති අඛණ්ඩෙහි…පෙ… සමාධිසංවත්තනිකෙහි. අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්තී’’ති. “हे मित्र मोग्गल्लान, अखंडित... समाधीला पोषक असणाऱ्या, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असणे खरोखरच उत्तम आहे. हे मित्र मोग्गल्लान, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात.” අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො පඤ්චහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි …පෙ… එකමන්තං ඨිතං ඛො සක්කං දෙවානමින්දං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र पाचशे देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे आला... एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांचा राजा शक्र याला आयुष्यमान महामोग्गल्लान असे म्हणाले – ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, බුද්ධසරණගමනං හොති. බුද්ධසරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “हे देवाधिपती शक्र, बुद्धांना शरण जाणे खरोखरच उत्तम आहे. बुद्धांना शरण जाण्याच्या कारणामुळेच, हे देवाधिपती शक्र, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, ධම්මසරණගමනං හොති. ධම්මසරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “हे देवाधिपती शक्र, धम्माला शरण जाणे खरोखरच उत्तम आहे. धम्माला शरण जाण्याच्या कारणामुळेच, हे देवाधिपती शक्र, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” ‘‘සාධු [Pg.468] ඛො, දෙවානමින්ද, සඞ්ඝසරණගමනං හොති. සඞ්ඝසරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති. “हे देवाधिपती शक्र, संघाला शरण जाणे खरोखरच उत्तम आहे. संघाला शरण जाण्याच्या कारणामुळेच, हे देवाधिपती शक्र, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, බුද්ධසරණගමනං හොති. බුද්ධසරණගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धांना शरण जाणे खरोखरच उत्तम आहे. बुद्धांना शरण जाण्याच्या कारणामुळेच, हे मित्र मोग्गल्लान, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... दिव्य स्पर्श.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, ධම්මසරණගමනං හොති…පෙ…. “हे मित्र मोग्गल्लान, धम्माला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे... पे...” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, සඞ්ඝසරණගමනං හොති. සඞ්ඝසරණගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති. “हे मित्र मोग्गल्लान, संघाला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे. हे मित्र मोग्गल्लान, संघाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො ඡහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ… අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො සත්තහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ… අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො අට්ඨහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ… අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො අසීතියා දෙවතාසහස්සෙහි සද්ධිං යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතං ඛො සක්කං දෙවානමින්දං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सहाशे देवतांसह... पे... सातशे देवतांसह... पे... आठशे देवतांसह... पे... ऐंशी हजार देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे आला; आल्यानंतर आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभ्या असलेल्या देवांचा राजा शक्राला आयुष्यमान महामोग्गल्लान म्हणाले – ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, බුද්ධසරණගමනං හොති. බුද්ධසරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “देवाधिपती शक्रा, बुद्धाला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे. देवाधिपती शक्रा, बुद्धाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... पे... दिव्य स्पर्शाने.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, ධම්මසරණගමනං හොති…පෙ…. “देवाधिपती शक्रा, धम्माला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे... पे...” ‘‘සාධු [Pg.469] ඛො, දෙවානමින්ද, සඞ්ඝසරණගමනං හොති. සඞ්ඝසරණගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති. “देवाधिपती शक्रा, संघाला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे. देवाधिपती शक्रा, संघाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, බුද්ධසරණගමනං හොති…පෙ… සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, ධම්මසරණගමනං හොති…පෙ… සාධු ඛො මාරිස මොග්ගල්ලාන, සඞ්ඝසරණගමනං හොති. සඞ්ඝසරණගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති. “हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धाला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे... पे... हे मित्र मोग्गल्लान, धम्माला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे... पे... हे मित्र मोग्गल्लान, संघाला शरण जाणे खरोखरच चांगले आहे. हे मित्र मोग्गल्लान, संघाला शरण गेल्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य अधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො පඤ්චහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතං ඛො සක්කං දෙවානමින්දං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र पाचशे देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे आला; आल्यानंतर आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन करून एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभ्या असलेल्या देवांचा राजा शक्राला आयुष्यमान महामोग्गल्लान म्हणाले – ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ඉතිපි සො භගවා…පෙ… සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා’ති. බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “देवाधिपती शक्रा, बुद्धावर अढळ श्रद्धा असणे खरोखरच चांगले आहे – ‘ते भगवान असे आहेत... पे... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध, भगवान आहेत.’ देवाधिपती शक्रा, बुद्धावर अढळ श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... पे... दिव्य स्पर्शाने.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො…පෙ… පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති…පෙ…. “देवाधिपती शक्रा, धम्मावर अढळ श्रद्धा असणे खरोखरच चांगले आहे – ‘भगवंतांनी धम्माचे सुंदर प्रकारे आख्यान केले आहे... पे... विद्वानांनी तो आपापल्या ठिकाणी अनुभवण्याजोगा आहे.’ देवाधिपती शक्रा, धम्मावर अढळ श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात... पे...” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘සුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො…පෙ… ලොකස්සා’ති. සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන [Pg.470] සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති…පෙ…. “देवाधिपती शक्रा, संघावर अढळ श्रद्धा असणे खरोखरच चांगले आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... पे... जगाचे अनुत्तर पुण्यक्षेत्र आहे.’ देवाधिपती शक्रा, संघावर अढळ श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात... पे...” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනං හොති අඛණ්ඩෙහි…පෙ… සමාධිසංවත්තනිකෙහි. අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති. “देवाधिपती शक्रा, अखंडित... पे... समाधीला पोषक असणाऱ्या, आर्यजनांना प्रिय असलेल्या शीलांनी संपन्न असणे खरोखरच चांगले आहे. देवाधिपती शक्रा, आर्यजनांना प्रिय असलेल्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... पे... दिव्य स्पर्शाने.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ඉතිපි සො භගවා…පෙ… සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා’ති. බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धावर अढळ श्रद्धा असणे खरोखरच चांगले आहे – ‘ते भगवान असे आहेत... पे... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध, भगवान आहेत.’ हे मित्र मोग्गल्लान, बुद्धावर अढळ श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... पे... दिव्य स्पर्शाने.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො…පෙ… පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “हे मित्र मोग्गल्लान, धम्मावर अढळ श्रद्धा असणे खरोखरच चांगले आहे – ‘भगवंतांनी धम्माचे सुंदर प्रकारे आख्यान केले आहे... पे... विद्वानांनी तो आपापल्या ठिकाणी अनुभवण्याजोगा आहे.’ हे मित्र मोग्गल्लान, धम्मावर अढळ श्रद्धा असण्याच्या कारणानेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला म्हणजेच स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात – दिव्य आयुष्य... पे... दिव्य स्पर्शाने.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘සුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො…පෙ… ලොකස්සා’ති. සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති…පෙ…. “हे प्रिय मोग्गल्लान, संघामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.’ हे प्रिय मोग्गल्लान, संघामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात...” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනං හොති අඛණ්ඩෙහි…පෙ… සමාධිසංවත්තනිකෙහි. අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති. “हे प्रिय मोग्गल्लान, आर्यांना प्रिय असलेल्या, अखंडित... समाधीला पोषक असणाऱ्या शीलांनी युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे. हे प्रिय मोग्गल्लान, आर्यांना प्रिय असलेल्या शीलांनी युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” අථ [Pg.471] ඛො සක්කො දෙවානමින්දො ඡහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ… අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො සත්තහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ… අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො අට්ඨහි දෙවතාසතෙහි සද්ධිං…පෙ… අථ ඛො සක්කො දෙවානමින්දො අසීතියා දෙවතාසහස්සෙහි සද්ධිං යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි. එකමන්තං ඨිතං ඛො සක්කං දෙවානමින්දං ආයස්මා මහාමොග්ගල්ලානො එතදවොච – त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सहाशे देवतांसह... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र सातशे देवतांसह... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र आठशे देवतांसह... त्यानंतर देवांचा राजा शक्र ऐंशी हजार देवतांसह जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते, तेथे आला. जवळ येऊन त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला उभा राहिला. एका बाजूला उभे राहिलेल्या देवांचा राजा शक्र याला आयुष्यमान महामोग्गल्लान यांनी असे म्हटले – ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ඉතිපි සො භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො විජ්ජාචරණසම්පන්නො සුගතො ලොකවිදූ අනුත්තරො පුරිසදම්මසාරථි සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා’ති. බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “देवांचा राजा शक्र, बुद्धामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘ते भगवंत अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवंत आहेत.’ देवांचा राजा शक्र, बुद्धामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने, दिव्य वर्णाने, दिव्य सुखाने, दिव्य यशाने, दिव्य आधिपत्याने, दिव्य रूपांनी, दिव्य शब्दांनी, दिव्य गंधांनी, दिव्य रसांनी आणि दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො සන්දිට්ඨිකො අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “देवांचा राजा शक्र, धम्मामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘भगवंतांनी धम्माचे सुस्पष्ट व्याख्यान केले आहे, तो संदृष्टिक, अकालिक, एहिपस्सिक, ओपनेय्यिक आणि विद्वानांनी आपापल्या परीने स्वतः अनुभवण्याजोगा आहे.’ देवांचा राजा शक्र, धम्मामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘සුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, උජුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, ඤායප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, සාමීචිප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, යදිදං චත්තාරි පුරිසයුගානි අට්ඨ පුරිසපුග්ගලා එස භගවතො සාවකසඞ්ඝො ආහුනෙය්යො පාහුනෙය්යො දක්ඛිණෙය්යො අඤ්ජලිකරණීයො අනුත්තරං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං ලොකස්සා’ති. සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ [Pg.472] අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “देवांचा राजा शक्र, संघामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ ऋजुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ न्यायप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ सामीचीप्रतिपन्न आहे. म्हणजेच, पुरुषांच्या चार जोड्या आणि आठ पुरुष-पुद्गल, हाच भगवंतांचा श्रावकसंघ आहुनेय्य, पाहुनेय्य, दक्खिणेय्य, अंजलिकरणीय आणि जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.’ देवांचा राजा शक्र, संघामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘සාධු ඛො, දෙවානමින්ද, අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනං හොති අඛණ්ඩෙහි අච්ඡිද්දෙහි අසබලෙහි අකම්මාසෙහි භුජිස්සෙහි විඤ්ඤුප්පසත්ථෙහි අපරාමට්ඨෙහි සමාධිසංවත්තනිකෙහි. අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනහෙතු ඛො, දෙවානමින්ද, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති. “देवांचा राजा शक्र, आर्यांना प्रिय असलेल्या, अखंडित, अछिद्र, कलंक नसलेल्या, डाग नसलेल्या, बंधनांतून मुक्त करणाऱ्या, विद्वानांनी प्रशंसिलेल्या, चुकीच्या दृष्टीने न स्पर्श केलेल्या आणि समाधीला पोषक असणाऱ्या शीलांनी युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे. देवांचा राजा शक्र, आर्यांना प्रिय असलेल्या शीलांनी युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने, दिव्य वर्णाने, दिव्य सुखाने, दिव्य यशाने, दिव्य आधिपत्याने, दिव्य रूपांनी, दिव्य शब्दांनी, दिव्य गंधांनी, दिव्य रसांनी आणि दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ඉතිපි සො භගවා…පෙ… සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා’ති. බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “हे प्रिय मोग्गल्लान, बुद्धामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘ते भगवंत... देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवंत आहेत.’ हे प्रिय मोग्गल्लान, बुद्धामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො…පෙ… පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “हे प्रिय मोग्गल्लान, धम्मामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘भगवंतांनी धम्माचे सुस्पष्ट व्याख्यान केले आहे... आणि विद्वानांनी आपापल्या परीने स्वतः अनुभवण्याजोगा आहे.’ हे प्रिय मोग्गल्लान, धम्मामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනං හොති – ‘සුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො…පෙ… අනුත්තරං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං ලොකස්සා’ති. සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගමනහෙතු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා…පෙ… දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහි. “हे प्रिय मोग्गल्लान, संघामध्ये अढळ श्रद्धेने युक्त असणे हे खरोखर कल्याणकारी आहे – ‘भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे... जगासाठी सर्वश्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र आहे.’ हे प्रिय मोग्गल्लान, संघामध्ये अशा अढळ श्रद्धेने युक्त असल्यामुळेच, या जगातील काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर, सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी वरचढ ठरतात – दिव्य आयुष्याने... दिव्य स्पर्शांनी.” ‘‘සාධු ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනං හොති අඛණ්ඩෙහි…පෙ… සමාධිසංවත්තනිකෙහි. අරියකන්තෙහි සීලෙහි සමන්නාගමනහෙතු [Pg.473] ඛො, මාරිස මොග්ගල්ලාන, එවමිධෙකච්චෙ සත්තා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජන්ති. තෙ අඤ්ඤෙ දෙවෙ දසහි ඨානෙහි අධිගණ්හන්ති – දිබ්බෙන ආයුනා, දිබ්බෙන වණ්ණෙන, දිබ්බෙන සුඛෙන, දිබ්බෙන යසෙන, දිබ්බෙන ආධිපතෙය්යෙන, දිබ්බෙහි රූපෙහි, දිබ්බෙහි සද්දෙහි, දිබ්බෙහි ගන්ධෙහි, දිබ්බෙහි රසෙහි, දිබ්බෙහි ඵොට්ඨබ්බෙහී’’ති. දසමං. “हे प्रिय मोग्गल्लान, अखंडित... आणि समाधीला पूरक असणाऱ्या, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असणे खरोखरच उत्तम आहे. हे प्रिय मोग्गल्लान, आर्यांना प्रिय असणाऱ्या शीलांनी संपन्न असण्याच्या कारणामुळेच, या जगात काही प्राणी शरीराच्या विघटनानंतर, मृत्यूनंतर सुगती असलेल्या स्वर्गलोकात उत्पन्न होतात. ते इतर देवांपेक्षा दहा बाबींमध्ये श्रेष्ठ ठरतात - दिव्य आयुष्य, दिव्य वर्ण, दिव्य सुख, दिव्य यश, दिव्य आधिपत्य, दिव्य रूप, दिव्य शब्द, दिव्य गंध, दिव्य रस आणि दिव्य स्पर्श.” दहावे. 11. චන්දනසුත්තං ११. चंदनसुत्त 342. අථ ඛො චන්දනො දෙවපුත්තො…පෙ…. ३४२. त्यानंतर चंदन देवपुत्र... (पेय्याल)... අථ ඛො සුයාමො දෙවපුත්තො…පෙ…. त्यानंतर सुयाम देवपुत्र... (पेय्याल)... අථ ඛො සන්තුසිතො දෙවපුත්තො…පෙ…. त्यानंतर संतुसित देवपुत्र... (पेय्याल)... අථ ඛො සුනිම්මිතො දෙවපුත්තො…පෙ…. त्यानंतर सुनिम्मित देवपुत्र... (पेय्याल)... අථ ඛො වසවත්ති දෙවපුත්තො…පෙ…. त्यानंतर वसवत्ती देवपुत्र... (पेय्याल)... (යථා සක්කසුත්තං තථා ඉමෙ පඤ්ච පෙය්යාලා විත්ථාරෙතබ්බා). එකාදසමං. (ज्याप्रमाणे सक्कसुत्त सविस्तर सांगितले आहे, त्याचप्रमाणे हे पाच पेय्याल सविस्तर जाणावेत). अकरावे. මොග්ගල්ලානසංයුත්තං සමත්තං. मोग्गल्लानसंयुत्त समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – සවිතක්කාවිතක්කඤ්ච, සුඛෙන ච උපෙක්ඛකො; ආකාසඤ්චෙව විඤ්ඤාණං, ආකිඤ්චං නෙවසඤ්ඤිනා; අනිමිත්තො ච සක්කො ච, චන්දනෙකාදසෙන චාති. सवितक्क-अवितक्क, सुख, उपेक्षक, आकास, विञ्ञाण, आकिञ्चञ्ञ, नेवसञ्ञीनासञ्ञी, अनिमित्त, सक्क आणि अकरावे चंदन. 7. චිත්තසංයුත්තං ७. चित्तसंयुत्त 1. සංයොජනසුත්තං १. संयोजनसुत्त 343. එකං [Pg.474] සමයං සම්බහුලා ථෙරා භික්ඛූ මච්ඡිකාසණ්ඩෙ විහරන්ති අම්බාටකවනෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන සම්බහුලානං ථෙරානං භික්ඛූනං පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තානං මණ්ඩලමාළෙ සන්නිසින්නානං සන්නිපතිතානං අයමන්තරාකථා උදපාදි – ‘‘‘සංයොජන’න්ති වා, ආවුසො, ‘සංයොජනියා ධම්මා’ති වා ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා නානාබ්යඤ්ජනා උදාහු එකත්ථා බ්යඤ්ජනමෙව නාන’’න්ති? තත්රෙකච්චෙහි ථෙරෙහි භික්ඛූහි එවං බ්යාකතං හොති – ‘‘‘සංයොජන’න්ති වා, ආවුසො, ‘සංයොජනියා ධම්මා’ති වා ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා චෙව නානාබ්යඤ්ජනා චා’’ති. එකච්චෙහි ථෙරෙහි භික්ඛූහි එවං බ්යාකතං හොති – ‘‘‘සංයොජන’න්ති වා, ආවුසො, ‘සංයොජනියා ධම්මා’ති වා ඉමෙ ධම්මා එකත්ථා බ්යඤ්ජනමෙව නාන’’න්ති. ३४३. एकदा अनेक थेर भिक्खू मच्छिकाखंड येथील आंबाटकवनात विहार करत होते. त्या वेळी, भोजनानंतर भिक्षाटनाहून परतलेले अनेक थेर भिक्खू मंडपशाळेत एकत्र बसले असताना त्यांच्यात असा संवाद सुरू झाला – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थानेही भिन्न आणि शब्दानेही भिन्न आहेत, की ते अर्थाने एकच असून केवळ शब्दाने भिन्न आहेत?” तेव्हा काही थेर भिक्खूंनी असे उत्तर दिले – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत.” तर काही थेर भिक्खूंनी असे उत्तर दिले – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थाने एकच आहेत, केवळ शब्दाने भिन्न आहेत.” තෙන ඛො පන සමයෙන චිත්තො ගහපති මිගපථකං අනුප්පත්තො හොති කෙනචිදෙව කරණීයෙන. අස්සොසි ඛො චිත්තො ගහපති සම්බහුලානං කිර ථෙරානං භික්ඛූනං පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තානං මණ්ඩලමාළෙ සන්නිසින්නානං සන්නිපතිතානං අයමන්තරාකථා උදපාදි – ‘‘‘සංයොජන’න්ති වා, ආවුසො, ‘සංයොජනියා ධම්මා’ති වා ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා නානාබ්යඤ්ජනා උදාහු එකත්ථා බ්යඤ්ජනමෙව නාන’’න්ති? තත්රෙකච්චෙහි ථෙරෙහි භික්ඛූහි එවං බ්යාකතං – ‘‘‘සංයොජන’න්ති වා, ආවුසො, ‘සංයොජනියා ධම්මා’ති වා ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා චෙව නානාබ්යඤ්ජනා චා’’ති. එකච්චෙහි ථෙරෙහි භික්ඛූහි එවං බ්යාකතං ‘සංයොජන’න්ති වා, ආවුසො ‘සංයොජනියා ධම්මා’ති වා ඉමෙ ධම්මා එකත්ථා බ්යඤ්ජනමෙව නානන්ති. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙන ථෙරා භික්ඛූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ථෙරෙ භික්ඛූ අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො චිත්තො ගහපති ථෙරෙ භික්ඛූ එතදවොච – ‘‘සුතං මෙතං, භන්තෙ, සම්බහුලානං කිර ථෙරානං භික්ඛූනං පච්ඡාභත්තං පිණ්ඩපාතපටික්කන්තානං මණ්ඩලමාළෙ සන්නිසින්නානං සන්නිපතිතානං අයමන්තරාකථා උදපාදි – ‘සංයොජන’න්ති වා, ආවුසො, ‘සංයොජනියා ධම්මා’ති වා ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා නානාබ්යඤ්ජනා උදාහු එකත්ථා බ්යඤ්ජනමෙව නාන’’න්ති? එකච්චෙහි ථෙරෙහි භික්ඛූහි [Pg.475] එවං බ්යාකතං – ‘‘‘සංයොජන’න්ති වා, ආවුසො, ‘සංයොජනියා ධම්මා’ති වා ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා චෙව නානාබ්යඤ්ජනා චා’’ති. එකච්චෙහි ථෙරෙහි භික්ඛූහි එවං බ්යාකතං ‘‘‘සංයොජන’න්ති වා, ආවුසො, ‘සංයොජනියා ධම්මා’ති වා ඉමෙ ධම්මා එකත්ථා බ්යඤ්ජනමෙව නාන’’න්ති. ‘‘එවං, ගහපතී’’ති. त्या वेळी चित्त गृहपती काही कामासाठी मिगपथक येथे आले होते. चित्त गृहपतींनी ऐकले की, भोजनानंतर भिक्षाटनाहून परतलेले अनेक थेर भिक्खू मंडपशाळेत एकत्र बसले असताना त्यांच्यात असा संवाद सुरू झाला आहे – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थानेही भिन्न आणि शब्दानेही भिन्न आहेत, की ते अर्थाने एकच असून केवळ शब्दाने भिन्न आहेत?” आणि काही थेर भिक्खूंनी उत्तर दिले आहे – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत.” तर काही थेर भिक्खूंनी उत्तर दिले आहे – “मित्रांनो, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थाने एकच आहेत, केवळ शब्दाने भिन्न आहेत.” त्यानंतर चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतींनी थेर भिक्खूंना विचारले – “भंते, मी असे ऐकले आहे की, भोजनानंतर भिक्षाटनाहून परतलेले अनेक थेर भिक्खू मंडपशाळेत एकत्र बसले असताना त्यांच्यात असा संवाद सुरू झाला – ‘मित्रांनो, संयोजन आणि संयोजनीय धर्म हे अर्थानेही भिन्न आणि शब्दानेही भिन्न आहेत, की ते अर्थाने एकच असून केवळ शब्दाने भिन्न आहेत?’ त्यावर काही थेर भिक्खूंनी उत्तर दिले – ‘मित्रांनो, संयोजन आणि संयोजनीय धर्म हे अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत.’ तर काही थेर भिक्खूंनी उत्तर दिले – ‘मित्रांनो, संयोजन आणि संयोजनीय धर्म हे अर्थाने एकच आहेत, केवळ शब्दाने भिन्न आहेत.’ हे खरे आहे का?” “होय, गृहपती, हे खरे आहे.” ‘‘‘සංයොජන’න්ති වා, භන්තෙ, ‘සංයොජනියා ධම්මා’ති වා ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා චෙව නානාබ්යඤ්ජනා ච. තෙන හි, භන්තෙ, උපමං වො කරිස්සාමි. උපමායපිධෙකච්චෙ විඤ්ඤූ පුරිසා භාසිතස්ස අත්ථං ආජානන්ති. සෙය්යථාපි, භන්තෙ, කාළො ච බලීබද්දො ඔදාතො ච බලීබද්දො එකෙන දාමෙන වා යොත්තෙන වා සංයුත්තා අස්සු. යො නු ඛො එවං වදෙය්ය – ‘කාළො බලීබද්දො ඔදාතස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජනං, ඔදාතො බලීබද්දො කාළස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජන’න්ති, සම්මා නු ඛො සො වදමානො වදෙය්යා’’ති? ‘‘නො හෙතං, ගහපති! න ඛො, ගහපති, කාළො බලීබද්දො ඔදාතස්ස බලීබද්දස්ස සංයොජනං, නපි ඔදාතො බලීබද්දො කාළස්ස බළීබද්දස්ස සංයොජනං; යෙන ඛො තෙ එකෙන දාමෙන වා යොත්තෙන වා සංයුත්තා තං තත්ථ සංයොජන’’න්ති. ‘‘එවමෙව ඛො, භන්තෙ, න චක්ඛු රූපානං සංයොජනං, න රූපා චක්ඛුස්ස සංයොජනං; යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො තං තත්ථ සංයොජනං. න සොතං සද්දානං… න ඝානං ගන්ධානං… න ජිව්හා රසානං… න කායො ඵොට්ඨබ්බානං සංයොජනං, න ඵොට්ඨබ්බා කායස්ස සංයොජනං; යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො තං තත්ථ සංයොජනං. න මනො ධම්මානං සංයොජනං, න ධම්මා මනස්ස සංයොජනං; යඤ්ච තත්ථ තදුභයං පටිච්ච උප්පජ්ජති ඡන්දරාගො තං තත්ථ සංයොජන’’න්ති. ‘‘ලාභා තෙ, ගහපති, සුලද්ධං තෙ, ගහපති, යස්ස තෙ ගම්භීරෙ බුද්ධවචනෙ පඤ්ඤාචක්ඛු කමතී’’ති. පඨමං. “भंते, ‘संयोजन’ आणि ‘संयोजनीय धर्म’ हे अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत. म्हणूनच, भंते, मी आपल्याला एक उपमा देतो. कारण या जगात काही बुद्धिमान लोक उपमेच्या द्वारेही बोलण्याचा अर्थ समजून घेतात. भंते, समजा एक काळा बैल आणि एक पांढरा बैल एकाच दोरीने किंवा जोताने एकत्र बांधलेले आहेत. जर कोणी असे म्हटले की – ‘काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे बंधन आहे, आणि पांढरा बैल हा काळ्या बैलाचे बंधन आहे’, तर त्याचे हे बोलणे योग्य ठरेल का?” “नाही, गृहपती! गृहपती, काळा बैल हा पांढऱ्या बैलाचे बंधन नाही, आणि पांढरा बैलही काळ्या बैलाचे बंधन नाही; तर ज्या एका दोरीने किंवा जोताने ते दोघे एकत्र बांधलेले आहेत, तेच तेथील बंधन (संयोजन) आहे.” “तसेच, भंते, डोळे हे रूपांचे बंधन नाही आणि रूपे ही डोळ्यांचे बंधन नाही; तर त्या दोन्हीच्या आधारे जो इच्छा-राग (छंदराग) उत्पन्न होतो, तेच तेथील बंधन आहे. कान हे शब्दांचे बंधन नाही... नाक हे गंधाचे बंधन नाही... जीभ ही रसांचे बंधन नाही... शरीर हे स्पर्शांचे बंधन नाही आणि स्पर्श हे शरीराचे बंधन नाही; तर त्या दोन्हीच्या आधारे जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथील बंधन आहे. मन हे धर्मांचे बंधन नाही आणि धर्म हे मनाचे बंधन नाही; तर त्या दोन्हीच्या आधारे जो इच्छा-राग उत्पन्न होतो, तेच तेथील बंधन आहे.” “गृहपती, हा तुझा लाभ आहे! गृहपती, तुला हे उत्तम लाभले आहे, की तुझी प्रज्ञाचक्षू बुद्धांच्या या गंभीर वचनात प्रवेश करते!” पहिले. 2. පඨමඉසිදත්තසුත්තං २. प्रथम इसिदत्तसुत्त 344. එකං සමයං සම්බහුලා ථෙරා භික්ඛූ මච්ඡිකාසණ්ඩෙ විහරන්ති අම්බාටකවනෙ. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙන ථෙරා භික්ඛූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ථෙරෙ භික්ඛූ අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො චිත්තො ගහපති ථෙරෙ භික්ඛූ එතදවොච – ‘‘අධිවාසෙන්තු මෙ, භන්තෙ, ථෙරා ස්වාතනාය භත්ත’’න්ති. අධිවාසෙසුං ඛො ථෙරා භික්ඛූ තුණ්හීභාවෙන[Pg.476]. අථ ඛො චිත්තො ගහපති ථෙරානං භික්ඛූනං අධිවාසනං විදිත්වා උට්ඨායාසනා ථෙරෙ භික්ඛූ අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමි. අථ ඛො ථෙරා භික්ඛූ තස්සා රත්තියා අච්චයෙන පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන චිත්තස්ස ගහපතිස්ස නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදිංසු. ३४४. एकदा अनेक ज्येष्ठ थेर भिक्खू मच्छिकाषंड येथील आंबाटक वनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंना असे म्हटले— 'भन्ते, थेर भिक्खूंनी उद्यासाठी माझे भोजन स्वीकारावे.' थेर भिक्खूंनी मौन राहून ते स्वीकारले. त्यानंतर चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंची संमती जाणून घेऊन, आपल्या आसनावरून उठून, थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा करून तो निघून गेला. त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर, सकाळी थेर भिक्खूंनी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन जेथे चित्त गृहपतीचे घर होते तेथे गेले; तिथे जाऊन ते मांडलेल्या आसनांवर बसले. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙන ථෙරා භික්ඛූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ථෙරෙ භික්ඛූ අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මන්තං ථෙරං එතදවොච – ‘‘‘ධාතුනානත්තං, ධාතුනානත්ත’න්ති, භන්තෙ ථෙර, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, ධාතුනානත්තං වුත්තං භගවතා’’ති? එවං වුත්තෙ ආයස්මා ථෙරො තුණ්හී අහොසි. දුතියම්පි ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මන්තං ථෙරං එතදවොච – ‘‘‘ධාතුනානත්තං, ධාතුනානත්ත’න්ති, භන්තෙ ථෙර, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, ධාතුනානත්තං වුත්තං භගවතා’’ති? දුතියම්පි ඛො ආයස්මා ථෙරො තුණ්හී අහොසි. තතියම්පි ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මන්තං ථෙරං එතදවොච – ‘‘‘ධාතුනානත්තං, ධාතුනානත්ත’න්ති, භන්තෙ ථෙර, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, ධාතුනානත්තං වුත්තං භගවතා’’ති? තතියම්පි ඛො ආයස්මා ථෙරො තුණ්හී අහොසි. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, धातूंची विविधता, धातूंची विविधता असे म्हटले जाते. भन्ते, भगवंतांनी किती प्रकारे धातूंची विविधता सांगितली आहे?' असे विचारले असता आयुष्यमान थेर मौन राहिले. दुसऱ्यांदाही चित्त गृहपतीने आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, धातूंची विविधता, धातूंची विविधता असे म्हटले जाते. भन्ते, भगवंतांनी किती प्रकारे धातूंची विविधता सांगितली आहे?' दुसऱ्यांदाही आयुष्यमान थेर मौन राहिले. तिसऱ्यांदाही चित्त गृहपतीने आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, धातूंची विविधता, धातूंची विविधता असे म्हटले जाते. भन्ते, भगवंतांनी किती प्रकारे धातूंची विविधता सांगितली आहे?' तिसऱ्यांदाही आयुष्यमान थेर मौन राहिले. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා ඉසිදත්තො තස්මිං භික්ඛුසඞ්ඝෙ සබ්බනවකො හොති. අථ ඛො ආයස්මා ඉසිදත්තො ආයස්මන්තං ථෙරං එතදවොච – ‘‘බ්යාකරොමහං, භන්තෙ ථෙර, චිත්තස්ස ගහපතිනො එතං පඤ්හ’’න්ති? ‘‘බ්යාකරොහි ත්වං, ආවුසො ඉසිදත්ත, චිත්තස්ස ගහපතිනො එතං පඤ්හ’’න්ති. ‘‘එවඤ්හි ත්වං, ගහපති, පුච්ඡසි – ‘ධාතුනානත්තං, ධාතුනානත්තන්ති, භන්තෙ ථෙර, වුච්චති. කිත්තාවතා නු ඛො, භන්තෙ, ධාතුනානත්තං, වුත්තං භගවතා’’’ති? ‘‘එවං, භන්තෙ’’. ‘‘ඉදං ඛො, ගහපති, ධාතුනානත්තං වුත්තං භගවතා – චක්ඛුධාතු, රූපධාතු, චක්ඛුවිඤ්ඤාණධාතු…පෙ… මනොධාතු, ධම්මධාතු, මනොවිඤ්ඤාණධාතු. එත්තාවතා ඛො, ගහපති, ධාතුනානත්තං වුත්තං භගවතා’’ති. त्या वेळी आयुष्यमान इसिदत्त त्या भिक्खू संघात सर्वात कनिष्ठ होते. तेव्हा आयुष्यमान इसिदत्तांनी आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, मी चित्त गृहपतीच्या या प्रश्नाचे उत्तर देऊ का?' 'आवुसो इसिदत्त, तूच चित्त गृहपतीच्या या प्रश्नाचे उत्तर दे.' 'गृहपती, तू असाच प्रश्न विचारत आहेस ना— भन्ते थेर, धातूंची विविधता, धातूंची विविधता असे म्हटले जाते. भन्ते, भगवंतांनी किती प्रकारे धातूंची विविधता सांगितली आहे?' 'होय, भन्ते.' 'गृहपती, भगवंतांनी ही धातूंची विविधता अशी सांगितली आहे— चक्षु-धातू, रूप-धातू, चक्षु-विज्ञान-धातू...पे... मनो-धातू, धम्म-धातू, मनो-विज्ञान-धातू. गृहपती, एवढ्याच प्रकारे भगवंतांनी धातूंची विविधता सांगितली आहे.' අථ ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මතො ඉසිදත්තස්ස භාසිතං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා ථෙරෙ භික්ඛූ පණීතෙන ඛාදනීයෙන භොජනීයෙන සහත්ථා සන්තප්පෙසි සම්පවාරෙසි. අථ ඛො ථෙරා භික්ඛූ භුත්තාවිනො ඔනීතපත්තපාණිනො උට්ඨායාසනා පක්කමිංසු. අථ ඛො ආයස්මා ථෙරො ආයස්මන්තං ඉසිදත්තං එතදවොච – ‘‘සාධු ඛො තං, ආවුසො ඉසිදත්ත[Pg.477], එසො පඤ්හො පටිභාසි, නෙසො පඤ්හො මං පටිභාසි. තෙනහාවුසො ඉසිදත්ත, යදා අඤ්ඤථාපි එවරූපො පඤ්හො ආගච්ඡෙය්ය, තඤ්ඤෙවෙත්ථ පටිභාසෙය්යා’’ති. දුතියං. तेव्हा चित्त गृहपतीने आयुष्यमान इसिदत्तांच्या भाषणाचे अभिनंदन व अनुमोदन करून, थेर भिक्खूंना उत्तम प्रकारच्या खाद्य व भोज्य पदार्थांनी स्वतःच्या हाताने तृप्त केले व संतुष्ट केले. त्यानंतर थेर भिक्खूंनी भोजन आटोपल्यावर आणि पात्रातून हात काढून घेतल्यावर, आसनावरून उठून ते निघून गेले. तेव्हा आयुष्यमान थेरांनी आयुष्यमान इसिदत्तांना असे म्हटले— 'साधू! आवुसो इसिदत्त, तुला या प्रश्नाचे उत्तर उत्तम प्रकारे सुचले. मला या प्रश्नाचे उत्तर सुचले नव्हते. म्हणूनच, आवुसो इसिदत्त, जेव्हा कधी भविष्यात असा प्रश्न येईल, तेव्हा तूच त्याचे उत्तर द्यावेस.' दुसरे. 3. දුතියඉසිදත්තසුත්තං ३. दुसरे इसिदत्त सुत्त 345. එකං සමයං සම්බහුලා ථෙරා භික්ඛූ මච්ඡිකාසණ්ඩෙ විහරන්ති අම්බාටකවනෙ. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙන ථෙරා භික්ඛූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ථෙරෙ භික්ඛූ අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො චිත්තො ගහපති ථෙරෙ භික්ඛූ එතදවොච – ‘‘අධිවාසෙන්තු මෙ, භන්තෙ ථෙරා, ස්වාතනාය භත්ත’’න්ති. අධිවාසෙසුං ඛො ථෙරා භික්ඛූ තුණ්හීභාවෙන. අථ ඛො චිත්තො ගහපති ථෙරානං භික්ඛූනං අධිවාසනං විදිත්වා උට්ඨායාසනා ථෙරෙ භික්ඛූ අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමි. අථ ඛො ථෙරා භික්ඛූ තස්සා රත්තියා අච්චයෙන පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන චිත්තස්ස ගහපතිස්ස නිවෙසනං තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදිංසු. ३४५. एकदा अनेक ज्येष्ठ थेर भिक्खू मच्छिकाषंड येथील आंबाटक वनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, उद्यासाठी माझे भोजन स्वीकारावे.' थेर भिक्खूंनी मौन राहून ते स्वीकारले. त्यानंतर चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंची संमती जाणून घेऊन, आपल्या आसनावरून उठून, थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा करून तो निघून गेला. त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर, सकाळी थेर भिक्खूंनी चिवर परिधान करून, पात्र व चिवर घेऊन जेथे चित्त गृहपतीचे घर होते तेथे गेले; तिथे जाऊन ते मांडलेल्या आसनांवर बसले. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙන ථෙරා භික්ඛූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ථෙරෙ භික්ඛූ අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මන්තං ථෙරං එතදවොච – ‘‘යා ඉමා, භන්තෙ ථෙර, අනෙකවිහිතා දිට්ඨියො ලොකෙ උප්පජ්ජන්ති – ‘සස්සතො ලොකොති වා, අසස්සතො ලොකොති වා, අන්තවා ලොකොති වා, අනන්තවා ලොකොති වා, තං ජීවං තං සරීරන්ති වා, අඤ්ඤං ජීවං අඤ්ඤං සරීරන්ති වා, හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, න හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා. යානි චිමානි ද්වාසට්ඨි දිට්ඨිගතානි බ්රහ්මජාලෙ භණිතානි; ඉමා නු ඛො, භන්තෙ, දිට්ඨියො කිස්මිං සති හොන්ති, කිස්මිං අසති න හොන්තී’’ති? तेव्हा चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले— 'भन्ते थेर, जगात ज्या या अनेक प्रकारच्या दृष्टी निर्माण होतात— लोक शाश्वत आहे किंवा लोक अशाश्वत आहे; लोक सान्त आहे किंवा लोक अनन्त आहे; जो जीव आहे तेच शरीर आहे किंवा जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे; तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात किंवा तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात किंवा तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही किंवा तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही; आणि ब्रह्मजाल सुत्तात ज्या बासष्ट दृष्टी सांगितल्या आहेत; भन्ते, या सर्व दृष्टी कशाच्या अस्तित्वामुळे निर्माण होतात आणि कशाच्या अभावामुळे निर्माण होत नाहीत?' එවං වුත්තෙ, ආයස්මා ථෙරො තුණ්හී අහොසි. දුතියම්පි ඛො චිත්තො ගහපති…පෙ… තතියම්පි ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මන්තං ථෙරං එතදවොච – ‘‘යා ඉමා, භන්තෙ ථෙර, අනෙකවිහිතා දිට්ඨියො ලොකෙ [Pg.478] උප්පජ්ජන්ති – සස්සතො ලොකොති වා, අසස්සතො ලොකොති වා, අන්තවා ලොකොති වා, අනන්තවා ලොකොති වා, තං ජීවං තං සරීරන්ති වා, අඤ්ඤං ජීවං අඤ්ඤං සරීරන්ති වා, හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, න හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති වා. යානි චිමානි ද්වාසට්ඨි දිට්ඨිගතානි බ්රහ්මජාලෙ භණිතානි; ඉමා නු ඛො, භන්තෙ, දිට්ඨියො කිස්මිං සති හොන්ති, කිස්මිං අසති න හොන්තී’’ති? තතියම්පි ඛො ආයස්මා ථෙරො තුණ්හී අහොසි. असे विचारले असता, आयुष्यमान स्थवीर शांत राहिले. दुसऱ्यांदाही चित्त गृहपतीने... आणि तिसऱ्यांदाही चित्त गृहपतीने आयुष्यमान स्थविरांना असे म्हटले – “भन्ते स्थवीर, जगात ज्या या अनेक प्रकारच्या दृष्टी उत्पन्न होतात – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा 'लोक अशाश्वत आहे', 'लोक सान्त आहे' किंवा 'लोक अनंंत आहे', 'जो जीव आहे तेच शरीर आहे' किंवा 'जीव वेगळा आहे आणि शरीर वेगळे आहे', 'तथागत मृत्यूनंतर असतात' किंवा 'तथागत मृत्यूनंतर नसतात', 'तथागत मृत्यूनंतर असतात आणि नसतातही' किंवा 'तथागत मृत्यूनंतर असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही'. तसेच ब्रह्मजाल सुत्तात ज्या बासष्ट दृष्टी सांगितल्या आहेत; भन्ते, या दृष्टी कशाच्या अस्तित्वामुळे निर्माण होतात आणि कशाच्या अभावामुळे निर्माण होत नाहीत?” तिसऱ्यांदाही आयुष्यमान स्थवीर शांतच राहिले. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා ඉසිදත්තො තස්මිං භික්ඛුසඞ්ඝෙ සබ්බනවකො හොති. අථ ඛො ආයස්මා ඉසිදත්තො ආයස්මන්තං ථෙරං එතදවොච – ‘‘බ්යාකරොමහං, භන්තෙ ථෙර, චිත්තස්ස ගහපතිනො එතං පඤ්හ’’න්ති? ‘‘බ්යාකරොහි ත්වං, ආවුසො ඉසිදත්ත, චිත්තස්ස ගහපතිනො එතං පඤ්හ’’න්ති. ‘‘එවඤ්හි ත්වං, ගහපති, පුච්ඡසි – ‘යා ඉමා, භන්තෙ ථෙර, අනෙකවිහිතා දිට්ඨියො ලොකෙ උප්පජ්ජන්ති – සස්සතො ලොකොති වා…පෙ…; ඉමා නු ඛො, භන්තෙ, දිට්ඨියො කිස්මිං සති හොන්ති, කිස්මිං අසති න හොන්තී’’’ති? ‘‘එවං, භන්තෙ’’. ‘‘යා ඉමා, ගහපති, අනෙකවිහිතා දිට්ඨියො ලොකෙ උප්පජ්ජන්ති – ‘සස්සතො ලොකොති වා, අසස්සතො ලොකොති වා, අන්තවා ලොකොති වා අනන්තවා ලොකොති වා, තං ජීවං තං සරීරන්ති වා, අඤ්ඤං ජීවං අඤ්ඤං සරීරන්ති වා, හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, න හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති වා. යානි චිමානි ද්වාසට්ඨි දිට්ඨිගතානි බ්රහ්මජාලෙ භණිතානි; ඉමා ඛො, ගහපති, දිට්ඨියො සක්කායදිට්ඨියා සති හොන්ති, සක්කායදිට්ඨියා අසති න හොන්තී’’’ති. त्या वेळी आयुष्यमान इसिदत्त त्या भिक्खू संघात सर्वात कनिष्ठ होते. तेव्हा आयुष्यमान इसिदत्तांनी आयुष्यमान स्थविरांना असे म्हटले – “भन्ते स्थवीर, मी चित्त गृहपतीच्या या प्रश्नाचे उत्तर देऊ का?” “मित्रा इसिदत्ता, तू चित्त गृहपतीच्या या प्रश्नाचे उत्तर दे.” (मग इसिदत्तांनी विचारले) “गृहपती, तू असाच प्रश्न विचारत आहेस का – 'भन्ते स्थवीर, जगात ज्या या अनेक प्रकारच्या दृष्टी उत्पन्न होतात – लोक शाश्वत आहे... इत्यादी... भन्ते, या दृष्टी कशाच्या अस्तित्वामुळे निर्माण होतात आणि कशाच्या अभावामुळे निर्माण होत नाहीत?'” “होय, भन्ते.” “गृहपती, जगात ज्या या अनेक प्रकारच्या दृष्टी उत्पन्न होतात – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा 'लोक अशाश्वत आहे', 'लोक सान्त आहे' किंवा 'लोक अनंंत आहे', 'जो जीव आहे तेच शरीर आहे' किंवा 'जीव वेगळा आहे आणि शरीर वेगळे आहे', 'तथागत मृत्यूनंतर असतात' किंवा 'तथागत मृत्यूनंतर नसतात', 'तथागत मृत्यूनंतर असतात आणि नसतातही' किंवा 'तथागत मृत्यूनंतर असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही'. तसेच ब्रह्मजाल सुत्तात ज्या बासष्ट दृष्टी सांगितल्या आहेत; गृहपती, या दृष्टी सत्कायदृष्टी अस्तित्वात असताना निर्माण होतात आणि सत्कायदृष्टी अस्तित्वात नसताना निर्माण होत नाहीत.” ‘‘කථං පන, භන්තෙ, සක්කායදිට්ඨි හොතී’’ති? ‘‘ඉධ, ගහපති, අස්සුතවා පුථුජ්ජනො අරියානං අදස්සාවී අරියධම්මස්ස අකොවිදො අරියධම්මෙ අවිනීතො, සප්පුරිසානං අදස්සාවී සප්පුරිසධම්මස්ස අකොවිදො සප්පුරිසධම්මෙ අවිනීතො රූපං අත්තතො සමනුපස්සති, රූපවන්තං වා අත්තානං, අත්තනි වා රූපං, රූපස්මිං වා අත්තානං; වෙදනං අත්තතො සමනුපස්සති…පෙ… සඤ්ඤං… සඞ්ඛාරෙ… විඤ්ඤාණං අත්තතො සමනුපස්සති, විඤ්ඤාණවන්තං වා අත්තානං, අත්තනි [Pg.479] වා විඤ්ඤාණං, විඤ්ඤාණස්මිං වා අත්තානං. එවං ඛො, ගහපති, සක්කායදිට්ඨි හොතී’’ති. “पण भन्ते, सत्कायदृष्टी कशी निर्माण होते?” “गृहपती, या जगात अश्रुतवान पृथग्जन, जो आर्यांचे दर्शन न घेतलेला, आर्यधम्मात अकुशल आणि आर्यधम्मात अविनीत आहे; सत्पुरुषांचे दर्शन न घेतलेला, सत्पुरुषधम्मात अकुशल आणि सत्पुरुषधम्मात अविनीत आहे; तो रूपाला आत्मा म्हणून पाहतो, किंवा आत्म्याला रूपवान पाहतो, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहतो, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहतो. तो वेदनेला आत्मा म्हणून पाहतो... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहतो, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान पाहतो, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहतो, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहतो. गृहपती, अशा प्रकारे सत्कायदृष्टी निर्माण होते.” ‘‘කථං පන, භන්තෙ, සක්කායදිට්ඨි න හොතී’’ති? ‘‘ඉධ, ගහපති, සුතවා අරියසාවකො අරියානං දස්සාවී අරියධම්මස්ස කොවිදො අරියධම්මෙ සුවිනීතො සප්පුරිසානං දස්සාවී සප්පුරිසධම්මස්ස කොවිදො සප්පුරිසධම්මෙ සුවිනීතො න රූපං අත්තතො සමනුපස්සති, න රූපවන්තං වා අත්තානං, න අත්තනි වා රූපං, න රූපස්මිං වා අත්තානං; න වෙදනං… න සඤ්ඤං… න සඞ්ඛාරෙ… න විඤ්ඤාණං අත්තතො සමනුපස්සති, න විඤ්ඤාණවන්තං වා අත්තානං, න අත්තනි වා විඤ්ඤාණං, න විඤ්ඤාණස්මිං වා අත්තානං. එවං ඛො, ගහපති, සක්කායදිට්ඨි න හොතී’’ති. “पण भन्ते, सत्कायदृष्टी कशी निर्माण होत नाही?” “गृहपती, या जगात श्रुतवान आर्यश्रावक, जो आर्यांचे दर्शन घेणारा, आर्यधम्मात कुशल आणि आर्यधम्मात सुविनीत आहे; सत्पुरुषांचे दर्शन घेणारा, सत्पुरुषधम्मात कुशल आणि सत्पुरुषधम्मात सुविनीत आहे; तो रूपाला आत्मा म्हणून पाहत नाही, किंवा आत्म्याला रूपवान पाहत नाही, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहत नाही, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहत नाही. तो वेदनेला... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहत नाही, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान पाहत नाही, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहत नाही, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहत नाही. गृहपती, अशा प्रकारे सत्कायदृष्टी निर्माण होत नाही.” ‘‘කුතො, භන්තෙ, අය්යො ඉසිදත්තො ආගච්ඡතී’’ති? ‘‘අවන්තියා ඛො, ගහපති, ආගච්ඡාමී’’ති. ‘‘අත්ථි, භන්තෙ, අවන්තියා ඉසිදත්තො නාම කුලපුත්තො අම්හාකං අදිට්ඨසහායො පබ්බජිතො? දිට්ඨො සො ආයස්මතා’’ති? ‘‘එවං, ගහපතී’’ති. ‘‘කහං නු ඛො සො, භන්තෙ, ආයස්මා එතරහි විහරතී’’ති? එවං වුත්තෙ, ආයස්මා ඉසිදත්තො තුණ්හී අහොසි. ‘‘අය්යො නො, භන්තෙ, ඉසිදත්තො’’ති? ‘‘එවං, ගහපතී’’ති. ‘‘අභිරමතු, භන්තෙ, අය්යො ඉසිදත්තො මච්ඡිකාසණ්ඩෙ. රමණීයං අම්බාටකවනං. අහං අය්යස්ස ඉසිදත්තස්ස උස්සුක්කං කරිස්සාමි චීවරපිණ්ඩපාතසෙනාසනගිලානප්පච්චයභෙසජ්ජපරික්ඛාරාන’’න්ති. ‘‘කල්යාණං වුච්චති, ගහපතී’’ති. “भन्ते, आर्य इसिदत्त कोठून आले आहेत?” “गृहपती, मी अवंती देशातून आलो आहे.” “भन्ते, अवंतीमध्ये इसिदत्त नावाचा एक कुलपुत्र आहे, जो आमचा न पाहिलेला मित्र आहे आणि त्याने प्रव्रज्या घेतली आहे. आयुष्यमानांनी त्याला पाहिले आहे का?” “होय, गृहपती.” “भन्ते, ते आयुष्यमान सध्या कोठे विहार करत आहेत?” असे विचारले असता, आयुष्यमान इसिदत्त शांत राहिले. “भन्ते, आपणच तर ते आर्य इसिदत्त नाही ना?” “होय, गृहपती, (मीच तो).” “भन्ते, आर्य इसिदत्तांनी मच्छिकाषंड येथेच आनंदाने राहावे. हे आंबाटकवन अत्यंत रमणीय आहे. मी आर्य इसिदत्तांसाठी चीवर, पिंडपात, शयनासन आणि आजारपणातील औषधोपचारांची व्यवस्था करण्यासाठी तत्पर राहीन.” “गृहपती, तू खूप चांगले बोललास.” අථ ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මතො ඉසිදත්තස්ස භාසිතං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා ථෙරෙ භික්ඛූ පණීතෙන ඛාදනීයෙන භොජනීයෙන සහත්ථා සන්තප්පෙසි සම්පවාරෙසි. අථ ඛො ථෙරා භික්ඛූ භුත්තාවිනො ඔනීතපත්තපාණිනො උට්ඨායාසනා පක්කමිංසු. අථ ඛො ආයස්මා ථෙරො ආයස්මන්තං ඉසිදත්තං එතදවොච – ‘‘සාධු ඛො තං, ආවුසො ඉසිදත්ත, එසො පඤ්හො පටිභාසි. නෙසො පඤ්හො මං පටිභාසි. තෙනහාවුසො ඉසිදත්ත, යදා අඤ්ඤථාපි එවරූපො පඤ්හො ආගච්ඡෙය්ය, තඤ්ඤෙවෙත්ථ පටිභාසෙය්යා’’ති. අථ ඛො ආයස්මා ඉසිදත්තො සෙනාසනං සංසාමෙත්වා පත්තචීවරමාදාය මච්ඡිකාසණ්ඩම්හා පක්කාමි. යං මච්ඡිකාසණ්ඩම්හා පක්කාමි, තථා පක්කන්තොව අහොසි, න පුන පච්චාගච්ඡීති. තතියං. त्यानंतर चित्त गृहपतीने आयुष्यमान इसिदत्तांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून व त्याचे कौतुक करून, ज्येष्ठ भिक्खूंना स्वतःच्या हाताने उत्तम खाद्य आणि भोज्य पदार्थांनी तृप्त केले व संतुष्ट केले. भोजन संपवून आणि पात्रातून हात काढून घेतल्यावर, ते ज्येष्ठ भिक्खू आपापल्या आसनांवरून उठून निघून गेले. त्यानंतर आयुष्यमान स्थविरांनी आयुष्यमान इसिदत्तांना असे म्हटले – “मित्रा इसिदत्ता, खूप छान! तुला या प्रश्नाचे उत्तर सुचले. मला या प्रश्नाचे उत्तर सुचले नव्हते. म्हणूनच, मित्रा इसिदत्ता, जेव्हा कधी भविष्यात असा प्रश्न येईल, तेव्हा तूच त्याचे उत्तर दे.” त्यानंतर आयुष्यमान इसिदत्तांनी आपले शयनासन आवरले, पात्र व चीवर घेतले आणि ते मच्छिकाषंड येथून निघून गेले. ते मच्छिकाषंड येथून जे गेले, ते कायमचेच गेले, पुन्हा कधीही परत आले नाहीत. (हे तिसरे सुत्त समाप्त.) 4. මහකපාටිහාරියසුත්තං ४. महकपाटिहारिय सुत्त 346. එකං [Pg.480] සමයං සම්බහුලා ථෙරා භික්ඛූ මච්ඡිකාසණ්ඩෙ විහරන්ති අම්බාටකවනෙ. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙන ථෙරා භික්ඛූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ථෙරෙ භික්ඛූ අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො චිත්තො ගහපති ථෙරෙ භික්ඛූ එතදවොච – ‘‘අධිවාසෙන්තු මෙ, භන්තෙ ථෙරා, ස්වාතනාය ගොකුලෙ භත්ත’’න්ති. අධිවාසෙසුං ඛො ථෙරා භික්ඛූ තුණ්හීභාවෙන. අථ ඛො චිත්තො ගහපති ථෙරානං භික්ඛූනං අධිවාසනං විදිත්වා උට්ඨායාසනා ථෙරෙ භික්ඛූ අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමි. අථ ඛො ථෙරා භික්ඛූ තස්සා රත්තියා අච්චයෙන පුබ්බණ්හසමයං නිවාසෙත්වා පත්තචීවරමාදාය යෙන චිත්තස්ස ගහපතිනො ගොකුලං තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා පඤ්ඤත්තෙ ආසනෙ නිසීදිංසු. ३४६. एका वेळी अनेक थेर भिक्खू मच्छिकाषण्ड येथील अंबाटकवनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे थेर भिक्खू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंना असे म्हटले – “भन्ते थेर, उद्या माझ्या गोठ्यात भोजनाचा स्वीकार करावा.” थेर भिक्खूंनी मौन बाळगून संमती दिली. त्यानंतर चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंची संमती जाणून घेऊन, आपल्या आसनावरून उठून, थेर भिक्खूंना अभिवादन केले आणि प्रदक्षिणा घालून तो निघून गेला. त्यानंतर ती रात्र उलटल्यावर, सकाळी थेर भिक्खूंनी चीवर परिधान केले आणि पात्र-चीवर घेऊन ते चित्त गृहपतीच्या गोठ्याकडे गेले; तिथे पोहोचून ते मांडलेल्या आसनांवर बसले. අථ ඛො චිත්තො ගහපති ථෙරෙ භික්ඛූ පණීතෙන සප්පිපායාසෙන සහත්ථා සන්තප්පෙසි සම්පවාරෙසි. අථ ඛො ථෙරා භික්ඛූ භුත්තාවිනො ඔනීතපත්තපාණිනො උට්ඨායාසනා පක්කමිංසු. චිත්තොපි ඛො ගහපති ‘සෙසකං විස්සජ්ජෙථා’ති වත්වා ථෙරෙ භික්ඛූ පිට්ඨිතො පිට්ඨිතො අනුබන්ධි. තෙන ඛො පන සමයෙන උණ්හං හොති කුථිතං ; තෙ ච ථෙරා භික්ඛූ පවෙලියමානෙන මඤ්ඤෙ කායෙන ගච්ඡන්ති, යථා තං භොජනං භුත්තාවිනො. त्यानंतर चित्त गृहपतीने थेर भिक्खूंना उत्तम तूपयुक्त खिरीने (पायसाने) स्वतःच्या हाताने वाढून तृप्त केले व संतुष्ट केले. भोजन आटोपल्यावर आणि पात्रातून हात काढून घेतल्यावर थेर भिक्खू आसनावरून उठून निघून गेले. चित्त गृहपतीनेही 'उरलेले अन्न वाटून द्या' असे सांगून थेर भिक्खूंच्या मागून पाठलाग केला (त्यांच्या मागे मागे गेला). त्या वेळी अतिशय कडक ऊन पडले होते आणि ते थेर भिक्खू जणू काही भोजन केल्यामुळे गलितगात्र झालेल्या शरीराने चालत होते. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා මහකො තස්මිං භික්ඛුසඞ්ඝෙ සබ්බනවකො හොති. අථ ඛො ආයස්මා මහකො ආයස්මන්තං ථෙරං එතදවොච – ‘‘සාධු ඛ්වස්ස, භන්තෙ ථෙර, සීතකො ච වාතො වායෙය්ය, අබ්භසම්පිලාපො ච අස්ස, දෙවො ච එකමෙකං ඵුසායෙය්යා’’ති. त्या वेळी आयुष्यमान महक त्या भिक्खू संघात सर्वात कनिष्ठ होते. तेव्हा आयुष्यमान महक यांनी आयुष्यमान थेरांना असे म्हटले – “भन्ते थेर, किती बरे झाले असते जर थंड वारा सुटला असता, ढग दाटून आले असते आणि पावसाचे थेंब पडले असते!” ‘‘සාධු ඛ්වස්ස, ආවුසො මහක, යං සීතකො ච වාතො වායෙය්ය, අබ්භසම්පිලාපො ච අස්ස, දෙවො ච එකමෙකං ඵුසායෙය්යා’’ති. අථ ඛො ආයස්මා මහකො තථාරූපං ඉද්ධාභිසඞ්ඛාරං අභිසඞ්ඛරි යථා සීතකො ච වාතො වායි, අබ්භසම්පිලාපො ච අස්ස, දෙවො ච එකමෙකං ඵුසි. අථ ඛො චිත්තස්ස ගහපතිනො එතදහොසි – ‘‘යො ඛො ඉමස්මිං භික්ඛුසඞ්ඝෙ සබ්බනවකො භික්ඛු තස්සායං එවරූපො ඉද්ධානුභාවො’’ති[Pg.481]. අථ ඛො ආයස්මා මහකො ආරාමං සම්පාපුණිත්වා ආයස්මන්තං ථෙරං එතදවොච – ‘‘අලමෙත්තාවතා, භන්තෙ ථෙරා’’ති? ‘‘අලමෙත්තාවතා, ආවුසො මහක! කතමෙත්තාවතා, ආවුසො මහක! පූජිතමෙත්තාවතා, ආවුසො මහකා’’ති. අථ ඛො ථෙරා භික්ඛූ යථාවිහාරං අගමංසු. ආයස්මාපි මහකො සකං විහාරං අගමාසි. “हे आवुसो महक, किती बरे झाले असते जर थंड वारा सुटला असता, ढग दाटून आले असते आणि पावसाचे थेंब पडले असते!” तेव्हा आयुष्यमान महक यांनी तशा प्रकारचा ऋद्धी-चमत्कार केला, ज्यामुळे थंड वारा सुटू लागला, ढग दाटून आले आणि पावसाचे थेंब पडू लागले. तेव्हा चित्त गृहपतीच्या मनात असा विचार आला – “या भिक्खू संघात जो सर्वात कनिष्ठ भिक्खू आहे, त्याचाच हा असा ऋद्धी-प्रभाव आहे!” त्यानंतर आयुष्यमान महक आरामात पोहोचल्यावर आयुष्यमान थेरांना म्हणाले – “भन्ते थेर, एवढे पुरेसे आहे का?” “आवुसो महक, एवढे पुरेसे आहे! आवुसो महक, एवढे केले ते पुरेसे आहे! आवुसो महक, एवढी पूजा पुरेसी आहे!” त्यानंतर थेर भिक्खू आपापल्या विहाराकडे गेले. आयुष्यमान महक देखील आपल्या स्वतःच्या विहाराकडे गेले. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙනායස්මා මහකො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං මහකං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මන්තං මහකං එතදවොච – ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ, අය්යො මහකො උත්තරිමනුස්සධම්මං ඉද්ධිපාටිහාරියං දස්සෙතූ’’ති. ‘‘තෙන හි ත්වං, ගහපති, ආලින්දෙ උත්තරාසඞ්ගං පඤ්ඤපෙත්වා තිණකලාපං ඔකාසෙහී’’ති. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මතො මහකස්ස පටිස්සුත්වා ආලින්දෙ උත්තරාසඞ්ගං පඤ්ඤපෙත්වා තිණකලාපං ඔකාසෙසි. අථ ඛො ආයස්මා මහකො විහාරං පවිසිත්වා සූචිඝටිකං දත්වා තථාරූපං ඉද්ධාභිසඞ්ඛාරං අභිසඞ්ඛරි යථා තාලච්ඡිග්ගළෙන ච අග්ගළන්තරිකාය ච අච්චි නික්ඛමිත්වා තිණානි ඣාපෙසි, උත්තරාසඞ්ගං න ඣාපෙසි. අථ ඛො චිත්තො ගහපති උත්තරාසඞ්ගං පප්ඵොටෙත්වා සංවිග්ගො ලොමහට්ඨජාතො එකමන්තං අට්ඨාසි. අථ ඛො ආයස්මා මහකො විහාරා නික්ඛමිත්වා චිත්තං ගහපතිං එතදවොච – ‘‘අලමෙත්තාවතා, ගහපතී’’ති? त्यानंतर चित्त गृहपती जेथे आयुष्यमान महक होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने आयुष्यमान महक यांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने आयुष्यमान महक यांना असे म्हटले – “भन्ते, पूजनीय महक यांनी मला मानसोत्तर धर्माचा (उत्तरीमनुस्सधम्म) ऋद्धी-चमत्कार दाखवावा, ही विनंती.” “तर मग गृहपती, तू ओसरीवर आपले उपरणे (उत्तरासंग) पसरवून त्यावर गवताची पेंढी पसरव.” “होय, भन्ते,” असे म्हणून चित्त गृहपतीने आयुष्यमान महक यांच्या सांगण्यावरून ओसरीवर आपले उपरणे पसरवले आणि त्यावर गवताची पेंढी पसरवली. त्यानंतर आयुष्यमान महक यांनी विहारात प्रवेश करून दार लावून घेतले आणि असा ऋद्धी-चमत्कार केला की, कुलुपाच्या छिद्रातून आणि दाराच्या फटीतून आगीची ज्वाला बाहेर पडली आणि तिने गवत जाळले, पण उपरण्याला काहीही इजा झाली नाही. तेव्हा चित्त गृहपतीने आपले उपरणे झटकले आणि तो भयभीत व रोमांचित होऊन एका बाजूला उभा राहिला. त्यानंतर आयुष्यमान महक विहारातून बाहेर आले आणि चित्त गृहपतीला म्हणाले – “गृहपती, एवढे पुरेसे आहे का?” ‘‘අලමෙත්තාවතා, භන්තෙ මහක! කතමෙත්තාවතා, භන්තෙ, මහක! පූජිතමෙත්තාවතා, භන්තෙ මහක! අභිරමතු, භන්තෙ, අය්යො මහකො මච්ඡිකාසණ්ඩෙ. රමණීයං අම්බාටකවනං. අහං අය්යස්ස මහකස්ස උස්සුක්කං කරිස්සාමි චීවරපිණ්ඩපාතසෙනාසනගිලානප්පච්චයභෙසජ්ජපරික්ඛාරාන’’න්ති. ‘‘කල්යාණං වුච්චති, ගහපතී’’ති. අථ ඛො ආයස්මා මහකො සෙනාසනං සංසාමෙත්වා පත්තචීවරමාදාය මච්ඡිකාසණ්ඩම්හා පක්කාමි. යං මච්ඡිකාසණ්ඩම්හා පක්කාමි, තථා පක්කන්තොව අහොසි; න පුන පච්චාගච්ඡීති. චතුත්ථං. “भन्ते महक, एवढे पुरेसे आहे! भन्ते महक, एवढे केले ते पुरेसे आहे! भन्ते महक, एवढी पूजा पुरेसी आहे! भन्ते, पूजनीय महक यांनी मच्छिकाषण्ड येथील रमणीय अंबाटकवनात आनंदाने राहावे. मी पूजनीय महक यांच्यासाठी चीवर, पिंडपात, शयनासन आणि आजारपणातील औषधोपचार या गरजा पुरवण्यास तत्पर राहीन.” “गृहपती, तू खूप चांगले बोललास,” असे ते म्हणाले. त्यानंतर आयुष्यमान महक यांनी आपले बिछाने आवरले आणि पात्र-चीवर घेऊन ते मच्छिकाषण्ड येथून निघून गेले. ते मच्छिकाषण्ड येथून जे निघून गेले, ते कायमचेच निघून गेले; ते पुन्हा कधीही परत आले नाहीत. चौथे सूत्र समाप्त. 5. පඨමකාමභූසුත්තං ५. प्रथम कामभू सूत्र 347. එකං සමයං ආයස්මා කාමභූ මච්ඡිකාසණ්ඩෙ විහරති අම්බාටකවනෙ. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙනායස්මා කාමභූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං කාමභුං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි[Pg.482]. එකමන්තං නිසින්නං ඛො චිත්තං ගහපතිං ආයස්මා කාමභූ එතදවොච – ३४७. एका वेळी आयुष्यमान कामभू मच्छिकाषण्ड येथील अंबाटकवनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे आयुष्यमान कामभू होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने आयुष्यमान कामभू यांना अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीला आयुष्यमान कामभू यांनी असे म्हटले – ‘‘වුත්තමිදං, ගහපති – “गृहपती, हे असे म्हटले गेले आहे – ‘‘නෙලඞ්ගො සෙතපච්ඡාදො, එකාරො වත්තතී රථො; අනීඝං පස්ස ආයන්තං, ඡින්නසොතං අබන්ධන’’න්ති. “दोषरहित चाके असलेला, पांढरे छत असलेला, एक कणा असलेला रथ चालत आहे; त्या दुःखमुक्त, तृष्णेचा प्रवाह तोडलेल्या आणि बंधनांमधून मुक्त झालेल्या येणाऱ्या (अर्हताला) पाहा.” ‘‘ඉමස්ස නු ඛො, ගහපති, සංඛිත්තෙන භාසිතස්ස කථං විත්ථාරෙන අත්ථො දට්ඨබ්බො’’ති? ‘‘කිං නු ඛො එතං, භන්තෙ, භගවතා භාසිත’’න්ති? ‘‘එවං, ගහපතී’’ති. ‘‘තෙන හි, භන්තෙ, මුහුත්තං ආගමෙහි යාවස්ස අත්ථං පෙක්ඛාමී’’ති. අථ ඛො චිත්තො ගහපති මුහුත්තං තුණ්හී හුත්වා ආයස්මන්තං කාමභුං එතදවොච – “गृहपती, संक्षेपाने सांगितलेल्या या वचनाचा सविस्तर अर्थ कसा समजून घ्यावा?” “भन्ते, हे भगवान बुद्धांनी सांगितले आहे का?” “होय, गृहपती.” “तर मग भन्ते, क्षणभर थांबा, जोपर्यंत मी याच्या अर्थावर विचार करतो.” त्यानंतर चित्त गृहपती क्षणभर शांत राहिला आणि आयुष्यमान कामभू यांना म्हणाला – ‘‘‘නෙලඞ්ග’න්ති ඛො, භන්තෙ, සීලානමෙතං අධිවචනං. ‘සෙතපච්ඡාදො’ති ඛො, භන්තෙ, විමුත්තියා එතං අධිවචනං. ‘එකාරො’ති ඛො, භන්තෙ, සතියා එතං අධිවචනං. ‘වත්තතී’ති ඛො, භන්තෙ, අභික්කමපටික්කමස්සෙතං අධිවචනං. ‘රථො’ති ඛො, භන්තෙ, ඉමස්සෙතං චාතුමහාභූතිකස්ස කායස්ස අධිවචනං මාතාපෙත්තිකසම්භවස්ස ඔදනකුම්මාසූපචයස්ස අනිච්චුච්ඡාදනපරිමද්දනභෙදනවිද්ධංසනධම්මස්ස. රාගො ඛො, භන්තෙ, නීඝො, දොසො නීඝො, මොහො නීඝො. තෙ ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො පහීනා උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා. තස්මා ඛීණාසවො භික්ඛු ‘අනීඝො’ති වුච්චති. ‘ආයන්ත’න්ති ඛො, භන්තෙ, අරහතො එතං අධිවචනං. ‘සොතො’ති ඛො, භන්තෙ, තණ්හායෙතං අධිවචනං. සා ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො පහීනා උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා. තස්මා ඛීණාසවො භික්ඛු ‘ඡින්නසොතො’ති වුච්චති. රාගො ඛො, භන්තෙ, බන්ධනං, දොසො බන්ධනං, මොහො බන්ධනං. තෙ ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො පහීනා උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා. තස්මා ඛීණාසවො භික්ඛු ‘අබන්ධනො’ති වුච්චති. ඉති ඛො, භන්තෙ, යං තං භගවතා වුත්තං – “भन्ते, 'नेळंग' (दोषरहित) हे शीलांचे नाव आहे. भन्ते, 'श्वेतछत्र' (पांढरे छप्पर) हे विमुक्तीचे नाव आहे. भन्ते, 'एकच कणा' (एक आरी) हे सतीचे (स्मृतीचे) नाव आहे. भन्ते, 'चालतो' हे पुढे जाणे आणि मागे फिरणे याचे नाव आहे. भन्ते, 'रथ' हे चार महाभूतांनी बनलेल्या, माता-पित्यांपासून उत्पन्न झालेल्या, भात आणि कण्याने पुष्ट झालेल्या, अनित्य, उटणे लावणे, चोळणे, नष्ट होणे आणि विखुरणे हा स्वभाव असलेल्या या शरीराचे नाव आहे. भन्ते, राग हा उपद्रव आहे, द्वेष हा उपद्रव आहे, मोह हा उपद्रव आहे. क्षीणासव भिक्खूने हे नष्ट केले आहेत, मुळासकट उपटून टाकले आहेत, ताळाच्या बुंध्यासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचे केले आहेत. म्हणून क्षीणासव भिक्खूला 'उपद्रवरहित' (अनीघ) म्हटले जाते. भन्ते, 'येणारा' हे अरहंताचे नाव आहे. भन्ते, 'प्रवाह' हे तण्हाचे (तृष्णेचे) नाव आहे. क्षीणासव भिक्खूने ती नष्ट केली आहे, मुळासकट उपटून टाकली आहे, ताळाच्या बुंध्यासारखी केली आहे, नामशेष केली आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाची केली आहे. म्हणून क्षीणासव भिक्खूला 'छिन्नस्रोत' (प्रवाह तोडलेला) म्हटले जाते. भन्ते, राग हे बंधन आहे, द्वेष हे बंधन आहे, मोह हे बंधन आहे. क्षीणासव भिक्खूने हे नष्ट केले आहेत, मुळासकट उपटून टाकले आहेत, ताळाच्या बुंध्यासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचे केले आहेत. म्हणून क्षीणासव भिक्खूला 'बंधनमुक्त' (अबंधन) म्हटले जाते. भन्ते, या प्रकारे भगवंतांनी जे म्हटले होते –” ‘‘නෙලඞ්ගො සෙතපච්ඡාදො, එකාරො වත්තතී රථො; අනීඝං පස්ස ආයන්තං, ඡින්නසොතං අබන්ධන’’න්ති. “दोषरहित, श्वेतछत्र असलेला, एक कणा असलेला रथ चालत आहे. उपद्रवरहित, प्रवाह तोडलेल्या, बंधनमुक्त अशा येणाऱ्याला पहा.” ‘‘ඉමස්ස [Pg.483] ඛො, භන්තෙ, භගවතා සංඛිත්තෙන භාසිතස්ස එවං විත්ථාරෙන අත්ථං ආජානාමී’’ති. ‘‘ලාභා තෙ, ගහපති, සුලද්ධං තෙ, ගහපති! යස්ස තෙ ගම්භීරෙ බුද්ධවචනෙ පඤ්ඤාචක්ඛු කමතී’’ති. පඤ්චමං. “भन्ते, भगवंतांनी संक्षेपाने सांगितलेल्या या वचनाचा अर्थ मी अशा प्रकारे सविस्तरपणे समजतो.” “हा तुझा लाभ आहे, गृहपती! हे तुला सुलाभ झाले आहे, गृहपती! ज्या तुझी प्रज्ञाचक्षू भगवंतांच्या गंभीर वचनात प्रवेश करते.” पाचवे समाप्त. 6. දුතියකාමභූසුත්තං ६. दुसरे कामभू सुत्त 348. එකං සමයං ආයස්මා කාමභූ මච්ඡිකාසණ්ඩෙ විහරති අම්බාටකවනෙ. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙනායස්මා කාමභූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මන්තං කාමභුං එතදවොච – ‘‘කති නු ඛො, භන්තෙ, සඞ්ඛාරා’’ති? ‘‘තයො ඛො, ගහපති, සඞ්ඛාරා – කායසඞ්ඛාරො, වචීසඞ්ඛාරො, චිත්තසඞ්ඛාරො’’ති. ‘‘සාධු, භන්තෙ’’ති ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මතො කාමභුස්ස භාසිතං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා ආයස්මන්තං කාමභුං උත්තරිං පඤ්හං අපුච්ඡි – ‘‘කතමො පන, භන්තෙ, කායසඞ්ඛාරො, කතමො වචීසඞ්ඛාරො, කතමො චිත්තසඞ්ඛාරො’’ති? ‘‘අස්සාසපස්සාසා ඛො, ගහපති, කායසඞ්ඛාරො, විතක්කවිචාරා වචීසඞ්ඛාරො, සඤ්ඤා ච වෙදනා ච චිත්තසඞ්ඛාරො’’ති. ३४८. एका वेळी आयुष्यमान कामभू मच्छिकाषंड येथील आंबाटक वनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे आयुष्यमान कामभू होते तेथे गेले; जाऊन एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने आयुष्यमान कामभू यांना असे म्हटले – “भन्ते, संस्कार किती आहेत?” “गृहपती, तीन संस्कार आहेत – कायसंस्कार, वचीसंस्कार आणि चित्तसंस्कार.” “खूप छान, भन्ते!” असे म्हणून चित्त गृहपतीने आयुष्यमान कामभू यांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून, अनुमोदन करून आयुष्यमान कामभू यांना पुढील प्रश्न विचारला – “पण भन्ते, कायसंस्कार कोणता, वचीसंस्कार कोणता आणि चित्तसंस्कार कोणता?” “गृहपती, श्वासोच्छ्वास हा कायसंस्कार आहे, वितर्क आणि विचार हा वचीसंस्कार आहे, संज्ञा आणि वेदना हा चित्तसंस्कार आहे.” ‘‘සාධු, භන්තෙ’’ති ඛො චිත්තො ගහපති…පෙ… උත්තරිං පඤ්හං අපුච්ඡි – ‘‘කස්මා පන, භන්තෙ, අස්සාසපස්සාසා කායසඞ්ඛාරො, කස්මා විතක්කවිචාරා වචීසඞ්ඛාරො, කස්මා සඤ්ඤා ච වෙදනා ච චිත්තසඞ්ඛාරො’’ති? ‘‘අස්සාසපස්සාසා ඛො, ගහපති, කායිකා. එතෙ ධම්මා කායප්පටිබද්ධා, තස්මා අස්සාසපස්සාසා කායසඞ්ඛාරො. පුබ්බෙ ඛො, ගහපති, විතක්කෙත්වා විචාරෙත්වා පච්ඡා වාචං භින්දති, තස්මා විතක්කවිචාරා වචීසඞ්ඛාරො. සඤ්ඤා ච වෙදනා ච චෙතසිකා. එතෙ ධම්මා චිත්තප්පටිබද්ධා, තස්මා සඤ්ඤා ච වෙදනා ච චිත්තසඞ්ඛාරො’’ති. “खूप छान, भन्ते!” असे म्हणून चित्त गृहपतीने...पे... पुढील प्रश्न विचारला – “पण भन्ते, श्वासोच्छ्वास हा कायसंस्कार का आहे, वितर्क आणि विचार हा वचीसंस्कार का आहे, आणि संज्ञा व वेदना हा चित्तसंस्कार का आहे?” “गृहपती, श्वासोच्छ्वास हे कायिक (शारीरिक) आहेत. हे धर्म शरीराशी संबंधित आहेत, म्हणून श्वासोच्छ्वास हा कायसंस्कार आहे. गृहपती, मनुष्य आधी वितर्क आणि विचार करतो, आणि नंतर वाणी उच्चारतो, म्हणून वितर्क आणि विचार हा वचीसंस्कार आहे. संज्ञा आणि वेदना हे चैतसिक आहेत. हे धर्म चित्ताशी संबंधित आहेत, म्हणून संज्ञा आणि वेदना हा चित्तसंस्कार आहे.” සාධු…පෙ… උත්තරිං පඤ්හං අපුච්ඡි – ‘‘කථං පන, භන්තෙ, සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්ති හොතී’’ති? ‘‘න ඛො, ගහපති, සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපජ්ජන්තස්ස භික්ඛුනො එවං හොති – ‘අහං සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපජ්ජිස්ස’න්ති වා ‘අහං සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපජ්ජාමී’ති වා ‘අහං සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නො’ති වා. අථ ඛ්වස්ස පුබ්බෙව තථා චිත්තං භාවිතං හොති යං තං තථත්තාය උපනෙතී’’ති. “खूप छान...” पे... पुढील प्रश्न विचारला – “पण भन्ते, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती कशी प्राप्त होते?” “गृहपती, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त करणाऱ्या भिक्खूच्या मनात असा विचार येत नाही – 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त करीन' किंवा 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त करत आहे' किंवा 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त केली आहे.' तर त्याचे चित्त आधीच अशा प्रकारे भावित (विकसित) झालेले असते, जे त्याला त्या अवस्थेकडे घेऊन जाते.” සාධු [Pg.484] …පෙ… උත්තරිං පඤ්හං අපුච්ඡි – ‘‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපජ්ජන්තස්ස පන, භන්තෙ, භික්ඛුනො කතමෙ ධම්මා පඨමං නිරුජ්ඣන්ති, යදි වා කායසඞ්ඛාරො, යදි වා වචීසඞ්ඛාරො, යදි වා චිත්තසඞ්ඛාරො’’ති? ‘‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපජ්ජන්තස්ස ඛො, ගහපති, භික්ඛුනො වචීසඞ්ඛාරො පඨමං නිරුජ්ඣති, තතො කායසඞ්ඛාරො, තතො චිත්තසඞ්ඛාරො’’ති. “खूप छान...” पे... पुढील प्रश्न विचारला – “पण भन्ते, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त करणाऱ्या भिक्खूचे कोणते धर्म आधी निरुद्ध होतात – कायसंस्कार, वचीसंस्कार की चित्तसंस्कार?” “गृहपती, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त करणाऱ्या भिक्खूचा वचीसंस्कार आधी निरुद्ध होतो, त्यानंतर कायसंस्कार आणि त्यानंतर चित्तसंस्कार निरुद्ध होतो.” සාධු…පෙ… උත්තරිං පඤ්හං අපුච්ඡි – ‘‘ය්වායං, භන්තෙ, මතො කාලඞ්කතො, යො චායං භික්ඛු සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නො, ඉමෙසං කිං නානාකරණ’’න්ති? ‘‘ය්වායං ගහපති, මතො කාලඞ්කතො තස්ස කායසඞ්ඛාරො නිරුද්ධො පටිප්පස්සද්ධො, වචීසඞ්ඛාරො නිරුද්ධො පටිප්පස්සද්ධො, චිත්තසඞ්ඛාරො නිරුද්ධො පටිප්පස්සද්ධො, ආයු පරික්ඛීණො, උස්මා වූපසන්තා, ඉන්ද්රියානි විපරිභින්නානි. යො ච ඛ්වායං, ගහපති, භික්ඛු සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නො, තස්සපි කායසඞ්ඛාරො නිරුද්ධො පටිප්පස්සද්ධො, වචීසඞ්ඛාරො නිරුද්ධො පටිප්පස්සද්ධො, චිත්තසඞ්ඛාරො නිරුද්ධො පටිප්පස්සද්ධො, ආයු අපරික්ඛීණො, උස්මා අවූපසන්තා, ඉන්ද්රියානි විප්පසන්නානි. ය්වායං, ගහපති, මතො කාලඞ්කතො, යො චායං භික්ඛු සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධං සමාපන්නො, ඉදං නෙසං නානාකරණ’’න්ති. “खूप छान...” पे... पुढील प्रश्न विचारला – “भन्ते, जो मृत झाला आहे, कालवश झाला आहे, आणि जो भिक्खू संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त झाला आहे, या दोघांमध्ये काय फरक आहे?” “गृहपती, जो मृत झाला आहे, कालवश झाला आहे, त्याचा कायसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, वचीसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, चित्तसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, आयुष्य संपले आहे, उष्मा (शारीरिक उष्णता) शांत झाली आहे आणि इंद्रिये नष्ट झाली आहेत. पण गृहपती, जो भिक्खू संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त झाला आहे, त्याचाही कायसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, वचीसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, चित्तसंस्कार निरुद्ध आणि शांत झाला आहे, परंतु त्याचे आयुष्य संपलेले नाही, उष्मा शांत झालेली नाही आणि इंद्रिये अत्यंत प्रसन्न (तेजस्वी) आहेत. गृहपती, जो मृत झाला आहे, कालवश झाला आहे, आणि जो भिक्खू संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्ती प्राप्त झाला आहे, हा त्यांच्यातील फरक आहे.” සාධු…පෙ… උත්තරිං පඤ්හං අපුච්ඡි – ‘‘කථං පන, භන්තෙ, සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨානං හොතී’’ති? ‘‘න ඛො, ගහපති, සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨහන්තස්ස භික්ඛුනො එවං හොති – ‘අහං සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨහිස්ස’න්ති වා ‘අහං සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨහාමී’ති වා ‘අහං සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨිතො’ති වා. අථ ඛ්වස්ස පුබ්බෙව තථා චිත්තං භාවිතං හොති, යං තං තථත්තාය උපනෙතී’’ති. “खूप छान...” पे... पुढील प्रश्न विचारला – “पण भन्ते, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्तीमधून व्युत्थान (बाहेर पडणे) कसे होते?” “गृहपती, संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडणाऱ्या भिक्खूच्या मनात असा विचार येत नाही – 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडेन' किंवा 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडत आहे' किंवा 'मी संज्ञा-वेदना-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडलो आहे.' तर त्याचे चित्त आधीच अशा प्रकारे भावित (विकसित) झालेले असते, जे त्याला त्या अवस्थेकडे घेऊन जाते.” සාධු, භන්තෙ…පෙ… උත්තරිං පඤ්හං අපුච්ඡි – ‘‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨහන්තස්ස පන, භන්තෙ, භික්ඛුනො කතමෙ ධම්මා පඨමං උප්පජ්ජන්ති, යදි වා කායසඞ්ඛාරො, යදි වා වචීසඞ්ඛාරො, යදි වා චිත්තසඞ්ඛාරො’’ති? ‘‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨහන්තස්ස, ගහපති, භික්ඛුනො චිත්තසඞ්ඛාරො පඨමං උප්පජ්ජති, තතො කායසඞ්ඛාරො, තතො වචීසඞ්ඛාරො’’ති. "साधू, भन्ते!" ... (असे म्हणून) त्यांनी पुढे आणखी प्रश्न विचारला— "भन्ते, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून (संज्ञा आणि वेदना यांच्या निरोधाच्या अवस्थेतून) बाहेर पडणाऱ्या भिक्खूमध्ये कोणते धर्म सर्वात आधी उत्पन्न होतात— कायसंखार (शारीरिक संस्कार), वचीसंखार (वाचिक संस्कार) की चित्तसंखार (मानसिक संस्कार)?" "गृहपती, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडणाऱ्या भिक्खूमध्ये सर्वात आधी चित्तसंखार उत्पन्न होतो, त्यानंतर कायसंखार आणि त्यानंतर वचीसंखार उत्पन्न होतो." සාධු…පෙ… උත්තරිං පඤ්හං අපුච්ඡි – ‘‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨිතං පන, භන්තෙ, භික්ඛුං කති ඵස්සා ඵුසන්ති’’? ‘‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨිතං [Pg.485] ඛො, ගහපති, භික්ඛුං තයො ඵස්සා ඵුසන්ති – සුඤ්ඤතො ඵස්සො, අනිමිත්තො ඵස්සො, අප්පණිහිතො ඵස්සො’’ති. "साधू, भन्ते!" ... त्यांनी पुढे आणखी प्रश्न विचारला— "भन्ते, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडलेल्या भिक्खूला किती प्रकारचे फस्स (स्पर्श) स्पर्श करतात?" "गृहपती, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडलेल्या भिक्खूला तीन प्रकारचे फस्स स्पर्श करतात— सुञ्ञत फस्स (शून्यता-स्पर्श), अनिमित्त फस्स (निमित्तहीन-स्पर्श) आणि अप्पणिहित फस्स (प्रणिधीरहित-स्पर्श)." සාධු…පෙ… උත්තරිං පඤ්හං අපුච්ඡි – ‘‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨිතස්ස පන, භන්තෙ, භික්ඛුනො කිංනින්නං චිත්තං හොති, කිංපොණං, කිංපබ්භාර’’න්ති? ‘‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා වුට්ඨිතස්ස ඛො, ගහපති, භික්ඛුනො විවෙකනින්නං චිත්තං හොති විවෙකපොණං විවෙකපබ්භාර’’න්ති. "साधू, भन्ते!" ... त्यांनी पुढे आणखी प्रश्न विचारला— "भन्ते, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडलेल्या भिक्खूचे चित्त कशाकडे झुकलेले, कशाकडे प्रवृत्त आणि कशाकडे प्रवण (कललेले) असते?" "गृहपती, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीमधून बाहेर पडलेल्या भिक्खूचे चित्त विवेकाकडे (एकांत/विवेक/निर्वाणाकडे) झुकलेले, विवेकाकडे प्रवृत्त आणि विवेकाकडे प्रवण असते." ‘‘සාධු, භන්තෙ’’ති ඛො චිත්තො ගහපති ආයස්මතො කාමභුස්ස භාසිතං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා ආයස්මන්තං කාමභුං උත්තරිං පඤ්හං අපුච්ඡි – ‘‘සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා පන, භන්තෙ, කති ධම්මා බහූපකාරා’’ති? ‘‘අද්ධා ඛො ත්වං, ගහපති, යං පඨමං පුච්ඡිතබ්බං තං පුච්ඡසි. අපි ච ත්යාහං බ්යාකරිස්සාමි. සඤ්ඤාවෙදයිතනිරොධසමාපත්තියා ඛො, ගහපති, ද්වෙ ධම්මා බහූපකාරා – සමථො ච විපස්සනා චා’’ති. ඡට්ඨං. "साधू, भन्ते!" असे म्हणून चित्त गृहपतीने आयुष्यमान कामभू यांच्या भाषणाचे अभिनंदन करून, त्याचे कौतुक करून आयुष्यमान कामभू यांना पुढे आणखी प्रश्न विचारला— "भन्ते, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीच्या प्राप्तीसाठी किती धर्म बहुउपकारक (अतिशय साहाय्यक) आहेत?" "गृहपती, खरोखर तू जो प्रश्न सर्वात आधी विचारायला हवा होतास, तो शेवटी विचारत आहेस; तरीही मी तुला याचे उत्तर देईन. गृहपती, संज्ञा-वेदयित-निरोध समापत्तीसाठी दोन धर्म बहुउपकारक आहेत— समथ आणि विपस्सना." सहावे (सुत्त समाप्त). 7. ගොදත්තසුත්තං ७. गोदत्तसुत्त 349. එකං සමයං ආයස්මා ගොදත්තො මච්ඡිකාසණ්ඩෙ විහරති අම්බාටකවනෙ. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙනායස්මා ගොදත්තො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මන්තං ගොදත්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො චිත්තං ගහපතිං ආයස්මා ගොදත්තො එතදවොච – ‘‘යා චායං, ගහපති, අප්පමාණා චෙතොවිමුත්ති, යා ච ආකිඤ්චඤ්ඤා චෙතොවිමුත්ති, යා ච සුඤ්ඤතා චෙතොවිමුත්ති, යා ච අනිමිත්තා චෙතොවිමුත්ති, ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා නානාබ්යඤ්ජනා උදාහු එකත්ථා බ්යඤ්ජනමෙව නාන’’න්ති? ‘‘අත්ථි, භන්තෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා චෙව නානාබ්යඤ්ජනා ච. අත්ථි පන, භන්තෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම ඉමෙ ධම්මා එකත්ථා බ්යඤ්ජනමෙව නාන’’න්ති. ३४९. एका वेळी आयुष्यमान गोदत्त मच्छिकाषण्ड येथील अम्बाटक वनात विहार करत होते. तेव्हा चित्त गृहपती जेथे आयुष्यमान गोदत्त होते तेथे गेले; आणि आयुष्यमान गोदत्त यांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीला आयुष्यमान गोदत्त म्हणाले— "गृहपती, ही जी अप्पमाण चेतोविमुत्ती (अप्रमाण चेतोविमुक्ती), आकिञ्चञ्ञ चेतोविमुत्ती (अकिंचन्य चेतोविमुक्ती), सुञ्ञता चेतोविमुत्ती (शून्यता चेतोविमुक्ती) आणि अनिमित्त चेतोविमुत्ती (निमित्तहीन चेतोविमुक्ती) आहे; हे धर्म अर्थानेही भिन्न आणि शब्दानेही भिन्न आहेत, की अर्थाने एकच असून केवळ शब्दानेच भिन्न आहेत?" "भन्ते, असा एक पर्याय (दृष्टिकोन) आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत. आणि भन्ते, असाही एक पर्याय आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थाने एकच आहेत आणि केवळ शब्दानेच भिन्न आहेत." ‘‘කතමො ච, භන්තෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා චෙව නානාබ්යඤ්ජනා ච? ඉධ, භන්තෙ, භික්ඛු මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං. ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං [Pg.486] මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. කරුණාසහගතෙන චෙතසා…පෙ… මුදිතාසහගතෙන චෙතසා…පෙ… උපෙක්ඛාසහගතෙන චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං. ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං උපෙක්ඛාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. අයං වුච්චති, භන්තෙ, අප්පමාණා චෙතොවිමුත්ති. "आणि भन्ते, तो कोणता पर्याय आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत? येथे, भन्ते, भिक्खू मैत्रीयुक्त चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहार करतो, तसेच दुसऱ्या दिशेला, तिसऱ्या दिशेला आणि चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना, तो या संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अप्रमाण (असीम), वैररहित आणि व्यापादरहित (द्वेषरहित) अशा मैत्रीयुक्त चित्ताने व्यापून विहार करतो. करुणेने युक्त चित्ताने... मुदितेने युक्त चित्ताने... उपेक्षेने युक्त चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहार करतो, तसेच दुसऱ्या दिशेला, तिसऱ्या दिशेला आणि चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना, तो या संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अप्रमाण, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा उपेक्षायुक्त चित्ताने व्यापून विहार करतो. भन्ते, याला 'अप्पमाण चेतोविमुत्ती' (अप्रमाण चेतोविमुक्ती) असे म्हणतात." ‘‘කතමා ච, භන්තෙ, ආකිඤ්චඤ්ඤා චෙතොවිමුත්ති? ඉධ, භන්තෙ, භික්ඛු සබ්බසො විඤ්ඤාණඤ්චායතනං සමතික්කම්ම, ‘නත්ථි කිඤ්චී’ති ආකිඤ්චඤ්ඤායතනං උපසම්පජ්ජ විහරති. අයං වුච්චති, භන්තෙ, ආකිඤ්චඤ්ඤා චෙතොවිමුත්ති. "आणि भन्ते, 'आकिञ्चञ्ञ चेतोविमुत्ती' (अकिंचन्य चेतोविमुक्ती) कोणती आहे? येथे, भन्ते, भिक्खू सर्व प्रकारे विञ्ञाणञ्चायतनाचा (विज्ञानानंत्यायतन) अतिक्रम करून, 'काहीही नाही' (नत्थि किञ्चि) अशा भावनेने आकिञ्चञ्ञायतन (अकिंचन्यायतन) समापत्ती प्राप्त करून विहार करतो. भन्ते, याला 'आकिञ्चञ्ञ चेतोविमुत्ती' असे म्हणतात." ‘‘කතමා ච, භන්තෙ, සුඤ්ඤතා චෙතොවිමුත්ති? ඉධ, භන්තෙ, භික්ඛු අරඤ්ඤගතො වා රුක්ඛමූලගතො වා සුඤ්ඤාගාරගතො වා ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘සුඤ්ඤමිදං අත්තෙන වා අත්තනියෙන වා’ති. අයං වුච්චති, භන්තෙ, සුඤ්ඤතා චෙතොවිමුත්ති. "आणि भन्ते, 'सुञ्ञता चेतोविमुत्ती' (शून्यता चेतोविमुक्ती) कोणती आहे? येथे, भन्ते, भिक्खू अरण्यात जाऊन, किंवा वृक्षाच्या मुळाशी जाऊन, किंवा शून्य घरात (एकांतात) जाऊन असा विचार करतो— 'हे आत्म्यापासून किंवा आत्म्याच्या मालकीच्या गोष्टींपासून शून्य आहे.' भन्ते, याला 'सुञ्ञता चेतोविमुत्ती' असे म्हणतात." ‘‘කතමා ච, භන්තෙ, අනිමිත්තා චෙතොවිමුත්ති? ඉධ, භන්තෙ, භික්ඛු සබ්බනිමිත්තානං අමනසිකාරා අනිමිත්තං චෙතොසමාධිං උපසම්පජ්ජ විහරති. අයං වුච්චති, භන්තෙ, අනිමිත්තා චෙතොවිමුත්ති. අයං ඛො, භන්තෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම ඉමෙ ධම්මා නානත්ථා චෙව නානාබ්යඤ්ජනා ච. "आणि भन्ते, 'अनिमित्त चेतोविमुत्ती' (निमित्तहीन चेतोविमुक्ती) कोणती आहे? येथे, भन्ते, भिक्खू सर्व प्रकारच्या निमित्तांकडे (चिन्हांकडे) दुर्लक्ष करून (मनात न आणता), अनिमित्त चेतोसमाधी प्राप्त करून विहार करतो. भन्ते, याला 'अनिमित्त चेतोविमुत्ती' असे म्हणतात. भन्ते, हाच तो पर्याय आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थानेही भिन्न आहेत आणि शब्दानेही भिन्न आहेत." ‘‘කතමො ච, භන්තෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම ඉමෙ ධම්මා එකත්ථා බ්යඤ්ජනමෙව නානං? රාගො, භන්තෙ, පමාණකරණො, දොසො පමාණකරණො, මොහො පමාණකරණො. තෙ ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො පහීනා උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා. යාවතා ඛො, භන්තෙ, අප්පමාණා චෙතොවිමුත්තියො, අකුප්පා තාසං චෙතොවිමුත්ති අග්ගමක්ඛායති. සා ඛො පන අකුප්පා චෙතොවිමුත්ති සුඤ්ඤා රාගෙන, සුඤ්ඤා දොසෙන, සුඤ්ඤා මොහෙන. රාගො ඛො, භන්තෙ, කිඤ්චනං, දොසො කිඤ්චනං, මොහො කිඤ්චනං. තෙ ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො පහීනා උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා. යාවතා ඛො, භන්තෙ, ආකිඤ්චඤ්ඤා චෙතොවිමුත්තියො, අකුප්පා තාසං චෙතොවිමුත්ති අග්ගමක්ඛායති. සා ඛො [Pg.487] පන අකුප්පා චෙතොවිමුත්ති සුඤ්ඤා රාගෙන, සුඤ්ඤා දොසෙන, සුඤ්ඤා මොහෙන. රාගො ඛො, භන්තෙ, නිමිත්තකරණො, දොසො නිමිත්තකරණො, මොහො නිමිත්තකරණො. තෙ ඛීණාසවස්ස භික්ඛුනො පහීනා උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා. යාවතා ඛො, භන්තෙ, අනිමිත්තා චෙතොවිමුත්තියො, අකුප්පා තාසං චෙතොවිමුත්ති අග්ගමක්ඛායති. සා ඛො පන අකුප්පා චෙතොවිමුත්ති සුඤ්ඤා රාගෙන, සුඤ්ඤා දොසෙන, සුඤ්ඤා මොහෙන. අයං ඛො, භන්තෙ, පරියායො යං පරියායං ආගම්ම ඉමෙ ධම්මා එකත්ථා බ්යඤ්ජනමෙව නාන’’න්ති. ‘‘ලාභා තෙ, ගහපති, සුලද්ධං තෙ, ගහපති! යස්ස තෙ ගම්භීරෙ බුද්ධවචනෙ පඤ්ඤාචක්ඛු කමතී’’ති. සත්තමං. “भन्ते, ती कोणती पद्धत (पर्याय) आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थाने एकच आहेत आणि केवळ त्यांच्या व्यंजनांमध्ये (शब्दांमध्ये) भिन्नता आहे? भन्ते, राग (आसक्ती) हा मर्यादा निर्माण करणारा आहे, द्वेष हा मर्यादा निर्माण करणारा आहे, आणि मोह हा मर्यादा निर्माण करणारा आहे. ज्या भिक्खूचे आसव नष्ट झाले आहेत (क्षीणासव), त्याने हे नष्ट केले आहेत, मुळापासून उपटून टाकले आहेत, ताडाच्या बुंध्यासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत, जेणेकरून भविष्यात ते पुन्हा उत्पन्न होणार नाहीत. भन्ते, जितक्या काही अमर्याद चित्तविमुक्ती (अप्पमाणा चेतोविमुत्ती) आहेत, त्या सर्वांमध्ये अकुप्पा (अकंप्य) चित्तविमुक्ती ही सर्वश्रेष्ठ मानली जाते. ती अकुप्पा चित्तविमुक्ती रागापासून शून्य आहे, द्वेषापासून शून्य आहे, मोहापासून शून्य आहे. भन्ते, राग हा अडथळा (किंचन) आहे, द्वेष हा अडथळा आहे, मोह हा अडथळा आहे. ज्या भिक्खूचे आसव नष्ट झाले आहेत, त्याने हे नष्ट केले आहेत, मुळापासून उपटून टाकले आहेत, ताडाच्या बुंध्यासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत, जेणेकरून भविष्यात ते पुन्हा उत्पन्न होणार नाहीत. भन्ते, जितक्या काही आकिंचन्या (अकिंचनत्व) चित्तविमुक्ती आहेत, त्या सर्वांमध्ये अकुप्पा चित्तविमुक्ती ही सर्वश्रेष्ठ मानली जाते. ती अकुप्पा चित्तविमुक्ती रागापासून शून्य आहे, द्वेषापासून शून्य आहे, मोहापासून शून्य आहे. भन्ते, राग हा निमित्त (चिन्ह) निर्माण करणारा आहे, द्वेष हा निमित्त निर्माण करणारा आहे, मोह हा निमित्त निर्माण करणारा आहे. ज्या भिक्खूचे आसव नष्ट झाले आहेत, त्याने हे नष्ट केले आहेत, मुळापासून उपटून टाकले आहेत, ताडाच्या बुंध्यासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत, जेणेकरून भविष्यात ते पुन्हा उत्पन्न होणार नाहीत. भन्ते, जितक्या काही अनिमित्त चित्तविमुक्ती आहेत, त्या सर्वांमध्ये अकुप्पा चित्तविमुक्ती ही सर्वश्रेष्ठ मानली जाते. ती अकुप्पा चित्तविमुक्ती रागापासून शून्य आहे, द्वेषापासून शून्य आहे, मोहापासून शून्य आहे. भन्ते, हीच ती पद्धत आहे, ज्या आधारे हे धर्म अर्थाने एकच आहेत आणि केवळ त्यांच्या व्यंजनांमध्ये (शब्दांमध्ये) भिन्नता आहे.” “हे गृहपती, हा तुझा लाभ आहे! हे गृहपती, तुला हे उत्तम प्रकारे प्राप्त झाले आहे! कारण तुझी प्रज्ञाचक्षू भगवंतांच्या या गंभीर वचनांमध्ये प्रवेश करते.” सातवे (सुत्त समाप्त). 8. නිගණ්ඨනාටපුත්තසුත්තං ८. निगण्ठ नाटपुत्त सुत्त 350. තෙන ඛො පන සමයෙන නිගණ්ඨො නාටපුත්තො මච්ඡිකාසණ්ඩං අනුප්පත්තො හොති මහතියා නිගණ්ඨපරිසාය සද්ධිං. අස්සොසි ඛො චිත්තො ගහපති – ‘‘නිගණ්ඨො කිර නාටපුත්තො මච්ඡිකාසණ්ඩං අනුප්පත්තො මහතියා නිගණ්ඨපරිසාය සද්ධි’’න්ති. අථ ඛො චිත්තො ගහපති සම්බහුලෙහි උපාසකෙහි සද්ධිං යෙන නිගණ්ඨො නාටපුත්තො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා නිගණ්ඨෙන නාටපුත්තෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො චිත්තං ගහපතිං නිගණ්ඨො නාටපුත්තො එතදවොච – ‘‘සද්දහසි ත්වං, ගහපති, සමණස්ස ගොතමස්ස – අත්ථි අවිතක්කො අවිචාරො සමාධි, අත්ථි විතක්කවිචාරානං නිරොධො’’ති? ३५०. त्या वेळी निगण्ठ नाटपुत्त आपल्या मोठ्या निगण्ठ अनुयायांच्या समूहासह मच्छिकाषण्ड येथे आलेला होता. चित्त गृहपतीने ऐकले की, “निगण्ठ नाटपुत्त आपल्या मोठ्या निगण्ठ अनुयायांच्या समूहासह मच्छिकाषण्ड येथे आलेला आहे.” तेव्हा चित्त गृहपती अनेक उपासकांसह जेथे निगण्ठ नाटपुत्त होता तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने निगण्ठ नाटपुत्त याच्याशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीला निगण्ठ नाटपुत्त म्हणाला, “गृहपती, श्रमण गोतमांच्या या गोष्टीवर तुझा विश्वास आहे का की, ‘वितर्क आणि विचार नसलेली समाधी (अवितक्क अविचार समाधी) असते, आणि वितर्क व विचारांचा निरोध (लय) होतो’?” ‘‘න ඛ්වාහං එත්ථ, භන්තෙ, භගවතො සද්ධාය ගච්ඡාමි. අත්ථි අවිතක්කො අවිචාරො සමාධි, අත්ථි විතක්කවිචාරානං නිරොධො’’ති. එවං වුත්තෙ, නිගණ්ඨො නාටපුත්තො උල්ලොකෙත්වා එතදවොච – ‘‘ඉදං භවන්තො පස්සන්තු, යාව උජුකො චායං චිත්තො ගහපති, යාව අසඨො චායං චිත්තො ගහපති, යාව අමායාවී චායං චිත්තො ගහපති, වාතං වා සො ජාලෙන බාධෙතබ්බං මඤ්ඤෙය්ය, යො විතක්කවිචාරෙ නිරොධෙතබ්බං මඤ්ඤෙය්ය[Pg.488], සකමුට්ඨිනා වා සො ගඞ්ගාය සොතං ආවාරෙතබ්බං මඤ්ඤෙය්ය, යො විතක්කවිචාරෙ නිරොධෙතබ්බං මඤ්ඤෙය්යා’’ති. “भन्ते, या बाबतीत मी केवळ भगवंतांवर श्रद्धा ठेवून चालत नाही की, ‘वितर्क आणि विचार नसलेली समाधी असते, आणि वितर्क व विचारांचा निरोध होतो’.” असे म्हटल्यावर, निगण्ठ नाटपुत्ताने आपल्या अनुयायांकडे अभिमानाने पाहत म्हटले, “महाशयांनो, हे पहा! हा चित्त गृहपती किती सरळ आहे! हा चित्त गृहपती किती निष्कपट आहे! हा चित्त गृहपती किती माया नसलेला (प्रामाणिक) आहे! जो कोणी असे मानतो की वितर्क आणि विचारांचा निरोध केला जाऊ शकतो, तो जाळ्याने वारा पकडता येईल असे मानण्यासारखे आहे, किंवा आपल्या मुठीने गंगा नदीचा प्रवाह रोखता येईल असे मानण्यासारखे आहे.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, භන්තෙ, කතමං නු ඛො පණීතතරං – ඤාණං වා සද්ධා වා’’ති? ‘‘සද්ධාය ඛො, ගහපති, ඤාණංයෙව පණීතතර’’න්ති. ‘‘අහං ඛො, භන්තෙ, යාවදෙව ආකඞ්ඛාමි, විවිච්චෙව කාමෙහි විවිච්ච අකුසලෙහි ධම්මෙහි සවිතක්කං සවිචාරං විවෙකජං පීතිසුඛං පඨමං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. අහං ඛො, භන්තෙ, යාවදෙව ආකඞ්ඛාමි, විතක්කවිචාරානං වූපසමා…පෙ… දුතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. අහං ඛො, භන්තෙ, යාවදෙව ආකඞ්ඛාමි, පීතියා ච විරාගා…පෙ… තතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. අහං ඛො, භන්තෙ, යාවදෙව ආකඞ්ඛාමි, සුඛස්ස ච පහානා…පෙ… චතුත්ථං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. න සො ඛ්වාහං, භන්තෙ, එවං ජානන්තො එවං පස්සන්තො කස්ස අඤ්ඤස්ස සමණස්ස වා බ්රාහ්මණස්ස වා සද්ධාය ගමිස්සාමි? අත්ථි අවිතක්කො අවිචාරො සමාධි, අත්ථි විතක්කවිචාරානං නිරොධො’’ති. “भन्ते, तुम्हाला काय वाटते, ज्ञान आणि श्रद्धा या दोन्हीपैकी काय अधिक श्रेष्ठ आहे?” “गृहपती, श्रद्धेपेक्षा ज्ञानच अधिक श्रेष्ठ आहे.” “भन्ते, मला जेव्हा जेव्हा इच्छा होते, तेव्हा मी कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह असलेल्या, विवेकापासून उत्पन्न झालेल्या प्रीती आणि सुखाने युक्त अशा पहिल्या ध्यानात (प्रथम ध्यान) प्रवेश करून विहरतो. भन्ते, मला जेव्हा जेव्हा इच्छा होते, तेव्हा वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्याने... (पूर्ववत)... दुसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. भन्ते, मला जेव्हा जेव्हा इच्छा होते, तेव्हा प्रीतीचाही विराग झाल्यामुळे... (पूर्ववत)... तिसऱ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. भन्ते, मला जेव्हा जेव्हा इच्छा होते, तेव्हा सुखाचाही त्याग केल्यामुळे... (पूर्ववत)... चौथ्या ध्यानात प्रवेश करून विहरतो. भन्ते, अशा प्रकारे जाणणारा आणि पाहणारा मी, ‘वितर्क आणि विचार नसलेली समाधी असते, आणि वितर्क व विचारांचा निरोध होतो’ या गोष्टीसाठी इतर कोणत्या श्रमणावर किंवा ब्राह्मणावर श्रद्धा ठेवून का जाईन?” එවං වුත්තෙ, නිගණ්ඨො නාටපුත්තො සකං පරිසං අපලොකෙත්වා එතදවොච – ‘‘ඉදං භවන්තො පස්සන්තු, යාව අනුජුකො චායං චිත්තො ගහපති, යාව සඨො චායං චිත්තො ගහපති, යාව මායාවී චායං චිත්තො ගහපතී’’ති. असे म्हटल्यावर, निगण्ठ नाटपुत्ताने आपल्या अनुयायांकडे तिरकस नजरेने पाहत म्हटले, “महाशयांनो, हे पहा! हा चित्त गृहपती किती कुटिल (असरळ) आहे! हा चित्त गृहपती किती धूर्त (सठ) आहे! हा चित्त गृहपती किती कपटी (मायी) आहे!” ‘‘ඉදානෙව ඛො තෙ මයං, භන්තෙ, භාසිතං – ‘එවං ආජානාම ඉදං භවන්තො පස්සන්තු, යාව උජුකො චායං චිත්තො ගහපති, යාව අසඨො චායං චිත්තො ගහපති, යාව අමායාවී චායං චිත්තො ගහපතී’ති. ඉදානෙව ච පන මයං, භන්තෙ, භාසිතං – ‘එවං ආජානාම ඉදං භවන්තො පස්සන්තු, යාව අනුජුකො චායං චිත්තො ගහපති, යාව සඨො චායං චිත්තො ගහපති, යාව මායාවී චායං චිත්තො ගහපතී’ති. සචෙ තෙ, භන්තෙ, පුරිමං සච්චං, පච්ඡිමං තෙ මිච්ඡා. සචෙ පන තෙ, භන්තෙ, පුරිමං මිච්ඡා, පච්ඡිමං තෙ සච්චං. ඉමෙ ඛො පන, භන්තෙ, දස සහධම්මිකා පඤ්හා ආගච්ඡන්ති. යදා නෙසං අත්ථං ආජානෙය්යාසි, අථ මං පටිහරෙය්යාසි සද්ධිං නිගණ්ඨපරිසාය. එකො පඤ්හො, එකො උද්දෙසො, එකං වෙය්යාකරණං. ද්වෙ පඤ්හා, ද්වෙ උද්දෙසා, ද්වෙ වෙය්යාකරණානි. තයො පඤ්හා, තයො උද්දෙසා, තීණි වෙය්යාකරණානි. චත්තාරො පඤ්හා, චත්තාරො උද්දෙසා, චත්තාරි [Pg.489] වෙය්යාකරණානි. පඤ්ච පඤ්හා, පඤ්ච උද්දෙසා, පඤ්ච වෙය්යාකරණානි. ඡ පඤ්හා, ඡ උද්දෙසා, ඡ වෙය්යාකරණානි. සත්ත පඤ්හා, සත්ත උද්දෙසා, සත්ත වෙය්යාකරණානි. අට්ඨ පඤ්හා, අට්ඨ උද්දෙසා, අට්ඨ වෙය්යාකරණානි. නව පඤ්හා, නව උද්දෙසා, නව වෙය්යාකරණානි. දස පඤ්හා, දස උද්දෙසා, දස වෙය්යාකරණානී’’ති. අථ ඛො චිත්තො ගහපති නිගණ්ඨං නාටපුත්තං ඉමෙ දස සහධම්මිකෙ පඤ්හෙ ආපුච්ඡිත්වා උට්ඨායාසනා පක්කාමීති. අට්ඨමං. "भन्ते, नुकतेच आम्ही आपले हे बोलणे ऐकले - 'अहो सज्जनो, हे पहा! हा चित्त गृहपती किती सरळ आहे, हा चित्त गृहपती किती निष्कपट आहे, हा चित्त गृहपती किती मायारहित आहे!' आणि आता लगेचच आम्ही आपले हे बोलणे ऐकतो - 'अहो सज्जनो, हे पहा! हा चित्त गृहपती किती कुटिल आहे, हा चित्त गृहपती किती कपटी आहे, हा चित्त गृहपती किती मायावी आहे!' भन्ते, जर तुमचे पहिले विधान सत्य असेल, तर तुमचे नंतरचे विधान असत्य आहे. आणि जर तुमचे पहिले विधान असत्य असेल, तर तुमचे नंतरचे विधान सत्य आहे. भन्ते, हे दहा सकारण प्रश्न उपस्थित होतात. जेव्हा तुम्हाला त्यांचा अर्थ समजेल, तेव्हा तुम्ही तुमच्या निगंठ परिषदेसह मला उत्तर द्यावे. एक प्रश्न, एक उद्देश, एक व्याकरण. दोन प्रश्न, दोन उद्देश, दोन व्याकरणे. तीन प्रश्न, तीन उद्देश, तीन व्याकरणे. चार प्रश्न, चार उद्देश, चार व्याकरणे. पाच प्रश्न, पाच उद्देश, पाच व्याकरणे. सहा प्रश्न, सहा उद्देश, सहा व्याकरणे. सात प्रश्न, सात उद्देश, सात व्याकरणे. आठ प्रश्न, आठ उद्देश, आठ व्याकरणे. नऊ प्रश्न, नऊ उद्देश, नऊ व्याकरणे. दहा प्रश्न, दहा उद्देश, दहा व्याकरणे." त्यानंतर चित्त गृहपतीने निगंठ नातपुत्ताला हे दहा सकारण प्रश्न विचारून आपल्या आसनावरून उठून तेथून प्रस्थान केले. आठवे सूत्र समाप्त. 9. අචෙලකස්සපසුත්තං ९. अचेलकस्सपसुत्त 351. තෙන ඛො පන සමයෙන අචෙලො කස්සපො මච්ඡිකාසණ්ඩං අනුප්පත්තො හොති චිත්තස්ස ගහපතිනො පුරාණගිහිසහායො. අස්සොසි ඛො චිත්තො ගහපති – ‘‘අචෙලො කිර කස්සපො මච්ඡිකාසණ්ඩං අනුප්පත්තො අම්හාකං පුරාණගිහිසහායො’’ති. අථ ඛො චිත්තො ගහපති යෙන අචෙලො කස්සපො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා අචෙලෙන කස්සපෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො චිත්තො ගහපති අචෙලං කස්සපං එතදවොච – ‘‘කීවචිරං පබ්බජිතස්ස, භන්තෙ, කස්සපා’’ති? ‘‘තිංසමත්තානි ඛො මෙ, ගහපති, වස්සානි පබ්බජිතස්සා’’ති. ‘‘ඉමෙහි පන තෙ, භන්තෙ, තිංසමත්තෙහි වස්සෙහි අත්ථි කොචි උත්තරිමනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසො අධිගතො ඵාසුවිහාරො’’ති? ‘‘ඉමෙහි ඛො මෙ, ගහපති, තිංසමත්තෙහි වස්සෙහි පබ්බජිතස්ස නත්ථි කොචි උත්තරිමනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසො අධිගතො ඵාසුවිහාරො, අඤ්ඤත්ර නග්ගෙය්යා ච මුණ්ඩෙය්යා ච පාවළනිප්ඵොටනාය චා’’ති. එවං වුත්තෙ, චිත්තො ගහපති අචෙලං කස්සපං එතදවොච – ‘‘අච්ඡරියං වත, භො, අබ්භුතං වත, භො! ධම්මස්ස ස්වාක්ඛාතතා යත්ර හි නාම තිංසමත්තෙහි වස්සෙහි න කොචි උත්තරිමනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසො අධිගතො අභවිස්ස ඵාසුවිහාරො, අඤ්ඤත්ර නග්ගෙය්යා ච මුණ්ඩෙය්යා ච පාවළනිප්ඵොටනාය චා’’ති! ३५१. त्या वेळी चित्त गृहपतीचा गृहस्थजीवनातील जुना मित्र असलेला अचेल कस्सप मच्छिकाखंड येथे आला होता. चित्त गृहपतीने ऐकले की, 'आमचा गृहस्थजीवनातील जुना मित्र अचेल कस्सप मच्छिकाखंड येथे आला आहे.' तेव्हा चित्त गृहपती जेथे अचेल कस्सप होता तेथे गेला; आणि तेथे पोहोचून त्याने अचेल कस्सपशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चित्त गृहपतीने अचेल कस्सपला विचारले, 'भन्ते कस्सप, तुम्हाला प्रव्रजित होऊन किती काळ झाला आहे?' 'गृहपती, मला प्रव्रजित होऊन सुमारे तीस वर्षे झाली आहेत.' 'पण भन्ते, या तीस वर्षांत तुम्हाला मानवी धर्मापलीकडचे, आर्यांना योग्य असे कोणतेही विशेष ज्ञान-दर्शन किंवा सुखाचा विहार प्राप्त झाला आहे का?' 'गृहपती, प्रव्रजित झाल्यापासून या तीस वर्षांत मला नग्न राहणे, मुंडण करणे आणि आसन स्वच्छ करण्यासाठी मोरपिसांचा झाडू वापरणे याशिवाय मानवी धर्मापलीकडचे, आर्यांना योग्य असे कोणतेही विशेष ज्ञान-दर्शन किंवा सुखाचा विहार प्राप्त झालेला नाही.' असे म्हटल्यावर चित्त गृहपती अचेल कस्सपला म्हणाला, 'आश्चर्य आहे, हे महाशय! अद्भुत आहे, हे महाशय! धम्माचे सुविख्यातत्व पहा, की तीस वर्षांनंतरही नग्न राहणे, मुंडण करणे आणि आसन स्वच्छ करण्यासाठी मोरपिसांचा झाडू वापरणे याशिवाय मानवी धर्मापलीकडचे, आर्यांना योग्य असे कोणतेही विशेष ज्ञान-दर्शन किंवा सुखाचा विहार प्राप्त होऊ शकला नाही!' ‘‘තුය්හං පන, ගහපති, කීවචිරං උපාසකත්තං උපගතස්සා’’ති? ‘‘මය්හම්පි ඛො පන, භන්තෙ, තිංසමත්තානි වස්සානි උපාසකත්තං උපගතස්සා’’ති. ‘‘ඉමෙහි පන තෙ, ගහපති, තිංසමත්තෙහි වස්සෙහි අත්ථි කොචි උත්තරිමනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසො [Pg.490] අධිගතො ඵාසුවිහාරො’’ති? ‘‘ගිහිනොපි සියා, භන්තෙ. අහඤ්හි, භන්තෙ, යාවදෙව ආකඞ්ඛාමි, විවිච්චෙව කාමෙහි විවිච්ච අකුසලෙහි ධම්මෙහි සවිතක්කං සවිචාරං විවෙකජං පීතිසුඛං පඨමං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. අහඤ්හි, භන්තෙ, යාවදෙව ආකඞ්ඛාමි, විතක්කවිචාරානං වූපසමා …පෙ… දුතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. අහඤ්හි, භන්තෙ, යාවදෙව ආකඞ්ඛාමි, පීතියා ච විරාගා…පෙ… තතියං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. අහඤ්හි, භන්තෙ, යාවදෙව ආකඞ්ඛාමි, සුඛස්ස ච පහානා…පෙ… චතුත්ථං ඣානං උපසම්පජ්ජ විහරාමි. සචෙ ඛො පනාහං, භන්තෙ, භගවතො පඨමතරං කාලං කරෙය්යං, අනච්ඡරියං ඛො පනෙතං යං මං භගවා එවං බ්යාකරෙය්ය – ‘නත්ථි තං සංයොජනං යෙන සංයොජනෙන සංයුත්තො චිත්තො ගහපති පුන ඉමං ලොකං ආගච්ඡෙය්යා’’’ති. එවං වුත්තෙ, අචෙලො කස්සපො චිත්තං ගහපතිං එතදවොච – ‘‘අච්ඡරියං වත භො, අබ්භුතං වත භො! ධම්මස්ස ස්වාක්ඛාතතා, යත්ර හි නාම ගිහී ඔදාතවසනො එවරූපං උත්තරිමනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං අධිගමිස්සති ඵාසුවිහාරං. ලභෙය්යාහං, ගහපති, ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ පබ්බජ්ජං, ලභෙය්යං උපසම්පද’’න්ති. 'पण गृहपती, तुला उपासकत्व पत्करून किती काळ झाला आहे?' 'भन्ते, मलाही उपासकत्व पत्करून सुमारे तीस वर्षे झाली आहेत.' 'पण गृहपती, या तीस वर्षांत तुला मानवी धर्मापलीकडचे, आर्यांना योग्य असे कोणतेही विशेष ज्ञान-दर्शन किंवा सुखाचा विहार प्राप्त झाला आहे का?' 'भन्ते, गृहस्थालाही ते प्राप्त होऊ शकते. मी, भन्ते, जेव्हा जेव्हा इच्छितो, तेव्हा कामभोगांपासून अलिप्त होऊन, अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन, वितर्क आणि विचारांसह, विवेकापासून उत्पन्न झालेले प्रीती व सुख असणारे पहिले ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. मी, भन्ते, जेव्हा जेव्हा इच्छितो, तेव्हा वितर्क आणि विचारांच्या शांत होण्याने... दुसरे ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. मी, भन्ते, जेव्हा जेव्हा इच्छितो, प्रीतीच्या विरागाने... तिसरे ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. मी, भन्ते, जेव्हा जेव्हा इच्छितो, सुखाचा त्याग केल्याने... चौथे ध्यान प्राप्त करून विहार करतो. भन्ते, जर मी भगवंतांच्या आधी मृत्यू पावलो, तर भगवंतांनी माझ्याविषयी असे घोषित करणे यात काही आश्चर्य नाही की - 'असे कोणतेही बंधन शिल्लक नाही, ज्या बंधनाने बांधला जाऊन चित्त गृहपती पुन्हा या जगात येईल.' असे म्हटल्यावर अचेल कस्सप चित्त गृहपतीला म्हणाला, 'आश्चर्य आहे, हे महाशय! अद्भुत आहे, हे महाशय! धम्माचे सुविख्यातत्व पहा, की पांढरे वस्त्र परिधान करणारा गृहस्थसुद्धा अशा प्रकारचा मानवी धर्मापलीकडचा, आर्यांना योग्य असा विशेष ज्ञान-दर्शन रूप सुखाचा विहार प्राप्त करू शकतो! गृहपती, मला या धम्म आणि विनयामध्ये प्रव्रज्या मिळावी, मला उपसंपदा मिळावी.' අථ ඛො චිත්තො ගහපති අචෙලං කස්සපං ආදාය යෙන ථෙරා භික්ඛූ තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ථෙරෙ භික්ඛූ එතදවොච – ‘‘අයං, භන්තෙ, අචෙලො කස්සපො අම්හාකං පුරාණගිහිසහායො. ඉමං ථෙරා පබ්බාජෙන්තු උපසම්පාදෙන්තු. අහමස්ස උස්සුක්කං කරිස්සාමි චීවරපිණ්ඩපාතසෙනාසනගිලානප්පච්චයභෙසජ්ජපරික්ඛාරාන’’න්ති. අලත්ථ ඛො අචෙලො කස්සපො ඉමස්මිං ධම්මවිනයෙ පබ්බජ්ජං, අලත්ථ උපසම්පදං. අචිරූපසම්පන්නො ච පනායස්මා කස්සපො එකො වූපකට්ඨො අප්පමත්තො ආතාපී පහිතත්තො විහරන්තො නචිරස්සෙව – යස්සත්ථාය කුලපුත්තා සම්මදෙව අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජන්ති, තදනුත්තරං බ්රහ්මචරියපරියොසානං දිට්ඨෙව ධම්මෙ සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා උපසම්පජ්ජ විහාසි. ‘‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’’ති අබ්භඤ්ඤාසි. අඤ්ඤතරො ච පනායස්මා කස්සපො අරහතං අහොසීති. නවමං. त्यानंतर चित्त गृहपतीने अचेल कस्सपला सोबत घेतले आणि जेथे थेर भिक्खू होते तेथे तो गेला; तेथे जाऊन तो थेर भिक्खूंना म्हणाला, 'भन्ते, हा अचेल कस्सप आमचा गृहस्थजीवनातील जुना मित्र आहे. थेर भिक्खूंनी याला प्रव्रज्या द्यावी आणि उपसंपदा द्यावी. मी याच्यासाठी चीवर, पिंडपात, शयनासन आणि आजारपणातील औषधोपचार या सर्व गरजा पुरवण्याची जबाबदारी घेतो.' अशा प्रकारे अचेल कस्सपला या धम्म आणि विनयामध्ये प्रव्रज्या मिळाली आणि उपसंपदा मिळाली. उपसंपदा मिळाल्यानंतर लवकरच आयुष्यमान कस्सप एकटे, जनसमुदायापासून दूर, अप्रमत्त, उद्योगी आणि दृढनिश्चयी होऊन विहार करू लागले. ज्या ध्येयासाठी कुलपुत्र योग्य रीतीने घरादाराचा त्याग करून अनगारिक अवस्थेत प्रव्रजित होतात, ते ब्रह्मचर्याचे सर्वश्रेष्ठ अंतिम ध्येय त्यांनी याच जन्मात स्वतः अभिज्ञाद्वारे साक्षात करून प्राप्त केले. 'जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य जगले गेले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर दुसरा कोणताही जन्म नाही,' हे त्यांनी प्रत्यक्ष जाणले. आणि आयुष्यमान कस्सप अर्हतांपैकी एक झाले. नववे सूत्र समाप्त. 10. ගිලානදස්සනසුත්තං १०. गिलाणदस्सनसुत्त 352. තෙන [Pg.491] ඛො පන සමයෙන චිත්තො ගහපති ආබාධිකො හොති දුක්ඛිතො බාළ්හගිලානො. අථ ඛො සම්බහුලා ආරාමදෙවතා වනදෙවතා රුක්ඛදෙවතා ඔසධිතිණවනප්පතීසු අධිවත්ථා දෙවතා සඞ්ගම්ම සමාගම්ම චිත්තං ගහපතිං එතදවොචුං – ‘‘පණිධෙහි, ගහපති, අනාගතමද්ධානං රාජා අස්සං චක්කවත්තී’’ති. ३५२. त्या वेळी चित्त गृहपती आजारी, दुःखी आणि अत्यंत आजारी होते. तेव्हा अनेक आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवता एकत्र येऊन, एकत्र जमून चित्त गृहपतीला असे म्हणाल्या – "गृहपती, भविष्यात मी चक्रवर्ती राजा व्हावे, अशी आकांक्षा कर." එවං වුත්තෙ, චිත්තො ගහපති තා ආරාමදෙවතා වනදෙවතා රුක්ඛදෙවතා ඔසධිතිණවනප්පතීසු අධිවත්ථා දෙවතා එතදවොච – ‘‘තම්පි අනිච්චං, තම්පි අද්ධුවං, තම්පි පහාය ගමනීය’’න්ති. එවං වුත්තෙ, චිත්තස්ස ගහපතිනො මිත්තාමච්චා ඤාතිසාලොහිතා චිත්තං ගහපතිං එතදවොචුං – ‘‘සතිං, අය්යපුත්ත, උපට්ඨපෙහි, මා විප්පලපී’’ති. ‘‘කිං තාහං වදාමි යං මං තුම්හෙ එවං වදෙථ – ‘සතිං, අය්යපුත්ත, උපට්ඨපෙහි, මා විප්පලපී’’’ති? ‘‘එවං ඛො ත්වං, අය්යපුත්ත, වදෙසි – ‘තම්පි අනිච්චං, තම්පි අද්ධුවං, තම්පි පහාය ගමනීය’’’න්ති. ‘‘තථා හි පන මං ආරාමදෙවතා වනදෙවතා රුක්ඛදෙවතා ඔසධිතිණවනප්පතීසු අධිවත්ථා දෙවතා එවමාහංසු – ‘පණිධෙහි, ගහපති, අනාගතමද්ධානං රාජා අස්සං චක්කවත්තී’ති. තාහං එවං වදාමි – ‘තම්පි අනිච්චං…පෙ… තම්පි පහාය ගමනීය’’’න්ති. ‘‘කිං පන තා, අය්යපුත්ත, ආරාමදෙවතා වනදෙවතා රුක්ඛදෙවතා ඔසධිතිණවනප්පතීසු අධිවත්ථා දෙවතා අත්ථවසං සම්පස්සමානා එවමාහංසු – ‘පණිධෙහි, ගහපති, අනාගතමද්ධානං රාජා අස්සං චක්කවත්තී’’’ති? ‘‘තාසං ඛො ආරාමදෙවතානං වනදෙවතානං රුක්ඛදෙවතානං ඔසධිතිණවනප්පතීසු අධිවත්ථානං දෙවතානං එවං හොති – ‘අයං ඛො චිත්තො ගහපති, සීලවා කල්යාණධම්මො. සචෙ පණිදහිස්සති – අනාගතමද්ධානං රාජා අස්සං චක්කවත්තී’ති, ‘තස්ස ඛො අයං ඉජ්ඣිස්සති, සීලවතො චෙතොපණිධි විසුද්ධත්තා ධම්මිකො ධම්මිකං ඵලං අනුපස්සතී’ති. ඉමං ඛො තා ආරාමදෙවතා වනදෙවතා රුක්ඛදෙවතා ඔසධිතිණවනප්පතීසු අධිවත්ථා දෙවතා අත්ථවසං සම්පස්සමානා එවමාහංසු – ‘පණිධෙහි, ගහපති, අනාගතමද්ධානං රාජා අස්සං චක්කවත්තී’ති. තාහං එවං වදාමි – ‘තම්පි අනිච්චං, තම්පි අද්ධුවං, තම්පි පහාය ගමනීය’’’න්ති. असे म्हटले असता, चित्त गृहपती त्या आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवतांना म्हणाले – "ते देखील अनित्य आहे, ते देखील अध्रुव आहे, ते देखील सोडून जावे लागणारे आहे." असे म्हटले असता, चित्त गृहपतीचे मित्र, अमात्य, नातेवाईक आणि सगेसोयरे चित्त गृहपतीला म्हणाले – "आर्यपुत्र, स्मृती जागृत ठेवा, बडबडू नका." "मी असे काय बोलत आहे की तुम्ही मला असे म्हणत आहात – 'आर्यपुत्र, स्मृती जागृत ठेवा, बडबडू नका'?" "आर्यपुत्र, आपण असे म्हणालात – 'ते देखील अनित्य आहे, ते देखील अध्रुव आहे, ते देखील सोडून जावे लागणारे आहे.'" "कारण आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवता मला असे म्हणाल्या होत्या – 'गृहपती, भविष्यात मी चक्रवर्ती राजा व्हावे, अशी आकांक्षा कर.' म्हणून मी त्यांना असे म्हणालो – 'ते देखील अनित्य आहे... पे... ते देखील सोडून जावे लागणारे आहे.'" "पण आर्यपुत्र, त्या आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवता कोणता विशेष लाभ पाहून असे म्हणाल्या – 'गृहपती, भविष्यात मी चक्रवर्ती राजा व्हावे, अशी आकांक्षा कर'?" "त्या आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवतांच्या मनात असा विचार आला – 'हा चित्त गृहपती शीलवान व कल्याणधर्मी आहे. जर त्याने भविष्यात मी चक्रवर्ती राजा व्हावे अशी आकांक्षा केली, तर त्याच्या शीलाच्या शुद्धतेमुळे त्याची ही मनोआकांक्षा पूर्ण होईल. धार्मिक व्यक्तीला धार्मिक फळच मिळते.' हा विशेष लाभ पाहून त्या आरामदेवता, वनदेवता, वृक्षदेवता आणि औषधी वनस्पती, गवत व वनवृक्षांवर अधिवास करणाऱ्या देवतांनी मला असे म्हटले – 'गृहपती, भविष्यात मी चक्रवर्ती राजा व्हावे, अशी आकांक्षा कर.' म्हणून मी त्यांना असे म्हणालो – 'ते देखील अनित्य आहे, ते देखील अध्रुव आहे, ते देखील सोडून जावे लागणारे आहे.'" ‘‘තෙන [Pg.492] හි, අය්යපුත්ත, අම්හෙපි ඔවදාහී’’ති. ‘‘තස්මා හි වො එවං සික්ඛිතබ්බං – බුද්ධෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගතා භවිස්සාම – ‘ඉතිපි සො භගවා අරහං සම්මාසම්බුද්ධො විජ්ජාචරණසම්පන්නො සුගතො ලොකවිදූ අනුත්තරො පුරිසදම්මසාරථි සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා’ති. ධම්මෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගතා භවිස්සාම – ‘ස්වාක්ඛාතො භගවතා ධම්මො සන්දිට්ඨිකො අකාලිකො එහිපස්සිකො ඔපනෙය්යිකො පච්චත්තං වෙදිතබ්බො විඤ්ඤූහී’ති. සඞ්ඝෙ අවෙච්චප්පසාදෙන සමන්නාගතා භවිස්සාම – ‘සුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, උජුප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, ඤායප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, සාමීචිප්පටිපන්නො භගවතො සාවකසඞ්ඝො, යදිදං චත්තාරි පුරිසයුගානි අට්ඨ පුරිසපුග්ගලා එස භගවතො සාවකසඞ්ඝො ආහුනෙය්යො පාහුනෙය්යො දක්ඛිණෙය්යො අඤ්ජලිකරණීයො අනුත්තරං පුඤ්ඤක්ඛෙත්තං ලොකස්සා’ති. යං ඛො පන කිඤ්චි කුලෙ දෙය්යධම්මං සබ්බං තං අප්පටිවිභත්තං භවිස්සති සීලවන්තෙහි කල්යාණධම්මෙහීති එවඤ්හි වො සික්ඛිතබ්බ’’න්ති. අථ ඛො චිත්තො ගහපති මිත්තාමච්චෙ ඤාතිසාලොහිතෙ බුද්ධෙ ච ධම්මෙ ච සඞ්ඝෙ ච චාගෙ ච සමාදපෙත්වා කාලමකාසීති. දසමං. "तसे असेल तर, आर्यपुत्र, आम्हालाही उपदेश करा." "म्हणून तुम्ही असे शिकले पाहिजे – 'आम्ही बुद्धांवर अचल श्रद्धेने युक्त होऊ – ते भगवान अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत.' 'आम्ही धम्मावर अचल श्रद्धेने युक्त होऊ – भगवंतांनी धम्माचे सुंदर रीतीने आख्यान केले आहे, तो प्रत्यक्ष पाहण्याजोगा, तात्काळ फळ देणारा, ये आणि पाहा असे म्हणण्यास योग्य, स्वतःच्या अंतकरणात धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी आपापल्या परीने अनुभवण्याजोगा आहे.' 'आम्ही संघावर अचल श्रद्धेने युक्त होऊ – भगवंतांचा श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ ऋजुप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ न्यायप्रतिपन्न आहे, भगवंतांचा श्रावकसंघ सामीचीप्रतिपन्न आहे; म्हणजेच ही चार पुरुषयुगे आणि आठ पुरुषपुद्गल आहेत, हा भगवंतांचा श्रावकसंघ आहुनेय, पाहुनेय, दक्खिणेय, अंजलिकरणीय आणि जगाचे अनुत्तर पुण्यक्षेत्र आहे.' 'तसेच, आमच्या कुळात जे काही देयधर्म असेल, ते सर्व आम्ही शीलवान व कल्याणधर्मी लोकांमध्ये सामायिकपणे वाटून देऊ.' अशा प्रकारे तुम्ही स्वतःला प्रशिक्षित केले पाहिजे." त्यानंतर चित्त गृहपतीने आपले मित्र, अमात्य, नातेवाईक आणि सगेसोयरे यांना बुद्ध, धम्म, संघ आणि त्याग यांमध्ये प्रस्थापित करून देहत्याग केला. दहावे सूत्र समाप्त. චිත්තසංයුත්තං සමත්තං. चित्तसंयुत्त समाप्त झाले. තස්සුද්දානං – त्याचे उद्दान – සංයොජනං ද්වෙ ඉසිදත්තා, මහකො කාමභූපි ච; ගොදත්තො ච නිගණ්ඨො ච, අචෙලෙන ගිලානදස්සනන්ති. संयोजन, दोन इसिदत्त सूत्रे, महक आणि कामभू सूत्र; गोदत्त आणि निगण्ठ सूत्र, अचेल आणि ग्लानदर्शन सूत्र. 8. ගාමණිසංයුත්තං ८. गामणिसंयुत्त 1. චණ්ඩසුත්තං १. चण्डसूत्र 353. සාවත්ථිනිදානං[Pg.493]. අථ ඛො චණ්ඩො ගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො චණ්ඩො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කො නු ඛො, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චො චණ්ඩො චණ්ඩොත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. කො පන, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙන මිධෙකච්චො සොරතො සොරතොත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡතී’’ති? ‘‘ඉධ, ගාමණි, එකච්චස්ස රාගො අප්පහීනො හොති. රාගස්ස අප්පහීනත්තා පරෙ කොපෙන්ති, පරෙහි කොපියමානො කොපං පාතුකරොති. සො චණ්ඩොත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. දොසො අප්පහීනො හොති. දොසස්ස අප්පහීනත්තා පරෙ කොපෙන්ති, පරෙහි කොපියමානො කොපං පාතුකරොති. සො චණ්ඩොත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. මොහො අප්පහීනො හොති. මොහස්ස අප්පහීනත්තා පරෙ කොපෙන්ති, පරෙහි කොපියමානො කොපං පාතුකරොති. සො චණ්ඩොත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. අයං ඛො, ගාමණි, හෙතු, අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චො චණ්ඩො චණ්ඩොත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති’’. ३५३. श्रावस्ती येथील निदान. तेव्हा चण्ड नावाचा ग्रामणी जेथे भगवान होते तेथे गेला; तिथे जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या चण्ड ग्रामणीने भगवंतांना असे विचारले – "भंते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही व्यक्तींना चण्ड, चण्ड असेच म्हटले जाते? आणि भंते, काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही व्यक्तींना सोरत, सोरत असेच म्हटले जाते?" "ग्रामणी, या जगात काही व्यक्तींचा राग नष्ट झालेला नसतो. राग नष्ट न झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करतात, आणि इतरांनी संतप्त केले असता ते आपला क्रोध प्रकट करतात. त्यामुळे त्यांना चण्ड असेच म्हटले जाते. त्यांचा द्वेष नष्ट झालेला नसतो. द्वेष नष्ट न झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करतात, आणि इतरांनी संतप्त केले असता ते आपला क्रोध प्रकट करतात. त्यामुळे त्यांना चण्ड असेच म्हटले जाते. त्यांचा मोह नष्ट झालेला नसतो. मोह नष्ट न झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करतात, आणि इतरांनी संतप्त केले असता ते आपला क्रोध प्रकट करतात. त्यामुळे त्यांना चण्ड असेच म्हटले जाते. ग्रामणी, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही व्यक्तींना चण्ड, चण्ड असेच म्हटले जाते." ‘‘ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චස්ස රාගො පහීනො හොති. රාගස්ස පහීනත්තා පරෙ න කොපෙන්ති, පරෙහි කොපියමානො කොපං න පාතුකරොති. සො සොරතොත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. දොසො පහීනො හොති. දොසස්ස පහීනත්තා පරෙ න කොපෙන්ති, පරෙහි කොපියමානො කොපං න පාතුකරොති. සො සොරතොත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. මොහො පහීනො හොති. මොහස්ස පහීනත්තා පරෙ න කොපෙන්ති, පරෙහි කොපියමානො කොපං න පාතුකරොති. සො සොරතොත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡති. අයං ඛො, ගාමණි, හෙතු අයං පච්චයො යෙන මිධෙකච්චො සොරතො සොරතොත්වෙව සඞ්ඛං ගච්ඡතී’’ති. "परंतु ग्रामणी, या जगात काही व्यक्तींचा राग नष्ट झालेला असतो. राग नष्ट झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करत नाहीत, आणि इतरांनी संतप्त केले तरी ते आपला क्रोध प्रकट करत नाहीत. त्यामुळे त्यांना सोरत असेच म्हटले जाते. त्यांचा द्वेष नष्ट झालेला असतो. द्वेष नष्ट झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करत नाहीत, आणि इतरांनी संतप्त केले तरी ते आपला क्रोध प्रकट करत नाहीत. त्यामुळे त्यांना सोरत असेच म्हटले जाते. त्यांचा मोह नष्ट झालेला असतो. मोह नष्ट झाल्यामुळे इतर लोक त्यांना संतप्त करत नाहीत, आणि इतरांनी संतप्त केले तरी ते आपला क्रोध प्रकट करत नाहीत. त्यामुळे त्यांना सोरत असेच म्हटले जाते. ग्रामणी, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे या जगात काही व्यक्तींना सोरत, सोरत असेच म्हटले जाते." එවං වුත්තෙ, චණ්ඩො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ, අභික්කන්තං, භන්තෙ! සෙය්යථාපි, භන්තෙ, නික්කුජ්ජිතං වා උක්කුජ්ජෙය්ය, පටිච්ඡන්නං වා [Pg.494] විවරෙය්ය, මූළ්හස්ස වා මග්ගං ආචික්ඛෙය්ය, අන්ධකාරෙ වා තෙලපජ්ජොතං ධාරෙය්ය – චක්ඛුමන්තො රූපානි දක්ඛන්තීති; එවමෙවං භගවතා අනෙකපරියායෙන ධම්මො පකාසිතො. එසාහං, භන්තෙ, භගවන්තං සරණං ගච්ඡාමි ධම්මඤ්ච භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. උපාසකං මං භගවා ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. පඨමං. असे म्हटले असता, चंड ग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “अतिशय सुंदर, भन्ते! अतिशय सुंदर, भन्ते! ज्याप्रमाणे, भन्ते, पालथा घातलेला घडा उताणा करावा, झाकलेली वस्तू उघडी करावी, वाट चुकलेल्याला मार्ग दाखवावा, किंवा डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसावीत म्हणून अंधारात तेलाचा दिवा धरावा; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक मार्गांनी धम्म प्रकाशित केला आहे. भन्ते, मी भगवंतांना, धम्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. भगवंतांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून मानावे.” पहिले. 2. තාලපුටසුත්තං २. तालपुट सुत्त 354. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. අථ ඛො තාලපුටො නටගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො තාලපුටො නටගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සුතං මෙතං, භන්තෙ, පුබ්බකානං ආචරියපාචරියානං නටානං භාසමානානං – ‘යො සො නටො රඞ්ගමජ්ඣෙ සමජ්ජමජ්ඣෙ සච්චාලිකෙන ජනං හාසෙති රමෙති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පහාසානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’ති. ඉධ භගවා කිමාහා’’ති? ‘‘අලං, ගාමණි, තිට්ඨතෙතං. මා මං එතං පුච්ඡී’’ති. දුතියම්පි ඛො තාලපුටො නටගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සුතං මෙතං, භන්තෙ, පුබ්බකානං ආචරියපාචරියානං නටානං භාසමානානං – ‘යො සො නටො රඞ්ගමජ්ඣෙ සමජ්ජමජ්ඣෙ සච්චාලිකෙන ජනං හාසෙති රමෙති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පහාසානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’ති. ඉධ භගවා කිමාහා’’ති? ‘‘අලං, ගාමණි, තිට්ඨතෙතං. මා මං එතං පුච්ඡී’’ති. තතියම්පි ඛො තාලපුටො නටගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සුතං මෙතං, භන්තෙ, පුබ්බකානං ආචරියපාචරියානං නටානං භාසමානානං – ‘යො සො නටො රඞ්ගමජ්ඣෙ සමජ්ජමජ්ඣෙ සච්චාලිකෙන ජනං හාසෙති රමෙති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පහාසානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’ති. ඉධ භගවා කිමාහා’’ති? ३५४. एकदा भगवान राजगृहातील वेळुवनात कलंदकनिवाप येथे विहार करत होते. तेव्हा तालपुट नावाचा नटग्रामणी जेथे भगवान होते तेथे आला. आल्यानंतर भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला तालपुट नटग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील नटांकडून असे ऐकले आहे की – ‘जो नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये सत्य आणि असत्याच्या साहाय्याने लोकांचे मनोरंजन करतो, त्यांना हसवतो व आनंदित करतो, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ‘पहास’ नावाच्या देवांच्या संगतीत जन्माला येतो.’ यावर भगवान काय म्हणतात?” “पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हा प्रश्न विचारू नकोस.” दुसऱ्यांदाही तालपुट नटग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील नटांकडून असे ऐकले आहे की – ‘जो नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये सत्य आणि असत्याच्या साहाय्याने लोकांचे मनोरंजन करतो, त्यांना हसवतो व आनंदित करतो, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ‘पहास’ नावाच्या देवांच्या संगतीत जन्माला येतो.’ यावर भगवान काय म्हणतात?” “पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हा प्रश्न विचारू नकोस.” तिसऱ्यांदाही तालपुट नटग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील नटांकडून असे ऐकले आहे की – ‘जो नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये सत्य आणि असत्याच्या साहाय्याने लोकांचे मनोरंजन करतो, त्यांना हसवतो व आनंदित करतो, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ‘पहास’ नावाच्या देवांच्या संगतीत जन्माला येतो.’ यावर भगवान काय म्हणतात?” ‘‘අද්ධා ඛො ත්යාහං, ගාමණි, න ලභාමි – ‘අලං, ගාමණි, තිට්ඨතෙතං, මා මං එතං පුච්ඡී’ති. අපි ච ත්යාහං බ්යාකරිස්සාමි. පුබ්බෙ ඛො, ගාමණි, සත්තා අවීතරාගා රාගබන්ධනබද්ධා. තෙසං නටො රඞ්ගමජ්ඣෙ සමජ්ජමජ්ඣෙ යෙ ධම්මා රජනීයා තෙ උපසංහරති භිය්යොසොමත්තාය. පුබ්බෙ ඛො, ගාමණි, සත්තා අවීතදොසා දොසබන්ධනබද්ධා. තෙසං නටො රඞ්ගමජ්ඣෙ සමජ්ජමජ්ඣෙ යෙ ධම්මා [Pg.495] දොසනීයා තෙ උපසංහරති භිය්යොසොමත්තාය. පුබ්බෙ ඛො, ගාමණි, සත්තා අවීතමොහා මොහබන්ධනබද්ධා. තෙසං නටො රඞ්ගමජ්ඣෙ සමජ්ජමජ්ඣෙ යෙ ධම්මා මොහනීයා තෙ උපසංහරති භිය්යොසොමත්තාය. සො අත්තනා මත්තො පමත්තො පරෙ මදෙත්වා පමාදෙත්වා කායස්ස භෙදා පරං මරණා පහාසො නාම නිරයො තත්ථ උපපජ්ජති. සචෙ ඛො පනස්ස එවංදිට්ඨි හොති – ‘යො සො නටො රඞ්ගමජ්ඣෙ සමජ්ජමජ්ඣෙ සච්චාලිකෙන ජනං හාසෙති රමෙති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පහාසානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’ති, සාස්ස හොති මිච්ඡාදිට්ඨි. මිච්ඡාදිට්ඨිකස්ස ඛො පනාහං, ගාමණි, පුරිසපුග්ගලස්ස ද්වින්නං ගතීනං අඤ්ඤතරං ගතිං වදාමි – නිරයං වා තිරච්ඡානයොනිං වා’’ති. “नक्कीच, ग्रामणी, मी तुला ‘पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे, मला हा प्रश्न विचारू नकोस’ असे म्हणून थांबवू शकलो नाही. तरीही, मी तुला याचे उत्तर देईन. ग्रामणी, पूर्वीपासूनच प्राणी हे रागापासून मुक्त नसतात, ते रागाच्या बंधनात बांधलेले असतात. अशा लोकांसमोर नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये जे राग उत्पन्न करणारे विषय आहेत, ते अधिक प्रमाणात सादर करतो. ग्रामणी, पूर्वीपासूनच प्राणी हे द्वेषापासून मुक्त नसतात, ते द्वेषाच्या बंधनात बांधलेले असतात. अशा लोकांसमोर नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये जे द्वेष उत्पन्न करणारे विषय आहेत, ते अधिक प्रमाणात सादर करतो. ग्रामणी, पूर्वीपासूनच प्राणी हे मोहापासून मुक्त नसतात, ते मोहाच्या बंधनात बांधलेले असतात. अशा लोकांसमोर नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये जे मोह उत्पन्न करणारे विषय आहेत, ते अधिक प्रमाणात सादर करतो. तो स्वतः मत्त आणि प्रमत्त होऊन, इतरांनाही मत्त व प्रमत्त करतो; त्यामुळे शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर तो ‘पहास’ नावाच्या नरकात जन्माला येतो. परंतु, जर त्याची अशी दृष्टी असेल की – ‘जो नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये सत्य आणि असत्याच्या साहाय्याने लोकांचे मनोरंजन करतो, त्यांना हसवतो व आनंदित करतो, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ‘पहास’ नावाच्या देवांच्या संगतीत जन्माला येतो’, तर ही त्याची मिथ्यादृष्टी आहे. ग्रामणी, मिथ्यादृष्टी असलेल्या व्यक्तीसाठी मी दोन गतींपैकी एक गती सांगतो – एक तर नरक किंवा तिर्यक योनी.” එවං වුත්තෙ, තාලපුටො නටගාමණි, පරොදි, අස්සූනි පවත්තෙසි. ‘‘එතං ඛො ත්යාහං, ගාමණි, නාලත්ථං – ‘අලං, ගාමණි, තිට්ඨතෙතං; මා මං එතං පුච්ඡී’’’ති. ‘‘නාහං, භන්තෙ, එතං රොදාමි යං මං භගවා එවමාහ; අපි චාහං, භන්තෙ, පුබ්බකෙහි ආචරියපාචරියෙහි නටෙහි දීඝරත්තං නිකතො වඤ්චිතො පලුද්ධො – ‘යො සො නටො රඞ්ගමජ්ඣෙ සමජ්ජමජ්ඣෙ සච්චාලිකෙන ජනං හාසෙති රමෙති සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පහාසානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’’’ති. ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ, අභික්කන්තං, භන්තෙ! සෙය්යථාපි, භන්තෙ, නික්කුජ්ජිතං වා උක්කුජ්ජෙය්ය, පටිච්ඡන්නං වා විවරෙය්ය, මූළ්හස්ස වා මග්ගං ආචික්ඛෙය්ය, අන්ධකාරෙ වා තෙලපජ්ජොතං ධාරෙය්ය – චක්ඛුමන්තො රූපානි දක්ඛන්තීති; එවමෙවං භගවතා අනෙකපරියායෙන ධම්මො පකාසිතො. එසාහං, භන්තෙ, භගවන්තං සරණං ගච්ඡාමි ධම්මඤ්ච භික්ඛුසඞ්ඝඤ්ච. ලභෙය්යාහං, භන්තෙ, භගවතො සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, ලභෙය්යං උපසම්පද’’න්ති. අලත්ථ ඛො තාලපුටො නටගාමණි භගවතො සන්තිකෙ පබ්බජ්ජං, අලත්ථ උපසම්පදං. අචිරූපසම්පන්නො ච පනායස්මා තාලපුටො…පෙ… අරහතං අහොසීති. දුතියං. असे म्हटले असता, तालपुट नटग्रामणी रडू लागला, त्याच्या डोळ्यांतून अश्रू वाहू लागले. “ग्रामणी, म्हणूनच मी तुला थांबवत होतो की – ‘पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे, मला हा प्रश्न विचारू नकोस.’” “भन्ते, भगवान मला असे म्हणाले म्हणून मी रडत नाही; तर भन्ते, पूर्वीच्या आचार्यांनी आणि त्यांच्याही आचार्यांनी, त्या नटांनी मला दीर्घकाळ फसवले, ठकवले आणि प्रलोभित केले की – ‘जो नट रंगमंचावर किंवा जनसमुदायामध्ये सत्य आणि असत्याच्या साहाय्याने लोकांचे मनोरंजन करतो, त्यांना हसवतो व आनंदित करतो, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर ‘पहास’ नावाच्या देवांच्या संगतीत जन्माला येतो.’ अतिशय सुंदर, भन्ते! अतिशय सुंदर, भन्ते! ज्याप्रमाणे, भन्ते, पालथा घातलेला घडा उताणा करावा, झाकलेली वस्तू उघडी करावी, वाट चुकलेल्याला मार्ग दाखवावा, किंवा डोळे असणाऱ्यांना रूपे दिसावीत म्हणून अंधारात तेलाचा दिवा धरावा; त्याचप्रमाणे भगवंतांनी अनेक मार्गांनी धम्म प्रकाशित केला आहे. भन्ते, मी भगवंतांना, धम्माला आणि भिक्खू संघाला शरण जातो. भन्ते, मला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळावी, उपसंपदा मिळावी.” त्यानंतर तालपुट नटग्रामणीला भगवंतांच्या सन्निध प्रवज्जा मिळाली, उपसंपदा मिळाली. उपसंपदा मिळाल्यानंतर लवकरच आयुष्यमान तालपुट... पे... अर्हतांपैकी एक झाले. दुसरे. 3. යොධාජීවසුත්තං ३. योधाजीव सुत्त 355. අථ ඛො යොධාජීවො ගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා…පෙ… එකමන්තං නිසින්නො ඛො යොධාජීවො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සුතං මෙතං, භන්තෙ, පුබ්බකානං ආචරියපාචරියානං යොධාජීවානං භාසමානානං – ‘යො සො යොධාජීවො සඞ්ගාමෙ උස්සහති වායමති, තමෙනං [Pg.496] උස්සහන්තං වායමන්තං පරෙ හනන්ති පරියාපාදෙන්ති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පරජිතානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’ති. ඉධ භගවා කිමාහා’’ති? ‘‘අලං, ගාමණි, තිට්ඨතෙතං; මා මං එතං පුච්ඡී’’ති. දුතියම්පි ඛො…පෙ… තතියම්පි ඛො යොධාජීවො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සුතං මෙතං, භන්තෙ, පුබ්බකානං ආචරියපාචරියානං යොධාජීවානං භාසමානානං – ‘යො සො යොධාජීවො සඞ්ගාමෙ උස්සහති වායමති, තමෙනං උස්සහන්තං වායමන්තං පරෙ හනන්ති පරියාපාදෙන්ති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පරජිතානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’ති. ඉධ භගවා කිමාහා’’ති? ३५५. तेव्हा योध्दाजीवक (योद्धा) ग्रामणी जेथे भगवान होते तेथे गेला; गेल्यावर... एका बाजूला बसलेल्या योध्दाजीवक ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले – "भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील योद्ध्यांकडून असे ऐकले आहे की – 'जो योद्धा युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो.' यावर भगवान काय म्हणतात?" "पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हे विचारू नकोस." दुसऱ्यांदाही... तिसऱ्यांदाही योध्दाजीवक ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले – "भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील योद्ध्यांकडून असे ऐकले आहे की – 'जो योद्धा युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो.' यावर भगवान काय म्हणतात?" ‘‘අද්ධා ඛො ත්යාහං, ගාමණි, න ලභාමි – ‘අලං, ගාමණි, තිට්ඨතෙතං; මා මං එතං පුච්ඡී’ති. අපි ච ත්යාහං බ්යාකරිස්සාමි. යො සො, ගාමණි, යොධාජීවො සඞ්ගාමෙ උස්සහති වායමති, තස්ස තං චිත්තං පුබ්බෙ ගහිතං දුක්කටං දුප්පණිහිතං – ‘ඉමෙ සත්තා හඤ්ඤන්තු වා බජ්ඣන්තු වා උච්ඡිජ්ජන්තු වා විනස්සන්තු වා මා වා අහෙසුං ඉති වා’ති. තමෙනං උස්සහන්තං වායමන්තං පරෙ හනන්ති පරියාපාදෙන්ති; සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පරජිතො නාම නිරයො තත්ථ උපපජ්ජතීති. සචෙ ඛො පනස්ස එවං දිට්ඨි හොති – ‘යො සො යොධාජීවො සඞ්ගාමෙ උස්සහති වායමති තමෙනං උස්සහන්තං වායමන්තං පරෙ හනන්ති පරියාපාදෙන්ති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පරජිතානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’ති, සාස්ස හොති මිච්ඡාදිට්ඨි. මිච්ඡාදිට්ඨිකස්ස ඛො පනාහං, ගාමණි, පුරිසපුග්ගලස්ස ද්වින්නං ගතීනං අඤ්ඤතරං ගතිං වදාමි – නිරයං වා තිරච්ඡානයොනිං වා’’ති. "नक्कीच, ग्रामणी, मी तुला 'पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हे विचारू नकोस' असे म्हणून थांबवू शकलो नाही. तरीही मी तुला याचे उत्तर देईन. ग्रामणी, जो योद्धा युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, त्याचे चित्त आधीच दूषित, चुकीच्या मार्गाने प्रवृत्त आणि अयोग्य रीतीने स्थापित झालेले असते की – 'हे प्राणी मारले जावोत, बांधले जावोत, नष्ट होवोत, विनाश पावोत किंवा त्यांचे अस्तित्वच संपून जावो.' अशा प्रकारे प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू त्याला मारतात, ठार करतात; तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या नरकात उत्पन्न होतो. परंतु, जर त्याची अशी दृष्टी (समजूत) असेल की – 'जो योद्धा युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो', तर ही त्याची मिथ्यादृष्टी (चुकीची समजूत) आहे. ग्रामणी, मिथ्यादृष्टी असलेल्या व्यक्तीसाठी मी दोन गतींपैकी एक गती सांगतो – एक तर नरक किंवा तिर्यक योनी (पशू योनी)." එවං වුත්තෙ, යොධාජීවො ගාමණි පරොදි, අස්සූනි පවත්තෙසි. ‘‘එතං ඛො ත්යාහං, ගාමණි, නාලත්ථං – ‘අලං, ගාමණි, තිට්ඨතෙතං; මා මං එතං පුච්ඡී’’’ති. ‘‘නාහං, භන්තෙ, එතං රොදාමි යං මං භගවා එවමාහ; අපිචාහං, භන්තෙ, පුබ්බකෙහි ආචරියපාචරියෙහි යොධාජීවෙහි දීඝරත්තං නිකතො වඤ්චිතො පලුද්ධො – ‘යො සො යොධාජීවො සඞ්ගාමෙ උස්සහති වායමති, තමෙනං උස්සහන්තං වායමන්තං පරෙ හනන්ති පරියාපාදෙන්ති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පරජිතානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’’’ති. ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ…පෙ… අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. තතියං. असे म्हटले असता, योध्दाजीवक ग्रामणी रडू लागला, त्याच्या डोळ्यांतून अश्रू वाहू लागले. (भगवान म्हणाले –) "ग्रामणी, म्हणूनच मी तुला आधीच थांबवत होतो की – 'पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हे विचारू नकोस.'" "भन्ते, भगवान मला असे म्हणाले म्हणून मी रडत नाही; तर भन्ते, मला पूर्वीच्या आचार्यांनी आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील योद्ध्यांनी दीर्घकाळापासून फसवले आहे, ठकवले आहे आणि प्रलोभित केले आहे की – 'जो योद्धा युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो.' अतिशय सुंदर, भन्ते! ... आजपासून मला प्राणांतिक शरण गेलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे." तिसरे (सूत्र समाप्त). 4. හත්ථාරොහසුත්තං ४. हत्थारोह सुत्त (हत्तीस्वार सुत्त) 356. අථ [Pg.497] ඛො හත්ථාරොහො ගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා…පෙ… අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගතන්ති. චතුත්ථං. ३५६. तेव्हा हत्थारोह (हत्तीस्वार) ग्रामणी जेथे भगवान होते तेथे गेला; गेल्यावर... आजपासून मला प्राणांतिक शरण गेलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे. चौथे (सूत्र समाप्त). 5. අස්සාරොහසුත්තං ५. अस्सारोह सुत्त (घोडस्वार सुत्त) 357. අථ ඛො අස්සාරොහො ගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො අස්සාරොහො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සුතං මෙතං, භන්තෙ, පුබ්බකානං ආචරියපාචරියානං අස්සාරොහානං භාසමානානං – ‘යො සො අස්සාරොහො සඞ්ගාමෙ උස්සහති වායමති, තමෙනං උස්සහන්තං වායමන්තං පරෙ හනන්ති පරියාපාදෙන්ති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පරජිතානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’ති. ඉධ භගවා කිමාහා’’ති? ‘‘අලං, ගාමණි, තිට්ඨතෙතං; මා මං එතං පුච්ඡී’’ති. දුතියම්පි ඛො…පෙ… තතියම්පි ඛො අස්සාරොහො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සුතං මෙතං, භන්තෙ, පුබ්බකානං ආචරියපාචරියානං අස්සාරොහානං භාසමානානං – ‘යො සො අස්සාරොහො සඞ්ගාමෙ උස්සහති වායමති, තමෙනං උස්සහන්තං වායමන්තං පරෙ හනන්ති පරියාපාදෙන්ති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පරජිතානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’ති. ඉධ භගවා කිමාහා’’ති? ३५७. तेव्हा अस्सारोह (घोडस्वार) ग्रामणी जेथे भगवान होते तेथे गेला; गेल्यावर एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या अस्सारोह ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले – "भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील घोडस्वारांकडून असे ऐकले आहे की – 'जो घोडस्वार युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो.' यावर भगवान काय म्हणतात?" "पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हे विचारू नकोस." दुसऱ्यांदाही... तिसऱ्यांदाही अस्सारोह ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले – "भन्ते, मी पूर्वीच्या आचार्यांच्या आणि त्यांच्याही आचार्यांच्या परंपरेतील घोडस्वारांकडून असे ऐकले आहे की – 'जो घोडस्वार युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो.' यावर भगवान काय म्हणतात?" ‘‘අද්ධා ඛො ත්යාහං, ගාමණි, න ලභාමි – ‘අලං, ගාමණි, තිට්ඨතෙතං; මා මං එතං පුච්ඡී’ති. අපි ච ඛො ත්යාහං බ්යාකරිස්සාමි. යො සො, ගාමණි, අස්සාරොහො සඞ්ගාමෙ උස්සහති වායමති තස්ස තං චිත්තං පුබ්බෙ ගහිතං දුක්කටං දුප්පණිහිතං – ‘ඉමෙ සත්තා හඤ්ඤන්තු වා බජ්ඣන්තු වා උච්ඡිජ්ජන්තු වා විනස්සන්තු වා මා අහෙසුං ඉති වා’ති. තමෙනං උස්සහන්තං වායමන්තං පරෙ හනන්ති පරියාපාදෙන්ති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පරජිතො නාම නිරයො තත්ථ උපපජ්ජති. සචෙ ඛො පනස්ස එවං දිට්ඨි හොති – ‘යො සො අස්සාරොහො සඞ්ගාමෙ උස්සහති වායමති, තමෙනං උස්සහන්තං වායමන්තං පරෙ හනන්ති පරියාපාදෙන්ති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පරජිතානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’ති, සාස්ස හොති මිච්ඡාදිට්ඨි. මිච්ඡාදිට්ඨිකස්ස ඛො පනාහං ගාමණි, පුරිසපුග්ගලස්ස ද්වින්නං ගතීනං අඤ්ඤතරං ගතිං වදාමි – නිරයං වා තිරච්ඡානයොනිං වා’’ති. "नक्कीच, ग्रामणी, मी तुला 'पुरे, ग्रामणी! हे राहू दे. मला हे विचारू नकोस' असे म्हणून थांबवू शकलो नाही. तरीही मी तुला याचे उत्तर देईन. ग्रामणी, जो घोडस्वार युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, त्याचे चित्त आधीच दूषित, चुकीच्या मार्गाने प्रवृत्त आणि अयोग्य रीतीने स्थापित झालेले असते की – 'हे प्राणी मारले जावोत, बांधले जावोत, नष्ट होवोत, विनाश पावोत किंवा त्यांचे अस्तित्वच संपून जावो.' अशा प्रकारे प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू त्याला मारतात, ठार करतात; तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या नरकात उत्पन्न होतो. परंतु, जर त्याची अशी दृष्टी (समजूत) असेल की – 'जो घोडस्वार युद्धात प्रयत्न करतो, परिश्रम करतो, आणि त्याला तसा प्रयत्न व परिश्रम करत असताना शत्रू मारतात, ठार करतात, तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो', तर ही त्याची मिथ्यादृष्टी (चुकीची समजूत) आहे. ग्रामणी, मिथ्यादृष्टी असलेल्या व्यक्तीसाठी मी दोन गतींपैकी एक गती सांगतो – एक तर नरक किंवा तिर्यक योनी (पशू योनी)." එවං [Pg.498] වුත්තෙ, අස්සාරොහො ගාමණි පරොදි, අස්සූනි පවත්තෙසි. ‘‘එතං ඛො ත්යාහං, ගාමණි, නාලත්ථං – ‘අලං, ගාමණි, තිට්ඨතෙතං; මා මං එතං පුච්ඡී’’’ති. ‘‘නාහං, භන්තෙ, එතං රොදාමි යං මං භගවා එවමාහ. අපිචාහං, භන්තෙ, පුබ්බකෙහි ආචරියපාචරියෙහි අස්සාරොහෙහි දීඝරත්තං නිකතො වඤ්චිතො පලුද්ධො – ‘යො සො අස්සාරොහො සඞ්ගාමෙ උස්සහති වායමති, තමෙනං උස්සහන්තං වායමන්තං පරෙ හනන්ති පරියාපාදෙන්ති, සො කායස්ස භෙදා පරං මරණා පරජිතානං දෙවානං සහබ්යතං උපපජ්ජතී’’’ති. ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ…පෙ… අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. පඤ්චමං. असे म्हटले असता, अश्वारोही गामणि रडू लागला आणि त्याने अश्रू ढाळले. 'गामणी, म्हणूनच मी तुला आधीच म्हणालो होतो— "असो गामणी, हे राहू दे; मला हा प्रश्न विचारू नकोस."' 'भंते, भगवान मला जे म्हणाले, त्याबद्दल मी रडत नाही. तर भंते, पूर्वीच्या आचार्यांनी आणि पूर्वाचार्यांनी, अश्वारोही शिक्षकांनी मला दीर्घकाळ फसवले, ठकवले आणि प्रलोभन दिले की— "जो अश्वारोही युद्धात पराक्रम करतो, प्रयत्न करतो, आणि त्या पराक्रम व प्रयत्न करणाऱ्याला शत्रू मारतात, ठार करतात; तो शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर 'परजित' नावाच्या देवांच्या सहवासात उत्पन्न होतो."' 'अतिशय सुंदर, भंते! ... आजपासून मला जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.' पाचवे. 6. අසිබන්ධකපුත්තසුත්තං ६. असिबंधकपुत्त सुत्त 358. එකං සමයං භගවා නාළන්දායං විහරති පාවාරිකම්බවනෙ. අථ ඛො අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘බ්රාහ්මණා, භන්තෙ, පච්ඡා භූමකා කාමණ්ඩලුකා සෙවාලමාලිකා උදකොරොහකා අග්ගිපරිචාරකා. තෙ මතං කාලඞ්කතං උය්යාපෙන්ති නාම සඤ්ඤාපෙන්ති නාම සග්ගං නාම ඔක්කාමෙන්ති. භගවා පන, භන්තෙ, අරහං සම්මාසම්බුද්ධො පහොති තථා කාතුං යථා සබ්බො ලොකො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජෙය්යා’’ති? ‘‘තෙන හි, ගාමණි, තඤ්ඤෙවෙත්ථ පටිපුච්ඡිස්සාමි. යථා තෙ ඛමෙය්ය තථා නං බ්යාකරෙය්යාසී’’ති. ३५८. एकदा भगवान नालंदामध्ये पावारिकाच्या आम्रवनात विहार करत होते. तेव्हा असिबंधकाचा पुत्र गामणि जेथे भगवान होते तेथे आला; आल्यानंतर भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला असिबंधकाचा पुत्र गामणि भगवंतांना म्हणाला— 'भंते, पश्चिमेकडील प्रदेशातील ब्राह्मण—जे कमंडलू धारण करतात, शेवाळाच्या माळा घालतात, पाण्यात उतरतात आणि अग्नीची पूजा करतात. ते मृत झालेल्या, कालवश झालेल्या व्यक्तीला वर नेतात, त्याला मार्ग दाखवतात आणि स्वर्गात प्रवेश करवून देतात. परंतु भंते, भगवान जे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध आहेत, ते असे करण्यास समर्थ आहेत का, जेणेकरून सर्व लोक शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होतील?' 'गामणी, तर मग मी तुलाच याविषयी उलट विचारतो. तुला जसे योग्य वाटेल तसे तू त्याचे उत्तर दे.' ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, ඉධස්ස පුරිසො පාණාතිපාතී අදින්නාදායී කාමෙසුමිච්ඡාචාරී මුසාවාදී පිසුණවාචො ඵරුසවාචො සම්ඵප්පලාපී අභිජ්ඣාලු බ්යාපන්නචිත්තො මිච්ඡාදිට්ඨිකො. තමෙනං මහා ජනකායො සඞ්ගම්ම සමාගම්ම ආයාචෙය්ය ථොමෙය්ය පඤ්ජලිකො අනුපරිසක්කෙය්ය – ‘අයං පුරිසො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජතූ’ති. තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අපි නු සො පුරිසො මහතො ජනකායස්ස ආයාචනහෙතු වා ථොමනහෙතු වා පඤ්ජලිකා අනුපරිසක්කනහෙතු වා කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජෙය්යා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. 'गामणी, तुला काय वाटते? समजा, एखादा माणूस प्राणातिपाती (जीवहिंसा करणारा), अदिन्नादायी (चोरी करणारा), कामेसू मिच्छाचारी (कामोपभोगात गैरवर्तन करणारा), मुसावादी (असत्य बोलणारा), पिसुणवाचो (चहाडखोर), फरुसवाचो (कठोर बोलणारा), संफप्पलापी (व्यर्थ बडबड करणारा), अभिज्झालू (लोभी), व्यापात्रचित्त (द्वेषी) आणि मिच्छादिट्ठिको (मिथ्या दृष्टी असलेला) असेल. आणि लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हा माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होवो." गामणी, तुला काय वाटते? त्या मोठ्या लोकसमुदायाच्या प्रार्थनेमुळे, स्तुतीमुळे किंवा हात जोडून प्रदक्षिणा घालण्याच्या प्रार्थनेमुळे, तो माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होईल का?' 'नाही, भंते.' ‘‘සෙය්යථාපි, ගාමණි, පුරිසො මහතිං පුථුසිලං ගම්භීරෙ උදකරහදෙ පක්ඛිපෙය්ය. තමෙනං මහා ජනකායො සඞ්ගම්ම සමාගම්ම ආයාචෙය්ය ථොමෙය්ය [Pg.499] පඤ්ජලිකො අනුපරිසක්කෙය්ය – ‘උම්මුජ්ජ, භො පුථුසිලෙ, උප්ලව, භො පුථුසිලෙ, ථලමුප්ලව, භො පුථුසිලෙ’ති. තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අපි නු සා පුථුසිලා මහතො ජනකායස්ස ආයාචනහෙතු වා ථොමනහෙතු වා පඤ්ජලිකා අනුපරිසක්කනහෙතු වා උම්මුජ්ජෙය්ය වා උප්ලවෙය්ය වා ථලං වා උප්ලවෙය්යා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘එවමෙව ඛො, ගාමණි, යො සො පුරිසො පාණාතිපාතී අදින්නාදායී කාමෙසුමිච්ඡාචාරී මුසාවාදී පිසුණවාචො ඵරුසවාචො සම්ඵප්පලාපී අභිජ්ඣාලු බ්යාපන්නචිත්තො මිච්ඡාදිට්ඨිකො. කිඤ්චාපි තං මහා ජනකායො සඞ්ගම්ම සමාගම්ම ආයාචෙය්ය ථොමෙය්ය පඤ්ජලිකො අනුපරිසක්කෙය්ය – ‘අයං පුරිසො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජතූ’’’ති, අථ ඛො සො පුරිසො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජෙය්ය. 'गामणी, जसे की एखाद्या माणसाने एका खोल पाण्याच्या तळ्यात मोठी शिळा फेकली. आणि लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हे शिळे, वर ये! हे शिळे, तरंग! हे शिळे, कोरड्या जमिनीवर ये!" गामणी, तुला काय वाटते? त्या मोठ्या लोकसमुदायाच्या प्रार्थनेमुळे, स्तुतीमुळे किंवा हात जोडून प्रदक्षिणा घालण्याच्या प्रार्थनेमुळे, ती शिळा वर येईल का, तरंगेल का किंवा कोरड्या जमिनीवर येईल का?' 'नाही, भंते.' 'तसेच, गामणी, जो माणूस प्राणातिपाती, अदिन्नादायी, कामेसू मिच्छाचारी, मुसावादी, पिसुणवाचो, फरुसवाचो, संफप्पलापी, अभिज्झालू, व्यापात्रचित्त आणि मिच्छादिट्ठिको आहे; जरी लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हा माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होवो," तरीही तो माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकातच उत्पन्न होईल.' ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, ඉධස්ස පුරිසො පාණාතිපාතා පටිවිරතො අදින්නාදානා පටිවිරතො කාමෙසුමිච්ඡාචාරා පටිවිරතො මුසාවාදා පටිවිරතො පිසුණාය වාචාය පටිවිරතො ඵරුසාය වාචාය පටිවිරතො සම්ඵප්පලාපා පටිවිරතො අනභිජ්ඣාලු අබ්යාපන්නචිත්තො සම්මාදිට්ඨිකො. තමෙනං මහා ජනකායො සඞ්ගම්ම සමාගම්ම ආයාචෙය්ය ථොමෙය්ය පඤ්ජලිකො අනුපරිසක්කෙය්ය – ‘අයං පුරිසො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතූ’ති. තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අපි නු සො පුරිසො මහතො ජනකායස්ස ආයාචනහෙතු වා ථොමනහෙතු වා පඤ්ජලිකා අනුපරිසක්කනහෙතු වා කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජෙය්යා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. 'गामणी, तुला काय वाटते? समजा, एखादा माणूस प्राणातिपातापासून (जीवहिंसेपासून) विरत असेल, अदिन्नादानापासून (चोरीपासून) विरत असेल, कामेसू मिच्छाचारापासून (कामोपभोगातील गैरवर्तनापासून) विरत असेल, मुसावादापासून (असत्य बोलण्यापासून) विरत असेल, पिसुणा वाचापासून (चहाडी करण्यापासून) विरत असेल, फरुसा वाचापासून (कठोर बोलण्यापासून) विरत असेल, संफप्पलापापासून (व्यर्थ बडबड करण्यापासून) विरत असेल, अनभिज्झालू (लोभ नसलेला), अव्यापात्रचित्त (द्वेष नसलेला) आणि सम्मादिट्ठिको (सम्यक दृष्टी असलेला) असेल. आणि लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हा माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होवो." गामणी, तुला काय वाटते? त्या मोठ्या लोकसमुदायाच्या प्रार्थनेमुळे, स्तुतीमुळे किंवा हात जोडून प्रदक्षिणा घालण्याच्या प्रार्थनेमुळे, तो माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होईल का?' 'नाही, भंते.' ‘‘සෙය්යථාපි, ගාමණි, පුරිසො සප්පිකුම්භං වා තෙලකුම්භං වා ගම්භීරෙ උදකරහදෙ ඔගාහෙත්වා භින්දෙය්ය. තත්ර යාස්ස සක්ඛරා වා කඨලා වා සා අධොගාමී අස්ස; යඤ්ච ඛ්වස්ස තත්ර සප්පි වා තෙලං වා තං උද්ධං ගාමි අස්ස. තමෙනං මහා ජනකායො සඞ්ගම්ම සමාගම්ම ආයාචෙය්ය ථොමෙය්ය පඤ්ජලිකො අනුපරිසක්කෙය්ය – ‘ඔසීද, භො සප්පිතෙල, සංසීද, භො සප්පිතෙල, අධො ගච්ඡ, භො සප්පිතෙලා’ති. තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අපි [Pg.500] නු තං සප්පිතෙලං මහතො ජනකායස්ස ආයාචනහෙතු වා ථොමනහෙතු වා පඤ්ජලිකා අනුපරිසක්කනහෙතු වා ඔසීදෙය්ය වා සංසීදෙය්ය වා අධො වා ගච්ඡෙය්යා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘එවමෙව ඛො, ගාමණි, යො සො පුරිසො පාණාතිපාතා පටිවිරතො, අදින්නාදානා පටිවිරතො, කාමෙසුමිච්ඡාචාරා පටිවිරතො, මුසාවාදා පටිවිරතො, පිසුණාය වාචාය පටිවිරතො, ඵරුසාය වාචාය පටිවිරතො, සම්ඵප්පලාපා පටිවිරතො, අනභිජ්ඣාලු, අබ්යාපන්නචිත්තො, සම්මාදිට්ඨිකො, කිඤ්චාපි තං මහා ජනකායො සඞ්ගම්ම සමාගම්ම ආයාචෙය්ය ථොමෙය්ය පඤ්ජලිකො අනුපරිසක්කෙය්ය – ‘අයං පුරිසො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජතූ’ති, අථ ඛො සො පුරිසො කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජෙය්යා’’ති. එවං වුත්තෙ, අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ…පෙ… අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. ඡට්ඨං. 'गामणी, जसे की एखाद्या माणसाने तुपाचा किंवा तेलाचा घडा खोल पाण्याच्या तळ्यात बुडवून फोडला. तेथे जे काही खडे किंवा खापर असतील ते खाली जातील; आणि जे काही तूप किंवा तेल असेल ते वर येईल. आणि लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हे तूप-तेला, खाली बुड! हे तूप-तेला, खाली जा! हे तूप-तेला, खाली बस!" गामणी, तुला काय वाटते? त्या मोठ्या लोकसमुदायाच्या प्रार्थनेमुळे, स्तुतीमुळे किंवा हात जोडून प्रदक्षिणा घालण्याच्या प्रार्थनेमुळे, ते तूप-तेल खाली बुडेल का, खाली जाईल का किंवा खाली बसेल का?' 'नाही, भंते.' 'तसेच, गामणी, जो माणूस प्राणातिपातापासून विरत आहे, अदिन्नादानापासून विरत आहे, कामेसू मिच्छाचारापासून विरत आहे, मुसावादापासून विरत आहे, पिसुणा वाचापासून विरत आहे, फरुसा वाचापासून विरत आहे, संफप्पलापापासून विरत आहे, अनभिज्झालू, अव्यापात्रचित्त आणि सम्मादिट्ठिको आहे; जरी लोकांचा मोठा समुदाय एकत्र येऊन, त्याच्याभोवती जमून, हात जोडून प्रार्थना करेल, त्याची स्तुती करेल आणि प्रदक्षिणा घालत म्हणेल— "हा माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि नरकात उत्पन्न होवो," तरीही तो माणूस शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर सुगतीला, स्वर्गलोकातच उत्पन्न होईल.' असे म्हटले असता, असिबंधकाचा पुत्र गामणि भगवंतांना म्हणाला— 'अतिशय सुंदर, भंते! ... आजपासून मला जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.' सहावे. 7. ඛෙත්තූපමසුත්තං ७. खेत्तूपम सुत्त (शेताच्या उपमेचे सुत्त) 359. එකං සමයං භගවා නාළන්දායං විහරති පාවාරිකම්බවනෙ. අථ ඛො අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘නනු, භන්තෙ, භගවා සබ්බපාණභූතහිතානුකම්පී විහරතී’’ති? ‘‘එවං, ගාමණි, තථාගතො සබ්බපාණභූතහිතානුකම්පී විහරතී’’ති. ‘‘අථ කිඤ්චරහි, භන්තෙ, භගවා එකච්චානං සක්කච්චං ධම්මං දෙසෙති, එකච්චානං නො තථා සක්කච්චං ධම්මං දෙසෙතී’’ති? ‘‘තෙන හි, ගාමණි, තඤ්ඤෙවෙත්ථ පටිපුච්ඡිස්සාමි. යථා තෙ ඛමෙය්ය තථා නං බ්යාකරෙය්යාසි. තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, ඉධස්සු කස්සකස්ස ගහපතිනො තීණි ඛෙත්තානි – එකං ඛෙත්තං අග්ගං, එකං ඛෙත්තං මජ්ඣිමං, එකං ඛෙත්තං හීනං ජඞ්ගලං ඌසරං පාපභූමි. තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අසු කස්සකො ගහපති බීජානි පතිට්ඨාපෙතුකාමො කත්ථ පඨමං පතිට්ඨාපෙය්ය, යං වා අදුං ඛෙත්තං අග්ගං, යං වා අදුං ඛෙත්තං මජ්ඣිමං, යං වා අදුං ඛෙත්තං හීනං ජඞ්ගලං ඌසරං පාපභූමී’’ති? ‘‘අසු, භන්තෙ, කස්සකො ගහපති බීජානි පතිට්ඨාපෙතුකාමො යං අදුං ඛෙත්තං අග්ගං තත්ථ පතිට්ඨාපෙය්ය[Pg.501]. තත්ථ පතිට්ඨාපෙත්වා යං අදුං ඛෙත්තං මජ්ඣිමං තත්ථ පතිට්ඨාපෙය්ය. තත්ථ පතිට්ඨාපෙත්වා යං අදුං ඛෙත්තං හීනං ජඞ්ගලං ඌසරං පාපභූමි තත්ථ පතිට්ඨාපෙය්යපි, නොපි පතිට්ඨාපෙය්ය. තං කිස්ස හෙතු? අන්තමසො ගොභත්තම්පි භවිස්සතී’’ති. ३५९. एकदा भगवान नालंदा येथे पावारिकाच्या आंबवनात विहार करत होते. तेव्हा असिबंधकपुत्र गामणी भगवंतांकडे आला; जवळ येऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला असिबंधकपुत्र गामणी भगवंतांना म्हणाला – "भंते, भगवान सर्व प्राणिमात्रांवर अनुकंपा करणारे आणि त्यांचे हित करणारे आहेत ना?" "होय गामणी, तथागत सर्व प्राणिमात्रांवर अनुकंपा करणारे आणि त्यांचे हित करणारे आहेत." "तर मग भंते, भगवान काही लोकांना आदरपूर्वक धम्म शिकवतात, तर काहींना तशा प्रकारे आदरपूर्वक धम्म का शिकवत नाहीत?" "तर मग गामणी, मी तुलाच याविषयी उलट प्रश्न विचारतो. तुला जसे योग्य वाटेल तसे तू उत्तर दे. गामणी, तुला काय वाटते? समजा, एखाद्या शेतकरी गृहपतीकडे तीन शेते आहेत – एक सर्वोत्तम शेत, एक मध्यम शेत आणि एक निकृष्ट, खडकाळ, खारट व वाईट जमीन असलेले शेत. गामणी, तुला काय वाटते? तो शेतकरी गृहपती जेव्हा बियाणे पेरू इच्छितो, तेव्हा तो सर्वात आधी कुठे पेरेल? सर्वोत्तम शेतात, मध्यम शेतात, की निकृष्ट, खडकाळ, खारट व वाईट जमीन असलेल्या शेतात?" "भंते, तो शेतकरी गृहपती बियाणे पेरू इच्छित असताना, सर्वात आधी जे सर्वोत्तम शेत आहे तिथे पेरेल. तिथे पेरणी केल्यानंतर, जे मध्यम शेत आहे तिथे पेरेल. तिथे पेरणी केल्यानंतर, जे निकृष्ट, खडकाळ, खारट व वाईट जमीन असलेले शेत आहे, तिथे तो पेरेलही किंवा कदाचित पेरणारही नाही. त्याचे कारण काय? कारण कमीत कमी गुरांसाठी चारा तरी होईल." ‘‘සෙය්යථාපි, ගාමණි, යං අදුං ඛෙත්තං අග්ගං; එවමෙව මය්හං භික්ඛුභික්ඛුනියො. තෙසාහං ධම්මං දෙසෙමි – ආදිකල්යාණං මජ්ඣෙකල්යාණං පරියොසානකල්යාණං, සාත්ථං සබ්යඤ්ජනං කෙවලපරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං පකාසෙමි. තං කිස්ස හෙතු? එතෙ හි, ගාමණි, මංදීපා මංලෙණා මංතාණා මංසරණා විහරන්ති. සෙය්යථාපි, ගාමණි, යං අදුං ඛෙත්තං මජ්ඣිමං; එවමෙව මය්හං උපාසකඋපාසිකායො. තෙසං පාහං ධම්මං දෙසෙමි – ආදිකල්යාණං මජ්ඣෙකල්යාණං පරියොසානකල්යාණං, සාත්ථං සබ්යඤ්ජනං කෙවලපරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං පකාසෙමි. තං කිස්ස හෙතු? එතෙ හි, ගාමණි, මංදීපා මංලෙණා මංතාණා මංසරණා විහරන්ති. සෙය්යථාපි, ගාමණි, යං අදුං ඛෙත්තං හීනං ජඞ්ගලං ඌසරං පාපභූමි; එවමෙව මය්හං අඤ්ඤතිත්ථියා සමණබ්රාහ්මණපරිබ්බාජකා. තෙසං පාහං ධම්මං දෙසෙමි – ආදිකල්යාණං මජ්ඣෙකල්යාණං පරියොසානකල්යාණං සාත්ථං සබ්යඤ්ජනං, කෙවලපරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං පකාසෙමි. තං කිස්ස හෙතු? අප්පෙව නාම එකං පදම්පි ආජානෙය්යුං තං නෙසං අස්ස දීඝරත්තං හිතාය සුඛායා’’ති. "गामणी, ज्याप्रमाणे ते सर्वोत्तम शेत आहे, त्याचप्रमाणे माझे भिक्खू आणि भिक्खुनी आहेत. मी त्यांना धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण (सुरुवातीला कल्याणकारी), मध्य-कल्याण (मध्ये कल्याणकारी) आणि परियोसान-कल्याण (शेवटी कल्याणकारी) आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण गामणी, हे भिक्खू आणि भिक्खुनी मलाच आपला द्वीप (आश्रय), मलाच आपले लेण (आडोसा), मलाच आपले त्राण (रक्षक) आणि मलाच आपले शरण मानून राहतात. गामणी, ज्याप्रमाणे ते मध्यम शेत आहे, त्याचप्रमाणे माझे उपासक आणि उपासिका आहेत. मी त्यांनाही धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण, मध्य-कल्याण आणि परियोसान-कल्याण आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण गामणी, हे उपासक आणि उपासिका मलाच आपला द्वीप, मलाच आपले लेण, मलाच आपले त्राण आणि मलाच आपले शरण मानून राहतात. गामणी, ज्याप्रमाणे ते निकृष्ट, खडकाळ, खारट व वाईट जमीन असलेले शेत आहे, त्याचप्रमाणे माझे अन्य पंथांचे श्रमण, ब्राह्मण आणि परिव्राजक आहेत. मी त्यांनाही धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण, मध्य-कल्याण आणि परियोसान-कल्याण आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण जर त्यांनी एक जरी पद (वाक्य) जाणले, तरी ते त्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." ‘‘සෙය්යථාපි, ගාමණි, පුරිසස්ස තයො උදකමණිකා – එකො උදකමණිකො අච්ඡිද්දො අහාරී අපරිහාරී, එකො උදකමණිකො අච්ඡිද්දො හාරී පරිහාරී, එකො උදකමණිකො ඡිද්දො හාරී පරිහාරී. තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අසු පුරිසො උදකං නික්ඛිපිතුකාමො කත්ථ පඨමං නික්ඛිපෙය්ය, යො වා සො උදකමණිකො අච්ඡිද්දො අහාරී අපරිහාරී, යො වා සො උදකමණිකො අච්ඡිද්දො හාරී පරිහාරී, යො වා සො උදකමණිකො ඡිද්දො හාරී පරිහාරී’’ති? ‘‘අසු, භන්තෙ, පුරිසො උදකං නික්ඛිපිතුකාමො, යො සො උදකමණිකො අච්ඡිද්දො අහාරී අපරිහාරී තත්ථ නික්ඛිපෙය්ය, තත්ථ නික්ඛිපිත්වා, යො සො උදකමණිකො අච්ඡිද්දො හාරී පරිහාරී තත්ථ නික්ඛිපෙය්ය, තත්ථ නික්ඛිපිත්වා, යො සො උදකමණිකො ඡිද්දො හාරී පරිහාරී තත්ථ නික්ඛිපෙය්යපි, නොපි නික්ඛිපෙය්ය. තං කිස්ස හෙතු? අන්තමසො භණ්ඩධොවනම්පි භවිස්සතී’’ති. "गामणी, ज्याप्रमाणे एखाद्या माणसाकडे पाण्याचे तीन रांजण असावेत – एक रांजण छिद्र नसलेला, पाणी न गळणारा आणि न पाझरणारा; एक रांजण छिद्र नसलेला पण पाणी गळणारा आणि पाझरणारा; आणि एक रांजण छिद्र असलेला, पाणी गळणारा आणि पाझरणारा. गामणी, तुला काय वाटते? तो माणूस जेव्हा पाणी साठवू इच्छितो, तेव्हा तो सर्वात आधी कोणत्या रांजणात पाणी साठवेल? जो छिद्र नसलेला, पाणी न गळणारा आणि न पाझरणारा आहे त्यात; की जो छिद्र नसलेला पण पाणी गळणारा आणि पाझरणारा आहे त्यात; की जो छिद्र असलेला, पाणी गळणारा आणि पाझरणारा आहे त्यात?" "भंते, तो माणूस पाणी साठवू इच्छित असताना, सर्वात आधी जो छिद्र नसलेला, पाणी न गळणारा आणि न पाझरणारा रांजण आहे त्यात पाणी साठवेल. त्यात साठवल्यानंतर, जो छिद्र नसलेला पण पाणी गळणारा आणि पाझरणारा रांजण आहे त्यात साठवेल. त्यात साठवल्यानंतर, जो छिद्र असलेला, पाणी गळणारा आणि पाझरणारा रांजण आहे, त्यात तो पाणी साठवेलही किंवा कदाचित साठवणारही नाही. त्याचे कारण काय? कारण कमीत कमी भांडी किंवा कपडे धुण्यासाठी तरी ते पाणी उपयोगी पडेल." ‘‘සෙය්යථාපි, ගාමණි, යො සො උදකමණිකො අච්ඡිද්දො අහාරී අපරිහාරී; එවමෙව මය්හං භික්ඛුභික්ඛුනියො. තෙසාහං ධම්මං දෙසෙමි – ආදිකල්යාණං මජ්ඣෙකල්යාණං පරියොසානකල්යාණං [Pg.502] සාත්ථං සබ්යඤ්ජනං, කෙවලපරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං පකාසෙමි. තං කිස්ස හෙතු? එතෙ හි, ගාමණි, මංදීපා මංලෙණා මංතාණා මංසරණා විහරන්ති. සෙය්යථාපි, ගාමණි, යො සො උදකමණිකො අච්ඡිද්දො හාරී පරිහාරී; එවමෙව මය්හං උපාසකඋපාසිකායො. තෙසාහං ධම්මං දෙසෙමි – ආදිකල්යාණං මජ්ඣෙකල්යාණං පරියොසානකල්යාණං සාත්ථං සබ්යඤ්ජනං, කෙවලපරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං පකාසෙමි. තං කිස්ස හෙතු? එතෙ හි, ගාමණි, මංදීපා මංලෙණා මංතාණා මංසරණා විහරන්ති. සෙය්යථාපි, ගාමණි, යො සො උදකමණිකො ඡිද්දො හාරී පරිහාරී; එවමෙව මය්හං අඤ්ඤතිත්ථියා සමණබ්රාහ්මණපරිබ්බාජකා. තෙසාහං ධම්මං දෙසෙමි – ආදිකල්යාණං මජ්ඣෙකල්යාණං පරියොසානකල්යාණං සාත්ථං සබ්යඤ්ජනං කෙවලපරිපුණ්ණං පරිසුද්ධං බ්රහ්මචරියං පකාසෙමි. තං කිස්ස හෙතු? අප්පෙව නාම එකං පදම්පි ආජානෙය්යුං, තං නෙසං අස්ස දීඝරත්තං හිතාය සුඛායා’’ති. එවං වුත්තෙ, අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ…පෙ… අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. සත්තමං. "गामणी, ज्याप्रमाणे तो छिद्र नसलेला, पाणी न गळणारा आणि न पाझरणारा रांजण आहे, त्याचप्रमाणे माझे भिक्खू आणि भिक्खुनी आहेत. मी त्यांना धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण, मध्य-कल्याण आणि परियोसान-कल्याण आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण गामणी, हे भिक्खू आणि भिक्खुनी मलाच आपला द्वीप, मलाच आपले लेण, मलाच आपले त्राण आणि मलाच आपले शरण मानून राहतात. गामणी, ज्याप्रमाणे तो छिद्र नसलेला पण पाणी गळणारा आणि पाझरणारा रांजण आहे, त्याचप्रमाणे माझे उपासक आणि उपासिका आहेत. मी त्यांना धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण, मध्य-कल्याण आणि परियोसान-कल्याण आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण गामणी, हे उपासक आणि उपासिका मलाच आपला द्वीप, मलाच आपले लेण, मलाच आपले त्राण आणि मलाच आपले शरण मानून राहतात. गामणी, ज्याप्रमाणे तो छिद्र असलेला, पाणी गळणारा आणि पाझरणारा रांजण आहे, त्याचप्रमाणे माझे अन्य पंथांचे श्रमण, ब्राह्मण आणि परिव्राजक आहेत. मी त्यांना धम्म उपदेश करतो – जो आदी-कल्याण, मध्य-कल्याण आणि परियोसान-कल्याण आहे; अर्थासहित आणि व्यंजनासहित परिपूर्ण व अत्यंत शुद्ध अशा ब्रह्मचर्याचे मी प्रकाशन करतो. त्याचे कारण काय? कारण जर त्यांनी एक जरी पद (वाक्य) जाणले, तरी ते त्यांच्या दीर्घकालीन हितासाठी आणि सुखासाठी होईल." असे म्हटले असता, असिबंधकपुत्र गामणी भगवंतांना म्हणाला – "अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! ... आजपासून मला भगवंतांनी जोपर्यंत जिवंत आहे तोपर्यंत शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे." सातवे सुत्त समाप्त. 8. සඞ්ඛධමසුත්තං ८. संखधम सुत्त (शंख वाजवणाऱ्याचे सुत्त) 360. එකං සමයං භගවා නාළන්දායං විහරති පාවාරිකම්බවනෙ. අථ ඛො අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි නිගණ්ඨසාවකො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො අසිබන්ධකපුත්තං ගාමණිං භගවා එතදවොච – ‘‘කථං නු ඛො, ගාමණි, නිගණ්ඨො නාටපුත්තො සාවකානං ධම්මං දෙසෙතී’’ති? ‘‘එවං ඛො, භන්තෙ, නිගණ්ඨො නාටපුත්තො සාවකානං ධම්මං දෙසෙති – ‘යො කොචි පාණං අතිපාතෙති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකො, යො කොචි අදින්නං ආදියති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකො, යො කොචි කාමෙසු මිච්ඡා චරති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකො, යො කොචි මුසා භණති සබ්බො, සො ආපායිකො නෙරයිකො. යංබහුලං යංබහුලං විහරති, තෙන තෙන නීයතී’ති. එවං ඛො, භන්තෙ, නිගණ්ඨො නාටපුත්තො සාවකානං ධම්මං දෙසෙතී’’ති. ‘‘‘යංබහුලං යංබහුලඤ්ච, ගාමණි, විහරති, තෙන තෙන නීයති’, එවං සන්තෙ න කොචි ආපායිකො නෙරයිකො භවිස්සති, යථා නිගණ්ඨස්ස නාටපුත්තස්ස වචනං’’. ३६०. एकदा भगवान नाळंदा येथे पावारिकच्या आम्रवनात विहार करत होते. तेव्हा निगंठ श्रावक असलेला असिबंधकपुत्र गामणी जेथे भगवान होते तेथे आला; आणि जवळ येऊन एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या असिबंधकपुत्र गामणीला भगवान म्हणाले – “गामणी, निगंठ नाटपुत्त आपल्या श्रावकांना कशा प्रकारे धम्माचा उपदेश करतात?” “भंते, निगंठ नाटपुत्त आपल्या श्रावकांना असा धम्माचा उपदेश करतात – ‘जो कोणी प्राणाची हिंसा करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी न दिलेले घेतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी कामभोगांमध्ये व्यभिचार करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी असत्य बोलतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो. मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो.’ भंते, अशा प्रकारे निगंठ नाटपुत्त आपल्या श्रावकांना धम्माचा उपदेश करतात.” “गामणी, जर ‘मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो’ असे असेल, तर निगंठ नाटपुत्तांच्या वचनानुसार कोणीही अपाय किंवा नरकात जाणार नाही.” ‘‘තං [Pg.503] කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, යො සො පුරිසො පාණාතිපාතී රත්තියා වා දිවසස්ස වා සමයාසමයං උපාදාය, කතමො බහුතරො සමයො, යං වා සො පාණමතිපාතෙති, යං වා සො පාණං නාතිපාතෙතී’’ති? ‘‘යො සො, භන්තෙ, පුරිසො පාණාතිපාතී රත්තියා වා දිවසස්ස වා සමයාසමයං උපාදාය, අප්පතරො සො සමයො යං සො පාණමතිපාතෙති, අථ ඛො ස්වෙව බහුතරො සමයො යං සො පාණං නාතිපාතෙතී’’ති. ‘‘‘යංබහුලං යංබහුලඤ්ච, ගාමණි, විහරති තෙන තෙන නීයතී’ති, එවං සන්තෙ න කොචි ආපායිකො නෙරයිකො භවිස්සති, යථා නිගණ්ඨස්ස නාටපුත්තස්ස වචනං’’. “गामणी, तुला काय वाटते? जो मनुष्य प्राणाची हिंसा करणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, कोणता काळ अधिक असतो – ज्या काळात तो प्राणाची हिंसा करतो की ज्या काळात तो प्राणाची हिंसा करत नाही?” “भंते, जो मनुष्य प्राणाची हिंसा करणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, ज्या काळात तो प्राणाची हिंसा करतो तो काळ अत्यंत अल्प असतो; उलटपक्षी, ज्या काळात तो प्राणाची हिंसा करत नाही तोच काळ अधिक असतो.” “गामणी, जर ‘मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो’ असे असेल, तर निगंठ नाटपुत्तांच्या वचनानुसार कोणीही अपाय किंवा नरकात जाणार नाही.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, යො සො පුරිසො අදින්නාදායී රත්තියා වා දිවසස්ස වා සමයාසමයං උපාදාය, කතමො බහුතරො සමයො, යං වා සො අදින්නං ආදියති, යං වා සො අදින්නං නාදියතී’’ති. ‘‘යො සො, භන්තෙ, පුරිසො අදින්නාදායී රත්තියා වා දිවසස්ස වා සමයාසමයං උපාදාය අප්පතරො සො සමයො, යං සො අදින්නං ආදියති, අථ ඛො ස්වෙව බහුතරො සමයො, යං සො අදින්නං නාදියතී’’ති. ‘‘‘යංබහුලං යංබහුලඤ්ච, ගාමණි, විහරති තෙන තෙන නීයතී’ති, එවං සන්තෙ න කොචි ආපායිකො නෙරයිකො භවිස්සති, යථා නිගණ්ඨස්ස නාටපුත්තස්ස වචනං’’. “गामणी, तुला काय वाटते? जो मनुष्य न दिलेले घेणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, कोणता काळ अधिक असतो – ज्या काळात तो न दिलेले घेतो की ज्या काळात तो न दिलेले घेत नाही?” “भंते, जो मनुष्य न दिलेले घेणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, ज्या काळात तो न दिलेले घेतो तो काळ अत्यंत अल्प असतो; उलटपक्षी, ज्या काळात तो न दिलेले घेत नाही तोच काळ अधिक असतो.” “गामणी, जर ‘मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो’ असे असेल, तर निगंठ नाटपुत्तांच्या वचनानुसार कोणीही अपाय किंवा नरकात जाणार नाही.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, යො සො පුරිසො කාමෙසුමිච්ඡාචාරී රත්තියා වා දිවසස්ස වා සමයාසමයං උපාදාය, කතමො බහුතරො සමයො, යං වා සො කාමෙසු මිච්ඡා චරති, යං වා සො කාමෙසු මිච්ඡා න චරතී’’ති? ‘‘යො සො, භන්තෙ, පුරිසො කාමෙසුමිච්ඡාචාරී රත්තියා වා දිවසස්ස වා සමයාසමයං උපාදාය, අප්පතරො සො සමයො යං සො කාමෙසු මිච්ඡා චරති, අථ ඛො ස්වෙව බහුතරො සමයො, යං සො කාමෙසු මිච්ඡා න චරතී’’ති. ‘‘‘යංබහුලං යංබහුලඤ්ච, ගාමණි, විහරති තෙන තෙන නීයතී’ති, එවං සන්තෙ න කොචි ආපායිකො නෙරයිකො භවිස්සති, යථා නිගණ්ඨස්ස නාටපුත්තස්ස වචනං’’. “गामणी, तुला काय वाटते? जो मनुष्य कामभोगांमध्ये व्यभिचार करणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, कोणता काळ अधिक असतो – ज्या काळात तो कामभोगांमध्ये व्यभिचार करतो की ज्या काळात तो कामभोगांमध्ये व्यभिचार करत नाही?” “भंते, जो मनुष्य कामभोगांमध्ये व्यभिचार करणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, ज्या काळात तो कामभोगांमध्ये व्यभिचार करतो तो काळ अत्यंत अल्प असतो; उलटपक्षी, ज्या काळात तो कामभोगांमध्ये व्यभिचार करत नाही तोच काळ अधिक असतो.” “गामणी, जर ‘मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो’ असे असेल, तर निगंठ नाटपुत्तांच्या वचनानुसार कोणीही अपाय किंवा नरकात जाणार नाही.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, යො සො පුරිසො මුසාවාදී රත්තියා වා දිවසස්ස වා සමයාසමයං උපාදාය, කතමො බහුතරො සමයො, යං වා සො මුසා භණති, යං වා සො මුසා න භණතී’’ති? ‘‘යො සො, භන්තෙ, පුරිසො මුසාවාදී රත්තියා වා දිවසස්ස වා සමයාසමයං උපාදාය[Pg.504], අප්පතරො සො සමයො, යං සො මුසා භණති, අථ ඛො ස්වෙව බහුතරො සමයො, යං සො මුසා න භණතී’’ති. ‘‘‘යංබහුලං යංබහුලඤ්ච, ගාමණි, විහරති තෙන තෙන නීයතී’ති, එවං සන්තෙ න කොචි ආපායිකො නෙරයිකො භවිස්සති, යථා නිගණ්ඨස්ස නාටපුත්තස්ස වචනං’’. “गामणी, तुला काय वाटते? जो मनुष्य असत्य बोलणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, कोणता काळ अधिक असतो – ज्या काळात तो असत्य बोलतो की ज्या काळात तो असत्य बोलत नाही?” “भंते, जो मनुष्य असत्य बोलणारा आहे, त्याच्या रात्रीच्या किंवा दिवसाच्या वेळेचा विचार करता, ज्या काळात तो असत्य बोलतो तो काळ अत्यंत अल्प असतो; उलटपक्षी, ज्या काळात तो असत्य बोलत नाही तोच काळ अधिक असतो.” “गामणी, जर ‘मनुष्य ज्या कर्मात बहुतांश काळ घालवतो, त्यानुसारच तो नेला जातो’ असे असेल, तर निगंठ नाटपुत्तांच्या वचनानुसार कोणीही अपाय किंवा नरकात जाणार नाही.” ‘‘ඉධ, ගාමණි, එකච්චො සත්ථා එවංවාදී හොති එවංදිට්ඨි – ‘යො කොචි පාණමතිපාතෙති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකො, යො කොචි අදින්නං ආදියති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකො, යො කොචි කාමෙසු මිච්ඡා චරති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකො, යො කොචි මුසා භණති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකො’ති. තස්මිං ඛො පන, ගාමණි, සත්ථරි සාවකො අභිප්පසන්නො හොති. තස්ස එවං හොති – ‘මය්හං ඛො සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – යො කොචි පාණමතිපාතෙති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකොති. අත්ථි ඛො පන මයා පාණො අතිපාතිතො, අහම්පම්හි ආපායිකො නෙරයිකොති දිට්ඨිං පටිලභති. තං, ගාමණි, වාචං අප්පහාය තං චිත්තං අප්පහාය තං දිට්ඨිං අප්පටිනිස්සජ්ජිත්වා යථාභතං නික්ඛිත්තො එවං නිරයෙ. මය්හං ඛො සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – යො කොචි අදින්නං ආදියති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකොති. අත්ථි ඛො පන මයා අදින්නං ආදින්නං අහම්පම්හි ආපායිකො නෙරයිකොති දිට්ඨිං පටිලභති. තං, ගාමණි, වාචං අප්පහාය තං චිත්තං අප්පහාය තං දිට්ඨිං අප්පටිනිස්සජ්ජිත්වා යථාභතං නික්ඛිත්තො එවං නිරයෙ. මය්හං ඛො සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – යො කොචි කාමෙසු මිච්ඡා චරති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකො’ති. අත්ථි ඛො පන මයා කාමෙසු මිච්ඡා චිණ්ණං. ‘අහම්පම්හි ආපායිකො නෙරයිකො’ති දිට්ඨිං පටිලභති. තං, ගාමණි, වාචං අප්පහාය තං චිත්තං අප්පහාය තං දිට්ඨිං අප්පටිනිස්සජ්ජිත්වා යථාභතං නික්ඛිත්තො එවං නිරයෙ. මය්හං ඛො සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – යො කොචි මුසා භණති, සබ්බො සො ආපායිකො නෙරයිකොති. අත්ථි ඛො පන මයා මුසා භණිතං. ‘අහම්පම්හි ආපායිකො නෙරයිකො’ති දිට්ඨිං පටිලභති. තං, ගාමණි, වාචං අප්පහාය තං චිත්තං අප්පහාය තං දිට්ඨිං අප්පටිනිස්සජ්ජිත්වා යථාභතං නික්ඛිත්තො එවං නිරයෙ. “गामणी, या जगात एखादा शास्ता असा वाद मांडणारा आणि अशी दृष्टी बाळगणारा असतो – ‘जो कोणी प्राणाची हिंसा करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी न दिलेले घेतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी कामभोगांमध्ये व्यभिचार करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो; जो कोणी असत्य बोलतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो.’ गामणी, त्या शास्त्यावर त्याचा एखादा श्रावक अत्यंत श्रद्धा ठेवतो. त्याच्या मनात असा विचार येतो – ‘माझे शास्ते असा वाद मांडणारे आणि अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की – जो कोणी प्राणाची हिंसा करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो. माझ्याकडूनही प्राणाची हिंसा झाली आहे, त्यामुळे मीसुद्धा अपाय आणि नरकास पात्र आहे.’ अशा प्रकारे तो ही दृष्टी दृढ करतो. गामणी, त्या वचनाचा त्याग न करता, त्या चित्ताचा त्याग न करता आणि त्या दृष्टीचा त्याग न करता, जणू काही उचलून आणून ठेवल्याप्रमाणे तो नरकात टाकला जातो. त्याच्या मनात असा विचार येतो – ‘माझे शास्ते असा वाद मांडणारे आणि अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की – जो कोणी न दिलेले घेतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो. माझ्याकडूनही न दिलेले घेतले गेले आहे, त्यामुळे मीसुद्धा अपाय आणि नरकास पात्र आहे.’ अशा प्रकारे तो ही दृष्टी दृढ करतो. गामणी, त्या वचनाचा त्याग न करता, त्या चित्ताचा त्याग न करता आणि त्या दृष्टीचा त्याग न करता, जणू काही उचलून आणून ठेवल्याप्रमाणे तो नरकात टाकला जातो. त्याच्या मनात असा विचार येतो – ‘माझे शास्ते असा वाद मांडणारे आणि अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की – जो कोणी कामभोगांमध्ये व्यभिचार करतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो. माझ्याकडूनही कामभोगांमध्ये व्यभिचार घडला आहे, त्यामुळे मीसुद्धा अपाय आणि नरकास पात्र आहे.’ अशा प्रकारे तो ही दृष्टी दृढ करतो. गामणी, त्या वचनाचा त्याग न करता, त्या चित्ताचा त्याग न करता आणि त्या दृष्टीचा त्याग न करता, जणू काही उचलून आणून ठेवल्याप्रमाणे तो नरकात टाकला जातो. त्याच्या मनात असा विचार येतो – ‘माझे शास्ते असा वाद मांडणारे आणि अशी दृष्टी बाळगणारे आहेत की – जो कोणी असत्य बोलतो, तो सर्व अपाय आणि नरकास पात्र होतो. माझ्याकडूनही असत्य बोलले गेले आहे, त्यामुळे मीसुद्धा अपाय आणि नरकास पात्र आहे.’ अशा प्रकारे तो ही दृष्टी दृढ करतो. गामणी, त्या वचनाचा त्याग न करता, त्या चित्ताचा त्याग न करता आणि त्या दृष्टीचा त्याग न करता, जणू काही उचलून आणून ठेवल्याप्रमाणे तो नरकात टाकला जातो.” ‘‘ඉධ [Pg.505] පන, ගාමණි, තථාගතො ලොකෙ උප්පජ්ජති අරහං සම්මාසම්බුද්ධො විජ්ජාචරණසම්පන්නො සුගතො ලොකවිදූ අනුත්තරො පුරිසදම්මසාරථි සත්ථා දෙවමනුස්සානං බුද්ධො භගවා. සො අනෙකපරියායෙන පාණාතිපාතං ගරහති විගරහති, ‘පාණාතිපාතා විරමථා’ති චාහ. අදින්නාදානං ගරහති විගරහති, ‘අදින්නාදානා විරමථා’ති චාහ. කාමෙසුමිච්ඡාචාරං ගරහති, විගරහති ‘කාමෙසුමිච්ඡාචාරා විරමථා’ති චාහ. මුසාවාදං ගරහති විගරහති ‘මුසාවාදා විරමථා’ති චාහ. තස්මිං ඛො පන, ගාමණි, සත්ථරි සාවකො අභිප්පසන්නො හොති. සො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘භගවා ඛො අනෙකපරියායෙන පාණාතිපාතං ගරහති විගරහති, පාණාතිපාතා විරමථාති චාහ. අත්ථි ඛො පන මයා පාණො අතිපාතිතො යාවතකො වා තාවතකො වා. යො ඛො පන මයා පාණො අතිපාතිතො යාවතකො වා තාවතකො වා, තං න සුට්ඨු, තං න සාධු. අහඤ්චෙව ඛො පන තප්පච්චයා විප්පටිසාරී අස්සං. න මෙතං පාපං කම්මං අකතං භවිස්සතී’ති. සො ඉති පටිසඞ්ඛාය තඤ්චෙව පාණාතිපාතං පජහති. ආයතිඤ්ච පාණාතිපාතා පටිවිරතො හොති. එවමෙතස්ස පාපස්ස කම්මස්ස පහානං හොති. එවමෙතස්ස පාපස්ස කම්මස්ස සමතික්කමො හොති. हे ग्रामणी, या जगात तथागत उत्पन्न होतात, जे अर्हत, सम्यक्संबुद्ध, विद्याचरणसंपन्न, सुगत, लोकविदू, अनुत्तर पुरुषदम्यसारथी, देव आणि मनुष्यांचे शास्ता, बुद्ध आणि भगवान आहेत. ते अनेक पर्यायांनी प्राणातिपाताची (जीवहिंसेची) निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: 'प्राणातिपातापासून अलिप्त राहा.' ते अदित्नादानाची (चोरीची) निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: 'अदित्नादानापासून अलिप्त राहा.' ते कामेसू मिच्छाचाराची (व्यभिचाराची) निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: 'कामेसू मिच्छाचारापासून अलिप्त राहा.' ते मृषावादाची (असत्य बोलण्याची) निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: 'मृषावादापासून अलिप्त राहा.' हे ग्रामणी, त्या शास्त्यांवर एखादा श्रावक अत्यंत प्रसन्न होतो. तो असा विचार करतो – 'भगवान अनेक पर्यायांनी प्राणातिपाताची निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: "प्राणातिपातापासून अलिप्त राहा." माझ्याकडून कमी-अधिक प्रमाणात प्राणांची हिंसा झाली आहे. माझ्याकडून जी काही कमी-अधिक प्रमाणात जीवहिंसा झाली आहे, ते योग्य नव्हते, ते चांगले नव्हते. जरी मी याबद्दल पश्चात्ताप केला, तरी माझे ते पापकर्म न केल्यासारखे होणार नाही.' तो असा विचार करून त्या प्राणातिपाताचा त्याग करतो आणि भविष्यात प्राणातिपातापासून अलिप्त राहतो. अशा प्रकारे त्याच्या त्या पापकर्माचा त्याग होतो; अशा प्रकारे तो त्या पापकर्माचे अतिक्रमण करतो. ‘‘‘භගවා ඛො අනෙකපරියායෙන අදින්නාදානං ගරහති විගරහති, අදින්නාදානා විරමථාති චාහ. අත්ථි ඛො පන මයා අදින්නං ආදින්නං යාවතකං වා තාවතකං වා. යං ඛො පන මයා අදින්නං ආදින්නං යාවතකං වා තාවතකං වා තං න සුට්ඨු, තං න සාධු. අහඤ්චෙව ඛො පන තප්පච්චයා විප්පටිසාරී අස්සං, න මෙතං පාපං කම්මං අකතං භවිස්සතී’ති. සො ඉති පටිසඞ්ඛාය තඤ්චෙව අදින්නාදානං පජහති. ආයතිඤ්ච අදින්නාදානා පටිවිරතො හොති. එවමෙතස්ස පාපස්ස කම්මස්ස පහානං හොති. එවමෙතස්ස පාපස්ස කම්මස්ස සමතික්කමො හොති. तो असा विचार करतो – 'भगवान अनेक पर्यायांनी अदित्नादानाची निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: "अदित्नादानापासून अलिप्त राहा." माझ्याकडून कमी-अधिक प्रमाणात न दिलेले घेतले गेले आहे. माझ्याकडून जे काही कमी-अधिक प्रमाणात न दिलेले घेतले गेले आहे, ते योग्य नव्हते, ते चांगले नव्हते. जरी मी याबद्दल पश्चात्ताप केला, तरी माझे ते पापकर्म न केल्यासारखे होणार नाही.' तो असा विचार करून त्या अदित्नादानाचा त्याग करतो आणि भविष्यात अदित्नादानापासून अलिप्त राहतो. अशा प्रकारे त्याच्या त्या पापकर्माचा त्याग होतो; अशा प्रकारे तो त्या पापकर्माचे अतिक्रमण करतो. ‘‘‘භගවා ඛො පන අනෙකපරියායෙන කාමෙසුමිච්ඡාචාරං ගරහති විගරහති, කාමෙසුමිච්ඡාචාරා විරමථාති චාහ. අත්ථි ඛො පන මයා කාමෙසු මිච්ඡා චිණ්ණං යාවතකං වා තාවතකං වා. යං ඛො පන මයා කාමෙසු මිච්ඡා චිණ්ණං යාවතකං වා තාවතකං වා තං න සුට්ඨු, තං න සාධු. අහඤ්චෙව ඛො පන තප්පච්චයා විප්පටිසාරී අස්සං, න [Pg.506] මෙතං පාපං කම්මං අකතං භවිස්සතී’ති. සො ඉති පටිසඞ්ඛාය තඤ්චෙව කාමෙසුමිච්ඡාචාරං පජහති, ආයතිඤ්ච කාමෙසුමිච්ඡාචාරා පටිවිරතො හොති. එවමෙතස්ස පාපස්ස කම්මස්ස පහානං හොති. එවමෙතස්ස පාපස්ස කම්මස්ස සමතික්කමො හොති. तो असा विचार करतो – 'भगवान अनेक पर्यायांनी कामेसू मिच्छाचाराची निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: "कामेसू मिच्छाचारापासून अलिप्त राहा." माझ्याकडून कमी-अधिक प्रमाणात कामभोगांमध्ये चुकीचे वर्तन घडले आहे. माझ्याकडून जे काही कमी-अधिक प्रमाणात कामभोगांमध्ये चुकीचे वर्तन घडले आहे, ते योग्य नव्हते, ते चांगले नव्हते. जरी मी याबद्दल पश्चात्ताप केला, तरी माझे ते पापकर्म न केल्यासारखे होणार नाही.' तो असा विचार करून त्या कामेसू मिच्छाचाराचा त्याग करतो आणि भविष्यात कामेसू मिच्छाचारापासून अलिप्त राहतो. अशा प्रकारे त्याच्या त्या पापकर्माचा त्याग होतो; अशा प्रकारे तो त्या पापकर्माचे अतिक्रमण करतो. ‘‘‘භගවා ඛො පන අනෙකපරියායෙන මුසාවාදං ගරහති විගරහති, මුසාවාදා විරමථාති චාහ. අත්ථි ඛො පන මයා මුසා භණිතං යාවතකං වා තාවතකං වා. යං ඛො පන මයා මුසා භණිතං යාවතකං වා තාවතකං වා තං න සුට්ඨු, තං න සාධු. අහඤ්චෙව ඛො පන තප්පච්චයා විප්පටිසාරී අස්සං, න මෙතං පාපං කම්මං අකතං භවිස්සතී’ති. සො ඉති පටිසඞ්ඛාය තඤ්චෙව මුසාවාදං පජහති, ආයතිඤ්ච මුසාවාදා පටිවිරතො හොති. එවමෙතස්ස පාපස්ස කම්මස්ස පහානං හොති. එවමෙතස්ස පාපස්ස කම්මස්ස සමතික්කමො හොති. तो असा विचार करतो – 'भगवान अनेक पर्यायांनी मृषावादाची निंदा करतात, निर्भत्सना करतात आणि म्हणतात: "मृषावादापासून अलिप्त राहा." माझ्याकडून कमी-अधिक प्रमाणात असत्य बोलले गेले आहे. माझ्याकडून जे काही कमी-अधिक प्रमाणात असत्य बोलले गेले आहे, ते योग्य नव्हते, ते चांगले नव्हते. जरी मी याबद्दल पश्चात्ताप केला, तरी माझे ते पापकर्म न केल्यासारखे होणार नाही.' तो असा विचार करून त्या मृषावादाचा त्याग करतो आणि भविष्यात मृषावादापासून अलिप्त राहतो. अशा प्रकारे त्याच्या त्या पापकर्माचा त्याग होतो; अशा प्रकारे तो त्या पापकर्माचे अतिक्रमण करतो. ‘‘සො පාණාතිපාතං පහාය පාණාතිපාතා පටිවිරතො හොති. අදින්නාදානං පහාය අදින්නාදානා පටිවිරතො හොති. කාමෙසුමිච්ඡාචාරං පහාය කාමෙසුමිච්ඡාචාරා පටිවිරතො හොති. මුසාවාදං පහාය මුසාවාදා පටිවිරතො හොති. පිසුණං වාචං පහාය පිසුණාය වාචාය පටිවිරතො හොති. ඵරුසං වාචං පහාය ඵරුසාය වාචාය පටිවිරතො හොති. සම්ඵප්පලාපං පහාය සම්ඵප්පලාපා පටිවිරතො හොති. අභිජ්ඣං පහාය අනභිජ්ඣාලු හොති. බ්යාපාදප්පදොසං පහාය අබ්යාපන්නචිත්තො හොති. මිච්ඡාදිට්ඨිං පහාය සම්මාදිට්ඨිකො හොති. तो प्राणातिपाताचा त्याग करून प्राणातिपातापासून अलिप्त राहतो. अदित्नादानाचा त्याग करून अदित्नादानापासून अलिप्त राहतो. कामेसू मिच्छाचाराचा त्याग करून कामेसू मिच्छाचारापासून अलिप्त राहतो. मृषावादाचा त्याग करून मृषावादापासून अलिप्त राहतो. पिशुन वाचेचा (चुगलीचा) त्याग करून पिशुन वाचेपासून अलिप्त राहतो. परुष वाचेचा (कठोर बोलण्याचा) त्याग करून परुष वाचेपासून अलिप्त राहतो. संफप्पलापाचा (व्यर्थ बडबडीचा) त्याग करून संफप्पलापापासून अलिप्त राहतो. अभिध्येचा (लोभाचा) त्याग करून अनभिध्यालू (लोभरहित) होतो. व्यापाद-प्रदोषाचा (द्वेषाचा) त्याग करून अव्यापन्नचित्त (द्वेषरहित चित्त असलेला) होतो. मिथ्यादृष्टीचा त्याग करून सम्यग्दृष्टी होतो. ‘‘ස ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං. ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. සෙය්යථාපි, ගාමණි, බලවා සඞ්ඛධමො අප්පකසිරෙනෙව චතුද්දිසා විඤ්ඤාපෙය්ය; එවමෙව ඛො, ගාමණි, එවං භාවිතාය මෙත්තාය චෙතොවිමුත්තියා එවං බහුලීකතාය යං පමාණකතං කම්මං, න තං තත්රාවසිස්සති, න තං තත්රාවතිට්ඨති. हे ग्रामणी, तो याप्रमाणे लोभरहित, द्वेषरहित, संमोहरहित, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन मैत्रीपूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो. हे ग्रामणी, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान शंख वाजवणारा अगदी सहजपणे चारही दिशांना आपला आवाज पोहोचवू शकतो; त्याचप्रमाणे, हे ग्रामणी, अशा प्रकारे मैत्रीच्या चेतोविमुक्तीची भावना केली असता, तिचा वारंवार सराव केला असता, जे काही मर्यादित कर्म असते, ते तेथे शिल्लक राहत नाही, ते तेथे टिकून राहत नाही. ‘‘ස [Pg.507] ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො කරුණාසහගතෙන චෙතසා…පෙ… මුදිතාසහගතෙන චෙතසා…පෙ…. උපෙක්ඛාසහගතෙන චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං. ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං උපෙක්ඛාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. සෙය්යථාපි, ගාමණි, බලවා සඞ්ඛධමො අප්පකසිරෙනෙව චතුද්දිසා විඤ්ඤාපෙය්ය; එවමෙව ඛො, ගාමණි, එවං භාවිතාය උපෙක්ඛාය චෙතොවිමුත්තියා එවං බහුලීකතාය යං පමාණකතං කම්මං න තං තත්රාවසිස්සති, න තං තත්රාවතිට්ඨතී’’ති. එවං වුත්තෙ, අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ, අභික්කන්තං, භන්තෙ…පෙ… උපාසකං මං භගවා ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. අට්ඨමං. हे ग्रामणी, तो याप्रमाणे लोभरहित, द्वेषरहित, संमोहरहित, संप्रजन्ययुक्त आणि स्मृतिमान होऊन करुणापूर्ण चित्ताने... पे... मुदितापूर्ण चित्ताने... पे... उपेक्षापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा उपेक्षापूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो. हे ग्रामणी, ज्याप्रमाणे एखादा बलवान शंख वाजवणारा अगदी सहजपणे चारही दिशांना आपला आवाज पोहोचवू शकतो; त्याचप्रमाणे, हे ग्रामणी, अशा प्रकारे उपेक्षेच्या चेतोविमुक्तीची भावना केली असता, तिचा वारंवार सराव केला असता, जे काही मर्यादित कर्म असते, ते तेथे शिल्लक राहत नाही, ते तेथे टिकून राहत नाही. असे म्हटले असता, असिबंधकपुत्र ग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – "अतिशय सुंदर, भन्ते! अतिशय सुंदर, भन्ते! ... भगवंतांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे." आठवे सूत्र समाप्त. 9. කුලසුත්තං ९. कुलसुत्त 361. එකං සමයං භගවා කොසලෙසු චාරිකං චරමානො මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං යෙන නාළන්දා තදවසරි. තත්ර සුදං භගවා නාළන්දායං විහරති පාවාරිකම්බවනෙ. ३६१. एकदा भगवान कोसल देशात मोठ्या भिक्खू संघासोबत चारिका (धम्मयात्रा) करत असताना जेथे नाळंदा होते, तेथे पोहोचले. तेथे भगवान नाळंदा येथील पावारिकाच्या आंबराईत (पावारिकम्बवनात) विहार करत होते. තෙන ඛො පන සමයෙන නාළන්දා දුබ්භික්ඛා හොති ද්වීහිතිකා සෙතට්ඨිකා සලාකාවුත්තා. තෙන ඛො පන සමයෙන නිගණ්ඨො නාටපුත්තො නාළන්දායං පටිවසති මහතියා නිගණ්ඨපරිසාය සද්ධිං. අථ ඛො අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි නිගණ්ඨසාවකො යෙන නිගණ්ඨො නාටපුත්තො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා නිගණ්ඨං නාටපුත්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නං ඛො අසිබන්ධකපුත්තං ගාමණිං නිගණ්ඨො නාටපුත්තො එතදවොච – ‘‘එහි ත්වං, ගාමණි, සමණස්ස ගොතමස්ස වාදං ආරොපෙහි. එවං තෙ කල්යාණො කිත්තිසද්දො අබ්භුග්ගච්ඡිස්සති – ‘අසිබන්ධකපුත්තෙන ගාමණිනා සමණස්ස ගොතමස්ස එවංමහිද්ධිකස්ස එවංමහානුභාවස්ස වාදො ආරොපිතො’’’ති. त्या वेळी नाळंदामध्ये मोठा दुष्काळ पडला होता, अन्न मिळणे कठीण झाले होते, (मृत लोकांची) हाडे पांढरी पडली होती आणि शलाकेद्वारे (रेशनच्या चिठ्ठ्यांद्वारे) उपजीविका करावी लागत होती. त्या वेळी निगण्ठ नाटपुत्त मोठ्या निगण्ठ परिषदेसह (अनुयायांसह) नाळंदामध्ये राहत होते. तेव्हा निगण्ठांचा श्रावक (शिष्य) असलेला असिबंधकपुत्र ग्रामणी (गावचा प्रमुख) जेथे निगण्ठ नाटपुत्त होते, तेथे गेला; आणि निगण्ठ नाटपुत्तांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या असिबंधकपुत्र ग्रामणीला निगण्ठ नाटपुत्त म्हणाले— 'ये ग्रामणी, तू श्रमण गोतमाच्या सिद्धांताचे खंडन कर (त्यांच्यावर वाद लाद). यामुळे तुझी अशी उत्तम कीर्ती सर्वत्र पसरून जाईल की— असिबंधकपुत्र ग्रामणीने एवढ्या महा-ऋद्धीवान आणि महा-प्रतापी श्रमण गोतमाच्या सिद्धांताचे खंडन केले आहे.' ‘‘කථං පනාහං, භන්තෙ, සමණස්ස ගොතමස්ස එවංමහිද්ධිකස්ස එවංමහානුභාවස්ස වාදං ආරොපෙස්සාමී’’ති? ‘‘එහි ත්වං, ගාමණි, යෙන සමණො ගොතමො තෙනුපසඞ්කම; උපසඞ්කමිත්වා සමණං ගොතමං එවං [Pg.508] වදෙහි – ‘නනු, භන්තෙ, භගවා අනෙකපරියායෙන කුලානං අනුද්දයං වණ්ණෙති, අනුරක්ඛං වණ්ණෙති, අනුකම්පං වණ්ණෙතී’ති? සචෙ ඛො, ගාමණි, සමණො ගොතමො එවං පුට්ඨො එවං බ්යාකරොති – ‘එවං, ගාමණි, තථාගතො අනෙකපරියායෙන කුලානං අනුද්දයං වණ්ණෙති, අනුරක්ඛං වණ්ණෙති, අනුකම්පං වණ්ණෙතී’ති, තමෙනං ත්වං එවං වදෙය්යාසි – ‘අථ කිඤ්චරහි, භන්තෙ, භගවා දුබ්භික්ඛෙ ද්වීහිතිකෙ සෙතට්ඨිකෙ සලාකාවුත්තෙ මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං චාරිකං චරති? උච්ඡෙදාය භගවා කුලානං පටිපන්නො, අනයාය භගවා කුලානං පටිපන්නො, උපඝාතාය භගවා කුලානං පටිපන්නො’ති! ඉමං ඛො තෙ, ගාමණි, සමණො ගොතමො උභතොකොටිකං පඤ්හං පුට්ඨො නෙව සක්ඛති උග්ගිලිතුං, නෙව සක්ඛති ඔගිලිතු’’න්ති. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි නිගණ්ඨස්ස නාටපුත්තස්ස පටිස්සුත්වා උට්ඨායාසනා නිගණ්ඨං නාටපුත්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – 'पण भंते, मी एवढ्या महा-ऋद्धीवान आणि महा-प्रतापी श्रमण गोतमाच्या सिद्धांताचे खंडन कसे करू शकेन?' 'ये ग्रामणी, तू जेथे श्रमण गोतम आहेत तेथे जा; आणि श्रमण गोतमांना असे विचार— भंते, भगवान अनेक प्रकारे कुळांवर (कुटुंबांवर) दया करण्याची, त्यांचे रक्षण करण्याची आणि त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगण्याची प्रशंसा करत नाहीत का? ग्रामणी, जर असे विचारल्यावर श्रमण गोतम असे उत्तर देतील की— होय ग्रामणी, तथागत अनेक प्रकारे कुळांवर दया करण्याची, त्यांचे रक्षण करण्याची आणि त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगण्याची प्रशंसा करतात, तर तू त्यांना असे म्हणावेस— तर मग भंते, भगवान या दुष्काळाच्या, अन्न मिळणे कठीण झालेल्या, हाडे पांढरी पडलेल्या आणि शलाकेद्वारे उपजीविका करावी लागणाऱ्या कठीण काळात मोठ्या भिक्खू संघासोबत चारिका का करत आहेत? भगवान कुळांच्या विनाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का, भगवान कुळांच्या अहितासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का, भगवान कुळांच्या नाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का? ग्रामणी, हा दोन्ही बाजूंनी कोंडीत पकडणारा प्रश्न विचारल्यावर श्रमण गोतमांना तो ना गिळता येईल, ना ओकता येईल.' 'तसेच असो, भंते,' असे म्हणून असिबंधकपुत्र ग्रामणीने निगण्ठ नाटपुत्तांचे म्हणणे मान्य केले. तो आपल्या आसनावरून उठला, निगण्ठ नाटपुत्तांना अभिवादन करून व प्रदक्षिणा घालून जेथे भगवान होते तेथे गेला; आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या असिबंधकपुत्र ग्रामणीने भगवंतांना असे विचारले— ‘‘නනු, භන්තෙ, භගවා අනෙකපරියායෙන කුලානං අනුද්දයං වණ්ණෙති, අනුරක්ඛං වණ්ණෙති, අනුකම්පං වණ්ණෙතී’’ති? ‘‘එවං, ගාමණි, තථාගතො අනෙකපරියායෙන කුලානං අනුද්දයං වණ්ණෙති, අනුරක්ඛං වණ්ණෙති, අනුකම්පං වණ්ණෙතී’’ති. ‘‘අථ කිඤ්චරහි, භන්තෙ, භගවා දුබ්භික්ඛෙ ද්වීහිතිකෙ සෙතට්ඨිකෙ සලාකාවුත්තෙ මහතා භික්ඛුසඞ්ඝෙන සද්ධිං චාරිකං චරති? උච්ඡෙදාය භගවා කුලානං පටිපන්නො, අනයාය භගවා කුලානං පටිපන්නො, උපඝාතාය භගවා කුලානං පටිපන්නො’’ති. ‘‘ඉතො සො, ගාමණි, එකනවුතිකප්පෙ යමහං අනුස්සරාමි, නාභිජානාමි කිඤ්චි කුලං පක්කභික්ඛානුප්පදානමත්තෙන උපහතපුබ්බං. අථ ඛො යානි තානි කුලානි අඩ්ඪානි මහද්ධනානි මහාභොගානි පහූතජාතරූපරජතානි පහූතවිත්තූපකරණානි පහූතධනධඤ්ඤානි, සබ්බානි තානි දානසම්භූතානි චෙව සච්චසම්භූතානි ච සාමඤ්ඤසම්භූතානි ච. අට්ඨ ඛො, ගාමණි, හෙතූ, අට්ඨ පච්චයා කුලානං උපඝාතාය. රාජතො වා කුලානි උපඝාතං ගච්ඡන්ති, චොරතො වා කුලානි උපඝාතං ගච්ඡන්ති, අග්ගිතො වා කුලානි උපඝාතං ගච්ඡන්ති[Pg.509], උදකතො වා කුලානි උපඝාතං ගච්ඡන්ති, නිහිතං වා ඨානා විගච්ඡති, දුප්පයුත්තා වා කම්මන්තා විපජ්ජන්ති, කුලෙ වා කුලඞ්ගාරොති උප්පජ්ජති, යො තෙ භොගෙ විකිරති විධමති විද්ධංසෙති, අනිච්චතායෙ අට්ඨමීති. ඉමෙ ඛො, ගාමණි, අට්ඨ හෙතූ, අට්ඨ පච්චයා කුලානං උපඝාතාය. ඉමෙසු ඛො, ගාමණි, අට්ඨසු හෙතූසු, අට්ඨසු පච්චයෙසු සංවිජ්ජමානෙසු යො මං එවං වදෙය්ය – ‘උච්ඡෙදාය භගවා කුලානං පටිපන්නො, අනයාය භගවා කුලානං පටිපන්නො, උපඝාතාය භගවා කුලානං පටිපන්නො’ති, තං, ගාමණි, වාචං අප්පහාය තං චිත්තං අප්පහාය තං දිට්ඨිං අප්පටිනිස්සජ්ජිත්වා යථාභතං නික්ඛිත්තො එවං නිරයෙ’’ති. එවං වුත්තෙ, අසිබන්ධකපුත්තො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ, අභික්කන්තං, භන්තෙ…පෙ… උපාසකං මං භගවා ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. නවමං. 'भंते, भगवान अनेक प्रकारे कुळांवर दया करण्याची, त्यांचे रक्षण करण्याची आणि त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगण्याची प्रशंसा करत नाहीत का?' 'होय ग्रामणी, तथागत अनेक प्रकारे कुळांवर दया करण्याची, त्यांचे रक्षण करण्याची आणि त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगण्याची प्रशंसा करतात.' 'तर मग भंते, भगवान या दुष्काळाच्या, अन्न मिळणे कठीण झालेल्या, हाडे पांढरी पडलेल्या आणि शलाकेद्वारे उपजीविका करावी लागणाऱ्या कठीण काळात मोठ्या भिक्खू संघासोबत चारिका का करत आहेत? भगवान कुळांच्या विनाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का, भगवान कुळांच्या अहितासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का, भगवान कुळांच्या नाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत का?' 'ग्रामणी, मला इथून मागे एक्याण्णव कल्प आठवतात, पण शिजवलेले अन्न दान केल्यामुळे कोणतेही कुळ नष्ट झाले आहे, असे मला आठवत नाही. उलट, जी कुळे समृद्ध, महाधनी, महाभोगी, विपुल सुवर्ण व चांदी असलेली, विपुल साधनसामग्री असलेली आणि विपुल धनधान्य असलेली आहेत, ती सर्व दानामुळे, सत्यपालनामुळे आणि संयमामुळे (श्रामण्यधर्मामुळे) तशी झाली आहेत. ग्रामणी, कुळांच्या नाशाची आठ कारणे आणि आठ प्रत्यय (परिस्थिती) आहेत. कुळे राजाकडून नष्ट होतात, चोरांकडून नष्ट होतात, अग्नीमुळे नष्ट होतात, पाण्यामुळे (पुरामुळे) नष्ट होतात; किंवा पुरून ठेवलेले धन जागेवरून नाहीसे होते; किंवा चुकीच्या पद्धतीने केलेले उद्योग अयशस्वी होतात; किंवा कुळात एखादा कुलंगार (उधळ्या) जन्माला येतो, जो त्या संपत्तीची उधळपट्टी करतो, ती नष्ट करतो; आणि अनित्यता (नाशवंतता) हे आठवे कारण आहे. ग्रामणी, कुळांच्या नाशाची ही आठ कारणे आणि आठ प्रत्यय आहेत. ग्रामणी, ही आठ कारणे आणि आठ प्रत्यय अस्तित्वात असताना, जो कोणी माझ्याविषयी असे म्हणेल की— भगवान कुळांच्या विनाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत, भगवान कुळांच्या अहितासाठी प्रवृत्त झाले आहेत, भगवान कुळांच्या नाशासाठी प्रवृत्त झाले आहेत, तर ग्रामणी, जोपर्यंत तो आपले ते बोलणे सोडत नाही, ते मन बदलत नाही आणि ती दृष्टी (मत) सोडत नाही, तोपर्यंत तो जणू काही उचलून नरकात टाकल्यासारखा होईल.' असे म्हटल्यावर, असिबंधकपुत्र ग्रामणी भगवंतांना म्हणाला— 'अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! ... आजपासून भगवंतांनी मला आजीवन शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.' नववे सूत्र समाप्त. 10. මණිචූළකසුත්තං १०. मणिचूळक सुत्त 362. එකං සමයං භගවා රාජගහෙ විහරති වෙළුවනෙ කලන්දකනිවාපෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන රාජන්තෙපුරෙ රාජපරිසාය සන්නිසින්නානං සන්නිපතිතානං අයමන්තරාකථා උදපාදි – ‘‘කප්පති සමණානං සක්යපුත්තියානං ජාතරූපරජතං, සාදියන්ති සමණා සක්යපුත්තියා ජාතරූපරජතං, පටිග්ගණ්හන්ති සමණා සක්යපුත්තියා ජාතරූපරජත’’න්ති! ३६२. एकदा भगवान राजगृह येथे वेळुवनातील कलंदकनिवापात विहार करत होते. त्या वेळी राजवाड्यात एकत्र जमलेल्या आणि बसलेल्या राजपरिषदेमध्ये अशी चर्चा सुरू झाली— 'शाक्यपुत्रीय श्रमणांना सुवर्ण आणि चांदी (पैसा-अडका) कल्पते (योग्य आहे), शाक्यपुत्रीय श्रमण सुवर्ण आणि चांदीचा स्वीकार करतात, शाक्यपुत्रीय श्रमण सुवर्ण आणि चांदी ग्रहण करतात!' තෙන ඛො පන සමයෙන මණිචූළකො ගාමණි තස්සං පරිසායං නිසින්නො හොති. අථ ඛො මණිචූළකො ගාමණි තං පරිසං එතදවොච – ‘‘මා අය්යො එවං අවචුත්ථ. න කප්පති සමණානං සක්යපුත්තියානං ජාතරූපරජතං, න සාදියන්ති සමණා සක්යපුත්තියා ජාතරූපරජතං, නප්පටිග්ගණ්හන්ති සමණා සක්යපුත්තියා ජාතරූපරජතං, නික්ඛිත්තමණිසුවණ්ණා සමණා සක්යපුත්තියා අපෙතජාතරූපරජතා’’ති. අසක්ඛි ඛො මණිචූළකො ගාමණි තං පරිසං සඤ්ඤාපෙතුං. අථ ඛො මණිචූළකො ගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො මණිචූළකො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධ, භන්තෙ, රාජන්තෙපුරෙ රාජපරිසාය සන්නිසින්නානං සන්නිපතිතානං අයමන්තරාකථා උදපාදි – ‘කප්පති සමණානං සක්යපුත්තියානං ජාතරූපරජතං, සාදියන්ති සමණා සක්යපුත්තියා ජාතරූපරජතං, පටිග්ගණ්හන්ති සමණා සක්යපුත්තියා ජාතරූපරජත’න්ති. එවං වුත්තෙ, අහං, භන්තෙ, තං පරිසං එතදවොචං – ‘මා අය්යො එවං අවචුත්ථ. න කප්පති සමණානං සක්යපුත්තියානං ජාතරූපරජතං, න සාදියන්ති සමණා සක්යපුත්තියා ජාතරූපරජතං, නප්පටිග්ගණ්හන්ති සමණා සක්යපුත්තියා [Pg.510] ජාතරූපරජතං, නික්ඛිත්තමණිසුවණ්ණා සමණා සක්යපුත්තියා අපෙතජාතරූපරජතා’ති. අසක්ඛිං ඛ්වාහං, භන්තෙ, තං පරිසං සඤ්ඤාපෙතුං. කච්චාහං, භන්තෙ, එවං බ්යාකරමානො වුත්තවාදී චෙව භගවතො හොමි, න ච භගවන්තං අභූතෙන අබ්භාචික්ඛාමි, ධම්මස්ස චානුධම්මං බ්යාකරොමි, න ච කොචි සහධම්මිකො වාදානුවාදො ගාරය්හං ඨානං ආගච්ඡතී’’ති? त्या वेळी मणिचूळक नावाचा ग्रामणी (गावप्रमुख) त्या सभेत बसलेला होता. तेव्हा मणिचूळक ग्रामणीने त्या सभेला असे म्हटले— "आर्यहो, असे बोलू नका. शाक्यपुत्रीय श्रमणांना सोने-चांदी कल्पत (योग्य) नाही. शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदीचा स्वीकार करत नाहीत, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदी ग्रहण करत नाहीत. शाक्यपुत्रीय श्रमणांनी मणी व सुवर्णाचा त्याग केला आहे, ते सोने-चांदीपासून अलिप्त आहेत." मणिचूळक ग्रामणी त्या सभेला हे पटवून देण्यास समर्थ ठरला. त्यानंतर मणिचूळक ग्रामणी जेथे भगवान होते, तेथे गेला; भगवंतांजवळ जाऊन आणि त्यांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या मणिचूळक ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले— "भन्ते, येथे राजवाड्यात राजसभेमध्ये एकत्र जमलेल्या आणि बसलेल्या लोकांमध्ये असा संवाद सुरू झाला होता— 'शाक्यपुत्रीय श्रमणांना सोने-चांदी कल्पते, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदीचा स्वीकार करतात, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदी ग्रहण करतात.' असे म्हटले असता, भन्ते, मी त्या सभेला असे म्हणालो— 'आर्यहो, असे बोलू नका. शाक्यपुत्रीय श्रमणांना सोने-चांदी कल्पत नाही, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदीचा स्वीकार करत नाहीत, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदी ग्रहण करत नाहीत. शाक्यपुत्रीय श्रमणांनी मणी व सुवर्णाचा त्याग केला आहे, ते सोने-चांदीपासून अलिप्त आहेत.' भन्ते, मी त्या सभेला हे पटवून देण्यास समर्थ ठरलो. भन्ते, असे उत्तर देऊन मी भगवंतांच्या शिकवणीनुसारच बोललो ना? मी भगवंतांवर असत्य आरोप तर केला नाही ना? मी धर्माला अनुसरूनच उत्तर दिले ना? आणि माझ्या या विधानाचा कोणताही तर्कसंगत निष्कर्ष आक्षेपार्ह ठरणार नाही ना?" ‘‘තග්ඝ ත්වං, ගාමණි, එවං බ්යාකරමානො වුත්තවාදී චෙව මෙ හොසි, න ච මං අභූතෙන අබ්භාචික්ඛසි, ධම්මස්ස චානුධම්මං බ්යාකරොසි, න ච කොචි සහධම්මිකො වාදානුවාදො ගාරය්හං ඨානං ආගච්ඡති. න හි, ගාමණි, කප්පති සමණානං සක්යපුත්තියානං ජාතරූපරජතං, න සාදියන්ති සමණා සක්යපුත්තියා ජාතරූපරජතං, නප්පටිග්ගණ්හන්ති සමණා සක්යපුත්තියා ජාතරූපරජතං, නික්ඛිත්තමණිසුවණ්ණා සමණා සක්යපුත්තියා අපෙතජාතරූපරජතා. යස්ස ඛො, ගාමණි, ජාතරූපරජතං කප්පති, පඤ්චපි තස්ස කාමගුණා කප්පන්ති. යස්ස පඤ්ච කාමගුණා කප්පන්ති ( ), එකංසෙනෙතං, ගාමණි, ධාරෙය්යාසි අස්සමණධම්මො අසක්යපුත්තියධම්මොති. අපි චාහං, ගාමණි, එවං වදාමි – තිණං තිණත්ථිකෙන පරියෙසිතබ්බං, දාරු දාරුත්ථිකෙන පරියෙසිතබ්බං, සකටං සකටත්ථිකෙන පරියෙසිතබ්බං, පුරිසො පුරිසත්ථිකෙන පරියෙසිතබ්බො. නත්වෙවාහං, ගාමණි, කෙනචි පරියායෙන ‘ජාතරූපරජතං සාදිතබ්බං පරියෙසිතබ්බ’න්ති වදාමී’’ති. දසමං. "नक्कीच, ग्रामणी! असे उत्तर देऊन तू माझ्या शिकवणीनुसारच बोलला आहेस, तू माझ्यावर असत्य आरोप केला नाहीस, तू धर्माला अनुसरूनच उत्तर दिले आहेस आणि तुझ्या या विधानाचा कोणताही तर्कसंगत निष्कर्ष आक्षेपार्ह ठरत नाही. कारण, ग्रामणी, शाक्यपुत्रीय श्रमणांना सोने-चांदी कल्पत नाही, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदीचा स्वीकार करत नाहीत, शाक्यपुत्रीय श्रमण सोने-चांदी ग्रहण करत नाहीत. शाक्यपुत्रीय श्रमणांनी मणी व सुवर्णाचा त्याग केला आहे, ते सोने-चांदीपासून अलिप्त आहेत. ग्रामणी, ज्याला सोने-चांदी कल्पते, त्याला पाचही कामगुण (इंद्रियसुखाचे पाच प्रकार) कल्पतात. ज्याला पाच कामगुण कल्पतात, त्याला तू निश्चितपणे असा समजावा की तो श्रमणधर्माचे पालन करणारा नाही आणि शाक्यपुत्रीय धर्माचे पालन करणारा नाही. शिवाय, ग्रामणी, मी असे सांगतो— 'ज्याला गवताची गरज आहे त्याने गवत शोधावे; ज्याला लाकडाची गरज आहे त्याने लाकूड शोधावे; ज्याला गाडीची गरज आहे त्याने गाडी शोधावी; ज्याला कामगाराची गरज आहे त्याने कामगार शोधावा.' परंतु, ग्रामणी, मी कोणत्याही प्रकारे असे म्हणत नाही की सोने-चांदीचा स्वीकार करावा किंवा त्याचा शोध घ्यावा." दहावे (सुत्त समाप्त). 11. භද්රකසුත්තං ११. भद्रक सुत्त 363. එකං සමයං භගවා මල්ලෙසු විහරති උරුවෙලකප්පං නාම මල්ලානං නිගමො. අථ ඛො භද්රකො ගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො භද්රකො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සාධු මෙ, භන්තෙ, භගවා දුක්ඛස්ස සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච දෙසෙතූ’’ති. ‘‘අහඤ්චෙ තෙ, ගාමණි, අතීතමද්ධානං ආරබ්භ [Pg.511] දුක්ඛස්ස සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච දෙසෙය්යං – ‘එවං අහොසි අතීතමද්ධාන’න්ති, තත්ර තෙ සියා කඞ්ඛා, සියා විමති. අහං චෙ තෙ, ගාමණි, අනාගතමද්ධානං ආරබ්භ දුක්ඛස්ස සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච දෙසෙය්යං – ‘එවං භවිස්සති අනාගතමද්ධාන’න්ති, තත්රාපි තෙ සියා කඞ්ඛා, සියා විමති. අපි චාහං, ගාමණි, ඉධෙව නිසින්නො එත්ථෙව තෙ නිසින්නස්ස දුක්ඛස්ස සමුදයඤ්ච අත්ථඞ්ගමඤ්ච දෙසෙස්සාමි. තං සුණාහි, සාධුකං මනසි කරොහි; භාසිස්සාමී’’ති. ‘‘එවං, භන්තෙ’’ති ඛො භද්රකො ගාමණි භගවතො පච්චස්සොසි. භගවා එතදවොච – ३६३. एकदा भगवान मल्ल देशात 'उरुवेलकप्प' नावाच्या मल्लांच्या नगरात विहार करत होते. तेव्हा भद्रक नावाचा ग्रामणी जेथे भगवान होते, तेथे गेला; भगवंतांजवळ जाऊन आणि त्यांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या भद्रक ग्रामणीने भगवंतांना असे म्हटले— "भन्ते, किती बरे होईल जर भगवंतांनी मला दुःखाचा उदय (उत्पत्ती) आणि त्याचा अस्त (निरोध) याविषयी उपदेश केला तर!" "ग्रामणी, जर मी तुला भूतकाळाचा संदर्भ देऊन दुःखाचा उदय आणि अस्त याविषयी उपदेश केला की, 'भूतकाळात असे घडले होते,' तर त्याविषयी तुझ्या मनात शंका आणि संभ्रम निर्माण होऊ शकतो. आणि जर मी तुला भविष्यकाळाचा संदर्भ देऊन दुःखाचा उदय आणि अस्त याविषयी उपदेश केला की, 'भविष्यकाळात असे घडेल,' तर तिथेही तुझ्या मनात शंका आणि संभ्रम निर्माण होऊ शकतो. त्याऐवजी, ग्रामणी, मी येथेच बसलेला असताना आणि तूही येथेच बसलेला असताना, मी तुला दुःखाचा उदय आणि अस्त याविषयी उपदेश करतो. ते लक्षपूर्वक ऐक आणि नीट मनात धर; मी सांगतो." "होय, भन्ते," असे म्हणून भद्रक ग्रामणीने भगवंतांच्या बोलण्याला संमती दिली. भगवान म्हणाले— ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අත්ථි තෙ උරුවෙලකප්පෙ මනුස්සා යෙසං තෙ වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා උප්පජ්ජෙය්යුං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා’’ති? ‘‘අත්ථි මෙ, භන්තෙ, උරුවෙලකප්පෙ මනුස්සා යෙසං මෙ වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා උප්පජ්ජෙය්යුං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා’’ති. ‘‘අත්ථි පන තෙ, ගාමණි, උරුවෙලකප්පෙ මනුස්සා යෙසං තෙ වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා නුප්පජ්ජෙය්යුං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා’’ති? ‘‘අත්ථි මෙ, භන්තෙ, උරුවෙලකප්පෙ මනුස්සා යෙසං මෙ වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා නුප්පජ්ජෙය්යුං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා’’ති. ‘‘කො නු ඛො, ගාමණි, හෙතු, කො පච්චයො යෙන තෙ එකච්චානං උරුවෙලකප්පියානං මනුස්සානං වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා උප්පජ්ජෙය්යුං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා’’ති? ‘‘යෙසං මෙ, භන්තෙ, උරුවෙලකප්පියානං මනුස්සානං වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා උප්පජ්ජෙය්යුං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා, අත්ථි මෙ තෙසු ඡන්දරාගො. යෙසං පන, භන්තෙ, උරුවෙලකප්පියානං මනුස්සානං වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා නුප්පජ්ජෙය්යුං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා, නත්ථි මෙ තෙසු ඡන්දරාගො’’ති. ‘‘ඉමිනා ත්වං, ගාමණි, ධම්මෙන දිට්ඨෙන විදිතෙන අකාලිකෙන පත්තෙන පරියොගාළ්හෙන අතීතානාගතෙ නයං නෙහි – ‘යං ඛො කිඤ්චි අතීතමද්ධානං දුක්ඛං උප්පජ්ජමානං උප්පජ්ජි සබ්බං තං ඡන්දමූලකං ඡන්දනිදානං. ඡන්දො හි මූලං දුක්ඛස්ස. යම්පි හි කිඤ්චි අනාගතමද්ධානං දුක්ඛං උප්පජ්ජමානං උප්පජ්ජිස්සති, සබ්බං තං ඡන්දමූලකං ඡන්දනිදානං. ඡන්දො හි මූලං දුක්ඛස්සා’’’ති[Pg.512]. ‘‘අච්ඡරියං, භන්තෙ, අබ්භුතං, භන්තෙ! යාව සුභාසිතං චිදං, භන්තෙ, භගවතා – ‘යං කිඤ්චි දුක්ඛං උප්පජ්ජමානං උප්පජ්ජති, සබ්බං තං ඡන්දමූලකං ඡන්දනිදානං. ඡන්දො හි මූලං දුක්ඛස්සා’ති. අත්ථි මෙ, භන්තෙ, චිරවාසී නාම කුමාරො බහි ආවසථෙ පටිවසති. සො ඛ්වාහං, භන්තෙ, කාලස්සෙව වුට්ඨාය පුරිසං උය්යොජෙමි – ‘ගච්ඡ, භණෙ, චිරවාසිං කුමාරං ජානාහී’ති. යාවකීවඤ්ච, භන්තෙ, සො පුරිසො නාගච්ඡති, තස්ස මෙ හොතෙව අඤ්ඤථත්තං – ‘මා හෙව චිරවාසිස්ස කුමාරස්ස කිඤ්චි ආබාධයිත්ථා’’’ති. “तुला काय वाटते, गामणी? उरुवेलाकप्पमध्ये असे काही लोक आहेत का, ज्यांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे तुला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील?” “आहेत, भन्ते! उरुवेलाकप्पमध्ये असे लोक आहेत, ज्यांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील.” “पण गामणी, उरुवेलाकप्पमध्ये असेही काही लोक आहेत का, ज्यांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे तुला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होणार नाहीत?” “आहेत, भन्ते! उरुवेलाकप्पमध्ये असेही लोक आहेत, ज्यांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होणार नाहीत.” “गामणी, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे उरुवेलाकप्पमधील काही लोकांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे तुला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील?” “भन्ते, उरुवेलाकप्पमधील ज्या लोकांच्या हत्येमुळे, बंधनामुळे, हानीमुळे किंवा निंदेमुळे मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील, त्यांच्याविषयी माझ्या मनात 'छंदराग' (इच्छा आणि आसक्ती) आहे. परंतु, भन्ते, ज्या लोकांच्या बाबतीत मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होणार नाहीत, त्यांच्याविषयी माझ्या मनात छंदराग नाही.” “गामणी, या प्रत्यक्ष पाहिलेल्या, जाणलेल्या, अकालिक (तात्काळ फळ देणाऱ्या), प्राप्त केलेल्या आणि पूर्णपणे अवगत केलेल्या धर्माच्या आधारे तू भूतकाळ आणि भविष्यकाळाबाबत हाच नियम लागू कर: 'भूतकाळात जे काही दुःख उत्पन्न झाले, ते सर्व छंदमूलक (इच्छेवर आधारित) आणि छंदनिदान (इच्छेमुळे उद्भवलेले) होते; कारण छंद (इच्छा/आसक्ती) हेच दुःखाचे मूळ आहे. भविष्यकाळातही जे काही दुःख उत्पन्न होईल, ते सर्व छंदमूलक आणि छंदनिदानच असेल; कारण छंद हेच दुःखाचे मूळ आहे.'” “आश्चर्यकारक आहे, भन्ते! अद्भुत आहे, भन्ते! भगवंतांनी हे किती सुंदर सांगितले आहे की—'जे काही दुःख उत्पन्न होते, ते सर्व छंदमूलक आणि छंदनिदान असते; कारण छंद हेच दुःखाचे मूळ आहे.' भन्ते, माझा 'चिरवासी' नावाचा एक मुलगा आहे, जो नगराबाहेर एका वस्तीत राहतो. भन्ते, मी पहाटेच उठून एका माणसाला पाठवतो आणि सांगतो—'अरे जा, चिरवासी कसा आहे ते पाहून ये.' भन्ते, जोपर्यंत तो माणूस परत येत नाही, तोपर्यंत माझे मन अस्वस्थ असते की—'माझ्या चिरवासी मुलाला काही त्रास तर झाला नसेल ना!'” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, චිරවාසිස්ස කුමාරස්ස වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා උප්පජ්ජෙය්යුං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා’’ති? ‘‘චිරවාසිස්ස මෙ, භන්තෙ, කුමාරස්ස වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා ජීවිතස්සපි සියා අඤ්ඤථත්තං, කිං පන මෙ නුප්පජ්ජිස්සන්ති සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා’’ති. ‘‘ඉමිනාපි ඛො එතං, ගාමණි, පරියායෙන වෙදිතබ්බං – ‘යං කිඤ්චි දුක්ඛං උප්පජ්ජමානං උප්පජ්ජති, සබ්බං තං ඡන්දමූලකං ඡන්දනිදානං. ඡන්දො හි මූලං දුක්ඛස්සා’’’ති. “तुला काय वाटते, गामणी? जर चिरवासी मुलाची हत्या झाली, त्याला बंधन झाले, त्याची हानी झाली किंवा त्याची निंदा झाली, तर तुला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील का?” “भन्ते, जर माझ्या चिरवासी मुलाची हत्या झाली, त्याला बंधन झाले, त्याची हानी झाली किंवा त्याची निंदा झाली, तर माझ्या प्राणावरच बेतेल, मग मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास का बरे उत्पन्न होणार नाहीत?” “गामणी, यावरूनही हे समजून घेतले पाहिजे की—'जे काही दुःख उत्पन्न होते, ते सर्व छंदमूलक आणि छंदनिदान असते; कारण छंद हेच दुःखाचे मूळ आहे.'” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, යදා තෙ චිරවාසිමාතා අදිට්ඨා අහොසි, අස්සුතා අහොසි, තෙ චිරවාසිමාතුයා ඡන්දො වා රාගො වා පෙමං වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘දස්සනං වා තෙ, ගාමණි, ආගම්ම සවනං වා එවං තෙ අහොසි – ‘චිරවාසිමාතුයා ඡන්දො වා රාගො වා පෙමං වා’’’ති? ‘‘එවං, භන්තෙ’’. “तुला काय वाटते, गामणी? जेव्हा तू चिरवासीच्या आईला पाहिले नव्हते किंवा तिच्याबद्दल ऐकलेही नव्हते, तेव्हा तिच्याविषयी तुझ्या मनात छंद (इच्छा), राग (आसक्ती) किंवा प्रेम होते का?” “नाही, भन्ते.” “गामणी, मग तिला पाहिल्यामुळे किंवा तिच्याबद्दल ऐकल्यामुळेच तुझ्या मनात चिरवासीच्या आईबद्दल छंद, राग किंवा प्रेम उत्पन्न झाले का?” “होय, भन्ते.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, චිරවාසිමාතුයා තෙ වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා උප්පජ්ජෙය්යුං සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා’’ති? ‘‘චිරවාසිමාතුයා මෙ, භන්තෙ, වධෙන වා බන්ධෙන වා ජානියා වා ගරහාය වා ජීවිතස්සපි සියා අඤ්ඤථත්තං, කිං පන මෙ නුප්පජ්ජිස්සන්ති සොකපරිදෙවදුක්ඛදොමනස්සුපායාසා’’ති! ‘‘ඉමිනාපි ඛො එතං, ගාමණි, පරියායෙන වෙදිතබ්බං – ‘යං කිඤ්චි දුක්ඛං උප්පජ්ජමානං උප්පජ්ජති, සබ්බං තං ඡන්දමූලකං ඡන්දනිදානං. ඡන්දො හි මූලං දුක්ඛස්සා’’’ති. එකාදසමං. “तुला काय वाटते, गामणी? जर चिरवासीच्या आईची हत्या झाली, तिला बंधन झाले, तिची हानी झाली किंवा तिची निंदा झाली, तर तुला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास उत्पन्न होतील का?” “भन्ते, जर चिरवासीच्या आईची हत्या झाली, तिला बंधन झाले, तिची हानी झाली किंवा तिची निंदा झाली, तर माझ्या प्राणावरच बेतेल, मग मला शोक, परिदेव, दुःख, डोमनस्य आणि उपायास का बरे उत्पन्न होणार नाहीत!” “गामणी, यावरूनही हे समजून घेतले पाहिजे की—'जे काही दुःख उत्पन्न होते, ते सर्व छंदमूलक आणि छंदनिदान असते; कारण छंद हेच दुःखाचे मूळ आहे.'” 12. රාසියසුත්තං १२. रासिय सुत्त 364. අථ [Pg.513] ඛො රාසියො ගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාසියො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සුතං මෙතං, භන්තෙ, ‘සමණො ගොතමො සබ්බං තපං ගරහති, සබ්බං තපස්සිං ලූඛජීවිං එකංසෙන උපවදති උපක්කොසතී’ති. යෙ තෙ, භන්තෙ, එවමාහංසු – ‘සමණො ගොතමො සබ්බං තපං ගරහති, සබ්බං තපස්සිං ලූඛජීවිං එකංසෙන උපවදති උපක්කොසතී’ති, කච්චි තෙ, භන්තෙ, භගවතො වුත්තවාදිනො, න ච භගවන්තං අභූතෙන අබ්භාචික්ඛන්ති, ධම්මස්ස චානුධම්මං බ්යාකරොන්ති, න ච කොචි සහධම්මිකො වාදානුවාදො ගාරය්හං ඨානං ආගච්ඡතී’’ති? ‘‘යෙ තෙ, ගාමණි, එවමාහංසු – ‘සමණො ගොතමො සබ්බං තපං ගරහති, සබ්බං තපස්සිං ලූඛජීවිං එකංසෙන උපවදති උපක්කොසතී’ති, න මෙ තෙ වුත්තවාදිනො, අබ්භාචික්ඛන්ති ච පන මං තෙ අසතා තුච්ඡා අභූතෙන’’. ३६४. त्यानंतर रासिय गामणी जेथे भगवंत होते तेथे गेला. जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या रासिय गामणीने भगवंतांना असे म्हटले— “भन्ते, मी असे ऐकले आहे की—‘श्रमण गौतम सर्व तपाची (तपश्चर्येची) निंदा करतात आणि खडतर जीवन जगणाऱ्या सर्व तपस्वी लोकांवर पूर्णपणे आक्षेप घेतात व त्यांची निर्भत्सना करतात.’ भन्ते, जे लोक असे म्हणतात की—‘श्रमण गौतम सर्व तपाची निंदा करतात आणि खडतर जीवन जगणाऱ्या सर्व तपस्वी लोकांवर पूर्णपणे आक्षेप घेतात व त्यांची निर्भत्सना करतात’, ते भगवंतांच्या वचनांचे योग्य प्रकारे कथन करत आहेत का? ते भगवंतांवर खोटा आरोप तर करत नाहीत ना? ते धर्माला अनुसरूनच स्पष्टीकरण देत आहेत का? आणि त्यांच्या या विधानामुळे कोणताही सहधर्मीय वादविवाद निंदनीय ठरत नाही ना?” “गामणी, जे लोक असे म्हणतात की—‘श्रमण गौतम सर्व तपाची निंदा करतात आणि खडतर जीवन जगणाऱ्या सर्व तपस्वी लोकांवर पूर्णपणे आक्षेप घेतात व त्यांची निर्भत्सना करतात’, ते माझ्या वचनांचे योग्य प्रकारे कथन करत नाहीत. उलट, ते माझ्यावर असत्य, निरर्थक आणि खोटा आरोप करत आहेत.” ‘‘ද්වෙමෙ, ගාමණි, අන්තා පබ්බජිතෙන න සෙවිතබ්බා – යො චායං කාමෙසු කාමසුඛල්ලිකානුයොගො හීනො ගම්මො පොථුජ්ජනිකො අනරියො අනත්ථසංහිතො, යො චායං අත්තකිලමථානුයොගො දුක්ඛො අනරියො අනත්ථසංහිතො. එතෙ තෙ, ගාමණි, උභො අන්තෙ අනුපගම්ම මජ්ඣිමා පටිපදා තථාගතෙන අභිසම්බුද්ධා – චක්ඛුකරණී ඤාණකරණී උපසමාය අභිඤ්ඤාය සම්බොධාය නිබ්බානාය සංවත්තති. කතමා ච සා, ගාමණි, මජ්ඣිමා පටිපදා තථාගතෙන අභිසම්බුද්ධා – චක්ඛුකරණී ඤාණකරණී උපසමාය අභිඤ්ඤාය සම්බොධාය නිබ්බානාය සංවත්තති? අයමෙව අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො, සෙය්යථිදං – සම්මාදිට්ඨි…පෙ… සම්මාසමාධි. අයං ඛො සා, ගාමණි, මජ්ඣිමා පටිපදා තථාගතෙන අභිසම්බුද්ධා – චක්ඛුකරණී ඤාණකරණී උපසමාය අභිඤ්ඤාය සම්බොධාය නිබ්බානාය සංවත්තති. “हे गामणी, प्रव्रजिताने (गृहत्याग केलेल्याने) या दोन टोकांचे सेवन करू नये. कोणते दोन? एक म्हणजे कामवासनांमध्ये कामसुखल्लिकानुयोग (इंद्रियसुखांचा उपभोग घेणे), जो हीन, ग्राम्य (सामान्य लोकांचा), पृथग्जनांचा, अनार्य आणि अनर्थकारक आहे; आणि दुसरा म्हणजे आत्मक्लमथानुयोग (स्वतःला क्लेश देणे), जो दुःखकारक, अनार्य आणि अनर्थकारक आहे. हे गामणी, या दोन्ही टोकांना न जाता तथागतांनी मध्यम मार्गाचा (मज्झिमा पटिपदा) साक्षात्कार केला आहे, जो ज्ञानचक्षू प्रदान करणारा, ज्ञान देणारा असून उपशमासाठी (शांतीसाठी), अभिज्ञेसाठी (विशिष्ट ज्ञानासाठी), संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरतो. आणि हे गामणी, तथागतांनी साक्षात्कार केलेला तो मध्यम मार्ग कोणता आहे, जो ज्ञानचक्षू प्रदान करणारा, ज्ञान देणारा असून उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरतो? तो हाच आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे, जसे की – सम्यक् दृष्टी... सम्यक् समाधी. हे गामणी, हाच तो मध्यम मार्ग आहे ज्याचा तथागतांनी साक्षात्कार केला आहे, जो ज्ञानचक्षू प्रदान करणारा, ज्ञान देणारा असून उपशमासाठी, अभिज्ञेसाठी, संबोधीसाठी आणि निर्वाणासाठी कारणीभूत ठरतो.” ‘‘තයො ඛො මෙ, ගාමණි, කාමභොගිනො සන්තො සංවිජ්ජමානා ලොකස්මිං. කතමෙ තයො? ඉධ, ගාමණි, එකච්චො කාමභොගී අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති, සාහසෙන අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙන න අත්තානං සුඛෙති න පීණෙති න සංවිභජති න පුඤ්ඤානි කරොති. ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චො කාමභොගී අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙන. අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙන අත්තානං සුඛෙති පීණෙති, න සංවිභජති න පුඤ්ඤානි කරොති. ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චො කාමභොගී අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති [Pg.514] සාහසෙන. අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙන අත්තානං සුඛෙති පීණෙති සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොති. “हे गामणी, जगात तीन प्रकारचे कामभोगी (इंद्रियसुखांचा उपभोग घेणारे) लोक अस्तित्वात आहेत. कोणते तीन? हे गामणी, येथे एखादा कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो. अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही, ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मेही करत नाही. हे गामणी, येथे दुसरा एखादा कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो. अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, पण ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे गामणी, येथे तिसरा एखादा कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो. अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मेही करतो.” ‘‘ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චො කාමභොගී ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනපි අසාහසෙනපි. ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙනපි අසාහසෙනපි න අත්තානං සුඛෙති, න පීණෙති, න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොති. ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චො කාමභොගී ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනපි අසාහසෙනපි. ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙනපි අසාහසෙනපි අත්තානං සුඛෙති පීණෙති, න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොති. ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චො කාමභොගී ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති, සාහසෙනපි අසාහසෙනපි. ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙනපි අසාහසෙනපි අත්තානං සුඛෙති පීණෙති සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොති. “हे गामणी, येथे एखादा कामभोगी धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही, ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मेही करत नाही. हे गामणी, येथे दुसरा एखादा कामभोगी धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, पण ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे गामणी, येथे तिसरा एखादा कामभोगी धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने व अधर्माने, बळजबरीने व बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मेही करतो.” ‘‘ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චො කාමභොගී ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙන. ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා අසාහසෙන න අත්තානං සුඛෙති, න පීණෙති, න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොති. ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චො කාමභොගී ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙන. ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා අසාහසෙන අත්තානං සුඛෙති පීණෙති, න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොති. ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චො කාමභොගී ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙන. ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා අසාහසෙන අත්තානං සුඛෙති පීණෙති සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොති. තෙ ච භොගෙ ගධිතො මුච්ඡිතො අජ්ඣොපන්නො අනාදීනවදස්සාවී අනිස්සරණපඤ්ඤො පරිභුඤ්ජති. ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චො කාමභොගී ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙන. ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා අසාහසෙන අත්තානං සුඛෙති පීණෙති සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොති. තෙ ච භොගෙ අගධිතො අමුච්ඡිතො අනජ්ඣොපන්නො ආදීනවදස්සාවී නිස්සරණපඤ්ඤො පරිභුඤ්ජති. “हे गामणी, येथे एखादा कामभोगी धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही, ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मेही करत नाही. हे गामणी, येथे दुसरा एखादा कामभोगी धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, पण ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे गामणी, येथे तिसरा एखादा कामभोगी धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मेही करतो; परंतु तो त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना त्यात आसक्त, मोहित आणि आकंठ बुडलेला असतो, त्यातील दोष पाहत नाही आणि त्यातून मुक्त होण्याचे ज्ञान त्याला नसते. हे गामणी, येथे आणखी एखादा कामभोगी धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवतो. धर्माने आणि बळजबरीशिवाय संपत्ती मिळवून तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मेही करतो; आणि तो त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना त्यात आसक्त न होता, मोहित न होता, आकंठ न बुडता, त्यातील दोष पाहून आणि त्यातून मुक्त होण्याचे ज्ञान ठेवून उपभोग घेतो.” ‘‘තත්ර[Pg.515], ගාමණි, ය්වායං කාමභොගී අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙන, අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙන න අත්තානං සුඛෙති, න පීණෙති, න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොති. අයං, ගාමණි, කාමභොගී තීහි ඨානෙහි ගාරය්හො. කතමෙහි තීහි ඨානෙහි ගාරය්හො? අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනාති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන ගාරය්හො. න අත්තානං සුඛෙති න පීණෙතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන ගාරය්හො. න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොතීති, ඉමිනා තතියෙන ඨානෙන ගාරය්හො. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ඉමෙහි තීහි ඨානෙහි ගාරය්හො. “त्यांच्यामध्ये, हे गामणी, जो कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि अधर्माने व बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही, ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मेही करत नाही; तो कामभोगी, हे गामणी, तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो. कोणत्या तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो? ‘तो अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो’ – या पहिल्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. ‘तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करत नाही’ – या दुसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. ‘तो ती संपत्ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही’ – या तिसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. हे गामणी, हा कामभोगी या तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो.” ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං කාමභොගී අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙන, අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙන අත්තානං සුඛෙති පීණෙති, න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොති. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො, එකෙන ඨානෙන පාසංසො. කතමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො? අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනාති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන ගාරය්හො. න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන ගාරය්හො. කතමෙන එකෙන ඨානෙන පාසංසො? අත්තානං සුඛෙති පීණෙතීති, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන පාසංසො. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ඉමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන පාසංසො. “त्यांच्यामध्ये, हे गामणी, जो कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि अधर्माने व बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, पण ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही; तो कामभोगी, हे गामणी, दोन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो आणि एका कारणामुळे प्रशंसनीय ठरतो. कोणत्या दोन कारणांमुळे तो निंदनीय ठरतो? ‘तो अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो’ – या पहिल्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. ‘तो ती संपत्ती इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही’ – या दुसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. आणि कोणत्या एका कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो? ‘तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो’ – या एका कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. हे गामणी, हा कामभोगी या दोन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो आणि या एका कारणामुळे प्रशंसनीय ठरतो.” ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං කාමභොගී අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙන, අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙන අත්තානං සුඛෙති පීණෙති සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොති. අයං, ගාමණි, කාමභොගී එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො, ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො. කතමෙන එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො? අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනාති, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. කතමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො? අත්තානං සුඛෙති පීණෙතීති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන පාසංසො. සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන පාසංසො. අයං, ගාමණි, කාමභොගී, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො, ඉමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො. “त्यांच्यामध्ये, हे गामणी, जो कामभोगी अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि अधर्माने व बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो, ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मेही करतो; तो कामभोगी, हे गामणी, एका कारणामुळे निंदनीय ठरतो आणि दोन कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो. कोणत्या एका कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो? ‘तो अधर्माने आणि बळजबरीने संपत्ती मिळवतो’ – या एका कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. आणि कोणत्या दोन कारणांमुळे तो प्रशंसनीय ठरतो? ‘तो स्वतःला सुखी व संतुष्ट करतो’ – या पहिल्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. ‘तो ती संपत्ती इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो’ – या दुसऱ्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. हे गामणी, हा कामभोगी या एका कारणामुळे निंदनीय ठरतो आणि या दोन कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो.” ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං කාමභොගී ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනපි අසාහසෙනපි, ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙනපි අසාහසෙනපි න අත්තානං සුඛෙති, න පීණෙති, න සංවිභජති, න [Pg.516] පුඤ්ඤානි කරොති. අයං, ගාමණි, කාමභොගී එකෙන ඨානෙන පාසංසො, තීහි ඨානෙහි ගාරය්හො. කතමෙන එකෙන ඨානෙන පාසංසො? ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙනාති, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන පාසංසො. කතමෙහි තීහි ඨානෙහි ගාරය්හො? අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනාති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන ගාරය්හො. න අත්තානං සුඛෙති, න පීණෙතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන ගාරය්හො. න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොතීති, ඉමිනා තතියෙන ඨානෙන ගාරය්හො. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ඉමිනා එකෙන ඨානෙන පාසංසො, ඉමෙහි තීහි ඨානෙහි ගාරය්හො. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करत नाही, तृप्त करत नाही, इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे ग्रामणी, हा कामभोगी एका कारणाने प्रशंसनीय आहे आणि तीन कारणांनी निंदनीय आहे. कोणत्या एका कारणाने प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या एका कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या तीन कारणांनी निंदनीय आहे? 'तो अन्यायाने, बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो निंदनीय आहे. 'तो स्वतःला सुखी करत नाही, तृप्त करत नाही' - या दुसऱ्या कारणाने तो निंदनीय आहे. 'तो इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही' - या तिसऱ्या कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या एका कारणाने प्रशंसनीय आहे आणि या तीन कारणांनी निंदनीय आहे. ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං කාමභොගී ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනපි අසාහසෙනපි, ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙනපි අසාහසෙනපි අත්තානං සුඛෙති පීණෙති, න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොති. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො, ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො. කතමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො? ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙනාති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන පාසංසො. අත්තානං සුඛෙති පීණෙතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන පාසංසො. කතමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො? අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනාති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන ගාරය්හො. න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන ගාරය්හො. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ඉමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො, ඉමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो, पण इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे ग्रामणी, हा कामभोगी दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि दोन कारणांनी निंदनीय आहे. कोणत्या दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो' - या दुसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या दोन कारणांनी निंदनीय आहे? 'तो अन्यायाने, बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो निंदनीय आहे. 'तो इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही' - या दुसऱ्या कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि या दोन कारणांनी निंदनीय आहे. ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං කාමභොගී ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනපි අසාහසෙනපි, ධම්මාධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා සාහසෙනපි අසාහසෙනපි අත්තානං සුඛෙති පීණෙති සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොති. අයං, ගාමණි, කාමභොගී තීහි ඨානෙහි පාසංසො, එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. කතමෙහි තීහි ඨානෙහි පාසංසො? ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙනාති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන පාසංසො. අත්තානං සුඛෙති පීණෙතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන පාසංසො. සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොතීති, ඉමිනා තතියෙන ඨානෙන පාසංසො. කතමෙන එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො? අධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති සාහසෙනාති[Pg.517], ඉමිනා එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ඉමෙහි තීහි ඨානෙහි පාසංසො, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने व अन्यायाने, बळजबरीने व विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो, इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो. हे ग्रामणी, हा कामभोगी तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि एका कारणाने निंदनीय आहे. कोणत्या तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो' - या दुसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो' - या तिसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या एका कारणाने निंदनीय आहे? 'तो अन्यायाने, बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या एका कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि या एका कारणाने निंदनीय आहे. ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං කාමභොගී ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙන, ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා අසාහසෙන, න අත්තානං සුඛෙති, න පීණෙති, න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොති. අයං, ගාමණි, කාමභොගී එකෙන ඨානෙන පාසංසො, ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො. කතමෙන එකෙන ඨානෙන පාසංසො? ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙනාති, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන පාසංසො. කතමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො? න අත්තානං සුඛෙති, න පීණෙතීති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන ගාරය්හො. න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන ගාරය්හො. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ඉමිනා එකෙන ඨානෙන පාසංසො, ඉමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करत नाही, तृप्त करत नाही, इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे ग्रामणी, हा कामभोगी एका कारणाने प्रशंसनीय आहे आणि दोन कारणांनी निंदनीय आहे. कोणत्या एका कारणाने प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या एका कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या दोन कारणांनी निंदनीय आहे? 'तो स्वतःला सुखी करत नाही, तृप्त करत नाही' - या पहिल्या कारणाने तो निंदनीय आहे. 'तो इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही' - या दुसऱ्या कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या एका कारणाने प्रशंसनीय आहे आणि या दोन कारणांनी निंदनीय आहे. ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං කාමභොගී ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙන, ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා අසාහසෙන අත්තානං සුඛෙති පීණෙති, න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොති. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො, එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. කතමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො? ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙනාති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන පාසංසො. අත්තානං සුඛෙති පීණෙතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන පාසංසො. කතමෙන එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො? න සංවිභජති, න පුඤ්ඤානි කරොතීති, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ඉමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो, पण इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही. हे ग्रामणी, हा कामभोगी दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि एका कारणाने निंदनीय आहे. कोणत्या दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो' - या दुसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या एका कारणाने निंदनीय आहे? 'तो इतरांना वाटत नाही आणि पुण्यकर्मे करत नाही' - या एका कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या दोन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि या एका कारणाने निंदनीय आहे. ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං කාමභොගී ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙන, ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා අසාහසෙන අත්තානං සුඛෙති පීණෙති සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොති, තෙ ච භොගෙ ගධිතො මුච්ඡිතො අජ්ඣොපන්නො අනාදීනවදස්සාවී අනිස්සරණපඤ්ඤො පරිභුඤ්ජති. අයං, ගාමණි, කාමභොගී තීහි ඨානෙහි පාසංසො, එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. කතමෙහි තීහි ඨානෙහි පාසංසො? ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙනාති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන පාසංසො. අත්තානං සුඛෙති පීණෙතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන පාසංසො. සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොතීති, ඉමිනා තතියෙන ඨානෙන පාසංසො[Pg.518]. කතමෙන එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො? තෙ ච භොගෙ ගධිතො මුච්ඡිතො අජ්ඣොපන්නො අනාදීනවදස්සාවී අනිස්සරණපඤ්ඤො පරිභුඤ්ජතීති, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ඉමෙහි තීහි ඨානෙහි පාසංසො, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. हे ग्रामणी, त्या लोकांमध्ये जो हा कामभोगी न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो, आणि न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो, इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो, परंतु त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना तो त्यात आसक्त, मोहित, आकंठ बुडालेला, त्यातील दोष न पाहणारा आणि त्यातून मुक्त होण्याचे ज्ञान नसलेला होऊन तिचा उपभोग घेतो. हे ग्रामणी, हा कामभोगी तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि एका कारणाने निंदनीय आहे. कोणत्या तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे? 'तो न्यायाने, विना-बळजबरीने संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो' - या दुसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. 'तो इतरांना वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो' - या तिसऱ्या कारणाने तो प्रशंसनीय आहे. कोणत्या एका कारणाने निंदनीय आहे? 'तो त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना त्यात आसक्त, मोहित, आकंठ बुडालेला, त्यातील दोष न पाहणारा आणि त्यातून मुक्त होण्याचे ज्ञान नसलेला होऊन तिचा उपभोग घेतो' - या एका कारणाने तो निंदनीय आहे. हे ग्रामणी, हा कामभोगी या तीन कारणांनी प्रशंसनीय आहे आणि या एका कारणाने निंदनीय आहे. ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං කාමභොගී ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙන, ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසිත්වා අසාහසෙන අත්තානං සුඛෙති පීණෙති සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොති. තෙ ච භොගෙ අගධිතො අමුච්ඡිතො අනජ්ඣොපන්නො ආදීනවදස්සාවී නිස්සරණපඤ්ඤො පරිභුඤ්ජති. අයං, ගාමණි, කාමභොගී චතූහි ඨානෙහි පාසංසො. කතමෙහි චතූහි ඨානෙහි පාසංසො? ධම්මෙන භොගෙ පරියෙසති අසාහසෙනාති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන පාසංසො. අත්තානං සුඛෙති පීණෙතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන පාසංසො. සංවිභජති පුඤ්ඤානි කරොතීති, ඉමිනා තතියෙන ඨානෙන පාසංසො. තෙ ච භොගෙ අගධිතො අමුච්ඡිතො අනජ්ඣොපන්නො ආදීනවදස්සාවී නිස්සරණපඤ්ඤො පරිභුඤ්ජතීති, ඉමිනා චතුත්ථෙන ඨානෙන පාසංසො. අයං, ගාමණි, කාමභොගී ඉමෙහි චතූහි ඨානෙහි පාසංසො. हे ग्रामणी! त्या (कामभोगी लोकांमध्ये) जो कामभोगी न्याय्य मार्गाने (धर्माने), बळजबरी न करता संपत्ती मिळवतो; न्याय्य मार्गाने आणि बळजबरी न करता संपत्ती मिळवून स्वतःला सुखी व तृप्त करतो; ती संपत्ती इतरांमध्ये वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो; आणि त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना त्यात आसक्त न होता, मोहित न होता, गुंतून न पडता, त्यातील दोष पाहणारा आणि मुक्तीची प्रज्ञा असणारा होऊन उपभोग घेतो. हे ग्रामणी! हा कामभोगी चार कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो. कोणत्या चार कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो? 'तो न्याय्य मार्गाने, बळजबरी न करता संपत्ती मिळवतो' - या पहिल्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. 'तो स्वतःला सुखी व तृप्त करतो' - या दुसऱ्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. 'तो संपत्ती वाटतो आणि पुण्यकर्मे करतो' - या तिसऱ्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. 'तो त्या संपत्तीचा उपभोग घेताना त्यात आसक्त न होता, मोहित न होता, गुंतून न पडता, त्यातील दोष पाहणारा आणि मुक्तीची प्रज्ञा असणारा होऊन उपभोग घेतो' - या चौथ्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. हे ग्रामणी! हा कामभोगी या चार कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो. ‘‘තයොමෙ, ගාමණි, තපස්සිනො ලූඛජීවිනො සන්තො සංවිජ්ජමානා ලොකස්මිං. කතමෙ තයො? ඉධ, ගාමණි, එකච්චො තපස්සී ලූඛජීවී සද්ධා අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජිතො හොති – ‘අප්පෙව නාම කුසලං ධම්මං අධිගච්ඡෙය්යං, අප්පෙව නාම උත්තරිමනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං සච්ඡිකරෙය්ය’න්ති. සො අත්තානං ආතාපෙති පරිතාපෙති, කුසලඤ්ච ධම්මං නාධිගච්ඡති, උත්තරි ච මනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං න සච්ඡිකරොති. हे ग्रामणी! जगात हे तीन प्रकारचे तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारे लोक अस्तित्वात आहेत. कोणते तीन? हे ग्रामणी! येथे एखादा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य श्रद्धेने घरातून बेघर होऊन प्रव्रजित होतो—'कदाचित मला कुशल धर्म प्राप्त होईल, कदाचित मला मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवता येईल' या विचाराने. तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; परंतु तो कुशल धर्म प्राप्त करत नाही आणि मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेषही प्रत्यक्ष अनुभवत नाही. ‘‘ඉධ පන, ගාමණි, එකච්චො තපස්සී ලූඛජීවී සද්ධා අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජිතො හොති – ‘අප්පෙව නාම කුසලං ධම්මං අධිගච්ඡෙය්යං, අප්පෙව නාම උත්තරිමනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං සච්ඡිකරෙය්ය’න්ති. සො අත්තානං ආතාපෙති පරිතාපෙති, කුසලඤ්හි ඛො ධම්මං අධිගච්ඡති, උත්තරිමනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං න සච්ඡිකරොති. हे ग्रामणी! पुन्हा येथे एखादा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य श्रद्धेने घरातून बेघर होऊन प्रव्रजित होतो—'कदाचित मला कुशल धर्म प्राप्त होईल, कदाचित मला मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवता येईल' या विचाराने. तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; तो कुशल धर्म तर प्राप्त करतो, परंतु मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवत नाही. ‘‘ඉධ [Pg.519] පන, ගාමණි, එකච්චො තපස්සී ලූඛජීවී සද්ධා අගාරස්මා අනගාරියං පබ්බජිතො හොති – ‘අප්පෙව නාම කුසලං ධම්මං අධිගච්ඡෙය්යං, අප්පෙව නාම උත්තරිමනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං සච්ඡිකරෙය්ය’න්ති. සො අත්තානං ආතාපෙති පරිතාපෙති, කුසලඤ්ච ධම්මං අධිගච්ඡති, උත්තරි ච මනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං සච්ඡිකරොති. हे ग्रामणी! पुन्हा येथे एखादा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य श्रद्धेने घरातून बेघर होऊन प्रव्रजित होतो—'कदाचित मला कुशल धर्म प्राप्त होईल, कदाचित मला मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवता येईल' या विचाराने. तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; तो कुशल धर्मही प्राप्त करतो आणि मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेषही प्रत्यक्ष अनुभवतो. ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං තපස්සී ලූඛජීවී අත්තානං ආතාපෙති පරිතාපෙති, කුසලඤ්ච ධම්මං නාධිගච්ඡති, උත්තරි ච මනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං න සච්ඡිකරොති. අයං, ගාමණි, තපස්සී ලූඛජීවී තීහි ඨානෙහි ගාරය්හො. කතමෙහි තීහි ඨානෙහි ගාරය්හො? අත්තානං ආතාපෙති පරිතාපෙතීති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන ගාරය්හො. කුසලඤ්ච ධම්මං නාධිගච්ඡතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන ගාරය්හො. උත්තරි ච මනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං න සච්ඡිකරොතීති, ඉමිනා තතියෙන ඨානෙන ගාරය්හො. අයං, ගාමණි, තපස්සී ලූඛජීවී, ඉමෙහි තීහි ඨානෙහි ගාරය්හො. हे ग्रामणी! त्या (तपस्वी लोकांमध्ये) जो तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; परंतु कुशल धर्म प्राप्त करत नाही आणि मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेषही प्रत्यक्ष अनुभवत नाही. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो. कोणत्या तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो? 'तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो' - या पहिल्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. 'तो कुशल धर्म प्राप्त करत नाही' - या दुसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. 'तो मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवत नाही' - या तिसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य या तीन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो. ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං තපස්සී ලූඛජීවී අත්තානං ආතාපෙති පරිතාපෙති, කුසලඤ්හි ඛො ධම්මං අධිගච්ඡති, උත්තරි ච මනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං න සච්ඡිකරොති. අයං, ගාමණි, තපස්සී ලූඛජීවී ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො, එකෙන ඨානෙන පාසංසො. කතමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො? අත්තානං ආතාපෙති පරිතාපෙතීති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන ගාරය්හො. උත්තරි ච මනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං න සච්ඡිකරොතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන ගාරය්හො. කතමෙන එකෙන ඨානෙන පාසංසො? කුසලඤ්හි ඛො ධම්මං අධිගච්ඡතීති, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන පාසංසො. අයං, ගාමණි, තපස්සී ලූඛජීවී ඉමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි ගාරය්හො, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන පාසංසො. हे ग्रामणी! त्या (तपस्वी लोकांमध्ये) जो तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; तो कुशल धर्म तर प्राप्त करतो, परंतु मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवत नाही. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य दोन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो आणि एका कारणामुळे प्रशंसनीय ठरतो. कोणत्या दोन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो? 'तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो' - या पहिल्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. 'तो मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवत नाही' - या दुसऱ्या कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. कोणत्या एका कारणामुळे प्रशंसनीय ठरतो? 'तो कुशल धर्म प्राप्त करतो' - या एका कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य या दोन कारणांमुळे निंदनीय ठरतो आणि या एका कारणामुळे प्रशंसनीय ठरतो. ‘‘තත්ර, ගාමණි, ය්වායං තපස්සී ලූඛජීවී අත්තානං ආතාපෙති පරිතාපෙති, කුසලඤ්ච ධම්මං අධිගච්ඡති, උත්තරි ච මනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං සච්ඡිකරොති. අයං, ගාමණි, තපස්සී ලූඛජීවී එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො, ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො. කතමෙන එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො? අත්තානං ආතාපෙති පරිතාපෙතීති, ඉමිනා එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො. කතමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො? කුසලඤ්ච ධම්මං අධිගච්ඡතීති, ඉමිනා පඨමෙන ඨානෙන පාසංසො. උත්තරි ච මනුස්සධම්මා අලමරියඤාණදස්සනවිසෙසං සච්ඡිකරොතීති, ඉමිනා දුතියෙන ඨානෙන පාසංසො[Pg.520]. අයං, ගාමණි, තපස්සී ලූඛජීවී ඉමිනා එකෙන ඨානෙන ගාරය්හො, ඉමෙහි ද්වීහි ඨානෙහි පාසංසො. हे ग्रामणी! त्या (तपस्वी लोकांमध्ये) जो तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो; तो कुशल धर्मही प्राप्त करतो आणि मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेषही प्रत्यक्ष अनुभवतो. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य एका कारणामुळे निंदनीय ठरतो आणि दोन कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो. कोणत्या एका कारणामुळे निंदनीय ठरतो? 'तो स्वतःला क्लेश देतो, अत्यंत पीडित करतो' - या एका कारणामुळे तो निंदनीय ठरतो. कोणत्या दोन कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो? 'तो कुशल धर्म प्राप्त करतो' - या पहिल्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. 'तो मानवी धर्मापलीकडील श्रेष्ठ असे आर्य ज्ञानदर्शन विशेष प्रत्यक्ष अनुभवतो' - या दुसऱ्या कारणामुळे तो प्रशंसनीय ठरतो. हे ग्रामणी! हा तपस्वी आणि खडतर जीवन जगणारा मनुष्य या एका कारणामुळे निंदनीय ठरतो आणि या दोन कारणांमुळे प्रशंसनीय ठरतो. ‘‘තිස්සො ඉමා, ගාමණි, සන්දිට්ඨිකා නිජ්ජරා අකාලිකා එහිපස්සිකා ඔපනෙය්යිකා පච්චත්තං වෙදිතබ්බා විඤ්ඤූහි. කතමා තිස්සො? යං රත්තො රාගාධිකරණං අත්තබ්යාබාධායපි චෙතෙති, පරබ්යාබාධායපි චෙතෙති, උභයබ්යාබාධායපි චෙතෙති. රාගෙ පහීනෙ නෙවත්තබ්යාබාධාය චෙතෙති, න පරබ්යාබාධාය චෙතෙති, න උභයබ්යාබාධාය චෙතෙති. සන්දිට්ඨිකා නිජ්ජරා අකාලිකා එහිපස්සිකා ඔපනෙය්යිකා පච්චත්තං වෙදිතබ්බා විඤ්ඤූහි. යං දුට්ඨො දොසාධිකරණං අත්තබ්යාබාධායපි චෙතෙති, පරබ්යාබාධායපි චෙතෙති, උභයබ්යාබාධායපි චෙතෙති. දොසෙ පහීනෙ නෙවත්තබ්යාබාධාය චෙතෙති, න පරබ්යාබාධාය චෙතෙති, න උභයබ්යාබාධාය චෙතෙති. සන්දිට්ඨිකා නිජ්ජරා අකාලිකා එහිපස්සිකා ඔපනෙය්යිකා පච්චත්තං වෙදිතබ්බා විඤ්ඤූහි. යං මූළ්හො මොහාධිකරණං අත්තබ්යාබාධායපි චෙතෙති, පරබ්යාබාධායපි චෙතෙති, උභයබ්යාබාධායපි චෙතෙති. මොහෙ පහීනෙ නෙවත්තබ්යාබාධාය චෙතෙති, න පරබ්යාබාධාය චෙතෙති, න උභයබ්යාබාධාය චෙතෙති. සන්දිට්ඨිකා නිජ්ජරා අකාලිකා එහිපස්සිකා ඔපනෙය්යිකා පච්චත්තං වෙදිතබ්බා විඤ්ඤූහි. ඉමා ඛො, ගාමණි, තිස්සො සන්දිට්ඨිකා නිජ්ජරා අකාලිකා එහිපස්සිකා ඔපනෙය්යිකා පච්චත්තං වෙදිතබ්බා විඤ්ඤූහී’’ති. “हे ग्रामणी, या तीन प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या (संदीट्ठिक), तात्काळ फळ देणाऱ्या (अकालिक), ‘या आणि पहा’ असे सांगण्यास योग्य (एहिपस्सिक), स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य (ओपनेय्यिक) आणि सुज्ञांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोग्या (पच्चत्तं वेदितब्बा विञ्ञूहि) क्लेश-क्षयाच्या (निर्जरा) गोष्टी आहेत. कोणत्या तीन? (१) जो मनुष्य रागाने (आसक्तीने) ग्रासलेला असतो, तो रागाच्या प्रभावामुळे स्वतःच्या विनाशाचा विचार करतो, इतरांच्या विनाशाचा विचार करतो आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करतो. राग नष्ट झाल्यावर, तो स्वतःच्या विनाशाचा विचार करत नाही, इतरांच्या विनाशाचा विचार करत नाही आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करत नाही. हा प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, ‘या आणि पहा’ असे सांगण्यास योग्य, स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोगा क्लेश-क्षय आहे. (२) जो मनुष्य द्वेषाने ग्रासलेला असतो, तो द्वेषाच्या प्रभावामुळे स्वतःच्या विनाशाचा विचार करतो, इतरांच्या विनाशाचा विचार करतो आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करतो. द्वेष नष्ट झाल्यावर, तो स्वतःच्या विनाशाचा विचार करत नाही, इतरांच्या विनाशाचा विचार करत नाही आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करत नाही. हा प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, ‘या आणि पहा’ असे सांगण्यास योग्य, स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोगा क्लेश-क्षय आहे. (३) जो मनुष्य मोहाने ग्रासलेला असतो, तो मोहाच्या प्रभावामुळे स्वतःच्या विनाशाचा विचार करतो, इतरांच्या विनाशाचा विचार करतो आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करतो. मोह नष्ट झाल्यावर, तो स्वतःच्या विनाशाचा विचार करत नाही, इतरांच्या विनाशाचा विचार करत नाही आणि दोघांच्याही विनाशाचा विचार करत नाही. हा प्रत्यक्ष दिसणारा, तात्काळ फळ देणारा, ‘या आणि पहा’ असे सांगण्यास योग्य, स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोगा क्लेश-क्षय आहे. हे ग्रामणी, या तीन प्रत्यक्ष दिसणाऱ्या, तात्काळ फळ देणाऱ्या, ‘या आणि पहा’ असे सांगण्यास योग्य, स्वतःमध्ये धारण करण्यास योग्य आणि सुज्ञांनी स्वतःच्या अंतःकरणात अनुभवण्याजोग्या क्लेश-क्षयाच्या गोष्टी आहेत.” එවං වුත්තෙ, රාසියො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ…පෙ… උපාසකං මං භගවා ධාරෙතු අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. ද්වාදසමං. असे म्हटले असता, रासिय ग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “अतिशय सुंदर, भन्ते! ... भगवंतांनी मला आजपासून जन्मभर शरण आलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.” बारावे सुत्त समाप्त. 13. පාටලියසුත්තං १३. पाटलीय सुत्त 365. එකං සමයං භගවා කොලියෙසු විහරති උත්තරං නාම කොලියානං නිගමො. අථ ඛො පාටලියො ගාමණි යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො පාටලියො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘සුතං මෙතං, භන්තෙ – ‘සමණො ගොතමො මායං ජානාතී’ති. යෙ තෙ, භන්තෙ, එවමාහංසු – ‘සමණො ගොතමො මායං ජානාතී’ති, කච්චි තෙ, භන්තෙ, භගවතො [Pg.521] වුත්තවාදිනො, න ච භගවන්තං අභූතෙන අබ්භාචික්ඛන්ති, ධම්මස්ස චානුධම්මං බ්යාකරොන්ති, න ච කොචි සහධම්මිකො වාදානුවාදො ගාරය්හං ඨානං ආගච්ඡති? අනබ්භාචික්ඛිතුකාමා හි මයං, භන්තෙ, භගවන්ත’’න්ති. ‘‘යෙ තෙ, ගාමණි, එවමාහංසු – ‘සමණො ගොතමො මායං ජානාතී’ති, වුත්තවාදිනො චෙව මෙ, තෙ න ච මං අභූතෙන අබ්භාචික්ඛන්ති, ධම්මස්ස චානුධම්මං බ්යාකරොන්ති, න ච කොචි සහධම්මිකො වාදානුවාදො ගාරය්හං ඨානං ආගච්ඡතීති, සච්චංයෙව කිර, භො, මයං තෙසං සමණබ්රාහ්මණානං න සද්දහාම – ‘සමණො ගොතමො මායං ජානාතීති, සමණො ඛලු භො ගොතමො මායාවී’ති. යො නු ඛො, ගාමණි, එවං වදෙති – ‘අහං මායං ජානාමී’ති, සො එවං වදෙති – ‘අහං මායාවී’ති. තථෙව තං භගවා හොති, තථෙව තං සුගත හොතී’’ති. තෙන හි, ගාමණි, තඤ්ඤෙවෙත්ථ පටිපුච්ඡිස්සාමි; යථා තෙ ඛමෙය්ය, තථා තං බ්යාකරෙය්යාසි – ३६५. एकदा भगवान कोलिय देशात ‘उत्तर’ नावाच्या कोलियांच्या नगरात विहार करत होते. तेव्हा पाटलीय ग्रामणी भगवंतांकडे गेला; जवळ जाऊन भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेला पाटलीय ग्रामणी भगवंतांना म्हणाला – “भन्ते, मी असे ऐकले आहे की – ‘श्रमण गौतम माया (जादू) जाणतात.’ भन्ते, जे असे म्हणतात की ‘श्रमण गौतम माया जाणतात’, ते भगवंतांच्या वचनानुसारच बोलत आहेत ना? ते भगवंतांवर खोटा आळ तर आणत नाहीत ना? ते धर्माला अनुसरूनच स्पष्टीकरण देत आहेत ना? आणि त्यांच्या विधानावरून कोणताही कायदेशीर आक्षेप किंवा निंदा करण्याची जागा निर्माण होत नाही ना? कारण भन्ते, आम्हाला भगवंतांवर खोटा आळ आणण्याची इच्छा नाही.” “हे ग्रामणी, जे असे म्हणतात की ‘श्रमण गौतम माया जाणतात’, ते मेरे वचनानुसारच बोलत आहेत आणि माझ्यावर खोटा आळ आणत नाहीत. ते धर्माला अनुसरूनच स्पष्टीकरण देत आहेत आणि त्यांच्या विधानावरून निंदा करण्याची कोणतीही जागा निर्माण होत नाही.” “भन्ते, मग तर आम्ही त्या श्रमण-ब्राह्मणांच्या विधानावर विश्वास ठेवला नव्हता जे म्हणत होते की ‘श्रमण गौतम माया जाणतात.’ खरोखरच, भन्ते, श्रमण गौतम तर मायावी (जादूगार) आहेत!” “हे ग्रामणी, जो असे म्हणतो की ‘मी माया जाणतो’, तो असेही म्हणतो का की ‘मी मायावी आहे’?” “तसेच आहे, भगवन्! तसेच आहे, सुगत!” “तर मग, हे ग्रामणी, मी तुला याच विषयावर काही प्रश्न विचारतो. तुला जसे योग्य वाटेल तसे उत्तर दे –” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, ජානාසි ත්වං කොලියානං ලම්බචූළකෙ භටෙ’’ති? ‘‘ජානාමහං, භන්තෙ, කොලියානං ලම්බචූළකෙ භටෙ’’ති. ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, කිමත්ථියා කොලියානං ලම්බචූළකා භටා’’ති? ‘‘යෙ ච, භන්තෙ, කොලියානං චොරා තෙ ච පටිසෙධෙතුං, යානි ච කොලියානං දූතෙය්යානි තානි ච වහාතුං, එතදත්ථියා, භන්තෙ, කොලියානං ලම්බචූළකා භටා’’ති. ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, ජානාසි ත්වං කොලියානං ලම්බචූළකෙ භටෙ සීලවන්තෙ වා තෙ දුස්සීලෙ වා’’ති? ‘‘ජානාමහං, භන්තෙ, කොලියානං ලම්බචූළකෙ භටෙ දුස්සීලෙ පාපධම්මෙ; යෙ ච ලොකෙ දුස්සීලා පාපධම්මා කොලියානං ලම්බචූළකා භටා තෙසං අඤ්ඤතරා’’ති. ‘‘යො නු ඛො, ගාමණි, එවං වදෙය්ය – ‘පාටලියො ගාමණි ජානාති කොලියානං ලම්බචූළකෙ භටෙ දුස්සීලෙ පාපධම්මෙ, පාටලියොපි ගාමණි දුස්සීලො පාපධම්මො’ති, සම්මා නු ඛො සො වදමානො වදෙය්යා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ! අඤ්ඤෙ, භන්තෙ, කොලියානං ලම්බචූළකා භටා, අඤ්ඤොහමස්මි. අඤ්ඤථාධම්මා කොලියානං ලම්බචූළකා භටා, අඤ්ඤථාධම්මොහමස්මී’’ති. ‘‘ත්වඤ්හි නාම, ගාමණි, ලච්ඡසි – ‘පාටලියො ගාමණි ජානාති කොලියානං ලම්බචූළකෙ භටෙ දුස්සීලෙ පාපධම්මෙ, න ච පාටලියො ගාමණි දුස්සීලො පාපධම්මො’ති, කස්මා තථාගතො න ලච්ඡති – ‘තථාගතො මායං ජානාති, න ච තථාගතො මායාවී’ති? මායං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, මායාය [Pg.522] ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච මායාවී කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි’’. “तुला काय वाटते, ग्रामणी? तू कोलियांच्या लम्बचूळक (लोबत्या तुऱ्याचे फेटे घालणाऱ्या) सेवकांना ओळखतोस का?” “होय, भन्ते! मी कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांना ओळखतो.” “तुला काय वाटते, ग्रामणी? कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांचे काय काम असते?” “भन्ते, कोलियांच्या वतीने चोरांना पकडणे आणि कोलियांचे निरोप (संदेश) पोहोचवणे, हेच कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांचे काम असते.” “तुला काय वाटते, ग्रामणी? तू कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांना शीलवान समजतोस की दुःशील (शीलहीन)?” “भन्ते, मी कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांना दुःशील आणि पापी स्वभावाचे म्हणून ओळखतो. जगात जे कोणी दुःशील आणि पापी स्वभावाचे लोक आहेत, त्यांपैकीच ते काही आहेत.” “हे ग्रामणी, जर कोणी असे म्हटले की – ‘पाटलीय ग्रामणी कोलियांच्या दुःशील व पापी लम्बचूळक सेवकांना ओळखतो, म्हणून पाटलीय ग्रामणी सुद्धा दुःशील आणि पापी आहे,’ तर त्याचे असे बोलणे योग्य ठरेल का?” “अजिबात नाही, भन्ते! कोलियांचे लम्बचूळक सेवक वेगळे आहेत आणि मी वेगळा आहे. कोलियांच्या लम्बचूळक सेवकांचा स्वभाव वेगळा आहे आणि माझा स्वभाव वेगळा आहे.” “हे ग्रामणी, जर तुझ्या बाबतीत असे म्हटले जाऊ शकते की – ‘पाटलीय ग्रामणी कोलियांच्या दुःशील व पापी लम्बचूळक सेवकांना ओळखतो, पण पाटलीय ग्रामणी स्वतः दुःशील आणि पापी नाही,’ तर तथागतांच्या बाबतीत असे का म्हटले जाऊ शकत नाही की – ‘तथागत माया (जादू) जाणतात, पण तथागत स्वतः मायावी (जादूगार) नाहीत’? हे ग्रामणी, मी मायाही जाणतो आणि मायेचे फळही जाणतो; तसेच मायेचा प्रयोग करणारा मनुष्य शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर कशा प्रकारे दुर्गतीला, अपायाला, विनिपाताला आणि नरकाला प्राप्त होतो, हेही मी चांगल्या प्रकारे जाणतो.” ‘‘පාණාතිපාතං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, පාණාතිපාතස්ස ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච පාණාතිපාතී කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි. අදින්නාදානං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, අදින්නාදානස්ස ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච අදින්නාදායී කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි. කාමෙසුමිච්ඡාචාරං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, කාමෙසුමිච්ඡාචාරස්ස ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච කාමෙසුමිච්ඡාචාරී කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි. මුසාවාදං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, මුසාවාදස්ස ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච මුසාවාදී කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි. පිසුණවාචං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, පිසුණවාචාය ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච පිසුණවාචො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි. ඵරුසවාචං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, ඵරුසවාචාය ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච ඵරුසවාචො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි. සම්ඵප්පලාපං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, සම්ඵප්පලාපස්ස ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච සම්ඵප්පලාපී කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි. අභිජ්ඣං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, අභිජ්ඣාය ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච අභිජ්ඣාලු කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි. බ්යාපාදපදොසං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, බ්යාපාදපදොසස්ස ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච බ්යාපන්නචිත්තො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි. මිච්ඡාදිට්ඨිං චාහං, ගාමණි, පජානාමි, මිච්ඡාදිට්ඨියා ච විපාකං, යථාපටිපන්නො ච මිච්ඡාදිට්ඨිකො කායස්ස භෙදා පරං මරණා අපායං දුග්ගතිං විනිපාතං නිරයං උපපජ්ජති තඤ්ච පජානාමි. हे ग्रामणी, मी प्राणातिपात (प्राणहत्या) जाणतो आणि प्राणातिपाताचा विपाक (परिणाम) देखील जाणतो. तसेच, प्राणातिपात करणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात (नरकात) उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी अदिन्नादान (चोरी) जाणतो आणि अदिन्नादानाचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, अदिन्नादान करणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी कामेसुमिच्छाचार (कामोपभोगातील व्यभिचार) जाणतो आणि कामेसुमिच्छाचाराचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, कामेसुमिच्छाचार करणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी मुसावाद (असत्य बोलणे) जाणतो आणि मुसावादाचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, मुसावाद बोलणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी पिसुणवाचा (चहाडी) जाणतो आणि पिसुणवाचेचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, पिसुणवाचा बोलणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी फरुसवाचा (कठोर बोलणे) जाणतो आणि फरुसवाचेचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, फरुसवाचा बोलणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी सम्फप्पलाप (व्यर्थ बडबड) जाणतो आणि सम्फप्पलापाचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, सम्फप्पलाप करणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी अभिध्या (लोभ) जाणतो आणि अभिध्येचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, अभिध्या बाळगणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी व्यापाद-प्रदोष (द्वेषयुक्त विचार) जाणतो आणि व्यापाद-प्रदोषाचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, व्यापादयुक्त चित्त असलेला मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. हे ग्रामणी, मी मिच्छादिट्ठी (मिथ्या दृष्टी) जाणतो आणि मिच्छादिट्ठीचा विपाक देखील जाणतो. तसेच, मिच्छादिट्ठी बाळगणारा मनुष्य कशा प्रकारे आचरण करून, काया भेदून मृत्यूनंतर अपाय, दुर्गती, विनिपात आणि निरयात उत्पन्न होतो, हे देखील मी जाणतो. ‘‘සන්ති හි, ගාමණි, එකෙ සමණබ්රාහ්මණා එවංවාදිනො එවංදිට්ඨිනො – ‘යො කොචි පාණමතිපාතෙති, සබ්බො සො දිට්ඨෙව ධම්මෙ දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදයති. යො කොචි අදින්නං ආදියති, සබ්බො සො දිට්ඨෙව ධම්මෙ [Pg.523] දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදයති. යො කොචි කාමෙසු මිච්ඡා චරති, සබ්බො සො දිට්ඨෙව ධම්මෙ දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදයති. යො කොචි මුසා භණති, සබ්බො සො දිට්ඨෙව ධම්මෙ දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදයතී’’’ති. हे ग्रामणी, काही श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे आणि अशा मताचे आहेत की—'जो कोणी प्राणातिपात (प्राणहत्या) करतो, तो सर्व या प्रत्यक्ष जन्मातच (दृष्टधर्मातच) दुःख आणि दौर्मनस्य (मानसिक क्लेश) भोगतो. जो कोणी अदिन्नादान (चोरी) करतो, तो सर्व या प्रत्यक्ष जन्मातच दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो. जो कोणी कामोपभोगात व्यभिचार करतो, तो सर्व या प्रत्यक्ष जन्मातच दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो. जो कोणी असत्य बोलतो, तो सर्व या प्रत्यक्ष जन्मातच दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो.' ‘‘දිස්සති ඛො පන, ගාමණි, ඉධෙකච්චො මාලී කුණ්ඩලී සුන්හාතො සුවිලිත්තො කප්පිතකෙසමස්සු ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙන්තො. තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො කිං අකාසි මාලී කුණ්ඩලී සුන්හාතො සුවිලිත්තො කප්පිතකෙසමස්සු ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙතී’ති? තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො රඤ්ඤො පච්චත්ථිකං පසය්හ ජීවිතා වොරොපෙසි. තස්ස රාජා අත්තමනො අභිහාරමදාසි. තෙනායං පුරිසො මාලී කුණ්ඩලී සුන්හාතො සුවිලිත්තො කප්පිතකෙසමස්සු, ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙතී’’’ති. परंतु, हे ग्रामणी, या जगात एखादा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केशरचना व दाढी व्यवस्थित केलेली आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होताना दिसतो. लोक त्याच्याबद्दल असे विचारतात—'अहो! या माणसाने असे काय केले आहे, ज्यामुळे तो फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केशरचना व दाढी व्यवस्थित केलेली आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होत आहे?' त्यावर लोक असे उत्तर देतात—'अहो! या माणसाने राजाच्या शत्रूवर हल्ला करून त्याला जिवंत मारले (त्याचे प्राण घेतले). राजाने प्रसन्न होऊन त्याला मोठा पुरस्कार दिला. म्हणूनच हा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केशरचना व दाढी व्यवस्थित केलेली आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होत आहे.' ‘‘දිස්සති ඛො, ගාමණි, ඉධෙකච්චො දළ්හාය රජ්ජුයා පච්ඡාබාහං ගාළ්හබන්ධනං බන්ධිත්වා ඛුරමුණ්ඩං කරිත්වා ඛරස්සරෙන පණවෙන රථියාය රථියං සිඞ්ඝාටකෙන සිඞ්ඝාටකං පරිනෙත්වා, දක්ඛිණෙන ද්වාරෙන නික්ඛාමෙත්වා, දක්ඛිණතො නගරස්ස සීසං ඡිජ්ජමානො. තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො කිං අකාසි, දළ්හාය රජ්ජුයා පච්ඡාබාහං ගාළ්හබන්ධනං බන්ධිත්වා ඛුරමුණ්ඩං කරිත්වා ඛරස්සරෙන පණවෙන රථියාය රථියං සිඞ්ඝාටකෙන සිඞ්ඝාටකං පරිනෙත්වා දක්ඛිණෙන ද්වාරෙන නික්ඛාමෙත්වා දක්ඛිණතො නගරස්ස සීසං ඡින්දතී’ති ? තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො රාජවෙරී ඉත්ථිං වා පුරිසං වා ජීවිතා වොරොපෙසි, තෙන නං රාජානො ගහෙත්වා එවරූපං කම්මකාරණං කාරෙන්තී’’’ති. तसेच, हे ग्रामणी, या जगात एखादा मनुष्य मजबूत दोरीने पाठीमागे हात घट्ट बांधलेला, डोके पूर्णपणे मुंडण केलेला, कर्कश आवाजाच्या ढोलाच्या तालावर गल्लीगल्लीतून आणि चौकाचौकातून फिरवला जाणारा, आणि नंतर दक्षिण दरवाजातून बाहेर नेऊन शहराच्या दक्षिणेला त्याचे शीर कापले जात असताना दिसतो. लोक त्याच्याबद्दल असे विचारतात—'अहो! या माणसाने असे काय केले आहे, ज्यामुळे मजबूत दोरीने पाठीमागे हात घट्ट बांधून, डोके मुंडण करून, कर्कश आवाजाच्या ढोलाच्या तालावर गल्लीगल्लीतून आणि चौकाचौकातून फिरवून, दक्षिण दरवाजातून बाहेर नेऊन शहराच्या दक्षिणेला त्याचे शीर कापले जात आहे?' त्यावर लोक असे उत्तर देतात—'अहो! हा मनुष्य राजाचा शत्रू होता, त्याने एखाद्या स्त्रीचे किंवा पुरुषाचे प्राण घेतले होते. म्हणूनच राजांनी त्याला पकडून अशी कठोर शिक्षा दिली आहे.' ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අපි නු තෙ එවරූපං දිට්ඨං වා සුතං වා’’ති? ‘‘දිට්ඨඤ්ච නො, භන්තෙ, සුතඤ්ච සුය්යිස්සති චා’’ති. ‘‘තත්ර, ගාමණි, යෙ තෙ සමණබ්රාහ්මණා එවංවාදිනො එවංදිට්ඨිනො – ‘යො කොචි පාණමතිපාතෙති, සබ්බො සො දිට්ඨෙව ධම්මෙ දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදයතී’ති, සච්චං වා තෙ ආහංසු මුසා වා’’ති? ‘‘මුසා, භන්තෙ’’. ‘‘යෙ පන තෙ තුච්ඡං මුසා විලපන්ති, සීලවන්තො වා තෙ දුස්සීලා වා’’ති? ‘‘දුස්සීලා, භන්තෙ’’. ‘‘යෙ පන තෙ දුස්සීලා [Pg.524] පාපධම්මා මිච්ඡාපටිපන්නා වා තෙ සම්මාපටිපන්නා වා’’ති? ‘‘මිච්ඡාපටිපන්නා, භන්තෙ’’. ‘‘යෙ පන තෙ මිච්ඡාපටිපන්නා මිච්ඡාදිට්ඨිකා වා තෙ සම්මාදිට්ඨිකා වා’’ති? ‘‘මිච්ඡාදිට්ඨිකා, භන්තෙ’’. ‘‘යෙ පන තෙ මිච්ඡාදිට්ඨිකා කල්ලං නු තෙසු පසීදිතු’’න්ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. यावर तुला काय वाटते, हे ग्रामणी? तू असे कधी पाहिले किंवा ऐकले आहे का?'' ''भन्ते, आम्ही हे पाहिले देखील आहे आणि ऐकले देखील आहे, आणि पुढेही ऐकू येईल.'' ''अशा वेळी, हे ग्रामणी, जे श्रमण व ब्राह्मण असे प्रतिपादन करणारे आणि अशा मताचे आहेत की—'जो कोणी प्राणातिपात करतो, तो सर्व या प्रत्यक्ष जन्मातच दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो,' ते खरे बोलतात की खोटे?'' ''खोटे बोलतात, भन्ते.'' ''आणि जे असे व्यर्थ असत्य बोलतात, ते शीलवान आहेत की दुःशील (शीलहीन)?'' ''दुःशील आहेत, भन्ते.'' ''आणि जे दुःशील, पापी प्रवृत्तीचे आहेत, ते चुकीच्या मार्गाने चालणारे (मिथ्याप्रतिपन्न) आहेत की योग्य मार्गाने चालणारे (सम्यक्प्रतिपन्न)?'' ''चुकीच्या मार्गाने चालणारे आहेत, भन्ते.'' ''आणि जे चुकीच्या मार्गाने चालणारे आहेत, ते मिथ्यादृष्टी (चुकीची दृष्टी असणारे) आहेत की सम्यग्दृष्टी (योग्य दृष्टी असणारे)?'' ''मिथ्यादृष्टी आहेत, भन्ते.'' ''आणि जे मिथ्यादृष्टी आहेत, त्यांच्यावर श्रद्धा ठेवणे किंवा त्यांच्याविषयी आदर बाळगणे योग्य आहे का?'' ''नाही, भन्ते, हे मुळीच योग्य नाही. ‘‘දිස්සති ඛො පන, ගාමණි, ඉධෙකච්චො මාලී කුණ්ඩලී…පෙ… ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙන්තො. තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො කිං අකාසි මාලී කුණ්ඩලී…පෙ… ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙතී’ති? තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො රඤ්ඤො පච්චත්ථිකස්ස පසය්හ රතනං අහාසි. තස්ස රාජා අත්තමනො අභිහාරමදාසි. තෙනායං පුරිසො මාලී කුණ්ඩලී…පෙ… ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙතී’’’ති. तसेच, हे ग्रामणी, या जगात एखादा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होताना दिसतो. लोक त्याच्याबद्दल असे विचारतात—'अहो! या माणसाने असे काय केले आहे, ज्यामुळे तो फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होत आहे?' त्यावर लोक असे उत्तर देतात—'अहो! या माणसाने राजाच्या शत्रूवर हल्ला करून त्याचे रत्न (मौल्यवान संपत्ती) चोरले. राजाने प्रसन्न होऊन त्याला मोठा पुरस्कार दिला. म्हणूनच हा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... आणि स्त्रियांसोबत कामोपभोगात जणू राजासारखा रममाण होत आहे.' ‘‘දිස්සති ඛො, ගාමණි, ඉධෙකච්චො දළ්හාය රජ්ජුයා…පෙ… දක්ඛිණතො නගරස්ස සීසං ඡිජ්ජමානො තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො කිං අකාසි දළ්හාය රජ්ජුයා…පෙ… දක්ඛිණතො නගරස්ස සීසං ඡින්දතී’ති? තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො ගාමා වා අරඤ්ඤා වා අදින්නං ථෙය්යසඞ්ඛාතං ආදියි. තෙන නං රාජානො ගහෙත්වා එවරූපං කම්මකාරණං කාරෙන්තී’ති. තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අපි නු තෙ එවරූපං දිට්ඨං වා සුතං වා’’ති? ‘‘දිට්ඨඤ්ච නො, භන්තෙ, සුතඤ්ච සුය්යිස්සති චා’’ති. ‘‘තත්ර, ගාමණි, යෙ තෙ සමණබ්රාහ්මණා එවංවාදිනො එවංදිට්ඨිනො – ‘යො කොචි අදින්නං ආදියති, සබ්බො සො දිට්ඨෙව ධම්මෙ දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදයතී’ති, සච්චං වා තෙ ආහංසු මුසා වාති…පෙ… කල්ලං නු තෙසු පසීදිතු’’න්ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “हे ग्रामणी, येथे एखादा मनुष्य मजबूत दोरीने [हात मागे बांधून]...पे... शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात असताना दिसतो. लोक त्याला पाहून असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने काय केले आहे, ज्यामुळे मजबूत दोरीने...पे... शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात आहे?' त्यावर लोक असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने गावातील किंवा अरण्यातील न दिलेली वस्तू चोरीच्या उद्देशाने घेतली (चोरली). म्हणूनच राजांनी त्याला पकडून अशी शिक्षा दिली आहे.' यावर तुला काय वाटते, ग्रामणी? तू असे कधी पाहिले किंवा ऐकले आहेस का?” “भन्ते, आम्ही हे पाहिले आहे, ऐकले आहे आणि पुढेही ऐकू.” “तिथे, ग्रामणी, जे श्रमण-ब्राह्मण अशा सिद्धांताचे व दृष्टीचे आहेत की—'जो कोणी न दिलेली वस्तू घेतो, तो सर्व याच जन्मात (दृष्टधर्मात) दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो,' त्यांनी खरे सांगितले की खोटे?...पे... अशा लोकांवर श्रद्धा ठेवणे योग्य आहे का?” “नाही, भन्ते.” ‘‘දිස්සති ඛො පන, ගාමණි, ඉධෙකච්චො මාලී කුණ්ඩලී…පෙ… ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙන්තො. තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො කිං අකාසි මාලී කුණ්ඩලී…පෙ… ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙතී’ති? තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො රඤ්ඤො පච්චත්ථිකස්ස දාරෙසු චාරිත්තං ආපජ්ජි. තස්ස රාජා අත්තමනො අභිහාරමදාසි. තෙනායං පුරිසො මාලී කුණ්ඩලී…පෙ… ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙතී’’’ති. “परंतु, हे ग्रामणी, येथे एखादा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करताना दिसतो. लोक त्याला पाहून असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने काय केले आहे, ज्यामुळे फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करत आहे?' त्यावर लोक असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने राजाच्या शत्रूच्या पत्नीशी संबंध ठेवले. राजा त्याच्यावर प्रसन्न झाला आणि त्याने त्याला बक्षीस दिले. म्हणूनच हा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला...पे... स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करत आहे.'” ‘‘දිස්සති [Pg.525] ඛො, ගාමණි, ඉධෙකච්චො දළ්හාය රජ්ජුයා…පෙ… දක්ඛිණතො නගරස්ස සීසං ඡිජ්ජමානො. තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො කිං අකාසි දළ්හාය රජ්ජුයා…පෙ… දක්ඛිණතො නගරස්ස සීසං ඡින්දතී’ති? තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො කුලිත්ථීසු කුලකුමාරීසු චාරිත්තං ආපජ්ජි, තෙන නං රාජානො ගහෙත්වා එවරූපං කම්මකාරණං කාරෙන්තී’ති. තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අපි නු තෙ එවරූපං දිට්ඨං වා සුතං වා’’ති? ‘‘දිට්ඨඤ්ච නො, භන්තෙ, සුතඤ්ච සුය්යිස්සති චා’’ති. ‘‘තත්ර, ගාමණි, යෙ තෙ සමණබ්රාහ්මණා එවංවාදිනො එවංදිට්ඨිනො – ‘යො කොචි කාමෙසු මිච්ඡා චරති, සබ්බො සො දිට්ඨෙව ධම්මෙ දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදයතී’ති, සච්චං වා තෙ ආහංසු මුසා වාති…පෙ… කල්ලං නු තෙසු පසීදිතු’’න්ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “हे ग्रामणी, येथे एखादा मनुष्य मजबूत दोरीने...पे... शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात असताना दिसतो. लोक त्याला पाहून असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने काय केले आहे, ज्यामुळे मजबूत दोरीने...पे... शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात आहे?' त्यावर लोक असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने कुलीन स्त्रियांशी किंवा कुलीन कुमारिकांशी व्यभिचार केला, म्हणूनच राजांनी त्याला पकडून अशी शिक्षा दिली आहे.' यावर तुला काय वाटते, ग्रामणी? तू असे कधी पाहिले किंवा ऐकले आहेस का?” “भन्ते, आम्ही हे पाहिले आहे, ऐकले आहे आणि पुढेही ऐकू.” “तिथे, ग्रामणी, जे श्रमण-ब्राह्मण अशा सिद्धांताचे व दृष्टीचे आहेत की—'जो कोणी कामभोगांमध्ये मिथ्याचार करतो, तो सर्व याच जन्मात (दृष्टधर्मात) दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो,' त्यांनी खरे सांगितले की खोटे?...पे... अशा लोकांवर श्रद्धा ठेवणे योग्य आहे का?” “नाही, भन्ते.” ‘‘දිස්සති ඛො පන, ගාමණි, ඉධෙකච්චො මාලී කුණ්ඩලී සුන්හාතො සුවිලිත්තො කප්පිතකෙසමස්සු ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙන්තො. තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො කිං අකාසි මාලී කුණ්ඩලී සුන්හාතො සුවිලිත්තො කප්පිතකෙසමස්සු ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙතී’ති? තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො රාජානං මුසාවාදෙන හාසෙසි. තස්ස රාජා අත්තමනො අභිහාරමදාසි. තෙනායං පුරිසො මාලී කුණ්ඩලී සුන්හාතො සුවිලිත්තො කප්පිතකෙසමස්සු ඉත්ථිකාමෙහි රාජා මඤ්ඤෙ පරිචාරෙතී’’’ති. “परंतु, हे ग्रामणी, येथे एखादा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम प्रकारे स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केस व दाढी व्यवस्थित कापलेला, स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करताना दिसतो. लोक त्याला पाहून असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने काय केले आहे, ज्यामुळे फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम प्रकारे स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केस व दाढी व्यवस्थित कापलेला, स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करत आहे?' त्यावर लोक असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने राजाला असत्य बोलून हसविले. राजा त्याच्यावर प्रसन्न झाला आणि त्याने त्याला बक्षीस दिले. म्हणूनच हा मनुष्य फुलांचे हार घातलेला, कुंडल धारण केलेला, उत्तम प्रकारे स्नान केलेला, सुगंधी उटणे लावलेला, केस व दाढी व्यवस्थित कापलेला, स्त्रियांसोबत कामभोगांचा उपभोग घेत एखाद्या राजासारखा विहार करत आहे.'” ‘‘දිස්සති ඛො, ගාමණි, ඉධෙකච්චො දළ්හාය රජ්ජුයා පච්ඡාබාහං ගාළ්හබන්ධනං බන්ධිත්වා ඛුරමුණ්ඩං කරිත්වා ඛරස්සරෙන පණවෙන රථියාය රථියං සිඞ්ඝාටකෙන සිඞ්ඝාටකං පරිනෙත්වා දක්ඛිණෙන ද්වාරෙන නික්ඛාමෙත්වා දක්ඛිණතො නගරස්ස සීසං ඡිජ්ජමානො. තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො කිං අකාසි දළ්හාය රජ්ජුයා පච්ඡාබාහං ගාළ්හබන්ධනං බන්ධිත්වා ඛුරමුණ්ඩං කරිත්වා ඛරස්සරෙන පණවෙන රථියාය රථියං සිඞ්ඝාටකෙන සිඞ්ඝාටකං පරිනෙත්වා, දක්ඛිණෙන ද්වාරෙන නික්ඛාමෙත්වා, දක්ඛිණතො නගරස්ස සීසං ඡින්දතී’ති? තමෙනං එවමාහංසු – ‘අම්භො! අයං පුරිසො ගහපතිස්ස වා ගහපතිපුත්තස්ස වා මුසාවාදෙන අත්ථං භඤ්ජි, තෙන නං රාජානො ගහෙත්වා එවරූපං කම්මකාරණං කාරෙන්තී’ති. තං කිං මඤ්ඤසි, ගාමණි, අපි නු තෙ එවරූපං දිට්ඨං වා සුතං වා’’ති? ‘‘දිට්ඨඤ්ච නො[Pg.526], භන්තෙ, සුතඤ්ච සුය්යිස්සති චා’’ති. ‘‘තත්ර, ගාමණි, යෙ තෙ සමණබ්රාහ්මණා එවංවාදිනො එවංදිට්ඨිනො – ‘යො කොචි මුසා භණති, සබ්බො සො දිට්ඨෙව ධම්මෙ දුක්ඛං දොමනස්සං පටිසංවෙදයතී’ති, සච්චං වා තෙ ආහංසු මුසා වා’’ති? ‘‘මුසා, භන්තෙ’’. ‘‘යෙ පන තෙ තුච්ඡං මුසා විලපන්ති සීලවන්තො වා තෙ දුස්සීලා වා’’ති? ‘‘දුස්සීලා, භන්තෙ’’. ‘‘යෙ පන තෙ දුස්සීලා පාපධම්මා මිච්ඡාපටිපන්නා වා තෙ සම්මාපටිපන්නා වා’’ති? ‘‘මිච්ඡාපටිපන්නා, භන්තෙ’’. ‘‘යෙ පන තෙ මිච්ඡාපටිපන්නා මිච්ඡාදිට්ඨිකා වා තෙ සම්මාදිට්ඨිකා වා’’ති? ‘‘මිච්ඡාදිට්ඨිකා, භන්තෙ’’. ‘‘යෙ පන තෙ මිච්ඡාදිට්ඨිකා කල්ලං නු තෙසු පසීදිතු’’න්ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “हे ग्रामणी, येथे एखादा मनुष्य मजबूत दोरीने हात मागे घट्ट बांधलेला, डोके पूर्णपणे मुंडण केलेला, कर्कश आवाजाच्या ढोलाच्या तालावर गल्लीगल्लीतून आणि चौकाचौकातून फिरवला जाऊन, दक्षिण दरवाजातून बाहेर काढून, शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात असताना दिसतो. लोक त्याला पाहून असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने काय केले आहे, ज्यामुळे मजबूत दोरीने हात मागे घट्ट बांधून, डोके पूर्णपणे मुंडण करून, कर्कश आवाजाच्या ढोलाच्या तालावर गल्लीगल्लीतून आणि चौकाचौकातून फिरवून, दक्षिण दरवाजातून बाहेर काढून, शहराच्या दक्षिण दिशेला त्याचे डोके कापले जात आहे?' त्यावर लोक असे म्हणतात—'अरे! या माणसाने एखाद्या गृहपतीचे किंवा गृहपतीच्या पुत्राचे असत्य बोलून नुकसान केले. म्हणूनच राजांनी त्याला पकडून अशी शिक्षा दिली आहे.' यावर तुला काय वाटते, ग्रामणी? तू असे कधी पाहिले किंवा ऐकले आहेस का?” “भन्ते, आम्ही हे पाहिले आहे, ऐकले आहे आणि पुढेही ऐकू.” “तिथे, ग्रामणी, जे श्रमण-ब्राह्मण अशा सिद्धांताचे व दृष्टीचे आहेत की—'जो कोणी असत्य बोलतो, तो सर्व याच जन्मात (दृष्टधर्मात) दुःख आणि दौर्मनस्य भोगतो,' त्यांनी खरे सांगितले की खोटे?” “खोटे, भन्ते.” “परंतु जे निरर्थक असत्य बडबडतात, ते शीलवान आहेत की दुःशील?” “दुःशील, भन्ते.” “परंतु जे दुःशील व पापी स्वभावाचे आहेत, ते मिथ्याप्रतिपन्न (चुकीच्या मार्गाने चालणारे) आहेत की सम्यक्प्रतिपन्न (योग्य मार्गाने चालणारे)?” “मिथ्याप्रतिपन्न, भन्ते.” “परंतु जे मिथ्याप्रतिपन्न आहेत, ते मिथ्यादृष्टीचे आहेत की सम्यग्दृष्टीचे?” “मिथ्यादृष्टीचे, भन्ते.” “परंतु जे मिथ्यादृष्टीचे आहेत, त्यांच्यावर श्रद्धा ठेवणे योग्य आहे का?” “नाही, भन्ते.” ‘‘අච්ඡරියං, භන්තෙ, අබ්භුතං, භන්තෙ! අත්ථි මෙ, භන්තෙ, ආවසථාගාරං. තත්ථ අත්ථි මඤ්චකානි, අත්ථි ආසනානි, අත්ථි උදකමණිකො, අත්ථි තෙලප්පදීපො. තත්ථ යො සමණො වා බ්රාහ්මණො වා වාසං උපෙති, තෙනාහං යථාසත්ති යථාබලං සංවිභජාමි. භූතපුබ්බං, භන්තෙ, චත්තාරො සත්ථාරො නානාදිට්ඨිකා නානාඛන්තිකා නානාරුචිකා, තස්මිං ආවසථාගාරෙ වාසං උපගච්ඡුං’’. “आश्चर्य आहे, भन्ते! अद्भुत आहे, भन्ते! भन्ते, माझी एक धर्मशाळा आहे. तिथे खाटा आहेत, आसने आहेत, पाण्याचा माठ आहे आणि तेलाचा दिवा आहे. तिथे जो कोणी श्रमण किंवा ब्राह्मण वास्तव्यासाठी येतो, त्याला मी माझ्या शक्तीनुसार व क्षमतेनुसार दान देतो. भन्ते, पूर्वीची गोष्ट आहे, वेगवेगळ्या दृष्टीचे, वेगवेगळ्या आवडीचे आणि वेगवेगळ्या पसंतीचे चार शास्ते त्या धर्मशाळेत वास्तव्यासाठी आले होते.” ‘‘එකො සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – ‘නත්ථි දින්නං, නත්ථි යිට්ඨං, නත්ථි හුතං, නත්ථි සුකතදුක්කටානං කම්මානං ඵලං විපාකො. නත්ථි අයං ලොකො, නත්ථි පරො ලොකො, නත්ථි මාතා, නත්ථි පිතා, නත්ථි සත්තා ඔපපාතිකා, නත්ථි ලොකෙ සමණබ්රාහ්මණා සම්මග්ගතා සම්මාපටිපන්නා යෙ ඉමඤ්ච ලොකං පරඤ්ච ලොකං සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා පවෙදෙන්තී’’’ති. “त्यातील एक शास्ता अशा सिद्धांताचा व दृष्टीचा होता—'दिलेल्या दानाला काही अर्थ नाही, यज्ञाला काही अर्थ नाही, हवनाला काही अर्थ नाही; चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक नसतो; हा लोक नाही, परलोक नाही; माता नाही, पिता नाही; औपपातिक (स्वयंभू उत्पन्न होणारे) प्राणी नाहीत; जगात असे कोणतेही योग्य मार्गाने चालणारे, सम्यक्प्रतिपन्न श्रमण-ब्राह्मण नाहीत, ज्यांनी स्वतःच्या अभिज्ञेने हा लोक आणि परलोक प्रत्यक्ष जाणून घेऊन तो प्रकट केला आहे.'” ‘‘එකො සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – ‘අත්ථි දින්නං, අත්ථි යිට්ඨං, අත්ථි හුතං, අත්ථි සුකතදුක්කටානං කම්මානං ඵලං විපාකො, අත්ථි අයං ලොකො, අත්ථි පරො ලොකො, අත්ථි මාතා, අත්ථි පිතා, අත්ථි සත්තා ඔපපාතිකා, අත්ථි ලොකෙ සමණබ්රාහ්මණා සම්මග්ගතා සම්මාපටිපන්නා, යෙ ඉමඤ්ච ලොකං පරඤ්ච ලොකං සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා පවෙදෙන්තී’’’ති. “एक शास्ता असा वाद मांडणारा व अशी दृष्टी असणारा आहे – 'दान दिल्यास त्याचे फळ असते, यज्ञ-पूजेचे फळ असते, हवनाचे फळ असते, चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ आणि विपाक असतो, हा लोक आहे, परलोक आहे, माता आहे, पिता आहे, औपपातिक प्राणी आहेत; जगात असे सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण व ब्राह्मण आहेत, जे स्वतःच्या उच्च ज्ञानाने या लोकाचा आणि परलोकाचा साक्षात्कार करून तो प्रकट करतात.'” ‘‘එකො සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – ‘කරොතො කාරයතො, ඡින්දතො ඡෙදාපයතො, පචතො පාචාපයතො, සොචයතො සොචාපයතො, කිලමතො කිලමාපයතො, ඵන්දතො ඵන්දාපයතො, පාණමතිපාතයතො, අදින්නං ආදියතො, සන්ධිං ඡින්දතො, නිල්ලොපං හරතො, එකාගාරිකං [Pg.527] කරොතො, පරිපන්ථෙ තිට්ඨතො, පරදාරං ගච්ඡතො, මුසා භණතො, කරොතො න කරීයති පාපං. ඛුරපරියන්තෙන චෙපි චක්කෙන යො ඉමිස්සා පථවියා පාණෙ එකං මංසඛලං එකං මංසපුඤ්ජං කරෙය්ය, නත්ථි තතොනිදානං පාපං, නත්ථි පාපස්ස ආගමො. දක්ඛිණං චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය හනන්තො ඝාතෙන්තො ඡින්දන්තො ඡෙදාපෙන්තො පචන්තො පාචාපෙන්තො, නත්ථි තතොනිදානං පාපං, නත්ථි පාපස්ස ආගමො. උත්තරං චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය දදන්තො දාපෙන්තො යජන්තො යජාපෙන්තො, නත්ථි තතොනිදානං පුඤ්ඤං, නත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො. දානෙන දමෙන සංයමෙන සච්චවජ්ජෙන නත්ථි පුඤ්ඤං, නත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො’’’ති. “एक शास्ता असा वाद मांडणारा व अशी दृष्टी असणारा आहे – 'करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, अंगच्छेद करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, छळ करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, शोक करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, त्रास देणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, भयभीत करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, प्राणांचा घात करणाऱ्याला, चोरी करणाऱ्याला, घरफोडी करणाऱ्याला, दरोडा घालणाऱ्याला, एकाकी घरावर हल्ला करणाऱ्याला, वाटेत अडवून लुटणाऱ्याला, परस्त्रीगमन करणाऱ्याला, असत्य बोलणाऱ्याला – हे सर्व करणाऱ्याला कोणतेही पाप लागत नाही. जर कोणी वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील सर्व प्राण्यांचे तुकडे करून त्यांचा एकच मांसाचा गोळा किंवा मांसाचा ढीग केला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पाप घडत नाही, किंवा पापाचा विपाक मिळत नाही. जर कोणी गंगेच्या दक्षिण किनाऱ्याने प्राण्यांची हत्या करत, करवून घेत, अंगच्छेद करत, करवून घेत, छळ करत, करवून घेत गेला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पाप घडत नाही, किंवा पापाचा विपाक मिळत नाही. जर कोणी गंगेच्या उत्तर किनाऱ्याने दान देत, देववत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पुण्य घडत नाही, किंवा पुण्याचा विपाक मिळत नाही. दान, इंद्रियसंयम, शील आणि सत्यवचन यांमुळे कोणतेही पुण्य लाभत नाही, किंवा पुण्याचा विपाक मिळत नाही.'” ‘‘එකො සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – ‘කරොතො කාරයතො, ඡින්දතො ඡෙදාපයතො, පචතො පාචාපයතො, සොචයතො සොචාපයතො, කිලමතො කිලමාපයතො, ඵන්දතො ඵන්දාපයතො, පාණමතිපාතයතො, අදින්නං ආදියතො, සන්ධිං ඡින්දතො, නිල්ලොපං හරතො, එකාගාරිකං කරොතො, පරිපන්ථෙ තිට්ඨතො, පරදාරං ගච්ඡතො, මුසා භණතො, කරොතො කරීයති පාපං. ඛුරපරියන්තෙන චෙපි චක්කෙන යො ඉමිස්සා පථවියා පාණෙ එකං මංසඛලං එකං මංසපුඤ්ජං කරෙය්ය, අත්ථි තතොනිදානං පාපං, අත්ථි පාපස්ස ආගමො. දක්ඛිණං චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය හනන්තො ඝාතෙන්තො ඡින්දන්තො ඡෙදාපෙන්තො පචන්තො පාචාපෙන්තො, අත්ථි තතොනිදානං පාපං, අත්ථි පාපස්ස ආගමො. උත්තරං චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය දදන්තො දාපෙන්තො, යජන්තො යජාපෙන්තො, අත්ථි තතොනිදානං පුඤ්ඤං, අත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො. දානෙන දමෙන සංයමෙන සච්චවජ්ජෙන අත්ථි පුඤ්ඤං, අත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො’’’ති. “एक शास्ता असा वाद मांडणारा व अशी दृष्टी असणारा आहे – 'करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, अंगच्छेद करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, छळ करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, शोक करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, त्रास देणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, भयभीत करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, प्राणांचा घात करणाऱ्याला, चोरी करणाऱ्याला, घरफोडी करणाऱ्याला, दरोडा घालणाऱ्याला, एकाकी घरावर हल्ला करणाऱ्याला, वाटेत अडवून लुटणाऱ्याला, परस्त्रीगमन करणाऱ्याला, असत्य बोलणाऱ्याला – हे सर्व करणाऱ्याला पाप लागते. जर कोणी वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील सर्व प्राण्यांचे तुकडे करून त्यांचा एकच मांसाचा गोळा किंवा मांसाचा ढीग केला, तर त्या कारणाने पाप घडते आणि पापाचा विपाक मिळतो. जर कोणी गंगेच्या दक्षिण किनाऱ्याने प्राण्यांची हत्या करत, करवून घेत, अंगच्छेद करत, करवून घेत, छळ करत, करवून घेत गेला, तर त्या कारणाने पाप घडते आणि पापाचा विपाक मिळतो. जर कोणी गंगेच्या उत्तर किनाऱ्याने दान देत, देववत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तर त्या कारणाने पुण्य घडते आणि पुण्याचा विपाक मिळतो. दान, इंद्रियसंयम, शील आणि सत्यवचन यांमुळे पुण्य लाभते आणि पुण्याचा विपाक मिळतो.'” ‘‘තස්ස මය්හං, භන්තෙ, අහුදෙව කඞ්ඛා, අහු විචිකිච්ඡා – ‘කොසු නාම ඉමෙසං භවතං සමණබ්රාහ්මණානං සච්චං ආහ, කො මුසා’’’ති? “त्यामुळे, भंते, माझ्या मनात शंका आणि संशय निर्माण झाला की – 'या आदरणीय श्रमण आणि ब्राह्मणांपैकी कोण बरे सत्य बोलत आहे आणि कोण असत्य?'” ‘‘අලඤ්හි තෙ, ගාමණි, කඞ්ඛිතුං, අලං විචිකිච්ඡිතුං. කඞ්ඛනීයෙ ච පන තෙ ඨානෙ විචිකිච්ඡා උප්පන්නා’’ති. ‘‘එවං පසන්නොහං, භන්තෙ, භගවති. පහොති මෙ භගවා තථා ධම්මං දෙසෙතුං යථාහං ඉමං කඞ්ඛාධම්මං පජහෙය්ය’’න්ති. “हे ग्रामणी, तुला शंका वाटणे योग्यच आहे, संशय येणे योग्यच आहे. संशयास्पद बाबीमध्येच तुला संशय निर्माण झाला आहे.” “भंते, मी भगवंतांवर असा प्रसन्न आहे. भगवंत मला अशा प्रकारे धम्माचा उपदेश करण्यास समर्थ आहेत, जेणेकरून मी या संशयाचा त्याग करू शकेन.” ‘‘අත්ථි, ගාමණි, ධම්මසමාධි. තත්ර චෙ ත්වං චිත්තසමාධිං පටිලභෙය්යාසි. එවං ත්වං ඉමං කඞ්ඛාධම්මං පජහෙය්යාසි. කතමො ච, ගාමණි, ධම්මසමාධි? ඉධ, ගාමණි, අරියසාවකො පාණාතිපාතං පහාය පාණාතිපාතා පටිවිරතො [Pg.528] හොති, අදින්නාදානං පහාය අදින්නාදානා පටිවිරතො හොති, කාමෙසුමිච්ඡාචාරං පහාය කාමෙසුමිච්ඡාචාරා පටිවිරතො හොති, මුසාවාදං පහාය මුසාවාදා පටිවිරතො හොති, පිසුණං වාචං පහාය පිසුණාය වාචාය පටිවිරතො හොති, ඵරුසං වාචං පහාය ඵරුසාය වාචාය පටිවිරතො හොති, සම්ඵප්පලාපං පහාය සම්ඵප්පලාපා පටිවිරතො හොති, අභිජ්ඣං පහාය අනභිජ්ඣාලු හොති, බ්යාපාදපදොසං පහාය අබ්යාපන්නචිත්තො හොති, මිච්ඡාදිට්ඨිං පහාය සම්මාදිට්ඨිකො හොති. “हे ग्रामणी, धम्मसमाधी अस्तित्वात आहे. जर तू त्यामध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयाचा त्याग करू शकशील. आणि हे ग्रामणी, धम्मसमाधी कोणती आहे? येथे, हे ग्रामणी, आर्यश्रावक प्राणातिपाताचा त्याग करून प्राणातिपातापासून अलिप्त राहतो; अदित्नादानाचा त्याग करून चोरीपासून अलिप्त राहतो; कामेसू मिच्छाचाराचा त्याग करून व्यभिचारापासून अलिप्त राहतो; मुसावादाचा त्याग करून असत्य बोलण्यापासून अलिप्त राहतो; पिसुणा वाचा त्यागून चहाडी करण्यापासून अलिप्त राहतो; फरुसा वाचा त्यागून कठोर बोलण्यापासून अलिप्त राहतो; सम्फप्पलापाचा त्याग करून व्यर्थ बडबडीपासून अलिप्त राहतो; अभिध्येचा त्याग करून लोभरहित होतो; व्यापाद-द्वेषाचा त्याग करून द्वेषरहित चित्ताचा होतो; आणि मिच्छादिट्ठीचा त्याग करून सम्यक दृष्टीचा होतो.” ‘‘ස ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං, ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. සො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘ය්වායං සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – නත්ථි දින්නං, නත්ථි යිට්ඨං, නත්ථි හුතං, නත්ථි සුකතදුක්කටානං කම්මානං ඵලං විපාකො, නත්ථි අයං ලොකො, නත්ථි පරො ලොකො, නත්ථි මාතා, නත්ථි පිතා, නත්ථි සත්තා ඔපපාතිකා, නත්ථි ලොකෙ සමණබ්රාහ්මණා, සම්මග්ගතා සම්මාපටිපන්නා යෙ ඉමඤ්ච ලොකං පරඤ්ච ලොකං සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා පවෙදෙන්තී’ති. ‘සචෙ තස්ස භොතො සත්ථුනො සච්චං වචනං, අපණ්ණකතාය මය්හං, ය්වාහං න කිඤ්චි බ්යාබාධෙමි තසං වා ථාවරං වා? උභයමෙත්ථ කටග්ගාහො, යං චම්හි කායෙන සංවුතො වාචාය සංවුතො මනසා සංවුතො, යඤ්ච කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජිස්සාමී’ති. තස්ස පාමොජ්ජං ජායති. පමුදිතස්ස පීති ජායති. පීතිමනස්ස කායො පස්සම්භති. පස්සද්ධකායො සුඛං වෙදයති. සුඛිනො චිත්තං සමාධියති. අයං ඛො, ගාමණි, ධම්මසමාධි. තත්ර චෙ ත්වං චිත්තසමාධිං පටිලභෙය්යාසි, එවං ත්වං ඉමං කඞ්ඛාධම්මං පජහෙය්යාසි. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभरहित, द्वेषरहित, संमोहरहित, जागरूक आणि स्मृतिमान होऊन मैत्रीपूर्ण चित्ताने एका देशात व्यापून राहतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तिसऱ्या दिशेला आणि चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, आडवे, सर्वत्र, सर्वांना स्वतःसमान मानून, संपूर्ण जगाला विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि द्वेषरहित अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून राहतो. तो असा विचार करतो – 'जो शास्ता असा वाद मांडणारा व अशी दृष्टी असणारा आहे की – "दान दिल्यास त्याचे फळ नसते, यज्ञ-पूजेचे फळ नसते, हवनाचे फळ नसते, चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ आणि विपाक असतो, हा लोक नाही, परलोक नाही, माता नाही, पिता नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत; जगात असे सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण व ब्राह्मण नाहीत, जे स्वतःच्या उच्च ज्ञानाने या लोकाचा आणि परलोकाचा साक्षात्कार करून तो प्रकट करतात." जर त्या आदरणीय शास्त्याचे वचन सत्य असेल, तरीही माझ्यासाठी हे निर्दोष आहे की मी कोणत्याही भयभीत होणाऱ्या किंवा स्थिर प्राण्याला पीडा देत नाही. दोन्ही प्रकारे माझाच विजय आहे; कारण मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे, आणि कायेच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन.' असा विचार केल्याने त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या व्यक्तीची काया शांत होते. शांत काया असणारा सुखाचा अनुभव घेतो. सुखी व्यक्तीचे चित्त समाधीस्थ होते. हे ग्रामणी, हीच धम्मसमाधी आहे. जर तू त्यामध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयाचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ස ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා [Pg.529] චතුත්ථං, ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. සො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘ය්වායං සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – අත්ථි දින්නං, අත්ථි යිට්ඨං, අත්ථි හුතං, අත්ථි සුකතදුක්කටානං කම්මානං ඵලං විපාකො, අත්ථි අයං ලොකො, අත්ථි පරො ලොකො, අත්ථි මාතා, අත්ථි පිතා, අත්ථි සත්තා ඔපපාතිකා, අත්ථි ලොකෙ සමණබ්රාහ්මණා, සම්මග්ගතා සම්මාපටිපන්නා යෙ ඉමඤ්ච ලොකං පරඤ්ච ලොකං සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා පවෙදෙන්තී’ති. ‘සචෙ තස්ස භොතො සත්ථුනො සච්චං වචනං, අපණ්ණකතාය මය්හං, ය්වාහං න කිඤ්චි බ්යාබාධෙමි තසං වා ථාවරං වා? උභයමෙත්ථ කටග්ගාහො, යං චම්හි කායෙන සංවුතො වාචාය සංවුතො මනසා සංවුතො, යඤ්ච කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජිස්සාමී’ති. තස්ස පාමොජ්ජං ජායති. පමුදිතස්ස පීති ජායති. පීතිමනස්ස කායො පස්සම්භති. පස්සද්ධකායො සුඛං වෙදයති. සුඛිනො චිත්තං සමාධියති. අයං ඛො, ගාමණි, ධම්මසමාධි. තත්ර චෙ ත්වං චිත්තසමාධිං පටිලභෙය්යාසි, එවං ත්වං ඉමං කඞ්ඛාධම්මං පජහෙය්යාසි. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोह विरहित, संप्रजन्ययुक्त (सजग) आणि स्मृतिमान होऊन एका दिशेला मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरके, सर्वत्र, सर्वांच्या ठिकाणी स्वतःप्रमाणेच, संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – ‘जो हा शास्ता असा वाद मांडणारा आणि अशी दृष्टी बाळगणारा आहे की – दान देण्याचे फळ आहे, यज्ञाचे फळ आहे, आहुतीचे फळ आहे; चांगल्या व वाईट कर्मांचे फळ आणि विपाक आहे; हा लोक आहे, परलोक आहे; माता आहे, पिता आहे; औपपातिक (स्वयं उत्पन्न होणारे) प्राणी आहेत; जगात असे सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण-ब्राह्मण आहेत, ज्यांनी या लोकाला आणि परलोकाला स्वतः अभिज्ञेने साक्षात करून प्रगट केले आहे.’ ‘जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्विवाद आहे की मी कोणत्याही त्रस किंवा स्थावर प्राण्याला पीडा देत नाही. दोन्ही प्रकारे मी विजयी डाव खेळला आहे: कारण मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होईन.’ त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमोद झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुखाचा अनुभव घेतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. हेच, हे ग्रामणी, धर्मसमाधी होय. जर तू त्यात चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयाचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ස ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං, ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. සො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘ය්වායං සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – කරොතො කාරයතො, ඡින්දතො ඡෙදාපයතො, පචතො පාචාපයතො, සොචයතො සොචාපයතො, කිලමතො කිලමාපයතො, ඵන්දතො ඵන්දාපයතො, පාණමතිපාතයතො, අදින්නං ආදියතො, සන්ධිං ඡින්දතො, නිල්ලොපං හරතො, එකාගාරිකං කරොතො, පරිපන්ථෙ තිට්ඨතො, පරදාරං ගච්ඡතො, මුසා භණතො, කරොතො න කරීයති පාපං. ඛුරපරියන්තෙන චෙපි චක්කෙන යො ඉමිස්සා පථවියා පාණෙ එකං මංසඛලං එකං මංසපුඤ්ජං කරෙය්ය, නත්ථි තතොනිදානං පාපං, නත්ථි පාපස්ස ආගමො. දක්ඛිණඤ්චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය හනන්තො ඝාතෙන්තො ඡින්දන්තො ඡෙදාපෙන්තො පචන්තො පාචාපෙන්තො, නත්ථි තතොනිදානං [Pg.530] පාපං, නත්ථි පාපස්ස ආගමො. උත්තරඤ්චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය දදන්තො දාපෙන්තො, යජන්තො යජාපෙන්තො, නත්ථි තතොනිදානං පුඤ්ඤං, නත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො. දානෙන දමෙන සංයමෙන සච්චවජ්ජෙන නත්ථි පුඤ්ඤං, නත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො’ති. ‘සචෙ තස්ස භොතො සත්ථුනො සච්චං වචනං, අපණ්ණකතාය මය්හං, ය්වාහං න කිඤ්චි බ්යාබාධෙමි තසං වා ථාවරං වා? උභයමෙත්ථ කටග්ගාහො, යං චම්හි කායෙන සංවුතො වාචාය සංවුතො මනසා සංවුතො, යඤ්ච කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජිස්සාමී’ති. තස්ස පාමොජ්ජං ජායති. පමුදිතස්ස පීති ජායති. පීතිමනස්ස කායො පස්සම්භති. පස්සද්ධකායො සුඛං වෙදයති. සුඛිනො චිත්තං සමාධියති. අයං ඛො, ගාමණි, ධම්මසමාධි තත්ර චෙ ත්වං චිත්තසමාධිං පටිලභෙය්යාසි, එවං ත්වං ඉමං කඞ්ඛාධම්මං පජහෙය්යාසි. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोह विरहित, संप्रजन्ययुक्त (सजग) आणि स्मृतिमान होऊन एका दिशेला मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरके, सर्वत्र, सर्वांच्या ठिकाणी स्वतःप्रमाणेच, संपूर्ण जगाला विस्तीर्ण, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित अशा मैत्रीपूर्ण चित्ताने व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – ‘जो हा शास्ता असा वाद मांडणारा आणि अशी दृष्टी बाळगणारा आहे की – करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, कापणाऱ्याला किंवा कापवून घेणाऱ्याला, छळणाऱ्याला किंवा छळवून घेणाऱ्याला, शोक करणाऱ्याला किंवा शोक करवून घेणाऱ्याला, थकवणाऱ्याला किंवा थकवून घेणाऱ्याला, थरथर कापणाऱ्याला किंवा थरथर कापवून घेणाऱ्याला, प्राणाचा घात करणाऱ्याला, चोरी करणाऱ्याला, घर फोडणाऱ्याला, दरोडा घालणाऱ्याला, एकाच घरावर हल्ला करणाऱ्याला, वाटेत दबा धरून बसणाऱ्याला, परस्त्रीगमन करणाऱ्याला, असत्य बोलणाऱ्याला – असे करणाऱ्याकडून कोणतेही पाप घडत नाही. जरी एखाद्याने वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील प्राण्यांचे एकाच मांसाच्या गोळ्यात किंवा मांसाच्या ढिगाऱ्यात रूपांतर केले, तरी त्या कारणाने कोणतेही पाप घडत नाही, किंवा पापाचा आगम (प्राप्ती) होत नाही. जरी कोणी गंगेच्या दक्षिण तीरावर प्राण्यांना मारत, मारवून घेत, कापत, कापवून घेत, छळत, छळवून घेत गेला, तरी त्या कारणाने कोणतेही पाप घडत नाही, किंवा पापाचा आगम होत नाही. जरी कोणी गंगेच्या उत्तर तीरावर दान देत, देववून घेत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तरी त्या कारणाने कोणतेही पुण्य लाभत नाही, किंवा पुण्याचा आगम होत नाही. दानाने, दमाने, संयमाने आणि सत्य बोलण्याने कोणतेही पुण्य लाभत नाही, किंवा पुण्याचा आगम होत नाही.’ ‘जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्विवाद आहे की मी कोणत्याही त्रस किंवा स्थावर प्राण्याला पीडा देत नाही. दोन्ही प्रकारे मी विजयी डाव खेळला आहे: कारण मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकात उत्पन्न होईन.’ त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमोद झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुखाचा अनुभव घेतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. हेच, हे ग्रामणी, धर्मसमाधी होय. जर तू त्यात चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयाचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ස ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො මෙත්තාසහගතෙ චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං, ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං මෙත්තාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. සො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘ය්වායං සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – කරොතො කාරයතො, ඡින්දතො ඡෙදාපයතො, පචතො පාචාපයතො, සොචයතො සොචාපයතො, කිලමතො කිලමාපයතො, ඵන්දතො ඵන්දාපයතො, පාණමතිපාතයතො, අදින්නං ආදියතො, සන්ධිං ඡින්දතො, නිල්ලොපං හරතො, එකාගාරිකං කරොතො, පරිපන්ථෙ තිට්ඨතො, පරදාරං ගච්ඡතො, මුසා භණතො, කරොතො කරීයති පාපං. ඛුරපරියන්තෙන චෙපි චක්කෙන යො ඉමිස්සා පථවියා පාණෙ එකං මංසඛලං එකං මංසපුඤ්ජං කරෙය්ය, අත්ථි තතොනිදානං පාපං, අත්ථි පාපස්ස ආගමො. දක්ඛිණඤ්චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය හනන්තො ඝාතෙන්තො ඡින්දන්තො ඡෙදාපෙන්තො පචන්තො පාචාපෙන්තො, අත්ථි තතොනිදානං පාපං, අත්ථි පාපස්ස ආගමො. උත්තරඤ්චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය දදන්තො දාපෙන්තො, යජන්තො යජාපෙන්තො, අත්ථි තතොනිදානං [Pg.531] පුඤ්ඤං, අත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො. දානෙන දමෙන සංයමෙන සච්චවජ්ජෙන අත්ථි පුඤ්ඤං අත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමොති. සචෙ තස්ස භොතො සත්ථුනො සච්චං වචනං, අපණ්ණකතාය මය්හං, ය්වාහං න කිඤ්චි බ්යාබාධෙමි තසං වා ථාවරං වා? උභයමෙත්ථ කටග්ගාහො, යං චම්හි කායෙන සංවුතො වාචාය සංවුතො මනසා සංවුතො, යඤ්ච කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජිස්සාමී’ති. තස්ස පාමොජ්ජං ජායති. පමුදිතස්ස පීති ජායති. පීතිමනස්ස කායො පස්සම්භති. පස්සද්ධකායො සුඛං වෙදයති. සුඛිනො චිත්තං සමාධියති. අයං ඛො, ගාමණි, ධම්මසමාධි. තත්ර චෙ ත්වං චිත්තසමාධිං පටිලභෙය්යාසි, එවං ත්වං ඉමං කඞ්ඛාධම්මං පජහෙය්යාසි. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोहरहित, प्रज्ञायुक्त आणि स्मृतिमान होऊन मैत्रीपूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो, तसेच दुसऱ्या, तसेच तिसऱ्या, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, सर्वांना स्वतःसमान मानून, संपूर्ण जगाला मैत्रीपूर्ण चित्ताने, जे विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित आहे, व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – ‘हा जो शास्ता असा वाद आणि अशी दृष्टी बाळगतो की: करणाऱ्याने, करवून घेणाऱ्याने, कापणाऱ्याने, कापवून घेणाऱ्याने, छळ करणाऱ्याने, छळ करवून घेणाऱ्याने, शोक करणाऱ्याने, शोक करवून घेणाऱ्याने, त्रास देणाऱ्याने, त्रास करवून घेणाऱ्याने, थरथर कापणाऱ्याने, थरथर कापवून घेणाऱ्याने, प्राणाचा घात करणाऱ्याने, चोरी करणाऱ्याने, घर फोडणाऱ्याने, दरोडा घालणाऱ्याने, वाटेत लुटणाऱ्याने, परस्त्रीगमन करणाऱ्याने, असत्य बोलणाऱ्याने - कर्म केल्यास पाप घडते. जरी कोणी वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील प्राण्यांचे एकाच मांसाच्या गोळ्यात किंवा मांसाच्या ढिगाऱ्यात रूपांतर केले, तरी त्या कारणाने पाप घडते, पापाचा संचय होतो. जरी कोणी गंगा नदीच्या दक्षिण तीरावर प्राण्यांचा घात करत, घात करवून घेत, कापून, कापवून घेत, छळ करत, छळ करवून घेत गेला, तरी त्या कारणाने पाप घडते, पापाचा संचय होतो. जरी कोणी गंगा नदीच्या उत्तर तीरावर दान देत, देववत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तरी त्या कारणाने पुण्य घडते, पुण्याचा संचय होतो. दानाने, दमाने, संयमाने आणि सत्य बोलण्याने पुण्य घडते, पुण्याचा संचय होतो.’ जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्दोष आहे, कारण मी कोणत्याही त्रस किंवा स्थावर प्राण्याला पीडा देत नाही. येथे दोन्ही प्रकारे माझाच विजय आहे: एक तर मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन. त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या व्यक्तीची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुख अनुभवतो. सुखी व्यक्तीचे चित्त समाधीस्थ होते. हे ग्रामणी, हाच ‘धम्मसमाधी’ आहे. जर तू यामध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयरूपी धम्माचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ස ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො කරුණාසහගතෙ චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති…පෙ… මුදිතාසහගතෙන චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති…පෙ…. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोहरहित, प्रज्ञायुक्त आणि स्मृतिमान होऊन करुणापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो... (तसेच सर्व दिशांना व्यापून विहरतो)... मुदितापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो...” ‘‘ස ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො උපෙක්ඛාසහගතෙ චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං, ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං උපෙක්ඛාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. සො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘ය්වායං සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – නත්ථි දින්නං, නත්ථි යිට්ඨං, නත්ථි හුතං නත්ථි සුකතදුක්කටානං කම්මානං ඵලං විපාකො, නත්ථි අයං ලොකො නත්ථි පරො ලොකො, නත්ථි මාතා නත්ථි පිතා නත්ථි සත්තා ඔපපාතිකා, නත්ථි ලොකෙ සමණබ්රාහ්මණා සම්මග්ගතා සම්මාපටිපන්නා යෙ ඉමඤ්ච ලොකං පරඤ්ච ලොකං සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා පවෙදෙන්තීති. සචෙ තස්ස භොතො සත්ථුනො සච්චං වචනං, අපණ්ණකතාය මය්හං, ය්වාහං න කිඤ්චි බ්යාබාධෙමි තසං වා ථාවරං වා? උභයමෙත්ථ කටග්ගාහො, යං චම්හි කායෙන සංවුතො වාචාය සංවුතො මනසා සංවුතො, යඤ්ච කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජිස්සාමී’ති. තස්ස පාමොජ්ජං ජායති. පමුදිතස්ස පීති ජායති. පීතිමනස්ස කායො පස්සම්භති. පස්සද්ධකායො සුඛං වෙදයති. සුඛිනො චිත්තං සමාධියති. අයං [Pg.532] ඛො, ගාමණි, ධම්මසමාධි. තත්ර චෙ ත්වං චිත්තසමාධිං පටිලභෙය්යාසි, එවං ත්වං ඉමං කඞ්ඛාධම්මං පජහෙය්යාසි. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोहरहित, प्रज्ञायुक्त आणि स्मृतिमान होऊन उपेक्षापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो, तसेच दुसऱ्या, तसेच तिसऱ्या, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, सर्वांना स्वतःसमान मानून, संपूर्ण जगाला उपेक्षापूर्ण चित्ताने, जे विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित आहे, व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – ‘हा जो शास्ता असा वाद आणि अशी दृष्टी बाळगतो की: दान देण्याला काही अर्थ नाही, यज्ञाला काही अर्थ नाही, हवनाला काही अर्थ नाही, चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक मिळत नाही, हा लोक नाही, परलोक नाही, माता नाही, पिता नाही, औपपातिक प्राणी नाहीत; जगात असे कोणी सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण किंवा ब्राह्मण नाहीत, ज्यांनी हा लोक आणि परलोक स्वतःच्या उच्च ज्ञानाने प्रत्यक्ष जाणून घोषित केला आहे.’ जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्दोष आहे, कारण मी कोणत्याही त्रस किंवा स्थावर प्राण्याला पीडा देत नाही. येथे दोन्ही प्रकारे माझाच विजय आहे: एक तर मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन. त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या व्यक्तीची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुख अनुभवतो. सुखी व्यक्तीचे चित्त समाधीस्थ होते. हे ग्रामणी, हाच ‘धम्मसमाधी’ आहे. जर तू यामध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयरूपी धम्माचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ස ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො උපෙක්ඛාසහගතෙ චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං, ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං උපෙක්ඛාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. සො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘ය්වායං සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – අත්ථි දින්නං, අත්ථි යිට්ඨං, අත්ථි හුතං, අත්ථි සුකතදුක්කටානං කම්මානං ඵලං විපාකො, අත්ථි අයං ලොකො අත්ථි පරො ලොකො, අත්ථි මාතා අත්ථි පිතා අත්ථි සත්තා ඔපපාතිකා, අත්ථි ලොකෙ සමණබ්රාහ්මණා සම්මග්ගතා සම්මාපටිපන්නා යෙ ඉමඤ්ච ලොකං පරඤ්ච ලොකං සයං අභිඤ්ඤා සච්ඡිකත්වා පවෙදෙන්තීති. සචෙ තස්ස භොතො සත්ථුනො සච්චං වචනං, අපණ්ණකතාය මය්හං, ය්වාහං න කිඤ්චි බ්යාබාධෙමි තසං වා ථාවරං වා? උභයමෙත්ථ කටග්ගාහො, යං චම්හි කායෙන සංවුතො වාචාය සංවුතො මනසා සංවුතො, යඤ්ච කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජිස්සාමී’ති. තස්ස පාමොජ්ජං ජායති. පමුදිතස්ස පීති ජායති. පීතිමනස්ස කායො පස්සම්භති. පස්සද්ධකායො සුඛං වෙදයති. සුඛිනො චිත්තං සමාධියති. අයං ඛො, ගාමණි, ධම්මසමාධි. තත්ර චෙ ත්වං චිත්තසමාධිං පටිලභෙය්යාසි, එවං ත්වං ඉමං කඞ්ඛාධම්මං පජහෙය්යාසි. “हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे लोभ विरहित, द्वेष विरहित, संमोहरहित, प्रज्ञायुक्त आणि स्मृतिमान होऊन उपेक्षापूर्ण चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो, तसेच दुसऱ्या, तसेच तिसऱ्या, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, तिरपे, सर्वत्र, सर्वांना स्वतःसमान मानून, संपूर्ण जगाला उपेक्षापूर्ण चित्ताने, जे विशाल, महान, अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित आहे, व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – ‘हा जो शास्ता असा वाद आणि अशी दृष्टी बाळगतो की: दान देण्याला अर्थ आहे, यज्ञाला अर्थ आहे, हवनाला अर्थ आहे, चांगल्या-वाईट कर्मांचे फळ किंवा विपाक मिळतो, हा लोक आहे, परलोक आहे, माता आहे, पिता आहे, औपपातिक प्राणी आहेत; जगात असे सम्यक मार्गावर चालणारे, सम्यक प्रतिपन्न श्रमण किंवा ब्राह्मण आहेत, ज्यांनी हा लोक आणि परलोक स्वतःच्या उच्च ज्ञानाने प्रत्यक्ष जाणून घोषित केला आहे.’ जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्दोष आहे, कारण मी कोणत्याही त्रस किंवा स्थावर प्राण्याला पीडा देत नाही. येथे दोन्ही प्रकारे माझाच विजय आहे: एक तर मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि शरीराच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन. त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या व्यक्तीची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुख अनुभवतो. सुखी व्यक्तीचे चित्त समाधीस्थ होते. हे ग्रामणी, हाच ‘धम्मसमाधी’ आहे. जर तू यामध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या संशयरूपी धम्माचा त्याग करू शकशील.” ‘‘ස ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො උපෙක්ඛාසහගතෙ චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං, ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං උපෙක්ඛාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. සො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘ය්වායං සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – කරොතො කාරයතො, ඡෙදතො ඡෙදාපයතො, පචතො පාචාපයතො, සොචයතො සොචාපයතො, කිලමතො කිලමාපයතො, ඵන්දතො ඵන්දාපයතො, පාණමතිපාතයතො, අදින්නං ආදියතො, සන්ධිං ඡින්දතො, නිල්ලොපං හරතො, එකාගාරිකං [Pg.533] කරොතො, පරිපන්ථෙ තිට්ඨතො, පරදාරං ගච්ඡතො, මුසා භණතො, කරොතො න කරීයති පාපං. ඛුරපරියන්තෙන චෙපි චක්කෙන යො ඉමිස්සා පථවියා පාණෙ එකං මංසඛලං එකං මංසපුඤ්ජං කරෙය්ය, නත්ථි තතොනිදානං පාපං, නත්ථි පාපස්ස ආගමො. දක්ඛිණඤ්චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය හනන්තො ඝාතෙන්තො ඡින්දන්තො ඡෙදාපෙන්තො පචන්තො පාචාපෙන්තො, නත්ථි තතොනිදානං පාපං, නත්ථි පාපස්ස ආගමො. උත්තරඤ්චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය දදන්තො දාපෙන්තො, යජන්තො යජාපෙන්තො, නත්ථි තතොනිදානං පුඤ්ඤං, නත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො. දානෙන දමෙන සංයමෙන සච්චවජ්ජෙන නත්ථි පුඤ්ඤං, නත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො’ති. ‘සචෙ තස්ස භොතො සත්ථුනො සච්චං වචනං, අපණ්ණකතාය මය්හං, ය්වාහං න කිඤ්චි බ්යාබාධෙමි තසං වා ථාවරං වා? උභයමෙත්ථ කටග්ගාහො, යං චම්හි කායෙන සංවුතො වාචාය සංවුතො මනසා සංවුතො, යඤ්ච කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජිස්සාමී’ති. තස්ස පාමොජ්ජං ජායති. පමුදිතස්ස පීති ජායති. පීතිමනස්ස කායො පස්සම්භති. පස්සද්ධකායො සුඛං වෙදයති. සුඛිනො චිත්තං සමාධියති. අයං ඛො, ගාමණි, ධම්මසමාධි. තත්ර චෙ ත්වං චිත්තසමාධිං පටිලභෙය්යාසි, එවං ත්වං ඉමං කඞ්ඛාධම්මං පජහෙය්යාසි. हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे अभिज्झा (लोभ) विरहित, व्यापाद (द्वेष) विरहित, संभ्रमरहित, संप्रज्ञानयुक्त (जागरूक) आणि स्मृतिमान होऊन, उपेक्षेने युक्त असलेल्या चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, आडवे (तिरके), सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला उपेक्षेने युक्त, विस्तीर्ण, महद्गत (महान), अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित (पीडारहित) चित्ताने व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – 'जे कोणी असे शास्ता (गुरू) आहेत जे अशा वादाचे व अशा दृष्टीचे आहेत की – "करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, अंगच्छेद करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, छळ करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, शोक करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, त्रास देणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, कंपित करणाऱ्याला किंवा कंपित करवून घेणाऱ्याला, प्राणातिपात करणाऱ्याला, चोरी करणाऱ्याला, घरफोडी करणाऱ्याला, दरोडा घालणाऱ्याला, एकाच घरावर दरोडा घालणाऱ्याला, वाटेत अडवून लुटणाऱ्याला, परस्त्रीगमन करणाऱ्याला, असत्य बोलणाऱ्याला – हे सर्व करणाऱ्याला कोणतेही पाप लागत नाही. जर एखाद्याने वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील प्राण्यांचा एकाच मांसाचा गोळा किंवा मांसाचा ढीग केला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पाप लागत नाही, पापाचा संचय होत नाही. जर कोणी गंगा नदीच्या दक्षिण तीरावर जाऊन हत्या करत, करवून घेत, अंगच्छेद करत, करवून घेत, छळ करत, करवून घेत गेला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पाप लागत नाही, पापाचा संचय होत नाही. जर कोणी गंगा नदीच्या उत्तर तीरावर जाऊन दान देत, देववत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तरीही त्या कारणाने कोणतेही पुण्य लाभत नाही, पुण्याचा संचय होत नाही. दानाने, दमनाने, संयमाने आणि सत्य बोलण्याने कोणतेही पुण्य लाभत नाही, पुण्याचा संचय होत नाही." जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्दोष (अपण्णक) आहे की मी कोणत्याही त्रस (चंचल) किंवा स्थावर (स्थिर) प्राण्याला पीडा देत नाही. दोन्ही प्रकारे माझाच विजय (कटग्गाहो) आहे: कारण मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि कायेच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन.' त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुखाचा अनुभव घेतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. हे ग्रामणी, हाच 'धम्मसमाधी' आहे. जर तू या धम्मसमाधीमध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या शंकेच्या (कांखाधम्माचा) त्याग करू शकशील. ‘‘ස ඛො සො, ගාමණි, අරියසාවකො එවං විගතාභිජ්ඣො විගතබ්යාපාදො අසම්මූළ්හො සම්පජානො පටිස්සතො උපෙක්ඛාසහගතෙ චෙතසා එකං දිසං ඵරිත්වා විහරති, තථා දුතියං, තථා තතියං, තථා චතුත්ථං, ඉති උද්ධමධො තිරියං සබ්බධි සබ්බත්තතාය සබ්බාවන්තං ලොකං උපෙක්ඛාසහගතෙන චෙතසා විපුලෙන මහග්ගතෙන අප්පමාණෙන අවෙරෙන අබ්යාපජ්ජෙන ඵරිත්වා විහරති. සො ඉති පටිසඤ්චික්ඛති – ‘ය්වායං සත්ථා එවංවාදී එවංදිට්ඨි – කරොතො කාරයතො, ඡින්දතො ඡෙදාපයතො, පචතො පාචාපයතො, සොචයතො සොචාපයතො, කිලමතො කිලමාපයතො, ඵන්දතො ඵන්දාපයතො, පාණමතිපාතයතො, අදින්නං ආදියතො, සන්ධිං ඡින්දතො, නිල්ලොපං හරතො, එකාගාරිකං කරොතො, පරිපන්ථෙ තිට්ඨතො, පරදාරං ගච්ඡතො, මුසා භණතො, කරොතො කරීයති පාපං. ඛුරපරියන්තෙන චෙපි චක්කෙන යො ඉමිස්සා පථවියා පාණෙ එකං මංසඛලං එකං මංසපුඤ්ජං කරෙය්ය, අත්ථි තතොනිදානං පාපං, අත්ථි පාපස්ස ආගමො. දක්ඛිණඤ්චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය හනන්තො [Pg.534] ඝාතෙන්තො ඡින්දන්තො ඡෙදාපෙන්තො පචන්තො පාචාපෙන්තො, අත්ථි තතොනිදානං පාපං, අත්ථි පාපස්ස ආගමො. උත්තරඤ්චෙපි ගඞ්ගාය තීරං ගච්ඡෙය්ය දදන්තො දාපෙන්තො, යජන්තො යජාපෙන්තො, අත්ථි තතොනිදානං පුඤ්ඤං, අත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො. දානෙන දමෙන සංයමෙන සච්චවජ්ජෙන අත්ථි පුඤ්ඤං, අත්ථි පුඤ්ඤස්ස ආගමො’ති. ‘සචෙ තස්ස භොතො සත්ථුනො සච්චං වචනං, අපණ්ණකතාය මය්හං, ය්වාහං න කිඤ්චි බ්යාබාධෙමි තසං වා ථාවරං වා? උභයමෙත්ථ කටග්ගාහො, යං චම්හි කායෙන සංවුතො වාචාය සංවුතො මනසා සංවුතො, යඤ්ච කායස්ස භෙදා පරං මරණා සුගතිං සග්ගං ලොකං උපපජ්ජිස්සාමී’ති. තස්ස පාමොජ්ජං ජායති. පමුදිතස්ස පීති ජායති. පීතිමනස්ස කායො පස්සම්භති. පස්සද්ධකායො සුඛං වෙදයති. සුඛිනො චිත්තං සමාධියති. අයං ඛො, ගාමණි, ධම්මසමාධි. තත්ර චෙ ත්වං චිත්තසමාධිං පටිලභෙය්යාසි, එවං ත්වං ඉමං කඞ්ඛාධම්මං පජහෙය්යාසී’’ති. हे ग्रामणी, तो आर्यश्रावक अशा प्रकारे अभिज्झा (लोभ) विरहित, व्यापाद (द्वेष) विरहित, संभ्रमरहित, संप्रज्ञानयुक्त (जागरूक) आणि स्मृतिमान होऊन, उपेक्षेने युक्त असलेल्या चित्ताने एका दिशेला व्यापून विहरतो; तसेच दुसऱ्या दिशेला, तसेच तिसऱ्या दिशेला, तसेच चौथ्या दिशेला. अशा प्रकारे वर, खाली, आडवे (तिरके), सर्वत्र, स्वतःप्रमाणेच सर्वांना मानून, संपूर्ण जगाला उपेक्षेने युक्त, विस्तीर्ण, महद्गत (महान), अमर्याद, वैररहित आणि व्यापादरहित (पीडारहित) चित्ताने व्यापून विहरतो. तो असा विचार करतो – 'जे कोणी असे शास्ता (गुरू) आहेत जे अशा वादाचे व अशा दृष्टीचे आहेत की – "करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, अंगच्छेद करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, छळ करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, शोक करणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, त्रास देणाऱ्याला किंवा करवून घेणाऱ्याला, कंपित करणाऱ्याला किंवा कंपित करवून घेणाऱ्याला, प्राणातिपात करणाऱ्याला, चोरी करणाऱ्याला, घरफोडी करणाऱ्याला, दरोडा घालणाऱ्याला, एकाच घरावर दरोडा घालणाऱ्याला, वाटेत अडवून लुटणाऱ्याला, परस्त्रीगमन करणाऱ्याला, असत्य बोलणाऱ्याला – हे सर्व करणाऱ्याला पाप लागते. जर एखाद्याने वस्तऱ्यासारख्या तीक्ष्ण धारेच्या चक्राने या पृथ्वीवरील प्राण्यांचा एकाच मांसाचा गोळा किंवा मांसाचा ढीग केला, तर त्या कारणाने पाप लागते, पापाचा संचय होतो. जर कोणी गंगा नदीच्या दक्षिण तीरावर जाऊन हत्या करत, करवून घेत, अंगच्छेद करत, करवून घेत, छळ करत, करवून घेत गेला, तर त्या कारणाने पाप लागते, पापाचा संचय होतो. जर कोणी गंगा नदीच्या उत्तर तीरावर जाऊन दान देत, देववत, यज्ञ करत, करवून घेत गेला, तर त्या कारणाने पुण्य लाभते, पुण्याचा संचय होतो. दानाने, दमनाने, संयमाने आणि सत्य बोलण्याने पुण्य लाभते, पुण्याचा संचय होतो." जर त्या आदरणीय शास्त्यांचे वचन सत्य असेल, तर माझ्यासाठी हे निर्दोष (अपण्णक) आहे की मी कोणत्याही त्रस (चंचल) किंवा स्थावर (स्थिर) प्राण्याला पीडा देत नाही. दोन्ही प्रकारे माझाच विजय (कटग्गाहो) आहे: कारण मी कायेने संयमित आहे, वाचेने संयमित आहे, मनाने संयमित आहे; आणि कायेच्या भेदानंतर, मृत्यूनंतर मी सुगतीला, स्वर्गलोकाला प्राप्त होईन.' त्याच्यामध्ये प्रमोद उत्पन्न होतो. प्रमुदित झालेल्याला प्रीती उत्पन्न होते. प्रीतीयुक्त मनाच्या माणसाची काया शांत होते. शांत काया असलेला सुखाचा अनुभव घेतो. सुखी माणसाचे चित्त समाहित होते. हे ग्रामणी, हाच 'धम्मसमाधी' आहे. जर तू या धम्मसमाधीमध्ये चित्तसमाधी प्राप्त केलीस, तर तू या शंकेच्या (कांखाधम्माचा) त्याग करू शकशील. එවං වුත්තෙ, පාටලියො ගාමණි භගවන්තං එතදවොච – ‘‘අභික්කන්තං, භන්තෙ, අභික්කන්තං, භන්තෙ…පෙ… අජ්ජතග්ගෙ පාණුපෙතං සරණං ගත’’න්ති. තෙරසමං. असे म्हटले असता, पाटलीय ग्रामणी भगवंतांना म्हणाले – “अतिशय सुंदर, भंते! अतिशय सुंदर, भंते! ... आजपासून मला भगवंतांनी जन्मभर शरण गेलेला उपासक म्हणून स्वीकारावे.” तेरावे (सुत्त समाप्त). ගාමණිසංයුත්තං සමත්තං. ग्रामणी संयुत्त समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – චණ්ඩො පුටො යොධාජීවො, හත්ථස්සො අසිබන්ධකො; දෙසනා සඞ්ඛකුලං මණිචූළං, භද්රරාසියපාටලීති. चंड, पुट, योधाजीव, हत्थस्स (हत्ती व घोडा), असिबंधक, देसना, संखकुल, मणीचूळ, भद्र, रासिय आणि पाटली. 9. අසඞ්ඛතසංයුත්තං ९. असंखत संयुत्त 1. පඨමවග්ගො १. प्रथम वर्ग 1. කායගතාසතිසුත්තං १. कायगतासती सुत्त 366. සාවත්ථිනිදානං[Pg.535]. ‘‘අසඞ්ඛතඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අසඞ්ඛතගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතං? යො, භික්ඛවෙ, රාගක්ඛයො දොසක්ඛයො මොහක්ඛයො – ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතං. කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? කායගතාසති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො’’. ३६६. श्रावस्ती येथील निदान. "भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंखत (असंस्कृत/निर्वाण) आणि असंखताकडे नेणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. भिक्षूंनो, असंखत कोणते? भिक्षूंनो, जो रागक्षय (लोभाचा नाश), द्वेषक्षय (द्वेषाचा नाश) आणि मोहक्षय (मोहाचा नाश) आहे – यालाच, भिक्षूंनो, असंखत असे म्हणतात. आणि भिक्षूंनो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? कायगतासती (शरीराविषयीची जागरूकता). भिक्षूंनो, यालाच असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात." ‘‘ඉති ඛො, භික්ඛවෙ, දෙසිතං වො මයා අසඞ්ඛතං, දෙසිතො අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො. යං, භික්ඛවෙ, සත්ථාරා කරණීයං සාවකානං හිතෙසිනා අනුකම්පකෙන අනුකම්පං උපාදාය, කතං වො තං මයා. එතානි, භික්ඛවෙ, රුක්ඛමූලානි, එතානි සුඤ්ඤාගාරානි. ඣායථ, භික්ඛවෙ, මා පමාදත්ථ; මා පච්ඡා විප්පටිසාරිනො අහුවත්ථ. අයං වො අම්හාකං අනුසාසනී’’ති. පඨමං. "अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंखताचा उपदेश केला आहे आणि असंखताकडे नेणाऱ्या मार्गाचाही उपदेश केला आहे. भिक्षूंनो, आपल्या श्रावकांचे हित इच्छिणाऱ्या, त्यांच्यावर अनुकंपा करणाऱ्या शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करणे आवश्यक आहे, ते मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्षूंनो, ही वृक्षमूले आहेत, ही शून्यगृहे (शांत/एकांत जागा) आहेत. भिक्षूंनो, ध्यान करा, आळस (प्रमाद) करू नका; नंतर पश्चात्ताप करण्याची वेळ येऊ देऊ नका. हीच आमची तुम्हांला शिकवण (अनुशासणी) आहे." पहिले (सुत्त समाप्त). 2. සමථවිපස්සනාසුත්තං २. समथविपस्सना सुत्त 367. ‘‘අසඞ්ඛතඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අසඞ්ඛතගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතං? යො, භික්ඛවෙ, රාගක්ඛයො දොසක්ඛයො මොහක්ඛයො – ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතං. කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? සමථො ච විපස්සනා ච. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. දුතියං. ३६७. “भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत (असंखत) आणि असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृत कोणते? भिक्षूंनो, जो रागाचा क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय आहे – यालाच, भिक्षूंनो, असंस्कृत म्हटले जाते. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? समथ आणि विपश्यना. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (दुसरे सूत्र).” 3. සවිතක්කසවිචාරසුත්තං ३. सवितक्क-सविचार सुत्त 368. ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? සවිතක්කසවිචාරො සමාධි, අවිතක්කවිචාරමත්තො සමාධි, අවිතක්කඅවිචාරො සමාධි – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. තතියං. ३६८. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? सवितक्क-सविचार समाधी, अवितक्क-विचारमात्र समाधी, अवितक्क-अविचार समाधी – भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (तिसरे सूत्र).” 4. සුඤ්ඤතසමාධිසුත්තං ४. सुञ्ञत-समाधी सुत्त 369. ‘‘කතමො [Pg.536] ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? සුඤ්ඤතො සමාධි, අනිමිත්තො සමාධි, අප්පණිහිතො සමාධි – අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. චතුත්ථං. ३६९. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? सुञ्ञत समाधी, अनिमित्त समाधी, अप्पणिहित समाधी – भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (चौथे सूत्र).” 5. සතිපට්ඨානසුත්තං ५. सतिपट्ठान सुत्त 370. ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? චත්තාරො සතිපට්ඨානා. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. පඤ්චමං. ३७०. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? चार सतिपट्ठान (स्मृतिप्रस्थान). भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (पाचवे सूत्र).” 6. සම්මප්පධානසුත්තං ६. सम्मदपधान सुत्त 371. ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? චත්තාරො සම්මප්පධානා. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. ඡට්ඨං. ३७१. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? चार सम्मप्पधान (सम्यक्प्रधान). भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (सहावे सूत्र).” 7. ඉද්ධිපාදසුත්තං ७. इद्धिपाद सुत्त 372. ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? චත්තාරො ඉද්ධිපාදා. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. සත්තමං. ३७२. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? चार इद्धिपाद (ऋद्धिपाद). भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (सातवे सूत्र).” 8. ඉන්ද්රියසුත්තං ८. इंद्रिय सुत्त 373. ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? පඤ්චින්ද්රියානි. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. අට්ඨමං. ३७३. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? पाच इंद्रिये. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (आठवे सूत्र).” 9. බලසුත්තං ९. बल सुत्त 374. ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? පඤ්ච බලානි. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. නවමං. ३७४. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? पाच बले. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (नवे सूत्र).” 10. බොජ්ඣඞ්ගසුත්තං १०. बोज्झंग सुत्त 375. ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? සත්ත බොජ්ඣඞ්ගා. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. දසමං. ३७५. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? सात बोज्झंग (बोध्यंग). भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... (दहावे सूत्र).” 11. මග්ගඞ්ගසුත්තං ११. मग्गंग सुत्त 376. ‘‘කතමො [Pg.537] ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? අරියො අට්ඨඞ්ගිකො මග්ගො. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො. ඉති ඛො, භික්ඛවෙ, දෙසිතං වො මයා අසඞ්ඛතං, දෙසිතො අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො. යං, භික්ඛවෙ, සත්ථාරා කරණීයං සාවකානං හිතෙසිනා අනුකම්පකෙන අනුකම්පං උපාදාය කතං වො තං මයා. එතානි, භික්ඛවෙ, රුක්ඛමූලානි, එතානි සුඤ්ඤාගාරානි. ඣායථ, භික්ඛවෙ, මා පමාදත්ථ; මා පච්ඡා විප්පටිසාරිනො අහුවත්ථ. අයං වො අම්හාකං අනුසාසනී’’ති. එකාදසමං. ३७६. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? आर्य अष्टांगिक मार्ग. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते. अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत उपदेशिले आहे आणि असंस्कृताकडे नेणारा मार्गही उपदेशिला आहे. भिक्षूंनो, शिष्यांचे कल्याण इच्छिणाऱ्या, त्यांच्यावर अनुकंपा करणाऱ्या शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करायला हवे, ते मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्षूंनो, ही वृक्षमूले आहेत, ही शून्य घरे आहेत. भिक्षूंनो, ध्यान करा, प्रमाद करू नका; नंतर पश्चात्ताप करण्याची वेळ येऊ देऊ नका. हीच आमची तुम्हांला अनुशासणी आहे.” (अकरावे सूत्र). පඨමො වග්ගො. पहिला वर्ग (वग्ग). තස්සුද්දානං – त्याची अनुक्रमणिका (उद्दान) – කායො සමථො සවිතක්කො, සුඤ්ඤතො සතිපට්ඨානා; සම්මප්පධානා ඉද්ධිපාදා, ඉන්ද්රියබලබොජ්ඣඞ්ගා; මග්ගෙන එකාදසමං, තස්සුද්දානං පවුච්චති. काया, समथ, सवितक्क, सुञ्ञत, सतिपट्ठान, सम्मप्पधान, इद्धिपाद, इंद्रिय, बल, बोज्झंग आणि अकरावा मार्ग; अशी ही अनुक्रमणिका सांगितली जाते. 2. දුතියවග්ගො २. दुसरा वर्ग (वग्ग) 1. අසඞ්ඛතසුත්තං १. असंखत सुत्त 377. ‘‘අසඞ්ඛතඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අසඞ්ඛතගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතං? යො, භික්ඛවෙ, රාගක්ඛයො දොසක්ඛයො මොහක්ඛයො – ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතං. කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? සමථො. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො. ඉති ඛො, භික්ඛවෙ, දෙසිතං වො මයා අසඞ්ඛතං, දෙසිතො අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො. යං, භික්ඛවෙ, සත්ථාරා කරණීයං සාවකානං හිතෙසිනා අනුකම්පකෙන අනුකම්පං උපාදාය, කතං වො තං මයා. එතානි, භික්ඛවෙ, රුක්ඛමූලානි, එතානි සුඤ්ඤාගාරානි. ඣායථ, භික්ඛවෙ, මා පමාදත්ථ; මා පච්ඡා විප්පටිසාරිනො අහුවත්ථ. අයං වො අම්හාකං අනුසාසනීති. ३७७. “भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत आणि असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृत कोणते? भिक्षूंनो, जो रागाचा क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय आहे – यालाच, भिक्षूंनो, असंस्कृत म्हटले जाते. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? समथ. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते. अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत उपदेशिले आहे आणि असंस्कृताकडे नेणारा मार्गही उपदेशिला आहे. भिक्षूंनो, शिष्यांचे कल्याण इच्छिणाऱ्या, त्यांच्यावर अनुकंपा करणाऱ्या शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करायला हवे, ते मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्षूंनो, ही वृक्षमूले आहेत, ही शून्य घरे आहेत. भिक्षूंनो, ध्यान करा, प्रमाद करू नका; नंतर पश्चात्ताप करण्याची वेळ येऊ देऊ नका. हीच आमची तुम्हांला अनुशासणी आहे.” ‘‘අසඞ්ඛතඤ්ච [Pg.538] වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අසඞ්ඛතගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතං? යො, භික්ඛවෙ, රාගක්ඛයො දොසක්ඛයො මොහක්ඛයො – ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතං. කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? විපස්සනා. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො. ඉති ඛො, භික්ඛවෙ, දෙසිතං වො මයා අසඞ්ඛතං…පෙ… අයං වො අම්හාකං අනුසාසනීති. “भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत आणि असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग उपदेशीन. तो ऐका. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृत कोणते? भिक्षूंनो, जो रागाचा क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय आहे – यालाच, भिक्षूंनो, असंस्कृत म्हटले जाते. आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? विपश्यना. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते. अशा प्रकारे, भिक्षूंनो, मी तुम्हांला असंस्कृत उपदेशिले आहे... हीच आमची तुम्हांला अनुशासणी आहे.” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? සවිතක්කො සවිචාරො සමාධි. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? අවිතක්කො විචාරමත්තො සමාධි. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? අවිතක්කො අවිචාරො සමාධි. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? सवितक्क-सविचार समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? अवितक्क-विचारमात्र समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? अवितक्क-अविचार समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते...” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? සුඤ්ඤතො සමාධි. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? අනිමිත්තො සමාධි. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? අප්පණිහිතො සමාධි. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? सुञ्ञत समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? अनिमित्त समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? अप्पणिहित समाधी. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते...” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු කායෙ කායානුපස්සී විහරති ආතාපී සම්පජානො සතිමා විනෙය්ය ලොකෙ අභිජ්ඣාදොමනස්සං. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු වෙදනාසු වෙදනානුපස්සී විහරති…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චිත්තෙ චිත්තානුපස්සී…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ධම්මෙසු ධම්මානුපස්සී විහරති…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. “आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू कायेमध्ये कायेचे सतत दर्शन घेत (कायानुपश्यी होऊन), उद्योगी, सजग आणि स्मृतिमान होऊन, लोकांमधील अभिज्झा आणि डोमनस्स दूर करून विहरतो. भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू वेदनांमध्ये वेदनांचे सतत दर्शन घेत (वेदनानुपश्यी होऊन) विहरतो... भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू चित्तामध्ये चित्ताचे सतत दर्शन घेत (चित्तानुपश्यी होऊन) विहरतो... भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते... आणि भिक्षूंनो, असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग कोणता? येथे, भिक्षूंनो, भिक्षू धम्मांमध्ये धम्मांचे सतत दर्शन घेत (धम्मानुपश्यी होऊन) विहरतो... भिक्षूंनो, यालाच असंस्कृताकडे नेणारा मार्ग म्हटले जाते...” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අනුප්පන්නානං පාපකානං අකුසලානං ධම්මානං අනුප්පාදා ඡන්දං ජනෙති වායමති වීරියං ආරභති චිත්තං පග්ගණ්හාති පදහති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු උප්පන්නානං [Pg.539] පාපකානං අකුසලානං ධම්මානං පහානා ඡන්දං ජනෙති වායමති වීරියං ආරභති චිත්තං පග්ගණ්හාති පදහති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු අනුප්පන්නානං කුසලානං ධම්මානං උප්පාදා ඡන්දං ජනෙති වායමති වීරියං ආරභති චිත්තං පග්ගණ්හාති පදහති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු උප්පන්නානං කුසලානං ධම්මානං ඨිතියා අසම්මොසාය භිය්යොභාවාය වෙපුල්ලාය භාවනාය පාරිපූරියා ඡන්දං ජනෙති වායමති වීරියං ආරභති චිත්තං පග්ගණ්හාති පදහති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. “भिक्खूहो, असंखताकडे (असंस्कृताकडे/निर्वाणाकडे) नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे (या धम्मात) भिक्खू न उत्पन्न झालेल्या पापकारक अकुशल धर्मांचा उत्पाद न होण्यासाठी छंद (इच्छा) उत्पन्न करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्त प्रग्रहित करतो आणि दृढ प्रयत्न करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू उत्पन्न झालेल्या पापकारक अकुशल धर्मांच्या प्रहाणासाठी (त्यागासाठी) छंद उत्पन्न करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्त प्रग्रहित करतो आणि दृढ प्रयत्न करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू न उत्पन्न झालेल्या कुशल धर्मांच्या उत्पत्तीसाठी छंद उत्पन्न करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्त प्रग्रहित करतो आणि दृढ प्रयत्न करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू उत्पन्न झालेल्या कुशल धर्मांच्या स्थितीसाठी, त्यांच्या विनाशाच्या अभावासाठी (असंमोहासाठी), वृद्धीसाठी, विपुलतेसाठी, भावनेसाठी आणि परिपूर्तीसाठी छंद उत्पन्न करतो, प्रयत्न करतो, वीर्य आरंभितो, चित्त प्रग्रहित करतो आणि दृढ प्रयत्न करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे...” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ඡන්දසමාධිපධානසඞ්ඛාරසමන්නාගතං ඉද්ධිපාදං භාවෙති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො …පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු වීරියසමාධිපධානසඞ්ඛාරසමන්නාගතං ඉද්ධිපාදං භාවෙති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු චිත්තසමාධිපධානසඞ්ඛාරසමන්නාගතං ඉද්ධිපාදං භාවෙති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු වීමංසසමාධිපධානසඞ්ඛාරසමන්නාගතං ඉද්ධිපාදං භාවෙති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. “भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू छंद-समाधी आणि प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची (ऋद्धिपादाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू वीर्य-समाधी आणि प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू चित्त-समाधी आणि प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विमंसा-समाधी (मीमांसा-समाधी) आणि प्रधान-संस्कारांनी युक्त अशा इद्धिपादाची भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे...” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සද්ධින්ද්රියං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං විරාගනිස්සිතං නිරොධනිස්සිතං වොස්සග්ගපරිණාමිං. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු වීරියින්ද්රියං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සතින්ද්රියං භාවෙති…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සමාධින්ද්රියං භාවෙති…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු පඤ්ඤින්ද්රියං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං විරාගනිස්සිතං [Pg.540] නිරොධනිස්සිතං වොස්සග්ගපරිණාමිං. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. “भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विवेक-आश्रित, विराग-आश्रित, निरोध-आश्रित आणि त्याग-परिणामी अशा सद्धिंद्रियाची (श्रद्धेंद्रियाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विवेक-आश्रित... पे... वीरियिंद्रियाची (वीर्येन्द्रियाची) भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... सतिंद्रियाची (स्मृतीन्द्रियाची) भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... समाधिंद्रियाची (समाधीन्द्रियाची) भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विवेक-आश्रित, विराग-आश्रित, निरोध-आश्रित आणि त्याग-परिणामी अशा पञ्ञिंद्रियाची (प्रज्ञेन्द्रियाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे...” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සද්ධාබලං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු වීරියබලං භාවෙති…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සතිබලං භාවෙති…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සමාධිබලං භාවෙති…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු පඤ්ඤාබලං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං විරාගනිස්සිතං නිරොධනිස්සිතං වොස්සග්ගපරිණාමිං. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. “भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विवेक-आश्रित... पे... श्रद्धाबलाची भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... वीर्यबलाची भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... सतिबलाची (स्मृतीबलाची) भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... समाधिबलाची भावना करतो... भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू विवेक-आश्रित, विराग-आश्रित, निरोध-आश्रित आणि त्याग-परिणामी अशा पञ्ञाबलाची (प्रज्ञाबलाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे...” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සතිසම්බොජ්ඣඞ්ගං භාවෙති…පෙ… අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු ධම්මවිචයසම්බොජ්ඣඞ්ගං භාවෙති…පෙ… වීරියසම්බොජ්ඣඞ්ගං භාවෙති…පෙ… පීතිසම්බොජ්ඣඞ්ගං භාවෙති…පෙ… පස්සද්ධිසම්බොජ්ඣඞ්ගං භාවෙති…පෙ… සමාධිසම්බොජ්ඣඞ්ගං භාවෙති…පෙ… උපෙක්ඛාසම්බොජ්ඣඞ්ගං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං විරාගනිස්සිතං නිරොධනිස්සිතං වොස්සග්ගපරිණාමිං. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ…. “भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... सति-संबोज्झंगाची (स्मृती-संबोध्यंगाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... भिक्खूहो, असंखताकडे नेणारा मार्ग कोणता? भिक्खूहो, येथे भिक्खू... पे... धम्मविचय-संबोज्झंगाची (धर्मविचय-संबोध्यंगाची) भावना करतो... वीर्य-संबोज्झंगाची भावना करतो... पे... पीति-संबोज्झंगाची भावना करतो... पे... पस्सद्धि-संबोज्झंगाची भावना करतो... पे... समाधी-संबोज्झंगाची भावना करतो... पे... विवेक-आश्रित, विराग-आश्रित, निरोध-आश्रित आणि त्याग-परिणामी अशा उपेक्खा-संबोज्झंगाची (उपेक्षा-संबोध्यंगाची) भावना करतो. भिक्खूहो, याला असंखताकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात... पे...” ‘‘කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්මාදිට්ඨිං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං විරාගනිස්සිතං නිරොධනිස්සිතං වොස්සග්ගපරිණාමිං. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො…පෙ… කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්මාසඞ්කප්පං භාවෙති …පෙ… සම්මාවාචං භාවෙති…පෙ… සම්මාකම්මන්තං භාවෙති…පෙ… සම්මාආජීවං භාවෙති…පෙ… සම්මාවායාමං භාවෙති…පෙ… සම්මාසතිං භාවෙති…පෙ… අසඞ්ඛතඤ්ච වො භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අසඞ්ඛතගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතං…පෙ…? කතමො ච, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො? ඉධ, භික්ඛවෙ, භික්ඛු සම්මාසමාධිං භාවෙති විවෙකනිස්සිතං විරාගනිස්සිතං නිරොධනිස්සිතං වොස්සග්ගපරිණාමිං[Pg.541]. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො. ඉති ඛො, භික්ඛවෙ, දෙසිතං වො මයා අසඞ්ඛතං, දෙසිතො අසඞ්ඛතගාමිමග්ගො. යං, භික්ඛවෙ, සත්ථාරා කරණීයං සාවකානං හිතෙසිනා අනුකම්පකෙන අනුකම්පං උපාදාය, කතං වො තං මයා. එතානි, භික්ඛවෙ, රුක්ඛමූලානි, එතානි සුඤ්ඤාගාරානි. ඣායථ, භික්ඛවෙ, මා පමාදත්ථ; මා පච්ඡා විප්පටිසාරිනො අහුවත්ථ. අයං වො අම්හාකං අනුසාසනී’’ති. පඨමං. “भिक्खूहो, असंखताकडे (असंस्कृत/निर्वाणाकडे) घेऊन जाणारा मार्ग कोणता आहे? इथे, भिक्खूहो, भिक्खू विवेकनिश्रित, विरागनिश्रित, निरोधनिश्रित आणि वोस्सग्गपरिणामी (त्यागामध्ये परिणत होणाऱ्या) सम्यक दृष्टीची भावना करतो. भिक्खूहो, यालाच असंखताकडे घेऊन जाणारा मार्ग असे म्हणतात... पे... आणि भिक्खूहो, असंखताकडे घेऊन जाणारा मार्ग कोणता आहे? इथे, भिक्खूहो, भिक्खू सम्यक संकल्पाची भावना करतो... पे... सम्यक वाचेची भावना करतो... पे... सम्यक कर्मांताची भावना करतो... पे... सम्यक आजीविकेची भावना करतो... पे... सम्यक व्यायामाची भावना करतो... पे... सम्यक स्मृतीची भावना करतो... पे... भिक्खूहो, मी तुम्हांला असंखत आणि असंखताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, असंखत कोणते आहे? ... पे ... आणि भिक्खूहो, असंखताकडे घेऊन जाणारा मार्ग कोणता आहे? इथे, भिक्खूहो, भिक्खू विवेकनिश्रित, विरागनिश्रित, निरोधनिश्रित आणि वोस्सग्गपरिणामी अशा सम्यक समाधीची भावना करतो. भिक्खूहो, यालाच असंखताकडे घेऊन जाणारा मार्ग असे म्हणतात. अशा प्रकारे, भिक्खूहो, मी तुम्हांला असंखताचा उपदेश केला आहे आणि असंखताकडे घेऊन जाणाऱ्या मार्गाचाही उपदेश केला आहे. भिक्खूहो, आपल्या श्रावकांचे कल्याण इच्छिणाऱ्या आणि त्यांच्याबद्दल अनुकंपा बाळगणाऱ्या शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करायला हवे, ते सर्व मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्खूहो, ही वृक्षमूळे आहेत, ही शून्यागारे आहेत. भिक्खूहो, ध्यान करा, प्रमाद करू नका; नंतर पश्चात्ताप करण्याची वेळ येऊ देऊ नका. हाच आमचा तुम्हांला उपदेश आहे.” पहिले सुत्तं. 2. අනතසුත්තං २. अनत सुत्त 378. ‘‘අනතඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි, අනතගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අනතං…පෙ…’’. (යථා අසඞ්ඛතං තථා විත්ථාරෙතබ්බං). දුතියං. ३७८. “भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनत (तृष्णारहित निर्वाण) आणि अनताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनत कोणते आहे? ... पे ...” (जसे असंखत सुत्तामध्ये सविस्तर सांगितले आहे, तसेच येथेही सविस्तर जाणावे). दुसरे सुत्तं. 3-32. අනාසවාදිසුත්තං ३-३२. अनासव सुत्त 379-408. ‘‘අනාසවඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අනාසවගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අනාසවං…පෙ… සච්චඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි සච්චගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, සච්චං…පෙ… පාරඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි පාරගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, පාරං…පෙ… නිපුණඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි නිපුණගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, නිපුණං…පෙ… සුදුද්දසඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි සුදුද්දසගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, සුදුද්දසං…පෙ… අජජ්ජරඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අජජ්ජරගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අජජ්ජරං…පෙ… ධුවඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි ධුවගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, ධුවං…පෙ… අපලොකිතඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අපලොකිතගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අපලොකිතං…පෙ… අනිදස්සනඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අනිදස්සනගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අනිදස්සනං…පෙ… නිප්පපඤ්චඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි නිප්පපඤ්චගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, නිප්පපඤ්චං…පෙ…? ३७९-४०८. “भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनासव (आसवरहित निर्वाण) आणि अनासवाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनासव कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला सत्य आणि सत्याकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, सत्य कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला पार (पलीकडचा तीर) आणि पाराकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, पार कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला निपुण (सूक्ष्म) आणि निपुणाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, निपुण कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला सुदुद्दरस (अतिशय कठीण दिसणारे) आणि सुदुद्दरसाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, सुदुद्दरस कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अजज्जर (जरा-रहित/वृद्धत्व नसलेले) आणि अजज्जराकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अजज्जर कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला ध्रुव (स्थिर/नित्य) आणि ध्रुवाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, ध्रुव कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अपलोकित (नाश न पावणारे) आणि अपलोकिताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अपलोकित कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनिदर्शन (अदृश्य/न दिसणारे) आणि अनिदर्शनाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनिदर्शन कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला निष्प्रपंच (प्रपंचापलीकडील) आणि निष्प्रपंचाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, निष्प्रपंच कोणते आहे? ... पे ...” ‘‘සන්තඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි සන්තගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, සන්තං…පෙ… අමතඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අමතගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අමතං…පෙ… පණීතඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි පණීතගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, පණීතං…පෙ… සිවඤ්ච වො, භික්ඛවෙ[Pg.542], දෙසෙස්සාමි සිවගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, සිවං…පෙ… ඛෙමඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි ඛෙමගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, ඛෙමං…පෙ… තණ්හාක්ඛයඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි තණ්හාක්ඛයගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, තණ්හාක්ඛයං…පෙ…? “भिक्खूहो, मी तुम्हांला शांत आणि शांताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, शांत कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अमृत (मरणरहित) आणि अमृताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अमृत कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्आनंला प्रणीत (श्रेष्ठ) आणि प्रणीताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, प्रणीत कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला शिव (कल्याणकारी/शीतल) आणि शिवाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, शिव कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला क्षेम (सुरक्षित) आणि क्षेमाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, क्षेम कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला तृष्णाक्षय (तण्हाक्खय) आणि तृष्णाक्षयाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, तृष्णाक्षय कोणते आहे? ... पे ...” ‘‘අච්ඡරියඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අච්ඡරියගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අච්ඡරියං…පෙ… අබ්භුතඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අබ්භුතගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අබ්භුතං…පෙ… අනීතිකඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අනීතිකගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අනීතිකං…පෙ… අනීතිකධම්මඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අනීතිකධම්මගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අනීතිකධම්මං…පෙ… නිබ්බානඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි නිබ්බානගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, නිබ්බානං…පෙ… අබ්යාපජ්ඣඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අබ්යාපජ්ඣගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, අබ්යාපජ්ඣං…පෙ… විරාගඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි විරාගගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, විරාගො…පෙ…? “भिक्खूहो, मी तुम्हांला आश्चर्यकारक आणि आश्चर्यकारकाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, आश्चर्यकारक कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अद्भुत आणि अद्भुताकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अद्भुत कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनीतिक (उपद्रवरहित) आणि अनीतिककडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनीतिक कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनीतिकधम्म (निरुपद्रवी स्वभाव असणारे) आणि अनीतिकधम्माकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनीतिकधम्म कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला निर्वाण (निब्बान) आणि निर्वाणाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, निर्वाण कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अव्यापज्झ (पीडारहित) आणि अव्यापज्झाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अव्यापज्झ कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला विराग (रागविरहित) आणि विरागाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, विराग कोणता आहे? ... पे ...” ‘‘සුද්ධිඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි සුද්ධිගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමා ච, භික්ඛවෙ, සුද්ධි…පෙ… මුත්තිඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි මුත්තිගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමා ච, භික්ඛවෙ, මුත්ති…පෙ… අනාලයඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි අනාලයගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමො ච, භික්ඛවෙ, අනාලයො…පෙ… දීපඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි දීපගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, දීපං…පෙ… ලෙණඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි ලෙණගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, ලෙණං…පෙ… තාණඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි තාණගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, තාණං…පෙ… සරණඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි සරණගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, සරණං…පෙ…අනුසාසනී’’ති? බාත්තිංසතිමං. “भिक्खूहो, मी तुम्हांला शुद्धी आणि शुद्धीकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, शुद्धी कोणती आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला मुक्ती आणि मुक्तीकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, मुक्ती कोणती आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला अनालय (आसक्ती नसलेले) आणि अनालयाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, अनालय कोणता आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला द्वीप (आश्रयस्थान) आणि द्वीपाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, द्वीप कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला लेण (गुहा/लपण्याची जागा) आणि लेणाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, leṇaṃ (लेण) कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला ताण (संरक्षण) आणि ताणाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, ताण कोणते आहे? ... पे ... भिक्खूहो, मी तुम्हांला शरण आणि शरणाकडे घेऊन जाणारा मार्ग उपदेशीन. तो लक्षपूर्वक ऐका. आणि भिक्खूहो, शरण कोणते आहे? ... पे ... हाच आमचा तुम्हांला उपदेश आहे.” बत्तिसावे सुत्तं. 33. පරායනසුත්තං ३३. परायन सुत्त 409. ‘‘පරායනඤ්ච වො, භික්ඛවෙ, දෙසෙස්සාමි පරායනගාමිඤ්ච මග්ගං. තං සුණාථ. කතමඤ්ච, භික්ඛවෙ, පරායනං? යො, භික්ඛවෙ, රාගක්ඛයො දොසක්ඛයො [Pg.543] මොහක්ඛයො – ඉදං වුච්චති, භික්ඛවෙ, පරායනං. කතමො ච, භික්ඛවෙ, පරායනගාමී මග්ගො? කායගතාසති. අයං වුච්චති, භික්ඛවෙ, පරායනගාමිමග්ගො. ඉති ඛො, භික්ඛවෙ, දෙසිතං වො මයා පරායනං, දෙසිතො පරායනගාමිමග්ගො. යං, භික්ඛවෙ, සත්ථාරා කරණීයං සාවකානං හිතෙසිනා අනුකම්පකෙන අනුකම්පං උපාදාය, කතං වො තං මයා. එතානි, භික්ඛවෙ, රුක්ඛමූලානි, එතානි සුඤ්ඤාගාරානි. ඣායථ, භික්ඛවෙ, මා පමාදත්ථ; මා පච්ඡා විප්පටිසාරිනො අහුවත්ථ. අයං වො අම්හාකං අනුසාසනී’’ති. (යථා අසඞ්ඛතං තථා විත්ථාරෙතබ්බං). තෙත්තිංසතිමං. ४०९. "भिक्खूहो, मी तुम्हांला अंतिम ध्येय (परायण) आणि अंतिम ध्येयाकडे नेणारा मार्ग उपदेशेन. तो ऐका. आणि भिक्खूहो, अंतिम ध्येय कोणते? भिक्खूहो, रागाचा क्षय, द्वेषाचा क्षय आणि मोहाचा क्षय – भिक्खूहो, यालाच अंतिम ध्येय असे म्हणतात. आणि भिक्खूहो, अंतिम ध्येयाकडे नेणारा मार्ग कोणता? कायगतासती (शरीराविषयीची स्मृती). भिक्खूहो, यालाच अंतिम ध्येयाकडे नेणारा मार्ग असे म्हणतात. अशा प्रकारे, भिक्खूहो, मी तुम्हांला अंतिम ध्येय उपदेशिले आहे आणि अंतिम ध्येयाकडे नेणारा मार्ग उपदेशिला आहे. भिक्खूहो, आपल्या शिष्यांचे हित इच्छिणाऱ्या आणि त्यांच्यावर अनुकंपा करणाऱ्या अनुकंपक शास्त्याने अनुकंपेपोटी जे काही करायला हवे, ते मी तुमच्यासाठी केले आहे. भिक्खूहो, ही वृक्षमूले आहेत, ही शून्यगृहे (निर्जन स्थाने) आहेत. ध्यान करा, भिक्खूहो, प्रमाद (आळस) करू नका; नंतर पश्चात्ताप करणारे होऊ नका. हेच आमचे तुम्हांला अनुशासन आहे." (असंखत सुत्ताप्रमाणे सविस्तर स्पष्ट करावे). तेहतिसावे सुत्त. දුතියො වග්ගො. दुसरा वग्ग समाप्त. තස්සුද්දානං – त्याची उद्दान-गाथा – අසඞ්ඛතං අනතං අනාසවං, සච්චඤ්ච පාරං නිපුණං සුදුද්දසං; අජජ්ජරං ධුවං අපලොකිතං, අනිදස්සනං නිප්පපඤ්ච සන්තං. असंखत (असंस्कृत), अनत (तृष्णारहित), अनासव (आसवरहित), सत्य, पार (पलीकडचा तीर), निपुण (सूक्ष्म), सुदुद्दस (अतिशय कठीणतेने दिसणारे), अजज्जर (जरा-रहित), ध्रुव (स्थिर), अपलोकित (नाशरहित), अनिदर्शन (अदृश्य), निष्प्रपंच (प्रपंचातीत) आणि शांत. අමතං පණීතඤ්ච සිවඤ්ච ඛෙමං, තණ්හාක්ඛයො අච්ඡරියඤ්ච අබ්භුතං; අනීතිකං අනීතිකධම්මං, නිබ්බානමෙතං සුගතෙන දෙසිතං. अमृत (मरणरहित), प्रणीत (उत्कृष्ट), शिव (कल्याणकारी), क्षेम (सुरक्षित), तृष्णाक्षय, आश्चर्यकारक, अद्भुत, अनितीक (उपद्रवरहित), अनितीकधम्म (उपद्रवरहित स्वभाव असलेले) – हेच ते सुगतांनी उपदेशिलेले निर्वाण होय. අබ්යාපජ්ඣො විරාගො ච, සුද්ධි මුත්ති අනාලයො; දීපො ලෙණඤ්ච තාණඤ්ච, සරණඤ්ච පරායනන්ති. अव्यापज्झ (व्याधी/पीडारहित), विराग, शुद्धी, मुक्ती, अनालय (आसक्तीरहित), द्वीप (आश्रयस्थान), लेण (गुहा/लपण्याची जागा), ताण (रक्षण), शरण आणि परायण (अंतिम ध्येय). අසඞ්ඛතසංයුත්තං සමත්තං. असंखतसंयुत्त समाप्त. 10. අබ්යාකතසංයුත්තං १०. अव्याकतसंयुत्त 1. ඛෙමාසුත්තං १. खेमा सुत्त 410. එකං [Pg.544] සමයං භගවා සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ අනාථපිණ්ඩිකස්ස ආරාමෙ. තෙන ඛො පන සමයෙන ඛෙමා භික්ඛුනී කොසලෙසු චාරිකං චරමානා අන්තරා ච සාවත්ථිං අන්තරා ච සාකෙතං තොරණවත්ථුස්මිං වාසං උපගතා හොති. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො සාකෙතා සාවත්ථිං ගච්ඡන්තො, අන්තරා ච සාකෙතං අන්තරා ච සාවත්ථිං තොරණවත්ථුස්මිං එකරත්තිවාසං උපගච්ඡි. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො අඤ්ඤතරං පුරිසං ආමන්තෙසි – ‘‘එහි ත්වං, අම්භො පුරිස, තොරණවත්ථුස්මිං තථාරූපං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා ජාන යමහං අජ්ජ පයිරුපාසෙය්ය’’න්ති. ४१०. एकदा भगवान श्रावस्तीमध्ये अनाथपिंडिकाच्या जेतवन आरामात विहार करत होते. त्या वेळी खेमा नावाची भिक्खुणी कोसल देशात चारिका (भ्रमण) करत असताना, श्रावस्ती आणि साकेत यांच्या दरम्यान असलेल्या तोरणवत्थू येथे मुक्कामास राहिली होती. तेव्हा कोसलचा राजा प्रसेनजित साकेतहून श्रावस्तीला जात असताना, साकेत आणि श्रावस्ती यांच्या दरम्यान असलेल्या तोरणवत्थू येथे एका रात्रीच्या मुक्कामासाठी थांबला. मग कोसलचा राजा प्रसेनजित एका माणसाला म्हणाला – 'हे माणसा, ये, तोरणवत्थूमध्ये असा एखादा श्रमण किंवा ब्राह्मण आहे का, ज्याची मी आज भेट घेऊ शकेन (सेवा करू शकेन), याचा शोध घे.' ‘‘එවං, දෙවා’’ති ඛො සො පුරිසො රඤ්ඤො පසෙනදිස්ස කොසලස්ස පටිස්සුත්වා කෙවලකප්පං තොරණවත්ථුං ආහිණ්ඩන්තො නාද්දස තථාරූපං සමණං වා බ්රාහ්මණං වා යං රාජා පසෙනදි කොසලො පයිරුපාසෙය්ය. අද්දසා ඛො සො පුරිසො ඛෙමං භික්ඛුනිං තොරණවත්ථුස්මිං වාසං උපගතං. දිස්වාන යෙන රාජා පසෙනදි කොසලො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා රාජානං පසෙනදිං කොසලං එතදවොච – 'तसेच होईल, महाराज,' असे म्हणून त्या माणसाने कोसलचा राजा प्रसेनजित याच्या आज्ञेचे पालन केले आणि संपूर्ण तोरणवत्थूमध्ये फिरूनही त्याला असा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण आढळला नाही, ज्याची राजा प्रसेनजित भेट घेऊ शकेल. परंतु, त्या माणसाने खेमा भिक्खुणीला तोरणवत्थू येथे मुक्कामास राहिलेले पाहिले. त्यांना पाहून तो कोसलचा राजा प्रसेनजित याच्याकडे गेला; आणि जवळ जाऊन राजा प्रसेनजितला म्हणाला – ‘‘නත්ථි ඛො, දෙව, තොරණවත්ථුස්මිං තථාරූපො සමණො වා බ්රාහ්මණො වා යං දෙවො පයිරුපාසෙය්ය. අත්ථි ච ඛො, දෙව, ඛෙමා නාම භික්ඛුනී, තස්ස භගවතො සාවිකා අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස. තස්සා ඛො පන අය්යාය එවං කල්යාණො කිත්තිසද්දො අබ්භුග්ගතො – ‘පණ්ඩිතා, වියත්තා මෙධාවිනී බහුස්සුතා චිත්තකථා කල්යාණපටිභානා’ති. තං දෙවො පයිරුපාසතූ’’ති. 'महाराज, तोरणवत्थूमध्ये असा कोणताही श्रमण किंवा ब्राह्मण नाही, ज्याची महाराज भेट घेऊ शकतील. परंतु, महाराज, त्या अर्हत, सम्यक्संबुद्ध भगवंतांची शिष्या असलेली खेमा नावाची भिक्खुणी येथे आहे. त्या आदरणीय आर्यांविषयी अशी उत्तम कीर्ती पसरली आहे की – 'त्या पंडिता (विदुषी), चतुर, बुद्धीमान, बहुश्रुत, वक्तृत्वसंपन्न आणि प्रतिभावान आहेत.' महाराजांनी त्यांची भेट घ्यावी.' අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො යෙන ඛෙමා භික්ඛුනී තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ඛෙමං භික්ඛුනිං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං [Pg.545] නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො ඛෙමං භික්ඛුනිං එතදවොච – ‘‘කිං නු ඛො, අය්යෙ, හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, මහාරාජ, භගවතා – ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං පනය්යෙ, න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, මහාරාජ, අබ්යාකතං භගවතා – ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං නු ඛො, අය්යෙ, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, මහාරාජ, භගවතා – ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං පනය්යෙ, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති. ‘‘එතම්පි ඛො, මහාරාජ, අබ්යාකතං භගවතා – ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. त्यानंतर कोसलचा राजा प्रसेनजित जेथे खेमा भिक्खुणी होती तेथे गेला; जवळ जाऊन त्याने खेमा भिक्खुणीला अभिवादन केले आणि तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या कोसलच्या राजा प्रसेनजितने खेमा भिक्खुणीला विचारले – 'आदरणीय आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात का?' 'महाराज, भगवंतांनी हे अव्याकृत (अस्पष्ट/घोषित न केलेले) ठेवले आहे की – 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात.'' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात का?' 'महाराज, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात.'' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही का?' 'महाराज, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही.'' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही का?' 'महाराज, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.' ‘‘‘කිං නු ඛො, අය්යෙ, හොති තථාගතො පරං මරණා’ති, ඉති පුට්ඨා සමානා – ‘අබ්යාකතං ඛො එතං, මහාරාජ, භගවතා – හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි. ‘කිං පනය්යෙ, න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති ඉති පුට්ඨා සමානා – ‘එතම්පි ඛො, මහාරාජ, අබ්යාකතං භගවතා – න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි. ‘කිං නු ඛො, අය්යෙ, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’ති ඉති පුට්ඨා සමානා – ‘අබ්යාකතං ඛො එතං, මහාරාජ, භගවතා – හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි. ‘කිං පනය්යෙ, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති ඉති පුට්ඨා සමානා – ‘එතම්පි ඛො, මහාරාජ, අබ්යාකතං භගවතා – නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි. ‘කො නු ඛො, අය්යෙ, හෙතු, කො පච්චයො යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’’ති? 'आदरणीय आर्ये, 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात का?' असे विचारले असता, आपण म्हणता – 'महाराज, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात.' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात का?' असे विचारले असता, आपण म्हणता – 'महाराज, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात.' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही का?' असे विचारले असता, आपण म्हणता – 'महाराज, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही.' 'तर मग, आर्ये, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही का?' असे विचारले असता, आपण म्हणता – 'महाराज, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.' तर मग, आर्ये, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?' ‘‘තෙන හි, මහාරාජ, තඤ්ඤෙවෙත්ථ පටිපුච්ඡිස්සාමි. යථා තෙ ඛමෙය්ය තථා නං බ්යාකරෙය්යාසි. තං කිං මඤ්ඤසි, මහාරාජ, අත්ථි තෙ කොචි ගණකො වා මුද්දිකො වා සඞ්ඛායකො වා යො පහොති ගඞ්ගාය වාලුකං ගණෙතුං – එත්තකා වාලුකා ඉති වා, එත්තකානි වාලුකසතානි ඉති වා, එත්තකානි වාලුකසහස්සානි ඉති වා, එත්තකානි වාලුකසතසහස්සානි ඉති වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, අය්යෙ’’. ‘‘අත්ථි පන තෙ කොචි ගණකො වා මුද්දිකො වා සඞ්ඛායකො වා යො පහොති මහාසමුද්දෙ [Pg.546] උදකං ගණෙතුං – එත්තකානි උදකාළ්හකානි ඉති වා, එත්තකානි උදකාළ්හකසතානි ඉති වා, එත්තකානි උදකාළ්හකසහස්සානි ඉති වා, එත්තකානි උදකාළ්හකසතසහස්සානි ඉති වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, අය්යෙ’’. ‘‘තං කිස්ස හෙතු’’? ‘‘මහාය්යෙ, සමුද්දො ගම්භීරො අප්පමෙය්යො දුප්පරියොගාහො’’ති. ‘‘එවමෙව ඛො, මහාරාජ, යෙන රූපෙ තථාගතං පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය තං රූපං තථාගතස්ස පහීනං උච්ඡින්නමූලං තාලාවත්ථුකතං අනභාවඞ්කතං ආයතිං අනුප්පාදධම්මං. රූපසඞ්ඛායවිමුත්තො ඛො, මහාරාජ, තථාගතො ගම්භීරො අප්පමෙය්යො දුප්පරියොගාහො – සෙය්යථාපි මහාසමුද්දො. ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති. “तर मग, महाराज, मी आपल्यालाच याविषयी पुन्हा विचारते. जसे आपल्याला योग्य वाटेल, तसे आपण त्याचे उत्तर द्यावे. महाराज, आपल्याला काय वाटते? आपल्याकडे असा कोणी गणक (हिशेबनीस), मुद्दिक (बोटांवर मोजणारा) किंवा संख्यायक (गणितज्ञ) आहे का, जो गंगेतील वाळूचे कण मोजण्यास समर्थ असेल—की 'इतके वाळूचे कण आहेत' किंवा 'इतके शेकडो वाळूचे कण आहेत' किंवा 'इतके हजारो वाळूचे कण आहेत' किंवा 'इतके लाखो वाळूचे कण आहेत'?” “नाही, आर्ये.” “तर मग, महाराज, आपल्याकडे असा कोणी गणक, मुद्दिक किंवा संख्यायक आहे का, जो महासागरातील पाण्याचे मोजमाप करण्यास समर्थ असेल—की 'इतके आढक पाणी आहे' किंवा 'इतके शेकडो आढक पाणी आहे' किंवा 'इतके हजारो आढक पाणी आहे' किंवा 'इतके लाखो आढक पाणी आहे'?” “नाही, आर्ये.” “ते कोणत्या कारणाने?” “आर्ये, महासागर हा खोल, अमेय (अथांग) आणि थांग लागण्यास कठीण आहे.” “त्याचप्रमाणे, महाराज, ज्या रूपाच्या आधारे तथागतांचे वर्णन केले जाऊ शकले असते, ते रूप तथागतांनी नष्ट केले आहे, मुळासकट उपटून टाकले आहे, ताडाच्या खुंटासारखे केले आहे, नामशेष केले आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्वभावाचे केले आहे. महाराज, रूपाच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत हे महासागरासारखेच खोल, अमेय आणि थांग लागण्यास कठीण आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही.” ‘‘යාය වෙදනාය තථාගතං පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය, සා වෙදනා තථාගතස්ස පහීනා උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා. වෙදනාසඞ්ඛායවිමුත්තො, මහාරාජ, තථාගතො ගම්භීරො අප්පමෙය්යො දුප්පරියොගාහො – සෙය්යථාපි මහාසමුද්දො. ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති. “ज्या वेदनेच्या आधारे तथागतांचे वर्णन केले जाऊ शकले असते, ती वेदना तथागतांनी नष्ट केली आहे, मुळासकट उपटून टाकली आहे, ताडाच्या खुंटासारखी केली आहे, नामशेष केली आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्वभावाची केली आहे. महाराज, वेदनेच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत हे महासागरासारखेच खोल, अमेय आणि थांग लागण्यास कठीण आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही.” ‘‘යාය සඤ්ඤා තථාගතං…පෙ… යෙහි සඞ්ඛාරෙහි තථාගතං පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය, තෙ සඞ්ඛාරා තථාගතස්ස පහීනා උච්ඡින්නමූලා තාලාවත්ථුකතා අනභාවඞ්කතා ආයතිං අනුප්පාදධම්මා. සඞ්ඛාරසඞ්ඛායවිමුත්තො ඛො, මහාරාජ, තථාගතො ගම්භීරො අප්පමෙය්යො දුප්පරියොගාහො – සෙය්යථාපි මහාසමුද්දො. ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති. “ज्या संज्ञेच्या आधारे तथागतांचे... (पेय्याल)... ज्या संस्कारांच्या आधारे तथागतांचे वर्णन केले जाऊ शकले असते, ते संस्कार तथागतांनी नष्ट केले आहेत, मुळासकट उपटून टाकले आहेत, ताडाच्या खुंटासारखे केले आहेत, नामशेष केले आहेत आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्वभावाचे केले आहेत. महाराज, संस्कारांच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत हे महासागरासारखेच खोल, अमेय आणि थांग लागण्यास कठीण आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही.” ‘‘යෙන විඤ්ඤාණෙ තථාගතං පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය තං විඤ්ඤාණං තථාගතස්ස පහීනං උච්ඡින්නමූලං තාලාවත්ථුකතං අනභාවඞ්කතං ආයතිං [Pg.547] අනුප්පාදධම්මං. විඤ්ඤාණසඞ්ඛායවිමුත්තො ඛො, මහාරාජ, තථාගතො ගම්භීරො අප්පමෙය්යො දුප්පරියොගාහො – සෙය්යථාපි මහාසමුද්දො. ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙතී’’ති. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො ඛෙමාය භික්ඛුනියා භාසිතං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා උට්ඨායාසනා ඛෙමං භික්ඛුනිං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමි. “ज्या विज्ञानाच्या आधारे तथागतांचे वर्णन केले जाऊ शकले असते, ते विज्ञान तथागतांनी नष्ट केले आहे, मुळासकट उपटून टाकले आहे, ताडाच्या खुंटासारखे केले आहे, नामशेष केले आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होण्याच्या स्वभावाचे केले आहे. महाराज, विज्ञानाच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत हे महासागरासारखेच खोल, अमेय आणि थांग लागण्यास कठीण आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही' हेही लागू होत नाही; 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही.” तेव्हा कोसलचा राजा प्रसेनजित याने खेमा भिक्षुणीच्या भाषणाचे अभिनंदन केले, त्याचे कौतुक केले आणि आसनावरून उठून खेमा भिक्षुणीला अभिवादन करून, प्रदक्षिणा घालून तो निघून गेला. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො අපරෙන සමයෙන යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කිං නු ඛො, භන්තෙ, හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, මහාරාජ, මයා – ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං පන, භන්තෙ, න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, මහාරාජ, අබ්යාකතං මයා – ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං නු ඛො, භන්තෙ, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, මහාරාජ, මයා – ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං පන, භන්තෙ, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, මහාරාජ, අබ්යාකතං මයා – ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං නු ඛො, භන්තෙ, හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති ඉති පුට්ඨො සමානො – ‘අබ්යාකතං ඛො එතං, මහාරාජ, මයා – හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි…පෙ…. ‘‘‘කිං පන, භන්තෙ, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති ඉති පුට්ඨො සමානො – ‘‘‘එතම්පි ඛො, මහාරාජ, අබ්යාකතං මයා – නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි. කො නු ඛො, භන්තෙ, හෙතු, කො පච්චයො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති? त्यानंतर दुसऱ्या एका प्रसंगी कोसलचा राजा प्रसेनजित जेथे भगवान होते तेथे गेला. तेथे पोहोचल्यावर भगवंतांना अभिवादन करून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या कोसलच्या राजा प्रसेनजिताने भगवंतांना विचारले—'भंते, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात का?' 'महाराज, मी हे घोषित केलेले नाही (अव्याकृत ठेवले आहे) की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात.' 'तर मग, भंते, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात का?' 'महाराज, मी हेही घोषित केलेले नाही की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात.' 'तर मग, भंते, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही का?' 'महाराज, मी हेही घोषित केलेले नाही की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही.' 'तर मग, भंते, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही का?' 'महाराज, मी हेही घोषित केलेले नाही की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही.' 'भंते, जेव्हा विचारले जाते की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात का? तेव्हा आपण म्हणता—महाराज, मी हे घोषित केलेले नाही की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात... (पेय्याल)... आणि जेव्हा विचारले जाते की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही का? तेव्हा आपण म्हणता—महाराज, मी हेही घोषित केलेले नाही की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही. भंते, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?' ‘‘තෙන හි, මහාරාජ, තඤ්ඤෙවෙත්ථ පටිපුච්ඡිස්සාමි. යථා තෙ ඛමෙය්ය තථා නං බ්යාකරෙය්යාසි. තං කිං මඤ්ඤසි, මහාරාජ, අත්ථි තෙ කොචි ගණකො වා මුද්දිකො වා සඞ්ඛායකො වා යො පහොති ගඞ්ගාය වාලුකං ගණෙතුං [Pg.548] – එත්තකා වාලුකා ඉති වා…පෙ… එත්තකානි වාලුකසතසහස්සානි ඉති වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘අත්ථි පන තෙ කොචි ගණකො වා මුද්දිකො වා සඞ්ඛායකො වා යො පහොති මහාසමුද්දෙ උදකං ගණෙතුං – එත්තකානි උදකාළ්හකානි ඉති වා…පෙ… එත්තකානි උදකාළ්හකසතසහස්සානි ඉති වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘තං කිස්ස හෙතු’’? ‘‘මහා, භන්තෙ, සමුද්දො ගම්භීරො අප්පමෙය්යො දුප්පරියොගාහො. එවමෙව ඛො, මහාරාජ, යෙන රූපෙන තථාගතං පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය, තං රූපං තථාගතස්ස පහීනං උච්ඡින්නමූලං තාලාවත්ථුකතං අනභාවඞ්කතං ආයතිං අනුප්පාදධම්මං. රූපසඞ්ඛායවිමුත්තො ඛො, මහාරාජ, තථාගතො ගම්භීරො අප්පමෙය්යො දුප්පරියොගාහො – සෙය්යථාපි මහාසමුද්දො. ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති. යාය වෙදනාය…පෙ… යාය සඤ්ඤාය…පෙ… යෙහි සඞ්ඛාරෙහි…පෙ…’’. “तसे असेल तर, महाराज, मी तुम्हालाच याविषयी पुन्हा विचारतो. जसे तुम्हाला योग्य वाटेल तसे तुम्ही त्याचे उत्तर द्या. महाराज, तुम्हाला काय वाटते? गंगेतील वाळू मोजण्यास समर्थ असा एखादा गणक (हिशोबनीस), मुद्रिक (बोटांवर मोजणारा) किंवा संख्यायक (संख्या मोजणारा) तुमच्याकडे आहे का, जो मोजू शकेल की—'इतके वाळूचे कण आहेत' किंवा... 'इतके लाख वाळूचे कण आहेत'?” “नाही, भंते.” “पण महाराज, महासागरातील पाणी मोजण्यास समर्थ असा एखादा गणक, मुद्रिक किंवा संख्यायक तुमच्याकडे आहे का, जो मोजू शकेल की—'पाण्याचे इतके आळ्हक (माप) आहेत' किंवा... 'पाण्याचे इतके लाख आळ्हक आहेत'?” “नाही, भंते.” “ते कशामुळे?” “भंते, महासागर हा विशाल, खोल, अमेय (मोजता न येणारा) आणि दुस्तर (प्रवेश करण्यास कठीण) आहे.” “तशाच प्रकारे, महाराज, ज्या रूपाने तथागतांना प्रज्ञप्त (वर्णन) केले जाऊ शकते, ते रूप तथागतांनी प्रहीन (नष्ट) केले आहे, मुळासकट उपटून टाकले आहे, ताडाच्या खुंटासारखे केले आहे, नामशेष केले आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचे केले आहे. महाराज, रूपाच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत महासागराप्रमाणेच खोल, अमेय आणि दुस्तर आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही... 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही. ज्या वेदनेने... ज्या संज्ञेने... ज्या संस्कारांनी...” ‘‘යෙන විඤ්ඤාණෙන තථාගතං පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය, තං විඤ්ඤාණං තථාගතස්ස පහීනං උච්ඡින්නමූලං තාලාවත්ථුකතං අනභාවඞ්කතං ආයතිං අනුප්පාදධම්මං. විඤ්ඤාණසඞ්ඛායවිමුත්තො ඛො, මහාරාජ, තථාගතො ගම්භීරො අප්පමෙය්යො දුප්පරියොගාහො – සෙය්යථාපි මහාසමුද්දො. ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙති, ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි න උපෙතී’’ති. “ज्या विज्ञानाने तथागतांना प्रज्ञप्त केले जाऊ शकते, ते विज्ञान तथागतांनी प्रहीन केले आहे, मुळासकट उपटून टाकले आहे, ताडाच्या खुंटासारखे केले आहे, नामशेष केले आहे आणि भविष्यात पुन्हा उत्पन्न न होणाऱ्या स्वभावाचे केले आहे. महाराज, विज्ञानाच्या संज्ञेपासून मुक्त झालेले तथागत महासागराप्रमाणेच खोल, अमेय आणि दुस्तर आहेत. 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात' हेही लागू होत नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात' हेही लागू होत नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही' हेही लागू होत नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात आणि नसतात असेही नाही' हेही लागू होत नाही.” ‘‘අච්ඡරියං, භන්තෙ, අබ්භුතං, භන්තෙ! යත්ර හි නාම සත්ථු චෙව සාවිකාය ච අත්ථෙන අත්ථො බ්යඤ්ජනෙන බ්යඤ්ජනං සංසන්දිස්සති, සමෙස්සති, න විරොධයිස්සති යදිදං අග්ගපදස්මිං. එකමිදාහං, භන්තෙ, සමයං ඛෙමං භික්ඛුනිං උපසඞ්කමිත්වා එතමත්ථං අපුච්ඡිං. සාපි මෙ අය්යා එතෙහි පදෙහි එතෙහි බ්යඤ්ජනෙහි එතමත්ථං බ්යාකාසි, සෙය්යථාපි භගවා. අච්ඡරියං, භන්තෙ, අබ්භුතං, භන්තෙ! යත්ර හි නාම සත්ථු චෙව සාවිකාය ච අත්ථෙන අත්ථො බ්යඤ්ජනෙන බ්යඤ්ජනං සංසන්දිස්සති, සමෙස්සති, න විරොධයිස්සති යදිදං අග්ගපදස්මිං. හන්ද දානි මයං, භන්තෙ, ගච්ඡාම. බහුකිච්චා මයං බහුකරණීයා’’ති. ‘‘යස්ස දානි ත්වං, මහාරාජ, කාලං මඤ්ඤසී’’ති. අථ ඛො රාජා පසෙනදි කොසලො භගවතො [Pg.549] භාසිතං අභිනන්දිත්වා අනුමොදිත්වා උට්ඨායාසනා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා පදක්ඛිණං කත්වා පක්කාමීති. පඨමං. “आश्चर्यकारक आहे, भंते! अद्भुत आहे, भंते! कारण या श्रेष्ठ पदाच्या (परम सत्याच्या) बाबतीत शास्त्यांचे (बुद्धांचे) आणि त्यांच्या श्राविकेचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी (शब्दांशी) व्यंजन तंतोतंत जुळते आहे, सुसंगत आहे आणि त्यात कोणताही विरोध नाही. भंते, एका वेळी मी खेमा भिक्खुणींकडे जाऊन त्यांना याविषयी विचारले होते. त्या आदरणीय आर्यांनीही मला याच पदांनी आणि याच व्यंजनांनी या विषयाचे स्पष्टीकरण दिले होते, जसे की भगवंतांनी दिले आहे. आश्चर्यकारक आहे, भंते! अद्भुत आहे, भंते! कारण या श्रेष्ठ पदाच्या बाबतीत शास्त्यांचे आणि त्यांच्या श्राविकेचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन तंतोतंत जुळते आहे, सुसंगत आहे आणि त्यात कोणताही विरोध नाही. भंते, आता आम्ही निघतो. आम्हाला बरीच कामे आणि कर्तव्ये आहेत.” “महाराज, आता तुम्हाला जी योग्य वेळ वाटेल ती (तुम्ही करू शकता).” त्यानंतर कोसलचा राजा प्रसेनजित भगवंतांच्या भाषणाचे अभिनंदन व अनुमोदन करून, आसनावरून उठून, भगवंतांना अभिवादन व प्रदक्षिणा करून निघून गेला. पहिले (सुत्त समाप्त). 2. අනුරාධසුත්තං २. अनुराध सुत्त 411. එකං සමයං භගවා වෙසාලියං විහරති මහාවනෙ කූටාගාරසාලායං. තෙන ඛො පන සමයෙන ආයස්මා අනුරාධො භගවතො අවිදූරෙ අරඤ්ඤකුටිකායං විහරති. අථ ඛො සම්බහුලා අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා යෙනායස්මා අනුරාධො තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා අනුරාධෙන සද්ධිං සම්මොදිංසු. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො තෙ අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා ආයස්මන්තං අනුරාධං එතදවොචුං – ‘‘යො සො, ආවුසො අනුරාධ, තථාගතො උත්තමපුරිසො පරමපුරිසො පරමපත්තිපත්තො, තං තථාගතො ඉමෙසු චතූසු ඨානෙසු පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙති – ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා, ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා, ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා, ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා’’ති? ‘‘යො සො, ආවුසො, තථාගතො උත්තමපුරිසො පරමපුරිසො පරමපත්තිපත්තො, තං තථාගතො අඤ්ඤත්ර ඉමෙහි චතූහි ඨානෙහි පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙති – ‘හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා, ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති වා’’ති. එවං වුත්තෙ, තෙ අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා ආයස්මන්තං අනුරාධං එතදවොචුං – ‘‘සො චායං භික්ඛු නවො භවිස්සති අචිරපබ්බජිතො, ථෙරො වා පන බාලො අබ්යත්තො’’ති. අථ ඛො තෙ අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා ආයස්මන්තං අනුරාධං නවවාදෙන ච බාලවාදෙන ච අපසාදෙත්වා උට්ඨායාසනා පක්කමිංසු. ४११. एकदा भगवान वैशाली येथील महावनातील कूटागारशाळेत विहार करत होते. त्या वेळी आयुष्यमान अनुराध भगवंतांपासून काही अंतरावर एका अरण्यकुटीत विहार करत होते. तेव्हा अनेक अन्यधर्मीय परिव्राजक आयुष्यमान अनुराधांकडे आले. आल्यानंतर त्यांनी आयुष्यमान अनुराधांशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण आटोपून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले ते अन्यधर्मीय परिव्राजक आयुष्यमान अनुराधांना म्हणाले—'मित्र अनुराध, जे तथागत उत्तम पुरुष, परम पुरुष आणि परम प्राप्तीला पोहोचलेले आहेत, ते तथागत या चार पर्यायांपैकी कोणत्या पर्यायाने प्रज्ञप्त (वर्णन) करतात—"तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात", "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात", "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही", किंवा "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात आणि नसतात असेही नाही"?' 'मित्रांनो, जे तथागत उत्तम पुरुष, परम पुरुष आणि परम प्राप्तीला पोहोचलेले आहेत, ते तथागत या चार पर्यायांव्यतिरिक्त इतर प्रकारे प्रज्ञप्त करतात की—"तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात", "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात", "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही", किंवा "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात आणि नसतात असेही नाही".' असे म्हटल्यावर, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक आयुष्यमान अनुराधांना म्हणाले—'हा भिक्खू नवीन असावा, ज्याने नुकतीच प्रव्रज्या घेतली आहे; किंवा जर तो थेर (ज्येष्ठ) असेल, तर तो मूर्ख आणि अज्ञानी असावा.' त्यानंतर ते अन्यधर्मीय परिव्राजक आयुष्यमान अनुराधांना 'नवशिका' आणि 'मूर्ख' असे म्हणून त्यांचा उपहास करून आसनावरून उठून निघून गेले. අථ ඛො ආයස්මතො අනුරාධස්ස අචිරපක්කන්තෙසු අඤ්ඤතිත්ථියෙසු පරිබ්බාජකෙසු එතදහොසි – ‘‘සචෙ ඛො මං තෙ අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා උත්තරිං පුච්ඡෙය්යුං, කථං බ්යාකරමානො නු ඛ්වාහං තෙසං අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං වුත්තවාදී චෙව භගවතො අස්සං, න [Pg.550] ච භගවන්තං අභූතෙන අබ්භාචික්ඛෙය්යං, ධම්මස්ස චානුධම්මං බ්යාකරෙය්යං, න ච කොචි සහධම්මිකො වාදානුවාදො ගාරය්හං ඨානං ආගච්ඡෙය්යා’’ති? අථ ඛො ආයස්මා අනුරාධො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවන්තං අභිවාදෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා අනුරාධො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘ඉධාහං, භන්තෙ, භගවතො අවිදූරෙ අරඤ්ඤකුටිකායං විහරාමි. අථ ඛො, භන්තෙ, සම්බහුලා අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා යෙනාහං තෙනුපසඞ්කමිංසු; උපසඞ්කමිත්වා මයා සද්ධිං සම්මොදිංසු. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදිංසු. එකමන්තං නිසින්නා ඛො, භන්තෙ, තෙ අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා මං එතදවොචුං – ‘‘යො සො, ආවුසො අනුරාධ, තථාගතො උත්තමපුරිසො පරමපුරිසො පරමපත්තිපත්තො, තං තථාගතො ඉමෙසු චතූසු ඨානෙසු පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙති – ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා’’ති? එවං වුත්තාහං, භන්තෙ, තෙ අඤ්ඤතිත්ථියෙ පරිබ්බාජකෙ එතදවොචං – ‘‘යො සො, ආවුසො, තථාගතො උත්තමපුරිසො පරමපුරිසො පරමපත්තිපත්තො, තං තථාගතො අඤ්ඤත්ර ඉමෙහි චතූහි ඨානෙහි පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙති – ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා’’ති. එවං වුත්තෙ, භන්තෙ, තෙ අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා මං එතදවොචුං – ‘‘සො චායං භික්ඛු නවො භවිස්සති අචිරපබ්බජිතො ථෙරො වා පන බාලො අබ්යත්තො’’ති. අථ ඛො මං, භන්තෙ, තෙ අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා නවවාදෙන ච බාලවාදෙන ච අපසාදෙත්වා උට්ඨායාසනා පක්කමිංසු. තස්ස මය්හං, භන්තෙ, අචිරපක්කන්තෙසු තෙසු අඤ්ඤතිත්ථියෙසු පරිබ්බාජකෙසු එතදහොසි – ‘‘සචෙ ඛො මං තෙ අඤ්ඤතිත්ථියා පරිබ්බාජකා උත්තරිං පුච්ඡෙය්යුං, කථං බ්යාකරමානො නු ඛ්වාහං තෙසං අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං වුත්තවාදී චෙව භගවතො අස්සං, න ච භගවන්තං අභූතෙන අබ්භාචික්ඛෙය්යං, ධම්මස්ස චානුධම්මං බ්යාකරෙය්යං, න ච කොචි සහධම්මිකො වාදානුවාදො ගාරය්හං ඨානං ආගච්ඡෙය්යා’’ති? त्यानंतर, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक निघून गेल्यावर काही वेळातच आयुष्यमान अनुराधांच्या मनात असा विचार आला – “जर ते अन्यधर्मीय परिव्राजक मला यापुढे विचारतील, तर मी त्या अन्यधर्मीय परिव्राजकांना कशा प्रकारे उत्तर दिले पाहिजे जेणेकरून मी भगवंतांच्या वचनांनुसार बोलणारा ठरेन, भगवंतांवर असत्य आरोप करणार नाही, धर्माला अनुसरूनच उत्तर देईन आणि कोणताही सहधर्मीय वादविवाद किंवा आक्षेप निंदनीय ठरणार नाही?” त्यानंतर आयुष्यमान अनुराध जेथे भगवंत होते तेथे गेले; आणि भगवंतांना अभिवादन करून एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेल्या आयुष्यमान अनुराधांनी भगवंतांना असे म्हटले – “भन्ते, मी येथे भगवंतांच्या जवळच एका अरण्यकुटीत राहत आहे. त्यानंतर, भन्ते, अनेक अन्यधर्मीय परिव्राजक मी जेथे होतो तेथे आले; आणि त्यांनी माझ्याशी कुशल-मंगल विचारपूस केली. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर, भन्ते, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक मला म्हणाले – ‘आवुसो अनुराध, जो तो तथागत उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला पोहोचलेला आहे, त्या तथागतांना या चार गोष्टींमध्ये प्रज्ञापित करताना तथागत कसे प्रज्ञापित करतात – तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही?’ असे विचारल्यावर, भन्ते, मी त्या अन्यधर्मीय परिव्राजकांना असे म्हटले – ‘आवुसो, जो तो तथागत उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला पोहोचलेला आहे, त्या तथागतांना या चार गोष्टींशिवाय प्रज्ञापित करताना तथागत कसे प्रज्ञापित करतात – तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही, किंवा... तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही?’ असे म्हटल्यावर, भन्ते, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक मला म्हणाले – ‘हा भिक्खू नक्कीच नवीन असेल, ज्याने नुकतीच प्रव्रज्या घेतली आहे, किंवा जर तो थेर असेल, तर तो मूर्ख आणि अज्ञानी असेल.’ त्यानंतर, भन्ते, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक मला ‘नवशिका’ आणि ‘मूर्ख’ असे म्हणून, माझा अनादर करून आसनावरून उठून निघून गेले. भन्ते, ते अन्यधर्मीय परिव्राजक निघून गेल्यावर काही वेळातच माझ्या मनात असा विचार आला – ‘जर ते अन्यधर्मीय परिव्राजक मला यापुढे विचारतील, तर मी त्या अन्यधर्मीय परिव्राजकांना कशा प्रकारे उत्तर दिले पाहिजे जेणेकरून मी भगवंतांच्या वचनांनुसार बोलणारा ठरेन, भगवंतांवर असत्य आरोप करणार नाही, धर्माला अनुसरूनच उत्तर देईन आणि कोणताही सहधर्मीय वादविवाद किंवा आक्षेप निंदनीय ठरणार नाही?’” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, අනුරාධ, රූපං නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “अनुराध, तुला काय वाटते, रूप नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘වෙදනා නිච්චා වා අනිච්චා වා’’ති?…පෙ… සඤ්ඤා [Pg.551] …පෙ… සඞ්ඛාරා…පෙ… ‘‘විඤ්ඤාණං නිච්චං වා අනිච්චං වා’’ති? “वेदना नित्य आहे की अनित्य?”... “संज्ञा...”... “संस्कार...”... “विज्ञान नित्य आहे की अनित्य?” ‘‘අනිච්චං, භන්තෙ’’. “अनित्य आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං වා තං සුඛං වා’’ති? “जे अनित्य आहे, ते दुःखकारक आहे की सुखकारक?” ‘‘දුක්ඛං, භන්තෙ’’. “दुःखकारक आहे, भन्ते.” ‘‘යං පනානිච්චං දුක්ඛං විපරිණාමධම්මං, කල්ලං නු තං සමනුපස්සිතුං – ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’’’ති? “जे अनित्य, दुःखकारक आणि परिवर्तनशील स्वभावाचे आहे, त्याविषयी ‘हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे’ असे मानणे योग्य आहे का?” ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘තස්මාතිහ, අනුරාධ, යං කිඤ්චි රූපං අතීතානාගතපච්චුප්පන්නං අජ්ඣත්තං වා බහිද්ධා වා ඔළාරිකං වා සුඛුමං වා හීනං වා පණීතං වා යං දූරෙ සන්තිකෙ වා, සබ්බං රූපං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. යා කාචි වෙදනා අතීතානාගතපච්චුප්පන්නා…පෙ… යා කාචි සඤ්ඤා…පෙ… යෙ කෙචි සඞ්ඛාරා…පෙ… යං කිඤ්චි විඤ්ඤාණං අතීතානාගතපච්චුප්පන්නං අජ්ඣත්තං වා බහිද්ධා වා ඔළාරිකං වා සුඛුමං වා හීනං වා පණීතං වා යං දූරෙ සන්තිකෙ වා, සබ්බං විඤ්ඤාණං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති එවමෙතං යථාභූතං සම්මප්පඤ්ඤාය දට්ඨබ්බං. එවං පස්සං, අනුරාධ, සුතවා අරියසාවකො රූපස්මිම්පි නිබ්බින්දති, වෙදනායපි නිබ්බින්දති, සඤ්ඤායපි නිබ්බින්දති, සඞ්ඛාරෙසුපි නිබ්බින්දති, විඤ්ඤාණස්මිම්පි නිබ්බින්දති. නිබ්බින්දං විරජ්ජති; විරාගා විමුච්චති; විමුත්තස්මිං විමුත්තමිති ඤාණං හොති. ‘ඛීණා ජාති, වුසිතං බ්රහ්මචරියං, කතං කරණීයං, නාපරං ඉත්ථත්තායා’ති පජානාති. “म्हणूनच, अनुराध, भूत, भविष्य किंवा वर्तमान काळातील, अंतर्गत किंवा बाह्य, स्थूल किंवा सूक्ष्म, हीन किंवा प्रणीत, दूर किंवा जवळ असलेले कोणतेही रूप असो; त्या सर्व रूपांविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. कोणतीही वेदना असो... कोणतीही संज्ञा असो... कोणतेही संस्कार असोत... भूत, भविष्य किंवा वर्तमान काळातील, अंतर्गत किंवा बाह्य, स्थूल किंवा सूक्ष्म, हीन किंवा प्रणीत, दूर किंवा जवळ असलेले कोणतेही विज्ञान असो; त्या सर्व विज्ञानांविषयी ‘हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही’ अशा प्रकारे यथार्थपणे सम्यक प्रज्ञेने पाहिले पाहिजे. असे पाहणारा, अनुराध, श्रुतवान आर्यश्रावक रूपाविषयीही विरक्त होतो, वेदनेविषयीही विरक्त होतो, संज्ञेविषयीही विरक्त होतो, संस्कारांविषयीही विरक्त होतो आणि विज्ञानाविषयीही विरक्त होतो. विरक्त झाल्यामुळे तो आसक्तीरहित होतो; आसक्तीरहित झाल्यामुळे तो मुक्त होतो. मुक्त झाल्यावर ‘मी मुक्त झालो आहे’ असे ज्ञान त्याला होते. ‘जन्म नष्ट झाला आहे, ब्रह्मचर्य पूर्ण झाले आहे, जे करायचे होते ते केले गेले आहे, आता या जन्मानंतर पुन्हा काहीही करायचे उरलेले नाही’ हे तो जाणतो.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, අනුරාධ, රූපං තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘වෙදනං තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘සඤ්ඤං තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘සඞ්ඛාරෙ තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘විඤ්ඤාණං තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, අනුරාධ, රූපස්මිං තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘අඤ්ඤත්ර රූපා තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘වෙදනාය…පෙ… අඤ්ඤත්ර වෙදනාය…පෙ… සඤ්ඤාය…පෙ… අඤ්ඤත්ර සඤ්ඤාය…පෙ… සඞ්ඛාරෙසු…පෙ… අඤ්ඤත්ර සඞ්ඛාරෙහි…පෙ… විඤ්ඤාණස්මිං තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘අඤ්ඤත්ර විඤ්ඤාණා තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. “अनुराध, तुला काय वाटते, तू रूपाला तथागत मानतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू वेदनेला तथागत मानतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू संज्ञेला तथागत मानतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू संस्कारांना तथागत मानतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू विज्ञानाला तथागत मानतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “अनुराध, तुला काय वाटते, तू तथागतांना रूपात पाहतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू तथागतांना रूपाव्यतिरिक्त पाहतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू तथागतांना वेदनेत... वेदनेव्यतिरिक्त... संज्ञेत... संज्ञेव्यतिरिक्त... संस्कारांत... संस्कारांव्यतिरिक्त... विज्ञानात पाहतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” “तू तथागतांना विज्ञानाव्यतिरिक्त पाहतोस का?” “नक्कीच नाही, भन्ते.” ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, අනුරාධ, රූපං, වෙදනං, සඤ්ඤං, සඞ්ඛාරෙ, විඤ්ඤාණං තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘තං කිං මඤ්ඤසි, අනුරාධ, අයං සො අරූපී අවෙදනො අසඤ්ඤී අසඞ්ඛාරො අවිඤ්ඤාණො තථාගතොති සමනුපස්සසී’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘එත්ථ ච තෙ, අනුරාධ, දිට්ඨෙව [Pg.552] ධම්මෙ සච්චතො ථෙතතො තථාගතෙ අනුපලබ්භියමානෙ කල්ලං නු තෙ තං වෙය්යාකරණං – යො සො, ආවුසො, තථාගතො උත්තමපුරිසො පරමපුරිසො පරමපත්තිපත්තො, තං තථාගතො අඤ්ඤත්ර ඉමෙහි චතූහි ඨානෙහි පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙති – ‘‘‘හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘සාධු සාධු, අනුරාධ! පුබ්බෙ චාහං, අනුරාධ, එතරහි ච දුක්ඛඤ්චෙව පඤ්ඤාපෙමි දුක්ඛස්ස ච නිරොධ’’න්ති. දුතියං. “अनुराधा, तुला काय वाटते? तू रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञानाला ‘तथागत’ म्हणून पाहतोस का?” “नाही, भन्ते.” “अनुराधा, तुला काय वाटते? हा जो रूपरहित, वेदनारहित, संज्ञारहित, संस्काररहित आणि विज्ञानरहित आहे, त्याला तू ‘तथागत’ म्हणून पाहतोस का?” “नाही, भन्ते.” “अनुराधा, जेव्हा याच जन्मात (दृष्टधर्मात) तथागत सत्यतः आणि निश्चितपणे उपलब्ध होत नाहीत, तर मग तुझे हे स्पष्टीकरण योग्य ठरेल का की—‘मित्रांनो, जो तो तथागत उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला प्राप्त झालेला आहे, त्याला या चार पर्यायांच्या व्यतिरिक्त इतर प्रकारे प्रज्ञापित (वर्णन) केले जाऊ शकते की—"तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात" किंवा... पे... "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही"?’” “नाही, भन्ते.” “साधू, साधू, अनुराधा! पूर्वीही आणि आताही, मी केवळ दुःख आणि दुःखाचा निरोधच प्रज्ञापित करतो.” दुसरे. 3. පඨමසාරිපුත්තකොට්ඨිකසුත්තං ३. प्रथम सारिपुत्त-कोट्ठिक सुत्त 412. එකං සමයං ආයස්මා ච සාරිපුත්තො, ආයස්මා ච මහාකොට්ඨිකො බාරාණසියං විහරන්ති ඉසිපතනෙ මිගදායෙ. අථ ඛො ආයස්මා මහාකොට්ඨිකො සායන්හසමයං පටිසල්ලානා වුට්ඨිතො යෙනායස්මා සාරිපුත්තො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා සාරිපුත්තෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා මහාකොට්ඨිකො ආයස්මන්තං සාරිපුත්තං එතදවොච – ४१२. एका वेळी आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाकोट्ठिक वाराणसी येथे इसिपतन येथील मृगदावात विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान महाकोट्ठिक संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून (एकांतातून) उठून जेथे आयुष्यमान सारिपुत्त होते तेथे गेले; तेथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान सारिपुत्त यांच्याशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसल्यावर आयुष्यमान महाकोट्ठिक आयुष्यमान सारिपुत्त यांना असे म्हणाले— ‘‘කිං නු ඛො, ආවුසො සාරිපුත්ත, හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, ආවුසො, භගවතා – ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං පනාවුසො, න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, ආවුසො, අබ්යාකතං භගවතා – ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං නු ඛො, ආවුසො, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, ආවුසො, භගවතා – ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං පනාවුසො, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, ආවුසො, අබ්යාකතං භගවතා – ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. “मित्र सारिपुत्त, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात?” “मित्रा, भगवंतांनी हे अव्याकृत (अस्पष्ट/अनुत्तरित) ठेवले आहे की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात.’” “पण मित्रा, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात?” “मित्रा, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात.’” “पण मित्रा, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही?” “मित्रा, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही.’” “पण मित्रा, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही?” “मित्रा, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’” ‘‘‘කිං නු ඛො, ආවුසො, හොති තථාගතො පරං මරණා’ති ඉති පුට්ඨො සමානො, ‘අබ්යාකතං ඛො එතං, ආවුසො, භගවතා – හොති තථාගතො [Pg.553] පරං මරණා’ති වදෙසි…පෙ… ‘කිං පනාවුසො, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති ඉති පුට්ඨො සමානො – ‘එතම්පි ඛො, ආවුසො, අබ්යාකතං භගවතා – නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි. කො නු ඛො, ආවුසො, හෙතු, කො පච්චයො යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති? “‘मित्रा, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात?’ असे विचारले असता, तू म्हणालास, ‘मित्रा, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... पे... ‘पण मित्रा, काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही?’ असे विचारले असता, तू म्हणालास, ‘मित्रा, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की—तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ मित्रा, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?” ‘‘හොති තථාගතො පරං මරණාති ඛො, ආවුසො, රූපගතමෙතං. න හොති තථාගතො පරං මරණාති, රූපගතමෙතං. හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාති, රූපගතමෙතං. නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති, රූපගතමෙතං. හොති තථාගතො පරං මරණාති ඛො, ආවුසො, වෙදනාගතමෙතං. න හොති තථාගතො පරං මරණාති, වෙදනාගතමෙතං. හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාති, වෙදනාගතමෙතං. නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති, වෙදනාගතමෙතං. හොති තථාගතො පරං මරණාති ඛො, ආවුසො, සඤ්ඤාගතමෙතං. න හොති තථාගතො පරං මරණාති, සඤ්ඤාගතමෙතං. හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාති, සඤ්ඤාගතමෙතං. නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති, සඤ්ඤාගතමෙතං. හොති තථාගතො පරං මරණාති ඛො, ආවුසො, සඞ්ඛාරගතමෙතං. න හොති තථාගතො පරං මරණාති, සඞ්ඛාරගතමෙතං. හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාති, සඞ්ඛාරගතමෙතං. නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති, සඞ්ඛාරගතමෙතං. හොති තථාගතො පරං මරණාති ඛො, ආවුසො, විඤ්ඤාණගතමෙතං. න හොති තථාගතො පරං මරණාති, විඤ්ඤාණගතමෙතං. හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාති, විඤ්ඤාණගතමෙතං. නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති, විඤ්ඤාණගතමෙතං. අයං ඛො, ආවුසො, හෙතු අයං පච්චයො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති. තතියං. “मित्रा, ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ हा विचार रूपाशी संबंधित (रूपगत) आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ हा विचार रूपाशी संबंधित आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ हा विचार रूपाशी संबंधित आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ हा विचार रूपाशी संबंधित आहे. मित्रा, ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ हा विचार वेदनेशी संबंधित (वेदनागत) आहे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ हा विचार वेदनेशी संबंधित आहे. मित्रा, ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ हा विचार संज्ञेशी संबंधित (संज्ञागत) आहे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ हा विचार संज्ञेशी संबंधित आहे. मित्रा, ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ हा विचार संस्कारांशी संबंधित (संस्कारगत) आहे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ हा विचार संस्कारांशी संबंधित आहे. मित्रा, ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ हा विचार विज्ञानाशी संबंधित (विज्ञानगत) आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ हा विचार विज्ञानाशी संबंधित आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ हा विचार विज्ञानाशी संबंधित आहे. ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ हा विचार विज्ञानाशी संबंधित आहे. मित्रा, हेच ते कारण आहे, हाच तो प्रत्यय आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” तिसरे. 4. දුතියසාරිපුත්තකොට්ඨිකසුත්තං ४. द्वितीय सारिपुत्त-कोट्ठिक सुत्त 413. එකං සමයං ආයස්මා ච සාරිපුත්තො, ආයස්මා ච මහාකොට්ඨිකො බාරාණසියං විහරන්ති ඉසිපතනෙ මිගදායෙ…පෙ… (සායෙව [Pg.554] පුච්ඡා) ‘‘කො නු ඛො, ආවුසො, හෙතු, කො පච්චයො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති? ‘‘රූපං ඛො, ආවුසො, අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, රූපසමුදයං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, රූපනිරොධං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, රූපනිරොධගාමිනිං පටිපදං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති; ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති; ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති; ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති. වෙදනං…පෙ… සඤ්ඤං…පෙ… සඞ්ඛාරෙ…පෙ… විඤ්ඤාණං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, විඤ්ඤාණසමුදයං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, විඤ්ඤාණනිරොධං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, විඤ්ඤාණනිරොධගාමිනිං පටිපදං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති; ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති; ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති; ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’තිපිස්ස හොති. ४१३. एका वेळी आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाकोट्ठिक वाराणसी येथे इसिपतन येथील मृगदावात विहार करत होते... पे... (तीच विचारणा) “मित्रा, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?” “मित्रा, रूपाला यथार्थपणे (यथाभूत) न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, रूपाच्या उत्पत्तीला (समुदयाला) यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, रूपाच्या निरोधाला यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, रूपाच्या निरोधाकडे नेणाऱ्या मार्गाला (प्रतिपदेला) यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला असे वाटते की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ वेदनेला... पे... संज्ञेला... पे... संस्कारांना... पे... विज्ञानाला यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, विज्ञानाच्या उत्पत्तीला यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, विज्ञानाच्या निरोधाला यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला, विज्ञानाच्या निरोधाकडे नेणाऱ्या मार्गाला यथार्थपणे न जाणणाऱ्या आणि न पाहणाऱ्याला असे वाटते की—‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’; किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’” ‘‘රූපඤ්ච ඛො, ආවුසො, ජානතො පස්සතො යථාභූතං, රූපසමුදයං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, රූපනිරොධං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, රූපනිරොධගාමිනිං පටිපදං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති. වෙදනං…පෙ… සඤ්ඤං…පෙ… සඞ්ඛාරෙ…පෙ… විඤ්ඤාණං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, විඤ්ඤාණසමුදයං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, විඤ්ඤාණනිරොධං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, විඤ්ඤාණනිරොධගාමිනිං පටිපදං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති; ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති; ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති; ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති. අයං ඛො, ආවුසො, හෙතු අයං පච්චයො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති. චතුත්ථං. “परंतु, आवुसो, जो रूपाला यथार्थपणे जाणतो आणि पाहतो, रूपाच्या उत्पत्तीला यथार्थपणे जाणतो आणि पाहतो, रूपाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणतो आणि पाहतो, रूपाच्या निरोधाकडे नेणाऱ्या मार्गाला यथार्थपणे जाणतो आणि पाहतो, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येत नाही... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असाही विचार येत नाही. वेदनेला... पे... संज्ञेला... पे... संस्कारांना... पे... विज्ञानाला यथार्थपणे जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या, विज्ञानाच्या उत्पत्तीला यथार्थपणे जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या, विज्ञानाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या, विज्ञानाच्या निरोधाकडे नेणाऱ्या मार्गाला यथार्थपणे जाणणाऱ्या आणि पाहणाऱ्या व्यक्तीच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येत नाही; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ असा विचार येत नाही; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ असा विचार येत नाही; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येत नाही. आवुसो, हेच ते कारण आहे, हाच तो हेतू आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत (अनुत्तरित) ठेवले आहे.” चौथे. 5. තතියසාරිපුත්තකොට්ඨිකසුත්තං ५. तृतीय सारिपुत्त-कोट्ठिक सुत्त 414. එකං [Pg.555] සමයං ආයස්මා ච සාරිපුත්තො, ආයස්මා ච මහාකොට්ඨිකො බාරාණසියං විහරන්ති ඉසිපතනෙ මිගදායෙ…පෙ… (සායෙව පුච්ඡා) ‘‘කො නු ඛො, ආවුසො, හෙතු කො පච්චයො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති? ‘‘රූපෙ ඛො, ආවුසො, අවිගතරාගස්ස අවිගතච්ඡන්දස්ස අවිගතපෙමස්ස අවිගතපිපාසස්ස අවිගතපරිළාහස්ස අවිගතතණ්හස්ස ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති. වෙදනාය…පෙ… සඤ්ඤාය…පෙ… සඞ්ඛාරෙසු…පෙ… විඤ්ඤාණෙ අවිගතරාගස්ස අවිගතච්ඡන්දස්ස අවිගතපෙමස්ස අවිගතපිපාසස්ස අවිගතපරිළාහස්ස අවිගතතණ්හස්ස ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති. රූපෙ ච ඛො, ආවුසො, විගතරාගස්ස…පෙ… වෙදනාය…පෙ… සඤ්ඤාය…පෙ… සඞ්ඛාරෙසු…පෙ… විඤ්ඤාණෙ විගතරාගස්ස විගතච්ඡන්දස්ස විගතපෙමස්ස විගතපිපාසස්ස විගතපරිළාහස්ස විගතතණ්හස්ස ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති. අයං ඛො, ආවුසො, හෙතු, අයං පච්චයො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති. පඤ්චමං. ४१४. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाकोट्ठिक वाराणसी येथे इसिपतन येथील मृगदावात विहार करत होते... पे... (तीच विचारणा) “आवुसो, भगवंतांनी हे अव्याकृत का ठेवले आहे, याचे कारण काय आणि हेतू काय?” “आवुसो, ज्याचा रूपावरील राग दूर झालेला नाही, ज्याची इच्छा दूर झालेली नाही, ज्याचे प्रेम दूर झालेले नाही, ज्याची तृष्णा दूर झालेली नाही, ज्याचा परिदाह दूर झालेला नाही, ज्याची तण्हा (तृष्णा) दूर झालेली नाही, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येतो... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येतो. वेदनेवर... पे... संज्ञेवर... पे... संस्कारांवर... पे... विज्ञानावर ज्याचा राग दूर झालेला नाही, ज्याची इच्छा दूर झालेली नाही, ज्याचे प्रेम दूर झालेले नाही, ज्याची तृष्णा दूर झालेली नाही, ज्याचा परिदाह दूर झालेला नाही, ज्याची तण्हा दूर झालेली नाही, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येतो... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येतो. परंतु आवुसो, ज्याचा रूपावरील राग दूर झाला आहे... पे... वेदनेवरील... पे... संज्ञेवरील... पे... संस्कारांवरील... पे... विज्ञानावरील राग दूर झाला आहे, इच्छा दूर झाली आहे, प्रेम दूर झाले आहे, तृष्णा दूर झाली आहे, परिदाह दूर झाला आहे, तण्हा दूर झाली आहे, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येत नाही... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येत नाही. आवुसो, हेच ते कारण आहे, हाच तो हेतू आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” पाचवे. 6. චතුත්ථසාරිපුත්තකොට්ඨිකසුත්තං ६. चतुर्थ सारिपुत्त-कोट्ठिक सुत्त 415. එකං සමයං ආයස්මා ච සාරිපුත්තො, ආයස්මා ච මහාකොට්ඨිකො බාරාණසියං විහරන්ති ඉසිපතනෙ මිගදායෙ. අථ ඛො ආයස්මා සාරිපුත්තො සායන්හසමයං පටිසල්ලානා වුට්ඨිතො යෙනායස්මා මහාකොට්ඨිකො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා මහාකොට්ඨිකෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො ආයස්මා සාරිපුත්තො ආයස්මන්තං මහාකොට්ඨිකං එතදවොච – ‘‘‘කිං නු ඛො, ආවුසො කොට්ඨික, හොති තථාගතො පරං මරණා’ති…පෙ… ‘කිං පනාවුසො, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති ඉති පුට්ඨො සමානො – ‘එතම්පි ඛො, ආවුසො, අබ්යාකතං භගවතා – නෙව හොති න න හොති තථාගතො [Pg.556] පරං මරණා’ති වදෙසි’’. ‘‘කො නු ඛො, ආවුසො, හෙතු, කො පච්චයො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති? ४१५. एकदा आयुष्यमान सारिपुत्त आणि आयुष्यमान महाकोट्ठिक वाराणसी येथे इसिपतन येथील मृगदावात विहार करत होते. तेव्हा आयुष्यमान सारिपुत्त संध्याकाळच्या वेळी ध्यानातून उठून जेथे आयुष्यमान महाकोट्ठिक होते तेथे गेले. तेथे जाऊन त्यांनी आयुष्यमान महाकोट्ठिक यांच्याशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून ते एका बाजूला बसले. एका बाजूला बसलेले आयुष्यमान सारिपुत्त आयुष्यमान महाकोट्ठिक यांना म्हणाले— “आवुसो कोट्ठिक, ‘काय तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात?’... पे... ‘आवुसो, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही का?’ असा प्रश्न विचारला असता, तुम्ही म्हणालात की, ‘आवुसो, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ आवुसो, भगवंतांनी हे अव्याकृत का ठेवले आहे, याचे कारण काय आणि हेतू काय?” ‘‘රූපාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, රූපරතස්ස රූපසම්මුදිතස්ස රූපනිරොධං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති; ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති; ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති; ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති. වෙදනාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, වෙදනාරතස්ස වෙදනාසම්මුදිතස්ස, වෙදනානිරොධං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති…පෙ… සඤ්ඤාරාමස්ස ඛො, ආවුසො…පෙ… සඞ්ඛාරාරාමස්ස ඛො ආවුසො…පෙ… විඤ්ඤාණාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, විඤ්ඤාණරතස්ස විඤ්ඤාණසම්මුදිතස්ස විඤ්ඤාණනිරොධං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති’’. “आवुसो, जो रूपात रममाण होतो, रूपात आनंद घेतो, रूपात हर्षित होतो आणि रूपाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणत नाही व पाहत नाही, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येतो; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ असा विचार येतो; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ असा विचार येतो; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येतो. आवुसो, जो वेदनेत रममाण होतो, वेदनेत आनंद घेतो, वेदनेत हर्षित होतो आणि वेदनेच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणत नाही व पाहत नाही, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येतो... पे... संज्ञेत रममाण होणाऱ्या... पे... संस्कारांत रममाण होणाऱ्या... पे... आवुसो, जो विज्ञानात रममाण होतो, विज्ञानात आनंद घेतो, विज्ञानात हर्षित होतो आणि विज्ञानाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणत नाही व पाहत नाही, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येतो... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येतो.” ‘‘න රූපාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, න රූපරතස්ස න රූපසම්මුදිතස්ස, රූපනිරොධං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති. න වෙදනාරාමස්ස ඛො, ආවුසො…පෙ… න සඤ්ඤාරාමස්ස ඛො, ආවුසො…පෙ… න සඞ්ඛාරාරාමස්ස ඛො, ආවුසො…පෙ… න විඤ්ඤාණාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, න විඤ්ඤාණරතස්ස න විඤ්ඤාණසම්මුදිතස්ස, විඤ්ඤාණනිරොධං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති. අයං ඛො, ආවුසො, හෙතු, අයං පච්චයො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති. “परंतु आवुसो, जो रूपात रममाण होत नाही, रूपात आनंद घेत नाही, रूपात हर्षित होत नाही आणि रूपाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणतो व पाहतो, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येत नाही... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येत नाही. जो वेदनेत रममाण होत नाही... पे... संज्ञेत रममाण होत नाही... पे... संस्कारांत रममाण होत नाही... पे... आवुसो, जो विज्ञानात रममाण होत नाही, विज्ञानात आनंद घेत नाही, विज्ञानात हर्षित होत नाही आणि विज्ञानाच्या निरोधाला यथार्थपणे जाणतो व पाहतो, त्याच्या मनात ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ असा विचार येत नाही... पे... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’ असा विचार येत नाही. आवुसो, हेच ते कारण आहे, हाच तो हेतू आहे, ज्यामुळे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” ‘‘සියා පනාවුසො, අඤ්ඤොපි පරියායො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති? ‘‘සියා, ආවුසො. භවාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, භවරතස්ස භවසම්මුදිතස්ස, භවනිරොධං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති. න [Pg.557] භවාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, න භවරතස්ස න භවසම්මුදිතස්ස, භවනිරොධං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති. අයම්පි ඛො, ආවුසො, පරියායො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති. “पण आवुसो, अशी दुसरी एखादी पद्धत (पर्याय) असू शकते का, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत (घोषित न केलेले) ठेवले आहे?” “असू शकते, आवुसो. जो भवामध्ये (अस्तित्वात) रमणारा, भवामध्ये आनंद घेणारा, भवामध्ये हर्ष मानणारा आहे आणि ज्याला भवाचा निरोध यथाभूत (जसा आहे तसा) माहीत नाही व दिसत नाही, त्याच्या मनात असे विचार येतात की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ परंतु, आवुसो, जो भवामध्ये रमणारा नाही, भवामध्ये आनंद घेणारा नाही, भवामध्ये हर्ष मानणारा नाही आणि ज्याला भवाचा निरोध यथाभूत माहीत आहे व दिसतो, त्याच्या मनात असे विचार येत नाहीत की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ आवुसो, हासुद्धा तो पर्याय आहे, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” ‘‘සියා පනාවුසො, අඤ්ඤොපි පරියායො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති? ‘‘සියා, ආවුසො. උපාදානාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, උපාදානරතස්ස උපාදානසම්මුදිතස්ස, උපාදානනිරොධං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති. න උපාදානාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, න උපාදානරතස්ස න උපාදානසම්මුදිතස්ස, උපාදානනිරොධං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති…පෙ… ‘නෙව, හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති. අයම්පි ඛො ආවුසො, පරියායො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති. “पण आवुसो, अशी दुसरी एखादी पद्धत (पर्याय) असू शकते का, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?” “असू शकते, आवुसो. जो उपादानामध्ये (आसक्तीत) रमणारा, उपादानामध्ये आनंद घेणारा, उपादानामध्ये हर्ष मानणारा आहे आणि ज्याला उपादानाचा निरोध यथाभूत माहीत नाही व दिसत नाही, त्याच्या मनात असे विचार येतात की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ परंतु, आवुसो, जो उपादानामध्ये रमणारा नाही, उपादानामध्ये आनंद घेणारा नाही, उपादानामध्ये हर्ष मानणारा नाही आणि ज्याला उपादानाचा निरोध यथाभूत माहीत आहे व दिसतो, त्याच्या मनात असे विचार येत नाहीत की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ आवुसो, हासुद्धा तो पर्याय आहे, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” ‘‘සියා පනාවුසො, අඤ්ඤොපි පරියායො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති? ‘‘සියා, ආවුසො. තණ්හාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, තණ්හාරතස්ස තණ්හාසම්මුදිතස්ස, තණ්හානිරොධං අජානතො අපස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස හොති. න තණ්හාරාමස්ස ඛො, ආවුසො, න තණ්හාරතස්ස න තණ්හාසම්මුදිතස්ස, තණ්හානිරොධං ජානතො පස්සතො යථාභූතං, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති…පෙ. … ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපිස්ස න හොති. අයම්පි ඛො, ආවුසො, පරියායො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති. “पण आवुसो, अशी दुसरी एखादी पद्धत (पर्याय) असू शकते का, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?” “असू शकते, आवुसो. जो तण्हामध्ये (तृष्णेत) रमणारा, तण्हामध्ये आनंद घेणारा, तण्हामध्ये हर्ष मानणारा आहे आणि ज्याला तण्हा-निरोध (तृष्णेचा निरोध) यथाभूत माहीत नाही व दिसत नाही, त्याच्या मनात असे विचार येतात की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ परंतु, आवुसो, जो तण्हामध्ये रमणारा नाही, तण्हामध्ये आनंद घेणारा नाही, तण्हामध्ये हर्ष मानणारा नाही आणि ज्याला तण्हा-निरोध यथाभूत माहीत आहे व दिसतो, त्याच्या मनात असे विचार येत नाहीत की: ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’... किंवा... ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही.’ आवुसो, हासुद्धा तो पर्याय आहे, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे.” ‘‘සියා පනාවුසො, අඤ්ඤොපි පරියායො, යෙනෙතං අබ්යාකතං භගවතා’’ති? ‘‘එත්ථ දානි, ආවුසො සාරිපුත්ත, ඉතො උත්තරි කිං ඉච්ඡසි? තණ්හාසඞ්ඛයවිමුත්තස්ස, ආවුසො සාරිපුත්ත, භික්ඛුනො වට්ටං නත්ථි පඤ්ඤාපනායා’’ති. ඡට්ඨං. “पण आवुसो, अशी दुसरी एखादी पद्धत (पर्याय) असू शकते का, ज्याद्वारे भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे?” “आता, आवुसो सारिपुत्त, यापेक्षा अधिक तुला काय हवे आहे? आवुसो सारिपुत्त, जो भिक्खू तृष्णेच्या क्षयामुळे विमुक्त झाला आहे, त्याच्या वर्णनासाठी (प्रज्ञप्तीसाठी) कोणतेही संसारचक्र शिल्लक राहत नाही.” (सहावे सूत्र समाप्त) 7. මොග්ගල්ලානසුත්තං ७. मोग्गल्लान सुत्त 416. අථ [Pg.558] ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා මහාමොග්ගල්ලානෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං එතදවොච – ४१६. तेव्हा वच्छगोत्त परिव्राजक जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे गेला. तेथे पोहोचल्यावर त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना असे म्हटले – ‘‘කිං නු ඛො, භො මොග්ගල්ලාන, සස්සතො ලොකො’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – ‘සස්සතො ලොකො’’’ති. ‘‘කිං පන, භො මොග්ගල්ලාන, අසස්සතො ලොකො’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං භගවතා – ‘අසස්සතො ලොකො’’’ති. ‘‘කිං නු ඛො, භො මොග්ගල්ලාන, අන්තවා ලොකො’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – ‘අන්තවා ලොකො’’’ති. ‘‘කිං පන, භො මොග්ගල්ලාන, අනන්තවා ලොකො’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං භගවතා – ‘අනන්තවා ලොකො’’’ති. ‘‘කිං නු ඛො, භො මොග්ගල්ලාන, තං ජීවං තං සරීර’’න්ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – ‘තං ජීවං තං සරීර’’’න්ති. ‘‘කිං පන, භො මොග්ගල්ලාන, අඤ්ඤං ජීවං අඤ්ඤං සරීර’’න්ති? ‘‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං භගවතා – ‘අඤ්ඤං ජීවං අඤ්ඤං සරීර’’’න්ති. ‘‘කිං නු ඛො, භො මොග්ගල්ලාන, හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං පන, භො මොග්ගල්ලාන, න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං භගවතා – ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං නු ඛො, භො මොග්ගල්ලාන, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං පන, භො මොග්ගල්ලාන, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං භගවතා – ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. “हे मोग्गल्लान, काय लोक (विश्व) शाश्वत आहे?” “वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘लोक शाश्वत आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, लोक अशाश्वत आहे का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘लोक अशाश्वत आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, लोक सान्त (मर्यादित) आहे का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘लोक सान्त आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, लोक अनन्त (अमर्यादित) आहे का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘लोक अनन्त आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, जो जीव आहे तेच शरीर आहे का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘जो जीव आहे तेच शरीर आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’.” “तर मग, हे मोग्गल्लान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही का?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’.” ‘‘කො නු ඛො, භො මොග්ගල්ලාන, හෙතු කො පච්චයො, යෙන අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං පුට්ඨානං එවං වෙය්යාකරණං හොති – සස්සතො ලොකොති වා, අසස්සතො ලොකොති වා, අන්තවා ලොකොති වා, අනන්තවා ලොකොති වා, තං ජීවං තං සරීරන්ති වා, අඤ්ඤං ජීවං අඤ්ඤං සරීරන්ති වා, හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, න හොති තථාගතො පරං [Pg.559] මරණාති වා, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාති වා, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති වා? කො පන, භො මොග්ගල්ලාන, හෙතු කො පච්චයො, යෙන සමණස්ස ගොතමස්ස එවං පුට්ඨස්ස න එවං වෙය්යාකරණං හොති – සස්සතො ලොකොතිපි, අසස්සතො ලොකොතිපි, අන්තවා ලොකොතිපි, අනන්තවා ලොකොතිපි, තං ජීවං තං සරීරන්තිපි, අඤ්ඤං ජීවං අඤ්ඤං සරීරන්තිපි, හොති තථාගතො පරං මරණාතිපි, න හොති තථාගතො පරං මරණාතිපි, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණාතිපි, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාතිපී’’ති? “हे मोग्गल्लान, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय (हेतू) आहे, ज्यामुळे इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे प्रश्न विचारले असता ते अशी उत्तरे देतात की – ‘लोक शाश्वत आहे’ किंवा ‘लोक अशाश्वत आहे’; ‘लोक सान्त आहे’ किंवा ‘लोक अनन्त आहे’; ‘जो जीव आहे तेच शरीर आहे’ किंवा ‘जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे’; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’? परंतु, हे मोग्गल्लान, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे श्रमण गोतमांना असे प्रश्न विचारले असता ते अशी उत्तरे देत नाहीत की – ‘लोक शाश्वत आहे’ किंवा ‘लोक अशाश्वत आहे’; ‘लोक सान्त आहे’ किंवा ‘लोक अनन्त आहे’; ‘जो जीव आहे तेच शरीर आहे’ किंवा ‘जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे’; ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही’ किंवा ‘तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वातही नसतात आणि नसतात असेही नाही’?” ‘‘අඤ්ඤතිත්ථියා ඛො, වච්ඡ, පරිබ්බාජකා චක්ඛුං ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සන්ති…පෙ… ජිව්හං ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සන්ති…පෙ… මනං ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සන්ති. තස්මා අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං පුට්ඨානං එවං වෙය්යාකරණං හොති – සස්සතො ලොකොති වා…පෙ… නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාති වා. තථාගතො ච ඛො, වච්ඡ, අරහං සම්මාසම්බුද්ධො චක්ඛුං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සති…පෙ… ජිව්හං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සති…පෙ… මනං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සති. තස්මා තථාගතස්ස එවං පුට්ඨස්ස න එවං වෙය්යාකරණං හොති – සස්සතො ලොකොතිපි…පෙ… නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණාතිපී’’ති. हे वच्छ, इतर पंथांचे परिव्राजक डोळ्याकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात...पे... जिभेकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात...पे... मनाकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात. म्हणूनच, जेव्हा इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे प्रश्न विचारले जातात, तेव्हा त्यांचे उत्तर असे असते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'. परंतु, हे वच्छ, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत डोळ्याकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात...पे... जिभेकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात...पे... मनाकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात. म्हणूनच, जेव्हा तथागतांना असे प्रश्न विचारले जातात, तेव्हा त्यांचे उत्तर असे होत नाही – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात' असे. අථ ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො උට්ඨායාසනා යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කිං නු ඛො, භො ගොතම, සස්සතො ලොකො’’ති? අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, මයා – ‘සස්සතො ලොකො’ති…පෙ…. ‘‘කිං පන, භො ගොතම, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං මයා – ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. तेव्हा वच्छगोत्त परिव्राजक आपल्या आसनावरून उठला आणि जेथे भगवान होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने भगवानांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने भगवानांना असे विचारले – 'हे गौतम, काय लोक शाश्वत आहे?' 'हे वच्छ, मी हे घोषित केलेले नाही की – लोक शाश्वत आहे ...पे...।' 'पण, हे गौतम, तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात काय?' 'हे वच्छ, मी हे देखील घोषित केलेले नाही की – तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'. ‘‘කො [Pg.560] නු ඛො, භො ගොතම, හෙතු කො පච්චයො, යෙන අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං පුට්ඨානං එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’ති වා…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා? කො පන, භො ගොතම, හෙතු කො පච්චයො, යෙන භොතො ගොතමස්ස එවං පුට්ඨස්ස න එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’තිපි…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපී’’ති? हे गौतम, कोणते कारण आणि कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे प्रश्न विचारले असता, ते असे उत्तर देतात – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'? आणि हे गौतम, कोणते कारण आणि कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे आपणा गौतमांना असे प्रश्न विचारले असता, आपण असे उत्तर देत नाही – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'? ‘‘අඤ්ඤතිත්ථියා ඛො, වච්ඡ, පරිබ්බාජකා චක්ඛුං ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සන්ති…පෙ… ජිව්හං ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සන්ති…පෙ… මනං ‘එතං මම, එසොහමස්මි, එසො මෙ අත්තා’ති සමනුපස්සන්ති. තස්මා අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං පුට්ඨානං එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’ති වා…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා. තථාගතො ච ඛො, වච්ඡ, අරහං සම්මාසම්බුද්ධො චක්ඛුං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සති…පෙ… ජිව්හං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සති…පෙ… මනං ‘නෙතං මම, නෙසොහමස්මි, න මෙසො අත්තා’ති සමනුපස්සති. තස්මා තථාගතස්ස එවං පුට්ඨස්ස න එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’තිපි, ‘අසස්සතො ලොකො’තිපි, ‘අන්තවා ලොකො’තිපි, ‘අනන්තවා ලොකො’තිපි, ‘තං ජීවං තං සරීර’න්තිපි, ‘අඤ්ඤං ජීවං අඤ්ඤං සරීර’න්තිපි, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි, ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි, ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි, ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපී’’ති. हे वच्छ, इतर पंथांचे परिव्राजक डोळ्याकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात...पे... जिभेकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात...पे... मनाकडे 'हे माझे आहे, हा मी आहे, हा माझा आत्मा आहे' असे पाहतात. म्हणूनच, जेव्हा इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे प्रश्न विचारले जातात, तेव्हा त्यांचे उत्तर असे असते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'. परंतु, हे वच्छ, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत डोळ्याकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात...पे... जिभेकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात...पे... मनाकडे 'हे माझे नाही, हा मी नाही, हा माझा आत्मा नाही' असे पाहतात. म्हणूनच, जेव्हा तथागतांना असे प्रश्न विचारले जातात, तेव्हा त्यांचे उत्तर असे होत नाही – 'लोक शाश्वत आहे', 'लोक अशाश्वत आहे', 'लोक सान्त आहे', 'लोक अनन्त आहे', 'तोच जीव आणि तेच शरीर आहे', 'जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे', 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात', 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात नसतात', 'तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात असतात आणि नसतातही', 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात' असे. ‘‘අච්ඡරියං, භො ගොතම, අබ්භුතං, භො ගොතම! යත්ර හි නාම සත්ථු ච සාවකස්ස ච අත්ථෙන අත්ථො බ්යඤ්ජනෙන බ්යඤ්ජනං සංසන්දිස්සති සමෙස්සති න විරොධයිස්සති, යදිදං අග්ගපදස්මිං. ඉදානාහං, භො ගොතම, සමණං මහාමොග්ගල්ලානං උපසඞ්කමිත්වා එතමත්ථං අපුච්ඡිං. සමණොපි මෙ මොග්ගල්ලානො එතෙහි පදෙහි එතෙහි බ්යඤ්ජනෙහි තමත්ථං බ්යාකාසි, සෙය්යථාපි භවං ගොතමො. අච්ඡරියං, භො ගොතම, අබ්භුතං, භො ගොතම[Pg.561]! යත්ර හි නාම සත්ථු ච සාවකස්ස ච අත්ථෙන අත්ථො බ්යඤ්ජනෙන බ්යඤ්ජනං සංසන්දිස්සති සමෙස්සති න විරොධයිස්සති, යදිදං අග්ගපදස්මි’’න්ති. සත්තමං. आश्चर्यकारक आहे, हे गौतम! अद्भुत आहे, हे गौतम! कारण की, या परम पदाच्या बाबतीत शास्त्याचे आणि श्रावकाचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन तंतोतंत जुळते, सुसंगत होते आणि विसंगत ठरत नाही. आत्ताच, हे गौतम, मी श्रमण महामोग्गल्लानांकडे जाऊन हाच विषय विचारला होता. श्रमण मोग्गल्लानांनी देखील याच पदांनी आणि याच व्यंजनांनी मला हाच अर्थ स्पष्ट केला, जसा आपण गौतम यांनी केला. आश्चर्यकारक आहे, हे गौतम! अद्भुत आहे, हे गौतम! कारण की, या परम पदाच्या बाबतीत शास्त्याचे आणि श्रावकाचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन तंतोतंत जुळते, सुसंगत होते आणि विसंगत ठरत नाही. 8. වච්ඡගොත්තසුත්තං ८. वच्छगोत्तसुत्त 417. අථ ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කිං නු ඛො, භො ගොතම, සස්සතො ලොකො’’ති? අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, මයා – ‘සස්සතො ලොකො’ති…පෙ…. ‘‘කිං පන, භො ගොතම, ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං මයා – ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ४१७. तेव्हा वच्छगोत्त परिव्राजक जेथे भगवान होते तेथे गेला; तिथे जाऊन त्याने भगवानांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि स्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने भगवानांना असे विचारले – 'हे गौतम, काय लोक शाश्वत आहे?' 'हे वच्छ, मी हे घोषित केलेले नाही की – लोक शाश्वत आहे ...पे...।' 'पण, हे गौतम, तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात काय?' 'हे वच्छ, मी हे देखील घोषित केलेले नाही की – तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'. ‘‘කො නු ඛො, භො ගොතම, හෙතු, කො පච්චයො, යෙන අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං පුට්ඨානං එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’ති වා…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා? කො පන, භො ගොතම, හෙතු, කො පච්චයො, යෙන භොතො ගොතමස්ස එවං පුට්ඨස්ස න එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’තිපි…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපී’’ති? हे गौतम, कोणते कारण आणि कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे प्रश्न विचारले असता, ते असे उत्तर देतात – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'? आणि हे गौतम, कोणते कारण आणि कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे आपणा गौतमांना असे प्रश्न विचारले असता, आपण असे उत्तर देत नाही – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा ...पे... 'तथागत मृत्यूनंतर न तर अस्तित्वात असतात, न तर अस्तित्वात नसतात'? ‘‘අඤ්ඤතිත්ථියා ඛො, වච්ඡ, පරිබ්බාජකා රූපං අත්තතො සමනුපස්සන්ති, රූපවන්තං වා අත්තානං, අත්තනි වා රූපං, රූපස්මිං වා අත්තානං. වෙදනං අත්තතො සමනුපස්සන්ති…පෙ… සඤ්ඤං…පෙ… සඞ්ඛාරෙ…පෙ… විඤ්ඤාණං අත්තතො සමනුපස්සන්ති, විඤ්ඤාණවන්තං වා අත්තානං, අත්තනි වා විඤ්ඤාණං, විඤ්ඤාණස්මිං වා අත්තානං. තස්මා අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං පුට්ඨානං එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’ති වා…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා. තථාගතො ච ඛො, වච්ඡ, අරහං සම්මාසම්බුද්ධො න රූපං අත්තතො සමනුපස්සති, න රූපවන්තං වා අත්තානං, න අත්තනි වා රූපං, න රූපස්මිං වා අත්තානං. න වෙදනං අත්තතො සමනුපස්සති…පෙ… න සඤ්ඤං…පෙ… න සඞ්ඛාරෙ…පෙ… න විඤ්ඤාණං අත්තතො සමනුපස්සති, න [Pg.562] විඤ්ඤාණවන්තං වා අත්තානං, න අත්තනි වා විඤ්ඤාණං, න විඤ්ඤාණස්මිං වා අත්තානං. තස්මා තථාගතස්ස එවං පුට්ඨස්ස න එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’තිපි…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපී’’ති. “हे वच्छ, इतर पंथांचे परिव्राजक रूपाला आत्मा म्हणून पाहतात, किंवा आत्म्याला रूपवान मानतात, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहतात, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहतात. ते वेदनेला आत्मा म्हणून पाहतात... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहतात, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान मानतात, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहतात, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहतात. म्हणूनच, इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर असते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा... 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असे. परंतु, हे वच्छ, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत रूपाला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत, किंवा आत्म्याला रूपवान मानत नाहीत, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहत नाहीत, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहत नाहीत. ते वेदनेला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान मानत नाहीत, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहत नाहीत, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहत नाहीत. म्हणूनच, तथागतांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर नसते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा... 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असे.” අථ ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො උට්ඨායාසනා යෙනායස්මා මහාමොග්ගල්ලානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා මහාමොග්ගල්ලානෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො ආයස්මන්තං මහාමොග්ගල්ලානං එතදවොච – ‘‘කිං නු ඛො, භො මොග්ගල්ලාන, සස්සතො ලොකො’’ති? අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – ‘සස්සතො ලොකො’ති…පෙ…. ‘‘කිං පන, භො මොග්ගල්ලාන, ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං භගවතා – ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. त्यानंतर वच्छगोत्त परिव्राजक आपल्या आसनावरून उठला आणि जेथे आयुष्यमान महामोग्गल्लान होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने आयुष्यमान महामोग्गल्लानांना असे विचारले – “हे मोग्गल्लान, काय लोक शाश्वत आहे?” “वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत (अनुत्तरित) ठेवले आहे की – 'लोक शाश्वत आहे'... “पण, हे मोग्गल्लान, 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' काय?” “वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात'.” ‘‘කො නු ඛො, භො මොග්ගල්ලාන, හෙතු, කො පච්චයො, යෙන අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං පුට්ඨානං එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’ති වා…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා? කො පන, භො මොග්ගල්ලාන, හෙතු, කො පච්චයො යෙන සමණස්ස ගොතමස්ස එවං පුට්ඨස්ස න එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’තිපි…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපී’’ති? “हे मोग्गल्लान, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर असते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा... 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असे? आणि हे मोग्गल्लान, याचे काय कारण आहे, कोणता प्रत्यय आहे, ज्यामुळे श्रमण गोतमांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर नसते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा... 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असे?” ‘‘අඤ්ඤතිත්ථියා ඛො, වච්ඡ, පරිබ්බාජකා රූපං අත්තතො සමනුපස්සන්ති, රූපවන්තං වා අත්තානං, අත්තනි වා රූපං, රූපස්මිං වා අත්තානං. වෙදනං අත්තතො සමනුපස්සන්ති…පෙ… සඤ්ඤං…පෙ… සඞ්ඛාරෙ…පෙ… විඤ්ඤාණං අත්තතො සමනුපස්සන්ති, විඤ්ඤාණවන්තං වා අත්තානං, අත්තනි වා විඤ්ඤාණං, විඤ්ඤාණස්මිං වා අත්තානං. තස්මා අඤ්ඤතිත්ථියානං පරිබ්බාජකානං එවං පුට්ඨානං එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’ති වා…පෙ… ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වා. තථාගතො ච ඛො, වච්ඡ, අරහං සම්මාසම්බුද්ධො න රූපං අත්තතො සමනුපස්සති, න රූපවන්තං වා අත්තානං, න අත්තනි වා රූපං, න රූපස්මිං වා අත්තානං. න වෙදනං අත්තතො සමනුපස්සති…පෙ… න [Pg.563] සඤ්ඤං…පෙ… න සඞ්ඛාරෙ…පෙ… න විඤ්ඤාණං අත්තතො සමනුපස්සති, න විඤ්ඤාණවන්තං වා අත්තානං, න අත්තනි වා විඤ්ඤාණං, න විඤ්ඤාණස්මිං වා අත්තානං. තස්මා තථාගතස්ස එවං පුට්ඨස්ස න එවං වෙය්යාකරණං හොති – ‘සස්සතො ලොකො’තිපි, ‘අසස්සතො ලොකො’තිපි, ‘අන්තවා ලොකො’තිපි, ‘අනන්තවා ලොකො’තිපි, ‘තං ජීවං තං සරීර’න්තිපි, ‘අඤ්ඤං ජීවං අඤ්ඤං සරීර’න්තිපි, ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි, ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි, ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපි, ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’තිපී’’ති. “वच्छ, इतर पंथांचे परिव्राजक रूपाला आत्मा म्हणून पाहतात, किंवा आत्म्याला रूपवान मानतात, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहतात, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहतात. ते वेदनेला आत्मा म्हणून पाहतात... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहतात, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान मानतात, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहतात, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहतात. म्हणूनच, इतर पंथांच्या परिव्राजकांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर असते – 'लोक शाश्वत आहे' किंवा... 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असे. परंतु, वच्छ, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध तथागत रूपाला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत, किंवा आत्म्याला रूपवान मानत नाहीत, किंवा आत्म्यामध्ये रूप पाहत नाहीत, किंवा रूपामध्ये आत्मा पाहत नाहीत. ते वेदनेला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत... संज्ञेला... संस्कारांना... विज्ञानाला आत्मा म्हणून पाहत नाहीत, किंवा आत्म्याला विज्ञानवान मानत नाहीत, किंवा आत्म्यामध्ये विज्ञान पाहत नाहीत, किंवा विज्ञानामध्ये आत्मा पाहत नाहीत. म्हणूनच, तथागतांना असे विचारले असता त्यांचे असे उत्तर नसते – 'लोक शाश्वत आहे' असेही नाही, 'लोक अशाश्वत आहे' असेही नाही, 'लोक सान्त आहे' असेही नाही, 'लोक अनन्त आहे' असेही नाही, 'तोच जीव आणि तेच शरीर आहे' असेही नाही, 'जीव वेगळा आणि शरीर वेगळे आहे' असेही नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर असतात' असेही नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर नसतात' असेही नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर असतात आणि नसतातही' असेही नाही, 'तथागत मृत्यूनंतर न असतात, न नसतात' असेही नाही.” ‘‘අච්ඡරියං, භො මොග්ගල්ලාන, අබ්භුතං, භො මොග්ගල්ලාන! යත්ර හි නාම සත්ථු ච සාවකස්ස ච අත්ථෙන අත්ථො බ්යඤ්ජනෙන බ්යඤ්ජනං සංසන්දිස්සති, සමෙස්සති, න විරොධයිස්සති, යදිදං අග්ගපදස්මිං. ඉදානාහං, භො මොග්ගල්ලාන, සමණං ගොතමං උපසඞ්කමිත්වා එතමත්ථං අපුච්ඡිං. සමණොපි මෙ ගොතමො එතෙහි පදෙහි එතෙහි බ්යඤ්ජනෙහි එතමත්ථං බ්යාකාසි, සෙය්යථාපි භවං මොග්ගල්ලානො. අච්ඡරියං, භො මොග්ගල්ලාන, අබ්භුතං, භො මොග්ගල්ලාන! යත්ර හි නාම සත්ථු ච සාවකස්ස ච අත්ථෙන අත්ථො බ්යඤ්ජනෙන බ්යඤ්ජනං සංසන්දිස්සති සමෙස්සති න විරොධයිස්සති, යදිදං අග්ගපදස්මි’’න්ති. අට්ඨමං. “आश्चर्यकारक आहे, हे मोग्गल्लान! अद्भुत आहे, हे मोग्गल्लान! कारण की, या परम पदाच्या बाबतीत शास्त्यांचे आणि श्रावकाचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन तंतोतंत जुळते, समान होते आणि विसंगत ठरत नाही. हे मोग्गल्लान, नुकतेच मी श्रमण गोतमांकडे जाऊन त्यांना याविषयी विचारले होते. श्रमण गोतमांनीही मला याच पदांनी आणि याच व्यंजनांनी हाच अर्थ स्पष्ट केला, जसा आपण, पूज्य मोग्गल्लानांनी केला. आश्चर्यकारक आहे, हे मोग्गल्लान! अद्भुत आहे, हे मोग्गल्लान! कारण की, या परम पदाच्या बाबतीत शास्त्यांचे आणि श्रावकाचे अर्थाशी अर्थ आणि व्यंजनाशी व्यंजन तंतोतंत जुळते, समान होते आणि विसंगत ठरत नाही.” आठवे सूत्र समाप्त. 9. කුතූහලසාලාසුත්තං ९. कुतूहलशाला सूत्र 418. අථ ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො භගවන්තං එතදවොච – ४१८. त्यानंतर वच्छगोत्त परिव्राजक जेथे भगवंत होते तेथे गेला. तेथे जाऊन त्याने भगवंतांशी कुशलमंगल विचारले. आनंददायी व संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने भगवंतांना असे विचारले – ‘‘පුරිමානි, භො ගොතම, දිවසානි පුරිමතරානි සම්බහුලානං නානාතිත්ථියානං සමණබ්රාහ්මණානං පරිබ්බාජකානං කුතූහලසාලායං සන්නිසින්නානං සන්නිපතිතානං අයමන්තරාකථා උදපාදි – ‘අයං ඛො පූරණො කස්සපො සඞ්ඝී චෙව ගණී ච ගණාචරියො ච ඤාතො යසස්සී තිත්ථකරො සාධුසම්මතො බහුජනස්ස. සොපි සාවකං අබ්භතීතං කාලඞ්කතං උපපත්තීසු බ්යාකරොති – ‘අසු අමුත්ර උපපන්නො, අසු අමුත්ර උපපන්නො’ති. යොපිස්ස [Pg.564] සාවකො උත්තමපුරිසො පරමපුරිසො පරමපත්තිපත්තො තම්පි සාවකං අබ්භතීතං කාලඞ්කතං උපපත්තීසු බ්යාකරොති – ‘අසු අමුත්ර උපපන්නො, අසු අමුත්ර උපපන්නො’’’ති. “हे गोतम, काही दिवसांपूर्वी, विविध पंथांचे अनेक श्रमण, ब्राह्मण आणि परिव्राजक कुतूहलशाळेत एकत्र जमले असताना त्यांच्यात असा संवाद सुरू झाला – 'हा पूरण कस्सप संघाचा नायक, गणाचा नायक, गणाचार्य, प्रसिद्ध, यशस्वी, पंथसंस्थापक आणि बहुसंख्य लोकांद्वारे साधू मानला गेलेला आहे. तो आपल्या मृत झालेल्या शिष्यांच्या पुनर्जन्माविषयी भाकीत करतो की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' त्याचा जो शिष्य उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला पोहोचलेला असतो, त्या मृत शिष्याविषयीही तो भाकीत करतो की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.'” ‘‘අයම්පි ඛො මක්ඛලි ගොසාලො…පෙ… අයම්පි ඛො නිගණ්ඨො නාටපුත්තො…පෙ… අයම්පි ඛො සඤ්චයො බෙලට්ඨපුත්තො…පෙ… අයම්පි ඛො පකුධො කච්චානො…පෙ… අයම්පි ඛො අජිතො කෙසකම්බලො සඞ්ඝී චෙව ගණී ච ගණාචරියො ච ඤාතො යසස්සී තිත්ථකරො සාධුසම්මතො බහුජනස්ස. සොපි සාවකං අබ්භතීතං කාලඞ්කතං උපපත්තීසු බ්යාකරොති – ‘අසු අමුත්ර උපපන්නො, අසු අමුත්ර උපපන්නො’ති. යොපිස්ස සාවකො උත්තමපුරිසො පරමපුරිසො පරමපත්තිපත්තො තම්පි සාවකං අබ්භතීතං කාලඞ්කතං උපපත්තීසු බ්යාකරොති – ‘අසු අමුත්ර උපපන්නො, අසු අමුත්ර උපපන්නො’’’ති. हा मक्खलि गोसाल देखील... हा निगण्ठ नाटपुत्त देखील... हा संजय बेलट्ठिपुत्त देखील... हा पकुध कच्चायन देखील... हा अजित केसकम्बल देखील संघनायक, गणप्रमुख, गणाचार्य, प्रसिद्ध, कीर्तिमान, पंथसंस्थापक आणि बहुसंख्य लोकांद्वारे सत्पुरुष मानला गेलेला आहे. तो देखील आपल्या मृत व दिवंगत झालेल्या शिष्यांच्या पुनर्जन्माविषयी घोषित करतो की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' त्याचा जो शिष्य उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला पोहोचलेला असतो, त्या मृत व दिवंगत शिष्याविषयी देखील तो पुनर्जन्माबाबत घोषित करतो की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' ‘‘අයම්පි ඛො සමණො ගොතමො සඞ්ඝී චෙව ගණී ච ගණාචරියො ච ඤාතො යසස්සී තිත්ථකරො සාධුසම්මතො බහුජනස්ස. සොපි සාවකං අබ්භතීතං කාලඞ්කතං උපපත්තීසු බ්යාකරොති – ‘අසු අමුත්ර උපපන්නො, අසු අමුත්ර උපපන්නො’ති. යොපිස්ස සාවකො උත්තමපුරිසො පරමපුරිසො පරමපත්තිපත්තො තඤ්ච සාවකං අබ්භතීතං කාලඞ්කතං උපපත්තීසු න බ්යාකරොති – ‘අසු අමුත්ර උපපන්නො, අසු අමුත්ර උපපන්නො’ති. අපි ච ඛො නං එවං බ්යාකරොති – ‘අච්ඡෙච්ඡි තණ්හං, විවත්තයි සංයොජනං, සම්මා මානාභිසමයා අන්තමකාසි දුක්ඛස්සා’ති. තස්ස මය්හං, භො ගොතම, අහු දෙව කඞ්ඛා, අහු විචිකිච්ඡා – ‘කථං නාම සමණස්ස ගොතමස්ස ධම්මො අභිඤ්ඤෙය්යො’’’ති ? हे श्रमण गौतम देखील संघनायक, गणप्रमुख, गणाचार्य, प्रसिद्ध, कीर्तिमान, पंथसंस्थापक आणि बहुसंख्य लोकांद्वारे सत्पुरुष मानले गेलेले आहेत. ते देखील आपल्या मृत व दिवंगत झालेल्या शिष्यांच्या पुनर्जन्माविषयी घोषित करतात की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' परंतु, त्यांचा जो शिष्य उत्तम पुरुष, परम पुरुष, परम प्राप्तीला पोहोचलेला असतो, त्या मृत व दिवंगत शिष्याविषयी मात्र ते पुनर्जन्माबाबत घोषित करत नाहीत की – 'अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे, अमुक व्यक्ती तिथे जन्मली आहे.' उलट, ते त्याच्याविषयी असे घोषित करतात की – 'त्याने तृष्णा नष्ट केली आहे, संयोजनांना (बंधनांना) तोडले आहे आणि मानाचे (अहंकाराचे) सम्यक् आकलन करून दुःखाचा अंत केला आहे.' हे गौतम, यामुळे माझ्या मनात शंका आणि संभ्रम निर्माण झाला की – 'श्रमण गौतमांचा धर्म नेमका कसा समजून घ्यावा?' ‘‘අලඤ්හි තෙ, වච්ඡ, කඞ්ඛිතුං, අලං විචිකිච්ඡිතුං. කඞ්ඛනීයෙ ච පන තෙ ඨානෙ විචිකිච්ඡා උප්පන්නා. සඋපාදානස්ස ඛ්වාහං, වච්ඡ, උපපත්තිං පඤ්ඤාපෙමි නො අනුපාදානස්ස. සෙය්යථාපි, වච්ඡ, අග්ගි සඋපාදානො ජලති, නො අනුපාදානො; එවමෙව ඛ්වාහං, වච්ඡ, සඋපාදානස්ස උපපත්තිං පඤ්ඤාපෙමි, නො අනුපාදානස්සා’’ති. हे वच्छ, तुझ्या मनात शंका निर्माण होणे स्वाभाविक आहे, संभ्रम निर्माण होणे योग्यच आहे. शंका घेण्यासारख्याच बाबतीत तुला संभ्रम निर्माण झाला आहे. वच्छ, मी उपादान (आसक्ती) असलेल्याचाच पुनर्जन्म प्रज्ञापित करतो, उपादान नसलेल्याचा नाही. वच्छ, ज्याप्रमाणे इंधन (उपादान) असेपर्यंतच अग्नी जळतो, इंधनाशिवाय नाही; त्याचप्रमाणे, वच्छ, मी उपादान असलेल्याचाच पुनर्जन्म प्रज्ञापित करतो, उपादान नसलेल्याचा नाही. ‘‘යස්මිං[Pg.565], භො ගොතම, සමයෙ අච්චි වාතෙන ඛිත්තා දූරම්පි ගච්ඡති, ඉමස්ස පන භවං ගොතමො කිං උපාදානස්මිං පඤ්ඤාපෙතී’’ති? ‘‘යස්මිං ඛො, වච්ඡ, සමයෙ අච්චි වාතෙන ඛිත්තා දූරම්පි ගච්ඡති, තමහං වාතූපාදානං පඤ්ඤාපෙමි. වාතො හිස්ස, වච්ඡ, තස්මිං සමයෙ උපාදානං හොතී’’ති. ‘‘යස්මිඤ්ච පන, භො ගොතම, සමයෙ ඉමඤ්ච කායං නික්ඛිපති, සත්තො ච අඤ්ඤතරං කායං අනුපපන්නො හොති, ඉමස්ස පන භවං ගොතමො කිං උපාදානස්මිං පඤ්ඤාපෙතී’’ති? ‘‘යස්මිං ඛො, වච්ඡ, සමයෙ ඉමඤ්ච කායං නික්ඛිපති, සත්තො ච අඤ්ඤතරං කායං අනුපපන්නො හොති, තමහං තණ්හූපාදානං වදාමි. තණ්හා හිස්ස, වච්ඡ, තස්මිං සමයෙ උපාදානං හොතී’’ති. නවමං. हे गौतम, ज्या वेळी वाऱ्याने उडालेली अग्नीची ज्वाला दूरवर जाते, त्या वेळी आपण त्या ज्वालेचे उपादान (इंधन) काय असल्याचे प्रज्ञापित करता? वच्छ, ज्या वेळी वाऱ्याने उडालेली अग्नीची ज्वाला दूरवर जाते, त्या वेळी मी 'वारा' हेच तिचे उपादान असल्याचे प्रज्ञापित करतो. कारण वच्छ, त्या वेळी वाराच तिचे उपादान असते. आणि हे गौतम, ज्या वेळी प्राणी या शरीराचा त्याग करतो आणि अद्याप दुसऱ्या शरीरात उत्पन्न झालेला नसतो, त्या वेळी आपण त्याचे उपादान काय असल्याचे प्रज्ञापित करता? वच्छ, ज्या वेळी प्राणी या शरीराचा त्याग करतो आणि अद्याप दुसऱ्या शरीरात उत्पन्न झालेला नसतो, त्या वेळी मी 'तृष्णा' हेच त्याचे उपादान असल्याचे सांगतो. कारण वच्छ, त्या वेळी तृष्णाच त्याचे उपादान असते. (नववे सूत्र समाप्त) 10. ආනන්දසුත්තං १०. आनंदसुत्त 419. අථ ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො යෙන භගවා තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා භගවතා සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කිං නු ඛො, භො ගොතම, අත්ථත්තා’’ති? එවං වුත්තෙ, භගවා තුණ්හී අහොසි. ‘‘කිං පන, භො ගොතම, නත්ථත්තා’’ති? දුතියම්පි ඛො භගවා තුණ්හී අහොසි. අථ ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො උට්ඨායාසනා පක්කාමි. ४१९. त्यानंतर वच्छगोत्त परिव्राजक जेथे भगवान होते तेथे गेला. तिथे पोहोचून त्याने भगवंतांसोबत कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने भगवंतांना विचारले – 'हे गौतम, आत्मा अस्तित्वात आहे का?' असे विचारले असता, भगवान मौन राहिले. 'तर मग हे गौतम, आत्मा अस्तित्वात नाही का?' दुसऱ्यांदा विचारले असता देखील भगवान मौनच राहिले. त्यानंतर वच्छगोत्त परिव्राजक आपल्या आसनावरून उठून निघून गेला. අථ ඛො ආයස්මා ආනන්දො අචිරපක්කන්තෙ වච්ඡගොත්තෙ පරිබ්බාජකෙ භගවන්තං එතදවොච – ‘‘කිං නු ඛො, භන්තෙ, භගවා වච්ඡගොත්තස්ස පරිබ්බාජකස්ස පඤ්හං පුට්ඨො න බ්යාකාසී’’ති? ‘‘අහඤ්චානන්ද, වච්ඡගොත්තස්ස පරිබ්බාජකස්ස ‘අත්ථත්තා’ති පුට්ඨො සමානො ‘අත්ථත්තා’ති බ්යාකරෙය්යං, යෙ තෙ, ආනන්ද, සමණබ්රාහ්මණා සස්සතවාදා තෙසමෙතං සද්ධිං අභවිස්ස. අහඤ්චානන්ද, වච්ඡගොත්තස්ස පරිබ්බාජකස්ස ‘නත්ථත්තා’ති පුට්ඨො සමානො ‘නත්ථත්තා’ති බ්යාකරෙය්යං, යෙ තෙ, ආනන්ද, සමණබ්රාහ්මණා උච්ඡෙදවාදා තෙසමෙතං සද්ධිං අභවිස්ස. අහඤ්චානන්ද, වච්ඡගොත්තස්ස පරිබ්බාජකස්ස ‘අත්ථත්තා’ති පුට්ඨො සමානො ‘අත්ථත්තා’ති බ්යාකරෙය්යං, අපි නු මෙ තං, ආනන්ද, අනුලොමං අභවිස්ස ඤාණස්ස උප්පාදාය – ‘සබ්බෙ ධම්මා අනත්තා’’’ති? ‘‘නො හෙතං, භන්තෙ’’. ‘‘අහඤ්චානන්ද, වච්ඡගොත්තස්ස පරිබ්බාජකස්ස [Pg.566] ‘නත්ථත්තා’ති පුට්ඨො සමානො ‘නත්ථත්තා’ති බ්යාකරෙය්යං, සම්මූළ්හස්ස, ආනන්ද, වච්ඡගොත්තස්ස පරිබ්බාජකස්ස භිය්යො සම්මොහාය අභවිස්ස – ‘අහුවා මෙ නූන පුබ්බෙ අත්තා, සො එතරහි නත්ථී’’’ති. දසමං. त्यानंतर, वच्छगोत्त परिव्राजक निघून गेल्यावर काही वेळातच आयुष्यमान आनंदाने भगवंतांना विचारले – 'भन्ते, भगवंतांनी वच्छगोत्त परिव्राजकाच्या प्रश्नाचे उत्तर का दिले नाही?' 'आनंदा, जर मी वच्छगोत्त परिव्राजकाच्या "आत्मा अस्तित्वात आहे का?" या प्रश्नाला "आत्मा अस्तित्वात आहे" असे उत्तर दिले असते, तर आनंदा, ते शाश्वतवादी श्रमण-ब्राह्मणांच्या मताशी सुसंगत ठरले असते. आणि आनंदा, जर मी वच्छगोत्त परिव्राजकाच्या "आत्मा अस्तित्वात नाही का?" या प्रश्नाला "आत्मा अस्तित्वात नाही" असे उत्तर दिले असते, तर आनंदा, ते उच्छेदवादी श्रमण-ब्राह्मणांच्या मताशी सुसंगत ठरले असते. आनंदा, जर मी वच्छगोत्त परिव्राजकाच्या "आत्मा अस्तित्वात आहे का?" या प्रश्नाला "आत्मा अस्तित्वात आहे" असे उत्तर दिले असते, तर आनंदा, "सर्व धर्म अनात्म आहेत" हे ज्ञान उत्पन्न होण्यास ते सुसंगत ठरले असते का?' 'नाही, भन्ते.' 'आणि आनंदा, जर मी वच्छगोत्त परिव्राजकाच्या "आत्मा अस्तित्वात नाही का?" या प्रश्नाला "आत्मा अस्तित्वात नाही" असे उत्तर दिले असते, तर आधीच संभ्रमात असलेला वच्छगोत्त परिव्राजक अधिकच संभ्रमात पडला असता की – "माझा आत्मा पूर्वी नक्कीच अस्तित्वात होता, तो आता नाहीसा झाला आहे."' (दहावे सूत्र समाप्त) 11. සභියකච්චානසුත්තං ११. सभियकच्चानसुत्त 420. එකං සමයං ආයස්මා සභියො කච්චානො ඤාතිකෙ විහරති ගිඤ්ජකාවසථෙ. අථ ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො යෙනායස්මා සභියො කච්චානො තෙනුපසඞ්කමි; උපසඞ්කමිත්වා ආයස්මතා සභියෙන කච්චානෙන සද්ධිං සම්මොදි. සම්මොදනීයං කථං සාරණීයං වීතිසාරෙත්වා එකමන්තං නිසීදි. එකමන්තං නිසින්නො ඛො වච්ඡගොත්තො පරිබ්බාජකො ආයස්මන්තං සභියං කච්චානං එතදවොච – ‘‘කිං නු ඛො භො, කච්චාන, හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – ‘හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං පන, භො කච්චාන, න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං භගවතා – ‘න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ४२०. एकदा आयुष्यमान सभिय कच्चान ज्ञातीक येथील विटांच्या विहारात (गिंजकावसथ) विहार करत होते. त्या वेळी वच्छगोत्त परिव्राजक जेथे आयुष्यमान सभिय कच्चान होते तेथे गेला. तिथे पोहोचून त्याने आयुष्यमान सभिय कच्चान यांच्याशी कुशल-मंगल विचारले. आनंददायी आणि संस्मरणीय संभाषण संपवून तो एका बाजूला बसला. एका बाजूला बसलेल्या वच्छगोत्त परिव्राजकाने आयुष्यमान सभिय कच्चान यांना विचारले – 'हे कच्चान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात का?' 'वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात."' 'तर मग हे कच्चान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहत नाहीत का?' 'वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहत नाहीत."' ‘‘කිං නු ඛො, භො කච්චාන, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – ‘හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. ‘‘කිං පන, භො කච්චාන, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’ති? ‘‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං භගවතා – ‘නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’’’ති. 'हे कच्चान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात आणि राहतही नाहीत का?' 'वच्छ, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की – "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतात आणि राहतही नाहीत."' 'तर मग हे कच्चान, तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतही नाहीत आणि असेही नाही की ते राहत नाहीत का?' 'वच्छ, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की – "तथागत मृत्यूनंतर अस्तित्वात राहतही नाहीत आणि असेही नाही की ते राहत नाहीत."' ‘‘‘කිං නු ඛො, භො කච්චාන, හොති තථාගතො පරං මරණා’ති, ඉති පුට්ඨො සමානො – ‘අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි. ‘කිං පන, භො කච්චාන, න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති, ඉති පුට්ඨො සමානො – ‘අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි. ‘කිං නු ඛො, භො කච්චාන, හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’ති, ඉති පුට්ඨො සමානො – ‘අබ්යාකතං ඛො එතං, වච්ඡ, භගවතා – හොති ච න ච හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි. ‘කිං පන, භො කච්චාන, නෙව හොති න න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති, ඉති පුට්ඨො සමානො – ‘එතම්පි ඛො, වච්ඡ, අබ්යාකතං භගවතා – නෙව හොති න [Pg.567] න හොති තථාගතො පරං මරණා’ති වදෙසි. කො නු ඛො, භො කච්චාන, හෙතු, කො පච්චයො, යෙනෙතං අබ්යාකතං සමණෙන ගොතමෙනා’’ති? ‘‘යො ච, වච්ඡ, හෙතු, යො ච පච්චයො පඤ්ඤාපනාය රූපීති වා අරූපීති වා සඤ්ඤීති වා අසඤ්ඤීති වා නෙවසඤ්ඤීනාසඤ්ඤීති වා, සො ච හෙතු, සො ච පච්චයො සබ්බෙන සබ්බං සබ්බථා සබ්බං අපරිසෙසං නිරුජ්ඣෙය්ය. කෙන නං පඤ්ඤාපයමානො පඤ්ඤාපෙය්ය රූපීති වා අරූපීති වා සඤ්ඤීති වා අසඤ්ඤීති වා නෙවසඤ්ඤීනාසඤ්ඤීති වා’’ති. ‘‘කීවචිරං පබ්බජිතොසි, භො කච්චානා’’ති? ‘‘නචිරං, ආවුසො, තීණි වස්සානී’’ති. ‘‘යස්සප’ස්ස, ආවුසො, එතමෙත්තකෙන එත්තකමෙව තංප’ස්ස බහු, කො පන වාදො එවං අභික්කන්තෙ’’ති! එකාදසමං. “‘हे कच्चान, मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात का?’ असा प्रश्न विचारला असता, तुम्ही म्हणालात की, ‘वच्छा, भगवंतांनी हे अव्याकृत (अनुत्तरित) ठेवले आहे की मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात.’ ‘पण हे कच्चान, मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात नसतात का?’ असा प्रश्न विचारला असता, तुम्ही म्हणालात की, ‘वच्छा, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात नसतात.’ ‘हे कच्चान, मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात आणि नसतातही का?’ असा प्रश्न विचारला असता, तुम्ही म्हणालात की, ‘वच्छा, भगवंतांनी हे अव्याकृत ठेवले आहे की मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात आणि नसतातही.’ ‘पण हे कच्चान, मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही का?’ असा प्रश्न विचारला असता, तुम्ही म्हणालात की, ‘वच्छा, भगवंतांनी हे देखील अव्याकृत ठेवले आहे की मृत्यूनंतर तथागत अस्तित्वात असतात असेही नाही आणि नसतात असेही नाही.’ हे कच्चान, श्रमण गोतमांनी हे अव्याकृत ठेवण्याचे कारण काय, प्रत्यय काय?” “वच्छा, ‘रूपी’ (रूपवान) किंवा ‘अरूपी’ (रूपरहित) किंवा ‘संज्ञी’ (संज्ञा असलेला) किंवा ‘असंज्ञी’ (संज्ञारहित) किंवा ‘नैवसंज्ञी-नासंज्ञी’ (संज्ञा असलेलाही नाही आणि नसलेलाही नाही) असे प्रज्ञप्त (वर्णन) करण्याचे जे कारण आणि जो प्रत्यय आहे, तो कारण आणि तो प्रत्यय जर सर्व प्रकारे, संपूर्णपणे, निरवशेषपणे निरुद्ध झाला, तर कोणत्या आधारावर त्याचे वर्णन ‘रूपी’ किंवा ‘अरूपी’ किंवा ‘संज्ञी’ किंवा ‘असंज्ञी’ किंवा ‘नैवसंज्ञी-नासंज्ञी’ असे केले जाऊ शकेल?” “हे कच्चान, तुम्हाला प्रव्रजित होऊन किती काळ झाला आहे?” “फार काळ झालेला नाही, आवुसो, तीन वर्षे झाली आहेत.” “आवुसो, ज्याने एवढ्या काळात एवढे प्राप्त केले आहे, त्याने खरोखरच खूप काही प्राप्त केले आहे, मग ज्याने याहून अधिक प्रगती केली आहे त्याच्याबद्दल काय सांगावे!” अकरावे सुत्त समाप्त। අබ්යාකතසංයුත්තං සමත්තං. अव्याकृतसंयुत्त समाप्त। තස්සුද්දානං – त्याची उद्दान (अनुक्रमणिका) – ඛෙමාථෙරී අනුරාධො, සාරිපුත්තොති කොට්ඨිකො; මොග්ගල්ලානො ච වච්ඡො ච, කුතූහලසාලානන්දො; සභියො එකාදසමන්ති; खेमाथेरी, अनुराध, सारिपुत्त, कोट्ठिक, मोग्गल्लान, वच्छ, कुतूहलसाला, आनंद आणि सभिय; ही अकरा सुत्ते आहेत। සළායතනවග්ගො චතුත්ථො. चौथा सळायतनवग्ग समाप्त। තස්සුද්දානං – त्याची उद्दान (अनुक्रमणिका) – සළායතනවෙදනා, මාතුගාමො ජම්බුඛාදකො; සාමණ්ඩකො මොග්ගල්ලානො, චිත්තො ගාමණි සඞ්ඛතං; අබ්යාකතන්ති දසධාති. सळायतन, वेदना, मातुगाम, जम्बुखादक, सामण्डक, मोग्गल्लान, चित्त, गामणि, संखत आणि अव्याकृत; हे दहा प्रकार आहेत। සළායතනවග්ගසංයුත්තපාළි නිට්ඨිතා. सळायतनवग्गसंयुत्तपाळि समाप्त। | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |