| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
1 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา. मोग्गल्लान वृत्तिविवरणपञ्चिका। วุตฺติสเมตา. वृत्ति सहित। นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส उन भगवान्, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। สทฺธมิทฺธคุณํ สาธุ นมสฺสิตฺวา ตถาคตํ,สธมฺมสงฺฆํ ภาสิสฺสํ มาคธํ สทฺทลกฺขณํ. सद्धर्म और ऋद्धि गुणों से युक्त तथागत को भली-भाँति नमस्कार कर, सद्धर्म और संघ सहित मागधी शब्द-लक्षण (व्याकरण) को कहूँगा। อการาทโย นิคฺคหีตนฺตา เตจตฺตาลีสกฺขรา วณฺณา นาม โหนฺติ, อ อา อิ อี อุ อู เอ ऐ โอ औ ก ข ค ฆ ง จ ฉ ช ฌ ญ ฏ ฐ ฑ ฒ ณ ต ถ ท ธ น ป ผ พ ภ ม ย ร ล ว ส ห ฬ อํ; เตน กฺวตฺโถ ‘‘โญนม วณฺเณ‘‘. ติตาลีสาติ วจนํ กตฺถวิ วณฺณโลปํ ญาเปติ; เตน-ปฏิสงฺขาโยนิ โสติ-อาทิ สิทฺธํ. 'अ' कार आदि निग्गहीत पर्यन्त वे तैंतालीस अक्षर 'वर्ण' कहलाते हैं; अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व स ह ळ अं; इससे क्या प्रयोजन है? 'ञोनम वण्णे' (सूत्र में)। 'तैंतालीस' यह वचन कहीं वर्ण-लोप को सूचित करता है; उससे 'पटिसङ्खायोनि सो' इत्यादि सिद्ध होता है। ทสาโท สรา-. आदि के दस 'स्वर' हैं। ตตฺถาทิมฺหิ ทส วณฺณา สรา นาม โหนฺติ; เตน กฺวตฺโถ ‘‘สโร โลโป สเร‘‘. จฺจาทิ. उनमें आदि के दस वर्ण 'स्वर' कहलाते हैं; इससे क्या प्रयोजन है? 'सरो लोपो सरे' इत्यादि। ทฺเวทฺเว สวณฺณา-. दो-दो 'सवर्ण' हैं। เตสุ ทฺเวทฺเว สรา สวณฺณา นาม โหนฺติ; เตน กฺวตฺโถ ‘‘วณฺณปเรณ สวณฺโณปิ‘‘ उनमें दो-दो स्वर 'सवर्ण' कहलाते हैं; इससे क्या प्रयोजन है? 'वण्णपरेण सवण्णोपि'। ๑.๒. १. २। ปุพฺโพ รสฺโส-. पूर्व वाला 'ह्रस्व' है। เตสุ ทฺวีสุ โย โย ปุพฺโพ โส โส รสฺสสญฺโญ โหติ; เตสุ เอ โอ สํโยคโต ปุพฺพาว ทิสฺสนฺติ; เตน กฺวตฺโถ ‘‘รสฺโส เว‘‘.จฺจาทิ. उन दो में जो-जो पूर्व है, वह 'ह्रस्व' संज्ञक होता है; उनमें 'ए' और 'ओ' संयोग से पूर्व ही देखे जाते हैं; इससे क्या प्रयोजन है? 'रस्सो वे' इत्यादि। ปโร ทีโฆ-. पर वाला 'दीर्घ' है। เตสฺเวว ทฺวีสุ โย โย ปโร โส โส ทีฆสญฺโญ โหติ; เตน กฺวตฺโถ’โยโลปนิสุ ทีโฆ‘‘.จฺจาทิ. उन्हीं दो में जो-जो पर है, वह 'दीर्घ' संज्ञक होता है; इससे क्या प्रयोजन है? 'यलोपनीसु दीघो' इत्यादि। กาทโย พฺยชนา-. 'क' आदि 'व्यंजन' हैं। กการาทโย วณฺณา นิคฺคหีตปริยนฺตา พฺยชนสญฺญา โหนฺติ; เตน กฺวตฺโถ ‘‘พฺยชเน ทีฆรสฺสา‘‘.จฺจาทิ. ककार आदि निग्गहीत पर्यन्त वर्ण 'व्यंजन' संज्ञक होते हैं; इससे क्या प्रयोजन है? 'ब्यजने दीघरस्सा' इत्यादि। ปญฺจ ปญฺจกา วคฺคา-. पाँच-पाँच के पाँच 'वर्ग' हैं। กาทโย ปญฺจกา ปญฺจ วคฺคา นาม โหนฺตี; เตน กฺวตฺโถ ‘‘วคฺเค วคฺคนฺโต‘‘. จฺจาทิ. ककार आदि पाँच-पाँच के पाँच 'वर्ग' कहलाते हैं; इससे क्या प्रयोजन है? 'वग्गे वग्गन्तो' इत्यादि। พินฺทุ นิคฺคหีตํ-. बिन्दु 'निग्गहीत' है। ยฺวายํ วณฺเณ พินฺทุมตฺโต โส นิคฺคหีตสญฺโญ โหติ; เตน กฺวตฺโถ ‘‘นิคฺคหีตมิ‘‘. จฺจาทิ; ครุสญฺญา กรณํ อนฺวตฺถสญฺญตฺถํ. वर्णों में जो यह बिन्दु मात्र है, वह 'निग्गहीत' संज्ञक होता है; इससे क्या प्रयोजन है? 'निग्गहीतम' इत्यादि; 'गुरु' संज्ञा करना सार्थक संज्ञा के लिए है। อิยุวณฺณา ชฺฌลา นามสฺสนฺเต-. नाम के अन्त में इ-वर्ण और उ-वर्ण 'झ' और 'ल' संज्ञक होते हैं। นามํ ปาฏิปทิกํ ตสฺส อนฺเต วตฺตมานา อิวณฺณุวณฺณา ฌลสญฺญา โหนฺติ ยถากฺกมํ; เตน กฺวตฺโถ‘‘ฌลา เว‘‘. จฺจาทิ. नाम प्रातिपदिक है, उसके अन्त में विद्यमान इ-वर्ण और उ-वर्ण यथाक्रम 'झ' और 'ल' संज्ञक होते हैं; इससे क्या प्रयोजन है? 'झला वे' इत्यादि। ปิตฺถิยํ-. स्त्रीलिंग में 'प' (संज्ञा) है। อิตฺถิยํ วตฺตมานสฺส นามสฺสนฺเต วตฺตมานา อิวณฺณุ วณฺณา ปสญฺญา โหนฺติ; เตน กฺวตฺถา ‘‘เย ปสฺสิวณฺณสฺส‘‘. อิจฺจาทิ. स्त्रीलिंग में प्रयुक्त नाम के अन्त में विद्यमान इ-वर्ण और उ-वर्ण 'प' संज्ञक होते हैं; इससे क्या प्रयोजन है? 'ये पस्सिवण्णस्स' इत्यादि। ฆา-. 'घा' (संज्ञा)। อิตฺถิยํ วตฺตมานสฺส นามสฺสนฺเต วตฺตมาโน อากาโร ฆสเญญฺญา โหติ; เตน กฺวตฺโถ ‘‘ฆพฺรหฺมาทิเต‘‘.จฺจาทิ. स्त्रीलिंग में प्रयुक्त नाम के अन्त में विद्यमान आकार 'घ' संज्ञक होता है; इससे क्या प्रयोजन है? 'घब्रह्मादिते' इत्यादि। โคสฺยาลปเน-. सम्बोधन में 'सि' की 'ग' संज्ञा होती है। อาลปเน สิ คสญฺโญ โหติ; เตน กฺวตฺโถ ‘‘เค เว‘‘.จฺจาทิ. सम्बोधन में 'सि' 'ग' संज्ञक होता है; इससे क्या प्रयोजन है? 'गे वे' इत्यादि। สญฺญาธิกาโร. संज्ञा-अधिकार। วิธิพฺพิเสสนนฺตสฺส-. विधि विशेषण अन्त वाले की होती है। ยํ วิเสสนํ ตทนฺตสฺส วิธิ ญาตพฺโพ; ‘‘อโต โยนํ ฏาเฏ‘‘. นรา นเร. जो विशेषण है, वह उसके अन्त वाले के लिए विधि (नियम) जानना चाहिए; जैसे— ‘‘अतो योनं टाटे‘‘। नरा, नरे। สตฺตมิยํ ปุพฺพสฺส-. सप्तमी विभक्ति के निर्देश में पूर्व (पहले वाले) को कार्य होता है। สตฺตมีนิทฺเทเส ปุพฺพสฺเสว การิยํ ญตพฺพํ; ‘‘สโร โลโป สเร‘‘. เวฬคฺคํ; ตมหนฺตีธ กสฺมา น โหติ; สเรโตปสิเลสิกาธาโร ตตฺเถตาว วุจฺจเต ปุพฺพสฺเสว โหติ น ปรสฺสาติ. सप्तमी के निर्देश में पूर्व को ही कार्य जानना चाहिए; जैसे— ‘‘सरो लोपो सरे‘‘। वेळग्गं; यहाँ 'तमहन्ति' में क्यों नहीं होता? क्योंकि यहाँ 'सरे' उपश्लेषिक आधार है, वहाँ इतना ही कहा जाता है कि पूर्व को ही होता है, पर (बाद वाले) को नहीं। ปญฺจมิยํ ปรสฺส-. पञ्चमी विभक्ति के निर्देश में पर (बाद वाले) को कार्य जानना चाहिए। ปญฺจมีนิทฺเทเส ปรสฺส การิยํ ญตพฺพํ; ‘‘อโต โยนํ ฏาเฏ‘‘. นรา นเร; อิธ น โหติ ชนฺตุโย อนนฺตา; อิธ กสฺมา น โหติ; โอสธฺโย อนนฺตเร กตตฺถตาย น วฺยว หิตสฺส การิยํ. पञ्चमी के निर्देश में पर (बाद वाले) को कार्य जानना चाहिए; जैसे— ‘‘अतो योनं टाटे‘‘। नरा, नरे; यहाँ 'जन्तुयो अनन्ता' में नहीं होता; यहाँ क्यों नहीं होता? 'ओसध्यो' में अव्यवहित (बिना व्यवधान के) के लिए कार्य होने के कारण व्यवहित (व्यवधान युक्त) को कार्य नहीं होता। อาทิสฺส-. आदि (प्रारम्भ) के वर्ण को। ปรสฺส สิสฺสมานํ การิยมาทิวณฺณสฺส ญาตพฺพํ; ‘‘ร สงฺขฺยาโต วา‘‘. ราชินา. पर (बाद वाले) के लिए जो कार्य विधान किया जाता है, वह उसके आदि वर्ण (प्रथम अक्षर) को जानना चाहिए; जैसे— ‘‘र सङ्ख्यातो वा‘‘। राजिना। ฉฏฺฐิยนฺตสฺส-. षष्ठी विभक्ति के निर्देश वाले के अन्त को। ฉฏฺฐินิทฺทิฏฺฐสฺส ยํ การิยํ ตทนฺตสฺส วณฺณสฺส วิญฺเญยฺยํ ‘‘ราชสฺสิ นามฺหิ‘‘. ราชินา. षष्ठी के द्वारा निर्दिष्ट जो कार्य है, वह उसके अन्त्य वर्ण को समझना चाहिए; जैसे— ‘‘राजस्सि नाम्हि‘‘। राजिना। งนุพนฺโธ-. 'ङ' अनुबन्ध वाला। งกาโร’นุพนฺโธ ยสฺส โส’นฺตสฺส โหติ; ‘‘โคสฺสาวงิ‘‘. ควาสฺสํ. जिसका 'ङ' कार अनुबन्ध है, वह अन्त को होता है; जैसे— ‘‘गोस्सावङि‘‘। गवास्सं। ฏนุพนฺธาเนกวณฺณา สพฺพสฺส-. 'ट' अनुबन्ध वाले और अनेक वर्णों (अक्षरों) वाले आदेश सम्पूर्ण के स्थान पर होते हैं। ฏกาโร’นุพนฺโธ ยสฺส โส’เนกกฺขโร จาเทโส สพฺพสฺส โหติ; ‘‘อิมสฺสานิตฺถิยํ เฏ‘‘. เอสุ ‘‘นามฺหนิมิ‘‘. อเนน. जिसका 'ट' कार अनुबन्ध है और जो अनेक अक्षरों वाला आदेश है, वह सम्पूर्ण के स्थान पर होता है; जैसे— ‘‘इमस्सानित्थियं टे‘‘। इनमें ‘‘नाम्हनमि‘‘। अनेन। ญกานุพนฺธาทฺยนฺตา-. 'ञ' और 'क' अनुबन्ध वाले क्रमशः आदि और अन्त में होते हैं। ฉฏฺฐินิทฺทิฏฺฐสฺส ญานุพนฺธกานุพนฺธา อาทฺยนฺตา โหนฺติ; ‘‘พฺรุโต ติสฺสีญ‘‘. พฺรวีติ, ‘‘ภุสฺส วุก‘‘. พภุว. षष्ठी के द्वारा निर्दिष्ट के लिए 'ञ' अनुबन्ध और 'क' अनुबन्ध वाले क्रमशः आदि और अन्त में होते हैं; जैसे— ‘‘ब्रुतो तिस्सीञ‘‘ (ब्रवीति), ‘‘भुस्स वुक‘‘ (बभुव)। มนุพนฺโธ สรานมนฺตา ปโร-. 'म' अनुबन्ध वाला स्वरों में अन्तिम स्वर के बाद होता है। มกาโร’นุพนฺโธ ยสฺส โส สรานมนฺตา สรา ปโร โหตี; ‘‘มญฺจ รุธาทีนํ‘‘. รุนฺธติ. जिसका 'म' कार अनुबन्ध है, वह स्वरों में अन्तिम स्वर के बाद होता है; जैसे— ‘‘मञ्च रुधादीनं‘‘। रुन्धति। วิปฺปฏิเสเธ-. विप्रतिषेध (विरोध) होने पर। ทฺวินฺนํ ติณฺณํ วา ปุริสานํ สหปฺปตฺติยํ ปโร; โส จ คจฺฉติ ตฺวญฺจ คจฺฉสิ, ตุมฺเห คจฺฉถ; โส จ คจฺฉติ ตฺวญฺจ คจฺฉสิ อหญฺจ คจฺฉามิ, มยํ คจฺฉาม. दो या तीन पुरुषों (प्रथम, मध्यम, उत्तम) के एक साथ प्राप्त होने पर पर (बाद वाला) पुरुष होता है; जैसे— वह जाता है और तुम जाते हो, तुम (सब) जाते हो; वह जाता है और तुम जाते हो और मैं जाता हूँ, हम (सब) जाते हैं। สงฺเกโต’นวยโว’นุพนฺโธ-. जो अवयव (अंश) न होकर केवल संकेत मात्र है, वह अनुबन्ध जानना चाहिए। โย’นวยวภุโต สงฺเกโต โส’นุพนฺโธติ ญตพฺโพ;ลตุปิตาทีนมาสิมฺหิ. กตฺตา, สงฺเกตคฺคหณํ กึ? ปกตียาทิสมุทายสฺสานุพนฺธตา มา โหตุติ; อนวยโว หิ สมุทาโย สมุทายรูปตฺตาเยว; อนวยวคฺคหณํ กึ?’อเตน’. ชเนน; อิมินาว โลปสฺสาวคตตฺตา นานุพนฺธโลปาย วจนมารทฺธํ. जो अवयव न होकर केवल संकेत मात्र है, उसे अनुबन्ध जानना चाहिए; जैसे— 'लतु', 'पितु' आदि में 'आसि' होने पर। कत्ता। 'संकेत' ग्रहण क्यों? जिससे प्रकृति आदि समुदाय की अनुबन्धता न हो जाए; क्योंकि समुदाय अपने समुदाय रूप होने के कारण अनवयव (अ-अंश) नहीं है। 'अनवयव' ग्रहण क्यों? 'अतेन'। जनेन। इसी से लोप का ज्ञान हो जाने के कारण अनुबन्ध-लोप के लिए अलग से वचन आरम्भ नहीं किया गया है। วณฺณปเรน สวณฺโณ’ปิ-. 'वर्ण' शब्द जिसके बाद में हो, उससे सवर्ण (समान वर्ण) का भी ग्रहण होता है। วณฺณสทฺโท ปโร ยสฺมา เตน สวณฺโณ’ปิ คยฺหติ สํว รูปํ; ยุวณฺณานมฺโญ ลุตฺตา‘‘. วาเตริตํ, สโมนา. 'वर्ण' शब्द जिसके बाद में हो, उससे सवर्ण का भी ग्रहण होता है, जो समान रूप वाला हो; जैसे— ‘‘युवण्णानमञो लुत्ता‘‘। वातेरितं, समोना। นฺตุ วนฺตุมนตฺวาวนฺตุตวนฺตุสมฺพนฺธิ-. 'वन्तु' आदि से सम्बन्धित ही 'न्तु' का ग्रहण होता है। วนฺตฺวาทิสมฺพนฺธิเยว นฺตุ คยฺหติ, ‘‘นฺตนฺตุนํ นฺโต โยมฺหิ ปฐเม‘‘. คุณวนฺโต; วนฺตฺวาทิสมฺพนฺธีติ กึ; ชนฺตุ ตนฺตุ. 'वन्तु' आदि से सम्बन्धित ही 'न्तु' का ग्रहण होता है; जैसे— ‘‘न्तन्तुनं न्तो योम्हि पठमे‘‘। गुणवन्तो; 'वन्तु आदि से सम्बन्धित' ऐसा क्यों कहा? जन्तु, तन्तु (यहाँ 'न्तु' का ग्रहण नहीं होगा)। ปริภาสาโย. परिभाषाएँ। สโร โลโป สเร-. स्वर के परे होने पर स्वर का लोप होता है। สเร สโร โลปนีโย โหติ; ตตฺริเม, สทฺธินฺทฺริยํ, โน เหตํ, ภิกฺขุโนวาโท, สเมตายสฺมา, อภิภายตนํ, ปุตฺตา มตฺถิ, อสนฺเตตฺถ. स्वर के परे होने पर स्वर का लोप होता है; जैसे— तत्रिमे, सद्धिन्द्रियं, नो हेतं, भिक्खुनोवादो, समेतायस्मा, अभिभायतनं, पुत्ता मत्थि, असन्तेत्थ। ปโร กฺวจิ โลปนีโย โหติ; โส’ปิ, สาว, ยโตทกํ, ตโตว; กฺววีติ กึ? สทฺธินฺทุยํ อยมธิกาโร อาปริจฺเฉทาวสานา เตน นาติปฺปสงฺโค. कभी पर (बाद वाला) स्वर भी लोप करने योग्य होता है; जैसे— सोऽपि, साव, यतोदकं, ततोव; 'क्वचि' (कभी) क्यों? सद्धिन्द्रियं। यह अधिकार परिच्छेद की समाप्ति तक है, जिससे अतिप्रसङ्ग (नियम का अनुचित विस्तार) नहीं होता। นทฺเววา-. द्वित्व नहीं होता। ปุพฺพปรสรา ทฺเว’ปิ วา กฺวจิ น ลุปฺยนฺเต; ลตา อิว ลเตว ลตาว. पूर्व और पर दोनों स्वर कभी-कभी लुप्त नहीं होते हैं; जैसे- latā iva, lateva, latāva। ยุวณฺณนมฺโญ ลุตฺตา-. लुप्त (स्वरों) के स्थान पर इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर 'ए' और 'ओ' होते हैं। ลุตฺตา สรา ปเรสํ อิวณฺณุวณฺณานํ โญ โหนฺติ วา ยถากฺกมํ; ตสฺเสทํ, วาเตริตํ, โนเปติ, วาโมรุ, อเตว’ญฺเญ, โวทกํ; กถํ ปจฺโจรสฺมนฺติ; โยควิภคา, วาตฺเวว ตสฺสิทํ; ลุตฺเตติ กึ? ลตา อิว. लुप्त स्वरों के बाद आने वाले इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर क्रमशः 'ए' और 'ओ' विकल्प से होते हैं; जैसे- tassedaṃ, vāteritaṃ, nopeti, vāmoru, ateva’ññe, vodakaṃ; 'paccorasmanti' कैसे सिद्ध होता है? योग-विभाग से। 'vā' (विकल्प) के कारण 'tassidaṃ' भी होता है। 'lutta' (लुप्त) क्यों कहा गया? 'latā iva' के लिए। ยวา สเร-. स्वर परे होने पर 'य' और 'व' होते हैं। สเร ปเร อิวณฺณุวณฺณานํ ยการวการา โหนฺติว ยถากฺกมํ; วฺยากโต, อิจฺจสฺส, อชฺฌิณมุตฺโต, สฺวาคตํ, ภวาปนลานีลํ; วาตฺเถว-อิติสฺส; กฺวจีตฺเวว-ยานีธ, สูปฏฺฐิตํ. स्वर परे होने पर इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर क्रमशः य-कार और व-कार विकल्प से होते हैं; जैसे- vyākato, iccassa, ajjhiṇamutto, svāgataṃ, bhavāpanalānīlaṃ; 'vā' के कारण 'itissa' भी होता है; 'kvaci' के कारण 'yānīdha', 'sūpaṭṭhitaṃ' भी होते हैं। โญนํ-. 'ए' और 'ओ' के स्थान पर 'य' और 'व' होते हैं। โญนํ ยวา โหนฺติ วา สเร ยถากฺกมํ; ตฺยชฺช เต’ชฺช สฺวาหํ โส’หํ,กฺวจิตฺเวว-ปุตฺตามตฺถิ อสนฺเตตฺถ. स्वर परे होने पर 'ए' और 'ओ' के स्थान पर क्रमशः 'य' और 'व' विकल्प से होते हैं; जैसे- tyajja, te’jja, svāhaṃ, so’haṃ; 'kvaci' के कारण 'puttāmatthi', 'asantettha' भी होते हैं। โคสฺสาวงิ-. 'गो' शब्द के स्थान पर 'अव' और 'इ' होते हैं। สเร โคสฺส อวงิ โหติ; ควาสฺสํ; ยถริว ตถริเวตินิปาตาว; ภุสามิเวติ อิวสทฺโท เอวตฺโถ. स्वर परे होने पर 'गो' शब्द के स्थान पर 'अव' और 'इ' (आदेश) होते हैं; जैसे- gavāssaṃ; 'yathariva', 'tathariva' ये निपात ही हैं; 'bhusāmiva' में 'iva' शब्द 'eva' के अर्थ में है। พฺยญฺชเน ทีฆรสฺสา-. व्यंजन परे होने पर दीर्घ और ह्रस्व होते हैं। รสฺสทีฆานํ กฺวจิ ทีฆรสฺสา โหนฺติ พฺยญฺชเน; ตตฺรายํ, มุนีวเร, สมฺมเทว, มาลหารี. व्यंजन परे होने पर ह्रस्व और दीर्घ स्वरों के स्थान पर कभी-कभी दीर्घ और ह्रस्व हो जाते हैं; जैसे- tatrāyaṃ, munīvare, sammadeva, mālahārī। สรมฺหา ทฺเว- स्वर के बाद द्वित्व होता है। สรมฺหา ปรสฺส พฺยญฺชนสฺส กฺวจิ ทฺเว รูปา โหนฺติ; ปคฺคโห; สรมฺหาติ-กึ? ตํขณํ. स्वर के बाद आने वाले व्यंजन के कभी-कभी दो रूप (द्वित्व) हो जाते हैं; जैसे- paggaho; 'स्वर से' (saramhā) क्यों कहा गया? 'taṃkhaṇaṃ' के लिए। จตุตฺถทุติเยสฺเวยํ ตติยปฐามา-. चौथे और दूसरे वर्णों के परे होने पर तीसरे और पहले वर्ण होते हैं। จตุตฺถทุติเยสุ ปเรสฺเวสํ จตุตฺถทุติยานํ ตพฺพคฺเค ตติยปฐมา โหนฺติ ปจฺจาสตฺตฺย; มหทฺธโน, ยส ตฺเถโร, อปฺผุฏํ, อพฺภุคฺคโต; เอสฺวิติ-กึ? เถโร; เอสนฺติกึ?ปตฺโถ. चौथे और दूसरे वर्णों के परे होने पर, उन चौथे और दूसरे वर्णों के स्थान पर उसी वर्ग के तीसरे और पहले वर्ण सामीप्य के कारण होते हैं; जैसे- mahaddhano, yasa tthero, apphuṭaṃ, abbhuggato; 'esu' क्यों कहा गया? 'thero' के लिए; 'esaṃ' क्यों कहा गया? 'pattho' के लिए। วิติสฺเสเว วา-. 'एव' शब्द परे होने पर 'इति' के स्थान पर 'व' विकल्प से होता है। เอวสทฺเท ปเร อิติสฺส โว โหติ วา; อิตฺเถว อิจฺเจว; เอเวติ-กึ,อิจฺจาห. 'एव' शब्द परे होने पर 'इति' के स्थान पर 'व' विकल्प से होता है; जैसे- ittheva, icceva; 'eva' क्यों कहा गया? 'iccāha' के लिए। โญนม วณฺเณ-. 'ए' और 'ओ' के स्थान पर 'अ' वर्ण होता है। โญนํ วณฺเณ กฺวจิ อ โหติ วา; ทิสฺวา ยาจกมาคเต, อกรมฺภสเต,เอสอตฺโถ, เอสธมฺโม, มคฺโค อคฺคมกฺขายติ, สฺวายตนํ, หิยฺยตฺตนํ, กรสฺสุ; วาตฺเวว-ยาจเก อาคเต, เอโส ธมฺโม; วณฺเณติ กึ?โส. वर्ण परे होने पर 'ए' और 'ओ' के स्थान पर कभी-कभी 'अ' विकल्प से होता है; जैसे- disvā yācakamāgate, akarambhasate, esa attho, esa dhammo, maggo aggamakkhāyati, svāyatanaṃ, hiyyattanaṃ, karassu; 'vā' के कारण 'yācake āgate', 'eso dhammo' भी होते हैं; 'vaṇṇe' क्यों कहा गया? 'so' के लिए। นิคฺคหีตํ-. निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम होता है। นิคฺคภีตมาคโม โหติ วา กฺวจิ; จกฺขุํ อุทปาทิ จกฺขุ อุทปาทิ, ปุริมํชาติ ปุริมชาติ, กตฺตพฺพํ กุสลํ พหุํ. อวํ สิโรติ-อาทิสุ นิจฺจํ ววตฺถีตวิภาสตฺตา วาธิการสฺส; สามตฺถี เยนาคโมว ส จ รสฺสสรสฺเสว โหติ ตสฺส รสฺสานุคตตฺตา. निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम कभी-कभी विकल्प से होता है; जैसे- cakkhuṃ udapādi, cakkhu udapādi, purimaṃjāti, purimajāti, kattabbaṃ kusalaṃ bahuṃ। 'avaṃ siro' आदि में 'vā' के अधिकार की व्यवस्थित विभाषा होने के कारण यह नित्य होता है; सामर्थ्य से जो आगम होता है, वह ह्रस्व स्वर के बाद ही होता है क्योंकि वह ह्रस्व का अनुगामी है। โลโป-. लोप होता है। นิคฺคหีตสฺส โลโป โหติ วา กฺวจิ; กฺยาหํ กีมหํ, สา รตฺโต สํรตฺโต; สลฺเลโข-คตฺตุกาโม-คนฺตุมโนติอาทิสุ นิจฺจํ. निग्गहीत का लोप कभी-कभी विकल्प से होता है; जैसे- kyāhaṃ, kīmahaṃ, sā ratto, saṃratto; 'sallekho', 'gattukāmo', 'gantumanā' आदि में यह नित्य होता है। ปรสรสฺส- पर स्वर का लोप होता है। นิคฺคหีตมฺหา ปรสฺส สรสฺส โลโป โหติ วา กฺวจิ; ตฺวํสิ ตฺวมสิ. निग्गहीत के बाद आने वाले स्वर का कभी-कभी विकल्प से लोप होता है; जैसे- tvaṃsi, tvamasi। วคฺเค วคฺคนฺโต- वर्ग परे होने पर वर्ग का अंतिम वर्ण होता है। นิคฺคหีตสฺส โข วคฺเค วคฺคนฺโต วา โหติ ปจฺจา สตฺยา; ตงฺกโรติ ตํ กโรติ, ตญฺจรติ ตํ จรติ, ตณฺฐานํ ตํ ฐานํ, ตนฺธนํ ตํ ธนํ, ตมฺปาติ ตํ ปาติ; นิจฺจํ ปท มชฺเฌ, คนฺตฺวา; กฺวจญฺญตฺราปิ, สนฺติฏฺฐติ. वर्ग परे होने पर निग्गहीत के स्थान पर सामीप्य के कारण विकल्प से उसी वर्ग का अंतिम वर्ण होता है; जैसे- taṅkaroti, taṃ karoti, tañcarati, taṃ carati, taṇṭhānaṃ, taṃ ṭhānaṃ, tandhanaṃ, taṃ dhanaṃ, tampāti, taṃ pāti; पद के मध्य में यह नित्य होता है, जैसे- gantvā; कहीं अन्यत्र भी होता है, जैसे- santiṭṭhati। เยวหิสุญฺโญ-. 'य', 'एव', 'हि' शब्दों के परे होने पर निग्गहीत के स्थान पर 'ञ' होता है। ยเอวหิสทฺเทสุ นิคฺคหีตสฺส วา โญ โหติ; ยยญฺญเทว, ตญฺเญว, ตญฺภิ; วาตฺเวว-ยํยเทว. 'य', 'एव', 'हि' शब्दों के परे होने पर निग्गहीत के स्थान पर विकल्प से 'ञ' होता है; जैसे- yayaññadeva, taññeva, tañbhi; 'vā' के कारण 'yaṃyadeva' भी होता है। เย สํสฺส- 'ये' और 'सं' के स्थान पर... สํสทฺทสฺส ยํ นิคฺคหีตํ ตสฺส วา โญ โหติ ยกาเร; สญฺญโม สํยโม. 'सं' शब्द के निग्गहीत (ं) को 'य' कार परे होने पर विकल्प से 'ञ' होता है; जैसे- सञ्ञमो (saññamo), संयमो (saṃyamo)। มยทา สเร-. म, य, द स्वर परे होने पर। นิคฺคหีตสฺส มยทา โหนฺติ วา สเร กฺวจิ; ตมหํ, ตยิทํ, ตทลํ; วาตฺเวว-ตํ อหํ. स्वर परे होने पर निग्गहीत के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'म', 'य' और 'द' होते हैं; जैसे- तमहं (tamahaṃ), तयिदं (tayidaṃ), तदलं (tadalaṃ); विकल्प से- तं अहं (taṃ ahaṃ)। วนตรคา จาคมา-. व, न, त, र, ग आगम होते हैं। เอเต มยทา จาคมา โหนฺติ สเร วา กฺวจิ; ติวงฺคีกํ, อิโต นายติ, จินิตฺวา, ตสฺมาติห, นิโรชํ, ปุถเคว, อิธมาหุ, ยถยิทํ, อตฺตทตฺถํ; วาตฺเวว-อตฺตตฺถํ; อติปฺปโค โข ตาวาติ-ปฐมนฺโต ปคสทฺโทว. ये (म, य, द) और (व, न, त, र, ग) स्वर परे होने पर कहीं-कहीं विकल्प से आगम होते हैं; जैसे- तिवङ्गीकं (tivaṅgīkaṃ), इतो नायति (ito nāyati), चिनित्वा (cinitvā), तस्मातिह (tasmātiha), निरोजं (nirojaṃ), पुथगेव (puthageva), इधमाहु (idhamāhu), यथयिदं (yathayidaṃ), अत्तदत्थं (attadatthaṃ); विकल्प से- अत्तत्थं (attatthaṃ); 'अतिप्पगो खो तावा' में 'पग' शब्द का प्रथम वर्ण ही है। ฉา โฬ-. 'छ' शब्द से 'ळ' आगम होता है। ฉสทฺทา ปรสฺส สรสฺส ฬกาโร อาคโม โหติ วา; ฉฬหํ, ฉฬายตนํ; วาตฺเวว-ฉ อภิญฺญา. 'छ' शब्द के बाद स्वर होने पर 'ळ' कार का आगम विकल्प से होता है; जैसे- छळहं (chaḷahaṃ), छळायतनं (chaḷāyatanaṃ); विकल्प से- छ अभिञ्ञा (cha abhiññā)। ตทมินาทีนิ- तदमिन आदि शब्द। ตทมินาทีนิ สาธูนิ ภวนฺติ? ตํ อิมินา ตทมินา, สกึ อาคามี สกทาคามี, เอกํ อิธ อหํ เอกมิทาหํ, สํวิธาย อวหาโร สํวิทาวหาโร, วาริโน วาหโก วลาหโก, ชีวนสฺส มูโต ชีมูโต, ฉวสฺส สยนํ สุสานํ, อุทฺธํ ขมสฺส อุทุกฺขลํ, ปิสิ ตาโส ปิสาโจ, มหิยํ รวตีติ มยูโร; เอวมญฺเญปิ ปโยค โต’นุคนฺตพฺพา; ปเรสํ ปิโสทราทิเวทํ ทฏฺฐพฺพํ. तदमिन आदि शब्द सिद्ध होते हैं। तं इमिना = तदमिन (tadaminā), सकिं आगामी = सकदागामी (sakadāgāmī), एकं इध अहं = एकमिदाहं (ekamidāhaṃ), संविधाय अवहारो = संविदावहारो (saṃvidāvahāro), वारिनो वाहको = वलाहको (valāhako), जीवनस्स मूतो = जीमूतो (jīmūto), छवस्स सयनं = सुसानं (susānaṃ), उद्धं खमस्स = उदुक्खलं (udukkhalaṃ), पिसि तासो = पिसाचो (pisāco), महियं रवतीति = मयूरो (mayūro); इसी प्रकार अन्य प्रयोगों को भी प्रयोग के अनुसार समझना चाहिए; इन्हें 'पिसोदरादि' (पृषोदरादि) गण के समान समझना चाहिए। ตวคฺควรณานํ เย จวคฺคพยญา-. त-वर्ग के वर्णों को 'य' कार परे होने पर क्रमशः च-वर्ग, 'ब' और 'ञ' होते हैं। ตวคฺควรณานํ จวคฺคพยญา โหนฺติ ยถากฺกมํ ยกาเร; อปูจฺจณฺฑกายํ, ตจฺฉํ, ยชฺเชวํ, อชฺฌตฺตํ, ถญญฺญํ, ทิพฺพํ, ปยฺเยสนา, โปกฺขรญฺโญ; กฺวจีตฺเวว-รตฺยา. त-वर्ग के वर्णों को 'य' कार परे होने पर यथाक्रम च-वर्ग, 'ब' और 'ञ' होते हैं; जैसे- अपूच्चण्डकायं (apūccaṇḍakāyaṃ), तच्छं (tacchaṃ), यज्जेवं (yajjevaṃ), अज्झत्तं (ajjhattaṃ), थञ्ञञ्ञं (thañaññaṃ), दिब्बं (dibbaṃ), पय्येसना (payyesanā), पोक्खरण्ञो (pokkharañño); कहीं-कहीं- रत्या (ratyā)। วคฺคลเสหิ เต- वर्ग, 'ल' और 'स' से वे। วคฺคลเสหิ ปรสฺส ยการสฺส กฺวจิ เต วคฺคลสา โหนฺติ; สกฺกเต, ปจฺจเต, อฏฺฏเต, กุปฺปเต, ผลฺลเต, อสฺสเต, กฺวจี ตฺเวจ-กฺยาหํ. वर्ग, 'ल' और 'स' के बाद 'य' कार को कहीं-कहीं वे ही वर्ग, 'ल' और 'स' हो जाते हैं; जैसे- सक्कते (sakkate), पच्चते (paccate), अट्ठते (aṭṭate), कुप्पते (kuppate), फल्लते (phallate), अस्सते (assate); कहीं-कहीं- क्याहं (kyāhaṃ)। หสฺส วิปลฺลาโส- 'ह' का विपर्यास (स्थान परिवर्तन) होता है। หสฺส วิปลฺลาโส โหติ ยกาเร; คุยฺหํ. 'य' कार परे होने पर 'ह' का विपर्यास होता है; जैसे- गुय्हं (guyhaṃ)। เว วา-. 'व' परे होने पर विकल्प से। หสฺส วิปลฺลาโส โหติ วา วกาเร; พวฺหาพาโธ พหฺวา พาโธ. 'व' कार परे होने पर 'ह' का विपर्यास विकल्प से होता है; जैसे- बव्हाबाधो (bavhābādho), बह्वा बाधो (bahvā bādho)। ตถนรานํ ฏฐณลา-. त, थ, न, र को विकल्प से ट, ठ, ण, ल होते हैं। ตถนรานํ ฏฐณลา โหนฺตี วา; ทุกฺกฏํ, อฏฺฐกถา, คหณํ, ปลิโฆ, ปลายติ, วาตฺเวจ-ทุกฺกตํ; กฺวจีตฺเวว-สุคโต. त, थ, न, र को विकल्प से ट, ठ, ण, ल होते हैं; जैसे- दुक्कटं (dukkaṭaṃ), अट्ठकथा (aṭṭhakathā), गहणं (gahaṇaṃ), पलिघो (paligho), पलायति (palāyati); विकल्प से- दुक्कतं (dukkataṃ); कहीं-कहीं- सुगतो (sugato)। สํโยคาทิโลโป- संयोग के आदि वर्ण का लोप होता है। สํโยคสฺส โย อาทิภุโต’วยโว ตสฺส วา กฺวจี โลโป โหติ; ปุปฺผํสา, ชายเต’คินิ. संयोग का जो आदि अवयव (वर्ण) है, उसका कहीं-कहीं विकल्प से लोप होता है; जैसे- पुप्फंसा (pupphaṃsā), जायतेऽगिनि (jāyate’gini)। วิจฺฉาภิกฺขญฺเญสุ ทฺเว- वीप्सा और आभीक्ष्ण्य में दो (द्वित्व) होते हैं। วีจฺฉายมาภิกฺขญฺเญ จ ยํ วตฺตเต ตสฺส ทฺเว รูปานิ โหนฺติ, กฺริยาย คุเณน ทพฺเพน วา ภินฺเน อตฺเถ วฺยาปิตุ มิจฺฉา วีจฺฉา; รุกฺขํรุกฺขํ สิญฺจติ, คาโมคาโม รมณีโย, คาเม คาเม ปานียํ, เคเห เคเห อิสฺสโร, รสํ รสํ ภกฺขยตี, กิริยํ กิริยมารหเต. वीप्सा और आभीक्ष्ण्य में जो शब्द प्रयुक्त होता है, उसके दो रूप (द्वित्व) होते हैं। क्रिया, गुण या द्रव्य के द्वारा भिन्न अर्थों को व्याप्त करने की इच्छा 'वीप्सा' है; जैसे- रुक्खंरुक्खं सिञ्चति (rukkhaṃrukkhaṃ siñcati), गामोगामो रमणीयो (gāmogāmo ramaṇīyo), गामे गामे पानीयं (gāme gāme pānīyaṃ), गेहे गेहे इस्सरो (gehe gehe issaro), रसं रसं भक्खयती (rasaṃ rasaṃ bhakkhayatī), किरियं किरियमारहते (kiriyaṃ kiriyamārahate)। อตฺถิเยวานุปุพฺพิเย’ปิ วีจฺฉา, มูเล ถูลา, อคฺเค อคฺเค สุขุมา; ยทิ หิ เอตฺถ มูลคฺคเภโท น สิยา อานุปุพฺพิยมฺปิ น ภเวยฺย, (เชฏฺฐํ เชฏฺฐมนุปฺปเวสย) มาสกํ มาสกํ อิมมฺหา กหาปณา ภวนฺตานํ ทฺวินฺนํ เทหีติ- มาสกํ มาสกมิจฺเจตสฺมา วีจฺฉาวคมฺยเต สทฺทนฺตรโต ปน อิมมฺหา กหาปณาติ อวธารณํ; ปุพฺพํ ปุพฺพํ ปุปฺผนฺติ, ปฐมํ ปฐมํ ปจฺจนฺตีติ วีจฺฉาว; อิเม อุโภ อฑฺฒา กตรา กตรา เอสํ ทฺวินฺนมฑฺฒตา, สพฺเพ อิเม อฑฺฒา กตมา กตมา อิเมสํ อฑฺฒตา, อิหาปิ วีจฺฉาว; อาภิกฺขญฺญํ-โปโนปุญฺญํ, ปจติ ปจติ ปปจติ ปปจติ, ลุนาหิ ลุนาหิตฺเววายํ ลุนาติ, ภุตฺวา ภุตฺวา คจฺฉติ, ปฏปฏา กโรติ, ปฏปฏายติ. आनुपूर्वी (क्रम) में भी वीप्सा होती है; जैसे- मूले थूला, अग्गे अग्गे सुखुमा (mūle thūlā, agge agge sukhumā); यदि यहाँ मूल और अग्र का भेद न हो तो आनुपूर्वी भी नहीं होगी। (जेट्ठं जेट्ठमनुप्पवेसय), 'मासकं मासकं इमम्हा कहापणा भवन्तानं द्विन्नं देहीति'—यहाँ 'मासकं मासकं' से वीप्सा समझी जाती है, और 'इमम्हा कहापणा' यह अन्य शब्द से अवधारण (निश्चय) है। 'पुब्बं पुब्बं पुप्फन्ति', 'पठमं पठमं पच्चन्तीति'—यहाँ भी वीप्सा ही है। 'इमे उभो अढ्ढा कतरा कतरा एसं द्विन्नमढ्ढता', 'सब्बे इमे अढ्ढा कतमा कतमा इमेसं अढ्ढता'—यहाँ भी वीप्सा ही है। आभीक्ष्ण्य का अर्थ है—पौनःपुन्य (बार-बार होना); जैसे- पचति पचति (pacati pacati), पपचति पपचति (papacati papacati), लुनाहि लुनाहितवेवायं लुनाति (lunāhi lunāhi), भुत्वा भुत्वा गच्छति (bhutvā bhutvā gacchati), पटपटा करोति (paṭapaṭā karoti), पटपटायति (paṭapaṭāyati)। สฺยาทิโลโป ปุพฺพสฺเสกสฺส-. पूर्व पद की 'स्यादि' (विभक्ति) का लोप होता है। วีจฺฉาเมกสฺส ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส สฺยาทิโลโป โหติ, เอเกกสฺส, กถํ มตฺถกมตฺถเกนาติ? สฺยาทิโลโป ปุพฺพสฺสาติ โยควิภาคา; น จาติปฺปงฺโค โยควิภาคา อิฏฺฐปฺปสิทฺธีติ. वीप्सा में एक शब्द के द्वित्व होने पर पूर्व पद की 'स्यादि' विभक्ति का लोप होता है; जैसे- एकेकस्स (ekekassa)। 'मत्थकमत्थकेन' (matthakamatthakena) कैसे सिद्ध होगा? 'स्यादिलोपो पुब्बस्स' इस योग-विभाग से; योग-विभाग से इष्ट की सिद्धि में कोई अतिप्रसंग (दोष) नहीं होता। สพฺพาทีนํ วีติหาเร-. व्यतिहार (परस्पर विनिमय) में 'सर्वादि' शब्दों का द्वित्व होता है। สพฺพาทีนํ วีติหาเร ทฺเว ภวนฺติ ปุพฺพสฺส สฺยาทิโลโป จ; อญฺญมญฺญสฺส โภชกา, อิตรีตรสฺส โภชกา. व्यतिहार में 'सर्वादि' शब्दों के दो रूप (द्वित्व) होते हैं और पूर्व पद की 'स्यादि' विभक्ति का लोप होता है; जैसे- अञ्ञमञ्ञस्स भोजका (aññamaññassa bhojakā), इतरीतरस्स भोजका (itarītarassa bhojakā)। ยาว โพธํ สมฺภเม-. संभ्रम (घबराहट या शीघ्रता) में बोध होने तक शब्दों की आवृत्ति होती है। ตุริเตนาปายเหตุปทสฺสนํ สมฺภโม, ตสฺมึ สติ วตฺตุ ยาวนฺเตห สทฺเทหิ โส’ตฺโถ วิญฺญายเต ตาวนฺโต สทฺทา ปยุชฺชนฺเต; สปฺโป สปฺโป สปฺโป, พุชฺฌสฺสุ พุชฺฌสฺสุ พุชฺฌสฺสุ, ภินฺโน ภิกฺขุสงฺโฆ ภินฺโน ภิกฺขุสงฺโฆ. शीघ्रता से अपाय (हानि) के कारण का प्रदर्शन 'संभ्रम' है। उसके होने पर वक्ता के द्वारा जितने शब्दों से वह अर्थ समझ में आ जाए, उतने शब्द प्रयुक्त होते हैं; जैसे- सप्पो सप्पो सप्पो (sappo sappo sappo), बुज्झस्सु बुज्झस्सु बुज्झस्सु (bujjhassu bujjhassu bujjhassu), भिन्नों भिक्खुसङ्घो भिन्नों भिक्खुसङ्घो (bhinno bhikkhusaṅgho bhinno bhikkhusaṅgho)। พหุลํ-. बहुलम् (प्रायः/अनेक प्रकार से)। อยมธิกาโร อาสตฺถปริสมตฺติยา เตน นาติปฺปสงฺโค อิฏฺฐสิทฺธิ จ. यह अधिकार शास्त्र की समाप्ति तक है, जिससे अतिप्रसंग (अति-व्याप्ति) नहीं होता और इष्ट (वांछित) सिद्धि होती है। อิติ โมคฺคลฺลานวฺยากรเณ วุตฺตียํ ปฐโม กณฺโฑ. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में प्रथम काण्ड (अध्याय) समाप्त हुआ। ทฺเวทฺเวกาเนเกสุ นามสฺมา สิโยอํโยนาภิสนํ สฺมาหิสนํสฺมึสุ-. एक और अनेक (एकवचन और बहुवचन) अर्थों में नाम (प्रातिपदिक) से परे 'सि-यो, अं-यो, ना-भि, सं-नं, स्मा-हि, सं-नं, स्मिं-सु' ये (प्रत्यय) दो-दो होते हैं। เอเตสํ ทฺเว ทฺเว โหนฺติ เอกาเนกตฺเถสุ วตฺตมานโต นามสฺมา; มุนิ มุนโย, มุนึ มุนโย, มุนินา มุนีหิ, มุนิสฺส มุนีนํ, มุนิสฺมา มุนีหิ, มุนิสฺส มุนีนํ, มุนิสฺมึ มุนีสุ, เอวํ กุมารี กุมาริโย, กญฺญา กญฺญาโยติ; เอตานิ สตฺต ทุกานิ สตฺตวิภตฺติโย; วิภาโค วิภตฺตีติ กตฺวา-เอตฺถ สิอมิตีการา การา ‘‘กิมํสิสู‘‘ติ. สํเกตตฺถา. एक और अनेक अर्थों में वर्तमान नाम से ये दो-दो होते हैं; जैसे- मुनि मुनयो (प्रथमा), मुनिं मुनयो (द्वितीया), मुनिना मुनीहि (तृतीया), मुनिस्स मुनीनं (चतुर्थी), मुनिस्मा मुनीहि (पञ्चमी), मुनिस्स मुनीनं (षष्ठी), मुनिस्मिं मुनीसु (सप्तमी)। इसी प्रकार कुमारी कुमारियो, कञ्ञा कञ्ञायो आदि। ये सात द्विक (जोड़े) सात विभक्तियाँ हैं। 'विभाग ही विभक्ति है' ऐसा मानकर यहाँ 'सि' आदि में इकार आदि 'किं-अं-सि-सु' की तरह संकेत (संज्ञा) के लिए हैं। กมฺเม ทุติยา-. कर्म में द्वितीया (विभक्ति होती है)। กรียติ กตฺตุกฺริยายาภีสมฺพนฺธียตีติ กมฺมํ, ตสฺมึ ทุติยา วิภตฺติ โหติ; กฏํ กโรติ, โอทนํ ปวติ, อาทิจฺจํ ปสฺสติ, โอทโน ปจฺจตีติ-โอทนสทฺทโต กมฺมตา นปฺปตียเต, กึ จรหิ? อาขฺยาตโต; กฏํ กโรติ วิปุลํ ทสฺสนียนฺติ- อตฺเถว คุณ ยุตฺตสฺส กมฺมตา; อิจฺฉิเต’ปิ กมฺมตฺตาว ทุติยา สิทฺธ; คาวุํ ปโย โทหติ, โคมนฺตํ คาวํ ยาวติ, ควมวรุนฺธติ วชํ, มาณวกํ มคฺคํ ปุจฺฉติ, โคมนฺตํ คาวํ ภิกฺขเต, รุกฺขมว จินาติ ผลานิ, สิสฺสํ ธมฺมํ พฺรูเต, สิสฺสํ ธมฺมมนุสาสติ. जो कर्ता की क्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है या जिससे संबंध जोड़ा जाता है, वह 'कर्म' है। उसमें द्वितीया विभक्ति होती है; जैसे- चटाई बनाता है (कटं करोति), भात पकाता है (ओदनं पचति), सूर्य को देखता है (आदिच्चं पस्सति)। 'ओदनो पच्चति' (भात पकता है) यहाँ ओदन शब्द से कर्मत्व प्रतीत नहीं होता, तो फिर किससे? आख्यात (क्रिया) से। 'कटं करोति विपुलं दस्सनीयं' (विशाल दर्शनीय चटाई बनाता है) यहाँ गुणयुक्त (विशेषण) की भी कर्मता होती है। इच्छित (ईप्सित) होने पर भी कर्मत्व के कारण द्वितीया सिद्ध होती है; जैसे- गाय से दूध दुहता है, गोमन्त से गाय माँगता है, बाड़े में गाय को रोकता है, बालक से मार्ग पूछता है, गोमन्त से गाय की भिक्षा माँगता है, वृक्ष से फल चुनता है, शिष्य को धर्म कहता है, शिष्य को धर्म का उपदेश देता है। เอวมนิจฉิเต’ปิ; อหึ ลงฺฆยติ, วีสํ ภกฺเขติ; ยนฺเน วิจฺฉิตํ นาปิ อนิจฺฉิตํ ตตฺถาปิ ทุตียา สิทฺธา; คามํ คจฺฉนฺโต รุกฺขมูลมุปสปฺปติ, ปถวึ อธิเสสฺสติ, คามมธิติฏฺฐติ, รุกฺข มชฺฌาสเตติ-อธิสีฐาสานํ ปโยเค’ธิกรเณ กมฺมวจนิจฺฉา. इसी प्रकार अनपेक्षित (अनीप्सित) में भी; जैसे- साँप को लाँघता है, विष खाता है। जो न तो इच्छित है और न ही अनपेक्षित, वहाँ भी द्वितीया सिद्ध होती है; जैसे- गाँव जाते हुए वृक्ष की जड़ के पास पहुँचता है। 'पृथ्वी पर सोएगा' (पथविं अधिसिस्सति), 'गाँव में ठहरता है' (गाममधितिट्ठति), 'वृक्ष पर बैठता है' (रुक्खं अज्झासते) - यहाँ 'अधि' उपसर्ग पूर्वक 'सी', 'ठा' और 'आस' धातुओं के प्रयोग में अधिकरण में कर्म की विवक्षा (इच्छा) होती है। วตฺติจฺฉาโต หิ การกานิ โหนฺติ; ตํ ยถา- วลาหกา วิชฺโชตเต, วลาหกสฺส วิชฺโชตเต, วลาหโก วิชฺโชตเต, วลาหเก วิชฺโชตเต, วลาหเกน วิชฺโชตเตติ. वक्ता की इच्छा (विवक्षा) से ही कारक होते हैं; जैसे- बादलों से बिजली चमकती है, बादल की बिजली चमकती है, बादल चमकता है, बादल में बिजली चमकती है, बादल के द्वारा बिजली चमकती है। เอวมภินวิสสฺส วา, ธมฺมมภินิวิสเต ธมฺเม วา, ตถา อุปนฺวชฺฌาวสสฺสาโภชนนวุตฺติจนสฺส; คามมุปวสติ, คาม มนุวสติ, ปพฺพตมธิวสติ, ฆรมาวสติ; อโภชนนิวุตฺติวจ นสฺสาติ-กึ? คาเม อุปวสติ-โภชนนิวุตฺตึ กโรตีติ อตฺโถ. ตปฺปานาจาเร’ปิ กมฺมตฺตาว ทุติยา สิทฺธา, นทิมฺปิวติ, คามํ จรติ; เอวํ สเจ มํ นาลปิสฺสตีติ-อาทิสุปิ. इसी प्रकार 'अभिनिविस' के योग में विकल्प से; जैसे- धर्म में अभिनिवेश करता है (धम्ममभिनिविसते या धम्मे वा)। उसी प्रकार 'उप', 'अनु', 'अधि' और 'आ' उपसर्ग पूर्वक 'वस' धातु के प्रयोग में (यदि अर्थ भोजन का त्याग न हो); जैसे- गाँव में रहता है (गाममुपवसति), गाँव में रहता है (गाममनुवसति), पर्वत पर रहता है (पब्बतमधिवसति), घर में रहता है (घरमावसति)। 'भोजन के त्याग का वाचक न होने पर' ऐसा क्यों कहा? 'गामे उपवसति' (गाँव में उपवास करता है) - यहाँ अर्थ भोजन का त्याग करना है। तृप्ति और आचरण के अर्थ में भी कर्मत्व के कारण द्वितीया सिद्ध होती है; जैसे- नदी (का जल) पीता है, गाँव में विचरण करता है; इसी प्रकार 'यदि वह मुझसे बात नहीं करेगा' (सचे मं नालपिस्सति) आदि में भी। วิหิตาว ปฏิโยเค ทุติยา, ปฏิภนฺตุ ตํ จุนฺท โพชฺฌงฺคาติ-ตํ ปฏิ โพชฺฌงฺคา ภาสนฺตูติ อตฺโถ; ยทา ตุ ธาตุนา ยุตฺโต ปติ ตทา เตนาโยคา สมฺพนฺเธ ฉฏฺฐี จ ตสฺส นปฺปฏิ ภาตีติ? อกฺเข ทิพฺพติ, อกฺเขหิ ทิพฺพติ, อกฺเขสุ ทิพฺพตีติกมฺมกรณาธิกรณวจนิจฺฉา. 'प्रति' के योग में विहित द्वितीया होती है; जैसे- 'हे चुन्द! तुम्हें बोध्यंग प्रतिभासित हों' (पटिभन्तु तं चुन्द बोज्झङ्गा) - यहाँ 'तुम्हारे प्रति बोध्यंग प्रकाशित हों' यह अर्थ है। किन्तु जब 'प्रति' धातु के साथ युक्त होता है, तब उसके साथ योग न होने से सम्बन्ध में षष्ठी भी होती है, जैसे- 'तस्स नप्पटिभाति' (उसे प्रतिभासित नहीं होता)। 'पासे से खेलता है' (अक्खे दिब्बति), 'पासों के द्वारा खेलता है' (अक्खेहि दिब्बति), 'पासों में खेलता है' (अक्खेसु दिब्बति) - यहाँ कर्म, करण और अधिकरण की विवक्षा है। กาลทฺธานมจฺจนฺตสํโยเค-. काल (समय) और अध्व (मार्ग) के अत्यन्त संयोग (निरन्तरता) में (द्वितीया होती है)। กฺริยาคุณทพฺเพหิ สากลฺเลน กาลทฺธานํ สมฺพนฺโธ อจฺจนฺตสํโยเค, ตสฺมึ วิญฺญายมาเน กาลสทฺเทหิ อทฺธ สทฺเทหิ จ ทุติยา โหติ; มาสมธีเต, มาสํ กลฺยาณิ. มาสํ คุฬธานา, โกสมธีเต, โกสํ กุฏิลา นที, โกสํ ปพฺพโต; อจฺจนฺตสํเยเคติ กึ? มาสสฺส ทฺวีหมธีเต; โกสสฺเสก เทเส ปพฺพโต; ปุพฺพนฺหสมยํ นิวาเสตฺวา, เอกํ สมยํ ภควา, อิมํ รตฺตึ จตฺตาโร มหาราชาติ; เอวมาทิสุ กาลวาจีหิ อจฺจนฺตสํเยคตฺตาว ทุติยา สิทฺธา, วิภตฺติวิปลฺลาเสน วา พหุลํ วิธานา- क्रिया, गुण और द्रव्य के साथ काल और मार्ग का पूर्ण रूप से सम्बन्ध 'अत्यन्त संयोग' है। उसके ज्ञात होने पर कालवाची और मार्गवाची शब्दों से द्वितीया होती है; जैसे- महीने भर पढ़ता है (मासमधीते), महीने भर कल्याणकारी (मासं कल्याणी), महीने भर गुड़-धान (मासं गुळधाना), कोस भर पढ़ता है (कोसमधीते), कोस भर टेढ़ी नदी (कोसं कुटिला नदी), कोस भर पर्वत (कोसं पब्बतो)। 'अत्यन्त संयोग' क्यों कहा? 'महीने में दो दिन पढ़ता है' (मासस्स द्वीहमधीते); 'कोस के एक भाग में पर्वत है' (कोसस्सेक देसे पब्बतो)। 'पूर्वाह्न समय में पहनकर' (पुब्बह्णसमयं निवासेत्वा), 'एक समय भगवान' (एकं समयं भगवा), 'इस रात्रि को चार महाराज' (इमं रत्तिं चत्तारो महाराजा) - इन उदाहरणों में कालवाची शब्दों से अत्यन्त संयोग के कारण ही द्वितीया सिद्ध होती है, अथवा विभक्ति के व्यत्यय (बदलाव) से बहुलता के विधान के कारण। ผลปฺปตฺติยํ กฺริยาปริสมตฺตฺยปวคฺโค ตสฺมึ วิญฺญาย มาเน กาลทฺธานํ กฺริยายาจฺจนฺตสํโยเค ตติยาภิมตา สาปิ กรณตฺตาว สิทฺธา; มาเสนานุวาโก’ธีโต, โกเสนานุวา โก’ธีโตติ; อนปวคฺเคตุ อสาธกตมตฺตา กรณตฺตาภเว ทุติยาว มาสมธีโต’นุวาโก, น จาเนน คหิโตติ. फल की प्राप्ति होने पर क्रिया की समाप्ति 'अपवर्ग' है। उसके ज्ञात होने पर काल और मार्ग के क्रिया के साथ अत्यन्त संयोग में तृतीया अभीष्ट है, वह भी करणत्व के कारण ही सिद्ध होती है; जैसे- महीने भर में अनुवाक पढ़ लिया (मासेनानुवाकोऽधीतो), कोस भर चलते हुए अनुवाक पढ़ लिया (कोसेनानुवाकोऽधीतो)। अपवर्ग (फल प्राप्ति) न होने पर, साधकतम (करण) न होने के कारण द्वितीया ही होती है; जैसे- महीने भर अनुवाक पढ़ा, पर उसे ग्रहण (याद) नहीं किया। การกมชฺเฌ เย กาลทฺธานวาจิโน ตโต สตฺตมีปปญฺจมิโย อภิมตา; อชฺช ภุตฺวา เทวทตฺโต ทฺวีเห ภุญฺชิสฺสติ ทฺวีหา ภุญฺชิสฺสติ, อตฺรฏฺโฐ’ยมิสฺสาโส โกเส ลกฺขํ วิชฺฌติ, โกสา ลกฺขํ วิชฺฌตีติ-ตาปีห สกสกการกวจนิจฺฉาเยว สิทฺธา. कारकों के मध्य जो काल और मार्ग वाची शब्द होते हैं, उनसे सप्तमी और पञ्चमी अभीष्ट हैं; जैसे- 'आज खाकर देवदत्त दो दिन में खाएगा' (द्वीहे भुञ्जिस्सति) या 'दो दिन बाद खाएगा' (द्वीहा भुञ्जिस्सति); 'यहाँ स्थित यह धनुर्धर कोस भर की दूरी पर लक्ष्य भेदता है' (कोसे लक्खं विज्झति) या 'कोस भर से लक्ष्य भेदता है' (कोसा लक्खं विज्झति) - ये भी यहाँ अपने-अपने कारक की विवक्षा से ही सिद्ध होते हैं। คติโพธาหารสทฺทตฺถกมฺมกหชฺชาทีนํ ปโยชฺเช-. गति (गमन), बोध (ज्ञान), आहार (भोजन), शब्द-अर्थ वाली और अकर्मक धातुओं तथा 'भज्ज' आदि के प्रयोज्य (कर्ता) में (द्वितीया होती है)। คมนตฺถานํ โพธตฺถานํ อาหารตฺถานํ สทฺทตฺถานมกมฺมกานํ ภชฺชาทีนญฺจ ปโยชฺเช กตฺตริ ทุติยา โหติ, สามตฺถิยา จ ปโยชกวฺยาปาเรน กมฺมตาวสฺส โหตีติ ปตียเต; คม ยติ มาณวกํ คามํ, ยาปยติ มาณวกํ คามํ, โพธยติ มาณวกํ ธมฺมํ, เวทยติ มาณวกํ ธมฺมํ, โภชยติ มาณวกโมทนํ, อาสยติ มาณวกโมทนํ, อชฺฌาปยติ มาณวกํ เวทํ ปาฐยติ มาณวกํ เวทํ, อาสยติ เทวทตฺตํ, สายยติ เทว ทตฺตํ, อญฺญํ ภชฺชาเปติ, อญฺญํ โกฏฺฏาเปติ, อญญฺญํ สนฺถราเปติ. เอเตสเมวาติ กึ?ปาจยติ โอทนํ เทวทตฺเตน ยญญฺญทตฺโต; ปเย ปฺโปติ กึ?คจฺฉติ เทวทตฺโต, ยทา จรหิคมยติ เทวทตฺตํ ยญฺญ ทตฺโต, ตมปโร ปโยชยติ ตทา คมยติ เทวทตฺตํ ยญฺญทตฺเตเนติ - ภวิตพฺพํ คมยติสฺสาคมนตฺถตฺตา. गमनार्थक, बोधार्थक, आहारार्थक, शब्दार्थक, अकर्मक और 'भज्ज' आदि धातुओं के प्रयोज्य कर्ता में द्वितीया होती है, और सामर्थ्य से प्रयोजक के व्यापार द्वारा उसकी कर्मता प्रतीत होती है; जैसे- बालक को गाँव भेजता है (गमयति माणवकं गामं), बालक को गाँव पहुँचाता है, बालक को धर्म समझाता है, बालक को धर्म का ज्ञान कराता है, बालक को भात खिलाता है, बालक को भात खिलाता है, बालक को वेद पढ़ाता है, बालक को वेद पढ़वाता है, देवदत्त को बिठाता है, देवदत्त को सुलाता है, दूसरे से भुनवाता है, दूसरे से कुटवाता है, दूसरे से बिछवाता है। 'इन्हीं का' ऐसा क्यों कहा? 'यज्ञदत्त देवदत्त से भात पकवाता है' (पाचयति ओदनं देवदत्तेन यञ्ञदत्तो)। 'प्रयोज्य में' ऐसा क्यों कहा? 'देवदत्त जाता है'। जब यज्ञदत्त देवदत्त को भेजता है और उसे कोई दूसरा प्रेरित करता है, तब 'यज्ञदत्त के द्वारा देवदत्त को भेजता है' (गमयति देवदत्तं यञ्ञदत्तेन) - ऐसा होना चाहिए क्योंकि 'गमयति' गमनार्थक है। หราทีนํ วา-. 'हृ' (हर) आदि धातुओं के योग में विकल्प से (द्वितीया होती है)। หราทีนํ ปโยชฺเช กตฺตริ ทุติยา โหติ วา; หาเรติ หารํ เทวทตฺตํ เทวทตฺเตเนติ วา, อชฺโฌหาเรติ สตฺตุํ เทวทตฺตํ เทวทตฺเตเนติ วา, กาเรติ เทวทตฺตํ เทวทตฺเตเนติ วา, ทสฺสยเต ชนํ ราชา ชเนเนติ วา, อภิวาทยเต คุรุํ เทวทตฺตํ เทวทตฺเตเนติ วา. 'हृ' (ले जाना) आदि धातुओं के प्रयोज्य कर्ता में विकल्प से द्वितीया होती है; जैसे—देवदत्त से हार हरवाता है (देवदत्तं/देवदत्तेन), देवदत्त से सत्तू खिलवाता है, देवदत्त से करवाता है, राजा लोगों को (स्वयं को) दिखाता है, देवदत्त से गुरु का अभिवादन करवाता है। น ขาทาทีนํ-. 'खाद्' आदि धातुओं के साथ (द्वितीया) नहीं होती। ขาทาทีนํ ปโยชฺเช กตฺตริ ทุติยา น โหติ; ขาทยติ เทวทตฺเตน, อาทยติ เทวทตฺเตน, อวฺหาปยติ เทวทตฺเตน, สทฺทายติ เทวทตฺเตน, กนฺทยติ เทวทตฺเตน, นายยติ เทวทตฺเตน. 'खाद्' आदि धातुओं के प्रयोज्य कर्ता में द्वितीया नहीं होती है; जैसे—देवदत्त से खिलवाता है, देवदत्त से ग्रहण करवाता है, देवदत्त से बुलवाता है, देवदत्त से शब्द करवाता है, देवदत्त से रुलाता है, देवदत्त से ले जाया जाता है। วหิสฺสานิยนฺตุเก-.() 'वह' धातु के साथ अनियन्तृक (सारथि से भिन्न) होने पर (द्वितीया नहीं होती)। วาหยติ ภารํ เทวทตฺเตน; อนิยนฺตุเกติ-กึ?วาหยติ คารํ พลิวทฺเท. देवदत्त से भार ढुलवाता है; 'अनियन्तृक' क्यों? (क्योंकि) बैलों से गाड़ी खिंचवाता है। ภกฺขิสฺสาหึสายํ-.() 'भक्ख' धातु के साथ अहिंसा के अर्थ में (द्वितीया नहीं होती)। ภกฺขยติ โมทเก เทวทตฺเตน; อหึสายนฺติ กึ? ภกฺขยติ พลิวทฺเท สสฺสํ. देवदत्त से मोदक खिलवाता है; 'अहिंसा' क्यों? (क्योंकि) बैलों से शस्य (फसल) खिलवाता है। ธฺยาทีหิ ยุตฺตา-. 'धि' आदि के योग में (द्वितीया होती है)। ธิอาทีหิ ยุตฺตโต ทุติยา โหติ? ธิรตฺถุมํ ปูติกายํ, อนฺตรา จ ราชคหํ, อนฺตรา จ นาฬนฺทํ, สมาธานมนฺตเรน, มุจลินฺทมภิโต สรมิจฺจาทิ-ฉฏฺฐิยาปวาโท ยํ. 'धि' आदि के योग में द्वितीया होती है; जैसे—इस दुर्गन्धित शरीर को धिक्कार है, राजगृह और नालन्दा के बीच में, समाधि के बिना, मुचलिन्द सरोवर के पास आदि—यह षष्ठी विभक्ति का अपवाद है। ลกฺขณิตฺถมฺภุตวีจฺฉาสฺวภินา-. लक्षण, इत्थंभूत और वीप्सा अर्थों में 'अभि' के योग में (द्वितीया होती है)। ลกฺขณาทิสฺวตฺเถสฺวหินา ยุตฺตมฺหา ทุติยา โหติ; รุกฺข มภิวิชฺเชตเต วิชฺชุ, สาธุ เทวทตฺโต มาตรมภิ, รุกฺขํ รุกฺขมภิติฏฺฐติ. लक्षण आदि अर्थों में 'अभि' के योग में द्वितीया होती है; जैसे—वृक्ष पर बिजली चमकती है, देवदत्त माता के प्रति अच्छा है, वह प्रत्येक वृक्ष के पास खड़ा होता है। ปติปรีหิ ภาเค จ-. 'प्रति' और 'परि' के योग में लक्षण आदि और 'भाग' अर्थ में भी (द्वितीया होती है)। ปติปรีหิ ยุตฺตมฺหา ลกฺขณาทิสุ ภาเค วตฺเถ ทุติยา โหติ; รุกฺขมฺปติ วิชฺโชตเต วิชฺชุ, สาธุ เทวทตฺโต มาตรํ ปติ, รุกฺขํ รุกฺขํ ปติ ติฏฺฐติ, ยเทตฺถ มํ ปติ สิยา, รุกฺขํ ปริวิชฺเชตเต วิชฺชุ, สาธุ เทวทตฺโต มาตรํ ปริ, รุกฺขํ รุกฺขํ ปริ ติฏฺฐติ, ยเทตฺถ มํ ปริ สิยา. 'प्रति' और 'परि' के योग में लक्षण आदि और भाग अर्थ में द्वितीया होती है; जैसे—वृक्ष पर बिजली चमकती है, देवदत्त माता के प्रति अच्छा है, वह प्रत्येक वृक्ष के पास खड़ा होता है, यहाँ जो मेरा भाग हो; (इसी प्रकार 'परि' के साथ) वृक्ष पर बिजली चमकती है, देवदत्त माता के प्रति अच्छा है, वह प्रत्येक वृक्ष के पास खड़ा होता है, यहाँ जो मेरा भाग हो। อนุนา-. 'अनु' के योग में (द्वितीया होती है)। ลกฺขณาทิสฺวตฺเถสฺวนุนา ยุตฺตมฺหา ทุติยา โหติ; รุกฺข มนุวิชฺโชตเต วิชฺชุ, สจฺจกิริยมนุปวสฺสิ; เหตุ จ ลกฺขณํ ภวติ, สาธุ เทวทตฺโต มาตรมนุ, รุกฺขํ รุกฺขมนุ ติฏฺฐติ, ยเทตฺถ มํ อนุสิยา. लक्षण आदि अर्थों में 'अनु' के योग में द्वितीया होती है; जैसे—वृक्ष पर बिजली चमकती है, सत्य-क्रिया के बाद वर्षा हुई (यहाँ हेतु ही लक्षण है), देवदत्त माता के प्रति अच्छा है, वह प्रत्येक वृक्ष के पास खड़ा होता है, यहाँ जो मेरा भाग हो। สหตฺเถ- 'सह' (साथ) के अर्थ में (अनु के योग में द्वितीया होती है)। สหตฺเถ’นุนา ยุตฺตมฺหา ทุติยา โหติ; ปพฺพตมนุติฏฺฐติ. 'सह' अर्थ में 'अनु' के योग में द्वितीया होती है; जैसे—वह पर्वत के साथ (लगा हुआ) खड़ा है। หีเน- 'हीन' (कम) के अर्थ में (अनु के योग में द्वितीया होती है)। หีนตฺเถ’นุนา ยุตฺตมฺหา ทุติยา โหติ; อนุสาริปุตฺตํ ปญฺญาวนฺโต. 'हीन' अर्थ में 'अनु' के योग में द्वितीया होती है; जैसे—बुद्धिमान लोग सारिपुत्र से कम (बुद्धि वाले) हैं। ปญฺญวนฺโต-ม. प्रज्ञावान (बुद्धिमान)। อุเปน-. 'उप' के योग में (द्वितीया होती है)। หินตฺเถ อุเปน ยุตฺตมฺหา ทุติยา โหติ; อุปสาริปุตฺต ปญฺญาวนฺโต. 'हीन' अर्थ में 'उप' के योग में द्वितीया होती है; जैसे—बुद्धिमान लोग सारिपुत्र से कम (बुद्धि वाले) हैं। สตฺตมฺยาธิกฺเย-. 'अधिक' अर्थ में (उप के योग में) सप्तमी होती है। อาธิกฺยตฺเถ อุเปน ยุตฺตมฺหา สตฺตมี โหติ; อุปขารยํ โทโณ. 'अधिक' अर्थ में 'उप' के योग में सप्तमी होती है; जैसे—खारी से अधिक द्रोण है। สามิตฺเต’ธินา-. 'स्वामी' भाव के अर्थ में 'अधि' के योग में (सप्तमी होती है)। สามิภาวตฺเถ’ธินา ยุตฺตมฺหา สตฺตมี โหติ; อธิพฺรหฺมทตฺเต ปญฺจาลา, อธิปญฺจาเลสุ พฺรหฺมทตฺโต. 'स्वामी' भाव के अर्थ में 'अधि' के योग में सप्तमी होती है; जैसे—ब्रह्मदत्त के अधीन पञ्चाल देश है, पञ्चालों का अधिपति ब्रह्मदत्त है। กตฺตุกรเณสุ ตติยา-. कर्ता और करण कारक में तृतीया होती है। กตฺตริ กรณ จฺैอ การเก ตติยา โหติ; ปุริเสน กตํ, อสินา ฉินฺทติ, ปกติยาภิรูโป, โคตฺเตน โคตโม’สุเมโธ นาม นาเมน, ชาติยา สตฺตวสฺสิโกติ-ภูธาตุสฺส สมฺภวา กรเณ เอว ตติยา; เอวํ สเมน ธาวติ, วิสเมน ธาวติ, ทฺวิโทเณน ธญฺญํ กิณาติ, ปญฺจเกน ปสโว กิณาตีติ. कर्ता और करण कारक में तृतीया होती है; जैसे—पुरुष द्वारा किया गया, तलवार से काटता है, स्वभाव से सुन्दर, गोत्र से गौतम, नाम से सुमेध, जन्म से सात वर्ष का—यहाँ 'भू' धातु के सम्भव (उत्पत्ति) अर्थ में करण में ही तृतीया है; इसी प्रकार समतल पर दौड़ता है, विषम (ऊबड़-खाबड़) पर दौड़ता है, दो द्रोण से अनाज खरीदता है, पाँच (मुद्राओं) से पशु खरीदता है। สหตฺเถน- 'सह' (साथ) के अर्थ में (तृतीया होती है)। สหตฺเถน โยเค ตติยา สิยา; ปุตฺเตน สหาคโต, ปุตฺเตน สทฺธึ อาคโต? ตติยาปิ ฉฏฺฐีว อปฺปธาเน เอว ภวติ. 'सह' के योग में तृतीया होती है; जैसे—पुत्र के साथ आया, पुत्र के साथ आया। तृतीया भी षष्ठी की तरह अप्रधान में ही होती है। ลกฺขเณ-. लक्षण में। ลกฺขเณ วตฺตมานโต ตติยา สิยา; ติทณฺฑเกน ปริพฺพาชกมทฺทกฺขิ, อกฺขินา กาโณ, เตน หิ องฺเคน องฺคิโน วิกาโร ลกฺขียเต. लक्षण के वर्तमान होने पर तृतीया (विभक्ति) होती है; जैसे- 'त्रिदण्डक से परिव्राजक को देखा', 'आँख से काणा', क्योंकि उस अंग से अंगी का विकार लक्षित होता है। เหตุมฺหิ-. हेतु में। ตกฺกิริยาโยคฺเค ตติยา สิยา; อนฺเนน วสติ, วิชฺชาย ยโส. उस क्रिया के योग में तृतीया होती है; जैसे- 'अन्न के कारण रहता है', 'विद्या से यश'। ปญฺจมีเณ วา-. ऋण में विकल्प से पञ्चमी। อิเณ เหตุมฺหี ปญฺจมี โหติ วา;ชฬตฺตา พทฺโธ สเตน วา. ऋण रूपी हेतु में विकल्प से पञ्चमी होती है; जैसे- 'जड़ता के कारण बँधा हुआ' या 'सौ (मुद्राओं के ऋण) से (बँधा हुआ)'। คุเณ- गुण में। ปรางฺคภุเต เหตุมฺหิ ปญฺจมี โหติ วา; ชฬตฺตา พทฺโธ ชฬตฺเตน วา, ปญฺญาย มุตฺโต, หุตฺวา อภาวโต’นิจฺจา, สงฺขาร นิโรธา วิญฺญาณนิโรโธ. पर-अंगभूत (गौण) हेतु में विकल्प से पञ्चमी होती है; जैसे- 'जड़ता के कारण बँधा हुआ' या 'जड़ता से', 'प्रज्ञा से मुक्त', 'होकर अभाव होने से अनित्य', 'संस्कारों के निरोध से विज्ञान का निरोध'। ฉฏฺฐี เหตฺวตฺเถหิ-. हेतु अर्थ वाले शब्दों के साथ षष्ठी। เหตฺวตฺถวจีหิ เยเค เหตุมฺหิ ฉฐี สิยยา; อุทรสฺส เหตุ, อุทรสฺส การณา. हेतु अर्थ वाले शब्दों के योग में हेतु में षष्ठी होती है; जैसे- 'पेट के हेतु', 'पेट के कारण'। สพฺพาทิโต สพฺพา-. 'सब्ब' आदि शब्दों से सभी (विभक्तियाँ)। เหตฺวตฺเถหิ โยเค สพฺพาทีหิ สพฺพา วิภตฺติโย โหนฺติ; โก เหตุ, กํ เหตุํ, เกน เหตุนา, ตสฺส เหตุสฺส, กสฺมา เหตุสฺมา, กสฺส เหตุสฺส, กสฺมึ เหตุสฺมึ; กึ การณํ, เกน การเณน; กึ นิมิตฺตํ, เกน นิมิตฺเตน; กึ ปโยชนํ, เกน ปโยชเนเนจฺเจวมาทิ –เหตฺวตฺเถหีตฺเวว-เกน กตํ. हेतु अर्थ के योग में 'सब्ब' आदि (सर्वनामों) से सभी विभक्तियाँ होती हैं; जैसे- 'क्या हेतु है', 'किस हेतु को', 'किस हेतु से', 'किस हेतु के लिए', 'किस हेतु से', 'किस हेतु का', 'किस हेतु में'; 'क्या कारण', 'किस कारण से'; 'क्या निमित्त', 'किस निमित्त से'; 'क्या प्रयोजन', 'किस प्रयोजन से' इत्यादि - हेतु अर्थ में ही - 'किसके द्वारा किया गया'। จตุตฺถิ สมฺปทาเน-. सम्प्रदान में चतुर्थी। ยสฺส สมฺมา ปทียเต ตสฺมึ จตุตฺถิ สิยา; สงฺฆสฺส ททาติ, อาธารวิจกฺขายํ สตฺตมีปิ สิยา, สงฺเฆ เทหิ. जिसे भली-भाँति दिया जाता है, उसमें चतुर्थी होती है; जैसे- 'संघ को देता है', आधार की विवक्षा में सप्तमी भी होती है, जैसे- 'संघ में दो'। ตาทตฺถฺเย-. तादर्थ्य में। ตสฺเสทํ ตทตฺถํ ตทตฺถภาเว โชตนีเย นามสฺมา จตุตฺถี สิยา; สีตสฺส ปฏิฆาตาย, อตฺถาย หิตาย เทวมนุสฺสานํ, นาลํ ทารภรณาย, ยูปาย ทารุ, ปากาย วชตีตฺเววมาทิ. 'उसके लिए यह' वह तादर्थ्य है, उस तादर्थ्य भाव को प्रकट करने के लिए नाम (संज्ञा) से चतुर्थी होती है; जैसे- 'शीत के निवारण के लिए', 'देवों और मनुष्यों के अर्थ और हित के लिए', 'पत्नी के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं', 'यूप (खंभे) के लिए लकड़ी', 'पकाने के लिए जाता है' इत्यादि। กสฺส สาทุํ น รุจฺจติ, มา อายสฺมนฺตานมฺปิ สงฺฆเภโท รุจฺจตฺถ, ขมติ สงฺฆสฺส, ภตฺตมสฺส นจฺฉาเทตีติ-ฉฏฺฐี สมฺพนฺธ วจนิจฺฉายํ; น เจวํ วิโรโธ สิยา สทิสรูปตฺตา เอวํ วิเธสุ จ สมฺพนฺธสฺส สทฺทิกานุมตตฺตา กสฺส วา ตฺวํ ธมฺมํ โรเจสีติ-อตฺถมตฺเต ปฐมา. 'किसे स्वादिष्ट नहीं लगता', 'आयुष्मन्तों को भी संघ-भेद अच्छा न लगे', 'संघ को क्षमा (पसंद) है', 'उसे भात अच्छा नहीं लगता' - यहाँ सम्बन्ध कहने की इच्छा में षष्ठी है; और इस प्रकार (चतुर्थी के साथ) विरोध नहीं होगा क्योंकि रूप समान हैं और इस प्रकार के प्रयोगों में सम्बन्ध वैयाकरणों द्वारा सम्मत है; 'तुम किसका धर्म पसंद करते हो' - यहाँ केवल अर्थ मात्र में प्रथमा है। เอวมญฺญาปิ วิญฺเญยฺยา ปรโต’ปิ ยถาคมํ. इसी प्रकार अन्य भी आगम (शास्त्र) के अनुसार आगे जानने चाहिए। รญฺโญ สตํ ธาเรติ, รญฺโญ ฉตฺตํ ธาเรตีติ สมฺพนฺเธ ฉฏฺฐี; เอวํ รญฺโญ สิลาฆเต, รญฺโญ หนุเต, รญฺโญ อุป ติฏฺฐเต, รญฺโญ สปเต, เทวาปิ ตสฺส ปิหยนฺติ ตาทิโน, ตสฺส กุชฺฌ มหาวีร, ยทิตํ ตสฺส ปกุปฺเปยฺยํ, ทุภยติ ทิสานํ เมโฆ, โย มิตฺตานํ น ทูหตี,[ ] โย อปฺปทุฏฺฐสฺส นรสฺส ทุสฺสติ, กฺยาหํ อยฺยานํ อปรชฺฌามิ, อิสฺสยนฺติ สมณานํ ติตฺถิยา, ธมฺเมน นยมานานํ กา อุสูย, [ ] รญฺโญ ภาคฺยมา รชฺฌติ, รญฺโญ ภาคฺยมิกฺขเต, เตน ยาจิโต อยาจิโต วา ตสฺส คาโว ปฏิสุณาติ, คาโว อาสุณาติ, ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ, โหตุ ปติคิณาติ, โหตฺวนุคิณาติ, อาโรวยามิ โว, ปติเวทยามิ โว, ธมฺม เต เทสิสฺสามิ, ยถา โน สตฺถา วฺยากเรยฺย, อลํ เต อิธ วาเสน, กึ เต ชฏาหิ ทุมฺเมธ, อรหติ มลฺโล มลฺลสฺสาติ –ชีวิตํ ติณายปิ น มญฺญมโนติ ตาทตฺถฺเย จตุตฺถิ; ติเณน โย อตฺโถ ตทตฺถายปีติ อตฺโถ; 'राजा का सौ (मुद्रा) धारता है', 'राजा का छत्र धारता है' - यहाँ सम्बन्ध में षष्ठी है; इसी प्रकार 'राजा की श्लाघा करता है', 'राजा से छिपाता है', 'राजा की उपासना करता है', 'राजा को कोसता है', 'देवता भी उस (तादृश) की स्पृहा करते हैं', 'हे महावीर! उस पर क्रोध करें', 'यदि वह उस पर कुपित हो', 'मेघ दिशाओं का द्रोह करता है', 'जो मित्रों का द्रोह नहीं करता', 'जो निर्दोष मनुष्य से द्वेष करता है', 'मैं आर्यों का क्या अपराध करता हूँ', 'तीर्थिक श्रमणों से ईर्ष्या करते हैं', 'धर्म से ले जाने वालों के प्रति क्या असूया', 'राजा के भाग्य में अनुरक्त होता है', 'राजा के भाग्य को देखता है', उसके द्वारा याचित या अयाचित होने पर 'उसकी गायों को स्वीकार करता है', 'गायों को सुनता है', 'भगवान् को उत्तर दिया', 'होता (यज्ञकर्ता) स्वीकार करता है', 'होता अनुग्रह करता है', 'तुम्हें सूचित करता हूँ', 'तुम्हें निवेदन करता हूँ', 'तुम्हें धर्म उपदेश दूँगा', 'जैसा हमारे शास्ता व्याख्या करेंगे', 'तुम्हें यहाँ रहने के लिए पर्याप्त है', 'हे दुर्बुद्धि! तुम्हें जटाओं से क्या', 'मल्ल मल्ल के योग्य है' - 'जीवन को तिनके के समान भी नहीं मानता' यहाँ तादर्थ्य में चतुर्थी है; 'तिनके से जो अर्थ है, उस अर्थ के लिए भी' यह अर्थ है। ‘‘โย จ สิตจ อุณฺหจ ติณา ภิยฺโย น นมญฺญติ‘‘ “और जो शीत और उष्ण को तिनके से अधिक नहीं मानता।” ติณมิว ชีวิตํ มญฺญมาโนติ-สวิสยาว วิภตฺติโย; สคฺคาย คจฺฉตีติ-ตาทตฺถฺเย จตุตฺถิ, โย หิ สคฺคํ คจฺฉติ ตทตฺถํ ตสฺส คมนนฺติ–-กมฺมววนิจฺฉายํ ตุ ทุติยาว - สคฺคํ คจฺฉติ; อายุํ โภโต โหตุ, จิรํ ชีวิตํ ภทฺทํ กลฺยาณํ อตฺถํ ปโยชนํ กุสลํ อนามยํ หิตํ ปถฺยํ สุขํ สาตํ โภโต โหตุ; สาธุ สมฺมุติ เมตสฺส, ปุตฺตสฺสาวิกเรยฺย คุยฺหมตฺถํ, ตสฺส เม สกฺโก ปาตุรโหสิ, ตสฺส ปหิเณยฺย, ภิกฺขูนํ ทูตํ ปาเหสิ, กปฺปติ สมณานํ อาโยโค, เอกสฺส ทฺวินฺนํ ติณฺณํ วา ปโหติ, อุปมํ เต กริสฺสามิ, อญฺชลึ เต ปคณฺหามิ, ตสฺส ผาสุ, โลกสฺสตฺโถ, นโม เต ปุริสาชญฺญ, โสตฺถิ ตสฺส, อลํ มลฺโล มลฺลสฺส, สมตฺโถ มลฺโล มิลฺลสฺส, ตสฺส หิตํ ตสฺส สุขํ, สฺวาคตํ เต มหาราชาติ-สพฺพตฺถ ฉฏฺฐี สมฺพนฺเธ. 'तिनके के समान जीवन को मानता हुआ' - ये अपने विषय की ही विभक्तियाँ हैं; 'स्वर्ग के लिए जाता है' - यहाँ तादर्थ्य में चतुर्थी है, क्योंकि जो स्वर्ग जाता है, उसका जाना उसी के लिए है - कर्म की विवक्षा में तो द्वितीया ही होती है - 'स्वर्ग को जाता है'; 'आपकी आयु हो', 'आपका चिर जीवन, भद्र, कल्याण, अर्थ, प्रयोजन, कुशल, अनामय, हित, पथ्य, सुख, सात (सुख) हो'; 'यह मेरी अच्छी सम्मति है', 'पुत्र के लिए गुप्त अर्थ प्रकट करे', 'वह शक्र मेरे सामने प्रकट हुआ', 'उसे भेजे', 'भिक्षुओं के पास दूत भेजा', 'श्रमणों के लिए उद्योग उचित है', 'एक, दो या तीन के लिए पर्याप्त है', 'तुम्हें उपमा दूँगा', 'तुम्हारे प्रति अंजलि जोड़ता हूँ', 'उसके लिए सुख', 'लोक का अर्थ (भला)', 'हे पुरुषश्रेष्ठ! तुम्हें नमस्कार', 'उसका कल्याण हो', 'मल्ल मल्ल के लिए पर्याप्त है', 'मल्ल मल्ल के समर्थ है', 'उसका हित, उसका सुख', 'हे महाराज! आपका स्वागत है' - इन सबमें सम्बन्ध में षष्ठी है। เอวํ วิธมญฺญมฺเปวํ วิญฺเญยยฺยํ ยถาคมํ. इस प्रकार के अन्य प्रयोगों को भी आगम के अनुसार इसी तरह जानना चाहिए। ปญฺจมฺยวธิสฺมา-. अवधि से पञ्चमी। ปทตฺถาวธิสฺมา ปญฺจมี วิภตฺติ โหติ; คามสฺมา อาคจฺฉติ เอวํ โจรสฺมา ภายติ, โจรสฺมา อุตฺตสติ, โจรสฺมา ตายติ โจรสฺมา รกฺขตีติ. पदार्थ की अवधि (सीमा) से पञ्चमी विभक्ति होती है; जैसे- 'गाँव से आता है', इसी प्रकार 'चोर से डरता है', 'चोर से त्रस्त होता है', 'चोर से बचाता है', 'चोर से रक्षा करता है'। สเวภายถ ทุกฺขสฺส, ปมาเท ภยทสฺสิวา ตสนฺติ ทณฺฑสฺสาติ,-ฉฏฺฐิสตฺตมิโย’ปิ โหนฺเตว สมฺพนฺธาธารววนิจฺฉายํ อชฺเฌนา ปราเชติ, ปฏิปกฺเข ปราเชตีติ-สวีสยาว วิภตฺติโย; สเจ เกวฏฺฏสฺส ปรชฺชิสฺสามีติ- ฉฏฺฐีปิ โหติ สมฺพนฺธววนิจฺฉายํ, ยเวหิ คาโว วาเรติ, ปาปา จิตฺตํ นิวารเย, กาเก รกฺขติ ตณฺฑุลาติ-สวิสเยว ปญฺจมี? จิตฺตํ รกฺเขถ เมธาวีติ-ทุติยาว ทิสฺสติ กมฺมตฺเถ; อุปชฺฌายา อนฺตรธายติ, อุปชฺฌายา อธีเต; กามโต ชายตี โสโกติ-สวิสเยว ปญฺจมี; ตตฺเถมิฉทฺธโย’ปิ โหนฺเตว สวิสเย; หิมจนฺตา ปภวติ คงฺคา, ปาณาติปาตา วิรมสฺสุ ขิปฺปํ, อญฺโญ เทวทตฺตา, ภินฺโน เทวทตฺตาติ-สมิสเยว ปญฺจมี; อญฺโญ เทวทตฺตา, ภินฺโน เทวทตฺตาติ-สวิสเยว ปญฺจมิ; เอวํ อารา โส [ ] อาสวกฺขยา, อิตโร เทวทตฺตา, อุทฺธํ ปาทตลา, อโธ เกสมตฺถกา, ปุพฺโพ คามา, ปุพฺเพว สมฺโพธา, ตโต ปรํ, ตโต อปเรน สมเยน, ตตุตฺตรินฺติ, สมฺพนฺธ วจนิจฺฉายํ ฉฏฺฐีปิ; ปุรโต คามสฺส, ทกฺขิณโต คามสฺส, อุปริ ปพฺพตสฺส, เหฏฺฐา ปาสาทสฺสาติ;ปาสาทมารุยฺห เปกฺขติ, ปาสาทา เปกฺขติ, อาสเน อุปวิสิตฺวา เปกฺขติ อาสนา เปกฺขตีติ-อวธิ วจนิจฺฉายํ ปญฺจมี; ปุจฺฉนขฺยาเนสุปิ; กุโต ภวํ, ปาฏลิปุตฺต สฺมาติ; ตถา เทสกาลมาเน’ปิ; ปาฏลิปุตฺตสฺมา ราชคหํ สตฺต โยชนานิ สตฺตสุ โยชเนสูติ วา; เอวมิโต ติณฺณํ มาสา นมจฺจเยนาติ; กิจฺฉา ลทฺธนฺตี-คุเณ ปญฺจมี; กจฺเฉน เม อธิ คตนฺติ เหตุมฺหิ กรเณ วา ตติยา; เอวํ โถกา มุตฺโต, โถ เกน มุตฺโตติ, โถกํ วลตีติ-กฺริยาวิเสสเน กมฺมนิ ทุติยา; ทูรนฺติกตฺถโยเค’ปิ สวิสเยว ปญฺจมีฉฏฺฐิโย สิยุํ; ทูรํคามสฺมา, อนฺติกํ คามสฺมา, ทูรํ คามสฺส, อนฺติกํ คามสฺสาติ-ทูรนฺติ กตฺเถ หี ตุ สพฺพาว สวิสเย สิยุํ พาธกาภาวา; ทูโร คาโม, อนฺติโก คาโมตฺเววมาทิ; เกจิ ปนาหุ อสตฺตวจเนเหเตหิ ปาฏิปทิกตฺเถ ทุติยาตติยาปญฺจมีสตฺตมิโย สตฺตวจเนหิ ตุ สพฺพาว สวิสเยติ; เต ปนญฺเญเหว ปฏิกฺขิตฺตา; ทูรํ มคฺโค, อนฺติกํ มคฺโคติ- กฺริยาวิเสสนํ ภุธาตุสฺส คมฺม มานตฺตา; สุทฺโธ โลภนีเยหิ ธมฺเมหิ, ปริมุตฺโต ทุกฺขสฺมา, วิวิจฺเจว กาเมหิ, คมฺภีรโต จ ปุถุลโต จ โยชนํ, อายาเมน โยชนํ, ตโตปฺปภุติ, ยโต สรามิ อตฺตานนฺตี-สวิสเยว วิภตฺติโย. सब दुःख से डरते हैं, प्रमाद में भय देखने वाले दण्ड से डरते हैं - यहाँ सम्बन्ध और आधार के निश्चय में षष्ठी और सप्तमी भी होती हैं। अध्ययन से हारता है, प्रतिपक्ष से हारता है - यहाँ विभक्तियाँ अपने विषय में ही हैं। यदि 'मछुआरे से हारूँगा' - यहाँ सम्बन्ध के निश्चय में षष्ठी भी होती है। जौ से गायों को रोकता है, पाप से चित्त को हटाए, कौवों से चावलों की रक्षा करता है - यहाँ पंचमी अपने विषय में ही है। बुद्धिमान चित्त की रक्षा करे - यहाँ कर्म अर्थ में द्वितीया ही देखी जाती है। उपाध्याय से छिपता है, उपाध्याय से पढ़ता है; काम से शोक उत्पन्न होता है - यहाँ पंचमी अपने विषय में ही है। वहाँ 'इमि' और 'छ' आदि प्रत्यय भी अपने विषय में होते हैं। हिमालय से गंगा निकलती है, प्राणातिपात से शीघ्र विरत हो, देवदत्त से अन्य, देवदत्त से भिन्न - यहाँ पंचमी अपने विषय में ही है। इसी प्रकार वह आस्रवक्षय से दूर है, देवदत्त से इतर, पैर के तलवों से ऊपर, केशों के मस्तक से नीचे, गाँव से पूर्व, सम्बोधि से पहले ही, उसके बाद, उसके बाद के समय में, उससे उत्तर - यहाँ सम्बन्ध की विवक्षा में षष्ठी भी होती है। गाँव के सामने, गाँव के दक्षिण में, पर्वत के ऊपर, प्रासाद के नीचे। प्रासाद पर चढ़कर देखता है - प्रासाद से देखता है, आसन पर बैठकर देखता है - आसन से देखता है - यहाँ अवधि की विवक्षा में पंचमी होती है। पूछने और आख्यान में भी; आप कहाँ से हैं? पाटलिपुत्र से। इसी प्रकार देश और काल के मान में भी; पाटलिपुत्र से राजगृह सात योजन है या सात योजनों में है। इसी प्रकार यहाँ से तीन महीने बीतने पर। कठिनाई से प्राप्त किया - यहाँ गुण में पंचमी है। कठिनाई से मुझे प्राप्त हुआ - यहाँ हेतु या करण में तृतीया है। इसी प्रकार थोड़े से मुक्त हुआ, थोड़े से मुक्त हुआ, थोड़ा मुड़ता है - यहाँ क्रियाविशेषण कर्म में द्वितीया है। दूर और निकट अर्थ के योग में भी पंचमी और षष्ठी अपने विषय में ही हों। गाँव से दूर, गाँव से निकट, गाँव का दूर, गाँव का निकट - दूर और निकट अर्थों में तो बाधक के अभाव के कारण सभी अपने विषय में हों। दूर गाँव, निकट गाँव इत्यादि। कुछ लोग कहते हैं कि अद्रव्यवाचक इन शब्दों के साथ प्रातिपदिक अर्थ में द्वितीया, तृतीया, पंचमी और सप्तमी होती हैं, किन्तु द्रव्यवाचक होने पर सभी अपने विषय में होती हैं। वे दूसरों के द्वारा प्रतिषेध किए गए हैं। दूर मार्ग, निकट मार्ग - यहाँ 'भू' धातु के गम्यमान होने से क्रियाविशेषण है। लोभनीय धर्मों से शुद्ध, दुःख से मुक्त, कामभोगों से विविक्त होकर ही, गहराई और चौड़ाई से एक योजन, लम्बाई से एक योजन, तब से लेकर, जब से मैं अपने आप को याद करता हूँ - ये विभक्तियाँ अपने विषय में ही हैं। อปปรีหิ วชฺชเน-. वर्जन (त्याग) अर्थ में 'अप' और 'परि' के साथ (पंचमी होती है)। วชฺชเน วตฺตมาเนหิ อปปรีหิ โยเค ปญฺจมี โหติ; อปสาลาย อายนฺติ วาณิชา, ปริสาลาย อายนฺติ วาณิชา, สาลํ วชฺเชตฺวาติ อตฺโถ; วชฺชเนติ กึ? รุกฺขํ ปริวิชฺโชตเต วิชฺชุ, อาปาฏลิปุตฺตสฺมา วสฺสิ เทโวติ-มริยาทาภิวิธิมฺหิเยว ปญฺจม, วินา ปาฏลปุตฺเตน สห เวติ-วิเสโส; เอวํ ยาว ปาฏลิปุตฺตสฺม วสฺสิ เทโวติ. वर्जन अर्थ में वर्तमान 'अप' और 'परि' के योग में पंचमी विभक्ति होती है; जैसे - 'अपसालाय आयन्ति वाणिजा' (शाला को छोड़कर व्यापारी आते हैं), 'परिसालाय आयन्ति वाणिजा' (शाला को छोड़कर व्यापारी आते हैं), यहाँ 'शाला को छोड़कर' यह अर्थ है। 'वर्जन में' ऐसा क्यों कहा? 'रुक्खं परिविज्जोतते विज्जु' (बिजली वृक्ष के चारों ओर चमकती है)। 'आपाटलिपुत्तस्मा वस्सि देवो' (पाटलिपुत्र तक देव बरसा) - यहाँ मर्यादा और अभिविधि में ही पंचमी है। 'विना पाटलिपुत्तेन सह वेति' - यह विशेष है। इसी प्रकार 'याव पाटलिपुत्तस्मा वस्सि देवो' (पाटलिपुत्र तक देव बरसा) तक। ปฏินิธิปฏิทาเนสุ ปตินา-. प्रतिनिधि और प्रतिदान अर्थों में 'पति' के साथ (पंचमी होती है)। ปฏินิธิมฺหิ ปฏิทาเน จ วตฺตมาเนน ปตินา โยเค นามสฺมา ปญฺจมี วิภตฺติ โหติ; พุทฺธสฺมา ปติ สาริปุตฺโต, ฆตมสฺส เตลสฺมา ปติ ททาติ, ปฏินิธิปฏิทาเนสูติ-กึ? รุกฺขํ ปติ วิปฺโปตเต. प्रतिनिधि और प्रतिदान अर्थ में वर्तमान 'पति' के योग में नाम से पंचमी विभक्ति होती है; जैसे - 'बुद्धस्मा पति सारिपुत्तो' (बुद्ध के प्रतिनिधि सारिपुत्र हैं), 'घतमस्स तेलस्मा पति ददाति' (वह उसे तेल के बदले घी देता है)। 'प्रतिनिधि और प्रतिदान में' ऐसा क्यों कहा? 'रुक्खं पति विप्पोटते' (वृक्ष की ओर चमकता है)। ริเต ทุติยา จ- 'ऋते' (बिना) के योग में द्वितीया भी (और पंचमी) होती है। ริเต สทฺเทน โยเค นามสฺมา ทุติยา โหติ ปญฺจมี จ ริเต สทฺธมฺมํ, ริเต สทฺธมฺมา. 'ऋते' शब्द के योग में नाम से द्वितीया और पंचमी विभक्ति होती है; जैसे - 'ऋते सद्धम्मं' (सद्धर्म के बिना), 'ऋते सद्धम्मा' (सद्धर्म के बिना)। วินาญฺญตฺร ตติยา จ-. 'विना' और 'अन्यत्र' के योग में तृतीया भी (द्वितीया और पंचमी भी) होती है। วินาญฺญตฺรสทฺเทหิ โยเค นามสฺมา ตติยา จ โหติ, ทุติยาปญฺจมิโย จ; วินา วาเตน, วินา วาตํ, วินา วาตสฺมา, อญฺญตฺร เอเกน ปิณฺฑปาตนีหารเกน, อญฺญตฺร ธมฺมํ, อญฺญตฺร ธมฺมา. 'विना' और 'अन्यत्र' शब्दों के योग में नाम से तृतीया, द्वितीया और पंचमी विभक्तियाँ होती हैं; जैसे - 'विना वातेन', 'विना वातं', 'विना वातस्मा' (वायु के बिना); 'अञ्ञत्र एकेन पिण्डपातानीहारकेन' (एक पिण्डपात ले जाने वाले के अतिरिक्त), 'अञ्ञत्र धम्मं', 'अञ्ञत्र धम्मा' (धम्म के अतिरिक्त)। ปุถนานาหิ-. 'पृथक्' और 'नाना' के साथ (तृतीया और पंचमी होती है)। เอเตหิ โยเค ตติยา โหติ ปญฺจมี จ; ปุถเคว ชเนน, ปุถเคว ชนสฺมา, ชเนน นานา, ชสนฺมา นานา. इनके योग में तृतीया और पंचमी विभक्ति होती है; जैसे - 'पुथगेव जनेन', 'पुथगेव जनस्मा' (जन से पृथक् ही); 'जनेन नाना', 'जनस्मा नाना' (जन से अलग)। สตฺตมฺยาธาเร-. आधार अर्थ में सप्तमी होती है। กฺริยาธารภุตกตฺตุกมฺมานํ ธารเณน โย กฺริยายาธาโร ตสฺมึ การเก นามสฺมา สตฺตมิ โหติ; กเฏ นิสีทติ, ถาลิยํ โอทนํ ปจติ, อากาเส สกุณา, ติเลสุ เตลํ, คงฺคายํ วโช. क्रिया के आधारभूत कर्ता और कर्म के धारण करने से जो क्रिया का आधार होता है, उस कारक में नाम से सप्तमी विभक्ति होती है; जैसे - 'कटे निसीदति' (चटाई पर बैठता है), 'थालियं ओदनं पचति' (बटलोई में भात पकाता है), 'आकासे सकुणा' (आकाश में पक्षी), 'तिलेसु तेलं' (तिलों में तेल), 'गङ्गायं वजो' (गंगा में गोष्ठ)। นิมิตฺเต-. निमित्त (प्रयोजन/कारण) अर्थ में (सप्तमी होती है)। นิมิตฺตตฺเถ สตฺตมี โหติ; อชินมฺหิ หญฺญเต ทีปิ, มุสา วาเท ปาจิตฺติยํ. निमित्त अर्थ में सप्तमी विभक्ति होती है; जैसे - 'अजिनम्हि हञ्ञते दीपि' (चर्म के लिए चीता मारा जाता है), 'मुसावादे पाचित्तियं' (झूठ बोलने पर पाचित्तिय होता है)। ยพฺภาโว ภาวลกฺขณํ-. जिसकी क्रिया से दूसरी क्रिया लक्षित हो (वहाँ सप्तमी होती है)। ยสฺส ภาโว ภาวนฺตรสฺส ลกฺขณํ ภวติ ตโต สตฺตมี โหติ; คาวีสุ ทุยฺหมานาสุ คโต, ทุทฺธาสุ อาคโต; ภาโวติ กึ? โย ชฏาหิ ส ภุญฺชติ; ภาวลกฺขณนฺติ กึ;โย ภุชเต โส เทวทตฺโต? อกาเล วสฺสติ ตสฺส, กาเล ตสฺส น วสฺสตีติ-วิสยสตฺตมี. जिसकी क्रिया दूसरी क्रिया का लक्षण होती है, उससे सप्तमी विभक्ति होती है; जैसे - 'गावीसु दुय्हमानासु गतो' (गायों के दुहे जाते समय वह गया), 'दुद्धासु आगतो' (दुह लेने पर आया)। 'भाव' (क्रिया) ऐसा क्यों कहा? 'यो जटाहि स भुञ्जति' (जो जटाओं से युक्त है वह भोजन करता है)। 'भावलक्षण' ऐसा क्यों कहा? 'यो भुजते सो देवदत्तो' (जो खाता है वह देवदत्त है)। 'अकाले वस्सति तस्स, काले तस्स न वस्सति' (उसके लिए असमय में वर्षा होती है, समय पर उसके लिए वर्षा नहीं होती) - यह विषय सप्तमी है। ฉฏฺฐี จานาทเร-. अनादर अर्थ में षष्ठी भी (और सप्तमी) होती है। ยสฺส ภาโว ภาวนฺตรสฺส ลกฺขณํ ภวติ ตโต ฉฏฺฐี ภวติ สตฺตมี จานาทเร คมฺยาเน. जिसकी क्रिया दूसरी क्रिया का लक्षण होती है, उससे अनादर प्रकट होने पर षष्ठी और सप्तमी विभक्ति होती है। ‘‘อาโกฏยนฺโต โส เนติ สิวิราชสฺส เปกฺขโต; มจฺจุ คจฺฉติ อาทาย เปกฺขมาเน มหาชเน. वह सवि राजा के देखते हुए (उसे) पीटते हुए ले जाता है; मृत्यु महान् लोगों के देखते हुए (उन्हें) लेकर चली जाती है। คุนฺนํ สามีติ-สมฺพนฺเธ ฉฏฺฐี, เคํสุ สามีติ วิสยสตฺตมี, เอวํ คุนฺนมิสฺสโร โคสิสฺสโร, คุนฺนํ อธิปติ โคสุ อธิปติ, คุนฺนํ ทายาโท โคสุ ทายาโท คุนฺนํ สกฺขิ โคสุ สกฺขิ, คุนฺนํ ปติภุ โคสุปติภุ, คุนฺนํ ปสูโต โคสุ ปสูโต, กุสลา นจฺจคีตสฺส กุสลา นจฺจคีเต, อายุตฺโต กฏกรณสฺส อายุตฺโต กฏกรเณ, ตถาธารวจนิจฺฉายํ ปตฺตมี; ภิกฺขุสุ อภิวาเทนฺติ, มุทฺธนิ จุมฺพิตฺวา, พาหาสุ คเหตฺวา, หตฺเถสุ ปิทฺธาย จรนฺติ, ปเถสุ คจฺฉนฺติ, กทลีสุ คเช รกฺขนฺตีติ; ญาณสฺมึ ปสนฺโนติวิสยสตฺตมี; ญาเณน ปสนฺโนติ-กรเณ ตติยา; เอวํ ญาณสฺมึ อุสฺสุกฺโก ญาเณน อุสฺสุกฺโกติ. 'Gunnaṃ sāmī' (गायों का स्वामी) में सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति है, 'gosu sāmī' (गायों में स्वामी) में विषय सप्तमी है। इसी प्रकार 'gunnamissaro' (गायों का ईश्वर) 'gosissaro' (गायों में ईश्वर), 'gunnaṃ adhipati' (गायों का अधिपति) 'gosu adhipati' (गायों में अधिपति), 'gunnaṃ dāyādo' (गायों का उत्तराधिकारी) 'gosu dāyādo' (गायों में उत्तराधिकारी), 'gunnaṃ sakkhi' (गायों का साक्षी) 'gosu sakkhi' (गायों में साक्षी), 'gunnaṃ patibhu' (गायों का प्रतिभू/ज़मानतदार) 'gosupatibhu' (गायों में प्रतिभू), 'gunnaṃ pasūto' (गायों से उत्पन्न) 'gosu pasūto' (गायों में उत्पन्न), 'kusalā naccagītassa' (नृत्य-गीत में कुशल) 'kusalā naccagīte' (नृत्य-गीत में कुशल), 'āyutto kaṭakaraṇassa' (चटाई बनाने में लगा हुआ) 'āyutto kaṭakaraṇe' (चटाई बनाने में लगा हुआ)। इसी प्रकार आधार की विवक्षा में सप्तमी होती है; 'bhikkhusu abhivādenti' (भिक्षुओं में अभिवादन करते हैं), 'muddhani cumbitvā' (मस्तक पर चूमकर), 'bāhāsu gahetvā' (बाँहों में पकड़कर), 'hatthesu piddhāya caranti' (हाथों को ढँककर चलते हैं), 'pathesu gacchanti' (मार्गों पर चलते हैं), 'kadalīsu gaje rakkhanti' (केलों के वन में हाथियों की रक्षा करते हैं); 'ñāṇasmiṃ pasanno' (ज्ञान में प्रसन्न) में विषय सप्तमी है; 'ñāṇena pasanno' (ज्ञान से प्रसन्न) में करण में तृतीया है; इसी प्रकार 'ñāṇasmiṃ ussukko' (ज्ञान में उत्सुक) और 'ñāṇena ussukko' (ज्ञान से उत्सुक) है। ยโต นิทฺธารณํ-. जिससे निर्धारण (अलग करना) हो। ชาติคุณกฺริยาหิ สมุทายเตกเทสสฺส ปุถกฺกรณํ นิทฺธารณํ ยโต ตํ กรียติ ตโต ฉฏฺฐีสตฺตมิโย โหนฺติ; สาลิโย สูกธญฺญานํ ปถฺยตมา สาลิโย สูกธญฺเญสุ ปถฺย ตมา,กณฺภา คาวีนํ สมฺปนฺนขีรตมา กณฺหา คาวีสุ สมฺปนฺน ขีรตมา, คจฺฉตํ ธาวนฺโต สีฆตมา คจฺฉนฺเตสุ ธาวนฺโต สีฆตมา –- สีลเมว สุตา เสยฺโยติ-อวธิมฺหิเยว ปญฺจมี. जाति, गुण और क्रिया के द्वारा समुदाय से एक देश (अंश) को पृथक करना 'निर्धारण' कहलाता है। जिससे वह (निर्धारण) किया जाता है, उसमें षष्ठी और सप्तमी विभक्तियाँ होती हैं; जैसे- 'sāliyo sūkadhaññānaṃ pathyatamā' (शालि धान शूकधान्यों में सबसे अधिक पथ्य है) या 'sāliyo sūkadhaññesu pathyatamā', 'kaṇhā gāvīnaṃ sampannakhīratamā' (काली गाय गायों में सबसे अधिक दूध देने वाली है) या 'kaṇhā gāvīsu sampannakhīratamā', 'gacchataṃ dhāvanto sīghatamā' (जाने वालों में दौड़ने वाला सबसे तेज़ है) या 'gacchantesu dhāvanto sīghatamā'। 'sīlameva sutā seyyo' (शील ही श्रुत से श्रेष्ठ है) - यहाँ अवधि (सीमा) में ही पञ्चमी हुई है। ปฐมาตฺถมนฺเต -. प्रथमा विभक्ति केवल अर्थ मात्र में होती है। นามสฺมาภิเธยฺยมตฺเต ปฐมาวิภตฺติ โหติ; รุกฺโข, อิตฺถิ, ปุมา นปุํสกนฺติ-ลิงฺคมฺปิ สทฺโทตฺโถว, ตถา โทโณ, ขารี อาฬหกนฺติ-ปริมาณมฺปิ สทฺทตฺโถว, เอโก, ทฺเว, พหโวติ-สํขฺยฺยาปิ สทฺทตฺโถว. नाम के अभिधेय (अर्थ) मात्र में प्रथमा विभक्ति होती है; जैसे- rukkho (वृक्ष), itthi (स्त्री), pumā (पुरुष), napuṃsaka (नपुंसक) - यहाँ लिंग भी शब्द का अर्थ ही है। उसी प्रकार 'doṇo', 'khārī', 'āḷahakaṃ' - यहाँ परिमाण (माप) भी शब्द का अर्थ ही है। 'eko' (एक), 'dve' (दो), 'bahavo' (बहुत) - यहाँ संख्या भी शब्द का अर्थ ही है। อามนฺตเณ -. आमन्त्रण (सम्बोधन) में। ยโต สทฺเทนาภิมุขีกรณมามนฺตณํ ตสฺมึ วิสเย ปฐมา วิภตฺติ โหติ; โภ ปุริส, โภ อิตฺถิ, โภ นปุํสก. ฉฏฺฐี สมฺพนฺเธ-. जिस शब्द के द्वारा अभिमुखीकरण (अपनी ओर उन्मुख करना) किया जाए, वह आमन्त्रण है, उस विषय में प्रथमा विभक्ति होती है; जैसे- हे पुरुष (bho purisa), हे स्त्री (bho itthi), हे नपुंसक (bho napuṃsaka)। सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति होती है। กฺริยาการกสญฺชาโต อสฺเสทมฺภาวเหตุโก สมฺพนฺโธ นาม ตสฺมึ ฉฏฺฐีวิภตฺติ โหติ; รญฺโญ ปุริโส, สรติ รชฺชสฺสาติ- สมฺพนฺเธ กฺฏฺฐี, รชชฺชสมฺพนฺธินึ สตึ กโรตีติ อตฺโถ; กมฺมวจนิจฺฉายนฺตุ ทุติยาว; สรติ รชฺชํ, ตถา รชกสฺส วตฺถํ ททาติ, ปหรโตปิฏฺฐึ ททาติ ปูรติ พาโล ปาปสฺส, क्रिया और कारक से उत्पन्न 'यह इसका है' इस भाव के हेतुभूत सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति होती है; जैसे- 'rañño puriso' (राजा का पुरुष)। 'sarati rajjassa' (राज्य को याद करता है) - यहाँ सम्बन्ध में षष्ठी है, 'राज्य सम्बन्धी स्मृति करता है' यह अर्थ है; किन्तु कर्म की विवक्षा होने पर द्वितीया ही होती है; जैसे- 'sarati rajjaṃ' (राज्य को याद करता है)। उसी प्रकार 'rajakassa vatthaṃ dadāti' (धोबी को वस्त्र देता है), 'paharatopiṭṭhiṃ dadāti' (प्रहार करते हुए की पीठ देता है), 'pūrati bālo pāpassa' (मूर्ख पाप से भर जाता है)। ‘‘อมจฺเจ ตาต ชานาหิ ธีเร อตฺถสฺส โกวิเท’’ "हे तात! उन अमात्यों को जानो जो धीर और अर्थ (प्रयोजन) के कोविद (विद्वान) हैं।" ทิวสสฺส ติฌตฺตุํ, สกึ ปกฺขสฺส, ปูรํ หิรญฺญสุวณฺณสฺส กุมฺภึ ตฺเววมาทิ. 'divasassa tijhattuṃ' (दिन में तीन बार), 'sakiṃ pakkhassa' (पक्ष में एक बार), 'pūraṃ hiraññasuvaṇṇassa kumbhiṃ' (सोने-चाँदी से भरा हुआ घड़ा) इत्यादि। กิตกปฺปโยเค กตฺตุกมฺเมสุ พหุลํ สมฺพนฺธวจนิจฺฉายํ ฉฏฺฐี; สาธุ สมฺมโต พหุชนสฺส, สุปฺปฏิวิทฺธา พุทฺธานํ ธมฺมธาตุ, ธมฺมสฺส คุตฺโต เมธาวี, อมตํ เตสํ ปริภุตฺตํ, ตสฺสภวนฺติ วตฺตาโร, อวิสํวาทโก โลกสฺส, อลชฺชีนํ นิสฺสาย, จตุนฺนํ มหาภูตานํอุปาทาย ปสาโทตฺเววมาทิ; กตฺตุกมฺม วจนิจฺฉายนฺตุ ตติยาทุติยาโยว สญฺจตฺโต ปิตรา อหํ, สรสิ ตฺวํ เอวรูปึ วาจา ภาสิตา, ภควนฺตํ ทสฺสนายตฺเถมาทิ. कृदन्त के प्रयोग में कर्ता और कर्म में बहुधा सम्बन्ध कहने की इच्छा होने पर षष्ठी विभक्ति होती है; जैसे- 'sādhu sammato bahujanassa' (बहुत लोगों द्वारा साधु माना गया), 'suppaṭividdhā buddhānaṃ dhammadhātu' (बुद्धों द्वारा धर्मधातु भली-भाँति जानी गई है), 'dhammassa gutto medhāvī' (धर्म द्वारा रक्षित बुद्धिमान), 'amataṃ tesaṃ paribhuttaṃ' (उनके द्वारा अमृत का उपभोग किया गया), 'tassa bhavanti vattāro' (उसके कहने वाले होते हैं), 'avisaṃvādako lokassa' (लोक को धोखा न देने वाला), 'alajjīnaṃ nissāya' (निर्लज्जों के आश्रय से), 'catunnaṃ mahābhūtānaṃ upādāya pasādo' (चार महाभूतों को उपादान कर प्रसाद) इत्यादि। किन्तु कर्ता और कर्म कहने की इच्छा होने पर तृतीया और द्वितीया ही होती हैं; जैसे- 'sañcatto pitarā ahaṃ' (पिता द्वारा मैं त्यागा गया), 'sarasi tvaṃ evarūpiṃ vācā bhāsitā' (तुम इस प्रकार की कही गई वाणी को याद करते हो), 'bhagavantaṃ dassanāya' (भगवान के दर्शन के लिए) इत्यादि। ตุลฺยตฺเถน วา ตติยา-. तुल्य (समान) अर्थ वाले शब्दों के योग में विकल्प से तृतीया होती है। ตุลฺยตฺเถน โยเค ฉฏฺฐี โหติ ตติยา วา; ตุลฺโย ปิตุ, ตุลฺโย ปิตรา; สทิโส ปิตุ, สทิโส ปิตรา –-อิห กถํ ตติยยา น โหติ; อชฺชุนสฺส ตุลา นตฺถิ, เกสวสฺสุปมา นเจติเนเต ลฺยตฺถา กึ จรหิ; ตุลฺยานโมปมฺมตฺถา. तुल्य अर्थ वाले शब्दों के योग में षष्ठी अथवा तृतीया विभक्ति होती है; जैसे- 'tulyo pitu' (पिता के तुल्य), 'tulyo pitarā' (पिता के समान); 'sadiso pitu' (पिता के सदृश), 'sadiso pitarā' (पिता के सदृश)। यहाँ तृतीया क्यों नहीं होती? 'ajjunassa tulā natthi' (अर्जुन की कोई तुलना नहीं है), 'kesavassupamā nacetinete lyatthā kiṃ carahi; tulyānamopammatthā' (केशव की कोई उपमा नहीं है) - ये तुल्य अर्थ वाले नहीं हैं, तो फिर क्या हैं? ये तुलना और उपमा के अर्थ में हैं। ออโต โยนํ ฏาเฏ-. अकारान्त से परे 'यो' विभक्तियों के स्थान पर 'आ' और 'ए' आदेश होते हैं। อการนฺตโต นามสฺมา โยนํ ฏาเฏ โหนฺติ ยถากฺกมํ ฏการา สพฺพาเทสตฺถา; พุทฺธา, พุทฺเธ, อโตติ-กึ? กญฺญาโย อิตฺถิโย, วธุโย –- อิธ กสฺมา น ภวติ อคฺคโย, อวิธาน สามตฺถิยา. अकारान्त नाम (प्रातिपदिक) से परे 'यो' (प्रथमा और द्वितीया बहुवचन) विभक्तियों के स्थान पर यथाक्रम 'आ' और 'ए' आदेश होते हैं; यहाँ 'ट' कार सर्वादेश के लिए है; जैसे- 'buddhā', 'buddhe'। 'ato' (अकारान्त से) क्यों कहा? 'kaññāyo', 'itthiyo', 'vadhuyo' - यहाँ क्यों नहीं होता? 'aggayo' - यहाँ विधान के सामर्थ्य के अभाव के कारण नहीं होता। นีนํ วา-. 'नि' विभक्तियों के स्थान पर विकल्प से 'आ' और 'ए' होते हैं। การนฺตโต นามสฺมา นีนํ ฏาเฏ วา โหนฺติ ยถากฺก มํ; รูปา, รูเป, รูปานิ; อโตตฺเถว-อฏฺฐีนิ. अकारान्त नाम से परे 'नि' (नपुंसक लिंग प्रथमा-द्वितीया बहुवचन) विभक्तियों के स्थान पर विकल्प से यथाक्रम 'आ' और 'ए' आदेश होते हैं; जैसे- 'rūpā', 'rūpe', 'rūpāni'। 'ato' (अकारान्त से) ही - 'aṭṭhīni' (हड्डियाँ)। สฺมาสฺมินฺนํ-. 'स्मा' और 'स्मिन्' विभक्तियों के स्थान पर। อการนฺตโต นามสฺมา สฺมาสฺมินฺนํ ฏาเฏ วา โหนฺติ ยถากฺกมํ; พุทฺธา, พุทฺธสฺมา, พุทฺเธ, พุทฺธสฺมึ; อโตตฺเวว-อคฺคีสฺมา อคฺคิสฺมึ. अकारान्त नाम से परे 'स्मा' (पञ्चमी एकवचन) और 'स्मिन्' (सप्तमी एकवचन) विभक्तियों के स्थान पर विकल्प से यथाक्रम 'आ' और 'ए' आदेश होते हैं; जैसे- 'buddhā', 'buddhasmā', 'buddhe', 'buddhasmiṃ'। 'ato' (अकारान्त से) ही - 'aggīsmā', 'aggismiṃ'। สสฺสาย จตุตฺถิยา-. चतुर्थी विभक्ति के 'स' के स्थान पर 'आय' होता है। อการนฺตโต ปรสฺส สสฺส จตุตฺถิยา อาโย โหติ วา; พุทฺธาย, พุทฺธสฺส, ภิยฺโย ตาทตฺถฺเยเยวายมาโย ทิสฺสเต กฺววิ เทวญฺญตฺถ; อโตตฺเวว-อิสิสฺส; จตุตฺถิยาติ-กึ? พุทฺธสฺส มุขํ –- อตฺตตฺถนฺติ อตฺถสทฺเทน สมาโส; สพฺพาทิโต’ปิ สฺมาสฺมึ สานํ ฏาฏฺญายา โหนฺเตว. นิรุตฺติการานุมตตฺตา พุทฺธ วจเน สนฺทสฺสนโต ว-ตตฺเรทมุทาหรณํ?- अकारान्त से परे चतुर्थी विभक्ति के 'स' प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'आय' आदेश होता है; जैसे- 'buddhāya', 'buddhassa'। प्रायः यह 'आय' आदेश 'तादर्थ्य' (उसके लिए) के अर्थ में ही देखा जाता है, कहीं-कहीं अन्यत्र भी। 'ato' (अकारान्त से) ही - 'isissa' (ऋषि का)। 'catutthiyā' (चतुर्थी का) क्यों कहा? 'buddhassa mukhaṃ' (बुद्ध का मुख) - यहाँ षष्ठी है। 'attatthanti' यहाँ 'अत्थ' शब्द के साथ समास है। 'सब्बादि' (सर्व आदि) गण से भी 'स्मा', 'स्मिन्' और 'स' के स्थान पर 'आ', 'ए' और 'आय' आदेश होते ही हैं। निरुक्तिकारों की अनुमति होने के कारण बुद्ध वचनों में भी ऐसा देखा जाता है - वहाँ यह उदाहरण है? ‘‘อสฺมา โลกา ปรมฺหา จ อุภยา ธํสเต นโร‘‘ตฺยาหํ มนฺเต ปรตฺถทฺโธ; ยาเยว โข ปนตฺถาย อาคจฺเฉยฺยาโถ; ตเมวตฺถํ สาธุกํ มนสิ กเรยฺยาโถติ. "इस लोक से और परलोक से, दोनों से मनुष्य भ्रष्ट हो जाता है" - ऐसा मैं मानता हूँ... "जिस प्रयोजन के लिए तुम आए हो, उसी अर्थ (प्रयोजन) को भली-भाँति मन में करो।" ฆปเตกสฺมึ สาทีนํ ยยา-. 'घ' और 'प' संज्ञक शब्दों से परे एकवचन में 'स' आदि के स्थान पर 'या' होता है। ฆปโต นาทีนเมกสฺมึ ยยา โหนฺติ ยถากฺกมํ; กญฺญาย, รตฺติยา, อิตฺถิยา, เธนุยา, วธุยา; เอกสฺมินฺติกึ?กญฺญาหิ, รตฺตีหิ. 'घ' और 'प' संज्ञक शब्दों से परे 'ना' आदि विभक्तियों के स्थान पर एकवचन में यथाक्रम 'या' आदेश होते हैं; जैसे- 'kaññāya', 'rattiyā', 'itthiyā', 'dhenuyā', 'vadhuyā'। 'ekasmiṃ' (एकवचन में) क्यों कहा? 'kaññāhi', 'rattīhi' (यहाँ बहुवचन में नहीं होता)। สฺสา วา เตติมามูหิ-. 'त', 'एत', 'इम' और 'अमु' शब्दों से परे विकल्प से 'स्सा' होता है। ฆปสญฺเญหิ เตติมามูหิ นาทีนเมกสฺมึ สฺสา วา โหติ; ตสฺสา กตํ, ตสฺสา ทียเต, ตสฺสา นิสฺสฏํ, ตสฺสา ปริคฺคโห, ตสฺสา ปติฏฺฐิตํ, ตาย วา; เอวํ เอติสฺสา, เอตาย, อิมิสฺสา, อิมาย, อมุสฺสา, อมุยา; เอเตหีติ-กึ? สพฺพาย, นาทีนํตฺเวว-สา, ฆปโตตฺเววเตน, เอกสฺมึตฺเวจ-ตาหิ, อมูหิ. 'घ' और 'प' संज्ञक 'त' (तद्), 'एत' (एतद्), 'इम' (इदम्) और 'अमु' (अदस्) शब्दों से परे 'ना' आदि विभक्तियों के स्थान पर एकवचन में विकल्प से 'स्सा' आदेश होता है; जैसे- 'tassā kataṃ' (उसके द्वारा किया गया), 'tassā dīyate' (उसको दिया जाता है), 'tassā nissaṭaṃ' (उससे निकला हुआ), 'tassā pariggaho' (उसका परिग्रह), 'tassā patiṭṭhitaṃ' (उसमें प्रतिष्ठित), अथवा 'tāya'। इसी प्रकार 'etissā', 'etāya'; 'imissā', 'imāya'; 'amussā', 'amuyā'। 'etehi' (इनसे) क्यों कहा? 'sabbāya'। 'nādīnaṃ' ही - 'sā'। 'ghapato' ही - 'tena'। 'ekasmiṃ' ही - 'tāhi', 'amūhi'। นมฺหิ นุก ทฺวาทนํ สตฺตรสนฺนํ-. 'नम्' विभक्ति होने पर 'द्वि' आदि सत्रह संख्याओं को 'नुक' आगम होता है। ทฺวาทีนํ สตฺตรสนฺนํ สํขฺยานํ นุก โหติ นมฺหิ วิภตฺติมฺหิ; ทฺวินฺนํ, จตุนฺนํ, ปญฺจนฺนํ, เอวํ ยาว อฏฺฐารสนฺนํ; อุกาโร อุจฺจารณตฺโถ, กกาโร อนฺตาวยวตฺโถ, เตนนมฺหิ น ทีโฆ. 'द्वि' आदि सत्रह संख्याओं के बाद 'नम्' विभक्ति होने पर 'नुक' आगम होता है; जैसे- 'dvinnaṃ' (दो का/को), 'catunnaṃ' (चार का), 'pañcannaṃ' (पाँच का), इसी प्रकार 'aṭṭhārasannaṃ' (अठारह का) तक। यहाँ 'उ' कार उच्चारण के लिए है और 'क' कार अन्त्यावयव (अन्त में जुड़ने) के लिए है, इसलिए 'नम्' के होने पर दीर्घ नहीं होता। พหุกตินฺนํ-. 'बहु' और 'कति' शब्दों को भी। นมฺหิ พหุโน กติสฺส จ สุกก โหติ? พหุนฺนํ, กตินฺนํ. 'न' (नम्) विभक्ति के परे होने पर 'बहु' और 'कति' को क्या 'सुक' (स-आगम) होता है? (उत्तर:) बहुन्नं, कतिन्नं। ณฺณํณฺณนฺนํ ติโตชฺฌา-. 'ति' शब्द से परे (झ-संज्ञा होने पर) 'नम्' को 'ण्णं' और 'ण्णन्नं' होता है। ฌสญฺญา ติโต นํวจนสฺส ณฺณํณฺณนฺนํ โหนฺติ; ติณฺณํ, ติณฺณนฺนํ, ฌาติ-กึ?ติสฺสนฺนํ. झ-संज्ञक 'ति' शब्द से परे 'नम्' विभक्ति को 'ण्णं' और 'ण्णन्नं' आदेश होते हैं; जैसे- तिण्णं, तिण्णन्नं। 'झ' (संज्ञा) क्यों? (स्त्रीलिंग में) तिस्सन्नं। อุภินฺนํ-. उभिण्णं। อุภา นํวจนสฺส อินฺนํ โหติ; อุภินฺนํ. 'उभ' शब्द से परे 'नम्' विभक्ति को 'इन्नं' होता है; उभिण्णं। สุญฺสสฺส-. 'स' (विभक्ति) को 'सुञ' (आदेश)। นามสฺมา สสฺส สุญ โหติ; พุทฺธสฺส–-ทฺวิสการปาเฐน สิทฺเธ ลาฆวตฺถมิทํ. नाम (प्रातिपदिक) से परे 'स' विभक्ति को 'सुञ' (स्स) होता है; बुद्धस्स। दो 'स' के पाठ से सिद्ध होने पर भी लाघव के लिए यह सूत्र है। สฺสํสฺสาสฺสาเยสฺวิตเรกญฺเญติมานมิ-. 'स्सं', 'स्सा', 'स्साय' और 'ए' (विभक्तियों) के परे होने पर 'इतर', 'एक', 'अञ्ञ', 'एत' और 'इम' के अन्त्य स्वर को 'इ' होता है। สฺสมาทิสฺวิตราทีนมิ โหติ; อิตริสฺสํ, อิตริสฺสา, เอกิสฺสํ, เอกิสฺสา, อญฺญสฺสํ, อญฺญสฺสา, เอติสฺสํ, เอติสฺสาย, อิมิสฺสํ, อิมิสฺสา, อิมสฺสาย; เอสฺวิติ-กึ? อิตราย, เอสนฺติ-กึ? สพฺพสฺสํ, สพฺพสฺสา. 'स्सं' आदि के परे होने पर 'इतर' आदि के अन्त्य स्वर को 'इ' होता है; इतरिस्सं, इतरिस्सा, एकिस्सं, एकिस्सा, अञ्ञस्सं, अञ्ञस्सा, एतिस्सं, एतिस्साय, इमिस्सं, इमिस्सा, इमस्साय। 'एषु' (स्सं आदि) क्यों? इतरय। 'एत' आदि क्यों? सब्बस्सं, सब्बस्सा। ตาย วา -. 'ता' शब्द के अन्त्य स्वर को विकल्प से 'इ' होता है। สฺสมาทิสุ ตสฺสา วา อิ โหติ; ติสฺสํ, ตสฺสํ, ติสฺสา, ตสฺสา, ติสฺสาย, ตสฺสาย; สฺสํสฺสาสฺสาเยสฺวิตฺเวว-ตาย. 'स्सं' आदि के परे होने पर 'ता' (तद् स्त्रीलिंग) को विकल्प से 'इ' होता है; तिस्सं, तस्सं, तिस्सा, तस्सा, तिस्साय, तस्साय। 'स्सं स्सा स्साय' की अनुवृत्ति में ही 'ता' का ग्रहण है। เตติมาโต ยสฺส สฺสาย-. 'त', 'एत' और 'इम' शब्दों से परे 'स' विभक्ति को 'स्साय' होता है। ตาเอตาอิมาโต สสฺสสฺสาโย โหติ วา; ตสฺสาย, ตาย, เอติสฺสาย, เอตาย, อิมิสฺสาย, อิมาย. 'ता', 'एता' और 'इमा' शब्दों से परे 'स' विभक्ति को विकल्प से 'स्साय' होता है; तस्साय, ताय, एतिस्साय, एताय, इमिस्साय, इमाय। รตฺยาทีหิ โฏ สฺมิโน-. 'रति' आदि शब्दों से परे 'स्मिं' को 'टो' (ओ) होता है। รตฺยาทีหิ สฺมิโน โฏ โหติ วา; รตฺโต, รตฺติยํ, อาโท, อาทิสฺมึ. 'रति' आदि शब्दों से परे 'स्मिं' को विकल्प से 'टो' होता है; रत्तो, रत्तियं, आदो, आदिस्मिं। สุหิสุภสฺโส-. 'सु' और 'हि' के परे होने पर 'उभ' को 'ओ' होता है। อุภสฺส สุหิสฺโว โหติ; อุโภสุ, อุโภหิ. 'उभ' शब्द को 'सु' और 'हि' के परे होने पर 'ओ' होता है; उभोसु, उभोहि। ลฺตุปิตาทีนมา สิมฺหิ-. 'लतु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को 'सि' के परे होने पर 'आ' होता है। ลตุปฺปจฺจยนฺตานํ ปิตาทีนญฺจา โหติ สิมฺหิ; กตฺตา ปิตา; ปิตุ มาตุ ภาตุ ธีตุ ทุหิตุ ชามาตุ นตฺตุ โหตุ โปตุ. 'लतु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को 'सि' विभक्ति के परे होने पर 'आ' होता है; कत्ता, पिता। पितु, मातु, भातु, धीतु, दुहितु, जामातु, नत्तु, होतु, पोतु। เค อ จ-. 'ग' (सम्बोधन) के परे होने पर 'अ' और 'आ' भी होते हैं। ลตุปิตาทีนํ อ โหติ เค อา จ; โภ กตฺต, โภ กตฺตา, โภ ปิต, โภ ปิตา. 'लतु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को 'ग' (सम्बोधन) के परे होने पर 'अ' और 'आ' होते हैं; भो कत्त, भो कत्ता, भो पित, भो पिता। อยูนํ วา ทีโฆ-. 'अ', 'इ', 'उ' को विकल्प से दीर्घ होता है। อ อิ อุ อิจฺเจสํ วา ทีโฆ โหติ เค ปเร ติลิงฺเค; โภ ปุริสา, โภ ปุริส, โภ อคฺคี, โภ อคฺคิ, โภ ภิกฺขู, โภ ภิกฺขู. तीनों लिंगों में 'ग' (सम्बोधन) के परे होने पर 'अ', 'इ', 'उ' को विकल्प से दीर्घ होता है; भो पुरिसा, भो पुरिस, भो अग्गी, भो अग्गि, भो भिक्खू, भो भिक्खु। ฆพฺรหฺมาทิเต-. 'घ' संज्ञक और 'ब्रह्म' आदि शब्दों से परे 'ग' को 'ए' होता है। ฆโต พฺรหฺมาทิโต จ คสฺเส วา โหติ; โหติ กญฺเญ, โหติ กญฺญา, โภ พฺรหฺเม, โภ พฺรหฺม, โภ กตฺเต, โภ กตฺต,โภ อิเส, โภ อิสิ, โภ สเข, โภ สข –- สขิ สขีติ-อิตฺถิยํ สิทฺธเมว; อากติคโณยํ; เอวมญฺญตฺราปิ. 'घ' संज्ञक और 'ब्रह्म' आदि शब्दों से परे 'ग' (सम्बोधन) को विकल्प से 'ए' होता है; होति कञ्ञे, होति कञ्ञा, भो ब्रह्म, भो ब्रह्म, भो कत्ते, भो कत्त, भो इसे, भो इसि, भो सखे, भो सखा। 'सखि' और 'सखी' स्त्रीलिंग में सिद्ध ही हैं। यह आकृतिगण है; अन्यत्र भी इसी प्रकार। นามฺมาทีหิ-. 'अम्मा' आदि शब्दों से परे 'ग' का लोप होता है। อมฺมาทีหิ คสฺเสน โหติ; โภติ อมฺมา; โภติ อนฺนา, โภติ อมฺพา. 'अम्मा' आदि शब्दों से परे 'ग' का लोप होता है; भोति अम्मा, भोति अन्ना, भोति अम्बा। รสฺโส วา-. विकल्प से ह्रस्व होता है। อมฺมาทีนํ เค รสฺโส โหติ วา; โภติ อมฺม, โภติ อมฺมา. 'अम्मा' आदि शब्दों को 'ग' के परे होने पर विकल्प से ह्रस्व होता है; भोति अम्म, भोति अम्मा। โฆ สฺสํสฺสาสฺสายํตึสุ-. 'घ' संज्ञक शब्दों को 'स्सं', 'स्सा', 'स्साय', 'अं', 'तिं' और 'सु' के परे होने पर (ह्रस्व होता है)। สฺสมาทิสุ โฆ รสฺโส โหติ; ตสฺสํ, ตสฺสา, ตสฺสาย, ตํ, สภตึ –-เอสฺวิติ-กึ? ตาย, สหาย. 'स' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'घो' (दीर्घ इ, ई, उ, ऊ) को ह्रस्व होता है; जैसे- तस्सं, तस्सा, तस्साय, तं, सब्भतिं। 'एस्सु' (इनमें) ऐसा क्यों कहा? ताया, सहाया (यहाँ ह्रस्व नहीं हुआ)। เอกวจนโยสฺวโฆนํ-. एकवचन और 'यो' विभक्तियों के परे होने पर 'अघो' (अकारान्त और ओकारान्त को छोड़कर) को... เอกวจเน โยสุว ฆโอการนฺตวชฺชิตานํ นามานํ รสฺโสโหติ ติลิงฺเค; อิตฺถึ, อิตฺถิยา, อิตฺถิโย, วธุํ, วธุยา, วธุโย; ททฺธึ, ททฺธินา, ททฺธิโน, สยมฺภุํ, สยมภุนา, สยมภุโว –- อโฆนนฺติ-กึ? กญฺญาย, กญฺญาโย; โอคฺคหณมุตฺตรตฺถํ. एकवचन और 'यो' विभक्तियों के परे होने पर 'घ' (इ, ई, उ, ऊ) और 'ओ' कारान्त को छोड़कर शेष नामों को तीनों लिंगों में ह्रस्व होता है; जैसे- इत्थिं, इत्थिया, इत्थियो; वधुं, वधुया, वधुयो; दद्धिं, दद्धिना, दद्धिनो; सयम्भुं, सयम्भुना, सयम्भुवो। 'अघोनं' ऐसा क्यों कहा? कञ्ञाय, कञ्ञायो (यहाँ ह्रस्व नहीं हुआ)। 'ओ' का ग्रहण उत्तर (बाद के सूत्रों) के लिए है। เค วา-. 'गे' (सम्बोधन एकवचन) के परे होने पर विकल्प से (ह्रस्व होता है)। อโฆนํ เค วา รสฺโส โหติ ติลิงฺเค?อิตฺถิ, อิตฺถิ, วธุ, วธุ,ททฺธิ, ททฺธี, สยมฺภุ, สยมฺภุ –- อโฆนํตฺเวว-โหติ กญฺญา, โภ โค. 'अघो' (अकारान्त और ओकारान्त वर्जित) को 'गे' (सम्बोधन) के परे होने पर तीनों लिंगों में विकल्प से ह्रस्व होता है। जैसे- इत्थि, इत्थी; वधु, वधू; दद्धि, दद्धी; सयम्भु, सयम्भू। 'अघोनं' कहने से ही यहाँ होता है- कञ्ञा, भो गो (यहाँ ह्रस्व नहीं हुआ)। สิสฺมึ นานปุํสกสฺส-. 'सि' विभक्ति के परे होने पर नपुंसक लिंग को छोड़कर (ह्रस्व नहीं होता)। นปุํสกวชฺชิตสฺส นามสฺส สิสฺมึ รสฺโส น โหติ. อิตฺถิ, ททฺธี, วธู, สยมฺภุ –-สิสฺมินฺติ-กึ?อิตฺถึ, อนปุํสกสฺสาติ-กึ. ททฺธิ, กุลํ. नपुंसक लिंग को छोड़कर अन्य नामों को 'सि' विभक्ति के परे होने पर ह्रस्व नहीं होता है। जैसे- इत्थी, दद्धी, वधू, सयम्भू। 'सिस्मिं' (सि में) ऐसा क्यों कहा? इत्थिं (यहाँ 'अं' है, 'सि' नहीं)। 'अनपुंसकस्स' (नपुंसक को छोड़कर) ऐसा क्यों कहा? दद्धि, कुलं (यहाँ नपुंसक होने के कारण ह्रस्व हुआ)। โคสฺสาคสิหินํสุ คาวควา-. 'गो' शब्द को 'आ', 'ग', 'सि', 'हि', 'नं' और 'सु' को छोड़कर अन्य विभक्तियों के परे होने पर 'गाव' और 'गव' आदेश होते हैं। คสิหินํ จชฺชิตาสุ วิภตฺติสุ โคสทฺทสฺส คาวควา โหนฺติ; คาโว, คโว, คาเวน, คเวน, คาวสฺส, ควสฺส, คาวสฺมา, ควสฺมา, คาเว, คเว; อคสิหินํสูติ-กึ? โภ โค โค ติฏฺฐติ, โคหิ, โคนํ. 'ग', 'सि', 'हि', 'नं' और 'सु' विभक्तियों को छोड़कर अन्य विभक्तियों के परे होने पर 'गो' शब्द के स्थान पर 'गाव' और 'गव' आदेश होते हैं; जैसे- गावो, गवो; गावेन, गवेन; गावस्स, गवस्स; गावस्मा, गवस्मा; गावे, गवे। 'अगसिहिनंसु' ऐसा क्यों कहा? भो गो, गो तिट्ठति, गोहि, गोनं (यहाँ आदेश नहीं हुए)। สุมฺหิ วา-. 'सु' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से (गाव और गव होते हैं)। โคสฺส สุมฺหิ คาวควา โหนฺติ วา; คาเวสุ, คเวสุ, โคสุ. 'गो' शब्द को 'सु' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से 'गाव' और 'गव' आदेश होते हैं; जैसे- गावेसु, गवेसु, गोसु। ควํ เสน-. 'स' विभक्ति के साथ 'गो' शब्द को विकल्प से 'गवं' आदेश होता है। โคสฺส เส วา ควํ โหติ สห เสน; ควํ, คาวสฺส, ควสฺส. 'गो' शब्द को 'स' विभक्ति के परे होने पर 'स' के साथ विकल्प से 'गवं' आदेश होता है; जैसे- गंव, गावस्स, गवस्स। คุนฺนว นํนา-. 'नं' विभक्ति के साथ 'गो' शब्द को 'गुन्नं' और 'गवं' आदेश होते हैं। นํวจเนน สห โคสฺส คุนฺนํ โหติ ควญฺจ วา; คุนฺนํ, ควํ, โคนํ. 'नं' विभक्ति के साथ 'गो' शब्द को विकल्प से 'गुन्नं' और 'गवं' आदेश होते हैं; जैसे- गुन्नं, गंव, गोनं। นาสฺสา-. 'गो' शब्द से परे 'ना' विभक्ति को विकल्प से 'आ' आदेश होता है। โคโต นาสฺส อา โหติ วา; คาวา, ควา, คาเวน, คเวน. 'गो' शब्द से परे 'ना' विभक्ति को विकल्प से 'आ' आदेश होता है; जैसे- गावा, गवा, गावेन, गवेन। คาวุมฺหิ-. 'अं' विभक्ति के परे होने पर 'गो' शब्द को 'गावु' आदेश होता है। อํวจเน โคสฺส คาวุ วา โหติ; คาวุํ, คาวํ, ควํ–-โคสฺส โคณาเทโส น กโต สทฺทนฺตรตฺตา. 'अं' विभक्ति के परे होने पर 'गो' शब्द को विकल्प से 'गावु' आदेश होता है; जैसे- गावुं, गावं, गंव। 'गो' शब्द को 'गोण' आदेश शब्दान्तर होने के कारण नहीं किया गया। ยํ ปิโต-. 'पी' संज्ञक (ई, ऊ) से परे 'अं' विभक्ति को विकल्प से 'यं' आदेश होता है। ปสญฺญีโต อํวจนสฺส ยํ วา โหติ; อิตฺถิยํ, อิตฺถึ–-ปิโตติ-กึ?ททฺธึ, รตฺตึ. 'पी' संज्ञक शब्दों से परे 'अं' विभक्ति को विकल्प से 'यं' आदेश होता है; जैसे- इत्थियं, इत्थिं। 'पीतो' ऐसा क्यों कहा? दद्धिं, रत्तिं (यहाँ 'इ' ह्रस्व है, 'पी' संज्ञक नहीं)। นํ ฌีโต-. 'झी' संज्ञक (इ, उ) से परे 'अं' विभक्ति को विकल्प से 'नं' आदेश होता है। ฌสญฺญีโต อํวจนสฺส นํ วา โหติ; ททฺธินํ, ททฺธึ–- กถํ? พุทฺธํ อาทิจฺจพนฺธุนนฺติ-โยควิภาคา; ฌาติ-กึ? อิตฺถึ, อีโตติ -กึ?อคฺคึ 'झ' संज्ञक शब्दों से परे 'अं' विभक्ति को विकल्प से 'नं' आदेश होता है; जैसे- दद्धिनं, दद्धिं। 'बुद्धं आदिच्चबन्धुं' (यहाँ 'नं' कैसे हुआ?) - योगविभाग से। 'झ' ऐसा क्यों कहा? इत्थिं (यहाँ 'ई' है)। 'ईतो' ऐसा क्यों कहा? अग्गिं। โยนํ โนเน ปุเม-. पुल्लिंग में 'झ' संज्ञक से परे 'यो' विभक्तियों को यथाक्रम से 'नो' और 'ने' आदेश विकल्प से होते हैं। ฌิโต โยนํ โนเน วา โหนฺติ ยถากฺกมํ ปุลฺลิงฺเค, ททฺธิโน, ททฺธิเน, ททฺธี–-ฌีโตตฺเวว อคฺคี; ปุเมติ-กึ?ททฺธีนิ, กุลานิ. पुल्लिंग में 'झ' संज्ञक से परे 'यो' विभक्तियों को विकल्प से यथाक्रम 'नो' और 'ने' आदेश होते हैं; जैसे- दद्धिनो, दद्धिने, दद्धी। 'झ' संज्ञक होने पर ही- अग्गी। 'पुमे' (पुल्लिंग में) ऐसा क्यों कहा? दद्धीनि, कुलानि (ये नपुंसक लिंग हैं)। โน-. पुल्लिंग में 'झ' संज्ञक से परे 'यो' विभक्तियों को विकल्प से 'नो' आदेश होता है। ฌิโต โยนํ โน วา โหติ ปุลฺลิงฺเค; ททฺธิโน ติฏฺฐนฺติ, ททฺธิโน ปสฺส, ททฺธี วา. पुल्लिंग में 'झ' संज्ञक से परे 'यो' विभक्तियों को विकल्प से 'नो' आदेश होता है; जैसे- दद्धिनो तिट्ठन्ति, दद्धिनो पस्स, या दद्धी। สฺมิโน นิ-. 'झ' संज्ञक से परे 'स्मिं' विभक्ति को विकल्प से 'नि' आदेश होता है। ฌิโต สฺมึวจนสฺส นิ โหติ วา; ททฺธินี, ททฺธิสฺมึ, ฌิโต ตฺเวว-อคฺคิสฺมึ. 'झ' संज्ञक से परे 'स्मिं' विभक्ति को विकल्प से 'नि' आदेश होता है; जैसे- दद्धिनी, दद्धिस्मिं। 'झ' संज्ञक होने पर ही- अग्गिस्मिं। อมฺพวาทีหิ-. 'अम्ब' आदि शब्दों से परे... อมฺพุอาทีหิ สฺมิโน นิ โหติ วา; ผลํ ปตติ อมฺพุนิ,’ปทุมํ ยถา ปํสุนิ อาตเป กตํ’, วาตฺเวว-อมฺพุมฺห, ปํสุมฺหิ. 'अम्बु' आदि शब्दों से परे 'स्मि' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'नि' होता है; जैसे- 'अम्बुनि' (जल में फल गिरता है), 'पंसुनि' (जैसे धूप में धूल में कमल रखा गया हो)। विकल्प के अभाव में- 'अम्बुम्हि', 'पंसुम्हि'। กมฺมาทิโต-. 'कम्म' आदि शब्दों से। กมฺมาทิโต สฺมิโน นิ โหติ วา; กมฺมนี, กมฺเม; กมฺม จมฺม เวสฺม ภสฺม พฺรหฺม อตฺต อาตุม ฆมฺม มุทฺธ–-กมฺมาทิโตติ-กึ? พุทฺเธ. 'कम्म' आदि शब्दों से परे 'स्मि' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'नि' होता है; जैसे- 'कम्मनि', 'कम्मे'। कम्म, चम्म, वेस्म, भस्म, ब्रह्म, अत्त, आतुम, घम्म, मुद्ध - ये 'कम्म' आदि शब्द हैं। 'कम्म' आदि से ही क्यों? 'बुद्धे' (यहाँ नहीं होता)। นาสฺเสโน-. 'ना' विभक्ति के स्थान पर 'एन' (विकल्प से)। กมฺมาทิโต นาววนสฺส เอโน วา โหติ; กมฺเมน, กมฺมนา, จมฺเมน, จมฺมนา–-กมฺมาทิโตตฺเวว-พุทฺเธน. 'कम्म' आदि शब्दों से परे 'ना' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'एन' होता है; जैसे- 'कम्मेन', 'कम्मना', 'चम्मेन', 'चम्मना'। 'कम्म' आदि से ही क्यों? 'बुद्धेन' (यहाँ 'ना' का 'एन' नित्य होता है)। ฌลา สสฺส โน-. 'झ' और 'ल' संज्ञक वर्णों से परे 'स' विभक्ति के स्थान पर 'नो' होता है। ฌลโต สสฺส โน วา โหติ; อคฺคิโน, อคฺคิสฺส, ททฺธิโน ททฺธิสฺส, ภิกฺขุโน, ภิกฺขุสฺส, สยมฺภุโน, สยมฺภุสฺส–-กถํ?’โย วา สิสฺโส มหามุเน’ติ. 'झ' और 'ल' संज्ञक वर्णों (इ, ई, उ, ऊ) से परे 'स' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'नो' होता है; जैसे- 'अग्गिनो', 'अग्गिस्स', 'दद्धिनो', 'दद्धिस्स', 'भिक्खुनो', 'भिक्खुस्स', 'सयम्भुनो', 'सयम्भुस्स'। तो फिर 'यो वा सिस्सो महामुने' कैसे हुआ? (यहाँ 'स' का 'नो' नहीं हुआ)। อิโต กฺววี สสฺส ฏานุพนฺเธติ -() 'इ' कारान्त से परे 'स' के स्थान पर 'ए' होता है, जहाँ 'ट' अनुबन्ध है। พฺรหฺมาทิสุ ปาฐา สสฺส เอ ฏานุพนฺโธ. 'ब्रह्म' आदि शब्दों के पाठ में 'स' विभक्ति के स्थान पर 'ए' होता है, जो 'ट' अनुबन्ध वाला है। นา สฺมาสฺส-. 'स्मा' विभक्ति के स्थान पर 'ना'। ฌลโต สฺมาสฺส นา โหติ วา; ออคฺคินา อคฺคิสฺมา ททฺธินา, ททฺธิสฺมา, ภิกฺขุนา, ภิกฺขุสฺมา, สยมฺภุนา, สยมฺภุสฺมา. 'झ' और 'ल' संज्ञक वर्णों से परे 'स्मा' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'ना' होता है; जैसे- 'अग्गिना', 'अग्गिस्मा', 'दद्धिना', 'दद्धिस्मा', 'भिक्खुना', 'भिक्खुस्मा', 'सयम्भुना', 'सयम्भुस्मा'। ลา โยนํ โว ปุเม-. पुल्लिंग में 'ल' संज्ञक वर्णों से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर 'वो' होता है। ลโต โยนํ โว โหติ วา ปลฺลิงฺเค; ภิกฺขโว, ภิกฺขู, สยมฺภุโว, สยมฺภุ–-ปุเมติ-กึ?อายูนิ. पुल्लिंग में 'ल' संज्ञक वर्णों (उ, ऊ) से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'वो' होता है; जैसे- 'भिक्खवो', 'भिक्खू', 'सयम्भुवो', 'सयम्भू'। पुल्लिंग में ही क्यों? 'आयूनि' (नपुंसक लिंग में नहीं)। ชนตฺวาทิโต โน จ-. 'जन्तु' आदि शब्दों से परे 'नो' और 'वो' भी होते हैं। ชนฺตฺวาทิโต โยนํ โน โหติ โว จ วา ปุลฺลิงฺเค; ชนฺตุโน, ชนฺตโว, ชนฺตุโย, โคตฺรภุโน, โคตฺรภุโว, โคตฺรภอ, สหภุโน, สหภุโว, สหภุ. पुल्लिंग में 'जन्तु' आदि शब्दों से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'नो' और 'वो' भी होते हैं; जैसे- 'जन्तुनो', 'जन्तवो', 'जन्तुयो', 'गोत्रभुनो', 'गोत्रभुवो', 'गोत्रभू', 'सहभुनो', 'सहभुवो', 'सहभू'। กุโต-. 'कु' प्रत्ययान्त शब्दों से। กุปฺปจฺจยนฺตโต โยนํ โน วา โหติ ปุลฺลิงฺเค; วิทุโน, วิทู, วิญฺญุโน, วิญฺญ, สพฺพญฺญุโน, สพฺพญฺญ. पुल्लिंग में 'कु' प्रत्यय से अन्त होने वाले शब्दों से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'नो' होता है; जैसे- 'विदुनो', 'विदू', 'विञ्ञुनो', 'विञ्ञू', 'सब्बञ्ञुनो', 'सब्बञ्ञू'। โลโป’มุสฺมา-. 'अमु' शब्द से परे 'यो' विभक्ति का लोप। อมุสทฺทโต โยนํ โลโปว โหติ ปุลฺลิงฺเค; อมู ปุเมตฺเวว-อมุโย,อมูนิ; โว’ปวาทา’ยํ. पुल्लिंग में 'अमु' शब्द से परे 'यो' विभक्ति का लोप ही होता है; जैसे- 'अमू'। पुल्लिंग में ही क्यों? 'अमुयो' (स्त्रीलिंग), 'अमूनि' (नपुंसक लिंग)। यह 'वो' आदेश का अपवाद है। น โน สสฺส-. 'स' विभक्ति के स्थान पर 'नो' नहीं होता। อมุสฺมา สสฺส โน น โหติ; อมุสฺส, โนติ-กึ? อมุยา. 'अमु' शब्द से परे 'स' विभक्ति के स्थान पर 'नो' नहीं होता; जैसे- 'अमुस्स'। 'नो' क्यों नहीं? 'अमुया' (स्त्रीलिंग में)। โยโลปนิสุ ทีโฆ-. 'यो' के लोप होने पर और 'नि' तथा 'सु' विभक्तियों के परे होने पर दीर्घ होता है। โยนํ โลเป นิสุว ทีโฆ โหติ; อฏฺฐิ, อฏฺฐีนิ; โยโลป นิสูติ-กึ? รตฺติโย. 'यो' विभक्ति के लोप होने पर तथा 'नि' और 'सु' विभक्तियों के परे होने पर दीर्घ होता है; जैसे- 'अट्ठि' (यहाँ लोप के बाद), 'अट्ठीनि'। 'यो' का लोप और 'नि', 'सु' ही क्यों? 'रत्तियो' (यहाँ दीर्घ नहीं हुआ)। สุนํหิสุ-. 'सु', 'नं' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर। เอสุ นามสฺส ทีโฆ โหติ; อคฺคีสุ, อคฺคีนํ, อคฺคีหนิ. इन ('सु', 'नं', 'हि') विभक्तियों के परे होने पर नाम (प्रातिपदिक) के अन्त्य स्वर का दीर्घ होता है; जैसे- 'अग्गीसु', 'अग्गीनं', 'अग्गीहि'। ปญฺจาทีนํ จุทฺทสนฺนม-. 'पञ्च' आदि चौदह शब्दों के अन्त्य स्वर को 'अ' होता है। ปญฺจาทีนํ วทฺทสนฺนํ สุนํหิสฺว โหติ; ปญฺจสุ, ปญฺจนฺนํ, ปญฺจหิ, ฉสุ, ฉนฺน, ฉหิ; เอวํ ยาว อฏฺฐารสา. 'पञ्च' आदि चौदह (संख्यावाचक) शब्दों के अन्त्य स्वर को 'सु', 'नं' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'अ' होता है; जैसे- 'पञ्चसु', 'पञ्चन्नं', 'पञ्चहि', 'छसु', 'छन्नं', 'छहि'; इसी प्रकार अठारह (अट्ठाठरस) तक। ยวาโท นฺตุสฺส-. 'य' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'न्तु' प्रत्यय के स्थान पर 'अ' होता है। ยวาทิสุ นฺตุสฺส อ โหติ; คุณวนฺตา, คุณวนฺตํ, คุณวนฺเต, คุณวนฺเตน, อิจฺจาทิ–-ยฺวาโทติ-กึ? คุณวา ติฏฺฐติ. อมุสฺสา-ม. 'य' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'न्तु' प्रत्यय के (उकार का) 'अ' होता है; जैसे- 'गुणवन्ता', 'गुणवन्तं', 'गुणवन्ते', 'गुणवन्तेन' इत्यादि। 'य' आदि विभक्तियों के परे होने पर ही क्यों? 'गुणवा तिट्ठति' (यहाँ नहीं हुआ)। 'अमु' शब्द के स्थान पर 'म'। นฺตสฺส จ ฏ วํเส-. और 'न्तु' प्रत्यय के स्थान पर 'ट' होता है 'वंस' (वंश) शब्द के परे होने पर। อํเสสุ นฺตปฺปจฺจยยสฺส ฏ โหติ วา นฺตุสฺส จิ;’ ยํ ยํ หิราช ภชติ สตํ วา ยทิ วา อสํ’’ กิจฺจานิ กุพฺพสฺส กเรยฺย กิจฺจํ’’หิมวํจ ปพฺพตํ’,’สุชาติ มนฺโต’ปิ อชาติมสฺส’ โยควิภาเคนาญฺญตฺราปิ’จกฺขุมา อนฺธิตา โหนฺติ’’ วคฺคุมุทาตีริยา ปน ภิกฺขู วณฺณวา โหนฺติ.’ 'अं' विभक्ति के परे होने पर 'न्त' प्रत्यय के स्थान पर 'अ' होता है, अथवा 'न्त' के स्थान पर 'अ' होता है। 'यं यं हिराज भजति सतं वा यदि वा असं' (हे राजन्! वह जिस-जिस सत् या असत् का सेवन करता है), 'किच्चानि कुब्बस्स करेय्य किच्चं' (कार्य करने वाले का कार्य करना चाहिए), 'हिमवञ्च पब्बतं' (और हिमवान पर्वत), 'सुजाति मन्तोऽपि अजातिमस्स' (अच्छी जाति वाले भी नीच जाति वाले के), योग-विभाग से अन्यत्र भी: 'चक्खुमा अन्धिता होन्ति' (चक्षुमान अंधे हो जाते हैं), 'वग्गुमुदातीरिया पन भिक्खू वण्णवा होन्ति' (मधुर बोलने वाले भिक्षु वर्णवान होते हैं)। โยสุชฺฌิสฺส ปุเม-. पुल्लिंग में 'इ' संज्ञक के परे 'यो' विभक्ति होने पर- ฌสญฺญสฺส อิสฺส โยสุ วา ฏ โหติ ปุลฺลิงฺเค;อคฺคโส อคฺคี–-ฌคฺคหณํ กึ? อิการนฺตสมุทายสฺส โฏ มา สิยาติรตฺติโย; อิคฺคหณํ กึ? ทณฺฑิโน; ปุเวติ-กึ; อฏฺฐิ. पुल्लिंग में 'झ' संज्ञक 'इ' के स्थान पर 'यो' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से 'अ' होता है; जैसे- अग्गसो, अग्गी। 'झ' ग्रहण क्यों? इकारान्त समुदाय के स्थान पर 'अ' न हो, जैसे- तिरत्तियो। 'इ' ग्रहण क्यों? दण्डिनो। 'पुवे' (पुल्लिंग) क्यों? अट्ठि। เวโวสุ ลุสฺส-. 'वे' और 'वो' के परे होने पर 'लु' संज्ञक के स्थान पर- ลสญฺญสฺส อุสฺส ทฺเวโวสุ ฏ โหติ; ภิกฺขเว, ภิกฺขโว, เวโวสูติ-กึ?จนฺตุโย; อุคฺคหณํ กึ; สยมฺภุโว. 'लु' संज्ञक 'उ' के स्थान पर 'वे' और 'वो' के परे होने पर 'अ' होता है; जैसे- भिक्खवे, भिक्खवो। 'वे-वो' क्यों? जन्तुयो। 'उ' ग्रहण क्यों? सयम्भुवो। โยมฺหิ วา กฺววิ-. 'यो' विभक्ति के परे होने पर कहीं-कहीं- โยมฺหี กฺวจิ ลสญฺญสฺส วา ฏ โหติ; เหตโย,’นนฺทนฺติ ตํ กุรโย ทสฺสเนน อชฺเชว ตํ กุรโย ปาปยาตุ’ วาติ-กึ เหตุโย. 'यो' विभक्ति के परे होने पर कहीं-कहीं 'लु' संज्ञक के स्थान पर विकल्प से 'अ' होता है; जैसे- हेतयो, 'नन्दन्ति तं कुरयो दस्सनेन' (कुरुवंशी उसे देखकर प्रसन्न होते हैं), 'अज्जेव तं कुरयो पापयातु' (आज ही उसे कुरुवंशियों के पास पहुँचा दे)। 'वा' (विकल्प) क्यों? हेतुयो। ปุมาลปเน เวโว-. पुल्लिंग सम्बोधन में 'वे' और 'वो'- ลสญฺญโต อุโต โยสฺสาลปเน เวโว โหนฺติ วา ปุลฺลิงฺเค; ภิกฺขเว, ภิกฺขโว, ภิกฺขู–-ปุเมติ-กึ; อายูนิ; อาลปเนติ-กึ?จนฺตุโย ติฏฺฐนฺติ; ลุตาตฺเววฺै-เธนุโย,สยมฺภุโว. पुल्लिंग में 'लु' संज्ञक 'उ' से परे सम्बोधन की 'यो' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'वे' और 'वो' होते हैं; जैसे- भिक्खवे, भिक्खवो, भिक्खू। 'पुल्लिंग' क्यों? आयूनि। 'सम्बोधन' क्यों? जन्तुयो तिट्ठन्ति। 'लु' संज्ञक होने पर ही- धेनुयो, सयम्भुवो। สฺมาหิสฺมินฺนํ มฺหาภิมฺหิ-. 'स्मा', 'हि' और 'स्मिं' के स्थान पर 'म्हा', 'भि' और 'म्हि'- นามสฺมา ปเรสํ สฺมาหิสฺมินฺนํ มฺหาภิมฺหิ วา โหนฺติ ยถา กฺกมํ; พุทฺธมฺหา, พุทฺธสฺมา, พุทฺเธหิ, พุทฺธมฺหิ, พุทฺธสฺมึ–-พหุลาธิการาปวาทวีสเย’ปิ; ทสสหสฺสิมฺหิ ธาตุยา. नाम (प्रातिपदिक) से परे 'स्मा', 'हि' और 'स्मिं' के स्थान पर क्रमशः 'म्हा', 'भि' और 'म्हि' विकल्प से होते हैं; जैसे- बुद्धम्हा, बुद्धस्मा, बुद्धेहि, बुद्धम्हि, बुद्धस्मिं। 'बहुला' अधिकार के कारण अपवाद विषयों में भी होता है; जैसे- दससहस्सिम्हि धातुया। สุหิสฺวสฺเส-. 'सु' और 'हि' के परे होने पर 'अ' के स्थान पर 'ए'- อการนฺตสฺส สุหิสฺเว โหติ; พุทฺเธสุ, พุทฺเธหิ. अकारान्त के स्थान पर 'सु' और 'हि' के परे होने पर 'ए' होता है; जैसे- बुद्धेसु, बुद्धेहि। สพฺพาทีนํ นมฺหิ จ-. 'सब्बादि' (सर्वनामों) के 'नं' विभक्ति के परे होने पर भी- อการนฺตานํ สพฺพาทีนํ เอ โหติ นมฺหิ สุหิสุจ; สพฺเพสํ สพฺเพสุ, สพฺเพหิ–-สพฺพาทีนนฺติ-กึ?พุทฺธานํ; อสฺเสตฺเวว อมูสํ. अकारान्त 'सब्बादि' (सर्वनामों) के स्थान पर 'नं', 'सु' और 'हि' के परे होने पर 'ए' होता है; जैसे- सब्बेसं, सब्बेसु, सब्बेहि। 'सब्बादि' क्यों? बुद्धानं। 'अ' कारान्त होने पर ही- अमूसं। สพฺพ กตร กตม อุภย อิตร อญฺญ อญฺญตร อญฺญตม; सब्ब (सब), कतर, कतम, उभय, इतर, अञ्ञ (अन्य), अञ्ञतर, अञ्ञतम; ปุพฺพปราปรทกฺขิณุตฺตราธรานิ ววตฺถายมสญฺญายํ-(). पुब्ब (पूर्व), पर, अपर, दक्खिण (दक्षिण), उत्तर, अधर - ये शब्द व्यवस्था (मर्यादा) में होने पर और संज्ञा (नाम) न होने पर (सब्बादि होते हैं)। ยตฺย ต เอต อิม อมุ กึ เอก ตุมฺห อมฺห (อิจฺเจเต สพฺพาทโย ) य, त्य, त, एत, इम, अमु, किं, एक, तुम्हा, अम्हा (ये सब 'सब्बादि' कहलाते हैं)। สํสานํ-. 'सं' और 'सानं'- สพฺพาทิโต นํวจนสฺส สํสานํ โหนฺติ; สพฺเพสํ, สพฺเพสานํ. 'सब्बादि' से परे 'नं' विभक्ति के स्थान पर 'सं' और 'सानं' होते हैं; जैसे- सब्बेसं, सब्बेस्यानं। ฆปา สสฺส สฺสา วา-. 'घ' और 'पा' संज्ञक से परे 'स' विभक्ति के स्थान पर 'स्सा' विकल्प से- สพฺพาทีนํ ฆปโต สสฺส สฺสา วา โหติ; สพฺพสฺสา, สพฺพาย, ปคฺคหณมุตฺตรตฺถํ. 'सब्बादि' के 'घ' और 'पा' संज्ञक से परे 'स' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'स्सा' होता है; जैसे- सब्बस्सा, सब्बाय। 'प' का ग्रहण आगे के सूत्रों के लिए है। สฺมิโน สฺสํ-. 'स्मिं' विभक्ति के स्थान पर 'स्सं'- สพฺพาทีนํ ฆปโต สฺมิโน สฺสํ วา โหติ; สพฺพสฺสํ, สพฺพาย; อมุสฺสํ, อมุยา. 'सब्बादि' के 'घ' और 'पा' संज्ञक से परे 'स्मिं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'स्सं' होता है; जैसे- सब्बस्सं, सब्बाय; अमुस्सं, अमुया। ยํ-. 'यं'- ฆปโต สฺมิโน ยํ วา โหติ; กญฺญายํ, ทญฺญาย, รตฺติยํ, รตฺติยา, วธุยํ, วธุยา, สพฺพายํ, สพฺพาย, อมุยํ, อมุยา. 'घ' और 'पा' संज्ञक से परे 'स्मिं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'यं' होता है; जैसे- कञ्ञायं, कञ्ञाय, रत्तियं, रत्तिया, वधुयं, वधुया, सब्बायं, सब्बाय, अमुयं, अमुया। ตึ สภาปริสาย-. 'सभा' और 'परिषा' शब्दों से परे 'स्मिं' के स्थान पर 'तिं'- สภาปริสาหิ สฺมิโน ตึ วา โหติ; สภตึ, สหาย, ปริสตึ, ปริสาย. 'सभा' और 'परिषा' शब्दों से परे 'स्मिं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'तिं' होता है; जैसे- सभातिं, सभाय, परिसातिं, परिसाय। ปทาทีหิ สิ-. 'पद' आदि शब्दों से परे 'स्मिं' के स्थान पर 'सि'- เอหิ สฺมิโน สิ โหติ วา, ปทสิ, ปทสฺมึ, พิลสิ, พิลสฺมึ. इनसे (पद आदि से) परे 'स्मिं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'सि' होता है; जैसे- पदसि, पदस्मिं, बिलसि, बिलस्मिं। นาสฺส สา-. ना (तृतीया एकवचन) के स्थान पर 'सा' आदेश होता है। ปทาทีหิ นาสฺส สา โหติ วา; ปทสา, ปเทน, พิลสา, พิเลน. पद आदि शब्दों से परे 'ना' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'सा' आदेश होता है; जैसे- पसा (पैर से), पदेन; बिलसा (बिल से), बिलेन। โกธาทีหิ-. क्रोध आदि शब्दों से... เอหิ นาสฺส สา โหติ วา; โกธสา, โกเธน, อตฺถสา, อตฺเถน. इन (क्रोध आदि) शब्दों से परे 'ना' के स्थान पर विकल्प से 'सा' आदेश होता है; जैसे- क्रोधसा, क्रोधेन; अत्थसा, अत्थेन। อเตน-. अकारान्त से 'एन' आदेश होता है। อการนฺตโต ปรสฺส นาววนสฺส เอนาเทโส โหติ; พุทฺเธน; อโตติ-กึ?อคฺคินา. अकारान्त शब्द से परे 'ना' विभक्ति के स्थान पर 'एन' आदेश होता है; जैसे- बुद्धेन। 'अत' (अकारान्त) क्यों कहा? ताकि इकारान्त आदि में न हो, जैसे- अग्गिना। สิสฺโส-. सि (प्रथमा एकवचन) के स्थान पर 'ओ' होता है। อการนฺตโต นามสฺมา สิสฺส โอ โหติ; พุทฺโธ; อโต ตฺเวว-อคฺคิ. अकारान्त नाम (प्रातिपदिक) से परे 'सि' विभक्ति के स्थान पर 'ओ' आदेश होता है; जैसे- बुद्धो। 'अत' (अकारान्त) ही क्यों? ताकि इकारान्त में न हो, जैसे- अग्गि। กฺวเจ วา-. कहीं-कहीं विकल्प से 'ए' होता है। อการนฺตโต นามสฺมา สิสฺส เอ โหติ วา กฺวจิ;’วนปฺป คุมฺเพ ยถา ผุสฺสิตคฺเค’ อปวาทวิสเย’ปิ พหุลํ วิธานา, สุเข, ทุกฺเข–-วาติ-กึ? วนปฺปคุมฺโพ; กฺวจีติ-กึ? ปกฺเข สพฺพตฺถ มา โหตุ. अकारान्त नाम से परे 'सि' विभक्ति के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'ए' आदेश होता है; जैसे- 'वनप्पगुम्बे यथा फुस्सितग्गे'। अपवाद के विषय में भी 'बहुलं' विधान होने से यह होता है, जैसे- सुखे, दुक्खे। 'वा' (विकल्प) क्यों? वनप्पगुम्बो। 'क्वचि' क्यों? ताकि अन्य पक्षों में सर्वत्र न हो। อํ นปุํสเก-. नपुंसक लिंग में 'अं' होता है। อการนฺตโต นามสฺมา สสฺส อํ โหติ นปุํสกลิงฺเค รูปํ. अकारान्त नाम से परे 'सि' के स्थान पर नपुंसक लिंग में 'अं' आदेश होकर रूप बनता है; जैसे- रूपं। โยนํ นิ-. यो (प्रथमा/द्वितीया बहुवचन) के स्थान पर 'नि' होता है। อการนฺตโต นามสฺมา โยนํ นิ โหติ นปุํสเก; สพฺพานิ, รูปานิ –-นิจฺจวิธาเน ผลเมกจฺจาทิสพฺพาทนํ ปฐมาย. अकारान्त नाम से परे नपुंसक लिंग में 'यो' विभक्तियों के स्थान पर 'नि' आदेश होता है; जैसे- सब्बानि, रूपाणि। नित्य विधान होने पर 'एकच्च' आदि और 'सब्ब' आदि शब्दों की प्रथमा विभक्ति में यही फल है। ฌลา วา-. झ और ल संज्ञक शब्दों से परे विकल्प से 'नि' होता है। ฌลโต โยนํ นิ โหติ วา นปุํสเก; อฏฺฐินิ, อฏฺฐี, อายูนิ, อายู. झ और ल संज्ञक शब्दों से परे नपुंसक लिंग में 'यो' के स्थान पर विकल्प से 'नि' आदेश होता है; जैसे- अट्ठीनि, अट्ठी; आयूनि, आयू। โลโป-. लोप होता है। ฌลโต โยนํ โลโป โหติ; อฏฺฐี, อายู, อคฺคี, ภิกฺขู, ฌลาตฺเวว-อคฺคโย; ปเคว กสฺมา น โหติ; อนฺตรงฺคตฺตา อากรสฺส. झ और ल संज्ञक शब्दों से परे 'यो' विभक्तियों का लोप होता है; जैसे- अट्ठी, आयू, अग्गी, भिक्खू। 'झ' और 'ल' से ही क्यों? ताकि अन्यत्र न हो, जैसे- अग्गयो। पहले ही (आदेश से पूर्व) लोप क्यों नहीं होता? आकार के अन्तरङ्ग होने के कारण। ชนฺตุตฺวีเฆเปหิ วา-. जन्तु, तु, ई, घ और प संज्ञक शब्दों से परे विकल्प से... ชนฺตุเหตูหิ อีการนฺเตหิ ฆปสญฺโญหิว ปเรสํ โยนํ วา โลโป โหติ; ชนฺตุ ชนฺตุโย, เหตุ เหตุโย, ททฺธี ททฺธีโย, กญฺญา กญฺญาโย, รตฺตี รตฺติโย, อิตฺถี อิตฺถิโย, เทณู เทณุยา, วฺैธู วธุโย. जन्तु, हेतु, ईकारान्त और घ-प संज्ञक शब्दों से परे 'यो' विभक्तियों का विकल्प से लोप होता है; जैसे- जन्तु, जन्तुयो; हेतु, हेतुयो; दद्धी, दद्धीयो; कञ्ञा, कञ्ञायो; रत्ती, रत्तियो; इत्थी, इत्थियो; धेनु, धेनुयो; वधू, वधुयो। เยปสฺสิวณฺณสฺส-. यकार परे होने पर इ-वर्ण का... ปสญฺญสฺส อิวณฺณสฺส โลโป โหติ วา ยกาเร; รตฺโย รตฺยา รตฺยํ, โปกฺขรญฺโญ โปกฺขรญฺญฺญา โปกฺขรญฺญํ–-วาตฺเวว-รตฺติโย; ปสฺสาติ-กึ?ททฺธิโย; อิวณฺณสฺสาติ-กึ? เธนุโย วธุยา; กฺैถํ; อนุญฺญาโต อหํ มตฺยาติ?’ เย ปสฺสา’ติ-โยควิภาคา. प-संज्ञक इ-वर्ण का यकार परे होने पर विकल्प से लोप होता है; जैसे- रत्यो, रत्या, रत्यं; पोक्खरण्ञो, पोक्खरण्ञा, पोक्खरण्ञं। 'वा' (विकल्प) के कारण ही- रत्तियो। 'प-संज्ञक' का ही क्यों? दद्धियो। 'इ-वर्ण' का ही क्यों? धेनुयो, वधुया। 'अनुञ्ञातो अहं मत्या' कैसे सिद्ध होगा? 'ये पस्सा' इस योग-विभाग से। คสีนํ-. ग और सि का... นามสฺมา คสีนํ โลโป โหติ วิชฺฌนฺตราภาเว; โภ ปุริส, อยํ ททฺธี. नाम से परे 'ग' (सम्बोधन) और 'सि' का लोप होता है जब कोई व्यवधान न हो; जैसे- भो पुरिस, अयं दद्धी। อสํขฺเยหิ สพฺพาสํ-. असंख्यातों (अव्ययों) से परे सभी विभक्तियों का... อวิชฺชมานสงฺขฺเยหิ ปราสํ สพฺพาสํ วิภตฺตีนํ โลโปโหติ;ว วา เอวเอวํ. เอตสฺมาเยว ลิงฺคา [ ] อสงฺขฺเยหิ สฺยาถุปฺปตฺตฺยนุมียเต. अविद्यमान संख्या वाले (अव्ययों) से परे सभी विभक्तियों का लोप होता है; जैसे- व, वा, एव, एवं। इसी लिंग (चिह्न) से असंख्यातों से 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति का अनुमान किया जाता है। เอกตฺถตายํ-. एकार्थता (समास आदि) होने पर... เอกตฺถีภาเว สพฺพาสํ วิภตฺตีนํ โลโป โหติ พหุลํ; ปุตฺตียติ, ราชปุริโส, วาสิฏฺโฐ–- กฺววิ น โหติ พหุลํ วิธานา; ปรนฺตโป. ภคนฺทโร, ปรสฺสปทํ, อตฺตโนปทํ, ควมฺปติ, เทวานมฺปิยติสฺโส, อนฺเตวาสี, ชเนสุโต, มมตฺตํ, มามโก. एकार्थीभाव होने पर सभी विभक्तियों का बहुलता से लोप होता है; जैसे- पुत्तीयति, राजपुरिसो, वासेट्ठो। कहीं-कहीं 'बहुलं' विधान के कारण लोप नहीं होता; जैसे- परन्तपो, भगन्दरो, परस्सपदं, अत्तनोपदं, गवम्पति, देवानम्पियतिस्सो, अन्तेवासी, जनेसुतो, ममत्तं, मामको। ปุพฺพสฺมามาทิโต-. अं आदि से पूर्व वाले पद से... อมาเทกตฺถา ปุพฺพํ ยเทกตฺถํ ตโต ปราสํ สพฺพาสํ วิภตฺตีนํ โลโป โหติ; อธิตฺถี–-อิธ น โหติ พหุลํ วิธานา, ยถาปตฺติยา, ยยถาปริสาย; ปุพฺพสฺมาติ-กึ?คามํ คโต. अं आदि के साथ एकार्थ हुए (अव्ययीभाव) में जो पूर्व पद एकार्थ है, उससे परे सभी विभक्तियों का लोप होता है; जैसे- अधित्थी। यहाँ 'बहुलं' विधान से लोप नहीं होता, जैसे- यथापत्तिया, यथापरिसया। 'पूर्व से' क्यों? गामं गतो। นาโตมปญฺจมิยา-. अकारान्त (अव्ययीभाव समास) से परे पञ्चमी विभक्ति को छोड़कर अन्य विभक्तियों का लोप नहीं होता है। อมาเทกตฺถา ปุพฺพํ ยเทกตฺถมการนฺตํ ตโต ปราสํ สพฺพาสํ วิภตฺตีนํ โลโป น โหติ อสฺตุ ภวตฺยปญฺจมฺยา; อุปกุมฺภํ, อปญฺจมิยาติ-กึ? อุปกุมฺภา อานย. 'अं' के साथ एकार्थीभूत जो अकारान्त (अव्ययीभाव) है, उससे परे सभी विभक्तियों का लोप नहीं होता है, किन्तु पञ्चमी विभक्ति का लोप होता है; जैसे- उपकुम्भं। 'अपञ्चम्या' (पञ्चमी को छोड़कर) क्यों? उपकुम्भा आनय (कुम्भ के समीप से लाओ)। วา ตนิยาสตฺตมินํ- तृतीया और सप्तमी विभक्तियों के स्थान पर विकल्प से 'अं' आदेश होता है। อมาเทกตฺถา ปุพฺพํ ยเทกตฺถมการนฺตํ ตโต ปราสํ ตติยาสตฺตมินํ วา อํ โหติ; อุปกุมฺเภน กตํ, อุปกุมฺภํ กตํ, อุปกุมฺเภ นิเธหิ, อุปกุมฺภํ นิเธหิ. 'अं' के साथ एकार्थीभूत जो अकारान्त (अव्ययीभाव) है, उससे परे तृतीया और सप्तमी विभक्तियों के स्थान पर विकल्प से 'अं' आदेश होता है; जैसे- उपकुम्भेण कतं, उपकुम्भं कतं; उपकुम्भे निधेहि, उपकुम्भं निधेहि। ราชสฺสิ นามฺหิ-. 'ना' विभक्ति परे होने पर 'राज' शब्द के अन्त्य अकार को 'इ' आदेश होता है। นามฺหิ ราชสฺสิ วา โหติ; สพฺพทตฺเตน ราชินา; วาตฺเว วรญฺญา. 'ना' विभक्ति परे होने पर 'राज' शब्द के अन्त्य अकार को विकल्प से 'इ' होता है; जैसे- सब्बदत्तेन राजिना। 'विकल्प' से होने के कारण- रञ्ञा। สุนํหิสู-. 'सु', 'नं' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'राज' शब्द के अन्त्य अकार को 'ऊ' आदेश होता है। ราชสฺส อู โหติ วา สุนํหิสุ; ราชูสุ ราเชสุ, ราชูนํ รญฺญํ, ราชูภิ ราเชภิ. 'सु', 'नं' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'राज' शब्द के अन्त्य अकार को विकल्प से 'ऊ' होता है; जैसे- राजूुसु, राजेसु; राजूनं, रञ्ञं; राजूभि, राजेभि। อิมสฺสานิตฺถิยํ เฏ-. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'इम' शब्द को 'सु', 'नं' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'ए' (ṭe) आदेश होता है। อิมสทฺทสฺสานิตฺถิยํ เฏ โหติ วา สุนํหิสุ; เอสุ อิเมสุ, เอสํ อิเมสํ, เอหิ อิเมหิ–-อนิตฺถิยนฺติ-กึ? อิมาสุ, อิมายํ, อิมาหิ. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'इम' शब्द को 'सु', 'नं' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से 'ए' (ṭe) आदेश होता है; जैसे- एसु, इमेसु; एसं, इमेसं; एहि, इमेहि। 'अस्त्रीलिङ्ग' क्यों? इमासु, इमायं, इमाहि। นามฺภนิมิ-. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'इम' शब्द को 'ना' विभक्ति परे होने पर 'अन' और 'इमि' आदेश होते हैं। อิมสทฺทสฺสานิตฺถิยํ นามฺหิ อนฺैมิ อิจฺจาเทสา โหนฺติ; อเนน, อิมินา; อนิตฺถิยํตฺเวว-อิมาย. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'इम' शब्द को 'ना' विभक्ति परे होने पर 'अन' और 'इमि' ये आदेश होते हैं; जैसे- अनेन, इमिना। अस्त्रीलिङ्ग में ही- इमाय। สีมฺภนปุํสกสฺสายํ-. नपुंसकलिङ्ग को छोड़कर 'इम' शब्द को 'सि' विभक्ति परे होने पर 'अयं' आदेश होता है। อิมสทฺทสฺสานปุํสกสฺส อยํ โหติ สิมฺหิ; อยํ ปุริโส, อยํ อิตฺถี; อนปุํสกสฺสาติ-กึ?อิมํ. नपुंसकलिङ्ग को छोड़कर 'इम' शब्द को 'सि' विभक्ति परे होने पर 'अयं' आदेश होता है; जैसे- अयं पुरिसो, अयं इत्थी। 'अनपुंसक' क्यों? इमं। ตฺยเตตานํ ตสฺส โส- नपुंसकलिङ्ग को छोड़कर 'त्य' और 'एत' शब्दों के 'त' को 'सि' विभक्ति परे होने पर 'स' आदेश होता है। ตฺยเตตานมนปุํสกานํ ตสฺส โส โหติ สิมฺหิ; สฺโย ปุริโส, สฺยา อิตฺถิ; เอวํ โส, สา, เอโส, เอสา –-อนปุํสก สฺเสตฺวฺैว-ตฺยํ, ตํ, เอตํ. नपुंसकलिङ्ग को छोड़कर 'त्य' और 'एत' शब्दों के 'त' को 'सि' विभक्ति परे होने पर 'स' आदेश होता है; जैसे- स्यो पुरिसो, स्या इत्थी; इसी प्रकार सो, सा, एसो, एसा। 'अनपुंसक' होने पर ही- त्यं, तं, एतं। มสฺสามุสฺส-. नपुंसकलिङ्ग को छोड़कर 'अमु' शब्द के मकार को 'सि' विभक्ति परे होने पर 'स' आदेश होता है। อนปุํสกสฺสามุสฺส มการสฺส โส โหติ สิมฺหิ; อสุ ปุริโส, อสุ อิตฺถิ. नपुंसकलिङ्ग को छोड़कर 'अमु' शब्द के मकार को 'सि' विभक्ति परे होने पर 'स' आदेश होता है; जैसे- असु पुरिसो, असु इत्थी। เก วา-. 'अमु' शब्द के मकार को 'क' प्रत्यय परे होने पर विकल्प से 'स' आदेश होता है। อมุสฺส มสฺส เก วา โส โหติ; อสุโก อมุโก, อสุกา อมุกา, อสุกํ อมุกํ, อสุกานิ อมุกานิ. 'अमु' शब्द के मकार को 'क' प्रत्यय परे होने पर विकल्प से 'स' आदेश होता है; जैसे- असुको, अमुको; असुका, अमुका; असुकं, अमुकं; असुकानि, अमुकानि। ตตสฺส โน สพฺพาสุ-. 'त' शब्द के 'त' को सभी विभक्तियों में विकल्प से 'न' आदेश होता है। ตสทฺทสฺส ตสฺส โน วา โหติ สพฺพาสุวิภตฺตีสุ; เน, เต, นาโย, ตาโย, นํ, ตํ, นานิ, ตานิ อิจฺจาทิ. 'त' शब्द के 'त' को सभी विभक्तियों में विकल्प से 'न' आदेश होता है; जैसे- ने, ते; नायो, तायो; नं, तं; नानि, तानि इत्यादि। ฏ สสฺมาสฺมึสฺสายยสฺสํสฺสาสํมฺภามฺหิสวิมสฺส จ-. 'स', 'स्मा', 'स्मिं', 'स्साय', 'स्सं', 'स्सा', 'सां', 'म्हा' और 'म्हि' विभक्तियों के परे होने पर 'इम' और 'त' शब्दों को विकल्प से 'अ' (ṭa) आदेश होता है। สาทิสฺวิมสฺส ตตสฺส จ โฏ วา โหติ; อสฺสฺैมสฺส, อสฺมา, อิมสฺมา, อสฺมึ อิมสฺมึ,อสฺสาย อิมิสฺสาย, อสฺสํ อิมสฺสํ, อสฺสา อิมิสฺสา, อาสํ อิมาสํ, อมฺหา อิมมฺหา, อมฺหิ อิมมฺหิ; อสฺส ตสฺส, อสฺมา ตสฺมา, อสฺมึ ตสฺมึ, อสฺสาย ตสฺสาย, อสฺสํ ตสฺสํ, อสฺสา ตสฺสา, อาสํ ตาสํ, อมฺหา ตมฺหา, อมฺหิ ตมฺหิ. สฺสายาทิคฺคหณ มาเทสนฺตเร มา โหตุตี. 'स' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'इम' और 'त' शब्दों को विकल्प से 'अ' (ṭa) आदेश होता है; जैसे- अस्स, इमस्स; अस्मा, इमस्मा; अस्मिं, इमस्मिं; अस्साय, इमिस्साय; अस्सं, इमस्सं; अस्सा, इमिस्सा; आसं, इमासं; अम्हा, इमम्हा; अम्हि, इमम्हि। इसी प्रकार- अस्स, तस्स; अस्मा, तस्मा; अस्मिं, तस्मिं; अस्साय, तस्साय; अस्सं, तस्सं; अस्सा, तस्सा; आसं, तासं; अम्हा, तम्हा; अम्हि, तम्हि। 'स्साय' आदि का ग्रहण अन्य आदेशों की व्यावृत्ति के लिए है। ฏา สิสฺสิสิสฺมา-. 'इसि' शब्द से परे 'सि' विभक्ति को विकल्प से 'ए' (ṭe) आदेश होता है। อิสิสฺมา สิสฺส เฏ วา โหติ;’ โยนชฺช วินเย กงฺขํ อตฺถธมฺมวิทู อิเส’ วาตฺเวว-อิสิ. 'इसि' शब्द से परे 'सि' विभक्ति को विकल्प से 'ए' (ṭe) आदेश होता है; जैसे- 'योनज्ज विनये कङ्खं अत्थधम्मविदू इसे'। विकल्प से होने के कारण- 'इसि'। ทุติยสฺส โยสฺส-. 'इसि' शब्द से परे द्वितीया विभक्ति के 'यो' को विकल्प से 'ए' (ṭe) आदेश होता है। อิสิสฺมา ปรสฺส ทุยาโยสฺส เฏ วา โหติ;’ สมเณ พฺราหฺมเณ วนฺเท สมฺปนฺนจรเณ อิเส’ วาตฺเวว-อิสโย ปสฺส; ทุติยสฺสาติ-กึ?อิสโย ติฏฺฐนฺติ. 'इसि' शब्द से परे द्वितीया विभक्ति के 'यो' को विकल्प से 'ए' (ṭe) आदेश होता है; जैसे- 'समणे ब्राह्मणे वन्दे सम्पन्नचरणे इसे'। विकल्प से होने के कारण- 'इसयो पस्स'। 'द्वितीया' क्यों? 'इसयो तिट्ठन्ति' (यहाँ प्रथमा है)। เอกจฺจาทิคโต-. अकारान्त 'एकच्च' आदि शब्दों से परे 'यो' विभक्ति को 'ए' (ṭe) आदेश होता है। อการนฺเตหิ เอกจฺจาทีหิ โยนํ เฏ โหติ; เอกจฺเจ ติฏฺฐนฺติ, เอกจฺเจ ปสฺส–-อโตติ-กึ? เอกจฺจาโย; เอวํ เอสส ปฐม. अकारान्त 'एकच्च' आदि शब्दों से परे 'यो' विभक्ति को 'ए' (ṭe) आदेश होता है; जैसे- एकच्चे तिट्ठन्ति, एकच्चे पस्स। 'अकारान्त' क्यों? एकच्चायो। इसी प्रकार एस, स, पठम। น นิสฺส ฏา-. न निस्सटा। เอกจฺจาทีหิ ปรสฺส นิสฺส ฏา น โหติ; เอกจฺจานิ. एकच्च आदि के बाद 'निस्सटा' नहीं होता है; जैसे- एकच्चानि। สพฺพาทีหิ ปรสฺส นิสฺส ฏา น โหติ; สพฺพานิ. सब्ब आदि के बाद 'निस्सटा' नहीं होता है; जैसे- सब्बानि। เยยานเมฏ-. ये-यानं-एटा। อการนฺเตหิ สพฺพาทีหิ โยนเมฏ โหติ; สพฺเพ ติฏฺฐนฺติ สพฺเพ ปสฺส; อโตตฺเวว-สพฺพาโย. अकारान्त सब्ब आदि शब्दों से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर 'ए' आदेश होता है; जैसे- सब्बे तिट्ठन्ति, सब्बे पस्स; 'अतो' के कारण ही- सब्बायो। นาญฺญญฺจ นามปฺปธานา-. न-अञ्ञं-च नाम-अप्पधाना। นามภุเตหิ อปฺปธาเนหิ จ สพฺพาทีหิ ยํ วุตฺตํ ยํ จญฺญํ สพฺพาทิการิยนฺตํ น โหติ; เต สพฺพา, เต ปิยสพฺพา, เต อติ สพฺพา. संज्ञाभूत और अप्रधान 'सब्ब' आदि शब्दों के लिए जो कहा गया है और जो अन्य 'सब्ब' आदि कार्य हैं, वे नहीं होते हैं; जैसे- ते सब्बा, ते पियसब्बा, ते अति सब्बा। ตติยตฺถโยเค-. ततियत्थ-योगे। ตติยตฺเถน โยเค สพฺพาทีหิ ยํ วุตฺตํ ยํ จญฺญํ สพฺพาทิ การิยนฺตํ น โหติ; มาเสนปุพฺพานํ มาสปุพฺพานํ. तृतीया विभक्ति के अर्थ के योग में 'सब्ब' आदि के लिए जो कहा गया है और जो अन्य 'सब्ब' आदि कार्य हैं, वे नहीं होते हैं; जैसे- मासेनपुब्बानं, मासपुब्बानं। จตฺถสมาเส-. च-अत्थ-समासे। จตฺถสมาสวิสเย สพฺพาทีหิ ยํ วุตฺตํ ยํ จญฺญํ สพฺพาทิ การิยนฺตํ น โหติ; ทกฺขิณุตฺตรปุพฺพานํ–-สมาเสติ-กึ?อมุสญฺจ เตสญฺจ เทหิ. द्वन्द्व समास के विषय में 'सब्ब' आदि के लिए जो कहा गया है और जो अन्य 'सब्ब' आदि कार्य हैं, वे नहीं होते हैं; जैसे- दक्खिणुत्तरपुब्बानं—'समास में' क्यों कहा? अमुसञ्च तेसञ्च देहि। เวฏ-. वे-एटा। จตฺถสมาสวิสเย สพฺพาทีหิ ยสฺเสฏ วุตฺโต ตสฺส วา โหติ; ปุพฺพุตฺตเร, ปุพฺพุตฺตรา. द्वन्द्व समास के विषय में 'सब्ब' आदि के लिए जिसके लिए 'ए' कहा गया है, वह विकल्प से होता है; जैसे- पुब्बुत्तरे, पुब्बुत्तरा। ปุพฺพาทีหิ ชหิ- पुब्बादीहि छहि। เอเตหิ ปุพฺพาทีหิ ฉหิ สวิสเย เอฏ วา โหติ?ปุพฺเพ ปุพฺพา, ปเร ปรา, อปเร อปรา,ทกฺขิเณ ทกฺขิณา, อุตฺตเร อุตฺตรา, อธเร อธรา–-ฉหีติ-กึ?เย.[ ] इन 'पुब्ब' आदि छह शब्दों के अपने विषय में 'ए' विकल्प से होता है। जैसे- पुब्बे-पुब्बा, परे-परा, अपरे-अपरा, दक्खिणे-दक्खिणा, उत्तरे-उत्तरा, अधरे-अधरा—'छह' क्यों कहा? ये। มนาทีหิ สฺมึสํนาสฺมานํ สิโสโอสาสา-. मनादीहि स्मिं-सं-ना-स्मानं सिसो-ओसा-सा। มนาทีหิ สมีมาทีนํ สิโสโอสาสา วา โหนฺติ ยถากฺกํ; มนสิ มนสฺมึ, มนโส มนสฺส, มโน มนํ, มนสา มเนน, มนสา มนสฺมา–-กถํ? ปุตฺโต ชาโต อเวตโส, หิตฺวา ยาติ สุเมธโส; สุทฺธุตฺตรวาสสา, เหมกปกฺปณวาสเสติ-สกตฺเถ ณนฺตา. मन आदि शब्दों से परे 'स्मिं' आदि विभक्तियों के स्थान पर क्रमशः 'सि', 'सो', 'ओ', 'सा', 'सा' आदेश विकल्प से होते हैं; जैसे- मनसि-मनस्मिं, मनसो-मनस्स, मनो-मनं, मनसा-मनेन, मनसा-मनस्मा—कैसे? पुत्तो जातो अवेतसो, हित्वा याति सुमेधसो; सुद्धुत्तरवाससा, हेमकपकपणवाससेति—ये स्वार्थ में 'ण' प्रत्ययान्त हैं। มน ตม ตป เตช สิร อุร วจ โอช รช ยส ปย मन, तम, तप, तेज, सिर, उर, वच, ओज, रज, यस, पय। สรวยยายวาสเจตา ชลาสยากฺขยโลหปฏมเนสุ-(). सर, वय, यय, आय, वास, चेता, जलासय, अक्खय, लोह, पट, मन—इनमें। สโต สพฺเภ-. सतो सब्भे। สนฺตสทฺทสฺส สพ ภวติ ภกาเร; สพฺภิ. 'सन्त' शब्द के स्थान पर 'सब' आदेश होता है 'भ' कार परे होने पर; जैसे- सब्भि। ภวโต วา โหนฺโต คโยนาเส-. भवतो वा होन्तो गयोनासे। ภวนฺตสทฺทสฺส โภนฺตาเทโส วา โหติ คโยนาเส; โภนฺต, ภวํ, โภนฺโต, ภวนฺโต, โภตา, ภวตา, โภโต, ภวโต–-โภ อิติ-อามนฺตเณ นิปาโต’กุโตนุ อาคจฺฉถ โภ ตโย ชนา’เอวํ ภนฺเตติ-ภทฺเทติ-สทฺทนฺตเรน สิทฺธํ;ภทฺทนฺต อิติ-ทสฺส ทฺวิภาเวน. 'भवन्त' शब्द के स्थान पर 'भोन्त' आदेश विकल्प से होता है 'ग', 'यो', 'ना', 'सि' विभक्तियों में; जैसे- भोन्त, भवं, भोन्तो, भवन्तो, भोता, भवता, भोतो, भवतो—'भो' यह सम्बोधन में निपात है 'कुतोनु आगच्छथ भो तयो जना'; इसी प्रकार 'भन्ते' और 'भद्दे' अन्य शब्दों से सिद्ध होते हैं; 'भद्दन्त' इसमें 'द' के द्वित्व होने से। สิสฺสาคฺคิโต นิ-. सिस्स-अग्गितो नि। อคฺคิสฺมา สิสฺส นิ โหติ วา; อคฺคินี,อคฺคิ. 'अग्गि' शब्द से परे 'सि' विभक्ति के स्थान पर 'नि' आदेश विकल्प से होता है; जैसे- अग्गिनी, अग्गि। นฺตสฺสํ-. न्तस्स-अं। สิมฺหิ นฺตปฺปจฺจยสฺส อํ โหติ วา; คจฺฉํ, คจฺฉนฺโต. 'सि' विभक्ति परे होने पर 'न्त' प्रत्यय के स्थान पर 'अं' आदेश विकल्प से होता है; जैसे- गच्छं, गच्छन्तो। ภุโต-. भूतो। ภุธาตุโต นฺตสฺส อํ โหติ สิมฺหิ นิจฺจํ ปุนพฺพิธานา; ภวํ. 'भू' धातु से परे 'न्त' प्रत्यय के स्थान पर 'सि' विभक्ति में 'अं' आदेश नित्य होता है पुनः विधान करने से; जैसे- भवं। มหนฺตรหตฺตานํ ฏา วา-. महन्त-अरहन्तानं टा वा। สิมฺหิ มหนฺตารหนฺตานํ นฺตสฺส ฏา วา โหติ; มหา, มหํ, อรหา, อรหํ. 'सि' (प्रथमा एकवचन) विभक्ति होने पर 'महन्त' और 'अरहन्त' के 'न्त' के स्थान पर विकल्प से 'आ' होता है; जैसे- महा, महं, अरहा, अरहं। นฺตุสฺส-. 'न्त' का। สิมฺหิ นฺตุสฺสฏา โหติ; คุณวา. 'सि' विभक्ति होने पर 'न्त' के स्थान पर 'आ' होता है; जैसे- गुणवा। อํงํ นปุํสเก-. नपुंसक लिंग में 'अं' और 'अ' आदेश। นฺตุสฺส อํงํ โหนฺติ สิมฺหิ นปุํสเก; คุณวํ กุลํ, คุณญฺจ นฺตํ กุลํ–-นปุํสเกติ กึ? สีลวา ภิกฺขุ. नपुंसक लिंग में 'सि' विभक्ति होने पर 'न्त' के स्थान पर 'अं' और 'अ' होते हैं; जैसे- गुणवं कुलं, गुणञ्च न्तं कुलं। 'नपुंसक लिंग में' ऐसा क्यों कहा? (उत्तर-) शीलवा भिक्खु (पुल्लिंग में)। หิมวโต วา โอ-. 'हिमवन्त' शब्द के 'न्त' के स्थान पर विकल्प से 'ओ' होता है। หิมวโต สิมฺหิ นฺตุสฺส โอ วา โหติ; หิมวนฺโต, หิมวา. 'सि' विभक्ति होने पर 'हिमवन्त' के 'न्त' के स्थान पर विकल्प से 'ओ' होता है; जैसे- हिमवन्तो, हिमवा। ราชาทิยุวาทิตฺวา -. 'राज' आदि और 'युव' आदि शब्दों से। ราชาทีหิ ยยุวาทีหิ จ สิสฺส อา โหติ; ราชา, ยยุวา–-ราช พฺรหฺม สข อตฺต อาตุม. 'राज' आदि और 'युव' आदि शब्दों से परे 'सि' विभक्ति के स्थान पर 'आ' होता है; जैसे- राजा, ययुवा—राज, ब्रह्म, सख, अत्त, आतुम। ธมฺโม วาญฺญตฺเถ-(). अन्य अर्थ (बहुव्रीहि समास) में 'धम्म' शब्द का विकल्प से (ओ) होता है। ทฬฺหธมฺมา; (ทฬฺหธมฺโม) อสฺมา. दळ्हधम्मा; (दळ्हधम्मो) अस्मा। อิโม ภาเว-(). भाव अर्थ में 'इम' (प्रत्यय) होता है। อณิมา, ลฆิมา–-ยุว สา สุวา มฆว ปุม วตฺตห. अणिमा, लघिमा—युव, सा, सुवा, मघव, पुम, वत्तह। วามฺภานทฺธ -. 'वं' और 'अं' विभक्ति होने पर 'आन' आदेश। ราชาทีนํ ยุวาทีนํ จานงิ โหติ วามฺหิ; [ ] ราชานํ, ราชํ, ยุวานํ, ยุวํ. 'वं' और 'अं' विभक्ति होने पर 'राज' आदि और 'युव' आदि शब्दों के (अन्त्य स्वर के) स्थान पर 'आन' आदेश होता है; जैसे- राजानं, राजं, युवानं, युवं। โยนมาโน-. 'यो' विभक्ति के स्थान पर 'आनो' आदेश। ราชาทีหิ ยุวาทีหิ จ โยนมาโน วา โหติ; ราชาโน, ยุวาโน–-วาตฺเวว-ราชา,ราเช, ยุวา, ยุเว. 'राज' आदि और 'युव' आदि शब्दों से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'आनो' आदेश होता है; जैसे- राजानो, युवानो। विकल्प से—राजा, राजे, युवा, युवे। อาโย โน จ สขา-. 'सख' शब्द से परे 'यो' के स्थान पर 'आयो' और 'नो' आदेश। สขโต โยนมาโยโน โหนฺติ วา อาโน จ; สขาโย, สขิโน, สขาโน?วาตฺเวว-สขา, สเข. 'सख' शब्द से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'आयो', 'नो' और 'आनो' आदेश होते हैं; जैसे- सखायो, सखिनो, सखानो? विकल्प से—सखा, सखे। เฏ สฺมิโน-. 'सि' विभक्ति के स्थान पर 'ए' आदेश। สขโต สฺมิโน เฏ โหติ; สเข นิจฺจตฺโถ’ยมารมฺโภ. 'सख' शब्द से परे 'सि' विभक्ति के स्थान पर 'ए' आदेश होता है; जैसे- सखे। यह नियम नित्य है। โนนาเสสฺวิ-. 'नो', 'ना' और 'से' विभक्तियों के परे होने पर 'इ' आदेश। สขสฺส อิ โหติ โนนาเสสุ; สขิโน, สขินา, สขิสฺส. 'नो', 'ना' और 'से' विभक्तियों के परे होने पर 'सख' शब्द के (अन्त्य स्वर के) स्थान पर 'इ' होता है; जैसे- सखिनो, सखिना, सखिस्स। สฺมานํสุ วา-. 'स्मा', 'नं' और 'सु' विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से। สขสฺส วา อิ โหตี สฺมานํสุ; สขิสฺมา, สขสฺมา, สขีนํ, สขานํ. 'स्मा', 'नं' और 'सु' विभक्तियों के परे होने पर 'सख' शब्द के (अन्त्य स्वर के) स्थान पर विकल्प से 'इ' होता है; जैसे- सखिस्मा, सखस्मा, सखीनं, सखानं। โยสฺวํหิสุ จารงิ-. 'यो', 'सु', 'अं' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'आर' आदेश। สขสฺส วา อารงิ โหติ โยสฺวํหิสุสฺมานํสุ จ; สขาโร สขาโย, สขาเรสุ, สเขสุ,สขารํ, สขํ, สขาเรหิ, สเขหิ, สขารา, สขารสฺมา, สขารานํ, สขานํ. 'यो', 'सु', 'अं', 'हि', 'स्मा' और 'नं' विभक्तियों के परे होने पर 'सख' शब्द के (अन्त्य स्वर के) स्थान पर विकल्प से 'आर' आदेश होता है; जैसे- सखारो, सखायो, सखारेसु, सखेसु, सखारं, सखं, सखारेहि, सखेहि, सखारा, सखारस्मा, सखारानं, सखानं। ลตุปิตาทินมเส-. 'लतु' प्रत्ययान्त और 'पिता' आदि शब्दों के (अन्त्य स्वर के) स्थान पर 'आर' आदेश होता है, 'से' विभक्ति को छोड़कर। ลตุปฺปจฺจยนฺตานํ ปิตาทีนํ จารงิ โภติ สโต’ญฺญตฺร; กตฺตาโร, ปิตโร, กตฺตารํ, ปิตรํ, กตฺตารา, ปิตรา, กตฺตริ, ปิตริ–-อเสติ-กึ?กตฺตุโน, ปิตุโน. 'लतु' प्रत्ययान्त और 'पिता' आदि शब्दों के (अन्त्य स्वर के) स्थान पर 'स' (चतुर्थी-षष्ठी एकवचन) विभक्ति को छोड़कर अन्यत्र 'आर' आदेश होता है; जैसे- कत्तारो, पितरो, कत्तारं, पितरं, कत्तारा, पितरा, कत्तरि, पितरि। 'स' विभक्ति को छोड़कर ऐसा क्यों कहा? (उत्तर-) कत्तुनो, पितुनो। นมฺหิ วา-. 'नं' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से। นมฺหิ ลตุปิตาทีนมารงิ วา โหติ; กตฺตารานํ, กตฺตุนํ, ปิตรานํ, ปิตุนฺนํ. 'न' (षष्ठी बहुवचन) परे होने पर 'लतु', 'पितु' आदि के स्थान पर विकल्प से 'अरङ्' (अर) आदेश होता है; जैसे- कत्तारानं, कत्तुनं, पितरानं, पितुन्नं। อา-๑ आ-१ . । นมฺหิ ลตุปิตาทีนมา วา โหติ; กตฺตานํ, กตฺตูนํ, ปิตานํ, ปิตุนฺนํ. 'न' (षष्ठी बहुवचन) परे होने पर 'लतु', 'पितु' आदि के स्थान पर विकल्प से 'आ' आदेश होता है; जैसे- कत्तानं, कत्तूनं, पितानं, पितुन्नं। สโลโป-. स-लोप। ลตุปิตาทีหิ สสฺส โลโป วา โหติ; กตฺตุ, กตฺตุโน, สกมนฺธาตุ, สกมนฺธาตุโน, ปิตุ, ปิตุโน. 'लतु', 'पितु' आदि से परे 'स' (षष्ठी एकवचन) का विकल्प से लोप होता है; जैसे- कत्तु, कत्तुनो, सकमन्धातु, सकमन्धातुनो, पितु, पितुनो। สุหิสฺวารงิ-. सु-हि में अरङ्। สุหิสุ ลตุปิตาทีนมรงิ วา โหติ; กตฺตาเรสุ, กตฺตุสุ, ปิตเรสุ, ปิตุสุ, กตฺตาเรหิ, กตฺตุหิ, ปิตเรหิ, ปิตุหิ. 'सु' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'लतु', 'पितु' आदि के स्थान पर विकल्प से 'अरङ्' (अर) आदेश होता है; जैसे- कत्तारेसु, कत्तुसु, पितरेसु, पितुसु, कत्तारेहि, कत्तुहि, पितरेहि, पितुहि। นชฺชาโยสฺวาม-. नज्जा-यो में आमि। โยสุ นทีสทฺทสฺส อามิ วา โหติ; นชฺชาโย, นทิโย. 'यो' विभक्तियों के परे होने पर 'नदी' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'आमि' आदेश होता है; जैसे- नज्जाया, नदियो। ฏิ กติมฺหา-. कति से परे टि। กติมฺหา โยนํ ฏิ โหติ; กติ ติฏฺฐนฺติ, กติ ปสฺส. 'कति' शब्द से परे 'यो' विभक्तियों के स्थान पर 'टि' आदेश होता है; जैसे- कति तिट्ठन्ति, कति पस्स। ฏ ปญฺจาทิหิ จุทฺทสหิ-. पञ्च आदि चौदह (संख्याओं) से परे ट। ปญฺจาทีหิ จุทฺทสหิ สํขฺยาหิ โยนํ โฏ โหติ; ปญฺจ ปญฺจ, เอวํ ยาว อฏฺฐารสา–-ปญฺจาทีหีกิ-กึ? ทฺเว ตโย จตฺตาโร; จุทฺทสภีติ-กึ? ทฺเววีสติโย. 'पञ्च' आदि चौदह संख्याओं से परे 'यो' विभक्तियों के स्थान पर 'टो' (लोप) होता है; जैसे- पञ्च, पञ्च, इसी प्रकार अठारह (अट्ठाठरस) तक। 'पञ्च आदि' क्यों? द्वे, तयो, चत्तारो (इनमें नहीं होता)। 'चौदह' क्यों? द्वेवीसतियो (इसमें नहीं होता)। อุภโคหิ โฏ-. उभ-गो से परे टो। อุภโคหิ โยนํ โฏ โหติ; อุโภ, อุโภ, คาโว, คาโว–-กถํ? อิเมกรตฺตึ อุภโย วสามาติ- โฏมฺหิ ยการาคโม. 'उभ' और 'गो' शब्दों से परे 'यो' विभक्तियों के स्थान पर 'टो' आदेश होता है; जैसे- उभो, उभो, गावो, गावो। 'इमेकरत्तिं उभयो वसाम' यहाँ कैसे? 'टो' परे होने पर 'य' कार का आगम होता है। อารงิสฺมา-. आरङ् से परे। อารงาเทสโต ปเรสํ โยนํ โฏ โหติ; สขาโร, กตฺตาโร, ปตโร. 'अरङ्' आदेश से परे 'यो' विभक्तियों के स्थान पर 'टो' आदेश होता है; जैसे- सखारो, कत्तारो, पितरो। โฏเฏ วา-. टो-टे विकल्प से। อารงาเทสมฺหา โยนํ โฏเฏ วา โหนฺติ ยถากฺกมํ; สขาโร, สขาเร, สขาโร–-โฏคฺคหณํ ลาฆวตฺถํ. 'अरङ्' आदेश से परे 'यो' विभक्तियों के स्थान पर यथाक्रम से विकल्प से 'टो' और 'टे' आदेश होते हैं; जैसे- सखारो, सखारे, सखारो। 'टो' का ग्रहण लाघव (संक्षेप) के लिए है। ฏา นาสฺมานํ-. ना-स्मा के स्थान पर टा। อารงาเทสมฺหา นาสฺมานํ ฏา โหติ; กตฺตารา, กตฺตารา, กฺวจิ วา โหติ พหกุลาธิการา; เอตาทิสา สขารสฺมา 'अरङ्' आदेश से परे 'ना' और 'स्मा' विभक्तियों के स्थान पर 'टा' आदेश होता है; जैसे- कत्तारा, कत्तारा। 'बहुकुल' के अधिकार से यह कहीं-कहीं विकल्प से होता है; इसी प्रकार 'सखार' से भी। ฏิ สฺมิโน-. स्मि के स्थान पर टि। อารงาเทสมฺหา สฺมิโน ฏิ โหติ; กตฺตริ, ปิตริ. 'अरङ्' आदेश से परे 'स्मि' विभक्ति के स्थान पर 'टि' आदेश होता है; जैसे- कत्तरि, पितरि। ทิวาทิโต-. दिवु आदि से। ทิวาทีหิ นาเมหิ สฺมิโน ฏิ โหติ; ทิวิ, ภุวิ–-นิจฺจํ วการาคโม. 'दिवु' आदि शब्दों से परे 'स्मि' विभक्ति के स्थान पर 'टि' आदेश होता है; जैसे- दिवि, भुवि। यहाँ 'व' कार का आगम नित्य होता है। รสฺสารงิ-. अरङ् का ह्रस्व। สฺมิมฺหิ อาโร รสฺโส โหติ; กตฺตริ, นตฺตริ. 'स्मि' विभक्ति परे होने पर 'आर' ह्रस्व हो जाता है; जैसे- कत्तरि, नत्तरि। ปิตาทีนมนตฺตฺวาทีนํ-. पितु आदि का, नत्तु आदि को छोड़कर। นตฺตฺวาทิวชฺชิตานํ ปิตาทีนมาโร รสฺโส โหติ สพฺพาสุ วิภตฺติสุ; ปิตโร, ปิตรํ–-อนตฺตฺวาทีนนฺติ กึ? นตฺตาโร. 'नत्तु' आदि को छोड़कर 'पितु' आदि शब्दों का 'आर' सभी विभक्तियों में ह्रस्व हो जाता है; जैसे- पितरो, पितरं। 'नत्तु आदि को छोड़कर' क्यों? नत्तारो (यहाँ ह्रस्व नहीं होता)। ยุวาทีนํ สุหิสฺวานงิ-. "युव" आदि शब्दों के बाद "सु" और "हि" विभक्तियों के होने पर "आनङ्" आदेश होता है। สุหิสุ ยุวาทีนํ อานงิ โหติ; ยยุวาเนสุ, ยุวาเนหิ. "सु" और "हि" विभक्तियों के परे होने पर "युव" आदि शब्दों को "आनङ्" आदेश होता है; जैसे- ययुवानेसु, युवानेहि। โนนาเนสฺวา-. "नो", "ना", "ने" विभक्तियों के परे होने पर "आ" होता है। เอสุ ยุวาทีนมา โหติ; ยุวาโน, ยุวานา, ยุวาเน. इन (विभक्तियों) के परे होने पर "युव" आदि शब्दों को "आ" होता है; जैसे- युवानो, युवाना, युवाने। สฺมาสฺมินฺนํ นาเน-. "स्मा" और "स्मिं" विभक्तियों के स्थान पर क्रमशः "ना" और "ने" आदेश होते हैं। ยุวาทีหึ สฺมาสฺมินฺนํ นาเน โหนฺติ ยถากฺกมํ; ยุวานา, ยุวาเน. "युव" आदि शब्दों से परे "स्मा" और "स्मिं" विभक्तियों के स्थान पर यथाक्रम "ना" और "ने" होते हैं; जैसे- युवाना, युवाने। โยนํ โนเน วา-. "यो" विभक्तियों के स्थान पर "नो" और "ने" विकल्प से होते हैं। ยุวาทีหิ โยนํ โนเน วา โหนฺติ ยถากฺกมึ; ยุวาโน ยุวาเน–-วาติ-กึ?ยุเว ปสฺส;โนคฺคหณํ ลาฆวตฺถํ. "युव" आदि शब्दों से परे "यो" विभक्तियों के स्थान पर यथाक्रम "नो" और "ने" विकल्प से होते हैं; जैसे- युवानो, युवाने। "वा" (विकल्प) क्यों? "युवे पस्स" (युवकों को देखो) के लिए। "नो" का ग्रहण लाघव (संक्षेप) के लिए है। อิโต’ญฺญตฺเถ ปุเม-. इससे भिन्न अर्थ में (बहुव्रीहि समास में) पुल्लिंग में। อญฺญปทตฺเถ วตฺตมานา อิการนฺตโต นามสฺมา โยนํ โนเน วา โหนฺติ ยถากฺกมํ ปุลฺลิงฺเค, โตมรํกุส ปาณิโน, โตมรํกุสปาณิเน, วาตฺเวว-โตมรํกุสปาณโย; อญฺญตฺเถติ-กึ?ปาณโย. अन्य पद के अर्थ में वर्तमान इकारान्त नाम (शब्द) से परे "यो" विभक्तियों के स्थान पर पुल्लिंग में यथाक्रम "नो" और "ने" विकल्प से होते हैं; जैसे- तोमरंकुसपाणिनो, तोमरंकुसपाणिने। "वा" (विकल्प) होने से- तोमरंकुसपाणयो। "अन्य अर्थ में" क्यों? पाणयो (हाथ)। เน สฺมิโน กฺววิ-. "स्मिं" विभक्ति के स्थान पर कहीं-कहीं "ने" होता है। อญฺญปทตฺเถ วตฺตมานา อิการนฺตโต นามสฺมา สฺมิโน เน โหติ วา กฺวจิ;’ กตญฺญุมฺหิ จ โปสมฺหิ สีลวนฺเต อริยวุตฺติเน’ วาตฺเวว-อริยวุตฺติมฺหิ; ปุเมตฺเวว-อริยยวุตฺติยา. अन्य पद के अर्थ में वर्तमान इकारान्त नाम से परे "स्मिं" विभक्ति के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से "ने" होता है; 'कतञ्ञुम्हि च पोसम्हि सीलवन्ते अरियवुत्तिने'। "वा" (विकल्प) होने से- अरियवुत्तिम्हि। "पुल्लिंग में" ही क्यों? अरिययवुत्तिया (स्त्रीलिंग में)। ปุมา-. "पुम" शब्द के लिए। ปุมสทฺทโต สฺมิโน ยํ วุตฺตํ ตํ วา โหติ; ปุมาเนปุเม. "पुम" शब्द से परे "स्मिं" के लिए जो (आदेश) कहा गया है, वह विकल्प से होता है; जैसे- पुमाने, पुमे। นามฺหิ-. "ना" विभक्ति के होने पर। ปุมสฺส นามฺหิ ยํ วุตฺตํ ตํ วา โหติ; ปุมานา ปุเมน. "पुम" शब्द के "ना" विभक्ति के परे होने पर जो कहा गया है, वह विकल्प से होता है; जैसे- पुमाना, पुमेन। สุมฺหา จ-. और "सु" विभक्ति के परे होने पर। ปุมสฺส สุมฺหิ ยํ วุตฺตํ ตํ อา จ วา โหติ; ปุมาเนสุ, ปุเมสุ, ปุมาสุ. "पुम" शब्द के "सु" विभक्ति के परे होने पर जो कहा गया है वह और "आ" भी विकल्प से होता है; जैसे- पुमानेसु, पुमेसु, पुमासु। คสฺสํ-. "ग" (सम्बोधन) के स्थान पर "अं" होता है। ปุมสทฺทโต คสฺส อํ วา โหติ; โภ ปุมํ, โภ ปุม, โภ อิตฺถิปุมํ, โภ อิตฺถิปุม. "पुम" शब्द से परे "ग" (सम्बोधन) के स्थान पर विकल्प से "अं" होता है; जैसे- भो पुमं, भो पुम, भो इत्थिपुमं, भो इत्थिपुम। สาสฺสํเส จานงิ-. "स" शब्द को "अं", "स" और "ग" (सम्बोधन) के परे होने पर "आनङ्" होता है। สาสทฺทสฺส อานงิ โหติ อํเส เค จ; สานํ, สานสฺส, โภ สาน. "स" शब्द को "अं", "स" और "ग" (सम्बोधन) के परे होने पर "आनङ्" होता है; जैसे- सानं, सानस्स, भो सान। วตฺตหา สนนฺนํ โนนานํ-. "वत्तहा" शब्द के बाद "स" और "नं" विभक्तियों के स्थान पर क्रमशः "नो" और "नानं" होते हैं। วตฺตหา สนนฺนํ โนนานํ โหนฺติ ยถากฺกม; วตฺตหา โน, วตฺตหานานํ. "वत्तहा" शब्द के बाद "स" और "नं" विभक्तियों के स्थान पर यथाक्रम "नो" और "नानं" होते हैं; जैसे- वत्तहा नो, वत्तहानानं। พฺรหฺมสฺสุ วา-. "ब्रह्म" शब्द को विकल्प से "उ" होता है। พฺรหฺมสฺสุ วา โหติ สนํสุ; พฺรหฺมุโน, พฺรหฺมสฺส, พฺรหฺมูนํ พฺรหฺมานํ. "ब्रह्म" शब्द को "स", "नं" और "सु" विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से "उ" होता है; जैसे- ब्रह्मुनो, ब्रह्मस्स, ब्रह्मूनं, ब्रह्मानं। นามฺหิ-. "ना" विभक्ति के होने पर। พฺรหฺมสฺสุ โหติ นามฺหิ; พฺรหฺมุนา, "ब्रह्म" शब्द को "ना" विभक्ति के परे होने पर "उ" होता है; जैसे- ब्रह्मुना। ปุมกมฺมถามทฺธานํ วา สสฺมาสุ จ-. "पुम", "कम्म", "थाम" और "अद्धान" शब्दों को "स", "स्मा", "सु" और "ना" विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से "उ" होता है। ปุทีนมุ โหติ วา สสฺมาสุ นามฺหิ จ; ปุมุโน, ปุมสฺส; ปุมุนา, ปุมานา, ปุมุนา, ปุมานา; กมฺมุโน, กมฺมสฺส; กมฺมุนา กมฺมสฺมา; กมฺมุนา, กมฺมนา; ฐามุโน, ฐามสฺส;ฐามุนา, ฐามสฺมา; ฐามุนา, ฐาเมน; อทฺธุโน, อทฺธสฺส; อทฺธุนา, อทฺธสฺมา;อทฺธุนา, อทฺธนา. "पुम" आदि शब्दों को "स", "स्मा", "सु" और "ना" विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से "उ" होता है; जैसे- पुमुनो, पुमस्स; पुमुना, पुमाना, पुमुना, पुमाना; कम्मुनो, कम्मस्स; कम्मुना, कम्मस्मा; कम्मुना, कम्मना; ठामुनो, ठामस्स; ठामुना, ठामस्मा; ठामुना, ठामेन; अद्धुनो, अद्धस्स; अद्धुना, अद्धस्मा; अद्धुना, अद्धना। ยุวา สสฺสโน-. युवा शब्द के 'स' विभक्ति के परे होने पर 'इन' आदेश होता है। ยุวา สสฺสวา อิโน โหติ, ยุวิโน, ยุวสฺส. 'युवा' शब्द के 'स' विभक्ति के परे होने पर 'इन' आदेश होता है; जैसे—युविनो, युवस्स। โนตฺตาตุมา-. 'अत्त' और 'आतुम' शब्दों के 'स' विभक्ति के परे होने पर 'नो' आदेश होता है। อตฺตาตุเมหิ สสฺส โน โหติ วา; อตฺตโน, อตฺตสฺส; อาตุมโน, อาตุมสฺส. 'अत्त' और 'आतुम' शब्दों से परे 'स' विभक्ति को 'नो' आदेश विकल्प से होता है; जैसे—अत्तनो, अत्तस्स; आतुमनो, आतुमस्स। สุหิสุ นก-. 'सु' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'नक' आदेश होता है। อตฺตอาตุมานํ สุหิสุ วา นก โหติ; อตฺตเนสุ, อตฺเตสุ, อาตุมเนสุ, อาตุเมสุ; อตฺตเนหิ, อตฺเตหิ; อาตุมเนหิ, อาตุเมหิ–-กถํ?เวริเนสูติ-นก อิติ โยควิภาคา. 'अत्त' और 'आतुम' शब्दों के 'सु' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से 'नक' आदेश होता है; जैसे—अत्तनेसु, अत्तेसु, आतुमनेसु, आतुमेसु; अत्तनेहि, अत्तेहि; आतुमनेहि, आतुमेहि। 'वेरिनेसु'—यह 'नक' इस योग-विभाग से सिद्ध होता है। สฺมาสฺสนา พฺรหฺมา จ-. 'ब्रह्म' शब्द और 'अत्त', 'आतुम' शब्दों के 'स्मा' विभक्ति के परे होने पर 'ना' आदेश होता है। พฺรหฺม อตฺตอาตุเมหิ จ สฺมาสฺส นา โหติ; พฺรหฺมุนา, อตฺตนา, อาตุมนา. 'ब्रह्म', 'अत्त' और 'आतुम' शब्दों से परे 'स्मा' विभक्ति को 'ना' आदेश होता है; जैसे—ब्रहुना, अत्तना, आतुमना। อิเมตานเมนาณฺวาเทเส ทุติยายํ-. 'इम' और 'एत' शब्दों के अनुवादेश के विषय में द्वितीया विभक्ति में 'एन' आदेश होता है। อิมเอตสทฺทานํ กถิตานุกถนวิสเย ทุติยายเมนาเทโส โหติ; อิมํ ภิกฺขุํ วินยมชฺฌาปยอโถ เอนํ ธมฺมมชฺฌาปย, อิเม ภิกฺขู วินยมชฺฌาปย อโถ เอเน ธมฺมมชฺฌาปย; เอวเม ตสฺส จ โยชนียํ. 'इम' और 'एत' शब्दों के कथित के अनुकथन (अनुवादेश) के विषय में द्वितीया विभक्ति में 'एन' आदेश होता है; जैसे—'इस भिक्षु को विनय पढ़ाओ और फिर इसे (एनं) धर्म पढ़ाओ', 'इन भिक्षुओं को विनय पढ़ाओ और फिर इन्हें (एने) धर्म पढ़ाओ'; इसी प्रकार 'एत' शब्द का भी प्रयोग करना चाहिए। กิสฺส โก สพฺพาสุ-. 'कि' शब्द को सभी विभक्तियों में 'को' आदेश होता है। สพฺพาสุ วิภตฺติสุกิสฺสโก โหติ; โก, เก, กา, กาโย, กํ, กานิ, เกเนจฺจาทิ. सभी विभक्तियों में 'कि' शब्द को 'को' आदेश होता है; जैसे—को, के, का, कायो, कं, कानि, केन इत्यादि। กิ สสฺมึสุวานิตฺถิยํ-. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'कि' शब्द को 'स', 'स्मिं' और 'सु' विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से 'कि' आदेश होता है। อนิตฺถิยํ กิสฺส กิ วา โหติ สสฺมึสุ; กิสฺส, กสฺส, กิสฺมึ, กสฺมึ; อนิตฺถิยนฺติ-กึ? โก, กํ. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'कि' शब्द को 'स', 'स्मिं' और 'सु' विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से 'कि' आदेश होता है; जैसे—किस्स, कस्स, किस्मिं, कस्मिं। 'अस्त्रीलिंग' क्यों? जैसे—को, कं। อิมสฺสิทํ วา-. नपुंसक लिंग में 'इम' शब्द को 'अं' और 'सि' विभक्तियों के साथ विकल्प से 'इदं' आदेश होता है। อํสิสุ สห เตหิอิมสฺสิทํ โหติ วา นปุํสเก; อิทํ, อิมํ; อิทํ,อิมํ. नपुंसक लिंग में 'अं' और 'सि' विभक्तियों के साथ 'इम' शब्द को विकल्प से 'इदं' आदेश होता है; जैसे—इदं, इमं; इदं, इमं। อมุสฺสาทุํ-. नपुंसक लिंग में 'अमु' शब्द को 'अं' और 'सि' विभक्तियों के साथ विकल्प से 'अदुं' आदेश होता है। อํสิสุ สห เตหิ อมุสฺส อทุํ โหติ วา นปุํสเก; อทุํ, อมุํ; อทุํ, อมุํ. नपुंसक लिंग में 'अं' और 'सि' विभक्तियों के साथ 'अमु' शब्द को विकल्प से 'अदुं' आदेश होता है; जैसे—अदुं, अमुं; अदुं, अमुं। สุมฺภามฺภสฺสาสฺมา- 'अम्ह' शब्द को 'सु' विभक्ति के परे होने पर 'अस्मा' आदेश होता है। อหฺมสฺส อสฺมา โหติ วา สุมฺหิ; ภตฺตีรสฺมาสุ สา ตว; วาตฺเวว-อมฺเหสุ. 'अम्ह' शब्द को 'सु' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से 'अस्मा' आदेश होता है; जैसे—'भत्तीरस्मासु सा तव'; विकल्प होने से—'अम्हेसु' भी होता है। นมฺหิ ติจตุนฺตมิตฺถิยํ ติสฺสจตสฺสา-. स्त्रीलिंग में 'न' विभक्ति के परे होने पर 'ति' और 'चतु' शब्दों को क्रमशः 'तिस्स' और 'चतस्स' आदेश होते हैं। นมฺหิ ติจตุนฺนํ ติสฺสวตสฺสา โหนฺติตฺถิยํ ยถากฺกมํ; ติสฺสนฺนํ, วตสฺสนฺนํ; อิตฺถิยนฺติ-กึ? ติณฺณํ, จตุนฺนํ. स्त्रीलिंग में 'न' विभक्ति के परे होने पर 'ति' और 'चतु' शब्दों को क्रमशः 'तिस्स' और 'चतस्स' आदेश होते हैं; जैसे—तिस्सन्नं, चतस्सन्नं। 'स्त्रीलिंग' क्यों? जैसे—तिण्णं, चतुन्नं। ติสฺโสจตสฺโส โยมฺหิ สวิภตฺตีนํ-. วิภตฺติสหิตานํ ติวตุนฺนํ โยมฺหิ ติสฺโส จตสฺโส โหนฺติตฺถิยํ ยถากฺกมํ; ติสฺโส,จตสฺโส स्त्रीलिंग में विभक्ति सहित 'ति' और 'चतु' शब्दों को 'यो' विभक्ति के परे होने पर क्रमशः 'तिस्सो' और 'चतस्सो' आदेश होते हैं; जैसे—तिस्सो, चतस्सो। ตีณิจตฺตาริ นปุํสเก-. नपुंसक लिंग में 'ति' और 'चतु' शब्दों को 'यो' विभक्ति के परे होने पर क्रमशः 'तीणि' और 'चत्तारि' आदेश होते हैं। โยมฺหิสวิภตฺตีนํ ติจตุนฺนํ ยถากฺกมํตีณิ จตฺตาริ โหนฺติ นปุํสเก; ตีณิ, จตฺตาริ. नपुंसक लिंग में विभक्ति सहित 'ति' और 'चतु' शब्दों को 'यो' विभक्ति के परे होने पर क्रमशः 'तीणि' और 'चत्तारि' आदेश होते हैं; जैसे—तीणि, चत्तारि। ปุเม ตโยจตฺตาโร-. पुल्लिंग में 'ति' और 'चतु' शब्दों को 'यो' विभक्ति के परे होने पर क्रमशः 'तयो' और 'चत्तारो' आदेश होते हैं। โยมฺหิ สวิภตฺตีนํ ติจตุนฺนํ ตโยจตฺตาโร โหนฺติ ยถากฺกมํ ปุลฺลิงฺเค; ตโย, จตฺตาโร. पुल्लिंग में विभक्ति सहित 'ति' और 'चतु' शब्दों को 'यो' विभक्ति के परे होने पर क्रमशः 'तयो' और 'चत्तारो' आदेश होते हैं; जैसे—तयो, चत्तारो। จตุโรวา จตุสฺส-. पुल्लिंग में 'चतु' शब्द को 'यो' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से 'चतुरो' आदेश होता है। จตุสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส โยมฺภิ จตุโร วา โหติ ปุลฺลิงฺเค; จตุโร ชนา สํวิธาย; กถํ? จตุโร นิมิตฺเตนาทฺทสาสินฺติ ลิงฺควิปลฺลาสา. पुल्लिंग में विभक्ति सहित 'चतु' शब्द को 'यो' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से 'चतुरो' आदेश होता है; जैसे—'चतुरो जना संविधाय'; 'चतुरो निमित्तेनद्दसासिं'—यह लिंग-विपर्यास (लिंग परिवर्तन) के कारण है। มยมสฺมามฺหสฺส-. 'अम्ह' शब्द को 'यो' विभक्ति के परे होने पर 'मयं' आदेश होता है। เยยาสฺวมฺหสฺส สวิภตฺติสฺสอสฺมากํมมํ โหนฺติ วา ยถากฺกมํ; อสฺมากํ, อมฺหากํ; มมํ, มม. Ye और As विभक्तियों के परे होने पर 'Amha' शब्द को अपनी विभक्ति के साथ क्रमशः 'asmākaṃ' और 'mamaṃ' विकल्प से होते हैं; जैसे- asmākaṃ, amhākaṃ; mamaṃ, mama। สิมฺภหํ-. 'Si' विभक्ति के परे होने पर 'Amha' को 'ahaṃ' होता है। สิมฺหิ อมฺหสฺส สวิภตฺติสฺส อหํ โหติ; อหํ. 'Si' विभक्ति में 'Amha' शब्द को अपनी विभक्ति के साथ 'ahaṃ' होता है; जैसे- ahaṃ। ตุมฺหสฺส ตุวํตฺวมมฺหิ จ-. 'Am' विभक्ति में 'Tumha' शब्द को 'tuvaṃ' और 'tvaṃ' भी होते हैं। อมฺหี สิมฺหิ จ ตุหฺมสฺส สวิภตฺติสฺส ตุวํตฺวํ โหนฺติ ยถากฺกมํ; ตุวํ, ตฺวํ. 'Am' और 'Si' विभक्ति में 'Tumha' शब्द को अपनी विभक्ति के साथ क्रमशः 'tuvaṃ' और 'tvaṃ' होते हैं; जैसे- tuvaṃ, tvaṃ। ตยาตยีนํ ตฺวํ วา ตสฺส-. 'Tayā' और 'Tayi' में 'Ta' के स्थान पर विकल्प से 'Tva' होता है। ตุมฺหสฺสตยาตยีนํ ตการสฺสตฺว โหติ วา; ตฺวยา, ตยา; ตฺวยิ, ตยิ. 'Tumha' शब्द के 'Tayā' और 'Tayi' रूपों में 'त' कार के स्थान पर विकल्प से 'त्व' होता है; जैसे- tvayā, tayā; tvayi, tayi। สฺมามฺหิ ตฺวมฺหา-. 'Smā' विभक्ति में 'Tumha' को 'tvamhā' होता है। สฺมามฺหิ ตุมฺหสฺส สวิภตฺติสฺส ตฺวมฺหา โหติ วา; ปตฺตา นิสฺสํสยํ [ ] ตฺวมฺหา–-วาตฺเวว-ตฺวยา. 'Smā' विभक्ति में 'Tumha' शब्द को अपनी विभक्ति के साथ विकल्प से 'tvamhā' होता है; जैसे- tvamhā, tvayā। นฺตนฺตุนํ นฺโต โยมฺหิ ปฐเม-. प्रथमा 'Yo' विभक्ति में 'nt' प्रत्ययान्त शब्दों को 'nto' आदेश विकल्प से होता है। ปฐเม โยมฺหิ นฺตนฺตุนํ สวิภตฺตินํ นฺโต อิจฺจาเทโส วา โหติ; คจฺฉนฺโต, คจฺฉนฺตา; คุณวนฺโต, คุณวนฺตา. प्रथमा 'Yo' विभक्ति में 'nt' प्रत्ययान्त शब्दों को अपनी विभक्ति के साथ 'nto' ऐसा आदेश विकल्प से होता है; जैसे- gacchanto, gacchantā; guṇavanto, guṇavantā। ตํ นมฺหิ-. 'Nam' विभक्ति में 'nt' प्रत्ययान्त शब्दों को 'taṃ' होता है। นมฺหิ นฺตนฺตุนํ สวิภตฺตินํ ตํ วา โหติ; คจฺฉตํ, คจฺฉนฺตานํ; คุณวตํ, คุณวนฺตานํ. 'Nam' विभक्ति में 'nt' प्रत्ययान्त शब्दों को अपनी विभक्ति के साथ विकल्प से 'taṃ' होता है; जैसे- gacchataṃ, gacchantānaṃ; guṇavataṃ, guṇavantānaṃ। โตตาติตา สสฺมาสฺมึนาสุ-. 'Sa', 'Smā', 'Smiṃ' और 'Nā' विभक्तियों में क्रमशः 'to', 'tā', 'ti' और 'tā' होते हैं। สาทิสุนฺตนฺตุนํ สวิภตฺตินํ โตตาติตา โหนฺติ วา ยถากฺกมํ; คจฺฉโต, คจฺฉนฺตสฺส; คุณวโต, คุณวนฺตสฺส; คจฺฉตา, คจฺฉนฺตมฺหา; คุณวตา, คุณวนฺตมฺหา; คจฺฉติ, คจฺฉนฺเต;คุณวติ, คุณวนฺเต; คจฺฉตา, คจฺฉนฺเตน; คุณวตา, คุณวนฺเตน. 'Sa' आदि विभक्तियों में 'nt' प्रत्ययान्त शब्दों को अपनी विभक्ति के साथ क्रमशः 'to', 'tā', 'ti' और 'tā' विकल्प से होते हैं; जैसे- gacchato, gacchantassa; guṇavato, guṇavantassa; gacchatā, gacchantamhā; guṇavatā, guṇavantamhā; gacchati, gacchante; guṇavati, guṇavante; gacchatā, gacchantena; guṇavatā, guṇavantena। ฏฏาอํ เค-. 'Ge' (सम्बोधन) में 'nt' प्रत्ययान्त शब्दों को 'ṭa', 'ṭā' और 'aṃ' होते हैं। เค ปเร นฺตนฺตุนํ สวิภตฺตีนํ ฏฏาอํ อิจฺจาเทสา โหนฺติ; โภ คจฺฉ, โภ คจฺฉา, โภก คจฺฉํ; โภ คุณว, โภ คุณวา, โภ คุณวํ. 'Ge' (सम्बोधन) परे होने पर 'nt' प्रत्ययान्त शब्दों को अपनी विभक्ति के साथ 'ṭa', 'ṭā' और 'aṃ' ये आदेश होते हैं; जैसे- bho gaccha, bho gacchā, bho gacchaṃ; bho guṇava, bho guṇavā, bho guṇavaṃ। โยมฺหิ ทฺวินฺนํ ทุเวญฺเจ-. 'Yo' विभक्ति में 'dvi' को 'duve' और 'dve' होते हैं। โยมฺหิ ทฺวิสฺส สวิภตฺติสฺส ทุเวทฺเว โหนฺติ ปจฺเจกํ; ทุเว, ทฺเว. 'Yo' विभक्ति में 'dvi' शब्द को अपनी विभक्ति के साथ 'duve' और 'dve' प्रत्येक होते हैं; जैसे- duve, dve। ทุวินฺนํ นมฺหิ วา-. 'Nam' विभक्ति में 'dvi' को विकल्प से 'duvinnaṃ' होता है। นมฺหิ ทฺวิสฺส สวิภตฺติสฺส ทุวินฺนํ โหติ วา; ทุวินฺนํ, ทฺวินฺนํ. 'Nam' विभक्ति में 'dvi' शब्द को अपनी विभक्ति के साथ विकल्प से 'duvinnaṃ' होता है; जैसे- duvinnaṃ, dvinnaṃ। ราชสฺส รญฺญํ-. 'Nam' विभक्ति में 'Rāja' शब्द को 'raññaṃ' होता है। นมฺหิ ราชสทฺทสฺสสวิภตฺติสฺสรญฺญํ โหติ วา; รญฺญํ, รชานํ 'Nam' विभक्ति में 'Rāja' शब्द को अपनी विभक्ति के साथ विकल्प से 'raññaṃ' होता है; जैसे- raññaṃ, rajānaṃ। นาสฺมาสุ รญฺญา-. 'Nā', 'Smā' और 'Su' विभक्तियों में 'Rāja' को 'raññā' होता है। นาสฺมาสุ ราชสฺส สวิภตฺติสฺสรญฺญา โหติ, รญฺญา กตํ, รญฺญานิสฺสฏํ. 'Nā', 'Smā' और 'Su' विभक्तियों में 'Rāja' शब्द को अपनी विभक्ति के साथ 'raññā' होता है; जैसे- raññā kataṃ, raññā nissaṭaṃ। รญฺโญรญฺญสฺสราชิโน เส-. 'Sa' विभक्ति में 'Rāja' को 'rañño', 'raññassa' और 'rājino' होते हैं। เส ราชสฺส สวิภตฺติสฺส รญฺโญรญฺญสฺสราชิโน โหนฺตี; รญฺโญ, รญฺญสฺส, ราชิโน. 'Sa' विभक्ति में 'Rāja' शब्द को अपनी विभक्ति के साथ 'rañño', 'raññassa' और 'rājino' होते हैं; जैसे- rañño, raññassa, rājino। สฺมิมฺหิ รญฺเญราชินิ-. 'Smiṃ' विभक्ति में 'Rāja' को 'raññe' और 'rājini' होते हैं। สฺมิมฺหิ ราชสฺส สวิภตฺติสฺส รญฺเญราชินิ โหนฺติ; รญฺเญ,ราชินิ. 'Smiṃ' विभक्ति में 'Rāja' शब्द को अपनी विभक्ति के साथ 'raññe' और 'rājini' होते हैं; जैसे- raññe, rājini। สมาเส วา-. समास में विकल्प से होता है। สมาสวิสเย เอเต อาเทสา ราชสฺสวา โหนฺติ; กาสิรญฺญา, กาสิราเชน; กาสิรญฺญา, กาสิราชสฺมา; กาสิรญฺโญ, กาสิราชสฺส; กาสิรญฺเญ, กาสิราเช. समास के विषय में ये आदेश 'राज' शब्द के समान होते हैं; जैसे- कासिराञ्ञा, कासिराजेन; कासिराञ्ञा, कासिराजस्मा; कासिराञ्ञो, कासिराजस्स; कासिराञ्ञे, कासिराजे। สฺมิมฺหิ ตุมฺหามฺหานํตยิมยิ-. 'स्मिं' विभक्ति होने पर 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तयि' और 'मयि' आदेश होते हैं। สฺมิมฺหิ ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตยิมยิ โหนฺติ ยถากฺกมํ; ตยิ,มยยิ. 'स्मिं' विभक्ति होने पर विभक्ति सहित 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तयि' और 'मयि' आदेश होते हैं; जैसे- तयि, मयि। อมฺหิ ตํมํตวํมมํ-. 'अं' विभक्ति होने पर 'तं', 'मं', 'तवं', 'ममं' आदेश होते हैं। อมฺหิ ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตํมํตวํมมํ โหนฺติ ยถากฺกมํ; ตํ, มํ, ตวํ, มมํ. 'अं' विभक्ति होने पर विभक्ति सहित 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तं', 'मं', 'तवं', 'ममं' आदेश होते हैं; जैसे- तं, मं, तवं, ममं। นาสฺมาสุตยามยา-. 'ना' और 'स्मा' विभक्तियों में 'तया' और 'मया' आदेश होते हैं। นาสฺมาสุ ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตยามยา โหนฺติ ยถากฺกมํ; ตยา กตํ, มยา กตํ; ตยา นิสฺสฏํ, มยา นิสฺสฏํ. 'ना' और 'स्मा' विभक्तियों में विभक्ति सहित 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तया' और 'मया' आदेश होते हैं; जैसे- तया कतं, मया कतं; तया निस्सटं, मया निस्सटं। ตวมมตุยฺหํมยฺหํ เส-. 'स' विभक्ति होने पर 'तव', 'मम', 'तुय्हं', 'मय्हं' आदेश होते हैं। เสตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตวมมตุยฺหํมยฺหํ โหนฺติ ยถากฺกมํ; ตว, ตุยฺหํ; มม,มยฺหํ. 'स' विभक्ति होने पर विभक्ति सहित 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तव', 'तुय्हं' और 'मम', 'मय्हं' आदेश होते हैं; जैसे- तव, तुय्हं; मम, मय्हं। งํงกํ นมฺหิ-. 'नं' विभक्ति होने पर 'णं' और 'णाकं' आदेश होते हैं। นมฺหิ ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ งํงากํ โหนฺติ ปจฺเจกํ; ตุมฺหํ, ตุมฺหากํ, อมฺหํ, อมฺหากํ–-ยถาสงฺขฺยมตฺร น วิวจฺฉเต. 'नं' विभक्ति होने पर विभक्ति सहित 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर प्रत्येक के लिए 'णं' और 'णाकं' आदेश होते हैं; जैसे- तुम्हं, तुम्हाकं, अम्हं, अम्हाकं—यहाँ यथासंख्य (क्रमशः) विवक्षित नहीं है। ทุติเย โยมฺหิ วา-. द्वितीया विभक्ति के 'यो' होने पर विकल्प से (ये आदेश) होते हैं। ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ปจฺเจกํ งํงากํ วา โหนฺติ โยมฺหิ ทุติเย; ตุมฺหํ’ตุมฺหากํ, ตุมฺเห; อมฺหํ,อมฺหากํ,อมฺเห. द्वितीया विभक्ति के 'यो' होने पर विभक्ति सहित 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर प्रत्येक के लिए विकल्प से 'णं' और 'णाकं' आदेश होते हैं; जैसे- तुम्हं, तुम्हाकं, तुम्हे; अम्हं, अम्हाकं, अम्हे। อปาทาโท ปทเตกวากฺเย-. पाद (चरण) के आदि में न होने पर, पद के बाद और एक ही वाक्य में होने पर। อิทมธิกตํ เวทิตพฺพํ; ปชฺชเต’เนนตฺโถติ-ปทํ, สฺยาทฺยนฺตํ ตฺยาทฺยานฺตญฺจ; ปทสมูโห วากฺยํ. इसे अधिकार के रूप में जानना चाहिए; जिसके द्वारा अर्थ प्राप्त किया जाता है वह 'पद' है, जो 'सि' आदि (सुप्) और 'ति' आदि (तिङ्) प्रत्ययों से अंत होने वाला होता है; पदों का समूह 'वाक्य' है। โยนํหิสฺวปญฺจมฺยา โวโน-. पंचमी को छोड़कर 'यो', 'नं' और 'हि' विभक्तियों में 'वो' और 'नो' आदेश होते हैं। อปญฺจมิยา โยนํหิสฺวปาทาโท วตฺตมานานํ ปทสฺมา ปเรสํ เอกวากฺเย ฐิตานํ ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ โว โน โหนฺติ วา ยถากฺกมํ; ติฏฺฐถ โว, ติฏฺฐถ ตุมฺเห; ติฏฺฐาม โน, ติฏฺฐาม มยํ; ปสฺสติ โว, ปสฺสติ ตุมฺเห; ปสฺสติ โน, ปสฺสติอมฺเห; ทียเต โว, ทียเต ตุมฺหํ; ทียเต โน, पंचमी विभक्ति को छोड़कर 'यो', 'नं' और 'हि' विभक्तियों में, पाद के आदि में न रहने वाले, पद के बाद आने वाले और एक ही वाक्य में स्थित विभक्ति सहित 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'वो' और 'नो' आदेश विकल्प से होते हैं; जैसे- तिट्ठथ वो, तिट्ठथ तुम्हे; तिट्ठाम नो, तिट्ठाम मयं; पस्सति वो, पस्सति तुम्हे; पस्सति नो, पस्सति अम्हे; दीयते वो, दीयते तुम्हं; दीयते नो, ทียเต อมฺหํ; ธนํ โว, ธนํ ตุมฺหํ; ธนํ โน, ธนํ อมฺหํ; กตํ โว, กตํ ตุมฺเหหิ; กตํ โน, กตํ อมฺเหหิ–-อปญฺจมฺยาติ-กึ?นิสฺสฏํ ตุมฺเหหิ, นิสฺสฏํ อมฺเหหิ; อปาทาโทตฺเวว दीयते अम्हं; धनं वो, धनं तुम्हं; धनं नो, धनं अम्हं; कतं वो, कतं तुम्हेहि; कतं नो, कतं अम्हेहि—'अपञ्चम्या' (पंचमी को छोड़कर) क्यों कहा गया? निस्सटं तुम्हेहि, निस्सटं अम्हेहि; 'अपादादो' (पाद के आदि में न होने पर) ही क्यों? ‘‘พลญฺจ ภิกฺขูนมนุปฺปทินฺนํ,ตุมฺเหหิ ปุญฺญํ ปสุตํ อนปฺปกํ’’; “भिक्षुओं को बल प्रदान किया गया है, तुम्हारे द्वारा बहुत पुण्य अर्जित किया गया है।” ปทโตตฺเวว- ตุมฺเห ติฏฺฐถ; เอกวากฺเยตฺเวว- เทวทตฺโต ติฏฺฐติ คาเม, ตุมฺเห ติฏฺฐถนคเร; สวิภตฺตีนํตฺเวว- อรหติ ธมฺโม ตุมฺหาทินํ; อรหติ ธมฺโม อมฺหาทิสานํ. 'पदतो' (पद के बाद) ही क्यों?—तुम्हे तिट्ठथ; 'एकवाक्ये' (एक ही वाक्य में) ही क्यों?—देवदत्तो तिट्ठति गामे, तुम्हे तिट्ठथ नगरे; 'सविभत्तीनं' (विभक्ति सहित) ही क्यों?—अरहति धम्मो तुम्हादीनं; अरहति धम्मो अम्हादीसानं। เตเม นาเส-. 'ना' और 'स' विभक्तियों में 'ते' और 'मे' आदेश होते हैं। นามฺหิ เส จ อปาทาโท วตฺตมานานํ ปทสฺมา ปเรสํ เอก วากฺเย ฐิตานํ ตุมฺหอมฺภสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ เตเม วา โหนฺติ ยถากฺกมํ; กตํ เต, กตํ ตยา; กตํเม, กตํ มยา; ทียเต เต, ทียเต ตว; ทียเต เม, ทียยเต มม; ธนํ เต, ธนํเม, ธนํ มม. 'ना' और 'स' विभक्तियों में, पाद के आदि में न रहने वाले, पद के बाद आने वाले और एक ही वाक्य में स्थित विभक्ति सहित 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'ते' और 'मे' आदेश विकल्प से होते हैं; जैसे- कतं ते, कतं तया; कतं मे, कतं मया; दीयते ते, दीयते तव; दीयते मे, दीयते मम; धनं ते, धनं मे, धनं मम। อนฺวาเทเส-. अन्वादेश (पुनः कथन) के विषय में। กถิตานุกถนวิสเย ตุมฺหอมฺหสทฺทานมาเทสา นิจฺจํ ภวนฺติ ปุนพฺพิธานา; คาโม ตุมฺหํ ปริคฺคโห, อโถ ชนปโท โว ปริคฺคโห. कहे हुए को पुनः कहने (अन्वादेश) के विषय में 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के आदेश पुनः विधान के कारण नित्य होते हैं; जैसे- गामो तुम्हं परिग्गहो, अथो जनपदो वो परिग्गहो। สปุพฺพา ปฐมนฺตา วา-. पूर्व पद के विद्यमान होने पर प्रथमान्त पद के बाद विकल्प से होते हैं। วิชฺชมานปุพฺพสฺมา ปฐมนฺตา ปเรสํ ตุมฺหอมฺหสทฺทานมา เทสา วา โหนฺติ อนฺวาเทเส’ปิ; คาเม ปโฏ ตุมฺหากํ, อโถ นคเร กมฺพโล โว; อโถ นคเร กมฺพโล ตุมฺหากํ; สปุพฺพาติ-กึ? ปโฏ ตุมฺหากํ, อโถ กมฺพโล โว; ปฐ มนฺตาติ-กึ-ปโฏ นคเร ตุมฺหากํ, อโถ กมฺพโล คาเม โว. विद्यमान पूर्व पद वाले प्रथमान्त पद के बाद आने वाले 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के आदेश अन्वादेश में भी विकल्प से होते हैं; जैसे- गामे पटो तुम्हाकं, अथो नगरे कम्बलो वो; अथवा अथो नगरे कम्बलो तुम्हाकं; 'सपुब्बा' क्यों?—पटो तुम्हाकं, अथो कम्बलो वो; 'पठमन्ता' क्यों?—पटो नगरे तुम्हाकं, अथो कम्बलो गामे वो। น ววาหาเหวโยเค-. 'व', 'वा', 'ह', 'अह', 'एव' के योग में (ये आदेश) नहीं होते। จาทีหิ โยเค ตุมฺหอมฺหสทฺทานมาเทสา น โหนฺติ; คาโม ตว จ ปริคฺคโห, มม จ ปริคฺคโห; คาโม ตว วา ปริคฺคโห, มม วา ปริคฺคโห; คาโม ตวห ปริคฺคโห, มมห ปริคฺคโห; คาโม ตวาห ปริคฺคโห, มมาห ปริคฺค โห; คามา ตเวว ปริคฺคโห, มเมว ปริคฺคโห; เอวํ สพฺพตฺถ อุทาหรริตพฺพํ–-โยเคติ กึ? คาโมจ เต ปริคฺคโห, นครญฺจ เม ปริคฺคโห. 'च' आदि के योग में 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के आदेश नहीं होते हैं; जैसे- गामो तव च परिग्गहो, मम च परिग्गहो; गामो तव वा परिग्गहो, मम वा परिग्गहो; गामो तव ह परिग्गहो, मम ह परिग्गहो; गामो तवाह परिग्गहो, ममाह परिग्गहो; गामा तवेव परिग्गहो, ममेव परिग्गहो; इसी प्रकार सर्वत्र उदाहरण देना चाहिए—'योगे' क्यों?—गामो च ते परिग्गहो, नगरञ्च मे परिग्गहो। ทสฺสนตฺเถนาโลจเน-. दर्शनार्थक धातुओं के प्रयोग में, यदि वे 'आलोचन' (देखना) अर्थ में न हों। ทสฺสนตฺเถสุ อาโลจนวชฺชิเตสุ ปยุชฺชมาเนสุ ตุมฺห อมฺหสทฺทานมาเทสา น โหนฺติ; คาโม ตุมฺเห อุทฺทิสฺสาคโต, คาโม อมฺเห อุทฺทิสฺสาคโต–-อนาโลจเนติ-กึ? คาโม โว อาโลเวติ, คาโม โน อาโลเจติ. 'आलोचन' को छोड़कर अन्य दर्शनार्थक धातुओं के प्रयोग में 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के आदेश नहीं होते हैं; जैसे- गामो तुम्हे उद्दिस्सागतो, गामो अम्हे उद्दिस्सागतो—'अनालोचने' क्यों?—गामो वो आलोचेति, गामो नो आलोचेति। อามนฺตณํ ปุพฺพมสนฺตํว-. संबोधन (आमन्त्रण) पूर्व में होने पर अविद्यमान (लुप्त) के समान होता है। อามนฺตณํ ปุพฺพมวิชฺชมานํ วิย โหติ ตุมฺหอมฺหสทฺทาน มาเทสวิสเย; เทวทตฺต ตว ปริคฺคโห–-อามนฺตณนฺติกึ? กมฺพโล เต ปริคฺคโห; ปุพฺพนฺติ-กึ?’มเยตํ สพฺพ มกฺขาตํ ตุมฺหากํ ทฺวิชปุงฺควา’ ปรสฺส หิ [ ] อวิชฺชมานนฺตา อปาทาโทติ-ปฏิเสโธน สิยา? อิวาติ-กึ? สวนํ[ ] ยถา สิยา. 'तुम' (युष्मद्) और 'हम' (अस्मद्) शब्दों के आदेश के विषय में, पूर्व में स्थित संबोधन अविद्यमान के समान होता है; जैसे- 'देवदत्त! तव परिग्गहो' (देवदत्त! तुम्हारा परिग्रह)। 'संबोधन' क्यों कहा? 'कम्बलो ते परिग्गहो' (कम्बल तुम्हारा परिग्रह है)। 'पूर्व' क्यों कहा? 'मयेतं सब्ब मक्खातं तुम्हाकं द्विजपुङ्गवा' (हे द्विजश्रेष्ठों! मैंने यह सब तुम्हें बताया है)। यदि परवर्ती अविद्यमान होता, तो 'अपादादो' (पाद के आदि में न होने पर) से निषेध नहीं होता? 'इव' (समान) क्यों कहा? जिससे श्रवण (उच्चारण) यथावत रहे। น สามญฺญวจนเมกตฺเถ-. एक ही अर्थ में प्रयुक्त सामान्य वचन (संबोधन) अविद्यमान के समान नहीं होता। สมานาธิกรเณ ปรโต สามญฺญวจนมามนฺตณมสนฺตํ วิย น โหติ; มาณวก ชฏิลก เตปริคฺคโห–-ปรสฺสา วิชฺชมานตฺเต’ปิ ปุพฺพรูปมุปาทายาเทโส โหติ; สามญฺญ วจนนฺติ-กึ? เทวทตฺต มาณวก ตว ปริคฺคโห; เอกตฺเถติกึ? เทวทตฺต ยญฺญทตฺต ตุมฺหํ ปริคฺคโห. समानाधिकरण के बाद होने पर सामान्य वचन वाला संबोधन अविद्यमान के समान नहीं होता; जैसे- 'माणवक जटिलक! ते परिग्गहो' (हे जटिल माणवक! तुम्हारा परिग्रह)। यहाँ परवर्ती के अविद्यमान होने पर भी पूर्वरूप को लेकर आदेश होता है। 'सामान्य वचन' क्यों कहा? 'देवदत्त माणवक! तव परिग्गहो'। 'एक अर्थ में' क्यों कहा? 'देवदत्त यज्ञदत्त! तुम्हं परिग्गहो'। พหุสุ วา-. बहुवचन में प्रयुक्त संबोधन सामान्य वचन होने पर एक ही अर्थ में विकल्प से अविद्यमान के समान नहीं होता। พหุสุ วตฺตมานมามนฺตณํ สามญฺญวจนเมกตฺเถ อวิชฺชมานํ วิย วา น โหติ; พฺราหฺมณา คุณวนฺโต ตุมฺหากํ ปริคฺคโห; พฺราหฺมณา คุณวนฺโต โว ปริคฺคโห. बहुवचन में प्रयुक्त संबोधन सामान्य वचन होने पर एक ही अर्थ में विकल्प से अविद्यमान के समान नहीं होता; जैसे- 'ब्राह्मणा गुणवन्तो तुम्हाकं परिग्गहो' (हे गुणवान ब्राह्मणों! तुम्हारा परिग्रह) और 'ब्राह्मणा गुणवन्तो वो परिग्गहो'। อิติ โมคฺคลฺลาเน วฺยากรเณ วุตฺติยํ สฺยาทิกณฺโฑ ทุติโย. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में 'स्यादि' काण्ड का दूसरा भाग समाप्त हुआ। สฺยาทิ สฺยาทิเนกตฺถํ-. स्यादि-अन्त (विभक्ति-अन्त) पद दूसरे स्यादि-अन्त पद के साथ मिलकर एक अर्थ वाला (समास) होता है। สฺยาทฺยนฺตํ สฺยาทฺยานฺเตน สเหกตฺถํ โหตีติ-อิทมธิกตํ เวทิตพฺพํ; โส จ ภินฺนตฺถานเมกตฺถิภาโว สมาโสติ วุจฺจเต. स्यादि-अन्त पद का स्यादि-अन्त पद के साथ एक अर्थ होना—यह अधिकार समझना चाहिए; और वह भिन्न अर्थों का एक अर्थ हो जाना 'समास' कहलाता है। อสํขฺยํ วิภตฺติสมฺปตฺติสมีปสากลฺยาภาวยถา ปจฺฉายุคปทตฺเถ-. अव्यय (असंख्या) पद विभक्ति, समृद्धि, समीप, साकल्य (पूर्णता), अभाव, यथा, पश्चात् और युगपत् (एक साथ) के अर्थों में स्यादि-अन्त पद के साथ एक अर्थ वाला (समास) होता है। อสํขฺยํ สฺยฺยาทฺยนฺตํ วิภตฺยาทีนมตฺเถ วตฺตมานํ สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺถํ ภวติ; ตตฺถ วิภตฺยตฺเถ ตาว-อิตฺถิสุ กถา ปวตฺตา อธิตฺถิ–-สมฺปตฺติ ทฺวิธา อตฺตสมฺปตฺติ สมิทฺธิ จสมฺปนฺนํ พฺรหฺมํ สพฺรหฺมํ, ลิจฺฉวีนํ; สมิทฺธิ ภิกฺขานํ สุภิกฺขํ. สมีเป-กุมฺภสฺส สมีปมุปกุมฺภํ–-สากลฺเย-สติณมชฺโฌ หรติ; สาคฺคฺยธีเต–-อภาโว สมฺพนฺธิเภทา พหุวิโธ; ตตฺร อิทฺธาภาเว-วิคตา อิทฺธิ สทฺทิกานํ ทุสฺสทฺทิกํ; อตฺถาภาเว-อภาโว มกฺขิกานํ นิมฺมกฺขิกํ; อติกฺกมาภาเว-อติคตานิ ติณานิ นิตฺติณํ; สมฺปตาภาเว-อติคตํ ลหุปาปุรณํ อติ ลหุปาปุรณํ; ลหุปาปุรณสฺส นายมุปโภคกาโลติ อตฺโถ. ยยถาตฺโถ’เนกวิโธ; ตตฺร โยคฺคตายํ-อนุรูปํ สุรูโป วหติ; วิจฺฉายํ -อนฺวทฺธมาสํ; อตฺถานติวตฺติยํ- ยถาสตฺติ; สทิสตฺเต- สทิโส กิขิยา[ ] สกิขิ; อานุปุพฺพิยํ- อนุเชฏฺฐํ; ปจฺฉาตฺเถ [ -]อนุรถํ; ยุคปทตฺเถ-สจกฺกํ นิธิ. अव्यय (असंख्या) पद विभक्ति आदि के अर्थों में वर्तमान होने पर स्यादि-अन्त पद के साथ एक अर्थ वाला होता है। वहाँ विभक्ति के अर्थ में—स्त्रियों के विषय में कथा प्रवृत्त हुई 'अधित्थि' (अधिस्त्रि)। समृद्धि दो प्रकार की है—आत्म-समृद्धि और ऋद्धि; जैसे- ब्रह्म की समृद्धि 'सब्रह्मं'; लिच्छवियों की भिक्षा की समृद्धि 'सुभिक्खं'। समीप के अर्थ में—कुम्भ के समीप 'उपकुम्भं'। साकल्य (पूर्णता) में—तिनके सहित खाता है 'सतिणमज्झो'; अग्नि के अध्ययन तक 'साग्ग्यधीते'। अभाव संबंध-भेद से बहुविध है; वहाँ ऋद्धि के अभाव में—'दुस्सद्दिकं'; अर्थ के अभाव में—मक्खियों का अभाव 'निम्मक्खिकं'; अतिक्रमण के अभाव में—तिनकों का निकल जाना 'नित्तिणं'; सम्प्रति (वर्तमान काल) के अभाव में—हल्के ओढ़ने का समय बीत जाना 'अतिलहुपापुरणं'। 'यथा' का अर्थ अनेक प्रकार का है; वहाँ योग्यता में—'अनुरूपं'; वीप्सा (पुनरावृत्ति) में—'अन्वद्धमासं' (प्रत्येक पखवाड़े); अर्थ का अनतिक्रमण (शक्ति के अनुसार) में—'यथासत्ति'; सादृश्य में—'सकिक्खि'; आनुपूर्वी (क्रम) में—'अनुजेट्ठं'; पश्चात् के अर्थ में—'अनुरथं'; युगपत् (एक साथ) के अर्थ में—'सचक्कं' (चक्र के साथ)। ยถา น ตุลฺเย-. 'यथा' शब्द तुलना (सादृश्य) के अर्थ में स्यादि-अन्त पद के साथ एक अर्थ वाला (समास) नहीं होता। ยถาสทฺโทตุลฺยตฺเถ วตฺตมาโน สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺโถ น ภวติ; ยถา เทวทตฺโต ตถา ยญฺญทตฺโต. 'यथा' शब्द तुलना के अर्थ में प्रयुक्त होने पर स्यादि-अन्त पद के साथ एक अर्थ वाला नहीं होता; जैसे- 'यथा देवदत्तो तथा यज्ञदत्तो' (जैसा देवदत्त वैसा यज्ञदत्त)। ยาวาวธารเณ-. 'याव' शब्द अवधारणा (सीमा निर्धारण) के अर्थ में स्यादि-अन्त पद के साथ एक अर्थ वाला होता है। ยาวสทฺโท’วธารเณ วตฺตมาโน สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺโถ ภวติ; อวธารณเมตฺตกตา ปริจฺเฉโท; ยาวามตฺตํ พฺราหฺมเณ อามนฺตย; ยาวชีวํ–-อวธารเณติ-กึ, ยาว ทินฺนํตาว ภุตฺตํ นาวธารยามิ กิตฺตกํ มยา ภุตฺตนฺติ. 'याव' शब्द अवधारणा के अर्थ में प्रयुक्त होने पर स्यादि-अन्त पद के साथ एक अर्थ वाला होता है; अवधारणा का अर्थ है मर्यादा या सीमा। जैसे- 'यावामत्तं ब्राह्मणे आमन्तय' (जितने ब्राह्मण हों उन्हें आमंत्रित करो); 'यावजीवं' (जीवन भर)। 'अवधारणा' क्यों कहा? 'याव दिन्नं ताव भुत्तं' (जितना दिया उतना खाया), यहाँ यह निर्धारित नहीं है कि मैंने कितना खाया। ปยฺยปาพหิติโรปุเรปจฺฉาวา ปญฺจมฺยา-. परि, अप, आ, बहि, तिरो, पुरे और पच्छा—ये शब्द पंचमी विभक्ति वाले पद के साथ विकल्प से एक अर्थ वाले (समास) होते हैं। ปริอาทโย วญฺจมฺยนฺเตน สเหกตฺถา โหนฺติ วา; ปริ ปพฺพตํ วสฺสิ เทโว, ปริปพฺพตา; อปปพฺพตํ วสฺสิ เทโว, อป ปพฺพตา; อาปาฏลิปุตฺตํ วสฺสิเทโว, อาปาฏลิปุตฺตา; พหิคามํ, พหิคามา; ติโรปพฺพตํ, ติโรปพฺพตา; ปุเรภตฺตํ, ปุเรภตฺตา; ปจฺฉาภตฺตํ, ปจฺฉาภตฺตา–-เวตาธิกาโร 'परि' आदि शब्द पंचमी-अन्त पद के साथ विकल्प से एक अर्थ वाले होते हैं; जैसे- 'परि पब्बतं वस्सि देवो' या 'परि पब्बता' (पर्वत के चारों ओर वर्षा हुई); 'अप पब्बतं' या 'अप पब्बता'; 'आपाटलिपुत्तं' या 'आपाटलिपुत्ता'; 'बहिगामं' या 'बहिगामा'; 'तिरोपब्बतं' या 'तिरोपब्बता'; 'पुरेभत्तं' या 'पुरेभत्ता'; 'पच्छाभत्तं' या 'पच्छाभत्ता'। यहाँ 'वा' (विकल्प) का अधिकार है। สมีปายาเมสฺวนุ-. 'अनु' शब्द समीप और आयाम (विस्तार) के अर्थ में स्यादि-अन्त पद के साथ विकल्प से एक अर्थ वाला होता है। อนุสทฺโท สามีปฺเย อายาเม จ วตฺตมาโน สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺโถ โหตี วา; อนุวนมสนิ คตา; อนุคงฺคํ พาราณสี–-สมีปายาเมสฺวิติ-กึ, รุกฺขมนุวิชฺโชตเต วิชฺชุ. 'अनु' शब्द सामीप्य और आयाम के अर्थ में प्रयुक्त होने पर स्यादि-अन्त पद के साथ विकल्प से एक अर्थ वाला होता है; जैसे- 'अनुवनमसानि गता'; 'अनुगङ्गं बाराणसी' (गंगा के किनारे वाराणसी)। 'समीप और आयाम' क्यों कहा? 'रुक्खमनुविज्जोतते विज्जु' (बिजली वृक्ष पर चमकती है)। ติฏฺฐคฺวาทินิ-. 'तिट्ठगु' आदि शब्द (अव्ययीभाव समास के रूप में) निपातित किए जाते हैं। ติฏฺฐคุปฺปภุตีนิ, เอกตฺถิภาววิสเย นิปาตียนฺเต;’ติฏฺฐนฺตี คาโว ยสฺมึ กาเล’ติฏฺฐคุ, กาโล; วหคฺคุ, กาโล; อายติควํ, ขเลยวํ, ลูนยวํ, ลูยมานยวมิจฺจาทิ–-วฺยนฺโต’เปตฺถ; เกสาเกสิ; ทณฺฑาทณฺฑิ–-ตถา เวลาปฺปภาวนตฺโถ’ปิ; ปาโต นหานํ ปาตนหานํ; สายํ นหานํ สายนหานํ; ปาตกาลํ, สายกาลํ; ปาตเมฆํ, สายเมฆํ; ปาตมคฺคํ, สายมคฺคํ. 'तिट्ठगु' आदि शब्द एकार्थीभाव (समास) के विषय में निपातित किए जाते हैं; जैसे- 'तिट्ठन्ति गावो यस्मिं काले' (जिस समय गायें खड़ी होती हैं) वह 'तिट्ठगु' काल है; 'वहग्गु' काल; 'आयतिगवं', 'खलेयवं', 'लूनयवं', 'लूयमानयवं' इत्यादि। यहाँ 'वि' प्रत्ययान्त भी होते हैं; जैसे- 'केसाकेसि' (बालों-बालों की लड़ाई), 'दण्डादण्डि' (लाठी-लाठी की लड़ाई)। इसी प्रकार समय को बताने वाले अर्थ में भी; जैसे- 'पात नहानं' (प्रातः स्नान), 'साय नहानं' (सायं स्नान), 'पातकल्लं', 'सायकल्लं', 'पातमेघं', 'सायमेघं', 'पातमग्गं', 'सायमग्गं'। โอเรปริปฏิปาเรมชฺเฌเหฐุทฺธาโธนฺโต วา ฉฏฺฐียา-. ओर, परि, पटि, पार, मज्झ, हेट्ठा, उद्ध, अध और अन्तो—ये शब्द षष्ठी विभक्ति वाले पद के साथ विकल्प से एक अर्थ वाले होते हैं। โอราทโย สทฺทา ฉฏฺฐิยนฺเตน สเหกตฺถา วา โหนฺติ; เอการนฺตตฺตํ นิปาตนโต–-โอเรคงฺคํ; อุปริสิขรํ; ปฏิ โสตํ; ปาเรยมุนํ; มชฺเฌคงฺคํ; เหฏฺฐาปาสาทํ; อุทฺธคงฺคํ; อโธคงฺคํ; อนฺโตปาสาทํ–-ปุน วาวิธานา คงฺคาโอรมิจฺจา ทิปิ โหติ. 'ओर' आदि शब्द षष्ठी-अन्त पद के साथ विकल्प से एक अर्थ वाले होते हैं; निपातन से एकारान्त भाव होता है—जैसे 'ओरेगङ्गं'; 'उपरिसिखरं'; 'पटिसोतं'; 'पारेयमुनं'; 'मज्झेगङ्गं'; 'हेट्ठापासादं'; 'उद्धगङ्गं'; 'अधोगङ्गं'; 'अन्तोपासादं'। पुनः 'वा' (विकल्प) के विधान से 'गङ्गाओरं' आदि भी होता है। ตํ นปุํสกํ-. वह (अव्ययीभाव समास) नपुंसक लिंग होता है। ยเทตมตกฺกนฺตเมกตฺถํ ตํ นปุํสกลิงฺคํ เวทิตพฺพํ; ตถา เวโวทาหฏํ; วา กฺวจิ พหุลาธิการา–-ยถาปริสํ, ยถา ปริสาย; สกาย สกาย ปริสายาติ อตฺโถ. जो यह एकार्थीभाव (समास) कहा गया है, उसे नपुंसक लिंग समझना चाहिए; जैसा कि उदाहरणों में दिखाया गया है। 'बहुला' के अधिकार से कहीं विकल्प से भी होता है—जैसे 'यथापरिसं' या 'यथा परिसाय'; जिसका अर्थ है 'अपनी-अपनी परिषद में'। อมาทิ-. 'अं' (द्वितीया) आदि विभक्तियों के अन्त वाले पद दूसरे स्यादि-अन्त पद के साथ बहुलता से एक अर्थ वाले (समास) होते हैं। อมาทิสฺยาทฺยนฺตํ สฺยาทฺยานฺเตน สห พหุลเมกตฺถํ โหติ;’คามํ คโต’ คามคโต;’มุหุตฺตํ สุขํ’ มุหุตฺตสุขํ. วุตฺติเย โวปปทสมาเส-กุมฺภกาโร; สปาโก; ตนฺตวาโย; จรา หโร–-นฺตมานกฺตวนฺตุหิ วากฺยเมว; ธมฺมํ สุณนฺโต; ธมฺมํ สุณมาโน; โอทนํ ภุตฺตวา.’ 'अं' आदि स्यादि-अन्त पद दूसरे स्यादि-अन्त पद के साथ बहुलता से एक अर्थ वाले होते हैं; जैसे- 'गामं गतो' (गाँव को गया) 'गामगतो'; 'मुहुत्तं सुखं' (मुहूर्त भर का सुख) 'मुहुत्तसुखं'। वृत्ति में उपपद समास में भी—'कुम्भकारो'; 'सपाको'; 'तन्तवायो'; 'चरा हरो'। 'न्त', 'मान' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के साथ केवल वाक्य ही होता है (समास नहीं); जैसे- 'धम्मं सुणन्तो'; 'धम्मं सुणमानो'; 'ओदनं भुत्तवा'। รญฺญา หโต’ ราชหโต;’อสินา ฉินฺโน’ อสิจฺฉินฺโน; ปิตุสทิโส; ปิตุสโม; สุขสหคตํ;’ทธินา อุปสิตฺตํ โภชนํ’ทธิโภชนํ;’คุเฬน มิสฺโส โอทโน’ คุโฬทโน. วุตฺติ ปเทเนโวปสิตฺตาทิกฺริยายาขฺยาปนโต นตฺถายุตฺตตฺถตา. 'रञ्ञा हतो' (राजा द्वारा मारा गया) 'राजहतो'; 'असिना छिन्नों' (तलवार से काटा गया) 'असिच्छिन्नो'; 'पितुसदिसो' (पिता के समान); 'पितुसमो'; 'सुखसहगतं'; 'दधिना उपसित्तं भोजनं' (दही से सींचा हुआ भोजन) 'दधिभोजनं'; 'गुळेन मिस्सो ओदनो' (गुड़ से मिश्रित भात) 'गुळोदनो'। वृत्ति पद से ही 'उपसिक्त' आदि क्रियाओं का बोध हो जाने से यहाँ अर्थ की अयुक्ति (असंगति) नहीं है। กฺววิ วุตฺติเยว; อุรโค ปาทโป–-กฺววิ วากฺยเมว; ผรสุนา ฉินฺนวา; ทสฺสเนน ปหาตพฺพา.’ कहीं केवल वृत्ति (समास) ही होती है; जैसे- उरग (छाती से चलने वाला), पादप (पैर से पीने वाला)। कहीं केवल वाक्य ही होता है; जैसे- 'फरसे से काटा हुआ'; 'दर्शन से त्यागने योग्य'। พุทฺธสฺสเทยฺยํ’ พุทฺธเทยฺยํ;’ยูปาย ทารุ’ ยูปทารุ;’รชนาย โทณิ’ รชนโทณิ; อิธ น โหติ-สงฺฆสฺส ทาตพฺพํ–-กถํ, เอตทตฺโถ เอตทตฺถนฺติ-อญฺญปทตฺเถ ภวิสฺสติ.’ 'बुद्धस्स देय्यं' (बुद्ध को देने योग्य) बुद्धदेय्यं; 'यूपाय दारु' (यूप के लिए लकड़ी) यूपदारु; 'रजनाय दोणि' (रंगने के लिए द्रोणी) रजनदोणि; यहाँ नहीं होता- 'संघस्स दातब्बं' (संघ को देना चाहिए)। 'एतदत्थो' कैसे? यह 'एतदत्थं' अन्यपदार्थ (बहुव्रीहि) में होगा। สวเรหิ ภยํ’ สวรภยํ; คามนิคฺคโต, เมถุนาเปโต. กฺวจิ วุตฺติเยว; กมฺมชํ, จิตฺตชํ–-อิธ น โหติ-รุกฺขา ปติโต.’ 'सवरेहि भयं' (शबरों से भय) सवरभयं; गामनिग्गतो (गाँव से निकला हुआ), मेधुनापेतो (मैथुन से दूर)। कहीं केवल वृत्ति ही होती है; जैसे- कम्मजं (कर्म से उत्पन्न), चित्तजं (चित्त से उत्पन्न)। यहाँ नहीं होता- 'रुक्खा पतितो' (वृक्ष से गिरा हुआ)। รญฺโญ ปุริโส’ ราชปุริโส–-พหุลาธิการา นฺตมาน นิทฺธาริยปูรณภาวติตฺตตฺเถหิ น โหติ; มมานุกุพฺพํ; มมานุ กุรุมาโน; คุนฺนํ กณฺหา สมฺปนฺนขีรตมา; สิสฺสานํ ปญฺจโม; ปฏสฺส สุกฺกตา–-กฺวจิ โหเตว; วตฺตมานสามีปฺยํ–-กถํ พฺราหฺมณสฺส สุกฺกา ทนฺตาติ-สาเปกฺขตาย น โหติ–-อิธ ปนโหเตว จนฺทนคนฺโธ; นทีโฆโส; กญฺญารูปํ; กายสมฺผสฺโส?ผลรโสติ [ –-]ผลานํติตฺโต; ผลานมาสิโต[ ] ผลานํ สุหิโต; พฺราหฺมณสฺสฺौจฺจํ เคหนฺติ; สาเปกฺข ตาย น โหติ–-รญฺโญปาฏลิปุตฺตกสฺสธนนฺติ–-ธน สมฺพนฺเธ ฉฏฺฐีติ ปาฏลิปุตฺตกฺैนสมฺพนฺธาภาวา นเหสฺสติ; รญฺโญ’โคว อสฺโส จ ปุริโส จา’ติ ภีนฺนตฺถตายํ [ ] วากฺย เมว–-’รญฺโญ ควาสฺสปุริสา ราชควาสฺสปุริสาติ วุตฺติ โหเตเวกตฺถิภาเว.’ทาเนโสณฺโฑ’ ทานโสณฺโฑ; ธมฺมรโต; ทานภิรโต–-กฺวจิวุตฺติเยว; กุจฺฉิสโย; ถลฏฺโฐ; ปงฺกชํ; สโรรุหํ อิธ น โหติ โภชเน มตฺตญฺญุตา; อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารตา; อาสเน นิสินฺโน อาสเน นิสีทิตพฺพํ. 'रञ्ञो पुरिसो' (राजा का पुरुष) राजपुरिसो; 'बहुला' के अधिकार से -न्त, -मान, निर्धारण, पूरण, भाव और तृप्त अर्थों में समास नहीं होता है; जैसे- ममानुकुब्बं; ममानु कुरुमानो; गुन्नं कण्हा सम्पन्नखीरतमा (गायों में काली सबसे अधिक दूध देने वाली); सिस्सानं पञ्चमो (शिष्यों में पाँचवाँ); पटस्स सुक्कता (वस्त्र की सफेदी)। कहीं होता ही है; वर्तमान सामीप्य में—'ब्राह्मणस्स सुक्का दन्ता' (ब्राह्मण के दाँत सफेद हैं) कैसे? सापेक्षता के कारण यहाँ नहीं होता। यहाँ तो होता ही है—चन्दनगन्धो (चन्दन की गन्ध); नदीघोसो (नदी का घोष); कञ्ञारूपं (कन्या का रूप); कायसम्फस्सो (काय-स्पर्श)। 'फलरसो'—फलों से तृप्त; फलों का आश्रित; फलों से सुहित। 'ब्राह्मणस्सोच्चं गेहं' (ब्राह्मण का ऊँचा घर); सापेक्षता के कारण नहीं होता। 'रञ्ञो पाटलिपुत्तकस्स धनं' (पाटलिपुत्रक राजा का धन)—यहाँ धन के सम्बन्ध में षष्ठी है, पाटलिपुत्रक के साथ सम्बन्ध न होने से समास नहीं होगा। 'रञ्ञो गावो अस्सो च पुरिसो च' (राजा की गायें, घोड़ा और पुरुष)—भिन्न अर्थ होने के कारण केवल वाक्य ही है। 'रञ्ञो गवास्सपुरिसा' या 'राजगवास्सपुरिसा'—एकत्व भाव होने पर वृत्ति (समास) होती ही है। 'दाने सोण्डो' (दान में शौण्ड/मस्त) दानसोण्डो; धम्मरतो (धर्म में रत); दानाभिरतो (दान में अभिरत)। कहीं केवल वृत्ति ही होती है; जैसे- कुच्छिसयो (कोख में सोने वाला); थलट्ठो (थल पर स्थित); पङ्कजं (कीचड़ में उत्पन्न); सरोरुहं (सरोवर में उत्पन्न)। यहाँ नहीं होता—भोजने मत्तञ्ञुता (भोजन में मात्रा को जानना); इन्द्रियेसु गुत्तद्वारता (इन्द्रियों में गुप्तद्वारता); आसने निसिन्नो (आसन पर बैठा हुआ); आसने निसीदितब्बं (आसन पर बैठना चाहिए)। วิเสสนเมกตฺเถน-. विशेषण का एक अर्थ वाले के साथ (समास होता है)। วิเสสนํ สฺยาทฺยนฺตํ วิเสสฺเสน สฺยาทฺยานฺเตน สมานาธิกรเณนสเหกตฺถํ โหติ;’นีลญฺจ ตํ อุปฺปลญฺเจ’ติ นิลุปฺปลํ,’ฉินฺนญฺจ ตํ ปรูฬฺหญฺเจ’ติ ฉินฺนปรูฬฺหํ; สตฺถิว สตฺถี,’สตฺถี จ สาสามา เจ’ติ สตฺถิสามา; สีโหว สีโห,’มุนิ จ โสสีโห วา’ติมุนิสีโห;’สีลเมว ธนํ’ สีลธนํ–-กฺจิ วากฺยเมว, ปุณฺโณ มนฺตาณิปุตฺโต; จิตฺโต คหปติ.–-กฺวจิ วุตฺติเยว; กณฺหสปฺโป; โลหิตสาลิ. วิเสสนนฺติ-กึ? ตจฺฉโก สปฺโป. เอกตฺเถเนติ-กึ? กาฬมฺหา อญฺโญ–-กถํ, ปตฺต ชีวิโก อาปนฺนชีวิโก[ ] มาสชาโตติ-อญฺญปทตฺเถ ภวิสฺสติ. सुबन्त विशेषण का समान अधिकरण वाले सुबन्त विशेष्य के साथ एक अर्थ (समास) होता है; जैसे—'नीलञ्च तं उप्पलञ्च' (वह जो नीला है और उत्पल है) नीलुपलं; 'छिन्नञ्च तं परूळ्हञ्च' (जो कटा हुआ और बढ़ा हुआ है) छिन्नपरूळ्हं; सस्थि ही सस्थि, 'सत्थी च सा सामा च' (वह जो सस्थि है और श्यामा है) सस्थिसामा; सिंह ही सिंह, 'मुनि च सो सीहो वा' (वह जो मुनि है और सिंह है) मुनिसीहो; 'सीलमेव धनं' (शील ही धन है) सीलधनं। कहीं केवल वाक्य ही होता है; जैसे—पुण्णो मन्ताणिपुत्तो; चित्तो गहपति। कहीं केवल वृत्ति ही होती है; जैसे—कण्हसप्पो (काला साँप); लोहितसालि (लाल धान)। 'विशेषण' क्यों कहा? तच्छको सप्पो (बढ़ई साँप)। 'एक अर्थ' क्यों कहा? काले से अन्य। 'पत्तजीविको', 'आपन्नजीविको', 'मासजातो' कैसे? ये अन्यपदार्थ (बहुव्रीहि) में होंगे। นญ-. 'नञ्' (निषेधवाचक अव्यय) का (समास होता है)। นญิจฺเจตํ สฺยาทฺยนฺตํ สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺถํ โหติ; น พฺราหฺมโณ อพฺราหฺมโณ–-พหุลาธิการโต อสมตฺเถหิปิ เกหิจิ โหติ; อปุนเคยฺยา, คาถา–-อโนกาสํ กาเรตฺวา อมูลามูลํ คนฺตฺวา–-อีสกฬาโร อีสปิงฺคโลติ-สฺยาทิ สฺยาทิเนกตฺถนฺติ สมาโส; วากฺยเมว วาติปฺปสงฺคาภาวา. यह 'नञ्' सुबन्त के साथ एक अर्थ (समास) वाला होता है; जैसे—'न ब्राह्मणो' अब्राह्मणो। 'बहुला' के अधिकार से कुछ असमर्थों के साथ भी होता है; जैसे—अपुनगेय्या गाथा; अनोकासं कारेत्वा; अमूलामूलं गन्त्वा। 'ईसकळारो', 'ईसपिङ्गलो'—यहाँ सुबन्त का सुबन्त के साथ एक अर्थ होने से समास है; अतिप्रसंग के अभाव के कारण यहाँ केवल वाक्य ही है। กุปาทโย นิจฺจมสฺยาทิวิธิมฺหิ-. 'कु' शब्द और 'प्र' आदि का सुबन्त के साथ नित्य समास होता है, 'अस्यादि' विधि को छोड़कर। กุสทฺโท ปาทโย จ สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺถา โหนฺติ นิจฺจํ สฺยทิวิธิวิสยโต’ญฺญตฺถ;’กุจฺฉิโต พฺราหฺมโณ’ กุพฺราหฺมโณ,’อีสกํ อุณฺหํ’ กทุณฺหํ; ปนายโก, อภิเสโก, ปกริตฺตฺวา, ปกตํ, ทุปฺปุริโส, ทุกฺกตํ, สุปุริโส, สุกตํ, อภิตฺถุตํ, อติตฺถุตํ, อากฬาโร, อาพทฺโธ. ปาทโย คตาทฺยตฺเถ ปฐมาย()’ ปคโต อาจริโย’ ปาจริโย; ปนฺเตวาสี–-อจฺจาทโย กนฺตาทฺยตฺเถ ทุติยาย;()’อติกฺกนฺโต มจ’มติมญฺโจ; อติมาโล. อวาทโย กุฏฺฐาทฺยตฺเถ ตติยาย;()’อวกุฏฺฐํ โกกิลาย วน’มวโกกิลํ; อวมยยูรํ. ปริยาทโย คิลานาทฺยตฺเถ จตุตฺถิยา; ()’ปริคิล โน’ชฺเฌนาย’ ปริยชฺเฌโน–-นฺยาทโย กนฺนาทฺยตฺเถ ปญฺจมิยา()’นิกฺขนฺโตโกสมฺพิยา’ นิกฺโกสมฺพิ–-อสฺยาทิวิธิมฺหีติ กึรุกฺขมฺปติ วิชฺโชตเต. 'कु' शब्द और 'प्र' आदि सुबन्त के साथ नित्य एक अर्थ (समास) वाले होते हैं, सुबन्त विधि के विषय से अन्यत्र; जैसे—'कुच्छितो ब्राह्मणो' (कुत्सित ब्राह्मण) कुब्राह्मणो; 'ईसकं उण्हं' (थोड़ा गर्म) कदुण्हं; पनायको, अभिसेको, पकरित्वा, पकतं, दुप्पुरिसो, दुक्कतं, सुपुरिसो, सुकतं, अभित्थुतं, अतित्थुतं, आकळारो, आबद्धो। 'प्र' आदि का 'गत' आदि अर्थों में प्रथमा के साथ; जैसे—'पगतो आचरियो' (गया हुआ आचार्य) पाचरियो; पन्तेवासी। 'अति' आदि का 'क्रान्त' आदि अर्थों में द्वितीया के साथ; जैसे—'अतिक्कन्तो मञ्चं' (मंच को लाँघ गया) अतिमञ्चो; अतिमालो। 'अव' आदि का 'कुष्ट' आदि अर्थों में तृतीया के साथ; जैसे—'अवकुट्ठं कोकिलाय वनं' (कोयल द्वारा कूजित वन) अवकोकिलं; अवमययूरं। 'परि' आदि का 'ग्लान' आदि अर्थों में चतुर्थी के साथ; जैसे—'परिगिलानो अज्झेनाय' (अध्ययन के लिए थका हुआ) परियज्झेनो। 'नि' आदि का 'क्रान्त' आदि अर्थों में पञ्चमी के साथ; जैसे—'निक्खन्तो कोसम्बिया' (कोशाम्बी से निकला हुआ) निक्कोसम्बि। 'अस्यादि विधि में' क्यों कहा? 'रुक्खं पति विज्जोतते' (वृक्ष की ओर चमकता है)। จี กฺริยตฺเถหิ-. 'ची' प्रत्ययान्त का क्रियार्थक सुबन्तों के साथ एक अर्थ (समास) होता है। จีปฺปจฺจยนฺโต กฺริยตฺเถหิ สฺยทฺยนฺเตหิ สเหกตฺโถ โหติ; มลินี กริย. 'ची' प्रत्ययान्त का क्रियार्थक सुबन्तों के साथ एक अर्थ (समास) होता है; जैसे—मलिनी करिय (मैला करके)। ภุสนาทรานาทเรสฺวลํสาสา-. भूषण, आदर और अनादर अर्थों में 'अलम्' आदि शब्द क्रियार्थक सुबन्तों के साथ एक अर्थ (समास) वाले होते हैं। ภุสนาทิสฺวตฺเถสฺวลมาทโย สทฺทา กฺริยาตฺเถหิ สฺยาทฺยนฺเตหิ สเหกตฺถา โหนฺติ; อลํกริย; สกฺกจฺจ; อสกฺกจฺจ–-ภุสนาทีสูติ-กึ? อลํ ภุตฺวา คโต; สกฺกตฺวา คโต; อสกฺกตฺวา คโต; ปริยตฺตํ โสภนมโสภนนฺติ อตฺโถ. भूषण आदि अर्थों में 'अलम्' आदि शब्द क्रियार्थक सुबन्तों के साथ एक अर्थ (समास) वाले होते हैं; जैसे—अलङ्करिय (अलंकृत करके); सक्कच्च (सत्कार करके); असक्कच्च (बिना सत्कार किए)। 'भूषण आदि में' क्यों कहा? 'अलं भुत्वा गतो' (पर्याप्त खाकर गया); 'सक्कतवा गतो' (सत्कार करके गया); 'असक्कतवा गतो' (सत्कार न करके गया); यहाँ अर्थ 'पर्याप्त', 'शोभन' और 'अशोभन' है। อญฺเญ จ-. और अन्य शब्द भी (समास होते हैं)। อญฺเญ จ สทฺทา กฺริยตฺเถหิ สฺยาทฺยนฺเตหิ สห พหุลเมกตฺถา ภวนฺติ; ปุโรภุย; ติโรภุย;ติโรกริย; อุรสิกริย; มนสิกริย; มชฺเฌกริย; ตุณฺหิภุย. और अन्य शब्द भी क्रियार्थक सुबन्तों के साथ बहुलता से एक अर्थ (समास) वाले होते हैं; जैसे—पुरोभुय (आगे होकर); तिरोभुय (तिरोभूत होकर); तिरोकरिय (ओझल करके); उरसिकरिय (हृदय में रखकर); मनसिकरिय (मन में रखकर); मज्झेकरिय (बीच में करके); तुण्हीभुय (मौन होकर)। วาเนกญฺญตฺเถ-. अन्य अर्थ में विकल्प से अनेक (पदों का समास होता है)। อเนกํ สฺยาทฺยนฺตมญฺญสฺส ปทสฺสตฺเถ เอกตฺถํ วา โหติ; พหูนิ ธนานิ ยสฺสโส’พหุธโน;’ลมฺพา กณฺณา ยสฺส โส’ ลมฺพกณฺโณ;’วชิรํ ปาณิมฺหิ ยสฺสโส’ยํ’ วชิรปาณิ;’มตฺตาพหโว มาตงฺคา เอตฺถ’ มตฺตพหุมาตงฺคํ, วนํ;’อารูฬฺโห วานโรยํ รุกฺขํ โส’ อารูฬฺหวานโร;’ชิตานิ อินฺทฺริยานิ เยนโส’ ชิตินฺทฺริโย;’ทินฺนํ โภชนํ ยสฺสโส’ ทินฺนโภชโน;’อปคตํ กาฬกํ ยสฺมา ปฏา โส’ย’ มปคตกาฬโก;’อุปคตาทส เยสํ เต’ อุปทสา; อาสนฺนทสา; อทูรทสา? อธิก ทสา;’ตโย ทส ปริมาณเมสํ) ติทสา–-กถํ, ทสสทฺโทสํ ขฺยาเน วตฺตเต ปริมาณสทฺทสนฺนิธานา, ยถา-ปญฺจปริมาณ เมสํ’ ปญฺจกา สกุณาติ; ทฺเว วา ตโย วาปริมาณเมส’ทฺวตฺตโย;วาสทฺทตฺเถ วา-’เว วา ตโย วา’ ทฺวตฺตโย–-’ทกฺขิณสฺสา จ ปุพฺพสฺสา จ ทิสาย ยทนฺตราฬํ’ ทกฺขิณปุพฺพา, ทินา;’ทกฺขิณา วสา ปุพฺพา จา’ติ วา;’สห ปุตฺเตนาคโต’ สปุตฺโต สโลมโก, วิชฺชมานโลมโกติ อตฺโถ เอวํ สปกฺขโก; อตฺถิขีรา, พฺราหฺมณิติ-อตฺถิสทฺโท วิชฺชมานตฺเถ นิปาโต–-กฺวจิ คตตฺถตาย ปทนฺตรานมปฺปโยโค, กณฺฐฏฺฐา กาฬา อสฺส กณฺเฐกาโฬ; [ ] โอฏฺฐมุขมิจ มุขมสฺสโอฏฺฐมุโข; เกสสงฺฆาโต จูฬา อสฺส เกสจูโฬ; สุวณฺณวิกาโร อลงฺกาโร อสฺสสุวณฺณาลงฺกาโร;’ ปปติตํ ปณฺณมสฺส’ ปปติตปณฺโณ, ปปณฺโณ;’อวิชฺชมานา ปุตฺตา อสฺส’ อวิชฺชมานปุตฺโต;’น สนฺติ ปุตฺตา อสฺส’ อปุตฺโต–-กฺวจิ น โหติปญฺจภุตฺตวนฺโต อสฺส, ภาตุโน ปุตฺโต อสฺส อตฺถิติ พหุลาธิการโต. अनेक सुबन्त पद अन्य पद के अर्थ में विकल्प से एक पद (समास) होते हैं; जिसके बहुत धन हैं वह 'बहुधन'; जिसके कान लंबे हैं वह 'लम्बकण्ण'; जिसके हाथ में वज्र है वह 'वजिरपाणि'; जहाँ बहुत मतवाले हाथी हैं वह 'मत्तबहुमातङ्ग' वन; जिस वृक्ष पर वानर चढ़ा है वह 'आरूळ्हवानर'; जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है वह 'जितेन्द्रिय'; जिसे भोजन दिया गया है वह 'दिन्नभोजन'; जिससे कालापन दूर हो गया है वह 'अपगतकाळक' वस्त्र; जो दस के समीप हैं वे 'उपदस'; जो दस के निकट हैं 'आसन्नदस'; जो दस से दूर नहीं हैं 'अदूरदस'; जो दस से अधिक हैं 'अधिक्क दस'; जिनका परिमाण तीन दस है वे 'तिदस' - यह कैसे, 'दस' शब्द संख्यावाचक है और परिमाण शब्द के सान्निध्य से 'तिदस' बना है, जैसे 'पञ्चक' पक्षी जिनका परिमाण पाँच है; दो या तीन जिनका परिमाण है वे 'द्वत्तय'; 'वा' शब्द के अर्थ में भी - 'दो या तीन' 'द्वत्तय'; दक्षिण और पूर्व दिशा के बीच का जो अन्तराल है वह 'दक्खिणपुब्बा' दिशा; अथवा 'दक्षिणा और पूर्वा'; पुत्र के साथ आया हुआ 'सपुत्त'; रोमों वाला 'सलोमक' अर्थात् विद्यमान रोम; इसी प्रकार 'सपक्खक'; 'अत्थि खीरं ब्राह्मणी' - यहाँ 'अत्थि' शब्द विद्यमान अर्थ में निपात है - कहीं-कहीं गत्यर्थक होने से अन्य पदों का प्रयोग नहीं होता, जैसे जिसके कण्ठ में कालापन स्थित है वह 'कण्ठेकळ'; जिसका मुख ऊँट के मुख जैसा है वह 'ओट्ठमुख'; जिसके केशों का समूह चूडा है वह 'केसचूळ'; जिसका अलङ्कार स्वर्ण का विकार है वह 'सुवण्णालङ्कार'; जिसके पत्ते गिर गए हैं वह 'पपतितपण्ण' या 'पपण्ण'; जिसके पुत्र विद्यमान नहीं हैं वह 'अविज्जमानपुत्त'; जिसके पुत्र नहीं हैं वह 'अपुत्त' - कहीं 'न' का लोप नहीं होता जैसे 'पञ्चभुत्तवन्तो' (पाँच भोजन वाले), 'भातुनो पुत्तो' (भाई का पुत्र) - यह 'बहुलाधिकार' से होता है। ตตฺถ คเหตฺวา เตน ปหริตฺวา ยุทฺเธ สรูปํ-. वहाँ (उस विषय में) पकड़कर और उससे प्रहार कर युद्ध होने पर समान रूप वाले (पदों का समास होता है)-। สตฺตมฺยนฺตํ ตติยนฺตญฺจ สรูปมเนกํ ตตฺถ คเหตฺวา เตน ปหริตฺวา ยุทฺเธ’ญฺญปทตฺเถ เอกตฺถํ วา โหติ;’เกเสสุ จ เกเสสุ จ คเหตฺวา ยุทฺธมฺปวตฺตํ’ เกสาเกสิ;’ทณฺเฑหิ จ ทณฺเฑหิ จ ปหริตฺวา ยุทฺธมฺปวตฺตํ’ ทณฺฑาทณฺฑิ; มุฏฺฐามุฏฺฐิ ‘‘จิ วีติ หาเร’ติ. จิ สมาสนฺโต [’]จิสฺมิ. นฺตฺยากาโร–-ตตฺถ เตเนติ-กึ? กายทฺว กายทฺว [ ] คเหตฺวา ยุทฺธํ ปวตฺตํ; คเหตฺวา ปหริตฺวาติ- กึ? รเถ จ รเถ จ ฐตฺวา ยุทฺธํปวตฺตํ; ยุทฺเธติกึ? หตฺเถ จ หตฺเถ จ คเหตฺวา สขฺยํ ปจตฺตํ; สรูปนฺติกึ? ทณฺเฑหิ จ มุสเลหิจ ปหริตฺวา ยุทฺธํ ปวตฺตํ. सप्तम्यन्त और तृतीयान्त अनेक समान रूप वाले पद 'वहाँ पकड़कर' और 'उससे प्रहार कर' युद्ध के अर्थ में अन्य पद के अर्थ में विकल्प से एक पद होते हैं; 'बालों और बालों को पकड़कर जो युद्ध हुआ' वह 'केसाकेसि'; 'डण्डों और डण्डों से प्रहार कर जो युद्ध हुआ' वह 'दण्डादण्डि'; 'मुट्ठामुठ्ठी'; व्यतिहार (युद्ध) के अर्थ में 'चि' प्रत्यय होता है। समास के अन्त में 'चि' होने पर 'इ' का 'ई' (दीर्घ) हो जाता है - 'वहाँ उससे' क्यों कहा? 'शरीर-शरीर को पकड़कर जो युद्ध हुआ' (यहाँ समास नहीं होगा); 'पकड़कर और प्रहार कर' क्यों कहा? 'रथ और रथ पर स्थित होकर जो युद्ध हुआ' (यहाँ समास नहीं होगा); 'युद्ध में' क्यों कहा? 'हाथ और हाथ पकड़कर जो मित्रता हुई' (यहाँ समास नहीं होगा); 'समान रूप' क्यों कहा? 'डण्डों और मूसलों से प्रहार कर जो युद्ध हुआ' (यहाँ समास नहीं होगा)। จตฺเถ-. 'च' के अर्थ में-। อเนกํ สฺยาทฺยนฺตํ จตฺเถ เอกตฺถํ วา ภวติ–-สมุจฺจโย’ณฺวาจโย อิตรีตรโยโค สมาหาโร จ จสทฺทตฺถา, ตตฺถ สมุจฺจยาณฺวาจเยสุ เนกตฺถิภาโว สมฺภวติ- เตสุ หิ สมุจฺจโย อญฺญมญฺญนิรเปกฺขานมตฺตปฺปธานานํ กตฺถจิ กฺริยาวิเสเส จียมานตา-ยถา-ธเว จ ขทิเร จ ปลาเส จ ฉินฺทาติ; อนฺวาจโยว ยตฺเถโก ปธานภาเวน วิธิยเต อปโร จคุณภาเวน-ยถา-ภิกฺขํ จร คาโว วานเยติ–-อิตรญฺจยย ตุ สมฺภวติ, เตสุ หิ อญฺญมญฺญสาเปกฺขานมว ยวเภทานุคโต อิตรีตรโยโค- ยถา- สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานาติอสฺสาวยวปฺปธานตฺตา พหุวจนเมว; อญฺญมญฺญ สาเปกฺขานเมว ติโรหิตาวยวเภโท สมุทายปฺปธาโน สมาหาโร-ยถา-ฉตฺตุปาหนนฺติ-อสฺส ปน สมุทายปฺปธานตฺตา เอกวจนเมว; เต จ สมาหารีตรีตรโยคา พหุลํ วิธานา นิยตวิสยาเยว โหนฺติ, ตตฺรายํ วิสยวิภาโค นิรุตฺติ ปิฏกาคโต. अनेक सुबन्त पद 'च' के अर्थ में विकल्प से एक पद (समास) होते हैं - समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग और समाहार 'च' शब्द के अर्थ हैं, उनमें समुच्चय और अन्वाचय में एकार्थीभाव (समास) संभव नहीं है - क्योंकि उनमें समुच्चय परस्पर निरपेक्ष और स्वयं प्रधान पदों का किसी क्रिया विशेष में संग्रह है - जैसे 'धवे च खदिरे च पलासे च छिन्दाहि' (धौ, खैर और पलाश को काटो); अन्वाचय वह है जहाँ एक प्रधान रूप से विहित होता है और दूसरा गौण रूप से - जैसे 'भिक्खं चर गावो च आनयेहि' (भिक्षा के लिए जाओ और गायों को भी ले आओ) - इतरेतरयोग तो संभव है, उनमें परस्पर सापेक्ष अवयव भेदों से युक्त इतरेतरयोग है - जैसे 'सारिपुत्तमोग्गल्लाना' यहाँ अवयवों की प्रधानता के कारण बहुवचन ही होता है; परस्पर सापेक्ष ही तिरोहित अवयव भेद वाला समुदाय प्रधान 'समाहार' है - जैसे 'छत्तुपाहनं' - इसके समुदाय प्रधान होने के कारण एकवचन ही होता है; वे समाहार और इतरेतरयोग समास बहुल विधान से निश्चित विषयों में ही होते हैं, वहाँ यह विषय विभाग निरुक्ति पिटक से आया है। ปาณิตุริยโยคฺคเสนงฺคานํ; นิจฺจเวรีนํ; สํขฺยาปริ มาณสญฺญานํ; ขุทฺทชนฺตุกานํ; ปจนวทฺธาลานํ; จรณสาธารณานํ; เอกฺฌายนปาวจนานํ; ลิงฺควิเสสานํ; วิวิธวิรุทฺธานํ; ทิสานํ; นทีนญฺจ; นิจฺจํ สมาหาเรกตฺถํ ภวติ. प्राणियों के अङ्ग, वाद्य यन्त्रों के अङ्ग, वाहनों के अङ्ग, सेना के अङ्ग; नित्य वैरियों; संख्या, परिमाण और संज्ञाओं; क्षुद्र जन्तुओं; पकाने वाले और वध करने वालों; आचरण और साधारण धर्मों; एक ही शाखा के अध्येताओं और प्रवचनों; लिङ्ग विशेषों; विविध विरुद्धों; दिशाओं; और नदियों का नित्य समाहार (एकवचन) में एक पद होता है। ติณรุกฺขปสุสกุณธนธญฺญวฺยญฺชนชนปทานํวา อญฺเญ สมิตรีตรโยโคว. तृण, वृक्ष, पशु, पक्षी, धन, धान्य, व्यञ्जन और जनपदों का अथवा अन्यों का समान रूप से इतरेतरयोग ही होता है। ปาณฺยงฺคานํ–-จกฺขุโสตํ; มุขนาสิก; หนุคีวํ; ฉวิ มํสโลหิตํ; นามรูปํ; ชรามรณํ;–-ตุริยงฺคานํ–-อลสตาฬมฺพรํ;มุรชโคมุขํ; สํขเททฺธิมํ; [ ] มทฺทวิกปาณวิกํ; คีตวาทตํ?สมฺมตาฬํ–-โยคฺคงฺคานํ–-ผาลปาจนํ; ยุคนงฺคลํ–-เสนงฺคานํ–-อสิสตฺติโตมรปิณฺฑํ;[ ] อสิจมฺมํ; พีฬารมูสิกํ; กาโกลูกํ; นาคสุปณฺณํ–-สํขฺยาปริมาณ สญฺญานํ–-เอกกทุกํ, ทุกติกํ; ติกจตุกฺกํ, จตุกฺกปญฺจกํ; ทเสกาทสกํ –- ขุทฺทชนฺตุกานํ–-กีฏปฏงฺคํ; กุตฺถกิปิลฺลิกํ; ฑํสมกสํ; มกฺขิกกิปิลฺลิกํ–-ปวนวทฺธาลานํ–-โอรรพฺคิกสุกริกํ; สากุนฺติกมาควิกํ;สปากวทฺธาลํ;เวน प्राणियों के अङ्ग - चक्षुसोतं; मुखनासिकं; हनुगीवं; छविमंसलोहितं; नामरूपं; जरामरणं; - वाद्य यन्त्रों के अङ्ग - अलसताळम्बरं; मुरजगोमुखं; संखदेद्धिमं; मद्दविकपाणविकं; गीतवादितं; सम्मताळं; - वाहनों के अङ्ग - फालपाचनं; युगानङ्गलं; - सेना के अङ्ग - असिसत्तितोमरपिण्डं; असिचम्मं; बीळारमूसिकं; काकोलूकं; नागसुपण्णं; - संख्या, परिमाण और संज्ञाओं के - एककदुकां, दुकतिकं; तिकचतुक्कं, चतुक्कपञ्चकं; दसेकादसाकं; - क्षुद्र जन्तुओं के - कीटपटङ्गं; कुत्थकिपिल्लिकं; डंसमकसं; मक्खिकाकिपिल्लिकं; - पकाने और वध करने वालों के - ओरब्भिकसूकरिकं; साकुन्तिकमागविकं; सपाकवद्धालं; वेण... รถการํ; ปุกฺกุสฉวฑาหกํ–-จรณสาธารณานํ–-อติสภารทฺวาชํ; กฐกาลาปํ; สีลปญฺญาณํ; สมถวิปสฺสนํ; วิชฺชาจรณํ–-เอกชฺฌายนปาวจนานํ–-ทีฆมชฺฌิมํ; เอกุตฺตรสํยุตฺตกํ; ขนฺธกวิภงฺคํ–-ลิงฺควิเสสานํ–-อิตฺถิปุมํ; ทาสิทาสํ; จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปจฺจยเภสชฺชปรริกฺขารํ; ติณกฏฺฐสาขาปลาสํ; ‘‘ลาภี โหติ จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาราน‘‘นฺติปิ ทิสฺสติ–-วิวิธวิรุทฺธานํ–-กุสลากุสลํ; สาวชฺชานวชฺชํ; หีนปฺปณิตํ; กณฺภสุกฺกํ; เฉกปาปกํ; อธรุตฺตรํ–-ทิสานํ–-ปุพฺพาปรํ; ทกฺขิณุตฺตรํ; ปุพฺพทกฺขิณํ; ปุพฺพุตฺตรํ; อปร ทกฺขิณํ; อปรุตฺตรํ–-นทีนํ–-คงฺคายมุนํ, มหีสรภุ. रथकार; पुक्कुस और शवदाहक—सामान्य आचरण वालों के लिए—अतिस और भारद्वाज; कठ और कालाप; शील और प्रज्ञा; शमथ और विपश्यना; विद्या और चरण—एक ही अध्ययन और प्रवचन वालों के लिए—दीघ और मज्झिम; एकुत्तर और संयुत्तक; खन्धक और विभङ्ग—लिङ्ग विशेषों के लिए—स्त्री और पुरुष; दासी और दास; चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लानप्रत्यय-भैषज्य-परिष्कार; तृण, काष्ठ, शाखा और पलाश; 'चीवर-पिण्डपात-शयनासन-ग्लानप्रत्यय-भैषज्य-परिष्कार का लाभ लेने वाला होता है' ऐसा भी देखा जाता है—विविध विरुद्धों के लिए—कुशल और अकुशल; सावद्य और अनवद्य; हीन और प्रणीत; कृष्ण और शुक्ल; चतुर और पापी; अधर और उत्तर—दिशाओं के लिए—पूर्व और अपर; दक्षिण और उत्तर; पूर्व-दक्षिण; पूर्व-उत्तर; अपर-दक्षिण; अपर-उत्तर—नदियों के लिए—गंगा और यमुना, मही और सरभू। ติณวิเสสานํ–-กาสกุสํ, กาสกุสา; อุสีรพีรณํ, อุสี รพีรณา; มุชพพฺพชํ, มุญฺชพพฺพชา–-รุกฺขวเสสานํ–-ขทิรปลาสํ, ขทิรปลาสา; ธวาสฺสกณฺณํ, ธวาสฺสกณฺณา; ปิลกฺขนิคฺโรธํ, ปิลกฺขนคฺโรธา; อสฺสตฺถกปิตฺถนํ, อสฺสตฺถ กปิตฺถนา; สากสาลํ, สากสาลา–-ปสุวิเสสานํ–-คช ควชํ,คชควชา; โควหิสํ, โคมหิสา;เอเณยฺยโคมหิสํ, เอเณยฺยโคมหิสา; เอเณยฺยวราหํ, เอเณยฺยวราหา; อเช तृण विशेषों के लिए—कास और कुश (कासकुशं, कासकुसा); उशीर और बीरण (उशीरबीरणं, उशीरबीपणा); मुञ्ज और बब्बज (मुञ्जबब्बजं, मुञ्जबब्बजा)—वृक्ष विशेषों के लिए—खदिर और पलाश (खदिरपलासं, खदिरपलासा); धव और अश्वकर्ण (धवास्सकण्णं, धवास्सकण्णा); प्लक्ष और न्यग्रोध (पिलक्खनिग्रोधं, पिलक्खनग्रोधा); अश्वत्थ और कपित्थन (अस्सत्थकपित्थनं, अस्सत्थकपित्थना); साक और साल (साकसालं, साकसाला)—पशु विशेषों के लिए—गज और गवज (गजगवजं, गजगवजा); गो और महिष (गोमहिसा); एणेय्य, गो और महिष (एणेय्यगोमहिसा); एणेय्य और वराह (एणेय्यवराहं, एणेय्यवराहा); अज। ฬกํ, อเชฬกา; กุกฺกุรสูกรํ, กุกฺกุรสูกรา; หตฺถิควาสฺส วฬวํ, หตฺถิควาสฺสวฬวา–-สกุณวิเสสานํ–-หํสพลาวํ, หํสพลาวา; การณฺฑววกฺกวากํ, การณฺฑววกฺกวากา; พกพลากํ, พกพลากา–-ธนานํ–-หิรญฺญสุวณฺณํ, หิรญฺญ สุวณฺณา;มณิสํขมุตฺตาเวผผริยํ, มณิสํขมุตฺตาเวฬุริยา; ชาตรูปรชตํ, ชาตรูปรชตา–-ธญฺญานํ–-สาลิยวกํ, สาลิยวกา; ติลมุคฺคมาสํ, ติลมคฺคมาสา; นิปฺผาวกุลตฺถํ, นิปฺผาวกุลตฺถา–-พฺยญฺชนานํ–-สากสุวํ, สากสุวา; คพฺยมาหิสํ, คพฺยมาหิสา; เอเณยฺยวาราหํ, เอเณยฺยวาราหา; มิคมายูรํ, มิคมายูรา–-ชนปทานํ–กาสิโกสลํ, กาสิโกสลา; วชฺชิมลฺลํ, วชฺชิมลฺลา; เจติวีสํ, เจติวีสา; มจฺฉสุรเสนํ, มจฺฉสูรเสนา; กุรุปญฺจาลํ, กุรุปญฺจาลา. और एडक (अजेळकं, अजेळका); कुक्कुर और सूकर (कुक्कुरसूकरं, कुक्कुरसूकरा); हस्ती, गो, अश्व और वडवा (हत्थिगवास्सवळवं, हत्थिगवास्सवळवा)—पक्षी विशेषों के लिए—हंस और बलाका (हंसबलाका); कारण्डव और चक्रवाक (कारण्डवचक्कवाका); बक और बलाका (बकबलका)—धनों के लिए—हिरण्य और सुवर्ण (हिरण्यसुवण्णा); मणि, शंख, मुक्ता और वैदूर्य (मणिसंखमुत्तावेळुरिया); जातरूप और रजत (जातरूपरजता)—धान्यों के लिए—शालि और यव (शालियवका); तिल, मुग्ग और मास (तिलमग्गमासा); निष्पाव और कुलत्थ (निप्फावकुलत्था)—व्यंजनों के लिए—शाक और सूप (साकसुवा); गव्य और माहिष (गब्यमाहिसा); एणेय्य और वाराह (एणेय्यवाराहा); मृग और मयूर (मिगमयूरा)—जनपदों के लिए—काशि और कोसल (कासिकोसला); वज्जि और मल्ल (वज्जिमल्ला); चेति और वंस (चेतिवंसा); मच्छ और शूरसेन (मच्छसूरसेना); कुरु और पञ्चाल (कुरुपञ्चाला)। อิตรีตรโยโค-ยถา-วนฺทิมสูริยา, สมณพฺราหฺมณา, มาตาปิตโร, อิจฺจาทิ, เอตสฺมึ เอกตฺถิภาวกณฺเฑ ยํ วุตฺตํ ปุพฺพํ ตเทว ปุพฺพํ นิปตติ กมาติกฺกเม ปโยชนาภาวา กฺววิ วิปลฺลาโส’ปิ โหติ พหุลาธิการโต.’ ทนฺตานํ ราชา’ ราชทนฺโต. กตฺถจิ กมมฺปจฺจนาทรา ปุพฺพกาลสฺสาปิ ปรนิปาโต. ลิตฺตวาสิโต, นคฺคมุสิโต, สิตฺตสมฺมฏฺโฐ, ภฏฺฐลุญฺจิโต–-จตฺเถ ยเทกตฺถํ ตตฺถ เกจิ ปุพฺพปทํ พหุธา นิยเมนฺติ ตทิห วฺยภิวารทสฺสนา น วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. इतरेतर योग—जैसे—वन्दिम और सूर्य, श्रमण और ब्राह्मण, माता और पिता, इत्यादि। इस एकार्थीभाव काण्ड में जो पहले कहा गया है, वही पहले आता है क्योंकि क्रम के उल्लंघन में कोई प्रयोजन नहीं है; कहीं-कहीं 'बहुलाधिकार' के कारण विपर्यास भी होता है। 'दन्तानां राजा' = राजदन्तो। कहीं-कहीं क्रम के प्रति अनादर के कारण पूर्वकाल का भी पर-निपात होता है। लिप्त-वासित, नग्न-मुषित, सिक्त-सम्मृष्ट, भ्रष्ट-लुञ्चित—'च' अर्थ में जहाँ एकत्व होता है, वहाँ कुछ लोग पूर्वपद को बहुत प्रकार से नियमित करते हैं, उसे यहाँ व्यभिचार दिखने के कारण नहीं कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। สมาหาเร สปุํสกํ-. समाहार में वह नपुंसक लिंग होता है। วตฺเถ สมาหาเร ยเทกตฺถํ ตนฺนปุํสกลิงฺคมฺหวติ; ตถา เวโวทาหฏํ–-กตฺถจิ น โหติ สภาปริสายาติ ญาปกา; อาธิ ปจฺจปริวาโร; ฉนฺทปาริสุทฺธิ; ปฏิสนฺธิปฺปวตฺติยํ. द्वन्द्व समास में समाहार अर्थ में जो एकत्व होता है, वह नपुंसक लिंग होता है; जैसा कि पहले उदाहरण दिया गया है—कहीं-कहीं 'सभापरिस' इत्यादि ज्ञापकों से नहीं होता है; जैसे—आधि पच्चपरिवारो; छन्दपारिसुद्धि; प्रतिसन्धि-प्रवृत्ति में। สํขฺยาทิ-. संख्या आदि— เอกตฺเถ สมาหาเร สํขฺยาทิ นปุํสกลิงฺคมฺภวติ; ปญฺจควํ; จตุปฺปถํ–-สมาหารสฺเสกตฺตา เอกวจนเมว โหติ; สมาหาเรตฺเวว-ปญฺจกปาโล, ปูโว; ติปุตฺโต. एकत्व समाहार में संख्या आदि (द्विगु) नपुंसक लिंग होते हैं; पञ्चगवं; चतुप्पथं—समाहार के एकत्व के कारण एकवचन ही होता है; समाहार अर्थ में ही—पञ्चकपालो पूवो; तिपुत्तो। กฺวเจกตฺตญฺจ ฉฏฺฐิยา-. षष्ठी विभक्ति में कहीं-कहीं एकत्व भी— ฉฏฺฐิเยกตฺเถ กฺวจิ นปุํสกตฺตํ โหเตกตฺตญฺจ;’สลภานํ ฉายา’ สลหจฺฉายํ; เอวํ’สกุนฺตานํ ฉายา’ สกุนฺตจฺฉายํ; षष्ठी के एकत्व अर्थ में कहीं-कहीं नपुंसकत्व और एकत्व होता है; 'सलभानां छाया' = सलभच्छायं; इसी प्रकार 'सकुन्तानां छाया' = सकुन्तच्छायं; ปาสาทจฺฉายยํ, ปาสาทจฺฉายยา; ฆรจฺฉายยํ, ฆรจฺฉายา. อมนุสฺสา สภาย นปุํสเกกตฺตมฺภวติ; พฺรหฺมสภํ; เทวสภํ; อินฺทสภํ; ยกฺขสภํ; สรภสภํ–-มนุสฺสสภายํ–-ขตฺติยสภา, ราชสภา อิจฺเจวมาทิ–-กฺวจีติ กึ?ราชปุริโส. प्रासाद की छाया (पासादच्छायं/पासादच्छाया); घर की छाया (घरच्छायं/घरच्छाया)। अमनुष्य की सभा के अर्थ में नपुंसकत्व और एकत्व होता है; ब्रह्मसभं; देवसभं; इन्दसभं; यक्खसभं; सरभसभं—मनुष्य सभा में—क्षत्रियसभा, राजसभा इत्यादि—'क्वचि' क्यों? राजपुरिसो। สฺยาทิสุ รสฺโส-. स्यादि विभक्तियों के परे होने पर ह्रस्व होता है— นปุํสเก วตฺตมานสฺส รสฺโส โหติ สฺยาทิสุ; สลภจฺฉายํ–-สฺยาทิสูติ-กึ?สลภจฺฉาเย. नपुंसक लिंग में वर्तमान शब्द का स्यादि विभक्तियों के परे होने पर ह्रस्व होता है; सलभच्छायं—'स्यादिषु' क्यों? सलभच्छाये। ฆปสฺสานฺตสฺสาปฺปธานสฺส-. घ और प संज्ञक प्रत्ययान्त अप्रधान शब्द के अन्त को (ह्रस्व होता है)— อนฺตภุตสฺสาปฺปธานสฺสฆปสฺสสฺยาทิสุรสฺโสโหติ; พหุมาโล, โปโส; นิกฺโกสมฺพิ; อติวาโมรุ–-อนฺตสฺสาติ-กึ? กญฺญาปิโย; อปฺปธานสฺสาติ-กึ? ราชกุมารี; พฺรหฺมพนฺธู. अन्त में स्थित अप्रधान घ और प संज्ञक शब्दों को स्यादि विभक्तियों के परे होने पर ह्रस्व होता है; बहुमालो पोसो; निक्कोसम्बि; अतिवामोरु—'अन्तस्स' क्यों? कञ्ञापियो; 'अप्पधानस्स' क्यों? राजकुमारी; ब्रह्मबन्धू। โคสฺสุ-. 'गो' शब्द को 'उ' होता है— อนฺตภุตสฺสาปฺปธานสฺส โคสฺส สฺยาทิสุ อุ โหติ; จิตฺตคุ–-อปฺปธานสฺสาตฺเวว - สุโค;อนฺตสฺสาตฺเวจโคกุลํ. अन्त में स्थित अप्रधान 'गो' शब्द को स्यादि विभक्तियों के परे होने पर 'उ' होता है; चित्तगु—'अप्पधानस्स' ही—सुगो; 'अन्तस्स' ही—गोकुलं। อิตฺถิยมตฺวา-. स्त्रीलिंग में 'आ' प्रत्यय— อิตฺถิยํ วตฺตมานโต อการนฺตโต นามสฺมา อาปฺปจฺจโย โหติ, ธมฺมทินฺนา. स्त्रीलिंग में वर्तमान अकारान्त नाम से 'आ' प्रत्यय होता है, जैसे—धम्मदित्ना। นทาทิโต ณฺฑี-. नद्यादि गण से 'ई' (ण्डी) प्रत्यय— นทาทีหิ อิตฺถิยํ ณฺฑีปฺปจฺจโย โหติ; นที, มหี, กุมารี, ตรุณี, วารุณี, โคตมี. नद्यादि शब्दों से स्त्रीलिंग में 'ई' (ण्डी) प्रत्यय होता है; नदी, मही, कुमारी, तरुणी, वारुणी, गोतमी। โคโต วา(). 'गो' शब्द से विकल्प से— คาวี, โค; อากติคโณ’ยํ–-งกาโร ‘‘นฺตนฺตุนํ งิมฺหิ โต วา‘‘ติ. วิเสสนตฺโถ. गावी, गो; यह आकृतिगण है—'ङ' कार 'न्तन्तुनं ङिम्हि तो वा' इस सूत्र में विशेष अर्थ के लिए है। ยกฺขาทิตฺตฺวิตี จ-. यक्षादि से 'इनी' और 'ई' भी— ยกฺขาทิโต อิตฺถิยมินี โหติ งี จ; ยกฺขินี, ยกฺขิ; นาคินี, นาคี; สีหินี, สีหี. यक्षादि शब्दों से स्त्रीलिंग में 'इनी' प्रत्यय होता है और 'ई' (ङी) भी; यक्खिनी, यक्खी; नागिनी, नागी; सीहिनी, सीही। อารามิกาทีหิ-. आरामिक आदि से— อารามิกาทิโต อินี โหติตฺถิยํ; อารามิกินี; อนนฺตราสิกินี; ราชินี. आरामिक आदि शब्दों से स्त्रीलिंग में 'इनी' प्रत्यय होता है; आरामकिनी; अनन्तरासिकिनी; राजिनी। สญฺญายํ มานุโส(). संज्ञा होने पर 'मानुस' शब्द से— มานุสินี; อญฺญตฺร มานุสี. मानुसिनी; अन्यत्र मानुसी। ยุวณฺโณหิ นี-. युवन् और अण् प्रत्ययान्तों से 'नी'— อิตฺถิยมิวณฺณุวณฺณนฺเตหิ นี โหติ พหุลํ; สทาปยต ปาณินี; ทณฺฑินี; ขตฺตพนฺธุนี; ปรจิตฺตวิทุนี–-มาตุ อาทิโต กสฺมา น โหติ? อิตฺถิปฺปจฺจยํ วินาปิ อิตฺถตฺตาหิ ธานโต. स्त्रीलिंग में 'इ' वर्ण और 'उ' वर्ण के अंत वाले शब्दों से 'नी' प्रत्यय बहुलता से होता है; जैसे- सदापयत पाणिनी, दण्डिनी, खत्तबन्धुनी, परचित्तविदुनी। 'मातु' आदि शब्दों से क्यों नहीं होता? क्योंकि स्त्री-प्रत्यय के बिना भी वे स्त्रीत्व (स्त्रीलिंग) में ही स्थित हैं। กฺติมฺหาญฺญตฺเถ-. 'क्ति' प्रत्यय से अन्य अर्थ में। กฺติมฺหาญฺญตฺเถเยว อิตฺถิยํ นี โหติ พหุลํ; สาหํ อหึสารตินี; ตสฺสา มุฏฺฐสฺสตินิยา; สา วจฺฉคิทฺธินี–-อญฺญตฺเถติ-กึ? ธมฺมรติ. 'क्ति' प्रत्यय से अन्य अर्थ में ही स्त्रीलिंग में 'नी' प्रत्यय बहुलता से होता है; जैसे- 'साहं अहिंसारतिनी' (वह मैं अहिंसा में रत हूँ), 'तस्सा मुट्ठस्सतिनिया' (उस विस्मृत स्मृति वाली की), 'सा वच्छगिद्धिनी' (वह बछड़े के प्रति आसक्त)। 'अन्य अर्थ में' ऐसा क्यों कहा? 'धम्मरति' (धर्म में रति)। ฆรณฺยาทโย-. घरणी आदि। ฆรณีปฺปภุตโย นีปฺปจฺจยนฺตา สาธโว ภวนฺติ; ฆรณี; โปกฺขรณี; อีสฺสตฺตํ นิปาตนา. घरणी आदि शब्द 'नी' प्रत्ययान्त होने पर शुद्ध होते हैं; जैसे- घरणी, पोक्खरणी; यहाँ 'ई' का होना निपातन से है। อาจริยา วา ยโลโป จ(); อาจรินี; อาจริยา. 'आचरिय' शब्द से विकल्प से (नी होता है) और 'य' का लोप भी होता है; जैसे- आचरिनी, आचरिया। มาตุลาทิตฺวานี ภริยายํ-. मातुल आदि शब्दों से पत्नी अर्थ में 'आनी' प्रत्यय होता है। มาตุลาทิโต ภริยายมานี โหติ; มาตุลานี; วรุณานี; คหปตานี; อาจริยานี. मातुल आदि शब्दों से पत्नी अर्थ में 'आनी' प्रत्यय होता है; जैसे- मातुलानी (मामी), वरुणानी, गहपतानी, आचरियानी। อภริยายํ ขตฺติยา วา() ขตฺติยานี; ขตฺติยา –-นทา ทีปาฐา ภริยายนฺตุ ขตฺติยี. पत्नी अर्थ न होने पर 'खत्तिय' शब्द से विकल्प से (आनी होता है); जैसे- खत्तियानी, खत्तिया। 'नद' आदि पाठ के अनुसार पत्नी अर्थ में 'खत्तियी' होता है। อุปมาสํหิตสหิตสญฺญตสหสผวามลกฺขณาทิตุรุตุ-. उपमा, संहित, सहित, सञ्ञत, सह, सथ, वाम, लक्षण आदि शब्दों के बाद 'ऊरु' शब्द होने पर। อูรุสทฺทา อุปมานาทิปุพฺพา อิตฺถิยมู โหติ; กรโหรู; สํหิโตรู; สหิโตรู; สญฺญโตรู; สโหรู; สโผรู; วาโม รู; ลกฺขโณรู–-’อู’ติ-โยควิภาคา อู; พฺรหฺมพนฺธุ. उपमान आदि पूर्व में होने पर 'ऊरु' शब्द से स्त्रीलिंग में 'ऊ' प्रत्यय होता है; जैसे- करहोरू, संहितोरू, सहितोरू, सञ्ञतोरू, सहोरू, सफोरू, वामोरू, लक्षणोरू। 'ऊ' इस योग-विभाग से 'ऊ' होता है; जैसे- ब्रह्मबन्धु। ยุวาติ -. 'युव' शब्द से 'ति' प्रत्यय। ยุวสทฺทโตติ โหติตฺถิยํ; ยุวติ. 'युव' शब्द से स्त्रीलिंग में 'ति' प्रत्यय होता है; जैसे- युवति। นฺตนฺตุนํ งีมฺหิ โต วา-. 'न्त' अन्त वाले शब्दों को 'ङी' प्रत्यय होने पर विकल्प से 'त' होता है। งีมฺหิ นฺตนฺตุนํ โต วา โหติ; คจฺฉตี, คจฺฉนฺตี; สีลวตี, สีลวนฺตี. 'ङी' प्रत्यय होने पर 'न्त' अन्त वाले शब्दों को विकल्प से 'त' होता है; जैसे- गच्छती, गच्छन्ती; सीलवती, सीलवन्ती। ภวโต โภโต-. 'भवन्त' शब्द को 'भोत' आदेश। งีมฺหิ ภวโต โภตาเทโส โหติ วา; โภตี; ภวนฺตี. 'ङी' प्रत्यय होने पर 'भवन्त' शब्द को विकल्प से 'भोत' आदेश होता है; जैसे- भोती, भवन्ती। โคสฺสาวงิ-. 'गो' शब्द को 'आवि' और 'ङी' प्रत्यय। โคสทฺทสฺส งีมฺหาวงิ โหติ; คาวี. 'गो' शब्द को 'ङी' प्रत्यय होने पर 'आवि' आदेश होता है; जैसे- गावी। ปุถุสฺสปถวปุถวา-. 'पुथु' शब्द को 'पथव' और 'पुथव' आदेश। งีมฺหิ ปุถุสฺส ปถวปุถวา โหนฺติ; ปถวี; ปุถวี.–-เฐ ปถวี. 'ङी' प्रत्यय होने पर 'पुथु' शब्द को 'पथव' और 'पुथव' आदेश होते हैं; जैसे- पथवी, पुथवी। स्थविरवाद में 'पथवी' है। สมาสนฺตฺว- समास के अन्त में 'अ'। สมาสนฺโต อ อิติ วาธิกรียนฺติ. 'समास के अन्त में अ' - यह अधिकार के रूप में प्रवृत्त होता है। ปาปาทีหิ ภุมิยา-. 'पाप' आदि शब्दों के बाद 'भूमि' शब्द होने पर। ปาปาทีหิ ปรา ยา ภุมิ ตสฺสา สมาสนฺโต อ โหติ; ปาป ภุมึ; ชาติภุมํ. 'पाप' आदि शब्दों के बाद जो 'भूमि' शब्द है, उसके अन्त में समास-प्रत्यय 'अ' होता है; जैसे- पापभुमिं, जातिभूमं। สํขฺยาหิ-. संख्याओं के बाद। สํขฺยาหิ ปรา ยา ภุมิ ตสฺสา สมาสนฺโต อ โหติ; ทฺวิภุมํ; ติภุมํ संख्याओं के बाद जो 'भूमि' शब्द है, उसके अन्त में समास-प्रत्यय 'अ' होता है; जैसे- द्विभूमं, त्रिभूमं। นทีโคทาวรีนํ-. 'नदी' और 'गोदावरी' शब्दों के। สํขฺยาหิ ปราสํ นทีโคทาวรีนํ สมาสนฺโต อ โหติ; ปญฺจนทํ, สตฺตโคทาวรํ. संख्याओं के बाद आने वाले 'नदी' और 'गोदावरी' शब्दों के अन्त में समास-प्रत्यय 'अ' होता है; जैसे- पञ्चनदं, सप्तगोदावरं। อสํขฺเยหิ จางฺคุลฺยานญฺญาสํขฺยตฺเถสุ-. असंख्यावाची शब्दों के बाद 'अङ्गुलि' शब्द होने पर और अन्य असंख्या अर्थों में (समास के अन्त में 'अ' होता है)। อสํขฺเยหิ สํขฺยาหิ จ ปราย องฺคุลฺยา สมาสนฺโต อโหติ โน เจ อญฺญปทตฺเถ อสํขฺยตฺเถว สมาโส วตฺติเต.’นิคฺคตมงฺคุลีหิ’ นิรงฺคุลํ; อจฺจงฺคุลํ; ทฺเว องฺคุลิโย สมาหฏา’ทฺวงฺคุลํ–-อนญฺญาสํขฺยตฺเถสูติ-กึ? ปญฺจงฺคุลิหตฺโถ; อุปงฺคุลิ–-กถํ, ทฺวฺญงฺคุลี ปมาณมสฺสาติ ทฺวงฺคุลนฺติ-นาตุ สมาโส’ญฺญปทตฺเถ วิหิโต มตฺตาทีนํ โลเป กเต ตตฺถวตฺตเต; องฺคุลสทฺโทวา ปมาณวาจีสทฺทนฺตรํ–-ยถาเสนางฺคุลปฺปมาเณน องฺคุลานํ สตํ ปุณฺณํ จตุทฺทส วา องฺคุลานีติ. असंख्य और संख्यावाचक शब्दों के बाद आने वाले 'अङ्गुलि' शब्द का समासान्त 'अ' होता है, यदि वह अन्यपदार्थ (बहुव्रीहि) या असंख्यात (अव्ययीभाव) अर्थ में न हो। 'निग्गतमङ्गुलीहि' से 'निरङ्गुलं'; 'अच्चङ्गुलं'; 'द्वे अङ्कुलियो समाहटा' से 'द्वङ्गुलं'। 'अनञ्ञासङ्ख्यत्थेसूति' (अन्यपदार्थ और असंख्यात अर्थ में न हो) - क्यों? 'पञ्चङ्गुलिहतtho'; 'उपङ्गुलि'। 'द्वञ्ञङ्गुली पमाणमस्साति द्वङ्गुलन्ति' - यहाँ समास अन्यपदार्थ में विहित नहीं है, 'मत्त' आदि का लोप होने पर वहाँ प्रवृत्त होता है; अथवा 'अङ्गुल' शब्द ही प्रमाणवाची अन्य शब्द है - जैसे 'सेनाङ्गुलप्पमाणेन' (सेना की अंगुली के प्रमाण से), 'अङ्गुलानां सतं पुण्णं' (सौ अंगुलियाँ पूर्ण), या 'चतुद्दस वा अङ्कुलानीति' (चौदह अंगुलियाँ)। ทีฆาโหวสฺเสกเทเสหิ จ รตฺยา-. 'दीर्घ', 'अह', 'वस्स' और 'एकदेश' (अंश) शब्दों के बाद 'रत्ति' (रात्रि) शब्द का... ทีฆาทีหิ อสํขฺเยหิ สํขฺยาหิ จ ปราย รตฺติยา สมาสนฺโต อ โหติ; ทีฆรตฺตํ; อโหรตฺตํ; วสฺสารตฺตํ; ปุพฺพรตฺตํ; อปรรตฺตํ; อฑฺฒรตฺตํ;’อติกฺกนฺโต รตฺตึ’ อติรตฺโต;’ทฺเว รตฺตี สมาหฏา’ ทฺวิรตฺตํ–-วา กฺวจิ พหุลาธิการาเอกรตฺตํ; เอกรตฺติ–-อนญฺญาสํขฺยตฺเถสุตฺเวว-ทีฆรตฺติ, เหมนฺโต; อุปรตฺติ–-กฺวจิ โหเตว พหุลํ วิธานา;ยถารตฺตํ. 'दीर्घ' आदि, 'असंख्य' और 'संख्या' शब्दों के बाद 'रत्ति' शब्द का समासान्त 'अ' होता है; 'दीघरत्तं' (दीर्घरात्रि); 'अहोरत्तं' (अहोरात्र); 'वस्सारत्तं' (वर्षा-रात्रि); 'पुब्बरत्तं' (पूर्वरात्रि); 'अपररत्तं' (अपररात्रि); 'अड्ढरत्तं' (अर्धरात्रि); 'अतिक्कन्तो रत्तिं' से 'अतिरत्तो'; 'द्वे रत्ती समाहटा' से 'द्विरत्तं' - 'बहुलाधिकार' के कारण कहीं 'एकरत्तं' भी होता है; 'एकरत्ति' - 'अनञ्ञासङ्ख्यत्थेसु' (अन्यपदार्थ और असंख्यात अर्थ में न हो) - 'दीघरत्ति', 'हेमन्तो'; 'उपरत्ति' - 'बहुला' विधान के कारण कहीं (समासान्त) होता ही है; जैसे 'यथारत्तं'। โคตฺวจตฺเถ จาโลเป-. 'गो' शब्द का, 'अचत्थ' (अन्यपदार्थ) में और 'अलोप' (लोप न होने) के विषय में... โคสทฺทา อโลปวิสยา สมาสนฺโต อโหติ น เว วตฺเถ สมาโส อญฺญปทตฺเถ อสํขฺยฺยตฺเถ จ; ราชคโว; ปรมคโวร ปญฺจควธโน; ทสควํ–-อโลเปติ-กึ?ปญฺจหิ โคหิ กีโต ปญฺจคุ; อจตฺเถติ-กึ? อชสฺสคาโว –-อนญฺญาสํขฺยตฺเถสุตฺเวว-จิตฺตคุ;อุปคุ. 'गो' शब्द से अलोप के विषय में समासान्त 'अ' होता है, किन्तु 'वत्थ' (वस्त्र) अर्थ में, अन्यपदार्थ (बहुव्रीहि) और असंख्यात (अव्ययीभाव) अर्थ में समास होने पर नहीं; 'राजगवो'; 'परमगवो'; 'पञ्चगवधनो'; 'दसगवं'। 'अलोपे' - क्यों? 'पञ्चहि गोहि कीतो' से 'पञ्चगु'। 'अचत्थे' - क्यों? 'अजस्सगावो'। 'अनञ्ञासङ्ख्यत्थेसु' - 'चित्तगु'; 'उपगु'। รตฺตินฺทิวทารควจตุรสฺสา-. 'रत्तिन्दिव', 'दारगव' और 'चतुरस्स' (शब्द)... เอเต สทฺทา อ อนฺตา นิปจฺจนฺเต;’รตฺโต จ ทิวา จ’ รตฺตินฺทิวํ;’ รตฺติ จ ทิวา จ’รตฺตินฺทิวํ;’ทารา จ คาโว จ’ ทารควํ;’ วตสฺโส อสฺสิโย อสฺส’ จตุรสฺโส. ये शब्द 'अ' अन्त वाले निपातित होते हैं; 'रत्तो च दिवा च' से 'रत्तिन्दिवं'; 'रत्ति च दिवा च' से 'रत्तिन्दिवं'; 'दारा च गावो च' से 'दारगवं'; 'चतस्सो अस्सियो अस्स' से 'चतुरस्सो'। อายาเม’นุควํ-. 'आयाम' (लम्बाई) अर्थ में 'अनुगवं' (निपातित होता है)। อนุควนฺติ นิปจฺจเต อายาเม คมฺยมาเน; อนุควํ, สกฏํ–-อายาเมติ-กึ? คุนฺนํ ปจฺฉา อนุคุ. आयाम (लम्बाई) अर्थ प्रतीत होने पर 'अनुगवं' निपातित होता है; 'अनुगवं सकटं' (गाड़ी की लम्बाई के अनुसार)। 'आयामे' - क्यों? 'गुन्नं पच्छा' से 'अनुगु'। อกฺขิสฺมาญฺญตฺเถ-. 'अक्खि' (आँख) शब्द से अन्यपदार्थ (बहुव्रीहि) में समासान्त 'अ' होता है। อกฺขิสฺมา สมาสนฺโต อ โหติ อญฺญตฺเถ เจ สมาโส; วิสาลกฺโข. 'अक्खि' शब्द से समासान्त 'अ' होता है यदि समास अन्यपदार्थ में हो; 'विसालक्खो' (विशाल आँखों वाला)। ทารุมฺภฺยงฺคุลฺยา-. 'दारु' (लकड़ी) अर्थ में 'अङ्गुलि' शब्द के अन्त में... องฺคุลนฺตา อญฺญปทตฺเถ ทารุมฺหิ สมาสนฺโต อ โหติ; ทฺวงฺคุลํ, ทารุ; ปญฺจงฺคุลํ–-องฺคุลิสทิสาวยวํ ธญฺญาทีนํ วีกฺเขปกํ ทารูติ วุจฺจเต–-ปมาเณ ตุ ปุพฺเพ วิย สิทฺธํ; สขราชสทฺทาอการนฺตาว, สิสฺโส’ปิ น ทิสฺสติ–-คาณฺฑีวธตฺวาติ ปกตนฺตเรนสิทฺธํ. 'दारु' (लकड़ी) अर्थ में अन्यपदार्थ समास होने पर 'अङ्गुलि' अन्त वाले शब्द का समासान्त 'अ' होता है; 'द्वङ्गुलं दारु'; 'पञ्चङ्गुलं' - अंगुली के समान अवयव वाले अनाज आदि को बिखेरने वाले लकड़ी के उपकरण को 'पञ्चङ्गुल' कहा जाता है। परिमाण अर्थ में तो पहले की तरह (नियम) सिद्ध है। 'सख' और 'राज' शब्द अकारान्त ही हैं, 'सिस्स' भी नहीं देखा जाता - 'गाण्डीवधत्वा' आदि अन्य प्रकृति से सिद्ध हैं। ทฺวิ วีติหาเร-. 'वीतिहार' (परस्पर क्रिया) अर्थ में 'इ' (प्रत्यय होता है)। กฺริยาวฺยติหาเร คมฺยมาเน อญฺญปทตฺเถ วตฺตมานโต จิ โหติ; เกสาเกสิ; ทณฺฑาทณฺฑิ–-จกาโร’จิสฺมิ’นฺติ. วิเสสนตฺโถ; สุคนฺธิ ทุคฺคนฺธีติ-ปโยโค นทิสฺสเต. क्रिया-व्यतिहार (परस्पर क्रिया) अर्थ प्रतीत होने पर अन्यपदार्थ में वर्तमान शब्द से 'इ' प्रत्यय होता है; 'केसाकेसि' (बालों को पकड़कर लड़ना); 'दण्डादण्डि' (डंडों से लड़ना)। 'च' कार 'इ' प्रत्यय में विशेष अर्थ के लिए है। 'सुगन्धि', 'दुग्गन्धि' - ऐसे प्रयोग नहीं देखे जाते। ลตฺวิตฺถิยูหิ โก-. 'लतु' प्रत्ययान्त और स्त्रीलिंग 'ई' तथा 'ऊ' कारान्त शब्दों से 'क' (प्रत्यय होता है)। ลตุปฺปจฺจยนฺเตหิ อิตฺถิยมีการูการนฺเตหิ จพหุลํ กปฺปจฺจโย โหติ อญฺญปทตฺเถ; พหุกตฺตุโก; พหุกุมาริโก; พหุพฺรหฺมพนฺธุโก, พหุลํตฺเวว-สุพฺภุ. 'लतु' प्रत्ययान्त और स्त्रीलिंग 'ई' कारान्त तथा 'ऊ' कारान्त शब्दों से अन्यपदार्थ में बहुधा 'क' प्रत्यय होता है; 'बहुकत्तुको'; 'बहुकुमारिको'; 'बहुब्रह्मबन्धुको'। 'बहुलं' (बहुधा) कहने से - 'सुब्भु'। วาญฺญโต-. अन्य शब्दों से (अन्यपदार्थ में) 'क' प्रत्यय विकल्प से होता है। อญฺเญหิ อญฺญปทตฺเถ โก วา พหุลํ โหติ; พหุ มาลโก; พหุมาโล. अन्य शब्दों से अन्यपदार्थ में 'क' प्रत्यय विकल्प से (बहुधा) होता है; 'बहुमालको'; 'बहुमालो'। อุตฺตรปเท-. उत्तरपद के विषय में (यह अधिकार सूत्र है)। เอตมธิกตํ เวทิตพฺพํ. इसे अधिकार (सूत्र) समझना चाहिए। อิมสฺสิทํ-. 'इम' शब्द का 'इदं' (होता है)। อุตฺตรปเท ปรโต อิมสฺส อิทํ โหติ; อิทมฏฺฐิตา; อิทปฺปจฺจยา; นิคฺคหีตโลโป ปสฺส จ ทฺวิภาโว. उत्तरपद परे होने पर 'इम' का 'इदं' होता है; 'इदमतु्ठिता'; 'इदप्पच्चया' - यहाँ निग्गहीत (अनुस्वार) का लोप और 'प' का द्वित्व हुआ है। ปุํ ปุมสฺส วา-. 'पुम' शब्द का 'पुं' विकल्प से (होता है)। ปุมสฺส ปุํโหตุตฺตรปเท วิภาสา; ปุลฺลิงฺคํ; ปุํลิงฺคํ. उत्तरपद परे होने पर 'पुम' का विकल्प से 'पुं' होता है; 'पुल्लिङ्गं'; 'पुंलिङ्गं'। ฏ นฺนนฺตุนํ-. 'न' अन्त वाले शब्दों का 'ट' (होता है)। เอสํ ฏ โหตุตฺตรปเทกฺวจิ วา; ภวมฺปติฏฺฐา มยํ; ภาควมมูลกา โน ธมฺมา–-พหุลาธิการา ตราทิสุ จ; ปเคว มหตฺตรี; รตฺตญฺญุมหตฺตํ. उत्तरपद परे होने पर इनका कहीं 'ट' होता है; 'भवम्पतिट्ठा मयं'; 'भागवममूलाका नो धम्मा'। 'बहुलाधिकार' के कारण 'तर' आदि प्रत्ययों के परे होने पर भी होता है; 'पगेव महत्तरी'; 'रत्तञ्ञुमहत्तं'। อ-๕ अ . । เอสํ อ โหตุตฺตรปเท; คุณวนฺตปติฏฺโฐ’สฺมิ. उत्तरपद परे होने पर इनका 'अ' होता है; 'गुणवन्तपतिट्ठोस्मि'। [หฺหฺว ปเค ] [पृष्ठ] มนาทฺยาปาทีนโม มเย จ-. मनस् आदि और आपस् आदि शब्दों को 'मय' परे होने पर 'ओ' होता है। มนาทีนมาปาทีนญฺจ โอ โหตุตฺตรปเท มเย จ; มโน เสฏฺฐา; มโนมยา; รโชชลฺลํ; รโชมยํ; อาโปคตํ; อาโปมยํ; อนุยนฺติ ทิโสทิสํ. मनस् आदि और आपस् आदि शब्दों के अन्त्य स्वर को उत्तरपद 'मय' परे होने पर 'ओ' होता है; जैसे- मनो सेट्ठा; मनोमया; रजो जल्लं; रजोमयं; आपोगतं; आपोमयं; अनुयन्ति दिसोदिसं। ปรสฺสสํขฺยาสุ-. संख्यावाचक शब्दों के परे होने पर 'पर' शब्द को 'ओ' होता है। สํขฺยาสุตฺตรปเทสุ ปรสฺส โอ โหติ; ปโรสตํ, ปโรสหสฺสํ–-สํขฺยาสูติ-กึ?ปรทตฺตุปชีวิโน. संख्यावाचक उत्तरपद परे होने पर 'पर' को 'ओ' होता है; जैसे- परोसतं, परोसहस्सं। 'संख्यावाचक' क्यों? परदत्तूपजीविनो। ชเน อุตฺตรปเท ผุถสฺส อุ โหติ; อริเยหิ ปุถเควายํ ชโนติ ปุถุชฺชโน. उत्तरपद 'जन' परे होने पर 'पुथ' को 'उ' होता है; जैसे- आर्यों से जो पृथक ही यह जन है, वह 'पुथुज्जनो' है। โส ฉสฺสาหายตเน วา-. 'अह' और 'आयतन' परे होने पर 'छ' (छह) को विकल्प से 'स' होता है। อเห อายตเน วุตฺตรปเท ฉสฺส โส วา โหติ; สาหํ, ฉาหํ; สฬายตนํ, ฉฬายตนํ. 'अह' और 'आयतन' उत्तरपद परे होने पर 'छ' को विकल्प से 'स' होता है; जैसे- साहं, छाहं; सळायतनं, छळायतनं। ลฺตุปิตาทีนมารงรงิ-. 'लतु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को 'आर' और 'अर' आदेश होते हैं। ลตุปฺปจฺจยนฺตานํ ปิตาทีนญฺจ ยถากฺกมมารงรงิ วา โหนฺตุตฺตรปเท; สตฺถารทสฺสนํ; กตฺตารนิทฺเทโส; มารต ปิตโร–-วาตฺเวว-สตฺถุทสฺสนํ; มาตาปิตโร. 'लतु' प्रत्ययान्त शब्दों और 'पितृ' आदि को उत्तरपद परे होने पर क्रमशः 'आर' और 'अर' विकल्प से होते हैं; जैसे- सत्थारदस्सनं; कत्तारनिद्देसो; मातापितरो। विकल्प से होने के कारण- सत्थुदस्सनं; मातापितरो। วิชฺชาโยนิสมฺพานฺธนมา ตตฺร จตฺเถ-. विद्या और योनि (जन्म) सम्बन्ध वाले शब्दों को 'च' के अर्थ (द्वन्द्व समास) में 'आ' होता है। ลตุปิตาทีนํ วิชฺชาสมฺพนฺธีนํ โยนิสมฺพนฺธีนญฺจ เตสฺเวว ลตุปิตาทิสุ วิชฺชาโยนิสมฺพนฺธิสุตฺตรปเทสุ จตฺถวิสเย อา โหติ; โหตาโปตาโร; มาตาปิตโร–-ลตุปิตาทีนนฺตฺเววปุตฺตภาตโร; ตตฺเรติ-กึ? ปิตุปิตามหา; จตฺเถติ-กึ; มาตุ ภาตา; วิชฺชาโยนิสมฺพนฺธานนฺติ-กึ?ทาตุภาตโร. 'लतु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि जो विद्या-सम्बन्धी और योनि-सम्बन्धी हैं, उन्हीं 'लतु-पितृ' आदि विद्या-योनि सम्बन्धी उत्तरपदों के परे होने पर 'च' के अर्थ (द्वन्द्व) के विषय में 'आ' होता है; जैसे- होतापोतारो; मातापितरो। 'लतु-पितृ' आदि के ही विषय में होने से- पुत्तभातरो। 'वहाँ' (उन्हीं उत्तरपदों में) क्यों? पितुपितामहा। 'च' के अर्थ में क्यों? मातु भाता। 'विद्या-योनि सम्बन्धी' क्यों? दातुभातरो। ปุตฺเต-. 'पुत्त' (पुत्र) परे होने पर। ปุตฺเต อุตฺตรปเท วตฺถวิสเย ลตุปิตาทีนํวิชฺชาโยนิ สมฺพนฺธานมา โหติ; ปิตาปุตฺตา; มาตาปุตฺตา. 'पुत्त' उत्तरपद परे होने पर विद्या और योनि सम्बन्ध वाले 'लतु-पितृ' आदि शब्दों को 'आ' होता है; जैसे- पितापुत्ता; मातापुत्ता। จิสฺมึ-. 'चि' प्रत्यय परे होने पर। จิปฺปจฺจยนฺเต อุตฺตรปเท อา โหติ; เกสาเกสิ; มุฏฺฐามุฏฺฐิ. 'चि' प्रत्ययान्त उत्तरपद परे होने पर 'आ' होता है; जैसे- केसाकेसि; मुट्ठामुट्ठि। อิตฺถิยมฺหาสิตปุมิตฺถิ ปุเมเวกตฺเถ-. स्त्रीलिंग में वर्तमान, एक ही अर्थ (समानाधिकरण) वाले उत्तरपद के परे होने पर, जो शब्द पहले पुल्लिंग में बोला गया हो (भाषितपुंस्क), वह स्त्रीलिंग शब्द पुल्लिंग के समान ही हो जाता है। อิตฺถิยํ วตฺตมาเน เอกตฺเถ สมานาธิกรเณ อุตฺตรปเท ปเร ภาสิตปุมา อิตฺถิ ปุเมว โหติ; กุรภริโย; ทีฆ स्त्रीलिंग में वर्तमान, समानाधिकरण उत्तरपद परे होने पर भाषितपुंस्क स्त्रीलिंग शब्द पुल्लिंग के समान होता है; जैसे- कुरभरियो; दीघ- ชงฺโฆ; ยุวชาโย–-อิตฺถิยนฺติ-กึ?’กลฺยาณี ปธานเมสํ’ กลฺยฺยาณิปฺปธานา; ภาสิตปุเมติ- กึ? กญฺญาภริโย; อิตฺถิติ-กึ? คามณิกุลํ ทิฏฺฐิ อสฺส’ คามณิทิฏฺฐิ; เอกตฺเถติ-กึ?’กลฺยาณิยา มาตา’ กลฺยาณีมาตา. जङ्घो; युवजायो। 'स्त्रीलिंग में' क्यों? 'कल्याणी पधानमेसं' - कल्याणिप्पधाना। 'भाषितपुंस्क' क्यों? कञ्ञाभरियो। 'स्त्रीलिंग' क्यों? गामणिकुलं, दिट्ठि अस्स - गामणिदिट्ठि। 'एक ही अर्थ (समानाधिकरण)' क्यों? 'कल्याणीया माता' - कल्याणीमाता। กฺวจิปฺปจฺจเย-. किसी प्रत्यय के परे होने पर। ภาสิตปุมิตฺถิ ปจฺจเย กฺวจิ ปุเมว โหติ; วฺยตฺตตรา, วฺยตฺตตมา. भाषितपुंस्क स्त्रीलिंग शब्द प्रत्यय परे होने पर कहीं पुल्लिंग के समान होता है; जैसे- व्यत्ततरा, व्यत्ततमा। สพฺพาทโย วุตฺติมตฺเต-. वृत्ति (समास, तद्धित आदि) मात्र में 'सब्ब' आदि शब्द। อิตฺถิวาจกา สพฺพาทโย วุตฺติมตฺเต ปุเมว โหนฺติ; ตสฺสา มุขํ’ ตมฺมุขํ; ตสฺสํ ตตฺร; ตาย ตโต; ตสฺสํเวลายํ ตทา. स्त्रीलिंग वाचक 'सब्ब' आदि शब्द वृत्ति मात्र में पुल्लिंग के समान होते हैं; जैसे- 'तस्सा मुखं' - तम्मुखं; 'तस्सं' - तत्र; 'ताय' - ततो; 'तस्सं वेलायं' - तदा। ฉายาย ชยํ ปติมฺหิ-. 'पति' परे होने पर 'जाया' को 'जय' होता है। ปติมฺหิ ปเร ชายาย ชยํ โหติ; ชยมฺปตี–-ชานิปตีติปกตนฺตเรน สิทฺธํ; ตถา ทมฺปตี ชมฺปตีติ. 'पति' परे होने पर 'जाया' को 'जय' होता है; जैसे- जयम्पती। 'जानिपती' यह अन्य व्याकरण से सिद्ध है; वैसे ही 'दम्पती' और 'जम्पती' भी। สญฺญายมุโททกสฺส-. संज्ञा (नाम) के विषय में 'उदक' को 'उद' होता है। สญฺญายมุทกสฺสุตฺตรปเท อุทาเทโส โหติ; อุทธี; อุทปานํ. संज्ञा के विषय में उत्तरपद परे होने पर 'उदक' को 'उद' आदेश होता है; जैसे- उदधि; उदपानं। กุมฺภาทิสุวา-. 'कुम्भ' आदि के परे होने पर विकल्प से। กุมฺภาทสุตฺตรปเทสุ อุทกสฺส อุทาเทโส วา โหติ; อุทกุมฺโภ, อุทกกุมฺโภ; อุทปตฺโต, อุทกปตฺโต; อุทพินฺทุ, อุกพินฺทุ–-อากติคโณ’ยํ. 'कुम्भ' आदि उत्तरपदों के परे होने पर 'उदक' को विकल्प से 'उद' आदेश होता है; जैसे- उदकुम्भो, उदककुम्भो; उदपत्तो, उदकपत्तो; उदबिन्दु, उदकबिन्दु। यह 'आकृतिगण' है। โสตาทิสูโลโป-. 'सोत' आदि के परे होने पर लोप होता है। โสตาทิสุตฺตรปเทสุอุทกสฺส อุสฺสโลโป โหติ; ทกโสตํ; ทกรกฺขโส. स्रोतादि उत्तरपदों के परे होने पर 'उदक' (udaka) के 'उ' का लोप होता है; जैसे- dakasotaṃ (जल का स्रोत); dakarakkhaso (जल-राक्षस)। ฏ นญฺสฺส-. 'नञ्' (nañ) के स्थान पर 'अ' (ṭa) होता है। อุตฺตรปเทนญฺสทฺทสฺส ฏ โหติ; อพฺราหฺมโณ –-ญกาโร กึ, เกวลสฺสมา โหตุ; ปามนปุตฺโต. उत्तरपद के परे होने पर 'नञ्' शब्द के स्थान पर 'अ' (ṭa) होता है; जैसे- abrāhmaṇo (जो ब्राह्मण नहीं है)। 'ञ' कार क्यों है? ताकि केवल 'न' का न हो; जैसे- pāmanaputto। อน สเร-. स्वर के परे होने पर 'अन' (ana) होता है। สราโท อุตฺตรปเท นญฺสทฺทสฺสอน โหติ; อนกฺขาตํ. स्वरादि उत्तरपद के परे होने पर 'नञ्' शब्द के स्थान पर 'अन' (ana) होता है; जैसे- anakkhātaṃ। ๒ ญกาโรติ-สพฺพตฺถ. २. 'ञ' कार सर्वत्र (सभी जगह) है। นขาทโย-. 'नख' आदि शब्द। นขาทโย สทฺทา อกตฏาเทสา นิปจฺจนฺเต;’นาสฺส ขมตฺถิติ’ นโข; อขมญฺญํ–-สญฺญาสทฺเทสุ จ นิปฺผตฺติมตฺตํ ยถากถจิ กตฺตพฺพํ.’ 'नख' आदि शब्द बिना 'अ' (ṭa) आदेश के ही निपातित होते हैं; 'जिसका क्षय (ख) नहीं है' वह 'nakho' (नख) है; अन्य अर्थ में 'akhamaññaṃ'। संज्ञा शब्दों में व्युत्पत्ति मात्र जैसे-तैसे करनी चाहिए। นาสฺส กุลมตฺถิ’ติ นกุโล; อกุลมญฺญํ; นข นกุล นปุํสก นกฺขตฺต นาก เอวมาทิ. 'जिसका कुल नहीं है' वह 'nakulo' (नेवला) है; अन्य अर्थ में 'akulamaññaṃ'। nakha, nakula, napuṃsaka, nakkhatta, nāka इत्यादि। นโค วาปฺปาณินิ-. अप्राणी (जड़) अर्थ में 'नग' (nago) विकल्प से निपातित होता है। นคฺैจฺจปฺปาณินิ วา นิปจฺจเต; นคา, รุกฺขา; นคา, ปพฺพตา; อคา, รุกฺขา; อคา ปพฺพตา–-อปฺปาณินีติ -กึ? อโค วสโล สีเตน. अप्राणी अर्थ में 'नग' विकल्प से निपातित होता है; जैसे- nagā (वृक्ष), rukkhā; nagā (पर्वत), pabbatā; agā (वृक्ष), rukkhā; agā (पर्वत), pabbatā। 'अप्राणी' क्यों? (प्राणी होने पर) 'ago vasalo sītena' (ठंड से कांपता हुआ शूद्र)। สหสฺส โส’ญฺญตฺเถ-. अन्य पदार्थ (बहुव्रीहि) में 'सह' (saha) के स्थान पर 'स' (so) होता है। อญฺญปทตฺถวุตฺติมฺหิ สมาเส อุตฺตรปเท ปเร สหสฺส โส วา โหติ; สปุตฺโต, สหปุตฺโต; อญฺญตฺเถติ-กึ? สหกตฺวา สหยุชฺฌิตฺวา. अन्यपदार्थ वृत्ति वाले समास में उत्तरपद के परे होने पर 'सह' के स्थान पर विकल्प से 'स' होता है; जैसे- saputto, sahaputto। 'अन्य अर्थ में' क्यों? (ताकि यहाँ न हो) sahakatvā, sahayujjhitvā। สญฺญายํ-. संज्ञा (नाम) होने पर। สหสฺสุตฺตรปเท โส เหติ สญฺญายํ; สาสฺสตฺถํ; สปลาสํ. संज्ञा होने पर उत्तरपद के परे 'सह' के स्थान पर 'स' होता है; जैसे- sāssatthaṃ, sapalāsaṃ। อปจฺจกฺเข-. परोक्ष (जो आँखों के सामने न हो) होने पर। อปจฺจกฺเข คมฺยมาเน สหสฺส โส โหตุตฺตรปเท; สาคฺคิ, กโปโต; สปิสาวา, วาตมณฺฑลิกา. परोक्ष अर्थ प्रतीत होने पर उत्तरपद के परे 'सह' के स्थान पर 'स' होता है; जैसे- sāggi kapoto, sapisāvā vātamaṇḍalikā। อกาเล สกตฺเถ-. काल (समय) को छोड़कर स्वार्थ (अव्ययीभाव) में। สกตฺถปฺปธานสฺส สหสทฺทสฺส อกาเล อุตฺตรปเท โส โหติ; สมฺปนฺนํ พฺรหฺมํ สพฺรหฺมํ; สจกฺกํ นิเธหิ, สธุรํ–-อกาเลติ-กึ? สหปุพฺพนหํ, สหาปรนฺหํ. स्वार्थ प्रधान 'सह' शब्द के स्थान पर, कालवाचक उत्तरपद को छोड़कर, 'स' होता है; जैसे- sampannaṃ brahmaṃ sabrahmaṃ; sacakkaṃ nidhehi, sadhuraṃ। 'अकाल' (काल रहित) क्यों? (ताकि यहाँ न हो) sahapubbanahaṃ, sahāparanhaṃ। คนฺถานฺตาธิกฺเย-. ग्रन्थ के अन्त और आधिक्य (अधिकता) अर्थ में। คนฺถานฺเต อาธิกฺย จฺैอ วตฺตมานสฺส สหสฺส โส โหตุตฺตรปเท; สกลํ โชติมธีเต; สมุหุตฺตํ–-กาลตฺโถ อารมฺโภ; อาธิกฺเย-สโทณา ขารี; สมาสโก กหาปโณ; นิจฺจตฺโถ’ยมารมฺโห. ग्रन्थ के अन्त और आधिक्य अर्थ में वर्तमान 'सह' के स्थान पर उत्तरपद के परे 'स' होता है; जैसे- sakalaṃ jotimadhīte; samuhuttaṃ - यहाँ काल अर्थ का आरम्भ है; आधिक्य में- sadoṇā khārī; samāsako kahāpaṇo; यह नित्य अर्थ का आरम्भ है। สมานสฺส ปกฺขาทิสุ วา-. 'पक्ष' आदि उत्तरपदों के परे होने पर 'समान' (samāna) के स्थान पर विकल्प से 'स' (so) होता है। ปกฺขาทิสุตฺตรปเทสุ สมานสฺสโส โหติ วา; สปกฺโข, สมานปกฺโข; สโชติ, สมานโชติ–-ปกฺขาทิสูติ-กึ? สมานสีโล; ปกฺข โชติ ชนปท รตฺติ ปตฺตินี ปตฺตี นาภี พนฺธุ พฺรหฺมจารี นาม โคตฺต รูป ฐานวณฺณ วโย วจน ธมฺม ชาติย ฆจฺจ. 'पक्ष' आदि उत्तरपदों के परे होने पर 'समान' के स्थान पर विकल्प से 'स' होता है; जैसे- sapakkho, samānapakkho; sajoti, samānajoti। 'पक्षादि' क्यों? (ताकि यहाँ न हो) samānasīlo। पक्षादि गण में हैं: pakkha, joti, janapada, ratti, pattinī, pattī, nābhī, bandhu, brahmacārī, nāma, gotta, rūpa, ṭhānavaṇṇa, vayo, vacana, dhamma, jātiya, ghacca। อุทเร อิเย-. 'उदर' (udara) शब्द के बाद 'इय' (iya) प्रत्यय होने पर। อุทเร อิยปเร ปรโต สมานสฺส โส วา โหติ; โสทริโย; สมาโนทริโย–-อิเยติ-กึ? สมาโนทรตํ. 'उदर' शब्द के बाद 'इय' प्रत्यय होने पर 'समान' के स्थान पर विकल्प से 'स' होता है; जैसे- sodariyo, samānodariyo। 'इय' क्यों? (ताकि यहाँ न हो) samānodarataṃ। รีริกฺขเกสุ-. 'री', 'रिक्ख' और 'क' (इश) के परे होने पर। เอเตสุสมานสฺส โส โหติ; สรี; สริกฺโข; สริโส. इनके परे होने पर 'समान' के स्थान पर 'स' होता है; जैसे- sarī, sarikkho, sariso। สพฺพาทินมา-. 'सब्ब' आदि के स्थान पर 'आ' (ā) होता है। รีริกฺขเกสุสพฺพาทีนมา โหติ; ยาที, ยาทิกฺโข, ยาทิโส. 'री', 'रिक्ख' और 'क' (इश) के परे होने पर 'सब्ब' आदि के स्थान पर 'आ' होता है; जैसे- yādī, yādikkho, yādiso। นฺตกิมิมานํ ฏากีฏี-. 'एत', 'किं' और 'इम' के स्थान पर क्रमशः 'टा', 'की' और 'टी' (ṭā, kī, ṭī) होते हैं। รีริกฺขเกสุ นฺตสทฺทกึสทฺทฺैมสทฺทานํ ฏากีฏี โหนฺติ ยถากฺกมํ; ภวาที, ภวาทิกฺโข, ภวาทิโส; กีที, กีทิกฺโข, กีทิโส; อีที, อีทิกฺโข, อีทิโส. ‘री’, ‘रिक्ख’ और ‘ख’ प्रत्ययों के परे होने पर ‘भवन्त’, ‘किं’ और ‘इम’ शब्दों के स्थान पर क्रमशः ‘टा’, ‘की’ और ‘ई’ आदेश होते हैं; जैसे- भवादी, भवादिक्खो, भवादिसो; कीदी, कीदिक्खो, कीदिसो; ईदी, ईदिक्खो, ईदिसो। ตุมฺหามฺภานํ ตาเมกสฺมึ-. ‘तुम्ह’ और ‘अम्ह’ के स्थान पर ‘ता’ और ‘म’ एकवचन में-। รีริกฺขเกสุ ตุมฺหามฺหานํ ตามา โหนฺเตกสฺมึ ยถากฺกมํ; ตาที, ตาทิกฺโข, ตาทิโส;มาที, มาทิกฺโข, มาทิโส; –-เอกสฺมินฺติ-กึ? ตุมฺหาที, อมฺหาที, ตุมฺหาทิกฺโข, อมฺหาทิกฺโข, ตุมฺหาทิโส, อมฺหาทิโส. ‘री’, ‘रिक्ख’ और ‘ख’ प्रत्ययों के परे होने पर ‘तुम्ह’ और ‘अम्ह’ के स्थान पर एकवचन में क्रमशः ‘ता’ और ‘मा’ आदेश होते हैं; जैसे- तादी, तादिक्खो, तादिसो; मादी, मादिक्खो, मादिसो। ‘एकस्मिं’ (एकवचन में) क्यों कहा? तुम्हादी, अम्हादी, तुम्हादिक्खो, अम्हादिक्खो, तुम्हादिसो, अम्हादिसो। ตํมมญฺญตฺร-. ‘तं’ और ‘मं’ अन्यत्र-। รีริกฺขกนฺตโต’ญฺญสฺมึ อุตฺตรปเท ตุมฺหามฺหานเม กสฺมึ ตํมํ โหนฺติ ยถากฺกมํ; ตนฺทีปา; มนฺทีปา; ตํ สรณา, มํสรณา; ตยฺโยโค มยฺโยโคติ-พินฺทุโลโป. ‘री’, ‘रिक्ख’ और ‘ख’ प्रत्ययों से भिन्न उत्तरपद के परे होने पर ‘तुम्ह’ और ‘अम्ह’ के स्थान पर एकवचन में क्रमशः ‘तं’ और ‘मं’ आदेश होते हैं; जैसे- तंदीपा; मंदीपा; तं सरणा, मं सरणा; तय्योगो, मय्योगो - यहाँ बिंदु (अनुस्वार) का लोप हुआ है। เวตสฺเสฏ-. ‘एत’ के स्थान पर विकल्प से ‘ए’-। รีริกฺขเกสฺเวตสฺเสฏ วา โหติ; เอที, เอตาที; เอทิกฺโข, เอตาทิกฺโข; เอทิโส, เอตาทิโส. ‘री’, ‘रिक्ख’ और ‘ख’ प्रत्ययों के परे होने पर ‘एत’ के स्थान पर विकल्प से ‘ए’ आदेश होता है; जैसे- एदी, एतादी; एदिक्खो, एतादिक्खो; एदिसो, एतादिसो। วิธาทิสุ ทฺวิสฺส ทุ-. ‘विधा’ आदि शब्दों के परे होने पर ‘द्वि’ के स्थान पर ‘दु’ होता है। ทฺวิสฺส ทุ โหติ วิธาทิสุ; ทุวิโธ, ทุปฏฺฏํ; เอวมาทิ. ‘विधा’ आदि शब्दों के परे होने पर ‘द्वि’ के स्थान पर ‘दु’ होता है; जैसे- दुविधो, दुपट्टं; इत्यादि। ทิ คุณาทิสุ-. ‘गुण’ आदि शब्दों के परे होने पर ‘द्वि’ के स्थान पर ‘दि’ होता है-। คุณาทิสุ ทฺวิสฺส ทิ โหติ; ทิคุณํ, ทิรตฺตํ, ทิคุ; เอวมาทิ ‘गुण’ आदि शब्दों के परे होने पर ‘द्वि’ के स्थान पर ‘दि’ होता है; जैसे- द्विगुणं, द्विरत्तं, द्विगु; इत्यादि। ติสฺว-. ‘ति’ (तीन) के परे होने पर ‘द्वि’ के स्थान पर ‘अ’ होता है-। ตีสุ ทฺวิสฺส อ โหติ; ทฺวตฺติกฺขตฺตุํ, ทฺวตฺติปตฺตปูรา. ‘ति’ (तीन) के परे होने पर ‘द्वि’ के स्थान पर ‘अ’ होता है; जैसे- द्वत्तिक्खत्तुं, द्वत्तिपत्तपूरा। อา สํขฺยายาสตาโท’นญฺญตฺเถ-. संख्यावाचक उत्तरपद के परे होने पर, ‘सत’ आदि को छोड़कर, अनन्य अर्थ में ‘द्वि’ के स्थान पर ‘आ’ होता है। สํขฺยายมุตฺตรปเท ทฺวิสฺสอา โหตสทาโท’นญฺญตฺเถ; ทฺวาทส, ทฺวาวีสติ, ทฺวตฺตึส; สํขฺยายนฺติ-กึ?’ทิรตฺตํ; อสตาโทติ-กึ? ทฺวิสตํ, ทฺวิสหสฺสํ; อนญฺญตฺเถติ-กึ?ทฺวิทสา. संख्यावाचक उत्तरपद के परे होने पर ‘द्वि’ के स्थान पर ‘आ’ होता है, ‘सत’ आदि को छोड़कर, अनन्य अर्थ में; जैसे- द्वादस, द्वावीसति, द्वत्तिंस। ‘संख्या’ क्यों कहा? ‘दिरत्तं’। ‘असत’ क्यों कहा? द्विसतं, द्विसहस्सं। ‘अनन्य अर्थ’ क्यों कहा? द्विदसा। ติสฺเส-. ‘ति’ के स्थान पर ‘ए’ होता है-। สํขฺยายมุตฺตรปเท ติสฺส เอโหตสตาโท’นญฺญตฺเถ; เตรส, เตวิส, เตตฺตึส–-สํขฺยายนฺตฺเวว-ติรตฺตํ; อสตาโทตฺเวว-ติสตํ; อนญฺญตฺเถตฺเวว-ติวตุกา. संख्यावाचक उत्तरपद के परे होने पर ‘ति’ के स्थान पर ‘ए’ होता है, ‘सत’ आदि को छोड़कर, अनन्य अर्थ में; जैसे- तेरस, तेवीस, तेत्तिंस। ‘संख्या’ होने पर ही - तिरत्तं। ‘असत’ होने पर ही - तिसतं। ‘अनन्य अर्थ’ होने पर ही - तिवतुका। จตฺตาลิสาโท วา-. ‘चत्तालीस’ आदि के परे होने पर विकल्प से-। ติสฺเสวา โหติ จตฺตาลีสาโท; เตจตฺตาลีส, ติจตฺตาลีส; เตปญฺญาส, ติปญฺญาส; เตสฏฺฐิ, ติสฏฺฐิ; เตสตฺตติ, ตีสตฺตตี; ตฺญสีติ, ติยาสีติ; เตนวุติ, ตินวุติ–-อสตาโทตฺเวว-ติสตํ. ‘चत्तालीस’ आदि के परे होने पर ‘ति’ के स्थान पर विकल्प से ‘ए’ होता है; जैसे- तेचत्तालीस, तिचत्तालीस; तेपञ्ञास, तिपञ्ञास; तेसट्ठि, तिसट्ठि; तेसत्तति, तीसत्तति; तेअसीति, तियासीति; तेनवुति, तिनवुति। ‘असत’ होने पर ही - तिसतं। ทฺวิสฺสา จ-. और ‘द्वि’ के स्थान पर भी-। อสตาโท’นญฺญตฺเถ จตฺตาลีสาโท ทฺวิสฺเส วา โหติ อาว ทฺเวจตฺตาลีสํ, ทฺวาจตฺตาสํ, ทฺวิจตฺตาลีสํ; ทฺเวปญฺญาสํ, ทฺวาปญฺญาสํ, ทฺวิปญฺญาสํ; อิจฺจาทิ. ‘सत’ आदि को छोड़कर अनन्य अर्थ में ‘चत्तालीस’ आदि के परे होने पर ‘द्वि’ के स्थान पर विकल्प से ‘आ’ अथवा ‘द्वे’ होता है; जैसे- द्वेचत्तालीसं, द्वाचत्तालीसं, द्विचत्तालीसं; द्वेपञ्ञासं, द्वापञ्ञासं, द्विपञ्ञासं; इत्यादि। พาจตฺตาลิสาโท-. ‘चत्तालीस’ आदि के परे होने पर ‘बा’-। ทฺวิสฺส พา วา โหตจตฺตาลีสาโท’นญฺญตฺเถ; พารส, ทฺวาทส; พาวีสติ, ทฺวาวีสติ; พตฺตึส, ทฺวตฺตึส–-อจตฺตาลีสาโทติ-กึ? ทฺวิจตฺตาลีส. अनन्य अर्थ में ‘चत्तालीस’ आदि से पूर्व ‘द्वि’ के स्थान पर विकल्प से ‘बा’ होता है; जैसे- बारस, द्वादस; बावीसति, द्वावीसति; बत्तिंस, द्वत्तिंस। ‘अचत्तालीस’ क्यों कहा? द्विचत्तालीस। ทฺวิสติทเสสุ ปญฺจสฺส ปณฺณุปนฺนา -. ‘वीसति’ और ‘दस’ के परे होने पर ‘पञ्च’ के स्थान पर ‘पण्णु’ और ‘पन्न’-। วีสติทเสสุ ปเรสุ ปญฺจสฺส ปณฺณุปนฺนา โหนฺติ วา ยถากฺกมํ; ปณฺณุวีสติ, ปญฺจวีสติ;ปนฺนรส, ปญฺจทส. ‘वीसति’ और ‘दस’ के परे होने पर ‘पञ्च’ के स्थान पर विकल्प से क्रमशः ‘पण्णु’ और ‘पन्न’ आदेश होते हैं; जैसे- पण्णुवीसति, पञ्चवीसति; पन्नरस, पञ्चदस। จตุสฺส จุโต ทเส-. ‘दस’ शब्द के परे होने पर ‘चतु’ के स्थान पर ‘चु’ और ‘चो’-। จตุสฺส จุโจ โหนฺติ วา ทสสทฺเท ปเร; จุทฺทส, โจทฺทส, จตุทฺทส. ‘दस’ शब्द के परे होने पर ‘चतु’ के स्थान पर विकल्प से ‘चु’ और ‘चो’ आदेश होते हैं; जैसे- चुद्दस, चोद्दस, चतुद्दस। ฉสฺส โส-. ‘छ’ के स्थान पर ‘सो’-। ฉสฺส โส อิจฺจยมาเทโส โหติ ทสสทฺเท ปเร; โสฬส. ‘दस’ शब्द के परे होने पर ‘छ’ के स्थान पर ‘सो’ यह आदेश होता है; जैसे- सोळस। เอกฏฺฐานมา-. ‘एक’ और ‘अट्ठ’ के स्थान पर ‘आ’-। เอกอฏฺฐานํ อา โหติ ทเส ปเร; เอกาทส, อฏฺฐารส. 'एक' और 'अट्ठ' शब्दों के बाद 'दस' होने पर 'आ' हो जाता है; जैसे- एकादस, अट्ठारस। ร สํขฺยาโต วา-. संख्यावाची शब्दों में विकल्प से 'र' आदेश होता है। สํขฺยาโต ปรสฺส ทสสฺสร โหติ วิภาสา; เอการส, เอกาทส; พารส, ทฺวาทส; ปนฺนรส, ปญฺจทส; สตฺตรส, สตฺตทส; อฏฺฐารส, อฏฺฐาทส–-ปนฺนพาเทเสสุ นิจฺจํ, อิธ น โหติ จตุทฺทส. संख्या के बाद 'दस' के 'द' को विकल्प से 'र' होता है; जैसे- एकारस, एकादस; बारस, द्वादस; पन्नरस, पञ्चदस; सत्तरस, सत्तदस; अट्ठारस, अट्ठादस। 'पन्न' और 'बा' आदेशों में यह नित्य होता है, यहाँ 'चतुद्दस' में नहीं होता। ฉตีหิ โฬ จ- 'छ' और 'ति' के बाद 'द' के स्थान पर 'ळ' भी होता है। ฉตีหิ ปรสฺส ทสสฺส โฬ โหติ โร จ; โสฬส, โสรส; เตฬส, เตรส. 'छ' और 'ति' के बाद 'दस' के 'द' को 'ळ' और 'र' होता है; जैसे- सोळस, सोरस; तेळस, तेरस। จตุตฺถตติยานมฑฺฒุฑฺฒติยา-. 'चतुत्थ' और 'ततिय' के स्थान पर क्रमशः 'अड्ढुड्ढ' और 'अड्ढतिय' होते हैं। อฑฺฒา ปเรสํ จตุตฺถตติยานํ อุฑฺฒติยา โหนฺติ ยถากฺกมํ;’อฑฺฒน จตุตฺโถ’ อฑฺฒุฑฺโฒ,’อฑฺเฒน ตติโย’ อฑฺฒติโย–-กถํ?อฑฺฒเตยฺโยติ-สกตฺเถ ณฺเย อุตฺตร ปทวุทฺธิ. 'अड्ढ' के बाद 'चतुत्थ' और 'ततिय' को क्रमशः 'उड्ढ' और 'तिय' होते हैं; 'अड्ढेन चतुत्थो' (साढ़े तीन) - अड्ढुड्ढो, 'अड्ढेन ततियो' (ढाई) - अड्ढतियो। 'अड्ढतेय्यो' कैसे? स्वार्थ में 'ण्य' प्रत्यय होने पर उत्तरपद की वृद्धि होती है। ทุติยสฺส สห ทิยฑฺฒทิวฑฺฒา-. 'दुतिय' (द्वितीय) के साथ 'दियड्ढ' और 'दिवड्ढ' होते हैं। อฑฺฒา ปรสฺส ทุติยสฺส สหอฑฺฒสทฺเทน ทิยฑฺฒทิวฑฺฒา โหนฺติ;’ อฑฺเฒน ทุติโย’ ทิยฑฺโฒ, ทิวฑฺโฒ วา. 'अड्ढ' के बाद 'दुतिय' को 'अड्ढ' शब्द के साथ 'दियड्ढ' और 'दिवड्ढ' होते हैं; 'अड्ढेन दुतियो' (डेढ़) - दियड्ढो या दिवड्ढो। สเร กท กุสฺสุนฺตรตฺเถ-. स्वर परे होने पर, कुत्सित अर्थ में 'कु' के स्थान पर 'कद' आदेश होता है। กุสฺสุตฺตรปทตฺเถ วตฺตมานสฺส สราโท อุตฺตรปเท กทา เทโสโหติ; กทนฺนํ, กทสนํ–-สเรติ-กึ? กุปุตฺโต; อุตฺตรตฺเถติ-กึ? กุโอฏฺโฐ; ราชา. कुत्सित उत्तरपद के अर्थ में वर्तमान 'कु' के बाद स्वर आदि वाला उत्तरपद होने पर 'कद' आदेश होता है; जैसे- कदन्नं, कदसनं। 'स्वर परे होने पर' क्यों? कुपुत्तो। 'कुत्सित अर्थ में' क्यों? कुओट्ठो; राजा। กาปฺปตฺเถ-. 'अल्प' अर्थ में 'कु' के स्थान पर 'का' होता है। อปฺปตฺเถ วตฺตมานสฺส กุสฺสกา โหตุตฺตรปทตฺเถ;’อปฺปกํ ลวณํ’ กาลวณํ. अल्प अर्थ में वर्तमान 'कु' के स्थान पर उत्तरपद परे होने पर 'का' होता है; 'अप्पकं लवणं' (थोड़ा नमक) - कालवणं। ปุริเสวา-. 'पुरिस' शब्द परे होने पर विकल्प से 'का' होता है। กุสฺส ปุริเสกา โหติ วา; กาปุริโส, กุปุริโส–-อยมปฺปตฺตวิภาสา–-อปฺปตฺเถ ตุปุพฺเพนนิจฺจํโหติ;’อีสํ ปุริโส’ กาปุริโส. 'कु' को 'पुरिस' परे होने पर विकल्प से 'का' होता है; कापुरिसो, कुपुरिसो। यह अप्राप्त-विभाषा है। अल्प (ईषत्) अर्थ में तो पूर्व सूत्र से नित्य होता है; 'ईसं पुरिसो' - कापुरिसो। ปุพฺพาทีหุตฺตรปทสฺสอหสฺส อนฺหาเทโส โหติ; ปุพฺพนฺโห; อปรนฺโห; อชชนฺโห; สายนฺโห; มชฺฌนฺโห. 'पुब्ब' आदि के बाद उत्तरपद 'अह' (दिन) के स्थान पर 'अन्ह' आदेश होता है; जैसे- पुब्बन्हो, अपरण्हो, अज्जन्हो, सायन्हो, मज्झन्हो। อิติ โมคฺคลฺลาเน วฺยากรเณ วุตฺติยํ สมาสกณฺโฑ ตติโย. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में समास का तीसरा काण्ड समाप्त हुआ। ฉฏฺฐิยนฺตา นามสฺมา วา ณปฺปจฺจโย โหตปจฺเจ’ภิเธเย; ณกาโร วุทฺธฺยตฺโถ; เอวมญฺญตฺราปิ,’วสิฏฺฐสฺสาปจฺจํ’ วาสิฏฺโฐ, วาสิฏฺฐี วา; โอปคโว, โอปควี วา –-เวติ-วากฺย สมาสวิกปฺปตฺถํ ตสฺสาธิกาโร สกตฺถาวธิ. षष्ठी-विभक्ति युक्त नाम से 'अपत्य' (संतान) अर्थ में विकल्प से 'ण' प्रत्यय होता है; 'ण'कार वृद्धि के लिए है; इसी प्रकार अन्यत्र भी; 'वसेट्ठस्सापच्चं' (वसिष्ठ की संतान) - वासेट्ठो या वासेट्ठी; ओपगवो या ओपगवी। 'वा' शब्द वाक्य और समास के विकल्प के लिए है, इसका अधिकार स्वार्थ तक है। วจฺฉาทิโตณานณายนา-. 'वच्छ' आदि से 'णान' और 'णायन' प्रत्यय होते हैं। วจฺฉาทีหิ อปจฺจปฺปจฺจยนฺเตหิ โหตฺตาทีหิจ สทฺเทหิ ณานณายนปฺปจฺจยา วา โหนฺตปจฺเจ. วจฺฉาโน วจฺฉายโน; กจฺจาโน, กจฺจายโน–-ยาคเม-กาติยาโน; โมคฺคลฺลาโน, โมคฺคลฺลายโน; สากฏาโน, สากฏายโน; กณฺภาโน, กณฺภายโน; อิจฺจาทิ. 'वच्छ' आदि से और 'होत्त' आदि अपत्य प्रत्ययान्त शब्दों से 'अपत्य' अर्थ में विकल्प से 'णान' और 'णायन' प्रत्यय होते हैं। वच्छानो, वच्छायनो; कच्चानो, कच्चायनो; 'य' आगम होने पर - कातियानो; मोग्गल्लानो, मोग्गल्लायनो; साकटानो, साकटायनो; कणभानो, कणभायनो; इत्यादि। กตฺติกาทีหิ วิธวาทีหิ จ เณยฺยเณรา วา ยถากฺกมํ โหนฺตปจฺเจ. กตฺติเกยฺโย. เวนเตยฺโย; ภาคีเนยฺโย อิจฺจาทิ–-เวธเวโร; วนฺธเกโร; นาฬิเกโร; สามเณโร อิจฺจาทิ. 'कत्तिका' आदि और 'विधवा' आदि से 'अपत्य' अर्थ में क्रमशः 'णेय्य' और 'णेर' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। कत्तिकेय्यो, वेनतेय्यो, भागिनेय्यो इत्यादि। वेधवेरो, वन्धकेरो, नाळिकेरो, सामणेरो इत्यादि। ณฺย ทิจฺจาทีหิ-. 'दिति' आदि से 'ण्य' प्रत्यय होता है। ทิติปฺปภุตีหิ ณฺโย วา โหตปจฺเจ. เทจฺโจ; อาทิจฺโจ; โกณฺฑญฺโญ; คคฺคฺโย; ภาตพฺโพ; อิจฺจาทิ 'दिति' आदि से 'अपत्य' अर्थ में विकल्प से 'ण्य' प्रत्यय होता है। देच्चो, आदिच्चो, कोण्डञ्ञो, गग्ग्यो, भातब्बो इत्यादि। อา ณิ-. अकारान्त शब्दों से 'णि' प्रत्यय होता है। อการนฺตโต ณิ วา โหตปจฺเจ ทกฺขิ; โทณิ; วาสวิ; วารุณิจฺจาทิ. अकारान्त शब्दों से 'अपत्य' अर्थ में विकल्प से 'णि' प्रत्यय होता है; जैसे- दक्खि, दोणि, वासवि, वारुणि इत्यादि। ราชโต ญฺโญ ชาติยํ-. 'राज' शब्द से जाति अर्थ में 'ञ्ञ' प्रत्यय होता है। ราชสทฺทโต ญฺโญ วา โหตปจฺเจ ชาติยํ คมฺยมานายํ. ราชญฺโญ–-ชาติยนฺติ กึ?ราชาปจฺจํ. 'राज' शब्द से जाति अर्थ प्रतीत होने पर 'अपत्य' अर्थ में विकल्प से 'ञ्ञ' प्रत्यय होता है। राजञ्ञो। 'जाति अर्थ में' क्यों? राजापच्चं (राजा की संतान)। ขตฺตา ยิยา-. ขตฺตสทฺทา เยยา โหนฺตปจฺเจ ชาติยํ ขตฺโย; ขตฺติโย ชาติยยนฺตฺเว-ขตฺติ. 'खत्त' शब्द से 'यिय' प्रत्यय होता है। 'खत्त' शब्द से जाति अर्थ में 'अपत्य' अर्थ में 'यिय' प्रत्यय होता है; खत्यो, खत्तियो। जाति अर्थ न होने पर - खत्ति। มนุโต สฺสสณิ-. 'मनु' शब्द से 'स्स' और 'सण' प्रत्यय होते हैं। มนุสทฺทโต ชาติยํ สฺสสณ โหนฺตปจฺเจ. มนุสฺโส; มานุโส? อิตฺถิยํ-มนุสฺสา; มานุสี–-ชาติยนฺตฺเวว-มาณโว. 'मनु' शब्द से जाति अर्थ में 'अपत्य' अर्थ में 'स्स' और 'सण' प्रत्यय होते हैं। मनुस्सो, मानुसो। स्त्रीलिंग में - मनुस्सा, मानुसी। जाति अर्थ न होने पर - माणवो। ชนปทนามสฺมา ขตฺติยา รญฺโญ จ โณ-. जनपद के नाम से क्षत्रिय (संतान) और राजा के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। ชนปทสฺส ยํ นามํ ตนฺนามสฺมา ขตฺติยาปจฺเจ รญฺโญว โณ โหติ. ปญฺจาโล; โกสโล; มาคโธ; โอกฺกาโก–-ชนปทนามสฺมาติ-กึ? ทาสรถิ; ขตฺติยาติ-กึ?’ปญฺจาลสฺส พฺราหฺมณสฺสาปจฺจํ’ ปญฺจาล. जनपद का जो नाम है, उस नाम से क्षत्रिय अपत्य (संतान) और राजा के अर्थ में ही 'ण' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पाञ्चालो (पञ्चाल का राजा/क्षत्रिय), कोसलो, मागधो, ओक्काको। 'जनपद के नाम से' क्यों? दासरथि (दशरथ जनपद नहीं है)। 'क्षत्रिय' क्यों? 'पञ्चाल ब्राह्मण की संतान' - यहाँ 'पञ्चाल' ही रहेगा (ण प्रत्यय नहीं होगा)। ณฺย กุรุสิวีหี-. कुरु और शिवि शब्दों से 'ण्य' प्रत्यय होता है। กุรุสิวีหปจฺเจ รญฺเญ จ ณฺโย โหติ; โกรพฺโย เสพฺโย. कुरु और शिवि के अपत्य और राजा के अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय होता है; जैसे - कोरब्यो (कुरु का), सेब्यो (शिवि का)। ณ ราคา เตน รตฺตํ-. 'उससे रंगा हुआ' इस अर्थ में राग (रंग) वाचक शब्द से 'ण' प्रत्यय होता है। ราควาจิตติยนฺตโต รตฺตมิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ โณ โหติ’กสาเวน รตฺตํ’ กาสาวํ;โกสุมฺภํ; หาลิทฺทํ–-ราคาติ กึ? เทวทตฺเตน รตฺตํ วตฺถํ; อิธ กสฺมา นโหติ? นีลํ ปีตนฺติ–-คุณวจนตฺตา วินาปิ เณน ณตฺถสฺสาภิธานโต. राग वाचक तृतीयान्त शब्द से 'रंगा हुआ' इस अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। 'कषाय (गेरुए) से रंगा हुआ' - कासावं; कोसुम्भं; हारिद्दं। 'राग से' क्यों? 'देवदत्त द्वारा रंगा हुआ वस्त्र'; यहाँ क्यों नहीं होता? 'नीलं', 'पीतं' आदि गुणवाचक होने के कारण 'ण' प्रत्यय के बिना ही उस अर्थ का बोध करा देते हैं। นกฺขตฺเตนินฺทุยุตฺเตน กาเล-. चन्द्रमा से युक्त नक्षत्र वाचक तृतीयान्त शब्द से उस नक्षत्र द्वारा लक्षित 'काल' (समय) के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। ตติยนฺตโต นกฺขตฺตา เตน ลกฺขิเต กาเล โณ โหติ; ตํ เจ นกฺขนฺตมินฺทุยุตฺตํ โหติ. ผุสฺสี, รตฺตี; ผุสฺโส, อโห–-นกฺขตฺเตเนติ-กึ? คุรุนา ลกฺขิตา รตฺติ; อินฺทุ ยนุตฺเตเนติ-กึ? กตฺติกาย ลกฺขิโต มุหุตฺโต; กาเลติ-กึ? ผุสฺเสนลกฺขิตา อตฺถสิทฺธิ–-อชฺชกตฺติกาติ กตฺติกา ยุตฺเต จนฺเท กตฺติกาสทฺโท วตฺตเต. तृतीयान्त नक्षत्र वाचक शब्द से उसके द्वारा लक्षित काल के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, यदि वह नक्षत्र चन्द्रमा से युक्त हो। जैसे - फुस्सी रत्ती (पुष्य नक्षत्र वाली रात्रि), फुस्सो अहो (पुष्य नक्षत्र वाला दिन)। 'नक्षत्र से' क्यों? गुरु (बृहस्पति) द्वारा लक्षित रात्रि। 'इन्दु (चन्द्रमा) से युक्त' क्यों? कार्तिका द्वारा लक्षित मुहूर्त। 'काल में' क्यों? पुष्य नक्षत्र द्वारा लक्षित कार्य-सिद्धि। 'अज्जकत्तिका' (आज कार्तिका है) - यहाँ कार्तिका से युक्त चन्द्रमा होने पर कार्तिका शब्द का प्रयोग होता है। สาสฺส เทวตา ปุณฺณมํสิ-. 'वह इसकी देवता है' और 'पूर्णिमा' के अर्थ में प्रथमान्त शब्द से 'ण' प्रत्यय होता है। เสติ ปฐมนฺตา อสฺสาติ ฉฏฺฐตฺเถ โณ ภวติ ยํ ปฐมนฺตํ สา เว เทวตา ปุณฺณมาสี วา.’สุคโต เทวตา อสฺสา’ติ โสคโต; มาหินฺโท; ยาโม; วารุโณ; ผุสฺสี ปุณฺณมาสี อสฺส สมฺพนฺธินี’ติ ผุสฺโส, มาโฆ; มาโฆ; ผคฺคุโน; จิตฺโต; เวสาโข;เปฏฺฐมุโล; อาสาฬฺโห; สาวโณ; โปฏฺฐปาโท; อสฺสยุโช; กตฺติโก; มาคสิโร–-ปุณฺณมาสีติ-กึ, ผุสฺสิ ปญฺจมี อสฺส–-ปุณฺณมาสีว คตกมาสสมฺพนฺธินี น โหติ;’ปุณฺโณ มา อสฺสนฺติ’ นิพฺพจนา–-อโต เอว นิปาตนา โณ, สาคโม จ, มาสสุตียาว นปปญฺจทสรตฺตาโท วิธิ. 'वह' इस प्रथमान्त शब्द से 'उसका' इस षष्ठी के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रथमान्त शब्द देवता या पूर्णिमा हो। 'सुगत जिसका देवता है' - सोगतो; माहिन्दो; यामो; वारुणो। 'पुष्य नक्षत्र वाली पूर्णिमा इससे संबंधित है' - फुस्सो, माघो; माघो; फग्गुनो; चित्तो; वेसाखो; पेट्ठमुलो; आसाळ्हो; सावणो; पोट्ठपादो; अस्सयुजो; कत्तिको; मागसिरो। 'पूर्णिमा' क्यों? 'पुष्य नक्षत्र वाली पंचमी' - यहाँ नहीं होगा। पूर्णिमा ही मास के संबंध को बताती है। 'पुण्णो मा अस्सं' (पूर्ण है मास इसका) इस व्युत्पत्ति से निपातन द्वारा 'ण' प्रत्यय और 'स' का आगम होता है। यह विधि मास की सूचना देने के लिए पन्द्रहवीं रात (पूर्णिमा) आदि में होती है। ตมธีเต ตํ ชานาติ กณิกา จ-. 'उसको पढ़ता है' या 'उसको जानता है' इन अर्थों में द्वितीयान्त शब्द से 'ण' और 'णिक' प्रत्यय होते हैं। ทุติยนฺตโต ตมธีเต ตํ ชานาตีติ เอเตสฺผตฺเถสุโณ โหติ โก ณิโกว.’ วฺยากรณมธีเต ชานาติ วา’ เวยฺยากรโณ; ฉานฺทโส; กมโก; ปทโก; เวนยิโก; สุตฺตนฺติโก–-ทฺวิตคฺคหณํ ปุถเคว วิธานตฺถํ ชานนสฺสจ อชฺเฌนวิสยภาวทสฺสนตฺถํ ปสิมฺพุปสํคหตฺถญฺจ. द्वितीयान्त शब्द से 'उसको पढ़ता है' या 'उसको जानता है' इन अर्थों में 'ण' या 'णिक' प्रत्यय होता है। 'व्याकरण पढ़ता है या जानता है' - वेय्याकरणो; छान्दसो; कमको; पदको; वेनयिको; सुत्तन्तिको। यहाँ दो (अधीते और जानाति) का ग्रहण अलग-अलग विधान के लिए है और यह दिखाने के लिए है कि ज्ञान अध्ययन का विषय है, तथा प्रसंग के संग्रह के लिए है। ตสฺส วิสเย เทเส.-. 'उसका विषय' इस अर्थ में षष्ठ्यन्त शब्द से देश (स्थान) वाचक होने पर 'ण' प्रत्यय होता है। ฉฐิยนฺตา วิสเย เทสรูเป โณ โหติ.’วสาตีนํ วิสโย เทโส’วาสาโต–-เทเสติ กึ? จกฺขุสฺส วิสโย รูปํ, เทวทตฺตสฺส วิสโย’นุวาโก. षष्ठ्यन्त शब्द से 'विषय' अर्थ में देश रूप होने पर 'ण' प्रत्यय होता है। 'वसातियों का विषय देश' - वासातो। 'देश' क्यों? 'चक्षु का विषय रूप', 'देवदत्त का विषय अनुवाक' (यहाँ नहीं होगा)। นิวาเส ตนฺนาเม-. 'निवास' अर्थ में षष्ठ्यन्त शब्द से देश का नाम होने पर 'ण' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา นิวาเส เทเส ตนฺนาเม โณ โหติ;’สิวีนํ นิวาโส เทโสเสพฺโย; วาสาโต. षष्ठ्यन्त शब्द से 'निवास' अर्थ में देश का वही नाम होने पर 'ण' प्रत्यय होता है; जैसे - 'शिवियों का निवास देश' - सेब्यो; वासातो। อทูรภเว-. 'समीप में होने वाला' इस अर्थ में षष्ठ्यन्त शब्द से देश का नाम होने पर 'ण' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา อทูรภเว เทเสตนฺนาเม โณ โหติ;’วิทสาย อทุรภวํ’ เวทิสํ. षष्ठ्यन्त शब्द से 'समीप में होने वाला' अर्थ में देश का नाम होने पर 'ण' प्रत्यय होता है; जैसे - 'विदिशा के समीप होने वाला' - वेदिसं। เตนติพฺพตฺเต-. 'उसके द्वारा निर्मित' इस अर्थ में तृतीयान्त शब्द से देश का नाम होने पर 'ण' प्रत्यय होता है। ตติยนฺตา นิพฺพตฺเต เทเสตนฺนาเม โณ โหติ; กุสมฺเพน นิพฺพตฺตา โกสมฺพี, นครี; กากนฺที, มากนฺที,’สหสฺเสน นิพฺพตฺตา’ สาหสฺสี, ปริขา–-เหตุมฺหิ กตฺตริกรเณ จ ยถาโยคํ ตติยา. तृतीयान्त शब्द से 'निर्मित' अर्थ में देश का नाम होने पर 'ण' प्रत्यय होता है; जैसे - 'कुसम्ब द्वारा निर्मित' - कोसम्बी नगरी; काकन्दी, माकन्दी। 'सहस्र द्वारा निर्मित' - साहस्सी परिखा। यहाँ हेतु, कर्ता और करण में यथासंभव तृतीया विभक्ति होती है। ตมิธตฺถิ-. 'वह यहाँ है' इस अर्थ में प्रथमान्त शब्द से सप्तमी के अर्थ में देश का नाम होने पर 'ण' प्रत्यय होता है। ตนฺติ ปฐมนฺตา อิธาติ สตฺตมฺยตฺเถ เทเส ตนฺนาเม โณ โหติ, ยนฺตํ ปฐมนฺตมตฺถิ เจ;’อุทุมฺพรา อสฺมึ เทเส สนฺตี’ติ โอทุมฺพโร, พาทโร, พพฺพโช. 'वह' इस प्रथमान्त शब्द से 'यहाँ' इस सप्तमी के अर्थ में देश का नाम होने पर 'ण' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रथमान्त वस्तु वहाँ विद्यमान हो; जैसे - 'इस देश में उदुम्बर (गूलर) हैं' - ओदुम्बरो, बादरो, बब्बजो। ตตฺร ภเว-. 'वहाँ होने वाला' इस अर्थ में सप्तम्यन्त शब्द से 'ण' प्रत्यय होता है। สตฺตมฺยนฺตา ภวตฺเถ โณ โหติ;’อุทเก ภโว’โอทโก, โอรโส, ชานปโท, มาคโธ, กาปิลวตฺถโว, โกสมฺโพ. सप्तम्यन्त शब्द से 'होने वाला' (भव) अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है; जैसे - 'जल में होने वाला' - ओदको, ओरसो (हृदय/उरस में होने वाला), जानपदो, मागधो, कापिलवत्थवो, कोसम्बो। อชฺชาทีหิ ตโต-. 'अज्ज' (आज) आदि शब्दों से उसके बाद 'तनो' प्रत्यय होता है। ภวตฺเถ อชฺชาทีหิ ตโน โหติ;’อชฺช ภโว’ อชฺชตโน, สฺวาตโน, หิยฺยตฺตโน. 'भव' अर्थ में 'अज्ज' आदि शब्दों से 'तनो' प्रत्यय होता है; जैसे - 'आज होने वाला' - अज्जतनो, स्वातनो (कल होने वाला), हिय्यत्तनो (बीते कल होने वाला)। ปุราโต โณ จ-. 'पुरा' शब्द से 'ण' और 'तनो' प्रत्यय होते हैं। ปุรา อิจฺจสฺมา ภวตฺเถ โณ โหติ ตโน จ; ปุราโณ, ปุราตโน. 'पुरा' इस शब्द से 'भव' अर्थ में 'ण' और 'तनो' प्रत्यय होते हैं; जैसे - पुराणो, पुरातनो। อมาตฺถจฺโจ-. อมาสทฺทโต อจฺโจ โหติ ภวตฺเถ; อมจฺโจ. 'अमा' शब्द से 'अच्चो' प्रत्यय होता है। 'अमा' शब्द से 'भव' अर्थ में 'अच्चो' प्रत्यय होता है; जैसे - अमच्चो (अमात्य)। มชฺฌาทิตฺวิโม-. 'मज्झ' (मध्य) आदि शब्दों से 'इमो' प्रत्यय होता है। มชฺฌาทีหิ สตฺตมฺยนฺเตหิ ภวตฺเถ อิโม โหติ; มชฺฌิโม, อนฺติโม–-มชฺกฺชฺธอนฺต เหฏฺฐา อุปริ โอร ปาร ปจฺฉา อพฺภนฺตร ปจฺจนฺต. 'मज्झ' आदि सप्तम्यन्त शब्दों से 'होने' (भव) के अर्थ में 'इम' प्रत्यय होता है; जैसे- मज्झिम (मध्यम), अन्तिम। मज्झ, अन्त, हेट्ठा, उपरि, ओर, पार, पच्छा, अब्भन्तर, पच्चन्त। กณฺเณยฺยเณยฺยกยิยา-. कण, णेय्य, णेय्यक, य, इय। สตฺตมฺยนฺตา เอเต ปจฺจยา โหนฺติ ภวตฺเถ; กณ-’กุสินารายํ ภโว’ โกสินารโก, มาคธโก, อารญฺญเก, วิหาโร–-เณยฺย-คงฺเคยฺโย, ปพฺพเตยฺโย, วาเนเยยฺยา–-เณยฺยก-โกเลยฺยโก, พาราณเสยฺยโก, จมฺเปยฺยโก; มิถิเลยฺยโกติ-เอยฺยโก–-ย-คมฺโม, ทิพฺโพ; อิยคามิโย, อุทริโย, ทิวิโย, ปญฺจาลิโย, โพธปกฺขีโย, โลกิโย. सप्तम्यन्त शब्दों से 'होने' के अर्थ में ये प्रत्यय होते हैं; कण- 'कुसिनारा में होने वाला' कोसिनारक, मागधक, आरञ्ञक (विहार); णेय्य- गङ्गेय्य, पब्बतेय्य, वानेय्य; णेय्यक- कोलेय्यक, बाराणसेय्यक, चम्पेय्यक, मिथिलेय्यक; य- गम्म, दिब्ब; इय- गामिय, उदरिय, दिविय, पञ्चालिय, बोधपक्खिय, लोकिय। ณิโก-. णिक। สตฺตมฺยนฺตา ภวตฺเถ ณิโก โหติ; สารทิโก, ทิวโส; สารทิกา, รตฺติ. सप्तम्यन्त शब्दों से 'होने' के अर्थ में 'णिक' प्रत्यय होता है; जैसे- सारदिक (दिवस), सारदिका (रात्रि)। ตมสฺส สิปฺปํ สีลํ ปณฺยํ ปหรณํ ปโยชนํ-. वह उसका शिल्प, शील (स्वभाव), पण्य (व्यापार की वस्तु), प्रहरण (शस्त्र) या प्रयोजन है। ปฐมนฺตา สิปฺปาทิวาจกา อสฺเสติ ฉฒตฺเถ ณิโก โหติ;’วีณาวาทนํ สิปฺปมสฺส’ เวณิโก, โมทงฺคิโก, วํสิโก;’ปํสุกูลธารณํ สีลมสฺส’ ปํสุกูลิโก, เตจีวริโก;’คนฺโธปณฺยมสฺส’ คนฺธิโก, เตลิโก, โคฬิโก’จาโป ปหรณมสฺส’ จาปิโก, โตมริโก, มุคฺคริโก;’อุปธิปฺป โยชนมสฺส’ โอปธิกํ, สาติกํ, สาหสฺสิกํ. शिल्प आदि वाचक प्रथमान्त शब्दों से 'उसका' इस षष्ठ्यर्थ में 'णिक' प्रत्यय होता है; 'वीणा बजाना जिसका शिल्प है' वेणिक, मोदङ्गिक, वंसिक; 'पांसुकूल धारण करना जिसका शील है' पांसुकूलिक, तेचीवरिक; 'गन्ध जिसका पण्य है' गन्धिक, तेलिक, गोळिक; 'चाप (धनुष) जिसका प्रहरण है' चापिक, तोमरिक, मुग्गरिक; 'उपधि जिसका प्रयोजन है' ओपधिक, सातिक, साहस्सिक। ตํ หนฺตรหติ คจฺฉตุญฺฉติ จรติ-. ทุติยนฺตา หนฺตีติ เอวมาทิสฺวตฺเถสุ ณิโก โหติ; ปกฺขีหิ-’ปกฺขิโน หนฺตี’ติ ปกฺขิโก, สากุณิโก, มายุริโก–-มจฺเฉหิ- มจฺฉิโก, เมนิโก–-มิเคหิ มาควิโก, หาริณิโก, - สูกริโกติ- อิโก;’สตมรหตี’ติ สาติกํ, สนฺทิฏฺฐิกํ;’เอหิ ปสฺส วิธึ รหตี’ติ เอหิปสฺสิโก, สาหสฺสิโก–-สหสฺสิโยตีธ อิโย;’ปรทารํ คจฺฉตี’ติ ปารทาริโก, มคฺคิโก, ปญฺญาสโยชนิโก;’ พทเร อุญฺฉตี’ติ พาทริโก, สามากิโก;’ธมฺมํ จรตี’ติ ธมฺมิโก, อธมฺมิโก. 'उसको मारता है', 'योग्य है', 'जाता है', 'चुनता है', 'आचरण करता है' - इन अर्थों में द्वितीयान्त शब्दों से 'णिक' प्रत्यय होता है; पक्षियों के सम्बन्ध में- 'पक्षियों को मारता है' पक्खिक, साकुणिक, मायुरिक; मछलियों के सम्बन्ध में- मच्छिक, मेनिक; मृगों के सम्बन्ध में- मागविक, हारिणिक, सूकरिक (यहाँ 'इक' प्रत्यय है); 'सौ के योग्य है' सातिक, सन्दििट्ठक; 'एहि पस्स (आओ देखो) विधि के योग्य है' एहिपस्सिक, साहस्सिक (यहाँ 'इय' प्रत्यय भी है); 'परस्त्री के पास जाता है' पारदारिक, मग्गिक, पञ्ञासयोजनिक; 'बेर चुनता है' बादरिक, सामाकिक; 'धर्म का आचरण करता है' धम्मिक, अधम्मिक। เตน กตํ กีตํ พทฺธมหิสงฺขตํ สํสฒํ หตํ หนฺติ ชิตํ ชยติ ทิพฺพติ ขณติ ตรติ จรติ วหติ ชิวติ-. उसके द्वारा किया गया, खरीदा गया, बाँधा गया, संस्कृत (बनाया गया), संसृष्ट (मिलाया गया), मारा गया, मारता है, जीता गया, जीतता है, खेलता है, खोदता है, तैरता है, चलता है, ढोता है, जीता है। ตติยนฺตา กตาทิสฺวตฺเถสุ ณิโก โหติ;’กาเยน กตํ’ กายิกํ, วาจสิกํ, มานสิกํ;’วาเตนกโต อาพาโธ’ วาติโก–-’สเตน กีตํ’ สาติกํ, สาหสฺสิกํ, มูลโตว-เทวทตฺเตน กีโตติ น โหติ ตทตฺถาปฺปตีติยา–-’วรตฺตาย พทฺโธ’ วารตฺติโก, อายสิโก, ปาสิโก; –-’ฆเตน อภิสงฺขตํ สํสฏฺฐํ วา’ ฆาติกํ, โคฬิกํ, ทาธิกํ, มาริจิกํ–-’ชาเลน หโต หนฺตีติ วา’ ชาลิโก, พาฬิสิโก–-’อกฺโขหิ ชิต’มกฺขิกํ, สาลากิกํ–-’อกฺเขหิ ชยติ ทิพฺพติ วา’ อกฺขิโก–-’ขณิตฺติยา ขณตี’ติ ขาณิตฺติโก, กุทฺทาลิโก-เทวทตฺเตน ชิตมงฺคุลฺยา ขณตีติ น โหติ ตทตฺถา นวคมา–-’อุฬุมฺเปน ตรตี’ติ โอฬุมฺปิโก; อุฬุมฺปิโกติ-อิโก; โคปุจฺฉิโก; นาวิโก–-’สกเฏน จรตี’ติ สากฏิโก. รถิโก–-ปรปฺปิโกติ อิโก-’ขนฺเธน วหตี’ติ ขนฺธิโก, อํสิโก; สีสิโกติ-อิโก–-’เวตเตน ชีวตี’ติ ขนฺธิโก, อํสิโก; สีสิโกติ-อิโก–-’เวตเนน ชีวตี’ติ เวตนิโก, ภติโก, กยิโก, วิกฺกยิโก; กยวิกฺกยยิโกติ-อิโก. तृतीयान्त शब्दों से 'किया गया' आदि अर्थों में 'णिक' प्रत्यय होता है; 'काया से किया गया' कायिक, वाचसिक, मानसिक; 'वात (वायु) से किया गया रोग' वातिक; 'सौ से खरीदा गया' सातिक, साहस्सिक (यह केवल मूल्य के अर्थ में होता है, 'देवदत्त द्वारा खरीदा गया' में नहीं होता); 'वरत्ता (चमड़े की रस्सी) से बाँधा गया' वारत्तिक, आयसिक, पासिक; 'घृत से संस्कृत या संसृष्ट' घातिक, गोळिक, दाधिक, मारिचिक; 'जाल से मारा गया या मारता है' जालिक, बाळिसिक; 'अक्षों (पाँसों) से जीता गया' अक्खिक, सालाकिंक; 'अक्षों से जीतता है या खेलता है' अक्खिक; 'खनित्ति (कुदाल) से खोदता है' खाणित्तिक, कुद्दालिक (देवदत्त द्वारा जीता गया या अंगुली से खोदता है, यहाँ नहीं होता); 'उळुम्प (बेड़े) से पार करता है' ओळुम्पिक (यहाँ 'इक' प्रत्यय भी है), गोपच्छिक, नाविक; 'सकट (गाड़ी) से चलता है' साकटिक, रथिक, परप्पिक; 'कन्धे से ढोता है' खन्धिक, अंसिक, सीसिक; 'वेतन से जीता है' वेतनिक, भतिक, कयिक, विक्कयिक, कयविक्कयिक। ตสฺส สํวตฺตติ-. उसके लिए संवर्तित (होता) है। จตุตฺถฺยนฺตา สํวตฺตติ อสฺมึ อตฺเถ ณิโก โหติ;’ปุนพฺภวาย สํวตฺตตี’ติ โปโนภวิโก, อิตฺถิยํ-โปโนภวิกา;’โลกาย สํวตฺตตี’ติ โลกิโก,’ สุฏฺฐุ อคฺโค’ติ สคฺโค,’สคฺคาย สํวตฺตตี’ติ โสวคฺคิโก, สสฺสาวฺैก ตทมินาทิ ปาฐา–-’ธนาย สํวตฺตตี’ติ ธญฺญํ-โย. चतुर्थ्यन्त शब्दों से 'संवर्तित होता है' इस अर्थ में 'णिक' प्रत्यय होता है; 'पुनर्भव के लिए संवर्तित होता है' पोनोभविक, स्त्रीलिंग में- पोनोभविका; 'लोक के लिए संवर्तित होता है' लोकिक; 'सुष्ठु अग्र' स्वर्ग है, 'स्वर्ग के लिए संवर्तित होता है' सोवग्गिक; 'धान्य के लिए संवर्तित होता है' धञ्ञ (यहाँ 'य' प्रत्यय है)। ตโต สมฺภุตมาคตํ-. उससे सम्भूत (उत्पन्न) या आगत (आया हुआ)। ปญฺจมฺยนฺตา สมฺภุตมาคตนฺติเอเตสฺวตฺเถสุ ณิโก โหติ;’มาติโต สมฺภุตมาคตนฺติ วา’ มตฺติกํ, เปตฺติกํ–-ณฺยริยณฺรฺยาปิ ทิสฺสนฺติ–-’สุรภิโต สมฺภุตํ’ โสรภฺยํ;’ถนโต สมฺภุตํ’ ถญฺญํ;’ปิติโต สมฺภุโต’ เปตฺติโย, มาติโย, มตฺติโย; มจฺโจ วา. पञ्चम्यन्त शब्दों से 'सम्भूत' या 'आगत' इन अर्थों में 'णिक' प्रत्यय होता है; 'माता से सम्भूत या आगत' मत्तिक, पेत्तिक; ण्य, य, इय प्रत्यय भी देखे जाते हैं- 'सुरभि से सम्भूत' सोरब्भ; 'स्तन से सम्भूत' थञ्ञ; 'पिता से सम्भूत' पेत्तिय, मातिय, मत्तिय; अथवा मच्च। ตตฺถ วสติ วิทิโต ภตฺโต นิยุตฺโต-. वहाँ रहता है, विदित (प्रसिद्ध) है, भक्त (अनुरक्त) है, नियुक्त है। สตฺตมฺยนฺตา วสตีตฺเววมาทิสฺวตฺเถสุ ณิโก โหติ;’รุกฺขมูเล วสตี’ติ รุกฺขมุลิโก,อารญฺญิโก, โสสานิโก;’โลเก วิทิโต’ โลกิโก;’จตุมหาราเชสุ ภตฺตา’ จาตุมฺมหาราชิกา;;ทฺวาเร นิยุตฺโต’ โทวาริโก; ทสฺโสก ตทมินาทิปาฐา,ภณฺฑาคาริโก;-อิโก นวกมฺมิโก–-กิโย-ชาติกิโย, อนฺธกิโย. सप्तम्यन्त शब्दों से 'रहता है' आदि अर्थों में 'णिक' प्रत्यय होता है; 'वृक्षमूल में रहता है' रुक्खमूलिक, आरञ्ञिक, सोसानिक; 'लोक में विदित' लोकिक; 'चातुमहाराजों में भक्त' चातुम्महाराजिका; 'द्वार पर नियुक्त' दोवारिक, भण्डागारिक, नवकम्मिक; 'किय' प्रत्यय- जातिकिय, अन्धकिय। ตสฺสิทํ-. यह उसका है। ฉฏฺฐิยนฺตา อิทมิจฺจสฺมึอตฺเถ ณิโก โหติ;’สงฺฆสฺส อิทํ’ สงฺฆิกํ, ปุคฺคลิกํ, สกฺยปุตฺติโก, นาถปุตฺติโก, เชนทตฺติโก–-กิเย-สกิโย, ปรกิโย; นิเย-อตฺตนิยํ;เก-สโก, ราชกํ, ภทฺธํ. षष्ठ्यन्त शब्दों से 'यह उसका है' इस अर्थ में 'णिक' प्रत्यय होता है; 'संघ का यह' संघिक, पुग्गलिक, सक्यपुत्तिक, नाथपुत्तिक, जेनदत्तिक; 'किय' प्रत्यय में- सकिय, परकिय; 'निय' प्रत्यय में- अत्तनीय; 'क' प्रत्यय में- सक, राजक, भद्द। โณ-. ण। ฉฏฺฐิยนฺตา อิทมิจฺจสฺมึ อตฺเถ โณ โหติ;’กจฺจายนสฺสฺैทํ’ กจฺจายนํ, วฺยากรณํ; โสคตํ, สาสนํ; มาหิสํ, มํสาทิ. षष्ठ्यन्त शब्दों से 'यह उसका है' इस अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है; 'कच्चायन का यह' कच्चायन (व्याकरण); सोगत (शासन); माहिस (मांस आदि)। ควาทีหิ โย-. 'गो' आदि शब्दों से 'य' प्रत्यय होता है। ควาทีหิ ฉฏฺฐิยนฺเตหิ อิทมิจฺจสฺมึ อตฺเถ โย โหติ;’คุนฺนํ อิทํ’คพฺยํ, มํสาทิ; กพฺยํ, ทพฺพํ. 'गो' आदि षष्ठ्यन्त शब्दों से 'यह उसका है' इस अर्थ में 'य' प्रत्यय होता है; 'गायों का यह' गब्य (मांस आदि); कब्य, दब्ब। ปิติโต ภาตริ เรยฺยณ-. 'पितु' शब्द से उसके भाई के अर्थ में 'रेय्यण' प्रत्यय होता है। ปิตุสทฺทา ตสฺส ภาตริ เรยฺยณ โหติ;’ปิตุภาตา’ เปตฺเตยฺโย. 'पितु' शब्द से उसके भाई के अर्थ में 'रेय्यण' प्रत्यय होता है; 'पिता का भाई' पेत्तेय्य। มาติโต จ ภคินิยํ โฉ-. 'मातु' और 'पितु' शब्दों से उनकी बहन के अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। มาติโต ปิติโต จ เตสํ ภคินียํ โฉ โหติ;’มาตุ ภคินิ’ มาตุจฺฉา;’ปิตุภคินี’ ปิตุจฺฉา–-กถํ มาตุโลตุ?’มาตุลาทิตฺวานี’ติ นิปาตนา. 'मातु' और 'पितु' शब्दों से उनकी बहन के अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है; 'माता की बहन' मातुच्छा; 'पिता की बहन' पितुच्छा। 'मातुल' (ममा) कैसे बनता है? 'मातुलादित्वानी' इस निपातन से। มาตาปิตุสฺวามโห-. 'माता' और 'पितु' शब्दों से उनके माता-पिता के अर्थ में 'आमहो' प्रत्यय होता है। มาตาปิตูหิ เตสํ มาตาปิตุสฺวามโห โหติ;’มาตุมาตา’ มาตามหี;’มาตุปิตา’ มาตามโห;’ปิตุมาตา’ ปตามหี;’ปิตุปิตา’ ปิตามโห–-น ยถาสํขฺยํ ปจฺเจกาภิสมฺพนฺธา. 'माता' और 'पितु' शब्दों से उनके माता और पिता के अर्थ में 'आमहो' प्रत्यय होता है; 'माता की माता' मातामही; 'माता का पिता' मातामह; 'पिता की माता' पितामही; 'पिता का पिता' पितामह। นหิเต เรยฺยณ-. 'नहि' (हित) अर्थ में 'रेय्यण' प्रत्यय होता है। มาตาปิตุหิ หิเต เรยฺยณ โหติ; มตฺเตยฺโย, เปตฺเตยฺโย. माता और पिता शब्दों से 'हित' अर्थ में 'रेय्यण' प्रत्यय होता है; जैसे- मत्तेय्यो (माता का हितैषी), पेत्तेय्यो (पिता का हितैषी)। นินฺทาญฺญาตปฺปปฏิภาครสฺสทยาสญฺญาสุ โก-. निन्दा, अज्ञात, अल्प, प्रतिभास (सादृश्य), ह्रस्व, दया और संज्ञा अर्थों में 'को' प्रत्यय होता है। นินฺทาทีสฺวตฺเถสุ นามสฺมา โก โหติ; นินฺทายํ-มุณฺฑโก, สมณโก; อญฺญาเต-’กสฺสายํ อสฺโส’ติ อสฺสโก–- निन्दा आदि अर्थों में नाम (प्रातिपदिक) से 'को' प्रत्यय होता है; निन्दा में- मुण्डको, समणको; अज्ञात में- 'यह किसका घोड़ा है' इस अर्थ में अस्सको। ปโยคสามตฺถิยา สมฺพนฺธิวิเสสานวคโม’วคมฺยเต–-อปฺปตฺเถ-เตลกํ, ฆตกํ–-ปฏิภาคตฺเถ-’หตฺถิ วิย’ หตฺถิโก, อสฺสโก, พลิวทฺทโก–-รสฺเส-มานุสโก, รุกฺขโก, ปิลกฺขโก–-ทยายํ-ปุตฺตโก, วจฺฉโก–-สญฺญายํ-’โมโรวิย’ โมรโก. प्रयोग की सामर्थ्य से सम्बन्ध विशेष का अनवगम (न जानना) समझा जाता है; अल्प अर्थ में- तेलकं, घतकं; प्रतिभास (सादृश्य) अर्थ में- 'हाथी के समान' हत्थिको, अस्सको, बलिवद्दको; ह्रस्व अर्थ में- मानुसको, रुक्खको, पिलक्खको; दया अर्थ में- पुत्तको, वच्छको; संज्ञा अर्थ में- 'मोर के समान' मोरको। ตมสฺส ปริมาณํ ณิโก จ-. 'वह इसका परिमाण है' इस अर्थ में 'णिक' और 'क' प्रत्यय होते हैं। ปฐมนฺตา อสฺเสติ อสฺมึ อตฺเถ ณิโก โหติ โก จ, ตํ เจ ปฐมนฺตํ ปริมาณํ ภวติ;’ปริมิยเต’เตเน’ติ ปริมาณํ–-’โทโณ ปริมาณมสฺส’ โทณิโก, วีหิ; ขารสติโก, ขารสหสฺสิโก, อาสีติโก, วโย; อุปฑฺฒกายิกํ, พิมฺโพหนํ; ปญฺจกํ,ฉกฺกํ. प्रथमान्त शब्द से 'इसका' इस अर्थ में 'णिक' और 'क' प्रत्यय होते हैं, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण हो; 'जिससे मापा जाए' वह परिमाण है; 'द्रोण इसका परिमाण है' दोणिको (चावल); खारसतिको, खारसहस्सिको, आसीतिको (अवस्था); उपड्ढकायिकं (बिछौना); पञ्चकं, छक्कं। สเตเตหิ ตฺตโก-. 'स' और 'एत' आदि शब्दों से 'त्तक' प्रत्यय होता है। ยาทีหิ ปฐมนฺเตหิอสฺเสติ ฉฏฺฐตฺเถตฺตโก โหติ, ตํ เว ปฐมนฺตํ ปริมาณํ ภวติ;’ยํ ปรมาณมสฺส ยนฺตกํ, ตตฺตกํ, เอตฺตกํ; อาวตเก-ยาวตโก, ตาวตโก. 'य' आदि प्रथमान्त शब्दों से 'इसका' इस षष्ठी अर्थ में 'त्तक' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण हो; 'जो इसका परिमाण है' यन्तकं, तत्तकं, एत्तकं; आवतक अर्थ में- यावतको, तावतको। สพฺพา จาวนฺตุ-. 'सब्ब' शब्द से और 'य' आदि से 'आवन्तु' प्रत्यय होता है। สพฺพโต ปฐมนฺเตหิ ยาทีหิ จ อสฺเสติ ฉฏฺฐตฺเถ อาวนฺตุ โหติ, ตํ เว ปฐมนฺตํ ปริมาณํ ภวติ;’สพฺพํ ปริมาณมสฺส’ สพฺพาวนฺตํ, ยาวนฺตํ, ตาวนฺตํ, เอตาวนฺตํ. 'सब्ब' और 'य' आदि प्रथमान्त शब्दों से 'इसका' इस षष्ठी अर्थ में 'आवन्तु' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण हो; 'सब इसका परिमाण है' सब्बावन्तं, यावन्तं, तावन्तं, एतावन्तं। กิมฺหา รติริวรีวตกริตฺตกา-. 'किं' शब्द से 'रति', 'रीवरी', 'वतक' और 'रित्तक' प्रत्यय होते हैं। กิมฺหา ปฐมนฺตา อสฺเสติ ฉฏฺฐตฺเถ รติรีวรีวตกริตฺตกา โหนฺติ, ตํ เจ ปฐมนฺตํ ปริมาณํ ภวติ;’กึ สํขฺยานํ ปริมาณเมสํ’ กติ, เอเต; กิว, กีวตกํ, กิตฺตกํ–-รีวนฺโต สภาวโต อสํขฺโย. 'किं' प्रथमान्त शब्द से 'इसका' इस षष्ठी अर्थ में 'रति', 'रीवरी', 'वतक' और 'रित्तक' प्रत्यय होते हैं, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण हो; 'इनकी क्या संख्या या परिमाण है' कति (ये); कीव, कीवतकं, कित्तकं; 'रीवन्त' स्वभाव से असंख्य है। สํชาตํ ตารกาทิตฺวิโต-. 'तारका' आदि शब्दों से 'इत' प्रत्यय होता है, 'उत्पन्न' अर्थ में। ตารกาทีหิ ปฐมนฺเตหิอสฺเสติ ฉฏฺฐตฺเถอิโต โหติ, เต เว สํชาตา โหนฺติ;’ตารกาสํชาตา อสฺส’ ตารกิตํ, คคนํ; ปุปฺผีโต, รุกฺโข; ปลฺลวิตา, ลตา. 'तारका' आदि प्रथमान्त शब्दों से 'इसका' इस षष्ठी अर्थ में 'इत' प्रत्यय होता है, यदि वे उत्पन्न हुए हों; 'जिसमें तारे उत्पन्न हुए हों' तारकितं (आकाश); पुप्फीतो (वृक्ष); पल्लविता (लता)। มาเน มตฺโต-. 'मान' (माप) अर्थ में 'मत्त' प्रत्यय होता है। ปฐมนฺตา มานวุตฺติโต อสฺเสติ อสฺมึ อตฺเถ มตฺโตโหติ;’ปลํ อุมฺมานมสฺส’ ปลมตฺตํ,’หตฺโถ ปมาณมสฺส’ หตฺถมตฺตํ,’สตํ มานมสฺส’ สตมตฺตํ,’โทโณ ปริมาณมสฺส’ โทณมตฺตํ–-อเภโทปวารา โทโณติปิ โหติ. प्रथमान्त मान-वाची शब्द से 'इसका' इस अर्थ में 'मत्त' प्रत्यय होता है; 'पल इसका उन्मान (तौल) है' पलमत्तं; 'हाथ इसका प्रमाण (लम्बाई) है' हत्थमत्तं; 'सौ इसका मान (संख्या) है' सतमत्तं; 'द्रोण इसका परिमाण (आयतन) है' दोणमत्तं; अभेदोपचार से 'दोण' भी होता है। ตคฺโฆ วุทฺธํ-. ऊर्ध्व-मान (ऊँचाई) अर्थ में 'तग्घ' प्रत्यय होता है। อุทฺธมานวุตฺติโต อสฺเสติ ฉฏฺฐตฺเถ ตคฺฆา โหตีมฺैตฺโต จ; ชณฺณุตคฺฆํ, ชณฺณุมตฺตํ. ऊर्ध्व-मान वाची शब्द से 'इसका' इस षष्ठी अर्थ में 'तग्घ' और 'मत्त' प्रत्यय होते हैं; जण्णुतग्घं, जण्णुमत्तं (घुटने तक ऊँचा)। โณ จ ปุริสา-. 'पुरिस' शब्द से 'ण' प्रत्यय भी होता है। ปุริสา ปฐมนฺตา อุทฺธมานวุตฺติโต โณ โหติ มตฺตาทโย จ; โปริสํ, ปุริสมตฺตํ, ปุริสตคฺฆํ. 'पुरिस' प्रथमान्त ऊर्ध्व-मान वाची शब्द से 'ण' प्रत्यय होता है और 'मत्त' आदि भी; पोरिसं, पुरिसमत्तं, पुरिसतग्घं (पुरुष की ऊँचाई के बराबर)। อยุภวีตีหํเส-. 'उभ' और 'इति' शब्दों से 'अयो' प्रत्यय होता है। อุพวิตีหิ อวยววุตฺตีหิ ปฐมนฺเตหิ อสฺเสติ ฉฏฺฐตฺเถ อโย โหติ;’ อุโภ อํสา อสฺส’ อุภยํ, ทฺวยํ, ตยํ. 'उभ' और 'इति' (द्वि, ति) अवयव-वाची प्रथमान्त शब्दों से 'इसका' इस षष्ठी अर्थ में 'अयो' प्रत्यय होता है; 'जिसके दोनों अंश (भाग) हों' उभयं, द्वयं, तययं। สํขฺยาย สจฺจุตีสสทสนฺตาธกาสฺมึ สตสหสฺเสโฑ-. 'सत्यन्त', 'उत्यन्त', 'ईसन्त', 'आसन्त' और 'दसान्त' संख्यावाची शब्दों से 'इसमें' इस सप्तमी अर्थ में 'डो' प्रत्यय होता है, यदि वह संख्या अधिक हो और जिसमें अधिक हो वह 'सत' (सौ) या 'सहस्स' (हजार) हो। สตฺยนฺตาย อุตฺยนฺตาย อีสนฺตาย อาสนฺตาย ทสนฺตาย จ สํขฺยาย ปฐมนฺตาย อสฺมินฺติ สตฺตมฺยตฺเถ โฑ โหติ, สา เจ สํขฺยา อธิกา โหติ, ยทสฺมินฺติ ตํ เจ สตํ สหสฺสํสต सत्यन्त (जैसे- वीसति), उत्यन्त (जैसे- नवुति), ईसन्त (जैसे- चत्तारीस), आसन्त (जैसे- पञ्ञास) और दसान्त (जैसे- एकादस) प्रथमान्त संख्या से 'इसमें' इस सप्तमी अर्थ में 'डो' प्रत्यय होता है, यदि वह संख्या अधिक हो, और जिसमें अधिक हो वह 'सत' या 'सहस्स' हो। สหสฺสํ วา โหติ;’วีสติ อธิกา อสฺมึ สเต’ติ วีสํสตํ, เอกวีสํสตํ, สหสฺสํ สตสหสฺสํ วา–-ตึสํสตํ, เอกตึสํ สตํ –-อุตฺยนฺตาย -นวุตํสตํ, สหสฺสํ สตสหสฺสํ วา –-อีสนฺติย-จตฺตารีสํสตํ, สหสฺสํ สตสหสฺสํ วา–-อาสนฺตาย-ปญฺญาสํสตํ สหสฺสํ สตสหสฺสํ วา–-ทสนฺตาย-เอกาทสํ สตํ, สหสฺสํ สตสหสฺสํ วา–-สจฺจุตีสาสทสนฺเตติ กึ?ฉาธิกา อสฺมึ สเต; อธิเกติ กึ? ปญฺจทสหีนา อสฺมึ สเต; อสฺมินฺติ กึ? วีสตฺยธิกา เอตสฺมาสตา; สตสหสฺเสติ กึ? เอกาทสอธิกา อสฺสํ วีสติยํ. 'सौ में बीस अधिक है' इस अर्थ में वीसंसतं, एकवीसंसतं, सहस्सं या सतसहस्सं; तिंसंसतं, एकतिंसं सतं; उत्यन्त में- नवुतंसतं, सहस्सं या सतसहस्सं; ईसन्त में- चत्तारीसंसतं, सहस्सं या सतसहस्सं; आसन्त में- पञ्ञासंसतं, सहस्सं या सतसहस्सं; दसान्त में- एकादसं सतं, सहस्सं या सतसहस्सं। 'सच्चुतीसा...' क्यों? 'सौ में छह अधिक है' (यहाँ नहीं होगा)। 'अधिक' क्यों? 'सौ में पन्द्रह कम है' (यहाँ नहीं होगा)। 'अस्मिं' क्यों? 'इस सौ से बीस अधिक है' (यहाँ नहीं होगा)। 'सतसहस्स' क्यों? 'इस बीस में ग्यारह अधिक है' (यहाँ नहीं होगा)। ตสฺส ปูเรเณกาทสาทิโต วา-. 'उसका पूरण' अर्थ में 'एकादस' आदि शब्दों से विकल्प से 'डो' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐียนฺตาเยกาทสาทิกาย สํขฺยาย โฑ โหติ ปูรณตฺเถ วิภาสา; สา สํขฺยาปูรียเตเยนตํ ปูรณํ’เอกาทสนฺนํ ปูรโณ’เอกาทโส, เอกาทสโม; วีโส, วีสติโม; ตึโส, ตีํสติโม; จตฺตาลีโส, ปญฺญาโส. षष्ठ्यन्त एकादस आदि संख्यावाची शब्दों से पूरण अर्थ में विकल्प से 'डो' प्रत्यय होता है; जिससे वह संख्या पूरी होती है वह पूरण है; 'ग्यारह का पूरण' एकादसो, एकादसमो; वीसो, वीसतिमो; तिंसो, तिंसतिमो; चत्तालीसो, पञ्ञासो। ม ปํจาทิกตีหิ-. 'पञ्च' आदि और 'कति' शब्दों से 'म' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐียนฺตาย ปํจาทิกาย สํขฺยายกติสฺมา จ โม โหติ ปูรณตฺเถ; ปญฺจโม, สตฺตโม, อฏฺฐโม; กติโม, กติมี. षष्ठ्यन्त पञ्च आदि संख्यावाची शब्दों से और 'कति' शब्द से पूरण अर्थ में 'म' प्रत्यय होता है; पञ्चमो, सत्तमो, अट्ठमो; कतिमो, कतिमी। สตาทีนมิ จ-. और 'सत' (सौ) आदि के साथ। สตาทิกาย สํขฺยาย ฉฏฺฐิยนฺตาย ปุรณตฺเถ โม โหติ, สตาทินมิจานฺตาเทโส; สติโม, สหสฺสิโม. 'सत' (सौ) आदि संख्यावाचक षष्ठ्यन्त शब्दों से 'पूरण' (क्रमवाचक) अर्थ में 'मो' प्रत्यय होता है और 'सत' आदि के अन्त्य वर्ण का 'इ' आदेश होता है; जैसे- सतिमो (सौवां), सहस्सिमो (हज़ारवां)। ฉา ทฺธทฺธมา -. 'छ' (छह) शब्द से 'द्ध' और 'द्धम'। ฉสทฺทาฏฺฐฏฺฐมาโหนฺติ ตสฺส ปูรณตฺเถ; ฉฏฺโฐ, ฉฏฺฐโม; อิตฺถีย-ฉฏฺฐิ ฉฏฺฐมิ–-กถํ,ทุติยํ ตติยํ จตุตฺถนฺติ? ทุติยสฺส-จตุตฺถตติยานนฺติ-นิปาตนา. 'छ' (छह) शब्द से पूरण अर्थ में 'ट्ठ' और 'ट्ठम' प्रत्यय होते हैं; जैसे- छट्ठो, छट्ठमो। स्त्रीलिंग में- छट्ठी, छट्ठमी। 'दुतियं', 'ततियं', 'चतुत्थं' कैसे सिद्ध होते हैं? 'दुतिय', 'ततिय' और 'चतुत्थ' शब्दों का निपातन से सिद्ध होना माना जाता है। เอกา กากฺยสหาเย-. 'एक' शब्द से 'क' और 'आकि' असहाय अर्थ में। เอกสฺมา อสหายตฺเถ กอากิ โหนฺติ วา; เอกโก, เอกากิ, เอโก. 'एक' शब्द से असहाय (अकेला) अर्थ में 'क' और 'आकि' प्रत्यय विकल्प से होते हैं; जैसे- एकको, एकाकी, एको। วจฺฉาทีหิ ตนุตฺเต ตโร-. 'वच्छ' (बछड़ा) आदि शब्दों से 'तनुत्व' (अल्पता/छोटापन) अर्थ में 'तरो' प्रत्यय होता है। วจฺฉาทีนํ สภาวสฺส ตนุตฺเต คมฺยมาเนตโร โหติ; สุสุตฺตสฺส ตนุตฺเต-วจฺฉตโร; อิตฺถิยํ-วจฺฉตรี; โยพฺพนสฺสตนุตฺตฺै-โอกฺขตโร; อสฺสภาวสฺส ตนุตฺเต-อสฺสตโร; สามตฺถิยสฺส ตนุตฺตฺै-อุสภตโร. 'वच्छ' आदि के स्वभाव की अल्पता (छोटापन) प्रतीत होने पर 'तरो' प्रत्यय होता है; जैसे- छोटे बछड़े के अर्थ में 'वच्छतरो'; स्त्रीलिंग में 'वच्छतरी'; यौवन की अल्पता में 'ओक्खतरो'; अश्व-भाव की अल्पता में 'अस्सतरो'; सामर्थ्य की अल्पता में 'उसभतरो'। กิมฺหา นิธารเณ รตรรตมา-. 'किं' शब्द से निर्धारण अर्थ में 'रतर' और 'रतम' प्रत्यय होते हैं। กึสทฺทา นิทฺธารเณ รตรรตมา โหนฺตี; กตโร ภวตํ เทวทตฺโต; กตโร ภวตํ กโฐ; กตโม ภวตํ เทวทตฺโต; กตโม ภวตํ กโฐ; ภารทฺวาชานํ กตโม’สิ พฺรหฺเม. 'किं' शब्द से निर्धारण (अनेक में से एक को चुनना) अर्थ में 'रतर' और 'रतम' प्रत्यय होते हैं; जैसे- आप लोगों में देवदत्त कौन (कत्तरो) है? आप लोगों में कठ कौन है? आप लोगों में देवदत्त कौन (कतमो) है? आप लोगों में कठ कौन है? हे ब्राह्मण! भारद्वाजों में तुम कौन (कतमो) हो? เตน ทตฺเต ลิยา-. 'उसके द्वारा दिया गया' इस अर्थ में 'ल' और 'इय' प्रत्यय होते हैं। ตติยนฺตา ทตฺเต’ภิเธเย ลฺैยา โหนฺติ;’เทเวนทตฺโต; เทวโล; เทวิโย; พฺรหฺมโล; พฺรหฺมโย–-สิวา-สีวโล; สีวิโย; สิสฺส ทีโฆ. तृतीयान्त शब्दों से 'दिया गया' अर्थ में 'ल' और 'इय' प्रत्यय होते हैं; जैसे- देव द्वारा दिया गया - देवलो, देवियो; ब्रह्मलो, ब्रह्मयो; 'सिव' शब्द से - सीवलो, सीवियो; यहाँ 'सि' का दीर्घ (सी) हो जाता है। ตสฺส ภาวกมฺเมสุ ตฺตตาตฺตนณฺยเณยฺย ณิยณิยยา-. षष्ठ्यन्त शब्दों से 'भाव' और 'कर्म' अर्थों में 'त्त', 'ता', 'त्तन', 'ण्य', 'णेय्य', 'ण', 'इय', 'णिय' और 'य' प्रत्यय होते हैं। ฉฏฺฐิยนฺตา ภาเว กมฺเม จ ตฺตาทโย โหนฺติ พหุลํ; น จ สพฺเพ สพฺพโต โหนฺติ,อญญฺญตฺร ตฺตตาหิ–-’ภวนฺติ เอตสฺมาพุทฺธิสทฺทา’ติ ภาโว, สทฺทสฺส ปวตฺตินิตฺตํ–-’นีลสฺสปฏสฺส ภาโว’ นีลตฺตํ, นีลตาติ คุโณ ภาโว–-’นีลสฺสคุณสฺส ภาโว นีลตฺตํ, นีลตาตี นีลคุณชาติ; โคตฺตํ โคตาติ, โคชาติ–-ปาจกตฺตํ ทณฺฑิตฺตํ วิสาณิตฺตํ ราชปุริสตฺตนฺติ กฺริยาทิสมฺพนฺธิตฺตํ–-เทวทตฺตตฺต จนฺทตฺตํ สูริยตฺตนฺตีตทวตฺถาวิเสสสามญฺญํ–-อากาสตฺตํ อภาจตฺตนฺติ อุปจริตเภทสามญฺญํ–-ตฺตน-ปุถุชฺชนตฺตนํ; เวทนตฺตนํ; ชายตฺตนํ ชารตฺตนํ–-ณฺย-อาลสฺยํ พฺรหฺมญฺญํ จาปลฺยํ เนปุญฺญํเปสุญฺญํ รชฺชํ อาธิปจฺจํ ทายชฺชํ เวสมฺมํ; เวสมนฺติ เกจิ, สขฺยํ วาณิชฺชํ–-เณยฺย-โสเจยฺยํ, อาธิปเตยฺยํ–-ณ-คารวํ ปาฏวํ อชฺชวํ มทฺทวํ–-อิย-อธิปติยํ ปณฺฑิติยํ พหุสฺสุติยํนคฺคิยํ สูริยํ –-ณิย-อาลสิยํ กาลุสิยํ มนฺทิยํ ทกฺขิยํ โปโรหิติยํ เวยฺยตฺติยํ–-กถํ, รามณียกนฺติ-สกตฺเถ กนฺตาเณน สิทฺธํ–-กมฺมํ กฺริยา; ตตฺถ.’อลสสฺส กมฺมํ’ อลสตฺตํ, อลสตา, อลสตฺตนํ; อาลสฺยํ อาลสิยํวา–-’สกตฺเถ’ติ. สกตฺเถ’ปิ ยถาภุจฺจํการุญฺญํ ปตฺตกลฺลํ อากาสานญฺจํ, กายปคุญฺญตา. षष्ठ्यन्त शब्दों से 'भाव' और 'कर्म' अर्थों में 'त्त' आदि प्रत्यय बहुलता से होते हैं; और सभी प्रत्यय सभी शब्दों से नहीं होते, सिवाय 'त्त' और 'ता' के। 'जिससे बुद्धि और शब्द उत्पन्न होते हैं' वह भाव है, जो शब्द की प्रवृत्ति का निमित्त है। 'नीले वस्त्र का भाव' नीलत्तं, नीलता - यह गुण-भाव है। 'नीले गुण का भाव' नीलत्तं, नीलता - यह नील-गुण की जाति है। गोत्तं, गोता - यह गो-जाति है। पाचकत्तं, दण्डित्तं, विसाणित्तं, राजपुरिसत्तं - ये क्रिया आदि के सम्बन्ध के भाव हैं। देवदत्तत्तं, चन्दत्तं, सूरियत्तं - ये उनकी अवस्था विशेष के सामान्य भाव हैं। आकासत्तं, अभावत्तं - ये उपचारित भेद के सामान्य भाव हैं। 'त्तन' प्रत्यय से - पुथुज्जनत्तनं, वेदनत्तनं, जायत्तनं, जारत्तनं। 'ण्य' प्रत्यय से - आलस्यं, ब्रह्मञ्ञं, चापल्यं, नेपुञ्ञं, पेसुञ्ञं, रज्जं, आधिपच्चं, दायज्जं, वेसम्मं (कुछ लोग 'वेसमं' कहते हैं), सख्यं, वाणिज्जं। 'णेय्य' प्रत्यय से - सोचेय्यं, आधिपतेय्यं। 'ण' प्रत्यय से - गारवं, पाटवं, अज्जवं, मद्दवं। 'इय' प्रत्यय से - अधिपतियं, पण्डितियं, बहुस्सुतियं, नग्गियं, सूरियं। 'णिय' प्रत्यय से - आलसियं, कालुसियं, मन्दियं, दक्खियं, पोरोहितियं, वेय्यत्तियं। 'रामणीयकां' कैसे सिद्ध होता है? यह स्वार्थ में 'क' और 'ताण' प्रत्यय से सिद्ध होता है। 'कर्म' का अर्थ क्रिया है; जैसे- 'आलसी का कर्म' अलसत्तं, अलसता, अलसत्तनं, आलस्यं या आलसियं। 'स्वार्थ में' - स्वार्थ में भी यथाभुच्चं, कारुञ्ञं, पत्तकल्लं, आकासानञ्चं, कायपगुञ्ञता आदि शब्द सिद्ध होते हैं। พฺย วทฺธทาสา วา-. 'वद्ध' और 'दास' शब्दों से 'ब्य' प्रत्यय विकल्प से होता है। ฉฏฺฐยนฺตา วทฺธา ทาสา จ พฺโย วาโหติ ภาวกมฺเมสุ; วทฺธขฺยํ, วทฺธตา; ทาสพฺยํ; ทาสตา–-กถํ, วทฺธวนฺติ เณ วาคโม. षष्ठ्यन्त 'वद्ध' और 'दास' शब्दों से भाव और कर्म अर्थों में 'ब्य' प्रत्यय विकल्प से होता है; जैसे- वद्धब्यं, वद्धता; दासब्यं, दासता। 'वद्धवं' कैसे सिद्ध होता है? इसमें 'ण' प्रत्यय होने पर 'व' का आगम होता है। นณ ยุวา โข จวสฺส-. 'युव' शब्द से 'ण' प्रत्यय होता है और 'वस्स' का आगम (या आदेश) होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา ยุวสฺทา ภาวกมฺเมสุนณ วา โหติ, วสฺสโพ จ; โยพฺพนํ; วาตฺเวว-ยุวตฺตํ, ยุวตา. षष्ठ्यन्त 'युव' शब्द से भाव और कर्म अर्थों में 'ण' प्रत्यय विकल्प से होता है और 'वस्स' आदेश होता है; जैसे- योब्बनं। विकल्प होने से - युवत्तं, युवता। อณฺวาทิตฺวิโม-. 'अणु' आदि शब्दों से 'इम' प्रत्यय होता है। อณุอาทีหิ ฉฏฺฐิยนฺเตหิ ภาเว วา อิเม โหติ; อณิมา; ลฆิมา; มหิมา;กสิมา–-วาตฺเวว-อณุตฺตํ; อณุตา. षष्ठ्यन्त 'अणु' आदि शब्दों से भाव अर्थ में 'इम' प्रत्यय विकल्प से होता है; जैसे- अणिमा, लघिमा, महिमा, कसिमा। विकल्प होने से - अणुत्तं, अणुता। ภาวา เตน นิพฺพตฺเต-. भाववाचक शब्दों से 'उसके द्वारा निष्पन्न' अर्थ में। ภาววาจกา สทฺทา เตน นิพฺพตฺเต’ภิเธเย อิโม โหติ;’ปาเกน นิพฺพตฺตํ’ ปากิมํ; เสกิมํ. भाववाचक शब्दों से 'उसके द्वारा निष्पन्न' (बना हुआ) अर्थ में 'इम' प्रत्यय होता है; जैसे- 'पाक (पकाने) से निष्पन्न' पाकिमं; सेकिमं। ตรตมิสฺสิกิยิฏฺฐาติสเย-. अतिशय (अधिकता) अर्थ में 'तर', 'तम', 'इस्सिक', 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्यय होते हैं। อติสเย วตฺตมานโต โหนฺเตเต ปจฺจยา;’อติสเยน ปาโป’ ปาปตโร; ปาปตโม, ปาปิสฺสิโก, ปาปิโย, ปาปิฏฺโฐ–-อิตฺถิยํ-ปาปตรา–-อติสยนฺตาปิ อติสยปฺปจฺจโย;’อติสเยน ปาปิฏฺโฐ’ ปาปิฏฺฐตโร. अतिशय अर्थ में वर्तमान शब्दों से ये प्रत्यय होते हैं; जैसे- 'अत्यधिक पापी' पापतरो, पापतमो, पापिसिको, पापियो, पापिठ्ठो। स्त्रीलिंग में - पापतरा। अतिशय अर्थ वाले शब्दों से भी पुनः अतिशय प्रत्यय हो सकता है; जैसे- 'अत्यधिक पापिठ्ठ' पापिठ्ठतरो। ตนฺนิสฺสิเต ลฺโล-. 'उस पर आश्रित' अर्थ में 'ल्ल' प्रत्यय होता है। ทุติยนฺตา ลฺลปฺปจฺจโย โหติ นิสฺสิตตฺเถ;’เวทนิสฺสิตํ’ เวทลฺลํ;’ ทุฐุนิสฺสิตํ’ ทุฏฺฐุลฺลํ–-อิลฺเล-สงฺขาริลฺลํ. द्वितीयान्त शब्दों से 'आश्रित' अर्थ में 'ल्ल' प्रत्यय होता है; जैसे- 'वेद पर आश्रित' वेदल्लं; 'दुष्टता पर आश्रित' दुट्ठुल्लं। 'इल्ल' प्रत्यय से - सङ्खारिल्लं। ตสฺส วิการาวยเวสุ ณฺณิกเณยฺยมยา-. षष्ठ्यन्त शब्दों से 'विकार' और 'अवयव' अर्थों में 'ण', 'णिक', 'णेय्य' और 'मय' प्रत्यय होते हैं। ปกติยา อุตฺตรมวตฺถนฺตรํ วิกาโร–-ฉฏฺฐิยนฺตา นามสฺมา วิกาเร’วยเว จ ณาทโยโหนฺติพหุลํ; ณ-อายสํ, พนฺธนํ; โอทุมฺพรํ, ปณฺณํ; โอทุมฺพรํ, ภสฺมํ; กาปาตฺैํ, มํสํ; กาโปตํ, สตฺถิ –-ณิก-กปฺปาสิกํ, วตฺถํ; เณยฺย-เอเณยฺยํ,มํสํ; เอเณยฺยํ, สตฺถิ; โกเสยฺยํ, วตฺถํ–-มย-ติณมยํ; ทารุมยํ, นฬมยํ; มตฺติกามยํ–-’อญฺญสฺมินฺติ’. คุนฺนํกรีเส’ปิ มโย; โคมยํ. प्रकृति (मूल अवस्था) से उत्तर की दूसरी अवस्था 'विकार' कहलाती है। षष्ठ्यन्त नाम-शब्दों से विकार और अवयव अर्थों में 'ण' आदि प्रत्यय बहुलता से होते हैं। 'ण' प्रत्यय से - आयसं बन्धनं (लोहे का बन्धन), ओदुम्बरं पण्णं (गूलर का पत्ता), ओदुम्बरं भस्मं, कापोतं मंसं (कबूतर का मांस), कापोतं सत्थि। 'णिक' प्रत्यय से - कप्पासिकं वत्थं (कपास का वस्त्र)। 'णेय्य' प्रत्यय से - एणेय्यं मंसं, एणेय्यं सत्थि, कोसेय्यं वत्थं (रेशमी वस्त्र)। 'मय' प्रत्यय से - तिणमयं (तृण से बना), दारुमयं, नळमयं, मत्तिकामयं। 'अन्य से भी' - गायों के गोबर (करीस) में भी 'मय' प्रत्यय होता है; जैसे- गोमयं। ชตุโต สฺสณฺวา-. 'जतु' (लाख) शब्द से 'स्स' और 'ण' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। ฉฏฺฐิยนฺตา นามสฺมาชตุโต วิการวยเวสุสฺสณฺวา โหติ;’ชตุโน วิกาโร’ ชาตุสฺสํชาตุมยํ–-‘‘โลโป‘‘ติ. พหุลํ ปจฺจยโลโป’ปิ ผลปุปฺผมูเลสุวิการาวยเวสุ;’ ปิยาลสฺส ผลานิ’ ปิยาลานิ;’มลฺลิกาย ปุปฺผานิ’ ปลฺลิกา;’อุสีรสฺส มูลํ’อุสีรํ–-ตํสทฺเทนวา ตทภิธานํ. षष्ठ्यन्त 'जतु' शब्द से विकार और अवयव अर्थों में 'स्स' और 'ण' प्रत्यय विकल्प से होते हैं; जैसे- 'लाख का विकार' जातुस्सं, जातुमयं। "लोप" - फल, पुष्प और मूल के विकार या अवयव अर्थों में प्रत्यय का बहुलता से लोप भी होता है; जैसे- 'पियाल के फल' पियालानि; 'मल्लिका के फूल' मल्लिका; 'उसीर की जड़' उसीरं। उस शब्द के द्वारा ही उसका कथन हो जाता है। สมูเห กณฺณณิกา-. समूह के अर्थ में 'क', 'ण' और 'णिक' प्रत्यय होते हैं। ฉฏฺฐิยนฺตา สมูเห กณฺณณิกา โหนฺติ; โคตฺตปฺปจฺจยนฺตา กณ-ราชญฺญกํ; มานุสฺสกํ–-อุกฺขาทีหิ-โอกฺขกํ; โอฏฺฐกํ; โอรพฺภกํ; ราชกํ; ราชปุตฺตกํ; หตฺถิกํ; เธนุกํ–-ณ-กากํ; ภิกฺขํ; ณิก-อจิตฺตา-อาปูปิกํ; สํกุลิกํ. षष्ठ्यन्त (छठी विभक्ति वाले) शब्दों से समूह के अर्थ में 'क', 'ण' और 'णिक' प्रत्यय होते हैं; गोत्र प्रत्ययान्त से 'क' और 'ण' - राज्ञकम् (राजाओं का समूह); मानुस्सकम् (मनुष्यों का समूह); उक्खादि गण से - ओक्खकम् (ऊँटों का समूह); ओट्ठकम् (ऊँटों का समूह); ओरब्भकम् (भेड़ों का समूह); राजकम् (राजाओं का समूह); राजपुत्तकम् (राजपुत्रों का समूह); हत्थिकम् (हाथियों का समूह); धेनुकम् (गायों का समूह); 'ण' प्रत्यय से - काकम् (कौओं का समूह); भिक्खम् (भिक्षुओं का समूह); 'णिक' प्रत्यय अचेतन शब्दों से - आपूपिकम् (पुओं का समूह); संकुलिकम् (गुड़ आदि के मिश्रण का समूह)। ชนาทีหิ ตา-. जन आदि शब्दों से 'ता' प्रत्यय होता है। ชนาทีหิ ฉฏฺฐิยนฺเตหิ สมูเห ตา โหติ; ชนตา; คชตา; พนฺธุตา; คามตา; สหายตา; นาครตา–-ตานฺตา สภาวโต อิตฺถิลิงฺคา–-มทนียนฺติ-กรเณ’ธิกรเณ วา อนีเยนสิทฺธํ –-ธุมายิตตฺตนฺติ-กฺตานฺตา นามธาตุโต เตตฺตน สิทฺธํ. जन आदि षष्ठ्यन्त शब्दों से समूह के अर्थ में 'ता' प्रत्यय होता है; जैसे - जनता, गजता, बन्धुता, गामता, सहायता, नागरता। 'ता' प्रत्ययान्त शब्द स्वभाव से स्त्रीलिंग होते हैं। 'मदनीयम्' शब्द करण या अधिकरण अर्थ में 'अनीय' प्रत्यय से सिद्ध होता है। 'धुमायितत्तम्' शब्द 'क्त' प्रत्ययान्त नामधातु से 'त्त' प्रत्यय द्वारा सिद्ध होता है। อิโย หิเต-. हित के अर्थ में 'इय' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา หิเต อิโย โหติ; อุปาทานิยํ–-อญฺญตฺราปิ’สมานาทฺैเร สยิโต’ โสทริโย. षष्ठ्यन्त शब्दों से हित के अर्थ में 'इय' प्रत्यय होता है; जैसे - उपादानीयम्। अन्यत्र भी - 'समान उदर में सोने वाला' सोदरियो (सहोदर)। จกฺขวาทิโต สฺโส-. चक्षु आदि शब्दों से 'स्स' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺเตหิ จกฺขุอาทีหิ หิเต สฺโสโหติ; จกฺขูสฺสํ; อายุสฺสํ. षष्ठ्यन्त चक्षु आदि शब्दों से हित के अर्थ में 'स्स' प्रत्यय होता है; जैसे - चक्खुस्सं (आँखों के लिए हितकारी), आयुस्सं (आयु के लिए हितकारी)। ณฺโย ตตฺถ สาธุ-. 'वहाँ साधु (कुशल)' इस अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय होता है। สตฺตมฺยนฺตา ตตฺถ สาธูติ อสฺมึ อตฺเถ ณฺยฺโย โหติ; สพฺโภ; ปาริสชฺโช–-สาธูติ-กุสโล โยคฺโค หิโต วา–-อญฺญตฺราปิ-’รถํ วหนฺตี’ติ รจฺฉา. सप्तम्यन्त शब्दों से 'वहाँ साधु' इस अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय होता है; जैसे - सब्भो (सभा में कुशल), पारिसज्जो (परिषद में कुशल)। 'साधु' का अर्थ कुशल, योग्य या हितकारी है। अन्यत्र भी - 'रथ को ढोने वाली' रच्छा (रथ्या/सड़क)। กมฺมา นิยญฺญา-. कर्म शब्द से 'निय' और 'ण्य' प्रत्यय होते हैं। สตฺตมฺยนฺตา กมฺมสททา ตตฺถ สาธูติ อสฺมึ อตฺเถ นิยญฺญา โหนฺติ;’ กมฺเม สาธุ’ กมฺมนิยํ; กมฺมญฺญํ. सप्तम्यन्त 'कम्म' शब्द से 'वहाँ साधु' इस अर्थ में 'निय' और 'ण्य' प्रत्यय होते हैं; 'कर्म में कुशल' - कमनीयं, कम्मञ्ञं। กถาทิตฺวิโก-. कथा आदि शब्दों से 'इक' प्रत्यय होता है। กถาทีหิ สตฺตมฺยนฺเตหิ ตตฺถ สาธูติ อสฺมึ อตฺเถ อิโก โหติ; กถิโก; ธมฺมกถิโก; สงฺคามิโก; ปวาสิโก; อุปวาสิโก. कथा आदि सप्तम्यन्त शब्दों से 'वहाँ साधु' इस अर्थ में 'इक' प्रत्यय होता है; जैसे - कथिको, धम्मकथिको, संगामिको, पवासिको, उपवासिको। ปถาทีหิ เณยฺโย-. पथ आदि शब्दों से 'णेय्य' प्रत्यय होता है। ปถาทีหิ สตฺตมฺยนฺเตหิ ตตฺถ สาธูติ อสฺมึ อตฺเถ เณยฺโย โหติ; ปาเถยฺยํ; สาปเตยฺยํ. पथ आदि सप्तम्यन्त शब्दों से 'वहाँ साधु' इस अर्थ में 'णेय्य' प्रत्यय होता है; जैसे - पाथेय्यं (रास्ते के लिए हितकारी/पाथेय), सापतेय्यं (स्वपतेः साधु - संपत्ति)। ทกฺขิณายารเห-. दक्षिणा शब्द से 'योग्य' अर्थ में 'णेय्य' प्रत्यय होता है। ทกฺขิณาสทฺทโต อรหตฺเถ เณยฺโย โหติ;’ทกฺขิณํ อรหตี’ติ ทกฺขิเณยฺโย. दक्षिणा शब्द से 'योग्य' अर्थ में 'णेय्य' प्रत्यय होता है; 'जो दक्षिणा के योग्य है' वह दक्खिणेय्यो। ราโย ตุมนฺตา-. तुमुन् प्रत्ययान्त से 'राय' प्रत्यय होता है। ตุมนฺตโต อรหตฺเถ ราโยโหติ; ‘‘ฆาเตตายํ วา ฆาเตตุํ, ชาเปตายํ วา ชาเปตุํ, ปพฺพาเชตายํ วา ปพฺพาเชตุํ‘‘. तुमुन् प्रत्ययान्त से 'योग्य' अर्थ में 'राय' प्रत्यय होता है; जैसे - 'घातयितुं अर्हति' इति घातेतारं (मारने योग्य), जापेतुं अर्हति इति जापेतारं, पब्बाजेतुं अर्हति इति पब्बाजेतारं। ตเมตฺถสฺสตฺถิติ มนฺตุ-. 'वह इसमें है' या 'उसका यह है' इस अर्थ में 'मन्तु' प्रत्यय होता है। ปฐมนฺตา เอตฺถ อสฺส อตฺถิติ เอเตสฺวตฺเถสุ มนฺตุ โหติ;’คาโม เอตฺถ เทเส อสฺส วา ปุริสสฺส สนฺตีติ’ โคมา–-อตฺถิติ วตฺตมานกาโลปาทานโต ภุตาหิ ภวิสฺสนฺตีหิ วา โคหิ น โคมา. กถํ โคมา อาสิ โคมา ภวิสฺสตีติ? ตทาปิ วตฺตมานาหิเยว โคหิ โคมา; อาสิ ภวิสฺสตีติ ปทนฺตรา กาลนฺตรํ; อิติกรณโต วิสยนิยโม. प्रथमान्त शब्दों से 'इसमें वह है' या 'उसका वह है' इन अर्थों में 'मन्तु' प्रत्यय होता है; जैसे - 'गायें इस देश में हैं या इस पुरुष की हैं' तो गोमा (गोमान्)। 'अत्थि' (है) इस वर्तमान काल के ग्रहण से भूत या भविष्य की गायों के होने पर 'गोमा' नहीं होगा। तो फिर 'गोमा आसी' (गोमान् था) या 'गोमा भविस्सति' (गोमान् होगा) कैसे होता है? तब भी वर्तमान गायों के कारण ही 'गोमा' है; 'आसी' और 'भविस्सति' अन्य पदों से कालान्तर का बोध होता है; 'इति' शब्द के प्रयोग से विषय का नियम होता है। ปหูเต จ ปสํสายํ นินฺทายญฺจาติสายเน นิจฺจโยเค จ สํสคฺเค โหนฺติเม มนฺตุอาทโย. प्रचुरता, प्रशंसा, निन्दा, अतिशयता, नित्ययोग और संसर्ग के अर्थ में ये 'मन्तु' आदि प्रत्यय होते हैं। โคอสฺโสติ-ชาติสทฺทานํ ทพฺพาภิธานสามตฺถิยา มนฺตฺวา ทโย นโหนฺติ; ตถา คุณสทฺทานํ เสโต ปโฏติ; เย สตฺตุ คุณสทฺทานํ ทพฺพาภิธานสามตฺถิยํ นตฺถิ เตหิ โหนฺเตว–-พุธิมา รูปวา รสวา คนฺธวา เอสฺสวา สทฺทวา; รสีรสิโก; รูปิ รูปิโก; คนฺธี คนฺธิโกติ. 'गो', 'अस्स' आदि जातिवाचक शब्दों से द्रव्य के अभिधान की सामर्थ्य होने पर 'मन्तु' आदि प्रत्यय नहीं होते; वैसे ही गुणवाचक शब्दों से भी, जैसे 'सेतो पटो' (सफेद कपड़ा); किन्तु जिन गुणवाचक शब्दों में द्रव्य के अभिधान की सामर्थ्य नहीं है, उनसे ये प्रत्यय होते ही हैं - जैसे बुद्धिमा, रूपवा, रसवा, गन्धवा, एस्सवा, सद्दवा; रसी, रसिको; रूपी, रूपिको; गन्धी, गन्धिको। วนฺตฺววณฺณา-. अकारान्त और आकारान्त शब्दों से 'वन्तु' प्रत्यय होता है। ปฐมนฺตโต อวณฺณนฺตา มนฺตฺวตฺเถ วนฺตุ โหติ; สีลวา; ปญฺญวา–-อวณฺณาติ-กึ? สติมา; พนฺธุมา. प्रथमान्त अकारान्त/आकारान्त शब्दों से 'मन्तु' के अर्थ में 'वन्तु' प्रत्यय होता है; जैसे - सीलवा, पञ्ञवा। 'अवण्णा' (अकार/आकार) क्यों कहा? सतिमा, बन्धुमा (यहाँ इकार/उकार होने से मन्तु हुआ)। ทณฺฑาทิตฺวิกอี วา-. दण्ड आदि शब्दों से 'इक' और 'ई' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। ทณฺฑาทีหิ อิกอี โหนฺติ วา มนฺตฺตฺวตฺเถ; พหุลํ วิธานา กุโตวิ ทฺเว โหนฺติ; กุโตเจกเมกํว. ทณฺฑโก, ทณฺฑิ, ทณฺฑวา; คนฺธิโก, คนฺธี, คนฺธวา; รูปิโก, รูปี, รูปวา–-อุตฺตมิเณว ธนา อิโก () ธนิโก; ธนี ธนวาญฺโญ –-อสนฺนิตฺญตฺถา () อตฺถิโก อตฺถิ; อญฺญตฺร อตฺถวา दण्ड आदि शब्दों से 'मन्तु' के अर्थ में 'इक' और 'ई' प्रत्यय विकल्प से होते हैं; बहुल विधान के कारण कहीं दो होते हैं, कहीं एक-एक ही। जैसे - दण्डको, दण्डी, दण्डवा; गन्धिको, गन्धी, गन्धवा; रूपिको, रूपी, रूपवा। उत्तमर्ण (ऋण देने वाला) अर्थ में 'धन' शब्द से 'इक' प्रत्यय होकर 'धनिको' बनता है; अन्य अर्थों में धनी, धनवा। 'अत्थि' (है) इस अर्थ में 'अत्थिको', 'अत्थी' बनते हैं; अन्यत्र 'अत्थवा'। –-ตทนฺตา จ;() ปุญฺญตฺถิโก, ปุญฺญตฺถิ–-วณฺณนฺตา อีเยว() พฺรหฺมวณฺณี เทววณฺณี–-หตฺถทนฺเตหิ ชาติยํ () หตฺถี; ทนฺตี; อญฺญตฺร หตฺถวา; ทนฺตวา–-วณฺณโต พฺรหฺมจาริมฺหิ; () วณฺณี, พุหฺมจารี; วณฺณวาญฺโญ–-โปกฺขราทิโต เทเส() โปกฺขรณี อุปฺปลินี กุมุทินี ภิสินี มุฬาลินี สาลุกินี –-กฺวาวาเทเส’ปิ-ปทุมนี, ปทุมินีปณฺณํ; อญฺญตฺร โปกฺขรวา, หตฺถิ–-นาวายิโก () นาวิโก; –-สุขทุกฺขา อี() สุข ทุกฺขี–-(สิขาทิหี วา)() สิขิ สิขาวา มาลี มกาลาวา สีลิ สีลวา พลี พลวา –-พลา พาหูรุปุพฺพา จ() พาหุพลี; อูรุพลี. और तदन्त शब्दों से भी; जैसे - पुञ्ञत्थिको, पुञ्ञत्थी। 'वण्ण' अन्त वाले शब्दों से 'ई' ही होता है - ब्रह्मवण्णी, देववण्णी। 'हत्थ' और 'दन्त' शब्दों से जाति अर्थ में 'ई' होता है - हत्थी, दन्ती; अन्यत्र हत्थवा, दन्तवा। 'वण्ण' शब्द से ब्रह्मचारी अर्थ में 'ई' होता है - वण्णी, ब्रह्मचारी; अन्यत्र वण्णवा। पोक्खर आदि शब्दों से स्थान (देश) अर्थ में - पोक्खरणी, उप्पलिनी, कुमुदिनी, भिसिनी, मुळालिनी, सालुकिनी। कहीं आदेश होने पर भी - पदुमनी, पदुमिनीपण्णं; अन्यत्र पोक्खरवा, हत्थि। 'नावा' शब्द से 'इको' - नाविको। सुख और दुःख शब्दों से 'ई' - सुखी, दुक्खी। शिखा आदि शब्दों से विकल्प से - सिखी, सिखावा; माली, मालांवा; सीली, सीलवा; बली, बलवा। बाहु और ऊरु शब्द पूर्व में हों तो 'बल' शब्द से 'ई' होता है - बाहुबली, ऊरुबली। ตปาทีหิ สฺสี-. तप आदि शब्दों से 'स्सी' प्रत्यय होता है। ตปาทิโต มนฺตฺวตฺเถ วา สฺสิ โหติ; ตปสฺสิ, ยสสฺสี, เตชสฺสี, มนสฺสี, ปยสฺสี –-วาตฺเวว-ยสวา. 'तप' आदि शब्दों से 'मतुप्' (वाला) के अर्थ में 'स्सि' प्रत्यय विकल्प से होता है; जैसे- तपस्सी, यशस्सी, तेजस्सी, मनस्सी, पयस्सी। विकल्प से होने के कारण- यशवा। มุขาทิโต โร-. 'मुख' आदि से 'रो' प्रत्यय होता है। มุขาทีหิ มนฺตฺวตฺถ โร หฺैโอติ; มุขโร, สุสิโร อูสโร, มธุโร, ขโร, กุชโร, นคโร –-ทนฺตสฺสุ จ อุตฺตตทนฺเต () ทนฺตุโร. 'मुख' आदि शब्दों से 'मतुप्' के अर्थ में 'रो' प्रत्यय होता है; जैसे- मुखरो, सुसिरो, ऊसरो, मधुरो, खरो, कुञ्जरो, नगरो। 'दन्त' शब्द के अन्त्य स्वर को 'उ' होकर 'रो' प्रत्यय होने पर- दन्तुरो। ตุณฺฑฺยาทีหิ โภ-. 'तुण्डि' आदि से 'भो' प्रत्यय होता है। ตุณฺฑิอาทีหิ มนฺตฺวตฺเถ โภ วา โหติ; ตุณฺฑิโภ, สาฬิโภ,วลิโภ, วาตฺเวว-ตุณฺฑิมา. 'तुण्डि' आदि शब्दों से 'मतुप्' के अर्थ में 'भो' प्रत्यय विकल्प से होता है; जैसे- तुण्डिभो, साळिभो, वलिभो। विकल्प से होने के कारण- तुण्डिमा। สทฺธาทิตฺว-. 'सद्धा' आदि से 'अ' प्रत्यय होता है। สทฺธาทีหิ มนฺตฺวตฺเถ อ โหติ วา; สนฺทฺโธ, ปญฺโญ; อิตฺถิยํ-สทฺธา; วาตฺเวว-ปญฺญวา. 'सद्धा' आदि शब्दों से 'मतुप्' के अर्थ में 'अ' प्रत्यय विकल्प से होता है; जैसे- सद्धो, पञ्ञो। स्त्रीलिंग में- सद्धा। विकल्प से होने के कारण- पञ्ञवा। โณ ตปา-. 'तप' से 'णो' प्रत्यय होता है। ตปา โณ โหติ มนฺตฺวตฺเถ; ตาปโส; อิตฺถิยํ-ตาปสี. 'तप' शब्द से 'मतुप्' के अर्थ में 'णो' प्रत्यय होता है; जैसे- तापसो। स्त्रीलिंग में- तापसी। อาลฺวาหิชฺฌาทีหิ-. อภิชฺฌาทีหิ อาลุ โหติมนฺตฺวตฺเถ; อภิชฺฌาลุ, สีตาลุ, ธชาลุ, ทยาลุ–-วาตฺเวว-ทยาวา. 'अभिज्झा' आदि शब्दों से 'मतुप्' के अर्थ में 'आलु' प्रत्यय होता है; जैसे- अभिज्झालु, सीतालु, धजालु, दयालु। विकल्प से होने के कारण- दयावा। ปิจฺฉาทิตฺวิโล-. 'पिच्छ' आदि से 'इलो' प्रत्यय होता है। ปิจฺฉาทีหิ อิโล โหติ จา มนฺตฺวตฺเถ; ปิจฺฉิโล, ปิจฺฉวา; เผณิโล, เผณวา; ชฏิโล, ชฏาวา;–-กถํ วาวาโลติ? นินฺทายมิลสฺสาทิโลเป ‘‘ปโร กฺวจี‘‘ติ. 'पिच्छ' आदि शब्दों से 'मतुप्' के अर्थ में 'इलो' प्रत्यय होता है; जैसे- पिच्छिलो, पिच्छवा; फेणिलो, फेणवा; जटिलो, जटावा। 'वावालो' कैसे बनता है? निन्दा के अर्थ में 'इल' के आदि लोप और 'परो क्वचि' सूत्र से। สิลาทิตา โว-. 'सील' आदि से 'वो' प्रत्यय होता है। สีลาทิหิ โว โหติ วา มฺैนฺตฺวตฺเถ; สีลโว, สีลวา; เกสโว, เกสวา–-อณฺณา นิจฺจํ;() อณฺณโว–-คาณฺฑิ ราชีหิ สญฺญายํ; () คาณฺฑิวํ, ธนุ; ราชิวํ, ปงฺกชํ. 'सील' आदि शब्दों से 'मतुप्' के अर्थ में 'वो' प्रत्यय विकल्प से होता है; जैसे- सीलवो, सीलवा; केसवो, केसवा। 'अण्ण' शब्द से नित्य होता है- अण्णवो। 'गाण्डि' और 'राजि' शब्दों से संज्ञा के अर्थ में- गाण्डिवं (धनुष), राजिवं (कमल)। มายาเมธาหิ วี-. 'माया' और 'मेधा' शब्दों से 'वी' प्रत्यय होता है। เอเตหิ ทฺวีหิ วี โหติ มนฺตฺวตฺเถ; มายาวิ, เมธาวี. इन दोनों शब्दों से 'मतुप्' के अर्थ में 'वी' प्रत्यय होता है; जैसे- मायावी, मेधावी। สิสฺสเร อามฺยุวามี-. 'ईश्वर' (स्वामी) के अर्थ में 'आम्यु' और 'वामी' प्रत्यय होते हैं। สสทฺทา อามฺยุวามี โหนฺติสฺสเร’ภิเธเย มนฺตฺวตฺเถ;’สมสฺสตฺถิติ’ สามี, สุวามี. 'स' शब्द से 'ईश्वर' (स्वामी) अर्थ अभिधेय होने पर 'मतुप्' के अर्थ में 'आम्यु' और 'वामी' प्रत्यय होते हैं; 'जिसका स्व (धन) है' वह- सामी, सुवामी। ลกฺขฺยา โณ อ จ-. 'लक्खी' शब्द से 'णो' प्रत्यय और 'अ' आदेश होता है। ลกฺขีสทฺทาโณ โหต มนฺตฺวตฺเถ; อ จนฺตสฺส; ณกาโร’ว สโว; ลกฺขโณ. 'लक्खी' शब्द से 'मतुप्' के अर्थ में 'णो' प्रत्यय होता है और उसके अन्त्य को 'अ' आदेश होता है; 'ण' कार केवल श्रवण (उच्चारण) के लिए है; लक्खणो। องฺคา โน กลฺยาเณ-. 'कल्याण' (सुन्दरता) के अर्थ में 'अङ्ग' शब्द से 'नो' प्रत्यय होता है। กลฺยาเณ คมฺยมานฺญงฺคสฺมาโนโหติ มนฺตฺวตฺเถ; องฺคนา. 'कल्याण' (सुन्दरता) प्रतीत होने पर 'अङ्ग' शब्द से 'मतुप्' के अर्थ में 'नो' प्रत्यय होता है; जैसे- अङ्गना। โส โลมา-. 'लोम' से 'सो' प्रत्यय होता है। โลมา โสโหติ มนฺตฺวตฺเถ; โลมโส; อิตฺถิยํ-โลมสา. 'लोम' शब्द से 'मतुप्' के अर्थ में 'सो' प्रत्यय होता है; जैसे- लोमसो। स्त्रीलिंग में- लोमसा। อิมิยา-. 'इमि' और 'इया' प्रत्यय होते हैं। มนฺตฺวตฺเถ อิมฺैยา โหนฺติ พหุลํ; ปุตฺติโม, กิตฺติโม, ปุตฺติโย, กปฺปิโย, ชฏิโย,หานภาคิโย, เสนิโย. 'मतुप्' के अर्थ में 'इमि' और 'इया' प्रत्यय बहुलता से होते हैं; जैसे- पुत्तिमो, कित्तिमो, पुत्तियो, कप्पियो, जटियो, हानभागियो, सेनियो। โต ปญฺจมฺยา-.- पञ्चमी विभक्ति के अर्थ में 'तो' प्रत्यय होता है। ปญฺจวฺยนฺตา พหุลํ โต โหติ วา; คามโต อาคจฺฉติ, คามสฺมาอาคจฺฉติ; โจรโต ภายติ, โจเรหิ ภายติ; สตฺถโตปริหีโน, สตฺถา ปริหีโน. पञ्चम्यन्त शब्दों से बहुलता से या विकल्प से 'तो' प्रत्यय होता है; जैसे- गामतो आगच्छति (गाँव से आता है), गामस्मा आगच्छति; चोरतो भायति (चोर से डरता है), चोरेहि भायति; सत्थतो परिहीनो (सार्थ से भ्रष्ट), सत्था परिहीनो। อิโตเตตฺโตกุโต-. 'इतो', 'एत्तो' और 'कुतो' की सिद्धि। โตมฺหิ อิมสฺส ฏิ นิปจฺจเต เอตสฺส ฏ เอต กึสทฺทสฺส กุตฺตจ; อิโต, อิมสฺมา; อโต, เอตฺโต, เอตสฺมา; กุโต, กสฺมา. 'तो' प्रत्यय परे होने पर 'इम' के स्थान पर 'इ' निपातित होता है, 'एत' के स्थान पर 'अ' और 'ए' तथा 'किं' शब्द के स्थान पर 'कु' आदेश होता है; जैसे- इतो (इससे), इमस्मा; अतो, एत्तो (उससे), एतस्मा; कुतो (कहाँ से), कस्मा। อภฺยาทีหิ-. अभ्यादीहि-। อภิอาทีหิ โต โหติ; อภิโต, ปริโต, ปจฺฉโต, เหฏฺฐโต. 'अभि' आदि से 'तो' प्रत्यय होता है; अभितो, परितो, पच्छतो, हेट्ठतो। อาทฺยาทีหิ-. आद्यादीहि-। อาทิปฺปภุตีหิ โต วา โหติ; อาโท, อาทิโต; มชฺฌโต, อนฺตโต, ปิฏฺฐิโต, ปสฺสโต, มุขโต–-ยโตทกํ ตทา ทิตฺตํ, ยํ อุทกํ ตเทวาทิตฺตนฺติ อตฺโถ. 'आदि' प्रभृति शब्दों से 'तो' विकल्प से होता है; आदो, आदितो; मज्झतो, अन्ततो, पिट्ठितो, पस्सतो, मुखतो— 'यतोदकं तदा दित्तं', जो जल है वही प्रदीप्त है, यह अर्थ है। สพฺพาทิโต สตฺตมฺยา ตฺรตฺถา-. सब्बादितो सप्तम्या त्रत्था-। สพฺพาทีหิ สตฺตมฺยนฺเตหิ ตฺรตฺถา วา โหนฺติ; สพฺพตฺร, สพฺพตฺถ, สพฺพสฺมึ; ยตฺร, ยตฺถ, ยสฺมึ–-พหุลาธิการา น ตุมฺหามฺเหหิ. सप्तमी विभक्ति के अन्त वाले 'सब्ब' आदि शब्दों से 'त्र' और 'त्थ' विकल्प से होते हैं; सब्बत्र, सब्बत्थ, सब्बस्मिं; यत्र, यत्थ, यस्मिं— बहुलाधिकार के कारण 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों से ये नहीं होते। กตฺเถตฺถ กุตฺราตฺรกฺเวหิธ-. कत्थेत्थ कुत्रात्रक्वेहिध-। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต; กสฺมึ กตฺถ, กุตฺร, กฺว; เอตสฺมึ เอตฺถ, อตฺร; อสฺมึ อิห, อิธ. ये शब्द निपातित होते हैं; 'कस्मिं' के अर्थ में कत्थ, कुत्र, क्व; 'एतस्मिं' के अर्थ में एत्थ, अत्र; 'अस्मिं' के अर्थ में इह, इध। ธิ สพฺพา วา- धि सब्बा वा- สตฺตมฺยนฺตโต สพฺพสฺมาธิ วา โหติ; สพฺพธิ; สพฺพตฺถ. सप्तमी विभक्ति के अन्त वाले 'सब्ब' शब्द से 'धि' विकल्प से होता है; सब्बधि; सब्बत्थ। ยา หึ-. या हिं-। สตฺตมฺยนฺตา ยโต หึ วา โหติ; ยหึ, ยตฺร. सप्तमी विभक्ति के अन्त वाले 'य' शब्द से 'हिं' विकल्प से होता है; यहिं, यत्र। ตา หํ จ-. ता हं च-। สตฺตมฺยนฺตา ตโต วา หํ โหติ หิญฺจ; ตหํ, ตหึ, ตตฺร. सप्तमी विभक्ति के अन्त वाले 'त' शब्द से विकल्प से 'हं' और 'हिं' होते हैं; तहं, तहिं, तत्र। กุหึกหํ-. कुहिंकहं-। กึสทฺทา สตฺตมฺยนฺตา หึหํ นิปจฺจนฺเต กิสฺส กุกา จ; กิหึ, กหํ, กถํ กุหิทฺวนนฺติ? จนํ อิติ นิปาตนฺตรํ; กิหิทฺวีติ-เอตฺถ วิสทฺโทวิย. सप्तमी विभक्ति के अन्त वाले 'किं' शब्द से 'हिं' और 'हं' निपातित होते हैं और 'किं' को 'कु' और 'क' आदेश होता है; किहिं, कहं, 'कथं कुहिद्वनन्ति'? 'चनं' यह एक अन्य निपात है; 'किहिद्वी' यहाँ 'वि' शब्द के समान है। สพฺเพกญฺญยเตหิ กาเล ทา-. सब्बेकञ्ञयतेहि काले दा-। เอเตหิ สตฺตมฺยนฺเตหิ จตฺตมาเนหิ กาเล ทา โหติ; สพฺพสฺมึ กาเล สพฺพทา; เอกทา, อญฺญทา, ยทา, ตทา–-กาเลติ-กึ? สพฺพตฺถเทเส. सप्तमी विभक्ति के अन्त वाले इन 'सब्ब', 'एक', 'अञ्ञ', 'य', 'त' शब्दों से काल के अर्थ में 'दा' प्रत्यय होता है; सब्बस्मिं काले - सब्बदा; एकदा, अञ्ञदा, यदा, तदा— 'काले' क्यों? सब्बत्थ (देश के अर्थ में) के लिए। กทากุทาสทาธุเนทาติ-. कदाकुदासदाधुनेदाति-। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต; ตสฺมึ กาเล กทา, กุทา; สมฺพสฺมึ กาเล สทา; อิมสฺมึ กาเล อธุนา, อิทานิ. ये शब्द निपातित होते हैं; 'तस्मिं काले' के अर्थ में कदा, कुदा; 'सब्बस्मिं काले' के अर्थ में सदा; 'इमस्मिं काले' के अर्थ में अधुना, इदानि। อชฺชสชฺชวปรชฺชฺเวตรหิกรหา-. अज्जसज्जवपरज्ज्वेतरहितरहा-। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต; เอกติปฺปจฺจโย อาเทโส กาล วิเสโสติ สพฺพเมตํ นิปาตนา ลพฺภติ; อิมสฺส โว ชฺโช จาหนิ นิปจฺจเต; อสฺมึ อหนิ อชฺช–-สมานสฺส สภาโวชฺชุ จาหนิ–-สมาเน อภนิ สชฺชุ–-อปรสฺมา ชฺชุ–-อปรสฺมึ อหนิอปรชฺชุ–-อิมสฺเสโตกาเล รหิ ว–-อิมสฺมึ กาเล เอตรหิ–-กึสทฺทสฺส โก รห จานชฺชตเน–-ตสฺมึ กาเล กรห. ये शब्द निपातित होते हैं; प्रत्यय, आदेश और काल विशेष—यह सब निपातन से प्राप्त होता है; 'इम' को 'अ' और 'अहनि' के स्थान पर 'ज्ज' निपातित होता है; 'अस्मिं अहनि' - अज्ज; समान को 'स' भाव और 'अहनि' के स्थान पर 'ज्जु' - 'समाने अहनि' - सज्ज; 'अपर' से 'ज्जु' - 'अपरस्मिं अहनि' - अपरज्जु; 'इम' को 'एत' और काल के अर्थ में 'रहि' - 'इमस्मिं काले' - एतरहि; 'किं' शब्द को 'क' और अनद्यतन काल में 'रह' - 'तस्मिं काले' - करह। สพฺพาทีหิ ปกาเร ถา-. सब्बादीहि प्रकारे था-। สามญฺญสฺส เภทโก วิเสโส ปกาโร, ตตฺถ วตฺตมาเนหิ สพฺพาทีหิ ถา โหติ สพฺเพนปกาเรน สพฺพถา; ยถา, ตถา. सामान्य का भेदक विशेष 'प्रकार' है, उस अर्थ में वर्तमान 'सब्ब' आदि शब्दों से 'था' प्रत्यय होता है; सब प्रकार से - सब्बथा; यथा, तथा। กถมิตฺถํ-. कथमित्थं-। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต ปกาเร; กิมิเมหิ ถํ ปจฺจโย, กฺैจฺจ เตสํ ยถากฺกมํ; กถมิตฺถํ. ये शब्द प्रकार के अर्थ में निपातित होते हैं; 'किं' और 'इम' से 'थं' प्रत्यय होता है और उन्हें क्रमशः 'क' और 'इ' आदेश होता है; कथं, इत्थं। ธา สงฺขฺยาหิ-. धा संख्याहि-। สงฺขฺยาวาจีหิ ปกาเร ธา ปโร โหติ;’ทฺวีหิ ปกาเรหิ ทฺเว วา ปกาเรกโรติ’ วิธากโรติ; พหุธา กโรติ;’เอกํ ราสึ ปญฺจปฺปการํ กโรติ’ ปญฺจธา กโรติ?ปญฺจปฺปการเมกปฺปการํ กโรติ’ เอกธากโรติ. संख्यावाची शब्दों से प्रकार के अर्थ में 'धा' प्रत्यय बाद में होता है; 'दो प्रकार से' या 'दो प्रकार करता है' - विधाकरोति; बहुधा करोति; 'एक राशि को पाँच प्रकार का करता है' - पञ्चधा करोति; 'पाँच प्रकार को एक प्रकार का करता है' - एकधा करोति। เวกาชฺฌํ-. वेकाज्झं-। เอกสฺมา ปกาเร ชฺฌํ วา โหติ; เอกชฺกฺวงฺกโรติ; เอกธา กโรติ. 'एक' शब्द से प्रकार के अर्थ में 'ज्झं' विकल्प से होता है; एकज्झं करोति; एकधा करोति। ทฺวิตีเหธา-. द्वितीहेधा-। ทฺวีติหิ ปกาเร เอธาวา โหติ; เวธา, เตธา; ทฺวิธา, ติธา. द्वि और ति शब्दों से 'प्रकार' अर्थ में 'एधा' और 'धा' प्रत्यय होते हैं; जैसे- वेधा, तेधा; द्विधा, तिधा। ตพฺพติ ชาติโย-. तब्बति जातियो-। ปการวติ ตํสามญฺญวาจกา สทฺทาชาติโย โหติ; ปฏุ ชาติโย, มุทุชาติโย. प्रकार अर्थ वाले उन सामान्यवाचक शब्दों से 'जातियो' प्रत्यय होता है; जैसे- पटुजातियो, मुदुजातियो। วารสํขฺยาย กฺขตฺตุํ- वारसंख्याय क्खत्तुं- วารสมฺพนฺธินิยา สํขฺยาย กฺขตฺตุํ โหติ;’ทฺเว วาเร ภุญฺชติ’ ทฺวิกฺขตฺตุํ ทิวสสฺส ภุญฺชติ; วารคฺคหณํ กึ? ปญจ ภิญฺชติ; สงฺขฺยายาติ-กึ? ปหูเต วาเร ภุญฺชติ. वार (बार) से सम्बन्धित संख्या से 'क्खत्तुं' प्रत्यय होता है; 'दो बार खाता है' - द्विक्खत्तुं दिवसस्स भुञ्जति (दिन में दो बार खाता है); 'वार' ग्रहण क्यों? पञ्च भुञ्जति (पाँच खाता है); 'संख्या' क्यों? पहूते वारे भुञ्जति (अनेक बार खाता है)। กติมฺหา-. कतिम्हा-। วารสมฺพนฺธินิยา กติสํขฺยาย กฺขตฺตุํ โหติ;’กติ วาเร ภุญฺชนิ’กติกฺขตฺตุํ ภุญฺชติ. वार से सम्बन्धित 'कति' संख्या से 'क्खत्तुं' प्रत्यय होता है; 'कति वारे भुञ्जति' - कतिक्खत्तुं भुञ्जति। พหุมฺภา ธา จ ปจฺจาสตฺติยํ-. बहुम्भा धा च पच्चासत्तियं-। วารสมฺพนฺธินิยา พหุสํขฺยาย ธาโหติ กฺขตฺตุญฺจ; วารานญฺเจ ปจฺจาสตฺติ โหติ; พหุธา ทิวสสฺส พุญฺชติ พหุกฺขตฺตุํ–-ปจฺจาสตฺติยนฺติ กึ? พหุกฺขตฺตุํ มาสสฺส ภุญฺชติ. वार से सम्बन्धित 'बहु' संख्या से 'धा' और 'क्खत्तुं' प्रत्यय होते हैं, यदि वारों की निकटता हो; बहुधा दिवसस्स भुञ्जति, बहुक्खत्तुं; 'पच्चासत्तियं' क्यों? बहुक्खत्तुं मासस्स भुञ्जति। สกึ วา-. सकिं वा-। เอกํ วารมิจฺจสฺมึ อตฺเถ สกินฺติ วา นิปจฺจเต;’เอกํ วารํ ภุญฺชติ’–-วาติ กึ?เอกกฺขตฺตุํ ภุญฺชติ. 'एक बार' इस अर्थ में 'सकिं' शब्द निपातित होता है; 'एकं वारं भुञ्जति'; 'वा' क्यों? एकक्खत्तुं भुञ्जति। โส วิจฺฉาปฺปกาเรสุ-. सो विच्छाप्पकारेसु-। วีจฺฉายํ ปกาเร จ โส โหติ พหุลํ; วีจฺฉายํ-ขณฺฑโส, พิลโส; ปกาเร-ปุถุโส,สพฺพโส. वीप्सा और प्रकार अर्थ में 'सो' प्रत्यय बहुलता से होता है; वीप्सा में - खण्डसो, बिलसो; प्रकार में - पुथुसो, सब्बसो। อภิตตพฺภาเว กราสภุโยเค วิการา จี-. अभूततब्भावे करासभुयोगे विकारा ची-। อวตฺถาวโต วตฺถนฺตเรนาภุตสฺส ตายาวตฺถาย ภาเว กราสภุหิ สมฺพนฺเธสติ วิการวาจกาจี โหติ;’อธวลํ ธวลํ กโรติ’ ธวลี กโรติ; อธวโล ธวโล สิยา ธวลี สิยา; อธวโล ธวโล ภวติ ธวลี ภวติ–-อภตตพฺภาเวติ-กึ? ฆฏํ กโรติ, ทธิอตฺถิ, ฆโฏ ภวติ–-กราสภุโยเคติ กึ? อธวลา ธฺวออิโล ชายเต–-วิการาติ-กึ? ปกติยา มา โหตุ; สุวณฺณํ กุณฺฑลี กโรติ. जो पहले वैसा नहीं था, उस अवस्था में होने पर 'कृ', 'अस्' और 'भू' के योग में विकारवाचक शब्द से 'ची' प्रत्यय होता है; 'अधवल को धवल करता है' - धवली करोति; अधवल धवल हो - धवली सिया; अधवल धवल होता है - धवली भवति। 'अभूततब्भावे' क्यों? घटं करोति, दधि अत्थि, घटो भवति। 'करासभुयोगे' क्यों? अधवला धवलो जायते। 'विकारा' क्यों? प्रकृति में न हो; सुवण्णं कुण्डली करोति। ทิสฺสนฺตญฺเญ’ปิ ปจฺจยา-. दिस्सन्ताञ्ञेऽपि पच्चया-। วุตฺตโต’ญฺเญ’ปิ ปจฺจยา ทิสฺสนฺติ วุตฺตาวุตฺตตฺเถสุ;’วิวิธา มาตโร’ วิมาตโร,’ตาสํ ปุตฺตา’ เวมาตีกา-ริกณ;’ปถํ คจฺฉนฺตีติ’ ปถาวิโน-อาวี;’ อิสฺสา อสฺส อตฺถิติ’ อิสฺสุกี-อุกี?’ธุรํ วหนฺตีติ’ โธรยฺหา-ยฺหณ.- कहे गए प्रत्ययों के अतिरिक्त अन्य प्रत्यय भी कहे गए और अनकहे अर्थों में देखे जाते हैं; 'विविधा मातरो' - विमातरो, 'तासं पुत्ता' - वेमातीका (रिकण प्रत्यय); 'पथं गच्छन्तीति' - पथाविनो (आवी प्रत्यय); 'इस्सा अस्स अत्थीति' - इस्सुकी (उकी प्रत्यय); 'धुरं वहन्तीति' - धोरय्हा (य्हण प्रत्यय)। อญฺญสฺมึ-. अञ्ञस्मिं-। วุตฺตโต’ญฺญสฺมิมฺปิ อตฺเถ วุตฺตปฺปจฺจยา ทิสฺสนฺติ;’มคธานํ อิสฺสโร’ มาคโธ-โณ;’กาสีติ สหสฺสํ, ตมคฺฆตีติ กาสิโย-อิโย. कहे गए अर्थों से भिन्न अर्थों में भी उक्त प्रत्यय देखे जाते हैं; 'मगधानां इस्सरो' - मागधो (ण प्रत्यय); 'कासीति सहस्सं, तमग्घतीति' - कासियो (इयो प्रत्यय)। สกตฺถ-. सकत्थ-। สกตฺเถ’ปิ ปจฺจยา ทิสฺสนฺติ; หีนโก, โปตโก, กิจจยยํ. स्वार्थ में भी प्रत्यय देखे जाते हैं; हीनको, पोतको, किच्चायनं। โลโป-. लोपो-। ปจฺจยานํ โลโป’ปิ ทิสฺสติ; พุทฺเธ รตนํ ปณีตํ, จกฺขุํ สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตนิเยยน วาติ ภาวปฺปจฺจย โลโป. प्रत्ययों का लोप भी देखा जाता है; 'बुद्धे रतनं पणीतं', 'चक्खुं सुञ्ञं अत्तेन वा अत्तनीयेन वा' - यहाँ भाव प्रत्यय का लोप है। สรานมาทิสฺสายุวณฺณสฺสาโญ ณานุพนฺเธ-. सरानामादिस्सायुवण्णस्सञ्ञो णानुबन्धे-। สรานมาทิภุตา เย อการิวณฺณุวณฺณา เตสํ อาโญ โหนฺติ ยถากฺกมํ ณานุพนฺเธ; ราฆโว, วฺैนเตยฺโย, เมนิโก, โอฬุมฺปิโก, โทหคฺคํ–-ณานุพนฺเธติ-กึ? ปุราตโน. स्वरों में आदिभूत 'अ', 'इ-ई' और 'उ-ऊ' को क्रमशः 'आ', 'ए' और 'ओ' होते हैं, ण-अनुबन्ध होने पर; राघव, वैनतेय, मेनिक, ओळुम्पिक, दोहग्गं। 'णानुबन्धे' क्यों? पुरातन। สํโยเค กฺวจิ-. संयोगे क्वचि-। สรานมาทิภุตา เย อยุวณฺณา เตสํ อาโญ โหนฺติ กฺวจิ เทว สํโยควิสเย ณานุพนฺเธ;เทจฺโจ, โกณฺฑญฺโญ –-กฺวจีติ-กึ? กตฺติเกยฺโย. ण-अनुबन्ध होने पर संयोग के विषय में आदिभूत 'इ-ई' और 'उ-ऊ' को कहीं-कहीं 'ए' और 'ओ' होते हैं; देच्चो, कोण्डञ्ञो। 'क्वचि' क्यों? कत्तिकेय्यो। มชฺเฌ-. मज्झे-। มชฺเฌ วตฺตมานานมฺปิ อยุวณฺณานํ อาโญ โหนฺติ กฺวจิ; อฑฺฒเตยฺยา, วาเสฏฺโฐ. मध्य में स्थित 'इ-ई' और 'उ-ऊ' को भी कहीं-कहीं 'ए' और 'ओ' होते हैं; अढतेय्या, वासेट्ठो। โกสฺชฺैชาชฺชวปาริสชฺชสุภชฺชมทฺทวาริสฺสาสภาชญฺญ เถยฺยพาหุสจฺจา-. कोसज्ज, अज्जव, पारिसज्ज, सुहज्ज, मद्दव, आरिस्स, आसभ, आजञ्ञ, थेय्य और बाहुसच्च। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต ณานุพนฺเธ;’กุสีตสฺส ภาโว’ โกสชฺชชํ;’ อุชุโน ภาโว’ อปฺปวํ;’ปริสาสุ สาธุ’ ปาริสชฺโช;’สุหทโยจ’ สุหชฺโช,’ตสฺส ปน ภาโว โสหชฺชํ;’มุทุโน ภาโว’มทฺทวํ;’อิสิโน อิทํ, ภาโว วา’ อาริสฺสํ;’อุสภสฺส อิทํ, ภาโว วา’ อาสภํ;’อาชานียสฺส ภาโว’ โส เอว วา’ อาชญฺญํ;’เถนสฺส ภาโว, กมฺมํ วา’ เถยฺยํ;’พหุสฺสุตสฺส ภาโว’ พาหุสจฺจํ–-เอเตสุ ยมลกฺขณิกํ ตํ นิปาตนา. ये शब्द 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्ययों में निपातित होते हैं; 'कुसीत' (आलसी) का भाव 'कोसज्ज' (आलस्य) है; 'उजु' (ऋजु/सीधा) का भाव 'अज्जव' (आर्जव/सरलता) है; 'परिसा' (परिषद) में साधु 'पारिसज्ज' है; 'सुहृदय' ही 'सुहज्ज' है, और उसका भाव 'सोहज्ज' है; 'मुदु' (मृदु) का भाव 'मद्दव' (मार्दव) है; 'इसि' (ऋषि) का यह अथवा भाव 'आरिस्स' (आर्ष) है; 'उसभ' (वृषभ) का यह अथवा भाव 'आसभ' (आर्षभ) है; 'आजानीय' का भाव अथवा वही 'आजञ्ञ' (आजन्य) है; 'थेन' (चोर) का भाव अथवा कर्म 'थेय्य' (स्तेय/चोरी) है; 'बहुस्सुत' (बहुश्रुत) का भाव 'बाहुसच्च' (बहुश्रुत्य) है - इनमें जो द्वित्व आदि लक्षण हैं, वे निपातन से सिद्ध होते हैं। มนาทีนํ สก-. मन आदि शब्दों के अन्त में 'स' होता है। มนาทีนํ สก โหติ ณานุพนฺเธ;’มนสิ ภวํ’ มานสํ;’ทุมฺมนโส ภาโว’ โทมนสฺสํ; โสมนสฺสํ. 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर मन आदि शब्दों के अन्त में 'स' होता है; 'मन' में होने वाला 'मानस' है; 'दुम्मन' (दुर्मन) का भाव 'दोमनस्स' (दौर्मनस्य) है; 'सोमनस्स' (सौमनस्य) है। อุวณฺณสฺสาวงิ โหติ; ราฆโว, ชามฺพวํ. 'उ' वर्ण के स्थान पर 'अव' होता है; जैसे - राघव, जाम्बव। ยมฺหิ โคสฺส จ-. 'य' प्रत्यय परे होने पर 'गो' शब्द के ओकार को भी (अव आदेश होता है)। ยการาโท ปจฺจย คฺैโอสฺสุวณฺณสฺส จ อวงิ โหติ; คพฺยํ, คาตพฺโย. यकार आदि प्रत्यय परे होने पर 'गो' शब्द के और 'उ' वर्ण के स्थान पर 'अव' होता है; जैसे - गब्य, गातब्य। โลโป’วณฺณิวณฺณานํ-. अ-वर्ण और इ-वर्ण का लोप होता है। ยการาโท ปจฺจเย อวณฺณิวณฺณานํ ลาโป โหติ, ทายฺชฺैชํ, การุญฺญํ, อาธิปจฺจํ, เทปฺปํ–-พหกุลํวิธานํ กฺวจิ น โหติ; กิจฺจยํ. यकार आदि प्रत्यय परे होने पर अ-वर्ण और इ-वर्ण का लोप होता है; जैसे - दायज्ज, कारुञ्ञ, आधिपच्च, देप्प - बहुल विधान के कारण कहीं-कहीं यह लोप नहीं होता है; जैसे - किच्चय। รานุพนฺเธ’นฺตสราทิสฺส-. 'र' अनुबन्ध वाले प्रत्यय में अन्त्य स्वर आदि का लोप होता है। อนฺโต สโร อาทิ ยสฺสาวยวสฺส ตสฺส โลโป โหติ รานุพนฺเธ; กิตฺตกํ, เปตฺเตยฺยํ. 'र' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर जिस अवयव का अन्त्य स्वर आदि है, उसका लोप होता है; जैसे - कित्तक, पेत्तेय्य। กิสมหตมิเม กสฺมหา-. 'किस' और 'महत' के स्थान पर क्रमशः 'कस' और 'मह' आदेश होते हैं 'इम' प्रत्यय परे होने पर। กิสสฺส มหโต อิเม กสฺมหา โหนฺติ ยถากฺกมํ; กสิมา, มหิมา. 'इम' प्रत्यय परे होने पर 'किस' और 'महत' के स्थान पर यथाक्रम 'कस' और 'मह' होते हैं; जैसे - कसिमा, महिमा। อายุสฺสายส มนฺตุมฺหิ-. 'मन्तु' प्रत्यय परे होने पर 'आयु' के स्थान पर 'आयस' आदेश होता है। อายุสฺส อายสาเทโส โหติ มนฺตุมฺหิ; อายสฺมา. 'मन्तु' प्रत्यय परे होने पर 'आयु' के स्थान पर 'आयस' आदेश होता है; जैसे - आयस्मा। โช วุทฺธสฺสิยิเฒสุ-. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर 'वुद्ध' (वृद्ध) के स्थान पर 'ज' आदेश होता है। วุทฺธสฺส โช โหติ อิยฺैฏฺเฐสุ; เชยฺโย, เชฏฺโฐ. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर 'वुद्ध' के स्थान पर 'ज' होता है; जैसे - जेय्य, जेट्ठ। พาฬฺหนฺติกปสตฺถานํ สาธเนทสา-. 'बाळ्ह', 'अन्तिक' और 'पसत्थ' के स्थान पर क्रमशः 'साध', 'नेद' और 'स' आदेश होते हैं। อิเยฏฺเฐสุ พาฬฺหนฺติกปสตฺถานํ สาธเนทสา โหนฺตี ยถากฺกมํ; สาธิโย, สาธิฏฺโฐ; เนทิโย, เนทิฏฺโฐ; เสยฺโย, เสฏฺโฐ 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर 'बाळ्ह', 'अन्तिक' और 'पसत्थ' के स्थान पर यथाक्रम 'साध', 'नेद' और 'स' होते हैं; जैसे - साधियो, साधिट्ठो; नेदियो, नेदिट्ठो; सेय्यो, सेट्ठो। กณฺกนาปฺปยุวานํ-. 'अप्प' और 'युव' के स्थान पर 'कण' और 'कन' आदेश होते हैं। อิเยฏฺเฐสุ อปฺปยุวานํ กณฺกนา โหนฺติ ยยถากฺกมํ; กณิโย, กณิฏฺโฐ; กนิโย, กนิฏฺโฐ. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर 'अप्प' और 'युव' के स्थान पर यथाक्रम 'कण' और 'कन' होते हैं; जैसे - कणियो, कणिट्ठो; कनियो, कनिट्ठो। โลโป วีมนฺตุวตฺตุนํ-. 'वी', 'मन्तु' और 'वन्तु' प्रत्ययों का लोप होता है। วีมนฺตุวนฺตุนํ โลโป โหติ อิยฺैฏฺเฐสุ?’อติสเยน เมธาวี’ เมธิโย, เมธิฏฺโฐ;’อติสเยนสติมา’สติโย, สติฏฺโฐ;’อติสเยน คุณวา’ คุณิยา, คุณิฏฺโฐ. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर 'वी', 'मन्तु' और 'वन्तु' का लोप होता है; जैसे - 'अतिशय मेधावी' के अर्थ में मेधियो, मेधिट्ठो; 'अतिशय सतिमान' के अर्थ में सतियो, सतिट्ठो; 'अतिशय गुणवान' के अर्थ में गुणियो, गुणिट्ठो। เส สฺติออิสฺส ติสฺส-. 'स' परे होने पर 'ति' का लोप होता है। เส ปเร สตฺยนฺตสฺส ติการสฺส โลโป โหติ; วีสํ สตํ, ตึสํ สตํ. 'स' परे होने पर 'सति' के अन्त में स्थित 'ति' कार का लोप होता है; जैसे - वीसं सतं, तिंसं सतं। เอตสฺเสฏ ตฺตเก-. 'त्तक' प्रत्यय परे होने पर 'एत' के स्थान पर 'एट्ट' आदेश होता है। ตฺตเก ปเร เอตสฺส เอฏ เหนาติ; เอตฺตกํ. 'त्तक' प्रत्यय परे होने पर 'एत' के स्थान पर 'एट्ट' होता है; जैसे - एत्तकं। ณิกสฺสิโย วา-. 'णिक' प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'इय' होता है। ณิกสฺสวา อิโย โหติ; สกฺยปุตฺติโย, สกฺยปุตฺติโก. 'णिक' के स्थान पर विकल्प से 'इय' होता है; जैसे - सक्यपुत्तियो, सक्यपुत्तिको। อธาตุสฺส เก’สฺยาทิโต เฆ’สฺสี-. अ-धातु के 'क' प्रत्यय परे होने पर 'सि' आदि के स्थान पर 'घ' और 'इ' होता है। เฆ ปเร อธาตุสฺส โย กกาโร ตโต ปุพฺพสฺส อการสฺส พกหุลํ อิ โหติ, สเว โฆน สฺยาทิโต ปโร โหติ; พาลิกา, การิกา–-อธาตุสฺสาติ-กึ? สกา; เกติ-กึ?นนฺทนา; อสฺยาทิโตติ-กึ? พหุปริพฺพาชกา, มธุรา –-พหุจมฺมิกาติ กกาเรน สฺยาทิโน พฺยวหิตตฺตา สิทฺธํ–-เฆติ-กึ? พาลโก; อสฺสาติ-กึ? พหุกตฺตุกา,สาลา. 'घे' (स्त्रीलिंग प्रत्यय) के परे होने पर, जो धातु का अंग नहीं है ऐसे 'क' कार से पूर्व 'अ' कार को बहुलता से 'इ' होता है, यदि वह 'सि' आदि (विभक्ति) से परे हो; जैसे- बालिका, कारिका। 'अधातुस्स' (अधातु का) क्यों? सका। 'के' (क कार) क्यों? नन्दना। 'अस्यादितो' (सि आदि से परे) क्यों? बहुपरिव्राजका, मधुरा। 'बहुचम्मिका' यहाँ 'क' कार द्वारा 'सि' आदि के व्यवहित होने से सिद्ध होता है। 'घे' क्यों? बालको। 'अस्स' (अकार का) क्यों? बहुकर्तृका, शाला। อิติ โมคฺคลฺลาเน วฺยากรเณ วุตฺติยํ ณาทิกณฺโฑ จตุตฺโถ. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में 'णादि' काण्ड चौथा (अध्याय) समाप्त हुआ। ติชมาเนหิ ขสา ขมาวีมํสาสุ-. 'तिज्' और 'मान्' धातुओं से 'ख' और 'स' प्रत्यय होते हैं, क्षमा और मीमांसा के अर्थ में। ขนฺติยํ ติชา วีมํสายํ มานา จ ขสปฺปจฺจยา โหนฺติ ยถากฺกมํ; ติติกฺขา, วีมํสา–-ติติกฺขติ, วีมํสติ. ขมาวีมํสา สุติ-กึ? เตชนํ, เตโช, เตชยติ, มานนํ, มาโน, มาเนติ. क्षमा (सहनशीलता) अर्थ में 'तिज्' धातु से और मीमांसा (विचार) अर्थ में 'मान्' धातु से यथाक्रम 'ख' और 'स' प्रत्यय होते हैं; जैसे- तितिक्खा (तितिक्षा), वीमंसा (मीमांसा) - तितिक्खति, वीमंसति। 'खमावीमंसासु' क्यों? तेजनं, तेजो, तेजयति, माननं, मानो, मानेति। กิตา ติกิจฺฉาสํสเยสุ โช-. 'कित्' धातु से चिकित्सा और संशय अर्थ में 'ज' प्रत्यय होता है। ติกิจฺฉายํ สํสเย จ วตฺตมานา กิตา โช โหติ–-ติกิจฺฉา, วิจิกิจฺฉา–-ติกิจฺฉติ, วิจิกิจฺฉติ–-อญฺญตฺรนิเกโต, สํเกโต, เกตนํ, เกโต, เกตยติ. चिकित्सा और संशय अर्थ में वर्तमान 'कित्' धातु से 'ज' प्रत्यय होता है - तिकिच्छा (चिकित्सा), विचिकिच्छा (विचिकित्सा) - तिकिच्छति, विचिकिच्छति। अन्यत्र - निकेतो, संकेतो, केतनं, केतो, केतयति। นินฺทายํ คุปพธา พสฺสโภ จ-. निन्दा अर्थ में 'गुप्' और 'बध्' धातुओं से 'ज' प्रत्यय होता है; और 'ब' के स्थान पर 'स' तथा 'भ' होता है। นินฺทายํ วตฺตมาเนหิ คุปพเธหิ โช โหติ; พสฺส โภ จ–-ชิคุจฺฉา, พีภจฺฉา–-ชิคุจฺฉติ, พีภจฺฉติ–-อญฺญตฺรโคปนํ, โคเป, โปเปติ, พธโก. निन्दा अर्थ में वर्तमान 'गुप्' और 'बध्' धातुओं से 'ज' प्रत्यय होता है; 'ब' को 'स' और 'भ' होता है - जिगुच्छा (जुगुप्सा), बीभच्छा (बीभत्सा) - जिगुच्छति, बीभच्छति। अन्यत्र - गोपनं, गोपे, पोपेति, बधको। ตุํสฺมา โลโป วิจฺฉายํเต-. 'तुं' प्रत्यय के बाद इच्छा अर्थ में 'ते' (ख, स, छ) प्रत्यय होने पर 'तुं' का लोप होता है। ตุมนฺตโต อิจฺฉายมตฺเถ เต ขสฉา โหนฺติพหกุลํ; โลโป จ ตุํปจฺจยสฺสโหติ สุตตฺตา–-พุภุกฺขา, ชิคึสา, ชิฆจฺฉา–-พุภุกฺขติ, ชิคึสติ, ชิฆจฺฉติ–-อิธกสฺมา น โหติโภตฺตุมิจฺฉตีติ? ปทนฺตเรนาภิธานา. ตุํสฺมาติ-กึ? โภชนมิจฺฉติ. อิจฺฉายนฺติ กึ? ภุญฺชิตุํ คจฺฉติ. กถํ กุลํ ปิปติสตีติ? ยถา กุลํ ปติตุมิจฺฉตีติวากฺยํ โหติ, เอวํ วุตฺติปิ เหสฺสติ; วากฺยเมวจรหิ กถํ โหติ? โลกสฺส ตถา วจนิจฺฉาย. 'तुमुन्' प्रत्ययान्त से इच्छा अर्थ में 'ते' अर्थात् 'ख', 'स', 'छ' प्रत्यय बहुलता से होते हैं; और सूत्र के सामर्थ्य से 'तुं' प्रत्यय का लोप होता है - बुभुक्खा (बुभुक्षा), जिगींसा (जिगीषा), जिघच्छा (जिघत्सा) - बुभुक्खति, जिगींसति, जिघacchati। यहाँ 'भोत्तुमिच्छति' (खाने की इच्छा करता है) ऐसा क्यों नहीं होता? क्योंकि दूसरे पद द्वारा कथन किया गया है। 'तुंस्मा' क्यों? भोजनमिच्छति। 'इच्छायां' क्यों? भुञ्जितुं गच्छति। 'कुलं पिपतिसति' (कुल गिरना चाहता है) यह कैसे सिद्ध होता है? जैसे 'कुलं पतितुमिच्छति' यह वाक्य होता है, वैसे ही वृत्ति (रूप) भी होगी; तो फिर वाक्य ही कैसे होता है? लोक की वैसी बोलने की इच्छा होने के कारण। อีโย กมฺมา-. कर्म से इच्छा अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है। อิจฺฉากมฺมโต อิจฺฉายมตฺเถ อียปฺปจฺจโย โหติ;’ปุตฺตมิจฺฉติ’ ปุตฺตียติ–-กมฺมาติ-กึ? ออสิเนจฺฉติ; อิธ กสฺมา น โหติ รญฺโญ ปุตฺตมิจฺฉตีติ? สาเปกฺขตฺตา; น หิ อญฺญมเปกฺขมาโน อญฺเญนสเหกตฺถิภาวมนุภวิตุํ สกฺโกติ; อิธาปิ จรหิ น สิยา อตฺตโนปุตฺตมิจฺฉตีติ; เนเวตฺถ ภวิตพฺพํ; น หิ ภวติ อตฺตโนปุตฺติยตีติ; กถํ จรหิ วุตฺตสฺส อตฺตติยตาวคมฺยเต? อญฺญสฺสาสุตตฺตา, อิจฺฉาย จ ตพฺพิสยตฺตา. इच्छा के कर्म से इच्छा अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है; 'पुत्तमिच्छति' (पुत्र की इच्छा करता है) - पुत्तीयति। 'कम्मा' क्यों? आसिनेच्छति। यहाँ 'रञ्ञो पुत्तमिच्छति' (राजा के पुत्र की इच्छा करता है) में क्यों नहीं होता? सापेक्ष होने के कारण; क्योंकि अन्य की अपेक्षा रखने वाला दूसरे के साथ एकार्थीभाव (समास/प्रत्यय) प्राप्त नहीं कर सकता। तो फिर यहाँ भी नहीं होना चाहिए 'अत्तनो पुत्तमिच्छति' (अपने पुत्र की इच्छा करता है)? यहाँ तो होना ही नहीं चाहिए; क्योंकि 'अत्तनो पुत्तीयति' ऐसा नहीं होता। तो फिर कहे गए शब्द में 'अपना' (आत्म) भाव कैसे समझा जाता है? क्योंकि अन्य (का पुत्र) नहीं सुना गया है, और इच्छा उसी विषय में है। อุปมานาจาเร-. उपमान कर्म से आचरण अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है। กมฺมโต อุปมานา อาวารตฺเถ อีโย โหติ;’ปุตฺตมวา จรติ’ ปุตฺตียติ มาณวกํ; อุปมานาติ กึ? ปุตฺตมาจรติ. उपमान रूप कर्म से आचरण अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है; 'पुत्तमिव आचरति' (पुत्र के समान आचरण करता है) - पुत्तीयति माणवकं (माणवक के प्रति पुत्र जैसा आचरण करता है)। 'उपमाना' क्यों? पुत्तमाचरति। อาธารา-. आधार रूप उपमान से आचरण अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है। อาธารตุปมานาอาวารตฺเถ อีโย โหติ;’กุฏิยมิวาจรติ’ กุฏิยติ ปาสาเท, ปาสาทียติ กุฏิยํ. आधार रूप उपमान से आचरण अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है; 'कुटियमिव आचरति' (कुटिया के समान आचरण करता है) - कुटियति पासादे (प्रासाद में कुटिया जैसा आचरण करता है), पासादीयति कुटियं (कुटिया में प्रासाद जैसा आचरण करता है)। กตฺตุตาโย-. कर्ता रूप उपमान से आचरण अर्थ में 'आय' प्रत्यय होता है। กตฺตตุปมานา อาจารตฺเถ อาโย โหติ;’ปพฺพโตวา จรติ’ปพฺพตายติ. कर्ता रूप उपमान से आचरण अर्थ में 'आय' प्रत्यय होता है; 'पब्बतो इव आचरति' (पर्वत के समान आचरण करता है) - पब्बतायति। จฺยตฺเถ-. 'च्वि' (अभूततद्भाव) के अर्थ में। กตฺตุโต อภุตตพฺภาเว อาโย โหติ พหุลํ; ภุสายติ, ปฏปฏายติ, โลหิตายติ–-กตฺตุโตตฺเวว-ภุสํกโรตีติ; อิห กสฺมา น โหติ ภุสิ ภวตีติ? วุตฺตตฺถตาย. कर्ता से अभूततद्भाव (जो पहले वैसा नहीं था, वैसा होना) अर्थ में बहुलता से 'आय' प्रत्यय होता है; भुसायति, पटपटायति, लोहितायति। 'कत्तितो' ही - 'भुसं करोति' (बहुत करता है); यहाँ 'भुसि भवति' में क्यों नहीं होता? क्योंकि अर्थ पहले ही कहा जा चुका है। สทฺทาทีติ กโรติ-. 'शब्दादि' द्वितीयान्त शब्दों से 'करता है' इस अर्थ में 'आय' प्रत्यय होता है। สทฺทาทีหิ ทุติยนฺเตหิ กโรตีติ อสฺมึ อตฺเถ อาโย โหติ; สทฺทายติ, เวรายติ, กลหายติ, ธูปายติ. 'शब्दादि' द्वितीयान्त शब्दों से 'करता है' इस अर्थ में 'आय' प्रत्यय होता है; सदायति (शब्द करता है), वेरायति (वैर करता है), कलहायति (कलह करता है), धुपायति (धुआँ करता है)। นโมตฺวสฺโส-. 'नमो' शब्द से 'करता है' इस अर्थ में 'अस्स' प्रत्यय होता है। นโม อิจฺจสฺมา กโรตีติ อสฺมึ อตฺเถ อสฺโส โหติ; นมสฺสติ ตถาคตํ. 'नमो' इस शब्द से 'करता है' इस अर्थ में 'अस्स' प्रत्यय होता है; नमस्सति तथागतं (तथागत को नमस्कार करता है)। ธาตฺวตฺเถ นามสฺมิ-. धातु के अर्थ में नाम (संज्ञा) से 'इ' प्रत्यय होता है। นามสฺมา ธาตฺวตฺเถ พหุลมิ โหติ;’หตฺถินา อติกฺกมติ’อติ หตฺถยติ;’ วีณาย อุปคายติ’ อุปวีณยติ;’ทฬหํ กโรติ’ วินยํ ทฬหยติ;’ วิสุทฺธา โหติ’ รตฺติ วิสุทฺธยติ;’กุสลํ ปุจฺฉติ’กุสลยติ. नाम (संज्ञा) से धातु के अर्थ में बहुलता से 'इ' प्रत्यय होता है; 'हत्थिना अतिक्कमति' (हाथी से अतिक्रमण करता है) - अतिहत्थियति; 'वीणाय उपगायति' (वीणा के साथ गाता है) - उपवीणयति; 'दळहं करोति' (दृढ़ करता है) - विनयं दळहयति; 'विसुद्धा होति' (विशुद्ध होती है) - रत्ति विसुद्धयति; 'कुसलं पुच्छति' (कुशल पूछता है) - कुसलयति। สจฺจาทีหาปิ-. 'सच्च' (सत्य) आदि शब्दों से धातु के अर्थ में 'आपि' प्रत्यय होता है। สจฺจาทีหิ ธาตฺวตฺเถ อาปิ โหติ; สจฺจาเปติ, อตฺถาเปติ, เวทาเปติ, สุกฺขาเปติ สุขาเปติ, ทุกฺขาเปติ. 'सच्च' आदि शब्दों से धातु के अर्थ में 'आपि' प्रत्यय होता है; सच्चापेति, अत्थापेति, वेदापेति, सुक्खापेति, सुखापेति, दुक्खापेति। กฺริยตฺถา-. क्रियार्थक (धातु)। อยมธิกาโร อา สตฺถปริสมตฺติยา;’กฺริยา อตฺโถ ยสฺสโส กฺริยตฺโถ’,ธาตุ. यह अधिकार शास्त्र की समाप्ति तक है; 'क्रिया अर्थ है जिसका वह क्रियार्थक है', अर्थात् धातु। จุราทิโต ณิ-. चुरादि (धातुओं) से 'णि' (प्रत्यय होता है)। จุราทีหิ กฺริยตฺเถหิ สกตฺเถ ณิ ปโร โหติ พหุลํ; ณกาโร วุทฺธฺยตฺโถ–-เอวมญฺญตฺราปิ–-โจรยติ, ลาฬยติ. กถํ รชฺชํ กาเรตีติ? โยควิภาคโต. क्रियार्थक चुरादि धातुओं से स्वार्थ में 'णि' प्रत्यय बहुलता से बाद में होता है; 'ण' कार वृद्धि के लिए है—इसी प्रकार अन्यत्र भी—चोरयति, लाळयति। 'राज्जं कारेति' (राज्य करता है) कैसे सिद्ध होता है? योग-विभाग से। ปโยชกพฺยาปาเร ณาปิ จ-. प्रयोजक के व्यापार में 'णापि' भी (होता है)। กตฺตารํ โย ปโยชยติ ตสฺส พฺยาปาเร กฺริยตฺถา ณิณาปี โหนฺติ พหุลํ; กาเรติ, การาเปติ–-นนุ จ กตฺตาปิ กรณาทีนํปโยชโกติ ตพฺยาปาเร?ปิ ณิณาปี ปาปุณนฺติ? ปโยชกคฺคหณสามตฺถิยา น ภวิสฺสนฺติ, จุราทีหิ วิสุํ วจนสามตฺถิยา จ–-อาโต ภิยฺโย ณาปิเยว, ณิเย วุวณฺณโต, ทฺวยเมวญฺเญหิ. जो कर्ता को प्रेरित करता है, उसके व्यापार में क्रियार्थक धातुओं से 'णि' और 'णापि' प्रत्यय बहुलता से होते हैं; कारेति, कारापेति। क्या कर्ता भी करण आदि का प्रयोजक नहीं है, तो क्या उसके व्यापार में भी 'णि' और 'णापि' प्राप्त होंगे? 'प्रयोजक' ग्रहण के सामर्थ्य से वे नहीं होंगे, और चुरादि धातुओं से अलग वचन के सामर्थ्य से भी—आकारान्त धातुओं से प्रायः 'णापि' ही होता है, उ-वर्ण और ऊ-वर्ण से 'णि' होता है, और अन्यों से दोनों ही होते हैं। กฺโย ภาวกมฺเมสฺวปโรกฺเขสุ มานนฺตตฺยาทิสุ- भाव और कर्म में, अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) अर्थ में, 'मान', 'अन्त', 'ति' आदि के परे होने पर 'क्य' (प्रत्यय होता है)। ภาวกมฺมวิหิเตสุ ปโรกฺขาวชฺชิเตสุ มานนฺตตฺยาทิสุ ปเรสุกฺโย โหติ กฺรยตฺถา–-นฺตคฺคหณมุตฺตรตฺถํ; กกาโร อวุทฺธฺยตฺโถ; เอวมุตฺตรตฺราปิ–-ฐิยมานํ, ฐิยเต; สูยมานํ, สูยเต–-อปโรกฺเขสูติ-กึ? พภุว เทวทตฺเตน; พิภิท กุสูโล. ภิชฺชเต กุสูโล สยเมวาติภิชฺชเตติ สวนา กมฺมตาวคมฺยเต, สยเมวาติ สวนโต กตฺตุตา; กตฺตุตาวจนิจฺฉายนฺตุ-ภินฺทติกุสุโล อตฺตานนฺติ ภวติ; เอวมญฺญมฺปิ ยถาคมมนุคนฺตพฺพํ. ‘‘อปโรกฺเขสุ มานนฺตตฺยาทิสู’ติ-อยมธิกาโร อา‘‘ตนาทิตฺโว‘‘อปิวเอเต ตฺยาทโย ตฺยาทิสุ ปรภุเตสุ กตฺตุกมฺมภาววิหิเตสุ กฺยลาทีนํ วิธานโต เตสฺเวว วิญฺญยนฺตีติ-อกมฺมเกหิ ธาตุหิ กตฺตุภาเวสุ สกมฺมเกหิ กตฺตุกมฺเมสุกมฺมาวจนิจฺฉายํ ภาเวว ภวนฺตีติ เวทิตพฺพา–-ยสฺสปนธาตุสฺส กฺริยา กมฺมมเปกฺขเต โสสกมฺมโก? ยสฺส ตุ กฺริยา กตฺตุมตฺตมเปกฺขเต โส อกมฺมโกติ ญาตพฺพํ. भाव और कर्म में विहित, परोक्ष से रहित (अपरोक्ष), 'मान', 'अन्त', 'ति' आदि के परे होने पर क्रियार्थक धातुओं से 'क्य' प्रत्यय होता है। 'अन्त' का ग्रहण उत्तर सूत्र के लिए है। 'क' कार वृद्धि न होने के लिए है; इसी प्रकार आगे भी—ठियमानं, ठियते; सूयमानं, सूयते। 'अपरोक्ष में' ऐसा क्यों कहा? 'बभुव देवदत्तेन'; 'बिभिद कुसूलो'। 'भिज्जते कुसूलो सयमेव'—यहाँ 'भिज्जते' सुनने से कर्मता जानी जाती है, और 'सयमेव' सुनने से कर्तृता। कर्तृता कहने की इच्छा होने पर 'भिन्दति कुसूलो अत्तानं' ऐसा होता है; इसी प्रकार अन्य भी आगम के अनुसार समझना चाहिए। 'अपरोक्षेषु मानन्तत्यादिसु'—यह अधिकार 'तनादित्वो' तक है। यद्यपि ये 'ति' आदि, 'ति' आदि के परे होने पर कर्ता, कर्म और भाव में विहित 'क्य' आदि के विधान से उन्हीं में जाने जाते हैं—अकर्मक धातुओं से कर्ता और भाव में, और सकर्मक धातुओं से कर्ता और कर्म में, कर्म कहने की इच्छा न होने पर भाव में ही होते हैं, ऐसा समझना चाहिए। जिस धातु की क्रिया कर्म की अपेक्षा रखती है, वह सकर्मक है; और जिसकी क्रिया केवल कर्ता की अपेक्षा रखती है, वह अकर्मक है, ऐसा जानना चाहिए। กตฺตริ โล-. कर्ता में 'लो' (प्रत्यय होता है)। กตฺตริ โล-. कर्ता में 'लो' (प्रत्यय होता है)। กฺริยตฺถโต อปโรกฺเขสุ กตฺตุวิตมานนฺตตฺยาทิสุ โล โหติ; ลกาโร ‘‘ญิลสฺเส’ติ. วิเสสนตฺโถ–-ปจมาโน, ปจนฺโต; ปวติ. क्रियार्थक धातुओं से अपरोक्ष अर्थ में, कर्ता में विहित 'मान', 'अन्त', 'ति' आदि के परे होने पर 'लो' प्रत्यय होता है। 'ल' कार 'ञिलस्से' सूत्र के विशेषण के लिए है—पचमानो, पचन्तो; पचति। มญฺจ รุธาทีนํ-. रुधादि (धातुओं) को 'मं' भी (होता है)। รุธาทิโต กตฺตุวิหิตมานาทิสุ โล โหติ; มํ วานฺต สรา ปโร; มกาโร’นุพนฺโธ; อกาโร อุจฺจารณตฺโว–-รุนฺธมาโน, รุนฺธนฺโต, รุนฺธติ. रुधादि धातुओं से कर्ता में विहित 'मान' आदि के परे होने पर 'लो' प्रत्यय होता है; उपान्त्य स्वर के बाद 'मं' होता है; 'म' कार अनुबन्ध है; 'अ' कार उच्चारण के लिए है—रुन्धमानो, रुन्धन्तो, रुन्धति। ณณาปฺยาปีหิ วา-. 'णि', 'णापि' और 'आपि' से विकल्प से (लो होता है)। ณิณาปฺยาผีหิ กตฺตุวิหิตมานาทิสุ โล โหติ วิภาสา; โจรยนฺโต, โจเรนฺโต; การยนฺตา, กาเรนฺโต; การาปฺैยนฺโต, การาเปนฺโต; สจฺจาปยนฺโต, สจฺจาเปนฺโต; โจรยติ, โจเรติ; การยติ, กาเรติ; การาปยติ, การาเปติ; สจฺจาปยติ, สจฺจาเปติ–-วจตฺถิตวิภาสตฺโถ’ยํ วา สทฺโท; เตน มาเน นิจฺจํ; โจรยมาโน, การยมาโน, การาปยมาโน, สจฺจาปยมาโน. 'णि', 'णापि' और 'आपि' प्रत्ययों से कर्ता में विहित 'मान' आदि के परे होने पर विकल्प से 'लो' होता है; चोरयन्तो, चोरन्तो; कारयन्तो, कारेन्तो; कारापयन्तो, कारापेन्तो; सच्चापयन्तो, सच्चापेन्तो; चोरयति, चोरेति; कारयति, कारेति; कारापयति, कारापेति; सच्चापयति, सच्चापेति—यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है; इसलिए 'मान' प्रत्यय के परे होने पर नित्य होता है; चोरयमानो, कारयमानो, कारापयमानो, सच्चापयमानो। ทิปาทีหิ ยยก-. दिवादि (धातुओं) से 'य' और 'यक' (होते हैं)। ทิวาทีหิ ลวีสเย ยก โหติ; ทิพฺพนฺโต; ทิพฺพติ. दिवादि धातुओं से 'लो' के विषय में 'यक' होता है; दिब्बन्तो; दिब्बति। ตุทาทีหิ โก-. तुदादि (धातुओं) से 'क' (प्रत्यय होता है)। ตุทาทีหิ ลวีสเย โก โหติ; ตุทมาโน, ตุทนฺโต; กุทติ. तुदादि धातुओं से 'लो' के विषय में 'क' होता है; तुदमानो, तुदन्तो; कुदति। ชฺยาทีหิ กฺนา-. ज्यादि (धातुओं) से 'क्ना' (प्रत्यय होता है)। ชิอาทีหิ ลวิสเย กฺนา โหติ; ชินนฺโต, ชินาติ–-กถํ ชยนฺโต, ชยตีนิ? ภุวาทิปาฐา. ज्यादि धातुओं से 'लो' के विषय में 'क्ना' होता है; जिनन्तो, जिनाति—'जयन्तो', 'जयति' कैसे होते हैं? भ्वादि गण में पाठ होने से। กฺยาทีหี กฺณา-. क्यादि (धातुओं) से 'क्णा' (प्रत्यय होता है)। กีอาทีหิ ลวิสเย กฺณา โหติ; กิณนฺโต, กิณาติ. क्यादि धातुओं से 'लो' के विषय में 'क्णा' होता है; किणन्तो, किणाति। สฺวาทีหี กฺโณ-. स्वादि (धातुओं) से 'क्णो' (प्रत्यय होता है)। สุอาทีหิ ลวิสเย กฺโณ โหติ; สุณมาโน, สุณนฺโต, สุโณติ; กถํ สุณาตีติ? กฺยาทิปาฐา. स्वादि धातुओं से 'लो' के विषय में 'क्णो' होता है; सुणमानो, suṇanto, सुणोति; 'सुणाति' कैसे होता है? क्यादि गण में पाठ होने से। ตนาทิตฺโว-. तनादि (धातुओं) से 'ओ' (प्रत्यय होता है)। ตนาทิโต ลวิสเย โอ โหติ; ตโนติ. तनादि धातुओं से 'लो' के विषय में 'ओ' होता है; तनोति। ภาวกมฺเมสุ ตพฺพานียา-. भाव और कर्म में 'तब्ब' और 'अनीय' (प्रत्यय होते हैं)। ตพฺพอนียา กฺริยตฺถา ปเร ภาวกมฺเมสุ พหุลมฺภวนฺติ; กตฺตพฺพํ, กรณียํ; กตฺตพฺโพ กโฏ; กรณีโย–-พหุลา क्रियार्थक धातुओं से परे भाव और कर्म में 'तब्ब' और 'अनीय' प्रत्यय बहुलता से होते हैं; कत्तब्बं, करणीयं; कत्तब्बो कटो; करणीयो—बहुलता से। ธิการา กรณาทิสุปิ ภวนฺติ–-สินานียํ, จุณฺณํ; ทานีโย, พฺราหฺมโณ; สมาวตฺตนีโย, คุรุ; ปวจนีโย, อุปชฺฌาโย; อุปฏฺฐานีโย, สิสฺโส. अधिकार से करण आदि में भी होते हैं—सिनानीयं चुण्णं; दानीयो ब्राह्मणो; समावत्तनीयो गुरु; पवचनीयो उपज्झायो; उपट्ठानीयो सिस्सो। ฆฺยณ-. 'घ्यण' (प्रत्यय होता है)। ภาวกมฺเมสุ กฺริยตฺถา ปโร ฆฺยณ โหติ พหุลํ; วากฺยํ, การิยํ, เวยฺยํ, เชยฺยํ. भाव और कर्म में क्रियार्थक धातुओं से परे 'घ्यण' प्रत्यय बहुलता से होता है; वाक्यं, कारियं, वेय्यं, जेय्यं। อาสฺเส จ-. आस्से च। อาโต ฆฺยณ โหติ ภาวกมฺเมสุ อาสฺส เอ จ; เทยฺยํ. आकारान्त धातुओं से भाव और कर्म वाच्य में 'घ्यण' प्रत्यय होता है और 'आ' को 'ए' हो जाता है; जैसे- देय्यं। วทาทีหิ โย-. वदादीहि यो। วทาทีหิ กฺริยตฺเถหิ โย โหติ พหุลมฺหาวกมฺเมสุ; วชฺชํ, มชฺชํ, คมฺมํ–-ภุชานฺเต () โภชฺโช, โอทโน; โภชฺชา, ยาคุ; โภคฺคมญฺญํ. वद आदि क्रियार्थक धातुओं से भाव और कर्म वाच्य में बहुलता से 'यो' प्रत्यय होता है; जैसे- वज्जं, मज्जं, गम्मं। 'भुज' धातु के अन्त में 'ओ' होने पर- भोज्जो (ओदन/भात); भोज्जा (यागु/पेय); भोग्गमञ्ञं (अन्य भोग्य वस्तु)। กิจฺจฆจฺจภจฺจภพฺพเลยฺยา-. किच्चघच्चभच्चभब्बलैय्या। เอเต สทฺทา ยปฺปจฺจยนฺตา นิปจฺจนฺเต. ये शब्द 'य' प्रत्ययान्त निपातन से सिद्ध होते हैं। คุหาทีหิ ยก-. गुहादीहि यक। คุหาทีหิ กฺริยตฺเถหิ ภาวกมฺเมสุ ยก โหติ; คุยฺหํ, ทุยฺหํ, สิสฺโส; สิทฺธา เอเวเต ตพฺพาทโย เปสาติสคฺคปตฺตกาเลสุปิ คมฺยมาเนสุ สามญฺเญน วิธานโต–-โหตา ขลุ กโฏ กตฺตพฺโพ, กรณีโย, การิโย, กิจฺโจ-เอวํ ตฺวยา กโฏ กตฺตพฺโพ; โหตา กโฏ กตฺตพฺโพ, โหโต หิ ปตฺโต กาโล กฏกรเณ–-เอวํ อุทฺธมุหุตฺติเก’ปิ วตฺตมานโต เปสาทิสุ สิทฺธา เอว–-ตถา อรเห กตฺตริ สตฺติวิสิฏฺเฐ จ ปตียมาเน อาวสฺสกาธมิณตาวิสิฏฺเฐว ภาวาโท สิทฺธา–-อุทฺธ มุหุตฺติกโต-โภตา กโฏ กตฺตพฺโพ; โภตา รชฺชํ กาตพฺพํ, ภวํ อรโห; โภตา ภาโร วหิตพฺโพ, ภวํ สตฺโต; โภตา อวสฺสํ กโฏ กตฺตพฺโพ; โภตา นิกฺโข ทาตพฺโพ. गुह आदि क्रियार्थक धातुओं से भाव और कर्म वाच्य में 'यक' प्रत्यय होता है; जैसे- गुय्हं, दुय्हं, सिस्सो। ये 'तब्ब' आदि प्रत्यय प्रैष (आज्ञा), अतिसर्ग (अनुमति) और प्राप्तकाल (उचित समय) के अर्थों में भी सामान्य विधान से सिद्ध होते हैं— जैसे, 'भता खलु कटो कत्तब्बो' (आपके द्वारा चटाई बनाई जानी चाहिए), करणीयो, कारियो, किच्चो। इसी प्रकार 'त्वया कटो कत्तब्बो'। प्रैष आदि अर्थों में वर्तमान काल से भी ये सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार योग्यता, सामर्थ्य, आवश्यकता और ऋण के अर्थों में भी भाव आदि में सिद्ध होते हैं— 'भता कटो कत्तब्बो'; 'भता रज्जं कातब्बं' (आपके द्वारा राज्य किया जाना चाहिए), 'भवं अरहो' (आप योग्य हैं); 'भता भारो वहितब्बो' (आपके द्वारा भार ढोया जाना चाहिए), 'भवं सत्तो' (आप समर्थ हैं); 'भता अवस्सं कटो कत्तब्बो' (आपके द्वारा अवश्य चटाई बनाई जानी चाहिए); 'भता निक्खो दातब्बो' (आपके द्वारा सिक्का दिया जाना चाहिए)। กตฺตริ ลตุณกา-. कत्तरि लतुणका। กตฺตริ การเก กฺริยตฺถา ลตุณกา โภนฺตี; ปฐิตา, ปาฐโก–-พหุลมิตฺเวว-ปาเทหิ หรียตี’ติ ปาทหารเก;’คเลจุปฺปตี’ติ คเลโจปโก–-สทฺโธ เอว ลตุอรเห สีลสาธุ ธมฺเมสุ จ สามญฺญวิหิตตตฺตา; ภวํ พลุ กญฺญาย ปริคฺคยิตา, ภวเมตํ อรหติ; สีลาทิสุ-ขลฺวปิ อุปาทาตา กุมารเก; คนฺตาเขโล; มุณฺฑยิตาโร สาวิฏฺฐายนา วธุํ กตปริคหํ. कर्ता कारक में क्रियार्थक धातुओं से 'ल', 'तु' और 'णक' प्रत्यय होते हैं; जैसे- पठिता, पाठको। 'बहुलं' के अधिकार से— 'पादेहि हरीयती'ति पादहारके; 'गलेचुप्पती'ति गलेचोपको। 'ल' और 'तु' प्रत्यय योग्यता, शील, साधु और धर्म के अर्थों में भी सामान्य विधान से होते हैं; जैसे- 'भवं बलु कञ्ञाय परिग्गयिता' (आप कन्या को ग्रहण करने योग्य हैं), 'भवमेतं अरहति'; शील आदि में— 'उपादाता कुमारके'; 'गन्ताखेलो'; 'मुण्डयितारो साविट्ठायना वधुं कतपरिगहं'। อาวี-. आवी। กฺริยยตฺถา อาวี โหติ พหุลํ กตฺตริ; ภยทสฺสาวี–-อปฺปวีสยตาญาปนตฺถํ ภินฺนโยคกรณํ; สามญฺญวิหิตตฺตา สีลาทิสุ จ โหเตว. क्रियार्थक धातुओं से कर्ता अर्थ में बहुलता से 'आवी' प्रत्यय होता है; जैसे- भयदस्सावी। अल्प विषयता को बताने के लिए भिन्न योग (नया सूत्र) किया गया है; सामान्य विधान होने से शील आदि अर्थों में भी यह होता ही है। อาสึสายมโก-. อาสึสายํ คมฺยมานายํ กฺริยตฺถา อโก โหติ กตฺตริ;’ชีวตุติ’ ชีวโก; นนฺทตุติ’ นนฺทโก;’ภวตุติ’ ภวโก. आसिंसायमको। आशंका (इच्छा/आशीर्वाद) अर्थ प्रतीत होने पर क्रियार्थक धातुओं से कर्ता में 'अको' प्रत्यय होता है; 'जीवतु' इति जीवको; 'नन्दतु' इति नन्दको; 'भवतु' इति भवको। กรา ณโน-. करा णनो। กรโต กตฺตริ ณโน โหติ;’กโรตี’ติ การณํ; กตฺตรีติ-กึ? กรณํ. कृ धातु से कर्ता अर्थ में 'णन' प्रत्यय होता है; 'करोति' इति कारणं (कर्ता)। 'कर्ता में' ऐसा क्यों कहा? (करण अर्थ में) कारणं। หาโต วีหิกาเลสุ-. हातो वीहिकालेसु। หาโต วีหิสึ กาเล จณโน โหตี กตฺตริ; หายนา นาม วีหโย; หายโน สํวจฺฉโร; วีหิกาเลสูติ - กึ? หาตา. हा धातु से व्रीहि (धान) और काल अर्थ में कर्ता में 'णन' प्रत्यय होता है; हायना नाम वीहयो (धान); हायनो संवच्छरो (वर्ष)। 'व्रीहि और काल में' ऐसा क्यों कहा? हाता। วีทา กุ -. वीदा कु। วิทสฺมา กู โหติ กตฺตริ; วิทู, โลกวิทู. विद् धातु से कर्ता में 'कू' प्रत्यय होता है; विदू, लोकविदू। วิโต ญาโต-. वितो ञातो। วิปุพฺพา ญาอิจฺจสฺมา กุ โหติ กตฺตริ; วิญฺญ; วิโตติ-กึ? ปญฺโญ. वि-पूर्वक ज्ञा धातु से कर्ता में 'कु' प्रत्यय होता है; विञ्ञू। 'वि-पूर्वक' क्यों? पञ्ञो। กมฺมา-. कम्मा। กมฺมโต ปรา ญาอิจฺจสฺมา กู โหติ กตฺตริ; สพฺพญฺญ, กาลญฺญ. कर्म के उपपद रहते ज्ञा धातु से कर्ता में 'कू' प्रत्यय होता है; सब्बञ्ञू, कालञ्ञू। กฺวจณ-. क्वचण। กมฺมโต ปรา กฺริยตฺถา กฺวจิ อณ โหติ กตฺตริ; กุมฺภกาโร, สรลาโว, มวฺตชฺฌาโย–-พหกุลาธิการา อิห น โหติ, อาทิจฺจํ ปสฺสติ, หิมวนฺตํ สุโณติ, คามํ คจฺฉติ. กฺวจีติ กึ? กมฺมกโร. कर्म के उपपद रहते क्रियार्थक धातुओं से कहीं-कहीं कर्ता में 'अण' प्रत्यय होता है; कुम्भकारो, सरलावो, मन्तज्झायो। 'बहुलं' के अधिकार से यहाँ नहीं होता— 'आदिच्चं पस्सति', 'हिमवन्तं सुणोति', 'गामं गच्छति'। 'कहीं-कहीं' क्यों? कम्मकरो। คมา รู-. गमा रू। กมฺมโต ปรํ คมา รู โหติ กตฺตริ; เวทคุ, ปารคุ. कर्म के उपपद रहते गम् धातु से कर्ता में 'रू' प्रत्यय होता है; वेदगू, पारगू। สมานญฺญภวนฺตยาทิตุปมานา ทิสา กมฺเม รีริกฺขกา-. समानञ्ञभवन्तयादितुपमाना दिसा कम्मे रीरिक्खका। สมานาทีหิ ยาทีหิโจปมาเนหิ ปรา ทิสา กมฺมการเก รีริกฺขกา โหนฺติ;’ สมาโน วิย ทิสฺสตี’ติ สที, สทิกฺโข, สทิโส; อญฺญาที, อญฺญาทิกฺโข, อญฺญาทิโส; ภวาที, ภวาทิกฺโข, ภวาทิโส; ยาที, ยาทิกฺโข, ยาทิโส; ตฺยาที, ตฺยฺยาทิกฺโข, ตฺยาทิโส –-สมานาทีหีติ กึ? รุกฺโข วิย ทิสฺสติ. อุปมานาติ กึ? โส ทิสฺสติ กมฺเมติ กึ? โส วิย ปสฺสตี–-รการา อนฺตสราทิโลปตฺถา. กกาโร เอการาภาวตฺโถ. समान आदि, य आदि और उपमानों के बाद दृश् (दिसा) धातु से कर्म कारक में 'री', 'इक्ख' और 'क' प्रत्यय होते हैं; 'समानो विय दिस्सती'ति सदी, सदिक्खो, सदिसो; अञ्ञादी, अञ्ञादिक्खो, अञ्ञादिसो; भवादी, भवादिक्खो, भवादिसो; यादी, यादिक्खो, यादिसो; त्यादी, त्यादिक्खो, त्यादिसो। 'समान आदि' क्यों? रुक्खो विय दिस्सति। 'उपमान' क्यों? सो दिस्सति। 'कर्म में' क्यों? सो विय पस्सति। 'र' कार अन्त्य स्वर आदि के लोप के लिए है। 'क' कार 'ए' कार के अभाव के लिए है। ภาวการเกสฺวฆณฺฆกา-. भावकारकेस्वघणघका। ภาเว การเก จ กฺริยตฺถา อฆณฺฆกา โหนฺติ พหกุลํ; อปคฺคโห, นิคฺคโห, กโร, คโร, จโย, ชโย, รโว, ภโว, ปโจ, วโจ, อนฺนโท, ปุรินฺทโท, อีสกฺกโร, ทุกฺกโร, สุกโร–-ฆณ-ภาเว-ปาโก- วาโค, ภาโว. การเก’ปิ สญฺญายํ ตาว-’ปชฺชเต’เนเน’ติ ปาโท;’รุชตี’ติ โรโค;’วีสตีติ เวโส;’สรติ กาลนฺตร’นฺติ สาโร, ถิรตฺโถ;’ทรียนฺเต เอเตภี’ติ ทารา;’ชีรยติ เอเตนา’ติ ชาโร–-อสญฺญายมฺปิ-ทาโย, ทตฺโต; ลาโภ, ลทฺโธ–-ฆ-วโกนิปโก–-ก-ปิโย, ขิโป, ภุโช, อายุธํ. भाव और कारक में क्रियार्थक धातुओं से 'अ', 'घण्', 'घ' और 'क' प्रत्यय बहुलता से होते हैं; जैसे- अपग्गहो, निग्गहो, करो, गरो, चयो, जयो, रवो, भवो, पचो, वचो, अन्नदो, पुरिन्ददो, ईसक्करो, दुक्करो, सुकरो। 'घण्' प्रत्यय भाव में - पाको, वागो, भावो। कारक में भी संज्ञा होने पर - 'पज्जते अनेन' इति पादो; 'रुजति' इति रोगो; 'वीसति' इति वेसो; 'सरति कालान्तरं' इति सारो (स्थिर अर्थ में); 'दरीयन्ते एतेभि' इति दारा; 'जीरयति एतेन' इति जारो। असंज्ञा में भी - दायो, दत्तो; लाभो, लद्धो। 'घ' प्रत्यय - वको, निपको। 'क' प्रत्यय - पियो, खिपो, भुजो, आयुधं। ทาธาตฺวิ-. 'दा' धातु से 'इ' प्रत्यय। ทาธาหิ พหุลมิ โหติภาวการเกสุ; อาทิ, นิธิ. วาลธิ. 'दा' और 'धा' धातुओं से भाव और कारक में 'इ' प्रत्यय बहुलता से होता है; जैसे- आदि, निधि, वालधि। วมาทีหถุ-. 'वम्' आदि धातुओं से 'अथु' प्रत्यय। วมาทิหิ ภาวการเกสฺวถุ โหติ; วมถุ, เวปถุ. 'वम्' आदि धातुओं से भाव और कारक में 'अथु' प्रत्यय होता है; जैसे- वमथु, वेपथु। กฺวิ-. 'क्वि' प्रत्यय। กฺริยตฺถา กฺวิ โหติ พหุลํ ภาวการเกสุ–-กกาโร กานุ พนฺธการิยตฺโถ–-อภิภุ, สยมฺภุ, ภตฺตคฺคํ, สลากคฺคํ, สภา, ปภา. क्रियार्थक धातुओं से भाव और कारक में 'क्वि' प्रत्यय बहुलता से होता है। 'क' कार अनुबन्ध कार्य के लिए है; जैसे- अभिभू, सयम्भू, भत्तग्गं, सलाकग्गं, सभा, पभा। อโน-.. 'अन' प्रत्यय। กฺริยตฺถา ภาวการเกสฺวโน โหติ; คมนํ, ทานํ, สมฺปทานํ, อปาทานํ, อธิกรณํ, จลโน, ชลโน, โกธโน, โกปโน, มณฺฑโน, ภุสโน. क्रियार्थक धातुओं से भाव और कारक में 'अन' प्रत्यय होता है; जैसे- गमनं, दानं, सम्प्रदानं, अपादानं, अधिकरणं, चलनौ, जलनौ, कोधनौ, कोपनौ, मण्डनौ, भुसनौ। อิตฺถิยมณกฺติกยกฺยา. จ-. स्त्रीलिंग में 'अ', 'ण', 'क्ति', 'क', 'य', 'क्य' और 'अन' प्रत्यय। อิตฺถิลิงฺเค ภาเว การเก จ กฺริยตฺถา ออาทโย โหนฺต โน จ พหุลํ–-อ-ติติกฺขา. วีมํสา, ชิคุจฺฉา, ปิปาสา, ปุตฺตียา, อีหา, ภิกฺขา, อาปทา, เมธา, โคธา–-ณ-การา, หารา, ตารา, ธารา, อารา–-กฺติ-อิฏฺฐิ, สิฏฺฐิ, ภิตฺติ, ภตฺติ, ตนฺติ, ภุติ –-ก- อุหา, รุชา, มุทา,–-ยก-วิชฺชา, อิชฺชา–-ย-เสยฺยา, สมชฺชา, ปพฺพชฺชา, ปริจริยา, ชาคริยา–-อน-การณา, หารณา, เวทนา, วนฺทนา, อุปาสนา. स्त्रीलिंग में भाव और कारक में क्रियार्थक धातुओं से 'अ' आदि प्रत्यय बहुलता से होते हैं; जैसे- 'अ' प्रत्यय - तितिक्खा, वीमंसा, जिगुच्छा, पिपासा, पुत्तीया, ईहा, भिक्खा, आपदा, मेधा, गोधा। 'ण' प्रत्यय - कारा, हारा, तारा, धारा, आरा। 'क्ति' प्रत्यय - इिट्ठि, सििट्ठि, भित्ति, भत्ति, तन्ति, भुति। 'क' प्रत्यय - ऊहा, रुजा, मुदा। 'य' और 'क' (यका) - विज्जा, इज्जा। 'य' प्रत्यय - सेय्या, समज्जा, पब्बज्जा, परिचरिया, जागरिया। 'अन' प्रत्यय - कारणा, हारणा, वेदना, वन्दना, उपासना। ชาหาห-. 'जा' और 'हा' धातुओं से 'नि' प्रत्यय। ชาหา อิจฺเจเตหิ นิ โหติตฺถิยํ; ชานิ, หานิ. 'जा' और 'हा' इन धातुओं से स्त्रीलिंग में 'नि' प्रत्यय होता है; जैसे- जानि, हानि। กรา ริริโย-. 'कर' धातु से 'रिरिय' प्रत्यय। กรโต ริริโย โหติตฺถิยํ;’กรณํ’ กิริยา–-กถํ กฺริยาติ?’กฺริยาย’นฺติ นิปาตนา. 'कर' धातु से स्त्रीलिंग में 'रिरिय' प्रत्यय होता है; 'करणं' के अर्थ में 'किरिया'। 'क्रिया' कैसे बना? 'क्रियाय' इस रूप में निपातन से। อิกิตี สรูเป-. स्वरूप अर्थ में 'इ', 'कि' और 'ति' प्रत्यय। กฺริยตฺถสฺส สรูเป’ภิเธเย กฺริยตฺถา ปเร อิกิตี โหนฺติ; วจิ, ยุธิ. ปจติ.–-อกาโร กกาโรติอาทิสุ การสทฺเทน สมาโส, ยถา เอวกาโรติ. क्रियार्थक धातु के स्वरूप का अभिधान होने पर क्रियार्थक धातु से परे 'इ', 'कि' और 'ति' प्रत्यय होते हैं; जैसे- वचि, युधि, पचति। 'अकारो', 'ककारो' आदि में 'कार' शब्द के साथ समास है, जैसे 'एवकारो'। สีลาภิกฺขญฺญาวสฺสเกสุ ณิ-. शील (स्वभाव), आभीक्ष्ण्य (बार-बार होना) और आवश्यकता अर्थों में 'णी' प्रत्यय। กฺริยตฺถา ณี โหติ สีลาทิสุ ปตียมาเนสุ; อุณฺหโภชิ, ขีรปายี, อวสฺสการี, สตตฺทายี. शील आदि अर्थों के प्रतीत होने पर क्रियार्थक धातुओं से 'णी' प्रत्यय होता है; जैसे- उण्हभोजी, खीरपायी, अवस्सकारी, सततदायी। ถาวริตฺตรภงฺคุรภิทุรภาสุรภสฺสรา-. थावर, इत्तर, भङ्गुर, भिदुर, भासुर, भस्सर शब्द। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต สีเล คมฺยมาเน. शील अर्थ के गम्यमान होने पर ये शब्द निपातित होते हैं। กตฺตริ ภุเต กฺตวนฺตุกฺตาวี-. कर्ता अर्थ में भूतकाल में 'क्तवन्तु' और 'क्तावी' प्रत्यय। ภุตตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา กฺตวนฺตุกฺตาวี โหนฺตี กตฺตริ; วิชิตวา, วิชิตาวี; ภุเตติ อธิกาโร ยาว อาหารตฺถาติ. भूतकाल के अर्थ में वर्तमान क्रियार्थक धातुओं से कर्ता में 'क्तवन्तु' और 'क्तावी' प्रत्यय होते हैं; जैसे- विजितवा, विजितावी। 'भूते' यह अधिकार 'आहारत्था' सूत्र तक है। กฺโต ภาวกมฺเมสุ-. भाव और कर्म में 'क्त' प्रत्यय। ภาเว กมฺเม จ ภุเต กฺโต โหติ; อาสิตํ ภวตา; กโต กโฏ ภวตา. भाव और कर्म में भूतकाल में 'क्त' प्रत्यय होता है; जैसे- आसितं भवता (आपके द्वारा बैठा गया); कतो कटो भवता (आपके द्वारा चटाई बनाई गई)। กตฺตรี จารมฺเห-. क्रिया के आरम्भ में कर्ता में भी 'क्त' प्रत्यय। กฺริยารมฺเภ กตฺตริ กฺโต โหต, ยถาปตฺตญฺจ; ปกโต ภวํ กฏํ; ปกโต กโฏ ภวตา; ปสุตฺโต ภวํ; ปสุตฺตํ ภวตา. क्रिया के आरम्भ में कर्ता में 'क्त' प्रत्यय होता है और यथाप्राप्त (भाव-कर्म) में भी; जैसे- पकतो भवं कटं (आपने चटाई बनाना शुरू किया); पकतो कटो भवता (आपके द्वारा चटाई बनाना शुरू किया गया); पसुत्तो भवं (आप सो गए); पसुत्तं भवता (आपके द्वारा सोया गया)। ฐาสวสสิลิสฆิรุหชรชนีหิ-. 'ठा', 'स', 'वस', 'सिलिस', 'घि', 'रुह', 'जर' और 'जन' धातुओं से। ฐาทีหิ กตฺตริ กฺโต โหติ ยถาปตฺตญฺจ; อุปฏฺฐิโต คุรุมฺภวํ, อุปฏฺฐิโต คุรุ โภตา; อุปาสิโต คุรุมฺภวํ, อุปาสิโต คุรุ โภตา; อนุวุสิโต คุรุมฺภวํ, อนุวุสิโต คุรุ โภตา; อาสิลิฏฺโฐ คุรุมฺภวํ, อาสิลิฏฺโฐ คุรุ โภตา; 'ठा' आदि धातुओं से कर्ता में 'क्त' प्रत्यय होता है और यथाप्राप्त (भाव-कर्म) में भी; जैसे- उपट्ठितो गुरुं भवं (आपने गुरु की सेवा की), उपट्ठितो गुरु भोता (आपके द्वारा गुरु की सेवा की गई); उपासितो गुरुं भवं, उपासितो गुरु भोता; अनुवुसितो गुरुं भवं, अनुवुसितो गुरु भोता; आसिलिट्ठो गुरुं भवं, आसिलिट्ठो गुरु भोता। อธิสยิโต ขโฏปิกํ ภวํ, อธิสยิตา ขโฏปิกา โภตา; อารุฬฺโห รุกฺขํ ภวํ, อารุฬฺโห รุกฺโข ภาตา; อนุชิณฺโณ วสลึ เทวทตฺโต, อนุชิณฺณา วสลี เทวทตฺเตน; อนุชาโต มาณวโก มาณวิกํ, อนุชาตา มาณวิกา มาณวเกน. अधिसयितो खटोपिकं भवं (आप खटोपिका पर सोए), अधिसयिता खटोपिका भोता (आपके द्वारा खटोपिका पर सोया गया); आरुळ्हो रुक्खं भवं (आप वृक्ष पर चढ़े), आरुळ्हो रुक्खो भोता (आपके द्वारा वृक्ष पर चढ़ा गया); अनुजिण्णो वसलिं देवदत्तो (देवदत्त चाण्डालनी के पीछे वृद्ध हुआ), अनुजिण्णा वसली देवदत्तेन; अनुजातो माणवको माणविकं (माणवक माणविका के बाद उत्पन्न हुआ), अनुजाता माणविका माणवकेन। คมนตฺถากมฺมกาธาเร จ-. गमनार्थक और अकर्मक धातुओं से आधार अर्थ में भी (क्त प्रत्यय होता है)। คมนตฺถโต อกมฺมกโต จ กฺริยตฺถา อาธาเร กฺโต โหติ กตฺตริ จ ยถาปตฺตญฺจ; อิทเมสํ ยาตํ, อิห เต ยาตํ, อิหเตหิ ยาตํ, อยํ เตหิ ยาโต ปโถ, อิทเมสมาสิตํ, อิห เต อาสิตา, อิห เตหิ อาสิตํ, เทโว เจ วฏฺโฐ สมฺปนฺนา สาลโยติ -การณ สามคฺคิสมฺปตฺติ เอตฺถาภิมตา. गमनार्थक और अकर्मक क्रियाओं से आधार में, कर्ता में और यथाप्राप्त अर्थों में 'क्त' प्रत्यय होता है; जैसे— 'इदमेसं यातम्' (इनका यह गमन है), 'इह ते यातम्' (यहाँ तुम्हारा गमन है), 'इहतेहि यातम्' (यहाँ उनके द्वारा गमन किया गया), 'अयं तेहि यातो पथो' (यह उनके द्वारा चला गया मार्ग है), 'इदमेसमासितम्' (इनका यह बैठना है), 'इह ते आसिता' (यहाँ वे बैठे हैं), 'इह तेहि आसितम्' (यहाँ उनके द्वारा बैठा गया), 'देवो चे वट्ठो सम्पन्नं सालयोति'—यहाँ कारण-सामग्री की सम्मपत्ति अभिप्रेत है। อาหารตฺถา-. आहारार्थक (भोजनार्थक धातुओं से)। อชฺโฌหารตฺถา อาธาเร กฺโต โหติ ยถาปตฺตญฺจ; อิทเมสํ ภุตฺตํ, อิทเมสํ ปีตํ, อิห เตหิ ภุตฺตํ, อิห เตหิ ปีตํ, โอทโน เตหิ ภุตฺโต, ปีตมุทกํ–-อกตฺตตฺโถ โยควิภาโค; กถํ ปีตา คาโวติ?’ปีตเมสํ วิชฺชตี’ติปีตา?พาหุลกา วา–-ปสฺสินฺโนติ ยา เอตฺถ ภุตกาลตา ตนฺร กฺโต; เอวํ รญฺญมฺมโต, รญฺญมิฏฺโฐ,รญฺญมฺพุทฺโธ, รญฺญํ ปูชิโต–-เอวํ สีลิโต, รกฺขิโต, ขนฺโต, อากุฏฺโฐ, รุฏฺโฐ, รุสิโต, อภิวฺยาหโฏ, ทยิโต, หฏฺโฐ, กนฺโต, สํยโต,อมโต–-กฏฺฐนฺติ ภุตตายเมว; เหตุโน ผลํ ตฺวตฺร ภาวิ. आहारार्थक (भोजनार्थक) धातुओं से आधार में और यथाप्राप्त अर्थों में 'क्त' प्रत्यय होता है; जैसे— 'इदमेसं भुत्तं' (इनका यह भोजन है), 'इदमेसं पीतं' (इनका यह पान है), 'इह तेहि भुत्तं' (यहाँ उनके द्वारा खाया गया), 'इह तेहि पीतं' (यहाँ उनके द्वारा पिया गया), 'ओदनो तेहि भुत्तो' (उनके द्वारा भात खाया गया), 'पीतमुदकं'—यहाँ अकर्तार्थक योग-विभाग है; 'कथं पीता गावोति?' (गायें पी चुकी हैं, यह कैसे?) 'पीतमेसं विज्जतीति पीता' (जिनका पान विद्यमान है वे पीता हैं)? अथवा बाहुलक से— 'पस्सिन्नो' यहाँ जो भूतकालता है उसमें 'क्त' प्रत्यय है; इसी प्रकार 'रञ्ञम्मतो' (राजा द्वारा सम्मत), 'रञ्ञमिट्ठो' (राजा को प्रिय), 'रञ्ञम्बुद्धो' (राजा द्वारा ज्ञात), 'रञ्ञं पूजितो' (राजा द्वारा पूजित)—इसी प्रकार 'सीलितो', 'रक्खितो', 'खन्तो', 'आकुट्ठो', 'रुट्ठो', 'रुसितो', 'अभिव्याहटो', 'दयितो', 'हट्ठो', 'कन्तो', 'संयतो', 'अमतो'—'कट्ठं' यहाँ भूतकाल में ही प्रत्यय है; परन्तु यहाँ हेतु का फल भविष्य में होगा। ตุํตาเยตเว ภาเว ภวิสฺสติ กฺริยายํ ตทตฺถายํ-. भविष्यत् काल के अर्थ में, क्रिया के लिए की जाने वाली क्रिया (तादर्थ्य) के उपपद होने पर, भाव अर्थ में 'तुं', 'ताये' और 'तवे' प्रत्यय होते हैं। ภวิสฺสติอตฺเถ วตฺตมานโต กฺรยตฺถา ภาเว ตุํตาเย ตเว โหนฺติ กฺริยายํ ตทตฺถายํ ปตียมานายํ; กาตุํ คจฺฉติ; กตฺตาเย คจฺฉติ; กาตเว คจฺฉติ–-อิจฺฉติ โภตฺตุํ กาเมติ โภตฺตุนฺติ อิมินาว สิทฺธํปุนพฺพิธาเนตฺวิหาปิ สิยา อิจฺฉนฺโต กโรตีติ–-เอวํ สกฺโกติโภตฺตุํ, ชานาติ โภตฺตุํ, คิลายติ โภตฺตุํ, ฆฏเต โภตฺตุํ, อารภเต โภตฺตุํ, ลภเต โภตฺตุํ, ปกฺกมติ โภตฺตุํ, อุสฺสหตี โภนฺตุํ, อรหติ โภตฺตุํ, อตฺถิ โภตฺตุํ, วิชฺชติ โภตฺตุํ, วฏฺฏติ โภตฺตุํ, กปฺปติ โภตฺตุนฺติ–-ตถา ปารยติ โภตฺตุํ, ปหุ โภตฺตุํ, สมตฺโถ โภตฺตุํ, ปริยตฺโต โภตฺตุํ, อลํ โภตฺตุนฺติ; ภวติสฺส สพฺพตฺถ สมฺภวา–-ตถา กาโล โภตฺตุํ, สมโย โภตฺตุํ, เวลา โภตฺตุนฺติ–-ยถา-โภตฺตุมโน, โสตุํ โสโต, ทฏฺฐุํ จกฺขุ. ยุชฺฌิตุํ ธนุ, วตฺตุ ชโฬ, คนฺตุํ มโน, กตฺตุมลโสติ–-อุจฺจารณนฺตุ วตฺตายตฺตํ–-ภาเวติ กึ? กริสฺสามิติ คจฺฉติ; กฺริยายนฺติ กึ? ภิกฺขิสฺสํ อิจฺจสฺส ชฏา; ตทตฺถายนฺติ กึ คจฺฉิสฺสโต เต ภวิสฺสติ ภตฺตํ โภชนาย. भविष्यत् काल के अर्थ में वर्तमान क्रिया से भाव में 'तुं', 'ताये' और 'तवे' प्रत्यय होते हैं, जब उस क्रिया के प्रयोजन वाली दूसरी क्रिया प्रतीत हो रही हो; जैसे— 'कातुं गच्छति' (करने के लिए जाता है); 'कत्ताये गच्छति'; 'कातवे गच्छति'— 'इच्छति भोत्तुं' (खाना चाहता है), 'कामेति भोत्तुं' (खाने की कामना करता है) इससे ही सिद्ध होने पर भी पुनः विधान यहाँ भी हो सकता है 'इच्छन्तो करोति' (चाहता हुआ करता है)—इसी प्रकार 'सक्कोति भोत्तुं' (खा सकता है), 'जानाति भोत्तुं' (खाना जानता है), 'गिलायति भोत्तुं' (खाने के लिए ग्लानि करता है), 'घटते भोत्तुं' (खाने के लिए चेष्टा करता है), 'आरभते भोत्तुं' (खाना आरम्भ करता है), 'लभते भोत्तुं' (खाने का अवसर पाता है), 'पक्कमति भोत्तुं' (खाने के लिए प्रस्थान करता है), 'उस्सहती भोत्तुं' (खाने के लिए उत्साह करता है), 'अरहति भोत्तुं' (खाने के योग्य है), 'अत्थि भोत्तुं' (खाने के लिए है), 'विज्जति भोत्तुं' (खाने के लिए विद्यमान है), 'वट्टति भोत्तुं' (खाना उचित है), 'कप्पति भोत्तुं' (खाना कल्प्य/उचित है)—तथा 'पारयति भोत्तुं', 'पहु भोत्तुं', 'समत्थो भोत्तुं', 'परियत्तो भोत्तुं', 'अलं भोत्तुं'; 'भवति' का सर्वत्र सम्भव होने से—तथा 'कालो भोत्तुं' (खाने का काल), 'समयो भोत्तुं' (खाने का समय), 'वेला भोत्तुं' (खाने की वेला)—जैसे 'भोत्तुमनो' (खाने का मन), 'सोतुं सोतो' (सुनने के लिए कान), 'दट्ठुं चक्खु' (देखने के लिए आँख)। 'युज्झितुं धनु' (युद्ध के लिए धनुष), 'वत्तु जळो' (बोलने में जड़), 'गन्तुं मनो' (जाने का मन), 'कत्तुमलसो' (करने में आलसी)—उच्चारण तो वक्ता के अधीन है—'भावे' क्यों? 'करिस्सामीति गच्छति' (करूँगा, ऐसा सोचकर जाता है); 'क्रियायां' क्यों? 'भिक्खिस्सं इच्चस्स जटा' (भीख माँगूँगा, इसलिए इसकी जटाएँ हैं); 'तदत्थायं' क्यों? 'गच्छस्सतो ते भविस्सति भत्तं भोजनाय' (जाते हुए तुम्हारे लिए भोजन के लिए भात होगा)। ปฏิเสเธ’ลํขลูนํ ตูนกฺตฺวานกฺตฺวา วา-. निषेध अर्थ वाले 'अलं' और 'खलु' शब्दों के प्रयोग में भाव अर्थ में 'तूना', 'क्त्वान' और 'क्त्वा' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। อลํขลุสทฺทานํ ปฏิเสธตฺถานํปโยเค ตุนาทโย วา โหนฺติ ภาเว; อลํ โสตุน, ขลุ โสตุน; อลํ สุตฺวาน, ขลุ สุตฺวาน; อลํ สุตฺวา, ขลุ สุตฺวา; ลํ สุเตน, ขลุ สุเตน–-อลํ ขลูนนฺติ กึ? มา โหตุ; ปฏิเสเธติ กึ? อลํกาโร. निषेधार्थक 'अलं' और 'खलु' शब्दों के प्रयोग में 'तूना' आदि प्रत्यय विकल्प से भाव में होते हैं; जैसे— 'अलं सोतुन', 'खलु सोतुन'; 'अलं सुत्वान', 'खलु सुत्वान'; 'अलं सुत्वा', 'खलु सुत्वा'; 'अलं सुतेन', 'खलु सुतेन'— 'अलंखलूनं' क्यों? 'मा होतु' (न हो); 'पटिसेधे' क्यों? 'अलंकारो' (आभूषण)। ปุพฺเพกกตฺตุกานํ-. समान कर्ता वाली क्रियाओं में (जो पूर्वकाल की क्रिया है उससे 'तूना' आदि प्रत्यय होते हैं)। เอโก กตฺตา เยสํ วฺยาปารานํ เตสุโย ปุพฺโพ ตทตฺถโต กฺริยตฺถา ตุนาทโย โหนฺติ ภาเว; โสตุน ยาติ, สุตฺวาน, สุตฺวาวา–-เอกกตฺตุกานนฺติ กึ ภุตฺตสฺมึ เทวทตฺเต ยญฺญทตฺโต วชติ; ปุพฺพาติ กึ? ภุญฺชติ จ ปจติ จ–-อปฺปตฺตฺวา นทึ ปพฺพโต, อติกฺกมฺม ปพฺพตํ นทีติ ภุธาตุสฺส สพฺพตฺถ สมฺภวา เอกกตฺตุกตา ปุพฺพกาลตา จ คมฺยเต. ภุตฺวา ภุตฺวา คจฺฉตีติ อิมินาว สิทฺธมาภิกฺขญฺญนฺตุ ทิพฺพจนาวคมฺยเต–-กถํ ชีวคาหํ อคาหสิ, กายปฺปจาลกํ คจฺฉนฺตีติอาทิ? ฆณนฺเตน กฺริยาวิเสสเนน สิทฺธํ; ยถา โอทนปากํ สยตีติ. जिन व्यापारों (क्रियाओं) का कर्ता एक हो, उनमें जो पूर्वकाल की क्रिया है, उससे भाव में 'तूना' आदि प्रत्यय होते हैं; जैसे— 'सोतुन याति' (सुनकर जाता है), 'सुत्वान', 'सुत्वा' वा— 'एककत्तुकानं' क्यों? 'भुत्तस्मिं देवदत्ते यञ्ञदत्तो वजति' (देवदत्त के खा लेने पर यज्ञदत्त जाता है); 'पुब्बा' क्यों? 'भुञ्जति च पचति च' (खाता है और पकाता है)— 'अप्पत्त्वा नदिं पब्बतो' (नदी तक न पहुँचकर पर्वत), 'अतिक्कम्म पब्बतं नदी' (पर्वत को पार कर नदी) यहाँ 'भू' धातु का सर्वत्र सम्भव होने से एककर्तुकता और पूर्वकालता समझी जाती है। 'भुत्वा भुत्वा गच्छति' (खा-खाकर जाता है) इससे ही आभीक्ष्ण्य (बार-बार होना) तो द्वित्व वचन से ही समझ लिया जाता है— 'कथं जीवगाहं अगाहसि' (कैसे जीवित पकड़ा), 'कायप्पचालकं गच्छन्ति' (शरीर हिलाते हुए जाते हैं) आदि कैसे सिद्ध होंगे? ये क्रिया-विशेषण होने से सिद्ध हैं; जैसे 'ओदनपाकं सयति' (भात पकने तक सोता है)। นฺโต กตฺตริ วตฺตมาเน-. वर्तमान काल के अर्थ में धातु से कर्ता अर्थ में 'न्त' प्रत्यय होता है। จตฺตมานตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา นฺโต โหติ กตฺตริ; ติฏฺฐนฺโต. वर्तमान अर्थ में विद्यमान क्रिया से कर्ता में 'न्त' प्रत्यय होता है; जैसे— 'तिट्ठन्तो' (खड़ा होता हुआ)। มาโน-. (वर्तमान काल में कर्ता अर्थ में) 'मान' प्रत्यय (भी होता है)। วตฺตมานตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา มาโน โหติ กตฺตริ; ติฏฺฐมาโน. वर्तमान अर्थ में विद्यमान क्रिया से कर्ता में 'मान' प्रत्यय होता है; जैसे— 'तिट्ठमानो' (खड़ा होता हुआ)। ภาวกมฺเมสุ -. भाव और कर्म अर्थों में (भी 'मान' प्रत्यय होता है)। วตฺตมานตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา ภาเว กมฺเม จ มาโน โหติ; ฐียมานํ, ปจฺจมาโน โอทโน. वर्तमान अर्थ में विद्यमान क्रिया से भाव और कर्म में 'मान' प्रत्यय होता है; जैसे— 'ठीयमानं' (खड़ा होना/स्थिति), 'पच्चमानो ओदनो' (पकता हुआ भात)। เต สฺสปุพฺพานาคเต-. भविष्यत् काल में 'न्त' और 'मान' प्रत्यय 'स्स' के बाद होते हैं। อนาคตตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยนฺถา เต นฺตมานา สฺสปุพฺพา โหนฺติ; ฐสฺสนฺโต, ฐสฺสมาโน, ฐิสิสฺสมานํ, ปจฺจสฺสมาโน โอทโน. भविष्यत् अर्थ में विद्यमान क्रिया से 'न्त' और 'मान' प्रत्यय 'स्स' पूर्व में होने पर होते हैं; जैसे— 'ठस्सन्तो', 'ठस्समानो', 'ठिसिस्समानं', 'पच्चस्समानो ओदनो'। ณฺวาทโย-. 'ण्वु' आदि प्रत्यय (भी होते हैं)। กฺริยตฺถา ปเร พหกุลํ ณฺวาทโย โหนฺติ; จารุ, ทารุ. क्रियाओं (धातुओं) से परे बाहुलक से 'ण्वु' आदि प्रत्यय होते हैं; जैसे— 'चारु', 'दारु'। ขชยานเมกสฺสโรทิ ทฺเว-. 'ख', 'छ', 'स' प्रत्ययान्त धातुओं के प्रथम एकाक्षर शब्द-रूप को द्वित्व (दो बार) होता है। ขฉสปฺปจฺจยนฺตานํ กฺริยตฺถานํ ปฐมเมกสฺสรํ สทฺทรูปํ ทฺเว ภวติ; ติติกฺขา, ชิคุจฺฉา, วีมํสา. 'ख', 'छ', 'स' प्रत्यय जिनके अन्त में हैं, ऐसी क्रियाओं के प्रथम एकाक्षर शब्द-रूप को द्वित्व होता है; जैसे— 'तितिक्खा', 'जिगुच्छा', 'वीमंसा'। ปโรกฺขายญฺจ-. परोक्षा (लकार) में भी (प्रथम एकाक्षर को द्वित्व होता है)। ปโรกฺขายํ ปฐมเมกสฺสรํ สทฺทรูปํ ทฺเว ภวติ; ชคาม–-จกาโร อวุตฺตสมุจฺจยตฺโถ; เตนญฺญตฺราปิ ยถาคมํ. परोक्षा में प्रथम एकाक्षर शब्द-रूप को द्वित्व होता है; जैसे— 'जगाम'— 'च' कार अनुक्त के समुच्चय के लिए है; उससे अन्यत्र भी आगम के अनुसार (द्वित्व होता है)। ชหาติ, ชหิตพฺพํ, ชหิตุํ, ททฺทลฺลติ, วงฺกมติ–-โลลุโป, โมมุโหติ โอตฺตํ’ตทมินาทิ’ ปาสา. 'जहाति', 'जहितब्बं', 'जहितुं', 'दद्दल्लति', 'वङ्कमति'— 'लोलुपो', 'मोमुहोति' यहाँ 'ओ' भाव 'तदमिनादि' पासा (सूत्र) से है। อาทิสฺมา สรา-. आदि में स्थित स्वर के बाद वाले एकाक्षर को द्वित्व होता है। อาทิภุตา สรา ปรเมกสฺสรํ ทฺเว โหติ; อสิสิสติ–-อาทิสฺมาติ กึ? ชชาคาร; สราติ กึ? ปปาจ. आदिभूत स्वर से परे एकाक्षर को द्वित्व होता है; जैसे— 'असिसिसति'— 'आदिस्मा' क्यों? 'जजागार'; 'सरा' क्यों? 'पपाच'। น ปุน-. जो एक बार द्वित्व हो चुका है, वह पुनः द्वित्व को प्राप्त नहीं होता। คํ ทฺวิภุตํ น ตํ ปุน ทฺวตฺตมาปชฺชเต; ติติกฺขสติ, ชิคุจฺฉิสติ. जो द्वित्व हो चुका है, वह पुनः द्वित्व को प्राप्त नहीं होता; जैसे— 'तितिक्खसति', 'जिगुच्छिसति'। ยถิฏฺฐํ สฺยาทิโน-. 'सि' आदि (विभक्तियाँ) इच्छानुसार (यथेष्ट) होती हैं। สฺยาทฺยนฺตสฺส ยถิฏฺฐเมกสฺสรมาทิภุตมญฺญํ วา ยถาคมํ ทฺวิตฺตมาปชฺชเต; ปุปุตฺติยิสติ, ปุติตฺตียิสตี, ปุตฺตียิยิสติ. 'स्यादि' (प्रत्यय) अन्त वाली धातु के इच्छानुसार आदिभूत एक स्वर अथवा आगम के अनुसार अन्य (स्वर) का द्वित्व होता है; जैसे- पुपुत्तियिसति, पुतित्तीयिसती, पुत्तीयियिसति। รสฺโส ปุพฺพสฺส-. पूर्व (स्वर) ह्रस्व होता है। จิตฺเต ปุพฺพสฺสลโร รสฺโส โหติ; ททาติ. द्वित्व होने पर पूर्व स्वर ह्रस्व होता है; जैसे- ददाति। โลโป’นาทิพฺยญฺชนสฺส-. अनादि (जो आदि में न हो) व्यञ्जन का लोप होता है। ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺสาทิโต’ญฺญสฺสพฺยญฺชนสฺส โลโป โหติ; อสิสิสติ. द्वित्व होने पर पूर्व के आदि व्यञ्जन से भिन्न व्यञ्जन का लोप होता है; जैसे- असिसिसति। ขชเสสฺวสฺสิ -. 'ख', 'छ', 'स' परे होने पर (पूर्व के 'अ' को 'इ' होता है)। ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส อสฺส อิ โหติ ขฉเสสุ; ปิปาสติ–-ขฉ เสสูติ กึ? ชหาติ; อสฺสาติ กึ? พุภุกฺขติ. द्वित्व होने पर 'ख', 'छ', 'स' परे होने पर पूर्व के 'अ' को 'इ' होता है; जैसे- पिपासति। 'ख', 'छ', 'स' परे होने पर ही क्यों? जहाति (यहाँ नहीं होता)। 'अ' को ही क्यों? बुभुक्खति (यहाँ 'उ' है)। คุปิสฺสุสฺส -. 'गुप्' धातु के 'उ' को (इ होता है)। ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส คุปิสฺส อุสฺส อิ โหติ ขฉเสสุ; ชิคุจฺฉติ. द्वित्व होने पर 'ख', 'छ', 'स' परे होने पर पूर्ववर्ती 'गुप्' धातु के 'उ' को 'इ' होता है; जैसे- जिगुच्छति। จตุตฺถทุติยยานํ ตติยปฐมา-. चतुर्थ और द्वितीय वर्णों के स्थान पर क्रमशः तृतीय और प्रथम वर्ण होते हैं। ทฺวิตฺเต ปุพฺเพสํ จตุตฺถทุติยานํ ตติยปฐมา โหนฺติ; พุภุกฺขติ. จิจฺเฉท. द्वित्व होने पर पूर्ववर्ती चतुर्थ और द्वितीय वर्णों के स्थान पर तृतीय और प्रथम वर्ण होते हैं; जैसे- बुभुक्खति, चिच्छेदि। กวคฺคหานํ จวคฺคชา-. क-वर्ग और 'ह' के स्थान पर च-वर्ग और 'ज' होते हैं। ทฺวิตฺเต ปุพฺเพสํ กวคฺคหานํ ววคฺคชาโหนฺติ ยถา กฺกมํ; จุโกป, ชหาติ. द्वित्व होने पर पूर्ववर्ती क-वर्ग और 'ह' के स्थान पर क्रमशः च-वर्ग और 'ज' होते हैं; जैसे- चुकोप, जहाति। มานสฺสวี ปรสฺส จ มํ-. 'मान' धातु के पूर्व भाग को 'वी' और पर भाग को 'मं' होता है। ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺสมานสฺส วี โหติ, ปรสฺสจ มํ; วีมํสติ. द्वित्व होने पर 'मान' धातु के पूर्व भाग को 'वी' और पर भाग को 'मं' होता है; जैसे- वीमंसति। กิตสฺสาสํสเยติ วา-. 'कित' धातु को असंशय (निश्चितता) अर्थ में विकल्प से (वा होता है)। สํสยโต’ญฺญสฺมึ จตฺตมานสฺสทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส กิตสฺสวาติ โหติ; ติกิจฺฉติ. จิกิจฺฉติ–-อสํสเยติ กึ? วิจิกิจฺฉติ. संशय से भिन्न अर्थ में 'मान' प्रत्यय परे होने पर द्वित्व होने पर पूर्ववर्ती 'कित' धातु को विकल्प से 'ति' होता है; जैसे- तिकिच्छति, चिकिच्छति। 'असंशय' में ही क्यों? विचिकिच्छति (यहाँ संशय अर्थ है)। ยุวณฺณานมฺโญปฺปจฺจเย-. प्रत्यय परे होने पर इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर क्रमशः ए और ओ होते हैं। อิวณฺณุวณฺณนฺตานํ กฺริยตฺถานํ โญ โหนฺติ ยถากฺกมํ ปจฺจเย; เจตพฺพํ, เนตพฺพํ, โสตพฺพํ, ภวิตพฺพํ. इ-वर्ण और उ-वर्ण अन्त वाली धातुओं के स्थान पर प्रत्यय परे होने पर क्रमशः ए और ओ होते हैं; जैसे- चेतब्बं, नेतब्बं, सोतब्बं, भवितब्बं। ลหุสฺสุปนฺตสฺส-. लघु उपधा (अन्तिम वर्ण से पूर्व) के स्थान पर। ลหุภุตสฺส อุปนฺตสฺส ยุวณฺณสฺส โญ โหนฺติ ยถากฺกมํ; เอสิตพฺพํ, โกสิตพฺพํ–-ลหุสฺสาติกึ? ธูปิตา; อุปนฺตสฺสาติ-กึ? รุนฺธติ. लघु उपधा वाले इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर क्रमशः ए और ओ होते हैं; जैसे- एसितब्बं, कोसितब्बं। 'लघु' ही क्यों? धूपिता (यहाँ दीर्घ है)। 'उपधा' ही क्यों? रुन्धति (यहाँ उपधा नहीं है)। อสฺสา ณานุพนฺเธ -. 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'अ' को 'आ' होता है। ณการานุพนฺเธ ปจฺจเย ปเร อุปนฺตสฺส อการสฺส อาโหติ; การโก. 'ण' कार अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर उपधा के 'अ' को 'आ' होता है; जैसे- कारको। น เต กานุพนฺธนาคเมสุ-. 'क' अनुबन्ध वाले प्रत्यय और 'न' आगम परे होने पर वे (ए, ओ, आ) नहीं होते हैं। เต โญอา กานุพนฺเธ นาคเม จ น โหนฺติ; จิโต, สุโต, ทิฏฺโฐ, ปุฏฺโฐ–-นาคเม วนาทินา. –-จินิตพฺพํ, วินิตุํ; สุณิตพฺพํ, สุณิตุํ; ปาปุณิตพฺพํ, ปาปุณิตุํ; ธุนิตพฺพํ, ธุนิตุํ, ธุนนํ, ธุนยิตพฺพํ, ธุนาเปตพฺพํ, ธุนยิตุํ,ธุนาเปตุํ, ธุนยนํ, ธุนาปนํ, ธุนยติ, ธุนาเปติ; ปีเนตพฺพํ, ปีนยิตุํ, ปีนนํ, ปีนิตุํ, ปีนยติ; สุโนติ; สิโนติ; ทุโนติ; หิโนติ; ปหิณิตพฺพํ, ปหิณิตุํ, ปหิณนํ. वे ए, ओ और आ 'क' अनुबन्ध वाले प्रत्यय और 'न' आगम परे होने पर नहीं होते हैं; जैसे- चितो, सुतो, दिट्ठो, पुट्ठो; 'न' आगम होने पर- चिनितब्बं, विनितुं; सुणितब्बं, सुणितुं; पापुणितब्बं, पापुणितुं; धुनितब्बं, धुनितुं, धुननं, धुनयितब्बं, धुनापेतब्बं, धुनयितुं, धुनापेतुं, धुनयनं, धुनापनं, धुनयति, धुनापेति; पीनेतब्बं, पीनयितुं, पीननं, पीनितुं, पीनयति; सुनोति; सिनोति; दुनोति; हिनोति; पहिणितब्बं, पहिणितुं, पहिणनं। วา กฺววิ-. कहीं-कहीं विकल्प से (नहीं होते)। เต กฺวจิ วา น โหนฺติ กานุพนฺธนาคเมสุ; มุทิโต โมทิโต; รุทิตํ, โรทิตํ. वे (ए, ओ आदि) 'क' अनुबन्ध और आगमों के परे होने पर कहीं-कहीं विकल्प से नहीं होते हैं; जैसे- मुदितो-मोदितो; रुदितं-रोदितं। อญฺญตฺราปิ-. अन्यत्र भी (नहीं होते)। กานุพนฺธนาคมโต’ญฺญสฺมิมฺปิ เต กฺวจิ น โหนฺติ; ขิปโก, ปนุทนํ, วธโก. 'क' अनुबन्ध और आगम से भिन्न होने पर भी वे कहीं-कहीं नहीं होते हैं; जैसे- खिपको, पनुदनं, वधको। ปฺเย สิสฺสา-. 'पि' और 'सि' परे होने पर (आदि)। สิสฺส อาติ ปฺยาเทเส; นิสฺสาย. si प्रत्यय के स्थान पर āti और p-y आदेश होते हैं; जैसे- nissāya (निस्राय)। โญนมยวา สเร-. स्वर परे होने पर 'e' और 'o' के स्थान पर क्रमशः 'ay' और 'av' होते हैं। สเร ปเร โญนมยวา โหนฺติ; ชโย, ภโว–-สเรติ กึ? เชติ; อนุโภติ. स्वर परे होने पर 'e' और 'o' के स्थान पर 'ay' और 'av' होते हैं; जैसे- jayo (जयो), bhavo (भवो)। 'स्वर परे होने पर' क्यों कहा? (ताकि) jeti (जेति), anubhoti (अनुभोति) में न हो। อายาวา ณานุพนฺเธ-. 'ṇ' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'āy' और 'āv' होते हैं। โญนมายาวา โหนฺติ สราโทณานุพนฺเธ; นายยติ, ภาวยติ. สยาเปตฺวาติอาทิสุรสฺสตฺตํ. स्वर आदि वाले 'ṇ' अनुबन्ध युक्त प्रत्यय परे होने पर 'e' और 'o' के स्थान पर 'āy' और 'āv' होते हैं; जैसे- nāyayati (नाययति), bhāvayati (भावयति)। 'sayāpetvā' आदि में ह्रस्व होता है। อาสฺสาณาปิมฺหิ ยุก-. 'ā' कारान्त धातु के बाद 'ṇāpi' को छोड़कर अन्य 'ṇ' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'yuk' (य) आगम होता है। อาการนฺตสฺส กฺริยตฺถสฺส ยุก โหติ ณาปิโต’ญฺญสฺมึ ณานุพนฺเธ; ทายโก–-ณานุพนฺเธตฺเวว? ทานํ. อณาปิมฺหีติ กึ? ทาปยติ. 'ā' कारान्त क्रियार्थक (धातु) को 'ṇāpi' से भिन्न 'ṇ' अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर 'yuk' (य) आगम होता है; जैसे- dāyako (दायको)। 'ṇ' अनुबन्ध होने पर ही क्यों? (ताकि) dānaṃ (दानं) में न हो। 'ṇāpi' से भिन्न क्यों? (ताकि) dāpayati (दापयति) में न हो। ปทาทีนํ กฺวจิ-. 'pad' आदि धातुओं को कहीं-कहीं 'yuk' (य) आगम होता है। ปทาทีนํ ยุก โหติ กฺวจิ; นิปชฺชิตพฺพํ, นิปชฺชิตุํ, นิปชฺชนํ, ปมชฺชิตพฺพํ, ปมชฺชิตุํ, ปมชฺชนํ–-กฺวจีติ กึ? ปาโท. 'pad' आदि धातुओं को कहीं-कहीं 'yuk' (य) आगम होता है; जैसे- nipajjitabbaṃ, nipajjituṃ, nipajjanaṃ, pamajjitabbaṃ, pamajjituṃ, pamajjanaṃ। 'कहीं-कहीं' क्यों? (ताकि) pādo (पादो) में न हो। มํ วา รุธาทีนํ-. 'rudh' आदि धातुओं को विकल्प से 'maṃ' (अनुस्वार/नकार) होता है। รุธาทีนํ กฺวจิ มํ วา โหติ; รุนฺธิตุํ, รุชฺฌิตุํ–-กฺวจิตฺเวว? นิโรโธ. 'rudh' आदि धातुओं को कहीं-कहीं विकल्प से 'maṃ' होता है; जैसे- rundhituṃ, rujjhituṃ। 'कहीं-कहीं' ही क्यों? (ताकि) nirodho (निरोधो) में न हो। กฺวมฺหิ โลโป’นฺตพฺยญฺชนสฺส-. 'kva' प्रत्यय परे होने पर अन्त्य व्यंजन का लोप होता है। อนฺตพฺยญฺชนสฺส โลโป โหติ กฺวมฺหิ;’ภตฺตํ ฆสนฺติ, คณฺหนฺติ วาเอตฺถา’ติ ภตฺตคฺคํ. 'kva' प्रत्यय परे होने पर अन्त्य व्यंजन का लोप होता है; जैसे- 'जहाँ भात खाते हैं या ग्रहण करते हैं' वह bhattaggaṃ (भत्तग्गं) है। ปรรูปมยกาเร พฺยญฺชเน-. 'y' को छोड़कर अन्य व्यंजन परे होने पर (धातु के अन्त्य व्यंजन को) पररूप होता है। กฺริยตฺถานมนฺตพฺยญฺชนสฺส ปรรูปํ โหติ ยการโต’ญฺญสฺมึ พฺยญฺชเน; เหตฺตพฺพํ; พฺยญฺชเนติ กึ? ภินฺทิตพฺพํ. อยกาเรติ กึ? ภิชฺชติ. यकार (y) से भिन्न व्यंजन परे होने पर क्रियार्थक (धातुओं) के अन्त्य व्यंजन को पररूप होता है; जैसे- hettabbaṃ। 'व्यंजन परे होने पर' क्यों? (ताकि) bhinditabbaṃ में न हो। 'यकार रहित' क्यों? (ताकि) bhijjati में न हो। มนานํ นิคฺคหีตํ-. 'm' और 'n' कारान्त धातुओं को 'y' रहित व्यंजन परे होने पर निग्गहीत (अनुस्वार) होता है। มการนการนฺตานํ กฺริยตฺถานํ นิคฺคหีตํ โหตยยกาเร พฺยญฺชเน; คนฺตพฺพํ, ชงฺฆา. พฺยญฺชเนตฺเวว? คมนํ; อย กาเรตฺเวว? คมฺยเต. 'm' और 'n' कारान्त क्रियार्थक (धातुओं) को 'y' रहित व्यंजन परे होने पर निग्गहीत होता है; जैसे- gantabbaṃ, jaṅghā। 'व्यंजन परे होने पर' ही क्यों? (ताकि) gamanaṃ में न हो। 'यकार रहित' ही क्यों? (ताकि) gamyate में न हो। น พฺรูสฺโส-. व्यंजन परे होने पर 'brū' धातु को 'o' नहीं होता है। พฺรูสฺส โอ น โหติ พฺยญฺชเน; พฺรูมิ. พฺยญฺชเนตฺเวว? อพฺรวิ. व्यंजन परे होने पर 'brū' धातु को 'o' नहीं होता है; जैसे- brūmi। 'व्यंजन परे होने पर' ही क्यों? (ताकि) abravi में (हो)। กคา จชานํ ฆานุพนฺเธ-. 'gh' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'c' और 'j' कारान्त धातुओं को क्रमशः 'k' और 'g' होते हैं। ฆานุพนฺเธ จการชการนฺตานํ กฺริยตฺถานํ กคา โหนฺติ ยถากฺกมํ; วากฺยํ, ภาคฺยํ. 'gh' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'c' और 'j' कारान्त क्रियार्थक (धातुओं) को यथाक्रम 'k' और 'g' होते हैं; जैसे- vākyaṃ, bhāgyaṃ। หนสฺส ฆาโต ณานุพนฺเธ-. 'ṇ' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'han' धातु को 'ghāta' आदेश होता है। หนสฺส ฆาโต โหติ ณานุพนฺเธ; อาฆาโต. 'ṇ' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'han' धातु को 'ghāta' आदेश होता है; जैसे- āghāto। กฺวิมฺหี โฆ ปริปจฺจสโมหิ-. 'pari', 'paṭi', 'saṃ' और 'o' के बाद 'han' धातु को 'kvi' प्रत्यय परे होने पर 'gho' होता है। ปฐฺยาทีหิ ปรสฺสหนสฺสโฆ โหติ กฺวิมฺหิ; ปลิโฆ, ปฏิโฆ, อฆํ-รสฺสตฺตํ นิปาตนา;สงฺโฆ, โอโฆ. 'paṭi' आदि के बाद 'han' धातु को 'kvi' प्रत्यय परे होने पर 'gho' होता है; जैसे- paligho, paṭigho, aghaṃ (यहाँ निपातन से ह्रस्व हुआ है), saṅgho, ogho। ปรสฺส ฆํ เส-. द्वित्व होने पर 'han' धातु को 'sa' परे होने पर 'ghaṃ' होता है। ทฺวิตฺเต ปรสฺส หนสฺส ฆํ โหติ เส; ชิฆํสา. द्वित्व होने पर 'han' धातु को 'sa' परे होने पर 'ghaṃ' होता है; जैसे- jighaṃsā। ชิหรานํ คึ-. द्वित्व होने पर 'ji' और 'har' धातुओं को 'sa' परे होने पर 'giṃ' होता है। ทฺวิตฺเต ปเรสํ ชิหรานํ คึ โหติ เส; วิชิคึสา, ชิคึสา. द्वित्व होने पर 'ji' और 'har' धातुओं को 'sa' परे होने पर 'giṃ' होता है; जैसे- vijigiṃsā, jigiṃsā। ธาสฺส โห-. 'dhā' धातु को 'ha' होता है। ทฺวิตฺเต ปรสฺส ธาสฺส ห โหติ; ทหติ. द्वित्व होने पर परवर्ती 'धा' के स्थान पर 'ह' होता है; जैसे- दहति। ณิมฺหิ ทีโฆ ทุสสฺส-. 'णि' प्रत्यय परे होने पर 'दुस्' का दीर्घ होता है। ทุสสฺสทีโฆ โหติ ณิมฺหี; ทูสิโต–-ณิมฺหีติ กึ? ทุฏฺโฐ. 'णि' प्रत्यय परे होने पर 'दुस्' का दीर्घ होता है; जैसे- दूषितो। 'णि' परे होने पर ही क्यों? दुट्ठो। คุหิสฺส สเร- स्वर परे होने पर 'गुह्' का (दीर्घ होता है)। คุหิสฺส ทีโฆ โหติ สเร; นิคุหนํ–-สเรติ กึ? คุยฺหํ. स्वर परे होने पर 'गुह्' का दीर्घ होता है; जैसे- निगूहनं। स्वर परे होने पर ही क्यों? गुय्हं। มุหพหานญฺจ เต กานุพนฺเธ’ตฺเว-. 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले 'त' प्रत्यय परे होने पर 'मुह्' और 'बह्' का (दीर्घ होता है)। มุหพหานํ คุหิสฺส จ ทีโฆ โหติ ตการาโท กานุพนฺเธตฺวานตฺวาวชฺชิเต; มูฬฺโห, พาเฬหา, คุฬฺโห–-เนติ กึ? มุยหติ. กานุพนฺเธติ กึ? มุ-หิตพฺพํ. อตฺเวติ กึ? มุยฺหิตฺวาน, มุยฺหิตฺวา, กานุพนฺเธตฺเวติ อยมธิกาโร ยาว สาสสฺสสิสฺเว‘‘ติ. 'त्वान' और 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले तकार-आदि प्रत्यय परे होने पर 'मुह्', 'बह्' और 'गुह्' का दीर्घ होता है; जैसे- मूळ्हो, बाळ्हो, गुळ्हो। 'न' क्यों नहीं? मुय्हति। 'क-अनुबन्ध' क्यों? मुहितब्बं। 'अत्वे' क्यों? मुय्हित्वान, मुय्हित्वा। 'क-अनुबन्ध' और 'अत्वे' यह अधिकार 'सासस्ससिस्वे' सूत्र तक है। วหสฺสุสฺส-. 'वह्' के 'अ' को 'उ' (और दीर्घ) होता है। วหสฺสฺौสฺส ทีโฆ โหติ เต กานุพนฺเธ ตฺวานตฺวาวชฺชิเต; จูฬฺโห. 'त्वान' और 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले 'त' प्रत्यय परे होने पर 'वह्' के 'अ' को दीर्घ (ऊ) होता है; जैसे- चूळ्हो। ธาสฺส หิ-. 'धा' के स्थान पर 'हि' होता है। ธา ธารเณนิมสฺส หิ โหติ เต กานุพนฺเธ ตฺวานตฺวา วชฺชิเต; นิหิโต, นิหิตวา. 'त्वान' और 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले 'त' प्रत्यय परे होने पर 'धा' (धारण अर्थ में) के स्थान पर 'हि' होता है; जैसे- निहितो, निहितवा। หมาทิรานํ โลโป’นฺตสฺส -. 'ह', 'म' आदि से शुरू होने वाली और 'र' कारान्त धातुओं के अन्त्य वर्ण का लोप होता है। หมาทีนํ รการนฺตานํ วานฺตสฺสโลโป โหติ เต กานุพนฺเธ ตฺวานตฺวาวชฺชิเต; คโต, ขโต, หโต, มโต, ตโต, สญฺญโต, รโต, กโต–-เตตฺเวจ? คมฺยเต. กานุพนฺเธตฺเวว. คนฺตพฺพํ. อตฺเวตฺเวว? คนฺตฺวาน, คนฺตฺวา. 'त्वान' और 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले 'त' प्रत्यय परे होने पर 'ह', 'म' आदि और 'र' कारान्त धातुओं के अन्त्य वर्ण का लोप होता है; जैसे- गतो, खतो, hato, मतो, ततो, सञ्ञतो, रतो, कतो। 'त' परे होने पर ही क्यों? गम्यते। 'क-अनुबन्ध' ही क्यों? गन्तब्बं। 'अत्वे' ही क्यों? गन्त्वान, गन्त्वा। วจาทินํ วสฺสุฏ วา-. 'वच्' आदि धातुओं के 'व' के स्थान पर विकल्प से 'उट' होता है। วจาทีนํ วสฺส วา อุฏ โหติ กานุพนฺเธ’ตฺเว; อุตฺตา, วุตฺตํ; อุตฺถํ, วุตฺถํ; อตฺเวตฺเวว? วตฺวาน, วตฺวา. 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'वच्' आदि धातुओं के 'व' के स्थान पर विकल्प से 'उट' होता है; जैसे- उत्ता, वुत्तं; उत्थं, वुत्थं। 'अत्वे' ही क्यों? वत्वान, वत्वा। อสฺสุ-. ('वच्' आदि के) 'अ' के स्थान पर 'उ' होता है। วจาทีนมสฺส อุ โหติ กานุพนฺเธ’ตฺเว; วุตฺตํ, วุตฺถํ. 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'वच्' आदि धातुओं के 'अ' के स्थान पर 'उ' होता है; जैसे- वुत्तं, वुत्थं। วทฺธสฺส วา-. 'वद्ध' धातु के (अकार को) विकल्प से (उकार होता है)। วทฺธสฺส อสฺส วา อุ โหติ กานุพนฺเธ’ตฺเว; วุทฺโธ, วทฺโธ–-อตฺเวตฺวว? วทฺธิตฺวาน; วทฺธิตฺวา. กถํ วุตฺตีติ?’วุตฺติ มตฺเต’ติ. นิปาตนา; วตฺตีติ โหเตว ยถาลกฺขณํ. 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'वद्ध' धातु के 'अ' के स्थान पर विकल्प से 'उ' होता है; जैसे- वुद्धो, वद्धो। 'अत्वे' ही क्यों? वद्धित्वान, वद्धित्वा। 'वृत्ति' कैसे बना? 'वृत्ति' शब्द निपातन से सिद्ध होता है; लक्षण के अनुसार 'वत्ति' ही होता है। ยชสฺสยสฺส ฏิยี-. 'यज्' धातु के 'य' के स्थान पर 'इ' होता है। ยชสฺส ยสฺส ฏิยี โหนฺตี กานุพนฺเธ’ตฺเว; อิฏฺฐํ, สิฏฺฐํ, อตฺเวตฺเวว? ยชิตฺวาน, ยชิตฺวา. 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'यज्' धातु के 'य' के स्थान पर 'इ' होता है; जैसे- इट्ठं, सिट्ठं। 'अत्वे' ही क्यों? यजित्वान, यजित्वा। ฐาสฺสิ-. 'ठा' धातु के स्थान पर 'इ' (ठि) होता है। ฐาสฺสิ โหติ กานุพนฺเธ’ตฺเว; ฐิโต. อตฺเวตฺเวว? ฐตฺวาน, ฐตฺวา. 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'ठा' धातु के स्थान पर 'इ' होता है; जैसे- ठितो। 'अत्वे' ही क्यों? ठत्वान, ठत्वा। คาปานมิ โหติ กานุพนฺเธ’ตฺเว; คีตํ, ปีตํ. อตฺเวตฺเวว? คายิตฺวา; นิจฺจํ ยาคโม; ปาสฺส ตุ ปีตฺวานิ พหุลาธิการา. 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'गा' और 'पा' धातुओं के स्थान पर 'ई' होता है; जैसे- गीतं, पीतं। 'अत्वे' ही क्यों? गायित्वा; यहाँ नित्य 'य' आगम होता है; 'पा' धातु के लिए 'पीत्वा' आदि रूप 'बहुलाधिकार' से सिद्ध होते हैं। ชนิสฺสา-. 'जन्' धातु के स्थान पर 'आ' होता है। ชนิสฺส อา โหติ กานุพนฺเธ’ตฺเว; ชาโต. อตฺเวตฺเวว? ชนิตฺวา. 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'जन्' धातु के स्थान पर 'आ' होता है; जैसे- जातो। 'अत्वे' ही क्यों? जनित्वा। สาสสฺสสิสฺวา-. 'सास्' धातु के स्थान पर विकल्प से 'सिस्' होता है। สาสสฺส วา สิสฺโหติ กานุพนฺเธ’ตฺเว; สิฏฺฐํ, สตฺถํ; สิสฺโส, สาสิโย. อตฺเวตฺเวว? อนุสาสิตฺวาน. 'त्वा' को छोड़कर, क-अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'सास्' धातु के स्थान पर विकल्प से 'सिस्' होता है; जैसे- सिट्ठं, सत्थं; सिस्सो, सासियो। 'अत्वे' ही क्यों? अनुसासित्वान। กรสฺสาตเว-. 'तवे' प्रत्यय परे होने पर 'कर्' धातु के स्थान पर 'आ' होता है। กรสฺสอา โหติ ตเว; กาตเว. 'तवे' प्रत्यय परे होने पर 'कर्' धातु के स्थान पर 'आ' होता है; जैसे- कातवे। ตุํตุนตพฺเพสุวา-. 'तुं', 'तुन' और 'तब्ब' प्रत्ययों के परे होने पर विकल्प से (परिवर्तन होता है)। ตุมาทิสุ วา กรสฺสา โหติ; กาตุํ, กตฺตุํ, กาตุน, กตฺตุน; กาตพฺพํ, กตฺตพฺพํ. 'तुं' आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'कर' धातु को 'का' आदेश विकल्प से होता है; जैसे- कातुं, कत्तुं, कातुन, कत्तुन; कातब्बं, कत्तब्बं। ญสฺส เน ชา-. 'न' प्रत्यय के परे होने पर 'ञा' धातु को 'जा' आदेश होता है। ญธาตุสฺส ชา โหติ นกาเร; ชานิตุํ, ชานตฺโต. เนติ กึ? ญาโต. 'ञा' धातु को 'न' कार के परे होने पर 'जा' आदेश होता है; जैसे- जानितुं, जानन्तो। 'न' के परे होने पर ही क्यों? (उत्तर:) ञातो (यहाँ 'त' प्रत्यय है, 'न' नहीं)। สกาปานํ กุกฺกุ เณ-. 'सक' और 'आप' धातुओं को 'ण' प्रत्यय के परे होने पर क्रमशः 'कु' और 'कु' आगम होते हैं। สกอาปานํ กุกฺกุ อิจฺเจเต อาคมา โหนฺติ ณกาเร. สกฺกุณนฺโต, ปาปุณนฺโต; สกฺกุโณติ, ปาปุโณติ. เณติ กึ? สกฺโกติ, ปาเปติ. 'सक' और 'आप' धातुओं को 'ण' कार के परे होने पर 'कु' और 'कु' आगम होते हैं। जैसे- सक्कुणन्तो, पापुणन्तो; सक्कुणोति, पापुणोति। 'ण' के परे होने पर ही क्यों? (उत्तर:) सक्कोति, पापेति। นิโต จิสฺส โช-. 'नि' उपसर्ग से परे 'चि' धातु के 'च' को 'छ' आदेश होता है। นิสฺมา ปรสฺส จิสฺส โฉ โหติ; นิจฺฉโย. 'नि' उपसर्ग से परे 'चि' धातु के 'च' को 'छ' आदेश होता है; जैसे- निच्छयो। ชรสทานมิม วา-. 'जर' और 'सद' धातुओं के अन्त्य स्वर के स्थान पर 'ईम' आदेश विकल्प से होता है। ชรสทานมนฺตสรา ปโร อีม โหติ วิภาสา; ชีรณา, ชีรติ, ชีราเปติ; นิสีทิตพฺพํ, นิสีทนํ, นิสีทิตุํ, นิสีทติ–-วาติ กึ? ชรา, นิสชฺชา;’อีม เวติ โยควิภาคา อญฺเญสมฺปิ?อภิรถ, สํโยคาทิโลโป’ตฺถสฺส. 'जर' और 'सद' धातुओं के अन्त्य स्वर के स्थान पर 'ईम' आदेश विकल्प से होता है; जैसे- जीरणा, जीरति, जीरापेति; निसीदितब्बं, निसीदनं, निसीदितुं, निसीदति। 'विकल्प' से क्यों? (उत्तर:) जरा, निसज्जा। 'ईम' और 'वा' के योग-विभाग से अन्य धातुओं में भी यह देखा जाता है, जैसे- अभिरथ। 'अत्थ' धातु के संयोग के आदि वर्ण का लोप होता है। ทิสสฺส ปสฺสทสฺสทสฺททกฺขา-. 'दिस' धातु के स्थान पर 'पस्स', 'दस्स', 'दद्द' और 'दक्ख' आदेश विकल्प से होते हैं। ทิสสฺส ปสฺสาทโย โหนฺติ วิภาสา; วิปสฺสนา, วิปสฺสิตุํ, วิปสฺสติ; สุทสฺสี, ปิยทสฺสี, ธมฺมทสฺสี, สุทสฺสํ, ทสฺสนํ, ทสฺเสติ; ทฏฺฐพฺพํ, ทฏฺฐา, ทฏฺฐุํ, ทุทฺทโส, อทฺทส; อทฺทา, อทฺทํ; อทฺทกฺขิ, ทกฺขิสฺสติ–-วาตฺเวว? ทิสฺสนฺติ พาลา. 'दिस' धातु के स्थान पर 'पस्स' आदि आदेश विकल्प से होते हैं; जैसे- विपस्सना, विपस्सितुं, विपस्सति; सुदस्सी, पियदस्सी, धम्मदस्सी, सुदस्सं, दस्सनं, दस्सेति; दट्ठब्बं, दट्ठा, दट्ठुं, दुद्दसो, अद्दस; अद्दा, अद्दं; अद्दक्खि, दक्खिस्सति। 'विकल्प' से ही क्यों? (उत्तर:) दिस्सन्ति बाला। สมานา โร รีริกฺขเกสุ -. 'समान' शब्द से परे 'दिस' धातु के स्थान पर 'र' आदेश विकल्प से होता है, 'री', 'रिक्ख' और 'क' प्रत्ययों के परे होने पर। สมานสทฺทโต ปรสฺส ทิสสฺส ร โหติ วา รีริกฺขเกสุ; สรี, สที; สริกฺโข, สทิกฺโข; สริโส, สทิโส. 'समान' शब्द से परे 'दिस' धातु के स्थान पर 'र' आदेश विकल्प से होता है, 'री', 'रिक्ख' और 'क' प्रत्ययों के परे होने पर; जैसे- सरी, सदी; सरिक्खो, सदिक्खो; सरिसो, सदिसो। ทหสฺส ทสฺสโฑ-. 'दह' धातु के 'द' कार के स्थान पर 'ड' आदेश विकल्प से होता है। ทหสฺส ทสฺสโฑ โหติ วา; ฑาเนหา, ทาโห; ฑหติ, ทหติ. 'दह' धातु के 'द' कार के स्थान पर 'ड' आदेश विकल्प से होता है; जैसे- डानेहा, दाहो; डहति, दहति। อนฆณฺสฺวาปรีหิ โฬ-. 'आ' और 'परि' उपसर्गों से परे 'दह' धातु के 'द' कार के स्थान पर 'ळ' आदेश होता है, 'अन', 'घ' और 'ण' प्रत्ययों के परे होने पर। อาปรีหิ ปรสฺส ทหสฺส ทสฺส โฬ โหตนฆณฺสุ; อาณาหนํ, ปริฬาโห. 'आ' और 'परि' उपसर्गों से परे 'दह' धातु के 'द' कार के स्थान पर 'ळ' आदेश होता है, 'अन', 'घ' और 'ण' प्रत्ययों के परे होने पर; जैसे- आणाहनं, परिळाहो। อตฺยาทินฺเตสฺวตฺถิสฺส ภุ-. 'ति' आदि (तिङ्) प्रत्ययों को छोड़कर अन्य प्रत्ययों के परे होने पर 'अस' (अत्थि) धातु के स्थान पर 'भु' आदेश होता है। ตฺยาทินฺนวชฺชิเตสุ ปจฺจเยสุ อส ภุวิจฺจสฺส ภุ โหติ; ภวิตพฺพํ. 'ति' आदि (तिङ्) प्रत्ययों को छोड़कर अन्य प्रत्ययों के परे होने पर 'अस' धातु के स्थान पर 'भु' आदेश होता है; जैसे- भवितब्बं। อาเทสวิธานมสสฺสาปฺปโยคตฺถเมตสฺมึ วิสเย–-เอเตน กตฺถจิ กสฺสจิ ธาตุสฺสาปฺปโยโค’ปิ ญาปิโต โหติ–-อตฺยาทินฺเตสูติ กึ? อตฺถิ, สนฺโต. อตฺถิสฺสาติ กึ? อสฺสติสฺส มา โหตุ. इस विषय में आदेश का विधान 'अस' धातु के अप्रयोग (न होने) के लिए है—इससे यह भी ज्ञापित होता है कि कहीं-कहीं किसी धातु का प्रयोग नहीं होता है—'ति' आदि को छोड़कर क्यों कहा? (उत्तर:) अत्थि, सन्तो। 'अत्थि' (अस धातु) का ही क्यों कहा? ताकि 'अस्सति' (असु धातु) का न हो। ออาสฺสอาทิสุ -. 'अ', 'आ', 'स्स' और 'आ' आदि (विभक्तियों) के परे होने पर 'अस' (अत्थि) धातु के स्थान पर 'भु' आदेश होता है। ออาโท อาอาโท สฺสอาโท จ อตฺถสฺส ภุ โหติ; พภุว, อภวา, อภวิสฺสา, ภวิสฺสติ. 'अ' आदि, 'आ' आदि और 'स्स' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'अस' (अत्थि) धातु के स्थान पर 'भु' आदेश होता है; जैसे- बभुव, अभवा, अभविस्सा, भविस्सति। นฺตมานานฺติยิยุํสฺวาทิโลโป-. 'न्त', 'मान', 'अन्ति', 'इ', 'यि' और 'युं' प्रत्ययों के परे होने पर 'अस' (अत्थि) धातु के आदि वर्ण (अ) का लोप होता है। นฺตาทีสฺวตฺถิสฺสาทิโลโป โหติ; สนฺโต, สมาโน, สนฺติ, สนฺตุ, สิยา, สิยุํ–-เอเตสฺวิติ กึ? อตฺถิ. 'न्त' आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'अस' (अत्थि) धातु के आदि वर्ण का लोप होता है; जैसे- सन्तो, समानो, सन्ति, सन्तु, सिया, सियुं। 'इन प्रत्ययों के परे होने पर ही' क्यों? (उत्तर:) अत्थि। ปาทิโต ฐาสฺส วา ฐโค กฺวจิ-. 'प' आदि (उपसर्गों) से परे 'ठा' धातु के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'ठह' आदेश होता है। ปาทีหิ กฺริยาวิเสสโชตเกหิ สทฺเทหิ ปรสฺส ฐาสฺส กฺวจิ ฐโห วา โหติ; สณฺฐหนฺโต, สนฺติฏฺฐนฺโต; สณฺฐหติ, สนฺติฏฺฐติ–-ป ปรา อป สํอนุ อว โอ นิ ทุ วิ อธิ อปิ อติ สุ อุอภิปติ ปริ อุป อา ปาทิ; กฺวจีติ กึ? สณฺฐิติ. 'प' आदि क्रिया-विशेष-द्योतक (उपसर्ग) शब्दों से परे 'ठा' धातु के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'ठह' आदेश होता है; जैसे- संठहन्तो, सन्तिट्ठन्तो; संठहति, सन्तिट्ठति। 'प, परा, अप, सं, अनु, अव, ओ, नि, दु, वि, अधि, अपि, अति, सु, उ, अभि, पति, परि, उप, आ'—ये 'प' आदि उपसर्ग हैं। 'कहीं-कहीं' क्यों? (उत्तर:) संठिति। ทาสฺสิยงิ-. 'प' आदि उपसर्गों से परे 'दा' धातु के स्थान पर कहीं-कहीं 'इयङ' आदेश होता है। ปาทิโต ปรสฺส ทาสฺส อิยงิ เหนาติ กฺวจิ; อนาทิสิตฺวา, สมาทิยติ; กฺวจีตฺเวว? อาทาย. 'प' आदि उपसर्गों से परे 'दा' धातु के स्थान पर कहीं-कहीं 'इयङ' आदेश होता है; जैसे- अनादिसित्वा, समादियति। 'कहीं-कहीं' ही क्यों? (उत्तर:) आदाय। ปาทิโต ปรสฺสกรสฺส กฺวจิข โหติ; สงฺขาโร, สงฺขรี ยติ –-กรสฺสาติ อวตฺวา กโรติสฺสาติ วจนํ ติมฺหิ จ วิกรณุปฺปตฺติ ญาเปตุํ. 'प' आदि उपसर्गों से परे 'कर' धातु के स्थान पर कहीं-कहीं 'ख' आदेश होता है; जैसे- संखारी, संखरी यति। यहाँ 'कर' न कहकर 'करोति' कहना 'ति' प्रत्यय के परे होने पर विकरण की उत्पत्ति को ज्ञापित करने के लिए है। ปุรสฺมา-. 'पुर' से-। ปุร อิจฺจสฺมา นิปาตา ปรสฺส กรสฺสข โหติ; ปุรกฺขตฺวา, ปุเรกฺขาโร, เอตฺตํ ตทมินาทิปาฐา. 'पुर' इस निपात से परे 'कर' को 'ख' होता है; जैसे- पुरक्खत्वा, पुरेक्खारो; 'एत्तं' यह 'तदमिनादि' पाठ से होता है। ติโต กมสฺส-. 'ति' से 'कम' को-। นิสฺมา ปรสฺส กมสฺส กฺวจิ ข โหติ; ปุรกฺขตฺวา, ปุเรกฺขาโร, เอตฺตํ ตทมินาทิปาฐา. 'नि' से परे 'कम' को कहीं 'ख' होता है; जैसे- पुरक्खत्वा, पुरेक्खारो; 'एत्तं' यह 'तदमिनादि' पाठ से है। นิโต กมสฺส-. 'नि' से 'कम' को-। นิสฺมา ปรสฺส กมสฺส กฺวจิ ข โหติ; นิกฺขมติ; กฺวจิตฺเวว? นิกฺกโม. 'नि' से परे 'कम' को कहीं 'ख' होता है; जैसे- निक्खमति; 'कहीं' ही क्यों? निक्कमो। ยุวณฺณานมิยงุวงิ สเร-. स्वर परे होने पर इ-वर्ण और उ-वर्ण को इयङ् और उवङ्-। อิวณฺณุวณฺณนฺตานํ กฺริยตฺถานมิยงุวงิ โหนฺติ สเร กฺววิ;เวทิยติ, พฺรุวนฺติ; สเรติ กึ? นิเวเทติ, พฺรูติ; กฺวจีตฺเวว? ชยติ, ภวติ. इ-वर्ण और उ-वर्ण अन्त वाली धातुओं को स्वर परे होने पर कहीं 'इयङ्' और 'उवङ्' आदेश होते हैं; जैसे- वेदियति, ब्रुवन्ति; 'स्वर परे होने पर' क्यों? निवेदेति, ब्रूति; 'कहीं' ही क्यों? जयति, भवति। อญฺญาทิสฺสาสฺสี กฺเย-. 'ज्ञा' के अतिरिक्त अन्य (आकारान्त) को 'क्य' परे होने पर 'ई' होता है-। ญาทิโต’ญฺญสฺส อาการนฺตสฺส กฺริยตฺถสฺส อี โหติ กฺเย; ทิยติ; อญฺญาทิสฺสาติ กึ? ญายติ, ตายติ. 'ज्ञा' धातु से भिन्न आकारान्त धातु को 'क्य' प्रत्यय परे होने पर 'ई' होता है; जैसे- दियति; 'ज्ञा आदि से भिन्न' क्यों? ञायति, तायति। ตนสฺสา วา-. 'तन' को विकल्प से 'आ'-। ตนสฺส อา โหติ วา กฺเย; ตายเต, ตญฺญเต. 'तन' धातु को 'क्य' प्रत्यय परे होने पर विकल्प से 'आ' होता है; जैसे- तायते, तञ्ञते। ทีโฆ สรสฺส-. स्वर को दीर्घ-। สรนฺตสฺส กฺริยตฺถสฺสทีโฆ โหติ กฺเย; จียเต, สูยเต. สานนฺตรสฺส ตสฺส โฐ-. स्वरान्त धातु को 'क्य' प्रत्यय परे होने पर दीर्घ होता है; जैसे- चीयते, सूयते। सकारान्त धातु से परे अव्यवहित 'त' को 'ठ' होता है-। สการนฺตโต กฺริยตฺถา ปรสฺสานนฺตรสฺสตการสฺส ฐ โหติ; กุฏฺโฐ, ตุฏฺฐวา, ตุฏฺฐพฺพํ, ตุฏฺฐี; อนนตรสาติ กึ? ตุสฺสิตฺวา. सकारान्त धातु से परे अव्यवहित 'त' कार को 'ठ' होता है; जैसे- कुट्ठो, तुट्ठवा, तुट्ठब्बं, तुट्ठी; 'अव्यवहित' क्यों? तुस्सित्वा। กสสฺสิม จ วา-. 'कस' को 'इम' और (त को ठ) विकल्प से-। กสสฺมา ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ฐ โหติ, กสสฺส วา อิม จ; กิฏฺฐํ, กฏฺฐํ–-อนนฺตรสฺสาตฺเวว? กสิตพฺพํ. 'कस' धातु से परे अव्यवहित 'त' को 'ठ' होता है, और 'कस' को विकल्प से 'इम' आदेश होता है; जैसे- किट्ठं, कट्ठं; 'अव्यवहित' ही क्यों? कसितब्बं। ธสฺโตตฺรสฺตา -. धस्त और त्रस्त-। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต. ये शब्द निपातन से सिद्ध होते हैं। ปุจฺฉาทิโต-. 'पुच्छ' आदि से-। ปุจฺฉาทีหิ กฺริยตฺเถหิ ปรสฺสานนฺตรสฺส ตการสฺสฐ โหติ; ปุฏฺโฐ, ภฏฺโฐ, ยิฏฺโฐ–-อนนฺตรสฺสาตฺเวว? ปุจฺฉิตฺวา. 'पुच्छ' आदि धातुओं से परे अव्यवहित 'त' कार को 'ठ' होता है; जैसे- पुट्ठो, भट्ठो, यिट्ठो; 'अव्यवहित' ही क्यों? पुच्छित्वा। สาสวสสํสสสา โถ-. सास, वस, संस, सस (के त) को 'थ'-। เอเตหิ ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ถ โหติ; สตฺถํ, วุตฺถํ, ปสตฺถํ, สตฺถํ–-กถมนุสิฏฺโฐติ? ‘‘กถนรานํ ฏฐณลา‘‘ติ. โฐ. อนนฺตรสฺสาตฺเวว? สาสตุํ. इनसे परे अव्यवहित 'त' को 'थ' होता है; जैसे- सत्थं, वुत्थं, पसत्थं, सत्थं; 'अनुसिट्ठो' कैसे सिद्ध हुआ? 'कथनरानां टठणला' सूत्र से 'ठ' होकर। 'अव्यवहित' ही क्यों? सासितुं। โธ ทหเภหิ-. 'दह' और 'भ' (अन्त वाली धातुओं के त) को 'ध'-। ธการหการภการนฺเตหิ กฺริยตฺเถหิ ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ธ โหติ; วุทฺโธ, ทุทฺธํ,ลทฺธํ. धकार, हकार और भकार अन्त वाली धातुओं से परे अव्यवहित 'त' को 'ध' होता है; जैसे- वुद्धो, दुद्धं, लद्धं। ทหา โฒ-. 'दह' (के त) को 'ढ'-। ทหา ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ฒ โหติ; ทงฺโฒ. 'दह' धातु से परे अव्यवहित 'त' को 'ढ' होता है; जैसे- दड्ढो। พหสฺสุม จ-. 'बह' को 'उम' और (त को स)-। พหา ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส โส โหติ, พหสฺสุม จ สสนฺตโยเคน; พุฑฺโฒ. 'बह' धातु से परे अव्यवहित 'त' को 'स' होता है, और 'बह' को 'उम' आदेश होता है 'स' के योग से; जैसे- बुड्ढो। รุหาทีหิ โห ฬ จ -. 'रुह' आदि धातुओं के 'ह' को 'ळ' होता है-। รุหาทีหิ ปรสฺสานนฺตรสฺสตสฺส ห โหติ, โฬ จานฺตสฺส; อารุฬฺโห, คุฬฺโห, วุฬฺโห, พาฬฺโห; อนนฺตรสฺสาตฺเวว? อาโรคตุํ. 'रुह' आदि धातुओं से परे अव्यवहित 'त' को 'ह' होता है, और धातु के अन्त्य वर्ण को 'ळ' होता है; जैसे- आरूळ्हो, गूळ्हो, वूळ्हो, बाळ्हो। 'अव्यवहित' क्यों कहा? 'आरोगतुं' (यहाँ व्यवधान है)। มุหา วา-. 'मुह' धातु से परे (विकल्प से)। มุหา ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ห โหติ วา, โฬ จานฺตสฺส หสนฺติโยเคน; มุฬฺโห, มุทฺโธ. 'मुह' धातु से परे अव्यवहित 'त' को विकल्प से 'ह' होता है, और धातु के अन्त्य वर्ण को 'ळ' होता है (हकार के योग से); जैसे- मुळ्हो, मुद्धो। ภิทาทิโต โน กฺตกฺกวนฺตุนํ-. ภิทาทิโต ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตุนํ ตสฺสโน โหติ; ภินฺโน, ภินฺนวา, ฉินฺโน, ฉินฺนวา, ฉนฺโน, ฉนฺนวา, ขินฺโน, ขินฺนวา, อุปฺปนฺโน, อุปฺปนนวา, สินฺโน, สินฺนวา, สเนนา, สนฺนวา, ปีโน, ปีนวา, สูโน, สูนวา, ทีโน, ทีนวา, ฑีโน, ฑีนวา, ลีโน, ลีนวา, ลูโน, ลูนวา–-กฺตกฺตวนฺตุนตฺติ กึ? ภิตฺติ; ฉิตฺติ, โภตฺตุํ, เฉตฺตุํ. 'भिद' आदि धातुओं से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'न' होता है; जैसे- भिन्नो, भिन्नवा, छिन्नो, छिन्नवा, छन्नो, छन्नवा, खिन्नो, खिन्नवा, उप्पन्नो, उप्पन्नवा, सिन्नो, सिन्नवा, सन्नो, सन्नवा, पीनो, पीनवा, सूनो, सूनवा, दीनो, दीनवा, डीनो, डीनवा, लीनो, लीनवा, लूनो, लूनवा। 'क्त-क्तवन्तु' क्यों कहा? भित्ति, छित्ति, भोत्तुं, छेत्तुं (यहाँ 'न' नहीं होता)। ทาตฺถีนฺโน-. 'दा' धातु से परे 'त' को 'इन्न' होता है। ทาโต ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตุนํ ตสฺส อินฺโน โหติ; ทินฺโน, ทินฺนวา. 'दा' धातु से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'इन्न' होता है; जैसे- दिन्नो, दिन्नवा। กิราทีหิ โณ-. 'किर' आदि धातुओं से परे 'ण' होता है। กิราทีหิ ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตุนํ ตสฺสานนฺตรสฺส ณ โหติ; กิณฺโณ, กิณฺณวา, ปุณฺโณ, ปุณฺณวา, ขีโณ, ขีณวา. 'किर' आदि धातुओं से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के अव्यवहित 'त' को 'ण' होता है; जैसे- किण्णो, किण्णवा, पुण्णो, पुण्णवा, खीणो, खीणवा। ตราทีห ริณฺโณ-. 'तर' आदि धातुओं से परे 'रिण्ण' होता है। ตราทีหิ ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตุนํ ตสฺสรณฺโณ โหติ; ติณฺโณ, ติณฺณวา, ชิณฺโณ, ชิณฺณวา, จิณฺโณ, จิณฺณวา. 'तर' आदि धातुओं से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'इण्ण' (या रिण्ण) होता है; जैसे- तिण्णो, तिण्णवा, जिण्णो, जिण्णवा, चिण्णो, चिण्णवा। โค ภญฺชาทีหิ-. 'भञ्ज' आदि धातुओं से परे 'ग' होता है। ภญฺชาทีหิ ปเรสํกฺตกฺตวนฺตุนํ ตสฺสานนฺตรสฺสค โหติ; ภคฺโค, ภคฺควา, ลคฺโค, ลคฺควา, นิมุคฺโค, นิมุคฺควา, สํวิคฺโค, สํวิคฺควา. 'भञ्ज' आदि धातुओं से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के अव्यवहित 'त' को 'ग' होता है; जैसे- भग्गो, भग्गवा, लग्गो, लग्गवा, निमुग्गो, निमुग्गवा, संविग्गो, संविग्गवा। สุสา โข-. 'सुस' धातु से परे 'ख' होता है। สุสา ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตุนํ ตสฺส โข โหติ; สุกฺเขํ, สุกฺขวา. 'सुस' धातु से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'ख' होता है; जैसे- सुक्खो, सुक्खवा। ปจา โก-. 'पच' धातु से परे 'क' होता है। ปจา ปเรสํ กฺตกฺกวนฺตุนํ ตสฺส โก โหติ; ปกฺโก, ปกฺกวา. 'पच' धातु से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'क' होता है; जैसे- पक्को, पक्कवा। มุจา วา-. 'मुच' धातु से परे विकल्प से 'क' होता है। มุจา ปเรสํกฺตกฺตวนฺตุนํ ตสฺส โก วา โหติ; มุกฺโก, มุตฺโต; มุกฺกวา, มุตฺตวา–-สกฺโกติ ณฺวาทิสุ สิทฺธํ–-กฺตกฺตวนฺตุสุ สตฺโต สตฺตวาตฺเวว โหติ. 'मुच' धातु से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को विकल्प से 'क' होता है; जैसे- मुक्को, मुत्तो; मुक्कवा, मुत्तवा। 'सक्को' यह 'ण्व' आदि प्रत्ययों में सिद्ध होता है; 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों में 'सत्तो', 'सत्तवा' ही होता है। โลโป วฑฺฒา กฺติสฺส-. 'वड्ढ' धातु से परे 'क्ति' प्रत्यय का लोप होता है। วฑฺฒา ปรสฺสกฺติสฺส ตสฺส โลโป โหติ; วฑฺฒิ. 'वड्ढ' धातु से परे 'क्ति' प्रत्यय के 'त' का लोप होता है; जैसे- वड्ढि। กฺวิสฺส-. 'क्वि' प्रत्यय का लोप होता है। กฺริยตฺถา ปรสฺส กฺวิสฺส โลโป โหติ; อภิภุ. क्रियार्थक धातु से परे 'क्वि' प्रत्यय का लोप होता है; जैसे- अभिभू। ณิณาปีนํ เตสุ-. उन (प्रत्ययों) के परे होने पर 'णि' और 'णापि' का लोप होता है। ณิณาปีนํ โลโป โหติ เตสุ ณิณาปีสุ;’กาเรนฺตํ ปโยชยยติ’กาเรติ, การาเปติ. उन 'णि' और 'णापि' प्रत्ययों का लोप होता है; जैसे- 'कारेंतं पयोजयति' - कारेति, कारापेति। กฺวจี วิกรณานํ-. विकरणों का कहीं-कहीं लोप होता है। วิกรณานํ กฺวจิ โลโป โหต; อุทปาทิ, หนฺติ. विकरणों का कहीं-कहीं लोप होता है; जैसे- उदपादि, हन्ति। มานสฺส มสฺส-. 'मान' प्रत्यय के 'म' का लोप होता है। กฺริยตฺถา ปรสฺส มานสฺส มการสฺส โลโป โหติ กฺวจิ; กราโณ; กฺวจติ กึ? กุรุมาโน. क्रियार्थक धातु से परे 'मान' प्रत्यय के मकार का कहीं-कहीं लोप होता है; जैसे- कराणो। 'कहीं-कहीं' क्यों कहा? कुरुमानो (यहाँ लोप नहीं हुआ)। เออิลสฺเส-. 'इ' और 'इत्वा' को 'ए' होता है। เออิลานเม โหต กฺวจี; คเหตฺวา, อเทนฺติ; กฺวจีตฺเวว? วปิตฺวา. 'इ' और 'इत्वा' प्रत्ययों को कहीं-कहीं 'ए' होता है; जैसे- गहेत्वा, अदेंति। 'कहीं-कहीं' क्यों कहा? वपित्वा (यहाँ नहीं हुआ)। ปฺโย วา ตฺวาสฺส สมาเส-. समास में 'त्वा' प्रत्यय के स्थान पर 'प्य' आदेश विकल्प से होता है। ตฺวาสฺสวา ปฺโย โหต สมาเส; ปกาโร’ปฺเย สสฺสา’ติ. วิเสสนตฺถา; อภิภูย, อภิภวิตฺวา–-สมาเสติ กึ? ปตฺวา; กฺววาสมาเส’ปิ พหกุลาธิการา?ลตํ ทนฺเตหิ ฉินฺทิย. समास में 'त्वा' के स्थान पर 'प्य' विकल्प से होता है; 'प्य' में 'प' कार 'स' (सकार) के लिए है। विशेष अर्थ के लिए; जैसे- 'अभिभूय', 'अभिभवित्वा'। 'समास में' क्यों? 'पत्वा' (यहाँ समास नहीं है)। 'बहुलाधिकार' के कारण कहीं-कहीं असमस्त (बिना समास) में भी होता है? जैसे- 'लतां दन्तेहि छिन्दिय' (दांतों से लता को काटकर)। ตุํยานา-. 'तुं' और 'यान' (आदेश)। ตฺวาสฺส วา ตุํยานา โหนฺติ สมาเส กฺวจิ; อภิหฐูํ, อภิหริตฺวา; อนุโมทิยาน, อนุโมทิตฺวา–-อสมาเส-ปิ พหุลาธิการา? ทฐุํ; ทิสฺวา–-เอสมปฺปวิสยตาญาปนตฺโถ โยควิภาโค. समास में कहीं-कहीं 'त्वा' के स्थान पर 'तुं' और 'यान' विकल्प से होते हैं; जैसे- 'अभिहठुं', 'अभिहरित्वा'; 'अनुमोदियान', 'अनुमोदित्वा'। 'बहुलाधिकार' से असमस्त में भी? 'दठुं' (देखकर); 'दिस्वा'। यह योग-विभाग अल्प विषयता को ज्ञापित करने के लिए है। หนา รจฺโจ-. 'हन्' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर 'रच्च' आदेश। หนสฺมา ปรสฺส ตฺวาสฺส รจฺโจ วา โหติ สมาเส; อหจฺจ, อหนิตฺวา. 'हन्' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर समास में 'रच्च' विकल्प से होता है; जैसे- 'अहच्च' (आहत्य/मारकर), 'अहनित्वा'। สาสาธิกรา จจริจฺจา-. 'स', 'आ', 'अधि' उपसर्गों के साथ 'कृ' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर 'चच्च' और 'रिच्च' आदेश। สาสาธีหิ ปรา กรา ปรสฺส ตฺวาสฺส จจริจฺจา วา โหนฺติ ยถากฺกมํ; สกฺกจฺจ, สกฺกริตฺวา, อสกฺกจฺจ, อสกฺกริตฺวา, อธิกิจฺจ, อธิกริตฺวา, 'स', 'आ', 'अधि' उपसर्गों के बाद 'कृ' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर यथाक्रम 'चच्च' और 'रिच्च' विकल्प से होते हैं; जैसे- 'सक्कच्च' (सत्कृत्य), 'सक्करित्वा', 'असक्कच्च', 'असक्करित्वा', 'अधिकिच्च' (अधिकृत्य), 'अधिकारित्वा'। อิโต จฺโจ-. 'इ' (इण्) धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर 'च्च' आदेश। อิอิจฺจสฺมา ปรสฺส ตฺวาสฺส จฺโจ วา โหติ; อธิจฺจ, อธิยิตฺวา, สเมจฺจ, สเมตฺวา. 'इ' (इण्) धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर 'च्च' विकल्प से होता है; जैसे- 'अधिच्च' (अधीत्य), 'अधियित्वा', 'समेच्च' (समेत्य), 'समेत्वा'। ทิสา วานวา ส จ-. 'दिस्' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर 'वान' आदेश और 'स' का आगम। ทิสโต ตฺวาสฺส วานวา โหนฺติ วา, ทิสสฺส จ สกาโร ตํ สนฺติโยเคน; สสฺส สวิธานํ ปรรูปพาธนตฺถํ; ทิสฺวาน, ทิสฺวา, ปสฺสิตฺวา–-กถํ นาทฏฺฐา ปรโต โทสนฺติ? ญาปกาตฺวาสฺส วโลโป; เอวํ ลทฺธา(น) ธนนฺติอาทิสุ. 'दिस्' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर 'वान' विकल्प से होता है, और 'दिस्' के स्थान पर 'स' कार होता है उस (त्वा) के रहने पर; 'स' का विधान पररूप के बाधन के लिए है; जैसे- 'दिस्वान', 'दिस्वा', 'पस्सित्वा'। 'न अदट्ठा परतो दोसं' यहाँ कैसे? ज्ञापक से 'त्वा' का लोप होता है; इसी प्रकार 'लद्धा(न) धनं' आदि में। เออิ พฺยญฺชนสฺส-. व्यञ्जनादि प्रत्यय परे होने पर 'इ' आगम। กฺริยตฺถา ปรสฺส พฺยญฺชนาทิปฺปจฺจยสฺส ญิ วา โหติ; ภุญฺชิตุํ, โหตฺตุ; พฺยญฺชนสฺสาติ กึ? ปาจโก. धातु से परे व्यञ्जनादि प्रत्यय होने पर 'इ' (इडागम) विकल्प से होता है; जैसे- 'भुञ्जितुं', 'होत्तु'। 'व्यञ्जन' क्यों? 'पाचको' (यहाँ प्रत्यय स्वरादि है)। รา นสฺส โณ-. 'र' कारान्त धातु से परे 'न' का 'ण' होना। รานฺตโต กฺริยตฺถา ปรสฺส ปจฺจยนการสฺส โณ โหติ; อรณํ, สรณํ. 'र' कारान्त धातु से परे प्रत्यय के 'न' कार का 'ण' कार होता है; जैसे- 'अरणं', 'सरणं'। น นฺตมานตฺยฺยาทินํ-. 'न्त', 'मान', 'ति' आदि के 'न' का 'ण' नहीं होता। รานฺตโต ปเรสํ นฺตมานตฺยาทีนํ นสฺส โณ น โหติ; กโรนฺโต, กุรุมาโน; กโรนฺติ. 'र' कारान्त धातु से परे 'न्त', 'मान', 'ति' आदि के 'न' कार का 'ण' कार नहीं होता है; जैसे- 'करोन्तो', 'कुरुमानो'; 'करोन्ति'। คมยมิสาสทิสานํ วา จฺฉงิ-. 'गम्', 'यम्', 'इष्', 'आस्', 'दिस्' धातुओं के स्थान पर 'च्छ' आदेश। เอเตสํ วา จฺฉงิ โหติ นฺตมานตฺยาทิสุ; คจฺฉนฺโต, คจฺฉมาโน, คจฺฉติ; ยจฺฉนฺโต, ยจฺฉมาโน, ยจฺฉติ; อิจฺฉนฺโต, อิจฺฉมาโน, อิจฺฉติ; อจฺฉนฺโต, อจฺฉมาโน, อจฺฉติ; ทิจฺฉนฺโต, ทิจฺฉมาโน, ทิจฺฉติ. วาติ กึ? คมิสฺสติ; ววตฺถิต วิหาสตฺเตนญฺเญสุ จ กฺวจิ? อิจฺฉิตพฺพํ, อิจฺฉา, อิจฺฉิตุํ; อจฺฉิตพฺพํ, อจฺฉตุํ; อญฺเญสญฺจ โยควิภาคา? ปเวจฺฉติ. 'न्त', 'मान', 'ति' आदि प्रत्ययों के परे होने पर इन (गम् आदि) धातुओं के स्थान पर विकल्प से 'च्छ' आदेश होता है; जैसे- 'गच्छन्तो', 'गच्छमानो', 'गच्छति'; 'यच्छन्तो', 'यच्छमानो', 'यच्छति'; 'इच्छन्तो', 'इच्छमानो', 'इच्छति'; 'अच्छन्तो', 'अच्छमानो', 'अच्छति'; 'दिच्छन्तो', 'दिच्छमानो', 'दिच्छति'। 'विकल्प' से क्यों? 'गमिस्सति'। व्यवस्थित विभाषा से अन्यत्र भी कहीं-कहीं होता है? 'इच्छितब्बं', 'इच्छा', 'इच्छितुं'; 'अच्छितब्बं', 'अच्छतुं'। योग-विभाग से अन्य धातुओं में भी? 'पवेच्छति'। ชรมรานมียงิ-. 'जृ' और 'मृ' धातुओं के स्थान पर 'ईय' आदेश। เอเตสมียงิ วา โหติ นฺตมานตฺยาทิสุ; ชียนฺโต, ชีรนฺโต; ชียมาโน, ชีรมาโน; ชียติ, ชีรติ; มียนฺโต, มรนฺโต; มียมาโน, มรมาโน; มียติ, มรติ. 'न्त', 'मान', 'ति' आदि प्रत्ययों के परे होने पर इन (जृ और मृ) धातुओं के स्थान पर विकल्प से 'ईय' आदेश होता है; जैसे- 'जीयन्तो', 'जीरन्तो'; 'जीयमानो', 'जीरमानो'; 'जीयति', 'जीरति'; 'मीयन्तो', 'मरन्तो'; 'मीयमानो', 'मरमानो'; 'मीयति', 'मरति'। ฐาปานํ ติฏฺฐปิวา-. 'स्था' और 'पा' धातुओं के स्थान पर 'तिट्ठ' और 'पिव' आदेश। ฐปานํ ติฏฺฐปิวา โหนฺติ วา นฺตมานตฺยาทิสุ; ติฏฺฐนฺโต, ติฏฺฐมาโน, ติฏฺฐติ; ปิวนฺโต, ปิวติ; วาตฺเวว? ฐาติ, ปาติ. 'न्त', 'मान', 'ति' आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'स्था' और 'पा' धातुओं के स्थान पर विकल्प से 'तिट्ठ' और 'पिव' आदेश होते हैं; जैसे- 'तिट्ठन्तो', 'तिट्ठमानो', 'तिट्ठति'; 'पिवन्तो', 'पिवति'। 'विकल्प' से ही? 'ठाति', 'पाति'। คมวททานํ ฆมฺมวชฺชทชฺชา-. 'गम्', 'वद्', 'दा' धातुओं के स्थान पर 'घम्म', 'वज्ज', 'दज्ज' आदेश। คมาทีนํ ฆมฺมาทโย วา โหนฺติ นฺตมานตฺยฺยาทิสุ; ฆมฺมนฺโต, คจฺฉนฺโต; วชฺชนฺโต, วทนฺโต; ทชฺชนฺโต, ททนฺโต. 'न्त', 'मान', 'ति' आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'गम्' आदि धातुओं के स्थान पर विकल्प से 'घम्म' आदि आदेश होते हैं; जैसे- 'घम्मन्तो', 'गच्छन्तो'; 'वज्जन्तो', 'वदन्तो'; 'दज्जन्तो', 'ददन्तो'। กรสฺส โสสฺส กุพฺพกุรุกยิรา-. 'ओ' कार सहित 'कृ' धातु के स्थान पर 'कुब्ब', 'कुरु', 'कयिर' आदेश। กรสฺส สโอการสฺส กุพฺพาทโย วา โหนฺติ นฺตมานตฺยาทิสุ; กุพฺพนฺโต, กยิรนฺโต, กโรนฺโต; กุพฺพมาโน, กุรุมาโน, กยิรมาโน, กราโณ; กุพฺพติ, กยิรติ, กโรติ; กุพฺพเต, กุรุเต, กยิรเต–-วจตฺถิตวิภาสตฺตา วาธิการสฺส ภิยฺโย มานปรจฺฉกฺเกสุกุรุ, กฺววิเทว ปุพฺพจฺฉกฺเก? อคฺฆํ กุรุตุ โน ภวํ; โสสฺสาติ วุตฺตตฺตา กตฺตริ เยวิเม. 'न्त', 'मान', 'ति' आदि प्रत्ययों के परे होने पर ओकार सहित 'कृ' धातु के स्थान पर विकल्प से 'कुब्ब' आदि आदेश होते हैं; जैसे- 'कुब्बन्तो', 'कयिरन्तो', 'करोन्तो'; 'कुब्बमानो', 'कुरुमानो', 'कयिरमानो', 'कराणो'; 'कुब्बति', 'कयिरति', 'करोति'; 'कुब्बते', 'कुरुते', 'कयिरते'। व्यवस्थित विभाषा और 'वा' के अधिकार से 'मान' और 'पर' (परस्मैपद) प्रत्ययों में 'कुरु' अधिक होता है, पूर्व प्रत्ययों में कहीं-कहीं? 'अग्घं कुरुतु नो भवं'। 'स-ओस्स' (ओकार सहित) कहने से ये केवल कर्तावाच्य में ही होते हैं। คหสฺส เฆปฺโป-. 'गह' (ग्रह्) धातु के स्थान पर 'घेप्प' आदेश। คหสฺส วา เฆปฺโปติ นฺตมานตฺยาทิสุ; เฆปฺปนฺโต, เฆปฺปมาโน, เฆปฺปติ–-วาตฺเวว? คณฺหาติ. 'न्त', 'मान', 'ति' आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'गह' धातु के स्थान पर विकल्प से 'घेप्प' आदेश होता है; जैसे- 'घेप्पन्तो', 'घेप्पमानो', 'घेप्पति'। 'विकल्प' से ही? 'गण्हाति'। โณ นิคฺคหิตสฺส-. 'णो' (प्रत्यय) 'निग्घित' (नि + गह) के लिए होता है। คหสฺส นิคฺคหตสฺส โณ โหติ; คณฺหิตพฺพํ, คณฺหิตุํ, คณฺหนฺโต. 'नि' उपसर्ग पूर्वक 'गह' धातु के लिए 'णो' होता है; (जैसे) गण्हितब्बं, गण्हितुं, गण्हन्तो। อิติ โมคฺคลฺลาเน วฺยากรเณ วุตฺติยํ ขาทิกณฺโฑ ปญฺจโม. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में पाँचवाँ 'खादिकाण्ड' समाप्त हुआ। วตฺตมาเน ติอนฺติสิถมิมตฺญนฺเต เสวฺหฺเญมฺเห-. वर्तमान काल में ति, अन्ति, सि, थ, मि, म और ते, अन्ते, से, व्हे, ए, म्हे (प्रत्यय होते हैं)। วตฺตมานฺญารทฺธาปริสมตฺเต อตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา ตฺยาทโย โหนฺตี; คจฺฉติ, คจฺฉนฺติ, คจฺฉสิ, คจฺฉถ, คจฺฉามิ, คจฺฉาม; คจฺฉเต, คจฺฉนฺเต, คจฺฉเส, คจฺฉวฺเห, คจฺเฉ, คจฺฉมฺเห –-กถํ ปุเร อธมฺโม ทิปฺปติ, ปุรา มรามิติ? วตฺตมานสฺเสว วตฺตุมิฏฺฐตฺตา, ตํสมีปสฺสตคฺคหเณน คหณา; ปุเรปุราสทฺเทหิ วา อนาคตตฺตาวคมฺยเต, ตทา ตสฺส วตฺตมานตฺตา; กาลวฺยตฺตโย วา เอโส; ภวนฺเตว หิ กาลนฺตเร’ปิ ตฺยาทโย พาหุลกา?‘‘สนฺเตสุ ปริคุหามิ มา จ กิญฺจิ อิโต อทํ, กายยสฺส เภทา อภิสมฺปรายํ สหวฺยตํ คจฺฉติ วาสวสฺส, อเนกชาติสํสารํ สนฺธาวิสฺสํ, อติเวลํ นมสฺสิสฺสนฺติ‘‘. वर्तमान काल में, जो आरम्भ हो चुका है किन्तु समाप्त नहीं हुआ है, उस अर्थ में 'ति' आदि प्रत्यय होते हैं; (जैसे) गच्छति, गच्छन्ति, गच्छसि, गच्छथ, गच्छामि, गच्छाम; गच्छते, गच्छन्ते, गच्छसे, गच्छव्वे, गच्छे, गच्छम्हे। 'पुरे अधम्मो दिप्पति' (पहले अधर्म चमकता है), 'पुरा मरामिति' (पहले मैं मरता हूँ) - यह कैसे? क्योंकि वर्तमान को ही कहने की इच्छा है, या उसके समीप होने के कारण ग्रहण किया गया है; अथवा 'पुरे' और 'पुरा' शब्दों से भविष्य का बोध होता है, तब वह वर्तमान के समान होता है; अथवा यह काल-व्यत्यय (काल का उलट-फेर) है; क्योंकि 'बाहुलक' से अन्य कालों में भी 'ति' आदि होते हैं। 'सन्तेसु परिगुहामि...', 'गच्छति वासवस्स', 'सन्धाविस्सं', 'नमस्सिस्सन्ति'। ภวสฺสติ สฺสติสฺสนฺติสฺสสิสฺสถสฺสามิสฺสามสฺสเตสฺสนฺเต สฺสเสสฺสวฺเหสฺสํสฺสามฺเห-. भविष्य काल में स्सति, स्सन्ति, स्ससि, स्सथ, स्सामि, स्साम और स्सते, स्सन्ते, स्ससे, स्सव्हे, स्सं, स्साम्हे (प्रत्यय होते हैं)। ภวิสฺสติ อนารทฺเธ อตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา สฺสตฺยาทโย โหนฺติ; คมิสฺสติ, คมิสฺสนฺติ, คมิสฺสสิ, คมิสฺสถ, คมิสฺสามิ, คมิสฺสาม; คมิสฺสเต, คมิสฺสนฺเต, คมิสฺสเส, คมิสฺสวฺเห, คมิสฺสํ, คมิสฺสามฺเห. भविष्य काल में, जो अभी आरम्भ नहीं हुआ है, उस अर्थ में 'स्सति' आदि प्रत्यय होते हैं; (जैसे) गमिस्सति, गमिस्सन्ति, गमिस्ससि, गमिस्सथ, गमिस्सामि, गमिस्साम; गमिस्सते, गमिस्सन्ते, गमिस्ससे, गमिस्सव्हे, गमिस्सं, गमिस्साम्हे। นาเม ครหาวิมฺภเยสุ-. 'नाम' शब्द के रहने पर, निन्दा (गर्हा) और विस्मय (विम्भय) के अर्थ में। นามสทฺเท นิปาเต สติ ครหายํ วิมฺภเย จ คมฺยมาเนสฺสตฺยาทโย โหนฺติ; อิเม หิ นาม กลฺยาณธมฺมา ปฏิชานิสฺสนฺติ; น หิ นาม ภิกฺขเว ตสฺส โมฆปุริสสฺสปาเณสุ อนุทฺทยา ภวิสฺสติ; กถญฺหิ นาม โส ภิกฺขเว โมฆปุริโส สพฺพมตฺติกามยํ กุฏิกํ กริสฺสติ; ตตฺถ นาม ตฺวํ โมฆปุริสมยา วิราคาย ธมฺเม เทสิเต สราคาย เวเตสฺสสิ, อตฺถิ นามตาต สุทินฺน อาภิโทสิกํ กุมฺมาสํ ปริภุญฺชิสฺสสิ, อตฺถิเยวิหาปิ นินฺทาวคโม. วิมฺภเย?- อจฺฉริยํ วต โภ อพฺภูตํ วต โภ สนฺเตน วต โภ ปพฺพชิตา วิหาเรนวิรนฺติ, ยตฺร หิ นาม สญฺญี สมาโน ชาคโร ปญฺจมตฺตานี สกฏสตานิ นิสฺสาย นิสฺสาย อติกฺกนฺตานิ เนว ทกฺขิติ, น ปน สทฺทํ โสสฺสติ; อจฺฉริยํ อนฺโธ นาม ปพฺพตมาโรหิสฺสติ; พธิโร นาม สทฺทํ โสสฺสติ. 'नाम' शब्द निपात के होने पर, निन्दा और विस्मय के प्रतीत होने पर 'स्सति' आदि प्रत्यय होते हैं; (जैसे निन्दा में) 'इमे हि नाम कल्याणधम्मा पटिजानिस्सन्ति' (ये निश्चय ही स्वयं को कल्याणधर्मी कहेंगे); 'न हि नाम भिक्खवे तस्स मोघपुरिसस्स पाणेसु अनुद्दया भविस्सति' (हे भिक्षुओं, उस मोघपुरुष की प्राणियों के प्रति दया नहीं होगी); 'कथञ्हि नाम सो भिक्खवे मोघपुरिसो सब्बमत्तिकामयं कुटिकं करिस्सति' (हे भिक्षुओं, वह मोघपुरुष कैसे पूरी तरह मिट्टी की कुटिया बनाएगा); 'तत्थ नाम त्वं मोघपुरिस मया विरागाय धम्मे देसिते सरागाय वेतेस्ससि' (वहाँ तुम मोघपुरुष, मेरे द्वारा वैराग्य के लिए धर्म उपदेश देने पर भी राग के लिए प्रयत्न करोगे); 'अत्थि नाम तात सुदिन्न आभिदोसिकं कुम्मासं परिभुञ्जिस्ससि' (हे तात सुदिन्न, क्या तुम बासी कुल्माष/जौ का भात खाओगे?) - यहाँ भी निन्दा का बोध है। विस्मय में? - 'अच्छरियं वत भो अब्भुतं वत भो...' (आश्चर्य है! अद्भुत है!), जहाँ संज्ञावान और जागृत होते हुए भी पाँच सौ छकड़े पास से निकल गए और उसने न देखा न शब्द सुना; 'अच्छरियं अन्धो नाम पब्बतमारोहिस्सति' (आश्चर्य है, अंधा पर्वत पर चढ़ेगा); 'बधिरो नाम सद्दं सोस्सति' (बहरा शब्द सुनेगा)। ภุเต อีอุํโอตฺเถมฺภาอาอูเสวฺหํอมฺเภ-. भूतकाल में ई, उं, ओ, त्थ, इं, म्हा और आ, ऊ, से, व्हं, अ, म्हे (प्रत्यय होते हैं)। ภุเต ปริสมตฺตฺญตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา อีอาทโย โหนฺติ; อคมี, อคมุํ, อคโม, อคมิตฺถ, อคมึ, อคมิมฺหา; อคมา, อคมู, อคมิเส, อคมิวฺหํ, อคม, อคมิมฺเห–-ภุต สามญฺญวจนิจฺฉายมนชฺชตเนปิ? สุโว อโหสิ อานนฺโท. भूतकाल में, जो कार्य समाप्त हो चुका है, उस अर्थ में 'ई' आदि प्रत्यय होते हैं; (जैसे) अगमी, अगमुं, अगमो, अगमित्थ, अगमिं, अगमिम्हा; अगमा, अगमू, अगमिसे, अगमिव्हं, अगम, अगमिम्हे। सामान्य भूत कहने की इच्छा होने पर अनद्यतन (जो आज का न हो) में भी? 'सुवो अहोसि आनन्दो' (कल आनन्द था)। อนชฺชตเน อาอูโอตฺถอมฺหาตฺถตฺถุํเสวฺหํอึมฺภเส-. अनद्यतन भूतकाल में आ, ऊ, ओ, त्थ, अ, म्हा और त्थ, त्थुं, से, व्हं, इं, म्भसे (प्रत्यय होते हैं)। อวิชฺชมานชฺชตเน ภุเต’ตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา อาอาทโย โหนฺติ. जो आज का नहीं है (अनद्यतन), ऐसे भूतकाल के अर्थ में 'आ' आदि प्रत्यय होते हैं। อาญายฺยา จ อุฏฺฐานา อาญายฺยา จ สํเวสนา,เอสชฺชตโน กาโล อหรูภยตฑฺฒรตฺตํ วา; जागने से लेकर सोने तक का समय 'अद्यतन' (आज का) काल है, अथवा दिन और दोनों रात्रियों का आधा-आधा भाग। อคมา, อคมู, อคโม, อคมตฺถ, อคม, อคมมฺหา; อคมิตฺถ, อคมตฺถุํ, อคมเส, อคมวฺหํ, คมึ, อคมมฺหเส; อญฺญปทตฺโถ กึ? อชฺช หิยฺโย วา อคมาสิ. अगमा, अगमू, अगमो, अगमत्थ, अगम, अगमम्हा; अगमित्थ, अगमत्थुं, अगमसे, अगमव्हं, गमिं, अगमम्हसे। 'अन्य पद का अर्थ' (अञ्ञपदत्थो) क्यों? 'अज्ज हिय्यो वा अगमासि' (आज या कल वह गया)। ปโรกฺเข โอเอตฺถอมฺภตฺถเรตฺโถวฺโหอิมฺเห-. परोक्ष (भूतकाल) में ओ, एत्थ, अ, म्हा और त्थरे, त्थो, व्हो, इ, म्हे (प्रत्यय होते हैं)। อปจฺจกฺเข ภุตานชฺชตเน’ตฺเถ จตฺตมานโต กฺริยตฺถา ออาทโย โหนฺติ; ชคาม, ชคมุ, ชคเม, ชคมิตฺถ, ชคม, ชคมิมฺห; ชคมิตฺถ, ชคมิเร, ชคมิตฺโถ, ชคมิวฺโห, ชคมิ, ชคมิมฺเห. –––––––––––––––––––- परोक्ष (जो आँखों के सामने न हो) अनद्यतन भूतकाल के अर्थ में 'अ' आदि प्रत्यय होते हैं; (जैसे) जगाम, जगमु, जगमे, जगमित्थ, जगाम, जगमिम्ह; जगमित्थ, जगमिरे, जगमित्थो, जगमिव्हो, जगमि, जगमिम्हे। มูฬฺหวิกฺขิตฺตพฺยาสตฺตจิตฺโตนตฺตนาปิ กฺริยา กตาภินิพฺพตฺติกาเล’นุปลทฺธา สมานา เอเลนานุมียมานา ปโรกฺขาจ วตฺถุโต; เตนุตฺตมวฺสเย’ปิ ปโยคสมฺภโว. मूढ़, विक्षिप्त या आसक्त चित्त वाले व्यक्ति द्वारा स्वयं की गई क्रिया भी, यदि निष्पत्ति के समय उपलब्ध (ज्ञात) न हो और बाद में लक्षणों से अनुमानित की जाए, तो वह वस्तुतः 'परोक्ष' ही है; इसलिए उत्तम पुरुष के विषय में भी इसका प्रयोग संभव है। เอยฺยาโท วาติปตฺติยยํ สฺสาสฺสํสุสฺเสสฺสถสฺสํสฺสมฺหาสฺสถ สฺสึสุสฺสเสสฺสวฺเหสฺสึสฺสาม อเส-. 'एय्या' आदि के विषय में क्रिया की अतिपत्ति (असिद्धि) होने पर 'स्सा' आदि प्रत्यय विकल्प से होते हैं। เอยฺยาโท วิสเย กฺริยาติปตฺติยํ สฺสาทโย โหนฺติ วิภาสา; วิธุรปฺปจฺจโยปนิปาตโต การณเวกลฺลโต วา กฺริยายาติ ปตนมนิปฺผตฺติ กฺริยาติปตฺติ; เอเต จ สฺสาทโย สามตฺถิยาตีตานาคเตสฺเวว โหนฺติ, น วตฺตมาเน, ตตฺร กฺริยาติปตฺตฺย สมฺภวา. 'एय्या' आदि के विषय में क्रिया की अतिपत्ति होने पर 'स्सा' आदि प्रत्यय विकल्प से होते हैं; प्रतिकूल कारणों के उपस्थित होने या कारणों की कमी से क्रिया का न होना 'क्रियातिपत्ति' है; और ये 'स्सा' आदि सामर्थ्य से अतीत और अनागत (भविष्य) में ही होते हैं, वर्तमान में नहीं, क्योंकि वहाँ क्रियातिपत्ति संभव नहीं है। สเจ ปฐมวเย ปพฺพชฺชํ อลภิสฺสา, อรหา อภวิสฺสา; ทกฺขิเณน เจ อคมิสฺสา, น สกฏํ ปริยาภวิสฺสา- ทกฺขิเณน เจ อคมิสฺสํสุ, อคมิสฺเส, อคมิสฺสถ, อคมิสฺสํ, อคมิสฺสมฺหา, อคมิสฺสถ, อคมิสฺสึสุ, อคมิสฺสเส, อคมิสฺสวฺเห,อคมิสฺสึ, อคมิสฺสาม อเส- น สกฏํ ปริยาภวิสฺสา. วาติ กึ? ทกฺขิเณน เจ คมิสฺสติ, น สกฏํ ปริยาภวิสฺสติ. 'यदि प्रथम अवस्था में प्रव्रज्या प्राप्त कर लेता, तो अर्हत् हो जाता (अलभिस्सा, अभविस्सा)'; 'यदि दक्षिण दिशा से जाता, तो छकड़ा नहीं उलटता' - यदि दक्षिण से जाते (अगमिस्संु), अगमिस्से, अगमिस्सथ, अगमिस्सं, अगमिस्सम्हा, अगमिस्सथ, अगमिस्सिंसु, अगमिस्ससे, अगमिस्सव्हे, अगमिस्सिं, अगमिस्साम असे - तो छकड़ा नहीं उलटता। 'विकल्प से' (वा) क्यों? 'यदि दक्षिण दिशा से जाएगा, तो छकड़ा नहीं उलटेगा' (भविष्य काल)। เหตุผเลสฺเวยฺยเอยฺยุํเอยฺยาสเอยฺยาถเอยฺยามิเอยฺยามเอถ เอรํเอโถเอยฺยวฺโหเอยฺยํเอยฺยามฺเห-. हेतु (कारण) और फल (कार्य) के अर्थ में एय्य, एय्युं, एय्यासि, एय्याथ, एय्यामि, एय्याम और एथ, एरं, एथो, एय्यवहो, एय्यं, एय्याम्हे (प्रत्यय होते हैं)। เหตุภุตายํ ผลภุตายญฺจ กฺริยายํ วตฺตมานโต กฺริยตฺถาเอยฺยาทโย วา โหนฺติ. हेतुभूत और फलभूत क्रिया में 'एय्या' आदि प्रत्यय विकल्प से होते हैं। สเจ สํขารา นิจฺจา ภเวยฺยุํ, น นิรุชฺเฌยฺยุํ; ทกฺขิเนณน เจ คจฺเฉยฺย, น สกฏํ ปริยาภเวยฺย-ทกฺขิเณน เจ คจฺเฉยฺยุํ, คจฺเฉยฺยาสิ, คจฺเฉยฺยาถ, คจฺเฉยฺยามิ, คจฺเฉยยฺยาม; คจฺเฉถ, คจฺเฉรํ, คจฺเฉโถ, คจฺเฉยฺยวฺโห, คจฺเฉยฺยํ, คจฺเฉยฺยามฺเห- น สกฏํ ปริยาภเวยฺย; ภวนํ คมนญฺจ เหตุ, อนิรุชฺฌนํ ปริยาภวนญฺจ ผลํ–-อิห กสฺมา น โหติ?- หนฺตีติ ปลายติ, วสฺสตีติ ธาวติ, หนิสฺสตีติ ปลายิสฺสตีติ? อิติสทฺเทเนว เหตุเหตุมนฺตตายย โชติตตฺตา วาติ กึ ทกฺขิเณน เจ คมิสฺสติ, น สกฏํ ปริยา ภวิสฺสติ. यदि संस्कार नित्य होते, तो वे निरुद्ध नहीं होते; यदि वह दक्षिण की ओर जाता, तो गाड़ी नहीं पलटती- यदि वे दक्षिण की ओर जाते, तुम जाते, तुम सब जाते, मैं जाता, हम सब जाते; तुम जाते, वे जाते, तुम जाते, तुम सब जाते, मैं जाता, हम सब जाते- गाड़ी नहीं पलटती; होना और जाना हेतु है, निरुद्ध न होना और न पलटना फल है—यहाँ क्यों नहीं होता?- 'हन्ति' (मारता है) तो भागता है, 'वस्सति' (वर्षा होती है) तो दौड़ता है, 'हनिस्सति' (मारेगा) तो 'पलायिस्सति' (भागेगा)? 'इति' शब्द से ही हेतु-हेतुमत्ता के प्रकाशित होने के कारण अथवा क्या दक्षिण की ओर जाएगा, गाड़ी नहीं पलटेगी। ปญฺหปตฺถนาวิธิสู-. प्रश्न, प्रार्थना और विधि में-। ปญฺโห-สมฺปุจฺฉนํ สมฺปธารณา นิรูปนา การิยนิจฺฉยนํ; ปตฺถนา-ยาวนมิฏฺฐาสึสนญฺจ; วิธานํ วิธิ นิโยชนํ กฺริยาสุ วฺยาปารณา; สา จ ทุวิธาว?- สาทรานาทรวเสน, วิสยเภเทน ภินฺนายปิ ตทุภยานติวตฺตนโต. प्रश्न- भली-भाँति पूछना, विचार करना, निरूपण करना और कार्य का निश्चय करना है; प्रार्थना- याचना और इष्ट की आकांक्षा है; विधान- विधि, नियोजन और क्रियाओं में प्रवृत्त करना है; और वह दो प्रकार की ही है?- सादर और अनादर के वश से, विषय के भेद से भिन्न होने पर भी उन दोनों का उल्लंघन न करने के कारण। เอเตสุ ปญฺหาทิสุ กฺริยตฺถโต เอยฺยาทโย โหนฺติ; ปญฺเห?-กิมายสฺมา วินยมฺปริยาปุเณยฺย,อุทาหุ ธมฺมํ?; คจฺเฉยฺยํ วาหํ อุโปสถํ, น วา คจฺเฉยฺยํ?, ปตฺถนายํ?- ลเภยฺยาหกกมฺภนฺเต ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ, ลเภยฺยํ อุปสมฺปทํ; ปสฺเสยฺยํ ตํ วสฺสสตํ อโรคํ. วิธิมฺหิ?-ภวํ ปตฺตํ ปเจยฺย, ภวํ ปุญฺญํ กเรยฺย, อิห ภวํ ภุญฺเชยฺย, อิห ภวํ นิสีเทยฺย, มาณวกํ ภวํ อชฺฌาเปยฺย–-อนุญฺญาปตฺตกาเลสุปิ สิทฺธาว, ตตฺถาปิ วิธิปฺปตีติโต; อนุญฺญายํ?เอวํกเรยฺยาสิ. ปตฺตกาเล?- กฏํ กเรยฺยาสิ, ปตฺโต เต กาโล กฏกรเณ; ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ สงฺโฆ อุโปสถํ กเรยฺย; เอตสฺส ภควา กาโล, เอตสฺส สุคต กาโล, ยมฺภควา สาวกานํ สิกฺขาปทํ ปญฺญเปยฺย–-เปสเน’ปิจฺฉนฺติ?- คามํ ตฺวํ ภเณ คจฺเฉยฺยาสิ. इन प्रश्न आदि में क्रिया के अर्थ में 'एय्य' आदि होते हैं; प्रश्न में?- क्या आयुष्मान् विनय का अध्ययन करेंगे अथवा धर्म का?; क्या मैं उपोसथ जाऊँ या न जाऊँ?, प्रार्थना में?- भन्ते! मैं भगवान् के समीप प्रव्रज्या प्राप्त करूँ, उपसम्पदा प्राप्त करूँ; मैं आपको सौ वर्ष तक नीरोग देखूँ। विधि में?- आप भात पकाएँ, आप पुण्य करें, यहाँ आप भोजन करें, यहाँ आप बैठें, आप माणवक (युवक) को पढ़ाएँ—अनुज्ञा और प्राप्तकाल (उचित समय) में भी सिद्ध ही हैं, वहाँ भी विधि की प्रतीति होने से; अनुज्ञा में? ऐसा करें। प्राप्तकाल में?- चटाई बनाएँ, आपके लिए चटाई बनाने का समय प्राप्त है; यदि संघ के लिए समय उचित हो, तो संघ उपोसथ करे; भगवान्! इसके लिए यह समय है, सुगत! इसके लिए यह समय है, कि भगवान् श्रावकों के लिए शिक्षापद प्रज्ञप्त करें—प्रेषण (आज्ञा) में भी चाहते हैं?- अरे! तुम गाँव जाओ। ตุอตฺตุหิถมิมตํอนฺตํสฺสุวฺโหญามเส-. तु, अन्तु, हि, थ, मि, म, तं, अन्तं, स्सु, व्हो, ए, आमसे-। ปญฺหาทิสฺเวเต โหนฺติ กฺริยตฺถโต; กฺริยตฺถโต; ยจฺฉตุ, คจฺฉนฺตุ, คจฺฉาหิ, คจฺฉถ, คจฺฉามิ, คจฺฉาม, คจฺฉตํ, คจฺฉนฺตํ, คจฺฉสฺสุ, คจฺฉวฺโห, คจฺเฉ, คจฺฉามเส–-ปญฺเห?- กินฺนุ พลุ โห วฺยากรณมธิยสฺสุ?. ปตฺถนายํ?- ททาหิ เม, ชิวตุ ภวํ. วิสิมฺหิ?-กฏํ กโรตุ ภวํ, ปุญฺญํ กโรตุ ภวํ, อิห ภวํ ภุญฺชตุ, อิหภวํ นิสีทตุ, อุทฺทิสตุ ภนฺเต ภควา ปาติโมกฺขา. เปสเน?- คจฺฉ ภเณ คามํ. อนุมติยํ?เอวํ กโรหิ. ปตฺตกาเล?-กาโล’ยํ เต มหาวีร อุปฺปชฺช มาตุกุจฺฉิยํ. प्रश्न आदि में ये क्रिया के अर्थ में होते हैं; क्रिया के अर्थ में; वह जाए, वे जाएँ, तुम जाओ, तुम सब जाओ, मैं जाऊँ, हम सब जाएँ, वह जाए, वे जाएँ, तुम जाओ, तुम सब जाओ, मैं जाऊँ, हम सब जाएँ—प्रश्न में?- क्या तुम व्याकरण पढ़ते हो? प्रार्थना में?- मुझे दो, आप जीवित रहें। विधि में?- आप चटाई बनाएँ, आप पुण्य करें, यहाँ आप भोजन करें, यहाँ आप बैठें, भन्ते! भगवान् पातिमोक्ष का निर्देश करें। प्रेषण में?- अरे! गाँव जाओ। अनुमति में? ऐसा करो। प्राप्तकाल में?- हे महावीर! यह आपके लिए माता की कुक्षि में उत्पन्न होने का समय है। สตฺตฺยรเหสฺเวยฺยาทิ-. शक्ति और अर्ह (योग्यता) के अर्थ में 'एय्य' आदि-। สตฺติยํ อรหตฺเถ จ กฺริยตฺถา. เอยฺยาทโย โหนฺติ; ภวํ ขลุ รชฺชํ กเรยฺย, ภวํ สตฺโต; อรโภ. शक्ति और अर्ह के अर्थ में क्रियाएँ होती हैं। 'एय्य' आदि होते हैं; आप निश्चय ही राज्य कर सकते हैं, आप समर्थ हैं; योग्य हैं। สมฺภาวเน วา-. सम्भावन (संभावना) में विकल्प से-। สมฺภาวเน คมฺยมาเน ธาตุนา วุจฺจมาเน จ เอยฺยาทโยโหนฺติ วิภาสา; อปิ ปพฺพตํ สิรสา ภินฺเทยฺย. กฺริยาติปตฺติยนฺตุสฺสาทิ?- อสนิยาปิ หโต นาปติสฺสา สมฺภาเวมิ สทฺทหามิอวกปฺเปมิ ภุญฺเชยฺย ภวํ; ภุชิสฺสติ ภวํ, อภุญฺชิ ภวํ. กฺรยาติปตฺติยนฺตุสฺสาทิ-สมฺภาเวมิ นาภุชิสฺสํ ภวํ. सम्भावन के प्रतीत होने पर और धातु द्वारा कहे जाने पर 'एय्य' आदि विकल्प से होते हैं; वह पर्वत को भी सिर से तोड़ सकता है। क्रियातिपत्ति (कार्य की असफलता) के अंत में 'उस्स' आदि?- बिजली से मारे जाने पर भी नहीं गिरेगा, ऐसी मैं सम्भावना करता हूँ, श्रद्धा करता हूँ, विश्वास करता हूँ कि आप भोजन करेंगे; आप भोजन करेंगे, आपने भोजन किया। क्रियातिपत्ति के अंत में 'उस्स' आदि- मैं सम्भावना करता हूँ कि मैं भोजन नहीं करूँगा। มาโยเค อีอาอาทิ-. 'मा' के योग में 'ई', 'आ' आदि-। มาโยเค สติ อีอาทโย อาอาทโย จ วา โหนฺติ; มาสฺสุปุนปิ เอวรูปมกาสิ, มา ภวํ อคมา วนํ; วาติ กึ? มา เตกามคุเณ ภมสฺสุ จิตฺตํ, มา ตฺวํ กริสฺสสิ, มา ตฺวํ กเรยฺยาสิ–-อสกกาลตฺโถ’ยมารมฺโภ; พุทฺโธ’ภวิสฺสตีติ ปทนฺตร สมฺพนฺเธน อนาคตกาลตา ปติยเต, เอวํ กโต กโฏ สฺเวภวิสฺสติ, ภาวิ กจฺจมาสีติ; ลุนาหิ ลุนาหิตฺเววายํ ลุนาติ, ลุนสฺสุ ลุนสฺสุตฺเววายํ ลุนาตีติ ตฺวาทีนเมเวตํ มชฺฌิมปุริ เสกวจนานมาภิกฺขญฺเญ วิพฺพวนํ; อิทํ วุตฺตํ โหติ?-เอวเมส ตุริโต อญฺเญ’ปิ นิโยเชนฺโต วิย กิริยํ กโรตีติ; เอวํ ลุนาถ ลุนาถาตฺเววายํ ลุนาติ, ลุนวฺโห ลุนวฺโห ตฺเววายํ ลุนาติ; ตถา กาลตฺตเรสุปิ ลุนาหิ ลุนาหิตฺเววายํ อลุนิ, อลุนา, ลุลาว, ลุนิสฺสตีติ; เอวํ สฺสุมฺหิ จ โยชนียํ–-ตถา สมุจฺจเย’ปิ มฐมฏ, วิหารมเฏตฺเววายมฏติ; มฐมฏสฺสุ, วิหารมฏสฺสุตฺเววายมฏติ–-พฺยาปารเภเท ตุ สามญฺญวจนสฺเสว พฺยาปกตฺตา อนุปฺปโยโค ภวติ? โอทนํ ภุญฺช, ยาคุมฺปิว, ธานา ขาเทตฺวาวายมชฺโฌหรติ. 'मा' का योग होने पर 'ई' आदि और 'आ' आदि विकल्प से होते हैं; फिर कभी ऐसा न करना, आप वन न जाएँ; 'वा' (विकल्प) क्यों? तुम्हारा चित्त कामगुणों में न भटके, तुम नहीं करोगे, तुम नहीं करो—यह अपने काल के अर्थ वाला आरम्भ है; 'बुद्धो भविष्यति' (बुद्ध होगा) इस प्रकार अन्य पद के सम्बन्ध से भविष्यत् काल की प्रतीति होती है, इसी प्रकार 'बनाई गई चटाई कल होगी', 'होने वाला कच्चा मांस' इत्यादि; 'काटो, काटो' इस प्रकार वह काटता है, 'काटो, काटो' इस प्रकार वह काटता है—यह 'तु' आदि मध्यम पुरुष एकवचन का ही बार-बार होने (आभीक्ष्ण्य) में स्पष्टीकरण है; यह कहा गया है?- इस प्रकार वह शीघ्रता करते हुए दूसरों को भी नियुक्त करते हुए के समान क्रिया करता है; इसी प्रकार 'काटो, काटो' (बहुवचन) इस प्रकार वह काटता है, 'काटो, काटो' (आत्मनेपद) इस प्रकार वह काटता है; उसी प्रकार अन्य कालों में भी 'काटो, काटो' इस प्रकार उसने काटा, उसने काटा, उसने काटा था, वह काटेगा; इसी प्रकार 'स्सु' में भी जोड़ना चाहिए—उसी प्रकार समुच्चय में भी 'मठ में घूमो, विहार में घूमो' इस प्रकार वह घूमता है; 'मठ में घूमो, विहार में घूमो' इस प्रकार वह घूमता है—व्यापार के भेद में तो सामान्य वचन के ही व्यापक होने से अनुप्रयोग होता है? भात खाओ, यवागू पियो, धान खाकर वह भोजन करता है। ปุพฺพปรจฺฉกฺกานเมกาเนเกสุ ตุมฺหามฺหเสเสสุ ทฺเวทฺเว มชฺฌิมุตฺตมปฐมา-. एक और अनेक 'तुम' और 'मैं' शब्दों के वाच्य होने पर और उनसे अन्य शब्दों के वाच्य होने पर कारकों में पूर्व छह और पर छह के मध्यम, उत्तम और प्रथम (पुरुष) के दो-दो (वचन) यथाक्रम क्रिया के अर्थ में होते हैं; यह 'उत्तम' शब्द स्वभाव से तीसरे द्विक (जोड़े) में रूढ़ है- तुम जाते हो, तुम सब जाते हो, तुम जाते हो, तुम सब जाते हो; तुम जाते हो, तुम सब जाते हो, तुम जाते हो, तुम सब जाते हो; मैं जाता हूँ, हम सब जाते हैं, मैं जाता हूँ, हम सब जाते हैं; वह जाता है, वे जाते हैं, वह जाता है, वे जाते हैं। เอกเนเกสุตุมฺหามฺหสทฺทวจนีเยสุ ตทญฺญสทฺทวจนีเยสุ จ การเกสุปุพฺพจฺฉกฺกานํ ปรจฺฉกฺกานํ มชฺฌิมุตฺตมปฐมา ทฺเว ทฺเว โหนฺติ ยถากฺกมํ กฺริยตฺถา; อุตฺตมสทฺโท’ยํ สภาวโต ตติยทุเก รุฬฺโห–-ตฺวํ คจฺฉสิ, ตุมฺเห คจฺฉถ, ตฺวํ คจฺฉเส, ตุมฺเห คจฺฉวฺเห; ตฺวํคจฺฉสิ, ตุมฺเห คจฺฉถ, ตฺวํ คจฺฉเส, ตุมฺเห คจฺฉวฺเห; อหํคจฺฉามิ, มยํ คจฺฉาม,อหํ คจฺเฉ, มยํ คจฺฉามฺเห; โส คจฺฉติ, เต คจฺฉนฺติ, โส คจฺฉเต, เต คจฺฉนฺเต. एक और अनेक 'तुम्ह' (युष्मद्) और 'अम्ह' (अस्मद्) शब्दों के वाच्य होने पर तथा उनसे भिन्न शब्दों के वाच्य होने पर, पूर्व छह (परस्मैपद) और पर छह (आत्मनेपद) के मध्यम, उत्तम और प्रथम पुरुष क्रमशः दो-दो होते हैं, जब क्रिया का अर्थ हो; यह 'उत्तम' शब्द स्वभाव से तृतीय द्विक (अन्तिम दो) में रूढ़ है—तुम जाते हो (tvaṃ gacchasi), तुम सब जाते हो (tumhe gacchatha), तुम जाते हो (tvaṃ gacchase), तुम सब जाते हो (tumhe gacchavhe); मैं जाता हूँ (ahaṃ gacchāmi), हम जाते हैं (mayaṃ gacchāma), मैं जाता हूँ (ahaṃ gacche), हम जाते हैं (mayaṃ gacchāmhe); वह जाता है (so gacchati), वे जाते हैं (te gacchanti), वह जाता है (so gacchate), वे जाते हैं (te gacchante)। สามตฺถิยา ลทฺธนฺตา อปฺปฐุชฺชมาเนสุปิ ตุมฺหามฺหเสเสสุ ภวนฺติ–-คจฺฉสี, คจฺฉถ, คจฺฉเส, คจฺฉวฺเห; คจฺฉามิ, คจฺฉาม, คจฺเฉ, คจฺฉามฺเห; คจฺฉติ,คจฺฉนฺติ, คจฺฉเต, คจฺฉนฺเต. सामर्थ्य से प्राप्त होने वाले (प्रत्यय) 'तुम्ह' और 'अम्ह' के प्रयोग न होने पर भी होते हैं—गच्छसि, गच्छथ, गच्छसे, गच्छवहे; गच्छामि, गच्छाम, गच्छे, गच्छामहे; गच्छति, गच्छन्ति, गच्छते, गच्छन्ते। อาอีสฺสาทิสฺวญ วา-. 'आ', 'ई', 'स्सा' आदि के परे होने पर 'अञ' विकल्प से होता है। อาอาโท อีอาโท สฺสาอาโท จ กฺริยตฺถสฺส วา อญ โหติ, ญกาโร’นุพนฺโธ–-อคมา, คมา; อคมี, คมี; อคมิสฺสา, คมิสฺสา. 'आ' आदि, 'ई' आदि और 'स्सा' आदि के परे होने पर क्रियार्थक (धातु) को विकल्प से 'अञ' होता है, 'ञ'कार अनुबन्ध है—अगम, गम; अगमी, गमी; अगमिस्सा, गमिस्सा। ออาทิสฺวาโห พฺรูสฺส-. พฺรูสฺส อาโห โหติ ออาทิสุ; อาห, อาหุ. 'अ' आदि के परे होने पर 'ब्रू' धातु को 'आह' होता है; 'अ' आदि में 'ब्रू' को 'आह' होता है; आह, आहु। ภุสฺส จุก-. 'भू' धातु को 'चुक' होता है। ออาทิสุ ภุสฺส จุก โหติ; กกาโร’นุพนฺโธ; อุกาโร อุจฺจารณตฺโถ; พภุว. 'अ' आदि के परे होने पर 'भू' धातु को 'चुक' होता है; 'क'कार अनुबन्ध है; 'उ'कार उच्चारण के लिए है; बभूव। ปุพฺพสฺส อ-. पूर्व (वर्ण) को 'अ' होता है। ออาทิสุ ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส ภุสฺสอ โหติ; พภุว. 'अ' आदि के परे होने पर द्वित्व होने पर 'भू' के पूर्व (वर्ण) को 'अ' होता है; बभूव। อุสฺสํสฺวาหา วา-. 'उ' और 'अंसु' के स्थान पर विकल्प से 'आह' होता है। อาหาเทสา ปรสฺสฺौสฺสอํสุวา โหติ; อาหํสุ อาหุ. 'आह' आदेश के बाद 'उ' और 'अंसु' विकल्प से होते हैं; आहंसु, आहु। ตฺยนฺตีนํ ฏฏู-. 'ति' और 'अन्ति' के स्थान पर 'ट' और 'टू' होते हैं। อาหา ปเรสํ ติอนฺตีนํ ฏฏู โหนฺติ; ฏการา สพฺพาเทสตฺถา; อาห, อาหุ. อโตเยว จ ญาปกา ติอนฺติสุ จ พฺรูสฺสาโห. 'आह' के बाद 'ति' और 'अन्ति' को 'ट' और 'टू' होते हैं; 'ट'कार सर्वादेश के लिए है; आह, आहु। इसी ज्ञापक से 'ति' और 'अन्ति' में भी 'ब्रू' को 'आह' होता है। อีอาโทวจสฺโสม-. 'ई' आदि के परे होने पर 'वच' धातु को 'ओम' होता है। อีอาทิสุวจสฺส โอม โหติ; มกาโร’นุพนฺธา; อโวจ; อีอาโทติ กึ? อวจ. 'ई' आदि के परे होने पर 'वच' धातु को 'ओम' होता है; 'म'कार अनुबन्ध है; अवोच; 'ई' आदि क्यों? अवच। ทาสฺส ทํ วา มเมสฺวทฺวิตฺเต-. द्वित्व न होने पर 'मि' और 'म' के परे होने पर 'दा' धातु को विकल्प से 'दं' होता है। อทฺวิตฺเต วตฺตมานสฺส ทาสฺส ทํ วา โหติ มิเมสุ; ทมฺมิ,เทมิ; ทมฺม, เทม. อญฺจิตฺเตติ กึ? ททามิ. ททาม. द्वित्व न होने पर वर्तमान काल में 'दा' धातु को 'मि' और 'म' के परे होने पर विकल्प से 'दं' होता है; दम्मि, देमि; दम्म, देम। 'अद्वित्ते' (अञ्चित्ते) क्यों? ददामि, ददाम। กรสฺส โสสฺสกุํ-. 'कर' धातु के 'ओ'कार सहित को 'कुं' होता है। กรสฺส สโอการสฺส กุํ วา โหติ มิเมสุ; กุมฺมิ, กุมฺม; กโรมิ, กโรม. 'कर' धातु के 'ओ'कार सहित को 'मि' और 'म' के परे होने पर विकल्प से 'कुं' होता है; कुम्मि, कुम्म; करोमि, करोम। กา อีอาทิสุ-. 'ई' आदि के परे होने पर 'का' होता है। กรสฺส สโอการสฺสกา โหติ วา อีอาทิสุ; อกาสิ, อกริ; อกํสุ, อกรึสุ; อกา, อกรา. 'कर' धातु के 'ओ'कार सहित को 'ई' आदि के परे होने पर विकल्प से 'का' होता है; अकासि, अकरि; अकंसु, अकरिंसु; अका, अकरा। หาสฺสจาหงิ สฺเสน-. 'कर' के 'ओ'कार सहित और 'हा' धातु को 'स्स' के साथ 'आह' और 'अह' (विकल्प से) होते हैं। กรสฺสโสสฺสหาสฺสจ อาหงิ วา โหติ สฺเสน สห; กาหติ, กริสฺสติ; อกาหา, อกริสฺสา;หาหตี, หายิสฺสติ; อาหาหา, อหายิสฺสา. 'कर' के 'ओ'कार सहित और 'हा' धातु को 'स्स' के साथ विकल्प से 'आह' और 'अह' होते हैं; काहति, करिस्सति; अकाहा, अकरिस्सा; हाहति, हायिस्सति; अहाहा, अहायिस्सा। ลภวสจฺฉิทภิทรุทานํ จฺฉงิ-. 'लभ', 'वस', 'छिद', 'भिद' और 'रुद' धातुओं को 'च्छ' होता है। ลภาทีนํ จฺฉงิ วา โหติ สฺเสน สห; อลจฺฉา, อลภิสฺสา, ลจฺฉติ, ลภิสฺสติ; อวจฺฉา, อวสิสฺสา; วจฺฉติ, วสิสฺสติ; จฺเฉจฺฉา, อจฺฉินฺทิสฺสา; เฉจฺฉติ. ฉินฺทิสฺสติ; เหจฺฉา, ภินฺทิสฺสา; เภจฺฉติ,ภินฺทิสฺสติ; อรุจฺฉา, อโรทิสฺสา; รุจฺฉติ, โรทิสฺสติ. อญฺญสฺมิมฺปิ ฉิทสฺส วา จฺฉงิ โยควิภาคา?- อจฺเฉจฺฉุํ, อจฺฉินฺทึสุ. อญฺเญสํ ว?-คจฺฉํ, คจฺฉิสฺสํ. 'लभ' आदि धातुओं को 'स्स' के साथ विकल्प से 'च्छ' होता है; अलच्छा, अलभिस्सा, लच्छति, लभिस्सति; अवच्छा, अवसिस्सा; वच्छति, वसिस्सति; च्छेच्छा, अच्छिन्दिस्सा; च्छेच्छति, छिन्दिस्सति; भेच्छा, भिन्दिस्सा; भेच्छति, भिन्दिस्सति; अरुच्छा, अरोदिस्सा; रुच्छति, रोदिस्सति। योगविभाग से अन्यत्र भी 'छिद' को विकल्प से 'च्छ' होता है?—अच्छेच्छुं, अच्छिंदिंसु। अन्यों के समान?—गच्छं, गच्छिस्सं। ภุชมุจวจวิสานํ กฺขงิ-. 'भुज', 'मुच', 'वच' और 'विस' धातुओं को 'क्ख' होता है। ภุชาทีนํ กฺขงิ วา โหติ สฺเสน สห; อโภกฺขา, อภุญฺชิสฺสา; โภกฺขติ, ภุชิสฺสติ; อโมกฺขา, อมุญฺจิสฺสา; โมกฺขตึ มุญฺจิสฺสติ; อจกฺขา, อวจิสฺสา; จกฺขติ. วจิสฺสติ; ปาเวกฺขา, ปาวิสิสฺสา; ปเวกฺขติ, ปวิสิสฺสติ. วิสสฺสาญฺญสฺมิมฺปิ วา กฺขงิ โยควิภาคา?-ปาเวกฺขิ, ปาวิสิ. 'भुज' आदि धातुओं को 'स्स' के साथ विकल्प से 'क्ख' होता है; अभोक्खा, अभुञ्जिस्सा; भोक्खति, भुञ्जिस्सति; अमोक्खा, अमुञ्चिस्सा; मोक्खति, मुञ्चिस्सति; अचक्खा, अवचिस्सा; चक्खति, वचिस्सति; पावेक्खा, पाविस्सिस्सा; पवेक्खति, पविस्सति। योगविभाग से 'विस' धातु को अन्यत्र भी विकल्प से 'क्ख' होता है?—पावेक्खि, पाविमि। อาอีอาทิสุ หรสฺสา-. 'आ', 'ई' आदि के परे होने पर 'हर' धातु को 'आ' होता है। อาอาโทอีอาโท จ หรสฺสอา โหติจา; อหา, อหรา; อภาสิ, อภริ. 'आ' आदि और 'ई' आदि के परे होने पर 'हर' धातु को 'आ' होता है; अहा, अहरा; अभासि, अभरि। คมิสฺส-. 'गम' धातु को। อาอาโทอีอาโท จ คมิสฺสา โหติ วา; อคา, อคมา; อคา,อคมิ. สํสสฺส จ ฉงิ-. 'आ' आदि और 'ई' आदि के परे होने पर 'गम' धातु को विकल्प से 'आ' होता है; अगा, अगमा; अगा, अगमि। और 'संस' धातु को 'छ' होता है। สํสสฺส จ คมิสฺส จ ฉงิ วา โหติ อาอีอาทิสุ; อฑญฺฉา, อฑํสา; อฑญฺฉิ,อฑํสิ; อคญฺฉา, อคจฺฉา, อคญฺฉิ, อคจฺฉิ. 'संस' (saṃsa) और 'गमि' (gami) के स्थान पर 'आ', 'ई' आदि के परे होने पर 'छ' (cha) और 'ङि' (ṅi) विकल्प से होते हैं; जैसे- अड़ञ्छा, अड़ंसा; अड़ञ्छि, अड़ंसि; अगञ्छा, अगच्छा, अगञ्छि, अगच्छि। หูสฺสเหเหหิโหหี สฺสจฺจาโท-. 'हू' (hū) धातु के स्थान पर 'स्स' आदि के परे होने पर 'हे', 'हेहि' और 'होहि' आदेश होते हैं। หูสฺส หฺญาทโย โหนฺติ สฺสจฺจาโท; เหสฺสติ, เหหิสฺสติ, โหหิสฺสติ. 'हू' (hū) के स्थान पर 'स्स' आदि के परे होने पर 'हे' आदि होते हैं; जैसे- हेस्सति, हेहिस्सति, होहिस्सति। ณานาสุ รสฺโส-. 'णा' और 'ना' के परे होने पर ह्रस्व होता है। กณกนาสุ กฺริยตฺถสฺสรสฺโส โหติ; กิณาติ, ธุนาติ. 'कणा' और 'कना' के परे होने पर क्रियार्थक (धातु) के स्वर को ह्रस्व होता है; जैसे- किणाति, धुनाति। อาอีอูมฺหาสฺสาสฺสมฺหานํ วา-. 'आ', 'ई', 'ऊ', 'म्ह', 'स्सा', 'स्सम्ह' का विकल्प से ह्रस्व होता है। เอสํ วา รสฺโส โหติ; คม, คมา; คมิ, คมี; คมุ; คมิมฺห, คมิมฺหา; คมิสฺส, คมิสฺสา; คมิสฺสมฺห, คมิสฺสมฺหา. इनका विकल्प से ह्रस्व होता है; जैसे- गम, गमा; गमि, गमी; गमु; गमिम्ह, गमिम्हा; गमिस्स, गमिस्सा; गमिस्सम्ह, गमिस्सम्हा। กุสรุเหหิสฺส ฉิ-. 'कुस' और 'रुह' धातुओं से परे 'इस्स' के स्थान पर 'छि' होता है। กุสา รุหา จ ปรสฺส อีสฺส ฉิ วา โหติ; อกฺโกจฺฉิ, อกฺโกสิ; อภิรุจฺฉิ, อภิรุหิ. 'कुस' और 'रुह' से परे 'इस्स' के स्थान पर विकल्प से 'छि' होता है; जैसे- अक्कोच्छि, अक्कोसि; अभिरुच्छि, अभिरुहि। ออีสฺสอาทีนํ พฺยญฺชนสฺสิญ-. 'अ', 'इस्स' आदि के व्यंजन के स्थान पर 'इञ' होता है। กฺริยตฺถา ปเรสํ ออาทีนํ อีอาทินํ สฺสอาทีนว พฺยญฺชนสฺสฺैญ โหติ วิภาสา; พภุวิตฺถ,อภวิตฺถ, อภวิสฺสา, อนุภวิสฺสา, อนุภวิสฺสติ, อนุโภสฺสติ, (หริสฺสติ) หสฺสติ. เอเตสนฺติ กึ? ภวติ; พฺยญฺชนสฺสาติ กึ? พภุว. क्रियार्थक (धातुओं) से परे 'अ' आदि, 'ई' आदि और 'स्स' आदि के व्यंजन के स्थान पर विकल्प से 'इञ' होता है; जैसे- बभुवित्थ, अभवित्थ, अभविस्सा, अनुभवविस्सा, अनुभवविस्सति, अनुभोसति, (हरिस्सति) हस्सति। 'इनका' ऐसा क्यों कहा? भवति; 'व्यंजन का' ऐसा क्यों कहा? बभुव। พฺรูโต ติสฺสีญ-. 'ब्रू' धातु से परे 'ति' के स्थान पर 'ईञ' होता है। พฺรูโต ปรสฺส ติสฺส อีญ วา โหติ; พฺรวีติ, พฺรูติ. 'ब्रू' से परे 'ति' के स्थान पर विकल्प से 'ईञ' होता है; जैसे- ब्रवीति, ब्रूति। กฺยสฺส-. 'क्य' के स्थान पर। กฺริยตฺถา ปรสฺสกฺยสฺส อีญฺวา โหติ; ปจียติ ปจฺจติ. क्रियार्थक (धातु) से परे 'क्य' के स्थान पर विकल्प से 'इञ' होता है; जैसे- पचीयति, पच्चति। เอยฺยาถสฺสฺญอาอีถานํ โอออํตฺถตฺโถวฺโหก-. 'एय्याथ', 'स्स', 'अ', 'ई', 'थ' के स्थान पर क्रमशः 'ओ', 'अ', 'अं', 'त्थ', 'त्थो', 'व्हो' आदि होते हैं। เอยฺยาถาทีนํ โออาทโย วา โหนฺติ ยถากฺกมํ; ตุมฺเห ภเวยฺยาโถ, ภเวยฺยาถ; ตฺวํ อภวิสฺส, อภวิสฺเส; อหํ อภวํ, อภว; โส อภวิตฺถ, อภวา; โส อภวิตฺโถ, อภวี; ตุมฺเห ภวถวฺโห, ภวถ–-อาสหวริโตว อกาโร คยฺหเต–-โถ ปนนฺเต นิทฺเทสา ตฺวาทิสมฺพนฺธีเยว, ตสฺเสว วา นิสฺสีตตฺตา; นิสฺสยยกรณมฺปิ หิ สุตฺตการาวิณฺณํ. 'एय्याथ' आदि के स्थान पर यथाक्रम 'ओ' आदि विकल्प से होते हैं; जैसे- तुम्हे भवेय्याथो, भवेय्याथ; त्वं अभविस्स, अभविस्से; अहं अभवं, अभव; सो अभवित्थ, अभवा; सो अभवित्थो, अभवी; तुम्हे भवथव्हो, भवथ। यहाँ 'आ' के साथ ही 'अ' कार ग्रहण किया जाता है। 'थो' का निर्देश अन्त में होने से वह 'त्वा' आदि से ही सम्बन्धित है, या उसी के आश्रित होने के कारण; क्योंकि सूत्रकारों का अभिप्राय आश्रय करना ही है। อุํสฺสึสฺวํสุ -. 'उं' के स्थान पर 'इंसु' और 'अंसु' होते हैं। อุมิจฺจสฺส อึสุอํสุ วา โหนฺติ; อคมึสุ, อคมํสุ, อคมุํ. 'उं' के स्थान पर विकल्प से 'इंसु' और 'अंसु' होते हैं; जैसे- अगमिंसु, अगमंसु, अगमुं। เอมนฺตา สุํ-. 'ए' और 'ओ' के बाद 'उं' के स्थान पर 'सुं' होता है। ญาเทสโต โออาเทสโต จ ปรสฺส อุมิจฺจสฺส สุํ วา โหติ; เนสุํ, นยึสุ; อสฺโสสุํ, อสฺสุํ–-อาเทสตฺตาขฺยา ปนตฺถํ ตฺตคฺคหณํ. 'ञा' आदेश और 'ओ' आदेश से परे 'उं' के स्थान पर विकल्प से 'सुं' होता है; जैसे- नेसुं, नयिंसु; अस्सोसुं, अस्सुं। यहाँ 'त' का ग्रहण आदेश के कथन के लिए है। หูโต เรสุํ-. 'हू' धातु से परे 'उं' के स्थान पर 'रेसुं' होता है। หูโต ปรสฺส อุมิจฺจสฺส เรสุํ วา โหติ; อเหสุํ, อหวุํ. 'हू' से परे 'उं' के स्थान पर विकल्प से 'रेसुं' होता है; जैसे- अहेसुं, अहवुं। โอสฺส ऐตฺถตฺโถ-. 'ओ' के स्थान पर 'अ', 'त्थ', 'त्थो' होते हैं। โอสฺส ออาทโย วา โหนฺติ; ตฺวํ อภว, อภวิ, อภวิตฺถ, อภวิตฺโถ, อภโว. 'ओ' के स्थान पर विकल्प से 'अ' आदि होते हैं; जैसे- त्वं अभव, अभवि, अभवित्थ, अभवित्थो, अभवो। สิ-. 'ओ' के स्थान पर 'सि' होता है। โอสฺส สิ วา โหติ; อโหสิ ตฺวํ อหุโว. 'ओ' के स्थान पर विकल्प से 'सि' होता है; जैसे- अहोसि, त्वं अहुवो। ทีฆา อีสฺส-. दीर्घ स्वर के बाद 'ई' के स्थान पर 'सि' होता है। ทีฆโต ปรสฺส อีสฺส สิ วา โหติ; อกาสิ, อกา; อทาสิ, อทา. दीर्घ से परे 'ई' के स्थान पर विकल्प से 'सि' होता है; जैसे- अकासि, अका; अदासि, अदा। มฺหาตฺถานมุญ-. 'म्ह' और 'त्थ' के स्थान पर 'उं' होता है। มฺหาตฺถานมุญฺทฺวา โหติ; อคมุมฺหา, อคมิมฺหา; อคมุตฺถ, อคมิตฺถ. 'म्हा' के स्थान पर 'उं' विकल्प से होता है; हम गए, हम गए; तुम गए, तुम गए। อึสฺส จ สิญ-. और 'इम्' का 'सिञ्' (होता है)-। อิมิจฺจสฺส สิญ วา โหติ มฺหาตฺถานญฺจ พหุลํ; อกาสึ, อกรึ; ออกาสิมฺหา, อกริมฺหา;อกาสิตฺถ, อกริตฺถ. इम् (im) के स्थान पर 'सिं' (siṃ) विकल्प से होता है और 'म्ह' (mha) के स्थान पर बहुलता से होता है; जैसे—अकासिं (akāsiṃ), अकरिं (akariṃ); अकासिम्ह (akāsimha), अकरिम्ह (akarimha); अकासित्थ (akāsittha), अकरित्थ (akarittha)। เอยฺยุํสฺสุํ-. एय्युं (eyyuṃ) के स्थान पर 'स्सुं' (ssuṃ) होता है। เอยฺยุมิจฺจสฺส อุํ วา โหติ; คจฺฉุํ, คจฺเฉยฺยุํ. एय्युं (eyyuṃ) के स्थान पर 'उं' (uṃ) विकल्प से होता है; जैसे—गच्छुं (gacchuṃ), गच्छेय्युं (gaccheyyuṃ)। หิสฺสโต โลโป-. 'हि' (hi) का लोप होता है। อโต ปรสฺส หิสฺส โลโป วา โหติ; คจฺฉ, คจฺฉาหิ–-อโตติ กึ? กโรหิ. 'अ' (a) के बाद आने वाले 'हि' (hi) का विकल्प से लोप होता है; जैसे—गच्छ (gaccha), गच्छाहि (gacchāhi)। 'अ' से (ato) क्यों कहा? करोहि (karohi)। กฺยสฺส สฺเส-. 'क्य' (kya) के स्थान पर 'स्से' (sse) होता है। กฺยสฺส วา โลโป โหติ สฺเส; อนฺธภวิสฺสา, อนฺวภุยิสฺสา, อนุภวิสฺสติ, อนุภุยิสฺสติ. 'स्से' (sse) परे होने पर 'क्य' (kya) का विकल्प से लोप होता है; जैसे—अन्धभविस्सा (andhabhavissā), अन्वभुयिस्सा (anvabhuyissā), अनुभविस्सति (anubhavissati), अनुभयिस्सति (anubhuyissati)। อตฺถิเตยฺยาทิจฺฉนฺตํ สฺสุสสถสํสาม -. 'अत्थि' (as धातु) से परे 'एय्या' आदि छह प्रत्ययों के स्थान पर क्रमशः स, सु, स, सथ, सं, साम होते हैं। อส-ภุวีจฺจสฺมา ปเรสํเอยฺยาทิจฺฉนฺนํ สาทโย โหนฺติ ยถากฺกมํ; อสฺส, อสฺสุ, อสฺส, อสฺสถ, อสฺสํ, อสฺสาม. 'अस' (as) और 'भु' (bhū) धातुओं से परे 'एय्या' आदि छह प्रत्ययों के स्थान पर क्रमशः 'सा' आदि (स, सु, स, सथ, सं, साम) होते हैं; जैसे—अस्स (assa), अस्सु (assu), अस्सा (assa), अस्सथ (assatha), अस्सं (assaṃ), अस्साम (assāma)। อาทิทฺวีนฺนมิยาอิยุํ-. आदि के दो (प्रथम पुरुष एकवचन और बहुवचन) के स्थान पर 'इया' (iyā) और 'इसुं' (isuṃ) होते हैं। อตฺถิเตยฺยาทิจฺฉนฺนํ อาทิภูตานํ ทฺวินฺนํ อิยาอิสุํ โหนฺติ ยถากฺกมํ; สิยา, สิยุํ. 'अत्थि' (as धातु) से परे 'एय्या' आदि छह प्रत्ययों में से आदि के दो के स्थान पर क्रमशः 'सिया' (siyā) और 'सियुं' (siyuṃ) होते हैं। ตสฺสโถ-. 'त' (ta) के स्थान पर 'थो' (tho) होता है। อตฺถิโต ปรสฺส ตการสฺส โถ โหติ; อตฺถ, อตฺถุ. 'अत्थि' (as धातु) से परे 'त' (ta) कार के स्थान पर 'थो' (tho) होता है; जैसे—अत्थ (attha), अत्थु (atthu)। สิหิสฺวฏ-. 'सि' (si) और 'हि' (hi) परे होने पर 'अत्थि' (as धातु) के स्थान पर 'अट' (aṭa) होता है। อตฺถิสฺส อฏ โหติ สิหิสุ; โฏ สพฺพาเทสตฺโถ; อสิ, อหิ. 'सि' (si) और 'हि' (hi) परे होने पर 'अत्थि' (as धातु) के स्थान पर 'अट' (aṭa) होता है; 'ट' सम्पूर्ण आदेश के लिए है; जैसे—असि (asi), अहि (ahi)। มิมานํ วา มฺหิมฺหา จ-. 'मि' (mi) और 'म' (ma) के स्थान पर विकल्प से 'म्हि' (mhi) और 'म्ह' (mha) होते हैं। อตฺถิสฺมา ปเรสํ มิมานํ มฺหิมฺหา วา โหนฺติ, ตํสนฺติโย เคน ตฺถิสฺส อฏ จ; อมฺหิ,อสฺมิ; อมฺห, อสฺม. 'अत्थि' (as धातु) से परे 'मि' (mi) और 'म' (ma) के स्थान पर विकल्प से 'म्हि' (mhi) और 'म्ह' (mha) होते हैं, और उस स्थिति में 'अत्थि' के स्थान पर 'अट' (aṭa) भी होता है; जैसे—अम्हि (amhi), अस्मि (asmi); अम्ह (amha), अस्म (asma)। เอสุ ส-. इन (मि, म) के परे होने पर 'स' (sa) होता है। เอสุ มิเมสุอตฺถิสฺส สกาโร โหติ; อสฺมิ, อสฺม; ปรรูปพาธนตฺถํ. इन 'मि' और 'म' के परे होने पर 'अत्थि' (as धातु) के स्थान पर 'स' (sa) कार होता है; जैसे—अस्मि (asmi), अस्म (asma); यह पररूप के बाध के लिए है। อีอาโท ทีโฆ-. 'ई' (ī) आदि के परे होने पर दीर्घ होता है। อตฺถิสฺส ทีโฆ โหติ อีอาทิมฺหิ; อาสิ, อาสุํ, อาสิ, อาสิตฺถ, อาสึ, อาสิมฺหา. 'ई' (ī) आदि के परे होने पर 'अत्थि' (as धातु) को दीर्घ होता है; जैसे—आसि (āsi), आसुं (āsuṃ), आसि (āsi), आसित्थ (āsittha), आसिं (āsiṃ), आसिम्ह (āsimha)। หิมิเมสฺวสฺส-. อการสฺส ทีโฆ โหติ หิมิเมสุ; ปวาหิ, ปวามิ, ปวาม; มุยฺหามิ. 'हि', 'मि' और 'म' के परे होने पर 'अ' कार का दीर्घ होता है; जैसे—पवाहि (pavāhi), पवामि (pavāmi), पवाम (pavāma); मुय्हामि (muyhāmi)। สกา ณาสฺส ข อีอาโท-. 'सक' (sak) धातु से परे 'णा' (ṇā) के स्थान पर 'ख' (kha) होता है, 'ई' आदि के परे होने पर। สกสฺมา กณาสฺส โข โหติ อี อาทิสุ; อสกฺขิ, อสกฺขึสุ. 'सक' (sak) धातु से परे 'कणा' (kaṇā) के स्थान पर 'ख' (kha) होता है, 'ई' आदि के परे होने पर; जैसे—असक्खि (asakkhi), असक्खिंसु (asakkhiṃsu)। สฺเส วา-. 'स्से' (sse) परे होने पर विकल्प से होता है। สกสฺมา กณาสฺส โข วา โภติ สฺเส; สกฺขิสฺสา, สกฺกุณิสฺสา; สกฺขิสฺสติ, สกฺกุณิสฺสติ. 'सक' (sak) धातु से परे 'कणा' (kaṇā) के स्थान पर 'ख' (kha) विकल्प से होता है, 'स्से' (sse) परे होने पर; जैसे—सक्खिस्सा (sakkhissā), सक्कुणिस्सा (sakkuṇissā); सक्खिस्सति (sakkhissati), सक्कुणिस्सति (sakkuṇissati)। เตสุ สุโต เกณากณานํ โรฏ-. उन ('ई' आदि) के परे होने पर 'सु' (su) धातु से परे 'केणा' और 'कणा' के स्थान पर 'रोट' (roṭa) होता है। เตสุ อีอาทิสฺเสสุ สุโต ปเรสํ เกณากณานํ โรฏ โหติ; อสฺโสสิ, อสุณิ; อสฺโสสฺสา, อสุณิสฺสา; โสสฺสติ, สุณิสฺสติ. उन 'ई' आदि के परे होने पर 'सु' (su) धातु से परे 'केणा' और 'कणा' के स्थान पर 'रोट' (roṭa) होता है; जैसे—अस्सोसि (assosi), असुणि (asuṇi); अस्सोस्सा (assossā), असुणिस्सा (asuṇissā); सोस्सति (sossati), सुणिस्सति (suṇissati)। ญาสฺส สนาสฺส นาโย ติมฺหิ-. ñā धातु और sanā प्रत्यय के स्थान पर 'ti' परे होने पर nāyo आदेश होता है। สนาสฺส ญาสฺส นาโย วา โหติ ติมฺหิ; นายติ. ชานาติ. 'ti' परे होने पर sanā और ñā के स्थान पर विकल्प से nāyo होता है; जैसे- nāyati, jānāti। ญมฺหิ ชํ-. ña प्रत्यय परे होने पर jaṃ आदेश होता है। ญาเทเส สนาสฺส ญาสฺส ชํ วา โหติ; ชญฺญา, ชาเนยฺย. ñā आदेश होने पर sanā और ñā के स्थान पर विकल्प से jaṃ होता है; जैसे- jaññā, jāneyya। เอยฺยสฺสิยาญา วา-. eyya के स्थान पर विकल्प से iyā और ñā होते हैं। ญาโต เอยฺยสฺส อิยาญา โหนฺติ วา; ชานิยา, ชญฺญา, ชาเนยฺย. ñā धातु से परे eyya के स्थान पर विकल्प से iyā और ñā होते हैं; जैसे- jāniyā, jaññā, jāneyya। อีสฺสจฺจาทิสุ กนา โลโป-. ī, ssacca आदि परे होने पर kanā का लोप होता है। อีอาโท สฺสจฺจาโท จ ญาโต กนา โลโป วา โหติ; อญฺญสิ, อชานิ; ญสฺสติ, ชานิสฺสติ. ī आदि और ssacca आदि परे होने पर ñā धातु से kanā का विकल्प से लोप होता है; जैसे- aññasi, ajāni; ñassati, jānissati। สฺสสฺส หิ กมฺเม-. कर्मवाच्य में ssa के स्थान पर hi होता है। ญาโต ปรสฺสสฺสสฺส หิ วา โหติ กมฺเม; ปญฺญายิหิติ, ปญฺญายิสฺสตี, ñā धातु से परे ssa के स्थान पर कर्मवाच्य में विकल्प से hi होता है; जैसे- paññāyihiti, paññāyissatī। เอติสฺมา-. eti धातु से परे। เอติสฺมา ปรสฺสสฺสสฺสหิ โหติ วา; เอหิติ, เอสฺสติ. eti धातु से परे ssa के स्थान पर विकल्प से hi होता है; जैसे- ehiti, essati। หนา เฉขา-. han धातु से परे ssa के स्थान पर che और khā होते हैं। หนา สฺสสฺส เฉขา วา โหนฺติ; หญฺเฉม, หนิสฺสาม; ปฏิหํขามิ, ปฏิหนิสฺสามิ. han धातु से परे ssa के स्थान पर विकल्प से che और khā होते हैं; जैसे- hañchema, hanissāma; paṭihaṃkhāmi, paṭihanissāmi। หาโต ห-. hā धातु से परे। หาโต ปรสฺส สฺสสฺส ห โหติ วา; หาหติ, ฉหิสฺสติ. hā धातु से परे ssa के स्थान पर विकल्प से ha होता है; जैसे- hāhati, chahissati। ทกฺขขเหหิโหหีหิ โลโป-. dakkha, kha, he, hi, ho, hī के बाद ssa का लोप होता है। ทกฺขาทีหิ อาเทเสหิ ปรสฺสสฺสสฺส โลโป วา โหติ; ทกฺขติ. ทกฺขิสฺสติ; สกฺขติ, สกฺขิสฺสติ; เหหิติ, เหหิสฺสติ; โหหิติ, โหหิสฺสติ. dakkha आदि आदेशों से परे ssa का विकल्प से लोप होता है; जैसे- dakkhati, dakkhissati; sakkhati, sakkhissati; hehiti, hehissati; hohiti, hohissati। กยิเรยฺยสฺเสยฺยุมาทีนํ-. kayira से परे eyya, eyyuṃ आदि का। กยิรา ปรสฺเสยฺยุมาทีนเมยฺยสฺส โลโป โหติ; กยิรุํ, กยิราสิ, กยิราถ, กยิรามิ, กยิราม. kayira से परे eyyuṃ आदि के eyya भाग का लोप होता है; जैसे- kayiruṃ, kayirāsi, kayirātha, kayirāmi, kayirāma। ฏา-. ṭā आदेश। กยิรา ปรสฺส เอยฺยสฺสฏา โหติ; โสกยิรา. kayira से परे eyya के स्थान पर ṭā होता है; जैसे- so kayirā। เอถสฺสา-. etha के स्थान पर ā। กยิรา ปรสฺเสถสฺส อา โหติ; กยิราถ. kayira से परे etha के स्थान पर ā होता है; जैसे- kayirātha। ลภา อึอีนํ ถํถา วา-. labh धातु से परे iṃ और ī के स्थान पर विकल्प से thaṃ और thā होते हैं। ลภสฺมา อึอีอิจฺเจสํ ถํถา โหนฺติ วา; อลตฺถํ, อลภึ; อลตฺถ, อลภิ. labh धातु से परे iṃ और ī इन दोनों के स्थान पर विकल्प से thaṃ और thā होते हैं; जैसे- alatthaṃ, alabhiṃ; alattha, alabhi। คุรุปุพฺพา รสฺสา เร นฺเตนฺตีนํ-. गुरु-पूर्व ह्रस्व से परे nti और ante के स्थान पर re होता है। คุรุปุพฺพสฺมา รสฺสา ปเรสํ นฺเตนฺตีนํ เร วา โหติ; คจฺฉเร, คจฺฉนฺติ; คจฺฉเร, คจฺฉนฺเต; คมิสฺสเร, คมิสฺสนฺติ; คมิสฺสเร, คมิสฺสนฺเต–-คุรุปุพฺพาติ กึ? ปจนฺติ. รสฺสาติ กึ? โหนฺติ गुरु-पूर्व ह्रस्व से परे nti और ante के स्थान पर विकल्प से re होता है; जैसे- gacchare, gacchanti; gacchare, gacchante; gamissare, gamissanti; gamissare, gamissante। गुरु-पूर्व क्यों? pacanti। ह्रस्व क्यों? honti। เอยฺเยยฺยาเสยฺยนฺตํ เฏ-. eyya, eyyāsi, eyyaṃ के स्थान पर ṭe होता है। เอยฺยาทีนํ เฏ วา โหติ; โส กเร, โส กเรยฺย; ตฺวํ, กเร, ตฺวํ กเรยฺยาสิ; อหํ กเร, อหํ กเรยฺยํ. eyya आदि के स्थान पर विकल्प से ṭe होता है; जैसे- so kare, so kareyya; tvaṃ kare, tvaṃ kareyyāsi; ahaṃ kare, ahaṃ kareyyaṃ। โอวิกรณสฺสุ ปรจฺฉกฺเก-. ओ-विकरण के स्थान पर 'उ' होता है पर-षट्क में। โอวิกรณสฺส อุ โหติ ปรจฺฉกฺกวิสเย; ตนุเต. 'ओ' विकरण के स्थान पर 'उ' होता है पर-षट्क के विषय में; जैसे - तनुते। ปุพฺพจฺฉกฺเก วา กฺวจิ-. पूर्व-षट्क में भी कहीं-कहीं। โอวิกรณสฺส อุ โหติ วา กฺวจิ ปุพฺพจฺฉกฺเก; วนุติ, วโนติ. 'ओ' विकरण के स्थान पर 'उ' विकल्प से कहीं-कहीं पूर्व-षट्क में होता है; जैसे - वनुति, वनोति। เอยฺยามสฺเสมุ จ-. 'एय्याम' के स्थान पर 'एमु' और 'उ' भी। เอยฺยามสฺเสมุ วา โหติ, อุ จ; ภเวมุ, ภเวยฺยามุ, ภเวยฺยาม. 'एय्याम' के स्थान पर 'एमु' विकल्प से होता है, और 'उ' भी; जैसे - भवेमु, भवेय्यामु, भवेय्याम। อิติ โมคฺคลฺลาเน วฺยากรเณ วุตฺติยํ ตฺยาทิกณฺโฑ ฉฏฺโฐ. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में 'त्यादि-काण्ड' छठा समाप्त हुआ। สมตฺตา จายํ โมคฺคลฺลานวุตฺติ ฉหิ ภาณวาเรหิ. और यह मोग्गल्लान-वृत्ति छह भाणवारों में पूर्ण हुई। ยสฺส รญฺโญ ปภาเวน ภาวิตตฺตสมากุลํ,อนากุลํ ทุลทฺธีหิ ปาปภิกฺขูหิ สพฺพโส; जिस राजा के प्रभाव से, जो आत्म-संयम से युक्त है, जो सभी प्रकार से पाप-भिक्षुओं और कुदृष्टियों से रहित है; ลงฺกาย มุนิราชสฺส สาสนํ สาธุ สณฺฐิตํ,ปุณฺณวนฺทสมาโยคา วาริธีจ วิวทฺธเต; लंका में मुनिराज का शासन भली-भांति प्रतिष्ठित है, और पूर्णिमा के चंद्रमा के संयोग से समुद्र की भाँति बढ़ रहा है; ปรกฺกมภุเช ตสฺมึ สทฺธาพุทฺธิคุโณทิเต,มนุวํสทฺธชากาเร ลงฺกาทีปํ ปสาสติ; उस पराक्रमबाहु के शासनकाल में, जो श्रद्धा और बुद्ध के गुणों से युक्त हैं, जो मनु-वंश के ध्वज के समान लंका द्वीप पर शासन करते हैं; มาคฺคลฺลาเนน เถเรน ธีมตา สุจิวุตฺตินํ,รจิตํ ยํ สุวิญฺเญยฺยมสนฺทิทฺธมนากุลํ; बुद्धिमान और शुद्ध आचरण वाले मोग्गल्लान स्थविर द्वारा रचित, जो सुविज्ञेय, असंदिग्ध और स्पष्ट है; อเสสวิสยวฺยาปิ ชินวฺยปฺปถนิสฺสยํ,สทฺทสตฺถมนายาสสาธิยํ พุทฺธิวทฺธนํ; जो समस्त विषयों में व्याप्त है, बुद्ध के वचनों पर आश्रित है, यह शब्द-शास्त्र जो सुगमता से साध्य और बुद्धि को बढ़ाने वाला है; ตสฺส วุตฺติ สมาเสน วิปุลตฺถปฺปกาสนี,รจิตา ปุน เตเนว สาสนุชฺโชตการินาติ; उसकी यह वृत्ति, जो संक्षेप में विस्तृत अर्थ को प्रकाशित करने वाली है, शासन को उद्योतित करने के लिए पुनः उन्हीं के द्वारा रचित है। | |||
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |