| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
ถุปวํโส थूपवंस นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना नमस्कार असो. ยสฺมึ สยึสุ ชินธาตุวรา สมนฺตาฉพฺพณฺณ รํสิ วิสเรหิ สมุชฺชลนฺตา,นิมฺมาย โลกหิตเหตุ ชินสฺส รูปํตํ ถุปมพฺภุต ตมํ สิรสา นมิตฺวา; จกฺขามหํ สกล โลก หิตาวหสฺสถุปสฺส สพฺพ ชน นณฺทน การณสฺส,วํสํ สุราสุร นริณฺทวเรหิ นิจฺจํสมฺปูชิตสฺส รตนุชฺชล ถูปิกสฺส; ज्यामध्ये जिनांचे (बुद्धांचे) श्रेष्ठ धातू सर्व बाजूंनी सहा रंगांच्या किरणांच्या समूहाने तळपत विराजमान आहेत, जगाच्या कल्याणासाठी जिनांचे रूप निर्माण करणाऱ्या त्या अत्यंत अद्भुत स्तूपाला डोके टेकवून नमस्कार करून; संपूर्ण जगाचे कल्याण करणाऱ्या, सर्व लोकांना आनंद देणाऱ्या, देव, असुर आणि श्रेष्ठ राजांद्वारे नेहमी पूजिल्या गेलेल्या आणि रत्नांनी तळपणाऱ्या कळसाने युक्त अशा स्तूपाचा वंश (इतिहास) मी सांगतो. กิญฺจาปิ โส ยติชเนน ปุราตเนนอตฺวาย สีหฬชนสฺส กโต ปุราปิ,วากฺเกน สิหฬภเวน’ภิสงฺขมตฺตาอตฺถํ น สาธหติ สพฺพชนสฺส สมฺมา; जरी तो इतिहास पूर्वीच्या प्राचीन भिक्खू संघाने सिंहली लोकांच्या हितासाठी सिंहली भाषेत रचला असला, तरी सिंहली भाषेतील रचनेमुळे तो सर्व लोकांचा उद्देश पूर्णपणे साध्य करत नाही. ยสฺมา จ มาคธ นิรุตฺติกโตปิ ถูป-วํโส วิรุทฺธนย สทฺท สมากุโล โส,วตฺตพฺพเมว จ พหุมฺปิ ยโต น วุตฺตํตมฺหา อหํ ปุนปิ วํสมิ’มํ วทามิ; आणि ज्याअर्थी मागधी भाषेतील (पाली भाषेतील) तो थूपवंस देखील परस्परविरोधी नियम आणि शब्दांनी युक्त आहे, तसेच जे पुष्कळ काही सांगायला हवे होते ते त्यात सांगितले गेले नाही, म्हणूनच मी पुन्हा एकदा हा वंश सांगत आहे. สุณาถ สาธโว สพฺเพ ปริปุณฺณมนากุลํวุจฺจมานํ มยา สาธุ วํสํ ถูปสฺส สตฺถุโนติ; हे सर्व सज्जनहो! माझ्याद्वारे चांगल्या प्रकारे सांगितला जाणारा, शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) स्तूपाचा हा परिपूर्ण आणि गोंधळरहित वंश लक्षपूर्वक ऐका. ตตฺถ ถูปสฺส วํสํ วกฺขามีติ เอตฺถ ตถาคโต อรหํ สมฺมา สมฺพุทฺโธ ถูปารโห, ปจฺเจกพุทฺโธ ถูปารโห, ตถาคตสฺส สาวโก ถูปารโห, ราชา จกฺกวตฺติ ถูปารโหติ วจนโต ถูปารหานํ พุทฺธาทีนํ ธาตุโย ปติฏฺฐาเปตฺวา กต เจติยํ อพฺภุนน ตฏฺเฐน ถูโปติ วุจฺจติ, อิธ ปน กญฺจน มาลิก มหาถูโป อธิปฺเปโต, โส กสฺส ธาตุโย ปติฏฺฐาเปตฺวา กโตติ เจ? โยทีปงฺกราทีนํ จตุวีสติยา พุทฺธานํ สนฺติเก ลทฺธวฺยากรโณ สมตึสปารมิโย ปูเรตฺวา ปรมาภิสมฺโพธึ ปตฺวา ธมฺมจกฺกปฺปวตฺตนโต ปฏฺฐาย ยาว สุหทฺท ปริพฺพาชก วินยาน สพฺพ พุทฺธกิจฺจานิ นิฏฺฐาเปตฺวา อนุปาทิเยสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพุโต ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมา สมฺพุทฺธสฺส ธาตุโย ปติฏฺฐาเปตฺวา กโต อยเมตฺถ สงฺเขโป, วิตฺถาโร ปน เวทิตพฺโพ? तेथे 'स्तूपाचा वंश सांगतो' या वाक्यात—'तथागत, अर्हत, सम्यक्संबुद्ध हे स्तूपास पात्र आहेत; प्रत्येकबुद्ध स्तूपास पात्र आहेत; तथागतांचे श्रावक स्तूपास पात्र आहेत; चक्रवर्ती राजा स्तूपास पात्र आहेत' या वचनानुसार, स्तूप उभारण्यास पात्र असलेल्या बुद्ध इत्यादींच्या धातूंची (अस्थी-अवशेषांची) प्रतिष्ठापना करून बांधलेल्या चेतियाला (चैत्याला) उंच असल्यामुळे 'स्तूप' असे म्हटले जाते. येथे मात्र 'कंचनमालिका महास्तूप' अभिप्रेत आहे. तो कोणाच्या धातूंची प्रतिष्ठापना करून बांधला गेला आहे? ज्यांनी दीपंकर इत्यादी चोवीस बुद्धांच्या सन्निध्यात भविष्यवाणी (व्याकरण) प्राप्त केली, तीस पारमिता पूर्ण केल्या, परम संबोधी (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त केली आणि धम्मचक्कपवत्तनापासून (धम्मचक्रप्रवर्तनापासून) सुरू करून सुभद्द परिव्राजकाच्या विनयापर्यंत (दीक्षेपर्यंत) सर्व बुद्धकृत्ये पूर्ण केली आणि उपादानरहित अशा निब्बानधातूमध्ये (निर्वाणधातूमध्ये) परिनिर्वाण प्राप्त केले, त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांच्या धातूंची प्रतिष्ठापना करून हा स्तूप बांधला गेला आहे. हा येथे संक्षेप (थोडक्यात अर्थ) आहे, याचा सविस्तर वृत्तांत पुढे समजून घ्यावा. ๒. อิโต กิร กปฺปสตสหสฺสาธิกานํ จตุนฺนํ อสงฺเขยฺยานํ มตฺถเก อมรวตี นาม นครํ อโหสิ. ตตฺถ สุเมโธ นาม พฺราหฺมโณ ปฏิวสติ. โส อญฺญํ กมฺมํ อกตฺวา พฺรหฺมณสิปฺปเมว อุคฺคณฺหิ ตสฺส ทหรกาเลเยว มาตาปิตโร กาลมกํสุ. อถสฺส ราสิวฑฺฒนโก อมจฺโจ อาย โปตฺถกํ อาหริตฺวา สุวณฺณ รชต มณิมุตฺตาทิ ภริเต คพฺเภ วิวริตฺวา เอตฺตกํ เต กุมาร มาตุ สนฺตกํ, เอตฺตกํ ปิตุสนฺตกํ, เอตฺตกํ อยฺยก ปยฺยกานนฺติ ยาว สตฺตมา กุลปริวฏฺฏา ธกํ อาจิกฺขิตฺวา เอตมฺปฏิชคฺคาหีติ อาห. โส สาธูติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา อคารํ อชฺฌาวสนฺโต เอกทิวสํ จินฺเตสิ. २. असे सांगितले जाते की, आजपासून : चार असंख्येय आणि एक लाख कप्पांपूर्वी (कल्पांपूर्वी) अमरावती नावाचे एक नगर होते. तेथे सुमेध नावाचा एक ब्राह्मण राहत होता. त्याने इतर कोणतेही काम न करता केवळ ब्राह्मणविद्यांचेच अध्ययन केले. तो लहान असतानाच त्याच्या माता-पित्यांचे निधन झाले. त्यानंतर त्याच्या संपत्तीची वाढ करणाऱ्या अमात्याने (कोषाधिकाऱ्याने) जमाखर्चाचे पुस्तक आणून, सोने, चांदी, मणी, मोती इत्यादींनी भरलेल्या खोल्या उघडून दाखवल्या आणि म्हटले, 'हे कुमारा! एवढी तुझ्या आईची संपत्ती आहे, एवढी तुझ्या वडिलांची आहे, आणि एवढी तुझ्या आजोबा-पणजोबांची आहे,' अशा प्रकारे सातव्या पिढीपर्यंतची संपत्ती दाखवून तो म्हणाला, 'याचा स्वीकार कर आणि सांभाळ कर.' त्याने 'ठीक आहे' म्हणून ती स्वीकारली आणि घरात राहत असताना एके दिवशी त्याने विचार केला: ๓. ปุนพฺภเว ปฏิสณฺธิคหณํ ตาม ทุกฺขํ, ตถา นิพฺพตฺต นิพฺพตฺตฏฺฐาเน สรีรเภทนํ อหญฺจ ชานิธมฺโม ชราธมฺโม วฺยาธิธมฺโม มรณธมฺโม. เอวํ ภูเตน มยา อชาติ อชรํ อวฺยาธึ อมรณํ สุขํ สีตลํ นิพฺพานํ คเวสิตุํ วฏฺฏตีติ เนกฺขมฺมการณํ จินฺเตตฺวา ปุน จินฺเตสิ อิมํ ธนํ สพฺพํ มยฺหํ ปิตุ ปิตามหาทโย ปรโลกํ คจฺฉนฺตา เอก กหาปณมฺปิ คเหตฺวา นคตา มยา ปน คเหตฺวา คมนการณํ กาตุํ วฏฺฏตีติ นคเร เภรึ จราเปตฺวา มหาชนสฺส ทานํ ทตฺวา หิมวนฺตสฺส ปวิสิตฺวา ตาปส ปพฺพชฺชํ ปพฺพชิตฺวา สตฺตาหพฺภนฺตเรเยว อภิญฺญา จ สมาปตฺติโย จ นิพฺพตฺเตตฺว สมาปตฺติสุเขน วีตินาเมสิ. ३. पुन्हा जन्म घेणे (पुनर्जन्म) हे खरोखरच दुःखदायक आहे, तसेच ज्या ज्या ठिकाणी जन्म होतो तेथे शरीराचा नाश होणेही दुःखद आहे. मी स्वतः जन्मस्वभावी, जराव्याधीस्वभावी आणि मरणस्वभावी आहे. अशा मी जन्मरहित, जरारहित, व्याधिरहित, मरणरहित, सुखरूप आणि शीतल अशा निब्बानाचा (निर्वाणाचा) शोध घेणे योग्य आहे. अशा प्रकारे नैष्क्रम्याचे (गृहत्यागाचे) कारण मनात आणून त्याने पुन्हा विचार केला: 'माझे वडील, आजोबा इत्यादी परलोकात जाताना या सर्व संपत्तीतील एक कहापण (नाणे) देखील सोबत घेऊन गेले नाहीत. परंतु मी मात्र ही संपत्ती सोबत घेऊन जाण्याचा मार्ग शोधला पाहिजे.' असा विचार करून त्याने नगरात दवंडी पिटवून लोकांना दान दिले आणि हिमालयात प्रवेश करून तापस प्रव्रज्या (संन्यास) घेतली. केवळ सात दिवसांच्या आतच त्याने अभिज्ञा (उच्च ज्ञान) आणि समापत्ती प्राप्त केली आणि तो समापत्तीच्या सुखात काळ घालवू लागला. ตทา ทีปงฺกโร นาม สตฺถา ปรยาภิสมฺโพธึ ปตฺวา สตฺต สตฺตาหํ โพธิสมีเปเจว วิตินาเมตฺวา สุนณฺทาราเม ธมฺมจกฺกํ ปวตฺเตตฺวา โกฏิสตฺตานํ เทวมนุสฺสานํ ธมฺมมตํ ปาเยตฺวา จาตุทฺทีปิก มหาเมโฆ วิย ธมฺมวสฺสํ วสฺเสนฺโต จตูหิ ขีณาสย สตสหสฺเสหิ ปริวุโต อนุปุพฺเพน จารกํ จรมาโน รมฺม นครํ ปตฺวา สุทสฺสน มหาวิหาเร ปฏิวสติ ตทา รมฺมนครวาสิโน สปฺปิ ผณิตาทีนิ เภสชฺชานิ คเหตฺวา ปุปฺผ ธูป คณฺธหตฺถา เยน พุทฺโธ เตนปสงฺกมิตฺวา สตฺถารํ วนฺทิตฺวา ปุปฺผาทีหิ ปูเชตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิตฺวา ธมฺมํ สุตฺวา สฺวาตนาย ภควนฺตํ นิมนฺเตตฺวา อุฏฺฐายาสนา ทสพลํ ปทกฺขีนํ กตฺวา ปกฺกมึสุ. त्या वेळी दीपंकर नावाच्या शास्त्यांनी (बुद्धांनी) परम संबोधी प्राप्त करून बोधिवृक्षाजवळ सात आठवडे घालवले, सुनंद आरामात धम्मचक्र प्रवर्तित केले, कोट्यवधी देव आणि मनुष्यांना धम्मरूपी अमृताचे प्राशन करवले आणि चारही महाद्वीपांवर पडणाऱ्या महामेघाप्रमाणे धम्माचा वर्षाव करत, चार लाख क्षीणास्रव (अर्हत) भिक्खूंसह क्रमशः चारिका (धम्मयात्रा) करत रम्म नगरात येऊन सुदस्सन महाविहारात वास्तव्य केले. तेव्हा रम्म नगरवासीयांनी तूप, गूळ इत्यादी औषधे घेतली आणि हातात फुले, धूप व गंध घेऊन जेथे बुद्ध होते तेथे ते गेले. त्यांनी शास्त्यांना वंदन केले, फुलांनी त्यांची पूजा केली, एका बाजूला बसून धम्म ऐकला आणि दुसऱ्या दिवशीच्या भोजनासाठी भगवंतांना आमंत्रित केले. त्यानंतर आसनावरून उठून त्यांनी दसबलांना (दशबल बुद्धांना) प्रदक्षिणा घातली आणि ते निघून गेले. เต ปุน ทิวเส อสทิส มหาทานํ สชฺเชตฺวา ทสพลสฺส อาคมน มคฺคํ โสเธนฺติ. ตสฺมึ กาเล สุเมธตาปโส อตฺตโน อสฺสม ปทโต อุคฺคนฺตฺวา รมฺมนครวาสีนํ เตสํ มนุสฺสานํ อุปริภาเคน อากาเสน คจฺฉนฺตา เต หฏฺฐปหฏฺเฐ มคฺคํ โสเธนฺเต ทิสฺวา กินฺนุ โข การณนฺติ จินฺเตนฺโต สพฺเพสํ ปสฺสนฺตานํเยว อากาสโต โอรุ เอกมนฺเต ฐตฺถายห เต มนุสฺเส ปุจฺฉิ.’หมฺโภ กสฺส ปน อิมํ มคฺคํ โสเธถา’ติ เต อาหํสุ ภนฺเต สุเมธ ตุมฺเห กึ นํ ชานาถ, ทีปงฺกโร นาม สตฺถา ปรมาภิสมฺโพธึ ปตฺวา ปวตฺตวร ธมฺมจกฺโก ชนปท จาริกํ จรมาโน อนุกฺกเมน อมฺหากํ นครํ ปตฺวา สุทสฺสน มหาวิหาเร ปฏิวสติ. มยํ ตํ ภควนฺตํ นิมนฺตยิมฺห ตสฺส ภควโต อาคมนมคฺคํ โสเธมาติ. ตํ สุตฺวา สุเมธปณฺฑิโต จินฺเตสิ. พุทฺโธติ โข ปเนส โฆโสปิ ทุลฺลโภ, ปเคว พุทฺธุปฺปาโท เตน หิ มยาปิ อิเมหิ มนุสฺเสหิ สทฺธึ ทสพลสฺส อาคมนมคฺคํ โสเธตุํ วฏฺฏตีติ โส เต มนุสฺเส อาห, สเจ โภ ตุมฺเห อิมํ มคฺค พุทฺธสฺส โสเธถ - สยหมฺปิ เอกํ โอกาสํ สมฺปฏิจฺฉตฺวา อยํ สุเมธปณฺฑิโต มหิทฺธิโก มหานุภาโวติ ชานนฺตา ทุพฺพิโสธนํ อุทกสมฺภินฺนํ อติวิสมํ เอกํ โอกาสํ สลฺลกฺเขตฺวา อิมํ หกาสํ ตุมฺเห โสเธถ. อลงฺกโรถาติ อทํสุ. त्यांनी दुसऱ्या दिवशी अतुलनीय महादानाची तयारी करून दसबलांच्या (बुद्धांच्या) आगमनाचा मार्ग साफ करण्यास सुरुवात केली. त्या वेळी सुमेध तापस आपल्या आश्रमातून निघून, रम्म नगरवासीयांच्या वरून आकाशातून जात असताना, त्यांना अत्यंत आनंदाने मार्ग साफ करताना पाहून 'याचे काय कारण असावे?' असा विचार करू लागला. सर्वांच्या देखतच तो आकाशातून खाली उतरला आणि एका बाजूला उभा राहून त्याने त्या लोकांना विचारले, 'अहो मित्रांनो! तुम्ही हा मार्ग कोणासाठी साफ करत आहात?' ते म्हणाले, 'भंते सुमेध, तुम्हाला हे माहीत नाही का? दीपंकर नावाचे शास्ते परम संबोधी प्राप्त करून आणि श्रेष्ठ धम्मचक्र प्रवर्तित करून जनपदात चारिका करत क्रमशः आमच्या नगरात आले आहेत आणि सुदस्सन महाविहारात राहत आहेत. आम्ही त्या भगवंतांना आमंत्रित केले आहे आणि आम्ही त्यांच्या आगमनाचा मार्ग साफ करत आहोत.' हे ऐकून सुमेध पंडिताने विचार केला, 'बुद्ध' हा शब्द ऐकणे देखील अत्यंत दुर्मिळ आहे, मग बुद्धांचा जन्म होणे तर कितीतरी कठीण! म्हणूनच मीसुद्धा या लोकांसोबत दसबलांच्या आगमनाचा मार्ग साफ करणे योग्य ठरेल.' त्याने त्या लोकांना म्हटले, 'सज्जनहो! जर तुम्ही हा मार्ग बुद्धांसाठी साफ करत असाल, तर मलाही एखादा भाग द्या.' हा सुमेध पंडित महाऋद्धीवान आणि महान प्रभावशाली आहे हे जाणून, त्यांनी साफ करण्यास अत्यंत कठीण, पाण्याने भरलेला आणि अतिशय खडबडीत असा एक भाग निवडून त्याला दिला आणि म्हटले, 'तुम्ही हा भाग साफ करा आणि सुशोभित करा.' สุเมธปณฺฑิโต พุทฺธารมฺมณ ปีตึ อุปฺปาเทตฺวา จินฺเตสิ. อหมฺปนิมํ โอกาสํ อิทฺธียา ปรมทสฺสนีย กาตุํ ปโหมิ เอวํ กโต ปน มํ น ปริโตเสติ อชฺช ปน มยา กายเวยฺยาวจฺจํ กาตุํ วฏฺฏติติ ปํสุํ อาหริตฺวา ตํ ปเหสํ ปูเรนิ, ตสฺส ปน ตสฺมึ ปเทเส อโสธิเต ชยสุมน กุสุม สทิสิ วณฺณํ ทุปฏฺฏจีวรํ ติมณฺฑลํ ปฏิจฺฉาเทตฺวา นิวาเสตฺวา ตสฺสุปริ ยุณฺณมาปงฺเคน กุสุมกลาปํ ปรกฺขิปนฺโต วิย วิชฺชุลฺลตา สสฺสีรีกํ กายพณฺธนํ พณฺธิตฺวา กนก คิริสิขร มตฺถเก ลาขารสํ ปริสิญฺจนฺเต วิย สุวณฺณเจติยํ ปวาฬชาเลน ปริกฺขิปนฺโต วิย สุวณฺณงฺฆกํ รตฺตกมฺพเลน ปฏิมุญฺจนฺโต วิย สรท สมย รชนิกรํ รตฺตวลาหเกน ปฏิจฺฉาเทนฺโต วิย จ ลาขารเสน ตินฺน กึ สุกกฺสุมวณฺณํ รตฺตวร ปสุกูล จีวรํ ปาริปิตฺวา คณฺธกูคิทฺว รโต กนกคุหาโต สีโห วิย นิกฺขมิตฺวา ชฬภิญฺญานํเยว จตูหิ ขีณาสว สตสหสฺเสหิ ปริวุโต อมรคณ ปริวุโต ทสสตนยโน วิย พฺรหฺมคณปริวุโต มหา พฺรหฺมา วิย จ อปริมิต สมย สมุปจิตาย กุสลพลชนิตาย อโนปมยา พุทฺธลีลาย ตาราคณปริวุโต สรท สมย รชนิกโร วิย คคนตลํ อลงฺคต ปฏิยตฺตํ มคฺคํ ปฏิปชฺชิ. सुमेध पंडिताने बुद्धारम्मण (बुद्धांचे आलंबन घेऊन) प्रीती उत्पन्न करून विचार केला, "मीसुद्धा या जागेला ऋद्धीने अत्यंत दर्शनीय बनवू शकतो. परंतु, असे केल्याने मला समाधान मिळणार नाही. आज मला शारीरिक सेवा (कायकर्म) करणेच योग्य आहे." असे म्हणून त्याने माती आणून तो खड्डा भरण्यास सुरुवात केली. परंतु, तो भाग अजून स्वच्छ झाला नसतानाच, जयासूमन (जास्वंद) फुलासारख्या रंगाचे दुपदरी चीवर तिन्ही मंडळांना (गुडघे आणि नाभी) झाकून परिधान करून, त्यावर सुवर्णसूत्राने फुलांचा गुच्छ गुंफल्याप्रमाणे आणि विजेच्या लतेसारखा शोभायमान असा कायबंध (कमरपट्टा) बांधून, सुवर्ण पर्वताच्या शिखरावर लाखेचा रस शिंपडल्याप्रमाणे, सुवर्ण चैत्याला प्रवाळाच्या (पोवळ्यांच्या) जाळीने वेढल्याप्रमाणे, सुवर्ण पात्राला लाल घोंगडीने झाकल्याप्रमाणे आणि शरद ऋतूतील चंद्राला तांबड्या ढगाने आच्छादल्याप्रमाणे, लाखेच्या रसाने रंगवलेल्या पळसाच्या फुलासारख्या रंगाचे उत्कृष्ट लाल पांसुकूल चीवर पांघरून, गंधकुटीच्या दारातून सोन्याच्या गुहेतून बाहेर पडणाऱ्या सिंहाप्रमाणे बाहेर पडून, षडभिज्ञ अशा चार लाख क्षीणासवांनी (अर्हतांनी) वेढलेले, देवगणांनी वेढलेल्या सहस्रनेत्र इंद्राप्रमाणे, ब्रह्मगणांनी वेढलेल्या महाब्रह्माप्रमाणे, अपरिमित काळापासून संचित केलेल्या कुशल बलामुळे निर्माण झालेल्या अनुपम बुद्धलीलेने, ताऱ्यांच्या समूहाने वेढलेल्या शरद ऋतूतील चंद्राप्रमाणे आकाशात शोभावे, तसे भगवान त्या सजवलेल्या आणि तयार केलेल्या मार्गावर चालू लागले. ๕. สุเมธตาปโสปิ เตน อลงฺกต ปฏิยตฺเตน มคฺเคน อาคจฺฉนฺตสฺส ทีปงฺกรสฺส ภควโต ทฺวตฺตึส วรลกฺขณ ปติมณฺฑิตํ อสติยา อนุพฺยญฺชเนหิ อนุพฺยญฺชิตํ พฺยามปฺปหาปริกฺเขป สสฺสีรีกํ อิณฺทนีลมณิสํกาโสอากาเส นานปฺปการา วิชฺชุลฺลตา วิย ฉพฺพณฺณพุทฺธรํสิโย วิสฺสชฺเชนฺตํ รูปคฺคปฺปตฺตํ อตฺตภาวํ โอโลเกตฺวา อชฺช มยา ทสพลสฺส ชีวิตปริจฺจาคํ กาตุํ วฏฺฏติ มา ภควา กลเล อกฺกมิ มณิมยํ ลกเสตุํ อกฺกมนฺโต วิย สทฺธึ จตูหิ ขีณาสว สตสหสฺเสหิ มม ปิฏฺฐึ อกฺกมนฺโต คจฺฉตุ ตํ เม ภวิสฺสติ ทีฆรตฺตํ หิตาย สุขายาติ เกเส โมเจตฺวา อชินชฏา วากจีรานิ กเลล ปตฺถริตฺวา ตตฺเถว กลลปิฏฺเฐ นิปชฺชิ นิปนฺโน จ สเจ อหํ อิจฺเฉยฺยํ สพฺพกิเลเส ฌาเปตฺวา สงฺฆนวโก หุตฺวา รมฺมนครํ ปวิเสยฺยํ อญฺญาตกเวเสน ปน เม กิเลเส ณฺธเปตฺวา นิพฺพานปตฺติยา กิจฺจํ นตฺถิ, ยํนูนาหํ ทีปงฺกร ทสพโล วิย ปรมาภิสมฺโพธึ ปตฺวา ธมฺมนาวํ อาโรเปตฺวา มหาชนํ สํสารสาครา อุตฺตาเรตฺวา ปจฺฉา ปรินิพฺพาเยยฺยํ. อิทํ เม ปติรุปนฺติ จินฺเตตฺวา อฏฺฐธมฺเม สโมธาเนตฺวา พุทฺธภาวาย อภินีหารํ กตฺวา นิปชฺช. ५. सुमेध तापसानेही त्या सजवलेल्या आणि तयार केलेल्या मार्गाने येत असलेल्या दीपंकर भगवंतांचे बत्तीस महापुरुष लक्षणांनी सुशोभित, ऐंशी अनुव्यंजनांनी युक्त, व्यामप्रभेने वेढलेले, इंद्रनील मण्यासारख्या आकाशात विविध प्रकारच्या विजा चमकत असल्याप्रमाणे सहा रंगांचे बुद्धकिरण उत्सर्जित करणारे, रूपसंपन्न शरीर पाहिले आणि विचार केला, "आज मी दशबलांसाठी (बुद्धांसाठी) प्राणांचे बलिदान देणे योग्य आहे. भगवंतांनी चिखलात पाय ठेवू नये. मण्यांच्या फरशीवर पाय ठेवल्याप्रमाणे, चार लाख क्षीणासवांसह माझ्या पाठीवर पाय ठेवून त्यांनी जावे. हे माझ्यासाठी दीर्घकाळ हितकारक आणि सुखकारक ठरेल." असे म्हणून त्याने आपले केस मोकळे केले, आपले अजिन (हरणाचे चामडे), जटा आणि वल्कले चिखलावर पसरली आणि तो स्वतः त्या चिखलावर आडवा पडला. आडवे पडल्यावर त्याने विचार केला, "जर मी इच्छिले, तर सर्व क्लेशांचा नाश करून, संघात नवीन भिक्खू बनून रम्म नगरात प्रवेश करू शकेन. परंतु, अज्ञात वेषात क्लेशांचा नाश करून निर्वाण प्राप्त करण्याचे मला काही प्रयोजन नाही. मी दीपंकर दशबलांप्रमाणेच परम अभिसंबोधी (सम्यक संबोधी) प्राप्त करून, धम्मरूपी नौकेत बसवून बहुजन समाजाला संसारसागरातून पार करावे आणि नंतर परिनिर्वाण प्राप्त करावे. हेच माझ्यासाठी योग्य आहे." असा विचार करून, त्याने आठ अटी (अष्ट धम्म) एकत्र करून बुद्धत्वासाठी दृढ संकल्प (अभिनीहार) केला आणि तो पडून राहिला. ทีปงฺกโรปิ ภควา อาคตฺตฺวา สุเมธปณฺฑิตสฺส สีสสาเค ฐตฺวา กลลปิฏฺเฐ นิปนฺนํ ตาปสํ ทิสฺวา อยํ ตาปโส พุทฺธตฺถาย อภินีหารํ กตฺวา นิปนฺโต, อิชฺฌิสฺสติ นุ โข เอตสฺส ปตฺถนา อุทาหุ โนติ อุปธาเรนฺโต - อนาคเต โคตโม นาม พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ ญตฺวา ฐิตโกว ปริส มชฺเฌ วฺยากาสิ, ปสฺสถ โน ตุมฺเห ภิกฺขเว อิมํ อุคฺคตปํ ตาปสํ กลลปิฏฺเฐ นิปนฺนนฺติ. เอวํ ภนฺเต, อยํ ยิทฺธตฺถาย อภินีหารํ กตฺวา นิปนฺโน สมิชฺฌิสฺสติ อิมสฺส ปตฺถตา กปฺปสต สหสฺสาธิกานํ จตุนฺตํ อสงฺเขยฺยานํ มตฺถเก โคตโม นาม พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ สพฺพํ วฺยากาสิ. दीपंकर भगवंतांनीही तेथे येऊन, सुमेध पंडिताच्या डोक्यापाशी उभे राहून, चिखलात पडलेल्या तापसाला पाहिले आणि विचार केला, "हा तापस बुद्धत्वासाठी संकल्प करून पडला आहे. याची प्रार्थना पूर्ण होईल की नाही?" याचा विचार करत, "भविष्यात हा गोतम नावाचा बुद्ध होईल" हे जाणून, त्यांनी उभे राहूनच जनसमुदायाच्या मध्यभागी भविष्यवाणी केली, "भिक्खूंनो, तुम्ही या उग्र तपस्वी तापसाला चिखलात पडलेले पाहत आहात का?" भिक्खू म्हणाले, "होय, भंते!" भगवंतांनी सर्व भविष्यवाणी केली, "हा बुद्धत्वासाठी संकल्प करून पडला आहे, याची प्रार्थना यशस्वी होईल. आजपासून चार असंख्येय आणि एक लाख कल्पानंतर हा गोतम नावाचा बुद्ध होईल." วุตฺตญฺเหตํ พุทฺธวํเส. बुद्धवंशात हे असे म्हटले आहे: ทีปงฺกโร โลกวิทู - อาหุตีนํ ปฏิคฺคโห,อุสฺสีสเก มํ ฐตฺวาน - อิทํ วจนมพฺรวิ; "लोकविदू आणि आहुती स्वीकारण्यास योग्य असणारे दीपंकर बुद्ध माझ्या डोक्यापाशी उभे राहिले आणि हे वचन बोलले:" ปสฺสถ อิมํ ตาปสํ - ชฏิล อุคฺคตาปสํ อปริเมยฺเย อิโต กปฺเป - อยํ พุทฺโธ ภวิสฺสติ. อหุ กปิลวหยา รมฺมา - นิกฺขมิตฺวา ตถาคโต. ปธานํ ปทหิตฺวาน - กตฺวา ทุกฺกร การิกํ "तुम्ही या जटाधारी उग्र तपस्वी तापसाला पहा. इथून अपरिमित कल्पानंतर हा बुद्ध होईल. हा तथागत रम्य अशा कपिलवस्तू नगरातून गृहत्याग करून, महान प्रयत्न (प्रधान) करून आणि दुष्कर कार्य (तपश्चर्या) करून," พุทฺเธ โลเก - เกจิ. "जगात बुद्ध..." อชปาล รุกฺขมูลสฺมึ - นิสีทิตฺวา ตถาคโต,ตตฺถ ปายาสมคฺคยฺห - เนรญฺชรมุเปเหติ; "अजपाल वृक्षाच्या मुळाशी बसून, ते तथागत तेथे खीर (पायस) स्वीकारून नेरंजरा नदीकडे जातील;" เนรญฺชราย ตีรมฺหิ - ปายาสาทาย โส ชิโน,ปฏิยตฺตวรมคฺเคน - โพธิมูลญฺหิ เอหีติ; "नेरंजरा नदीच्या तीरावर खीर ग्रहण करून, ते जिन (विजेते) सजवलेल्या श्रेष्ठ मार्गाने बोधिवृक्षाच्या मुळाशी येतील;" ตโต ปทกฺขิณํ กตฺวา - โพธิมณฺฑํ อนุตฺตโรอสฺสตฺถรากฺขมูลมฺหิ - วุชฺฌิสฺสติ มหายโส; "त्यानंतर बोधिमंडळाला प्रदक्षिणा घालून, ते अनुत्तर आणि महायशस्वी बुद्ध पिंपळाच्या (अस्सत्थ) वृक्षाच्या मुळाशी बुद्धत्व प्राप्त करतील;" อิมสฺสชนิกา มาตา - มายา นาม ภวิสฺสติ, ปิตา สุทฺโธทโน นาม - อยํ เหสฺสติ โคตโม. อนาสวา วีตราคา - สนฺตจิตฺตา สมาหิตา, "यांची जन्मदात्री माता माया नावाची असेल आणि पिता शुद्धोदन नावाचे असतील. हे गोतम बुद्ध होतील. अनास्रव (आसवरहित), वीतरागी, शांतचित्त आणि समाहित असणारे," โกลิโต อุปติสฺโส จ - อคฺคา เหสฺสนฺติ สาวกา; อานณฺโท นามุปฏฺฐาโก - อุปฏฺฐิสฺสตี’มํ ชินํ; "कोलित (महामोग्गल्लान) आणि उपतिस्स (सारिपुत्त) हे त्यांचे अग्रश्रावक होतील. आनंद नावाचे उपस्थायक (सेवक) या जिनांची सेवा करतील;" เขมา อุปฺปลวณฺณา จ - อคฺคา เหสฺสนฺติ สาวิกา; อนาสวา วีตราคา - สนฺตจิตฺตา สมาหิตา; "खेमा आणि उप्पलवण्णा या त्यांच्या अग्रश्राविका होतील, ज्या अनास्रव, वीतरागी, शांतचित्त आणि समाहित असतील;" โพธิ ตสฺส ภควโต อสฺสตฺโถติ ปวุจฺจตี’’ติ. "त्या भगवंतांच्या बोधिवृक्षाला 'अस्सत्थ' (पिंपळ) म्हटले जाईल." อภินีหาร กถา "अभिनीहार कथा (संकल्पाची कथा)" ๖. ตโต ทีปงฺกโร ทสพโล โพธิสตฺตํ ปสํสิตฺวา อฏฺฐหิ ปุปฺผ มุฏฺฐีหิ ปูเชตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปกฺกามิ. เตปิ จตูสต สหสฺส ขีณาสวา โพธิสตฺตํ ปุปฺเผหิ จ คณฺเธหิ จ ปูเชตฺวา ปทปฺผณํ กตฺวา ปกฺกมึสุ. เทวมนุสฺสา จ ตเถว ปูเชตฺวา วนฺทิตฺวา อถ โข โพธิสตฺโต ทสพลสฺส วฺยากรณํ สุตฺวา พุทฺธภาวํ กรตลคตมิว มญฺญมาโน ปมุทิต หทโย สพฺเพสุ ปฏิกฺกนฺเตสุ สยนา วุฏฺฐาย ปุปฺผราสิ มตฺถเก ปลฺลงฺกํ อาภุชิตฺวา นิสินฺโน พุทฺธการกธมฺเม อุปธาเรนฺโต กหนนุ โข พุทฺธการก ธมฺมา, กึ อุทฺธํ อโธ ทิสาสุ วีทียาสูติ อนุกฺกเมน สกลํ ธมฺมธาตุํ วิจินนฺโต โปราณกโพธิสตฺเตหิ อาเสวิต นิเสวิต ปฐมํ ทานปารมึ ทิสฺวา ตตฺถ ทฬภิสมาทาน กตฺวา เอวํ อนุกฺกเมน สีล - เนกฺขมฺม - ปญฺญา - วีริย - ขนฺติ - สจฺจ - อธิฏฺฐาน - เมตฺตา - อุเปกฺขา ปารมิโยจ ทิสฺวา ตตฺถทฬฺห สมาทานํ กตฺวา เทวตาหิ อภิตฺถุโต อากาสมพภุคฺคนตฺว หิม หิมวนฺตเมว อคมาสิ. ६. "त्यानंतर दीपंकर दशबलांनी बोधिसत्त्वांची प्रशंसा केली आणि आठ मुठी फुलांनी त्यांची पूजा करून, प्रदक्षिणा घालून ते निघून गेले. ते चार लाख क्षीणासव (अर्हत) देखील बोधिसत्त्वांची फुले व गंधांनी पूजा करून, प्रदक्षिणा घालून निघून गेले. देव आणि मनुष्यांनीही त्याचप्रमाणे पूजा व वंदन केले. त्यानंतर बोधिसत्त्वाने दशबलांची (बुद्धांची) भविष्यवाणी ऐकून, बुद्धत्व आपल्या हाताच्या तळव्यावर आल्यासारखे मानून, प्रसन्न मनाने, सर्व जण निघून गेल्यावर आपल्या आसनावरून उठून, फुलांच्या ढिगाऱ्यावर मांडी घालून बसले आणि बुद्ध बनवणाऱ्या धर्मांचा (बुद्धकारक धम्मांचा) विचार करू लागले: "बुद्धकारक धम्म कोठे आहेत? ते वर, खाली की दिशा-उपदिशांमध्ये आहेत?" अशा प्रकारे अनुक्रमाने संपूर्ण धम्मधातूचा शोध घेत असताना, त्यांना प्राचीन बोधिसत्त्वांनी आचरलेली पहिली 'दानपारमिता' दिसली. त्यांनी तिचा दृढ संकल्प केला. अशाच प्रकारे अनुक्रमाने शील, नैष्क्रम्य (नेक्खम्म), प्रज्ञा (पञ्ञा), वीर्य (वीरिय), क्षंती (खंती), सत्य (सच्च), अधिष्ठान (अधिट्ठान), मैत्री (मेत्ता) आणि उपेक्षा (उपेक्खा) या पारमिता पाहून त्यांचा दृढ संकल्प केला. देवतांनी स्तुती केली असता, ते आकाशात उडून हिमालयात निघून गेले." ทีปงฺกโรปิ สตฺถา จตูหิ ขีณาสว สตสหสฺเสหิ ปริวุโต รมฺมนครวาสีหิ ปูชียมาโน เทวตาหิ อภินณฺทิยมาโน อลงฺกต ปฏิยตฺเตน มคฺเคน รมฺมนครํ ปวิสิตฺวา ปญฺญตฺตวรพุทฺธาสเน นิสีทิ. ภิกฺขุสงฺโฆปิ อตฺตโน อตฺตโน ปตฺตาสเน นิสีทิ. รมฺมนครวาสิโนปิ อุปาสกา พุทฺธปมุขสฺส ภิกฺขุสงฺฆสฺส มหาทานํ ทตฺวา ภควนฺตํ ภุตฺตาวึ โอนีต ปตฺตปาณึ มาลาคณฺธาทีหิ ปูเชตฺวา ทานานุโมทนํ โสตุกามา นิสีทึสุ. ภควาปิ เตสํ อนุโมทนํ กโรนฺโต ทานกถํ สีลกถํ สคฺคิกถํ กามานํ อาทีนวํ โอการํ สํกิเลสํ เนกฺขมฺเม อานิสํสญฺจ ปกาเสตฺวา อมต ปริโยสานํ ธมฺมกถํ กเถสิ. शास्ता दीपंकर सुद्धा चार लाख क्षीणासवांनी वेढलेले, रम्म नगरवासीयांद्वारे पूजिले जाणारे आणि देवतांद्वारे अभिनंदिले जाणारे, सजविलेल्या व तयार केलेल्या मार्गाने रम्म नगरात प्रवेश करून, मांडलेल्या श्रेष्ठ बुद्ध-आसनावर विराजमान झाले. भिक्खू संघ सुद्धा आपापल्या योग्य आसनांवर बसला. रम्म नगरातील उपासकांनी सुद्धा बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला महादान देऊन, भोजन आटोपलेल्या व पात्रातून हात काढून घेतलेल्या भगवंतांची पुष्पमाला, गंध इत्यादींनी पूजा केली आणि दानाचे अनुमोदन ऐकण्याच्या इच्छेने ते बसले. भगवंतांनी सुद्धा त्यांचे अनुमोदन करताना दानकथा, शीलकथा, स्वर्गकथा, कामांचे दुष्परिणाम, हीनत्व व संक्लेश आणि नेक्खम्माचे (नैष्क्रम्याचे) फायदे प्रकट करून, अमृतामध्ये (निर्वाणात) पर्यवसान होणारी धम्मकथा सांगितली. เอวํ ตสฺส มหชนสฺส ธมฺมํ เทเสตฺวา เอกจฺเจ สรเณสุ เอกจฺเจ ปญฺจสุ สีเลสุ เอกจฺเจ โสตาปตฺติผเล เอกจฺเจ สกทาคามิ ผเล เอกจฺเจ อนาคามี ผเล เอกจฺเจ จตุสุปิ ผเลสุ เอกจฺเจ ตีสุ วิชฺชาสุ เอกจฺเจ ฉฬภิญฺญาสุ เอกจฺเจ อฏฺฐสุ สมาปตฺติสุ ปติฏฺฐาเปตฺวา อุฏฺฐายาสนา รมฺมนครโต นิกฺขมิตฺวา สุทสฺสน มหาวิหารเมว ปาวิสิ. अशा प्रकारे त्या जनसमुदायाला धम्मदेशना देऊन, काहींना शरणागमनात, काहींना पंचशीलात, काहींना सोतापत्ती फलात, काहींना सकदागामी फलात, काहींना अनागामी फलात, काहींना चारी फलात, काहींना तीन विद्यांमध्ये, काहींना सळभिञ्ञांमध्ये, तर काहींना आठ समापत्तींमध्ये प्रतिष्ठित करून, आसनावरून उठून रम्म नगरातून बाहेर पडून ते सुदस्सन महाविहारातच प्रविष्ट झाले. วุตฺตญฺเหตํ याविषयी असे म्हटले आहे - ‘‘ตทา เต โภชยิตฺวาน - สสงฺฆํ โลกนายกํ,อุผคฉุญฺญํ สรณํ ตสฺส - ทีปงฺกรสฺส สตฺถุโน,สรณาคมเน กญฺจิ - นิวเสติ ตถาคโตกญฺจิ ปญฺจสุ สีเลสุ - สีเล ทสวิเธ ปรํ; “तेव्हा संघासहित लोकनायकाला भोजन देऊन, त्यांनी त्या शास्ता दीपंकरांचे शरण ग्रहण केले. तथागत कोणाला शरणागमनात स्थापित करतात, कोणाला पंचशीलात, तर कोणाला दहा प्रकारच्या शीलात स्थापित करतात; กสฺสจิ เทติ สามญฺญํ - จตุโร ผลมุตฺตเม,กสฺสจิ อสเถ ธมฺเม - เทติ โส ปฏิสมฺภิทา; कोणाला ते श्रामण्य आणि चार उत्तम फले देतात, तर कोणाला ते निष्कपट धम्मात प्रतिसंभिदा प्रदान करतात; กสฺสจิ วรสมาปตฺติโย - อฏฺฐ เทติ นราสโภ,ติสฺโส กสฺสจิ วิชฺชาโย - ฉฬภิญฺญ ปเวจฺฉติ; कोणाला ते नरश्रेष्ठ आठ श्रेष्ठ समापत्ती देतात, तर कोणाला तीन विद्या आणि सळभिञ्ञा प्रदान करतात; เตน โยเคน ชนกายํ - โอวเทติ มหามุนิ,เตน วิตฺถาริกํ อาสี - โลกนาถสฺส สาสนํ; त्याच पद्धतीने ते महामुनी जनसमुदायाला उपदेश करतात, त्यामुळे लोकनाथांचे शासन विस्तृत झाले; มหาหนูสภกฺขณฺโธ - ทีปงฺกรสนามโก,พหู ชเน ตารยติ - ปริโมเจติ ทุคฺคตึ; दीपंकर नावाचे ते महाहनू आणि वृषभासारख्या खांद्यांचे बुद्ध अनेक लोकांना तारतात आणि दुर्गतीपासून मुक्त करतात; โพธเนยฺยํ ชนํ ทิสฺวา - สตสหสฺเสปิ โยชเนขเณน อุปคนฺตฺวาน - โพเธติ ตํ มหามุนี’’ติ; बोध प्राप्त करण्यास योग्य अशा व्यक्तीला लाख योजने दूर जरी पाहिले, तरी ते महामुनी एका क्षणात तेथे पोहोचून त्याला बोध प्राप्त करून देतात.” อิติ โส ทีปงฺกโร สตฺถา วสฺสสต สหสฺสานิ ฐตฺวา สตฺตานํ พณฺธนโมกฺขํ กุรุมาโน สพฺพพุทฺธกิจฺจานิ นิฏฺฐาเปตฺวา นณฺทาราเม อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพายินเหว ธาตุโย ตสฺส - สตฺถุโน วิกิรึสุ ตา. ฐิตา เอกฆนา หุตฺวา - สุวณฺณปฏิมา วิย สกลชมฺพุทีปวาสิโน มนุสฺสา ฆนโกฏิฏิมสุวณฺณฏฺฐิกาหิ เอวํ ฉตฺตึส โยชนิกํ มหาถูปมกํสุ นิเวทสิ - เกจิ. अशा प्रकारे ते शास्ता दीपंकर एक लाख वर्षे राहून, प्राण्यांना बंधनातून मुक्त करत, सर्व बुद्धकृत्ये पूर्ण करून नंदारामात अनुपधिशेष निर्वाणधातूने परिनिर्वाण पावले. त्या शास्त्यांचे धातू विखुरले गेले नाहीत. ते सोन्याच्या प्रतिमेप्रमाणे एकाच घनरूपात राहिले. संपूर्ण जंबुद्वीपातील लोकांनी कोट्यवधी सुवर्ण विटांनी छत्तीस योजन उंच असा महास्तूप बांधला, असे काही जण सांगतात. เตน วุตฺตํ त्यामुळेच म्हटले आहे - ‘‘ทีปงฺกโร ชิโน สตฺถา - นณฺทารามมฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว ตสฺส ชินถูโป - ฉตฺตึสุพฺเพธ โยชโน‘‘; “दीपंकर जिन शास्ता नंदारामात परिनिर्वाण पावले, तेथेच त्यांचा छत्तीस योजन उंचीचा जिनस्तूप आहे;” ‘‘ปตฺต จีวร ปริกฺขาร - ปริโภคญฺช สตฺถุโน,โพธิมูเล ตทา ถูโป - ตีณิ โยชนมุคฺคโต’’ติ; “शास्त्यांचे पात्र, चीवर आणि परिभोग परिष्कार यांवर बोधिवृक्षाच्या मुळाशी तेव्हा तीन योजन उंच स्तूप उभारण्यात आला.” ๗. ทีปงฺกรสฺส ปน ภควโต อปรภาโค เอกํ อสงฺเขยฺยํ อติกฺกมิตฺวา โกณฺฑญฺโญ นาม สตฺถา อุทปาทิ. ตทา โพธิสตฺโต วิชิตาวิ นาม จกฺกวตฺติ หุตฺวา โกฏิสตสหสฺส สงฺขสฺส พุทฺธ ปมุขสฺส ภิกฺขุสงฺฆสฺส มหาทานํ อทายิ สตฺถา โพธิสตฺตํ พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากริตฺวา ธมฺมํ เทเสสิ โส สตฺถุ ธมฺมํกถํ สุตฺวา รชฺชิ นิยฺยาเทตฺวา ปพฺพชิ โส ตีณิ ปิฏกานิ อุคฺคเหตฺวา อฏฺฐ สมาปตฺติโย ปญฺจอภิญฺญาโยจ อุปฺปาเทตฺวา อปริหีนชฺฌาโน พฺรหฺมโลเก นิพฺพตฺติ. โสปิ พุทฺโธ วสฺสสตสหสฺสานิ ฐตฺวา สพฺพพุทฺธกิจฺจานิ นิฏฺฐาเปตฺวา จณฺทาราเม ปรินิพฺพายิ ตสฺสาปิ ภควโต ธาตุยา น วิกิรึสุ สกลชมฺพุทีปวาสิโน มนุสฺสา สมาคนฺตฺวา สตฺตโยชนิกาสตฺตรตนมยํ หริตาลมโนสิลายมตฺติกากิจฺจํ เตล สปฺปีหิ อุทกกิจฺจํ กตฺวา เจติยํ นิฏฺฐาเปสุํ ७. भगवान दीपंकरांनंतर, एक असंख्येय काळ उलटून गेल्यावर कोंडण्य नावाचे शास्ता उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्व विजितावी नावाचे चक्रवर्ती राजे होते. त्यांनी एक लाख कोटी भिक्खूंच्या बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला महादान दिले. शास्त्यांनी बोधिसत्वाला 'हा बुद्ध होईल' असे भाकीत करून धम्मदेशना दिली. त्यांनी शास्त्यांची धम्मकथा ऐकून राज्य सोडून प्रवज्जा घेतली. त्यांनी तीन पिटके (त्रिपिटक) ग्रहण करून, आठ समापत्ती आणि पाच अभिज्ञा उत्पन्न केल्या आणि ध्यान न गमावता ते ब्रह्मलोकात उत्पन्न झाले. ते बुद्ध सुद्धा एक लाख वर्षे राहून, सर्व बुद्धकृत्ये पूर्ण करून चंडारामात परिनिर्वाण पावले. त्या भगवंतांचे धातू सुद्धा विखुरले गेले नाहीत. संपूर्ण जंबुद्वीपातील लोकांनी एकत्र येऊन सात योजन उंच, सप्तरत्नमय, हरिताल व मनःशिला यांच्या मातीचे काम करून, तेल व तुपाने पाण्याचे कार्य करून चैत्य पूर्ण केला. โกณฺฑญฺเญ กิร สมฺพุทฺโธ - จณฺทาราเม มโนรเม,นิพฺพายิ เจติโย ตสฺส - สตฺตโยชนิโก กโตติ; “असे म्हटले जाते की, सम्यक्संबुद्ध कोंडण्य हे रमणीय चंडारामात परिनिर्वाण पावले आणि त्यांचा सात योजन उंच चैत्य बांधण्यात आला.” ตสฺส อปรภาเค เอกํ อสํงฺขยฺยํ อติกฺกมิตฺวา เอกสฺมึเยว กปฺเป จตฺตาโร พุทฺธา อุปฺปชฺชึสุ - มงฺคโล สุมโน เรวโต โยหิโตติ. มงฺคลสฺส ปน ภควโต กาเล โพธิสตฺโต สุรุจิ นาม พฺราหฺมโณ หุตฺวา สตฺถารํ นิมนฺเตสฺสามีติ อุปสงฺกมิตฺวา มธุร ธมฺมํกตํ สุตฺวา สฺวาตนาย นิมนฺเตตฺวา โกฏิสตสหสฺส สงฺขสฺส พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส สตฺตาหํ ควปานํ นาม ทานมทาสิ สตฺถา อนุโมทนํ กโรนฺโต มหาปุริสํ อามนฺเตตฺวา ตฺวํ กปฺปสตสหสฺสาธิกานํ ทฺวนฺนํ อสงฺเขยฺยานํ มตฺถเก โคตโม นาม พุทฺโธ ภวิสฺสสีติ วฺยากาสิ มหาปุริโส วฺยากรณํ สุตฺวา อหํ กิร พุทฺโธ ภวิสฺสามิ โก เม ฆราวาเสน อตฺโถ ปพฺพชิสฺสมีติ จินฺตตฺวา ตถารูปํ สมฺปตฺตึ เกฬปิณฺฑํ วีย ปหาย สตฺถุ สนฺติเก ปพฺพชิตฺวา พุทฺธวจนํ อุคฺคณฺหิตฺวา อภิญฺญา จ สมาปตฺติโย จ นิพฺพตฺเตตฺวา อายุปริโยสาเน พฺรหฺมโลเก นิพฺพตฺติ, ตสฺมิมฺปิ พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ธาตุโย น วิกิรึสุ, ชมฺพุทีปวาสิโน ปุพฺเพ วิย ตึสโยชนกํ ถูปมกํสุ. त्यानंतर एक असंख्येय काळ उलटून गेल्यावर एकाच कल्पामध्ये चार बुद्ध उत्पन्न झाले - मंगल, सुमन, रेवत आणि शोभित. भगवान मंगलांच्या काळात बोधिसत्व सुरुची नावाचे ब्राह्मण होते. 'मी शास्त्यांना निमंत्रित करीन' असे म्हणून ते त्यांच्याकडे गेले आणि मधुर धम्मकथा ऐकून त्यांनी दुसऱ्या दिवशीच्या भोजनासाठी निमंत्रण दिले. त्यांनी एक लाख कोटी भिक्खूंच्या बुद्धप्रमुख संघाला सात दिवस 'गवपान' (दुग्धजन्य पेय) नावाचे दान दिले. शास्त्यांनी अनुमोदन करताना त्या महापुरुषाला उद्देशून म्हटले, 'तू एक लाख कल्प अधिक दोन असंख्येय काळानंतर गोतम नावाचा बुद्ध होशील.' त्या महापुरुषाने हे भाकीत ऐकून विचार केला, 'मी बुद्ध होणार आहे, तर मला गृहस्थाश्रमाचे काय प्रयोजन? मी प्रवज्जा घेईन.' त्यांनी त्या अफाट संपत्तीचा थुंकीच्या गोळ्यासारखा त्याग करून, शास्त्यांच्या सन्निध प्रवज्जा घेतली. त्यांनी बुद्धवचन ग्रहण करून, अभिज्ञा आणि समापत्ती प्राप्त केल्या आणि आयुष्य संपल्यावर ते ब्रह्मलोकात उत्पन्न झाले. त्या बुद्धांच्या परिनिर्वाणानंतरही धातू विखुरले गेले नाहीत. जंबुद्वीपातील लोकांनी पूर्वीप्रमाणेच तीस योजन उंच स्तूप बांधला. เตน วุตฺตํ ‘‘อุยฺยาเน วสโภ นาม - พุทฺโธ นิพฺพายิ มงฺคโล, ตตฺเถว ตสฺส ชินถูโป - ตึสโยชนมุคฺคิโต’’ติ. त्यामुळेच म्हटले आहे - “वसभ नावाच्या उद्यानात बुद्ध मंगल परिनिर्वाण पावले, तेथेच त्यांचा तीस योजन उंच जिनस्तूप उभारण्यात आला.” ตสฺส อปรภาเค สุมโน นาม สตฺถา อุทปาทิ ตทา มหาสตฺโต อตุโล นาม นาคราชา หุตฺวา นิพฺพตฺติ-มหิทฺธิโก มหานุภาโว โส พุทฺโธ อุปฺปนฺโนติ สุตฺวา ญาติสงฺฆปริวุโต นาคภวนา นิกฺขมิตฺวา โกฏิสตสหสฺส ภิกฺขุปริวารสฺส ตสฺส ภควโต ทิพฺพตุริเยหิ อุปหารํ กาเรตฺวา มหาทานํ ปวตฺเตตฺวา ปจฺเจกํ ทุสฺสยุคานิ ทตฺวา สรเณสุ ปติฏฺฐาสิ โสปิ นํ สตฺถา อนาคเต พุทฺโธ ภวิสฺสสีติ วฺยากาสิ ตสฺมิมฺปิ พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ธาตุโย น วิกิรึสุ ชมฺพุทีปวาสโน ปุพฺเพ วิย จตุโยชนิกํ ถูปมกํสุ. त्यानंतर सुमन नावाचे शास्ता उत्पन्न झाले. तेव्हा महासत्व अतुल नावाचे नागराज म्हणून उत्पन्न झाले होते, जे महाऋद्धीमान व महानुभाव होते. 'बुद्ध उत्पन्न झाले आहेत' असे ऐकून ते आपल्या नातेवाईकांच्या समूहासह नागभवनातून बाहेर पडले. त्यांनी एक लाख कोटी भिक्खूंचा परिवार असलेल्या त्या भगवंतांची दिव्य वाद्यांनी पूजा केली, महादान दिले, प्रत्येकाला वस्त्रजोडी दिली आणि ते शरणागत झाले. त्या शास्त्यांनी सुद्धा 'तू भविष्यात बुद्ध होशील' असे त्यांचे भाकीत केले. त्या बुद्धांच्या परिनिर्वाणानंतरही धातू विखुरले गेले नाहीत. जंबुद्वीपातील लोकांनी पूर्वीप्रमाणेच चार योजन उंच स्तूप बांधला. เตน วุตฺตํ त्यामुळेच म्हटले आहे - ‘‘สุมโน ยสธโร - พุทฺโธ อคฺคารามมฺห นิพฺพุโต,ตตฺเถว ตสฺส ชินถูโป - จตุโยชนมุคฺคโต’’ติ; “यशस्वी बुद्ध सुमन हे अग्गाराम येथे परिनिर्वाण पावले, आणि तेथेच त्यांचा चार योजन उंच असा जिनस्तूप उभारण्यात आला.” ตสฺส อปรภาเค เรวโต นาม สตฺถา อุทปาทิ ตทา โพธิสตฺโต อติเทโว นาม พฺราหฺมโณ หุตฺวา สตฺถุ ธมฺมเทสน สุตฺวา สรเณสุ ปติฏฺฐาย สิรสิ อญฺชลึ ปคฺคเหตฺวา ตสฺส สตฺถุโน กิเลสปฺปหาเน วณฺณํ วตฺวา อุตฺตราสงฺเฆน ปูชมกาสิ. โสปิ นํ สตฺถา พุทฺโธ ภวิสฺสติติ วฺยากาสิ ตสฺมึ ปน พุทฺเธ ปรินิพฺพุเต ธาตุโย วิกิรึสุ. त्यांच्या नंतरच्या काळात रेवत नावाचे शास्ता उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्व अतिदेव नावाचे ब्राह्मण झाले होते. त्यांनी शास्त्यांची धम्मदेशना ऐकून, शरणांमध्ये (त्रिशरणात) प्रतिष्ठित होऊन, डोक्यावर हात जोडून (अंजली करून) त्या शास्त्यांच्या क्लेश-प्रहाणाची (क्लेशांचा नाश करण्याची) स्तुती केली आणि आपल्या उत्तरासंगाने (वरच्या वस्त्राने) त्यांची पूजा केली. त्या शास्त्यांनीही 'हा भविष्यात बुद्ध होईल' असा त्यांच्याविषयी व्याकर (भविष्यवाणी) केला. त्या बुद्धांच्या परिनिर्वाणानंतर त्यांच्या धातू (अस्थी-अवशेष) विखुरल्या गेल्या. เตน วุตฺตํ त्यामुळेच म्हटले आहे - ‘‘เรวโต ปวโร พุทฺโธ - นิพฺพุโต โส มหาปุเร,ธาตุ วิตฺถาริกํ อาสี - เตสุ เตสุ ปเทสโต’’ติ; “श्रेष्ठ बुद्ध रेवत हे महापुरात परिनिर्वाण पावले, आणि त्यांच्या धातू वेगवेगळ्या प्रदेशांत विखुरल्या गेल्या.” ตสฺส อปรภาเค โสภิโต นาม สตฺถา อุทปาทิ ตทา โพธิสตฺโต อชิโต นาม พฺราหฺมโณ หุตฺวา สตฺถุ ธมฺมเทสนํ สุตฺวา สรเณสุ ปติฏฺฏาย พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส มหาทานํ อทาสิ. โสปิ นํ สตฺถา พุทฺโธ ภวิสฺสสีติ วฺยากาสิ ตสฺสาปิ ภควโต ธาตุโย วิกิรึสุ. त्यांच्या नंतरच्या काळात सोभित नावाचे शास्ता उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्व अजित नावाचे ब्राह्मण झाले होते. त्यांनी शास्त्यांची धम्मदेशना ऐकून, शरणांमध्ये प्रतिष्ठित होऊन, बुद्धप्रमुख संघाला महादान दिले. त्या शास्त्यांनीही 'तू भविष्यात बुद्ध होशील' असा त्यांच्याविषयी व्याकर केला. त्या भगवंतांच्याही धातू विखुरल्या गेल्या. เตน วุตฺตํ त्यामुळेच म्हटले आहे - ‘‘โสภิโต วรสมฺพุทฺโธ - สีหรามมฺหิ นิพฺพุโต,ธาตุวิตฺถาริกํ อาสี - เตสุ เตสุ ปเทสโต’’ติ; “श्रेष्ठ सम्यकसबुद्ध सोभित हे सीहाराम येथे परिनिर्वाण पावले, आणि त्यांच्या धातू वेगवेगळ्या प्रदेशांत विखुरल्या गेल्या.” ตสฺส อปรภาเค เอกมสงฺเขยฺยํ อติกฺกมิตฺวา เอกสฺมึเยว กปฺเป ตโย พุทฺธา นิพฺพตฺตึสุ - อโนมทสฺสิ ปทุโม นารโทติ. อโนมทสฺสิสฺส ภควโต กาเล โพธิสตฺโต เอโก त्यांच्या नंतर, एक असंख्येय काळ उलटून गेल्यावर, एकाच कल्पामध्ये तीन बुद्ध उत्पन्न झाले - अनोमदस्सी, पदुम आणि नारद. भगवान अनोमदस्सी यांच्या काळात बोधिसत्व एक... ๑. ยสวโร ธีโร - เกจิ. १. यशस्वी आणि धीर - असे काही म्हणतात. ยกฺข เสนาปติ อโหสิ มหิทฺธิโก มหานุภาโว อเนก โกฏิสตสหสฺสานํ ยกฺขานํ อธิปติ. โส พุทฺโธ อุปฺปนฺโนติ สุตฺวา อาคนฺตฺวา พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส มหาทานมทาสิ สตฺถาปิ ตํ อนาคเต พุทฺโธ ภวิสฺสสีติ วฺยากาสิ. อโนมทสฺสิมฺหิ ปน ภควติ ปรินิพฺพุเต ธาตุโย น วิกิรึสุ ชมฺพุทีปวาสิโน ปญฺจวีสโยชนกํ ถูปํ กรึสุ यक्ष सेनापती होते, जे महाऋद्धिवान, महान प्रभावशाली आणि अनेक अब्ज यक्षांचे अधिपती होते. 'बुद्ध उत्पन्न झाले आहेत' असे ऐकून त्यांनी येऊन बुद्धप्रमुख संघाला महादान दिले. शास्त्यांनीही 'तू भविष्यात बुद्ध होशील' असा त्यांच्याविषयी व्याकर केला. भगवान अनोमदस्सी परिनिर्वाण पावले तेव्हा त्यांच्या धातू विखुरल्या गेल्या नाहीत; जंबुद्विपवासीयांनी पंचवीस योजन उंच असा स्तूप उभारला. เตน วุตฺตํ त्यामुळेच म्हटले आहे - ‘‘อโนมทสฺสิ ชิโน สตฺถา - ธมฺมารามมฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว ตสฺส ชินถูโป - อุพฺเพธา ปณฺณุวีสตี’ติ; “विजेते शास्ता अनोमदस्सी हे धम्माराम येथे परिनिर्वाण पावले, आणि तेथेच त्यांचा पंचवीस योजन उंचीचा जिनस्तूप उभारण्यात आला.” ตสฺส อปรภาเค ปทุโม นาม สตฺถา อุทปาทิ ตถาคเต อคามการญฺเญ วิหเรนฺตา โพธิสตฺโต สีโห หุตฺวา สตฺถารํ นิโรธสมาปตฺติยา สมาปนฺนํ ทิสฺวา ปสนฺนจิตฺโต วนฺทิตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา ปีติโสมนสฺสชาโต ติกฺขตฺตุํ สีหนาทํ นทิตฺวา สตฺตาหํ พุทฺธารมฺมณํ ปีตึ อวิชหิตฺวา ปีติสุเขเนว โคจราย อปกฺกมิตฺวา ชิวิตปริจฺจาคํ กตฺวา ปยิรุปาสมาโน อฏฺฐาสิ สตฺถา สตฺตาหจฺจเยน นิโรธา วุฏฺฐิโต สีหํ โอโลเกตฺวา ภิกฺขุสงฺเฆปิ จิตฺตํ ปสาเทตฺวา สงฺฆํ วนฺทิสฺสตี‘‘ติ ภิกฺขุสงฺโฆ อาคจฺฉตูติ จินฺเตสิ ภิกฺขุ ตาวเทว อาคมึสุ สีโห สงฺเฆ จิตฺตํ ปสาเทสิ. สตฺถา ตสฺส มนํ โอโลเกตฺวา อนาคเต พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ ตสฺส ปน ภควโต ธาตุโย วิกิรึสุ. त्यांच्या नंतरच्या काळात पदुम नावाचे शास्ता उत्पन्न झाले. तथागत जेव्हा निर्जन अरण्यात विहार करत होते, तेव्हा बोधिसत्व सिंह झाले होते. शास्त्यांना निरोध-समापत्तीमध्ये लीन झालेले पाहून, प्रसन्न चित्ताने त्यांना वंदन करून आणि प्रदक्षिणा घालून, प्रीती व सोमनस्याने (आनंदाने) युक्त होऊन त्यांनी तीन वेळा सिंहनाद केला. सात दिवस बुद्धांच्या स्मरणातून मिळणारा आनंद न सोडता, त्या प्रीतीसुखामुळेच भोजनासाठीही बाहेर न पडता, प्राणांची पर्वा न करता ते त्यांची सेवा करत उभे राहिले. सात दिवसांनंतर शास्ते निरोध-समापत्तीतून बाहेर आले आणि त्यांनी सिंहाकडे पाहिले. 'हा भिक्षुसंघावरही आपले चित्त प्रसन्न करून संघाला वंदन करेल' असा विचार करून त्यांनी 'भिक्षुसंघ येथे यावा' असे चिंतन केले. भिक्षु लगेचच तेथे आले आणि सिंहाने संघावर आपले चित्त प्रसन्न केले. शास्त्यांनी त्याचे मन ओळखून 'हा भविष्यात बुद्ध होईल' असा व्याकर केला. त्या भगवंतांच्याही धातू विखुरल्या गेल्या. เตน วุตฺตํ त्यामुळेच म्हटले आहे - ‘‘ปทุโม ชินวโร สตฺถา - ธมฺมารามมฺหิ นิพฺพุโต,ธาตุ วิตฺถาริกํ อาสิ - เตสุ เตสุ ปเทสโต’’ติ; “श्रेष्ठ जिन शास्ता पदुम हे धम्माराम येथे परिनिर्वाण पावले, आणि त्यांच्या धातू वेगवेगळ्या प्रदेशांत विखुरल्या गेल्या.” ตสฺส อปรภาเค นารโท นาม สตฺถา อโหสิ ตทา โพธิสตฺโต, อิสิปพฺพชฺชํ ปพฺพชิตฺวา ปญฺจสุ อภิญฺญาสุ อฏฺฐสุจ สมาปตฺติสุจิณฺณวสี หุตฺวา พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส มหาทานํ ทตฺวา โลหิต จณฺทเนน ปูชมกาสิ โสปิ นํ อนาคโต พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ นารท ปน ภควโต ธาตุโย เอกฆนา อเหสุํ. สพฺเพ เทว มนุสฺสา สนฺนิปติตฺวา จตุโยชนิกํ ถูปํ กรึสุ. त्यांच्या नंतरच्या काळात नारद नावाचे शास्ता झाले. तेव्हा बोधिसत्व ऋषी-प्रव्रज्या घेऊन, पाच अभिज्ञा आणि आठ समापत्तींमध्ये पारंगत झाले होते. त्यांनी बुद्धप्रमुख संघाला महादान दिले आणि लाल चंदनाने त्यांची पूजा केली. त्यांनीही 'हा भविष्यात बुद्ध होईल' असा व्याकर केला. भगवान नारद यांच्या धातू मात्र एकसंध राहिल्या. सर्व देव आणि मनुष्यांनी एकत्र येऊन चार योजन उंच असा स्तूप उभारला. เตน วุตฺตํ त्यामुळेच म्हटले आहे - ‘‘นารโท ชินวสโภ - นิพฺพุโต สุทสฺสเน ปุเร,ตตฺเถว ตสฺส ถูปวโร - จตุโยชนมุคฺคโต’’ติ; “नरश्रेष्ठ जिन नारद हे सुदस्सन नगरात परिनिर्वाण पावले, आणि तेथेच त्यांचा चार योजन उंच असा श्रेष्ठ स्तूप उभारण्यात आला.” ตสฺส อปรภาเค เอกมสงฺเขยฺยมติกฺกมิตฺวา อิโต กปฺปสตสหสฺส มตฺถเก เอกสฺมึ กปฺเป ปทุมุตฺตโร นาม สตฺถา อุทปาทิ. ตทา โพธิสตฺโต ชฏิโล นาม มหารฏฺฐิโก หุตฺวา พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส จิวรทานมทาสิ. โสปิ ตํ อนาคโต พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ. ปทุมุตฺตรสฺสาปิ ภควโต ธาตุโย เอกฆนา อเหสุํ. สพฺเพ เทวมนุสฺสา สนฺนิปติตฺวา ทฺวาทส โยชนิกํ มหาถูปมกํสุ. त्यांच्या नंतर, एक असंख्येय काळ उलटून गेल्यावर, आजपासून एक लाख कल्प मागे एका कल्पामध्ये पदुमुत्तर नावाचे शास्ता उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्व जटिला नावाचे महाशासक झाले होते. त्यांनी बुद्धप्रमुख संघाला चीवरदान दिले. त्यांनीही 'हा भविष्यात बुद्ध होईल' असा व्याकर केला. भगवान पदुमुत्तर यांच्याही धातू एकसंध राहिल्या. सर्व देव आणि मनुष्यांनी एकत्र येऊन बारा योजन उंच असा महास्तूप उभारला. เตน วุตฺตํ त्यामुळेच म्हटले आहे - ‘‘ปทุมุตฺตโร ชิโน พุทฺโธ - นณฺทารามมฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว ตสฺส ถูปวโร - ทฺวาทสุพฺเพธโยชโน’’ติ; “विजेते बुद्ध पदुमुत्तर हे नंदाराम येथे परिनिर्वाण पावले, आणि तेथेच त्यांचा बारा योजन उंचीचा श्रेष्ठ स्तूप उभारण्यात आला.” ตสฺส อปรภาเค ตึสกปฺป สหสฺสานิ อติกฺกมิตฺวา สุเมโธ สุชาโต จาติ เอกสฺมึ กปฺเป ทฺเว พุทฺธา นิพฺพตฺตึสุ สุเมธสฺส ปน ภควโต กาเล โพธิสตฺโต อุตฺตโร นาม มานโว หุตฺวา นิทหิตฺวา ฐปิตํเยว อสีติโกฏิธนํ วิสฺสชฺเชตฺวา พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส มหาทานํ ทตฺวา ธมฺมํ สุตฺวา สรเณสุ ปติฏฺฐาย นิกฺขมิตฺวา ปพฺพชิ โสปิ นํ อนาคเต พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ. สุมฺเธสฺส ปน ภควโต ธาตุโย วิกิรึสุ त्यांच्या नंतर, तीस हजार कल्प उलटून गेल्यावर, एकाच कल्पामध्ये सुमेध आणि सुजात नावाचे दोन बुद्ध उत्पन्न झाले. भगवान सुमेध यांच्या काळात बोधिसत्व उत्तर नावाचे तरुण झाले होते. त्यांनी साठवून ठेवलेले ऐंशी कोटींचे धन खर्च करून बुद्धप्रमुख संघाला महादान दिले, धम्म ऐकून शरणांमध्ये प्रतिष्ठित झाले आणि गृहत्याग करून प्रव्रज्या घेतली. त्यांनीही 'हा भविष्यात बुद्ध होईल' असा व्याकर केला. भगवान सुमेध यांच्या धातू मात्र विखुरल्या गेल्या. เตน วุตฺตํ त्यामुळेच म्हटले आहे - ‘‘สุเมโธ ชินวโร พุทฺโธ - เมธารามมฺหิ นิพฺพุโต,ธาตุวิตฺถาริกํ อาสิ - เตสุ เตสุ ปเทสโต’’ติ; “श्रेष्ठ जिन बुद्ध सुमेध हे मेधाराम येथे परिनिर्वाण पावले, आणि त्यांच्या धातू वेगवेगळ्या प्रदेशांत विखुरल्या गेल्या.” ตสฺส อปรภาเค สุชาโต นาม สตฺถา อุทปาทิ. ตทา โพธิสตฺโตจกฺกวตฺติราชา หุตฺวา พุทฺโธ อุปฺปนฺโนติ สุตฺวา อุปสํกมิตฺวา ธมฺมํ สุตฺวา พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส สทฺธึ สตฺตหิ รตเนหิ จตุมหาทีปํ รชฺชํ ทตฺวา สตฺถุ สนฺติเก ปพฺพชิ สกลรฏฺฐวาสิโน รฏฺฐุปฺปาทํ คเหตฺวา อารามิก กิจฺจํ สาเธนฺตา พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส นิจฺจํ มหาทานมทํสุ. โสปิ นํ สตฺถา อนาคเต พุทฺโธภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ สุชาตสฺส ปน ภควโต ธาตุโย เอกฆนา อเหสุํ ชมฺพุทีปวาสิโน ติคาวุตํ ถูปมกํสุ त्यांच्या नंतरच्या काळात सुजात नावाचे शास्ता उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्व चक्रवर्ती राजा झाले होते. 'बुद्ध उत्पन्न झाले आहेत' असे ऐकून त्यांनी त्यांच्याकडे जाऊन धम्म ऐकला आणि बुद्धप्रमुख संघाला सात रत्नांसह चारही महाद्वीपांचे राज्य दान करून शास्त्यांच्या सानिध्यात प्रव्रज्या घेतली. सर्व राष्ट्रवासीयांनी राष्ट्राचा कारभार सांभाळत आणि आरामाची कामे करत बुद्धप्रमुख संघाला नित्य महादान दिले. त्या शास्त्यांनीही 'हा भविष्यात बुद्ध होईल' असा व्याकर केला. भगवान सुजात यांच्या धातू मात्र एकसंध राहिल्या. जंबुद्विपवासीयांनी तीन गाऊत उंच असा स्तूप उभारला. เตน วุตฺตํ त्यामुळेच म्हटले आहे - ‘‘สุชาโต ชินวโร พุทฺโธ สีลารามมฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว เจติโย ตสฺส - ตีณิ คาวุตมุคฺคโต’’ติ; “श्रेष्ठ जिन बुद्ध सुजात हे सीलाराम येथे परिनिर्वाण पावले, आणि तेथेच त्यांचा तीन गाऊत उंच असा चैत्य उभारण्यात आला.” ตสฺส อปรภาเค อฏฺฐารส กปฺปสตมตฺถเก เอกสฺมึ กปฺเป ปิยทสฺสิ อตฺถทสฺสิ ธมฺมทสฺสิติ ตโย พุทฺธา นิพฺพตฺตึสุ ปิยทสฺสิ พุทฺธกาเล โพธิสตฺโต กสฺสโป นาม มาณโว ติณฺณํ เวทานํ ปารคโต หุตฺวา สตฺถุ ธมฺมเทสนํ สุตฺวา โกฏิสตสหสฺส ธน ปริจฺจาเคน สงฺฆารามํ กาเรตฺวา สรเณสุ จ สีเลสุ จ ปติฏฺฐาสิ อถ นํ สตฺถา อฏฺฐารส กปฺป สตจฺจเยน พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ ปิยทสฺสิสฺส ภควโตปิ ธาตุโย เอกฆนาว อเหสุํ ชมฺพุทีปวาสิโน สนฺนิปติตฺวา ติโยชนิกํ มหาถูปมกํสุ. त्यानंतरच्या काळात, एकशे अठरा कल्प मागे एकाच कल्पात पियदस्सी, अत्थदस्सी आणि धम्मदस्सी नावाचे तीन बुद्ध उत्पन्न झाले. पियदस्सी बुद्धांच्या काळात बोधिसत्त्व 'कस्सप' नावाचे माणव (तरुण ब्राह्मण) होते. ते तीन वेदांमध्ये पारंगत होते. शास्त्यांची धम्मदेशना ऐकून त्यांनी एक लाख कोटी धन दान करून संघाराम बांधला आणि शरण व शीलांमध्ये प्रतिष्ठित झाले. तेव्हा शास्त्यांनी त्यांना भविष्य वर्तवले की, "एकशे अठरा कल्प उलटून गेल्यावर हे बुद्ध होतील." भगवान पियदस्सींचे धातू देखील एकसंध राहिले. जम्बुद्वीपवासीयांनी एकत्र येऊन तीन योजन उंचीचा महास्तूप बांधला. เตน วุตฺตํ म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘ปิยทสฺสิ มุนิวโร - สลลารามมฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว ตสฺส ชินถูโป - ตีณิ โยชนมุคฺคโต’’ติ; "मुनिश्रेष्ठ पियदस्सी सळल आरामात परिनिर्वाण पावले, तिथेच त्या जिनांचा स्तूप तीन योजन उंच उभारला गेला." ตสฺส อปรภาเค อตฺถทสฺสิ นาม ภควา อุทปาทิ ตทา โพธิสตฺโต มหิทฺธิโก มหานุภาโว สุสิโม นาม ตาปโส หุตฺวา ภควโต สนฺติเก ธมฺมํ สุตฺวา ปสีทิตฺวา ทิพฺพานิ มณฺทารว ปทุมปาริจฺฉตฺตกาทีนิ ปุปฺผานิ อาหริตฺวา จาตุทฺวีปิก มหาเมโฆ วิย ปุปฺผวสฺสํ วสฺเสตฺวา สมนฺตโต ปุปฺผมณฺฑป ปุปฺผอคฆิย โตรณาทีนิ กตฺวา มณฺทารว ปุปฺผจฺฉตฺเตน ทสพลํ ปูเชสิ โสปิ นํ ภควา อนาคโต โคตโม นาม พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วากาสิ. ตสฺส ปน ภควโต ธาตุโย วิกิรึสุ. त्यानंतरच्या काळात 'अत्थदस्सी' नावाचे भगवान उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्त्व हे महाऋद्धीवान आणि महानुभाव 'सुसीम' नावाचे तापस होते. भगवंतांच्या सन्निध धम्म ऐकून व प्रसन्न होऊन त्यांनी दिव्य मंदारव, पद्म आणि पारिजातक इत्यादी फुले आणून, चारही द्वीपांवर बरसणाऱ्या महामेघाप्रमाणे फुलांचा वर्षाव केला. सभोवताली पुष्पमंडप, पुष्पमाला आणि तोरणे इत्यादी तयार करून मंदारव फुलांच्या छत्राने दशबलांची पूजा केली. त्या भगवंतांनीही त्यांना भविष्य वर्तवले की, "हे भविष्यात गोतम नावाचे बुद्ध होतील." त्या भगवंतांचे धातू मात्र विखुरले गेले. เตน วุตฺตํ म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘อตฺถทสฺสิ ชินวโร - อโนมารามมฺหิ นิพฺพุโต,ธาตุวิตฺถาริกํ อาสิ - เตสุ เตสุ จ รฏฺฐโต’’ติ; "जिनश्रेष्ठ अत्थदस्सी अनोम आरामात परिनिर्वाण पावले, त्यांच्या धातूंचे त्या त्या विविध राज्यांमध्ये वितरण झाले." ตสฺส อปรภาเค ธมฺมทสฺสิ นาม สตฺถา อุทปาทิ. ตทา โพธิสตฺโต สกฺกา เทวราชา ทิพฺพคณฺธปุปฺเผหิ จ ทิพฺพตุริเยหิ จ ปูชํ อกาสิ โสปิ นํ พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ. ธมฺมทสฺสิสฺส ปน ภควโต ธาตุโย เอกฆนา อเหสุํ. ชมฺพุทีปวาสิโน ติโยชนิกํ ถูปมกํสุ. त्यानंतरच्या काळात 'धम्मदस्सी' नावाचे शास्ता उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्त्व हे देवराज शक्र होते. त्यांनी दिव्य गंधपुष्पांनी आणि दिव्य वाद्यांनी भगवंतांची पूजा केली. त्या बुद्धांनीही त्यांना भविष्य वर्तवले की, "हे बुद्ध होतील." भगवान धम्मदस्सींचे धातू मात्र एकसंध राहिले. जम्बुद्वीपवासीयांनी तीन योजन उंचीचा स्तूप बांधला. เตน วุตฺตํ म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘ธมฺมทสฺสิ มหาวีโร-เกลาสารมมฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว ถูปวโร ตสฺส-ตีณิ โยชนมุคฺคโต’’ติ; "महावीर धम्मदस्सी केलास आरामात परिनिर्वाण पावले, तिथेच त्यांचा श्रेष्ठ स्तूप तीन योजन उंच उभारला गेला." ตสฺส อปรภาเค จตุนวุติกปฺป มตฺถเก เอกสฺมึ กปฺเป เอโกว สิทฺธตฺโถ นาม สตฺถา อุทปาทิ. ตทา โพธิสตฺโต อุคฺคเตโช อภิญฺญาพล สมฺปนฺโน มงฺคโล นาม ตาปโส หุตฺวา มหาชมฺพุผลํ อาหริตฺวา ตถาคสฺส อทาสิ สตฺถา ตํ ผลํ ปริภุญฺชิตฺวา จตุนวุติ กปฺปมตฺถเก พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ ตสฺสาปิ ภควโต ธาตุโย น วิกิรึสุ, จตุโยชนิกํ รตนมยํ ถูปมกํสุ. त्यानंतरच्या काळात, चौऱ्याण्णव कल्प मागे एकाच कल्पात 'सिद्धत्थ' नावाचे एकमेव शास्ता उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्त्व हे उग्रतेजस्वी आणि अभिज्ञाबलाने संपन्न 'मंगल' नावाचे तापस होते. त्यांनी एक मोठे जांभळाचे फळ आणून तथागतांना दिले. शास्त्यांनी त्या फळाचे सेवन करून भविष्य वर्तवले की, "हे चौऱ्याण्णव कल्प उलटून गेल्यावर बुद्ध होतील." त्या भगवंतांचे धातू देखील विखुरले गेले नाहीत, लोकांनी चार योजन उंचीचा रत्नमय स्तूप बांधला. เตน วุตฺตํ म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘สิทฺธตฺโต มุนิวโร พุทฺโธ อโนมารมมฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว ตสฺส ถูปวโร-จตุโยชนมุคฺคโต’’ติ; "मुनिश्रेष्ठ बुद्ध सिद्धत्थ अनोम आरामात परिनिर्वाण पावले, तिथेच त्यांचा श्रेष्ठ स्तूप चार योजन उंच उभारला गेला." ตสฺส อปรภาเค อิโต ทฺวานวุติ กปฺปมตฺถเก ติสฺโส ผุสฺโสติ เอกสฺมึ กปฺเป เทว พุทฺธา นิพฺพตฺตึสุ ติสฺสสฺส ภควโต กาเล โพธิสตฺตา มหาโภโค มหายโส สุชาโต นาม ขตฺติโย หุตฺวา อิสิปพฺพชฺชํ ปพฺพชิตฺวา มหิทฺธิกภาวํ ปตฺวา พุทฺโธ อุปฺปนฺโนติ สุตฺวา ทิพฺพมณฺทารว ปทุม ปาริจฺฉตฺต ปุปฺผานิ อาทาย จตุปริสมชฺเฌ คจฺฉนฺตํ ตถาคตํ ปูเชสิ. อากาเส ปุปฺผวิตานมิว อฏฺฐาสิ โสปิ นํ สตฺถา อิโต ทฺวานวุติ กปฺปมตฺถเก พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ. ตสฺสาปิ ภควโต ธาตุโย น วิกิรึสุ ธาตุโย คเหตฺวา ติโยชนิกํ ถูปมกํสุ. त्यानंतरच्या काळात, येथून ब्याण्णव कल्प मागे एका कल्पात 'तिस्स' आणि 'फुस्स' नावाचे दोन बुद्ध उत्पन्न झाले. भगवान तिस्सांच्या काळात बोधिसत्त्व हे महाभोगी आणि महायशस्वी 'सुजात' नावाचे क्षत्रिय होते. त्यांनी ऋषी-प्रव्रज्या ग्रहण केली आणि महाऋद्धी प्राप्त केली. "बुद्ध उत्पन्न झाले आहेत" असे ऐकून त्यांनी दिव्य मंदारव, पद्म आणि पारिजातक फुले घेऊन, चारही परिषदांच्या मध्य भागातून जाणाऱ्या तथागतांची पूजा केली. ती फुले आकाशात फुलांच्या चांदव्यासारखी राहिली. त्या शास्त्यांनीही त्यांना भविष्य वर्तवले की, "हे येथून ब्याण्णव कल्प उलटून गेल्यावर बुद्ध होतील." त्या भगवंतांचे धातू देखील विखुरले गेले नाहीत. लोकांनी धातू घेऊन तीन योजन उंचीचा स्तूप बांधला. เตน วุตฺตํ म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘ติสฺโส ชินวโร พุทฺโธ-นณฺทารามมฺหิ นิพฺพุโตตตฺเถว ตสฺส ถูปวโร-ตีณิ โยชนมุสฺสิโต’’ติ; "जिनश्रेष्ठ बुद्ध तिस्स नंद आरामात परिनिर्वाण पावले, तिथेच त्यांचा श्रेष्ठ स्तूप तीन योजन उंच उभारला गेला." ตสฺส อปรภาเค ผุสฺโส นาม พุทฺโธ อุทปาทิ ตทา โพธิสตฺโต วิชิตาวิ นาม ขตฺติโย หุตฺวา มหารชฺชํ ปหาย สตฺถุ สนฺติเก ปพฺพชิตฺวา ตีณิ ปิฏกานิ อุคฺคเหตฺวา มหาชนสฺส ธมฺมกถํ กเถตฺวา สีลปารมิญฺจ ปูเรสิ. โสปิ นํ พุทฺโธ ตเถว วฺยากาสิ ตสฺส ปน ภควโต ธาตุโย วิกิรึสุ. त्यानंतरच्या काळात 'फुस्स' नावाचे बुद्ध उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्त्व हे 'विजितावी' नावाचे क्षत्रिय होते. त्यांनी आपले मोठे राज्य सोडून शास्त्यांच्या सन्निध प्रव्रज्या घेतली, तीन पिटकांचे अध्ययन केले, महाजनांना धम्मकथा सांगितली आणि शीलपारमिता पूर्ण केली. त्या बुद्धांनीही त्यांना तसेच भविष्य वर्तवले. त्या भगवंतांचे धातू मात्र विखुरले गेले. เตน วุตฺตํ म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘ผุสฺโส ชินวโร สตฺถา-สุนนฺทารามมฺหิ นิพฺพุโตธาตุวิตฺถาริกํ อาสิ-เตสุ เตสุ ปเทสโต’’ติ; "जिनश्रेष्ठ शास्ता फुस्स सुनंद आरामात परिनिर्वाण पावले, त्यांच्या धातूंचे त्या त्या विविध प्रदेशांमध्ये वितरण झाले." ตสฺส อปรภาเค อิโต เอกนวุติ กปฺปมตฺถเก วิปสฺสิ นาม พุทฺโธ อุทปาทิ ตทา โพธิสตฺโต มหิทฺธิโก มหานุภาโว อตุโล นาม นาคราชา หุตฺวา สตฺตรตน ขจิตํ โสวณฺณมหาปีฐํ ภควโต อทาสิ โสปิ นํ อิโต เอกนวุติกปฺปมตฺถเก พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ ตสฺส ปน ภควโต ธาตุโย น วิกิรึสุ สพฺเพ เทวมนุสฺสา สนฺติปติตฺวา ธาตุโย คเหตฺวา สตฺตโยชนิกํ ถูปมกํสุ. त्यानंतरच्या काळात, येथून ९१ कल्प मागे 'विपस्सी' नावाचे बुद्ध उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्त्व हे महाऋद्धीवान आणि महानुभाव 'अतुल' नावाचे नागराज होते. त्यांनी सप्तरत्नखचित सुवर्ण महापीठ भगवंतांना दिले. त्यांनीही त्यांना भविष्य वर्तवले की, "हे येथून ९१ कल्प उलटून गेल्यावर बुद्ध होतील." त्या भगवंतांचे धातू मात्र विखुरले गेले नाहीत. सर्व देव आणि मनुष्यांनी एकत्र येऊन धातू घेऊन सात योजन उंचीचा स्तूप बांधला. เตน วุตฺตํ म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘วิปสฺสิ ชินวโร วีโร-สุมิตฺตารามมฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว โส ถูปวโร-สตฺตโยชนิโก กโต’’ติ; "वीर जिनश्रेष्ठ विपस्सी सुमित्त आरामात परिनिर्वाण पावले, तिथेच तो श्रेष्ठ स्तूप सात योजन उंचीचा बांधला गेला." ตสฺส อปรภาเค อิโต เอกตึส กปฺปมตฺถเก สิขี เวสฺสภูติ ทฺเว พุทฺธา นิพฺพตฺตึสุ สิขิสฺส ภควโต กาเล โพธิสตฺโต อริณฺทโม นาม ราชา หุตฺวา พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส สจิวรํ มหาทานํ ปวตฺเตตฺวา สตฺตรตน ปติมณฺฑิตํ หตฺถิรตนํ ทตฺวา หตฺถิปฺปมาณํ กตฺวา กปฺปิย ภณฺฑมทาสิ โสปิ นํ อิโต เอกตึส กปฺเป พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ, สิขิสฺส ภควโต ธาตุโย เอกฆนา หุตฺวา อฏฺฐํสุ, สกล ชมฺพุทีปวาสิโน ปน มนุสฺสา ธาตุโย คเหตฺวา ติโยชนุพฺเพธํ สตฺตรตนมยํ หิมคิริ สทิส โสภํ ถูปมกํสุ. त्यानंतरच्या काळात, येथून एकतीस कल्प मागे 'शिखी' आणि 'वेस्सभू' नावाचे दोन बुद्ध उत्पन्न झाले. भगवान शिखींच्या काळात बोधिसत्त्व हे 'अरिंदम' नावाचे राजे होते. त्यांनी बुद्धप्रमुख संघाला चीवरांसहित महादान दिले, सप्तरत्नांनी सुशोभित हत्तीरत्न दान केले आणि हत्तीच्या प्रमाणावर कल्पिय वस्तू दान केल्या. त्यांनीही त्यांना भविष्य वर्तवले की, "हे येथून एकतीस कल्प उलटून गेल्यावर बुद्ध होतील." भगवान शिखींचे धातू एकसंध राहिले. संपूर्ण जम्बुद्वीपवासी मनुष्यांनी धातू घेऊन तीन योजन उंचीचा, सप्तरत्नमय आणि हिमगिरीसारखा शोभणारा स्तूप बांधला. สิขี มุนิวโร พุทฺโธ-ทุสฺสารามมฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว ตสฺส ถูปวโร-ตีณิ โยชนมุคฺคโต’’ติ; "मुनिश्रेष्ठ बुद्ध शिखी दुस्स आरामात परिनिर्वाण पावले, तिथेच त्यांचा श्रेष्ठ स्तूप तीन योजन उंच उभारला गेला." ตสฺส อปรภาเค เวสฺสภู นาม สตฺถา อุทปาทิ. ตทา โพธิสตฺโต สุทสฺสโน นาม ราชา หุตฺวา พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส สจีวรมหาทานํ ทตฺวา ตสฺส สนฺติเก ปพฺพชิตฺวา อาจารคุณสมฺปนฺโน พุทฺธรตเน จิตตีการ ปีติ พหุโล อโหสิ เสปิ นํ สตฺถา อิโต เอกตึสกปฺเป พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ วฺยากาสิ เวสฺสภุสฺส ปน ภควโต ธาตุโย วิกิรึสุ. त्यानंतरच्या काळात 'वेस्सभू' नावाचे शास्ता उत्पन्न झाले. तेव्हा बोधिसत्त्व हे 'सुदस्सन' नावाचे राजे होते. त्यांनी बुद्धप्रमुख संघाला चीवरांसहित महादान दिले आणि त्यांच्या सन्निध प्रव्रज्या घेतली. ते आचार व गुणांनी संपन्न झाले आणि बुद्धरत्नाविषयी अत्यंत आदरयुक्त प्रीतीने युक्त झाले. त्या शास्त्यांनीही त्यांना भविष्य वर्तवले की, "हे येथून एकतीस कल्प उलटून गेल्यावर बुद्ध होतील." भगवान वेस्सभूंचे धातू मात्र विखुरले गेले. เตน วุตฺตํ म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘เวสฺสภู ชินวโร สตฺถา-เขมารามมฺหิ นิพฺพุโต; ธาตุวิตฺถาริกํ อาสิ-เตสุ เตสุ ปเทสโต’’ติ; “जिनांमध्ये श्रेष्ठ शास्ते वेस्सभू हे खेमाराम येथे परिनिर्वाण पावले; आणि त्यांच्या शरीराचे धातू (अस्थी-अवशेष) त्या त्या प्रदेशांमध्ये विस्तृतपणे पसरले गेले.” ตสฺส อปรภาเค อิมสฺมึ กปฺเป จตฺตาโร พุทฺธา นิพฺพตฺตึสุ กกุสณฺโธ โกนาคมโน กสฺสโป อมฺหากํ ภควาติ กตุสณฺธสฺส ปน ภควโต กาโล โพธิสตฺโต เขโม นาม ราชา หุตฺวา พุทฺธปมุขสฺส สงฺฆสฺส สปตฺตจีวรํ ทานญฺเจว อญฺชนาทิ เภสชฺชานิ จ ทตฺวา สตฺถุ ธมฺมเทสนํ สุตฺวา ปพฺพชิ โสปิ นํ สตฺถา วฺยากาสิ ตสฺส ปน ภควโต ธาตุโย น วิกิรึสุ สพฺเพ สนฺนิปติตฺวา ธาตุโย คเหตฺวา คาวุตุพฺเพธํ ถูปมกํสุ. त्याच्या नंतरच्या काळात या कल्पामध्ये चार बुद्ध उत्पन्न झाले - ककुसंध, कोणागमन, कस्सप आणि आपले भगवान (बुद्ध). ककुसंध भगवंतांच्या काळात बोधिसत्व हे 'खेम' नावाचे राजे होते. त्यांनी बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला पात्र व चीवरांचे दान दिले आणि अंजन इत्यादी औषधे देऊन शास्त्यांची धम्मदेशना ऐकली व प्रव्रज्या घेतली. त्या शास्त्यांनीही त्यांच्याविषयी (भविष्यात बुद्ध होण्याचे) भाकीत केले. त्या भगवंतांचे धातू (अस्थी-अवशेष) विखुरले गेले नाहीत; सर्वांनी एकत्र येऊन ते धातू घेतले आणि एक गाऊत उंचीचा स्तूप बांधला. เตน วุตฺตํ म्हणून असे म्हटले आहे - ‘‘กกุสณฺโธ ชินวโร - เขมารามมฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว ตสฺส ถูปวโร-คาวุตํ นภมุคฺคโต’’ติ; “जिनांमध्ये श्रेष्ठ ककुसंध हे खेमाराम येथे परिनिर्वाण पावले, आणि तेथेच त्यांचा श्रेष्ठ स्तूप आकाशात एक गाऊत उंचीपर्यंत उभारला गेला.” ตสฺส อปรภาเค โกนาคมโน นาม สตฺถา อุทปาทิ ตทา โพธิสตฺโต ปพฺพโต นาม รชา หุตฺวา อมจฺจคณ ปริวุโต สตฺถุ สนฺติเก คนฺตฺวา ธมฺมเทสนํ สุตฺวา พุทฺธปมุขํ ภิกฺขุสงฺฆํ นิมนฺเตตฺวา มหาทานํ ปวตฺเตตฺวา ปตฺตุณฺณจีนปฏฺฏ โกเสยฺย กมฺพล ทุกุลานิ เจว สุวณฺณปฏฺฏกญฺจ ทตฺวา สตฺถุ สนฺติเก ปพฺพชิ. โสปิ นํ สตฺถา วฺยากาสิ ตสฺส ภควโต ธาตุโย วิกิรึสุ त्याच्या नंतरच्या काळात कोणागमन नावाचे शास्ते उत्पन्न झाले. त्यावेळी बोधिसत्व हे 'पब्बत' नावाचे राजे होते. ते आपल्या अमात्यगणासह शास्त्यांच्या जवळ गेले आणि धम्मदेशना ऐकून त्यांनी बुद्धप्रमुख भिक्खू संघाला निमंत्रित करून महादान दिले. त्यांनी पट्टुर्ण, चीनपट्ट, कौशेय (रेशमी वस्त्र), घोंगडी (कंबल), दुकूल (सूक्ष्म वस्त्र) आणि सुवर्णपट्ट देऊन शास्त्यांच्या सन्निध प्रव्रज्या घेतली. त्या शास्त्यांनीही त्यांच्याविषयी (भविष्यात बुद्ध होण्याचे) भाकीत केले. त्या भगवंतांचे धातू विखुरले गेले. เตน วุตฺตํ म्हणून असे म्हटले आहे - ‘‘โกนาคมโน สมฺพุทฺโธ ปพฺพตารามมฺหิ นิพฺพุโต,ธาตุ วิตฺถาริกํ อาสิ-เตสุ เตสุ ปเทสโต’’ติ; “सम्यक्संबुद्ध कोणागमन हे पब्बत आरामात परिनिर्वाण पावले, आणि त्यांच्या शरीराचे धातू त्या त्या प्रदेशांमध्ये विस्तृतपणे पसरले गेले.” ตสฺส อปรภาเค กสฺสโป นาม สตฺถา อุทปาทิ. ตทา โพธิสตฺโต โชติปาโล นาม มาณโว หุตฺวา ติณฺณํ เวทานํ ปารคุภูมิยญฺเจว อนฺตลิกฺเขว ปากโฏ ฆฏีการสฺส กุมฺภการสฺส มิตฺโต อโหสิ. โส เตน สทฺธึ สตฺถารํ อุปสงฺกมิตฺวา ธมฺม त्याच्या नंतरच्या काळात कस्सप नावाचे शास्ते उत्पन्न झाले. त्यावेळी बोधिसत्व हे 'जोतिपाल' नावाचे माणवक (तरुण ब्राह्मण) होते. ते तीन वेदांमध्ये पारंगत असून पृथ्वीवर तसेच अंतरिक्षातही प्रसिद्ध होते आणि घटीकार कुंभाराचे मित्र होते. ते त्यांच्यासोबत शास्त्यांच्या जवळ गेले आणि धम्म... กถํ สุตฺวา ปพฺพชิตฺวา อารทฺธวีริโย ตีณิ ปิฏกานิ อุคฺคเหตฺวา วตฺตา วตฺตสมฺปตฺติยา พุทฺธสาสนํ โสเภสิ. โสปิ นํ สตฺถา วฺยากาสิ. กสฺสปสฺส ปน สตฺถุโน ธาตุโย น วิกิรึสุ สกล ชมฺพุทีปวาสิโน มนุสฺสา สนฺนิปติตฺวา เอเกกํ สุวณฺณฏฺฐิกํ โกฏิ อคฺฆนกํ รตนวิจิตฺตํ พหิ รจนตฺถํ เอเกกํ อฑฺฒโกฏิ อคฺฆนกํ อพฺภนฺตร ปูรณตฺถํ มโนสิลาย มตฺติกากิจฺจํ เตเลน อุทกกิจฺจํ กโรนฺตา โยชนุพฺเพธํ ถุปมกํสุ. प्रवचन ऐकून त्यांनी प्रव्रज्या घेतली आणि दृढ निश्चय करून तीन पिटकांचे अध्ययन केले व आपल्या आचार-कर्तव्यांच्या परिपूर्णतेने बुद्धशासनाला सुशोभित केले. त्या शास्त्यांनीही त्यांच्याविषयी (भविष्यात बुद्ध होण्याचे) भाकीत केले. कस्सप शास्त्यांचे धातू मात्र विखुरले गेले नाहीत. संपूर्ण जंबुद्विपातील लोकांनी एकत्र येऊन, बाहेरील रचनेसाठी प्रत्येकी एक कोटी मूल्याची रत्नांनी जडवलेली सोन्याची वीट आणि आतील भाग भरण्यासाठी प्रत्येकी अर्धा कोटी मूल्याची वीट वापरून, मनोशिलेचा माती म्हणून आणि पाण्याचा वापर करण्याऐवजी तेलाचा वापर करून एक योजन उंचीचा स्तूप बांधला. เตน วุตฺตํ म्हणून असे म्हटले आहे - ‘‘มหากสฺสโป ชิโน สตฺถา-เสตวฺยายญฺหิ นิพฺพุโต,ตตฺเถว ตสฺส ชินถุโป-โยชนุพฺเพธมุคฺคโต’’ติ; “जिनांमध्ये श्रेष्ठ शास्ते महाकस्सप हे सेतव्या नगरीत परिनिर्वाण पावले, आणि तेथेच त्या जिनांचा स्तूप आकाशात एक योजन उंचीपर्यंत उभारला गेला.” เอตฺถ จ आणि येथे - ทีปงฺกโร จ โกณฺฑญฺโญ-มงฺคโล สุมโน ตถา,อโนมทสฺสี พุทฺโธ จ-นารโท ปทุมุตฺตโร; “दीपंकर, कोंडञ्ञ, मंगल, तसेच सुमन, अनोमदस्सी बुद्ध, नारद आणि पदुमुत्तर;” สุชาโต ปิยทสฺสี จ-ธมฺมทสฺสิ นรุตฺตโม,สิทฺธตฺถพุทฺโธ ติสฺโส จ-วิปสฺสิ จ สิขี ตถา; “सुजात, पियदस्सी, नरोत्तम धम्मदस्सी, सिद्धत्थ बुद्ध, तिस्स, विपस्सी आणि तसेच शिखी;” กกุสณฺโธ กสฺสโป จาติ-โสฬเสเต มเหสโย,ถุปปฺปมาณเมเตสํ ปาลิยํเยว ทสฺสิตํ; “ककुसंध आणि कस्सप - या सोळा महर्षींच्या (बुद्धांच्या) स्तूपांचे प्रमाण पालि ग्रंथातच दर्शवले आहे.” ยสฺมา ตสฺมา มยา สาธู-เต สพฺเพปิ ปกาสิตา,ถูปา สทฺธา ชนา สาธู-เต วนฺเทยฺยถ สาทรํ; “म्हणून माझ्याद्वारे हे सर्व स्तूप चांगल्या प्रकारे प्रकाशित केले गेले आहेत. हे श्रद्धावान सज्जन लोकांनो, तुम्ही त्यांना आदराने वंदन करा.” เยสานํ ปน อฏฺฐนฺนํ - สุคตานํ หิเตสินํธาตุ วิตฺถาริกา อาสุํ - เตสุ เตสุ ปเทสโตติ; “ज्या आठ हितैषी सुगतांचे (बुद्धांचे) धातू त्या त्या प्रदेशांमध्ये विस्तृतपणे पसरले गेले.” สาธุชน มโนปสาทนตฺถาย กเต ถูปวํเส วิชฺชมานถูปานํ พุทฺธานํ ถูปกถา เจว สพฺเพสํ สนฺติเก อภินิหารกตาเจ. สมตฺตา. सज्जनांच्या मनाला प्रसन्न करण्यासाठी रचलेल्या 'थूपवंस' (स्तूपवंश) मधील विद्यमान स्तूपांच्या बुद्धांची स्तूपकथा आणि सर्वांच्या सन्निध केलेल्या संकल्पाची (अभिनिहार) कथा समाप्त झाली. กสฺสปสฺส ปน ภควโต อปรภาเค ฐเปตฺวา อิมํ สมฺมา สมฺพุทฺธํ อญฺโญ พุทฺโธ นาม นตฺถิ. เอวํ ทีปงฺกราทีนํ จตุวีสติยา พุทฺธานํ สนฺติเก ลทฺธวฺยากรโณ โพธิสตฺโต ปารมิโย ปูเรตฺวา เวสฺสนฺตรตฺตภาเว ฐิโต- कस्सप भगवंतांच्या नंतरच्या काळात या सम्यक्संबुद्धांना (गौतम बुद्धांना) सोडून दुसरा कोणताही बुद्ध झाला नाही. अशा प्रकारे दीपंकर इत्यादी चोवीस बुद्धांच्या सन्निध भविष्यात बुद्ध होण्याचे भाकीत मिळवलेले बोधिसत्व आपल्या पारमिता पूर्ण करून वेस्सन्तर जन्मात असताना - ‘‘อเจตนายํ ปถวี-อวิญฺญาย สุขํ ทุขํ,สาปิ ทานพโล มยฺหํ-สตฺตกฺกตฺตุํ ปกมฺปถา’’ติ; ““ही अचेतन पृथ्वी, जिला सुख आणि दुःखाची जाणीव नाही, ती देखील माझ्या दानाच्या बलाने सात वेळा कंपित झाली.”” เอวํ มหาปถวิ กมฺปนานิ ปุญฺญานิ กตฺวา อายุปริโยสาเน ตโต จุโต ตุสิตภวเน นิพฺพตฺติ ตตฺถ อญฺเญ เทเว ทสหิ ฐาเนหิ อธิคณฺหิตฺวา ยาวตายุกํ ทิพฺพสมฺปตฺตึ อนุภวนฺโต มนุสฺสคณนาย สตฺตหิ ทิวเสหิ อายุกฺขยํ ปาปุณิสฺสติติ วตฺถานิ กิฬิสฺสนฺติ, มาลา มิลายนฺติ, กจฺเฉหิ เสทา มุจฺจนฺติ, กาเยเจว ทุพฺพณฺณิยํ โอกฺกมติ. เทโว เทวาสเน นาภิรมตีติ อิเมสุ ปญฺจสุ ปุพฺพนิมิตฺเตสุ อุปฺปนฺเนสุ ตานิ ทิสฺวาสุญฺญาวต โน สคฺคา ภวิสฺสนฺติติ สํเวคชาตาหิ เทวตาหิ มหาสตฺตสฺส ปารมินํ ปูริตภาวํ ญตฺวา อิมสฺมึ อิทานิ อญฺญํ เทวโลกํ อนุปคนฺตฺวา มนุสฺสโลเก อุปฺปชฺชิตฺวา พุทฺธภาวํ ปตฺเต ปุญฺญานิ กตฺวา จุต จุตา เทวโลกํ ปูเรสฺสนฺตีติ จินฺเตตฺวา. अशा प्रकारे पृथ्वीला कंपित करणारी पुण्ये करून, आयुष्याच्या शेवटी तेथून च्युत होऊन ते तुषित भवनात उत्पन्न झाले. तेथे इतर देवांपेक्षा दहा गोष्टींनी श्रेष्ठ ठरून आयुष्यभर दिव्य संपत्तीचा अनुभव घेत असताना, मानवी गणनेनुसार सात दिवसांत त्यांचे आयुष्य संपणार आहे हे दर्शवणारी पाच पूर्वलक्षणे उत्पन्न झाली - वस्त्रे मलीन होणे, फुलांच्या माळा कोमेजणे, बगलेतून घाम सुटणे, शरीराचा वर्ण निस्तेज होणे आणि देव आपल्या देव-आसनावर न रमणे. ही पूर्वलक्षणे पाहून 'अरेरे, आमचे स्वर्ग रिकामे होतील' अशा संवेगाने व्याकुळ झालेल्या देवतांनी महासत्त्वांच्या पारमिता पूर्ण झाल्याचे जाणून, 'आता ते इतर कोणत्याही देवलोकात न जाता मनुष्यलोकात जन्म घेऊन बुद्धत्व प्राप्त करतील आणि लोक पुण्ये करून च्युत झाल्यावर पुन्हा देवलोक भरतील' असा विचार केला. ‘‘ยโตหํ ตุสิเต กาเย-สนฺตุสิโต นามหํ ตทา,ทสสหสฺสิ สมาคนฺตฺวา-ยาจนฺติ ปญฺชลี มมํ; ““जेव्हा मी तुषित कायात 'संतुषित' नावाचा देव होतो, तेव्हा दहा हजार (लोकधातूतील देव) एकत्र येऊन मला हात जोडून विनंती करू लागले;”” กาโลยํเต มหาวีร-อุปฺปชฺช มาตุกุจฺฉิยํ,สเทวกํ ตารยนฺโต-พุชฺฌสฺสุ อมตํ ปทนฺติ’’; ““हे महावीरा, हाच तुमच्यासाठी योग्य काळ आहे, मातेच्या उदरात जन्म घ्या आणि देवलोकासह सर्वांना तारत अमृत पदाचा (निर्वाणाचा) बोध घ्या.”” เอวํ พุทฺธภาวตฺถาย อายาจิโต กาลํ-ทีปํ-เทสํ กุลํ-ชเนตฺติยา อายุปฺปมาณนฺติ อิมานิ ปญฺจ มหาวิโลกนานิ วิโลเกตฺวา กตสนฺนิฏฺฐาโน ตโต จุโต สกฺยราชกุเล ปฏิสณฺธึคเหตฺวา ตตฺถ มหาสมฺปตฺติยา ปริหริยมาโน อนุกฺกเมน ภทฺทํ โยพฺพนํ อนุปาปุณิตฺวา ติณฺณํ อุตูนํ อนุจฺฉวิเกสุ ตีสุ ปาสาเทสุ เทวโลกสิรึ วิย รชฺชสิรึ อนุภวมาโน อุยฺยานกีฬาย คมนสมเย อนุกฺกเมน ชิณฺณ - วฺยาธิ - มตสงฺขาเต ตโย เทวทูเต ทิสฺวา สํชาต สํเวคา นิวตฺติตฺวา จตุตฺเถ วาเร ปพฺพชิตํ ทิสฺวา สาธุ ปพฺพชฺชาติ ปพฺพชฺชาย รุจึ อุปฺปาเทตฺวา อุยฺยานํ คนฺตฺวา ตตฺถ ทิวสํ เขเปตฺวา มงฺคล โปกฺขรณิตีเร นิสินฺโน กปฺปก เวสํ คเหตฺวา อาคเตน วิสฺสกมฺม เทวปุตฺเตน อลงฺกต ปฏิยตฺโต ราหุลกุมารสฺส ปาตสาสนํ สุตฺวา ปุตฺตสิเนหสฺส พลวภาวํ ญตฺวา ยาว อิมํ พณฺธนํ น วฑฺฒติ ตาวเทวนํ ฉิณฺทิสฺสามีติ จินฺเตตฺวา สายํ นครํ ปวิสนฺโต- अशा प्रकारे बुद्धत्वासाठी याचना केली असता, त्यांनी काळ, द्वीप, देश, कूळ आणि मातेचे आयुष्यमान या पाच महाविलोकनांचे (निरीक्षण) करून निश्चय केला. तेथून च्युत होऊन त्यांनी शाक्य राजकुलात प्रतिसंधी (पुनर्जन्म) घेतली. तेथे महासंपत्तीने सांभाळले जात असताना, अनुक्रमाने सुंदर तारुण्यात पदार्पण करून, तीन ऋतूंना अनुकूल अशा तीन प्रासादांमध्ये देवलोकातील वैभवाप्रमाणे राज्यवैभवाचा अनुभव घेत असताना, उद्यानविहारासाठी जात असताना त्यांनी अनुक्रमाने वृद्ध, रोगी आणि मृत अशा तीन देवदूतांना पाहिले. त्यामुळे मनात संवेग उत्पन्न होऊन ते परत फिरले. चौथ्या वेळी त्यांनी एका प्रव्रजिताला (संन्याशाला) पाहिले आणि 'प्रव्रज्या हीच कल्याणकारी आहे' अशी प्रव्रज्येविषयी आवड निर्माण करून ते उद्यानात गेले. तेथे दिवस घालवून मंगल पुष्करणीच्या तीरावर बसले असताना, न्हाव्याचे रूप घेऊन आलेल्या विश्वकर्मा देवपुत्राने त्यांना अलंकृत व सुसज्ज केले. तेथे राहुल कुमाराच्या जन्माची बातमी ऐकून, पुत्रप्रेमाची प्रबळता जाणून 'हे बंधन वाढण्यापूर्वीच मी ते तोडून टाकीन' असा विचार करून संध्याकाळी नगरात प्रवेश करत असताना - ‘‘นิพฺพุตา นูน สา มาตา - นิพฺพุโต นูน โส ปิตา,นิพฺพุตา นูน สา นารี - ยสฺสายํ อีทิโส ปติ’’ติ; ““ती माता नक्कीच शांत (सुखी) झाली असेल, तो पिता नक्कीच शांत झाला असेल, आणि ती स्त्री नक्कीच शांत झाली असेल, जिचा असा पती आहे.”” กิสาโคตมิยา นาม ปิตุจฺฉา ธีตาย ภาสิตํ อิมํ คาถา สุตฺวา อิหํ อิมาย นิพฺพุตปทํ สาวิโตติ คีวโต สตสหสฺสคฺฆนกํ มุตฺตาหารํ โอมุญฺจิตฺวา ตสฺสา เปเสตฺวา อตฺตโน ภวนํ ปวิสิตฺวา สิรีสยเน นิปนฺโน นิทฺทาวส คตานํ นาฏกานํ วิปฺปการํ ทิสฺวา นิพฺพินฺนหทโย ฉนฺนํ อุฏฺฐาเปตฺวา กณฺถกํ อาหาราเปตฺวา ตํ อารุยฺห ฉนฺนสหาโย ทสสหสฺส จกฺกวาฬ เทวตาหิ กต ปริวาโร มหาภินิกฺขมนา นิกฺขมิตฺวา เตเนว รตฺตาวเสเสน ตีณิ รชฺชานิ อติกฺกมฺม อโนมาย นทิยา ปรตีรํ ปตฺวา อสฺสาปิฏฺฐิโต โอรุยฺห มุตฺตราสิ สทิเส จาลิกาปุลิเณ ฐตฺวา ฉนฺนตฺวํ มยฺหํ อาภรณานิ เจว กณฺถกญฺจ อาทาย คจฺฉาหิ อาภรณานิ จ กณฺถกญฺจ ปฏิจฺฉาเปตฺวา ทกฺขิณ หตฺเถน มงฺคลขคฺคมาทาย วามหตฺเถน โมลิยา สทฺธึ จูฬํ ฉิณฺทิตฺวา สเจ อหํ พุทฺโธ ภวิสฺสามิ อากาเส ติฏฺฐตุ โน เจ ภูมิยํ ปตตูติ อากาเส ขิปิ จุฬามณี พณฺธนํ โยชนปฺปมาณํ ฐานํคนฺตฺวา อากาเส อฏฺฐาสิ อถ สกฺโก เทวราชา โยชนิเกน รตนจงฺโคฏเกน ปฏิคฺคเหสิ. किसागोतमी नावाच्या आत्याच्या कन्येने म्हटलेली ही गाथा ऐकून, 'हिने मला निर्वाणपद ऐकवले आहे' असे मानून, आपल्या गळ्यातून एक लाख (मुद्रा) मूल्याचा मोत्यांचा हार काढून तिला पाठवून दिला. स्वतःच्या महालात प्रवेश करून, शय्येवर निजले असता, झोपी गेलेल्या नर्तकींची विस्कळीत अवस्था पाहून विरक्त मनाने छन्नाला उठवून, कंथक घोड्याला आणवून, त्यावर आरूढ होऊन, छन्नाच्या सोबतीने, दहा हजार चक्रवाळांतील देवतांनी वेढलेले असून, महाभिनिष्क्रमण करून निघाले. त्याच रात्रीच्या उर्वरित भागात तीन राज्ये ओलांडून अनोमा नदीच्या पलीकडच्या तीरावर पोहोचले. घोड्यावरून खाली उतरून, मोत्यांच्या राशीसारख्या वाळूच्या पुळणीवर उभे राहून, 'छन्ना, तू माझे दागिने आणि कंथकाला घेऊन परत जा' असे सांगून दागिने आणि कंथक त्याला सोपवले. नंतर उजव्या हाताने मंगल खड्ग घेऊन आणि डाव्या हाताने केसांच्या जटांसह मुकुट कापून, 'जर मी बुद्ध होणार असेन, तर हे आकाशातच राहो, नाहीतर जमिनीवर पडो' असे म्हणून आकाशात फेकले. तो चूडामणीचा बंध एक योजन अंतरावर जाऊन आकाशातच स्थिरावला. तेव्हा देवराज शक्राने एक योजन आकाराच्या रत्नमयी करंडकात तो झेलला. ยถาห जसे म्हटले आहे - เฉตฺวาน โมลึ วรคนฺธวาสิตํเวหาสยํ อุกฺขิปิ สกฺยปุงฺคยโว,สหสฺสเนตฺโต สิรสา ปฏิคฺคหิสุวณฺณ วงฺโคฏวเรน วาสโว’ติ; उत्कृष्ट सुगंधाने सुवासित असलेला मुकुट कापून शाक्यश्रेष्ठाने तो आकाशात फेकला; सहस्रनेत्र असलेल्या वासव (शक्र) देवाने आपल्या मस्तकाने सुवर्णमयी श्रेष्ठ करंडकात तो झेलला. ปฏิคฺคเหตฺวา จ ปน เทวโลกํ เนตฺวา สุเนรุ มุทฺธนิ ติโยชนปฺปมาณํ อิณฺทนีลมณิมยํ จุฬามณิ เจติยํ นาม อกาสิ อถ กสฺสป พุทฺธกาเล โปราณ สหายโก ฆฏิการ มหาพฺรหฺมา เอกํ พุทฺธนฺตรํ วินาวาสภาวปฺปตฺเตน มตฺตภาโว จิตฺเตสิ. อชฺช เม สหายโก มหาภินิกฺขมนํ นิกฺขนฺโต สมณ ปริกฺขารมสฺส คเหตฺวา คจฺฉามีติ- तो स्वीकारून देवलोकात नेऊन, सुमेरू पर्वताच्या शिखरावर तीन योजन आकाराचे इंद्रनीलमणीमय 'चूडामणी चैत्य' नावाचे स्तूप बांधले. त्यानंतर, कश्यप बुद्धांच्या काळातील जुने मित्र घटिकार महाब्रह्म यांनी, एका बुद्ध-अंतरापर्यंत (शुद्धावास लोकात) राहिल्यामुळे, विचार केला: 'आज माझे मित्र महाभिनिष्क्रमण करून निघाले आहेत, मी त्यांच्यासाठी श्रमण-परिकार घेऊन जातो' - ‘‘ติจีวรญฺจ ปตฺโต จ วาสิ สูจิ จ พณฺธนํ,ปริสฺสาวน อฏฺเฐเตน-ยุตฺตโยคสฺส ภิกฺขุโน’’ติ; “तीन चीवरे, भिक्षापात्र, वस्तरा, सुई, कंबरपट्टा आणि जलगाळणी - हे आठ योगयुक्त भिक्षूचे परिकार आहेत.” อิเม สมณปริกฺขาเร อาหริตฺวา อทาสิ มหาปุริโส อรหทฺธชํ นิวาเสตฺวา อุตฺตมํ ปพฺพชฺชาเวสํ คณฺหิตฺวา สาฏกยุคลํ อากาเส ขิปิ ตํ พฺรหฺมา ปฏิคฺคเหตฺวา พฺรหฺมโลเก ทฺวาทสโยชนิกํ สพฺพรตนมยํ ทุสฺสเจติยมกาสิ. हे श्रमण-परिकार आणून त्यांनी दिले. महापुरुषाने अर्हत-ध्वज (चीवर) परिधान करून, उत्तम प्रव्रज्या-वेष धारण केला आणि आपले वस्त्रांचे जोड आकाशात फेकले. ते ब्रह्मदेवाने स्वीकारून ब्रह्मलोकात बारा योजन आकाराचे सर्व-रत्नमय 'दुस्स चैत्य' (वस्त्र-स्तूप) बांधले. ‘‘กิเลส อปฺปหีเณปิ=มหาสตฺตสฺส ตํ ขเณ,ยสฺสานุภาวโต เอวํ ทุสฺสจูฬา หิ ปูชิตาตสฺมา ตมฺม มหาโพธิ-สตฺตานํ ปฏิปตฺติยํ,น กเรยฺย มหุสฺสาหํว-โก หิ นาม พุโธ ชโน’’ติ; “त्या क्षणी महासत्त्वाचे क्लेश नष्ट झाले नसतानाही, ज्यांच्या प्रभावामुळे अशा प्रकारे वस्त्र आणि चूडामणी पूजले गेले; म्हणून त्या महाबोधिसत्त्वांच्या प्रतिपत्तीमध्ये (साधनेमध्ये) कोणता बरं बुद्धिमान माणूस मोठा उत्साह दाखवणार नाही?” จูฬามณิทุสฺส ถุปทฺวยกถา चूडामणी आणि दुस्स (वस्त्र) या दोन स्तूपांची कथा. ๙. โพธิสตฺโต ปพฺพชิตฺวา อนุกฺกเมน ราชคหํ คนฺตฺวา ตตฺถ ปิณฺฑาย จริตฺวา ปณฺฑว ปพฺพตปพฺภาเร นิสินฺโน มคธราเชน รชฺเชน นิมนฺติยมาโน ตํ ปฏิกฺขิปิตฺวา สพฺพญฺญุตํ ปตฺวา ติสฺสวิชิตํ อาคมนตฺถายเตนคหิต ปฏิญฺโญ อาฬารํ-อุทฺทกญฺจ อุปสงฺกมิตฺวา เตสํ สนฺติเก อธิคตวิเสเสน อปริตุฏฺโฐ ฉพฺพสฺสานิ มหาปธานํ ปทหิตฺวา วิสาข ปุณฺณม ทิวเส เสนานินิคเม สุชาตาย ทินฺนปายาสํ ปริภุญฺชิตฺวา เนรญฺชราย นทิยา สุวณฺณปาตึ ปวาเหตฺวา เนรญฺชราย ตีเร มหาวนสณฺเฑ นานาสมาปตฺตีหิ ทิวาภาคํ วิตินาเมตฺวา สายณฺห สมเย โสตฺถิเยน ทินฺนํ ติณมุฏฺฐึ คเหตฺวา กาเฬน นาคราเชน อภิตฺถุตคุโณ โพธิมณฺฑํ อารุยฺห ติณานิ. สตฺถริตฺวา น ตาวีมํ ปลฺลงฺกํ ภิณฺทิสฺสามิ ยาว เม อนุปาทาย อาสเวหิ จิตฺตํ วิมุจฺจิสฺสตี’’ติ ปฏิญฺญํ กตฺวา ปาจีน ทาสาภิมุโข นิสีทิตฺวา-สูริเย อนตฺถมิเตเยว มารพลํ วิธเมตฺวา ปฐมยาเม ปุพฺเพ นิวาสญาณํ มชฺฌิมยาเม จุตูปปาตญาณํ ปตฺวา ปจฺฉิมยามาวสาเน ทสพล จตุเวสารชฺชาทิ สพฺพคุณปติมณฺฑิตํสพฺพญฺญุตญาณํ ปฏิวิชฺฌิตฺวา สตฺต สตฺตาหํ โพธิสมีเปเยว วีตินาเมตฺวา อฏฺฐเม สตฺตาเห อชปาล นิคฺโรธมูเล นิสินฺโน ธมฺมคมฺภีรตา ปจฺจเวกฺขเนน อปฺโปสฺสุกฺกตํ อาปชฺชมาโน ทสทหสฺสี มหาพฺรหฺม ปริวาเรน สหมฺปติ มหาพฺรหฺมุนา อายาจิต ธมฺมเทสโน พุทฺธจกฺขุนา โลกํ โอโลเกนฺโต พฺรหฺมุโน อชฺเฌสนํ อาทาย กสฺส นุ โข ปฐมํ ธมฺมํ เทเสยฺยนฺติ โอโลเกนฺโต อาฬารุทฺทกานํ กาลกตภาวํ ญตฺวา ปญฺจวคฺคียานํ ภิกฺขุนํ พหูปการตํ อนุสฺสริตฺวา อุฏฺฐายาสนา กาสิปุรํ คจฺฉนฺโต อนฺตรามคฺเค อุปเกน สทฺธึ มนฺเตตฺวา อาสาฬหิปุณฺณม ทิวเส อิสิปตเน มิคทาเย ปญฺจ วคฺคิยานํ ภิกฺขุนํ วสนฏฺฐานํ ปตฺวา เต อนนุจฺฉวิเกน อาวุโส วาเทน สมุทาจรนฺเต อญฺญาเปตฺวา ธมฺมจกฺกํ ปวตฺเตนฺโต อญฺญาโกณฺฑญฺญตฺเถรปมุเข อฏฺฐารส โกฏิโย อมตปานํ ปาเยสิ. ९. बोधिसत्त्वांनी प्रव्रज्या घेऊन अनुक्रमाने राजगृहाला जाऊन, तेथे भिक्षेसाठी संचार केला. पांडव पर्वताच्या गुहेत बसले असता, मगधराजा (बिंबिसार) याने त्यांना राज्याचे आमंत्रण दिले, परंतु त्यांनी ते नाकारले आणि सर्वज्ञता प्राप्त केल्यावर त्याच्या राज्यात परत येण्याचे वचन दिले. त्यानंतर त्यांनी आलार (कालाम) आणि उद्दक (रामपुत्त) यांच्याकडे जाऊन, त्यांच्याकडून प्राप्त झालेल्या विशेष ज्ञानाने असंतुष्ट राहून, सहा वर्षे कठोर तपश्चर्या (महाप्रधान) केली. वैशाख पूर्णिमेच्या दिवशी सेनानी गावामध्ये सुजातेने दिलेली खीर (पायस) ग्रहण करून, निरंजना नदीत सोन्याचे पात्र वाहून दिले. निरंजना नदीच्या तीरावरील महावनात विविध समापत्तींमध्ये दिवसाचा काळ घालवून, संध्याकाळच्या वेळी सोत्थिय (स्वस्तिक) याने दिलेली गवताची मुठ घेऊन, काल नागराजाकडून स्तुती ऐकत बोधिमंडळावर आरूढ झाले. तेथे गवत पसरून, 'जोपर्यंत माझे चित्त उपादानरहित होऊन आसवांपासून मुक्त होत नाही, तोपर्यंत मी हे आसन सोडणार नाही' अशी प्रतिज्ञा करून, पूर्व दिशेकडे तोंड करून बसले. सूर्य मावळण्यापूर्वीच मारबलाचा पराभव करून, रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात 'पुब्बेनिवासज्ञान' (पूर्वजन्मांचे ज्ञान), दुसऱ्या प्रहरात 'च्युतूपपातज्ञान' (प्राण्यांच्या मृत्यू व जन्माचे ज्ञान) प्राप्त केले आणि रात्रीच्या शेवटच्या प्रहराच्या शेवटी दशबल, चार वैशारद्य इत्यादी सर्व गुणांनी अलंकृत अशा 'सर्वज्ञता ज्ञानाचा' साक्षात्कार केला. त्यानंतर सात आठवडे (सत्तसप्ताह) बोधिवृक्षाच्या समीपच घालवून, आठव्या आठवड्यात अजपाल वडाच्या झाडाखाली बसले असता, धर्माच्या गंभीरतेचा विचार करून उपदेश करण्याविषयी उदासीन झाले. तेव्हा दहा हजार महाब्रह्मांच्या परिवारासह महाब्रह्मा सहम्पती यांनी त्यांना धर्मोपदेश करण्याची याचना केली. बुद्धचक्षूने जगाकडे पाहून, ब्रह्माची विनंती स्वीकारून, 'मी प्रथम कोणाला धर्मोपदेश करावा?' असा विचार केला. आलार आणि उद्दक यांचा मृत्यू झाल्याचे जाणून, पंचवर्गीय भिक्षूंच्या उपकारांचे स्मरण केले. आसनावरून उठून काशी नगराकडे जात असताना, वाटेत उपक नावाच्या आजीवकाशी संवाद साधून, आषाढ पूर्णिमेच्या दिवशी इसिपतन (ऋषिपतन) येथील मृगदायात पंचवर्गीय भिक्षूंच्या निवासस्थानी पोहोचले. त्यांना अयोग्य अशा 'आवुसो' (मित्रा) या संबोधनाने बोलवण्यापासून परावृत्त करून, धम्मचक्र प्रवर्तन करत, आज्ञाकोंडण्य स्थविरांच्या प्रमुखतेखाली अठरा कोटी देव-ब्रह्मांना अमृतरसाचे (धर्माचे) पान करवले. ตโต ปฏฺฐาย จตฺตาลีส สํวจฺฉรานิ ฐตฺวา จตุราสีติ ธมฺมกฺขณฺธ สหสฺสานิ เทเสตฺวา คณนปถมตีเต สตฺเต ภวกนฺตารโต สนฺตาเรตฺวา สพฺพพุทฺธกิจฺจานิ นิฏฺฐเปตฺวา กุสินารายํ อุปวตฺตเน มลฺลานํ สาลวเน ยมกสาลาน มนฺตเร อุตฺตสีสกํ ปญฺญตฺเต มญฺจเก วิสาขปุณฺณม ทิวเส ทกฺขิเณน ปสฺเสน สโต สมฺปชาโน อนุฏฺฐานเสยฺยาย นิปชฺชิ. ตทา กิร ภควโต ปูชาย ยมกสาลา สพฺพปาลิผุลฺลา มูลโต ปฏฺฐาย ยาว อคฺคา เอกจฺฉนฺนา อเหสุํ. น เกวลญฺจ ยมกสาลาเยว สพฺเพปิ รุกฺขสาขา สพฺพปาลิผุลฺลาว อเหสุํ. त्यानंतर चाळीस वर्षे राहून, चौऱ्याऐंशी हजार धर्मस्कंधांचा उपदेश करून, असंख्य प्राण्यांना संसाररूपी अरण्यातून तारून, सर्व बुद्धकृत्ये पूर्ण करून, कुसिनारा येथील मल्लांच्या उपवर्तन शालवनात, जोड शालवृक्षांच्या मध्ये, उत्तरेकडे डोके करून तयार केलेल्या मंचकावर, वैशाख पूर्णिमेच्या दिवशी, उजव्या कुशीवर स्मृती व संप्रजन्ययुक्त होऊन अंतिम शय्येवर (अनुत्थान शय्येवर) निजले. त्या वेळी भगवंतांच्या पूजेसाठी ते जोड शालवृक्ष मुळापासून शेंड्यापर्यंत पूर्णपणे बहरले होते. केवळ ते जोड शालवृक्षच नव्हे, तर सर्वच वृक्षांच्या फांद्या पूर्णपणे बहरल्या होत्या. น เกวลญฺจ ตสฺมึเยว อุยฺยาเน สกเลปิ ทสสหสฺส จกฺกวาเฬ ผลุปค รุกฺขา ผลํ คณฺหึสุ. สพฺพรุกฺขานํ ขณฺเธสุ ขณฺธ ปทุมานิ, วลลีสุ วลลิปทุมานิ. อากาเส อุลฺโลกปทุมานิ, ปถวิตลํ ภิณฺทิตฺวา ทณฺฑกปทุมานิ ปุปฺผึสุ. สพฺโพ มหา สมุทฺโท ปญฺจวณฺณ ปทุมสญฺฉนฺโน อโหสิ ติโยชน สหสฺสวิตฺถโต ปน หิมวา ฆนพทฺธโมรปิญฺฉกลาโป วิย นิรนฺตรํ มาลาทามควกฺขิโต วิย สุฏฺฐุ ปีเฬตฺวา อาพทฺธปุปฺผวฏํสโก วิย สุปูริต ปุปฺผจงฺเคฏกํ วิย จ อติรมณีโย อโหสิ. केवळ त्याच उद्यानातच नव्हे, तर संपूर्ण दहा हजार चक्रवाळांमध्ये फळ देणारे सर्व वृक्ष फळांनी बहरले. सर्व वृक्षांच्या खोडांवर खोड-कमळे, वेलींवर वेल-कमळे उमलली. आकाशात लटकणारी कमळे आणि पृथ्वीचा पृष्ठभाग भेदून दांडी असलेली कमळे फुलली. संपूर्ण महासागर पंचरंगी कमळांनी व्यापून गेला. तीन हजार योजन विस्तीर्ण असलेला हिमालय पर्वत दाट बांधलेल्या मोराच्या पिसारासारखा, फुलांच्या माळांनी सुशोभित केलेल्या गवाक्षासारखा (खिडकीसारखा), घट्ट दाबून बांधलेल्या फुलांच्या मुकुटासारखा आणि फुलांनी काठोकाठ भरलेल्या टोपलीसारखा अत्यंत रमणीय झाला होता. ยมกสาลา ภุมฺมเทวตานิ สญฺจาลิตกฺขวิณฺธฏปา ตถาคตสรีรสฺส อุปริปุปฺผานิ วิกิรนฺติ. ทิพฺพานิปิ มณฺทารว ปุปฺผานิ อนฺตลิกฺขา ปตนฺติ. ตานิ โหนฺติ สุวณฺณ วณฺณานิ ปณฺณจฺฉตฺตปฺปมาณานิ มหาตุมฺพมตฺตํ เรณุ คณฺหนฺติ น เกวลญฺจ มณฺทารว ปุปฺผาเนจ, อญฺญานิปิ สพฺพานิ ปาริจฺฉตฺตก ปุปฺผาทีนิ สุวณฺณวงฺโคฏกานิ รชตจงฺโคฏกานิ จ ปูเรตฺวา ปูเรตฺวา ติทส ปุเรปิ พฺรหฺมโลเกปิ ฐิตาหิ เทวตาหิ วิวิธานิ อนฺตรา อวิปฺปกิณฺณาเนว หุตฺวา อาคนฺตฺวา ปตฺตกึชกฺข เรณุ จุณฺเณหิ ตถาคตสฺส สรีรเมว โอกีรนฺติ น เกวลญฺจ เทวตานํเยว นาค สุปณฺณ มนุสฺสานมฺปิ อุปกปฺปน จณฺทน จุณฺณานิ น เกวลญฺจ จณฺทนจุณฺณาเนว กาฬานุสารี ตคร โลหิตจณฺทนาทิ สพฺพคนฺธชาตจุณฺณานิ, หริตาลญฺชน สุวณฺณ รชต จุณฺณานิ, สพฺพคนฺธวาส วิกติโย สุวณฺณ รชตาทิสมุคฺเค ปูเรตฺวา จกฺกวาฬ มุขวฏฺฏิอาทิสุ ฐิตาหิ เทวตาหิ ปวิทฺธา อนฺตรา อวิปฺปกิริตฺวา ตถาคตสฺเสว สรีรํ โอกิรนฺติ ทิพฺพานิปิ ตุริยานิ อนฺตลิกฺเข วชฺชนฺติ. น เกวลญฺจ ตานิเยว สพฺพานิปิ ตนฺติพทฺธ จมฺมปริโยนทฺธ สุสิราทิ เภทานิ ทสสหสฺสจกฺกวาเฬ เทว-นาคว-สุปณฺณ-มนุสฺสานํ ตุริยานิ เอกจกฺกวาเฬ สนฺนิปติตฺวา อนฺตลิกฺเข วชฺชนฺติ. भूमी-देवतांनी यमक साल वृक्षांच्या फांद्या हलवून तथागतांच्या शरीरावर फुले उधळली. दिव्य मंदारव फुले देखील आकाशातून पडत होती. ती सुवर्ण रंगाची, पानांच्या छत्रीच्या आकाराची होती आणि मोठ्या पात्राएवढा परागकण धारण करत होती. केवळ मंदारव फुलेच नव्हे, तर पारिजातक इत्यादी इतर सर्व फुले सोन्याच्या आणि चांदीच्या टोपल्यांमध्ये भरभरून, त्रयस्त्रिंश देवलोकात आणि ब्रह्मलोकात राहणाऱ्या देवतांनी विविध प्रकारे हवेत न विखुरता आणून, पाकळ्या आणि परागकणांच्या चूर्णाने तथागतांच्या शरीरावरच वर्षाव केला. केवळ देवतांचेच नव्हे, तर नाग, सुपर्ण आणि मनुष्यांचेही चंदनाचे चूर्ण; आणि केवळ चंदनाचे चूर्णच नव्हे, तर काळानुसारी, तगर, लाल चंदन इत्यादी सर्व प्रकारच्या सुगंधी द्रव्यांचे चूर्ण, हरताळ, काजळ, सोने व चांदीचे चूर्ण, आणि सर्व सुगंधी सुवासिक पदार्थ सोन्या-चांदीच्या डब्यांमध्ये भरून, चक्रवाळाच्या कडांवर उभ्या असलेल्या देवतांनी हवेत न विखुरता फेकून तथागतांच्या शरीरावरच वर्षाव केला. दिव्य वाद्ये देखील आकाशात वाजू लागली. केवळ तीच नव्हे, तर तंतूने बांधलेली, चामड्याने मढवलेली, सुशीर इत्यादी विविध प्रकारची दहा हजार चक्रवाळांमधील देव, नाग, सुपर्ण आणि मनुष्यांची सर्व वाद्ये एकाच चक्रवाळात एकत्र येऊन आकाशात वाजू लागली. วรจารณเทวตา กิร นาเมกา ทีฆายุกา เทวตา มหาปุริโส มนุสฺสปเถ นิพฺพตฺติตฺวา พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ สุตฺว ปฏิสณฺธิทิวเส คณฺหิตฺวา คมิสฺสามาติ มาลา คนฺถิตุํ อารภึสุ ตา คณฺถมานาว มหาปุริเส มาตุกุจฺฉิยํ นิพฺพตฺเต ตุมฺเภ กสฺส คณฺถถาติ วุตฺตา น ตาว ติฏฺฐาติ กุจฺฉิโต นิกฺขมน ทิวเส คเหตฺวา คมิสฺสามาติ อาหํสุ ปุน นิกฺเขนฺโตติ สุตฺวา มหาภินิกฺขมนทิวเส คมิสฺสามาติ มหาภินิกฺขมนํ นิกฺขนฺโตติ สุตฺวา อภิสมฺโพธิ ทิวเส คมิสฺสามาติ. อชฺช อภิสมฺพุทฺโธติ สุตฺวา ธมฺมจกฺกปฺปวตฺตนทิวเส คมิสฺสามาติ ธมฺมจกฺกํ ปวตฺตยีติ สุตฺวา ยมกปาฏิหาริยทิวเส คมิสฺสามาติ. อชฺช ยมกปาฏิหาริยํ กรีติ สุตฺวา เทโว โรหนทิวเส คมิสฺสามาติ. อชฺช เทโวโรหนํ กรีติ สุตฺวา อายุสงฺขาโรสฺสชฺชเน คมิสฺสามาติ อายุสงฺขารํ โอสฺสชีติ สุตฺวา น ตาว นิฏฺฐาติ ปรินิพฺพานทิวเส คมิสฺสามาติ? वरचारण देवता नावाच्या दीर्घायुषी देवतांनी, 'महापुरुष मनुष्यलोकात जन्म घेऊन बुद्ध होतील' असे ऐकून, प्रतिसंधीच्या (गर्भधारणेच्या) दिवशी घेऊन जाण्यासाठी माळा गुंफायला सुरुवात केली. त्या माळा गुंफत असतानाच महापुरुषाने मातेच्या गर्भात प्रवेश केला. तेव्हा "तुम्ही कोणासाठी गुंफत आहात?" असे विचारले असता, त्या म्हणाल्या, "अजून वेळ आहे, गर्भातून बाहेर पडण्याच्या (जन्माच्या) दिवशी घेऊन जाऊ." पुन्हा, "ते जन्माला आले आहेत" असे ऐकून, "आम्ही महाभिनिष्क्रमणाच्या दिवशी जाऊ" असे म्हणाल्या. "त्यांनी महाभिनिष्क्रमण केले आहे" असे ऐकून, "आम्ही अभिसंबोधीच्या (ज्ञानप्राप्तीच्या) दिवशी जाऊ" असे म्हणाल्या. "आज त्यांना अभिसंबोधी प्राप्त झाली" असे ऐकून, "आम्ही धम्मचक्रप्रवर्तनाच्या दिवशी जाऊ" असे म्हणाल्या. "त्यांनी धम्मचक्र प्रवर्तित केले" असे ऐकून, "आम्ही यमकप्रातिहार्याच्या दिवशी जाऊ" असे म्हणाल्या. "आज त्यांनी यमकप्रातिहार्य केले" असे ऐकून, "आम्ही देवोरोहणाच्या दिवशी जाऊ" असे म्हणाल्या. "आज त्यांनी देवोरोहण केले" असे ऐकून, "आम्ही आयुष्यसंस्कार विसर्जनाच्या दिवशी जाऊ" असे म्हणाल्या. "त्यांनी आयुष्यसंस्कार विसर्जित केला" असे ऐकून, "अजून पूर्ण झाले नाही, आम्ही परिनिर्वाणाच्या दिवशी जाऊ" असे म्हणाल्या. อชฺช ภควา ยมกสาลานมนฺตเร ทกฺขิเณน ปสฺเสน สโต สมฺปชาโน สีหเสยฺยํ อุปคโต พลว ปจฺจุสมเย ปรินิพฺพายิสฺสติ ตุมฺเห กสฺส คณฺถถาติ วุตฺตา ปน กินฺนาเมตํ อชฺเชว มาตุกุจฺฉิยํ ปฏิสณฺธึ คณฺหิ อชฺเชว กุจฺฉิโต นิกฺขนฺโต, อชฺเชว มหาภินิกฺขมนํ นิกฺขมิ. อชฺเชวพุทฺโธ อโหสิ อชฺเชว ธมฺมจกฺกํ ปวตฺตยิ. อชฺเชว ยมกปาฏิหาริยํ อกาสิ. อชฺเชว เทวโลกา โอตินณฺณา. อชฺเชว อายุสงฺขรํ โอสฺสชิ. อชฺเชว กิร ปรินิพฺพุโต. นนุ นาม ทุติย ทิวเส ยาคุปาน กาลมตฺตมฺปิ ฐาตพฺพํ อสฺส, ทส ปารมิโย ปูเรตฺวา พุทฺธตฺตํ ปตฺตสฺส นาม อนนุจฺฉวิกนฺติ อปริ นิฏฺฐิตาว มาลาโย คเหตฺวา อาคมฺม อนฺโต จกฺกวาเฬ โอกาสํ อาลภมานา จกฺกวาฬ มุขวฏฺฏิยํ ลภิตฺวา อาธาวนฺติโย หตฺเถน หตฺถํ คีวาย คีวํ คเหตฺวา ตีณิ รตนานิ อารพฺภทฺวตฺตึสมหปุริสลกฺขณานิ ฉพฺพณฺณรํสิโย ทสปารมิโย อทฺธจฺฉฏฺฐานิ ชาตกสตานิ จุทฺทสฺส พุทฺธญาณานิ อารพฺภ คายิตฺวา ตสฺส ตสฺส อวสาเน สหาย เห สหาย เหติ วทนฺติ. อิทเมตํ ปฏิจฺจวุตฺตํ-ทิพฺพานิปิ สํคีตานิ อนฺตลิกฺเข วตฺตนฺติติ. "आज भगवान यमक सालांच्या मध्ये उजव्या कुशीवर स्मृतिमान व संप्रजन्य राखून सिंहशय्येवर पहुडले आहेत आणि पहाटेच्या वेळी ते परिनिर्वाण पावतील; तुम्ही कोणासाठी गुंफत आहात?" असे विचारले असता, त्या म्हणाल्या, "हे काय आहे? जणू आजच त्यांनी मातेच्या गर्भात प्रवेश केला, आजच ते गर्भातून बाहेर पडले, आजच त्यांनी महाभिनिष्क्रमण केले, आजच ते बुद्ध झाले, आजच त्यांनी धम्मचक्र प्रवर्तित केले, आजच त्यांनी यमकप्रातिहार्य केले, आजच ते देवलोकातून उतरले, आजच त्यांनी आयुष्यसंस्कार विसर्जित केला आणि आजच ते परिनिर्वाण पावत आहेत! दुसऱ्या दिवशी केवळ पेज पिण्याच्या वेळेइतके तरी थांबायला हवे होते ना! दहा पारमिता पूर्ण करून बुद्धत्व प्राप्त केलेल्यांसाठी हे अयोग्य आहे!" असे म्हणून त्या अपूर्ण राहिलेल्याच माळा घेऊन आल्या आणि चक्रवाळाच्या आत जागा न मिळाल्यामुळे चक्रवाळाच्या कडेवर जागा मिळवून धावत सुटल्या. एकमेकींचे हात हातात धरून आणि गळ्यात गळे घालून, त्रिरत्ने, बत्तीस महापुरुष लक्षणे, षड्रंग रश्मी, दहा पारमिता, साडेपाचशे जातक कथा आणि चौदा बुद्ध-ज्ञानांविषयी गाणी गाऊन, प्रत्येक गाण्याच्या शेवटी "हे सखी! हे सखी!" असे म्हणू लागल्या. याच संदर्भात असे म्हटले आहे की - "आकाशात दिव्य संगीत देखील वाजू लागले." ภควา ปน เอวํ มหติยา ปูชาย วตฺตมานยา ปฐมยาเม มลฺลานํ ธมฺมํ เทเสสิ มชฺฌิมยาเม สุภทฺทสฺส ธมฺมํ เทเสตฺวา ตํ มคฺคผเล ปติฏฺฐาเปสิ ปจฺฉิมยาเม ภิกฺขุ โอวทิตฺวา พลว ปจฺจูส สมเย มหาปถวึ กมฺเปนฺโต อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพายิ ปรินิพฺพุเต ปน ภควติ โลกนาเถ อานณฺทตฺเถโร มลฺลราชุนํ ตํ ปวตฺตึ อาโรเจติ เต สุตฺวาว คณฺธมาลํ สพฺพญฺจ ตาลาวจรํ ปญฺจ จ ทุสฺสยุคสตานิ อาทาย คนฺตฺวา ภควโต สรีรํ นจฺเจหิ - คีเตหิ - วาทิเตหิ - มาเลหิ - คณฺเธหิ สกฺกโรนฺตา ครุกโรนฺตา มาเนนฺตา - ปูเชนฺตา เจลวิตานานิ กโรนฺตา มณฺฑล มาลานิ ปฏิยาเทนฺตา เอวํ ตา ทิวสํ วีตินาเมสุํ. अशा प्रकारे चाललेल्या या महान पूजेच्या दरम्यान, भगवंतांनी रात्रीच्या पहिल्या प्रहरात मल्लांना धम्मदेशना दिली. मध्य प्रहरात सुभद्दास धम्मदेशना देऊन त्याला मार्गफलावर प्रतिष्ठित केले. अंतिम प्रहरात भिक्खूंना उपदेश देऊन, पहाटेच्या वेळी महापृथ्वीला कंपित करत, अनुपधिशेष निर्वाणधातूमध्ये ते परिनिर्वाण पावले. लोकनाथ भगवंतांचे परिनिर्वाण झाल्यावर, स्थवीर आनंदांनी मल्ल राजांना ही वार्ता कळवली. ते ऐकताच त्यांनी गंध, माळा, सर्व प्रकारची वाद्ये आणि पाचशे वस्त्रजोड्या घेऊन तेथे गेले आणि भगवंतांच्या शरीराचा नृत्य, गीत, वादन, माळा आणि गंधांनी सत्कार, आदर, मान आणि पूजा करत, कापडी छत लावून आणि मंडप सजवून तो संपूर्ण दिवस घालवला. อถ เทวตานญฺจ โกสินารกานํ มลฺลานญฺจ เอตทโหสิ-อติวิกาโล โข อชฺช ภควโต สรีร ฌาเปตุํ, สฺเวทานิ ภควโต สรีรํ ฌเปสฺสามาติ ตถา ทุติยมฺปิ ทิวสํ วีตินาเมสุํ. ตถา ตติยํ จตุตฺถํ ปญฺจมํ ฉฏฺฐมฺปิ ทิวสํ วีตินาเมสุํ สตฺต เม ทิวเส เทวตา จ โทสินารกา มลฺลา จ ภควโต สรีรํ ทิพฺเพหิ มานุสเกหิ จ นจฺเฉหิ - คีเตหิ - วาทิเตหิ - มาเลหิ - คณฺเธหิ สกฺกาโรนฺโต ครุกโรนฺตา มาเนนฺตา ปูเชนฺตา นครมชฺเฌน นีหริตฺวา ยตฺถ มกุฏพณฺธนํ นาม มลฺลานํ เจติยํ ตตฺถ นิกฺขิปึสุ त्यानंतर देवतांना आणि कुसिनाराच्या मल्लांना असे वाटले - "आज भगवंतांच्या शरीरावर दाहसंस्कार करण्यास फार उशीर झाला आहे, उद्या आपण भगवंतांच्या शरीराचा दाहसंस्कार करू." अशा प्रकारे त्यांनी दुसरा दिवसही घालवला. तसेच त्यांनी तिसरा, चौथा, पाचवा आणि सहावा दिवसही घालवला. सातव्या दिवशी देवतांनी आणि कुसिनाराच्या मल्लांनी भगवंतांच्या शरीराचा दिव्य आणि मानवी नृत्य, गीत, वादन, माळा आणि गंधांनी सत्कार, आदर, मान आणि पूजा करत, नगराच्या मध्यभागातून बाहेर आणून, जेथे मल्लांचे 'मुकुटबंधन' नावाचे चैत्य होते, तेथे ठेवले. เตน โข ปน สมเยน กุสินารา ยาว สนฺธิสมล สํกฏีราชนฺนุมตฺเตน โอธินา มณฺทารว ปุปฺเผน สตฺถตา โหติ อถ โข โกสินารกา มลฺลา ภควโต สรีรํ จกฺกวตฺติสฺส สรีรํ วิย อหเตน วตฺเถน เวเฐสุํ อหเตน วตฺเถน เวเฐตฺวา วิหเตน กปฺปาเสน เวเฐสุํ วิหเตน กปฺปาเสน เวเฐตฺวา อหเตน วตฺเถน เวเฐสุํ. เอเตเนว นเยน ปญฺจหิยุคสเตหิ เวเฐตฺวา อายสาย เตลโทณิยา ปกฺขิปิตฺวา อญฺญิสฺสา อายสาย โทณิยา ปฏิกุชฺเชตฺวา สพฺพคนฺธานํ จิตกํ กริตฺวา ภควโต สรีรํ จิตกํ อาโรเปสุํ. เตน โข ปน สมเยน อายสฺมา มหา กสฺสโป ปาวาย กุสินารํ อทฺธานมคฺค ปฏิปนฺโน โหติ มหตาภิกฺขุสงฺเฆน สทฺธึ ปญฺจมตฺเตหิ ภิกฺขุสเตหิ เตน โข ปน สมเยน เถเร จิตฺตํ ปสาเทตฺวา สคฺเค นิพฺพตฺตา เทวตา ตสฺมึ สมาคเม เถรํ อทิสฺวา กุหินฺนุ โข อมฺหากํ กุลุปค เถโรติ อาวชฺเชนฺโต อนฺตรามคฺคปฏิปนฺนํ ทิสฺวา อมฺหากํ กุลุปค เถเร อวณฺทิเต จิตโก มา ปชฺชลิตฺถาติ อธิฏฺฐิหึสุ. त्या वेळी कुसिनारा शहर अगदी गल्लीबोळांतील कचराकुंडी आणि उकिरड्यांपर्यंत मंदार फुलांनी आच्छादले गेले होते. त्यानंतर कुसिनाराच्या मल्लांनी भगवंतांच्या शरीराला चक्रवर्ती राजाच्या शरीराप्रमाणे नवीन वस्त्राने वेढले; नवीन वस्त्राने वेढल्यानंतर पिंजलेल्या कापसाने वेढले, पिंजलेल्या कापसाने वेढल्यानंतर पुन्हा नवीन वस्त्राने वेढले. याच पद्धतीने पाचशे वस्त्रांच्या जोड्यांनी वेढून, लोखंडाच्या तेलद्रोणीत (तेलाच्या पात्रात) ठेवून, दुसऱ्या लोखंडाच्या द्रोणीने ते झाकून, सर्व प्रकारच्या सुगंधी द्रव्यांची चिता रचून भगवंतांच्या शरीराला चितेवर चढवले. त्या वेळी आयुष्यमान महाकस्सप हे पावा येथून कुसिनाराकडे जाणाऱ्या मार्गावर पाचशे भिक्खूंच्या मोठ्या भिक्खूसंघासह प्रवास करत होते. त्या वेळी, स्थविरांवर (महाकस्सपांवर) चित्त प्रसन्न करून स्वर्गात उत्पन्न झालेल्या देवतांनी, त्या सभेत स्थविरांना न पाहून, 'आमचे कुलूपग स्थवीर कोठे आहेत?' असा विचार केला. त्यांना मार्गावर प्रवास करताना पाहून, 'आमच्या कुलूपग स्थविरांनी वंदन केल्याशिवाय चिता पेटू नये,' असा त्यांनी संकल्प केला. อถ โข จตฺตาโร มลฺลปาโมกฺขา สีสํ นหาตา อหตานิ วตฺถานิ นิจตฺถา วี สํรตนสติกํ จณฺทนจิตกํ อาลิมฺเปสฺสามาติ อฏฺฐปิ โสลสปิ ทฺวตฺตึสาปิ ชนา หุตฺวา ยมก อุกฺกโย คเหตฺวา ตาลวเณฏหิ วิชนฺตา ภสฺตานิ ธมนฺตา น สกฺโกนฺติเยว อคฺคึ คาหาเปตุํ. อถ โข โกสินารกา มลฺลา จิตกสฺส อปชฺชลน การณํ อายสฺมนฺตํ อนุรุทฺธํ ปุจฺฉิตฺวํ เทวตานํ อภิปฺปายํ สุตฺวา มหากสฺสโป กิร โภ ปญฺจหิ ภิกฺขุสเตหิ สทฺธึ ทสพลสฺส ปาเท วนฺทิสฺสามีติ อาคจฺฉติ ตสฺมึ กิร อนาคเต จิตโก น ปชฺชลติ กีทิโส โภโส ภิกฺขุ กาโล โอทาโต ทีโฆ รสฺโส เอวรูเป นาม โภ ภิกฺขุมฺหิ ฐิโต กึ ทสพลสฺส ปรินิพฺพานํ นามาติ เทจิ คณฺธมาลาทิ หตฺถา ปฏิปถํ คจฺฉึสุ เกจิ วีถิโย วิจิตฺตา กตฺวา อาคมนมคฺคํ โอโลกยมานา อฏฺฐํสุ. อถ โข อายสฺมา มหากสฺสโป เยน กุสินารา มกูฏพณฺธนํ นาม มลฺลานํ เจติยํ, เยน ภควโต จิตโก เตนุปสงฺกมิ. อุปสงฺกมิตฺวา เอกํสํ จีวรํ กตฺวา ติกฺขตฺตุํ จิตกํ ปทกฺขิณํ กตฺวา อาวชฺเชนฺโตว สลฺลกฺเขสิ-อิมสฺมึ ฐาเน ปาทาติ ตเต ปาทสมีเป ฐตฺวา อภิญฺญาปาทกํ จตุตฺถชฺฌานํ สมาปชฺชิตฺวา วุฏฺฐาย อรสหสฺส ปติมณฺฑิตา ทสพลสฺส ปาทา สทฺธึ กปฺปาส ปฏเลหิ ปญฺจทุสฺสยุคสตานิ สุวณฺณโทณึ วณฺทนจิตกญฺจ ทฺเวธา กตฺวา มยฺหํ อุตฺตมงฺเค สิรสิ ปติฏฺฐหนฺตูติ อธิฏฺฐาสิ สห อธิฏฺฐาน จิตฺเตน ตานิ ทุสฺสยุคาทินิ ทฺเวธา กตฺวา วลาหกนฺตรา ปุณฺณจณฺโท วิย ปาทา นิกฺขมึสุ. त्यानंतर मल्लांचे चार प्रमुख, ज्यांनी डोक्यावरून स्नान केले होते आणि नवीन वस्त्रे परिधान केली होती, 'आम्ही एकशे वीस हात उंच चंदनाच्या चितेला आग लावू' असे म्हणून, आठ, सोळा किंवा बत्तीस जण एकत्र येऊन, दुहेरी मशाली घेऊन, ताडाच्या पंख्यांनी वारा घालत आणि भाते फुंकत राहिले, तरीही ते चिता पेटवू शकले नाहीत. त्यानंतर कुसिनाराच्या मल्लांनी चिता न पेटण्याचे कारण आयुष्यमान अनुरुद्धांना विचारले. देवतांचा अभिप्राय ऐकून (अनुरुद्धांनी सांगितले की), 'अहो, महाकस्सप पाचशे भिक्खूंसह दसबलांच्या (बुद्धांच्या) चरणांना वंदन करण्यासाठी येत आहेत. ते आल्याशिवाय चिता पेटणार नाही.' 'अहो, ते भिक्खू कसे आहेत? काळे, गोरे, उंच की बुटके? अशा भिक्खूंच्या उपस्थितीवर दसबलांचे परिनिब्बान अवलंबून आहे काय?' असे विचारत काही जण हातात गंध, पुष्पमाला इत्यादी घेऊन त्यांच्या स्वागतासाठी सामोरे गेले, तर काही जण रस्ते सुशोभित करून त्यांच्या येण्याच्या मार्गाकडे पाहत उभे राहिले. त्यानंतर आयुष्यमान महाकस्सप कुसिनारा येथील मल्लांचे 'मकूटबंधन' नावाचे चैत्य जेथे होते, आणि जेथे भगवंतांची चिता होती, तेथे गेले. तेथे जाऊन, एका खांद्यावर चीवर परिधान करून, चितेला तीन वेळा प्रदक्षिणा घातली आणि विचार करत निश्चित केले की, 'या ठिकाणी भगवंतांचे चरण आहेत.' नंतर चरणांच्या जवळ उभे राहून, अभिज्ञा प्राप्त करून देणाऱ्या चतुर्थ ध्यानात समापन्न झाले. त्यातून उठून त्यांनी संकल्प केला की, 'हजारो चक्रांनी सुशोभित असलेले दसबलांचे चरण, कापसाच्या थरांसह, पाचशे वस्त्रांच्या जोड्या, सोन्याची द्रोणी आणि चिता यांना दुभंगून माझ्या मस्तकावर प्रस्थापित व्हावेत.' संकल्पाच्या चित्ताबरोबरच ती वस्त्रजोडपे इत्यादी दुभंगून, ढगांच्या आडून पूर्ण चंद्र बाहेर पडावा त्याप्रमाणे भगवंतांचे चरण बाहेर आले. เถโร วิกสิต รตฺตปทุม สทิเส หตฺเถ ปสาเรตฺวา สุวณฺณวณฺเณ สตฺถุ ปาเท ยาว โคปฺผกา พาฬฺหํ คเหตฺว อตฺตโน สิรวเร ปติฏฺฐาเปสิ มหาชโน ตํ อจฺฉริยํ ทิสฺวา เอกปฺปหาเร เนว มหานาทํ นทิ. คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺวา ยถารุจึ วณฺทิ. เอว ปน เถเรน จ มหาชเนน จ เตหิ จ ปญฺจหิ ภิกฺขุสเตหิ วณฺทิต มตฺเตเถรสฺส หตฺถโต มุญฺจิตฺวา อลตฺตก วณฺณานิ ภควโต ปาทตาลานิ ทารุอาทิสุ กิญฺจิ อจาเลตฺวาว ยถาฏฺฐาเน ปติฏฺฐหึสุ. ภควโต ปาเทสุ นิกฺขมนฺเตสุ วา ปวิสนฺเตสุ วา กปฺปาสอํสุ วา ทสาตนฺตุ วา เตลพิณฺทุ วา ทารุขณฺฑํ วา ฐานา จลิตํ นาม นาโหสิ. สพฺพํ ยถาฏฺฐาเน ฐิตเมว อโหสิ. อุฏฺฐหิตฺวา ปน อตฺถงฺคเต จณฺเท วิย สูริเย วิย จ ตถาคตสฺส ปาเทสุ อนฺตรหิเตสุ มหาชโน มหากณฺทิตํ กณฺทิ. ปรินิพฺพุตกาลโต อธิกตรํ การุญฺญํ อโหสิ อถ โข เทวาตานุภาเวน ปเนส จิตเก สมนฺตโต เอกปฺปหาเรเนว ปชฺชลิ. ฌายมานสฺส ภควโต สรีรสฺส ฉวิ จมฺม มํสาทีนํ เนว ฉาริกามตฺตมฺปิ อนฺตมโส ปญฺญายิตฺถ น มสิ, สุมน มกุล สทิสา ปน โธตมุตฺต สทิสา สุวณฺณสทิสา จ ธาตุโย อวสิสฺสึสุ. स्थविरांनी (महाकस्सपांनी) उमललेल्या लाल कमळासारखे आपले हात पसरून, शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) सुवर्णवर्णी चरणांना घोट्यांपर्यंत घट्ट धरून आपल्या मस्तकावर प्रस्थापित केले. लोकांनी ते आश्चर्य पाहून एकाच वेळी मोठा जयघोष केला. गंध, पुष्पमाला इत्यादींनी पूजा करून आपापल्या आवडीनुसार वंदन केले. अशा प्रकारे स्थविरांनी, महाजनांनी आणि त्या पाचशे भिक्खूंनी वंदन केल्यावर, स्थविरांच्या हातातून सुटून, भगवंतांचे तांबड्या रंगाचे तळपाय लाकूड इत्यादींना किंचितही न हलवता पूर्ववत जागी प्रस्थापित झाले. भगवंतांचे चरण बाहेर येताना किंवा आत जाताना, कापसाचा एक धागा, वस्त्राचा एक तंतू, तेलाचा एक थेंब किंवा लाकडाचा एक तुकडाही आपल्या जागेवरून हलला नाही. सर्व काही जसेच्या तसे पूर्ववत राहिले. चंद्र किंवा सूर्य मावळल्याप्रमाणे तथागतांचे चरण अदृश्य झाल्यावर लोकांनी मोठा आक्रोश केला. परिनिब्बानाच्या वेळेपेक्षाही अधिक कारुण्य पसरले. त्यानंतर देवतांच्या प्रभावाने ती चिता सर्व बाजूंनी एकाच वेळी पेटली. जळत असलेल्या भगवंतांच्या शरीराची त्वचा, चामडी, मांस इत्यादींची राख किंवा काजळी देखील उरली नाही. केवळ जाईच्या कळीसारख्या, धुतलेल्या मोत्यांसारख्या आणि सुवर्णासारख्या धातू (अस्थी अवशेष) शिल्लक राहिल्या. ทีฆายุก พุทฺธานญฺหิ สรีรํ สุวณฺณกฺขณฺธสทิสํ เอกฆนเมว โหติ. ภควา ปน อหํน จิรํ ฐตฺวา ฐตฺวา ปรินิพฺพายามิ. มยฺหํ สาสนํ น ตาว สพฺพตฺถ วิตฺถาริตํ, ตสฺมา ปรินิพฺพุตสฺสปิ เม สาสสมตฺตมฺปิ ธาตุํ คเหตฺวา อตฺตโน อตฺตโน วสนฏฺฐาเน เจติยํ กตฺวา ปริจรนฺโต มหาชโน สคฺคปรายโน โหติติ ธาตูนํ วิกิรณํ อธิฏฺฐาสิ. กติ ปนสฺส ธาตุโย วิปฺปกิณฺณา, กติ น วิปฺปกิณฺณาติ จตสฺโส ทาฏฺฐา, ทฺเว อกฺขกา, อุณฺหีสนฺติ อิมา สตฺตธาตุโย น วิปฺปกิณฺณา. เสสา วิปฺปกิรึสุ. ตตฺถ สพฺพขุทฺทกา ธาตุ สาสป พีชมตฺตา อโหสิ มหาธาตุ มชฺเฌ ภินฺน ตณฺฑุลมตฺตา. อติมหตี มชฺเฌ ภินฺนมุคฺค พีชมตฺตา อโหสิ. दीर्घायुषी बुद्धांचे शरीर सोन्याच्या तुकड्यासारखे एकसंध असते. परंतु भगवंतांनी विचार केला, 'मी फार काळ न राहता परिनिब्बान पावत आहे. माझे शासन अजून सर्वत्र पसरलेले नाही. म्हणून, माझ्या परिनिब्बानानंतरही लोकांनी मोहरीच्या दाण्याएवढी जरी धातू घेऊन आपापल्या राहण्याच्या ठिकाणी चैत्य बांधून तिची पूजा केली, तर ते स्वर्गलोकाचे भागीदार होतील.' असा विचार करून त्यांनी आपल्या धातूंचे विकीर्ण होण्याचे अधिष्ठान केले. त्यांच्या किती धातू विखुरल्या गेल्या आणि किती विखुरल्या गेल्या नाहीत? चार सुळे (दाढा), दोन अक्षक (गळ्याची हाडे) आणि उष्णीष या सात धातू विखुरल्या गेल्या नाहीत. उर्वरित सर्व विखुरल्या गेल्या. त्यामध्ये सर्वात लहान धातू मोहरीच्या दाण्याएवढी होती, मध्यम आकाराची धातू तांदळाच्या कणाएवढी होती आणि सर्वात मोठी धातू मूग डाळीच्या दाण्याएवढी होती. ทฑฺเฒ โข ปน ภควโต สรีเร อากาสโต อคฺคพาหุมตฺตาปิ ชงฺฆมตฺตาปิ ตาลกฺขณฺธมตฺตาปิ อุทกธารา ปติตฺวา จิตกํ นิพฺพาเปสิ น เกวลํ อากาสโตเยว ปริวาเรตฺวา ฐิตสาลรุกฺขานมฺปิ สาขตฺตร วิฏปนฺตเรหิ อุทกธารา นิกฺขมิตฺวา นิพฺพาเปสุํ, ภควโต จิตโก มหนฺโต, สมนฺตา ปถวึ ภิณฺทิตฺวา ตํงฺคลสีสมตฺตา อุทกวฏฺฏิ เอฬิก วฏํสก สทิสา คนฺตฺวา จิตกเมว คณฺหิ มลฺลราชาโน จ สุวณฺณฆเฏ รชตฆเฏ จ ปูเรตฺวา อาภต นานาคณฺโธทเกน สุวณฺณ รชตมเยหิ อฏฺฐทนฺตเกหิ วิกิริตฺวา จณฺทนจิตกํ นิพฺพาเปสุํ. ตตฺถ จิตเก ฌยมาเน ปริวาเรตฺวา ฐิต สาลรุกฺขานํ สาขนฺตเรหิ วิฏปนฺตเรหิ ปตฺตนฺตเรหิ จ ชาเล อุคฺคจฺฉนฺเต ปตฺตํ วา สาขา วา ทฑฺฒา นาม นตฺถิ กิปิลฺลิกาปิ มกฺกฏกาปิ ปาณกาปิ ชาลานํ อนฺตเร เนว วิจรนฺติ. भगवंतांचे शरीर दग्ध झाल्यावर, आकाशातून हत्तीच्या सोंडेसारख्या, जंघेसारख्या आणि ताडाच्या खोडासारख्या पाण्याच्या धारा कोसळल्या आणि त्यांनी चिता विझवली. केवळ आकाशातूनच नव्हे, तर सभोवताली असलेल्या सालवृक्षांच्या फांद्या आणि डहाळ्यांमधूनही पाण्याच्या धारा बाहेर पडून त्यांनी चिता विझवली. भगवंतांची चिता मोठी होती. चहूबाजूंनी पृथ्वी भेदून नांगराच्या फाळासारखी पाण्याची धार मेंढीच्या शिंगासारखी वळण घेत थेट चितेवरच पडली. मल्ल राजांनी सोन्याच्या आणि चांदीच्या कलशांमध्ये आणलेल्या विविध सुगंधी पाण्याने, सोन्या-चांदीच्या आठ नळ्यांनी शिंपडून चंदनाची चिता विझवली. ती चिता जळत असताना, सभोवताली असलेल्या सालवृक्षांच्या फांद्या, डहाळ्या आणि पानांमधून ज्वाळा निघत असतानाही, एकही पान किंवा फांदी जळाली नाही; तसेच मुंग्या, कोळी किंवा इतर कीटकही त्या ज्वाळांच्या दरम्यान फिरत असताना त्यांना कोणतीही इजा झाली नाही. อากาสโต ปติต อุทกธาราสุปิ สาลรุกฺเขหิ นิกฺขนฺตฺौทกธาราสุปิ ปถวึ ภิณฺทิตฺวา นิกฺขนฺต อุทกธาราสุปิ ธมฺมตาว ปมาณํ เอวํ จิตกํ นิพฺพาเปตฺวา ปน มลฺลราชาโน สนฺถาคาเร จตุชาติคณฺธ ปริภณฺฑํ กาเรตฺวา ลาช ปญฺจมานิ ปุปฺผานิ วิกิริตฺวา อุปริ เจลวิตานํ พณฺธาเปตฺวา สุวณฺณตารกาหิ ขเจตฺวา ตตฺถ คณฺธทาม มาลาทาม รตนทามานิ โอลมฺเพตฺวา สตฺถาคารโต ยาว มกุฏ พณฺธน สงฺขาตา สีสปฺปสาธน มงฺคลสาลา ตาว อุโภหิ ปสฺเสหิ สาณิกิลญฺช ปริกฺเขปํ กาเรตฺวา อุปริ เจลวิตานํ พณฺธาเปตฺวา สุวณฺณตารกาหิ ขเจตฺวา ตตฺถาปิ คณฺธทาม มาลาทาม รตนทามานิ โอลมฺเพตฺวา มณิทณฺเฑหิ ปญฺจวณฺณธเช อุสฺสเปตฺวา สมนฺตา ธชปตากา ปิริกฺขิปิตฺวา สิตฺตสมฺมฏฺฐาสุ วีถิสุ กทลิโย ปุณฺณฆเฏ จ ฐเปตฺวา ทณฺฑทีปิกา ชาเลตฺวา อลงฺกต หตฺถิกฺขณฺเธ สหธาตูหิ สุวณฺณโทณึ ฐเปตฺวา มาลาคณฺธาทีหิ ปูเชตฺวา สาธุกีฬํ กีฬนฺตา อนฺโตนครํ ปเวเสตฺวา สนฺถาคาเร สรภมย ปลฺลงฺเก ฐเปตฺวา อุปริ เสตจฺฉตฺตํ ธารยิตฺวา สตฺติ หตฺเถหิ ปุริเสหิ ปริกฺขิปาเปตฺวา หตฺถีหิ กุมฺเภน กุมฺภํ ปหรนฺเตหิ ปริกฺขิปาเปตฺวา ตโต อสฺเสหิ คีวาย คีวํ ปหรนฺเตหิ ตโต รเถหิ อาณิโกฏิยา อาณิโกฏึ ปหนฺเตหิ ตโต โยเธหิ พาหูหิ พาหุํ ปหรนฺเตหิ เตสํ ปริยนฺเต โกฏิยา โกฏึ ปหรมาเนหิ ธนูหิ ปริกฺขิปาเปสุํ. आकाशातून पडणाऱ्या पाण्याच्या धारा, सालवृक्षांमधून निघणाऱ्या पाण्याच्या धारा आणि पृथ्वी भेदून निघणाऱ्या पाण्याच्या धारा या सर्वांमध्ये केवळ 'धम्मता' (नैसर्गिक नियम) हेच प्रमाण होते. अशा प्रकारे चिता विझवून मल्ल राजांनी संथागारात (सभागृहात) चार प्रकारच्या सुगंधी द्रव्यांची उटी लावली, लाह्यांसह पाच प्रकारची फुले विखुरली, वर सोन्याच्या ताऱ्यांनी जडविलेले कापडी छत बांधले, आणि तिथे सुगंधी माळा, पुष्पमाळा व रत्नमाळा लटकवल्या. संथागारापासून ते 'मुकुटबंधन' नावाच्या मंगल सभागृहापर्यंत दोन्ही बाजूंनी पडदे आणि चटयांचे कुंपण घालून, वर सोन्याच्या ताऱ्यांनी जडविलेले कापडी छत बांधले, तिथेही सुगंधी माळा, पुष्पमाळा व रत्नमाळा लटकवल्या. मण्यांच्या दांड्यांचे पंचरंगी ध्वज उभारले, चहूबाजूंनी ध्वज-पताका लावल्या. सडा-संमार्जन केलेल्या रस्त्यांवर केळीचे खांब आणि पूर्णघट ठेवले, मशाली पेटवल्या. सजवलेल्या हत्तीच्या पाठीवर धातूंसह (अस्थींसह) सोन्याची मंजुषा ठेवून, पुष्प-गंध इत्यादींनी पूजा करत, उत्सव साजरा करत त्यांनी नगरात प्रवेश केला. संथागारात शराभमयी आसनावर ती मंजुषा ठेवून, त्यावर श्वेतछत्र धरले. हातात भाले घेतलेल्या पुरुषांनी, गंडस्थळाला गंडस्थळ भिडवून उभ्या असलेल्या हत्तींनी, मानेला मान भिडवून उभ्या असलेल्या घोड्यांनी, रथाच्या कण्याला कणा भिडवून उभ्या असलेल्या रथांनी, खांद्याला खांदा भिडवून उभ्या असलेल्या योद्ध्यांनी आणि त्यांच्या शेवटी टोकाला टोक भिडवून उभ्या असलेल्या धनुर्धाऱ्यांनी चहूबाजूंनी वेढा घालून कडेकोट बंदोबस्त केला. อิติ สมนฺตา โยชนปฺปมาณํ ฐานํ สนฺนาหคจฺฉิตํ วิย กตฺวา อารกฺขํ สํวิทหึสุ. กสฺมา ปเนเต เอวมกํสูติ. อิโต ปุริเมสุ ทฺวีสุ สตฺตาเหสุ เต ภิกฺขุสงฺฆสฺส ฐานนิสชฺโชกาสํ กโรนฺตา ขาทนีย โภชนียํ สํวิทหนฺตา สาธุกีฬาย โอกาสํ น ลภึสุ ตโต เตสํ อโหสิ - อิมํ สตฺตาหํ สาธุกีฬํ กีฬิสฺสาม. ฐานํ โข ปเนตํ วิชฺชติ ยํ อมฺหากํ ปมตฺตภาวํ ญตฺวา โกจีเทว อาคนฺตฺวา ธาตุโย คณฺหยฺย-ตสฺมา อารกฺขํ ฐเปตฺวา กีฬิสฺสามาติ เตน เต เอวมกํสุ. अशा प्रकारे त्यांनी चहूबाजूंनी एक योजन प्रमाणाच्या जागेला जणू चिलखत घातल्यासारखे करून कडेकोट बंदोबस्त केला. त्यांनी असे का केले? कारण यापूर्वीच्या दोन आठवड्यांत ते भिक्खू संघासाठी राहण्याची व बसण्याची जागा तयार करण्यात आणि खाद्य-भोज्य पदार्थांची व्यवस्था करण्यात व्यस्त असल्याने त्यांना उत्सव साजरा करण्याची संधी मिळाली नव्हती. म्हणून त्यांना वाटले की, 'या आठवड्यात आपण उत्सव साजरा करू या. परंतु, आपण गाफील आहोत हे जाणून कोणीतरी येऊन धातू (अस्थी अवशेष) घेऊन जाण्याची शक्यता आहे. म्हणून आपण कडेकोट बंदोबस्त ठेवूनच उत्सव साजरा करू या.' याच कारणास्तव त्यांनी तसे केले. อถ โข อสฺโสสิ โข ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ ภควา กิร กุสินารายํ ปรินิพฺพุโตติ กถํ อสฺโสสิ ปฐมเมวสฺส อมจฺจา สุตฺวา จินฺตยึสุ? สตฺถา นาม ปรินิพฺพุโต, น โส สกฺกา ปุน อาหรึตุ โปถุชฺชนิก สทฺธาย ปน อมฺหากํ รญฺญา สทิโส นตฺถิ. สเจ เอส อิมินาว นิยาเมน สุณิสฺสติ, หทยมสฺส เอฬิสฺสติ ราชา โข ปนมฺเภหิ อนุรกฺขิตพฺโพติ เต ติสฺโส สุวณฺณโทณิโย อาหริตฺวา จตุมธุรสฺส ปูเรตฺวา รญฺโญ สนฺติกํ คนฺตฺวา เอตทโวจุํ. ทฺเว อมฺเหหิ สุปินโก ทิฏฺโฐ ตสฺส ปฏิฆาตตฺถํ ตุมฺเหหิ ทุกูลปฏฺฏํ นิวาเสตฺวา ยถา นาสาปุฏมตฺตํ ปญฺญายติ เอวํ จตุมธุรโทณิยํ นิปชฺชิตุํ วฏฺฏตีติ. ราชา อตฺถวรกานํ วจนํ สุตฺวา เอวํ โหตุ ตาตา’ติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา ตถา อกาสิ. त्यानंतर मगधचे राजे अजातशत्रू यांनी ऐकले की, 'भगवान कुसिनारा येथे परिनिर्वाण पावले आहेत.' त्यांना हे कसे समजले? सर्वात आधी जेव्हा त्यांच्या अमात्यांनी हे ऐकले, तेव्हा त्यांनी विचार केला, 'शास्ता परिनिर्वाण पावले आहेत, त्यांना पुन्हा परत आणणे शक्य नाही. परंतु, सामान्य माणसाच्या श्रद्धेच्या बाबतीत आमच्या राजांसारखे दुसरे कोणी नाही. जर त्यांनी ही बातमी थेट ऐकली, तर त्यांचे हृदय फाटेल. राजांचे रक्षण करणे हे आपले कर्तव्य आहे.' म्हणून त्यांनी सोन्याचे तीन द्रोण आणले, ते चतुमधुराने (तूप, मध, तेल आणि साखर यांच्या मिश्रणाने) भरले आणि राजांकडे जाऊन म्हणाले, 'महाराज, आम्ही एक वाईट स्वप्न पाहिले आहे. त्याचे दुष्परिणाम टाळण्यासाठी आपण रेशमी वस्त्र परिधान करून, केवळ नाकपुड्या उघड्या राहतील अशा प्रकारे या चतुमधुराने भरलेल्या द्रोणात झोपणे योग्य ठरेल.' राजांनी आपल्या हितचिंतक अमात्यांचे बोलणे ऐकून, 'तसेच असो, मित्रांनो' असे म्हणून ते मान्य केले आणि तसे केले. อเถโก อมจฺโจ อลงฺการํ โอมุญฺจิตฺวา เกเส ปริกิริย ยาย ทิสาย สตฺถา ปรินิพฺพุโต ตทภิมุโข หุตฺวา อญฺชลิมฺปคฺคยฺห ราชานํ อาห- เทวมรณโต มุญฺจนกสตฺโต นาม นตฺถิ. อมฺหากํ อายุวทฺธเกนา เจติยฏฺฐานํ ปุญฺญกฺเขตฺตํ อภิเสกปิฏฺฐิกา ภควา สตฺถา กุสินารายํ ปรินิพฺพุโตติ ราชา สุตฺวา วิสญฺญี ชาโต จตุมธุรโทณิ อุสุมํ มุญฺจิ ราชานํ อุกฺขิปิตฺวา ทุติยาย โทณิยา นิปชฺชาเปสุํ โส สญฺญํ ลภิตฺวา ตาต กึ วทถาติ ปุจฺฉิ. สตฺถา มหาราช ปรินิพฺพุโตติ, ปุน วิสญฺญิ ชาโต จตุมธุรโทณึ อุสุมํ มุญฺจิ. อถ นํ ตโตปิ อุกฺขิปิตฺวา ตติยาย โทณิยา นิปชฺชาเปสุํ โส ปุน สญฺญํ ปฏิลภิตฺวา ตาต กึ วทถาติ ปุจฺฉิ สตฺถา มหาราช ปรินิพฺพุโตติ. ราชา ปุน วิสญฺญี ชาโต จ มธุรโทณิ อุสุมํ มุญฺจิ. त्यानंतर एका अमात्याने आपले अलंकार उतरवले, केस मोकळे सोडले आणि ज्या दिशेला शास्ता परिनिर्वाण पावले होते, त्या दिशेकडे तोंड करून, हात जोडून राजांना म्हटले, 'महाराज, मृत्यूपासून सुटका मिळवू शकणारा असा कोणताही प्राणी नाही. आमचे आयुष्य वाढवणारे, चैत्यस्थान, पुण्यक्षेत्र आणि अभिषेकाचे स्थान असलेले भगवान शास्ता कुसिनारा येथे परिनिर्वाण पावले आहेत.' हे ऐकताच राजे बेशुद्ध झाले आणि चतुमधुराच्या द्रोणातून उष्ण वाफा निघू लागल्या. अमात्यांनी राजांना उचलून दुसऱ्या द्रोणात झोपवले. शुद्धीवर आल्यावर राजांनी विचारले, 'मित्रांनो, तुम्ही काय म्हणत आहात?' अमात्य म्हणाले, 'महाराज, शास्ता परिनिर्वाण पावले आहेत.' राजे पुन्हा बेशुद्ध झाले आणि चतुमधुराच्या द्रोणातून उष्ण वाफा निघू लागल्या. मग त्यांनी राजांना तिथूनही उचलून तिसऱ्या द्रोणात झोपवले. पुन्हा शुद्धीवर आल्यावर राजांनी विचारले, 'मित्रांनो, तुम्ही काय म्हणत आहात?' अमात्य म्हणाले, 'महाराज, शास्ता परिनिर्वाण पावले आहेत.' राजे पुन्हा बेशुद्ध झाले आणि चतुमधुराच्या द्रोणातून उष्ण वाफा निघू लागल्या. อถ นํ ตโตปิ อุกฺขิปิตฺวา นหาเปตฺวา มตฺถเก ฆเฏหิ อุทกํ อาสิญฺจึสุ ราชา สญฺญํ ปฏิลภิตฺวา อาสนา อุฏฺฐาย คณฺธปริภาวีเต มณิวณฺณเกเส สุวณฺณผลก วณฺณาย ปิฏฺฐิยํ ปกิริตฺวา ปวาฬงฺคุรวณฺณาหิ สุวฏฺฏิตงฺคุลีหิ สุวณฺณพิมฺพก วณฺณํ อุรํ สํสิพฺพนฺโต วิย คเหตฺวา ปริเทวมาโน อุมฺมตฺตกเวเสเนว อนฺตรวีถึ โอติณฺโณ โส อลงฺกต นาฏก ปริวุโต นครา นิกฺขมฺม ชีวกมฺพวนํ คนฺตฺวา ยสฺมึ ฐาเน นิสินฺเนน ภควตา ธมฺโม เทสิโต ตํ โอโลเกตฺวา ภควา สพฺพญฺญุ นนุ เม อิมสฺมึ ฐาเน นิสีทิตฺวา ธมฺมํ เทสยิตฺถ ตุมฺเห โสกสลฺลํ วิโนทยิตฺถ. ตุมฺเห มยฺหํ โสกสลฺลํ นีหริตฺถ. อหํ ตุมฺหากํ สรณํ คโต. อิทานิ ปน เม ปฏิวจนมฺปิ น เทถ ภควาติ ปุนปฺปุน ปริเทวิตฺวา นนุ ภควา อหํ อญฺญทา เอวรูเป กาเล ตุฏฺเฐ มหาภิกฺขุสงฺฆปริวารา ชมฺพุทีปตเล จาริกํ จรถาติ สุณาม อิทานิ ปน อหํ ตุมฺหากํ อนนุรูปํ อยุตฺตํ ปวตฺตึ สุณามีติ เอวมาทีนิ จ วตฺตา สฏฺฐิมตฺตาหิ คาถาหิ ภควโต คุณํ อนุสฺสริตฺวา จินฺเตสิ มม ปริเทวิเต เนว น สิชฺฌติ. ทสพลสฺส ธาตุโย อาหราเปสฺสามิติ มลฺลราชุนํ ทูตญฺจ ปณฺณญฺจ ปาเหสิ. त्यानंतर त्यांनी त्याला तेथून उचलले, स्नान घातले आणि डोक्यावर घागरीने पाणी ओतले. राजाने शुद्धीवर येऊन, आसनावरून उठून, सुगंधी द्रव्यांनी सुवासित केलेले, मण्यांच्या रंगासारखे काळेभोर केस सुवर्णपटासारख्या पाठीवर मोकळे सोडले. प्रवाळाच्या कोंबासारख्या सुंदर वळणदार बोटांनी सुवर्णबिंबासारख्या छातीला कुरवाळत असल्यासारखे धरून, विलाप करत, एखाद्या वेड्यासारखा तो मधल्या रस्त्यावर उतरला. तो अलंकृत नर्तकींनी वेढलेला राजा नगरातून बाहेर पडून जीवक-अंबवनात गेला. ज्या ठिकाणी बसून भगवंतांनी धम्माचा उपदेश केला होता, त्या ठिकाणाकडे पाहून तो म्हणाला, "भगवंता, आपण सर्वज्ञ आहात. आपण याच ठिकाणी बसून मला धम्मोपदेश केला होता ना? आपण माझे शोकशल्य दूर केले होते. आपण माझे दुःख दूर केले होते. मी आपल्या चरणी शरण आलो होतो. पण आता मात्र आपण मला उत्तरही देत नाही, भगवंता!" असा वारंवार विलाप करून तो म्हणाला, "भगवंता, इतर वेळी अशा प्रसंगी आपण प्रसन्न चित्ताने महाभिक्खू संघासह जम्बुदीपात चारिका करत आहात असे आम्ही ऐकत होतो. पण आता मात्र मी आपल्याबद्दल अत्यंत विसंगत आणि अयोग्य वृत्त ऐकत आहे." अशा प्रकारे सुमारे साठ गाथांमधून भगवंतांच्या गुणांचे स्मरण करून त्याने विचार केला, "माझ्या विलाप करण्याने काही साध्य होणार नाही. मी दसबलांचे धातू आणवीन." असा विचार करून त्याने मल्ल राजांकडे दूत आणि पत्र पाठवले। ภควาปิ ขตฺติโย, อหมฺปิ ขตฺติโย, อหมฺปิ อรหามิ ภควโต สรีรานํ ถูปญฺจ มหญฺจ กาเรตุนฺติ เปเสตฺวา ปน สเจ ทสฺสนฺติ สุณฺทรํ, โน เจ ทสฺสนฺติ อาหรณุปาเยน อาหริสฺสามีติ จตุรงฺคินึ เสนํ สนฺนยฺหิตฺวา สยมฺปิ นิกฺขนฺโตเยว ยถา จ อชาตสตฺตุ เอวํ เวสาลิยํ ลิจฺฉวิราชาโน กปิลวตฺถุมฺหิ สกฺยราชาโน อลฺลกปฺปเก พุลโย รามคามเก โกฬิยา เวฐทีปเก พฺราหฺมโณ ปาวายญฺจ มลฺลา ทูตํ เปเสตฺวา สยมฺปิ จตุรงฺคินิยา เสนาย นิกฺขมึสุเยว ตตฺถ ปาเจยฺยกา สพฺเพหิ อาสนฺนตรา กุสินาราโต ติคาวุตนฺตเร นคเร วสนฺติ. ภควาปิ ปาวํ ปวิสิตฺวา กุสินารํ คโต. มหาปริหารา ปเนเต ราชาโน ปริหารา กาเรํนฺตาว ปจฺฉโต ชาตา. เต สพฺเพปิ สตฺตนครวาสิโน อาคตฺตฺวา อมฺหากํ ธาตุโย วา เทนฺตุ ยุทฺธํ วาติ กุสินารา นครํ ปริวารยึสุ. "भगवंतही क्षत्रिय होते, मीही क्षत्रिय आहे. त्यामुळे भगवंतांच्या शरीराच्या धातूंवर स्तूप उभारण्यास आणि त्यांची पूजा करण्यास मीही पात्र आहे," असा संदेश पाठवून, "जर ते (धातू) देतील तर उत्तम, नाहीतर मी ते उपायाने मिळवीन," असा निश्चय करून त्याने चतुरंग सेना सज्ज केली आणि स्वतःही निघाला. ज्याप्रमाणे अजातशत्रू निघाला, त्याचप्रमाणे वेसालीचे लिच्छवी राजे, कपिलवस्तूचे शाक्य राजे, अल्लकप्पचे बुली, रामगामचे कोलिय, वेठदीपाचा ब्राह्मण आणि पावाचे मल्ल यांनीही दूत पाठवले आणि स्वतःही चतुरंग सेनेसह निघाले. तेथे पावेय्यक हे सर्वांत जवळ होते, जे कुसिनारापासून तीन गाऊ अंतरावरील नगरात राहत होते. भगवंतही पावा नगरात प्रवेश करून कुसिनाराला गेले होते. हे राजे मोठ्या लवाजम्यासह प्रवास करत असल्यामुळे मागे राहिले होते. ते सर्व सात नगरांचे रहिवासी तेथे आले आणि "आम्हाला धातू द्या किंवा युद्ध करा," असे म्हणून त्यांनी कुसिनारा नगराला वेढा घातला। ตโต มลฺลราชาโนเอตทโวจุํ-ภควาอมฺหากํคามกฺเขตฺเต ปรินิพฺพุโต, น มยํ สตฺถุ สาสนํ ปหิณิมฺห น คตฺตฺวา อานยิมฺห. สตฺถา ปส สยเมว อาคนฺตฺวา สาสนํ เปเสตฺวา อมฺเห ปกฺโกสเปสิ ตุมฺเหปิ โข ปน ยํ ตุมฺหากํ คามกฺเขตฺเต รตนํ อุปฺปชฺชติ น ตํ อมฺหากํ เทถ สเทวเก โลเก พุทฺธรตนสมํ รตนํ นาม นตฺถิ, เอวรูปํ. อุตฺตมํ รตนํ ลภิตฺวา มยํ น ทสฺสมาติ เอวํ เต กลหํ วฑฺเฒตฺวา น โข ปน ตุมฺเหหิเยว มาตุ ถนโต ขิรํ ปีตํ, อมฺเหหิปิ ปีตํ ตุมฺเหเยว ปุริสา อมฺเห น ปุริสา โหตุ โหตูติ อญฺญมญฺญํ อหํการํ กตฺวา สาสน ปฏิสาสนํ เปเสนฺตา อญฺญมญฺญํ มานคชฺชิตํ คชฺชึสุ ยุทฺเธ ปน สติ โกสินารกานํเยว ชโย อภวิสฺส, กสฺมา ธาตุปาสนตฺถํ อาคตา เทวตา เตสํ ปกฺขาอเหสุํ. त्यावर मल्ल राजे म्हणाले, "भगवंत आमच्या गावच्या हद्दीत परिनिर्वाण पावले आहेत. आम्ही शास्त्यांचा संदेश पाठवला नव्हता किंवा त्यांना जाऊन आणले नव्हते. शास्त्यांनी स्वतःच येथे येऊन, संदेश पाठवून आम्हाला बोलावले होते. तुमच्या स्वतःच्या गावच्या हद्दीत जे काही रत्न उत्पन्न होते, ते तुम्ही आम्हाला देत नाही. देवलोकासह संपूर्ण जगात बुद्धरत्नासारखे दुसरे कोणतेही रत्न नाही. असे हे उत्तम रत्न मिळाल्यावर आम्ही ते देणार नाही." अशा प्रकारे त्यांनी वाद वाढवला आणि म्हणाले, "केवळ तुम्हीच आईचे दूध प्यायलेले नाही, आम्हीही प्यायले आहे. तुम्हीच काय ते पुरुष आहात आणि आम्ही पुरुष नाही काय? ठीक आहे, जे होईल ते होईल!" असा एकमेकांवर अहंकार दाखवून, निरोप आणि प्रतिनिरोप पाठवून त्यांनी एकमेकांवर गर्जना केली. जर युद्ध झाले असते, तर कुसिनाराच्या लोकांचाच विजय झाला असता, कारण धातूंच्या पूजेसाठी आलेल्या देवता त्यांच्या बाजूने होत्या। ตโต โทโณ พฺราหฺมโณ อิมํ วิวาทํ สุตฺวา เอเต ราชาโน ภควเต ปรินิพฺพุตฏฺฐาเน วิวิทํ กโรนฺติ น โข ปเนตํ ปติรูปํ อลํ อิมินา กลเหน จูปสเมสฺสามิ น นฺติ อุณฺณตปฺปเทเส ฐตฺวา ทฺเวภาณวารปริมาณํ โทณคชฺชิตํ นาม อโวจ ตตฺถ ปฏฺฐมกภาณวาเร ตาว เอกปทมฺปิ เต น ชานึสุ ทุติยก ภาณวาร ปริโยสาเน’อาจริยสฺส วิย โภสทฺโท, อาจริยสฺส วิย โภ สทฺโท’ติ สพฺเพ นี รวา อเหสุํ สกลชมฺพุทีปตเล กิร กุลฆเร ชาโต เยภุยฺเยน ตสฺส น อนฺเตวาสิโก นาม นตฺถิ อถ โส เต อตฺตโน วจนํ สุตฺวา ตุณฺหีภูเต วิทิตฺวา ปุน เอตทโวจ त्यानंतर दोण ब्राह्मणाने हा वाद ऐकला आणि विचार केला, "हे राजे भगवंतांच्या परिनिर्वाणाच्या ठिकाणी वाद घालत आहेत, हे मुळीच योग्य नाही. हा वाद पुरे झाला, मी हा वाद शांत करतो." असे म्हणून तो एका उंच जागेवर उभा राहिला आणि त्याने दोन भाणवार लांबीचे 'दोणगर्जित' नावाचे भाषण केले. त्यातील पहिल्या भाणवाराच्या वेळी त्यांना एक शब्दही समजला नाही. दुसऱ्या भाणवाराच्या शेवटी, "हा तर आचार्यांसारखाच आवाज आहे, आचार्यांसारखाच आवाज आहे!" असे म्हणून सर्वजण शांत झाले. संपूर्ण जम्बुदीपात कुलीन घराण्यात जन्मलेला असा बहुधा कोणीच नव्हता जो त्याचा शिष्य नव्हता. त्यानंतर, आपले बोलणे ऐकून ते शांत झाले आहेत हे पाहून तो पुन्हा म्हणाला: ‘‘สุณนฺตุ โภนฺโต มม เอกวากฺยํอมฺหากํ พุทฺโธ อหุ ขนฺติวาโท,น หิ สาธยํ อุตฺตม ปุคฺคลสฺสสรีรภงฺเค สิยา สมฺปหาโรสพฺเพว โภนฺโต สหิตา สมคฺคาสมฺโมทมานา กโรมฏฺฐภาเค,วิตฺถาริกา โหนฺตุ ทิสายุ ถูปาพหุชฺชโน จกฺขุมโต ปสนฺโน’’ติ; "हे महाशयांनो, माझे एक वाक्य ऐका. आपले बुद्ध हे खंतिवादी (क्षमावादी) होते. अशा उत्तम पुद्गलाच्या शरीराच्या अवशेषांवरून (धातूंवरून) संघर्ष होणे योग्य नाही. आपण सर्वजण एकत्र येऊन, संघटित होऊन आणि आनंदाने या धातूंचे आठ भाग करूया. सर्व दिशांना स्तूप उभारले जावेत, जेणेकरून त्या ज्ञानचक्षू असलेल्या बुद्धांवर बहुजन प्रसन्न (श्रद्धावान) होतील।" ตตฺรายมตฺโถ ‘‘อมฺหากํ พุทฺโธ อหุ ขนฺติวาโท‘‘ติ พุทฺธภูมึ อปฺปตฺวาปิ ปารมิโย ปูเรนฺโต ขนฺติวาท ตาปสกาเล ธมฺมปาลกุมาร กาเล ฉทฺทนฺตหตฺถิกาเล ภูริทตฺต นาคราช กาเล จมฺเปยฺย นาคราช กาเล สงฺขปาล นาคราช กาเล มหากปิกาเล อญฺเญสุปิ พหูสุ ชาตเกสุ ปเรสุ โกปํ อกตฺวา ขนฺติเมว อกาสิ. ขนฺติเมว วณฺณยิ, กิมงฺค ปน เอตรหิ อิฏฺฐานิฏฺเฐสุ ตาทิลกฺขณํ ปตฺโต สพฺพถาปิ อมฺหากํ พุทฺโธ ขนฺติวาโท อโหสิ. येथे हा अर्थ आहे - "आपले बुद्ध हे खंतिवादी होते" म्हणजे बुद्धत्व प्राप्त होण्यापूर्वीही, पारमिता पूर्ण करत असताना, खंतिवाद तापसाच्या काळात, धम्मपाल कुमाराच्या काळात, छद्दंत हत्तीच्या काळात, भूरिदत्त नागराजाच्या काळात, चंपेय्य नागराजाच्या काळात, संखपाल नागराजाच्या काळात, महाकपीच्या काळात आणि इतर अनेक जातकांमध्ये त्यांनी इतरांवर क्रोध न करता केवळ क्षमाच (शांतीच) बाळगली. त्यांनी क्षमेचीच प्रशंसा केली. मग आता तर इष्ट आणि अनिष्ट गोष्टींमध्ये तादिलक्षण (समता) प्राप्त केल्यावर काय सांगावे! सर्व प्रकारे आपले बुद्ध हे खंतिवादीच होते। ตสฺส เอวํ วิธสฺส น หิ สาธย อุตฺตมปุคฺคลสฺส สรีรภงฺเค สิยา สมฺปหาโร, ‘‘น หิ สาธยนฺติ‘‘น หิ สาธุ อยํ, ‘‘สรีรภงฺเคติ สรีร ภงฺคนิมิตฺตํ ธาตุโกฏฺฐาสเหตูติ อตฺโถ ‘‘สิยา สมฺปหาโร‘‘ติ อายุธ สมฺปหาโร น หิ สาธุ สิยาติ วุตฺตํ โหติ. ‘‘สพฺเพว โภนฺโต สหิตา‘‘ติ สพฺเพว ภวนฺโต สหิตา โภถ มา ภิชฺชิตฺถ. ‘‘สมคฺคาติ‘‘ กาเยน วาจาย จ เอกสนฺนิปาตา เอกวจนา สมคฺคา โภถ ‘‘สมฺโมทมานา‘‘ติ จิตฺเตนาปิ อญฺญมญฺญํ โมทมานา โภถ.’กโรมฏฺฐภาเค‘‘ติ ภควตา สรีรานิ อฏฺฐภาเค กโรม. ‘‘จกฺขุมโต‘‘ติ ปญฺจหิ จกฺขุหี จกฺขุตา พุทฺธสฺส, น เกวลํ ตุมฺเหเยว พหุชฺชโน ปสนฺโน เตสุ เอโกปิ ลทฺธุ อยุตฺโต นาม นตฺถิติ พหุํ การณํ วตฺวา สญฺญาเปสิ. अशा प्रकारच्या "त्या उत्तम पुद्गलाच्या शरीराच्या अवशेषांवरून संघर्ष होणे योग्य नाही" यातील "न हि साधयन्ति" म्हणजे "हे मुळीच योग्य नाही." "शरीरभंगे" म्हणजे शरीराच्या विघटनामुळे मिळालेल्या धातूंच्या वाटणीच्या कारणावरून. "सिया संपहारो" म्हणजे शस्त्रास्त्रांचा संघर्ष होणे मुळीच योग्य नाही, असा अर्थ आहे. "सब्बेव भोन्तो सहिता" म्हणजे आपण सर्वजण एकत्र व्हा, विभक्त होऊ नका. "समग्गा" म्हणजे काया आणि वाचेने एकत्र येऊन, एकमताने संघटित व्हा. "समोदमाना" म्हणजे मनानेही एकमेकांशी आनंदाने वागा. "करोमट्ठभागे" म्हणजे भगवंतांच्या शरीराचे (धातूंचे) आपण आठ भाग करूया. "चक्खुमतो" म्हणजे पाच चक्षूंनी युक्त असलेल्या बुद्धांवर केवळ तुम्हीच नाही, तर बहुजन श्रद्धा ठेवून आहेत, त्यांच्यापैकी एकालाही काही न मिळणे अयोग्य आहे, असे अनेक विचार मांडून त्याने सर्वांना शांत केले। อถ สพฺเพปิ ราชาโน เอวมาหํสุ-เตน หิ พฺราหฺมณ ตฺวญฺเญว ภควโต สรีรานิ อฏฺฐธา สมํ สุวิภตฺตํ วิภชาหีติ. เอวํ โภติ โข โทโณ พฺราหฺมโณ เตสํ ราชูนํ ปฏิสฺสุตฺวา ธาตุโย สมํ สุวิภตฺตํ วิภชิ. तेव्हा सर्व राजे असे म्हणाले—"तर मग, हे ब्राह्मणा, तुम्हीच भगवंतांच्या शरीर-धातूंचे आठ समान आणि सुविभक्त भाग करा." "तथास्तु, महाशयानो!" असे म्हणून द्रोण ब्राह्मणाने त्या राजांचे म्हणणे मान्य केले आणि धातूंचे समान व सुविभक्त भाग केले. ตตฺรายมนุกฺกโม โทโณ กิร เตสํ ปฏิสฺสุตฺวา สุวณฺณโทณึ วิวราเปสิ. ราชาโน อาคนฺตฺวา โทณิยํ เยวตา สุวณฺณวณฺณา ธาตุโย ทิสฺวา ภควา สพฺพญฺญุ ปุพฺเพ มยํ ตุมฺหากํ ทฺวตฺตึส ลกฺขณ ปติมณฺฑิตํ ฉพฺพณฺณพุทฺธรสฺมิขจิตํ สุวณฺณวณฺณํ สรีรํ อทฺทสาม อิทานิ ปน สุวณฺณวณฺณา ธาตุโยว อวสิฏฺฐา ชาตา, น ยุตฺตมิทํ ภควา ตุมฺหากนฺติ ปริเทวึสุ. พฺราหฺมโณ ตสฺมึ สมเย เตสํ ปมตฺตภาวํ ญตฺวา ทกฺขิณทาฐํ คเหตฺวา เวฐนฺตเร ฐเปสิ อถ ปจฺฉา สมํ สุวิภตฺตํ วิภชิ. สพฺพาปิ ธาตุโย ปากติก นาฬิยา โสฬส นาฬิโย อโหสุํ. เอเกก นครวาสิโน ทฺเว ทฺเว นาฬิโย ลภึสุ. त्या प्रसंगी असा क्रम होता की, द्रोणाने त्यांचे म्हणणे मान्य करून सोन्याचे भांडे उघडले. राजांनी जवळ येऊन त्या भांड्यात सुवर्णवर्णी धातू पाहिले आणि विलाप केला, "हे सर्वज्ञ भगवंता! पूर्वी आम्ही आपले बत्तीस महापुरुष लक्षणांनी सुशोभित, सहा रंगांच्या बुद्ध-रश्मींनी वेढलेले सुवर्णवर्णी शरीर पाहिले होते; परंतु आता केवळ सुवर्णवर्णी धातूच शिल्लक राहिले आहेत. हे भगवंता, आपल्या बाबतीत हे योग्य नाही." ब्राह्मणाने त्या वेळी त्यांचा गाफीलपणा पाहून उजवा सुळा (दाढ) काढून आपल्या पगडीच्या घडीत लपवून ठेवला. त्यानंतर त्याने धातूंचे समान व सुविभक्त भाग केले. सर्व धातू मिळून नेहमीच्या मापाने सोळा मापे झाले. प्रत्येक नगरवासीयांना दोन-दोन मापे मिळाले. พฺราหฺมณสฺส ปน ธาตุโย วิภชนฺตสฺเสว สกฺโก เทวานมินฺโท เกน นุ โข สเทวกสฺส โลกสฺส กงฺขาจฺเฉทนาย จตุสจฺจกถาย ปจฺจยภูตา ภควโต ทกฺขิณทาฐา คหิตาติ โอโลเกนฺโต พฺราหฺมเณน คหิตาติ ทิสฺวา พฺราหฺมโณ ทาฐาย อนุจฺฉวิกํ สกฺการํ กาตุํ น สกฺขิสฺสติ คณฺหามิ นนฺติ เวฐนฺตรโต คเหตฺวา สุวณฺณ จงฺโคฏเก ฐเปตฺวา เทวโลกํ เนตฺวา จุฬามณี เจติเย ปติฏฺฐาเปสิ พฺราหฺมโณปิ ธาตุโย วิภชิตฺวา ทาฐํ อปสฺสนฺโต เกน เม ฐา คหิตาติ ปุจฺฉิตุมฺปิ นาสกฺขิ. นนุ ตยา ธาตุโย วิภชิตา, กึ ตฺวํ ปฐมํเยว อตฺตโน ธาตูหิ อตฺถิภาวํ น อญฺญาสีติ, อตฺตนิ โทสาโรปนํ สมฺปสฺสมาโน มยฺหมฺปิ โกฏฺฐาสํ เทถาติ วตฺตุมฺปิ นาสกฺขิ. ब्राह्मण धातूंचे विभाजन करत असतानाच, देवराज शक्राने विचार केला, "देवलोकासह संपूर्ण जगाची शंका दूर करण्यासाठी आणि चार आर्यसत्यांच्या उपदेशाचे कारण बनलेली भगवंतांची उजवी दाढ कोणी घेतली आहे?" असे पाहत असताना त्याला दिसले की ती ब्राह्मणाने घेतली आहे. "हा ब्राह्मण या दाढेचा योग्य तो सत्कार करू शकणार नाही, म्हणून मी ती घेतो," असा विचार करून त्याने ती पगडीच्या घडीतून काढून घेतली, सोन्याच्या करंडकात ठेवली आणि देवलोकात नेऊन चूडामणी चैत्यात प्रस्थापित केली. ब्राह्मणानेही धातूंचे विभाजन केल्यावर दाढ न दिसल्याने, "माझी दाढ कोणी घेतली?" असे विचारण्याचे धाडस तो करू शकला नाही. "तूच तर धातूंचे विभाजन केलेस, मग तुला आधीच स्वतःच्या वाट्याला आलेल्या धातूंच्या अस्तित्वाबद्दल माहिती नव्हती का?" असा स्वतःवर दोषारोप होईल या भीतीने, "मलाही एक हिस्सा द्या," असे म्हणण्याचे धाडसही तो करू शकला नाही. ตโต อยํ สุวณฺณกุมฺโภปิ ธาตุคติโกเยว เยน ตถาคตสฺส ธาตุโย มินิตา. อิมสฺสาหํ ถูปํ กริสฺสามีติ จินฺเตตฺวา อิมํ เม โภนฺโต กุมฺภํ ททนฺตูติ อาห ตโต ราชาโน พฺราหฺมณสฺส กุมฺภมทํสุ ปิปฺผลิวนิยาปิ โข โมริยา ภควโต ปรินิพฺพุตภาวํ สุตฺวา ภควาปิ ขตฺติโย, มยมฺปิ ขตฺติโย มยมฺปิ, อรหาม ลภิตุํ ภควโต สรีรานํ ภาคนฺติ ทูตํ เปเสตฺวา ยุทฺธ สชฺชา นิกฺขมิตฺวา อาคตา เตสํ ราชาโน เอวมาหํสุ - นตฺถิ ภควโต สรีรานํ ภาโค, วิภตฺตานิ ภควโต สรีรานิ อิโต องฺคารํ ครถาติ. เต ตโต องฺคารํ หรึสุ. त्यानंतर, "हा सोन्याचा कुंभ देखील धातूंच्याच श्रेणीतील आहे, ज्याने तथागतांच्या धातूंचे मापन केले गेले आहे. मी यावर स्तूप बांधीन," असा विचार करून तो म्हणाला, "महाशयानो, हा कुंभ मला द्या." तेव्हा राजांनी तो कुंभ ब्राह्मणाला दिला. पिप्पलीवनाचे मोरिय देखील भगवंतांच्या परिनिर्वाणाची बातमी ऐकून, "भगवंतही क्षत्रिय होते आणि आम्हीही क्षत्रिय आहोत. म्हणून आम्हीही भगवंतांच्या शरीर-धातूंचा हिस्सा मिळण्यास पात्र आहोत," असा संदेश देऊन दूत पाठवून, युद्धाच्या तयारीने निघाले आणि तेथे आले. राजांनी त्यांना असे सांगितले, "भगवंतांच्या शरीर-धातूंचा आता कोणताही हिस्सा उरलेला नाही, भगवंतांच्या शरीर-धातूंचे विभाजन झाले आहे. तुम्ही येथून अंगार (कोळसे) घेऊन जा." तेव्हा त्यांनी तेथून अंगार नेले. อถ โข ราชา อชาตสตฺตุ กุสินาราย จ ราชคหสฺส จ อนฺตเร ปญฺจวีสติ โยชนมคฺคํ อฏฺฐ อุสภวิตฺถตํ สมตลํ กาเรตฺวา สาทิสํ มลฺลราชาโน มกุฏพณฺธนสฺส จ สนฺถาคารสฺส จ อนฺตเร ปูชํ กาเรสุํ ตาทิสํ ปญฺจวีสติโยชเนปิ มคฺเค ปูชา กาเรตฺวา โลกสฺส อนุกฺกณฺฐนตฺถํ สพฺพตฺถ อนฺตราปเณ ปสาเรตฺวา สุวณฺณโทณิยํ ปกฺขิตฺตธาตุโย สตฺติปญฺชเรน ปริกฺขิปาเปตฺวา อตฺตโน วิชิเต ปญฺจโยชนสต ปริมณฺฑเล มนุสฺเส สนฺนิปาตาเปสิ. त्यानंतर राजा अजातशत्रूने कुसिनारा आणि राजगृह यांच्यामधील पंचवीस योजन लांबीचा आणि आठ उसभ रुंदीचा मार्ग समतल करून घेतला. मल्ल राजांनी मुकुटबंधन आणि संथागार यांच्यामध्ये जशी पूजा केली होती, तशीच पूजा त्या पंचवीस योजन लांबीच्या मार्गावरही करवून घेतली. लोकांच्या आनंदासाठी सर्वत्र बाजारपेठा सजवल्या आणि सोन्याच्या द्रोणीत ठेवलेल्या धातूंना भाल्यांच्या पिंजऱ्याने वेढून घेतले, आणि आपल्या राज्यातील पाचशे योजन परिघातील लोकांना एकत्र बोलावले. เต ธาตุโย คเหตฺวา กุสินาราโต ธาตุกีฬํ กีฬนฺตา นิกฺขมิตฺวา ยตฺถ ยตฺถ วณฺณวนฺตานิ ปุปฺผานิ ปสฺสนฺติ, ตตฺถ ตตฺถ ธาตุโย สตฺติ อนฺตเร ฐเปตฺวา เตสํ ปุปฺผานํ ขีณกาเล คจฺฉนฺติ. รถสฺส ธุรฏฺฐานํ ปจฺฉิมฏฺฐาเน สมฺปตฺเต สตฺต ทิวเส สาธุกีฬํ กีฬนฺติ เอวํ ธาตุโย คเหตฺวา อาคจฺฉนฺตานํ สตฺตวสฺสานิ สตฺตมาสานิ สตฺต จ ทิวสานิ วิติวตฺตานิ มิจฺฉาทิฏฺฐิกา สมณสฺส โคตมสฺส ปรินิพฺพุต กาลโต ปฏฺฐาย พลกฺกาเรน สาธุกีฬิกาย อุปทฺทุตมฺหา, สพฺเพ โน กมฺมนฺตา นฏฺฐาติ อุชฺฌายนฺตา มนํ ปทูเสตฺวา ฉฬาสีติสหสฺสมตฺตา อปาเย นิพฺพตฺตา, ขีณาสว อาวชฺชิตฺวา มหาชโน มนํ ปทูเสตฺวา อปาเย นิพฺพตฺโตติ สกฺกํ เทวราชานํ ทิสฺวา ธาตุ อาหรณุปายํ กริสฺสามาติ ตสฺส สนฺติกํ คนฺตฺวา ตมตฺถํ อาโรเจตฺวา ธาตุ อาหรณุปายํ กาโรหิ มหาราชาติ อาหํสุ. สกฺโก อาห ‘‘ปุถุชฺชโน นาม อชาตสตฺตุนา สโม สทฺโธ นตฺถิ, น โส มม วจนํ กริสฺสติ อปิ จ โข มารวิภิสกสทิสํ วิภีสกํ ทสฺเสสฺสามิ ยกฺข คาหก ขิปนก อโรจเก กริสฺสามิ ตุมฺเห ’มหาราช อมนุสฺสา กุปิตา, ธาตุโย อาหราเปถาติ’. วเทยฺยาถ เอวํ โส อาหราเปสฺสตีติ. อถ โข สกฺโก ตํ สพฺพํ อกาสิ. ते धातू घेऊन कुसिनाराहून 'धातू-महोत्सव' साजरा करत निघाले. जिथे जिथे त्यांना सुंदर फुले दिसत, तिथे तिथे ते भाल्यांच्या मध्ये धातू ठेवून, ती फुले कोमेजेपर्यंत थांबत आणि मग पुढे जात. रथाचे पुढचे टोक मागच्या टोकापर्यंत पोहोचल्यावर ते सात दिवस उत्सव साजरा करत. अशा प्रकारे धातू घेऊन येणाऱ्यांना सात वर्षे, सात महिने आणि सात दिवस उलटून गेले. "श्रमण गोतमांच्या परिनिर्वाणापासून आम्हाला बळजबरीने या उत्सवाचा त्रास दिला जात आहे, आमचे सर्व कामधंदे नष्ट झाले आहेत," असा विचार करून संतापलेले आणि मन कलुषित केलेले सुमारे शहाऐंशी हजार मिथ्यादृष्टी लोक अपायलोकात (नरकात) उत्पन्न झाले. क्षीणासवांनी ध्यान करून पाहिले की, बहुसंख्य लोक मन कलुषित करून अपायलोकात उत्पन्न होत आहेत. त्यांनी देवराज शक्राला पाहून विचार केला, "आम्ही धातू परत आणण्याचा उपाय करू." ते शक्राकडे गेले आणि त्याला ही हकीकत सांगून म्हणाले, "हे महाराज, धातू परत आणण्याचा काहीतरी उपाय करा." शक्र म्हणाला, "पृथग्जनांमध्ये अजातशत्रूसारखा श्रद्धाळू दुसरा कोणी नाही. तो माझे ऐकणार नाही. परंतु, मी माराच्या भीतीसारखे भयानक रूप दाखवीन, यक्ष, पिशाच आणि रोगराई निर्माण करीन. तुम्ही त्याला म्हणा, 'महाराज, अमणुष्य संतप्त झाले आहेत, धातू परत आणा.' असे केल्यास तो धातू परत आणेल." त्यानंतर शक्राने ते सर्व केले. เถราปิ ราชานํ อุปสงฺกมิตฺวา มหาราช อมนุสฺสา กุปิตํ, ธาตุโย อาหราเปหีติ ภณึสุ ราชา น ตาว ภนฺเต มยฺหํ จิตฺตํ ตุสฺสติ. เอวํ สนฺเตปิ อาหรตูติ อาห สตฺตเม ทิวเส ธาตุโย อาหรึสุ. เอวํ อาหตธาตุโย คเหตฺวา ราชา ราชคเห ถุปมกาสิ อิตเรปิ ราชาโน อตฺตโน อตฺตโน พลานุรูเปน นีหริตฺวา สกสกฏฺฐาเน ถูปมกํสุ. โทณิปิ พฺราหฺมโณ ปิผฺผลีวนิยาปิ โมริยา สกสกฏฺฐาเน ถูปมกํสูติ. थेर देखील राजाकडे गेले आणि म्हणाले, "महाराज, अमणुष्य संतप्त झाले आहेत, धातू परत आणा." राजा म्हणाला, "भंते, माझे मन अजून तृप्त झालेले नाही. तरीही, असे असेल तर धातू परत आणावेत." सातव्या दिवशी धातू परत आणण्यात आले. अशा प्रकारे आणलेले धातू घेऊन राजाने राजगृहात स्तूप बांधला. इतर राजांनीही आपापल्या शक्तीनुसार धातू नेऊन आपापल्या ठिकाणी स्तूप बांधले. द्रोण ब्राह्मणाने आणि पिप्पलीवनाच्या मोरियानेही आपापल्या ठिकाणी स्तूप बांधले. เอโก ถูโป ราชคเห - เอโก เวสาลิยา ปุเร,เอโก กปิลวตฺถุสฺมึ - เอโก จ อลฺลกปฺปเก; एक स्तूप राजगृहात, एक वैशाली नगरात, एक कपिलवस्तूत आणि एक अल्लकप्पमध्ये; เอโก ถูโป รามคาเม - เอโก จ เวฐทีปเก,เอโก ปาเจยฺยเก มลฺเล - เอโก จ กุสินารเก; एक स्तूप रामगामात, एक वेठदीपात, एक पावेय्यक मल्लांमध्ये आणि एक कुसिनारात; เย เต สารีริกา ถูปา - ชมฺพุวทีเป ปติฏฺฐิตา; องฺคารกุมฺภถูเปหิ - ทส ถูปา ภวนฺติ เต; जे हे शारीरिक स्तूप जंबूद्गीपात प्रस्थापित आहेत; अंगार स्तूप आणि कुंभ स्तूपासह ते एकूण दहा स्तूप होतात; ทสาปิ ถูปา ปุริสุตฺตมสฺส เย-ยถานุรูปํ นรราช ปูชิตา,สพฺเพน โลเกน สเทวเกน เต-นมสฺสเนยฺยาจ ภวนฺติ สพฺพทาติ; पुरुषोत्तमाचे जे हे दहाही स्तूप आहेत, जे नरराजांनी यथाशक्ती पूजिले आहेत, देवलोकासह संपूर्ण जगाकडून ते नेहमीच वंदनीय आहेत. ทสถูปกถา दहा स्तूपांची कथा. ๑๐. เอวํ ปติฏฺฐิเตสุ ปน ถูเปสุ มหากสฺสปตฺเถโร ธาตูนํ อนฺตรายํ ทิสฺวา อชาตสตฺตุํ อุปสงฺกมิตฺวา มหาราช เอกํ ธาตุนิธานํ กาตุํ วฏฺฏติติ อาห สาธุ ภนฺเต นิธานกมฺมํ ตาว มม โหตุ, ธาตุโย ปน กถํ อาหราเปมิติ. น มหาราช ธาตุ อาหรณํ ตุยฺหํ ภาโร, อมฺหากํ ภาโรติ. สาธุ ภนฺเต ตุมฺเห ธาตุโย อาหรถ. อหํ ธาตุนิธานํ กริสฺสามีติ. เถโร เตสํ เตสํ ราชกุลานํ ปริจรณมตฺตกเมว ฐเปตฺวา เสเสธาตุโย อาหริ. १०. अशा प्रकारे स्तूप स्थापित झाल्यावर, महाकस्सप थेरांनी धातूंच्या (अस्थि-अवशेषांच्या) सुरक्षेला धोका असल्याचे पाहून अजातशत्रू राजाकडे जाऊन म्हटले, "महाराज, धातूंचे एक सुरक्षित निधान (गुप्त ठेवा) करणे योग्य ठरेल." राजा म्हणाला, "उत्तम आहे, भंते! निधानाचे काम तर माझे असू द्या, परंतु धातू कशा प्रकारे आणायचे?" थेर म्हणाले, "महाराज, धातू आणण्याची जबाबदारी तुमची नाही, ती आमची जबाबदारी आहे." राजा म्हणाला, "उत्तम आहे, भंते! आपण धातू घेऊन या. मी धातूंचे निधान करीन." त्यानंतर थेरांनी त्या त्या राजघराण्यांच्या पूजेसाठी केवळ थोडा भाग ठेवून उर्वरित सर्व धातू आणले. รามคาเม ปน ธาตุโย นาคา คณฺหึสุ ตาสํ อนฺตราโย นตฺถิ, อนาคเต ลงฺกาทีเป มหาวิหาเร มหาเจติยมฺหิ นิธิยิสฺส นีติ. ตา น อาหริตฺถ, เสเสหิ สตฺตหิ นคเรหิ อาหริตฺวา ราชคหสฺส ปาจีน ทกฺขิน ทิสาภาเค ฐเปตฺวา อิมสฺมึ ฐาเน โย ปาสาโณ อตฺถิ, โส อนฺตรธายตุ, ปํสุ สุวิสุทฺธา โหตุ, อุทกญฺจ มา อุฏฺฐหตูติ อธิฏฺฐาสิ. रामगामातील धातू नागलोकांनी घेतले होते, त्यांना कोणताही धोका नव्हता; कारण भविष्यात लंकाद्वीपातील महाविहाराच्या महाचेतियामध्ये (महास्तूपात) ते प्रस्थापित केले जाणार होते. म्हणून ते धातू आणले नाहीत. उर्वरित सात नगरांतून धातू आणून, राजगहाच्या पूर्व-दक्षिण दिशेला ठेवून, "या ठिकाणी जो दगड आहे तो नाहीसा होवो, माती अत्यंत शुद्ध होवो आणि पाणी वर येऊ नये," असा त्यांनी (थेरांनी) अधिष्ठान केला. ราชา ตํ ฐานํ ขณาเปตฺวา ตโต อุทฺธฏ ปํสุนา อิฏฺฐิกา กาเรตฺวา อสีติ มหาสาวกานํ ถูเป กาเรติ อิธ ราชา กึ กาเรหีติ ปุจฺฉนฺตานมฺปิ มหาสาวกานํเจติยา นีติ วทนฺติ น โกจิ ธาตุนิธานภาวํ ชานาติ อสีติหตฺถคมฺภีเร ปน ตสฺมึ ปเทเส ชาเต เหฏฺฐา โลภสตฺถรํ สตฺถราเปตฺวา ตตฺถ ถูปาราเม เจติย ฆรปฺปมาณํ ตมฺพโลหมยํ เคหํ การาเปตฺวา อฏฺฐฏฺฐ หริ จณฺทนาทิมเย กรณฺเฑ จ ถูเป จ การาเปสิ. राजाने ती जागा खोदून घेतली आणि तेथून काढलेल्या मातीपासून विटा बनवून ऐंशी महाश्रावकांचे स्तूप बांधले. "येथे राजा काय करत आहे?" असे विचारणाऱ्या लोकांनाही, "हे महाश्रावकांचे चेतिय (स्तूप) आहेत," असे सांगितले जात असे. कोणालाही तेथे धातूंचे निधान केले जात असल्याचे माहीत नव्हते. तो खड्डा ऐंशी हात खोल झाल्यावर, खाली लोखंडाचा थर पसरवून, तेथे थूपारामातील चेतिय-घराच्या (स्तूपगृहाच्या) आकाराचे तांब्याचे घर बांधले आणि त्यात पिवळ्या चंदनाचे (हरिचंदन) प्रत्येकी आठ करंडे आणि आठ स्तूप तयार करवून घेतले. อถ โข ภควโต ธาตุโย หริจณฺทน กรณฺเฑ ปกฺขิปิตฺวา ตํ หริจณฺทนํ กรณฺฑํ อญฺญสฺมึ หริจณฺทน กรณฺเฑ ตมฺปิ อญฺญสฺมินฺติ เอวํ อฏฺฐ หริจณฺทน กรณฺเฑ เอกโต กตฺวา เอเตเนว อุปาเยน อฏฺฐ กรณฺเฑ อฏฺฐสุ หริจณฺทน ถูเปสุ อฏฺฐ หริจณฺทนถูเป อฏฺฐสุ โลหิตจณฺทน กรณฺเฑสุ, อฏฺฐ โลหิตจณฺทนกรณฺเฑ อฏฺฐสุ โลหิตจณฺทนถูเปสุ, อฏฺฐโลหิต จณฺทนถูเป อฏฺฐสุ ทนฺตกรณฺเฑสุ, อฏฺฐ ทนฺตกรณฺเฑ อฏฺฐสุ ทนฺตถูเปสุ, อฏฺฐทนฺตถูเป อฏฺฐสุสพฺพ รตนกรณฺเฑสุ, อฏฺฐ สพฺพ รตนกรณฺเฑ อฏฺฐสุ สพฺพรตนถูเปสุ, อฏฺฐ สพฺพรตน ถูเป อฏฺฐสุ สุวณฺณกรณฺเฑสุ. อฏฺฐสุวณฺณกรณฺเฑ อฏฺฐสุ สุวณฺณถูเปสุ, อฏฺฐสุวณฺณถูเป อฏฺฐสุรชตกรณฺเฑสุ, อฏฺฐ รชตกรณฺเฑ อฏฺฐสุ รชตถูเปเส อฏฺฐ รชตถูเป อฏฺฐสุ มณิกรณฺเฑสุ อฏฺฐมณิกเรณฺฑอฏฺฐสุวณฺณถูเปสุ, อฏฺฐ มณิถูเป อฏฺฐสุ โลหิตงฺก กรณฺเฑสุ, อฏฺฐโลหิตงฺก กรณฺเฑ อฏฺฐสุ โลหิตงฺกถูเปสุ, อฏฺฐ โลหิตงฺกถูเป อฏฺฐสุ มสารคลฺลถูเปสุ, อฏฺฐ มสารคลฺลถูเป อฏฺฐสุ ผลิก กรณฺเฑสุ, อฏฺฐ ผฬิก กรณฺเฑ อฏฺฐสุ ผฬิกถูเปสุ ปกฺขิปิ สพฺพ อุปริมํ ผฬิกเจติยํ ถูปาราม เจติยปฺปมาณํ อโหสิ. त्यानंतर भगवंतांचे धातू पिवळ्या चंदनाच्या (हरिचंदन) करंड्यात ठेवले. तो हरिचंदनाचा करंडा दुसऱ्या हरिचंदनाच्या करंड्यात, तो तिसऱ्यात, अशा प्रकारे आठ हरिचंदनाचे करंडे एकावर एक ठेवून, याच पद्धतीने ते आठ करंडे आठ हरिचंदनाच्या स्तूपांमध्ये ठेवले. ते आठ हरिचंदन स्तूप आठ लाल चंदनाच्या (लोहितचंदन) करंड्यांमध्ये, ते आठ लाल चंदनाचे करंडे आठ लाल चंदनाच्या स्तूपांमध्ये, ते आठ लाल चंदनाचे स्तूप आठ हस्तिदंती करंड्यांमध्ये, ते आठ हस्तिदंती करंडे आठ हस्तिदंती स्तूपांमध्ये, ते आठ हस्तिदंती स्तूप आठ सर्वरत्नमय करंड्यांमध्ये, ते आठ सर्वरत्नमय करंडे आठ सर्वरत्नमय स्तूपांमध्ये, ते आठ सर्वरत्नमय स्तूप आठ सोन्याच्या करंड्यांमध्ये, ते आठ सोन्याचे करंडे आठ सोन्याच्या स्तूपांमध्ये, ते आठ सोन्याचे स्तूप आठ चांदीच्या करंड्यांमध्ये, ते आठ चांदीचे करंडे आठ चांदीच्या स्तूपांमध्ये, ते आठ चांदीचे स्तूप आठ मणींच्या करंड्यांमध्ये, ते आठ मणींचे करंडे आठ मणींच्या स्तूपांमध्ये, ते आठ मणींचे स्तूप आठ लोहितंक (लाल मणी) करंड्यांमध्ये, ते आठ लोहितंक करंडे आठ लोहितंक स्तूपांमध्ये, ते आठ लोहितंक स्तूप आठ मसारगल्ल स्तूपांमध्ये, ते आठ मसारगल्ल स्तूप आठ स्फटिक करंड्यांमध्ये आणि ते आठ स्फटिक करंडे आठ स्फटिक स्तूपांमध्ये ठेवले. सर्वात वरचे स्फटिक चेतिय (स्तूप) हे थूपारामातील चेतियच्या आकाराचे होते. ตสฺส อุปริสพฺพรตนมยํ เคหํ กาเรสิ ตสฺส อุปริ สุวณฺณมยํ, ตสฺส อุปริ รชตมยํ, ตสฺส อุปริ ตมฺพโลหมยํ เคหํ กาเรสิ ตตฺถ สพฺพรตนมยํ วาลุกํ โอกิริตฺวา ชลช ถลช ปุปฺผานํ สหสฺสานิ วิปฺปกิริตฺวา อทฺธจฺฉฏฺฐานิ ชาตกสตานิ อาสีติ มหาเถเร สุทฺโธทน มหาราชานํ มหามายาเทวึ สตฺต สหชาเต สพฺพาเนตานิ สุวณฺณมยาเนว กาเรสิ ปญฺจปญฺจสเต สุวณฺณรชตมเย ปุณฺณฆเฏ ฐปาเปสิ ปญฺจสุวณฺณธชสเต ปญฺจสเต สุวณฺณทีปเก จ การาเปตฺวา สุคณฺธเตลสฺส ปูเรตฺวา เตสุ ทุกูลวฏฺฏิโย ฐเปสิ. त्याच्यावर सर्वरत्नमय घर बांधले, त्याच्यावर सोन्याचे, त्याच्यावर चांदीचे आणि त्याच्यावर तांब्याचे घर बांधले. तेथे सर्वरत्नमय वाळू पसरवून, पाण्यात आणि जमिनीवर उगवणाऱ्या हजारो फुलांची उधळण केली. साडेपाचशे जातक कथा, ऐंशी महाथेर, शुद्धोदन महाराज, महामाया देवी आणि सात सहजात (भगवंतांसोबत जन्मलेले सात जण) या सर्वांच्या मूर्ती सोन्याच्याच बनवल्या. पाच-पाचशे सोन्याचे व चांदीचे पूर्णघट (कलश) ठेवले. पाचशे सोन्याचे ध्वज आणि पाचशे सोन्याचे दिवे तयार करवून, ते सुगंधित तेलाने भरले आणि त्यात रेशमी कापडाच्या वाती ठेवल्या. อถายสฺมา มหากสฺสโป มาลา มา มิลายนฺตุ. คณฺธา มา วินสฺสนฺตุ, ทีปา มา วิชฺฌายนฺตูติ อธิฏฺฐหิตฺวา สุวณฺณปฏฺฏอกฺขรานิ ฉิณฺทาเปสิ. อนาคเต ปิยทาโส นาม กุมาโร ฉตฺตํ อุสฺสาเปตฺวา อโสโก นาม ธมฺมราชา ภวิสฺสติ โส อิมํ ธาตุโย วิตฺถาริกา กริสฺสตีติ ราชา สพฺพปสาธเนหิ ปูเชตฺวา อาทิโต ปฏฺฐาย ทฺวารํ ปิทหนฺโต นิกฺขมิ ตมฺพโลหทฺวารํ ปิทหิตฺวา อาวิญฺชน รชฺชุยํ กุญฺจิกมุทฺทิกํ พณฺธิ ตตฺเถว มหนฺตํ มณิกฺขณฺธํ ฐเปสิ อนาคเต ทฬิทฺทราชาโน อิมํ มณึ คเหตฺวา ธาตูนํ สกฺการํ กโรนฺตูติ อกฺขรานิ ฉิณฺทาเปสี. तेव्हा आयुष्यमान महाकस्सपांनी "फुले सुकू नयेत, सुगंध नष्ट होऊ नये आणि दिवे विझू नयेत," असा अधिष्ठान केला. त्यांनी सोन्याच्या पट्टीवर अक्षरे कोरून घेतली: "भविष्यात प्रियदास नावाचा राजकुमार छत्र धारण करून अशोक नावाचा धर्मराज होईल, तो या धातूंचा विस्तार करील." राजाने सर्व अलंकारांनी पूजा करून सुरुवातीपासूनचे दरवाजे बंद करत बाहेर पडला. तांब्याचे मुख्य द्वार बंद करून, दोरीला कुलूप आणि किल्लीची मुद्रा बांधली. तेथेच एक मोठा मौल्यवान मणी ठेवला आणि "भविष्यात गरीब राजांनी हा मणी घेऊन धातूंचा सत्कार करावा," अशी अक्षरे कोरून घेतली. สกฺโก เทวราชา วิสฺสกมฺมํ อามนฺเตตฺวา’ตาต, อชาตสตฺตุนา ธาตุนิธานํ กตํ. เอตฺถ อารกฺขํ ฐเปหิ’ติ ปหิณิ โส อาคนฺตฺวา วาฬสงฺฆาฏยนฺตํ โยเชสิ. กฏฺฐรูปกานิ ตสฺมึ ธาตุคพฺเภ ผฬิกวณฺณ ขคฺเค คเหตฺวา วาตสทิเสน เวเคน อนุปริยายนฺตํ โยเชตฺวา เอกาย เอว อาณิวา พณฺธิตฺวา สมนฺตโต คิญฺชก วสถากาเรน สิลาปริกฺเขปํ กตฺวา อุปริ เอกาย ปิทหิตฺวา ปํสุํ ปกฺขิปิตฺวา ภูมึ สมํ กตฺวา ตสฺสุปริ ปาสาณถูปํ ปติฏฺฐาเปสิ. देवराज शक्राने विश्वकर्म्याला बोलावून सांगितले, "वत्सा, अजातशत्रूने धातूंचे निधान केले आहे. तेथे संरक्षणाची व्यवस्था कर." त्याने येऊन तेथे फिरणारे चक्र (यंत्र) बसवले. त्या धातूगर्भात लाकडी बाहुल्या हातात स्फटिकासारख्या रंगाच्या तलवारी घेऊन वाऱ्यासारख्या वेगाने फिरतील अशी योजना केली आणि त्यांना एकाच खिळ्याने बांधले. सभोवताली विटांच्या घरासारखे दगडांचे कुंपण बांधले, वरून एका मोठ्या दगडाने झाकून, माती टाकून जमीन सपाट केली आणि त्यावर एक पाषाणस्तूप स्थापित केला. ธาตุนิธาน กถา धातूनिधान कथा ๑๑. เอวํ นิฏฺฐิเต ธาตุนิธาเน ยาวตายุกํ ฐตฺวา เถโร ปรินิพฺพุโต, ราชาปิ ยถากมฺมํ คโต, เตปิ มนุสฺสา กาลกตา, อปรภาเค ปิยทาโส กุมาโร ฉตฺตํ อุสฺสาเปตฺวา อโสโก นาม ธมฺม ราชา หุตฺวา ตา ธาตุโย คเหตฺวา ชมฺพุทีเป จตุราสีติยา เจติย สหสฺเสสุ ปติฏฺฐาเปสิ. กถํ พิณฺทุสารสฺส กิร เอกสตํ ปุตฺตา อเหสุํ เต สพฺเพ อโสโก อตฺตนา สทฺธึ เอกมาติกํ ติสฺส กุมารํ ฐเปตฺวา ฆาเตสิ. ฆาเตนฺโต จตฺตาริ วสฺสานิ อนภิสิตฺโต รชฺชํ กาเรตฺวา จตุนฺนํ วสฺสานํ อจฺจเยน ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานโต ทฺวินฺนํ วสฺสสตานํ อุปริ อฏฺฐารสเม วสฺเส สกลชมฺพุทีเป เอกรชฺชาภิเสกํ ปาปุณิ. ११. अशा प्रकारे धातूंचे निधान पूर्ण झाल्यावर, थेर आपले आयुष्य पूर्ण करून परिनिर्वाण पावले. राजा देखील आपल्या कर्मानुसार परलोकी गेला आणि ते लोकही मृत्यू पावले. नंतरच्या काळात प्रियदास राजकुमार छत्र धारण करून अशोक नावाचा धर्मराज झाला आणि त्याने ते धातू काढून जंबुद्वीपातील चौऱ्याऐंशी हजार चेतियांमध्ये (स्तूपांमध्ये) प्रस्थापित केले. ते कसे? असे म्हटले जाते की, बिंदुसाराला शंभर पुत्र होते. अशोकाने स्वतःचा सख्खा भाऊ तिस्स कुमार याला सोडून त्या सर्वांना मारून टाकले. त्यांचा वध करत त्याने चार वर्षे राज्याभिषेकाशिवाय राज्य केले आणि चार वर्षांनंतर, तथागतांच्या परिनिर्वाणानंतर दोनशे अठराव्या वर्षी संपूर्ण जंबुद्वीपाचा सम्राट म्हणून त्याचा राज्याभिषेक झाला. อภิเสกานุภาเวน อิมา ราชิทฺธิโย อาคตา มหาปถวิยา เหฏฺฐา โยชนปฺปมาเณ อาณา ปวตฺติ, ตถา อุปริ อากาเส, อโนตตฺตทหโต อฏฺฐหิ กาเชหิ โสฬส ปานียฆเฏ ทิวเส ทิวเส เทวตา อาหรนฺติ. ยโต สาสเน อุปฺปนฺนสทฺโธ หุตฺวา อฏฺฐ ฆเฏ ภิกฺขุสงฺฆสฺส อทาสิ ทฺเว ฆเฏ สฏฺฐิมตฺตานํ ติปิฏก ภิกฺขุนํ ทฺเวฆเฏ อคฺคมเหสิยา อสณฺธิมิตฺตาย จตฺตาโร ฆเฏ อตฺตนา ปริภุญฺชิ. เทวตา เอว หิมวนฺเต นาคลตา ทนฺตกฏฺฐ นาม อตฺถิ สินิทฺธา มุทุกํ รสวนฺตํ, ตํ ทิวเส ทิวเส อาภิรนฺติ เยน รญฺโญ จ อคฺคมเหสิยา จ โสฬสนฺนํ นาฏกสหสฺสานํ สฏฺฐิมตฺตานํ ภิกฺขุสหสฺสานํ เทวสิกํ ทนฺตโปณกิจฺจํ นิปฺผชฺชิ. राज्याभिषेकाच्या प्रभावाने या राज-ऋद्धी (राजकीय चमत्कारिक शक्ती) प्राप्त झाल्या होत्या. महापृथ्वीच्या खाली एक योजन अंतरापर्यंत आणि तसेच वर आकाशात त्यांची आज्ञा चालत असे. देवगण दररोज अनोतत्त सरोवरातून आठ कावडींद्वारे सोळा पाण्याचे घडे आणत असत. जेव्हा बुद्ध शासनावर त्यांची श्रद्धा निर्माण झाली, तेव्हा त्यांनी त्यातील आठ घडे भिक्खू संघाला दिले, दोन घडे साठ त्रिपिटकधारी भिक्खूंना दिले, दोन घडे अग्रमहिषी असंधिमित्ता हिला दिले आणि चार घडे स्वतः वापरले. देवगण हिमालयातून 'नागलता' नावाचे गुळगुळीत, मऊ आणि चवदार दात घासण्याचे काष्ठ (दातून) दररोज आणत असत, ज्याच्याद्वारे राजा, अग्रमहिषी, सोळा हजार नर्तकी आणि साठ हजार भिक्खू यांचे रोजचे दंतधावनाचे कार्य पूर्ण होत असे. เทวสิกเมวสฺส เทวตา อคทามลกํ อคทหรีฏกํ สุวณฺณวณฺณญฺจ คณฺธสมฺปนฺนํ อมฺพปกฺกํ อาหรนฺติ ตถา ฉทฺทนฺต ทหโต ปญฺจวณฺณํ นิวาสน ปารุปณํ, ปีตกวณฺณํ หตฺถปุญฺฉนก ปฏฺฏํทิพฺพญฺจชานกํ อาหรนฺติ เทวสิกเมว ปนสฺส อนุเลปคณฺธํ ปารุปนตฺถาย อสุตฺตมยิกํ สุมนปุปฺผปฏํ มหารหญฺจ อญฺชนํ นาคภวนโต นาคราชาโน อาหรนฺติ. ฉทฺทนฺตทเหเยว อุฏฺฐิตสฺส สาลิโน นว จาห สหสฺสานิ ทิวเส ทิวเส สุวา อาหรนฺติ. มูสิกา นิตฺถุส กเณ กโรนฺติ เอโกปิ ขณฺฑตณฺฑุโล น โหติ. รญฺโญ สพฺพฏฺฐาเนสุ อยเมว ตณฺฑุโล ปริโภคํ คจฺฉติ. มธุมกฺขิกา มธุํ กโรนฺติ. กมฺมารสาลาสุ อจฺฉา กูฏํ ปหรนฺติ. ทีปิกา จมฺมานิ จาเลนฺติ กรวีก สกุณา อาคตฺตฺวา มธุรสฺสรํ วิกุเชนฺตา รญฺโญ พลิกมฺมํ กโรนฺติ. देवगण दररोज त्यांच्यासाठी औषधी आवळा (अगद-आमलक), औषधी हिरडा (अगद-हरीतक) आणि सुवर्णवर्णी व सुगंधी पिकलेला आंबा आणत असत. तसेच छद्दंत सरोवरातून पाच रंगांचे परिधान करण्याचे व पांघरण्याचे वस्त्र, पिवळ्या रंगाचे हात पुसण्याचे रेशमी वस्त्र आणि दिव्य पेय आणत असत. नागलोकातून नागराज दररोज त्यांच्यासाठी सुगंधी उटणे, पांघरण्यासाठी सुताशिवाय बनवलेले मोगऱ्याच्या फुलांचे वस्त्र आणि मौल्यवान काजळ आणत असत. छद्दंत सरोवराच्या परिसरात स्वतःहून उगवणाऱ्या शाली तांदळाचे नऊ हजार वाहने (भार) पोपट दररोज वाहून आणत असत. उंदीर त्या तांदळाचे टरफले काढून देत असत, ज्यामध्ये एकही तांदूळ तुटलेला नसे. राजाच्या सर्व भोजनशाळांमध्ये याच तांदळाचा वापर केला जात असे. मधमाश्या मध तयार करत असत. लोहारांच्या शाळांमध्ये अस्वल हातोडे मारण्याचे काम करत असत. बिबटे चामडे साफ करत असत आणि करवीक पक्षी येऊन मधुर स्वरात गात राजाची सेवा करत असत. อิมาหิ อิทฺธีหิ สมนฺนาคโต ราชาเอก ทิวสํ สุวณฺณ สงฺขลิก พณฺธนํ เปเสตฺวา จตุนฺนํ พุทฺธานํ อธิคต รูปทสฺสนํ กปฺปายุกํ มหากาฬ นาคราชานํ อานยิตฺวา เสตจฺฉตฺตสฺส เหฏฺฐา มหารเห ปลฺลงฺเก นิสีทาเปตฺวา อเนก สตวณฺเณหิ ชลช ถลช ปุปฺเผหิ สุวณฺณปุปฺเผหิ จ ปูชํ กตฺวา สพฺพาลงฺการ ปติมณฺฑิเตหิ จ โสฬสหิ นาฏก สหสฺเสหิ สมนฺตโต ปริกฺขิปิตฺวา อนนฺตญาณสฺส ตาว เม สทฺธมฺมวร จกฺกวตฺติโน สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส รูปํ อิเมสํ อกฺขีนํ อาปาถํ กโรหีติ นิพฺพตฺตาสีติ อนุพฺยญฺชน ปติมณฺฑิตํ ทฺวตฺตึส มหา ปุริส ลกฺขณ สสฺสิรีกตาย วิกสิต กมลุปฺผล ปุณฺฑรีก ปติมณฺฑิตมิว สลิลตลํ ตาราคณรํสิชาล วิสรวิปฺผุตโสภาสมุชฺชลมิวคคนตลํ นีล-ปีต-โลหิตาทิ เภท วิจิตฺตวณฺณรํสิ วินทฺธ พฺยามปฺปภา ปริกฺเขป วิลาสิตาย สญฺฌปฺปภานุราค อิณฺทธนุ วิชฺชุลฺลตา ปริกฺขิตฺตมิว กนกคิริ สิขรํ นานาวิราค วิมลเกตุมาลา สมุชฺชลิตจารุมตฺถกโสภํ นยนรสายนมิว พฺรหฺมเทว-มนุช นาค-ยกฺข คณานํ พุทฺธรูปํ ปสฺสนฺโต สตฺตทิวสํ อกฺขิปูชํ นาม อกาสิ या ऋद्धींनी संपन्न असलेल्या राजाने एके दिवशी सोन्याची साखळी पाठवून, चार बुद्धांचे रूप पाहिलेल्या आणि कल्पभर आयुष्य असलेल्या महाकाळ नागराजाला बोलावून आणले. त्याला श्वेतछत्राखाली एका मौल्यवान सिंहासनावर बसवून, शेकडो रंगांच्या जलज (पाण्यात उगवणाऱ्या) व थलज (जमिनीवर उगवणाऱ्या) फुलांनी आणि सोन्याच्या फुलांनी त्याची पूजा केली. सर्व अलंकारांनी नटलेल्या सोळा हजार नर्तकींनी त्याला सर्व बाजूंनी वेढले. राजाने त्याला विनंती केली, 'अनंत ज्ञानी, सद्धम्म-चक्रवर्ती सम्यक्संबुद्धांचे रूप माझ्या या डोळ्यांसमोर प्रकट करा.' त्यानंतर, ऐंशी अनुव्यंजनांनी सुशोभित, बत्तीस महापुरुष लक्षणांच्या वैभवाने युक्त, उमललेल्या कमळ, नीलकमळ आणि श्वेतकमळांनी सुशोभित जलाशयासारखे, नक्षत्रगणांच्या किरणजालाने उजळलेल्या आकाशमंडळासारखे, निळ्या, पिवळ्या, लाल इत्यादी विविध रंगांच्या किरणांनी युक्त अशा व्यामप्रभेने (शरीराभोवतीच्या प्रभामंडळाने) वेढलेले, संध्याकाळची प्रभा, इंद्रधनुष्य आणि विजेच्या लतेने वेढलेल्या सुवर्णगिरीच्या शिखरासारखे, विविध रंगांच्या निर्मळ मुकुटमालेने सुशोभित आणि ब्रह्मदेव, मनुष्य, नाग व यक्ष यांच्या डोळ्यांना सुख देणारे बुद्धरूप पाहत राजाने सात दिवस 'अक्षिपूजा' (नेत्रपूजा) केली. ราชา กิร อภิเสกํ ปาปุณิตฺวา ตีณิเยว สํวจฺฉรานิ พาหิรก ปาสณฺฑํ ปริคณฺหิ จตุตฺเถ สํวจฺฉเร พุทฺธสาสเน ปสีทินํ พฺราหฺมณ ชาติย ปาสณฺฑานญฺจ ปณฺฑรงฺค ปริพฺพาชกานญฺจ สฏฺฐิสหสฺสมตฺตานํ นิจฺจภตฺตํ ปฏฺฐเปสิ. असे म्हटले जाते की, राजाने राज्याभिषेक झाल्यानंतर तीन वर्षांपर्यंत बाह्य पंथांचे (इतर संप्रदायांचे) आदरातिथ्य केले. चौथ्या वर्षी ते बुद्ध शासनावर प्रसन्न (श्रद्धावान) झाले. त्यांनी ब्राह्मण जातीच्या पंथांच्या आणि पांढरी वस्त्रे परिधान करणाऱ्या परिव्राजकांच्या अशा सुमारे साठ हजार लोकांना रोजचे भोजन देण्याची व्यवस्था केली होती. อโสโก ปิตรา ปวตฺติตํ ทานํ อตฺตโน อนฺเตปุเร ตเถว ททมาโน เอกทิวสํ สีหปญฺชเร ฐิโต อุปสม ปริพาหิเรน อาจาเรน ภุญฺชมาเน อสํยติณฺทฺริเย อวินิต อิริยาปเถ ทิสฺวา จินฺเตสิ อีทิสํ ทานํ อุปปริกฺขิตฺวา ยุตฺตฏฺฐาเน ทาตุํ วฏฺฏติติ เอวํ จินฺเตตฺวา อมจฺเจ อาห. คจฺฉถ ภเณ อตฺตโน อตฺตโน สาธุสมฺมเต สมณ พฺราหฺมเณ อนฺเตปุรํ อติหรถ, ทานํ ทสฺสามาติ อมจฺจา สาธุ เทวาติ รญฺโญ ปฏิสฺสุตฺวา เต เต ปณฺฑรงฺค ปริพฺพาชกาชีวก นิคณฺฐาทโย อาเนตฺวา อิเม มหาราช อมฺหากํ อรหนฺโตติ อาหํสุ. अशोकांनी आपल्या पित्याने सुरू केलेले दान आपल्या अंतःपुरात (राजवाड्यात) तसेच चालू ठेवले होते. एके दिवशी सिंहखिडकीत उभे असताना, त्यांनी शांततेचा अभाव असलेल्या आचरणाने भोजन करणाऱ्या, इंद्रिये असंयत असलेल्या आणि अविनीत (अशिस्तबद्ध) शारीरिक हालचाली (इरियापथ) असलेल्या लोकांना पाहिले आणि विचार केला, 'अशा दानाची परीक्षा करून ते योग्य ठिकाणी देणे योग्य ठरेल.' असा विचार करून त्यांनी अमात्यांना (मंत्र्यांना) सांगितले, 'जा, तुम्ही आपापल्या दृष्टीने सज्जन मानलेल्या श्रमण व ब्राह्मणांना अंतःपुरात घेऊन या, मी त्यांना दान देईन.' अमात्यांनी 'होय महाराज' असे म्हणून राजाची आज्ञा शिरसावंद्य मानली आणि त्या त्या पांढरी वस्त्रे परिधान करणाऱ्या परिव्राजकांना, आजीविकांना, निग्रंथांना इत्यादींना आणून सांगितले, 'महाराज, हे आमचे अरहंत आहेत.' อถ ราชา อนฺเตปุเร อุจฺจาวจานิ อาสนานิ ปญฺญาเปตฺว อาคจฺฉนฺตูติ วตฺวา อาคตาคเต อาห อตฺตโน อตฺตโน อนุรูเป อาสเน นิสีทถาติ เอกจฺเจ ภทฺทปีฐเก เอกจฺเจ ผลกปีฐเกเส นิสีทึสุ. ตํ ทิสฺวา ราชา นตฺถิ เอเตสํ อนฺเตสาโรติ ญตฺวา เตสํ อนุรูปํ ขาทนียํ โภชนียํ ทตฺวา อุยฺโยเชสิ. त्यानंतर राजाने अंतःपुरात लहान-मोठी (उच्च-नीच) आसने मांडायला लावून 'त्यांना आत येऊ द्या' असे सांगितले. आत आलेल्या प्रत्येकाला त्यांनी सांगितले, 'आपल्या योग्यतेनुसार आपापल्या आसनावर बसा.' काही जण भद्रपीठांवर (उत्कृष्ट आसनांवर) तर काही जण लाकडी पाटांवर बसले. हे पाहून राजाने ओळखले की, 'यांच्यामध्ये कोणताही आंतरिक सार (गुण) नाही.' त्यांनी त्यांना त्यांच्या योग्यतेनुसार खाद्य व भोज्य पदार्थ देऊन निरोप दिला. เอวํ คจฺฉนฺเต กาเล เอก ทิวสํ สีหปญฺชเร ฐิโต อทฺทส นิคฺโรธ สามเณรํ ราชงฺคเณน คจฺฉนฺตํ ทนฺตํ คุตฺตํ สนฺตินฺทฺริยํ อิริยาปถ สมฺปนฺนํ. โก ปนายํ นิคฺโรโธ นาม, พิณฺทุสาร รญฺโญ เชฏฺฐปุตฺตสฺส สุมนราช กุมารสฺส ปุตฺโต. ตตฺรายํ อานุปุพฺพี กถา-พิณฺทุสาร รญฺโญ กิร ทุพฺพลกาเลเยว อโสก กุมาโร อตฺตนา ลทฺธํ อุชฺเชนิรชฺชํ ปหาย อาคนฺตฺวา สพฺพํ นครํ อตฺตโน หตฺถคตํ กตฺวา สุมน ราชกุมารํ อคฺคเหสิ. अशा प्रकारे काळ जात असताना, एके दिवशी सिंहखिडकीत उभे असताना त्यांनी निग्रोध सामणेराला राजवाड्यातून जाताना पाहिले, जो अत्यंत शांत, संयमित, शांत इंद्रिये असलेला आणि उत्तम इरियापथाने (शारीरिक शिस्तीने) युक्त होता. हा निग्रोध कोण होता? तो राजा बिंदुसार यांच्या ज्येष्ठ पुत्र सुमन राजकुमार याचा मुलगा होता. त्याची अनुक्रमिक कथा अशी आहे— राजा बिंदुसार जेव्हा दुर्बल झाले होते, तेव्हा अशोक कुमाराने स्वतःला मिळालेले उज्जैनचे राज्य सोडून येथे येऊन संपूर्ण नगर आपल्या ताब्यात घेतले आणि सुमन राजकुमाराला बंदी बनवले. ตํ ทิวสเมว สุมนสฺส ราชกุมารสฺส สุมนา นาม เทวี ปริปุณฺณคพฺภา อโหสิ. สา อญฺญาตกเวเสน นิกฺขมิตฺวา อวิทูเร อญฺญตรํ จณฺฑาลคามํ สนฺธาย คจฺฉนฺติ, เชฏฺฐก จณฺฑาลสฺส เคหโต อวิทูเร เอกสฺมึ นิคฺโรธ รุกฺเข อธิวตฺถาย เทวตาย อิโต สุมเนติ วหนฺติยา สทฺทํ สุตฺวา ตสฺสา สมีปํ คตา เทวตา อตฺตโน อานุภาเวน เอกํ สาลํ นิมฺมิณิตฺวา เอตฺถ วสาหิติ ปทาสิ. สา ตํ สาลํ ปาวิสิ. คตทิวเสเยว ปุตฺตํ วิชายิ. त्याच दिवशी सुमन राजकुमाराची 'सुमना' नावाची राणी पूर्ण गरोदर होती. ती वेशांतर करून बाहेर पडली आणि जवळच असलेल्या एका चांडाळ वस्तीच्या दिशेने जाऊ लागली. चांडाळ प्रमुखाच्या घराजवळ एका वडाच्या (निग्रोध) वृक्षावर राहणाऱ्या देवतेने 'सुमने, इकडे ये' अशी हाक मारलेली ऐकून ती तिच्याजवळ गेली. देवतेने आपल्या प्रभावाने एक शाळा (कुटी) निर्माण केली आणि 'येथे राहा' म्हणून तिला दिली. ती त्या शाळेत प्रविष्ट झाली. तेथे पोहोचलेल्या दिवशीच तिने पुत्राला जन्म दिला. สา ตสฺส นิคฺโรธ เทวตาย ปริคฺคหิตตฺตา นิคฺโรโธตฺเวว นามํ อกาสิ. เชฏฺฐก จณฺฑาโล ทฏฺฐทิวสโตปฺปภูติ ตํ อตฺตโน สามิธีตรํ วิย มญฺญมาโน นิพทฺธํ วฏฺฏํ ปฏฺฐเปสิ. ราชธีตา ตตฺถ สตฺต วสฺสานิ วสิ. นิคฺโรธกุมาโรปิ สตฺตวสฺสิโก ชาโต ตทา มหาวรุณตฺเถโร นาม เอโก อรหา ทารกสฺส เหตุสมฺปทํ ทิสฺวา วิหรมาโน สตฺตวสฺสิโกทานิ ทารโก กาโล นํ ปพฺพาเชตุนฺติ จินฺเตตฺวา ราชธีตยา อาโรจาเปตฺวา นิคฺโรธกุมารํ ปพฺพาเชสิ. กุมาโร ขุรคฺเคเยว อรหตฺตํ ปาปุณิ. โส เอกทิวสํ ปาโตว สรีรํ ปฏิชคฺคิตฺวา อาจริยุปชฺฌานํ วตฺตํ กตฺวา ปตฺตจีวรมาทาย มาตุอุปาสิกาย เคหทฺวารํ คจฺฉามีติ นิกฺขมิ มาตุ นิเวสนฏฺฐานญฺจสฺส ทกฺขิณทฺวาเรน นครํ ปวิสิตฺวา นครมชฺเฌน คนฺตฺวา ปาจีนทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา คนฺตพฺพํ โหติ เตน จ สมเยน อโสโก ธมฺมราชา ปาจีน ทิสาภิมุโข สีหปญฺชเร จงฺกมติ. तिने (त्या मुलाचे) वडाच्या झाडावरील देवतेने रक्षण केल्यामुळे 'निग्रोध' असेच नाव ठेवले. मुख्य चांडाळाने तिला पाहिल्या दिवसापासून आपल्या मालकाची मुलगी मानून तिच्यासाठी नियमित भोजनाची व्यवस्था केली. ती राजकन्या तिथे सात वर्षे राहिली. निग्रोध कुमारही सात वर्षांचा झाला. तेव्हा महावरुण थेर नावाच्या एका अरहंतांनी त्या बालकाची हेतू-संपदा (पुण्य-सामर्थ्य) पाहून, 'हा बालक आता सात वर्षांचा झाला आहे, हीच त्याला प्रवज्जा देण्याची योग्य वेळ आहे' असा विचार केला. त्यांनी राजकन्येला कळवून निग्रोध कुमाराला प्रवज्जित केले. तो कुमार क्षौरकर्माच्या वेळीच अरहंत पदाला प्राप्त झाला. त्यांनी एके दिवशी पहाटेच शरीर-कृत्ये आटोपून, आचार्य आणि उपाध्यायांचे कर्तव्य पूर्ण करून, पात्र व चीवर घेऊन 'मी माझ्या आई असलेल्या उपासिकेच्या घराच्या दाराशी जातो' असे म्हणून प्रस्थान केले. त्यांच्या आईचे निवासस्थान असे होते की, दक्षिण दाराने नगरात प्रवेश करून, नगराच्या मध्यभागातून जाऊन पूर्व दाराने बाहेर पडून तिथे जावे लागत असे. आणि त्याच वेळी धम्मराज अशोक पूर्व दिशेकडे तोंड करून सिंहपंजरावर चंक्रमण करत होते. ตํ ขณํเยว สิคฺโรโธ สามเณโร ราชงฺคณํ ปาปุณิ สนฺตินฺทฺริโย สนฺตมานโส ยุคมตฺตํ เปกฺขมาโน. เตน วุตฺตํ. เอกทิวสํ สีหปญฺชเร ฐิโต อทฺทส นิคฺโรธสามเณรํ ราชงฺคเณน คจฺฉนฺตํ ทนฺตํ คุตฺตํ สนฺตินฺทฺริยํ อิริยาปถ สมฺปนฺนนฺติ. ทิสฺวา ปนสฺส เอตทโหสิ? อยํ ชโน สพฺโพปิ วิกฺขิตฺตจิตฺโตหนฺตมคปฏิภาโค, อยมฺปน ทารโก อวิกฺขิตฺตจิตฺโต อติวิยสฺส อโลกิต วิโลกิตํ สมฺมิญฺชน ปสารณญฺจ โสภติ, อทฺธา เอตสฺส อพฺภนฺตเร โลกุตฺตรธมฺโม ภวิสฺสตีติ รญฺโญ สหทสฺสเนเนว สามเณเร จิตฺตํ ปสีทิ. เปมํ สณฺฐหิ กสฺมา? ปุพฺเพ กิร ปุญฺญ กรณกาเล เอส รญฺโญ เชฏฺฐภาตา วาณิชโก อโหสิ. त्याच क्षणी निग्रोध सामणेर शांत इंद्रिये आणि शांत मन ठेवून, जमिनीवर एक जू अंतरावर पाहत राजवाड्यात पोहोचले. म्हणूनच म्हटले आहे: 'एके दिवशी सिंहपंजरावर उभे असताना राजाने निग्रोध सामणेरांना राजवाड्यातून जाताना पाहिले, जे दमित, रक्षित, शांत इंद्रिय असलेले आणि उत्तम ईर्यापथाने युक्त होते.' त्यांना पाहून राजाच्या मनात असा विचार आला: 'हा सर्व लोक चंचल मनाचा आणि माकडासारखा आहे, परंतु हा बालक मात्र शांत मनाचा आहे. याचे पाहणे, वळणे, हात आकुंचन करणे आणि पसरवणे अत्यंत शोभून दिसत आहे. नक्कीच याच्या अंतरात लोकोत्तर धम्म असणार.' असे पाहून राजाचे मन सामणेरांना पाहताच प्रसन्न झाले. त्यांच्याबद्दल प्रेम निर्माण झाले. ते का? कारण पूर्वजन्मात पुण्यकर्म करताना हा राजाचा मोठा भाऊ असलेला एक व्यापारी होता. อถ ราชา สญฺชาตเปโม สพหุมาโน สามเณรํ ปกฺโกสถาติ อมจฺเจ เปเสสิ อติจิรายตีติ ปุน ทฺเว ตโย เปเสสิ ตุริตํ อาคจฺฉตูติ สามรเณโร อตฺตโน ปกติยา เอว อคมาสิ ราชา ปติรูปาสนํ ญตฺวา นิสีทถาติ อาห. อิโต จิโต จ โอโลเกตฺวา นตฺถิทานิ อญฺโญ ภิกฺขุติ สมุสฺสิต เสตจฺฉตฺตํ ราชปฬฺลงฺกํ อุปสงฺกมิตฺวา ปตฺตคหณตฺถาย รญฺโญ อาการํ ทสฺเสสิ. ราชา ตํ ปลฺลงฺกํ สมีปํ คจฺฉนฺตํ ทิสฺวา เอวํ จินฺเตสิ. อชฺเชวทานิ อยํ สามเณโร อิมสฺส เคหสฺส สามิโก ภวิสฺสติ. สามเณโร รญฺโญ หตฺเถ ปตฺตํ ทตฺวา ปลฺลงฺกํ อภรุหิตฺวา นิสีทิ. नंतर राजाने मनात प्रेम आणि आदर उत्पन्न झाल्यामुळे अमात्यांना पाठवले की, 'सामणेरांना बोलवून आणा.' 'फार वेळ लागत आहे' म्हणून पुन्हा दोन-तीन जणांना पाठवले की, 'त्यांना लवकर घेऊन या.' सामणेर मात्र आपल्या नैसर्गिक गतीनेच आले. राजाने त्यांना 'योग्य आसन पाहून बसावे' असे सांगितले. त्यांनी इकडे तिकडे पाहिले आणि 'आता दुसरा कोणताही भिक्खू नाही' हे जाणून, ज्यावर पांढरे छत्र उभारले होते अशा राजसिंहासनाजवळ जाऊन, राजाला आपले पात्र पकडण्यासाठी संकेत केला. राजाने त्यांना सिंहासनाजवळ जाताना पाहून असा विचार केला, 'आजच हा सामणेर या घराचा स्वामी होईल.' सामणेरांनी राजाच्या हातात पात्र दिले आणि सिंहासनावर चढून ते बसले. ราชา อตฺตโน อตฺถาย สมฺปาทิตํ สพฺพํ ยาคุ-กชฺชก ภตฺต วิกตึ อุปนาเมสิ. สามเณโร อตฺตโน ยาปนมตฺตเมว สมฺปฏิจฺฉิ. ภตฺตกิจฺจาวสาเน ราชา อาห สตฺถารา ตุมฺหากํ ทินฺโนวาทํ ชานาถาติ ชานมิ มหาราช เอกเทเสนาติ. ตาต, มยฺหมฺปิ นํ กเถหีติ สาธุ มหาราชาติ รญฺโญ อนุรูปํ ธมฺมปเท อปฺปมาท วคฺคํ อนุโมทนตฺถาย อภาสิ. राजाने स्वतःसाठी तयार केलेले सर्व पेज, खाद्यपदार्थ आणि भाताचे विविध प्रकार त्यांच्यासमोर सादर केले. सामणेरांनी केवळ आपल्या उपजीविकेपुरतेच अन्न स्वीकारले. भोजन आटोपल्यावर राजा म्हणाला, 'शास्त्यांनी तुम्हाला दिलेला उपदेश तुम्हाला माहीत आहे का?' 'होय महाराज, काही अंशी माहीत आहे,' (सामणेर म्हणाले). 'बाळा, मलाही तो उपदेश सांग,' (राजा म्हणाला). 'ठीक आहे महाराज,' असे म्हणून त्यांनी राजाला अनुरूप अशा धम्मपदातील 'अप्पमाद वग्ग' (अप्रमाद वर्ग) मधील गाथा अनुमोदनासाठी उपदेशिली. ราชา ปน อปฺปมาโท อมตปทํ, ปมาโท มจฺจุโน ปทนฺติ สุตฺว จ, อญฺญาตํ ตาต ปริโยสาเปหีติ อาห อนุโมทนาวสาเน ทฺวตฺตึส ธุรภตฺตานิ ลภิตฺวา ปุน ทิวเส ทฺวตฺตึส ภิกฺขุ คเหตฺวา ราชนฺเตปุรํ ปวิสิตฺวา ภตฺตกิจฺจมกาสิ ราชา อญฺเญปิ ทฺวตฺตึส ภิกฺขุ ตุมฺเหหิ สทฺธึเยว ภิกฺขํ คณฺหนฺตูติ เอเตเนว อุปาเยน ทิวเส ทิวเส วฑฺฒาเปนฺเต สฏฺฐิ สหสฺสานํ พฺราหฺมณ ปริพฺพาชกานํ ภตฺตํ อุปจฺฉิณฺทิตฺวา อนฺโต นิเวสเน สฏฺฐิสหสฺสานํ ภิกฺขุนํ นิจฺจภตฺตํ ปฏฺฐเปสิ, นิคฺโรธตฺเถร คเตเนว ปสาเทน, นิคฺโรธตฺเถโรปิ ราชานํ สปริสํ ตีสุ สรเณสุ ปญฺจสุ จ สีเลสุ ปติฏฺฐาเปตฺวา พุทฺธสาสเน โปถุชฺชนิเกน ปสาเทน อจลปฺปสาทํ กตฺวา ปติฏฺฐาเปสิ. राजाने 'अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं' (अप्रमाद हे अमृताचे स्थान आहे, आणि प्रमाद हे मृत्यूचे स्थान आहे) हे ऐकले आणि म्हटले, 'बाळा, मला हे समजले आहे, आता समाप्त कर.' अनुमोदनाच्या शेवटी बत्तीस भिक्खूंच्या भोजनाचे आमंत्रण मिळवून, दुसऱ्या दिवशी बत्तीस भिक्खूंना सोबत घेऊन त्यांनी राजवाड्यात प्रवेश केला आणि भोजन केले. राजाने 'इतरही बत्तीस भिक्खू तुमच्यासोबतच भिक्षा ग्रहण करोत' असे म्हटले. याच पद्धतीने दिवसेंदिवस संख्या वाढवत जाऊन, साठ हजार ब्राह्मण आणि परिव्राजकांचे भोजन बंद करून, राजवाड्यात साठ हजार भिक्खूंसाठी नित्य भोजनाची व्यवस्था केली. हे सर्व निग्रोध थेरांच्या प्रति असलेल्या श्रद्धेमुळेच झाले. निग्रोध थेरांनीही राजाला त्याच्या परिवारासह त्रिशरण आणि पंचशीलात प्रतिष्ठित केले, आणि बुद्धशासनावरील त्यांची सामान्य श्रद्धा बदलून ती अचल श्रद्धेत रूपांतरित करून त्यांना प्रतिष्ठित केले. ปุน ราช อโสการามํ นาม มหาวิหารํ การเปตฺวา สฏฺฐิสหสฺสานํ ภิกฺขูนํ ภตฺตํ ปฏฺฐเปสิ. สกลชมฺพุทีเป จตุราสีติยา นครสหสฺเสสุ จตุราสีติ วิหารสหสฺสานิ การาเปสิ. จตุราสีติ เจติยสหสฺส ปติมณฺฑิตานิ ธมฺเมเนว โน อธมฺเมน, เอกทิวสํ กิร ราชา อโสการาเม มหาทานํ ทตฺวา สฏฺฐิสหสฺส สงฺขสฺส ภิกฺขุสงฺฆสฺส มชฺเฌ นิสชฺช สงฺฆํ จตูหิ ปวฺจเยหิ ปวาเรตฺวา อิมํ ปญฺหํ ปุจฺฉิ ภนฺเต ภควโต เทสิต ธมฺโม นาม กิตฺตโก โหตีติ. มหาราช นว องฺคานิ, ขณฺทโต จตุราสีติ ธมฺมกฺขณฺธ สหสฺสานีติ. पुन्हा राजाने 'अशोकाराम' नावाचा महाविहार बांधून तिथे साठ हजार भिक्खूंच्या भोजनाची व्यवस्था केली. संपूर्ण जम्बुद्विपातील चौऱ्याऐंशी हजार नगरांमध्ये चौऱ्याऐंशी हजार विहार बांधले. जे चौऱ्याऐंशी हजार चेतियांनी सुशोभित होते, आणि हे सर्व धम्मानेच केले गेले, अधम्माने नाही. एके दिवशी राजाने अशोकाराम विहारात महादान देऊन, साठ हजार भिक्खूंच्या संघामध्ये बसून, संघाला चार प्रत्ययांनी निमंत्रित करून हा प्रश्न विचारला: 'भंते, भगवंतांनी उपदेशिलेला धम्म किती प्रमाणात आहे?' 'महाराज, तो नऊ अंगांचा आहे आणि भागांच्या दृष्टीने चौऱ्याऐंशी हजार धम्मस्कंध आहेत.' ราชา ธมฺเม ปสีทิตฺวา เอเกกํ ธมฺมกฺขณฺธํ เอเกเกน วิหาเรน ปูเชสฺสามีติ เอกทิวสเมว ฉนฺนวุติ โกฏิธนํ วิสฺสชฺเชตฺวา อมจฺเจ อาณาเปสิ. เอถ ภเณ เอเกกสฺมึ นคเร เอกเมกํ วิหารํ กาเรนฺตา จตุราสีติยา นครสหสฺเสสุ จตุราสีติ วิหารสหสฺสานิ การาเปถาติ สยญฺจ อโสการาเม อโสก มหาวิหารตฺถาย กมฺมํ ปฏฺฐเปสิ. राजाने धम्मावर प्रसन्न होऊन 'मी प्रत्येक धम्मस्कंधाची पूजा एका एका विहाराने करीन' असा निश्चय करून, एकाच दिवशी शहाण्णव कोटी धन खर्च करून अमात्यांना आज्ञा दिली: 'अहो! तुम्ही प्रत्येक नगरात एकेक विहार बांधून, चौऱ्याऐंशी हजार नगरांमध्ये चौऱ्याऐंशी हजार विहार बांधा.' आणि त्यांनी स्वतः अशोकाराम विहारात 'अशोक महाविहार' बांधण्याचे काम सुरू केले. สงฺโฆ อิณฺทคุตฺตตฺเถรํ นาม มหิทฺธิยํ มหานุภาวํ ขีณาสวํ นวกมฺมาธิฏฺฐายกํ อทาสิ. เถโร ยํ ยํ น นิฏฺฐาติ ตํ ตํ อตฺตโน อานุภาเวน นิฏฺฐาเปสิ. เอวํ ตีหิ สํวจฺฉเรหิ วิหารกมฺมํ นิฏฺฐาเปสิ. เอกทิวสเมว สพฺพนคเรหิ ปณฺณานิ อาคมึสุ อมจฺจา รญฺโญ อาโรเจสุํ. นิฏฺฐิตานิ เทว จตุราสีติ วิหารสหสฺสานีติ อถ ราชา ภิกฺขุสงฺฆํ อุปสงฺกมิตฺวา ภนฺเต มยา จตุราสีติ วิหารสหสฺสานิ การิตานิ ธาตุโยกุโต ลภิสฺสามีติ ปุจ ปุจฺฉิ. संघाने इंद्रगुप्त थेर नावाच्या महाऋद्धीवान, महानुभाव आणि क्षीणासव भिक्खूंना नवकम्म-अधिष्ठाता म्हणून नियुक्त केले. थेरांनी जे जे काम पूर्ण होत नव्हते, ते ते आपल्या प्रभावाने पूर्ण केले. अशा प्रकारे तीन वर्षांत विहाराचे काम पूर्ण झाले. एकाच दिवशी सर्व नगरांतून पत्रे आली आणि अमात्यांनी राजाला कळवले: 'महाराज, चौऱ्याऐंशी हजार विहार पूर्ण झाले आहेत.' त्यानंतर राजाने भिक्खू संघाकडे जाऊन विचारले, 'भंते, मी चौऱ्याऐंशी हजार विहार बांधले आहेत, पण मला धातू कोठून मिळतील?' มหาราช ธาตุนิธานํ นาม อตฺถีติ สุโณม. น ปน ปญฺญายติ อสุกาฏฺฐาเนติ ราชา ราชคเห เจติยํ ภิณฺทาเปตฺวา ธาตุํ อปสฺสนฺโต ปฏิปากติยํ กาเรตฺวา ภิกฺขุ-ภิกฺขุนิโย-อุปาสก-อุปาสิกาโยติ จตสฺโส ปริสา คเหตฺวา เวสาลึ คโต. ตตฺราปิ อลภิตฺวา กปิฬวตฺถุํ, ตตฺราปิ อลภิตฺวา รามคามํ คโต, รามคาเม นาคา เจติยํ ภิณฺทิตุํ น อทํสุ. เจติเย นิปติต กุทฺทาโล ขณฺฑาขณฺฑํ โหติ เอวํ ตตฺราปิ อลภิตฺวา อลฺลกปฺปํ-ปาวํ-กุสินารนฺติ สพฺพตฺถ เจติยาติ ภิณฺทิตฺวา ธาตุํ อลภิตฺวา ปฏิปากติกานิ กตฺวา ราชคหํ คนฺตฺวา จตสฺโส ปริสา สนฺนิปาเตตฺวา อตฺถิ เกนจิ สุตปุพฺพํ อสุกฏฺฐาเน นาม ธาตุ นิธานนฺติ ปุจฺฉิ. महाराज, 'धातुनिधान' (धातूंचा गुप्त ठेवा) नावाचे काहीतरी आहे असे आम्ही ऐकतो, परंतु ते अमुक एका ठिकाणी आहे हे माहीत नाही. तेव्हा राजाने राजगृहातील चेतिय (स्तूप) फोडून धातू न मिळाल्यामुळे ते पूर्ववत करून घेतले आणि भिक्खू, भिक्खुनी, उपासक व उपासिका या चारही परिषदांना सोबत घेऊन तो वेसालीला गेला. तेथेही धातू न मिळाल्यामुळे तो कपिलवत्थूला गेला, तेथेही न मिळाल्यामुळे रामगामाला गेला. रामगामामध्ये नागांनी चेतिय फोडू दिला नाही. चेतियवर मारलेली कुदळ तुकडे-तुकडे झाली. अशा प्रकारे तेथेही धातू न मिळाल्यामुळे अल्लाकप्प, पावा आणि कुसिनारा अशा सर्व ठिकाणी चेतिय फोडूनही धातू न मिळाल्यामुळे ते पूर्ववत करून, राजगृहाला परत जाऊन चारही परिषदांना एकत्र बोलावून विचारले, 'अमुक एका ठिकाणी धातूंचे निधान आहे, असे पूर्वी कोणाकडून ऐकले आहे का?' ตตฺเถโก วิสํวสฺส สติโก เถโร อสุกฏฺฐาเน ธาตุนิธานนฺติ น ชานามิ. มยฺหํ ปน ปิตามหตฺเถโร มยิ สตฺตวสฺสิกกาเล มาลาจงฺโคฏกํ คาหาเปตฺวา เอหิ สามเณร, อสุก คจฺฉนฺตเร ปาสานถูโป อตฺถิ, ตตฺถ คจฺฉามาติ คนฺตฺวา ปูเชตฺวา อิมํ ฐานํ อุปธาเรตุํ วฏฺฏติ สามเณโรติ อาห. อหํ เอตฺตกเมว ชานามิ มหาราชาติ อาห. तेथे एक १२० वर्षे वयाचे थेर म्हणाले, 'अमुक ठिकाणी धातुनिधान आहे हे मला माहीत नाही. परंतु माझे आजोबा थेर यांनी मी सात वर्षांचा असताना माझ्या हातात फुलांची करंडी देऊन सांगितले की, «ये सामणेर, अमुक झाडीच्या मागे एक दगडाचा स्तूप आहे, आपण तेथे जाऊ या.» तेथे जाऊन पूजा करून ते म्हणाले, «हे सामणेर, या स्थानाचे नीट स्मरण ठेवणे योग्य आहे.» महाराज, मला एवढेच माहीत आहे.' ราชา เอตเทว ฐานนฺติ วตฺวา คจฺเฉ หราเปตฺวา ปาสาณถูปํ ปํสุญฺจ อปเนตฺวา เหฏฺฐา สุธาภูมึ อทฺทส. ตโต สุธญฺจ อิฏฺฐกาโย จ หราเปตฺวา อนุปุพฺเพน ปริเวณา โอรุยฺห สตฺต รตนวาลิกํ อสีติ หตฺถานิ จ กฏฺฐรูปานิ สมฺปริวตฺตนฺตานิ อทฺทส. โส ยกฺข ทาสเก ปกฺโกสาเปตฺวา พลิกมฺมํ กาเรตฺวาปิ เนว อนฺตํ น โกฏึ ปนฺนนฺโต เทวตา นมสฺสมาโน อหํ อิมา ธาตุโย คเหตฺวา จตุราสีติยา วิหารสหสฺเสสุ นิทหิตฺวา สกฺการํ กโรมิ มา เทวตา อนฺตรายํ กเรนฺตูติ อาห. राजाने 'हेच ते स्थान' असे म्हणून तेथील झाडीझुडपे तोडून, दगडाचा स्तूप आणि माती बाजूला सारून खाली चुन्याची जमीन पाहिली. त्यानंतर चुना आणि विटा बाजूला सारून अनुक्रमाने तळघरात उतरून, सात रत्नांची वाळू आणि गोल फिरणाऱ्या ऐंशी हातांच्या लाकडी बाहुल्या (यंत्रे) पाहिल्या. त्याने यक्षदासांना बोलावून पूजा-अर्चा (बलिकर्म) करूनही जेव्हा त्याला त्याचा अंत किंवा मर्यादा सापडली नाही, तेव्हा देवतांना नमस्कार करत तो म्हणाला, 'मी या धातू घेऊन चौऱ्याऐंशी हजार विहारांमध्ये प्रस्थापित करून त्यांचा सत्कार करणार आहे. हे देवतांनो, माझ्या कार्यात अडथळा आणू नका.' สกฺโก เทวราชา จาริกํ จรนฺโต ตํ ทิสฺวา วิสฺสกมฺมํ อามนฺเตตฺวา อาห. ตาต, อโสโก ธมฺมราชา ธาตุโย นีหริสฺสามีติ ปริเวณํ โอติณฺโณ, คนฺตฺวา กฏฺฐรูปานิ หาเรหีติ โส ปญฺจจูฬคาม ทารกเวเสนาคนฺตฺวา รญฺโญ ปุรโต ธนุกหตฺโถ ฐตฺวา หาเรมิ มหาราชาติ อาห. หร ตาตาติ. สรํ คเหตฺวา สนฺธิมฺหิเยว วิชฺฌิ, สพฺพํ วิปฺปกิรียิตฺถ. देवराज शक्राने चारिका करत असताना हे पाहिले आणि विस्सकम्माला बोलावून म्हटले, 'वत्सा, धम्मराज अशोक धातू बाहेर काढण्यासाठी तळघरात उतरला आहे. तू जाऊन त्या लाकडी बाहुल्या काढून टाक.' तो पाच शेंड्या असलेल्या गावातील मुलाचे रूप घेऊन आला आणि हातात धनुष्य घेऊन राजासमोर उभा राहून म्हणाला, 'महाराज, मी हे काढून टाकतो.' राजा म्हणाला, 'काढून टाक, वत्सा!' तेव्हा त्याने बाण घेऊन यंत्राच्या सांध्यावरच मारला, आणि ते सर्व विखुरले गेले. อถ ราชา อาจิญฺชเน พทฺธ กุญฺจิก มุทฺทิกํ คณฺหิ, มณิกฺขณฺธํ ปสฺสิ, อนาคเต ทฬิทฺทราชาโน อิมํ มณึ คเหตฺวา ธาตูนํ สกฺการํ กโรนฺตูติ ปน อกฺขรานิ ทิสฺวา กุชฺฌิตฺวา มาทิสํ นาม ราชานํ ทฬิทฺทราชาติ จตฺตุ ยุตฺตนฺติ ปุนปฺปุน ฆเฏตฺวา ทฺวารํ วิจริตฺวา อนฺโตเคหํ ปวิฏฺโฐ. อฏฺฐารส วสฺสาธิกานํ ทฺวินฺนํ วสฺสสตานํ อุปริ อาโรปิตทีปา ตเถว ปชฺชลนฺติ นิลุปฺปล ปุปฺผานิ ตํ ขณํ อาหริตฺวา อาโรปิตานิ วิย, ปุปฺผสณฺถโร ตํ ขณํ สนฺถโต วิย, คณฺธา ตํ มุหุตฺตํ ปึสิตฺวา ฐปิตา วิย. त्यानंतर राजाने दोरीला बांधलेली किल्ली आणि मुद्रा घेतली, आणि मण्यांचा ढीग पाहिला. तसेच 'भविष्यात गरीब राजांनी हा मणी घेऊन धातूंचा सत्कार करावा' अशी अक्षरे लिहिलेली पाहून तो क्रोधीत झाला आणि 'माझ्यासारख्या राजाला गरीब राजा म्हणणे योग्य आहे का?' असे वारंवार पुटपुटत, दरवाजा उघडून तो गर्भगृहात शिरला. दोनशे अठरा वर्षांपूर्वी लावलेले दिवे अजूनही तसेच जळत होते. निळ्या कमळांची फुले जणू त्याच क्षणी आणून वाहिलेली असावीत तशी होती, फुलांची अंथरलेली शय्या जणू त्याच क्षणी अंथरली असावी तशी होती, आणि सुगंध जणू त्याच क्षणी वाटून ठेवला असावा तसा दरवळत होता. ราชา สุวณฺณปฏฺฏํ คเหตฺวา อนาคเต ปิยทาโสนาม กุมาโร ฉตฺตํ อุสฺสาเปตฺวา อโสโก นาม ธมฺมราชา ภวิสฺสติ โส อิมา ธาตุโย คเหตฺวา วิตฺถาริกา กริสฺสตีติ วาเจตฺวา ทิฏฺโฐ’หํ อยฺโยน มหากสฺสปตฺเถเรนาติ วตฺวา วามหตฺถํ อาภุชิตฺวา ทกฺขิณหตฺเถน อปฺโปเฐสิ. राजाने सोन्याचा पट्टा हातात घेतला आणि त्यावर लिहिलेले वाचले: 'भविष्यात प्रियदास नावाचा कुमार छत्र धारण करेल आणि अशोक नावाचा धम्मराज होईल. तो या धातू घेऊन त्यांचा विस्तार करेल.' हे वाचून, 'आदरणीय महाकस्सप थेरांनी मला पाहिले होते!' असे म्हणून त्याने आपला डावा हात दुमडला आणि उजव्या हाताने टाळी वाजवली (आनंदाने दंड थापटला). โส ตสฺมึ ฐาเน ปริจรณก ธาตุมตฺตกเมว ฐเปตฺวา เสสธาตุโย สพฺพา คเหตฺวา ธาตุฆรํ ปุพฺเพ ปิหิตนเยเนว ปิทหิตฺวา สพฺพํ ยถา ปกติยาว กาเรตฺวา อุปริ ปาสาณเจติยํ ปติฏฺฐาเปตฺวา จตุราสีติยา วิหารสหสฺเสสุธาตุโย ปติฏฺฐาเปสิ เอวํ ชมฺพุทีปตเล อโสโก ธมฺมราชา จตุราสิติ เจติย สหสฺสานิ การาเปสิ. त्याने त्या ठिकाणी केवळ पूजेसाठी काही धातू ठेवून इतर सर्व धातू घेतल्या, आणि धातूगृह पूर्वीप्रमाणेच बंद करून सर्व काही पूर्ववत केले. त्यावर दगडाचे चेतिय प्रस्थापित करून, चौऱ्याऐंशी हजार विहारांमध्ये त्या धातूंची प्रतिष्ठापना केली. अशा प्रकारे जम्बुदीपात धम्मराज अशोकाने चौऱ्याऐंशी हजार चेतिय बांधले. สพฺเพ ถูปา สพฺพโลเกกทีปา สพฺเพสํ เย สคฺคโมกฺขาวหา จ, หิตฺวา สพฺพํ กิจฺจมญฺญํ ชเนน วณฺทยฺยา เต สพฺพถา สพฺพกาลนฺติ. जे सर्व स्तूप संपूर्ण जगाचे एकमेव दीप आहेत आणि जे सर्वांना स्वर्ग व मुक्ती मिळवून देणारे आहेत, लोकांनी इतर सर्व कामे सोडून, त्या स्तूपांची सर्व प्रकारे व सर्व काळी वंदना करावी. จตุราสีติ สหสฺส ถูปกถา चौऱ्याऐंशी हजार स्तूपांची कथा. ๑๒. เอวํ อโสโก ธมฺมราชา จตุราสีติ วิหารสหสฺสมหํ กตฺวา มหาเถโร วนฺทิตฺวา ปุจฺฉิ ทายาโทมฺหิ ภนฺเต พุทฺธสาสเน’ติ. กิสฺส ทายาโท ตฺวํ มหาราช, พาหิรโก ตฺวํ สาสนสฺสาติ. ภนฺเต ฉนฺนวุติโกฏิธนํ วิสฺสชฺเชตฺวา จตุราสีติ วิหารสหสฺสานิ สเจติยานิ การาเปตฺวา อหํ น ทายาโท, อญฺเญ โก ทายาโทติ, ปจฺจย ทายโก นาม ตฺวํ มหาราช, โย ปน อตฺตโน ปุตฺตญฺจ ธีตรญฺจ ปพฺพาเชติ, อยํ สาสเน ทายาโท นามาติ. १२. अशा प्रकारे धम्मराज अशोकाने चौऱ्याऐंशी हजार विहारांचा महोत्सव करून, महाथेरांना वंदन करून विचारले, 'भंते, मी बुद्धशासनाचा दायाद (वारसदार) झालो आहे का?' महाथेर म्हणाले, 'महाराज, तू कसला दायाद? तू तर शासनाचा बाहेरीलच आहेस.' राजा म्हणाला, 'भंते, ९६ कोटी धन खर्च करून, चेतिय (स्तूप) सहित चौऱ्याऐंशी हजार विहार बांधूनही जर मी दायाद नाही, तर मग दुसरा कोण दायाद असू शकतो?' महाथेर म्हणाले, 'महाराज, तू तर केवळ प्रत्यय-दायक (साधनसामग्री देणारा) आहेस. जो कोणी आपल्या पुत्राला आणि कन्येला प्रव्रजित करतो, तोच खऱ्या अर्थाने शासनाचा दायाद होतो.' เอวํ วุตฺเต อโสโก ราชา สาสเน ทายาทภาวํ ปตฺถยมาโน อวิทูเร ฐิตํ มหิณฺทกุมารํ ทิสฺวา สกฺขิสฺสสิตฺวํ ตาต ปพฺพชิตุนฺติ อาห. กุมาโร ปกติยา ปพฺพชิตุกาโม รญฺโญ วจนํ สุตฺวา อติวิย ปาโมชฺชชาโต ปพฺพฺชามิ เทว, มํ ปพฺพาเชตฺวา สาสเน ทายาโท โหถาติ อาห เตน จ สมเยน ราชธีตา สงฺฆมิตฺตาปิ ตสฺมึ ฐาเน ฐิตา โหติ ตํ ทิสฺวา อาห-’ตฺวมฺปิ อมฺม ปพฺพชิตุํ สกฺขิสฺสสี’ติ, สาธุ ตาตาติ สมฺปฏิจฺฉิ. ราชา ปุตฺต น มนํ ลภิตฺวา ปหฏฺฐจิตฺโต ภิกฺขุสงฺฆํ อุปสงฺกมิตฺวา ภนฺเต อิเม ทารเก ปพฺพาเชตฺวา มํ สาสเน ทายาทํ กโรถาติ สงฺโฆ รญฺโญ วจนํ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา กุมารํ โมคฺคลิปุตฺต ติสฺสตฺเถเรน อุปชฺฌาเยน มหาเทวตฺเถเรน จ อาจริเยน ปพฺพชฺชาเปสิ. มชฺฌนฺติกตฺเถเรน อาจริเยน อุปสมฺปาเทสิ อุปสมฺปทามาลเกเยว สหปฏิสมฺภิทาหิ อรหตฺตํ ปาปุณิ. असे म्हटल्यावर, शासनाचा दायाद होण्याची इच्छा धरणाऱ्या अशोक राजाने जवळच उभे असलेल्या महिंद कुमाराला पाहून विचारले, 'वत्सा, तू प्रव्रजित होऊ शकशील का?' कुमार स्वभावतःच प्रव्रजित होण्याची इच्छा बाळगणारा असल्यामुळे, राजाचे वचन ऐकून अत्यंत आनंदित झाला आणि म्हणाला, 'देव, मी प्रव्रजित होईन. मला प्रव्रजित करून आपण शासनाचे दायाद व्हा.' त्याच वेळी राजकन्या संघमित्ता देखील तेथे उभी होती. तिला पाहून राजाने विचारले, 'बाळ, तू सुद्धा प्रव्रजित होऊ शकशील का?' तिने 'होय, तात!' असे म्हणून संमती दिली. मुलांची संमती मिळवून राजा अत्यंत प्रसन्न चित्ताने भिक्खू संघाकडे गेला आणि म्हणाला, 'भंते, या मुलांना प्रव्रजित करून मला शासनाचा दायाद बनवा.' संघाने राजाच्या वचनाचा स्वीकार करून, मोग्गलिपुत्त तिस्स थेरांना उपाज्झाय आणि महादेव थेरांना आचार्य बनवून कुमाराला प्रव्रज्या दिली. मज्झंतिक थेरांना आचार्य बनवून त्याची उपसंपदा करवून घेतली. उपसंपदेच्या सीमा-मंडपातच (माळकावरच) त्याने प्रतिसंभिदांसह अरहंतपद प्राप्त केले. สงฺฆมิตฺตายปิ ราชธีตาย อาจริยา อายุปาลตฺเถริ นาม, อุปชฺฌายา ปน ธมฺมปาลตฺเถรี นาม อโหสิ. อถ มหิณฺทตฺเถโร อุปสมฺปนฺน กาลโตปฺปภูติ อตฺตโน อุปชฺฌายสฺเสว สนฺติเก ธมฺมญฺจ วินยญฺจ ปริยาปุณนฺโต ทฺเวปิ สงฺคิติโย อารุฬฺหํ ติปิฏก สงฺคหีตํ สาฏฺฐกถํ เถรวาทํ ติณฺณํ วสฺสานํ อพฺภนฺตเร อุคฺคเหตฺวา อตฺตโน อุปชฺฌายสฺส อนฺเตวาสิกานํ สหสฺสมตฺตานํ ภิกฺขูนํ ปาโมกฺขํ อโหสิ. राजकन्या संघमित्ता हिची आचार्य आयुपाल थेरी आणि उपाज्झाय धम्मपाल थेरी या होत्या. त्यानंतर महिंद थेरांनी उपसंपदा मिळाल्यापासून आपल्या उपाज्झाय यांच्या जवळच धम्म आणि विनय यांचे अध्ययन करत, दोन्ही संगीतींमध्ये संकलित केलेले, अट्ठकथांसह संपूर्ण तिपिटक आणि थेरवाद तीन वर्षांच्या आत आत्मसात केले, आणि ते आपल्या उपाज्झाय यांच्या सुमारे एक हजार अंत्यवासी (शिष्य) भिक्खूंचे प्रमुख झाले. เตน โข ปน สมเยน โมคฺคลิปุตฺตติสฺสตฺเถโร กตฺถ นุ โข อนาคเต สาสนํ สุปฺปติฏฺฐิตํ คเวยฺยาติ อุปปริกฺขนฺโต ปจฺจนฺติเมสุ ชนปเทสุ สุปฺปติฏฺฐิตํ ภวิสฺสตีติ ญตฺวา เตสํ เตสํ ภิกฺขูนํ ภารํ กตฺวา เต เต ภิกฺขุ ตตฺถ ตตฺถ เปเสสิ. त्या वेळी मोग्गलिपुत्ततिस्स थेरांनी 'भविष्यात शासन (बुद्धशासन) कोठे चांगल्या प्रकारे प्रतिष्ठित होईल?' असा विचार केला. सीमावर्ती देशांमध्ये (प्रत्यंत जनपदांमध्ये) ते चांगल्या प्रकारे प्रतिष्ठित होईल हे जाणून त्यांनी त्या त्या भिक्खूंवर जबाबदारी सोपवून त्या त्या भिक्खूंना तेथे तेथे पाठवले. มชฺฌนฺติกตฺเถรํ กสฺมีร คณฺธาร รฏฺฐํเปเสสิ ตฺวํ เอตํ รฏฺฐํ คนฺตฺวา ตตฺถ สาสนํ ปติฏฺฐาเปหีติ มหาเทวตฺเถรํ ตเถว วตฺวา มหึสกมณฺฑลํ เปเสสิ. รกฺขิตตฺเถรํวนวาสีํ, โยนกธมฺมรกฺขิตตฺเถรํ อปรนฺตกํ, มหาธมฺมรกฺขิตตฺเถรํ มหารฏฺฐํ มหารกฺขิตตฺเถรํ โยนก โลกํ. มชฺฌิมตฺเถรํ หิมวนฺตเทส ภาคํ, โสณตฺเถรํ-อุตฺตรตฺเถรญฺจ สุวณฺณภูมึ. อตฺตโน สทฺธิวิหาริกํ มหิณฺทตฺเถรํ อิฏฺฏิยตฺเถเรน อุตฺติยตฺเถเรน ภทฺทสาลตฺเถเรน สมฺพลตฺเถเรน จ สทฺธึ ตมฺพปณฺณิทีปํ คนฺตฺวา เอตฺถ สาสนํ ปติฏฺฐาเปถาติ. สพฺเพปิ ตํ ตํ ทิสาภาคํ คจฺฉนฺตา อตฺตปญฺจมา อคมึสุ สพฺเพปิ เถรา คตคตฏฺฐาเน มนุสฺเส ปสาเทตฺวา สาสนํ ปติฏฺฐาเปสุํ. त्यांनी मज्झंतिक थेरांना काश्मीर आणि गांधार देशात पाठवले आणि म्हणाले, "तुम्ही या देशात जाऊन तेथे शासनाची स्थापना करा." तसेच महादेवा थेरांना सांगून महिंसकमंडलात पाठवले. रक्खित थेरांना वनवासी देशात, योनक धम्मरक्खित थेरांना अपरांतकात, महाधम्मरक्खित थेरांना महारठ्ठ (महाराष्ट्र) मध्ये, महारक्खित थेरांना योनक लोकात, मज्झिम थेरांना हिमवंत (हिमालय) प्रदेशात, आणि सोण थेर व उत्तर थेरांना सुवण्णभूमीत पाठवले. आपले सद्धिविहारिक (शिष्य) महिंद थेरांना इट्टिय थेर, उत्तिय थेर, bhaddasālattherena (भद्दसाल थेर) आणि संबल थेर यांच्यासह तांबपण्णिदीपावर (श्रीलंका) पाठवले आणि सांगितले की, "तेथे जाऊन शासनाची स्थापना करा." ते सर्व जण आपापल्या दिशेला पाच-पाच जणांच्या संघात गेले. त्या सर्व थेरांनी आपापल्या गेलेल्या ठिकाणी लोकांना प्रसन्न करून (श्रद्धा उत्पन्न करून) शासनाची स्थापना केली. มหิณฺทตฺเถโร ปน ตมฺพปณฺณิทีปํ คนฺตฺวา สาสนํ ปติฏฺฐาเปหีติ อุปชฺฌาเยน ภิกฺขุสงฺเฆน จ อชฺฌิฏฺโฐ กาโล นุ โข เม ตมฺพปณฺณิทีปํ คนฺตุํ โนติ อุปธาเรนฺโต มุฏสีวรญฺโญ มหลฺลกภาวํ จินฺเตสิ. อยํ มหาราชา มหลฺลโก, น สกฺกา อิมํ คณฺหิตฺวา สาสนํ ปคฺคเหตุํ, อิทานิ ปนสฺส ปุตฺโต เทวานมฺปิยติสฺโส รชฺชํ กาเรสฺสติ. ตํ คณฺหิตฺวา สกฺกา ภวิสฺสติ สาสนํ ปคฺคเหตุํ, หณฺท ยาว โส สมโย อาคจฺฉติ ตาว ญาตเก โอโลเกม, ปุน’ทานิ อิมํ ชนปทํ อาคจฺเฉยฺยาม วา น วาติ. परंतु, महिंद थेरांना त्यांच्या उपाध्यायांनी आणि भिक्खू संघाने 'तांबपण्णिदीपावर जाऊन शासनाची स्थापना करा' अशी विनंती केली असता, 'माझ्यासाठी तांबपण्णिदीपावर जाण्याची ही योग्य वेळ आहे का?' याचा विचार करताना त्यांनी मुटसीव राजाच्या वृद्धत्वाचा विचार केला. "हा महाराज वृद्ध आहे, याला सोबत घेऊन शासनाचा विस्तार करणे शक्य नाही. आता त्यांचा मुलगा देवानंपियतिस्स राज्य करेल. त्याला सोबत घेऊन शासनाचा विस्तार करणे शक्य होईल. चला तर, जोपर्यंत ती वेळ येत नाही, तोपर्यंत आपण आपल्या नातेवाईकांना भेटू या, कारण पुन्हा आपण या जनपदात येऊ की नाही (हे सांगता येत नाही)." โส เอวํ จินฺเตตฺวา อุปชฺฌายญฺจ ภิกฺขุสงฺฆญฺจ วนฺทิตฺวา อโสการามโต นิกฺขมฺม เตหิ อิฏฺฏิยาทีหิ จตูหิ เถเรหิ สงฺฆมิตฺตาย ปุตฺเตน สุมนสามเณเรน ภณฺฑุเกนก จ อุปาสเกน สทฺธึ ราชคหนคร อุปวตฺตเก ทกฺขิณ คิริชนปเท จาริกํ จรมาโน ญาตเก โอโลเกนฺโต ฉ มาเส อติกฺกาเมสิ อถานุปุพฺเพน มาตุนิเวสนฏฺฐานํ เวฏิส นครํ นาม สมฺปตฺโต สมฺปตฺตญฺจ ปน เถรํ ทิสฺวา เถรมาตา เทวี ปาเท สิรสา วนฺทิตฺวา ภิกฺขํ ทตฺวา เถรํ อตฺตนา กตํ เวฏิสคิริ วิหารํ นาม อาโรเปสิ. त्यांनी असा विचार करून आपले उपाध्याय आणि भिक्खू संघाला वंदन केले आणि असोकाराममधून बाहेर पडून त्या इट्टिय इत्यादी चार थेरांसह, संघमित्तेचा मुलगा सुमन सामणेर आणि भंडुक उपासक यांच्यासोबत राजगृहाच्या जवळील दक्खिणागिरी जनपदात चारिका (धम्मयात्रा) करत, नातेवाईकांना भेटत सहा महिने घालवले. त्यानंतर अनुक्रमे ते आपल्या आईचे निवासस्थान असलेल्या वेटिस नावाच्या नगरात पोहोचले. थेर आलेले पाहून थेरांच्या माता देवी यांनी त्यांच्या चरणी डोके ठेवून वंदन केले, भिक्षा दिली आणि थेरांना स्वतः बांधलेल्या वेटिसगिरी नावाच्या विहारात नेले. เถโร ตสฺมึ วิหาเร นิสนฺโน จินฺเตสิ อมฺหากํ อิธ กตฺตพฺพ กิจฺจํ นิฏฺฐิตํ. สมโย นุ โข อิทานิ ลงฺกาทิปํ คนฺตุนฺติ. ตโต จินฺเตสิ-อนุภวตุ ตาว เม ปิตรา เปสิตํ อภิเสกํ เทวานมฺปิยติสฺโส รตนตฺตยคุณญฺจ สุณาตุ, ฉณตฺถญฺจ นครโต นิกฺขมิตฺวา มิสฺสกปพฺพตํ อภิรูหตุ ตทา ตํ ตตฺถ ทกฺขิสฺสามาติ. อถาปรํ เอกมาสํ ตตฺเถว วาสํ กปฺเปสิ. त्या विहारात बसून थेरांनी विचार केला, "आमचे येथील कर्तव्य पूर्ण झाले आहे. आता लंकादीपावर जाण्याची वेळ आली आहे का?" नंतर त्यांनी विचार केला, "माझ्या वडिलांनी पाठवलेला राज्याभिषेक देवानंपियतिस्स आधी अनुभवू दे, आणि तो त्रिरत्नांचे गुण ऐकू दे. उत्सवासाठी नगरातून बाहेर पडून तो मिस्सक पर्वतावर चढेल, तेव्हा मी त्याला तेथे भेटेन." त्यानंतर त्यांनी आणखी एक महिना तेथेच मुक्काम केला. มาสาติกฺกเม สกฺโก เทวานมินฺโท มหิณฺทตฺเถรํ อุปสงฺกมิตฺวา เอตทโวจ.’ กาลกโต ภนฺเต มุฏสีวราชา, อิทานิ เทวานมฺปิยติสฺส ราชา รชฺชํ กาเรติ. สมฺมาสมฺพุทฺเธน จ ตุมฺเห วฺยากตา อนาคเต มหิณฺโท นาม ภิกฺขุ ตมฺพปณฺณิทีปํ ปสาเทสฺสตี’ติ. ตสฺมา ติห โว ภนฺเต กาโล ทีปวรํ คมนาย, อหมฺปิ โว สหาโย ภวิสฺสามี. एक महिना उलटल्यावर, देवांचा राजा सक्क याने महिंद थेरांकडे येऊन असे म्हटले, "भंते, मुटसीव राजा कालवश झाला आहे, आता देवानंपियतिस्स राजा राज्य करत आहे. सम्यक्संबुद्धांनी तुमच्याविषयी भाकीत केले होते की, 'भविष्यात महिंद नावाचा भिक्खू तांबपण्णिदीपावर श्रद्धा उत्पन्न करेल.' म्हणूनच, भंते, आपल्यासाठी त्या श्रेष्ठ द्वीपावर जाण्याची हीच वेळ आहे, मीसुद्धा आपला साहाय्यक होईन." เถโร ตสฺส วจนํ สมฺปฏิจฺฉิตฺวาอตฺตสตฺตโม เวฏิส ปพฺพตวิหารา เวหาสํ อุปฺปติตฺว อนุราธปุรสฺส ปุรตฺถิมาย ทิสาย มิสฺสกปพฺพเต ปติฏฺฐหิ ยํ เอตรหิ เจติยปพฺพโตติปิ สญฺชานนฺติ ตสฺสมึ ทิวเส ตมฺพปณฺณิทิเป เชฏฺฐมูล นกฺขตฺตํ นาม โหติ ราชา นกฺขตฺตํ โฆสาเปตฺวา ฉณํ กโรถาติ อมจฺเจ อาณาเปตฺวา จตฺตาลีส ปุริส สหสฺสปริวาโร นครมฺภา นิกฺขมิตฺวา เยน มิสฺสกปพฺพโต เตน ปายาสิ มิควํ กีฬิตุกาโม อถ ตสฺมึ ปพฺพเต อธิวตฺถา เทวตา รญฺโญ เถเร ทสฺเสสฺสามีติ โรหิต มิครูปํ คเหตฺวา อวิทูเร ติณปณฺณานิ ขาทมานา วิย จรติ. थेरांनी त्याचे बोलणे स्वीकारले आणि स्वतःसह सात जण (अत्तसत्तमो) वेटिस पर्वत विहारातून आकाशात उडून अनुराधापूरच्या पूर्व दिशेला असलेल्या मिस्सक पर्वतावर उतरले, ज्याला आजकाल 'चेतियपब्बत' म्हणून ओळखले जाते. त्या दिवशी तांबपण्णिदीपावर 'जेट्ठमूल' (ज्येष्ठमूळ) नक्षत्र होते. राजाने अमात्यांना नक्षत्राची घोषणा करून उत्सव साजरा करण्याची आज्ञा दिली आणि चाळीस हजार पुरुषांच्या परिसरासह नगरातून बाहेर पडून शिकार खेळण्याच्या इच्छेने मिस्सक पर्वताच्या दिशेने निघाला. तेव्हा त्या पर्वतावर राहणाऱ्या देवतेने 'मी राजाला थेरांचे दर्शन घडवीन' असा विचार करून तांबड्या हरणाचे (रोहित मृग) रूप घेतले आणि जवळच गवत व पाने खात असल्यासारखे फिरू लागली. ราชา ทิสฺวา อยุตฺตํ ทานิ ปมตฺตํ วิชฺฌิตุนฺติ ชียํ โปเฐสิ. มโค อมฺพตฺถลมคฺคํ คเหตฺวา ปลายิตุํ อารภิ ราชาปิ ปิฏฺฐิโต ปิฏฺฐิโต อนุพณฺธนฺโต อมฺพตฺถลเมว อารุหิ. มิโค เถรานํ อวิทูเร อนฺตรธายิ. राजाने त्याला पाहून विचार केला, "असावध प्राण्यावर बाण चालवणे अयोग्य आहे," म्हणून त्याने धनुष्याची दोरी ओढून आवाज केला. हरणाने अंबत्थलचा मार्ग धरला आणि पळू लागले. राजानेही त्याच्या पाठीमागे पाठलाग करत अंबत्थलवरच चढाई केली. ते हरण थेरांच्या जवळच अदृश्य झाले. มหิณฺทตฺเถโร ราชานํ อวิทูเร อาคจฺฉนฺตํ’มมํเยว ราชา ปสฺสตุ, มา อิตเร’ติ อธิฏฺฐหิตฺวา’ติสฺส! ติสฺส! อิโต เอหี’ติ อาห. ราชา สุตฺวา จินฺเตสิ-อิมสฺมึ ตมฺพปณฺณิทีเป ชาโต มํ ติสฺโสติ นามํ คเหตฺวา อาลปิตุํ สมตฺโถ นาม นตฺถิ. อยมฺปน ฉินฺนภินฺนปฏธโร ภณฺฑุกาสาว วสโน มํ นาเมน อาลปติ, โก นุ โข อยํ ภวิสฺสติ มนุสฺโส วา อมนุสฺโส วาติ. เถโร อาห. महिंद थेरांनी राजाला जवळ येत असल्याचे पाहून, 'राजाने फक्त मलाच पाहावे, इतरांना नाही' असा अधिष्ठान (संकल्प) केला आणि ते म्हणाले, "तिस्स! तिस्स! इकडे ये!" राजाने हे ऐकून विचार केला, "या तांबपण्णिदीपावर जन्मलेला असा कोणीही नाही जो माझे 'तिस्स' हे नाव घेऊन मला हाक मारण्यास समर्थ असेल. पण हा फाटलेले-तुटलेले वस्त्र परिधान केलेला, मुंडण केलेला आणि काषाय वस्त्र नेसलेला माणूस मला नावाने हाक मारत आहे, हा कोण असावा, मनुष्य की अमनुष्य?" थेर म्हणाले: สมณา มยํ มหาราช - ธมฺมราชสฺส สาวกา,ตเวว อนุกมฺปาย - ชมฺพุทีปา อิธาคตาติ; "महाराज! आम्ही श्रमण आहोत, धम्मराजाचे (बुद्धांचे) श्रावक आहोत. तुमच्यावरच अनुकंपा (दया) करण्यासाठी आम्ही जम्बुदीपावरून येथे आलो आहोत." เตน สมเยน เทวานมฺปิยติสฺส ราชา จ อโสกธมฺมราชา จ อทิฏฺฐ สหายกา โหนฺติ. เทวานมฺปิยติสฺส รญฺเญ จ ปุญฺญานุภาเวน ฉาตปพฺพตปาเท เอกสฺมึ เวฬุคุมฺเพ ติสฺโส เวฬุยฏฺฐิโย นิพฺพตฺตึสุ เอกา ลตายฏฺฐิ นาม, เอกา ปุปฺผยฏฺฐิ นาม เอกา สกุณยฏฺฐิ นาม. ตาสุ ลตายฏฺฐิ สยํ รชตวณฺณา โหติ ตํ อลงฺกริตฺวา อุปฺปนฺนลตา กญฺจน วณฺณา ขายติ ปุปฺผยฏฺฐิยํ ปน นีล-ปีต-โลหิต-โอทาต-กาฬวณฺณานิ ปุปฺผานิ สุจิภตฺตวณฺฏ ปตฺต กิญฺชกฺขา หุตฺวา ขายนฺติ สกุณยฏฺฐิยํ หํสกุกฺกุฏ-ชีวํชีวกาทโย สกุณา นานาปฺปการานิ จ จตุปฺปทานิ สชีวานิ วิย ขายนฺติ สมุทฺทโตปิสฺส มุตฺตา-มณิ-เวฬุริยาทิ อเนกวิหิตํ รตนํ อุปฺปชฺชิ. त्या वेळी राजा देवानंपियतिस्स आणि धम्मराज अशोक हे न पाहिलेले मित्र (अदृष्ट मित्र) होते. राजा देवानंपियतिस्स यांच्या पुण्याच्या प्रभावाने चात पर्वताच्या पायथ्याशी एका बांबूच्या वनात तीन बांबूच्या काठ्या (वेळूयठ्ठी) उत्पन्न झाल्या: एक 'लतायठ्ठी' (वेल-काठी) नावाची, एक 'पुप्फयठ्ठी' (फूल-काठी) नावाची आणि एक 'सकुणयठ्ठी' (पक्षी-काठी) नावाची. त्यांपैकी लतायठ्ठी स्वतः चांदीच्या रंगाची होती आणि तिला सुशोभित करणारी वेल सोन्याच्या रंगाची दिसत होती. पुप्फयठ्ठीवर निळ्या, पिवळ्या, लाल, पांढऱ्या आणि काळ्या रंगांची फुले सुंदर देठ, पाने आणि परागकणांसह दिसत होती. सकुणयठ्ठीवर हंस, कोंबडे, जीवंजीवक इत्यादी पक्षी आणि विविध प्रकारचे चार पायांचे प्राणी जणू जिवंत असल्यासारखे दिसत होते. समुद्रातूनही त्यांच्यासाठी मोती, मणी, वैडूर्य (वेळुरिय) इत्यादी अनेक प्रकारची रत्ने उत्पन्न झाली. ตมฺพปณฺณิยํ ปน อฏฺฐมุตฺตํ อุปฺปชฺชึสุ-ภยมุตฺตา คชมุตฺตา รถมุตฺตา อามลกมุตฺตา จลยมุตฺตา องฺคุลีเวฐกมุตฺตา กกุธผลมุตฺตา ปากติกมุตฺตาติ โส ตา จ ยฏฺฐิโย ตา จ มุตฺตาโย อญฺญฺจ พหุํ รตนํ อโสกสฺส ธมฺมรญฺโญ ปณฺณาการตฺถาย เปเสสิ. อโสโกปิ ปสีทิตฺวา ปญฺจ ราชกกุธภณฺฑานิเจว อญฺเญ จ อภิเสกตฺถาย พหูปณฺณากาเร ปหิณิ. น เกวลญฺจ เอตํ อามิส ปณฺณาการํ, อิมํ กิร ธมฺม ปณฺณาการมฺปิ เปเสสิ. तांबपण्णीमध्ये (श्रीलंकेत) आठ प्रकारचे मोती उत्पन्न झाले - भय-मोती, गज-मोती, रथ-मोती, आवळा-मोती, वलय-मोती, अंगठी-मोती, ककुधफळ-मोती आणि सामान्य मोती. त्यांनी (राजा देवानंपिय तिस्स यांनी) त्या यष्टी (बांबूच्या काठ्या), ते मोती आणि इतर अनेक रत्ने धर्मराज अशोकांना भेट म्हणून पाठवले. अशोकांनीही प्रसन्न होऊन राज्याभिषेकासाठी पाच राजचिन्हे (राजककुधभांड) आणि इतर अनेक भेटवस्तू पाठवल्या. केवळ ही आमिष-भेट (भौतिक भेट) नव्हे, तर त्यांनी ही धम्म-भेटही पाठवली. ‘‘อหํ พุทฺธญฺจ ธมฺมญฺจ-สงฺฆญฺจ สรณํ คโต,อุปาสกตฺตํ เวเทสึ-สกฺยปุตฺตสฺส สาสเน,อิเมสุ ตีสุ วตฺถูสุ-อุนฺนเมสุ นรุตฺตม,จิตฺตํ ปสาทยิตฺวาน-สทฺธาย สรณํ วชา’ติ; ’’ “मी बुद्ध, धम्म आणि संघाला शरण गेलो आहे. मी शाक्यपुत्राच्या (बुद्धांच्या) शासनात उपासकत्व स्वीकारले आहे. हे नरश्रेष्ठा, या तीन सर्वोत्तम वस्तूंवर आपले चित्त प्रसन्न करून, श्रद्धेने तुम्हीही शरण जा.” ราชา อวิรสุตํ สาสนปวตฺตึ อนุสฺสรมาโน เถรสฺส ตํ ‘‘สมณามยํ มหาราช ธมฺมราชสฺส สาวกา‘‘ติ วจนํ สุตฺวา อยฺยา นุ โข อาคตาติ ตาวเทว อาวุธํ นิกฺขิปิตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ สมฺโมทนียํ กถํ กถยมาโน, สมฺโมทนียกถํ กุรุมาเนเยว ตสฺมึ ตานิปิ จตฺตาลีส ปุริสสหสฺสานิ อาคนฺตฺวา ตํ ปริวาเรสุํ. ตทา เถโร อิตเรปิ ชเน ทสฺเสสิ. राजाने पूर्वी ऐकलेल्या शासनाच्या (धम्माच्या) वृत्तांताचे स्मरण करत, थेरांचे ते वचन ऐकले की, “महाराज, आम्ही श्रमण आहोत, धर्मराजाचे (बुद्धांचे) श्रावक आहोत.” हे ऐकून 'आर्य आले आहेत काय?' असे समजून त्यांनी तात्काळ आपले शस्त्र खाली ठेवले आणि एका बाजूला बसून ते कुशल-मंगल (संमोदनीय) संभाषण करू लागले. ते कुशल-मंगल संभाषण करत असतानाच, ते चाळीस हजार पुरुषही तेथे आले आणि त्यांनी राजाला वेढले. तेव्हा थेरांनी इतर व्यक्तींनाही (आपल्या सोबतच्या भिक्खूंना) प्रकट केले. ราชา ทิสฺวา อิเม กทา อาคตาติ ปุจฺฉิ มยา สทฺธึเยว มหา ราชาติ. อิทานิ ปน ชมฺพุทีเป อญฺญฺโญปิ เอวรูปา สมณา สนฺตีติ. มหาราช เอตรหิ ชมฺพุทีโป กาสาว ปชฺโชโต อิสิวาตปริวาโต, ตสฺมึ- राजाने त्यांना पाहून विचारले, “हे कधी आले?” (थेर म्हणाले), “महाराज, माझ्यासोबतच.” (राजाने विचारले), “पण आता जंबुद्विपात असे इतरही श्रमण आहेत का?” (थेर म्हणाले), “महाराज, सध्या जंबुद्वीप काषाय वस्त्रांनी (भगव्या वस्त्रांनी) प्रकाशमान आहे आणि ऋषींच्या वाऱ्याने सुवासित आहे. त्या जंबुद्विपात—” ‘‘เต วิชฺชา อิทฺธิปตฺตา จ เจโตปริยาย โกจิทา,ขีณาสาว อรหนฺโต-พหู พุทฺธสฺส สาวกาติ’’; “ते त्रिविद्य (तेविज्जा) प्राप्त, ऋद्धिप्राप्त, चेतोपरियायज्ञान (दुसऱ्यांच्या मनातील जाणणे) जाणणारे, क्षीणासव (आस्रवमुक्त) आणि अर्हत असे बुद्धांचे अनेक श्रावक आहेत.” อถ ราชา ภนฺเต สฺเว รถํ เปเสสฺสามิ. ตํ อภิรูหิตฺวา อาคจฺเฉยฺยาถาติ วตฺวา ปกฺกากมิ เถโร อจิรปกฺกนฺตสฺส รญฺโญ สุมณสามเณรํ อามนฺเตสิ เอหิ ตฺวํ สุมน ธมฺมสวนกาลํ โฆเสหีติ สามเณโร อภิญฺญาปาทกํ จตุตฺถชฺฌานํ สมาปชฺชิตฺวา วุฏฺฐาย อธิฏฺฐหิตฺวา สมาหิเตน จิตฺเตน สกลตมฺพปณฺณิทีปํ สาเจนฺโต ธมฺมสวนกาลํ โฆเสสิ. त्यानंतर राजा म्हणाला, “भंते, उद्या मी रथ पाठवीन. त्यावर आरूढ होऊन आपण यावे.” असे सांगून तो निघून गेला. राजा निघून गेल्यावर लगेचच थेरांनी सुमन सामणेराला बोलावले, “सुमन, ये आणि धम्मश्रवणाची वेळ झाली असल्याची घोषणा कर.” सामणेराने अभिज्ञा-पादक चतुर्थ ध्यानात समाधी घेतली, त्यातून उठून अधिष्ठान केले आणि एकाग्र चित्ताने संपूर्ण तांबपण्णी द्वीपात ऐकू जाईल अशा आवाजात धम्मश्रवणाच्या वेळेची घोषणा केली. สามเณรสฺส สทฺทํ สุตฺวา ภุมฺมา เทวตา สทฺทมนุสฺสาเวสุ, เอเตนุปาเยน ยาว พฺรหฺมโลกา สทฺโท อพฺภุคฺคญฺฉิ. เตน สทฺเทน มหาเทวตา สนฺนิปาโต อโหสิ เถโร มหนฺตํ เทวตา สนฺติปาตํ ทิสฺวา สมจิตฺตสุตฺตนฺตํ กเถสิ. กถา ปริโยสาเน อสงฺเขยฺยานํ เทวานํ ธมฺมาภิสมโย อโหสิ. พหู นาค สุปณฺณา จ สรเณสุ ปติฏฺฐหึสุ. อถ ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน ราชา เถรานํ รถํ เปเสสิ. เถรา น มยํ รถํ อารุหาม. คจฺฉ ตฺวํ, ปจฺฉา มยํ อาคจฺฉิสฺสามาติ วตฺวา เวหาสํ อพฺภุคฺคนฺตฺวา อนุราธปุรสฺส ปจฺฉิมทิสาย ปฐมก เจติยฏฺฐาเน โอตรึสุ. सामणेराचा आवाज ऐकून भूमीवरील देवतांनी (भुम्मा देवता) तो आवाज घुमवला, आणि या पद्धतीने तो आवाज थेट ब्रह्मलोकापर्यंत पोहोचला. त्या आवाजामुळे देवतांची मोठी सभा भरली. थेरांनी देवतांची ती मोठी सभा पाहून 'समचित्त सुत्तंत' उपदेशिला. प्रवचनाच्या शेवटी असंख्य देवतांना धम्माभिसमय (धम्मज्ञान) प्राप्त झाले. अनेक नाग आणि सुपर्ण (गरुड) शरणागतीमध्ये (त्रिशरणात) प्रतिष्ठित झाले. त्यानंतर ती रात्र संपल्यावर राजाने थेरांसाठी रथ पाठवला. थेर म्हणाले, “आम्ही रथात बसत नाही. तू जा, आम्ही नंतर येऊ.” असे सांगून त्यांनी आकाशात उड्डाण केले आणि अनुराधपूरच्या पश्चिम दिशेला असलेल्या 'प्रथम चैत्य' स्थानावर ते उतरले. ราชาปิ สารถึ เปเสตฺวา อนฺโต นิเวสเน มณฺฑปํ ปฏิยาเทตฺวา จินฺเตสิ’ นิสีทิสฺสนฺติ นุ โข อยฺยา อาสเน น นิสีทิสฺสนฺตี‘‘ติ. ตสฺเสวํ จินฺตยนฺตสฺเสว สารถิ นครทฺวารํ ปตฺวา อทฺทส เถเร ปฐมตรํ อาคนฺตฺวา กายพณฺธนํ พณฺธิตฺวา จีวรํ ปารุปนฺเต, ทิสฺวา อติวิย ปสนฺนมานโส หุตฺวา อาคนฺตฺวา รญฺโญ อาโรเจสิ อาคตา เทว เถราติ. राजानेही सारथ्याला पाठवून महालाच्या आत मंडप तयार केला आणि विचार केला, 'आर्य आसनांवर बसतील की बसणार नाहीत?' तो असा विचार करत असतानाच, सारथी नगरद्वारात पोहोचला आणि त्याने पाहिले की थेर आधीच तेथे पोहोचले असून ते आपले कायबंधन (कमरपट्टा) बांधत आहेत आणि चीवर परिधान करत आहेत. हे पाहून त्याचे मन अत्यंत प्रसन्न झाले आणि त्याने येऊन राजाला सांगितले, “महाराज, थेर आले आहेत.” ราชา รถํ อารุฬฺหาติ ปุจฺฉิ น อารูฬฺหา เทว, อปิ จ ปจฺฉโต นิกฺขมิตฺวา ปฐมตรํ อาคนฺตฺวา ปาจีนทฺวาเร ฐิตาติ. ราชา รถํ น อารุภึสูตี สุตฺวา เตน หิ ภเณ ภุมฺมตฺถรณ สงฺเขเปน อาสนานิ ปญฺญาเปถาติ วตฺวา ปฏิปถา อาคมาสิ อมจฺจา ปถวิยํ ตฏฺฏิกํ ปญฺญาเปตฺวา อุปริ โกชวกาทีนิ วิจิตฺตตฺถรณานิ ปญฺญาเปสุํ ราชาปิ คนฺตฺวา เถเร วนฺทิตฺวา มหิณฺทตฺเถรสฺส หตฺถโต ปตฺตํ คเหตฺวา มหติยา ปูชาย จ สกฺกาเรน จ เถเร ปณีเตน ขาทนีเยน โภชนีเยน สหตฺถา สนฺตปฺเปตฺวา อนุลาเทวี ปมุขา ปญฺจ อิตฺถิสตานิ เถรานํ อภิวาทนํ ปูชาสกฺการญฺจ กาโรนตูติ ปกฺโกสาเปตฺวา เอกมนฺตํ นิสีทิ. เถโร รญฺโญ สปริชนสฺส ธมฺมรตนวสฺสํ วสฺเสนฺโต เปตวตฺถุํ-วิมานวตฺถุํ-สจฺจสํยุตฺตญฺจ กเถสิ. ตํ สุตฺวา ตานิปิ ปญฺจ อิตฺถิสตานิ โสตาปตฺติผลํ สจฺฉิกรึสุ. राजाने विचारले, “ते रथात बसले का?” (सारथी म्हणाला), “नाही महाराज, ते रथात बसले नाहीत; परंतु माझ्या निघाल्यानंतर ते आधीच पोहोचले असून पूर्वद्वाराजवळ उभे आहेत.” थेर रथात बसले नाहीत हे ऐकून राजा म्हणाला, “तर मग सेवकांनो, जमिनीवर चटया अंथरून आसने तयार करा.” असे सांगून तो त्यांच्या स्वागतासाठी गेला. अमात्यांनी जमिनीवर चटया अंथरल्या आणि त्यावर लोकरीचे गालिचे (कोजवक) इत्यादी रंगीबेरंगी बिछाने पसरवले. राजानेही जाऊन थेरांना वंदन केले, महिंद थेरांच्या हातातून भिक्षापात्र घेतले आणि मोठ्या आदराने व सत्काराने थेरांना स्वतःच्या हाताने उत्तम खाद्य व भोज्य पदार्थांनी तृप्त केले. त्यानंतर अनुला देवीच्या प्रमुखतेखाली पाचशे स्त्रियांना थेरांचे अभिवादन व पूजा-सत्कार करण्यासाठी बोलावून राजा एका बाजूला बसला. थेरांनी राजा आणि त्यांच्या परिवारावर धम्मरत्नाचा वर्षाव करत 'पेतवत्थु' (प्रेतवस्तू), 'विमानवत्थु' (विमानवस्तू) आणि 'सच्चसंयुत्त' (सत्यसंयुत्त) उपदेशिले. ते ऐकून त्या पाचशे स्त्रियांनीही स्रोतापत्ती फल प्राप्त केले. ตทา นาครา เถรานํ คุเณ สุตฺวา เถเร ทฏฺฐุํ น ลภามาติ อุปกฺโกสนฺติ อถ ราชา อิธ โอกาโส นตฺถีติ จินฺเตตฺวา,’คจฺฉถ ภเณ หตฺถิสาลํ ปฏิชคฺคิตฺวา วาลุกํ โอกิริตฺวา ปญฺจวณฺณานิ ปุปฺผานิ วิกิริตฺวา วิตานํ พณฺธิตฺวา มงฺคล หตฺถิฏฺฐาเน เถรานํ อาสนานิ ปญฺญาเปถา’ติ อาห, อมจฺจา ตถา อกํสุ. तेव्हा नगरातील लोकांनी थेरांच्या गुणांबद्दल ऐकून, “आम्हाला थेरांचे दर्शन मिळत नाही,” अशी तक्रार केली. तेव्हा राजाने 'येथे पुरेशी जागा नाही' असा विचार करून सांगितले, “जा सेवकांनो, हत्तीशाळा स्वच्छ करा, तेथे वाळू पसरा, पंचरंगी फुले टाका, छत (वितान) बांधा आणि मंगल हत्तीच्या ठिकाणी थेरांसाठी आसने तयार करा.” अमात्यांनी त्याप्रमाणे केले. เถโร ตตฺถ คนฺตฺวา นิสีทิตฺวา เทวทูตสุตฺตนฺตํ กเถสิ กถา ปริโยสาเน ปาณสหสฺสํ โสตาปตฺติผเล ปติฏฺฐหิ ตถา หตฺถิสาลา สมฺพาธาติ ทกฺขิณทฺวาเร นณฺทนุยฺยาเน อาสนํ ปญฺญาเปสุํ. เถโร ตตฺถ นิสีทิตฺวา อาสิวิโสปม สุตฺตนฺตํ กเถสิ. ตมฺปิ สุตฺวา ปาณสหสฺสํ โสตาปตฺติผลํ ปฏิลภิ เอวํ อาคตทิวสโต ทุติยทิวเส อฑฺฒเตยฺยานํ ปาณสหสฺสานํ ธมฺมาภิสมโย อโหสิ. थेरांनी तेथे जाऊन आसन ग्रहण केले आणि 'देवदूत सुत्तंत' उपदेशिला. प्रवचनाच्या शेवटी एक हजार लोक स्रोतापत्ती फलात प्रतिष्ठित झाले. हत्तीशाळा देखील अरुंद वाटल्यामुळे त्यांनी दक्षिण द्वाराजवळील 'नंदन उद्यानात' आसने तयार केली. थेरांनी तेथे बसून 'आशीविषोपम सुत्तंत' उपदेशिला. ते ऐकूनही एक हजार लोकांनी स्रोतापत्ती फल प्राप्त केले. अशा प्रकारे, त्यांच्या आगमनाच्या दुसऱ्या दिवशी अडीच हजार (२,५००) लोकांना धम्माभिसमय प्राप्त झाला. เถรสฺส นณฺทนวเน อาคตาคตาหิ กุลิตฺถีหิ กุลสุณฺหาหิ กุลกุมารีหิ สทฺธิ สโมทมานสฺเสว สายณฺหสมโย ชาโต, เถโร กาลํ สลฺลกฺเขตฺวา คจฺฉามิ’ทานิ มิสฺสก ปพฺพตนฺติ อุฏฺฐหิ. อมจฺจา มหาเมฆวนุยฺยาเน เถเร วาเสสุํ ราชาปิ โข ตสฺสา รตฺติยา อจฺจเยน เถรสฺส สมีปํ คนฺตฺวา สุขสยิตภาวํ ปุจฺฉิตฺวา กปฺปติ ภนฺเต ภิกฺขุสงฺฆสฺส อาราโมติ ปุจฺฉิ. เถโร กปฺปติ มหาราชาติ อาห. नंदनवनात येणाऱ्या कुलीन स्त्रिया, कुलवधू आणि कुलकुमारी यांच्याशी संभाषण करत असतानाच संध्याकाळ झाली. थेरांनी वेळेची नोंद घेऊन, “आता मी मिस्सक पर्वतावर जातो,” असे म्हणून ते उठले. अमात्यांनी थेरांना 'महामेघवन उद्यानात' मुक्कामासाठी थांबवले. ती रात्र संपल्यावर राजानेही थेरांच्या समीप जाऊन त्यांच्या सुखावह निद्रेविषयी विचारपूस केली आणि विचारले, “भंते, भिक्खू संघासाठी आराम (उद्यान/विहार) कल्प्य (योग्य) आहे का?” थेरांनी सांगितले, “महाराज, ते कल्प्य (योग्य) आहे.” ราชา ตุฏฺโฐ สุวณฺณ ภึการํ คเหตฺวา เถรสฺส หตฺเถ อุทกํ ปาเตตฺวา มหาเมฆวนุยฺยานํ อทาสิ เถโร ปุนทิวเสปิ ราชเคเหเยว ภุญฺชิตฺวา นณฺทนวเน อนมตคฺคิยานิ กเถสิ. ปุน ทิวเส อคฺคิกฺขณฺโธปม สุตฺตนฺตํ กเถสิ. เอเตเนว อุปาเยน สตฺต ทิวสานิ กเถสิ อฑฺฒ นจมานํ ปาณสหสฺสานํ ธมฺมาภิสมโย อโหสิ. สตฺตเม ทิวเส ปน เถโร อนฺโตปุเร รญฺโญ อปฺปมาท สุตฺตนฺตํ กถยิตฺวา เจติยคิริเมว อคมาสิ. राजाने संतुष्ट होऊन सोन्याची झारी हातात घेतली आणि थेरांच्या हातावर पाणी सोडून महामेघवन उद्यान दान दिले. थेरांनी दुसऱ्या दिवशीही राजवाड्यातच भोजन करून नंदनवनात 'अनमतग्गिय' (अनमताग्ग सुत्त) उपदेश केला. त्यानंतरच्या दिवशी त्यांनी 'अग्गिक्खंधोपम सुत्त' सांगितले. याच पद्धतीने त्यांनी सात दिवस उपदेश केला, ज्यायोगे साडेआठ हजार जीवांना धम्माभिसमय (धम्मज्ञान प्राप्ती) झाला. सातव्या दिवशी थेरांनी अंतःपुरात राजाला 'अप्पमाद सुत्त' सांगून चेतियगिरीलाच प्रस्थान केले. อถ โข ราชา เถโร อายาจิโต สยเมวาคโต, ตสฺมา ตสฺส อนาปุจฺฉา คมนมฺปิ ภเวยฺยาติ จินฺเตตฺวา รถํ อภิรูหิตฺวา, เจติยคิรึ อคมาสิ มหตา ราชานุภาเวน คนฺตฺวา เถรานํ สนฺติกํ อุปสงฺกมนฺโต อติวิย กิลนฺตรูโป หุตฺวา อุปสงฺกมิ. ตโต นํ เถโร อาห กสฺมา ตฺวํ มหาราช เอวํ กิลม มาโน อาคโตติ. ตุมฺเห มม คาฬฺหํ โอวาทํ ทตฺวา อิทานิ คนฺตุกามา นุโขติ ชานนตฺถํ ภนฺเตติ. น มยํ มหาราช คนฺตุกามา, อปิ จ วสฺสุปนายิก กาโลนมายํ สมเณน นาม วสฺสุปนายิกํ ฐานํ ญาตุํ วฏฺฏตีติ. ราชาปิ โข ตํขณํเยว กรณฺฑก เจติยงฺคณํ ปริกฺขิปิตฺวา อฏฺฐสฏฺฐิยา เลเณสุ กมฺมํ ปฏฺฐเปตฺวา นครเมว อคมาสิ. तेव्हा राजाने विचार केला, 'थेर माझ्या विनंतीवरून स्वतः आले आहेत, त्यामुळे ते न विचारताही निघून जाऊ शकतात.' असा विचार करून तो रथात बसून मोठ्या राजवैभवाने चेतियगिरीला गेला. थेरांच्या जवळ पोहोचताना तो अत्यंत थकलेला दिसत होता. तेव्हा थेरांनी त्याला विचारले, 'महाराज, आपण असे थकलेले का आला आहात?' राजा म्हणाला, 'भंते, आपण मला गंभीर उपदेश देऊन आता निघून जाऊ इच्छिता की काय, हे जाणून घेण्यासाठी मी आलो आहे.' थेर म्हणाले, 'महाराज, आम्ही जाऊ इच्छित नाही; परंतु हा वर्षावासाचा काळ आहे आणि श्रमणाने वर्षावासाचे स्थान निश्चित करणे योग्य असते.' राजानेही त्याच क्षणी करंडक चेतिय प्रांगणाला वेढून अडुसष्ट (६८) लेण्यांचे काम सुरू करवून घेतले आणि तो नगराकडे परतला. เตปิ เถโร มหาชนํ โอวทมานา เจติยคิริมฺหิ วสฺสํ วสึสุ. อถายสฺมา มหามหิณฺโท วุตฺถวสฺโส ปวาเรตฺวา กตฺติกปุณฺณมายํ อุโปสถทิวเส ราชานํ เอตทโวจ จิรทิฏฺโฐ โน มหาราช สมฺมาสมฺพุทฺโธ อภิวาทน ปจฺจุปฏฺฐาน อญฺชลิ กมฺม สามีจิ กมฺม กรณฏฺฐานํ นตฺถิ, เตนมฺหํ อุกฺกณฺฐิตาติ ตนุ ภนฺเต ตุมฺเห อโวจุตฺถ ปรินิพฺพุโต สมฺมาสมฺพุทฺโธติ กิญฺจาปิ มหาราช ปรินิพฺพุโต, อถสฺส สรีรธาตุโย ติฏฺฐนฺตีติ. อญฺญา ตมฺภนฺเต ถูปํ ปติฏฺฐาเปมิ ภูมิภาคํ วิจินถาติ. อปิ จ ธาตุโย กุโต ลจฺฉามีติ สุมเนน สทฺธึ มนฺเตหิ มหาราชาติ ราชา สุมนํ อุปสงฺกมิตฺวา ปุจฺฉิ’กุโตทานิ ภนฺเตธาตุโย ลจฺฉามา’ติ สุมโน อาห-อปฺโปสฺสุกฺโก ตฺวํ มหาราช, วีถิโย โสธาเปตฺวา ธช ปตาก ปุณฺณฆฏาทีหิ อลงฺการาเปตฺวา สปริชฺชโน อุโปสถํ สมาทิยิตฺวา สพฺพตาลาวจเร อุปฏฺฐเปตฺวา มงฺคลหตฺถึ สพฺพาลงฺกาเรหิ ปติมณฺฑิตํ กาเรตฺวา อุปริ วสฺส เสตจฺฉตฺตํ อุสฺสาเปตฺวา สายณฺหสมเย มหานาควนุยฺยานาภิมุโข ยา หิ อทฺธา ตสฺมึ ฐาเน ธาตุโย ลจฺฉสิติ, ราชา สาธูติ สมฺปฏิจฺฉิ. เถโร เจติยคิริเมว อคมึสุ. ते थेर देखील लोकांना उपदेश करत चेतियगिरीवर वर्षावास राहिले. त्यानंतर आयुष्मान महामहिंद यांनी वर्षावास पूर्ण करून (पवारणा करून) कार्तिक पौर्णिमेच्या उपोसथ दिवशी राजाला असे म्हटले, 'महाराज, आम्हाला सम्यक्संबुद्धांचे दर्शन घेऊन खूप काळ झाला आहे. येथे अभिवादन, प्रत्युत्थान, अंजलीकर्म आणि आदरातिथ्य करण्यासाठी कोणतेही स्थान (चैत्य किंवा स्तूप) नाही, त्यामुळे आम्ही व्याकुळ झालो आहोत.' राजा म्हणाला, 'भंते, आपण तर म्हणालात की सम्यक्संबुद्ध परिनिर्वाण पावले आहेत?' थेर म्हणाले, 'महाराज, जरी ते परिनिर्वाण पावले असले, तरी त्यांच्या शरीरधातू (अस्थी अवशेष) विद्यमान आहेत.' राजा म्हणाला, 'भंते, मला समजले. मी स्तूप स्थापन करीन, आपण योग्य जागा निवडा. पण मला धातू कोठून मिळतील?' थेर म्हणाले, 'महाराज, आपण सुमन (सामणेरा) याच्याशी चर्चा करा.' राजाने सुमन जवळ जाऊन विचारले, 'भंते, आता आपल्याला धातू कोठून मिळतील?' सुमन म्हणाला, 'महाराज, आपण निश्चिंत राहा. रस्ते स्वच्छ करून घ्या, ते ध्वज, पताका, मंगल कलश इत्यादींनी सजवून घ्या. आपल्या परिवारासह उपोसथ व्रत ग्रहण करा, सर्व प्रकारची वाद्ये वाजवणारे वादक एकत्र करा, मंगल हत्तीला सर्व अलंकारांनी सुशोभित करा, त्याच्यावर पांढरे छत्र धरा आणि संध्याकाळच्या वेळी महानागवन उद्यानाकडे जा. नक्कीच त्या ठिकाणी आपल्याला धातू मिळतील.' राजाने 'ठीक आहे' म्हणून ते मान्य केले. थेर चेतियगिरीलाच गेले. ตตฺรายสฺมา มหิณฺทตฺเถโร สุมน สามเณรมาห- คจฺฉ ตฺวํ สามเณร ชมฺพุทีเป อยฺยกํ อโสกธมฺมราชานํ อุปสงฺกมิตฺวา มม วจเนน เอวํ วเทหิ’สหาโย เต มหาราช เทวานมฺปิย ติสฺโส พุทฺธสาสเน ปสนฺโน ถูปํ ปติฏฺฐาเปตุกาโม ตุมฺหากํ กิร หตฺเถ ภควโต ปริภุตฺตปตฺโต เจวธาตุ จ อตฺถิ, ตมฺเม เทถา’ติ ตํ คเหตฺวา สกฺกํ เทวราชานํ อุปสงฺกมิตฺวา ตุมฺหากํ กิร มหาราช หตฺเถ ทฺเว ธาตุโย อตฺถิ ทกฺขิณทาฐา จ ทกฺขิณกฺขกญฺจ, ตโตตุมฺเห ทกฺขิณทาฐํปูเชถ, ทกฺขิณกฺขกํ ปน มยฺหํ เทถาติ, เอวญฺจ นํ วเทหิ กสฺมา ตฺวํ มหาราช อมฺเห ตมฺพปณฺณิทีปํ ปหิณิตฺวา ปมชฺชิตฺถาติ. तेथे आयुष्मान महिंद थेरांनी सुमन सामणेराला म्हटले, 'सामणेरा, तू जंबुद्विपात तुझे आजोबा सम्राट अशोक धम्मराजांकडे जा आणि माझ्या वतीने त्यांना असे सांग की, "महाराज, आपले मित्र देवनांपिय तिस्स बुद्धशासनात श्रद्धावान झाले असून ते स्तूप स्थापन करू इच्छितात. आपल्याकडे भगवंतांनी वापरलेले भिक्षापात्र आणि शरीरधातू आहेत, त्या कृपया आम्हाला द्या." ते घेऊन तू देवराज शक्राकडे जा आणि त्याला सांग की, "महाराज, आपल्याकडे दोन धातू आहेत - उजवा सुळा (दाढ) आणि उजवे जत्रू (अक्षकास्थी). त्यातील उजव्या सुळ्याची आपण पूजा करा आणि उजवे जत्रू मला द्या." आणि त्याला असेही विचार की, "महाराज, आपण आम्हाला तांबपण्णि द्वीपात पाठवून आता दुर्लक्ष का करत आहात?"' สาธุ ภนฺเตติ โข สุมโน เถรสฺส วจนํ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา ตาวเทว ปตฺตจีวรมาทาย เวหาสมพฺภุคฺคนฺตฺวา ปาฏลิปุตฺตทฺวาเร โอรุยฺห รญฺโญ สนฺติกํ คนฺตฺวา ตมตฺถํ อาโรเจสิ ราชา ตุฏฺโฐ สามเณรสฺส หตฺถโต ปตฺตํ คเหตฺวา โภเชตฺวา ภควโต ปตฺตํ คณฺเธหิ อุพฺพฏฺเฏตฺวา วรมุตฺตสทิสานํ ธาตูนํ ปูเรตฺวา อทาสิ. 'ठीक आहे, भंते,' असे म्हणून सुमनने थेरांचे वचन मान्य केले आणि त्याच क्षणी आपले पात्र व चीवर घेऊन आकाशात उड्डाण केले. पाटलीपुत्राच्या वेशीवर उतरून तो राजाकडे गेला आणि त्याला सर्व हकीकत सांगितली. राजाने संतुष्ट होऊन सामणेराच्या हातातून पात्र घेतले, त्याला भोजन दिले आणि भगवंतांचे भिक्षापात्र सुगंधी द्रव्यांनी स्वच्छ करून, श्रेष्ठ मोत्यांसारख्या धातूंनी ते भरून दिले. โส ตุํ คเหตฺวา สกฺกํ เทวราชานํ อุปสงฺกมิ สกฺโก เทวาราชา สามเณรํ ทิสฺวา กึ ภนฺเต สุมน อาหิณฺฑสีติ อาห. ตฺวํ มหาราช อมฺเห ตมฺพปณฺณิทีปํ ปหิณิตฺวา กสฺมา ปมชฺชสีติ, ตปฺปมชฺชามิ ภนฺเต, วเทหิ กึ กโรมีติ. ตุมฺหากํ กิร หตฺเถ ทฺเว ธาตุโย อตฺถิ ทกฺขิณทาฐา จ ทกฺขิณกฺขกญฺจ, ตโต ตุมฺเห ทกฺขิณทาฐํ ปูเชถ ทกฺขิณกฺขกํ ปน มยฺหํ เทถาติ. สาธุ ภนฺเตติ โข สกฺโก เทวานมิณฺโท โยชนปฺปมานํ มณิถูปํ อุคฺฆาเฏตฺวา ทกฺขิณกฺขกํ นีหริตฺวา สุมนสฺส อทาสิ. तो ते घेऊन देवराज शक्राकडे गेला. देवराज शक्राने सामणेराला पाहून विचारले, 'भंते सुमन, आपण कशासाठी फिरत आहात?' सुमन म्हणाला, 'महाराज, आपण आम्हाला तांबपण्णि द्वीपात पाठवून दुर्लक्ष का करत आहात?' शक्र म्हणाला, 'भंते, माझ्याकडून दुर्लक्ष झाले आहे, सांगा मी काय करू?' सुमन म्हणाला, 'आपल्याकडे दोन धातू आहेत - उजवा सुळा आणि उजवे जत्रू. त्यातील उजव्या सुळ्याची आपण पूजा करा आणि उजवे जत्रू मला द्या.' 'ठीक आहे, भंते,' असे म्हणून देवांचा राजा शक्र याने एक योजन आकाराचा मणीस्तूप उघडून, उजवे जत्रू बाहेर काढले आणि सुमनला दिले. โส ตํ คเหตฺวา เจติยคิริมฺหิเยว ปติฏฺฐาสิ อถ โข มหิณฺทปมุขา สพฺเพ เต มหานาคา อโสกธมฺมราเชน ทินฺน ธาตุโย เจติยคิริยมฺหิเยว ปติฏฺฐาเปตฺวา ทกฺขิณกฺขกํ อาทาย วฑฺฒมานกจฺฉายาย มหานาค วนุยฺยานมคมํสุ. ราชาปิ โข สุมเนน วุตฺตปฺปการํ ปูชาสกฺการํ กตฺวา หตฺถิกฺขณฺธวรคโต สายํ มงฺคลหตฺถิมตฺถเก เสตจฺฉตฺตํ ธารยมาโน มหานาค วนุยฺยานํ สมฺปาปุณิ. तो ते घेऊन चेतियगिरीवरच उतरला. त्यानंतर महिंदांच्या नेतृत्वाखालील त्या सर्व श्रेष्ठ थेरांनी सम्राट अशोक धम्मराजांनी दिलेल्या धातू चेतियगिरीवरच सुरक्षित ठेवल्या आणि उजवे जत्रू घेऊन, सावली लांबत असताना (दुपारनंतरच्या वेळी) ते महानागवन उद्यानाकडे गेले. राजानेही सुमनने सांगितल्याप्रमाणे पूजा-सत्कार करून, संध्याकाळी श्रेष्ठ हत्तीच्या पाठीवर बसून आणि मंगल हत्तीच्या मस्तकावर पांढरे छत्र धरून महानागवन उद्यान गाठले. อถสฺส เอตทโหสิ- สเจ อยํ สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ธาตุ, ฉตฺตํ อปนมตุ, มงฺคลหตฺถิ ชณฺณุเกหิ ภูมิยํ ปติฏฺฐาหตุ, ธาตุ จงฺโคฏกํ มยฺหํ มตฺถเก ปติฏฺฐหตูติ สห รญฺโญ จิตฺตุปฺปาเทน ฉตฺตํ อปนมิ หตฺถิชณฺณุเกหิ ปติฏฺฐหิ ธาตุจงฺโคฏกํ รญฺโญ มตฺถเก ปติฏฺฐหิ ราชา อมเตเนวาภิสิตฺตคตฺโต ปรเมน ปีติปาโมชฺเชน สมนฺนาคโต หุตฺวา ปุจฺฉิ ธาตุํ ภนฺเต กึ กโรมีติ. หตฺถิกุมฺภิเยว ตาว มหาราช ฐเปหีติ. ราชา ธาตุวงฺโคฏกํ หตฺถิกุมฺเภ ฐเปสิ. ปมุทิโต นาโค กุญฺจนาทํ นทิ มหาเมโฆ อุฏฺฐหิตฺวา โปกฺขรวสฺสํ วสิสิ อุกทปริยนฺตํ กตฺวา มหาภูมิจาโล อโหสิ ปจฺจนฺเตปิ นาม สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ธาตุโย ปติฏฺฐหิสฺสนฺตีติ. तेव्हा राजाच्या मनात असा विचार आला, 'जर ही सम्यक्संबुद्धांची खरी धातू असेल, तर छत्र बाजूला व्हावे, मंगल हत्तीने आपले गुडघे जमिनीवर टेकावेत आणि धातूची करंडी माझ्या मस्तकावर प्रस्थापित व्हावी.' राजाच्या मनात हा विचार येताच छत्र बाजूला झाले, हत्तीने आपले गुडघे जमिनीवर टेकले आणि धातूची करंडी राजाच्या मस्तकावर प्रस्थापित झाली. राजाचे शरीर जणू अमृताने न्हाऊन निघाले आणि तो अत्यंत प्रीती व आनंदाने युक्त होऊन विचारू लागला, 'भंते, मी या धातूचे काय करू?' थेर म्हणाले, 'महाराज, तूर्तास ती हत्तीच्या कुंभस्थळावर ठेवा.' राजाने धातूची करंडी हत्तीच्या कुंभस्थळावर ठेवली. तेव्हा आनंदित झालेल्या हत्तीने चित्कार केला, महामेघ दाटून आला आणि त्याने कमळ-पावसाचा (पोक्खरवस्स) वर्षाव केला, तसेच पाण्याचा पूर येईपर्यंत पाऊस पडला आणि मोठा भूकंप झाला. 'प्रत्यंत देशातही (सीमावर्ती भागातही) सम्यक्संबुद्धांच्या धातू प्रस्थापित होतील' या संकेतासाठी हे घडले. อถ โส หตฺถินาโค อเนก ตาลาวจรปริวุโต อติวิย อุฬาเรน ปูชาสกฺกาเรน สกฺกริยมาโน ปจฺฉิมทิสาภิมุโข หุตฺวา อปสกฺกนฺโต ยาว นครสฺส ปุรตฺถิม ทฺวารํ ตาว คนฺตฺวา ปุรตฺถิเมน ทฺวาเรน นครํ ปวิสิตฺวา สกลนคเร อุฬาราย ปูชาย กยิรามานาย ทกฺขิณทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา ถูปารามสฺส ปจฺฉิมทิสาภาเค ปเภชวตฺถุ นาม กิร อตฺถิ ตตฺถ คนฺตฺวา ปุน ถูปารามาภิมุโข เอว ปฏินิวตฺติ. โส จ ปุริมกานํ ติณฺณํ สมฺมาสมฺพุทฺธานํ ธมฺมกรกํ กายพณฺธนํ อุทกสาฏีกํ ปติฏฺฐาเปตฺวา กตเจติยฏฺฐานํ โหตี. ตเทตํ วินฏฺเฐสุปิ เจติเยสุ เทวตานุภาเวน กณฺฏก สมากิณฺณสาขาหิ นานาคจฺเฉหิ ปริวุตํ ติฏฺฐติ. มา นํ โกจิ อุจฺจิฏฺฐา สุวิมล กจวเรหิ สนฺทุเสสีติ. त्यानंतर तो हत्तीराज अनेक वाद्यांच्या गजरात, अत्यंत भव्य अशा पूजा-सत्काराने सत्कृत होत, पश्चिम दिशेकडे तोंड करून मागे सरकत नगराच्या पूर्व दारापर्यंत गेला. पूर्व दाराने नगरात प्रवेश करून, संपूर्ण नगरात भव्य पूजा केली जात असताना, दक्षिण दाराने बाहेर पडून थूपारामाच्या पश्चिम दिशेला 'पभेजवत्थु' नावाचे जे स्थान आहे, तिथे जाऊन पुन्हा थूपारामाकडेच तोंड करून परतला. ते स्थान पूर्वीच्या तिन्ही सम्यक्संबुद्धांचे धम्मकरक (पाण्याचे भांडे), कायबंधन (कमरपट्टा) आणि उदकसाटीक (स्नानवस्त्र) प्रस्थापित करून बनवलेले चैत्यस्थान होते. ते चैत्य नष्ट झाले तरीही, देवतेच्या प्रभावाने ते काटेरी फांद्यांनी आणि विविध झुडपांनी वेढलेले राहत असे, जेणेकरून कोणीही उच्छिष्ट किंवा कचरा टाकून त्या अत्यंत निर्मळ स्थानाला दूषित करू नये. อถ ตสฺส หตฺถิโน ปุรโต คนฺตฺวา ราชปุริสา สพฺพ คจฺเฉ ฉิณฺทิตฺวา ภูมึ โสเธตฺวา ตํ หตฺถตลสทิสํ อกํสุ. หตฺถินาโค คนฺตฺวา ตํ ฐานํ ปุรโต กตฺวา ตสฺส ปจฺฉิมทิสาภาเค โพธิรุกฺขฏฺฐเน อฏฺฐาสิ. อถสฺส มตฺถกโต ธาตุํ โอโรเปตุํ อารภึสุ นาโค โอโรเปตุํ น เทติ. เถรํ ปุจฺฉิ, กสฺมา ภนฺเต นาโค ธาตุํ โอโรเปตุํ น เทตีติ त्यानंतर त्या हत्तीच्या पुढे जाऊन राजपुरुषांनी सर्व झुडपे तोडून, जमीन साफ करून ती हाताच्या तळव्यासारखी सपाट केली. हत्तीराजाने जाऊन ते स्थान पुढे केले आणि त्याच्या पश्चिम दिशेला असलेल्या बोधिवृक्षाच्या जागी तो उभा राहिला. त्यानंतर त्याच्या मस्तकावरून धातू उतरवण्यास सुरुवात केली, पण हत्तीने ती उतरवू दिली नाही. (राजाने) थेरांना विचारले, 'भंते, हत्ती धातू का उतरवू देत नाही?' อารุฬฺหํ มหาราช โอโรเปตุํ น วฏฺฏติติ. ตสฺมิญฺจ กาเล อภยวาปิยา อุทกํ ชินฺนํ โหติ สมนฺตา ภูมิ ผลิตา สุอุทฺธรา มตฺติกปิณฺฑา. ตโต มหาชโน สีฆสีฆํ มตฺติกํ อาหริตฺวา หตฺถกุมฺภปฺปมาณํ วตฺถุมกาสิ. ตาวเทว ถูปกรณตฺถํ อิฏฺฐิกา กาตุํ อารภึสุ. ยาว อิฏฺฐิกา ปรินิฏฺฐนฺติ ตาว หตฺถินาโค กติปาหํ ทิวา โพธิรุกฺขฏฺฐาเน หตฺถิสาลายํ ติฏฺฐติ. รตฺติยํ ถูปปติฏฺฐาน ภูมิยํ ปริยายติ. थेर म्हणाले, 'महाराज, चढवलेली धातू खाली उतरवणे योग्य नाही.' आणि त्या काळात अभयवापीचे पाणी सुकले होते, सभोवतालची जमीन दुभंगली होती आणि मातीचे ढेकूळ सहज काढता येण्याजोगे होते. त्यानंतर लोकांनी घाईघाईने माती आणून हत्तीच्या कुंभस्थळाच्या आकाराचा चबुतरा बनवला. लगेचच स्तूप बांधण्यासाठी विटा बनवण्यास सुरुवात झाली. जोपर्यंत विटा तयार होत नव्हत्या, तोपर्यंत तो हत्तीराज काही दिवस दिवसा बोधिवृक्षाच्या जागी असलेल्या हत्तीशाळेत राहत असे आणि रात्री स्तूपाच्या स्थापनेच्या भूमीवर फिरत असे. อถ วตฺถุํ วินาเปตฺวา ราชา เถรํ ปุจฺฉิ, กีทิโส ภนฺเต ถูโป กาตพฺโพติ. วีหิราสิ สทิโส มหาราชาติ, สาธุ ภนฺเตติ ราชา ชงฺฆปฺปมาณํ ถูปํ จินาเปตฺวา ธาตุโอโรปนตฺถาย มหาสกฺการํ กาเรสิ. त्यानंतर चबुतरा तयार करून राजाने थेरांना विचारले, 'भंते, स्तूप कसा बनवावा?' थेर म्हणाले, 'महाराज, धान्याच्या राशीसारखा.' राजाने 'साधू भंते' असे म्हणून गुडघ्याइतक्या उंचीचा स्तूप बांधला आणि धातू प्रस्थापित करण्यासाठी भव्य सत्कार आयोजित केला. ตโต สกลนาครา จ ชานปทา จ ธาตุมฺห ทสฺสนตฺถํ สนฺติปตึสุ สนฺนิปติเต จ ตสฺมึ มหาชเน ทสพลสฺส ธาตุ หตฺถิกุมฺภโต สตฺตตาลปฺปมานํ เวหาสมพฺภุคฺคนฺตฺวา ยมกปาฏิหาริยํ ทสฺเสสิ. เตหิ เตหิ ธาตุปฺปเทเสหิ ฉพฺพณฺณรํสิโย อุทกธรา จ อคฺคิกฺขณฺธา จ ปวตฺตนฺติ. สาวตฺถิยํ คณฺฑมฺพมูเล ภควตา ทสฺสิต ปาฏิหาริย สทิสํ เอว ปาฏิหาริยํ อโหสิ. ตญฺจ โข เนว เถรานุภาเวนน เทวตานุภาเวน, อปิ จ โข พุทฺธานํเยว อานุภาเวน ภควา กิร ธรมาโนว อธิฏฺฐาสิ - ตมฺพปณฺณิทีเป อนุราธปุรสฺส ทกฺขิณทิสาภาเค ปุริมกานํ ติณฺณํ พุทฺธานํ เจติยฏฺฐาเน มม ทกฺขิณกฺขกธาตุ ปติฏฺฐาน ทิวเส ยมกปาฏิหาริยํ โหตูติ. त्यानंतर सर्व नगरवासी आणि जनपदवासी धातूच्या दर्शनासाठी एकत्र जमले. तो जनसमुदाय एकत्र जमल्यावर, दशबलांची (बुद्धांची) धातू हत्तीच्या कुंभस्थळावरून सात ताड माडांच्या उंचीएवढी आकाशात वर गेली आणि तिने यमकप्रातिहार्य दाखवले. त्या धातूच्या विविध भागांतून षड्रंगी किरण, पाण्याच्या धारा आणि अग्नीचे लोळ बाहेर पडू लागले. श्रावस्तीमध्ये गंडंब वृक्षाच्या मुळाशी भगवंतांनी दाखवलेल्या प्रातिहार्यासारखेच हे प्रातिहार्य होते. आणि ते प्रातिहार्य थेरांच्या प्रभावाने किंवा देवतेच्या प्रभावाने झाले नव्हते, तर बुद्धांच्याच प्रभावाने झाले होते. भगवंतांनी जिवंत असतानाच असा अधिष्ठान केला होता की - 'ताम्रपर्णी द्वीपात अनुराधापूरच्या दक्षिण दिशेला, पूर्वीच्या तिन्ही बुद्धांच्या चैत्यस्थानी माझ्या उजव्या जतुधातूच्या स्थापनेच्या दिवशी यमकप्रातिहार्य घडो.' เอวํ อจินฺติยา พุทฺธา-พุทฺธธมฺมา อจินฺติยา,อจินฺติเยสุ ปสนฺนานํ-วิปาโก โหติ อจินฺติโยติ; अशा प्रकारे बुद्ध अचिंत्य आहेत, बुद्धधम्म अचिंत्य आहे; आणि अचिंत्य अशा बुद्धांवर व धम्मावर प्रसन्न असणाऱ्यांचा विपाक देखील अचिंत्य असतो. ธาตุสรีรโต นิกฺขนฺต อุทกผุสิเตหิ สกเลหิ ตมฺพปณฺณิทีปตเล น โกจิ อผุฏฺโฐกาโส นาม อโหสิ. เอวมสฺส ตํ ธาตุ สรีรํ อุทกผุสิเตหิ ตมฺพปณฺณิตฺถลสฺส ปริทาหํ วูปสเมตฺวา มหาชนสฺส ปาฏิหาริยํ ทสฺเสตฺวา โอตริตฺวา รญฺโญ มตฺถเก ปติฏฺฐาสิ ราชา สผลํ มนุสฺสตฺตปฏิลาภํ มญฺญมาโน มหนฺตํ สกฺการํ กตฺวา ธาตุํ ปติฏฺฐาเปสิ. สห ธาตุปติฏฺฐาเนน มหาภูมิจาโล อโหสิ นิฏฺฐิเต ปน ถูเป ราชา จ ราชา ภาติกา จ เทวิโย จ เท-นาค-ยกฺขานํ วิมฺภยกรํ ปจฺเจกํ ถูปมกํสุ. धातूच्या शरीरातून निघालेल्या पाण्याच्या थेंबांनी संपूर्ण ताम्रपर्णी द्वीपाच्या भूमीवर अशी कोणतीही जागा उरली नाही जी स्पर्शली गेली नाही. अशा प्रकारे, त्या धातूने पाण्याच्या थेंबांनी ताम्रपर्णीच्या भूमीचा दाह शांत केला आणि जनसमुदायाला प्रातिहार्य दाखवून, खाली उतरून ती राजाच्या मस्तकावर प्रस्थापित झाली. राजाने आपला मनुष्यजन्म यशस्वी झाला असे मानून, मोठा सत्कार करून धातूची स्थापना केली. धातूच्या स्थापनेसोबतच मोठा भूकंप झाला. स्तूप पूर्ण झाल्यावर राजाने, राजाच्या भावांनी आणि राण्यांनी देव, नाग व यक्षांना विस्मित करणारे स्वतंत्र स्तूप बांधले. เอวํ ชิโน ธาตุสรีรเกนคโตปิ สนฺตึ ชนตาหิตญฺจ,สุขญฺจ ธมฺมา พหุธา กเรยฺยฐิโต หิ นาโถนุกรํ กเรยฺย; अशा प्रकारे, जरी जिन (बुद्ध) परम शांतीला (निर्वाणाला) प्राप्त झाले असले, तरी त्यांच्या धातूशरीराद्वारे ते लोकांचे कल्याण आणि सुख अनेक प्रकारे करतात. जणू काही प्रत्यक्ष उपस्थित असलेले नाथ लोकांवर अनुकंपा करत आहेत. สาธุชน มโนปสาทนตฺถาย กเต ถูปวํเส ถูปาราม กถา, सज्जनांच्या मनाला प्रसन्न करण्यासाठी रचलेल्या 'थूपवंस' मधील 'थूपाराम कथा' समाप्त झाली. ๑๓. นิฏฺฐิตาย ปน ธาตุปูชาย ปติฏฺฐิเต ธาตุวเร มหิณฺทตฺเถโร มหาเมฆวนุยฺยานเมว คนฺตฺวาวาสํ กปฺเปสิ. ตสฺมึ โข ปน สมเย อนุลาเทวี ปพฺพชิตุกามา หุตฺวา รญฺโญ อาโรเจสิ. ราชา ตสฺสา วจนํ สุตฺวา เถรํ เอตทโวจ? ภนฺเต อนุลาเทวี ปพฺพชิตุกามา, ปพฺพาเชถ นนฺต น มหาราช อมฺหากํ มาตุคามํ ปพฺพาเชตุํ กปฺปติ. ปาฏลิปุตฺเต ปน มยฺหํ ภคินิ สงฺฆมิตฺตา เถรี นาม อตฺถิ, ตํ ปกฺโกสาเปหิ มหาราช, อิมสฺมิญฺจ ทีเป ปุริมกานญฺจ ติณฺณํ สมฺมาสมฺพุทฺธานํ โพธิ ปติฏฺฐํสิ อมฺหากมฺปิ ภควโต สรส รํสิชาล วิสฺสชฺชนเกน โพธินา ปติฏฺฐาตพฺพํ, ตสฺมา สาสนํ ปหิเณยฺยสิ ยถา สงฺฆมิตฺตา โพธึ คเหตฺวา อาคจฺเฉยฺยาติ. १३. धातूची पूजा संपन्न झाल्यावर आणि श्रेष्ठ धातू प्रस्थापित झाल्यावर, महिंद थेर महामेघवन उद्यानातच जाऊन राहू लागले. त्या काळी अनुलादेवीने प्रवज्जित होण्याची इच्छा राजाला कळवली. राजाने तिचे बोलणे ऐकून थेरांना विचारले, 'भंते, अनुलादेवी प्रवज्जित होऊ इच्छिते, तिला प्रवज्जा द्या.' थेर म्हणाले, 'नाही महाराज, आम्हाला स्त्रियांना प्रवज्जा देणे कल्पत नाही. पाटलीपुत्र येथे माझी बहीण संघमित्ता थेरी नावाची आहे, तिला बोलवून घ्या, महाराज. आणि या द्वीपात पूर्वीच्या तिन्ही सम्यक्संबुद्धांचे बोधिवृक्ष प्रस्थापित झाले होते, आमच्या भगवंतांच्याही रश्मीजाल पसरवणाऱ्या बोधिवृक्षाची स्थापना झाली पाहिजे. म्हणून असा संदेश पाठवा की जेणेकरून संघमित्ता बोधिवृक्ष घेऊन येईल.' ราชา เถรสฺส วจนํ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา อมจฺเจหิ สทฺธึ มนฺเตนฺโต อริฏฺฐํ นาม อตฺตโน ภาคิเนยฺยํ อาห สกฺขิสฺสสิ ตฺวํ ตาต ปาฏลีปุตฺตํ คนฺตฺวา มหาโพธินา สทฺธึ อยฺยํ สงฺฆมิตฺตตฺเถรึ อาเนตุนฺติ สกฺขิสฺสามิ เทว สเจ เม ปพฺพชฺชํ อนุชานิสฺสสีติ. राजाने थेरांचे वचन स्वीकारून, अमात्यांशी चर्चा करून आपला भाचा अरिट्ठ याला विचारले, 'बाळा, तू पाटलीपुत्रला जाऊन महाबोधीसह आर्या संघमित्ता थेरीला आणू शकशील का?' अरिट्ठ म्हणाला, 'महाराज, मी आणू शकेन, जर आपण मला प्रवज्जेची अनुमती दिली तर.' คจฺฉ ตาต เถรึ อาเนตฺวา ปพฺพชฺชาหีติ. โส รญฺโญ จ เถริสฺส จ สาสนํ คเหตฺวา เถรสฺส อธิฏฺฐานวเสน เอกทิวเส น ชมฺพุโกลปฏฺฏนํ คนฺตฺวา นาวํ อภิรูหิตฺว สมุทฺทํ อติกฺกมิตฺวา ปาฏลีปุตฺตํ คนฺตฺวา รญฺโญ สาสนํ อาจิกฺขิ-ปุตฺโต เต เทว มหิณฺทเถโร เอวมาห. สหายสฺส กิร เต เทวานมฺปิยติสฺสสฺส ภาตุชายา อนุลาเทวี นาม ปพฺพชิตุกามา, ตํ ปพฺพาเชตุํ อยฺยํ สงฺฆมิตฺตตฺเถรึ ปหิเณยฺยาถ, อยฺยาย เอว จ สทฺธึ มหาโพธินฺติ. राजा म्हणाला, 'जा बाळा, थेरीला घेऊन ये आणि प्रवज्जित हो.' तो राजाचा आणि थेरांचा संदेश घेऊन, थेरांच्या अधिष्ठान बलाने एकाच दिवसात जम्बुकोल बंदरात गेला. जहाजात बसून समुद्र पार करून तो पाटलीपुत्रला पोहोचला आणि त्याने राजाला संदेश सांगितला - 'महाराज, आपले पुत्र महिंद थेर असे म्हणाले आहेत: आपले मित्र देवानंपियतिस्स यांची भावजय अनुलादेवी प्रवज्जित होऊ इच्छिते. तिला प्रवज्जा देण्यासाठी आर्या संघमित्ता थेरीला पाठवावे, आणि आर्यांसोबतच महाबोधीलाही पाठवावे.' เถรสฺส สาสนํ อาโรเจตฺวา สงฺฆมิตฺตตฺเถรึ อุปสงฺกมิตฺวา เอวมาห. อยฺเย ตุมฺหากํ ภาตา มหิณฺทตฺเถโร มํ ตุมฺหากํ สนฺติกํ เปเสสิ เทวานมฺปิยติสฺส รญฺโญ ภาตุชายา อนุลาเทวี นาม ปญฺจหิ กญฺญาสเตหิ ปญฺจหิ จ อนฺเตปุริสา สเตหิ สทฺธึ ปพฺพชิตุกามาติ, ตํ กิร อาคนฺตฺวา ปพฺพาเชถาติ. थेरांचा संदेश सांगून, संघमित्ता थेरींकडे जाऊन त्यांनी असे म्हटले, "आर्ये! आपले बंधू महिन्द थेरांनी मला आपल्याकडे पाठवले आहे. देवानंपियतिस्स राजाची भावजय अनुलादेवी नावाच्या देवी, पाचशे कन्या आणि पाचशे अंतःपुरातील स्त्रियांसह प्रवज्जा घेण्याची इच्छा बाळगून आहेत; तरी आपण येऊन त्यांना प्रवज्जित करावे." สา ตาว เทว ตุริต ตุริตา คนฺตฺวา รญฺญา ตฺैมตฺถํ อาโรเจตฺวา คจฺฉามหํ มหาราช ตมฺพปณฺณิทีปนฺติ อาห. त्या लगेचच अत्यंत घाईघाईने राजाकडे गेल्या आणि त्यांना हा विषय कळवून म्हणाल्या, "महाराज, मी तंबपण्णिदीपाला (ताम्रपर्णी द्वीपाला) जात आहे." เตน หิ อมฺม มหาโพธึ คเหตฺวา คจฺฉาหีติ วตฺวา ปาฏลีปุตฺตโต ยาว มหาโพธิ ตาว มคฺคํ ปฏิชคฺคาเปตฺวา สตฺตโยชนายามย ติโยชน วิตฺถตาย มหติยา เสนาย ปาฏลิปุตฺตโต นิกฺขมิตฺวา อริยสงฺฆํ อาทาย มหาโพธิสมีปํ อคมาสิ. "तर मग बाळ, महाबोधी घेऊन जा," असे म्हणून राजाने पाटलीपुत्रापासून महाबोधीपर्यंतचा मार्ग दुरुस्त करवून घेतला आणि सात योजन लांब व तीन योजन रुंद अशा विशाल सैन्यासह पाटलीपुत्रातून निघून, आर्यसंघाला सोबत घेऊन ते महाबोधीच्या समीप गेले. เสนาย สมุสฺสิต ธชปตากํ นานารตน วิจิตฺตํ อเนกาลงฺการ ปติมณฺฑิตํ นานาวิธ กุสุม สมากิณฺณํ อเนก ตุริย สํฆฺรฏฺฐํ มหาโพธึ ปริกฺขิปิ ตโต ราชา ปุปฺผ-คณฺธ-มาลาทีหิ ปูเชตฺวา ติกฺขตฺตุํ ปทกฺขิณํ กตฺวา อฏฺฐสุ ฐาเนสุ วนฺทิตฺวา อุฏฺฐาย อญฺชลิมฺปคฺคยฺห ฐตฺวา สจฺจวจนกิริยาย โพธึ คณฺหิตุกาโม รตนปีฐํ อารุยฺห ตุลิกํ คเหตฺวา มโนสิลาย เลขํ กตฺวา ยทิ มหาโพธินา ลงฺกาทีเป ปติฏฺฐาตพฺพํ, ยทิ จาหํ พุทฺธสาสเน นิพฺเพมติโก ภเวยฺยํ, มหาโพธิ สยเมว อิมสฺมึ สุวณฺณกฏาเห ปติฏฺฐหตูติ สจฺจกิริยมกาสิ สห สจฺจกิริยาย โพธิสาขา มโนสิลาย ปริจฺฉินฺนฏฺฐาเนหิ ฉิณฺทิตฺวา คณฺธ กลล ปูรสฺส สุวณฺณกฏาหสฺส อุปริ อฏฺฐาสิ. सैन्याने उभारलेले ध्वज आणि पताका असलेल्या, विविध रत्नांनी सुशोभित, अनेक अलंकारांनी नटलेल्या, नानाविध फुलांनी आच्छादलेल्या आणि अनेक वाद्यांच्या गजराने युक्त अशा महाबोधीला वेढले. त्यानंतर राजाने फुले, गंध, माळा इत्यादींनी पूजा करून, तीन वेळा प्रदक्षिणा घालून, आठ ठिकाणी वंदन केले. मग उठून, हात जोडून उभे राहून, सत्यवचन क्रियेने (सच्चकिरिया) बोधी ग्रहण करण्याची इच्छा धरून, रत्नपीठावर चढून, सुवर्णकुंचला हाती घेऊन मनःशिलेने रेघ मारली आणि अशी सत्यक्रिया केली की, "जर महाबोधीची लंकाद्वीपात प्रतिष्ठापना होणार असेल, आणि जर मी बुद्धशासनात पूर्णपणे निःशंक असेन, तर महाबोधी स्वतःच या सुवर्णपात्रात प्रस्थापित होवो." सत्यक्रिया करताच, बोधीशाखा मनःशिलेने आखलेल्या जागेवरून स्वतःच तुटून, सुगंधित चिखलाने भरलेल्या सुवर्णपात्राच्या वर येऊन स्थिरावली. ตโต ราชา มหาโพธึ โพธิมณฺฑโต มหนฺเตน สกฺกาเรน ปาฏลีปุตฺตํ อาเนตฺวา สพฺพปริหารานิ ทตฺวา มหาโพธึ คงฺคาย นาวํ อาโรเปตฺวา สยมฺปิ นครโต นิกฺขมิตฺวา วิญฺฌาฏวึ สมติกฺกมฺม อนุปุพฺเพน สตฺตทิวเสหิ ตามลิตฺตึ อนุปฺปตฺโต อนฺตรมคฺเค เทว-นาค-มนุสฺสา อุฬารํ มหาโพธิ ปูชมกํสุ. त्यानंतर राजाने महाबोधीला बोधिमंडावरून मोठ्या आदराने पाटलीपुत्रात आणले, सर्व प्रकारचे राजसन्मान देऊन महाबोधीला गंगेमध्ये नौकेवर चढवले. ते स्वतःही नगरातून बाहेर पडून, विंध्य अरण्याचा टप्पा पार करत अनुक्रमे सात दिवसांत ताम्रलिप्ती बंदरात पोहोचले. वाटेत देव, नाग आणि मनुष्यांनी महाबोधीची भव्य पूजा केली. ราชาปิ สมุทฺทตีเร สตฺตทิวสานิ มหาโพธึ ฐเปตฺวา มหนฺตํ สกฺการํ กตฺวา โพธิมฺปิ สํงฺฆมิตฺตตฺเถริมฺปิ สปริวารํ นาวํ อาโรเปตฺวา คจฺฉติ วตเร ทสพลสฺส สรส รํสิชาลา มุญฺจมาโน มหาโพธิ รุกฺโขติ กณฺทิตฺวา อญฺชลิมฺปคฺคเหตฺวา อสฺสูนิ ปวตฺตยมาโน อฏฺฐาสิ สาปิ โข มหาโพธิ สมรูฬฺหนาวา ปสฺสโต ปสฺสโต มหาราชสฺส มหาสมุทฺทตลํ ปกฺขณฺทิ มหาสมุทฺเทปิ สมนฺตา โยชนํ วีจิ วูปสนฺตา ปญฺจวณฺณานิ ปทุมานิ ปุปฺผิตานิ อนฺตลิกฺเข ทิพฺพตุริยานิ วชฺชึสุ อากาเส ชล ถล สนฺนิสฺสิตาหิ เทวตาหิ ปวตฺติตา อติวิย อุฬาร ปูชา อโหสิ. เอวํ มหติยา ปูชาย สา นาวา ชมฺพุโกลปฏฺฏนํ ปาวิสิ. राजानेही समुद्रकिनाऱ्यावर सात दिवस महाबोधीला ठेवून मोठा सत्कार केला आणि बोधीला तसेच संघमित्ता थेरींना त्यांच्या परिवारासह नौकेवर चढवले. "अरेरे! दशबलांच्या सतेज रश्मींचे जाळे पसरवणारा हा महाबोधी वृक्ष चालला आहे," असे म्हणून आक्रोश करत, हात जोडून, डोळ्यांतून अश्रू ढाळत ते उभे राहिले. ती महाबोधी नौकेवर आरूढ होऊन महाराज पाहत असतानाच महासमुद्रात पुढे निघाली. महासमुद्रातही सभोवताली एक योजनपर्यंत लाटा शांत झाल्या, पाच रंगांची कमळे उमलली, अंतराळात दिव्य वाद्ये वाजू लागली आणि आकाशात, पाण्यात व जमिनीवर राहणाऱ्या देवतांनी केलेली अत्यंत भव्य पूजा झाली. अशा प्रकारे मोठ्या पूजेसह ती नौका जम्बुकोल बंदरात प्रविष्ट झाली. เทวานมฺปิยติสฺส มหาราชาปิ อุตฺตรทฺวารโต ปฏฺฐาย ยาว ชมฺพุโกลปฏฺฏนา มคฺคํ โสธาเปตฺวา อลงฺการาเปตฺวา นครโต นิกฺขมน ทิวเส อุตฺตรทฺวาร สมีเป สทฺทสาลาวตฺถุสฺมึ ฐิโต ตาย วิภูติยา มหาสมุทฺเท อาคจฺฉนฺตํเยว มหาโพธึ เถรสฺสานุภาเวน ทิสฺวา ตุฏฺฐมานโส นิกฺขมิตฺวา สพฺพํ มคฺคํ ปญฺจวณฺเณหิ ปุปฺเผหิ โอกิรนฺโต อนฺตรนฺตรา ปุปฺผอคฺฆิยานิ ฐเปนฺโต เอกาเหเนว ชมฺพุโกลปฏฺฏนํ คนฺตฺวา สพฺพตาลาวจร ปริวุโต ปุปฺผ ธูปคณฺธาทีหิ ปูชยมาโน คลปฺปมํนํ อุทกํ โอรุยฺห อาคโต วต เรทสพลสฺส สรส รํสิชาลํ วิสฺสชฺชนโก โพธิรุกฺโขติ ปสนฺนจิตฺโต มหาโพธึ อุกฺขิปิตฺวา อุตฺตมงฺเค สิรสฺมึ ปติฏฺฐเปตฺวา มหาโพธึ ปริวาเรตฺวา อาคเตหิ โสฬสหิ ชาติสมฺปนฺนกุเลหิ สทฺธึ สมุทฺทโต ปจฺจุตฺตริตฺวา สมุทฺทตีเร โพธึ ฐเปตฺวา ตีณิ ทิวสานิ สกล ตมฺพปณฺณิ รชฺเชน ปูเชสิ. देवानंपियतिस्स महाराजांनीही उत्तर द्वारापासून जम्बुकोल बंदरापर्यंतचा मार्ग स्वच्छ व सुशोभित करून घेतला. नगरातून बाहेर पडण्याच्या दिवशी उत्तर द्वाराजवळ 'सद्दसाला' वास्तूमध्ये उभे राहून, त्या वैभवाने महासमुद्रातून येत असलेल्या महाबोधीला थेरांच्या प्रभावाने पाहून, अत्यंत आनंदी मनाने ते बाहेर पडले. संपूर्ण मार्गावर पाच रंगांची फुले उधळत आणि जागोजागी फुलांचे अर्घ्य ठेवत ते एकाच दिवसात जम्बुकोल बंदरात पोहोचले. सर्व प्रकारच्या वाद्यवृंदांनी वेढलेले ते फुले, धूप, गंध इत्यादींनी पूजा करत गळ्यापर्यंत पाण्यात उतरले आणि "अरेरे! दशबलांच्या सतेज रश्मींचे जाळे पसरवणारा हा बोधिवृक्ष आला आहे," अशा प्रसन्न चित्ताने त्यांनी महाबोधीला उचलून आपल्या मस्तकावर धारण केले. महाबोधीच्या सोबत आलेल्या सोळा उच्चकुलीन घराण्यांतील लोकांसह समुद्रातून बाहेर येऊन, समुद्रकिनाऱ्यावर बोधीला ठेवून त्यांनी तीन दिवस संपूर्ण तंबपण्णि राज्याकडून तिची पूजा करवली. อถ จตุตฺเถ ทิวเส มหาโพธึ อาทาย อุฬารํ ปูชํ กุรุมาโน อนุปุพฺเพน อนุราธปุรํ สมฺปตฺเต อนุราธปุเรปิ มหาสกฺการํ กตฺวา จาตุทฺทสี ทิวเส วฑฺฒมานกจฺฉายาย มหาโพธึ อุตฺตรทฺวาเรน ปเวเสตฺวา นครมชฺฌน อติหริตฺวา ทกฺขิณทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา ทกฺขิณทฺวารโต ปญฺจธนุ สติเก ฐาเน ยตฺถ อมฺหากํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ นิโรธ สมาปตฺตึ สมาปชฺชิตฺวา นิสีทิ. ปุริมกา จ ตโย สมฺมาสมฺพุทฺธา สมาปตฺตึ อปฺเปตฺวา นิสีทึสุ. ยตฺถ จ กกุสณฺธสฺส ภควโต สิรีสโพธิ, โกนาคมนสฺส ภควโต อุทุมฺพรโพธิ, กสฺสปสฺส ภควโต นิคฺโรธโพธิ, ปติฏฺฐาเปสิ -ตสฺมึ มหาเมฆวนุยฺยานสฺส ติลกภูเต กตภูมิ ปริกมฺเม ราชวตฺถุทฺวารโกฏฺฐกฏฺฐาเน มหาโพธึ ปติฏฺฐาเปสิ. त्यानंतर चौथ्या दिवशी महाबोधीला घेऊन भव्य पूजा करत ते अनुक्रमे अनुराधापूरला पोहोचले. अनुराधापुरातही मोठा सत्कार करून, चतुर्दशीच्या दिवशी दुपारच्या वेळी (वाढत्या सावलीच्या वेळी) महाबोधीला उत्तर द्वाराने प्रवेश दिला. नगराच्या मध्यभागातून नेऊन दक्षिण द्वाराने बाहेर काढले आणि दक्षिण द्वारापासून पाचशे धनुष्य अंतरावर असलेल्या ठिकाणी—जिथे आमचे सम्यक्संबुद्ध निरोध-समापत्ती प्राप्त करून बसले होते, आणि पूर्वीचे तीन सम्यक्संबुद्धही समापत्ती प्राप्त करून बसले होते; तसेच जिथे भगवान ककुसंधांचा शिरीषबोधी, भगवान कोणागमनांचा उदुंबरबोधी आणि भगवान कश्यपांचा न्यग्रोधबोधी प्रस्थापित केला गेला होता—त्या महामेघवन उद्यानाचा टिळा असलेल्या, सुशोभित केलेल्या भूमीवर, राजवाड्याच्या प्रवेशद्वाराच्या ठिकाणी महाबोधीची प्रतिष्ठापना केली. เอวํ ลงฺกาหิตตฺถาย-สาสนสฺสจ วุทฺธิยา,มหาเมฆวเน รมฺเม-มหาโพธิ ปติฏฺฐิโตติ; अशा प्रकारे लंकेच्या हितासाठी आणि बुद्ध शासनाच्या वृद्धीसाठी, रमणीय महामेघवनात महाबोधी प्रस्थापित झाली. โพธิ อาคมนกถา बोधी आगमन कथा. ๑๔. อนุลาเทวี ปญฺจหิ กญฺญาสเตหิ ปญฺจหิ อนฺเตปุริสา สเตหีติ มาตุคามสหสฺเสน สทฺธึ สงฺฆมิตฺตตฺเถริยา สนฺติเก ปพฺพชิตฺวา นจิรสฺเสว สปริวารา อรหตฺเต ปติฏฺฐาสิ. อริฏฺโฐปิ โข รญฺโญ ภาคิเนยฺโย ปญฺจหิ ปุริส สเตหิ สทฺธึ เถรสฺส สนฺติเก ปพฺพชิตฺวา สปริวาโร นจิรสฺเสว อรหตฺเต ปติฏฺฐาสิ. อเถกทิวสํ ราชา โพธึ วนฺทิตฺวา เถเรน สทฺธึ ถูปารามํ คจฺฉติ. ตสฺส โลหปาสาทฏฺฐานํ สมฺปตฺตสฺส ปุริสา ปุปฺผานิ อาหรึสุ ราชา เถรสฺส ปุปฺผานิ อทาสิ. เถโร ปุปฺเผหิ โลหปาสาทฏฺฐานํ ปูเชสิ ปุปฺเผสุ ภูมิยา ปติต มตฺเตสุ มหาภูมิจาโล อโหสิ? १४. अनुलादेवींनी पाचशे कन्या आणि पाचशे अंतःपुरातील स्त्रिया अशा एक हजार स्त्रियांसह संघमित्ता थेरींच्या सन्निध प्रवज्जा घेतली आणि लवकरच त्या आपल्या परिवारासह अर्हत पदावर प्रतिष्ठित झाल्या. राजाचा भाचा अरिट्ठ यानेही पाचशे पुरुषांसह थेरांच्या सन्निध प्रवज्जा घेतली आणि तोही आपल्या परिवारासह लवकरच अर्हत पदावर प्रतिष्ठित झाला. त्यानंतर एके दिवशी राजा बोधीला वंदन करून थेरांसह थूपारामाकडे जात होता. तो लोहप्रासादाच्या जागी पोहोचला असता, लोकांनी फुले आणली. राजाने ती फुले थेरांना दिली. थेरांनी त्या फुलांनी लोहप्रासादाच्या जागेची पूजा केली. फुले जमिनीवर पडताच मोठा भूकंप झाला. ราชา กสฺมา ภนฺเต ภูมิ จลิตานิ ปุจฺฉิ. อิมสฺมึ มหาราช โอกาเส อนาคเต สงฺฆสฺส อุโปสถาคารํ ภวิสฺสติ. ตสฺเสตํ ปุพฺพนิมิตฺตนฺติ อาห. ปุน ตสฺส มหาเจติยฏฺฐานํ สมฺปตฺตสฺส จมฺปก ปุปฺผานิ อภิหรึสุ. ตานิปิ ราชา เถรสฺส อทาสิ. เถโร มหาเจติยฏฺฐานํ ปุปฺเผหิ ปูเชตฺวา วนฺทิ ตาวเทว มหาปถวี สํกมฺปิ. ราชา ภนฺเต กสฺมา ปถวี กมฺปิตฺถาติ ปุจฺฉิ. มหาราช อิมสฺมึ ฐาเน อนาคเต พุทฺธสฺส ภควโต อสทิโส มหาถูโป ภวิสฺสติ. ตสฺเสตํ ปุพฺพนิมิตฺตนฺติ อาห. อหเมว กโรมิ ภนฺเตติ. อลํ มหาราช ตุมฺหากํ อญฺญํ พหุํ กมฺมํ อตฺถิ. ตุมฺหากํ ปน นนฺตา ทุฏฺฐคามณี อภโย นาม กาเรสฺสตีติ. राजाने विचारले, "भन्ते, पृथ्वी का कंपित झाली?" (थेरांनी उत्तर दिले,) "महाराज, या ठिकाणी भविष्यात संघाचे उपोसथागार होईल. हे त्याचेच पूर्वनिमित्त आहे." पुन्हा, ते महाचेतिय (महास्तूप) च्या स्थानावर पोहोचले असता, चाफ्याची फुले आणण्यात आली. राजाने ती फुले सुद्धा थेरांना दिली. थेरांनी महाचेतिय स्थानाची फुलांनी पूजा करून वंदन केले, त्याच वेळी महापृथ्वी कंपित झाली. राजाने विचारले, "भन्ते, पृथ्वी का कंपित झाली?" (थेरांनी उत्तर दिले,) "महाराज, या ठिकाणी भविष्यात बुद्ध भगवंतांचा एक अद्वितीय महास्तूप होईल. हे त्याचेच पूर्वनिमित्त आहे." (राजाने म्हटले,) "भन्ते, मीच तो बनवीन." (थेरांनी उत्तर दिले,) "महाराज, पुरे. आपल्याला इतर अनेक कामे आहेत. परंतु आपला नातू, दुट्ठगामणी अभय नावाचा, हा तो बनवेल." อถ ราชา สเจ ภนฺเต มยฺหํ นนฺตา กริสฺสติ. กตํเยว มยาติ ทฺวาทสหตฺถํ ปาสาณตฺถมฺหํ อาหราเปตฺวา เทวานมฺปิยติสฺส รญฺโญ นตฺตา ทุฏฺฐคามณิ อภโย นาม อิมสฺมึ ปเทเส ถูปํ กโรตีติ อกฺขรานิ ลิขาเปตฺวา ปติฏฺฐาเปสีติ อถ เทวานมฺปิยติสฺสราชา เจติยปปฺปเต นิหิตา สมฺมาสมฺพุทฺธ ภุตฺต ปตฺต ปูเรตฺวา อาหฏา ธาตุโยหตฺถิกฺขณฺเธน อาหราเปตฺวา สกลตมฺพปณฺณิทีเป โยชเน โยชเน ถูปํ กาเรตฺวา ธาตุโย ปติฏฺฐาเปสิ ภควโต ปตฺตํ ปน ราช เคเหยว ฐเปตฺวา ปูชมกาสีติ. तेव्हा राजा म्हणाला, "भन्ते, जर माझा नातू हा स्तूप बनवणार असेल, तर तो मीच बनवल्यासारखा आहे." असे म्हणून त्याने बारा हात लांबीचा दगडाचा खांब आणवला आणि "देवानंपियतिस्स राजाचा नातू दुट्ठगामणी अभय नावाचा या ठिकाणी स्तूप बनवेल," अशी अक्षरे त्यावर कोरून तो तेथे स्थापित केला. त्यानंतर देवानंपियतिस्स राजाने चेतियपब्बत (चेतिय पर्वत) वर ठेवलेल्या, सम्यक्संबुद्धांनी भोजन केलेल्या पात्रात भरून आणलेल्या धातू हत्तीच्या पाठीवरून आणवल्या आणि संपूर्ण तंबपण्णि द्वीपात प्रत्येक योजनावरावर स्तूप बांधून त्या धातू प्रस्थापित केल्या. परंतु भगवंतांचे ते पात्र राजाने आपल्या राजवाड्यातच ठेवून त्याची पूजा केली. นิธาเปตฺวาน สมฺพุทฺธ-ธาตุโย ปตฺตมตฺตกา,การาเปสิ มหาราช-ถูเป โยชน โยชเนติ; सम्यक्संबुद्धांच्या पात्रात भरलेल्या धातू प्रस्थापित करून, महाराजांनी प्रत्येक योजनावरावर स्तूप बांधले. โยชนถูป กถา योजनथूप कथा (योजनस्तूप कथा) อถ ราชา อญฺญานิ จ พหูนิ ปุญฺญกมฺมานิ กตฺวา จตฺตาลีส วสฺสานิ รชฺชํ กาเรสิ. ตสฺส อจฺจเยน ตํ กนิฏฺโฐ อุตฺติย ราชา ทสวสฺสานิ รชฺชํ กาเรสิ. ตสฺส อจฺจเยน ตํ กนิฏฺโฐ มหาสีโว ทสวสฺสาเนว รชฺชํ กาเรสิ ตสฺส อจฺจเยน ตสฺสาปิ กนิฏฺโฐ สูรติสฺโส ทสวสฺสาเนว รชฺชํ กาเรสิ ตโต อสฺสนาวิก ปุตฺตา ทฺเว ทมิฬา สูรติสฺสํ คเหตฺวา ทฺเววีส วสฺสานิ ธมฺเมน รชฺชํ กาเรสุํ. เต คเหตฺวา มุฏสีวสฺส รญฺโญ ปุตฺโต อเสโล นาม ทสวสฺสานิ รชฺชํ กาเรสิ อถ โจฬรฏฺฐโต อคนฺตฺวา เอฬาโร นาม ทมิโล อเสล ภูปตึ คเหตฺวา จตุจตฺตาลีส วสฺสานิ รชฺชํ กาเรสิ เอฬารํ คเหตฺวา ทุฏฺฐคามณิ อภโย ราชา อโหสิ. त्यानंतर राजाने इतरही अनेक पुण्यकर्मे करून चाळीस वर्षे राज्य केले. त्यांच्या निधनानंतर, त्यांचा धाकटा भाऊ उत्तिय राजाने दहा वर्षे राज्य केले. त्यांच्या निधनानंतर, त्यांचा धाकटा भाऊ महासीव याने दहा वर्षेच राज्य केले. त्यांच्या निधनानंतर, त्यांचाही धाकटा भाऊ सूरतिस्स याने दहा वर्षेच राज्य केले. त्यानंतर दोन तमिळ (दमिळ) घोड्यांच्या व्यापाऱ्यांच्या मुलांनी सूरतिस्साला पराभूत करून बावीस वर्षे धर्माने राज्य केले. त्यांना पराभूत करून मुटसीव राजाचा मुलगा असेल नावाचा याने दहा वर्षे राज्य केले. त्यानंतर चोळ राष्ट्रातून आलेल्या एळार नावाच्या तमिळाने असेल राजाला पराभूत करून चव्वेचाळीस वर्षे राज्य केले. एळारला पराभूत करून दुट्ठगामणी अभय राजा झाला. ตทตฺถทีปนตฺถํ อยมนุปุพฺพกถา त्याचा अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी ही अनुक्रमिक कथा (अनुपूर्व कथा) आहे: ๑๕. เทวานมฺปิยติสฺส รญฺโญ กิร ทุติยภาติโก อุปราชา มหานาโค นาม อโหสิ. อถ รญฺโญ เทวี อตฺตโน ปุตฺตสฺส รชฺชํ อิจฺฉนฺติ ตรจฺฉนาวา วาปึ กโรนฺตสฺส อุปราชสฺสวิเสน อมฺพํ โยเชตฺวา อมฺพมตฺถเก ฐเปตฺวา เปเสสิ เทวิยิ ปุตฺเต, อุปราเชน สทฺธึ คโต ภาชเน วิวเฏ สยเมว อมพํ คเหตฺวา ขาทิตฺวา กาลมกาสิ อุปราชา ตํ การณํ ญตฺวา เทวิยา ภีโต ตโตเยว อตฺตโน เทวิญฺจ พลวาหนญฺจ คเหตฺวา โรหณํ อคมาสิ. ตสฺส อคฺคมเหสิ อนฺตรามคฺเค ยฏฺฏาลวิหาเร นาม ปุตฺตํ วิชายิ ตสฺส ติสฺโสติ ภาตุนาม’มกํสิ. १५. असे म्हटले जाते की, देवानंपियतिस्स राजाचा दुसरा भाऊ महानग नावाचा उपराजा होता. तेव्हा राजाच्या राणीने आपल्या पुत्राला राज्य मिळावे अशी इच्छा धरून, तरच्छनावा तलावाचे काम करत असलेल्या उपराजासाठी विषाने माखलेला आंबा आंब्यांच्या टोपलीच्या वर ठेवून पाठवला. राणीचा मुलगा, जो उपराजासोबत गेला होता, त्याने भांडे उघडल्यावर स्वतःच तो आंबा घेऊन खाल्ला आणि तो मरण पावला. उपराजाला हे कारण समजले आणि राणीच्या भीतीने त्याने लगेचच आपली पत्नी (देवी) आणि सैन्य घेऊन रोहण देशात पळ काढला. वाटेत त्याच्या मुख्य राणीने (अग्रमहिषीने) यट्टाळविहार येथे एका पुत्राला जन्म दिला. त्याने आपल्या भावाच्या नावावरून त्याचे नाव 'तिस्स' असे ठेवले. โส ตโต คนฺตฺวา มหาคาเม วสนฺโต โรหเณ รชฺชํ กาเรสิ ตสฺส อจฺจเยน ตสฺส ปุตฺโต ยฏฺฏาลติสฺโส มหาคาเมเยว รชฺชํ กาเรสิ. ตสฺส อจฺจเยน ตสฺสาปิ ปุตฺโต โคฐาภโย นาม ตตฺเถว รชฺชํ กาเรสิ. โคฐาภยสฺส ปุตฺโต กากวณฺณติสฺโส นาม ตตฺเถว รชฺชํ กาเรสิ. กากวณฺณติสฺส รญฺโญ กิร กลฺยาณิติสฺส รญฺโญ ธีตา วิหารมหาเทวี นาม อคฺคมเหสิ อโหสิ สา รญฺโญ ปิยา อโหสิ มนาปา. ราชา ตาย สทฺธึ สมคฺควาสํ วสนฺโต ปุญฺญานิ กโรนฺโต วิหาสิ. อเถกทิวสํ เทวี ราชเคเหเยว ภิกฺขุสงฺฆสฺส มหาทานํ ทตฺวา สายณฺหสมเย คณฺธมาลาทีนิ คาหาเปตฺวา ธมฺมํ โสตุํ วิหารํคตา, ตตฺถ นิปนฺนํ พาฬฺหคิลานํ อาสนฺนมรณํ สีลวนฺตํ สามเณรํ ทิสฺวา คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺวา อตฺตโน สมฺปตฺตึ วณฺเณตฺวา มม ปุตฺตภาวํ ปตฺเถถ ภนฺเตติ ยาจิ. तो तेथून निघून महागाम येथे राहू लागला आणि रोहण देशावर राज्य करू लागला. त्यांच्या निधनानंतर, त्यांचा मुलगा यट्टाळतिस्स याने महागाम येथेच राज्य केले. त्यांच्या निधनानंतर, त्यांचाही मुलगा गोठाभय नावाचा याने तेथेच राज्य केले. गोठाभयाचा मुलगा काकवण्णतिस्स नावाचा याने तेथेच राज्य केले. असे म्हटले जाते की, काकवण्णतिस्स राजाची मुख्य राणी (अग्रमहिषी) कल्याणितिस्स राजाची कन्या विहारमहादेवी नावाची होती. ती राजाला अत्यंत प्रिय आणि मनपसंत होती. राजा तिच्यासोबत सुखाने संसार करत आणि पुण्यकर्मे करत राहत असे. एके दिवशी राणीने राजवाड्यातच भिक्खू संघाला महादान दिले आणि संध्याकाळच्या वेळी गंध, पुष्प इत्यादी घेऊन धम्म ऐकण्यासाठी ती विहारात गेली. तेथे आजारी असलेल्या, मरणासन्न आणि शीलवान अशा एका सामणेराला पाहून, तिने गंध, पुष्प इत्यादींनी त्यांची पूजा केली आणि आपल्या वैभवाचे वर्णन करून, "भन्ते, आपण माझा पुत्र म्हणून जन्म घेण्याची प्रार्थना करावी," अशी याचना केली. โส น อิจฺฉิ, ยาปิ ปุนปฺปุน ยาจิเยว. สามเณโรปิ เอวํ สนฺเต สาสนานุคฺคหํ กาตุํ สกฺกาติสมฺปฏิจฺฉิตฺวา คตินิมิตฺตวเสน อุปฏฺฐิตมฺปิ เทวโลกํ ฉฑฺเฑตฺวา นิกนฺติวเสน สุวณฺณ สิวิกาย คจฺฉนฺติยา เทวิยา กุจฺฉิมฺหิ ปฏิสณฺธึ คณฺหิ. त्यांनी नकार दिला, परंतु तिने पुन्हा पुन्हा याचना केलीच. सामणेराने देखील विचार केला की, "असे झाल्यास बुद्ध शासनावर अनुग्रह करता येईल," हे स्वीकारून, गतीनिमित्ताने समोर आलेल्या देवलोकाचा त्याग केला आणि इच्छेपोटी सोन्याच्या पालखीतून जाणाऱ्या राणीच्या गर्भात प्रतिसंधी ग्रहण केली (पुनर्जन्म घेतला). สา ทสมาสจฺจเยน ปุตฺตํ วิชายิ. ตสฺส คามณิ อภโยติ นามํ กรึสุ. อปรภาเค อปรมฺปิ ตสฺส ติสฺโสติ นามํ กรึสุ. คามณิ กุมาโร กเมน วฑฺเฒนฺโต โสฬส วสฺสิโก หุตฺวา หตฺถสฺส ถรา สิปฺเปสุ โกวิโท เตโชพล ปรกฺกม สมฺปนฺโน อโหสิ. อถ โข กากวณฺณติสฺส ราชา นณฺธิมิตฺโต-สุรนิมฺมโล-มหาเสโน-โคฐยิมฺพโร-เถรปุตฺตาภ- โย-ภรโณ-เวฬุสุมโน-ขญฺจเทโว-ผุสฺสเทโว-ลภิยฺยวสโภติ อิเม ทสามหาโยเธ ปุตฺตสฺส สนฺติเก ฐเปตฺวา วาเสสิ. दहा महिन्यांनंतर तिने एका पुत्राला जन्म दिला. त्यांनी त्याचे नाव 'गामणी अभय' असे ठेवले. नंतरच्या काळात, त्यांनी दुसऱ्या पुत्राचे नाव 'तिस्स' असे ठेवले. गामणी कुमार हळूहळू मोठा होत सोळा वर्षांचा झाला आणि हत्ती चालवणे, शस्त्रविद्या इत्यादी कलांमध्ये निपुण, तसेच तेज, बल आणि पराक्रमाने संपन्न झाला. त्यानंतर काकवण्णतिस्स राजाने नंदिमित्त, सुरनिम्मल, महासेन, गोठयिम्बर, थेरपुत्ताभय, भरण, वेळुसुमन, खंजदेव, फुस्सदेव आणि लभिय्यवषभ या दहा महायोद्ध्यांना आपल्या पुत्राच्या सेवेत ठेवले. เตสํ อุปฺปตฺติกถา มหาวํสโต คเหตพฺพา ราชา ทสมหาโยธานํ ปุตฺตสฺส สกฺการสมํสกฺการํ กาเรสิ ติสฺสกุมารํ ชนปท รกฺขนตฺถาย ทีฆวาปิยํ ฐเปสิ อเถกทิวสํ คามิณี กุมาโร อตฺตโน พลวาหน สมฺปตฺตึ ทิสฺวา ทมิเฬหิ สทฺธึ ยุชฺฌสฺสามีติ รญฺโญ กถาเปสิ. ราชา ปุตฺตํ อนุรกฺขนฺโต อลํ โอรคงฺคนฺติ นิวาเรสิ. โส ยาว ตติยํ กถาเปสิ ราชา กุชฺฌิตฺวา เหมสงฺขลิกํ กโรถ พณฺธิตฺวา รกฺขิสฺสามีติ. อภโย ปิตุ รญฺโญ กุชฺฌิตฺวา ปลายิตฺวา มลยํ อคมาสิ ตโต ปฏฺฐาย ปิตริ ทุฏฺฐตฺตา ทุฏฺฐคามณีติ ปญฺญาโต ราชา ปุตฺตานํ กลหฏฺฐานํ อาคมนตฺถาย โยเธหิ สปถํ กาเรสิ. त्यांच्या जन्माची कथा महावंशातून घ्यावी. राजाने त्या दहा महायोद्ध्यांना आपल्या पुत्रासमानच आदर-सत्कार दिला. तिस्स कुमाराला जनपदाच्या रक्षणासाठी दीघवापी येथे ठेवले. एके दिवशी गामणी कुमाराने आपले सैन्य आणि शक्ती पाहून, "मी तमिळांशी युद्ध करीन," असा निरोप राजाला पाठवला. राजाने पुत्राच्या रक्षणासाठी "गंगा नदीच्या अलीकडचा प्रदेश पुरेसा आहे," असे सांगून त्याला रोखले. त्याने तीन वेळा निरोप पाठवला, तेव्हा राजाने रागावून म्हटले, "सोन्याची साखळी तयार करा, मी त्याला बांधून ठेवीन." अभय आपल्या पिता राजावर रागावला आणि पळून मलय देशात निघून गेला. तेव्हापासून वडिलांवर रागावल्यामुळे तो 'दुट्टगामणी' म्हणून ओळखला जाऊ लागला. राजाने आपल्या पुत्रांमध्ये युद्धाची वेळ येऊ नये म्हणून योद्ध्यांकडून शपथ घेतली. อถ กากวณฺณติสฺส ราชา จตุสฏฺฐิวิหาเร กาเรตฺวา จตุสฏฺฐิ สํวจฺฉราเนว ฐตฺวา กาลมกาสิ ติสฺสกุมาโร ปิตุกาลกตภาวํ สุตฺวา ทีฆวาปิโต อาคนฺตฺวา ปิตุ สรีรกิจฺจํ กาเรตฺวา มาตรํ - กณฺฑุล หตฺถิญฺจ คเหตฺวา ภาตุ ภยา ทีฆวาปึ อคมาสิ. อมจฺจา สนฺนิปติตฺวา ตํ ปวตฺตึ วตฺวา ทุฏฺฐคามณิติสฺส สนฺติกํ เปเสสุํ. โส ตํ สาสนํ สุตฺวา ภุตฺตสาลํ อาคมฺม ภาตุ สนฺติกํ ทูเต เปเสตฺวา ตโต มหาคามํ อาคนฺตฺวา อภิเสกํ ปตฺวา มาตรํ กณฺฑุลหตฺถิญฺจ เปเสตูติ ยาว ตติยํ ภาตุ สนฺติกํ เลขา เปเสตฺวา อเปสน ภาวํ ญตฺวา ยุทฺธาย นิกฺขมิ. กุมาโรปิ ยุทฺธสชฺโชหุตฺวานิกฺขมิ. จุฬงฺคณิย ปิฏฺฐิยํ ทฺวินฺนํ ภาตูนํ มหายุทฺธํ อโหสิ. त्यानंतर काकवर्णतिस्स राजाने चौसष्ट विहार बांधून, चौसष्ट वर्षे जगून काळ केला. तिस्स कुमाराने पित्याच्या मृत्यूची बातमी ऐकून, दीघवापीहून येऊन, पित्याचे अंत्यसंस्कार केले आणि आईला व कण्डुल हत्तीला घेऊन भावाच्या भयाने तो दीघवापीला निघून गेला. अमात्यांनी एकत्र येऊन ती हकीकत सांगण्यासाठी दुट्ठगामणी तिस्सकडे दूत पाठवले. त्याने तो संदेश ऐकून, भुत्तसाला येथे येऊन भावाकडे दूत पाठवले, त्यानंतर महागाम येथे येऊन राज्याभिषेक करून घेतला आणि आईला व कण्डुल हत्तीला पाठवून द्यावे म्हणून भावाकडे तीन वेळा पत्रे पाठवली. परंतु त्याने ते न पाठविल्याचे जाणून तो युद्धासाठी निघाला. कुमार देखील युद्धाची तयारी करून निघाला. चुळंगणीय मैदानावर दोन्ही भावांमध्ये मोठे युद्ध झाले। เต กิร โยธา สปถสฺส กตตฺตา เตสํ ยุทฺเธ สหายา น ภวึสุ. ตทา รญฺโญ อเนกสหสฺส มนุสฺสา มรึสุ. ราชา ปรชฺชิตฺวา ติสฺสามจฺจํ ทิฆตุณิกํ วฬวญฺจ คเหตฺวา ปลายิ. กุมาโร ปจฺฉโต ปจฺฉโต อนุพณฺธิ. อนฺตเร ภิกฺขุ ปพฺพตํ มาเปสุํ. ตํ ทิสฺวา กุมาโร ภิกฺขุสงฺฆสฺส กมฺมนฺติ ญตฺวา นิวตฺติ ราชา ปลายิตฺวา กปฺปณฺทกร นทิยา ชลมาลติตฺถํ นาม คนฺตฺวํ ฉาโตมฺหิติ อาห. อมจฺโจ สุวณฺณสรเก ปกฺขิตฺตภตฺตา นิหริตฺวา อทาสิ. असे म्हणतात की, त्या योद्ध्यांनी शपथ घेतली असल्यामुळे ते त्यांच्या युद्धात सहभागी झाले नाहीत. तेव्हा राजाचे अनेक हजार सैनिक मारले गेले. राजा पराभूत होऊन, तिस्स नावाचा अमात्य आणि दीघतूणिक नावाची घोडी घेऊन पळून गेला. कुमार त्याच्या पाठीमागे पाठलाग करत गेला. दरम्यान, भिक्खूंनी एक पर्वत निर्माण केला. ते पाहून कुमाराने हे भिक्खूसंघाचे कार्य आहे असे जाणून तो मागे फिरला. राजा पळून जाऊन कप्पणदकर नदीच्या जलमालतीर्थ नावाच्या घाटावर पोहोचला आणि म्हणाला, 'मला भूक लागली आहे.' अमात्याने सोन्याच्या पात्रात ठेवलेले अन्न काढून त्याला दिले। ราชา กาลํ สลฺลกฺเขตฺวา สงฺฆสฺส ทตฺวา ภุญฺชามิติ สงฺฆสฺส-อมจฺจสฺส-วฬวาย-อตฺตโน จาติ จตุภาคํ กตฺวา กาลา โฆสาเปสิ ตทา ปิยงฺคุทิปโต กุฏุมฺพิยติสฺสตฺเถโร นาม อาคนฺตฺวา ปุรโต อฏฺฐาสิ. ราชา เถรํ ทิสฺวา ปสนฺนมานโส สงฺฆสฺส ฐปิตภาคํ อตฺตโน ภาคญฺจ เถรสฺส ปตฺเต ปกฺขิปึ อมจฺโจปิ อตฺตโน ภาคํ ปกฺขิปิ วฬวาปิ ทาตุกามา อโหสิ. ตสฺสาภิปฺปายํ ญตฺวา อมจฺโจ ตสฺสาปิ ภาคํ ปตฺเต ปกฺขิปิ. राजाने वेळेचा विचार करून, 'संघाला दान देऊनच मी भोजन करेन' असे ठरवून, संघाचा, अमात्याचा, घोडीचा आणि स्वतःचा असे चार भाग केले आणि भोजनाची वेळ झाल्याची घोषणा केली. तेव्हा पियंगुदीपावरून कुटूंबियतिस्स थेर नावाचे स्थवीर तेथे आले आणि त्यांच्या समोर उभे राहिले. राजाने थेरांना पाहून प्रसन्न मनाने संघासाठी ठेवलेला भाग आणि स्वतःचा भाग थेरांच्या पात्रात टाकला. अमात्यानेही आपला भाग पात्रात टाकला. घोडीची देखील आपला भाग देण्याची इच्छा झाली. तिचा अभिप्राय जाणून अमात्याने तिचाही भाग पात्रात टाकला। อิติ โส ราชา เถรสฺส ปริปุณฺณ ภตฺตปตฺตํ อทาสิ. เถโร ปตฺตํ คเหตฺวา คนฺตฺวา โคตมตฺเถรสฺส นาม อทาสิ. โส ปญฺจสต ภิกฺขุ โภเชตฺวา ปุน ตโต ลทฺเธหิ ภาเคหิ ปตฺตปูเรตฺวา อากาเส ขิปิ ปตฺโต คนฺตฺวา รญฺโญ ปุรโต อฏฺฐาสิ ติสฺโส ปตฺตํ คเหตฺวา ราชานํ โภเชตฺวา ตโต สยํ ภุญฺชิตฺวา วฬวํ โภเชสิ. ตโต ราชา สนฺนาหํ จุมฺพฏกํ กตฺวา ปตฺตํ วิสฺสชฺเชสิ. ตโต คนฺตฺวา เถรสฺส หตฺเถ ปติฏฺฐาสิ, ราชา ปุน มหาคามํ อาคนฺตฺวา เสนํ สงฺกฑฺฑิโว สฏฺฐิสหสฺสพลา คเหตฺวา ปุน ภาตรา สทฺธึ ยุชฺฌิ ตทา กุมารสฺส อเนก สหสฺสํ มนุสฺสา ปตึสุ. अशा प्रकारे त्या राजाने थेरांना अन्नाने पूर्ण भरलेले पात्र दिले. थेरांनी ते पात्र घेऊन जाऊन गोतम थेर नावाच्या स्थविरांना दिले. त्यांनी पाचशे भिक्खूंना भोजन करवून, पुन्हा त्यातून मिळालेल्या भागांनी पात्र भरून आकाशात फेकले. ते पात्र हवेतून जाऊन राजाच्या समोर उभे राहिले. तिस्सने ते पात्र घेऊन राजाला भोजन करवले, त्यानंतर स्वतः भोजन केले आणि घोडीलाही खाऊ घातले. त्यानंतर राजाने आपल्या चिलखताची चुंबळ करून पात्र परत पाठवले. तेथून जाऊन ते थेरांच्या हातात स्थिरावले. राजाने पुन्हा महागाम येथे येऊन साठ हजार सैनिकांचे सैन्य गोळा केले आणि पुन्हा भावाशी युद्ध केले. तेव्हा कुमाराचे अनेक हजार सैनिक मारले गेले। กุมาโร ปลายิตฺวา วิหารํ ปวิสิตฺวา มหาเถรสฺส เคหํ ปาวิสิ. कुमार पळून जाऊन विहारात शिरला आणि महाथेरांच्या कुटीत प्रवेश केला। ราชา ปจฺฉโต ปจฺฉโต อนุพณฺธนฺโต วิหารํ ปวิฏฺฐภาวํ ญตฺวา นิวตฺติ ปจฺฉา เถรา เต อุโภ ภาตโร อญฺญมญฺญํ ขมาเปสุํ. ตทา ราชา สสฺสกมฺมานิ กาเรตุํ ติสฺสกุมารํ ทีฆวาปิเมว ปหิณิตฺวา สยมฺปิ เภรํ จราเปตฺวา สสฺสกมฺมานิ กาเรสิ. อถ มหาชนสฺส สงฺคหํกตฺวา กุนฺเต ธาตุํ นิธาเปตฺวา พลวาหน ปริวุโต ติสฺสารามํ คนฺตฺวา สงฺฆํ วนฺทิตฺวา ภนฺเต สาสนํ โชเตตุํ ปารคงฺคํ คมิสฺสามิ สกฺกาเรตุํ อมฺเหหิ สหคามิโน ภิกฺขุ เทถาติ อาห. राजाने पाठीमागे पाठलाग करत तो विहारात शिरल्याचे जाणून माघार घेतली. नंतर थेरांनी त्या दोन्ही भावांना एकमेकांची क्षमा मागायला लावून त्यांच्यात समेट घडवून आणला. तेव्हा राजाने शेतीची कामे करण्यासाठी तिस्स कुमाराला दीघवापीलाच पाठवले आणि स्वतः देखील दवंडी पिटवून शेतीची कामे करवून घेतली. त्यानंतर जनतेचे कल्याण करून, आपल्या भाल्यामध्ये धातू प्रस्थापित करून, सैन्य व वाहनांसह तिस्स आरामात जाऊन, संघाला वंदन करून तो म्हणाला, 'भंते, शासनाचा प्रसार करण्यासाठी मी गंगापार जाणार आहे. आमचा सत्कार स्वीकारण्यासाठी आमच्यासोबत येणारे भिक्खू आम्हाला द्यावे।' สงฺโฆ ปญฺจสตภิกฺขุ อทาสิ. ราชา ภิกฺขุสงฺฆํ คเหตฺวา กณฺฑุลหตฺถิมารุยฺห โยเธหิ ปริวุโต มหตา พลกาเยน ยุทฺธาย นิกฺขมิตฺวา มหิยงฺคณํ อาคนนฺตฺวา ตตฺถ ทมิเฬหิ สทฺธึ ยุชฺฌนฺโต มหิยงฺคเณ กญฺจุก ถูปํ กาเรสิ. ตสฺส ถูปสฺส วิภาวนตฺถํ อยมานุปุพฺพกถา. संघाने पाचशे भिक्खू दिले. राजा भिक्खूसंघाला सोबत घेऊन, कण्डुल हत्तीवर आरूढ होऊन, योद्ध्यांनी वेढलेला आणि मोठ्या सैन्यासह युद्धासाठी निघाला. महियंगण येथे येथे येऊन तेथे तमिळांशी युद्ध करत असताना त्याने महियंगण येथे कंचुक स्तूप बांधला. त्या स्तूपाच्या उत्पत्तीचे स्पष्टीकरण करण्यासाठी ही अनुक्रमिक कथा आहे। ๑๖. ภควา กิร โพธิเต นวเม มาเส อิมํ ทีปมาคนฺตฺวา คงฺคาตีเร ติโยชนายเต โยชนวิตฺถเต มหานาควนุยฺยาเน ยกฺขสมาคมํ อาคนฺตฺวา เตสํ ยกฺขานํ อุปริภาเค มหิยงฺคณ ถูปสฺส ฐาเน เวหาสยํ ฐิโต วุฏฺฐิ วาตนฺธการาทีหิ ยกฺเข สนฺตาเสตฺวา เตหิ อภยํ ยาจิโต ตุมฺหากํ อภยํ ทสฺสามิ ตุมฺเห สมคฺคา มยฺหํ นิสีทนฏฺฐานํ เทถาติ อาห. १६. असे म्हणतात की, भगवान बुद्धत्व प्राप्तीनंतरच्या नवव्या महिन्यात या द्वीपावर आले आणि गंगा नदीच्या तीरावर तीन योजन लांब व एक योजन रुंद असलेल्या महानागवन उद्यानात यक्षांच्या सभेत पोहोचले. त्या यक्षांच्या वर, महियंगण स्तूपाच्या ठिकाणी आकाशात उभे राहून, पाऊस, वारा आणि अंधार इत्यादींनी त्यांनी यक्षांना भयभीत केले. तेव्हा त्यांनी अभयाची याचना केली असता, 'मी तुम्हाला अभय देईन, तुम्ही सर्वजण मिळून मला बसण्यासाठी जागा द्या,' असे भगवान म्हणाले। ยกฺขา, มาริส เต อิมํ สกลทีปํ เทมิ. อภยํ โน เทหีติ อาหํสุ. ตโต ภควา เตสํ ภยํ อปนุทิตฺวา เตหิ ทินฺนภภูมิยํ จมฺมขณฺฑํ ปตฺถริตฺวา ตตฺถ นิสินฺโน เตโชกสิณํ สมาปชฺชิตฺวา จมฺมขณฺฑํ สมนฺตโต ชาเลตฺวา วฑฺเฒสิ. เต จมฺมขณฺเฑน อภิภูนา สมนฺตโต สาคร ปริยนฺเต ราสิภูตา อเหสุํ ภควา อิทฺธิพเลน คิริทีปํ นาม อิธาเนตฺวา ตตฺถ ยกฺเข ปเวเสตฺวา ทีปํ ยถาฏฺฐาเน ฐเปตฺวา จมฺมขณฺฑํ สงฺขิปิ ตทา เทวตา สมาคโม อโหสิ. ตสฺมึ สมาคเม ภควา ธมฺมํ เทเสสิ-ตทา. यक्ष म्हणाले, 'हे पूजनीय, आम्ही तुम्हाला हे संपूर्ण द्वीप देतो. आम्हाला अभय द्या.' त्यानंतर भगवंतांनी त्यांचे भय दूर केले आणि त्यांनी दिलेल्या भूमीवर चामड्याचे आसन पसरवून त्यावर बसले. त्यांनी तेजोकसिण समाधी प्राप्त करून चामड्याच्या आसनाला चहूबाजूंनी प्रज्वलित करून त्याचा विस्तार केला. ते यक्ष त्या चामड्याच्या आसनाने पराभूत होऊन चहूबाजूंनी समुद्राच्या किनाऱ्यावर एकत्र जमा झाले. भगवंतांनी आपल्या ऋद्धीबलाने 'गिरीद्वीप' नावाचे द्वीप येथे आणले, त्यात यक्षांना प्रवेश दिला आणि ते द्वीप पूर्ववत जागी ठेवून चामड्याचे आसन आकुंचित केले. तेव्हा देवतांचा मेळावा झाला. त्या सभेत भगवंतांनी धम्मदेशना दिली - तेव्हा: ‘‘เนเกสํ ปาณโกฏีนํ-ธมฺมาภิสมโย อหู,สรเณสุ จ สีเลสุ-ฐิตา อาสุํ อสงฺขิยา; अनेक कोटी प्राण्यांना धम्माचा बोध (धम्माभिसमय) झाला, आणि असंख्य प्राणी शरण आणि शीलांमध्ये प्रतिष्ठित झाले। โสตาปตฺติผลํ ปตฺวา-เสเล สุมนกูฏเก,มหาสุมน เทวิณฺโท-ปูชิยํ ยาจิ ปูฉิยํ; सुमनकूट पर्वतावरील महासुमन नावाच्या देवेंद्राने सोतापत्ती फल प्राप्त करून, पूजनीय बुद्धांकडे पूजेसाठी काहीतरी याचना केली। สิรํ ปรามสิตฺวาน-นิลามลสิโรรุเห,ปาณิมตฺเต อทา เกเส ตสฺส ปาณิหิโต ชิโน; आपल्या मस्तकावरील निळ्या व स्वच्छ केसांवरून हात फिरवून, त्या हितचिंतक जिनाने (बुद्धांनी) त्याला मुठभर केस दिले। โส ตํ สุวณฺณิจงฺโคฏํ-จเรนาทาย สตฺถุโน, นิสินฺนฏฺฐาน รจิเต-นานารตนสญฺจเย. त्याने शास्त्यांचे (बुद्धांचे) ते केस सोन्याच्या करंडकात आदराने घेतले, आणि त्यांच्या बसण्याच्या ठिकाणी विविध रत्नांचा ढीग रचला। อุจฺจโต สตฺตรตเน-ฐเปตฺวาน สิโรรุเห,ตํ อิณฺทนีล ถูเปน-ปิทเหสิ นมสฺสิ จ’’; सात हात उंचीवर ते केस ठेवून, त्याने त्यावर इंद्रनील मण्यांचा स्तूप बांधून ते झाकले आणि त्याला नमस्कार केला। ปรินิพฺพุเต ปน ภควติ ธมฺมเสนาปติ สาริ ปุตฺตตฺเถรสฺส อนฺเตวาสิโก สรภู นาเมโก เถโร จิตกโต คีวฏฺฐิธาตุ คเหตฺวา ภิกฺขุ สงฺฆปริวุโต อาคนฺตฺวา ตสฺมึเยว เจติเย ปติฏฺฐาเปตฺวา เมฆวณฺณปาสาเณหิ ฉาเทตฺวา ทฺวาทส หตฺถุพฺเพธํ ถูปํ กาเรตฺวา ปกฺกามิ. อถ เทวานมฺปิยติสฺส รญฺโญ ภาตา จูฬาภโย นาม ตํ อพฺภุตํ เจติยํ ทิสฺวา ตึสหตฺถุพฺเพธํ เจติยํ กาเรสิ. อิทานิ ทุฏฺฐคามณีปิ อภยราชา มหิยงฺคณํ อาคนฺตฺวา ตตฺถ ทมิเฬ มทฺทนฺโต อสิติหตฺถุพฺเพธํ กญฺจุกเจติยํ กาเรตฺวา ปูชมกาสิ. भगवान परिनिर्वाण पावल्यानंतर, धम्मसेनापती सारिपुत्त थेरांचे अंतेवासी (शिष्य) सरभू नावाचे थेर चितेवरून ग्रीवा-धातू (गळ्याचे अस्थी-धातू) घेऊन भिक्खू संघासह आले आणि त्यांनी त्याच चेतियामध्ये ते प्रस्थापित केले. त्यांनी ते मेघवर्ण पाषाणांनी झाकून बारा हात उंचीचा स्तूप बांधला व ते निघून गेले. त्यानंतर देवानंपियतिस्स राजाचा भाऊ चुळाभय याने ते अद्भुत चेतिय पाहून तीस हात उंचीचे चेतिय बांधले. आता दुट्ठगामणी अभय राजानेही महियंगण येथे येऊन, तेथील दमिळांचे दमन करून, ऐंशी हात उंचीचे कंचुक-चेतिय बांधून त्याची पूजा केली. เอวมจฺจายิกํ กมฺมํ-กโรนฺตาปิ คุณากรา, กโรนฺติ ปุญฺญํ สปฺปญฺญา-สํสารภส ภีรุกาติ. अशा प्रकारे अत्यंत तातडीचे काम करत असतानाही, गुणांचे भांडार असलेले आणि संसारभयाने भयभीत झालेले प्रज्ञावंत लोक पुण्यकर्म करतात. มหิยงฺคน ถูปกถา महियंगण स्तूपकथा ๑๗. ตโต ราชา ทมิเฬหิ สทฺธึ ยุชฺฌิตฺวา ฉตฺตทมิฬํ คณฺหิตฺวา ตตฺร พหุ ทมิเฬ ฆาเตตฺวา อมฺพติตฺถํ อาคนฺตฺวา อมฺพทมิฬํ จตูหิ มาเสหิ คณฺหิ. ตโต โอรุยฺห มหพฺพเล สตฺตทมิเฬ เอกาเหเนว คณฺหิ ตโต อนฺตรโสพฺเภ มหาโกฏฺฐ ทมิฬํ-โทณคาเม ควร ทมิฬํ-หาลโกเล มหิสฺสริย ทมิฬํ-นาฬิโสพฺเภ นาฬิก ทมิฬํ-ทิฆาภสคลฺลมฺหิ ทิฆาภย ทมิฬํ คณฺหิ. ตโต กจฺฉติตฺเถ กิญฺจิสีส ทมิฬํ จตูหิ มาเสหิ คณฺหิ ตโต เวฐ นคเร ตาฬ ทมิฬํ, ภาณกทมิฬญฺจ-วหิฏฺเฐ วหิฏฺฐ ทมิฬํ=คามณิมฺหิ คามณิ ทมิฬํ-กุมฺพุคามมฺหิ กุมฺพุ ทมิฬํ-นณฺทิก คามมฺหิ นณฺทิก ทมิฬํ-ขาณุคามมฺหิ ขาณุ ทมิฬํ-ตมฺพุนฺนคามเก มาตุล ภาคิเนยฺเย ทฺเว ทมิเฬ คณฺหิ ตทา- १७. त्यानंतर राजाने दमिळांशी युद्ध करून छत्तदमिळाला पकडले आणि तेथे अनेक दमिळांचा वध करून अंबतित्थ येथे येऊन चार महिन्यांत अंबदमिळाला पकडले. त्यानंतर खाली उतरून महाबलाढ्य अशा सात दमिळांना एकाच दिवसात पकडले. त्यानंतर अंतरसोब्भ येथे महाकोट्ठ दमिळाला, दोणगाम येथे गवर दमिळाला, हालकोल येथे महिस्सरीय दमिळाला, नाळिसोब्भ येथे नाळिक दमिळाला आणि दीघाभसगल्ल येथे दीघाभय दमिळाला पकडले. त्यानंतर कच्छतित्थ येथे किंचिसीस दमिळाला चार महिन्यांत पकडले. त्यानंतर वेठ नगरात ताळ दमिळ आणि भाणक दमिळाला, वहिट्ठ येथे वहिट्ठ दमिळाला, गामणि येथे गामणि दमिळाला, कुम्बुगाम येथे कुम्बु दमिळाला, नंदिकगाम येथे नंदिक दमिळाला, खाणुगाम येथे खाणु दमिळाला आणि तम्बुन्नगाम येथे मामा व भाचा अशा दोन दमिळांना पकडले. तेव्हा- ‘‘อชานิตฺวา สกํ เสนํ-ฆาเตนฺติ สชนา อิติ,สุตฺวาน สจฺจกิริยํ-อกริ ตตฺถ ภุปติ; "आपलेच लोक स्वतःच्या सैन्याला न ओळखता मारत आहेत, हे ऐकून तेथे राजाने सत्यक्रिया (सच्चकिरिया) केली;" รชฺชสุขาย วายาโม-นายํ มม กทาปิ จ,สมฺพุทฺธสาสนสฺเสว-ฐปนาย อยํ มม; "माझा हा प्रयत्न कधीही राज्यसुखासाठी नाही, तर हा माझा प्रयत्न केवळ सम्यक्संबुद्धांच्या शासनाच्या (धम्माच्या) प्रस्थापिततेसाठीच आहे;" เตน สจฺเจน เม เสนา-กาโยปคต ภณฺฑกํ,ชาลวณฺณํว โหตูติ-ตํ ตเถว ตทา อหุ; ’’ "या सत्याच्या बळावर माझ्या सैनिकांच्या शरीरावरील शस्त्रे व उपकरणे प्रकाशाच्या जाळ्यासारखी (किंवा अग्नीच्या ज्वालेसारखी) भासू देत. आणि तेव्हा तसेच झाले." เอวํ ราชา คงฺคาตีเร ทมิเฬ ฆาเตสิ. ฆาติต โส สพฺเพ อาคนฺตฺวา วิชิต นคเร ปวิสึสุ. ตทา ราชา วิชิต นครํ คณฺหิตุํ วีมํสนตฺถาย อาคจฺฉนฺตํ นณฺธิมิตฺตํ ทิสฺวา กณฺฑุลํ มุญฺเจสิ. กณฺฑุโลปิ ตํ คณฺหิตุํ อาคญฺฉิ ตทา นณฺธิมิตฺโต หตฺเถตหิ อุโภ ทนฺเต พาฬฺหํ คเหตฺวา ปีเฬตฺวา อุกฺกุฏิกํ นิสีทาเปสิ. ราชา อุโภ วิมํเสตฺวา วิชิตนครํ อาคโต. ตโต ทกฺขิณทฺวาเร โยธานํ มหาสงฺคาโม อโหสิ ปุรตฺถิมทฺวาเร เวฬุสุมโน อสฺสํ อารุยฺห พหู ทมิเฬ ฆาเตสิ ทมิฬา อนฺโต ปิวิสิตฺวา ทฺวารํ ถเกสุํ. ตโต ราชา โยเธ วิสฺสชฺเชสิ, กณฺฑุลหตฺถิ นณฺธิมิตฺโต สุรนิมฺมโล จ ทกฺขิณทฺวาเร กมฺมํ กรึสุ มหาโสโณ โคฐยิมฺพโร เถรปุตฺตาภโย จาติ อิเม ตโย อิตเรสุ ตีสุ ทฺวาเรสุ กมฺมํ กรึสุ. अशा प्रकारे राजाने गंगातीरावर दमिळांचा वध केला. वाचलेले सर्व जण पळून विजित नगरात शिरले. तेव्हा राजाने विजित नगर जिंकण्यासाठी परीक्षा घेण्याच्या उद्देशाने येत असलेल्या नंदिमित्तला पाहून कण्डुल हत्तीला मोकळे सोडले. कण्डुलसुद्धा त्याला पकडण्यासाठी धावला, तेव्हा नंदिमित्तने दोन्ही हातांनी त्याचे दोन्ही सुळे घट्ट पकडून, दाबून त्याला गुडघ्यावर बसवले. राजाने दोघांची परीक्षा घेऊन विजित नगराकडे कूच केले. त्यानंतर दक्षिण दारावर योद्ध्यांचे मोठे युद्ध झाले. पूर्व दारावर वेळुसुमन घोड्यावर स्वार होऊन अनेक दमिळांचा वध करत होता. दमिळ आत पळून गेले आणि त्यांनी दरवाजा बंद केला. त्यानंतर राजाने योद्ध्यांना पाठवले. कण्डुल हत्ती, नंदिमित्त आणि सुरनिर्मल यांनी दक्षिण दारावर पराक्रम केला. महासोण, गोठयिम्बर आणि थेरपुत्ताभय या तिघांनी इतर तीन दारांवर पराक्रम केला. ตญฺจ นครํ ปริขาตฺตย ปริกฺขิตฺตํ, ทฬฺห ปาการ โคปุรํ, อโย ทฺวารยุตฺตํ อโหสิ กณฺฑุโล ชาณุหิ ฐตฺวา สิลา สุธา อิฏฺฐกา ภิณฺทิตฺวา อโยทฺวารํ ปาปุณิ ตทา ทมิฬา โคปุเร ฐตฺวา นานาวุธานิ ขิปึสุ ปกฺก อโยคุเฬ เจวปกฺกฏฺฐิต สิเลสญฺจ หตฺถิปิฏฺฐิยํ ปกฺขิปึสุ? ตทา กณฺฑุโล เวทนฏฺโฏ อุทกฏฺฐานํ คนฺตฺวา อุทเก โอคาหิ. ตทา โคฐยิมฺพโร น อิทํ สุราปานํ ภวติ. อโยทฺวาร วิฆาฏนํ นาม, คจฺฉ ทฺวารํ วิฆาเฏหีติ อาห. ตํ สุตฺวา ชาตาภิมาโต กุญฺจนาทํ กตฺวา อุทน อุคฺคมฺม ถเล อฏฺฐาสิ อถ หตฺถิเวชฺโช สิเลสํ โธวิตฺวา โอสธํ อกาสิ. ตโต ราชา หตฺถึ อารุยฺห ปาณินา กุมฺเภ ปรามสิตฺวา สกล ลงฺกาตเล รชฺชํ ตว ทมฺมีติ โตเสตฺวา วรโภชนํ โภเชตฺวา วณํ สาฏเกน เวเฐตฺวา สุวมฺมีตํ กตฺวา วมฺมปิฏฺฐิยํ มหิสจมฺมํ สตฺตคุณํ กตฺวา พณฺธิตฺวา ตสฺสุปริ เตลจมฺมํ พณฺธิตฺวา ตํ วิสฺสชฺเชสิ โส อสนิ วิยคชฺชนฺโต คนฺตฺวา ทาฐาหิ ปทรํ วิชฺฌิตฺวา ปาเทน อุมฺมารํ หนิ. ทฺวารํ พาหาหิ สทฺธึ อโยทฺวารํ มหาสทฺเทน ภูมิยํ ปติ. โคปุเร ทพฺพสมฺภารํ ปน หตฺถิปิฏฺฐิยํ ปตนฺตํ ทิสฺวา นณฺธิมิตฺโต พาหาหิ ปหริตฺวา ปวฏฺเฏสิ ตทา กณฺฑุโล ทาฐาปีฬนเวรํ ฉฑฺเฒสิ. ते नगर तीन खंदकांनी वेढलेले, मजबूत तटबंदी व गोपुर असलेले आणि लोखंडी दरवाजांनी युक्त होते. कण्डुलने गुडघ्यांवर बसून दगड, चुना आणि विटा फोडून लोखंडी दरवाजा गाठला. तेव्हा दमिळांनी गोपुरावर उभे राहून विविध शस्त्रे फेकली, तसेच तापवलेले लोखंडी गोळे आणि वितळवलेला डांबर हत्तीच्या पाठीवर टाकला. तेव्हा कण्डुल वेदनेने व्याकुळ होऊन पाण्याच्या ठिकाणी गेला आणि पाण्यात शिरला. तेव्हा गोठयिम्बर म्हणाला, "हे काही मद्यपान नाही. हे लोखंडी दरवाजा तोडणे आहे. जा, दरवाजा तोड!" ते ऐकून स्वाभिमान जागृत झालेल्या हत्तीने चित्कार केला आणि पाण्यातून बाहेर पडून जमिनीवर उभा राहिला. त्यानंतर हत्तीच्या वैद्याने तो डांबर धुवून त्यावर औषधोपचार केला. त्यानंतर राजाने हत्तीवर स्वार होऊन आपल्या हाताने त्याच्या गंडस्थळाला कुरवाळले आणि "संपूर्ण लंकाद्वीपाचे राज्य मी तुला देईन" असे सांगून त्याला संतुष्ट केले, त्याला उत्तम भोजन दिले, त्याच्या जखमेवर कापड बांधले, त्याला चिलखत घातले, चिलखताच्या पाठीवर म्हशीच्या कातड्याचे सात थर बांधले आणि त्यावर तेलाने माखलेले कातडे बांधून त्याला सोडले. तो विजेच्या कडकडाटासारखा गर्जना करत गेला आणि आपल्या सुळ्यांनी दरवाजाच्या फळ्या टोचून पायाने उंबरठ्यावर प्रहार केला. तो लोखंडी दरवाजा चौकटीसह मोठ्या आवाजात जमिनीवर कोसळला. गोपुरावरील लाकूड व दगड हत्तीच्या पाठीवर पडताना पाहून नंदिमित्तने आपल्या हातांनी प्रहार करून ते बाजूला फेकून दिले. तेव्हा कण्डुलने (नंदिमित्तने पूर्वी त्याचे सुळे दाबल्यामुळे मनात धरलेला) राग सोडून दिला. ตโต กณฺฑุโล อตฺตโน ปิฏฺฐึ อารูหนตฺถาย นณฺธิมิตฺตํ โอโลเกสิ. โส ตยา กตมคฺเคน น ปวิสิสฺสามีติ อฏฺฐารส หตฺถุพฺเพธํ ปาการํ พาหุนา ปหริตฺวา อฏฺฐุสหปฺปมาณํ ปาการปฺปเทสํ ปาเตตฺวา สุรนิมฺมลํ โอโลเกสิ โสปิ เตน กตมคฺคํ อนิจฺฉนฺโต ปาการํ ลฑฺฑีตฺวา นครพฺภนฺตเร ปติ โคฐยิมฺพโรปิ - โสโณปิ - เถรปุตฺตาภโยปิ เอเกก ทฺวารํ ภิณฺทิตฺวา ปวิสึสุ-ตโต. त्यानंतर कण्डुलने आपल्या पाठीवर चढण्यासाठी नंदिमित्तकडे पाहिले. तो म्हणाला, "तू तयार केलेल्या मार्गाने मी प्रवेश करणार नाही," आणि त्याने अठरा हात उंचीच्या तटबंदीवर हाताने प्रहार करून आठ उसभ (एक प्राचीन मोजमाप) लांबीचा तटबंदीचा भाग पाडला आणि सुरनिर्मलकडे पाहिले. त्यानेही त्याच्या मार्गाने जाणे नाकारून तटबंदीवरून उडी मारून नगराच्या आत प्रवेश केला. गोठयिम्बर, सोण आणि थेरपुत्ताभय यांनीही एकेक दरवाजा तोडून आत प्रवेश केला. त्यानंतर- ‘‘หตฺถิ คเหตฺวา รถจกฺกํ-มิตฺโต สกฏ ปญฺชรํ,นาฬิเกรตรุํ โคโฐ-นิมฺมโล ขคฺคมุตฺตมํ; "हत्तीने रथाचे चाक घेतले, नंदिमित्तने गाडीचा सांगाडा घेतला, गोठने नारळाचे झाड घेतले आणि सुरनिर्मलने उत्तम तलवार घेतली;" ตาลรุกฺขํ มหาโสโณ-เถรปุตฺโต มหาคทํ,วิสุํ วิสุํ วีถิคตา-ทมิเฬ นตฺถ จุณฺณยุํ’’; "महासोणने ताडाचे झाड घेतले आणि थेरपुत्ताने मोठी गदा घेतली. वेगवेगळ्या रस्त्यांवर जाऊन त्यांनी दमिळांचा चक्काचूर केला." เอวํ วิชิตนครํ จตูหิ มาเสหิ ภิณฺทิตฺวา ทมิเฬ มาเรตฺวา ตโต คริโลกํ นาม คนฺตฺวา คิริย ทมิฬํ อคฺคเหสิ. ตโต มเหล นครํ คนฺตฺวา จตูหิ มาเสหิ มเหล ราชานํ คณฺหึ ตโต ราชา อนุรุธปุรํ คจฺฉนฺโต ปริโตกาสปพฺพเต นาม ขณฺธาวารํ นิวาเสตฺวา ตตฺถ ตฬากํ กาเรตฺวา เชฏฺฐมูลมาสมฺหิ อุทกกีฬํ กีฬิ. เอฬาโรปิ ทุฏฺฐคามณิสฺส อาคตภาวํ สุตฺวา อมจฺเจหิ สทฺธึ มนฺเตตฺวา สฺเว ยุทฺธํ กริสฺสามาติ นิจฺฉยํ อกาสิ ปุนทิวเส สนฺนทฺโธ มหาปพฺพต หตฺถึ อารุยฺห มหา พลกาย ปริวุโต นิกฺขมิ. คามณีปิ มาตรา สทฺธึ มนฺเตตฺวา ทฺวตฺตึส พล โกฏฺฐเก กาเรตฺวา ฉตฺตธเร ราชรูปเก ตตฺถ ตตฺถ ฐเปสิ. อพฺภนฺตร โกฏฺฐเก สยํ อฏฺฐาสิ. अशा प्रकारे चार महिन्यांत विजित नगर जिंकून आणि दमिळांना मारून, त्यानंतर गरिलोक नावाच्या ठिकाणी जाऊन गिरिय दमिळाला पकडले. त्यानंतर महेल नगरात जाऊन चार महिन्यांत महेल राजाला पकडले. त्यानंतर राजाने अनुराधपुराकडे जाताना परितोकासपब्बत नावाच्या पर्वतावर छावणी ठोकली, तेथे तलाव बांधला आणि ज्येष्ठ महिन्यात जलक्रीडा केली. एळार राजानेही दुट्ठगामणी आल्याचे ऐकून मंत्र्यांशी सल्लामसलत केली आणि "उद्या युद्ध करू" असा निश्चय केला. दुसऱ्या दिवशी तो सज्ज होऊन महापब्बत हत्तीवर स्वार झाला आणि मोठ्या सैन्यासह बाहेर पडला. गामणीनेही आपल्या मातेशी सल्लामसलत करून सैन्याचे बत्तीस गट केले आणि छत्र धारण केलेल्या राजाच्या प्रतिकृती ठिकठिकाणी ठेवल्या. स्वतः मात्र सर्वात आतील गटात उभा राहिला. ตโต สงฺคาเม วตฺตมาเน เอฬาร รญฺโญ ทีฆชตฺตุ นาม มหา โยโธ ขคฺคผลกํ คเหตฺวา ภูมิโต อฏฺฐารส หตฺถํ นภมุคฺคนฺตฺวา ราชรูปํ ฉิณฺทิตฺวา ปฐมํ พล โกฏฺฐกํ ภิณฺทิ เอวํ เสเสปิ พลโกฏฺฐเก ภิณฺทิตฺวา มหาคมณินา ฐตํ พลโกฏฺฐกํ อาคมิ. ตทา สุรนิมฺมโล รญฺโญ ปริคจฺฉนฺตํ ทิสฺวา อตฺตโน นามํ สาเวตฺวา ตํ อกฺโกสิ ตํ สุตฺวา ทีฆชนฺตุ ปฐมํ อิมํ มาเรมีติ กุชฺฌิตฺวา อากสมพฺภุคฺคนฺตฺวา อตฺตโนปริ โอตรนฺตํ ทิสฺวา สรนิมฺมโล อตฺตโน ผลกํ อุปนาเมสิ. อิตโรปิ ผลเกน สทฺธึ ตํ ภิณฺทิสฺส มีติ จินฺเตตฺวา ผลกํ ปหริ. อิตโร ผลกํ มุญฺจิ, ทีฆชนฺตุ ผลกํ ฉิณฺทนฺโต ภูมิยํ ปติ. สุรนิมฺมโล ตํ สตฺติยา ปหริ, ผุสฺสเทโว ตํ ขเณ สงฺขํ ธมิ, อสนิสทฺโท วิย อโหสิ อุมฺมาทปฺปตฺตา วิย มนุสฺสา อเหสุํ. ตโต ทมิฬ เสนา ภิชฺชิตฺถ, เอฬาโร ปลายิตฺถ ตทาปิ พหุ ทมิเฬ ฆาเตสุํ. त्यानंतर युद्ध सुरू असताना, एळार राजाचा दीघजंतू नावाचा महायोद्धा ढाल-तलवार घेऊन जमिनीवरून अठरा हात आकाशात उडाला आणि राजाच्या प्रतिमेला छेदून त्याने पहिल्या सैन्यतळाचा भेद केला. अशा प्रकारे इतरही सैन्यतळांचा भेद करून तो महागामणी जेथे उभा होता, त्या सैन्यतळापाशी आला. तेव्हा सुरनिम्मलाने त्याला राजाकडे येताना पाहून आपले नाव घोषित केले आणि त्याला आव्हान दिले. ते ऐकून दीघजंतूने 'आधी यालाच मारतो' असा विचार करून क्रोधाने आकाशात झेप घेतली. त्याला आपल्यावर झेप घेताना पाहून सुरनिम्मलाने आपली ढाल पुढे केली. दुसऱ्याने (दीघजंतूने) ढालीसह त्याला कापून टाकीन असा विचार करून ढालीवर प्रहार केला. सुरनिम्मलाने ढाल सोडून दिली, आणि दीघजंतू ढाल कापत जमिनीवर पडला. सुरनिम्मलाने त्याच्यावर भाल्याने प्रहार केला. त्याच क्षणी फुस्सदेवाने शंख फुंकला, जो विजेच्या कडकडाटासारखा वाटला आणि लोक वेड्यासारखे झाले. त्यानंतर दमिळ सैन्य छिन्नभिन्न झाले, एळार पळून गेला आणि तेव्हा अनेक दमिळ मारले गेले. ‘‘ตตฺถ วาปิชลํ อาสิ-หตานํ โลหิตาวิลํ,ตสฺมา กุลตฺถวาปีติ-นามโต วิสฺสุตา อหู; तेथे मारल्या गेलेल्यांच्या रक्ताने तलावाचे पाणी लाल झाले होते, म्हणूनच तो तलाव 'कुलत्थवापी' या नावाने प्रसिद्ध झाला. จราเปตฺวา ตหึ เภรึ-ทุฏฺฐคามิณิ ภูปติ,น หนิสฺสตุ เอฬารํ-มํ มุญฺจิย ปโร อิติ; राजा दुट्ठगामणीने तेथे दवंडी पिटवून घोषित केले की, 'माझ्याशिवाय इतर कोणीही एळारला मारू नये.' สนฺนทฺโธ สยมารุยฺห-สนฺนทฺธํ กณฺฑุลํ กรึ,เอฬารํ อนุพณฺธนฺโต-ทกฺขิณทฺวาร มาคมิ; स्वतः चिलखत चढवून सज्ज झालेल्या राजाने, चिलखत घातलेल्या कण्डुल हत्तीवर आरूढ होऊन, एळारचा पाठलाग करत दक्षिण द्वारापाशी प्रवेश केला. ปุเร ทกฺขิณภาคมฺหิ-อุโภ ยุชฺฌึสุ ภูมิปา,โตมรํ ขิปิ เอฬาโร-คามณิ ตํ อวญฺจยิ; नगराच्या दक्षिण भागात दोन्ही राजांनी युद्ध केले. एळारने भाला फेकला, परंतु गामणीने तो चुकवला. วิชฺฌาเปสิ จ ทนฺเตหิ-ตํ หตฺถึ สกหตฺถินา,โตมรํ ขิปิ เอฬาโร-สหตฺถิ ตตฺถ โส ปติ; आणि आपल्या हत्तीच्या दातांनी त्या हत्तीला जखमी केले. गामणीने भाला फेकला आणि तो (एळार) आपल्या हत्तीसह तेथेच कोसळला. ตโต วิชิต สงฺคาโม-สโยคฺคพลวาหโน,ลงฺกา เอกาตปตฺตํ โส-กตฺวาน ปาวิสิ ปุรํ; ’’ त्यानंतर युद्ध जिंकून, आपल्या सैन्य आणि वाहनांसह, लंकेला एका छत्राखाली आणून त्याने नगरात प्रवेश केला. อถ ราชา นคเร เภรึ จราเปตฺวา สมนฺตา โยชนปฺปมาเณ มนุสฺเส สนฺนิปาเตตฺวา เอฬาร รญฺโญ สรีรํ มหนฺตํ สกฺการํ กาเรตฺวา กูฏาคาเรน เนตฺวา ฌาเปตฺวา ตตฺถ เตจิยํ กาเรตฺวา ปริหารมทาสิ. อชฺชปิ ราชาโน ตํ ปเทสมฺปตฺวา เภรึ น วาทาเปนฺติ. เอวํ ทุฏฺฐคามณิ อภย มหาราชา ทฺวตฺตึส ทมิฬ ราชาโน มาเรตฺวา ลงฺกาทีปํ เอกจฺฉตฺตมกาสิ. त्यानंतर राजाने नगरात दवंडी पिटवून सभोवतालच्या एक योजन अंतरावरील लोकांना एकत्र केले आणि एळार राजाच्या शरीराचा मोठा आदर-सत्कार करून, त्याला कुटागारात नेऊन त्याचा दाहसंस्कार केला. तेथे एक चैत्य बांधून त्याला सन्मान दिला. आजही राजे त्या ठिकाणी पोहोचल्यावर वाद्ये वाजवत नाहीत. अशा प्रकारे महाराज दुट्ठगामणी अभय यांनी बत्तीस दमिळ राजांना मारून लंकाद्वीप एका छत्राखाली आणले. ยทา ทุฏฺฐคามณิ วิชิตํ นครํ คณฺหิ ตทา ทีฆชนฺตุ โยโธ เอฬารํ อุปสงฺกมิตฺวา อตฺตโน ภาคิเนยฺยสฺส ภลฺลุกสฺส โยธ ภาวํ อาจิกฺขิตฺวา อิธาคมนตฺถาย ตสฺส สนฺติกํ เปเสสิ. ภลฺลุโกปิ เอฬารสฺส ทฑฺฒทิวสโต สตฺตเม ทิวเส สฏฺฐิยา ปุริส สหสฺเสหิ สทฺธึ โอติณฺโณ รญฺโญ มตภาวํ สุตฺวาปิ ลชฺชาย ยุชฺฌิสฺสามีติ มหาติตฺถโต นิกฺขมิตฺวา โกลมฺพหาลเก นาม คาเม ขณฺธาวารํ นิเวเสสิ. ราชาปิ ตสฺสา’คมนํ สุตฺวา สนฺนทฺโธ กณฺฑุลํ อารุยฺห โยธปริวุโต มหตา พลกาเยน อภินิกฺขมิ. ผุสฺสเทโวปิ ปญฺจาวุธ สนฺนทฺโธ รญฺโญ ปจฺฉิมาสเน นิสีทิ. ภลฺลุโกปิ ปญฺจาวุธ สนฺนทฺโธ หตฺถึ อารุยฺห ราชาภิมุโข อคญฺฉิ. ตทา กณฺฑุโล ตสฺส เวคมณฺทิ ภาวตฺถํ สนิกํ สนิกํ ปจฺโจสกกิ เสนาปิ หตฺถินา สทฺธึ ตเถว ปจฺโจสกกิ. जेव्हा दुट्ठगामणीने विजित नगर ताब्यात घेतले, तेव्हा दीघजंतू योद्ध्याने एळार राजाकडे जाऊन आपला भाचा भल्लुक याच्या वीरतेबद्दल सांगितले होते आणि त्याला येथे बोलावण्यासाठी त्याच्याकडे निरोप पाठवला होता. भल्लुक देखील एळारच्या दाहसंस्काराच्या सातव्या दिवशी साठ हजार सैनिकांसह उतरला. राजाच्या मृत्यूची बातमी ऐकूनही, 'लाजेस्तव मी युद्ध करीनच' असे म्हणून तो महातित्थ येथून निघाला आणि त्याने कोळम्बहालक नावाच्या गावात आपला तळ ठोकला. राजानेही त्याचे आगमन ऐकून चिलखत परिधान केले, कण्डुल हत्तीवर आरूढ होऊन योद्ध्यांनी वेढलेल्या मोठ्या सैन्यासह तो बाहेर पडला. फुस्सदेव देखील पाच शस्त्रास्त्रांनी सज्ज होऊन राजाच्या पाठीमागील आसनावर बसला. भल्लुकही पाच शस्त्रास्त्रांनी सज्ज होऊन हत्तीवर आरूढ होऊन राजाच्या दिशेने गेला. तेव्हा कण्डुल हत्तीने त्याचा वेग कमी करण्यासाठी हळूहळू मागे पाऊल टाकले, आणि सैन्यही हत्तीसोबत तसेच मागे सरकले. ราชา ผุสฺสเทวํ อาห อยํ หตฺถิ ปุพฺเพ อฏฺฐวีสติยา ยุทฺเธสุ อปจฺโจสกกิตฺวา อิทานิ กสฺมา ปน ปจฺโจสกฺกตีติ. โส อาหาเทว. อมฺหากเมว ชโย อยํ คโช ชยภูมึ อเวกฺขนฺโต ปจฺโจสกฺกติ ชยภูมึ ปตฺวา ฐสฺสตีติ? นาโคปิ ปจฺโจสกกิตฺว ปุร เทวสฺส ปสฺเส มหาวิหาร สีมนฺเต อฏฺฐาสิ. राजाने फुस्सदेवाला विचारले, 'हा हत्ती पूर्वी अठ्ठावीस युद्धांमध्ये कधीही मागे हटला नाही, मग आता का मागे सरकत आहे?' तो म्हणाला, 'हे देव (महाराज)! विजय आपलाच होणार आहे. हा हत्ती विजयभूमी शोधत मागे सरकत आहे, विजयभूमीवर पोहोचताच तो थांबेल.' तो हत्ती देखील मागे सरकत पुरदेवाच्या बाजूला महाविहाराच्या सीमेवर थांबला. ตโต ภลฺลุโก ราชาภิมุขา อาคนฺตฺวา ราชานํ อุปฺปณฺเฑสิ ราชาปิ ขคฺคตเลน มุขํ ปิธาย ตํ อกฺโกสิ รญฺโญ มุเข วิชฺฌิสฺสามีติ สรํ ขิปิ. โส ขคฺคตล มาคจฺจภูมิยํ ปติ, ภลฺลุโก มุเข วิทฺเธสฺมิติ สญฺญาย อุกฺกุฏฺฐิ, อกาสิ ตทา รญฺโญ ปจฺฉิมาสเน นิสินฺโน ผุสฺสเทโว รญฺโญ กุณฺฑลํ ฆเฏนฺโต ตสฺส มุเข กณฺฑํ ปาเตสิ รญฺโญ ปาเท กตฺวา ปตมานสฺส ชาณุมฺหิ อปเรน กณฺเฑน วิชฺฌิตฺวา รญฺโญ สีสํ กตฺวา ปาเตสิ. ราชา ลทฺธชโย นครํ อาคนฺตฺวา สรํ อาหราเปตฺวา ปุงฺเขน อุชุกํ ฐปาเปตฺวา ตํ ปมาณํ กหาปณราสึ กตฺวา ผุสฺสเทวสฺส อทาสิ. त्यानंतर भल्लुक राजाच्या समोर आला आणि त्याने राजाची थट्टा केली. राजानेही तलवारीच्या पात्याने आपले तोंड झाकून त्याला आव्हान दिले. भल्लुकने राजाच्या तोंडात मारण्याच्या उद्देशाने बाण सोडला. तो बाण तलवारीच्या पात्याला आदळून जमिनीवर पडला. 'मी तोंडात बाण मारला' असे समजून भल्लुकने आनंदाने गर्जना केली. तेव्हा राजाच्या पाठीमागील आसनावर बसलेल्या फुस्सदेवाने, राजाच्या कानातील कुंडल घासून जाणाऱ्या बाणाने भल्लुकच्या तोंडात बाण मारला. तो राजाच्या पायाशी पडत असताना, फुस्सदेवाने दुसऱ्या बाणाने त्याच्या गुडघ्यावर प्रहार केला आणि त्याचे डोके राजाच्या पायाशी पडेल अशा रीतीने त्याला पाडले. विजय मिळवून राजा नगरात परतला, त्याने तो बाण मागवला आणि त्याचा मागचा भाग सरळ उभा करून, त्या उंचीएवढी कहापणांची रास करून ती फुस्सदेवाला दिली. เอวํ ลงฺการชฺชํ เอกจฺฉตฺตํ กตฺวา ราชา โยธานํ ยถานุรูปํ ฐานนฺตรํ อทาสิ. เถรปุตฺตาภโย ปน ทียมานํ ฏฺฐานนฺตรํ น คณฺหิ กสฺมา น คณฺหสิติ ปุจฺฉิโน ยุทฺธํ อตฺถิ มหาราชาติ อาหํ. อิทานิ เอกรชฺเช กเต กึ นาม ยุทฺธนฺติ ปุจฺฉิเต กิเลส โจเรหิ ยุชฺฌิสฺส มีติ อาห. ราชา ปุนปฺปุนํ นิวาเรสิ โสปิ ปุนปฺปุน ยาจิตฺวา ราชานุญฺญาย ปพฺพชิตฺวา วิปสฺสนาย กมฺมํ กโรนฺโต อรหตฺตํ ปตฺวา ปญฺจ ขีณาสวสต ปริวาโร อโหสิ. अशा प्रकारे लंका राज्य एका छत्राखाली आणून राजाने योद्ध्यांना त्यांच्या योग्यतेनुसार पदे दिली. परंतु थेरपुत्ताभयाने दिले जाणारे पद स्वीकारले नाही. 'तू पद का स्वीकारत नाहीस?' असे विचारले असता, त्याने 'महाराज, अजून युद्ध बाकी आहे,' असे सांगितले. 'आता एकछत्री राज्य स्थापन झाल्यावर कसले युद्ध?' असे विचारले असता, तो म्हणाला, 'मी क्लेशरूपी चोरांशी युद्ध करीन.' राजाने त्याला वारंवार रोखले, परंतु त्याने पुन्हा पुन्हा विनंती केली आणि राजाच्या परवानगीने प्रव्रज्या घेतली. विपश्यना साधना करत त्याने अर्हतपद प्राप्त केले आणि तो पाचशे क्षीणासवांच्या परिवारासह राहू लागला. ตโต ราชา อตฺตโน ปาสาทตเล สิรีสยนคโต มหตึ สมฺปตฺตึ โอโลเกตฺวา อกฺโขภิณิ เสนาฆาตํ อนุสฺสริ. อนุสฺสรนฺตสฺส รญฺโญ มหนฺตํ เทมนสฺสํ อุปฺปชฺชิ สคฺค มคฺคนฺตราโย เม ภเวยฺยาติ. त्यानंतर राजाने आपल्या प्रासादाच्या छतावर राजशय्येवर पडून आपल्या अफाट संपत्तीकडे पाहिले आणि अक्षौहिणी सैन्याच्या विनाशाचे स्मरण केले. त्याचे स्मरण करत असताना राजाच्या मनात तीव्र खिन्नता निर्माण झाली की, 'माझ्या स्वर्गमार्गात हा अडथळा ठरेल का?' ตทา ปิยงฺคุทีเป อรหนฺโต รญฺโญ ปริจิตกฺกํ ญตฺวา ตํ อสฺสาเสตุํ อฏฺฐ อรหนฺเต เปสฺเส. เต อาคนฺตฺวา อาคตภาวา นิเวเทตฺวา ปาสาทตลํ อภิรุหึสุ ราชา เถเร วนฺทิตฺวา อาสเน นิสีทาเปตฺวา อาคต การณํ ปุจฺฉิ. เถราปิ อาคต การณํ วตฺวา รญฺโญ เตน กมฺมุนา สคฺค-โมกฺขนฺตรายภาวํ โพเธตฺว ปกฺกมึสุ ราชา เตสํ วจนํ สุตฺวา อสฺสาสํ ปฏิลภิตฺวา วนฺทิตฺวา (เต วิสฺสชฺเชตฺวา) สิริสยนคโต ปุน จินฺเตสิ. तेव्हा पियंगुद्वीपातील अर्हतांनी राजाच्या मनातील विचार जाणून त्याला धीर देण्यासाठी आठ अर्हतांना पाठवले. त्यांनी येऊन आपल्या आगमनाची वर्दी दिली आणि ते प्रासादावर चढले. राजाने थेरांना वंदन केले, त्यांना आसनावर बसवले आणि त्यांच्या येण्याचे कारण विचारले. थेरांनीही येण्याचे कारण सांगून, राजाला त्या कर्मामुळे स्वर्ग आणि मोक्षाच्या मार्गात कोणताही अडथळा येणार नाही हे पटवून दिले आणि ते निघून गेले. राजाने त्यांचे वचन ऐकून धीर धरला, त्यांना वंदन करून निरोप दिला आणि राजशय्येवर जाऊन पुन्हा विचार करू लागला. มาติปิตโร โข ปน มา โจ กทาจิปิ วินา สงฺเฆน อาหารํ ภุญฺชถาติ อมฺเหหิ สปถํ กาเรสุํ ภิกฺขุสงฺฆสฺส อทตฺวา ภุตฺตํ อตฺถิ นุ โข นตฺถิติ จินฺตยนฺโต สติสมฺโมเสน สงฺฆสฺส อทตฺวา ปาตราสกาเล ปริภุตฺตํ เอกํเยว มริจวฏฺฏึ อทฺทส. ทิสฺวา จ อยุตฺตํ มยา กตํ ทณฺฑกมฺมํ เม กาตพฺพนฺตี จินฺเตสิ อถ ราชา ฉตฺตมงฺคล สตฺตาเห วีติวตฺเต มหตา ราชานุภาเวน มหนฺเตน กีฬาวิธาเนน อุทกกีฬํ กีฬิตุํ อภิสิตฺตานํ ราชุนํ จาริตฺตานุ ปาลนตฺถญฺจ ติสฺสวาปึ อคมาสิ. รญฺโญ สพฺพํ ปริจฺฉทํ อุปาหนฉตฺตานิ จ มริจวฏฺฏิ วิหารฏฺฐานมฺหิ ฐปยึสุ. माझ्या मातापित्यांनी आम्हाला अशी शपथ दिली होती की, 'भिक्खू संघाला दिल्याशिवाय कधीही अन्न ग्रहण करू नका.' 'मी भिक्खू संघाला न देता काही खाल्ले आहे की नाही?' असा विचार करत असताना, विस्मरणामुळे त्याने पाहिले की, सकाळच्या जेवणाच्या वेळी भिक्खू संघाला न देता त्याने केवळ एक मिरचीची शेंग (मरीचवट्टि) खाल्ली होती. हे पाहून त्याने विचार केला, 'माझ्याकडून अयोग्य कृत्य झाले आहे, मला याचे प्रायश्चित्त (दण्डकम्म) केले पाहिजे.' त्यानंतर, छत्र-महोत्सवाचे (छत्तमंगल) सात दिवस उलटून गेल्यावर, राजाने मोठ्या राजवैभवाने आणि भव्य क्रीडा आयोजनासह, जलक्रीडा करण्यासाठी आणि अभिषिक्त राजांच्या परंपरेचे पालन करण्यासाठी तिस्सवापी (तिस्स तलाव) येथे गमन केले. राजाचे सर्व सामान, पादत्राणे आणि छत्रे मरीचवट्टि विहाराच्या जागेवर ठेवण्यात आली. ตตฺราปิ ถูปฏฺฐาเน ราชปุริสา รญฺโญ สธาตุกํ กุนฺตํ อุชุกํ ฐเปสุํ. ราชา ทิวสภาคํ โอโรธ ปริวุโต กีฬิตฺวา สายณฺเห ชาเต นครํ คมิสฺสาม กุนฺตํ วฑฺเฒถาติ อาห. ราชปุริสา กุนฺตํ คณฺหนฺตา จาเลตุํ นาสกฺขึสุ ราชเสน, ตํ อจฺฉริยํ ทิสฺวา สมาคนฺตฺวา คณฺธมาลาทีหิ ปูเชสิ ราชาปิ มหนฺตํ อจฺฉริยํ ทิสฺวา หฏฺฐมานโส สมนฺตา อารกฺขํ สํวิทหิตฺวา นครํ ปาวิสิ. तेथेही, स्तूपाच्या जागेवर राजपुरुषांनी राजाचा धातूयुक्त भाला (कुंत) सरळ उभा करून ठेवला. राजाने अंतःपुरातील स्त्रियांनी वेढलेले असताना दिवसभर क्रीडा केली आणि संध्याकाळ झाल्यावर ते म्हणाले, 'आपण नगरात जाऊ या, भाला उचलून घ्या.' राजपुरुष भाला उचलण्याचा प्रयत्न करू लागले, परंतु ते त्याला हलवू शकले नाहीत. राजाच्या सैन्याने हे आश्चर्य पाहून एकत्र येऊन गंध, पुष्पमाला इत्यादींनी त्याची पूजा केली. राजानेही हे मोठे आश्चर्य पाहून आनंदित मनाने चहूबाजूंनी कडक सुरक्षा व्यवस्था केली आणि नगरात प्रवेश केला. ตโต ราชา กุนฺตํ ปริกฺขิปาเปตฺวา เจติยํ ตํ ปริกฺขิปาเปตฺวา วิหารญฺจ กาเรสิ. วิหาโร ตีหิ สํวจฺฉเรหิ นิฏฺฐาสึ ราชา วิหารมหตฺถาย สงฺฆํ สนฺนิปาเตสิ ภิกฺขูนํ สตสหสฺสานิ ภิกฺขุนีนํ นวุติ สหสฺสานิ สนฺนิปตึสุ ตสฺมึ สมาคเม ราชา สงฺฆํ วนฺทิตฺวา เอวมาห ภนฺเต วิสฺสริตฺวา วินา สงฺเฆน มริจวฏฺฏิกํ ปริภุญฺชึ ตทตฺถํ ทณฺฑกมฺมํ เม โหตูติ-สเจติยํ มริจวฏฺฏิยํ วิหารํ กาเรสึ ปติคณฺหาตุ ภนฺเต สงฺโฆ สเจติยํ วิหารนฺติ ทกฺขิโณทกํ ปาเตตฺวา ภิกฺขุสงฺฆสฺส วิหารํ อทาสิ. त्यानंतर राजाने त्या भाल्याभोवती कुंपण घालून चैत्य बांधले आणि विहारही बांधला. तीन वर्षांत विहाराचे काम पूर्ण झाले. राजाने विहाराच्या उद्घाटनासाठी संघाला आमंत्रित केले. त्या प्रसंगी एक लाख भिक्खू आणि नव्वद हजार भिक्खुणी एकत्र जमले. त्या सभेत राजाने संघाला वंदन करून असे म्हटले, 'भंते, विस्मरणाने मी भिक्खू संघाला न देता मिरची (मरीचवट्टिका) खाल्ली होती. त्याबद्दल माझे प्रायश्चित्त (दण्डकम्म) म्हणून मी चैत्यासह हा मरीचवट्टि विहार बांधला आहे. भंते, संघाने या चैत्ययुक्त विहाराचा स्वीकार करावा.' असे म्हणून त्यांनी दानोदक सोडून भिक्खू संघाला तो विहार दान केला. วิหารสฺส สมนฺตโต ภิกฺขุสงฺฆสฺส นิสีทนตฺถาย มหนฺตํ มณฺฑปํ กาเรสิ มณฺฑป ปาทา อภยวาปิยา ชเล ปติฏฺฐิตา อเหสุํ. เสโสกาเส กถาจนตฺถิ. ตตฺถ ภิกฺขุสงฺฆํ นิสีทาเปตฺวา สตฺตาหํ มหาทานํ ทตฺวา สพฺพปริกฺขารํ อทาสิ. ตตฺถ สงฺฆตฺเถเรน ลทฺธ ปริกฺขาโร สตสหสฺสคฺฆนโก อโหสิ. विहाराच्या चहूबाजूंनी भिक्खू संघाला बसण्यासाठी त्यांनी एक मोठा मंडप उभारला. त्या मंडपाचे खांब अभयवापीच्या पाण्यात उभे होते. उर्वरित जागेबद्दल काही सांगण्याची गरज नाही. तेथे भिक्खू संघाला बसवून त्यांनी सात दिवस महादान दिले आणि सर्व परिष्कार दान केले. तेथे संघस्थविरांना मिळालेल्या परिष्कारांचे मूल्य एक लाख इतके होते. เอวํ- अशा प्रकारे— ‘‘ยุทฺเธ ทาเน จ สูเรน-สูรินา รตนตฺตเม,ปสนฺนามลจิตฺเตน-สาสนุชฺโชตนตฺถินา; “युद्धात आणि दानात शूर असलेल्या, बुद्धिमान, रत्नत्रयावर प्रसन्न व निर्मळ चित्त असलेल्या आणि शासनाच्या प्रकाशाची इच्छा धरणाऱ्या; รญฺญา กตญฺญุนา เตน-ถูปการาปนาทิโต,วิหารมหนนฺตานิ - ปูเชตุํ รตนตฺตยํ; त्या कृतज्ञ राजाने, स्तूप उभारण्यापासून ते विहाराच्या उद्घाटनापर्यंत, रत्नत्रयाची पूजा करण्यासाठी; ปริจฺจตฺตธนาเนตฺถ-อนคฺฆานิ วิมุญฺจิย,เสสานิ โหนฺติ เอกาย-อูนา วิสติโกฏิโย; ’’ येथे त्याग केलेले अमूल्य धन सोडून, उर्वरित खर्च केलेले धन एक कमी वीस कोटी (म्हणजे एकोणीस कोटी) होते.” เอวํ สปญฺโญ ภิทูเร อสาเร,เทเห ธเน สงฺคมติกฺกมิตฺวากตฺวาน ปุญฺญํ สุขสาทนตฺถํ,สารํ คเหตุํ สตตํ ยเตยฺยาติ; अशा प्रकारे, बुद्धिमान मनुष्याने या नश्वर आणि निस्सार शरीर व धनावरील आसक्ती सोडून, सुखाच्या प्राप्तीसाठी पुण्यकर्म करून, नेहमी सार ग्रहण करण्याचा प्रयत्न केला पाहिजे. มรีจวฏฺฏิ วิหารกถา मरीचवट्टि विहार कथा ๑๘. ตโต ราชา จินฺเตสิ มหามหิณฺทตฺเถโร กิร มม อยฺยกสฺส เทวานมฺปิยติสฺส รญฺโญ เอวมาห. นตฺตา เต มหาราช ทุฏฺฐคามณิ อภโย วิสํ หตฺถสติกํ โสวณฺณมาลึ ถูปํ กาเรสฺสติ. สงฺฆสฺส จ อุโปสถาคารภูตํ นวภูมกํ โลหปาสาทํ กาเรสฺสตีติ จินฺเตตฺวา จ ปน โอโลเกนฺโต ราชเคเห กรณฺฑเก ฐปิตํ สุวณฺณปฏฺฏเลขํ ทิสฺวา ตํ วาเจสิ. อนาคเต จตฺตาลีสํ วสฺสสตํ อติกฺกมฺม กากวณฺณติสฺสสฺส ปุตฺโต ทุฏฺฐคามณิ อภโย อิทญฺจิทญฺจ กาเรสฺสตีติ สุตฺวา หฏฺโฐ อุทคฺโค อปฺโปเฐสิ-อยฺเยน กิร วตมฺหิ ทิฏฺโฐ มหา มหิณฺเทนาติ. १८. त्यानंतर राजाने विचार केला: 'असे म्हणतात की, महामहिंद स्थविरांनी माझे आजोबा राजा देवनामपियतिस्स यांना असे म्हटले होते: "हे महाराज, तुमचा नातू दुट्ठगामणी अभय हा एकशे वीस हात उंच सुवण्णमाली स्तूप बांधेल. आणि तो संघासाठी उपोसथ-गृह म्हणून नऊ मजली लोहप्रासाद बांधेल."' असा विचार करून शोध घेत असताना, त्याला राजवाड्यातील एका पेटीत ठेवलेली सोन्याची पट्टी (सुवण्णपट्टलेख) आढळली आणि त्याने ती वाचली: 'भविष्यात, एकशे चाळीस वर्षे उलटून गेल्यावर, काकवण्णतिस्सचा मुलगा दुट्ठगामणी अभय हे आणि हे बांधेल.' हे ऐकून तो अत्यंत हर्षित व आनंदित झाला आणि टाळ्या वाजवून म्हणाला: 'खरोखरच, पूज्य महामहिंद स्थविरांनी मला पाहिले होते!' ตโต ปาโตว มหาเมฆวนํ คนฺตฺวา ภิกฺขุสงฺฆํ สนฺนิปาเตตฺวา เอตทโวจ? ภนฺเต ภิกฺขุสงฺฆสฺส อุโปสถาคารํ กตฺวา เทววิมาน สทิสํ ปาสาทํ กาเรสฺสามิ เทวโลกํ เปเสตฺวา ปเฏ วิมานาการํ ลิขาเปตฺวา เม เทถาติ? สงฺโฆ อฏฺฐ ขีณาสเว เปเสสิ. เต ตาวตึสภวนํ คนฺตฺวา ทฺวาทสโยชนุพฺเพธา อฏฺฐจตฺตาลีส โยชน ปริกฺเขปํ กูฏาคารํ สหสฺส ปติมณฺฑิตํ นวภูมกํ สหสฺสคพฺภํ ขีรณ เทวธีตาย ปุญฺญานุภาวนิพฺพตฺตํ อากาสฏฺฐํ รตนปาสาทํ โอโลเกตฺวา หิงฺคุลเกน ปเฏ ตทาการํ ลิขิตฺวา อาเนตฺวา ภิกฺขุสงฺฆสฺส อทํสุ สงฺโฆ รญฺโญ ปาเหสิ. त्यानंतर अगदी पहाटेच महामेघवन येथे जाऊन आणि भिक्खू संघाला एकत्र बोलावून ते म्हणाले: 'भंते, मी भिक्खू संघासाठी उपोसथ-गृह म्हणून देवविमानासारखा एक प्रासाद बांधणार आहे. आपण देवलोकात कोणालातरी पाठवून कापडावर त्या विमानाची आकृती रेखाटून मला द्यावी.' संघाने आठ अर्हतांना पाठवले. त्यांनी तावतिंस देवलोकात जाऊन, हवेत तरंगणारा, बारा योजन उंच आणि अठ्ठेचाळीस योजन परिघ असलेला, हजार शिखरांनी सुशोभित, नऊ मजली, हजार खोल्या असलेला आणि खिरणा देवीच्या पुण्यप्रभावाने निर्माण झालेला तो रत्नप्रासाद पाहिला. त्यांनी हिंगुळाने कापडावर त्याचे चित्र रेखाटले आणि ते आणून भिक्खू संघाला दिले. संघाने ते राजाकडे पाठवले. ตํ ทิสฺวา ราชา ตุฏฺฐมานโส ตทา ตํ เลขตุลฺยํ โลหปาสาทํ กาเรสิ. กมฺมนฺตารมฺภ กาเล ปน จตุสุ ทฺวาเรสุ อฏฺฐสตสหสฺสานิ หิรญฺญานิ ฐปาเปสิ ตทา จตุสุ ทฺวาเรสุ สหสฺส สหสฺสํ วตฺถปุฏานิ เจว คุฬ-เตล-สกฺขร-มธุปุรา อเนกสหสฺสจาฏิโย จ ฐปาเปสิ. ปาสาเท อมูลเกน กมฺมํ น กาตพฺพนฺติ เภรึ จารเปตฺวา อมูลเกน กตกมฺมํ อคฺฆาเปตฺวา การกานํ มูลํ ทาเปสิ. ปาสาโท เอเกเกน ปสฺเสน หตฺถสต หตฺถสตปฺปมาโณ อโหสิ ตถา อุพฺเพธน, นวภูมาโย จสฺส อเหสุํ เอเกกิสฺสา ภูมิยา สตํ สตํ กูฏาคารานิ, ตานิ สพฺพานิปิ รตนขจิตานิ เจว สุวณฺณ กิงฺกิณิกาปนฺติ ปริกฺขิตฺตานิ จ อเหสุํ เตสํ กูฏาคารานิ นานารตน ภูสิกา ปวาฬ เวทิกา เจว, ตาสํ ปทุมานิ จ นานารตน วิจิตฺตาเนว อเหสุํ. ตถา สหสฺสคพฺภา จ นานารตน ขจิตา สียปญฺชร วิภูสิตา จ. เวสฺสวนสฺส นาริวาภนยานํ สุตฺวา ตทาการํ มชฺเฌ รตน มณฺฑปํ กาเรสิ. ते पाहून राजाने अत्यंत प्रसन्न मनाने त्या रेखाचित्राप्रमाणे लोहप्रासाद बांधला. कामाच्या सुरुवातीला त्यांनी चारही दारांवर आठ लाख सुवर्णमुद्रा ठेवल्या. तसेच चारही दारांवर प्रत्येकी एक हजार कापडांचे गाठोडे आणि गूळ, तेल, साखर व मध यांनी भरलेले अनेक हजार घडे ठेवले. त्यांनी नगरात दवंडी पिटवली की, 'प्रासादाचे कोणतेही काम विनामूल्य केले जाऊ नये.' कामगारांनी केलेल्या कामाचे मूल्यमापन करून त्यांनी त्यांना मजुरी दिली. तो प्रासाद प्रत्येक बाजूने शंभर हात लांब आणि तितकाच उंच होता. त्याला नऊ मजले होते. प्रत्येक मजल्यावर शंभर शंभर शिखरे होती, ती सर्व रत्नांनी जडवलेली आणि सोन्याच्या घंटांच्या माळांनी वेढलेली होती. त्या शिखरांना विविध रत्नांनी सुशोभित केलेले पोवळ्यांचे कठडे होते आणि त्यावरील कमळे देखील विविध रत्नांनी सुशोभित होती. तसेच, विविध रत्नांनी जडवलेल्या आणि सिंहखिडक्यांनी सुशोभित अशा हजार खोल्या होत्या. वेस्सवणाच्या 'नारीवाहन' नावाच्या रथाबद्दल ऐकून, त्यांनी त्याच्या आकाराचा एक रत्नमंडप मध्यभागी बांधला. โส อเนเกหิ รตนตฺถมฺเภหิ สีหวฺยคฺฆาทิ รูเปหิ เทวตา รูเปหิ จ ปติมณฺฑิโต สมนฺตโต โอลมฺพก มุตฺตา ชาเลน จ ปริกฺขิตฺโต อโหสิ ปวาฬเวทิกา จสฺส ปุพฺเพ วุตฺตปฺปการาว สตฺตรตน วิจิตฺตมณฺฑป มชฺเฌ ปน เอฬิกมย ภูมิยา ทนฺตมย ปลฺลงฺโก อโหสิ อปสฺเสนมฺปิ ทนฺตมยเมว, โส สุวณฺณสูริยมณฺฑเลหิ รชต จณฺท มณฺฑเลหิ มุตฺตามย ตารกาหิ จ วิจิตฺโต ตตฺถ ตตฺถ ยถารหํ นานารตนมย ปทุมานิ เจว ปสาท ชนกานิ จ ชาตกานิ อนฺตรนฺตรา สุวณฺณลตาโย จ กาเรสิ. ตตฺถ มหคฺฆํ ปจฺจตฺถรณํ อตฺถริตฺวา มนุญฺญํ ทนฺต วิชนึ ฐเปสิ. ปวาฬมย ปาทุกา กาเรสิ. ตถา ปลฺลงฺกสฺโสปริ เอฬิกภูมิยา ปติฏฺฐิตํ รชตมยทณฺฑํ เสตจฺจตฺตํ กาเรสิ. ตตฺถ สตฺตรตนมยานิ อฏฺฐมงฺคลานิ อนฺตรนฺตรา จ มณิมุตฺตามยา จตุปฺปาท ปนฺติโย จ กาเรสิ. ฉตฺตนฺเต จสฺส รตนมย ฆณฺฏาปนฺติโย โอลมฺพึสุ. तो (प्रासाद) अनेक रत्नस्तंभांनी, सिंह-व्याघ्रादी रूपांनी आणि देवतारूपांनी सुशोभित होता, तसेच चहूबाजूंनी लटकणाऱ्या मोत्यांच्या जाळ्यांनी वेढलेला होता. त्याची प्रवाळ-वेदिका (पोवळ्यांची वेदिका) पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच होती. सप्तरत्नांनी सुशोभित अशा विचित्र मंडपाच्या मध्यभागी, मेंढीच्या लोकरीच्या जमिनीवर एक हस्तिदंती पलंग (आसन) होता; त्याचे पाठीचे आसनही हस्तिदंतीच होते. तो पलंग सोन्याच्या सूर्यमंडळांनी, चांदीच्या चंद्रमंडळांनी आणि मोत्यांच्या ताऱ्यांनी सुशोभित होता. तेथे जागोजागी योग्यतेनुसार विविध रत्नमय कमळे, मनाला प्रसन्न करणाऱ्या जातककथा आणि मध्ये-मध्ये सोन्याच्या वेली बनवून घेतल्या. तेथे मौल्यवान बिछाना पसरून एक सुंदर हस्तिदंती पंखा ठेवला. प्रवाळाच्या पादुका बनवल्या. तसेच पलंगाच्या वर लोकरीच्या जमिनीवर स्थापित असलेला, चांदीचा दांडा असलेला पांढरा छत्र (श्वेतछत्र) तयार करवला. तेथे सप्तरत्नमय अष्टमंगले आणि मध्ये-मध्ये मणी व मोत्यांच्या चतुष्पाद प्राण्यांच्या रांगा बनवल्या. छत्राच्या टोकाला रत्नमय घंटांच्या माळा लटकत होत्या. ปาสาโท ฉตฺตํ ปลฺลงฺโก มณฺฑโป จาติ จตฺตาโร อนคฺฆา อเหสุํ มหคฺฆานิ มญฺจปีฐานิ ปญฺญตฺโว ตตฺถ มหคฺฆานิ กมฺพลานิ ภุมฺมตฺถรณานิ อตฺถราเปสิ อาวมน กุมฺหิ อุฬุงฺโก จ โสวณฺณมยาเยว อเหสุํ. เสส ปริโภค ภณฺเฑสุ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ ทฺวารโกฏฺฐโกปิ มโนหร ปากาเรน ปริกฺขิตฺโต. ตมฺพโลหิฏฺฐิกาภิ ปน ฉาทิตตฺตา ปาสาทสฺส โลหปาสาโทติ โวหาโร อโหสิ. प्रासाद, छत्र, पलंग आणि मंडप हे चार अमूल्य होते. तेथे मौल्यवान मंचक आणि आसने मांडून त्यावर मौल्यवान कंबले (घोंगड्या) व चटया पसरवल्या. पाण्याचे भांडे आणि पळी सोन्याचीच होती. इतर उपभोग्य वस्तूंच्या बाबतीत तर बोलण्याची गरजच नाही (त्या सर्व अत्यंत मौल्यवान होत्या). प्रवेशद्वारही एका सुंदर तटबंदीने वेढलेले होते. तांब्याच्या विटांनी (पत्र्यांनी) छप्पर झाकलेले असल्यामुळे त्या प्रासादाला 'लोहप्रासाद' असे नाव पडले. เอวํ ตาวตึสภวเน เทวสภา วิย ปาสาทํ นิฏฺฐาเปตฺวา สงฺฆํ สนฺนิปาเตสิ. มริจวฏฺฏิ วิหารมเค วิย สงฺโฆ สนฺนิปติ. ปฐมภูมิยํ ปุถุชฺชนาเยว อฏฺฐํสุ ทุติยภูมิยา เตปิฏกา, ตติยาทิสุ ตีสุ ภูมิสุ กเมน โสตาปนฺน - สกทาคามิ - อนาคามิโน, อุปริ จตุสุ ภูมิสุ ขีณาสวาเยว อฏฺฐํสุ. เอวํ สงฺฆํ สนฺนิปาเตตฺวา สงฺฆสฺส ปาสาทํ ทตฺวา มริจวฏฺฏิ วิหารมเห วิย สตฺตาหํ มหาทานมทาสีติ. अशा प्रकारे, तावतिंस स्वर्गातील देवसभेसारखा प्रासाद पूर्ण करून त्यांनी संघाला एकत्रित केले. मरिचवट्टि विहाराच्या उत्सवाप्रमाणेच संघ एकत्रित झाला. पहिल्या मजल्यावर केवळ पृथग्जन (सामान्य भिक्खू) राहिले, दुसऱ्या मजल्यावर त्रिपिटकधारी भिक्खू, तिसऱ्या इत्यादी तीन मजल्यांवर अनुक्रमे सोतापन्न, सकदागामी आणि अनागामी राहिले, आणि वरच्या चार मजल्यांवर केवळ क्षीणासव (अर्हत) राहिले. अशा प्रकारे संघाला एकत्रित करून आणि तो प्रासाद संघाला दान करून त्यांनी मरिचवट्टि विहाराच्या उत्सवाप्रमाणेच सात दिवस महादान दिले. ‘‘ปาสาทเหตุ จตฺตานิ-มหาจาเคน ราชินา,อนคฺฆานิ ฐเปตฺวาน-อเหสุํ ตึสโกฏิโย; ’’ “महात्यागी राजाने प्रासादासाठी, अमूल्य वस्तू वगळून, तीस कोटी (द्रव्य) खर्च केले;” ปหาย คมนียนฺตํ-ทตฺวาน ธนสญฺจยํ,อนุคามิธนํ ทานํ-เอวํ กุพฺพนฺติ ปณฺฑิตา; मृत्यूनंतर सोडून जावे लागणारे संचित धन दान करून, दान हेच सोबत जाणारे धन बनवतात; अशा प्रकारे ज्ञानी लोक करतात. ๑๙. อเถกทิวสํ ราชา สตสหสฺสํ วิสฺสชฺเชตฺวา มหาโพธิ ปูชํ กาเรตฺวา นครํ ปวิสนฺโต ถูปฏฺฐาเน ปติฏฺฐิตํ สิลาถูปํ ทิสฺวา มหิณฺทตฺเถเรน วุตฺตวจนํ อนุสฺสริตฺวา มหาถูปํ กาเรสฺสามีติ กตสนฺนิฏฺฐาโน นครํ ปวิสิตฺวา มหํตลํ อารุยฺห สุโภชนํ ภุญฺชิตฺวา สิริสยนคโต เอวํ จินฺเตสิ มยา ทมิเฬ มทฺทมาเนน อยํ โลโก อติวิย ปีฬิโต, เกน นุ โข อุปาเยน โลกสฺส ปิฬนํ อกตฺวา ธมฺเมน สเมน มหา เจติยสฺส อนุจฺฉวิกํ อิฏฺฐกา อุปฺปาเทสฺสามีติ ตํ จินฺติตํ ฉตฺตํ อธิวตฺถา เทวตา ชานิตฺวา ราชา เอวํ จินฺเตสีติ อุคฺโฆเสสิ. १९. त्यानंतर एका दिवशी राजांनी एक लाख (मुद्रा) खर्च करून महाबोधीची पूजा केली. नगरात प्रवेश करताना, स्तूपाच्या ठिकाणी स्थापित असलेला शिलास्तूप पाहून, महिंद थेरांनी सांगितलेले वचन आठवून, 'मी महास्तूप बनवीन' असा दृढ निश्चय करून त्यांनी नगरात प्रवेश केला. प्रासादाच्या वरच्या मजल्यावर जाऊन, उत्तम भोजन करून आणि राजशय्येवर विसावून ते असा विचार करू लागले, 'माझ्याकडून तमिळांचे दमन करताना ही प्रजा अत्यंत पीडित झाली आहे. अशा कोणत्या उपायाने, लोकांना त्रास न देता, धर्माने आणि न्यायाने मी महाचेतियासाठी (महास्तूपासाठी) योग्य अशा विटा मिळवू शकेन?' त्यांचा हा विचार छत्रावर अधिष्ठित असलेल्या देवतेने जाणून, 'राजे असा विचार करत आहेत' अशी घोषणा केली. ปรมฺปราย เทวโลเกปิ โกลาหลมโหสิ ตํ ญตฺวา สกฺโก เทวราชํ วิสฺสกมฺมํ อามนฺเตตฺวา’ตาต! วิสฺส กมฺม! ทุฏฺฐคามณิ อภย มหาราชา มหา เจติยสฺส อิฏฺฐกตฺถาย จินฺเตสิ. ตฺวํ คนฺตฺวา อุตฺตรปสฺเส นครโต โยชนปฺปมาเณ ฐาเน คมฺภิร นทิยา ตีเร อิฏฺฐกา มาเปตฺวา เอหิ’ติ เปเสสิ. परंपरेने देवलोकातही मोठा कोलाहल झाला. ते जाणून देवराज शक्राने विस्सकम्माला (विश्वकर्माला) बोलावून म्हटले, 'हे प्रिय विस्सकम्मा! महाराज दुट्ठगामणी अभय महाचेतियासाठी विटांच्या बाबतीत विचार करत आहेत. तू जाऊन नगराच्या उत्तर दिशेला एक योजन अंतरावर, गंभीरा नदीच्या तीरावर विटांची निर्मिती करून ये.' असे सांगून त्याला पाठवले. ตํ ญตฺวา วิสฺสกมฺม เทวปุตฺโต อาคนฺตฺวา ตตฺเถว มหาเจติยานุจฺฉวิกํ อิฏฺฐกา มาเปตฺวา เทวปุรเมว คโต. ปุน ทิวเส เอโก สุนขลุทฺโท สุนเข คเหตฺวา อรญฺญํ คนฺตฺวา ตตฺถ ตตฺถ วิจรนฺโต ตํ ฐานํ ปตฺวา อิฏฺฐกา อทิสฺวา จ นิกฺขมิ. ตสฺมึ ขเณ เอกา ภุมฺมา เทวตา ตสฺส อิฏฺฐกา ทสฺเสตุํ มหนฺตํ โคธาวณฺณํ คเหตฺวา ลุทฺทสฺส สุนขานญฺจ อตฺตานํ ทสฺเสตฺวา เตหิ อนุพทฺโธ อิฏฺฐกาภิมุขํ อตฺตฺวา อนฺตรธายิ. ते जाणून विस्सकम्म देवपुत्राने येऊन तेथेच महाचेतियासाठी योग्य अशा विटांची निर्मिती केली आणि तो देवलोकात परत गेला. दुसऱ्या दिवशी, एका श्वान-पारध्याने (कुत्रे बाळगणाऱ्या शिकाऱ्याने) कुत्र्यांना सोबत घेऊन अरण्यात प्रवेश केला. इकडेतिकडे फिरत असताना तो त्या ठिकाणी पोहोचला, पण विटा न पाहताच तो तेथून निघू लागला. त्याच वेळी, एका भूम्य देवतेने त्याला विटा दाखवण्यासाठी एका मोठ्या घोरपडीचे रूप घेतले आणि स्वतःला शिकारी व त्याच्या कुत्र्यांसमोर प्रकट केले. कुत्र्यांनी पाठलाग केला असता, ती घोरपड विटांच्या दिशेने धावली आणि तेथेच अदृश्य झाली. สุนขลุทฺโท อิฏฺฐกา ทิสฺวา อมฺหากํ ราชา ถูปํ กาเรตุกาโม, มหนฺโต วต โน ปณฺณากาโร ลทฺโธติ หฏฺฐมานโส ปุน ทิวเส ปาโตจ อาคนฺตฺวา อตฺตนา ทิฏฺฐํ อิฏฺฐก ปณฺณาการํ รญฺโญ นิเวเทสิ. ราชา ตํ สาสนํ สุตฺวา อตฺตมโน หุตฺวา ตสฺส มหนฺตํ สกฺการํ กาเรตฺวา ตํเยว อิฏฺฐก โคปนํ กาเรสิ. ตโต ราชา อหเมว อิฏฺฐโกโลกนตฺถาย คจฺฉามิ - กุนฺตํ วฑฺเฒถาติ อาห. त्या श्वान-पारध्याने विटा पाहून विचार केला, 'आमचे राजे स्तूप बनवू इच्छितात, नक्कीच आम्हाला एक मोठी भेट मिळाली आहे!' अत्यंत आनंदी मनाने दुसऱ्या दिवशी सकाळीच येऊन त्याने स्वतः पाहिलेल्या विटांच्या भेटीबद्दल राजांना सांगितले. राजे तो संदेश ऐकून अत्यंत प्रसन्न झाले आणि त्यांनी त्याचा मोठा सत्कार करून त्यालाच त्या विटांच्या रक्षणावर नियुक्त केले. त्यानंतर राजे म्हणाले, 'मी स्वतः विटा पाहण्यासाठी जाईन, माझा कुंत (भाला) तयार करा.' ตสฺมึเยว ขเณ ปุน อญฺญํ สาสนํ อาหรึสุ. นครโต ติโยชนมตฺถเก ฐาเน ปุพฺพุตฺตรกณฺเณ อาจาร วิฏฺฐิคาเม ติยามรตฺตึ อภิปฺปวฏฺเฏ เทเว โสฬส กรีสปฺปมาเณ ปเทเส สุวณฺณพีชานิ อุฏฺฐหึสุ. ตานิ ปมาณโต อุกฺกฏฺฐานิ วิทตฺถิปฺปมาณานิ. โอมกานิ อฏฺฐงฺคุลปฺปมาณานิ อเหสุํ, อถ วิภาตาย รตฺติยา คามวาสิโน สุวณฺณพิชานิ ทิสฺวา ราฉา’รหํ วต ภณฺฑํ อุปฺปนฺนนฺติ สมนฺตโต อารกฺขา สํวิทหิตฺวา สุวณฺณพีชานิ ปาติยํ ปูเรตฺวา อาคนฺตฺวา รญฺโญ ทสฺเสสุํ ราชา เตสมฺปิ ยถารหํ สกฺการํ กาเรตฺวา เตเยว สุวณฺณ โคปเก อกาสิ. त्याच क्षणी आणखी एक संदेश आला. नगरापासून तीन योजन अंतरावर, ईशान्य दिशेला असलेल्या आचारविठ्ठि गावात रात्रीच्या three प्रहरात पाऊस पडल्यानंतर, सोळा करीस प्रमाणाच्या भूभागावर सोन्याचे कण उगवले. ते आकाराने मोठे म्हणजे एका वितीएवढे होते आणि लहान आठ बोटांच्या प्रमाणाचे होते. रात्र संपून सकाळ झाल्यावर गावकऱ्यांनी ते सोन्याचे कण पाहिले आणि 'नक्कीच राजांच्या योग्य अशी वस्तू उत्पन्न झाली आहे' असा विचार करून चहूबाजूंनी रक्षक नेमले. त्यांनी ते सोन्याचे कण एका पात्रात भरून आणले आणि राजांना दाखवले. राजांनी त्यांचाही योग्य सत्कार करून त्यांनाच त्या सोन्याचे रक्षक बनवले. อถ ตสฺมึเยว ขเณ อญฺญํ สาสนํ อาหรึสุ. นครโต ปาจีนปสฺเส สตฺตโยชน มตฺถโก ฐาเน ปารคงฺคาย ตมฺพวิฏฺฐิ นาม ชนปเท ตมฺพโลหํ อุปฺปชฺชิ. คามิกา ปาตึ ปูเรตฺวา ตมฺพโลหํ คเหตฺวา อาคนฺตฺวา รญฺโญ ทสฺเสสุํ ราชา ยถานุรูปํ สกฺการํ เตสมฺปิ กาเรตฺวา เตเยว โคปเก อกาสิ. त्यानंतर त्याच क्षणी आणखी एक संदेश आला. नगराच्या पूर्व दिशेला सात योजन अंतरावर, गंगेच्या पलीकडे तांबविठ्ठि नावाच्या जनपदात तांबे उत्पन्न झाले. गावकऱ्यांनी पात्रात तांबे भरून आणले आणि राजांना दाखवले. राजांनी त्यांचाही योग्य सत्कार करून त्यांनाच त्याचे रक्षक बनवले. ตทนนฺตรํ อญฺญํ สาสนํ อาหรึสุ. ปุรโต จตุโยชนมตฺถโก ฐาเน ปุพฺพทกฺขิณ กณฺเณ สุมนวาปิคาเม อุปฺปลกุรุวิณฺท มิสฺสกา พหู มณโย อุปฺปชฺชึสุ คามิกา ปาตึ ปูเรตฺวา อาคนฺตฺวา มานโย รญฺโญ ทสฺเสสุํ. ราชา เตสมฺปิ สกฺการํ กาเรตฺวา เตเยว โคปเก อกาสิ. त्यानंतर लगेचच आणखी एक संदेश आला. नगराच्या समोर चार योजन अंतरावर, आग्नेय दिशेला असलेल्या सुमनवापि गावात निळे कमळ आणि कुरुविंद (माणिक) मिश्रित अनेक मणी उत्पन्न झाले. गावकऱ्यांनी पात्रात मणी भरून आणले आणि राजांना दाखवले. राजांनी त्यांचाही सत्कार करून त्यांनाच त्या मण्यांचे रक्षक बनवले. ตทนนฺตรํ อญฺญมฺปิ สาสนํ อาหรึสุ. นครโต ทกฺขิณ ปสฺเส อฏฺฐโยชน มตฺถเก ฐาเน อมฺพฏฺฐโกล ชนปเท เอกสฺมึ เลเณ รชตํ อุปฺปชฺชิ ตสฺมึ สมเย นครวาสิโก เอโก วาณิโช พหูหิ สกเฏหิ หฬิทฺทิ สิงฺคิเวราทีนมตฺถาย มลยํ คโต, เลณสฺส อวิทูเร สกฏานิ มุญฺจิตฺวา ปโตททารุํ ปริเยสนฺโต ตํ ปพฺพตํ อภิรูฬฺโห เอกํ ปณสยฏฺฐึ อทฺทส. त्यानंतर आणखी एक बातमी आणली गेली. नगराच्या दक्षिण दिशेला आठ योजनांच्या अंतरावर असलेल्या आंबट्टकोल जनपदातील एका लेण्यात चांदी उत्पन्न झाली. त्या वेळी नगरात राहणारा एक व्यापारी अनेक गाड्या घेऊन हळद, आले इत्यादींच्या खरेदीसाठी मलय देशात गेला होता. लेण्यापासून जवळच गाड्या सोडून, चाबकाची काठी शोधत तो त्या पर्वतावर चढला आणि त्याने फणसाचे एक झाड पाहिले. ตสฺส มหนฺตํ จาฏิปฺปมาณํ เอกเมว ปณส ผลํ นรุณยฏฺฐึ นาเมตฺวา เหฏฺฐา ปาสาณปิฏฺฐิยํ อฏฺฐาสิ. โส ตํ ผลภาเรน นมิตํ ทิสฺวา อุปคนฺตฺวา หตฺเถน ปรามสิตฺวา ปกฺกภาวํ ญตฺวา วณฺฏํ ฉิณฺทิ ปณสยฏฺฐิ อุคฺคนฺตฺวา ยฏาฏฺฐานํ อฏฺฐาสิ วาณิโช อคฺคํ ทตฺวา ภุญฺชิสฺสามีติ จินฺเตตฺวา กาลํ โฆเสสิ. ตทา จตฺตาโร ขีณาสว อาคนฺตฺวา ตสฺส ปุรโต ปาตุรเหสุํ. วาณิโช เต ทิสฺวา อตฺตมโน ปาเท วนฺทิตฺวา นิสีทาเปตฺวา ตสฺส ผลสฺส วณฺฏาสมนฺตา วาสิยา ตจฺเฉตฺวา อปสฺสยํ ลุญฺจิตฺวา อปนาเมสิ. สมนฺตโต ยุสํ โอตริตฺวา อปสฺสยานิตํ อาวาฏํ ปูเรสิ วาณิโช มโนสิโลทกวณฺณ ปณสยุสํ ปตฺเต ปูเรตฺวา อทาสิ. เต ขีณาสวา ตสฺส ปสฺสนฺตสฺเสว อากาสมพฺภุคฺคนฺตฺวา ปกฺกมึสุ. त्या झाडाचे मातीच्या मोठ्या मडक्याच्या आकाराचे एकच मोठे फणसाचे फळ कोवळ्या फांदीला वाकवून खाली खडकावर टेकले होते. त्याने ते फळाच्या भाराने वाकलेले पाहून जवळ जाऊन, हाताने स्पर्श करून ते पिकलेले असल्याचे जाणून त्याचा देठ कापला. फणसाची फांदी वर जाऊन आपल्या मूळ जागी स्थिर झाली. व्यापाऱ्याने 'प्रथम दान देऊन मगच मी खाईन' असा विचार करून दानाची वेळ पुकारली. तेव्हा चार क्षीणास्रव येऊन त्याच्यासमोर प्रकट झाले. व्यापाऱ्याने त्यांना पाहून प्रसन्न चित्ताने त्यांच्या चरणांना वंदन केले, त्यांना बसवून, त्या फळाच्या देठाभोवती वाशीने तासून, साल काढून बाजूला केली. चहूबाजूंनी रस वाहून त्याने साल काढलेल्या भागातील खड्डा भरून गेला. व्यापाऱ्याने मनशिलच्या पाण्याच्या रंगासारखा फणसाचा रस पात्रात भरून त्यांना दिला. ते क्षीणास्रव त्याच्या पाहत असतानाच आकाशात उडून निघून गेले. โส ปุน กาลํโฆเสสิ อญฺเญ จตฺตโร ขีณาสวา อาคมึสุ. เตสมฺปิ หตฺถโต ปตฺเต คเหตฺวา สุวณฺณวณฺเณหิ ปน สมิญฺเชหิ ปูเรตฺวา อทาสิ เตสุ ตโย เถรา อากาเสน ปกฺกมึสุ อิตโร อิณฺทคุตฺตตฺเถโร นาม ขีณาสโว ตสฺส ตํ รชตํ ทสฺเสตุกาโม อุปริ ปพฺพตา โอตริตฺวา ตสฺส เลณสฺส อวิทูเร นิสีทิตฺวา ปณส มิญฺชํ ปริภุญฺชติ อุปาสโก เถรสฺส คตกาเล อวเสส มิญฺชํ อตฺตนาปิ ขาทิตฺวา เสสกํ ภณฺฑิกํ กตฺวา อาทาย คจฺฉนฺโต เถรํ ทิสฺวา อุทกญฺจ ปตฺตโธวนสาขญฺจ อทาสิ. त्याने पुन्हा वेळ पुकारली, तेव्हा दुसरे चार क्षीणास्रव आले. त्यांच्याही हातातील पात्रे घेऊन त्याने ती सुवर्णवर्णाच्या फणसाच्या गऱ्यांनी भरून दिली. त्यांच्यापैकी तीन थेर आकाशाने निघून गेले. दुसरा इंदगुत्त थेर नावाचा क्षीणास्रव त्याला ती चांदी दाखवण्याच्या इच्छेने पर्वतावरून खाली उतरून, त्या लेण्याजवळ बसून फणसाचे गरे खाऊ लागला. थेर निघून गेल्यावर उपासकाने उरलेले गरे स्वतःही खाल्ले आणि उरलेल्या गऱ्यांची गाठोडी बांधून घेऊन जात असताना थेरांना पाहून पाणी आणि पात्र धुण्यासाठी फांदी दिली. เถโรปิ เลณทฺวาเรน สกฏ สมีปคามิ มคฺคํ มาเปตฺวา อิมินา มคฺเคน คจฺฉ อุปาสกาติ อาห. โส เถรํ วนฺทิตฺวา เตน มคฺเคน คจฺฉนฺโต เลณทฺวารํ ปตฺวา สมนฺตา เลณํ โอโลเกนฺโต ตํ รชตราสึ ทิสฺวา รชตปิณฺฑํ คเหตฺวา จาสิยา ฉิณฺทิตฺวา รชตภาวํ ญตฺวา มหนฺตํ สชฺฌปิณฺฑํ คเหตฺวา สกฏ สนฺติกํ คนฺตฺวา ติโณทก สมฺปนฺเน ฐาเน สกฏานิ นิเวเสตฺวา ลหุํ อนุราธปุรํ คนฺตฺวา รญฺญฺโญ ทสฺเสตฺวา ตมตฺถํ นิเวเทสิ ราชา ตสฺสาปิ ยถารหํ สกฺการํ กาเรสิ. थेरांनीही लेण्याच्या दारातून गाड्यांच्या जवळ जाणारा मार्ग निर्माण करून 'हे उपासका, या मार्गाने जा' असे सांगितले. त्याने थेरांना वंदन केले आणि त्या मार्गाने जात असताना लेण्याच्या दारापाशी पोहोचून चहूबाजूला लेणे न्याहाळले, तेव्हा त्याला तो चांदीचा ढीग दिसला. त्याने चांदीचा गोळा घेऊन वाशीने कापून ती चांदीच असल्याची खात्री केली आणि तो मोठा चांदीचा गोळा घेऊन गाड्यांजवळ गेला. गवत व पाणी असलेल्या ठिकाणी गाड्या थांबवून, तो लवकरच अनुराधपूरला गेला आणि राजाला ती चांदी दाखवून ती हकीकत सांगितली. राजाने त्याचाही योग्य तो सत्कार केला. ตทนฺตรํ อญฺญมฺปิ สาสนํ อาหรึสุ นครโต ปจฺฉิม ทิสาภาเค ปญฺจ โยชน มตฺถเก ฐาเน อุรุเวล ปพฺพต มหามลกมตฺตา ปจาฬ มิสฺสกา สฏฺฐิ สกฏปฺปมาณมุตฺตา สมุทฺทโต ถลมุคฺคมึสุ เกวฏฺฏา ทิสฺวา ราชารหํ วต ภณฺฑํ อุปฺปนฺนนฺติ ราสึ กตฺวา อารกฺขํ ทตฺวา ปาตึ ปูเรตฺวา อาคนฺตฺวา รญฺโญ ทสฺเสตฺวา ตมตฺถํ นิเวเทสุํ. ราชา เตสมฺปิ ยถารหํ สกฺการํ กาเรสิ. त्यानंतर आणखी एक बातमी आणली गेली. नगराच्या पश्चिम दिशेला पाच योजनांच्या अंतरावर असलेल्या उरुवेल पर्वताजवळ आवळ्याच्या आकाराचे, प्रवाळाने मिश्रित असलेले साठ गाड्यांएवढे मोती समुद्रातून जमिनीवर आले. कोळ्यांनी ते पाहून 'राजासाठी योग्य अशीच ही वस्तू उत्पन्न झाली आहे' असे म्हणून त्याचा ढीग केला, तिथे पहारा ठेवला आणि एक थाळी भरून राजाकडे येऊन ती दाखवली व ती हकीकत सांगितली. राजाने त्यांचाही योग्य तो सत्कार केला. ปุน อญฺญํ สาสนํ อาหรึสุ นครโต ปจฺฉิมุตฺตร กณฺเณ สตฺตโยชน มตฺถเก ฐาเน เปฬิวาปิ คามสฺส วาปิยา โอติณฺณ กณฺทเร ปุลิน ปุฏฺเฐ นิสทโปตปฺปมาณ ทีฆโต วิทตฺถิจตุรงฺคุลา อุมฺมาปุปฺผวณฺณา จตฺตาโร มหามณิ อุปฺปชฺชึสุ. อเถโก มตฺโต นาม สุนขลุทฺโท สุนเข คเหตฺวา ตตฺถ วิจรนฺโต ตํ ฐานํ ปตฺวา ทิสฺวา ราชารหํ วต ภณฺฑนฺติ วาลิกาหิ ปฏิจฺฉาเทตฺวา อาคนฺตฺวา รญฺโญ นิเวเทสิ. ราชา ตสฺสาปิ ยถารหํ สกฺการํ กาเรสิ. เอวํ ราชา ถูปตฺถาย อุปฺปนฺนานิ อิฏฺฐกาทีนิ ตทเหว อสฺโสสิ อิฏฺฐก รชตานํ อุปฺปนฺนฏฺฐานํ เตเนว นามํ ลภิ. पुन्हा दुसरी एक बातमी आणली गेली. नगराच्या वायव्य कोपऱ्यात सात योजनांच्या अंतरावर असलेल्या पेळिवापी गावाच्या तलावात उतरणाऱ्या ओढ्यातील वाळूच्या ढिगाऱ्यावर पाटा-वरवंट्याच्या आकाराचे, लांबीला एक वीत आणि चार बोटे असलेले, अंबाडीच्या फुलाच्या रंगाचे चार मोठे मणी उत्पन्न झाले. तेव्हा मत्त नावाचा एक शिकारी कुत्र्यांना घेऊन तिथे फिरत असताना त्या ठिकाणी पोहोचला आणि त्याने ते पाहून 'हे राजासाठी योग्य असेच रत्न आहे' असे म्हणून ते वाळूने झाकून टाकले आणि राजाकडे येऊन सांगितले. राजाने त्याचाही योग्य तो सत्कार केला. अशा प्रकारे राजाने स्तूपासाठी उत्पन्न झालेल्या विटा इत्यादींविषयी त्याच दिवशी ऐकले. विटा आणि चांदी ज्या ठिकाणी उत्पन्न झाली, त्या ठिकाणांना त्याच नावाने ओळखले जाऊ लागले. ถูปสาธน ลาภกถา स्तूप उभारणीच्या साधनांच्या प्राप्तीची कथा. ๒๐. อถ ราชา ถูปตฺถาย อุปฺปนฺนานิ สุวณฺณาทีนิ อาหราเปตฺวา ภณฺฑาคาเรสุ ราสึ กาเรสิ ตโต สพฺพสมฺภาเร สมตฺเต วิสาข ปุณฺณมุโปสถทิวเส ปตฺต วิสาข นกฺขตฺเต มหาถูปกรณตฺถาย ภูมิปริกมฺมํ อารภิ. ราชา ถุปฏฺฐาเน ปติฏฺฐาปิตํ สิลาถูปํ หราเปตฺวา ถิรภาวตฺถาย สมนฺตโต หตฺถิปาการ ปริยนฺตํ คมฺภีรโต สตรตนปฺปมาณํ ภูมึ ขนาเปตฺวา ปํสุํ อปเนตฺวา โยเธหิ คุฬปาสาเณ อตฺถราเปตฺวา กมฺมารกูเฏหิ อาหนาเปตฺวา จุณฺณวิจุณฺเณ กาเรสิ. २०. त्यानंतर राजाने स्तूपासाठी उत्पन्न झालेले सोने इत्यादी आणवून भांडारात त्याचे ढीग केले. त्यानंतर सर्व साहित्य गोळा झाल्यावर वैशाख पौर्णिमेच्या उपोसथ दिवशी, विशाखा नक्षत्रावर महास्तूपाच्या बांधकामासाठी भूमीची तयारी सुरू केली. राजाने स्तूपाच्या ठिकाणी स्थापित केलेला दगडी स्तूप हलवून, मजबुतीसाठी चहूबाजूंनी हत्तीच्या तटबंदीपर्यंत शंभर हात खोल जमीन खणून घेतली, माती काढून टाकली आणि योद्ध्यांकडून गोल दगड पसरवून लोहारांच्या हातोड्यांनी ते ठोकून त्यांचे बारीक तुकडे करून घेतले. ตโต จมฺมวินทฺเธหิ ปาเทหิ มหา หตฺถีหิ มทฺทาเปตฺวา ปาสาณโกฏฺฏิมสฺสุปริ นวนีต มตฺติกํ อตฺถราเปสิ. อากาส คงฺคายหิ ติปติตฏฺฐาเน อุทกพินฺทูนิ อุคฺคนฺตฺวา สมนฺตา ตึส โยชนปฺปมาณปเทเส ปตนฺติ ยตฺถ สยญฺชาตสาลี อุปฺปชฺชตฺติ ตํ ฐานํ นิจฺจเมว ตินฺตตฺตา นินฺตสีสโกฬํ นาม ฉาตํ. ตตฺถ มตฺติกา สุขุมุตฺตา นวนีต มตฺติกาติ วุจฺจติ. त्यानंतर चामड्याने पाय बांधलेल्या मोठ्या हत्तींकडून ते तुडवून घेऊन, त्या दगडाच्या कुट्टिम थरावर लोण्यासारखी मऊ माती (नवनीत मृत्तिका) पसरवली. आकाशगंगेचे पाणी ज्या ठिकाणी पडते, तिथून पाण्याचे थेंब उडून चहूबाजूंनी तीस योजनांच्या प्रदेशात पडतात. जिथे स्वतःहून उगवणारे तांदूळ उत्पन्न होतात, ते ठिकाण नेहमी ओले असल्यामुळे 'निंतसीसकोळ' या नावाने प्रसिद्ध आहे. तिथली माती अत्यंत मऊ असल्यामुळे तिला 'नवनीत मृत्तिका' असे म्हणतात. ตํ ตโต ขีณสวา สามเณรา อาหรนฺติ ตาย สพฺพตฺถ มตฺติกากิจฺจนฺติ ญาตพฺพํ. มตฺติโกปริ อิฏฺฐกา อตฺถราเปสิ. อิฏฺฐโกปริ ขรสุกมฺมํ, ตสฺโสปริกุรุวิณฺทปาสาณํ, ตสฺโสปริอโยชาลํ, ตสฺโสปริ ขีณาสว สามเณเรหิ หิมวนฺตโต อาหฏํ สุคณฺธมารุมฺพํ, ตสฺโสปริ ขีรปาสาณํ, ตสฺโสปริ เอฬิกปาสาณํ, ตสฺโสปริ สีลํ อตฺถราเปสิ. สพฺพมตฺติกากิจฺเจ นวนีตมตฺติกา เอว อโหสิ. ती माती तिथून क्षीणास्रव सामणेर घेऊन येत असत. त्या मातीनेच सर्व ठिकाणी मातीचे काम केले गेले, असे समजावे. मातीवर विटा पसरवल्या. विटांवर खरसुकाम, त्यावर कुरुविंद दगड, त्यावर लोखंडी जाळी, त्यावर क्षीणास्रव सामणेरांनी हिमालयातून आणलेली सुगंधी वाळू, त्यावर दुधी दगड (क्षीरपाषाण), त्यावर गारगोटीचा दगड (एळिकपाषाण) आणि त्यावर शिळा पसरवली. मातीच्या सर्व कामात केवळ नवनीत मृत्तिकाच वापरली गेली होती. สิลาสตฺถาโรปริ รโสทก สนฺตินฺเตน กปิตฺถ นิยฺยาเสน อฏฺฐงฺคุลพหลตมฺพโลหปฏฺฏํ, ตสฺโสปริ ติลเตลยนฺตินฺตาย มโนสิลาย สตฺตงฺคุล พหลํ รชตปฏฺฏํ อตฺถราเปสิ เอวํ ราชา สพฺพากาเรน ภูมิปริกมฺมํ การาเปตฺวา อาสาฬหิ สุกฺกปกฺขสฺส จาตุทฺทส ทิวเส ภิกฺขุสงฺฆา สนฺนิปาเตตฺวา เอวมาห. สฺเว ปุณฺณมุโปสถทิวเส อุตฺตราสาฬฺห นกฺขตฺเตน มหาเจติเย มงฺคลิฏฺฐกํ ปติฏฺฐาเปสฺสามิ สฺเว ถูปูฏฺฐาเน สพฺโพ สงฺโฆ สนฺติปตตูติ นคเร เภรึ จราเปสิ มหาชโน อุโปสถิโก หุตฺวา คณฺธมาลาทีนิ คเหตฺวา ถูปฏฺฐาเน สนฺนิปตตูติ. शिळांच्या थरावर पाऱ्याच्या पाण्याने आणि कवीठाच्या डिंकाने जोडलेला आठ अंगुळे जाडीचा तांब्याचा पट्टा आणि त्यावर तिळाच्या तेलात घासलेल्या मनःशिलेने जोडलेला सात अंगुळे जाडीचा चांदीचा पट्टा राजाने अंथरला. अशा प्रकारे राजाने सर्व प्रकारे भूमीची तयारी (भूमिकर्म) करून घेऊन, आसाळ्ह महिन्याच्या शुक्ल पक्षाच्या चतुर्दशीच्या दिवशी भिक्खू संघाला एकत्र बोलावून ते असे म्हणाले, 'उद्या पौर्णिमेच्या उपोसथ दिवशी उत्तराषाढा नक्षत्रावर मी महाचेतियाची मंगल वीट प्रस्थापित करीन. उद्या स्तूपाच्या ठिकाणी संपूर्ण संघाने एकत्र यावे.' तसेच त्याने शहरात दवंडी पिटवून जाहीर केले की, 'सर्व लोकांनी उपोसथ व्रत धारण करून, गंध, पुष्पमाला इत्यादी घेऊन स्तूपस्थानी एकत्र यावे.' ตโต วิสาขสิริ เทวนามเก ทฺเว อมจฺเจ อาณาเปสิ. ตุมฺเห คนฺตฺวา มหา เจติยฏฺฐานํ อลงฺกโรถาติ. เต คนฺตฺวา สมนฺตโต รชตปฏฺฏวณฺณวาลุกํ โอกีราเปตฺวา ลาชปญฺจมกานิ ปุปฺผานิ วิกิริตฺวา กทลิโตรณํ อุสฺสาเปตฺวา ปุณฺณฆเฏ ฐปาเปตฺวา มณิวณฺเณ เวฬุมฺหิ ปญฺจปณฺณธชํ พณฺธาเปตฺวา คณฺธสมฺปนฺนานิ นานาวิธ กุสุมานิสณฺถราเปตฺวา นานาปฺปกาเรหิ ตํ ฐานํ อลงฺกรึสุ. त्यानंतर त्यांनी विशाख आणि सिरीदेव नावाच्या दोन अमात्यांना आज्ञा दिली, 'तुम्ही जाऊन महाचेतियाच्या जागेची सजावट करा.' त्यांनी जाऊन चहूबाजूंनी चांदीच्या रंगाची वाळू पसरवली, लाह्या आणि पाच प्रकारची फुले विखुरली, केळीचे तोरण उभारले, पूर्णघट (पाण्याचे भरलेले कलश) ठेवले, मण्यांच्या रंगाच्या वेळूवर पाच रंगांचे ध्वज बांधले आणि सुगंधी विविध प्रकारची फुले पसरवून नाना प्रकारे त्या जागेची सजावट केली. อถ ราชา สกลนครญฺจ วิหารคามิ มคฺคญฺจ อลงฺการาเปสิ ปภาตาย รตฺติยา นคเร จตุสุ ทฺวาเรสุ มสฺสุ กมฺมตฺถาย นหาปิเต, นหาปนตฺถายนหาปนเก, อลงฺการตฺถาย กปฺปเกว นานาวิราค วตฺถ คณฺธมาลาทีนิ จ สูปวฺยญฺชน สมฺปนฺนานิ มธุรภตฺตานิ จ ฐปาเปตฺวา สพฺเพ นครา จ ชานปทา จ ยถารุจึ มสฺสูกมฺมํ กาเรตฺวา นหาตฺวา ภุญฺชิตฺวา วตฺถาภรณาทีหิ อลงฺกริตฺวา มหาเจติยฏฺฐานํ อาคจฺฉนฺตูติ อายุตฺตเกหิ อาโรจาเปสิ. त्यानंतर राजाने संपूर्ण नगर आणि विहाराकडे जाणारा मार्ग सजवून घेतला. रात्र संपून पहाट झाल्यावर नगराच्या चारही वेशींवर दाढी-कटिंग करण्यासाठी न्हावी, स्नान घालण्यासाठी सेवक, सजवण्यासाठी केशभूषाकार, विविध रंगांचे वस्त्र, गंध, पुष्पमाला इत्यादी आणि विविध व्यंजनांनी युक्त मधुर भोजन ठेवून, 'सर्व नगरवासी आणि जनपदवासीयांनी आपल्या आवडीनुसार दाढी-कटिंग करून, स्नान करून, भोजन करून, वस्त्र आणि आभूषणांनी नटून महाचेतियाच्या ठिकाणी यावे,' अशी घोषणा त्यांनी अधिकाऱ्यांमार्फत करवली. สยมฺปิ สพฺพาภรณ วิภูสิโต จตฺตาลีส ปุริส สหสฺเสหิ สทฺธึ อุโปสโก หุตฺวา อเนเกหิ สุมณฺฑิต ปสาธิเตหิ อมจฺเจหิ คหิตารกฺโข อลงฺกตาหิ เทวกญฺญ ปมาหิ นาฏกิตฺถิหิ ปริวุโต อมรคณ ปริวุโต เทวราชา วิย อตฺตโน สิริสมฺปตฺติหา มหาชนํ โตสยนฺโต อเนเกหิ ตุริย สงฺฆุฏฺเฐหิ วตฺตมาเนหิ อปรณฺเห มหาถูปฏฺฐานํ อุปคญฺชิ. มหา เจติยฏฺฐาน มงฺคลตฺถาย ปุฏพทฺธานิ วตฺถานิ อฏฺฐุตฺตร สหสฺสํ ฐปาเปสิ. จตุสุ ปสฺเสสุ วตฺถราสึ กาเรสิ เตล-มธุ-สกฺกร-ผาณิตาทีนิ จ ฐปาเปสิ. ते स्वतः देखील सर्व आभूषणांनी विभूषित होऊन, चाळीस हजार पुरुषांसह उपोसक बनून, अनेक सुशोभित व नटलेल्या अमात्यांच्या संरक्षणात, देवकन्यांसारख्या नटलेल्या नर्तकींनी वेढलेले, देवगणांनी वेढलेल्या देवराजाप्रमाणे (इंद्राप्रमाणे) आपल्या वैभवाने लोकांना आनंदित करत, अनेक वाद्यांच्या गजरात दुपारी महास्तूपाच्या ठिकाणी पोहोचले. महाचेतियाच्या जागेच्या मांगलिक कार्यासाठी त्यांनी एक हजार आठ घड्या घातलेली वस्त्रे ठेवली. चारही बाजूंना वस्त्रांचे ढीग केले आणि तेल, मध, साखर, गूळ इत्यादी देखील ठेवले. อถ นานาเทสโต พหู ภิกฺขู อาคมึสุ ราชคหา สมนฺตา อิณฺทิคุตฺตตฺเถโร นาม อสีติ ภิกฺขุสหสฺสานิ คเหตฺวา อากาเสนาคญฺฉิ ตถา พาราณสิยํ อิสิปตเน มหา วิหารโต ธมฺมเสนตฺเถโร นาม ทฺวาทส ภิกฺขุสหสฺสานิ. สาวตฺถิยํ เชตวน วิหารโต ปิยทสฺสิ นาม เถโร สฏฺฐิ ภิกฺขุ สหสฺสานิ เวสาลิยํ มหา วนโต พุทฺธรกฺขิตตฺเถโร อฏฺฐารส ภิกฺขุ สหสฺสานิ, โกสมฺพิยํ โฆสิตารามโต มหาธมฺมรกฺขิตตฺเถโร ตึส ภิกฺขุสหสฺสานิ. อุชฺเชนิยํ ทกฺขิณคิริ มหา วิหารโต ธมฺมรกฺขิตตฺเถโร จตฺตาลีส ภิกฺขุสหสฺสานิ-ปาฏลิปุตฺเต อโสการามโต มิตฺติณฺณตฺเถโร ภิกฺขูนํ สตสหสฺสานิ สฏฺฐิญฺจ สหสฺสานิ คณฺธาร รฏฺฐโต อตฺตินฺน เถโร นาม ภิกฺขูนํ ทฺเว สตสหสฺสานิ อสีติญฺจ สหสฺสานิ. มหาปลฺลว โภคโต มหาเทวตฺเถโร ภิกฺขูนํ จตฺตาริ สตสหสฺสานิ สฏฺฐิญฺจ สหสฺสานิ โยนกรฏฺเฐ อลสณฺทา นครโต โยนก ธมฺมรกฺขิตตฺเถโร ตึส ภิกฺขุ สหสฺสานิ. วิญฺฌาฏวิวตฺตนิย เสนาสนโต อุตฺตรตฺเถโร อสีติ ภิกฺขุสหสฺสานิ. มหาโพธิมณฺฑ วิหารโต จิตฺตคุตฺตตฺเถโร ตึส ภิกฺขุสหสฺสานิ วนวาสิโภคโต จณฺทคุตฺตตฺเถโร อสีติ ภิกฺขุสหสฺสานิ. เกลาส มหาวิหารโต สุริภคุตฺตตฺเถโร ฉนฺนวุติ สหสฺสานิ คเหตฺวา อากาเสนาคญฺฉิ. त्यानंतर वेगवेगळ्या देशांतून अनेक भिक्खू आले. राजगृहाच्या आसपासच्या भागातून इंदगुत्त थेर ऐंशी हजार भिक्खूंना घेऊन आकाशातून आले. तसेच वाराणसीच्या इसिपतन महाविहारातून धम्मसेन थेर बारा हजार भिक्खूंना घेऊन आले. सावत्थीच्या जेतवन विहारातून पियदस्सी थेर साठ हजार भिक्खूंना घेऊन आले. वेसालीच्या महावनातून बुद्धरक्खित थेर अठरा हजार भिक्खूंना घेऊन आले. कोसंबीच्या घोसितारामातून महाधम्मरक्खित थेर तीस हजार भिक्खूंना घेऊन आले. उज्जैनीच्या दक्खिणागिरी महाविहारातून धम्मरक्खित थेर चाळीस हजार भिक्खूंना घेऊन आले. पाटलीपुत्राच्या असोकारामातून मित्तिय थेर एक लाख साठ हजार भिक्खूंना घेऊन आले. गंधार देशातून अतिण्ण थेर दोन लाख ऐंशी हजार भिक्खूंना घेऊन आले. महापल्लव प्रांतातून महादेव थेर चार लाख साठ हजार भिक्खूंना घेऊन आले. योनक देशातील अलसंदा नगरातून योनक धम्मरक्खित थेर तीस हजार भिक्खूंना घेऊन आले. विंध्याटवीच्या सेनासनातून उत्तर थेर ऐंशी हजार भिक्खूंना घेऊन आले. महाबोधिमंड विहारातून चित्तगुत्त थेर तीस हजार भिक्खूंना घेऊन आले. वनवासी प्रांतातून चंदगुत्त थेर ऐंशी हजार भिक्खूंना घेऊन आले. आणि कैलास महाविहारातून सुरियगुत्त थेर शहाण्णव हजार भिक्खूंना घेऊन आकाशातून आले. ‘‘ภิกฺขูนํ ทีปวาสีนํ-อาคตานญฺจ สพฺพโส,คณนาย ปริจฺเฉโท-โปราเณหิ น ภาสิโต; “या द्वीपावर राहणाऱ्या आणि सर्व बाजूंनी आलेल्या भिक्खूंच्या संख्येची मर्यादा प्राचीन आचार्यांनी सांगितलेली नाही; สมาคตานํ ภิกฺขูนํ-สพฺเพสํ ตํ สมาคเม,วุตฺตา ขีณาสวาเยว-เต ฉนฺนวุติ โกฏิโย; ’’ त्या समागमामध्ये एकत्र आलेल्या सर्व भिक्खूंपैकी केवळ क्षीणास्रव (अर्हत) भिक्खूंचीच संख्या शहाण्णव कोटी सांगितली आहे.” อถ สงฺโฆ ปริกฺขิตฺต ปวาฬเวทิกา วิย มชฺเฌ รญฺโญ โอกาเส ฐเปตฺวา อญฺญมญฺญํ อฆฏฺเฏตฺวา อฏฺฐาสิ. ปาจินปสฺเส พุทฺธรกฺขิตนามโก ขีณาสาวตฺเถโร อตฺตนาสทิสนามเก ปญฺจสตขีณาสเว คเหตฺวา อฏฺฐาสิ. ตถา ทกฺขิณปสฺเส ปจฺฉิมปสฺเส อุตฺตรปสฺเส จ ธมฺมรกฺขิต - สงฺฆรกฺขิต - อานณฺท นามกา ขีณาสวตฺเถรา อตฺตนา สทิสนามเก ปญฺจปญฺจสต ขีณาสเว คเหตฺวา อฏฺฐํสุ ปิยทสฺสิ นาม ขีณาสวตฺเถโร มหาภิกฺขุสงฺฆํ คเหตฺวา ปุพฺพุตฺตร กณฺเณ อฏฺฐาสิ. त्यानंतर संघाने, वेढलेल्या पोवळ्यांच्या वेदिकेप्रमाणे मध्ये राजासाठी जागा ठेवून, एकमेकांना स्पर्श न करता शिस्तीत उभे राहिले. पूर्व दिशेला बुद्धरक्खित नावाचे क्षीणास्रव थेर आपल्यासारखेच नाव असलेल्या पाचशे क्षीणास्रव भिक्खूंना घेऊन उभे राहिले. तसेच दक्षिण दिशेला, पश्चिम दिशेला आणि उत्तर दिशेला अनुक्रमे धम्मरक्खित, संघरक्खित आणि आनंद नावाचे क्षीणास्रव थेर आपल्यासारखेच नाव असलेल्या प्रत्येकी पाच-पाचशे क्षीणास्रव भिक्खूंना घेऊन उभे राहिले. पियदस्सी नावाचे क्षीणास्रव थेर मोठ्या भिक्खू संघाला घेऊन ईशान्य कोपऱ्यात (पूर्व-उत्तर कोपऱ्यात) उभे राहिले. ราชา กิร สงฺฆมชฺฌํ ปวิสนฺโตเยว สเจ มยา กยิรมานํ เจติยกมฺมํ อนนฺตราเยน นิฏฺฐํ คจฺฉติ ปาจิน-ทกฺขิณ-ปจฺฉิม-อุตฺตรปสฺเสสุ พุทฺธรกฺขิต-จมฺมรกฺขิต-สงฺฆรกฺขิต-อานณฺท นามกา เถรา อตฺตนาสทิสนามเก ปญฺจปญฺจสตภิกฺขุ คเหตฺวา ติฏฺฐนฺตุ ปิยทสฺสิ นาม เถโร ปุพฺพุตฺตรกณฺเณ ภิกฺขุสงฺฆํ คเหตฺวา ติฏฺฐตูติ จินฺเตสิ. เถราปิ รญฺโญ อธิปฺปายํ ญตฺวา ตถา ฐิตาติ วทนฺตี สิทฺธตฺเถโร ปน มงฺคโล-สุมโน-ปทุโม-สีวลิ-จณฺทคุตฺโต-สูริยคุตฺโต-อิณฺทคุ- ตฺโต-สาคโร-จิตฺตเสโน -ชยเสโน-อจโลติ อิเมหิ เอกาทสหิ เถเรหิ ปริวุโต ปุณฺณฆเฏ ปูรโต กตฺวา ปุรตฺถาภิมุโข อฏฺฐาสิ. राजाने संघामध्ये प्रवेश करतानाच असा विचार केला होता की, 'जर माझ्याकडून केले जाणारे चेतियकाम (स्तूपाचे काम) विना अडथळा पूर्ण होणार असेल, तर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम आणि उत्तर दिशांना अनुक्रमे बुद्धरक्खित, धम्मरक्खित, संघरक्खित आणि आनंद नावाचे थेर आपल्यासारखेच नाव असलेल्या प्रत्येकी पाच-पाचशे भिक्खूंना घेऊन उभे राहोत आणि पियदस्सी नावाचे थेर ईशान्य कोपऱ्यात भिक्खू संघाला घेऊन उभे राहोत.' थेरांनी देखील राजाचा मनोदय जाणून घेऊन तसेच केले, असे म्हणतात. सिद्ध थेर मात्र मंगल, सुमन, पदुम, सीवली, चंदगुत्त, सुरियगुत्त, इंदगुत्त, सागर, चित्तसेन, जयसेन आणि अचल या अकरा थेरांनी वेढलेले असून, पूर्णघट पुढे ठेवून पूर्वेकडे तोंड करून उभे राहिले. อถ ราชา ตถา ฐิตํ ภิกฺขุสงฺฆํ ทิสฺวา ปสนฺนจิตฺโต คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺวา ปทกฺขิณํ กตฺวา จตูสุ ฐาเนสุ วนฺทิตฺวา ปุณฺณสฏฏฺฐานํ ปวิสิตฺวา สุยณฺณขีเล ปฏิมุกฺกํรชตมยํ ปริพฺภมน ทณฺฑํ วิชฺชมานมาตาปิตูนํ อุภโต สุชาเตน สุมณฺฑิต ปสาธิเตน อภิมงฺคล สมฺมเตน อมจฺจปุตฺเตน คาหาเปตฺวา มหนฺตํ เจติยาวฏฺฏํ กาเรตุํ อารภิ. ตถา กาเรนฺตํ ปน สิทฺธตฺถตฺเถโร นิวาเรสิ. เอวํ กิรสฺส อโหสิ - ยทิ มหาราชา มหนฺตํ เจติยํ กโรติ, อนิฏฺฐิเตเยว มริสฺสติ อนาคเต ทุปฺปริหริยญฺจ ภวิสฺสตีติ. ตสฺมึ ขเณ ภิกฺขุสงฺโฆ มหา ราช เถโร ปาณฺฑิโต, เถรสฺส วจนํ กาตุํ วฏฺฏตีติ อาห. त्यानंतर राजाने अशा प्रकारे स्थित असलेल्या भिक्खू संघाला पाहून, प्रसन्न चित्ताने गंध-माला इत्यादींनी पूजा करून, प्रदक्षिणा घालून, चार ठिकाणी वंदन करून, पूर्ण घट असलेल्या ठिकाणी प्रवेश केला. त्याने सोन्याच्या खांबाला जोडलेला चांदीचा फिरणारा दांडा, ज्याचे माता-पिता जिवंत आहेत, जो दोन्ही बाजूंनी सुजात (उच्च कुळातील), सुशोभित, अलंकृत आणि अत्यंत मंगल मानला गेलेला आहे, अशा एका अमात्यपुत्राला (मंत्र्यांच्या मुलाला) पकडायला लावून, महास्तूप (चेतिय) वर्तुळ आखण्यास सुरुवात केली. परंतु, तसे करत असताना सिद्धत्थ थेरांनी त्याला रोखले. त्यांच्या मनात असा विचार आला की - जर महाराजांनी एवढा मोठा स्तूप बांधायला घेतला, तर तो पूर्ण होण्यापूर्वीच त्यांचा मृत्यू होईल आणि भविष्यात ते सांभाळणे कठीण होईल. त्या क्षणी भिक्खू संघ म्हणाला, 'महाराज! थेर पंडित आहेत, थेरांचे वचन ऐकणे योग्य आहे.' ราชา ภิกฺขุสงฺฆสฺส อธิปฺปายํ ญตฺวา เถโร กโรตีติ มญฺญมาโน กีทิสํ ภนฺเต ปมาณํ กโรมีติ อาห. เถโร มม คตคตฏฺฐานโต เจติยาวฏฺฏํ กโรหีติ วตฺวา อุปทิสนฺโต อาวิชฺฌิตฺวา อคมาสิ. ราชา เถรสฺส วุตฺตนเยน เจติยาวฏฺฏํ กาเรตฺวา เถรํ อุปสงฺกมิตฺวา นามํ ปุจฺฉิตฺวา คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺวา วมฺพตฺวา ปริวาเรตฺวา ฐิเต เสส เอกาทส เถเร จ อุปสงฺกมิตฺวา ปูเชตฺวา วนฺทิตฺวา เตสํ นามานิ จ ปุจฺฉิตฺวา ปริพฺภมน ทณฺฑคาหกสฺส อมจฺจ ปุตฺตสฺส ตาม ปุจฺฉิ. राजाने भिक्खू संघाचा अभिप्राय जाणून, 'थेर जसे सांगतील तसे करावे' असा विचार करून विचारले, 'भन्ते! मी किती आकाराचा (स्तूप) करू?' थेर म्हणाले, 'मी जिथे जिथे जाईन, तिथून स्तूपाचे वर्तुळ आख.' असे सांगून ते मार्गदर्शन करत फिरू लागले. राजाने थेरांनी सांगितलेल्या पद्धतीने स्तूपाचे वर्तुळ आखून, थेरांच्या जवळ जाऊन त्यांचे नाव विचारले आणि गंध-माला इत्यादींनी त्यांची पूजा करून वंदन केले. त्यानंतर त्यांच्या भोवती वेढून राहिलेल्या इतर अकरा थेरांच्या जवळ जाऊन, त्यांची पूजा व वंदन करून त्यांची नावे विचारली आणि फिरणारा दांडा पकडलेल्या अमात्यपुत्राचे नावही विचारले. อหํ เทว สุปฺปติฏฺฐิต พฺรหฺมา นามาติ วุตฺเต ตว ปิตา กึ นาโมติ ปุจฺฉิตฺวาน นณฺทิเสโน นามาติ วุตฺเต มาตุนามํ ปุจฺฉิ. สุมนาเทวี นามาติ วุตฺเต สพฺเพสํ นามานิ อภิมงฺคลสมฺมตานิ, มยา กยรมานํ เจติยกมฺมํ อวสฺสํ นิฏฺฐานํ คจฺฉติติ หฏฺโฐ อโหสิ, ตโต ราชา มชฺเฌ อฏฺฐ สุวณฺณฆเฏ รชตฆเฏ จ ฐปาเปตฺวา เต ปริวาเรตฺวา อฏฺฐุตฺตรสยสฺส ปุณฺณฆเฏ ฐปาเปสิ. त्याने 'महाराज, माझे नाव सुप्पतिट्ठित ब्रह्मा आहे' असे म्हटल्यावर, 'तुझ्या वडिलांचे नाव काय?' असे विचारले. 'नंदिसेन' असे उत्तर मिळाल्यावर आईचे नाव विचारले. 'सुमनादेवी' असे उत्तर मिळाल्यावर, 'सर्वांची नावे अत्यंत मंगल आणि शुभ आहेत, माझ्याकडून केले जाणारे स्तूपाचे काम नक्कीच पूर्णत्वास जाईल' असे समजून राजा अत्यंत हर्षित झाला. त्यानंतर राजाने मध्यभागी आठ सोन्याचे घट आणि चांदीचे घट ठेवले आणि त्यांच्याभोवती एकशे आठ पूर्ण घट (मंगल कलश) ठेवले. อถ อฏฺฐ สุวณฺณิฏฺฐกา ฐปาเปสิ. ตาสุ เอเกกํ ปริวาเรตฺวา อฏฺฐุตฺตรสต อฏฺฐุตฺตรสต รชติฏฺฐกาโย. อฏฺฐุตฺตรสต อฏฺฐุตฺตรสต วตฺถานิ จ ฐปาเปสิ. อถ สุปฺปติฏฺฐิต พฺรหฺมนาเมน อมจฺจปุตฺเตน เอกํ สุวณฺณิฏฺฐกํ คาหาเปตฺวา เตน สทิส นาเมหิ จ ชีวมานก มาตาปิตูหิ สตฺตหิ อมจฺจปุตฺเตหิ เสส สตฺติฏฺฐกาโย คาหาเปสิ. त्यानंतर त्याने आठ सोन्याच्या विटा ठेवल्या. त्यातील प्रत्येकाभोवती एकशे आठ चांदीच्या विटा आणि एकशे आठ वस्त्रे ठेवली. मग सुप्पतिट्ठित ब्रह्मा नावाच्या अमात्यपुत्राकडून एक सोन्याची वीट पकडायला लावली आणि त्याच्यासारखीच शुभ नावे असलेल्या व ज्यांचे माता-पिता जिवंत आहेत अशा इतर सात अमात्यपुत्रांकडून उर्वरित सात विटा पकडायला लावल्या. ตสฺมึ ขเณ มิตฺตตฺเถโร นาม ปุรตฺถิม ทิสาภาเค ปริพฺภมิต เลขาย ภูมิยํ คณฺธปิณฺฑํ ฐเปสิ. ชยเสนตฺเถโร นาม อุทกํ อาสิญฺจิตฺวา สนฺตินฺเตตฺวา สมํ อกาสิ. สุปฺปติฏฺฐิตพฺรหฺมา ภทฺท นกฺขตฺเตน เอวํ นานาวิธ มงฺคลานิสงฺขฏฏฺฐาเน ปฐมํ มงฺคลิกฏฺฐกํ ปติฏฺฐาเปสิ. สุมนตฺเถโรนาม ชาติสุมนปุปฺเผหิ ตํ ปูเชสิ. ตสฺมึ ขเณ อุทกปริยนฺตํ กตฺวา มหาปถวิ กมฺโป อโหสิ. เอเตเนว นเยน เสส สตฺติฏฺฐกาโยปิ ปติฏฺฐาเปสุํ. त्याच क्षणी, मित्त थेरांनी पूर्व दिशेला आखलेल्या रेषेवर जमिनीवर गंधपिंड (सुगंधी गोळा) ठेवला. जयसेन थेरांनी पाणी शिंपडून, मंत्रोच्चार करून ती जागा समतल केली. सुप्पतिट्ठित ब्रह्माने भद्र नक्षत्रावर अशा विविध प्रकारच्या मंगल विधींनी युक्त असलेल्या ठिकाणी पहिली मंगल वीट स्थापित केली. सुमन थेरांनी जाईच्या फुलांनी तिची पूजा केली. त्या क्षणी समुद्राच्या पाण्यापर्यंत संपूर्ण पृथ्वी कंपित झाली. याच पद्धतीने उर्वरित सात विटाही स्थापित करण्यात आल्या. ตโต ราชา รชติฏฺฐกาโยปิ ปติฏฺฐาเปตฺวา คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺวา มงฺคลวิธานํ นิฏฺฐาเปตฺวา สุวณฺณเปลายปุปฺผานิ คาหาเปตฺวา ปาจีนปสฺเส ภิกฺขุสงฺฆสฺส ปุรโต ฐิตํ มหา พุทฺธรกฺขิตตฺเถรํ อุปสงฺกมิตฺวา คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺวา วนฺทิตฺวา เถรสฺส ปริวาเรตฺวา ฐิต ภิกฺขูนญฺจ นามานิ ปุจฺฉิตฺวา ตโต ทกฺขิณปสฺเส ฐิตํ มหาธมฺมรกฺขิตตฺเถรํ ปจฺฉิมปสฺเส ฐิตํ มหาสงฺฆรกฺขิตตฺเถรํ อุตฺตรปสฺเส ฐิตํ อานณฺทตฺเถรญฺจ อุปสงฺกมิตฺวา คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺวา ปญฺจปติฏฺฐิเตน วนฺทิตฺวา ตเถว นามานิ ปุจฺฉิตฺวา ปุพฺพุตฺตร กณฺณํ คนฺตฺวา ตตฺถ ฐิตํ ปิยทสฺสิ มหาเถรํ วนฺทิตฺวา ปูเชตฺวา นามานิ ปุจฺฉิตฺวา สนฺติเก อฏฺฐาสิ. त्यानंतर राजाने चांदीच्या विटाही स्थापित केल्या, गंध-माला इत्यादींनी पूजा करून मंगल विधी पूर्ण केला. सोन्याच्या करंडकातील फुले घेऊन, पूर्व दिशेला भिक्खू संघाच्या समोर उभे असलेल्या महा बुद्धरक्खित थेरांच्या जवळ जाऊन, गंध-माला इत्यादींनी त्यांची पूजा करून वंदन केले आणि थेरांच्या भोवती असलेल्या भिक्खूंची नावे विचारली. त्यानंतर दक्षिण दिशेला उभे असलेल्या महा धम्मरक्खित थेरांच्या जवळ, पश्चिम दिशेला उभे असलेल्या महा संघरक्खित थेरांच्या जवळ आणि उत्तर दिशेला उभे असलेल्या आनंद थेरांच्या जवळ जाऊन, गंध-माला इत्यादींनी त्यांची पूजा केली, साष्टांग (पंचप्रतिष्ठित) वंदन केले आणि त्यांची नावे विचारली. मग ईशान्य कोपऱ्यात जाऊन तिथे उभे असलेल्या पियदस्सी महाथेरांना वंदन व पूजा करून, त्यांचे नाव विचारून तो त्यांच्या जवळ उभा राहिला. เถโร มงฺคลํ วฑฺเฒนฺโต รญฺโญ ธมฺมํ เทเสสิ. มงฺคลปริโยสาเน สมฺปตฺต คิหิปริสาสุ จตฺตาลีส สหสฺสานิ อรหนฺโต ปติฏฺฐหึสุ. จตฺตาลีส สหสฺสานิ โสตาปตฺติผโล สหสฺสํ สกทาคามิผเล, สหสฺสํ อนาคามิผเล, ภิกฺขูนํ ปน อฏฺฐารสสหสฺสานิ อรหตฺตํ ปาปุณึสุ. ภิกฺขุนีนํ จตุทฺทส สหสฺสานีติ. थेरांनी मंगल कामना करत राजाला धम्म उपदेश केला. उपदेशाच्या शेवटी, तिथे उपस्थित असलेल्या गृहस्थ समुदायातील चाळीस हजार लोक अर्हत पदावर प्रतिष्ठित झाले. चाळीस हजार लोक सोतापन्न फलाला, एक हजार सकदागामी फलाला आणि एक हजार अनागामी फलाला प्राप्त झाले. भिक्खूंपैकी अठरा हजार भिक्खूंनी अर्हत पद प्राप्त केले आणि भिक्खुणींपैकी चौदा हजार भिक्खुणींनी अर्हत पद प्राप्त केले. ถูปารมฺห กถา थूपाराम कथा (स्तूपाच्या आरंभाची कथा) ๒๑. ตโต ราชา ภิกฺขุสงฺฆํ วนฺทิตฺวา ยาจ มหาเจติยํ นิฏฺฐาตินาว เม ภิกฺขุสงฺโฆ ภิกฺขํ คณฺหาตูติ อาห. ภิกฺขู นาธิวาเสสุ, อนุปุพฺเพน ยาจนฺโต อุปลฺลภิกฺขูนํ สตฺตาหํ อธิวาสนํ ลภิตฺวา ถูปฏฺฐานสฺส สมนฺตโต อฏฺฐารสสุ ฐาเนสุ มณฺฑเป การยิตฺวา ภิกฺขุสงฺฆํ นิสีทาเปตฺวา สตฺตาหํ มหาทานํ ทตฺวา สพฺเพสํเยว เตล-มธุ-ปาณิตาทิ เภสชฺชํ ทตฺวา ภิกฺขุสงฺฆํ วิสฺสชฺเชสิ ตโต นคเร เภรึจาราเปตฺวา สพฺเพ อิฏฺฐก วฑฺฒกิ สนฺติปาเตสิ. เต ปญฺจสตมตฺตา อเหสุํ. २१. त्यानंतर राजाने भिक्खू संघाला वंदन करून विचारले, 'जोपर्यंत महास्तूप पूर्ण होत नाही, तोपर्यंत भिक्खू संघाने माझ्याकडूनच भिक्षा ग्रहण करावी.' भिक्खूंनी हे स्वीकारले नाही. वारंवार विनंती केल्यावर, राजाला भिक्खू संघाकडून सात दिवसांची संमती मिळाली. त्याने स्तूपाच्या जागेभोवती अठरा ठिकाणी मंडप उभारले, तिथे भिक्खू संघाला बसवून सात दिवस महादान दिले. सर्वांना तेल, मध, गूळ इत्यादी औषधे देऊन भिक्खू संघाला निरोप दिला. त्यानंतर नगरात दवंडी पिटवून सर्व वीटकाम करणाऱ्या कारागिरांना (गवंड्यांना) एकत्र बोलावले. ते सुमारे पाचशे होते. เตสุ เอโก อหํ รญฺโญ จิตฺตํ อาราเธตฺวา มหาเจติยํ กาตุํ สกฺโกมีติ ราชานํ ปสฺสิ ราชา กถํ กโรสีติ ปุจฺฉิ. อหํ เทว เปสิกานํ สตํ คเหตฺวา เอกาหํ เอกํ ปํสุสกฏํ เขเปตฺวา กมฺมํ กโรมีติ อาห. ราชา เอวํ สติ ปํสุราสิกํ ภวิสฺสติ. ติณรุกฺขาทีนิ อุปฺปชฺชิสฺสนฺติ อทฺธานํ นปฺปวตฺตตีติ ตํ ปฏิพาหิ. त्यांच्यापैकी एकाने, 'मी राजाचे मन प्रसन्न करून महास्तूप बांधू शकेन' असा विचार करून राजाची भेट घेतली. राजाने विचारले, 'तू हे कसे करशील?' तो म्हणाला, 'महाराज! मी शंभर मजूर घेऊन एका दिवसात मातीची एक गाडी संपवून काम करीन.' राजा म्हणाला, 'असे केल्यास मातीचा ढीग तयार होईल. त्यावर गवत, झाडे इत्यादी उगवतील आणि ते दीर्घकाळ टिकणार नाही.' असे सांगून राजाने त्याला नकार दिला. อญฺโญ อหํ ปุริสสตํ คเหตฺวา เอกาหํ เอกํ ปํสุคุมฺพํ เขเปตฺวา กมฺมํ กโรมีติ อาห. दुसरा म्हणाला, 'मी शंभर माणसे घेऊन एका दिवसात मातीचा एक ढीग संपवून काम करीन.' อญฺโญ ปํสูนํ ปญฺจมฺมณานิ เขเปตฺวา กมฺมํ กโรมีติ อาห. तिसरा म्हणाला, 'मी पाच अम्मण (एक माप) माती संपवून काम करीन.' อญฺโญ ทฺเว อมฺมณานิ เขเปตฺวา กมฺมํ กโรมีติ อาห. เตปิ ราชา ปฏิพาหิเยว. चौथा म्हणाला, 'मी दोन अम्मण माती संपवून काम करीन.' राजाने त्यांनाही नकारच दिला. อถ อญฺโญ ปณฺฑิโต อิฏฺฐก วฑฺฒกี อหํ เทว อุทุกฺขเล โกฏฺเฏตฺวา สุปฺเปหิ วฏฺเฏตฺวา นิสเทปึสิตฺวา ปํสูนํ เอกมฺมณํ เอกาเหเนว เขเปตฺวา เปสิกานํ สตํ คเหตฺวา กมฺมํ กโรมีติ อาห. त्यानंतर एका बुद्धिमान वीटकाम करणाऱ्या कारागिराने (गवंड्याने) म्हटले, 'महाराज! मी उखळात कुटून, सुपाने पाखडून, पाटा-वरवंट्यावर वाटून, एका दिवसात फक्त एक अम्मण माती वापरून, शंभर मजूर घेऊन काम करीन.' ราชา เอวํ สติ มหาเจติเย ติณาทีนิ น ภวิสฺสนฺติ จิรฏฺฐิติกญฺจ ภวิสฺสติติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา ปุน ปุจฺฉิ-กึ สณฺฐานํ ปน กริสฺสสีติ. राजाने विचार केला, 'असे केल्यास महास्तूपावर गवत इत्यादी उगवणार नाही आणि तो दीर्घकाळ टिकेल.' हे मान्य करून त्याने पुन्हा विचारले, 'पण तू त्याचा आकार कसा बनवशील?' ตสฺมึ ขเณ วิสฺสกมฺม เทวปุตฺโต วฑฺฒกิสฺส สรีเร อธิมุจฺจิ. วฑฺฒกี สุวณฺณปาตึ ปูเรตฺวา อุทกมาหราเปตฺวา ปาณินา อุทกํ คเหตฺวา อุทกปิฏฺฐิยํ อาหนิ. เอฬิกฆฏ สทิสํ มหนฺตํ อุทกพุพฺพุลํ อุฐฺฐาสิ. เทว อีทิสํ กโรมีติ อาห. त्या क्षणी विश्वकर्म देवपुत्राने सुताराच्या शरीरात प्रवेश केला. सुताराने सोन्याचे पात्र पाण्याने भरून आणवले आणि हाताने पाणी घेऊन पाण्याच्या पृष्ठभागावर मारले. तेव्हा घागरीसारखा एक मोठा पाण्याचा बुडबुडा वर उठला. तो म्हणाला, 'महाराज, मी असे (स्तूप) बनवू का?' ราชา สาธูติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา ตสฺส สหสฺสคฺฆนกํ สาฏก ยุคลํ, สหสฺสคฺฆนกํเยว ปุณฺณกํ นาม สุวณฺณาลงฺการํ สหสฺสคฺฆนกา ปาทุกา, ทฺวาทส กหาปน สหสฺสานิ จ ทตฺวา อนุรูปฏฺฐาเน เคหญฺจ เขตฺตญฺจ ทาเปสิ. राजाने 'फार छान' असे म्हणून ते स्वीकारले आणि त्याला एक हजार मूल्य असलेली वस्त्रांची जोडी, एक हजार मूल्य असलेला 'पुण्णक' नावाचा सोन्याचा अलंकार, एक हजार मूल्य असलेल्या पादुका आणि बारा हजार कहापण दिले, तसेच योग्य ठिकाणी घर आणि शेतही देववले. ตโต ราชารตฺติภาเค จินฺเตสิ กถํ นาม มนุสฺเส อปีเลตฺวา อิฏฺฐกา อาหราเปยฺยนฺติ เทวตา รญฺโญ จิตฺตํ ญตฺวา เจติยสฺส จตุสุ ทฺวาเรสุ เอเกกทิวสปฺปโหณกํ กตฺวา ตสฺสาเยว รตฺติยา อิฏฺฐการาสึ อกํสุ วิหาตาย รตฺติยา มนุสฺสา ทิสฺวา รญฺโญ อาโรเจสุํ. ราชา ตุสฺสิตฺวา วฑฺฒกึ กมฺเม ปฏฺฐเปสิ. เทวตา เอเตเนว นเยน ยาว มหาเจติยสฺส นิฏฺฐานํ ตาว เอเกกสฺส ทิวสสฺส ปโหณกํ กตฺวา อิฏฺฐกา อาหรึสุ. สกลทิวสภาเค กมฺมํ กตฏฺฐาเน มตฺติกา อิฏฺฐก จุณฺณํ วาปิ น ปญฺญายติ. รตฺติยํ เทวตา อนฺตรธาเปนฺติ. त्यानंतर राजाने रात्रीच्या वेळी विचार केला की, 'लोकांना त्रास न देता विटा कशा आणवाव्यात?' देवतेने राजाचे मन जाणून घेऊन, चैत्याच्या चारही दारांवर प्रत्येक दिवसाला पुरेल एवढ्या विटांचे ढीग त्याच रात्री तयार केले. रात्र संपल्यावर लोकांनी ते पाहिले आणि राजाला सांगितले. राजाने प्रसन्न होऊन सुताराला कामाला लावले. देवतेने याच पद्धतीने महाचैत्याचे काम पूर्ण होईपर्यंत प्रत्येक दिवसाला पुरतील एवढ्या विटा आणून दिल्या. दिवसभर काम केलेल्या ठिकाणी माती किंवा विटांचा चुरा देखील दिसत नसे. रात्रीच्या वेळी देवता ते नाहीसे करत असत. อถ ราชา มหาเจติเยกมฺมการายจตุปริสายหตฺถ กมฺมมูลตฺถํจตุสุ ทฺวาเรสุ เอเกกสฺมึ ทฺวาเร โสฬส กหาปน สหสฺสานิ วตฺถาลงฺการ-คนฺธ-มาล-เตล-มธุ-ผาณิต-ปญฺจกฏุก เภสชฺชานิ นานาวิธ สูปวฺยญฺชน สํยุตฺตํ ภตฺตํ ยาคุขชฺชกาทีนิ อฏฺฐวิธ กปฺปิยย ปานกานิ ปญฺจวิธ มุขวาส สหิต ตามฺพูลานิ จ ฐปาเปตฺวา มหาเจติเย กมฺมํ กโรนฺตาคหฏฺฐา วา ปพฺพชิตา วา ยถาชฺฌาสยํ คณฺหนฺตุ มุลํ อคเหตฺวา กมฺมํ กโรนฺตานํ กาตุํ น เทถาติ อาณาเปสิ. नंतर राजाने महाचैत्याचे काम करणाऱ्या चारही परिषदांना त्यांच्या श्रमाचा मोबदला देण्यासाठी चारही दारांपैकी प्रत्येक दारावर सोळा हजार कहापण, वस्त्रे, अलंकार, गंध, माळा, तेल, मध, गूळ, पाच तिखट औषधे, विविध प्रकारच्या आमटी व भाज्यांनी युक्त भात, पेज व खाद्यान्न इत्यादी, आठ प्रकारची कप्पिय पेये आणि पाच प्रकारच्या मुखवासासह विडे ठेवले; आणि आज्ञा दिली की, 'महाचैत्याचे काम करणारे गृहस्थ असोत वा प्रव्रजित, त्यांनी आपल्या इच्छेनुसार हे घ्यावे. मोबदला घेतल्याशिवाय कोणालाही काम करू देऊ नका.' อเถโก เถโร เจติยกมฺเม สหาย ภาวํ อิจฺฉนฺโต กมฺมกรณฏฺฐาเน มตฺติกา สทิสํ กตฺวา อตฺตานํ อภิสงฺขฏํ มตฺติกา ปิณฺฑํ เอเกน หตฺเถน คเหตฺวา อญฺเญน มาลา คเหตฺวา มหาเจติยงฺคณํ อารุยฺห ราชกมฺมิเก วญฺเจตฺวา วฑฺฒกิสฺส อทาสิ. โส คณฺหนฺโตว ปกติมตฺติ กา นา ภวตีติ ญตฺวา เถรสฺส มุขํ โอโลเกสิ ตสฺสาการํ ญตฺวา ตตฺถ โกลาหล มโหสิ อนุกฺกเมน ราชา สุตฺวา อาคนฺตฺวา วฑฺฒกึ ปุจฺฉิ-ตุยฺหํ กิร ภเณ เอโก ภิกฺขุ อมูลก มตฺติกาปิณฺฑํ อทาสีติ. तेव्हा एका थेरांनी चैत्यकामात हातभार लावण्याची इच्छा धरून, काम करण्याच्या ठिकाणी असलेल्या मातीसारखाच स्वतः तयार केलेला मातीचा गोळा एका हाताने धरून आणि दुसऱ्या हाताने पुष्पमाळ घेऊन, महाचैत्याच्या अंगणात चढून राजाच्या कर्मचाऱ्यांना चकवले व तो गोळा सुताराला दिला. तो घेतानाच 'ही सामान्य माती नाही' हे ओळखून सुताराने थेरांच्या मुखाकडे पाहिले. त्यांचा भाव ओळखून तिथे कोलाहल झाला. अनुक्रमाने राजाने हे ऐकले आणि तिथे येऊन सुताराला विचारले, 'अरे भल्या माणसा, तुला म्हणे एका भिक्खूंनी मोबदला न घेता मातीचा गोळा दिला?' โส เอวมาห-เยภุยฺเยน อยฺยา เอเกน หตฺเถน ปุปฺผํ เอเกน มตฺติกาปิณฺเฑ คเหตฺวา อาหริตฺวา เทนฺติ เตนาหํ อชานิตฺวา กมฺเม อุปเนสึ ‘‘อยํ ปน อาคนฺตุโก, อยํ เนวาสิโกติ เอตฺตกํ ชานามีติ.‘‘เตน หิ ตํ เถรํ อิมสฺส ทสฺเสหีติ เอกํ มหลฺลก พลตฺถํ วฑฺฒกิสฺส สนฺติเก ฐเปสิ วฑฺฒกี ปุน อาคตกาเล ตํ เถรํ พลตฺถสฺส ทสฺเสสิ โส ตํ สญฺชานิตฺวา รญฺโญ อาโรเจสิ. तो म्हणाला, 'बहुतेक करून पूजनीय भिक्खू एका हाताने फूल आणि एका हाताने मातीचा गोळा घेऊन येतात आणि देतात, त्यामुळे मी न जाणता तो कामात वापरला. पण हे बाहेरून आलेले (आगंतुक) आहेत आणि हे येथील रहिवासी आहेत एवढेच मला ठाऊक आहे.' 'तर मग त्या थेरांना याला दाखव' असे म्हणून राजाने एका वृद्ध रक्षकाला सुताराच्या जवळ ठेवले. सुताराने ते थेर पुन्हा आल्यावर त्यांना रक्षकाला दाखवले. त्याने त्यांना ओळखून राजाला कळवले. ราชา ตสฺส สญฺญํ อทาสิ. โต ตฺวํ ตโย ชาติสุมน มกุลกุมฺเภ มหาโพธิ องฺคเณ ราสึ กตฺวา คณฺธญฺจ ฐเปตฺวา มหาโพธิ องฺคณํ คต กาเล อาคนฺตุกสฺส เถรสฺส ปูชนตฺถาย รญฺโญ ทาปิตํ คณฺธมาลานฺติ วตฺวา เทหีติ. พลตฺโถ รญฺโญ วุตฺตนเยเนว ตสฺส โพธิ องฺคณํ คต กาเล ตํ คณฺธมาลํ อทาสิ. राजाने त्याला सूचना दिली, 'तू जाईच्या कळ्यांनी भरलेले तीन कुंभ महाबोधीच्या अंगणात एकत्र करून आणि सुगंधी द्रव्ये ठेवून, ते थेर महाबोधीच्या अंगणात गेल्यावर बाहेरून आलेल्या थेरांच्या पूजेसाठी राजाने पाठवलेली ही गंध आणि पुष्पमाळ आहे असे सांगून त्यांना दे.' रक्षकाने राजाने सांगितल्याप्रमाणेच ते थेर बोधी अंगणात गेल्यावर त्यांना ती गंध आणि पुष्पमाळ दिली. โสปิ โสมนสฺสปฺปตฺโต หุตฺวา เสลสณฺถรํ โธวิตฺวา คณฺเธน ปริภณฺฑํ กตฺวา สิลาสนฺถรํ กตฺวา ปุปฺผํ ปูเชตฺวา จตุสุ ฐาเนสุ วนฺทิตฺวา ปาจีนทฺวาเร อญฺชลึ ปคฺคยฺห ปีตึ อุปฺปาเทตฺวา ปุปฺผ ปูชํ โอโลเกนฺโต อฏฺฐาสิ. ते देखील अत्यंत प्रसन्न झाले आणि त्यांनी दगडाचा ओटा धुवून, त्याला सुगंधी द्रव्याने लेप दिला, त्यावर फुलांची पूजा केली, चारही बाजूंनी वंदन केले आणि पूर्व दाराकडे हात जोडून मनात प्रीती उत्पन्न करत फुलांच्या पूजेकडे पाहत ते उभे राहिले. พลตฺโถ ตสฺมึ กาเล ตํ เถรํ อุปสงฺกมิตฺวา วนฺทิตฺวา เอวมาห. ภนฺเต ตุมฺหากํ เจติยกมฺเม สหายภาวตฺถาย ทินฺนสฺส อมูลก มตฺติกาปิณฺฑสฺส มูลํ ทินฺนภาวํ ราชา ชานาเปติ อตฺตโน วนฺทเนน วนฺทาเปตีติ. ตํ สุตฺวา เถโร อนตฺตมโน อโหสิ. พลตฺโถ ติฏฺฐนฺตุ ภนฺเต ตโย สุมน มกุล กุมฺภาตตฺตกาเนว สุวณฺณปุปฺผานิปิ เอตํ มตฺติกปิณฺฑํ นาคฺฆนฺติ. จิตฺตํ ปสาเทถ ภนฺเตติ ปกฺกามิ. रक्षकाने त्या वेळी त्या थेरांच्या जवळ जाऊन, वंदन करून असे म्हटले, 'भंते, चैत्यकामात हातभार लावण्यासाठी आपण मोबदला न घेता दिलेल्या मातीच्या गोळ्याचे मूल्य दिले गेले आहे, हे राजा आपल्याला कळवत आहे आणि त्यांनी आपले वंदन पाठवले आहे.' ते ऐकून थेर अप्रसन्न झाले. रक्षकाने म्हटले, 'भंते, जाईच्या कळ्यांचे हे तीन कुंभ तर राहू द्या, पण तेवढीच सोन्याची फुले देखील आपल्या त्या मातीच्या गोळ्याच्या मूल्याची बरोबरी करू शकत नाहीत. भंते, आपले मन प्रसन्न ठेवा,' असे म्हणून तो निघून गेला. ตทา โกฏฺฐิวาลชนปเท ปิยงฺคลฺล วิหารวาสี เอโก เถโร อิฏฺฐกวฑฺฒกิสฺส ญาตโก อโหสิ. โส อาคนฺตฺวา วฑฺฒกินา สทฺธึ มนฺเตตฺวา ทีฆ พหล กิริยโต อิฏฺฐกปฺปมาณํ ชานิตฺวา คนฺตฺวา สหตฺเถเนว สกฺกจฺจํ มตฺติกํ มทฺทิตฺวา อิฏฺฐกํ กตฺวา ปจิตฺวา ปตฺตตฺถวิกาย ปกฺขิปิตฺวา ปจฺจาคนฺตฺวา เอเกน หตฺเถน รญฺโญ อิฏฺฐกํ เอเกน ปุปฺผํ คเหตฺวา อตฺตโน อิฏฺฐกาส สทฺธึ รญฺโญ อิฏฺฐกํ อทาสิ. วฑฺฒกี คเหตฺวา กมฺเม อุปเนสิ. तेव्हा कोठ्ठीवाळ जनपदातील पियंगळ विहारात राहणारे एक थेर विटा बनवणाऱ्या सुताराचे नातेवाईक होते. त्यांनी येऊन सुताराशी चर्चा केली आणि लांबी व जाडीनुसार विटांचे माप जाणून घेतले. त्यानंतर जाऊन स्वतःच्या हाताने काळजीपूर्वक माती मळून, वीट तयार करून व ती भाजून, आपल्या पात्राच्या पिशवीत ठेवून ते परत आले. त्यांनी एका हाताने राजाची वीट आणि एका हाताने फूल घेऊन, स्वतःच्या विटेसोबत राजाची वीट सुताराला दिली. सुताराने ती घेऊन कामात वापरली. เถโร สญฺชาต ปีติ โสมนสฺโส มหาเจติเย กมฺมํ กโรนฺโต อิฏฺฐ กสาลปริเวเณ วสติ ตสฺส ตํ กมฺมํ ปากฏํ อโหสิ. ราชา วฑฺฒกึ ปุจฺฉิ-ภเณ เอเกน กิร อยฺเยน อมูลิก อิฏฺฐกา ทินฺนาติ. สจฺจํ เทว, เอเกน อยฺเยน ทินฺน อิฏฺฐกา อมฺหากํ อิฏฺฐกาย สทิสาติ กมฺเม อุปเนสินฺติ อาห. ปุน ตํ อิฏฺฐกํ สญฺชานาสีติ รญฺญา วุตฺเต ญาตกานุคฺคเหน น ชานามีติ อาห. ते थेर मनात प्रीती व आनंद उत्पन्न करून महाचैत्याचे काम करत विटांच्या शाळेच्या परिवेणात राहत होते. त्यांचे ते कृत्य उघड झाले. राजाने सुताराला विचारले, 'अरे भल्या माणसा, एका पूजनीय भिक्खूंनी म्हणे मोबदला न घेता वीट दिली?' तो म्हणाला, 'होय महाराज, एका पूजनीय भिक्खूंनी दिलेली वीट आमच्या विटेसारखीच होती, म्हणून मी ती कामात वापरली.' राजाने विचारले, 'तू ती वीट ओळखू शकशील का?' तेव्हा नातेवाईकावरील अनुग्रहामुळे तो म्हणाला, 'मी ओळखत नाही.' ราชา ยทิ เอวํ ตํ อิมสฺส ทนฺเนหีติ พลตฺถํ ฐเปสิ โส ตํ ปุพฺเพ วิย พลตฺถสฺส ทสฺเสสิ. พลตฺโถ ปริเวณํ คนฺตฺวา สนฺติเก นิสีทิตฺวา ปฏิสณฺถารํ กตฺวา ภนฺเต ตุมฺเห อาคนฺตุกา เนวาสิกาติ ปุจฺฉิ. อาคนฺตุโกมฺหี อุปาสกาติ. กตร รฏฺฐวาสิโก ภนฺเตติ โกฏฺฐิวาลชนปเท ปิยงฺคลฺล วิหารวาสิมฺหิ อุปาสกาติ อิเธว วสถ คจฺฉถาติ. อิธ น วสาม อสุกทิวเส คจฺฉามาติ อาห. พลตฺโถปิ อหมฺปิ ตุมฺเหหิ สทฺธึ อาคมิสฺสามิ. มยฺหมฺปิ คาโม เอตสฺมึเยว ชนปเท อสุก คาโม นามาติ อาห. เถโร สาธูติ สมฺปฏิจฺฉิ. พลตฺโถ ตํ ปวตฺตึ รญฺโญ นิเวเทสิ. राजाने म्हटले, 'जर असे असेल, तर त्यांना याला दाखव' आणि एका रक्षकाला तिथे ठेवले. त्याने पूर्वीप्रमाणेच ते थेर आल्यावर रक्षकाला दाखवले. रक्षकाने परिवेणात जाऊन, त्यांच्या जवळ बसून, कुशल विचारपूस करून विचारले, 'भंते, आपण बाहेरून आलेले आहात की येथील रहिवासी आहात?' 'उपासका, मी बाहेरून आलेलो आहे.' 'भंते, आपण कोणत्या प्रदेशातील रहिवासी आहात?' 'उपासका, मी कोठ्ठीवाळ जनपदातील पियंगळ विहाराचा रहिवासी आहे.' 'आपण येथेच राहणार की जाणार?' 'आम्ही येथे राहत नाही, अमुक दिवशी जाणार आहोत,' असे ते म्हणाले. रक्षकाने म्हटले, 'मी देखील आपल्यासोबत येईन. माझे गाव देखील याच जनपदातील अमुक नावाचे गाव आहे.' थेरांनी 'ठीक आहे' म्हणून संमती दिली. रक्षकाने ती सर्व हकीकत राजाला कळवली. ราชา พลตฺถสฺส สหสฺสคฺฆนกํ วตฺถยุคลํ มหคฺฆํ รตฺตกมฺพลํ อุปาหนยุคํ สุคณฺธเตลนาฬึ อญฺญฺจ พหุํ สมณปริกฺขารํ เถรสฺส เทหีติ ทาเปสิ โสปิ ปริกฺขารํ คเหตฺวา ปริเวณํ คนฺตฺวา เถเรน สทฺธึ รตฺตึ วสิตฺวา ปาโต สทฺธึเยว นิกฺขมิตฺวา อนุปุพฺเพน คนฺตฺวา ปิยงฺคลฺล วิหารสฺส ทิสฺสมาเน ฐาเน สีตจฺฉายาย เถรํ นิสีทาเปตฺวา ปาเท โธวิตฺวา คณฺธเตเลน มกฺเขตฺวา คุโฬทกํ ปาเยตฺวา อุปาหนํ ปฏิมุญฺจิตฺวา อิทํ เม ปริกฺขารํ กุลูปคเถรสฺสตฺถาย คหิตํ, อิทานิ ตุมฺหากํ ทมฺมิ, อิทํ ปน สาฏกยุคํ มม ปุตฺตสฺส มงฺคลตฺถาย คหิตํ, ตุมฺเห จีวรํ กตฺวา ปารุปถาติ วตฺวา เถรสฺส ปาทมูเล ฐเปสิ. राजाने राजसेवकाला एक हजार (कार्षापण) मूल्याची वस्त्रजोडी, मौल्यवान लाल घोंगडी, पादत्राणांची जोडी, सुगंधी तेलाची कुपी आणि इतर अनेक श्रमण-परिकार थेरांना देण्यासाठी दिले. त्यानेही तो परिकार घेतला आणि परिवेणात जाऊन थेरांसोबत रात्र घालवली. सकाळी त्यांच्यासोबतच निघून, अनुक्रमाने प्रवास करत, पियंगल्ल विहाराच्या दृश्यमान ठिकाणी एका थंड छायेत थेरांना बसवले, त्यांचे पाय धुतले, सुगंधी तेल लावले, गुळाचे पाणी पाजले आणि पादत्राणे पायात घालून म्हटले: 'हा परिकार मी कुलोपग थेरांसाठी घेतला होता, आता तो मी आपल्याला देत आहे. आणि ही वस्त्रजोडी माझ्या मुलाच्या मंगलकार्यासाठी घेतली होती, आपण याचे चीवर बनवून परिधान करावे.' असे म्हणून त्याने ते थेरांच्या चरणांशी ठेवले. เถโร สาฏกยุคํ ปตฺตตฺถวิกาย ปกฺขิปิตฺวา เสสปริกฺขารํ ภณฺฑิกํ กตฺวา อุปาหนํ อารุยฺหํ กตฺตยฏฺฐึ คเหตฺวา มคฺคํ ปฏฺปชฺชิ. พลตฺโถ เตน สทฺธึ โถกํ คนฺตฺวา ‘‘ติฏฺฐถ ภนฺเต, มยฺหํ อยํ มคฺโค‘‘ติ วตฺวา ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว รญฺโญ สาสนํ เถรสฺส อาโรเจสิ थेरांनी ती वस्त्रजोडी पात्राच्या पिशवीत ठेवली, उर्वरित परिकाराचे गाठोडे बांधले, पादत्राणे घातली आणि काठी हातात घेऊन ते मार्गाला लागले. राजसेवक त्यांच्यासोबत थोडा वेळ गेला आणि म्हणाला, 'थांबा भंते, हा माझा मार्ग आहे.' असे म्हणून त्याने पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच राजाचा संदेश थेरांना ऐकवला. เถโร ตํ สุตฺวา มหนฺเตน ปรกฺกเมน กตกมฺมํ อกตํ วิย ชาตนฺติ โทมนสฺสปฺปตฺโต หุตฺวา อสฺสุธารํ ปวตฺเตตฺวา’อุปาสก ตว ปริกฺขารํ ตฺวเมว คณฺหาหี‘‘ติ ฐิตโกว สพฺพาปริกฺขารํ ฉฑฺเฑสิ พลตฺโถ กึ นาม ภนฺเต วทถ เอส ราชา ตุยฺหํ ภวคฺคปฺปมาณํ กตฺวา ปจฺจยํ เทนฺโตปิ ตว อิฏฺฐกานุรูปํ กาตุํ น สกฺโกติ. เกวลํ ปน มหาเจติเย กมฺมํ อญฺเญสํ อปตฺตกํ กตฺวา กโรมีติ อธิปฺปาเยน เอวํ กาเรติ ตุมฺเห ปน ภนฺเต อตฺตนา ลทฺธปริกฺขารํ คเหตฺวา จิตฺตํ ปสาเทถาติ วตฺวา เถรํ สญฺญาเปตฺวา ปกฺกามิ. อิมสฺมึ ปน เจติเย ภติยา กมฺมํ กตฺวา จิตฺตํ ปสาเทตฺวา สคฺเค นิพฺพตฺต สตฺตานํ ปมาณํ นตฺถิ. थेरांनी ते ऐकले आणि मोठ्या कष्टाने केलेले काम न केल्यासारखे झाले, या विचाराने ते अत्यंत दुःखी झाले. त्यांच्या डोळ्यातून अश्रू वाहू लागले. ते उभे राहूनच म्हणाले, 'उपासका, तुझा परिकार तूच परत घे.' आणि त्यांनी सर्व परिकार तिथेच टाकून दिला. राजसेवक म्हणाला, 'भंते, आपण हे काय बोलत आहात? हा राजा आपल्याला भवग्ग-प्रमाण मानून प्रत्यय (दान) देत असला, तरी तो आपल्या इच्छेनुसार करू शकत नाही. केवळ महाचेतियाचे काम इतरांना वाटा न देता स्वतःच करावे या उद्देशाने तो असे करत आहे. म्हणून भंते, आपण स्वतः मिळालेला परिकार स्वीकारावा आणि आपले चित्त प्रसन्न करावे.' असे सांगून त्याने थेरांना समजावले आणि तो निघून गेला. या चेतियामध्ये मजुरीचे काम करून आणि चित्त प्रसन्न करून स्वर्गात उत्पन्न झालेल्या प्राण्यांची संख्या मोजता येण्यासारखी नाही. ตาวตึส ภวเน กิร นิพฺพตฺต เทวธีตโร อตฺตโน สมฺปตฺตึ โอโลเกตฺวา เกน นุ โก กมฺเมน อิมํ สมฺปตฺตึ ลภิมฺหาติ อาวชฺชมานา มหาเจติเย ภติยา กมฺมํ กตฺวา ลทฺธภาวํ ญตฺวา ภติยา กตกมฺมสฺสาปิ ผลํ อีทิสํ, อตฺตโน สนฺตเกน กมฺมผลํ สทฺทหิตฺวา กตกมฺมสฺส ผลํ กีทิสํ ภวิสฺสตีติ จินฺเตตฺวา ทิพฺพคณฺธมาลํ อาทาย รตฺติภาเค อาคนฺตฺวา ปูเชตฺวา เจติยํ วนฺทนฺติ. असे ऐकिवात आहे की, तावतिंस भवनात उत्पन्न झालेल्या देवकन्यांनी आपली संपत्ती पाहून, 'आम्हाला ही संपत्ती कोणत्या कर्मामुळे मिळाली?' असा विचार केला. तेव्हा त्यांना समजले की, महाचेतियामध्ये मजुरीचे काम केल्यामुळे ही संपत्ती मिळाली आहे. 'मजुरीने केलेल्या कर्माचे फळ जर असे आहे, तर स्वतःच्या मालकीच्या वस्तूने, कर्माच्या फळावर श्रद्धा ठेवून केलेल्या कर्माचे फळ किती मोठे असेल!' असा विचार करून त्या दिव्य गंध आणि पुष्पमाला घेऊन रात्रीच्या वेळी येत असत आणि चेतियाची पूजा करून वंदन करत असत. ตสฺมึ ขเณ ภาติวงฺกวาสี มหาสีวตฺเถโร นาม เจติยํ วนฺทนตฺถาย คโต, ตา วนฺทนฺติโย ทิสฺวา มหาสตฺตปณฺณิรุกฺขสมีเป ฐิโต ตาสํ ยถารุจึ วนฺทิตฺวา คมนกาเล ปุจฺฉิ? ตุมฺหากํ สรีราโลเกน สกลตมฺพปณฺณิทิโป เอกาโลโก, กึ กมฺมํ กริตฺถาติ ภนฺเต อมฺหากํ สนฺตเก กตกมฺมํ นาม นตฺถิ อิมสฺมึ เจติเย มนํ ปสาเทตฺวา ภติยา กมฺมํ กริมฺหาติ อาหํสุ เอวํ พุทฺธสาสเน ปสนฺนจิตฺเตน ภติยา กตกมฺมมฺปิ มหปฺผลํ โหติ. ตสฺมา- त्या वेळी भातिवंकवासी महासीव थेर नावाचे भिक्खू चेतियाला वंदन करण्यासाठी गेले होते. त्यांना वंदन करताना पाहून, महासत्तपण्णी वृक्षाजवळ उभे राहून, त्यांनी त्या देवकन्यांना त्यांच्या इच्छेनुसार वंदन करून परत जाण्याच्या वेळी विचारले: 'तुमच्या शरीराच्या प्रकाशाने संपूर्ण तांबपण्णि द्वीप प्रकाशमान झाला आहे, तुम्ही असे कोणते कर्म केले होते?' त्या म्हणाल्या, 'भंते, आमच्या स्वतःच्या मालकीचे असे कोणतेही कर्म नाही. आम्ही या चेतियामध्ये मन प्रसन्न करून मजुरीचे काम केले होते.' अशा प्रकारे, बुद्धशासनात प्रसन्न चित्ताने मजुरीने केलेले कर्म देखील महाफळ देणारे ठरते. म्हणून - ‘‘จิตฺตปฺปสาทมตฺเตน-สุคเต คติ อุตฺตมา,ลพฺภตีติ วิทิตฺวาน-ถูปปูชํ กเร พุทฺโธ’’ติ; 'सुगतांच्या ठिकाणी केवळ चित्त प्रसन्न केल्याने उत्तम गती प्राप्त होते, हे जाणून ज्ञानी माणसाने थूपाची पूजा करावी.' เอวํ ราชา เจติยกมฺมํ การาเปนฺโต ปุปฺผธานตฺตยํ นิฏฺฐาเปสิ. ตํ ขีณาสว ถิรภาวตฺถาย ภูมิสมํ กตฺวา โอสีทาเปสุํ, เอวํ นววาเร จิตํ จิตํ โอสีทาเปสุํ. ราชา การณํ อชานนฺโต อนตฺตมโน หุตฺวา ภิกฺขุสงฺฆํ สนฺนิปาเตสิ. อสีติ ภิกฺขุสหสฺสานิ สนฺนิปตึสุ ราชา ภิกฺขุสงฺฆํ คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺวา วนฺทิตฺวา ปุจฺฉิ’ภนฺเต มหาเจติเย ปุปฺผธานตฺตยํ นววาเร น ชานามี’ติ ภิกฺขุสงฺโฆ อาห มหาราช ตุยฺหํ กมฺมสฺส วา ชีวิตสฺส วา อนฺตราโย นตฺถิ. อนาคเต ถิรภาวตฺถาย อิทฺธิมนฺเตหิ โอสีทาปิตํ, อิโต ปฏฺฐาย น โอสีทาเปสฺสนฺติ. ตฺวํ อญฺญถตฺตํ อกตฺวา มหาถูปํ สมาเปหีติ. ตํ สุตฺวา หฏฺโฐ ราชา ถูปกมฺมํ กาเรสิ. अशा प्रकारे राजाने चेतियाचे काम करवून घेताना तीन पुष्पधान पूर्ण केले. ते भविष्यात स्थिर राहण्यासाठी क्षीणासवांनी जमिनीच्या बरोबरीने खाली खचवले. अशा प्रकारे नऊ वेळा बांधलेले थर खाली खचवले गेले. राजाला याचे कारण माहीत नसल्यामुळे तो खिन्न झाला आणि त्याने भिक्खू संघाला एकत्र बोलावले. ऐंशी हजार भिक्खू एकत्र आले. राजाने गंध, पुष्प इत्यादींनी भिक्खू संघाची पूजा करून, वंदन करून विचारले, 'भंते, महाचेतियाचे तीन पुष्पधान नऊ वेळा खचले आहेत, याचे कारण मला समजत नाही.' भिक्खू संघ म्हणाला, 'महाराज, तुमच्या कर्माला किंवा जीविताला कोणताही धोका नाही. भविष्यात ते स्थिर राहावे म्हणून ऋद्धिमंत भिक्खूंनी ते खाली खचवले आहे. यापुढे ते खचणार नाही. तुम्ही मनात कोणताही संशय न धरता महास्तूपाचे काम पूर्ण करा.' हे ऐकून राजा अत्यंत हर्षित झाला आणि त्याने स्तूपाचे काम पुढे चालू केले. ทสปุปฺผธานานิ ทสหิ อิฏฺฐกาโกฏีหิ นิฏฺฐนํ คมึสุ ปุน ปุปฺผธานตฺตเย นิฏฺฐิเต ภิกฺขุสงฺโฆ อุตฺตร-สุมน นามเก ทฺเว ขีณาสว สามเณเร อาณาเปสิ. ตุมฺเห สมจตุรสฺสํ อฏฺฐรตน พหลํ เอเกก ปสฺสโต อสีติ อสิติ หตฺถปฺปมาณํ ฉเมทก วณฺณปาสาเณ อาหรถาติ. เต สาธูติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา อุตฺตรกุรุํ คนฺตฺวา จุตฺตปฺปการปฺปมาเณ ภณฺฑิปุปฺผนิเหฉ เมทวณฺณปาสาเณ อาหริตฺวา เอกํ ปาสาณํ ธาตุคพฺภสฺส ภูมิยํ อตฺถริตฺวา จตฺตาโร ปาสาเณ จตุสุ ปสฺเสสุ สํวิธาย อปรํ ธาตุคพฺภํ ปิทหนตฺถาย ปาจีน ทิสาภาเค วาลุก ปาการ สมีเป อทิสฺสมานํ กตฺวา ฐเปสุํ. दहा कोटी विटांनी दहा पुष्पधान पूर्ण झाले. पुन्हा तीन पुष्पधान पूर्ण झाल्यावर भिक्खू संघाने उत्तर आणि सुमन नावाच्या दोन क्षीणासव सामणेरांना आज्ञा केली: 'तुम्ही समचौरस, आठ हात जाडीचे, प्रत्येक बाजूला ऐंशी-ऐंशी हात लांबीचे, मेदवर्ण पाषाण घेऊन या.' त्यांनी 'साधू' म्हणून ते मान्य केले आणि उत्तरकुरुला जाऊन, सांगितलेल्या प्रमाणाचे, भांडिपुष्पासारखे शुभ्र मेदवर्ण पाषाण आणले. त्यांनी एक पाषाण धातूगर्भाच्या जमिनीवर पसरला, चार पाषाण चार बाजूंना लावले आणि दुसरा पाषाण धातूगर्भ झाकण्यासाठी पूर्व दिशेला वाळूच्या भिंतीजवळ अदृश्य करून ठेवला. ๒๒. ตโต ราชา ธาตุคพฺภสฺส มชฺเฌ สพฺพรตนมยํ สพฺพาการสมฺปนฺนํ มโนหรํ โพธิรุกฺขํ กาเรสิ โส หิ อิณฺทนีลมณิภูมิยํ ปติฏฺฐิโต, ตสฺสมูลานิ ปจาฬมยานิ, ขณฺโธ สิริวจฺฉาทีหิ อฏฺฐมงฺคลิเกหิ ปุปฺผปนฺติ ลตาปนฺติ จตุปฺปท หํสปนฺติหิ จ วิจิตฺโต อฏฺฐารส หตฺถุพฺเพโธ รชตมโย อโหสิ. २२. त्यानंतर राजाने धातूगर्भाच्या मध्यभागी सर्व रत्नांनी युक्त, सर्व प्रकारे संपन्न असा एक मनोहर बोधिवृक्ष तयार करवला. तो इंद्रनील मण्यांच्या जमिनीवर प्रतिष्ठित होता. त्याची मुळे प्रवाळाची होती. त्याचा बुंधा श्रीवत्स इत्यादी आठ मांगलिक चिन्हांनी, पुष्पमालांनी, लतावेलींनी, चौपाया प्राण्यांच्या आणि हंसांच्या रांगांनी सुशोभित होता. तो अठरा हात उंच आणि चांदीचा बनवलेला होता. ปญฺจมหาสาขาปิ อฏฺฐารสหตฺถาจ, ปตฺตาปิ มณิมยานิ, ปณฺฑุปตฺตานิ, เหมมยานิ, ผลา ปวาฬมยานิ. ตถา องฺกุโรปริ เจลวิตานํ พณฺธาเปสิ. ตสฺส อนฺเต สมนฺนโต มุตฺตมย กิงฺกิณิกชาลํ โอลมฺพติ. สฺวณฺณฆณฺฏาปนฺติ จ สุวณฺณทามานิ จ ตหึ ตหึ โอลมฺพนฺติ วิตานสฺส จตุสุ กณฺเณสุ นวสตสหสฺสคฺฆนโก เอเกโก มุตฺตากลาโป โอลมฺพติ. ตตฺถ ยถานุรูปํ นานารตน กตาเนว จณฺท-สูริย-ตารการูปานิ ปทุมานิ จ อปฺปิตานิ อเหสุํ. มหคฺฆานิ อเนกวณฺณานิ อฏฺฐุตฺตร สหสฺสานิ วตฺถานิ โอลมฺพึสุ. त्याच्या पाच मुख्य फांद्याही अठरा हात लांबीच्या होत्या. पाने मण्यांची होती, पिकलेली पाने सोन्याची होती आणि फळे प्रवाळाची होती. तसेच, अंकुरांच्या वर कापडी छत बांधले होते. त्याच्या कडेला चहूबाजूंनी मोत्यांची घुंगुरमाळ लटकत होती. सोन्याच्या घंटांची रांग आणि सोन्याच्या माळा जागोजागी लटकत होत्या. छताच्या चार कोपऱ्यांत नऊ लाख मूल्याचा एकेक मोत्यांचा गुच्छ लटकत होता. तिथे योग्यतेनुसार विविध रत्नांनी बनवलेले चंद्र, सूर्य, तारे आणि कमळे बसवलेली होती. मौल्यवान आणि अनेक रंगांची एक हजार आठ वस्त्रे तिथे लटकत होती. ตโต โพธิรุกฺขสฺส สมนฺตโต สตฺต รตนมย เวทิกา กาเรตฺวา มหามลก มุตฺตา อตฺถราเปสิ มุตฺตา เวทิกานํ อนฺตเร คณฺโธทก ปุณฺณ สตฺตรตนมย ปุณฺณฆฏ ปนฺติโย ฐปาเปสิ. ตาสุ สุวณฺณฆเฏ ปวาฬมยานิ ปุปฺผานิ อเหสุํ. ปวาฬฆเฏ สุวณฺณมยานิ ปุปฺผานิ. มณิฆเฏ รชตมยานิ ปุปฺผานิ รชตฆเฏ มณิมยานิปุปฺผาติ. สตฺตรตนฆเฏ สตฺตรตนมยานิ ปุปฺผานิ อเหสุํ. त्यानंतर बोधिवृक्षाच्या चारी बाजूंनी सात रत्नमय वेदिका (कठडे) बनवून त्यावर मोठ्या आवळ्याच्या आकाराचे मोती पसरवले. मोत्यांच्या वेदिकांच्या दरम्यान सुगंधी पाण्याने भरलेल्या सप्तरत्नमय पूर्णघटांच्या (कलशांच्या) रांगा ठेवल्या. त्या सोन्याच्या कलशांमध्ये पोवळ्यांची फुले होती. पोवळ्यांच्या कलशांमध्ये सोन्याची फुले होती. मणीघटांमध्ये (रत्नांच्या कलशांमध्ये) चांदीची फुले आणि चांदीच्या कलशांमध्ये रत्नांची फुले होती. सप्तरत्नघटांमध्ये सप्तरत्नमय फुले होती. โพธิรุกฺขสฺส ปาจีน ทิสาภาเค รตนมเย โกฏิอคฺฆนเก ปลฺลงฺเก ฆนโกฏฺฏิม สุวณฺณมยํ พุทฺธปฏิมํ นิสีทาเปสิ. ตสฺสา ปฏิมาย วีสติ นขา อกฺขินํ เสตฏฺฐานานิ จ ผฬกมยานิ. หตฺถตล ปาทตล ทนฺตาวรณานิ อกฺขีนํ รตฺตฏฺฐาตานิ จ ปวาฬมยานิ เกส ภมุกานิ อกฺขินํ กาฬกฏฺฐานานิ จ อิณฺทนีล มณิมยานิ อุณฺณาโลมํ ปนํ รชตมยํ อโหสิ. ตโต สหมฺปติ มหา พฺรหฺมานํ รชตจฺฉตฺตํ ธาเรตฺวา ฐินํ กาเรสิ. ตตา ทฺวีสุ เทวโลเกสุ เทวตาหิ สทฺธึ วิชยุตฺตรสงฺขํ คเหตฺวา อภิเสกํ ททมานํ สกฺกํ เทวราชานํ ปญฺจสิข เทวปุตฺตํ เพฬุว ปณฺฑุ วีณมาทาย คณฺธพฺพํ กุรุมานํ. มหากาฬ นาคราชานํ นาคกญฺญาปริวุตํ นานาวิเธนถุติโฆเสน ตถาคตํ วณฺเณนฺตํ กาเรสิ. बोधिवृक्षाच्या पूर्व दिशेला कोट्यवधी मूल्याच्या रत्नमय आसनावर भरीव सोन्याची बुद्धमूर्ती प्रस्थापित केली. त्या मूर्तीची वीस नखे आणि डोळ्यांचे पांढरे भाग स्फटिकमय होते. हाताचे तळवे, पायाचे तळवे, ओठ आणि डोळ्यांचे लाल भाग प्रवाळमय (पोवळ्यांचे) होते. केस, भुवया आणि डोळ्यांचे काळे भाग इंद्रनील मणीमय होते, तर उर्णालोम चांदीचा होता. त्यानंतर सहंपती महाब्रह्मदेवाला चांदीचे छत्र धरून उभे केले. तसेच दोन देवलोकांतील देवतांसह विजयोत्तर शंख घेऊन अभिषेक करणाऱ्या देवराज शक्राला आणि बेलुवपंडु वीणा घेऊन गायन करणाऱ्या पंचशिख देवपुत्राला दाखवले. नागकन्यांनी वेढलेल्या महाकाळ नागराजाला विविध प्रकारच्या स्तुतीघोषाने तथागतांचे गुणगान करताना दाखवले. วสวตฺติมารมฺปน พาหุสหสฺสํ มาเปตฺวา ติสูล มุคฺคราทิ นานาวุธานิ คเหตฺวา สหสฺสกุมฺภํ คิริเมขล หตฺถิกฺขณฺธ มารุยฺห มารพลํ ปริวาเรตฺวา โพธิมณฺฑํ อาคนฺตฺวา อเนก ภึสนกํ กุรุมานํ กาเรสิ. เสสาสุ ทิสาสุ ปาจีน ทิสาภาเค ปลฺลงฺกสทิเส โกฏิ โกฏิ อคฺฆนเก ตโย ปลฺลงฺเก อตฺถราเปตฺวา ทนฺตมยํ ทณฺฑํ ปวาฬวีชนึ ฐปาเปสิ. โพธิกฺขณฺธํ อุสฺสีสเก กตฺวา นานารตนํ มณฺฑิตํ โกฏิอคฺฆนกํ รชต สยนํ อตฺถราเปสิ. वसवत्ती माराने हजार हात निर्माण करून, त्रिशूळ, मुद्गर इत्यादी विविध शस्त्रे हाती घेऊन, गिरीमेखल हत्तीवर आरूढ होऊन आणि मारसेनेने वेढून बोधिमंडळावर येत अनेक भयानक कृत्ये करताना दाखवले. उर्वरित दिशांमध्ये, पूर्व दिशेच्या आसनासारखेच कोट्यवधी मूल्याचे तीन पलंग पसरवून हस्तिदंताची दांडी असलेला प्रवाळाचा पंखा ठेवला. बोधिवृक्षाच्या खोडाला उशाशी करून विविध रत्नांनी मढवलेले, कोट्यवधी मूल्याचे चांदीचे शयन (बिछाना) पसरवले. ทสพลสฺส อภิสมฺโพธิมฺปตฺวา อนิมิเสน จกฺขุนา โพธิปลฺลงฺกํ โอโลกิตฏฺฐานํ สตฺตาหเมว รตนจงฺกเม จงฺกมิตฏฺฐานํ โอโลกิตฏฺฐานํ สตฺตาหเมว รตนจงฺกเม จงฺกมิตฏฺฐานํ รตนฆรํ ปวิสิตฺวา ธมฺมสมฺมสิตฏฺฐานํ มุจลิณฺทมูลํ คนฺตฺวา นิสินฺนสฺส มุจลิณฺเทน นาเคน สตฺตกฺขตฺตุํ โภเคหิ ปริกฺขิปิตฺวา อุปริ ผณํ กตฺวา ฐิตฏฺฐานํ, ตโต อชปาล นิคฺโรธ มูลํ คนฺตฺวา นิสินฺนฏฺฐานํ, ตโต ราชายตนํ โภชเน อุปนีเต จตุมหาราเชหิ อุปนีต ปตฺตปฏิคฺคหณํ กาเรสิ. दशबलांनी (बुद्धांनी) संबोधी प्राप्त केल्यानंतर, अनिमिष नेत्रांनी बोधिपलंगाकडे पाहिलेले स्थान, सात दिवस रत्नचक्रमणावर चक्रमण केलेले स्थान, रत्नघरात प्रवेश करून धर्माचे चिंतन केलेले स्थान, मुचलिंद वृक्षाच्या मुळाशी जाऊन बसलेल्या बुद्धांना मुचलिंद नागाने सात वेळा वेटोळे घालून वर फणा धरून रक्षण केलेले स्थान, त्यानंतर अजपाल वडाच्या झाडाखाली जाऊन बसलेले स्थान आणि त्यानंतर राजायतन वृक्षाखाली भोजन आणले असता चार महाराज देवांनी आणलेले भिक्षापात्र स्वीकारल्याचे स्थान दाखवले. ตโต พฺรหฺมายาจนํ ธมฺมจกฺกปฺปวตฺตนํ สสปพฺพชฺชํ, ภทฺทวคฺคิย ปพฺพชฺชํ, เตภาติก ชฏิล ทมนํ, ลฏฺฐิวนุยฺยาเน พิมฺพิสาโรปคมณํ, ราชคหปฺปเวสนํ, เวฬุวน ปฏิคฺคหณํ อสีติ มหาสาวเก จ กาเรสิ ตโต กปิลวตฺถุคมนํ รตนจงฺกเม ฐตฏฺฐานํ, ราหุลปพฺพชฺชํ, นณฺทฺรปพฺพชฺชํ เชตวนปฏิคฺคหณํ, คณฺฑมฺพมูเล ยมก ปาฏิหาริกํ เทวโลเก. त्यानंतर ब्रह्माची याचना, धम्मचक्रप्रवर्तन, यश प्रव्रज्या, भद्रवर्गीय प्रव्रज्या, तीन जटिल बंधूंचे दमन, लठ्ठिवन उद्यानात बिंबिसाराचे आगमन, राजगृह प्रवेश, वेळुवन दान स्वीकारणे आणि ऐंशी महाश्रावक दाखवले. त्यानंतर कपिलवस्तू गमन, रत्नचक्रमणावर उभे राहिलेले स्थान, राहुल प्रव्रज्या, नंद प्रव्रज्या, जेतवन दान स्वीकारणे, गंडंब वृक्षाच्या मुळाशी यमक प्रातिहार्य आणि देवलोकातील गमन दाखवले. ‘‘นิสินฺเน’’ติ กตฺถจิ. काही ठिकाणी 'निसिन्ने' (बसलेले) असे म्हटले आहे. อภิธมฺม เทสนา เทโวโรหณ ปาฏีหีรํ เถรปญฺห สมาคมญฺจ กาเรสิ. अभिधम्म देशना, देवोरोहण प्रातिहार्य आणि थेरप्रश्नांचा समागम (प्रसंग) दाखवला. ตถา มหาสมยสุตฺต-ราหุโลวาท สุตฺต-มงฺคสุตฺตปารายน สุตฺต สมาคมํ ธนปาล-อาฬวก-องฺคุลิมาล-อปลาล ทมนํ อายุสงฺขาร โวสฺสชฺชนํ สูกรมทฺทว ปริคฺคหณํ สิงฺคิวณฺณ วตฺถยุค ปฏิคฺคหณํ ปสนฺโนทกปานํ ปรินิพฺพานํ เทวมนุสฺส ปริเทวนํ มหากสฺสปตฺเถรสฺสภควโตปาทวณฺทนํ สรีร งหนํ อคฺคินิพฺพานํ อาฬาหนสกฺการํ เทเณน พฺราหฺมเณน กตธาตุ วิภาคญฺจ กาเรสิ. तसेच महासमयसुत्त, राहुलोवादसुत्त, मंगलसुत्त आणि पारायणसुत्त यांचा समागम (प्रसंग); धनपाल, आलवक, अंगुलिमाल आणि अपलाल यांचे दमन; आयुष्यसंस्काराचा त्याग; सूकरमद्दव भोजन स्वीकारणे; सुवर्णवर्णी वस्त्रयुग स्वीकारणे; स्वच्छ जलप्राशन; परिनिर्वाण; देव आणि मनुष्यांचा विलाप; महाकस्सप थेरांनी भगवंतांच्या चरणांचे केलेले वंदन; शरीर स्नान; अग्नी शांत होणे; अंत्यसंस्कार आणि द्रोण ब्राह्मणाने केलेले धातूंचे (अस्थींचे) विभाजन दाखवले. ตถา อทฺธจฺฉฏฺฐานิ ชาตกสตานิ กาเรสิ. เวสฺสนฺตรชาตกํ ปน กาเรนฺโต สญฺชย มหาราชํ ผุสตีเทวึ มทฺทิเทวึ ชาลิย กุมารํ กณฺหาชินญฺจ กาเรสิ. ตโต ปณฺฑว หตฺถิทานํ สตฺต สตก มหาทานํ นคร วิโลกนํ สินฺธวทานํ เทวตาหิ โรหิตถ วณฺเณน รถสฺส วหนํ รถทานํ สยเมโวณต ทุมโต ผลํ คเหตฺวา ทารกานํ มธุมํส ทินฺน เนสาทสฺส สุวณฺณ สูจิทานํ วงฺกปพฺพตกุจฺฉิมฺหิ ปพฺพชฺชาเวเสน วสิตฏฺฐานํ ปูชกสฺส ทารกทานํ สกฺกพฺราหฺมณสฺส ภริยํทานํ ปูชกสฺส เทวตานุภาเวก ทารเก คเหตฺวา คนฺตฺวา สญฺชย นริณฺทสฺส ปุรโต คตฏฺฐานํ ตโต วงฺกปพฺพตกุจฺฉิยํ ฉนฺนํ ขตฺติยานํ สมาคมํ เวสฺสนฺตรสฺส มทฺทิยา จ อภิเสกํ ปตฺตฏฺฐานํ นกรมฺปวิฏฺเฐ สตฺตรตนวสฺสํ วสฺสิตฏฺฐานํ ตโต จวิตฺวา ตุสิตปุเร นิพฺพตฺตฏฺฐานญฺจ สพฺพํ วิตฺถาเรน กาเรสิ. तसेच साडेपाचशे जातककथा दाखवल्या. वेस्सन्तर जातक दाखवताना संजय महाराज, फुसती देवी, मद्दी देवी, जाली कुमार आणि कन्हाजिना यांना दाखवले. त्यानंतर पांढऱ्या हत्तीचे दान, सप्तशतक महादान, नगराचे सिंहावलोकन, सिंधू घोड्यांचे दान, देवतांनी तांबड्या हरणांच्या रूपाने रथ ओढणे, रथाचे दान, स्वतःच खाली वाकलेल्या वृक्षावरून फळे काढून मुलांना देणे, मध आणि मांस देणाऱ्या व्याधाला सोन्याची सुई देणे, वंक पर्वताच्या कुशीत प्रव्रजित वेषात राहिल्याचे स्थान, जुजक ब्राह्मणाला मुलांचे दान देणे, ब्राह्मण रूपी शक्राला पत्नीचे दान देणे, जुजक ब्राह्मणाने देवांच्या प्रभावाने मुलांना घेऊन संजय राजासमोर गेल्याचे स्थान, त्यानंतर वंक पर्वताच्या कुशीत सहा क्षत्रियांचा समागम (भेट), वेस्सन्तर आणि मद्दी यांच्या अभिषेकाचे स्थान, नगरात प्रवेश केल्यावर सप्तरत्नांचा पाऊस पडल्याचे स्थान आणि त्यानंतर तेथून च्युत होऊन तुषित स्वर्गात उत्पन्न झाल्याचे स्थान, हे सर्व विस्ताराने दाखवले. ตโต ทส สหสฺส จกฺกวาฬเทวตาหิ พุทฺธ ภาวาย อายาจิตฏฺฐานํ อปุนราวตฺตนํ มาตุกุจฺฉิโอกฺกมนํ มหามายาเทวึ สุทฺโธทน มหาราชํ ลุมฺพินีวเน ชาตฏฺฐานํ อนฺตลิกฺขโต ทฺวินฺนํ อุทกธารานํ ปตนํ อุตฺตราภิมุขํ สตฺตปทวีติหาร คมนํ กาฬเทวฬสฺส ชฏามตฺถเก มหาปุริสสฺส ปาทปติฏฺฐาน อนติวตฺตมานาย ชมฺพุจฺฉายาย ธาตีนํ ปมาทํ ทิสฺวา สิริสยเน ปลฺลงฺเก นิสีทิตฺวา ฌานสมาปนฺนฏฺฐานญฺจ กาเรสิ. त्यानंतर दहा हजार चक्रवाळांतील देवतांनी बुद्धत्वासाठी याचना केल्याचे स्थान, अंतिम जन्मासाठी मातेच्या कुशीत प्रवेश केल्याचे स्थान, महामाया देवी, शुद्धोदन महाराज, लुंबिनी वनात जन्म झाल्याचे स्थान, आकाशातून दोन जलधारा पडल्याचे स्थान, उत्तरेकडे तोंड करून सात पावले चालल्याचे स्थान, काळदेवल ऋषींच्या जटांवर महापुरुषाचे पाय टेकल्याचे स्थान आणि न बदलणाऱ्या जांभळीच्या झाडाच्या सावलीत, दाईंचा निष्काळजीपणा पाहून, बिछान्यावरील आसनावर बसून ध्यानस्थ झाल्याचे स्थान दाखवले. ตโต ราหุล มาตรํ ราหุล ภทฺทกญฺจ กาเรสิ ตโต เอกูน ตึสวสฺสกาเล อุยฺยาเน กีฬตตฺถาย คมน สมเย ชิณฺณ วฺยาธิต มต สงฺขฺยาเต ตโย เทวทูเต ทิสฺวา นิวตฺตนฏฺฐานํ จตุตฺถวาเร ปพฺพชิตรูปํ ทิสฺวา สาธุปพฺพชฺชาติ จิตฺตํ อุปฺปาเทตฺวา อุยฺยานํ คนฺตฺวา อุยฺยานสิรึ อนุภวิตฺวา สายณฺห สมเย นหาตฺวา มงฺคล สิลาปฏฺเฏ นิสินฺนมตฺต วิสฺสกฏฺฐานา อลงฺกรณฏฺฐาณํ ตโต มชฺฌิมรตฺติยํ นาฏกานํ วิปฺปการํ ทิสฺวา กณฺถก หย วรมารุยฺห) มหาภินิกฺขมณํ นิกฺขมิตฏฺฐานํ ทส สหสฺส) จกฺกวาฬ เทวตาหิ กต ปูชาวิธึ กณฺถกนิวตฺตน เจติยฏฺฐานํ อโนมา นทีตีเร ปพฺพชฺชํ ราชคหปฺปเวสนํ ปณฺฑว ปพฺพตจฺฉ ยาย รญฺโญ พิมฺพิสารมฺม รชฺชกรณตฺถาย อายาจนํ สุชาตาย ทินฺน ขีรปายาส ปฏิคฺคหณํ เนรญฺชราย นทิยา ตีเร ปายาส ปริโภคํ นทิยา ปาติวิสฺสฏฺฐํ ปาฏิหาริยํ สาลวเน ทิวาวิหาร คตฏฺฐานํ โสตฺถิเยน ทินฺน กุสติณปฏิคฺคหณํ โพธิมณฺฑํ อารุยฺห นิสินฺนฏฺฐานญฺจ สพฺพํ วิตฺถาเรน กาเรสิ. त्यानंतर त्यांनी राहुलची माता (यशोधरा) आणि कल्याणकारी राहुल यांच्या मूर्ती बनवल्या. त्यानंतर, एकोणतीस वर्षांचे असताना उद्यानात क्रीडेसाठी जात असताना वृद्ध, रोगी आणि मृत अशा तीन देवदूतांना पाहून परत फिरण्याचे ठिकाण; चौथ्या वेळी प्रव्रजिताचे रूप पाहून 'प्रव्रज्या उत्तम आहे' असा चित्तात विचार उत्पन्न करून उद्यानात जाणे आणि उद्यान-शोभेचा अनुभव घेणे; संध्याकाळच्या वेळी स्नान करून मंगल शिलापट्टावर बसल्यावर विश्वकर्म्याने केलेल्या अलंकृत करण्याचे ठिकाण; त्यानंतर मध्यरात्री नर्तकींची विस्कळीत अवस्था पाहून, कंथक नावाच्या श्रेष्ठ घोड्यावर स्वार होऊन महाभिनिष्क्रमण करण्याचे ठिकाण; दहा हजार चक्रवाळांतील देवतांनी केलेली पूजाविधी; कंथक परत फिरल्याचे चैत्य-स्थान; अनोमा नदीच्या तीरावर घेतलेली प्रव्रज्या; राजगृहात केलेला प्रवेश; पांडव पर्वताच्या छायेत राजा बिंबिसाराने राज्य करण्यासाठी केलेली विनंती; सुजातेने दिलेल्या खीर-पायसाचा स्वीकार; निरंजना नदीच्या तीरावर पायसाचे सेवन; नदीत पात्राचा प्रवाहाच्या विरुद्ध दिशेने वाहण्याचा चमत्कार; सालवनात दिवसा विहारासाठी गेलेले ठिकाण; सोत्थियने दिलेल्या कुशाच्या गवताचा स्वीकार; आणि बोधिमंडावर आरूढ होऊन बसण्याचे ठिकाण, हे सर्व त्यांनी सविस्तरपणे तयार करवून घेतले. ตโต มหิณฺทตฺเถร ปมุเข สตฺต สห อาคเต จ การาเปสิ. จตุสุ ทิสาสุ ขคฺคหตฺเถ จตฺตาโร มหาราชาโน กาเรสิ ตโต ทฺวตฺตึส เทวปุตฺเต ตโต สุวณฺณ ทณฺฑ ทีปกธารา ทฺวตฺตึส เทวกุมาริโย ตโต อฏฺฐวีสติ ยกฺขเสนาปติโน ตโต อญฺชลึ ปคฺคยฺห ฐิต เทวตาโย ตโต รตนมย ปุปฺปกลาเป คเหตฺวา ฐิต เทวตาโย ตโต สุวณฺณฆเฏ คเหตฺวา ฐิติ เทวตาโย ตโต นจฺจนก เทวตาโย ตโต ตุริยวาทก เทวตาโย ตโต ปจฺเจก สตสหสฺสคฺฆนเก ทสหตฺถปฺปมาเณ อาทาเส คเหตฺวา ฐิต เทวตาโย ตโต ตเถว สตสหสฺสคฺฆนก ปุปฺผ สาขาโย คเหตฺวา ฐิตเทวตาโย ตโต จณฺทมณฺฑเล คเหตฺวา ฐิตเทวตาโย สูริยมณฺฑเล คเหตฺวา ฐิตเทวตาโย ตโต ปทุมานิ คเหตฺวา ฐิต เทวตาโย ตโต ฉตฺตานิ คเหตฺวา ฐิตเทวตาโย ตโต วิจิตฺตเวสธเร มลฺลเทวปุตฺเต ตโต ทุสฺสโปฐน เทวตาโย ตโต รตนคฺฆิเก คเหตฺวา ฐิตเทวตาโย ตโต ธมฺมจกฺกากิ คเหตฺวา ฐิตเทวตาโย ตโต ขคฺคธรา เทวตาโย ตโต ปญฺจหตฺถปฺปมาณ คณฺธิเตลปูริตา ทุกูลวฏฺฏิยํ ปชฺชลิต ทีปกญฺจนน ปาติโย สีเสหิ ธาเรตฺวา ฐิตเทวตาโย จ การาเปสิ. त्यानंतर त्यांनी महिंद थेरांच्या नेतृत्वाखाली आलेल्या सात जणांच्या मूर्ती बनवल्या. चारही दिशांना हातात तलवार घेतलेल्या चार महाराजांच्या मूर्ती बनवल्या. त्यानंतर बत्तीस देवपुत्र, त्यानंतर सोन्याचे दांडे असलेले दिवे हातात घेतलेल्या बत्तीस देवकुमारी, त्यानंतर अठ्ठावीस यक्षसेनापती, त्यानंतर हात जोडून उभे राहिलेले देव, त्यानंतर रत्नांचे फुलांचे गुच्छ हातात घेऊन उभे राहिलेले देव, त्यानंतर सोन्याचे कलश हातात घेऊन उभे राहिलेले देव, त्यानंतर नृत्य करणारे देव, त्यानंतर वाद्ये वाजवणारे देव, त्यानंतर प्रत्येकी एक लाख मूल्य असलेले आणि दहा हात लांबीचे आरसे हातात घेऊन उभे राहिलेले देव, त्यानंतर त्याचप्रमाणे एक लाख मूल्य असलेल्या फुलांच्या फांद्या हातात घेऊन उभे राहिलेले देव, त्यानंतर चंद्रमंडळ हातात घेऊन उभे राहिलेले देव, सूर्यमंडळ हातात घेऊन उभे राहिलेले देव, त्यानंतर कमळे हातात घेऊन उभे राहिलेले देव, त्यानंतर छत्रे हातात घेऊन उभे राहिलेले देव, त्यानंतर विविध प्रकारचे वस्त्र परिधान केलेले मल्ल देवपुत्र, त्यानंतर वस्त्रे फडकावणारे देव, त्यानंतर रत्नांचे तोरण हातात घेऊन उभे राहिलेले देव, त्यानंतर धम्मचक्र हातात घेऊन उभे राहिलेले देव, त्यानंतर तलवार धारण केलेले देव, आणि त्यानंतर डोक्यावर पाच हात लांबीचे, सुगंधी तेलाने भरलेले आणि रेशमी कापडाच्या वातीने पेटवलेले दिवे असलेले सोन्याचे थाळ धारण करून उभे राहिलेले देव त्यांनी बनवून घेतले. ตโต จตุสุกณฺเณสุผฬิกมยอคฺฆิย มตฺถเก จตฺตาโรมหามณ ฐปาเปสิ จตุสุ กณฺเณสุ สุวณฺณ-มณิ-มุตฺต-วชิรานํ จตฺตาโร ราสิโย กาเรสิ ตโต เมฆวณฺณ ปาสาณภิตฺติยํ วิชฺชุลฺลตา กาเรสิ ตโต รตน ลตาโย ตโต จาฬวิชติโย ตโต นิลุปฺปเล คเหตฺวา ฐิต นาคมณวิกาโย กาเรสิ. त्यानंतर त्यांनी चारही कोपऱ्यांतील स्फटिकांच्या तोरणांच्या शिखरावर चार मोठे मणी प्रस्थापित केले. चारही कोपऱ्यांत सोने, मणी, मोती आणि हिरे यांचे चार ढीग तयार केले. त्यानंतर ढगांच्या रंगाच्या दगडाच्या भिंतीवर विद्युल्लता बनवल्या, त्यानंतर रत्नांच्या वेली, त्यानंतर चामरे आणि त्यानंतर निळी कमळे हातात घेऊन उभे राहिलेल्या नागकन्या बनवल्या. ราชา เอกฺติกานิ รูปกานิ ฆนโกฏฺฏิม สุวณฺเณเหว กาเรสิ. อวเสสมฺปิ ปูชาวิธึ สตฺตรตเนเหว กาเรสีติ. เอตฺถ จ วุตฺตปฺปการมฺปน ปูชนียภณฺฑํ อนนฺตมปริมาณํ โหติ ตถา หิ อมฺพปาสานวาสี จิตฺตคุตฺตตฺเถโรนาม เหฏฺฐา โลหปาสาเท สนฺนิปติตานํ ทฺวาทสนฺนํ ภิกฺขุสหสฺสานํ ธมฺมํ กเถนฺโต รถวินีตสุตฺตํ อารภิตฺวา มหา ธาตุนิธานํ วณฺเณนฺโต เอกจฺเจ น สทฺทหิสฺสนฺตีติ มญฺญมาโน โอสกฺกิตฺวา กเถสิ. ตสฺมึ ขเณ โกฏปพฺพตวาสี มหาติสฺสตฺเถโร นาม ขีณาสโว อวิทูเร นิสีทิตฺวา ธมฺมํ สุณนฺโต อาวุโส ธมฺมกถิก ตว กถาโต ปริหีนมฺปิ อตฺถิ. อปจฺโจ สกกิตฺวา วิตฺถาเรน กเถหีติ อาห. อถ อิมสฺมึเยว ทีเป ภาติย มหาราชา นาม สทฺโท ปสนฺโน อโหสิ โส สายํ ปาตํ มหเจติยํ วนฺทิตฺวาว ภุญฺชติ. เอกทิวสํ วินิจฺฉเย นิสีทิตฺว ทุพฺพีนิจฺฉิตํ อฏฺฏํ วินิจฺฉินนฺโต อติสายํ วุฏฺฐิโต ถูปวณฺทนํ วิสฺสริตฺวา โภชเน อุปนีเต หตฺถํ โอตาเรตฺวา มนุสฺเส ปุจฺฉิอชฺช มยา อยฺยโก วนฺทิโต น วนฺทิโตติ. โปราณก ราชาโน หิ สตฺถารํ อยฺยโกติ วทนฺติ. มนุสฺสา น วนฺทิโต เทวาติ อาหํสุ. राजांनी या सर्व मूर्ती भरीव सोन्याच्याच बनवून घेतल्या. उर्वरित पूजेचे साहित्यही त्यांनी सप्त रत्नांचेच बनवून घेतले. आणि येथे वर्णन केलेल्या प्रकारच्या पूजनीय वस्तू अनंत आणि अमर्याद होत्या. जसे की, आंबपाषाण येथे राहणारे चित्तगुत्त थेर हे लोहप्रासादाच्या तळमजल्यावर जमलेल्या बारा हजार भिक्खूंच्या समुदायाला धम्म उपदेश करत असताना, 'रथविनीत सुत्ता'पासून सुरुवात करून महाधातू-निधानाचा महिमा सांगत होते; परंतु काही लोक यावर विश्वास ठेवणार नाहीत असे वाटून ते थोडे आढेवेढे घेत संकोचाने बोलू लागले. त्याच वेळी, जवळच बसून धम्म ऐकत असलेले कोटपर्वत निवासी महातिस्स थेर नावाचे क्षीणास्रव (अर्हत) म्हणाले, 'आयुष्यमान धम्मकथिका! तुमच्या कथनातून काही गोष्टी सुटल्या आहेत. संकोच न बाळगता सविस्तरपणे सांगा.' तसेच, याच द्वीपावर भातिय नावाचे महाराज अत्यंत श्रद्धावान व प्रसन्न चित्ताचे होते. ते सकाळी आणि संध्याकाळी महाचेतीयाची वंदना करूनच भोजन करत असत. एक दिवस न्यायसभेत बसून एका गुंतागुंतीच्या खटल्याचा निवाडा करत असताना त्यांना उठायला खूप उशीर झाला. स्तूपाची वंदना करण्याचे विसरून गेल्यामुळे, भोजन समोर आणले असता त्यांनी आपला हात मागे घेतला आणि लोकांना विचारले, 'आज मी आजोबांची (बुद्धांची) वंदना केली की नाही?' कारण प्राचीन काळातील राजे शास्त्यांना 'आजोबा' (अय्यक) म्हणत असत. लोकांनी उत्तर दिले, 'महाराज, वंदना केली नाही.' ตสฺมึ ขเณ ราชา หตฺเถน คหิต ภตฺตปิณฺฑํ ปาติยํ ปาเตตฺวา อุฏฺฐาย ทกฺขิณทฺวารํ วิวราเปตฺวา อาคนฺตฺวา ปาจีน ทฺวาเรน มหาเจติยงฺคณํ อารุยฺห วนฺทนฺโต อนฺโต ธาตุคพฺเภ ขีณาสวานํ ธมฺมํ โอสารณสทฺทํ สุตฺวา ทกฺขิณทฺวาเรติ มญฺญมาโน ตตฺถ คนฺตฺวา อทิสฺวา เอเตเนว นเยน อิตรานิปิ ทฺวารานิ คนฺตฺวา ตตฺถาปิ อทิสฺวา อยฺยา ธมฺมํ โอสาเรนฺโต วิจรนฺตีติ มญฺญมาโน โอโลกนตฺถาย จตุสุ ทฺวาเรสุ มนุสฺเส ฐเปตฺวา สยํ ปุน วิจริตฺวา อปสฺสนฺโต มนุสฺเส ปุจฺฉิตฺวา พหิทฺธา นตฺถิ ภาวํ ญตฺวา อนฺโต ธาตุคพฺเภ ภวิสฺสติติ สนฺนิฏฺฐานํ กตฺวา ปาจีนทฺวาเร อาสนฺนตเร มหา เจติยาภิมุโข หตฺถปาเท ปสาเรตฺวา ชีวิตุํ ปริจฺจชิตฺวา ทฬฺหสมาทานํ กตฺวา นิปชฺชิ. สเจ มา อยฺยา ธาตุคพฺภํ น โอโลกาเปนฺติ-สตฺตาหํ นิราหาโร หุตฺวา สุสฺสมาโน ภูสมุฏฺฐิ วิย วิปฺปกิริยมาโนปิ น อุฏฺฐหิสฺสามีติ. ตสฺส คุณานุภาเวน สกฺกสฺส ภวนํ อุณฺหาการํ ทสฺเสสิ. त्याच क्षणी राजांनी हातातील अन्नाचा घास थाळीत परत टाकला आणि उठून, दक्षिण द्वार उघडायला लावून बाहेर आले. पूर्व द्वाराने महाचेतीय प्रांगणात चढून वंदना करत असताना, त्यांना धातूगर्भाच्या आत क्षीणास्रवांचा धम्म पठण करण्याचा आवाज ऐकू आला. तो आवाज दक्षिण द्वाराकडून येत आहे असे वाटून ते तिथे गेले, पण त्यांना तिथे कोणी दिसले नाही. याच पद्धतीने ते इतरही द्वारांवर गेले, पण तिथेही त्यांना कोणी दिसले नाही. 'पूजनीय भिक्खू धम्म पठण करत फिरत असावेत,' असा विचार करून त्यांनी पाहण्यासाठी चारही द्वारांवर माणसे तैनात केली. स्वतः पुन्हा फिरूनही कोणी न दिसल्याने त्यांनी माणसांना विचारले. बाहेर कोणीही नसल्याचे समजल्यावर, 'ते नक्कीच धातूगर्भाच्या आत असावेत,' असा त्यांनी निश्चय केला. त्यानंतर पूर्व द्वाराच्या अगदी जवळ, महाचेतीयाकडे तोंड करून, हातपाय पसरून, प्राणांची पर्वा न करता दृढ संकल्प करून ते जमिनीवर आडवे झाले. 'जर पूजनीय भिक्खू मला धातूगर्भ दाखवणार नाहीत, तर मी सात दिवस अन्नत्याग करून सुकेन आणि जरी माझी मूठभर धुळीसारखी विल्हेवाट लागली, तरी मी येथून उठणार नाही.' त्यांच्या या गुणांच्या प्रभावाने शक्राचे भवन तप्त झाले. สกฺโก อาวชฺชนฺโต ตํ การณํ ญตฺวา อคนฺตฺวา ธมฺมํ โอสาเรนฺตานํ เถรานํ เอวมาห. อยํ ภนฺเต ราชา ธมฺมิโก พุทฺธสาสเน ปสนฺโน อิมสฺมึ ฐาเน สชฺฌายน สทฺทํ สุตฺวา ธาตุคพฺภํ อปสฺสิตฺวา น อุฏฺฐหิสฺสามีติ ทฬฺหสมาทานํ กตฺวา นิปนฺโน สเจ ธาตุคพฺภํ น ปสฺสติ ตตฺเถว มริสฺสติ. ตํ ปเวเสตฺวา ธาตุ คพฺภํ โอโลกาเปถาติ. เถราปิ ตสฺส อนุกมฺปาย ธาตุคพฺภํ ทสฺเสตุํ เอกํ เถรํ อาณาเปสุํ ราชานํ อาเนตฺวา ธาตุคพฺภา โอโลกาเปตฺวา เปเสหีติ. โส รญฺโญ หตฺเถ คเหตฺวา ธาตุคพฺภํ ปเวเสตฺวา ยถารุจึ วนฺทาเปตฺวา สพฺพํ สลฺลกฺขิตกาเล เปเสสิ ราชา นครํ คนฺตฺวา อปเรน สมเยน ธาตุคพฺเภ อตฺตนา ทิฏฺฐรูปเกสุ เอกเทสานิ สุวณฺณขจิตานิ กาเรตฺวา ราชงฺคเณ มหนฺตํ มณฺฑปํ กาเรตฺวา ตสฺมึ มณฺฑเป ตานิ รูปกานิ สํวิทหาเปตฺวา นคเร สนฺนิปาเตตฺวา ธาตุคพฺเภ มยา ทิฏฺฐานิ สุวณฺณรูปกานิ อีทิสานิ อาห. เตสํ รูปกานํ นิยาเมน กตตฺตา นิยามก รูปกานิ นาม ชาตานิ. शक्राने विचार करून ते कारण जाणून घेतले आणि तेथे येऊन धम्माचा उपदेश करणाऱ्या थेरांना असे म्हटले, "भन्ते, हा धार्मिक राजा बुद्धशासनात प्रसन्न (श्रद्धाळू) आहे. 'या ठिकाणी सज्झायनाचा आवाज ऐकून, धातूगर्भ न पाहता मी उठणार नाही', असा दृढ संकल्प करून तो झोपला आहे. जर त्याने धातूगर्भ पाहिला नाही, तर तो तिथेच मरेल. त्याला आत प्रवेश देऊन धातूगर्भ दाखवा." थेरांनीही त्याच्यावर अनुकंपा करून धातूगर्भ दाखवण्यासाठी एका थेरांना आज्ञा दिली की, "राजाला आणून धातूगर्भ दाखवून परत पाठवा." त्यांनी राजाचा हात धरून त्याला धातूगर्भात प्रवेश दिला आणि त्याच्या आवडीनुसार वंदन करवून, सर्व काही नीट पाहिल्यावर त्याला परत पाठवले. राजाने नगरात जाऊन, नंतरच्या काळात धातूगर्भात स्वतः पाहिलेल्या मूर्तींपैकी काही मूर्ती सोन्याने मढवून घेतल्या, राजवाड्यात एक मोठा मंडप उभारला, त्या मंडपात त्या मूर्तींची मांडणी केली आणि नगरातील लोकांना एकत्र जमवून सांगितले, "मी धातूगर्भात पाहिलेल्या सोन्याच्या मूर्ती अशा प्रकारच्या आहेत." त्या मूर्तींच्या प्रमाणानुसार बनवल्या गेल्यामुळे त्यांना 'नियामक रूपके' असे नाव पडले. ราชา สํวจฺฉเร สํวจฺฉเร ตานิ รูปกานิ นีหราเปตฺวา นาครานํ ทสฺเสสิ ปฐมํ ทสฺสิตกาเล นาครา ปสีทิตฺวา เอเกก กุลโต เอเกกํ ทารกํ นีหริตฺวา ปพฺพาเชสุํ. ปุน ราชา อยฺยา เอตํ ปการํ อชานนกา พหู เตสมฺปิ อาโรเจสฺสามีติ วิหารํ คนฺตฺวา เหฏฺฐา โลหปาสาเท ภิกฺขุสงฺฆํ สนฺนิปาเตตฺวา สยํ ธมฺมาสนคโต ติยาม รตฺตึ ธาตุคพฺเภ อธิการํ กเถตฺวา ปริโยสาเปตุมสกฺกานฺโตเสว อุฏฺฐาสิ. ตตฺเถโก ภิกฺขุ ราชานํ ปุจฺฉิ-มหาราช ตฺวํ ปาตราสภตฺตํ ภูตฺวา อาคโตสิ. ติยาม รตฺตึ วณฺเณนฺโต ธาตุคพฺเภ ปูชาวิธิมฺปิ ปริโยสาเปตุํ นาสกฺขิ อญฺญมฺปิ พหุํ อตฺถิติ. राजा दरवर्षी त्या मूर्ती बाहेर काढून नगरवासीयांना दाखवत असे. पहिल्यांदा त्या दाखवल्या गेल्या तेव्हा नगरवासी प्रसन्न झाले आणि त्यांनी प्रत्येक कुळातून एका मुलाला बाहेर आणून प्रवज्जित केले. पुन्हा राजाने विचार केला, "अनेक पूजनीय भिक्खू या गोष्टीबद्दल अनभिज्ञ आहेत, मी त्यांनाही हे सांगेन." असे विचार करून तो विहारात गेला आणि खालील लोहप्रासादात भिक्खू संघाला एकत्र जमवून, स्वतः धम्मासनावर बसून रात्रीच्या तिन्ही प्रहरांत धातूगर्भाच्या महात्म्याचे वर्णन केले, परंतु ते संपवू न शकल्यानेच तो उठला. तेथे एका भिक्खूंनी राजाला विचारले, "महाराज, आपण सकाळी भोजन करून आला आहात. रात्रीच्या तिन्ही प्रहरांत वर्णन करूनही आपण धातूगर्भातील पूजाविधीचे वर्णन संपवू शकला नाही, अजूनही बरेच काही शिल्लक आहे का?" ราชา กึ กเถต ภนฺเต, ตุมฺหากํ มยา กถิตํ ทสภาเคสุ เอกภาคมฺปิ นปฺปโหติ. อหมฺปน มยา สลฺลกฺขิต มตฺตเมว กเถสึ. อนนฺตํ ภนฺเต ธาตุคพฺเภ ปูชาวิธานนฺติ อาห เอวํ อนนฺตํ ปูชนียภณฺฑํ สมจตุรสฺเส เอเกก ปสฺสโต อสีติ อสีติ หตฺถปฺปมาเณ ธาตุคพฺเภ นิรนฺตรํ กตฺวา ปุเรตุมฺปิ น สุกรํ, ปเคว ยถารหํ สํวิธาตุ ติฏฺฐตุ ตาว ธาตุคพฺโภ ยาว มหาเจติเย วาลุก ปาการ ปริจฺเฉทา นิรนฺตรํ ปุเรตุมฺปิ น สกฺกา. ตสฺมา ตํ สพฺพํ ปูชนียภณฺฑํ ตตฺถ กถํ คณฺหีติ ยเทตฺถ วตฺตพฺพํ โปราเณหิ วุตฺตเมว. राजा म्हणाला, "भन्ते, काय सांगू! मी आपल्याला जे सांगितले ते दहा भागांतील एक भागही नाही. मी तर केवळ मला जेवढे आठवले तेवढेच सांगितले. भन्ते, धातूगर्भातील पूजाविधी अनंत आहे." तो पुढे म्हणाला, "अशा प्रकारे अनंत पूजनीय वस्तू चौरस आकाराच्या, प्रत्येक बाजूला ऐंशी-ऐंशी हात लांबीच्या धातूगर्भात पूर्णपणे भरणे देखील सोपे नाही, मग योग्य प्रकारे मांडणी करणे तर दूरच राहिले. धातूगर्भ तर राहू द्या, महाचेतीयाच्या वाळूच्या तटबंदीच्या मर्यादेपर्यंतही ते पूर्णपणे भरणे शक्य नाही. म्हणून, त्या सर्व पूजनीय वस्तू तेथे कशा सामावल्या गेल्या, याविषयी जे काही सांगायचे आहे ते प्राचीन आचार्यांनी सांगितलेच आहे." นิคฺโร ธปิฏฺฐิ เตปิฏก มหาสีวตฺเถโร กิร ราชเคเห นิสิทิตฺวา รญฺโญ ทสพล สีหนาทสุตตํ กเถนฺโต ธาตุนิธานํ วณฺเณตฺวา สุตฺตนฺตํ วินิวฏฺเฏสิ. ราชา เถรสฺส เอวมาห-อยํ ภนฺเต ธาตุคพฺภา สมจตุรสฺโส, เอเกกปสฺสโต อสีติ อสีติ หตฺถปฺปมาเณ เอตฺตกานิ ปูชนีย ภณฺฑานิ เอตฺถ ฏฺฐิตานีติ โก สทฺทเหสฺสติติ. เถโร อาห. อิณฺทสาลคุหากิตฺตกปฺปมาณาติ ตยา สุตปุพฺพาติ. ราชา ขุทฺทก มญฺจกปฺปมาณา ภนฺเตติ อาห. ตโต เถโร อาห, มหาราช อมฺหากํ สตฺถารา สกฺกสส สกฺก ปญฺหสุตฺตนฺตํ กถนทิวเส คุหาย กิตฺตกา ปริสา โอสฏาติ สุตปุพฺพาติ. ราชา ทฺวีสุ ภนฺเต เทวโลเกสุ เทวตาติ อาห. เอวํ สนฺเต ตมฺปิ อสทฺทเหยฺยํ นุ มหาราชาติ เถเรน วุตฺเต ราชา ตํ ปน เทวานํ เทวิทฺธิยา อโหสิ เทวิทฺธิ นาม อจินฺเตยฺยา ภนฺเตติ อาห. असे ऐकले जाते की, निग्रोधपिठ्ठी येथील त्रिपिटकाचार्य महासीव थेर राजगृहात बसून राजाला 'दसबल सीहनाद सुत्त' सांगत होते. धातूच्या निधानाचा (ठेव्याचा) गौरव करून त्यांनी सुत्ताचा समारोप केला. राजा थेरांना म्हणाला, "भन्ते, हा धातूगर्भ चौरस आहे, ज्याची प्रत्येक बाजू ऐंशी-ऐंशी हात लांबीची आहे. यात एवढ्या पूजनीय वस्तू ठेवल्या आहेत, यावर कोण विश्वास ठेवेल?" थेर म्हणाले, "इंद्रसाल गुहा किती आकाराची आहे, हे आपण पूर्वी ऐकले आहे का?" राजा म्हणाला, "भन्ते, ती एका लहान खाटेच्या आकाराची आहे." त्यावर थेर म्हणाले, "महाराज, आपल्या शास्त्यांनी सक्कपञ्ह सुत्त (शक्रप्रश्न सुत्त) सांगितले त्या दिवशी त्या गुहेत किती परिषद एकत्र आली होती, हे आपण पूर्वी ऐकले आहे का?" राजा म्हणाला, "भन्ते, दोन देवलोकांतील देवता." थेरांनी विचारले, "असे असेल तर, महाराज, आपण त्यावरही अविश्वास ठेवणार का?" राजा म्हणाला, "भन्ते, ते तर देवांच्या देविद्धीमुळे (दैवी शक्तीमुळे) झाले होते. देविद्धी ही अचिंत्य असते, भन्ते." ตโต เถโร มหาราช ตํ เอกายเยว เทวิทฺธิยา อโหสิ. อิทํ ปน รญฺโญ ราชิทฺธิยา เทวานํ เทวิทฺธิยา อริยานํ อริยิทฺธิยาติ อิมาหิ ตีหิ อิทฺธีหิ ชาตนฺติ อโวจ. ราชา เถรสฺส วจนํ สาธูติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา เถรํ เสตจฺฉตฺเตน ปูเชตฺวา มตฺถเก ฉตฺตํ ธาเรนฺโต มหา วิหารํ อาเนตฺวา ปุน มหาเจติยสฺส สตฺตาหํ ฉตฺตํ ทตฺวา ชาติ สุมนปุปฺผ ปูชํ อกาสีติ. เอตสฺสตฺถสฺส สาธนตฺถเมว อญฺญานิปิ พหูนิ วตฺถูนิ ทสฺสิตานิ ตานิ กินฺเตหีติ อมฺเห อุเปกฺขิตานิ เอตฺถ จ ราชา มเหสกฺโข มหานุภาโว ปูริตปารมิ กตาภินีหาโรติ ตสฺสวเสน ราชิทฺธิเวทิตพฺพา สกฺเกน อาณตฺเตน วิสฺสกมฺมุนา เทวปุตฺเตน อาทิโต ปฏฺฐาย อาวิสิตฺวา กตตฺตา ตสฺส วเสน เทวิทธิ เวทิตพฺพา, กมฺมาธิฏฺฐายก อิณฺทคุตฺตตฺเถโร ขุทฺทานุขุทฺทกํ กมฺมํ อนุวิธายนฺโต กาเรสิ น เกวลํเถโรเยว, สพฺเพปิ อริยา อตฺตนา อตฺตนา กตฺตพฺพ กิจฺเจสุ อุสฺสุกฺกมาปนฺนาเยว อเหสุนฺติ อิมาหิ ตีหิ อิทฺธีหิ กตนฺติ เวทิตพฺพํ. त्यावर थेर म्हणाले, "महाराज, ते तर केवळ एकाच देविद्धीमुळे झाले होते. परंतु हे राजाच्या 'राजिद्धी', देवांच्या 'देविद्धी' आणि अरियांच्या 'अरियिद्धी' या तीन ऋद्धींमुळे निर्माण झाले आहे." राजाने थेरांचे वचन "साधू" म्हणून स्वीकारले आणि थेरांना श्वेतछत्राने पूजले. त्यांच्या डोक्यावर छत्र धरून त्यांना महाविहारात आणले आणि पुन्हा महाचेतीयाला सात दिवस छत्र अर्पण करून जाईच्या फुलांची पूजा केली. हाच अर्थ सिद्ध करण्यासाठी इतरही अनेक कथा दाखवल्या आहेत, परंतु "त्यांच्याशी काय करायचे?" म्हणून आम्ही त्या सोडल्या आहेत. येथे राजा हा महान प्रभावी, महापराक्रमी, पारमिता पूर्ण केलेला आणि दृढ संकल्प केलेला होता, म्हणून त्याच्या प्रभावावरून 'राजिद्धी' समजली पाहिजे. शक्राच्या आज्ञेने विस्सकम्म देवपुत्राने सुरुवातीपासूनच प्रवेश करून हे काम केले, म्हणून त्याच्या प्रभावावरून 'देविद्धी' समजली पाहिजे. कामाचे अधिष्ठाता इंदगुत्त थेरांनी लहान-सहान कामे देखील पद्धतशीरपणे करवून घेतली. केवळ थेरच नव्हे, तर सर्वच अरिय आपापल्या कर्तव्यात तत्पर होते. म्हणून हे कार्य या तीन ऋद्धींमुळे झाले आहे, असे समजले पाहिजे. วุตฺตญฺเหตํ มหาวํโส. महावंशात असे म्हटले आहे: อิณฺทคุตฺต มหาเถโร-ฉฬภิญฺโญ มหามติ,กมฺมาธิฏฺฐายโก เอตฺถ-สพฺพํ สํวิทหิ อิมํ; สพฺพํ ราชิทฺธิยา เอตํ เทวตานญฺจ อิทฺธิยา; อิทฺธิยา อริยานญฺจ-อสมฺพาธา ปติฏฺฐิต’’นฺติ; "सळभिञ्ञ (सहा अभिज्ञा प्राप्त) आणि महाबुद्धीमान इंदगुत्त महाथेरांनी या कामाचे अधिष्ठाता म्हणून या सर्व गोष्टींची व्यवस्था केली. हे सर्व राजाच्या ऋद्धीने, देवतांच्या ऋद्धीने आणि अरियांच्या ऋद्धीने कोणत्याही अडथळ्याशिवाय प्रस्थापित झाले आहे." ธาตุคพฺพ รูปวณฺณนากถา धातूगर्भ रूपवर्णन कथा. ๒๓. เอวํ ราชา ธาตุคพฺเภ กตฺตพฺพ กมฺมํ นิฏฺฐาเปตฺวา จาตุทฺทสิ ทิวเส วิหารํ คนฺตฺวา ภิกฺขุสงฺฆํ สนฺนิปาเตสิ, สนฺนิปตฺติ ภิกฺขู ตึส สหสฺสานิ อเหสุํ ราชา ภิกฺขุสงฺฆํ วนฺทิตฺวา เอวมาห. ธาตุคพฺเภ มยา กตฺตพฺพกมฺมํ นิฏฺฐาปิตํ, สฺเว อาสาฬภิมุโปสถ ทิวเส อุตฺตรสาฬฺห นกฺขตฺเตน ธาตุนิธานํ ภวิสฺสติ ธาตุโย ชนาถ ภนฺเตติ ภิกฺขุสงฺฆสฺส ภารํ กตฺวา นครเมวาคญฺชิ. २३. अशा प्रकारे राजाने धातूगर्भात करायचे काम पूर्ण करून, चतुर्दशीच्या दिवशी विहारात जाऊन भिक्खू संघाला एकत्र जमवले. जमलेल्या भिक्खूंची संख्या तीस हजार होती. राजाने भिक्खू संघाला वंदन करून असे म्हटले, "भन्ते, धातूगर्भात माझ्याकडून करायचे काम पूर्ण झाले आहे. उद्या आषाढ उपोसथ दिवशी, उत्तरासाळ्हा नक्षत्रावर धातूंचे निधान होईल. भन्ते, आपण धातूंची व्यवस्था करावी." अशी भिक्खू संघावर जबाबदारी सोपवून तो नगरात परत आला। อถ ภิกฺขุสงฺโฆ ธาตุ อาหรณกํ ภิกฺขุํ คเวสนฺโต ปูชา ปริเวณ วาสิกํ โสฬส วสฺสุทฺเทสิกํ ฉฬภิญฺญํ โสณุตฺตรํ นาม สามเณรํ ทิสฺวา ตํ ปกฺโกสาเปตฺวา อาวุโส โสณุตฺตร ราชา ธาตุคพฺภํ นิฏฺฐาเปตฺวา ธาตุ อาภรณํ ภิกฺขุสงฺฆสฺส ภารมกาสิ. ตสฺมา ตยา ธาตุโย อาหริตพฺพาติ อาหรามิ ภนฺเต ธาตุโย กุโต ลจฺฉามีติ ปุจฺฉิ ตสฺส ภิกฺขุสงฺโฆ เอวมาห. อาวุโส โสณุตฺตร ตตาคโต มรณมญฺเจ นิปนฺโน สกฺกํ เทวราชานํ อามนฺเตตฺวา มยฺหํ อฏฺฐโทณปฺปมาเณสุ สารีริก ธาตุสุ เอกํ โทณํ โกฬิยราชุหิ สกฺกตํ, อนาคเต ตมฺพปณฺณิ ทีเป มหาเจติเย ปติฏฺฐหิสฺสตีติ อาห. त्यानंतर भिक्खू संघाने धातू आणणाऱ्या भिक्खूचा शोध घेत असताना, पूजा परिवेणात (विहारात) राहणाऱ्या, सोळा वर्षांच्या, षळभिज्ञ (सहा अभिज्ञा प्राप्त) सोणुत्तर नावाच्या सामणेराला पाहिले आणि त्याला बोलावून घेतले: 'आयुष्यमान सोणुत्तर, राजाने धातूगर्भ (चैत्यगृह) पूर्ण केले असून धातू आणण्याची जबाबदारी भिक्खू संघावर सोपवली आहे. म्हणून तू त्या धातू घेऊन आल्या पाहिजेत.' (सोणुत्तराने) विचारले, 'भंते, मी धातू आणतो, पण मला त्या कुठून मिळतील?' त्यावर भिक्खू संघाने त्याला असे सांगितले: 'आयुष्यमान सोणुत्तर, तथागत जेव्हा महापरिनिर्वाण शय्येवर निजले होते, तेव्हा त्यांनी देवराज शक्राला बोलावून सांगितले होते की, माझ्या आठ द्रोण प्रमाणाच्या शारीरिक धातूंपैकी एक द्रोण धातू, जी कोलीय राजांद्वारे पूजिली जात आहे, ती भविष्यात तांबपण्णी द्वीपातील महाचैत्यात प्रस्थापित केली जाईल.' อถ ภควติ ปรินิพฺพุเต โทณ พฺราหฺมโณ ธาตุโย อฏฺฐ โกฏฺฐาเส กตฺวา อฏฺฐนฺนํ นครวาสีนํ อทาสิ เต อตฺตโน อตฺตโน นคเร เจติยํ กาเรตฺวา ปริหรึสุ เตสุ รามคาเม โกฬิเยหิ กตเจติเย มโหเฆน ภินฺเน ธาตุกรณฺฑโก สมุทฺทํ ปวิสิตฺวา รตนวาลุกา ปิฏฺเฐ ฉพฺพณฺณรํสิ สมากิณฺโณ อฏฺฐาสิ. त्यानंतर भगवान परिनिर्वाण पावले असता, द्रोण ब्राह्मणाने धातूंचे आठ भाग करून आठ नगरांतील रहिवाशांना दिले. त्यांनी आपापल्या नगरात चैत्य बांधून त्यांची पूजा-अर्चना केली. त्यांपैकी रामगामात कोलीयांनी बांधलेले चैत्य महापुराने वाहून गेले (नष्ट झाले) तेव्हा धातूंचा करंडक समुद्रात प्रवेश करून रत्नमय वाळूच्या पृष्ठभागावर षड्रश्मींनी (सहा रंगांच्या किरणांनी) वेढलेला राहिला. นาคา ทิสฺวา มญฺเชริก นาค ภวนํ คนฺตฺวา มหากาฬ นาค รญฺโญ อาโรเจสุํ โส ทสโกฏิ นาค สหสฺส ปริวุโต อาคนฺตฺวา คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺวา สุวณฺณ-ปวาฬ-มิณิ-รชตธเช อุสฺสาเปตฺวา ปญฺจงฺคิก ตุริย ปคฺคหีต นานาวิธ นาค นาฏกานํ มชฺฌหโต ธากุกรณฺฑํ มณิจงฺโคฏเก ฐเปตฺวา สีเสนาทาย มหาสกฺการ สมฺมานํ กโรนฺโต นาคภวนํ เนตฺวา ฉนฺนวุติ โกฏิธเน ปูเชตฺวา สพฺพรตเนหิ เจติยญฺจ เจติยฆรญฺจ มาเปตฺวา ธาตุโย ปริหรติ. มหากสฺสปตฺเถโร อชาตสตฺตุโน ธาตุนิธานํ กโรนฺโต รามคาเม ธาตุโย ฐเปตฺวา เสส ธาตุโย อาหริตฺวา อทาสิ ราชา รามคาเม ธาตุโย กสฺมา นาหฏาติ ปุจฺฉิ. नागांनी ते पाहून मंजेरिका नागभवनात जाऊन महाकाळ नागराजाला सांगितले. तो दहा कोटी नागांच्या परिवारासह आला आणि त्याने गंध, पुष्प इत्यादींनी पूजा करून, सुवर्ण, प्रवाळ, मणी आणि चांदीचे ध्वज उभारून, पंचवाद्यांच्या गजरात आणि विविध प्रकारच्या नाग-नाट्यांच्या मध्यभागी तो धातूकरंडक एका मणीमय करंडकात ठेवून, डोक्यावर धारण करून, मोठा सत्कार व सन्मान करत नागभवनात नेला. तिथे नव्व्याण्णव कोटी (९६ कोटी) धनाची पूजा करून, सर्व रत्नांनी युक्त चैत्य आणि चैत्यगृह बांधून तो धातूंचे रक्षण करू लागला. महाकस्सप थेरांनी अजातशत्रूसाठी धातूंचे निधान (स्थापना) करताना रामगामातील धातू तिथेच ठेवून उर्वरित धातू आणून दिल्या. राजाने विचारले, 'रामगामातील धातू का आणल्या नाहीत?' เถโร มหาราช ตาสํ อนฺตราโย นตฺถิ อนาคเต ตมฺพปณฺณิทีเป มหาเจติเย ปติฏฺฐหิสฺสนฺตีติ อาห. อโสโก ธมฺมราชาปิ ธาตุนิธานํ อุคฺฆาเฏตฺวา โอโลเกนฺโต อฏฺฐมํ ธาตุโทณํ อทิสฺวา อปรํ ธาตุํ โทณํ กตฺถ ภนฺเตติ ปุจฺฉิ มหาราช ตํ โกฬิเยหิ คงฺคาตีเร กต เจติเย ปติฏฺฐิตํ, มโหเฆน เจติเย ภินฺเน มหาสมุทฺทํ ปาวิสิ. थेर म्हणाले, 'महाराज, त्यांना कोणताही धोका नाही. भविष्यात त्या तांबपण्णी द्वीपातील महाचैत्यात प्रस्थापित केल्या जातील.' धम्मराज अशोकानेही धातूंचे निधान उघडून पाहिले असता आठवा धातूचा द्रोण न दिसल्याने विचारले, 'भंते, दुसरा धातूचा द्रोण कुठे आहे?' (थेरांनी सांगितले,) 'महाराज, तो कोलीयांनी गंगा नदीच्या तीरावर बांधलेल्या चैत्यात प्रस्थापित केला होता, पण महापुराने चैत्य नष्ट झाल्यावर तो महासमुद्रात प्रवेश करून गेला.' ตํ นาคา ทิสฺวา อตฺตโน นาคภวนํ เนตฺวา ปริหรนฺตีติ ขีณาสวา อาหํสุ ราชา นาคภวนํ นาม มม อาณาปวตฺตนฏฺฐานํ, ตมฺปิ อาหรามิ ภนฺเตติ อาห. มหาราช ตา ธาตุโย อนาคเต ตมฺพปณฺณิทีเป มหาเจติเย ปติฏฺฐหิสฺสนฺติติ นิวาเรสุํ. ตสฺมา ตฺวํ มญฺเฉริก นาค ภวนํ คนฺตฺวา ตํ ปวตฺตึ นาค รญฺโญ นิเวเทตฺวา ธาตุโย อาหร, สฺเว ธาตุ นิธานํ ภวิสฺสตีติ. โสณุตฺตโร สาธูติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา อตฺตโน ปริเวณํ อคมาสิ. खीणासवांनी सांगितले, 'नागांनी ते पाहून आपल्या नागभवनात नेले आणि ते त्याचे रक्षण करत आहेत.' राजा म्हणाला, 'भंते, नागभवन हे माझ्या आज्ञेचे ठिकाण आहे, मी तिथूनही त्या आणतो.' (अर्हतांनी) त्याला रोखले आणि सांगितले, 'महाराज, त्या धातू भविष्यात तांबपण्णी द्वीपातील महाचैत्यात प्रस्थापित केल्या जातील. म्हणून तू मंजेरिका नागभवनात जाऊन ही हकीकत नागराजाला सांग आणि धातू घेऊन ये. उद्या धातूंचे निधान होईल.' सोणुत्तराने 'साधू' (ठीक आहे) असे म्हणून ते मान्य केले आणि तो आपल्या परिवेणात गेला. ราชาปิ นครํ อนฺตฺวา นคเร เภรึ จราเปสิ- สฺเว ธาตุนิธานํ ภวิสฺสติ นาครา อตฺตโน อตฺตโน วิภวานุรูเปน อลงฺกริตฺวา คณฺธมาลาทีนิ คเหตฺวา มหาเจติยงฺคณํ โอตรนฺตุติ. สกฺโกปิ วิสฺสกมฺมํ อาณาเปสิ-สฺเว มหาเจติเย ธาตุนิธานํ ภวิสฺสติ. สกล ตมฺปปณฺณิทีปํ อลงฺกโรหีติ. โส ปุนทิวเส เอกูนโยชนสติกํ ตมฺพปณฺณิทีปํ กสีณมณฺฑลํ วิย สมํ กตฺวา รชตปฏฺฏสทิสํ วาลุกากิณฺณํปญฺจวณฺณปุปฺผสมากูลํ กตฺวา สมนฺตโต ปุณฺณฆฏปนฺติโย ฐปาเปตฺวา สาณีหิ ปริกฺขิปิตฺวา อุปริ เจลวิตานํ พณฺธิตฺวา ปถวิตเล ถลปทุมานิ อากาเส โอลมฺพก ปทุมานิ ทสฺเสตฺวา อลงฺกต เทวสภํ วิย สชฺเชสิ. มหาสมุทฺทญฺจ สนฺนิสินฺนํ ปญฺจวิธ ปทุมสญฺจนฺนํ อกาสิ. राजानेही नगरात जाऊन दवंडी पिटवली की, 'उद्या धातूंचे निधान होणार आहे. नागरिकांनी आपापल्या वैभवानुसार स्वतःला सजवून, गंध, पुष्प इत्यादी घेऊन महाचैत्याच्या प्रांगणात यावे.' शक्रानेही विस्सकम्माला आज्ञा दिली, 'उद्या महाचैत्यात धातूंचे निधान होणार आहे. संपूर्ण तांबपण्णी द्वीप सजव.' त्याने दुसऱ्या दिवशी एकशे उणे एक (९९) योजन विस्तार असलेल्या तांबपण्णी द्वीपाला कसीणमंडळाप्रमाणे सपाट केले, चांदीच्या पटासारखे वाळूने पसरवले, पाच रंगांच्या फुलांनी सुशोभित केले, चहूबाजूंनी पूर्णघटांच्या रांगा लावल्या, पडद्यांनी वेढले, वर कापडी छत बांधले, जमिनीवर स्थलपद्मे आणि आकाशात लटकणारी कमळे दाखवून सजवलेल्या देवसभेसारखे सजवले. आणि महासमुद्राला शांत करून पाच प्रकारच्या कमळांनी झाकून टाकले. ธาตุ อานุภาเวน สกล จกฺกวาฬํ คพฺโภกฺกมนาภิสมฺโพธิกาลาทิสุ วิย สชฺชิตํ อโหสิ นาคราป นคร วีถิโย สมฺมชฺชิตฺวา มุตฺตาผล สทิสํ วาลุกํ โอกิริตฺวา ลาชปญฺจมก ปุปฺผานิ สโมกิริตฺวา นานาวิราค ธชปฏากาโย อุสฺสาเปตฺวา สุวณฺณฆฏ กทลิโตรณ มาลคฆิกาทีหิ อลงฺกริตฺวา นครํ สชฺเชสุ. ราชา นครสฺส จตุสุ ทฺวาเรสุ อนาถานํ มนุสฺสานํ ปริโภตฺถาย นานาปฺปการ ขาทนีย โภชนีย คณฺธมาล วตฺถาภรณ ปญฺจวิธิ มุธวาส สหิต ตามฺพุลานิ จ ฐปาเปสิ. धातूंच्या प्रभावाने संपूर्ण चक्रवाळ (ब्रह्मांड) हे गर्भावक्रांती आणि अभिसंबोधीच्या काळाप्रमाणे सजवले गेले. नागरिकांनीही नगरातील रस्ते झाडून, मोत्यांसारखी वाळू पसरवून, लाह्या आणि पाच प्रकारची फुले विखरून, विविध रंगांचे ध्वज आणि पताका उभारून, सुवर्णघट, केळीचे तोरण आणि पुष्पमाला इत्यादींनी सजवून नगर सुशोभित केले. राजाने नगराच्या चारही दारांवर गरीब व अनाथ लोकांसाठी विविध प्रकारचे खाद्यपदार्थ, भोज्यपदार्थ, गंध, पुष्पमाला, वस्त्रे, अलंकार आणि पाच प्रकारच्या मुखवासासह विडे ठेवले. อถ ราชา สพฺพาภรณ วิภูสิโต กุมุท ปนฺนวณฺณ จตุสิณฺธวยุตฺต รถวรมารุยฺห อลงฺกตํ กณฺฑุลํ หตฺถึ ปุรโต กตฺวา สุวณฺณจงฺโคฏกํ สีเส กตฺวา เสตจฺฉตฺตสฺส เหฏฺฐา อฏฺฐาสิ. ตสฺมึ ขเณ สกฺกํ เทวราชานํ เทวจฺฉรา วิย นานาภรณวิภูสิตา เทวกญฺญุปมา อเนก สหสฺส นาฏกิตฺถิโย เจว ทสมหาโยธา จ จตุรงฺคินี เสนา จ ราชานํ ปริวาเรสุํ. त्यानंतर सर्व अलंकारांनी विभूषित झालेला राजा, पांढऱ्या कमळाच्या पाकळ्यांच्या रंगाचे चार सिंधू घोडे जोडलेल्या श्रेष्ठ रथावर आरूढ झाला. त्याने सजवलेल्या कण्डुल हत्तीला पुढे केले आणि सोन्याचा करंडक डोक्यावर ठेवून तो श्वेतछत्राखाली उभा राहिला. त्या क्षणी, देवराज शक्राला अप्सरा वेढतात त्याप्रमाणे, विविध अलंकारांनी विभूषित झालेल्या देवकन्यांसारख्या अनेक हजार नर्तिका, दहा महायोद्धे आणि चतुरंग सेना यांनी राजाला वेढले. ตถา อฏฺฐุตฺตร สหสฺส อิตฺถิโย จ ปุณฺณฆเฏ ครหตฺวา ปริวาเรสุํ. อฏฺฐุตฺตร สหสฺส อฏฺฐุตฺตร สรสฺสปฺปมาเณเยว ปุริสา เจว อิตฺถิโย จ ปุปฺผสมุคฺคานิ ทณฺฑทีปิกา นานาวณฺณ ธเช จ คเหตฺวา ปริวาเรสุํ. เอวํ ราชา มหนฺเตน ราชานุภาเวน นณฺทนวนํ นิกฺขนฺต เทวราชา วิย นิกฺขมิ. ตทา นานาวิธ ตุริย โฆเสหิ เจว หตฺถสฺส รถ สทฺเทหิ จ มหาปถวิภิชฺชนาการปฺปตฺตา วิย อโหสิ. तसेच, एक हजार आठ स्त्रियांनी हातात पूर्णघट घेऊन वेढले होते. एक हजार आठ पुरुष आणि तितक्याच स्त्रियांनी फुलांचे करंडक, मशाली आणि विविध रंगांचे ध्वज हातात घेऊन वेढले होते. अशा प्रकारे राजा मोठ्या राजवैभवाने, नंदनवनातून बाहेर पडणाऱ्या देवराजाप्रमाणे बाहेर पडला. तेव्हा विविध प्रकारच्या वाद्यांच्या आवाजाने आणि हत्ती व रथांच्या आवाजाने जणू काही पृथ्वी दुभंगून जात आहे असे वाटत होते. ตสฺมึ ขเณ โสณุตฺตโร อตฺตโน ปริเวเณเยว นิสินฺโน ตุริย โฆเสน รญฺโญ นิกฺขนฺตภาวํ ญตฺวา อภิญฺญาปาทกํ จตุตฺถชฺฌานํ สมาปชฺชิตฺวา อธิฏฺฐยา ปถวิยํ นิมุชฺชิตฺวา มญฺเชริก นาคภวเน มหากาฬานาครญฺโญ ปุรโต ปาตุรโหสิ. นาคราชา โสณุตฺตรํ ทิสฺวา อุฏฺฐายาสนา อภิวาเทตฺวา คณฺโธทเกน ปาเท โธวิตฺวา วณฺณ คณฺธ สมฺปนฺน กุสุเมหิ ปูเชตฺวา เอกามนฺตํ นิสีทิตฺวา กุโต อาคตตฺถ ภนฺเตติ ปุจฺฉิ ตมฺพปณฺณิ ทีปโต อาคตมฺหาหิ วุตฺเต กิมตฺถายาติ ปุจฺฉิ. त्या क्षणी आपल्या परिवेणातच बसलेल्या सोणुत्तरांनी, वाद्यांच्या घोषावरून राजा निघाला असल्याचे जाणून, अभिज्ञा-पादक चतुर्थ ध्यानात समापन्न होऊन, अधिष्ठान करून पृथ्वीत बुडी घेतली आणि मंजेरिका नागभवनात महाकाळ नागराजाच्या समोर ते प्रकट झाले. नागराजांनी सोणुत्तरांना पाहून आसनावरून उठून, त्यांना अभिवादन केले, सुगंधी जलाने त्यांचे पाय धुतले, वर्ण व गंधयुक्त फुलांनी त्यांची पूजा केली आणि एका बाजूला बसून विचारले, 'भंते, आपण कोठून आलात?' 'आम्ही तांबपण्णी द्वीपातून आलो आहोत,' असे सांगितल्यावर त्यांनी विचारले, 'कशासाठी?' มหาราช ตมฺพปณฺณิทีเป ทุฏฺฐคามณิ อภย มหาราชา มหา เจติยํ กาเรนฺโต ธาตุโย ภิกฺขุสงฺฆสฺส ภารมกาสิ. มหาวิหาเร ตึสมตฺตานิ ภิกฺขุสหสฺสานิ สนฺนิปติตฺวา มหาถูปตฺถาย ฐปิตธาตุโย มหากาฬ นาค รญฺโญ สนฺติเก ฐิตา, ตสฺส ตํ ปวตฺตึ กเถตฺวา ธาตุโย อาหราติ มํ เปเสสุํ, ตสฺมา อิธาคโตมฺหีติ อาห. तेव्हा सोणुत्तर म्हणाले, 'महाराज, तांबपण्णी द्वीपात दुट्ठगामणी अभय महाराज महाचेतिय (महास्तूप) बांधीत असून त्यांनी धातू (बुद्ध-धातू) आणण्याचा भार भिक्खू संघावर सोपवला आहे. महाविहारात सुमारे तीस हजार भिक्खू एकत्र जमले असून, महास्तूपासाठी राखून ठेवलेल्या धातू महाकाळ नागराजाकडे आहेत, ही माहिती देऊन त्यांनी 'त्या धातू घेऊन ये' असे सांगून मला पाठवले आहे; म्हणूनच मी येथे आलो आहे.' ตํ สุตฺวา นาคราชา ปพฺพเตน วิย อชฺโฌตฺถโฏ มหนฺเตน มทามนสฺเสน อภิภูโต เอวํ จินฺเตสิ มยํ ปน อิมา ธาตุโย ปูเชตฺวา อปายโต มุญฺจิตฺวา สคฺเค นิพฺพตฺติสฺสมาติ อมญฺญิมฺห. อยํ ปน ภิกฺขุ มหิทฺธิโก มหานุภาโว, สเจ อิมา ธาตุโย อิมสฺมึ ฐาเน ฐิโต ภเวยฺยุํ, อมฺเห อภิภวิตฺวาปิ คณฺหิตุํ สกฺกุเณยฺย. ธาตุโย อปเนตุํ วฏฺฏตีติ จินฺเตตฺวา ปริสํ โอโลเกนฺโต ปริส ปริยนฺเต ฐิตํ วาสุลทตฺตํ นาม อตฺตโน ภาคิเนยฺยํ ทิสฺวา ตสฺส สญฺญมทาสิ โส มาตุลสฺส อธิปฺปายํ ญตฺวา เจติยฆรํ คนฺตฺวา ธาตุกรณฺฑกํ อาทาย คิลิตฺวา สิเนรุปพฺพต ปาทมูลํ คนฺตฺวา- ते ऐकून नागराजा जणू पर्वताखाली दबल्यासारखा झाला आणि मोठ्या दुःखाने व्याकुळ होऊन असा विचार करू लागला, 'आम्ही तर या धातूंची पूजा करून दुर्गतीपासून मुक्त होऊ आणि स्वर्गात जन्म घेऊ, असे मानत होतो. परंतु हा भिक्खू महाऋद्धीवान व महाप्रभावशाली आहे. जर या धातू याच ठिकाणी राहिल्या, तर तो आमच्यावर मात करूनही त्या हस्तगत करू शकेल. त्यामुळे धातू येथून दूर नेणेच योग्य ठरेल.' असा विचार करून त्याने सभेकडे पाहिले आणि सभेच्या एका टोकाला उभा असलेला आपला भाचा 'वासुलदत्त' याला पाहून त्याला खूण केली. त्याने आपल्या मामाचा हेतू जाणून चैत्यगृहात जाऊन धातूंचा करंडा घेतला आणि तो गिळून तो सिनेरू पर्वताच्या पायथ्याशी गेला आणि— โยชนสตามาวฏฺฏํ ทีฆํ ติสต โยชนํ,ผณาเนกสหสฺสานิ-มาปิสิตฺวา มหิทฺธิโก,สิเนรุ ปาทมูลมฺหิ-ธุมายนฺโต จ ปชฺชลํ,อาภุชิตฺวาน โส โภเค-นิปชฺชิ วาลุกาตเล; 'शंभर योजन वेढ्याचा आणि तीनशे योजन लांबीचा देह धारण करून, अनेक हजार फणा निर्माण करून, त्या महाऋद्धीवान नागाने सिनेरू पर्वताच्या पायथ्याशी धूर आणि ज्वाला ओकत, आपले शरीर वेटोळे करून तो वाळूच्या मैदानावर निजला.' ‘‘อเนกานิ สหสฺสานิ-อตฺตนา สทิเส อหิ,มาปยิตฺวา สยาเปสิ-สมนฺตา ปริวาริเต,พหู เทวา จ นาคา จ-โอสรึสุ ตหึ ตทา,ยุทฺธํ อุภินฺนํ นาคานํ-สสฺสิสฺสาม มยํ อิติ; ’’ 'त्याने आपल्यासारखेच अनेक हजार सर्प निर्माण करून त्यांना सभोवताली वेढून निजवले. 'आम्ही या दोन्ही नागांचे युद्ध पाहू' या विचाराने तेव्हा तेथे अनेक देव आणि नाग एकत्र जमले.' ตโต นาคราชา ภาคิเนยฺเยน ธาตุโย อปนีตภาวํ ญตฺวา เอวมาห- มม สนฺติเก ธาตุโย นตฺถิ, ตุมฺเห อิธ ปปญฺจ อกตฺวา สีฆํ คนฺตฺวา ภิกฺขุสงฺฆสฺส ตํ ปวตฺตึ อาโรเจถ ภิกฺขุสงฺโฆ อญฺญโต ธาตุํ ปริเยสิสฺสตีติ สามเณโร อาทิเต ปฏฺฐาย ธาตุ อาคมนํ วตฺวา ธาตุโย ตว สนฺติเกเยว, ปปญฺจํ อกตฺวา เทหีติ โจเทสิ. त्यानंतर नागराजाने, भाच्याने धातू दूर नेल्याचे जाणून, असे म्हटले— 'माझ्याकडे धातू नाहीत. तुम्ही येथे विलंब न करता त्वरित जाऊन भिक्खू संघाला ही हकीकत सांगा; भिक्खू संघ इतर कोठून तरी धातूंचा शोध घेईल.' त्यावर सामणेरांनी सुरुवातीपासून धातूंच्या आगमनाचा इतिहास सांगून, 'धातू तुमच्याकडेच आहेत, विलंब न करता त्या द्या,' असा आग्रह धरला. ตโต นาคราชา สามเณเรน มูลมฺหิ คหิตภาวํ ญตฺวา เยน เกนจิ ปริยาเยน ธาตุโย อทตฺวาว เปสิตุํ วฏฺฏตีติ จินฺเตตฺวา สามเณรํ ธาตุฆรํ เนตฺวา เจติยญฺจ เจติยฆรญฺจ ทสฺเสสิ. ตํ ปน เจติยญฺจ เจติยฆรญฺจ สพฺพรตนมยเมว อโหสิ. त्यानंतर नागराजाने, सामणेरांना मूळ रहस्य समजले आहे हे जाणून, 'कोणत्याही उपायाने धातू न देताच यांना परत पाठवणे योग्य होईल,' असा विचार केला आणि त्यांनी सामणेरांना धातूगृहात नेऊन चैत्य व चैत्यगृह दाखवले. ते चैत्य आणि चैत्यगृह सर्व प्रकारच्या रत्नांनीच मढवलेले होते. วุตฺตญฺเหตํ มหาวํเส महावंशात असे म्हटले आहे— ‘‘อเนกธา อเนเกหิ รตเนหิ สุสงฺขตํ,เจติยํ เจติยฆรํ-ปสฺส ภิกฺขุ สุนิมฺมิต’’นฺติ; 'अनेक प्रकारे अनेक रत्नांनी सुशोभित केलेले, हे सुंदर रीतीने निर्माण केलेले चैत्य आणि चैत्यगृह पहा, हे भिक्खू!' ทสฺเสตฺวา จ ปน เจติยฆรโต โอรุยฺห อทฺธจณฺทกปาสาเณ ปวาฬปทุมมฺหิ ฐตฺวา อิมสฺส เจติยสฺส เจติยฆรสฺส จ อคฺฆํ กโรหิ ภนฺเตติ อาห สามเณโร น สกฺโกม มหาราช อคฺฆํ กาตุํ, สกเลปิ ตมฺภปณฺณิทีเป รตนานิ อิมํ อทฺธจณฺทก ปาสาณํ นาคฺฆตีติ อาห. ते दाखवून आणि चैत्यगृहातून खाली उतरून, अर्धचंद्राकृती पाषाणावरील प्रवाळ-कमळावर उभे राहून तो म्हणाला, 'भंते, या चैत्याचे आणि चैत्यगृहाचे मूल्य ठरवा.' सामणेर म्हणाले, 'महाराज, आम्ही याचे मूल्य ठरवू शकत नाही. संपूर्ण तांबपण्णी द्वीपातील रत्ने देखील या एका अर्धचंद्राकृती पाषाणाच्या मूल्याची बरोबरी करू शकत नाहीत.' นาคราชา เอวํ สนฺเต มหาสกฺการฏฺฐานโต อปฺปสกฺการฏฺฐานํ ธาตูนํ นยนํ อยุตฺตํ นนุ ภิกฺขูติ อาห. สามเณโร เอวมาหมหาราช พุทฺธา นาม ธมฺมครุกา, น อามิส ครุกํ, ตุมฺเหสุ จกฺกวาฬปฺปมาณํ รตนฆรํ มาเปตฺวา สพฺพรตนสฺส ปูเรตฺวา ธาตุโย ปริหรนฺเตสุปิ เอกนาโคปิ ธมฺมาภิสมยํ กาตุํ สมตฺโถ นาม นตฺถิ ยสฺมา- नागराज म्हणाला, 'असे असेल तर, भिक्खू, या धातूंना अशा महासत्कार (भव्य पूजेच्या) स्थानावरून कमी सत्काराच्या स्थानावर नेणे अयोग्य नाही का?' सामणेर म्हणाले, 'महाराज, बुद्ध हे धर्माला महत्त्व देणारे असतात, आमिषाला (भौतिक वस्तूंना) नाही. तुम्ही जरी चक्रवाळाच्या आकाराचे रत्नगृह निर्माण करून, ते सर्व प्रकारच्या रत्नांनी भरून धातूंचे जतन केले, तरी तुमच्यापैकी एकाही नागामध्ये धम्माचा साक्षात्कार (धम्माभिसमय) करण्याची क्षमता नाही, कारण—' ‘‘สจฺจาภิสมโย นาค-ตุมฺหากมฺปิ น วิชฺชติ. สจฺจาภิสมยฏฺฐานํ-เนตุํ ยุตฺตญฺหิ ธาตุโย. สํสารทุกฺขโมกฺขาย-อุปฺปชฺชนฺต ตถาคตา, พุทฺธสฺส เวตฺถาทีปฺปาโย-เตน เนสฺสามิ ธาตุโย. ธาตุนิธานํ อชฺเชว-โส หิ ราชา กริสฺสติ. 'हे नागा, तुमच्यामध्ये सत्याचा साक्षात्कार (सच्चाभिसमय) करण्याची क्षमता नाही. जेथे सत्याचा साक्षात्कार होऊ शकतो, अशा ठिकाणीच धातू नेणे योग्य आहे. संसार-दुःखातून मुक्तीसाठीच तथागत उत्पन्न होतात. बुद्धांचा हाच हेतू जाणून मी या धातू घेऊन जात आहे. कारण तो राजा आजच या धातूंची प्रतिष्ठापना करणार आहे.' ตสฺมา ปปญฺจมกริตฺวา-ลหุํ เม เทหิ ธาตุเย’’ติ-อาห. เอวํ วุตฺเต นาคราชา อปฺปฏิหาโน ยุตฺวา อตฺตโน ภาคิเนยฺเยน ธาตุโย โคปิโตติ มญฺญมาโน เอวมาห. ตุมฺเห ภนฺเต เจติเย ธาตูนํ อตฺถิภาวํ วา นตฺถิภาวํ วา อชานนฺตา เทหิ เทหีติ วทถ. อหํ นตฺถีติ วทามิ. สเจ ปสฺสถ คเหตฺวา คจฺฉถาติ. คณฺหามิ มหาราชาติ, คณฺห ภิกฺขูติ. คณฺหามิ มหาราชาติ, คณฺห ภิกฺขูติ ติกฺขตฺตุํ ปฏิญฺญํ คเหตฺวา. 'म्हणून विलंब न करता मला त्वरित धातू द्या,' असे ते म्हणाले. असे म्हटल्यावर नागराजा निरुत्तर झाला आणि आपल्या भाच्याने धातू सुरक्षितपणे लपवून ठेवल्या आहेत असे मानून तो म्हणाला, 'भंते, आपण चैत्यात धातू आहेत की नाहीत हे न जाणताच 'द्या, द्या' असे म्हणत आहात. मी सांगतो की त्या येथे नाहीत. जर आपल्याला त्या दिसत असतील, तर घेऊन जा.' 'मी घेतो, महाराज,' 'घ्या, भिक्खू,' 'मी घेतो, महाराज,' 'घ्या, भिक्खू' अशी तीन वेळा प्रतिज्ञा (वचन) घेऊन— ‘‘สุขุมํ กรํ มาปยิตฺวา-ถิกฺขู ตตฺร ฐิโตจ โส,ภาคิเนยฺยสฺส วทเน-หตฺถมฺปกฺขิปฺป ตาวเท,ธาตุกรณฺฑมทาย-ติฏฺฐ นาคาติ ภาสิห,นิมุชฺชิตฺวา ปถวิยํ-ปริเวณมฺหิ อุฏฺฐหิ; ’’ 'तेथे उभे असलेल्या त्या भिक्खूने आपला हात सूक्ष्म करून, तत्काळ (नागराजाच्या) भाच्याच्या तोंडात हात घातला आणि धातूंचा करंडा काढून घेऊन 'थांब, नागा!' असे म्हटले. मग पृथ्वीत बुडी घेऊन तो आपल्या परिवेणात प्रकट झाला.' ตทา สามเณรสฺส นาเคน สทฺธึ ยุทฺธํ ปสฺสิสฺสามาติ สมาคตา เทว-นาค ปริสาป ภิกฺขุนาคสฺส วิชยํ ทิสฺวา หฏฺฐา ปโมทิโต ธาตุโย ปูชยนฺตาว เตเนว สห อาคมุํ, นาคราชา สามเณรสฺส คต กาเล ภิกฺขุํ วญฺเจตฺวา เปสิโตมฺหีติ หฏฺฐตุฏฺโฐ ธาตุโย คเหตฺวา อาคมตฺถาย ภาคิเนยฺยสฺส สาสนํ เปเสสิ. तेव्हा सामणेराचे नागासोबतचे युद्ध पाहण्यासाठी जमलेली देव आणि नागांची परिषद देखील त्या भिक्खू-नागाचा (सामणेराचा) विजय पाहून अत्यंत हर्षित व आनंदित झाली आणि धातूंची पूजा करतच त्याच्यासोबत आली. दुसरीकडे, सामणेर निघून गेल्यावर नागराजा 'मी भिक्खूला फसवून परत पाठवले आहे,' या विचाराने अत्यंत आनंदी झाला आणि धातू घेऊन याण्यासाठी त्याने आपल्या भाच्याला निरोप पाठवला. ‘‘ภาคิเนยฺโย’ถ กุจฺฉิมฺหิ-อปสฺสิตฺวา กรณฺฑกํ,ปริเทวมาโน อาคนฺตฺวา-มาตุลสฺส นิเวทยิ; ตทา โส นาคราชาปิ-วญฺจิตมฺห มยํ อิติ,ปริเทวิ นาคา สพฺเพปิ-ปริเทวึสุ ปิณฺฑิตา; ’’ 'त्यानंतर भाच्याने आपल्या पोटात करंडा न पाहिल्यामुळे, तो विलाप करत आला आणि त्याने आपल्या मामाला हे सांगितले. तेव्हा तो नागराजा देखील 'आम्ही फसवले गेलो आहोत' असे म्हणून विलाप करू लागला आणि सर्व नाग एकत्र yeun शोक करू लागले.' ตโต นาคภวเน สพฺเพ นาคา สมาคนฺตฺวา เกเส มุญฺจิตฺวา อุโภหิ หตฺเถหิ หทเย คเหตฺวา นีลุปฺปล สทิเสหิ เนตฺเตหิ วิลีน โสกมิว อสฺสุธารํ ปวตฺตยมานา- त्यानंतर नागभवनात सर्व नाग एकत्र आले. त्यांनी आपले केस मोकळे सोडले, दोन्ही हातांनी आपले हृदय धरले आणि नीलकमळासारख्या आपल्या डोळ्यांतून जणू वितळलेल्या शोकाप्रमाणे अश्रूंच्या धारा वाहू लागल्या— ‘‘ปริเทวมานา อาคนฺตฺวา-นาคา สงฺฆสฺส สนฺติเก,พหุธา ปริเทวึส-ธาตาหรณ ทุกฺขิตา’’ติ; 'विलाप करत ते नाग भिक्खू संघाच्या समोर आले आणि धातू हिरावून घेतल्याच्या दुःखाने व्याकुळ होऊन त्यांनी अनेक प्रकारे विलाप केला.' ปริเทวิตฺวา จ ภิกฺขุสงฺฆสฺส เอวมาหํสุ- ภนฺเต กสฺสจิ ปีฬํ อกตฺวา อมฺหากํ ปุญฺญานุภาเวน ลภิตฺวา จีรปริหฏ ธาตุโย กสฺมา อนวเสสํ กตฺวา อหราเปถ อมฺหากํ สคฺคโมกฺขนฺตรายํ กโรถาติ. आणि विलाप करून ते भिक्खू संघाला असे म्हणाले, "भन्ते, कोणालाही पीडा न देता, आमच्या पुण्याच्या प्रभावाने प्राप्त झालेल्या आणि दीर्घकाळ जतन केलेल्या या धातू तुम्ही काहीही शिल्लक न ठेवता सर्वच्या सर्व का घेऊन जात आहात? तुम्ही आमच्या स्वर्ग आणि मुक्तीच्या मार्गात अडथळा आणत आहात." ’เตสํ สงฺโฆ’นุกมฺปาย-โถกํ ธาตุมทาปยิ,เต เตน ตุฏฺฐา คนฺตฺวาน-ปูชาภณฺฑานิ อาหรุํ; "त्यांच्यावरील अनुकंपेने संघाने त्यांना थोडेसे धातू दिले. त्याने संतुष्ट होऊन त्यांनी जाऊन पूजेचे साहित्य आणले;" ตโต สกฺโก เทวานมิณฺโท วิสฺสกมฺมํ อามนฺเตตฺวา สามเณรสฺส อุฏฺฐิตฏฺฐาเน สตฺตรตนมยํ มณฺฑปํ มาเปหีติ อาห. โส ตสฺมิเยว ขเณ มณฺฑปํ มาเปสิ อถ สกฺโก ทฺวีสุ เทวโลเกสุ เทวปริสาย ปริวุโต สุวณฺณจงฺโคฏเกน สทฺธึ รตน ปลฺลงฺกมาทาย อาคนฺตฺวา ตสฺมึ มณฺฑเป ปติฏฺฐาเปตฺวา สามเณรสฺส หตฺถโต ธาตุกรณฺฑกํ คเหตฺวา ตสฺมึ ปลฺลงฺเก ปติฏฺฐาเปสิ. ตทา- त्यानंतर देवांचा राजा शक्र याने विश्वकर्माला बोलावून सांगितले, "सामणेर जेथे उभे राहिले आहेत, त्या ठिकाणी सप्त रत्नमयी मंडप तयार कर." त्याने त्याच क्षणी मंडप तयार केला. त्यानंतर शक्र, दोन देवलोकांतील देवगणांनी वेढलेला, सोन्याच्या करंडीसह रत्नजडित पलंग घेऊन आला आणि त्या मंडपात तो स्थापित करून, सामणेरांच्या हातातून धातूची करंडी घेऊन त्या पलंगावर स्थापित केली. त्या वेळी- ’พฺรหฺมา ฉตฺตมธาเรสิ-สนฺตุสิโต วาลวิชนึ,มณิตาลวณฺฏํ สุยาโม-สกฺโก สงฺขนฺตุ โสทกํ; "ब्रह्मदेवाने छत्र धरले, संतुषित देवाने चामर धरले, सुयाम देवाने मणीजडित ताडपत्राचा पंखा धरला आणि शक्राने पाण्याने भरलेला शंख फुंकला;" จตฺตาโร ตุ มหาราช-อฏฺฐํสุ ขคฺคปาณิโน,สมุคฺคหตฺถา ทฺวตฺตึสา-เทวปุตฺตา มหิทฺธิกา; "चार महाराज हातात तलवार घेऊन उभे राहिले, आणि हातात पेट्या घेतलेले बत्तीस महर्द्धिक देवपुत्र उभे राहिले;" ปาริจฺฉตฺตก ปุปฺเผหิ ปูชยนฺตา ตหึ ฐิตา,กุมาริโยปิ ทฺวตฺตึสา-ทณฺฑิทีปธรา ฐิตา; "पारिजातकाच्या फुलांनी पूजा करत ते तिथे उभे राहिले, आणि बत्तीस देवकन्या हातात दीपदंड घेऊन उभ्या राहिल्या;" ปลาเปตฺวา ทุฏฺฐยกฺเข-ยกฺขเสนาปติ ปนอฏฺฐวีสติ อฏฺฐํสุ-อารกฺขํ กุรุมานกา; "दुष्ट यक्षांना पळवून लावून, अठ्ठावीस यक्ष सेनापती रक्षण करत उभे राहिले;" วีณํ วาทยมาโนว-อฏฺฐา ปญฺจสิโข ตหึ,รงฺคภูมึ มาปยิตฺวา-ติมฺพรู ตุริยโฆสวา; "पंचशिख तिथे वीणा वाजवत उभा राहिला, आणि तिम्बरूने रंगभूमी निर्माण करून वाद्यांचा घोष केला;" อเนกา เทวปุตฺตา จ-สาธุคีตปฺปโยชกา,มหากาโล นาคราชา-ถูยมาโน อเนกธา; "अनेक देवपुत्र मधुर गीते गात होते, आणि नागराज महाकाल विविध प्रकारे स्तुती करत होता;" ทิพฺพตุริยานิ วชฺชนฺติ-ทิพฺพสงฺคิติ วตฺตติ,ทิพฺพคณฺธา จ วสฺสานิ-วสฺสาเปนฺติ จ เทวตา; "दिव्य वाद्ये वाजत होती, दिव्य संगीत चालले होते आणि देवता दिव्य सुगंधाचा वर्षाव करत होत्या." ตทา อิณฺทคุตฺตตฺเถโร มารสฺส ปฏิพาหนตฺถาย จกฺกวาฬปริยนฺตํ กตฺวา อากาเส โลหฉตฺตํ มาเปสิ. ปญฺจนิกายิก เถรา ธาตุโย ปริวาเรตฺวา ปญฺจสุ ฐาเนสุ นิสีทิตฺวา คณสชฺฌายมกํสุ. ตสฺมึ กาเล ราชา ตํ ฐนํ อาคนฺตฺวา สิสโต สุวณฺณ จงฺโคฏกํ โอตาเรตฺวา ธาตุ จงฺโคฏกํ อตฺตโน จงฺโคฏเก ฐเปตฺวา ปลฺลงฺเก ปติฏฺฐาเปตฺวา คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺวา ปญฺจปติฏฺฐิเตน วนฺทิตฺวา สิรสิ อญฺชลึ ปคฺคยฺห อกฺขีนิ อุมฺมีเลตฺวา โอโลเกนฺโต อฏฺฐาสิ. ตสฺมึ ขเณ ธาตุมตฺถเก เสตจฺฉตฺตํ ทิสฺสติ ฉตฺตคาหก พฺรหฺมา น ทิสฺสติ. ตถา ตาลวณฺฏ วิชนิ อาทโย ทิสฺสนฺติ คาหกา น ทิสฺสนฺติ ทิพฺพตุริยโฆส สงฺคิติโย สุยฺยนฺติ คณฺธพฺพ เทวตา น ทิสฺสนฺติ. ราชา เอตํ อจฺฉริยํ ทิสฺวา อิณฺทคุตฺตตฺเถรํ เอวมาห-เทวตา ทิพฺพฉตฺเตน ปูเชสุํ อหํ มานุส กจฺฉตฺเตน ปูเชมิ ภนฺเนติ. เถโร ยุตฺตํ มหาราชาติ อาห. ราชา อตฺตโน สุวณฺณปิณฺฑิเก เสตจฺฉตฺเตน ปูเชตฺวา สุวณฺณภึการํ คเหตฺวา อภิเสโกทกํ ทตฺวา ตํ ทิวสํ สกลตมฺพปณฺณิ ทีเป รชฺชํ อทาสิ. त्या वेळी थेर इंदगुत्त यांनी माराचा प्रतिकार करण्यासाठी चक्रवाळाच्या मर्यादेपर्यंत आकाशात लोखंडी छत्र निर्माण केले. पाच निकायांचे ज्ञाते असलेले थेर धातूंना वेढून पाच ठिकाणी बसले आणि त्यांनी सामूहिक सज्जाय (पाठ) केला. त्या वेळी राजाने त्या ठिकाणी येऊन आपल्या डोक्यावरून सोन्याची करंडी उतरवली आणि धातूंची करंडी स्वतःच्या करंडीत ठेवून ती पलंगावर स्थापित केली. गंध, पुष्पमाला इत्यादींनी पूजा करून, पंचांग प्रणिपात करून वंदन केले आणि डोक्यावर हात जोडून, डोळे उघडून पाहत तो उभा राहिला. त्या क्षणी धातूंच्या वर श्वेतछत्र दिसत होते, पण छत्र धरणारा ब्रह्मदेव दिसत नव्हता. तसेच ताडपत्राचा पंखा, चामर इत्यादी दिसत होते, पण ते धरणारे दिसत नव्हते. दिव्य वाद्यांचे आवाज आणि संगीत ऐकू येत होते, पण गंधर्व देव दिसत नव्हते. राजाने हे आश्चर्य पाहून थेर इंदगुत्त यांना असे म्हटले, "भन्ते, देवतांनी दिव्य छत्राने पूजा केली, मी मानवी छत्राने पूजा करतो." थेर म्हणाले, "योग्य आहे, महाराज." राजाने आपल्या सोन्याच्या पीठावर श्वेतछत्राने पूजा केली आणि सोन्याची झारी घेऊन अभिषेकाचे पाणी अर्पण करून त्या दिवशी संपूर्ण तांबपण्णी द्वीपाचे राज्य अर्पण केले. ตโต สพฺพตุริยานิ ปคฺคณฺหึสุ, คณฺธมาลาทีหิ ปูเชตฺว มหนฺตํ สกฺการมกํสุ ปุน ราชา เถรํ ปุจฺฉิ - อมฺหากํ สตฺถา ทิพฺพมานุสกานิ ทฺเว ฉตฺตานิ ธาเรสิ ภนฺเต. น ทฺเว ฉตฺตานิ ตีณิ ฉตฺตานิ มหาราชาติ. อญฺญํ ฉตฺตํ นปสฺสามิ ภนฺเนติ. สีลปติฏฺฐํ สมาธิทณฺฑกํ อิณฺทฺริยสลากํ พลมาลํ มคฺคผลปตฺต สญฺฉนฺนํ วิมุตฺติวรเสตจฺฉตฺตํ อุสฺสาเปตฺวา ญาณาภิเสกมฺปตฺโต ธมฺมรตน จกฺกํ ปวตฺเตตฺวา ทสสหสฺส จกฺกวาเฬสุ พุทฺธรชฺชํ หตฺถคตํ กตฺวา รชฺชํ กาเรสีติ ราชา ตีณิจฺฉตฺต ธารกสฺส สตฺถุโน ติกฺขตฺตุํ รชฺชํ ทมฺมีติ ติกฺขตฺตุํ ธาตุโย รชฺเชน ปูเชสิ. त्यानंतर सर्व वाद्ये वाजू लागली, गंध, पुष्पमाला इत्यादींनी पूजा करून त्यांनी मोठा सत्कार केला. पुन्हा राजाने थेरांना विचारले, "भन्ते, आमचे शास्ता दिव्य आणि मानवी अशी दोन छत्रे धारण करतात का?" थेर म्हणाले, "दोन छत्रे नव्हे, तर तीन छत्रे, महाराज." राजा म्हणाला, "भन्ते, मी तिसरे छत्र पाहत नाही." (थेर म्हणाले), "शील हा ज्याचा पाया आहे, समाधी हा ज्याचा दांडा आहे, इंद्रिये या ज्याच्या काड्या आहेत, बल ही ज्याची माला आहे आणि मार्ग-फलांच्या पानांनी जे आच्छादित आहे, असे विमुक्तीचे श्रेष्ठ श्वेतछत्र उभारून, ज्ञान-अभिषेक प्राप्त करून, धम्मरत्न चक्र प्रवर्तित करून, दहा हजार चक्रवाळांमध्ये बुद्धराज्य हस्तगत करून त्यांनी राज्य केले." तेव्हा राजाने "तीन छत्रे धारण करणाऱ्या शास्त्यांना मी तीन वेळा राज्य अर्पण करतो" असे म्हणून तीन वेळा धातूंची राज्याने पूजा केली. ตโต ราชา เทวมนุสฺเสสุ ทิพฺพคณฺธมาลาทีหิ ปูเชนฺเตสุ อเนเกสุ ตุริยโฆส สงฺคิเตสุ วตฺตมาเนสุ ธาตุกรณฺฑกํ สีเสนาทาย รตนมณฺฑปโต นิกฺขมิตฺวา ภิกฺขุสงฺฆ ปริวุโต มหาเจติยํ ปทกฺขิณํ กตฺวา ปาจีนทฺวาเรนารุยฺห ธาตุคพฺภํ โอตริ. ตโต มหาเจติยํ ปริวาเรตฺวา ฉนฺนวุติ โกฏิปฺปมาณ อรหนฺโต อฏฺฐํสุ. त्यानंतर, देव आणि मानव दिव्य गंध, पुष्पमाला इत्यादींनी पूजा करत असताना आणि अनेक वाद्यांचे घोष व संगीत चालू असताना, राजाने धातूंची करंडी डोक्यावर घेतली आणि रत्नमंडपातून बाहेर पडून, भिक्खू संघाने वेढलेल्या अवस्थेत महाचेतियाला प्रदक्षिणा घालून, पूर्व दाराने वर चढून धातूगर्भात प्रवेश केला. त्यानंतर महाचेतियाला वेढून शहाण्णव कोटी अरहंत उभे राहिले. ราชา สีสโต ธาตุกรณฺฑกํ โอตาเรตฺวา มหารเห สยนปิฏฺเฐ ฐเปสฺสามีติ จินฺเตสิ ตสฺมึ ขเณ ธาตุกรณฺฑโก รญฺโญ สีสโต สตฺต ตาลปฺปมาเณ ฐาเน คนฺตฺวา สยเมว วิจริ ธาตุโย อากาสมุคฺคนฺตฺวา ทฺวตฺตึส มหา ปุริสลกฺขณ อสิติ อนุพฺยญฺชนา พฺยามปฺปภา ปติมณฺฑิตํ เกตุมาโลป โสภิตํ นิล-ปีต-โลหิตาทิ เภท วิจิตฺร รํสิชาลา สมุชฺชลํ พุทฺธเวสํ คเหตฺวา คณฺฑมฺพมูเล ยมก ปาฏิหาริยํ สทิส ยมก ปาฏิหาริยํ อกํสุ. ตํ ธาตุปาฏิหาริยํ ทิสฺวา ปสีทิตฺวา อรหตฺตมฺปตฺตา เทวมนุสฺสา ทฺวาทสโกฏิโย อเหสุํ. เสสผลตฺตยํ ปตฺตา คณนปถมตีตา อเหสุํ. เอวํ ธาตุโย อเนกธา ปาฏิหาริยํ ทสฺเสตฺวา พุทฺธเวสํ วิสฺสชฺเชตฺวา กรณฺฑกํ ปวิสิตฺวา เตน สทฺธึ โอตริตฺวา รญฺโญ สีเส ปติฏฺฐหึสุ. राजाने विचार केला की, "मी डोक्यावरून धातूंची करंडी उतरवून ती मौल्यवान शय्येवर ठेवीन." त्याच क्षणी धातूंची करंडी राजाच्या डोक्यावरून सात ताड झाडांच्या उंचीवर गेली आणि स्वतःच फिरू लागली. धातू आकाशात वर गेले आणि बत्तीस महापुरुष लक्षणे, ऐंशी अनुव्यंजने, व्यामप्रभा यांनी सुशोभित, केतुमालेने शोभिवंत आणि निळ्या, पिवळ्या, तांबड्या इत्यादी विविध रंगांच्या किरणजालाने देदीप्यमान असे बुद्धरूप धारण करून, त्यांनी गंडंब वृक्षाच्या मुळाशी केलेल्या यमक प्रातिहार्यासारखे यमक प्रातिहार्य केले. ते धातूंचे प्रातिहार्य पाहून प्रसन्न झालेले आणि अरहंतपद प्राप्त केलेले देव व मनुष्य बारा कोटी झाले. उर्वरित तीन फले प्राप्त करणारे तर अगणित होते. अशा प्रकारे धातूंनी अनेक प्रकारे प्रातिहार्य दाखवून, बुद्धरूप सोडून करंडीत प्रवेश केला आणि तिच्यासह खाली उतरून राजाच्या डोक्यावर स्थापित झाल्या. ราชา อมเตน วิย อภิสิตฺโต สผลํ มนุสฺสตฺต ปฏิลาภํ มญฺญมาโน อุโภหิ หตฺเถหิ ธาตุกรณฺฑกํ คเหตฺวา นาฏก ปริวุโต อลงฺกต สยน สมีปํ คนฺตฺวา ธาตุจงฺโคฏกํ รตนปลฺลงฺเก ฐเปตฺวา คณฺธวาสิโตทเกน หตฺเถ โธวิตฺวา วตุชาติย คณฺเธน อุพฺพฏฺเฏตฺวา รตนกรณฺฑกํ วิจริตฺวา ธาตุโย คเหตฺวา เอวํ จินฺเตสิ. राजा जणू अमृताने अभिषिक्त झाल्यासारखा, आपला मनुष्यजन्म यशस्वी झाला असे मानून, दोन्ही हातांनी धातूंची करंडी घेऊन, नर्तकींनी वेढलेल्या अवस्थेत सुशोभित शय्येच्या जवळ गेला. त्याने धातूंची करंडी रत्नजडित पलंगावर ठेवली, सुगंधी पाण्याने आपले हात धुतले, उत्कृष्ट सुगंधी द्रव्याने हात चोळले आणि रत्नकरंडी उघडून धातू हातात घेऊन असा विचार करू लागला. ‘‘อนากุลา เกหิจิปิ ยทิ เหสฺสสฺติ ธาตุโย,ชนสฺส สรณํ หุตฺวา ยทิ ฐสฺสนฺติ ธาตุโย; "जर या धातू कोणाकडूनही विचलित न होता सुरक्षित राहणार असतील, आणि जर या धातू लोकांचे शरण बनून राहणार असतील;" สตฺถุนิปนฺนา กาเรน ปรินิพฺพาน มญฺจเก,นิปชฺชนฺตุ สุปญฺญตฺเต-สยนมฺหิ มหารเห’’ติ; "तर शास्त्यांनी परिनिर्वाण शय्येवर ज्या प्रकारे शयन केले होते, त्याच प्रकारे त्यांनी या उत्तम सजवलेल्या मौल्यवान शय्येवर शयन करावे." เอวํ จินฺเตตฺวา ปน วรสยนปิฏฺเฐ ธาตุโย ฐเปสิ ตสฺมึ ขเณ ธาตุโย รญฺญา จินฺติต นิยาเมเนว มหารเห สยเน พุทฺธเวเสน สยึสุ. असा विचार करून त्याने त्या श्रेष्ठ शय्येवर धातू ठेवल्या. त्याच क्षणी, राजाने विचार केल्याप्रमाणेच, त्या धातूंनी बुद्धरूपात त्या मौल्यवान शय्येवर शयन केले. ‘‘อาสาฬหิ สุกฺกปกฺขสฺส ปนฺนรส อุโปสเถ,อุตฺตราสาฬฺห นกฺขตฺเต เอวํ ธาตุ ปติฏฺฐิตา; "आषाढ महिन्याच्या शुक्ल पक्षातील पंधराव्या उपोसथ दिवशी, उत्तराषाढा नक्षत्रावर अशा प्रकारे धातूंची स्थापना झाली;" สห ธาตุ ปติฏฺฐานา อกมฺปิตฺถ มหามหี, ปาฏิหีรานิ เนกานิ ปวตฺตึสุ อเนกธา.’’ धातूंच्या स्थापनेबरोबरच ही महापृथ्वी कंपित झाली आणि अनेक प्रकारची प्रातिहार्ये विविध मार्गांनी घडून आली. ตทหิ อุทกปริยนฺตํ กตฺวา อยํ มหาปถวี สงฺกมฺปิ สมฺปกมฺปิ สมฺปเวธิ, มหาสมุทฺโท สงฺขูภิ, อากาเส วิชฺชุลฺลตา นิจฺฉรึสุ. ขณิกวสฺสํ วสฺสิ, ฉ เทวโลกา เอกโกลาหล มโหสิ ราชา เอตํ อจฺฉริยํ ทิสฺวา ปสนฺโน อตฺตโน กญฺจน มาลิก เสตจฺฉตฺเตน ธาตุโย ปูเชตฺวา ตมฺพปณฺณิทิเป รชฺชํ สตฺตาหํ ทตฺวา ตึส สตสหสฺสคฺฆนกํ อลงฺการ ภณฺฑํ โอมุญฺจิตฺวา ปูเชสิ. ตถา สพฺพาปิ นาฏกิตฺถิโย อมจฺจา เสส มหาชโน เทวา จ สพฺพาภรณานิ ปูเชสุํ ตสฺมา- त्या दिवशी जलाच्या मर्यादेपर्यंत ही महापृथ्वी कंपित झाली, अत्यंत प्रकंपित झाली आणि तीव्रतेने थरथरली; महासागर खवळला, आकाशात विजा चमकू लागल्या. क्षणिक पाऊस पडला आणि सहा देवलोकांमध्ये एकच कोलाहल माजला. राजाने हे आश्चर्य पाहून प्रसन्न होऊन आपल्या सुवर्णमालेने आणि श्वेतछत्राने धातूंची पूजा केली, ताम्रपर्णी द्वीपाचे राज्य सात दिवसांसाठी अर्पण केले आणि तीन लाख मूल्य असलेले आपले अलंकार व दागिने अंगावरून उतरवून अर्पण केले. त्याचप्रमाणे सर्व नर्तकी, अमात्य, उर्वरित जनसमुदाय आणि देवांनीही आपले सर्व अलंकार अर्पण करून पूजा केली. म्हणून - ติฏฺฐนฺตํ สุคตํ ติโลกมหิตํ โย ปูชเย สาทรํ,โย วา สาสป พีชมตฺตมฺปิ ตํ ธาตุํ นโร ปูชเย; जो मनुष्य तिन्ही लोकांत पूजनीय अशा प्रत्यक्ष विद्यमान सुगतांची (बुद्धांची) आदराने पूजा करतो, किंवा जो मनुष्य त्यांच्या मोहरीच्या दाण्याएवढ्या धातूची पूजा करतो; เตสํ ปุญฺญผลํ สมานมีติ ตํ จิตฺตปฺปสาเท สเม,ญตฺวา ตํ ปรินิพฺพุเตปิ สุคเต ธาตุํ พุโธ ปูชเย’ติ; चित्ताची प्रसन्नता समान असल्यास, त्या दोन्हीचे पुण्यफळ समानच असते, हे जाणून सुगत परिनिर्वाण पावले असले तरीही बुद्धिमान माणसाने त्यांच्या धातूंची पूजा करावी. ตโต ราชา จีวรวตฺถานิ เจว คุฬ-สปฺปิ อาทิ เภสชฺชานิ จ สงฺฆสฺส ทตฺวา สพฺพรตฺตึ คณสชฺฌายํ กาเรสิ ปุน ทิวเส นคเร เภรึ จราเปสิ มหาชโน อิมํ สตฺตาหํ คณฺธมาลาทีนิ อาทิย คนฺตฺวา ธาตุโย วนฺทตูติ อิณฺทคุตฺตตฺเถโรปิ สกล ตมฺพปณฺณิ ทีเป มนุสฺสา ธาตุโย วนฺทิตุกามา, ตํ ขณํเยว อาคนฺตฺวา วนฺทิตฺวา ยถาฏฺฐานํ คจฺฉนฺตูติ อธิฏฺฐาสิ. त्यानंतर राजाने संघाला चीवर-वस्त्रे तसेच गूळ, तूप इत्यादी औषधी देऊन रात्रभर सामूहिक सज्झाय (पठण) करवला. दुसऱ्या दिवशी नगरात दवंडी पिटवली की, 'लोकांनी या सात दिवसांत गंध, पुष्पमाला इत्यादी घेऊन जाऊन धातूंची वंदना करावी.' इंद्रगुप्त थेरांनीही असा अधिष्ठान केला की, 'संपूर्ण ताम्रपर्णी द्वीपातील जे लोक धातूंची वंदना करू इच्छितात, त्यांनी त्याच क्षणी येथे येऊन वंदना करावी आणि आपापल्या स्थानी परत जावे.' เต ตเถว ธาตุโย วนฺทิตฺวา คมึสุ ราชา สตฺตาหํ สงฺฆสฺส มหาทานํ ปวตฺเตตฺวา สตฺตาหสฺส อจฺจเยน ธาตุคพฺเภ มยา กตฺตพฺพกิจฺจํ นิฏฺฐาปิตํ, ธาตุคพฺภํ ปิทหถ ภนฺเตติ สงฺฆสฺส อาโรเจสิ. สงฺโฆ อุตฺตรสุมน สามเณเร อามนฺเตตฺวา ตุมฺเหหิ ปุพฺเพ อาหฏ เมทวณฺณ ปาสาเณน ธาตุ คพฺภํ ปิทหถาติ อาห. เต สาธูติ สมฺปฏิจฺฉิตฺวา ธาตุคพฺภํ ปิทหึสุ. त्यांनी तसेच धातूंची वंदना केली आणि ते निघून गेले. राजाने सात दिवस संघाला महादान दिले आणि सात दिवस संपल्यावर, 'भंते, धातूगर्भाच्या ठिकाणी माझे जे कर्तव्य होते ते मी पूर्ण केले आहे, आता आपण धातूगर्भ बंद करावा,' असे राजाने संघाला सांगितले. संघाने उत्तर आणि सुमन या सामणेरांना बोलावून सांगितले, 'तुम्ही पूर्वी आणलेल्या मेदवर्ण पाषाणाने धातूगर्भ बंद करा.' त्यांनी 'साधू' म्हणून ते स्वीकारले आणि धातूगर्भ बंद केला. ตโต ขีณาสวา ธาตุคพฺเภ คณฺธา มา สุสนฺตุ มาลา มา มิลายนฺตุ. ทีปา มา นิพฺพายนฺตุ รตนานิ มา วิวณฺณานิ โหนฺตุ ปูชนียภณฺฑานิ มา นสฺสนฺตุ. เมทวณฺณ ปาสาณา สนฺธียนฺตุ, ปจฺจตฺถิกานํ โอกาโส มา โหตูติ อธิฏฺฐหึสุ. त्यानंतर क्षीणासवांनी (अर्हतांनी) असा अधिष्ठान केला की, 'धातूगर्भातील सुगंध सुकू नयेत, पुष्पमाला कोमजू नयेत, दिवे विझू नयेत, रत्ने निस्तेज होऊ नयेत, पूजनीय वस्तू नष्ट होऊ नयेत, मेदवर्ण पाषाण एकमेकांशी घट्ट जोडले जावेत आणि शत्रूंना येथे प्रवेश करण्याची संधी मिळू नये.' เอวํ ราชา ธาตุ นิธาเปตฺวา ปุน นคเร เภรึ จราเปสิ มหา เจติเย ธาตุํ นิธาเปตฺวา ธาตุํ อาหริตฺวา นิธานํ กโรนฺตูติ. มหาชโน อตฺตโน อตฺตโน พลานุรูเปน สุวณฺณ รชตาทิ กรณฺเฑ การาเปตฺวา ตตฺถ ธาตุโย ปติฏฺฐาเปตฺวา ธาตุนิธานสฺสุปริ เมทวณฺณ ปาสาณ ปิฏฺฐิยํ นิทหึสุ. สพฺเพหิ สนฺนิหิต ธาตุโย สหสฺสมตฺตา อเหสุนฺติ. अशा प्रकारे राजाने धातूंची स्थापना करून पुन्हा नगरात दवंडी पिटवली की, 'महाचेतियामध्ये धातूंची स्थापना केली जात आहे, तरी लोकांनीही धातू आणून त्यांची स्थापना करावी.' लोकांनी आपापल्या शक्तीनुसार सोन्या-चांदीचे करंडे बनवून, त्यात धातू ठेवून, धातूंच्या स्थापनेच्या वर मेदवर्ण पाषाणाच्या पृष्ठभागावर ते ठेवले. सर्वांनी मिळून आणलेले धातू सुमारे एक हजार झाले. อิติ สาธุชน มโนปสาทนตฺถาย กเต ถูปวํเส ธาตุนิธาน กถา นิฏฺฐิตา. अशा प्रकारे, सज्जनांच्या मनाच्या प्रसन्नतेसाठी रचलेल्या 'थूपवंस' (स्तूपवंश) मधील 'धातू स्थापना कथा' समाप्त झाली. ๒๔. ตโต ราชา ตํ สพฺพํ ปิทเหตฺวา เจติยํ กโรนฺโต อุทเรน สทฺธึ จตุรสฺส โกฏฺฐกํ นิฏฺฐาเปสิ อถ ฉตฺตกมฺเม สุธากมฺเม จ อนิฏฺฐิเตเยว มารณนฺติก โรเคน คิลาโน หุตฺวา ทีฆวาปิโต กนิฏฺฐภาตรํ ปกฺโกสาเปตฺวา เจติเย อนิฏฺฐิตํ ฉตฺตกมฺมํ สุธากมฺมญฺจ สีฆํ นิฏฺฐาเปตฺวา มํ โตเสหิ ตาตาติ อาห. โส รญฺโญ ทุพฺพลภาวํ ญตฺวา อนฺตเร อนิฏฺฐิตกมฺมํ กาตุํ น สกฺกาติ สุทฺธวตฺเถหิ กญฺจุกํ กาเรตฺวา เจติเย ปฏิมุญฺจาเปตฺวา จิตฺตกาเรหิ กญฺจุก มตฺถเก เวทิกา จ ปุณฺณฆฏ ปญฺจงฺคุลิ ปนฺติโย จ การาเปสิ. २४. त्यानंतर राजाने ते सर्व बंद करून चेतिय (स्तूप) बांधताना गर्भासह चौरस कोठडी पूर्ण केली. परंतु छत्र बसवण्याचे काम (छत्रकर्म) आणि चुना लावण्याचे काम (सुधाकर्म) अपूर्ण असतानाच, राजा प्राणघातक आजाराने आजारी पडला. त्याने दीघवापीहून आपल्या धाकट्या भावाला बोलावून घेतले आणि सांगितले, 'बाळा, चेतियचे अपूर्ण राहिलेले छत्रकर्म आणि सुधाकर्म लवकर पूर्ण करून मला संतुष्ट कर.' त्याने राजाची दुर्बल अवस्था पाहून विचार केला की, 'या थोड्या वेळात हे अपूर्ण काम पूर्ण करणे शक्य नाही.' म्हणून त्याने पांढऱ्या शुभ्र कापडाचे आच्छादन (कंचुक) तयार करून ते चेतियवर चढवले आणि चित्रकारांकडून त्या आच्छादनाच्या वरच्या भागावर वेदिका, पूर्णघट आणि पंचअंगुलींच्या रांगा चितारून घेतल्या. นฬกาเรหิ เวฬุมย ฉตฺตํ กาเรตฺวา ขรปตฺตมเย จณฺทสูริยมณฺฑเล มุทฺธนิ เวทิกา กาเรตฺวา ลาขากุกุฏฺฐเกหิ ตํ วิจิตฺตํ กตฺวา ถูปกมฺมํ นิฏฺฐิตนฺติ รญฺโญ อโรเจสิ ราชา เตน หิ มํ มหาเจติยํ ทสฺเสหีติ วตฺวา สิวิกาย นิปชฺชิตฺวา เจติยา ปทกฺขิณํ กตฺวา ทกฺขิณทฺวาเร ภูมิสยนํ ปญฺญาเปตฺวา ตตฺถ นิปนฺโน ทกฺขิเณน ปสฺเสน สยิตฺวา มหาถูปํ วามปสฺเสน สยิตฺวา โลหปาสาทํ โอโลเกนฺโต ปสนฺน จิตฺโต อโหสิ. ตทา รญฺโญ สาสนสฺส พหูปการภาวํ สลฺลกฺเขตฺวา คิลาน ปุจฺฉนตฺถาย ตโต ตโต อาคตา ภิกฺขุ ฉนฺนวุติ โกฏิโย ราชานํ ปริวาเรตฺวา อฏฺฐํสุ. ตโต สงฺโฆ วคฺค วคฺคา หุตฺวา คณสชฺฌายํ อกาสิ. त्यांनी बांबूचे काम करणाऱ्यांकडून बांबूचे छत्र बनवून घेतले, ताडाच्या पानांचे सूर्य-चंद्र मंडल बनवून शिखरावर वेदिका तयार केली, लाख आणि रंगांनी ते सुशोभित केले आणि 'स्तूपाचे काम पूर्ण झाले आहे' असे राजाला सांगितले. राजे म्हणाले, 'असे असेल तर मला महाचेतिय दाखवा.' पालखीत निजून त्यांनी चेतियला प्रदक्षिणा घातली आणि दक्षिण दारापाशी जमिनीवर अंथरूण पसरवून, तिथे उजव्या कुशीवर निजून महास्तूपाकडे आणि डाव्या कुशीवर निजून लोहप्रासादाकडे पाहत ते प्रसन्नचित्त झाले. तेव्हा राजाने बुद्ध शासनासाठी केलेल्या महान उपकारांचा विचार करून, त्यांच्या आजारपणाची विचारपूस करण्यासाठी ठिकठिकाणाहून आलेले शहाण्णव कोटी भिक्खू राजाला वेढून उभे राहिले. त्यानंतर संघाने वेगवेगळ्या गटांत विभागून सामूहिक सज्झाय (पठण) केला. ราชา ตสฺมึ สมาคเม เถรปุตฺตาภยตฺเถรํ อทิสฺวา เอวํ จินฺเตสิ. โส มยิ ทมิเฬหิ สทฺธึ อฏฺฐวีสติ มหายุทฺเธ กยิรมาเส อปจฺโจสกกิตฺวา อิทานิ มรณยุทฺเธ วตฺตมาเณ มยฺหํ ปราชยํ ทิสฺวา มญฺเญ นาคจฺฉตีติ. ตทา เถโร กริณฺท นที สีเส ปชฺชลิต ปพฺพเต วสนฺโต รญฺโญ ปริวิตกฺกํ ญตฺวา ปญฺจสต ขีณาสว ปริวุเสตา อากาเสนาคนฺตฺวา รญฺโญ ปุรโต ปาตุรโหสิ. राजाने त्या सभेत थेरपुत्ताभय थेरांना न पाहून असा विचार केला, 'ज्यांनी माझ्यासोबत तमिळांविरुद्धच्या अठ्ठावीस महायुद्धांमध्ये कधीही माघार घेतली नाही, ते आता या मृत्यूशी चाललेल्या युद्धात माझा पराभव पाहून बहुधा आले नसावेत.' तेव्हा करिंद नदीच्या उगमापाशी असलेल्या प्रज्वलित पर्वतावर राहणाऱ्या थेरांनी राजाचा हा विचार जाणून घेतला आणि पाचशे क्षीणासवांच्या (अर्हतांच्या) परिवारासह आकाशातून येऊन ते राजाच्या समोर प्रकट झाले. ราชา เถรํ ทิสฺวา อตฺตโน ปุรโต นิสีทาเปตฺวา เอวมาห ภนฺเต ตุมฺเหหิ สทฺธึ ทสมหา โยเธ คเหตฺวา ทมิเฬหิ สทฺธิ ยุชฺฌึ. อิทานิ เอกโกว มจฺจูนา สทฺธึ ยุชฺฌิตุํ อารภึ. มจฺจุ สตฺตุมฺปน ปราเชตุํ น สกฺโกมีติ. ตโต- राजाने थेरांना पाहून आपल्यासमोर बसवले आणि म्हणाले, 'भंते, मी तुमच्यासह दहा महायोद्ध्यांना सोबत घेऊन तमिळांशी युद्ध केले. आता मी एकटाच मृत्यूशी युद्ध करू लागलो आहे. परंतु मृत्यूरूपी शत्रूला मी पराभूत करू शकत नाही.' त्यानंतर - เถรปุตฺตาภยตฺเถโร มา ภายิ มนุชาธิป,กิเลส สตฺตุํ อชินิตฺวา อเชยฺโย มจฺจูสตฺตุโก; थेरपुत्ताभय थेर म्हणाले, 'हे मनुष्याधिपती (राजा), घाबरू नका. जोपर्यंत क्लेशरूपी शत्रू जिंकला जात नाही, तोपर्यंत मृत्यूरूपी शत्रू अजिंक्यच राहतो.' อิติ วตฺวา เอวํ อนุสาสิ. มหาราช สพฺโพเยว โลก สนฺนิวาเส ชาติยา อนุคโต, ชราย อนุสโฏ, วฺยาธินา อภิภูโต, มรเณน อพฺภาหโต. เตตาห- असे म्हणून त्यांनी असा उपदेश केला, 'महाराज, या संपूर्ण जगात सर्वच प्राणी जन्माच्या अधीन आहेत, जरेने (वृद्धत्वाने) ग्रासलेले आहेत, व्याधीने पीडित आहेत आणि मृत्यूने आहत आहेत. म्हणूनच म्हटले आहे -' ‘‘ยถาปิ เสลา วิปุลา-นหํ อาหจฺจ ปพฺพตา,สมนฺตา อนุปริเยยฺยุํ-นิปฺโปเถนฺตา จตุทฺทิสํ; 'ज्याप्रमाणे आकाशाला भिडणारे विशाल पाषाणमय पर्वत चारी दिशांनी सर्व काही चिरडत पुढे सरकतात;' เอวํ ชรา จ มจฺจุ จ-อธิวตฺตนฺติ ปาณิโน,ขตฺติโย พฺราหฺมเณ เวสฺเส สุทฺเท จณฺฑาล ปุกฺกุเส,น กิญฺจิ ปริวชฺเชติ-สพฺพเมวาภิมทฺทติ; 'त्याचप्रमाणे जरा (वृद्धत्व) आणि मृत्यू प्राण्यांवर चालून येतात. क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, चंडाल किंवा पुक्कस असो, ते कोणालाही सोडत नाहीत, सर्वांनाच चिरडून टाकतात.' น ตตฺถ หตฺถินํ ภูมิ-น รถานํ น ปตฺติยา,น จาปิ มนฺตยุทฺเธน-สกฺกา เชตุํ ธเนน วา’’ติ; 'तिथे हत्तींच्या सैन्याला स्थान नाही, रथांना नाही आणि पायदळालाही नाही. तसेच मंत्रयुद्धाने किंवा धनानेही त्याला जिंकणे शक्य नाही.' ตสฺมา อิทํ มรณํ นาม มหายสานํ มหาสมฺมตาทีนํ มหา ปุญฺญานํ โชติยาทีนํ มหาถามานํ พลเทวาทีนํ อิทฺธิมนฺตานํ มหาโมคฺคลฺลานาทีนํ ปญฺญาวนฺตานํ สาริปุตฺตาทีนํ สยมฺภูญาเณน อธิคต สจฺจานํ, ปจฺเจกพุทฺธานํ สพฺพคุณสมนฺนาคตานํ สมฺมาสมฺพุทฺธานมฺปิ อุปริ นิราสงฺกเมว ปตติ กิมงฺคปนญฺเญสุ สตฺเตสุ. म्हणूनच, हे मरण नावाचे संकट महायशस्वी महासंमतादींवर, महापुण्यवान जोतियादींवर, महाबली बलदेवादींवर, ऋद्धीमान महामोग्गल्लानादींवर, प्रज्ञावान सारिपुत्तादींवर, स्वयंभू ज्ञानाने सत्य प्राप्त केलेल्या प्रत्येकबुद्धांवर आणि सर्व गुणांनी संपन्न अशा सम्यक्संबुद्धांवरही निःशंकपणे कोसळते, मग इतर सामान्य प्राण्यांची काय कथा! ตสฺมา- म्हणूनच- มหายสา ราชวรา คตา เต สพฺเพ มหาสมฺมต อาทโยปิ,อนิจฺจภาวํ พลเทว อาทิ มหาพลา เจว ตถา คมึสุ; ते सर्व महायशस्वी श्रेष्ठ राजे, महासंमत इत्यादी आणि बलदेवासारखे महाबली देखील अनित्यतेला प्राप्त झाले (मरण पावले); เย ปุญฺญวนฺตานิ คตา ปสิทฺธึ มหทฺธนํ โชติยเมณฺฑกาที,อุปาวิสึ วจฺจุมุขํ สโภคา สพฺเพปิ เต ราหุมุขํ สสีว; जे जोतिय आणि मेण्डक इत्यादी महाधनी व प्रसिद्ध पुण्यवान होते, ते सर्व आपल्या भोगांसह मृत्यूच्या मुखात तसे गेले, जसा चंद्र राहूच्या मुखात जातो; โย อิทฺธิมนฺเตสุ ตถาคตสฺส ปุตฺเตสุเสฏฺโฐ อิติ วิสฺสุโตปิ,เถโร มหาราชสเหว อิทฺธิพเลน โส มจฺจุมุขํ ปวิฏฺโฐ; तथागतांच्या पुत्रांमध्ये जे ऋद्धीमानांत श्रेष्ठ म्हणून प्रसिद्ध होते, ते महामोग्गल्लान थेर देखील आपल्या ऋद्धीबलासह मृत्यूच्या मुखात प्रविष्ट झाले; สพฺเพสุ สตฺเตสุ ชินํ ฐเปตฺวา เนวตฺถิ ปญฺญาย สโมปิ เยน,โส ธมฺมเสนาปติ สาวโกปิ คโต มหาราช อนิจฺจตํ’จ; हे महाराज, सर्व प्राण्यांमध्ये जिनांना (बुद्धांना) सोडून प्रज्ञेमध्ये ज्यांच्या तोडीचा दुसरा कोणी नव्हता, ते धम्मसेनापती श्रावक देखील अनित्यतेला प्राप्त झाले; สยมฺภูญาณสฺส พเลน สนฺตึ คตา มหาราช สยมฺภูโนปิ,สพฺเพปิ เต ญาณพลูป ปนฺนา อนิจฺจตํ เนว อติกฺกมึสุ; हे महाराज, स्वयंभू ज्ञानाच्या बलाने शांतीला प्राप्त झालेले ते प्रत्येकबुद्ध देखील, जे सर्व ज्ञानबलाने संपन्न होते, अनित्यतेचे उल्लंघन करू शकले नाहीत; ติโลกนาโถ ปุริสุตฺตโม โส อนิจฺจภาวํ สมติกฺกมิตฺวา,นาสกฺขิ คนฺตุํ สุคโตปิ ราช อญฺเญสุ สตฺเตสุ กถาว นตฺถิ; हे राजन, ते त्रिलोकनाथ, पुरुषोत्तम सुगत देखील अनित्यतेचे उल्लंघन करून जाऊ शकले नाहीत, तर मग इतर प्राण्यांची काय कथा! ตสฺมา มหาราช ภเวสุ สตฺตา สพฺเพปิ นาสุํ มรณา วิมุตฺตา,สพฺพมฺปิ สงฺขารคตํ อนิจฺจํ ทูกฺขํ อนตฺตาติ วิจินฺตยสฺสุ; म्हणूनच, हे महाराज, संसारातील सर्व प्राणी मृत्यूपासून मुक्त नाहीत. 'सर्व संस्कार अनित्य, दुःख आणि अनात्म आहेत' असा विचार करा. ‘‘ทุติเย อตฺตภาเวปิ ธมฺมจฺฉณฺโท มหา หิ เต,อุปฏฺฐิเต เทวโลเก หิตฺวา ทิพฺพสุขํ ตุวํ; तुमच्या दुसऱ्या जन्मातही तुमचा धम्मावरील छंद मोठा होता. देवलोक समोर उपस्थित असतानाही, दिव्य सुखाचा त्याग करून तुम्ही... อิธาคมฺม พหุํ ปุญฺญํ อกาสิ จ อเนกธา,กรณมฺเปก รชฺชสฺส สาสนชฺโชตนาย เต; येथे येऊन अनेक प्रकारे पुष्कळ पुण्य केले आणि बुद्ध शासनाच्या प्रभावासाठी तुम्ही राज्यकारभार केला. มหา ราช กตํ ปุญฺญํ ยาวชฺช ทิวสา ตยา,สพฺพํ อนุสฺสเรเถว สุขํ สชฺชุ ภวิสฺสติ; हे महाराज, आजच्या दिवसापर्यंत तुम्ही जे काही पुण्य केले आहे, त्या सर्वांचे स्मरण करा; तुम्हाला त्वरित सुख प्राप्त होईल. ตํ สุตฺวา ตุฏฺฐมานโส ราชา ภนฺเต ตุมฺเห มจฺจุยุทฺเธปิ อปสฺสยาติ วตฺวา ลทฺธสฺสาโส ปุญฺญโปตฺถกํ วาเจตุํ อาณาเปสิ เลขโก ปุญฺญโปตฺถกํ เอวํ วาเจสิ. ते ऐकून प्रसन्न चित्त झालेल्या राजाने, 'भंते, मृत्यूच्या युद्धातही तुम्हीच माझे आधार आहात,' असे म्हणून धीर धरला आणि पुण्यपुस्तक वाचण्याची आज्ञा दिली. लेखकाने पुण्यपुस्तक अशा प्रकारे वाचले: ‘‘เอกูนสตวิหารา มหาราเชน การิตา,เอกูนสตโกฏีหิ วิหาโร มริจฏฺฏิ จ; महाराजांनी नव्व्याण्णव विहार बांधले आणि नव्व्याण्णव कोटी खर्च करून मरिचवट्टि विहार बांधला. อุตฺตโม โลหปาสาโท ตึสโกฏีหิ การิโต,มหาถูเป อนคฺฆานิ การิตา จตุวีสติ; तीस कोटी खर्च करून उत्तम लोहप्रासाद बांधला आणि महास्तूपात चोवीस अमूल्य वस्तू अर्पण केल्या. มหาถูปมฺหิ เสสานิ กริตานิ สุพุทฺธินา,โกฏิสหสฺสํ อคฺฆนฺติ มหาราช ตยา ปุน; हे महाराज, सुबुद्ध अशा तुमच्याद्वारे महास्तूपात केलेल्या इतर गोष्टींची किंमत हजार कोटी आहे. โกฬมฺพ นาม มเลย อกฺขกฺขายิก ฉาตเก,กุณฺฑลานิ มหคฺฆานิ ทุเว ทตฺวาน คณฺหิย; मलय देशातील 'कोळंब' नावाच्या भीषण दुष्काळात, स्वतःची दोन अत्यंत मौल्यवान कुंडले देऊन आणि त्याबदल्यात... ขีณาสวานํ ปญฺจนฺนํ มหาเถรานมุตฺตโม,ทินฺโน ปสนฺนจิตฺเตน กงฺคุ อมฺพิล ปิณฺฑโก; ...प्रसन्न चित्ताने पाच क्षीणास्रव महाथेरांना बाजरीची आंबट पेज दान दिली. จูฬงฺคณิย ยุทฺธมฺหิ ปรชฺฌิตฺวา ปลายตา,กาลํ โฆสาปยิตฺวาน อาคตสฺส วิหายสา; चूळंगणियच्या युद्धात पराभूत होऊन पळून जात असताना, भोजनाची वेळ घोषित करून आकाशातून आलेल्या... ขีณาสวสฺส ยติโน อตฺตานมนเปกฺขิย,ทินฺนํ สรก ภตฺตนฺติ ปุญฺญโปตฺถํ อวาจยิ; ...क्षीणास्रव मुनीला स्वतःच्या प्राणांची पर्वा न करता वाटीभर भात दान दिला. ๒๕. ตํ สุตฺวา ราชา ตุสฺสิตฺวา ฐเปหิ ฐเปหิ ภเณติ วตฺวา เอวมาห. มริจวฏฺฏิ วิหารมหสตฺตาเห ถูปารมฺหสตฺตาเห จ จาตุทฺทิส อุภโต สงฺฆสฺส มหารหํ มหาทานํ ปวตฺเตสึ. จตุวีสติ มหาวิสาขปูชา กาเรสึ ตมฺพปณฺณิทีเป มหาภิกฺขุสงฺฆสฺส ติกฺขตฺตุํ จีวรมทาสึ สตฺต สตฺต ทีนานิ ลงฺกา รชฺชํ สาสนสฺส ปญฺจกฺขตฺตุํ อทาสึ สปฺปิ สนฺนิตฺต สุปริสุทฺธ วฏฺฏิยา ทฺวาทสฐาเนสุ, สตฺตํ ทีปสหสฺสํ ชาเลสึ อฏฺฐารสฺสุ ฐาเนสุ คิลานานํ เวชฺเชหิ เภสชฺชญฺจ ภตฺตญฺจ นิจฺจํ ทาเปสิ. จตุจตฺตาลีส ฐาเนสุ เตลุลฺโลปกญฺจ อทาสึ. ตตฺตเกสุเยว ฐาเนสุ ฆตปกฺกชาลปูเว ภตฺเตน สทฺธึ นิจฺจํ ทาเปสึ. २५. ते ऐकून राजाने आनंदी होऊन 'थांब, थांब!' असे म्हटले आणि तो म्हणाला: 'मी मरिचवट्टि विहाराच्या सात दिवसांच्या महोत्सवात आणि थूपारामच्या सात दिवसांच्या महोत्सवात चारही दिशांच्या दोन्ही संघांना बहुमूल्य महादान दिले. मी चोवीस वेळा महावैशाख पूजा केली. तांबपण्णिदीपातील महाभिक्खू संघाला तीन वेळा चीवर दान दिले. पाच वेळा, प्रत्येकी सात-सात दिवसांसाठी लंकेचे राज्य बुद्ध शासनाला अर्पण केले. बारा ठिकाणी शुद्ध तुपाने भिजवलेल्या वातींचे सात हजार दिवे लावले. अठरा ठिकाणी आजारी लोकांसाठी वैद्यांद्वारे औषध आणि अन्न सतत देण्याची व्यवस्था केली. चव्वेचाळीस ठिकाणी तेलाचे मर्दन दिले. तितक्याच ठिकाणी तुपात तळलेले गोड पदार्थ अन्नासह सतत दिले.' มาเส มาเส อฏฺฐสุ อุโปสถทิวเสสุ ลงฺกาทีเป สพฺพวิหาเรสุ ทีปเตลํ ทาเปสึ. อามิส ทานโต ธมฺมทานํ มหนฺตนฺติ สุตฺวา เหฏฺฐํ โลหปาสาเท ธมฺมาสเน นิสีทิตฺวา มงฺคล สุตฺตํ โอสาเรตุํ อารภิตฺวาปิ สงฺฆ คารเวน โอสาเรตุํ นาสกฺขึ. ตโต ปฏฺฐาย ธมฺมเทสเก สกฺกริตฺวา สพฺพวิหาเรสุ ธมฺมกถํ กถาเปสึ เอเกกสฺส ธมฺมกถิกสฺส นาฬ นาฬิปฺปมาณานิ สปฺปิผาณิต สกฺขรานิ จตุรงฺคุล มุฏฺฐิปฺปมาณํ ยฏฺฐิมธุกํ สาฏกทฺวยญฺจ มาสสฺส อฏฺฐสุ อุโปสถ ทิเสสุ ทาเปสึ. เอตํ สพฺพมฺปิ อิสฺสริเย ฐตฺวา ทินฺนตฺตา มม จิตฺตํ ส อาราเธติ. ชีวิตํ ปน อนเปกฺขิตฺวา ทุคฺคเตน มยา ทินฺนทานทฺวยเมว อาราเธตีติ. दरमहा आठ उपोसथ दिवशी लंकेतील सर्व विहारांमध्ये दिव्यांसाठी तेल दिले. 'आमिष दानापेक्षा धम्मदान श्रेष्ठ आहे' हे ऐकून, मी खालच्या लोहप्रासादात धम्मासनावर बसून मंगल सुत्ताचे पठण करण्यास सुरुवात केली, परंतु संघाच्या आदरापोटी मी ते पूर्ण करू शकलो नाही. तेव्हापासून धम्मदेशकांचा सत्कार करून सर्व विहारांमध्ये धम्मकथा सांगण्याची व्यवस्था केली. प्रत्येक धम्मकथिकाला दरमहा आठ उपोसथ दिवशी प्रत्येकी एक-एक नाळी तूप, गूळ, साखर, चार बोटे मुठीच्या आकाराचे ज्येष्ठमध आणि दोन वस्त्रे दिली. हे सर्व ऐश्वर्यात असताना दिले गेल्यामुळे माझ्या चित्ताला तितका आनंद देत नाही. परंतु, प्राणांची पर्वा न करता मी गरीब असताना दिलेली दोन दानेच माझ्या चित्ताला सर्वाधिक आनंद देतात. ตํ สุตฺวา อภยตฺเถโร มหาราช ปสาทนียฏฺฐาเนเยว ปสาทํ อกาสิ ตํ ปน ปิณฺฑปาตทฺวยํ ปริสฺส ปีฬํ อกตฺวา ลทฺธ ธมฺมิก ปจฺจยตฺตา อตฺตานํ อนวโลเกตฺวา อสชฺชมาเนน ทินฺนตฺตา ปฏิคฺคาหกานํ ยาวทตฺถํ กตฺวา ทินฺนตฺตา ปีติปาโมชฺชํชนยิตฺวา พลว สทฺธาย ทินฺนตฺตา เทยฺยธมฺมสฺส นิรวเสสํ ปริโภคํ คตตฺตาติ อิเมหิ ปญฺจหิ การเณหิ มหนฺตตฺติ วตฺวา มหาราช กงฺคุ อมฺพิลิ ปิณฺฑคาหกตฺเถเรสุ มลิยมหาเทวตฺเถโร สมนฺตกูเฏ ปญฺจนฺนํ ภิกฺขุสตานํ ทตฺวา ปริภุญฺชิ ปถวิ จาลนก ธมฺมคุตฺตตฺเถโร กลฺยาณีย วิหาเร ปญฺจนฺนํ ภิกฺขุสตานํ ทตฺวา ปริภุญฺชิ. ते ऐकून अभय थेर म्हणाले, 'हे महाराज, तुम्ही योग्य ठिकाणीच श्रद्धा ठेवली आहे. ते दोन पिंडपात इतरांना त्रास न देता, धार्मिक मार्गाने मिळवलेले असल्यामुळे, स्वतःकडे न पाहता अनासक्त भावाने दिले गेल्यामुळे, ग्रहण करणाऱ्यांच्या गरजेनुसार दिले गेल्यामुळे, प्रीती आणि आनंद निर्माण करणाऱ्या प्रबळ श्रद्धेने दिले गेल्यामुळे आणि दान केलेल्या वस्तूचा पूर्णपणे उपभोग घेतला गेल्यामुळे, या पाच कारणांमुळे ते महान आहेत.' आणि ते पुढे म्हणाले, 'हे महाराज, बाजरीची आंबट पेज ग्रहण करणाऱ्या थेरांपैकी मळियमहादेव थेरांनी समंतकूटावर पाचशे भिक्खूंना ते वाटून स्वतः ग्रहण केले. पृथ्वी कंपित करणाऱ्या धम्मगुत्त थेरांनी कल्याणी विहारात पाचशे भिक्खूंना ते वाटून स्वतः ग्रहण केले.' ตลงฺครวาสี ธมฺมคุตฺตตฺเถโรปิ ปิยงฺคุทีเป ทฺวาทสนฺนํ ภิกฺขุสหสฺสานํ ทตฺวา ปริภุญฺชิ. มงฺคณวาสี จุฬติสฺสตฺเถโร เกลาสกูเฏ วิหาเร สฏฺฐิสหสฺสานํ ภิกฺขูนํ ทตฺวา ปริภุญฺชิ มหาภคฺคตฺเถโรปิ อุกฺกานคร วิหาเร สตฺตสตานํ ภิกฺขูนํ ทตฺวา ปริภุญฺชิ สรก ภตฺตคาหกตฺเถโร ปน ปิยงฺคุทีเป ทฺวาทสนฺนํ ภิกฺขุสหสฺสานํ ทตฺวา ปริโภคมกาสีติ วตฺวา รญฺโญ จิตฺตํ หาเสสิ. तलंगरवासी धम्मगुत्त थेरांनी देखील पियंगुदीपात बारा हजार भिक्खूंना ते वाटून स्वतः ग्रहण केले. मंगणवासी चुळतिस्स थेरांनी कैलासकूट विहारात साठ हजार भिक्खूंना ते वाटून स्वतः ग्रहण केले. महाभग्ग थेरांनी देखील उक्कानगर विहारात सातशे भिक्खूंना ते वाटून स्वतः ग्रहण केले. आणि वाटीभर भात ग्रहण करणाऱ्या थेरांनी पियंगुदीपात बारा हजार भिक्खूंना ते वाटून स्वतः उपभोग घेतला.' असे सांगून त्यांनी राजाच्या चित्ताला आनंदित केले. ราชา จิตฺตํ ปสาเทตฺวา เอวมาห-อหมฺภนฺเต จตุวีสติ วสฺสานิ รชฺชํ กาเรนฺโต ภิกฺขุสงฺฆสฺส ปหูปกาโร อโหสึ. กาโยปิ เม สงฺฆสฺส อุปการโก โหตุ สงฺฆทาสสฺส เม สรีรํ มหาเจติยสฺส ทสฺสนฏฺฐาเน สงฺฆสฺส กมฺมมาลเก ฌาเปถาติ. ตโต กนิฏฺฐํ อามนฺเตตฺวา’ตาต! ติสฺส! มหาถูเป อนิฏฺฐิตํ กมฺมํ สาธุกํ นิฏฺฐาเปสิ. สายํ ปาโต จ มหาถูเป ปุปฺผปูชํ กาเรตฺวา ติกฺขตฺตุํ อุปหารํ กาเรหิ. มยา ฐปิตํ ทานวฏฺฏํ สพฺพํ อปริหาเปตฺวา สงฺฆสฺส กตฺตพฺพกิจฺเจสุ สทา อปฺปมตฺโต โหหี’ติ อนุสายิตฺวา ตุณฺหิ อโหสิ. राजाने आपले चित्त प्रसन्न करून असे म्हटले - "भन्ते! मी चोवीस वर्षे राज्य करीत भिक्षुसंघाचा मोठा उपकारक राहिलो आहे. माझा हा देहसुद्धा संघासाठी उपकारक ठरो. संघाचा दास असलेल्या माझ्या या शरीराला महाचेतियाच्या (महास्तूपाच्या) दर्शनस्थानी, संघाच्या कर्ममाळकात (सीमेमध्ये) दहन करावे." त्यानंतर आपल्या धाकट्या भावाला बोलावून ते म्हणाले, "तात तिस्स! महास्तूपाचे अपूर्ण राहिलेले काम चांगल्या प्रकारे पूर्ण कर. सकाळी आणि संध्याकाळी महास्तूपावर पुष्पपूजा करून तीन वेळा उपहार (पूजा-अर्चना) कर. माझ्याद्वारे प्रस्थापित केलेले दानकार्य (दानवट्ट) काहीही कमी न करता, संघाच्या कर्तव्यकर्मांमध्ये नेहमी अप्रमत्त (जागरूक) राहा." असा उपदेश करून ते शांत झाले। ตสฺมึ ขเณ ภิกฺขุ คณสชฺฌายํ อารภึสุ เทวตา ปน ฉเทว โลกโต ฉ รเถ คเหตฺวา อาทาย ปฏิปาฏิยา ฐเปตฺวา มหาราช อมฺหากํ เทวโลโก รมณีโย, อมฺหากํ เทวโลโก รมณีโยติ วตฺวา อตฺตโน อตฺตโน เทวโลกํ อาคมนตฺถาย ยาจึสุ ราชา เตสํ วจนํ สุตฺวา ยาวาหํ ธมฺมํ สุณามิ- ตาว อธิวาเสถาติ เต หตฺถสญฺญาย นิวาเรสิ สงฺโฆ คณสชฺฌายํ นิวาเรสีติ มญฺญิตฺวา สชฺฌายํ ฐปาเปสิ. त्याच क्षणी भिक्षूंनी गणसज्झाय (सामूहिक पठण) सुरू केले. परंतु देवतांनी सहा देवलोकांतून सहा रथ आणून ते एकापाठोपाठ एक उभे केले आणि "महाराज! आमचा देवलोक रमणीय आहे, आमचा देवलोक रमणीय आहे" असे सांगून आपापल्या देवलोकात येण्यासाठी त्यांना विनंती करू लागल्या. राजाने त्यांचे बोलणे ऐकून, "जोपर्यंत मी धम्म ऐकतो आहे, तोपर्यंत थांबा" असे सांगून त्यांना हाताच्या इशाऱ्याने थांबवले. भिक्षुसंघाने विचार केला की राजाने आपल्याला थांबवले आहे, म्हणून त्यांनी सज्झाय (पठण) थांबवले। ราชา กสฺมา ภนฺเต คณสชฺฌายํ ฐเปถาติ อาห. มหาราช ตยา หตฺถสญฺญาย นิวาริตตฺตาติ. ภนฺเต ตุมฺหากํ สญฺญํ นาทาสึ. เทวตา ฉเทวโลกโต ฉ รเถ อาเนตฺวา อตฺตโน อตฺตโน เทวโลกํ คนฺตุํ ยาจนฺติ ตสฺมา เตสํ ยาวาหํ ธมฺมํ สุณามิ ตาว อาคเมถาติ สญฺญํ อทาสินฺติ ตํ สุตฺวา เกจิ อยํ ราชา มรณภยภิโต วิปฺปลปติ, มรณโต อภายนก สตฺโต นาม นตฺถีติ มญฺญึสุ. राजाने विचारले, "भन्ते! आपण गणसज्झाय का थांबवला?" (भिक्षू म्हणाले,) "महाराज! आपण हाताच्या इशाऱ्याने थांबवल्यामुळे." (राजा म्हणाला,) "भन्ते! मी आपल्याला इशारा केला नव्हता. देवता सहा देवलोकांतून सहा रथ आणून मला आपापल्या देवलोकात येण्याची विनंती करत आहेत, म्हणून मी त्यांना 'जोपर्यंत मी धम्म ऐकतो आहे, तोपर्यंत थांबा' असा इशारा केला होता." हे ऐकून काही लोकांनी विचार केला की, "हा राजा मृत्यूच्या भयाने व्याकुळ होऊन बरळत आहे, मृत्यूला न भरणारा असा कोणताही प्राणी नाही।" ตโต อภยตฺเถโร อาห กถํ มหาราช สทฺทหิตุํ สกฺกา ฉ เทวโลกโต ฉ รถา อานีตาติ ตํ สุตฺวา ราชา อากาเส ปุปฺผทามานิ ขิปาเปสิ. ตานิ คนฺตฺวา วิสุํ รถธุเร โอลมฺพึสุ มหาชโน อากาเส โอลมฺพนฺตานิ ปุปฺผทามานิ ทิสฺวา นิกฺกงฺโข อโหสิ. त्यानंतर अभय थेरांनी विचारले, "महाराज! सहा देवलोकांतून सहा रथ आणले गेले आहेत, यावर कसा विश्वास ठेवावा?" हे ऐकून राजाने आकाशात फुलांचे हार फेकण्यास सांगितले. ते हार जाऊन वेगवेगळ्या रथांच्या धुरांवर लटकले. लोकांनी आकाशात लटकणारे फुलांचे हार पाहून त्यांची शंका दूर झाली। ตโต ราชา เถรํ ปุจฺฉิ-กตโม ปน ภนฺเต เทวโลโก รมณีโยติ. ตุสิตภวนํ ปน มหาราช รมณียํ, พุทฺธภาวาย สมยํ โอโลเกนฺโต เมตฺเตยฺโย โพธิสตฺโตปิ ตสฺมึเยว วสตีติ อาห. त्यानंतर राजाने थेरांना विचारले, "भन्ते! कोणता देवलोक अधिक रमणीय आहे?" (थेर म्हणाले,) "महाराज! तुषित भवन अत्यंत रमणीय आहे. बुद्धत्वासाठी योग्य काळाची वाट पाहत असलेले मैत्तेय बोधिसत्तसुद्धा तिथेच निवास करतात।" ตํ สุตฺวา ราชา ตสฺมึ อาลยํ กตฺวา มหาถูปํ โอโลเกนฺโต นิปนฺโนว จวิตฺวา สุตฺตปฺปพุทฺโธ วิย ตุสิต ภวนโต อาหฏ. รเถ นิพฺพตฺติตฺวา อตฺตโน กตปุญฺญสฺส ถลํ มหาชนสฺส ปากฏํ กาตุํ รเถเยว ฐตฺวา ทิพฺพาภรณ วิภูสิโต มหาชนสฺส ปสฺสนฺตสฺเสว ติกฺขตฺตุํ มหาถูปํ ปทกฺขิณํ กตฺวา ภิกฺขุสงฺฆญฺจ วนฺทิตฺวา ตุสิตภวนํ อคมาสิ. ते ऐकून राजाने त्या (तुषित भवना)विषयी आसक्ती धरली आणि महास्तूपाकडे पाहत पाहत, झोपेतून जागे व्हावे त्याप्रमाणे, पडून राहूनच देहत्याग केला. तुषित भवनातून आलेल्या रथात उत्पन्न होऊन, आपल्या पुण्यकर्माचे फळ महालोकाला दाखवण्यासाठी, रथातच उभे राहून, दिव्य आभूषणांनी विभूषित होऊन, सर्व लोकांच्या देखत महास्तूपाला तीन वेळा प्रदक्षिणा घातली आणि भिक्षुसंघाला वंदन करून ते तुषित भवनात निघून गेले। เอวํ อสาเร นิจเย ธนานํ อนิจฺจสงฺฆํ สตฺตํ สปญฺญา,กตฺวน จาคํ รตนตฺตยมหิ อาทาย สารํ สุคตึ วชนฺติ; अशा प्रकारे, संपत्तीच्या या असार संचयात आणि अनित्य प्राण्यांमध्ये जे प्रज्ञावान आहेत, ते रत्नत्रयाची पूजा करून आणि त्याग करून, सार ग्रहण करतात आणि सुगतीला जातात। รญฺโญ นาฏกตฺถิโย มตภาวํ ญตฺวา ยตฺถ ฐิตา มกุฬํ โมจยึสุ ตตฺถํ ฐาเน กตสาลา มกุฬมุตฺตสาลานามชาตา. รญฺโญ สรีรสฺมึ จิตกํ อาโรปิเต ยตฺถ มหาชโน หตฺเถ ปคฺคเหตฺวา วิรจิ. ตตฺถ กตสาลา วิรจิตฺถสาลา นาม ชาตา. รญฺโญ สรีรํ ยตฺถ ฌาเปสุํ - โส สีมามาลโก ราชมาลโก นาม ชาโต. อถ รญฺโญ กนิฏฺฐภาตา สทฺธาติสฺสมหาราชา นาม หุตฺวา เจติเย อนิฏฺฐตํ ชตฺตกมฺมํ สุธากมฺมญฺจ นิฏฺฐาเปตฺวา ถูปมกาสีติ राजाच्या अंतःपुरातील स्त्रियांनी राजाच्या मृत्यूची बातमी ऐकून ज्या ठिकाणी उभे राहून आपले मुकुट सोडले, त्या ठिकाणी बांधलेली शाळा 'मकुळमुत्तशाळा' म्हणून प्रसिद्ध झाली. राजाच्या शरीराला चितेवर चढवले असता, ज्या ठिकाणी लोकांनी हात जोडून विलाप केला, तिथे बांधलेली शाळा 'विरचित्तशाळा' म्हणून प्रसिद्ध झाली. राजाच्या शरीराचे ज्या ठिकाणी दहन केले गेले, तो सीमामालक 'राजमालक' म्हणून प्रसिद्ध झाला. त्यानंतर राजाचा धाकटा भाऊ सद्धातिस्स नावाचा महाराज झाला आणि त्याने चेतियाचे अपूर्ण राहिलेले काम आणि चुन्याचे काम पूर्ण करून स्तूप पूर्ण केला। อิติ สาธุชน มโนปสาทนตฺถาย กเต ถูปวํเส มหาเจติเย กตา นิฏฺฐิตา. अशा प्रकारे, सज्जनांच्या मनाला प्रसन्न करण्यासाठी रचलेल्या थूपवंसातील महाचेतियाचे वर्णन पूर्ण झाले। ๒๖. เอตรหิ ทุฏฺฐคามณิ อภย มหาราชสฺส ปิตา กากวณฺณติสฺส ราชา เมตฺเตยฺยสฺส ภควโต ปิตา ภวิสฺสติ. วิหารมหาเทวี มาตา ภวิสฺสติ. ทุฏฺฐคามิณิ อภโย อคฺคสาวโก ภวิสฺสติ. กนิฏฺโฐ ทุติย สาวโก ภวิสสติ. รญฺโญ ปิตุจฺฉา อนุฬาเทวี อคฺคมเหสี ภวิสฺสติ. รญฺโญ ปุตฺโต สาลิ ราชกุมาโร ปุตฺโต ภวิสฺสติ. ภณฺฑาคาริก สงฺฆามจฺโจ อคฺคุปฏฺฐาโก ภวิสฺสติ ตสฺสามจฺจสฺส ธีตา อคฺคุปฏฺฐายิกา ภวิสฺสตีติ เอวํ สพฺเพปิ กตาธิการา เหตุ สมฺปนฺนา ตสฺส ภควโต ธมฺมํ สุตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริตฺวา อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพายิสฺสนฺตีติ. २६. आता, दुट्ठगामणी अभय महाराजांचे पिता काकवण्णतिस्स राजे हे मैत्तेय भगवंतांचे पिता होतील. विहारमहादेवी त्यांची माता होईल. दुट्ठगामणी अभय हे अग्रश्रावक होतील. धाकटा भाऊ दुसरा श्रावक होईल. राजाची आत्या अनुळादेवी अग्रतपस्वी (अग्रमहिषी) होईल. राजाचा मुलगा साळी राजकुमार हा त्यांचा मुलगा होईल. भांडागारिक संघ अमात्य हा अग्रउपस्थापक होईल आणि त्या अमात्याची मुलगी अग्रउपस्थापिका होईल. अशा प्रकारे, सर्व पुण्यवान आणि हेतू-संपन्न लोक त्या भगवंतांचा धम्म ऐकून, दुःखाचा अंत करून, अनुपधिशेष निर्वाणधातूमध्ये परिनिर्वाण प्राप्त करतील। เอตฺตาวตา จ आणि एवढ्यानेच ๒๗. २७. มหิณฺทเสน นามมฺหิ วสนฺโต ปริเวณเก,ปตฺตจีวรปาโท? โย ปิฏกตฺตย ปารโค; महिंदसेन नावाच्या परिवेणात राहणारे, जे पात्र-चीवराचे धारक आणि त्रिपिटकाचे पारंगत आहेत; สทฺธาสิลคุณุเปโต สพฺพสตฺตหิเต รโต,เตน สาธุ สมชฺฌิฏฺโฐ ยมหํ กาตุมารภึ; जे श्रद्धा, शील आणि गुणांनी युक्त असून सर्व प्राण्यांच्या हितामध्ये मग्न आहेत, त्यांच्याद्वारे चांगल्या प्रकारे विनंती केल्यामुळे मी हे करण्यास प्रारंभ केला; โสทานิ นิฏฺฐํ สมฺปตฺโต ถูปวํโส อนากุโล,ปริปุณฺโณ สงฺขถา สาธุ ปณฺฑิเตหิ ปสํสิโต; तो हा व्याकुळतेशिवाय असलेला, परिपूर्ण आणि पंडितांद्वारे प्रशंसित असलेला 'थूपवंस' आता पूर्णत्वास पोहोचला आहे; ยํ ปตฺตํ กุสลํ กมฺมํ กโรนฺเตน อิมํ มยํ,เตน เอเตน ปุญฺเญน สตฺตา คจฺฉนฺตุ นิพฺพุตึ; हे कार्य करताना आमच्याद्वारे जे काही कुशल कर्म प्राप्त झाले आहे, त्या पुण्याच्या प्रभावाने सर्व प्राणी निर्वाणाला प्राप्त होवोत; อนนฺตราเยน ยถา จ สิทฺธึมูปาคโต ถูปวรสฺส วํโส,ตเถว สทฺธมฺมสิตา ชนานํมโน รถา สีฆมุเปนฺตุ สิทฺธึ; ज्याप्रमाणे हा श्रेष्ठ स्तूपाचा वंश कोणत्याही अडथळ्याशिवाय पूर्णत्वास गेला आहे, त्याचप्रमाणे सद्धम्माचा आश्रय घेतलेल्या लोकांचे मनोरथ लवकरच सिद्धीस जावोत; ปริสมฺภิทามคฺคสฺส เยน ลีลตฺถ ทีปนิฏีกา วิรจิตา สาธุ สทฺธมฺโมทย กามินา; ज्यांच्याद्वारे सद्धम्माच्या उदयाची इच्छा बाळगून 'पटिसंभिदामग्ग' ची 'लीलत्थदीपनी' नावाची सुंदर टीका रचली गेली; ตถา ปกรเณ สจฺจสงฺเขเป อตฺถทีปนา,ธีมตา สุกตา เยน สุฏฺฐุ สีหฬ ภาสโต तसेच ज्या बुद्धिमान व्यक्तीने 'सच्चसंखेप' या ग्रंथावर सिंहली भाषेतून 'अत्थदीपनी' नावाची सुंदर व्याख्या केली; วิสุทฺธิมคฺค สงฺเขเป เยน อตฺถปฺปกาสนา,โยคี นมุปการาย กตา สีหฬภาสโต; आणि ज्यांनी योग्यांच्या उपकारासाठी 'विसुद्धिमग्ग' च्या संक्षेपाची 'अत्थप्पकासना' सिंहली भाषेतून केली; ปรกฺกม นริณฺทสฺส สพฺพภูปาน เกตุโน,ธมฺมาคาเร นิยุตฺโต โย ปิฏกตฺตย ปารโค; सर्व राजांचे मुकुटमणी असलेल्या पराक्रम राजाच्या धम्मगृहात नियुक्त असलेले, जे त्रिपिटकाचे पारंगत आहेत; สาสนํ สุฏฺฐิตํ ยสฺส อนฺเตวาสิก ภิกฺขุสุ,เตน วาจิสฺสรตฺเถร ปาเทน ลิขิโต อยนฺติ; ज्यांचे शासन त्यांच्या अंतेवासी भिक्षूंमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित आहे, त्या पूज्य वाचिस्सर थेरांद्वारे हा ग्रंथ लिहिला गेला आहे. ถูปวํโส นิฏฺฐิโต. थूपवंस समाप्त झाला. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |