| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. उन भगवन्, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। สีมวิโสธนี सीमा-विशोधनी วรทํ [Pg.5] วรทํ อคฺคํ, ทิจฺจํ ทิจฺจํว วนชํ; โพธกํ โพธกํ ปาณํ, เทว’เทวํ นมาม’หํ. वरदान देने वालों में श्रेष्ठ वरदाता, सूर्य के समान देदीप्यमान कमल के समान, प्राणियों को बोध कराने वाले बोधक, देवों के देव को मैं नमस्कार करता हूँ। สนฺตํ สนฺตํ สทา วฏฺฏํ, ปชํ’ภเว สุตํ; นิพฺพุทํ นิพฺพุทํ ตารํ, ธมฺมวรํ นมาม’หํ. जो सदैव शान्त हैं, संसार-चक्र में स्थित प्रजा के लिए श्रुत (प्रसिद्ध) हैं, जो निर्वाण-स्वरूप और तारक हैं, उस श्रेष्ठ धर्म को मैं नमस्कार करता हूँ। สุตํ สุตํ ภวเน ยํ, นตนํ นตนา’รหํ; นรา’นรา สทา’กํสุ, สงฺฆวรํ นมาม’หํ. जो इस लोक में श्रुत (विख्यात) हैं, जो वन्दनीय और वन्दना के योग्य हैं, जिनकी मनुष्य और अमनुष्य सदैव वन्दना करते हैं, उस श्रेष्ठ संघ को मैं नमस्कार करता हूँ। อิจฺเจว’มจฺจนฺตนตสฺสเนยฺยํ, นตยฺยมาโน รตนตฺตยํ ยํ; ปุญฺญาภิวฑฺฒึ มหคฺฆํ อลตฺถํ, ตสฺสานุภาเวน หตนฺตราโย. इस प्रकार अत्यन्त वन्दनीय रत्नत्रय की वन्दना करते हुए मैंने जो महान् पुण्य-वृद्धि प्राप्त की है, उसके प्रभाव से सभी विघ्न-बाधाएँ नष्ट हो जाएँ। วินเย สติ ฐิเต ยํ, สาสนํ สณฺฐิตํ ภเว; วินเย สติ นฏฺเฐ ยํ, วินฏฺฐํ สาสนํ ภเว. विनय के स्थित रहने पर ही शासन (बुद्ध-शासन) सुस्थित रहता है; विनय के नष्ट होने पर शासन विनष्ट हो जाता है। ตสฺมา ทิตฺตํ มเม’ทานิ, โชตยิตฺวาน สาสเน; ภินฺทิตฺวา ทฺเวฬฺหกํ วาทํ, เอกีภาวํ กโรม’หํ. इसलिए अब मैं शासन को प्रकाशित करते हुए, द्वैध (संदेहपूर्ण) मतों का भेदन कर, एकता स्थापित करता हूँ। อตฺตุกฺกํสน-ภาวญฺจ, ปรวมฺภนกมฺปิจ; เตสุ จิตฺตํ อเปเสตฺวา, สาสนสฺส สุวุฑฺฒิยา. आत्म-प्रशंसा और पर-निन्दा के भाव में चित्त को न लगाते हुए, शासन की सुवृद्धि के लिए (यह कार्य कर रहा हूँ)। ยทิ เม อีทิสํ จิตฺตํ, ภเวยฺยุํ ปาปสงฺกปฺปา; ปจฺจิสฺสํ นิรเย ภยํ, หีน’ชฺฌาสยการณา. यदि मेरे चित्त में ऐसे पाप-संकल्प हों, तो हीन आशय के कारण मैं भयानक नरक में गिरूँगा। สาสนสฺส [Pg.6] สุลภํ’ว ปตฺถยนฺโต สตา’จาโร; สํสนฺทิสฺสมหํ ทานิ, จิรํ สทฺธมฺม’สุทฺธิยา. शासन की सुलभता की प्रार्थना करते हुए और सदाचार का पालन करते हुए, मैं अब सद्धर्म की शुद्धि के लिए (ग्रन्थों का) मिलान करूँगा। สุทุลฺลภํ ลภิตฺวาน, ปพฺพชฺชํ ชินสาสเน; สมฺพุทฺธสฺส วรํ วาทํ, กตฺวา ทฺเวฬฺหก’เมกิกํ. जिन-शासन में सुदुर्लभ प्रव्रज्या को प्राप्त कर, सम्बुद्ध के श्रेष्ठ वचनों के प्रति द्वैध (संदेह) को दूर कर। สีมวิโสธนึ นาม, นานาคนฺถสมาหฏํ; กริสฺสํ เม นิสาเมนฺตุ, สาธโว กวิปุงฺควา. विभिन्न ग्रन्थों से संकलित 'सीमाविशोधनी' नामक इस रचना को मैं करूँगा; विद्वज्जन इसे ध्यानपूर्वक सुनें। ปาฬึ อฏฺฐกถญฺเจว, มาติกํ ปทภาชนึ; โอคาเหตฺวาน ตํ สพฺพํ, ปุนปฺปุนํ อเสสโต. पालि, अट्ठकथा, मातिका और पदभाजन—इन सबका पूर्णतः और बार-बार अवगाहन (गहन अध्ययन) करके। อตฺตโนมติคนฺเถสุ, ฏีกาคณฺฐิปเทสุจ; วินิจฺฉยวิมตีสุ, มาติกา’ฏฺฐกถาสุปิ. अपने मति-ग्रन्थों, टीकाओं, गण्ठिपदों, विनिश्चयों और सन्देहों के निवारण हेतु मातिका एवं अट्ठकथाओं में भी। สพฺพํ อเสสกํ กตฺวา, สํสนฺทิตฺวาน เอกโต; ปวตฺตา วณฺณนา เอสา, โตสยนฺตี วิจกฺขเณติ. इन सबको पूर्णतः एक साथ मिलाकर, विद्वानों को संतुष्ट करने वाली यह व्याख्या प्रवृत्त की जा रही है। พุทฺธุปฺปาโท หิ ทุลฺลโภ, ตโต ปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จ, วุตฺตญฺเหตํ बुद्ध का उत्पन्न होना दुर्लभ है, उसके बाद प्रव्रज्या और उपसम्पदा (दुर्लभ है); ऐसा कहा गया है— พุทฺโธ จ ทุลฺลโภ โลเก, สทฺธมฺมสวนมฺปิ จ; สงฺโฆ จ ทุลฺลโภ โลเก, สปฺปูริสา’ติทุลฺลภา. लोक में बुद्ध का होना दुर्लभ है और सद्धर्म का श्रवण भी दुर्लभ है; लोक में संघ दुर्लभ है और सत्पुरुषों का मिलना अत्यन्त दुर्लभ है। ทุลฺลภญฺจ มนุสฺสตฺตํ, พุทฺธุปฺปาโท จ ทุลฺลโภ; ทุลฺลภา ขณสมฺปตฺติ, สทฺธมฺโม ปรมทุลฺลโภ’ติ. मनुष्य जन्म दुर्लभ है और बुद्ध का प्रादुर्भाव भी दुर्लभ है; क्षण-सम्पत्ति (उपयुक्त अवसर) दुर्लभ है और सद्धर्म परम दुर्लभ है। ๑. อุปสมฺปทากณฺโฑ १. उपसम्पदा-काण्ड อิมสฺมิญฺหิ ฐาเน ฐตฺวา พุทฺธคุณปฏิสํยุตฺตาย กถาย วุจฺจมานาย สาธูนํ จิตฺตสมฺปหํสนญฺเจว, อิมสฺเสว ปกรณสฺส อนุมฺมตฺตวจนภาโว จ ภเวยฺย, อนุมฺมตฺตวจนตฺเต จ สิทฺเธ โสตพฺพํ มญฺญิสฺสนฺติ, ตสฺมา พุทฺธคุณํ วณฺณยิสฺสาม. อมฺหากํ กิร ภควา พฺรหฺมเทวพุทฺธมาทึ กตฺวา ยาว โปราณสกฺยโคตมา มโนปณิธิวเสน, กฏฺฐวาหนชาตกํอาทึกตฺวา ยาว มชฺฌิมทีปงฺกรา วาจงฺควเสน มชฺฌิมทีปงฺกรปาทมูลโต ปฏฺฐาย กายวาจงฺควเสน สพฺพํ สมฺปิณฺเฑตฺวา ยาว เวสฺสนฺตรตฺตภาวา วีสติ อสงฺขฺเยยฺยานิ ปารมิโย ปูเรนฺตสฺส สพฺพญฺญุตญฺญาณตฺถาย เยว อลงฺกตํ สีสํ ฉินฺทิตฺวา เทนฺตสฺส สพฺพญฺญุโพธิสตฺตสฺส สีสํ ชมฺพุทีปวาสีนํ อุทฺธนโตปิ พหุตรํ, อญฺชิตนยนํ อุปฺปาเฏตฺวา เทนฺตสฺส นยนํ อชฏากาเส คคนตเล ตาราคณโตปิ พหุตรํ, หทยมํสํ วา ทกฺขิณพาหุํ [Pg.7] วา ฉินฺทิตฺวา เทนฺตสฺส มํสํ ฉนหุต อฏฺฐส หสฺสาธิกสตสหสฺสปมาณสิเนรุราชโตปิ พหุตรํ, โลหิตํ อุปฺปาเฏตฺวา เทนฺตสฺส รุหิรํ จตูสุ มหาสมุทฺเทสุ อุทกโตปิ พหุตรํ, มทฺทีสทิเส จ ภริเย ชาลีกณฺหาชินสทิเส จ ปุตฺเต ปเรสํ ทาสตฺถาย เทนฺตสฺส คณนปถํ วีติวตฺตา. เอวํ ปารมิโย ปูเรนฺตสฺเสว. इस स्थान पर स्थित होकर बुद्ध के गुणों से युक्त कथा कहने से सज्जनों के चित्त में प्रसन्नता होती है और इस प्रकरण की प्रामाणिकता सिद्ध होती है; प्रामाणिकता सिद्ध होने पर लोग इसे सुनने योग्य मानेंगे, इसलिए हम बुद्ध के गुणों का वर्णन करेंगे। हमारे भगवान् ने ब्रह्मदेव बुद्ध से लेकर प्राचीन शाक्य गौतम बुद्ध तक 'मनोप्रणिधान' (मानसिक संकल्प) के द्वारा, कट्ठवाहन जातक आदि से लेकर मध्यम दीपंकर बुद्ध तक 'वाक्-प्रणिधान' (वाचिक संकल्प) के द्वारा, और मध्यम दीपंकर के चरणों से लेकर वेस्सन्तर के अस्तित्व तक 'काय-वाक्-प्रणिधान' (कायिक और वाचिक संकल्प) के द्वारा कुल बीस असंख्येय कल्पों तक पारमिताओं को पूर्ण किया। सर्वज्ञता-ज्ञान की प्राप्ति के लिए उन्होंने अपने अलंकृत सिर को काटकर दान दिया, जो जम्बूद्वीप के निवासियों के चूल्हों (की संख्या) से भी अधिक थे। अंजन लगे नेत्रों को निकालकर दान दिया, जो आकाश मण्डल के तारागणों से भी अधिक थे। अपने हृदय का मांस या दाहिनी भुजा का मांस काटकर दान दिया, जो छह लाख अस्सी हजार योजन ऊँचे सुमेरु पर्वत से भी अधिक था। अपना रक्त निकाल कर दान दिया, जो चारों महासमुद्रों के जल से भी अधिक था। मद्री जैसी पत्नियों और जाली-कण्हाजिना जैसे पुत्रों को दूसरों की दासता के लिए दान दिया, जिनकी गणना नहीं की जा सकती। इस प्रकार उन्होंने पारमिताओं को पूर्ण किया। จินฺติตํ สตฺตสงฺขฺเยยฺยํ, นวสงฺขฺเยยฺย’วาจกํ; กายวาจา จตุขฺยาตํ, พุทฺธตฺตํ สมุปาคมีติ. सात असंख्येय कल्पों तक (बुद्धत्व का) चिन्तन किया, नौ असंख्येय कल्पों तक वाणी से व्यक्त किया, और चार असंख्येय कल्पों तक काय एवं वाणी से (पारमिताओं को पूर्ण कर) बुद्धत्व प्राप्त किया। ชาตตฺตกีโสตตฺตกิยา วุตฺตนเยน อสูโร หุตฺวา พุทฺธตฺตํ จินฺเตนฺตสฺเสว สตฺตอสงฺขฺเยยฺยานิ วีติวตฺตานิ. อติสูโร อหุตฺวา วาจามตฺตเมว นว อสงฺขฺเยยฺยานิ วีติวตฺตานิ. อติสูโร หุตฺวา กายงฺควาจงฺควเสน ปูเรนฺตสฺส จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยานิ วีติวตฺตานิ. อิมานิ จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยานิ ทีปงฺกรปาทมูลโต ปฏฺฐาย เวทิตพฺพานิ. สตสหสฺสกปฺปมตฺถเก ปน อชฺฌตฺตปารมี ปูริตาติ เวทิตพฺพา. เวสฺสนฺตรตฺตภาเวน จ สตฺตกมหาทานํ ทตฺวา สตฺตกฺขตฺตุํ ปถวึ กมฺเปตฺวา วงฺกปพฺพตํ คนฺตฺวา นยนสทิเส ทฺเว ปุตฺเต พฺราหฺมณสฺส ทาสตฺถาย ทตฺวา ทุติยทิวเส พฺราหฺมณวณฺเณน อาคตสฺส สกฺกสฺส เทวรญฺโญ อตฺตสมํ มทฺทึ นาม ภริยํ ทตฺวา ตสฺมึ ภเว อปริเมยฺยานิ ปุญฺญานิ กตฺวา ตโต ตุสิตปุรํ คนฺตฺวา ตตฺถ ยาวตายุกํ ฐตฺวา ทสหิ จกฺกวาฬสหสฺเสหิ อาคนฺตฺวา เทวตาวิเสเสหิ. 'जातत्तकी-सोतत्तकी' में वर्णित विधि के अनुसार, वीर होकर बुद्धत्व का चिन्तन करते हुए सात असंख्येय कल्प व्यतीत हुए। अति-वीर न होकर केवल वाणी मात्र से (संकल्प करते हुए) नौ असंख्येय कल्प व्यतीत हुए। अति-वीर होकर कायिक और वाचिक अंगों से पारमिताओं को पूर्ण करते हुए चार असंख्येय कल्प व्यतीत हुए। इन चार असंख्येय कल्पों को दीपंकर बुद्ध के चरणों के समय से समझना चाहिए। एक लाख कल्प पूर्व 'अध्यात्म-पारमिता' पूर्ण हुई, ऐसा जानना चाहिए। वेस्सन्तर के रूप में सात महादान देकर और सात बार पृथ्वी को कम्पित कर, वंक पर्वत पर जाकर, अपने नेत्रों के समान दो पुत्रों को ब्राह्मण की दासता के लिए दान दिया। दूसरे दिन ब्राह्मण के वेश में आए देवराज शक्र को अपनी प्राणप्रिय पत्नी मद्री का दान दिया। उस भव में अपरिमेय पुण्य कर वे तुषित लोक गए और वहाँ आयु पर्यन्त रहकर दस हजार चक्रवातों से आए विशिष्ट देवताओं द्वारा (प्रार्थना की गई)— กาโล เทว มหาวีร, อุปฺปชฺช มาตุกุจฺฉิยํ; สเทวกํ ตารยนฺโต, พุชฺฌสฺสุ อมตํ ปทนฺติ. हे देव! हे महावीर! अब समय आ गया है, माता की कुक्षि (गर्भ) में उत्पन्न हों। देवों सहित सम्पूर्ण लोक को तारते हुए अमृत पद (निर्वाण) का बोध प्राप्त करें। ยาจิยมาโน กาลํ ทีปญฺจ เทสญฺจ กุลํ มาตรเมวจาติ อิมานิ ปญฺจ มหาวิโลกนานิ วิโลเกตฺวา ตุสิตปุรโต จวิตฺวา มหาสมฺมตวํสชสฺส โอกฺกากรญฺโญ ปุตฺตานํ กุสลมฺเภทภเยน ภคินีหิเยว สทฺธึ อาวาหกรณํ สุตฺวา สกฺยา วต โภ ราชกุมาราติ โอกฺกากมหาราเชน วุตฺตวจนํ ปวตฺตนิมิตฺตํ กตฺวา สกฺยาติ ลทฺธนามานํ ราชูนมพฺภนฺตเร ปวตฺตสฺส สุทฺโธทนมหาราชสฺส เชฏฺฐมเหสิยา สิริมหามายาย กุจฺฉิมฺหิ นิพฺพตฺติตฺวา ทสมาสจฺจเยน เทวทหนครสฺส กปิลวตฺถุสฺส จ มชฺเฌ ลุมฺพินีวเน มาตุกุจฺฉิโต นิกฺขมิตฺวา ชาตกฺขเณเยว [Pg.8] อุตฺตราภิมุขํ สตฺตปทวีติหาเรน คนฺตฺวา อฉมฺภิวาจํ นิจฺฉาเรตฺวา ปิตรํ วนฺทาเปตฺวา อนุกฺกเมน โสฬสวสฺสุทฺเทสิกกาเล รชฺชสิรึ อนุภวิตฺวา ราหุลภทฺทสฺส ชาตทิวเส นิกฺขมิตฺวา ฉพฺพสฺสานิ ทุกฺกรจริยํ จริตฺวา เวสาขปุณฺณมทิวเส อนุตฺตรํ สมฺมาสมฺโพธึ อภิสมฺพุชฺฌิตฺวา ปญฺจจตฺตาลีส วสฺสานิ เทวมนุสฺสานํ รตนทามํ คนฺเถนฺโต วิย ธมฺมรตนวสฺสํ วสฺสาเปตฺวา ยาว สุภทฺทปริพฺพาชกวินยนา กตพุทฺธกิจฺเจ กุสินารายอุปวฏฺฏเน มลฺลานํ สาลวเน เวสาขปุณฺณมทิวเส ปจฺจูสสมเย อนุปาทิเสสาย นิพฺพานธาตุยา ปรินิพฺพุเต ภควติโลกนาเถ สุภทฺเทน วุฑฺฒปพฺพชิเตน ‘‘อลํ อาวุโส มา โสจิตฺถ มา ปริเทวิตฺถ, สุมุตฺตา มยํ เตน มหาสมเณน, อุปทฺทุตา จ โหม’อิทํ โว กปฺปติ อิทํ โว น กปฺปตี’ติ. อิทานิ ปน มยํ ยํ อิจฺฉิสฺสาม ตํ กริสฺสาม, ยํ น อิจฺฉิสฺสาม น ตํ กริสฺสามา’’ติ วุตฺตวจนํ สลฺลกฺเขตฺวา คณปาโมกฺขานํ สตฺตนฺนํ ภิกฺขุสตสหสฺสานํ สงฺฆตฺเถโร อายสฺมา มหากสฺสโป ธมฺมสงฺคีตึ กตฺวา ปริสุทฺเธ ธมฺมวินเย ตโต อปรภาเค วสฺสสตสฺส อจฺจเยน เวสาลิยา วชฺชิปุตฺตกา ทสวตฺถูนิ ทสฺเสตฺวา สาสนวิปตฺตึ กโรนฺเต ทิสฺวา อายสฺมตา ยสตฺเถเรน กากณฺฑกปุตฺเตน สมุสฺสาหิยมาโน ทุติยสงฺคีตึ กตฺวา ตโต อปรภาเค ตถาคตสฺส ปรินิพฺพานโต ทฺวินฺนํ วสฺสสตานํ อุปริ อฏฺฐารสเม วสฺเส ธมฺมาโสโกนาม ราชา สกลชมฺพุทีปตเล เอกรชฺชาภิเสกํ ปาปุณิตฺวา พุทฺธสาสเน มหนฺตํ ลาภสกฺการํ ปวตฺเตตฺวา ปริหีนลาภสกฺการา ติตฺถิยา อนฺตมโส ฆาสจฺฉาทนมตฺตมฺปิ อลภนฺตา ลาภสกฺการํ ปตฺถยมานา สาสเน ปพฺพชิตฺวา สกานิ สกานิ ทิฏฺฐิคตานิ ทีเปตฺวา สาสเน มหนฺตํ อพฺพุทญฺจ มลญฺจ ปวตฺเตสุํ. ตทา ธมฺมาโสกรญฺโญ ปตฺตาภิเสกโต สตฺตรสเม วสฺเส สฏฺฐิสตสหสฺส ภิกฺขูสุ สหสฺสภิกฺขุํ คเหตฺวา โมคฺคลิปุตฺตติสฺโส นาม สงฺฆตฺเถโร มหาปวารณาย ปรปฺปวาทํ ภินฺทิตฺวา กถาวตฺถุปฺปกรณํ เทเสตฺวา ตติยธมฺมสงฺคีตึ กตฺวา ปริสุทฺเธ ธมฺมวินเย สาฏฺฐกเถพุทฺธวจเน ธรนฺเตว ปาฬิยฏฺฐกถาสุ อตฺถจฺฉายํ คเหตฺวา อตฺตโน มติวเสน นานาคนฺถวิเสสานิ กโรนฺติ, เตสุ อตฺตโนมติวเสน อตฺถจฺฉายํ คเหตฺวา การณปติรูปกํ กตฺวา [Pg.9] วุตฺตวจนํ สารโต สลฺลกฺเขตฺวา สุตฺต-สุตฺตานุโลมอาจริยวาเท มุญฺจิตฺวา ปาฬิยา อฏฺฐกถํ, อฏฺฐกถาย จ ปาฬึ ตพฺพิวรณภูตํ สารตฺถทีปนิญฺจ อญฺญานิ จ คนฺถวิเสสานิ อสํสนฺทิตฺวา อตฺตโนมติยาปิ ปุพฺพาปรํ อสมาเนตฺวา วาทปฺปกาสนมตฺตเมว ฐเปตฺวา ครุกลหุเกสุ ครุเกเยว ฐาตพฺเพปิ ครุเก อฏฺฐตฺวา เกจิ ภิกฺขู นทิยา อุทกุกฺเขปํ อกตฺวา กโรนฺติ. เอวํ สาสเน ทฺวิธา ภินฺนา โหนฺติ. อิทญฺจ ภินฺทนํ โกสมฺพกกฺขนฺธเก ภินฺนโตปิ สตคุเณน สหสฺสคุเณน พลวตรเมว สาสนสฺส วิปตฺติการณตฺตา, ตถา หิ น อิทํ มนุสฺสโลเก ภิกฺขูนํเยว โหติ, ภิกฺขูนํ, อุปาสกมนุสฺสานํ, อารกฺขกเทวตานมฺปิ, ตาสํ สหายกานํ ภุมฺมนิสฺสิตเทวตานมฺปิ ตาสํ สหายกานํ รุกฺขนิสฺสิตเทวตานมฺปิ ตาสํสหายกานํ อากาสฏฺฐกเทวตานมฺปิ, ตาสํ สหายกานํ จาตุมหาราชิกเทวตานมฺปิ, ตาสํ สหายกานํ ตาวตึสเทวตานมฺปิ, เอวํ มิตฺตปรมฺปรวเสน ฉกามาวจรเทวตานมฺปิ ตาสํ มิตฺตานํ พฺรหฺมปาริสชฺชานมฺปีติ เอวํ ยาวอกนิฏฺฐพฺรหฺมโลกา อริยปุคฺคเล ฐเปตฺวา สพฺเพ ปุถุชฺชนา เทวมนุสฺสา ภินฺนา โหนฺติ, เตสํ ภินฺนตฺตา พหุ จ ปาปํ ปสวติ, ตสฺมา ปาฬิยา อฏฺฐกถํ, อฏฺฐกถาย จ ปาฬึ สํสนฺทิตฺวา ตานิ ตานิ คนฺถวิเสสานิ จ เอกโต กตฺวา คงฺโคทเก น ยมุโนทกํ วิย มิสฺสิตฺวา เอกีภาวํ กตฺวา สีมวิโสธนึ นาม กริสฺสามิ, ตํ สุณาถ สาธุกํ มนสิกโรถ ธมฺมราชสฺส สาวกาติ. याचना किए जाने पर, काल, द्वीप, देश, कुल और माता—इन पाँच महाविलोकनों को देखकर, तुषितपुर से च्युत होकर, महासम्मत वंश के राजा ओक्काक के पुत्रों द्वारा कुल-मिश्रण के भय से अपनी बहनों के साथ ही विवाह करने की बात सुनकर महाराज ओक्काक द्वारा कहे गए वचन 'सक्य वत भो राजकुमार' (हे! राजकुमार समर्थ हैं) को निमित्त बनाकर 'शाक्य' नाम प्राप्त करने वाले राजाओं के मध्य उत्पन्न महाराज शुद्धोदन की ज्येष्ठ महिषी श्रीमहामाया की कुक्षि (गर्भ) में उत्पन्न होकर, दस मास बीतने पर देवदह नगर और कपिलवस्तु के मध्य लुम्बिनी वन में माता की कुक्षि से निकलकर, जन्म के क्षण ही उत्तर की ओर मुख कर सात कदम चलकर, निर्भय वाणी बोलकर, पिता से वन्दना करवाकर, क्रमशः सोलह वर्ष की आयु में राज्यलक्ष्मी का अनुभव कर, राहुल भद्र के जन्म के दिन (गृह-त्याग कर) निकलकर, छह वर्षों तक दुष्करचर्या कर, वैशाख पूर्णिमा के दिन अनुत्तर सम्यक्सम्बोधि प्राप्त कर, पैंतालीस वर्षों तक देवों और मनुष्यों के लिए रत्नमाला गूँथने के समान धर्म-रत्न की वर्षा कराकर, सुभद्र परिव्राजक के विनय (दीक्षा) तक बुद्ध-कृत्यों को पूर्ण कर, कुसीनारा के उपवत्तन मल्लों के शालवन में वैशाख पूर्णिमा के दिन प्रत्युष काल में अनुपधिशेष निर्वाण-धातु से परिनिर्वाण प्राप्त भगवान लोकनाथ के (पश्चात्), वृद्ध-प्रव्रजित सुभद्र द्वारा कहे गए इन वचनों को लक्ष्य कर कि 'बस आयुष्मानों! शोक मत करो, विलाप मत करो; हम उस महाश्रमण से अच्छी तरह मुक्त हो गए हैं, हम इस बात से परेशान थे कि यह तुम्हारे लिए कल्प्य (उचित) है, यह तुम्हारे लिए अकल्प्य (अनुचित) है। अब हम जो चाहेंगे वह करेंगे, जो नहीं चाहेंगे वह नहीं करेंगे'—गण-प्रमुख सात लाख भिक्षुओं के संघस्थविर आयुष्मान महाकस्सप ने धर्म-संगीति की। उसके पश्चात् शुद्ध धर्म-विनय के रहते हुए, सौ वर्ष बीतने पर वैशाली के वज्जिपुत्तक भिक्षुओं को दस वस्तुओं (दश-वस्तु) को दिखाकर शासन की विपत्ति करते देख, काकण्डक-पुत्र आयुष्मान यश स्थविर द्वारा उत्साहित किए जाने पर द्वितीय संगीति की। उसके पश्चात् तथागत के परिनिर्वाण से दो सौ अठारहवें वर्ष में धर्माशोक नामक राजा ने सकल जम्बूद्वीप तल पर एक-राज्य का अभिषेक प्राप्त कर बुद्ध-शासन में महान लाभ-सत्कार प्रवृत्त किया। लाभ-सत्कार से हीन हुए तीर्थिक, यहाँ तक कि भोजन-वस्त्र मात्र भी न पाते हुए, लाभ-सत्कार की इच्छा से शासन में प्रव्रजित होकर अपने-अपने दृष्टिगतों (मिथ्या धारणाओं) को प्रकाशित करते हुए शासन में महान अर्बुद (गाँठ) और मल प्रवृत्त करने लगे। तब धर्माशोक राजा के अभिषेक से सत्रहवें वर्ष में साठ लाख भिक्षुओं में से एक हजार भिक्षुओं को लेकर मोग्गलिपुत्त तिस्स नामक संघस्थविर ने महाप्रवारणा के अवसर पर पर-प्रवादों (अन्य मतों) का खण्डन कर कथावस्तु-प्रकरण का उपदेश दिया और तृतीय धर्म-संगीति की। शुद्ध धर्म-विनय और अट्ठकथा सहित बुद्ध-वचन के रहते हुए ही, पालि और अट्ठकथाओं में अर्थ की छाया को ग्रहण कर अपनी मति के अनुसार नाना ग्रन्थ-विशेषों की रचना करने लगे। उनमें अपनी मति के अनुसार अर्थ की छाया ग्रहण कर, उसे युक्तिसंगत बनाकर कहे गए वचनों को सार रूप में मानकर, सुत्त, सुत्तानुलोम और आचार्य-वाद को छोड़कर, पालि की अट्ठकथा और अट्ठकथा की पालि, उसके विवरण स्वरूप सारत्थदीपनी तथा अन्य ग्रन्थ-विशेषों का मिलान न कर, अपनी मति से भी पूर्वापर का सामंजस्य न बैठाकर, केवल वाद-प्रकाशन मात्र को स्थापित कर, गुरु (भारी) और लघु (हल्के) नियमों में गुरु में ही स्थित रहने योग्य होने पर भी गुरु में स्थित न रहकर, कुछ भिक्षु नदी में 'उदकुक्खेप' (जल-उछाल) किए बिना (विनय कर्म) करते हैं। इस प्रकार शासन में दो भाग हो गए हैं। और यह भेद कोसम्बक खन्धक के भेद से भी सौ गुना, हजार गुना अधिक बलवान है क्योंकि यह शासन की विपत्ति का कारण है; क्योंकि यह केवल मनुष्य लोक में भिक्षुओं के बीच ही नहीं होता, बल्कि भिक्षुओं, उपासक मनुष्यों, आरक्षक देवताओं, उनके सहायक भूमि-स्थित देवताओं, उनके सहायक वृक्ष-स्थित देवताओं, उनके सहायक आकाश-स्थित देवताओं, उनके सहायक चातुमहाराजिक देवताओं, उनके सहायक तावतिंस देवताओं, इस प्रकार मित्र-परम्परा के वश से छह कामावचर देवताओं और उनके मित्र ब्रह्मपारिसज्ज देवों तक—इस प्रकार अकनिष्ट ब्रह्मलोक तक आर्य पुद्गलों को छोड़कर सभी पृथग्जन देव और मनुष्य विभाजित हो गए हैं, उनके विभाजित होने से बहुत पाप उत्पन्न होता है। इसलिए पालि से अट्ठकथा और अट्ठकथा से पालि का मिलान कर, उन-उन ग्रन्थ-विशेषों को एकत्र कर, गंगा के जल में यमुना के जल के समान मिश्रित कर, एकीभाव कर 'सीमाविसोधनी' नामक (ग्रन्थ) की रचना करूँगा; उसे सुनें, हे धर्मराज के श्रावकों! उसे भली-भाँति मन में धारण करें। ตตฺถ พุทฺธุปฺปาโท ทุลฺลโภ ติ พุทฺธสฺส อุปฺปาทกาโล ทุลฺลโภ ตถา หิ อนุปฺปนฺนกาเล พุทฺเธ พุทฺโธติ สทฺทมฺปิ อสุตฺวา วีติวตฺตานํ กปฺปานํ คณนปถํ วีติวตฺตา. พุทฺธการณสฺส ทุกฺกรตฺตํ เหฏฺฐา วุตฺตเมว. वहाँ 'बुद्ध का उत्पन्न होना दुर्लभ है' का अर्थ है कि बुद्ध के उत्पन्न होने का समय दुर्लभ है। क्योंकि बुद्ध के अनुत्पन्न काल में 'बुद्ध' शब्द को भी बिना सुने व्यतीत हुए कल्पों की गणना का मार्ग (संख्या) पार हो गया है। बुद्धत्व के कारण की दुष्करता पहले ही कही जा चुकी है। ตโต ปพฺพชา จ อุปสมฺปทาจา ติเอตฺถ โตปจฺจโย ลามกตฺเถ, ปญฺจมฺยตฺเถ วา. พุทฺธุปฺปาโท ทุลฺลโภ, ตมนุปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จ ทุลฺลภาเยวาติ อธิปฺปาโย. ยถา จ โลเก กิญฺจิเทว มหคฺฆํ อลภิตพฺพํ ลภิตฺวา วา เตน สหการีการณภูตํ อปฺปคฺฆมฺปิ มหคฺฆํ มหคฺฆํ ทุลฺลภํ ทุลฺลภนฺติ วุจฺจติ, เอวเมว อติทุลฺลภํ พุทฺธุปฺปาทํ อาคมฺม ตมนุปพฺพชิตมฺปิ ทุลฺลภนฺติ วุจฺจติ, ยถา จ นิทิยา อุปริมภาเค สตฺตาหวฏฺฏลิกาทิภาเวน อุทกปูรเณ เหฏฺฐา กิสฺมิญฺจิ ฐาเน ตริตุํ อวิสหนฺตา อิทเมว ฐานํ [Pg.10] ทุกฺกรนฺติ วุจฺจติ, เอวเมว พุทฺธการณสฺส ทุกฺกรภาเว น ตมนุปพฺพชฺชุปสมฺปทาปิ ทุกฺกรํ ทุลฺลภนฺติ วุจฺจติ. อญฺญถา พุทฺธภควโต ปิ ปพฺพชฺชุปสมฺปทภาโวเยว เสฏฺโฐ ภเวยฺย. อถวา การณูปจารวเสนาปิ เอวํ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, ยถา เสมฺโหคุโฬติ ตถา หิ คุฬสฺส ปิ วนปจฺจยา เสมฺโห อุสฺสนฺโน, ตํ ชโน คุเฬนเสมฺโหติ วตฺตพฺเพปิ การณสฺมึ คุเฬ ผลภูตํ เสมฺหํ โรเปตฺวา เสมฺโห คุโฬติ วุจฺจติ, เอวํ การณสฺส ทุกฺกรตฺตา ทุลฺลเภ พุทฺธุปฺปาเท ตมนุกฺริยา ปพฺพชฺชาปิ ตํ มูลการณภูเต พุทฺธุปฺปาเท โรเปตฺวา ทุลฺลภา ปพฺพชฺชาติ วุจฺจติ. พุทฺธุปฺปาทกาเลปิ พุทฺธทสฺสนํ ทุลฺลภเมว, อนุปฺปนฺนกาเล ปน ปเคว, สพฺพขเณสุ นวมขณตฺตา จ ตถา หิ มิลกฺขุเทสอรูปภูมิอสญฺญสตฺตนิรยเปตติรจฺฉานภูมีสุ ชายมาเนสุ วา มชฺฌิมเทเส ชายมาโนปิ มิจฺฉาทิฏฺฐิภูตา วา, สมฺมาทิฏฺฐิกุเล ชายมานาปิ จกฺขุโสต วิกลภาเวน องฺควิกลา วา พุทฺธทสฺสนํ น อรหนฺติ, ทสฺสนมฺปิ ทสฺสนมตฺตเมว. สุปณฺณนาคราชาทีนํ ตสฺมึ ภเว มคฺคผลภาคิโน น โหนฺติ, โหนฺติ เจตฺถ. 'उसके बाद प्रव्रज्या और उपसंपदा' यहाँ 'तो' प्रत्यय हीन अर्थ में या पंचमी के अर्थ में है। बुद्ध का उत्पाद दुर्लभ है, उसके बाद प्रव्रज्या और उपसंपदा भी दुर्लभ ही है - यह अभिप्राय है। जैसे लोक में किसी बहुमूल्य अप्राप्य वस्तु को प्राप्त कर लेने पर, उसके साथ सहायक कारण बनी हुई अल्पमूल्य वस्तु को भी 'बहुमूल्य-बहुमूल्य, दुर्लभ-दुर्लभ' कहा जाता है, वैसे ही अति दुर्लभ बुद्ध के उत्पाद को प्राप्त कर उसके बाद प्रव्रजित होना भी दुर्लभ कहा जाता है। जैसे नदी के ऊपरी भाग में सात दिनों की वर्षा आदि से जल भर जाने पर, नीचे किसी स्थान पर तैरने में असमर्थ होने पर 'यही स्थान दुष्कर है' कहा जाता है, वैसे ही बुद्धत्व के कारण की दुष्करता के कारण उसके बाद की प्रव्रज्या और उपसंपदा को भी दुष्कर और दुर्लभ कहा जाता है। अन्यथा बुद्ध भगवान के लिए भी प्रव्रज्या और उपसंपदा का भाव ही श्रेष्ठ होता। अथवा 'कारणोपचार' के वश से भी ऐसा कहा गया है, यह समझना चाहिए। जैसे 'गुड़ कफ है', क्योंकि गुड़ के सेवन के प्रत्यय से कफ बढ़ जाता है, लोग 'गुड़ से कफ होता है' कहने के बजाय कारण रूप गुड़ में फल रूप कफ का आरोप कर 'गुड़ कफ है' कहते हैं। इसी प्रकार कारण की दुष्करता से दुर्लभ बुद्ध-उत्पाद में, उसके बाद होने वाली प्रव्रज्या को भी उसके मूल कारण बुद्ध-उत्पाद में आरोपित कर 'प्रव्रज्या दुर्लभ है' कहा जाता है। बुद्ध के उत्पाद काल में भी बुद्ध का दर्शन दुर्लभ ही है, अनुत्पन्न काल में तो कहना ही क्या! सभी क्षणों में नौवाँ क्षण होने के कारण भी (दुर्लभ है)। क्योंकि म्लेच्छ देश, अरूप भूमि, असंज्ञी सत्त्व, नरक, प्रेत और तिर्यक योनियों में उत्पन्न होने वालों के लिए, या मध्य देश में उत्पन्न होकर भी मिथ्यादृष्टि होने वालों के लिए, या सम्यकदृष्टि कुल में उत्पन्न होकर भी चक्षु-श्रोत्र की विकलता के कारण अंग-विकल होने वालों के लिए बुद्ध-दर्शन संभव नहीं है; और दर्शन भी मात्र दर्शन ही होता है। सुपर्ण और नागराज आदि उस भव में मार्ग-फल के भागी नहीं होते, यहाँ होते हैं। ‘‘ปจฺจนฺตโช อรูปิโน, วิกลงฺโค อสญฺญโช; มิจฺฉาทิฏฺฐิ ติรจฺฉาโน, เปโต เนรยิโกปิจ. "प्रत्यन्त देश में उत्पन्न, अरूप (ब्रह्मलोक) में उत्पन्न, विकलांग, असंज्ञी सत्त्वों में उत्पन्न, मिथ्यादृष्टि, तिर्यक (पशु), प्रेत और नारकीय जीव।" เอเต อฏฺฐกฺขณา วุตฺตา, พุทฺเธนาทิจฺจพนฺธุนา; พุทฺธุปฺปาโท ขโณ เอโก, นวโมติ ปวุจฺจตีติ’’. "ये आठ अक्षण (अनुपयुक्त समय) आदित्यबन्धु बुद्ध द्वारा कहे गए हैं; बुद्ध का उत्पाद ही एक (उपयुक्त) क्षण है, जिसे नौवाँ कहा जाता है।" ปพฺพชฺชา ติเจตฺถ สามญฺเญน วุตฺเตปิ สามเณราว อธิปฺเปตา, อุปสมฺปทา จาติ วิสุํ วุตฺตตฺตา. สามเณรา จ นาม พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามิตฺยาทินา ติกฺขตฺตุํ วตฺวา อุภโตสุทฺธิวเสเนว สามเณรภูมิยํ ติฏฺฐนฺติ. ทสสีลานิ ปน เตสํ สิกฺขาปทมตฺตเมว. ตานิ ปาฬิวเสน อสกฺโกนฺโต อตฺถวเสน ‘‘อิทญฺจ สมาทาย วตฺเตหี’’ติ อาจิกฺขิตุมฺปิ วฏฺฏติเยว. อิธ วตฺตพฺพํ นตฺถิ. อุปสมฺปทา ปน อฏฺฐวิธา โหนฺติ เอหิภิกฺขูปสมฺปทา, สรณคมนูปสมฺปทา, โอวาท ปฏิคฺคหณูปสมฺปทา, ปญฺหาพฺยากรณูปสมฺปทา, อฏฺฐครุธมฺมปฏิคฺคหณูปสมฺปทา, ทูเตนูปสมฺปทา, อฏฺฐวาจิกูปสมฺปทา, ญตฺติจตุตฺถูปสมฺปทา จาติ. ตตฺถ ภควา เอหิ ภิกฺขุภาวาย อุปนิสฺสยสมฺปนฺนํ ปุคฺคลํ ทิสฺวา รตฺตปํสุกูลนฺตรโต สุวณฺณวณฺณํ ทกฺขิณหตฺถํ นีหริตฺวา พฺรหฺมโฆสํ นิจฺฉาเรนฺโต ‘‘เอหิ ภิกฺขุ จร พฺรหฺมจริยํ [Pg.11] สมฺมา ทุกฺขสฺส อนฺตกิริยายา’’ติ วทติ. ตสฺสานนฺตรเมว คิหิลิงฺคํ อนฺตรธายิตฺวา. यहाँ 'प्रव्रज्या' सामान्य रूप से कहे जाने पर भी 'सामणेर' (श्रमण) ही अभिप्रेत है, क्योंकि 'उपसंपदा' अलग से कही गई है। सामणेर 'बुद्धं सरणं गच्छामि' आदि तीन बार कहकर दोनों प्रकार की शुद्धि के वश से ही सामणेर भूमि में स्थित होते हैं। दस शील तो उनके लिए मात्र शिक्षापद हैं। उन्हें पालि के अनुसार कहने में असमर्थ होने पर अर्थ के अनुसार 'इसे ग्रहण कर पालन करो' - ऐसा कहना भी उचित ही है। यहाँ और कुछ कहने योग्य नहीं है। उपसंपदा आठ प्रकार की होती है: एहि-भिक्षु उपसंपदा, शरणगमन उपसंपदा, ओवाद-प्रतिग्रहण उपसंपदा, प्रश्न-व्याकरण उपसंपदा, अष्ट-गरुधर्म-प्रतिग्रहण उपसंपदा, दूत द्वारा उपसंपदा, अष्ट-वाचिक उपसंपदा और ज्ञप्ति-चतुर्थ उपसंपदा। उनमें भगवान 'एहि-भिक्षु' भाव के लिए उपनिश्रय-सम्पन्न पुद्गल को देखकर, रक्त पांशुकुल के भीतर से सुवर्ण वर्ण का दाहिना हाथ निकालकर ब्रह्मघोष करते हुए कहते हैं - 'आओ भिक्षु! दुःख के सम्यक अंत के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करो।' उसके तुरंत बाद ही गृहस्थ वेश अंतर्धान हो जाता है। ติจีวรญฺจ ปตฺโต จ, วาสิ สูจิจ พนฺธนํ; ปริสฺสาวนมฏฺเฐเต, ยุตฺตโยคสฺส ภิกฺขุโนติ. "तीन चीवर, पात्र, उस्तरा, सुई, कमरबंद और जल छानने का वस्त्र - ये आठ योगयुक्त भिक्षु के परिष्कार हैं।" เอวํ วุตฺเตหิ อฏฺฐหิปริกฺขาเรหิ สรีเร ปฏิมุตฺโตเยว วสฺสสติกตฺเถโร วิย อิริยาปถสมฺปนฺโน พุทฺธาจริยโก พุทฺธุปชฺฌายโก สมฺมาสมฺพุทฺธํ วนฺทมาโนว ติฏฺฐติ. อยํ เอหิ ภิกฺขูปสมฺปทา นาม. ภควา หิ ปฐมโพธิยํ เอตสฺมึ กาเล เอหิ ภิกฺขุปสมฺปทาย เอว อุปสมฺปาเทติ. ตานิ ปน ปญฺจวคฺคิยาทโย องฺคุลิมาลตฺเถรปริโยสานา. इस प्रकार कहे गए आठ परिष्कारों से शरीर युक्त होकर, सौ वर्ष के स्थविर के समान ईर्यापथ से संपन्न, बुद्ध को ही आचार्य और बुद्ध को ही उपाध्याय मानकर, सम्यकसम्बुद्ध की वंदना करते हुए वह खड़ा हो जाता है। इसे 'एहि-भिक्षु उपसंपदा' कहते हैं। भगवान प्रथम बोधि के इस काल में 'एहि-भिक्षु उपसंपदा' द्वारा ही उपसंपन्न करते थे। वे पंचवर्गीय भिक्षुओं से लेकर अंगुलिमाल स्थविर तक थे। ตีณิสตํ สหสฺสญฺจ, จตฺตาลีสํ ปุนาปโร; เอโก จ เถโร สปฺปญฺโญ; สพฺเพ เต เอหิ ภิกฺขุกาติ. "एक हजार तीन सौ चालीस और फिर एक और प्रज्ञावान स्थविर; वे सभी 'एहि-भिक्षु' थे।" เอเต วินยปิฏเก นิทฺทิฏฺฐเอหิภิกฺขู นาม วินยปิฏเก อนิทฺทิฏฺฐา ปน ติสตปริวารเสลพฺราหฺมณาทโย. ये विनयपिटक में निर्दिष्ट 'एहि-भिक्षु' हैं; विनयपिटक में अनिर्दिष्ट तो तीन सौ अनुयायियों वाले सेल ब्राह्मण आदि हैं। สตฺตวีส สหสฺสานิ, ตีณิเยว สตานิ จ; เอเต หิ สพฺเพ สงฺขาตา, สพฺเพ เต เอหิภิกฺขุกาติ. "सत्ताईस हजार और तीन सौ; ये सभी गिने गए हैं, वे सभी 'एहि-भिक्षु' थे।" ตํ สพฺพํ สมฺปิณฺเฑตฺวา อฏฺฐวีสสหสฺสานิ ฉสตานิ เอกจตฺตาลีสุตฺตรานิ จ โหนฺติ. ปฐมโพธิจ นาเมสา วีสติวสฺสานิ โหนฺติ. उन सबको मिलाकर अट्ठाईस हजार छह सौ इकतालीस होते हैं। यह 'प्रथम बोधि' नाम का काल बीस वर्षों का था। ภควา หิ อนุตฺตรํ ธมฺมจกฺกํ ปวตฺเตตฺวา อฏฺฐารสโกฏิพฺราหฺมณานํ อมตํ ปาเยตฺวา ปฐมวสฺสํ วสิ. ทุติยตติยจตุตฺถวสฺเสสุ ราชคเห เวฬุวนวิหาเร วสฺสํ วสิ, ภควา หิ อาสาฬฺหินกฺขตฺตปุณฺณมิยํ พาราณสิยา อิสิปตเน มิคทาเย ปฐมวสฺสํ วสิตฺวา ผคฺคุณมาเส ผคฺคุณปุณฺณมิยํ ราชคหํ ปตฺวา พิมฺพิสารรญฺญา การิเต เวฬุวน วิหาเร เอกมาสมตฺตํ วสิตฺวา จิตฺรมาเส วีสติขีณาสวสหสฺสปริวุโต กปิลวตฺถุํ คนฺตฺวา อสีติยา ญาติสหสฺสานํ มชฺเฌ วิปฺปฏิปนฺนานํ ราชูนํ มตฺถเก ปํสุรชํ โอกิริตฺวา เต วนฺทาเปตฺวา โปกฺขรวสฺสญฺจ วสฺสาเปตฺวา ตมาคมฺม อสีติยา ญาติสหสฺสานํ เวสฺสนฺตร ชาตกํ กเถตฺวา ราหุลมาตรมาคมฺม จนฺทกินฺนรีชาตกญฺจ กเถตฺวา ปิตรํ อนาคามิผเล ปติฏฺฐาเปตฺวา ราชคหเมว อาคนฺตฺวา วาสํ กปฺเปสิ, เตน วุตฺตํ ทุติย ตติย จตุตฺถ วสฺเสสุ ราชคเห เวฬุวนวิหาเร วสฺสํ วสี’’ติ[Pg.12]. ปญฺจเม ปน เวสาลิยํ เอกวาสํ วสิ. ฉฏฺเฐ มกุฬปพฺพเต เอกวาสํ วสิ. ปุณฺโณ วา ตตฺถ. ตตฺรายํ อนุปุพฺพิกถา สุนาปรนฺตรฏฺเฐ กิร เอกสฺมึ วาณิชกคาเม ทฺเว ภาตโร. เตสุ กทาจิ เชฏฺโฐ ปญฺจสกฏสตานิ คเหตฺวา ชนปทํ คนฺตฺวา ภณฺฑํ อาหรติ, กทาจิ กนิฏฺโฐ. อิมสฺมึ ปน สมเย กนิฏฺฐํ ฆเร ฐเปตฺวา เชฏฺฐภาติโก ปญฺจ สกฏสตานิ คเหตฺวา ชนปทจาริกํ จรนฺโต อนุปุพฺเพน สาวตฺถึ ปตฺวา เชตวนสฺส อวิทูเร ปญฺจสกฏสตานิ ฐเปตฺวา ภุตฺตปาตราโส ปริชนปริวุโต ผาสุกฏฺฐาเน นิสีทิ. เตน จ สมเยน สาวตฺถิวาสิโน ภุตฺตปาตราสา อุโปสถงฺคานิ อธิฏฺฐาย สุฏฺฐุตฺตราสงฺคา คนฺธปุปฺผาทิหตฺถา เยนพุทฺโธ, เยนธมฺโม, เยนสงฺโฆ, ตนฺนินฺนา ตปฺโปณา ตปฺปพฺภรา หุตฺวา ทิกฺขิณทฺวาเรน นิกฺขมิตฺวา เชตวนํ คจฺฉนฺติ. โส เต ทิสฺวา ‘‘กหํ อิเม คจฺฉนฺตี’’ติ เอกํ มนุสฺสํ ปุจฺฉิ. กึ ตฺวํ อยฺโย น ชานาสิ, โลเก พุทฺธธมฺมสงฺฆรตนานิ นาม อุปฺปนฺนานิ, อิจฺเจว มหาชโน สตฺถุสนฺติเก ธมฺมกถํ โสตุํ คจฺฉตีติ. ตสฺส ‘‘พุทฺโธ’’ติ วจนํ ฉวิจมฺมาทีนิ ฉินฺทิตฺวา อฏฺฐิมิญฺชํ อาหจฺจ อฏฺฐาสิ. อถ อตฺตโน ปริชนปริวุโต ตาย ปริสายสทฺธึ วิหารํ คนฺตฺวา สตฺถามธุรสฺสเรน ธมฺมํ เทเสนฺตสฺส ปริส ปริยนฺเต ฐิโต ธมฺมํ สุตฺวา ปพฺพชฺชาย จิตฺตํ อุปฺปาเทสิ. อถ ตถาคเตน กาลํ วิทิตฺวา ปริสาย อุยฺโยชิตาย สตฺถารํ อุปสงฺกมิตฺวา วนฺทิตฺวา สฺวาตนาย นิมนฺเตตฺวา ทุติยทิวเส มณฺฑปํ กเรตฺวา อาสนานิ ปญฺญาเปตฺวา พุทฺธปฺปมุขสฺส สงฺฆสฺส มหาทานํ ทตฺวา ภตฺตกิจฺจาวสาเน ภควา อนุโมทนํ กตฺวา ปกฺกมิ. ภุตฺตปาตรโส อุโปสถงฺคานิ อธิฏฺฐาย ภณฺฑาคาริกํ ปกฺโกสาเปตฺวา ‘‘เอตฺตกํ ภณฺฑํ วิสฺสชฺชิตํ เอตฺตกํ ปน น วิสฺสชฺชิต’’นฺติ สพฺพํ อาจิกฺขิตฺวา ‘‘อิมํ สาปเตยฺยํ มยฺหํ กนิฏฺฐสฺส เทหี’’ติ สพฺพํ นิยฺโยเตตฺวา สตฺถุ สนฺติเก ปพฺพชิตฺวา กมฺมฏฺฐาน ปรายโณ อโหสิ. อถสฺส กมฺมฏฺฐานํ มนสิกโรนฺตสฺส กมฺมฏฺฐานํ น อุปฏฺฐาติ, ตโต จินฺเตสิ ‘‘อยํ ชนปโท มยฺหํ อสปฺปาโย, ยํนูนาหํ สตฺถุ สนฺติเก กมฺมฏฺฐานํ คเหตฺวา สกฏฺฐานเมว คจฺเฉยฺย’’นฺติ. อถ ปุพฺพณฺหสมเย ปิณฺฑาย จริตฺวา สายนฺหสมเย ปฏิสลฺลานา วุฏฺฐิโต ภควนฺตํ อุปสงฺกมิตฺวา กมฺมฏฺฐานํ กถาเปตฺวา สตฺถา สีหนาทํ นทิตฺวา ปกฺกมิ. อถ โข อายสฺมา ปุณฺโณ สูนาปรนฺตรฏฺฐํ [Pg.13] ปตฺวา สมฺมตปพฺพตํ นาม ปวิสิตฺวา วาณิชกคามํ ปิณฺฑาย ปาวิสิ. อถ นํ กนิฏฺฐภาตา สเคหํ เนตฺวา ภิกฺขํ ทตฺวา ‘‘ภนฺเต อญฺญตฺถ อคนฺตฺวา อิเธว วสถา’’ติ ปฏิญฺญํ กาเรตฺวา วสาเปสิ. ตโต สมุทฺทคิริวิหารํ นาม อคมาสิ. ตตฺถ สมุทฺทวีจิโย อาคนฺตฺวา อยกณฺฏปาสาเณสุ ปหริตฺวา มหาสทฺทํ กโรนฺติ. เถโร กมฺมฏฺฐานํ มนสิกโรนฺโต น ผาสุวิหาโร โหตีติ สมุทฺทํ นิสทฺทํ กตฺวา อธิฏฺฐาสิ. ตโต มาตุลคิรึ นาม อาคมาสิ. ตตฺถ สกุณสงฺโฆ อุสฺสนฺโน รตฺติญฺจ ทิวา จ สทฺโท เอโก พทฺโธ โหติ. เถโร ‘‘อิทํ ฐานํ อผาสุกนฺติ ตโต มกุฬการามวิหารํ นาม คโต. โส วาณิชคามสฺส นาติทูโร นาจฺจาสนฺโน คมนาคมนสมฺปนฺโน วิวิตฺโต อปฺปสทฺโท. เถโร ‘‘อิทํ ฐานํ ผาสุก’’นฺติ ตตฺถ รตฺติฏฺฐานทิวาฐาเน จงฺกมนาทีนิ กาเรตฺวา วสฺสํ อุปคจฺฉติ. เอวํ จตูสุ ฐาเนสุ วิหาสิ. อเถกทิวสํ ตสฺมึเยว อนฺโตวสฺเส ปญฺจ วาณิชกสตานิ ‘‘ปรสมุทฺทํ คจฺฉามา’’ติ นาวาย ภณฺฑํ ปกฺขิปึสุ. นาวาโรหนทิวเส เถรสฺส กนิฏฺฐภาตา เถรํ โภเชตฺวา เถรสฺส สนฺติเก สิกฺขาปทานิ คเหตฺวา คจฺฉนฺโต ‘‘ภนฺเต มหาสมุทฺโท นาม อสฺสทฺเธยฺโย จาเนกนฺตราโย จ, อมฺเห อาวชฺเชยฺยาถา’’ติ วตฺวา นาวํ อารูยฺหิ. นาวา อูมิชเวน คจฺฉมานา อญฺญตรํ ทีปํ ปาปุณิ. มนุสฺสา ‘‘ปาตราสํ กริสฺสามา’’ติ ทีปเก โอติณฺณา. ตสฺมึ ทีปเก อญฺญํ กิญฺจิ นตฺถิ, จนฺทนวนเมว อโหสิ. อเถโก วา สิยา รุกฺขํ อาโกเฏตฺวา โลหิตจนฺทนภาวํ ญตฺวา ‘‘โภ มยํ ลาภตฺถาย ปรสมุทฺทํ คจฺฉาม, อิโต จ อุตฺตริ ลาภา นาม นตฺถิ, จตุรงฺคุล มตฺตาปิ ฆฏิกา สตสหสฺสํ อคฺฆติ, สํหาเรตพฺพกยุตฺตํ ภณฺฑํ หาเรตฺวา คจฺฉามา’’ติ. เต ตถา กรึสุ จนฺทนวเน อธิวตฺถา อมนุสฺสา กุชฺฌิตฺวา อิเมหิ อมฺหากํ จนฺทนวนํ นาสิตํ, ฆาเตสฺสาม เน’’ติ จินฺเตตฺวา น อิเมสุ ฆาฏิเตสุ สพฺพํ เอกกุณปํ ภวิสฺสติ, สมุทฺทมชฺเฌ เนสํ นาวํ โอสีเทสฺสามา’’ติ อาหํสุ. อถ เตสํ นาวํ อารูยฺห มุหุตฺตํ คตกาเลเยว อุปฺปาทิกํ อุปฏฺฐาเปตฺวา สยมฺปิ เต อมนุสฺสา ภยานกานิ รูปานิ ทสฺสยึสุ. ภีตา มนุสฺสา อตฺตโน เทวตา นมสฺสนฺติ. เถรสฺส กนิฏฺโฐ จูฬปุณฺณกุฏุมฺพิโก ‘‘มยฺหํ ภาตา อวสฺสโย โหตู’’ติ เถรสฺส นมสฺสมาโน อฏฺฐาสิ. เถโร ปิ กิร ตสฺมึเยว ขเณ [Pg.14] อาวชฺเชตฺวา เตสํ พฺยสนปฺปตฺตึ ญตฺวา เวหาสํ อุปฺปติตฺวา อภิมุโข อฏฺฐาสิ. อมนุสฺสา เถรํ ทิสฺวาว ‘‘อยฺยปุณฺณตฺเถโร เอหี’’ ติ ปกฺกมึสุ. อุปฺปาทิกํ สนฺนิสีทิ. เถโร ‘‘มา ภายถา’’ติ เตสํ อสฺสาเสตฺวาว กหํ คนฺตุกามตฺถา’’ติ ปุจฺฉิ. ‘‘ภนฺเต อมฺหากํ สกฏฺฐานเมว คจฺฉามา’’ติ เถโร นาวํ ผเล อกฺกมิตฺวา ‘‘เอเตสํ อิจฺฉิตฏฺฐานํ คจฺฉตู’’ติ อธิฏฺฐาติ. วาณิชา สกฏฺฐานํ คนฺตฺวา ตํ ปวตฺตึ ปุตฺตทารสฺส อาโรเจตฺวา ‘‘เอถ เถรํ สรณํ คจฺฉามา’’ติ ปญฺจสตานิ อตฺตโน อตฺตโน ปญฺจมาตุคามสเตหิ สทฺธึ ตีสุ สรเณสุ ปติฏฺฐาย อุปาสกตฺตํ ปฏิเวเทสุํ. ตโต นาวาย ภณฺฑํ โอตาเรตฺวา เถรสฺส เอกํ โกฏฺฐาสํ กตฺวา ‘‘อยํ ภนฺเต ตุมฺหากํ โกฏฺฐาโส’’ติ อาหํสุ. เถโร ‘‘มยฺหํ วิสุํ โกฏฺฐาส กิจฺจํ นตฺถิ’’. สตฺถา ปน ตุมฺเหหิ ทิฏฺฐปุพฺโพ’ติ. น ทิฏฺฐปุพฺโพ ภนฺเต’ติ, เตนหิ อิมินา สตฺถุ มณฺฑลมาฬํ กโรถ. เอวํ สตฺถารํ ปสฺสิสฺสถาติ เต สาธุ ภนฺเต’ติ เตน จ โกฏฺฐาเสน อตฺตโน จ โกฏฺฐาเสน มณฺฑลมาฬํ กาตุํ อารภึสุ. สตฺถา กิรสฺส อารทฺธกาลโต ปฏฺฐาย ปริโภคํ อกาสิ. ตโถ มนุสฺสา รตฺตึ โอภาสํ ทิสฺวา ‘‘มเหสกฺขา เทวตา อตฺถี’’ติ สญฺญํกรึสุ. อุปาสกา มณฺฑลมาฬญฺจ ภิกฺขุสงฺฆสฺส เสนาสนานิ จ นิฏฺฐเปตฺวา ทานสมฺภารํ สชฺเชตฺวา ‘‘กตํ ภนฺเต อมฺเหหิ อตฺตโนกิจฺจํ, สตฺถารํ ปกฺโกสถา’’ติ เถรสฺส อาโรเจสุํ. เถโร สายนฺหสมเย อิทฺธิยาสาวตฺถึ ปตฺวา ‘‘ภนฺเต วาณิชคามวาสิโน ตุมฺเห ทฏฺฐุกามา, เตสํ อนุกมฺปํ กโรถา’’ติ. ภควา อธิวาเสสิ. เถโร ภควโต อธิวาสนํ วิทิตฺวา สกฏฺฐานเมว ปจฺจาคโต. ภควา อานนฺทตฺเถรํ อามนฺเตสิ ‘‘อานนฺท สฺเว สูนาปรนฺเต วาณิชคาเม ปิณฺฑาย จริสฺสาม, ตฺวํ เอกูนปญฺจสตานํ ภิกฺขูนํ สลากํ เทหี’’ติ. เถโร สาธุ ภนฺเต’ติ ภิกฺขุสงฺฆสฺส ตมตฺถํ อาโรเจตฺวา ‘‘จาริกา สลากํ คณฺหนฺตู’’ติ อาห. ตํ ทิวสํ กุณฺฑธานตฺเถโร ปฐมํ สลากํ อคฺคโหติ. วาณิชคามวาสิโนปิ ‘‘สฺเว กิร สตฺถา อาคมิสฺสตี’’ติ คามมชฺเฌ มณฺฑปํ กตฺวา ทานคฺคํ สชฺชยึสุ. ภควา ปาโตว สรีรปฏิชคฺคนํ กตฺวา คนฺธกุฏึ ปวิสิตฺวา ผลสมาปตฺตึ อปฺเปตฺวา นิสีทิ. สกฺกสฺส ปณฺฑุกมฺพลสิลาสนํ อุณฺหํ อโหสิ. โส กึ อิทนฺติ อาวชฺเชตฺวา สตฺถุ สูนาปรนฺตคมนํ ทิสฺวา วิสุกมฺมํ อามนฺเตสิ [Pg.15] ‘‘ตาต อชฺช ภควา ตีณิมตฺตานิ โยชนสตานิ ปิณฺฑาจารํ คมิสฺสติ, ปญฺจ กูฏาคารสตานิ มาเปตฺวา เชตวนทฺวาร โกฏฺฐมตฺถเก คมนสชฺชานึ กตฺวา ฐเปหี’’ติ, โส ตถา อกาสิ. ภควโต กูฏาคารํ จตุมุขํ อโหสิ, ทฺวินฺนํ อคฺคสาวกานํ ทฺวิมุขํ, เสสานํ เอกมุขํ, สตฺถา คนฺธกุฏิโต นิกฺขมฺม ปฏิปาฏิยา ฐปิต กูฏาคาเรสุ ธุรกูฏาคารํ ปาวิสิ. ทฺเว อคฺคสาวเก อาทึ กตฺวา เอกูนปญฺจภิกฺขุสตานิปิ กูฏาคารํ คนฺตฺวา นิสินฺนา อเหสุํ, เอกํ ตุจฺฉกูฏาคารํ อโหสิ. ปญฺจปิ กูฏาคารสตานิ อากาเส อุปฺปตึสุ. สตฺถา สจฺจพนฺธปพฺพตํ นาม ปตฺวา กูฏาคารํ อากาเส ฐเปตฺวา ตสฺมึ ปพฺพเต สจฺจพนฺโธ นาม มิจฺฉาทิฏฺฐิ, โส มหาชนํ มิจฺฉาทิฏฺฐึ อุคฺคณฺหาเปนฺโต ลาภคฺคยสคฺคปฺปตฺโต หุตฺวา วสติ. อพฺภนฺตเร จสฺส อนฺโตจาฏิยํ ปทีโป วิย อรหตฺตสฺส อุปนิสฺสโย ชลติ, ตํ ทิสฺวา ‘‘ธมฺมมสฺส กเถสฺสามี’’ติ คนฺตฺวา ธมฺมํ เทเสติ. ตาปโส เทสนาปริโยสาเน อรหตฺตํ ปาปุณิ. มคฺเคเนวสฺส อภิญฺญา อาคตา, เอหิ ภิกฺขุ หุตฺวา อิทฺธิมยปตฺตจีวโร กูฏาคารํ ปาวิสิ. ภควา กูฏาคารคเตหิ ปญฺจหิ ภิกฺขุสเตหิสทฺธึ วาณิชคามํ คนฺตฺวา กูฏาคารานิ อทิสฺสมานานิ กตฺวา วาณิชคามํ ปาวิสิ. วาณิชา พุทฺธปฺปมุขสฺส ภิกฺขุสงฺฆสฺส มหาทานํ ทตฺวา สสตฺถารํ มกุฬการามํ นยึสุ. สตฺถา มณฺฑลมาฬํ ปาวิสิ. มหาชโน ยาว สตฺถา ภตฺตทรถํ ปฏิปฺปสฺสมฺเภติ, ตาว ปาตราสํ กตฺวา อุโปสถงฺคานิ สมาทาย คนฺธญฺจ ปุปฺผญฺจ อาทาย ธมฺมสวนตฺถาย อารามํ ปจฺจาคมาสิ. สตฺถา ธมฺมํ เทเสสิ. มหาชนสฺส พนฺธนา โมกฺโข ชาโต, มหนฺต พุทฺธโกลาหลํ อโหสิ. สตฺถา มหาชนสฺส สงฺคหตฺถํ กติปาหํ ตตฺเถว วสิ, อรุณํ ปน มหาคนฺธกุฏิยํเยว อุฏฺฐเปสิ. ตตฺถ กติปาหํ วสิตฺวา วาณิชคาเม ปิณฺฑาย จริตฺวา ‘‘ตฺวํ อิเธว วสาหี’’ติ ปุณฺณตฺเถรํ นิวตฺเตตฺวา อนฺตเร นมฺมทานที นาม อตฺถิ, ตสฺสา ตีรํ อคมาสิ. นมฺมทานาคราชา สตฺถุ ปจฺจุคฺคนฺตฺวา นาคภวนํ ปเวเสตฺวา ติณฺณํ รตนานํ สกฺการํ อกาสิ. สตฺถา ตสฺส ธมฺมํ กเถตฺวา นาคภวนา นิกฺขมิ. โส ‘‘มยฺหํ ภนฺเต ปริจริตพฺพํ เทถา’’ติ ยาจิ. ภควา นมฺมทานทีตีเร ปทเจติยํ ทสฺเสสิ. ตํ วีจีสุ อาคหาสุ ปิธิยติ วีจีสุ คตาสุ วิวรติ, มหาสกฺการปฺปตฺตํ อโหสิ. สตฺถา ตโต นิกฺขมฺม สจฺจพนฺธปพฺพตํ คนฺตฺวา [Pg.16] สจฺจพนฺธํ อาห ‘‘ตยา มหาชโน อปายมคฺเค โอตาริโต. ตฺวํ อิเธว วสิตฺวา เอเตสํ ลทฺธึ วิสฺสชฺชาเปตฺวา นิพฺพานมคฺเค ปติฏฺฐาเปหี’’ติ. โสปิ ปริจริตพฺพํ ยาจิ. สตฺถา ฆนปิฏฺฐิปาสาเณ อลฺลมตฺติกปิณฺฑมฺหิ ลญฺฉนํ วิย ปทเจติยํ ทสฺเสสิ. เอวํ สูนาปรนฺตรฏฺเฐเยว ทฺเว จกฺกรตนเจติยานิ ยาวสาสนนฺตรธานํ ปติฏฺฐาเปสิ. สตฺตเม ปน วสฺเส สาวตฺถิยํ กณฺฑมฺพรุกฺขมูเล ติตฺถิ มทฺทนํ กโรนฺโต ยมกปาฏิหาริยํ กตฺวา ทสหิ จกฺกวาฬ สหสฺเสหิ อาคตานํ เทวตานํ มาตรํ กายสกฺขึ กตฺวา อภิธมฺมํ เทเสนฺเต ตาวตึสภวเน ปาริจฺฉตฺตกมูเล ปณฺฑุกมฺพลสิลายํ วสฺสํ วสิ. อฏฺฐเม สํสุมารนคเร เอกวสฺสํ วสิ. นวเม โกสมฺพิยํ เอกวสฺสํ วสิ. ตทา ภทฺทิโย, กิมิโล, ภคุ, อานนฺโท, อนุรุทฺโธ, เทวทตฺโต, จาติ ฉ ขตฺติยา ปพฺพชึสุ. เตสํ วิตฺถาโร ธมฺมปเท อาคโต. ทสเม ปน วสฺเส ปาลิเลยฺยาคาเม ทกฺขิณวนสณฺเฑ ภทฺทสาลมูเล ปาลิเลยฺยเกน หตฺถินา อุปฏฺฐิยมาโน ผาสุกํ วสฺสาวาสํ วสิ. เอกาทสเม นาลนฺธพฺราหฺมณคาเม เอกวาสํ วสิ. ทฺวาทสเม เวรญฺชายํ เอกวาสํ วสิ ทุจฺจริตสฺส วิปากํ อนุภวมาโน, ภควตา กิร ผุสฺสสฺส ภควโต กาเล สาวกานํ วจีทุจฺจริตวเสน กตุปจิตสฺส อกุสลกมฺมสฺส ตทา ลทฺโธกาสวเสน อุปฏฺฐิตตฺตา เวรญฺชพฺราหฺมเณน นิมนฺติโตปิ สมาโน มาราวฏฺฏน วเสน อสลฺลกฺเขตฺวา อสฺสวาณิชกานํ นิพทฺธวตฺตสงฺเขเปน ปญฺญตฺตํ ปตฺถปตฺถมูลกํ ยวตณฺฑุลเมว เตมาสํ ภุญฺชติ, วุตฺตญฺเหตํ อปทาเน. भगवान ने अनुत्तर धम्मचक्र प्रवर्तित कर अठारह करोड़ ब्राह्मणों को अमृत पान कराकर प्रथम वर्षावास व्यतीत किया। दूसरे, तीसरे और चौथे वर्षावास में वे राजगृह के वेणुवन विहार में रहे। भगवान ने आषाढ़ नक्षत्र की पूर्णिमा को वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में प्रथम वर्षावास व्यतीत कर, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को राजगृह पहुँचकर, राजा बिम्बिसार द्वारा निर्मित वेणुवन विहार में लगभग एक मास रहकर, चैत्र मास में बीस हजार क्षीणास्त्रव (अर्हतों) के साथ कपिलवस्तु जाकर, अस्सी हजार ज्ञातियों के मध्य विपरीत राजाओं के मस्तक पर धूल छिड़ककर, उन्हें वन्दना कराकर और पुष्कर-वृष्टि कराकर, वहाँ अस्सी हजार ज्ञातियों को वेस्सन्तर जातक सुनाया, राहुलमाता (यशोधरा) के पास जाकर चन्दकिन्नरी जातक सुनाया, पिता को अनागामी फल में प्रतिष्ठित किया और पुनः राजगृह लौटकर निवास किया। इसीलिए कहा गया है कि 'दूसरे, तीसरे और चौथे वर्षावास में वे राजगृह के वेणुवन विहार में रहे'। पाँचवें वर्ष में वैशाली में एक वर्षावास किया। छठे वर्ष में मकुल पर्वत पर एक वर्षावास किया। वहाँ पूर्ण (पुण्ण) थे। वहाँ यह अनुक्रमिक कथा है—सुनापरान्त राष्ट्र के एक वणिक ग्राम में दो भाई थे। उनमें कभी ज्येष्ठ पाँच सौ छकड़े लेकर जनपद जाकर माल लाता था, कभी कनिष्ठ। इस समय कनिष्ठ को घर पर छोड़कर ज्येष्ठ भाई पाँच सौ छकड़े लेकर जनपद की यात्रा करते हुए क्रमशः श्रावस्ती पहुँचा और जेतवन के समीप पाँच सौ छकड़े खड़े कर, कलेवा (प्रातराश) कर, परिजनों के साथ सुखद स्थान पर बैठ गया। उस समय श्रावस्ती निवासी कलेवा कर, उपोसथ अंगों का अधिष्ठान कर, उत्तम उत्तरीय वस्त्र धारण कर, हाथ में गन्ध-पुष्प आदि लेकर जहाँ बुद्ध, जहाँ धम्म और जहाँ संघ था, उसी ओर प्रवृत्त, प्रवण और उन्मुख होकर दक्षिण द्वार से निकलकर जेतवन जा रहे थे। उसने उन्हें देखकर एक मनुष्य से पूछा—'ये कहाँ जा रहे हैं?' 'क्या आप नहीं जानते, लोक में बुद्ध, धम्म और संघ रूपी रत्नों का प्रादुर्भाव हुआ है, इसलिए यह जनसमूह शास्ता के पास धम्म-कथा सुनने जा रहा है।' उसके लिए 'बुद्ध' शब्द त्वचा और चर्म आदि को भेदकर अस्थि-मज्जा तक पहुँच गया। तब वह अपने परिजनों के साथ उस सभा के साथ विहार गया और शास्ता के मधुर स्वर में धम्म-देशना देते समय सभा के प्रान्त (छोर) पर खड़े होकर धम्म सुनकर प्रव्रज्या का विचार उत्पन्न किया। तब तथागत द्वारा समय जानकर सभा को विसर्जित करने पर, शास्ता के पास जाकर, वन्दना कर, अगले दिन के लिए निमन्त्रित किया और दूसरे दिन मण्डप बनवाकर, आसन बिछवाकर, बुद्ध प्रमुख संघ को महादान देकर, भोजन के अन्त में भगवान द्वारा अनुमोदन करने पर वे चले गए। उसने कलेवा कर, उपोसथ अंगों का अधिष्ठान कर, भण्डागारिक को बुलाकर—'इतना माल बिक गया, इतना नहीं बिका'—यह सब बताकर, 'यह सम्पत्ति मेरे कनिष्ठ भाई को दे देना'—यह सब सौंपकर, शास्ता के पास प्रव्रजित होकर कर्मस्थान (ध्यान) परायण हो गया। तब कर्मस्थान का मनन करते हुए उसे कर्मस्थान स्पष्ट नहीं हो रहा था, तब उसने सोचा—'यह जनपद मेरे लिए अनुपयुक्त है, क्यों न मैं शास्ता से कर्मस्थान ग्रहण कर अपने ही स्थान पर चला जाऊँ।' तब पूर्वाह्न समय में पिण्डपात के लिए चरकर, सायंकाल ध्यान से उठकर भगवान के पास जाकर कर्मस्थान के विषय में पूछा और शास्ता द्वारा सिंहनाद (उपदेश) करने पर वे चले गए। तब आयुष्मान पुण्ण सुनापरान्त राष्ट्र पहुँचकर सम्मत पर्वत नामक स्थान पर प्रविष्ट हुए और वणिक ग्राम में पिण्डपात के लिए गए। तब कनिष्ठ भाई ने उन्हें अपने घर ले जाकर भिक्षा दी और 'भन्ते, अन्यत्र न जाकर यहीं रहें'—यह प्रतिज्ञा कराकर वहीं ठहरा लिया। वहाँ से वे समुद्रगिरि विहार गए। वहाँ समुद्र की लहरें आकर लौह-पाषाणों पर प्रहार कर भारी शब्द करती थीं। स्थविर ने कर्मस्थान का मनन करते समय इसे असुविधाजनक पाकर समुद्र को निशब्द करने का अधिष्ठान किया। वहाँ से वे मातुलगिरि आए। वहाँ पक्षियों का समूह बहुत था और रात-दिन एक जैसा शोर होता था। स्थविर ने 'यह स्थान असुविधाजनक है' सोचकर वहाँ से मकुलकाराम विहार गए। वह वणिक ग्राम से न बहुत दूर था, न बहुत पास, आवागमन के लिए सुलभ, विविक्त और अल्प शब्द वाला था। स्थविर ने 'यह स्थान सुखद है' सोचकर वहाँ रात्रि-स्थान और दिवा-स्थान, चंक्रमण आदि बनवाकर वर्षावास किया। इस प्रकार वे चार स्थानों पर रहे। तब एक दिन उसी वर्षावास के भीतर पाँच सौ व्यापारियों ने 'पर-समुद्र (विदेश) जाएँगे' कहकर नौका में माल लादा। नौका पर चढ़ने के दिन स्थविर के कनिष्ठ भाई ने स्थविर को भोजन कराकर, स्थविर से शिक्षापद ग्रहण कर जाते समय कहा—'भन्ते, महासमुद्र अविश्वसनीय और अनेक अन्तरायों वाला है, हमें याद रखिएगा'—यह कहकर नौका पर चढ़ गया। नौका लहरों के वेग से चलते हुए एक द्वीप पर पहुँची। मनुष्य 'कलेवा करेंगे' सोचकर द्वीप पर उतरे। उस द्वीप पर और कुछ नहीं था, केवल चन्दन का वन ही था। तब किसी ने वृक्ष को काटकर उसे लोहित चन्दन जानकर कहा—'भाइयों, हम लाभ के लिए पर-समुद्र जा रहे हैं, इससे बढ़कर और कोई लाभ नहीं है, चार अंगुल की लकड़ी भी लाख की बिकती है, ले जाने योग्य माल छोड़कर इसे ले चलें।' उन्होंने वैसा ही किया। चन्दन वन में रहने वाले अमनुष्यों ने क्रोधित होकर सोचा—'इन्होंने हमारा चन्दन वन नष्ट कर दिया है, इन्हें मार डालेंगे।' फिर सोचा—'इन्हें मारने पर सब एक साथ शव बन जाएँगे, समुद्र के बीच में इनकी नौका डुबो देंगे।' तब उनके नौका पर चढ़कर थोड़ी दूर जाने पर ही उत्पात उत्पन्न कर स्वयं वे अमनुष्य भयानक रूप दिखाने लगे। डरे हुए मनुष्य अपने-अपने देवताओं को नमस्कार करने लगे। स्थविर का कनिष्ठ भाई चुलपुण्ण कुटुम्बिक 'मेरे भाई सहायक हों' कहकर स्थविर को नमस्कार करते हुए खड़ा हो गया। स्थविर ने भी उसी क्षण ध्यान देकर उनकी विपत्ति को जानकर आकाश में उड़कर उनके सामने खड़े हो गए। अमनुष्य स्थविर को देखते ही 'आर्य पुण्ण स्थविर आ गए' कहकर चले गए। उत्पात शान्त हो गया। स्थविर ने 'डरो मत' कहकर उन्हें आश्वस्त किया और पूछा—'कहाँ जाना चाहते हो?' 'भन्ते, हम अपने ही स्थान पर जाना चाहते हैं।' स्थविर ने नौका के अग्रभाग पर पैर रखकर अधिष्ठान किया—'यह इनके इच्छित स्थान पर जाए।' व्यापारियों ने अपने स्थान पर पहुँचकर वह वृत्तान्त अपने स्त्री-पुत्रों को बताया और 'आओ, स्थविर की शरण में चलें' कहकर पाँच सौ व्यापारियों ने अपनी-अपनी पाँच सौ पत्नियों के साथ त्रिशरण में प्रतिष्ठित होकर उपासक भाव प्रकट किया। तब नौका से माल उतारकर स्थविर का एक हिस्सा अलग कर कहा—'भन्ते, यह आपका हिस्सा है।' स्थविर ने कहा—'मेरा अलग हिस्से से कोई प्रयोजन नहीं है। क्या तुमने शास्ता को पहले देखा है?' 'भन्ते, पहले नहीं देखा।' 'तो इस हिस्से से शास्ता के लिए मण्डलमार्ग (सभा-भवन) बनाओ। इस प्रकार तुम शास्ता के दर्शन करोगे।' उन्होंने 'साधु भन्ते' कहकर उस हिस्से से और अपने हिस्से से मण्डलमार्ग बनाना आरम्भ किया। शास्ता ने उसके आरम्भ काल से ही उसका परिभोग किया। तब मनुष्यों ने रात में प्रकाश देखकर समझा कि 'कोई महानुभाव देवता है।' उपासकों ने मण्डलमार्ग और भिक्षु संघ के लिए सेनासन पूर्ण कर दान की सामग्री तैयार कर स्थविर से कहा—'भन्ते, हमने अपना कार्य कर लिया है, शास्ता को बुलाइए।' स्थविर ने सायंकाल ऋद्धि से श्रावस्ती पहुँचकर कहा—'भन्ते, वणिक ग्राम के निवासी आपके दर्शन के इच्छुक हैं, उन पर अनुकम्पा करें।' भगवान ने स्वीकृति दी। स्थविर भगवान की स्वीकृति जानकर अपने स्थान पर लौट आए। भगवान ने आनन्द स्थविर को आमन्त्रित किया—'आनन्द, कल सुनापरान्त के वणिक ग्राम में पिण्डपात के लिए चलेंगे, तुम चार सौ निन्यानवे भिक्षुओं को शलाका (टिकट) दो।' स्थविर ने 'साधु भन्ते' कहकर भिक्षु संघ को वह बात बताई और कहा—'चारिका के लिए शलाका ग्रहण करें।' उस दिन कुण्डधान स्थविर ने प्रथम शलाका ग्रहण की। वणिक ग्राम के निवासियों ने भी 'कल शास्ता आएँगे' जानकर ग्राम के मध्य मण्डप बनाकर दान-शाला तैयार की। भगवान ने प्रातः शरीर-चर्या कर गन्धकुटी में प्रवेश कर फल-समापत्ति में लीन होकर बैठ गए। शक्र का पाण्डुकम्बल शिलासन गर्म हो गया। उसने 'यह क्या है' विचार कर शास्ता का सुनापरान्त गमन देखकर विश्वकर्मा को आमन्त्रित किया—'तात, आज भगवान तीन सौ योजन पिण्डचार के लिए जाएँगे, पाँच सौ कूटागार (शिखरयुक्त भवन) निर्माण कर जेतवन के द्वार-कोष्ठक के ऊपर गमन के लिए तैयार कर रखो।' उसने वैसा ही किया। भगवान का कूटागार चतुर्मुख था, दो अग्रश्रावकों के द्विमुख और शेष के एकमुख। शास्ता गन्धकुटी से निकलकर क्रम से रखे हुए कूटागारों में से मुख्य कूटागार में प्रविष्ट हुए। दो अग्रश्रावकों को आदि लेकर चार सौ निन्यानवे भिक्षु भी कूटागारों में जाकर बैठ गए, एक कूटागार रिक्त था। पाँचों सौ कूटागार आकाश में उड़ चले। शास्ता सच्चबन्ध पर्वत नामक स्थान पर पहुँचकर कूटागार को आकाश में खड़ा कर, उस पर्वत पर सच्चबन्ध नामक मिथ्यादृष्टि (तापस) के पास गए, जो जनसमूह को मिथ्यादृष्टि सिखाते हुए परम लाभ और यश प्राप्त कर रहता था। उसके भीतर घड़े के भीतर दीपक के समान अर्हत्व का उपनिश्रय जल रहा था, उसे देखकर 'मैं इसे धम्म सुनाऊँगा' सोचकर जाकर धम्म-देशना दी। तापस देशना के अन्त में अर्हत्व को प्राप्त हुआ। मार्ग में ही उसे अभिज्ञाएँ प्राप्त हुईं, 'एहि भिक्षु' होकर ऋद्धिमय पात्र-चीवर के साथ कूटागार में प्रविष्ट हुआ। भगवान कूटागार में स्थित पाँच सौ भिक्षुओं के साथ वणिक ग्राम जाकर कूटागारों को अदृश्य कर वणिक ग्राम में प्रविष्ट हुए। व्यापारियों ने बुद्ध प्रमुख भिक्षु संघ को महादान देकर शास्ता सहित उन्हें मकुलकाराम ले गए। शास्ता मण्डलमार्ग में प्रविष्ट हुए। जनसमूह ने जब तक शास्ता भोजन की थकान दूर करते, तब तक कलेवा कर, उपोसथ अंगों को ग्रहण कर, गन्ध और पुष्प लेकर धम्म सुनने के लिए आराम (विहार) में आए। शास्ता ने धम्म-देशना दी। जनसमूह बन्धन से मुक्त हुआ, महान बुद्ध-कोलाहल हुआ। शास्ता जनसमूह के संग्रह के लिए कुछ दिन वहीं रहे, किन्तु अरुणोदय (भोर) महागन्धकुटी में ही करते थे। वहाँ कुछ दिन रहकर वणिक ग्राम में पिण्डचार कर 'तुम यहीं रहो' कहकर पुण्ण स्थविर को रोककर, बीच में नर्मदा नामक नदी है, उसके तट पर गए। नर्मदा नागराज ने शास्ता की अगवानी कर नागभवन में प्रवेश कराकर त्रिरत्नों का सत्कार किया। शास्ता ने उसे धम्म सुनाकर नागभवन से प्रस्थान किया। उसने 'भन्ते, मुझे पूजने के लिए कुछ दें' ऐसी याचना की। भगवान ने नर्मदा नदी के तट पर पद-चिह्न (पदचेतिय) दिखाया। वह लहरों के आने पर ढक जाता था और लहरों के जाने पर प्रकट हो जाता था, वह महान सत्कार को प्राप्त हुआ। शास्ता वहाँ से निकलकर सच्चबन्ध पर्वत गए और सच्चबन्ध से कहा—'तुम्हारे द्वारा जनसमूह अपाय मार्ग (दुर्गति) में उतारा गया है। तुम यहीं रहकर इनकी धारणा छुड़ाकर निर्वाण मार्ग पर प्रतिष्ठित करो।' उसने भी पूजने के लिए याचना की। शास्ता ने ठोस पत्थर पर गीली मिट्टी के पिण्ड पर छाप के समान पद-चिह्न दिखाया। इस प्रकार सुनापरान्त राष्ट्र में ही दो चक्ररत्न-चेतिय (पद-चिह्न) शासन के अन्तर्धान होने तक के लिए प्रतिष्ठित किए। सातवें वर्ष में श्रावस्ती में गण्डम्ब वृक्ष के मूल में तीर्थिकों का दमन करते हुए यमक प्रातिहार्य कर, दस हजार चक्रवातों से आए हुए देवताओं के बीच माता को साक्षी बनाकर अभिधम्म की देशना देते हुए तावतिंस भवन में पारिच्छत्तक वृक्ष के मूल में पाण्डुकम्बल शिला पर वर्षावास किया। आठवें वर्ष में संसुमार नगर में एक वर्षावास किया। नौवें वर्ष में कौशाम्बी में एक वर्षावास किया। तब भद्दिय, किमिल, भगु, आनन्द, अनुरुद्ध और देवदत्त—इन छह क्षत्रियों ने प्रव्रज्या ली। उनका विस्तार धम्मपद में आया है। दसवें वर्ष में पालिलेय्यक ग्राम के दक्षिण वनखण्ड में भद्रशाल के मूल में पालिलेय्यक हाथी द्वारा सेवा किए जाते हुए सुखपूर्वक वर्षावास किया। ग्यारहवें वर्ष में नालन्ध ब्राह्मण ग्राम में एक वर्षावास किया। बारहवें वर्ष में वेरंजा में एक वर्षावास किया, जहाँ (पूर्व के) दुश्चरित्र के विपाक का अनुभव किया। कहा जाता है कि भगवान द्वारा फुस्स बुद्ध के काल में श्रावकों के प्रति वचन-दुश्चरित्र के कारण संचित अकुशल कर्म के उस समय अवसर प्राप्त होने के कारण उपस्थित होने से, वेरंजा ब्राह्मण द्वारा निमन्त्रित होने पर भी मार के घेरे के कारण ध्यान न दे पाने से, अश्व-व्यापारियों द्वारा नियत भोजन के संक्षेप में प्रज्ञप्त प्रस्थ-प्रस्थ (एक-एक माप) जौ का भात ही तीन मास तक खाया; यह अपदान में कहा गया है। ‘‘ผุสฺสสฺสาหํ ปาวจเน, สาวเก ปริภาสิสฺสํ; ยวํ ขาทถ ภุญฺชถ, มาจ ภุญฺชถ สาลิโน. फुस्स बुद्ध के शासन में मैंने श्रावकों को अपशब्द कहे थे— "तुम जौ खाओ, चावल मत खाओ।" เตน กมฺมวิปาเกน, เตมาสํ ขาทิตํ ยวํ; นิมนฺติโต พฺราหฺมเณน, เวรญฺชายํ วสึ ตทาติ’’. उस कर्म-विपाक के कारण, ब्राह्मण द्वारा निमन्त्रित होने पर भी मैंने वेरंजा में तीन महीने तक जौ खाकर वास किया। เตน วุตฺตํ ‘‘ทฺวาทสเม เวรญฺชายํ เอกวาสํ วสิ ทุจฺจริตสฺส วิปากํ อนุภวมาโน’’ติ. เตรสเม ชาลิยปพฺพเต เอกวาสํ วสิ. จตุทฺทสเม สาวตฺถิยํ อนาถปิณฺฑิกสฺส อาราเม เชตวนวิหาเร ปฐมวาสํ วสิตฺวา ปนฺนรสเม วสฺเส ญาติชนสงฺคหตฺถํ กปิลวตฺถุํ คนฺตฺวา เอกเมว วาสํ กปฺเปสิ[Pg.17]. โสฬสเม วสฺเส อาฬวกยกฺขทมนตฺถํ อคฺคาฬวีนคเร เอกวาสํ วสิ. สตฺตรสเม วสฺเส ราชคหเมว นิวตฺติตฺวา วาสํ กปฺเปสิ. อฏฺฐารสเม วสฺเส ชาลิยปพฺพตเมว นิวตฺติตฺวา วสิ. เอกูนวีสติเมปิ วสฺเส ตตฺเถว ชาลิยปพฺพตเมว วสิ. วีสติเม วสฺเส ราชคหสฺส อวิทูเร ภีสนเก เภสกลวนสณฺเฑ วาสํ กปฺเปสี’’ติ อิมานิ วีสติ วสฺสานิ ปฐมโพธีติ เวทิตพฺพานิ. เอตสฺมึ กาเล เอหิภิกฺขูปสมฺปทายเอว อุปสมฺปาเทสีติ เยภุยฺเยน ภควนฺตํเยว อุทฺทิสฺส อาจริยุปชฺฌายํ กตฺวา เอหิภิกฺขุ ภาวมาปนฺเน ปุญฺญวนฺตปุคฺคเลเยว สนฺธาย วุตฺตํ, อญฺเญสมฺปิ อริยภาวมนาปนฺนานํ สุทินฺนาทีนํ วา ยมกปาฏิหาริเย ปสีทิตฺวา อายสฺมโต สาริปุตฺตตฺเถรสฺส สนฺติเก ปพฺพชิตานํ ปุพฺเพ กสฺสปพุทฺธกาเล วคฺคุลิภูตปุพฺพานํ ปญฺจนฺนํ ภิกฺขุสตานํ เถรสฺเสว สนฺติเก ปพฺพชิตภาวสฺส ทิสฺสนโต เตน วุตฺตํ ‘‘ภควา หิ ปฐมโพธิยํ เอตสฺมึ กาเล เอหิ ภิกฺขูปสมฺปทาย เอว อุปสมฺปาเทสี’’ติ. อิโต ปเรสุ ปน ปญฺจวีสติวสฺเสสุ อนาถปิณฺฑิเกน การิเต เชตวนมหาวิหาเร เอกูนวีสติวสฺสา วาสํ วสิ. วิสาขาย สตฺตวีสติ โกฏิธนปริจฺจาเคน การิเต ปุพฺพาราเม ฉพฺพสฺสานิ วสิ. ทฺวินฺนํ กุลานํ คุณมหตฺตํ ปฏิจฺจ สาวตฺถิยํ นิสฺสาย ปญฺจวีสติ วสฺสานิ วาสํ วสิ. อนฺติเม ปน วสฺเส เพฬุวคาเม วสิตฺวา มรณนฺติกา เวทนา อุปฺปชฺชิ, อายุสงฺขาโรสฺสชฺชนญฺจ ตตฺถ อกาสิ. อิมานิ อิธ นาธิปฺเปตานิ, ภควโต วสฺสกฺกมชานนตฺถํเยว วุตฺตนฺติ. इसीलिए कहा गया है—'बारहवें वर्ष में वेरंजा में एक वर्षावास किया, जहाँ उन्होंने अपने दुष्कर्म के विपाक का अनुभव किया।' तेरहवें वर्ष में जालीय पर्वत पर एक वर्षावास किया। चौदहवें वर्ष में श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन विहार में प्रथम वर्षावास करने के बाद, पंद्रहवें वर्ष में परिजनों के कल्याण के लिए कपिलवस्तु जाकर केवल एक ही वर्षावास किया। सोलहवें वर्ष में आलवक यक्ष के दमन के लिए अग्गालवी नगर में एक वर्षावास किया। सत्रहवें वर्ष में राजगृह लौटकर वर्षावास किया। अठारहवें वर्ष में जालीय पर्वत पर ही लौटकर रहे। उन्नीसवें वर्ष में भी वहीं जालीय पर्वत पर ही रहे। बीसवें वर्ष में राजगृह के समीप भयानक भेषकलवन खंड में वर्षावास किया'—इन बीस वर्षों को 'प्रथम बोधि' के रूप में जानना चाहिए। इस काल में 'एहि भिक्खु' उपसंपदा से ही उपसंपन्न किया—यह मुख्य रूप से भगवान को ही आचार्य और उपाध्याय मानकर 'एहि भिक्खु' भाव को प्राप्त पुण्यवान व्यक्तियों के संदर्भ में कहा गया है। अन्य जो आर्य भाव को प्राप्त नहीं हुए थे, जैसे सुदिन्न आदि, या यमक प्रातिहार्य को देखकर प्रसन्न होकर आयुष्मान सारिपुत्र स्थविर के पास प्रव्रजित हुए, अथवा पूर्व में कश्यप बुद्ध के काल में चमगादड़ रहे पाँच सौ भिक्षुओं के स्थविर के पास ही प्रव्रजित होने के कारण, यह कहा गया है—'भगवान ने प्रथम बोधि के इस काल में एहि भिक्खु उपसंपदा से ही उपसंपन्न किया।' इसके बाद के पच्चीस वर्षों में, अनाथपिण्डिक द्वारा निर्मित जेतवन महाविहार में उन्नीस वर्ष निवास किया। विशाखा द्वारा सत्ताईस करोड़ धन के त्याग से निर्मित पुब्बाराम में छह वर्ष निवास किया। इन दो कुलों के गुणों की महानता के कारण श्रावस्ती के आश्रय में पच्चीस वर्ष निवास किया। अंतिम वर्ष में बेलुव ग्राम में निवास करते समय मरणान्तिक वेदना उत्पन्न हुई और वहीं उन्होंने आयु-संस्कार का त्याग किया। ये यहाँ अभिप्रेत नहीं हैं, केवल भगवान के वर्षावासों के क्रम को जानने के लिए कहे गए हैं। สรณคมนูปสมฺปทา นาม ‘‘พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามิ’’ตฺยาทินา ติกฺขตฺตุํ วาจํ ภินฺทิตฺวา วุตฺเตหิ ตีหิ สรณคมเนหิ อุปสมฺปนฺโน. शरणगमन उपसंपदा उसे कहते हैं, जिसमें 'बुद्धं सरणं गच्छामि' आदि वचनों को तीन बार स्पष्ट रूप से उच्चारण कर तीन शरणगमनों के द्वारा उपसंपन्न किया जाता है। โอวาทปฏิคฺคหณูปสมฺปทา นาม ‘‘ตสฺมา ติห เต กสฺสป เอวํ สิกฺขิตพฺพํ ติพฺพเมว หิโรตฺตปฺปํ ปจฺจุปฏฺฐิตํ ภวิสฺสติ เถเรสุ นเวสุ มชฺฌิเมสุ จาติ, เอวญฺหิ เต กสฺสป สิกฺขิตพฺพํ ตสฺมา ติห เต กสฺสป เอวํ สิกฺขิตพฺพํ ยํ กิญฺจิ ธมฺมํ โสสฺสามิ กุสลูปสญฺหิตํ สพฺพนฺตํ อฏฺฐึ กตฺวา มนสิกตฺวา สพฺพเมว เจตโส สมนฺนาหริตฺวา โอหิตโสโต ธมฺมํ โสสฺสามีติ, เอวญฺหิ เต กสฺสป สิกฺขิตพฺพํ ตสฺมา ติห เต กสฺสป เอวํ สิกฺขิตพฺพํ สาตสหคตํ เม กายคตา สตึ น ชหิสฺสตีติ[Pg.18], เอวญฺหิ เต กสฺสป สิกฺขิตพฺพนฺติ อิมินา โอวาทปฏิคฺคเณน มหากสฺสปตฺเถรสฺส อนุญฺญาตอุปสมฺปทา นาม. ओवाद-प्रतिग्रहण उपसंपदा उसे कहते हैं, जो महाकश्यप स्थविर को इस उपदेश-ग्रहण के द्वारा प्रदान की गई थी—'इसलिए, हे कश्यप! तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए—स्थविरों, नवों और मध्यमों के प्रति तीव्र ह्री और ओत्तप्प उपस्थित रहेगा; हे कश्यप! तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए। इसलिए, हे कश्यप! तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए—जो कुछ भी कुशल-युक्त धर्म मैं सुनूँगा, उसे सार मानकर, मन में धारण कर, पूरे चित्त से एकाग्र होकर और कान लगाकर सुनूँगा; हे कश्यप! तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए। इसलिए, हे कश्यप! तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए—सुख-सहगत कायानुस्मृति मुझे नहीं छोड़ेगी; हे कश्यप! तुम्हें इस प्रकार सीखना चाहिए'—यही महाकश्यप स्थविर की अनुज्ञात उपसंपदा है। ปญฺหาพฺยากรณูปสมฺปทา นาม โสปากสฺส อนุญฺญาตอุปสมฺปทา, ภควา กิร ปุพฺพาราเม อนุจงฺกมนฺโต โสปากสามเณรํ ‘‘อุทฺธุมาตกสญฺญาติ วา โสปาก รูปสญฺญาติ วา อิเม ธมฺมา นานตฺถา นานาพฺยญฺชนา, อุทาหุ เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นาน’’นฺติ ทสอสุภนิสฺสิเต ปญฺเห ปุจฺฉิ. โส เต พฺยากาสิ. ภควา ตสฺส สาธุการํ ทตฺวา ‘‘กติวสฺโสสิ ตฺวํ โสปากา’’ติ ปุจฺฉิ. ‘‘สตฺตวสฺโส อหํ ภควา’’ติ, ‘‘โสปาก ตฺวํ มม สพฺพญฺญุตญฺญาเณน สทฺธึ สํสนฺทิตฺวา ปญฺเห พฺยากาสี’’ติ อารทฺธจิตฺโต อุปสมฺปทํ อนุชานาติ, อยํ ปญฺหาพฺยากรณูปสมฺปทา. प्रश्न-व्याकरण उपसंपदा सोपाक को अनुज्ञात उपसंपदा है। कहा जाता है कि भगवान ने पुब्बाराम में चंक्रमण करते हुए सोपाक श्रामणेर से दस अशुभ-निश्रित प्रश्न पूछे—'हे सोपाक! क्या उद्धुमातक संज्ञा और रूप संज्ञा, ये धर्म भिन्न अर्थ और भिन्न व्यंजन वाले हैं, अथवा एक ही अर्थ और केवल भिन्न व्यंजन वाले हैं?' उसने उन प्रश्नों का उत्तर दिया। भगवान ने उसे साधुवाद दिया और पूछा—'हे सोपाक! तुम कितने वर्ष के हो?' 'भगवान! मैं सात वर्ष का हूँ।' 'सोपाक! तुमने मेरे सर्वज्ञता-ज्ञान के साथ तुलना करते हुए प्रश्नों का उत्तर दिया है'—ऐसा कहकर प्रसन्न चित्त से भगवान ने उसे उपसंपदा प्रदान की; यही प्रश्न-व्याकरण उपसंपदा है। อฏฺฐวาจิกูปสมฺปทา นาม ภิกฺขุนิยา ภิกฺขุนิสงฺฆโต ญตฺติจตุตฺเถน ภิกฺขุสงฺฆโต ญตฺติจตุตฺเถนาติ อิเมหิ ทฺวีหิ กมฺเมหิ อุปสมฺปทา. ญตฺติจตุตฺถกมฺมูปสมฺปทา นาม ภิกฺขูนํ เอตรหิ อุปสมฺปทา, อยเมว อิธาธิปฺเปตา, สมฺปตฺติวิปตฺติวเสน สมฺภวโต. กสฺมา เหส อุปสมฺปนฺโน นามาติ. สมคฺเคน สงฺเฆน ญตฺติจตุตฺเถน กมฺเมน อกุปฺเปน ฐานารเหน อุปริภาวํ สมาปนฺโน ปตฺโตติ อุปสมฺปนฺโน, เสฏฺฐภาวํ ปตฺโตติอตฺโถ ตถา หิ คิหิภาวโต สามเณรภาโว เสฏฺโฐ นาม, ตโตปิ อุปสมฺปนฺนภาโวเยว เสฏฺโฐ. ตตฺถ สมคฺเคน สงฺเฆนาติ สพฺพนฺติเมน ปริยาเยน ปญฺจวคฺคกรณีเย กมฺเม ยาวติกา ภิกฺขู กมฺมปฺปตฺตา, เตสํ อาคตตฺตา ฉนฺทารหานํ ฉนฺทสฺส อาหฏตฺตา, สมฺมุขีภูตานญฺจ อปฺปฏิกฺโกสนโต เอตสฺมึ กมฺเม สมคฺคภาวํ อุปคเตน. ญตฺติจตุตฺเถนาติ ตีหิ อนุสาวนาหิ เอกาย จ ญตฺติยา กตฺตพฺเพน. เอตฺถ จ กิญฺจาปิ ญตฺติ สพฺพปฐมํ วุตฺตา, ติสฺสนฺนํ ปน อนุสาวนานํ อตฺถพฺยญฺชนเภทาภาวโต อตฺถพฺยญฺชนภินฺนา ญตฺติ ตาสํ จตุตฺถนฺติ กตฺวา ญตฺติจตุตฺถนฺติ วุจฺจติ. กมฺเมนา ติ ธมฺมิเกน กมฺเมน, วินยกมฺเมนาติอตฺโถ. อกุปฺเปนา ติ วตฺถุ ญตฺติ อนุสาวน สีม ปริสสมฺปตฺติ สมฺปนฺนตฺตา อโกเปตพฺพตํ อปฺปฏิกฺโกสิตพฺพตญฺจ อุปคเตน. ฐานารเหนา ติ การณารเหน, สตฺถุสาสนารเหนาติ อตฺโถ. เอเตหิ การเณหิ เสฏฺฐภาวมาปนฺโนติ อตฺโถ. ตตฺถ สมฺปตฺติวิปตฺติวเสน สมฺภวโต ติ วตฺถุสมฺปตฺติ ญตฺติสมฺปตฺติ อนุสาวนสมฺปตฺติสีมสมฺปตฺติปริสสมฺปตฺติวเสน [Pg.19] ปญฺจหิ สมฺปตฺตีหิ อุปสมฺปทกมฺมสฺส สิชฺฌนโตติ อตฺโถ. ตตฺถ วตฺถุ สมฺปตฺตินาม ปริปุณฺณวีสติวสฺสภาโว อิทานิ ปุริสตฺตภาโว จ. อุนฺนวีสติวสฺสํ, อนฺติมวตฺถุอชฺฌาปนฺนปุพฺพํ, ปณฺฑโก, เถยฺยสํวาสโก, ติตฺถิยปกฺกนฺตโก, ติรจฺฉานคโต, มาตุฆาตโก, ปิตุฆาตโก, อรหนฺตฆาตโก, ภิกฺขุนิทูสโก, สงฺฆเภทโก, โลหิตุปฺปาทโก, อุภโตพฺยญฺชนโก, ติ อิเม เตรส ปุคฺคลา อุปสมฺปทาย อวตฺถุ. ตตฺถ อูนวีสติวสฺสนฺติ สามญฺเญน วุตฺเตปิ มาตุกุจฺฉิโต นิกฺขมนโต ปฏฺฐาย เอกูนวีสปริปุณฺโณ ปุริสปุคฺคโล อุปสมฺปทาย วตฺถุ, ตโต โอรํ น อุปสมฺปทาย วตฺถุ ตโถ หิ เอกสฺมึ สํวจฺฉเร เหมนฺตคิมฺหวสฺสวเสน ติณฺณํ อุตูนํ สมฺภวตฺตา ตโย อุตู โหนฺติ, โหนฺติ เจตฺถ. अष्टवाचिक उपसम्पदा भिक्षुणियों के लिए भिक्षुणी संघ द्वारा ज्ञप्ति-चतुर्थ कर्म और भिक्षु संघ द्वारा ज्ञप्ति-चतुर्थ कर्म—इन दो कर्मों द्वारा होने वाली उपसम्पदा है। ज्ञप्ति-चतुर्थ कर्म उपसम्पदा वर्तमान में भिक्षुओं की उपसम्पदा है, और यहाँ यही अभिप्रेत है, क्योंकि यह सम्पत्ति और विपत्ति के वश में संभव होती है। उसे उपसम्पन्न क्यों कहा जाता है? क्योंकि वह समग्र संघ द्वारा, ज्ञप्ति-चतुर्थ कर्म द्वारा, जो अकुप्य और स्थान-योग्य है, उच्च अवस्था को प्राप्त हुआ है, इसलिए वह उपसम्पन्न है; इसका अर्थ है श्रेष्ठ भाव को प्राप्त होना। जैसे गृहस्थ भाव से सामणेर भाव श्रेष्ठ है, वैसे ही उससे भी उपसम्पन्न भाव ही श्रेष्ठ है। वहाँ 'समग्र संघ द्वारा' का अर्थ है—न्यूनतम सीमा में पाँच वर्ग के करणीय कर्म में जितने भिक्षु कर्म के पात्र हैं, उनके आने से, छन्द के योग्य भिक्षुओं का छन्द लाने से, और उपस्थित भिक्षुओं द्वारा विरोध न करने से, इस कर्म में समग्रता को प्राप्त संघ द्वारा। 'ज्ञप्ति-चतुर्थ द्वारा' का अर्थ है—तीन अनुसावन और एक ज्ञप्ति द्वारा किए जाने वाले कर्म से। यहाँ यद्यपि ज्ञप्ति सबसे पहले कही गई है, फिर भी तीन अनुसावनों के अर्थ और व्यंजन में भेद न होने के कारण, अर्थ और व्यंजन में भिन्न ज्ञप्ति को उनका चौथा मानकर 'ज्ञप्ति-चतुर्थ' कहा जाता है। 'कर्म द्वारा' का अर्थ है—धार्मिक कर्म द्वारा, अर्थात् विनय-सम्मत कर्म द्वारा। 'अकुप्य द्वारा' का अर्थ है—वस्तु, ज्ञप्ति, अनुसावन, सीमा और परिषद् की सम्पत्ति से सम्पन्न होने के कारण जो अकोपित और अप्रतिक्षिप्त होने को प्राप्त है। 'स्थान-योग्य' का अर्थ है—कारण-योग्य, अर्थात् शास्ता के शासन के योग्य। इन कारणों से श्रेष्ठ भाव को प्राप्त होना ही इसका अर्थ है। वहाँ 'सम्पत्ति और विपत्ति के वश में संभव होने' का अर्थ है—वस्तु-सम्पत्ति, ज्ञप्ति-सम्पत्ति, अनुसावन-सम्पत्ति, सीमा-सम्पत्ति और परिषद्-सम्पत्ति—इन पाँच सम्पत्तियों के द्वारा उपसम्पदा कर्म की सिद्धि होना। वहाँ 'वस्तु-सम्पत्ति' का अर्थ है—पूर्ण बीस वर्ष की आयु और वर्तमान में पुरुष होना। उन्नीस वर्ष से कम आयु वाला, पहले पाराजिका का उल्लंघन करने वाला, पण्डक, स्तेय-संवासक, तित्थिय-पक्कन्तक, तिर्यंच, मातृघाती, पितृघाती, अर्हन्तघाती, भिक्षुणी-दूषक, संघ-भेदक, लोहितोत्पादक, और उभय-व्यंजनक—ये तेरह पुद्गल उपसम्पदा के लिए अयोग्य हैं। वहाँ 'उन्नीस वर्ष से कम' सामान्य रूप से कहे जाने पर भी, माता की कोख से निकलने के समय से लेकर उन्नीस वर्ष पूर्ण करने वाला पुरुष पुद्गल उपसम्पदा के लिए योग्य है, उससे कम आयु वाला उपसम्पदा के लिए योग्य नहीं है। क्योंकि एक वर्ष में हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा के भेद से तीन ऋतुएँ होती हैं, और यहाँ वे होती हैं। ‘‘กตฺติกนฺติกปกฺขมฺหา, เหมํ ผคฺคุณปุณฺณมา; ตสฺสนฺติ กปกฺขมฺหา, คิมฺหํ อาสาฬฺหิปุณฺณมา; วสฺสกาลํ ตโต เสสํ, จตุวีสตูโปสถา. कार्तिक के अंतिम पक्ष से फाल्गुन की पूर्णिमा तक हेमन्त ऋतु है; उसके अंतिम पक्ष से आषाढ़ की पूर्णिमा तक ग्रीष्म ऋतु है; उसके बाद शेष समय वर्षा काल है; (इस प्रकार) चौबीस उपोसथ होते हैं। จาตุทฺทสี ฉ เอเตสุ, ปกฺขา ตติยสตฺตมา; เสสา ปนฺนรสี เญยฺยา, อฏฺฐารส อุโปสถาติ’’. इनमें छह चतुर्दशी (उपोसथ) हैं—तीसरे और सातवें पक्ष में; शेष अठारह पूर्णिमा (पञ्चदशी) उपोसथ जानने चाहिए। เอตฺถ จ กตฺติกสฺส กาฬปกฺขปาฏิปทโต ปฏฺฐาย ยาว ผคฺคุณปุณฺณมา จตฺตาโร มาสา เหมอุตุ นาม. ผคฺคุณสฺส กาฬปกฺขปาฏิปทโต ปฏฺฐาย ยาว อาสาฬฺหีปุณฺณมา จตฺตาโร มาสา คิมฺหอุตุ นาม. อสาฬฺหกาฬปกฺขปาฏิปทโต ปฏฺฐาย ยาว อปรกตฺติกปุณฺณมา จตฺตาโร มาสา วสฺสอุตุ นาม. เอวํ เอกสฺมึ สํวจฺฉเร ตโย อุตู โหนฺติ. ตตฺถ เอกสฺมึ อุตุมฺหิ ปกฺขสฺส ตติยสตฺตเมสุ ทฺเว ทฺเว กตฺวา ฉ จตุทฺทสิกา, ปฐมทุติยจตุตฺถปญฺจมฉฏฺฐอฏฺฐเมสุ ฉ ฉ กตฺวา อฏฺฐารส ปนฺนรสิกาติ เอวํ เอกสํวจฺฉเร จตุวีสติ อุโปสถา โหนฺติ. อิเมสุ จตุวีสตุโปสเถสุ จาตุทฺทสิยา เอกูนตึส ทิวสา โหนฺตีติ กตฺวา เอกสํวจฺฉเร ฉ อูนา ทิวสา โหนฺติ. อิมินา นเยน เอกูนวีสติเม วสฺเส ฉมาสาธิกานิ อฏฺฐารสวสฺสานิ โหนฺติ. ตสฺมึ มาตุกุจฺฉิมฺหิ นิพฺพตฺตกาเล ทสมาเส ปกฺขิปิตฺวา จตฺตาริ มาสาธิกานิ เอกูนวีสวสฺสานิ ปริปุณฺณานิ. ราชาโน ปน ติณฺณํ ติณฺณํ วสฺสานํ อจฺจเยน มาสํ อากฑฺฒนฺติ[Pg.20], ทิวเสน สห มาสมฺปิ, ตสฺมา อฏฺฐารสวสฺเส เยว ฉ มาสาธิกานิ โหนฺติ. ตํ เหฏฺฐาจตุมาสาธิก เอกูนวีสติเม วสฺเส ปกฺขิปิตฺวา เอกมาสาธิกานิ วีสติวสฺสานิ สพฺพโส ปริปุณฺณานิ โหนฺติ. เอวํ เอกูนวีสติวสฺสโต ปฏฺฐาย คพฺภวีโส อุปสมฺปทาย วตฺถูติ เวทิตพฺโพ. อิทานิ ปุริสตฺตภาโว ติ ภิกฺขุนิยา อภาวโต ปุริสปุคฺคโลว อิทานิ วฏฺฏตีติ อธิปฺเปโต ตถา หิ มาตุคามสฺส ปพฺพชิตตฺถา ปญฺจวสฺสสตานิ สทฺธมฺโม ติฏฺเฐยฺย, ปญฺญตฺตตฺตา ปน อปรานิ ปญฺจวสฺสสตานิ ฐสฺสตีติ เอวํ วสฺสสหสฺสเมว ปฏิสมฺภิทาปฺปตฺตสทฺธมฺมสฺส ปติฏฺฐิตภาโว วุตฺโต. มาตุคามา จ นาม ทุปฺปญฺญา ติพฺพกิเลสา ลามกา จ. ภควตา จ ปฐมโพธิยํ อาทิโต ปฏฺฐายเมว มหาปชาปติยา โคตมิยา อฏฺฐครุธมฺมปฏิคฺคหเณน อุปสมฺปทตฺเต อนุญฺญาเตปิ สาสนสฺส อจิรฏฺฐิติกภาโว วุตฺโต. ทุปฺปญฺญตฺตา อิตฺถิโย สาสเน จิรํ น ติฏฺฐนฺติ, ติพฺพกิเลสตฺตา ยถา ปญฺญตฺต สิกฺขาปทานุรูปํ สํวรมฺปิ รกฺขิตุํ น สกฺโกนฺติ. ลามกตฺตาปิ ตา อฏฺฐสมาปตฺตึ ลภนฺตาปิ พฺราหฺมปาริสชฺชํ นาติกฺกมนฺติ, เอวํ ภิกฺขุนิยา อภาวโต อิทานิ ปุริสปุคฺคโลติ วุตฺตํ. อิมสฺมึ ฐาเน ฐตฺวา จตฺตาริ เขตฺตานิ เวทิตพฺพานิ ตถา หิ มาตุคามสฺส ปพฺพชิตตฺตา วสฺสสหสฺสเมว ฐสฺสตีติ เจตํ ปฏิสมฺภิทาปฺปตฺตขีณาสววเสน วุตฺตํ, ตโต ปรํ อุตฺตริปิ สุกฺขวิปสฺสกขีณาสววเสน วสฺสสหสฺสํ, อนาคามิวเสน วสฺสสหสฺสํ, สกทาคามิวเสน วสฺสสหสฺสํ, โสตาปนฺนวเสน วสฺสสหสฺสนฺติ เอวํ ปญฺจวสฺสสหสฺสานิ ปฏิเวธสทฺธมฺโม ติฏฺฐติ. ปริยตฺติสทฺธมฺโมปิ ตานิเยว น หิ ปริยตฺติยา อสติ ปฏิเวโธ อตฺถิ. นาปิ ปริยตฺติยา สติ ปฏิเวโธ น โหติ. ลิงฺคํ ปน ปริยตฺติยา อนฺตรหิตาย จิรํ ปวตฺติสฺสติ, อิทํ ขนฺธกภาณกานํ มเตน วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. ทีฆนิกายฏฺฐกถายํ ปน เอวํ วุตฺตํ ‘‘ปฏิสมฺภิทาปฺปตฺเตหิ วสฺสสหสฺสํ อฏฺฐาสิ, ฉฬภิญฺเญหิ วสฺสสหสฺสํ, เตวิชฺเชหิ วสฺสสหสฺสํ, สุกฺขวิปสฺสเกหิ วสฺสสหสฺสํ, ปาติโมกฺเขน วสฺสสหสฺสํ อฏฺฐาสี’’ติ. อิทมฺปิ ทีฆภาณกตฺเถรานํ มเตน วุตฺตํ. องฺคุตฺตรนิกายฏฺฐกถายมฺปิ พุทฺธานํ ปรินิพฺพานโต วสฺสสหสฺสเมว ปฏิสมฺภิทา นิพฺพตฺเตตุํ สกฺโกนฺติ, ตโต ปรํ ฉ อภิญฺญา[Pg.21], ตโต ตาปิ อสกฺโกนฺตา ติสฺโส วิชฺชา นิพฺพตฺตนฺติ. คจฺฉนฺเตกาเล ตานิปิ นิพฺพตฺเตตุํ อสกฺโกนฺตา สุกฺขวิปสฺสกา โหนฺติ. เอเตเนว อุปาเยน อนาคามิโน สกทาคิมิโน, โสตาปนฺนาติ วุตฺตํ. อิทมฺปิ องฺคุตฺตรนิกาเย วุตฺตํ. สํยุตฺตนิกายฏฺฐกถายํ ปน ปฐมโพธิยํ ภิกฺขู ปฏิสมฺภิทาปฺปตฺตา. อถ กาเล คจฺฉนฺเต ปฏิสมฺภิทา ปาปุณิตุํ น สกฺขึสุ, ฉฬภิญฺญา อเหสุํ. ตโต ฉปิ อภิญฺญา ปตฺตุํ อสกฺโกนฺตา ติสฺโส วิชฺชา ปาปุณึสุ. อิทานิ กาเล คจฺฉนฺเต ติสฺโส วิชฺชา ปาปุณิตุํ อสกฺโกนฺตา อาสวกฺขยํ ปาปุณิสฺสนฺติ, ตมฺปิ อสกฺโกนฺตา อนาคามิผลํ, ตมฺปิ อสกฺโกนฺตา สกทาคามิผลํ, ตมฺปิ อสกฺโกนฺตา โสตาปตฺติผลํ. คจฺฉนฺเตกาเล โสตาปตฺติผลมฺปิ ปตฺตุํ น สกฺขิสฺสนฺตี’ติ วุตฺตํ. ยสฺมา เจ เต อาจริยา ภินฺนวาทา, ตสฺมา เตสํ อาจริยานํ ภาณกานํ มตเมว พุทฺธโฆสาจริเยน ตตฺถ ตตฺถ ลิขิตนฺติ คเหตพฺพํ, อญฺญถา อาจริยสฺเสว ปุพฺพาปรวิโรธปฺปสงฺโค สิยา อาจริยพุทฺธโฆเสเนว หิ สีหฬภาสํ อปเนตฺวา มาคธภาสาย สาฏฺฐกถํ พุทฺธวจนํ ลิขิตํ, น อญฺเญน อาจริเยน ตสฺมา อฏฺฐกถาย วุตฺตวจนเมว ปมาณนฺติ คเหตพฺพํ. นนุ จตฺตาโรปิ นิกายฏฺฐกถาสงฺคีตึ อารูฬฺหา, อถ กสฺมา เอวํ ภินฺนาติ. สจฺจํ, ตถาปิ เกสญฺจิ เถรานํ วาทปฺปกาสนตฺถํ วุตฺตํ. น สงฺคาหกตฺเถรานํ, ตสฺมา อฏฺฐกถาวจนเมว ปมาณนฺติ วุตฺตํ. यहाँ कार्तिक की कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से लेकर फाल्गुन की पूर्णिमा तक के चार महीने 'हेमन्त ऋतु' कहलाते हैं। फाल्गुन की कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से लेकर आषाढ़ की पूर्णिमा तक के चार महीने 'ग्रीष्म ऋतु' कहलाते हैं। आषाढ़ की कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से लेकर (अगले) कार्तिक की पूर्णिमा तक के चार महीने 'वर्षा ऋतु' कहलाते हैं। इस प्रकार एक वर्ष में तीन ऋतुएँ होती हैं। वहाँ एक ऋतु में, पक्षों की तीसरी और सातवीं (तिथियों) में दो-दो करके छह चतुर्दशी (के उपोसथ) होते हैं, और पहली, दूसरी, चौथी, पाँचवीं, छठी और आठवीं (तिथियों) में छह-छह करके अठारह पूर्णिमा (के उपोसथ) होते हैं; इस प्रकार एक वर्ष में चौबीस उपोसथ होते हैं। इन चौबीस उपोसथों में चतुर्दशी के कारण उनतीस दिन होने से एक वर्ष में छह दिन कम हो जाते हैं। इस विधि से उन्नीसवें वर्ष में अठारह वर्ष और छह महीने होते हैं। उसमें माता के गर्भ में रहने के दस महीनों को जोड़ने पर उन्नीस वर्ष और चार महीने पूरे होते हैं। किन्तु राजा लोग प्रत्येक तीन वर्ष के बीतने पर एक महीना बढ़ा देते हैं, दिन के साथ महीना भी, इसलिए अठारह वर्षों में ही छह महीने (अतिरिक्त) हो जाते हैं। उसे पहले बताए गए चार महीने अधिक वाले उन्नीसवें वर्ष में जोड़ने पर बीस वर्ष और एक महीना पूरी तरह से पूर्ण हो जाते हैं। इस प्रकार उन्नीसवें वर्ष से लेकर गर्भ के समय को मिलाकर उपसम्पदा के लिए बीस वर्ष का आधार समझना चाहिए। अब 'पुरुष भाव' का अर्थ है कि भिक्षुणी के अभाव के कारण अब केवल पुरुष पुद्गल ही (उपसम्पदा के लिए) उपयुक्त है, ऐसा अभिप्राय है; क्योंकि स्त्रियों के प्रव्रजित होने के कारण सद्धर्म पाँच सौ वर्ष तक ही रहता, किन्तु (नियमों के) प्रज्ञप्त होने के कारण अन्य पाँच सौ वर्ष तक रहेगा; इस प्रकार प्रतिसंविदा प्राप्त सद्धर्म की स्थिति एक हजार वर्ष ही कही गई है। स्त्रियाँ अल्प-प्रज्ञा वाली, तीव्र क्लेशों वाली और हीन होती हैं। भगवान ने प्रथम बोधि के समय से ही महाप्रजापति गौतमी द्वारा आठ गुरुधर्मों को स्वीकार करने से उपसम्पदा की अनुमति देने पर भी शासन की अल्पकालिक स्थिति की बात कही थी। अल्प-प्रज्ञा होने के कारण स्त्रियाँ शासन में चिरकाल तक नहीं टिकतीं, तीव्र क्लेशों के कारण वे प्रज्ञप्त शिक्षापदों के अनुरूप संवर की रक्षा नहीं कर पातीं। हीन होने के कारण वे आठ समापत्तियाँ प्राप्त करके भी ब्रह्म-पार्षद (देवलोक) का अतिक्रमण नहीं कर पातीं, इसलिए भिक्षुणी के अभाव के कारण अब 'पुरुष पुद्गल' कहा गया है। इस स्थान पर चार क्षेत्र समझने चाहिए—स्त्रियों के प्रव्रजित होने के कारण (सद्धर्म) एक हजार वर्ष ही रहेगा, यह प्रतिसंविदा प्राप्त क्षीणास्त्रवों के वश से कहा गया है, उसके बाद आगे भी शुष्क-विपश्यक क्षीणास्त्रवों के वश से एक हजार वर्ष, अनागामी के वश से एक हजार वर्ष, सकृदागामी के वश से एक हजार वर्ष, और स्रोतआपन्न के वश से एक हजार वर्ष—इस प्रकार पाँच हजार वर्ष तक प्रतिवेध-सद्धर्म रहता है। पर्यत्ति-सद्धर्म भी उतने ही समय रहता है, क्योंकि पर्यत्ति के बिना प्रतिवेध नहीं होता। और पर्यत्ति के होने पर प्रतिवेध न हो, ऐसा नहीं है। पर्यत्ति के अन्तर्धान होने पर भी लिंग (वेष) चिरकाल तक बना रहेगा, यह खन्धक-भाणकों के मत से कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। दीघनिकाय-अट्ठकथा में तो ऐसा कहा गया है—'प्रतिसंविदा प्राप्तों के साथ एक हजार वर्ष रहा, षडभिज्ञाओं के साथ एक हजार वर्ष, त्रिविद्याओं के साथ एक हजार वर्ष, शुष्क-विपश्यकों के साथ एक हजार वर्ष, और पातिमोक्ष के साथ एक हजार वर्ष रहा।' यह भी दीघ-भाणक स्थविरों के मत से कहा गया है। अङ्गुत्तरनिकाय-अट्ठकथा में भी बुद्धों के परिनिर्वाण से एक हजार वर्ष तक ही प्रतिसंविदा उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं, उसके बाद छह अभिज्ञाएँ, उसके बाद उन्हें भी न कर पाने पर तीन विद्याएँ उत्पन्न होती हैं। समय बीतने पर उन्हें भी उत्पन्न न कर पाने पर वे शुष्क-विपश्यक होते हैं। इसी उपाय से अनागामी, सकृदागामी और स्रोतआपन्न कहे गए हैं। यह भी अङ्गुत्तरनिकाय में कहा गया है। संयुत्तनिकाय-अट्ठकथा में तो प्रथम बोधि में भिक्षु प्रतिसंविदा प्राप्त थे। फिर समय बीतने पर प्रतिसंविदा प्राप्त न कर सके, तो षडभिज्ञ हुए। फिर छह अभिज्ञाएँ भी प्राप्त न कर सकने पर त्रिविद्या प्राप्त हुए। अब समय बीतने पर त्रिविद्या प्राप्त न कर सकने पर आस्रव-क्षय (अर्हत्व) प्राप्त करेंगे, उसे भी न कर पाने पर अनागामी फल, उसे भी न कर पाने पर सकृदागामी फल, उसे भी न कर पाने पर स्रोतआपत्ति फल। समय बीतने पर स्रोतआपत्ति फल भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे—ऐसा कहा गया है। चूँकि वे आचार्य भिन्न-भिन्न मत वाले हैं, इसलिए उन आचार्य-भाणकों के मत को ही आचार्य बुद्धघोष ने जहाँ-तहाँ लिखा है, ऐसा समझना चाहिए; अन्यथा आचार्य के ही पूर्वापर विरोध का प्रसंग आ जाएगा। क्योंकि आचार्य बुद्धघोष ने ही सिंहल भाषा को हटाकर मागधी भाषा में अट्ठकथा सहित बुद्धवचन को लिखा है, किसी अन्य आचार्य ने नहीं। इसलिए अट्ठकथा में कहा गया वचन ही प्रमाण मानना चाहिए। क्या चारों निकाय-अट्ठकथाएँ संगीति में नहीं चढ़ाई गईं? फिर वे इस प्रकार भिन्न क्यों हैं? सत्य है, फिर भी यह कुछ स्थविरों के वाद को प्रकट करने के लिए कहा गया है, संगीति करने वाले स्थविरों का नहीं। इसलिए अट्ठकथा का वचन ही प्रमाण है, ऐसा कहा गया है। อนฺติมวตฺถุอชฺฌาปนฺนปุพฺพนฺติ ปาราชิกภิกฺขุ, โส อภพฺโพ สาสเน อุปสมฺปทกมฺมสฺส ลทฺธุํ. अन्तिम वस्तु (पाराजिक) का उल्लंघन करने वाला पूर्व पाराजिक भिक्षु है, वह शासन में उपसम्पदा कर्म प्राप्त करने के अयोग्य है। ปณฺฑโกติเจตฺต ปญฺจวิโธ โหติ อาสิตฺตปณฺฑโก, อุสฺสูยปณฺฑโก, โอปกฺกมิกปณฺฑโก, นปุํสโก, ปกฺขปณฺฑโกติ. ตตฺถ ยสฺส ปเรสํ องฺคชาตํ มุเขน คณฺหิตฺวา อสุจินา อาสิตฺตสฺส ปริฬาโห วูปสมติ, อยํ อาสิตฺตปณฺฑโก นาม. ยสฺส ปเรสํ อชฺฌาจารํ ปสฺสโต อุสฺสูยาย อุปฺปนฺนาย ปริฬาโห วูปสมติ, อยํ อุสฺสูยปณฺฑโก นาม. ยสฺส อุปกฺกเมน พีชานิ อปนีตานิ โหนฺติ, อยํ โอปกฺกมิกปณฺฑโก นาม. โย ปน ปฏิสนฺธิยํ เยว อภาวโก อุปฺปนฺโน โหติ, อยํ นปุํสโก นาม. เอกจฺโจ ปน อกุสลวิปากานุภาเวน กาฬปกฺเข ปณฺฑโก โหติ, ชุณฺหปกฺเข ปนสฺส ปริฬาโหวูปสมติ[Pg.22], อยํ ปกฺขปณฺฑโก นาม, เกจิ ปน โย กาฬปกฺเข อิตฺถี โหติ, ชุณฺหปกฺเข ปุริโส, อยํ ปกฺขปณฺฑโกติ วทนฺติ, ตํ เตสํ มติมตฺตเมว. เอเตสุ อาสิตฺตปณฺฑกสฺส จ อุสฺสูยปณฺฑกสฺส จ ปพฺพชฺชา น วาริตา. โอปกฺกมิกนปุํสกปกฺขปณฺฑกานํ ปน วาริตา. เตสุปิ ปกฺขปณฺฑกสฺส ยสฺมึ ปกฺเข ปณฺฑโก โหติ, ตสฺมึเยว ปพฺพชฺชา วาริตา. เอตฺถ จ อปณฺฑกปกฺเข ปพฺพชิตฺวา ปณฺฑกปกฺเข นาเสตพฺโพติ ตีสุปิ คณฺฐิปเทสุ วุตฺตํ. เกจิ ปน ‘‘อปณฺฑกปกฺเขปพฺพชิโต สโต กิเลสกฺขยํ ปาปุณาติ, น นาเสตพฺโพ’’ติ วทนฺติ, ตํ เตสํ มติมตฺตเมว, ปณฺฑกสฺส กิเลสกฺขยา สมฺภวโต ขีณกิเลสสฺส จ ปณฺฑกภาวานุปปตฺติโต อเหตุก ปฏิสนฺธิกถายญฺหิ อวิเสเสน ปณฺฑกสฺส อเหตุกปฏิสนฺธิ กตา วุตฺตา, อาสิตฺต อุสฺสูยปกฺขปณฺฑกานญฺจ ปฏิสนฺธิโต ปฏฺฐาเยว ปณฺฑกภาโว, น ปวตฺติยํเยวาติ วทนฺติ. เตเนว อเหตุกปฏิสนฺธินิทฺเทเส ชจฺจนฺธ-ชจฺจพธิราทโย วิย ปณฺฑโก ชาติสทฺเทน วิเสเสตฺวา นิทฺทิฏฺโฐ. จตุตฺถปาราชิกสํวณฺณนายํ ปน อภพฺพปุคฺคเล ทสฺเสนฺเตน ปณฺฑกติรจฺฉานคตอุภโต พฺยญฺชนกา ตโย วตฺถุวิปนฺนา อเหตุกปฏิสนฺธิกา, เตสํ สคฺโค อวาริโตติ อวิเสเสน วุตฺตํ, เอวํ ปญฺจวิธา ปณฺฑกา เต ปณฺฑกสามญฺเญน อวิเสเสตฺวา ‘‘ปณฺฑกาติ เอวเมว วตฺวา ปณฺฑโก ภิกฺขเว น อุปสมฺปาเทตพฺโพ’’ติ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. यहाँ 'पण्डक' पाँच प्रकार के होते हैं: आसित्तपण्डक, उस्सूयपण्डक, ओपक्कमिकपण्डक, नपुंसक और पक्खपण्डक। उनमें से, जिसके द्वारा दूसरों के अङ्ग को मुख से ग्रहण करने पर अशुचि (वीर्य) से सिञ्चित होने पर काम-दाह शान्त होता है, वह 'आसित्तपण्डक' कहलाता है। जिसके द्वारा दूसरों के मैथुन-आचार को देखते हुए ईर्ष्या उत्पन्न होने पर काम-दाह शान्त होता है, वह 'उस्सूयपण्डक' कहलाता है। जिसके प्रयत्न (शस्त्र आदि) से अण्डकोष निकाल दिए गए हों, वह 'ओपक्कमिकपण्डक' कहलाता है। जो प्रतिसन्धि (जन्म) के समय ही लिङ्ग-रहित उत्पन्न होता है, वह 'नपुंसक' कहलाता है। कोई अकुशल विपाक के प्रभाव से कृष्ण पक्ष में पण्डक होता है और शुक्ल पक्ष में उसका काम-दाह शान्त हो जाता है, वह 'पक्खपण्डक' कहलाता है; कुछ लोग कहते हैं कि जो कृष्ण पक्ष में स्त्री होता है और शुक्ल पक्ष में पुरुष, वह 'पक्खपण्डक' है, किन्तु यह केवल उनका मत मात्र है। इनमें से आसित्तपण्डक और उस्सूयपण्डक की प्रव्रज्या वर्जित नहीं है। ओपक्कमिक, नपुंसक और पक्खपण्डक की प्रव्रज्या वर्जित है। उनमें भी पक्खपण्डक के जिस पक्ष में वह पण्डक होता है, उसी पक्ष में प्रव्रज्या वर्जित है। यहाँ यह भी कहा गया है कि अपण्डक पक्ष में प्रव्रजित होकर पण्डक पक्ष में उसे निकाल देना चाहिए—यह तीनों गण्ठिपदों में कहा गया है। कुछ लोग कहते हैं कि 'अपण्डक पक्ष में प्रव्रजित होकर यदि वह स्मृतिमान रहते हुए क्लेशों का क्षय प्राप्त कर लेता है, तो उसे नहीं निकालना चाहिए', किन्तु यह केवल उनका मत मात्र है, क्योंकि पण्डक के लिए क्लेश-क्षय सम्भव नहीं है और क्षीणक्लेश (अर्हत्) का पण्डक होना असम्भव है। अहेतुक प्रतिसन्धि की कथा में सामान्य रूप से पण्डक की अहेतुक प्रतिसन्धि कही गई है। आसित्त, उस्सूय और पक्खपण्डकों का पण्डक-भाव प्रतिसन्धि से ही होता है, न कि केवल प्रवृत्ति काल में—ऐसा वे कहते हैं। इसीलिए अहेतुक प्रतिसन्धि के निर्देश में जन्मान्ध, जन्मबधिर आदि की तरह पण्डक को 'जाति' शब्द से विशेषित कर निर्दिष्ट किया गया है। चतुर्थ पाराजिक की व्याख्या में अभव्य पुद्गलों को दिखाते हुए पण्डक, तिर्यञ्च और उभतोब्यञ्जनक—ये तीन वस्तु-विपन्न अहेतुक प्रतिसन्धिक हैं, उनका स्वर्ग वर्जित नहीं है—ऐसा सामान्य रूप से कहा गया है। इस प्रकार ये पाँच प्रकार के पण्डक हैं, उन्हें पण्डक के सामान्य लक्षण से बिना भेद किए 'पण्डक' ही कहकर 'भिक्षुओं, पण्डक को उपसम्पदा नहीं देनी चाहिए'—ऐसा कहा गया है, यह समझना चाहिए। เถยฺยสํวาสโก ติ โย สยเมว ปพฺพชฺชาลิงฺคํ คเหตฺวา ภิกฺขุวสฺสํ คเณตฺวา ภิกฺขูติ ปฏิญฺญํ สมฺปฏิจฺฉติ, ยถาวุฑฺฒํ วนฺทนํ สาทิยติ, โส ลิงฺคสฺส สํวาสสฺส จ เถนตฺตา อุภยตฺเถนโก นาม. โย ปน ยถาวุฑฺฒํ วนฺทนํ น สาทิยติ, อสุทฺธจิตฺตวเสน ลิงฺคสฺสเถนตฺตาลิงฺคตฺเถนโก นาม. โย วา ปน สามเณรภูมิยํ ฐตฺวา มุสาวาเทน ภิกฺขุติ ปฏิญฺญํ คเหตฺวา ภิกฺขุวสฺสคฺเคน วนฺทนาทึ สาทิยติ, โส ภิกฺขูหิ ทินฺนลิงฺคตฺตา ลิงฺคตฺเถนโก น โหติ, สํวาสสฺส เถนตฺตา สํวาสตฺเถนโก นาม. เอตฺถ จ อุภยตฺเถนโกปิ อสุทฺธจิตฺเตน ลิงฺคตฺเถนเกเอว ปวิฏฺโฐติ เวทิตพฺโพ. โยปิ สามเณโร วุฑฺฒสามเณรานํ วนฺทนํ สาทิยติ, ทหรภิกฺขูปิ วุฑฺฒภิกฺขูนํ วนฺทนํ สาทิยติ, โสปิ เถยฺยสํวาสโก นาปิ โหติ, อเถนตฺตา. โย วา ปน ภิกฺขุปาราชิกมาปนฺโนว ภิกฺขุลิงฺเค [Pg.23] ฐิโต ยาว ปฏิชานาติ, ตาว อตฺเถว ตสฺส ภิกฺขุภาโว, น โส อนุปสมฺปนฺนสงฺขฺยํ คจฺฉติ, ตถา หิ โส สํวาสํ สาทิยนฺโตปิ เถยฺยสํวาสโก น โหติ, โส สหเสยฺยาทิอาปตฺติมฺปิ น ชเนติ, โอมสวาเท ปาจิตฺติยญฺจ น ชเนติ เตเนว ‘‘อสุทฺโธ โหติ ปุคฺคโล อญฺญตรํ ปาราชิกํ ธมฺมํ อชฺฌาปนฺโน, ตญฺเจ สุทฺธทิฏฺฐิ สมาโน โอกาสํ การาเปตฺวา อกฺโกสาธิปฺปาโย วทติ อาปตฺติ โอมสวาทสฺสา’’ติ โอมสวาเท ปาจิตฺติยํ วุตฺตํ. อสติ หิ ภิกฺขุภาเว ทุกฺกฏํ วเทยฺย. โย ปน สามเณโร สามเณรลิงฺเคเนว ปาณาติปาตาทิปญฺจวิธํ สิลวิปตฺตึ ปาปุณาติ, โสปิ อาคโต ลิงฺคนาสนาย นาเสตฺวา สรณสีลํ ทาตพฺพํ, อเถนตฺตา อุปสมฺปทาย อวตฺถุภาวมฺปิ น ปาปุณาติ. วิกาลโภชนาทิกํ กโรนฺตสฺส ปน ‘‘อจฺจโย มํ ภนฺเต อจฺจาคมา’’ตฺยาทินา สงฺฆมชฺเฌ อจฺจยํ เทสาเปตฺวา วา ทณฺฑกมฺมํ วา กตฺวา สีลํ ทาตพฺพเมว. ติตฺถิยปกฺกนฺตโก อุตฺตาโนเยว. 'थेय्यसंवासक' (चोरी से साथ रहने वाला) वह है जो स्वयं ही प्रव्रज्या के चिह्न (चीवर आदि) धारण कर, भिक्षु-वर्षों की गणना कर, 'मैं भिक्षु हूँ' ऐसी प्रतिज्ञा स्वीकार करता है और वरिष्ठता के अनुसार वन्दना स्वीकार करता है; वह चिह्न और संवास (साथ रहने) की चोरी के कारण 'उभयत्थेनक' (दोनों का चोर) कहलाता है। जो वरिष्ठता के अनुसार वन्दना स्वीकार नहीं करता, किन्तु अशुद्ध चित्त से चिह्न धारण करने के कारण 'लिङ्गत्वेनक' (चिह्न का चोर) कहलाता है। अथवा जो श्रामणेर अवस्था में रहकर झूठ बोलकर 'मैं भिक्षु हूँ' ऐसी प्रतिज्ञा कर भिक्षु-वर्षों के अनुसार वन्दना आदि स्वीकार करता है, वह भिक्षुओं द्वारा चिह्न दिए जाने के कारण 'लिङ्गत्वेनक' नहीं होता, किन्तु संवास की चोरी के कारण 'संवासत्थेनक' कहलाता है। यहाँ यह समझना चाहिए कि उभयत्थेनक भी अशुद्ध चित्त वाले लिङ्गत्वेनक के अन्तर्गत ही आता है। जो श्रामणेर वृद्ध श्रामणेरों की वन्दना स्वीकार करता है, अथवा कनिष्ठ भिक्षु वृद्ध भिक्षुओं की वन्दना स्वीकार करता है, वह चोरी न होने के कारण थेय्यसंवासक नहीं होता। अथवा जो भिक्षु पाराजिक आपत्ति को प्राप्त होकर भी भिक्षु के चिह्न में स्थित रहता है, जब तक वह स्वीकार करता है, तब तक उसका भिक्षु-भाव बना रहता है, वह अनुपसम्पन्न की श्रेणी में नहीं आता। इसी प्रकार वह संवास स्वीकार करते हुए भी थेय्यसंवासक नहीं होता, वह सहशय्या आदि की आपत्ति भी उत्पन्न नहीं करता और ओमसवाद (अपमानजनक वचन) में पाचित्तिय भी उत्पन्न नहीं करता। इसीलिए कहा गया है—'यदि कोई पुद्गल अशुद्ध है, किसी पाराजिक धर्म का उल्लंघन कर चुका है, और यदि कोई शुद्ध दृष्टि वाला व्यक्ति उसे अवसर प्रदान कर (पूछकर) गाली देने के अभिप्राय से बोलता है, तो ओमसवाद की आपत्ति होती है।' भिक्षु-भाव न होने पर तो दुक्कट (दुष्कृत) कहा जाता। जो श्रामणेर श्रामणेर के चिह्न में रहते हुए ही प्राणातिपात आदि पाँच प्रकार के शील-विपत्ति को प्राप्त होता है, उसे भी 'लिङ्ग-नासना' के लिए आए हुए (नियम) के अनुसार नाशित (निष्कासित) कर शरण और शील देना चाहिए; चोरी न होने के कारण वह उपसम्पदा के लिए अयोग्य नहीं होता। विकाल-भोजन आदि करने वाले को तो 'भन्ते, मुझसे अपराध हो गया' आदि कहकर संघ के बीच अपराध की देशना कराकर या दण्डकर्म देकर शील देना ही चाहिए। 'तित्थियपक्कन्तक' (तीर्थकों के पास गया हुआ) स्पष्ट ही है। ติรจฺฉานคโตติ โยโกจิ อมนุสฺสภูโต จตฺตาโร อปายิกาปิ อุปสมฺปทาย อวตฺถุเยว. เต ปฏิสนฺธิยา ลามกตฺตา อภพฺพา สาสเน ปพฺพชิตุํ. ยทิ จตฺตาโร อปายิกา อุปสมฺปทาย อวตฺถุ ภเวยฺย, อถ กสฺมา เสเส อนปทิสิตฺวา ติรจฺฉานคโตว อวตฺถูติ วุตฺตนฺติ. เสสานํ อปากฏวตฺถุตฺตา, ตถา หิ สมฺพุทฺธกาเล ติรจฺฉานโยนิยํ นิพฺพตฺโต เอโก นาคราชา นาคโยนิยา อฏฺฏียติ หรายติ ชิคุจฺฉติ. อถโข ตสฺส นาคสฺส เอตทโหสิ เกนนุโข อหํ อุปาเยน นาคโยนิยา ปริมุจฺเจยฺยํ ขิปฺปญฺจ มนุสฺสตฺตํ ลเภยฺยนฺติ. อถโข ตสฺส นาคสฺส เอตทโหสิ ‘‘อิเม โข สมณาสกฺยปุตฺติยา ธมฺมจาริโน สมจาริโน พฺรหฺมจาริโน สจฺจวาทิโน สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา สเจ โข อหํ สมเณสุ สกฺยปุตฺติเยสุ ปพฺพเชยฺยํ, เอวาหํ นาคโยนิยา ปริมุจฺเจยฺยํ ขิปฺปญฺจ มนุสฺสตฺตํ ปฏิลเภยฺย’’นฺติ. อถ โข โส นาโค มาณวกวณฺเณน ภิกฺขู อุปสงฺกมิตฺวา ปพฺพชฺชํ ยาจิ. ตํ ภิกฺขู ปพฺพาเชสุํ อุปสมฺปาเทสุํ. เตน โข ปน สมเยน โส นาโค อญฺญตเรน ภิกฺขุนา สทฺธึ ปจฺจนฺติเม วิหาเร ปฏิวสติ. อถ โข โส ภิกฺขุ รตฺติยา ปจฺจูสสมยํ ปจฺจูฏฺฐาย อชฺโฌกาเส [Pg.24] จงฺกมติ. อถ โข โส นาโค ตสฺส ภิกฺขุโน นิกฺขนฺเต วิสฺสฏฺโฐ นิทฺทํ โอกฺกเมสิ. สพฺโพ วิหาโร อหินา ปุณฺโณ, วาตปาเนหิ โภคา นิกฺขนฺตา โหนฺติ. อถโข โส ภิกฺขุ ‘‘วิหารํ ปวิสิสฺสามี’’ติ กวาฏํ ปณาเมนฺโต อทฺทส สพฺพํ วิหารํ อหินาปุณฺณํ วาตปาเนหิ โภเค นิกฺขนฺเต. ทิสฺวาน ภีโต วิสฺสรมกาสิ. ภิกฺขู อุปธาวิตฺวา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจุํ ‘‘กิสฺส ตฺวํ อาวุโส วิสฺสรมกาสี’’ติ. อยํ อาวุโส สพฺโพ วิหาโร อหินา ปุณฺโณ วาตปาเนหิ โภคา นิกฺขนฺตาติ. อถ โข โส นาโค เตน สทฺเทน ปพุชฺฌิตฺวา สเก อาสเน นิสีทิ. ภิกฺขู เอวมาหํสุ ‘‘โกจิ ตฺวํ อาวุโส’’ติ. ‘‘อหํ ภนฺเต นาโค’’ติ. ‘‘กิสฺส ปน ตฺวํ อาวุโส เอวรูปํ อกาสี’’ติ. อถ โข โส นาโค ภิกฺขูนํ เอตมตฺถํ อาโรเจสี. ภิกฺขู ภควโต เอตมตฺถํ อาโรเจสุํ. อถ โข ภควา เอตสฺมึ นิทาเน เอตสฺมึ ปกรเณ ภิกฺขุสงฺฆํ สนฺนิปาตาเปตฺวา ตํ นาคํ เอตทโวจ ‘‘ตุมฺเห ขฺวตฺถ นาคา อวิรูฬฺหิธมฺมา อิมสฺมึ ธมฺมวินเย, คจฺฉ ตฺวํ นาค, ตตฺเถว จาตุทฺทเส ปนฺนรเส อฏฺฐมิยา จ ปกฺขสฺส อุโปสถํ อุปวส, เอวํ ตฺวํ นาคโยนิยา ปริมุจฺจิสฺสสิ ขิปฺปญฺจ มนุสฺสตฺตํ ปฏิลภิสฺสสี’’ติ. อถ โข โส นาโค ‘‘อวิรูฬฺหธมฺโม กิราหํ อิมสฺมึ ธมฺมวินเยติ ทุกฺขี ทุมฺมโน อสฺสูนิ ปวตฺตยมาโน วิสฺสรํ กตฺวา ปกฺกมิ. อถ โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ ‘‘ทฺเว เม ภิกฺขเว ปจฺจยา นาคสฺส สภาวปาตุกมฺมาย. ยทา จ สชาติยา เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสวติ, ยทา จ วิสฺสฏฺโฐ นิทฺทํ โอกฺกมติ. อิเม โข ภิกฺขเว ทฺเว ปจฺจยา นาคสฺส สภาว ปาตุกมฺมาย. ติรจฺฉานคโต ภิกฺขเว น อุปสมฺปาเทตพฺโพ, อุปสมฺปนฺโน นาเสตพฺโพ’’ติ เอวํ ติรจฺฉานสฺเสว ปากฏวตฺตุตฺตาติ. เอตฺถ จ ปวตฺติยํ อภิณฺหํ สภาวปาตุกมฺมทสฺสนวเสน ‘‘ทฺเว ปจฺจยา’’ติ วุตฺตํ. นาคสฺส ปน ปญฺจสุ กาเลสุ สภาวปาตุกมฺมํ โหติ ปฏิสนฺธิกาเล, ตจปชหนนกาเล, สชาติยา เมถุนกาเล, วิสฺสฏฺฐ นิทฺโทกฺกมนกาเล, จุติกาเลติ. นนุ จ เทวาปิ อุปสมฺปทาย อวตฺถุเยว, อถ กสฺมา จตฺตาโร อปายิกาว อุปสมฺปทาย อวตฺถูติ วุตฺตนฺติ. สจฺจํ, ตถาปิ เทวานํ อภพฺพตฺตา ปฏิเวธสาสนสฺส ฐิตตฺตา เต อภพฺพโต วิสุํ กรณตฺถาย เอวํ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. วกฺขติ หิ สมนฺตปาสาทิกาย วินยฏฺฐกถาย มหาวคฺเค ‘‘ติรจฺฉานคโต ภิกฺขเวติ [Pg.25] เอตฺถ นาโค วา โหตุ สุปณฺณมาณวกาทีนํ วา อญฺญตโร อนฺตมโส สกฺกํ เทวราชานํ อุปาทาย โย โกจิ อมนุสฺสชาติโย สพฺโพว อิมสฺมึ อตฺเถ ติรจฺฉานคโตติ เวทิตพฺโพ’’ติ, เตน ‘‘ติรจฺฉานคโตติ โยโกจิ อมนุสฺสภูโต’’ติ วุตฺตนฺติ. เอตฺถ จาห ยทิ นาคสุปณฺณา ปฏิสนฺธิยา ลามกา ภเวยฺย, อถ กสฺมา วิธุรชาตเก จตฺตาโร ชนา นาคสุปณฺณสกฺกธนญฺจยโกรพฺเยสุ ภวเนสุ ตํ ตเทว ฐานํ ปตฺเถนฺตา ทานาทีนิ ปุญฺญานิ กโรนฺติ, เตสุ เอโก อายุปริโยสาเน สปุตฺตทาโร นาคภวเน นาคราชา หุตฺวา นิพฺพตฺติ, เอโก สุปณฺณภวเน สิมฺพลิวิมาเน สุปณฺณราชา หุตฺวา นิพฺพตฺติ, เอโก ตาวตึสภวเน สกฺโก หุตฺวา นิพฺพตฺติ, เอโก ธนญฺจยโกรพฺยรญฺโญ อคฺคมเหสิยา กุจฺฉิมฺหิ นิพฺพตฺตีติ จตุนฺนมฺปิ ชนานํ ปฏิสนฺธิยํ กุสลกมฺเมเนว ปวตฺตภาโว วุตฺโต ยทิ กุสลกมฺเมน ภเวยฺย, ‘‘กุสลา เจตนา วิปากานํ ขนฺธานํ กฏตฺตา จ รูปานํ กมฺมปจฺจเยน ปจฺจโย’’ติ อิมิสฺสาปิ ปฏฺฐานปาฬิยา อเหตุกานมฺปิ ปฏิสนฺธิกฺขเณ กมฺมปจฺจยภาโว วุตฺโต ภเวยฺย, น ปเนวํ วตฺตพฺพํ อถ กถญฺจิทํ ปจฺเจตพฺพนฺติ. วุจฺจเต, นิกนฺติยา พลวตฺตา สตฺตวิธเมถุนสํโยคตฺตา จ อปริสุทฺธา เตสํ กุสลเจตนา, อปริสุทฺธาเยว สุคติภูมิยํ ชเนตุํ น สกฺโกนฺติ. ทุคฺคติภูมิยํ ปวตฺตมานาปิ กมฺมา ยูหนกาเล ตํ ตํ ภูมิปตฺถนา ตณฺหาสมฺปยุตฺตาปุพฺพภาคเจตนา พเลน เตสุ ติรจฺฉานภูมีสุ นิพฺพตฺตนฺติ, น อญฺเญน อกุสเลน. เอวญฺหิ ปตฺถิตปตฺถนา สิทฺธาปิ ภเวยฺย. ยทิ อญฺเญน อกุสลกมฺเมน ภเวยฺย, อิจฺฉิตปตฺถนาปิ อสิทฺธาว ภเวยฺย. นิกนฺติจ นาเมสา พลวฌานสมฺปยุตฺตเจตนาปิ ปฏิพาหิตุํ สกฺกา ตถา หิ โคปกเทวทตฺตสฺส อาจริยสมโณ ฌานพเลน พฺรหฺมภูมีสุ อนิพฺพตฺติตฺวา ฌานํ ปฏิพาหิตฺวา อญฺญกมฺเมน คนฺธพฺพเทเวสุเยว อุปฺปชฺชติ ‘‘สีลวโต หิ ภิกฺขเว เจโตปณิธิ สมิชฺฌติ วิสุทฺธตฺตา’’ติ เตสํ วิตฺถาโร ทีฆนิกาเย อาคโต, อตฺถิเกหิ ตตฺถ โอโลเกตพฺโพ. สตฺตวิธเมถุนสํโยควเสนาปิ สตฺตา ทุกฺขโต น มุจฺจนฺติ วุตฺตญฺหิ ภควตา ‘‘อิธ พฺราหฺมณ เอกจฺโจ สมโณ วา พฺราหฺมโณ วา สมฺมา พฺรหฺมจารี ปฏิชานมาโน น เหว โข มาตุคาเมน สทฺธึ ทฺวยํทฺวย สมาปตฺตึ สมาปชฺชติ, อปิ [Pg.26] จ โข มาตุคามสฺส อุจฺฉาทนํ นฺหาปนํ ปริมทฺทนํ สมฺพาหนํ สาทิยติ, โส ตทสฺสาเทติ ตํ นิกาเมติ, เตนจวิตฺตึ อาปชฺชติ. อิทมฺปิโข พฺราหฺมณพฺรหฺมจริยสฺส ขณฺฑมฺปิ ฉิทฺทมฺปิ สพลมฺปิ กมฺมาสมฺปิ. อยํ วุจฺจติ พฺราหฺมณ อปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ จรติ. สํยุตฺโต เมถุนสํโยเคน น ปริมุจฺจติ ชาติยา ชรามรเณน…เป… น ปริมุจฺจติ ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. ปุนจ ปรํ พฺราหฺมณ อิเธกจฺโจ สมโณวา…เป… ปฏิชานมาโน. น เหว โข มาตุคาเมนสทฺธึ ทฺวยํทฺวยสมาปตฺตึ สมาปชฺชติ, น ปิ มาตุคามสฺส อุจฺฉาทนํ…เป… สาทิยติ, อปิ จ โข มาตุคาเมน สทฺธึ สํชคฺฆติ สํกีฬติ สํเกฬายติ, โส ตทสฺสาเทติ…เป… ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. ปุนจ ปรํ พฺราหฺมณ อิเธกจฺโจ สมโณ วา…เป… น เหว โข มาตุคาเมน สทฺธึ สมาปชฺชติ. นปิ มาตุคามสฺส อุจฺฉาทนํ สาทิยติ. นปิ มาตุคาเมน สทฺธึ สํชคฺฆติ สํกีฬติ สํเกฬายติ. อปิจ โข มาตุคามสฺส จกฺขุํ อุปนิชฺฌายติ เปกฺขติ, โส ตทสฺสาเทติ…เป… ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. ปุนจ ปรํ พฺราหฺมณ อิเธกจฺโจ สมโณวา พฺราหฺมโณ วา…เป… น เหว โข มาตุคาเมน, น มาตุคามสฺส, นปิ มาตุคาเมน เปกฺขติ. อปิ จ โข มาตุคามสฺส สทฺทํ สุณาติ ติโรกุฏฺฏํวา ติโรปาการํวา หสนฺติยา วา ภณนฺติยา วา คายนฺติยา วา โรทนฺติยา วา, โส ตทสฺสาเทติ…เป… ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. ปุนจ ปรํ พฺราหฺมณ อิเธกจฺโจ สมโณ วา พฺรหฺมโณ วา…เป… นเหว โข มาตุคาเมน, นปิ มาตุคามสฺส, นปิ มาตุคาเมน, นปิ มาตุคามสฺส โรทนฺติยา วา…เป… อปิ จ โข ยานิตานิ ปุพฺเพ มาตุคาเมน สทฺธึ หสิตลปิตกีฬิตานิ อนุสฺสรติ. โส ตทสฺสา เทติ…เป… ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. ปุนจ ปรํ พฺราหฺมณ อิเธกจฺโจ สมโณ วา พฺรหฺมโณ วา…เป… น เหว โข มาตุคาเมน, นปิ มาตุคามสฺส…เป… น ปิ ยานิ ตานิ ปุพฺเพ มาตุคาเมน สทฺธึ หสิตลปิตกีฬิตานิ อนุสฺสรติ, อปิ จ โข คหปตึ วา คหปติปุตฺตํ วา ปญฺจหิ กามคุเณหิ สหิตํ สมงฺคีภูตํ ปริจารยมานํ, โส ตทสฺสาเทติ…เป… ทุกฺขสฺมาติ วทามิ. ปุนจ ปรํ พฺราหฺมณ…เป… น เหว โข มาตุคาเมน…เป… นปิ อนุสฺสรติ คหปตึ วา คหปติปุตฺตํ วา ปริจารยมานํ, อปิ จ โข อญฺญตรํ เทวนิกายํ ปณิธาย พฺรหฺมจริยํ จรติ อิมินาหํ สีเลน วา วเตน วา ตเปนวา พฺรหฺมจริเยน วา เทโว วา ภวิสฺสามิ เทวญฺญตโร วาติ, โส ตทสฺสาเทติ[Pg.27], ตํ นิกาเมติ, เตน จ วิตฺตึ อาปชฺชติ. อิทํ โข พฺราหฺมณ พฺรหฺมจริยสฺส ขณฺฑมฺปิ ฉิทฺทมฺปิ สพลมฺปิ กมฺมาสมฺปี’’ติ เอวํ ลาภาทิเหตุเกน เภเทน จ สตฺตวิธเมถุนสํโยเคน ขณฺฑาทิภาโว สงฺคหิโตติ เวทิตพฺโพ. ‘तिर्यकगत’ (पशु) का अर्थ है कोई भी जो मनुष्य नहीं है; चारों अपायों के प्राणी भी उपसंपदा के लिए अयोग्य ही हैं। वे प्रतिसंधि की हीनता के कारण शासन में प्रव्रजित होने के लिए असमर्थ हैं। यदि चारों अपायों के प्राणी उपसंपदा के लिए अयोग्य हैं, तो फिर अन्यों का निर्देश न कर केवल ‘तिर्यकगत ही अयोग्य है’ ऐसा क्यों कहा गया? क्योंकि अन्यों का मामला इतना स्पष्ट नहीं था। जैसा कि, बुद्ध के समय में तिर्यक योनि में उत्पन्न एक नागराज अपनी नाग योनि से पीड़ित, लज्जित और घृणा करता था। तब उस नाग को यह विचार आया— ‘मैं किस उपाय से नाग योनि से मुक्त हो जाऊँ और शीघ्र ही मनुष्यत्व प्राप्त करूँ?’ तब उस नाग को यह विचार आया— ‘ये शाक्यपुत्रीय श्रमण धर्मचारी, समचारी, ब्रह्मचारी, सत्यवादी, शीलवान और कल्याणधर्मी हैं; यदि मैं शाक्यपुत्रीय श्रमणों में प्रव्रजित हो जाऊँ, तो इस प्रकार मैं नाग योनि से मुक्त हो जाऊँगा और शीघ्र ही मनुष्यत्व प्राप्त कर लूँगा।’ तब वह नाग एक युवक का रूप धारण कर भिक्षुओं के पास गया और प्रव्रज्या की याचना की। भिक्षुओं ने उसे प्रव्रजित और उपसंपन्न कर दिया। उस समय वह नाग किसी अन्य भिक्षु के साथ सीमावर्ती विहार में रहता था। तब वह भिक्षु रात्रि के अंतिम प्रहर में उठकर खुले आकाश में चंक्रमण करने लगा। तब वह नाग उस भिक्षु के बाहर जाने पर आश्वस्त होकर सो गया। सारा विहार साँप से भर गया, खिड़कियों से उसके शरीर के घेरे बाहर निकले हुए थे। तब वह भिक्षु ‘विहार में प्रवेश करूँगा’ ऐसा सोचकर किवाड़ खोलते हुए देखा कि सारा विहार साँप से भरा है और खिड़कियों से शरीर के घेरे बाहर निकले हुए हैं। देखकर डर के मारे वह चिल्लाने लगा। भिक्षु दौड़कर आए और उस भिक्षु से बोले— ‘आयुष्मान, तुम क्यों चिल्ला रहे हो?’ ‘आयुष्मान, यह सारा विहार साँप से भरा है, खिड़कियों से शरीर के घेरे बाहर निकले हुए हैं।’ तब वह नाग उस शब्द से जागकर अपने आसन पर बैठ गया। भिक्षुओं ने पूछा— ‘आयुष्मान, तुम कौन हो?’ ‘भन्ते, मैं नाग हूँ।’ ‘आयुष्मान, तुमने ऐसा क्यों किया?’ तब उस नाग ने भिक्षुओं को वह सारी बात बता दी। भिक्षुओं ने भगवान को यह बात बताई। तब भगवान ने इसी निदान में, इसी प्रकरण में भिक्षु-संघ को एकत्रित कर उस नाग से यह कहा— ‘तुम नाग इस धर्म-विनय में वृद्धि (मार्ग फल की प्राप्ति) करने वाले नहीं हो। जाओ नाग, तुम वहीं चौदहवीं, पंद्रहवीं और पक्ष की अष्टमी को उपोसथ का पालन करो; इस प्रकार तुम नाग योनि से मुक्त हो जाओगे और शीघ्र ही मनुष्यत्व प्राप्त कर लोगे।’ तब वह नाग ‘मैं इस धर्म-विनय में वृद्धि करने वाला नहीं हूँ’ ऐसा सोचकर दुखी और उदास होकर, आँसू बहाते हुए और विलाप करते हुए चला गया। तब भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया— ‘भिक्षुओं, नाग के वास्तविक रूप के प्रकट होने के ये दो कारण हैं— जब वह अपनी ही जाति के साथ मैथुन धर्म का सेवन करता है, और जब वह आश्वस्त होकर सो जाता है। भिक्षुओं, नाग के वास्तविक रूप के प्रकट होने के ये ही दो कारण हैं। भिक्षुओं, तिर्यकगत को उपसंपदा नहीं देनी चाहिए, यदि दे दी गई हो तो उसे निकाल देना चाहिए।’ इस प्रकार तिर्यक के मामले में ही स्पष्ट होने के कारण ऐसा कहा गया है। और यहाँ इस प्रसंग में बार-बार वास्तविक रूप के प्रकट होने के दर्शन के वश में ‘दो कारण’ कहा गया है। नाग का वास्तविक रूप पाँच समयों में प्रकट होता है— प्रतिसंधि काल में, केंचुल छोड़ते समय, अपनी जाति के साथ मैथुन के समय, आश्वस्त होकर गहरी नींद के समय, और मृत्यु (च्युति) के समय। क्या देवता भी उपसंपदा के लिए अयोग्य ही नहीं हैं? फिर क्यों केवल चारों अपायों के प्राणियों को ही उपसंपदा के लिए अयोग्य कहा गया? यह सत्य है, फिर भी देवताओं के मार्ग-साक्षात्कार (प्रतिवेध) के लिए अयोग्य होने और शासन की स्थिति के कारण, उन्हें अयोग्य के रूप में अलग से बताने के लिए ऐसा कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। समन्तपासाधिका नामक विनय-अट्ठकथा के महावग्ग में कहा जाएगा— ‘भिक्षुओं, तिर्यकगत’ यहाँ नाग हो या सुपर्ण, युवक आदि में से कोई भी हो, यहाँ तक कि देवराज शक्र को लेकर जो कोई भी अमनुष्य जाति का है, वह सब इस अर्थ में ‘तिर्यकगत’ ही समझना चाहिए; इसीलिए ‘तिर्यकगत का अर्थ है कोई भी जो अमनुष्य है’ ऐसा कहा गया है। यहाँ यह कहा गया है कि यदि नाग और सुपर्ण प्रतिसंधि के कारण हीन होते, तो विधुर जातक में चार लोग नाग, सुपर्ण, शक्र और धनंजय कोरव्य के भवनों में उसी-उसी स्थान की प्रार्थना करते हुए दान आदि पुण्य क्यों करते? उनमें से एक आयु की समाप्ति पर अपने पुत्र और पत्नी के साथ नाग भवन में नागराज होकर उत्पन्न हुआ, एक सुपर्ण भवन के शाल्मली विमान में सुपर्णराज होकर उत्पन्न हुआ, एक तावतिंस भवन में शक्र होकर उत्पन्न हुआ, और एक राजा धनंजय कोरव्य की अग्र-महिषी की कोख में उत्पन्न हुआ। इन चारों ही व्यक्तियों की प्रतिसंधि कुशल कर्म से ही होने की बात कही गई है। यदि कुशल कर्म से होती है, तो ‘कुशल चेतना विपाक स्कंधों और कर्मज रूपों के लिए कर्म प्रत्यय से प्रत्यय है’— इस पट्ठानपालि के अनुसार अहेतुक प्रतिसंधि के क्षण में भी कर्म प्रत्यय का होना कहा गया होगा। लेकिन ऐसा नहीं कहना चाहिए, तो फिर इसे कैसे समझना चाहिए? कहा जाता है— निकान्ति (तृष्णा) की प्रबलता और सात प्रकार के मैथुन-संयोगों के कारण उनकी कुशल चेतना अशुद्ध थी; अशुद्ध होने के कारण वे सुगति भूमि में उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होते। दुर्गति भूमि में होने वाले कर्म भी संचय (यूहना) के समय उस-उस भूमि की प्रार्थना और तृष्णा से युक्त पूर्वभाग की चेतना के बल से उन तिर्यक भूमियों में उत्पन्न होते हैं, किसी अन्य अकुशल कर्म से नहीं। इस प्रकार चाही गई प्रार्थना सिद्ध भी हो सकती है। यदि किसी अन्य अकुशल कर्म से होती, तो इच्छित प्रार्थना भी असिद्ध ही रहती। ‘निकान्ति’ नामक यह प्रबल ध्यान-युक्त चेतना को भी रोकने में समर्थ है; जैसे कि गोपिक देवदत्त के आचार्य श्रमण ध्यान के बल से ब्रह्म-भूमि में उत्पन्न न होकर, ध्यान के रुक जाने पर अन्य कर्म के कारण गंधर्व देवों में ही उत्पन्न हुए। ‘भिक्षुओं, शीलवान की चित्त-प्रणिधि शुद्ध होने के कारण सिद्ध होती है’— इनका विस्तार दीघनिकाय में आया है, इच्छुक व्यक्ति वहाँ देख सकते हैं। सात प्रकार के मैथुन-संयोगों के कारण भी प्राणी दुःख से मुक्त नहीं होते; जैसा कि भगवान ने कहा है— ‘यहाँ ब्राह्मण, कोई श्रमण या ब्राह्मण सम्यक ब्रह्मचारी होने का दावा करता है, वह स्त्री के साथ द्वंद्व-समापत्ति (मैथुन) तो नहीं करता, किंतु वह स्त्री द्वारा उबटन लगाने, स्नान कराने, मर्दन करने और संवाहन (मालिश) करने को स्वीकार करता है, वह उसमें आनंद लेता है, उसकी इच्छा करता है और उससे तृप्ति पाता है। ब्राह्मण, यह भी ब्रह्मचर्य का खंडित होना, छिद्रित होना, धब्बेदार होना और चितकबरा होना है। ब्राह्मण, इसे अशुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन करना कहा जाता है। मैथुन-संयोग से युक्त होने के कारण वह जाति, जरा, मरण... दुःख से मुक्त नहीं होता, ऐसा मैं कहता हूँ। फिर ब्राह्मण, यहाँ कोई श्रमण... दावा करता है। वह स्त्री के साथ द्वंद्व-समापत्ति नहीं करता, न ही उबटन आदि स्वीकार करता है, किंतु वह स्त्री के साथ हँसता है, खेलता है और क्रीड़ा करता है, वह उसमें आनंद लेता है... दुःख से मुक्त नहीं होता, ऐसा मैं कहता हूँ। फिर ब्राह्मण, यहाँ कोई श्रमण... वह स्त्री के साथ द्वंद्व-समापत्ति नहीं करता, न ही उबटन आदि स्वीकार करता है, न ही हँसता-खेलता है, किंतु वह स्त्री की आँखों में आँखें डालकर देखता है, वह उसमें आनंद लेता है... दुःख से मुक्त नहीं होता, ऐसा मैं कहता हूँ। फिर ब्राह्मण, यहाँ कोई श्रमण... वह स्त्री के साथ नहीं, न ही उबटन, न ही देखता है, किंतु वह दीवार या घेरे के पीछे से स्त्री का शब्द सुनता है— हँसती हुई, बोलती हुई, गाती हुई या रोती हुई; वह उसमें आनंद लेता है... दुःख से मुक्त नहीं होता, ऐसा मैं कहता हूँ। फिर ब्राह्मण, यहाँ कोई श्रमण... वह स्त्री के साथ नहीं, न ही उबटन, न ही देखता है, न ही रोती हुई का शब्द सुनता है, किंतु वह पहले स्त्री के साथ किए गए हँसने, बोलने और खेलने को याद करता है। वह उसमें आनंद लेता है... दुःख से मुक्त नहीं होता, ऐसा मैं कहता हूँ। फिर ब्राह्मण, यहाँ कोई श्रमण... वह स्त्री के साथ नहीं, न ही उबटन... न ही पहले की बातों को याद करता है, किंतु वह किसी गृहपति या गृहपति-पुत्र को पाँच काम-गुणों से युक्त होकर भोग विलास करते हुए देखता है। वह उसमें आनंद लेता है... दुःख से मुक्त नहीं होता, ऐसा मैं कहता हूँ। फिर ब्राह्मण... वह स्त्री के साथ नहीं... न ही गृहपति-पुत्र को भोग विलास करते देखता है, किंतु वह किसी देव-निकाय की प्रार्थना करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करता है— ‘मैं इस शील, व्रत, तप या ब्रह्मचर्य से देव या कोई अन्य देवता बनूँगा’; वह उसमें आनंद लेता है, उसकी इच्छा करता है और उससे तृप्ति पाता है। ब्राह्मण, यह भी ब्रह्मचर्य का खंडित होना, छिद्रित होना, धब्बेदार होना और चितकबरा होना है।’ इस प्रकार लाभ आदि के हेतु और भेद से सात प्रकार के मैथुन-संयोगों द्वारा खंडित आदि होने का भाव समझना चाहिए। มาตุฆาตเก ปน เยน มนุสฺสิตฺถิภูตาปิ อชนิกา โปสา วนิกา มาตา วา มหามาตา วา จูฬมาตา วา ชนิกาปิ อมนุสฺสิตฺถิภูตา มาตา ฆาติตา, ตสฺส ปพฺพชฺชา น วาริตา, น จ อนนฺตริโก โหติ. ติรจฺฉานิตฺถิโยปิ มนุสฺสปุริสมาคมฺม มนุสฺสภูตํ ปุตฺตํ วิชายนฺติ โกนฺตปุตฺตา ทฺเวภาติกตฺเถรา วิย เตปิ หิ อณฺฑชาเยว, ตถา หิ เปตโลเก ติรจฺฉาเน มนุสฺเส จาติ อิเมสุ ตีสุ ภูมีสุ จตสฺโส โยนิโย สมฺภวนฺติ. มนุสฺเสสุ ปเนตฺถ เกจิเทว โอปปาติกา โหนฺติ, เสยฺยถาปิ มหาปทุมกุมาราทโย. อณฺฑชาปิ โกนฺต ปุตฺตา ทฺเวภาติกตฺเถรา วิย. วิตฺถาโร ปน สีหฬวตฺถุสฺมึ โอโลเกตพฺโพ. เอตฺถ จ โกนฺตาติ กินฺนรี, ตสฺสา ปุตฺตา โกนฺตปุตฺตา, สา หิ รญฺโญ อโสกธมฺมราชสฺส กาเล วนจรเกน ลภิตฺวา มนุสฺสสํวาสมาคมฺม ทฺเว ปุตฺเต วิชายิตฺวา ‘‘อิทานิ ทารเก ปหาย น คมิสฺสตี’’ติ สญฺญาย วนจรโก ตสฺสา โปตฺถํ อทาสิ, สา โปตฺถํ ลภิตฺวา ปกฺขนฺทิตฺวา สกฏฺฐานเมว คตา กินฺนริโย หิ โปตฺถํ วินา ปกฺขนฺทิตุํ น สกฺโกนฺติ, เตเนว ตาปโส ‘‘มา โปตฺถํ อสฺสา อทาสี’’ติ อาห. กมฺมปจฺจย อุตุสมุฏฺฐานญฺหิ ตาสํ โปตฺถํ, รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส จกฺกรตนํ วิย, ตถา หิ จกฺกวตฺติโน เวหาสคมนาทิ ปุญฺญวโต อิทฺธินาม, น เตน จกฺกรตนํ วา หตฺถิอสฺสรตนํ วา วินา อตฺตโน สภาเวเนว คนฺตุํ สกฺโกนฺติ. ตตฺถ จกฺกรตนํ รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส กมฺมพเลน นิพฺพตฺตตฺตา สมุทฺทมชฺเฌ ชายมานมฺปิ กมฺมปจฺจยอุตุสมุฏฺฐานํ นาม. หตฺถิอสฺสรตนานิ ปน กมฺมปจฺจยกมฺมสมุฏฺฐานานิ นาม. ปกฺขีนํ เวหาสคมนาทิกา กมฺมวิปากชา อิทฺธิ. กินฺนริโย ปน โปตฺถํ วินา อตฺตโน สภาเวน ปกฺขนฺทิตุํ น สกฺโกนฺติ, ตสฺมา ตาสํ โปตฺถํ กมฺมปจฺจยอุตุสมุฏฺฐานนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. เกจิ ปน เทวานํ อลงฺการา วิย ปฏิสนฺธิยา สห อาคโตติ วทนฺติ, น ตํ ปจฺเจตพฺพํ, อณฺฑชชลาพุชานํ ตถา อสมฺภวโต. เกจิปิ ปวตฺติ กาเล กตนฺติ วทนฺติ, ตมฺปิ อยุตฺตเมว, สํเสทชาปิ ปทุมคพฺเภวา เวฬุคพฺเภ [Pg.28] วา นิพฺพตฺตา โปกฺขรสาติพฺราหฺมณปทุมวตีเวฬุวตีเทวีอาทโย วิย. ชลาพุชา ปน ปากฏาเยว. เยน สยํ ติรจฺฉานภูเตน มนุสฺสิตฺถิภูตา มาตา ฆาติตา, โสปิ อานนฺตริโก น โหติ ติรจฺฉานคตตฺตา ปนสฺส ปพฺพชฺชา ปฏิกฺขิตฺตา, กมฺมํ ปนสฺส ภาริยํ โหติ, อานนฺตริยํ อาหจฺจ ติฏฺฐติ. มนุสฺสิตฺถิโยปิ ติรจฺฉานมาคมฺม คพฺภํ ชเนนฺติ, เสยฺยถาปิ ภูริทตฺตสฺส มาตา อิตฺถิโย หิ อฏฺฐหิ การเณหิ คพฺภคฺคหณํ โหติ - อชฺฌาจาเรน, กายสํสคฺเคน, โจฬคฺคหเณน, อสุจิปาเนน, นาภิปรามสเนน, รูปทสฺสเนน, สทฺเทน คนฺเธนาติ. ตตฺถ อชฺฌาจาเรน สุทินฺนสฺส ปุราณทุติยิกา คพฺภํ คณฺหิตฺวา ปจฺฉิมภวิกํ สุวณฺณพิมฺพสทิสํ พีชกํ นาม ปุตฺตํ วิชายิ. กทาจิ เอกจฺจา อุตุสมเย ฉนฺทราครตฺตา ปุริสานํ หตฺถคาหเวณิคาหองฺคปจฺจงฺคปรามสนํ สาทิยนฺติโยปิ คพฺภํ คณฺหนฺติ. เอวํ กายสํสคฺเคน คพฺภคฺคหณํ โหติ. อุทายิตฺเถรสฺส ปน ปุราณทุติยิกา ภิกฺขุนี ตํ อสุจึ เอกเทสํ มุเขน อคฺคเหสิ, เอกเทสํ โจฬเกเนว สทฺธึ องฺคชาเต ปกฺขิปิ, สา เตน คพฺภํ คณฺหิ. เอวํ โจฬคฺคหเณน คพฺภคฺคหณํ โหติ. มิคสิงฺคตาปสสฺส มาตา มิคี อุตุสมเย ตาปสสฺส ปสฺสาวฏฺฐานํ อาคนฺตฺวา สสมฺภวํ ปิวิ, สา เตน คพฺภํ คณฺหิตฺวา มิคสิงฺคํ นาม ตาปสทารกํ วิชายิ. เอวํ อสุจิปาเนน คพฺภคฺคหณํ โหติ. สามสฺส ปน โพธิสตฺตสฺส มาตา อุตุสมเย นาภิปรามสเนน คพฺภํ คณฺหิตฺวา สามตาปสทารกํ วิชายิ, เอวํ มณฺฑพฺยสฺส จ จณฺฑปชฺโช ตสฺส จ มาตา อุตุสมเย นาภิปรามสนวเสน, ตตฺถ จ ทิฏฺฐมงฺคลิกาย นาภิปรามสเนน มณฺฑพฺยสฺส นิพฺพตฺติ อโหสิ. จณฺฑปชฺโชตสฺส มาตุ นาภิยํ วิจฺฉิโก ผริตฺวา คโต, เตน จณฺฑปชฺโชตสฺส นิพฺพตฺติ อโหสิ. อิเธกจฺจา อิตฺถี อุตุสมเย ปุริสสํสคฺคํ อลภมานา ฉนฺทราควเสน อนฺโตเคเหคตาว ปุริสํ อุปนิชฺฌายติ, ราโชโรโธ วิย, สา เตน คพฺภํ คณฺหาติ. เอวํ รูปทสฺสเนน คพฺภคฺคหณํ โหติ. พลากาสุ ปน ปุริโสนาม นตฺถิ, ตา อุตุสมเย เมฆสทฺทํ สุตฺวา คพฺภํ คณฺหนฺติ. คาวีเอว วา กทาจิ อุสภคนฺเธน คพฺภํ คณฺหนฺติ. เอวํ คนฺเธน คพฺภคฺคหณํ โหติ. เอวํ อฏฺฐหิ การเณหิ อิตฺถิโย คพฺภํ คณฺหนฺติ. เอตฺถ จ ปิตุสทิสาเยว [Pg.29] ปุตฺตา โหนฺติ, ตสฺมา ภูริทตฺตาทโย ธตรฏฺฐํ นาคราชานํ ปฏิจฺจ นาคาเยว โหนฺติ. จณฺฑปชฺโชตสฺส ปน วิจฺฉิกํ ปฏิจฺจ มนุสฺโส ชาโต, สมฺภเวน อชาตตฺตา. ปิตุฆาตเกปิ เอเสว นโย. मातृघातक (माता की हत्या) के विषय में, यदि किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी स्त्री की हत्या की जाती है जो मनुष्य है किन्तु जन्म देने वाली माता नहीं है, जैसे कि धाय, दादी या चाची, अथवा यदि जन्म देने वाली माता जो अमानुषी (गैर-मानव) है उसकी हत्या की जाती है, तो उसकी प्रव्रज्या वर्जित नहीं है और वह आनन्तरिक (पाप का भागी) नहीं होता। तिर्यक (पशु) स्त्रियाँ भी मनुष्य पुरुष के संसर्ग से मनुष्य पुत्र को जन्म देती हैं, जैसे कोन्तपुत्त के दो भ्राता स्थविर; वे भी अण्डज ही थे। इसी प्रकार प्रेतलोक, तिर्यकलोक और मनुष्यलोक—इन तीनों भूमियों में चारों योनियाँ संभव हैं। मनुष्यों में यहाँ कुछ ओपपातिक होते हैं, जैसे महापदुम कुमार आदि। अण्डज भी होते हैं, जैसे कोन्तपुत्त के दो भ्राता स्थविर। इसका विस्तार 'सीहलवत्थु' में देखना चाहिए। यहाँ 'कोन्ता' एक किन्नरी है, उसके पुत्र 'कोन्तपुत्त' हैं। वह राजा अशोक धर्मराज के काल में एक वनवासी द्वारा पकड़ी गई थी और मनुष्य के साथ संसर्ग से उसने दो पुत्रों को जन्म दिया। 'अब यह बच्चों को छोड़कर नहीं जाएगी' इस विचार से वनवासी ने उसे उसका 'पोत्थ' (उड़ने का साधन) दे दिया। वह पोत्थ पाकर उड़ गई और अपने स्थान चली गई; क्योंकि किन्नरियाँ पोत्थ के बिना उड़ नहीं सकतीं, इसीलिए तापस ने कहा था— 'उसे पोत्थ मत देना।' उनका वह पोत्थ कर्म-प्रत्यय ऋतु-समुत्थान होता है, जैसे चक्रवर्ती राजा का चक्र-रत्न। चक्रवर्ती का आकाश-गमन आदि पुण्यवान की ऋद्धि कहलाती है; वे उस चक्र-रत्न या हस्ति-अश्व रत्न के बिना अपने स्वभाव से नहीं जा सकते। वहाँ चक्र-रत्न चक्रवर्ती राजा के कर्म-बल से उत्पन्न होने के कारण समुद्र के बीच में उत्पन्न होने पर भी 'कर्म-प्रत्यय ऋतु-समुत्थान' कहलाता है। हस्ति और अश्व रत्न 'कर्म-प्रत्यय कर्म-समुत्थान' कहलाते हैं। पक्षियों का आकाश-गमन आदि कर्म-विपाकज ऋद्धि है। किन्नरियाँ पोत्थ के बिना अपने स्वभाव से नहीं उड़ सकतीं, इसलिए उनका पोत्थ 'कर्म-प्रत्यय ऋतु-समुत्थान' समझना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि यह देवताओं के अलंकारों की तरह प्रतिसन्धि के साथ ही आता है, किन्तु उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि अण्डज और जरायुज प्राणियों के लिए ऐसा संभव नहीं है। कुछ कहते हैं कि यह जीवन काल में बनता है, वह भी अनुचित है; जैसे संस्वेदज भी कमल के गर्भ या बाँस के गर्भ में उत्पन्न होते हैं, जैसे पोक्खरसाति ब्राह्मण, पदुमवती, वेलुवती देवी आदि। जरायुज तो स्पष्ट ही हैं। यदि स्वयं तिर्यक होकर किसी ने मनुष्य रूपी माता की हत्या की है, तो वह भी आनन्तरिक नहीं होता, किन्तु तिर्यक होने के कारण उसकी प्रव्रज्या निषिद्ध है; उसका कर्म भारी होता है, वह आनन्तर्य के निकट खड़ा रहता है। मनुष्य स्त्रियाँ भी तिर्यक के संसर्ग से गर्भ धारण करती हैं, जैसे भूरिदत्त की माता। स्त्रियों को आठ कारणों से गर्भ धारण होता है—अध्याचार (मैथुन), काय-संसर्ग, चोल-ग्रहण (वस्त्र), अशुचि-पान (वीर्य पीना), नाभि-परामर्शन (नाभि छूना), रूप-दर्शन, शब्द और गन्ध से। वहाँ अध्याचार से सुदिन्न की पुरानी पत्नी ने गर्भ धारण कर अन्तिम भव वाले, स्वर्ण-प्रतिमा के समान 'बीजक' नामक पुत्र को जन्म दिया। कभी-कभी कुछ स्त्रियाँ ऋतुकाल में काम-राग से रक्त होकर पुरुषों द्वारा हाथ पकड़ने, चोटी पकड़ने या अंगों के स्पर्श को स्वीकार करते हुए भी गर्भ धारण कर लेती हैं। इस प्रकार काय-संसर्ग से गर्भ धारण होता है। स्थविर उदायी की पुरानी पत्नी (भिक्षुणी) ने उस अशुचि के एक भाग को मुख से ग्रहण किया और एक भाग वस्त्र के साथ जननांग में डाल लिया, उससे उसने गर्भ धारण किया। इस प्रकार चोल-ग्रहण से गर्भ धारण होता है। मृगशृंग तापस की माता एक मृगी थी, जिसने ऋतुकाल में तापस के मूत्र-स्थान पर आकर वीर्य-मिश्रित मूत्र पिया; उससे गर्भ धारण कर उसने मृगशृंग नामक तापस बालक को जन्म दिया। इस प्रकार अशुचि-पान से गर्भ धारण होता है। बोधिसत्व साम की माता ने ऋतुकाल में नाभि-स्पर्श से गर्भ धारण कर साम तापस बालक को जन्म दिया। इसी प्रकार मण्डव्य और चण्डप्रद्योत की माताओं ने ऋतुकाल में नाभि-स्पर्श के वश से गर्भ धारण किया; वहाँ दिट्ठमङ्गलिका के नाभि-स्पर्श से मण्डव्य की उत्पत्ति हुई। चण्डप्रद्योत की माता की नाभि पर एक बिच्छू रेंग कर चला गया, उससे चण्डप्रद्योत की उत्पत्ति हुई। यहाँ कोई स्त्री ऋतुकाल में पुरुष-संसर्ग न मिलने पर काम-राग के वश घर के भीतर से ही पुरुष को ध्यान से देखती है, जैसे राजा का अन्तःपुर; वह उससे गर्भ धारण करती है। इस प्रकार रूप-दर्शन से गर्भ धारण होता है। बगुला पक्षियों में नर नहीं होते, वे ऋतुकाल में मेघ की गर्जना सुनकर गर्भ धारण करती हैं। अथवा गायें कभी-कभी सांड की गन्ध से गर्भ धारण करती हैं। इस प्रकार गन्ध से गर्भ धारण होता है। इस प्रकार आठ कारणों से स्त्रियाँ गर्भ धारण करती हैं। और यहाँ पुत्र पिता के समान ही होते हैं, इसलिए भूरिदत्त आदि धतराष्ट्र नागराज के कारण नाग ही होते हैं। किन्तु चण्डप्रद्योत के मामले में बिच्छू के कारण मनुष्य उत्पन्न हुआ, क्योंकि वह वीर्य से उत्पन्न नहीं हुआ था। पितृघातक के विषय में भी यही नियम है। อรหนฺตฆาตโก ปน อมนุสฺส อรหนฺตเทวตํ วา มนุสฺสชาติยํ วา อวเสสํ อริยปุคฺคลํ ฆาเตตฺวา อนนฺตริโย น โหติ, ปพฺพชฺชาปิสฺส น วาริตา, กมฺมํ ปน พลวํ โหติ. ติรจฺฉาโน ปน อมนุสฺสอรหนฺตมฺปิ ฆาเตตฺวา อานนฺตริโก น โหติ, กมฺมํ ปน ภาริยํ ติรจฺฉานคตตฺตา ปนสฺส ปพฺพชฺชา วาริตา. ภิกฺขุนิทูสกสงฺฆเภทกานิ ปากฏาเยว. किन्तु अर्हन्त का घातक यदि अमनुष्य हो, और वह अर्हन्त देवता या मनुष्य जाति के शेष आर्य पुद्गल की हत्या करे, तो वह आनन्तर्य नहीं होता, उसकी प्रव्रज्या भी वर्जित नहीं है, किन्तु कर्म बलवान होता है। तिर्यक यदि अमनुष्य अर्हन्त की भी हत्या करे, तो वह आनन्तर्य नहीं होता, किन्तु कर्म भारी होता है और तिर्यक योनि में होने के कारण उसकी प्रव्रज्या वर्जित है। भिक्षुणी-दूषक और संघ-भेदक तो स्पष्ट ही हैं। โลหิตุปฺปาทโก ปน โย ตถาคตสฺส อเภชฺชกายตาย ปรูปกฺกเมน จมฺมํ ฉินฺทิตฺวา โลหิตํ ปคฺฆริตุํ น สกฺโกติ, สรีรสฺส ปน อนฺโตเยว เอกสฺมึ ฐาเน โลหิตํ สโมสรติ, อาฆาเตน ปตุพฺพนมานํ สญฺจิตํ โหติ, ตสฺส พหุ อปุญฺญํ ปสวติ, อานนฺตริโก จ โหติ, ปพฺพชฺชาปิสฺส วาริตา, เสยฺยถาปิ เทวทตฺโต. โย ปน ชีวโก วิย โรควูปสมนตฺถํ ผาเลตฺวา ปูติมํสญฺจ โลหิตญฺจ นีหริตฺวา ผาสุํ กโรติ, อยํ โลหิตุปฺปาทโก น โหติ, พหุปุญฺญํ ปสวติ พฺรหฺมปุญฺญํ ปสวติ, เสยฺยถาปิ ชีวโกโกมารภจฺโจ. किन्तु लोहितुत्पादक वह है जो तथागत की अभेद्य काया होने के कारण पर-उपक्रम से चर्म को काटकर रक्त प्रवाहित करने में समर्थ नहीं होता, किन्तु शरीर के भीतर ही एक स्थान पर रक्त इकट्ठा हो जाता है, आघात से सूजकर संचित हो जाता है, वह बहुत अपुण्य उत्पन्न करता है और आनन्तर्य होता है, उसकी प्रव्रज्या भी वर्जित है, जैसे कि देवदत्त। किन्तु जो जीवक के समान रोग की शान्ति के लिए चीरा लगाकर सड़े हुए मांस और रक्त को निकालकर सुख पहुँचाता है, वह लोहितुत्पादक नहीं होता, वह बहुत पुण्य उत्पन्न करता है, ब्रह्म-पुण्य उत्पन्न करता है, जैसे कि जीवक कौमारभृत्य। อุพฺภโตพฺยญฺชนโก ปน อิตฺถิ-ปุริสวเสน ทุวิโธ ตตฺถ อิตฺถิอุภโตพฺยญฺชนกสฺส อิตฺถินิมิตฺตํ ปากฏํ, ปุริสนิมิตฺตํ ปฏิจฺฉนฺนํ. ปุริสอุภโตพฺยญฺชนกสฺส ปุริสนิมิตฺตํ ปากฏํ, อิตฺถินิมิตฺตํ ปฏิจฺฉนฺนํ. อิตฺถิอุภโตพฺยญฺชนกสฺส อิตฺถีสุ ปุริสตฺตํ กโรนฺตสฺส อิตฺถินิมิตฺตํ ปฏิจฺฉนฺนํ โหติ, ปุริสนิมิตฺตํ ปากฏํ โหติ. ปุริสอุภโตพฺยญฺชนกสฺส ปุริสานํ อิตฺถิภาวํ อุปคจฺฉนฺตสฺส ปุริสนิมิตฺตํ ปฏิจฺฉนฺนํ โหติ, อิตฺถินิมิตฺตํ ปากฏํ. อิตฺถิอุภโตพฺยญฺชนโก สยญฺจ คพฺภํ คณฺหาติ, ปรญฺจ คณฺหาเปติ. ปุริส อุภโต พฺยญฺชนโก ปน สยํ น คณฺหาติ, ปรํ คณฺหาเปติ. อิทเมว เตสํ นานากรณํ. อุภโตพฺยญฺชนนฺติ เจตฺถ ‘‘พฺยญฺชนนฺติ นิมิตฺตํ. อุภโต พฺยญฺชนํ อสฺส อตฺถีติ วิคฺคเหน ‘‘อุภโตพฺยญฺช’’นฺติ วกฺขถ, เอกสฺส ทฺเว อินฺทฺริยานิ โหนฺติ, อถ เอกเมวาติ. เอกเมว น ทฺเว, ‘‘ยสฺส อิตฺถินฺทฺริยํ อุปฺปชฺชติ, ตสฺส ปุริสินฺทฺริยํ อุปฺปชฺชตีติ โน. ยสฺส วา ปน ปุริสินฺทฺริยํ [Pg.30] อุปฺปชฺชติ, ตสฺส อิตฺถินฺทฺริยํ อุปฺปชฺชตีติ โนติ เอกสฺมึ สนฺตาเน อินฺทฺริย ทฺวยสฺส ปฏิเสวิตตฺตา. ตญฺจ โข อิตฺถิอุภโตพฺยญฺชนกสฺส อิตฺถินฺทฺริยํ, ปุริสอุภโตพฺยญฺชนกสฺส ปุริสินฺทฺริยเมวาติ. ยทิ เอกเมว อินฺทฺริยํ, เอวํ อุภโตพฺยญฺชนกภาโว กถํ สิยา. อินฺทฺริยํ พฺยญฺชนการณนฺติ วุตฺตํ, ตญฺจ ตสฺส นตฺถีติ. วุจฺจเต น อิตฺถินฺทฺริยํ ปุริสพฺยญฺชนสฺส การณํ, ตถา ปุริสินฺทฺริยมฺปิ อิตฺถิพฺยญฺชนกสฺส, กสฺมา สทา อภาวโตติ, ตถา หิ อิตฺถิ อุภโตพฺยญฺชนกสฺส ยทา อิตฺถิยา รตฺตํ โหติ, ตทา ปุริสพฺยญฺชนํ ปากฏํ โหติ, อิตฺถิพฺยญฺชนํ ปฏิจฺฉนฺนํ ตถา ปุริสอุภโตพฺยญฺชนกสฺสปิ. ยทิ เตสํ อินฺทฺริยทฺวยํ พฺยญฺชนานํ การณํ ภเวยฺย, สทา พฺยญฺชน ทฺวยํ เอกโต ติฏฺเฐยฺย น ปน ติฏฺฐติ, ตสฺมา เอกเมว อินฺทฺริยนฺติ นิฏฺฐเมตฺถาว คนฺตพฺพํ. พฺยญฺชนการณํ อินฺทฺริยํ ปหาย ราคจิตฺตเมเวตฺถ พฺยญฺชนทฺวยสฺส การณนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, ตสฺมา อิตฺถิอุภโตพฺยญฺชนโก สยมฺปิ คพฺภํ คณฺหาติ, ปรมฺปิ คณฺหาเปติ, ปุริสอุภโตพฺยญฺชนโก ปรํ คณฺหาเปติ, สยํ ปน น คณฺหาติ, อิตฺถินฺทฺริยสมงฺคิสฺเสว คพฺภสมฺภวโตติ. กุรุนฺทิยํ ปน ‘‘ยทิ ปฏิสนฺธิยํ ปุริสลิงฺคํ, ปวตฺเต อิตฺถิลิงฺคํ นิพฺพตฺตติ, ยทิ ปฏิสนฺธิยํ อิตฺถิลิงฺคํ, ปวตฺเต ปุริสลิงฺคํ นิพฺพตี’’ติ ปฏิสนฺธิยํ ลิงฺคสมฺภโว วุตฺโต, โส อยุตฺโตว. กสฺมา, ปวตฺติยํเยว อิตฺถิลิงฺคาทีนิ สมุฏฺฐหนฺติ. ปฏิสนฺธิยเมว สมุฏฺฐาติ, น ลิงฺคาทีนิ. อินฺทฺริยเมว ลิงฺคนฺติ น สกฺกา วตฺตุํ, อินฺทฺริยลิงฺคานํ ภินฺนสภาวตฺตา, ยถา จ พีเช สติ รุกฺโข สมฺภวติ, นาสติ, เอวเมว อินฺทฺริเย สติ ลิงฺคาทีนิ สมฺภวนฺติ พีชสทิสญฺหิ อินฺทฺริยํ, รุกฺขสทิสานิ ลิงฺคาทีนิ เอวเมว เตสุ ปุคฺคเลสุ ปณฺฑกาทโย เอกาทสปุคฺคลา ตสฺมึ เยว ภเว นิยามํ โอกฺกมิตุํ น อรหนฺติ, ตสฺมา อภพฺพา นาม. อูนวีสติ อนฺติมวตฺถุอชฺฌาปนฺนปุพฺพา ทฺเว อุปสมฺปทาย อวตฺถุมตฺตเมว, อุปนิสฺสเย สติ ตสฺมึเยว ภเว นิยามํ โอกฺกมิตุํ อรหนฺติ, ตสฺมา ภพฺพานาม โหนฺติ. उभतोव्यञ्जनक स्त्री और पुरुष के भेद से दो प्रकार का होता है। वहाँ स्त्री-उभतोव्यञ्जनक का स्त्री-चिह्न प्रकट होता है और पुरुष-चिह्न प्रच्छन्न। पुरुष-उभतोव्यञ्जनक का पुरुष-चिह्न प्रकट होता है और स्त्री-चिह्न प्रच्छन्न। स्त्री-उभतोव्यञ्जनक जब स्त्रियों में पुरुषत्व करता है, तब स्त्री-चिह्न प्रच्छन्न हो जाता है और पुरुष-चिह्न प्रकट हो जाता है। पुरुष-उभतोव्यञ्जनक जब पुरुषों में स्त्री-भाव को प्राप्त होता है, तब पुरुष-चिह्न प्रच्छन्न हो जाता है और स्त्री-चिह्न प्रकट। स्त्री-उभतोव्यञ्जनक स्वयं भी गर्भ धारण करता है और दूसरे को भी गर्भ धारण कराता है। किन्तु पुरुष-उभतोव्यञ्जनक स्वयं गर्भ धारण नहीं करता, दूसरे को गर्भ धारण कराता है। यही उनमें अन्तर है। यहाँ 'उभतोव्यञ्जन' में 'व्यञ्जन' का अर्थ 'चिह्न' है। 'जिसके दोनों चिह्न हों' इस विग्रह से 'उभतोव्यञ्जन' कहा जाता है। क्या एक व्यक्ति के दो इन्द्रियाँ होती हैं या एक ही? एक ही होती है, दो नहीं। 'जिसके स्त्री-इन्द्रिय उत्पन्न होती है, उसके पुरुष-इन्द्रिय उत्पन्न होती है' - ऐसा नहीं है। अथवा 'जिसके पुरुष-इन्द्रिय उत्पन्न होती है, उसके स्त्री-इन्द्रिय उत्पन्न होती है' - ऐसा नहीं है, क्योंकि एक ही सन्तान में दो इन्द्रियों का सेवन नहीं होता। और वह स्त्री-उभतोव्यञ्जनक की स्त्री-इन्द्रिय ही है, और पुरुष-उभतोव्यञ्जनक की पुरुष-इन्द्रिय ही। यदि एक ही इन्द्रिय है, तो उभतोव्यञ्जनक भाव कैसे होगा? कहा गया है कि इन्द्रिय व्यञ्जन का कारण है, और वह उसके पास नहीं है। कहा जाता है कि स्त्री-इन्द्रिय पुरुष-व्यञ्जन का कारण नहीं है, वैसे ही पुरुष-इन्द्रिय भी स्त्री-व्यञ्जन का कारण नहीं है, क्योंकि वे सदा विद्यमान नहीं रहते। जैसे कि स्त्री-उभतोव्यञ्जनक का जब स्त्री के प्रति राग होता है, तब पुरुष-व्यञ्जन प्रकट होता है और स्त्री-व्यञ्जन प्रच्छन्न, वैसे ही पुरुष-उभतोव्यञ्जनक का भी। यदि उनकी दो इन्द्रियाँ व्यञ्जनों का कारण होतीं, तो सदा दोनों व्यञ्जन एक साथ रहते, किन्तु नहीं रहते, इसलिए यहाँ एक ही इन्द्रिय है - ऐसा निश्चय करना चाहिए। इन्द्रिय को व्यञ्जन का कारण छोड़कर राग-चित्त ही यहाँ दोनों व्यञ्जनों का कारण है - ऐसा देखना चाहिए। इसलिए स्त्री-उभतोव्यञ्जनक स्वयं भी गर्भ धारण करता है और दूसरे को भी कराता है, पुरुष-उभतोव्यञ्जनक दूसरे को गर्भ धारण कराता है, स्वयं नहीं करता, क्योंकि स्त्री-इन्द्रिय से युक्त व्यक्ति में ही गर्भ की सम्भावना होती है। कुरुन्दी में तो 'यदि प्रतिसन्धि में पुरुष-लिंग हो, तो प्रवृत्ति काल में स्त्री-लिंग उत्पन्न होता है, यदि प्रतिसन्धि में स्त्री-लिंग हो, तो प्रवृत्ति काल में पुरुष-लिंग उत्पन्न होता है' - इस प्रकार प्रतिसन्धि में लिंग की उत्पत्ति कही गई है, वह अयुक्त ही है। क्यों? क्योंकि प्रवृत्ति काल में ही स्त्री-लिंग आदि समुत्पन्न होते हैं। प्रतिसन्धि में ही समुत्पन्न होती है, लिंग आदि नहीं। इन्द्रिय को ही लिंग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इन्द्रिय और लिंग का स्वभाव भिन्न है। जैसे बीज होने पर वृक्ष उत्पन्न होता है, न होने पर नहीं, वैसे ही इन्द्रिय होने पर लिंग आदि उत्पन्न होते हैं। बीज के समान इन्द्रिय है और वृक्ष के समान लिंग आदि। इसी प्रकार उन पुद्गलों में पण्डक आदि ग्यारह पुद्गल उसी भव में नियम में उतरने के योग्य नहीं होते, इसलिए वे 'अभव्य' कहलाते हैं। उन्नीस अन्तिम वस्तुओं में से जिन्होंने पहले पाराजिक का अध्याचार किया है, वे दो उपसम्पदा के लिए केवल अयोग्य मात्र हैं, उपनिश्रय होने पर वे उसी भव में नियम में उतरने के योग्य होते हैं, इसलिए वे 'भव्य' कहलाते हैं। วตฺถุสมฺปตฺติกถา นิฏฺฐิตา. वस्तु-सम्पत्ति की कथा समाप्त हुई। ญตฺติสมฺปตฺติ นาม. ज्ञप्ति-सम्पत्ति का विवरण इस प्रकार है। ‘‘สิถิลํ ธนิตญฺจ ทีฆรสฺสํ, ครุกํ ลหุกญฺจ นิคฺคหิตํ; สมฺพนฺธํ ววตฺถิตํ วิมุตฺตํ, ทสธา พฺยญฺชนพุทฺธิยา ปเภโท’’ติ. शिथिल और धनित, दीर्घ और ह्रस्व, गुरु और लघु, निगृहीत, सम्बद्ध, व्यवस्थित और विमुक्त - इस प्रकार व्यञ्जन-बुद्धि के दस भेद हैं। เอวํ [Pg.31] วุตฺตํ ทสวิธํ พฺยญฺชนํ อเปกฺขิตฺวา วา เอวํ อสกฺโกนฺเตนาปิ สิถิลธนิต วิมุตฺตนิคฺคหิตวเสน วุตฺตานิ พฺยญฺชนานิ อโกเปตฺวา วา ทุรุตฺตํ วา อกตฺวา วุตฺตํ ญตฺติสมฺปตฺติ นาม. ญตฺติวิปตฺติ นาม สพฺพโส ญตฺตึ อฏฺฐเปตฺวา วา วตฺถุสงฺฆปุคฺคลญตฺตีนํ อปรามสนานิ ปจฺฉา ญตฺติฏฺฐปนญฺจาติ อิเม ตาว ปญฺจ ญตฺติโทสา. ตตฺถ อยํ อิตฺถนาโมติ อุปสมฺปทาเปกฺขสฺส อปิ อกิตฺตนํ วตฺถุอปรามสนํ นาม. สุณาตุ เม ภนฺเต สงฺโฆติ เอตฺถ สุณาตุ เม ภนฺเตติ วตฺวา สงฺโฆติ อภณนํ สงฺฆอปรามสนํ นาม. อิตฺถนฺนามสฺส อุปสมฺปทาเปกฺโขติ อุปชฺฌายสฺส อกิตฺตนํ ปุคฺคลอปรามสนํ นาม. สพฺเพน สพฺพํ ญตฺติยา อนุจฺจารณํ ญตฺติอปรามสนํ นาม. ปฐมํ กมฺมวาจํ นิฏฺฐาเปตฺวา เอสา ญตฺตีติ วตฺวา ขมติ สงฺฆสฺสาติ เอวํ ญตฺติ กิตฺตนํ ปจฺฉา ญตฺติฏฺฐปนํ นาม. อิติ อิเม ปญฺจ ญตฺติโทสา ญตฺติวิปตฺติ นาม. อิเมหิ โทเสหิ วิมุตฺตาย ญตฺติยา สมฺปนฺนํ ญตฺติสมฺปตฺติ นาม. इस प्रकार कहे गए दस प्रकार के व्यंजनों की अपेक्षा करते हुए, अथवा ऐसा करने में असमर्थ होने पर भी शिथिल, धनित, विमुक्त और निगृहीत के रूप में कहे गए व्यंजनों को बिना बिगाड़े या बिना अशुद्ध उच्चारण किए कहना 'ज्ञप्ति-सम्पत्ति' कहलाती है। 'ज्ञप्ति-विपत्ति' का अर्थ है—ज्ञप्ति को पूरी तरह से स्थापित न करना, अथवा वस्तु, संघ, पुद्गल और ज्ञप्ति का उल्लेख न करना, और ज्ञप्ति को बाद में स्थापित करना—ये पाँच ज्ञप्ति-दोष हैं। उनमें, 'यह अमुक नाम वाला है'—इस प्रकार उपसम्पदा की इच्छा रखने वाले का उल्लेख न करना 'वस्तु-अपरामर्शन' कहलाता है। 'सुणातु मे भन्ते सङ्घो' यहाँ 'सुणातु मे भन्ते' कहकर 'सङ्घो' न कहना 'संघ-अपरामर्शन' कहलाता है। 'अमुक नाम वाले का उपसम्पदा-अपेक्षी'—इस प्रकार उपाध्याय का उल्लेख न करना 'पुद्गल-अपरामर्शन' कहलाता है। ज्ञप्ति का पूरी तरह से उच्चारण न करना 'ज्ञप्ति-अपरामर्शन' कहलाता है। पहले कर्मवाचा को समाप्त करके 'यह ज्ञप्ति है' ऐसा कहकर 'संघ को क्षम्य है'—इस प्रकार ज्ञप्ति का कीर्तन करना 'पश्चात् ज्ञप्ति-स्थापन' कहलाता है। इस प्रकार ये पाँच ज्ञप्ति-दोष 'ज्ञप्ति-विपत्ति' कहलाते हैं। इन दोषों से मुक्त ज्ञप्ति से सम्पन्न होना 'ज्ञप्ति-सम्पत्ति' कहलाती है। ญตฺติสมฺปตฺติกถา นิฏฺฐิตา. ज्ञप्ति-सम्पत्ति की कथा समाप्त हुई। อนุสาวนสมฺปตฺติ นาม วตฺถุ สงฺฆปุคฺคลานํ อปรามสนานิ, สาวนาย หาปนํ, อกาเล สาวนนฺติ อิเม ปญฺจ อนุสาวนโทเส วชฺเชตฺวา กถนํ อนุสาวนสมฺปตฺติ นาม. ตตฺถ วตฺถาทีนํ อปรามสนานิ ญตฺติยํ วุตฺตสทิสาเนว. ตีสุ ปน อนุสาวนาสุ ยตฺถ กตฺถจิ เอเตสํ อปรามสนํ อปรามสนเมว. สพฺเพน สพฺพํ ปน กมฺมวาจํ อวตฺวา จตุกฺขตฺตุํ ญตฺติกิตฺตนเมว วา กมฺมวาจพฺภนฺตเรปิ จตฺตาริ พฺยญฺชนานิ โกเปตฺวา วา อกฺขรสฺส วา ปทสฺส วา ทุรุจฺจารณํ วา กตฺวา สาวนํ สาวนาย หาปนํ นาม, ตถา หิ สิถิลธนิตวิมุตฺตนิคฺคหิตวเสน จตฺตาริ พฺยญฺชนานิ อนฺโตกมฺมวาจาย กมฺมํ โกเปนฺติ. ตตฺถ ‘‘สุณาตุ เม ติ สิถิเล วตฺตพฺเพ สุณาถุ เม’’ติ วจนํ สิถิเล ธนิตํ นาม. ‘‘ภนฺเต’’ติ วตฺตพฺเพ ภนฺเตติ วจนํ ธนิเต สิถิลํ นาม. ‘‘สุณาตุ เอสา ญตฺตี’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘สุณนฺตุ เอสํ ญตฺตี’’ติ วจนํ วิมุตฺเต นิคฺคหิตํ นาม. ‘‘ปตฺตกลฺล’’นฺติ วตฺตพฺเพ ‘‘ปตฺตกลฺลา’’ติ วจนํ นิคฺคหิเต วิมุตฺตํ นาม. เอวํ อิมานิ จตฺตาริ พฺยญฺชนานิ อนฺโตกมฺมวาจาย กมฺมํ ทูเสนฺติ. อิมานิ จตฺตาริ อโกเปตฺวา วทนฺเตนาปิ อญฺญสฺมึ อกฺขเร [Pg.32] วตฺตพฺเพ อญฺญํ อกฺขรํ วทนฺโต ทุรุตฺตํ กโรติ นาม. อิตเรสุ ทีฆรสฺสาทีสุ ฉสุ ฐาเนสุ ทีฆฏฺฐาเน ทีฆํ, รสฺสฏฺฐาเน รสฺสเมวาติ เอวํ ยถาฐาเน ตํ ตเทว อกฺขรํ ภาสนฺเตน อนุกฺกมาคตํ ปเวณึ อวินาเสตฺวา กมฺมวาจา กาตพฺพา. สเจ ปน เอวํ อกตฺวา ทีเฆ วตฺตพฺเพ รสฺสํ, รสฺเส วตฺตพฺเพ ทีฆํ วทติ, ตถา ครุเก วตฺตพฺเพ ลหุกํ, ลหุเก วตฺตพฺเพ ครุกํ วทติ. สมฺพนฺเธ วา วตฺตพฺเพ ววตฺถิตํ, ววตฺถิเต วา วตฺตพฺเพ สมฺพนฺธํ วทติ, เอวมฺปิ กมฺมวาจา น กุปฺปติ. อิมานิ ฉ พฺยญฺชนานิ กมฺมํ น โกเปนฺติ. อิทเมว อาจริยานํ สมานกถา. อปเร ปน อิทานิ พฺยญฺชนานิ อนฺโตกมฺมวาจาย กมฺมํ ทูเสนฺตีติ วทนฺติ, เอวํ สติ อนุปสมฺปนฺนาว พหุตรา ภเวยฺยุํ, วีมํสิตฺวา ปน คเหตพฺพํ. สุฏฺฐุตรา วา กมฺมวาจา สิกฺขิตพฺพา. สาวนาย อโนกาเส ปฐมํ ญตฺตึ อฏฺฐเปตฺวา อนุสาวนํ อกาเล สาวนํ นาม. อิติ อิเมหิ โทเสหิ วิมุตฺตาย อนุสาวนาย สมฺปนฺนํ อนุสาวนสมฺปตฺติสมฺปนฺนํ นาม. ยทิ ปตฺตจีวรรหิตํ ปุคฺคลํ อุปสมฺปาเทติ, ‘‘ปริปุณฺณสฺส ปตฺตจีวร’’นฺติ อนุสาวนาย กตตฺตา กมฺมโกโป น โหติ, การกสงฺโฆ ปน สาติสาโร เตเนวาห วิมติวิโนทนิยมฺปิ ปตฺตจีวรานํ อภาเวปิ’ปริปุณฺณสฺส ปตฺตจีวร’นฺติ กมฺมวาจาย สาวิตตฺตา กมฺมโกปํ อวตฺวา ทุกฺกฏเมว วุตฺตนฺติ. สเจ อนุปชฺฌายโก อุปสมฺปาเทติ, ‘‘อิตฺถนฺนามสฺส อุปสมฺปทาเปกฺโข, อิตฺถนฺนาเมน อุปชฺฌาเยนา’’ติ วา อุปชฺฌายํ สาเวติ, สูปสมฺปนฺโนว โหติ. อุปชฺฌายํ น สาเวติ นุปสมฺปนฺโน. วกฺขติ หิ วิมติวิโนทนิยํ ‘‘กมฺมํ น กุปฺปตีติ อิทํ อุปชฺฌายาภาเวปิ อิตฺถนฺนามสฺส อุปสมฺปทาเปกฺโข อิตฺถนฺนาเมน อุปชฺฌาเยนา’’ติ มตสฺส วา วิพฺภมนฺตสฺส วา ปุราณอุปชฺฌายสฺส วา ยสฺส กสฺสจิ อวิชฺชมานสฺสาปิ นาเมน สพฺพตฺถ อุปชฺฌายกิตฺตนสฺส กตตฺตา วุตฺตํ. ยทิ หิ อุปชฺฌายกิตฺตนํ น กเรยฺย,’ปุคฺคลํ น ปรามสตี’ติ วุตฺตกมฺมวิปตฺติเอว สิยา, เตเนว ปาฬิยํ ‘‘อนุปชฺฌายกนฺติ วุตฺต’’นฺติ. สเจ สงฺฆุปชฺฌาเยน คณุปชฺฌาเยน อุปสมฺปาเทติ, การกสงฺโฆ สาติสาโร, กมฺมํ ปน น กุปฺปติ, วกฺขติ หิ วิมติวิโนทนิยํ ‘‘สงฺเฆน อุปชฺฌาเยนา’’ติ อยํ อิตฺถนฺนาโม สงฺฆสฺส อุปสมฺปทาเปกฺโข, อิตฺถนฺนาโม สงฺฆํ อุปสมฺปทํ ยาจติ. สงฺเฆน อุปชฺฌาเยนา’’ติ เอวํ กมฺมวาจาย สงฺฆเมว อุปชฺฌายํ กิตฺเตตฺวาติ อตฺโถ. เอวํ’คเณน อุปชฺฌาเยนา’ติ เอตฺถาปิ อยํ อิตฺถนฺนาโมคณสฺส อุปสมฺปทาเปกฺโข’ติ อาทินา โยชนา เวทิตพฺพา. เอวํ วุตฺเตปิ กมฺมํ น กุปฺปติ เอว, ทุกฺกฏสฺเสว วุตฺตตฺตา, อญฺญถา โส จ ปุคฺคโล อนุปสมฺปนฺโนติ วเทยฺยา’ติ. สเจ ปณฺฑกาทินา อนุปสมฺปนฺนเกน อุปชฺฌาเยน อุปสมฺปาเทติ, เต วชฺเชตฺวา ปญฺจวคฺคาทิคโณ หตฺถปาสํ อวิชหิตฺวา ปูรติ, กมฺมํ น กุปฺปติ, การกสงฺโฆ ปน สาติสาโร เตน วุตฺตํ วิมติวิโนทนิยํ ‘‘ปณฺฑกาทีหิ อุปชฺฌาเยหิ กริยมาเนสุ ปณฺฑกาทิเกน วินาว ปญฺจวคฺคาทิคโณ ปูรติ, กมฺมํ น กุปฺปติ. อิตรถา กุปฺปตี’’ติ. สเจ จตฺตาโร อาจริยา เอกโต อนุสาเวนฺติ, เอตฺถ ปน กถนฺติ วุจฺจเต, สพฺพอฏฺฐกถาสุ ทฺวีหิ วา ตีหิ วา อาจริเยหิ วิสุํ วิสุํ เอเกน เอกสฺสาติ เอกปฺปหาเรเนว ทฺเว ติสฺโส วา กมฺมวาจา กาตพฺพา. สเจ ปน นานาจริยา นานุปชฺฌายา โหนฺติ, ติสฺสตฺเถโร สุมนตฺเถรสฺส สทฺธิวิหาริกํ, สุมนตฺเถโร ติสฺสตฺเถรสฺส สทฺธิวิหาริกํ อนุสาเวติ, คณปูรกา โหนฺติ วฏฺฏติ. สเจ ปน นานุปชฺฌายา โหนฺติ, เอโก อาจริโย โหติ, นตฺเวว’นานุปชฺฌาเยนา’ติ ปฏิกฺขิตฺตตฺตา น วฏฺฏตีติ เอตฺตกเมว วุตฺตํ. จตุนฺนํ ปน ชนานํ วิจารณกถาย นาปิ กมฺมวิปตฺติฉายา ทิสฺสติ, ตถาปิ น กตฺตพฺพเมว, สพฺพอฏฺฐกถาสุ อวิจาริตตฺตา. สเจ วตฺถาลงฺการาทิสหิตปรูฬฺหเกสมสฺสุํ อุปสมฺปาเทติ, สูปสมฺปนฺโนว โหติ, ปจฺฉา เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตุํ วฏฺฏติ เตรสวตฺถุวิมุตฺตตฺตา สมฺปตฺติ เยเวตฺถปมาณตฺตา จ. अनुसावन-सम्पत्ति (उद्घोषणा की पूर्णता) का अर्थ है वस्तु, संघ और पुद्गल का उल्लेख न करना, अनुसावन में कमी करना और असमय अनुसावन करना—इन पाँच अनुसावन दोषों को त्याग कर कहना अनुसावन-सम्पत्ति है। वहाँ वस्तु आदि का उल्लेख न करना ज्ञप्ति में कहे गए के समान ही है। तीन अनुसावनों में जहाँ कहीं भी इनका उल्लेख न होना, उल्लेख न होना ही है। पूरी कर्मवाचा को न कहकर केवल चार बार ज्ञप्ति का कीर्तन करना, या कर्मवाचा के भीतर चार व्यंजनों को बिगाड़ना, या अक्षर या पद का गलत उच्चारण करके सुनाना 'अनुसावन की हानि' (कमी) कहलाती है; क्योंकि शिथिल, धनित, विमुक्त और निगृहीत के भेद से चार व्यंजन कर्मवाचा के भीतर कर्म को बिगाड़ देते हैं। वहाँ 'सुणातु मे' (suṇātu me) इस शिथिल के स्थान पर 'सुणाथु मे' (suṇāthu me) कहना 'शिथिल में धनित' कहलाता है। 'भन्ते' (bhante) कहने के स्थान पर 'भन्ते' (बिना महाप्राण के) कहना 'धनित में शिथिल' कहलाता है। 'सुणातु एसा ञत्ति' (suṇātu esā ñattī) कहने के स्थान पर 'सुणन्तु एसं ञत्ति' (suṇantu esaṃ ñattī) कहना 'विमुक्त में निगृहीत' कहलाता है। 'पत्तकल्ल' (pattakallaṃ) कहने के स्थान पर 'पत्तकल्ला' (pattakallā) कहना 'निगृहीत में विमुक्त' कहलाता है। इस प्रकार ये चार व्यंजन कर्मवाचा के भीतर कर्म को दूषित करते हैं। इन चारों को न बिगाड़ते हुए भी, यदि कोई अन्य अक्षर कहना हो और वह दूसरा अक्षर बोलता है, तो वह 'दुरुक्त' (गलत उच्चारण) करता है। अन्य दीर्घ-ह्रस्व आदि छह स्थानों में, दीर्घ के स्थान पर दीर्घ और ह्रस्व के स्थान पर ह्रस्व ही—इस प्रकार यथास्थान उसी अक्षर को बोलते हुए, परम्परा से आई हुई पद्धति को नष्ट किए बिना कर्मवाचा करनी चाहिए। यदि ऐसा न करके दीर्घ के स्थान पर ह्रस्व, ह्रस्व के स्थान पर दीर्घ बोलता है; उसी प्रकार गुरु के स्थान पर लघु, लघु के स्थान पर गुरु बोलता है; अथवा सम्बन्ध (जोड़कर) बोलना हो वहाँ विविक्त (अलग) बोलता है, और विविक्त बोलना हो वहाँ सम्बन्ध बोलता है, तो भी कर्मवाचा दूषित नहीं होती। ये छह व्यंजन कर्म को नहीं बिगाड़ते। यही आचार्यों का समान कथन है। परन्तु अन्य लोग कहते हैं कि ये व्यंजन भी कर्मवाचा के भीतर कर्म को दूषित करते हैं; यदि ऐसा हो तो अधिकांश लोग अनुपसम्पन्न (बिना दीक्षा वाले) ही होंगे, अतः विचार करके ग्रहण करना चाहिए। अथवा कर्मवाचा को बहुत अच्छी तरह सीखना चाहिए। अनुसावन के अवसर के बिना, पहले ज्ञप्ति को स्थापित किए बिना अनुसावन करना 'असमय अनुसावन' कहलाता है। इस प्रकार इन दोषों से मुक्त अनुसावन से युक्त होना 'अनुसावन-सम्पत्ति-सम्पन्न' कहलाता है। यदि पात्र और चीवर से रहित पुद्गल की उपसम्पदा करता है, तो अनुसावन में 'परिपुण्णस्स पत्तचीवरं' (उसके पात्र-चीवर पूर्ण हैं) कह देने के कारण कर्म का कोप (विफलता) नहीं होता, किन्तु कर्म करने वाला संघ दोषयुक्त (सातिसार) होता है। इसीलिए विमतिविनोदनी में भी कहा गया है कि पात्र-चीवर के अभाव में भी 'परिपुण्णस्स पत्तचीवरं' इस प्रकार कर्मवाचा में सुना देने के कारण कर्म-कोप न कहकर केवल दुष्कृत (दुक्कट) ही कहा गया है। यदि उपाध्याय के बिना उपसम्पदा करता है, और 'अमुक नाम वाले का उपसम्पदा-अभिलाषी, अमुक नाम वाले उपाध्याय के साथ' इस प्रकार उपाध्याय की घोषणा करता है, तो वह सु-उपसम्पन्न (भली-भाँति दीक्षित) ही होता है। यदि उपाध्याय की घोषणा नहीं करता, तो वह अनुपसम्पन्न होता है। विमतिविनोदनी में कहा जाएगा—'कर्म कुपित नहीं होता', यह बात उपाध्याय के अभाव में भी 'अमुक नाम वाले का उपसम्पदा-अभिलाषी अमुक नाम वाले उपाध्याय के साथ'—इस प्रकार किसी मृत, विभ्रान्त (धर्मच्युत) या पुराने उपाध्याय या किसी भी अविद्यमान व्यक्ति के नाम से सब जगह उपाध्याय का कीर्तन किए जाने के कारण कही गई है। यदि उपाध्याय का कीर्तन न करे, तो 'पुद्गल का उल्लेख नहीं करता' इस प्रकार कही गई कर्म-विपत्ति ही होगी, इसीलिए पालि में 'अनुपाध्याय' कहा गया है। यदि संघ-उपाध्याय या गण-उपाध्याय के साथ उपसम्पदा करता है, तो कर्म करने वाला संघ दोषयुक्त होता है, किन्तु कर्म कुपित नहीं होता। विमतिविनोदनी में कहा जाएगा—'संघ को उपाध्याय बनाकर' इसका अर्थ है कि यह अमुक नाम वाला संघ का उपसम्पदा-अभिलाषी है, अमुक नाम वाला संघ से उपसम्पदा की याचना करता है। 'संघ को उपाध्याय बनाकर' इस प्रकार कर्मवाचा में संघ को ही उपाध्याय के रूप में कीर्तित करने का अर्थ है। इसी प्रकार 'गण को उपाध्याय बनाकर' यहाँ भी 'यह अमुक नाम वाला गण का उपसम्पदा-अभिलाषी है' आदि के अनुसार योजना समझनी चाहिए। ऐसा कहने पर भी कर्म कुपित नहीं ही होता, क्योंकि केवल दुष्कृत ही कहा गया है, अन्यथा वह पुद्गल अनुपसम्पन्न है ऐसा कहा जाता। यदि पण्डक (नपुंसक) आदि अनुपसम्पन्न उपाध्याय के साथ उपसम्पदा करता है, और उन्हें छोड़कर पंचवर्गीय आदि गण हस्तपाश को न छोड़ते हुए (कोरम) पूरा करते हैं, तो कर्म कुपित नहीं होता, किन्तु कर्म करने वाला संघ दोषयुक्त होता है। इसीलिए विमतिविनोदनी में कहा गया है—'पण्डक आदि उपाध्यायों द्वारा किए जाने पर, पण्डक आदि के बिना ही यदि पंचवर्गीय आदि गण पूरा होता है, तो कर्म कुपित नहीं होता। अन्यथा कुपित होता है'। यदि चार आचार्य एक साथ अनुसावन करते हैं, तो यहाँ क्या कहना है? सभी अट्ठकथाओं में कहा गया है कि दो या तीन आचार्यों द्वारा अलग-अलग, एक-एक करके, एक ही प्रहार (समय) में दो या तीन कर्मवाचाएँ की जानी चाहिए। यदि अलग-अलग आचार्य और अलग-अलग उपाध्याय हों—तिस्स स्थविर सुमन स्थविर के सार्धविहारिका (शिष्य) के लिए अनुसावन करते हैं, और सुमन स्थविर तिस्स स्थविर के सार्धविहारिका के लिए अनुसावन करते हैं, और वे गण-पूरक (कोरम पूरा करने वाले) होते हैं, तो यह उचित है। यदि अलग-अलग उपाध्याय हों और एक ही आचार्य हो, तो 'विभिन्न उपाध्यायों के साथ [एक साथ]' इस बात का निषेध होने के कारण यह उचित नहीं है—इतना ही कहा गया है। चार व्यक्तियों की विचार-चर्चा में कर्म-विपत्ति की छाया भी नहीं दिखती, फिर भी ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि सभी अट्ठकथाओं में इस पर विचार नहीं किया गया है। यदि वस्त्राभूषण आदि के साथ और बढ़े हुए केश-श्मश्रु (बाल-दाढ़ी) वाले की उपसम्पदा करता है, तो वह सु-उपसम्पन्न ही होता है; बाद में केश-श्मश्रु मुँडाकर काषाय वस्त्र धारण करना उचित है, क्योंकि वह तेरह वस्तुओं (दोषों) से मुक्त है और यहाँ 'सम्पत्ति' (पूर्णता) ही प्रमाण है। อนุสาวนสมฺปตฺติกถา นิฏฺฐิตา. अनुसावन-सम्पत्ति-कथा समाप्त हुई। อิทานิ สีมวิโสธนึ นาม, นานาคนฺถสมาหนฺติ อิมิสฺสา คาถาย สํวณฺณนากฺกโม อนุปฺปตฺโต. अब 'सीमाविसोधनी' नामक, 'नानागन्थसमाहन्ति' इस गाथा की व्याख्या का क्रम प्राप्त हुआ है। ปญฺญาว สพฺพเญยฺเยสุ, ทยา ยสฺส มเหสิโน; อนนฺเตสุปิ สตฺเตสุ, ปวตฺติตฺถ ยถารุจิ. जिन महर्षि (बुद्ध) की प्रज्ञा समस्त ज्ञेय वस्तुओं में (व्याप्त) है और जिनकी दया अनन्त सत्त्वों (प्राणियों) में यथारुचि प्रवृत्त हुई। ตาย อุสฺสาหิโต สตฺถา, ภิกฺขูนํ หิตการณํ; ยํ สีมํ อนุชานาติ, ตตฺถ ปญฺโห ปวตฺตติ. उससे (दया से) उत्साहित होकर शास्ता (बुद्ध) ने भिक्षुओं के हित के लिए जिस सीमा की अनुमति दी है, वहाँ प्रश्न उत्पन्न होता है। ทฺเวฬฺหกา [Pg.34] สํสยา โหนฺติ, เทเส สพฺพตฺถ ภิกฺขโว; คนฺถาปิ วิสมา โหนฺติ, อตฺตโนมติการณา. सभी प्रदेशों में भिक्षुओं को दुविधा और संशय होते हैं; अपनी व्यक्तिगत मति (राय) के कारण ग्रन्थ भी विषम (परस्पर विरोधी) हो जाते हैं। ยทิ เม อีทิสํ วาทํ, สุตฺวาวุเปกฺขโก ภเว; ปพฺพชฺชา นิปฺผลา มยฺหํ, วเร สมฺพุทฺธสาสเน; คมฺภีโร นิปุโณ อตฺโถ, สพฺพญฺญุชินโคจโร. यदि मैं इस प्रकार के वाद को सुनकर उपेक्षा करने वाला (तटस्थ) हो जाऊँ, तो श्रेष्ठ बुद्ध-शासन में मेरी प्रव्रज्या निष्फल हो जाएगी; (क्योंकि) यह अर्थ गम्भीर और निपुण है, जो सर्वज्ञ जिन (बुद्ध) का विषय है। สาริปุตฺโต มหาปญฺโญ, เถรสฺสปิ อวิสโย; กถํ ตฺวํ สกฺกุเณยฺยาสิ, สพฺพญฺญุชินโคจเร; อิติ เม อุปวเทยฺยุํ, ธรเตว มหามุนิ. “महाप्राज्ञ सारिपुत्र स्थविर का भी जो विषय नहीं है, उस सर्वज्ञ जिन के विषय में तुम कैसे समर्थ हो सकोगे?” - इस प्रकार वे (लोग) मेरी निन्दा कर सकते हैं, (किन्तु) महामुनि (बुद्ध) अभी भी (अपने धर्म के रूप में) विद्यमान ही हैं। ปาลิผุลฺโล มหาสาโล, อุจฺโจ เมรุนคูปโม; ปรินิพฺพานกาลมฺหิ, สมฺพุทฺโธ อิจฺจมพฺรวิ. पालि-पुष्पों से प्रफुल्लित, मेरु पर्वत के समान ऊँचे महासाल वृक्ष के समान सम्बुद्ध ने परिनिर्वाण के समय इस प्रकार कहा था। มา ตฺวํ อานนฺท โรทสิ, มา ตฺวํ อานนฺท โสจสิ; อหเมโกว นิพฺพายิ, ธรนฺเตว พหู พุทฺธา. “हे आनन्द! तुम मत रोओ, हे आनन्द! तुम शोक मत करो; मैं अकेला ही निर्वाण प्राप्त कर रहा हूँ, (किन्तु) बहुत से बुद्ध (धर्म के रूप में) विद्यमान ही हैं।” สมฺพุทฺธา จตุราสีติ, สหสฺสานิ อิมานิ เต; โอวทิสฺสนฺติ ตฺวํ ภิกฺขุ, กตปุญฺโญสิ โหหิสิ. “ये चौरासी हजार (धर्मस्कन्ध) ही तुम्हारे सम्बुद्ध हैं; हे भिक्षु! वे तुम्हें उपदेश देंगे, तुम कृतपुण्य (पुण्यवान) होगे।” วเร สาฏฺฐกเถ ปาฬิ, ฐิเต สพฺพญฺญุโคจเร; นิพฺพุโตปิ สมฺพุทฺโธ, อสุญฺโญว ปชํ อิมํ. अर्थकथा सहित श्रेष्ठ पालि के रूप में सर्वज्ञ (बुद्ध) का विषय स्थित रहने पर, सम्बुद्ध के निर्वाण प्राप्त होने पर भी यह प्रजा (संसार) शून्य नहीं है। เอวาหํ จินฺตยิตฺวาน, รตฺติทิวํ อตนฺทิโต; ธรนฺเตเยว สมฺพุทฺเธ, ภินฺนวาโท อวิสโย. ऐसा विचार कर, रात-दिन आलस्य रहित होकर, सम्बुद्ध के (धर्म रूप में) विद्यमान रहते हुए, भिन्नवाद (मतभेद) का कोई स्थान नहीं है। ตํ วาทํ ภินฺทยิตฺวาน, ชหิตฺวา วตฺตโนมตึ; วิสฺสชฺชิสฺสมหํ ทานิ, จิรํ สทฺธมฺมสุทฺธิยาติ. उस (गलत) वाद का खण्डन कर और अपनी वर्तमान मति (व्यक्तिगत राय) को त्याग कर, अब मैं सद्धर्म की चिरकाल तक शुद्धि के लिए (इस विषय की) व्याख्या करूँगा। ตตฺถ สีมวิโสธนิ'นฺติ สีมวิปตฺติชหนํ สีมวิปตฺตึ ปหาย สมฺปตฺติลกฺขณปฺปกาสกํ ปกรณํ กริสฺสนฺติ อตฺโถ. ตตฺถ สีมาติ ปนฺนรสวิธา สีมา. กตเม ปนฺนรส. ขณฺฑสีมา, อุปจารสีมา, สมานสํวาสสีมา, อวิปฺปวาสสีมา, ลาภสีมา, คามสีมา, นิคมสีมา, นครสีมา, อพฺภนฺตรสีมา, อุทกุกฺเขปสีมา, ชนปทสีมา, รฏฺฐสีมา, รชฺชสีมา, ทีปสีมา, จกฺกวาฬสีมา’ติ. ตตฺถ ขณฺฑสีมา นาม ปพฺพชฺชุปสมฺปทาทีนํ สงฺฆกมฺมานํ สุขกรณตฺถํ มหาสีมาย วา คามเขตฺเต วา ขณฺฑิตฺวา ปริจฺฉินฺทิตฺวา สมฺมตา. ตสฺสาวิตฺถาโร ''ปฐมํ นิมิตฺตา กิตฺเตตพฺพา''ติ อาทินา ทฺวาสตฺตติปฺปเภทาย สมนฺตปาสาทิกาย วินยฏฺฐกถาย มหาวคฺเค วุตฺโต, อิธ วุตฺโตปิ ตเถว วุตฺโต ภเวยฺย, ตสฺมา น [Pg.35] วกฺขาม, ทุวิญฺเญยฺยฏฺฐานเมว กิญฺจิฐานํ นีหริตฺวา ปากฏํ กริสฺสาม. ตตฺถ สเจ ปน เหฏฺฐา อุปริมสฺส สีมาปริจฺเฉทสฺส ปรโต อนฺโต เลณํ โหติ, พหิ สีมา น โอตรติ. อถาปิ อุปริมสฺส สีมาปริจฺเฉทสฺส โอรโต พหิ เลณํ โหติ, อนฺโตสีมา น โอตรตีติ อิเม ทฺเว เอกตฺถา พฺยญฺชนเมว นานํ. อยญฺเหตฺถตฺโถอุปริมสฺส สีมาปริจฺเฉทสฺส โอริมภาคโต เหฏฺฐา ปพฺพตปาเท อุมงฺคสณฺฐาเนน ปพฺพตปสฺเส วิชฺฌิตฺวา เลณํ โหติ, สีมาปริจฺเฉทสฺส ปรโต เลเณ จ เลณสฺส พหิภูเต เหฏฺฐา ปพฺพเต จ ภูมิภาเค สีมา น โอตรติ, เลณสฺส อุปริเยว สีมา โหตีติ. ตสฺส อุปริมสฺส สีมาปริจฺเฉทสฺส โอริมภาคโต พหิภูเต เหฏฺฐา ปพฺพตปาเท อุมงฺคสณฺฐาเนน วิชฺฌิตฺวา ปพฺพตปสฺเส เลณํ อถาปิ โหติ, เลเณ จ เลณสฺส ปรภูเต เหฏฺฐา ปพฺพเต จ ภูมิภาเค สีมา น โอตรติ, เลณสฺส อุปริภาเค ว สีมา โหตีติ. เอสา จ วิจารณา วิมติวิโนทนิยมฺปิ กตา. อนฺโต ติ ปพฺพตสฺส อนฺโต, ปพฺพตมูเลติ อตฺโถ. ตเมว อนฺโตสทฺทํ สีมาปริจฺเฉเทน วิเสเสตุํ ‘‘อุปริมสฺส สีมาปริจฺเฉทสฺส ปรโต’’ติ วุตฺตํ. ปพฺพตปาทํ ปน อเปกฺขิตฺวา ‘‘โอรโต’’ติ วตฺตพฺเพปิ สีมานิสฺสยํ ปพฺพตคฺคํ สนฺธาย ‘‘ปรโต’’ติ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ เตเนว พหิเลณนฺติ เอตฺถ พหิสทฺทํ วิเสเสนฺโต ‘‘อุปริมสฺส สีมาปริจฺเฉทสฺส โอรโต’’ติ อาห. พหิ สีมา น โอตรตีติ เอตฺถ พหี ติ ปพฺพตปาเทเลณํ สนฺธาย วุตฺตํ. เลณสฺส พหิภูเต อุปริ สีมาปริจฺเฉทสฺส เหฏฺฐาภาเค สีมา น โอตรตีติ อตฺโถ. อนฺโตสีมาติ เลณสฺส จ ปพฺพตปาทสฺส จ อนฺโต อตฺตโน โอตรณารหฏฺฐาเน น โอตรตีติ อตฺโถ. พหิ สีมา น โอตรตีติ อตฺโถ, สีมา น โอตรตี ติ เจตฺถ อตฺตโน โอตรณารหฏฺฐาเน เลณภาเวน สีมา สพฺพถา ‘‘อโนตรณเมว ทสฺสิตนฺติ คเหตพฺพํ. ตตฺถ ปิ อโนตรณนฺติ อุปริเอว สีมา โหตี’’ติ วิมติวิโนทนี. เกจิ ปน เวฬุสุสิโร วิย สุสิรเมว เลณนฺติ วทนฺติ, ตํ อยุตฺตํ. वहाँ 'सीमाविसोधनी' का अर्थ है - सीमा-विपत्ति का त्याग करना, सीमा-विपत्ति को छोड़कर (सीमा) सम्पत्ति के लक्षणों को प्रकाशित करने वाले प्रकरण को करूँगा, यह अर्थ है। वहाँ सीमा पन्द्रह प्रकार की होती है। वे पन्द्रह कौन सी हैं? खण्ड-सीमा, उपचार-सीमा, समान-संवास-सीमा, अविप्रवास-सीमा, लाभ-सीमा, ग्राम-सीमा, निगम-सीमा, नगर-सीमा, अभ्यन्तर-सीमा, उदकुक्खेप-सीमा, जनपद-सीमा, राष्ट्र-सीमा, राज्य-सीमा, द्वीप-सीमा और चक्रवाल-सीमा। वहाँ खण्ड-सीमा उसे कहते हैं जो प्रव्रज्या, उपसम्पदा आदि संघ-कर्मों को सुगमता से करने के लिए महासीमा में या ग्राम-क्षेत्र में खण्डित (विभाजित) कर और परिच्छिन्न (सीमित) कर सम्मत (निर्धारित) की गई हो। उसका विस्तार “पहले निमित्तों का कीर्तन करना चाहिए” इत्यादि के द्वारा बहत्तर (72) प्रकार के भेदों वाली समन्तपासादिका नामक विनय-अट्ठकथा के महावग्ग में कहा गया है; यहाँ कहे जाने पर भी वह वैसा ही होगा, इसलिए (यहाँ) नहीं कहेंगे। केवल कुछ कठिनता से समझने योग्य स्थानों को उद्धृत कर स्पष्ट करेंगे। वहाँ यदि नीचे, ऊपरी सीमा-परिच्छेद के परे (अन्दर की ओर) गुफा (लेण) हो, तो बाहर सीमा नहीं उतरती। और यदि ऊपरी सीमा-परिच्छेद के इस ओर (बाहर की ओर) गुफा हो, तो अन्तःसीमा नहीं उतरती - ये दोनों एक ही अर्थ वाले हैं, केवल व्यंजन (शब्द) भिन्न हैं। यहाँ यह अर्थ है - ऊपरी सीमा-परिच्छेद के इस भाग से नीचे पर्वत के पाद (तलहटी) में सुरंग के आकार में पर्वत के पार्श्व को छेदकर गुफा हो, तो सीमा-परिच्छेद के परे गुफा में और गुफा के बाहर स्थित नीचे पर्वत के भूमि-भाग में सीमा नहीं उतरती, गुफा के ऊपर ही सीमा होती है। उस ऊपरी सीमा-परिच्छेद के इस भाग से बाहर स्थित नीचे पर्वत के पाद में सुरंग के आकार में छेदकर पर्वत के पार्श्व में यदि गुफा हो, तो गुफा में और गुफा के परे स्थित नीचे पर्वत के भूमि-भाग में सीमा नहीं उतरती, गुफा के ऊपरी भाग में ही सीमा होती है। यह विवेचना विमतिविनोदनी (टीका) में भी की गई है। 'अन्तः' का अर्थ है - पर्वत के भीतर, पर्वत की जड़ में। उसी 'अन्तः' शब्द को सीमा-परिच्छेद के द्वारा विशेषित करने के लिए “ऊपरी सीमा-परिच्छेद के परे” ऐसा कहा गया है। पर्वत-पाद की अपेक्षा से “इस ओर” (ओरतो) कहना चाहिए था, फिर भी सीमा के आश्रय पर्वत-शिखर को ध्यान में रखकर “परे” (परतो) कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। इसीलिए 'बहि-लेण' (बाहरी गुफा) में 'बहि' शब्द को विशेषित करते हुए “ऊपरी सीमा-परिच्छेद के इस ओर” कहा गया है। “बाहर सीमा नहीं उतरती” यहाँ 'बहि' शब्द पर्वत-पाद की गुफा के सन्दर्भ में कहा गया है। गुफा के बाहर स्थित ऊपरी सीमा-परिच्छेद के निचले भाग में सीमा नहीं उतरती, यह अर्थ है। 'अन्तःसीमा' का अर्थ है - गुफा और पर्वत-पाद के भीतर अपने उतरने योग्य स्थान पर (सीमा) नहीं उतरती। “बाहर सीमा नहीं उतरती” का अर्थ है, और “सीमा नहीं उतरती” यहाँ अपने उतरने योग्य स्थान पर गुफा होने के कारण सीमा का सर्वथा “न उतरना ही दिखाया गया है”, ऐसा ग्रहण करना चाहिए। वहाँ भी “न उतरने का अर्थ है कि सीमा ऊपर ही होती है” - ऐसा विमतिविनोदनी में कहा गया है। किन्तु कुछ लोग बाँस के छिद्र के समान छिद्र को ही 'लेण' (गुफा) कहते हैं, वह अयुक्त (अनुचित) है। อุปจารสีมา นาม คามารญฺญนิคมาทิวสา ยาว พฺรหฺมโลกา เตสํ เตสํ สตฺตานํ นิวาสเคหสฺส วา เทววิมานกปฺปรุกฺขาทีนํ วา อุปจารารหฏฺฐานเมว อุปจารสีมา เต อิธ นาธิปฺเปตา, ภิกฺขูนํ อวิสยตาย[Pg.36]. ยํ ปน ปเทสํ ปริจฺฉินฺทิตฺวา ปริเวณํ กตฺวา ปาการาทิปริกฺขิตฺตํ วา กตฺวา อปริกฺขิตฺเตปิ อุปจารารหฏฺฐานํ ปริจฺฉินฺทิตฺวา วา ยสฺมึ ปเทเส ภิกฺขู วสนฺติ, อยเมว อุปจารสีมาติ อธิปฺเปตา. ภิกฺขูนํ วสฺสูปคมนกถินตฺถารกรณฏฺฐานตฺตา, ตถา หิ ‘‘กถินตฺถตสีมาย’’นฺติ อุปจารสีมํ สนฺธาย วุตฺตํ, ขนฺธสีมาย ตตฺรุปฺปาทาภาวโตติ ตีสุปิ คณฺฐิปเทสุ วุตฺตํ. ตตฺรุปฺปาเทนา ภตนฺติ วิหารสนฺตเกน เขตฺตวตฺถุอาทินา อาภตํ กิญฺจิ สงฺฆิกํ จีวรํ อุปฺปชฺชติ, ตํ เตสํ กถินตฺถารกภิกฺขูนํ เยว ภวิสฺสตีติ โยชนา กาตพฺพา. เขตฺตวตฺถุอาทินา ติ เอตฺถ อาทิสทฺเทน มตกจีวรํ วา โหตุ สํฆํ อุทฺทิสฺส ทินฺนํ วา สงฺฆิเกน วา ติ มหาอฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. ตสฺมึ อุปจารสีเม ปวตฺตจีวรํ สพฺพํ สงฺคณฺหาติ, เตเนว ‘‘เตน โข ปน สมเยน อญฺญตเรน อุปาสเกน สงฺฆํ อุทฺทิสฺส วิหาโร การิโต โหติ, โส ตสฺส วิหารสฺส กเต อุภโตสงฺฆสฺส อกาลจีวรํ ทาตุกาโม โหติ. เตน โข ปน สมเยน อุภโตสงฺฆสฺส กถินํ อตฺถตํ โหติ. อถ โข โส อุปาสโก สงฺฆํ อุปสงฺกมิตฺวา กถินุทฺธารํ ยาจี’’ติ อิมสฺมึ วตฺถุสฺมึ อานิสํสปสมฺภนตฺถํ กถินุทฺธารํ ภควตา ปญฺญตฺตํ, เตเนว ถุลฺลนนฺทา ภิกฺขุนี อานิสํสํ อปฺปฏิปฺปสฺสมฺเภนฺตา จีวรํ อมฺหากํ ภวิสฺสตีติ กถินุทฺธารํ ปฏิพาหิ, ตสฺมา กถินตฺถตสีมายํ อนุทฺธเฏ กถิเน ยาว ผคฺคุณปุณฺณมา ปญฺจ มาสา เอตฺถนฺตเร มตกจีวรํ วา โหตุ จาตุทฺทิสํ สงฺฆํ อุทฺทิสฺส มตานํ ญาติชนานํ วา, ภิกฺขาปญฺญตฺติยา วา วิหารมหาทิกิจฺเจน วา เยนเกนจิ อากาเรน สงฺฆิกํ จีวรํ ทินฺนํ โหติ, ตํ สพฺพํ เตสํ กถินตฺถารกภิกฺขูนํเยว โหติ. ฉินฺนวสฺสานํ วา ปจฺฉิมิกาย อุปคตานํ วา ตตฺถ สมฺปตฺตานํ สีมฏฺฐกภิกฺขูนํ วา น โหติ. อชานิตฺวา เจ คณฺหนฺติ ทาตพฺพเมว. ยทิ ตํ จีวรํ ตณฺฑุลาทิขาทนียโภชนํ กโรติ, อิตเรสมฺปิ โหติเยว. กสฺมาติ เจ อานิสํส วิคตตฺตา. เตเนว คณปูรณวเสน สมฺปตฺตานํ ฉินฺนํ วสฺสานํ วา ปจฺฉิมิกาย อุปคตานํ วา อญฺญสฺมึ วิหาเร วุตฺถวสฺสนํ วา ขาทนียโภชนียาทีนิ ปาปุณนฺติ. กถินตฺถตสาฏกสฺส ทานกมฺมวาจา ปน ขณฺฑสีมายเมว วฏฺฏสิ. ตสฺมึ วิหาเร อสติ อญฺญวิหาเร พทฺธสีมาย วา อุทกุกฺเขปสีมาทีสุ วา กาตพฺพเมว. उपचार-सीमा नाम से ग्राम, अरण्य, निगम आदि के अनुसार ब्रह्मलोक तक उन-उन सत्त्वों के निवास-गृहों या देव-विमानों, कल्पवृक्षों आदि के समीपवर्ती स्थान ही उपचार-सीमा हैं; वे यहाँ अभिप्रेत नहीं हैं, क्योंकि वे भिक्षुओं के विषय (अधिकार क्षेत्र) से बाहर हैं। परन्तु जिस प्रदेश को परिच्छिन्न (सीमांकित) कर, प्रांगण (परिवेण) बनाकर, चहारदीवारी (प्राकार) आदि से घेरा गया हो, अथवा बिना घेरे हुए भी समीपवर्ती उपयुक्त स्थान को परिच्छिन्न कर जिस प्रदेश में भिक्षु निवास करते हैं, वही यहाँ 'उपचार-सीमा' के रूप में अभिप्रेत है। भिक्षुओं के वर्षावास और कठिन-आस्तरण (कठिन वस्त्र फैलाने) का स्थान होने के कारण, 'कठिन-आस्तरण की सीमा में' ऐसा उपचार-सीमा के संदर्भ में कहा गया है; खण्ड-सीमा में इसकी (लाभ की) उत्पत्ति न होने के कारण तीनों गण्ठिपदों (टीकाओं) में ऐसा कहा गया है। 'वहाँ उत्पन्न होने से प्राप्त' का अर्थ है—विहार के स्वामित्व वाले खेत, वास्तु आदि के माध्यम से प्राप्त कोई साङ्घिक चीवर उत्पन्न होता है, तो वह उन कठिन फैलाने वाले भिक्षुओं का ही होगा, ऐसा अर्थ लगाना चाहिए। 'खेत, वास्तु आदि' में 'आदि' शब्द से मृतक-चीवर या संघ को उद्देश्य कर दिया गया चीवर भी सम्मिलित है, ऐसा महाअट्ठकथा में कहा गया है। उस उपचार-सीमा में प्राप्त होने वाले सभी चीवरों का इसमें समावेश होता है, इसीलिए 'उस समय किसी उपासक ने संघ के उद्देश्य से विहार बनवाया था, वह उस विहार के बन जाने पर उभय-संघ को अकाल-चीवर देना चाहता था। उस समय उभय-संघ का कठिन फैलाया जा चुका था। तब उस उपासक ने संघ के पास जाकर कठिन-उद्धार (कठिन की समाप्ति) की याचना की'—इस कथावस्तु में लाभ (आशंस) को न रोकने के लिए भगवान द्वारा कठिन-उद्धार प्रज्ञप्त किया गया। इसी कारण थुल्लनन्दा भिक्षुणी ने लाभ को न रुकने देने की इच्छा से 'चीवर हमारा होगा' ऐसा सोचकर कठिन-उद्धार का विरोध किया। इसलिए कठिन-आस्तरण की सीमा में जब तक कठिन का उद्धार नहीं होता, फाल्गुन पूर्णिमा तक पाँच महीनों के अंतराल में चाहे मृतक-चीवर हो, या चारों दिशाओं के संघ के उद्देश्य से अथवा मृत परिजनों के निमित्त दिया गया हो, या भिक्षा-प्रज्ञप्ति से, या विहार-मह आदि कार्यों से, जिस किसी भी प्रकार से साङ्घिक चीवर दिया जाता है, वह सब उन कठिन फैलाने वाले भिक्षुओं का ही होता है। जिनका वर्षावास खंडित हो गया है, या जिन्होंने पश्चिमिक (बाद वाला) वर्षावास किया है, या वहाँ पहुँचे हुए सीमास्थ भिक्षुओं का वह नहीं होता। यदि वे अनजाने में ग्रहण कर लें, तो उसे लौटा देना चाहिए। यदि उस चीवर (की सामग्री) से चावल आदि खाद्य-भोज्य पदार्थ बनाए जाते हैं, तो वह दूसरों का भी होता है। यदि पूछें क्यों? तो कठिन के लाभ (आशंस) के समाप्त हो जाने के कारण। इसीलिए गण-पूर्ति के लिए आए हुए, खंडित वर्षावास वाले, पश्चिमिक वर्षावास वाले या अन्य विहार में वर्षावास व्यतीत करने वाले भिक्षु खाद्य-भोज्य आदि प्राप्त करते हैं। कठिन-आस्तरण के वस्त्र की दान-कर्मवाचा तो खण्ड-सीमा में ही उचित है। उस विहार में (खण्ड-सीमा) न होने पर अन्य विहार की बद्ध-सीमा या उदकुक्खेप-सीमा (जल-सीमा) आदि में यह कार्य अवश्य करना चाहिए। กสฺมาติ เจ[Pg.37], ตสฺมึ วิหาเร ปุริมิกาย อุปคตา กถินตฺถารกุสลา น โหนฺติ. อตฺถารกุสลา ขนฺธกภาณกตฺเถรา ปริเยสิตฺวา อาเนตพฺพา. กมฺมวาจํ สาเวตฺวา กถินํ อตฺถราเปตฺวา ทานญฺจ ภุญฺชิตฺวา คมิสฺสนฺติ, อานิสํโส ปน อิตเรสํ วโหตี’ติ. อญฺญสีมฏฺฐกภิกฺขูนมฺปิ กมฺมวาจ สาวนสฺส อฏฺฐกถายํ วุตฺตตฺตา. ฉินฺนวสฺสาวา ปจฺฉิมิกาย อุปคตา วา อญฺญสฺมึ วิหาเร วุตฺถวสฺสาปิ วา ปุริมิกาย อุปคตานํ คณปูรณมตฺตเมว ลภนฺติ, อานิสํโส อิตเรสํเยว โหติ. สเจปิ เต ฉินฺนวสฺสาทโย อนุโมเทนฺติ, ภินฺโน กถินตฺถาโร, อิทํ อฏฺฐกถายํ วิจาริตํ. อปเร ปน ‘‘กถินตฺถตสีมนฺติ อุปจารสีมํ สนฺธาย วุตฺต’’นฺติ วุตฺตตฺตา อุปจารสีมายเมว กถินนตฺถารก ญตฺตึ กโรนฺติ, ตํ อยุตฺตํ, โสเธตุํ ทุกฺกรตฺตา. ตถา หิ อุปจารสีมายเมว ปวิฏฺฐคามสีมายํ ตตฺถ โอติณฺเณ ภิกฺขู ตตฺถ ปาสานยนํ วา พหิสีมกรณํ วา โก สกฺขิสฺสติ. ‘‘กถินตฺถตสีมาย’’นฺติ อิมินาปิปเทน กถินตฺถตภาโวเยว วุตฺโต, น กถินตฺถตสาฏกสฺส ทานกมฺมวาจา, สา จ วิจารณา กมฺมจตุกฺเกน ทีเปตพฺพา. ตตฺถ อปโลกนกมฺมํ ญตฺติกมฺมํ ญตฺติทุติยกมฺมํ ญตฺติจตุตฺถกมฺมนฺติ. ตตฺถ อปโลกนกมฺมํ นาม สีมฏฺฐกสงฺฆํ โสเธตฺวา ฉนฺทารหานํ ฉนฺทํ อาหริตฺวา สมคฺคสฺส สงฺฆสฺส อนุมติยา สงฺฆํ กิตฺเตตฺวา ‘‘รุจฺจติ สงฺฆสฺสา’’ติ ติกฺขุตฺตุํ อนุสาเวตฺวา กตฺตพฺพํ วุจฺจติ. ญตฺติกมฺมํ นาม วุตฺตนเยเนว สมคฺคสฺส สงฺฆสฺส อนุมติยา เอกาย ญตฺติยา กตฺตพฺพํ กมฺมํ. ญตฺติทุติยกมฺมํ นาม วุตฺตนเยเนว สมคฺคสฺส สงฺฆสฺส อนุมติยา เอกาย ญตฺติยา เอกาย จ อนุสาวนายาติ เอวํ ญตฺติทุติยาย อนุสาวนาย กตฺตพฺพํ กมฺมํ. ญตฺติจตุตฺถกมฺมํ นาม วุตฺตนเยเนว สมคฺคสฺส สงฺฆสฺส อนุมติยา เอกาย ญตฺติยา ตีหิ จ อนุสาวนาหีติ เอวํ ญตฺติจตุตฺถาหิ ตีหิ อนุสาวนาหิ กตฺตพฺพํ กมฺมํ. ตตฺถ อปโลกนกมฺมํ ผลภาชนกาลาทีสุ ลหุกกมฺเมเยว ลพฺภติ. กถินตฺถตสาฏกทาเนปิ อนตฺถเตเยว กถิเน ตโต พหุอานิสํสจีวรสาฏกํ ลภิตฺวา เตเนว สาฏเกน อตฺถริตพฺพา, ปุน กมฺมวาจาย ทานกิจฺจํ นตฺถิ อปโลกนกมฺเมน สงฺฆสฺส อนุมติยา ทาตพฺพํ. กถินตฺถตสาฏกทานกมฺมวาจา เอกา เจ วฏฺฏติ. ปุน กมฺม วาจายกิจฺจํ [Pg.38] นตฺถิ. ญตฺติกมฺมํ ปน ธมฺมสงฺคาหกกาเล มหากสฺสปตฺเถราทีหิ อตฺตนาว อตฺตานํ สมฺมนฺนนกาเล ลหุกกมฺเมเยว ลพฺภติ. ญตฺติทุติยกมฺมํ ปน สีมาสมฺมุติ, สีมาสมูหนํ, กถินทานํ, กถินุทฺธาโร, กุฏิวตฺถุเทสนา, วิหารวตฺถุเทสนาติ อิมานิ ฉ ครุกมฺมานิ อปโลเกตฺวา กาตุํ น วฏฺฏติ. ญตฺติทุติยกมฺมวาจํ สาเวตฺวาว กาตพฺพํ. อิโต ปเรสุ จีวรวิปฺปวาสสมฺมุติอาทีสุ ญตฺติทุติยกมฺเมสุ อปโลเกตฺวาปิ กาตพฺพํ, ลหุกกมฺมตฺตา. ญตฺติจตุตฺถกมฺมํ ปน อิทานิ อุปสมฺปทากมฺมํ อิทานิ จตฺตาริ กมฺมานิ พทฺธสีมาย วา, ตสฺมึ อสติ อุทกุกฺเขปสีมาย วา โสเธตุํ อสกฺโกนฺเต สติ อพทฺธสีมาย วา กาตพฺพเมว. อปเร เอวํ วทนฺติ ‘‘กุฏิวตฺถุการวิหารวตฺถุการกาเล ตานิ กุฏิวิหารวตฺถูนิ กถํ สีมฏฺฐา กาตุํ สกฺขิสฺสนฺติ, ตสฺมา ตตฺถ ตตฺเถว กุฏิวิหารกรณฏฺฐาเนเยว กาตพฺพ’’นฺติ, ตํ เตสํ วจนมตฺตเมว, น สารโต ปจฺเจตพฺพํ. วตฺถุปรามสนเมเวตฺถ ปมาณํ, ตถา หิ สงฺฆกุฏิวตฺถุํ โอโลเกนฺตํ ยาจติตฺยาทินา วตฺถุปรามสนํ กตฺวา เหฏฺฐา วตฺถุญตฺติโทเส จ วิปตฺติ ลกฺขเณ จ วชฺเชตฺวา ญตฺติทุติยกมฺเมน สมฺมตภิกฺขูหิ ตตฺถ กุฏิวิหารฏฺฐานํ คนฺตฺวา โอโลเกตพฺพํ เตเนว ปาฬิยํ ‘‘เตหิ สมฺมเตหิ ภิกฺขูหิ ตตฺถ คนฺตฺวา กุฏิวตฺถุ โอโลเกตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. อญฺญถา ปตฺตจีวรวิรหิตํ ปุคฺคลํ วา อนุปชฺฌายกํ วา กตฺวา อุปสมฺปาเทนฺเตหิ ‘‘ปริปุณฺณสฺส ปตฺตจีวร’’นฺติ วา ‘‘อิตฺถนฺนามสฺส อุปสมฺปทาเปกฺโข, อิตฺถนฺนาเมน อุปชฺฌาเยนา’’ติ กมฺมวาจาย สาวิเตปิ กมฺมสฺส อสิชฺฌนํ ภเวยฺย. อปเร เอวํ วทนฺติ ‘‘สีมาสมฺมุติกาเล ปน กตํ, ตถา หิ สีมาสมฺมุติกาเล ภิกฺขู ตสฺมึ เยว ฐาเน ฐตฺวา กมฺมวาจํ สาเวนฺติ, ตสฺมิมฺปิ ฐาเน อพทฺธสีมาว โหติ. ยทิ พทฺธสีมา ภเวยฺย, สีมชฺโฌตฺถรณํ วา สีมสมฺเภโท วา สิยา’’ติ. สจฺจํ, ตถาปิ ตํ สีมาสมฺมุติฏฺฐานํ ภุชิสฺสํ กตฺวา สีมสมฺมุติกมฺมสฺสกตตฺตา วิสุํคาเม สมฺมตานํ ภิกฺขูนํ คามสีเม ฐิตา ภิกฺขู กมฺมํ โกเปตุํ น สกฺโกนฺติ. ยทิ สีมสมฺมุติฏฺฐานํ ภุชิสฺสํ กตฺวาว สีมํ สมฺมนฺเนยฺย, กถํ ภควโต ธรมานกาเล ฉพฺพคฺคิยา ภิกฺขุ ยถาสุขํ สีมํ สมฺมนฺนิสฺสนฺตีติ น ปเนวํ ทฏฺฐพฺพํ ตถา หิ วาสาขา มิคารมาตาปิ นวโกฏีหิ ภูมึ คณฺหิตฺวา ปุพฺพารามํ นาม มหา วิหารํ [Pg.39] กาเรสิ, ตถา อนาถปิณฺฑิโก กหาปณสนฺถเตน เชตสฺส ราชกุมารสฺส อุยฺยานฏฺฐานํ กิณาเปตฺวา คณฺหิตฺวา เชตวนํ นาม มหาวิหารํ กาเรสิ เอวํ ปุญฺญกามา ปริเวณํ กตฺวา วิหารํ กโรนฺติ ตสฺมา ฉพฺพคฺคิยา ภิกฺขู ยถาสุขํ สีมํ พนฺธนฺตีติ ทฏฺฐพฺพนฺติ. อยํ อุปจารสีมาย วิจารณา. यदि पूछा जाए कि क्यों, तो उस विहार में प्रथम वर्षावास (पुरिमिका) के लिए आए हुए भिक्षु कठिन बिछाने (कठिनत्थार) में कुशल नहीं होते। बिछाने में कुशल खन्धक-भाणक (खन्धक के ज्ञाता) स्थविरों को खोजकर लाना चाहिए। वे कर्मवाच्य सुनाकर, कठिन बिछवाकर और दान ग्रहण कर चले जाएंगे, परंतु इसका आनृशंस (लाभ) दूसरों को ही प्राप्त होता है। अन्य सीमा में स्थित भिक्षुओं के लिए भी कर्मवाच्य सुनाने की बात अट्ठकथा में कही गई है। जिनका वर्षावास खंडित हो गया है या जो बाद वाले (पच्छिमिका) वर्षावास में आए हैं, अथवा अन्य विहार में वर्षावास बिताने वाले भिक्षु, प्रथम वर्षावास वालों के लिए केवल गण-पूरक (संख्या पूरी करने वाले) मात्र होते हैं, आनृशंस केवल दूसरों (पुरिमिका वालों) को ही होता है। यदि वे खंडित वर्षावास वाले आदि भिक्षु अनुमोदन करते हैं, तो कठिन का बिछाना भंग हो जाता है, ऐसा अट्ठकथा में विचार किया गया है। दूसरे लोग कहते हैं कि 'कठिनत्थतसीमा' का अर्थ 'उपचार सीमा' के संदर्भ में कहा गया है, इसलिए वे उपचार सीमा में ही कठिन बिछाने की ज्ञप्ति (सूचना) करते हैं, वह अनुचित है क्योंकि उसे शुद्ध करना कठिन है। क्योंकि उपचार सीमा में ही प्रविष्ट ग्राम-सीमा में वहाँ आए हुए भिक्षुओं को वहाँ से हटाना या सीमा से बाहर करना कौन कर सकेगा? 'कठिनत्थतसीमा' इस पद से कठिन बिछाने का भाव ही कहा गया है, न कि कठिन के वस्त्र के दान का कर्मवाच्य। उस विचार को चार प्रकार के कर्मों द्वारा स्पष्ट करना चाहिए। वहाँ अपलोकन-कर्म, ज्ञप्ति-कर्म, ज्ञप्ति-द्वितीय-कर्म और ज्ञप्ति-चतुर्थ-कर्म हैं। वहाँ अपलोकन-कर्म उसे कहते हैं जो सीमा में स्थित संघ को शुद्ध कर, छन्द (सहमति) के योग्य भिक्षुओं का छन्द लाकर, समग्र संघ की अनुमति से संघ को सूचित कर 'क्या संघ को यह रुचिकर है' ऐसा तीन बार सुनाकर किया जाता है। ज्ञप्ति-कर्म उसे कहते हैं जो पूर्वोक्त विधि से ही समग्र संघ की अनुमति से एक ज्ञप्ति द्वारा किया जाता है। ज्ञप्ति-द्वितीय-कर्म उसे कहते हैं जो पूर्वोक्त विधि से ही समग्र संघ की अनुमति से एक ज्ञप्ति और एक अनुसावन (घोषणा) द्वारा किया जाता है। ज्ञप्ति-चतुर्थ-कर्म उसे कहते हैं जो पूर्वोक्त विधि से ही समग्र संघ की अनुमति से एक ज्ञप्ति और तीन अनुसावन द्वारा किया जाता है। वहाँ अपलोकन-कर्म फल-विभाजन आदि लघु कर्मों में ही प्राप्त होता है। कठिन के वस्त्र के दान में भी, जब कठिन न बिछाया गया हो, तब बहुत आनृशंस वाले चीवर-वस्त्र को प्राप्त कर उसी वस्त्र से कठिन बिछाना चाहिए; पुनः कर्मवाच्य द्वारा दान की आवश्यकता नहीं है, संघ की अनुमति से अपलोकन-कर्म द्वारा दिया जाना चाहिए। यदि कठिन के वस्त्र के दान की एक कर्मवाच्य होती है, तो वह उचित है। पुनः कर्मवाच्य की आवश्यकता नहीं है। ज्ञप्ति-कर्म तो धर्म-संग्रहण के समय महाकस्सप स्थविर आदि द्वारा स्वयं को ही सम्मत (नियुक्त) करने के समय लघु कर्म में ही प्राप्त होता है। ज्ञप्ति-द्वितीय-कर्म तो सीमा-सम्मति, सीमा-समुद्धार, कठिन-दान, कठिन-उद्धार, कुटी-वस्तु-देशना, विहार-वस्तु-देशना—इन छह गुरु कर्मों को अपलोकन द्वारा करना उचित नहीं है। इन्हें ज्ञप्ति-द्वितीय कर्मवाच्य सुनाकर ही करना चाहिए। इससे भिन्न चीवर-विप्रवास-सम्मति आदि ज्ञप्ति-द्वितीय कर्मों में लघु कर्म होने के कारण अपलोकन द्वारा भी किया जा सकता है। ज्ञप्ति-चतुर्थ-कर्म तो अब उपसम्पदा कर्म है। अब ये चार कर्म बद्ध-सीमा में, या उसके न होने पर उदकुक्खेप-सीमा (जल-सीमा) में, और यदि उसे शुद्ध करने में असमर्थ हों तो अबद्ध-सीमा में ही करने चाहिए। दूसरे ऐसा कहते हैं—'कुटी और विहार बनाने के समय उन कुटी और विहार के स्थानों को सीमा में स्थित कैसे किया जा सकेगा? इसलिए जहाँ-जहाँ कुटी और विहार बनाने का स्थान है, वहीं यह कर्म करना चाहिए।' यह उनका केवल कथन मात्र है, इसे सार रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए। यहाँ वस्तु (स्थान) का निरीक्षण ही प्रमाण है। जैसे संघ की कुटी के स्थान को देखते हुए याचना करता है, इत्यादि विधि से स्थान का निरीक्षण कर, नीचे के स्थान-ज्ञप्ति के दोषों और विपत्ति के लक्षणों को वर्जित कर, ज्ञप्ति-द्वितीय-कर्म द्वारा सम्मत भिक्षुओं को वहाँ कुटी या विहार के स्थान पर जाकर निरीक्षण करना चाहिए। इसीलिए पालि में कहा गया है—'उन सम्मत भिक्षुओं को वहाँ जाकर कुटी के स्थान का निरीक्षण करना चाहिए'। अन्यथा पात्र और चीवर से रहित व्यक्ति को या उपाध्याय रहित व्यक्ति को उपसम्पदा देते समय 'पात्र और चीवर पूर्ण हैं' या 'अमुक नाम का उपसम्पदा का इच्छुक है, अमुक नाम के उपाध्याय द्वारा' ऐसा कर्मवाच्य सुनाने पर भी कर्म सिद्ध नहीं होगा। दूसरे ऐसा कहते हैं—'सीमा-सम्मति के समय तो किया गया है, क्योंकि सीमा-सम्मति के समय भिक्षु उसी स्थान पर खड़े होकर कर्मवाच्य सुनाते हैं, उस स्थान पर भी अबद्ध-सीमा ही होती है। यदि बद्ध-सीमा होती, तो सीमा का अतिव्यापन या सीमा का संभेद हो जाता'। सत्य है, फिर भी उस सीमा-सम्मति के स्थान को स्वतंत्र (भुजिस्स) कर सीमा-सम्मति का कर्म किए जाने के कारण, अलग गाँव में सम्मत भिक्षुओं के लिए ग्राम-सीमा में स्थित भिक्षु कर्म को दूषित नहीं कर सकते। यदि सीमा-सम्मति के स्थान को स्वतंत्र करके ही सीमा सम्मत की जाए, तो भगवान के समय में छब्बग्गीय भिक्षु अपनी इच्छा अनुसार सीमा कैसे सम्मत करते थे? इसे इस प्रकार नहीं देखना चाहिए। क्योंकि विशाखा मृगारमाता ने भी नौ करोड़ मुद्राओं से भूमि खरीदकर पूर्वाराम नामक महाविहार बनवाया था। वैसे ही अनाथपिण्डिक ने कार्षापण बिछाकर राजकुमार जेत के उद्यान को खरीदकर जेतवन नामक महाविहार बनवाया था। इस प्रकार पुण्यकामी लोग परिवेण बनाकर विहार बनवाते हैं, इसलिए छब्बग्गीय भिक्षु अपनी इच्छा अनुसार सीमा बाँधते थे, ऐसा समझना चाहिए। यह उपचार सीमा का विचार है। สมานสํวาสสีมา นาม ทิฏฺฐิสีลสามญฺญสงฺฆาตสงฺขาเตหิ ภิกฺขุคเณหิ อุโปสถาทิสงฺฆกมฺเมน สมานํ เอกีภาวํ หุตฺวา วสิตุํ สมฺมตา สีมา. อวิปฺปวาสสีมา นาม ติจีวเรน วิปฺปวสิตุํ สมฺมตา สีมา, เอตา ทฺเวสีมา ติโยชนปรมตายปิ สมฺภวโต มหาสีมา ติปิ นามํ ลภนฺติ, ตาสํ วิจารณา มหาอฏฺฐกถายํ สพฺพโส ปริปุณฺณํ กตฺวา วุตฺตา, ตสฺมา อิธ น วกฺขาม วุจฺจมานมฺปิ อวิเสเสตฺวา วุตฺตํ ภเวยฺย, ตสฺมา น วกฺขาม. समान-संवास सीमा वह सीमा है जो दृष्टि और शील की समानता वाले भिक्षु-गणों द्वारा उपोसथ आदि संघ-कर्मों के लिए एक होकर रहने हेतु सम्मत की गई हो। अविप्रवास सीमा वह सीमा है जो तीन चीवरों से अलग न रहने के लिए सम्मत की गई हो। ये दो सीमाएँ तीन योजन तक की अधिकतम सीमा में संभव होने के कारण 'महासीमा' नाम भी प्राप्त करती हैं। इनका विवेचन महाअट्ठकथा में पूरी तरह से विस्तारपूर्वक किया गया है, इसलिए यहाँ नहीं कहेंगे; यदि कहा भी जाए तो वह बिना किसी विशेष अंतर के ही होगा, इसलिए यहाँ नहीं कहेंगे। ลาภสีมา นาม ยํ คามํ วา นิคมํ วา โปกฺขรณีตฬากวนาทิกํ วา ยํ ยํ ปเทสํ สงฺฆสฺส จตุจฺจปฺปยตฺถาย ราชราชมหามตฺเตหิ ปริจฺฉินฺทิตฺวา ฐปิตา, เอสา ลาภสีมา นาม. เนว สมฺมาสมฺพุทฺเธน อนุญฺญาตา, น ธมฺมสงฺคหกตฺเถเรหิ ฐปิตา, อปิ จ โข ลาภทายเกหิ ฐปิตาว. มาติกาฏฺฐกถาย ลีนตฺถปฺปกาสนิยมฺปิ ลาภสีมาติ ยํ ราชราชมหามตฺตาทโย วิหารํ กาเรตฺวา คาวุตํ วา อฑฺฒโยชนํ วา โยชนํ วา สมนฺตา ปริจฺฉินฺทิตฺวา ‘‘อยํ อมฺหากํ วิหารสฺส ลาภสีมา, ยํ เอตฺถนฺตเร อุปฺปชฺชติ, ตํ สพฺพํ อมฺหากํ วิหารสฺส เทมา’’ติ ฐเปนฺติ, อยํ ลาภสีมา นามา’ติ วุตฺตํ. อิมสฺมึ ลาภสีมาธิกาเร รญฺโญ มหาเจติยทายกสฺส ทิวงฺคตกาลโต เอกสฺมึ สํวจฺฉเร อตีเต ตสฺส เชฏฺฐปุตฺตสฺส ธมฺมรญฺโญ กาเล อีทิสํ ปุญฺญํ ภูตปุพฺพํ. ยทิ หิ ราชราชมหามตฺตาทีสุ โย โกจิ ยสฺส วิหารสฺส ยานิ ตฬากเขตฺตวตฺถาทีนิ ทตฺวา ตํ สหิตวิหารํ ปุคฺคลสฺส เทติ, เอวํ สติ กึ ตสฺส ปุคฺคลสฺส ตํ สหิตวิหารํ ปุคฺคลิกภาเวน ปฏิคฺคเหตุํ วฏฺฏติ, อุทาหุ สงฺฆิกภาเวเนวาติ ตฬากเขตฺตวตฺถาทิวิรหิโต ปน เกวโล ปุคฺคลิกวิหาโร อญฺเญสํ ทมฺมีติ อทตฺวา ปุคฺคเล มเต สงฺฆิโก โหติ, อุทาหุ ปุคฺคลิโกเยวาติ. ตตฺรายํ วิสฺสชฺชนา, ยทิ หิ ราชราชมหามตฺตาทีสุ โยโกจิ วิหารสฺส ตฬากเขตฺตาวตฺถาทีนิ [Pg.40] เทติ, เอวํ สติ ปฏิกฺขิปิตุํ น วฏฺฏตีติทฏฺฐพฺพํ เตน วุตฺตํ วินยฏฺฐกถายํ ‘‘อิมํ ตฬากํ, อิมํ เขตฺตํ, อิมํ วตฺถุํ วิหารสฺส เทมาติ วุตฺเต ปฏิกฺขิปิตุํ น ลพฺภตี’’ติ. ‘‘ปาสาทสฺส ทาสึ, ทาสํ, เขตฺตํ, วตฺถุํ, โคมหึสํ เทมาติ วทนฺติ, ปาเฏกฺกํ คหณกิจฺจํ นตฺถิ, ปาสาเท ปฏิคฺคหิเต ปฏิคฺคหิตเมว โหตี’’ติ จ. วินยวินิจฺฉยปกรเณ จ. लाभसीमा उसे कहते हैं जिसे राजाओं या राज-महामात्रों द्वारा संघ के चार प्रत्ययों (चीवर, पिण्डपात, शयनासन, ग्लानप्रत्यय) के लिए किसी गाँव, कस्बे, पुष्करिणी (पोखर), तालाब, वन आदि जिस-जिस प्रदेश को परिसीमित कर स्थापित किया गया हो, वह लाभसीमा कहलाती है। यह न तो सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा अनुमत है, न ही धर्म-संग्रहक स्थविरों द्वारा स्थापित है, बल्कि यह लाभ देने वालों (दाताओं) द्वारा ही स्थापित की गई है। मातिका-अट्ठकथा की लीनत्थप्पकासिनी में भी कहा गया है—'लाभसीमा वह है जिसे राजा, राज-महामात्र आदि विहार बनवाकर उसके चारों ओर एक गावुत, आधा योजन या एक योजन की सीमा निर्धारित कर यह स्थापित करते हैं कि—यह हमारे विहार की लाभसीमा है, इसके भीतर जो कुछ भी उत्पन्न होगा, वह सब हम अपने विहार को देते हैं—यह लाभसीमा कहलाती है'। इस लाभसीमा के अधिकार के विषय में, महाचेतिय के दायक राजा के स्वर्गवास के एक वर्ष बीत जाने पर, उनके ज्येष्ठ पुत्र धर्मराज के काल में ऐसा पुण्य कार्य पहले हुआ था। यदि राजाओं या राज-महामात्रों आदि में से कोई किसी विहार के लिए जो तालाब, खेत, वास्तु (भूमि) आदि देकर उस सहित विहार को किसी व्यक्ति (पुद्गल) को देता है, तो ऐसी स्थिति में क्या उस व्यक्ति के लिए उस सहित विहार को व्यक्तिगत (पुद्गलिक) रूप में ग्रहण करना उचित है, अथवा संघिक रूप में ही? और तालाब, खेत, वास्तु आदि से रहित केवल व्यक्तिगत विहार, 'मैं दूसरों को देता हूँ' ऐसा कहे बिना व्यक्ति की मृत्यु होने पर संघिक हो जाता है, अथवा व्यक्तिगत ही रहता है? वहाँ यह उत्तर है—यदि राजाओं या राज-महामात्रों आदि में से कोई विहार के लिए तालाब, खेत, वास्तु आदि देता है, तो ऐसी स्थिति में उसे अस्वीकार करना उचित नहीं है, ऐसा समझना चाहिए। इसीलिए विनय-अट्ठकथा में कहा गया है—'यह तालाब, यह खेत, यह वास्तु हम विहार को देते हैं—ऐसा कहने पर उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता'। और 'प्रासाद (भवन) के लिए दासी, दास, खेत, वास्तु, गाय-भैंस देते हैं' ऐसा कहते हैं, तो उन्हें अलग से ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है, प्रासाद के ग्रहण कर लेने पर वे भी ग्रहण किए हुए ही हो जाते हैं। और विनयविनिच्छय-प्रकरण में भी। ‘‘เขตฺตวตฺถุตฬากํ วา, เทม โคอชิกาทิกํ; วิหารสฺสาติ วุตฺเตปิ, นิเสเธตุํ น วฏฺฏตี’’ติ. 'खेत, वास्तु, तालाब अथवा गाय, बकरी आदि हम विहार को देते हैं'—ऐसा कहने पर भी निषेध करना उचित नहीं है। ขุทฺทสิกฺขาปกรเณ จ ‘‘เขตฺตาทีนิ วิหารสฺส, วุตฺเต ทมฺมีติ วฏฺฏตี’’ติ วุตฺตํ. ‘‘วิหารสฺส เทมา’’ติ เจตฺถ สงฺฆิกวิหารสฺเสว, น ปุคฺคลิกวิหารสฺสาติ ทฏฺฐพฺพํ, ตถา หิ วุตฺตํ วิมติวิโนทนิยํ วิหารสฺส เทมาติ สงฺฆิกวิหารํ สนฺธาย วุตฺตนฺติ. ‘‘ปาสาทสฺสา’’ติ จ สามญฺเญน วุตฺเตปิ ‘‘เตน โข ปน สมเยน วิสาขา มิคารมาตา สงฺฆสฺส อตฺถาย สาฬินฺทํ ปาสาทํ การาเปตุกาโม โหติ หตฺถินขก’’นฺติ อิมสฺมึ วตฺถุสฺมึ ปาสาทปริโภคสฺส อนุญฺญาตตฺตา สงฺฆิกํเยว ปาสาทํ สนฺธาย วุตฺตนฺติ วิญฺญายติ ตถา หิ วุตฺตํ วิมติวิโนทนิยํ สพฺพํ ปาสาทปริโภค’นฺติ. ปาฬิยา อฏฺฐกถาย วณฺณนาธิกาเร ‘‘สุวณฺณรชตาทิวิจิตฺรานี’’ติอาทิ สงฺฆิกเสนาสนํ สนฺธาย วุตฺตํ. ปุคฺคลิกํ ปน สุวณฺณาทิวิจิตฺรํ ภิกฺขุสฺส สมฺปฏิจฺฉิตุเมว น วฏฺฏติ, ‘‘น เกนจิ ปริยาเยน ชาตรูปชตํ สาทิยิตพฺพ’’นฺติ วุตฺตตฺตา, เตเนเวตฺถ อฏฺฐกถายํ สงฺฆิกวิหาเร วา ปุคฺคลิกวิหาเร วาติ น วุตฺต’นฺติ. ‘‘ภิกฺขูนํ ธมฺมวินยวณฺณนฏฺฐาเน’’ติ วุตฺตตฺตา สงฺฆิกเมว สุวณฺณาทิมยํ เสนาสนํ เสนาสนปริกฺขารา จ วฏฺฏนฺติ, น ปุคฺคลิกานีติ คเหตพฺพนฺติ จ, ตสฺมา ตฬากเขตฺตวตฺถาทิสหิตวิหาโร สงฺฆิโกเยว โหติ, น ปุคฺคลิโกติ วินยโกวิเทหิ ทฏฺฐพฺโพ. สเจ ปน ราชราชมหามตฺตาทีสุ โยโกจิ ตฬากเขตฺตวตฺถาทิสหิตํ วิหารํ ปุคฺคลสฺส ตํ สหิตวิหารภาวมาโรเจตฺวา เทติ, เอวํ สติ ปุคฺคลสฺส สงฺฆิกวิหารภาเวเนว ปฏิคฺคเหตุํ วฏฺฏติ, น ปุคฺคลิกวิหารภาเวนาติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘กสฺมา, วิหารสฺส เทมา’’ติ วตฺวา ทินฺนานํ ตฬากเขตฺตวตฺถาทีนํ สงฺฆสฺเสว วฏฺฏมานตฺตา. เตเนวาห วิมติวิโนทนิยํ ‘‘วิหารสฺส เทมาติ วุตฺตํ สงฺฆสฺส วฏฺฏติ, น ปุคฺคลสฺส, เขตฺตาทิ วิย ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ. ตตฺรายํ โยชนา [Pg.41] วิหารสฺสาเทมาติ วตฺวา ทินฺนํ เขตฺตาทิ สงฺฆสฺส วฏฺฏติ, น ปุคฺคลสฺส, เอวํ วิหารสฺส เทมาติ วุตฺตํ สุวณฺณาทิวิจิตฺตํ อกปฺปิยมญฺจํ สงฺฆสฺส วฏฺฏติ, น ปุคฺคลสฺสาติ ทฏฺฐพฺพนฺติ. สงฺฆสฺเสว กปฺปิยโวหาเรน เขตฺตาทีนิ ปฏิคฺคเหตุํ วฏฺฏติ, ตถา หิ วุตฺตํ วิมติวิโนทนิยํ ‘‘จตฺตาโรปจฺจเย ปริภุญฺชตูติ เทติ วฏฺฏตีติเอตฺถ ภิกฺขุสงฺฆสฺส จตุปจฺจยปริโภคตฺถาย ตฬากํ ทมฺมีติ วา ภิกฺขุสงฺโฆ จตฺตาโร ปจฺจเย ปริภุญฺชิตุํ ตฬากํ ทมฺมีติ วา อิโต ตฬากโต อุปฺปนฺเน จตฺตาโร ปจฺจเย ทมฺมีติ วา วุตฺตมฺปิ วฏฺฏติ. อิทญฺจ สงฺฆสฺส ทิยฺยมานญฺเญว สนฺธาย วุตฺตํ, ปุคฺคลสฺส ปน เอวมฺปิ ทินฺนํ ตฬากเขตฺตาทิ น วฏฺฏติ. สุทฺธจิตฺตสฺส ปน อุทกปริโภคตฺถํ กูปโปกฺขรณีอาทโย วฏฺฏนฺติ. สงฺฆสฺสตฬากํอตฺถิ, ตํกถนฺติอาทินาหิสพฺพตฺถ สงฺฆสฺสวเสเนว วุตฺตนฺติ. ‘‘เขตฺตาทโย ปน สพฺเพสงฺฆสฺเสว วฏฺฏนฺติ, ปาฬิยํ ปุคฺคลิกวเสน คเหตุํ อนนุญฺญาตตฺตาติ ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ จ. ปุคฺคลสฺส ปน ปุคฺคลานญฺจ เขตฺตวตฺถาทีนิ กปฺปิยโวหาเรนาปิ ปฏิคฺคเหตุํ น วฏฺฏติ. เอวญฺจกตฺวา วิมติวิโนทนิยํ ‘‘เขตฺตวตฺถาทีนิปิ กปฺปิยโวหาเรนาปิ ปุคฺคลานํ คเหตุํ น วฏฺฏติ, ตถา อนุญฺญาตตฺตาติ วิญฺญายติ เขตฺตวตฺถุปฏิคฺคหณา ปฏิวิรโต โหตี’’ติ อาทินา หิ ปฏิกฺขิตฺตาสุ เอกสฺเสว ปุคฺคลิกวเสน คหเณ อนนุญฺญาเต ตทิตรานํ ตถาคเหตพฺพตา สิทฺธาว โหตี’ติ วุตฺตํ, ตสฺมา ตฬากเขตฺตวตฺถาทิสหิตสฺส วิหารสฺส สงฺฆิกภาเวเนว ปฏิคฺคเหตพฺพตา สิทฺธา โหตีติ ทฏฺฐพฺพา. อยํ ปฐมปญฺเห วิสฺสชฺชนา. खुद्दसिक्खा प्रकरण में कहा गया है कि 'विहार के लिए खेत आदि देता हूँ' ऐसा कहने पर वह कल्पनीय होता है। 'विहार को देते हैं' यहाँ यह समझना चाहिए कि यह केवल सांघिक विहार के लिए है, व्यक्तिगत विहार के लिए नहीं; जैसा कि विमतिविनोदनी में कहा गया है कि 'विहार को देते हैं' यह सांघिक विहार के संदर्भ में कहा गया है। 'प्रासाद के लिए' ऐसा सामान्य रूप से कहे जाने पर भी 'उस समय विशाखा मृगारमाता संघ के लिए हाथी के नख के समान आलिन्द वाला प्रासाद बनवाना चाहती थी', इस प्रकरण में प्रासाद के परिभोग की अनुमति होने के कारण, यह सांघिक प्रासाद के संदर्भ में ही कहा गया है, ऐसा समझा जाता है; जैसा कि विमतिविनोदनी में कहा गया है—'सभी प्रासाद परिभोग'। पालि अट्ठकथा के व्याख्यान में 'सुवर्ण-रजत आदि से विचित्र' आदि सांघिक सेनासन के संदर्भ में कहा गया है। व्यक्तिगत रूप से सुवर्ण आदि से विचित्र वस्तु को भिक्षु के लिए स्वीकार करना उचित नहीं है, क्योंकि कहा गया है कि 'किसी भी प्रकार से जातरूप-रजत को स्वीकार नहीं करना चाहिए', इसीलिए यहाँ अट्ठकथा में 'सांघिक विहार में या व्यक्तिगत विहार में' ऐसा नहीं कहा गया है। 'भिक्षुओं के धम्म-विनय की व्याख्या के स्थान में' ऐसा कहे जाने के कारण, केवल सांघिक सुवर्ण आदि से निर्मित सेनासन और सेनासन-परिष्कार ही कल्पनीय हैं, व्यक्तिगत नहीं, ऐसा ग्रहण करना चाहिए; इसलिए, तालाब, खेत, वास्तु आदि सहित विहार सांघिक ही होता है, व्यक्तिगत नहीं, ऐसा विनय के विद्वानों द्वारा देखा जाना चाहिए। यदि राजा या राज-महामात्र आदि में से कोई तालाब, खेत, वास्तु आदि सहित विहार किसी व्यक्ति को उस सहित विहार होने की सूचना देकर देता है, तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति को उसे सांघिक विहार के रूप में ही ग्रहण करना उचित है, व्यक्तिगत विहार के रूप में नहीं, ऐसा समझना चाहिए। 'क्यों? क्योंकि विहार को देते हैं' ऐसा कहकर दिए गए तालाब, खेत, वास्तु आदि संघ के लिए ही कल्पनीय होते हैं। इसीलिए विमतिविनोदनी में कहा गया है—'विहार को देते हैं, ऐसा कहा गया संघ के लिए कल्पनीय है, व्यक्ति के लिए नहीं, इसे खेत आदि के समान समझना चाहिए।' वहाँ यह व्याख्या है—'विहार को देते हैं' ऐसा कहकर दिया गया खेत आदि संघ के लिए कल्पनीय है, व्यक्ति के लिए नहीं; इसी प्रकार 'विहार को देते हैं' ऐसा कहा गया सुवर्ण आदि से विचित्र अकल्पनीय मंच संघ के लिए कल्पनीय है, व्यक्ति के लिए नहीं, ऐसा समझना चाहिए। संघ के लिए ही कल्पिय-व्यवहार से खेत आदि ग्रहण करना उचित है; जैसा कि विमतिविनोदनी में कहा गया है—'चार प्रत्ययों का परिभोग करें, ऐसा कहकर देता है तो वह कल्पनीय है; यहाँ भिक्षु संघ के चार प्रत्ययों के परिभोग के लिए तालाब देता हूँ या भिक्षु संघ चार प्रत्ययों का परिभोग करने के लिए तालाब देता हूँ या इस तालाब से उत्पन्न चार प्रत्ययों को देता हूँ, ऐसा कहना भी कल्पनीय है।' और यह संघ को दिए जाने के संदर्भ में ही कहा गया है, व्यक्ति को इस प्रकार दिया गया तालाब, खेत आदि कल्पनीय नहीं है। शुद्ध चित्त वाले के लिए जल के परिभोग हेतु कुआँ, पुष्करिणी आदि कल्पनीय हैं। 'संघ का तालाब है, वह कैसे' आदि के द्वारा सब जगह संघ के अधिकार में ही कहा गया है। 'खेत आदि तो सभी संघ के लिए ही कल्पनीय हैं, क्योंकि पालि में व्यक्तिगत रूप से ग्रहण करने की अनुमति नहीं दी गई है, ऐसा समझना चाहिए।' व्यक्ति या व्यक्तियों के लिए खेत, वास्तु आदि कल्पिय-व्यवहार से भी ग्रहण करना उचित नहीं है। ऐसा मानकर विमतिविनोदनी में कहा गया है—'खेत, वास्तु आदि भी कल्पिय-व्यवहार से व्यक्तियों के लिए ग्रहण करना उचित नहीं है, क्योंकि वैसी अनुमति नहीं है, ऐसा जाना जाता है; खेत और वास्तु के प्रतिग्रहण से विरत होता है आदि के द्वारा जब मना किया गया है, तो एक के लिए भी व्यक्तिगत रूप से ग्रहण करने की अनुमति न होने पर, दूसरों के लिए भी उसी प्रकार ग्रहण न करना सिद्ध ही होता है।' इसलिए, तालाब, खेत, वास्तु आदि सहित विहार को सांघिक रूप में ही ग्रहण करना सिद्ध होता है, ऐसा समझना चाहिए। यह प्रथम प्रश्न का उत्तर है। ตฬากเขตฺตวตฺถาทิวิรหิตํ ปน วิหารํ ปุคฺคลิกภาเวนาปิ ปฏิคฺคเหตุํ วฏฺฏติ. โส จ วิหาโร ตสฺมึ ปุคฺคเล ชีวนฺเต ปุคฺคลิโก โหติ. อญฺเญสํ ทมฺมีติ อทตฺวา มเต อวิสฺสชฺชนีโย อเวภงฺคิโย, สงฺฆิโกเยว โหตีติ ทฏฺฐพฺโพ. ยถาห, ภิกฺขุสฺส ภิกฺขเว กาลงฺกเต สงฺโฆ สามิ ปตฺตจีวเร. อปิ จ คิลานุปฏฺฐากา พหูปการา, อนุชานามิ ภิกฺขเว สงฺเฆน ติจีวรญฺจ คิลานุปฏฺฐากานํ ทาตุํ. ยํ ตตฺถ ลหุภณฺฑํ ลหุปริกฺขารํ, ตํ สมฺมุขีภูเตน สงฺเฆน ภาเชตพฺพํ. ยํ ตตฺถ ครุภณฺฑํครุปริกฺขารํ ตํ อาคตานาคตสฺส จาตุทฺทิสสฺส สงฺฆสฺส อวิสฺสชฺชิยํ อเวภงฺคิยนฺติ. วินยฏฺฐกถายญฺจ ‘‘ตสฺมึ [Pg.42] ชีวนฺเต ปุคฺคลิโก, มเต สงฺฆิโกเยวาติ อญฺเญสํ อทตฺวา ฐปิตปริกฺขาราปิ ตตฺถ สงฺฆสฺเสว โหนฺติ. ทฺวินฺนํ สนฺตกํ โหติ อวิภตฺตํ, เอกสฺมึ กาลงฺกเต อิตโร สามิ. พหูนํ สนฺตเกปิ เอเสว นโย, สพฺเพสุ มเตสุ สงฺฆิกํ โหตี’’ติ วุตฺตํ. तालाब, खेत, वास्तु आदि से रहित विहार को व्यक्तिगत रूप में भी ग्रहण करना उचित है। और वह विहार उस व्यक्ति के जीवित रहने तक व्यक्तिगत होता है। 'दूसरों को देता हूँ' ऐसा कहे बिना मृत्यु होने पर, वह अविस्सर्जनीय और अभेद्य होकर सांघिक ही हो जाता है, ऐसा समझना चाहिए। जैसा कि कहा गया है—'भिक्षुओं! भिक्षु की मृत्यु होने पर संघ पात्र और चीवर का स्वामी होता है। किन्तु ग्लान-उपस्थापक बहुत उपकारी होते हैं; भिक्षुओं! मैं अनुमति देता हूँ कि संघ द्वारा त्रि-चीवर ग्लान-उपस्थापकों को दिया जाए। वहाँ जो लघु-भाण्ड और लघु-परिष्कार हैं, उन्हें उपस्थित संघ द्वारा विभाजित किया जाना चाहिए। वहाँ जो गुरु-भाण्ड और गुरु-परिष्कार हैं, वे आगत-अनागत चारों दिशाओं के संघ के लिए अविस्सर्जनीय और अभेद्य हैं।' और विनय-अट्ठकथा में कहा गया है—'उसके जीवित रहते वह व्यक्तिगत है, मृत्यु होने पर वह सांघिक ही है; इस प्रकार दूसरों को न देकर रखे गए परिष्कार भी वहाँ संघ के ही होते हैं। दो व्यक्तियों की अविभक्त संपत्ति होने पर, एक की मृत्यु होने पर दूसरा स्वामी होता है। बहुत से लोगों की संपत्ति होने पर भी यही नियम है; सभी के मर जाने पर वह सांघिक हो जाता है'—ऐसा कहा गया है। เอตฺถ จ ยํ ตตฺถ ครุภณฺฑ’นฺติ อาทีสุ ครุภณฺฑํ นาม ราสิวเสน ปญฺจวิธํ, สรูปวเสน ปน ปญฺจวีสติวิธํ โหติ, ตสฺมา มตกสนฺตกภูตสฺสาปิ วิหารสฺส ครุภณฺฑภาโว เวทิตพฺโพ, เตนาห อฏฺฐกถายํ ‘‘ยํ ตตฺถ ลหุภณฺฑํ ยํ ตตฺถ ครุภณฺฑ’’นฺติ. और यहाँ 'जो वहाँ गुरुभाण्ड है' इत्यादि में गुरुभाण्ड राशि (समूह) के भेद से पाँच प्रकार का और स्वरूप के भेद से पच्चीस प्रकार का होता है, इसलिए मृतक की सम्पत्ति बने हुए विहार का भी गुरुभाण्ड होना समझना चाहिए, इसीलिए अट्ठकथा में कहा है— 'जो वहाँ लघुभाण्ड है, जो वहाँ गुरुभाण्ड है'। อิติ ปญฺจหิ ราสีหิ, ปญฺจนิมฺมลโลจโน; ปญฺจวีสวิธํ นาโถ, ครุภณฺฑํ ปกาสยีติ. इस प्रकार पाँच राशियों के द्वारा, पाँच निर्मल नेत्रों वाले नाथ (बुद्ध) ने पच्चीस प्रकार के गुरुभाण्ड को प्रकाशित किया है। เอตฺถ วิหารสฺส ครุภณฺฑภาโว เวทิตพฺโพ. อยํ ทุติยปญฺเห วิสฺสชฺชนา. यहाँ विहार का गुरुभाण्ड होना समझना चाहिए। यह दूसरे प्रश्न का उत्तर है। อยํ หํสาวติยา ปาโมกฺขมหาเถรานํ วิสฺสชฺชนา. รามญฺญรฏฺฐวาสิโน ปน มหาเถรา ปุคฺคลิกภาเวนาปิ ปฏิคฺคเหตพฺพเมวาติ วทนฺติ, ตถา ชํมายรฏฺฐวาสิโนปิ มหาเถรา, ตถา สูนาปรนฺตรฏฺฐวาสิโนปิ มหาเถรา ตถา อิสินครวาสิโนปิ มหาเถรา ปุคฺคลิกภาเวน ปฏิคฺคหเณ โทโส นตฺถี’ติ วทนฺติ เตสํ มหาเถรานํ อยมธิปฺปาโย ลาภสีมานาเมสา เนว สมฺมาสมฺพุทฺเธน อนุญฺญาตา. น ธมฺมสงฺคาหกตฺเถเรหิปิ ฐปิตา. อปิ จ โข ปุญฺญตฺถิเกหิ ลาภทายเกหิ ฐปิตา ตสฺมา ปุญฺญตฺถิกา ราชราชมหามตฺตาทโย วิหารํ การาเปตฺวา ตสฺส วิหารสฺส ลาภตฺถาย ปเทสํ ปริจฺฉินฺทิตฺวา ฐเปนฺติ ‘‘ยํ เอตฺถนฺตเร อุปฺปชฺชติ, ตํ สพฺพํ อมฺหากํ วิหารสฺส เทมา’’ติ. ตํ ปน วิหารํ อตฺตโน รุจิตสฺส ยสฺสกสฺสจิ ปุคฺคลสฺส ‘‘อิมํ วิหารํ ตุยฺหํ ทมฺมิ, ตว วิหาโร โหตู’’ติวา อตฺตโน รุจิยา เทติ โสปิ ปุคฺคโล ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว ปญฺจเลณานิ วิหาร’’นฺติ อาทินา อนุญฺญาตวิหารเมว ปฏิคฺคณฺหาติ, ภควโต อนุญฺญาตวิหารมตฺตสฺเสว ปฏิคฺคหิตตฺตาติ. ตสฺมึ วิหาเร เขตฺตวตฺถาทีนิ อตฺถีติ เจ. ‘‘เขตฺตวตฺถุปฏิคฺคหณา ปฏิวิรโต โหตี’’ติ อาทินา ยํ เขตฺตาทิวตฺถุปฏิคฺคหณํ ปฏิกฺขิตฺตํ, ตสฺส เขตฺตาทิวตฺถุสฺส อปฺปฏิคฺคหิตตฺตา วิหารมตฺตเมว หิ ปฏิคฺคหิเต ตปฺปฏิพทฺธา เขตฺตาทิวตฺถุสฺมึ อุปฺปนฺนจีวร ปิณฺฑปาตคิลานปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาราปิ [Pg.43] ตสฺเสว ปุคฺคลสฺส กปฺปิยภาเวเนว ปวตฺตนฺติ, ปุคฺคลสฺส ปฏิคฺคหเณ วา ปริภุตฺเต วา โทโส นตฺถิ, ภควตา เอว อนุญฺญาตสฺส กปฺปิยปจฺจยสฺส ปริภุญฺชิตตฺตา. สุตฺตํ อาหราติ เจ, ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว สพฺพํ ปาสาทปริโภค’’นฺติ. นนุ จ วิสาขา มิคารมาตา สงฺฆสฺเสว อตฺถาย สาฬินฺทํ ปาสาทํ หตฺถินขกนฺติ. สจฺจํ, ตถาปิ ปุคฺคโล สงฺฆปริยาปนฺโน สงฺฆสฺส ปาสาทปริโภเค อนุญฺญาเต ตทนฺโตคธสฺสปิ ปุคฺคลสฺส อนุญฺญาตเมว โหติ. อญฺญถา ปุคฺคเล อนฺโตวิหาเร นิสินฺโนเยว สงฺโฆ ตสฺมึ เยว วิหารสีเม กมฺมํ กโรนฺโตปิ กมฺมโกโป น ภเวยฺย, อวคฺคารหตฺตาติ วกฺขติ จ สารตฺถทีปนิยํ ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว สพฺพํ ปาสาทปริโภค’’นฺติ วจนโต ปุคฺคลิเกปิ เสนาสเน เส นาสนปริโภควเสน นิยมิตํ สุวณฺณฆฏาทิกํ ปริภุญฺชิตุํ วฏฺฏมานมฺปิ เกวลํ อตฺตโน สนฺตกํ กตฺวา ปริภุญฺชิตุํ น วฏฺฏตี’’ติ, อิมินาปิ วจเนน ปุคฺคลิกวิหารสฺสปิ สพฺพกปฺปิยภาโว วิญฺญายติ ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว สพฺพํ ปาสาทปริโภค’’นฺติ ญาปกสฺส ทสฺสนโต. สุวณฺณฆฏาทิกนฺติ เอตฺถ อาทิสทฺโท มริยาทตฺโถ, ปการตฺโถ วา, เตน รชตหารกูฏ-ชาติผลิกาทีนิ อกปฺปิยฆฏานิ สุวณฺณรชตหารกูฏ ชาติผลิกาทิภาชนสรวาทีนิ จ เสนาสนปริกฺขารานิ สงฺคณฺหาติ, ตานิ ภิกฺขุสฺส ปริกฺขารภาเวน น วฏฺฏนฺติ ตถา ทาสิทาสโคมหึสาปิ, ตถา เขตฺตาทิวตฺถุมฺปิ ภิกฺขุสฺส อตฺตโน สนฺตกภาเวน ปฏิคฺคเหตุํ น วฏฺฏนฺติ, วิหารสฺส ปน ปฏิเสเธตพฺพํ นตฺถิ, สพฺพสทฺทสฺส ทสฺสนโต เตเนวาห สมนฺตปาสาทิกาย วินยฏฺฐกถาย ‘‘เสนาสเน ปน ทฺวารกวาฏ วาตปานกวาฏาทีสุ สพฺพํ รตนมยมฺปิ วณฺณมฏฺฐกมฺมํ วฏฺฏติ. เสนาสเน กิญฺจิ ปฏิเสเธตพฺพํ นตฺถิ อญฺญตฺร วิรุทฺธเสนาสนา’’ติ, อิมินา ฐเปตฺวา’คามญฺจ คามูปจารญฺจา’ติ เอตฺถ วิรุทฺธเสนาสนํ ฐเปตฺวา สพฺพกปฺปิยากปฺปิยํ วิหารสฺส กปฺปติ, กิญฺจิอปฺปมตฺตกมฺปิ ปฏิเสเธตพฺพํ นาม นตฺถีติ วิญฺญายติ, เตเนวาห วินยวินิจฺฉเย. यह हंसावती के प्रमुख महास्थविरों का उत्तर है। किन्तु रामञ्ञ देश के निवासी महास्थविर कहते हैं कि इसे पुद्गलिक (व्यक्तिगत) रूप में भी ग्रहण करना चाहिए; वैसे ही जम्माय देश के निवासी महास्थविर, वैसे ही सूनापरन्त देश के निवासी महास्थविर और वैसे ही इसिनगर के निवासी महास्थविर भी कहते हैं कि पुद्गलिक रूप में ग्रहण करने में कोई दोष नहीं है। उन महास्थविरों का यह अभिप्राय है कि ये 'लाभसीमा' नाम की वस्तुएँ न तो सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा अनुमत हैं और न ही धर्म-संगीतक स्थविरों द्वारा स्थापित की गई हैं। अपितु पुण्य के इच्छुक लाभदाताओं द्वारा स्थापित की गई हैं। इसलिए पुण्य के इच्छुक राजा, राज-महामात्र आदि विहार बनवाकर उस विहार के लाभ के लिए प्रदेश को परिच्छिन्न (सीमांकित) कर स्थापित करते हैं कि 'इसके भीतर जो कुछ भी उत्पन्न हो, वह सब हम अपने विहार को देते हैं'। फिर वे उस विहार को अपनी रुचि के अनुसार जिस किसी व्यक्ति को 'यह विहार मैं तुम्हें देता हूँ, यह तुम्हारा विहार हो' इस प्रकार अपनी रुचि से देते हैं। वह व्यक्ति भी 'भिक्षुओं, मैं पाँच प्रकार के लयणों (आवासों) की अनुमति देता हूँ' इत्यादि के द्वारा अनुमत विहार को ही ग्रहण करता है, क्योंकि भगवान द्वारा अनुमत विहार मात्र को ही ग्रहण किया गया है। यदि कहें कि उस विहार में खेत-वस्तु (भूमि) आदि हैं, तो 'खेत-वस्तु ग्रहण करने से विरत होता है' इत्यादि के द्वारा जो खेत आदि वस्तुओं का ग्रहण निषिद्ध है, उन खेत आदि वस्तुओं के ग्रहण न किए जाने के कारण, केवल विहार मात्र के ही ग्रहण किए जाने पर, उससे सम्बद्ध खेत आदि वस्तुओं में उत्पन्न चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लानप्रत्यय-भेषज-परिष्कार भी उस व्यक्ति के लिए कप्पिय (कल्प्य/उचित) भाव से ही प्रवृत्त होते हैं। व्यक्ति के ग्रहण करने या उपभोग करने में कोई दोष नहीं है, क्योंकि भगवान द्वारा ही अनुमत कप्पिय प्रत्यय का उपभोग किया गया है। यदि कहें कि सूत्र (प्रमाण) लाओ, तो 'भिक्षुओं, मैं समस्त प्रासाद-परिभोग की अनुमति देता हूँ'। क्या विशाखा मृगारमाता ने संघ के ही अर्थ के लिए सालिन्द प्रासाद और हत्थिनखक बनवाया था? सत्य है, फिर भी संघ के अन्तर्गत होने के कारण व्यक्ति के लिए संघ के प्रासाद-परिभोग की अनुमति होने पर, उसके अन्तर्गत व्यक्ति के लिए भी वह अनुमत ही होता है। अन्यथा विहार के भीतर बैठे हुए संघ द्वारा उसी विहार की सीमा में कर्म करते हुए भी कर्म-कोप (विघ्न) नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह 'अवग्ग' (अव्यग्र/अविभाजित) है। सारत्थदीपनी में भी कहा जाएगा— 'भिक्षुओं, मैं समस्त प्रासाद-परिभोग की अनुमति देता हूँ' इस वचन से पुद्गलिक शयनासन में भी शयनासन-परिभोग के रूप में नियत सुवर्ण-घट आदि का उपभोग करना उचित होने पर भी, केवल अपना निजी बनाकर उपभोग करना उचित नहीं है। इस वचन से भी पुद्गलिक विहार की भी सर्व-कप्पियता जानी जाती है, क्योंकि 'भिक्षुओं, मैं समस्त प्रासाद-परिभोग की अनुमति देता हूँ' यह ज्ञापक (प्रमाण) देखा जाता है। 'सुवर्ण-घट आदि' यहाँ 'आदि' शब्द मर्यादा अर्थ में है या प्रकार अर्थ में है; उससे रजत-हारकूट, जाति-फलिक आदि अकप्पिय घटों और सुवर्ण-रजत-हारकूट-जाति-फलिक आदि के पात्रों और सरावों आदि शयनासन-परिष्कारों का संग्रह होता है। वे भिक्षु के परिष्कार के रूप में उचित नहीं हैं। वैसे ही दासी-दास, गाय-भैंस भी, और वैसे ही खेत आदि वस्तुएँ भी भिक्षु के अपने निजी स्वामित्व के रूप में ग्रहण करना उचित नहीं है। किन्तु विहार के लिए कुछ भी प्रतिषेध करने योग्य नहीं है, क्योंकि 'सब्ब' (सब) शब्द का प्रयोग देखा जाता है। इसीलिए समन्तपासाधिका विनय-अट्ठकथा में कहा है— 'शयनासन में तो द्वार-कपाट, वातायन-कपाट आदि में सब कुछ रत्नमय होने पर भी वर्ण-मृष्ट-कर्म उचित है। शयनासन में 'विरुद्ध शयनासन' को छोड़कर कुछ भी प्रतिषेध करने योग्य नहीं है'। इससे 'गाँव और गाँव के उपनगर को छोड़कर' यहाँ विरुद्ध शयनासन को छोड़कर विहार के लिए सब कुछ कप्पिय और अकप्पिय उचित है, थोड़ा सा भी प्रतिषेध करने योग्य नहीं है, ऐसा जाना जाता है। इसीलिए विनयविनिच्चय में कहा है— ‘‘เขตฺตวตฺถุ ตฬากํวา, เทม โคอชิกาทิกํ; วิหารสฺสาติ วุตฺเตปิ, นิเสเธตุํ น วฏฺฏตี’’ติ. 'खेत, वस्तु (भूमि), तालाब अथवा गाय-बकरी आदि हम विहार को देते हैं'—ऐसा कहे जाने पर भी निषेध करना उचित नहीं है। นนุจ [Pg.44] วิหารสฺส เทมาติ สงฺฆิกวิหารํ สนฺธาย วุตฺตนฺติ วิมติวิโนทนิยํ วุตฺตนฺติ. วุตฺตํ เอตฺถ หิ อาจริยสฺสอธิปฺปาเยน ภวิตพฺพํ ‘‘เขตฺตวตฺตาทีนิปุคฺคลิกวิหารสฺส เทมา’’ติ วุตฺเต ‘‘น กปฺปติ อุปาสกา’’ติ ปฏิกฺขิปิตพฺพํ. กสฺมา ปุคฺคโล ตสฺส วิหารสฺส สามิ, วิหารสฺส ทินฺเน ปุคฺคลสฺส ทินฺนเมว โหติ, เอวํ สติ จ ‘‘เขตฺตวตฺถุปฏิคฺคหณา ปฏิวิรโต โหตี’’ติ อาทินา วุตฺตสิกฺขาปเทน กาเรตพฺพตํ อาปชฺชติ. สงฺฆิกวิหารสฺส ปน น ปฏิกฺขิปิตพฺพํ. กสฺมา โส ปุคฺคโล ตสฺส สงฺฆิกวิหารสฺส อนิสฺสโร. จาตุทฺทิสํ สงฺฆํ อุทฺทิสฺส ทินฺนํ ยํกิญฺจิ ขุทฺทกํ วา มหนฺตํ วา ปเทสํ อจฺฉินฺทิตฺวา คณฺหนฺตสฺสปิ ปาราชิโก น โหติ, สพฺพสฺเสว จาตุทฺทิสิกสฺส สงฺฆสฺส ธุรนิกฺเขปสฺส อสมฺภวโต ตสฺมา สงฺฆิกวิหารสฺส ทินฺเน ปฏิกฺขิตฺเต สงฺฆสฺส ลาภนฺตรายกโร โหตีติ. อิมเมวตฺถํ สนฺธาย วิหารสฺส เทมาติ สงฺฆิกวิหารํ สนฺธาย วุตฺต’นฺติ วุตฺตํ ภเวยฺย, น ปุคฺคลิกภาเวนาปิ ปฏิคฺคเหตพฺพนฺติ. เอวญฺจ สติ สามิกานํ ธุรนิกฺเขเปนา’ติ เอตฺถ เอกสฺส สนฺตเก ตฬาเก เขตฺเต จ ชาเต ตสฺเสว ธุรนิกฺเขเปน ปาราชิกํ. ยทิ ปน ตํ ตฬากํ สพฺพสาธารณํ, เขตฺตานิ ปาฏิปุคฺคลิกานิ, ตสฺส จ ธุรนิกฺเขเป อวหาโร. อถ เขตฺตานิปิ สพฺพสาธารณานิ, สพฺเพสํ ธุรนิกฺเขเปเยว ปาราชิกํ, นาสตีติ ทฏฺฐพฺพนฺติ วิมติวิโนทนิยํ วุตฺตวจเนน อวิโรโธ สิยา, ตถา หิ เขตฺตวตฺถาทิสหิตสฺส วิหารสฺส ปุคฺคลิกภาเวน อกปฺปิเย สติ. กถํ ปุคฺคลสฺส เขตฺตวตฺถาทิกมารพฺภ อภิยุญฺชภาโว ภเวยฺย, เอวญฺจ ปน วเทยฺย ‘‘ธุรํ นิกฺขิปตีติ เอตฺถ เอกสฺส สนฺตเก ตฬาเก เขตฺเต จาติเอตฺถ คิหิสนฺตกเมว สนฺธาย วุตฺต’’นฺติ. ตถาปิ น วตฺตพฺพํ. กสฺมา ‘‘ธุรํ นิกฺขิปตีติ ยทา ปน สามิโก อยํ ถทฺโธ กกฺขโฬ, ชีวิตพฺรหฺมจริยนฺตรายมฺปิ เม กเรยฺย, อลํ ทานิ มยฺหํ อิมินา’’ติ ปทสฺส ทิสฺสนโต เตเนว ‘‘เขตฺตานิ ปาฏิปุคฺคลิกานิ, ตสฺส จ ธุรนิกฺเขเป’’ติ วิมติวิโนทนิยํ วุตฺตํ. ตถา ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว สพฺพํ ปาสาทปริโภค’’นฺติ วจนโต ปุคฺคลิเกปิ เสนาสเน เสนาสนปริโภควเสน นิยมิตํ สุวณฺณฆฏาทิกํ ปริภุญฺชิตุํ น วฏฺฏมานมฺปิ เกวลํ อตฺตโน สนฺตกํ กตฺวา ปริภุญฺชิตุํ น วฏฺฏตี’’ติ สารตฺถทีปนิยํ วุตฺต วจเนนาปิ อวิโรโธ สิยา, ตถา ‘‘เสนาสเน กิญฺจิ ปฏิเสเธตพฺพํ [Pg.45] นตฺถิ อญฺญตฺร วิรุทฺธเสนาสนนา’’ติ อฏฺฐกถาวจเนนาปิ สํสนฺทเมว. ตถา ‘‘ยํ ภิกฺขเว มยา อิทํ น กปฺปตีติ อปฺปฏิกฺขิตฺตํ, ตํ เจ กปฺปิยํ อนุโลเมติ, อกปฺปิยํ ปฏิพาหติ, ตํ โว กปฺปตี’’ติ อิมินา สุตฺตานุโลเมนปิสํนฺทเมว. กถํ ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว ปญฺจเลณานิ วิหารนฺตฺยา’’ทินา อนุญฺญาตวิหารสฺส ปฏิคฺคหิตตฺถา. ตปฺปฏิพทฺธจีวราทิกปฺปิยปจฺจยสฺเสว ปริภุญฺชิตตฺตา จ วิหารปิณฺฑปาตคิลานปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาราปิ ภิกฺขุสฺส สพฺพกปฺปิยา กปฺปิยานุโลมา จ โหนฺติ. เอวํ สุตฺตสุตฺตานุโลมอาจริยวาทอตฺตโนมตีหิ สํสนฺทนโต อญฺญทตฺถุ คงฺโคทเกน ยมุโนทกํ วิย เขตฺตวตฺถาทิสหิตวิหาโร ปุคฺคลิกภาเวนาปิ ปฏิคฺคเหตพฺโพติ กปฺปิยา กปฺปิยานิ วินยโกวิเทหิ ทฏฺฐพฺโพ. อยํ อิสินครวาสีนํ มหาเถรานํ สมานวิสฺสชฺชนา. ननु च 'विहार के लिए देते हैं' ऐसा संघिक विहार के उद्देश्य से कहा गया है, यह विमतिविनोदनी में कहा गया है। यहाँ आचार्य के अभिप्राय के अनुसार होना चाहिए—'खेत और वास्तु आदि पुद्गलिक विहार के लिए देते हैं' ऐसा कहने पर 'उपासकों, यह कल्पनीय नहीं है' ऐसा कहकर अस्वीकार कर देना चाहिए। क्योंकि व्यक्ति उस विहार का स्वामी होता है, और विहार को दिया गया दान व्यक्ति को दिया गया ही होता है, जिससे 'खेत और वास्तु के प्रतिग्रहण से विरत होता है' आदि शिक्षापदों का उल्लंघन होता है। परंतु संघिक विहार के लिए (दिए जाने पर) अस्वीकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि वह व्यक्ति उस संघिक विहार का स्वामी नहीं है। चारों दिशाओं के संघ के उद्देश्य से दिए गए किसी भी छोटे या बड़े क्षेत्र को छीनकर लेने वाले को भी पाराजिक नहीं होता है, क्योंकि समस्त चातुद्दिशिक संघ द्वारा उत्तरदायित्व का त्याग (धुर-निक्षेप) असंभव है। इसलिए संघिक विहार के दान को अस्वीकार करने पर वह संघ के लाभ में बाधा डालने वाला होता है। इसी अर्थ को ध्यान में रखते हुए 'विहार के लिए देते हैं' ऐसा संघिक विहार के लिए कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए, न कि पुद्गलिक रूप में भी ग्रहण करना चाहिए। और ऐसा होने पर 'स्वामियों के धुर-निक्षेप से' यहाँ एक के स्वामित्व वाले तालाब और खेत के होने पर, उसी के धुर-निक्षेप से पाराजिक होता है। यदि वह तालाब सबका साझा है और खेत व्यक्तिगत हैं, तो उसके धुर-निक्षेप में चोरी (अवहार) होती है। यदि खेत भी सबके साझे हैं, तो सबके धुर-निक्षेप पर ही पाराजिक होता है, अन्यथा नहीं—ऐसा विमतिविनोदनी के वचनों के साथ अविरोध होना चाहिए। क्योंकि खेत-वास्तु आदि सहित विहार के पुद्गलिक रूप में अकल्पनीय होने पर, व्यक्ति का खेत-वास्तु आदि पर दावा कैसे हो सकता है? और ऐसा कहना चाहिए—'धुर निक्षेप करता है' यहाँ एक के स्वामित्व वाले तालाब और खेत में, यहाँ गृहस्थ के स्वामित्व के संदर्भ में ही कहा गया है। फिर भी ऐसा नहीं कहना चाहिए। क्योंकि 'धुर निक्षेप करता है' जब स्वामी सोचता है कि 'यह कठोर है, मेरे जीवन और ब्रह्मचर्य में बाधा डाल सकता है, अब मुझे इससे क्या'—इस पद के कारण ही 'खेत व्यक्तिगत हैं, और उसके धुर-निक्षेप में' ऐसा विमतिविनोदनी में कहा गया है। वैसे ही 'भिक्षुओं, मैं सभी प्रासाद-परिभोग की अनुमति देता हूँ' इस वचन से पुद्गलिक शयनासन में भी शयनासन-परिभोग के रूप में नियत सुवर्ण-घट आदि का परिभोग करना यद्यपि उचित नहीं है, फिर भी केवल अपना बनाकर परिभोग करना अनुचित है—ऐसा सारत्थदीपनी के वचन से भी अविरोध होगा। वैसे ही 'शयनासन में कुछ भी निषिद्ध नहीं है, सिवाय विरुद्ध शयनासन के' इस अट्ठकथा वचन से भी मेल खाता है। वैसे ही 'भिक्षुओं, जो मेरे द्वारा निषिद्ध नहीं किया गया है, यदि वह कल्पनीय के अनुकूल है और अकल्पनीय के विरुद्ध है, तो वह तुम्हारे लिए कल्पनीय है'—इस सुत्तानुलोम से भी मेल खाता है। जैसे 'भिक्षुओं, मैं पाँच प्रकार के विहारों की अनुमति देता हूँ' आदि द्वारा अनुमत विहार के ग्रहण के अर्थ में। उससे संबद्ध चीवर आदि कल्पनीय वस्तुओं के ही परिभोग किए जाने के कारण विहार, पिंडदान, ग्लान-प्रत्यय-भैषज्य-परिष्कार भी भिक्षु के लिए सभी कल्पनीय और कल्पनीय के अनुकूल होते हैं। इस प्रकार सुत्त, सुत्तानुलोम, आचार्य-वाद और आत्म-मति के समन्वय से, निश्चित रूप से गंगा के जल में यमुना के जल की तरह, खेत-वास्तु आदि सहित विहार पुद्गलिक रूप में भी ग्रहण किया जाना चाहिए—ऐसा विनय के विद्वानों द्वारा देखा जाना चाहिए। यह इसिनगर-वासी महास्थविरों का सर्वसम्मत उत्तर है। ‘‘เย จ ชนา ครุภณฺฑํ สํวิธาย อวหรุํ. ธุรนิกฺเขโป จ โหติ, ปาราชิกมนาปนฺนา, ปญฺหาเมสา กุสเลหิ จินฺติตา’’ติ. और जो लोग गुरुभाण्ड की व्यवस्था करके उसे चुरा लेते हैं, और धुर-निक्षेप भी होता है, फिर भी वे पाराजिक को प्राप्त नहीं होते; यह प्रश्न विद्वानों द्वारा विचारित है। อยํ ปญฺหา สงฺฆิกภูมิเถนเก ภิกฺขุ สนฺธาย วุตฺตา, ตตฺถ หิ ปจฺจุปฺปนฺนสงฺฆสฺส ธุรนิกฺเขเปน จาตุทฺทิสิกสงฺฆสฺส ธุรนิกฺเขปาภาวโต อวหาโร นตฺถีติ. อยํ ลาภสิมาย วิจารณา. यह प्रश्न संघिक भूमि की चोरी करने वाले भिक्षु के संदर्भ में कहा गया है, क्योंकि वहाँ वर्तमान संघ के धुर-निक्षेप से चातुद्दिशिक संघ के धुर-निक्षेप का अभाव होने के कारण चोरी (पाराजिक) नहीं होती है। यह लाभ-सीमा की विवेचना है। คามสีมานิคมสีมานครสีมา ปน ปากฏาเยว. ตาสํ ปน วิเสโส เอวํ เวทิตพฺโพ ยสฺมึ ปน ปเทเส อาปณเมว อตฺถิ, น ปาการปริกฺขิตฺตํ ปาการปริกฺขิตฺตเมว วา อตฺถิ น อาปณํ อยํ ปเทโส คาโม นาม. ยสฺมึ ปน ฏฺฐาเน คาโมเยว อตฺถิ, น ปน อาปณปาการา สนฺติ, อยํ ปเทโส นิคโม นาม. ยตฺถ ปน อาปณมฺปิ อตฺถิ ปาการปริกฺขิตฺตมฺปิ, อยํ ปเทโส นครํ นาม. อยํ ปเทโส นาคารวนฺติ เอตฺถาติ วจนตฺเถน ราชูนํ วา มหามตฺตานํ วา นิวาสนโยคฺยฏฺฐานตฺตา นครนฺติ วุจฺจติ. โลกิยสตฺเถ ปน. ग्राम-सीमा, निगम-सीमा और नगर-सीमा तो प्रसिद्ध ही हैं। उनका अंतर इस प्रकार समझना चाहिए—जिस स्थान पर केवल बाजार है, दीवार से घिरा नहीं है, या दीवार से घिरा है पर बाजार नहीं है, वह ग्राम है। जहाँ केवल ग्राम है, पर बाजार और दीवार नहीं है, वह निगम है। जहाँ बाजार भी है और दीवार भी, वह नगर है। जहाँ 'नगर' (निवासी) रहते हैं, उस अर्थ में अथवा राजाओं या महामात्रों के निवास योग्य होने के कारण इसे नगर कहा जाता है। लौकिक शास्त्र में— ‘‘วิจิตฺตเทวายตนํ, ปาสาทาปณมนฺทิรํ; นครํ ทสฺสเย วิทฺวา, ราชมคฺโค ปโสภิต’’นฺติ. 'विद्वान को अनेक देवालयों, प्रासादों, बाजारों और भवनों से युक्त तथा राजपथ से सुशोभित नगर दिखाना चाहिए'। วุตฺตํ. เอวํ คามนิคมนครานํ วิเสสํ ญตฺวา คาโมเยว คามสีมา, นิคโมเยว นิคมสีมา, นครเมว นครสีมาติ ตาสํ วจนตฺโถ เวทิตพฺโพ. ตตฺถ ยํ ปเทสํ อสมฺมตาย ภิกฺขเว สีมาย อฐปิตาย ยํ [Pg.46] คามํ วา นิคมํ วา อุปนิสฺสาย วิหรติ, ยา ตสฺส คามสฺส วา คามสีมา นิคมสฺส วา นิคมสีมา, อยํ ตตฺถ สมานสํวาสา เอกูโปสถา’ติ อนุญฺญาตํ, ตสฺมึ ปเทเส สพฺโพปิ วา คามปเทโส. ยมฺปิ เอกสฺมึเยว คามเขตฺเต เอกํ ปเทสํ ‘‘อยํ วิสุํ คาโม โหตู’’ติ ปริจฺฉินฺทิตฺวา ราชา กสฺสจิ เทติ โสปิ วิสุํคามสีมา โหติเยว ตสฺมา สา จ อิตรา จ ปกติคามนครนิคมสีมา พทฺธสีมาสทิสาเยว โหนฺติ. เกวลํ ปน ติจีวรวิปฺปวาสปริหารํ น ลภนฺติ. เอตฺถ จ อปเร เอวํ วทนฺติ, ‘‘ราชา ปเสนทีโกสลาทโย โปกฺขรสาติปภุตีนํ ทกฺขิโณทกปาตนวเสน เทนฺติ วิย พฺรหฺมเทยฺยวเสน ทินฺนเมว วิสุํ คามสีมา โหติ, น อายมตฺตสฺส, เฉชฺชเภชฺชสฺส อนิสฺสรตฺตา’’ติ ตํ น ปเนวํ ทฏฺฐพฺพํ, เฉชฺชเภชฺชสฺส ราชารหตฺตา ตถา หิ โลกโวหารสงฺเกตวเสน อยํ ปเทโส อิมสฺส คามสฺส ปริจฺเฉโท’’ติ อิสฺสเรหิ กตปริจฺฉินฺนเมว ปมาณํ โหติ. ยทิ เฉชฺชเภชฺชกโร ภเวยฺย, ราชาตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. โสปิ คามเทโส นครรชฺชสีมา ภเวยฺย, น ปน คามสีมามตฺตเมว, เตเนวาห สมนฺตปาสาทิกาย วินยฏฺฐกถาย ‘‘ยตฺตเก ปเทเส ตสฺส คามสฺส คามโภชกา พลึ ลภนฺติ, โส ปเทโส อปฺโป วา โหตุ มหนฺโต วา, คามสีมาตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ. นครนิคมสีมาสุปิ เอเสว นโย’’ติ. อยํ คาม นิคมนครสีมานํ วิจารณา. कहा गया है। इस प्रकार गाँव, निगम और नगर के विशेष अन्तर को जानकर गाँव ही गाँव की सीमा है, निगम ही निगम की सीमा है और नगर ही नगर की सीमा है - ऐसा उनका अर्थ समझना चाहिए। वहाँ जिस प्रदेश में, हे भिक्षुओं! सीमा सम्मत (निर्धारित) न होने पर, सीमा स्थापित न होने पर, जिस गाँव या निगम के आश्रय में (भिक्षु) विहार करता है, उस गाँव की जो गाँव-सीमा है या निगम की जो निगम-सीमा है, वह वहाँ 'समान संवास' और 'एक उपोसथ' वाली अनुज्ञात है, उस प्रदेश में अथवा सम्पूर्ण गाँव का प्रदेश। यदि एक ही गाँव के क्षेत्र में किसी एक प्रदेश को 'यह अलग गाँव हो' ऐसा परिच्छेद (सीमांकन) करके राजा किसी को देता है, तो वह भी अलग गाँव-सीमा ही होती है; इसलिए वह और दूसरी सामान्य गाँव-नगर-निगम की सीमाएँ बद्ध-सीमा के समान ही होती हैं। केवल वे 'तिचीवर-विप्पवास' (तीन चीवरों से अलग रहने) के परिहार को प्राप्त नहीं करतीं। यहाँ कुछ अन्य ऐसा कहते हैं, 'राजा पसेनदि कोसल आदि जैसे पोक्खरसाति आदि को दक्षिणा-जल गिराकर दान देते हैं, वैसे ही ब्रह्मदेय के रूप में दिया गया ही अलग गाँव-सीमा होती है, केवल आय मात्र (राजस्व) के लिए नहीं, क्योंकि दण्ड देने (छेद्य-भेद्य) का अधिकार नहीं होता' - उसे इस प्रकार नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि दण्ड देने का अधिकार राजा के अधीन होने के कारण लोक-व्यवहार के संकेत के वश 'यह प्रदेश इस गाँव का परिच्छेद (सीमा) है' - ऐसा स्वामियों (शासकों) द्वारा किया गया परिच्छेद ही प्रमाण होता है। यदि वह दण्ड देने वाला हो, तो वह 'राजा' की ही संज्ञा प्राप्त करता है। वह गाँव का प्रदेश नगर या राज्य की सीमा हो सकता है, न कि केवल गाँव की सीमा; इसीलिए समन्तपासाविका नामक विनय-अट्ठकथा में कहा गया है - 'जितने प्रदेश में उस गाँव के ग्राम-भोजक (मुखिया) कर (बलि) प्राप्त करते हैं, वह प्रदेश चाहे छोटा हो या बड़ा, वह 'गाँव-सीमा' की ही संज्ञा प्राप्त करता है। नगर और निगम की सीमाओं में भी यही नियम है।' यह गाँव, निगम और नगर की सीमाओं का विचार है। อพฺภนฺตรสีมา นาม ยํ ปฏปเทสํ อคามเก ภิกฺขเว อรญฺเญ สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตรา, อยํ ตตฺถ สมานสํวาสา เอกูโปสถา’ติ อนุญฺญาตา อพฺภนฺตรสีมา นาม. ตตฺถ สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตราติ ยสฺมึ วิญฺฌาฏวิสทิเส อรญฺเญ ภิกฺขุ วสติ, อถสฺส ฐิโตกาสโต สมนฺตา ปุรตฺถิมาย สตฺตพฺภนฺตรา ปจฺฉิมาย สตฺตพฺภนฺตรา ทกฺขิณาย สตฺตพฺภนฺตรา อุตฺตราย สตฺตพฺภนฺตราติ สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตรา. วินิพฺเพเธน จุทฺทสา ติ ปุรตฺถิมปจฺฉิมวเสน จุทฺทสพฺภนฺตรา, ทกฺขิณุตฺตรวเสนปิ จุทฺทสพฺภนฺตราติ เอวํ นิพฺเพเธน จุทฺทส จุทฺทส กตฺวา สมนฺตา อฏฺฐวีสติ อพฺภนฺตรา โหนฺติ. เอตฺถ จ เอกํ อพฺภนฺตรํ อฏฺฐวีสติ หตฺถปฺปมาณํ โหติ, ตสฺมา ปุรตฺถิมาย สตฺตพฺภนฺตเร ฉนฺนวุติสตหตฺถปฺปมาณํ โหติ, เอวํ ทกฺขิณุตฺตรปจฺฉิเมสุปีติ สพฺพํ สมฺปิณฺเฑตฺวา จตุราสีติสตฺตสตหตฺถปฺปมาณํ [Pg.47] โหติ. ปริมณฺฑลวเสน ปน สพฺพํ ฉสตฺตติเอกสตุตฺตรานิ จ เอกํ สหสฺสญฺจ โหติ. ปกติอยนวเสน มินิเต ปน – अभ्यन्तर-सीमा उसे कहते हैं, जो, हे भिक्षुओं! गाँव रहित अरण्य (जंगल) में चारों ओर सात 'अब्भन्तर' (आन्तरिक माप) का प्रदेश है, वह वहाँ 'समान संवास' और 'एक उपोसथ' वाली अनुज्ञात 'अभ्यन्तर-सीमा' कहलाती है। वहाँ 'चारों ओर सात अब्भन्तर' का अर्थ है - जिस विन्ध्याटवी के समान अरण्य में भिक्षु रहता है, वहाँ उसके खड़े होने के स्थान से चारों ओर - पूर्व में सात अब्भन्तर, पश्चिम में सात अब्भन्तर, दक्षिण में सात अब्भन्तर और उत्तर में सात अब्भन्तर - इस प्रकार चारों ओर सात अब्भन्तर। विनिब्बेध (व्यास) से चौदह - अर्थात् पूर्व-पश्चिम के हिसाब से चौदह अब्भन्तर और दक्षिण-उत्तर के हिसाब से भी चौदह अब्भन्तर; इस प्रकार विनिब्बेध से चौदह-चौदह करके चारों ओर अट्ठाईस अब्भन्तर होते हैं। यहाँ एक अब्भन्तर अट्ठाईस हाथ के परिमाण का होता है, इसलिए पूर्व दिशा में सात अब्भन्तर एक सौ छियानवे (१९६) हाथ के परिमाण के होते हैं, इसी प्रकार दक्षिण, उत्तर और पश्चिम में भी; इस प्रकार सबको मिलाकर सात सौ चौरासी (७८४) हाथ का परिमाण होता है। परिमण्डल (घेरे) के हिसाब से तो सब एक हजार एक सौ छिहत्तर (११७६) होता है। सामान्य मार्ग के हिसाब से मापने पर तो - ‘‘ปญฺจหตฺโถ มโต ทณฺโฑ, วีสทณฺโฑ อุสโภ; อถีติอุสภา คาวี, จตุคาวี โยชน’’นฺติ. 'पाँच हाथ का एक दण्ड माना गया है, बीस दण्ड का एक उसभ; अस्सी उसभ की एक गाव्यूति (गावी) और चार गाव्यूति का एक योजन होता है।' วุตฺตตฺตา อยนวเสน วินิพฺเพเธ จุทฺทสพฺภนฺตเร ทฺเวหตฺถาธิกอฏฺฐสตฺตติ โหติ. สพฺพํ อฏฺฐวีสติ อพฺภนฺตรํ สมฺปิณฺเฑตฺวา จตุหตฺถาธิกฉปฺปญฺญาสุตฺตร เอกสตํ โหติ. ปริมณฺฑลวเสน ปน ฉหตฺถาธิกจตุตึสุตฺตรทฺเวสตานิ โหนฺติ, อุสภวเสน ปน วินิพฺเพเธน จุทฺทส อพฺภนฺตเร ทฺเวหิ อูนานิ จตฺตาริ อุสภานิ จ ทฺเวรตนญฺจ โหนฺติ. สพฺพํ สมฺปิณฺเฑตฺวา อฏฺฐวีสติยา อพฺภนฺตเร จตุรตนญฺจ โสฬส อยนานิ อธิกานิ สตฺต อุสภานิ โหนฺติ. ปริมณฺฑลวเสน ปน ฉรตนญฺจ จุทฺทสอยนานิ จ อธิกานิ เอกาทส อุสภานิ โหนฺติ. อยเมตฺถ สารโต วินิจฺฉโย. เกจิ ปน อพฺภนฺตรสทฺทํ หตฺถรตนวาจกํ ปริกปฺเปตฺวา เอวํ วทนฺติ มชฺเฌ ฐิตสฺส สมนฺตา สตฺต วินิพฺเพเธน จุทฺทสา’ติ วุตฺตตฺตา ปุรตฺถิมาย สตฺต หตฺถา ทกฺขิณุตฺตรปจฺฉิเมสุปิ สตฺต สตฺต หตฺถาติ กตฺวา เอวํ นิพฺเพเธน จุทฺทส หตฺถา โหนฺติ. สพฺพํ สมฺปิณฺเฑตฺวา อฏฺฐวีสติหตฺถํ อพฺภนฺตรนฺติ ตํ เตสํ มติมตฺตเมว, น สารโต ปจฺเจตพฺพํ. กสฺมา อฏฺฐกถายํ ตตฺถ เอกํ อพฺภนฺตรํ อฏฺฐวีสติหตฺถ’นฺติ วุตฺตตฺตา. ยทิ เตสํ มเตน สพฺพํ สมฺปิณฺเฑตฺวา อฏฺฐวีสติหตฺถพฺภนฺตรํ ภเวยฺย, อฏฺฐกถายํ ตตฺถ อพฺภนฺตรํ นาม อฏฺฐวีสติหตฺถปฺปมาณํ โหติ, มชฺเฌ ฐิตสฺส สมนฺตา สตฺตวินิพฺเพเธน จุทฺทสา โหนฺตี’ติ วตฺตพฺพํ ภเวยฺย, น ปเนวํ วุตฺตํ, ตสฺมา ตํ เตสํ มติมตฺตเมวาติ ทฏฺฐพฺพํ. ตตฺถ อยญฺเหตฺถตฺโถ ตตฺถ ตตฺถา’ติ นิทฺธารเณ ภุมฺมํ. เอกนฺติ คณนปริจฺเฉโท. อพฺภนฺตรนฺติ ปริจฺฉินฺนนิทฺเทโส, นิยมิตปริทีปนํ วา. อฏฺฐวีสติหตฺถปฺปมาณนฺติ ปริจฺฉินฺทิตพฺพธมฺมสมุทายนิทฺเทโส ตตฺถ เตสุ สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตเรสุ เอกํ อพฺภนฺตรํ นาม อฏฺฐวีสติหตฺถปฺปมาณํ โหตีติ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เอตฺถ ปน สงฺขฺยา กเถตพฺพา. สา ทุวิธา ปริมาณมินนวเสน. ตตฺถ ปริมาณ สงฺขฺยา เอวํ เวทิตพฺพา จตสฺโส มุฏฺฐิโย เอโก กุฑุโว. จตฺตาโร กุฑุวา เอโก ปตฺโถ, จตฺตาโร ปตฺถา เอโก อาฬฺหโก. จตฺตาโร อาฬฺหกา เอกํ โทณํ, จตฺตาริ โทณานิ เอกา มานิกา. จตสฺโส มานิกา [Pg.48] เอกา ขารี. วีสติ ขาริกา เอโก วาโห. ตเทว เอกํ สกฏนฺติ สุตฺตนิปาตฏฺฐกถาทีสุ วุตฺตํ. สารตฺถทีปนิยํ ปน นว วาหสหสฺสานีติ เอตฺถ จตสฺโส มุฏฺฐิโย กุฑุโว, จตฺตาโร กุฑุวา เอโก ปตฺโถ, จตฺตาโร ปตฺถา เอโก อาฬฺหโก. จตฺตาโร อาฬฺหกา เอกํ โทณํ, จตฺตาริ โทณานิ เอกา มานิกา, จตฺตสฺโส มานิกา เอกา ขารี. วีสติขาริกา เอโก วาโห. ตเทว เอกํ สกฏนฺติ สุตฺตนิปาตฏฺฐกถาทีสุ วุตฺต’นฺติ วตฺวา ‘‘อิธ ปน ทฺเว สกฏานิ เอโก วาโหติ วทนฺตี’’ติ ลิขิตํ ปจฺจนฺตโวหาเรน มินิเต ปน สฏฺฐิสตํ เอโก วาโหติ รญฺโญ ธมฺมาโสกสฺส สูวกาหตสาลิยา มินิเต ปน ปจฺจนฺตโวหาเรน วีสาธิกติสตํ โหติ เอโก วาโหติ วทนฺติ. มินน สงฺขฺยา ปน เอวํ เวทิตพฺพา. ตถา หิ – कहे जाने के कारण, अयन के अनुसार विनिब्भेद (भेदने) में चौदह अब्भन्तरों में अठहत्तर और दो अधिक हाथ (८० हाथ) होते हैं। सभी अट्ठाईस अब्भन्तरों को मिलाकर एक सौ छप्पन और चार अधिक हाथ (१६० हाथ) होते हैं। परिमण्डल के अनुसार तो दो सौ चौंतीस और छह अधिक हाथ (२४० हाथ) होते हैं। उसभ के अनुसार विनिब्भेद से चौदह अब्भन्तरों में दो कम चार उसभ और दो रतन होते हैं। सभी को मिलाकर अट्ठाईस अब्भन्तरों में सात उसभ और चार रतन तथा सोलह अयन अधिक होते हैं। परिमण्डल के अनुसार तो ग्यारह उसभ और छह रतन तथा चौदह अयन अधिक होते हैं। यहाँ यह सारतः विनिश्चय है। कुछ लोग तो 'अब्भन्तर' शब्द को 'हत्थरतन' (हाथ) का वाचक मानकर ऐसा कहते हैं—'मध्य में स्थित व्यक्ति के चारों ओर सात, विनिब्भेद से चौदह' ऐसा कहे जाने के कारण पूर्व में सात हाथ, दक्षिण, उत्तर और पश्चिम में भी सात-सात हाथ करके इस प्रकार विनिब्भेद से चौदह हाथ होते हैं। सभी को मिलाकर अट्ठाईस हाथ का एक अब्भन्तर होता है—यह केवल उनका मत मात्र है, इसे सार रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए। क्यों? क्योंकि अट्ठकथा में वहाँ 'एक अब्भन्तर अट्ठाईस हाथ का होता है' ऐसा कहा गया है। यदि उनके मत के अनुसार सभी को मिलाकर अट्ठाईस हाथ का अब्भन्तर होता, तो अट्ठकथा में 'वहाँ अब्भन्तर अट्ठाईस हाथ के परिमाण वाला होता है, मध्य में स्थित व्यक्ति के चारों ओर सात-सात, विनिब्भेद से चौदह होते हैं' ऐसा कहना चाहिए था, किन्तु ऐसा नहीं कहा गया है, इसलिए उसे केवल उनका मत मात्र ही समझना चाहिए। वहाँ इसका यह अर्थ है—'तत्य तत्य' (वहाँ-वहाँ) यह निर्धारण में सप्तमी विभक्ति है। 'एक' यह गणना का परिच्छेद है। 'अब्भन्तर' यह परिच्छिन्न का निर्देश है, अथवा निश्चित स्पष्टीकरण है। 'अट्ठाईस हाथ के परिमाण वाला' यह परिच्छेद किए जाने वाले धर्मों के समूह का निर्देश है। वहाँ उन चारों ओर के सात अब्भन्तरों में 'एक अब्भन्तर अट्ठाईस हाथ के परिमाण वाला होता है'—ऐसा अर्थ समझना चाहिए। यहाँ संख्या कही जानी चाहिए। वह परिमाण और मापन के भेद से दो प्रकार की है। वहाँ परिमाण संख्या इस प्रकार समझनी चाहिए—चार मुट्ठी का एक कुडुव। चार कुडुव का एक पत्थ (प्रस्थ), चार पत्थ का एक आळहक। चार आळहक का एक दोण (द्रोण), चार दोण की एक मानिका। चार मानिका की एक खारी। बीस खारी का एक वाह। वही एक सकट (गाड़ी) है—ऐसा सुत्तनिपात-अट्ठकथा आदि में कहा गया है। सारत्थदीपनी में तो 'नौ हजार वाह' यहाँ 'चार मुट्ठी का एक कुडुव, चार कुडुव का एक पत्थ, चार पत्थ का एक आळहक। चार आळहक का एक दोण, चार दोण की एक मानिका, चार मानिका की एक खारी। बीस खारी का एक वाह। वही एक सकट है'—ऐसा सुत्तनिपात-अट्ठकथा आदि में कहा गया है, ऐसा कहकर 'यहाँ तो दो सकट का एक वाह कहते हैं' ऐसा लिखा है। क्षेत्रीय व्यवहार (पच्चन्तवोहार) से मापने पर एक सौ साठ का एक वाह होता है। राजा धम्मासोक (धर्माशोक) के तोतों द्वारा लाए गए शालि (चावल) को मापने पर क्षेत्रीय व्यवहार से तीन सौ बीस का एक वाह होता है—ऐसा कहते हैं। मापन संख्या इस प्रकार समझनी चाहिए। जैसे कि— ‘‘ฉตฺตึส ปรมาณูนํ, อณุมตฺตนฺติ วุจฺจติ; ฉตฺตึ สอณุมตฺตํ, ตชฺชารีติ ปวุจฺจติ. छत्तीस परमाणुओं का एक 'अणु' कहा जाता है; छत्तीस अणुओं का एक 'तज्जारी' कहा जाता है। ฉตฺตึ สมตฺตาตชฺชารี, รถเรณุปมาณํ; ฉตฺตึส รถเรณู จ, เอกา ลิกฺขาติ วุจฺจติ. छत्तीस तज्जारी एक 'रथरेणु' के परिमाण के बराबर होते हैं; और छत्तीस रथरेणु की एक 'लिख्खा' कही जाती है। สตฺตลิกฺขา จ เอกูกา, สตฺตูกา ธญฺญมาสโก; สตฺตธญฺญงฺคุลิ เอกา, วิทตฺถิ ทฺวาทสงฺคุลิ. सात लिख्खा की एक 'ऊका', सात ऊका का एक 'धञ्ञमासक' (धान्यमासक); सात धान्य की एक 'अंगुलि', बारह अंगुलि की एक 'विदत्थि' (बित्ता) होती है। ทฺเว วิทตฺถิตุ รตนํ, สตฺตหตฺถํ เอกยฏฺฐิ; วีสยฏฺฐิตุ อุสภํ, อุสภาสีติ คาวุตํ; คาวุตานิ จตฺตาริ, เมรุโยชนนฺติ วุจฺจตี’’ติ. दो विदत्थि का एक 'रतन' (हाथ), सात हाथ की एक 'यट्ठी'; बीस यट्ठी का एक 'उसभ', अस्सी उसभ का एक 'गावुत'; चार गावुत का एक 'मेरु-योजन' कहा जाता है। วุตฺตตฺตา เอกา รโช ปรมาณุ อติสุขุมา อจกฺขุวิญฺเญยฺยา, สรีรมฺปิ ฆนเสลมยํ สิเนรุปพฺพตราชมฺปิ วินิชฺฌิตฺวา คตา. ตสฺสา ฉตฺตึสปริมาณํ เอโกอณุ ตชฺชาริตสฺส ฉตฺตึสปริมาณํ เอการถเรณุ. ตสฺสา ฉตฺตึสปริมาณํ เอกลิกฺขา. สตฺตลิกฺขา เอกา อูกา. สตฺต อูกา เอกํ ธญฺญํ. สตฺตธญฺญํ เอกา องฺคุลิ, ทฺวาทสองฺคุลิ เอกา วิทตฺถิ. ทฺเว วิทตฺถิ เอกรตนํ. สตฺตหตฺถํ เอกยฏฺฐิ, วีสยฏฺฐิ เอกา อุสภา, อสีติ อุสภา คาวุตํ. จตฺตาริ คาวุตานิ เมรุโยชนนฺติ วุจฺจติ. ตตฺถ อณุรโช กิฬญฺชกุฏฺฏฉิทฺทาทีสุ วาเต ปหฏกาเล สูริยาโลเกสุ ทิสฺสติ. ตชฺชารี ปน สกฏมคฺคาทีสุ ทกฺขิณวาม ปสฺสาทีสุ ทิสฺสติ[Pg.49]. รถเรณุ ปน ตสฺสา อลฺลียนฏฺฐาเนสุ ทิสฺสติ. ลิกฺขา ปน อติโอฬาริกา ปากฏา โหติ. อยํ เมรุอยนวเสน วุตฺตํ. कहे जाने के कारण, एक रज परमाणु अत्यंत सूक्ष्म और चक्षु-विज्ञान (आँखों) से न जानने योग्य होता है, वह शरीर और सघन पत्थर के समान सिनेरु पर्वतराज को भी भेदकर निकल जाता है। उसके छत्तीस परिमाण का एक 'अणु' होता है, तज्जारी के छत्तीस परिमाण का एक 'रथरेणु' होता है। उसके छत्तीस परिमाण की एक 'लिख्खा' होती है। सात लिख्खा की एक 'ऊका' होती है। सात ऊका का एक 'धञ्ञ' (धान्य) होता है। सात धान्य की एक 'अंगुलि' होती है, बारह अंगुलि की एक 'विदत्थि' होती है। दो विदत्थि का एक 'रतन' होता है। सात हाथ की एक 'यट्ठी', बीस यट्ठी का एक 'उसभ', अस्सी उसभ का एक 'गावुत' होता है। चार गावुत का एक 'मेरु-योजन' कहा जाता है। वहाँ 'अणुरजो' (अणु-रज) चटाई या कुटिया के छिद्र आदि में हवा चलने के समय सूर्य के प्रकाश में दिखाई देता है। 'तज्जारी' तो गाड़ी के मार्ग आदि में दाहिने और बाएँ भागों में दिखाई देती है। 'रथरेणु' तो उसके चिपकने के स्थानों पर दिखाई देता है। 'लिख्खा' तो अत्यंत स्थूल और प्रकट होती है। यह मेरु-अयन के अनुसार कहा गया है। อปรมฺปิ इसके अतिरिक्त— ‘‘ทส เกสา เอกติลํ, ฉติลํ ยวกํ ภเว; จตุยวญฺจ องฺคุลิ, ปญฺจทส เอกปาท’’นฺติ. दस बाल (केस) का एक 'तिल', छह तिल का एक 'यव' होता है; चार यव की एक 'अंगुलि', पन्द्रह अंगुलि का एक 'पाद' होता है। วุตฺตตฺตา ทส เกสา เอกติลํ นาม. ฉติลํ เอกํ ยวํ นาม. จตุยวํ เอโก องฺคุลิ นาม. ปญฺจทสงฺคุลิโย เอโก ปาโทติ วุจฺจติ. อิทํ ตีสุ เวเทสุ อาคตวเสน วุตฺตํ. कहे जाने के कारण, दस बाल का नाम एक 'तिल' है। छह तिल का नाम एक 'यव' है। चार यव का नाम एक 'अंगुलि' है। पन्द्रह अंगुलियों का एक 'पाद' कहा जाता है। यह तीन वेदों में आए हुए (वर्णन) के अनुसार कहा गया है। อปรมฺปิ इसके अतिरिक्त— ‘‘ทส เกสา เอกติลํ, ฉติลํ ยวกํ ภเว; จตุยวญฺจ องฺคุลิ, อฏฺฐงฺคุลิ เอกา มุฏฺฐิ, รตนํ ติมุฏฺฐิ ภเว’’ติ. दस बाल का एक 'तिल', छह तिल का एक 'यव' होता है; चार यव की एक 'अंगुलि', आठ अंगुलि की एक 'मुट्ठी', और तीन मुट्ठी का एक 'रतन' होता है। วุตฺตตฺตา ทสเกสา เอกํ ติลํ นาม. ฉติลํ เอกํ ยวํ นาม. จตุยวํ เอกาองฺคุลิ นาม. อฏฺฐงฺคุลํ เอกามุฏฺฐิ. ตฺริมุฏฺฐิ เอกรตนํ. ปญฺจ รตนานิ เอโกทณฺโฑ. วีสติ ทณฺฑานิ เอโกอุสโภ. อสีติ อุสภา เอกา คาวี. จตสฺโส คาวิโย เอกโยชนนฺติ วุตฺตํ, เตเนวาห. कहा गया है कि दस केशों का एक तिल होता है। छह तिल का एक यव होता है। चार यव की एक अंगुल होती है। आठ अंगुल की एक मुट्ठी। तीन मुट्ठी का एक रतन (हाथ)। पाँच रतन का एक दंड। बीस दंड का एक उसभ। अस्सी उसभ की एक गाव्यूति। चार गाव्यूति का एक योजन होता है, ऐसा कहा गया है, इसीलिए उन्होंने कहा। ‘‘ปญฺจหตฺโถ มโต ทณฺโฑ, วีสทณฺโฑ จ อุสโภ; อสีติ อุสภา คาวี, จตุคาวี จ โยชน’’นฺติ. "पाँच हाथ का एक दंड माना गया है, और बीस दंड का एक उसभ; अस्सी उसभ की एक गाव्यूति, और चार गाव्यूति का एक योजन होता है।" อิทํ ปกติอยนวเสน วุตฺตํ. จกฺกวาฬอยนโยชนวเสน ปน यह सामान्य माप के अनुसार कहा गया है। परंतु चक्रवाल के माप के योजन के अनुसार— ‘‘สตฺตหตฺโถ มโต ทณฺโฑ, วีสทณฺโฑ จ อุสโภ; อสีติ อุสภา คาวี, จตุคาวี จ โยชน’’นฺติ วุตฺตํ. "सात हाथ का एक दंड माना गया है, और बीस दंड का एक उसभ; अस्सी उसभ की एक गाव्यूति, और चार गाव्यूति का एक योजन होता है"—ऐसा कहा गया है। อปรมฺปิ. अन्य भी। ‘‘ทส เกสา เอกติลํ; ฉติลํ เอกํ ยวํ; จตุยวํ เอกงฺคุลิ; อฏฺฐงฺคุลํ เอกามุฏฺฐิ; ตฺริมุฏฺฐิ เอกรตนํ, อฏฺฐวีสติรตนํ เอกํอพฺภนฺตรนฺติ. "दस केशों का एक तिल; छह तिल का एक यव; चार यव की एक अंगुल; आठ अंगुल की एक मुट्ठी; तीन मुट्ठी का एक रतन (हाथ), और अट्ठाईस रतन का एक अभ्यन्तर होता है।" วุตฺตํ. เตเนวาห ‘‘ตตฺถ เอกํ อฏฺฐวีสติหตฺตปฺปมาณํ โหตี’’ติ. เอตฺถ จ อคามเก เจติ เอตฺถ อกาโร กตรตฺโถติ, ตถา หิ อกาโร. ऐसा कहा गया है। इसीलिए उन्होंने कहा— "वहाँ एक (अभ्यन्तर) अट्ठाईस हाथ के प्रमाण का होता है।" और यहाँ 'अगामके' (गाँव रहित) में 'अ' कार किस अर्थ में है? क्योंकि 'अ' कार— ปฏิเสเธ วุทฺธิตพฺภาเว, อญฺญตฺเถ สทิเสปิจ; วิรุทฺเธ ครเห สุญฺเญ, อกาโร วิรห’ปฺปเก’ติ. "प्रतिषेध (निषेध), वृद्धि, तद्भाव (अभाव), अन्य अर्थ, सादृश्य, विरुद्ध, निंदा, शून्य, विरह (रहित) और अल्प अर्थ में 'अ' कार होता है।" วุตฺเตสุ ทิสฺสติ ตถา หิ อชเนตฺวา ติอาทีสุ ปฏิเสเธ ทิสฺสติ. ‘‘อปริหานียา ธมฺมา’’ติ อาทีสุ วุทฺธิมฺหิ. ‘‘อนวชฺชํ ภนฺเต’’ติ อาทีสุ ตพฺภาเว อกฺขรา’ติ อาทีสุ [Pg.50] อญฺญตฺเถ. ‘‘อมรุ ราชา’’ติอาทีสุ สทิเส. ‘‘อมล’’นฺติ อาทีสุ วิรุทฺเธ. ‘‘อเสฏฺโฐยํ พฺราหฺมโณ อพฺรหฺมจารี’’ติ อาทีสุ ครเห. ‘‘อคาโม’’ติ อาทีสุ สุญฺเญ. ‘‘อปติกายํอิตฺถี’’ติ อาทีสุ วิรเห. ‘‘อถ นายํ กญฺญา’’ติ อาทีสุ อปฺปเก. อิธ ปน สุญฺเญ วิรเห วา ทฏฺฐพฺโพ. สุญฺญตฺเถน ปน อคามเก นิมนุสฺเส เกวลารญฺเญติ อตฺโถ. วิรหตฺโถ วา อคามเก คามวิรหิเต ปเทเสติ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. เตเนว สุญฺญตฺเถน วิรหตฺเถน ‘‘อคามเก’’ติมินาปเทน คามนทีชาตสฺสรสมุทฺเท มุญฺจิตฺวา ยํ อนวเสสํ เหฏฺฐา ปถวีสนฺธารกอุทกมฺปิอุทกสนฺธารโก วาโตปิ อชฏากาสมฺปิ, ตถา ยาว อุปริพฺรหฺมโลกํ อุปาทาย สพฺพํ อสุรยกฺขสุราทิอากาสฏฺฐกเทวพฺรหฺมวิมานานิปิ อรญฺญนฺตฺเวว สงฺคหิตา. นทีสมุทฺทนฺตเรสุปิ มจฺฉพนฺธานํ อคมนปโถ ทีปโก วา ปพฺพโต วา, โสปิ อรญฺญสีมาตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ, ตสฺมา อยํ สตฺตพฺภนฺตรสีมา นิมนุสฺเส เกวลารญฺเญ ปถวีมณฺฑเลปิ เทวโลเก วิมานกปฺปรุกฺขาทีสุปิ ลพฺภเตว. ปถวิยํ ปน ยสฺมึ คามเขตฺเต เหฏฺฐา ปถวิยา ยตฺถ วา สุวณฺณมณิอาทีนิ ขณิตฺวา คเหตุํ สกฺโกนฺติ, ตํ ปเทสํ คามเขตฺตเมว. ตโต ปรา ยาว ปถวีสนฺธารกอุทกา อชฏากาเสปิ ลพฺภเตว. นนุ ฉกามาวจร เทวโลเกสุปิ เทววิมานกปฺปรุกฺขคามนิคมาทโยปิ อตฺเถว. อถ กสฺมา ‘‘อรญฺญา’’ติ กถิตาติ อมนุสฺสา วา สตฺตา ชาติภินฺนตฺตา จ เต อคามาเยว, เตเนว ‘‘นิมนุสฺสมฺหิ อรญฺญมฺหี’’ติ วุตฺตํ. ติรจฺฉานวตฺถุสฺมิมฺปิ ‘‘นาโค วา โหตุ สุปณฺณมาณวกาทีนํ วา อญฺญตโร อนฺตมโส สกฺกํ เทวราชานํ อุปาทาย โย โกจิ อมนุสฺสชาติโก สพฺโพว อิมสฺมึ อตฺเถ ติรจฺฉานคโตติ เวทิตพฺโพ’’ติ วุตฺตํ, ตสฺมา ชาติภินฺนตาย อมนุสฺสาวาโส อรญฺญนฺติ เวทิตพฺโพ. อพฺภนฺตรสีมาย วิจารณา. जैसा कि कहा गया है, 'अजनेत्वा' आदि में प्रतिषेध (निषेध) में देखा जाता है। 'अपरिहानीया धम्मा' आदि में वृद्धि में। 'अनवज्जं भन्ते' आदि में तद्भाव (अभाव) में। 'अक्खरा' आदि में अन्य अर्थ में। 'अमरु राजा' आदि में सादृश्य (समानता) में। 'अमलं' आदि में विरुद्ध अर्थ में। 'असेट्ठो अयं ब्राह्मणो अब्रह्मचारी' आदि में निंदा में। 'अगामो' आदि में शून्य अर्थ में। 'अपतिका इत्थी' आदि में विरह (रहित) अर्थ में। 'अथ नायं कञ्ञा' आदि में अल्प अर्थ में। यहाँ (अगामके में) इसे शून्य या विरह अर्थ में देखना चाहिए। शून्य अर्थ में 'अगामके' का अर्थ है—मनुष्यों से रहित केवल अरण्य (जंगल)। विरह अर्थ में 'अगामके' का अर्थ है—गाँव से रहित प्रदेश। इसीलिए शून्य और विरह अर्थ में 'अगामके' पद के द्वारा गाँव, नदी, झील, सरोवर और समुद्र को छोड़कर जो शेष नीचे पृथ्वी को धारण करने वाला जल है, या जल को धारण करने वाली वायु है, या आकाश है, वैसे ही ऊपर ब्रह्मलोक तक सब असुर, यक्ष, सुर आदि के आकाश स्थित देव-ब्रह्म विमान भी अरण्य में ही संगृहीत हैं। नदियों और समुद्रों के बीच में भी मछुआरों के जाने का मार्ग या द्वीप या पर्वत, वह भी अरण्य-सीमा की ही गणना में आता है। इसलिए यह सात अभ्यन्तर की सीमा मनुष्यों से रहित केवल अरण्य में, पृथ्वी मंडल पर, और देवलोक में विमान और कल्पवृक्ष आदि में भी प्राप्त होती ही है। पृथ्वी पर जिस गाँव के क्षेत्र में, पृथ्वी के नीचे जहाँ सोना, मणि आदि खोदकर लिया जा सकता है, वह प्रदेश गाँव का क्षेत्र ही है। उसके परे पृथ्वी को धारण करने वाले जल तक और आकाश में भी (अरण्य सीमा) प्राप्त होती ही है। क्या छह कामावचर देवलोकों में भी देव-विमान, कल्पवृक्ष, गाँव और नगर आदि नहीं हैं? फिर उन्हें 'अरण्य' क्यों कहा गया? क्योंकि वे मनुष्य नहीं हैं और जाति भिन्न होने के कारण वे 'अगाम' (गाँव रहित) ही हैं। इसीलिए कहा गया है— "अमनुष्य अरण्य में"। तिर्यक (पशु) योनि के विषय में भी कहा गया है— "चाहे नाग हो, सुपर्ण, माणवक आदि में से कोई अन्य हो, यहाँ तक कि देवराज शक्र तक, जो कोई भी अमनुष्य जाति का है, वह सब इस अर्थ में तिर्यक ही समझना चाहिए।" इसलिए जाति की भिन्नता के कारण अमनुष्यों का आवास अरण्य ही समझना चाहिए। अभ्यन्तर सीमा का विचार समाप्त। อิทานิ อุทกุกฺเขปสีมาย สํวณฺณนากฺกโม สมฺปตฺโต. ตตฺถ ‘‘สพฺพา ภิกฺขเว นที อสีมา. สพฺโพ สมุทฺโท อสีโม. สพฺโพ ชาตสฺสโร อสีโม. นทิยา วา ภิกฺขเว สมุทฺเท วา ชาตสฺสเร วา ยํ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา อุทกุกฺเขปา, อยํ ตตฺถ สมานสํวาสา เอกูโปสถา’’ติ ปญฺญตฺตา, อยํ อุทกุกฺเขปสีมา นาม. ตตฺถ ‘‘สพฺพา ภิกฺขเว นที อสีมา’’ติ เอตฺถ [Pg.51] อสีมสทฺเท อกาโร วิรหตฺโถ, อสีมา พทฺธสีมา วิรหิตาติ อตฺโถ. ญตฺติทุติยกมฺมวาจํ สาเวตฺวาปิ พนฺธสีมาวิรหิตาติ วุตฺตํ โหติ. ปฏิเสธตฺโถ วา, อสมฺมนฺนิตพฺพาติ อตฺโถ. วุฑฺฒิอตฺโถ วา, ‘‘อเสกฺขา ธมฺมา’’ติ ยถา สิกฺขิตสิกฺขา นิฏฺฐิตสิกฺขาติ วุตฺตํ โหติ. เอวํ อสีมาสีมกิจฺจนิฏฺฐปฺปตฺตาติ อตฺโถ. ญตฺติทุติยกมฺม วาจํ สาเวตฺวา สมฺมตาปิ อสมฺมตาเยว, อตฺตโน สภาเวเนว คามสีมา วิย พทฺธสีมาสทิสาติ วุตฺตํ โหติ. เอเตน นทีชาตสฺสรสมุทฺทานํ พทฺธสีมาย อเขตฺตภาโว ทสฺสิโต โหติ. เอวํ ‘‘สพฺพา ภิกฺขเว นที อสีมา’’ติอาทินา นทีสมุทฺทชาตสฺสรานํ พทฺธสีมาภาวํ ปฏิกฺขิปิตฺวา ตตฺถ โลกโวหารสิทฺธาสุ เอตาสุ นทีอาทีสุ อพทฺธสีมาสุ ปุน วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ วาลิกาทีหิ สีมปริจฺฉินฺทนํ กตฺตุกาโม ภควา ‘‘นทิยา วา ภิกฺขเว สมุทฺเท วา ชาตสฺสเร วา ยํ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา อุทกุกฺเขปา’’ติ อาทิมาห. ตตฺถ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺสติ ถามมชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส เตเนวาห สมนฺตปากาทิกาย วินยฏฺฐกถายํ ‘‘ถามมชฺฌิเมน ปุริเสนา’’ติ. ยทิ วฑฺฒกีปุริสมิจฺเฉยฺย, ‘‘วฑฺฒกีปุริเสนา’’ติ วุตฺตํ ภเวยฺย, น ปเนวํ วุตฺตํ, เตน ญายติ ‘‘ถามมชฺฌิมสฺส ปุริสสฺสา’’ติ. ติวิธา หิ ปุริสา อุตฺตมปุริโส มชฺฌิมปุริโส ปกติปุริโสติ. ตตฺถ อุตฺตมปุริโส นาม สพฺพญฺญุ ภควา, โส หิ ภควา สพฺพสตฺตุตฺตโม ถามยสสมฺปตฺติอิสฺสริยาทีหิ ตถา หิ ตถาคตสฺส ถาโม. अब उदकुक्खेप सीमा (जल-प्रक्षेप सीमा) की व्याख्या का क्रम प्राप्त हुआ है। वहाँ (बुद्ध ने कहा है)— 'भिक्षुओं! सभी नदियाँ असीमा हैं। सभी समुद्र असीमा हैं। सभी जातस्सर (प्राकृतिक झीलें) असीमा हैं। भिक्षुओं! नदी में, समुद्र में या जातस्सर में, एक मध्यम पुरुष द्वारा चारों ओर जहाँ तक जल फेंका जा सकता है, वह वहाँ समान संवास और एक उपोसथ वाली (सीमा) है'— ऐसा प्रज्ञप्त किया गया है, इसे 'उदकुक्खेप सीमा' कहा जाता है। वहाँ 'भिक्षुओं! सभी नदियाँ असीमा हैं'— यहाँ 'असीमा' शब्द में 'अ' कार 'विरह' (रहित) के अर्थ में है, 'असीमा' का अर्थ 'बद्ध सीमा से रहित' है। ज्ञप्ति-द्वितीय कर्मवाचा सुनाकर भी (इन्हें) बद्ध सीमा से रहित कहा गया है। अथवा यह प्रतिषेध के अर्थ में है, जिसका अर्थ है 'सम्मनित (निर्धारित) नहीं की जानी चाहिए'। अथवा यह 'वृद्धि' के अर्थ में है, जैसे 'असेख धर्म' में 'शिक्षित-शिक्षा' या 'निष्ठित-शिक्षा' (पूर्ण शिक्षा) कहा जाता है। इस प्रकार 'असीमा' का अर्थ 'सीमा के कार्य की निष्ठा (पूर्णता) को प्राप्त' है। ज्ञप्ति-द्वितीय कर्मवाचा सुनाकर सम्मत (निर्धारित) होने पर भी वे असम्मत ही हैं, अपने स्वभाव से ही ग्राम-सीमा की तरह बद्ध-सीमा के सदृश कही गई हैं। इससे नदियों, जातस्सरों और समुद्रों का बद्ध-सीमा के लिए अयोग्य होना (अक्षेत्र भाव) दिखाया गया है। इस प्रकार 'भिक्षुओं! सभी नदियाँ असीमा हैं' इत्यादि के द्वारा नदी, समुद्र और जातस्सरों के बद्ध-सीमा होने का निषेध करके, लोक-व्यवहार से सिद्ध इन नदी आदि अबद्ध-सीमाओं में पुनः 'वर्ग-कर्म' (विभाजित कर्म) के परिहार के लिए, बालू आदि से सीमा का परिच्छेद (निर्धारण) करने की इच्छा से भगवान ने 'भिक्षुओं! नदी में, समुद्र में या जातस्सर में, एक मध्यम पुरुष द्वारा चारों ओर जहाँ तक जल फेंका जा सकता है' इत्यादि कहा। वहाँ 'मध्यम पुरुष' का अर्थ 'मध्यम शक्ति वाला पुरुष' है, इसीलिए समन्तपासादिका आदि विनय-अट्ठकथा में 'मध्यम शक्ति वाले पुरुष द्वारा' कहा गया है। यदि 'बढ़ई' (शिल्पी) पुरुष अभीष्ट होता, तो 'बढ़ई पुरुष द्वारा' कहा गया होता, किन्तु ऐसा नहीं कहा गया है, इसलिए यह 'मध्यम शक्ति वाले पुरुष का' ही समझा जाता है। क्योंकि पुरुष तीन प्रकार के होते हैं— उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष और प्राकृत (सामान्य) पुरुष। वहाँ 'उत्तम पुरुष' सर्वज्ञ भगवान हैं, क्योंकि वे भगवान शक्ति, यश, सम्पत्ति और ऐश्वर्य आदि में सभी सत्त्वों में उत्तम हैं, वैसी ही तथागत की शक्ति है। ‘‘กาฬาวกญฺจ คงฺเคยฺยํ, ปณฺฑรํ ตมฺพปิงฺคลํ; คนฺธมงฺคลเหมญฺจ, อุโปสถํ ฉทฺทนฺติเม’’ติ. काळावक, गङ्गेय्य, पण्डर, तम्बि-पिङ्गल, गन्ध, मङ्गल, हेम, उपोसथ और छद्दन्त— ये (दस प्रकार के हाथी) हैं। วุตฺตานํ ทสนฺนํ หตฺถิกุลานํ พลานุสาเรน เวทิตพฺโพ. ตตฺถ กาฬาวก นฺติ ปกติหตฺถิกุลํ ยํ ทสนฺนํ ปุริสานํ กายพลํ, ตํ เอกสฺส กาฬาวกสฺส หตฺถิโน พลํ. ยํ ทสนฺนํ กาฬาวกานํ พลํ, ตํ เอกสฺส คงฺเคยฺยสฺส พลํ. ยํ ทสนฺนํ คงฺเคยฺยานํ พลํ, ตํ เอกสฺส ปณฺฑรสฺส พลํ, ยํ ทสนฺนํ ปณฺฑรานํ พลํ, ตํ เอกสฺส ตมฺพสฺส พลํ. ยํ ทสนฺนํ ตมฺพานํ พลํ, ตํ เอกสฺส ปิงฺคลสฺส พลํ. ยํ ทสนฺนํ ปิงฺคลานํ พลํ, ตํ เอกสฺส คนฺธหตฺถิโน พลํ. ยํ ทสนฺนํ คนฺธหตฺถีนํ พลํ, ตํ เอกสฺส มงฺคลสฺส พลํ. ยํ ทสนฺนํ มงฺคลานํ พลํ, ตํ เอกสฺส เหมสฺส พลํ. ยํ ทสนฺนํ เหมวตานํ พลํ, ตํ เอกสฺส [Pg.52] อุโปสถสฺส พลํ. ยํ ทสนฺนํ อุโปสถานํ พลํ, ตํ เอกสฺส ฉทฺทนฺตสฺส พลํ. ยํ ทสนฺนํ ฉทฺทนฺตานํ พลํ, ตํ เอกสฺส ตถาคตสฺส กายพลํ. ‘‘นารายนสงฺขาตํ พล’’นฺติปิ อิทเมว วุจฺจติ. ตตฺถ นารา วุจฺจนฺติ รสฺมิโย, ตา พหู นานาวิธา ตโต อุปฺปชฺชนฺตีติ นารยนํ, วชิรํ, ตสฺมา วชิรสงฺขาตํ พลนฺติ ปิ อตฺโถ, ตเทตํ ปกติหตฺถิคณนาย หตฺถิโกฏิสหสฺสํ, ปุริสคณนาย ทสนฺนํ ปุริสโกฏิสหสฺสานํ พลํ โหติ, อิทํ ตถาคตสฺส กายพลํ. อิสฺสริยาทิพลวิธานํ ปน ตํตํ สุตฺตานุสาเรน เวทิตพฺพํ. มชฺฌิมปุริโส นาม วฑฺฒกิปุริโส โส หิ ตถาคตสฺส พลํ ปฏิจฺจ สิเนรุปพฺพตราชํ สาสปพีเชน มินนฺโต วิย สเตนปิสหสฺเสนปิ สตสหสฺเสนปิ มิเนตุํ อภพฺโพ, อนฺตมโส ปาทงฺคุฏฺฐ โส ปาทงฺคุฏฺฐกมฺปิ คณฺเหตุํ อภพฺโพว. ตสฺส ปกติปุริสโต มหนฺตภาเวน มชฺเฌ ภวตฺตา มชฺฌิมปุริโส นาม ชาโต, ตถา หิ สุคตวิทตฺถิ วฑฺฒกิสฺส ติสฺโส วิทตฺถิโย, วฑฺฒกิหตฺเถน ทิยฑฺฒหตฺโถ โหติ, ตถา วฑฺฒกิวิทตฺถิ ปกติปุริสสฺส ทฺเว วิทตฺถิโย, ปกติปุริสหตฺเถน ปริปุณฺณหตฺโถ โหติ ตถา หิ สุคตวิทตฺถิ นาม อิทานิ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส ติสฺโส วิทตฺถิโย, วฑฺฒกิหตฺเถน ทิยฑฺโฒ หตฺโถ โหตีติ กุฏิการสิกฺขาปทฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. อยํ อิธ มชฺฌิมปุริโสติ นาธิปฺเปตา. กสฺมา กุฏิการสิกฺขาปเทเยว ติหตฺถาติ วฑฺฒกิหตฺเถน ติหตฺถา. ปมาณยุตฺโต มญฺโจติ ปกติวิทตฺถิยา นววิทตฺถิปฺปมาโณ มญฺโจติ วุจฺจติ ยถา, เอวํ มชฺฌิมปุริเสนา’ติ อิธ อวตฺวา’ถามมชฺฌิเมน ปุริเสนา’ติ อฏฺฐกถายํ วุตฺตตฺตา. ปกติปุริโส นาม’ยํ ทสนฺนํ ปุริสานํ กายพลํ, ตํ เอกสฺส กาฬาวกสฺส หตฺถิโน พล’นฺติ วุตฺตปุริโส ปกติปุริโส นาม. ตตฺถ กิญฺจาปิ เอกจฺเจ ปุญฺญวนฺตา ราชา อชาตสตฺตุ ชีวโก โกมารภจฺโจ อิตฺถิยาปิ วิสาขา มิคารมาตาติ เอวมาทโย ปญฺจนฺนํ หตฺถีนํ พลํ ธาเรนฺติ, น ปน เต มชฺฌิมปุริสา นาม โหนฺติ, ปกติปุริโส เยว, ปุญฺญวนฺตภาเวน วิเสสปุริสตฺตา. อิธ ปน ปกติปุริโสเยว ถาม มชฺฌิมปุริโสติ อธิปฺเปโต. อุทกุกฺเขปาติ อุทกุกฺเขเปน ปริจฺฉินฺนา, เตเนวาห มาติกาฏฺฐกถายํ ลีนตฺถปฺปกาสนิยํ อุทกุกฺเขปาติ กรณตฺเถ นิสฺสกฺกวจนนฺติ อาห. อุทกุกฺเขเปนา’ติ อยญฺเหตฺถตฺโถ[Pg.53]. นทีสมุทฺทชาตสฺสเรสุ ยํฐานํ มชฺชิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา ปริสปริยนฺตโต อุทกุกฺเขเปน ปริจฺฉินฺนํ, อยํ ตตฺถ นทีอาทีสุ โลกโวหาร สิทฺธาสุ ตาสุเอว อพทฺธสีมาสุ อปราปิ สมานสํวาสา เอกูโปสถาติ กงฺขาวิตรณิยํ ปน ยํ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา อุทกุกฺเขปาติ ยํ ฐานํ ถามมชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตโต อุทกุกฺเขเปน ปริจฺฉินฺนํ. ตตฺถ ยถา อกฺขธุตฺตา ทารุคุฬํ ขิปนฺติ, เอวํ อุทกํ วา วาลิกํ วา หตฺเถน คเหตฺวา มชฺฌิเมน ปุริเสน สพฺพถาเมน ขิปิตพฺพํ. ยตฺถ เอวํ ขิตฺตํ อุทกํ วา วาลิกา ปตติ, อยํ อุทกุกฺเขโป นาม. อยํ ตตฺถ สมาน สํวาสา เอกูโปสถาติ, อยํ เตสุ นทีอาทีสุ อุทกุกฺเขปปริจฺฉินฺนา สีมา สมานสํวาสาเจว เอกูโปสถาจา’ติ อตฺถโยชนํ กตฺวา อยํ เอเตสํ นทีอาทีนํ อนฺโตเยว ลพฺภติ, น พหิ, ตสฺมา นทิยา วา ชาตสฺสเร วา ยตฺตกํ ปเทสํ ปกติวสฺสกาเล จตูสุ มาเสสุ อุทกํ โอตฺถรติ, สมุทฺเท ยสฺมึ ปเทเส ปกติวีจิโย โอสริตฺวา สณฺฐหนฺติ, ตโตปฏฺฐาย กปฺปิยภูมิ. ทุพฺพุฏฺฐิกาเล วา คิมฺเห วา นทีชาตสฺสเรสุ สุกฺเขสุปิ สาเอว กปฺปิยภูมิ. สเจ ปน สุกฺเข ชาตสฺสเร วาปึ วา ขณนฺติ วปฺปํ วา กโรนฺติ, ตํ ฐานํ คามเขตฺตํ โหติ. ยา ปเนสา กปฺปิยภูมีติ วุตฺตา, ตโต พหิ อุทกุกฺเขปสีมา น คจฺฉติ, อนฺโตเยว คจฺฉติ, ตสฺมา เตสํ อนฺโตปริสปริยนฺตโต ปฏฺฐาย สมนฺตาอุทกุกฺเขป ปริจฺเฉโท กาตพฺโพ’’ติ วุตฺตํ. คณฺฐิปเท ปน ยํ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา อุทกุกฺเขปาติ ปน เอติสฺสา นทิยา จตุวคฺคาทีนํ สงฺฆานํ วิสุํ จตุวคฺคกรณียาทิกมฺมกรณกาเล สีมาปริจฺเฉททสฺสนตฺถํ วุตฺตํ, ติจีวเรน วิปฺปวาสปริจฺเฉททสฺสนตฺถมฺปิ สตฺตพฺภนฺตรสีมาย ปริจฺเฉททสฺสนํ วิยาติ อาจริยา, ตสฺมา อุทกุกฺเขปปริจฺเฉทาภาเวปิ อนฺโตนทิยํ กาตุํ วฏฺฏตีติ สิทฺธ’นฺติ ลิขิตํ. ตตฺถ อุทกุกฺเขปปริจฺเฉทาภาเวปี’ติ อิทํ ปทํ สมนฺตโต อุทกุกฺเขเปน ปริจฺฉินฺน’นฺติ มหาอฏฺฐกถาวจเนน วา สมนฺตา อุทกุกฺเขปปริจฺเฉโท กาตพฺโพ’ติ มาติกาฏฺฐกถาย กงฺขา วิตรณิยญฺจ วุตฺตวจเนน วา, ‘‘ตตฺถาปิ หิ มชฺฌิมปุริโส น ญายติ, ตถา สพฺพถาเมน ขิปน’’นฺติ วา, ‘‘เอตทตฺถเมว หิ วาลิกาทีหิ สีมปริจฺฉินฺทน’’นฺติ วา วิมติวิโนทนีวจเนหิ วา น สเมติ. คนฺถกาเรนาปิ ปรูปวาทวิวชฺชนตฺถํ ‘‘อยํ อมฺหากํ ขนฺตี’’ติ อวตฺวา’อจริยา’ติ [Pg.54] อญฺญกตฺตาเร นิทสฺสิตฺวา ปรโต นิคมเน ‘‘อิทํ สพฺพํ สุฏฺฐุ วิจาเรตฺวา ครุกุเล ปยิรุปาสิตฺวา คเหตพฺพํ ยุตฺตํ คเหตพฺพํ, อิตรํ ฉฑฺเฑตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ ตสฺมา อญฺเญสํ อาจริยานํ มเตน ลิขิตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. อญฺญถา ติสฺโสปิ สงฺคีติโย อารูฬฺเห อฏฺฐกถาวจเน จ กงฺขาวิตรณี-วิมติวิโนทนีวจนานิ จ มกฺเขตพฺพานิ ภเวยฺยุํ, คนฺถาปิ อญฺญมญฺญวิรุทฺธา ภเวยฺยุํ, ภควตา ปญฺญตฺตสิกฺขาปทมฺปิ สาวกานํ มเตน ปฏิสงฺขริตพฺพํ ภเวยฺย ภควตา ปญฺญตฺตสิกฺขาปทํ ปน น มกฺเขตพฺพํ, ยถา ปญฺญตฺเตเยว วตฺติตพฺพํ วกฺขติ หิ วตฺถุํ ชานิตฺวาปิ มชฺชํ ปิวโต ภิกฺขุสฺส ปาจิตฺติยํ, สามเณรสฺส ปน ชานิตฺวา ปิวโต สีลเภโท, น อชานิตฺวาติ วุตฺตํ ตตฺถ การณํ มคฺคิตพฺพํ, สิกฺขาปท ปญฺญตฺติยา พุทฺธานเมว วิสยตฺตา น วา มคฺคิตพฺพํ, ยถา ปญฺญตฺเตเยว วตฺติตพฺพ’นฺติ ตสฺมา สมนฺตา อุทกุกฺเขปาติ ปญฺญตฺตสิกฺขาปทานุรูปํ สมนฺตโต อุทกุกฺเขเปน ปริจฺฉินฺนนฺติ วา อุทกํ อุกฺขิปิตพฺพนฺติ วา อุทกุกฺเขเปน ปิ ปริจฺฉินฺนา สีมาติวา สมนฺตา อุทกุกฺเขปปริจฺเฉโท กาตพฺโพติ วา วุตฺตธมฺมสงฺคาหกตฺเถรานํ วจนเมว ปมาณํ เต หิ พุทฺธมตญฺญุโน, อิทญฺจ วจนํ ภควโต น ปจฺจกฺขวจนํ นาปิสงฺคาหกตฺเถรานํ วจนํ อถวา ‘‘ยํ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา อุทกุกฺเขปา’’ติ ปน เอติสฺสา นทิยา…เป… สตฺตพฺภนฺตรสีมาย ปริจฺเฉททสฺสนํ วิย สีมปริจฺเฉททสฺสนตฺถํ วุตฺต’นฺติ อาจริยา ยสฺมา วทนฺติ, ตสฺมา อุทกุกฺเขปปริจฺเฉทาภาเวปิ อนฺโตนทิยํ กาตุํ วฏฺฏตีติ สิทฺธนฺติ อิมิสฺสา อตฺถโยชนาย น ธมฺมสงฺคาหกตฺเถราปิ ปวิฏฺฐา, คนฺถกาโรปิ อปวิฏฺโฐ. กสฺมาติ เจ ติสฺโสปิ สงฺคีติโย อารูฬฺเหสุ วินยฏฺฐกถาสุเจว ตพฺพิวรณภูตาสุ สิโลกฏีกาสุ จ ‘‘อุทกุกฺเขเปน ปริจฺฉินฺนํ, อุทกํ อุกฺขิปิตพฺพํ, อุทกุกฺเขปปริจฺเฉโท กาตพฺโพ’’ติ อาทินา พหูหิ อากาเรหิ อุทกุกฺเขปปริจฺเฉทเมว ลิขนฺติ, ตสฺมา ธมฺมสงฺคาหกตฺเถราปิ อปฺปวิฏฺฐาติ วิญฺญายติ คนฺถกาโร ปิ ปรูปวาทวิวชฺชนตฺถํ ‘‘อาจริยา’’ติ อญฺญกตฺตาเร นิทสฺเสติ, ตสฺมา คนฺตฺถกาโรปิ อปฺปวิฏฺโฐติ วิญฺญายติ, อิทญฺจ วจนํ เกสญฺจิ เถรานํ อตฺตโนมติ, อตฺตโนมติจ นาเมสา สพฺพทุพฺพลา, สิเนรุปพฺพตราชํ สาสปพีเชน มิเนนฺโต วิย สพฺพญฺญุพุทฺเธน ปญฺญตฺตสฺส อุทกุกฺเขปาติ สิกฺขาปทสฺส อตฺถํ วทนฺตานํ มหากสฺสปยสโมคฺคลิปุตฺตติสฺสปภุตีนญฺจ [Pg.55] เตสํ สิสฺสานุสิสฺสานํ มหาวิหารวาสีนญฺจ วจนํ โก นาม ปุคฺคโล มกฺเขตุํ สกฺขิสฺสติ, อุปสมฺปทาทิกมฺมสฺส จ ครุกมฺมตฺตา สาสนสฺส มูลตฺตา จ ครุเกเยว ฐาตพฺพํ. ‘‘ยํ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา อุทกุกฺเขปา’’ติ ภควตา ปญฺญตฺตํ, กถํ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส อุทกุกฺเขปารหฏฺฐานเมว อุทกุกฺเขปสีมา, อุทาหุ อุทกุกฺเขเปเนว อุทกุกฺเขปสีมาติ โจทนํ ปริหรนฺโต อฏฺฐกถาจริโย กถํ ปน อุทกํ อุกฺขิปิตพฺพนฺตฺยาทิมาห. ตตฺถ กถนฺติ กเถตุกมฺยตา ปุจฺฉา, กถํ เกน การเณน อุทกํ อุกฺขิปิตพฺพํ อุทกาสิญฺจนสงฺเขเปน อุกฺขิปิตพฺพํ อถ โข เลฑฺฑุขิปนทารุคุฬขิปนากาเรน อุกฺขิปิตพฺพนฺติ อตฺโถ. อกฺขธุตฺตาติ สามญฺเญน วุตฺเตปิ ‘‘สีโห คายติ นงฺคุฏฺฐํ, สีโห จาเลติ วาลธิ’’นฺติ เอตฺถ วิย ทารุคุฬํ ขิปนฺติ สทฺทนฺตรสนฺนิธานโต อตฺถวเสน ทารุคุฬกีฬกา ธุตฺตชนาติ วิญฺญายติ อกฺขสทฺโท หิ ชูเตปิ นิรูฬฺโห. ทารุคุฬนฺติ ภมํ อาโรเปตฺวา อารคฺเคน กตทารุวิกติ อยญฺเหตฺถตฺโถ… ยถา อกฺขธุตฺตา ทารุคุฬกา ธุตฺตชนา ทารุคุฬํ หตฺเถน คเหตฺวา อตฺตโน พลํ ทสฺเสนฺตา วิย สพฺพถาเมน อตฺตานํ โอนมิตฺวา ขิปนฺติ, เอวเมว ถามมชฺฌิเมน ปุริเสน อุทกํ วา วาลิกํ วา หตฺเถน คเหตฺวา อตฺตโน พลํ ทสฺเสนฺตาวิย โอนมิตฺวา สพฺพถาเมน นิสินฺนสฺส วา ฐิตสฺส วา ปริสปริยนฺตโต อนุปริยายิตฺวา ขิปิตพฺพํ, เอวํ จิตฺตํ อุทกํ วา วาลิกํ วา ยตฺถ ยสฺมึ ฐาเน ปตติ, อยเมโก อุทกุกฺเขโป นามาติ ‘‘อยเมโก อุทกุกฺเขโป’’ติ อิมินา ปเทน ทฺวินฺนํ สงฺฆานํ วิสุํวิสุํ กมฺมกรณาธิกาเร สีมนฺตริกตฺตา อญฺญสฺสาปิ อุทกุกฺเขปสฺส สมฺภวํ ทสฺเสติ, เตเนว มาติกาฏฺฐกถายํ ‘‘สเจ ปน ทฺเว สงฺฆา วิสุํวิสุํ อุโปสถาทิกมฺมํ กโรนฺติ, ทฺวินฺนํ อุทกุกฺเขปานํ อนฺตเร อญฺโญ เอโก อุทกุกฺเขโป อุปจารตฺถาย ฐเปตพฺโพ’’ติ วุตฺตํ, วิมติวิโนทนิยมฺปิ ‘‘ตสฺส อนฺโตติ ตสฺส อุทกุกฺเขปปริจฺฉินฺนสฺส ฐานสฺส อนฺโต น เกวลญฺจ ตสฺเสว อนฺโต, ตโต พหิปิ เอกสฺส อุทกุกฺเขปสฺส อนฺโต ฐาตุํ น วฏฺฏตีติ วจนํ อุทกุกฺเขปปริจฺเฉทสฺส ทุพฺพิชานโต กมฺมโกปสงฺกา โหตี’’ติ วุตฺตํ, สารตฺถทีปนิยํ ปน ‘‘ตสฺส อนฺโต หตฺถปาสํ วิชหิตฺวา ฐิโต กมฺมํ โกเปตีติ อิมินา ปริจฺเฉทโต พหิ ยตฺถ กตฺถจิ ฐิโต กมฺมํ น โกเปตีติ ทีเปตี’’ติ วตฺวา มาติกาฏฺฐกถาวจนมฺปิ ปฏิกฺขิปิ, ตํ เอกสงฺฆํ สนฺนิปาตํ [Pg.56] สนฺธาย วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, ยถา จ มหาสีมาย ขณฺฑิตฺวา พทฺธานํ ขณฺฑสีมานํ อญฺญมญฺญสงฺกรวิวชฺชนตฺถํ สีมนฺตริกา ฐปิตา, เอวเมว อตฺตโน สภาเวน คามสีมา วิย สยํ ชาตสีมายํ นทีสมุทฺทชาตสฺสรานํ อติมหนฺตภาเวน อุทกุกฺเขเปน อุทกุกฺเขปสีมา ภควตา อนุญฺญาตา, ตถาปิ ทฺวินฺนํ พทฺธสีมานมิว อญฺญมญฺญสงฺกรวิวชฺชนตฺถํ ทฺวินฺนํ อุทกุกฺเขปสีมานํ อนฺตเร สีมนฺตริกตฺถาย อญฺโญ อุทกุกฺเขโป ฐเปตพฺโพ’ติ วุตฺตํ, สนิมิตฺตา พทฺธสีมา, สอุทกุกฺเขปา อุทกุกฺเขปสีมา, สีมนฺตริกา วิย เอโก อุทกุกฺเขโป ทฏฺฐพฺโพ, เตเนว วิมติวิโนทนิยํ ‘‘อิทญฺเจตฺถ สีมนฺตริกาวิธานํ ทฺวินฺนํ พทฺธสีมานํ สีมนฺตริกาอนุชานนสุตฺตานุโลมโต สิทฺธนฺติ ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ, เอกสฺมึ สงฺฆสนฺนิปาเต ปน เอกสฺส อุทกุกฺเขปสฺส พหิ ติฏฺฐนฺโตปิ กมฺมํ น โกเปตีติ ทฏฺฐพฺพํ วุตฺตญฺหิ วิมติวิโนทนิยํ ภควตา นิทานวเสน เอกคามสีมนิสฺสิตานํ เอกสภาคานญฺจ ทฺวินฺนํ พทฺธสีมานเมว อญฺญมญฺญํ สมฺเภทชฺโฌตฺถรณํ สีมนฺตริกํ วินา อพฺยวธาเน ฐานญฺจ ภควตา อนุมตเมวาติ ญตฺวา อฏฺฐกถาจริยา อิธาปิ สีมนฺตริกาวิธานมกํสุ วิสภาคสีมานมฺปิ หิ เอกสีมนิสฺสิตตฺตํ เอกสภาวตฺตญฺจาติ ทฺวีหงฺเคหิ สมนฺนาคเต สติ เอว สีมนฺตริกํ วินา ฐานํ สมฺเภทาย โหติ, นาสตีติ ทฏฺฐพฺพ’นฺติ. เอวํ นทีสมุทฺทชาตสฺสเรสุ สมนฺตาอุทกุกฺเขปาติ ปญฺญตฺตสิกฺขาปทานุรูปํ อุทกุกฺเขเปน ปริจฺเฉทํ ทสฺเสตฺวา รสฺสปภเว นทีชาตสฺสรปเทเส อุทกุกฺเขเปน วินาว อตฺตโน สภาเวน คามสีมายมิว สพฺพถา กปฺปิยภาวํ ทสฺเสตุํ สเจ ปน นาติทีฆา โหติ, ปภวโต ปฏฺฐาย ตฺยาทิมาห. ตตฺถ ปภวโต ปฏฺฐายาติ ยสฺมึ ปเทเส จตุมาสปรมา นที สนฺทติ, ตสฺส อุปริมภาคโต ปฏฺฐายาติ อตฺโถ. ยาว มุขทฺวารา ติ ยาว นทีตีรเมเวตฺถ มุขทฺวาราติ อธิปฺเปตา. สพฺพตฺถา’ติ สพฺพสฺมึ นทีปเทเส อุทกุกฺเขปสีมากมฺมํ นตฺถี ติ อุทกุกฺเขเปน ปวตฺตา สีมา อุทกุกฺเขปสีมา. กริตพฺพนฺติ กมฺมํ, กรกรเณติ ธาตุ, รมฺมปจฺจโย. กรเณติ มโนทฺวารวีถิยา สตฺตมกุสลชวนจิตฺตสมุฏฺฐาปิตวาโยธาตุยา วิการภูโต กายปโยโค, เตน กายปโยเคน ขิปิตพฺพํ อุทฺธฏํ กมฺมนฺติ วุจฺจติ ปรมตฺถวเสน ปน กายปโยคสงฺขาตาย จิตฺตํ ชวาโยธาตุยา วิปฺผาเรน เทสนฺตรปฺปตฺติสมุฏฺฐาปิกา [Pg.57] อฏฺฐกลาปปุญฺชาเยว. อุทกุกฺเขปสีมาย กมฺมํ อุทกุกฺเขปสีมากมฺมํ ตํ เอตฺถ รสฺสปภวนทิยา นตฺถีติ อตฺโถ. อยญฺเหตฺถตฺโถ สเจ นที นาติทีฆา โหติ อฑฺฒโยชนํ วา คาวุตํ วา อฑฺฒคาวุตํ วา, ตสฺสา ปวตฺตนฏฺฐานโต ปฏฺฐาย ยาว นทีตีรา สพฺพตฺถ นทีปเทเส อชฺโฌตฺถริตฺวา สงฺโฆ นิสีทติ, ตตฺถ ตสฺมึ นทีปเทเส สมนฺตโต อวเสสนทิยา อภาวา วคฺคกมฺมสงฺกาภาเวน อุทกุกฺเขปสีมา กมฺมํ นตฺถิ, เกวลา นที สีมาเยวาติ สารตฺถทีปนิยมฺปิ มาติกาฏฺฐกถายลีนตฺถปฺปกาสนิยมฺปิ เอตเทว สนฺนิฏฺฐานํ วุตฺตํ วิมติวิโนทนิยํ ปน ยตฺถ ขุทฺทเก อรญฺเญ มหนฺเตหิ วา ภิกฺขูหิ ปริปุณฺณตาย วคฺคกมฺมสงฺกาภาเวน สตฺตพฺภนฺตรสีมาเปกฺขา นตฺถิ, ตตฺถ สตฺถพฺภนฺตรสีมา น อุปฺปชฺชติ, เกวลารญฺญสีมาเยว ตตฺถ สงฺเฆน กมฺมํ กาตพฺพํ นทีอาทีสุปิ เอเสว นโย วกฺขติ หิ สเจ นที นาติทีฆา โหติ, ปภวโต ปฏฺฐาย ยาวมุขทฺวารา สพฺพตฺถ สงฺโฆ นิสีทติ, อุทกุกฺเขปสีมากมฺมํ นตฺถี’ติ อาทิ จ อุภยตฺถาปิ จ. ยสฺสํ ทิสายํ สตฺตพฺภนฺตรสฺส วา อุทกุกฺเขปสฺส วา โอกาโส นปฺปโหติ, ตตฺถ กถํ มินนํ ขิปนํ วา ภเวยฺย, คามเขตฺตาทีสุ ปวิสนโต อเขตฺเต สีมา ปวิฏฺฐา นามาติสีมา วิปชฺเชยฺย, อเปกฺขาย สีมุปฺปตฺติยํ ปน ยโต ปโหติ, ตตฺถ สตฺตพฺภนฺตรอุทกุกฺเขปสีมา สยเมว ปริปุณฺณา ชายนฺติ. ยโต ปน นปฺปโหติ, ตตฺถ อตฺตโน เขตฺตปฺปมาเณเนว ชายนฺติ, น พหีติ วุตฺตํ, เอตฺถ จ’สีมาเปกฺขาย สตฺตพฺภนฺตรอุทกุกฺเขปสีมา สยเมว ปริปุณฺณา ชายนฺตี’ติ วุตฺตตฺตา อุทกุกฺเขปํ วินาเยว อเปกฺขาย สีมาย อุทกุกฺเขปสีมา อุปฺปชฺชตี’ติ อตฺถํ วทนฺติ, ตํ อยุตฺตรูปํ วิย ทิสฺสติ. กสฺมาติ เจ ปาฬินยวิโรธโต วิมติวิโนทนิยํ ปรโต วุตฺตวจเนนาปิ วิโรธโต จ. อิทญฺจ วจนํ อาจริยสฺส เกสญฺจิ ปุคฺคลานํ วาทปฺปกาสนตฺถํ วุตฺตํ ภเวยฺย. กสฺมา ปรโต วุตฺตวจเนน อฆฏิยตฺตา จ ปาฬิยฏฺฐกถาฏีกาวจเนหิปิ วิรุชฺฌนโต จ, ตํ ปรโต วณฺณยิสฺสาม. ยถา จ โลเก วตึ อปริกฺขิปิตฺวา ‘‘อิทํ วติยา ฐาน’’นฺติ จ ยถา จ นงฺคลโกฏิยา อกสิตฺวา ‘‘อิทํ กสิกฏฺฐาน’’นฺติ จ ยถา จ วตฺถุํ กโรนฺตา มนุสฺสา กุธารีผรสุอาทินา รุกฺเข อจฺฉินฺทิตฺวา ‘‘อิทํ มม กุธาริปตนฏฺฐาน’’นฺติ จ ยถา จ ทาตฺเตน อลายิตฺวา ‘‘อิทํ มม ลายิตฏฺฐาน’’นฺติ [Pg.58] จ น สกฺกา วตฺตุํ, เอวเมว อุทกํ วา วาลิกํ วา หตฺเถน อขิปิตฺวา ‘‘อยเมโก อุทกุกฺเขโปติ จ, อุทกปตนฏฺฐานนฺติ จ น สกฺกา วตฺตุํ. เอตฺถ จ ทฺเว ภิกฺขู เอวํ วิวาทํ กโรนฺติ วิมติวิโนทนิยํ ‘‘ยตฺถ ขุทฺทเก อรญฺเญ มหนฺเตหิ ภิกฺขูหิ ปริปุณฺณตาย วคฺคกมฺมสงฺกาภาเวน สตฺตพฺภนฺตรสีมาเปกฺขา นตฺถิ, ตตฺถ สตฺตพฺภนฺตรสีมา น อุปฺปชฺชติ, เกวลารญฺญสีมาเยว ตตฺถ สงฺเฆน กมฺมํ กตฺตพฺพํ นที อาทีสุปิ เอเสว นโย. วกฺขติ หิ สเจ นที นาติทีฆา โหติ. ปภวโต ปฏฺฐาย ยาว มุขทฺวารา สพฺพตฺถ สงฺโฆ นิสีทติ, อุทกุกฺเขปสีมากมฺมํ นตฺถี’ติอาทึ, อิมินา เอว วจเนน วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ สีมาเปกฺขาย สติ เอว อุทกุกฺเขปสีมา สตฺตพฺภนฺตรสีมา อุปฺปชฺชนฺติ, นาสตีติ ทฏฺฐพฺพ’นฺติ วุตฺตตฺตา อุทกุกฺเขปํ วินาว ปริสปริยนฺตโต ปฏฺฐาย สีมาเปกฺขาย สเหว อุทกุกฺเขปสีมา อุปฺปชฺชติ ตสฺมา อุทกุกฺเขเปน ปโยชนํ นตฺเถวาติ เต เอวํ วตฺตพฺพา ‘‘มา สปฺปุริสา เอวํ วเทยฺยาถ อาจริยวรญฺจ มา อพฺภาจิกฺขถ อิทญฺจ วจนํ อาจริยวรสฺส เนยฺยวจนํ, ปรโตปิ อาจริยวโร สนฺนิฏฺฐานํ วกฺขติ วินยฏฺฐกถาสุเจว สารตฺถทีปนิยญฺจ วุตฺตวจเนหิปิ ตว วจนํ อสํสนฺเทว, วิมติวิโนทนิยเมว ปรโต วุตฺตวจเนนาปิ น ฆฏิยติ. กถํ เนยฺยวจนํ โหตีติ. ‘‘สีมาเปกฺขาย สติ เอว…เป… นสฺสตี’’ติ เอตฺถ สีมาเปกฺขาย วินา มคฺคคมนนฺหานาทิ อตฺเถหิ ภิกฺขูหิ อรญฺเญ วา นทีอาทีสุปิวา ปวิฏฺฐกฺขเณเยว นุปฺปชฺชติ, สีมาเปกฺขาย สติเอว อรญฺเญ สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตรา’ติ ปญฺญตฺตสิกฺขาปทานุรูปํ อพฺภนฺตรสีมา อุปฺปชฺชติ’ นทีสมุทฺทชาตสฺสเรสุปิ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา อุทกุกฺเข’ปาติ ปญฺญตฺต สิกฺขาปทานุรูปํ อุทกุกฺเขเปน สห อุทกุกฺเขปสีมา อุปฺปชฺชติ, น อุทกุกฺเขเปน วินาติ อยํ เนยฺยตฺโถ. นาสตีติเอตฺถ อุทกุกฺเขเปน วินาติ อตฺโถปิ น ลพฺภเต. เอวญฺจ สติ วิมติวิโนทนิยํ เยว ปุน ตตฺถาติ โลกโวหารสิทฺธาสุ เอตาสุ นทีอาทีสุ ตีสุ อพทฺธสีมาสุ ปุนวคฺคกมฺมปริหารตฺถํ สาสนโวหารสิทฺธาย อพทฺธสีมาย ปริจฺเฉทํ ทสฺเสนฺโตติ อธิปฺปาโย. ปาฬิยํ ‘‘ยํ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺสา’’ติ อาทีสุ อุทกํ อุกฺขิปิตฺวา ขิปิยติ เอตฺถาติ อุทกุกฺเขโป, อุทกสฺส ปถโนกาโส, ตสฺมา อุทกุกฺเขปา. อยญฺเหตฺถ ปทสมฺพนฺธวเสน อตฺโถ… ‘‘ปริส ปริยนฺตโต ปฏฺฐาย สมนฺตา ยาว มชฺฌิมสฺส [Pg.59] ปุริสสฺส อุทกุกฺเขโป อุทกปตนฏฺฐานํ, ตาว ยํ ตํ ปริจฺฉินฺนํ ฏฺฐานํ, อยํ ตตฺถ นทีอาทีสุ อปรา สมานสํวาสา อุทกุกฺเขปสีมา’’ติ วุตฺตอตฺถปเทหิปิ สมานํ ภเวยฺย อาจริยเมว หิ เกจิปน สมนฺตา อพฺภนฺตรํ มินิตฺวา ปริจฺเฉทกรเณเนว สีมา สญฺชายติ, น สยเมวาติ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺภนฺตฺยาทินา เกจิวาทํ ปฏิกฺขิปิตฺวา มินนขิปเน โทสํ ทสฺเสตฺวา จ ยํ ปเนตฺถ อพฺภนฺตรมินนปฺปมาณสฺส วาลิกาทิขิปนกมฺมสฺส จ ทสฺสนํ, ตํ สยํชาตสีมานํ ฐิตฏฺฐานปริจฺเฉททสฺสนตฺถํ กตํ, คามูปจารฆรูปจารชานนตฺถํ เลฑฺฑุสุปฺปาทิขิปนวิชานนทสฺสนํ วิย, เตเนว มาติกาฏฺฐกถายํ สีมํ วา พนฺธนฺติ อุทกุกฺเขปํ วา ปริจฺเฉท’นฺติ วุตฺตํ, เอวํ กเตปิ ตสฺส ปริจฺเฉทสฺส ปภวโต ญาตุํ อสกฺกุเณยฺยตฺเตน ถูลโต ญตฺวา อนฺโตติฏฺฐนฺเตหิ นิราสงฺกฏฺฐาเน ฐาตพฺพํ อญฺญํ พหิกโรนฺเตหิ อติทูเร นิราสงฺกฏฺฐาเน เปเสตพฺพนฺติ วา, ตสฺมา ยถา วุตฺตสีมาเปกฺขวเสเนว ตาสํ สตฺตพฺภนฺตรอุทกุกฺเขปสีมานํ อุปฺปตฺติ, ตพฺพิคเมน วินาโส จ คเหตพฺโพติ อมฺหากํ ขนฺติ, วีมํสิตฺวา คเหตพฺพํ, อญฺโญ วา ปกาโร อิโต ยุตฺตตโร คเวสิตพฺโพ’ติ อาห. วีมํสิตฺวา คเหตพฺพํ. อญฺโญ วา ปกาโร อิโต ยุตฺตตโร คเวสิตพฺโพ’ติ อิมินา อาจริยสฺส วจเนน อิมสฺส วจนสฺส อตฺตโนมติภาวญฺจ อาจริยสฺส อปฏิสมฺภิทาปตฺตภาวญฺจ ทสฺเสติ. อิทญฺจ วจนํ น ภควโต ปจฺจกฺขวจนํ, นาปิธมฺมสงฺคาหกตฺเถรานํ วจนํ, ติสฺโสปิ สงฺคีติโย อนารูฬฺหา, นาปิ อฏฺฐกถาย สํวณฺณนาจริยสฺส วาทปฺปกาสนเมว ตสฺมา อสลฺลกฺขิตพฺพเมว สารตฺถทีปนิยมฺปิ สเจ นที นาติทีฆา โหตีติ อิมิสฺสา สํวณฺณนาธิกาเร อุทกุกฺเขปสีมา กมฺมํ นตฺถีติ ยสฺมา สพฺโพปิ นทีปเทโส ภิกฺขูหิ อชฺโฌตฺถโฏ, ตสฺมา สมนฺตโต นทิยา อภาวา อุทกุกฺเขเปน ปโยชนํ นตฺถี’ติ วุตฺตํ ตถา หิ สมนฺตโต นทิยา อภาวา อุทกุกฺเขเปน ปโยชนํ นตฺถี’ติอิมสฺส อนฺวยวเสน วา อตฺถาปตฺติวเสน วา สมนฺตโต นทิยา ภาเว สติ อุทกุกฺเขเปน ปโยชนํ อตฺเถว วคฺคกมฺมปริหารตฺถนฺติ อตฺโถ ลพฺภเต มาติกาฏฺฐกถาย ลีนตฺถปฺปกาสนิยมฺปิ ‘‘สมนฺตา อุทกุกฺเขปปริจฺเฉโท กาตพฺโพติ ปโหนกฏฺฐานํ สนฺธาย วุตฺตํ ยตฺถ ปน กุนฺนทิยํ นปฺปโหติ. ตตฺถ ปโหนกฏฺฐาเน อุทกุกฺเขปปริจฺเฉโท [Pg.60] กาตพฺโพ’ติวุตฺตํ. อุทกุกฺเขปปริจฺเฉโท กาตพฺโพ’ติ อิมินา วจเนน สีมาเปกฺขาย สห อุทกุกฺเขปํ วินา อตฺตโน สภาเวเนว นุปฺปชฺชตีติ วิญฺญายติ, ตถา หิ อุทกุกฺเขปปริจฺเฉทเก กตฺตาเร อสติ กถํ อุทกุกฺเขปปริจฺเฉโท กาตพฺโพ ภเวยฺย ตสฺมา ‘‘วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ สีมาเปกฺขาย สติ เอว อุทกุกฺเขปสตฺตพฺภนฺตรสีมา อุปฺปชฺชนฺติ, นาสตี’ติ อิทํ วจนํ สารตฺถทีปนิยญฺจ มาติกาฏฺฐกถายญฺจ วุตฺตวจเนหิ อญฺญมญฺญวิรุทฺธํ วิย ทิสฺสติ วิมติวิโนทนิยํเยว จ ‘‘มโหเฆน ปน อุนฺนตฏฺฐานโต นินฺนฏฺฐาเน ปตนฺเตน ขโต ขุทฺทโก วา มหนฺโต วา ลกฺขณยุตฺโต ชาตสฺสโรว เอตฺถาปิ ขุทฺทเก อุทกุกฺเขปกิจฺจํ นตฺถิ สมุทฺเท ปน สพฺพถา อุทกุกฺเขปสีมายเมว กมฺมํ กาตพฺพํ, โสเธตุํ ทุกฺกรตฺตา’’ติ วุตฺตํ ตถา หิ อยมาจริยวโร ปุพฺเพ ‘‘วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ สีมาเปกฺขาย สติ เอว อุทกุกฺเขปสตฺตพฺภนฺตรสีมา อุปฺปชฺชนฺติ, นาสตี’’ติ วตฺวา ปรโต กถมาจริยวเรน ‘‘เอตฺถาปิ ขุทฺทเก อุทกุกฺเขปกิจฺจํ นตฺถิ’’ตฺยาทิวจนมุจฺจเต, ตตฺถายํ วิคฺคโห อุทกํ อุกฺขิปิตฺวา ขิปียติ เอตฺถาติ อุทกุกฺเขโป อุทกสฺส ปตโนกาโส กินฺตุํ, ฐานํ กริตพฺพํ กิจฺจํ กร กรเณติ ธาตุ ริจฺจปจฺจโย ยํ. ‘‘อชฺเชว กิจฺจํ อาตปฺป’’นฺติ ยถา, อุทกุกฺเขปสฺส กิจฺจํ กรณํ อุทกุกฺเขปกิจฺจํ. สมุทฺเท ปนา ติ เอตฺถ ปน สทฺโท วิเสสตฺโถ, ปกฺขนฺตรตฺโถติปิ อปเร วิเสสตฺเถ ปน นทีชาตสฺสเรสุ มหนฺเตสุ อุทกุกฺเขปสีมายเมว กาตพฺพํ, ขุทฺทเก ปน เกวเล นทีชาตสฺสเรปิ กาตพฺพํ สมุทฺเท ปน วิเสสโต อุทกุกฺเขปสีมายเมว กาตพฺพนฺติ อยํ ปน สทฺทสฺส วิเสสตฺโถ. สพฺพถา ติ สพฺเพน สพฺพํ. อุทกุกฺเขปสีมายเมวา ติ เอตฺถ เอวกาโร สนฺนิฏฺฐานตฺโถ, อุทกุกฺเขปสีมายเมว กมฺมํ กาตพฺพํ, น สมุทฺทสีมาย กทาจีติ อตฺโถ ยุชฺชเตว. นทีชาตสฺสเรสุ ปน มหนฺเตสุ อุทกุกฺเขปสีมาย กาตพฺพํ, ขุทฺทเก นทีชาตสฺสเรเยว น กาตพฺพนฺติ อยํ อตฺโถ สามตฺถิยโต ลพฺภเตว นทีชาตสฺสเรสุ ขุทฺทกมหนฺตภาเวน นทีชาตสฺสรอุทกุกฺเขปาติ ทฺเว ทฺเว สีมา ลพฺภนฺติ สมุทฺเท ปน กสฺมา สมุทฺทอุทกุกฺเขปวเสน ทฺเว น ลพฺภนฺตีติ สมุทฺเท ปน กสฺมา สมุทฺทอุทกุกฺเขปวเสน ทฺเว น ลพฺภนฺตีติ โจทนํ มนสิสนฺธายาห ‘‘โสเธตุํ ทุกฺกรตฺตา’’ติ. ตตฺถ โสเธตุํ ทุกฺกรตฺตา ติ สมุทฺทสฺส อติมหนฺตภาเวน สมุทฺทโมติณฺเณ ภิกฺขู [Pg.61] หตฺถปาสนยนํ วา พหิสมุทฺทกรณํ วา กาตุํ อติทุกฺกรํ ตสฺมา สพฺพถา สพฺเพน สพฺพํ อุทกุกฺเขปสีมายเมว กาตพฺพนฺติ อยมาจริยวรสฺส อธิปฺปาโย. ยทิ วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ สีมาเปกฺขาย สติ เอว อุทกุกฺเขปสีมา อุปฺปชฺเชยฺย, เอวํ สติ สมุทฺทโมติณฺเณ ภิกฺขุสมูเหว หตฺถปาสโต พหิ กเรยฺย, เอวญฺจ สติ โสเธตุํ ทุกฺกรตฺตา’ติ เหตุปทมฺปิ นิรตฺถกํ ภเวยฺย น ปเนวํ สกฺกา วตฺตุํ, เตน ญายติ ‘‘วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ อุทกุกฺเขปปโยชน’’นฺติ. อปิจ เตสํ อาจริยานํ อธิปฺปาเยน ‘‘มยํ อุทกุกฺเขปสีมาย น กโรม, เกวลํ สมุทฺเทเยว กโรมา’’ติ อิจฺฉมาเน สติ กถํ กริสฺสนฺติ. ตสฺมา เตสํ มเตน สีมาเปกฺขาย สเหว อุทกุกฺเขปสีมาย สมฺภวโต คตคตฏฺฐาเน อุทกุกฺเขปสีมา ภเวยฺย เอวญฺจ สติ ‘‘สมุทฺเท ปน สพฺพถา อุทกุกฺเขปสีมายเมว กมฺมํ กาตพฺพํ, โสเธตุํ ทุกฺกรตฺตา’’ติ วจนมฺปิ นิรตฺถกํ ภเวยฺย เอวญฺจ ปน วเทยฺย… สพฺพโส สมุทฺทสีมาย อลพฺภมานตํ สนฺธาย ‘‘สมุทฺเท ปนา’’ตฺยาทิวจนํ อาจริยวเรน วุตฺตนฺติ ตถาปิ น วตฺตพฺพํ กสฺมา เอวญฺจ อตฺเถ อิจฺฉมาเน สติ ‘‘สมุทฺเท ปน สพฺพตฺถ อุทกุกฺเข ปสีมาว ลพฺภตี’’ติ วตฺตพฺพํ สิยา นเนวํ วุตฺตํ. อถวา ปกรณาทิวเสน สทฺทตฺเถ วิภชฺชียมาเนปิ วิรุชฺฌเตว กถํ สํโยควเสน ‘‘สวจฺฉํ เธนุมาเนหี’’ติ วุตฺเต ‘‘คาวี’’ติ วิญฺญายติ, น วฬวา. ‘‘อวจฺฉํ เธนุ’’นฺติ วุตฺเต คาวีติ วิญฺญายติ, น วฬวาติ เอตฺถ วิย กทาจิปิ เอวสทฺเทน นิวตฺเตตพฺพสฺส สมุทฺทสฺส นทิยมิว นาติทีฆภาเว อลพฺภมาเน สติ ‘‘สมุทฺเท ปน สพฺพถา อุทกุกฺเขปสีมายเมว กมฺมํ กาตพฺพ’’นฺติ เอวกาเรน อวตฺตพฺพํ สิยา, ตถา หิ สํโยควิปฺปโยควเสน ‘‘สวจฺฉํ เธนุํ, อวจฺฉํ เธนุ’’นฺติ วุตฺเต คาวีติ วิญฺญายติ, น วฬวา. วฬวา จ นาม โยนิมคฺคสฺส อติสมฺพาธตฺตา วิชายิตุํ น สกฺโกนฺติ, คพฺภสฺส ปริณตกาเล กุจฺฉึ ผาเลตฺวา อาชญฺญโปตกํ คณฺหนฺติ เอวํ เอกคพฺเภเนว มรนฺติ ตสฺมา ‘‘วฬวํ สวจฺฉ’’นฺติวา อวจฺฉ’’นฺติ วา วตฺตุํ นารหติ เอวเมว กทาจิปิ นาติทีฆสมุทฺทสฺสปิ อนุปลพฺภมานตฺตา ตํ นิวตฺตาปเกน เอวสทฺเทน ‘‘สมุทฺเท ปน สพฺพถา อุทกุกฺเขปสีมายเมว กมฺมํ กาตพฺพ’’นฺติ อปทิสิตุํ นารหติเยว ตสฺมา อุทกุกฺเขเปน สีมา อุปฺปชฺชตีติ นิฏฺฐเมตฺถาว คนฺตพฺพํ เตน วุตฺตํ ‘‘เอวญฺจ อตฺเถ อิจฺฉมาเน สติ สมุทฺเท ปน [Pg.62] สพฺพถา อุทกุกฺเขปสีมาว ลพฺภตีติ วตฺตพฺพํ สิยา น ปเนวํ วุตฺต’’นฺติ เตน ญายติ วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ วาลิกาทีหิ ขิปนนฺติ อปิจ วิมติวิโนทนิยํเยว ‘‘คจฺฉนฺติยา ปน นาวาย กาตุํ น วฏฺฏติ. กสฺมา อุทกุกฺเขปมตฺตเมว หิ สีมา, ตํ นาวา สีฆเมว อติกฺกเมติ เอวํ สติ อญฺญิสฺสา สีมาย ญตฺติ, อญฺญิสฺสา อนุสาวนา โหตี’’ติ อิมสฺส สํวณฺณนาธิกาเร ตนฺติ สีมํ. สีฆเมว อติกฺกเมตีติ อิมินา ตํ อนติกฺกมิตฺวา อนฺโต เอว ปริวตฺตมานาย กาตุํ วฏฺฏตีติ ทสฺเสติ. เอตทตฺถเมว หิ วาลิกาทีหิ สีมาปริจฺฉินฺทนํ. อิตรถา ‘‘พหิปริวตฺตา นุโข โน วา’’ติ กมฺมโกปสงฺกา ภเวยฺย. อญฺญิสฺสา อนุสาวนาติ เกวลาย นทีสีมาย อนุสาวนา’ติ อาจริยวเรน วุตฺตํ. ยทิสี มาเปกฺขาย สห อตฺตโน สภาเวน อุทกุกฺเขปสีมา อุปฺปชฺเชยฺย, เอวํ สติ นาวาย คตคตฏฺฐาเน สมนฺตโต สภา วิย ปริขิปิตฺวา อุทกุกฺเขปสีมา อุปฺปชฺเชยฺย, อุปฺปชฺชมาเนปิ จ อญฺญิสฺสา อนุสาวนาติ จ อปราย อุทกุกฺเขปสีมาย อนุสาวนาติ วตฺตพฺพํ ภเวยฺย น ปเนวํ วุตฺตํ อถาปิ วเทยฺย ‘‘ปฐโมติณฺณฏฺฐาเนเยว สีมาเปกฺขา โหติ, คตคตฏฺฐาเน นตฺถี’’ติ, ตมฺปิ วจนํ อยุตฺตเมว. กสฺมา ยาว กมฺมํ น นิปฺผนฺนํ, ตาว สีมาเปกฺขาย วินา อสมฺภวโต เตน ญายติ ‘‘วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ อุทกุกฺเขปํ วินา สีมาเปกฺขาย สเหว อตฺตโน สภาเวน อุทกุกฺเขปสีมา นุปฺปชฺชตี’’ติ นิฏฺฐเมตฺถาว คนฺตพฺพํ ตสฺมา นาวาย กมฺมํ กโรนฺเตหิ ถิรตรํ กตฺวา นาวํ อคมนียํ กตฺวาว กาตพฺพํ. สารตฺถทีปนิยมฺปิ ‘‘คจฺฉนฺติยา ปน นาวาย กาตุํนวฏฺฏตีติ เอตฺถ อุทกุกฺเขปํ อนติกฺกมิตฺวา ปริวตฺตมานาย กาตุํ วฏฺฏตีติ เวทิตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. เอวญฺจ ปน วเทยฺย ‘‘ยาว ปริสา วฑฺฒติ, ตาว สีมาปิ วฑฺฒติ ปริสปริยนฺตโต อุทกุกฺเขโปเยว ปมาณนฺติ วินยฏฺฐกถายํ วุตฺตตฺตา ปริสวเสน วฑฺฒมานา อุทกขิปนํ วินาเยว วฑฺฒติ อุปจารสีมา วิย ตสฺมา อุทกุกฺเขเปน ปโยชนํ นตฺเถวา’’ติ. ตํ นุ, อยญฺเหตฺถตฺโถ… อุทกุกฺเขปสีมา นาเมสา วฑฺฒมานา ปริสวเสเนว วฑฺฒติ พทฺธสีมายํ ปน วฑฺฒมานา สมูหวเสน วฑฺฒติ. กสฺมา ปริสวเสน วฑฺฒมานา ปริสปริยนฺตโต อุทกุกฺเขโป กาตพฺโพติ. อปเร เอวํ วทนฺติ ปุพฺเพ อุทกุกฺเขโปเยว ปมาณํ, ปุน อุทกุกฺเขปกิจฺจํ นตฺถิ, กถินตฺถตสาฏกทานกมฺมวาจาวิย [Pg.63] ตถา หิ กถินตฺถตสาฏกทานกาเล วุตฺตกมฺมวาจา เอกาเยววฏฺฏติ, อตฺถเตเยว กถิเน ปุน วรสาฏกํ ลภิตฺวา กมฺมวาจาย ทานกิจฺจํ นตฺถิ เอวเมว เอตฺถาปิ ปุพฺเพ อุทกุกฺเขโปเยว ปมาณํ, ปุน อุทกุกฺเขปกิจฺจํ นตฺถีติ เต อุปจารสีมายมิว มญฺญิตฺวา วทนฺติ อุปจารสีมายญฺหิ ปุริสาย นิสินฺนฏฺฐานเมว อุปจารสีมาภาเวน วฑฺฒติ อิธ ปน ปริสปริยนฺตโต อุทกุกฺเขปปฺปมาเณน วฑฺฒติเยว น อุทกุกฺเขปํ วินาว อิชฺฌเต ‘‘กถํ ปน อุทกํ อุกฺขิปิตพฺพํ ยถา อกฺขธุตฺตา ทารุคุฬํ ขิปนฺติ, เอวํ อุทกํ วา วาลิกํ วา หตฺเถน คเหตฺวา ถามมชฺฌิเมน ปุริเสน สพฺพถาเมน ขิปิตพฺพํ, ยตฺถ เอวํ ขิตฺตํ อุทกํ วา วาลิกํ วา ปตติ, อยเมโก อุทกุกฺเขโป’’ติ อฏฺฐกถาวจนํ ภินฺทนฺติ นาม. กิมิวาติ เจ, เย ปน ‘‘กมฺมเมว กมฺมกรณํ กโรติ, นตฺถิ นิรยปาลา’’ติ วทนฺติ, เต ‘‘อตฺถิ ภิกฺขเว นิรเย นิรยปาลา’’ติ เทวทูตสุตฺตํ ภินฺทนฺติ วิยาติ. เอวญฺจปน วเทยฺย เย อุทกุกฺเขเปน สห อิชฺฌนฺติ, เตปิ ‘‘สเจปิ หิ ภิกฺขุสหสฺสํ ติฏฺฐติ, ตสฺส ฐิโตกาสสฺส พาหิรนฺตโต ปฏฺฐาย ภิกฺขูนํ วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ สีมาเปกฺขาย อุปฺปนฺนาย ตาย สห สยเมว สญฺชาตา สตฺตพฺภนฺตรสีมา สมานสํวาสกาติ อธิปฺปาโย. ยตฺถ ปน ขุทฺทเก อรญฺเญ มหนฺเตหิ วา ภิกฺขูหิ ปริปุณฺณตาย วคฺคกมฺมสงฺกาภาเวน สตฺตพฺภนฺตรสีมาเปกฺขา นตฺถิ, ตตฺถ สตฺตพฺภนฺตรสีมา น อุปฺปชฺชติ, เกวลารญฺญสีมายเมว ตตฺถ สงฺเฆน กมฺมํ กาตพฺพํ นทีอาทีสุปิ เอเสวนโย’’ติ วิมติ วิโนทนิยํ วุตฺตวจนํ ภินฺทนฺติ นามาติ. ตํ น, เตน โน กา หานิ เอวมฺปิ อมฺหากํ วาเท โกจิ วิโรโธ น วิชฺชเตว. กสฺมาติ เจ, อิเม ทฺเว สทฺทรจนาปิ อสมฺพนฺธาว ภินฺนลกฺขณา ภินฺนวิสยา เจตา สีมา. กถํ สทฺทรจนา อสมฺพนฺธา. ยถา อรญฺเญ ตตฺถ สตฺตพฺภนฺตรสีมา น อุปฺปชฺชติ, เกวลารญฺญเมวาติ วุจฺจติ, เอว เมว ‘‘นทิยาปิ สพฺพตฺถ สงฺโฆ นิสีทติ, อุทกุกฺเขปสีมา นุปฺปชฺชตี’’ติ อวตฺวา ‘‘อุทกุกฺเขปสีมา กมฺมํ นตฺถี’’ติ กฺริยาปรามสนวเสน วุตฺตํ. กริตพฺพํ กมฺมํ. กึ ตํ, ขิปนํ. เอวมฺปิ สทฺทรจนา อสมฺพนฺธาว. ‘‘วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ…เป… อุทกุกฺเขปสีมา สตฺตพฺภนฺตรสีมา อุปฺปชฺชติ, นาสตี’’ติ เอตฺถ ‘‘นาสตี’’ติ อิมสฺส อุทกุกฺเขเปน วินาปีติ อตฺโถปิ ยุชฺชเตว. กสฺมาติ เจ ‘‘สีมาเปกฺขาย สติเอวา’’ติ อิมินา อนุโลมนยวเสน ‘‘สีมาเปกฺขาย อสติ [Pg.64] นุปฺปชฺชตี’’ติ อตฺโถ ยุชฺชเตว. เกจิปน ‘‘สมนฺตา อพฺภนฺตรํ มินิตฺวา ปริจฺเฉทกรเณเนว สีมา สญฺชายติ, น สยเมวา’’ติ วทนฺติ ตํ น คเหตพฺพํ. ยทิ หิ…เป… ยถา เจตฺถ, เอวํ อุทกุกฺเขปสีมายปิ นทีอาทีสุปิ ตตฺถาปิ หิ มชฺฌิมปุริโส น ญายติ, ตถา สพฺพถาเมน ขิปนนฺติ อิมินาปิ วจเนน อาจริยวรสฺส อุทกุกฺเขเปน สเหว สีมาเปกฺขาย สติ อุทกุกฺเขปสีมา อุปฺปชฺชติ, นาสตีติ อธิปฺปาโย ญายติ. กถํ ภินฺนลกฺขณา, คามสีมสตฺตพฺภนฺตรอุทกุกฺเขปสีมา กิญฺจาปิ อพทฺธสีมสามญฺเญน สมานา, น ปน สมานลกฺขณา ตถา หิ ‘‘อสมฺมตาย ภิกฺขเว สีมาย อฏฺฐปิตาย ยํ คามํ วา นิคมํ วา อุปนิสฺสาย วิหรติ, ยา ตสฺส คามสฺส วา คามสีมา, นิคมสฺส วา นิคมสีมา, อยํ ตตฺถ สมานสํวาสา เอกูโปสถา’’ติ อิมสฺมึ สิกฺขาปเท ขุทฺทโก วา มหนฺโต วา สพฺโพปิ คามปเทโส คามสีมาติ อนุญฺญาตา, น สตฺตพฺภนฺตรสีมาย วิย สมนฺตา เลฑฺฑุปาตุกฺเขเปน อนุญฺญาตา อพฺภนฺตรสีมายปิ อคามเก เจ อรญฺเญ ยํ นิสฺสาย วิหรติ, ตสฺส อรญฺญสฺส อรญฺญสีมาติ นานุญฺญาตา ตถา นทีสมุทฺทชาตสฺสเรสุปิ คามสีมายมิว สพฺโพ นทีสมุทฺทชาตสฺสรปเทโส นทีสมุทฺทชาตสฺส รสีมาติ เอวเมว น อนุญฺญาตา ตถา อพฺภนฺตรสีมายมิว สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตราติ วา นานุญฺญาตา เอวมิมา คามสีมสตฺตพฺภนฺตรอุทกุกฺเขปสีมา ภินฺนลกฺขณา, ตสฺมา ภควตา ปญฺญตฺตสิกฺขาปทานุสาเรเนว คามสีมายปิ ขุทฺทโก วา มหนฺโต วา สพฺโพ คามปเทโส คามสีมาว โหติ, สตฺตพฺภนฺตรสีมายปิ ‘‘สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตรา’’ติ ปญฺญตฺตสิกฺขาปทานุสาเรน สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตรสีมา สีมาเปกฺขาย สห สยเมว อุปฺปชฺชตี’’ติ มินนามินนวิจารณา ปน นิรตฺถกาว ตถา อุทกุกฺเขปสีมายปิ ‘‘มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา อุทกุกฺเขปา’’ติ ปญฺญตฺตสิกฺขาปทานุรูปํ อุทกุกฺเขเปน สเหว อุปฺปชฺชตีติ นตฺถิ ขิปนาขิปน วิจารณาย ปโยชนนฺติ. กถํ ภินฺนวิสยา สตฺตพฺภนฺตรสีมา อรญฺญวิสยา, อุทกุกฺเขปสีมา นทีสมุทฺทชาตสฺสรวิสยา, เอวมฺปิ เอตา คามสีมสตฺตพฺภนฺตรอุทกุกฺเขปสีมา ภินฺนวิสยาว ตสฺมา ‘‘นทีอาทีสุ เอเสว นโย’’ติ วุตฺเตปิ สตฺตพฺภนฺตรสีมา อเปกฺขาย สเหว อตฺตโน สภาเวเนว สตฺตพฺภนฺตรสีมา อุปฺปชฺชติ ยถา. เอวเมว อุทกุกฺเขปสีมายปิ [Pg.65] อเปกฺขาย สห อุทกุกฺเขปํ กตฺวาว วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ อุทกุกฺเขปสีมา อุปฺปชฺชติ, น วินาติ สนฺนิฏฺฐานํ กาตพฺพํ. นนุ จ มาติกาฏฺฐกถายํ ปริจฺเฉทพฺภนฺตเร หตฺถปาสํ วิชหิตฺวา ฐิโตปิ, ปริจฺเฉทา พหิ อญฺญํ ตตฺตกํเยว ปริจฺเฉทํ อนติกฺกมิตฺวา ฐิโตปิ กมฺมํ โกเปติ, อิทํ สพฺพอฏฺฐกถาสุ สินฺนิฏฺฐาน’นฺติ วุตฺตวจเน นวิรุชฺฌตีติ เจ. ตํ น, มาติกาฏฺฐกถายํ ‘‘สเจ ปน ทฺเวสงฺฆา วิสุํวิสุํ อุโปสถาทิกมฺมํ กโรนฺติ, ทฺวินฺนํ อุทกุกฺเขปานํ อนฺตเร อญฺโญ เอโก อุทกุกฺเขโป อุปจารตฺถาย ฐเปตพฺโพ’’ติ ทฺวินฺนํ สงฺฆานํ วิสุํ วิสุํ กมฺมกรณาธิกาเร วุตฺตตฺตา. สารตฺถทีปนิยมฺปิ ‘‘ตตฺถ อญฺญํ ตตฺตกํเยว ปริจฺเฉทํ อนติกฺกมิตฺวา ฐิโตปิ กมฺมํ โกเปตีติ อิทํ เนว ปาฬิยํ, น อฏฺฐกถายํ อุปลพฺภติ. ยทิ เจตํ ทฺวินฺนํ สงฺฆานํ วิสุํวิสุํ อุโปสถาทิกมฺมกรณาธิกาเร วุตฺตตฺตา อุทกุกฺเขปโต พหิ อญฺญํ อุทกุกฺเขปํ อนติกฺกมิตฺวา อุโปสถาทิกรณตฺถํ. ฐิโต สงฺโฆ สีมาสมฺเภทสมฺภวโต กมฺมํ โกเปตีติ อิมินา อธิปฺปาเยน วุตฺตํ สิยา. เอวํ สติ ยุชฺเชยฺย, เตเนว มาติกาฏฺฐกถายํ ลีนตฺถปฺปกาสนิยํ อญฺญํ ตตฺตกํเยว ปริจฺเฉทนฺติ ทุติยํ อุทกุกฺเขปํ อนติกฺกมนฺโตปิ โกเปติ. กสฺมา, อตฺตโน อุทกุกฺเขปสีมาย ปเรสํ อุทกุกฺเขปสีมาย อชฺโฌตฺถตตฺตา สีมาสมฺเภโท โหติ, ตสฺมา โกเปตี’ติ ‘‘อิทํ สพฺพอฏฺฐกถาสุ สนฺนิฏฺฐาน’’นฺติ จ อิมินา อธิปฺปาเยน วุตฺตนฺติ คเหตพฺพํ. สพฺพาสุปิ อฏฺฐกถาสุ สีมาสมฺเภทสฺส อนิจฺฉิตตฺตา เตเนว อตฺตโน จ อญฺเญสญฺจ อุทกุกฺเขปปริจฺเฉทสฺส อนฺตรา อญฺโญ อุทกุกฺเขโป สีมนฺตริกตฺถาย ฐเปตพฺโพติ วุตฺตํ. อญฺเญ ปเนตฺถ อญฺญถาปิ ปปญฺเจนฺติ, ตํ น คเหตพฺพ’นฺติ วตฺวา ปฏิกฺขิตฺตํ. ตสฺส ‘‘อนฺโตหตฺถปาสํ วิชหิตฺวา ฐิโต กมฺมํ โกเปตี’’ติ อิมินา ปริจฺเฉทโต พหิ ยตฺถกตฺถจิ ฐิโต กมฺมํ น โกเปตีติ ทีเปตีติ สารตฺถทีปนีวจเนนาปิ เอกสฺมึ สงฺฆสนฺนิปาเต ปริจฺเฉทโต พหิ อญฺญํ ตตฺตกํเยว ปริจฺเฉทํ อนติกฺกมิตฺวา ฐิโตปิ กมฺมํ น โกเปตีติ เวทิตพฺพเมตํ สารตฺถทีปนิยํเยว อิมมตฺถํ ทฬฺหิกรณวเสน อุทกุกฺเขปปฺปมาณา สีมนฺตริกา สุวิญฺเญยฺยตรา โหติ, สีมาสมฺเภทสงฺกา จ น สิยาติ สามิจิทสฺสนตฺถํ อญฺโญ อุทกุกฺเขโป สีมนฺตริกตฺถาย ฐเปตพฺโพ’ติ วุตฺตํ. ยตฺตเกน ปน สีมาสมฺเภโท น [Pg.66] โหติ, ตตฺตกํ ฐเปตุํ วฏฺฏติเยว, เตนาหุ โปราณา ‘‘ยตฺตเกน สีมสงฺกโร น โหติ, ตตฺตกมฺปิ ฐเปตุํ วฏฺฏติ. ขุทฺทกํ ปน น วฏฺฏตี’’ติ อิทมฺปิ อุทกุกฺเขปสีมาย ปริสวเสน วฑฺฒนโต สีมสมฺเภทสงฺกา สิยา. ตํ นิวารณตฺถเมว วุตฺตนฺติ. कहे गए दस हाथी कुलों के बल के अनुसार इसे समझना चाहिए। वहाँ 'काळावक' सामान्य हाथी कुल है; जो दस पुरुषों का शारीरिक बल है, वह एक काळावक हाथी का बल है। जो दस काळावकों का बल है, वह एक गङ्गेय का बल है। जो दस गङ्गेयों का बल है, वह एक पण्डर का बल है। जो दस पण्डरों का बल है, वह एक तम्ब का बल है। जो दस तम्बों का बल है, वह एक पिङ्गल का बल है। जो दस पिङ्गलों का बल है, वह एक गन्धहस्ती का बल है। जो दस गन्धहस्तियों का बल है, वह एक मङ्गल का बल है। जो दस मङ्गलों का बल है, वह एक हेम का बल है। जो दस हेमवतों का बल है, वह एक उपोसथ का बल है। जो दस उपोसथों का बल है, वह एक छद्दन्त का बल है। जो दस छद्दन्तों का बल है, वह एक तथागत का कायबल (शारीरिक बल) है। इसे 'नारायण' नामक बल भी कहा जाता है। वहाँ 'नारा' किरणों को कहते हैं, वे अनेक प्रकार की वहाँ से उत्पन्न होती हैं, इसलिए 'नारायण' वज्र है; अतः वज्र-संज्ञक बल भी इसका अर्थ है। वह सामान्य हाथियों की गणना से एक हजार अरब (कोटी-सहस्र) हाथियों का और पुरुषों की गणना से दस हजार अरब पुरुषों का बल होता है; यह तथागत का कायबल है। ऐश्वर्य आदि बलों का विधान तो उन-उन सूत्रों के अनुसार समझना चाहिए। 'मज्झिमपुरिस' (मध्यम पुरुष) नाम का अर्थ बढ़ई (वर्धकी) है; वह तथागत के बल की तुलना में सुमेरु पर्वतराज को सरसों के दाने से मापने वाले के समान है, जो सौ, हजार या लाख बार मापने पर भी असमर्थ है, यहाँ तक कि वह पैर के अँगूठे के बराबर भी ग्रहण करने में असमर्थ है। वह सामान्य पुरुष से बड़ा होने के कारण और मध्य में होने के कारण 'मज्झिमपुरिस' कहलाता है। तथागत की एक वितस्ति (बिलाँत) बढ़ई की तीन वितस्ति के बराबर होती है, बढ़ई के हाथ से वह डेढ़ हाथ होती है। इसी प्रकार बढ़ई की एक वितस्ति सामान्य पुरुष की दो वितस्ति के बराबर होती है, सामान्य पुरुष के हाथ से वह एक पूर्ण हाथ होती है। जैसा कि कुटिका-सिक्खापद की अट्ठकथा में कहा गया है कि सुगत की एक वितस्ति वर्तमान मध्यम पुरुष की तीन वितस्ति के बराबर और बढ़ई के हाथ से डेढ़ हाथ होती है। यहाँ 'मज्झिमपुरिस' से वह (बढ़ई) अभिप्रेत नहीं है। क्योंकि कुटिका-सिक्खापद में ही 'तीन हाथ' का अर्थ बढ़ई के हाथ से तीन हाथ है। जैसे 'प्रमाणयुक्त मंच' सामान्य वितस्ति से नौ वितस्ति प्रमाण वाला मंच कहा जाता है, वैसे ही यहाँ 'मज्झिमपुरिस' न कहकर अट्ठकथा में 'शक्तिशाली मध्यम पुरुष' (थाममज्झिमपुरिस) कहा गया है। सामान्य पुरुष वह है जिसके बारे में कहा गया है कि 'दस पुरुषों का कायबल एक काळावक हाथी का बल है'। वहाँ यद्यपि कुछ पुण्यवान राजा अजातशत्रु, जीवक कौमारभृत्य और स्त्रियों में विशाखा मृगारमाता आदि पाँच हाथियों का बल धारण करते हैं, फिर भी वे 'मज्झिमपुरिस' नहीं कहलाते, वे पुण्य के कारण विशेष पुरुष होने पर भी सामान्य पुरुष ही हैं। यहाँ तो सामान्य पुरुष ही 'शक्तिशाली मध्यम पुरुष' के रूप में अभिप्रेत है। 'उदकुक्खेपा' का अर्थ है जल के क्षेपण (फेंकने) से परिच्छिन्न (निर्धारित)। इसीलिए मातृका-अट्ठकथा की लीनत्थप्पकासिनी में कहा गया है कि 'उदकुक्खेपा' करण अर्थ में पंचमी विभक्ति है। 'जल के क्षेपण द्वारा'—यही यहाँ अर्थ है। नदियों, समुद्रों और प्राकृतिक सरोवरों में जो स्थान मध्यम पुरुष द्वारा चारों ओर सभा की सीमा से जल-क्षेपण द्वारा निर्धारित है, वह उन नदियों आदि लोक-व्यवहार में प्रसिद्ध अबद्ध सीमाओं में एक अन्य समान संवास वाली और एक उपोसथ वाली सीमा है। कङ्खावितरणी में कहा गया है कि जो मध्यम पुरुष के चारों ओर जल-क्षेपण की दूरी है, वह स्थान शक्तिशाली मध्यम पुरुष द्वारा चारों ओर जल फेंकने से निर्धारित है। वहाँ जैसे जुआरी लकड़ी की गुल्ली (दार्गुळ) फेंकते हैं, वैसे ही मध्यम पुरुष को जल या बालू हाथ में लेकर पूरी शक्ति से फेंकना चाहिए। जहाँ इस प्रकार फेंका गया जल या बालू गिरता है, वह 'उदकुक्खेप' कहलाता है। 'यह वहाँ समान संवास और एक उपोसथ वाली सीमा है'—इस अर्थ योजना के अनुसार यह उन नदियों आदि के भीतर ही प्राप्त होती है, बाहर नहीं। इसलिए नदी या प्राकृतिक सरोवर में जितने प्रदेश में सामान्य वर्षा काल के चार महीनों में जल व्याप्त रहता है, और समुद्र में जिस प्रदेश में सामान्य लहरें आकर ठहरती हैं, वहाँ से आगे 'कप्पिय-भूमि' (कल्प्य भूमि) है। अकाल या गर्मी के समय नदियों और सरोवरों के सूख जाने पर भी वही कप्पिय-भूमि रहती है। यदि सूखे सरोवर में बावड़ी खोदते हैं या खेती करते हैं, तो वह स्थान 'ग्राम-क्षेत्र' हो जाता है। जो यह कप्पिय-भूमि कही गई है, उससे बाहर जल-क्षेपण सीमा नहीं जाती, भीतर ही रहती है। इसलिए उनकी आंतरिक सभा की सीमा से शुरू करके चारों ओर जल-क्षेपण का निर्धारण करना चाहिए—ऐसा कहा गया है। गण्ठिपद में कहा गया है कि 'जो मध्यम पुरुष के चारों ओर जल-क्षेपण है', वह इस नदी में चतुर्वर्ग आदि संघों के अलग-अलग कर्म करते समय सीमा निर्धारण दिखाने के लिए कहा गया है, जैसे त्रिचीवर-विप्रवास निर्धारण दिखाने के लिए सात 'अब्भन्तर' सीमा का निर्धारण दिखाया जाता है। इसलिए जल-क्षेपण निर्धारण के अभाव में भी नदी के भीतर (कर्म) करना उचित है—ऐसा लिखा गया है। वहाँ 'जल-क्षेपण निर्धारण के अभाव में भी' यह पद महाअट्ठकथा के वचन 'चारों ओर जल-क्षेपण से परिच्छिन्न' या मातृका-अट्ठकथा और कङ्खावितरणी के वचन 'चारों ओर जल-क्षेपण निर्धारण करना चाहिए' से मेल नहीं खाता। विमतिविनोदनी के वचनों—'वहाँ भी मध्यम पुरुष नहीं जाना जाता, वैसे ही पूरी शक्ति से फेंकना' या 'इसी उद्देश्य के लिए बालू आदि से सीमा निर्धारण'—से भी यह मेल नहीं खाता। ग्रंथकार ने भी दूसरों के विवाद से बचने के लिए 'यह हमारा मत है' न कहकर 'आचार्याः' (आचार्य कहते हैं) कहकर अन्य कर्ताओं का निर्देश किया है और अंत में निष्कर्ष दिया है कि 'इस सब पर अच्छी तरह विचार करके और गुरु-कुल की सेवा करके जो उचित हो उसे ग्रहण करना चाहिए, शेष को छोड़ देना चाहिए'। इसलिए यह अन्य आचार्यों के मत से लिखा गया समझना चाहिए। अन्यथा तीनों संगीतियों में आरूढ़ अट्ठकथा वचनों और कङ्खावितरणी-विमतिविनोदनी के वचनों का लोप हो जाएगा, ग्रंथ भी परस्पर विरोधी हो जाएंगे, और भगवान द्वारा प्रज्ञप्त शिक्षापद भी शिष्यों के मत से संशोधित करने पड़ेंगे। भगवान द्वारा प्रज्ञप्त शिक्षापद का लोप नहीं करना चाहिए, जैसा प्रज्ञप्त है वैसा ही पालन करना चाहिए। जैसे—जानते हुए भी मद्यपान करने वाले भिक्षु को पाचित्तिय होता है, और श्रामणेर के लिए जानते हुए पीने पर शील-भेद होता है, न जानते हुए नहीं—वहाँ कारण खोजना चाहिए। शिक्षापद प्रज्ञप्ति केवल बुद्धों का विषय होने के कारण कारण नहीं खोजना चाहिए, जैसा प्रज्ञप्त है वैसा ही पालन करना चाहिए। इसलिए 'चारों ओर जल-क्षेपण' इस प्रज्ञप्त शिक्षापद के अनुरूप 'चारों ओर जल-क्षेपण से परिच्छिन्न' या 'जल फेंकना चाहिए' या 'जल-क्षेपण से परिच्छिन्न सीमा' या 'चारों ओर जल-क्षेपण निर्धारण करना चाहिए'—इन धर्म-संग्राहक स्थविरों के वचन ही प्रमाण हैं, क्योंकि वे बुद्ध के मत को जानने वाले हैं। और यह वचन न तो भगवान का प्रत्यक्ष वचन है और न ही संग्राहक स्थविरों का। अथवा 'जो मध्यम पुरुष के चारों ओर जल-क्षेपण है' वह इस नदी की... (पेय्याल)... सात अब्भन्तर सीमा के निर्धारण की तरह सीमा निर्धारण दिखाने के लिए कहा गया है—ऐसा आचार्य कहते हैं। इसलिए 'जल-क्षेपण निर्धारण के अभाव में भी नदी के भीतर करना उचित है'—इस अर्थ योजना में न तो धर्म-संग्राहक स्थविर सम्मिलित हैं और न ही ग्रंथकार। क्यों? क्योंकि तीनों संगीतियों में आरूढ़ विनय-अट्ठकथाओं में और उनकी व्याख्या रूप टीकाओं में 'जल-क्षेपण से परिच्छिन्न, जल फेंकना चाहिए, जल-क्षेपण निर्धारण करना चाहिए' आदि अनेक प्रकार से जल-क्षेपण निर्धारण ही लिखा गया है। इसलिए धर्म-संग्राहक स्थविर इसमें सम्मिलित नहीं हैं, ऐसा जाना जाता है। ग्रंथकार भी विवाद से बचने के लिए 'आचार्याः' कहकर अन्य कर्ताओं का निर्देश करता है, इसलिए ग्रंथकार भी इसमें सम्मिलित नहीं है, ऐसा जाना जाता है। और यह वचन कुछ स्थविरों का अपना मत (अत्तनोमति) है, और अपना मत सबसे दुर्बल होता है। सुमेरु पर्वतराज को सरसों के दाने से मापने वाले के समान सर्वज्ञ बुद्ध द्वारा प्रज्ञप्त 'उदकुक्खेप' शिक्षापद का अर्थ बताने वाले महाकश्यप, यश, मोग्गलिपुत्त तिस्स आदि और उनके शिष्यों-प्रशिष्यों तथा महाविहारवासियों के वचन को कौन व्यक्ति मिटा सकेगा? उपसंपदा आदि कर्मों के गुरु-कर्म होने और शासन का मूल होने के कारण गंभीरता से ही स्थित रहना चाहिए। 'जो मध्यम पुरुष के चारों ओर जल-क्षेपण है'—यह भगवान द्वारा प्रज्ञप्त है। क्या मध्यम पुरुष के जल-क्षेपण के योग्य स्थान ही जल-क्षेपण सीमा है, अथवा जल-क्षेपण द्वारा ही जल-क्षेपण सीमा होती है—इस आक्षेप का समाधान करते हुए अट्ठकथाचार्य कहते हैं कि 'जल कैसे फेंकना चाहिए' आदि। वहाँ 'कैसे' (कथं) कहने की इच्छा से पूछा गया प्रश्न है। किस कारण से जल फेंकना चाहिए? क्या जल छिड़कने के संक्षेप में फेंकना चाहिए? नहीं, बल्कि ढेला फेंकने या लकड़ी की गुल्ली फेंकने के तरीके से फेंकना चाहिए—यही अर्थ है। 'अक्खधुत्ता' (जुआरी) सामान्य रूप से कहे जाने पर भी, जैसे 'सिंह पूँछ हिलाता है' यहाँ अन्य शब्दों के सान्निध्य से अर्थ स्पष्ट होता है, वैसे ही 'लकड़ी की गुल्ली फेंकते हैं' इस अर्थ के कारण लकड़ी की गुल्ली से खेलने वाले धूर्त लोग समझे जाते हैं, क्योंकि 'अक्ख' शब्द जुए में रूढ़ है। 'दार्गुळ' का अर्थ है खराद पर चढ़ाकर आरे से बनाई गई लकड़ी की वस्तु... जैसे जुआरी धूर्त लोग लकड़ी की गुल्ली हाथ में लेकर अपना बल दिखाते हुए पूरी शक्ति से झुककर फेंकते हैं, वैसे ही शक्तिशाली मध्यम पुरुष द्वारा जल या बालू हाथ में लेकर अपना बल दिखाते हुए झुककर पूरी शक्ति से, बैठे हुए या खड़े हुए, सभा की सीमा के चारों ओर घूमकर फेंकना चाहिए। इस प्रकार फेंका गया जल या बालू जिस स्थान पर गिरता है, वह 'एक जल-क्षेपण' कहलाता है। 'यह एक जल-क्षेपण' इस पद से दो संघों के अलग-अलग कर्म करने के अधिकार में सीमांतरिक होने के कारण दूसरे जल-क्षेपण की संभावना भी दिखाई गई है। इसीलिए मातृका-अट्ठकथा में कहा गया है कि 'यदि दो संघ अलग-अलग उपोसथ आदि कर्म करते हैं, तो दो जल-क्षेपणों के बीच एक अन्य जल-क्षेपण उपचार के लिए रखना चाहिए'। विमतिविनोदनी में भी कहा गया है कि 'उसके भीतर' का अर्थ है उस जल-क्षेपण से परिच्छिन्न स्थान के भीतर; और न केवल उसके भीतर, बल्कि उससे बाहर भी एक जल-क्षेपण के भीतर स्थित होना उचित नहीं है, क्योंकि जल-क्षेपण निर्धारण को कठिनता से जानने के कारण कर्म के बिगड़ने की आशंका होती है। सारत्थदीपनी में तो 'उसके भीतर हस्तपाश छोड़कर स्थित होने वाला कर्म बिगाड़ता है'—इससे यह स्पष्ट होता है कि निर्धारण से बाहर कहीं भी स्थित होने वाला कर्म नहीं बिगाड़ता—ऐसा कहकर मातृका-अट्ठकथा के वचन का खंडन किया गया है। उसे एक संघ के सन्निपात के संदर्भ में कहा गया समझना चाहिए। जैसे महासीमा में खंडित करके बांधी गई खंड-सीमाओं के परस्पर संकर (मिश्रण) से बचने के लिए सीमांतरिक रखी जाती है, वैसे ही अपने स्वभाव से ग्राम-सीमा की तरह स्वयं उत्पन्न सीमा में नदी, समुद्र और प्राकृतिक सरोवरों की विशालता के कारण भगवान द्वारा जल-क्षेपण सीमा अनुमत है। फिर भी दो बद्ध सीमाओं की तरह परस्पर संकर से बचने के लिए दो जल-क्षेपण सीमाओं के बीच सीमांतरिक के लिए एक अन्य जल-क्षेपण रखना चाहिए—ऐसा कहा गया है। निमित्त वाली बद्ध-सीमा और जल-क्षेपण वाली जल-क्षेपण सीमा में सीमांतरिक की तरह एक जल-क्षेपण समझना चाहिए। इसीलिए विमतिविनोदनी में कहा गया है कि 'यहाँ यह सीमांतरिक विधान दो बद्ध सीमाओं की सीमांतरिक अनुमति वाले सूत्र के अनुरूप सिद्ध समझना चाहिए'। एक संघ के सन्निपात में तो एक जल-क्षेपण के बाहर स्थित होने वाला भी कर्म नहीं बिगाड़ता—ऐसा समझना चाहिए। विमतिविनोदनी में कहा गया है कि भगवान द्वारा निदान के वश से एक ग्राम-सीमा के आश्रित और एक ही स्वभाव वाली दो बद्ध सीमाओं का परस्पर संभेद और बिना सीमांतरिक के स्थित होना अनुमत ही है—ऐसा जानकर अट्ठकथाचार्यों ने यहाँ भी सीमांतरिक विधान किया। विजातीय सीमाओं का भी एक सीमा के आश्रित होना और एक स्वभाव वाला होना—इन दो अंगों के होने पर ही बिना सीमांतरिक के स्थिति संभेद के लिए होती है, अन्यथा नहीं—ऐसा समझना चाहिए। इस प्रकार नदी, समुद्र और प्राकृतिक सरोवरों में 'चारों ओर जल-क्षेपण' इस प्रज्ञप्त शिक्षापद के अनुरूप जल-क्षेपण द्वारा निर्धारण दिखाकर, छोटी नदी या सरोवर के प्रदेश में जल-क्षेपण के बिना ही अपने स्वभाव से ग्राम-सीमा की तरह सर्वथा कप्पिय-भाव दिखाने के लिए 'यदि वह बहुत लंबी नहीं है, उद्गम से लेकर' आदि कहा गया है। वहाँ 'उद्गम से लेकर' का अर्थ है जिस प्रदेश से अधिकतम चार महीने तक नदी बहती है, उसके ऊपरी भाग से लेकर। 'मुखद्वार तक' का अर्थ यहाँ नदी का तट ही अभिप्रेत है। 'सर्वत्र' का अर्थ है संपूर्ण नदी प्रदेश में जल-क्षेपण सीमा का कार्य नहीं है। जल-क्षेपण द्वारा प्रवृत्त सीमा 'उदकुक्खेप-सीमा' है। 'करितब्बं' (करना चाहिए) कार्य है, 'कर' धातु है। 'करण' मन के द्वारा सातवें कुशल जवन चित्त से उत्पन्न वायु धातु का विकार रूप काय-प्रयोग है; उस काय-प्रयोग द्वारा फेंका गया कार्य 'उद्धत' कहलाता है। परमार्थ रूप से तो काय-प्रयोग संज्ञक चित्त-ज-वायु-धातु के विस्तार से देशान्तर प्राप्ति कराने वाले आठ कलापों का समूह ही है। जल-क्षेपण सीमा का कार्य यहाँ छोटी नदी में नहीं है—यही अर्थ है। इसका अर्थ यह है कि यदि नदी बहुत लंबी नहीं है—आधा योजन, एक गाव्यूत या आधा गाव्यूत—तो उसके बहने के स्थान से लेकर नदी तट तक संपूर्ण नदी प्रदेश में संघ व्याप्त होकर बैठता है। वहाँ उस नदी प्रदेश में चारों ओर शेष नदी के अभाव में वर्ग-कर्म (अपूर्ण संघ द्वारा कर्म) की आशंका न होने से जल-क्षेपण सीमा का कार्य नहीं है, केवल नदी ही सीमा है—सारत्थदीपनी और मातृका-अट्ठकथा की लीनत्थप्पकासिनी में भी यही निष्कर्ष दिया गया है। विमतिविनोदनी में तो कहा गया है कि जहाँ छोटे जंगल में बहुत से भिक्षुओं के होने से वर्ग-कर्म की आशंका न होने के कारण सात अब्भन्तर सीमा की अपेक्षा नहीं है, वहाँ सात अब्भन्तर सीमा उत्पन्न नहीं होती, केवल अरण्य-सीमा ही होती है; वहाँ संघ द्वारा कर्म करना चाहिए। नदियों आदि में भी यही नियम है। जैसा कि कहा जाएगा—'यदि नदी बहुत लंबी नहीं है, उद्गम से लेकर मुखद्वार तक सर्वत्र संघ बैठता है, तो जल-क्षेपण सीमा का कार्य नहीं है' आदि दोनों स्थानों पर। जिस दिशा में सात अब्भन्तर या जल-क्षेपण का स्थान पर्याप्त नहीं है, वहाँ मापना या फेंकना कैसे होगा? ग्राम-क्षेत्र आदि में प्रवेश करने से अ-क्षेत्र में सीमा प्रविष्ट मानी जाएगी और सीमा विफल हो जाएगी। अपेक्षा होने पर सीमा की उत्पत्ति में जहाँ पर्याप्त स्थान है, वहाँ सात अब्भन्तर जल-क्षेपण सीमा स्वयं ही पूर्ण हो जाती है। जहाँ पर्याप्त नहीं है, वहाँ अपने क्षेत्र के प्रमाण से ही उत्पन्न होती है, बाहर नहीं—ऐसा कहा गया है। और यहाँ 'सीमा की अपेक्षा से सात अब्भन्तर जल-क्षेपण सीमा स्वयं ही पूर्ण उत्पन्न होती है'—ऐसा कहे जाने के कारण 'जल-क्षेपण के बिना ही अपेक्षा मात्र से जल-क्षेपण सीमा उत्पन्न होती है'—ऐसा जो अर्थ कहते हैं, वह अनुचित प्रतीत होता है। क्यों? क्योंकि यह पालि-नियम के विरुद्ध है और विमतिविनोदनी में आगे कहे गए वचनों के भी विरुद्ध है। और यह वचन आचार्य द्वारा कुछ व्यक्तियों के वाद को प्रकट करने के लिए कहा गया होगा। क्योंकि आगे कहे गए वचनों से मेल न खाने के कारण और पालि-अट्ठकथा-टीका के वचनों से भी विरुद्ध होने के कारण, हम उसका आगे वर्णन करेंगे। जैसे लोक में बाड़ लगाए बिना 'यह बाड़ का स्थान है' नहीं कहा जा सकता, और हल की नोक से जोते बिना 'यह जुता हुआ स्थान है' नहीं कहा जा सकता, और जैसे घर बनाने वाले मनुष्य कुल्हाड़ी आदि से वृक्षों को काटे बिना 'यह मेरी कुल्हाड़ी गिरने का स्थान है' नहीं कह सकते, और जैसे हँसिये से काटे बिना 'यह मेरा कटा हुआ स्थान है' नहीं कहा जा सकता, वैसे ही जल या बालू हाथ से फेंके बिना 'यह एक जल-क्षेपण है' या 'यह जल गिरने का स्थान है' नहीं कहा जा सकता। यहाँ दो भिक्षु इस प्रकार विवाद करते हैं—विमतिविनोदनी में कहा गया है कि 'जहाँ छोटे जंगल में बहुत से भिक्षुओं के होने से वर्ग-कर्म की आशंका न होने के कारण सात अब्भन्तर सीमा की अपेक्षा नहीं है, वहाँ सात अब्भन्तर सीमा उत्पन्न नहीं होती, केवल अरण्य-सीमा ही होती है; वहाँ संघ द्वारा कर्म करना चाहिए। नदियों आदि में भी यही नियम है। जैसा कि कहा जाएगा—यदि नदी बहुत लंबी नहीं है, उद्गम से लेकर मुखद्वार तक सर्वत्र संघ बैठता है, तो जल-क्षेपण सीमा का कार्य नहीं है आदि। इसी वचन से वर्ग-कर्म के परिहार के लिए सीमा की अपेक्षा होने पर ही जल-क्षेपण सीमा और सात अब्भन्तर सीमा उत्पन्न होती है, अन्यथा नहीं—ऐसा समझना चाहिए'। इस प्रकार जल-क्षेपण के बिना ही सभा की सीमा से शुरू करके सीमा की अपेक्षा के साथ ही जल-क्षेपण सीमा उत्पन्न होती है, इसलिए जल-क्षेपण का कोई प्रयोजन नहीं है—उन्हें ऐसा कहना चाहिए: 'हे सत्पुरुषों! ऐसा मत कहो और श्रेष्ठ आचार्य पर मिथ्या आरोप मत लगाओ। यह श्रेष्ठ आचार्य का 'नेय्य' (व्याख्या योग्य) वचन है, आगे आचार्य स्वयं निष्कर्ष कहेंगे। विनय-अट्ठकथाओं और सारत्थदीपनी में कहे गए वचनों से भी तुम्हारा वचन मेल नहीं खाता, विमतिविनोदनी के ही आगे कहे गए वचनों से भी यह नहीं जुड़ता'। यह 'नेय्य' वचन कैसे है? 'सीमा की अपेक्षा होने पर ही... (पेय्याल)... नष्ट होती है'—यहाँ सीमा की अपेक्षा के बिना मार्ग गमन, स्नान आदि के लिए भिक्षुओं के जंगल या नदियों आदि में प्रवेश करते ही सीमा उत्पन्न नहीं होती। सीमा की अपेक्षा होने पर ही जंगल में 'चारों ओर सात अब्भन्तर' इस प्रज्ञप्त शिक्षापद के अनुरूप अब्भन्तर सीमा उत्पन्न होती है; नदियों, समुद्रों और प्राकृतिक सरोवरों में भी 'मध्यम पुरुष के चारों ओर जल-क्षेपण' इस प्रज्ञप्त शिक्षापद के अनुरूप जल-क्षेपण के साथ ही जल-क्षेपण सीमा उत्पन्न होती है, जल-क्षेपण के बिना नहीं—यही इसका व्याख्या योग्य अर्थ है। 'नहीं होती' (नासंति) यहाँ 'जल-क्षेपण के बिना' यह अर्थ भी प्राप्त नहीं होता। और ऐसा होने पर विमतिविनोदनी में ही पुनः 'वहाँ' का अर्थ है लोक-व्यवहार में प्रसिद्ध इन तीन अबद्ध सीमाओं (नदी आदि) में पुनः वर्ग-कर्म के परिहार के लिए शासन-व्यवहार में प्रसिद्ध अबद्ध सीमा का निर्धारण दिखाना अभिप्रेत है। पालि में 'जो मध्यम पुरुष का...' आदि में जल फेंककर जहाँ गिराया जाता है वह 'उदकुक्खेपो' है, जल के गिरने का स्थान; इसलिए 'उदकुक्खेपा'। यहाँ पद-संबंध के अनुसार अर्थ यह है—'सभा की सीमा से शुरू करके चारों ओर जहाँ तक मध्यम पुरुष का जल-क्षेपण (जल गिरने का स्थान) है, वहाँ तक जो वह परिच्छिन्न स्थान है, वह उन नदियों आदि में दूसरी समान संवास वाली जल-क्षेपण सीमा है'—यह अर्थ पदों के अनुसार भी समान होगा। कुछ लोग तो कहते हैं कि 'चारों ओर अब्भन्तर को मापकर निर्धारण करने से ही सीमा उत्पन्न होती है, स्वयं नहीं', उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि... (पेय्याल)... जैसे यहाँ, वैसे ही जल-क्षेपण सीमा में भी, नदियों आदि में भी, 'वहाँ भी मध्यम पुरुष नहीं जाना जाता, वैसे ही पूरी शक्ति से फेंकना'—इस वचन से भी आचार्य का यही अभिप्राय जाना जाता है कि जल-क्षेपण के साथ ही सीमा की अपेक्षा होने पर जल-क्षेपण सीमा उत्पन्न होती है, अन्यथा नहीं। ये कैसे भिन्न लक्षण वाली हैं? ग्राम-सीमा, सात अब्भन्तर सीमा और जल-क्षेपण सीमा यद्यपि 'अबद्ध सीमा' होने के नाते सामान्य रूप से समान हैं, फिर भी वे समान लक्षण वाली नहीं हैं। जैसा कि 'हे भिक्षुओं! असममत (बिना बांधी गई) सीमा के न होने पर जिस ग्राम या निगम के आश्रय में रहता है, उस ग्राम की जो ग्राम-सीमा है या निगम की जो निगम-सीमा है, वह वहाँ समान संवास और एक उपोसथ वाली सीमा है'—इस शिक्षापद में छोटा या बड़ा संपूर्ण ग्राम प्रदेश 'ग्राम-सीमा' के रूप में अनुमत है, न कि सात अब्भन्तर सीमा की तरह चारों ओर ढेला फेंकने की दूरी से। अब्भन्तर सीमा में भी, यदि निर्जन जंगल में रहता है, तो उस जंगल की 'अरण्य-सीमा' के रूप में अनुमति नहीं दी गई है। वैसे ही नदियों, समुद्रों और प्राकृतिक सरोवरों में भी ग्राम-सीमा की तरह संपूर्ण नदी, समुद्र या सरोवर प्रदेश 'नदी-समुद्र-सरोवर सीमा' के रूप में अनुमत नहीं है। वैसे ही अब्भन्तर सीमा की तरह 'चारों ओर सात अब्भन्तर' के रूप में भी अनुमति नहीं दी गई है। इस प्रकार ये ग्राम-सीमा, सात अब्भन्तर सीमा और जल-क्षेपण सीमा भिन्न लक्षणों वाली हैं। इसलिए भगवान द्वारा प्रज्ञप्त शिक्षापद के अनुसार ही ग्राम-सीमा में छोटा या बड़ा संपूर्ण ग्राम प्रदेश ग्राम-सीमा ही होता है। सात अब्भन्तर सीमा में भी 'चारों ओर सात अब्भन्तर' इस प्रज्ञप्त शिक्षापद के अनुसार चारों ओर सात अब्भन्तर सीमा, सीमा की अपेक्षा के साथ स्वयं ही उत्पन्न होती है; मापने या न मापने का विचार निरर्थक ही है। वैसे ही जल-क्षेपण सीमा में भी 'मध्यम पुरुष के चारों ओर जल-क्षेपण' इस प्रज्ञप्त शिक्षापद के अनुरूप जल-क्षेपण के साथ ही उत्पन्न होती है, फेंकने या न फेंकने के विचार का कोई प्रयोजन नहीं है। ये कैसे भिन्न विषय वाली हैं? सात अब्भन्तर सीमा जंगल के विषय में है, जल-क्षेपण सीमा नदी, समुद्र और प्राकृतिक सरोवर के विषय में है। इस प्रकार ये ग्राम-सीमा, सात अब्भन्तर सीमा और जल-क्षेपण सीमा भिन्न विषयों वाली ही हैं। इसलिए 'नदियों आदि में भी यही नियम है'—ऐसा कहे जाने पर भी, जैसे सात अब्भन्तर सीमा अपेक्षा के साथ अपने स्वभाव से ही उत्पन्न होती है, वैसे ही जल-क्षेपण सीमा में भी अपेक्षा के साथ जल-क्षेपण करके ही वर्ग-कर्म के परिहार के लिए जल-क्षेपण सीमा उत्पन्न होती है, बिना उसके नहीं—यही निष्कर्ष निकालना चाहिए। क्या मातृका-अट्ठकथा में यह नहीं कहा गया है कि 'निर्धारण के भीतर हस्तपाश छोड़कर स्थित होने वाला भी, और निर्धारण के बाहर उतनी ही दूरी के भीतर स्थित होने वाला भी कर्म बिगाड़ता है, यह सभी अट्ठकथाओं का निष्कर्ष है'? यह (विरोध) नहीं है, क्योंकि मातृका-अट्ठकथा में 'यदि दो संघ अलग-अलग उपोसथ आदि कर्म करते हैं, तो दो जल-क्षेपणों के बीच एक अन्य जल-क्षेपण उपचार के लिए रखना चाहिए'—यह दो संघों के अलग-अलग कर्म करने के अधिकार में कहा गया है। सारत्थदीपनी में भी कहा गया है कि 'वहाँ उतनी ही दूरी के भीतर स्थित होने वाला भी कर्म बिगाड़ता है—यह न तो पालि में है और न ही अट्ठकथा में प्राप्त होता है। यदि यह दो संघों के अलग-अलग उपोसथ आदि कर्म करने के अधिकार में कहा गया है, तो जल-क्षेपण से बाहर दूसरे जल-क्षेपण की दूरी के भीतर उपोसथ आदि करने के लिए स्थित संघ सीमा-संभेद की संभावना के कारण कर्म बिगाड़ता है—इसी अभिप्राय से कहा गया होगा। ऐसा होने पर यह उचित होगा। इसीलिए मातृका-अट्ठकथा की लीनत्थप्पकासिनी में 'उतनी ही दूरी' का अर्थ है दूसरे जल-क्षेपण की दूरी के भीतर रहने वाला भी बिगाड़ता है। क्यों? अपनी जल-क्षेपण सीमा में दूसरों की जल-क्षेपण सीमा के व्याप्त हो जाने से सीमा-संभेद होता है, इसलिए बिगाड़ता है—'यह सभी अट्ठकथाओं का निष्कर्ष है'—इसे इसी अभिप्राय से ग्रहण करना चाहिए। सभी अट्ठकथाओं में सीमा-संभेद अनपेक्षित है, इसीलिए अपनी और दूसरों की जल-क्षेपण सीमा के बीच एक अन्य जल-क्षेपण सीमांतरिक के लिए रखना चाहिए—ऐसा कहा गया है। अन्य लोग यहाँ दूसरी तरह से विस्तार करते हैं, उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए—ऐसा कहकर खंडन किया गया है। 'उसके भीतर हस्तपाश छोड़कर स्थित होने वाला कर्म बिगाड़ता है'—इससे यह स्पष्ट होता है कि निर्धारण से बाहर कहीं भी स्थित होने वाला कर्म नहीं बिगाड़ता—सारत्थदीपनी के इस वचन से भी एक संघ के सन्निपात में निर्धारण के बाहर उतनी ही दूरी के भीतर स्थित होने वाला भी कर्म नहीं बिगाड़ता—यह समझना चाहिए। सारत्थदीपनी ही इस अर्थ को पुष्ट करते हुए कहती है कि जल-क्षेपण प्रमाण वाली सीमांतरिक अधिक सुबोध होती है, और सीमा-संभेद की आशंका भी नहीं होती; इसलिए शिष्टाचार दिखाने के लिए 'एक अन्य जल-क्षेपण सीमांतरिक के लिए रखना चाहिए'—ऐसा कहा गया है। जितनी दूरी से सीमा-संभेद नहीं होता, उतनी दूरी रखना उचित ही है। इसीलिए प्राचीन आचार्यों (पोरणा) ने कहा है—'जितनी दूरी से सीमा-संकर नहीं होता, उतनी दूरी रखना उचित है, कम दूरी उचित नहीं है'। यह भी जल-क्षेपण सीमा में सभा के अनुसार बढ़ने के कारण सीमा-संभेद की आशंका होने पर, उसके निवारण के लिए ही कहा गया है। ปาฬึ อฏฺฐกถญฺเจว, ฏีกาวิมติอาทิเก; โอโลเกตฺวา ปุนปฺปุนํ, มญฺญนฺตุ กวิปุงฺควาติ; อยเมตฺถ อุทกุกฺเขปสีมาย วิจารณา. पालि, अट्ठकथा, टीका और विमति-विच्छेदनी आदि को बार-बार देखकर विद्वान श्रेष्ठ इसे समझें। यहाँ यह उदकुक्खेप सीमा का विचार है। ชนปทสีมา นาม เอกสฺส รญฺโญ วิชิเต ปวตฺโต มหามจฺจานํ นิวาสภูโต เอกเมโก ปเทโส ชนปทสีมา นาม. जनपद सीमा उसे कहते हैं जो एक राजा के विजित प्रदेश में स्थित हो और महामात्यों का निवास स्थान हो, ऐसा एक-एक प्रदेश जनपद सीमा कहलाता है। รฏฺฐสีมา นาม กาสิโกสลาทิกา โสฬส มหาชนปทา. ‘‘โสฬสมหานคร’’นฺติปิ เตสํ นามํ. ตตฺถ โสฬส มหาชนปทานิ นาม. องฺครฏฺฐํ, มคธรฏฺฐํ, โกสลรฏฺฐํ, วชฺชิรฏฺฐํ, เจติยรฏฺฐํ, กุรุรฏฺฐํ, ปญฺจาลรฏฺฐํ, มชฺฌรฏฺฐํ, สุรเสนรฏฺฐํ, อสฺสกรฏฺฐํ, อวนฺติรฏฺฐํ, คนฺธาลรฏฺฐํ, มลฺลรฏฺฐํ, กมฺโพชรฏฺฐนฺติ อิมานิ โสฬสมหาชนปทานิ นาม. อิเม โสฬสมหาชนปทา มชฺฌิมปเทเสเยว ปวตฺตา มหารฏฺฐา นาม ตทญฺเญปิ สุนาปรนฺตรฏฺฐาทิกา พหุตราว. ตถา ปจฺจนฺตวิสเยปิ รามญฺญาทิกา อเนกปฺปเภทา มหารฏฺฐา อตฺเถว เตปิ สพฺเพ รฏฺฐสีมา นาม. โลกิยสตฺเถสุ ปน ยสฺมึ ปเทเส ขตฺติยพฺราหฺมณเวสฺสสุทฺทวเสน จตุวณฺณานิ วสนฺติ, โส ปเทโส ‘‘มหารฏฺโฐ’’ติ ปวุจฺจติ. วุตฺตญฺเห ตํ โปราเณหิ. राष्ट्र सीमा का अर्थ है काशी, कोसल आदि सोलह महाजनपद। उन्हें 'सोलह महानगर' भी कहा जाता है। वहाँ सोलह महाजनपद ये हैं: अंग राष्ट्र, मगध राष्ट्र, कोसल राष्ट्र, वज्जि राष्ट्र, चेति राष्ट्र, कुरु राष्ट्र, पञ्चाल राष्ट्र, मज्झ राष्ट्र, सूरसेन राष्ट्र, अस्सक राष्ट्र, अवन्ति राष्ट्र, गन्धार राष्ट्र, मल्ल राष्ट्र, कम्बोज राष्ट्र - ये सोलह महाजनपद कहलाते हैं। ये सोलह महाजनपद मध्य प्रदेश में ही स्थित महान राष्ट्र हैं, इनके अतिरिक्त सुनापरन्त राष्ट्र आदि और भी बहुत से हैं। उसी प्रकार प्रत्यन्त प्रदेशों में भी रामञ्ञ आदि अनेक प्रकार के महान राष्ट्र हैं, वे सभी राष्ट्र सीमा कहलाते हैं। लौकिक शास्त्रों में तो जिस प्रदेश में क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र के भेद से चारों वर्ण निवास करते हैं, वह प्रदेश 'महान राष्ट्र' कहा जाता है। जैसा कि प्राचीन आचार्यों ने कहा है। ‘‘ปวตฺตา จตุวณฺณานํ, ยสฺมึ ปเทเส น วิชฺชเต; โส มิลกฺขุเทโส วุตฺโต, ปุญฺญภูมิ ตโต ปร’’นฺติ. जिस प्रदेश में चारों वर्णों की व्यवस्था विद्यमान नहीं है, उसे मिलक्ख (म्लेच्छ) देश कहा गया है, और उससे भिन्न पुण्यभूमि है। รชฺชสีมา นาม เอกสฺส รญฺโญ อาณาปวตฺตฏฺฐานํ รชฺชสีมา นาม. राज्य सीमा का अर्थ है एक राजा की आज्ञा जहाँ तक चलती है, वह स्थान राज्य सीमा कहलाता है। ทีปสีมา นาม สมุทฺทนฺตเร วา นทิมชฺเฌ วา ปวตฺตา ทีปา ทีปสีมา นาม. ยสฺมึ ปน ทีเป คามา วสนฺติ, โส คามสีมาตฺเวว สงฺขฺยํ คจฺฉติ, วกฺขติ หิ สุกฺเข ชาตสฺสเร วาปึ วา ขณนฺติ วปฺปํ วา กโรนฺติ, ตํ ฐานํ คามเขตฺตํ โหตีติ. द्वीप सीमा का अर्थ है समुद्र के भीतर या नदी के मध्य में स्थित द्वीप, द्वीप सीमा कहलाते हैं। जिस द्वीप में गाँव बसे हों, वह 'ग्राम सीमा' की ही गणना में आता है, क्योंकि आगे कहा जाएगा कि सूखे हुए प्राकृतिक सरोवर में यदि बावड़ी खोदते हैं या खेती करते हैं, तो वह स्थान ग्राम-क्षेत्र हो जाता है। จกฺกวาฬสีมา นาม ‘‘อายามโต จ วิตฺถารโต จ โยชนานํ ทฺวาทสสตสหสฺสานิ ตีณิสหสฺสานิ จตฺตาริสตานิ ปญฺญาสญฺจโยชนานิ. चक्रवाल सीमा का अर्थ है - आयाम (लंबाई) और विस्तार (चौड़ाई) में बारह लाख तीन हजार चार सौ पचास योजन। ปริกฺเขปโต परिधि (घेरे) से - ‘‘สพฺพํ [Pg.67] สตสหสฺสานิ, ฉตฺตึสปริมณฺฑลํ; ทสญฺเจว สหสฺสานิ, อฑฺฒุฑฺฒานิ สตานิจา’’ติ. कुल छत्तीस लाख दस हजार और साढ़े तीन सौ (योजन) परिमंडल (परिधि) है। วุตฺตํ เอกํ จกฺกวาฬํ จกฺกวาฬสีมา นาม. เอวํ ปนฺนรสปฺปเภทา โหติ สีมา. ตตฺถ อิทฺธิมา ปุคฺคโล ยสฺมึ ยสฺมึ วา สีเม อุโปสถาทิสงฺฆกมฺมํ กโรติ, ตตฺถ ตตฺถ คเต ภิกฺขู หตฺถปาสนยนํ วา พหิสีมกรณํ วา กาตุํ ฉนฺทารหานํ, ฉนฺทํ อาหริตฺวา กาตุํ สกฺกุเณยฺยภาโวเยว ปมาณํ. เอวมสกฺโกนฺเต อนิทฺธิมปุคฺคเล สนฺธาย อติมหนฺตารญฺเญ สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตรสีมา อนุญฺญาตา. ตตฺถ สีมาเปกฺขาย สห สมนฺตา สตฺตพฺภนฺตรสีมา อตฺตโน สภาเวเนว ชาตา ตถา นทีสมุทฺทชาตสฺสเรสุปิ มชฺฌิมสฺส ปุริสสฺส สมนฺตา อุทกุกฺเขปสีมา อนุญฺญาตา ตตฺถปิ วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ สีมาเปกฺขํ กตฺวา อุทกุกฺเขเปน สห อุทกุกฺเขปสีมา อุปฺปชฺชติ ตถา คามนิคมชนปทนครรฏฺฐรชฺชสีมาสุปิ วคฺคกมฺมปริหารตฺถํ พทฺธสีมา อนุญฺญาตา. ตโต ปเรสุ ปน คามสีมสตฺตพฺภนฺตรอุทกุกฺเขปสีมา นุญฺญาตสุตฺตานุโลมนยสามตฺถิยโต ขุทฺทเกสุ คามนิคมชนปทนคเรสุ ตตฺถ ตตฺถ คเต ภิกฺขู โสเธตฺวา ฉนฺทารหานํ ฉนฺทํ อาหริตฺวา สมคฺคสฺส สงฺฆสฺส อนุมติยาว อุโปสถาทิสงฺฆกมฺมํ กาตพฺพเมว ตถา ขุทฺทเก อรญฺเญปิ นทีชาตสฺสเรปิ ยถาสุขํ อุโปสถาทิสงฺฆกมฺมํ กาตพฺพเมวาติ. उक्त एक चक्रवाल, चक्रवाल सीमा कहलाता है। इस प्रकार सीमा के पंद्रह भेद होते हैं। वहाँ ऋद्धिमान पुद्गल जिस-जिस सीमा में उपोसथ आदि संघकर्म करता है, वहाँ-वहाँ आए हुए भिक्षुओं को हाथ के घेरे (हत्थपास) में लाना या सीमा से बाहर करना, अथवा जो छंद (सहमति) देने के योग्य हैं, उनका छंद लाकर कर्म करने की सामर्थ्य ही प्रमाण है। ऐसा करने में असमर्थ अ-ऋद्धिमान पुद्गल के लिए अति विशाल अरण्य में चारों ओर सात 'अब्भन्तर' की सीमा अनुमत है। वहाँ सीमा की अपेक्षा के साथ चारों ओर सात अब्भन्तर की सीमा अपने स्वभाव से ही उत्पन्न होती है। उसी प्रकार नदी, समुद्र और प्राकृतिक सरोवरों में मध्यम पुरुष के बल के अनुसार चारों ओर 'उदकुक्खेप' (जल-प्रक्षेप) सीमा अनुमत है। वहाँ भी वर्ग-कर्म के परिहार के लिए सीमा की अपेक्षा करके उदकुक्खेप के साथ उदकुक्खेप सीमा उत्पन्न होती है। उसी प्रकार ग्राम, निगम, जनपद, नगर, राष्ट्र और राज्य सीमाओं में भी वर्ग-कर्म के परिहार के लिए बद्ध सीमा अनुमत है। उससे भिन्न, ग्राम सीमा, सात अब्भन्तर और उदकुक्खेप सीमा के अनुमत सूत्रों के अनुलोम नय की सामर्थ्य से, छोटे ग्रामों, निगमों, जनपदों और नगरों में वहाँ-वहाँ आए हुए भिक्षुओं को शुद्ध करके, छंद के योग्य भिक्षुओं का छंद लाकर, समग्र संघ की अनुमति से ही उपोसथ आदि संघकर्म करना चाहिए। उसी प्रकार छोटे अरण्य में, नदी में और प्राकृतिक सरोवर में भी यथासुख उपोसथ आदि संघकर्म करना चाहिए। เอวํ ปริจฺฉินฺทนลกฺขเณน อเภเทปิ พทฺธาพทฺธวเสน ทุวิธา. ตปฺปเภเทน ปนฺนรสวิธา, สรูปวเสน ปน ขณฺฑสีมา, อุปจารสีมา, สมานสํวาสสีมา, อวิปฺปวาสสีมา, ลาภสีมา, คามสีมา. นิคมสีมา, นครสีมา, อพฺภนฺตรสีมา, อรญฺญสีมา, อุทกุกฺเขปสีมา, นทีสีมา, ชาตสฺสรสีมา, สมุทฺทสีมา, ชนปทสีมา, รฏฺฐสีมา, รชฺชสีมา, ทีปสีมา, จกฺกวาฬสีมาติเอกูนวีสปฺปเภเท ปิ สีเม วิปตฺติลกฺขณํ ปหาย สมฺปตฺติลกฺขณปฺปกาสกํ สีมวิโสธนีนาม ปกรณํ สมตฺตํ. इस प्रकार परिच्छेद के लक्षण से अभेद होने पर भी बद्ध और अबद्ध के भेद से सीमा दो प्रकार की है। उसके भेदों से पंद्रह प्रकार की है, किंतु स्वरूप के अनुसार - खण्ड सीमा, उपचार सीमा, समानसंवास सीमा, अविप्पवास सीमा, लाभ सीमा, ग्राम सीमा, निगम सीमा, नगर सीमा, अब्भन्तर सीमा, अरण्य सीमा, उदकुक्खेप सीमा, नदी सीमा, जातस्सर सीमा, समुद्र सीमा, जनपद सीमा, राष्ट्र सीमा, राज्य सीमा, द्वीप सीमा और चक्रवाल सीमा - इन उन्नीस प्रकार के भेदों वाली सीमाओं में विपत्ति के लक्षणों को त्यागकर संपत्ति के लक्षणों को प्रकाशित करने वाला 'सीमाविसोधनी' नामक प्रकरण समाप्त हुआ। อิติ इस प्रकार - ‘‘สีมวิโสธนึ นาม, นานาคนฺถสมาหฏํ; กริสฺสํ เม นิสาเมนฺตุ, สาธโว กวิปุงฺควา. अनेक ग्रंथों से संकलित इस 'सीमाविसोधनी' को मैं करूँगा, श्रेष्ठ विद्वान सज्जन इसे ध्यानपूर्वक सुनें। ปาฬึ [Pg.68] อฏฺฐกถญฺเจว, มาติกาปทภาชนึ; โอคาเหตฺวาน ตํ สพฺพํ, ปุนปฺปุนมเสสโต. पालि, अट्ठकथा और मातिका-पदभाजन - इन सबको पूर्णतः बार-बार अवगाहन करके। อตฺตโนมติคนฺเถสุ, ฏีกาคณฺฐิปเทสุ จ; วินิจฺฉยวิมตีสุ, มาติกาฏฺฐกถาสุปิ. अपने मति-ग्रंथों में, टीकाओं और गण्ठिपदों में, विनिश्चय और विमति-विच्छेदनी में, तथा मातिका-अट्ठकथाओं में भी। สพฺพํ อเสสกํ กตฺวา, สํสนฺทิตฺวาน เอกโต; ปวตฺตา วณฺณนา เอสา, โตสยนฺตี วิจกฺขเณ’’ติ. सबको पूर्ण रूप से एक साथ मिलाकर, यह व्याख्या प्रवृत्त हुई है, जो विद्वानों को संतुष्ट करने वाली है। อิเมสํ คาถาปทานํ อตฺโถ สพฺพโส สํวณฺณิโต โหติ. इन गाथा-पदों का अर्थ पूरी तरह से वर्णित हो गया है। สีมสมฺปตฺติกถา นิฏฺฐิตา. सीमा-सम्पत्ति कथा समाप्त हुई। ปริสสมฺปตฺตินาม เอกวีสติวชฺชนียปุคฺคเล วชฺเชตฺวา เอตรหิ ญตฺติจตุตฺถกมฺเมน อุปสมฺปนฺนา ภิกฺขู ปจฺจนฺติเมสุ ชนปเทสุ ปญฺจวคฺคโต ปฏฺฐาย, มชฺฌิเมสุ ชนปเทสุ ทสวคฺคโต ปฏฺฐาย สพฺเพ หตฺถปาสํ อวิชหิตฺวา นิสินฺนา โหนฺติ, อยํ ปริสสมฺปตฺติ นาม. ตตฺถ เอกวีสติ วชฺชนียา นาม ‘‘น ภิกฺขเว สค ฏฺฐาย ปริสายา’’ติ วจนโต เหฏฺฐา ‘‘น ภิกฺขเว ภิกฺขุนิยา นิสินฺนปริสาย ปาติโมกฺขํ อุทฺทิสิตพฺพ’’นฺติ อาทินานเยน วุตฺตา ภิกฺขุนี, สิกฺขมานา, สามเณโร, สามเณรี, สิกฺขาปจฺจกฺขาตโก, อนฺติมวตฺถุอชฺฌาปนฺนโก, อาปตฺติยา อทสฺสเน อุกฺขิตฺตโก, อาปตฺติยา อปฺปฏิกมฺเม อุกฺขิตฺตโก, ปาปิกาย ทิฏฺฐิยา อปฺปฏินิสฺสคฺเค อุกฺขิตฺตโก, ปณฺฑโก, เถยฺยสํวาสโก, ติตฺถิยปกฺกนฺตโก, ติรจฺฉานคโต, มาฆาตุตโก, ปิตุฆาตโก, อรหนฺตฆาตโก, ภิกฺขุนิทูสโก, สงฺฆเภทโก, โลหิตุปฺปาทโก, อุภโตพฺยญฺชนโกติ เต พหิสีมกรณวเสน นิสินฺนาติ อตฺโถ. ยทิ เต หตฺถปาเส วา สีเมเยว วา โหนฺติ, เต อวชฺเชตฺวา ปญฺจวคฺคาทิโก ปกตตฺตคโณ หตฺถปาสํ อวิชหิตฺวา นิสินฺโน โหติ, การกสงฺโฆ สาวชฺโช, กมฺมํปน น กุปฺปติ กสฺมา อวคฺคารหตฺตา. อปเรปน เอวํ วทนฺติ อนฺติมวตฺถุอชฺฌาปนฺนสฺส อวนฺทนีเยสุ อวุตฺตตฺตา, เตน สทฺธึ สยนฺตสฺส สหเสยฺยาปตฺติยา อภาวโต ตสฺส จ ปฏิคฺคหณสฺส รูหนโตติ ตเทว ยุตฺตตรนฺติ วิญฺญายติ, กิญฺจาปิ ยาว โส ภิกฺขุภาวํ ปฏิชานาติ, ตาว วนฺทิตพฺโพ. ยทา ปน ‘‘อสฺสมโณมฺหี’’ติ [Pg.69] ปฏิชานาติ, ตทา น วนฺทิตพฺโพติ อยเมตฺถ วิเสโส เวทิตพฺโพ. อนฺติมวตฺถุอชฺฌาปนฺนสฺส หิ ภิกฺขุภาวํ ปฏิชานนฺตสฺเสว ภิกฺขุภาโว, น ตโตปรํ. ภิกฺขุภาวํ อปฺปฏิชานนฺโต หิ อนุปสมฺปนฺนปกฺขํ ภชตีติ มชฺฌิมคณฺฐิปเท สารตฺถทีปนิยญฺจ วุตฺตตฺตา อนฺติมวตฺถุ อชฺฌาปนฺนปุพฺโพ ภิกฺขุ อตฺตโน การณํ อชานิตฺวาว เตน สห ปญฺจวคฺคคโณ อุโปสถาทิสงฺฆกมฺมํ กโรติ, การกสงฺโฆ อนวชฺโช, กมฺมมฺปิ น กุปฺปตีติ, เตสํ มติมตฺตเมว. กสฺมา สหเสยฺยาปตฺติ อภาโวปิ ตสฺส ภิกฺขุสญฺญาย ปติฏฺฐิตตฺตา, ปฏิคฺคหณรุหณสฺส จ ตสฺมึ ปุคฺคเล ภิกฺขูติ สทฺทหิตตฺตา เตน ปุคฺคเลน สหเสยฺยาปตฺติปิ นตฺถิ, ปฏิคฺคหณญฺจ รุหติ, เอกวีสติวชฺชนียปุคฺคเลปิ ตถาวิธสฺส อวิจาริกตฺตา เตน สห ปญฺจวคฺคคโณ อุโปสถาทิสงฺฆกมฺมํ กโรนฺโต การกสงฺโฆ อสญฺจิจฺจ อนุปวชฺโช. กมฺมํ ปน กุปฺปตีติ อมฺหากํ ขนฺติ, อิโต ยุตฺตตโร ลพฺภมาโน ปริเยสิตพฺโพว. 'परिषद-सम्पत्ति' का अर्थ है इक्कीस वर्जनीय व्यक्तियों को छोड़कर, वर्तमान में ज्ञप्ति-चतुर्थ कर्म द्वारा उपसम्पन्न भिक्षु, प्रत्यन्त जनपदों में पाँच के वर्ग से लेकर और मध्य जनपदों में दस के वर्ग से लेकर, सभी हत्थपास (हाथ के फास) को न छोड़ते हुए बैठे हों, यह परिषद-सम्पत्ति कहलाती है। वहाँ इक्कीस वर्जनीय व्यक्ति वे हैं जो "भिक्षुओं, अपनी सभा में नहीं" इस वचन के कारण नीचे "भिक्षुओं, भिक्षुणी की उपस्थिति वाली सभा में पातिमोक्ख का पाठ नहीं करना चाहिए" आदि विधि से कहे गए हैं: भिक्षुणी, शिक्षमाणा, श्रामणेर, श्रामणेरी, शिक्षा-प्रत्याख्यातक (जिसने शिक्षा छोड़ दी हो), अन्तिम वस्तु (पाराजिक) का अपराधी, आपत्ति न देखने के कारण उत्क्षिप्त, आपत्ति का प्रतिकर्म न करने के कारण उत्क्षिप्त, पापपूर्ण दृष्टि का त्याग न करने के कारण उत्क्षिप्त, पण्डक, स्तेय-संवासक (चोर की तरह रहने वाला), तित्थिय-पक्कन्तक (अन्य मत में गया हुआ), तिर्यक (पशु), मातृघाती, पितृघाती, अर्हन्तघाती, भिक्षुणी-दूषक, संघभेदक, लोहितुत्पादक (बुद्ध का रक्त निकालने वाला), उभय-व्यञ्जक—ये सीमा के बाहर करने के अर्थ में बैठे होते हैं। यदि वे हत्थपास में या सीमा में ही हों, तो उन्हें छोड़कर पाँच के वर्ग आदि वाला प्राकृत (सामान्य) गण हत्थपास को न छोड़ते हुए बैठा हो, तो कारक संघ सादोष है, परन्तु कर्म अमान्य नहीं होता क्योंकि वह वर्ग (अपूर्ण) नहीं है। दूसरे लोग ऐसा कहते हैं कि अन्तिम वस्तु के अपराधी का अवन्दनीय व्यक्तियों में उल्लेख नहीं होने के कारण, उसके साथ सोने पर 'सहशय्या' आपत्ति के अभाव के कारण और उसके द्वारा (भिक्षा आदि) ग्रहण के सिद्ध होने के कारण वही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है; यद्यपि जब तक वह भिक्षु-भाव को स्वीकार करता है, तब तक वह वन्दनीय है। जब वह स्वीकार करता है कि "मैं श्रमण नहीं हूँ", तब वह वन्दनीय नहीं है—यहाँ यह विशेषता समझनी चाहिए। क्योंकि अन्तिम वस्तु के अपराधी का भिक्षु-भाव तभी तक है जब तक वह भिक्षु-भाव को स्वीकार करता है, उसके बाद नहीं। भिक्षु-भाव को स्वीकार न करने वाला अनुपसम्पन्न पक्ष का सेवन करता है—ऐसा 'मज्झिमगण्ठिपद' और 'सारत्थदीपनी' में कहे जाने के कारण, अन्तिम वस्तु का अपराधी पूर्व भिक्षु अपने कारण को न जानते हुए ही उसके साथ पाँच का वर्ग गण उपोसथ आदि संघ-कर्म करता है, तो कारक संघ निर्दोष है और कर्म भी अमान्य नहीं होता—यह केवल उनका मत है। क्योंकि सहशय्या आपत्ति का अभाव भी उसकी भिक्षु-संज्ञा में प्रतिष्ठित होने के कारण है, और उस व्यक्ति में भिक्षु होने का विश्वास होने के कारण ग्रहण सिद्ध होता है, उस व्यक्ति के साथ सहशय्या आपत्ति भी नहीं होती और ग्रहण भी सिद्ध होता है; इक्कीस वर्जनीय व्यक्तियों में भी उस प्रकार के (अज्ञात अपराधी) के विषय में विचार न होने के कारण उसके साथ पाँच का वर्ग गण उपोसथ आदि संघ-कर्म करते हुए कारक संघ अनजाने में निर्दोष है। परन्तु कर्म अमान्य होता है—यह हमारी सम्मति है; इससे अधिक युक्तियुक्त जो प्राप्त हो, उसे खोजना चाहिए। ปริสสมฺปตฺติกถา นิฏฺฐิตา. परिषद-सम्पत्ति की कथा समाप्त हुई। เอวํ วตฺถุญตฺติอนุสาวนสีมปริสสมฺปตฺติวเสน ปญฺจหิ องฺเคหิ สมฺปนฺโนติ ปญฺจงฺโคติ วา สมคฺเคน สงฺเฆน ญตฺติจตุตฺเถน กมฺเมน อกุปฺเปน ฐานารเหน อุปริภาวํ สมาปนฺโนติ วา ทฺวีหิ การเณหิ ลทฺธนาโม ญตฺติ จตุตฺถอุปสมฺปนฺนภาโว อติทุลฺลโภว. इस प्रकार वस्तु, ज्ञप्ति, अनुसावन, सीमा और परिषद-सम्पत्ति के वश से पाँच अंगों से सम्पन्न होने के कारण 'पञ्चाङ्ग' अथवा समग्र संघ द्वारा ज्ञप्ति-चतुर्थ कर्म से, जो अमान्य न हो और स्थिति के योग्य हो, उच्च भाव (भिक्षुत्व) को प्राप्त होना—इन दो कारणों से नाम प्राप्त 'ज्ञप्ति-चतुर्थ उपसम्पदा' का भाव अत्यन्त दुर्लभ ही है। เอวํ พุทฺธุปฺปาโท ทุลฺลโภ, ตโต ปพฺพชฺชา จ อุปสมฺปทา จา ติ อิเมสํ ติณฺณํ ปทานํ อตฺโต วุตฺโตเยว โหติ. इस प्रकार बुद्ध का उत्पन्न होना दुर्लभ है, उसके बाद प्रव्रज्या और उपसम्पदा—इन तीन पदों का अर्थ कह ही दिया गया है। อิติ สาครพุทฺธิตฺเถรวิรจิเต สีมวิโสธเน इस प्रकार सागरबुद्धि स्थविर द्वारा रचित 'सीमा-विशोधन' में— อุปสมฺปทากณฺโฑ ปฐโม ปริจฺเฉโท. उपसम्पदा-काण्ड नामक प्रथम परिच्छेद। ๒. กปฺปวินาสกณฺโฑ २. कल्प-विनाश काण्ड। อิทานิ พุทฺธุปฺปาททุลฺลภกถา अब बुद्ध के प्रादुर्भाव की दुर्लभता की कथा। ‘‘พุทฺโธ จ ทุลฺลโภ โลเก, สทฺธมฺมสวนมฺปิ จ; สงฺโฆ จ ทุลฺลโภ โลเก, สปฺปุริสาติ ทุลฺลภา’’ติ. "लोक में बुद्ध का होना दुर्लभ है, और सद्धर्म का श्रवण भी; लोक में संघ दुर्लभ है, और सत्पुरुष भी दुर्लभ हैं।" อิมิสฺสา [Pg.70] คาถาย สํวณฺณนากฺกโม สมฺปตฺโต. ตตฺถ อิมสฺมึ สตฺตโลเก โอกาสโลเก วา สพฺพญฺญุสมฺมาสมฺพุทฺโธ ทุลฺลโภว ตถา เหส โลโก สงฺขารโลโก, สตฺตโลโก, โอกาสโลโกติ ติปฺปเภโท โหติ เตสํ สมฺปตฺติวิปตฺติ จ เอวํ เวทิตพฺพา ตตฺถ ลุชฺชติ ปลุชฺชตีติ โลโกติ วจนตฺเถน สตฺตโลโก เวทิตพฺโพ. โลกิยนฺติ ปติฏฺฐหนฺติ เอตฺถ สตฺตนิกายาติ วจนตฺเถน โอกาสโลโก เวทิตพฺโพ. ตถา เหส สตฺตา อวกสนฺติ เอตฺถาติโอกาโสติ วุจฺจติ โส ภูมิวเสน อปายภูมิ, กามสุคติภูมิ, รูปาวจรภูมิ, อรูปาวจรภูมิเจติ จตุพฺพิธา โหติ. ตตฺถ นิรยํ, ติรจฺฉานโยนิ, เปตฺติวิสโย, อสุรกาโย, ติ จตสฺโส อปายภูมิ นาม. มนุสฺสา, จาตุมหาราชิกา, ตาวตึสา, ยามา, ตุสิตา, นิมฺมานรติ, ปรนิมฺมิตวสวตฺตี เจติ สตฺตวิธา โหติ กามสุคติภูมิ สาปนายํ เอกาทสวิธาปิ กามตณฺหา อวจรติ เอตฺถาติ วจนตฺเถน กามาวจรภูมิ นาม. พฺรหฺมปาริสชฺชา, พฺรหฺมปุโรหิตา, มหาพฺรหฺมา จ ปฐมชฺฌานภูมิ อิทํ อคฺคินา ปริคฺคหิตฏฺฐานํ. ปริตฺตาภา, อปฺปมาณาภา, อาภสฺสรา จ ทุติยชฺฌานภูมิ อิทํ อาเปน ปริคฺคหิตฏฺฐานํ. ปริตฺตสุภา, อปฺปมาณสุภา, สุภกิณฺหา จ ตติยชฺฌานภูมิ อิทํ วาเตน ปริคฺคหิตฏฺฐานํ, เตสํ วิปตฺตึ ปรโต วณฺณยิสฺสาม. เวหปฺผลา, อสญฺญสตฺตา, สุทฺธาวาสา จ จตุตฺถชฺฌานภูมิเจติ รูปาวจรภูมิ โสฬสวิธา โหติ. อวิหา, อตปฺปา, สุทสฺสา, สุทสฺสี, อกนิฏฺฐาเจติ สุทฺธาวาสภูมิ ปญฺจวิธา โหติ. อากาสานญฺจายตนภูมิ, วิญฺญาณญฺจายตนภูมิ, อากิญฺจญฺญายตนภูมิ, เนวสญฺญานาสญฺญายตนภูมิเจติ จตุพฺพิธา โหติ อรูปภูมิ. เอตฺตาวตา เอกตึสปฺปเภทาปิ ภูมิ อวกสนฺติ เอตฺถ สตฺตนิกายาติ วจนตฺเถน โอกาโสติ วุจฺจติ. ตตฺถ อฏฺฐ มหานิรยานิ อปายภูมิ นาม. ติรจฺฉานํ เปตฺติวิสโย อสุรกาโยติ อิเมสํ วิสุํ ภูมิ นาม นตฺถิ, มนุสฺสภูมิยํเยว ยตฺถ กตฺถจิ อรญฺญวนปตฺถาทีสุ นิพทฺธวาสํ วสนฺติ โสเยว ปเทโส เตสํ ภูมิ. มนุสฺสภูมิโต ทฺวิตาลีสสหสฺสโยชโน ยุคนฺธรปฺปมาโณ สิเนรุโน ปญฺจมาฬินฺโธ จาตุมหาราชิกภูมิ. ตตุปริ ทฺวิตาลีสสหสฺสโยชนํ สิเนรุมตฺถกํ ตาวตึสานํ [Pg.71] ภูมิ. ตตุปริ ทฺเวตาลีสสหสฺสโยชนํ ฐานํ ยามานํ ภูมิ. อิมินา นเยน ยาว วสวตฺติภูมิ ทฺวิตาลีสสหสฺสโยชเน ติฏฺฐติ, ตสฺมา มนุสฺสภูมิโต ยาว วสวตฺติภูมิ ทฺเวสหสฺสานิปญฺจน หุตานิ ทุเวสตสหสฺสานิ โยชนานิ โหนฺติ, เตเนตํ วุจฺจติ. इस गाथा की व्याख्या का क्रम प्राप्त हुआ है। वहाँ, इस सत्त्वलोक या अवकाशलोक में सर्वज्ञ सम्यक्सम्बुद्ध दुर्लभ ही हैं; क्योंकि यह लोक संस्कारलोक, सत्त्वलोक और अवकाशलोक के रूप में तीन प्रकार का होता है, और उनकी संपत्ति तथा विपत्ति को इस प्रकार समझना चाहिए—वहाँ 'लुज्जति पलुज्जति' (टूटता है, नष्ट होता है) इस वचन के अर्थ से 'सत्त्वलोक' समझना चाहिए। जहाँ सत्त्व-निकाय स्थित होते हैं, इस अर्थ में 'अवकाशलोक' समझना चाहिए। क्योंकि जहाँ सत्त्व अवकाश (स्थान) प्राप्त करते हैं, उसे 'अवकाश' कहा जाता है; वह भूमि के भेद से चार प्रकार का होता है: अपायभूमि, कामसुगतिभूमि, रूपावचरभूमि और अरूपावचरभूमि। वहाँ निरय (नरक), तिर्यक योनि, प्रेतविषय और असुरकाय—ये चार 'अपायभूमि' कहलाती हैं। मनुष्य, चातुमहाराजिक, त्रायस्त्रिंश, याम, तुषित, निर्माणरति और परनिर्मितवशवर्ती—ये सात प्रकार की 'कामसुगतिभूमि' होती हैं; और यह ग्यारह प्रकार की भूमि 'कामावचरभूमि' कहलाती है क्योंकि यहाँ काम-तृष्णा विचरण करती है। ब्रह्मपारिसज्ज, ब्रह्मपुरोहित और महाब्रह्मा—ये प्रथम ध्यान की भूमियाँ हैं, यह अग्नि द्वारा परिगृहीत स्थान है। परीत्ताभ, अप्रमाणाभ और आभास्वर—ये द्वितीय ध्यान की भूमियाँ हैं, यह जल द्वारा परिगृहीत स्थान है। परीत्तशुभ, अप्रमाणशुभ और शुभकृत्स्न—ये तृतीय ध्यान की भूमियाँ हैं, यह वायु द्वारा परिगृहीत स्थान है; इनकी विपत्ति का वर्णन आगे करेंगे। वेहप्फल, असंज्ञसत्त्व और शुद्धावास—ये चतुर्थ ध्यान की भूमियाँ हैं; इस प्रकार रूपावचरभूमि सोलह प्रकार की होती है। अविह, अतप्प, सुदस्स, सुदस्सी और अकनिष्ठ—ये शुद्धावास भूमियाँ पाँच प्रकार की होती हैं। आकाशानन्त्यायतन भूमि, विज्ञानानन्त्यायतन भूमि, आकिंचन्यायतन भूमि और नैवसंज्ञानासंज्ञायतन भूमि—ये चार प्रकार की अरूपभूमियाँ हैं। इस प्रकार इकतीस प्रकार की भूमियाँ जहाँ सत्त्व-निकाय अवकाश प्राप्त करते हैं, उसे 'अवकाश' कहा जाता है। वहाँ आठ महानरक 'अपायभूमि' कहलाते हैं। तिर्यक, प्रेतविषय और असुरकाय की अलग से कोई भूमि नहीं है; मनुष्यभूमि में ही जहाँ कहीं अरण्य, वन आदि में वे निवास करते हैं, वही प्रदेश उनकी भूमि है। मनुष्यभूमि से बयालीस हजार योजन ऊपर, युगन्धर पर्वत के बराबर, सुमेरु की पाँचवीं वेदी चातुमहाराजिक भूमि है। उसके ऊपर बयालीस हजार योजन सुमेरु के शिखर पर त्रायस्त्रिंशों की भूमि है। उसके ऊपर बयालीस हजार योजन के स्थान पर याम देवों की भूमि है। इसी क्रम से वशवर्ती भूमि तक प्रत्येक के बीच बयालीस हजार योजन का अंतर है; इसलिए मनुष्यभूमि से लेकर वशवर्ती भूमि तक दो लाख बावन हजार योजन होते हैं, इसीलिए यह कहा गया है— ‘‘มนุสฺสภูมิโต ยาว, ภูมิ วสวตฺตนฺตรา; ทุเว สตสหสฺสานิ, ปญฺจนหุตเมว จ. “मनुष्यभूमि से लेकर वशवर्ती भूमि के बीच की दूरी; दो लाख और पाँच नहुत (पचास हजार) ही है। ทฺเวสหสฺสญฺจ มธิกํ, โยชนานํ ปมาณโต; คณนา นาม ภูมีสุ, สงฺขฺยา เอวํ ปกาสิตา’’ติ. और परिमाण में दो हजार योजन अधिक है; भूमियों की गणना में इस प्रकार की संख्या प्रकाशित की गई है।” ตตุปริ พฺรหฺมปาริสชฺชาทโย ตโย พฺรหฺมุโน ปญฺจปญฺญาสสตสหสฺส อฏฺฐสหสฺสโยชเน สมตเล ฐาเน ติฏฺฐนฺติ. ทุติยตติยภูมีพฺรหฺมุโนปิ ตปฺปมาเณสุ สมตเลสุ ติฏฺฐนฺติ. จตุตฺถภูมิยํ ปน เวหปฺผลอสญฺญสตฺตา ตปฺปมาเณ สมตเล ฐาเน ติฏฺฐนฺติ. ตตุปริสุทฺธาวาสภูมิโย ตํตํ ปมาเณ ฐาเน อุปรูปริ ติฏฺฐนฺติ. จตสฺโสปิ อรูปภูมิโย ตปฺปมาเณ ฐาเน อุปรูปริ ติฏฺฐนฺติ. เอตฺตาวตา จ มนุสฺสภูมิโต ยาว ภวคฺคา โยชนานํ สตฺตโกฏิ จ อฏฺฐารสลกฺขา จ ปญฺจนหุตานิ จ ฉสหสฺสานิ จ โหนฺติ เตเนตํ วุจฺจติ โปราเณหิ. उसके ऊपर ब्रह्मपारिसज्ज आदि तीन ब्रह्मलोक पचपन लाख आठ हजार (५५,०८,०००) योजन की दूरी पर समतल स्थान पर स्थित हैं। द्वितीय और तृतीय भूमि के ब्रह्मलोक भी उतनी ही दूरी के समतल स्थानों पर स्थित हैं। चतुर्थ भूमि में वेहप्फल और असंज्ञसत्त्व उतनी ही दूरी के समतल स्थान पर स्थित हैं। उसके ऊपर शुद्धावास भूमियाँ उस-उस परिमाण के स्थान पर एक के ऊपर एक स्थित हैं। चारों अरूपभूमियाँ भी उसी परिमाण के स्थान पर एक के ऊपर एक स्थित हैं। इस प्रकार मनुष्यभूमि से लेकर भवग्ग (अकनिष्ठ) तक सात करोड़ अठारह लाख छप्पन हजार (७,१८,५६,०००) योजन होते हैं, इसीलिए प्राचीन आचार्यों द्वारा यह कहा गया है— ‘‘เหฏฺฐิมา พฺรหฺมโลกมฺหา, ปติตา มหตี สิลา; อโหรตฺเตน เอเกน, อุคฺคตา อฏฺฐตาลีสํ. “सबसे निचले ब्रह्मलोक से गिराई गई एक बड़ी शिला; एक अहोरात्र (दिन-रात) में अड़तालीस हजार— โยชนานํ สหสฺสานิ, จาตุมาเสหิ ภูมิ; เอวํ วุตฺตปฺปมาเณน, สายํ เหฏฺฐิมภูมิ. योजन नीचे गिरती है, इस परिमाण से वह चार महीने में पृथ्वी तक पहुँचती है; इस प्रकार वह सबसे निचली (ब्रह्म) भूमि कही गई है। อิโต สตสหสฺสานิ, สตฺตปญฺญาส จาปรํ; สฏฺฐิ เจว สหสฺสานิ, อุพฺเพเธน ปกาสิตา. इससे ऊपर एक लाख सत्तावन हजार और साठ हजार (१,५७,००० + ६०,०००) योजन की ऊँचाई बताई गई है। โยชเนสุปิ วุตฺเตสุ, หิตฺวา กามปฺปมาณกํ; เสสานิ วสวตฺตีนํ, ปาริสชฺชาน มนฺตรํ. कहे गए योजनों में काम-लोक के परिमाण को छोड़कर; शेष वशवर्ती देवों और ब्रह्मपारिसज्ज देवों के बीच का अंतर है। ตญฺจ ปญฺจหิ ปญฺญาส, สตสหสฺสานิ จาปรํ; อฏฺฐ เจว สหสฺสานิ, โยชนานิ ปวุจฺจเร. वह पचपन लाख और आठ हजार योजन कहा जाता है। อิโต ปราสุ สพฺพาสุ, พฺรหฺมภูมีสุ โยชนา; ตปฺปมาณาว ทฏฺฐพฺพา, นยคฺคาเหน ธีมตา. इसके बाद की सभी ब्रह्मभूमियों के बीच की दूरी भी; बुद्धिमान व्यक्ति को इसी परिमाण के अनुसार समझनी चाहिए। ภูมิโต [Pg.72] อาภวคฺคมฺหา, สตฺตโกฏิ อฏฺฐารส; ลกฺขา ปญฺจ นหุตานิ, ฉสหสฺสานิ สพฺพทาติ. पृथ्वी से लेकर भवग्ग तक कुल सात करोड़ अठारह लाख छप्पन हजार योजन की दूरी है।” เอสา จ วิจารณา ฏีกา จริยมเตน กตา; อิทเมว สนฺธาย, ยาวตา จนฺทิมสูริยา. यह विवेचना टीकाकार के मत के अनुसार की गई है। इसी के संदर्भ में यह कहा गया है—'जहाँ तक चाँद और सूरज— ปริหรนฺติ ทิสา ภนฺติ, วิโรจมานา ยาวตา; ตาว สหสฺสธา โลเก, เอตฺถ เต วตฺตตี วโส’’ติ. घूमते हैं और दिशाओं को प्रकाशित करते हुए सुशोभित होते हैं; वहाँ तक हजार गुना लोक में तुम्हारा वश चलता है'। วุตฺตํ. เอตฺถนฺตเร สตฺตา ติฏฺฐนฺติ, เตสํ วิตฺถาโร อปุพฺพํ กตฺวา กเถตุํ อสกฺกุเณยฺยตฺตา น วกฺขาม อิมสฺมึ สตฺตโลเก โอกาสโลเก จ สพฺพญฺญุสมฺมาสมฺพุทฺโธว ทุลฺลโภ, ตถา หิ จตฺตาโร พุทฺธา อนุพุทฺโธ, สาวกพุทฺโธ, ปจฺเจกพุทฺโธ, สมฺมาสมฺพุทฺโธติ. ตตฺถ พหุสฺสุตํ ภิกฺขุํ ปสํสนฺเตน จ น โส ตุมฺหากํ สาวโก นาม, พุทฺโธนาเมส จุนฺทาติ พหุสฺสุตสฺส ภิกฺขุโน พุทฺธภาวํ อนุชานนฺเตน จ. ऐसा कहा गया है। इस अंतराल में सत्त्व रहते हैं, उनका विस्तार पहले न कहे जाने के कारण यहाँ नहीं कहेंगे। इस सत्त्वलोक और अवकाशलोक में सर्वज्ञ सम्यक्सम्बुद्ध ही दुर्लभ हैं; क्योंकि बुद्ध चार प्रकार के होते हैं: अनुबुद्ध, श्रावकबुद्ध, प्रत्येकबुद्ध और सम्यक्सम्बुद्ध। वहाँ बहुश्रुत भिक्षु की प्रशंसा करते हुए 'वह तुम्हारा श्रावक नहीं है, हे चुन्द! वह बुद्ध ही है'—इस प्रकार बहुश्रुत भिक्षु के बुद्धत्व को स्वीकार करते हुए (यह कहा गया है)। ธมฺมกาโย ยโต สตฺถา, ธมฺโม สตฺถุกาโย มโต; ธมฺมาสิโกโส สงฺโฆ จ, สตฺถุสงฺขฺยมฺปิ คจฺฉตีติ. चूँकि शास्ता (बुद्ध) धर्मकाय हैं, इसलिए धर्म को शास्ता का काय माना गया है; और संघ धर्म का कोश (भण्डार) होने के कारण शास्ता की संज्ञा को प्राप्त होता है। วุตฺเต ปุถุชฺชโนปิ อุปจารวเสน วาจนามคฺคสฺส โพธตฺตา อนุพุทฺโธ นาม. อริยสาวโก ปน ปรโต โยสวเสน จตฺตาริ สจฺจานิ พุชฺฌติ พุชฺฌนมตฺตเมว วาติ วจนตฺเถน พุชฺฌนสภาวตฺตา สาวกพุทฺโธ นาม. โย ปน ขคฺควิสาณกปฺโป สยมฺภูญาเณน อนญฺญโพธโก หุตฺวา สามํ พุชฺฌนตฺเถน ปจฺเจกพุชฺฌตฺตา ปจฺเจกพุทฺโธ นาม. สมฺพุทฺโธติปิ เอตสฺเสว นามํ. โย ปน สงฺขตาสงฺขตปฺปเภทํ สกลมฺปิ ธมฺมชาตํ ยาถาวสรสลกฺขณปฺปฏิเวธวเสน สมฺมา ปกาเรน สยํ ปจิตุปารมิตาสยมฺภูเตน สยมฺภูญาเณน สยเมว อนญฺญโพธิโต หุตฺวา สวาสนสมฺโมหนิทฺทาย อจฺจนฺตํ วิคโต ทินกรกิรณสมาคเมน ปรมรุจิรสิรีโสภคฺคปฺปตฺติยา วิกสิตมิว ปทุมํ อคฺคมคฺคญาณสมาคเมน อปริมิตคุณคณาลงฺกตสพฺพญฺญุตญฺญาณปฺปตฺติยา สพฺพธมฺเม พุชฺฌิ อพุชฺฌิ อญฺญาสีติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ภควา, โสว โลเก ทุลฺลโภ ปจฺเจกสมฺพุทฺธานมฺปิ หิ เอกสฺมึ กาเล สตสหสฺสาทิวเสน เอกโต ปวตฺตตฺตา เต ทุลฺลภาปิ อนจฺฉริยชาตตฺตา ปเรสํ มคฺคผลาธิคมาย อุปนิสฺสยรหิตตฺตา จ สมฺมาสมฺพุทฺโธว โลเก ทุลฺลโภ, อยํ โลกสมฺปตฺติวิจารณา. ऐसा कहा गया है कि पृथग्जन भी उपचारवश वाचन-मार्ग के बोध के कारण 'अनुबुद्ध' कहलाता है। किन्तु आर्यश्रावक, जो दूसरों के उपदेश से चार सत्यों को समझता है, समझने के स्वभाव वाला होने के कारण 'श्रावकबुद्ध' कहलाता है। जो गैंडे के सींग के समान एकाकी, स्वयंभू ज्ञान से दूसरों को बिना बोधित किए स्वयं समझने के कारण 'प्रत्येकबुद्ध' कहलाता है। 'सम्बुद्ध' भी इसी का नाम है। किन्तु जिसने संस्कृत और असंस्कृत के भेद वाली समस्त धर्म-राशि को यथार्थ स्वरूप और लक्षणों के साक्षात्कार के द्वारा, सम्यक् प्रकार से, स्वयं संचित पारमिताओं से उत्पन्न स्वयंभू ज्ञान के द्वारा, बिना किसी अन्य के उपदेश के स्वयं ही जानकर, वासना सहित सम्मोह रूपी निद्रा से पूर्णतः मुक्त होकर, सूर्य की किरणों के सम्पर्क से परम सुन्दर शोभा को प्राप्त खिले हुए कमल के समान, अग्र-मार्ग ज्ञान के समागम से अपरिमित गुण-समूह से अलंकृत सर्वज्ञता-ज्ञान की प्राप्ति द्वारा सभी धर्मों को जान लिया है, वह 'सम्यक्सम्बुद्ध' भगवान है। वही लोक में दुर्लभ है। यद्यपि प्रत्येकबुद्ध भी एक समय में लाखों की संख्या में एक साथ होने के कारण दुर्लभ हैं, फिर भी वे दूसरों के मार्ग-फल की प्राप्ति के लिए उपनिश्रय (सहायक कारण) से रहित होने के कारण उतने आश्चर्यजनक नहीं हैं, अतः लोक में सम्यक्सम्बुद्ध ही दुर्लभ हैं। यह लोक-सम्पत्ति का विचार है। กถํ [Pg.73] โลกสฺส วิปตฺติ เวทิตพฺพา ตถา เหส โลโก วินสฺสมาโน เตเชนปิ อาเปนปิ วายุนาปิ วินสฺสติ. ตสฺส วิตฺถาโร วิสุทฺธิมคฺคาทีสุ วุจฺจมาโนปิ เกสญฺจิ ปุคฺคลานํ มเตน มิจฺฉาคาหตฺตา พฺรหฺมูนํ อายุนา มินิเตปิ อสมานํ สํวฏฺฏสีมาปิ วิรุทฺธา, ตสฺมา เตสํ วาทํ อปเนตฺวา คนฺถโต สมาเนตฺวา วกฺขาม. ตตฺถ จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยานิ. กตมานิ จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยานิ สํวฏฺโฏ, สํวฏฺฏฏฺฐายี, วิวฏฺโฏ, วฏฺฏฏฺฐายีติ. ตโย สํวฏฺฏา อาโปสํวฏฺโฏ, เตโชสํวฏฺโฏ, วาโยสํวฏฺโฏ. ติสฺโส สํวฏฺฏสีมา อาภสฺสรา, สุภกิณฺหา, เวหปฺผลาติ. อยเมตฺถ อุทฺเทโส. ตตฺถ สํวฏฺโฏ นาม ปริหายมาโน กปฺโป. เตน สํวฏฺฏฏฺฐายีปิ คหิโต โหติ, ตํ มูลกตฺตา. วฑฺฒยมาโน วิวฏฺฏกปฺโป นาม. เตน วิวฏฺฏฏฺฐายีปิ คหิโต ตํ มูลกตฺตา. ตตฺถ สํวฏฺโฏติ วินาโส. ยทา กปฺโป วินสฺสมาโน เตเชน สํวฏฺฏติ, อาภสฺสรโต เหฏฺฐา ปฐมชฺฌานภูมิ อคฺคินา ทยฺหติ. ยทา อาเปน สํวฏฺฏติ, สุภกิณฺหโต เหฏฺฐา ยาว ทุติยชฺฌานภูมิ อุทเกน วิลียติ. ยทา วายุนา สํวฏฺฏติ, เวหปฺผลโต เหฏฺฐา ยาว ตติยชฺฌานภูมิ วาเตน สํวฏฺฏติ. วิตฺถารโต ปน ชาติเขตฺต อาณาเขตฺตวิสยเขตฺตวเสน ติณฺณํ พุทฺธเขตฺตานํ อาณาเขตฺตํ วินสฺสติ. ตสฺมึ วินฏฺเฐ ชาติเขตฺตมฺปิ วินสฺสเตว. ตตฺถ ชาติเขตฺตํ ทสสหสฺสจกฺกวาฬปริยนฺตํ โหติ. ตํ ตถาคตสฺส ปฏิสนฺธิคฺคหณอายุสงฺขาโรสฺสชฺชนาทิกาเลสุปิ กมฺปติ. อาณาเขตฺตํ โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาฬปริยนฺตํ. ยตฺถ รตนสุตฺตํ ขนฺธปริตฺตํ ธชคฺคปริตฺตํ อาฏานาฏิยปริตฺตํ โมรปริตฺตนฺติ อิเมสํ ปริตฺตานํ อานุภาโว ปวตฺตติ. วิสยเขตฺตํ อนนฺตํ อปริมาณํ. ตตฺถ ชาติเขตฺตอาณาเขตฺตาวเสน ทฺเว เขตฺตานิ เอกโต วินสฺสนฺติ. สณฺฐหนฺตมฺปิ เอกโต สณฺฐหติ. ตสฺส วินาโสจ สณฺฐหนฺตญฺจ เอวํ เวทิตพฺพํ ยสฺมึ สมเย กปฺโป อคฺคินา นสฺสติ, ตทา อาทิโต กปฺปวินาสกมหาเมโฆ วุฏฺฐหิตฺวา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาฬํ เอกเมฆวสฺสํ วสิ, ตุฏฺฐา มนุสฺสา พีชานิ วปฺเปนฺติ, สสฺเสสุ โคขายิตมตฺเตสุ ชาเตสุ คทฺรภรวํ วิรวนฺโต เอกพินฺทุปิ น ปตติ. ยทา ปจฺฉินฺนเมว โหติ ตทา วสฺสูปชีวิโน สตฺตา กาลํ กตฺวา ปริตฺตาเภสุ พฺรหฺมภูมีสุ [Pg.74] อุปฺปชฺชนฺติ ปุญฺญผลูปชีวิโนปิ เทวตา ตตฺเถว พฺรหฺมโลเก อุปฺปชฺชนฺติ, เอวํ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน ตตฺถ ตตฺถ อุทกํ ปริกฺขยํ คจฺฉติ, มจฺฉกจฺฉปาทิ อุทกนิสฺสิตา ปาณา กาลํ กตฺวา มนุสฺสเทวโลเกสุ นิพฺพตฺติตฺวา ฌานํ อุปฺปาเทตฺวา พฺรหฺมโลเก นิพฺพตฺตนฺติ. เนรยิกสตฺตาปิ สตฺตมสูริยปาตุภาวา วินสฺสนฺติ, เตปิ เทวโลเก ปฏิลทฺธชฺฌานวเสน พฺรหฺมโลเก อุปฺปชฺชนฺติ, ตทา หิ โลกพฺยูหา นาม กามาวจรเทวา อุกฺขิตฺตสิรา วิกิณฺณเกสา รุทมุขา อสฺสูนิ หตฺเถหิ มุญฺจมานา รตฺตวตฺถนิวตฺถา อติวิย วิรูปเวสธาริโน หุตฺวา มนุสฺสปเถ วิจรนฺตา เอวํ อาโรเจนฺติ ‘‘มาริสา โภ อิโต วสฺสสต สหสฺสจฺจเยน กปฺปวุฏฺฐานํ ภวิสฺสติ อยํ โลโก วินสฺสิสฺสติ มหาสมุทฺโทปิสุสฺสิสฺสติ อยญฺจ มหาปถวี สิเนรุปพฺพตราชา ฑยฺหิสฺสติ วินสฺสิสฺสติ ยาวพฺรหฺมโลกา วินาโส ภวิสฺสติ เมตฺตํ มาริสา ภาเวถ. กรุณํ, มุทิตํ, อุเปกฺขํ มาริสา ภาเวถ มาตรํ อุปฏฺฐหถ, ปิตรํ อุปฏฺฐหถ, กุเล เชฏฺฐาปจายิโน โหถา’’ติ. เตสํ วจนํ สุตฺวา เยภุยฺเยน มนุสฺสา จ ภุมฺมเทวตา จ สํเวคชาตา อญฺญมญฺญํ มุทุจิตฺตา หุตฺวา เมตฺตาทีนิ ปุญฺญานิ กริตฺวา เทวโลเก นิพฺพตฺตนฺติ. ตตฺถ สุธาโภชนํ ภุญฺชิตฺวา วาโย ปริกมฺมํ กตฺวา ฌานํ ปฏิลภนฺติ, เอวํ เนรยิกสตฺตาปิ อปราปริยกมฺเมน เทวโลกํ นิพฺพตฺตนฺติ. เย ปน นิยตมิจฺฉาทิฏฺฐิกา เตสํ กมฺมสฺส อปริกฺขยา อญฺญจกฺกวาเฬสุ อตฺตโน กมฺมานุรูปํ วิปากมนุโภนฺติ. เตเนว อโหสิกมฺเม มิจฺฉาทิฏฺฐิวเสน อกตฺตพฺพํ นาม ปาปํ นตฺถิ, ยโต สํสารขาณุภาโวว นาม โหตีติ อาห ‘‘ทิฏฺฐิ ปรมานิ ภิกฺขเว วชฺชานี’’ติ. ‘‘อปราปริยเวทนียกมฺมรหิโตปิ สํสรนฺโต สตฺโต นาม นตฺถี’’ติ วุตฺตตฺตา. ‘‘อปราปริยกมฺมวเสน ยโต มิจฺฉาทิฏฺฐิสมาทานโต สปฺปุริสูปนิสฺสยวเสน วิราเชตฺวา ภวโต วุฏฺฐานํ นาม ภเวยฺยาติ อมฺหากํ ขนฺติ. เอวํ เทวโลเก ปฏิลทฺธชฺฌานวเสน สพฺเพปิ พฺรหฺมโลเก นิพฺพตฺตนฺติ. วสฺสุปจฺเฉทโต ปน อุทฺธํ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน ทุติโย สูริโย ปาตุภวติ. ปาตุภูเต จ ตสฺมึ เนว รตฺติปริจฺเฉโท, น ทิวา ปริจฺเฉโท ปญฺญายติ, เอโก สูริโย อุฏฺเฐติ, เอโก สูริโย อตฺถํ คจฺฉติ. อวิจฺฉินฺนสูริยสนฺตาโปว โลโก โหติ. लोक की विपत्ति (विनाश) को कैसे जानना चाहिए? यह लोक विनाश के समय तेज (अग्नि), जल और वायु से भी विनष्ट होता है। इसका विस्तार विशुद्धिमग्ग आदि में कहा गया है, फिर भी कुछ व्यक्तियों के मत में मिथ्या धारणा के कारण, ब्रह्माओं की आयु से मापने पर भी असमानता है और संवर्त-सीमा (विनाश की सीमा) भी विरुद्ध है, इसलिए उनके मत को हटाकर ग्रंथों के अनुसार संक्षेप में कहेंगे। वहाँ चार असंख्येय (कल्प) हैं। वे चार असंख्येय कौन से हैं? संवर्त, संवर्त-स्थायी, विवर्त और विवर्त-स्थायी। तीन संवर्त हैं: आप-संवर्त, तेज-संवर्त और वायु-संवर्त। तीन संवर्त-सीमाएँ हैं: आभास्वर, शुभकृत्स्न और वेहप्फल। यह यहाँ संक्षिप्त विवरण है। वहाँ 'संवर्त' का अर्थ है क्षय होता हुआ कल्प। इसके द्वारा 'संवर्त-स्थायी' का भी ग्रहण होता है, क्योंकि वह उसका मूल है। बढ़ता हुआ कल्प 'विवर्त-कल्प' कहलाता है। इसके द्वारा 'विवर्त-स्थायी' का भी ग्रहण होता है, क्योंकि वह उसका मूल है। वहाँ 'संवर्त' का अर्थ विनाश है। जब कल्प विनष्ट होते हुए तेज (अग्नि) से संवर्तित होता है, तब आभास्वर लोक से नीचे की प्रथम ध्यान भूमि अग्नि से जल जाती है। जब जल से संवर्तित होता है, तब शुभकृत्स्न लोक से नीचे द्वितीय ध्यान भूमि तक जल में विलीन हो जाता है। जब वायु से संवर्तित होता है, तब वेहप्फल लोक से नीचे तृतीय ध्यान भूमि तक वायु से विनष्ट होता है। विस्तार से तो, जाति-क्षेत्र, आज्ञा-क्षेत्र और विषय-क्षेत्र के भेद से तीन बुद्धक्षेत्रों में से आज्ञा-क्षेत्र विनष्ट होता है। उसके विनष्ट होने पर जाति-क्षेत्र भी विनष्ट हो ही जाता है। वहाँ जाति-क्षेत्र दस हजार चक्रवालो (ब्रह्मांडों) की सीमा तक होता है। वह तथागत के प्रतिसन्धि ग्रहण, आयु-संस्कार के त्याग आदि के समय भी कम्पित होता है। आज्ञा-क्षेत्र एक लाख करोड़ चक्रवालो की सीमा तक है। जहाँ रतन सुत्त, खन्ध परित्त, ध्वजग्ग परित्त, आटानाटिय परित्त, मोर परित्त—इन परित्तों का प्रभाव प्रवर्तित होता है। विषय-क्षेत्र अनन्त और अपरिमेय है। वहाँ जाति-क्षेत्र और आज्ञा-क्षेत्र के रूप में दो क्षेत्र एक साथ विनष्ट होते हैं। और पुनः स्थापित होते समय भी एक साथ स्थापित होते हैं। उसका विनाश और पुनः स्थापना इस प्रकार जाननी चाहिए—जिस समय कल्प अग्नि से नष्ट होता है, तब आरम्भ में कल्प-विनाशक महामेघ उठकर एक लाख करोड़ चक्रवालो में एक मेघ-वर्षा करता है, प्रसन्न होकर मनुष्य बीज बोते हैं, जब फसलें गाय के चरने योग्य हो जाती हैं, तब गधे की आवाज जैसा गर्जन करते हुए एक बूंद भी नहीं गिरती। जब वर्षा पूरी तरह रुक जाती है, तब वर्षा पर आश्रित प्राणी काल कर परीत्ताभ ब्रह्म-भूमियों में उत्पन्न होते हैं, और पुण्य-फल पर आश्रित देवता भी उसी ब्रह्मलोक में उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार दीर्घ काल बीतने पर जगह-जगह जल क्षय हो जाता है, मछली-कछुए आदि जल-आश्रित प्राणी काल कर मनुष्य और देव लोकों में उत्पन्न होकर, ध्यान उत्पन्न कर ब्रह्मलोक में उत्पन्न होते हैं। नारकीय प्राणी भी सातवें सूर्य के प्रादुर्भाव से विनष्ट होते हैं, वे भी देवलोक में प्राप्त ध्यान के वश से ब्रह्मलोक में उत्पन्न होते हैं। तब 'लोकव्यूह' नामक कामावचर देव, बिखरे बालों वाले और व्याकुल, रोते हुए मुख वाले, हाथों से आँसू पोंछते हुए, लाल वस्त्र पहने हुए और अत्यंत विरूप वेश धारण किए हुए मनुष्य-पथ पर विचरते हुए इस प्रकार घोषणा करते हैं—'हे प्रियजनों! आज से एक लाख वर्ष बीतने पर कल्प का अंत होगा, यह लोक विनष्ट हो जाएगा, महासमुद्र भी सूख जाएगा, और यह महापृथ्वी तथा पर्वतराज सुमेरु जल जाएँगे, विनष्ट हो जाएँगे, ब्रह्मलोक तक विनाश होगा। हे प्रियजनों! मैत्री की भावना करें। करुणा, मुदिता और उपेक्षा की भावना करें। माता की सेवा करें, पिता की सेवा करें, कुल में बड़ों का आदर करने वाले बनें।' उनके वचनों को सुनकर प्रायः मनुष्य और भूम्य-देवता संवेग को प्राप्त होकर, एक-दूसरे के प्रति कोमल चित्त वाले होकर, मैत्री आदि पुण्य कर्म करके देवलोक में उत्पन्न होते हैं। वहाँ सुधा-भोजन करके और वायु-परिकर्म करके ध्यान प्राप्त करते हैं, इस प्रकार नारकीय प्राणी भी अपरापारीय कर्म के द्वारा देवलोक में उत्पन्न होते हैं। किन्तु जो नियत मिथ्यादृष्टि वाले हैं, वे अपने कर्मों के क्षय न होने के कारण अन्य चक्रवालो में अपने कर्मानुसार विपाक भोगते हैं। इसीलिए अहोसि-कर्म में मिथ्यादृष्टि के कारण न करने योग्य कोई पाप नहीं है, जिससे संसार में ठूँठ के समान स्थिति हो जाती है, जैसा कि कहा गया है—'भिक्षुओं! दृष्टियाँ ही परम दोष हैं।' 'अपरापारीय-वेदनीय कर्म से रहित संसार में विचरण करने वाला कोई प्राणी नहीं है'—ऐसा कहे जाने के कारण। 'अपरापारीय कर्म के वश से, मिथ्यादृष्टि के ग्रहण से, सत्पुरुषों के आश्रय के कारण विरक्त होकर भव से उत्थान हो सकता है'—यह हमारा मत है। इस प्रकार देवलोक में प्राप्त ध्यान के वश से सभी ब्रह्मलोक में उत्पन्न होते हैं। वर्षा के रुकने के बाद, दीर्घ काल बीतने पर दूसरा सूर्य प्रादुर्भूत होता है। उसके प्रादुर्भूत होने पर न रात का भेद पता चलता है, न दिन का; एक सूर्य उदय होता है, एक सूर्य अस्त होता है। लोक निरंतर सूर्य के संताप से युक्त हो जाता है। ปกติสูริเย [Pg.75] สูริยเทวปุตฺโต อตฺถิ กปฺปวินาสกสูริเย ปน นตฺถิ. ปกติสูริโยภาเสน อากาเส วลาหกา ธูมสิขาปิ จรนฺติ. กปฺปวินาสกสูริโยภาเสน วิคตธูมวลาหกํ อาทาสมณฺฑลํ วิย นิมฺมลํ โหติ นภํ ฐเปตฺวา คงฺคา, ยมุนา, สรภู, อจิรวตี, มหีติ, อิมา ปญฺจ มหานทิโย ฐเปตฺวา อวเสสปญฺจสตกุนฺนทีอาทีสุ อุทกํ สุสฺสติ ตโต ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน ตติโย สูริโย ปาตุภวติ ตสฺมึ ปาตุภูเต ปญฺจ มหานทิโยปิ สุสฺสนฺติ. ตโต ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน จตุตฺโถ สูริโย ปาตุภวติ. ยสฺส ปาตุภาวา หิมวตี มหานทีนํ ปภวา สีหปตโน, หํสปตโน, มนฺทากินี, กณฺณมุณฺฑโก, รถการทโห, อโนตตฺตทโห, ฉทฺทนฺตทโห, กุณาลทโหติ อิเม สตฺต มหาสรา สุสฺสนฺติ. ตโต ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน ปญฺจโม สูริโย ปาตุภวติ, ยสฺส ปาตุภาวา อนุปุพฺเพน มหาสมุทฺโท องฺคุลิปพฺพเตมนมตฺตมฺปิ อุทกํ น สณฺฐาติ. ตโต ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน ฉฏฺโฐ สูริโย ปาตุภวติ, ยสฺมึ ปาตุภาเว สกลจกฺกวาฬํ เอกธูมํ โหติ, ปริยาทินฺนสิเนหธูเมน ยถา จ เอวํ โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาฬมฺปิ. ตโตปิ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน สตฺตโม สูริโย ปาตุภวติ, ยสฺส ปาตุภาวา สกลจกฺกวาฬํ เอกชาลํ โหติ สทฺธึ โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬหิ โยชนสติกาทิเภทา สิเนรุกูฏานิ ปลุชฺชิตฺวา อากาเสเยว อนฺตรธายนฺติ. สาปิ อคฺคิชาลา อุฏฺฐหิตฺวา จาตุมหาราชิเก คณฺหาติ, ตตฺถ กนกวิมานรตนวิมานานิ ฌาเปตฺวา ตาวตึสภวนํ คณฺหาติ เอเตนูปาเยน ยาว ปฐมชฺฌานภูมิ คณฺหาติ. ตตฺถ ตโยปิ พฺรหฺมโลเก ฌาเปตฺวา อาภสฺสเร อาหจฺจ อฏฺฐาสิ. สา ยาว อณุมตฺตมฺปิ สงฺขารคตํ อตฺถิ, ตาว นนิพฺพายิ. สพฺพสงฺขารปริกฺขยา ปน สปฺปิเตลฌาปนอคฺคิสิขา วิย ฉาริกมฺปิ อนวเสเสตฺวา นิพฺพายิ. เหฏฺฐา อากาเสน สห อุปริ อากาโส เอโก โหติ มหนฺธกาโร. เอวํ กปฺปวินาสกมหาเมฆโต ยาวชาลปริจฺเฉทา สํวฏฺโฏ นาม เอกมสงฺขฺเยยฺยํ นาม. อถ ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน มหาเมโฆ วุฏฺฐหิตฺวา ปฐมํ สุขุมํ วสฺสติ. อนุปุพฺเพน กุมุทนาฬยฏฺฐิมุสลตาลกฺขนฺธาทิปฺปมาณาหิ ธาราหิ วสฺสนฺโต [Pg.76] โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาเฬสุ สพฺพฑฑฺฒฏฺฐานํ ปูเรตฺวา อนฺตรธายติ. ตํ อุทกํ เหฏฺฐา จ ติริยญฺจ วาโต สมุฏฺฐหิตฺวา ฆนํ กโรติ. ปริวฏุมํ ปทุมินิปตฺเต อุทกพินฺทุสทิสํ. เอวํ อคฺคิชาลนิพฺพายนโต ยาว โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาฬปริปูรโต สมฺปตฺติมหาเมโฆ, อิทํ สํวฏฺฏฏฺฐายี นาม, ทุติยมสงฺขฺเยยฺยํ นาม. กถํ ตาว มหนฺตํ อุทกราสึ วาโต ฆนํ กโรตีติ เจ. วิวรสมฺปทานโต ตํ วา เตน ปิณฺฑิยมานํ ฆนํ กริยมานํ ปริกฺขยมานํ อนุปุพฺเพน เหฏฺฐา โอตรติ. โอติณฺโณติณฺเณ อุทเก ปุพฺเพ พฺรหฺมโลกฏฺฐาเน พฺรหฺมปาริ สชฺช-พฺรหฺมปุโรหิตมหาพฺรหฺมาวเสน ปฐมชฺฌานภูมิ ปฐมํ ปาตุภวติ. ตโต โอติณฺโณติณฺเณ อุทเก จตุกามาวจรเทวโลกฏฺฐาเน อนุกฺกเมน ปรนิมฺมิตวสวตฺตี, นิมฺมานรตี, ตุสิตา, ยามาติ จตฺตาโร กามาวจรเทวโลกา ปาตุภวนฺติ. ตโต ปุริมปถวิฏฺฐานํ โอติณฺเณ ปน อุทเก พลววาตา อุปฺปชฺชนฺติ. เต ตํ ปิทหิตทฺวาเร ธมกรเณ ฐิตอุทกมิว นิรุสฺสาสํ กตฺวา นิรุชฺฌนฺติ. มธุโรทกํ ปริกฺขยํ คจฺฉมานํ อุปริ รสปถวึ สมุฏฺฐาเปติ สา วณฺณสมฺปนฺนาเจว โหติ คนฺธรสสมฺปนฺนา จ, นิรุทกปายาสสฺส อุปริ ปฏลํ วิย ตทา จ อาภสฺสรพฺรหฺมโลเก ปฐมตราภินิพฺพตฺตา สตฺตา อายุกฺขยา วา ปุญฺญกฺขยา วา ตโต จวิตฺวา อิธูปปชฺชนฺติ. ‘‘ปุญฺญกฺขยา วา’’ติ อิมินา พฺรหฺมูนํ อายุปริจฺเฉทํ อปฺปตฺวาว กมฺมกฺขเยน มรณํ วิญฺญายติ. เต โหนฺติ สยํปภา อนฺตลิกฺขจรา. เต อคฺคญฺญสุตฺเต วุตฺตนเยน ตํ รสปถวึ สายิตฺวา ตณฺหาภิภูตา อาลุปฺปการํ ปริภุญฺชิตุํ อุปกฺกมนฺติ. อถ เนสํ สยํ ปภา อนฺตรธายติ, อนฺธกาโร โหติ เต อนฺธการํ ทิสฺวา ภายนฺติ. ตโต เนสํ ภยํ นาเสตฺวา สูรภาวํ ชนยนฺตํ ปริปุณฺณปณฺณาสโยชนํ สูริยมณฺฑลํ วา ปาตุภวติ. เต ตํ ทิสฺวา ‘‘อาโลกํ ปฏิลภิมฺหา’’ติ หฏฺฐตุฏฺฐา หุตฺวา ‘‘อมฺหากํ ภยํ นาเสตฺวา สูรภาวํ ชนยนฺโต อุฏฺฐิโต, ตสฺมา สูริโย โหตู’’ติ สูริโย ตฺเววสฺส นามํ กโรนฺติ. อถ สูริเย ทิวสํ อาโลกํ กตฺวา อตฺถงฺคเต ‘‘ยมฺปิ อาโลกํ ลภิมฺหา, โสปิ โน นฏฺโฐ’’ติ ปุน ภีตา โหนฺติ. เตสํ เอวํ โหติ ‘‘สาธุวตสฺส อญฺญํ อาโลกํ ลเภยฺยามา’’ติ. เตสํ จิตฺตํ ญตฺวา วิย เอกูนปญฺญาสโยชนํ จนฺทมณฺฑลํ ปาตุภวติ[Pg.77]. เต ตํ ทิสฺวา ภิยฺโยโสมตฺตาย หฏฺฐตุฏฺฐา หุตฺวา ‘‘อมฺหากํ ฉนฺทํ ญตฺวา วิย อุฏฺฐิโต, ตสฺมา จนฺโท โหตู’’ติ จนฺโทตฺเววสฺส นามํ กโรนฺติ. ตโต ปภุติ รตฺติทิวา ปญฺญายนฺติ. อนุกฺกเมน จ มาสทฺธมาสอุตุสํวจฺฉรา. จนฺทิมสูริยานํ ปน ปาตุภูตทิวเสเยว สิเนรุจกฺกวาฬหิมวนฺตปพฺพตา ปาตุภวนฺติ, เต จ โข อปุพฺพํ อจริมํ ผคฺคุณปุณฺณมทิวเสเยว ปาตุภวนฺติ. กถํ ยถานาม กงฺคุภตฺเต ปจฺจมาเน เอกปฺปหาเรเนว พุพฺพุฬกานิ อุฏฺฐหนฺติ. เอเก ปเทสา ถูปถูปา โหนฺติ, เอเก นินฺนนินฺนา, เอเก สมสมา เอวเมว ถูปถูปฏฺฐาเน ปพฺพตา โหนฺติ, นินฺนนินฺนฏฺฐาเน สมุทฺทา, สมสมฏฺฐาเน ทีปาติ เอวํ มนุสฺสโลเก สณฺฐิเต จาตุมหาราชิกา, ตาวตึสาติ ทฺเว กามาวจรเทวโลกา ปจฺฉโต ปาตุภวนฺติ. ภูมนิสฺสิตา นาม เหเต ทฺเว เทวโลกา. เอวํ สมฺปตฺติมหาเมฆโต ยาว จนฺทิมสูริยปาตุภาโว, อิทํ วิวฏฺโฏ นาม ตติยมสงฺขฺเยยฺยํ นาม. อถ เตสํ สตฺตานํ รสปถวึ ปริภุญฺชนฺตานํ กมฺเมน เอกจฺเจ วณฺณวนฺโต, เอกจฺเจ ทุพฺพณฺณา โหนฺติ ตตฺถ วณฺณวนฺโต ทุพฺพณฺเณ อติมญฺญนฺติ. เตสํ มานาติมานปจฺจยา สาปิ รสปถวี อนฺตรธายติ. ภูมิปปฺปฏโก ปาตุภวติ อถ เนสํ เตเนว นเยน โสปิ อนฺตรธายติ, ปตาลตา ปาตุภวติ, เตเนว นเยน สาปิ อนฺตรธายติ. อกฏฺฐปาโก สาลิ ปาตุภวติ อกโณ อถุโส สุทฺโธ สุคนฺโธ ตณฺฑุลปฺผโล. ตโต เนสํ ภาชนานิ อุปฺปชฺชนฺติ เต สาลี ภาชเน ฐเปตฺวา ปาสาณปิฏฺฐิยา ฐเปนฺติ, สยเมว ชาลสิขา อุฏฺฐหิตฺวา ปจติ. โส โหติ โอทโน สุมนชาติปุปฺผสทิโส, น ตสฺส สูเปน วา พฺยญฺชเนน วา กรณียํ อตฺถิ. ยํยํ รสํ ภุญฺชิตุกามา โหนฺติ, ตํตํ รโสว โหติ. เตสํ ตํ โอฬาริกํ อาหารํ อาหรตํ ตโต ปภุติ มุตฺตกรีสํ สญฺชายติ. อถ เนสํ ตสฺส นิกฺขมนตฺถาย วณมุขานิ ปภิชฺชนฺติ. ปุริสสฺส ปุริสภาโว, อิตฺถิยา อิตฺถิภาโว ปาตุภวติ. ตตฺรสุทํ อิตฺถี ปุริสํ, ปุริโส จ อิตฺถึ อติเวลํ อุปนิชฺฌายติ. เตสํ อติเวลํ อุปนิชฺฌายนภาวา กามปริฬาโห อุปฺปชฺชติ. ตโต เมถุนธมฺมํ ปฏิเสวนฺติ. เต อสทฺธมฺมปฏิเสวนปจฺจยา วิญฺญูหิ ครหิยมานา วิเหฐิยมานา ตสฺส อสทฺธมฺมสฺส ปฏิจฺฉาทนเหตุ อคารานิ กโรนฺติ. सामान्य सूर्य में सूर्यदेवपुत्र होता है, किन्तु कल्प-विनाशक सूर्य में नहीं होता। सामान्य सूर्य के प्रकाश से आकाश में बादल और धुएँ की शिखाएँ भी विचरण करती हैं। कल्प-विनाशक सूर्य के प्रकाश से आकाश धुएँ और बादलों से रहित होकर दर्पण के मण्डल के समान निर्मल हो जाता है; गंगा, यमुना, सरभू, अचिरवती और मही—इन पाँच महानदियों को छोड़कर शेष पाँच सौ छोटी नदियों आदि का जल सूख जाता है। तत्पश्चात् दीर्घ काल बीतने पर तीसरा सूर्य प्रकट होता है; उसके प्रकट होने पर वे पाँच महानदियाँ भी सूख जाती हैं। उसके बाद दीर्घ काल बीतने पर चौथा सूर्य प्रकट होता है। जिसके प्राकट्य से हिमालय की महानदियों के स्रोत—सिंहपतन, हंसपतन, मन्दाकिनी, कण्णमुण्डक, रथकारदह, अनोतत्तदह, छद्दन्तदह और कुणालदह—ये सात महासरोवर सूख जाते हैं। तत्पश्चात् दीर्घ काल बीतने पर पाँचवाँ सूर्य प्रकट होता है, जिसके प्राकट्य से क्रमशः महासमुद्र में अंगुली के पोर मात्र भी जल शेष नहीं रहता। उसके बाद दीर्घ काल बीतने पर छठा सूर्य प्रकट होता है, जिसके प्रकट होने पर सम्पूर्ण चक्रवाल एक धुआँ हो जाता है; स्नेह (नमी) के समाप्त होने से उत्पन्न धुएँ के कारण, और इसी प्रकार सौ अरब चक्रवाल भी। उसके बाद भी दीर्घ काल बीतने पर सातवाँ सूर्य प्रकट होता है, जिसके प्राकट्य से सम्पूर्ण चक्रवाल सौ अरब चक्रवालों के साथ एक ज्वाला बन जाता है; सौ योजन आदि विस्तार वाले सिनेरु के शिखर टूटकर आकाश में ही अन्तर्धान हो जाते हैं। वह अग्नि की ज्वाला उठकर चातुमहाराजिक देवलोक को व्याप्त कर लेती है, वहाँ स्वर्ण-विमानों और रत्न-विमानों को जलाकर तावतिंस भवन तक पहुँच जाती है; इसी क्रम से वह प्रथम ध्यान भूमि तक पहुँच जाती है। वहाँ तीनों ब्रह्मलोकों को जलाकर वह आभास्वर (ब्रह्मलोक) तक पहुँचकर रुक जाती है। जब तक अणु मात्र भी संस्कार शेष रहता है, तब तक वह नहीं बुझती। किन्तु सभी संस्कारों के पूर्णतः क्षय हो जाने पर, घी या तेल को जलाने वाली अग्नि-शिखा के समान, वह राख भी शेष न छोड़ते हुए बुझ जाती है। नीचे के आकाश के साथ ऊपर का आकाश एक होकर महान अन्धकारमय हो जाता है। इस प्रकार कल्प-विनाशक महामेघ से लेकर ज्वालाओं की समाप्ति तक का काल 'संवर्त' नामक प्रथम असंख्येय है। फिर दीर्घ काल बीतने पर महामेघ उठकर पहले सूक्ष्म वर्षा करता है। क्रमशः कुमुद की नाल, लाठी, मूसल और ताड़ के तने के समान धाराओं से बरसते हुए, वह सौ अरब चक्रवालों में सभी दग्ध स्थानों को भरकर अन्तर्धान हो जाता है। उस जल को नीचे और तिरछी दिशाओं से उठी हुई वायु सघन कर देती है। वह कमलिनी के पत्ते पर जल की बूँद के समान गोल हो जाता है। इस प्रकार अग्नि-ज्वाला के बुझने से लेकर सौ अरब चक्रवालों के भरने तक जो महामेघ आया, वह 'संवर्त-स्थायी' नामक दूसरा असंख्येय है। यदि यह पूछा जाए कि वायु इतने विशाल जल-राशि को सघन कैसे करती है? तो अवकाश प्राप्त होने से, वह जल उस वायु द्वारा पिण्डित और सघन किया जाता हुआ तथा कम होता हुआ क्रमशः नीचे उतरता है। जल के नीचे-नीचे उतरने पर, पूर्व के ब्रह्मलोक के स्थान पर ब्रह्मपारिसज्ज, ब्रह्मपुरोहित और महाब्रह्मा के भेद से प्रथम ध्यान भूमि सबसे पहले प्रकट होती है। उसके बाद जल के और नीचे उतरने पर, चार कामावचर देवलोकों के स्थान पर क्रमशः परनिर्मितवसवत्ती, निर्माणरती, तुषित और याम—ये चार कामावचर देवलोक प्रकट होते हैं। तत्पश्चात् जब जल पूर्व के पृथ्वी-स्थान तक उतर जाता है, तब बलवती वायु उत्पन्न होती है। वे उस जल को, बन्द मुख वाले जल-पात्र में स्थित जल की भाँति, निरुच्छ्वास करके रुक जाती हैं। मधुर जल के क्षय होने पर वह ऊपर 'रस-पृथ्वी' को उत्पन्न करता है; वह वर्ण, गन्ध और रस से सम्पन्न होती है, जैसे बिना जल वाली खीर के ऊपर की मलाई हो; और तब आभास्वर ब्रह्मलोक में पहले उत्पन्न हुए सत्त्व आयु-क्षय या पुण्य-क्षय के कारण वहाँ से च्युत होकर यहाँ उत्पन्न होते हैं। 'पुण्य-क्षय से' इस कथन से यह समझा जाता है कि ब्रह्मों की आयु-सीमा तक पहुँचे बिना ही कर्म-क्षय से मृत्यु हो जाती है। वे स्वयं-प्रकाशित और आकाशचारी होते हैं। वे अग्गञ्ञ सुत्त में वर्णित विधि के अनुसार उस रस-पृथ्वी को चखकर, तृष्णा से अभिभूत हो, ग्रास बना-बनाकर खाने लगते हैं। तब उनकी स्वयं-प्रभा अन्तर्धान हो जाती है और अन्धकार हो जाता है; वे अन्धकार को देखकर डर जाते हैं। तब उनके भय को नष्ट करने और साहस उत्पन्न करने के लिए पचास योजन का सूर्य-मण्डल प्रकट होता है। वे उसे देखकर 'हमें आलोक प्राप्त हो गया' ऐसा कह हर्षित होते हैं और 'हमारे भय को नष्ट कर शूर-भाव उत्पन्न करते हुए यह उदित हुआ है, इसलिए यह सूर्य हो' ऐसा कहकर उसका नाम 'सूर्य' रखते हैं। फिर सूर्य के दिन भर आलोक करके अस्त हो जाने पर, 'जो आलोक हमें मिला था, वह भी नष्ट हो गया' ऐसा कह वे पुनः भयभीत होते हैं। उन्हें ऐसा विचार आता है—'कितना अच्छा हो यदि हमें कोई अन्य आलोक मिल जाए।' उनके चित्त को जानकर ही मानो उनचास योजन का चन्द्र-मण्डल प्रकट होता है। वे उसे देखकर और भी अधिक हर्षित होते हैं और 'हमारी इच्छा को जानकर ही मानो यह उदित हुआ है, इसलिए यह चन्द्र हो' ऐसा कहकर उसका नाम 'चन्द्र' रखते हैं। तब से रात और दिन जाने जाने लगे, और क्रमशः मास, अर्ध-मास, ऋतु और वर्ष। चन्द्र और सूर्य के प्रकट होने के दिन ही सिनेरु, चक्रवाल और हिमवन्त पर्वत प्रकट होते हैं; और वे सब एक साथ फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन ही प्रकट होते हैं। कैसे? जैसे पकते हुए कंगु के भात में एक साथ ही बुलबुले उठते हैं। कुछ स्थान ऊँचे होते हैं, कुछ नीचे और कुछ समतल; वैसे ही ऊँचे स्थानों पर पर्वत होते हैं, नीचे स्थानों पर समुद्र और समतल स्थानों पर द्वीप; इस प्रकार मनुष्य लोक के व्यवस्थित हो जाने पर चातुमहाराजिक और तावतिंस—ये दो कामावचर देवलोक बाद में प्रकट होते हैं। ये दोनों देवलोक पृथ्वी पर आधारित कहलाते हैं। इस प्रकार महामेघ के आने से लेकर चन्द्र-सूर्य के प्राकट्य तक का यह काल 'विवर्त' नामक तीसरा असंख्येय है। फिर उन सत्त्वों के रस-पृथ्वी का उपभोग करने पर, कर्मवश कुछ सुन्दर और कुछ कुरूप हो जाते हैं; वहाँ सुन्दर लोग कुरूपों का अपमान करते हैं। उनके मान और अभिमान के कारण वह रस-पृथ्वी भी अन्तर्धान हो जाती है। तब भूमि-पर्पटक प्रकट होता है; फिर उसी रीति से वह भी अन्तर्धान हो जाता है और पतालता प्रकट होती है; उसी रीति से वह भी अन्तर्धान हो जाती है। तब बिना जोते-बोये पकने वाला शालि प्रकट होता है, जो भूसी और लाल छिलके से रहित, शुद्ध, सुगन्धित और चावल के दानों वाला होता है। तब उनके लिए पात्र उत्पन्न होते हैं; वे उस शालि को पात्र में रखकर पत्थर की शिला पर रख देते हैं, और स्वयं ही अग्नि-शिखा उठकर उसे पका देती है। वह भात चमेली के फूल के समान होता है, उसके साथ दाल या व्यंजन की आवश्यकता नहीं होती। वे जिस-जिस रस की इच्छा करते हैं, वह वैसा ही हो जाता है। उस स्थूल आहार को ग्रहण करने वाले उन सत्त्वों में तब से मूत्र और मल उत्पन्न होने लगा। तब उसके निकास के लिए उनके शरीर में मार्ग बन गए। पुरुष में पुरुष-भाव और स्त्री में स्त्री-भाव प्रकट हुआ। वहाँ स्त्री पुरुष को और पुरुष स्त्री को अत्यधिक निहारने लगे। उनके अत्यधिक निहारने के कारण काम-वासना उत्पन्न हुई। तब वे मैथुन-धर्म का सेवन करने लगे। उस असद्धर्म के सेवन के कारण विद्वानों द्वारा निन्दित और प्रताड़ित होने पर, वे उस असद्धर्म को छिपाने के लिए घरों का निर्माण करने लगे। เต [Pg.78] อคารํ อชฺฌาวสมานา อนุกฺกเมน อญฺญตรสฺส อลสชาติกสฺส สตฺตสฺส ทิฏฺฐานุคตึ อาปชฺชนฺตา สนฺนิธึ กโรนฺติ. ตโต ปภุติ กโณปิ ถุโสปิ ตณฺฑุลํ ปริโยนทฺธนฺติ, ลายิตฏฺฐานมฺปิ นปฺปฏิวิรูหติ. เต สนฺนิปติตฺวา อนุฏฺฐุนนฺติ ‘‘ปาปกา วต โภ ธมฺมา สตฺเตสุ ปาตุภูตา, มยํ ปุพฺเพ มโนมยา อหุมฺหา’’ติ. อคฺคญฺญสุตฺเต วุตฺตนเยน วิตฺถเรตพฺพํ. ตโต มริยาทํ ฐเปนฺติ. อถญฺญตโร สตฺโต อญฺญสฺส ภาคํ อทินฺนํ อาทิยติ. ตํ ทฺวิกฺขตฺตุํ ปริภาสิตฺวา ตติยวาเร เลฑฺฑุทณฺเฑหิ ปหรนฺติ. เต เอวํ อทินฺนาทานกลหมุสาวาททณฺฑทาเนสุ อุปฺปนฺเนสุ สนฺนิปติตฺวา จินฺตยนฺติ, ‘‘ยํนูน มยํ เอกํ สตฺตํ สมฺมนฺเนยฺยาม, โย โน สมฺมา ขิยิตพฺพํ ขิเยยฺย, ครหิตพฺพํ ครเหยฺย, ปพฺพาเชตพฺพํ ปพฺพาเชยฺย, มยํ ปนสฺส สาลีนํ ภาคํ อนุปทสฺสามา’’ติ. เอวํ กตสนฺนิฏฺฐาเนสุ ปน สตฺเตสุ อิมสฺมึ ตาว กปฺเป อยเมว ภควา โพธิสตฺตภูโต เตน สมเยน เตสุ สตฺเตสุ อภิรูปตโร จ ทสฺสนียตโร จ มเหสกฺขตโร จ พุทฺธิสมฺปนฺโน ปฏิพโล นิคฺคหปคฺคหํ กาตุํ เต ตํ อุปสงฺกมิตฺวา ยาจิตฺวา สมฺมนึสุ. โส เตน มหาชเนน สมฺมโตติปิ มหาสมฺมโต, เขตฺตานํ อธิปตีติ ขตฺติโย, ธมฺเมน สเมน ปเรสํ รญฺเชตีติ ราชาติ, ตีหิ นาเมหิ ปญฺญายิตฺถ. ยญฺหิ โลเก อจฺฉริยํ ฐานํ โพธิสตฺโตว ตตฺถ อาทิ ปุริโสติ เอวํ โพธิสตฺตํ อาทึ กตฺวา ขตฺติยมณฺฑเล สณฺฐิเต อนุปุพฺเพน พฺราหฺมณาทโยปิ วณฺณา สณฺฐหึสุ. เอวํ จนฺทิมสูริยปาตุ ภาวโต ยาว ปุน กปฺปวินาสกมหาเมโฆ, อิทํ วิวฏฺฏฏฺฐายี นาม จตุตฺถมสงฺขฺเยยฺยํ นาม. เตเนตํ วุจฺจติ เมโฆ ชาลปริจฺฉินฺโน สํวฏฺโฏติ ชาลา เมฆปริจฺฉินฺโน สํวฏฺฏฏฺฐายีติ วุจฺจติ. เมฆา สูริยปริจฺฉินฺโน วิวฏฺโฏติ วุจฺจติ. สูริยา เมฆปริจฺฉินฺโน วิวฏฺฏฏฺฐายีติ วุจฺจติ. จตฺตาริ อิมานิ กปฺปานิ มหากปฺโปติ วุจฺจติ. วิวฏฺฏฏฺฐายิกปฺเปเยว อุปฺปชฺชนฺติ พุทฺธาทโยติ. ตถา หิ อิมสฺมึเยว วิวฏฺฏฏฺฐายิอสงฺขฺยยฺยกปฺเป พุทฺธปจฺเจก พุทฺธสาวกจกฺกวตฺติโน อุปฺปชฺชนฺติ, น ตีสุ อสงฺขฺเยยฺยกปฺเปสุ. ตญฺจ โข อสุญฺญกปฺเปเยว, น สุญฺญกปฺเป. ตตฺถ พุทฺธปจฺเจกพุทฺธสาวกจกฺกวตฺตีหิ ปุญฺญวนฺตปุคฺคเลหิ อสุญฺญตฺตา อสุญฺญกปฺโป นาม. ตพฺพิคเมน สุญฺญกปฺโป เวทิตพฺโพ. เตสุปิ อสุญฺญกปฺโป ปญฺจวิโธ โหติ สารกปฺโป[Pg.79], มณฺฑกปฺโป, วรกปฺโป, สารมณฺฑกปฺโป, ภทฺทกปฺโปติ, เตสุ ยสฺมึ กปฺเป เอโกว พุทฺโธ อุปฺปชฺชติ, โส สารกปฺโป นาม. ยสฺมึ กปฺเป ทฺเว พุทฺธา อุปฺปชฺชนฺติ, โส มณฺฑกปฺโป นาม. ยสฺมึ กปฺเป ตโย อุปฺปชฺชนฺติ, โส วรกปฺโป นาม. ยสฺมึ กปฺเป จตฺตาโร พุทฺธา อุปฺปชฺชนฺติ, โส สารมณฺฑกปฺโป นาม. ยสฺมึ กปฺเป ปญฺจ พุทฺธา อุปฺปชฺชนฺติ, โส ภทฺทกปฺโปนาม. อิมานิ ปญฺจกปฺปานิเยว สเหว สโมธาเนตฺวา ชาตตฺตกีโสตตฺตกิยา นิทาเน. वे घरों में रहते हुए क्रमशः किसी आलसी स्वभाव के प्राणी के अनुकरण में संग्रह करने लगे। तब से चावलों पर भूसी और छिलका आने लगा और कटा हुआ स्थान फिर से नहीं उगता था। वे इकट्ठा होकर विलाप करने लगे—'अरे! प्राणियों में पाप धर्म प्रकट हो गए हैं, हम पहले मनोमय थे।' इसे अग्गञ्ञ सुत्त में बताए गए तरीके से विस्तार से समझना चाहिए। फिर उन्होंने मर्यादा (सीमा) स्थापित की। तब किसी प्राणी ने दूसरे का बिना दिया हुआ भाग ले लिया। उसे दो बार डाँटकर तीसरी बार ढेलों और डंडों से मारा। इस प्रकार चोरी, कलह, झूठ और दंड के उत्पन्न होने पर उन्होंने इकट्ठा होकर सोचा—'क्यों न हम एक ऐसे प्राणी को चुनें जो हमारे लिए सही ढंग से क्रोध करने योग्य पर क्रोध करे, निंदा करने योग्य की निंदा करे और निर्वासित करने योग्य को निर्वासित करे; हम उसे अपने शालि (चावल) का एक भाग देंगे।' जब प्राणियों ने ऐसा निश्चय किया, तब इस कल्प में बोधिसत्व रूप में भगवान ही उन प्राणियों में सबसे अधिक रूपवान, दर्शनीय, प्रभावशाली और बुद्धिमान थे, जो निग्रह और अनुग्रह करने में समर्थ थे। वे उनके पास गए और याचना करके उन्हें चुना। वे महाजन द्वारा चुने जाने के कारण 'महासंमत', खेतों के अधिपति होने के कारण 'खत्तिय', और धर्मपूर्वक समान रूप से दूसरों को प्रसन्न करने के कारण 'राजा'—इन तीन नामों से जाने गए। संसार में जो भी आश्चर्यजनक स्थान है, वहाँ बोधिसत्व ही आदि पुरुष होते हैं। इस प्रकार बोधिसत्व को आदि मानकर क्षत्रिय मंडल के स्थापित होने पर क्रमशः ब्राह्मण आदि वर्ण भी स्थापित हुए। इस प्रकार चन्द्रमा और सूर्य के प्रकट होने से लेकर पुनः कल्प-विनाशकारी महामेघ तक, यह 'विवट्टट्ठायी' नामक चौथा असंख्येय है। इसीलिए कहा गया है—'ज्वाला से परिच्छिन्न मेघ संवट्ट है, मेघ से परिच्छिन्न ज्वाला संवट्टट्ठायी है। सूर्य से परिच्छिन्न मेघ विवट्ट है। मेघ से परिच्छिन्न सूर्य विवट्टट्ठायी है।' इन चार कल्पों को 'महाकल्प' कहा जाता है। विवट्टट्ठायी कल्प में ही बुद्ध आदि उत्पन्न होते हैं। क्योंकि इसी विवट्टट्ठायी असंख्येय कल्प में बुद्ध, प्रत्येक बुद्ध, बुद्ध-श्रावक और चक्रवर्ती उत्पन्न होते हैं, अन्य तीन असंख्येय कल्पों में नहीं। और वह भी केवल अशुन्य कल्प में, शून्य कल्प में नहीं। वहाँ बुद्ध, प्रत्येक बुद्ध, बुद्ध-श्रावक और चक्रवर्ती जैसे पुण्यवान व्यक्तियों से युक्त होने के कारण उसे 'अशुन्य कल्प' कहा जाता है। उनके अभाव में 'शून्य कल्प' समझना चाहिए। उनमें भी अशुन्य कल्प पाँच प्रकार का होता है—सारकल्प, मण्डकल्प, वरकल्प, सारमण्डकल्प और भद्रकल्प। उनमें जिस कल्प में केवल एक बुद्ध उत्पन्न होते हैं, वह सारकल्प है। जिस कल्प में दो बुद्ध उत्पन्न होते हैं, वह मण्डकल्प है। जिस कल्प में तीन उत्पन्न होते हैं, वह वरकल्प है। जिस कल्प में चार बुद्ध उत्पन्न होते हैं, वह सारमण्डकल्प है। जिस कल्प में पाँच बुद्ध उत्पन्न होते हैं, वह भद्रकल्प है। इन पाँच कल्पों को एक साथ मिलाकर जातक-निदान में कहा गया है। ‘‘นนฺโท สุนนฺโท ปถวี, มณฺโฑ ธรณี สาคโร; ปุณฺฑรีโก อิเม สตฺต, อสงฺขฺเยยฺยา ปกาสิตา. नन्द, सुनन्द, पठवी, मण्ड, धरणी, सागर और पुण्डरीक—ये सात असंख्येय प्रकाशित किए गए हैं। ปญฺจ พุทฺธสหสฺสานิ, โหนฺติ นนฺเท อสงฺขฺเยยฺเย; นว พุทฺธสหสฺสานิ, สุนนฺทมฺหิ อสงฺขฺเยยฺเย. नन्द असंख्येय में पाँच हजार बुद्ध हुए; सुनन्द असंख्येय में नौ हजार बुद्ध हुए। ทส พุทฺธสหสฺสานิ, ปถวิมฺหิ อสงฺขฺเยยฺเย; เอกาทส สหสฺสานิ, ตมฺหิ มณฺเฑ อสงฺขฺเยยฺเย. पठवी असंख्येय में दस हजार बुद्ध हुए; उस मण्ड असंख्येय में ग्यारह हजार बुद्ध हुए। วีสติ พุทฺธสหสฺสานิ, ธรณิมฺหิ อสงฺขฺเยยฺเย; ตึส พุทฺธสหสฺสานิ, สาครมฺหิ อสงฺขฺเยยฺเย. धरणी असंख्येय में बीस हजार बुद्ध हुए; सागर असंख्येय में तीस हजार बुद्ध हुए। จตฺตาลีส สหสฺสานิ, ปุณฺฑรีเก อสงฺขฺเยยฺเย; อสงฺขฺเยยฺเยสุ สตฺตสุ, เอตฺตกาติ ปวุจฺจติ. पुण्डरीक असंख्येय में चालीस हजार बुद्ध हुए; इन सात असंख्येयों में इतने बुद्ध कहे गए हैं। เอกํสตสหสฺสานิ, วีสติ จ สหสฺสญฺจ; เสสา ปญฺจสหสฺสานิ, สพฺพพุทฺเธหิ มณฺฑิตา’’ติ. एक लाख बीस हजार और शेष पाँच हजार, सभी बुद्धों से सुशोभित हैं। วุตฺตํ. อปรมฺปิ วุตฺตํ. कहा गया है। और भी कहा गया है। ‘‘ภทฺโท สพฺพผุลฺโล, สพฺพรตโน อุสภกฺขนฺโธ; มานิตภทฺโท จ ปทุโม, อุสภกฺขนฺตุตฺตเมว จ; สพฺพภาโส อสงฺขฺเยยฺโย, นวโมติ ปวุจฺจติ. भद्र, सब्बफुल्ल, सब्बरतन, उसभक्खन्ध, मानितभद्र, पदुम, उसभ और खन्तुत्तम; सब्बभास असंख्येय नौवाँ कहा गया है। ปณฺณาส พุทฺธสหสฺสานิ, สพฺพภทฺเท อสงฺขฺเยยฺเย; สฏฺฐิ พุทฺธสหสฺสานิ, สพฺพผุลฺเล อสงฺขฺเยยฺเย. सब्बभद्र असंख्येय में पचास हजार बुद्ध हुए; सब्बफुल्ल असंख्येय में साठ हजार बुद्ध हुए। สตฺตติ พุทฺธสหสฺสานิ, สพฺพรตเน อสงฺขฺเยยฺเย; อสีติ พุทฺธสหสฺสานิ, อุสภกฺขนฺเธ อสงฺขฺเยยฺเย. सब्बरतन असंख्येय में सत्तर हजार बुद्ध हुए; उसभक्खन्ध असंख्येय में अस्सी हजार बुद्ध हुए। นวุติ พุทฺธสหสฺสานิ, มานิตภทฺเท อสงฺขฺเยยฺเย; วีสติ พุทฺธสหสฺสานิ, ปทุมมฺหิ อสงฺขฺเยยฺเย. मानितभद्र असंख्येय में नब्बे हजार बुद्ध हुए; पदुम असंख्येय में बीस हजार बुद्ध हुए। ทส [Pg.80] พุทฺธสหสฺสานิ อุสภมฺหิ อสงฺขฺเยยฺเย; ปญฺจ พุทฺธสหสฺสานิ, ขนฺตุตฺตเม อสงฺขฺเยยฺเย. उसभ असंख्येय में दस हजार बुद्ध हुए; खन्तुत्तम असंख्येय में पाँच हजार बुद्ध हुए। ทฺเว จ พุทฺธสหสฺสานิ, สพฺพภาเส อสงฺขฺเยยฺเย; องฺขฺเยเย นวสฺมึ, เอตฺตกาติ ปวุจฺจติ. सब्बभास असंख्येय में दो हजार बुद्ध हुए; इन नौ असंख्येयों में इतने बुद्ध कहे गए हैं। ตีณิ สตสหสฺสานิ, สตฺตาสีติสหสฺสญฺจ; คณนานญฺจ พุทฺธานํ, สพฺพพุทฺเธหิ มณฺฑิตา’’ติ. तीन लाख सतासी हजार बुद्धों की गणना है, जो सभी बुद्धों से सुशोभित हैं। เต สพฺเพปิ สมฺมาสมฺพุทฺเธ ยาว อริเมตฺเตยฺยา สโมธาเนตฺวา उन सभी सम्यक सम्बुद्धों को आर्य मैत्रेय तक सम्मिलित करके— ‘‘สมฺพุทฺเธ อฏฺฐวีสญฺจ, ทฺวาทสญฺจ สหสฺสเก; ปญฺจสตสหสฺสานิ, นมามิ สิรสา มหํ; เตสํ ธมฺมญฺจ สงฺฆญฺจ, อาทเรน นมามหํ. अट्ठाईस बुद्धों को, बारह हजार बुद्धों को और पाँच लाख बुद्धों को, मैं सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ; उनके धर्म और संघ को मैं आदरपूर्वक नमस्कार करता हूँ। นมกฺการานุภาเวน, หิตฺวา สพฺเพ อุปทฺทเว; อเนกอนฺตรายาปิ, วินสฺสนฺตุ อเสสโต’’ติ. नमस्कार के प्रभाव से सभी उपद्रवों को त्यागकर, अनेक बाधाएँ भी पूरी तरह नष्ट हो जाएँ। นมสฺสนคาถา ปวตฺตา สา อูนสงฺขฺยาวเสเนว กตาว ภวิตพฺพํ, ตถา หิ อมฺหากํ ภควา โปราณพฺรหฺมเทวพุทฺธํ อาทึ กตฺวา ยาว โปราณสกฺยโคตมา มนสาว จินฺเตนฺตสฺส สตฺตอสงฺขฺเยยฺยานิ วีติวตฺตานิ โปราณสกฺยโคตมพุทฺธํ อาทึ กตฺวา ยาว มชฺฌิมทีปงฺกรา วาจามตฺเตน นว อสงฺขฺเยยฺยานิ วีติวตฺตานิ. มชฺฌิมทีปงฺกรโต ปฏฺฐาย ยาว ปทุมุตฺตรพุทฺธา กายงฺควาจงฺควเสน จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยานิ วีติวตฺตานิ. ปทุมุตฺตรพุทฺธโต ยาว กกุสนฺธา เอกมสงฺขฺเยยฺยํ วีติวตฺตํ. เอวมิเมสุ วีสติอสงฺขฺเยยฺเยสุ พฺรหฺมเทวโปราณสกฺยโคตมพุทฺธานมนฺตเร สตฺต อสงฺขฺเยยฺเย สพฺพํ สมฺปิณฺเฑตฺวา เอกสตสหสฺสญฺจ วีสติ สหสฺสญฺจ ปญฺจสหสฺสานิ จ โหนฺติ. โปราณสกฺยโคตมมชฺฌิมทีปงฺกรานมนฺตเร นว อสงฺขฺเยยฺเย สพฺพํ สมฺปิณฺเฑตฺวา ตีณิสตสหสฺสานิ สตฺตาสีติสหสฺสานิ จ โหนฺติ. มชฺฌิมทีปงฺกรโต ยาว เมตฺเตยฺยา อฏฺฐวีสาติ สพฺพํ สโมธาเนตฺวา อฏฺฐวีสญฺจ ทฺวาทสสหสฺสญฺจ ปญฺจสตสหสฺสานิ จ โหนฺติ ตสฺมา อูนสงฺขฺยาติ เวทิตพฺพา. ปริปุณฺณสงฺขฺยาวเสน อิจฺฉมาเนหิ จินฺเตตพฺพาว. เอสา จ สงฺขฺยาวิจารณา นิทาเน วุตฺตาว. प्रस्तुत नमस्कार गाथाएँ न्यून संख्या के आधार पर ही रची गई समझनी चाहिए, क्योंकि हमारे भगवान ने प्राचीन ब्रह्मदेव बुद्ध से लेकर प्राचीन शाक्यगोतम बुद्ध तक केवल मन से चिंतन करते हुए सात असंख्येय कल्प व्यतीत किए; प्राचीन शाक्यगोतम बुद्ध से लेकर मध्यम दीपंकर बुद्ध तक केवल वाणी के माध्यम से नौ असंख्येय कल्प व्यतीत किए; मध्यम दीपंकर बुद्ध से लेकर पदुमुत्तर बुद्ध तक काय और वाणी के द्वारा चार असंख्येय कल्प व्यतीत किए; और पदुमुत्तर बुद्ध से लेकर ककुसन्ध बुद्ध तक एक असंख्येय कल्प व्यतीत हुआ। इस प्रकार इन बीस असंख्येयों में, ब्रह्मदेव और प्राचीन शाक्यगोतम बुद्धों के अंतराल में सात असंख्येयों को कुल मिलाकर एक लाख पच्चीस हजार होते हैं। प्राचीन शाक्यगोतम और मध्यम दीपंकर के अंतराल में नौ असंख्येयों को कुल मिलाकर तीन लाख सतासी हजार होते हैं। मध्यम दीपंकर से लेकर मेत्तेय्य तक अट्ठाईस बुद्धों को सम्मिलित करने पर पाँच लाख बारह हजार अट्ठाईस होते हैं, इसलिए इसे न्यून संख्या समझना चाहिए। जो पूर्ण संख्या के अनुसार गणना चाहते हैं, उन्हें वैसा ही विचार करना चाहिए। यह संख्या-विवेचन निदान-कथा में कहा गया है। เอวํ ‘‘จินฺติตํ สตฺตสงฺขฺเยยฺยํ, นวสงฺขฺเยยฺยวาจกํ; กายวาจา จตุสงฺขฺเยยฺยํ, พุทฺธตฺตํสมุปาคมี’’ติ. इस प्रकार— 'सात असंख्येय तक मन से चिंतन किया, नौ असंख्येय तक वाणी से कहा, और चार असंख्येय तक काय एवं वाणी से बुद्धत्व को प्राप्त किया'। วุตฺเตสุ [Pg.81] วีสติอสงฺขฺเยยฺเยสุ ปวตฺตอสงฺขฺเยยฺยกปฺปวเสเนว กตา. อตฺถโต ปน สารกปฺปมณฺฑกปฺปวรกปฺปสารมณฺฑกปฺปภทฺทกปฺปวเสน ปญฺจวิธาติ เวทิตพฺพา. อิมานิ ปญฺจนามานิ พุทฺธุปฺปาทกปฺเปเยว ลพฺภนฺติ, อนุปฺปนฺนกปฺเป ปน สุญฺญกปฺโปตฺเวว นามํ ลพฺภติ ตถา หิ กปฺปสณฺฐหนกาเล สพฺพปฐมํ มหาโพธิปลฺลงฺกฏฺฐาเนเยว ปทุมินิคพฺภา อุปฺปชฺชติ. สา ยสฺมึ กาเล เอโก พุทฺโธ อุปฺปชฺชิสฺสติ, เอโก ปทุมินิคพฺโภ อฏฺฐปริกฺขาเรหิ สห อุปฺปชฺชติ. ตํ ทิสฺวา สุทฺธาวาสพฺรหฺมุโน เนมิตฺตปาฐกา อรหนฺโต อิมสฺมึ กปฺเป เอโก พุทฺโธ อุปฺปชฺชิสฺสตีติ สญฺชาตปีติโสมนสฺสา หุตฺวา อฏฺฐปริกฺขาเร คเหตฺวา พฺรหฺมโลเก ฐเปนฺติ ‘‘ยทา พุทฺโธ อุปฺปชฺชิสฺสติ, ตทา ทสฺสามา’’ติ. เอวํ ทฺเว ตโย จตฺตาโร ปญฺจ พุทฺธา อุปฺปชฺชิสฺสนฺติ, ตทา ทฺเว ตีณิ จตฺตาริ ปญฺจ ปทุมินิคพฺภา อฏฺฐปริกฺขาเรหิ สห อุปฺปชฺชนฺติ. ตญฺจ โข เอกสฺมึ เยว นาเฬเกก พทฺธา หุตฺวา อุปฺปชฺชนฺติ. เอวํ กปฺปสณฺฐหนกาลโต ปฏฺฐาเยว อิมานิ ปญฺจ นามานิ ลพฺภนฺตีติ เวทิตพฺพานิ. เอตฺตาวตา อิมสฺมึเยว วิวฏฺฏฏฺฐายีอสงฺขฺเยยฺยกปฺเป พุทฺธาทโย มเหสกฺขา ปุญฺญวนฺโต จกฺกวตฺติราชาโน อุปฺปชฺชนฺติ, ตถา อายุกปฺปนฺตรกปฺปานิปิ. ตตฺถ อายุกปฺโป นาม เตสํ เตสํ สตฺตานํ อายุปริจฺเฉโท. อนฺตรกปฺโป นาม ตตฺถ สตฺถโรคทุพฺภิกฺขานํ อญฺญตรสํวฏฺฏเนน พหูสุ วินาสมุปคเตสุ อวสิฏฺฐสตฺตสนฺตา นปฺปวตฺตกุสลกมฺมานุภาเวน ทสวสฺสโต ปฏฺฐาย อนุกฺกเมน อสงฺขฺเยยฺยายุกปฺปปฺปมาเณสุ สตฺเตสุ ปน อธมฺมสมาทานวเสน กเมน ปริหายิตฺวา ทสวสฺสายุเกสุ ชาเตสุ โรคาทีนมญฺญตรสํวฏฺฏเนน สตฺตานํ วินาสปฺปตฺติ ยาว อยเมโก อนฺตรกปฺโป. เอวํ ปริจฺฉินฺนอนฺตรกปฺปวเสน จตุสฏฺฐิอนฺตรกปฺโป เอโก อสงฺขฺเยยฺยกปฺโป วีสติ อนฺตรกปฺปปฺปมาโณติ อปเร วทนฺติ. อิมานิ จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยกปฺปานิ เอโก มหากปฺโป นาม. เอวํ เตโช สํวฏฺฏวเสน ตาว มหากปฺปานํ อนฺตรํ อคฺคินาว วินสฺสติ. ยสฺมึ ปน สมเย กปฺโป อุทเกน นสฺสติ, ตทา อาทิโตว กปฺปวินาสกมหาเมโฆ วุฏฺฐหิตฺวาติ ปุพฺเพ วุตฺตนเยเนว วิตฺถาเรตพฺพํ อยํ ปน วิเสโส ยถา ตตฺถ ทุติยสูริโย, เอวมิธปิ กปฺปวินาสโก ขารุทกมหาเมโฆ วุฏฺฐาติ โส อาทิโต สุขุมํ วสฺสนฺโต อนุกฺกเมน มหาธาราหิ โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาฬํ [Pg.82] ปูเรนฺโต วสฺสติ. ขารุทเกน ผุฏฺฐผุฏฺฐา ปถวีปพฺพตาทโย วิลียนฺติ ตํ อุทกํ วาเตน สมนฺตโต ธาริตํ ปถวิโต ยาว ปริตฺตาภา อปฺปมาณาภา อาภสฺสราติ ตโยปิ ทุติยชฺฌานภูมิ อุทกํ คณฺหาติ. ตตฺถ ตโยปิ พฺรหฺมโลเก วิลียาเปตฺวา สุภ กิณฺเห อาหจฺจ ติฏฺฐติ ยาว อณุมตฺตํ สงฺขารคตํ อตฺถิ, ตาว น วูปสมติ. อุทกานุคตํ ปน สพฺพสงฺขารคตํ อภิภวิตฺวา สหสา วูปสมติ อนฺตรธานํ คจฺฉติ, เหฏฺฐา อากาเสน สห อุปริ อากาโส เอโก โหติ มหนฺธกาโรติ สพฺพํ วุตฺตสทิสเมว. เกวลํ ปนิธ โอติณฺโณติณฺเณ อุทเก อาภสฺสรพฺรหฺมโลกํ อาทึ กตฺวา โลกปาตุภาโว เวทิตพฺโพ. สุภกิณฺหโต จวิตฺวา อาภสฺสรฏฺฐานาทีสุ สตฺตา นิพฺพตฺตนฺติ เอตฺถาปิ กปฺปวินาสกมหาเมฆโต ยาว กปฺปวินาสกอุทกปริจฺเฉโท สํวฏฺโฏ นาม ปฐมมสงฺขฺเยยฺยกปฺโป นามาติ จตฺตาริอสงฺขฺเยยฺยกปฺปานิ วุตฺตสทิสานิ เอวํ สตฺต มหากปฺปานิ สตฺตกฺขตฺตุํ อคฺคินา วิลียิตฺวา อฏฺฐเม มหากปฺเป อุทเกนปิ วินาโส จ สณฺฐหนญฺจ เวทิตพฺพํ, เอวํ สตฺตสตฺตมหากปฺโป สตฺตสตฺตวารํ อคฺคินา วิลียิตฺวา อฏฺฐเม อฏฺฐเม วาเร อาเปน วิลียิตฺวา อนุกฺกเมน เตสฏฺฐิมหากปฺปานิ ปริปุณฺณานิ ตทา อาปวารํ ปฏิพาหิตฺวา จตุสฏฺฐิเม มหากปฺเป วาเตน วินสฺสติ ตทา อาทิโต กปฺปวินาสกมหาวาโต วุฏฺฐหิตฺวาติ สพฺพํ ปุพฺเพ วุตฺตนยเมว. อยํ ปน วิเสโส ยถา อคฺคินา วินาสกปฺเป ทุติยสูริโย, เอวมิธาปิ กปฺปวินาสนตฺถํ วาโต สมุฏฺฐาติ โส ปฐมํ สุขุมรชํ อุฏฺฐาเปติ, ตโต ถูลรชํ สณฺหรชํ สุขุมวาลิกํ สกฺขรปาสาณาทโยติ ยาว กูฏาคารมตฺเต ปาสาเณปิ วิสมฏฺฐาเน ฐิตมหารุกฺเขจ อุฏฺฐาเปติ, เต ปถวิโต นภมุคฺคตา น ปุน ปตนฺติ, ตตฺเถว จุณฺณวิจุณฺณา หุตฺวา อภาวํ คจฺฉนฺติ. ยถานุกฺกเมน เหฏฺฐา มหาปถวิยา วาโต สมุฏฺฐหิตฺวา ปถวึ ปริวตฺเตตฺวา อุทฺธํมูลํ กตฺวา อากาเส ขิปติ โยชนสตปฺปมาณาปิ ปถวิปฺปเทสา ทฺวิโยชนติโยชนจตุโยชนปญฺจโยชนฉโยชนสตฺตโยชนปฺปมาณาปิ ภิชฺชิตฺวา เต เวคกฺขิตฺตา อากาเสเยว จุณฺณวิจุณฺณา หุตฺวา อภาวํ คจฺฉนฺติ จกฺกวาฬปพฺพตมฺปิ วาโต อุกฺขิปิตฺวา อากาเส ขิปติ เต อญฺญมญฺญํ ฆฏฺฏยนฺตา จุณฺณวิจุณฺณา [Pg.83] หุตฺวา วินสฺสนฺติ เอเตเนว ภูมฏฺฐกวิมานานิ อากาสฏฺฐกวิมานานิ จ วินาเสนฺโต ฉกามาวจรเทวโลเก นาเสตฺวา โกฏิสตสหสฺสจกฺกวาฬานิ วินาเสติ. ตตฺถ จกฺกวาฬา จกฺกวาเฬหิ, หิมวนฺตา หิมวนฺเตหิ, สิเนรู สิเนรูหิ อญฺญมญฺญํ สมาคนฺตฺวา จุณฺณวิจุณฺณา หุตฺวา วินสฺสนฺติ. ปถวิโต ยาว ปริตฺตสุภา, อปฺปมาณสุภา, สุภณิณฺหาติ ตโยปิ ตติยชฺฌานภูมี วาโต คณฺหาติ ตตฺถ ตโยปิ พฺรหฺมโลเก วินาเสตฺวา เวหปฺผลํ อาหจฺจ อฏฺฐาสิ. เอวํ สพฺพํ สงฺขารคตํ วินาเสตฺวา สยํ วินสฺสติ, เหฏฺฐา อากาเสน สห อุปริ อากาโส เอโก โหติ มหนฺธกาโรติ สพฺพํ วุตฺตสทิสํ. อิธ ปน สุภกิณฺหพฺรหฺมโลกํ อาทึ กตฺวา โลโก ปาตุภวติ. เวหปฺผลโต จวิตฺวา สุภกิณฺหาทีสุ สตฺตา นิพฺพตฺตนฺติ, ตตฺถกปฺปวินา สกมหาเมฆโต ยาว กปฺปวินาสกวาตุปจฺเฉโท, อิทํ สํวฏฺโฏ นาม, ปฐมมสงฺขฺเยยฺยํ นามาติ จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยกปฺปานิ เอโก มหากปฺโป นามาติ สพฺพํ เตโชสํวฏฺเฏ วุตฺตนยเมว. कहे गए बीस असंख्ययेयों में यह प्रवृत्त असंख्ययेय कल्पों के वश से ही किया गया है। अर्थ की दृष्टि से इसे सारकल्प, मण्डकल्प, वरकल्प, सारमण्डकल्प और भद्रकल्प के भेद से पाँच प्रकार का समझना चाहिए। ये पाँच नाम बुद्धों के उत्पन्न होने वाले कल्पों में ही प्राप्त होते हैं, जबकि बुद्धों के उत्पन्न न होने वाले कल्प में केवल 'शून्यकल्प' नाम ही प्राप्त होता है; क्योंकि कल्प के संस्थान (बनने) के समय सबसे पहले महाबोधि-पल्यङ्क के स्थान पर ही पद्म-गर्भ (कमल की कलियाँ) उत्पन्न होते हैं। जिस समय एक बुद्ध उत्पन्न होने वाले होते हैं, तब एक पद्म-गर्भ आठ परिष्कारों के साथ उत्पन्न होता है। उसे देखकर शुद्धावास लोक के भविष्यवक्ता अर्हन्त ब्रह्मा, "इस कल्प में एक बुद्ध उत्पन्न होंगे" ऐसा सोचकर उत्पन्न हुई प्रीति और सौमनस्य से युक्त होकर उन आठ परिष्कारों को लेकर ब्रह्मलोक में रख देते हैं कि "जब बुद्ध उत्पन्न होंगे, तब हम उन्हें देंगे।" इसी प्रकार यदि दो, तीन, चार या पाँच बुद्ध उत्पन्न होने वाले हों, तो दो, तीन, चार या पाँच पद्म-गर्भ आठ परिष्कारों के साथ उत्पन्न होते हैं। वे एक ही डंठल में अलग-अलग बँधे हुए उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार कल्प के संस्थान काल से ही ये पाँच नाम प्राप्त होते हैं, ऐसा समझना चाहिए। इतने समय में इसी विवर्तस्थायी असंख्ययेय कल्प में बुद्ध आदि महान प्रभावशाली पुण्यवान चक्रवर्ती राजा उत्पन्न होते हैं, और वैसे ही आयुकल्प और अन्तरकल्प भी। वहाँ आयुकल्प का अर्थ उन-उन सत्त्वों की आयु की सीमा है। अन्तरकल्प का अर्थ है—वहाँ शस्त्र, रोग और दुर्भिक्ष में से किसी एक संवर्त (विनाश) द्वारा बहुत से सत्त्वों के विनाश को प्राप्त होने पर, शेष बचे सत्त्वों की सन्तान में प्रवृत्त कुशल कर्मों के प्रभाव से, दस वर्ष की आयु से लेकर क्रमशः असंख्ययेय आयु वाले सत्त्वों के होने तक, और फिर अधर्म के ग्रहण के कारण क्रमशः आयु घटते हुए जब दस वर्ष की आयु हो जाती है, तब रोग आदि किसी एक संवर्त से सत्त्वों का विनाश होता है—यहाँ तक का समय एक अन्तरकल्प है। इस प्रकार परिच्छिन्न अन्तरकल्पों के वश से चौंसठ अन्तरकल्पों का एक असंख्ययेय कल्प होता है; दूसरे कहते हैं कि यह बीस अन्तरकल्पों के परिमाण का होता है। ये चार असंख्ययेय कल्प मिलकर एक 'महाकल्प' कहलाते हैं। इस प्रकार तेज-संवर्त (अग्नि द्वारा विनाश) के वश से महाकल्पों का अन्तराल अग्नि से ही नष्ट होता है। जिस समय कल्प जल से नष्ट होता है, तब आरम्भ में कल्प-विनाशक महामेघ के उठने से लेकर पहले कही गई विधि के अनुसार ही विस्तार से समझना चाहिए। यहाँ विशेषता यह है कि जैसे वहाँ (अग्नि विनाश में) दूसरा सूर्य निकलता है, वैसे ही यहाँ कल्प-विनाशक खारी जल (क्षारोदक) का महामेघ उठता है। वह आरम्भ में सूक्ष्म वर्षा करता हुआ क्रमशः महाधाराओं के साथ करोड़ों-लाखों चक्रवातों को भरते हुए बरसता है। खारी जल के स्पर्श से पृथ्वी, पर्वत आदि पिघल जाते हैं। वह जल वायु द्वारा चारों ओर से थामे जाने पर पृथ्वी से लेकर परीत्ताभा, अप्रमाणाभा और आभास्वर—इन तीनों द्वितीय ध्यान की भूमियों को भी ले लेता है। वहाँ उन तीनों ब्रह्मलोकों को विलीन कर वह शुभकृत्स्न (सुभकिण्ह) तक पहुँचकर रुक जाता है। जब तक अणु मात्र भी संस्कार शेष रहता है, तब तक वह शान्त नहीं होता। जल के भीतर आए हुए सभी संस्कारों को अभिभूत कर वह अचानक शान्त हो जाता है और अन्तर्धान हो जाता है। नीचे के आकाश के साथ ऊपर का आकाश एक हो जाता है और महाअन्धकार छा जाता है—यह सब पहले कहे अनुसार ही है। केवल यहाँ जल के धीरे-धीरे उतरने पर आभास्वर ब्रह्मलोक से आरम्भ कर लोक का प्रादुर्भाव समझना चाहिए। शुभकृत्स्न से च्युत होकर सत्त्व आभास्वर आदि स्थानों में उत्पन्न होते हैं। यहाँ भी कल्प-विनाशक महामेघ से लेकर कल्प-विनाशक जल की सीमा तक का समय 'संवर्त' नामक पहला असंख्ययेय कल्प है। इस प्रकार चार असंख्ययेय कल्प पहले कहे अनुसार ही हैं। इस प्रकार सात महाकल्पों तक सात बार अग्नि से विलीन होने के बाद, आठवें महाकल्प में जल द्वारा विनाश और संस्थान समझना चाहिए। इस प्रकार सात-सात महाकल्पों के सात-सात बार अग्नि से विलीन होने और प्रत्येक आठवें बार जल से विलीन होने के क्रम से जब तिरसठ (63) महाकल्प पूर्ण हो जाते हैं, तब जल की बारी को रोककर चौंसठवें (64) महाकल्प में वायु से विनाश होता है। तब आरम्भ में कल्प-विनाशक महावात (आँधी) के उठने से लेकर सब कुछ पहले कही गई विधि के अनुसार ही है। यहाँ विशेषता यह है कि जैसे अग्नि-विनाश कल्प में दूसरा सूर्य निकलता है, वैसे ही यहाँ कल्प-विनाश के लिए वायु उत्पन्न होती है। वह पहले सूक्ष्म धूल उठाती है, फिर स्थूल धूल, बारीक रेत, सूक्ष्म बालू, कंकड़, पत्थर आदि से लेकर कूटागार के समान बड़े पत्थरों और विषम स्थानों पर स्थित विशाल वृक्षों को भी उखाड़ देती है। वे पृथ्वी से आकाश में उड़ जाते हैं और पुनः नीचे नहीं गिरते, वहीं चूर्ण-विचूर्ण होकर अभाव को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे-जैसे क्रमशः नीचे महापृथ्वी से वायु उठती है, वह पृथ्वी को पलटकर, जड़ ऊपर की ओर करके आकाश में फेंक देती है। सौ योजन परिमाण वाले पृथ्वी के प्रदेश भी, दो-तीन-चार-पांच-छह-सात योजन परिमाण वाले टुकड़े होकर वेग से आकाश में फेंके जाने पर चूर्ण-विचूर्ण होकर नष्ट हो जाते हैं। वायु चक्रवाल पर्वत को भी उखाड़कर आकाश में फेंक देती है, वे आपस में टकराकर चूर्ण-विचूर्ण होकर नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार भूमि पर स्थित विमानों और आकाश में स्थित विमानों को नष्ट करते हुए, छह कामावचर देवलोकों को नष्ट कर करोड़ों-लाखों चक्रवातों को नष्ट कर देती है। वहाँ चक्रवाल चक्रवालों से, हिमालय हिमालयों से, और सिनेरु सिनेरुओं से आपस में टकराकर चूर्ण-विचूर्ण होकर नष्ट हो जाते हैं। पृथ्वी से लेकर परीत्तशुभ, अप्रमाणशुभ और शुभकृत्स्न—इन तीनों तृतीय ध्यान की भूमियों को वायु अपनी चपेट में ले लेती है। वहाँ उन तीनों ब्रह्मलोकों को नष्ट कर वह वेहप्फल तक पहुँचकर रुक जाती है। इस प्रकार समस्त संस्कारों को नष्ट कर वह स्वयं शान्त हो जाती है। नीचे के आकाश के साथ ऊपर का आकाश एक हो जाता है और महाअन्धकार छा जाता है—यह सब पहले कहे अनुसार ही है। यहाँ शुभकृत्स्न ब्रह्मलोक से आरम्भ कर लोक का प्रादुर्भाव होता है। वेहप्फल से च्युत होकर सत्त्व शुभकृत्स्न आदि में उत्पन्न होते हैं। वहाँ कल्प-विनाशक महामेघ से लेकर कल्प-विनाशक वायु के रुकने तक का समय 'संवर्त' नामक पहला असंख्ययेय कल्प है। इस प्रकार चार असंख्ययेय कल्पों का एक महाकल्प होता है—यह सब तेज-संवर्त में कही गई विधि के अनुसार ही है। วุตฺตมฺปิ เจตํ. यह कहा भी गया है। ‘‘สตฺต สตฺต คฺคินา วารา, อฏฺฐเม อฏฺฐเม ทกา; จตุสฏฺฐิ ยทา ปุณฺณา, เอโก วายุวโร สิยา. “सात-सात बार अग्नि से, आठवें-आठवें बार जल से; जब चौंसठ (बार) पूर्ण हो जाते हैं, तब एक बार वायु (का अवसर) होता है। อคฺคินา’ภสฺสรา เหฏฺฐา, อาเปน สุภกิณฺหโต; เวหปฺผลโต วาเตน, เอวํ โลโก วินสฺสตี’’ติ. अग्नि से आभास्वर के नीचे, जल से शुभकृत्स्न के नीचे; वेहप्फल से वायु द्वारा, इस प्रकार लोक विनष्ट होता है।” ตสฺมา ติณฺณมฺปิ ปฐมชฺฌานตลานํ เอกกปฺเปปิ อวินาสาภาวโต สกลกปฺเป เตสํ สมฺภโว นตฺถีติ อสงฺขฺเยยฺย กปฺปวเสน เตสํ อายุปริจฺเฉโท ทฏฺฐพฺโพ. ทุติยชฺฌานตลโต ปฏฺฐาย ปน ปริปุณฺณมหากปฺปวเสน อายุปริจฺเฉโท ทฏฺฐพฺโพ, น อสงฺขฺเยยฺยกปฺปวเสน. ยทิ ทุติยชฺฌานตลโต ปฏฺฐาย ปริปุณฺณมหากปฺปวเสน อายุปริจฺเฉโท สิยา, กถํ อาภสฺสราทีสุ พฺรหฺมูนํ อฏฺฐมหากปฺปาทิวเสน อายุ ปริปุณฺณํ สิยา, ตถา หิ ปฐมชฺฌานตลํ สตฺตสุ วาเรสุ อคฺคินา วินสฺสติ. อฏฺฐเม วาเร ยาว อาภสฺสรา อุทเกน วินสฺสติ ปุน สตฺตวาเรสุ อคฺคินา ปฐมชฺฌานตลํ, ปุน อฏฺฐเมวาเร อุทเกน ทุติยชฺฌานตลํ วินสฺสตีติ เอวํ อฏฺฐเม วาเร อาปวารํ ปฏิพาหิตฺวา ยาว สุภกิณฺหา วาเตน วินสฺสติ เอวํ จตุสฏฺฐิ ปริปุณฺณา โหตีติ สจฺจํ[Pg.84], เหฏฺฐาวิวฏฺฏฏฺฐายี อสงฺขฺเยยฺยกปฺปวเสน เอโก สตฺต มหากปฺปานิ จาติ อฏฺฐ กปฺปานิ อาภสฺสรพฺรหฺมูนํ อายุปฺปมาณํ โหติ. จตุสฏฺฐิกปฺเปสุปิ วิวฏฺฏฏฺฐายีอสงฺขฺเยยฺยกปฺปวเสน เอโก เต สฏฺฐิมหากปฺปานิ จาติ จตุสฏฺฐิกปฺปานิ สุภกิณฺหานํ พฺรหฺมูนํ อายุปฺปมาณํ โหติ เตน วุตฺตํ โปราเณหิ. इसलिए तीनों प्रथम ध्यान भूमियों का एक कल्प में भी अविनाशी न होने के कारण, सम्पूर्ण कल्प में उनका अस्तित्व नहीं रहता, अतः असंख्येय कल्प के अनुसार उनकी आयु की सीमा देखनी चाहिए। द्वितीय ध्यान भूमि से लेकर तो परिपूर्ण महाकल्प के अनुसार आयु की सीमा देखनी चाहिए, न कि असंख्येय कल्प के अनुसार। यदि द्वितीय ध्यान भूमि से लेकर परिपूर्ण महाकल्प के अनुसार आयु की सीमा हो, तो आभास्वर आदि के ब्रह्मों की आयु आठ महाकल्प आदि के अनुसार कैसे पूर्ण होगी? क्योंकि प्रथम ध्यान भूमि सात बार अग्नि से विनष्ट होती है। आठवीं बार में आभास्वर तक जल से विनाश होता है, पुनः सात बार अग्नि से प्रथम ध्यान भूमि, पुनः आठवीं बार जल से द्वितीय ध्यान भूमि विनष्ट होती है; इस प्रकार आठवीं बार जल के विनाश को पार कर जब तक शुभकृत्स्न वायु से विनष्ट होता है, तब चौंसठ पूर्ण होते हैं, यह सत्य है। नीचे के विवर्तस्थायी असंख्येय कल्प के अनुसार एक और सात महाकल्प, इस प्रकार आठ कल्प आभास्वर ब्रह्मों की आयु का प्रमाण होता है। चौंसठ कल्पों में भी विवर्तस्थायी असंख्येय कल्प के अनुसार एक और तिरसठ महाकल्प, इस प्रकार चौंसठ कल्प शुभकृत्स्न ब्रह्मों की आयु का प्रमाण होता है, इसलिए प्राचीन आचार्यों ने कहा है। สตฺต สตฺต’คฺคินา วารา, อฏฺฐเม อฏฺฐเม ทกา; จตุสฏฺฐิ ยทา ปุณฺณา, เอโก วายุวโร สิยา’ติ. सात-सात बार अग्नि से, आठवें-आठवें बार जल से; जब चौंसठ पूर्ण हो जाते हैं, तब एक बार वायु (का अवसर) होता है। เกจิ ปน. किन्तु कुछ (आचार्य)। ‘‘อคฺคินา’ภสฺสรา เหฏฺฐา, อาเปน สุภกิณฺหโต; เวหปฺผลโต วาเตน, เอวํ โลโก วินสฺสตี’’ติ. “अग्नि से आभास्वर के नीचे, जल से शुभकृत्स्न के नीचे; वेहप्फल से वायु द्वारा, इस प्रकार लोक विनष्ट होता है।” อิมิสฺสา คาถาย ‘‘อาภสฺสราติ’’จ ‘‘สุภกิณฺหโต’’ติ จ ‘‘เวหปฺผลโต’’ติ จ อภิวิธิวเสน วุตฺตภาวญฺจ สมตลภาเวปิ เสฏฺฐภูมิตฺตา ปฏฺฐานวเสน วุตฺตภาวญฺจ อมญฺญิตฺวา สุทฺธาวาสภูมีสุ วิย อุปรูปริวเสน ภูมิกฺกโมติ มญฺญิตฺวา. इस गाथा में ‘आभास्वर’ और ‘शुभकृत्स्न’ और ‘वेहप्फल’ को अभिविधि (सीमा सहित) के रूप में कहे जाने को, तथा समतल होने पर भी श्रेष्ठ होने के कारण प्रस्थान (क्रम) के रूप में कहे जाने को न मानकर, शुद्धावास भूमियों की तरह ऊपर-ऊपर के क्रम से भूमि का क्रम मानकर। ‘‘ปญฺจภูมิ นฏฺฐา อคฺคิ, อฏฺฐ ภูมิ นฏฺฐา ทกา; นวภูมิ นฏฺฐา วาตา, โลกนฏฺฐา ตทา สิยุํ. “पाँच भूमियाँ अग्नि से नष्ट होती हैं, आठ भूमियाँ जल से नष्ट होती हैं; नौ भूमियाँ वायु से नष्ट होती हैं, तब लोक विनष्ट होते हैं। ปฐเม อคฺคิ ทฺวตฺตึส, ทุติเย อาทิ โสฬส; ทุติยภูเม มชฺเฌ อฏฺฐมํ, ตํ ฉปฺปญฺญาส วารกํ. प्रथम (विनाश) में अग्नि बत्तीस (बार), द्वितीय में आदि सोलह; द्वितीय भूमि के मध्य में आठवां, वह छप्पन बार। อาภสฺสรมฺหิ จตุตฺถํ, ปริตฺตสุภมฺหิ ทฺเว ชลํ; อปฺปมาณสุภํ เอกวารํ, มตํ อุทกสตฺตม’’นฺติ. आभास्वर में चौथा, परीत्तशुभ में दो जल; अप्रमाणशुभ में एक बार, सातवां जल माना गया है।” วทนฺติ เตสํ วาเท อาภสฺสรโต เหฏฺฐา ปญฺจภูมิ อคฺคินฏฺฐา, สุภกิณฺหโต เหฏฺฐา อฏฺฐภูมิ อุทกนฏฺฐาติ วทนฺติ. สมตลทีปนตฺถํ สนฺเทหจฺเฉทนตฺถํ เอวํ คหิตาติ เอกภวปริโยสานํ สนฺธาย ปฏิสนฺธิภวญฺจาติ อาทิ วุตฺตนฺติ. อิมิสฺสาปิ อตฺถํ ทุคฺคหิเตน คเหตฺวา ปฏิสนฺธิภวงฺควเสน สทิสภาวเมว สนฺธาย วุตฺตนฺติ ปริกปฺเปนฺติ โส อยุตฺตรูโป วิย ทิสฺสติ อติวิย มิจฺฉาคาโห จ โหติ อคฺคญฺญสุตฺตวิสุทฺธิมคฺคาทีหิ วิรุชฺฌนโต สํวฏฺฏสีมาปิ วิรุทฺธา ตตฺถ ปฐมชฺฌานตลํ อุปาทาย อคฺคินา, ทุติยชฺฌานตลํ อุปาทาย อุทเกน, จตุตฺถชฺฌานตลํ อุปาทาย วาเตน วินสฺสตีติ วุตฺตวจเนนาปิ วิรุชฺฌเตว ตสฺมา [Pg.85] ‘‘อาภสฺสรา’’ติ จ ‘‘สุภกิณฺหโต’’ติ จ ‘‘เวหปฺผลโต’’ติ จ เอตฺถาภิวิธิวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ. อญฺญถา ‘‘อุปริ ปพฺพตา เทโว วสฺสตี’’ติ เอตฺถ วิย อาภสฺสรสุภกิณฺหเวหปฺผลานํ เตน เตน สํวฏฺเฏน วินาโสปิ น ภเวยฺย. อยํ โลกวิปตฺติปริจฺเฉโท. เอวํ พุทฺโธ จ ทุลฺลโภ โลเก ติ อิมสฺส อตฺโถ วุตฺโตเยว. वे कहते हैं कि उनके मत में आभास्वर से नीचे पाँच भूमियाँ अग्नि से नष्ट होती हैं, शुभकृत्स्न से नीचे आठ भूमियाँ जल से नष्ट होती हैं। समतल दिखाने के लिए और संदेह दूर करने के लिए ऐसा ग्रहण किया गया है, एक भव की समाप्ति के संदर्भ में प्रतिसंधि भव आदि कहा गया है। इसका भी अर्थ गलत तरीके से ग्रहण करके, प्रतिसंधि और भवंग के अनुसार समानता के संदर्भ में ही कहा गया है, ऐसा वे कल्पना करते हैं। वह अनुचित सा प्रतीत होता है और अत्यंत मिथ्या धारणा है, क्योंकि यह अग्गञ्ञसुत्त और विशुद्धिमार्ग आदि से विरुद्ध है। संवर्त-सीमा भी विरुद्ध है। वहाँ ‘प्रथम ध्यान भूमि से लेकर अग्नि द्वारा, द्वितीय ध्यान भूमि से लेकर जल द्वारा, चतुर्थ ध्यान भूमि से लेकर वायु द्वारा विनष्ट होता है’ - इस वचन से भी विरोध होता है। इसलिए ‘आभास्वर’, ‘शुभकृत्स्न’ और ‘वेहप्फल’ यहाँ अभिविधि (सीमा सहित) के रूप में अर्थ ग्रहण करना चाहिए। अन्यथा ‘पर्वत के ऊपर देव वर्षा करता है’ यहाँ की तरह आभास्वर, शुभकृत्स्न और वेहप्फल का उस-उस संवर्त (विनाश) से विनाश भी नहीं होगा। यह लोक-विपत्ति का परिच्छेद है। इस प्रकार ‘बुद्ध का लोक में दुर्लभ होना’ इसका अर्थ कहा ही जा चुका है। อิติ สาครพุทฺธิตฺเถรวิรจิเต สีมวิโสธเน इस प्रकार सागरबुद्धि स्थविर द्वारा रचित सीमा-विशोधन में। กปฺปวินาสกณฺโฑ ทุติโย ปริจฺเฉโท. कल्प-विनाश काण्ड नामक द्वितीय परिच्छेद समाप्त। ๓. นิพฺพานกณฺโฑ ३. निर्वाण काण्ड। อิทานิ ‘‘สทฺธมฺมสวนมฺปิ จาติ อิมสฺส สํวณฺณนากฺกโม สมฺปตฺโต ตตฺถ สทฺธมฺมสวนมฺปิ จ โลเก ทุลฺลภเมว ตถา หิ สทฺธมฺโม นาม ติวิโธ โหติ. ปริยตฺติสทฺธมฺโม, ปฏิปตฺติสทฺธมฺโม, ปฏิเวธสทฺธมฺโมติ. ตตฺถ ปริยตฺติสทฺธมฺโม นาม เตปิฏกํ พุทฺธวจนํ. ปฏิปตฺติสทฺธมฺโม นาม เตรสธุตงฺคานิ อสีติ ขนฺธกวตฺตาทโย อภิสมาจารวตฺตาทีนิ. ปฏิเวธสทฺธมฺโม นาม จตุสจฺจปฺปฏิเวโธ. เตสุ ปริยตฺติสทฺธมฺโม ทฺวินฺนํ สทฺธมฺมานํ ปุพฺพงฺคโมเยว ปทฏฺฐานญฺจ. กสฺมา ตํมูลกตฺตา ตถา หิ ปริยตฺติยา อสติ ปฏิเวโธ นาม นตฺถิ. ปริยตฺติยา อนฺตรหิตาย ปฏิปตฺติ, ปฏิปตฺติยา อนฺตรหิตาย อธิคโม อนฺตรธายติ. กึ การณา อยญฺหิ ปริยตฺติ ปฏิปตฺติยา ปจฺจโย โหติ. ปฏิปตฺติอธิคมสฺสาปิ ปริยตฺติเยว ปมาณํ. ตตฺถ ปฏิเวโธ จ ปฏิปตฺติ จ โหติปิ นโหติปิ. เอกสฺมิญฺหิ กาเล ปฏิเวธธรา ภิกฺขู พหู โหนฺติ, ‘‘เอส ภิกฺขุ ปุถุชฺชโน’’ติ องฺคุลึ ปหริตฺวา ทสฺเสตพฺโพ โหติ. อิมสฺมึ เยว ทีเป เอกวารํ ปุถุชฺชนภิกฺขุนาม นาโหสิ. ปฏิปตฺติปูรกาปิ กทาจิ พหู โหนฺติ กทาจิ อปฺปา. อิติ ปฏิเวโธ จ ปฏิปตฺติ จ โหติปิ น โหติปิ. สาสนสฺส ฐิติยา ปน ปริยตฺติเยว ปมาณํ ปณฺฑิโต หิ เตปิฏกํ สุตฺวา ทฺเวปิ ปูเรติ, ยถา อมฺหากํ โพธิสตฺโต อาฬารสฺส สนฺติเก ปญฺจ อภิญฺญา สตฺต จ สมาปตฺติโย นิพฺพตฺเตตฺวา เนวสญฺญานาสญฺญายตน สมาปตฺติยา ปริกมฺมํ ปุจฺฉิ. โส ‘‘น ชานามี’’ติ อาห. ตโต อุทกสฺส สนฺติกํ คนฺตฺวา อธิคตวิเสสํ สํสนฺทิตฺวา เนวสญฺญานาสญฺญายตนสฺส ปริกมฺมํ ปุจฺฉิ. โส อาจิกฺขิ, ตสฺส วจนสมนนฺตรเมว มหาสตฺโต ตํ [Pg.86] สมฺปาเทสิ เอวเมว ปญฺญวา ภิกฺขุ ปริยตฺตึ สุตฺวา ทฺเวปิ ปูเรติ ตสฺมา ปริยตฺติยา ฐิตาย สาสนํ ฐิตํ โหติ ยถา มหาตฬากสฺส ปาฬิยา ถิราย อุทกํ น ฐสฺสตีติ น วตฺตพฺพํ อุทเก สติ ปทุมาทีนิ ปุปฺผานิ น ปุปฺผิสฺสนฺตีติ น วตฺตพฺพํ เอวเมว มหาตฬากสฺส ถิรปาฬิสทิเส เตปิฏเก พุทฺธวจเน สติ มหาตฬาเก อุทกสทิสา ปฏิปตฺติปูรกา กุลปุตฺตา นตฺถีติ น วตฺตพฺพํ. เตสุ สติ มหาตฬาเกสุ ปทุมาทีนิ ปุปฺผานิ วิย โสตาปนฺนาทโย อริยปุคฺคลา นตฺถีติ น วตฺตพฺพํ, เอกนฺตโต ปริยตฺติเยว ปมาณํ ปริยตฺติยา อนฺตรหิตาย ปฏิปตฺติปฏิเวธานํ อนฺตรธานโต. ตตฺถ ปริยตฺตินาม เตปิฏกํ พุทฺธวจนํ สาฏฺฐกถา ปาฬิยาว สา ติฏฺฐติ, ตาว ปริยตฺติ ปริปุณฺณา โหติ. คจฺฉนฺเต กาเล กลิยุคราชาโน อธมฺมิกา โหนฺติ เตสุ อธมฺมิเกสุ ราชามจฺจาทโย อธมฺมิกา โหนฺติ ตถา รฏฺฐชนปทวาสิโนปิ อธมฺมิกา เอเตสํ อธมฺมิกตาย น เทโว สมฺมา วสฺสติ, ตโต สสฺสานิ น สมฺปชฺชนฺติ. เตสุ สมฺปชฺชนฺเตสุ ปจฺจยทายกา ภิกฺขุสงฺฆสฺส ปจฺจเย ทาตุํ น สกฺโกนฺติ. ภิกฺขู ปจฺจเยหิ กิลมนฺตา อนฺเตวาสิเก สงฺคเหตุํ น สกฺโกนฺติ. คจฺฉนฺเต คจฺฉนฺเต กาเล ปริยตฺติ ปริหายติ, อตฺถวเสน ธาเรตุํ น สกฺโกนฺติ, ปาฬิวเสเนว ธาเรนฺติ. ตโต กาเล คจฺฉนฺเต ปาฬิมฺปิ สกลํ ธาเรตุํ น สกฺโกนฺติ ปฐมํ อภิธมฺมปิฏกํ ปริหายติ. ปริหายมานํ มตฺถกโต ปฏฺฐาย ปริยตฺติ หายติ ปฐมญฺหิ มหาปกรณํ ปริหายติ. ตสฺมึ ปริหายมาเน ยมกํ, กถาวตฺถุ, ปุคฺคลปญฺญตฺติ, ธาตุกถา, วิภงฺโค, ธมฺมสงฺคโหติ เอวํ อภิธมฺมปิฏเก ปริหีเน มตฺถกโต ปฏฺฐาย สุตฺตนฺตปิฏกํ ปริหายติ. ปฐมญฺหิ องฺคุตฺตรนิกาโย ปริหายติ. ตสฺมิมฺปิ ปฐมํ เอกาทสนิปาโต…เป… ตโต เอกนิปาโตติ เอวํ องฺคุตฺตเร ปริหีเน มตฺถกโต ปฏฺฐาย สํยุตฺตนิกาโย ปริหายติ, ปฐมํ มหาวคฺโค ปริหายติ. ตโต ปฏฺฐาย สฬายตนวคฺโค, ขนฺธวคฺโค, นิทานวคฺโค, สคาถาวคฺโคติ เอวํ สํยุตฺตนิกาเย ปริหีเน มตฺถกโต ปฏฺฐาย มชฺฌิมนิกาโย ปริหายติ ปฐมญฺหิ อุปริปณฺณาสโก ปริหายติ. ตโต มชฺฌิมปณฺณาสโก, ตโต มูลปณฺณาสโกติ เอวํ มชฺฌิมนิกาเย ปริหีเน มตฺถกโต ปฏฺฐาย ทีฆนิกาโย ปริหายติ, ปฐมญฺหิ ปาถิยวคฺโค [Pg.87] ปริหายติ ตโต มหาวคฺโค, ตโต ขนฺธกวคฺโคติ ทีฆนิกาเย ปริหีเน สุตฺตนฺตปิฏกํ ปริหีนํ นาม โหติ. วินยปิฏเกน สทฺธึ ชาตกเมว ธาเรนฺติ. วินยปิฏกํ ลชฺชิโน ธาเรนฺติ. ลาภกามา ปน สุตฺตนฺเต กถิเตปิ สลฺลกฺเขนฺตา นตฺถีติ ชาตกเมว ธาเรนฺติ. คจฺฉนฺเต กาเล ชาตกมฺปิ ธาเรตุํ น สกฺโกนฺติ. อถ เนสํ ปฐมํ เวสฺสนฺตรชาตกํ ปริหายติ. ตโต ปฏิโลมกฺกเมน ปุณฺณกชากตกํ, มหานารทกสฺสปชาตกํ ปริหายติ. วินยปิฏกเมว ธาเรนฺติ. คจฺฉนฺเต กาเล ตมฺปิ มตฺถกโต ปริหายติ ปฐมญฺหิ ปริวาโร ปริหายติ, ตโต ขนฺธโก ภิกฺขุนีวิภงฺโค มหาวิภงฺโคติ อนุกฺกเมน อุโปสถกฺขนฺธกมตฺตเมว ธาเรนฺติ, ตทา ปริยตฺติ อนนฺตรหิตาว โหติ. ยาว ปน มนุสฺเสสุ จตุปฺปทิกคาถาปิ ปวตฺตติ, ตาว ปริยตฺติ อนนฺตรหิตาว โหติ. ยทา สทฺโธ ปสนฺโน ราชา หตฺถิกฺขนฺเธ สุวณฺณจงฺโกฏกมฺหิ สหสฺสตฺถวิกํ ฐปาเปตฺวา ‘‘พุทฺเธหิ กถิตํ จตุปฺปทิกํ คาถํ ชานนฺโต อิมํ สหสฺสํ คณฺหตู’’ติ นคเร เภรึ จราเปตฺวา คณฺหกํ อลภิตฺวา เอกวารํ จราปิเต น สุณนฺตาปิ โหนฺติ อสุณนฺตาปิ, ยาว ตติยํ จราเปตฺวา คณฺหกํ อลภิตฺวา ราชปุริสา สหสฺสตฺถวิกํ ปุน ราชกุลํ ปเวเสนฺติ, ตทา ปริยตฺติอนฺตรหิตา นาม โหติ. เอวํ ปริยตฺติยา อนฺตรหิตาย ปฏิปตฺติปิ ปฏิเวโธปิ อนฺตรหิโตว โหติ. สทฺธมฺมสวนสฺส ทุลฺลภภาโว ธมฺมโสณฺฑกวตฺถุนา ทีเปตพฺโพ อมฺหากํ กิร สมฺมาสมฺพุทฺโธ กสฺสปสมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ธมฺมราชสฺส สาสนนฺตรธานโต นจิเรเนว กาเลน พาราณสิรญฺโญ ปุตฺโต ธมฺมโสณฺฑกราชกุมาโร หุตฺวา ปิตุอจฺจเยน รชฺเช ปติฏฺฐาย กสฺสปทสพเลน เทสิตํ ธมฺมํ โสตุกาโม หุตฺวา มาสมตฺตํ รชฺชํ กตฺวา อมฺหากํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ อิมสฺมึ เยว ภทฺทกปฺเป รชฺชํ กาเรตฺวา เทวนครสทิเส พาราณสินคเร จกฺกวตฺติรชฺชสทิสํ รชฺชํ กโรนฺโต เอวํ จินฺเตสิ… ‘‘มยฺหํ เอวรูปํ รชฺชํ กึ วิลาสํ รชฺชานุภาวํ สทฺธมฺมวิโยเคน, ทิวากรวิรหิโต อากาโส วิย, สสงฺกวิรหิตรตฺติ วิย, ทาฐาวิรหิตคโช วิย, เวลนฺตวิรหิตมหาสมุทฺโท วิย จกฺขุวิรหิต สุสชฺชิตวทนํ วิย, สุคนฺธวิรหิตปาริฉตฺตปุปฺผํ วิย, จตุอกฺขรนิยมิตธมฺมเทสนาวิโยเคน มยฺหํ อิทํ รชฺชํ น โสภตี’’ติ [Pg.88] จินฺเตตฺวา สุวณฺณจงฺโกฏเกน สหสฺสตฺถวิกํ ภณฺฑกํ สุสชฺชิตํ มงฺคลหตฺถิกุมฺเภ ฐเปตฺวา พาราณสีนคเร มหาวีถิยํ เภรึ จราเปติ ‘‘เอกปทิกํ วา ทฺวิปทิกํ วา ติปทิกํ วา จตุปฺปทิกํ วา ธมฺมปทํ ชานนฺตสฺส ทมฺมี’’ติ เอวํ เภรึ จราเปตฺวา ธมฺมชานนกํ อลภิตฺวา ปุนปฺปุนํ ทฺวิสหสฺสํ ติสหสฺสํ ยาว สตสหสฺสํ โกฏิ ทฺเว สหสฺสโกฏิ, สตสหสฺสโกฏิ คามนิคมชนปทเสนาปติฏฺฐานํ อุปราชฏฺฐานํ. ปริโยสาเน ธมฺมเทสกํ อลภิตฺวา อตฺตโน สุวณฺณปีฐกํ เสตจฺฉตฺตํ จชิตฺวาปิ ธมฺมเทสกํ อลภิตฺวา รชฺชสิรึ ปหาย อตฺตานํ จชิตฺวา ‘‘ธมฺมเทสกสฺส ทาโส หุตฺวาปิ ธมฺมํ โสสฺสามี’’ติ วตฺวา เอวมฺปิ ธมฺม เทสกํ อลภิตฺวา วิปฺปฏิสารี หุตฺวา ‘‘กึ เม สทฺธมฺมวิโยเคน รชฺเชนาติ อมจฺจานํ รชฺชํ นิยฺยาเตตฺวา สทฺธมฺมคเวสโก หุตฺวา ธมฺมโสณฺฑกมหาราชา มหาวนํ ปาวิสิ ธมฺมโสณฺฑกมหาราชสฺส สทฺธมฺมสวนํ สนฺธาย ปวิฏฺฐกฺขเก สกฺกเทวมหาราชสฺส เวชยนฺตปาสาโท สเหว กิณฺณิกาย กมฺโป อโหสิ, ปณฺฑุกมฺพลสิลาสนํ อุณฺหาการํ อโหสิ. สกฺโกเทวราชา เกนการเณน ปณฺฑุกมฺพลสิลาสนํ อุณฺหาการํ อโหสี’’ติ จินฺเตตฺวา อตฺตโน สหสฺสเนตฺเตน เทวมนุสฺเสสุ วิตฺถาเรตฺวา โอโลเกนฺโต ธมฺมคเวสโก หุตฺวา วนํ ปวิฏฺฐํ ธมฺมโสณฺฑกมหาราชานํ ทิสฺวา จินฺเตสิ… ‘‘อชฺช เม อตฺตานมฺปิ ชหาย รกฺขสเวสํ มาเปตฺวา เอตํ อนิจฺจปริทีปนํ ชาติชราพฺยาธิมรณํ สกลสรีเร โทสํ ทสฺเสตฺวา ธมฺมํ เทเสตฺวา เอตํ สกรชฺเชเยว ปติฏฺฐาเปตพฺพ’’นฺติ จินฺเตตฺวา สกฺโก เทวราชา ยกฺขสรูปํ มาเปตฺวา โพธิสตฺตสฺส อภิมุโข อวิทูเร อตฺตานํ ทสฺเสสิ. ตํ ทิสฺวา ธมฺมโสณฺฑกมหาราชา เอวํ จินฺเตสิ… ‘‘เอวํรูโป นาม รกฺขโส ธมฺมํ ชาเนยฺยา’’ติ, จินฺเตตฺวา อวิทูเร ฐาเน ฐตฺวา ปุจฺฉามีติ รกฺขเสน สทฺธึ สลฺลปนฺโต อาห ‘‘สามิปุญฺญเทวราช อิมสฺมึ ปน วนฆเน วสนกเทวราชา กึ นุโข ธมฺมํ ชานาสี’’ติ, เทวตา ‘‘มหาราช ธมฺมํ ชานามี’’ติ อาห. ‘‘ยทิ ธมฺมํ ชานาสิ, มยฺหํ ธมฺมกถํ กเถถา’’ติ อาห. ‘‘อหํ ตุยฺหํ ธมฺมํ กเถสฺสามิ, ตฺวํ มยฺหํ กีทิสํ ธมฺมกถิกสฺส สกฺการํ กริสฺสสี’’ติ อาห. ‘‘เอวํ สนฺเต มยฺหํ ธมฺมํ กเถตฺวา ปจฺฉา มยฺหํ สรีเร มํสํ ขาทิสฺสสี’’ติ อาห. ‘‘อหํ มหาราช ฉาโต หุตฺวา ธมฺมํ กเถตุํ น สกฺโกมี’’ติ อาห. ‘‘ยทิ ตุมฺเห [Pg.89] ปฐมํ มํสํ ขาทถ, ธมฺมํ โก สุณิสฺสตี’’ติ อาห. ปุน โส รกฺขโส ‘‘นาหํ ธมฺมํ เทเสตุํ สกฺโกมี’’ติ. ปุน ราชา ‘‘มยฺหํ ธมฺมปฏิลาภญฺจ ตุมฺหากํ มํสปฏิลาภญฺจ ตุมฺเห ชานิตฺวา มยฺหํ ธมฺมํ เทเสถา’’ติ อาห. อถ สกฺโก เทวราชา ‘‘สาธุ โหถา’’ติ วตฺวา อวิทูเร ฐาเน อุพฺเพเธน ติคาวุตมตฺตํ มหนฺตํ อญฺชนปพฺพตํ มาเปตฺวา เอวมาห… ‘‘สเจ มหาราช อิมํ ปพฺพตมุทฺธนึ อารูยฺห อากาสา อุปฺปติตฺวา ตฺวํ มม มุเข ปติสฺสสิ, อหํ เต อากาสคตกาเล ธมฺมํ เทเสสฺสามิ, เอวํ สนฺเต ตุยฺหญฺจ ธมฺมปฺปลาโภ มยฺหญฺจ มํสปฏิลาโภ ภวิสฺสตี’’ติ อาห. ตสฺส กถํ สุตฺวา ธมฺมโสณฺฑกมหาราชา ‘‘อนมตคฺเค สํสาเร ปุริโส หุตฺวา อธมฺมสมงฺคี หุตฺวา อธมฺมสฺเสว อตฺถาย ปาณาติปาโต อทินฺนาทาโน กาเมสุมิจฺฉาจาโร สูกริโก โอรพฺภิโก สากุณิ โก โจโร ปรทาริโก ตํ คเหตฺวา สีสจฺฉินฺนานํ โลหิตํ จตูสุ มหาสมุทฺเทสุ อุทกโตปิ พหุตรํ มาตาปิตุอาทีนมฺปิ มนาปานํ อตฺถาย โรทนฺตานํ อสฺสุ จตูสุมหาสมุทฺเทสุ อุทกโตปิ พหุตรํ, อิมํ ปน สรีรํ ธมฺมสฺส อตฺถาย วิกฺกิณามิ ตํ มหปฺผลญฺจ มนาปญฺจา’’ติ จินฺเตตฺวา ‘‘สาธุ มาริส เอวํ กโรมี’’ติ ปพฺพตํ อารูยฺห ปพฺพตคฺเค ฐิโต ‘‘มม รชฺเชน สทฺธึ มยฺหํ สชีวสรีรํ สทฺธมฺมสฺสตฺถาย ทสฺสามี’’ติ โสมนสฺโส หุตฺวา ‘‘ธมฺมํ กเถถา’’ติ สทฺธมฺมตฺถาย ชีวิตํ ปริจฺจชิตฺวา อากาสโต อุปฺปติตฺวา ธมฺมํ กเถถาติ อาห. อถ สกฺโก เทวราชา สกตฺตภาเวน สพฺพาลงฺกาเรหิ ปฏิมณฺฑิโต อติวิย โสตุํ โสมนสฺโส อากาสโต ปตนฺตํ ทิพฺพผสฺเสน ปรามสนฺโต อุเรน ปฏิคฺคณฺหิตฺวา เทวโลกํ เนตฺวา ปณฺฑุกมฺพลสิลาสเน นิสีทาเปตฺวา มาลาคนฺธาทีหิ ปูเชตฺวา ธมฺมโสณฺฑกมหาราชสฺส ธมฺมํ เทเสนฺโต อิมํ คาถมาห. अब 'सद्धम्मसवनं' (सद्धर्म का श्रवण) के इस व्याख्यान का क्रम प्राप्त हुआ है। संसार में सद्धर्म का श्रवण दुर्लभ ही है। सद्धर्म तीन प्रकार का होता है: परियत्ति सद्धर्म, पटिपत्ति सद्धर्म और पटिवेध सद्धर्म। उनमें से परियत्ति सद्धर्म त्रिपिटक बुद्धवचन है। पटिपत्ति सद्धर्म तेरह धुतंग, अस्सी खन्धक-वृत्त आदि और अभिसमाचार-वृत्त आदि हैं। पटिवेध सद्धर्म चार आर्य सत्यों का साक्षात्कार है। उनमें से परियत्ति सद्धर्म ही अन्य दो सद्धर्मों का अग्रगामी और पदस्थान (आधार) है। क्योंकि वह उनका मूल है। परियत्ति के न होने पर पटिवेध नहीं होता। परियत्ति के लुप्त होने पर पटिपत्ति और पटिपत्ति के लुप्त होने पर अधिगम (प्राप्ति) लुप्त हो जाता है। किस कारण से? क्योंकि यह परियत्ति ही पटिपत्ति का प्रत्यय (कारण) है। पटिपत्ति और अधिगम के लिए भी परियत्ति ही प्रमाण है। वहाँ पटिवेध और पटिपत्ति हो भी सकते हैं और नहीं भी। एक समय में पटिवेध-धारी भिक्षु बहुत होते थे, तब 'यह भिक्षु पृथग्जन है' ऐसा उंगली उठाकर दिखाना पड़ता था। इसी द्वीप (श्रीलंका) में एक समय ऐसा था जब कोई पृथग्जन भिक्षु नहीं था। पटिपत्ति को पूर्ण करने वाले भी कभी बहुत होते हैं, कभी कम। इस प्रकार पटिवेध और पटिपत्ति हो भी सकते हैं और नहीं भी। शासन की स्थिति के लिए तो परियत्ति ही प्रमाण है। विद्वान त्रिपिटक सुनकर दोनों (पटिपत्ति और पटिवेध) को पूर्ण करता है। जैसे हमारे बोधिसत्व ने आलार (कालाम) के पास पाँच अभिज्ञाएँ और सात समापत्तियाँ प्राप्त कर 'नैवसंज्ञानासंज्ञायतन' समापत्ति की परिकर्म (विधि) पूछी। उसने कहा 'मैं नहीं जानता'। तब उद्दक के पास जाकर प्राप्त विशेष ज्ञान की तुलना कर 'नैवसंज्ञानासंज्ञायतन' की परिकर्म पूछी। उसने बताया, और उसके वचन के साथ ही महासत्व ने उसे प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार प्रज्ञावान भिक्षु परियत्ति सुनकर दोनों को पूर्ण करता है। इसलिए परियत्ति के स्थित रहने पर शासन स्थित रहता है। जैसे किसी बड़े तालाब की पाल (मेड़) के सुदृढ़ होने पर 'पानी नहीं ठहरेगा' ऐसा नहीं कहा जा सकता, और पानी होने पर 'कमल आदि फूल नहीं खिलेंगे' ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार बड़े तालाब की सुदृढ़ पाल के समान त्रिपिटक बुद्धवचन के होने पर, बड़े तालाब के पानी के समान पटिपत्ति को पूर्ण करने वाले कुलपुत्र नहीं होंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनके होने पर, बड़े तालाब में कमल आदि फूलों के समान स्रोतापन्न आदि आर्य पुद्गल नहीं होंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता। निश्चित रूप से परियत्ति ही प्रमाण है, क्योंकि परियत्ति के लुप्त होने पर पटिपत्ति और पटिवेध का लोप हो जाता है। वहाँ परियत्ति का अर्थ है अर्थकथा सहित त्रिपिटक बुद्धवचन। जब तक वह (पालि) रहती है, तब तक परियत्ति परिपूर्ण रहती है। समय बीतने पर कलियुग के राजा अधार्मिक हो जाते हैं। उनके अधार्मिक होने पर राज-अमात्य आदि अधार्मिक हो जाते हैं, वैसे ही राष्ट्र और जनपद के निवासी भी अधार्मिक हो जाते हैं। उनकी अधार्मिकता के कारण देव (बादल) ठीक से वर्षा नहीं करते, जिससे फसलें नहीं होतीं। फसलों के न होने पर भिक्षु संघ को प्रत्यय (दान) देने वाले प्रत्यय देने में असमर्थ हो जाते हैं। भिक्षु प्रत्ययों के अभाव में अपने अन्तेवासियों (शिष्यों) का संग्रह नहीं कर पाते। समय बीतते-बीतते परियत्ति का ह्रास होता है। वे अर्थ के साथ धारण नहीं कर पाते, केवल पालि के रूप में धारण करते हैं। फिर समय बीतने पर वे पूरी पालि को भी धारण नहीं कर पाते। सबसे पहले अभिधम्म पिटक लुप्त होता है। लुप्त होते समय ऊपर से प्रस्थान (पट्ठान) से परियत्ति का ह्रास होता है। सबसे पहले महाप्रकरण (पट्ठान) लुप्त होता है। उसके लुप्त होने पर यमक, कथावस्तु, पुग्गलपञ्ञत्ति, धातुकथा, विभंग और धम्मसंगणि—इस प्रकार अभिधम्म पिटक के लुप्त होने पर ऊपर से सुत्तन्त पिटक लुप्त होता है। सबसे पहले अंगुत्तर निकाय लुप्त होता है। उसमें भी पहले एकादश निपात... और अंत में एक निपात। इस प्रकार अंगुत्तर के लुप्त होने पर ऊपर से संयुत्त निकाय लुप्त होता है। पहले महावग्ग लुप्त होता है, फिर सळायतनवग्ग, खन्धवग्ग, निदानवग्ग और सगाथावग्ग। इस प्रकार संयुत्त निकाय के लुप्त होने पर ऊपर से मज्झिम निकाय लुप्त होता है। पहले उपरिपण्णासक, फिर मज्झिमपण्णासक और फिर मूलपण्णासक। इस प्रकार मज्झिम निकाय के लुप्त होने पर ऊपर से दीघ निकाय लुप्त होता है। पहले पाथियवग्ग, फिर महावग्ग और फिर खन्धकवग्ग (सीलक्खन्धवग्ग)। दीघ निकाय के लुप्त होने पर सुत्तन्त पिटक लुप्त माना जाता है। विनय पिटक के साथ केवल जातक को ही धारण करते हैं। लज्जावान (शीलवान) भिक्षु विनय पिटक को धारण करते हैं। लाभ की इच्छा रखने वाले सुत्तन्त के कहे जाने पर भी ध्यान नहीं देते और केवल जातक को ही धारण करते हैं। समय बीतने पर वे जातक को भी धारण नहीं कर पाते। तब उनमें सबसे पहले वेस्सन्तर जातक लुप्त होता है। फिर उल्टे क्रम से पुण्णक जातक, महानारदकस्सप जातक लुप्त होते हैं। वे केवल विनय पिटक को ही धारण करते हैं। समय बीतने पर वह भी ऊपर से लुप्त होता है। पहले परिवार, फिर खन्धक, भिक्खुनी विभंग और महाविभंग—इस प्रकार क्रम से केवल उपोसथ खन्धक मात्र को ही धारण करते हैं। तब तक परियत्ति लुप्त नहीं मानी जाती। जब तक मनुष्यों में चार चरणों वाली एक गाथा भी प्रचलित रहती है, तब तक परियत्ति लुप्त नहीं होती। जब कोई श्रद्धालु और प्रसन्न राजा हाथी के कंधे पर सोने की पिटारी में एक हजार (मुद्राओं) की थैली रखकर नगर में भेरी पिटवाता है कि 'बुद्धों द्वारा कही गई चार चरणों वाली गाथा को जो जानता हो, वह यह हजार मुद्राएँ ले ले', और उसे लेने वाला कोई नहीं मिलता। एक बार भेरी पिटवाने पर लोग नहीं सुनते, दूसरी बार भी नहीं, और तीसरी बार भी भेरी पिटवाने पर जब कोई लेने वाला नहीं मिलता, तब राजपुरुष उस हजार की थैली को पुनः राजकुल में ले जाते हैं, तब परियत्ति लुप्त मानी जाती है। इस प्रकार परियत्ति के लुप्त होने पर पटिपत्ति और पटिवेध भी लुप्त हो जाते हैं। सद्धर्म-श्रवण की दुर्लभता को 'धम्मसोण्डक' की कथा से स्पष्ट करना चाहिए। हमारे सम्यक्सम्बुद्ध, काश्यप सम्यक्सम्बुद्ध धर्मराज के शासन के लुप्त होने के कुछ समय बाद, वाराणसी के राजा के पुत्र 'धम्मसोण्डक' राजकुमार हुए। पिता की मृत्यु के बाद राज्य प्राप्त कर, काश्यप दशबल द्वारा देशित धर्म को सुनने के इच्छुक हुए। एक माह तक राज्य करने के बाद, हमारे सम्यक्सम्बुद्ध ने इसी भद्रकल्प में राज्य करते हुए, देवनगर के समान वाराणसी नगर में चक्रवर्ती राज्य के समान राज्य करते हुए ऐसा सोचा... "सद्धर्म के वियोग में मेरे ऐसे राज्य, विलास और राज-अनुभाव का क्या लाभ? जैसे सूर्य के बिना आकाश, चन्द्रमा के बिना रात्रि, दांतों के बिना हाथी, तट के बिना महासमुद्र, आँखों के बिना सजा हुआ मुख, सुगंध के बिना पारिजात का फूल—वैसे ही चार अक्षरों से बद्ध धर्म-देशना के वियोग में मेरा यह राज्य शोभा नहीं देता।" ऐसा सोचकर उन्होंने सोने की पिटारी में एक हजार मुद्राओं की थैली सजाकर मंगल-हाथी के कुम्भ पर रखी और वाराणसी नगर की मुख्य गलियों में भेरी पिटवाई—"जो एक पद, दो पद, तीन पद या चार पदों वाला धर्म-पद जानता हो, उसे मैं यह दूँगा।" इस प्रकार भेरी पिटवाकर भी धर्म जानने वाला न मिलने पर, बार-बार दो हजार, तीन हजार, लाख, करोड़, दो हजार करोड़, लाख करोड़, गाँव-निगम-जनपद का सेनापति पद, उपराज पद (की घोषणा की)। अंत में धर्म-देशक न मिलने पर अपने स्वर्ण-पीठ और श्वेत-छत्र को त्यागने पर भी धर्म-देशक न मिला। तब राज्य-लक्ष्मी को छोड़कर और स्वयं का त्याग कर कहा—"धर्म-देशक का दास बनकर भी मैं धर्म सुनूँगा।" ऐसा कहने पर भी धर्म-देशक न मिलने पर वे पश्चाताप करते हुए बोले—"सद्धर्म के वियोग में मुझे राज्य से क्या लेना-देना?" और अमात्यों को राज्य सौंपकर सद्धर्म की खोज में धम्मसोण्डक महाराज महावन में प्रविष्ट हुए। धम्मसोण्डक महाराज के सद्धर्म-श्रवण के उद्देश्य से वन में प्रवेश करते ही शक्र देवेन्द्र का वैजयन्त प्रासाद किंकिणी (घंटियों) सहित कांपने लगा और पाण्डुकम्बल शिलासन गर्म हो गया। शक्र देवेन्द्र ने सोचा—"किस कारण से पाण्डुकम्बल शिलासन गर्म हुआ है?" और अपनी सहस्र आँखों से देवों और मनुष्यों में देखते हुए, धर्म की खोज में वन में प्रविष्ट धम्मसोण्डक महाराज को देखा और सोचा—"आज मुझे स्वयं को भी छोड़कर (जोखिम में डालकर) राक्षस का वेश धारण कर, इसे अनित्यता का प्रतिपादन करने वाले तथा सकल शरीर के दोष—जाति, जरा, व्याधि और मरण को दिखाकर धर्म-देशना देनी चाहिए और इसे इसके राज्य में ही प्रतिष्ठित करना चाहिए।" ऐसा सोचकर शक्र देवेन्द्र ने यक्ष का रूप धारण किया और बोधिसत्व के सामने थोड़ी दूर पर स्वयं को प्रकट किया। उन्हें देखकर धम्मसोण्डक महाराज ने सोचा—"क्या ऐसा राक्षस धर्म जान सकता है?" फिर पास जाकर पूछने के विचार से राक्षस से बात करते हुए कहा—"हे पुण्यवान देवराज! इस सघन वन में रहने वाले देवराज, क्या आप धर्म जानते हैं?" देवता ने कहा—"महाराज, मैं धर्म जानता हूँ।" (राजा ने) कहा—"यदि आप धर्म जानते हैं, तो मुझे धर्म-कथा सुनाएँ।" (राक्षस ने) कहा—"मैं तुम्हें धर्म सुनाऊँगा, पर तुम मुझ धर्म-कथक का कैसा सत्कार करोगे?" (राजा ने) कहा—"ऐसा होने पर, आप मुझे धर्म सुनाकर बाद में मेरे शरीर का मांस खा लेना।" (राक्षस ने) कहा—"महाराज, मैं भूखा होने के कारण धर्म सुनाने में समर्थ नहीं हूँ।" (राजा ने) कहा—"यदि आप पहले मांस खा लेंगे, तो धर्म कौन सुनेगा?" फिर उस राक्षस ने कहा—"मैं धर्म सुनाने में समर्थ नहीं हूँ।" पुनः राजा ने कहा—"मेरे धर्म-लाभ और आपके मांस-लाभ को जानकर आप मुझे धर्म सुनाएँ।" तब शक्र देवेन्द्र ने "साधु" कहकर पास ही तीन गाव्यूत ऊँचा एक विशाल अंजन पर्वत निर्मित किया और कहा—"महाराज, यदि आप इस पर्वत के शिखर पर चढ़कर आकाश से कूदकर मेरे मुख में गिरेंगे, तो मैं आपके आकाश में रहने के दौरान धर्म सुनाऊँगा। इस प्रकार आपको धर्म का लाभ होगा और मुझे मांस का लाभ होगा।" उसकी बात सुनकर धम्मसोण्डक महाराज ने सोचा—"इस अनादि संसार में मनुष्य होकर अधर्म में लीन रहते हुए, अधर्म के लिए ही प्राणातिपात, अदत्तादान, काम-मिथ्याचार करने वाले कसाई, भेड़ मारने वाले, पक्षी मारने वाले, चोर और परस्त्रीगामी होने के कारण जिनका सिर काटा गया, उनका रक्त चारों महासमुद्रों के जल से भी अधिक है; माता-पिता आदि प्रियजनों के लिए रोते हुए (प्राणियों) के आँसू चारों महासमुद्रों के जल से भी अधिक हैं। मैं तो इस शरीर को धर्म के लिए बेच रहा हूँ, यह महान फलदायी और प्रिय है।" ऐसा सोचकर "हे मित्र, ठीक है, मैं ऐसा ही करता हूँ" कहकर वे पर्वत पर चढ़ गए। पर्वत के शिखर पर खड़े होकर "मैं अपने राज्य सहित अपना जीवित शरीर सद्धर्म के लिए देता हूँ" ऐसा कहकर वे सोमनस्य (प्रसन्नता) से भर गए और "धर्म सुनाएँ" कहते हुए सद्धर्म के लिए जीवन का परित्याग कर आकाश से कूद पड़े और कहा—"धर्म सुनाएँ।" तब शक्र देवेन्द्र ने अपने वास्तविक रूप में, सभी अलंकारों से विभूषित होकर, अत्यंत प्रसन्नता के साथ आकाश से गिरते हुए (राजा) को दिव्य स्पर्श से पकड़ लिया और अपनी छाती से लगाकर देवलोक ले गए। वहाँ पाण्डुकम्बल शिलासन पर बिठाकर माला-गंध आदि से पूजा की और धम्मसोण्डक महाराज को धर्म सुनाते हुए यह गाथा कही। ‘‘อนิจฺจา วต สงฺขารา, อุปฺปาทวยธมฺมิโน; อุปฺปชฺชิตฺวา นิรุชฺฌนฺติ, เตสํ วูปสโม สุโข’’ติ. “अनित्य हैं निश्चय ही संस्कार, जिनका स्वभाव उत्पन्न होना और नष्ट होना है; वे उत्पन्न होकर निरुद्ध हो जाते हैं, उनका उपशम (शान्त होना) ही सुख है।” เอวํ สกฺโก ธมฺมโสณฺฑกมหาราชสฺส ธมฺมํ เทเสตฺวา เทวโลกสมฺปตฺตึ ทสฺเสตฺวา เทวโลกโต อาเนตฺวา สกรชฺเช ปติฏฺฐาเปตฺวา อปฺปมาเทน โอวทิตฺวา เทวโลกเมว อคมาสิ เอวํ สทฺธมฺมสวนสฺสาปิ ทุลฺลภภาโว เวทิตพฺโพ. เอวํ ปริยตฺติอนฺตรธาเนน ปฏิปตฺติ ปฏิเวธาปิ [Pg.90] อนฺตรธายนฺติ. เอตฺถ จ ตีณิ ปรินิพฺพานานิ เวทิตพฺพานิ กตมานิ ตีณิ ปรินิพฺพานานิ. กิเลสปรินิพฺพานํ, ขนฺธปรินิพฺพานํ, ธาตุปรินิพฺพานนฺติ. ตตฺถ กิเลสปรินิพฺพานํ โพธิมณฺเฑเยว โหติ, ภควา หิ โพธิมณฺเฑเยว วีริยปาเทหิ สีลปถวิยํ ปติฏฺฐาย สทฺธาหตฺเถน กมฺมกฺขยกรํ ญาณผรสุํ คเหตฺวา สพฺโพ โลภโทสโมหวิปรีตมนสิการอหิรีกาโนตฺตปฺปโกธูปนาหมกฺขปฬาส- อิสฺสามจฺฉริยมายาสาเฐยฺยถมฺภสารมฺภมานาติ มานมทปมาทตณฺหา’วิชฺชาติวิธากุสลมูลทุจฺจริตสํกิเลสมลวิสมสญฺญาวิตกฺก ปปญฺจจตุพฺพิธวิปริเยสอาสวคนฺถโอฆโยคา’คติคนฺถุ’ ปาทานปญฺจเจโตขิลวินิพนฺธนีวรณา’ภินนฺทน ฉวิวาทมูลตณฺหากายสตฺตานุสย อฏฺฐมิจฺฉตฺตนวตณฺหามูลกทสากุสลกมฺมปถ ทฺวาสฏฺฐิทิฏฺฐิคต อฏฺฐสตตณฺหาวิจริตปฺป เภท สพฺพทรถปริฬาหกิเลสสตสหสฺสานิ, สงฺเขปโต วา ปญฺจ กิเลสอภิสงฺขารขนฺธมจฺจุเทวปุตฺตมาเร อเสสโต หตา วิหตา อนภาวํกตา ตสฺมา สพฺเพปิ กิเลสา โพธิมณฺเฑเยว นิพฺพานํ นิโรธํ คจฺฉนฺตีติ กิเลสนิพฺพานํ โพธิมณฺเฑเยว โหติ เอตฺถ จ โพธีติ อรหตฺตมคฺคญฺญาณํ อธิปฺเปตํ ตถา หิ สพฺเพสมฺปิ พุทฺธปจฺเจกพุทฺธอริยสาวกานํ อรหตฺตมคฺคกฺขเณเยว สพฺเพปิ กิเลสา อเสสํ นิโรธํ นิพฺพานํ คจฺฉนฺติ เตปิ พุทฺธา อุคฺฆฏิตวิญฺญูวิภชฺชิตญฺญูเนยฺยวเสน ติวิธา โหนฺติ วุตฺตญฺเหตํ ชาตตฺตกีโสตตฺตกีนิทาเน. इस प्रकार शक्र ने महाराज धर्मसोण्डक को धर्म का उपदेश देकर, देवलोक की सम्पत्ति दिखाकर, देवलोक से लाकर उनके अपने राज्य में प्रतिष्ठित कर और अप्रमाद का उपदेश देकर देवलोक ही चले गए। इस प्रकार सद्धर्म श्रवण की दुर्लभता भी जाननी चाहिए। इसी प्रकार पर्यप्ति (शास्त्र ज्ञान) के अन्तर्धान होने से प्रतिपत्ति (साधना) और प्रतिवेध (साक्षात्कार) भी अन्तर्धान हो जाते हैं। यहाँ तीन परिनिर्वाण जानने चाहिए। कौन से तीन परिनिर्वाण? क्लेश-परिनिर्वाण, स्कन्ध-परिनिर्वाण और धातु-परिनिर्वाण। उनमें से क्लेश-परिनिर्वाण बोधिमण्ड पर ही होता है, क्योंकि भगवान ने बोधिमण्ड पर ही वीर्य रूपी चरणों से शील रूपी पृथ्वी पर प्रतिष्ठित होकर, श्रद्धा रूपी हाथ से कर्मों का क्षय करने वाले ज्ञान रूपी परशु (कुल्हाड़ी) को लेकर समस्त लोभ, द्वेष, मोह, विपरीत मनसिकार, अहीरीक, अनोत्तप्प, क्रोध, उपनाह, म्रक्ष, पलाश, ईर्ष्या, मात्सर्य, माया, शाठ्य, स्तम्भ, सारम्भ, मान, अतिमान, मद, प्रमाद, तृष्णा, अविद्या, तीन प्रकार के अकुशल मूल, दुश्चरित, संक्लेश, मल, विषम संज्ञा, वितर्क, प्रपंच, चार प्रकार के विपर्यास, आस्रव, ग्रन्थ, ओघ, योग, अगति, ग्रन्थ, उपादान, पाँच चेतोखिल, विनिबन्ध, नीवरण, अभिनन्दन, छह विवादमूल, तृष्णाकाय, सात अनुशय, आठ मिथ्यात्व, नौ तृष्णामूलक धर्म, दस अकुशल कर्मपथ, बासठ दृष्टिगत, एक सौ आठ तृष्णा-विचरित के भेद और सभी सन्ताप एवं परिदाह उत्पन्न करने वाले लाखों क्लेशों को, संक्षेप में पाँच क्लेश-मार, अभिसंस्कार-मार, स्कन्ध-मार, मृत्यु-मार और देवपुत्र-मार को पूर्णतः नष्ट कर दिया, विनष्ट कर दिया और अस्तित्वहीन कर दिया। इसलिए सभी क्लेश बोधिमण्ड पर ही निर्वाण और निरोध को प्राप्त होते हैं, अतः क्लेश-निर्वाण बोधिमण्ड पर ही होता है। यहाँ 'बोधि' से अर्हत् मार्ग ज्ञान अभिप्रेत है। क्योंकि सभी बुद्धों, प्रत्येक बुद्धों और आर्य श्रावकों के अर्हत् मार्ग के क्षण में ही सभी क्लेश पूर्णतः निरोध और निर्वाण को प्राप्त हो जाते हैं। वे बुद्ध भी उद्घटितज्ञ, विप्रचितज्ञ और नेय के भेद से तीन प्रकार के होते हैं। यह जातक-अट्ठकथा और सोतत्तकी-निदान में कहा गया है। ‘‘อุคฺฆฏิตญฺญุนามโก, วิภชฺชิตญฺญุโน ทุเว; ตติโย เนยฺโย นาเมน, โพธิสตฺโต ติธา มโต. “उद्घटितज्ञ नामक, और दूसरा विप्रचितज्ञ; तीसरा नेय नाम से, इस प्रकार बोधिसत्व तीन प्रकार के माने गए हैं। อุคฺฆฏิตญฺญุโพธิสตฺโต, ปญฺญาธิโกติ นามโส; วิภชฺชิตญฺญุโพธิสตฺโต, วุตฺโต วีริยาธิโก. उद्घटितज्ञ बोधिसत्व 'प्रज्ञाधिक' नाम वाले हैं; विप्रचितज्ञ बोधिसत्व 'वीर्याधिक' कहे गए हैं। มโต เนยฺโย สทฺธาธิโก นาม, โพธิสตฺตา อิเม ตโย; กปฺเปจ สตสหสฺเส, จตุโร จ อสงฺขฺเยยฺเย. नेय 'श्रद्धाधिक' नाम से माने गए हैं, ये तीन बोधिसत्व हैं; (प्रथम के लिए) चार असंख्येय और एक लाख कल्पों में। ปูเรตฺวา โพธิสมฺภาเร, ลทฺธพฺยากรโณ ปุเร; อุคฺฆฏิตญฺญุโพธิสตฺโต, ปตฺโต สมฺโพธิมุตฺตมํ. पूर्व में बोधिसम्भारों को पूर्ण कर और व्याकरण (भविष्यवाणी) प्राप्त कर, उद्घटितज्ञ बोधिसत्व ने उत्तम सम्बोधि प्राप्त की। อฏฺฐเม [Pg.91] จ อสงฺขฺเยยฺเย, กปฺเป จ สตสหสฺเส; ปูเรตฺวา โพธิสมฺภาเร, ลทฺธพฺยากรโณ ปุเร. आठ असंख्येय और एक लाख कल्पों में, पूर्व में बोधिसम्भारों को पूर्ण कर और व्याकरण प्राप्त कर। วิปญฺจิตญฺญุโพธิสตฺโต, ปตฺโต สมฺโพธิมุตฺตมํ; เนยฺโย ตุ โพธิสตฺโต จ, โสฬเส อสงฺขฺเยยฺเย. विप्रचितज्ञ बोधिसत्व ने उत्तम सम्बोधि प्राप्त की; और नेय बोधिसत्व ने सोलह असंख्येय (कल्पों में)। กปฺเป จ สตสหสฺเส, ลทฺธพฺยากรโณ ปุเร; ปูเรตฺวา โพธิสมฺภาเร, ปตฺโต สมฺโพธิมุตฺตม’’ นฺติ. और एक लाख कल्पों में, पूर्व में व्याकरण प्राप्त कर और बोधिसम्भारों को पूर्ण कर, उत्तम सम्बोधि प्राप्त की।” สุตฺตนิปาตอปทานฏฺฐกถาสุ ปน ‘‘พุทฺธานํ อานนฺท เหฏฺฐิมปริจฺเฉเทน จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยานิ กปฺปสตสหสฺสญฺจ, มชฺฌิมปริจฺเฉเทน อฏฺฐ อสงฺขฺเยยฺยานิ กปฺปสตสหสฺสญฺจ, อุปริมปริจฺเฉเทน โสฬสาสงฺขฺยฺเยยฺยานิ กปฺปสตสหสฺสญฺจ. เอเตจ ปญฺญาธิกสทฺธาธิกวีริยาธิกวเสน เวทิตพฺพาติ วุตฺตํ เตสุ ปญฺญาธิโก จตฺตาริ อสงฺขฺเยยฺยานิ กปฺปสตสหสฺสญฺจ, สทฺธาธิโก อฏฺฐอสงฺเขยฺเยยฺยานิ กปฺปสตสหสฺสญฺจ, วีริยาธิโก โสฬสอสงฺขฺเยยฺยานิ กปฺปสตสหสฺสญฺจาติ เวทิตพฺพํ. ตตฺถ ปญฺญาธิโก โยนิคติวิญฺญาณฏฺฐิติสตฺตาวาเสสุ สํสรนฺโตปิ ปญฺญาพหุลฺลวเสน สมฺปนฺนชฺฌาสย สมฺภวโต ขิปฺปญฺเญว ตสฺส สมฺโพธิ. สทฺธาธิโก ปน มนฺทปญฺญตฺตา อสฺสทฺทหิตพฺเพปิ สทฺทหติ, ตสฺมา ตสฺส มนฺทญฺเญว สมฺโพธิ. วีริยาธิโก ปน อุภยมนฺโท อสฺสทฺทหิตพฺพมฺปิ สทฺทหติ, อกตฺตพฺพมฺปิ กโรติ, ราชา ปสฺเสนทีโกสโล ยถา โส หิ สพฺพญฺญุพุทฺเธ ธรมาเนเยว อคมนียมฺปิ ปรทารํ คนฺตุํ จิตฺตํ อุปฺปาเทตฺวา ปรํ ชีวิตา โวโรเปตุํ อารทฺโธ เนรยิกานํ วิรวนฺตานํ ทุ-ส-น-โสติ สทฺทมฺปิ สุตฺวา อติวิมูฬฺโห สพฺพญฺญุพุทฺธํ ฐเปตฺวา มิจฺฉาทิฏฺฐิพฺราหฺมณํ ปุจฺฉิตฺวา ตสฺส วจเนน สพฺพชนานํ ยญฺญตฺถาย ทุกฺขํ อุปฺปาเทสิ โก ปนวาโท อนุปฺปนฺเน พุทฺเธ, ตถา หิ เอส กสฺสปภควโต สาสนนฺตรธาเนน อนฺธภูเต โลเก พาราณสิยํ ราชา หุตฺวาปิ นิคฺโรธรุกฺขเทวตาย ยญฺญตฺถาย เอกสตราชาโน มเหสีหิ สทฺธึ มาเรตุํ อารทฺโธ. เอวํ วีริยาธิโก อุภยมนฺโท, ตสฺมา ตสฺส สมฺโพธิ อติมนฺโทติ เอวํ ปญฺญาธิกสทฺธาธิกวีริยาธิกวเสน กาลสฺสาปิ รสฺสทีฆภาโว เวทิตพฺโพติ. ปจฺฉิมนโยเอว ปสํสิตพฺโพติ อยเมตฺถ อมฺหากํ อตฺตโนมติ. ขนฺธปรินิพฺพานํ ปน กุสินาราย อุปวตฺตเน มลฺลานํ สาลวเน ยมกสาลานมนฺตเร [Pg.92] เวสาขปุณฺณมทิวเส ปจฺจูสสมเย เอกูนวีสติยา จุติจิตฺเตสุ เมตฺตาปุพฺพภาคสฺส โสมนสฺสญาณสมฺปยุตฺตอสงฺขาริกกุสลจิตฺตสทิเสน มหาวิปากจิตฺเตน อพฺยากเตน จริมกํ กตฺวา กตฺถจิ ภเว ปฏิสนฺธิวิญฺญาณสฺส อนนฺตรปจฺจโย หุตฺวา กมฺมตณฺหากิเลเสหิ อนุปาทาโน สพฺพุปธิปฏินิสฺสคฺโค อุปาทินฺนกกฺขนฺธปริจฺจาโค โหตีติ เวทิตพฺพํ. วิตฺถาโร ปน ทีฆนิกาเย มหาวคฺเค มหาปรินิพฺพานสุตฺตวณฺณนายํ โอโลเกตพฺโพ. ตตฺถ วิเทสํ คจฺฉนฺโต ปุริโส สพฺพํ ญาติชนํ อาลิงฺเคตฺวา สีเส จุมฺพิตฺวา คจฺฉติ วิย ภควาปิ นิพฺพานปุรํ ปวิสนฺโต สพฺเพปิ จตุวีสติโกฏิสตสหสฺสสมาปตฺติโย อนวเสสํ สมาปชฺชิตฺวา ยาว สญฺญาเวทยิตํ, ตโตปิ วุฏฺฐาย ยาว เนวสญฺญานาสญฺญายตนํ สมาปชฺชิตฺวา วุฏฺฐาย ฌานงฺคานิ ปจฺจเวกฺขิตฺวา ภวงฺคจิตฺเตน อพฺยากเตน ทุกฺขสจฺเจน ปรินิพฺพายิ. ปาฬิยํ ปน ‘‘จตุตฺถชฺฌานา วุฏฺฐหิตฺวา สมนนฺตรา ภควา ปรินิพฺพายี’’ติ วุตฺตํ ตตฺถ ทฺเว สมนนฺตรา ฌานสมนนฺตรา, ปจฺจเวกฺขณสมนนฺตราติ. ตตฺถ ฌานา วุฏฺฐาย ภวงฺคํ โอติณฺณสฺส ตตฺเถว ปรินิพฺพานํ ฌานสมนนฺตรํ นาม. ฌานา วุฏฺฐหิตฺวา ปุน ฌานงฺคานิ ปจฺจเวกฺขิตฺวา ภวงฺคํ โอติณฺณสฺส ตตฺเถว ปรินิพฺพานํ ปจฺจเวกฺขณสมนนฺตรํ นาม. ภควา ปน ฌานสมนนฺตรา อปริ นิพฺพายิตฺตา ปจฺจเวกฺขณสมนนฺตรเมว ปรินิพฺพายีติ เวทิตพฺพํ, เตเนวาห ‘‘ภควา ปน ฌานํ สมาปชฺชิตฺวา ฌานา วุฏฺฐาย ฌานงฺคานิ ปจฺจเวกฺขิตฺวา ภวงฺคจิตฺเตน อพฺยากเตน ทุกฺขสจฺเจน ปรินิพฺพายี’’ติ. เอตฺถ ภควโต ปรินิพฺพานจิตฺตสฺส กึ อารมฺมณํ กมฺมํ วา โหติ, อุทาหุ กมฺมนิมิตฺตคตินิมิตฺตานิ, อถ นิพฺพานนฺติ อปเร เอวํ วทนฺติ. सुत्तनिपात और अपदान की अट्ठकथाओं में कहा गया है कि बुद्धों के लिए (बोधिसत्व काल) न्यूनतम सीमा से चार असंख्येय और एक लाख कल्प, मध्यम सीमा से आठ असंख्येय और एक लाख कल्प, तथा अधिकतम सीमा से सोलह असंख्येय और एक लाख कल्प हैं। इन्हें प्रज्ञाधिक, श्रद्धाधिक और वीर्याधिक के भेद से समझना चाहिए। उनमें प्रज्ञाधिक चार असंख्येय और एक लाख कल्पों में, श्रद्धाधिक आठ असंख्येय और एक लाख कल्पों में, तथा वीर्याधिक सोलह असंख्येय और एक लाख कल्पों में (बुद्धत्व प्राप्त करता है) - ऐसा जानना चाहिए। वहाँ प्रज्ञाधिक, योनियों, गतियों, विज्ञान-स्थितियों और सत्त्वावासों में संसरण करते हुए भी, प्रज्ञा की प्रचुरता के कारण संपन्न संकल्प वाला होने से, उसकी संबोधि शीघ्र ही होती है। श्रद्धाधिक, मन्द प्रज्ञा होने के कारण, न श्रद्धा करने योग्य विषय पर भी श्रद्धा करता है, इसलिए उसकी संबोधि मन्द होती है। वीर्याधिक दोनों (प्रज्ञा और श्रद्धा) में मन्द होने के कारण, न श्रद्धा करने योग्य पर भी श्रद्धा करता है और न करने योग्य कार्य भी करता है; जैसे राजा पसेनदि कोसल, जिन्होंने बुद्ध के जीवित रहते हुए भी अगम्य परस्त्री के पास जाने का विचार कर दूसरे के प्राण लेने का उपक्रम किया, और नरकवासियों के 'दु-स-न-सो' शब्दों को सुनकर अत्यंत विमूढ़ हो गए, तथा बुद्ध को छोड़कर मिथ्यादृष्टि ब्राह्मण से पूछकर उसके वचनों से सभी लोगों के यज्ञ के लिए दुःख उत्पन्न किया; फिर बुद्ध के अनुत्पन्न होने पर तो कहना ही क्या? जैसे वह कस्सप भगवान के शासन के अंतर्धान होने पर संसार के अंधकारमय होने पर वाराणसी में राजा होकर भी न्यग्रोध वृक्ष की देवता के यज्ञ के लिए एक सौ राजाओं को उनकी रानियों सहित मारने के लिए उद्यत हुआ था। इस प्रकार वीर्याधिक दोनों में मन्द होता है, इसलिए उसकी संबोधि अत्यंत मन्द होती है - इस प्रकार प्रज्ञाधिक, श्रद्धाधिक और वीर्याधिक के भेद से काल की लघुता और दीर्घता जाननी चाहिए। पिछला नय ही प्रशंसनीय है - यह यहाँ हमारा अपना मत है। स्कन्ध-परिनिर्वाण के विषय में जानना चाहिए कि कुसीनारा के उपवत्तन में मल्लों के शालवन में यमक शालों के बीच वैशाख पूर्णिमा के दिन प्रत्युष काल में उन्नीस च्युति-चित्तों में से मैत्री-पूर्वभाग वाले सौमनस्य-ज्ञान-संप्रयुक्त असंखारिक कुशल चित्त के समान महाविपाक चित्त (अव्याकृत) को अंतिम बनाकर, किसी भी भव में प्रतिसंधि-विज्ञान का अनन्तर प्रत्यय न होकर, कर्म-तृष्णा-क्लेशों से रहित, सभी उपाधियों का त्याग और उपादान-स्कन्धों का परित्याग होता है। इसका विस्तार दीघनिकाय के महावग्ग में महापरिनिब्बान सुत्त की व्याख्या में देखना चाहिए। वहाँ जैसे विदेश जाने वाला पुरुष सभी स्वजनों का आलिंगन कर और सिर चूमकर जाता है, वैसे ही भगवान भी निर्वाण-पुर में प्रवेश करते हुए सभी चौबीस कोटि लाख समापत्तियों को पूर्णतः प्राप्त कर संज्ञा-वेदयित-निरोध तक गए, वहाँ से व्युत्थान कर नेवसंज्ञा-नासंज्ञायतन तक समापत्ति प्राप्त कर, फिर व्युत्थान कर ध्यान के अंगों का प्रत्यवेक्षण कर, अव्याकृत भवंग-चित्त द्वारा दुःख-सत्य के साथ परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। पालि में तो कहा गया है कि 'चौथे ध्यान से व्युत्थान कर उसके अनन्तर ही भगवान परिनिर्वाण को प्राप्त हुए'। वहाँ दो 'अनन्तर' हैं - ध्यान-अनन्तर और प्रत्यवेक्षण-अनन्तर। वहाँ ध्यान से व्युत्थान कर भवंग में उतरे हुए का वहीं परिनिर्वाण होना 'ध्यान-अनन्तर' कहलाता है। ध्यान से व्युत्थान कर पुनः ध्यान-अंगों का प्रत्यवेक्षण कर भवंग में उतरे हुए का वहीं परिनिर्वाण होना 'प्रत्यवेक्षण-अनन्तर' कहलाता है। भगवान ध्यान-अनन्तर परिनिर्वाण को प्राप्त न होकर प्रत्यवेक्षण-अनन्तर ही परिनिर्वाण को प्राप्त हुए - ऐसा जानना चाहिए। इसीलिए कहा गया है - 'भगवान ध्यान को प्राप्त कर, ध्यान से व्युत्थान कर, ध्यान-अंगों का प्रत्यवेक्षण कर, अव्याकृत भवंग-चित्त द्वारा दुःख-सत्य के साथ परिनिर्वाण को प्राप्त हुए'। यहाँ भगवान के परिनिर्वाण-चित्त का आलम्बन क्या है? क्या वह कर्म है, अथवा कर्म-निमित्त या गति-निमित्त है, अथवा निर्वाण है? - ऐसा दूसरे कहते हैं। นาหุ อสฺสาสปสฺสาสา, ฐิตจิตฺตสฺส ตาทิโน; อเนโช สนฺติ’มารพฺภ, ยํกาล’มกรี มุนิ. उस स्थिर चित्त वाले तथा राग-द्वेष रहित मुनि के श्वास-प्रश्वास नहीं थे; शांति (निर्वाण) को लक्ष्य कर जब मुनि ने देह त्याग किया। อสลฺลีเนน จิตฺเตน, เวทนํ อชฺฌวาสยิ; ปชฺโชตสฺเส’ว นิพฺพานํ, วิโมกฺโข เจตโส อหู’ติ. अविचलित चित्त से उन्होंने वेदना को सहन किया; जैसे दीपक का बुझ जाना होता है, वैसे ही उनके चित्त का विमोक्ष हुआ। อิมิสฺสาคาถาย ‘‘ยํ โย มุนิ อเนโช สนฺติ นิพฺพานํ อารพฺภ กาลํ อกรี’’ติ โยเชตฺวา ภควโต ปรินิพฺพานจิตฺตสฺส นิพฺพานารมฺมณนฺติ ตมยุตฺตํ, ปฏิสนฺธิภวงฺคจุตีนํ นิพฺพานารมฺมณสฺส อนารหตฺตา ‘‘นิพฺพานํ โคตฺรภุสฺส โวทานสฺส มคฺคสฺส อารมฺมณปจฺจเยนปจฺจโย, นิพฺพานํ ผลสฺส [Pg.93] อาวชฺชนายา’’ติ ปฏฺฐานปาฬิยา ชวนอาวชฺชนานเมว อธิปฺเปตตฺตา ตสฺมา เอตฺถ ‘‘ยํ โย มุนิ ผลสมาปตฺติยา อเนโช อเนชสงฺขาโต ตณฺหารหิโต สนฺตึ นิพฺพานํ อารพฺภ อารมฺมณํ กตฺวา กาลํ อสีติวสฺสปริมาณํ อกริ อติกฺกมี’’ติ โยชนา กาตพฺพา. เกจิ ปน เอวํ วทนฺติ… ‘‘กตฺถจิ ปน อนุปฺปชฺชมานสฺส ขีณาสวสฺส ยโถปฏฺฐิตํ นามรูปธมฺมาทิกเมว จุติปริโยสานานํ โคจรภาวํ คจฺฉติ, น กมฺม-กมฺมนิมิตฺตาทโย’’ติ วุตฺตตฺตา กมฺมนิตฺตคตินิมิตฺตานิ อรหโต จุติจิตฺตสฺส อารมฺมณภาวํ น คจฺฉนฺตีติ ตมฺปิ อยุตฺตเมว อยญฺเหตฺถตฺโถ กตฺถจิ ปน ภเว อนุปฺปชฺชมานสฺส ขีณาสวสฺส อรหโต ยถา ยถา เยน เยน ปกาเรน อุปฏฺฐิตํ นามรูปธมฺมาทิกเมว จุติปริโยสานํ อาวชฺชนชวนจิตฺตานํ โคจรภาวํ คจฺฉติ, ปุน ภวาภินิพฺพตฺติยา อภาวโต. กึ การณํ ภูตานิ กมฺมกมฺมนิมิตฺตคตินิมิตฺตานิ โคจรภาวํ น คจฺฉนฺตีติ. จุติจิตฺตสฺส ปน ปฏิสนฺธิจิตฺเตน คหิตํ อตีตารมฺมณเมว โคจรภาวํ คจฺฉติ. ‘‘นามรูปาทิกเมวา ติ เอตฺถ นาม’’นฺติ จิตฺตเจตสิกนิพฺพานํ รูปนฺติ อฏฺฐารสวิธํ รูปํ สงฺคณฺหาติ. นามญฺจ รูปญฺจ นามรูปา. นามรูปา จ เต ธมฺมา เจติ ตถา. เต อาทิ เยสํ เตติ นามรูปธมฺมาทิ ตเมว นามรูปธมฺมาทิกํ. อาทิสทฺเทน ฉ ปญฺญตฺติโย สงฺคณฺหาติ, เตน นิพฺพานมฺปิ อรหโต มรณาสนฺนกาเล กฺริยชวนสฺสปิ อารมฺมณภาโว ภเวยฺยาติ อมฺหากํ ขนฺติ วีมํสิตฺวา ปน คเหตพฺพํ. ภควโต นิพฺพานจิตฺตสฺส ปน ตุสิตปุรโต จวิตฺวา สิรีมหามายาย กุจฺฉิมฺหิ วสิตปฏิสนฺธิจิตฺเตน คหิตารมฺมณเมว อารมฺมณํ โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ ตญฺจ โข คตินิมิตฺตเมว, น กมฺมกมฺมนิมิตฺตานิ. ยุตฺติโตปิ อาคมโตปิ คตินิมิตฺตเมว ยุชฺชติ ตถา หิ ตุสิตปุเรเยว เสตเกตุเทวปุตฺโต หุตฺวา ทิพฺพคณนาย จตฺตาริ สหสฺสานิ, มนุสฺสคณนาย สตฺตปญฺญาสวสฺสโกฏิ,สฏฺฐิวสฺสสตสหสฺสานิ ฐตฺวา ปริโยสาเน ปญฺจ ปุพฺพนิมิตฺตานิ ทิสฺวา สุทฺธาวาเส อรหนฺตพฺรหฺมุนา ทสหิ จกฺกวาฬสหสฺเสหิ อาคมฺม เทวตาวิเสเสหิ จ. इस गाथा में 'जो मुनि तृष्णारहित होकर शान्ति (निर्वाण) को आलम्बन बनाकर काल कर गया'—इस प्रकार जोड़कर भगवान् के परिनिर्वाण-चित्त का आलम्बन निर्वाण है, ऐसा कहना अयुक्त है; क्योंकि प्रतिसन्धि, भवङ्ग और च्युति चित्तों का आलम्बन निर्वाण नहीं होता। पट्ठानपालि के अनुसार 'निर्वाण गोत्रभू, वोदान और मार्ग के लिए आलम्बन-प्रत्यय से प्रत्यय है; निर्वाण फल के आवर्जन के लिए है'—यहाँ केवल जवन और आवर्जन ही अभिप्रेत हैं। इसलिए यहाँ 'जो मुनि फल-समापत्ति के द्वारा तृष्णारहित (अनेज) होकर शान्ति (निर्वाण) को आलम्बन बनाकर अस्सी वर्ष के काल को व्यतीत कर गया'—ऐसी योजना करनी चाहिए। किन्तु कुछ लोग ऐसा कहते हैं—'कहीं भी उत्पन्न न होने वाले क्षीणास्त्रव (अर्हत्) के लिए च्युति पर्यवसान वाले चित्तों का विषय यथा-उपस्थित नाम-रूप धर्म आदि ही होते हैं, कर्म और कर्म-निमित्त आदि नहीं'—ऐसा कहे जाने के कारण कर्म-निमित्त और गति-निमित्त अर्हत् के च्युति-चित्त के आलम्बन नहीं बनते। यह भी अयुक्त ही है। यहाँ यह अर्थ है—कहीं भी पुनः भव में उत्पन्न न होने वाले क्षीणास्त्रव अर्हत् के लिए जिस-जिस प्रकार से उपस्थित नाम-रूप धर्म आदि ही च्युति-पर्यवसान वाले आवर्जन और जवन चित्तों के विषय होते हैं, क्योंकि पुनः भव की उत्पत्ति नहीं होती। क्या कारण है कि कर्म, कर्म-निमित्त और गति-निमित्त विषय नहीं होते? च्युति-चित्त का विषय तो प्रतिसन्धि-चित्त द्वारा ग्रहण किया गया अतीत आलम्बन ही होता है। 'नाम-रूप आदि ही'—यहाँ 'नाम' से चित्त, चैतसिक और निर्वाण तथा 'रूप' से अठारह प्रकार के रूप संगृहीत होते हैं। नाम और रूप 'नामरूप' हैं। वे नाम-रूप ही धर्म हैं। वे (नाम-रूप धर्म) जिनके आदि में हैं, वे 'नामरूपधर्मादि' हैं। 'आदि' शब्द से छह प्रज्ञप्तियों का संग्रह होता है। इससे अर्हत् के मरणकाल के समय क्रिया-जवन का आलम्बन निर्वाण भी हो सकता है—यह हमारा मत है, किन्तु विचार करके ही इसे ग्रहण करना चाहिए। भगवान् के निर्वाण-चित्त (च्युति-चित्त) का आलम्बन तो तुषितपुर से च्युत होकर श्रीमहामाया की कुक्षि में वास करने वाले प्रतिसन्धि-चित्त द्वारा ग्रहण किया गया आलम्बन ही होता है, ऐसा समझना चाहिए। और वह गति-निमित्त ही था, कर्म या कर्म-निमित्त नहीं। युक्ति और आगम से भी गति-निमित्त ही उचित सिद्ध होता है। क्योंकि तुषितपुर में ही श्वेतकेतु देवपुत्र होकर दिव्य गणना से चार हजार वर्ष (मनुष्य गणना से सत्तावन करोड़ साठ लाख वर्ष) रहकर अन्त में पाँच पूर्वनिमित्तों को देखकर, शुद्धावास के अर्हत् ब्रह्माओं और दस हजार चक्रवालो से आए विशेष देवताओं द्वारा (प्रार्थना की गई)— ‘‘กาโล เทว มหาวีร, อุปฺปชฺช มาตุกุจฺฉยํ; สเทวกํ ตารยนฺโต, พุชฺฌสฺสุ อมตํ ปท’’นฺติ. “हे देव! हे महावीर! अब समय है, माता की कुक्षि में उत्पन्न हों; देवलोक सहित संसार को तारते हुए अमृत पद (निर्वाण) को प्राप्त करें।” ยาจิยมาโน [Pg.94] ‘‘กาลํ ทีปญฺจ เทสญฺจ, กุลํ มาตรเมว จา’’ติ วุตฺตานิ ปญฺจ มหาวิโลกนานิ วิโลเกตฺวา ตุสิตปุรโต จวิตฺวา อาสาฬฺหีปุณฺณมายํ อุตฺตราสาฬฺหนกฺขตฺเตเนว สทฺธึ เอกูนวีสติยา ปฏิสนฺธิจิตฺเตสุ เมตฺตาปุพฺพภาคมสฺส โสมนสฺสญาณสมฺปยุตฺตอสงฺขาริกกุสลจิตฺตสฺส สทิเสน มหาวิปากจิตฺเตน ปฏิสนฺธึ อคฺคเหสิ. ตทารมฺมณาสนฺนวีถิโต ปุพฺพภาเค อาโลกิตานิ กาลทีปเทสกุลมาตรวเสน อิมานิ ปญฺจ ปฏิสนฺธิจิตฺตสฺส คตินิมิตฺตารมฺมณภาเวน โคจรภาวํ คจฺฉนฺตีติ อมฺหากํ ขนฺติ ตนฺนินฺนตปฺโปณตปฺปพฺภารวเสน พาหุลฺลปฺปวตฺติโต เตเนว อภิธมฺมตฺถสงฺคหาทีสุ อภิธมฺมตฺถ วิภาวนิยํ ‘‘มรณกาเล ยถารหํ อภิมุขีภูตํ ภวนฺตเร ปฏิสนฺธิชนกํ กมฺมํ วา ตํ กมฺมกรณกาเล รูปาทิกมุปลทฺธปุพฺพมุปกรณภูตญฺจ กมฺมนิมิตฺตํ วา อนนฺตรมุปฺปชฺชมานภเว อุปลภิตพฺพํ อุปโภคภูตํ คตินิมิตฺตํ วา กมฺมพเลน ฉนฺนํ ทฺวารานมญฺญตรสฺมึ ปจฺจุปฏฺฐาสิ, ตโต ปรํ ตเมว ตโถปฏฺฐิตมาลมฺพณํ อารพฺภ วิปจฺจมานกกมฺมานุรูปํ ปริสุทฺธํ วา, อุปกฺกิลิฏฺฐํ วา อุปปชฺชิตพฺพภวานุรูปํ ตตฺโถณตํว จิตฺตสนฺตานมภิณฺหํ ปวตฺตติ พาหุลฺเลน. ตเมว วา ปน ชนกภูตํ กมฺมํ อภินวกรณวเสน ทฺวารปฺปตฺตํ โหติ. ปจฺจาสนฺนมรณสฺส ปน ตสฺส วีถิจิตฺตาวสาเน ภวงฺคกฺขเยวา จวนวเสน ปจฺจุปฺปนฺนภวปริโยสานภูตํ จุติจิตฺตํ อุปฺปชฺชิตฺวา นิรุชฺฌติ. ตสฺมึ นิรุทฺธาวสาเน ตสฺสานนฺตรเมว ตถา คหิตมาลมฺพณมารพฺภ สวตฺถุกมวตฺถุกเมว วา ยถารหํ อวิชฺชานุสยปริกฺขิตฺเตน ตณฺหานุสยมูลเกน สงฺขาเรน ชนิยมานํ สมฺปยุตฺเตหิ ปริคฺคยฺหมานํ สหชาตานมธิฏฺฐานภาเวน ปุพฺพงฺคมภูตํ ภวนฺตรปฏิสนฺธานวเสน ปฏิสนฺธิสงฺขาตํ มานสมุปฺปชฺชมานเมว ปติฏฺฐาติ ภวนฺตเร’’ติ วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘ตตฺโถณตํว จิตฺตสนฺตานมภิณฺหํ ปวตฺตติ พาหุลฺเลนา’’ติ อิมินา กมฺมพเลน อุปฏฺฐิตํ คตินิมิตฺตํ มรณาสนฺนวีถิโต ปุพฺเพ เอกาหทฺวีหาทิวเสน สตฺตาหมฺปิ, สตฺตาหโต อุตฺตริปิ อุปฺปชฺชเต วาติ ทสฺเสติ ตถา หิ ปริสุทฺธํ วา อุปกฺกิลิฏฺฐํ วา วิปจฺจมานกกมฺมานุรูปํ คตินิมิตฺตํ จิรกาลมฺปิ ติฏฺฐติ, อริยคาลติสฺสโจรฆาตกาทโย วิย ตถา หิ อริยคาลติสฺโส นาม อุปาสโก สีหฬทีเป อตฺตโน ภริยาย สุมนาย สทฺธึ ยาวชีวํ ทานาทิ ปุญฺญกมฺมานิ [Pg.95] กตฺวา อายูหปริโยสาเน อริยคาลติสฺสสฺส มรณมญฺเจ นิปนฺนสฺส ฉเทวโลกโต รถํ อาเนตฺวา อตฺตโน อตฺตโน เทวโลกํ วณฺเณสุํ. อุปาสโก เทวตานํ กถํ สุตฺวา ตุสิตปุรโต อาหฏรถํ ฐเปตฺวา อวเสสรเถ ‘‘คเหตฺวา คจฺฉถา’’ติ อาห. สุมนา ปน อตฺตโน สามิกสฺส วจนํ สุตฺวา ‘‘กึ ติสฺส มรณาสนฺเน วิลาปํ อกาสี’’ติ อาห. ติสฺโส อตฺตโน ภริยาย กถํ สุตฺวา อาห… ‘‘อหํ วิลาปํ น กโรมิ, เทวโลกโต เทวตา ฉ รเถ อาเนสุํ ตาหิ เทวตาหิ สทฺธํ กเถมี’’ติ. ตํ นปสฺสามิ กุหิ’’นฺติ วุตฺเต ปุปฺผทามํ อาหราเปตฺวา อากาเส ขิปาเปสิ. สา ตํ ปุปฺผทามํ รถสีเส โอลมฺพมานํ ทิสฺวา คพฺภํ ปวิสิตฺวา สยเน สยิตฺวา นาสิกวาตํ สนฺนิรุชฺฌิตฺวา จวิตฺวา ปาตุรโหสิ. สา อตฺตโน สามิกสฺส สาสนํ เปเสสิ… ‘‘อหํ ปน ปฐมํ อาคโตมฺหิ, ตฺวํ กสฺมา จิรายสี’’ติ. อุโภปิ รเถ ฐตฺวา สพฺเพ โอโลเกนฺตานํเยว ตุสิตปุรํ อคมํสุ. อิมสฺมิญฺหิ วตฺถุสฺมึ สามิกสฺส อุปฏฺฐิตคตินิมิตฺตํ ภริยาย ปากฏํ หุตฺวา ปุเรตรตุสิตปุเร นิพฺพตฺติตฺวา สามิกสฺส สาสนํ เปเสสิ เตน อริยคาลติสฺสสฺส จิรกาลํ คตินิมิตฺตํ อุปฏฺฐาตีติ เวทิตพฺพํ. มนุสฺสโลเก หิ จิรกาลํ ตุสิตปุเร มุหุตฺตํว โหติ. เอวํ ปริสุทฺธํ วิปจฺจมานกกมฺมานุรูปํ คตินิมิตฺตํ จิรกาลํ ปวตฺตติ อิมินา นเยน ทุฏฺฐคามณิอภยธมฺมิกอุปฺสกาทีนมฺปิ วตฺถุ วิตฺถาเรตพฺพํ. โจรฆาตกสฺส ปน มหานิรเย วิปจฺจมานกกมฺมานุรูปํ เนรยคฺคิชาลาทิกํ สตฺตาหํ อุปฏฺฐาติ. สาวตฺถินคเร กิร ปญฺจสตา โจรา พหินคเร โจรกมฺมํ กโรนฺติ. อเถกทิวสํ ชนปทปุริโส เตสํ อพฺภนฺตโร หุตฺวา โจรกมฺมํ อกาสิ, ตทา เต สพฺเพปิ ราชปุริสา อคฺคเหสุํ. ราชา เต ทิสฺวา ‘‘ตุมฺหากํ อนฺตเร อิเม สพฺเพ มาเรตุํ สมตฺถสฺส ชีวิตํ ทมฺมี’’ติ อาห. ปญฺจสตา โจรา อญฺญมญฺญํ สมฺพนฺธา อญฺญมญฺญํ สหายกาติ อญฺญมญฺญํ มาเรตุํ น อิจฺฉึสุ, ชนปทมนุสฺโส ปน ‘‘อหํ มาเรมี’’ติ วตฺวา สพฺเพ มาเรสิ. ราชา ตสฺส ตุสฺสิตฺวา โจรฆาตกกมฺมํ อทาสิ. โส ปญฺจวีสติวสฺสานิ โจรฆาตกกมฺมํ อากาสิ. ราชา ตสฺส มหลฺลโกติ วตฺวา อญฺญสฺส โจรฆาตก กมฺมํ ทาเปสิ. โส โจรฆาตกกมฺมา อปนีโต อญฺญตรสฺส สนฺติเก [Pg.96] นาสิกวาตํ อุคฺคณฺหิตฺวา หตฺถปาทกณฺณนาสาทีหิ ฉินฺทิตพฺพานํ อูรูถนกฏฺฐานํ ภินฺทนฺตมาเรตพฺพยุตฺตานํ นาสิกวาตํ วิสฺสชฺเชตฺวา มาเรตพฺพํ มนฺตํ ลภิ. โส ราชานํ อาโรเจตฺวา นาสิกวาเตน โจรฆาตกกมฺมํ กโรนฺตสฺเสว ตึส วสฺสานิ อติกฺกมิ. โส ปจฺฉา มหลฺลโก หุตฺวา มรณมญฺเจ นิปชฺชิ ‘‘สตฺตทิวเสน กาลํ กริสฺสตี’’ติ. มรณกาเล มหนฺตํ เวทนํ อโหสิ. โส มหานิรเย นิพฺพตฺโต วิย มหาสทฺทํ กตฺวา ทุกฺขิโต โหติ. ตสฺส สทฺเทน ภีตา มนุสฺสา อุภโตปสฺเส เคหํ ฉฑฺเฑตฺวา ปลายึสุ. ตสฺส มรณทิวเส สาริปุตฺตตฺเถโร ทิพฺพจกฺขุนา โลกํ โอโลเกนฺโต เอตสฺส กาลํ กตฺวา มหานิรเย นิพฺพตฺตมานํ ทิสฺวา ตสฺส อนุกมฺปํ ปฏิจฺจ เคหทฺวาเร ปากโฏ อโหสิ. โส กุชฺฌิตฺวา นาสิกวาตํ วิสฺสชฺเชสิ. ยาว ตติยํ วิสฺสชฺชมาโนปิ วิสฺสชฺชาเปตุํ อสกฺโกนฺโต เถรํ อติเรเกน วิโรจมานํ ทิสฺวา จิตฺตํ ปสาเทตฺวา ปายาสํ เถรสฺส ทาเปสิ. เถโร มงฺคลํ วฑฺเฒตฺวา อคมาสิ. โจรฆาตโก เถรสฺส ทินฺนทานํ อนุสฺสริตฺวา จวิตฺวา สคฺเค นิพฺพตฺติ, นิรยชาลาทโย อนฺตรธายนฺติ. โส อนาคเตปิ ปจฺเจกพุทฺโธ ภวิสฺสติ. เอวํ อุปกฺกิลิฏฺฐํ วา วิปจฺจมาน กกมฺมานุรูปํ คตินิมิตฺตมฺปิ สตฺตาหปรมํ อุปฏฺฐาติ. อตฺถิเกหิ ปน สหสฺสวตฺถุ สคาถาวคฺเคสุ โอโลเกตพฺโพ. ภควโต ปน ปริสุทฺธํ เมตฺตาปุพฺพภาคสฺส โสมนสฺส ญาณสมฺปยุตฺตกุสลสฺส กมฺมสฺส เวเคน กาลทีปเทสกุลมาตรวเสน อิมานิ ปญฺจคตินิมิตฺตานิ จิรกาลํ หุตฺวา อุปฏฺฐหนฺติ. จิรกาลนฺติ มนุสฺสโลเก สตฺตาหมตฺตํ, ตุสิตปุเรมุหุตฺตเมว, ตถาปิ มนุสฺสโลเก สตฺตาหมตฺเต กาเล เทวตานํ ปญฺจปุพฺพนิมิตฺตานิ ปญฺญายนฺติ ตญฺจ โข ปุญฺญวนฺตานํเยว ปญฺญายนฺติ, น สพฺเพสํ มนุสฺสโลเก ปุญฺญวนฺตานํ ราชราชมหามตฺตาทีนํ วิย ตํ ทิสฺวา มเหสกฺขา เทวตา ชานนฺติ, น อปฺเปสกฺขา, มนุสฺสโลเก เนมิตฺตกา พฺราหฺมณปณฺฑิตาทโยวิย. มเหสกฺขา เทวตา ตํ ปุพฺพนิมิตฺตํ ทิสฺวา นนฺทวนํ เนตฺวา ‘‘กาโล เทวา’’ติ อาทีหิ ยาจนฺติ. มหาสกฺโก ตตฺเถว นนฺทวนุยฺยาเน กาลทีปเทสกุลมาตรวเสน ปญฺจ วิโลเกตฺวา จวิตฺวา ตมารมฺมณํ กตฺวา มหามายาย กุจฺฉิมฺหิ ปฏิสนฺธึ อคฺคเหสีติ สนฺนิฏฺฐานมวคนฺตพฺพํ. याचना किए जाने पर 'काल, द्वीप, देश, कुल और माता'—इन कहे गए पाँच महाविलोकनों (महान अवलोकनों) को देखकर, तुषितपुर से च्युत होकर, आषाढ़ी पूर्णिमा को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के साथ ही, उन्नीस प्रतिसन्धि-चित्तों में से मैत्री-पूर्वभाग वाले सौमनस्य-ज्ञान-सम्प्रयुक्त-असंस्कारिक-कुशल-चित्त के सदृश महाविपाक-चित्त के द्वारा प्रतिसन्धि ग्रहण की। उस समय आलम्बन के निकटवर्ती वीथि से पूर्व भाग में देखे गए काल, द्वीप, देश, कुल और माता के वश से ये पाँच (विषय) प्रतिसन्धि-चित्त के गति-निमित्त-आलम्बन के रूप में गोचर भाव (विषय) को प्राप्त होते हैं—यह हमारी क्षान्ति (स्वीकृति) है, जो उस ओर झुकाव और प्रवणता के कारण बहुलता से प्रवृत्त होने से है। इसीलिए अभिधम्मत्थसंग्रह आदि की 'अभिधम्मत्थ विभावनी' में कहा गया है— 'मरण काल में यथायोग्य अभिमुख हुआ, जन्मान्तर में प्रतिसन्धि जनक कर्म, या उस कर्म को करते समय रूपादि के रूप में पहले प्राप्त हुआ उपकरण-भूत कर्म-निमित्त, अथवा अनन्तर उत्पन्न होने वाले भव में प्राप्त होने योग्य उपभोग-भूत गति-निमित्त—कर्म के बल से छहों द्वारों में से किसी एक में उपस्थित होता है; उसके बाद उसी प्रकार उपस्थित आलम्बन को लेकर, विपाक देने वाले कर्म के अनुरूप, शुद्ध या क्लिष्ट, उत्पन्न होने वाले भव के अनुरूप, उसमें झुका हुआ सा चित्त-सन्तान बहुलता से निरन्तर प्रवृत्त होता है। अथवा वही जनक-भूत कर्म अभिनवकरण (नूतन व्यापार) के रूप में द्वार-प्राप्त होता है। आसन्न-मरण वाले उस व्यक्ति के वीथि-चित्त के अवसान में, भवाङ्ग के क्षय होने पर ही, च्यवन के रूप में वर्तमान भव के पर्यवसान-भूत चुति-चित्त उत्पन्न होकर निरुद्ध होता है। उस निरोध के अनन्तर ही, उसी प्रकार ग्रहण किए गए आलम्बन को लेकर, सवस्तु (आधार सहित) या अवस्तु (आधार रहित) जैसा भी योग्य हो, अविद्या-अनुशय से घिरे हुए और तृष्णा-अनुशय-मूलक संस्कार द्वारा जनित, सम्प्रयुक्त धर्मों द्वारा परिगृहीत, सहजात धर्मों के अधिष्ठान-भूत और पूर्वगामी होकर, जन्मान्तर की प्रतिसन्धि के रूप में 'प्रतिसन्धि' संज्ञक चित्त उत्पन्न होता हुआ ही जन्मान्तर में प्रतिष्ठित होता है।' वहाँ 'उसमें झुका हुआ सा चित्त-सन्तान बहुलता से निरन्तर प्रवृत्त होता है'—इससे यह दर्शाया गया है कि कर्म-बल से उपस्थित गति-निमित्त मरण-आसन्न-वीथि से पूर्व एक दिन, दो दिन आदि के वश से सात दिन तक, या सात दिन से अधिक भी उत्पन्न होता है। क्योंकि विपाक देने वाले कर्म के अनुरूप शुद्ध या क्लिष्ट गति-निमित्त चिरकाल तक भी रहता है, जैसे आर्यगालतिस्स और चोर-घातक आदि के विषय में। सिंहल द्वीप में आर्यगालतिस्स नामक उपासक ने अपनी पत्नी सुमना के साथ जीवन भर दानादि पुण्य कर्म किए। आयु के अंत में मरण-शय्या पर लेटे हुए आर्यगालतिस्स के लिए छह देवलोकों से रथ आए और देवताओं ने अपने-अपने देवलोक का वर्णन किया। उपासक ने देवताओं की बात सुनकर तुषितपुर से आए रथ को रखकर शेष रथों के लिए कहा— 'इन्हें लेकर जाओ।' सुमना ने अपने पति के वचन सुनकर कहा— 'तिस्स! क्या मरण काल में प्रलाप कर रहे हो?' तिस्स ने अपनी पत्नी की बात सुनकर कहा— 'मैं प्रलाप नहीं कर रहा हूँ, देवलोक से देवता छह रथ लाए हैं, मैं उन देवताओं के साथ बात कर रहा हूँ।' जब पत्नी ने कहा— 'मैं उन्हें नहीं देख रही हूँ, वे कहाँ हैं?', तो उसने पुष्पमाला मँगवाकर आकाश में फिंकवाई। उसने उस पुष्पमाला को रथ के शीर्ष पर लटकते देख, गर्भ में प्रवेश कर, शय्या पर लेटकर, श्वास रोककर च्युत होकर वहाँ (तुषितपुर में) उत्पन्न हुई। उसने अपने पति को संदेश भेजा— 'मैं तो पहले आ गई हूँ, तुम क्यों देर कर रहे हो?' दोनों ही रथों पर स्थित होकर सबके देखते-देखते ही तुषितपुर चले गए। इस कथा में पति को उपस्थित गति-निमित्त पत्नी के लिए प्रकट हो गया और वह पहले ही तुषितपुर में उत्पन्न होकर पति को संदेश भेजती है, इससे यह समझना चाहिए कि आर्यगालतिस्स के लिए चिरकाल तक गति-निमित्त उपस्थित रहा। मनुष्य लोक का चिरकाल तुषितपुर में एक मुहूर्त के समान होता है। इस प्रकार विपाक देने वाले कर्म के अनुरूप शुद्ध गति-निमित्त चिरकाल तक प्रवृत्त होता है; इसी न्याय से दुट्ठगामणी अभय और धम्मिक उपासक आदि की कथा का विस्तार करना चाहिए। चोर-घातक के लिए तो महानिरय में विपाक देने वाले कर्म के अनुरूप नरक की अग्नि की ज्वाला आदि सात दिनों तक उपस्थित रही। श्रावस्ती नगर में पाँच सौ चोर नगर के बाहर चोरी करते थे। एक दिन एक जनपद का व्यक्ति उनके साथ होकर चोरी करने लगा, तब वे सभी राजपुरुषों द्वारा पकड़े गए। राजा ने उन्हें देखकर कहा— 'तुममें से जो इन सबको मारने में समर्थ होगा, उसे मैं जीवन दान दूँगा।' पाँच सौ चोरों ने एक-दूसरे के मित्र होने के कारण एक-दूसरे को मारना नहीं चाहा, किन्तु उस जनपद के मनुष्य ने 'मैं मारूँगा' कहकर सबको मार दिया। राजा ने प्रसन्न होकर उसे चोर-घातक (वधिक) का पद दे दिया। उसने पच्चीस वर्षों तक चोर-घातक का कार्य किया। राजा ने उसे वृद्ध समझकर दूसरे को वह कार्य दे दिया। उस कार्य से मुक्त होकर उसने किसी के पास से नासिका-वायु (प्राण) को रोकने और हाथ-पैर-कान-नाक आदि काटने योग्य अंगों को भेदकर मारने का मन्त्र प्राप्त किया। उसने राजा को सूचित कर नासिका-वायु द्वारा चोर-घातक का कार्य करते हुए तीस वर्ष व्यतीत किए। बाद में वृद्ध होकर वह मरण-शय्या पर पड़ा और 'सातवें दिन काल करेगा' ऐसा कहा गया। मरण काल में उसे महान वेदना हुई। वह महानिरय में उत्पन्न होने वाले के समान महान शब्द (चीख) करते हुए दुखी हुआ। उसके शब्द से डरे हुए लोग घर छोड़कर भाग गए। उसके मरण के दिन सारिपुत्त स्थविर ने दिव्यचक्षु से लोक को देखते हुए उसे काल कर महानिरय में उत्पन्न होते देख, उस पर अनुकम्पा कर उसके घर के द्वार पर प्रकट हुए। उसने क्रुद्ध होकर नासिका-वायु छोड़ी। तीसरी बार भी छोड़ने में असमर्थ होकर स्थविर को अत्यधिक तेजस्वी देख चित्त प्रसन्न किया और स्थविर को पायस (खीर) दान दी। स्थविर मंगल-पाठ कर चले गए। चोर-घातक स्थविर को दिए गए दान का अनुस्मरण करते हुए च्युत होकर स्वर्ग में उत्पन्न हुआ और निरय की ज्वाला आदि अन्तर्धान हो गई। वह भविष्य में प्रत्येक बुद्ध भी होगा। इस प्रकार क्लिष्ट या विपाक देने वाले कर्म के अनुरूप गति-निमित्त भी अधिकतम सात दिन तक उपस्थित रहता है। इच्छुक व्यक्तियों को 'सहस्सवत्थु' के सगाथावग्गों में देखना चाहिए। भगवान के तो शुद्ध मैत्री-पूर्वभाग वाले सौमनस्य-ज्ञान-सम्प्रयुक्त कुशल कर्म के वेग से काल, द्वीप, देश, कुल और माता के वश से ये पाँच गति-निमित्त चिरकाल तक होकर उपस्थित होते हैं। चिरकाल का अर्थ मनुष्य लोक में मात्र सात दिन है, जो तुषितपुर में एक मुहूर्त ही है। फिर भी मनुष्य लोक में सात दिन के समय में देवताओं के पाँच पूर्वनिमित्त दिखाई देते हैं, और वे केवल पुण्यवानों को ही दिखाई देते हैं, सभी को नहीं; जैसे मनुष्य लोक में पुण्यवान राजाओं और महामात्रों आदि को देखकर नैमित्तिक ब्राह्मण और पण्डित आदि जान लेते हैं, वैसे ही उन्हें देखकर महेशाख्य (महान) देवता जान लेते हैं, अल्पेशाख्य नहीं। महेशाख्य देवता उन पूर्वनिमित्तों को देखकर नन्दन वन ले जाकर 'देव! यह काल है' आदि कहकर याचना करते हैं। महासक्क (महाबोधिसत्व) ने वहीं नन्दन वनोद्यान में काल, द्वीप, देश, कुल और माता के वश से पाँचों का अवलोकन कर, च्युत होकर, उसे आलम्बन बनाकर महामाया की कुक्षि में प्रतिसन्धि ग्रहण की—ऐसा निश्चय समझना चाहिए। ตตฺถ [Pg.97] กาลนฺติ มนุสฺสโลเก เอกูนตึสติเม วสฺเส เวสาขปุณฺณมทิวเส พุทฺโธ ภวิสฺสามีติ กาลํ โอโลเกสิ. ทีปนฺติ ชมฺพุทีเปเยว ภวิสฺสามิ, น อญฺญทีเปสูติ ทีปํ โอโลเกสิ. เทสนฺติ มชฺฌิมเทเสเยว, ตญฺจ โข มหาโพธิมณฺเฑเยว, น อญฺญเทเสติ เทสํ โอโลเกสิ. กุลนฺติ ทฺเว กุลานิ ขตฺติยกุลพฺราหฺมณกุลวเสน. ตตฺถ ยสฺมึ กาเล ขตฺติยกุลํ โลเก เสฏฺฐภาเวน ‘‘อยเมว โลเก อคฺโค’’ติ สมฺมนฺนติ, ตทา ขตฺติยกุเลเยว พุทฺธา อุปฺปชฺชนฺติ. ยสฺมึ ปน กาเล พฺราหฺมณกุลํ อยเมว โลเก อคฺโคติ, ตทา พฺราหฺมณกุเลเยว พุทฺธา อุปฺปชฺชนฺติ. อิทานิ ปน ขตฺติยกุลเมว อคฺโคติ สมฺมนฺนนฺติ. ขตฺติยกุเลปิ สกฺยราชาโนว โลเก อุตฺตมา, อสมฺภินฺนขตฺติยกุลตฺตา ตสฺมา สกฺยราชกุเลเยว ภวิสฺสามีติ กุลํ โอโลเกสิ. มาตรนฺติ มม มาตรํ ทส มาสานิ สตฺต จ ทิวสานิ ฐสฺสติ, เอตฺถนฺตเร มม มาตุยา อโรโค ภวิสฺสตีติ มาตรมฺปิ โอโลเกสิ. โพธิสตฺตมาตา ปน ปจฺฉิมวเย ฐิตา. เอวํ ยุตฺติโตปิ อาคมโตปิ ภควโต นิพฺพานจิตฺตสฺส ปฏสนฺธิจิตฺเตน คหิตนิมิตฺตเมว อารมฺมณํ โหตีติ เวทิตพฺพํ. वहाँ 'काल' के विषय में उन्होंने विचार किया कि मनुष्य लोक में उनतीसवें वर्ष में वैशाख पूर्णिमा के दिन मैं बुद्ध बनूँगा। 'द्वीप' के विषय में विचार किया कि मैं जम्बुद्वीप में ही उत्पन्न होऊँगा, अन्य द्वीपों में नहीं। 'देश' के विषय में विचार किया कि मध्यदेश में ही, और वह भी महाबोधिमण्ड में ही, अन्य देशों में नहीं। 'कुल' के विषय में क्षत्रिय कुल और ब्राह्मण कुल के रूप में दो कुलों का विचार किया। वहाँ जिस समय लोक में क्षत्रिय कुल श्रेष्ठता के कारण "यही लोक में अग्र है" ऐसा माना जाता है, तब बुद्ध क्षत्रिय कुल में ही उत्पन्न होते हैं। परन्तु जिस समय ब्राह्मण कुल "यही लोक में अग्र है" ऐसा माना जाता है, तब बुद्ध ब्राह्मण कुल में ही उत्पन्न होते हैं। अब तो क्षत्रिय कुल को ही अग्र माना जाता है। क्षत्रिय कुल में भी शाक्य राजा ही लोक में उत्तम हैं, क्योंकि वे अखण्डित क्षत्रिय कुल के हैं, इसलिए मैं शाक्य राजकुल में ही उत्पन्न होऊँगा—ऐसा उन्होंने कुल का विचार किया। 'माता' के विषय में विचार किया कि मेरी माता दस महीने और सात दिन तक जीवित रहेगी, इस बीच मेरी माता निरोग रहेगी। बोधिसत्व की माता तो अपनी आयु के अंतिम भाग में स्थित थी। इस प्रकार युक्ति से और आगम से भी यह जानना चाहिए कि भगवान के निर्वाण-चित्त का प्रतिसन्धि-चित्त द्वारा ग्रहण किया गया निमित्त ही आलम्बन होता है। สพฺพญฺญุชินนิพฺพาน, จิตฺตสฺส โคจรํ สุภํ; วิญฺเญยฺยํ คตินิมิตฺตํ, คนฺเถหิ อวิโรธโต. सर्वज्ञ जिन के निर्वाण-चित्त का शुभ गोचर (विषय), ग्रन्थों के अविरोध से गति-निमित्त के रूप में जानना चाहिए। ธาตุปรินิพฺพานมฺปิ โพธิมณฺเฑเยว ภวิสฺสติ วุตฺตญฺเหตํ อุปริปณฺณาสเก ‘‘ธาตุปรินิพฺพานํ อนาคเต ภวิสฺสติ สาสนสฺส หิ โอสกฺกนกาเล อิมสฺมึ ตมฺพปณฺณิทีเป ธาตุโย สนฺนิปติตฺวา มหาเจติยโต นาคทีเป ราชายตนเจติยํ, ตโต มหาโพธิปลฺลงฺกํ คมิสฺสนฺติ. นาคภวนโตปิ เทวโลกโตปิ ธาตุโย มหาโพธิปลฺลงฺกเมว คมิสฺสนฺติ สาสปมตฺตาปิ ธาตุโย อนฺตรา น นสฺสิสฺสนฺติ, สพฺพา ธาตุโย มหาโพธิปลฺลงฺเก ราสิภูตา สุวณฺณกฺขนฺธา วิย เอกคฺฆนา หุตฺวา ฉพฺพณฺณรสฺมิโย วิสฺสชฺชิสฺสนฺติ, ตา ทสสหสฺสโลกธาตุํ ผริสฺสนฺติ. ตโต ทสสหสฺสจกฺกวาเฬสุ เทวตา สนฺนิปติตฺวา ''อชฺช สตฺถา ปรินิพฺพายติ อชฺช สาสนํ โอสกฺกติ ปจฺฉิมทสฺสนํ อิทํ อมฺหาก’’นฺติ ทสพลสฺส ปรินิพฺพุตทิวสโต มหนฺตตรํ การุญฺญํ กริสฺสนฺติ ฐเปตฺวา อนาคามิขีณาสเว อวเสสา สกตฺตภาเวน สนฺธาเรตุํ [Pg.98] นาสกฺขึสุ, ธาตุสรีรโต เตโชธาตุ อุฏฺฐหิตฺวา ยาว พฺรหฺมโลกา อุคฺคจฺฉิสฺสติ. สาสปมตฺตายปิ ธาตุยา สติ เอกชาลา ภวิสฺสติ ธาตูสุ ปริยาทานํ คตาสุ ปจฺฉิชฺชิสฺสติ. เอวํ มหนฺตํ อานุภาวํ ทสฺเสตฺวา ธาตูสุ อนฺตรหิตาสุ สาสนํ อนฺตรหิตํ นาม โหติ. ยาว เอวํ น อนฺตรธายติ, ตาว อนนฺตรธานเมว สาสนํ. ปรินิพฺพานกาลโต ปฏฺฐาย ยาว สาสปมตฺตา ธาตุ ติฏฺฐติ, ตาว พุทฺธกาลโต ปจฺฉาติ น เวทิตพฺพํ ธาตูสุ หิ ฐิตาสุ พุทฺธา ฐิตา ว โหนฺติ, ตสฺมา เอตฺถนฺตเร อญฺญสฺส พุทฺธสฺส อุปฺปตฺติ นิวาริตาว โหติ. เตเนว วทาม. धातुओं का परिनिर्वाण भी बोधिमण्ड में ही होगा। उपरिपण्णासक में यह कहा गया है— "भविष्य में शासन के ह्रास के समय धातुओं का परिनिर्वाण होगा। इस ताम्रपर्णी द्वीप में धातुएँ एकत्रित होकर महाचेतिय से नागद्वीप के राजायतन चेतिय में जाएँगी, वहाँ से महाबोधि पर्यङ्क पर जाएँगी। नागभवन और देवलोक से भी धातुएँ महाबोधि पर्यङ्क पर ही जाएँगी। सरसों के दाने के बराबर भी धातुएँ बीच में नष्ट नहीं होंगी। सभी धातुएँ महाबोधि पर्यङ्क पर एकत्रित होकर स्वर्ण-पुंज की तरह एक ठोस पिण्ड बनकर छह वर्णों की रश्मियाँ उत्सर्जित करेंगी। वे दस हजार लोकधातुओं में फैल जाएँगी। तब दस हजार चक्रवातों के देवता एकत्रित होकर— 'आज शास्ता परिनिर्वाण प्राप्त कर रहे हैं, आज शासन का ह्रास हो रहा है, यह हमारा अंतिम दर्शन है'—ऐसा कहकर दशबल के परिनिर्वाण दिवस से भी अधिक करुणा करेंगे। अनागामी और क्षीणास्त्रव को छोड़कर शेष देवता अपने शरीर को सँभालने में असमर्थ हो जाएँगे। धातु-शरीर से तेजोधातु उठकर ब्रह्मलोक तक जाएगी। जब तक सरसों के दाने के बराबर भी धातु रहेगी, तब तक एक ज्वाला बनी रहेगी; धातुओं के पूर्णतः समाप्त होने पर वह बुझ जाएगी। इस प्रकार महान अनुभाव दिखाकर धातुओं के अन्तर्धान होने पर शासन अन्तर्हित माना जाता है। जब तक इस प्रकार अन्तर्धान नहीं होता, तब तक शासन अनन्तर्धान ही है। परिनिर्वाण काल से लेकर जब तक सरसों के दाने के बराबर भी धातु विद्यमान है, तब तक उसे बुद्ध काल के बाद का समय नहीं समझना चाहिए। क्योंकि धातुओं के स्थित रहने पर बुद्ध ही स्थित रहते हैं, इसलिए इस बीच अन्य बुद्ध की उत्पत्ति वर्जित ही है। इसीलिए हम कहते हैं।" ปรินิพฺพานกาลโต, ปจฺฉา ธรนฺติ ธาตุโย; อนิพฺพุโตว สมฺพุทฺโธ, อญฺญพุทฺธสฺส วาริตา. परिनिर्वाण काल के बाद भी जब तक धातुएँ विद्यमान रहती हैं, तब तक सम्यक्सम्बुद्ध अनिर्वृत (विद्यमान) ही हैं, और अन्य बुद्ध का आना वर्जित है। ชีวมาเนปิ สมฺพุทฺเธ, นิพฺพุเต วา ตถาคเต; โย กโรติ สมํ ปูชํ, ผลํ ตาส สมํ สิยา’ติ. चाहे सम्यक्सम्बुद्ध जीवित हों या तथागत निर्वाण प्राप्त कर चुके हों, जो समान रूप से पूजा करता है, उसका फल भी समान ही होता है। อิติ สาครพุทฺธิตฺเถรวิจริเต สีมวิโสธเน ธมฺมวณฺณนาย इस प्रकार स्थविर सागरबुद्धि द्वारा रचित सीमा-विशोधन की धर्म-वर्णना में— นิพฺพานกณฺโฑ ตติโย ปริจฺเฉโท. निर्वाण-काण्ड नामक तीसरा परिच्छेद। ๔. สมสีสิกณฺโฑ ४. समसीसि-काण्ड। อิทานิ สงฺโฆ จ ทุลฺลโภ โลเกติ ปทสฺส วณฺณนากฺกโม สมฺปตฺโต. ตตฺถ สงฺโฆติ ปรมตฺถสมฺมุติวเสน ทุวิโธ โหติ. เตสุ ปรมตฺถสงฺโฆ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ, อฏฺฐปุริสปุคฺคลา, จตฺตาลีสมฺปิ ปุคฺคลา, อฏฺฐสตมฺปิ ปุริสปุคฺคลาติ จตุพฺพิโธ โหติ. ตตฺถ สงฺเขปวเสน โสตาปตฺติมคฺคฏฺโฐ ผลฏฺโฐติ เอกํ ยุคํ, สกทามิมคฺคฏฺโฐ ผลฏฺโฐติ เอกํ, อนาคามิมคฺคฏฺโฐ ผลฏฺโฐติ เอกํ, อรหตฺตมคฺคฏฺโฐ ผลฏฺโฐติ เอกนฺติ จตฺตาริ ปุริสยุคานิ โหนฺติ. จตฺตาโร มคฺคฏฺฐา จตฺตาโร ผลฏฺฐาติ อฏฺฐปุริสปุคฺคลา โหนฺติ. จตฺตาลีสมฺปิ ปุคฺคลาติ โสตาปตฺติมคฺคฏฺโฐ ปฐมฌานิกาทิวเสน ปญฺจ, ตถา สกทาคามิอนาคามิอรหตฺตมคฺคฏฺฐาปิ ปญฺจ ปญฺจาติ วีสติ มคฺคฏฺฐปุคฺคลา, ตถา ผลฏฺฐาปิ โสตปตฺติผลฏฺฐาทิวเสน ปญฺจ ปญฺจาติ วีสติ ผลฏฺฐาติ จตฺตาลีสปุคฺคลา โหนฺติ. เอตฺถ จ มคฺคสฺส เอกจิตฺตกฺขณิกตฺตา กถํ วีสติมคฺคฏฺฐา ปุคฺคลา ภเวยฺยุนฺติ. अब "लोक में संघ दुर्लभ है" इस पद की व्याख्या का क्रम प्राप्त हुआ है। वहाँ 'संघ' परमार्थ और सम्मति के भेद से दो प्रकार का होता है। उनमें परमार्थ संघ चार पुरुष-युगल, आठ पुरुष-पुद्गल, चालीस पुद्गल और एक सौ आठ पुरुष-पुद्गल के रूप में चार प्रकार का होता है। वहाँ संक्षेप में— स्रोतापत्ति मार्गस्थ और फलस्थ एक युगल है, सकदागामी मार्गस्थ और फलस्थ एक, अनागामी मार्गस्थ और फलस्थ एक, अर्हत्व मार्गस्थ और फलस्थ एक—इस प्रकार चार पुरुष-युगल होते हैं। चार मार्गस्थ और चार फलस्थ—इस प्रकार आठ पुरुष-पुद्गल होते हैं। चालीस पुद्गल इस प्रकार हैं— स्रोतापत्ति मार्गस्थ प्रथम ध्यान आदि के भेद से पाँच, उसी प्रकार सकदागामी, अनागामी और अर्हत्व मार्गस्थ भी पाँच-पाँच—इस प्रकार बीस मार्गस्थ पुद्गल; उसी प्रकार फलस्थ भी स्रोतापत्ति फलस्थ आदि के भेद से पाँच-पाँच—इस प्रकार बीस फलस्थ—कुल चालीस पुद्गल होते हैं। यहाँ प्रश्न है कि मार्ग के एक चित्त-क्षण मात्र होने पर बीस मार्गस्थ पुद्गल कैसे हो सकते हैं? วุจฺจเตปาทกชฺฌานสมฺมสิตชฺฌานปุคฺคลชฺฌาสเยสุปิ [Pg.99] หิ อญฺญตรวเสน ตํ ตํ ฌานสทิสวิตกฺกาทิองฺคปาตุภาเวน จตฺตาโรปิ มคฺคฏฺฐา ปฐมชฺฌานิกาทิโวหารํ ลภนฺตา ปจฺเจกํ ปญฺจปญฺจธา วิภชิยนฺติ, ตสฺมา วีสติ มคฺคฏฺฐา โหนฺติ. ตตฺถ ปฐมชฺฌานาทีสุ ยํ ยํ ฌานํ สมาปชฺชิตฺวา ตโต วุฏฺฐาย สงฺขาเร สมฺมสนฺตสฺส วุฏฺฐานคามินีวิปสฺสนา ปวตฺตา, ตํ ปาทกชฺฌานํ วุฏฺฐานคามินิวิปสฺสนาย ปทฏฺฐานภาวโต. ยํ ยํ ฌานํ สมฺมสนฺตสฺส สา ปวตฺตา, ตํ สมฺมสิตชฺฌานํ. ‘‘อโห วต เม ปฐมชฺฌานสทิโส มคฺโค ปญฺจงฺคิโก, ทุติยชฺฌานาทีสุ วา อญฺญตรสทิโส จตุรงฺคิกาทิเภโท มคฺโค ภเวยฺยา’’ติ เอวํ โยคาวจรสฺส อุปฺปนฺนชฺฌาสโย ปุคฺคลชฺฌาสโย นาม. ตตฺถ เยน ปฐมชฺฌานาทีสุ อญฺญตรํ ฌานํ สมาปชฺชิตฺวา ตโต วุฏฺฐาย ปกิณฺณกสงฺขาเร สมฺมสิตฺวา มคฺโค อุปฺปาทิโต โหติ, ตสฺส โส มคฺโค ปฐมชฺฌานาทิ ตํ ตํ ปาทกชฺฌานสทิโส โหติ. สเจ ปน วิปสฺสนาปาทกํ กิญฺจิฌานํ นตฺถิ, เกวลํ ปฐมชฺฌานาทีสุ อญฺญตรํ ฌานํ สมฺมสิตฺวา มคฺโค อุปฺปาทิโต โหติ, ตสฺส โส สมฺมสิตชฺฌานสทิโส โหติ. ยทา ปนยํ กิญฺจิ ฌานํ สมาปชฺชิตฺวา ตโต อญฺญํ สมฺมสิตฺวา มคฺโค อุปฺปาทิโต โหติ, ตทา ปุคฺคลชฺฌาสยวเสน ทฺวีสุ อญฺญตรสทิโส โหติ. เอวํ สมถยานิกสฺส ปุถุชฺชนสฺส อริยานํ วา ปาทกชฺฌานสมฺมสิตชฺฌานปุคฺคลชฺฌาสยวเสน ปฐมชฺฌานาทีนํ อญฺญตรฌานสทิสสฺส มคฺคงฺคิกสฺส ปวตฺตนโต ปุคฺคลเภทวเสน วีสติ มคฺคฏฺฐา ปุคฺคลา โหนฺติ, ตถา ผลฏฺฐาปิ วีสตีติ จตฺตาลีสอริยปุคฺคลา โหนฺติ. อปรมฺปิ สเจ ปน ปุคฺคลสฺส ตถา วิโธ อชฺฌาสโย นตฺถิ, อนุโลมวเสน เหฏฺฐิมเหฏฺฐิมฌานโต วุฏฺฐาย อุปรูปริฌานธมฺเม สมฺมสิตฺวา อุปฺปาทิตมคฺโค ปาทกชฺฌานมนเปกฺขิตฺวา สมฺมสิตชฺฌานสทิโส โหติ. ปฏิโลมวเสน อุปรูปริฌานโต วุฏฺฐาย เหฏฺฐิมเหฏฺฐิมฌานธมฺเม สมฺมสิตฺวา อุปฺปาทิตมคฺโค สมฺมสิตชฺฌานมนเปกฺขิตฺวา ปาทกชฺฌานสทิโส โหติ, เหฏฺฐิมเหฏฺฐิมฌานโต หิ อุปรูปริฌานํ พลวตรนฺติ, อฏฺฐสตมฺปิ ปุริสปุคฺคลาติ ตตฺถ เอกพีชี, โกลํโกโล, สตฺตกฺขตฺตุปรโมติ ตโย โสตาปนฺนา. กามรูปารูปภเวสุ อธิคตผลา ตโย สกทาคามิโนติ เต สพฺเพปิ ทุกฺขปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญํ, ทุกฺขปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญํ, สุขาปฏิปทา ทนฺธาภิญฺญํ, สุขาปฏิปทา ขิปฺปาภิญฺญนฺติ [Pg.100] จตุนฺนํ ปฏิปทานํ วเสน จตุวีสติ, อนฺตราปรินิพฺพายี, อุปหจฺจปริ นิพฺพายี, สสงฺขารปรินิพฺพายี, อสงฺขารปรินิพฺพายี, อุทฺธํโสโต อกนิฏฺฐคามีติ อวิหาสุ ปญฺจ อนามิคาโน, ตถา อตปฺปาสุทสฺสาสุทสฺสีสุปิ ปญฺจ. อกนิฏฺเฐสุ ปน อุทฺธํโสตวชฺชา อนฺตราปรินิพฺพายี, อุปหจฺจปรินิพฺพายี, สสงฺขารปรินิพฺพายี, อสงฺขารปริพฺพายีติ จตฺตาโรติ จตุวีสติ อนาคามิโน. สุกฺขวิปสฺสโก, สมถยานิโกติ ทฺเว อรหนฺโต, จตฺตาโร มคฺคฏฺฐาติ จตุปญฺญาส เต สพฺเพปิ สทฺธาธุรปญฺญาธุรานํวเสน ทฺเวคุเณ หุตฺวา อฏฺฐสตํ อริยปุคฺคลา โหนฺติ. เต สพฺเพปิ ‘‘อฏฺฐสตํ วา’’ติ วิตฺถารวเสน อุทฺทิฏฺฐา อริยปุคฺคลา เต สงฺเขปโต ยุควเสน โสตาปตฺติ มคฺคฏฺโฐ ผลฏฺโฐติ เอกํ ยุคนฺตฺยาทินา จตฺตาโรว โหนฺติ. เตเนวาห รตนปริตฺเต ‘‘เย ปุคฺคลา อฏฺฐสตํ ปสตฺถา, จตฺตาริ เอตานิ ยุคานิ โหนฺตี’’ติ อยํ ปเภโทมคฺคฏฺฐผลฏฺเฐสุ มิสฺสกวเสน ลพฺภติ ฌานิกวิปสฺสกปเภโท ปน ผลฏฺเฐเยว ลพฺภติ มคฺคสฺส เอกจิตฺตกฺขติกตฺตา มคฺคฏฺเฐสุ น ลพฺภติ. ตตฺถ โสตาปตฺติผลฏฺโฐ ฌานิกสุกฺขวิปสฺสกวเสน ทุวิโธ. เตสุ ฌานิโก ปุคฺคโล ตสฺมึ ภเว อรหตฺตปฺปตฺโต ปรินิพฺพายติ. อปฺปตฺโต พฺรหฺมโลกคโต โหติ, โส ฌานิโก นาม. มูลฏีกายํ ปน นิกนฺติยา สติ ปุถุชฺชนาทโย ยถาลทฺธชฺฌานสฺส ภูมิภูเต สุทฺธาวาสวชฺชิเต ยตฺถ กตฺถจิ นิพฺพตฺตนฺติ ตถา กามภเวปิ กามาวจรกมฺมพเลน ‘‘อิชฺฌติ หิ ภิกฺขเว สีลวโต เจโตปณิธิ วิสุทฺธตฺตา’’ติ วุตฺตํ. อนาคามิโน ปน กามราคสฺส สพฺพโส ปหีนตฺตา กามภเวสุ นิกนฺตึ น อุปฺปาเทนฺตีติ กามโลกวชฺชิเต ยถาลทฺธสฺส ภูมิ ภูเต ยตฺถ กตฺถจิ นิพฺพตฺตนฺตี’ติ วุตฺตํ ตถา หิ อนาคามิสฺเสว กามภเว นิกนฺติยา ปหีนตฺตา โสตาปนฺนสกทาคามีนมฺปิ นิกนฺติยา สติ กามภเว กามาวจรกมฺมพเลน อุปฺปตฺติภาโว อวาริโตว โหตีติ วิญฺญายติ ตสฺมา ‘‘อปฺปตฺเต พฺรหฺมโลกคโต โหติ, โส ฌานิโก นามาติ อิทํ เยภุยฺยวเสน วุตฺต’’นฺติ ทฏฺฐพฺพํ. สุกฺขวิปสฺสโก ปน ติวิโธ เอกพีชี, โกลํโกโล, สตฺตกฺขตฺตุปรโมติ. ตตฺถ เอโก มนุสฺสโลเก วา โหตุ ฉเทวโลเก วา, เอกปฏิสนฺธิโก หุตฺวา อรหตฺตํ ปตฺวา ปรินิพฺพายติ, อยํ เอกพีชี นาม เอโก [Pg.101] มนุสฺสโลเก เอกา ปฏิสนฺธิ เทวโลเก เอกาติ ทฺเวปฏิสนฺธิโก วา, เอวํ ติจตุปญฺจฉปรโม หุตฺวา อรหตฺตํ ปตฺวา ปรินิพฺพายติ, อยํ โกลํโกโล นาม. เอโก มนุสฺสโลเก โสตาปนฺโน หุตฺวา เทวโลเก เอกา ปฏิสนฺธิ ตโต ปุนาคนฺตฺวา มนุสฺสโลเก เอกาติ เอวํ มนุสฺสเทวโลกมิสฺสกวเสน ตตฺถ จตฺตาริ อิธ ตีณิตฺยาทินา ตตฺถ ฉ, อิธ เอโกติ ยาว สตฺตปฏิสนฺธิโก หุตฺวา ปรินิพฺพายติ, อยํ สตฺตกฺขตฺตุปรโม นาม. เกวลํ ปน มนุสฺสโลเก เยว สตฺต เทวโลเกเยว วา สตฺตาติ เอวํ อมิสฺโส หุตฺวา ปฏิสนฺธิโก คเหตพฺโพ อปเร ปน ‘‘อิโต สตฺต, ตโต สตฺต สํสาเร วิจรนฺตี’’ติ วุตฺตตฺตา มนุสฺสโลกสตฺตปฏิสนฺธิเทวโลก สตฺตปฏิสนฺธิวเสน สตฺตกฺขตฺตุปรมํ วทนฺติ. ตํ อยุตฺตํ กสฺมา ‘‘กิญฺจาปิ เต โหนฺติ ภุสํปมตฺตา, น เต ภวํ อฏฺฐมมาทิยนฺตี’’ติ ปาฬิยา วิโรธตฺตา. อปิจ ทฺวิภวปริจฺฉินฺโน สกทาคามีปิ ทฺวิกฺขตฺตุํ มนุสฺสโลกํ อาคโต ภเวยฺย, ตสฺสปิ ตตฺถ เอกํ, อิธ เอกนฺติ วารสฺส ลพฺภิตพฺพโต น ปเนวํ ทฏฺฐพฺพํ. สกึ อิมํ มนุสฺสโลกํ อาคจฺฉตีติ สกทาคามี อิธ ปตฺวา อิธ ปรินิพฺพายี, ตตฺถ ปตฺวา ตตฺถ ปรินิพฺพายี, ตตฺถ ปตฺวา อิธ ปรินิพฺพายี, อิธ ปตฺวา ตตฺถ ปรินิพฺพายีติ ปญฺจสุ สกทาคามีสุ ปญฺจมโก อิธ อธิปฺเปโต. ยทิ เอวํ อิธ ปตฺวา อิธ ปรินิพฺพายีติ อาทโย จตฺตาโร กถํ สกทาคามีนามาติ. เต สกึ ปุน อาคจฺฉตีติ วจนตฺเถน สกทาคามี นาม. กามตณฺหาย สพฺพโส ปหีนตฺตา อิมํ กามธาตุํ อนาคจฺฉตีติ อนาคามี, นิจฺจํ พฺรหฺมโลเกเยว ปฏิสนฺธิ วเสน อาคจฺฉตีติ อธิปฺปาโย. ฌานิกสฺส เอวํ โหตุ, สุกฺขวิปสฺสกสฺส กถนฺติ โสปิ ฌานิโกว หุตฺวา คจฺฉติ ตสฺส หิ มคฺคนฺตเร สีหพฺยคฺฆาทีหิ หตสฺสาปิ ลกฺขณตฺตยํ อาโรเปตฺวา ฌานิโก หุตฺวาว มรณํ โหติ อยํ ปน รูปารูปภเวน เอกกฺขตฺตุปรโม นาม. สตฺตกฺขตฺตุปรมาทโย อริยา รูปารูปโลเกสุ อเนกกฺขตฺตุปฏิสนฺธิกาปิ พฺรหฺมโลกสามญฺเญน เอกปฏิสนฺธิกา นาม โหนฺติ. อรหา ปน ปาปกรเณ รหาภาวา ทกฺขิณํ อรหตฺตา ปุน ภวา ภินิพฺพตฺติยารหาภาวาตฺยาทินา วจนตฺเถน อรหา นาม. โสปิ ติวิโธ ฌานิก สุกฺขวิปสฺสก สมสีสีวเสน. ตตฺถ ฌานิโก มคฺเคเนว อาคโต[Pg.102], โส ปฏิสมฺภิทาปฺปตฺโต นาม. อปโรปิ ปุถุชฺชนเสกฺขสนฺตาเน ฌานิโก หุตฺวา ฌานํ ปาทกํ กตฺวา มคฺคํ อุปฺปาเทติ, โสปิ ฌานิโกว. สุกฺขวิปสฺสโก ปน กิเลสกฺขยมตฺตเมว มคฺเคน สห อนาคตฌานํ นาม นตฺถิ, ตํ ปจฺฉา ปริหายตีติปิ วทนฺติ. สมสีสี ปน ติวิโธ โหติ อิริยาปถสมสีสี, โรคสมสีสี, ชีวิตสมสีสีติ. ตตฺถ โย ฐานาทีสุ อิริยาปเถสุ เยเนว อิริยปเถน สมนฺนาคโต หุตฺวา วิปสฺสนํ อารภติ, เตเนว อิริยาปเถน อรหตฺตํ ปตฺวา ปรินิพฺพายติ อยํ อิริยาปถสมสีสี นาม. โย ปน เอกํ โรคํ ปตฺวา อนฺโตโรเค เอว วิปสฺสนํ ปฏฺฐเปตฺวา อรหตฺตํ ปตฺวา เตเนว โรเคน ปรินิพฺพายติ อยํ โรคสมสีสิ นาม. โย ปน เตรสสุ สีเสสุ กิเลสสีสํ อวิชฺชํ อรหตฺตมคฺโค ปริยาทิยติ, ปวตฺติสีสํ ชีวิตินฺทฺริยํ จุติจิตฺตํ ปริยาทิยติ, อยํ ชีวิตสมสีสีนาม. ตตฺถ เตรส สีสานิ กตมานิ เตรส สีสานิ. ปลิโพธสีสํ, ตณฺหาพนฺธนสีสํ, มานปรามาสสีสํ, ทิฏฺฐิวิกฺเขปสีสํ, อุทฺธจฺจกิเลสสีสํ, อวิชฺชาอธิโมกฺขสีสํ, สทฺธาปคฺคหสีสํ, วีริยอุปฏฺฐานสีสํ, สติอวิกฺเขปสีสํ, สมาธิทสฺสนสีสํ, ปญฺญาปวตฺติสีสํ, ชีวิตินฺทฺริยโคจรสีสํ, วิโมกฺขสงฺขารสีสนฺติ. เอตฺถ จ อวิชฺชา ปริยาทายกํ มคฺคจิตฺตํ ชีวิตินฺทฺริยํ ปริยาทาตุํ สกฺโกติ, ชีวิตปริยาทายกํ จุติจิตฺตํ อวิชฺชํ ปริยาทาตุํ น สกฺโกติ, อวิชฺชา ปริยาทายกํ จิตฺตํ อญฺญํ, ชีวิตินฺทฺริยปริยาทายกํ จิตฺตํ อญฺญํ. กถํ ปนิทํ สีสํ สมํ โหตีติ. วารสมตาย, ยสฺมิญฺหิ วาเร มคฺควุฏฺฐานํ โหติ, โสตาปตฺติมคฺเค มคฺคผลนิพฺพานปหีนเสสกิเลสปจฺจเวกฺขณาวเสน ปญฺจ ปจฺจเวกฺขณานิ, ตถา สกทามิมคฺเค ปญฺจ, อนาคามิมคฺเค ปญฺจ, อรหตฺตมคฺเค เสสกิเลสาภาวา จตฺตารีติ เอกูนวีสติเม ปจฺจเวกฺขณญาเณ ปติฏฺฐาย ภวงฺคํ โอตริตฺวา ปรินิพฺพายโต อิมาย วารสมตาย อิทํ อุภยสีส ปริยาทานมฺปิ สมํ โหติ นาม. อรหตฺตมคฺเค จ ปวตฺติสีสํ ชีวิตินฺทฺริยํ ปวตฺติโต วุฏฺฐหนฺโต มคฺโค จุติโต อุทฺธํ อปฺปวตฺติกรณวเสน ยทิปิ ปริยาทิยติ. ยาว ปน จุติ, ตาว ปวตฺติสภาวโต ปวตฺติสีสํ ชีวิตินฺทฺริยํ จุติจิตฺตํ ปริยาทิยติ นาม. กิเลสปริยาทาเนน มคฺคจิตฺเตน อตฺตโน อนนฺตรํ วิย นิปฺผาเทตพฺพา ปจฺจเวกฺขณวาราว [Pg.103] ปริปุณฺณา. ปริปุณฺณวเสน ปหีนกิเลเส ปจฺจเวกฺขณโต กิเลสปริยาทานสฺเสว วาราติ วตฺตพฺพตํ อรหนฺติ, เตเนว กิเลสสีสํ อวิชฺชาปริยาทานญฺจ ปวตฺติสีสํ ชีวิตินฺทฺริยปริยาทานญฺจ สมํ กตฺวา อิมาย วารสมตาย กิเลสปริยาทานํ ชีวิตปริยาทานานํ อปุพฺพจริมตา เวทิตพฺพาติ วุตฺตํ. สํยุตฺตฐกถายํ ปน ยสฺส ปุคฺคลสฺส อปุพฺพํ อจริมํ อาสวปริยาทานญฺจ โหติ ชีวิตปริยาทานญฺจ, อยํติ ปุคฺคโล สมสีสี. เอตฺถ จ ปวตฺติสีสํ กิเลสสีสนฺติ ทฺเว สีสานิ. ตตฺถ ปวตฺติสีสํ นาม ชีวิตินฺทฺริยํ. กิเลสสีสํ นาม อวิชฺชา. เตสุ ชีวิตินฺทฺริยํ จุติจิตฺตํ เขเปติ. อวิชฺชํ มคฺคจิตฺตํ. ทฺวินฺนํ จิตฺตานํ เอกโต อุปฺปาโท นตฺถิ. มคฺคานนฺตรํ ปน ผลํ, ผลานนฺตรํ ภวงฺคํ, ภวงฺคโต วุฏฺฐาย ปจฺจเวกฺขณํ ปริปุณฺณํ โหติ, ตํ อปริปุณฺณํ วาติ. ติขิเณน อสินา สีเส ฉินฺทนฺเตปิ หิ เอโก วา ทฺเว วา ปจฺจเวกฺขณวารา อวสฺสํ อุปฺปชฺชนฺติเยว, จิตฺตานํ ปน ลหุปริวตฺติตาย อาสวกฺขโย จ ชีวิตปริยาทานญฺจ เอกกฺขเณ วิย สญฺชายตี’ติ วุตฺตํ. ตฏฺฏีกายญฺจ ‘‘ทฺวินฺนํ จิตฺตานนฺติ จุติจิตฺตมคฺคจิตฺตานํ. ตนฺติ ปจฺจยเวกลฺลํ. ปริปุณฺณํ ชวนจิตฺตานํ สตฺตกฺขตฺตุํ ปวตฺติยา. อปริปุณฺณํ ปญฺจกฺขตฺตุํ ปวตฺติยา. กิญฺจาปิ เอโก วา ทฺเว วา ติ วุตฺตํ, ตํ ปน วจน สิลิฏฺฐวเสน วุตฺตํ. ยาว เอกํ วา ทฺเว วา ตทารมฺมณจิตฺตานีติ เหฏฺฐิมนฺเตน ทฺเว ปวตฺตนฺตีติ วทนฺตี’’ติ วุตฺตํ. เอตฺถ จ ‘‘ปริปุณฺณํ ชวนจิตฺตานํ สตฺตกฺขตฺตุํ ปวตฺติยา, อปริปุณฺณํ ปญฺฉกฺขตฺตุํ ปวตฺติยา’’ติ อิมินา อฏฺฐกถาฏีกาวจเนน สมสีสีนํ ปจฺจเวกฺขณาวเสน มรณาสนฺนวีถิยํ ปริปุณฺณวเสน สตฺตกฺขตฺตุํ, อปริปุณฺณวเสน ปญฺจกฺขตฺตุํ กฺริยชวนานิ ชวนฺตีติ สนฺนิฏฺฐานเมตฺถาว คนฺตพฺพํ. ‘‘อสมฺมูฬฺโห กาลํ กโรตี’’ติ วุตฺตตฺตา จ วิญฺญายติ สตฺตกฺขตฺตุํ ปริปุณฺณวเสน มรณาสนฺนกาเล ชวนปวตฺติ. เอวญฺจ สติ ‘‘มนฺทปฺปวตฺติยํ ปน มรณกาลาทีสุ ปญฺจวารเมวา’’ติ เอตฺถ ‘‘มนฺทปฺปวตฺติย’’นฺติ วิเสสนํ สาตฺถกํ สิยา. ‘‘ปญฺจวารเมวา’’ติ เอตฺถ เอวกาเรน มนฺทปฺปวตฺติกาเล ฉสตฺตกฺขตฺตุํ นิวตฺเตติ. อสมฺมูฬฺหกาเล ปน ฉสตฺตกฺขตฺตุมฺปิ อนุชานาติ. กามาวจรชวนานญฺจ อนิยตปริมาณา พลวกาเลปิ ปริสมฺปุณฺณภาวา ตถา หิ ‘‘กามาวจรชวนานิพลวกาเล สตฺตกฺขตฺตุํ ฉกฺขตฺตุํ วา, มนฺทปฺปวตฺติยํ ปน มรณกาลาทีสุ ปญฺจวารเมว. ภควโต ยมกปาฏิหาริยกาลาทีสุ ลหุกปฺปวตฺติยํ จตฺตาริ ปญฺจวา [Pg.104] ปจฺจเวกฺขณชวนจิตฺตานิ ภวนฺตี’’ติ อนิยมิตปฺปมาณวเสน อุปฺปตฺติภาโว อาคโต อิมสฺมึ สมสีสินิทฺเทสวาเรปิ มรณาสนฺนวีถิจิตฺตสฺส วิสุํ อลพฺภนโต ปจฺจเวกฺขณนฺเตเยว ภวงฺคจิตฺเตน ปรินิพฺพานโต ปริปุณฺณวเสน สตฺต ชวนจิตฺตานิ ปาฏิกงฺขิตพฺพานีติ อมฺหากํ ขนฺติ วีมํสิตฺวา คเหตพฺโพ อิโต ยุตฺตตโร วา ปกาโร ลพฺภมาโน คเวสิตพฺโพ. เอวํ ปรมตฺถสงฺฆวเสน จตฺตาริ ปุริสยุคานิ, อฏฺฐ ปุริสปุคฺคลา, จตฺตาลีสมฺปิปุคฺคลา อฏฺฐสตมฺปิ ปุริสปุคฺคลาติ สพฺพํ สโมธาเนตฺวา อิมสฺมึ โลเก สงฺโฆปิ ทุลฺลโภติ เวทิตพฺโพ ตถา หิ อริยปุคฺคลา อติทุลฺลภาว สาสนสฺส วิชฺชมานกาเลปิ อิทานิ โสตาปนฺนสฺสาปิ อวิชฺชมานโต อยํ ปรมตฺถสงฺฆวิจารณา. สมฺมุติสงฺโฆ ปน ญตฺติจตุตฺเถน อุปสมฺปนฺโน ปุถุชฺชนสงฺโฆว, โสปิ ทุลฺลโภเยว. กสฺมา พุทฺธุปฺปาทกาเลเยว ลพฺภนโต ตถา หิ อนุปฺปนฺเน พุทฺเธ ปจฺเจกพุทฺธานํ สตสหสฺสาทิคณเน อุปฺปชฺชมาเนปิ เตสํ สนฺติเก อุปสมฺปทาภาวสฺส อลพฺภมานโต ปจฺเจกพุทฺธานญฺหิ สนฺติเก ปพฺพชิตานํ กุลปุตฺตานํ สรณคมนกมฺมฏฺฐานสฺสาปิ ทาตุํ อสกฺกุเณยฺยตฺตา. ปจฺเจกพุทฺธา จ นาม มูคสฺส สุปินทสฺสนํ วิย อตฺตนา ปฏิลทฺธสจฺจธมฺเม ปเรสํ อาจิกฺขิตุํ น สกฺโกนฺติ, ตสฺมา เต ปพฺพาเชตฺวา กมฺมฏฺฐาเน นิโยเชตุํ อสมตฺถา ‘‘เอวํ เต นิวาเสตพฺพํ, เอวํ เต ปารุปิตพฺพ’’นฺติ อาทินานเยน อภิสมาจาริกเมว สิกฺขาเปสุํ ตสฺมา พุทฺธุปฺปาทกาเลเยว สมฺมุติสงฺโฆ ลพฺภติ. อปิจ น เต ทุลฺลภาเยว โหนฺติ, อถ โข ตสฺมึ อุทฺทิสฺส อปฺปมตฺตกสฺสาปิ กตาการสฺส อสงฺขฺเยยฺยผลาปิ โหนฺติ วุตฺตญฺเหตํ ภควตา ‘‘ภวิสฺสนฺติ โข ปนานนฺท อนาคตมทฺธานํ โคตฺรภุโน กาสาวกณฺฐา ทุสฺสีลา ปาปธมฺมา เตสุ ทุสฺสีเลสุ สงฺฆํ อุทฺทิสฺส ทานํ ทสฺสนฺติ, ตทา ปาหํ อานนฺท สงฺฆคตํ ทกฺขิณํ อสงฺขฺเยยฺยํ อปฺปเมยฺยํ วทามิ น ตฺเววาหํ อานนฺท เกนจิ ปริยาเยน สงฺฆคตา ทกฺขิณา ปาฏิปุคฺคลิกํ ทกฺขิณํ มหปฺผลนฺติ วทามี’’ติ. ตถา หิ อุปริปณฺณาสเก ทกฺขิณวิภงฺควณฺณนายํ ‘‘กาสาวกณฺฐานํ สงฺเฆ ทินฺเน ทกฺขิณาปิ คุณาสงฺขฺยาย อสงฺขฺเยยฺยา’’ติ วุตฺตํ. สงฺฆคตทกฺขิณา หิ สงฺเฆ จิตฺตีการํ กาตุํ สกฺโกนฺตสฺส โหติ. สงฺเฆ ปน จิตฺตีกาโร ทุกฺกโร โย หิ ‘‘สงฺฆคตํ ทกฺขิณํ ทสฺสามี’’ติ เทยฺยธมฺมํ ปฏิยาเทตฺวา [Pg.105] วิหารํ คนฺตฺวา ภนฺเต สงฺฆํ อุทฺทิสฺส เอกํ เถรํ เทถา’ติ วทติ, อถ สงฺฆโต สามเณรํ ลภิตฺวา ‘‘สามเณโร เม ลทฺโธ’’ติ อญฺญถตฺตํ อาปชฺชติ, ตสฺส ทกฺขิณา สงฺฆคตา น โหติ. มหาเถรํ ลภิตฺวา ปิ ‘‘มหาเถโร เม ลทฺโธ’’ติ โสมนสฺสํ อุปฺปาเทนฺตสฺสาปิ น โหติเยว. ตสฺส ทกฺขิณา สงฺฆคตา น โหติ. โย ปน สามเณรํ อุปสมฺปนฺนํ วา ทหรํ วา เถรํ วา พาลํ วา ปณฺฑิตํ วา ยํกิญฺจิ สงฺฆโต ลภิตฺวา นิพฺเพมติโก หุตฺวา ‘‘สงฺฆสฺส ทมฺมี’’ติ สงฺเฆ จิตฺตีการํ กาตุํ สกฺโกติ, ตสฺส ทกฺขิณา สงฺฆคตา นาม โหติ. ปรสมุทฺทวาสิโน กิร เอวํ กโรนฺติ ตตฺถ หิ เอโก วิหารสฺสามิกุฏุมฺพิโก ‘‘สงฺฆคตํ ทกฺขิณํ ทสฺสามี’’ติ สงฺฆโต อุทฺทิสิตฺวา ‘‘เอกํ ภิกฺขุํ เทถา’’ติ ยาจิตฺวา โส เอกํ ทุสฺสีลภิกฺขุํ ลภิตฺวา นิสีทนฏฺฐานํ โอปุญฺชาเปตฺวา อาสนํ ปญฺญเปตฺวา อุปริ วิตานํ พนฺธิตฺวา คนฺธธูมปุปฺเผหิ ปูเชตฺวา ปาเท โธวิตฺวา มกฺเขตฺวา พุทฺธสฺส นิปจฺจการํ กโรนฺโต วิย สงฺเฆ จิตฺตีกาเรน เทยฺยธมฺมํ อทาสิ โส ภิกฺขุ ปจฺฉาภตฺตํ วิหารํ ชคฺคนตฺถาย ‘‘กุทาลกํ เทถา’’ติ ฆรทฺวารํ อาคโต อุปาสโก นิสินฺโนว กุทาลํ ปาเทน ขิปิตฺวา ‘‘คณฺหา’’ติ อทาสิ ตเมนํ มนุสฺสา อาหํสุ ‘‘ตุมฺเหหิ ปาโตว เอตสฺส กตสกฺกาโร วตฺตุํ น สกฺกา, อิทานิ อปจยมตฺตกมฺปิ นตฺถิ, กึ นาเมต’’นฺติ. อุปาสโก ‘‘สงฺฆสฺส โส อยฺโย จิตฺตีกาโร, น เอตสฺสา’’ติ อาห. กาสาวกณฺฐสงฺฆทินฺนทกฺขิณํ ปน โก โสเธติ, สาริปุตฺตโมคฺคลานาทโย อสีติมหาเถรา โสเธนฺติ อปิ จ เถรา จิรปรินิพฺพุตา, เถเร อาทึ กตฺวา ยาวชฺชตนา ธรมานขีณาสวา โสเธนฺติเยว, ตถา หิ ทายกโต ปฏิคฺคาหโตปิ มหปฺผลํ โหติ ทานํ. ทายกโต เวสฺสนฺตรชาตกํ กเถตพฺพํ เวสฺสนฺตโร หิ ทุสฺสีลสฺส ชูชกาพฺราหฺมณสฺส นยนสทิเส ทฺเว ชาลีกณฺหาชิเน ปุตฺเต ทตฺวา ปถวึ กมฺเปสิ. สพฺพญฺญุตญฺญาณํ อารพฺภ ปวตฺตเจตนาย มหนฺตภาเวน ปถวึ กมฺเปสิ. เอวํ ทายกโตปิ มหปฺผลํ โหติ. ปฏิคฺคาหกโต ปน สาริปุตฺตตฺเถรสฺส ทินฺนโจรฆาตกวตฺถุ กเถตพฺพํ โจรฆาตโก นาม หิ สาวตฺถิยํ เอโก ชนปทปุริโส ปญฺจวีสติ วสฺสานิ โจรฆาตกกมฺมํ กตฺวา มหลฺลกกาเลปิ ตึส วสฺสานิ นาสิกวาเตเนว กณฺณนาสาทีนิ ฉินฺทิตฺวา โจรฆาตกกมฺมํ [Pg.106] กโรนฺตสฺเสว ปญฺจปญฺญาส วสฺสานิ วีติวตฺตานิ. โส มรณ มญฺเจ นิปนฺโนว อตฺตโน กมฺมพเลน มหานิรเย นิพฺพตฺโต วิย มหาสทฺทํ กตฺวา ทุกฺขิโต โหติ, ตสฺส สทฺเทน ภีตา มนุสฺสา อุภโต ปสฺเส เคหํ ฉฑฺเฑตฺวา ปลายึสุ. ตทา สาริปุตฺตตฺเถโร ทิพฺพจกฺขุ นา โลกํ โวโลเกนฺโต ตํ ทิสฺวา ตสฺส อนุกมฺปํ ปฏิจฺจ ตสฺส เคหทฺวาเร อฏฺฐาสิ. โส กุชฺฌิตฺวา ติกฺขตฺตุํ นาสิกวาเตน วิสฺสชฺชมาโนปิ วิสฺสชฺชิตุํ อสกฺโกนฺโต อติวิโรจมานํ เถรํ ทิสฺวา อติวิย ปสีทิตฺวา อตฺตโน อตฺถาย สมฺปาทิตํ ปายาสํ อทาสิ. เถโรปิ มงฺคลํ วฑฺเฒตฺวา ปกฺกมิ. โจรฆาตโก เถรสฺส ทินฺนทานํ อนุสฺสริตฺวา สคฺเค นิพฺพตฺติ, เอวํ ปฏิคฺคาหกโตปิ มหปฺผลํ โหติ. อุภยโตปิ มหปฺผลํ, อนาถปิณฺฑิกวิสาขาทโย พุทฺธปฺปมุขสฺส ทินฺนทานํ เวทิตพฺพํ. पादक ध्यान, सम्मसित ध्यान और पुग्गलज्झासय (व्यक्तिगत रुचि) के आधार पर, प्रथम ध्यान आदि के वितर्क आदि अंगों के प्रादुर्भाव के कारण, चारों मार्गस्थ पुद्गल प्रथम ध्यान आदि का व्यवहार प्राप्त करते हुए प्रत्येक पाँच-पाँच प्रकार से विभाजित होते हैं, इसलिए बीस मार्गस्थ होते हैं। वहाँ प्रथम ध्यान आदि में से जिस-जिस ध्यान को समापन्न होकर, उससे व्युत्थान कर संस्कारों का सम्मसन (विपश्यना) करने वाले की व्युत्थानगामिनी विपश्यना प्रवृत्त होती है, वह 'पादक ध्यान' कहलाता है, क्योंकि वह व्युत्थानगामिनी विपश्यना का पदस्थान (आधार) होता है। जिस-जिस ध्यान का सम्मसन करते हुए वह (विपश्यना) प्रवृत्त होती है, वह 'सम्मसित ध्यान' है। 'अहो! मेरा मार्ग प्रथम ध्यान के समान पाँच अंगों वाला हो, या द्वितीय ध्यान आदि में से किसी के समान चार अंगों वाला हो'—इस प्रकार योगावचर के भीतर उत्पन्न रुचि 'पुग्गलज्झासय' कहलाती है। वहाँ जिसने प्रथम ध्यान आदि में से किसी एक ध्यान को समापन्न होकर, उससे व्युत्थान कर प्रकीर्णक संस्कारों का सम्मसन करके मार्ग उत्पन्न किया है, उसका वह मार्ग प्रथम ध्यान आदि उस-उस पादक ध्यान के सदृश होता है। यदि विपश्यना का पादक कोई ध्यान नहीं है, केवल प्रथम ध्यान आदि में से किसी एक ध्यान का सम्मसन करके मार्ग उत्पन्न किया गया है, तो उसका वह मार्ग सम्मसित ध्यान के सदृश होता है। जब कोई एक ध्यान समापन्न होकर दूसरे का सम्मसन करके मार्ग उत्पन्न करता है, तब पुग्गलज्झासय के वश से दोनों में से किसी एक के सदृश होता है। इस प्रकार शमथयानिक पृथग्जन या आर्यों के पादक ध्यान, सम्मसित ध्यान और पुग्गलज्झासय के वश से प्रथम ध्यान आदि किसी एक ध्यान के सदृश मार्गांगों के प्रवृत्त होने से, पुद्गल भेद के वश से बीस मार्गस्थ पुद्गल होते हैं, वैसे ही बीस फलस्थ भी होते हैं, इस प्रकार चालीस आर्य पुद्गल होते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि पुद्गल की वैसी रुचि नहीं है, तो अनुलोम वश नीचे-नीचे के ध्यान से व्युत्थान कर ऊपर-ऊपर के ध्यान धर्मों का सम्मसन करके उत्पन्न मार्ग पादक ध्यान की अपेक्षा न कर सम्मसित ध्यान के सदृश होता है। प्रतिलोम वश ऊपर-ऊपर के ध्यान से व्युत्थान कर नीचे-नीचे के ध्यान धर्मों का सम्मसन करके उत्पन्न मार्ग सम्मसित ध्यान की अपेक्षा न कर पादक ध्यान के सदृश होता है, क्योंकि नीचे के ध्यान की अपेक्षा ऊपर का ध्यान अधिक बलवान होता है। एक सौ आठ पुरुष पुद्गलों में—वहाँ एकबीजी, कोलंकुल और सप्तक्खत्तुपरम ये तीन स्रोतापन्न हैं। काम, रूप और अरूप भवों में फल प्राप्त करने वाले तीन सकदागामी हैं; वे सभी दुःख प्रतिपदा-दन्धाभिज्ञा, दुःख प्रतिपदा-क्षिपाभिज्ञा, सुख प्रतिपदा-दन्धाभिज्ञा और सुख प्रतिपदा-क्षिपाभिज्ञा—इन चार प्रतिपदाओं के वश से चौबीस होते हैं। अन्तरापरिनिब्बायी, उपहच्चपरिनिब्बायी, ससंखारपरिनिब्बायी, असंखारपरिनिब्बायी और उद्धंसोतो अकनिठ्ठगामी—ये पाँच अनागामी अविहा लोकों में होते हैं, वैसे ही अतप्पा, सुदस्सा और सुदस्सी लोकों में भी पाँच-पाँच होते हैं। अकनिठ्ठ लोक में उद्धंसोतो को छोड़कर अन्तरापरिनिब्बायी, उपहच्चपरिनिब्बायी, ससंखारपरिनिब्बायी और असंखारपरिनिब्बायी—ये चार होते हैं, इस प्रकार चौबीस अनागामी होते हैं। शुद्धविपश्यक और शमथयानिक—ये दो अर्हत् हैं। चार मार्गस्थ हैं—इस प्रकार ये चौवन होते हैं। वे सभी श्रद्धाधुर और प्रज्ञाधुर के वश से दोगुने होकर एक सौ आठ आर्य पुद्गल होते हैं। वे सभी 'एक सौ आठ' विस्तार से निर्दिष्ट आर्य पुद्गल संक्षेप में युगल के वश से 'स्रोतापत्ति मार्गस्थ और फलस्थ'—इस प्रकार एक युगल आदि के क्रम से चार ही होते हैं। इसीलिए रतनपरित्त में कहा गया है—'ये पुग्गला अट्ठसतं पसत्था, चत्तारि एतानि युगानि होन्ति'। यह प्रभेद मार्गस्थ और फलस्थों में मिश्रित रूप से मिलता है, किन्तु ध्यानिक और विपश्यक का प्रभेद केवल फलस्थों में ही मिलता है, मार्ग के एक चित्तक्षण मात्र होने के कारण मार्गस्थों में नहीं मिलता। वहाँ स्रोतापत्ति फलस्थ ध्यानिक और शुद्धविपश्यक के वश से दो प्रकार का होता है। उनमें से ध्यानिक पुद्गल उसी भव में अर्हत् पद प्राप्त कर परिनिर्वाण प्राप्त करता है। यदि प्राप्त नहीं करता, तो ब्रह्मलोक गया हुआ होता है, वह 'ध्यानिक' कहलाता है। मूलटीका में तो कहा गया है कि निकान्ति (तृष्णा) होने पर पृथग्जन आदि यथाप्राप्त ध्यान की भूमि स्वरूप शुद्धावास को छोड़कर जहाँ कहीं भी उत्पन्न होते हैं, वैसे ही कामभव में भी कामावचर कर्म के बल से—'भिक्षुओं! शीलवान की चेतना की प्रणिधि शुद्ध होने के कारण सिद्ध होती है'—ऐसा कहा गया है। अनागामी तो कामराग के सर्वथा प्रहीण होने के कारण कामभवों में निकान्ति उत्पन्न नहीं करते, इसलिए कामलोक को छोड़कर यथाप्राप्त भूमि में जहाँ कहीं भी उत्पन्न होते हैं—ऐसा कहा गया है। क्योंकि अनागामी में ही कामभव की निकान्ति प्रहीण होती है, अतः स्रोतापन्न और सकदागामी की निकान्ति होने पर कामभव में कामावचर कर्म के बल से उत्पत्ति होना बाधित नहीं है, ऐसा समझना चाहिए। इसलिए 'अप्राप्त होने पर ब्रह्मलोक गया हुआ होता है, वह ध्यानिक है'—यह बाहुल्य के वश से कहा गया है, ऐसा देखना चाहिए। शुद्धविपश्यक तीन प्रकार का होता है—एकबीजी, कोलंकुल और सप्तक्खत्तुपरम। वहाँ जो एक बार मनुष्य लोक में या छह देवलोकों में से किसी एक में प्रतिसन्धि लेकर अर्हत् पद प्राप्त कर परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'एकबीजी' कहलाता है। जो एक बार मनुष्य लोक में और एक बार देवलोक में—इस प्रकार दो प्रतिसन्धि वाला, अथवा इसी प्रकार तीन, चार, पाँच या छह बार तक जन्म लेकर अर्हत् पद प्राप्त कर परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'कोलंकुल' कहलाता है। जो एक बार मनुष्य लोक में स्रोतापन्न होकर देवलोक में एक प्रतिसन्धि लेता है, फिर वहाँ से पुनः मनुष्य लोक में आता है—इस प्रकार मनुष्य और देवलोक के मिश्रण से वहाँ चार यहाँ तीन आदि के क्रम से, अथवा वहाँ छह यहाँ एक—इस प्रकार सात प्रतिसन्धि तक लेकर परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'सप्तक्खत्तुपरम' कहलाता है। केवल मनुष्य लोक में ही सात बार या केवल देवलोक में ही सात बार—इस प्रकार अमिश्रित रूप से प्रतिसन्धि लेने वाला समझना चाहिए। अन्य आचार्य कहते हैं कि 'यहाँ से सात, वहाँ से सात संसार में विचरते हैं'—ऐसा कहे जाने के कारण मनुष्य लोक की सात प्रतिसन्धि और देवलोक की सात प्रतिसन्धि के वश से सप्तक्खत्तुपरम कहते हैं। वह अयुक्त है, क्योंकि 'किञ्चापि ते होन्ति भुसप्पमत्ता, न ते भवं अट्ठममादियन्ति'—इस पालि वचन से विरोध होता है। इसके अतिरिक्त, दो भवों की सीमा वाला सकदागामी भी दो बार मनुष्य लोक में आया हुआ हो सकता है, उसके लिए भी वहाँ एक और यहाँ एक का अवसर प्राप्त होता है, किन्तु इसे इस प्रकार नहीं देखना चाहिए। 'जो एक बार इस मनुष्य लोक में आता है' वह सकदागामी है—यहाँ प्राप्त कर यहीं परिनिर्वाण प्राप्त करने वाला, वहाँ प्राप्त कर वहीं परिनिर्वाण प्राप्त करने वाला, वहाँ प्राप्त कर यहाँ परिनिर्वाण प्राप्त करने वाला, यहाँ प्राप्त कर वहाँ परिनिर्वाण प्राप्त करने वाला—इन पाँच सकदागामियों में से पाँचवाँ यहाँ अभिप्रेत है। यदि ऐसा है, तो 'यहाँ प्राप्त कर यहीं परिनिर्वाण प्राप्त करने वाला' आदि चार कैसे सकदागामी कहलाते हैं? वे 'एक बार पुनः आता है' इस वचन के अर्थ से सकदागामी कहलाते हैं। कामतृष्णा के सर्वथा प्रहीण होने के कारण इस कामधातु में नहीं आता, इसलिए 'अनागामी' है; वह सदा ब्रह्मलोक में ही प्रतिसन्धि के वश से आता है, यह अभिप्राय है। ध्यानिक का ऐसा हो, शुद्धविपश्यक का कैसे? वह भी ध्यानिक होकर ही जाता है, क्योंकि मार्ग के अन्तराल में सिंह-व्याघ्र आदि द्वारा मारे जाने पर भी तीन लक्षणों (अनित्य, दुःख, अनात्मा) का आरोपण करके ध्यानिक होकर ही मरण होता है; यह रूप-अरूप भव के कारण 'एकक्खत्तुपरम' कहलाता है। सप्तक्खत्तुपरम आदि आर्य रूप-अरूप लोकों में अनेक बार प्रतिसन्धि लेने पर भी ब्रह्मलोक की सामान्यता के कारण 'एक प्रतिसन्धि' वाले कहलाते हैं। पाप करने से दूर (रह) होने के कारण, दक्षिणा के योग्य होने के कारण, अर्हत् होने के कारण और पुनः भव में उत्पत्ति के अयोग्य होने के कारण 'अर्हत्' कहलाते हैं। वह भी ध्यानिक, शुद्धविपश्यक और समसीसी के वश से तीन प्रकार का होता है। वहाँ ध्यानिक मार्ग से ही आया हुआ होता है, वह 'प्रतिसम्भिदाप्राप्त' कहलाता है। दूसरा पुद्गल पृथग्जन या शैक्ष अवस्था में ध्यानिक होकर, ध्यान को पादक बनाकर मार्ग उत्पन्न करता है, वह भी ध्यानिक ही है। शुद्धविपश्यक के लिए मार्ग के साथ क्लेशक्षय मात्र ही होता है, अनागत ध्यान जैसा कुछ नहीं होता; कुछ लोग कहते हैं कि वह बाद में परिहीण हो जाता है। समसीसी तीन प्रकार का होता है—ईर्यापथ समसीसी, रोग समसीसी और जीवित समसीसी। वहाँ जो खड़ा होने आदि ईर्यापथों में से जिस ईर्यापथ में स्थित होकर विपश्यना आरम्भ करता है, उसी ईर्यापथ में अर्हत् पद प्राप्त कर परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'ईर्यापथ समसीसी' कहलाता है। जो किसी एक रोग को प्राप्त कर, रोग की अवस्था में ही विपश्यना प्रतिष्ठित कर अर्हत् पद प्राप्त कर उसी रोग से परिनिर्वाण प्राप्त करता है, वह 'रोग समसीसी' कहलाता है। जो तेरह शीर्षों (प्रमुख धर्मों) में से क्लेश-शीर्ष अविद्या को अर्हत् मार्ग द्वारा समाप्त करता है और प्रवृत्ति-शीर्ष जीवितेन्द्रिय को च्युति-चित्त द्वारा समाप्त करता है, वह 'जीवित समसीसी' कहलाता है। वहाँ तेरह शीर्ष कौन से हैं? तेरह शीर्ष ये हैं—परिबोध शीर्ष, तृष्णा-बन्धन शीर्ष, मान-परामर्श शीर्ष, दृष्टि-विक्षेप शीर्ष, औद्धत्य-क्लेश शीर्ष, अविद्या-अधिमोक्ष शीर्ष, श्रद्धा-प्रग्रह शीर्ष, वीर्य-उपस्थान शीर्ष, स्मृति-अविक्षेप शीर्ष, समाधि-दर्शन शीर्ष, प्रज्ञा-प्रवृत्ति शीर्ष, जीवितेन्द्रिय-गोचर शीर्ष और विमोक्ष-संस्कार शीर्ष। यहाँ अविद्या को समाप्त करने वाला मार्ग-चित्त जीवितेन्द्रिय को समाप्त करने में समर्थ है, किन्तु जीवित को समाप्त करने वाला च्युति-चित्त अविद्या को समाप्त करने में समर्थ नहीं है; अविद्या को समाप्त करने वाला चित्त दूसरा है और जीवितेन्द्रिय को समाप्त करने वाला चित्त दूसरा है। तो फिर यह शीर्ष 'सम' (एक साथ) कैसे होता है? वार-समता (अवसर की समानता) से। जिस अवसर पर मार्ग से व्युत्थान होता है, स्रोतापत्ति मार्ग में मार्ग, फल, निर्वाण और प्रहीण तथा शेष क्लेशों के प्रत्यवेक्षण के वश से पाँच प्रत्यवेक्षण होते हैं, वैसे ही सकदागामी मार्ग में पाँच, अनागामी मार्ग में पाँच और अर्हत् मार्ग में शेष क्लेशों के अभाव के कारण चार—इस प्रकार उन्नीस प्रत्यवेक्षण ज्ञानों में प्रतिष्ठित होकर भवांग में उतरकर परिनिर्वाण प्राप्त करने वाले की इस वार-समता से यह दोनों शीर्षों का समाप्त होना 'सम' कहलाता है। अर्हत् मार्ग में प्रवृत्ति-शीर्ष जीवितेन्द्रिय की प्रवृत्ति से व्युत्थित होता हुआ मार्ग, च्युति के बाद पुनः अप्रवृत्ति करने के वश से यद्यपि समाप्त करता है, किन्तु जब तक च्युति नहीं होती, तब तक प्रवृत्ति स्वभाव होने के कारण प्रवृत्ति-शीर्ष जीवितेन्द्रिय को च्युति-चित्त समाप्त करता है। क्लेशों की समाप्ति करने वाले मार्ग-चित्त द्वारा अपने अनन्तर ही निष्पादित किए जाने वाले प्रत्यवेक्षण-वार ही परिपूर्ण होते हैं। परिपूर्ण होने के कारण प्रहीण क्लेशों के प्रत्यवेक्षण से क्लेश-समाप्ति के ही वार कहे जाने योग्य हैं, इसीलिए क्लेश-शीर्ष अविद्या की समाप्ति और प्रवृत्ति-शीर्ष जीवितेन्द्रिय की समाप्ति को समान करके, इस वार-समता से क्लेश-समाप्ति और जीवित-समाप्ति की अग्र-पश्चातता (आगे-पीछे न होना) जाननी चाहिए—ऐसा कहा गया है। संयुत्त-अट्ठकथा में तो कहा गया है कि जिस पुद्गल की आस्रव-समाप्ति और जीवित-समाप्ति न पहले न पीछे (एक साथ) होती है, वह पुद्गल 'समसीसी' है। यहाँ प्रवृत्ति-शीर्ष और क्लेश-शीर्ष—ये दो शीर्ष हैं। वहाँ प्रवृत्ति-शीर्ष जीवितेन्द्रिय है और क्लेश-शीर्ष अविद्या है। उनमें से जीवितेन्द्रिय को च्युति-चित्त समाप्त करता है और अविद्या को मार्ग-चित्त। दो चित्तों की एक साथ उत्पत्ति नहीं होती। मार्ग के अनन्तर फल, फल के अनन्तर भवांग और भवांग से व्युत्थान कर प्रत्यवेक्षण परिपूर्ण होता है, चाहे वह परिपूर्ण हो या अपरिपूर्ण। तीक्ष्ण तलवार से सिर काटने पर भी एक या दो प्रत्यवेक्षण वार अवश्य उत्पन्न होते ही हैं, किन्तु चित्तों के शीघ्र परिवर्तनशील होने के कारण आस्रव-क्षय और जीवित-समाप्ति एक ही क्षण में जैसे हो जाते हैं—ऐसा कहा गया है। उसकी टीका में 'दो चित्तों का' का अर्थ च्युति-चित्त और मार्ग-चित्त है। 'वह' प्रत्यय की विकलता है। जवन चित्तों की सात बार प्रवृत्ति होने से 'परिपूर्ण' और पाँच बार प्रवृत्ति होने से 'अपरिपूर्ण' होता है। यद्यपि 'एक या दो' कहा गया है, वह वचन की सुगमता के लिए कहा गया है। जब तक एक या दो तदारम्बन चित्त होते हैं, तब तक कम से कम दो प्रवृत्त होते हैं—ऐसा कहते हैं। यहाँ 'जवन चित्तों की सात बार प्रवृत्ति से परिपूर्ण और पाँच बार प्रवृत्ति से अपरिपूर्ण'—इस अट्ठकथा-टीका के वचन से समसीसियों के प्रत्यवेक्षण के वश से मरणासन्न वीथि में परिपूर्ण रूप से सात और अपरिपूर्ण रूप से पाँच क्रिया-जवन जवते हैं, ऐसा निष्कर्ष यहाँ निकालना चाहिए। 'असंमूढ़ होकर काल (मृत्यु) करता है'—ऐसा कहे जाने से भी मरणासन्न काल में सात बार परिपूर्ण जवन की प्रवृत्ति समझी जाती है। और ऐसा होने पर 'मन्द प्रवृत्ति में मरण काल आदि में पाँच बार ही'—यहाँ 'मन्द प्रवृत्ति' यह विशेषण सार्थक होगा। 'पाँच बार ही' यहाँ 'ही' शब्द मन्द प्रवृत्ति के समय छह या सात बार का निषेध करता है। असंमूढ़ काल में तो छह या सात बार भी स्वीकार करता है। कामावचर जवनों की अनियत संख्या होने से बलवान काल में भी परिपूर्णता होती है, क्योंकि 'कामावचर जवनों के बलवान काल में सात बार या छह बार, मन्द प्रवृत्ति में मरण काल आदि में पाँच बार ही, भगवान के यमक प्रातिहार्य काल आदि में लघु प्रवृत्ति में चार या पाँच प्रत्यवेक्षण जवन चित्त होते हैं'—इस प्रकार अनियत प्रमाण से उत्पत्ति की बात आई है। इस समसीसी निर्देश के अवसर पर भी मरणासन्न वीथि चित्त के अलग से न मिलने के कारण प्रत्यवेक्षण के अन्त में ही भवांग चित्त के साथ परिनिर्वाण होने से परिपूर्ण रूप से सात जवन चित्तों की अपेक्षा करनी चाहिए—यह हमारा विचार है, इसे जाँचकर ग्रहण करना चाहिए अथवा इससे अधिक युक्तियुक्त कोई अन्य प्रकार मिले तो उसे खोजना चाहिए। इस प्रकार परमार्थ संघ के वश से चार पुरुष युगल, आठ पुरुष पुद्गल, चालीस पुद्गल और एक सौ आठ पुरुष पुद्गल—इन सबको मिलाकर इस लोक में संघ भी दुर्लभ है, ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि आर्य पुद्गल अत्यन्त दुर्लभ ही हैं, शासन के विद्यमान काल में भी अब स्रोतापन्न के भी न होने के कारण यह परमार्थ संघ की विचारणा है। सम्मति संघ तो ज्ञप्ति-चतुर्थ कर्म से उपसम्पन्न पृथग्जन संघ ही है, वह भी दुर्लभ ही है। क्योंकि वह बुद्धों की उत्पत्ति के काल में ही प्राप्त होता है; बुद्ध के अनुत्पन्न होने पर प्रत्येक बुद्धों के लाखों की संख्या में उत्पन्न होने पर भी उनके पास उपसम्पदा का अभाव होता है, क्योंकि प्रत्येक बुद्धों के पास प्रव्रजित कुलपुत्रों को शरणागमन और कर्मस्थान देने की भी सामर्थ्य नहीं होती। प्रत्येक बुद्ध स्वयं के द्वारा प्राप्त सत्य धर्म को दूसरों को बताने में समर्थ नहीं होते, जैसे गूँगे का सपना; इसलिए वे प्रव्रजित कराकर कर्मस्थान में नियोजित करने में असमर्थ होते हैं, वे केवल 'ऐसे पहनना चाहिए, ऐसे ओढ़ना चाहिए' आदि के माध्यम से आभिसमाचारिक (आचरण सम्बन्धी) शिक्षा ही देते हैं, इसलिए बुद्धों की उत्पत्ति के काल में ही सम्मति संघ प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त, वे दुर्लभ ही नहीं होते, बल्कि उस (संघ) के उद्देश्य से अल्पमात्र भी किए गए सत्कार का असंख्य फल होता है। भगवान ने कहा भी है—'आनन्द! भविष्य में गोत्रभू, काषाय-कण्ठ (गले में पीला वस्त्र धारण करने वाले), दुःशील और पापधर्मी होंगे, उन दुःशीलों में संघ के उद्देश्य से जो दान देंगे, तब भी आनन्द! मैं संघगत दक्षिणा को असंख्य और अप्रमेय कहता हूँ; किन्तु आनन्द! मैं किसी भी प्रकार से संघगत दक्षिणा की तुलना में प्रातिपुद्गलिक (व्यक्तिगत) दक्षिणा को महाफलदायी नहीं कहता हूँ।' वैसे ही उपरिपण्णासक में दक्षिणाविभंग की वर्णना में कहा गया है—'काषाय-कण्ठों के संघ में दिए गए दान की दक्षिणा भी गुणों की गणना न होने के कारण असंख्य है।' संघगत दक्षिणा तो संघ में गौरव (चित्तीकार) करने में समर्थ व्यक्ति की होती है। संघ में गौरव करना कठिन है; जो 'संघगत दक्षिणा दूँगा' ऐसा सोचकर देयधर्म तैयार कर विहार जाकर कहता है—'भन्ते! संघ के उद्देश्य से एक स्थविर दीजिए', फिर संघ से श्रमणर को प्राप्त कर 'मुझे श्रमणर मिला'—ऐसा सोचकर भाव बदल लेता है, उसकी दक्षिणा संघगत नहीं होती। महास्थविर को प्राप्त कर भी 'मुझे महास्थविर मिला'—ऐसा सोचकर प्रसन्न होने वाले की भी नहीं होती। उसकी दक्षिणा संघगत नहीं होती। जो श्रमणर या उपसम्पन्न, युवा या स्थविर, मूर्ख या पंडित—जो कोई भी संघ से प्राप्त हो, उसमें भेदभाव रहित होकर 'संघ को देता हूँ'—ऐसा संघ में गौरव कर सकता है, उसकी दक्षिणा संघगत कहलाती है। समुद्र पार रहने वाले लोग ऐसा करते हैं; वहाँ विहार के स्वामी एक कुटुम्बी ने 'संघगत दक्षिणा दूँगा' ऐसा सोचकर संघ से 'एक भिक्षु दीजिए' ऐसी याचना की, उसे एक दुःशील भिक्षु मिला। उसने बैठने का स्थान साफ करवाकर, आसन बिछाकर, ऊपर वितान (चंदोवा) बाँधकर, गन्ध-धूप-पुष्पों से पूजा कर, पैर धोकर और लेपन कर बुद्ध के प्रति विनय करने के समान संघ के गौरव से देयधर्म दिया। वह भिक्षु भोजन के बाद विहार की देखभाल के लिए 'कुदाल दीजिए' कहता हुआ घर के द्वार पर आया, तो उपासक ने बैठे-बैठे ही कुदाल को पैर से खिसकाकर 'ले लो'—ऐसा कहकर दे दिया। तब लोगों ने उससे कहा—'आपने सुबह तो इनका इतना सत्कार किया कि कहा नहीं जा सकता, अब थोड़ा भी आदर नहीं है, यह क्या बात है?' उपासक ने कहा—'वह गौरव संघ के लिए था, इस आर्य के लिए नहीं।' काषाय-कण्ठ संघ को दी गई दक्षिणा को कौन शुद्ध करता है? सारिपुत्र, मोग्गलान आदि अस्सी महास्थविर शुद्ध करते हैं। यद्यपि स्थविर चिरकाल पहले परिनिर्वाण प्राप्त कर चुके हैं, तथापि स्थविरों को आदि लेकर आज तक के विद्यमान क्षीणास्रव उसे शुद्ध ही करते हैं, इसीलिए दायक और प्रतिग्राहक दोनों की ओर से दान महाफलदायी होता है। दायक की ओर से वेस्सन्तर जातक कहना चाहिए; वेस्सन्तर ने दुःशील जूजक ब्राह्मण को अपनी आँखों के समान प्रिय दो पुत्रों जाली और कन्हाजिना को देकर पृथ्वी को कम्पित कर दिया। सर्वज्ञता ज्ञान के निमित्त प्रवृत्त चेतना की महानता के कारण पृथ्वी कम्पित हुई। इस प्रकार दायक की ओर से भी महाफल होता है। प्रतिग्राहक की ओर से सारिपुत्र स्थविर को दिए गए चोरघातक की कथा कहनी चाहिए; श्रावस्ती में एक जनपद निवासी चोरघातक था, जिसने पच्चीस वर्षों तक चोरघातक का काम किया, फिर वृद्धावस्था में भी तीस वर्षों तक नाक की हवा से ही कान-नाक आदि काटकर चोरघातक का काम करते हुए पचपन वर्ष व्यतीत किए। वह मरण-शय्या पर लेटे हुए अपने कर्म के बल से महानरक में उत्पन्न होने वाले के समान महान शब्द करके दुःखी हो रहा था, उसके शब्द से डरकर लोग घर छोड़कर भाग गए। तब सारिपुत्र स्थविर ने दिव्यचक्षु से लोक को देखते हुए उसे देखा और उस पर अनुकम्पा करके उसके घर के द्वार पर खड़े हो गए। वह क्रोधित होकर तीन बार नाक की हवा छोड़ने पर भी छोड़ने में असमर्थ रहा, फिर अत्यन्त तेजस्वी स्थविर को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और अपने लिए तैयार की गई खीर उन्हें दे दी। स्थविर भी मंगल बढ़ाकर चले गए। चोरघातक स्थविर को दिए गए दान का अनुस्मरण कर स्वर्ग में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार प्रतिग्राहक की ओर से भी महाफल होता है। दोनों की ओर से महाफल के लिए अनाथपिण्डिक, विशाखा आदि द्वारा बुद्ध प्रमुख संघ को दिए गए दान को समझना चाहिए। วุตฺตญฺเหตํ ภควตา. भगवान द्वारा यह कहा गया है। ‘‘ตถาคเต จ สมฺพุทฺเธ, อถวา ตสฺส สาวเก; นตฺถิ จิตฺเต ปสนฺนมฺหิ, อปฺปกา นาม ทกฺขิณา. “तथागत सम्यक सम्बुद्ध में, अथवा उनके श्रावकों में; चित्त के प्रसन्न होने पर, दक्षिणा (दान) अल्प नहीं होती। เอวํ อจินฺติยา พุทฺธา, พุทฺธธมฺมา อจินฺติยา; อจินฺติเย ปสนฺนานํ, วิปาโก โหติ อจินฺติโย’’ติ. इस प्रकार बुद्ध अचिन्त्य हैं, बुद्ध-धर्म अचिन्त्य हैं; अचिन्त्य में प्रसन्न होने वालों का विपाक (फल) अचिन्त्य होता है।” เอวํ อุภยวเสน มหปฺผลภาโว เวทิตพฺโพ. ทายกโตปิ ปฏิคฺคาหกโตปิ นิปฺผลเมว. เสยฺยถาปิ มกฺขลิโคสาลฉสตฺถาราทีนํ อตฺตโน อุปาสกมิจฺฉาทิฏฺฐีหิ ปูชาวิเสสา วุตฺตญฺเหตํ ภควตา. इस प्रकार दोनों प्रकार से महाफलदायी होने का भाव समझना चाहिए। दायक की ओर से भी और प्रतिग्राहक की ओर से भी (मिथ्या दृष्टि होने पर) दान निष्फल ही है। जैसे मक्खलि गोसाल आदि छह शास्ताओं के अपने उपासकों की मिथ्या दृष्टियों के कारण विशेष पूजाएँ; भगवान द्वारा यह कहा गया है— ‘‘มาเส มาเส กุสคฺเคน, พาโล ภุญฺเชยฺย โภชนํ; น โส สงฺขตธมฺมานํ, กลํ นาคฺฆติ โสฬสิ’’นฺติ. “महीने-महीने (प्रति मास) कुश की नोक से मूर्ख भोजन ग्रहण करे; (फिर भी) वह संस्कृत धर्मों (को जानने वालों) के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं है।” เตเนวาห ภควา จตฺตาริมานิ อานนฺท ทกฺขิณวิสุทฺธิโย’’ติ. อิมานิ ตีณิ พุทฺธธมฺมสงฺฆรตนานิ สาธูนํ รติชนนตฺเถน รตนานิ นาม. इसीलिए भगवान ने कहा— 'आनन्द! ये चार दक्षिणा-विशुद्धियाँ हैं।' ये तीन बुद्ध, धर्म और संघ रत्न, सज्जनों में रति (प्रसन्नता) उत्पन्न करने के कारण 'रत्न' कहलाते हैं। วุตฺตญฺเหตํ. यह कहा गया है— ‘‘จิตฺตีกตํ มหคฺฆญฺจ, อตุลํ ทุลฺลภทสฺสนํ; อโนมสตฺตปริโภคํ, รตนํ เตน วุจฺจตี’’ติ. “जो सम्मानित है, बहुमूल्य है, अतुलनीय है, जिसका दर्शन दुर्लभ है, और जो उत्तम सत्त्वों (प्राणियों) द्वारा परिभोग किया जाता है; उसे 'रत्न' कहा जाता है।” รตนญฺจ นาม ทุวิธํ สวิญฺญาณกาวิญฺญาณกวเสน. ตตฺถ อวิญฺญาณกํ จกฺกรตนํ, มณิรตนํ ยํ วา ปนญฺญมฺปิ อนินฺทฺริยพทฺธสุวณฺณรชตาทิ. สวิญฺญาณกํ หตฺถิอสฺสรตนาทิปริณายกรตนปริโยสานํ, ยํ วา [Pg.107] ปนญฺญมฺปิ อินฺทฺริยพทฺธํ. เอวํ ทุวิเธ เจตฺถ สวิญฺญาณกรตนํ อคฺคมกฺขายติ, กสฺมา ยสฺมา อวิญฺญาณกํ สุวณฺณรชตมณิมุตฺตาทิรตนํ สวิญฺญาณกานํ หตฺติรตนาทีนํ อลงฺการตฺถาย อุปนียติ. สวิญฺญาณกรตนมฺปิ ทุวิธํ ติรจฺฉานคตรตนํ มนุสฺสรตนญฺจ. ตตฺถ มนุสฺสรตนํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา ยสฺมา ติรจฺฉานคตรตนํ มนุสฺสรตนสฺส โอปวยฺหํ โหติ. มนุสฺสรตนมฺปิ ทุวิธํ อิตฺถิรตนํ ปุริสรตนญฺจ. ตตฺถ ปุริสรตนํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา ยสฺมา อิตฺถิรตนํ ปุริสรตนสฺส ปริจาริกตฺตํ อาปชฺชติ. ปุริสรตนมฺปิ ทุวิธํ อคาริกรตนํ อนคาริกรตนญฺจ ตตฺถ อนคาริกรตนํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา ยสฺมา อคาริกรตเนสุ อคฺโค จกฺกวตฺตีปิ สีลาทิคุณยุตฺตํ อนคาริกรตนํ ปญฺจปติฏฺฐิเตน วนฺทิตฺวา อุปฏฺฐหิตฺวา ปยิรุปาสิตฺวา ทิพฺพมานุสฺสิกา สมฺปตฺติโย ปาปุณิตฺวา อนฺเต นิพฺพานสมฺปตฺตึ ปาปุณาติ. อนคาริกรตนมฺปิ ทุวิธํ อริยปุถุชฺชนวเสน. อริยรตนมฺปิ ทุวิธํ เสกฺขาเสกฺขวเสน. อเสกฺขรตนมฺปิ ทุวิธํ สุกฺขวิปสฺสกสมถยานิกวเสน. สมถยานิกรตนมฺปิ ทุวิธํ สาวกปารมิปฺปตฺตมปตฺตญฺจ. ตตฺถ สาวกปารมิปฺปตฺตํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา คุณมหตฺตตาย. สาวกปารมิปฺปตฺตรตนโตปิ ปจฺเจกพุทฺธรตนํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา คุณมหตฺตตาย. สาริปุตฺตโมคฺคลานสทิสาปิ หิ อเนกสตา สาวกา ปจฺเจกพุทฺธสฺส คุณานํ สตภาคมฺปิ น อุปเนนฺติ. ปจฺเจกพุทฺธโต สมฺพุทฺธรตนํ อคฺคมกฺขายติ. กสฺมา คุณมหตฺตตาย สกลมฺปิ ชมฺพุทีปํ ปลฺลงฺเก น ปลฺลงฺกํ ฆฏฺเฏนฺโต นิสินฺนา ปจฺเจกสมฺพุทฺธา เอกสฺส คุณานํ เนว สงฺขฺยํ กลํ คณนภาคํ อุปเนนฺติ, วุตฺตญฺเหตํ ภควตา ‘‘ยาวตา ภิกฺขเว สตฺตา อปทา วา…เป… ตถาคโต เตสํ อคฺคมกฺขายตี’’ติ อาทิ. เอวํ ‘‘พุทฺโธ จ ทุลฺลโภ โลเก, สทฺธมฺมสวนมฺปิ จ, สงฺโฆ จ ทุลฺลโภ โลเก’’ติ อิเมสํ ติณฺณํ ปทานํ อตฺถุทฺธารวเสน สพฺพโส อตฺโถ วุตฺโตเยว โหติ. रत्न दो प्रकार के होते हैं: सविज्ञान (चेतन) और अविज्ञान (अचेतन)। वहाँ अविज्ञान रत्न चक्र-रत्न, मणि-रत्न अथवा अन्य जो भी इन्द्रिय-रहित सुवर्ण-रजत आदि हैं। सविज्ञान रत्न हाथी-रत्न, अश्व-रत्न आदि से लेकर परिणायक-रत्न तक, अथवा अन्य जो भी इन्द्रिय-युक्त हैं। इन दो प्रकारों में सविज्ञान रत्न श्रेष्ठ कहा जाता है, क्योंकि सुवर्ण, रजत, मणि, मुक्ता आदि अविज्ञान रत्न सविज्ञान हाथी आदि रत्नों के अलंकार के लिए लाए जाते हैं। सविज्ञान रत्न भी दो प्रकार के हैं: तिर्यक (पशु) रत्न और मनुष्य रत्न। वहाँ मनुष्य रत्न श्रेष्ठ कहा जाता है, क्योंकि तिर्यक रत्न मनुष्य रत्न का वाहन होता है। मनुष्य रत्न भी दो प्रकार के हैं: स्त्री रत्न और पुरुष रत्न। वहाँ पुरुष रत्न श्रेष्ठ कहा जाता है, क्योंकि स्त्री रत्न पुरुष रत्न की परिचारिका होती है। पुरुष रत्न भी दो प्रकार के हैं: अगारिक (गृहस्थ) रत्न और अनगारिक (संन्यासी) रत्न। वहाँ अनगारिक रत्न श्रेष्ठ कहा जाता है, क्योंकि अगारिक रत्नों में श्रेष्ठ चक्रवर्ती भी शील आदि गुणों से युक्त अनगारिक रत्न को पञ्च-प्रतिष्ठित (साष्टांग) वन्दना कर, सेवा कर और उपासना कर दिव्य एवं मानुषी सम्पत्तियों को प्राप्त करता है और अन्त में निर्वाण-सम्पत्ति को प्राप्त करता है। अनगारिक रत्न भी आर्य और पृथग्जन के भेद से दो प्रकार के हैं। आर्य रत्न भी शैक्ष और अशैक्ष के भेद से दो प्रकार के हैं। अशैक्ष रत्न भी शुद्ध-विपश्यक और शमथ-यानिक के भेद से दो प्रकार के हैं। शमथ-यानिक रत्न भी श्रावक-पारमिता प्राप्त और अप्राप्त के भेद से दो प्रकार के हैं। वहाँ श्रावक-पारमिता प्राप्त श्रेष्ठ कहा जाता है, गुणों की महानता के कारण। श्रावक-पारमिता प्राप्त रत्न से भी प्रत्येकबुद्ध रत्न श्रेष्ठ कहा जाता है, गुणों की महानता के कारण। सारिपुत्र और मोग्गलान जैसे अनेक सौ श्रावक भी प्रत्येकबुद्ध के गुणों के सौवें भाग के बराबर भी नहीं होते। प्रत्येकबुद्ध से सम्यकसम्बुद्ध रत्न श्रेष्ठ कहा जाता है, गुणों की महानता के कारण। सम्पूर्ण जम्बूद्वीप में पर्यङ्क (आसन) से आसन सटाकर बैठे हुए प्रत्येकबुद्ध भी एक (सम्बुद्ध) के गुणों की संख्या, कला या गणना के भाग के बराबर नहीं होते; जैसा कि भगवान ने कहा है— 'भिक्षुओं! जितने भी प्राणी हैं, अपद हों या... (पे)... तथागत उनमें श्रेष्ठ कहे जाते हैं।' इस प्रकार 'बुद्ध लोक में दुर्लभ हैं, सद्धर्म का श्रवण भी (दुर्लभ है), और संघ लोक में दुर्लभ है'—इन तीन पदों के अर्थ-उद्धरण के द्वारा पूर्णतः अर्थ कहा गया है। อิติ สาครพุทฺธิตฺเถรวิรจิเต สีมวิโสธเน สงฺฆวณฺณนาย इस प्रकार स्थविर सागरबुद्धि द्वारा रचित 'सीमाविशोधन' में संघ-वर्णन के अन्तर्गत— สมสีสิกณฺโฑ จตุตฺโถ ปริจฺเฉโท. समसीसि-काण्ड नामक चतुर्थ परिच्छेद (समाप्त)। ปกิณฺณกกณฺโฑ प्रकीर्णक-काण्ड อิทานิ [Pg.108] สปฺปุริสาติ ทุลฺลภาติ อิมสฺส สํวณฺณนากฺกโม สมฺปตฺโต ตถา หิ โลเก สปฺปุริสาปิ อติทุลฺลภาเยว. สปฺปุริสาติ กลฺยาณคุณสมฺปนฺนา อุตฺตมปุริสา. เต นิสฺสาย ชาติธมฺมา สตฺตา ชาติยา, มรณธมฺมา สตฺตา มรณโต มุจฺจนฺติ วุตฺตญฺเหตํ ภควตา ‘‘มมญฺหิ อานนฺท กลฺยาณมิตฺตํ อาคมฺม ชาติยา ปริมุจฺจนฺติ, ชราธมฺมา สตฺตา ชราย มุจฺจนฺตี’’ติ อาทิ วจนโต ปน สมฺมาสมฺพุทฺโธเยว สพฺพาการสมฺปนฺโน กลฺยาณมิตฺโต นาม. ตํ อลภนฺเตน สาริปุตฺตโมคฺคลานาทโย อริยปุคฺคลา วา. เตปิ อลภนฺเตน เอกนฺตชหิตํ สิวฏฺฐิกํ กลฺยาณมิตฺตํ ลภิตพฺพํ, วุตฺตญฺเหตํ โปราเณหิ. अब 'सत्पुरुष दुर्लभ हैं'—इसकी व्याख्या का क्रम प्राप्त है। क्योंकि लोक में सत्पुरुष भी अत्यन्त दुर्लभ ही हैं। 'सत्पुरुष' अर्थात् कल्याणकारी गुणों से सम्पन्न उत्तम पुरुष। उनका आश्रय लेकर जन्म-धर्मा (जन्म लेने वाले) प्राणी जन्म से, और मरण-धर्मा प्राणी मरण से मुक्त होते हैं। जैसा कि भगवान ने कहा है— 'आनन्द! मेरा कल्याणमित्र के रूप में आश्रय लेकर (प्राणी) जन्म से मुक्त होते हैं, जरा-धर्मा प्राणी जरा से मुक्त होते हैं' आदि वचनों के अनुसार सम्यकसम्बुद्ध ही सभी प्रकार से सम्पन्न 'कल्याणमित्र' हैं। उन्हें न पाने पर सारिपुत्र, मोग्गलान आदि आर्य पुद्गल (कल्याणमित्र हैं)। उन्हें भी न पाने पर एकान्त रूप से (संसार का) त्याग करने वाले कल्याणमित्र को प्राप्त करना चाहिए, जैसा कि पुरातन आचार्यों ने कहा है— ‘‘ปิโย ครุ ภาวนีโย, วตฺตา จ วจนกฺขโม; คมฺภีรญฺจ กถํ กตฺตา, โนจาฐาเน นิโยชเย’’ติ. “प्रिय, गुरु (आदरणीय), पूजनीय, वक्ता (उपदेशक), वचनों को सहने वाला, गम्भीर कथा (चर्चा) करने वाला, और अनुचित स्थान पर न लगाने वाला।” เอวมาทิคุณสมนฺนาคโต วฑฺฒิปกฺเข ฐิตปณฺฑิตปุคฺคโล โลเก ทุลฺลโภว. กตโม ปณฺฑิตปุคฺคโล พุทฺธปจฺเจกพุทฺธา อสีติ จ มหาสาวกา อญฺเญ จ ตถาคตสฺส สาวกา สุเนตฺตมหาโควินฺทวิธุรสรภงฺคมโหสธสุตโสมนิมิราชอโยฆรกุมารก อกตฺติปณฺฑิตาทโย จ ปณฺฑิตาติ เวทิตพฺพา. เต ภเย วิย รกฺขา, อนฺธกาเร วิย ปทีปา, ขุปฺปิปาสาทิทุกฺขาภิภเว วิย อนฺนปานาทิปฏิลาโภ, อตฺตโน วจนกรานํ สพฺพภยอุปทฺทวูปสคฺควิทฺธํสนสมตฺถา โหนฺติ ตถา หิ ตถาคตํ อาคมฺม อสงฺขฺเยยฺยา อปริมาณา เทวมนุสฺสา อาสวกฺขยํ ปตฺตา พฺรหฺมโลเก ปติฏฺฐิตา, เทวโลเก อุปฺปนฺนา. สาริปุตฺตตฺเถเร จิตฺตํ ปสาเทตฺวา จตูหิ จ ปจฺจเยหิ เถรํ อุปฏฺฐหิตฺวา อสีติ กุสลหสฺสานิ สคฺเค นิพฺพตฺตานิ, ตถา มหาโมคฺคลานมหากสฺสปปภุติ สุเนตฺตสฺส สตฺถุโน สาวกา อปฺเปกจฺเจ พฺรหฺมโลเก อุปปชฺชึสุ, อปฺเปกจฺเจ ปรนิมฺมิตวสวตฺตีนํ เทวานํ สหพฺยตํ…เป… อปฺเปกจฺเจ คหปติมหาสาลกุลานํ สหพฺยตํ อุปปชฺชึสุ, วุตฺตญฺเหตํ ‘‘นตฺถิ ภิกฺขเว ปณฺฑิตโต ภยํ, นตฺถิ ปณฺฑิตโต อุปทฺทโว, นตฺถิ ปณฺฑิตโต อุปสคฺโค’’ติ. อปิจ ตคฺครมาลาทิคนฺธภณฺฑสทิโส ปณฺฑิโต, ตคฺครมาลาทิคนฺธภณฺฑปลิเวฐนปตฺตสทิโส ตทุปเสวี วุตฺตญฺเหตํ นารทชาตเก. इस प्रकार के गुणों से युक्त, उन्नति के पक्ष में स्थित पंडित पुरुष लोक में दुर्लभ ही हैं। कौन पंडित पुरुष? बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध, अस्सी महाश्रावक और तथागत के अन्य श्रावक, तथा सुनेत्त, महागोविन्द, विधुर, सरभंग, महोसध, सुतसोम, निमिराज, अयोगरकुमार, अकित्ति पंडित आदि को पंडित समझना चाहिए। वे भय में रक्षा के समान, अंधकार में प्रदीप के समान, और भूख-प्यास आदि दुखों के अभिभव में अन्न-पान आदि की प्राप्ति के समान हैं; वे अपने वचनों का पालन करने वालों के सभी भय, उपद्रव और उपसर्गों का विनाश करने में समर्थ होते हैं। क्योंकि तथागत के आश्रय से असंख्य और अपरिमेय देव और मनुष्य आस्रवों के क्षय को प्राप्त हुए, ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित हुए और देवलोक में उत्पन्न हुए। सारिपुत्त थेर के प्रति चित्त प्रसन्न कर और चार प्रत्ययों से थेर की उपस्थापना कर अस्सी हजार कुशल (पुण्य करने वाले) स्वर्ग में उत्पन्न हुए। इसी प्रकार महामौद्गल्यायन, महाकाश्यप आदि और सुनेत्त शास्ता के श्रावक, कुछ ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुए, कुछ परनिर्मितवशवर्ती देवों के साथ... कुछ महाशाल गृहपति कुलों में उत्पन्न हुए। यह कहा भी गया है— 'भिक्षुओं, पंडित से कोई भय नहीं होता, पंडित से कोई उपद्रव नहीं होता, पंडित से कोई उपसर्ग नहीं होता।' इसके अतिरिक्त, पंडित तगर और माला आदि सुगंधित वस्तुओं के समान है, और उसका सेवन करने वाला तगर और माला आदि सुगंधित वस्तुओं को लपेटने वाले पत्ते के समान है। यह नारद जातक में कहा गया है। ‘‘ตคฺครญฺจ [Pg.109] ปลาเสน, โย นโร อุปนยฺหติ; ปตฺตาปิ สุรภิ วายนฺติ, เอวํ ธีรูปเสวนา’’ติ. जो मनुष्य पलाश के पत्ते में तगर (सुगंधित काष्ठ) को लपेटता है, उसके वे पत्ते भी सुगंधित महकने लगते हैं; इसी प्रकार धीर (पंडित) की सेवा (संगति) का प्रभाव होता है। อกิตฺติปณฺฑิโต สกฺเกน เทวานมินฺเทน วเร ทิยฺยมาเน เอวมาห अकित्ति पंडित ने देवराज शक्र द्वारा वरदान दिए जाने पर यह कहा— ‘‘ธีรํ ปสฺเส สุเณ ธีรํ, ธีเรน สห สํวเส; ธีเรนา’ลาปสลฺลาปํ, ตํ กเร ตญฺจ โรจเย. धीर (पंडित) को देखे, धीर को सुने, धीर के साथ निवास करे; धीर के साथ ही आलाप-संलाप (बातचीत) करे और उसी को पसंद करे। กึ นุ เต อกรํ ธีโร, วท กสฺสป การณํ; เกน กสฺสป ธีรสฺส, ทสฺสนํ อภิกงฺขสิ. धीर ने तुम्हारा क्या उपकार किया है? हे काश्यप, कारण बताओ; हे काश्यप, तुम किस कारण से धीर के दर्शन की अभिलाषा करते हो? นยํ นยติ เมธาวี, อทุรายํ น ยุญฺชติ; สนโร เสยฺยโส โหติ, สมฺมา วุตฺโต น กุปฺปติ; วินยํ โส ปชานาติ, สาธุ เตน สมาคโม’’ติ. मेधावी (पंडित) सही मार्ग पर ले जाता है, वह अनुचित कार्यों में नहीं लगाता; उसके साथ रहने वाला मनुष्य श्रेष्ठ बनता है, सही बात कहे जाने पर वह क्रोध नहीं करता; वह विनय (अनुशासन) को जानता है, इसलिए उसके साथ समागम (मेल-जोल) उत्तम है। อปิจ เตปิ สปฺปุริเส สงฺคมฺม อสฺสุตปุพฺพมฺปิ อุภยโลกหิตาวหํ วาจํ สุยฺยเตว, วุตฺตมฺปิ เจตํ. इसके अतिरिक्त, उन सत्पुरुषों की संगति करके पहले कभी न सुनी गई और दोनों लोकों (इहलोक और परलोक) का हित करने वाली वाणी सुनी ही जाती है, और यह कहा भी गया है— ‘‘สุภาสิตํ อุตฺตมมาหุ สนฺโต, ธมฺมํ ภเณ นาธมฺมํ ตํ ทุติยํ; ปิยํ ภเณ นาปฺปิยํ ตํ ตติยํ, สจฺจํ ภเณ นาลีกํ ตํ จตุตฺถ’’นฺติ จ. संत पुरुष सुभाषित को उत्तम कहते हैं, धर्म की बात कहे अधर्म की नहीं—यह दूसरी बात है; प्रिय बोले अप्रिय नहीं—यह तीसरी बात है; सत्य बोले झूठ नहीं—यह चौथी बात है। ‘‘ยํ พุทฺโธ ภาสติ วาจํ, เขมํ นิพฺพานปตฺติยา; ทุกฺขสฺสนฺตกิริยาย, สา เว วาจานมุตฺตมา’’ติ. बुद्ध जो वाणी बोलते हैं, जो निर्वाण की प्राप्ति के लिए क्षेम (सुरक्षित) है और दुःख का अंत करने वाली है, वही वाणी वास्तव में वाणियों में उत्तम है। สปฺปุริสูปนิสฺสยเสวนปจฺจยาเยว ทานาทิกุสลสมาโยเคน อปายทุกฺขโต มุจฺจนฺติ วุตฺตญฺเหตํ ‘‘อปิจ เนรยิกาทิทุกฺขปริตฺตาณโต ปุญฺญานิ เอว ปาณีนํ พหูปการานิ, ยโต เตสมฺปิ อุปการานุสฺสรณตา กตญฺญุตา สปฺปุริเสหิ ปสํสนียาทินานปฺปการวิเสสาธิคมเหตูจ โหนฺติ วุตฺตญฺเหตํ ภควตา, ‘‘ทฺเว เม ภิกฺขเว ปุคฺคลา ทุลฺลภา โลกสฺมึ, กตเม ทฺเว, โย จ ปุพฺพการี, โย จ กตญฺญุ กตเวที’’ติ. อปิจ วิธุรมโหสธชาตกาทิกาเลปิ อิธโลกปรโลกสมฺปตฺติอตฺถเมว อตฺตโน วจนกเร สมฺมา โยเชนฺติ. อนากุลกมฺมนฺตาธิฏฺฐาเนน กาลญฺญุตาย ปติรูปการิตาย อนลสตาย อุฏฺฐานวีริยสมตาย อพฺยสนิยตาจ กาลานติกฺกมนอปฺปติรูปกรณอกรณสิถิลกรณาหิ อกุสลาทีหิ รหิตกสิโครกฺขวาณิชฺชาทโย กมฺมนฺตา, เอเต อตฺตโน วา ปุตฺตทารสฺส วา ทาสกมฺมกรานํ วา พฺยตฺตตาย เอวํ ปโยชิตา ทิฏฺเฐว ธมฺเม ธนธญฺญวิตฺติ ปฏิลาภเหตู โหนฺติ, วุตฺตญฺเหตํ ภควตา. सत्पुरुषों के आश्रय और सेवा के कारण ही दान आदि कुशल कर्मों के योग से प्राणी अपायों के दुखों से मुक्त होते हैं। यह कहा भी गया है— 'निश्चित ही प्राणियों के लिए पुण्य ही नरक आदि के दुखों से रक्षा करने वाले और बहुत उपकारी होते हैं, इसलिए उन उपकारों का स्मरण करना (कृतज्ञता) सत्पुरुषों द्वारा प्रशंसनीय है और अनेक प्रकार के विशेष गुणों की प्राप्ति का हेतु है।' भगवान ने यह कहा भी है— 'भिक्षुओं, लोक में ये दो पुद्गल दुर्लभ हैं। कौन से दो? जो पहले उपकार करने वाला (पूर्वकारी) है, और जो कृतज्ञ तथा कृतवेदी है।' इसके अतिरिक्त, विधुर और महोसध जातक आदि के समय में भी, वे इस लोक और परलोक की संपत्ति के लिए ही अपने वचनों का पालन करने वालों को सम्यक् रूप से नियोजित करते हैं। व्याकुलता रहित कर्मों के निश्चय से, समय की पहचान से, उचित कार्य करने से, आलस्य रहित होने से, पुरुषार्थ की निरंतरता से और व्यसन रहित होने से, तथा समय न गँवाने, अनुचित कार्य न करने और कार्यों को शिथिल न करने जैसे अकुशल कार्यों से रहित कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य आदि कर्म, यदि स्वयं के लिए या पुत्र-स्त्री के लिए या दास-कर्मकारों के लिए कुशलतापूर्वक इस प्रकार किए जाएँ, तो वे इसी जन्म में धन-धान्य और संपत्ति की प्राप्ति के हेतु होते हैं। भगवान ने यह कहा भी है— ปติรูปการีริ [Pg.110] ธุรวา, อุฏฺฐานตา วินฺทเต ธนนฺติ จ; น ทิวา โสปฺปสีเล, รตฺตึ อุฏฺฐานทสฺสินา; นิจฺจปฺปมตฺเตน โสณฺเฑน, สกฺกา อาวสิตุํ ฆรํ. उचित कार्य करने वाला, उत्तरदायित्व निभाने वाला और पुरुषार्थी व्यक्ति धन प्राप्त करता है। तथा दिन में सोने के स्वभाव वाले, रात में पुरुषार्थ न देखने वाले, निरंतर प्रमादी और व्यसनी व्यक्ति के लिए घर (गृहस्थी) चलाना संभव नहीं है। อตีสิตํ อติอุณฺหํ, อติสารมิทํ อหุ; อิติ วิสฺสฏฺฐกมฺมนฺเต, อตฺถา อจฺเจนฺติ มาณเว. अत्यधिक ठंड है, अत्यधिक गर्मी है, बहुत देर हो गई है—इस प्रकार जो अपने कार्यों को छोड़ देते हैं, उन मनुष्यों के हाथ से अवसर (लाभ) निकल जाते हैं। โย จ สีตญฺจ อุณฺหญฺจ; ติณานิ โย น มญฺญติ; สปฺปุริสกิจฺจานิ, โส สุขํ น วิหายตี’’ติ จ. जो ठंड और गर्मी को तिनके के समान (तुच्छ) समझता है और सत्पुरुषों के कर्तव्यों को करता है, वह सुख से वंचित नहीं होता। โภเค สํหรมานสฺส, ปรสฺเสว อิรยโต; โภคา สนฺนิจยํ ยนฺติ, วมฺมิโกวูปจียตีติ. भोगों (संपत्ति) का संग्रह करने वाले और (भ्रमर के समान) प्रयत्न करने वाले व्यक्ति के भोग उसी प्रकार संचित होते जाते हैं, जैसे दीमक की बांबी (वल्मीक) बढ़ती है। เอวมาทิปฺปเภทา สปฺปุริสา โลเก อติทุลฺลภาว. ตพฺพิคเมน ทุปฺปุริสา พาลชนา อคเวสนฺโตปิ ลพฺภนฺเตว เต พาลา อตฺตานํ เสวมาเน ปรชเน สํสารทุกฺเขเยว โอสีเทนฺติ ภวโต วุฏฺฐานํ น เทนฺติ ตถา หิ ปูรณกสฺสปาทโย ฉสตฺถารา เทวทตฺตโกกาลิก-โมทกติสฺส ขณฺฑเทวิยาปุตฺตสมุทฺททตฺตจิญฺจมาณวิกาทโย อตีตกาเล จ ทีฆทุกฺขสฺส ลาภาติ อิเม อญฺเญ จ เอวรูปา สตฺตา พาลา อคฺคิปทิตฺตมิว อคารํ อตฺตนา ทุคฺคหิเตน อตฺตานญฺจ อตฺตโน วจนการเก จ วินาเสนฺติ ตถา หิ เทวทตฺตมาคมฺม ราชา อชาตสตฺตุ-โกกาลิกาทโย ตทญฺเญปิ ปุคฺคลา อปาเย นิพฺพตฺตนฺติ. ราชา อชาตสตฺตุ สามญฺญผลสุตฺตนฺตสวนกาเล ยทิ ปิตรํ อฆาเตยฺย, โสตาปนฺโน ภเวยฺย ปิตรํ ฆาติตตฺตา มคฺคผลมฺปิ อปฺปตฺวา โลหกุมฺภิยํ สฏฺฐิวสฺสสหสฺสานิ ปจฺจิตฺวา มุจฺจิสฺสติ อนาคเตปิ ปจฺเจกพุทฺโธ ภวิสฺสติ. โกกาลิโกปิ สาริปุตฺตโมคฺคลานตฺเถเร อนปจายิตฺวา มหานิรเย ปทุมคณนาย ปจฺจโนกาเส นิรยปเทเส ปทุมนิรเย…เป… ปทุมํ โข ปน อญฺญตโร ภิกฺขุ นิรยํ โกกาลิโก ภิกฺขุ อุปปนฺโน สาริปุตฺตโมคฺคลาเนสุ จิตฺตํ อาฆาเตตฺวา’’ติ อาห. ตตฺถ อญฺญตโร ภิกฺขูติ นามโคตฺเตน อปากฏํ ‘‘กึ ว ทีฆํ นุโข ภนฺเต ปทุเม นิรเย อายุปฺปมาณ’’นฺติ ปญฺหํ ปุจฺฉิตฺวา นิสินฺนํ เอกํ ภิกฺขุํ เอวมาห ‘‘ทีฆํ โข ภิกฺขุ นิรเย อายุปฺปมาณํ, ตํ น สุกรํ สงฺขาตุํ เอตฺตกานิ วสฺสานีติ วา เอตฺตกานิ วสฺสสตานีติ วา เอตฺตกานิ วสฺสสหสฺสานีติ วา เอตฺตกานิ วสฺสสตสหสฺสานี’’ติ [Pg.111] วา สกฺกา ปน ภนฺเต อุปมํ กาตุนฺติ. ‘‘สกฺกา ภิกฺขู’’ติ ภควา อโวจ. เสยฺยถาปิ ภิกฺขุ วีสติขาริโก โกสลโก ติลวาโห โหติ, ตโต ปุริโส วสฺสสตสฺส วสฺสสหสฺสสฺส อจฺจเยน เอกเมกํ ติลํ อุทฺธเรยฺย, ขิปฺปตรํ โข โส ภิกฺขุ วีสติขาริโก โกสลโก ติลวาโห อิมินา อุปกฺกเมน ปริกฺขยํ ปริยาทานํ คจฺเฉยฺย, น ตฺเวว เอโก อพฺพุโท นิรโย. เสยฺยถาปิ ภิกฺขุ วีส อพฺพุโท นิรโย, เอวเมโก นิรพฺพุโท นิรโย’’ติ อาทิ. วีสติขาริโก ติ มาคธิเกน ปตฺเถน จตฺตาโร ปตฺถา โกสลรฏฺเฐ เอโก ปตฺโถ โหติ. เตน ปตฺเถน จตฺตาโร ปตฺถา อาฬฺหกํ. จตฺตาริ อาฬฺหกานิ โทณํ. จตุโทณา มานิกา. จตุมานิกา ขารี. ตายขาริยา วีสติขาริโก ติลวาโห. ติลวาโหติ ติลสกฏํ. อพฺพุโท นิรโยติ อพฺพุโท นาม เอโก ปจฺเจกนิรโย นตฺถิ, อวีจิมฺหิ เอว ปน อพฺพุทคณนาย ปจฺจโนกาโส ‘‘อพฺพุโท นิรโย’’ติ วุตฺโต. เอส นโย นิรพฺพุทาทีสุปิ. ตตฺถ วสฺสคณนาปิ เอวํ เวทิตพฺพา ยถาห ‘‘สตํสตสหสฺสานิ โกฏิ โหติ เอวํ สตํสหสฺสโกฏิโย ปโกฏิ นาม. สตํสตสหสฺสปโกฏิโย โกฏิปโกฏิ นาม. สตํ สตสหสฺสโกฏิปโกฏิโย นหุตํ. สตํสตสหสฺสนหุตานิ นินฺนหุตํ. สตํสตสหสฺสนินฺนหุตานิ เอโก อพฺพุโท. ตโต วีสติคุโณ นิรพฺพุโท. เอส นโย สพฺพตฺถ อยญฺจ คณนา อปริจิตานํ ทุกฺกรา’’ติ วุตฺตํ ตํ น สุกรํ สงฺขาตุ’นฺติ เกจิ ปน ตตฺถ ปริเทวนานตฺเตนปิ กมฺมกรณนานตฺเตนปิ อิมานิ นามานิ ลทฺธานีติ วทนฺติ. อปเรปิ วานการเณหีติ ฏีกาเนตฺติ. ยถา จ ทีฆวิทสฺสอาฆาตา จ พุทฺธนฺตรํ สฏฺฐิโยชนมตฺเตน อตฺตภาเวน อุตฺตาโน ปติโต มหานิรเย ปจฺจติ ยถา จ, ตสฺส ทิฏฺฐิอภิรุจิตานิ ปญฺจ กุลสตานิ ตสฺเสว สหพฺยตํ อุปฺปนฺนานิ มหานิรเย ปจฺจนฺติ. วุตฺตญฺเจตํ ภควตา ‘‘เสยฺยถาปิ ภิกฺขเว นฬาคารํ วา ติณาคารํ วา อคฺคิผุฏฺโฐ กูฏาคารานิ ทหติ อุลฺลิตฺตาวลิตฺตานิ นิวาตานิ ผุสิตคฺคฬานิ ปิหิต วาตปานานิ เอวเมว โข ภิกฺขเว ยานิกานิจิ ภยานิ อุปฺปชฺชนฺติ, สพฺพานิ พาลโต อุปฺปชฺชนฺติ, โน ปณฺฑิตโต เยเกจิ อุปทฺทวา อุปฺปชฺชนฺติ, โน ปณฺฑิตโต, เยเกจิ อุปสคฺคา…เป… โน ปณฺฑิตโต. อิติ โข ภิกฺขเว สปฺปฏิภโย [Pg.112] พาโล อปฺปฏิภโย ปณฺฑิโต สอุปทฺทโว พาโล อนุปทฺทโว ปณฺฑิโต, สอุปสคฺโค พาโล อนุปสคฺโค ปณฺฑิโตติ. อปิ จ ปูติมจฺฉสทิโส พาโล, ปูติมจฺฉพทฺธปตฺต ปุติสทิโส โหติ ตทุปเสวี. ฉฑฺฑนียตํ ชิคุจฺฉนียตญฺจ อาปชฺชติ วิญฺญูนํ วุตฺตมฺปิ เจตํ นารทชาตเก. इस प्रकार के भेदों वाले सत्पुरुष लोक में अत्यंत दुर्लभ ही हैं। उनके अभाव में दुष्ट पुरुष और मूर्ख लोग बिना खोजे भी मिल जाते हैं। वे मूर्ख अपनी सेवा करने वाले दूसरे लोगों को संसार के दुखों में ही डुबो देते हैं, उन्हें भव से निकलने नहीं देते। जैसे कि पूर्णकस्सप आदि छह शास्ता, देवदत्त, कोकालिक, मोदकतिस्स, खण्डदेवियापुत्त, समुद्रदत्त, चिञ्चामाणविका आदि और अतीत काल में दीर्घ दुख प्राप्त करने वाले ये और इस प्रकार के अन्य मूर्ख प्राणी, आग से जलते हुए घर के समान, स्वयं के गलत आचरण से स्वयं को और अपने वचनों का पालन करने वालों को विनाश की ओर ले जाते हैं। जैसे कि देवदत्त के कारण राजा अजातशत्रु, कोकालिक आदि और अन्य व्यक्ति भी अपाय में उत्पन्न हुए। राजा अजातशत्रु यदि सामञ्ञफल सुत्त सुनते समय अपने पिता की हत्या न करता, तो वह स्रोतापन्न हो जाता। पिता की हत्या करने के कारण मार्ग-फल को प्राप्त न कर, वह लोहकुम्भी नरक में साठ हजार वर्षों तक पकने के बाद मुक्त होगा और भविष्य में प्रत्येकबुद्ध बनेगा। कोकालिक भी सारिपुत्त और मोग्गलान स्थविरों के प्रति अनादर कर महानरक के पद्म नामक नरक प्रदेश में पद्म की गणना के अनुसार पक रहा है... 'पद्म नरक में कोकालिक भिक्षु उत्पन्न हुआ है, सारिपुत्त और मोग्गलान के प्रति चित्त में द्वेष रखकर' - ऐसा कहा गया है। वहाँ 'एक भिक्षु' जिसका नाम और गोत्र प्रकट नहीं है, उसने बैठकर यह प्रश्न पूछा - 'भन्ते! पद्म नरक में आयु का प्रमाण कितना लंबा है?' तब भगवान ने उससे कहा - 'भिक्षु! नरक में आयु का प्रमाण बहुत लंबा है, उसे इतने वर्ष, इतने सौ वर्ष, इतने हजार वर्ष या इतने लाख वर्ष कहकर गिनना आसान नहीं है।' 'भन्ते! क्या कोई उपमा दी जा सकती है?' भगवान ने कहा - 'भिक्षु! दी जा सकती है। जैसे भिक्षु! कोसल देश की बीस खारी तिल की गाड़ी हो, और कोई पुरुष प्रत्येक सौ वर्ष या हजार वर्ष के बीतने पर उसमें से एक-एक तिल निकाले, तो भिक्षु! वह बीस खारी तिल की गाड़ी इस विधि से जल्दी समाप्त हो जाएगी, लेकिन एक अब्बुद नरक की आयु समाप्त नहीं होगी। भिक्षु! जैसे बीस अब्बुद नरक होते हैं, वैसा एक निरब्बुद नरक होता है' आदि। 'बीस खारी' का अर्थ है - मागधी प्रस्थ के अनुसार चार प्रस्थ कोसल राष्ट्र में एक प्रस्थ होता है। उस प्रस्थ से चार प्रस्थ एक आढक होता है। चार आढक एक द्रोण। चार द्रोण एक मानिका। चार मानिका एक खारी। उस खारी से बीस खारी तिल की गाड़ी। 'तिलवाहो' का अर्थ है तिल की गाड़ी। 'अब्बुद नरक' का अर्थ है - अब्बुद नाम का कोई अलग नरक नहीं है, बल्कि अवीचि नरक में ही अब्बुद की गणना के अनुसार जो समय का भाग है, उसे 'अब्बुद नरक' कहा गया है। यही नियम निरब्बुद आदि के लिए भी है। वहाँ वर्षों की गणना इस प्रकार जाननी चाहिए जैसा कि कहा गया है - 'सौ लाख एक करोड़ होती है, इसी प्रकार सौ लाख करोड़ एक पकोड़ि कहलाती है। सौ लाख पकोड़ि एक कोटिपकोड़ि कहलाती है। सौ लाख कोटिपकोड़ि एक नहुत। सौ लाख नहुत एक निन्नहुत। सौ लाख निन्नहुत एक अब्बुद। उससे बीस गुना निरब्बुद। यही नियम सर्वत्र है और यह गणना अपरिचितों के लिए कठिन है' - इसलिए कहा गया है कि 'उसे गिनना आसान नहीं है'। कुछ लोग वहाँ विलाप की विविधता और यातनाओं की विविधता के कारण ये नाम प्राप्त हुए हैं, ऐसा कहते हैं। अन्य लोग टीका के अनुसार अन्य कारण बताते हैं। और जैसे दीर्घविद्दस के आघात से बुद्धों के बीच के अंतराल में साठ योजन के शरीर के साथ महानरक में पीठ के बल गिरकर पकता है, और जैसे उसकी दृष्टि में रुचि रखने वाले पाँच सौ कुल उसी के साथ महानरक में उत्पन्न होकर पकते हैं। भगवान द्वारा यह कहा गया है - 'भिक्षुओ! जैसे आग की एक चिंगारी घास के घर या फूस के घर को जला देती है और फिर उन कूटागारों को भी जला देती है जो भीतर-बाहर से लिपे-पुते हों, जहाँ हवा न आती हो, जहाँ अर्गला लगी हो और खिड़कियाँ बंद हों; उसी प्रकार भिक्षुओ! जो भी भय उत्पन्न होते हैं, वे सब मूर्ख से उत्पन्न होते हैं, पंडित से नहीं। जो भी उपद्रव उत्पन्न होते हैं, वे मूर्ख से उत्पन्न होते हैं, पंडित से नहीं। जो भी उपसर्ग आदि उत्पन्न होते हैं, वे मूर्ख से उत्पन्न होते हैं, पंडित से नहीं। इस प्रकार भिक्षुओ! मूर्ख भययुक्त है, पंडित भयरहित है; मूर्ख उपद्रवयुक्त है, पंडित उपद्रवरहित है; मूर्ख उपसर्गयुक्त है, पंडित उपसर्ग रहित है। इसके अतिरिक्त, मूर्ख सड़ी हुई मछली के समान है, और उसका सेवन करने वाला सड़ी हुई मछली को बाँधने वाले पत्ते के समान दुर्गंधयुक्त हो जाता है। वह विद्वानों के लिए त्यागने योग्य और घृणा के योग्य हो जाता है। यह नारद जातक में भी कहा गया है। ‘‘ปูติมจฺฉํ กุสคฺเคน, โย นโร อุปนยฺหติ; กุสาปิ ปูติ วายนฺติ, เอวํ พาลูปเสวนา’’ติ. जो मनुष्य कुश की नोक से सड़ी हुई मछली को बाँधता है, उसके वे कुश भी दुर्गंध देने लगते हैं; मूर्खों की संगति भी ऐसी ही होती है। อกตฺติปณฺฑิโตจาปิ สกฺเกน เทวานมินฺเทน วเร ทิยฺยมาเน เอวมาห अकत्ति पंडित ने भी देवराज शक्र द्वारा वरदान दिए जाने पर यह कहा था - ‘‘พาลํ น ปสฺเส น สุเณ, น จ พาเลน สํวเส; พาเลนา’ลฺลาปสลฺลาปํ, น กเร น จ โรจเย. मूर्ख को न देखे, न सुने और न ही मूर्ख के साथ निवास करे; मूर्ख के साथ बातचीत न करे और न ही उसे पसंद करे। กึนุ เต อกรํ พาโล, วท กสฺสป การณํ; เกน กสฺสป พาลสฺส, ทสฺสนํ นาภิกงฺขสิ. हे काश्यप! मूर्ख ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? कारण बताओ। हे काश्यप! तुम मूर्ख के दर्शन की इच्छा क्यों नहीं करते? อนยํ นยติ ทุมฺเมโธ, อธุรายํ นิยุญฺชติ; ทุนฺนโย เสยฺยโส โหติ, สมฺมา วุตฺโต ปกุปฺปติ; วินยํ โส น ชานาติ, สาธุ ตสฺส อทสฺสน’’นฺติ. दुर्बुद्धि (मूर्ख) गलत रास्ते पर ले जाता है, वह अकर्तव्य में नियुक्त करता है; उसका कुमार्ग ही उसे श्रेष्ठ लगता है, सही बात कहने पर वह क्रोधित होता है; वह विनय को नहीं जानता, इसलिए उसका न देखना ही अच्छा है। เอวํ พาลทุชฺชนสํสคฺควเสเนว สพฺพานิ ภยุปทฺทวานิ อุปฺปชฺชนฺติ, โน ปณฺฑิตเสวนวเสนาติสพฺพโส สปฺปุริสา อติทุลฺลภาว. इस प्रकार मूर्ख और दुर्जनों की संगति के कारण ही सभी भय और उपद्रव उत्पन्न होते हैं, पण्डितों की सेवा के कारण नहीं; इसलिए सत्पुरुष सर्वथा अति दुर्लभ ही हैं। อิทานิ. अब। ‘‘ทุลฺลภญฺจ มนุสฺสตฺตํ, พุทฺธุปฺปาโท จ ทุลฺลโภ; ทุลฺลภา ขณสมฺปตฺติ, สทฺธมฺโม ปรมทุลฺลโภ’’ติ. मनुष्य जन्म दुर्लभ है, बुद्ध का उत्पन्न होना दुर्लभ है, क्षण-सम्पत्ति दुर्लभ है और सद्धर्म परम दुर्लभ है। อิมิสฺสา คาถาย วณฺณนากฺกโม สมฺปตฺโต. ตตฺถ ทุลฺลภญฺจ มนุสฺสตฺตนฺติ มนุสฺสภาโวปิ ทุลฺลโภเยว มนุสฺสสฺส ทุลฺลภภาโว กาณกจฺฉโปปมาทีหิ เวทิตพฺโพ เอโก กิร กสฺสโก คงฺคาตีเร ตีณิ สํวจฺฉรานิ กสิตฺวา กิญฺจิมตฺตมฺปิ อลภิตฺวา นงฺคลผาลํ ทฺเวธา ภินฺทิตฺวา คงฺคายํ ขิปิ เตน คงฺคานทิยา วาเหน เอโก อุทฺธํ เอโก เหฏฺฐาติ เอวํ ทฺเว นงฺคลผาลกา คงฺคายํ วุยฺหนฺตา จิเรน เอโก อุทฺธํ เอโก เหฏฺฐาติ ทฺเว เอกโต หุตฺวา ปากติกา ยุชฺชนฺติ ตสฺมึ ขเณ วสฺสสตวสฺสสหสฺสจฺจเยน เอกวารํ อุมฺมุชฺชมาโน กาณกจฺฉโป อุมฺมุชฺชมานกฺขเณ ตสฺส คีวา ทฺวินฺนํ นงฺคลผาลานมนฺตเร โหติ อยํ กาโล [Pg.113] ทุลฺลโภว เอวเมว มนุสฺสตฺตภาโวปิ ทุลฺลโภเยว ตถาหิ มนุสฺสตฺตภาวํ อลภิตฺวาว นิรยเปตอสุรกายติรจฺฉานภูมีสุเยว สํสริตฺวา สีสมฺปิ อุกฺขิปิตุํ อลภนฺตา เอกพุทฺธนฺตรา ทฺเว พุทฺธนฺตรา ตโย พุทฺธนฺตรา จตฺตาโร พุทฺธนฺตรา เอกาสงฺขฺเยยฺยวเสน นิรเย ปจฺจนกสตฺตานํ คณนปถํ วีติวตฺตา, ตถา เปตอสุรกายติรจฺฉานภูมีสุปิ อติขุทฺทเกน อตฺตภาเวน ติลพีชสาสปพีชสฺส จตุปญฺจฉสตฺตอฏฺฐกลภาคมตฺเตเนว องฺคุลิยา ปติฏฺฐิตฏฺฐานมตฺเตเยว ภูมิปเทเส นิสินฺนานํ อติขุทฺทกสตฺตานํ คณนปถมฺปิ วีติวตฺตา เต หิ คณิตุํ อิทฺธิมนฺตปุคฺคเล ฐเปตฺวา อญฺโญ โก นาม สกฺขิสฺสติ เตหิ โมหนฺธภาเวน กณฺหสุกฺกปกฺขมฺปิ อชานนฺตา อเนเกสุ พุทฺธสเตสุ วา พุทฺธสหสฺเสสุ วา อุปฺปชฺชมาเนสุปิ พุทฺโธติสทฺทํ อสุตฺวา วีติวตฺตา, เอวํ มนุสฺสตฺตภาโวปิ ทุลฺลโภเยว. มนุสฺสตฺตภาเว ลภมาเนปิ พุทฺธุปฺปาทกาโล อติทุลฺลโภว. พุทฺธุปฺปาทกาเลปิ สมฺมาทิฏฺฐิ หุตฺวา กุสลูปปตฺติสงฺขาตา ขณสมฺปตฺติ ทุลฺลภาว, สทฺธมฺมเทสกสฺสาปิ ทุลฺลภตฺตา, ตสฺมิมฺปิ สติ องฺควิกลภาเวน สทฺธมฺมสวนสฺสาปิ ทุลฺลภตฺตาติ เอวมาทิปฺปเภทา มนุสฺสตฺตภาวาทิกา ขณสมฺปตฺติโย ทุลฺลภาติ เวทิตพฺพา. ทุลฺลภา ขณสมฺปตฺตีติ กุสลูปปตฺติสงฺขาตา ขณสมฺปตฺติ ทุลฺลภาเยว ตถา หิ ปจฺจนฺตวิสย อรูปอสญฺญสตฺตติรจฺฉานเปตเนรยิกกาเล วา มชฺฌิมเทเสปิ จกฺขาทิองฺควิกเลวา ปริปุณฺณองฺคภาเวปิ มิจฺฉาทิฏฺฐิภูตา วา กุสลูปปตฺติสงฺขาตา ขณา น โหนฺติ ปจฺจนฺตวิสเย หิ ปวตฺตา ชนา ปาณาติปาตาทิทสอกุสลกมฺมปเถเยว รมนฺติ อภิรมนฺติ, จณฺฑสภาวา จ เต โหนฺติ, รตนตฺตยคุณมฺปิ น ชานนฺติ. อรูปิโนปิ ปุคฺคลา ปรโตโฆสวิรหิตตฺตา โสตาปตฺติมคฺคปฏิลาโภปิ เตสํ นตฺถิ, พุทฺธทสฺสนาทีนิปิ น ลภนฺติ. อสญฺญสตฺตติรจฺฉานเปตเนรยิกกาเลสุ ปน ปเคว ปูริตปารมีนํ สตฺตานํ ปวตฺตนมฺปิ อพฺโพหาริกํ, สมฺมาทิฏฺฐิกุเล ชายมานาปิ จกฺขุวิกเลน พุทฺธสงฺฆรตนานํ อทสฺสนํ, โสตวิกเลน ธมฺมสวนโตปิ หายติ เอฬมูคาทิภาเวน กุสลสมาทานา น โหนฺติ. องฺคสมฺปนฺเนปิ มิจฺฉาทิฏฺฐิภาเวน ทฺวตฺตึสมหาปุริสลกฺขณอสีติอนุพฺยญฺชนพฺยามปฺปภาปริกฺขิตฺตํ สพฺพชนานํ [Pg.114] นยนรสายตนภูตํ สพฺพญฺญุพุทฺธมฺปิ ทิสฺวา ปสาทโสมฺเมน จกฺขุนา โอโลเกตพฺพมฺปิ น มญฺญนฺติ มโนปโทสวเสเนว ยุคคฺคาหา หุตฺวา ยมกปาฏิหาริยกาลาทีสุ อเนเกปิ มิจฺฉาทิฏฺฐิโน มหานิรเย อุปฺปชฺชนฺติ. เอวํ กุสลูปปตฺติขณสมฺปตฺติปิ ทุลฺลภาเยว. इस गाथा की व्याख्या का क्रम प्राप्त हुआ है। वहाँ 'मनुष्यत्व दुर्लभ है' का अर्थ है कि मनुष्य भाव भी दुर्लभ ही है। मनुष्य की दुर्लभता को काणे कछुए की उपमा आदि से समझना चाहिए। कहते हैं कि एक किसान ने गंगा के तट पर तीन वर्षों तक खेती की, किन्तु कुछ भी प्राप्त न होने पर उसने हल के फाल (फल) को दो भागों में तोड़कर गंगा में फेंक दिया। गंगा नदी के प्रवाह से एक ऊपर और एक नीचे की ओर बहने लगा। इस प्रकार गंगा में बहते हुए वे दो फाल बहुत समय बाद एक बार ऊपर और नीचे से आकर एक साथ जुड़ गए। उसी क्षण, सौ वर्ष या हजार वर्ष के अंतराल पर एक बार ऊपर आने वाले काणे कछुए की गर्दन, उसके ऊपर आने के क्षण में, उन दो फालों के बीच आ गई। जैसे यह समय अत्यंत दुर्लभ है, वैसे ही मनुष्यत्व भी दुर्लभ ही है। क्योंकि मनुष्य भाव को प्राप्त न कर पाने वाले प्राणी नरक, प्रेत, असुर और तिर्यक योनियों में ही संसरण करते हुए, सिर उठाने का अवसर भी न पाकर, एक बुद्धान्तर, दो बुद्धान्तर, तीन बुद्धान्तर, चार बुद्धान्तर या एक असंख्येय काल तक नरक में पचते हुए गणना से परे हो जाते हैं। उसी प्रकार प्रेत, असुर और तिर्यक योनियों में भी अत्यंत सूक्ष्म शरीर वाले, जो तिल या सरसों के बीज के करोड़वें भाग के बराबर हैं और उंगली रखने मात्र के स्थान पर बैठे हैं, ऐसे अत्यंत सूक्ष्म प्राणियों की संख्या भी गणना से परे है। ऋद्धिमान पुरुषों को छोड़कर भला और कौन उन्हें गिनने में समर्थ होगा? वे मोह के अंधेपन के कारण कृष्ण और शुक्ल पक्ष (पाप-पुण्य) को न जानते हुए, अनेक सौ या हजार बुद्धों के उत्पन्न होने पर भी 'बुद्ध' शब्द को सुने बिना ही व्यतीत हो जाते हैं। इस प्रकार मनुष्यत्व भी दुर्लभ ही है। मनुष्यत्व प्राप्त होने पर भी बुद्ध का उत्पाद काल अति दुर्लभ है। बुद्ध के उत्पाद काल में भी सम्यग्दृष्टि होकर कुशल योनि में उत्पन्न होना रूपी 'क्षण-संपत्ति' दुर्लभ ही है, क्योंकि सद्धर्म के उपदेशक का मिलना भी दुर्लभ है। उसके होने पर भी, अंगों की विकलता के कारण सद्धर्म का श्रवण भी दुर्लभ है। इस प्रकार मनुष्यत्व आदि क्षण-संपत्तियाँ दुर्लभ हैं, ऐसा समझना चाहिए। 'क्षण-संपत्ति दुर्लभ है' का अर्थ है कि कुशल योनि में जन्म रूपी क्षण-संपत्ति दुर्लभ ही है। क्योंकि प्रत्यन्त देश, अरूप लोक, असंज्ञी सत्त्व, तिर्यक, प्रेत या नरक के समय में, अथवा मध्य देश में भी चक्षु आदि अंगों से विकल होने पर, या अंग पूर्ण होने पर भी मिथ्यादृष्टि होने पर, कुशल उत्पत्ति रूपी 'क्षण' नहीं होते। प्रत्यन्त देशों में रहने वाले लोग प्राणातिपात आदि दस अकुशल कर्मपथों में ही रमे रहते हैं, वे चण्ड स्वभाव के होते हैं और रत्नत्रय के गुणों को भी नहीं जानते। अरूप लोक के पुद्गल भी परतोघोष से रहित होने के कारण स्रोतापत्ति मार्ग को प्राप्त नहीं कर पाते और बुद्ध दर्शन आदि भी उन्हें सुलभ नहीं होते। असंज्ञी सत्त्व, तिर्यक, प्रेत और नरक की अवस्थाओं में तो पारमिता पूर्ण करने वाले सत्त्वों का होना भी व्यवहार से परे है। सम्यग्दृष्टि कुल में जन्म लेने पर भी चक्षु की विकलता से बुद्ध और संघ रूपी रत्नों का दर्शन नहीं होता, श्रोत्र की विकलता से धर्म श्रवण से वंचित रह जाते हैं, और जड़-मूक होने के कारण कुशल का समादान नहीं कर पाते। अंगों से संपन्न होने पर भी मिथ्यादृष्टि होने के कारण, बत्तीस महापुरुष लक्षणों और अस्सी अनुव्यंजनों से युक्त, व्याम-प्रभा से घिरे हुए, सभी जनों के नेत्रों के लिए रसास्वादन के केंद्र स्वरूप सर्वज्ञ बुद्ध को देखकर भी, वे उन्हें प्रसन्न और सौम्य दृष्टि से देखने योग्य नहीं मानते। मन के दोष के कारण वे बुद्ध के प्रति ईर्ष्या भाव रखते हैं और यमक प्रातिहार्य आदि के समय भी अनेक मिथ्यादृष्टि महानरक में उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार कुशल उत्पत्ति रूपी क्षण-संपत्ति भी दुर्लभ ही है। ‘‘ทุลฺลภญฺจ มนุสฺสตฺตํ, พุทฺธุปฺปาโท จ ทุลฺลโภ; ทุลฺลภา ขณสมฺปตฺติ, สทฺธมฺโม ปรมทุลฺลโภ’’ติ. मनुष्यत्व दुर्लभ है, बुद्ध का उत्पाद दुर्लभ है; क्षण-संपत्ति दुर्लभ है और सद्धर्म परम दुर्लभ है। อิมิสฺสา คาถาย อตฺโถ วุตฺโตเยว. इस गाथा का अर्थ कहा जा चुका है। อิติ สาครพุทฺธิตฺเถรวิรจิเต สีมวิโสธเน इस प्रकार स्थविर सागरबुद्धि द्वारा रचित 'सीमाविसोधनी' में ปกิณฺณกกณฺโฑ นาม ปญฺจโม ปริจฺเฉโท. 'प्रकीर्णक काण्ड' नामक पाँचवाँ परिच्छेद समाप्त हुआ। เอวํ สตฺถุปรินิพฺพานโต วสฺสสตจฺจเยน ปติฏฺฐิเต อิสินา การิตตฺตา’ อิสินคร’นฺติ ลทฺธนาเม ทฺวตฺตปาทิภูปาลานํ นิวาสฏฺฐานภูเต สีริเขตฺตนคเร เอราวติยา นทิยา ปาริมตีรภูเต ปพฺพตสานุมฺหิ ปติฏฺฐิตสฺส กญฺจนวรมหาถูปสฺส ทายกสฺส สตฺวิวมหาธมฺมรญฺโญ กาเล สาสนสฺส ทฺวิสหสฺสสตาธิกเอกตึสติเม วสฺเส สาสเน ปฏิลทฺธสทฺธานํ กุลปุตฺตานํ มหาชานิกรณวเสน วิมติวิโนทนิยา วุตฺตวจนํ สทฺทยุตฺติอตฺถยุตฺติวเสน สาธุกํ อวิจินิตฺวา นทิยา อุทกุกฺเขปํ อกตฺวา อุปสมฺปทา กมฺมสฺส การิตตฺตา สาสเน ปราชยมาปนฺเน กุลปุตฺเต อุปารมฺภกรณวเสน สีมวิปตฺติหารโก สีมสมฺปตฺติปฺปกาสโก คนฺโถ ปวตฺตติ. इस प्रकार शास्ता के परिनिर्वाण से २१३१ वर्ष बीत जाने पर, ऋषियों द्वारा बसाए जाने के कारण 'इसिनगर' नाम से प्रसिद्ध, द्वत्तपाद आदि राजाओं के निवास स्थान श्रीक्षेत्र नगर में, इरावती नदी के उस पार पर्वत की चोटी पर स्थित श्रेष्ठ स्वर्ण महास्तूप के दायक सत्विवमहाधर्मराज के काल में, शासन के प्रति श्रद्धा रखने वाले कुलपुत्रों के महान अज्ञान को दूर करने के लिए, विमतिविनोदनी में कहे गए वचनों का शब्द और अर्थ की युक्ति के अनुसार भली-भाँति विचार किए बिना, नदी में जल-उत्क्षेप किए बिना ही उपसंपदा कर्म कराए जाने के कारण जब शासन में ह्रास की स्थिति उत्पन्न हुई, तब कुलपुत्रों के सुधार के लिए सीमा की विपत्ति को दूर करने वाला और सीमा की सम्पत्ति को प्रकाशित करने वाला यह ग्रन्थ प्रवर्तित हुआ। เอตฺตาวตา จ สิริเขตฺตนครโคจรคาเมน สตฺวิวมหาธมฺมราชคุรุภูเตน มหาเวยฺยากรเณน ติปิฏกธเรน’สทฺธมฺมโกวิโท’ติ ปากฏ นามเธยฺเยน มหาเถเรน อุปชฺฌาโย หุตฺวา ปญฺญาธิปตีนํ นิวาสภูเต ปจฺฉิมชินจกฺกสาสนวเร วาสิคณาจริเยน คณวาจเกน วินยธเรน มหาสามินา จ, ราชคุรุนา ติปิฏกนาคตฺเถเรน จ อาจริโย หุตฺวา เวชฺชกมฺมชงฺฆเปสนกมฺมาทิวเสน อเนสนํ ปหาย สมฺมา อาชีเวน วิสุทฺธาชีเวหิ สงฺฆคเณหิ การกสงฺฆา หุตฺวา สิริเขตฺตนครสฺส ทกฺขิณทิสาภาเค ทีฆปพฺพตสานุมฺหิ เอราวติยา นทิยา ตีเร วาลิกปุฬิเน สีมาเปกฺขาย สห อุทกุกฺเขปํ [Pg.115] กตฺวา ปวตฺตาย อุทกุกฺเขปสีมาย ทสธา พฺยญฺชนวิปตฺตึ อกตฺวา ฐานารเหน ญตฺติจตุตฺเถน กมฺเมน อุปสมฺปทาย วีสติวสฺเสน สาครพุทฺธีติ ครูหิ คหิตนามเธยฺเยน ภิกฺขุนา รจิโต สาสนวิปตฺติหารโก สีมวิโสธนี นาม คนฺโถ สมตฺโต. इतने से, श्रीक्षेत्र नगर के गोचर ग्राम के निवासी, सत्विव महाधर्मराजगुरु, महान वैयाकरण, त्रिपिटकधर और 'सद्धम्मकोविद' के नाम से प्रसिद्ध महास्थविर को उपाध्याय बनाकर; प्रज्ञा के अधिपति (बुद्धिमानों) के निवास स्थान, पश्चिम जिनचक्र शासन के श्रेष्ठ वासिगणाचार्य, गणवाचक, विनयधर महास्वामी और राजगुरु त्रिपिटकनाग स्थविर को आचार्य बनाकर; वैद्यकर्म और जंघाप्रेषण (दूत कार्य) आदि के द्वारा होने वाली अनेषणा (अनुचित आजीविका) को त्यागकर, सम्यक् आजीविका वाले विशुद्ध आजीविका युक्त संघ गणों के द्वारा कारक संघ बनकर; श्रीक्षेत्र नगर के दक्षिण दिशा के भाग में, दीर्घ पर्वत की तलहटी में, इरावती नदी के तट पर बालू के पुलिन (रेत के मैदान) में, सीमा की अपेक्षा से जल-उत्क्षेप (उदकुक्खेप) के साथ की गई उदकुक्खेप सीमा में, दस प्रकार के व्यंजन-विपत्ति को न करते हुए, स्थान के योग्य ज्ञप्ति-चतुर्थ कर्म के द्वारा उपसम्पदा प्राप्त, बीस वर्ष के (दीक्षित) 'सागरबुद्धि' इस गुरुओं द्वारा दिए गए नाम वाले भिक्षु द्वारा रचित, शासन की विपत्ति को दूर करने वाला 'सीमाविशोधनी' नामक ग्रन्थ समाप्त हुआ। เอตฺตาวตา วิภตฺตา หิ, สปฺปเภทปฺปวตฺติกา; สีมวิโสธนีเหสา, นิปุณา สาธุจินฺติตา. इतने से यह भेदों सहित प्रवृत्त, निपुण और भली-भांति विचार की गई 'सीमाविशोधनी' विभक्त (पूर्ण) हुई। สิริเขตฺตาติ ปญฺญาเต, ปุเร อปรนามเก; ทกฺขิเณยฺยทิสาภาเค, อุจฺจเนน กตาลเย. श्रीक्षेत्र नाम से विख्यात, अपर (पश्चिमी) नाम वाले नगर में; दक्षिण दिशा के भाग में, ऊँचाई पर बनाए गए निवास में। วสนฺโต ภิกฺขุ นาเมน, สาครพุทฺธีติ วิสฺสุโต; ปุณฺเณ วีสติวสฺสมฺหิ, คนฺโถยํ สาธุจินฺติโต. वहाँ निवास करते हुए, 'सागरबुद्धि' नाम से प्रसिद्ध भिक्षु द्वारा; (प्रव्रज्या के) बीस वर्ष पूर्ण होने पर, यह ग्रन्थ भली-भांति विचार कर रचा गया। มยายํ รจิโต คนฺโถ, นิฏฺฐปฺปตฺโต อนากุโล; เอวํ ปาณินํ สพฺเพ, สีฆํ สิชฺฌนฺตุ สงฺกปฺปา. मेरे द्वारा रचित यह ग्रन्थ व्याकुलता रहित होकर निष्पन्न (पूर्ण) हुआ; इसी प्रकार सभी प्राणियों के संकल्प शीघ्र सिद्ध हों। ยาว พุทฺโธตินามมฺปิ โลกเชฏฺฐสฺส ตาทิโน; ตาว ติฏฺฐตุ ยํ คนฺโถ, สาสเน หารยํ ตมํ. जब तक लोक के ज्येष्ठ, तादी (राग-द्वेष रहित) बुद्ध का नाम रहेगा; तब तक शासन के अन्धकार को दूर करने वाला यह ग्रन्थ टिका रहे। อุทฺธํ ยาว ภวคฺคา จ, อโธ ยาว อวีจิโต; สมนฺตา จกฺกวาเฬสุ, เย สตฺตา ปถวีจรา. ऊपर भवग्र (ब्रह्मलोक) तक और नीचे अवीचि (नरक) तक; चारों ओर के चक्रवातों में जो पृथ्वी पर विचरने वाले प्राणी हैं। เตปิ สพฺเพ มยา โหนฺตุ, สมสมวิปากิโน; จิรํ ชีวตุ โน ราชา, สาสนสฺส อุชฺโชตโก. वे सभी मेरे समान पुण्य फल के भागी हों; शासन को प्रकाशित करने वाले हमारे राजा चिरकाल तक जीवित रहें। ทิพฺพนฺโต ราชธมฺเมน, อโรโค สห ญาติภิ; อเนน ปุญฺญกมฺเมน, ภเวยฺยํ ชาติชาติยํ. राजधर्म से सुशोभित, अपने ज्ञातियों (सगे-संबंधियों) के साथ निरोग रहें; इस पुण्य कर्म से मैं जन्म-जन्मान्तर में (ऐसा) होऊँ— สาสนํ โชตยนฺโตว, สกฺยปุตฺตสฺส สาสเน; ยทา นสฺสติ สทฺธมฺโม, อนฺธีภูโต มหีตเล; เทวโลเก ตทา เหสฺสํ, ตุสิเต ฐานมุตฺตเมติ. शाक्यपुत्र (बुद्ध) के शासन में शासन को प्रकाशित करता रहूँ; और जब इस पृथ्वी तल पर सद्धर्म नष्ट होकर अन्धकार छा जाए; तब मैं देवलोक में, तुषित (स्वर्ग) के उत्तम स्थान में होऊँगा। สีมวิโสธนี นิฏฺฐิตา. सीमाविशोधनी समाप्त। | |||
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |