| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
နမော တဿ ဘဂဝတော အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ. त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धांना माझा नमस्कार असो. သုဗောဓာလင်္ကာရဋီကာ सुबोधालंकारटीका ဂန္ထာရမ္ဘကထာ ग्रंथारंभकथा ယော [Pg.1] ပါဒနီရဇဝရောဒရရာဓိတေန,လောကတ္တယေန’ဝိကလေန နိရာကုလေန; ဝိညာပယီ နိရုပမေယျတမတ္တနော တံ,ဝန္ဒေ မုနိန္ဒမဘိဝန္ဒိယ ဝန္ဒနီယံ. ज्यांनी आपल्या चरणकमलांच्या धूलीने संपूर्ण आणि व्याकुळता नसलेल्या तिन्ही लोकांद्वारे पूजिले जाऊन, स्वतःच्या अनुपम स्वरूपाचे ज्ञान करून दिले, त्या वंदनीय मुनींद्रांना (मुनींच्या राजाला) मी अभिवादन करून वंदन करतो. ပတ္တော သပတ္တဝိဇယော ဇယဗောဓိမူလေ,သဒ္ဓမ္မရာဇပဒဝိံ ယဒနုဂ္ဂဟေန; သတ္တာပသတ္တ ဝိပုလာမလသဂ္ဂုဏဿ,သဒ္ဓမ္မသာရရတနဿ နမတ္ထု တဿ. ज्यांच्या अनुग्रहाने, विजयी बोधिवृक्षाच्या मुळाशी शत्रूंवर (क्लेशांवर) विजय मिळवून सद्धम्मराजाचे पद प्राप्त केले; प्राणी ज्याच्याशी जोडलेले आहेत अशा त्या विशाल, निर्मळ आणि सद्गुणांनी युक्त असलेल्या सद्धम्मरूप श्रेष्ठ रत्नाला माझा नमस्कार असो. ယော ဘာဇနတ္တမဘိသမ္ဘုဏိ သဂ္ဂုဏဿ,တဿာပိ ဓမ္မရတနဿ မဟာရဟဿ; သမ္ဘာဝိတံ သသိရသာဟိတသန္နတေဟိ,သမ္ဘာဝယာမိ သိရသာ ဂဏမုတ္တမံ တံ. जो सद्गुणांचे आणि अत्यंत मौल्यवान अशा धम्मरत्नाचे पात्र बनला; मस्तक नमवून वंदन करणाऱ्यांनी सन्मानित केलेल्या त्या उत्तम संघाला (गणाला) मी मस्तक नमवून आदरपूर्वक वंदन करतो. ယေ’နန္တတန္တရတနာကရမန္ထနေန,မန္ထာ’စလောလ္လသိတဉာဏဝရေန လဒ္ဓါ; သာရာ မတာတိ သုခိတာ သုခယန္တိ စညေ,တေ မေ ဇယန္တိ ဂုရဝေါ ဂုရဝေါ ဂုဏေဟိ. ज्यांनी अनंत शास्त्ररूपी रत्नांच्या महासागराचे मंथन करून, मंदर पर्वताप्रमाणे शोभणाऱ्या आपल्या श्रेष्ठ ज्ञानरूपी मंथनदंडाने (धम्माचा) सार प्राप्त केला, स्वतः सुखी झाले आणि इतरांनाही सुखी करतात; गुणांनी थोर असलेले ते माझे गुरुदेव विजयी होवोत. ၁. ဒေါသာဝဗောဓ ပဌမပရိစ္ဆေဒ १. दोषबोध (दोषांचे ज्ञान) - पहिला परिच्छेद ရတနတ္တယပ္ပဏာမဝဏ္ဏနာ रत्नत्रय-प्रणाम-वर्णन ၁. १. မုနိန္ဒဝဒနမ္ဘောဇ-ဂဗ္ဘသမ္ဘဝသုန္ဒရီ; သရဏံ ပါဏိနံ ဝါဏီ, မယှံ ပီဏယတံ မနံ. मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) मुखकमलाच्या गर्भातून उत्पन्न झालेली सुंदर, प्राण्यांना शरण देणारी वाणी माझ्या मनाला आनंदित करो. ၁. အထာယံ [Pg.2] ဂန္ထကာရော ဂန္ထာရမ္ဘေ ပုဗ္ဗပယောဂါနုဗန္ဓသဘာဝသိဒ္ဓိကဝိဂုဏောပေတာနံ ယတိပေါတာနံ တဒုပါယန္တရဝိရတာ ကမန္တရာပေတပရက္ကမသမ္ဘဝေနာဓိဂတဗျသနသတမုပလဗ္ဘ ဒယာသဉ္ဇာတရသရသဟဒယတာယ တဒုပါယဘူတံ ဗန္ဓလက္ခဏံ ဝိရစယိတုကာမောဘိမတသိဒ္ဓိနိမိတ္တမတ္တနောဓိဂတသဒ္ဓမ္မဒေဝတာနုဿရဏံ တာဝ ဒဿေတုမာဟ ‘‘မုနိန္ဒေ’’စ္စာဒိ. နနု ‘‘ဗန္ဓလက္ခဏံ ဝိရစယိတုကာမော’’တိ ဝုတ္တံ, ကိမေတ္ထ လက္ခဏကရဏေန အဒိဋ္ဌလက္ခဏာပိ ဒိဿန္တိ ဗန္ဓန္တာတိ? သစ္စံ, တထာပိ တေ ဃုဏက္ခရပ္ပကာသာ တဗ္ဗိဒူနံ ပယောဂါနုသာရိနော ဝါ သိယုံ, ပုဗ္ဗေ ကတသတ္ထပရိစယာ ဝါ သိယုန္တိ ဝိညေယျံ. ဝါဏီ မယှံ မနံ ပီဏယတန္တိ သမ္ဗန္ဓော. ဝါဏီတိ ဝါ သရဿတျပရနာမဓေယျာ ကာစိ ဒေဝတာ, သာ သဗ္ဗာဝဒါတာ ယထိစ္ဆိတတ္ထသာဓနပုဏ္ဍရီကဂဗ္ဘေ နိသီဒတီတိ လောကဝါဒေါ. ဝါဏီတိ ပန ပစ္စုဟဝိရဟေနာဘိမတသိဒ္ဓိနိဗန္ဓနေကတာဏော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဘာသိတော သဒ္ဓမ္မော, တတောယေဝါယံ ဒေဝတာ ရုပ္ပတေ. တတ္ထ သရဿတိယာ ယထာ’သတ္တာ ဇာတာယ မနောသမ္ပီဏနန္တိ လောကော, သဒ္ဓမ္မဒေဝတာယ တု မနောပီဏနံ, တဿာ သဗ္ဗဝဇ္ဇရဟိတာယစ္စန္တနိမ္မလာယ နိရန္တရတ္ထနေကတာဏပ္ပဝတ္တိယာ မနသော သမ္ပီဏနံ. တေန စ ပဿဒ္ဓိ, တာယ ပန သုခံ, တေနာပိ သမာဓိ, သမာဓိသမ္ဘဝေန ယထာဘူတာဝဗောဓသမ္ဘဝတော ဝိစိတ္တာနေကသဒ္ဒတ္ထဝိသေသာ ပဋိဘန္တျနာယာသေန, တတော စ ယထိစ္ဆိတသိဒ္ဓိနိပ္ဖတ္တီတိ ဝင်္ကဝုတ္တိယာ တပ္ပသာဒမာသီသတိ. १. आता, हा ग्रंथकार ग्रंथाच्या सुरुवातीला, पूर्वप्रयत्न, अनुबंध आणि स्वभावसिद्धी यांमधील दोषांनी युक्त असलेल्या नवशिक्या भिक्षूंना (यतिपुत्रांना) इतर उपायांपासून विन्मुख झाल्यामुळे आणि योग्य प्रयत्नांच्या अभावामुळे शेकडो संकटांना सामोरे जावे लागते हे पाहून, दयेमुळे निर्माण झालेल्या रसाने (करुणेने) आर्द्र झालेल्या अंतःकरणाने, त्यावर उपायभूत असणारे 'बंधलक्षण' (काव्यरचनाशास्त्र) रचण्याची इच्छा धरून, आपल्या इष्ट कार्याच्या सिद्धीसाठी स्वतःला प्राप्त झालेल्या सद्धम्मरूपी देवतेचे स्मरण दर्शवण्यासाठी 'मुनींद्र' इत्यादी (गाथा) म्हणतात. शंका: 'बंधलक्षण रचण्याची इच्छा आहे' असे म्हटले आहे, तर येथे लक्षणे तयार करण्याचे काय प्रयोजन? कारण ज्यांना लक्षणे माहीत नाहीत, तेही काव्यरचना करताना दिसतात? उत्तर: हे खरे आहे, तरीही त्यांची ती रचना घुणाक्षराप्रमाणे (योगायोगाने) झालेली असते. ते तज्ज्ञांच्या प्रयोगांचे अनुकरण करणारे असावेत किंवा त्यांनी पूर्वी शास्त्राचा अभ्यास केलेला असावा, असे समजले पाहिजे. 'वाणी माझ्या मनाला आनंदित करो' असा (येथे) संबंध आहे. 'वाणी' म्हणजे सरस्वती हे दुसरे नाव असलेली कोणीतरी देवता, जी अत्यंत शुभ्र असून इच्छित अर्थ साध्य करणाऱ्या कमळाच्या गर्भात बसते, असा लोकप्रवाद आहे. परंतु 'वाणी' म्हणजे अडथळ्यांशिवाय इष्ट सिद्धी देणारा आणि एकमेव रक्षक असलेला सम्यक्संबुद्धांनी भाषिलेला 'सद्धम्म' होय, म्हणूनच या देवतेचे रूपक दिले आहे. त्यात, जसे सरस्वतीच्या उत्पत्तीने लोकांचे मन प्रसन्न होते, तसे सद्धम्मरूपी देवतेद्वारे मनाचे प्रसन्न होणे म्हणजे सर्व दोषांनी रहित, अत्यंत निर्मळ आणि निरंतर कल्याणाचे रक्षण करणाऱ्या प्रवृत्तीमुळे मनाचे पूर्ण समाधान होणे होय. आणि त्यामुळे 'प्रस्रब्धी' (शांती) मिळते, त्यापासून 'सुख' मिळते, सुखापासून 'समाधी' प्राप्त होते. समाधीच्या प्राप्तीमुळे यथाभूत ज्ञानाचा (यथार्थ ज्ञानाचा) उदय होत असल्याने, विविध आणि अनेक शब्द व अर्थांचे विशेष अनायासाने स्फुरतात, आणि त्यातून इच्छित सिद्धी प्राप्त होते; अशा वक्रोक्तीने (ग्रंथकार) तिच्या प्रसादाची (कृपेची) आकांक्षा करतो. ကိံဝိသိဋ္ဌောစ္စာဟ [Pg.3] ‘‘မုနိန္ဒေ’’စ္စာဒိ. ဥဘော လောကေ မုနာတိ ဇာနာတီတိ မုနိ, ဣန္ဒတိ ပရမိဿရိယံ ပဝတ္တေတိ သဗ္ဗတ္ထာတိ ဣန္ဒော, မုနိ စ သော ဣန္ဒော စ, မုနီနံ ဣန္ဒောတိ ဝါ မုနိန္ဒော, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ. တတောယံ တဿ နိမိတ္တကသညာ. ဝိဇ္ဇမာနေသုပိ ပရိယာယသဒ္ဒေသွညေသု ကဝိကာမိတဿတ္ထဿေကန္တဝါစကတ္တေနော’ စိတျသမ္ပောသကောယံ မုနိန္ဒသဒ္ဒေါ, တထာ ဟိ ယော ဥဘယလောကဇာနနေန မုနီနံ ပရမိဿရိယပုဂ္ဂလာနမ္ပိ ပရမိဿရိယံ ဝတ္တေတိ, သော ပရံ ပီဏေတိ ဟေတုဘာဝေန’တြေ’တျု’စိတမေဝ, တထာ ပဒန္တရာနမ္ပိ ဩစိတျံ ပေါသေတိ. တထာ ဟိ တာဒိသဿ ဝဒနာရဝိန္ဒောဒရေ သမ္ဘဝါ သုန္ဒရီ, တတောယေဝ ပဋိသရဏံ, တသ္မာ စ မနော ပီဏေတီတိ. တဿ ဝဒနံ, တမိဝ မုနိန္ဒဝဒနံ, အမ္ဘောဇံ. တမေဝ ဝါ လက္ခိသံယောဂိတာဒိသဓမ္မေန’မ္ဘောဇံ, ပဒုမံ. တဿ ဂဗ္ဘော. တတ္ထ သမ္ဘဝေန ပဝတ္တိယာ, ဥပ္ပတ္တိယာ ဝါ သုန္ဒရီ နိရဝဇ္ဇာ ဒေဝတာ. ဝါစာ ပန ဒေါသလေသေနာပ’သမ္ဖုဋ္ဌာဝ နိရဝဇ္ဇာ, တထာ စ ဝက္ခတိ ‘‘ဂုဏာလင်္ကာရသံယုတ္တာ’’ ဣစ္စာဒိ. တတောဝါယံ သရဏံ ပါဏိနံ သတ္တာနံ ပဋိဘာနာဒိဂုဏဝိသေသာဝဟတ္တမတ္တေန ပဋိသရဏဘူတာ ဒေဝတာ. ဝါစာ ပန သဗ္ဗုပဒ္ဒဝနိဝါရဏေန သဗ္ဗဟိတသုခသမ္ပဒါသမ္ပာဒနေနစ္စန္တပဋိသရဏဘူတာ. သဘာဝနပုံသကတ္တာ စေတ္ထ န လိင်္ဂပရိဝတ္တနံ. မယှန္တိ ဧကဝစနေနတ္တနော နိရဘိမာနတ’မာနေတိ သဇ္ဇနမာစာရံ. အဘိန္နပဒသိလေသော စာယံ, သဗ္ဗတ္ထေဝါဝီကတသဒ္ဒပ္ပယောဂတော. သိလေသော စာယံ ဝင်္ကဝုတ္တိယာ သဗ္ဗတ္ထ သိရိံ ပေါသေတိ. တထာ စ ဝက္ခတိ ‘‘ဝင်္ကဝုတ္တီသု ပေါသေတိ, သိလေသော တု သိရိံ ပရ’’န္တိ. အယမေတ္ထ သင်္ခေပေန နယေန အတ္ထဝဏ္ဏနာ. ဝိတ္ထာရနယေန ပန နာနပ္ပကာရေနတ္ထော သံဝဏ္ဏေတုံ သက္ကာ. တထာ သတိ ဂန္ထဂါရဝေါပိ သိယာတိ ပကာရောယမေဝဗ္ဘုပဂတော. ती वाणी कशी विशिष्ट आहे? हे सांगण्यासाठी 'मुनींद्र' इत्यादी म्हटले आहे. दोन्ही लोकांचे (या लोक आणि परलोकाचे) जे ज्ञान प्राप्त करतात ते 'मुनी' होत. जे सर्वत्र परम ऐश्वर्य गाजवतात ते 'इंद्र' होत. जे मुनीही आहेत आणि इंद्रही आहेत, किंवा जे मुनींचे इंद्र (राजे) आहेत, ते 'मुनींद्र' म्हणजेच सम्यक्संबुद्ध होत. त्यामुळे ही त्यांची कारणात्मक संज्ञा (नाव) आहे. इतर अनेक पर्यायी शब्द उपलब्ध असतानाही, कवीला अभिप्रेत असलेल्या अर्थाचा तो एकमेव वाचक असल्याने आणि औचित्य वाढवणारा असल्याने येथे 'मुनींद्र' हा शब्द वापरला आहे. कारण, जो दोन्ही लोकांच्या ज्ञानामुळे मुनींच्या आणि परम ऐश्वर्यशाली व्यक्तींच्याही वर परम ऐश्वर्य गाजवतो, तो इतरांना आनंदित करतो, हे त्याचे कारण असणे येथे अत्यंत योग्यच आहे; तसेच तो इतर शब्दांचेही औचित्य वाढवतो. तसेच, अशा मुनींद्रांच्या मुखकमलाच्या गर्भातून उत्पन्न झालेली ती सुंदर (वाणी) आहे, म्हणूनच ती शरण (आश्रय) आहे आणि म्हणूनच ती मनाला आनंदित करते. त्यांचे मुख, त्यासारखे मुनींद्रांचे मुख हेच 'अंभोज' (कमळ) होय. किंवा शोभा इत्यादी गुणांच्या साधर्म्यामुळे ते 'अंभोज' म्हणजे कमळ आहे. त्याचा गर्भ (आतील भाग). तेथे उत्पन्न झाल्यामुळे किंवा प्रवृत्त झाल्यामुळे ती सुंदर आणि निर्दोष देवता आहे. वाणी तर दोषाच्या लवलेशानेही स्पर्श न झालेली असल्याने निर्दोष आहे, आणि म्हणूनच पुढे 'गुणांने व अलंकाराने युक्त' इत्यादी म्हटले जाईल. म्हणूनच ही प्राण्यांना (सजीवांना) शरण देणारी आहे. केवळ प्रतिभा इत्यादी विशेष गुणांना प्राप्त करून देणारी असल्याने ती शरणभूत देवता आहे. वाणी तर सर्व उपद्रवांचे निवारण करून, सर्व हित आणि सुखसंपत्ती प्रदान करणारी असल्याने अत्यंत श्रेष्ठ शरणभूत आहे. स्वभावतः नपुंसकलिंगी असल्यामुळे येथे लिंगपरिवर्तन होत नाही. 'माझ्या' (मया/मय्हं) या एकवचनाने स्वतःची निरभिमानता दर्शवणे हा सज्जनांचा आचार आहे. आणि हा अभिन्नपद श्लेष अलंकार आहे, कारण सर्वत्र स्पष्ट शब्दांचा प्रयोग केला आहे. आणि हा श्लेष वक्रोक्तीद्वारे सर्वत्र शोभा वाढवतो. म्हणूनच पुढे म्हटले जाईल - 'वक्रोक्तींमध्ये शलेशन अत्यंत शोभा वाढवतो'. ही येथे संक्षेपाने केलेली अर्थाची मांडणी (स्पष्टीकरण) आहे. विस्ताराने तर अनेक प्रकारे अर्थ स्पष्ट करता येऊ शकतो. परंतु तसे केल्यास ग्रंथाचा विस्तार खूप वाढेल, म्हणून हाच मार्ग स्वीकारला आहे. ၁. သုပရိသုဒ္ဓဗုဒ္ဓိဂေါစရပရမဝိစိတ္တဂန္ထကာရကောယမာစရိယ- သံဃရက္ခိတမဟာသာမိပါဒေါ [Pg.4] သပိဋကတ္တယသဗ္ဗသတ္ထပါရာဝတရဏေန သဉ္ဇာတာနပ္ပကပီတိသုခမနုဘဝံ ပဋိပတ္တိပဋိဝေဓသာသနဒွယဿ ပရိယတ္တိမူလကတ္တာ ယေန ကေနစိ ပရိယာယေန တဿာ ပရိယတ္တိယာ အတ္ထာဝဗောဓေန ‘‘အပ္ပေဝ နာမ သာဓုဇနံ ပရိတောသေယျ’’မိတိ တဒဓိဂမောပါယဘူတမိဒံ ပကရဏမာရဘန္တော ဂန္ထာရမ္ဘေ ဣဋ္ဌဒေဝတာယ ပဏာမကရဏံ သတာစာရာနုရက္ခဏတ္ထံ, ဝိသေသတော အဘိမတဂန္ထဿာနန္တရာယေန ပရိသမတ္တိယာ စ ကာရဏမိတိ ဣဋ္ဌဒေဝတာနုဿရဏံ, ဂန္ထန္တရာရမ္ဘပဋိက္ခေပကဇနပဋိဗာဟနပုဗ္ဗကာနိ အဘိဓာနာဘိဓေယျကရဏပ္ပကာရပယောဇနာနိ စ ဒဿေန္တော ‘‘မုနိန္ဒဝဒနမ္ဘောဇ…ပေ… ပရိဿမော’’တိ ဂါထတ္တယမာဟ. ဧတ္ထ ပဌမဂါထာယ ဣဋ္ဌဒေဝတာသင်္ခါတရတနတ္တယပ္ပဏာမော ဒဿိတော, ဒုတိယဂါထာယ အာရမ္ဘပဋိက္ခေပကဇနာ နိသေဓိတာ, တတိယဂါထာယ အဘိဓာနာဒိကံ ဒဿိတံ. တထာ ဟိ လောကုတ္တရဓမ္မနိဿိတပရိယတ္တိသင်္ခါတသဗ္ဗညုဘာရတိယာ မနောသမ္ပီဏနာသီသနာပဒေသေန အတ္တနော နိဿေသဓမ္မရတနေ ပသာဒေါ ပကာသိတော. သော ပန ဓမ္မပ္ပသာဒေါ တဒဝိနာဘာဝတော ဗုဒ္ဓသံဃေသုပိ သိဒ္ဓေါတိ ရတနတ္တယဝိသယံ ပဏာမံ ဝင်္ကဝုတ္တိယာ ဒဿေတိ. သော ဟိ အတ္ထတော ပဏာမကြိယာဘိနိပ္ဖာဒိကာ ကုသလစေတနာ. ဧတ္ထ ဖလံ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တမေဝ. १. अतिशय परिशुद्ध बुद्धीचे क्षेत्र असलेले आणि अत्यंत विस्तीर्ण व विविध ग्रंथांचे रचनाकार असलेले हे आचार्य संघरक्षित महासामीपाद, तिन्ही पिटक आणि सर्व शास्त्रांमध्ये पारंगत झाल्यामुळे उत्पन्न झालेल्या विपुल प्रीती आणि सुखाचा अनुभव घेत, प्रतिपत्ती (आचरण) आणि प्रतिवेध (साक्षात्कार) या दोन्ही शासनांचे मूळ 'परियत्ती' (धम्मवचन अभ्यास) असल्यामुळे, कोणत्याही प्रकारे त्या परियत्तीच्या अर्थाचे आकलन करून "सज्जन लोकांना आनंद व्हावा" या हेतूने, त्या आकलनाचा उपाय असलेल्या या प्रकरणाचा (ग्रंथाचा) आरंभ करत आहेत. ग्रंथाच्या आरंभी इष्टदेवतेला वंदन करणे हे सत्पुरुषांच्या आचाराचे रक्षण करण्यासाठी आहे, आणि विशेषतः इच्छित ग्रंथ विनाअडथळा पूर्ण व्हावा या कारणासाठी इष्टदेवतेचे स्मरण करणे, तसेच इतर ग्रंथांच्या आरंभाला विरोध करणाऱ्या लोकांचे खंडन करून ग्रंथाचे नाव (अभिधान), विषय (अभिधेय), रचना करण्याची पद्धत आणि प्रयोजन दर्शवत त्यांनी "मुनिन्दवदनम्भोज...पे... परिस्समो" या तीन गाथा म्हटल्या आहेत. येथे पहिल्या गाथेत इष्टदेवता मानल्या गेलेल्या रतनत्तय (त्रिरत्न) ला केलेले वंदन दर्शवले आहे, दुसऱ्या गाथेत ग्रंथाच्या आरंभाला विरोध करणाऱ्या लोकांचे निषेध केले आहे, आणि तिसऱ्या गाथेत ग्रंथाचे नाव इत्यादी दर्शवले आहे. तसेच, लोकोत्तर धम्मावर आधारित असलेल्या आणि 'परियत्ती' नावाच्या सर्वज्ञ बुद्धवाणीने मनाला प्रसन्न करण्याच्या इच्छेच्या बहाण्याने त्यांनी आपल्या संपूर्ण धम्मरत्नावरील श्रद्धा (पसादो) व्यक्त केली आहे. ती धम्मावरील श्रद्धा बुद्ध आणि संघाशी अविनाभावी (अविभाज्य) असल्यामुळे, त्यांनी अप्रत्यक्षपणे (वंकवृत्तीने) त्रिरत्नाप्रतीचे वंदन दर्शवले आहे. कारण अर्थाच्या दृष्टीने वंदनाची क्रिया पूर्ण करणारी ती एक कुशल चेतनाच आहे. याचे फळ खाली (पूर्वीच) सांगितले आहे. ပုန သန္တေသု ရာမသမ္မာဒျလင်္ကာရေသု ပိဋ္ဌပိသနံ ဝိယ ဟောတီဒံ အလင်္ကာရကရဏန္တိ ဝဒန္တာ ဝိရုဒ္ဓဝါဒိနော ရာမသမ္မာဒီနမတ္ထိဘာဝံ ဥဗ္ဘာဝေတွာ တေ သုဒ္ဓမာဂဓိကာ န ဝဠဉ္ဇေန္တီတိ ဣမိနာ ပဋိသိဒ္ဓါ. နိရာကရဏဖလဉှိ ဂန္ထဿ နိဒ္ဒေါသဘာဝေါဝ. အပိစ သဒ္ဒါလင်္ကာရအတ္ထာလင်္ကာရဒီပကေန အလင်္ကာရသဒ္ဒေန [Pg.5] ဂန္ထသရီရသင်္ခါတသညိနော သညာသင်္ခါတအဘိဓာနဉ္စ အလင်္ကာရသဒ္ဒဿ သဒ္ဒါလင်္ကာရာဒျဘိဓေယျဉ္စ သုဒ္ဓမာဂဓိကတ္တံ ဝတွာ အလင်္ကာရသဒ္ဒဿ ဝိသေသနဘူတအနုရူပသဒ္ဒေါပါဒါနေန ဗုဒ္ဓဝစနဿ ဥပယောဂတ္တံ မာဂဓိကဝေါဟာရေန ဘဝတီတိ ဂမျမာနတ္တာ ကရဏပ္ပကာရဉ္စ အလင်္ကာရဂန္ထပ္ပဝတ္တိယာ အတ္ထာလင်္ကာရာဒိနိဿိတတ္တာ ဣမိနာ အလင်္ကာရသဒ္ဒေနေဝ အလင်္ကာရသင်္ခရဏသင်္ခါတပ္ပယောဇနဉ္စ ဒဿေတိ. पुन्हा, "रामसम्मदी (काव्यादर्श इत्यादी संस्कृत अलंकार ग्रंथ) अस्तित्वात असताना, हा अलंकार ग्रंथ तयार करणे म्हणजे पिष्टपेषण (दळलेले पुन्हा दळणे) करण्यासारखे आहे," असे म्हणणाऱ्या विरोधकांचे, रामसम्मदी इत्यादींचे अस्तित्व मान्य करूनही, "ते शुद्ध मागधी (पाली) भाषिक वापरत नाहीत" या विधानाने खंडन केले आहे. कारण खंडनाचे फळ ग्रंथाचे निर्दोषत्व हेच असते. शिवाय, शब्दालंकार आणि अर्थालंकार प्रकाशित करणाऱ्या 'अलंकार' या शब्दाने, ग्रंथशरीररूपी संज्ञेचे नाव (अभिधान) आणि 'अलंकार' शब्दाचा शब्दालंकार इत्यादी अर्थ (अभिधेय) हा शुद्ध मागधी भाषेत आहे असे सांगून, 'अलंकार' शब्दाचे विशेषण असलेल्या योग्य शब्दांच्या वापराने बुद्धवचनाची उपयुक्तता मागधी व्यवहाराने होते हे समजून येत असल्यामुळे रचना करण्याची पद्धत, आणि अलंकार ग्रंथाची प्रवृत्ती अर्थालंकार इत्यादींवर आधारित असल्यामुळे या 'अलंकार' शब्दानेच अलंकारांचे संपादन (संस्कार) करणे हे प्रयोजन दर्शवले आहे. သတ္ထပ္ပယောဇနာနံ သာဓျသာဓနလက္ခဏော သမ္ဗန္ဓော ပန သမ္ဗန္ဓဿ နိဿယဘူတသတ္ထပ္ပယောဇနာနံ ဒဿနေနေဝ တန္နိဿိတတ္တာ သယမ္ပိ ဝုတ္တော ဟောတိ. ဝုတ္တံ ဟိ– शास्त्र आणि प्रयोजन यांमधील साध्य-साधन लक्षण असलेला संबंध तर, त्या संबंधाचे आधार असलेल्या शास्त्र आणि प्रयोजन यांच्या दर्शनानेच, त्यावर आधारित असल्यामुळे स्वतःच सांगितला जातो. कारण असे म्हटले आहे– ‘‘သတ္ထံ ပယောဇနဉ္စေဝ, ဥဘော သမ္ဗန္ဓနိဿယာ; ဝုတ္တာ တံဝုတ္တိယာယေဝ, ဝုတ္တော တန္နိဿိတောပိ သော’’တိ. "शास्त्र आणि प्रयोजन हे दोन्ही संबंधाचे आधार आहेत; त्यांच्या कथनानेच त्यावर आधारित असलेला तो संबंध देखील सांगितला जातो." တဿတ္ထော– သမ္ဗန္ဓနိဿယာ သမ္ဗန္ဓဿ အာဓာရဘူတာ သတ္ထံ, ပယောဇနဉ္စ ဥဘော ဝုတ္တာ, တံဝုတ္တိယာယေဝ တေသံ ဥဘိန္နံ ကထနေနေဝ တန္နိဿိတော တေ နိဿာယ ပဝတ္တော သောပိ သမ္ဗန္ဓော ဝုတ္တော ဘဝတီတိ. त्याचा अर्थ असा– संबंधाचे आधार असलेले शास्त्र आणि प्रयोजन हे दोन्ही सांगितले असता, त्यांच्या कथनानेच म्हणजेच त्या दोघांच्या बोलण्यानेच, त्यावर आधारित असलेला आणि त्यांचा आश्रय घेऊन प्रवृत्त झालेला तो संबंध देखील सांगितला जातो. ဧတ္ထ အဘိဓာနကထနံ ဝေါဟာရသုခတ္ထံ, အဘိဓေယျာဒိကထနံ ပန တေဟိ ယုတ္တာနံယေဝ ဂန္ထာနံ သုဗုဒ္ဓိပုဗ္ဗကာဒီနံ ဥပါဒေယျတ္တဉ္စ တဗ္ဗိပရီတာနံ ဥမ္မတ္တကဝစနာဒီနမိဝအနုပါဒေယျတ္တဉ္စ ပကာသနတ္ထန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဝုတ္တဉှိ – येथे नावाचे (अभिधानाचे) कथन हे व्यवहाराच्या सुलभतेसाठी आहे, तर विषयाचे (अभिधेयाचे) इत्यादींचे कथन हे त्या विषयांनी युक्त असलेल्या आणि सुबुद्धीपूर्वक रचलेल्या ग्रंथांची स्वीकार्यता (उपादेयता) दर्शवण्यासाठी आणि त्याविपरीत असलेल्या वेड्याच्या बडबडीसारख्या ग्रंथांची अस्वीकार्यता (अनुपादेयता) प्रकट करण्यासाठी आहे, असे समजावे. कारण असे म्हटले आहे – ‘‘သမ္ဗန္ဓာနုဂုဏောပါယံ, ပုရိသတ္ထာဘိဓာယကံ; ဝီမံသာဓိဂတံ ဝါကျ-မတောနဓိဂတံ ပရ’’န္တိ. "संबंधाला अनुकूल असा उपाय असलेले, python (मानवी ध्येय) सांगणारे आणि मीमांसेने (विचाराने) प्राप्त झालेले वाक्यच (स्वीकारार्ह आहे), याव्यतिरिक्त इतर (वाक्य) स्वीकारार्ह नाही." တဿတ္ထော– သမ္ဗန္ဓာနုဂုဏောပါယံ သာဓိယသာဓနလက္ခဏသမ္ဗန္ဓဿ နိဿယဘူတဝါစ္စဝါစကာနံ သမ္ဗန္ဓိဘူတာနံ အညမညာနုရူပဂုဏပရိဇာနနေ ကာရဏဘူတံ ပုရိသတ္ထာဘိဓာယကံ စတုဗ္ဗိဓဓမ္မအတ္ထကာမမောက္ခသင်္ခါတာနံ ပုရိသတ္ထာနံ ဝါစကဘူတံ [Pg.6] ဝါကျံ ‘‘ဧကာချာတော ပဒစ္စယော, သိယာ ဝါကျံ သကာရကော’’တိ ဝုတ္တလက္ခဏမဇ္ဈပတိတဝါကျသမုဒါယောပေတံ မဟာဝါကျသရူပသတ္ထံ ဝီမံသာဓိဂတံ ဉာဏဂတိလက္ခဏဥပပရိက္ခာယ အဓိဂတံ အဓိပ္ပေတံ, အတော ပရံ ဝုတ္တလက္ခဏသတ္ထတော အညံ အနဓိဂတံ နာဓိပ္ပေတန္တိ. ဣဒံ ပနေတ္ထ ဂါထာနံ နိက္ခေပပ္ပယောဇနံ. त्याचा अर्थ असा– 'संबंधानुकूलोपाय' म्हणजे साध्य-साधन लक्षण असलेल्या संबंधाचे आधार असलेल्या वाच्य (प्रतिपाद्य विषय) आणि वाचक (शब्द) या संबंधितांच्या परस्परांना अनुरूप अशा गुणांचे ज्ञान करून देण्यास कारणीभूत असलेले. 'पुरुषार्थाभिधायक' म्हणजे धम्म, अत्थ (अर्थ), काम आणि मोक्ख (मोक्ष) या संज्ञेच्या चार प्रकारच्या पुरुषार्थांचे प्रतिपादन करणारे. 'वाक्य' म्हणजे "एक क्रियापद आणि कारकांसह असलेला पदांचा समूह हे वाक्य होय" या सांगितलेल्या लक्षणांतर्गत येणाऱ्या वाक्यसमुदायाने युक्त असलेले महावाक्यरूपी शास्त्र. 'मीमांसाधिगत' म्हणजे ज्ञानाच्या गतीचे लक्षण असलेल्या परीक्षणाने प्राप्त झालेले (अभिप्रेत असलेले). 'याव्यतिरिक्त' म्हणजे सांगितलेल्या लक्षणांच्या शास्त्रापेक्षा वेगळे असलेले, जे अप्राप्त (अनभिप्रेत) आहे. हेच येथे गाथांच्या मांडणीचे प्रयोजन आहे. လောကေ ပဒုမဂဗ္ဘေ ဝသန္တိယာ သဗ္ဗင်္ဂဓဝလာယ ယထိစ္ဆိတတ္ထသာဓိကာယ သရဿတီနာမိကာယ ဒေဝတာယ ‘‘ဝါဏီ’’တိ ဝေါဟာရတော ဣမိနာ အတ္ထေန ယောဇေတွာ အဘိန္နပဒသိလေသာလင်္ကာရဝသေန ဝုတ္တတ္တာ ပဒတ္ထော ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗော – မုနိန္ဒဿ သောဘာသုဂန္ဓာဒိဂုဏယောဂတော မုခသဒိသဿ, နော စေ မုခသင်္ခါတအမ္ဘောဇဿ ဂဗ္ဘေ ဥဒရေ သမ္ဘဝေန ပဝတ္တိယာ ဥပ္ပတ္တိယာ ဝါ သုန္ဒရီ နိဒ္ဒေါသာ, သောဘနာ ဝါ ပါဏိနံ သရဏံ အတောယေဝ အဟိတာပနယနဟိတာဝဟတ္ထေန သဗ္ဗသတ္တာနံ ပဋိဿရဏဘူတာ ဝါဏီ ယထာဝုတ္တဂုဏောပေတာ သရဿတီဒေဝတာ, နော စေ သဗ္ဗညုဘာရတီတိ ဝုတ္တသဒ္ဓမ္မရတနံ မယှံ မနံ ဂန္ထဝိရစနေ ဗျာဝဋဿ မေ စိတ္တံ ပီဏယတံ အဘိမတတ္ထသမ္ပာဒနေန ပီဏယတူတိ. जगात कमळाच्या गर्भात राहणाऱ्या, सर्व अंगांनी धवल (पांढऱ्या) असलेल्या, इच्छित अर्थ पूर्ण करणाऱ्या 'सरस्वती' नावाच्या देवतेसाठी 'वाणी' असा व्यवहार होत असल्यामुळे, या अर्थाशी जोडून आणि अभिन्नपद श्लेष अलंकाराच्या (अभिन्नपदसिलेस) प्रभावाने म्हटल्यामुळे, पदांचा अर्थ असा समजावा – मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) शोभा, सुगंध इत्यादी गुणांच्या योगाने मुखासारख्या असलेल्या, किंवा मुखरूपी कमळाच्या गर्भातून (उदरातून) उत्पन्न झाल्यामुळे किंवा प्रवृत्त झाल्यामुळे सुंदर, निर्दोष किंवा शोभिवंत असलेली; प्राण्यांचे शरण असलेली, म्हणूनच अहित दूर करून हित करणाऱ्या हाताने सर्व प्राण्यांचा आश्रय बनलेली; अशा पूर्वोक्त गुणांनी युक्त असलेली 'वाणी' म्हणजेच सरस्वती देवी, किंवा 'सर्वज्ञभारती' (बुद्धवाणी) नावाचे सद्धम्मरत्न, ग्रंथ रचण्यात मग्न असलेल्या माझ्या मनाला (चित्ताला) इच्छित अर्थाची प्राप्ती करून देऊन प्रसन्न करो. ဥဘယလောကဇာနနတော မုနိ စ သော ဣန္ဒဘာဝပဝတ္တနတော ဣန္ဒော စေတိ ကမ္မဓာရယေန ဝါ, အဂါရိယမုနိအနဂါရိယမုနိသေခမုနိအသေခမုနီနံ စတုန္နံ ပဉ္စမော ဟုတွာ ဣန္ဒောတိ ဆဋ္ဌီတပ္ပုရိသေန ဝါ မုနိန္ဒော. ဒေဝတာပက္ခေ ဝဒနမိဝ ဝဒနန္တိ အမ္ဘောဇေ, သဒ္ဓမ္မပက္ခေ အမ္ဘောဇမိဝ အမ္ဘောဇန္တိ ဝဒနေ စ ဥပစာရေန ဂဟိတေ ကမ္မဓာရယော. မုနိန္ဒဿ ဝဒနမ္ဘောဇမိတိ စ, တဿ ဂဗ္ဘောတိ စ, တသ္မိံ သမ္ဘဝေါတိ စ, တေန သုန္ဒရီတိ စ ဝါကျံ. ဝါဏိယာ ဝိသေသနတ္တေပိ ဧကန္တနပုံသကတ္တာ သရဏသဒ္ဒဿ န လိင်္ဂပရိဝတ္တနဘာဝေါ. ပါဏိနန္တိ ရဿတ္တံ, ဒီဃဿ ဗျဘိစာရတ္တာ. မယှန္တိ ဧကဝစနေန အတ္တနော သာဓုဂုဏောဒယကာရဏံ [Pg.7] နိရတိမာနတံ ဒီပေတိ. သန္တေသုပိ အညေသု ဇိနပရိယာယေသု မုနိန္ဒသဒ္ဒေါ ဣဋ္ဌမနောသမ္ပီဏနအမ္ဘောဇတုလျတာသုန္ဒရိတ္တသရဏတ္တသင်္ခါတာနံ အတ္ထန္တရာနံ ဩစိတျံ ပေါသေတီတိ ပယုတ္တော. တထာ ဟိ တာဒိသဿ မုခံ အမ္ဘောဇတုလျံ, တသ္မိံ မုခေါဒရေ သမ္ဘဝါ သုန္ဒရီ, တတောယေဝ ပါဏိနံ သရဏံ. တသ္မာယေဝ မနောသမ္ပီဏနေ ပဋုတ္တံ သုဗျတ္တမိတိ ဩစိတျံ ဟောတိ. လောကေ ပတ္ထဋမိဒမောစိတျမာဒရဏီယံ ဟောတိ. တသ္မိဉှိ ဥတ္တမကဝယောယေဝ ဥပဒေသကာတိ. ဝုတ္တဉှိ – दोन्ही लोकांचे ज्ञान असल्यामुळे ते 'मुनी' आहेत आणि इंद्रत्वाचे (प्रभुत्वाचे) प्रवर्तन करत असल्यामुळे 'इंद्र' आहेत, अशा प्रकारे कर्मधारय समासाने; किंवा गृहस्थ-मुनी (अगारियमुनी), अनागारिय-मुनी, शैक्ष-मुनी (सेखमुनी) आणि अशैक्ष-मुनी (असेखमुनी) या चार मुनींनंतर पाचवे असणारे इंद्र (श्रेष्ठ) या अर्थाने षष्ठी तत्पुरुष समासाने 'मुनिंद' (मुनींद्र) हा शब्द सिद्ध होतो. देवतेच्या पक्षात मुखासारखे मुख कमळामध्ये, आणि सद्धम्माच्या पक्षात कमळासारखे कमळ मुखामध्ये, अशा उपचाराने ग्रहण केल्यास कर्मधारय समास होतो. 'मुनिंदांचे वदनकमळ', 'त्याचा गर्भ (अंतरंग)', 'त्यात उत्पन्न झालेली', आणि 'त्यामुळे सुंदरी (वाणी)' असे हे वाक्य आहे. 'वाणी' चे विशेषण असूनही, 'शरण' हा शब्द एकांततः (नित्य) नपुंसकलिंगी असल्यामुळे त्याचे लिंगपरिवर्तन होत नाही. 'पाणिनां' यामध्ये र्हस्वत्व आहे, कारण दीर्घत्वाचा व्यभिचार (अपवाद) होतो. 'मय्हं' (माझ्यासाठी) या एकवचनाने स्वतःच्या साधुगुणांच्या उदयाचे कारण असलेली निरभिमानता प्रकट होते. जिनांचे (बुद्धांचे) इतरही अनेक पर्यायशब्द असताना 'मुनिंद' हा शब्द वापरला आहे, कारण तो इष्ट मनाचे समाधान करणे, कमळाशी समानता, सौंदर्य आणि शरणत्व या विविध अर्थांचे औचित्य पोषित करतो. कारण अशा (मुनिंदांचे) मुख कमळासारखे आहे, त्या मुखकमळातून उत्पन्न झालेली वाणी सुंदरी आहे, आणि म्हणूनच ती प्राण्यांचे शरण आहे. म्हणूनच मनाचे रंजन करण्यात तिचे नैपुण्य स्पष्टपणे व्यक्त होते, हेच औचित्य आहे. जगात पसरलेले हे औचित्य आदरणीय असते. कारण त्याविषयी उत्तम कवीच उपदेशक असतात. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘ဩစိတျံ နာမ ဝိညေယျံ, လောကေ ဝိချာတမာဒရာ; တတ္ထောပဒေသပ္ပဘဝါ, သုဇနာ ကဝိပုင်္ဂဝါ’’တိ. “औचित्य हे जाणले पाहिजे, जे जगात आदराने प्रसिद्ध आहे; त्याविषयी उपदेश करण्यात समर्थ असणारे सुजन हे कवींमध्ये श्रेष्ठ (कविपुंगव) असतात.” နိမိတ္တဝဏ္ဏနာ निमित्त-वर्णन ၂. २. ရာမသမ္မာဒျလင်္ကာရာ, သန္တိ သန္တော ပုရာတနာ; တထာပိ တု ဝဠဉ္ဇေန္တိ, သုဒ္ဓမာဂဓိကာ န တေ. रामसम्म इत्यादी प्राचीन व सुंदर अलंकार अस्तित्वात आहेत; तरीही शुद्ध मागधी भाषेचा वापर करणारे त्यांचा उपयोग करत नाहीत. ၂. အထေဝမဘိဂတာမိတသိဒ္ဓိသမ္ပဒါပါဒနေကစတုရပရမိဋ္ဌဒေဝတာ- ဘာဝရူပိတသဒ္ဓမ္မရတနဿော’ ပဒဿိတနိပစ္စကာရေန ဣဋ္ဌဒေဝတာပူဇံ ဒဿေတွာ ‘‘နနု ဗန္ဓလက္ခဏမတ္ထိယေဝ ပုဗ္ဗကံ, တသ္မာ ကိမနေန ပိဋ္ဌပိသနေနေ’’တိ လက္ခဏန္တရာရမ္ဘပဋိက္ခေပကဇနပဋိဗာဟနပုဗ္ဗကမဘိဓေယျပ္ပယောဇန- သမ္ဗန္ဓေ ဒဿေတုမာဟ ‘‘ရာမသမ္မေ’’စ္စာဒိ. ရာမသမ္မာဒီနံ ရာမသမ္မပဘုတီနံ ပုဗ္ဗာစရိယာနံ, ရာမသမ္မာဒယော ဝါ တံသမ္ဗန္ဓတော. ဘဝတိ ဟိ တံသမ္ဗန္ဓတော တဗ္ဗောဟာရော ယထာ ကိဉ္စိပိ ဝေဇ္ဇသတ္ထံ ‘‘ဗိမ္ဗိသာရော’’တိ. အလင်္ကာရာ ဘူသာဝိသေသာ, ဗန္ဓာလင်္ကာရပဋိပါဒကတ္ထေန အလင်္ကာရချာ ဂန္ထဝိသေသာ ဝါ. သန္တော သောဘနာ. ဒွေပိ ပုရာ ပုဗ္ဗကာလေ ဘဝါ ပုရာတနာ, ပေါရာဏိကာ. ဥဘောပိ သန္တိ. ယဇ္ဇပိ သံဝိဇ္ဇန္တိ. တထာပိ တူတိ နိပါတသမုဒါယောယံ [Pg.8] ဝိသေသာဘိဓာနာရမ္ဘေ. ဧဝံ သန္တေပီတိ အတ္ထော. သုဒ္ဓမာဂဓိကာတိ မဂဓေသု ဘဝါ, တတ္ထ ဝိဒိတာ ဝါ မဂဓာ, သဒ္ဒါ. တေ ဧတေသံ သန္တိ, တေသု ဝါ နိယုတ္တာတိ မာဂဓိကာ. သုဒ္ဓါ စ သက္ကဋာဒိဘာသိတကာလုသိယာဘာဝေန ဝိသုဒ္ဓါ, အသမ္မိဿာ ဝါ အပရိစိတတ္တာ တေ မာဂဓိကာ စာတိ သုဒ္ဓမာဂဓိကာ, ယတိပေါတာ. တေ ယထာဝုတ္တေ အလင်္ကာရေ အာဘရဏဝိသေသေ န ဝဠဉ္ဇေန္တိ, ပသာဓနဝိသေသေ နာနုဘဝန္တိ. ဂန္ထဝိသေသေ ပန ဥဂ္ဂဟဏဓာရဏာဒိဝသေန အတ္တနော သုဒ္ဓမာဂဓိကတ္တာ, ရာမသမ္မာဒီနဉ္စ သက္ကဋာဒိဘာဝတောတိ အယမေတ္ထ သဒ္ဒတ္ထော. ဘာဝတ္ထလေသောပေတ္ထ ပရိပူရတိ, တထာဝိဓပတီတိယောဂတော. သုဒ္ဓမာဂဓိကာ အတ္တနော ပရိသုဒ္ဓဘာဝေန ပုဗ္ဗေ သောဘနာပိ တေ အလင်္ကာရာ ဣဒါနိ မလဂ္ဂဟိတဘာဝပ္ပတ္တာ ‘‘ကိံ တေဟိ မလဂ္ဂဟိတေဟိ အမှာဒိသာနံ သုဒ္ဓသတ္တာန’’န္တိ န ဝဠဉ္ဇေန္တီတိ. २. अशा प्रकारे, प्राप्त झालेल्या अमर्याद सिद्धी आणि संपत्ती प्रदान करण्यात अत्यंत चतुर अशा इष्टदेवतेच्या रूपात असलेल्या सद्धम्मरत्नाला नम्रतेने वंदन करून इष्टदेवतेची पूजा दाखवल्यानंतर, “पूर्वीचे काव्यलक्षण अस्तित्वात आहेच, तर मग या पिष्टपेषणाची (पुन्हा पुन्हा सांगण्याची) काय गरज?” असा आक्षेप घेऊन नवीन लक्षण ग्रंथाच्या आरंभाला विरोध करणाऱ्या लोकांचे खंडन करण्यासाठी, अभिधेय (विषय), प्रयोजन आणि संबंध दर्शवण्यासाठी “रामसम्मे” इत्यादी गाथा म्हणतात. 'रामसम्म' इत्यादी म्हणजे रामसम्म इत्यादी पूर्वाचार्यांचे, किंवा त्यांच्या संबंधामुळे 'रामसम्म' इत्यादी नाव पडले आहे. कारण संबंधामुळे तसा व्यवहार होतो, जसे की एखाद्या वैद्यकशास्त्राला 'बिंबिसार' म्हटले जाते. 'अलंकार' म्हणजे भूषणांचे प्रकार, किंवा काव्याच्या अलंकारांचे प्रतिपादन करणारे 'अलंकार' नावाचे ग्रंथविशेष. 'संतो' म्हणजे सुंदर, शोभिवंत. दोन्हीही प्राचीन काळातील असल्यामुळे 'पुराण' किंवा 'पौराणिक' आहेत. दोन्हीही 'संती' म्हणजे अस्तित्वात आहेत, जरी ते उपलब्ध आहेत. 'तथापि तु' हा निपातसमूह विशेष विधानाचा आरंभ करण्यासाठी आहे. 'असे असूनही' असा याचा अर्थ आहे. 'शुद्धमागधिक' म्हणजे मगध देशात उत्पन्न झालेले किंवा तेथे प्रसिद्ध असलेले मागध शब्द. जे या शब्दांचा वापर करतात किंवा त्यात निपुण आहेत ते 'मागधिक'. आणि जे संस्कृत इत्यादी भाषांच्या मिश्रणाने होणाऱ्या दोषांपासून मुक्त असल्यामुळे 'शुद्ध' आहेत, किंवा अमिश्रित असल्यामुळे आणि अपरिचित नसल्यामुळे ते मागधिक आहेत, ते 'शुद्धमागधिक' होत, म्हणजेच यतिपुत्र (भिक्खू). ते वर सांगितलेल्या अलंकारांचा (आभूषणांचा) उपयोग करत नाहीत, सौंदर्यप्रसाधनांच्या रूपात त्यांचा अनुभव घेत नाहीत. ग्रंथविशेषांच्या बाबतीत मात्र, स्वतः शुद्धमागधिक असल्यामुळे आणि रामसम्म इत्यादी ग्रंथ संस्कृत इत्यादी भाषांमध्ये असल्यामुळे, ते अध्ययन-धारणा इत्यादींद्वारे त्यांचा स्वीकार करत नाहीत, हा येथे शब्दाचा अर्थ आहे. अशा प्रकारच्या प्रतीतीचा संबंध असल्यामुळे येथे भावार्थ देखील पूर्ण होतो. शुद्धमागधिक लोक आपल्या अत्यंत शुद्ध स्वभावामुळे, पूर्वी सुंदर असलेले परंतु आता मलीन झालेले ते अलंकार “आमच्यासारख्या शुद्ध प्राण्यांना अशा मलीन अलंकारांचे काय काम?” असे म्हणून वापरत नाहीत. ‘‘ပတီယမာနံ ပန ကိဉ္စိ ဝတ္ထု,အတ္ထေဝ ဝါဏီသု မဟာကဝီနံ; ယံ တံ ပသိဒ္ဓါဝယဝါတိရိတ္တ-မာဘာတိ လာဝဏျမိဝင်္ဂနာသူ’’တိ. “परंतु महाकवींच्या वाणीमध्ये प्रतीत होणारी अशी काही गोष्ट (अर्थ) नक्कीच असते, जी स्त्रियांच्या शरीरात प्रसिद्ध अवयवांपेक्षा अतिरिक्त असणाऱ्या लावण्याप्रमाणे भासते.” ဟိ ဝုတ္တံ. असे म्हटले आहे. ၂. သန္တော ဝိညူဟိ ပသတ္ထတ္တာ သောဘနာ ပုရာတနာ ပုဗ္ဗကာလသမ္ဘူတာ ရာမသမ္မာဒျလင်္ကာရာ ရာမသမ္မာဒီဟိ အာစရိယေဟိ ဝိရစိတတ္တာ, တေသံ တံသမ္ဗန္ဓတော တဗ္ဗောဟာရသဒိသနာမတ္တာ ဝါ ရာမသမ္မာဒယော နာမ အလင်္ကာရာ ကိသ္မိဉ္စိ ဝေဇ္ဇသတ္ထေ ‘‘ဗိမ္ဗိသာရော’’တိ ဝေါဟာရော ဝိယ. အလင်္ကာရာ ဘူသာဝိသေသာ, အလင်္ကာရတ္တပဋိပါဒနတော အလင်္ကာရနာမိကာ ဂန္ထဝိသေသာ ဝါ သန္တိ ကိဉ္စာပိ ဝိဇ္ဇန္တိ, တထာပိ တု ဧဝံ သန္တေပိ သုဒ္ဓမာဂဓိကာ သက္ကဋပါကတာဒီသု အညဘာသာသု ပရိစယာဘာဝတော ကေဝလမာဂဓိကာ တေ ရာမသမ္မာဒိကေ အလင်္ကာရေ န ဝဠဉ္ဇေန္တိ ပသာဓနဝသေန, ဥဂ္ဂဟဏဓာရဏာဒိဝသေန [Pg.9] န သေဝန္တိ. မဂဓေသု ဘဝါ, တေသု ဝါ ဝိဒိတာ မဂဓာ, သဒ္ဒါ. တေ ဧတေသံ အတ္ထိ, တေသု နိယုတ္တာတိ ဝါ မာဂဓိကာ. သုဒ္ဓသဒ္ဒေါ မဂဓဝိသေသနော, မာဂဓိကဝိသေသနော ဝါ ဟောတိ. သဒ္ဒါနံ တာဒိသပတီတိဝိသေသယောဂတော ဘာဝတ္ထလေသောပိ ဣဓ ဒိပ္ပတိ. တထာ ဟိ သုဒ္ဓမာဂဓိကာ အတ္တနော သုဒ္ဓတ္တာ တေသံ ဝိနျာသေန သောဘနတ္တေ သတိပိ ဘာသာယ ပုရာတနတ္တာ အပရိသုဒ္ဓေါတိ အဝမညမာနာ န ဝဠဉ္ဇေန္တီတိ. ဝတ္တိစ္ဆိတဿတ္ထဿ ဥပတ္ထမ္ဘကဘူတော ဘာဝတ္ထလေသောပိ မဟာကဝီနံ ဝစနေသုယေဝ လဗ္ဘတီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဝုတ္တံ ဟိ– २. विद्वानांनी प्रशंसा केल्यामुळे जे सुंदर (संतो) आहेत, प्राचीन काळी निर्माण झालेले आहेत, रामसम्म इत्यादी आचार्यांनी रचलेले असल्यामुळे किंवा त्यांच्या संबंधामुळे तशाच नावाचे व्यवहार असणारे 'रामसम्म' इत्यादी अलंकार आहेत, जसे की एखाद्या वैद्यकशास्त्रात 'बिंबिसार' असा व्यवहार होतो. 'अलंकार' म्हणजे भूषणांचे प्रकार, किंवा अलंकारत्वाचे प्रतिपादन करत असल्यामुळे 'अलंकार' नावाचे ग्रंथविशेष अस्तित्वात आहेत, जरी ते उपलब्ध आहेत; तरीही असे असूनही, शुद्धमागधिक लोक संस्कृत, प्राकृत इत्यादी इतर भाषांचा परिचय नसल्यामुळे केवळ मागधी भाषेचा वापर करणारे असल्यामुळे, ते रामसम्म इत्यादी अलंकारांचा प्रसाधनाच्या रूपाने उपयोग करत नाहीत, किंवा अध्ययन-धारणा इत्यादींद्वारे त्यांचे सेवन करत नाहीत. मगध देशात उत्पन्न झालेले किंवा तेथे प्रसिद्ध असलेले मागध शब्द. जे या शब्दांचा वापर करतात किंवा त्यात निपुण आहेत ते 'मागधिक'. 'शुद्ध' हा शब्द 'मागध' चे विशेषण आहे किंवा 'मागधिक' चे विशेषण आहे. शब्दांच्या अशा विशिष्ट प्रतीतीच्या संबंधामुळे येथे भावार्थ देखील प्रकाशित होतो. कारण शुद्धमागधिक लोक स्वतःच्या शुद्धतेमुळे, त्या अलंकारांच्या रचनेत सौंदर्य असूनही, भाषेच्या प्राचीनतेमुळे ते अपवित्र आहेत असे मानून त्यांचा उपयोग करत नाहीत. वक्त्याला अभिप्रेत असलेल्या अर्थाचा पोषक असणारा भावार्थ देखील महाकवींच्या वचनांमध्येच प्राप्त होतो, असे समजले पाहिजे. कारण म्हटले आहे – ‘‘ပတီယမာနံ ပန ကိဉ္စိ ဝတ္ထု,အတ္ထေဝ ဝါဏီသု မဟာကဝီနံ; ယံ တံ ပသိဒ္ဓါဝယဝါတိရိတ္တ-မာဘာတိ လာဝဏျမိဝင်္ဂနာသူ’’တိ. “परंतु महाकवींच्या वाणीमध्ये प्रतीत होणारी अशी काही गोष्ट (अर्थ) नक्कीच असते, जी स्त्रियांच्या शरीरात प्रसिद्ध अवयवांपेक्षा अतिरिक्त असणाऱ्या लावण्याप्रमाणे भासते.” တဿတ္ထော – မဟာကဝီနံ ပူဇိတကဝီနံ ဝါဏီသု ဝစနဝိသေသေသု ပတီယမာနံ ဂမ္မမာနံ ယံ ကိဉ္စိ ဝတ္ထု ယော ကောစိ အတ္ထလေသော အတ္ထေဝ အတ္ထိ ဧဝ, တံ ဝတ္ထု အင်္ဂနာသု ဝနိတာသု ပသိဒ္ဓါဝယဝါတိရိတ္တံ ဟတ္ထပါဒါဒိပါကဋသရီရာဝယဝတော အဓိကံ လာဝဏျမိဝ မနောဂေါစရီဘူတသုန္ဒရတ္တံ ဝိယ ပသိဒ္ဓါဝယဝါတိရိတ္တံ ပကာသသဒ္ဒါဝယဝတော အဓိကံ ဟုတွာ အာဘာတိ ဒိပ္ပတီတိ. त्याचा अर्थ असा – महाकवींच्या म्हणजेच पूजनीय कवींच्या वाणीमध्ये, विशिष्ट वचनांमध्ये प्रतीत होणारा किंवा समजणारा जो काही अर्थविशेष (वस्तू) नक्कीच असतो, तो अर्थ स्त्रियांमध्ये (वनितांमध्ये) हात, पाय इत्यादी प्रसिद्ध शरीरावयवांपेक्षा अतिरिक्त असणाऱ्या लावण्याप्रमाणे (मनाला जाणवणाऱ्या सौंदर्याप्रमाणे), प्रसिद्ध शब्दावयवांपेक्षा अतिरिक्त होऊन प्रकाशित होतो, शोभून दिसतो. အဘိဓာနာဒိဝဏ္ဏနာ अभिधान-आदींचे वर्णन ၃. ३. တေနာပိ နာမ တောသေယျ-မေတေ’လင်္ကာရဝဇ္ဇိတေ; အနုရူပေနာ’လင်္ကာရေ-နေ’သမေသော ပရိဿမော. त्यामुळे, अलंकारांनी रहित असलेल्या या (मागधी भाषेचा वापर करणाऱ्यांना) अनुरूप अलंकाराने संतुष्ट करावे, याच उद्देशाने हा आमचा परिश्रम आहे. ၃. တေနေစ္စာဒိ. ယေန တေ အလင်္ကာရေ န ဝဠဉ္ဇေန္တိ, တေန ကာရဏေန အလင်္ကာရဝဇ္ဇိတေ အာဘရဏေဟိ, ဂန္ထဝိသေသေဟိ ဝါ ရဟိတေ, အလင်္ကာရာ ဝါ ယထာဝုတ္တဝဇ္ဇိတာ ယေဟိ [Pg.10] တေ, ဧတေ ယတိပေါတေ ဧသံ ယတိပေါတာနံ အနုရူပေန ဣဒါနိ ဝိရစိယမာနတ္တာဘိနဝဘာဝတော, ဒသဗလဝဒနကမလမဇ္ဈဝါသိတဘာသိတဝိရစိတဘာဝတော စ အနုစ္ဆဝိကေန အလင်္ကာရေန အာဘရဏေန, အလင်္ကာရသတ္ထေန ဝါ တောသေယျံ အပိနာမ ယထိစ္ဆိတပသာဓနဝသေန, သဝနဓာရဏာဒိဝသေန ဝါ ဝဠဉ္ဇနေန သန္တုဋ္ဌေ ကရေယျံ အပ္ပေဝ နာမ ယန္နူနာတိ ဧသော ပရိဿမော အယံ အမှာကံ တာဒိသသန္တုဋ္ဌိဇနကာလင်္ကာရပကရဏပ္ပယောဂေါ. ३. तेनेच्चादि (त्या कारणाने इत्यादी). ज्या कारणाने ते अलंकारांचा वापर करत नाहीत, त्या कारणाने अलंकाररहित, म्हणजे विशिष्ट आभूषणांनी किंवा ग्रंथविशेषांनी रहित; किंवा ज्यांच्याद्वारे पूर्वोक्त अलंकार वर्जित आहेत ते; या तरुण भिक्खूंना (यतिपोतांना) त्यांच्या अनुरूप, आता रचले जात असल्यामुळे नूतन भावाने, आणि दसबल (बुद्ध) यांच्या मुखकमलातून प्रवृत्त झालेल्या भाषितातून रचले गेल्यामुळे, योग्य अशा अलंकाराने (आभूषणाने) किंवा अलंकारशास्त्राने मी संतुष्ट करावे. कदाचित त्यांच्या इच्छित प्रसाधनाद्वारे किंवा श्रवण-धारणा इत्यादीद्वारे वापर केल्याने मी त्यांना संतुष्ट करावे; हा आमचा तशा प्रकारचा संतोष निर्माण करणाऱ्या अलंकार-प्रकरणाचा (ग्रंथाचा) प्रयोग करण्याचा परिश्रम आहे. အလင်္ကရောန္တိ အတ္တဘာဝမနေနာတိ အလင်္ကာရော, အာဘရဏံ ဟာရကေယူရာဒိ. အလင်္ကရောန္တိ ဗန္ဓသရီရမနေနာတိ အလင်္ကာရောတိမိနာ ပန အလင်္ကာရသဒ္ဒေန ပသာဒါဒယော သဒ္ဒါလင်္ကာရာ, သဘာဝဝုတျာဒယော စ အတ္ထာလင်္ကာရာ နာနပ္ပကာရာ သင်္ဂဟိတာ, ယေဟိ သဒ္ဒတ္ထသင်္ခါတံ ဗန္ဓသရီရံ သောဘတေ, ယထာ ဟိ ပုရိသသရီရေ ဟာရကေယူရာဒျလင်္ကာရော နျသျတေ, ယေန သောဘတေ, တထာ ဗန္ဓသရီရေပိ သဒ္ဒါလင်္ကာရာ, အတ္ထာလင်္ကာရာ စ နိက္ခိပီယန္တိ, ယတော သောဘတေ. တေနေဝ ဝက္ခတိ ‘‘တံ တု ပါပေန္တုလင်္ကာရာ, ဝိန္ဒနီယတရတ္တန’’န္တိ စ, ‘‘အတ္ထာလင်္ကာရသဟိတေ’’စ္စာဒိကဉ္စ. ज्याद्वारे आत्मभावाला (शरीराला) अलंकृत करतात तो 'अलंकार' होय, जसे की हार, केयूर (बाजूबंद) इत्यादी आभूषणे. ज्याद्वारे रचनेच्या शरीराला (काव्यशरीराला) अलंकृत करतात तो 'अलंकार' होय. या अलंकार शब्दाने प्रसाद इत्यादी शब्दालंकार आणि स्वभावोक्ती इत्यादी विविध प्रकारचे अर्थालंकार समाविष्ट केले जातात, ज्यांच्याद्वारे शब्द आणि अर्थाने युक्त असलेले रचना-शरीर शोभून दिसते. ज्याप्रमाणे मनुष्याच्या शरीरावर हार, केयूर इत्यादी अलंकार घातले जातात, ज्याने ते शोभून दिसते, त्याचप्रमाणे रचना-शरीरातही शब्दालंकार आणि अर्थालंकार योजले जातात, ज्याने ते शोभून दिसते. म्हणूनच पुढे म्हटले जाईल— "ते अलंकार त्याला अधिक आस्वादनीय बनवतात" आणि "अर्थालंकाराने युक्त" इत्यादी. အလင်္ကာရဝိဓာနဘာဝေန တု ဗန္ဓသရီရမ္ပိ တဒတ္ထိယာ အလင်္ကာရော, တထာ တပ္ပဋိပါဒကံ သုဗောဓာလင်္ကာရနာမဓေယျသတ္ထံ အလင်္ကတပဋိပါဒကတ္တေန မင်္ဂလသုတ္တန္တိ ဝိယ. ဝက္ခတိ ဟိ ‘‘ဂန္ထောပိ ကဝိဝါစာန-မလင်္ကာရပ္ပကာသကော’’ စ္စာဒိ. အတြ ဥစ္စတေ – परंतु अलंकार-विधानाच्या स्वरूपात रचना-शरीर देखील त्या हेतूने 'अलंकार' ठरते; त्याचप्रमाणे त्याचे प्रतिपादन करणारे 'सुबोधालंकार' नावाचे शास्त्र देखील अलंकृत गोष्टीचे प्रतिपादन करत असल्यामुळे (अलंकार म्हटले जाते), जसे की 'मंगळसुत्त' (मंगलकारक असल्यामुळे मंगळसुत्त म्हटले जाते). कारण पुढे म्हटले जाईल— "हा ग्रंथ देखील कवींच्या वाणीच्या अलंकाराला प्रकाशित करणारा आहे" इत्यादी. येथे म्हटले आहे— ‘‘မုချောလင်္ကာရသဒ္ဒေါယံ, သဒ္ဒတ္ထာလင်္ကတိဿိတော; သာမတ္ထိယာ တွဓိဋ္ဌာနေ, တထာ သတ္ထေပိ တဗ္ဗတီ’’တိ. "हा 'अलंकार' शब्द मुख्यत्वे शब्द आणि अर्थाच्या अलंकारांवर आश्रित आहे; परंतु सामर्थ्यामुळे (लाक्षणिकतेने) तो त्याच्या अधिष्ठानावर (रचना-शरीरावर) आणि त्याचप्रमाणे त्याविषयीच्या शास्त्रग्रंथावरही लागू होतो." အနေနဿာဘိဓေယျာဒီနိ [Pg.11] ဝုစ္စန္တိ. အဘိဓီယတေ ဣတိ အဘိဓေယျံ, သမုဒိတေန သတ္ထေန ဝစနီယတ္ထော. သော စ သရီရာလင်္ကာရဝိဘာဂကပ္ပနာယ တေသံ ပဋိပါဒနံ. သုဗောဓာလင်္ကာရေန ဟိ တေ ပဋိပါဒီယန္တိ. ယေန စ ယော ပဋိပါဒီယတိ, တဿာယမတ္ထော ဘဝတီတိ အဘိဓေယျသတ္ထောပိ. ဒဿိတမေဝ တု သရီရာလင်္ကာရသင်္ခရဏံ ပယောဇနံ, တံ နိဿာယ သုဗောဓာလင်္ကာရပ္ပဝတ္တိတော. ယဿ ဟိ ယမုဒ္ဒိဿ ပဝတ္တိ ဟောတိ, တံ တဿ ပယောဇနံ, တံ ပန ကဝိတ္တကိတ္တိပသိဒ္ဓါဒိလက္ခဏံ, ပရမ္ပရာယ တဒတ္ထတာယ သုဗောဓာလင်္ကာရသင်္ခရဏဿ. သတ္ထပယောဇနာနံ, သာဓိယသာဓနလက္ခဏော သမ္ဗန္ဓော တု နိဿယပဒဿိနာ ဒဿိတောယေဝ. ယထာဟ – याद्वारे याचे अभिधेय (प्रतिपाद्य विषय) इत्यादी सांगितले जातात. जे प्रतिपादन केले जाते ते 'अभिधेय' होय, म्हणजेच संपूर्ण शास्त्राद्वारे सांगण्याचा विषय असलेला अर्थ. आणि तो म्हणजे शरीर व अलंकारांच्या विभागांची कल्पना करून त्यांचे प्रतिपादन करणे होय. कारण 'सुबोधालंकार' ग्रंथाद्वारे त्यांचे प्रतिपादन केले जाते. आणि ज्याच्याद्वारे जे प्रतिपादन केले जाते, तो त्याचा विषय होतो, म्हणून हे अभिधेय-शास्त्र देखील आहे. शरीर आणि अलंकारांचे संपादन करणे हे प्रयोजन तर दाखवलेच आहे, कारण त्यालाच आश्रय करून 'सुबोधालंकार' प्रवृत्त होतो. कारण ज्याला उद्देशून जी प्रवृत्ती होते, ते त्याचे प्रयोजन असते; आणि ते प्रयोजन परंपरेने कवित्व, कीर्ती, प्रसिद्धी इत्यादी लक्षणांचे असते, कारण सुबोधालंकाराची रचना त्याच हेतूने झाली आहे. शास्त्र आणि प्रयोजन यांमधील साध्य-साधन लक्षण असलेला संबंध तर आश्रय दाखवणाऱ्याने दाखवलाच आहे. जसे म्हटले आहे— ‘‘သတ္ထံ ပယောဇနဉ္စေဝ, ဥဘော သမ္ဗန္ဓနိဿယာ; ဝုတ္တာတံဝုတ္တိယာယေဝ, ဝုတ္တော တန္နိဿိတောပိ သော’’တိ. "शास्त्र आणि प्रयोजन, तसेच संबंध आणि आश्रय हे दोन्ही त्या वृत्तीद्वारेच (कथनाद्वारेच) सांगितले आहेत; आणि त्यावर आश्रित असलेला तो (विषय) देखील सांगितला गेला आहे." အဘိဓေယျာဒိကထနဉ္စ တံသမင်္ဂိဿေဝ စ ဝီမံသာဝိသေသသမင်္ဂီနမုပါဒီယမာနတ္တာ, အညာဒိသဿ ပန ဥမ္မတ္တကဝစနာဒိနော ဝိယ ဟေယျတ္တာ. ဝုတ္တဉှေတံ – आणि अभिधेय इत्यादींचे कथन केवळ त्या योग्यतेच्या, म्हणजेच विशेष विचार-मीमांसा करणाऱ्या व्यक्तींकडूनच स्वीकारले जाते; इतरांसाठी मात्र ते वेड्याच्या बडबडीप्रमाणे त्याज्य असते. कारण असे म्हटले आहे— ‘‘သမ္ဗန္ဓာနုဂုဏောပါယံ, ပုရိသတ္ထာဘိဓာယကံ; ဝီမံသာဓိဂတံ ဝါကျ-မတောနဓိဂတံ ပရ’’န္တိ. "संबंधाला अनुकूल असा उपाय असणारे, पुरुषार्थ (मानवी ध्येय) सांगणारे आणि विचार-मीमांसेने जाणलेले वाक्यच (स्वीकारार्ह असते); याहून भिन्न असलेले (विचार-मीमांसेने न जाणलेले) वाक्य इतर (त्याज्य) असते." ဝါကျန္တိ စေတ္ထ ဝါကျလက္ခဏောပေတမန္တရဝါကျသန္နိစယံ မဟာဝါကျသရူပံ သတ္ထမေဝါဓိပ္ပေတံ. आणि येथे 'वाक्य' म्हणजे वाक्याच्या लक्षणांनी युक्त असलेला, अंतर्गत वाक्यांचा समूह असलेला आणि महावाक्याच्या स्वरूपाचा असलेला 'शास्त्रग्रंथ' हाच अभिप्रेत आहे. ၃. ယေန တေ တေ အလင်္ကာရေန ဝဠဉ္ဇေန္တိ, တေန ကာရဏေန အလင်္ကာရဝဇ္ဇိတေ အာဘရဏဝိသေသေဟိ, ဂန္ထဝိသေသေဟိ ဝါ ဝဇ္ဇိတေ, တေ ဝိရဟိတေ ယေဟိ ဧတေ သုဒ္ဓမာဂဓိကေ ဧသံ သုဒ္ဓမာဂဓိကာနံ အနုရူပေန အဘိနဝဘာဝတော မာဂဓိကသရူပံ အနုဂတရူပေန, ဒသဗလဘာသိတဝိရစိတတ္တာ ဝါ အနုကူလေန အလင်္ကာရေန အာဘရဏဝိသေသေန, ဂန္ထဝိသေသေန ဝါ တောသေယျံ အလင်္ကာရဝဠဉ္ဇာပနေန, ဂန္ထဝိသေသေ ဥဂ္ဂဟဏဓာရဏာဒိကာရာပနေန [Pg.12] ဝါ သန္တုဋ္ဌေ ကရေယျံ အပိနာမ ယံနူန သုန္ဒရမိတိ, ဧသော ပရိဿမော အယံ မမ အလင်္ကာရပကရဏပ္ပယောဂေါ. အပိနာမာတိ ဧတ္ထ ဣတိသဒ္ဒေါ ဂမျမာနော. ३. ज्या कारणाने ते त्या अलंकारांचा वापर करत नाहीत, त्या कारणाने अलंकाररहित, म्हणजे विशिष्ट आभूषणांनी किंवा ग्रंथविशेषांनी रहित; त्या रहित असलेल्या ज्या या शुद्ध मागधी भाषेचा वापर करणाऱ्यांना (शुद्धमागधिकांना) त्यांच्या अनुरूप, नूतनत्वामुळे मागधीच्या स्वरूपाचे अनुकरण करणाऱ्या रूपाने, किंवा दसबल (बुद्ध) यांच्या भाषिताने रचले गेल्यामुळे अनुकूल अशा अलंकाराने (विशिष्ट आभूषणाने) किंवा ग्रंथविशेषाने मी संतुष्ट करावे; अलंकाराचा वापर करवून किंवा ग्रंथविशेषाचे ग्रहण व धारण इत्यादी करवून मी त्यांना संतुष्ट करावे. 'कदाचित हे खरोखरच सुंदर होईल' असा हा माझा परिश्रम, हा माझा अलंकार-प्रकरणाचा (ग्रंथाचा) प्रयोग आहे. 'अपिनामा' या शब्दात 'इति' हा शब्द अध्याहृत आहे. အလင်္ကာရေဟိ ဝဇ္ဇိတာ, အလင်္ကာရာ ဝဇ္ဇိတာ ယေဟိ ဝါတိ စ. ရူပဿ အနု အနုရူပံ, ရူပံ အနုဂတံ အနုရူပံ ဝါ, တေန အနုရူပေန. အလင်္ကရောန္တိ အတ္တဘာဝမနေနေတိ အလင်္ကာရော, ဟာရကေယူရာဒိ အာဘရဏပက္ခေ, ဂန္ထပက္ခေ တု အလင်္ကရောန္တိ ဗန္ဓသရီရမနေနေတိ အလင်္ကာရော. ဣမိနာ မုချဘာဝေန ပသာဒါဒိသဒ္ဒါလင်္ကာရာ စ သဘာဝဝုတျာဒိအတ္ထာလင်္ကာရာ စ ပဝုစ္စန္တိ. အမုချတော ပန ဣမေသံ ဒွိန္နံ အလင်္ကာရာနမဓိဋ္ဌာနဘူတဗန္ဓသရီရမ္ပိ, တထာ မင်္ဂလသုတ္တရတနသုတ္တာဒိဝေါဟာရော ဝိယ အလင်္ကာရပကာသကံ ‘‘သမ္မာ ဗုဇ္ဈန္တိ ဒွိပ္ပကာရာ အလင်္ကာရာ အနေနေ’’တိ ဣမိနာ အတ္ထေန လဒ္ဓသုဗောဓာလင်္ကာရဝရနာမဓေယျသတ္ထမ္ပိ ဝုစ္စတိ. ဝုတ္တမိဒမေဝ – 'अलंकारांनी वर्जित' किंवा 'ज्यांच्याकडून अलंकार वर्जित आहेत' असे. रूपाच्या योग्य ते 'अनुरूप', किंवा रूपाचे अनुकरण करणारे ते 'अनुरूप', त्या अनुरूपतेने. 'ज्याद्वारे आत्मभावाला (शरीराला) अलंकृत करतात' तो 'अलंकार' होय—आभूषणांच्या संदर्भात हार, केयूर इत्यादी; तर ग्रंथाच्या संदर्भात 'ज्याद्वारे रचना-शरीराला अलंकृत करतात' तो 'अलंकार' होय. या मुख्य अर्थाने प्रसाद इत्यादी शब्दालंकार आणि स्वभावोक्ती इत्यादी अर्थालंकार सांगितले जातात. परंतु अमुख्य (लाक्षणिक) अर्थाने या दोन्ही अलंकारांचे अधिष्ठान असलेले रचना-शरीर देखील 'अलंकार' म्हटले जाते; तसेच 'मंगळसुत्त', 'रतनसुत्त' इत्यादी व्यवहाराप्रमाणे, अलंकारांना प्रकाशित करणारे आणि 'ज्याद्वारे दोन्ही प्रकारचे अलंकार योग्य प्रकारे समजतात' या अर्थाने 'सुबोधालंकार' हे श्रेष्ठ नाव प्राप्त झालेले शास्त्र देखील 'अलंकार' म्हटले जाते. हेच सांगितले आहे— ‘‘မုချောလင်္ကာရသဒ္ဒေါယံ, သဒ္ဒတ္ထာလင်္ကတိဿိတော; သာမတ္ထိယာ တွဓိဋ္ဌာနေ, တထာ သတ္ထေပိ တဗ္ဗတီ’’တိ. "हा 'अलंकार' शब्द मुख्यत्वे शब्द आणि अर्थाच्या अलंकारांवर आश्रित आहे; परंतु सामर्थ्यामुळे (लाक्षणिकतेने) तो त्याच्या अधिष्ठानावर (रचना-शरीरावर) आणि त्याचप्रमाणे त्याविषयीच्या शास्त्रग्रंथावरही लागू होतो." ဧတ္ထ သာမတ္ထိယံ နာမ တဒါဓာရတပ္ပဋိပါဒကတ္တဝေါဟာရတော တဒါဓေယျတပ္ပဋိပါဒနီယံ န ဘဝတိ စေ, အညံ ကိံ ဘဝတီတိ အညထာနုပပတ္တိလက္ခဏမေဝါတိ. येथे 'सामर्थ्य' म्हणजे—त्याचा आधार असणे आणि त्याचे प्रतिपादन करणे या व्यवहारावरून, जर त्यात समाविष्ट असलेले आणि प्रतिपादन केले जाणारे समजले जात नसेल, तर दुसरे काय असणार? अशा प्रकारे हे 'अन्यथा अनुपपत्ती' (दुसरा कोणताही मार्ग न उरणे) या लक्षणाचेच आहे. ၄. ४. ယေသံ န သဉ္စိတာ ပညာ-နေကသတ္ထန္တရောစိတာ; သမ္မောဟဗ္ဘာဟတာဝေ’တေ, နာဝဗုဇ္ဈန္တိ ကိဉ္စိပိ. ज्यांची अनेक इतर शास्त्रांना समजून घेण्यास योग्य अशी प्रज्ञा संचित झालेली नाही, ते मोहाच्या ढगाने ग्रासलेले लोक काहीही समजू शकत नाहीत. ၅. ५. ကိံ တေဟိ ပါဒသုဿူသာ, ယေသံ နတ္ထိ ဂုရူနီ’ဟ ; ယေ တပ္ပာဒရဇောကိဏ္ဏာ, တေ’ဝ သာဓူဝိဝေကိနော. ज्यांनी या जगात गुरूंच्या चरणांची सेवा केली नाही, अशा लोकांचा काय उपयोग? जे त्यांच्या चरणधुलीने माखलेले आहेत, तेच खरोखर सज्जन आणि विवेकी आहेत. ၄-၅. ဧဝံ လက္ခဏာရမ္ဘပဋိက္ခေပကဇနပဋိဗာဟနပုဗ္ဗကမဘိဓေယျာဒိကံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ သတ္ထတောဝ သဗ္ဗတ္ထ ဂုဏဒေါသဝိဝေစနံ. အတောယေဝ ဝုစ္စတိ – ४-५. अशा प्रकारे, लक्षणांच्या आरंभाला विरोध करणाऱ्या लोकांचे निवारण करून अभिधेय (विषय) इत्यादी दाखवल्यानंतर, आता सर्व ठिकाणी गुण आणि दोषांचे विवेचन केवळ शास्त्राच्या आधारेच केले जाते. म्हणूनच म्हटले आहे— ‘‘သဗ္ဗတ္ထ [Pg.13] သတ္ထတောယေဝ, ဂုဏဒေါသဝိဝေစနံ; ယံ ကရောတိ ဝိနာ သတ္ထံ, သာဟသံ ကိမတောဓိက’’န္တိ. "सर्व ठिकाणी गुण आणि दोषांचे विवेचन केवळ शास्त्राच्या आधारेच होते; जो शास्त्राशिवाय हे करतो, त्याचे हे धाडस यापेक्षा अधिक काय असू शकते?" တသ္မာ ဂုဏဒေါသဝိဘာဂဝိစာရဏံ နာမ တဗ္ဗိဒူနံယေဝ, နာသတ္ထညူနံ ပုရိသပသူနံ. တထာ စာဟ – त्यामुळे गुण आणि दोषांच्या विभागाचा विचार करणे हे केवळ शास्त्र जाणणाऱ्यांचेच काम आहे, शास्त्र न जाणणाऱ्या नरपशूंचे नाही. आणि म्हणूनच म्हटले आहे— ‘‘ဂုဏဒေါသမသတ္ထညူ, ဇနော ဝိဘဇတေ ကထံ; အဓိကာရော ကိမန္ဓဿ, ရူပဘေဒေါပလဒ္ဓိယ’’န္တိ. "शास्त्र न जाणणारा मनुष्य गुण आणि दोषांची विभागणी कशी करू शकेल? अंध व्यक्तीला रूपांमधील भेद ओळखण्याचा काय अधिकार आहे?" ယေနေဝံ, တေနေတ္ထ ဂုဏဒေါသဒဿနေ ပသန္နာနေကသတ္ထစက္ခုယေဝါဓိဂတော, နညော တဗ္ဗိပရီတောတျနွယဗျတိရေကဝသေန ဒဿေန္တော ‘‘ယေသ’’န္တိအာဒိဂါထာဒွယမာဟ. တတ္ထ ယေသန္တိ အနိယမုဒ္ဒေသော, ယေဟီတိ အတ္ထော. ယေဟိ န သဉ္စိတာ န ရာသိကတာ, နာနာသန္တာနဝုတ္တိနီပိ ဧကတ္တနယေန ဧကသ္မိံ သန္တာနေ န ဝါသိတာ နပရိဘာဝိတာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ကာ သာ? ပညာ ဟေယျောပါဒေယျဝိဝေကရူပါ. ကီဒိသီတိ အာဟ ‘‘အနေကသတ္ထန္တရောစိတာ’’တိ. အနေကသ္မိံ တိပိဋကတက္ကဗျာကရဏာလင်္ကာရသတ္ထာဒိကေ သတ္ထန္တရေ ဥစိတာ သဝနဓာရဏာဒိဝသေန ပရိစိတာ သာယံ ပညာ ယေသံ န သဉ္စိတာတိ ပကတံ. ဧတေတိ ယထာဥဒ္ဒိဋ္ဌာနံ နိယမဝစနံ. သမ္မောဟဗ္ဘာဟတာတိ ယထာဝုတ္တာယာတိသယဝတိယာ ပညာယာဘာဝတော ဗလပ္ပတ္တေန မောဟေန အဗ္ဘာဟတာ ဝိသေသေန ပဟတာ, ဧဝသဒ္ဒိတာ ဟောန္တီတိ အဓိပ္ပာယော. ယတော ဧဝံ, တသ္မာပိ ကိဉ္စိပိ ဟေယျောပါဒေယျရူပံ ယံ ကိဉ္စိဒေဝ အဋ္ဌာနာနိယောဇကတာဒိသဂုရုပါဒသုဿူသာနိဿယပဋိလဒ္ဓဝိဝေကပညာတိ- သယာလာဘေန နာဝဗုဇ္ဈန္တိ, န ဇာနန္တီတျတ္ထော. ယတော အာလသိယာဒိဒေါသလေသပရိဂ္ဂဟောပိ သတတာစရိယသေဝနဝသေန သိရောဝိကိဏ္ဏတာဒိသဂုရုပါဒပင်္ကဇမ္ဗုဇပရာယနော စိရေနပိ ကာလေန နာနာဝိဓသတ္ထန္တရကတပရိစယဗလေန ပပ္ပောတိ တာဒိသံ ပညာဝေယတ္တိယံ. တေနေဝါဟ ဘဂဝါ – ज्याअर्थी असे आहे, त्याअर्थी येथे गुण आणि दोषांचे दर्शन घेण्यात प्रसन्न (निपुण) अशा अनेक शास्त्ररूपी चक्षू असलेल्यानेच (हे ज्ञान) प्राप्त केले आहे, त्याच्या विपरीत असणाऱ्या दुसऱ्या कोणाही व्यक्तीने नाही, हे अन्वय आणि व्यतिरेक नियमाद्वारे दर्शविताना 'येसं' (ज्यांच्या) इत्यादी दोन गाथा म्हटल्या आहेत. तेथे 'येसं' हा अनियम निर्देश आहे, 'ज्यांच्याद्वारे' असा याचा अर्थ आहे. ज्यांच्याद्वारे संचित केली गेली नाही, राशीभूत केली गेली नाही; नाना प्रकारच्या संततीमध्ये (प्रवाहामध्ये) राहणारी असूनही एकत्वाच्या न्यायाने एकाच संततीमध्ये जी वासित (संस्कारित) किंवा परिभावित केली गेली नाही, असे म्हटले आहे. ती कोणती? हेय (त्याज्य) आणि उपादेय (ग्राह्य) यांच्या विवेकरूपा असणारी प्रज्ञा. ती कशी आहे? हे सांगताना 'अनेकसत्थन्तरोचिता' (अनेक शास्त्रांमध्ये निपुण) असे म्हटले आहे. अनेक अशा तिपिटक, तर्क, व्याकरण, अलंकार इत्यादी शास्त्रांमध्ये जी योग्य आहे, श्रवण आणि धारण इत्यादींद्वारे जिचा परिचय झाला आहे, अशी ती प्रज्ञा ज्यांनी संचित केली नाही, हा येथे संदर्भ आहे. 'एते' (हे) हा यथा-निर्दिष्ट लोकांचा नियमवाचक शब्द आहे. 'संमोहब्भाहता' (संमोहाने ग्रस्त) म्हणजे वर सांगितलेल्या अतिशययुक्त प्रज्ञेच्या अभावामुळे बलवान झालेल्या मोहाने जे ग्रस्त आहेत, विशेष रूपाने आहत (पीडित) आहेत, ते असेच असतात, असा अभिप्राय आहे. ज्याअर्थी असे आहे, त्याअर्थी अयोग्य ठिकाणी न योजणे इत्यादी गुणांनी युक्त अशा गुरूंच्या चरणांची सेवा आणि त्यांच्या आश्रयाने प्राप्त होणाऱ्या विवेकप्रज्ञेच्या अतिशयाचा लाभ न झाल्यामुळे, ते कोणतेही हेय आणि उपादेय रूप जाणत नाहीत, समजत नाहीत, असा अर्थ आहे. कारण आळस इत्यादी दोषांचा लवलेशही नसलेला, निरंतर आचार्यांच्या सेवेमध्ये मग्न असलेला, मस्तकावर धूळ उडवून घेणारा इत्यादी प्रकारे गुरूंच्या चरणकमलांच्या आश्रयाला राहिलेला मनुष्य दीर्घकाळानंतरही नाना प्रकारच्या शास्त्रांच्या परिचयाच्या बळावर तशा प्रकारच्या प्रज्ञेच्या निपुणतेला प्राप्त करतो. त्यामुळेच भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘နိဟီယတိ [Pg.14] ပုရိသော နိဟီနသေဝီ,န စ ဟာယေထ ကဒါစိ တုလျသေဝီ; သေဋ္ဌမုပနမံ ဥဒေတိ ခိပ္ပံ,တသ္မာ’တ္တနော ဥတ္တရိတရံ ဘဇေထာ’’တိ. “हीन (दुर्जन) लोकांची सेवा करणारा मनुष्य अधोगतीला जातो, समान लोकांची सेवा करणारा कधीही नष्ट (ऱ्हास) पावत नाही; श्रेष्ठ लोकांच्या जवळ जाणारा मनुष्य शीघ्रच प्रगती करतो, म्हणून स्वतःपेक्षा श्रेष्ठ असलेल्यांचीच सेवा करावी.” တတော ဧတာဒိသော ပညဝါယေဝေတ္ထ ဂုဏဒေါသဝိဘာဂဝိဝေစနေ အဓိကာရီ, နညော တဗ္ဗိပရီတော ပုရိသပသူတိ အယမေတ္ထာဓိပ္ပာယော. ရုဠှော အတ္ထဝိသေသော. တေနာဟ ‘‘ကိံ တေဟိ ပါဒသုဿူသာ, ယေသံ နတ္ထိ ဂုရူနိဟာ’’တိ. ဣဟာတိ ဣမသ္မိံ လောကေ ယေသံ ဇနာနံ ဂုရူနံ ကာတဗ္ဗာ ပါဒသုဿူသာ ပါဒပရိစရိယာ နတ္ထိ, တေဟိ ဇနေဟိ ယထာဝုတ္တနယေန ပညာဝေယတ္တိယရသာနဘိညေဟိ ကိံ ပယောဇနံ, လေသမတ္တမ္ပိ နတ္ထိ, အနဓိဂတာယေဝေတ္ထ ဧတေတိ အဓိပ္ပာယော. ဣဒါနိ ဗျတိရေကမုခေန အာဟ ‘‘ယေ’’တိအာဒိ. ယေ ပုဗ္ဗေ ကတပုညတာဒိသမ္ပတ္တိသမ္ပန္နာ တပ္ပာဒရဇေဟိ တေသံ ဂုရူနံ ပါဒဓူလီဟိ ဩကိဏ္ဏာ ဩနဒ္ဓါ ဂဝစ္ဆိတာ, တေဝ သာဓူ ယထာဝုတ္တနယေန ပညာဝေယတ္တိယေန အဘိညာတာ သဇ္ဇနာ ဧဝ ဝိဝေကိနော ဟေယျောပါဒေယျဂုဏဒေါသဝိဘာဂနိယမနပညာသမ္ပတ္တိသမင်္ဂိနော ဟောန္တိ, တေယေဝေတ္ထ ဂုဏဒေါသဝိဝေစနေ အဓိဂတာတိ အဓိပ္ပာယော. သာ စာယံ ဂုရုပါဒသုဿူသာ ဝိသိဋ္ဌာဒရေန ကရဏီယာတိ ဝင်္ကဝုတ္တိယာ တဒဘျာသေ သာဓုဇနေ နိယောဇေတိ. त्यामुळे असा प्रज्ञावान मनुष्यच येथे गुण आणि दोषांच्या विभागाचे विवेचन करण्यास अधिकारी आहे, त्याच्या विपरीत असणारा दुसरा 'पशूतुल्य मनुष्य' नाही, असा येथे अभिप्राय आहे. हा रूढ अर्थविशेष आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – 'ज्यांची या जगात गुरूंच्या चरणांची सेवा करण्याची वृत्ती नाही, त्यांच्याशी काय प्रयोजन?' 'इह' म्हणजे या लोकात ज्या लोकांची गुरूंच्या चरणांची सेवा करण्याची, चरणपरिचर्या करण्याची वृत्ती नाही, अशा वर सांगितलेल्या पद्धतीने प्रज्ञेच्या निपुणतेच्या रसाला न जाणणाऱ्या लोकांपासून काय प्रयोजन? काहीही उपयोग नाही, त्यांना येथे काहीही प्राप्त झालेले नाही, असा अभिप्राय आहे. आता व्यतिरेक पद्धतीने 'ये' (जे) इत्यादी म्हणतात. जे पूर्वी केलेल्या पुण्यकर्मांच्या संपत्तीने संपन्न आहेत, जे त्यांच्या गुरूंच्या चरणधुळीने माखलेले, आच्छादित आणि सुशोभित आहेत, तेच सज्जन वर सांगितलेल्या पद्धतीने प्रज्ञेच्या निपुणतेने युक्त असलेले, विवेकी आणि हेय-उपादेय तसेच गुण-दोषांच्या विभागाचे नियमन करणाऱ्या प्रज्ञासंपत्तीने युक्त असतात. तेच येथे गुण-दोषांच्या विवेचनात अधिकार प्राप्त करतात, असा अभिप्राय आहे. आणि ही गुरूंच्या चरणांची सेवा विशेष आदराने केली पाहिजे, असे वक्रोक्तीने (अप्रत्यक्षपणे) सांगून सज्जन लोकांना त्याच्या अभ्यासात प्रवृत्त केले जाते. ၄-၅. ယေ သကလသတ္ထပရိစိတညာဏပါဋဝါ ယဒိ ဒေါသမာရောပယန္တိ, တေသံ တဒ္ဒေါသနိရာကရဏံ ဝိနာ ပဒေသာဝဗောဓနမတ္တေန ပဏ္ဍိတမာနီနံ ဝစနဿာဂုရုကရဏံ ဝင်္ကဝုတ္တိယာ ဒဿေန္တော စ တံဒွါရေနေဝ အတ္တနော အနညသာဓာရဏဂုရုဂါရဝတံ သာဓုဇနေဟိ ပရမာဒရေန သမ္ပာဒေတဗ္ဗမိတိ ဒဿေတုံ ‘‘ယေသံ…ပေ… ကိနော’’တိ ဂါထာဒွယမာဟ. အနေကသတ္ထာနံ [Pg.15] တိပိဋကတက္ကဗျာကရဏာဒီနံ အနေကေသံ ဂန္ထာနံ အန္တရေ တတွတ္ထသင်္ခါတအဗ္ဘန္တရေ ဥစိတာ သဝနဥဂ္ဂဟဏဓာရဏာဒိဝသေန ပရိစိတာ ပညာ သုတမယာ ပညာ ယေသံ ယေဟိ န သဉ္စိတာ, ဒွိန္နမေကက္ခဏေ ပဝတ္တိယာဘာဝေပိ ဥပစိတသမူဟဘာဝတော, ပုဗ္ဗကာလိကပညာယ အပရကာလိကပညာယ အနန္တရအာသေဝနာဒိပစ္စယလာဘတော အဝတ္ထဗာဟုလ္လပဝတ္တိတော ဝါ သဉ္စိတဗ္ဗာပိ န ရာသိကတာ. ဧတေ ဤဒိသပညာပါဋဝရဟိတာ ဣမေ သမ္မောဟဗ္ဘာဟတာ ပညာပါဋဝါဘာဝတော ဗလပ္ပတ္တေန မောဟေန ဝိသေသေန ပဟတာ ဧဝ ကိဉ္စိပိ ဟေယျောပါဒေယျံ နာဝဗုဇ္ဈန္တိ. န ဧကေ အနေကေတိ စ, တေ စ တေ သတ္ထာ စေတိ စ, တေသမန္တရမိတိ စ, တသ္မိံ ဥစိတာတိ စ သမ္မောဟေန အဗ္ဘာဟတာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. တေန ဝုတ္တံ– ४-५. जे सर्व शास्त्रांच्या परिचयाने प्राप्त झालेल्या ज्ञानकौशल्याने युक्त आहेत, ते जर दोषारोप करत असतील, तर त्या दोषांचे निराकरण केल्याशिवाय, केवळ काही भागाच्या ज्ञानाने स्वतःला पंडित मानणाऱ्यांच्या वचनाला महत्त्व न देणे वक्रोक्तीने दर्शवत आणि त्याचद्वारे स्वतःचा असाधारण गुरुआदर सज्जन लोकांनी परम आदराने संपादन केला पाहिजे, हे दर्शवण्यासाठी 'yesaṃ…pe… kino' (ज्यांच्या...पे...) या दोन गाथा म्हटल्या आहेत. अनेक शास्त्रांच्या म्हणजे तिपिटक, तर्क, व्याकरण इत्यादी अनेक ग्रंथांच्या अंतर्गत असलेल्या तत्त्वार्थाच्या अभ्यंतरात जी योग्य आहे, श्रवण, ग्रहण, धारण इत्यादींद्वारे जिचा परिचय झाला आहे, अशी श्रुतमयी प्रज्ञा ज्यांनी संचित केली नाही; जरी दोन प्रज्ञा एकाच क्षणी प्रवृत्त होत नसतील, तरीही उपचित (एकत्रित) समूहाच्या रूपाने, पूर्वकालीन प्रज्ञेच्या आणि उत्तरकालीन प्रज्ञेच्या निरंतर आसेवनादी प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) लाभामुळे किंवा अवस्थांच्या बहुलतेच्या प्रवृत्तीमुळे संचित करण्यायोग्य असूनही ती राशीभूत केली गेली नाही. अशा प्रज्ञाकौशल्याने रहित असलेले हे लोक संमोहाने ग्रस्त आहेत. प्रज्ञाकौशल्याच्या अभावामुळे बलवान झालेल्या मोहाने विशेष रूपाने आहत (पीडित) असल्यामुळे ते कोणतेही हेय आणि उपादेय जाणत नाहीत. 'न एके अनेक' (एक नसलेले ते अनेक), 'ते च ते सत्था च' (ते आणि ते शास्त्र), 'तेषामन्तरम्' (त्यांच्या अंतर्गत), 'तस्मिन् उचिता' (त्यात योग्य) आणि 'संमोहेन अब्भाहता' (संमोहाने ग्रस्त) असा हा विग्रह आहे. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘ဂုဏဒေါသမသတ္ထညူ, ဇနော ဝိဘဇတေ ကထံ; အဓိကာရော ကိမန္ဓဿ, ရူပဘေဒေါပလဒ္ဓိယ’’န္တိ. “शास्त्राला न जाणणारा मनुष्य गुण आणि दोषांचे विभाजन कसे करू शकेल? अंध माणसाचा रूपाच्या भेदांचे (रंगांचे) आकलन करण्यात काय अधिकार असू शकतो?” တဿတ္ထော – အသတ္ထညူ ဇနော ဂုဏဒေါသံ ကထံ ဝိဘဇတေ. တထာ ဟိ ရူပဘေဒေါပလဒ္ဓိယံ နီလပီတာဒိရူပဝိသေသာဝဗောဓနေ အန္ဓဿ အဓိကာရော အဘိမုခကရဏံ ကိံ ဟောတိ, န ဘဝတျေဝ, တသ္မာ အနေကသတ္ထန္တရဂတသုပ္ပသန္နပညာစက္ခုနာ ဧဝ ဂုဏဒေါသဝိဝေစနံ ဘဝတိ, တဒဘာဝေ န ဘဝတျေဝ. ဣဒမေဝ ဝုစ္စတေ– त्याचा अर्थ असा – शास्त्राला न जाणणारा मनुष्य गुण आणि दोषांचे विभाजन कसे करणार? ज्याप्रमाणे रूपाच्या भेदांचे आकलन करण्यात, म्हणजे निळा, पिवळा इत्यादी रूपांच्या विशेषांचे ज्ञान मिळवण्यात अंध माणसाचा काय अधिकार (प्रवृत्ती) असू शकतो? काहीही नाही. म्हणूनच, अनेक शास्त्रांच्या अंतर्गत असलेल्या अत्यंत प्रसन्न अशा प्रज्ञारूपी चक्षूनेच गुण आणि दोषांचे विवेचन होऊ शकते, त्याच्या अभावी ते होऊ शकत नाही. हेच म्हटले आहे – ‘‘သဗ္ဗတ္ထ သတ္ထတောယေဝ, ဂုဏဒေါသဝိဝေစနံ; ယံ ကရောတိ ဝိနာ သတ္ထံ, သာဟသံ ကိမတောဓိက’’န္တိ. “सर्व ठिकाणी शास्त्राच्या आधारेच गुण आणि दोषांचे विवेचन होते; शास्त्राशिवाय जे काही केले जाते, ते केवळ धाडस आहे, यापेक्षा अधिक काय असू शकते?” တဿတ္ထော – သဗ္ဗတ္ထ ဂုဏဒေါသဝိဝေစနံ သတ္ထတောယေဝ ဟောတိ, သတ္ထံ ဝိနာ သတ္ထောစိတတာဒိသပညံ ဝိနာ ယံ ကရောတိ ဂုဏာဂုဏဝိဘာဂံ ကရောတိ, ယံ ကရဏံ အတ္ထိ, အတောဓိကံ သာဟသံ ကိံ အာသုံ ကိရိယာ အနုပပရိက္ခနကိရိယာ နတ္ထေဝ. त्याचा अर्थ असा – सर्व ठिकाणी गुण आणि दोषांचे विवेचन शास्त्राच्या आधारेच होते. शास्त्राशिवाय, म्हणजे शास्त्राला योग्य अशा प्रज्ञेशिवाय जे काही केले जाते, जो गुणागुणांचा विभाग केला जातो, ते करणे म्हणजे यापेक्षा मोठे धाडस काय असू शकते? ती केवळ विचार न करता केलेली घाईघाईची कृती आहे, त्यात कसलीही परीक्षा (परीक्षण) नसते. ဣဟ [Pg.16] ဣမသ္မိံ လောကေ ယေသံ အကတပုညာနံ ဇနာနံ ဂုရူနံ या जगात ज्या पुण्य न केलेल्या लोकांची, गुरूंच्या... ‘‘ပိယော ဂရု ဘာဝနီယော,ဝတ္တာ စ ဝစနက္ခမော; ဂမ္ဘီရဉ္စ ကထံ ကတ္တာ,နော စာ’ဋ္ဌာနေ နိယောဇကော’’တိ. “जे प्रिय, आदरणीय, पूजनीय, उपदेशक, वचनांचे सहन करणारे (सहनशील), गंभीर विषयांवर चर्चा करणारे आणि अयोग्य ठिकाणी न योजणारे (अयोग्य मार्गावर न नेणारे) असतात;” နိဒ္ဒိဋ္ဌဂုဏောပေတာနံ အာစရိယာနံ ကာတဗ္ဗာ ပါဒသုဿူသာ ပါဒပရိစရိယာ နတ္ထိ, တေဟိ ကိံ ပယောဇနံ. ယေ ကတပုညာ ဇနာ တပ္ပာဒရဇောကိဏ္ဏာ တေသံ ဂုရူနံ ပါဒရဇေဟိ ဂဝစ္ဆိတာ, တေဝ သာဓူ ဇနာ ဧဝ ဝိဝေကိနော ကလျာဏမိတ္တဂုရုပါသနာဟိ အဓိဂတဝိသိဋ္ဌဝိဝေကဗုဒ္ဓိနော ဘဝန္တိ, တေ ဧဝ ဝိဝေကံ ဇာနန္တီတိ ဘာဝေါ. သောတုမိစ္ဆာ သုဿူသာ, တံ နိဿာယ ကတ္တဗ္ဗပါဒပရိစရိယာပိ တဒတ္ထိယာ သုဿူသာ နာမ ဟောတိ. ပါဒေသု သုဿူသာတိ စ, တေသံ ပါဒါတိ စ, တေသု ရဇာနီတိ စ, တေဟိ ဩကိဏ္ဏာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. သိဿာနံ သကလာဘိဗုဒ္ဓိယာ ဂုရုပဋိဗဒ္ဓတ္တာ အတ္တနော ဂုဏတော အဓိကတရာယေဝ သေဝိတဗ္ဗာ. ဝုတ္တဉှိ ဘဂဝတာ – अशा निर्दिष्ट गुणांनी युक्त असलेल्या आचार्यांच्या चरणांची सेवा, चरणपरिचर्या ज्यांच्याकडून केली जात नाही, त्यांच्याशी काय प्रयोजन? जे पुण्यवान लोक त्यांच्या गुरूंच्या चरणधुळीने माखलेले आहेत, तेच सज्जन लोक विवेकी असतात. कल्याणमित्र आणि गुरूंच्या उपासनेने ज्यांना विशिष्ट विवेकबुद्धी प्राप्त झाली आहे, तेच विवेकाला जाणतात, असा भाव आहे. ऐकण्याची इच्छा म्हणजे 'सुस्स्रूसा' (शुश्रूषा), तिच्या आश्रयाने केली जाणारी चरणपरिचर्या देखील त्याच अर्थाने 'शुश्रूषा' म्हटली जाते. 'पादेसु सुस्स्रूसा' (चरणांची सेवा), 'तेसं पादा' (त्यांचे चरण), 'तेसु रजानि' (त्यांच्यावरील धूळ) आणि 'तेहि ओकिण्णा' (त्यांनी माखलेले) असा हा विग्रह आहे. शिष्यांची सर्व प्रकारची प्रगती गुरूंवरच अवलंबून असल्यामुळे, स्वतःच्या गुणांपेक्षा अधिक गुण असणाऱ्यांचीच सेवा केली पाहिजे. कारण भगवंतांनी म्हटले आहे – ‘‘နိဟီယတိ ပုရိသော နိဟီနသေဝီ,န စ ဟာယေထ ကဒါစိ တုလျသေဝီ; သေဋ္ဌမုပနမံ ဥဒေတိ ခိပ္ပံ,တသ္မာ’တ္တနော ဥတ္တရိတရံ ဘဇေထာ’’တိ. हीन (कनिष्ठ) लोकांची संगत करणारा मनुष्य अधोगतीला जातो, समान दर्जाच्या लोकांची संगत करणारा कधीही मागे पडत नाही (ऱ्हास पावत नाही); आणि श्रेष्ठ लोकांच्या जवळ जाणारा वेगाने प्रगती करतो. म्हणूनच, माणसाने स्वतःपेक्षा श्रेष्ठ असलेल्यांचीच संगत करावी. ၆. ६. ကဗ္ဗနာဋကနိက္ခိတ္တ-နေတ္တစိတ္တာ ကဝိဇ္ဇနာ; ယံကိဉ္စိ ရစယန္တေ’တံ, န ဝိမှယကရံ ပရံ. काव्य आणि नाटकामध्ये ज्यांचे डोळे आणि मन गुंतलेले आहे, असे कवी लोक जे काही रचतात, ते इतरांसाठी फारसे आश्चर्यकारक नसते. ၇. ७. တေယေ’ဝ ပဋိဘာဝန္တော, သော’ဝ ဗန္ဓော သဝိမှယော; ယေန တောသေန္တိ ဝိညူယေ, တတ္ထာပျ’ဝိဟိတာဒရာ. तेच प्रतिभासंपन्न लोक अशी रचना करतात जी आश्चर्यकारक असते, ज्याद्वारे ते विद्वानांना संतुष्ट करतात, जरी त्या विद्वानांचा त्यामध्ये विशेष रस (आदर) नसला तरीही. ၆-၇. ဧဝမေတ္ထာနွယဗျတိရေကဝသေနာဓိဂတေ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ‘‘ကိံ အမှာကံ ကဗ္ဗနာဋကပရိစယာဘာဝေရစနာဝိသေသာဘိယောဂေါပဇနိတပရိဿမေနာ’’တိ ဩလီနဝုတ္တိနော သောတုဇနေ သမုဿာဟေတိ [Pg.17] ‘‘ကဗ္ဗနာဋကာ’’တိအာဒိနာ. ကဝိပ္ပယောဂသင်္ခါတော ဗန္ဓောဝ ကဝိနော ဣဒန္တိ ကဗ္ဗံ. မုတ္တကာဒိဝါကျသွမုတ္တိကာဒျဝယဝသဘာဝါ အန္တရဝါကျသမုဒါယသမ္ပန္နံ ဝုတ္တဇာတိဘေဒဘိန္နံ ပဇ္ဇမယံ ဂဇ္ဇမယံ ပဇ္ဇဂဇ္ဇမယံ စမ္ပူနာမကဉ္စ, မဟာဝါကျရူပံ မဟာကဗ္ဗဉ္စ, တံ ပန မဟာကဗ္ဗံ သဂ္ဂေဟိ သဂ္ဂနာမကေဟိ ပရိစ္ဆေဒဝိသေသေဟိ ဗန္ဓျတေ ကရီယတီတိ သဂ္ဂဗန္ဓောတိ ပဝုစ္စတိ. တဿ တု လက္ခဏံ ‘‘သဂ္ဂဗန္ဓဿ မုခံ ဣဋ္ဌာသီသနံ သိယာ ပဏာမော ဝါ ဗန္ဓသမ္ဗန္ဓိနော ကဿစိ အတ္ထဿ နိဒ္ဒေသော ဝါ’’တိအာဒိနာ အနေကဓာ ဝဏ္ဏေန္တိ. တံ ယထာ? ६-७. अशा प्रकारे, येथे अन्वय आणि व्यतिरेक यांच्याद्वारे प्राप्त झालेल्या गोष्टी दाखवून, आता 'काव्य आणि नाटकाच्या परिचयाच्या अभावामुळे विशेष रचना करण्याच्या प्रयत्नातून निर्माण होणाऱ्या श्रमाचा आपल्याला काय उपयोग?' असा विचार करून निरुत्साही झालेल्या श्रोत्यांना 'काव्यनाटक' इत्यादींद्वारे प्रोत्साहित करतात. कवीच्या प्रयोगाला (कृतीला) 'काव्य' (कब्ब) असे म्हणतात. मुक्तक इत्यादी वाक्यांच्या अवयव स्वभावामुळे, अंतर्गत वाक्यसमुदायाने युक्त, वृत्त आणि जातीच्या भेदांनी विभागलेले, पद्यमय, गद्यमय किंवा पद्य-गद्यमय (ज्याला 'चम्पू' म्हणतात) आणि महावाक्याच्या रूपातील 'महाकाव्य' होय. ते महाकाव्य 'सर्ग' नावाच्या विशेष परिच्छेदांनी बांधले (रचले) जाते, म्हणून त्याला 'सर्गबंध' असे म्हणतात. त्याचे लक्षण 'सर्गबंधाची सुरुवात इष्ट आशीर्वाद, नमस्कार किंवा काव्याशी संबंधित एखाद्या विषयाच्या निर्देशाने व्हावी' इत्यादी प्रकारे अनेक प्रकारे वर्णन केले जाते. ते कसे? ‘‘သဂ္ဂဗန္ဓော မဟာကဗ္ဗ-မုစ္စတေ တွဿ လက္ခဏံ; ပဏာမော ဝတ္ထုနိဒ္ဒေသော, အာသီသာပိ စ တမ္မုခံ. सर्गबंधाला 'महाकाव्य' म्हटले जाते, आणि त्याचे लक्षण असे आहे: त्याच्या सुरुवातीला नमस्कार (प्रणाम), कथावस्तूचा निर्देश (विषय-निर्देश) किंवा आशीर्वाद असावा. ဣတိဟာသကထုဗ္ဘူတံ, သန္တသန္နိဿယမ္ပိ ဝါ; စတုဝဂ္ဂဖလာယတ္တံ, စတုရောဒါတ္တနာယကံ. ते इतिहासातील कथेवर आधारित असावे किंवा सज्जनांच्या चरित्रावर आधारित असावे; धर्म, अर्थ, काम आणि मोक्ष या चार पुरुषार्थांच्या (चतुर्वर्ग) फलांवर आधारित असावे, आणि त्याचा नायक चतुर व उदात्त असावा. ပုရဏ္ဏဝုတုသေလိန္ဒု-သဝိတူဒယဝဏ္ဏနံ; ဥယျာနသလိလက္ကီဠာ, မဓုပါနရတုဿဝံ. त्यात नगर, समुद्र, पर्वत, ऋतू, चंद्रोदय आणि सूर्योदय यांचे वर्णन असावे; तसेच उद्यानविहार, जलक्रीडा, मद्यपान आणि रतिक्रीडेचे उत्सव यांचे वर्णन असावे. ဝိပ္ပလမ္ဘဝိဝါဟေဟိ, ကုမာရောဒယဝဍ္ဎိဟိ; မန္တဒူတပ္ပယာနာဇိ-နာယကာဘျူဒယေဟိပိ. विरह (विप्रलंभ) आणि विवाह, पुत्राचा (राजकुमाराचा) जन्म आणि त्याची वाढ; मंत्रणा (सल्लामसलत), दूत पाठवणे, सैन्याची कूच (प्रयाण), युद्ध आणि नायकाचा अभ्युदय (विजय) यांनी ते युक्त असावे. အလင်္ကတမသံခိတ္တ-ရသဘာဝနိရန္တရံ; နာတိဝိတ္ထိဏ္ဏသဂ္ဂေဟိ, ပိယဝုတ္တသုသန္ဓိဘိ. ते अलंकारांनी सुशोभित, विविध रस आणि भावांनी निरंतर समृद्ध, फार लांब नसलेल्या सर्गांनी युक्त, आणि ऐकण्यास मधुर अशा वृत्तांनी व सुंदर संधींनी (जोडणीने) युक्त असावे. သဗ္ဗတ္ထ ဘိန္နသဂ္ဂန္တေ-ဟုပေတံ လောကရဉ္ဇကံ; ကဗ္ဗံ ကပ္ပန္တရဋ္ဌာယိ, ဇာယတေ သာဓွလင်္ကတီ’’တိ. सर्व ठिकाणी सर्गाच्या शेवटी भिन्न वृत्त असणारे, लोकांचे मनोरंजन करणारे आणि उत्तम अलंकारांनी युक्त असलेले काव्य युगायुगांपर्यंत टिकून राहते. တတ္ထ ဣတိဟာသကထုဗ္ဘူတန္တိ ပုရာဝုတ္တကထာသန္နိဿယံ. သန္တသန္နိဿယန္တိ ဣတရသောဘနာဓိကရဏဂုဏရာဇစရိတာဒိနိဿယံ ဝါ. စတုဝဂ္ဂဖလာယတ္တန္တိ ဓမ္မာဒိစတုဝဂ္ဂဖလာယတ္တံ. ဓမ္မော [Pg.18] နာမ အဗ္ဘူဒယနိဗ္ဗာနဟေတုကော. အတ္ထော နာမ ဝိဇ္ဇာဘုမျာဒီနံ ယထာညာယမဇ္ဇနံ, အဇ္ဇိတာနဉ္စ ရက္ခဏံ. ကာမော နာမ နိရယော ဝိသယော ပယောဂေါ. မောက္ခော နာမ သဗ္ဗသံသာရဒုက္ခနိဝတ္တိ. စတုရောဒါတ္တနာယကန္တိ ဥဿာဟသတ္တိမန္တသတ္တိပဘူသတ္တိယောဂေန စတုရော ကုသလော စာဂါတိသယာဒိယောဂေန ဥဒါတ္တော ဥဒါရော နာယကော ဝိပက္ခော, ပဋိပက္ခော စ ယတ္ထ, တံ. မဓု နာမ သုရာ. ဝိပ္ပလမ္ဘော ဝိရဟော. မန္တော နီတိဝေဒီဟိ သဟ ကာရီယနိစ္ဆယော. ဒူတော သန္ဓာနပ္ပဝတ္တော ပုရိသော. ပယာနံ သင်္ဂါမာဒိနိမိတ္တဂမနံ. အာဇိ သန္ဓျာဘာဝေ ဝိဂ္ဂဟော. အသင်္ခတ္တရသဘာဝနိရန္တရန္တိ အသံခိတ္တာ ဗဟုတ္တာ ရသာ သိင်္ဂါရဝီရာဒယော, ဘာဝါ ရတိဥဿာဟာဒယော, တေဟိ နိရန္တရံ ပတ္ထဋံ. ပိယဝုတ္တသုသန္ဓိဘီတိ ပိယာနိ သုတိသုဘဂါနိ ဝုတ္တာနိ ဣန္ဒဝဇိရာဒီနိ အညမညသမ္ဗန္ဓသံသဂ္ဂတာယ သောဘနော သန္ဓိ အညမညသင်္ဂဟာ ယေသံ သဂ္ဂါနံ, တေဟီတိ. तेथे, 'इतिहासकथुब्भूत' म्हणजे प्राचीन काळातील कथांवर आधारित. 'संतसन्निश्रय' म्हणजे इतर शोभिवंत गुण असलेल्या राजांच्या चरित्रावर आधारित. 'चतुर्वर्गफलायत्त' म्हणजे धम्मादी चतुर्वर्गाच्या फलांवर आधारित. 'धम्म' म्हणजे अभ्युदय (लौकिक प्रगती) आणि निब्बाण (निर्वाण) यांचे कारण होय. 'अत्थ' (अर्थ) म्हणजे न्याय्य मार्गाने विद्या, भूमी इत्यादींचे संपादन करणे आणि संपादन केलेल्याचे रक्षण करणे. 'काम' म्हणजे इंद्रियविषयांचा उपभोग घेणे. 'मोक्ख' (मोक्ष) म्हणजे सर्व संसारदुःखांची निवृत्ती. 'चतुरोदात्तनायक' म्हणजे उत्साहशक्ती, मंत्रशक्ती आणि प्रभूशक्तीने युक्त असल्यामुळे चतुर (कुशल) असलेला, आणि त्याग इत्यादींच्या अतिशयाने युक्त असल्यामुळे उदात्त (उदार) असलेला नायक, आणि जेथे प्रतिनायक (शत्रू) देखील असतो. 'मधु' म्हणजे मद्य (सुरा). 'विप्रलंभ' म्हणजे विरह. 'मंत' (मंत्रणा) म्हणजे नीतिशास्त्रज्ञांच्या सोबत करायच्या कार्याचा निर्णय घेणे. 'दूत' म्हणजे संधान (तडजोड) साधण्यासाठी पाठवलेला मनुष्य. 'प्रयाण' म्हणजे युद्धादी कारणांसाठी प्रस्थान करणे. 'आजि' म्हणजे संधीचा (शांततेचा) अभाव असताना होणारे युद्ध. 'असंखित्तरसभावनिरंतर' म्हणजे शृंगार, वीर इत्यादी असंक्षिप्त (पुष्कळ) रस आणि रती, उत्साह इत्यादी भाव यांनी निरंतर व्यापलेले. 'पियवृत्तसुसंधी' म्हणजे ऐकण्यास मधुर असणारी इंद्रवज्रा इत्यादी वृत्ते आणि एकमेकांच्या संबंधामुळे व जोडणीमुळे ज्या सर्गांमध्ये सुंदर संधी (मेळ) साधला गेला आहे, अशा सर्गांनी युक्त. ပုနပိ ယထာဝုတ္တေသု အင်္ဂေသု နဂရဝဏ္ဏနာဒီသု ကိဉ္စ ယထာသမ္ဘဝံ မဓုပါနာဒိရဟိတမ္ပိ တညူနံ မနော ရဉ္ဇေတိ ဥပါဒိယတေဝ သဗ္ဘီတိ ဒဿေတုမာဟ– पुन्हा, वर सांगितलेल्या नगरवर्णन इत्यादी अंगांपैकी किंवा परिस्थितीनुसार मद्यपान इत्यादींशिवाय देखील ते काव्य जाणकारांच्या मनाचे रंजन करते आणि सज्जनांद्वारे स्वीकारले जाते, हे दर्शवण्यासाठी ते म्हणाले– ‘‘ကဗ္ဗံ န ဒုဿတင်္ဂေဟိ, နျူနမပျတြ ကေဟိစိ; ဗန္ဓင်္ဂသမ္ပဒါ တညူ, ကာမမာရာဓယန္တိ စေ’’တိ. जरी यातील काही अंगांची कमतरता असली, तरी काव्याची रचना बिघडत नाही; जर त्या काव्याच्या रचनेच्या समृद्धीने जाणकार लोक संतुष्ट होत असतील तर. ပုနပိ – पुन्हा – ‘‘ဂုဏတော ပဌမံ ဝတွာ, နာယကံ တေန သတ္တုနော; နိရာကရဏမိစ္စေသ, မဂ္ဂေါ ပကတိသုန္ဒရော. प्रथम नायकाच्या गुणांचे वर्णन करून, त्यानंतर त्याच्याद्वारे शत्रूचा पराभव (निराकरण) दाखवणे, हाच नैसर्गिकरीत्या सुंदर मार्ग आहे. ဝံသဝီရသုတာဒီနိ, ဝဏ္ဏယိတွာ ရိပုဿပိ; တဇ္ဇယာ နာယကုက္ကံသ-ကထနဉ္စ သုခေတိ နော’’တိ အာဟု. शत्रूच्या देखील वंश, शौर्य, ज्ञान इत्यादींचे वर्णन करून, त्यावर विजय मिळवून नायकाच्या उत्कर्षाचे वर्णन करणे देखील आपल्याला आनंद देते, असे ते म्हणाले. သဗ္ဗမ္ပေတံ [Pg.19] သဒ္ဓမ္မာမတရသပါနသရသဟဒယာနံ သမ္ဖပ္ပလာပဝိပုလဝိသပ္ပဝေသောပဒ္ဒုတကဗ္ဗနာဋကပရမ္မုခါနံ သတတစရိတသဉ္စရိတရတနဘာဇနာနံ သပ္ပုရိသာနံ ကိံ ဟဒယခေဒေါပဇနိတပရိဿမေနေတိ တဒနုရူပမေဝေါပဒဿိတန္တိ. हे सर्व, सद्धम्माच्या अमृतरसाचे पान केल्यामुळे सरस हृदय असलेल्या, निरर्थक बडबडीच्या (सम्पप्पलाप) विपुल विषाच्या प्रवेशाने दूषित झालेल्या काव्य आणि नाटकांकडे पाठ फिरवलेल्या, आणि सतत सदाचाराचे आचरण करणाऱ्या रत्नपात्र स्वरूप सज्जनांना 'हृदयाला खेद उत्पन्न करणाऱ्या श्रमाचा काय उपयोग?' असा विचार करून, त्यांच्या अनुरूपच दर्शवले गेले आहे. နာဋကံ နာမ ဘရတာဒိနာဋျသတ္ထေ နာနပ္ပကာရနိရူပိတရူပံ ကပ္ပံ, တံလက္ခဏေကဒေသဘူတလက္ခဏာနိ ပကရဏာဒီနိ နဝ ရူပကာနိ. နာဋိကာ စ ဧတ္ထေဝါဝရုမ္ဘန္တိ. ကဗ္ဗဉ္စ နာဋကဉ္စ, တေသု နိက္ခိတ္တံ ဌပိတံ နေတ္တဉ္စ စိတ္တဉ္စ ယေဟီတိ ဝိဂ္ဂဟော. ကေ တေ? ကဝိနော. တတ္ထ နိက္ခိတ္တနေတ္တစိတ္တဝစနေန သုတဿ စိန္တနဉ္စ ဦဟာပေါဟမုခေန ယထုဂ္ဂဟိတနိယာမံ, အဝိပရီတတ္ထနိစ္ဆယနံ, နိစ္ဆိတဿ ဘာဝနာ, နိရန္တရာဘိယောဂေါ စ ဒဿိတော. ကဗ္ဗနာဋကဝစနေန သုတံ, စိန္တိတံ, ဘာဝိတဉ္စ ဒဿိတံ. သုတေ ဒဿိတေ တန္နိဿယံ သုတမယဉာဏမ္ပိ ဒဿိတမေဝ သိယာတိ. ‘‘ကဗ္ဗနာဋကနိက္ခိတ္တနေတ္တစိတ္တာ’’တိ ဣမိနာ သုတစိန္တာဘာဝနာနုက္ကမေန သမ္ပာဒိတပညာပါဋဝါနံ ကဗ္ဗရစနာယ သာမတ္ထိယံ ဒဿေတိ. ဟောတိ ဟိ တာဒိသာနံ တံသုတာဒိ ဗန္ဓနကာရဏံ. ဝုတ္တဉှိ – नाटक म्हणजे भरत इत्यादींच्या नाट्यशास्त्रात विविध प्रकारे निरूपण केलेले रूपक होय. प्रकरण इत्यादी नऊ रूपके हे त्याच्या लक्षणांचा एक भाग आहेत. 'नाटिका' देखील यातच समाविष्ट होतात. काव्य आणि नाटक, यांच्यामध्ये ज्यांनी आपले डोळे आणि मन स्थिर केले आहे, असा याचा विग्रह आहे. ते कोण? कवी. येथे 'डोळे आणि मन स्थिर केले' या शब्दाने ऐकलेल्या गोष्टीचे चिंतन, तर्क-वितर्काद्वारे (ऊहापोह) ग्रहण केलेल्या नियमांनुसार अचूक अर्थाचा निश्चय करणे, निश्चित केलेल्या अर्थाची भावना (ध्यान) करणे आणि निरंतर अभ्यास करणे दर्शवले आहे. 'काव्य आणि नाटक' या शब्दांनी श्रुत (ऐकलेले), चिंतित (विचार केलेले) आणि भावित (ध्यान केलेले) दर्शवले आहे. श्रुत दर्शवले असता, त्यावर आधारित 'श्रुतमय ज्ञान' देखील दर्शवले जाते. 'काव्य आणि नाटकामध्ये ज्यांचे डोळे आणि मन गुंतलेले आहे' याने श्रवण, चिंतन आणि भावना यांच्या क्रमाने बुद्धीचे चातुर्य प्राप्त केलेल्या लोकांची काव्य रचण्याची क्षमता दर्शवली आहे. कारण अशा लोकांचे ते श्रवण इत्यादीच काव्यरचनेचे कारण बनते. कारण असे म्हटले आहे की – ‘‘သာဘာဝိကီ စ ပဋိဘာ,သုတဉ္စ ဗဟု နိမ္မလံ; အမန္ဒော စာဘိယောဂေါယံ,ဟေတု ဟောတိဟ ဗန္ဓနေ’’တိ. नैसर्गिक प्रतिभा, विपुल व निर्मळ ज्ञान (श्रुत) आणि तीव्र अभ्यास (उद्योग) हेच येथे काव्यरचनेचे कारण ठरतात. ယံကိဉ္စီတိ အတ္တနော စိတ္တာရုဠှံ ယံကိဉ္စိ ဗန္ဓဇာတံ. ဣမိနာ ပန အနိယမဝစနေန အတ္တနော တတ္ထ အာဒရာဘာဝံ ဒီပေတိ. ရစယန္တိ ကရောန္တိ. ဧတံ တေဟိ ရစိတံ ဗန္ဓဇာတံ ပရံ အစ္စန္တမေဝ ဝိမှယကရံ န ဟောတိ, တာဒိသောပါယသမ္ပတ္တိသမ္ပန္နဿ ဥပေယျသမ္ပတ္တိသဗ္ဘာဝတော အနစ္ဆရိယမေဝါတိ အဓိပ္ပာယော. တတ္ထ တေသု ကဗ္ဗနာဋကေသု ရစနာဝိသေသဧကန္တောပါယဘူတေသု အဝိဟိတာဒရာအပိ သုတာဒိဝသေန အကတာဒရာပိ [Pg.20] ယေ သပ္ပုရိသာ ပညဝန္တော ယေန ဗန္ဓဝိသေသေန ဝိညူ ဂုဏဒေါသဝိဒုနော သတ္ထညုနော ပဏ္ဍိတဇနေ တောသေန္တိ ပီဏေန္တိ. တောသေန္တိယေဝ ဟိ တေ တာဒိသေ သာဘာဝိကိပဋိဘာဝိရဟေပိ ဧတာဒိသေသု အတ္ထေသု သုတစိန္တာဘာဝနာဝသေန ဝါယမန္တာ. ဝုတ္တဉှိ – 'जे काही' (यंकिंचि) म्हणजे स्वतःच्या मनात आलेली कोणतीही रचना. या अनिश्चित शब्दाने ते आपला त्याविषयीचा आदराचा अभाव दर्शवतात. 'रचतात' (रचयन्ति) म्हणजे निर्माण करतात. त्यांनी रचलेली ही रचना अत्यंत आश्चर्यकारक नसते; कारण अशा साधनांनी युक्त असलेल्या व्यक्तीला साध्य प्राप्त होणे हे आश्चर्यकारक नाही, असा याचा अभिप्राय आहे. तेथे, विशेष काव्यरचनेचे एकमेव साधन असलेल्या त्या काव्य आणि नाटकांमध्ये ज्यांनी विशेष रस घेतला नाही किंवा श्रवणादींद्वारे आदर दाखवला नाही, असे जे बुद्धिमान सज्जन आहेत, ते अशा विशिष्ट रचनेद्वारे गुण-दोष जाणणाऱ्या, शास्त्रज्ञ आणि पंडित विद्वानांना संतुष्ट करतात. नैसर्गिक प्रतिभेचा अभाव असला तरी, अशा विषयांमध्ये श्रवण, चिंतन आणि भावना यांच्याद्वारे प्रयत्न करणारे लोक विद्वानांना संतुष्ट करतातच. कारण असे म्हटले आहे की – ‘‘န ဝိဇ္ဇတီ ယဇ္ဇပိ ပုဗ္ဗဝါသနာ-ဂုဏာနုဗန္ဓိ ပဋိဘာနမဗ္ဘုတံ; သုတေန ဝါစု’ဿဟနေနုပါသိတာ,ဓုဝံ ကရောတျေဝ ကမပျနုဂ္ဂဟ’’န္တိ. जरी पूर्ववासनेच्या गुणांशी संबंधित असलेली अद्भुत प्रतिभा विद्यमान नसेल, तरीही श्रवणाने आणि वाणीच्या उत्साहाने केलेली उपासना निश्चितपणे काही ना काही उपकार करतेच. ပဋိဘာဝန္တော ဟေယျောပါဒေယျပရိစ္ဆေဒလက္ခဏပညာယ ပညဝန္တော နာမ, တေယေဝ သပ္ပုရိသာ. သဝိမှယော ‘‘ကီဒိသာယံ, တာဒိသောပါယန္တရရဟိတာနမ္ပိ ဧတာဒိသော ဗန္ဓော သိယာ’’တိ ဝိမှယေန သဟ ဝတ္တမာနောပိ. သောဝ ဗန္ဓော တမေဝ ဗန္ဓနံ တာဒိသောပါယသမ္ပတ္တိဝိရဟေနောပေယျသမ္ပတ္တိယာ သဗ္ဘာဝတော, နာညောတိ. प्रतिभावंत म्हणजे काय त्याज्य आणि काय ग्राह्य हे ठरवण्याच्या लक्षणयुक्त प्रज्ञेने युक्त असलेले प्रज्ञावंत होत, तेच सत्पुरुष आहेत. 'हा कसा आहे, अशा प्रकारच्या इतर उपायांशिवाय असणाऱ्यांनाही असा बंध कसा काय प्राप्त होऊ शकतो?' अशा आश्चर्याने युक्त असणारा सुद्धा. तोच बंध, तीच रचना, तशा प्रकारच्या उपाय-संपत्तीच्या अभावी देखील साध्य-संपत्तीच्या अस्तित्वामुळे होते, इतर कशानेही नाही. ၆-၇. ဣဒါနိ ကဗ္ဗနာဋကေသု အပရိစိတာနမမှာကံ ဂန္ထရစနာသဘာဝါဝဗောဓောဝ ကုတောတိ ဩသက္ကန္တေ ‘‘ကဗ္ဗနာဋကာ’’ဒိဂါထာဒွယေန သမုဿာဟေတိ. ကဗ္ဗနာဋကနိက္ခိတ္တနေတ္တစိတ္တာ ကဗ္ဗနာဋကေသု သုတာနုလောကနစိန္တာဘာဝနာဝသေန ဌပိတနေတ္တစိတ္တာ ကဝိဇ္ဇနာ ကဗ္ဗကာရကာ ယံ ကိဉ္စိ အတ္တနော အဘိမတံ ရစယန္တိ ကရောန္တိ, ဧတံ ဗန္ဓနံ ပရံ အတိသယေန န ဝိမှယကရံ အစ္ဆရိယကရံ န ဟောတိ, နိရန္တရာဘိယောဂတော သိဒ္ဓေါပါယမူလပညာသမ္ပဒါယ ဥပေယျဘူတဂန္ထသင်္ခရဏံ ဘဝတျေဝါတိ အဓိပ္ပာယော. ကဝိနော ဣဒံ ကဗ္ဗန္တိ စ, နဋကဿ ဣဒံ နာဋကံ, နစ္စဂီတာဒိ. ဣဓ ပန တပ္ပဋိပါဒကကထာပကာသကဂန္ထော နာဋကံ နာမ. ကဗ္ဗဉ္စ နာဋကဉ္စာတိ စ, ကဗ္ဗနာဋကေသု နိက္ခိတ္တံ နေတ္တစိတ္တံ ယေဟီတိ စ [Pg.21] ဝိဂ္ဂဟော. ယေ ဇနာ တတ္ထ တေသု ကဗ္ဗနာဋကေသု အဝိဟိတာဒရာပိ သဝနဓာရဏာဒိဝသေန အကတသမ္ဘမာ ဧဝ ဝိညူ ယေန ဂန္ထရစနာဝိသေသေန တောသေန္တိ ပီဏေန္တိ, တေယေဝ ပဋိဘာဝန္တော ပဋိဘာနသင်္ခါတပညဝန္တော ဘဝန္တိ. သောဝ ဗန္ဓော သဝိမှယော အညေသံ ဥပ္ပဇ္ဇမာနဝိမှယေန သဟိတော. ပဋိဘာ ဧတေသံ အတ္ထီတိ စ, သဟ ဝိမှယေန ဝတ္တတီတိ စ, အဝိဟိတော အာဒရော ယေဟီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဗာဟိရသတ္ထာဘိယောဂါဘာဝေပိ ပုဗ္ဗဝါသနာဘာဝေပိ ဣဟ နိရန္တရာဘိယောဂံ ကရောန္တော တာဒိသသာမတ္ထိယံ သာဓေတီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဝုတ္တဉှိ – ६-७. आता, 'काव्य आणि नाटकांमध्ये अपरिचित असणाऱ्या आम्हांला ग्रंथ रचनेच्या स्वरूपाचे आकलन कसे होणार?' असे म्हणून मागे हटणाऱ्यांना 'काव्य-नाटक' इत्यादी दोन गाथांद्वारे प्रोत्साहित केले जाते. काव्य आणि नाटकांमध्ये डोळे आणि चित्त एकाग्र केलेले, काव्य व नाटकांमध्ये श्रवण, अवलोकन, चिंतन आणि भावनेच्या प्रभावाने डोळे व चित्त स्थिर केलेले कवी लोक, काव्यकार जे काही आपल्या आवडीचे रचतात किंवा करतात, ती रचना इतरांसाठी अत्यंत आश्चर्यकारक किंवा विस्मयकारक ठरत नाही; कारण निरंतरच्या परिश्रमामुळे सिद्ध झालेल्या उपायांवर आधारित मूळ प्रज्ञेच्या समृद्धीने साध्यभूत ग्रंथाची रचना होतेच, असा याचा अभिप्राय आहे. कवीचे ते 'काव्य' आणि नटाचे ते 'नाटक' जसे की नृत्य, गीत इत्यादी. परंतु येथे त्या विषयाचे प्रतिपादन करणाऱ्या आणि कथा प्रकाशित करणाऱ्या ग्रंथाला 'नाटक' म्हटले आहे. 'काव्य आणि नाटक' आणि 'काव्य व नाटकांमध्ये ज्यांनी आपले डोळे व चित्त एकाग्र केले आहे ते' असा विग्रह होतो. जे लोक त्या काव्य-नाटकांमध्ये विशेष आदर नसतानाही, केवळ श्रवण आणि धारणा इत्यादींच्या माध्यमातून गोंधळून न जाता, ज्या विशिष्ट ग्रंथ रचनेने सुज्ञांना संतुष्ट व प्रसन्न करतात, तेच प्रतिभावंत म्हणजेच प्रतिभा नावाच्या प्रज्ञेने युक्त असतात. तीच रचना आश्चर्याने युक्त असते, जी इतरांमध्ये निर्माण होणाऱ्या आश्चर्याने सहवर्तमान असते. 'ज्यांच्याकडे प्रतिभा आहे ते' आणि 'जे आश्चर्याने युक्त आहे ते' आणि 'ज्यांचा आदर विहित नाही ते' असा विग्रह आहे. बाह्य शास्त्रांचा अभ्यास नसतानाही आणि पूर्ववासना नसतानाही, या जन्मात निरंतर परिश्रम केल्याने तशा प्रकारची क्षमता साध्य करता येते, असे सांगितले आहे. कारण म्हटलेच आहे – ‘‘န ဝိဇ္ဇတီ ယဇ္ဇပိ ပုဗ္ဗဝါသနာ-ဂုဏာနုဗန္ဓိ ပဋိဘာနမဗ္ဘုတံ; သုတေန ဝါစု’ဿဟနေနုပါသိတာ,ဓုဝံ ကရောတျေဝ ကမပျနုဂ္ဂဟ’’န္တိ. जरी पूर्ववासनेच्या गुणांशी संबंधित असलेली अद्भुत प्रतिभा विद्यमान नसेल, तरीही श्रवणाने आणि वाणीच्या उत्साहाने केलेली उपासना निश्चितपणे काही ना काही उपकार करतेच. တဿတ္ထော – ယဒိ ပုဗ္ဗဝါသနာဂုဏာနုဗန္ဓီ အတီတဇာတိယာ ပရိစယဝါသနာဂုဏဿ အနုဗလပ္ပဒါနဝသေန အနုဗန္ဓော ယဿတ္ထိ, တာဒိသံ အဗ္ဘုတံ ပဋိဘာနံ န ဝိဇ္ဇတိပိ, တထာပိ သုတေန သဝနေန ဥဿဟနေန ပဂုဏကရဏာဒိဝါစုဿဟနေန ဝါ ဥပါသိတာ ကတဂုရုပါသနာ ဝါစာ ကမပိ အနုဂ္ဂဟံ ကိဉ္စိပိ ပညာပါဋဝံ ဓုဝံ ဧကန္တေန ကရောတိ ဧဝါတိ. त्याचा अर्थ असा – जरी पूर्ववासनेच्या गुणांशी संबंधित असलेली, म्हणजे पूर्वजन्मातील परिचयाच्या वासनेच्या गुणाला बळ देण्याच्या स्वरूपात जिचा संबंध आहे अशी, अद्भुत प्रतिभा विद्यमान नसली, तरीही श्रवणाने, उत्साहाने, अभ्यासाने किंवा वाणीच्या प्रयत्नाने केलेली उपासना, अथवा गुरूंची केलेली उपासना, वाणीला निश्चितपणे काही ना काही अनुग्रह म्हणजे प्रज्ञेचे चातुर्य नक्कीच प्राप्त करून देते. ဧတ္ထ ကဗ္ဗံ နာမ မုတ္တကကုလကာဒိဝါကျဝသေန စ အဝယဝသဘာဝေဟိ တေသံယေဝ အန္တရဝါကျာဝယဝသမူဟေဟိ ပရိပုဏ္ဏံ ဝုတ္တဝိသေသေဟိ ပဘေဒဂတံ ကေဝလံ ပဇ္ဇမယံ ဝါ ဂဇ္ဇမယံ ဝါ စမ္ပူတိချာတပဇ္ဇဂဇ္ဇမယံ ဝါတိ မဟာဝါကျသဘာဝေန စ တိဋ္ဌတိ. နာဋကံ နာမ ဘရတာဒိနဋသတ္ထဂတနာနပ္ပကာရဒဿိတသဘာဝံ. ကဗ္ဗဉ္စ ဣဓေဝ ဒဿိတလက္ခဏတော ဧကဒေသယုတ္တပ္ပကရဏာဒိနဝရူပကာနိ စ နာဋိကာ စ ဘဝန္တိ. ကဗ္ဗလက္ခဏံ ပန ဧဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ– येथे 'काव्य' म्हणजे मुक्तक, कुलक इत्यादी वाक्यांच्या स्वरूपात आणि त्यांच्या अवयवांच्या स्वरूपाने, त्यांच्याच अंतर्गत वाक्य-अवयवांच्या समूहाने परिपूर्ण, विशिष्ट वृत्तांनी विभागलेले, केवळ पद्यमय किंवा गद्यमय किंवा 'चंपू' म्हणून प्रसिद्ध असलेले पद्य-गद्यमय अशा महावाक्याच्या स्वरूपात असते. 'नाटक' म्हणजे भरत इत्यादी नटशास्त्रात सांगितलेल्या विविध प्रकारांनी दर्शवलेले स्वरूप होय. आणि काव्य हे येथे दर्शवलेल्या लक्षणांनुसार एका अंशाने युक्त असलेल्या प्रकरणादी नऊ रूपके आणि नाटिकांच्या स्वरूपात असते. काव्याचे लक्षण तर याप्रमाणे समजले पाहिजे – ‘‘သဂ္ဂဗန္ဓော [Pg.22] မဟာကဗ္ဗ-မုစ္စတေ တွဿ လက္ခဏံ; ပဏာမော ဝတ္ထုနိဒ္ဒေသော, အာသီသာပိ စ တမ္မုခံ. सर्गबंधाला 'महाकाव्य' म्हटले जाते, आणि त्याचे लक्षण असे सांगितले आहे: नमस्कार, वस्तूचा निर्देश आणि आशीर्वाद हे त्याचे मुख असते. ဣတိဟာသကထုဗ္ဘူတံ, သန္တသန္နိဿယမ္ပိ ဝါ; စတုဝဂ္ဂဖလာယတ္တံ, စတုရောဒါတ္တနာယကံ. ते इतिहासातील कथेवर आधारित असते किंवा सज्जनांच्या आश्रयाने असते; धर्म, अर्थ, काम आणि मोक्ष या चतुर्वर्ग फलांवर आधारित असते आणि त्याचा नायक चतुर व उदात्त असतो. ပုရဏ္ဏဝုတုသေလိန္ဒု-သဝိတူဒယဝဏ္ဏနံ; ဥယျာနသလိလက္ကီဠာ, မဓုပါနရတုဿဝံ. त्यात नगर, समुद्र, पर्वत, चंद्र आणि सूर्याच्या उदयाचे वर्णन असते; तसेच उद्यानविहार, जलक्रीडा, मद्यपान आणि रती-उत्सवाचे वर्णन असते. ဝိပ္ပလမ္ဘဝိဝါဟေဟိ, ကုမာရောဒယဝဍ္ဎိဟိ; မန္တဒူတပ္ပယာနာဇိ-နာယကာဘျူဒယေဟိပိ. विरह आणि विवाह, पुत्राचा जन्म आणि त्याची वाढ; तसेच मंत्र, दूत पाठवणे, प्रयाण, युद्ध आणि नायकाचा अभ्युदय यांचेही वर्णन असते. အလင်္ကတမသံခိတ္တ-ရသဘာဝနိရန္တရံ; နာတိဝိတ္ထိဏ္ဏသဂ္ဂေဟိ, ပိယဝုတ္တသုသန္ဓိဘိ. ते अलंकारांनी सुशोभित, संक्षिप्त नसलेले, रस आणि भावांनी निरंतर युक्त, फार मोठे नसलेले सर्ग आणि प्रिय वृत्तांनी व चांगल्या संधींनी युक्त असते. သဗ္ဗတ္ထ ဘိန္နသဂ္ဂန္တေ-ဟုပေတံ လောကရဉ္ဇကံ; ကဗ္ဗံ ကပ္ပန္တရဋ္ဌာယိ, ဇာယတေ သာဓွလင်္ကတီ’’တိ. सर्वत्र सर्गाच्या शेवटी भिन्न छंद असणारे, लोकांचे रंजन करणारे आणि उत्तम अलंकारांनी युक्त असलेले काव्य युगायुगांपर्यंत टिकून राहणारे बनते. တဿတ္ထော – သဂ္ဂဗန္ဓော သဂ္ဂသင်္ခါတေဟိ ပရိစ္ဆေဒဝိသေသေဟိ ဗန္ဓော ‘‘မဟာကဗ္ဗ’’န္တိ ဥစ္စတေ. အဿ လက္ခဏံ တု ဝုစ္စတေတိ သမ္ဗန္ဓော ကာကက္ခိဂေါဠကနယေန တမ္မုခံ တဿ ကဗ္ဗဿ အာဒိ ပန ပဏာမော ဒေဝတာနမဿနံ ဝါ, ဝတ္ထုနိဒ္ဒေသော – त्याचा अर्थ असा – सर्गबंध म्हणजे सर्ग नावाच्या विशिष्ट परिच्छेदांनी केलेली रचना, याला 'महाकाव्य' म्हटले जाते. 'त्याचे लक्षण तर सांगितले जाते' असा संबंध काकाक्षिगोलक न्यायाने जोडला जातो. 'त्याचे मुख' म्हणजे त्या काव्याचा प्रारंभ होय, जो देवांना नमस्कार किंवा वस्तूचा निर्देश असतो – ‘‘အသ္တျုတ္တရသျာံ ဒိဂိ ဒေဝတာတ္မ,ဟိမာလယော နာမ နဂါဓိရာဇ?; ပူဝါပရေင ဝါရိနိဓီ ဝိဂါဟျ,သ္ထိတ? ပထိဈာ ဣဝ မာနဒဏ္ဍ?’’. उत्तर दिशेला देवात्मा असलेला, हिमालया नावाचा पर्वतांचा राजा आहे; जो पूर्व आणि पश्चिम समुद्रात प्रवेश करून, पृथ्वीचा जणू मानदंड असल्यासारखा उभा आहे. ဣစ္စာဒိဗန္ဓသမ္ဗန္ဓိနော ကဿစိ ဝတ္ထုနော ဒဿနံ, အာသီသာပိ ‘‘မယှံ ပီဏယတံ မန’’ မိစ္စာဒိဣဋ္ဌာသီသနံ ဝါ ဘဝတိ. इत्यादी रचनांशी संबंधित असलेल्या कोणत्याही विषयाचे दर्शन घडवणे, किंवा 'माझ्या मनाला आनंद देवो' इत्यादी इष्ट आशीर्वाद देणे, हे त्याचे स्वरूप असते. ဣတိဟာသကထုဗ္ဘူတံ ပုရာဝုတ္တကထာသန္နိဿယံ ဝါ သန္တသန္နိဿယမ္ပိ သောဘနာနမ္ပိ ရာဇစရိယာဒိနိဿယံ ဝါ စတုဝဂ္ဂဖလာယတ္တံ [Pg.23] လောကိယလောကုတ္တရသုခကာရဏံ ဓမ္မော, ဝိဇ္ဇာဘူမိအာဒီနံ သဉ္စယော, သဉ္စိတာနံ ရက္ခာ စ အတ္ထော, အပါယသံဝတ္တနိကပဉ္စကာမဂုဏသင်္ခါတော ကာမော, သဗ္ဗဒုက္ခာ နိဝတ္တိဟေတု မောက္ခော စာတိ စတုဝဂ္ဂဖလာဓီနံ စတုရောဒါတ္တနာယကံ ဥဿာဟသတ္တိမန္တသတ္တိပဘူသတ္တိယောဂတော စတုရော ဒက္ခော စာဂါတိသယာဒိယောဂေန ဥဒါတ္တော ဥဠာရော သပက္ခော, ဝိပက္ခော ဝါ နာယကော ယတ္ထ, တံ ယထာဝုတ္တံ ပုရဏ္ဏဝုတုသေလိန္ဒု-သဝိတူဒယဝဏ္ဏနံ ပုရံ နဂရံ, အဏ္ဏဝံ သာဂရံ, ဥတု ဟေမန္တဝသန္တာဒိဥတု, သေလံ ပဗ္ဗတော, ဣန္ဒုသဝိတူဒယော စန္ဒသူရိယာနံ ဥဒယော စာတိ ဣမေသံ ဝဏ္ဏနံ ယတ္ထ, တံ. သဝိတာတိ ဧတ္ထ တုပစ္စယန္တော. ဥယျာနသလိလက္ကီဠာမဓုပါနရတုဿဝံ ဥယျာနကီဠာသုရာပါနရတိကီဠာသင်္ခါတော ဥဿဝေါ ယတ္ထ, တံ ဝိပ္ပလမ္ဘဝိဝါဟေဟိ ဒါရာဝိယောဂဒါရပရိဂ္ဂဟေဟိ စ ကုမာရောဒယဝဍ္ဎိဟိ ကုမာရုပ္ပတ္တိကုမာရဝဍ္ဎီဟိ စ မန္တဒူတပ္ပယာနာဇိနာယကာဘျူဒယေဟိ နီတိဇာနနပညာ မန္တော, သန္ဓာနကာရကော ဒူတော, ယုဒ္ဓါဘိဂမနံ ပယာနံ, ယုဒ္ဓသင်္ခါတော အာဇိ, သပက္ခနာယကဿ အဘိဝဍ္ဎိသင်္ခါတော အဘျူဒယော စာတိ ဣမေဟိ အလင်္ကတံ သဇ္ဇိတံ အသံခိတ္တ…ပေ… န္တရံ အသံခိတ္တာ ဝိတ္ထာရာ ရသာ သိင်္ဂါရာဒယော အဋ္ဌ ဘာဝါ ရတိဥဿာဟာဒယော စာတိ ဣမေဟိ နိရန္တရံ ဝိတ္ထိဏ္ဏံ ပိယဝုတ္တသုသန္ဓိဘိ သုတိသုဘဂေဟိ ဣန္ဒဝဇိရာဒီဟိ ဝုတ္တေဟိ ပုဗ္ဗာပရသမ္ဗန္ဓပရိစ္ဆေဒတာယ သောဘနာ သန္ဓိ ယေသံ သဂ္ဂါနံ, တေဟိ သဗ္ဗတ္ထ သဗ္ဗသ္မိံ ပရိစ္ဆေဒေ ဘိန္နသဂ္ဂန္တေဟိ ဘိန္နသဂ္ဂါ ပရိယောသာနာ ယေသံ, တေဟိ နာတိဝိတ္ထိဏ္ဏသဂ္ဂေဟိ နာတိဝိတ္ထာရသဂ္ဂသင်္ခါတေဟိ ပရိစ္ဆေဒေဟိ ဥပေတံ ယုတ္တံ သာဓွလင်္ကတိ သောဘနာလင်္ကာရဝန္တံ ကဗ္ဗံ လောကရဉ္ဇကံ တံ သမာနံ ကပ္ပန္တရဋ္ဌာယိ ကပ္ပနိရန္တရဋ္ဌာယိ ကပ္ပန္တရေ ဌာယိ ဝါ ဇာယတေ. ဧတ္ထ မဓုပါနာဒိရဟိတပုရဝဏ္ဏနာဒယောပိ တညူနံ စိတ္တံ အာရာဓေတိ စေ, တံပျဒုဋ္ဌံ. ဝုတ္တဉှိ – इतिहासकथेतून उद्भूत झालेले किंवा प्राचीन कथेवर आधारित असलेले, किंवा सज्जनांच्या चरित्रावर आधारित असलेले, किंवा राजांच्या सुंदर चरित्रादींवर आधारित असलेले; धर्म, अर्थ, काम आणि मोक्ष या चतुर्वर्ग फलांवर अवलंबून असलेले, जे लौकिक आणि लोकोत्तर सुखाचे कारण आहे. (त्यात) 'धर्म' म्हणजे विद्याभूमी इत्यादींचा संग्रह; 'अर्थ' म्हणजे संचित केलेल्याचा (संग्रहित केलेल्याचा) सांभाळ करणे; 'काम' म्हणजे अपायाकडे (दुर्गतीकडे) नेणाऱ्या पंचकामगुणांनी युक्त असलेला काम; आणि 'मोक्ष' म्हणजे सर्व दुःखांपासून निवृत्तीचे कारण होय. अशा या चतुर्वर्ग फलांच्या अधीन असलेला, चार प्रकारच्या उदात्त नायकांनी युक्त असलेला; उत्साहशक्ती, मंत्रशक्ती आणि प्रभुशक्ती यांच्या योगाने चतुर (दक्ष) असलेला, आणि त्याग इत्यादींच्या अतिशयाने उदात्त, उदार, स्वपक्षीय किंवा प्रतिपक्षीय नायक ज्यामध्ये असतो ते; तसेच वर सांगितल्याप्रमाणे नगर, समुद्र, ऋतू (हेमंत, वसंत इत्यादी ऋतू), पर्वत, चंद्र आणि सूर्य यांचा उदय यांचे वर्णन ज्यामध्ये असते ते. येथे 'सविता' या शब्दात 'तु' प्रत्यय लागला आहे. उद्यानविहार, जलक्रीडा, मद्यपान आणि रतिक्रीडा यांनी युक्त असलेला उत्सव ज्यामध्ये असतो ते; विप्रलंभ (विरह) व विवाह (स्त्रीचा वियोग आणि स्त्रीचा स्वीकार), पुत्राचा जन्म व पुत्राची वाढ, तसेच मंत्र (नीती जाणण्याची प्रज्ञा), दूत (संधि करणारा), प्रयाण (युद्धासाठी निघणे), आजि (युद्ध) आणि अभ्युदय (स्वपक्षीय नायकाचा उत्कर्ष) यांनी जे अलंकृत (सज्जित) केलेले असते; जे असंक्षिप्त...पे... (विस्तृत) रसांनी (शृंगार इत्यादी आठ रस) आणि भावांनी (रती, उत्साह इत्यादी भाव) निरंतर व्याप्त असते; ऐकण्यास मधुर असलेल्या इंद्रवज्रा इत्यादी वृत्तांनी युक्त आणि पूर्व-पर संबंधांच्या परिच्छेदामुळे ज्यांचे सर्ग सुंदर संधींनी युक्त असतात; सर्व ठिकाणी, सर्व परिच्छेदांमध्ये भिन्न सर्गांच्या अंताने समाप्त होणारे; फार मोठे नसलेल्या सर्गांनी (परिच्छेदांनी) युक्त असलेले; सुंदर अलंकारांनी युक्त असलेले आणि लोकांना आनंद देणारे असे काव्य कल्पान्तरापर्यंत टिकणारे (युगानुयुगे टिकणारे) होते. येथे मद्यपान इत्यादींनी रहित असलेले नगरवर्णन इत्यादी देखील जर मर्मज्ञांच्या चित्ताला आनंद देत असेल, तर तेही निर्दोषच मानले जाते. कारण असे म्हटले आहे की – ‘‘ကဗ္ဗံ [Pg.24] န ဒုဿတင်္ဂေဟိ, နျူနမပျတြ ကေဟိစိ; ဗန္ဓင်္ဂသမ္ပဒါ တညူ, ကာမမာရာဓယန္တိ စေ’’တိ. “काही अंगांनी (भागांनी) उणे असले तरी काव्य दूषित होत नाही; जर रचना-अंगांच्या समृद्धीने मर्मज्ञ (काव्य जाणणारे) लोक इच्छेनुसार संतुष्ट होत असतील तर.” တဿတ္ထော – အတြ ဣမေသု ကဗ္ဗင်္ဂေသု မဇ္ဈေ ကေဟိစိ အင်္ဂေဟိ ကေဟိစိ အဝယဝေဟိ နျူနမပိ ဦနမပိ, နိသဒ္ဒေါတြတဗ္ဘာဝေ. ကဗ္ဗံ န ဒုဿတိ, တံ ပန အဒုဿနံ ဗန္ဓင်္ဂသမ္ပဒါ ရစိတပုရဝဏ္ဏနာဒိအင်္ဂသမ္ပဒါ တညူ ကဗ္ဗညူ ဇနေ ကာမံ ဣစ္ဆာနုရူပံ စေ အာရာဓယန္တိ, ဧဝံ သန္တေ ဘဝတိ. ပုနပိ နာယကဝဏ္ဏနာသု သပက္ခနာယကံ ဝဏ္ဏေတွာ တေန နိရာကရဏဘာဝမ္ပိ. နော စေ, ပစ္စတ္ထိကံ ဝဏ္ဏေတွာ အတ္တနော နာယကေန တဿာဘိဘဝနမ္ပိ ဝဏ္ဏေတုံ ဝဋ္ဋတိ. ဝုတ္တဉှိ – त्याचा अर्थ – येथे या काव्यांगांच्या मध्ये काही अंगांनी किंवा काही अवयवांनी उणे (कमी) असले तरी, (येथे 'अत्र' मधील 'अ' चा लोप झाला आहे). काव्य दूषित होत नाही. परंतु ते दूषित न होणे तेव्हाच घडते जेव्हा रचना-अंगांच्या समृद्धीने, म्हणजे रचलेल्या नगरवर्णन इत्यादी अंगांच्या समृद्धीने मर्मज्ञ (काव्य जाणणारे) लोक इच्छेनुसार संतुष्ट होतात. पुन्हा, नायकाच्या वर्णनामध्ये स्वपक्षीय नायकाचे वर्णन करून त्याच्याद्वारे (शत्रूच्या) निराकरणाचा भाव दाखवणे योग्य आहे. जर तसे नसेल, तर शत्रूचे वर्णन करून आपल्या नायकाद्वारे त्याचा पराभव केल्याचे वर्णन करणे योग्य ठरते. कारण असे म्हटले आहे की – ‘‘ဂုဏတော ပဌမံ ဝတွာ, နာယကံ တေန သတ္တုနော; နိရာကရဏမိစ္စေသ, မဂ္ဂေါ ပကတိသုန္ဒရော. “प्रथम गुणांच्या दृष्टीने नायकाचे वर्णन करून, त्याच्याद्वारे शत्रूचे निराकरण (पराभव) दाखवणे, हा मार्ग नैसर्गिकरीत्या सुंदर आहे. ဝံသဝီရသုတာဒီနိ, ဝဏ္ဏယိတွာ ရိပုဿပိ; တဇ္ဇယာ နာယကုက္ကံသ-ကထနဉ္စ သုခေတိ နော’’တိ. शत्रूच्या देखील वंशाचे, वीरतेचे आणि शास्त्रादींचे वर्णन करून, त्यावर विजय मिळवल्याने नायकाच्या उत्कर्षाचे कथन करणे देखील आपल्याला सुखदायक वाटते.” ၈. ८. ဗန္ဓော စ နာမ သဒ္ဒတ္ထာ, သဟိတာ ဒေါသဝဇ္ဇိတာ; ပဇ္ဇဂဇ္ဇဝိမိဿာနံ, ဘေဒေနာ’ယံ တိဓာ ဘဝေ. रचना (काव्यबंध) म्हणजे दोषांनी रहित असलेले आणि एकत्र आलेले शब्द व अर्थ होय; पद्य, गद्य आणि मिश्र (चंपू) अशा भेदांनी हे तीन प्रकारचे असते. ၈. ဧဝမေတေဟိ သောတုဇနသမုဿာဟနံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ကတ္တုမိစ္ဆိတဗန္ဓောတိ ဝုတ္တံ ဗန္ဓဿ လက္ခဏံ ကတ္တုမာရဘတေ ‘‘ဗန္ဓော စာ’’တိအာဒိ. ဒေါသဝဇ္ဇိတာ ဒေါသေဟိ သဒ္ဒနိဿိတေဟိ, အတ္ထနိဿိတေဟိ စ ဝိရောဓေဟိ ဝဇ္ဇိတာ ပရိစ္စတ္တာ, တေ ဝါ ဝဇ္ဇိတာ ယေဟိ, သဒ္ဒတ္ထာ သဟိတာ ဧကီဘူတာ. ဝုတ္တလက္ခဏာ ယေဟိ တေ ပုဗ္ဗာစရိယေဟိ သဟိတာ ဝုစ္စန္တိ. သဟိတာနံ ဘာဝေါ သဟဒယဟိလာဒကာရဏံ သာဓျံ သာဟိစ္စံ. ဣတိ ဒေါသဝဇ္ဇိတေ သဟိတေ သဒ္ဒတ္ထေ ပသိဒ္ဓဘာဝေန အနုဝဒိတွာ ဗန္ဓော နာမ သဘာဝဝုတ္တိဝင်္ကဝုတ္တိအလင်္ကာရဝုတ္တိဝသေန တိဝိဓောပီတိ အပ္ပသိဒ္ဓံ ဗန္ဓသရီရံ ဝိဓီယတေ ယထာ ‘‘ယော ကုဏ္ဍလီ, သော ဒေဝဒတ္တော’’တိ. စသဒ္ဒေါဝတ္တဗ္ဗန္တရဿ သမုစ္စယော, ကိဉ္စီတိ အတ္ထော. ८. अशा प्रकारे श्रोत्यांच्या उत्साहाचे प्रदर्शन करून, आता करू इच्छित असलेल्या रचनेचे (काव्यबंधाचे) लक्षण सांगण्यास 'बन्धो च' इत्यादींनी प्रारंभ करतात. 'दोषवर्जित' म्हणजे शब्दांवर आधारित आणि अर्थांवर आधारित दोषांनी व विरोधांनी रहित (मुक्त) केलेले, किंवा ज्यांच्याद्वारे ते वर्जित केले गेले आहेत ते; 'शब्द आणि अर्थ' एकत्र आलेले (एकजीव झालेले). पूर्व आचार्यांनी ज्यांचे लक्षण सांगितले आहे, त्यांना 'सहित' म्हटले जाते. सहितांचा भाव म्हणजे सहृदयांना आनंद देणारे साध्य साहित्य होय. अशा प्रकारे दोषरहित आणि एकत्र आलेल्या शब्द व अर्थांचा प्रसिद्ध रूपाने अनुवाद करून, 'रचना' (काव्यबंध) ही स्वभावोक्ती, वक्रोक्ती आणि अलंकारोक्तीच्या रूपाने तीन प्रकारची असते, हे दर्शवण्यासाठी रचनेचे शरीर (स्वरूप) स्पष्ट केले जाते; जसे की 'जो कुंडल परिधान करणारा आहे, तो देवदत्त आहे'. 'च' हा शब्द दुसऱ्या सांगण्यायोग्य गोष्टीचा समुच्चय करतो, ज्याचा अर्थ 'काही' असा आहे. တတ္ထ [Pg.25] ဇာတိဂုဏကြိယာဒဗ္ဗလက္ခဏော သဒ္ဒါနမတ္ထော မုချော စတုဗ္ဗိဓော ဟောတိ. မုချဿတ္ထဿ စတုဗ္ဗိဓတ္တာ တိဝိဓေသု သဒ္ဒေသု တဗ္ဗာစကော စတုဗ္ဗိဓော ဟောတိ ဇာတိသဒ္ဒေါ ဂုဏသဒ္ဒေါ ကြိယာသဒ္ဒေါ ဒဗ္ဗသဒ္ဒေါတိ. တိဝိဓော ဟိ သဒ္ဒေါ ဝါစကော လက္ခဏိကော ဗျဉ္ဇကောတိ ဗျာပါရဘေဒေန. ဗျာပါရော စ နာမ သဒ္ဒဿ’တ္ထပ္ပတီတိကာရိတ္တမေဝ. သော ဟိ တိဝိဓော မုချော လက္ခဏော ဗျဉ္ဇနသဘာဝေါ စေတိ. တတ္ထ ဇာတျာဒိနိရန္တရတ္ထဝိသယော သဒ္ဒဗျာပါရော မုချော. သောယေဝ အဘိဓာတိ ဥစ္စတေ. တံဗျာပါရဝါ အဗျဝဟိတဇာတျာဒိသကေဟိ တမတ္ထံ မုချဘာဝေန ယော ဝဒတိ ဂေါအာဒိကော, သော ဝါစကော. သဒ္ဒန္တရတ္ထဝိသယနိဒ္ဒိဋ္ဌော သဒ္ဒဗျာပါရော လက္ခဏော. သာ ဒုဝိဓာ သုဒ္ဓါ, ဥပစာရမိဿာ စေတိ. တတ္ထ သုဒ္ဓါ ယထာ ‘‘ဂေါ မုစ္စတု, မဉ္စာ ဥဂ္ဃောသေန္တိ, ဂင်္ဂါယံ ဃောသော’’တိ. ဧတ္ထ ဂေါသဒ္ဒေန ဝိသေသနံ ဂေါတ္တသာမညမေဝေါစ္စတေ, န တု ဂေါဗျတ္တိ. ဝုတ္တဉှိ – त्यामध्ये, जाती, गुण, क्रिया आणि द्रव्य हे लक्षण असलेला शब्दांचा मुख्य अर्थ चार प्रकारचा असतो. मुख्य अर्थ चार प्रकारचा असल्यामुळे, three प्रकारच्या शब्दांमध्ये त्याचा वाचक देखील चार प्रकारचा असतो – जातीशब्द, गुणशब्द, क्रियाशब्द आणि द्रव्यशब्द. शब्दांच्या व्यापाराच्या भेदाने शब्द तीन प्रकारचा असतो – वाचक, लाक्षणिक आणि व्यंजक. 'व्यापार' म्हणजे शब्दाची अर्थप्रतीती करून देण्याची क्षमताच होय. तो व्यापार देखील तीन प्रकारचा असतो – मुख्य (अभिधा), लक्षण (लक्षणा) आणि व्यंजना स्वभाव असलेला. त्यामध्ये, जाती इत्यादी निरंतर अर्थाचा विषय असलेला शब्दव्यापार हा मुख्य होय. त्यालाच 'अभिधा' असे म्हटले जाते. त्या व्यापाराने युक्त असलेला आणि व्यवधानरहित अशा स्वतःच्या जाती इत्यादी अर्थाला मुख्य रूपाने जो सांगतो, जसे की 'गाय' इत्यादी, तो 'वाचक' शब्द होय. दुसऱ्या शब्दाच्या अर्थाचा विषय म्हणून निर्दिष्ट केलेला शब्दव्यापार म्हणजे 'लक्षण' (लक्षणा) होय. ती दोन प्रकारची असते – शुद्धा आणि उपचारमिश्रा (गौणी). त्यामध्ये शुद्धा जसे की – 'गाय मुक्त केली जावो, मंचक ओरडत आहेत, गंगेवर वस्ती आहे'. येथे 'गो' (गाय) या शब्दाने विशेषण असलेले गोत्व सामान्यच सांगितले जाते, गो-व्यक्ती (विशिष्ट गाय) नाही. कारण असे म्हटले आहे की – ‘‘ဝိသေသျံနာဘိဓာ ဂစ္ဆေ, ခီဏသတ္တိ ဝိသေသနေ’’တိ. “विशेषणावर शक्ती क्षीण झाल्यावर अभिधा विशेष्यापर्यंत पोहोचत नाही.” သာမညဿ ဗျာပကတ္တာ, အသရီရတ္တာ စ. တတ္ထ ဗန္ဓနမောစနာနိ န သမ္ဘဝန္တီတိ အတ္တနော နိဿယဘူတာ ဂေါဗျတ္တိ အာကဍ္ဎီယတေ, တထာ မဉ္စာနမုဂ္ဃောသနံ န သမ္ဘဝတီတိ အတ္တနော ဥဂ္ဃောသနကြိယာသိဒ္ဓျတ္ထံ မဉ္စသမင်္ဂိနော ပုရိသာ အာကဍ္ဎီယန္တိ. တထာ ဂင်္ဂါသဒ္ဒဝါစ္စဿ ဇလပ္ပဝါဟဿ ဃောသပ္ပတျာကရတာ န သမ္ဘဝတီတိ ဂင်္ဂါသဒ္ဒေါ အတ္တနောဘိဓေယျဿောဒကပ္ပဝါဟဿ နိကဋံ တဋံ လက္ခေတိ. ဥပစာရဿာနေကပ္ပကာရတ္တာ ဥပစာရမိဿာ လက္ခဏာပျနေကဓာ သိယာ. ယထာ ကတ္ထစိ ကာရဏေ ကာရီယမုပစရိယတေ, ယထာ ‘‘အာယု ဃတ’’န္တိ. ကတ္ထစိ ကာရဏကာရိယာနမဘေဒေါ ယထာ ‘‘အာယုယေဝေဒ’’န္တိ. ကတ္ထစိ [Pg.26] ဥပမာနေ ဥပမေယျမုပစရီယတေ, ယထာ ‘‘ဂေါ ဗာဟိကော’’တိ. ကတ္ထစိ အဘေဒေါ တေသံ, ယထာ ‘‘ဂေါယေဝါယ’’န္တိ. ကတ္ထစိ တဒါဓာရတာယ တံဗျပဒေသော, ယထာ ‘‘ပဒီပဋ္ဌာ ကပလ္လိကာ ပဒီပေါ’’တိ. ကတ္ထစိ တံကမ္မသမ္ဗန္ဓာ တံဗျပဒေသော, ယထာ ‘‘အဝဍ္ဎကီပိ ဝဍ္ဎကီ အယ’’န္တိ. ကတ္ထစိ သံသာမိသမ္ဗန္ဓာ, ယထာ ‘‘ရာဇသမ္ဗန္ဓီ ပုရိသော ရာဇာယ’’န္တိ. ကတ္ထစိ အဝယဝေ သမုဒါယဗျပဒေသော, ယထာ ‘‘ပဋေကဒေသေ ပဋသဒ္ဒေါ’’ ဣစ္စာဒိ. सामान्यत्वाच्या व्यापकतेमुळे आणि अशरीरत्वामुळे (अमूर्तत्वामुळे). तेथे बंधन आणि मोचन संभवत नाही म्हणून स्वतःचा आश्रय असणारी 'गो-व्यक्ती' (गाय) ओढली जाते; तसेच मंचांचे (खाटांचे) ओरडणे संभवत नाही म्हणून स्वतःच्या ओरडण्याच्या क्रियेच्या सिद्धीसाठी मंचावर बसलेले पुरुष ओढले जातात (लक्षित केले जातात). तसेच 'गंगा' या शब्दाने वाच्य असणाऱ्या जलप्रवाहामध्ये गवळ्यांची वस्ती संभवत नाही म्हणून 'गंगा' हा शब्द स्वतःच्या अभिधेय असणाऱ्या जलप्रवाहाच्या जवळचा 'तीर' (काठ) लक्षित करतो. उपचाराच्या अनेक प्रकारांमुळे उपचारमिश्रित लक्षणा देखील अनेक प्रकारची असू शकते. जसे की, कोठे कारणात कार्याचे उपचार केले जाते, जसे “आयुष्य हे तूप आहे” (आयु घृतम्). कोठे कारण आणि कार्यात अभेद असतो, जसे “आयुष्य हेच हे आहे” (आयुरेवेदम्). कोठे उपमानात उपमेयाचा उपचार केला जातो, जसे “बाहिक हा बैल आहे” (गो बाहिकः). कोठे त्यांचा अभेद असतो, जसे “हा बैलच आहे” (गोरेवायम्). कोठे त्याच्या आधारावरून त्याचे व्यपदेशन (नाव) होते, जसे “दिवा ठेवलेले भांडे म्हणजे दिवा” (प्रदीपस्था कपल्लिका प्रदीपः). कोठे त्याच्या कर्माच्या संबंधाने त्याचे व्यपदेशन होते, जसे “हा सुतार नसला तरी सुतार आहे” (अवर्धकी अपि वर्धकी अयम्). कोठे स्वामी-सेवक संबंधाने, जसे “राजाशी संबंधित पुरुष हा राजाच आहे” (राजसंबंधी पुरुषो राजा). कोठे अवयवामध्ये समुदायाचे व्यपदेशन होते, जसे “वस्त्राच्या एका भागात वस्त्र हा शब्द” (पटैकदेशे पटशब्दः) इत्यादी। လက္ခဏာယ နိဿယော သဒ္ဒေါ လက္ခဏိကော. ဗျဉ္ဇနသဘာဝေါ ပန ပရပရိယာယော သဒ္ဒဿ တတိယော ဗျာပါရော. တဿ နိဿယော သဒ္ဒေါ ဗျဉ္ဇနကော. ဣစ္စေတံ တိဏ္ဏံ သဒ္ဒါနံ ဝသေန အတ္ထောပိ တိဝိဓော ဟောတိ ဝါစ္စော လက္ခဏိယော ဗျင်္ဂျောတိ. တတ္ထ ဗျင်္ဂျောယေဝတ္ထော ဗန္ဓသတ္ထာ ဝုစ္စတေ. တေနေဝ ပဓာနဗျင်္ဂျော ဗန္ဓော ဥတ္တမော, အပဓာနဗျင်္ဂျော မဇ္ဈိမော, အဗျင်္ဂျော အဓမော, ဗျင်္ဂျေန ဝိနာ ဗန္ဓော နိဇ္ဇီဝေါ သိယာတိ ပုဗ္ဗာစရိယာနံ ပဝတ္တိ, သဘာဝဝုတ္တိ ဗန္ဓောပိ တု နိဇ္ဇီဝေါတိ နာသင်္ကနီယော. ယသ္မာ ကဝီနံ လောကဝေါဟာရကောသလ္လံ သဘာဝဝုတ္တိယေဝ ဂမေတိ. ယော ဟိ သကလလောကဋ္ဌိတိံ န ဇာနာတိ, သော ကဝိယေဝ န ဟောတီတိ. लक्षणावर आश्रित असणारा शब्द 'लाक्षणिक' असतो. व्यंजना स्वभाव (व्यंग्य अर्थ प्रकट करणे) हा शब्दाचा तिसरा व्यापार आहे, जो दुसऱ्या पर्यायाने ओळखला जातो. त्यावर आश्रित असणारा शब्द 'व्यंजक' असतो. अशा प्रकारे या तीन शब्दांच्या आधारे अर्थ देखील तीन प्रकारचा असतो - वाच्य, लक्षणीय (लक्ष्य) आणि व्यंग्य. त्यामध्ये व्यंग्य अर्थालाच काव्याचा (बंधाचा) आत्मा म्हटले जाते. म्हणूनच प्रधान व्यंग्य असणारे काव्य उत्तम, अप्रधान व्यंग्य असणारे मध्यम आणि व्यंग्य नसलेले काव्य अधम मानले जाते. व्यंग्याशिवाय काव्य निर्जीव असते, अशी पूर्वाचार्यांची धारणा आहे. परंतु स्वभावोक्ती काव्य देखील निर्जीव आहे अशी शंका घेऊ नये. कारण कवींचे लोकव्यवहारातील कौशल्य स्वभावोक्तीमधूनच प्रकट होते. जो संपूर्ण जगाची स्थिती जाणत नाही, तो कवीच होऊ शकत नाही। အထေတ္ထ တိဝိဓမ္ပိ အတ္ထံ တာဒိသဇနာဝဗောဓတ္ထံ သမုဒါဟရိဿာမ ‘‘မုနိန္ဒဝဒနမ္ဘောဇေ’’တျာဒိ. ဧတ္ထ ဝါဏီသဒ္ဒဿ သဒ္ဓမ္မသင်္ခါတော အတ္ထော ဝါစ္စတ္ထော. ဝါဏီ နာမ စေတနာ, တဿံ ယာဝ ဒေဝတတ္ထံ နာရောပျတေ, တာဝ တပ္ပတီ အတ္တနော မနောသမ္ပီဏနအာသီသနာ န သံဂစ္ဆတီတိ ဝါကျသာမတ္ထိယာယေဝ ဝါဏိယံ သာယမောစိတျဘေဒေန ဒေဝတာသဒ္ဒဿ အာရောပိတောတ္ထော လက္ခဏိယော. တထာ ဝဒနသဒ္ဒဿာပိ မုခံ ဝါစ္စတ္ထော. အမ္ဘောဇသဒ္ဒဿ သမာရောပိတောတ္ထော လက္ခဏိယော. မနောသမ္ပီဏနဿ တု အညထာ အနုပပတ္တိယာ ပဿဒ္ဓျာဒိက္ကမေန ယထာဘူတာဝဗောဓသမ္ဘဝါ အနာယာသေန [Pg.27] ဝိစိတ္တာနေကသဒ္ဒတ္ထပဋိဘာနေန ဂန္ထပရိသမတ္တိသင်္ခါတာ ယထိစ္ဆိတတ္ထနိပ္ဖတ္တိ ဟောတေဝ, အယံ ဗျင်္ဂျတ္ထော. တဗ္ဗာစကာ သဒ္ဒါ ဝါစကလက္ခဏိကဗျဉ္ဇကာ ဟောန္တီတိ ဧဝံ သဗ္ဗတ္ထ သဒ္ဒတ္ထဝိစာရော ဂန္တဗ္ဗော. आता येथे त्या प्रकारच्या लोकांच्या आकलनासाठी तिन्ही प्रकारच्या अर्थांचे उदाहरण देऊ, जसे की “मुनींद्रवदनांभोजे” इत्यादी. येथे 'वाणी' शब्दाचा सद्धम्म नावाचा अर्थ हा वाच्य अर्थ आहे. वाणी म्हणजे चेतना; जोपर्यंत तिच्यावर देवतेचा आरोप केला जात नाही, तोपर्यंत तिच्याकडून स्वतःच्या मनाला आनंद देणारी प्रार्थना सुसंगत ठरत नाही. म्हणून वाक्याच्या सामर्थ्यामुळेच वाणीमध्ये योग्यतेच्या भेदाने देवता शब्दाचा आरोपित अर्थ हा लक्षणीय (लक्ष्य) अर्थ आहे. तसेच 'वदन' शब्दाचा 'मुख' हा वाच्य अर्थ आहे. 'अंभोज' (कमळ) शब्दाचा आरोपित अर्थ लक्षणीय आहे. मनाच्या आनंदाची इतर प्रकारे अनुपपत्ती असल्यामुळे, प्रसन्नता इत्यादी क्रमाने यथाभूत ज्ञानाचा संभव होत असल्यामुळे, अनायासाने विविध आणि अनेक शब्दार्थांच्या प्रतिभेने ग्रंथाच्या समाप्तीरूप इच्छित अर्थाची निष्पत्ती होतेच; हा व्यंग्य अर्थ आहे. त्याचे वाचक असणारे शब्द वाचक, लाक्षणिक आणि व्यंजक असतात. अशा प्रकारे सर्वत्र शब्द आणि अर्थाचा विचार केला पाहिजे। တမေဝံ ယထာဝုတ္တဗန္ဓသရီရံ ကတိဝိဓမိစ္စာဟ ‘‘ပဇ္ဇေ’’စ္စာဒိ. အယံ ယထာဝုတ္တော ဗန္ဓော ဗန္ဓသရီရံ တိဓာ ဘဝေ တိပ္ပကာရေန သိယာ, နာဓိကံ နာပျူနံ. ကထံ? ပဇ္ဇဂဇ္ဇဝိမိဿာနံ ဘေဒေန ပဇ္ဇသဘာဝါဒီနံ ဝိသေသေန တိဓာ ဘဝေတိ ပကတံ. တတ္ထ ပဇ္ဇံ နာမ အမှေဟိယေဝ ဝိရစိတဝုတ္တောဒယာချေ ဆန္ဒသိ နိရူပိတာ ဝုတ္တဇာတိပ္ပဘေဒါ စတုပ္ပဒိကတ္ထာ နိရူပိတော မုတ္တကာဒိပိ ဝုတ္တဇာတိပ္ပကာရောယေဝ. တေနေဝေတ္ထ တေသမဒဿနံ. တေသု ဧကဂါထာ နိဋ္ဌိတတ္ထာ သပ္ပဓာနာ ဂါထန္တရာနိရပေက္ခာ မုတ္တကံ, ဧကကြိယာဒါနေန အညမညသာပေက္ခာ နိဋ္ဌိတတ္ထာ ပစ္စေကံ အနိဋ္ဌိတတ္ထာ ဂါထာ ကုလကံ, နာနာဘိတ္တိယော ဘိန္နကိရိယော သပ္ပဓာနာ ဂါထာ ကောသော ဝိယ ဌပိတာ ကောသော, ဧကဘိတ္တိပဒေါသာဒိကံ ဝဏ္ဏေတုံ သမုဒါယေန ပဝတ္တာ ဘိန္နကြိယာ ဂါထာ သံဃာတော, သောပိ စတုဗ္ဗိဓော ပဇ္ဇပ္ပကာရော ယထာဝုတ္တသဂ္ဂဗန္ဓောဝါတိ ဝိညာတဗ္ဗံ. ဂဇ္ဇံ နာမ ပါဒသန္နိဋ္ဌာနရဟိတော သျာဒျန္တတျာဒျန္တပ္ပဗန္ဓော. တဿ တု ဒွေ ပကာရာ အာချာယိကာ, ကထာတိ. ဝိမိဿံ ပဇ္ဇဂဇ္ဇမယံ နာဋကပ္ပကရဏာဒိ, စမ္ပူ ဇာတကမာလာဒိကာ စ. अशा प्रकारे वर सांगितलेले काव्याचे शरीर (रचना) किती प्रकारचे आहे, हे सांगण्यासाठी “पद्य” इत्यादी म्हटले आहे. हे वर सांगितलेले काव्यशरीर तीन प्रकारचे असते, त्यापेक्षा जास्तही नाही आणि कमीही नाही. कसे? पद्य, गद्य आणि मिश्र यांच्या भेदाने पद्यस्वभाव इत्यादींच्या विशेषत्वाने ते तीन प्रकारचे होते, हे स्पष्ट आहे. त्यामध्ये 'पद्य' म्हणजे आम्हीच रचलेल्या 'वृत्तोदय' नावाच्या छंदशास्त्रात निरूपित केलेले, वृत्त आणि जातीच्या भेदांनी युक्त, चार चरणांचे आणि मुक्तक इत्यादी वृत्तजातींच्या प्रकारांचेच निरूपण होय. म्हणूनच येथे त्यांचे दर्शन घडवले नाही. त्यामध्ये एकच गाथा जिचा अर्थ पूर्ण झाला आहे, जी मुख्य आहे आणि दुसऱ्या गाथेची अपेक्षा ठेवत नाही, तिला 'मुक्तक' म्हणतात. एकाच क्रियेच्या संबंधाने एकमेकांवर अवलंबून असणाऱ्या, अर्थ पूर्ण करणाऱ्या परंतु स्वतंत्रपणे अर्थ पूर्ण न करणाऱ्या गाथांच्या समूहाला 'कुलक' म्हणतात. विविध आश्रय असणाऱ्या, भिन्न क्रिया असणाऱ्या आणि मुख्य असणाऱ्या गाथा कोशाप्रमाणे एकत्र ठेवल्यास त्याला 'कोश' म्हणतात. एकाच भिंतीच्या भागाचे इत्यादींचे वर्णन करण्यासाठी समुदायाने प्रवृत्त झालेल्या आणि भिन्न क्रिया असणाऱ्या गाथांना 'संघात' म्हणतात. हा चार प्रकारचा पद्यप्रकार देखील वर सांगितलेल्या सर्गबंधाप्रमाणेच (महाकाव्याप्रमाणेच) समजावा. 'गद्य' म्हणजे चरणांच्या बंधनाशिवाय असणारा, सुबंत आणि तिङंत पदांचा प्रबंध होय. त्याचे दोन प्रकार आहेत - आख्यायिका आणि कथा. 'मिश्र' म्हणजे पद्य आणि गद्य यांनी युक्त असणारे नाटक, प्रकरण इत्यादी, आणि चंपू काव्य जसे की जातकमाला इत्यादी। ၈. ဣဒါနိ သဉ္ဇာနနာဘိလာသီနံ အလင်္ကာရနိဿိတံ ဗန္ဓသရီရံ, သောဝ ဗန္ဓောတိ အဓိကတံ, ‘‘ယော ကုဏ္ဍလီ, သော ဒေဝဒတ္တော’’တိ ပသိဒ္ဓကုဏ္ဍလိတ္တာနုဝါဒေန အပ္ပသိဒ္ဓဿ ဒေဝဒတ္တတ္တဝိဓာနံ ဝိယ ဒဿေန္တော ‘‘ဗန္ဓော’’စ္စာဒိမာဟ. တတ္ထ ဗန္ဓော နာမ စ ဗန္ဓနံ ပန. ဒေါသဝဇ္ဇိတာ သဒ္ဒတ္ထနိဿိတဒေါသေဟိ ပရိစ္စတ္တာ, တေ ဝါ ဝဇ္ဇိတာ ဧတေဟိ တာဒိသာ. သဟိတာ အညမညာနုရူပတ္ထေန သဟဘာဝံ ဂတာ. သဒ္ဒတ္ထာ သဒ္ဒေါ, [Pg.28] အတ္ထော စ. ဧဝံပကာရေဟိ တု ဤဒိသသဒ္ဒတ္ထာနံ ဝိညူနံ တုဋ္ဌိဇနကအညမညာနုရူပဂုဏသဟိတာနံ ဘာဝေါတိ ဝစနတ္ထေန ‘‘သာဟိစ္စ’’မိတိ ဝဒန္တိ. သဒ္ဒတ္ထာတိ ဧတ္ထ သဒ္ဒတ္ထာနံ ကိံ နာနာကရဏန္တိ? သဒ္ဒေါ ပန အတ္ထပ္ပတီတိယံ အတ္တနော မုချဗျာပါရံ လက္ခဏဗျာပါရံ ဗျဉ္ဇနသဘာဝဗျာပါရဉ္စေတိ တိဝိဓံ ဗျာပါရဘေဒေန. ကမတော ဝါစကော လက္ခဏိကော ဗျဉ္ဇနကော စေတိ တိဝိဓော. တထာ အတ္ထောပိ ဝါစ္စော လက္ခဏိယော ဗျင်္ဂျော စေဘိ တိဝိဓော. အတြ တု ဝါစကော သဒ္ဒေါ အတ္တနာ ဒီပေတဗ္ဗမုချတ္ထဿ ဇာတိဂုဏကြိယာဒဗ္ဗဘေဒေန စတုဗ္ဗိဓတ္တာ သယမ္ပိ ဇာတိဂုဏကြိယာဒဗ္ဗသဒ္ဒဝသေန စတုဗ္ဗိဓော. ဝါစကသဒ္ဒဿ မုချဗျာပါရော ‘‘အဘိဓာ’’တိ စ ဝေါဟရီယတိ. သော မုချဗျာပါရော ဇာတျာဒီဟိ အဗျဝဟိတတ္ထေဝ ဝတ္တတေ. တထာ ဟိ ‘‘ဂေါ နီလံ ပါစကော ဝိသာဏိ’’စ္စာဒေါ ဂေါအာဒိသဒ္ဒါနံ မုချဗျာပါရော ဂေါပိဏ္ဍနီလပဋပါစကကတ္တုသိင်္ဂီတိ ဒဗ္ဗာနံ ဝိသေသနဘူတဇာတိဂုဏကြိယာဒဗ္ဗေသွေဝ ပဝတ္တတိ, န ပန ဇာတျာဒီနံ နိဿယဘူတဂေါပိဏ္ဍာဒီသူတိ. ဝုတ္တံ ဟိ– ८. आता, ज्यांना जाणून घेण्याची इच्छा आहे त्यांच्यासाठी अलंकारावर आश्रित असणारे काव्यशरीर, तेच काव्य आहे हे अधिकृत करून, “जो कुंडल परिधान करणारा आहे, तो देवदत्त आहे” या प्रसिद्ध कुंडलाच्या अनुवादाने देवदत्तत्वाचे विधान केल्याप्रमाणे दाखवून देत “बंधः” (काव्य) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये 'बंध' म्हणजे रचना होय. 'दोषवर्जित' म्हणजे शब्द आणि अर्थाशी संबंधित दोषांनी रहित असणारे. 'सहित' म्हणजे एकमेकांना अनुरूप अशा अर्थाने सहभाव प्राप्त झालेले. 'शब्दार्थ' म्हणजे शब्द आणि अर्थ. अशा प्रकारे, विद्वानांना आनंद देणाऱ्या आणि एकमेकांना अनुरूप अशा गुणांनी युक्त असणाऱ्या शब्द आणि अर्थांच्या भावाला 'साहित्य' (साहिच्च) असे म्हणतात. 'शब्दार्थ' यामध्ये शब्द आणि अर्थांचे काय वेगळेपण आहे? शब्द हा अर्थाच्या प्रतीतीमध्ये स्वतःचा मुख्य व्यापार, लक्षण व्यापार आणि व्यंजना स्वभाव व्यापार अशा तीन प्रकारच्या व्यापारांच्या भेदाने तीन प्रकारचा असतो. क्रमाने तो वाचक, लाक्षणिक आणि व्यंजक असा तीन प्रकारचा आहे. तसेच अर्थ देखील वाच्य, लक्षणीय आणि व्यंग्य असा तीन प्रकारचा आहे. येथे 'वाचक' शब्द स्वतः प्रकाशित करावयाच्या मुख्य अर्थाच्या जात, गुण, क्रिया आणि द्रव्य या भेदांमुळे चार प्रकारचा असल्यामुळे, स्वतः देखील जात, गुण, क्रिया आणि द्रव्य शब्दांच्या रूपाने चार प्रकारचा होतो. वाचक शब्दाच्या मुख्य व्यापाराला 'abhidhā' (अभिधा) असे देखील म्हटले जाते. तो मुख्य व्यापार जाती इत्यादींनी थेट संबंधित असणाऱ्या अर्थामध्येच प्रवृत्त होतो. जसे की, “गाय, निळा, स्वयंपाकी, शिंगे असलेला” इत्यादींमध्ये गाय इत्यादी शब्दांचा मुख्य व्यापार हा गोपिंड (गाईचे शरीर), निळे वस्त्र, स्वयंपाक करणारा कर्ता आणि शिंगे असलेले द्रव्य यांच्या विशेषण असणाऱ्या जात, गुण, क्रिया आणि द्रव्यांमध्येच प्रवृत्त होतो, परंतु जाती इत्यादींचा आश्रय असणाऱ्या गोपिंड इत्यादींमध्ये प्रवृत्त होत नाही. म्हणूनच म्हटले आहे की– ‘‘ဝိသေသျံ နာဘိဓာ ဂစ္ဆေ, ခီဏသတ္တိ ဝိသေသနေ’’တိ. “अभिधा (शब्दाची मुख्य शक्ती) विशेष्यापर्यंत पोहोचत नाही, कारण तिची शक्ती विशेषणामध्येच क्षीण झालेली असते.” တဿတ္ထော – ဝိသေသနေ ဝိသေသနဘူတဇာတျာဒိမှိ ခီဏသတ္တိ ခီဏဗျာပါရဝတီ အဘိဓာ မုချဗျာပါရောဝ ဝိသေသျံ ဒဗ္ဗံ န ဂစ္ဆေ န ပါပုဏာတီတိ. त्याचा अर्थ असा आहे – विशेषणामध्ये, जे विशेषणभूत जाती इत्यादी आहेत, त्यामध्ये क्षीण शक्ती आणि क्षीण व्यापार असलेली 'अभिधा' (मुख्य व्यापारच) विशेष्य अशा द्रव्याला प्राप्त होत नाही किंवा पोहोचत नाही. ဇာတျာဒီနံ နိဿယဂေါပိဏ္ဍာဒိကံ အဘိဓာ န ဝဒတိ စေ, ဧဝဉ္စ သတိ ‘‘ဂေါ ဂစ္ဆတိ, နီလံ နိဝါသေတိ, ပါစကော အာဂစ္ဆတိ, သိင်္ဂီ ဓာဝတိ’’စ္စာဒီသု ဇာတျာဒိဝိသိဋ္ဌဂေါပိဏ္ဍာဒီနံ ဂေါအာဒိသဒ္ဒဿ ကထံ ဝါစကတ္တံ ယုဇ္ဇတီတိ? ဒဗ္ဗာဓီနဇာတိဂုဏာဒီသု ဝုတ္တေသု တဗ္ဗိသိဋ္ဌဿ ဒဗ္ဗဿ ပရိယာယတော ဝါစကတ္တာ. နိပ္ပရိယာယတော ပန သုဒ္ဓလက္ခဏဗျာပါရဿေဝ ဝိသယော. လက္ခဏဗျာပါရောပိ သုဒ္ဓေါ ဥပစာရမိဿောတိ ဒုဝိဓော. [Pg.29] တတ္ထ သုဒ္ဓေါ လက္ခဏဗျာပါရော ဇာတျာဒိဝဇ္ဇိတတ္ထဝိသယော. တထာ ဟိ ‘‘ဂေါ ဂစ္ဆတိ, နီလံ နိဝါသေတိ, ပါစကော အာဂစ္ဆတိ, သိင်္ဂီ ဓာဝတိ, မဉ္စာ ဥဂ္ဃောသေန္တိ, ဂင်္ဂါယံ ဃောသော’’တျာဒီသု ဇာတိဂုဏကြိယာသိင်္ဂဒဗ္ဗမဉ္စဂင်္ဂါဒီနံ ဂမနာဒီဟိ ယောဂါသမ္ဘဝတော ဇာတိဂုဏာဒယော အတိက္ကမ္မ ယထာက္ကမံ ဂမနနိဝါသနအာဂမနဓာဝနဥဂ္ဃောသနဃောသာဒီနံ နိဿယဘူတဂေါပိဏ္ဍာဒယော ပရာမသတိ. जर अभिधा जाती इत्यादींचा आश्रय असलेल्या गोपिंड (गाईचे शरीर) इत्यादींना सांगत नसेल, तर असे असताना 'गाय जाते, निळा (वस्त्र) नेसतो, आचारी येतो, शिंग असलेला धावतो' इत्यादींमध्ये जाती इत्यादींनी विशिष्ट असलेल्या गोपिंड इत्यादींना 'गो' (गाय) इत्यादी शब्दांचे वाचकत्व कसे योग्य ठरेल? द्रव्याच्या अधीन असलेल्या जाती, गुण इत्यादींचे कथन केले असता, त्याने विशिष्ट असलेल्या द्रव्याचे पर्यायाने वाचकत्व सिद्ध होते. परंतु निष्पर्यायाने (थेटपणे) हा केवळ शुद्ध लक्षणा व्यापाराचाच विषय आहे. लक्षणा व्यापार सुद्धा 'शुद्ध' आणि 'उपचारमिश्र' असा दोन प्रकारचा आहे. त्यामध्ये शुद्ध लक्षणा व्यापार हा जाती इत्यादींनी रहित असलेल्या अर्थाचा विषय आहे. तसेच, 'गाय जाते, निळा नेसतो, आचारी येतो, शिंग असलेला धावतो, खाटा ओरडतात, गंगेवर घोष (वस्ती) आहे' इत्यादींमध्ये जाती, गुण, क्रिया, शिंग, द्रव्य, मंचक, गंगा इत्यादींचा गमनादी क्रियांशी संबंध असणे असंभव असल्यामुळे, जाती, गुण इत्यादींचे उल्लंघन करून अनुक्रमे गमन, नेसणे, आगमन, धावणे, ओरडणे, घोष इत्यादींचा आश्रय असलेल्या गोपिंड इत्यादींचा निर्देश केला जातो. မိဿော တု ဥပစာရဘေဒေန ဗဟုဝိဓော. တထာ ဟိ ကတ္ထစိ ကာရဏေ ကာရိယမုပစရီယတေ, ယထာ ‘‘အာယုဃတ’’န္တိ, ဧတ္ထ အာယုဝဍ္ဎနကာရဏဘူတေ ဃတေ ကာရိယဘူတအာယုနော ဝေါဟာရော အာရောပိတော ဟောတိ. ဥပရိပိ ဥပစာရော ယထာယောဂံ ယောဇေတဗ္ဗော. အတံသဘာဝေ ဟိ တံသဘာဝါရောပနံ ဥပစာရော. ကတ္ထစိ ကာရဏကာရိယာနမဘေဒေါ, ယထာ ‘‘အာယုယေဝ ဃတ’’န္တိ. ကတ္ထစိ ဥပမေယျဥပမာနောပစာရော, ယထာ ‘‘ဂေါ ဗာဟိကော’’တိ. ကတ္ထစိ ဥပမာနဥပမေယျာနမဘေဒေါ, ယထာ ‘‘ဂေါယေဝါယံ ဗာဟိကော’’တိ. ကတ္ထစိ တဒါဓာရတာယ တဒူပစာရော, ယထာ ‘‘ပဒီပဋ္ဌာ ကပလ္လိကာ ပဒီပေါ’’တိ. ကတ္ထစိ ကြိယာသမ္ဗန္ဓေန တံဗျပဒေသော, ယထာ ‘‘အဝဍ္ဎကီပိ ဝဍ္ဎကီ အယ’’န္တိ. ကတ္ထစိ သံသာမိသမ္ဗန္ဓေန တံဗျပဒေသော, ယထာ ‘‘ရာဇဝလ္လဘောပိ ရာဇာ အယ’’န္တိ. ကတ္ထစိ အဝယဝေ သမုဒါယဗျပဒေသော, ယထာ ‘‘ပဋော ဒဍ္ဎော’’တိ. ဣမိနာ မုခေန ဥပစာရဘေဒေါ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဗျဉ္ဇနသဘာဝဗျာပါရော ဧဝ ‘‘ဓန’’န္တိ စ ဝုစ္စတိ, တဿ တတိယဗျာပါရဿ ဝိသယော တာဒိသဝါကျမေဝ ဝါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. मिश्र (उपचारमिश्र लक्षणा) तर उपचाराच्या भेदाने अनेक प्रकारचा आहे. जसे की, कोठे कारणावर कार्याचा उपचार केला जातो, जसे 'आयुष्य हेच तूप' (आयुघृतम्), येथे आयुष्य वाढवण्यास कारणीभूत असलेल्या तुपामध्ये कार्यरूप आयुष्याचा व्यवहार आरोपित केला जातो. पुढेही उपचाराची योजना योग्यतेनुसार करावी. कारण तद्रूप नसलेल्या गोष्टीवर तद्रूपतेचा आरोप करणे म्हणजेच 'उपचार' होय. कोठे कारण आणि कार्यात अभेद असतो, जसे 'आयुष्य म्हणजेच तूप'. कोठे उपमेय आणि उपमानाचा उपचार असतो, जसे 'बाहीक (मूर्ख माणूस) हा बैल आहे'. कोठे उपमान आणि उपमेयाचा अभेद असतो, जसे 'हा बाहीक बैलच आहे'. कोठे त्याच्या आधारावर त्याचा उपचार असतो, जसे 'दिव्याचा आधार असलेली पणती म्हणजे दिवाच'. कोठे क्रियासंबंधामुळे तसा निर्देश केला जातो, जसे 'सुतार नसलेलाही हा सुतार आहे'. कोठे स्वामी-सेवक संबंधामुळे तसा निर्देश केला जातो, जसे 'राजाचा आवडता असलेलाही हा राजाच आहे'. कोठे अवयवावर समुदायाचा निर्देश केला जातो, जसे 'वस्त्र जळाले'. या प्रकारे उपचाराचे भेद समजून घ्यावेत. व्यंजना स्वभाव असणाऱ्या व्यापारालाच 'ध्वनी' (किंवा धन) असेही म्हटले जाते, आणि त्या तिसऱ्या व्यापाराचा विषय तशाच प्रकारचे वाक्य आहे, असे समजावे. ဧတ္ထ ဗျင်္ဂျတ္ထံ ဗန္ဓဿ ဇီဝိတမိတိ စ, ဗျင်္ဂျတ္ထပဓာနံ ဗန္ဓမုတ္တမန္တိ စ, ဗျင်္ဂျတ္ထပဓာနရဟိတံ မဇ္ဈိမန္တိ စ, အဗျင်္ဂျဗန္ဓံ အဓမမိတိ စ ဝဒန္တိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ – येथे व्यंग्यार्थाला रचनेचे (काव्याचे) जीवित (प्राण) म्हणतात, व्यंग्यार्थ प्रधान असलेल्या रचनेला 'उत्तम' म्हणतात, व्यंग्यार्थ प्राधान्य नसलेल्या रचनेला 'मध्यम' म्हणतात, आणि व्यंग्यार्थ नसलेल्या रचनेला 'अधम' म्हणतात. आणि याविषयी पुढील श्लोक आहेत – အတ္ထပ္ပတီတိယံ သဒ္ဒ-ဗျာပါရော တိဝိဓော ဘဝေ; မုချော လက္ခဏဗျဉ္ဇန-သဘာဝေါ စာတိ ဧတ္ထ တု. अर्थाच्या प्रतीतीमध्ये शब्दाचा व्यापार तीन प्रकारचा असतो; मुख्य (अभिधा), लक्षणा आणि व्यंजना स्वभावाचा, असे येथे समजावे. အဘိဓာပရပရိယာယော, [Pg.30] ဗျာပါရော ပဌမော ဘဝေ; ဓနန္တာပရပရိယာယော, ဗျာပါရော တတိယော ပုန. पहिला व्यापार हा 'अभिधा' या दुसऱ्या पर्यायाने ओळखला जातो; आणि तिसरा व्यापार हा 'ध्वनी' (किंवा धन) या दुसऱ्या पर्यायाने ओळखला जातो. မုချော နိရန္တရတ္ထေသု, လက္ခဏာ တု တိရောဟိတေ; အတ္ထေ’တရော တု ဝါကျဿ, အတ္ထေယေဝ ပဝတ္တတိ. मुख्य व्यापार हा व्यवधान नसलेल्या (थेट) अर्थांमध्ये प्रवृत्त होतो, तर लक्षणा ही मुख्य अर्थ लुप्त (बाधित) झाल्यावर प्रवृत्त होते; आणि दुसरा (व्यंजना व्यापार) हा वाक्याच्या अर्थामध्येच प्रवृत्त होतो. ဗျာပါရဿ ပဘေဒေန, တိဓာ သဒ္ဒေါပိ ဝါစကော; လက္ခဏိကော ဗျဉ္ဇကောတိ, တဒတ္ထောပိ တိဓာ မတော. व्यापाराच्या भेदाने शब्द सुद्धा तीन प्रकारचा होतो – वाचक, लाक्षणिक आणि व्यंजक; आणि त्याचा अर्थ सुद्धा तीन प्रकारचा मानला गेला आहे. ဝါစ္စော လက္ခဏိယော ဗျင်္ဂျော-စ္စေဝံ သဒ္ဒေသု ဝါစကော; ဇာတိဂုဏကြိယာဒဗ္ဗ-ဘေဒေန သော စတုဗ္ဗိဓော. शब्दांमध्ये वाच्य, लाक्षणिक आणि व्यंग्य अशा अर्थांपैकी वाचक अर्थ, जाती, गुण, क्रिया आणि द्रव्य यांच्या भेदाने चार प्रकारचा असतो. ဝါစ္စတ္ထဿ စတုဒ္ဓါဝ, ဘိန္နတ္တာ ဇာတိအာဒိတော; ဇာတျာဒီနံ ပဘေဒေန, တထာ လက္ခဏိကော မတော. वाच्य अर्थ हा जाती इत्यादींच्या भेदाने चार प्रकारचाच भिन्न असल्यामुळे, जाती इत्यादींच्या भेदाने लाक्षणिक अर्थ देखील तसाच (चार प्रकारचा) मानला गेला आहे. ဥပစာရဗဟုတ္တေန, ဘေဒေ သတိပိ တဿ တု; ဗျဉ္ဇကော တု အနညတ္တာ, ဝိသုံ တေဟိ န ဝုစ္စတီတိ. उपचाराच्या बहुत्वामुळे त्याचे अनेक भेद होत असले तरी, व्यंजक अर्थ हा अनन्यतेमुळे त्यांच्यापासून वेगळा सांगितला जात नाही. လက္ခဏတော ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗံ – ‘‘မုနိန္ဒဝဒနမ္ဘောဇေ’’ တျာဒိဂါထာယံ ဝဒနသဒ္ဒဿ မုခတ္ထော ဝါစ္စတ္ထော, အာရောပိတအမ္ဘောဇတ္ထော လက္ခဏိယတ္ထော. အမ္ဘောဇသဒ္ဒဿ ပဒုမတ္ထော ဝါစ္စတ္ထော, ဥပစရိတမုခတ္ထော လက္ခဏိယတ္ထော. ဝါဏိသဒ္ဒဿ သဒ္ဓမ္မသင်္ခါတော အတ္ထော ဝါစ္စတ္ထော, အာရောပိတဒေဝတာအတ္ထော လက္ခဏိယတ္ထော. ဧတ္ထ အာသီသနာ နာမ ယထာဝုတ္တနယေန ပုညာတိသယတာ, တတော ဣဓ အဘိမတတ္ထဗာဓကာကုသလနိဝါရဏဉ္စ ကုသလာနမနုဗလပ္ပဒါနဉ္စ တတော ကာယစိတ္တပီဠာဝိဂမော စ တတော သုခပ္ပဋိလာဘော စ တတော စိတ္တသမာဓာနဉ္စ တတောယေဝ အနေကဝိဓတ္ထာဝဗောဓော စ တတော အဘိမတဂန္ထပရိသမတ္တိ စ ဘဝတီတျယံ ဝါကျသာမတ္ထိယတော လဒ္ဓတ္ထော ဗျင်္ဂျတ္တော. တံတံအတ္ထပ္ပကာသကာ သဒ္ဒါ ဝါစကလက္ခဏိကဗျဉ္ဇနကာ နာမ ဘဝန္တိ. ဧဝံ သဒ္ဒသဒ္ဒတ္ထဝိစာရော ဝေဒိတဗ္ဗော. लक्षणावरून असे जाणावे – 'मुनिन्दवदनम्भोने' (मुनींद्रांच्या मुखकमलात) इत्यादी गाथेमध्ये 'वदन' शब्दाचा मुख्य अर्थ हा वाच्य अर्थ आहे, आणि आरोपित 'अम्भोज' (कमळ) अर्थ हा लाक्षणिक अर्थ आहे. 'अम्भोज' शब्दाचा 'कमळ' हा वाच्य अर्थ आहे, आणि उपचारित 'मुख' हा लाक्षणिक अर्थ आहे. 'वाणी' शब्दाचा सद्धम्म नावाचा अर्थ हा वाच्य अर्थ आहे, आणि आरोपित 'देवता' हा लाक्षणिक अर्थ आहे. येथे 'आशीर्वाद' (आसीसना) म्हणजे वर सांगितलेल्या पद्धतीने पुण्याचा अतिशय (उत्कर्ष) होय, त्यामुळे येथे इष्ट अर्थाला बाधा आणणाऱ्या अकुशलाचे निवारण आणि कुशलांना बळ देणे, त्यामुळे काय आणि चित्ताच्या पीळेचा (पीडेचा) नाश, त्यामुळे सुखाची प्राप्ती, त्यामुळे चित्ताची एकाग्रता (समाधान), आणि त्यामुळेच अनेक प्रकारच्या अर्थांचे आकलन आणि त्यामुळे इष्ट ग्रंथाची समाप्ती होते, हा वाक्याच्या सामर्थ्यावरून प्राप्त झालेला अर्थ 'व्यंग्यार्थ' आहे. त्या त्या अर्थाचे प्रकाशन करणारे शब्द अनुक्रमे वाचक, लाक्षणिक आणि व्यंजक असे असतात. अशा प्रकारे शब्द आणि शब्दाच्या अर्थाचा विचार जाणावा. ဣဒါနိ [Pg.31] ပကာသိတဗန္ဓဿ ဘေဒံ ဝဒတိ ‘‘ပဇ္ဇာ’’ဒိနာ. အယံ ဝုတ္တလက္ခဏော ဗန္ဓော ပဇ္ဇဂဇ္ဇဝိမိဿာနံ ဘေဒေန ဂါထာစုဏ္ဏိယတဒုဘယမိဿာနံ ဝသေန တိဓာ ဘဝေ. သဒ္ဒေါ စ အတ္ထော စေတိ စ, သဟဘာဝံ ဣတာ ပတ္တာတိ စ, ဒေါသေဟိ ဝဇ္ဇိတာ, ဒေါသေ ဝါ ဝဇ္ဇိတာ ယေဟီတိ စ, ပဇ္ဇဉ္စ ဂဇ္ဇဉ္စ ဝိမိဿဉ္စေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဣဟ ပဇ္ဇံ နာမ မုတ္တကကုလကကောသကသံဃာတဝသေန စတုပ္ပဘေဒံ ဆန္ဒသိ နိဒ္ဒိဋ္ဌဝုတ္တဝိသေသဝိရစိတံ စတုပ္ပဒိကဂါထာဗန္ဓံ. တတ္ထ မုတ္တကံ နာမ နိဋ္ဌိတတ္ထာ သပ္ပဓာနာ ဧကာ ဂါထာ, ကုလကံ နာမ ပစ္စေကမနိဋ္ဌိတတ္ထာ အညမညသာပေက္ခာ ဧကကြိယာဒွါရိကာ နာနာဂါထာ, ကောသကော နာမ နာနာဝိဓဝဏ္ဏနာဘူမိကာ ဘိန္နကြိယာဒွါရပ္ပဝတ္တာ သပ္ပဓာနာ ဂါထာရာသိ, သံဃာတော နာမ သဉ္စျာကာလာဒိဧကဝဏ္ဏနာဘူမိနိဿိတာ ဘိန္နကြိယာသမုဒါယေန ပဝတ္တာ ဂါထာ. ဂဇ္ဇံ နာမ အနိယတပဒေါ အာချာယိကာကထာဝသေန ဒွိပ္ပဘေဒေါ သျာဒျန္တတျာဒျန္တော ဝစနပ္ပဗန္ဓော. မိဿော ပန ဣမေဟိ ဒွီဟိ သံမိဿော နာဋကပကရဏာဒိ စ ဇာတကမာလာဒိစမ္ပူ စ. आता प्रकाशित केलेल्या रचनेचे (काव्याचे) भेद 'पद्य' इत्यादी शब्दांनी सांगतात. ही वर सांगितलेली लक्षणे असलेली रचना पद्य, गद्य आणि मिश्र यांच्या भेदाने, म्हणजेच गाथा, चूर्णिका आणि त्या दोन्हीच्या मिश्रणाने तीन प्रकारची होते. 'शब्द आणि अर्थ', 'सहभाव प्राप्त झालेले', 'दोषांनी रहित' किंवा 'ज्यांच्याद्वारे दोष वर्ज्य केले जातात', आणि 'पद्य, गद्य व मिश्र' असा हा विग्रह आहे. येथे 'पद्य' म्हणजे मुक्तक, kulak (कुलक), कोशक आणि संघात यांच्या भेदाने चार प्रकारची, छंदःशास्त्रात निर्दिष्ट केलेल्या विशिष्ट वृत्तांनी रचलेली चार चरणांची गाथारचना होय. त्यामध्ये 'मुक्तक' म्हणजे पूर्ण अर्थ असलेली, स्वतः प्रधान असलेली एक गाथा होय; 'कुलक' म्हणजे प्रत्येक गाथेचा अर्थ पूर्ण नसलेली, एकमेकांवर अवलंबून असलेली आणि एकाच क्रियापदाशी जोडलेली अनेक गाथांची रचना होय; 'कोशक' म्हणजे विविध प्रकारच्या वर्णनांवर आधारित, वेगवेगळ्या क्रियापदांनी युक्त असलेली, स्वतः प्रधान असलेल्या गाथांचा समूह होय; 'संघात' म्हणजे संचय, काळ इत्यादी एकाच वर्णनाच्या विषयावर आधारित, वेगवेगळ्या क्रियापदांच्या समूहाने प्रवृत्त झालेली गाथारचना होय. 'गद्य' म्हणजे अनियत (नियम नसलेले) पद असलेली, आख्यायिका आणि कथा यांच्या भेदाने दोन प्रकारची, सुबंत आणि तिङंत यांनी युक्त असलेली वाक्यरचना होय. आणि 'मिश्र' म्हणजे या दोन्हीचे मिश्रण असलेली, जसे नाटक, प्रकरण इत्यादी आणि जातकमाला इत्यादी चंपूकाव्य होय. ၉. ९. နိဗန္ဓော စာ’နိဗန္ဓော စ, ပုန ဒွိဓာ နိရုပ္ပတေ; တံ တု ပါပေန္တျ’လင်္ကာရာ, ဝိန္ဒနီယတရတ္တနံ. निबंध (बद्ध रचना) आणि अनिबंध (मुक्त रचना) अशा प्रकारे पुन्हा दोन प्रकार सांगितले जातात; आणि अलंकार त्या रचनेला अधिक आस्वाद घेण्यायोग्य (सुंदर) बनवतात. ၉. ဧဝံ တိပ္ပကာရံ ဗန္ဓသရီရံ ဝတွာ ဣဒါနိ အညထာပိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘နိဗန္ဓောစာ’နိဗန္ဓော စ, ပုန ဒွိဓာ နိရုပ္ပတေ’’ ဣတိ. ပုန ဘိယျော ယထာဝုတ္တော ပဇ္ဇမယဗန္ဓော ဒွိဓာ ဒွိပ္ပကာရေန နိရုပ္ပတေ နိစ္ဆီယတေ. ကထံ? နိဗန္ဓော စ တဒေကဒေသဘူတေဟိ မုတ္တကာဒီဟိ စတူဟိ သဂ္ဂဗန္ဓာဒိဝသေန ဗန္ဓော စ အနိဗန္ဓော စ ကေဝလံ မုတ္တကဝသေနာတိ ဧဝံ ဒွိဓာ နိရုပ္ပတေ ဣတိ ပကတံ. နနု တဿေတဿ ယထာဝုတ္တဝါတိမယဿ သက္ကဋံ ပါကတံ အပဗ္ဘံသော ပေသာစိကံ မိဿဉ္စေတိ ပဉ္စဝိဓတ္တံ ဝတွာ ‘‘သက္ကဋံ နာမ ဒေဝတာဘာသာ. ပါကတံ စတုဗ္ဗိဓံ သက္ကဋေဟိ ဝဏ္ဏညတ္တမတ္တေန ဥပ္ပန္နတ္တာ [Pg.32] မဟိန္ဒသိန္ဓဝါဒိ တဗ္ဘဝံ, တဿမံ ဟိရိဟရကမလာဒိ, မဟာရဋ္ဌာဒိဒေသပသိဒ္ဓံ ဒေသီယံ, တဗ္ဘဝါဒီဟိ သမ္မိဿံ မိဿံ. အာဘီရာဒီနံ ဝါစာ အပဗ္ဘံသော, သော စ ပါကတံ ဝိယ စတုဗ္ဗိဓော, တိဝိဓော စ နာဂရဥပနာဂရဝုဒ္ဓဘေဒေန. ပိသာစာနံ ဝစနံ ပေသာစိကံ. သဗ္ဗေသံ ဝသေန မိဿ’’န္တိ သက္ကဋာဒီနံ လက္ခဏံ ဝုတ္တံ. တထာ ‘‘သိင်္ဂါရပ္ပဓာနနစ္စသင်္ခါတလာသျာဒီနံ ပဋိပါဒကတ္ထေန လာသျာဒိကမဘိနယပ္ပဓာနတ္တာ ဒဿနီယံ, ဣတရံ ကဗ္ဗံ သဝနီယ’’န္တိ ဒုဝိဓံ ဝုတ္တံ, ဧဝံ ပုဗ္ဗာစရိယေဟိ ဘာသာဘေဒေန ဝုတ္တံ ပဉ္စဝိဓတ္တံ, ဝိနိယောဂဘေဒေန ဝုတ္တံ ဒုဝိဓတ္တဉ္စ ဣဓ ကသ္မာ န ဝုတ္တန္တိ? သစ္စံ, တထာပိ တဒေဝမိဓာနုပယောဂိတာယ န ဝုတ္တန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ९. अशा प्रकारे तीन प्रकारच्या 'बंधशरीरा'चे (रचना-शरीराचे) वर्णन करून, आता दुसऱ्या प्रकारे दर्शवण्यासाठी "निबंध आणि अनिबंध, पुन्हा दोन प्रकारे निरूपण केले जाते" असे म्हटले आहे. पुन्हा अधिक प्रमाणात, पूर्वोक्त पद्यमय बंध दोन प्रकारे (दोन प्रकारांनी) निरूपित केला जातो, निश्चित केला जातो. कसा? निबंध म्हणजे त्याच्याच एक भाग असलेल्या मुक्तक इत्यादी चार प्रकारांनी सर्गबंधादींच्या (महाकाव्यादींच्या) स्वरूपात बांधलेला आणि अनिबंध म्हणजे केवळ मुक्तक स्वरूपात असलेला; अशा प्रकारे दोन प्रकारांनी निरूपित केला जातो, हे प्रस्तुत आहे. शंका अशी की, त्या पूर्वोक्त वाणीमय बंधाचे 'सक्कठ' (संस्कृत), 'पाकत' (प्राकृत), 'अपब्भंस' (अपभ्रंश), 'पेसाचिक' (पैशाचिक) आणि 'मिस्स' (मिश्र) असे पाच प्रकार सांगून: "सक्कठ म्हणजे देवांची भाषा. पाकत हे चार प्रकारचे आहे - सक्कठ भाषेतील वर्णांच्या केवळ फरकाने उत्पन्न झाल्यामुळे 'तब्भव' (तद्भव) जसे की महिंद, सिंधव इत्यादी; त्याच्याशी समान असलेले 'तस्सम' (तत्सम) जसे की हरि, हर, कमल इत्यादी; महाराष्ट्र इत्यादी देशांमध्ये प्रसिद्ध असलेले 'देसीय' (देशीय); आणि तब्भव इत्यादींशी संमिश्र असलेले 'मिस्स' (मिश्र). आभीरादींची (गोपाळांची) भाषा म्हणजे 'अपब्भंस' (अपभ्रंश), ती प्राकृताप्रमाणे चार प्रकारची आहे आणि नागर, उपनागर व वृद्ध अशा भेदांनी तीन प्रकारची आहे. पिशाचांची भाषा म्हणजे 'पेसाचिक' (पैशाचिक). सर्वांच्या मिश्रणाने 'मिस्स' (मिश्र) होते" असे सक्कठ इत्यादींचे लक्षण सांगितले आहे. तसेच, "शृंगारप्रधान नृत्यात्मक लास्यादींचे प्रतिपादन करण्याच्या अर्थाने, अभिनयाची प्रधानता असल्यामुळे लास्यादी हे 'दसनीय' (दर्शनीय) आहे आणि इतर काव्य 'सवनीय' (श्रवणीय) आहे" असे दोन प्रकार सांगितले आहेत. मग पूर्व आचार्यांनी भाषाभेदाने सांगितलेले पाच प्रकार आणि विनियोगभेदाने सांगितलेले दोन प्रकार येथे का सांगितले नाहीत? हे सत्य आहे, तरीही ते येथे अनुपयुक्त असल्यामुळे सांगितले नाही, असे समजावे. ဧဝမလင်္ကာရာဓိဋ္ဌာနဘာဝေန ပဌမံ ဗန္ဓသရီရံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ဟာရကေယူရာဒိနာ ပုရိသသရီရမိဝ ဗန္ဓသရီရံ သဒ္ဒါလင်္ကာရအတ္ထာလင်္ကာရေဟိ ဝိန္ဒနီယတရံ ဟောတီတိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘တံ တု’’ ဣစ္စာဒိ. တုသဒ္ဒေါ ဝိသေသဝစနိစ္ဆာယံ. တံ ဗန္ဓသရီရံ တု အလင်္ကာရာ အလင်္ကရိယတိ တံ ဗန္ဓသရီရမေတေဟီတိ ပသာဒါဒယော သဒ္ဒါလင်္ကာရာ, သဘာဝဝုတျာဒယော အတ္ထာလင်္ကာရာ စ ဝိန္ဒနီယတရတ္တနံ အတိသယေန ဝိန္ဒနီယဘာဝံ အဿာဒနီယဘာဝံ ပါပေန္တိ နယန္တိ. သဗ္ဗထာ နိဒ္ဒေါသဘူတာနံ သဒ္ဒတ္ထာနံ အညမညာနုရူပတော သဟိတဘာဝေန ပရမာယ ဝဏ္ဏပေါက္ခရတာယ သမန္နာဂတံ တာဒိသပုရိသသရီရမိဝ ဝိန္ဒနီယမ္ပိ သမာနံ အလင်္ကာရေဟိ ပသာဓိတေ သတိ အစ္စန္တမေဝ ဝိန္ဒနီယံ သိယာတိ အဓိပ္ပာယော. अशा प्रकारे अलंकाराचे अधिष्ठान (आधार) म्हणून प्रथम 'बंधशरीर' दर्शवून, आता हार, केयूर (बाजूबंद) इत्यादींनी युक्त पुरुषाच्या शरीराप्रमाणे, बंधशरीर हे शब्दालंकार आणि अर्थालंकारांनी अधिक आस्वादनीय (आनंददायी) होते, हे दर्शवण्यासाठी "तंतु" (पण ते) इत्यादी म्हटले आहे. 'तु' हा शब्द विशेष अर्थ निश्चित करण्यासाठी आहे. 'ते बंधशरीर पण अलंकार' - ज्यांच्याद्वारे ते बंधशरीर अलंकृत केले जाते ते 'प्रसाद' इत्यादी शब्दालंकार आणि 'स्वभावोक्ती' इत्यादी अर्थालंकार त्याला 'विंदनीयतरत्व' म्हणजे अत्यंत आस्वादनीयता किंवा उपभोग्यतेप्रत पोहोचवतात (नेतात). सर्व प्रकारे दोषरहित असलेल्या शब्द आणि अर्थांच्या परस्परांशी सुसंगत अशा सहभावामुळे, परम वर्णसौंदर्याने युक्त असलेल्या पुरुषाच्या शरीराप्रमाणे, ते आधीच आस्वादनीय असले तरी, अलंकारांनी सुशोभित केल्यावर ते अत्यंत आस्वादनीय होते, असा अभिप्राय आहे. ၉. ပုနပိ တဿေဝ ဗန္ဓဿ ဘေဒံ ကထေတုံ ‘‘နိဗန္ဓော စာ’’ဒိမာဟ. ပုန နိဗန္ဓော စ မုတ္တကာဒီဟိ စတူဟိ အဝိနာဘာဝတော မဟာကဗ္ဗာဒိသဘာဝေန နိရန္တရံ ကတွာ ဗန္ဓော စ အနိဗန္ဓော စ ကေဝလံ မဟာကဗ္ဗာဒိသဘာဝေန မုတ္တကတ္တာ အနိရန္တရံ ကတွာ ဗန္ဓော စာတိ သောဝ ဗန္ဓော ဒွိဓာ နိရုပ္ပတေ နိစ္ဆီယတေ. [Pg.33] ပုနပိ သော ဗန္ဓော သက္ကဋပါကတအပဗ္ဘံ သပေသာစိကမိဿဘာသာဘေဒေန ပဉ္စဝိဓော. သိင်္ဂါရပဓာနနစ္စသင်္ခါတလာသျာဒီနံ ဒဿနပ္ပဓာနတ္တာ တာဒိသံ နစ္စံဒဿနီယံ, တဒညံ ကဗ္ဗံ သဝနီယမိတိ ဝဠဉ္ဇနဘေဒတော ဒုဝိဓော စ ဟောတိ. သော သဗ္ဗောပိ ပယောဇနာဘာဝတော ဣဟ န ဂဟိတော. တတ္ထ သက္ကဋံ နာမ ဒေဝတာဘာသာ. တတော ကေဟိစိ အက္ခရေဟိ ဘိန္နံ ပါကတံ နာမ. တံ ပန တဗ္ဘဝတဿမဒေသိယမိဿဝသေန စတုဗ္ဗိဓံ ဟောတိ. တတ္ထ သက္ကဋတော ဝဏ္ဏညတ္တမတ္တေန နိဗ္ဗတ္တံ တဗ္ဘဝံ နာမ, တံ မဟိန္ဒသိန္ဓဝါဒိ. တဿမံ ဟိရိဟရကမလာဒိ. ဒေသေ ပသိဒ္ဓံ ဒေသိယံ. မိဿံ နာမ တဗ္ဘဝါဒီဟိ သမ္မိဿံ. အပဗ္ဘံသော နာမ ဂေါပါလကာဒီနံ ဝါစာ, သော စ တဗ္ဘဝါဒီဟိ စတုဗ္ဗိဓော, နာဂရဥပနာဂရဝုဒ္ဓဘေဒေန တိဝိဓော စ ဟောတိ. ပိသာစာနံ ဝစနံ ပေသာစိကံ. တေဟိ သက္ကဋာဒီဟိ သမ္မိဿံ မိဿံ နာမ ဟောတိ. ဣဒါနိ ဤဒိသပ္ပဘေဒဝန္တဗန္ဓဿ အလင်္ကာရေန သောဘနတ္တံ ဝတ္တုံ ‘‘တံ တု’’စ္စာဒိမာဟ. တံ တု တံ ပန ဝုတ္တပ္ပကာရံ ဗန္ဓသရီရံ အလင်္ကာရာ ပသာဒါဒိသဒ္ဒါလင်္ကာရာ, သဘာဝဝုတျာဒိအတ္ထာလင်္ကာရာ စ ဝိန္ဒနီယတရတ္တနံ အတိသယပသာဒနီယတ္တံ ပါပေန္တိ. နိရန္တရံ ဗန္ဓော နိဗန္ဓောတိ စ, န နိဗန္ဓော အနိဗန္ဓောတိ စ, အတိသယေန ဝိန္ဒနီယော ဝိန္ဒနီယတရော, တဿ ဘာဝေါ ဝိန္ဒနီယတရတ္တနန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ९. पुन्हा त्याच बंधाचा भेद सांगण्यासाठी "निबंध आणि..." इत्यादी म्हटले आहे. पुन्हा, निबंध म्हणजे मुक्तक इत्यादी चार प्रकारांशी अविनाभाव संबंध असल्यामुळे महाकाव्यादींच्या स्वरूपात निरंतर (सलग) केलेली रचना; आणि अनिबंध म्हणजे केवळ महाकाव्यादींच्या स्वरूपात नसून मुक्तक असल्यामुळे अनिरंतर (सलग नसलेली) केलेली रचना; अशा प्रकारे तोच बंध दोन प्रकारे निरूपित केला जातो, निश्चित केला जातो. पुन्हा तो बंध सक्कठ (संस्कृत), पाकत (प्राकृत), अपब्भंस (अपभ्रंश), पेसाचिक (पैशाचिक) आणि मिस्स (मिश्र) या भाषाभेदांमुळे पाच प्रकारचा आहे. शृंगारप्रधान नृत्यात्मक लास्यादींच्या दर्शनप्रधानतेमुळे तसे नृत्य 'दसनीय' (दर्शनीय) आहे, आणि त्याव्यतिरिक्त इतर काव्य 'सवनीय' (श्रवणीय) आहे, अशा वापराच्या भेदावरून तो दोन प्रकारचा होतो. तो सर्वच प्रकार येथे प्रयोजनाच्या अभावामुळे घेतलेला नाही. त्यात 'सक्कठ' म्हणजे देवांची भाषा. त्यापेक्षा काही अक्षरांनी भिन्न असलेली ती 'पाकत' (प्राकृत) होय. ती पुन्हा तब्भव, तस्सम, देसीय आणि मिस्स या भेदांमुळे चार प्रकारची असते. त्यात सक्कठ भाषेतील वर्णांच्या केवळ फरकाने निर्माण झालेले ते 'तब्भव' (तद्भव) होय, जसे की महिंद, सिंधव इत्यादी. त्याच्याशी समान असलेले ते 'तस्सम' (तत्सम) होय, जसे की हरि, हर, कमल इत्यादी. देशात प्रसिद्ध असलेले ते 'देसीय' (देशीय) होय. 'मिस्स' (मिश्र) म्हणजे तब्भव इत्यादींशी संमिश्र असलेले. 'अपब्भंस' (अपभ्रंश) म्हणजे गोपाळांची (गुराख्यांची) भाषा, ती तब्भव इत्यादींमुळे चार प्रकारची आणि नागर, उपनागर व वृद्ध या भेदांमुळे तीन प्रकारची असते. पिशाचांचे बोलणे म्हणजे 'पेसाचिक' (पैशाचिक). त्या सक्कठ इत्यादींशी संमिश्र असलेले ते 'मिस्स' (मिश्र) होय. आता अशा प्रकारच्या भेदयुक्त बंधाची अलंकाराने होणारी शोभा सांगण्यासाठी "तंतु" इत्यादी म्हटले आहे. 'तंतु' म्हणजे ते पूर्वोक्त प्रकारचे बंधशरीर, 'अलंकार' म्हणजे प्रसाद इत्यादी शब्दालंकार आणि स्वभावोक्ती इत्यादी अर्थालंकार त्याला 'विंदनीयतरत्व' म्हणजे अत्यंत आल्हाददायकता प्राप्त करून देतात. 'निरंतर बंध तो निबंध', 'जो निबंध नाही तो अनिबंध', 'अतिशय विंदनीय (आस्वादनीय) तो विंदनीयतर' आणि 'त्याचा भाव तो विंदनीयतरत्व' असा विग्रह आहे. ၁၀. १०. အနဝဇ္ဇံ မုခမ္ဘောဇ-မနဝဇ္ဇာ စ ဘာရတီ; အလင်္ကတာဝ သောဘန္တေ, ကိံ နု’တေ နိရလင်္ကတာ? दोषरहित मुखकमल आणि दोषरहित वाणी (भाषा) हे अलंकृत झाल्यावरच शोभून दिसतात; ते अलंकाररहित असताना शोभतील काय? (अर्थात शोभणार नाहीत). ၁၀. တမေဝ သမတ္ထေတိ ‘‘အနဝဇ္ဇ’’ မိစ္စာဒိနာ. အနဝဇ္ဇံ အညမညာနုရူပါဓိကတနေတ္တကဏ္ဏာဒိအဝယဝေန ပိဠကတိလကကာဠကာဒျနာဟတာယ စ သုန္ဒရဘာဝတော အဂရဟိတံ မုခမ္ဘောဇံ ဝဒနာရဝိန္ဒဉ္စ တထာ အနဝဇ္ဇာ ပဒါဒိဒေါသာနဘိဘူတာယ သုန္ဒရဘာဝေန အဂရဟိတာ ဘာရတီ စ ဝါဏီ ဥပစာရတော တပ္ပဋိပါဒနီယော အတ္ထော စာတိ ဧတေ အလင်္ကတာဝ [Pg.34] မုခံ တိလကတာဍင်္ကာဒိနာလင်္ကာရေန, သဒ္ဒတ္ထာ သဒ္ဒါလင်္ကာရအတ္ထာလင်္ကာရေဟိ ပသာဓိတာ သဇ္ဇိတာ ဧဝ, နိရလင်္ကတာ တထာ အပသာဓိတာ အသဇ္ဇိတာ သောဘန္တေ ကိံ နု, န သောဘန္တေဝါတိ ဝိတက္ကေမီတိ အတ္ထော. နုဣတိ ဝိတက္ကေ. १०. त्याचेच समर्थन "अनवज्ज" (दोषरहित) इत्यादींद्वारे करतात. 'अनवज्ज' म्हणजे परस्परांशी सुसंगत असलेले डोळे, कान इत्यादी अवयवांमुळे आणि पुरळ, तीळ, काळे डाग इत्यादींनी रहित असल्यामुळे सुंदरतेमुळे अनिंदित (दोषरहित) असलेले मुखकमल (वदनारविंद); तसेच 'अनवज्जा' म्हणजे पदादी दोषांनी अनभिभूत (मुक्त) असल्यामुळे सुंदरतेने अनिंदित असलेली 'भारती' म्हणजे वाणी आणि उपचाराने तिच्याद्वारे प्रतिपादन केला जाणारा अर्थ; हे 'अलंकृत' झाल्यावरच - मुख हे टिळा, ताटंक (कर्णभूषण) इत्यादी अलंकारांनी आणि शब्द-अर्थ हे शब्दालंकार व अर्थालंकारांनी सुशोभित, सज्ज झाल्यावरच; 'निरलंकृत' म्हणजे तसे सुशोभित न करता, सज्ज न करता शोभतील काय? अर्थात शोभणार नाहीत, असा मी तर्क करतो, हा अर्थ आहे. 'नु' हा शब्द तर्कासाठी (वितर्कासाठी) आहे. ၁၀. တမေဝ ‘‘အနဝဇ္ဇ’’ မိစ္စာဒိနာ သမတ္ထေတိ. ဝဏ္ဏသဏ္ဌာနာဒိအဝယဝသမ္ပတ္တိယာ စ ပိဠကတိလကကာဠကာဒိဒေါသရဟိတတ္တာ စ အနိန္ဒိတံ မုခမ္ဘောဇဉ္စ အနဝဇ္ဇာ ပဒဒေါသဝါကျဒေါသအတ္ထဒေါသေဟိ အမိဿတ္တာ အဂရဟိတာ ဘာရတီ ဝါဏီ စ အဘေဒေါပစာရေန တပ္ပဋိပါဒနီယတ္ထော စာတိ ဣမေ အလင်္ကတာဝ ကုဏ္ဍလတိလကာဒိအာဘရဏေဟိ စ သဒ္ဒါလင်္ကာရအတ္ထာလင်္ကာရေဟိ စ သဇ္ဇိတာ ဧဝ, နိရလင်္ကတာ တေဟိ အဝိဘူသိတာ သောဘန္တေ ကိံ နု, န သောဘန္တေတိ မညေ. နတ္ထိ အဝဇ္ဇမဿာတိ စ, မုခမေဝ အမ္ဘောဇမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ကိမိတိ ပဋိသေဓေ, နုဣတိ ဝိတက္ကေတိ. १०. त्याचेच "अनवज्ज" इत्यादींद्वारे समर्थन करतात. वर्ण, आकार इत्यादी अवयवांच्या समृद्धीमुळे आणि पुरळ, तीळ, काळे डाग इत्यादी दोषांनी रहित असल्यामुळे अनिंदित असलेले मुखकमल; आणि 'अनवज्जा' म्हणजे पददोष, वाक्यदोष व अर्थदोष यांनी अमिश्रित (रहित) असल्यामुळे अनिंदित असलेली 'भारती' म्हणजे वाणी आणि अभेदाच्या उपचाराने तिच्याद्वारे प्रतिपादन केला जाणारा अर्थ; हे 'अलंकृत' झाल्यावरच - कुंडल, टिळा इत्यादी आभूषणांनी आणि शब्दालंकार व अर्थालंकारांनी सज्ज झाल्यावरच; 'निरलंकृत' म्हणजे त्यांनी विभूषित नसताना शोभतील काय? अर्थात शोभणार नाहीत, असे मला वाटते. 'ज्याला दोष नाही ते' (अनवद्य) आणि 'मुख हेच कमल' (मुखकमल) असा विग्रह आहे. 'किं' हा शब्द निषेधार्थ आहे, 'नु' हा शब्द तर्कासाठी आहे. ၁၁. ११. ဝိနာ ဂုရူပဒေသံ တံ, ဗာလော’လင်္ကတ္တုမိစ္ဆတိ; သမ္ပာပုဏေ န ဝိညူဟိ, ဟဿဘာဝံ ကထံ နု သော? गुरूंच्या उपदेशाशिवाय जो मूर्ख मनुष्य त्या (काव्याला) अलंकृत करू इच्छितो, तो विद्वानांमध्ये उपहासाला (हसण्याला) कसा बरं पात्र ठरणार नाही? (अर्थात तो नक्कीच उपहासाचा विषय बनेल). ၁၁. အလင်္ကရဏဉ္စ တေသံ ဝိနာ ဂုရူပဒေသေန ကရောန္တော ဝိနာ ပဟာသံ နာပရံ ဝိသေသမဓိဂစ္ဆတီတိ ဒဿေတုံ သိလေသာလင်္ကာရမာဟ ‘‘ဝိနာ’’တိအာဒိ. ဂုရူနံ ပသာဓနောပါယောပဒေသကာနံ, အလင်္ကာရကာရဏောပါယောပဒေသကာနံ ဝါ ဥပဒေသံ ‘‘ဧတ္ထ ဧဝံ ကတေ သောဘေယျာ’’တိ ဥပဒိသနံ ဝိနာ ပရိစ္စဇ္ဇ မုခဿ, ဗန္ဓဿ စ အလင်္ကရဏာနဘိညတာယ ဗာလော အညာဏကော ယော ကောစိ ပုဂ္ဂလော တံ မုခံ, ဗန္ဓံ ဝါ အလင်္ကတ္တုံ အနုရူပဝသေန သဇ္ဇေတုံ ဣစ္ဆတိ အဓိပ္ပေတိ, သော တာဒိသော အညာဏပုဂ္ဂလော ဝိညူဟိ တဗ္ဗိဒူဟိ ပဏ္ဍိတဇနေဟိ ဟဿဘာဝံ အဝဟာသံ ကထံ ကေန [Pg.35] ပကာရေန န သမ္ပာပုဏေယျ. ‘‘ကိမိဒံ အညာဏပုရိသေန ကရိယတီ’’တိ ဟသန္တေဝါတိ အဓိပ္ပာယော. နုဣတိ ဝိတက္ကေ. ११. त्यांचे (चेहरा आणि काव्यरचना यांचे) सुशोभीकरण गुरूंच्या उपदेशाशिवाय करत असताना, उपहासाशिवाय इतर कोणतीही विशेष प्राप्ती होत नाही, हे दर्शवण्यासाठी 'विना' इत्यादी श्लेषालंकार (silesālaṅkāra) सांगितला आहे. गुरूंच्या म्हणजे प्रसाधनाचे (सुशोभीकरणाचे) उपाय शिकवणाऱ्यांच्या किंवा अलंकाराच्या निर्मितीचे उपाय शिकवणाऱ्यांच्या उपदेशाशिवाय, म्हणजेच 'येथे असे केल्यास ते शोभून दिसेल' अशा उपदेशाचा त्याग करून, चेहरा आणि काव्यरचना (बंध) यांच्या सुशोभीकरणाचे ज्ञान नसलेला कोणताही अज्ञानी, मूर्ख मनुष्य जर त्या चेहऱ्याला किंवा काव्यरचनेला योग्य प्रकारे सजवू इच्छितो, तर तो अज्ञानी मनुष्य विद्वानांकडून, त्या विषयातील तज्ज्ञ पंडितांकडून उपहासाला (हसण्याला) कसा बरं पात्र ठरणार नाही? 'या अज्ञानी माणसाने हे काय केले आहे?' असे म्हणून ते नक्कीच हसतील, असा याचा अभिप्राय आहे. 'नु' (nu) हा शब्द वितर्कासाठी (तर्कासाठी) आहे. ၁၁. ဣဒါနိ ပဒါဒိဒေါသရဟိတဗန္ဓသရီရဿ အလင်္ကာရေဟိ ဘူသနမပိ ဂုရူပဒေသသဟိတမေဝ သေဋ္ဌန္တိ ဒဿေတုံ ‘‘ဝိနာ ဂုရူပဒေသ’’ မိစ္စာဒိသိလေသာလင်္ကာရမာဟ. ဗာလော မုခါဒိသရီရာလင်္ကာရေ, ဗန္ဓာလင်္ကာရေ ဝါ အသမတ္ထော ယော ကောစိ ဂုရူပဒေသံ ဝိနာ သရီရာလင်္ကာရကရဏဿ, ဗန္ဓာလင်္ကာရကရဏဿ ဝါ အနုရူပေါပဒေသမန္တရေန တံ သရီရံ, ဗန္ဓံ ဝါ အလင်္ကတ္တုံ တိလကတာဍင်္ကာဒီဟိ, သဒ္ဒါလင်္ကာရအတ္ထာလင်္ကာရေဟိ ဝါ သဇ္ဇေတုံ ဣစ္ဆတိ စေ, သော ဝိညူဟိ တဒုဘယညူဟိ ဟဿဘာဝံ အဝဟသိတဗ္ဗတံ ကထံ န သမ္ပာပုဏေ, ပါပုဏာတျေဝ, တသ္မာ ဂုရူဟိ သာဒရတော ဥဂ္ဂဏှိတွာ ကတ္တဗ္ဗန္တိ ဘာဝေါ. ११. आता, शब्दादी दोषांनी रहित असलेल्या काव्यरूपी शरीराचे अलंकारांनी सुशोभीकरण करणे देखील गुरूंच्या उपदेशासह असणेच श्रेष्ठ आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'विना गुरुपदेश' इत्यादी श्लेषालंकार सांगितला आहे. चेहरा इत्यादी शरीराचे अलंकार किंवा काव्यरचनेचे अलंकार करण्यात असमर्थ असलेला कोणताही मूर्ख मनुष्य जर गुरूंच्या उपदेशाशिवाय, शरीर सुशोभीकरणाच्या किंवा काव्यरचना सुशोभीकरणाच्या योग्य उपदेशाशिवाय, त्या शरीराला किंवा काव्यरचनेला टिळा, कर्णभूषणे इत्यादींनी किंवा शब्दालंकार व अर्थालंकारांनी सजवू इच्छित असेल, तर तो त्या दोन्ही गोष्टी जाणणाऱ्या विद्वानांकडून उपहासाला कसा बरं पात्र ठरणार नाही? तो नक्कीच पात्र ठरेल. म्हणूनच, गुरूंकडून आदराने शिकूनच हे केले पाहिजे, असा भाव आहे. ၁၂. १२. ဂန္ထောပိ ကဝိဝါစာန-မလင်္ကာရပ္ပကာသကော; ယာတိ တဗ္ဗစနီယတ္တံ, တဗ္ဗောဟာရူပစာရတော. कवींच्या वाणीच्या अलंकारांना प्रकाशित करणारा ग्रंथ देखील, त्या (अलंकार) शब्दाच्या व्यवहाराच्या उपचाराने (लाक्षणिक प्रयोगाने) त्याच नावाला (अलंकार या संज्ञेला) प्राप्त होतो. ၁၂. နနု သဒ္ဒဂမ္မာ, အတ္ထဂမ္မာ စ အလင်္ကာရာတိ ဂန္ထော ကထန္တိ အာဟ ‘‘ဂန္ထောပီ’’တိအာဒိ. ကဝိဝါစာနံ ကဝိပ္ပယောဂါနံ သမုဒါယရူပါနံ, ပဋိပါဒနီယတာယ တဗ္ဗစနီယာနဉ္စ အတ္ထာနံ အလင်္ကာရပ္ပကာသကော အလင်္ကာရာနံ ယထာဝုတ္တာနံ ဝိဘာဝိတော ဂန္ထောပိ ကိရိယာကပ္ပသင်္ခါတံ သတ္ထမ္ပိ တဗ္ဗစနီယတ္တံ တေန အလင်္ကာရသဒ္ဒေန ဝါစ္စတံ ယာတိ ဥပဂစ္ဆတိ. ကိန္တိ အာဟ ‘‘တဗ္ဗောဟာရူပစာရတော’’တိ. တဿ ကတဝေါဟာရဿ အလင်္ကာရသဒ္ဒဿ, တသ္မိံ ဝါ မဏ္ဍနဝိသေသေ ပဝတ္တဿ အလင်္ကာရဝေါဟာရဿ ဥပစရဏံ သောယမိတျဘေဒေန ပရိကပ္ပနံ ဥပစာရော. ကသ္မာ? ပဋိပါဒနီယပဋိပါဒကာနံ အဘေဒဝသေန ကာရဏေ ကာရီယဿ ဥပစရိယတောတိ အဓိပ္ပာယော. १२. जर अलंकार हे शब्दाने समजणारे आणि अर्थाने समजणारे असतात, तर ग्रंथाला 'अलंकार' कसे म्हटले जाते? यावर 'ग्रंथोपि' (ganthopī) इत्यादी म्हटले आहे. समुदाय रूपातील कवींच्या प्रयोगांच्या म्हणजेच कवींच्या वाणीच्या, आणि प्रतिपादन करण्यास योग्य अशा प्रतिपाद्य अर्थांच्या अलंकारांना प्रकाशित करणारा, पूर्वोक्त अलंकारांना स्पष्ट करणारा ग्रंथ देखील—जो 'क्रियाकल्प' नावाचे शास्त्र आहे—त्या (अलंकार) शब्दाने वाच्यतेला (अलंकार या संज्ञेला) प्राप्त होतो. ते कशाने होते? यावर 'तद्वोहारूपचारतो' (tabbohārūpacārato) असे म्हटले आहे. त्या व्यवहारात आणलेल्या 'अलंकार' शब्दाचा, किंवा त्या विशिष्ट सुशोभीकरणात प्रवृत्त झालेल्या 'अलंकार' या व्यवहाराचा उपचार करणे, म्हणजेच 'तोच हा आहे' अशा अभेदाने कल्पना करणे म्हणजे 'उपचार' होय. कशामुळे? प्रतिपादन केले जाणारे (प्रतिपाद्य) आणि प्रतिपादन करणारे (प्रतिपादक) यांच्यातील अभेदामुळे कारणामध्ये कार्याच्या उपचाराने (आरोपाने) हे होते, असा अभिप्राय आहे. ၁၂. ဣဒါနိ [Pg.36] သဒ္ဒါလင်္ကာရအတ္ထာလင်္ကာရဂန္ထော ကထမလင်္ကာရောတိ အာဟ ‘‘ဂန္ထော’’စ္စာဒိ. ကဝိဝါစာနံ ကဝီဟိ ဝုတ္တဝါကျသင်္ခါတာနံ, ဥပစာရတော တပ္ပဋိပါဒနီယအတ္ထသင်္ခါတာနဉ္စ ကဝိပ္ပယောဂါနံ အလင်္ကာရပ္ပကာသကော သဒ္ဒတ္ထာလင်္ကာရပ္ပကာသကော ဂန္ထောအပိ ကိရိယာကပ္ပသင်္ခါတံ သတ္ထမ္ပိ တဗ္ဗောဟာရူပစာရတော တဿ အလင်္ကာရောတိ ကတဝေါဟာရဿ အလင်္ကာရသဒ္ဒဿ ကာရဏေ ကာရီယူပစာရေန တဗ္ဗစနီယတ္တံ တေန အလင်္ကာရသဒ္ဒေန ဝတ္တဗ္ဗတံ ယာတိ. အပိသဒ္ဒေါ အလင်္ကာရမပေက္ခတိ. အလင်္ကာရေ ပကာသေတိ, အလင်္ကာရာနံ ဝါ ပကာသကောတိ စ, တေန ဝစနီယော, တဿ ဘာဝေါတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဧတ္ထ ဘာဝေါတိ ဝါစ္စဝါစကသမ္ဗန္ဓော. တဿ သဒ္ဒါဒိအလင်္ကာရဿ ဝေါဟာရောတိ စ, တဗ္ဗောဟာရဿ အလင်္ကာရသဒ္ဒဿ ဥပစာရောတိ စ ဝါကျန္တိ. १२. आता, शब्दालंकार आणि अर्थालंकाराचा ग्रंथ स्वतः 'अलंकार' कसा आहे? हे सांगण्यासाठी 'ग्रंथो' इत्यादी म्हटले आहे. कवींनी म्हटलेल्या वाक्यांच्या रूपातील कवींच्या वाणीच्या, आणि उपचाराने (लाक्षणिक अर्थाने) त्याद्वारे प्रतिपादन केल्या जाणाऱ्या अर्थांच्या रूपातील कवींच्या प्रयोगांच्या अलंकारांना प्रकाशित करणारा, म्हणजेच शब्द आणि अर्थ यांच्या अलंकारांना प्रकाशित करणारा ग्रंथ देखील—जो 'क्रियाकल्प' नावाचे शास्त्र आहे—त्या 'अलंकार' असा व्यवहार ठरलेल्या शब्दाच्या कारणामध्ये कार्याच्या उपचाराने (आरोपाने) त्या शब्दाने वाच्यतेला (अलंकार या संज्ञेने संबोधले जाण्यास) प्राप्त होतो. 'अपि' (api) हा शब्द अलंकाराची अपेक्षा करतो. 'अलंकारांना प्रकाशित करतो' किंवा 'अलंकारांचा प्रकाशक आहे' या अर्थाने 'वचनीय' (बोलण्यास योग्य) आणि त्याचा भाव म्हणजे 'वचनीयत्व' असा विग्रह होतो. येथे 'भाव' म्हणजे वाच्य-वाचक संबंध (वाच्य आणि वाचक यांचा संबंध) होय. त्या शब्दादी अलंकाराचा व्यवहार आणि त्या व्यवहारातील 'अलंकार' शब्दाचा उपचार, असा या वाक्याचा अर्थ आहे. ၁၃. १३. ဒွိပ္ပကာရာ အလင်္ကာရာ, တတ္ထ သဒ္ဒတ္ထဘေဒတော; သဒ္ဒတ္ထာ ဗန္ဓနာမာဝ, တံသဇ္ဇိတတဒါဝလိ. अलंकार दोन प्रकारचे आहेत, त्यामध्ये शब्द आणि अर्थ यांच्या भेदाने (शब्दालंकार आणि अर्थालंकार असे दोन प्रकार होतात). शब्द आणि अर्थ यांनाच 'बंध' (काव्यरचना) असे नाव आहे, आणि त्यांनी सुशोभित केलेली त्यांची मालिका (समूह) म्हणजेच ती (काव्यरचना) होय. ၁၃. ဣဒါနိ ယထာဝုတ္တအလင်္ကာရာနံ ပဘေဒံ, တပ္ပသင်္ကဉ္စ တံဗန္ဓသရီရဉ္စ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တမ္ပိ ဧကတော သမ္ဗန္ဓေတွာ ဒဿေတုံ ‘‘ဒွိပ္ပကာရာ’’ဒိ အာရဒ္ဓံ. တတ္ထ တသ္မိံ ကိရိယာကပ္ပသင်္ခါတေ ဂန္ထေ, တသ္မိံ ဝါ ဗန္ဓာလင်္ကာရာဓိကာရေ အလင်္ကာရာ ယထာဝုတ္တာ ဒွိပ္ပကာရာ ဟောန္တိ. ကထံ? သဒ္ဒဘေဒတော, အတ္ထဘေဒတော စ, သဒ္ဒါလင်္ကာရာ အတ္ထာလင်္ကာရာတိ အလင်္ကာရာ ဒွိပ္ပကာရာ ဟောန္တီတိ အတ္ထော. ယေသံ ဘေဒေန တေ ဒွိပ္ပကာရာ, တေ သဒ္ဒါ, အတ္ထာ စ. ‘‘ဗန္ဓော’’ ဣတိ ဝုတ္တံ နာမံ ယဿာ အာဝလိယာ သာ ဗန္ဓနာမာ ဧဝ. တံသဇ္ဇိတတဒါဝလိ တေဟိ အလင်္ကာရေဟိ သဇ္ဇိတာ ပကာသိတာ တံသဇ္ဇိတာ, တေသံ သဒ္ဒတ္ထာနံ အာဝလိ သမုဒါယာ, မဟာဝါကျံ, အန္တရဝါကျံ ဝါ. ပရိပုဏ္ဏော ဗန္ဓော မဟာဝါကျံ, မုတ္တကာဒယောဝယဝါ အန္တရဝါကျာနိ, တံသဇ္ဇိတတဒါဝလိကံ ပသိဒ္ဓဘာဝေန အနုဝဒိတွာ အပ္ပသိဒ္ဓါ သဒ္ဒတ္ထာ ဝိဓီယန္တေ. १३. आता, पूर्वोक्त अलंकारांचे प्रकार, त्यांचा प्रसंग आणि त्यांचे काव्यरूपी शरीर, जे आधी वेगवेगळ्या ठिकाणी सांगितले आहे, ते एकत्र जोडून दर्शवण्यासाठी 'द्विप्पकारा' (dvippakārā) इत्यादी सुरू केले आहे. त्यामध्ये, त्या 'क्रियाकल्प' नावाच्या ग्रंथात किंवा त्या काव्यरचना-अलंकाराच्या अधिकारात पूर्वोक्त अलंकार दोन प्रकारचे असतात. कसे? शब्दभेदाने आणि अर्थभेदाने; म्हणजेच शब्दालंकार आणि अर्थालंकार असे अलंकार दोन प्रकारचे असतात, असा अर्थ आहे. ज्यांच्या भेदाने ते दोन प्रकारचे होतात, ते म्हणजे शब्द आणि अर्थ होत. ज्या मालिकेला (समूहाला) 'बंध' (काव्यरचना) असे नाव दिले आहे, ती 'बंध' या नावानेच ओळखली जाते. 'तंसज्जिततदावलि' म्हणजे त्या अलंकारांनी सुशोभित केलेली, प्रकाशित केलेली; त्या शब्द आणि अर्थांची मालिका म्हणजे समूह, महावाक्य किंवा अंतर्गत वाक्य होय. परिपूर्ण काव्यरचना म्हणजे महावाक्य, आणि मुक्तक इत्यादी अवयव म्हणजे अंतर्गत वाक्ये होत. त्या अलंकारांनी सुशोभित केलेल्या शब्द-अर्थांच्या मालिकेला प्रसिद्ध रूपाने अनुवादाच्या स्वरूपात सांगून, शब्द आणि अर्थांचे विधान केले जाते. ၁၃. ဣဒါနိ [Pg.37] ယထာဝုတ္တအလင်္ကာရာနံ အဝုတ္တဘေဒဉ္စ တဒါဓာရာဓိကတံ ယထာဝုတ္တဗန္ဓသရီရဉ္စ ဧကတော ဒဿေတုံ ‘‘ဒွိပ္ပကာရေ’’စ္စာဒိမာဟ. တတ္ထ တသ္မိံ ကိရိယာကပ္ပသင်္ခါတေ အလင်္ကာရဂန္ထေ, နော စေ, အလင်္ကာရာဓိကာရေ ဝါ အလင်္ကာရာ ဝက္ခမာနာလင်္ကာရာ သဒ္ဒတ္ထဘေဒတော သဒ္ဒါလင်္ကာရအတ္ထာလင်္ကာရဘေဒေန ဒွိပ္ပကာရာ ဟောန္တိ, ယေသံ ဘေဒေန အလင်္ကာရာ ဘိန္နာ, တေ သဒ္ဒတ္ထာ ဗန္ဓနာမာဝ. တံသဇ္ဇိတတဒါဝလိ တေဟိ သဒ္ဒတ္ထာလင်္ကာရေဟိ အလင်္ကတာ, တေသံ သဒ္ဒတ္ထာနံ မဟာကဗ္ဗာဒိသမုဒါယရူပါ ပဋိပါဋိဗန္ဓောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ‘‘ဗန္ဓော’’ ဣတိ နာမံ ယဿေတိ စ, တေဟိ သဒ္ဒတ္ထာလင်္ကာရေဟိ သဇ္ဇိတာတိ စ, တေသံ သဒ္ဒတ္ထာနံ အာဝလီတိ စ သမာသော. १३. आता, पूर्वोक्त अलंकारांचे न सांगितलेले प्रकार आणि त्यांचा आधार असलेल्या पूर्वोक्त काव्यरूपी शरीराला एकत्र दर्शवण्यासाठी 'द्विप्पकारे' (dvippakāre) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये, त्या 'क्रियाकल्प' नावाच्या अलंकार ग्रंथात किंवा अलंकार अधिकारात, पुढे सांगितले जाणारे अलंकार शब्द आणि अर्थ यांच्या भेदाने, म्हणजेच शब्दालंकार आणि अर्थालंकार या भेदाने दोन प्रकारचे असतात. ज्यांच्या भेदाने अलंकार भिन्न होतात, ते शब्द आणि अर्थ म्हणजेच 'बंध' (काव्यरचना) होय. 'तंसज्जिततदावलि' म्हणजे त्या शब्दालंकार आणि अर्थालंकारांनी सुशोभित केलेली, त्या शब्द आणि अर्थांची महाकाव्य इत्यादी समूह रूपातील रचना (क्रमबद्ध रचना) होय, असे म्हटले आहे. 'बंध' हे नाव जिचे आहे ती, आणि त्या शब्द-अर्थांच्या अलंकारांनी सुशोभित केलेली, त्या शब्द-अर्थांची मालिका, असा हा समास आहे. ၁၄. १४. ဂုဏာလင်္ကာရသံယုတ္တာ, အပိ ဒေါသလဝင်္ကိတာ; ပသံသိယာ န ဝိညူဟိ, သာ ကညာ ဝိယ တာဒိသီ. गुणांनी आणि अलंकारांनी युक्त असली, तरीही जर ती थोड्याशा दोषाने देखील दूषित असेल, तर विद्वानांकडून तिची प्रशंसा केली जात नाही; ती (दोषयुक्त काव्यरचना) तशाच प्रकारच्या (दोषयुक्त) कन्येसारखी (मुलीसारखी) असते. ၁၄. ဧဝံ ဂုဏေန အလင်္ကာရေန သဇ္ဇိတာပိ သာ သဒ္ဒတ္ထာဝလိ အပ္ပကေနပိ ဒေါသေန သံယုတ္တာ သတီ အသမ္ဖုသိတဗ္ဗာဝ ဝိညူဟိ သိယာတိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘ဂုဏ’’ ဣစ္စာဒိ. သဒ္ဒါလင်္ကာရာချေန ဂုဏေန, အတ္ထာလင်္ကာရေန စ သံယုတ္တာပိ ဝိသေသေန သဇ္ဇိတာပိ သဒ္ဒတ္ထာဝလိ ဒေါသလဝေန ဒေါသလေသေနာပိ အင်္ကိတာ အဘိလဉ္ဆိတာ သတီ ဝိညူဟိ ဂုဏဒေါသဝိဘာဂဝိဒူဟိ ပဏ္ဍိတပုရိသေဟိ န ပသံသိယာ နေဝ ပသံသိတဗ္ဗာ. ကာဝိယာတိ အာဟ ‘‘ကညာ ဝိယတာဒိသီ’’တိ. ယထာ ဟိ ကညာ ဒသဝဿိကာ သန္နဒ္ဓယောဗ္ဗနာဘိမုခဘာဝေန ဇနနယနမနောဝိလုဗ္ဘိနီဂုဏေန, အာဘရဏဝိသေသေန စာလင်္ကတာ ကေနစိ ကုဋ္ဌဒေါသလေသေန အင်္ကိတာ ဝိညူနံ အသမ္ဖုသနီယာ သိယာ, ပဂေဝါပရာ, ဧဝမေဝ သဒ္ဒတ္ထာဝလိပိ အပ္ပကေနပိ သဒ္ဒရူပေန, အတ္ထလက္ခဏေန စ ဒေါသေန ကုဋ္ဌကပ္ပေန ဝဇ္ဇနီယာ ဧဝ ဝိညူနံ, ပဂေဝ ဗဟုနာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. १४. अशा प्रकारे गुणांनी आणि अलंकारांनी सजवलेली असली तरीही, ती सद्दत्थावलि (शब्दार्थांची मालिका) जर थोड्याशा दोषानेही युक्त असेल, तर ती विद्वानांनी स्पर्श करण्यास अयोग्य (अस्वीकारार्ह) ठरते, हे दर्शवण्यासाठी 'गुण' इत्यादी म्हटले आहे. शब्दालंकार नावाच्या गुणाने आणि अर्थालंकाराने युक्त असूनही, विशेष रूपाने सजवलेली असूनही, ती सद्दत्थावलि जर थोड्याशा दोषाने किंवा दोषाच्या अंशाने चिन्हांकित असेल, तर गुण आणि दोषांमधील फरक जाणणाऱ्या विद्वान पुरुषांकडून (विज्ञांकडून) ती प्रशंसनीय ठरत नाही, तिची प्रशंसा केली जाऊ नये. काव्याच्या बाबतीत म्हटले आहे: 'ज्याप्रमाणे एखादी कन्या...' इत्यादी. ज्याप्रमाणे एखादी दहा वर्षांची कन्या, जिचे यौवन नुकतेच विकसित होऊ लागले आहे, जी लोकांच्या डोळ्यांना आणि मनाला आकर्षित करणाऱ्या गुणांनी युक्त आहे आणि विविध आभूषणांनी सजलेली आहे, परंतु जर ती कुष्ठरोगाच्या (कोडाच्या) थोड्याशा डागाने चिन्हांकित असेल, तर ती विद्वानांसाठी स्पर्श करण्यास अयोग्य ठरते, मग इतरांचे काय सांगावे! त्याचप्रमाणे, सद्दत्थावलि देखील जर शब्दाच्या स्वरूपातील किंवा अर्थाच्या लक्षणातील कुष्ठरोगासारख्या अगदी लहानशा दोषाने युक्त असेल, तर ती विद्वानांनी वर्ज्यच केली पाहिजे, मग मोठ्या दोषांचे काय सांगावे, असे म्हटले आहे. ၁၄. ဧဝံ [Pg.38] သဒ္ဒတ္ထာနံ ဂုဏီဘူတေဟိ အလင်္ကာရေဟိ သဇ္ဇိတာ သဒ္ဒတ္ထာဝလိ ကေနစိ ပဒါဒိဒေါသေန အဘိလက္ခိတာ စေ, အပ္ပသတ္ထာတိ ဒဿေန္တော ‘‘ဂုဏာလင်္ကာရိ’’စ္စာဒိမာဟ. ဂုဏာလင်္ကာရသံယုတ္တာ အပိ သဒ္ဒါလင်္ကာရသင်္ခါတဂုဏေန, အတ္ထာလင်္ကာရေန စ ဝိသေသေန ယုတ္တာပိ သာ သဒ္ဒတ္ထာဝလိ ဒေါသလဝင်္ကိတာ ပဒဒေါသာဒိနာ အဏုမတ္တေနပိ ဒေါသေန အင်္ကိတာ ယုတ္တာ သဟိတာ တာဒိသီ ဂုဏာလင်္ကာရသံယုတ္တာပိ ဒေါသလဝင်္ကိတာ ကညာ ဝိယ ဒသဝဿိကာ ယောဗ္ဗနပ္ပတ္တာ ဝနိတာဝ ဝိညူဟိ ဂုဏဒေါသပရိက္ခကေဟိ န ပသံသိယာ န ပသံသိတဗ္ဗာ. ယထာ ဟိ ဒသဝဿိကာ ဣတ္ထီ ပိယသဘာဝသဏ္ဌိတာ မနုညေဟိ ဂုဏေဟိ, သောဘနာနုရူပဂီဝေယျာဒိအာဘရဏဝိသေသေဟိ ယုတ္တာပိ ဒိဿမာနေန ကေနစိ သေတကုဋ္ဌလဝေန ယုတ္တာ သမာနာ ဂုဏဒေါသပရိက္ခကေဟိ ဒဿနီယာ န ဟောတိ, ဧဝံ ဝုတ္တပ္ပကာရာပိ ဗန္ဓပဒ္ဓတိ ကုဋ္ဌတုလျေန ကေနစိ ပဒါဒိဒေါသေန ယုတ္တာ ဝိညူဟိ အဿာဒနီယာတိ အဓိပ္ပာယော. ဒေါသာနံ လဝေါ, တေန အင်္ကိတာတိ စ, သာ ဝိယ ဒိဿတီတိ တာဒီသီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १४. अशा प्रकारे, शब्दांच्या आणि अर्थांच्या गुणांनी व अलंकारांनी सजवलेली सद्दत्थावलि जर एखाद्या पदादी दोषाने चिन्हांकित असेल, तर ती अप्रशस्त (अयोग्य) ठरते, हे दर्शवण्यासाठी 'गुणालंकार...' इत्यादी म्हटले आहे. गुणांनी आणि अलंकारांनी युक्त असूनही, म्हणजे शब्दालंकार नावाच्या गुणाने आणि अर्थालंकाराने विशेष रूपाने युक्त असूनही, ती सद्दत्थावलि जर थोड्याशा दोषाने चिन्हांकित असेल, म्हणजे पदादी दोषांपैकी अगदी लहानशा दोषाने युक्त किंवा चिन्हांकित असेल, तर ती गुणांनी व अलंकारांनी युक्त असूनही थोड्याशा दोषाने चिन्हांकित असल्यामुळे, दहा वर्षांच्या यौवनावस्थेत पोहोचलेल्या कन्येप्रमाणे किंवा स्त्रीप्रमाणे, गुण आणि दोषांचे परीक्षण करणाऱ्या विद्वानांकडून प्रशंसनीय ठरत नाही, तिची प्रशंसा केली जाऊ नये. ज्याप्रमाणे एखादी दहा वर्षांची मुलगी, जी प्रिय स्वभावाची व सुंदर शरीराची आहे, मनोहर गुणांनी आणि सुंदर व अनुरूप अशा गळ्यातील दागिन्यांनी युक्त आहे, परंतु जर ती पांढऱ्या कोडाच्या (श्वेतकुष्ठ) लहानशा डागाने युक्त असेल, तर ती गुण-दोषांचे परीक्षण करणाऱ्यांच्या दृष्टीने दर्शनीय (आकर्षक) ठरत नाही; त्याचप्रमाणे, वर सांगितलेल्या प्रकारची रचना (काव्यबंध) देखील कुष्ठरोगासारख्या एखाद्या पदादी दोषाने युक्त असेल, तर ती विद्वानांना आस्वादन करण्यायोग्य वाटत नाही, असा अभिप्राय आहे. 'दोषांचा लव (अंश), त्याने चिन्हांकित' असा आणि 'तिच्यासारखी दिसते म्हणून तशी' असा विग्रह आहे. ၁၅. १५. တေန ဒေါသနိရာသောဝ, မဟုဿာဟေန သာဓိယော; နိဒ္ဒေါသာ သဗ္ဗထာ သာ’ယံ, သဂုဏာ န ဘဝေယျ ကိံ. म्हणूनच, मोठ्या उत्साहाने (प्रयत्नाने) दोषांचे निवारण करणेच अधिक श्रेयस्कर आहे; सर्व प्रकारे दोषरहित असलेली ही (सद्दत्थावलि) गुणांनी युक्त का बरं होणार नाही? (ती नक्कीच गुणांनी युक्त होईल.) ၁၅. ယတော ဧဝံ, တေန တသ္မာ ကာရဏာ မဟုဿာဟေန မဟတာ ဝါယာမေန ဒေါသာနံ ပဒဒေါသာဒီနမနတ္ထနိမိတ္တာနံ နိရာသောဝ သတ္ထဒိဋ္ဌိယာ သတ္ထပ္ပဘာဝတော ပရိစ္စာဂေါယေဝ သာဓိယော သာဓေတဗ္ဗော, ‘‘ဝိညူဟီ’’တိ သေသော. ဧဝံ ဒေါသနိရာသေ ကော ဂုဏော ဥပလဗ္ဘတီတိ စေ. သဗ္ဗထာ သဗ္ဗပ္ပကာရေန နိဒ္ဒေါသာ ဒေါသေဟိ နိဂ္ဂတာ သာယံ သဒ္ဒတ္ထာဝလိ သဂုဏာ သဒ္ဒါလင်္ကာရသင်္ခါတေဟိ ဂုဏေဟိ သဟိတာ န ဘဝေယျ ကိံ, ဘဝတျေဝ, ဂုဏရဟိတံ တံအလင်္ကတမနုပါဒေယျံ သိယာတိ အဓိပ္ပာယော. १५. ज्या अर्थी असे आहे, त्या अर्थी (त्या कारणाने) मोठ्या उत्साहाने म्हणजे मोठ्या प्रयत्नाने, अनर्थाला कारणीभूत ठरणाऱ्या पदादी दोषांचे निवारण करणे, म्हणजेच शास्त्राच्या दृष्टीने आणि शास्त्राच्या प्रभावाने त्यांचा त्याग करणेच अधिक श्रेयस्कर आहे, ते विद्वानांनी साध्य केले पाहिजे ('विद्वानांनी' हा शब्द येथे अध्याहृत आहे). जर विचारले की, अशा प्रकारे दोषांचे निवारण केल्याने कोणता गुण प्राप्त होतो? तर, सर्व प्रकारे (सर्व प्रकारे दोषरहित झालेली), दोषांपासून मुक्त झालेली ही सद्दत्थावलि शब्दालंकार नावाच्या गुणांनी युक्त का बरं होणार नाही? ती नक्कीच गुणांनी युक्त होईल. गुणांशिवाय केवळ अलंकारांनी सजवलेले काव्य स्वीकारण्यास अयोग्य असते, असा अभिप्राय आहे. ၁၅. တေန [Pg.39] ယတော ဒေါသယုတ္တာ ဝိညူဟိ အနုပါဒေယျာ, တသ္မာ မဟုဿာဟေန အဓိကဝါယာမေန ဒေါသနိရာသောဝ ပဒဒေါသာဒီနံ နိရာကရဏမေဝ သာဓိယော အနေကသတ္ထဝိသယာယ ပညာယ ဝိညူဟိ သာဓေတဗ္ဗော, ဧဝံ သတိ သဗ္ဗထာ သဗ္ဗာကာရေန နိဒ္ဒေါသာ ဒေါသရဟိတာ သာ အယံ သဒ္ဒတ္ထာဝလိ သဂုဏာ သဒ္ဒါလင်္ကာရသင်္ခါတေဟိ ဂုဏေဟိ ယုတ္တာ န ဘဝေယျ ကိံ, ဂုဏယုတ္တာ ဘဝေယျာတိ အဓိပ္ပာယော. ဒေါသာနံ နိရာသောတိ စ, နတ္ထိ ဒေါသာ ဧတိဿာ, နိဂ္ဂတာ ဒေါသေဟိ ဝါတိ စ, သဟ ဂုဏေဟိ ဝတ္တမာနာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १५. म्हणूनच, ज्या अर्थी दोषांनी युक्त असलेली रचना विद्वानांकडून स्वीकारली जात नाही, त्या अर्थी मोठ्या उत्साहाने म्हणजे अधिक प्रयत्नाने, पदादी दोषांचे निवारण करणेच अधिक श्रेयस्कर आहे, जे अनेक शास्त्रांचे ज्ञान असलेल्या प्रज्ञेच्या साहाय्याने विद्वानांनी साध्य केले पाहिजे. असे झाले असता, सर्व प्रकारे म्हणजे सर्व रूपाने दोषरहित (दोषमुक्त) झालेली ही सद्दत्थावलि शब्दालंकार नावाच्या गुणांनी युक्त का बरं होणार नाही? ती गुणांनी युक्त होईलच, असा अभिप्राय आहे. 'दोषांचे निवारण' असा, 'जिच्यामध्ये दोष नाहीत किंवा जिच्यातून दोष निघून गेले आहेत ती' असा आणि 'गुणांसह वर्तमान असलेली' असा विग्रह आहे. ၁၆. १६. သာ’လင်္ကာရဝိယုတ္တာပိ, ဂုဏယုတ္တာ မနောဟရာ; နိဒ္ဒေါသာ ဒေါသရဟိတာ, ဂုဏယုတ္တာ ဝဓူ ဝိယ. अलंकारांशिवाय असली तरीही, गुणांनी युक्त आणि दोषरहित असलेली ती (सद्दत्थावलि) मनोहर वाटते; ज्याप्रमाणे दोषांनी रहित आणि गुणांनी युक्त असलेली वधू (मनोहर वाटते). ၁၆. ကိံကာရဏမေဝံဘူတော ဒေါသပရိစ္စာဂေန ဂုဏာဒါနေန ဗန္ဓောတိ အာဟ ‘‘သာ’လင်္ကာရေ’’စ္စာဒိ. သာ သဒ္ဒတ္ထာဝလိ အလင်္ကာရေဟိ ဝိယုတ္တာပိ သတီ နိဒ္ဒေါသာ သဗ္ဗပ္ပကာရေန ဒေါသေဟိ နိဂ္ဂတာ ဂုဏေဟိ သဒ္ဒါလင်္ကာရသင်္ခါတေဟိ သံယုတ္တာ ဇနာနမာနန္ဒသန္ဒောဟာဘိသန္ဒနေကဟေတုတာယ မနော ဟရတိ အတ္တနော သန္တိကမာကဍ္ဎတီတိ မနောဟရာ ဟောတီတိ. တတ္ထောဒါဟရဏမာဟ ‘‘ဒေါသရဟိတာ ဂုဏယုတ္တာ ဝဓူ ဝိယာ’’တိ. ယထာ ယေန ကေနစိပိ ဒေါသေန ဝိရဟိတာ ဝဓူ မနာပစာရိတာဒီဟိ ဂုဏဝိသေသေဟိ သံယုတ္တာ သတီ ကေနစိ အာဘရဏေန အမဏ္ဍိတာ အပသာဓိတာပိ ကိန္နာမ မဓုရာ ကဝီနံ ပသာဓနံ ကိန္နာမ မနောဟရာ ဟောတိ, ဧဝမယံ သဒ္ဒတ္ထာဝလိပိ မနောဟရာ ဟောတီတိ အတ္ထော. १६. दोषांचा त्याग करून आणि गुणांचा स्वीकार करून केलेली रचना अशा प्रकारची का असते, हे सांगण्यासाठी 'सालंकार...' इत्यादी म्हटले आहे. ती सद्दत्थावलि अलंकारांशिवाय असली तरीही, सर्व प्रकारे दोषांपासून मुक्त (दोषरहित) आणि शब्दालंकार नावाच्या गुणांनी युक्त असल्यामुळे, लोकांच्या मनात आनंदाचा वर्षाव करण्याचे एकमेव कारण बनून मन हरण करते, म्हणजेच स्वतःकडे आकर्षित करते, म्हणून ती 'मनोहर' ठरते. त्याविषयी उदाहरण दिले आहे: 'दोषरहित आणि गुणांनी युक्त असलेल्या वधूप्रमाणे'. ज्याप्रमाणे कोणत्याही दोषाने रहित असलेली वधू, मनाला अनुकूल वर्तन इत्यादी विशेष गुणांनी युक्त असेल, तर ती कोणत्याही दागिन्यांनी सजवलेली नसली तरीही, कवींच्या दृष्टीने ती मधुर आणि मनोहरच असते; त्याचप्रमाणे ही सद्दत्थावलि देखील मनोहर ठरते, असा अर्थ आहे. ၁၆. ဣဒါနိ ဒေါသပရိစ္စာဂေန ဂုဏာဒါနေ ပယောဇနံ ဒဿေတိ ‘‘သာ’လင်္ကာရဝိယုတ္တေ’’စ္စာဒိနာ. သာ သဒ္ဒတ္ထာဝလိ အလင်္ကာရေဟိ ဝိယုတ္တာ သတီပိ နိဒ္ဒေါသာ သဗ္ဗပ္ပကာရေန ဒေါသရဟိတာ ဂုဏယုတ္တာ တတောယေဝ ဂုဏီဘူတာ သဒ္ဒါလင်္ကာရေန ယုတ္တာ ဒေါသရဟိတာ ဒုဗ္ဗဏ္ဏဒုဿဏ္ဌာနာဒိဒေါသေဟိ [Pg.40] ပရိစ္စတ္တာ ဂုဏယုတ္တာ ဟဒယင်္ဂမဂုဏယုတ္တာ ဝဓူ ဝိယ အင်္ဂနာ ဝိယ မနောဟရာ သာဓုဇနေ အာရာဓေတိ. १६. आता, दोषांचा त्याग करून गुणांचा स्वीकार करण्याचे प्रयोजन 'सालंकारवियुत्ता...' इत्यादीद्वारे दर्शवले आहे. ती सद्दत्थावलि अलंकारांशिवाय असली तरीही, सर्व प्रकारे दोषरहित आणि गुणांनी युक्त असल्यामुळे, म्हणजेच शब्दालंकाराने युक्त असल्यामुळे, तसेच कुरूपता, वाईट ठेवण इत्यादी दोषांनी रहित आणि हृदयस्पर्शी गुणांनी युक्त असल्यामुळे, एखाद्या वधूप्रमाणे किंवा स्त्रीप्रमाणे मनोहर होऊन सज्जन लोकांना आनंदित करते. ၁၇. १७. ပဒေ ဝါကျေ တဒတ္ထေ စ, ဒေါသာ ယေ ဝိဝိဓာ မတာ; သောဒါဟရဏမေတေသံ, လက္ခဏံ ကထယာမျ’ဟံ. पदामध्ये, वाक्यामध्ये आणि त्यांच्या अर्थामध्ये जे विविध प्रकारचे दोष मानले गेले आहेत, त्यांचे लक्षण मी उदाहरणासहित सांगतो. ၁၇. ယတော ဧဝံ ဂုဏာလင်္ကာရသံယုတ္တာယပိ ဒေါသလဝင်္ကိတာယ ဝိညူနမနာဒရဏီယတာ, အလင်္ကာရဝိယုတ္တာပိ ဒေါသာဘာဝေန ဂုဏယုတ္တာယ မနောဟရတာ, ဧဝမနတ္ထာဝဟဿာပိ ဒေါသဿ ပရိဟရိတဗ္ဗတာ သတ္ထဒိဋ္ဌိယာ, တသ္မာ တေ ဒေါသေ ဒဿေတုံ ပဋိဇာနာတိ ‘‘ပဒေ’’တိအာဒိနာ. တေသံ ပဒါနံ ဝါကျာနံ အတ္ထော တဒတ္ထော, တသ္မိံ. ဥဒါဟရီယတိ လက္ချဘာဝေနာတိ ဥဒါဟရဏံ, သဟ ဥဒါဟရဏေဟီတိ သောဒါဟရဏံ. လက္ခိယတိ လက္ခိယမနေနာတိ လက္ခဏံ. १७. ज्या अर्थी गुणांनी आणि अलंकारांनी युक्त असूनही थोड्याशा दोषाने चिन्हांकित असलेली रचना विद्वानांसाठी अनादरणीय ठरते, आणि अलंकारांशिवाय असली तरीही दोषांच्या अभावामुळे गुणांनी युक्त असलेली रचना मनोहर ठरते, तसेच अनर्थ घडवून आणणाऱ्या दोषांचे शास्त्राच्या दृष्टीने परिहार करणे (टाळणे) आवश्यक आहे; म्हणूनच, ते दोष दर्शवण्यासाठी 'पदे...' इत्यादीद्वारे प्रतिज्ञा केली आहे. त्या पदांचा आणि वाक्यांचा जो अर्थ, तो 'तदर्थ', त्यामध्ये. ज्याच्याद्वारे लक्ष्याचे स्पष्टीकरण केले जाते ते 'उदाहरण', उदाहरणासह ते 'सोदाहरण'. ज्याच्याद्वारे लक्षण निश्चित केले जाते ते 'लक्षण' होय. ၁၇. ဧဝံ အလင်္ကာရယုတ္တာပိ အပ္ပကေန ဒေါသေန ယုတ္တဗန္ဓဿ အနုပါဒေယျတ္တာ, အလင်္ကာရအလင်္ကရဏေ အသတိပိ ဒေါသရဟိတေ ဝိညူဟိ ဥပါဒေယျတ္တာ စ မုချဿ ဒေါသပရိဟာရဿ အဝဿံ ကတ္တဗ္ဗတ္တာ ဣဒါနိ အဓိဂတဒေါသေ ဒဿေတုံ ပဋိဇာနာတိ ‘‘ပဒေ ဝါကျေ’’စ္စာဒိနာ. ပဒေ နာမာဒိစတုဗ္ဗိဓပဒေ စ, ဝါကျေ ‘‘သျာဒျန္တတျာဒျန္တာနံ စယော ဝါကျံ သကာရကကိရိယာ’’တိ ဝုတ္တလက္ခဏေ ဝါကျေ စ, တဒတ္ထေ စ တေသံ ပဒဝါကျာနံ အတ္ထေ စ ဝိဝိဓာ အနေကပ္ပကာရာ ယေ ဒေါသာ ဝိညူဟိ ဒေါသဘာဝေန မတာ ဉေယျာ, ဧတေသံ ပဒါဒိဒေါသာနံ သောဒါဟရဏံ ဥဒါဟရဏသဟိတံ လက္ခဏံ အဟံ ကထယာမိ. ဧတ္ထ စ– १७. अशा प्रकारे, जरी अलंकारयुक्त असले तरी, अल्पशा दोषाने युक्त असलेली रचना (बंध) अग्राह्य (स्वीकारण्यास अयोग्य) ठरते; आणि अलंकार नसतानाही दोषरहित असलेली रचना विद्वानांकडून स्वीकारली जाते. म्हणून मुख्य दोषांचे परिहार करणे अत्यंत आवश्यक असल्यामुळे, आता प्राप्त झालेल्या दोषांचे दर्शन घडवण्यासाठी "पदे वाक्ये" इत्यादींद्वारे प्रतिज्ञा केली जाते. 'पदे' म्हणजे नाम इत्यादी चार प्रकारच्या पदांमध्ये, 'वाक्ये' म्हणजे "सुबन्त आणि तिङन्त यांचा समूह आणि कारकासह क्रिया असणारे ते वाक्य" अशा सांगितलेल्या लक्षणाने युक्त वाक्यामध्ये, आणि 'तदत्थे' म्हणजे त्या पद आणि वाक्यांच्या अर्थामध्ये, विद्वानांनी दोष म्हणून मानलेले जे विविध आणि अनेक प्रकारचे दोष आहेत, त्या पद इत्यादी दोषांचे उदाहरणासहित लक्षण मी सांगतो. आणि येथे – ‘‘ပဒံ စတုဗ္ဗိဓံ ဝုတ္တံ, နာမာချာတောပသဂ္ဂိကံ; နိပါတကဉ္စ တညူဟိ, အဿော ခလွာဘိဓာဝတီ’’တိ. "पद चार प्रकारचे सांगितले आहे - नाम, आख्यात (क्रियापद), उपसर्ग आणि निपात; त्या विषयाच्या जाणकारांनी (उदाहरणादाखल) 'अस्सो खलु आभिधावति' (घोडा खरोखर वेगाने धावतो) असे म्हटले आहे." ဝုတ္တနိယာမေန ပဒံ တာဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဥဒါဟရီယန္တိ လက္ခိယဘာဝေနာတိ ဥဒါဟရဏာနီတိ စ, သဟ ဥဒါဟရဏေနာတိ သောဒါဟရဏန္တိ [Pg.41] စ, လက္ခီယတိ လက္ခိယမနေနာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. सांगितलेल्या नियमानुसार प्रथम पद समजून घ्यावे. 'ज्यांच्याद्वारे लक्षित केले जाते ते' म्हणजे उदाहरणे (उदाहरणाने युक्त), आणि 'उदाहरणासह' म्हणजे सोदाहरण, आणि 'ज्याद्वारे लक्षित केले जाते' असा विग्रह आहे. ပဒဒေါသဥဒ္ဒေသ पददोषांचे उद्देश (कथन) ၁၈. १८. ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရာဈတ္ထ-ကိလိဋ္ဌာနိ ဝိရောဓိ စ; နေယျံ ဝိသေသနာပေက္ခံ, ဟီနတ္ထကမနတ္ထကံ. विरुद्धार्थान्तर, अझत्थ (अध्यर्थ), किलिट्ठ (क्लिष्ट), विरोधी, नेय्य (नेय), विसेसनापेक्ख (विशेषणापेक्ष), हीनत्थक (हीनार्थक) आणि अनत्थक (अनर्थक). ဝါကျဒေါသဥဒ္ဒေသ वाक्यदोषांचे उद्देश (कथन) ၁၉. १९. ဒေါသာ ပဒါန, ဝါကျာန-မေကတ္ထံ ဘဂ္ဂရီတိကံ; တထာ ဗျာကိဏ္ဏဂါမ္မာနိ, ယတိဟီနံ ကမစ္စုတံ; အတိဝုတ္တမပေတတ္ထံ, သဗန္ဓဖရုသံ တထာ पदांचे दोष (सांगितल्यानंतर), वाक्यांचे दोष (सांगितले जातात) - एकत्थ (एकार्थ), भग्गरीतिक (भग्नरीतिक), तसेच व्याकिण्ण (व्याकीर्ण), गाम्म (ग्राम्य), यतिहीन, कमच्चुत (क्रमच्युत), अतिवृत्त, अपेतत्थ (अपेतार्थ) आणि सबन्धफरुस (सबंधपरुष). ဝါကျတ္ထဒေါသဥဒ္ဒေသ वाक्यार्थदोषांचे उद्देश (कथन) ၂၀. २०. အပက္ကမော’စိတျဟီနံ, ဘဂ္ဂရီတိ သသံသယံ; ဂါမ္မံ ဒုဋ္ဌာလင်္ကတီတိ, ဒေါသာ ဝါကျတ္ထနိဿိတာ. अपक्कम (अपक्रम), ओचित्यहीन (औचित्यहीन), भग्गरीति (भग्नरीति), ससंशय, गाम्म (ग्राम्य) आणि दुट्ठाळंकती (दुष्टालंकृती) - हे वाक्यार्थावर आधारित (वाक्यार्थनिश्रित) दोष आहेत. ပဒဒေါသာဒိဥဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ पददोष इत्यादींच्या उद्देशाची वर्णना (स्पष्टीकरण) ၁၈-၁၉-၂၀. ဣဒါနိ ယထာပဋိညာတေ ဒေါသေ ဥဒ္ဒိသတိ ‘‘ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရ’’ ဣစ္စာဒိနာ. ဝိရုဒ္ဓံ အတ္ထန္တရံ ယဿ တံ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရံ. ကိံ တံ? ပဒံ. ဧဝမုပရိပိ ယထာယောဂံ. အဓိကော အတ္ထော ဝိသေသျဿ ယေန တံ အဓျတ္ထံ. နီယတိ အဝုတ္တော ဟေတု ဧတ္ထ အာနီယတီတိ နေယျံ. ဒေါသာ ပဒါနန္တိ ယေဟိ ဒေါသေဟိ ပဒါနိ ဒုဋ္ဌာနိ, တေ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရတာဒယော ပဒါနံ ဒေါသာတိ အတ္ထော. ဧဝမုပရိပိ ယထာယောဂံ. ဝါကျာနံ ဒေါသာတိ သမ္ဗန္ဓော. ဘဂ္ဂါ ရီတိ ကမော ယသ္မိံ တံ ဘဂ္ဂရီတိကံ, ဝါကျံ. အပက္ကမတာဒယော ဝါကျတ္ထဒေါသာ, ဝါကျတ္ထာနံ ဒေါသတော. ဝါကျံ ဒုဋ္ဌံ သိယာတိ ဝါကျမေဝ ဝိသေသျတေ. တေန သဗ္ဗတ္ထ နပုံသကလိင်္ဂေန နိဒ္ဒေသော. १८-१९-२०. आता प्रतिज्ञा केल्याप्रमाणे "विरुद्धत्थन्तर" इत्यादींद्वारे दोषांचे निर्देश करतात. ज्याचा दुसरा अर्थ विरुद्ध आहे ते 'विरुद्धत्थन्तर' होय. ते काय आहे? पद. याचप्रमाणे पुढेही योग्यतेनुसार समजून घ्यावे. विशेष्याला अधिक अर्थ प्राप्त करून देण्यामुळे त्याला 'अझत्थ' (अध्यर्थ) म्हणतात. जेथे न सांगितलेला हेतू आणला जातो ते 'नेय्य' (नेय) होय. 'पदांचे दोष' म्हणजे ज्या दोषांमुळे पदे दूषित होतात, ते विरुद्धत्थन्तर इत्यादी पदांचे दोष आहेत असा अर्थ आहे. याचप्रमाणे पुढेही योग्यतेनुसार समजून घ्यावे. 'वाक्यांचे दोष' असा संबंध आहे. ज्यामध्ये रीतीचा क्रम भग्न झाला आहे ते 'भग्गरीतिक' वाक्य होय. अपक्रम इत्यादी वाक्यार्थाचे दोष आहेत, कारण ते वाक्यार्थाचे दोष आहेत. 'वाक्य दूषित असावे' यामध्ये वाक्याचेच विशेषण केले आहे. म्हणून सर्वत्र नपुंसकलिंगाने निर्देश केला आहे. ၁၈-၁၉-၂၀. ဣဒါနိ ကထေတဗ္ဗဘာဝေန ပဋိညာတေ ဒေါသေ ဥဒ္ဒိသန္တော ‘‘ဝိရုဒ္ဓ…ပေ… နိဿိတာ’’တိ အာဟ. ကဝီဟိ ဣစ္ဆိတတ္ထတော [Pg.42] ဝိရုဒ္ဓေါ အညတ္ထော ယဿ ပဒဿာတိ တံ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရံ နာမ. ဝိသေသျဿ အဓိကတ္ထဘာဝကရဏတော အဈတ္ထံ နာမ. ကဝီဟိ ဣစ္ဆိတတ္ထဿာဝီကရဏေ အဝိသဒတ္တာ ကိလိဋ္ဌံ နာမ. ဒေသကာလကလာဒီနံ ဝိရုဒ္ဓတ္တာ ဝိရောဓိ နာမ. အညမာဟရိတွာ ဝတ္တဗ္ဗတော နေယျံ နာမ. ဝိသေသနံ ပတွာဝ သာတ္ထကဘာဝပ္ပတ္တိတော ဝိသေသနာပေက္ခံ နာမ. ဝိသေသျဿ ဟီနတာပါဒနတော ဟီနတ္ထကံ နာမ. အတ္ထရဟိတတ္တာ အနတ္ထကံ နာမာတိ ဣမေ အဋ္ဌ ပဒနိဿိတတ္တာ ပဒဒေါသာ နာမ. १८-१९-२०. आता सांगण्याच्या उद्देशाने प्रतिज्ञा केलेल्या दोषांचा निर्देश करताना "विरुद्ध...पे... निस्सिता" असे म्हणतात. कवींना अभिप्रेत असलेल्या अर्थापेक्षा ज्या पदाचा दुसरा अर्थ विरुद्ध असतो, त्याला 'विरुद्धत्थन्तर' म्हणतात. विशेष्याला अधिक अर्थ प्राप्त करून देण्यामुळे त्याला 'अझत्थ' म्हणतात. कवींना अभिप्रेत असलेला अर्थ स्पष्ट न झाल्यामुळे अस्पष्ट असण्याला 'किलिट्ठ' (क्लिष्ट) म्हणतात. देश, काळ, कला इत्यादींच्या विरुद्ध असल्यामुळे त्याला 'विरोधी' म्हणतात. दुसरा अर्थ आणून सांगावा लागत असल्यामुळे त्याला 'नेय्य' म्हणतात. विशेषण प्राप्त करूनच सार्थकता प्राप्त होत असल्यामुळे त्याला 'विसेसनापेक्ख' (विशेषणापेक्ष) म्हणतात. विशेष्याची हीनता दर्शवत असल्यामुळे त्याला 'हीनत्थक' (हीनार्थक) म्हणतात. अर्थरहित असल्यामुळे त्याला 'अनत्थक' (अनर्थक) म्हणतात. हे आठ पदांवर आधारित असल्यामुळे 'पददोष' म्हणून ओळखले जातात. ဝုတ္တတ္ထဿေဝ ပုန ဝစနတော ဧကတ္ထံ နာမ. ဘိန္နက္ကမတ္တာ ဘဂ္ဂရီတိကံ နာမ. တထာ သမ္မောဟကာရဏတ္တာ ဗျာကိဏ္ဏံ နာမ. ဝိသိဋ္ဌဝစနဝိရဟတော ဂါမ္မံ နာမ. ယတိသမ္ပတ္တိဝိရဟတော ယတိဟီနံ နာမ. ပဒတ္ထက္ကမတော စုတတ္တာ ကမစ္စုတံ နာမ. လောကိယံ ဝေါဟာရမတိက္ကမ္မ ဝုတ္တတ္တာ အတိဝုတ္တံ နာမ. သမုဒါယတ္ထတော အပဂတတ္တာ အပေတတ္ထံ နာမ. ဗန္ဓဖရုသယုတ္တတ္တာ ဗန္ဓဖရုသံ နာမ, တေန သဟိတံ သဗန္ဓဖရုသန္တိ ဣမေ နဝ ဝါကျာနံ တထာ ဒေါသာ နာမ. ဧတ္ထ တထာသဒ္ဒေါ ‘‘ဒေါသာ’’တိ ပဒံ ဥပသံဟရတိ. सांगितलेल्या अर्थाचीच पुन्हा पुनरावृत्ती करण्याला 'एकत्थ' (एकार्थ) म्हणतात. क्रम भिन्न असल्यामुळे त्याला 'भग्गरीतिक' म्हणतात. तसेच संभ्रम निर्माण करत असल्यामुळे त्याला 'व्याकिण्ण' (व्याकीर्ण) म्हणतात. विशिष्ट (शिष्ट) शब्दांच्या अभावामुळे त्याला 'गाम्म' (ग्राम्य) म्हणतात. यतीचा अभाव असल्यामुळे त्याला 'यतिहीन' म्हणतात. पदांच्या अर्थाच्या क्रमापासून च्युत झाल्यामुळे त्याला 'कमच्चुत' (क्रमच्युत) म्हणतात. लौकिक व्यवहाराचे उल्लंघन करून बोलल्यामुळे त्याला 'अतिवृत्त' म्हणतात. समुदाय अर्थापासून दूर गेल्यामुळे त्याला 'अपेतत्थ' (अपेतार्थ) म्हणतात. रचनेच्या कठोरतेने युक्त असल्यामुळे त्याला 'बन्धफरुस' म्हणतात, आणि त्याने युक्त असण्याला 'सबन्धफरुस' म्हणतात. हे नऊ वाक्यांचे दोष आहेत. येथे 'तथा' हा शब्द 'दोष' या पदाचा उपसंहार करतो. အပဂတက္ကမတ္တာ အပက္ကမံ နာမ. ဥစိတဘာဝဿ ပရိဟီနတ္တာ ဩစိတျဟီနံ နာမ. ဘိန္နဝိဘတ္တိက္ကမတ္တာ ဘဂ္ဂရီတိ နာမ. သံသယဇနနတော သသံသယံ နာမ. ဒုပ္ပတီတိကရတ္တာ ဂါမ္မံ နာမ. ဒူသိတာလင်္ကာရတ္တာ ဒုဋ္ဌာလင်္ကတိ နာမာတိမေ ဆ ဝါကျတ္ထနိဿိတတ္တာ ဝါကျတ္ထဒေါသာ နာမ. क्रम सुटल्यामुळे त्याला 'अपक्कम' (अपक्रम) म्हणतात. योग्यतेचा (औचित्याचा) अभाव असल्यामुळे त्याला 'ओचित्यहीन' (औचित्यहीन) म्हणतात. विभक्तीचा क्रम भिन्न असल्यामुळे त्याला 'भग्गरीति' म्हणतात. संशय निर्माण करत असल्यामुळे त्याला 'ससंशय' म्हणतात. समजण्यास कठीण असल्यामुळे त्याला 'गाम्म' (ग्राम्य) म्हणतात. अलंकार दूषित झाल्यामुळे त्याला 'दुट्ठाळंकती' (दुष्टालंकृती) म्हणतात. हे सहा वाक्यार्थावर आधारित असल्यामुळे 'वाक्यार्थदोष' म्हणून ओळखले जातात. အညော အတ္ထော အတ္ထန္တရော. ဝိရုဒ္ဓေါ အတ္ထန္တရော ယဿာတိ ဝိဂ္ဂဟော. ဒေါသပကာသကပဒမ္ပိ ဒေါသတော အဗျတိရိတ္တတ္တာ ဒေါသော နာမ. ဧဝံ သန္တေပိ သမာသေန ပဒဿ ဂဟိတတ္တာ နပုံသကံ ဟောတိ. ဧသေဝနယော ဣတော ပရေသုပိ. ဝိသေသျဿ အဓိကော အတ္ထော ယဿ တံ, ကိလိဋ္ဌံ ဝိယ ကိလိဋ္ဌံ. ယထာ ဟိ မလဂ္ဂဟိတော အာဒါသော အတ္တနော ကိလိဋ္ဌတ္တာ [Pg.43] မုခါဒီနံ ပကာသနေ အဝိသဒေါ ဟောတိ, ဧဝမဓိပ္ပေတတ္ထပ္ပကာသနေ အသမတ္ထံ ပဒံ ကိလိဋ္ဌံ နာမ. ဝိရောဓော အဿ အတ္ထီတိ ဝိရောဓိ. နီယတိ အဝုတ္တော ဟေတု ဧတ္ထာတိ နေယျံ. ဝိသေသနေ အပေက္ခာ ယဿ တံ. ဟီနော ဝိသေသျဿ အတ္ထော ယေန တံ. နတ္ထိ အတ္ထော ယဿ တန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. दुसरा अर्थ म्हणजे 'अर्थान्तर'. ज्याचा दुसरा अर्थ विरुद्ध आहे असा विग्रह आहे. दोषाचे प्रकाशन करणारे पद देखील दोषापेक्षा भिन्न नसल्यामुळे 'दोष' म्हटले जाते. असे असले तरी समासामध्ये पद ग्रहण केल्यामुळे ते नपुंसकलिंगी होते. हाच नियम यापुढील शब्दांनाही लागू होतो. विशेष्याचा अधिक अर्थ ज्यामध्ये असतो ते, आणि क्लिष्टासारखे असणारे ते 'किलिट्ठ' (क्लिष्ट) होय. ज्याप्रमाणे धुळीने माखलेला आरसा स्वतः मलीन (क्लिष्ट) असल्यामुळे मुख इत्यादींचे दर्शन घडवण्यात अस्पष्ट असतो, त्याचप्रमाणे अभिप्रेत अर्थ प्रकट करण्यात असमर्थ असणारे पद 'किलिट्ठ' (क्लिष्ट) म्हटले जाते. ज्यामध्ये विरोध असतो तो 'विरोधी'. जेथे न सांगितलेला हेतू आणला जातो ते 'नेय्य' (नेय). ज्याला विशेषणाची अपेक्षा असते ते (विशेषणापेक्ष). ज्याच्यामुळे विशेष्याचा अर्थ हीन होतो ते (हीनार्थक). ज्याला अर्थ नाही तो 'अनर्थक' असा विग्रह आहे. ပဒဒေါသာနံ အနညတ္တေပိ ဝိကပ္ပနာဘေဒတော ‘‘ပဒါနံ ဒေါသာ’’တိ ဝုတ္တံ, ယထာ ‘‘သိလာပုတ္တကဿ သရီရ’’န္တိ. ဝါကျာနံ ဒေါသာတိ ဧတ္ထာပိ ဧသေဝ နယော. ဧကော အတ္ထော ယဿ တံ. ဘဂ္ဂါရီတိ ကမော ယဿ တံ. ဝိသုံ ဝိသုံ အာကိဏ္ဏံ ဗျာကိဏ္ဏံ. ဂါမေ ဘဝေါ ဂါမ္မော, အဗျတ္တာနံ ဝေါဟာရော. တပ္ပကာသကပဒမ္ပိ ဥပစာရတော ဂါမ္မံ နာမ. ယတိ ဟီနာ ဧတ္ထာတိ ယတိဟီနံ. ကမတော စုတံ ကမစ္စုတံ. အတိက္ကမ္မ ဝုတ္တံ အတိဝုတ္တံ. အတ္ထတော အပေတံ အပေတတ္ထံ. ဗန္ဓေ ဖရုသံ ဖရုသတာ ယတ္ထ တံ. အပဂတော ကမော ယသ္မာ တံ. ဩစိတျံ ဟီနံ ယတ္ထ တံ. ဘဂ္ဂါ ရီတိ ယတ္ထ တံ. သဟ သံသယေန ဝတ္တတီတိ တံ. ဂါမ္မံ ဝုတ္တနယမေဝ. ဒုဋ္ဌာ ဒူသိတာ အလင်္ကတိ အလင်္ကာရော ယတ္ထ တံ. ဝါကျာနံ အတ္ထော, တန္နိဿိတာ ဝါကျတ္ထနိဿိတာတိ ဝိဂ္ဂဟော. ဧတ္ထ အနတ္ထကာပေတတ္ထဒေါသဒွယံ ပဒဝါကျတော ဘိန္နံ, အညံ ဘဂ္ဂရီတိဒေါသဒွယံ, ဂါမ္မဒွယံ, ကမစ္စုတအပက္ကမဒွယဉ္စ ဝါကျဝါကျတ္ထတော ဘိန္နံ. पददोषांमध्ये भेद नसला तरी विकल्पांच्या भेदांमुळे "पदांचे दोष" असे म्हटले आहे, जसे की "शिलापुत्राचे (दगडाच्या मूर्तीचे) शरीर". 'वाक्यांचे दोष' यामध्येही हाच नियम आहे. ज्याचा एकच अर्थ आहे ते (एकार्थ). ज्याचा रीतीचा क्रम भग्न झाला आहे ते (भग्नरीतिक). वेगवेगळ्या ठिकाणी विखुरलेले ते 'व्याकिण्ण' (व्याकीर्ण). गावात राहणारा तो 'गाम्म' (ग्राम्य), म्हणजेच अडाणी लोकांचा व्यवहार. तो प्रकट करणारे पद देखील उपचाराने 'गाम्म' (ग्राम्य) म्हटले जाते. जेथे यतीचा अभाव आहे ते 'यतिहीन'. क्रमापासून च्युत झालेले ते 'कमच्चुत' (क्रमच्युत). मर्यादा ओलांडून बोललेले ते 'अतिवृत्त'. अर्थापासून दूर गेलेले ते 'अपेतत्थ' (अपेतार्थ). रचनेत कठोरता असणे म्हणजे 'परुषता' होय. ज्यातून क्रम निघून गेला आहे ते (अपक्रम). जेथे औचित्याचा अभाव आहे ते (औचित्यहीन). जेथे रीती भग्न झाली आहे ते (भग्नरीति). जे संशयाने युक्त असते ते (ससंशय). 'गाम्म' हे आधी सांगितलेल्या नियमाप्रमाणेच आहे. जेथे अलंकार दूषित झाला आहे ते 'दुट्ठाळंकती' (दुष्टालंकृती). वाक्याचा अर्थ आणि त्यावर आधारित असणारे ते 'वाक्यार्थनिश्रित' असा विग्रह आहे. येथे 'अनत्थक' (अनर्थक) आणि 'अपेतत्थ' (अपेतार्थ) हे दोन दोष पद आणि वाक्यापेक्षा भिन्न आहेत; आणि दुसरे 'भग्गरीति' हे दोन दोष, 'गाम्म' हे दोन दोष, आणि 'कमच्चुत' व 'अपक्कम' हे दोन दोष वाक्य आणि वाक्यार्थापेक्षा भिन्न आहेत. ပဒဒေါသနိဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ पददोषनिर्देशाची वर्णना (स्पष्टीकरण) ၂၁. २१. ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရံ တဉှိ, ယဿ’ညတ္ထော ဝိရုဇ္ဈတိ; အဓိပ္ပေတေ ယထာ မေဃော, ဝိသဒေါ သုခယေ ဇနံ. कारण ज्या शब्दाचा दुसरा अर्थ अभिप्रेत अर्थाशी विरुद्ध असतो, तो 'विरुद्धत्थन्तर' (विरुद्ध अर्थ असलेला) दोष होय; जसे की— 'विसद (विष देणारा / पाणी देणारा) मेघ लोकांनी सुखी करो.' ၂၁. အထောဒ္ဒေသက္ကမေန ပဒါဒိဒေါသေ ဥဒါဟရတိ ‘‘ဝိရုဒ္ဓိ’’ စ္စာဒိနာ. ဟိ ယသ္မာ ကာရဏာ, ပသိဒ္ဓိယံ ဝါ ဟိသဒ္ဒေါ. ယဿ ပဒဿ အညော အဓိပ္ပေတတော အပရော အတ္ထော အဓိပ္ပေတေ ဝတ္တုမိစ္ဆိတေ အတ္ထေ ဝိရုဇ္ဈတီတိ အနုဝဒိတွာ တသ္မာ [Pg.44] တံ ‘‘ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရ’’န္တိ ဝိဓီယတေ. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ. ယထာ ဣဒံ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရံ, တထာ အညမ္ပိ တာဒိသံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. န တွိဒမေဝေတိ ယထာသဒ္ဒဿ အတ္ထော. မေဃော ဝိသဒေါ သုခယေ ဇနန္တိ. ဝိသံ ဥဒကံ, တံ ဒဒါတီတိ ဝိသဒေါ မေဃော ဝါရိဝဟော ဇနံ လောကံ သုခယေ သုခယတီတိ ကဝိစ္ဆိတတ္ထော. ဝိသသဒ္ဒေါ ဂရဠဿ စ ဝါစကော သိယာတိ ဂရဠဒေါ မေဃော မာရယတိ, န ပန သုခယတီတိ ‘‘ဝိသဒေါ’’တိ ဝိသေသနပဒဿ ဝိရုဒ္ဓတာ. २१. आता उद्देशक्रमानुसार (अनुक्रमे) 'विरुद्धी' इत्यादींद्वारे पदादी दोषांचे उदाहरण देतात. 'हि' म्हणजे ज्या कारणाने, किंवा 'हि' हा शब्द प्रसिद्धीसाठी आहे. ज्या पदाचा दुसरा अर्थ अभिप्रेत असलेल्या (सांगावयाच्या) अर्थाशी विरुद्ध असतो, असा अनुवाद करून, म्हणून त्याला 'विरुद्धत्थन्तर' असे म्हटले जाते. 'यथा' (जसे) असे उदाहरण देतात. जसे हे 'विरुद्धत्थन्तर' आहे, तसेच दुसरेही तशाच प्रकारचे समजावे. केवळ हेच नाही, असा 'यथा' शब्दाचा अर्थ आहे. 'मेघो विसदो सुखये जनं' (विसद मेघ लोकांना सुखी करो). 'विस' म्हणजे पाणी, ते देणारा तो 'विसद' म्हणजे मेघ (पाणी वाहून नेणारा) लोकांना सुखी करो, हा कवीचा अभिप्रेत अर्थ आहे. परंतु 'विस' शब्द हा विषाचाही (गरळ) वाचक असू शकतो, म्हणून 'विष देणारा मेघ मारतो, सुखी करत नाही' अशी 'विसद' या विशेषण पदाची विरुद्धता (विरोधाभास) आहे. ၂၁. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနုက္ကမေန ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရာဒီနံ သလက္ခဏလက္ခိယံ ဒဿေန္တော ‘‘ဝိရုဒ္ဓိ’’စ္စာဒိမာဟ. ယဿ ပဒဿ အညတ္ထော ကဝိစ္ဆိတတ္ထတော အညော အတ္ထော အဓိပ္ပေတေ ဣစ္ဆိတတ္ထေ ဟိ ယသ္မာ ဝိရုဇ္ဈတိ, တသ္မာ တံ ပဒံ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရံ နာမ. ပသိဒ္ဓိယံ ဝါ ဟိသဒ္ဒေါ. တထာ ဟေသ အပ္ပသိဒ္ဓံ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရံ ‘‘ယဿ အညတ္ထော အဓိပ္ပေတေ ဝိရုဇ္ဈတီ’’တိ ပကာသေတွာ တသ္မိံ ပကာသိတတ္ထဝိသယေ ဝတ္တတိ. ‘‘တံ ဟီ’’တိ ယောဇိတတ္တာ ‘‘ယဿ အညတ္ထော အဓိပ္ပေတေ ဝိရုဇ္ဈတီ’’တိ လက္ခဏံ ပသိဒ္ဓဘာဝေန အနုဝဒိတွာ တံ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရန္တိ အနုဝဒိတဗ္ဗအပ္ပသိဒ္ဓဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရံ ဝိဓီယတေ, ယထာ ‘‘ယော ကုဏ္ဍလီ, သော ဒေဝဒတ္တော’’တိ. ဥပရိ ပသိဒ္ဓါနုဝါဒေန အပ္ပသိဒ္ဓဝိဓာနမေဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ‘‘ယထာ…ပေ… ဇန’’န္တိ ဥဒါဟရဏံ လက္ခိယံ ဒဿေတိ. ယထာ ‘‘မေဃော ဝိသဒေါ’’စ္စာဒိ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရဿ ဥဒါဟရဏံ, ဧဝမီဒိသမညမ္ပိ ဣမဿုဒါဟရဏံ, န ကေဝလံ ‘‘မေဃော’’စ္စာဒိမေဝ ဘဝတီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ယထာသဒ္ဒေါ စေတ္ထ ဣဝသဒ္ဒပရိယာယတ္ထေပိ ဥဒါဟရဏတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော, ဥပရိပျေဝံ. မေဃော အမ္ဗုဓရော ဝိသဒေါ ဝိသသင်္ခါတံ ဇလံ ဒဒန္တော ဇနံ သုခယေ သုခယတီတိ ကဝီဟိ အဓိပ္ပေတတ္ထော. ဧတ္ထ ဝိသသဒ္ဒဿ ဂရဠသင်္ခါတသပ္ပဝိသဝါစကတ္တာ, ‘‘ဝိသံ ဒဒါတီတိ ဝိသဒေါ’’တိ ဧတ္ထ ဝိသဿ ဥဒကဝိသာနံ သာဓာရဏတ္တာ ဝိသဒါယကော မေဃော နာသေတိယေဝ, န သုခယတီတိ ကဝိနာ [Pg.45] အဓိပ္ပေတဿ သုခကာရဏဿ မေဃဝိသေသနဝိသသဒ္ဒဿ ဝိရုဒ္ဓအညတ္ထတာတိ ဝိသပဒံ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရဒေါသေန ဒုဋ္ဌန္တိ. २१. आता उद्देशक्रमानुसार 'विरुद्धत्थन्तर' इत्यादींचे लक्षण आणि उदाहरणासह दर्शन घडवत 'विरुद्धी' इत्यादी म्हणतात. ज्या पदाचा दुसरा अर्थ कवीच्या अभिप्रेत अर्थापेक्षा वेगळा असून इच्छित अर्थाशी विरुद्ध असतो, म्हणून त्या पदाला 'विरुद्धत्थन्तर' म्हणतात. किंवा 'हि' शब्द प्रसिद्धीसाठी आहे. तसेच 'ज्याचा दुसरा अर्थ अभिप्रेत अर्थाशी विरुद्ध असतो' असे स्पष्ट करून त्या स्पष्ट केलेल्या अर्थाच्या विषयात तो वर्ततो. 'तं ही' असे जोडल्यामुळे 'ज्याचा दुसरा अर्थ अभिप्रेत अर्थाशी विरुद्ध असतो' हे लक्षण प्रसिद्ध असल्याने त्याचा अनुवाद करून, ते 'विरुद्धत्थन्तर' आहे असा अनुवाद करण्यायोग्य अप्रसिद्ध विरुद्धत्थन्तर सांगितले जाते, जसे 'जो कुंडल परिधान केलेला आहे, तो देवदत्त आहे'. पुढे प्रसिद्ध अनुवादाने अप्रसिद्ध विधानच पाहावे. 'यथा...पे... जनं' हे उदाहरण लक्ष्यार्थ दाखवते. जसे 'मेघो विसदो' इत्यादी विरुद्धत्थन्तरचे उदाहरण आहे, तसेच या प्रकारचे दुसरेही याचे उदाहरण असू शकते, केवळ 'मेघो' इत्यादीच नाही, असे म्हटले आहे. येथे 'यथा' शब्द 'इव' शब्दाच्या पर्यायी अर्थात उदाहरणासाठी समजला पाहिजे, पुढेही तसेच आहे. 'मेघो' म्हणजे मेघ, 'विसदो' म्हणजे विस नावाचे पाणी देणारा लोकांना सुखी करो, हा कवीचा अभिप्रेत अर्थ आहे. येथे 'विस' शब्दाचा अर्थ सर्पविष असाही होत असल्याने, 'विष देणारा तो विसद' यामध्ये 'विस' हा शब्द पाणी आणि विष या दोन्हीसाठी सामान्य असल्याने, विष देणारा मेघ नष्टच करतो, सुखी करत नाही. त्यामुळे कवीला अभिप्रेत असलेल्या सुखाच्या कारणाचा मेघविशेषण 'विसद' या शब्दाशी विरुद्ध असा दुसरा अर्थ निघत असल्याने, 'विस' हे पद 'विरुद्धत्थन्तर' दोषाने दूषित आहे. ၂၂. २२. ဝိသေသျမဓိကံ ယေနာ’-ဓျတ္ထမေတံ ဘဝေ ယထာ; ဩဘာသိတာသေသဒိသော,ခဇ္ဇောတော’ယံ ဝိရာဇတေ. ज्या (विशेषणाने) विशेष्य (ज्याचे वर्णन करायचे आहे ते पद) अर्थाच्या दृष्टीने अधिक (अतिशयोक्तीपूर्ण) होते, त्याला 'अज्झत्थ' (अत्यर्थ/अतिशयोक्ती) दोष म्हणावे; जसे की— 'सर्व दिशांना प्रकाशित करणारा हा काजवा शोभून दिसत आहे.' ၂၂. ယေန ပဒေန ဝိသေသျံ ဝိသေသိတဗ္ဗံ အပရံ ပဒံ အတ္ထဝသေန အဓိကံ ဘဝတီတျနုဝဒိတွာ ဧတံ အဈတ္ထံ ဘဝေတိ ဝိဓီယတေ. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ ‘‘ဩဘာသိတေ’’စ္စာဒိ. ဧဝမုပရိပိ သုဝိညေယျံ. ဩဘာသိတာ ဒီပိတာ အသေသာ နိခိလာ ဒိသာယေန သောယံ ခဇ္ဇောတော ဝိရာဇတေ ဒိပ္ပတိ. ဧတ္ထ ခဇ္ဇောတဿာခိလဒိသာဘာဂါဝဘာသနမတိဝုတ္တီတိ အဓိကတ္ထံ. २२. ज्या पदाने विशेष्य म्हणजे विशेषित केले जाणारे दुसरे पद अर्थाच्या दृष्टीने अधिक होते, असा अनुवाद करून, त्याला 'अज्झत्थ' (अतिशयोक्ती) दोष म्हणतात. 'यथा' (जसे) असे 'ओभासित' इत्यादी उदाहरण देतात. यापुढेही हे सहज समजण्यासारखे आहे. 'ओभासिता' म्हणजे प्रकाशित केल्या आहेत 'असेसा' म्हणजे सर्व दिशा ज्याने, असा हा 'खज्जोतो' (काजवा) 'विराजते' (चमकत आहे). येथे काजव्याने सर्व दिशा प्रकाशित करणे ही अतिशयोक्ती (अतिवृत्ती) असल्याने हा 'अधिकत्थ' (अधिक अर्थ) दोष आहे. ၂၂. ယေန ဝိသေသနပဒေန ဝိသေသျံ ဝိသေသိတဗ္ဗံ ပဒံ အတ္ထဝသေန အဓိကံ ဟောတိ, ဧတံ ယထာဝုတ္တလက္ခဏောပေတံ ပဒံ အဈတ္ထံ ဘဝေ အဈတ္ထံ နာမ ပဒဒေါသော ဘဝေ. ယထာ တဿုဒါဟရဏမေဝံ. ဩဘာသိတာသေသဒိသော ဇောတိတသဗ္ဗဒိသော အယံ ခဇ္ဇောတော အယံ ဇောတိရိင်္ဂဏော ဝိရာဇတေ ဒိပ္ပတိ. ဧတ္ထ ဝိသေသျဿ ခဇ္ဇောတဿ သကလဒိသောဘာသနဿ အဈတ္ထတ္တာ ‘‘ဩဘာသိတာသေသဒိသော’’တိ ဝိသေသနပဒံ အဈတ္ထပဒဒေါသော နာမ. ဩဘာသိတာ အသေသဒိသာ ယေနာတိ ဝိဂ္ဂဟော. २२. ज्या विशेषण पदाने विशेष्य म्हणजे विशेषित केले जाणारे पद अर्थाच्या दृष्टीने अधिक होते, हे वर सांगितलेल्या लक्षणाने युक्त असलेले पद 'अज्झत्थ' नावाचा पददोष ठरते. त्याचे उदाहरण याप्रमाणे आहे— 'ओभासितासेसदिसो' म्हणजे सर्व दिशा प्रकाशित करणारा 'अयं खज्जोतो' म्हणजे हा काजवा 'विराजते' म्हणजे चमकत आहे. येथे विशेष्य असलेल्या काजव्याचे सर्व दिशा प्रकाशित करणे हे अतिशयोक्तीपूर्ण (अज्झत्थ) असल्याने 'ओभासितासेसदिसो' हे विशेषण पद 'अज्झत्थ' नावाचा पददोष आहे. 'ओभासिता असेसा दिसा येन' (ज्याने सर्व दिशा प्रकाशित केल्या आहेत) असा याचा विग्रह आहे. ၂၃. २३. ယဿ’တ္ထာဝဂမော ဒုက္ခော,ပကတျာဒိဝိဘာဂတော; ကိလိဋ္ဌံ တံ ယထာ တာယ,သော’ယမာလိင်္ဂျတေ ပိယာ. प्रकृती (धातू/मूळ शब्द) आणि प्रत्यय इत्यादींच्या विभाजनामुळे ज्याचा अर्थ समजणे कठीण असते, तो 'किलिट्ठ' (क्लिष्ट) दोष होय; जसे की— 'तिच्याद्वारे, त्या प्रियेद्वारे, हा आलिंगिला जात आहे.' ၂၃. ပကတျာဒိဝိဘာဂတောတိ [Pg.46] ပစ္စယာ ပဌမံ ကရီယတီတိ ပကတိ. အာဒိသဒ္ဒေန ပစ္စယာဒီနံ ပရိဂ္ဂဟော. ပကတျာဒီနံဝိဘာဂတော ဝိဘဇနတော, ‘‘အယံ ပကတိ, အယံ ပစ္စယော, အယမာဒေသော’’တိအာဒိနာ ပကတိပစ္စယဝိဘာဂကပ္ပနတောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ပီဏေတီတိ ပီ, တာယ ပိယာ ဝလ္လဘာယ သောယံ သာမီ အာလိင်္ဂျတေ သိလိဿတေ. ဧတ္ထ ‘‘ပိယာ’’တိ ကိလိဋ္ဌံ. २३. 'पकत्यादिविभागतो' म्हणजे प्रत्ययाच्या आधी जे केले जाते ती 'पकति' (प्रकृती/मूळ शब्द). 'आदि' शब्दाने प्रत्यय इत्यादींचे ग्रहण होते. प्रकृती इत्यादींच्या विभाजनावरून म्हणजे 'ही प्रकृती, हा प्रत्यय, हा आदेश' इत्यादी प्रकारे प्रकृती-प्रत्यय विभागाची कल्पना केल्याने, असे म्हटले आहे. 'पीणेति' (प्रसन्न करते) म्हणून 'पी' (स्त्री/प्रिया); तिच्याद्वारे म्हणजे 'पिया' (प्रियेद्वारे) हा पती आलिंगिला जात आहे. येथे 'पिया' हे पद क्लिष्ट (किलिट्ठ) आहे. ၂၃. ယဿ ပဒဿ အတ္ထာဝဂမော အတ္ထာဝဗောဓော ပကတျာဒိဝိဘာဂတော ‘‘အယံ ပကတိ, အယံ ပစ္စယော, အယမာဒေသော’’တိအာဒိနာ ပကတျာဒီနံ ဝိဘဇနဇာနနေန, ‘‘ပကတျာဒိ နာမ ကိ’’န္တိ ဂဝေသနတော ဝါ ဒုက္ခော, တံ ကိလိဋ္ဌံ နာမ. ယထာ တဿုဒါဟရဏမေဝံ. တာယ ပိယာ ဝနိတာယ သော အယံ ဝလ္လဘော အာလိင်္ဂျတေ သိလိဿတေ. ပစ္စယာ ပဌမံ ကရီယတီတိ ပကတိ. သာ အာဒိ ယေသံ ပစ္စယာနံ, တေသံ ဝိဘာဂေါတိ ဝါကျံ. ပီဏေတီတိ ပီ, နာရီ. တာယ ပိယာ ဧတ္ထ ပိယာသင်္ခါတာယ ဝလ္လဘာယ ကထနေ ပီသဒ္ဒဿ အဝိသဒတ္တာ ‘‘ပိယာ’’တိ ပဒံ ကိလိဋ္ဌံ. २३. ज्या पदाचा अर्थबोध प्रकृती इत्यादींच्या विभाजनावरून म्हणजे 'ही प्रकृती, हा प्रत्यय, हा आदेश' इत्यादी प्रकारे प्रकृती इत्यादींचे विभाजन समजून घेतल्याने किंवा 'प्रकृती इत्यादी म्हणजे काय?' असा शोध घेतल्याने कणे होते, त्याला 'किलिट्ठ' (क्लिष्ट) म्हणतात. त्याचे उदाहरण याप्रमाणे आहे— तिच्याद्वारे म्हणजे त्या प्रिय स्त्रीद्वारे हा पती आलिंगिला जात आहे. प्रत्ययाच्या आधी जे केले जाते ती प्रकृती. ती प्रकृती ज्या प्रत्ययांच्या सुरुवातीला असते, त्यांचे विभाजन असा वाक्याचा अर्थ आहे. 'पीणेति' (प्रसन्न करते) म्हणून 'पी' म्हणजे स्त्री. तिच्याद्वारे 'पिया'; येथे 'पिया' म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या प्रियेविषयी सांगताना 'पी' हा शब्द अस्पष्ट असल्याने 'पिया' हे पद क्लिष्ट (किलिट्ठ) आहे. ၂၄. २४. ယံ ကိလိဋ္ဌပဒံ မန္ဒာ-ဘိဓေယျံ ယမကာဒိကံ; ကိလိဋ္ဌပဒဒေါသေဝ, တမ္ပိ အန္တော ကရီယတိ. जे क्लिष्ट पद मंद (अस्पष्ट) अर्थाचे असते, जसे की यमक इत्यादी, ते देखील क्लिष्ट पददोषाच्या (किलिट्ठपददोषाच्या) अंतर्गतच समाविष्ट केले जाते. ၂၄. ဣဒါနိ ယမကာဒိကမနဓိပ္ပေတမ္ပိ ကိလိဋ္ဌေယေဝ အန္တောဂဓံ ဒဿေတုမာဟ ‘‘ယ’’န္တိအာဒိ. တတ္ထ ယန္တိ အနိယမဝစနံ, တဿ နိယမဝစနံ ယမကာဒိကန္တိ. ယမကမာဒိ ယဿ ပဟေဠိကာဇာတဿ တံ ယမကာဒိကံ. ကီဒိသန္တိ အာဟ ‘‘ကိလိဋ္ဌပဒ’’န္တိအာဒိ. ကိလိဋ္ဌာနိ အပ္ပတီတဒေါသသဘာဝေ ဌိတတာယ မလိတာနျဝိသဒါနိ ပဒါနိ ယဿ တံ ကိလိဋ္ဌပဒံ. မန္ဒော အပ္ပကော အဘိဓေယျော အတ္ထော ယဿ တံ မန္ဒာဘိဓေယျံ, တာဒိသံ တမ္ပိ ယမကာဒိကံ ကိလိဋ္ဌပဒဒေါသေယေဝ ယထာဝုတ္တေ အန္တော အဗ္ဘန္တရေ ကရီယတိ ဝိဓီယတိ [Pg.47] တတ္ထေဝ ပက္ခိပီယတိ, ကိလိဋ္ဌပဒဒေါသတော န ဗျတိရိစ္စတီတိ အဓိပ္ပာယော. २४. आता यमक इत्यादी अनभिप्रेत असले तरी ते क्लिष्ट (किलिट्ठ) दोषातच समाविष्ट आहेत हे दाखवण्यासाठी 'यं' इत्यादी म्हणतात. तेथे 'यं' हा अनियमवाचक शब्द आहे, त्याचा नियमवाचक शब्द 'यमिकादिकं' असा आहे. यमक ज्याच्या सुरुवातीला असते अशा कोडेवजा रचनेला 'यमकादिक' म्हणतात. ते कसे असते? यावर 'किलिट्ठपदं' इत्यादी म्हणतात. अप्रतीती (अस्पष्टता) दोषाच्या स्वभावात राहिल्यामुळे जे शब्द मलिन आणि अस्पष्ट असतात, ते 'किलिट्ठपद' (क्लिष्ट पद) होय. ज्याचा अभिधेय (वाच्य) अर्थ मंद म्हणजे अल्प असतो, ते 'मंदाभिधेय' होय. अशा प्रकारच्या यमकादिकांना देखील वर सांगितलेल्या क्लिष्ट पददोषाच्या (किलिट्ठपददोषाच्या) अंतर्गतच समाविष्ट केले जाते किंवा त्यातच टाकले जाते; ते क्लिष्ट पददोषापेक्षा वेगळे नाही, असा याचा अभिप्राय आहे. ၂၄. ဣဒါနိ အနဓိပ္ပေတမပိ ယမကာဒိံ ကိလိဋ္ဌဒေါသေယေဝ အန္တောကရဏဗျာဇေန အာဝီကရောန္တော အာဟ ‘‘ယံ ကိလိဋ္ဌေ’’စ္စာဒိ. ကိလိဋ္ဌပဒံ အပ္ပတီတဒေါသေန မိဿကတ္တာ အဝိသဒပဒံ မန္ဒာဘိဓေယျံ အပ္ပကာဘိဓေယျံ ယံ ယမကာဒိကံ ယံ ယမကပ္ပဟေဠိကာဇာတမတ္ထိ, တမ္ပိ ကိလိဋ္ဌပဒဒေါသေယေဝ ယထာဝုတ္တကိလိဋ္ဌပဒဒေါသေယေဝ အန္တော ကရီယတိ အဗ္ဘန္တရေ ကရီယတိ, ကိလိဋ္ဌပဒဒေါသတော အဗျတိရိတ္တန္တိ အဓိပ္ပာယော. ကိလိဋ္ဌာနိ ပဒါနိ ယဿ, မန္ဒော အဘိဓေယျော ယဿ, ယမကံ အာဒိ ယဿ ပဟေဠိကာဇာတဿ, ကိလိဋ္ဌပဒါနံ ဒေါသောတိ ဝိဂ္ဂဟော. २४. आता अनपेक्षित असलेल्या देखील यमकादींना क्लिष्ट दोषातच समाविष्ट करण्याच्या बहाण्याने प्रकट करताना 'यं किलिट्ठे' (जे क्लिष्ट आहे) इत्यादी म्हणाले. क्लिष्ट पद हे अप्रतीत (अस्पष्ट) दोषाने मिश्रित असल्यामुळे अविशद पद, मंद अर्थ असणारे, अल्प अर्थ असणारे जे यमकादिक किंवा जे यमक-प्रहेलिका (कोडे) समूह आहे, त्याचाही क्लिष्ट पद दोषातच, म्हणजेच पूर्वोक्त क्लिष्ट पद दोषातच अंतर्भाव केला जातो, तो क्लिष्ट पद दोषापेक्षा वेगळा नाही असा अभिप्राय आहे. ज्याची पदे क्लिष्ट आहेत, ज्याचा अर्थ मंद (अस्पष्ट) आहे, यमक आदि ज्या प्रहेलिका समूहाचे आहे, तो 'क्लिष्ट पदांचा दोष' असा विग्रह आहे. ၂၅. २५. ပတီတသဒ္ဒရစိတံ, သိလိဋ္ဌပဒသန္ဓိကံ; ပသာဒဂုဏသံယုတ္တံ, ယမကံ မတ’မေဒိသံ. प्रसिद्ध शब्दांनी रचलेले, सुश्लिष्ट पदसंधी असणारे आणि प्रसाद गुणाने युक्त असणारे, असे यमक (विद्वानांना) संमत आहे. ၂၅. ဟောတု ကာမမနဘိမတမေဒိသံ ယမကာဒိကံ, ကိဉ္စရဟိ အဘိမတန္တိ အာဟ ‘‘ပတီတိ’’စ္စာဒိ. အတ္တနော ဝစနီယတ္ထပ္ပတီတဝသေန ဝါစကာပိ သဒ္ဒါ ပတီတာယေဝ နာမာတိ ပတီတေဟိ ပသိဒ္ဓေဟိ သဒ္ဒေဟိ ပါဋိပဒိကေဟိ ရစိတံ ကတံ ပတီတသဒ္ဒရစိတံ. သိလိဋ္ဌာ အညမညာလိင်္ဂနေန မဋ္ဌာ ပဒါနံ သျာဒျန္တာဒီနံ သန္ဓယော သန္ဓနာ ယဿ တံ သိလိဋ္ဌပဒသန္ဓိကံ. ပတီတသဒ္ဒရစိတတ္တာယေဝ ပသာဒသင်္ခါတေန ဂုဏေန သဒ္ဒါလင်္ကာရေန သံယုတ္တံ သမ္မဒေဝေါပေတံ ဧဒိသံ ယထာဝုတ္တဂုဏာသယံ ရမဏီယံ ယမကံ မတံ အဘိမတန္တိ အတ္ထော. २५. असे (दोषयुक्त) यमकादिक अनभिमत (नापसंत) असो, तर मग अभिमत (पसंत) कोणते? यावर 'प्रतीत' इत्यादी म्हणाले. आपल्या सांगण्यायोग्य अर्थाच्या प्रतीतीमुळे वाचक शब्द देखील 'प्रतीत' (प्रसिद्ध) च होत असल्यामुळे, प्रतीत म्हणजे प्रसिद्ध प्रातिपदिक शब्दांनी रचलेले (केलेले) ते 'प्रतीतिशब्दरचित' होय. परस्परांच्या आलिंगनाने (जोडणीने) सुळसुळीत (मऊ) झालेल्या सुप्-तिङ् प्रत्ययान्त इत्यादी पदांचे संधी (जोडण्या) ज्यात आहेत, ते 'श्लिष्टपदसंधी' होय. प्रतीत शब्दांनी रचलेले असल्यामुळेच 'प्रसाद' नावाच्या गुणाने म्हणजेच शब्दालंकाराने युक्त, चांगल्या प्रकारे संपन्न, अशा पूर्वोक्त गुणांचा आश्रय असणारे रमणीय यमक संमत (अभिमत) आहे, असा अर्थ आहे. ၂၅. ဣဒါနိ အဓိဂတေသု ယမကေသု ဤဒိသံ ယမကမိဋ္ဌမိတိ သိဿာနံ ဥပဒိသန္တော အာဟ ‘‘ပတီတေ’’စ္စာဒိ. ပတီတသဒ္ဒရစိတံ ‘‘ဣမဿတ္ထဿာယံ ဝါစကော’’တိ ပတီတေဟိ ပသိဒ္ဓေဟိ သဒ္ဒေဟိ ရစိတံ ပါဋိပဒိကေဟိ ကတံ သိလိဋ္ဌပဒသန္ဓိကံ သိလိဋ္ဌာ သျာဒျန္တာဒိပဒါနံ သန္ဓယော ယဿ တံ [Pg.48] ပသာဒဂုဏသံယုတ္တံ ပတီတသဒ္ဒရစိတတ္တာယေဝ ပသာဒသင်္ခါတေန သဒ္ဒါလင်္ကာရဂုဏေန သံယုတ္တံ ဤဒိသံ ဧဝံဘူတံ ဂုဏာဓိကတော ရမဏီယံ ဥပရိ ဝက္ခမာနယမကသဒိသံ ယမကံ မတံ ဝိညူဟိ အဘိမတံ. ပတီတာ စ တေ သဒ္ဒါ စ, တေဟိ ရစိတံ, သိလိဋ္ဌာ ပဒါနံ သန္ဓယော ယဿ, ပသာဒေါတိ ဂုဏော သဒ္ဒါလင်္ကာရော, တေန သံယုတ္တန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. २५. आता समजलेल्या यमकांमध्ये असे यमक इष्ट (योग्य) आहे, असा शिष्यांना उपदेश करताना 'प्रतीत' इत्यादी म्हणाले. प्रतीतशब्दांनी रचलेले म्हणजे 'या अर्थाचा हा वाचक आहे' अशा प्रतीत (प्रसिद्ध) प्रातिपदिक शब्दांनी रचलेले, श्लिष्टपदसंधी म्हणजे सुप्-तिङ् प्रत्ययान्त इत्यादी पदांचे संधी ज्यात श्लिष्ट (सुबद्ध) आहेत, प्रसादगुणयुक्त म्हणजे प्रतीत शब्दांनी रचलेले असल्यामुळेच 'प्रसाद' नावाच्या शब्दालंकार गुणाने युक्त, असे या प्रकारचे, गुणांच्या अधिक्यामुळे रमणीय आणि पुढे सांगण्यात येणाऱ्या यमकासारखे यमक विद्वानांना संमत (अभिमत) आहे. प्रतीत (प्रसिद्ध) असलेले ते शब्द आणि त्यांनी रचलेले; श्लिष्ट (सुबद्ध) आहेत पदांचे संधी ज्यात ते; 'प्रसाद' हा गुण म्हणजेच शब्दालंकार, त्याने युक्त, असा विग्रह आहे. ၂၆. २६. အဗျပေတံ ဗျပေတ’ည-မာဝုတ္တာနေကဝဏ္ဏဇံ; ယမကံ တဉ္စ ပါဒါန-မာဒိမဇ္ဈန္တဂေါစရံ. अव्यवहित (जवळ असलेले), व्यवहित (अंतर असलेले) आणि इतर (मिश्र), अनेक वर्णांच्या आवृत्तीने उत्पन्न झालेले यमक हे चरणांच्या (पादांच्या) आदि, मध्य आणि अंतात आढळणारे असते. ၂၆. ဣဒါနိ တံ ယထာဝုတ္တမဘိမတံ ဒဿေတုမုပက္ကမတေ ‘‘အဗျပေတေ’’စ္စာဒိနာ. အာဝုတ္တာ အဓိဝုတ္တာ ပုနပ္ပုနုစ္စာရဏုပေတာ အနေကေသံ ပတိရူပတ္တာ, ဗဟုဝဏ္ဏာ သရဗျဉ္ဇနရူပါ, န ဧကော ဝဏ္ဏော တဿာနုပ္ပာသတ္တာ, တထာ စ ဝက္ခတိ ‘‘ဝဏ္ဏာဝုတ္တိ ပရော ယထာ’’တိ, တေဟိ ဇာတံ ယမကန္တိ ဝိညာယတေ. ကတိဝိဓံ တံ ဝိကပ္ပီယတီတိ အာဟ ‘‘အဗျပေတံ ဗျပေတည’’န္တိ. တတ္ထ ယံ ဝဏ္ဏန္တရာဗျဝဟိတံ ဝဏ္ဏသမုဒါယေန ဝုတ္တံ. တဒဗျပေတံ ယမကံ. ယံ တု ဗျဝဟိတံ, တံ ဗျပေတံ. ယံ ပန ဥဘယမိဿံ, တံ အညံ အပရံ အဗျပေတဗျပေတန္တိ တိဓာ ယမကံ တာဝ ဝိကပ္ပီယတေ. တမေတံ တိဝိဓံ ယမကံ ဝိသယဝိဘာဂနိရူပနာယံ အာဒိ စ မဇ္ဈော စ အန္တော စ ဂေါစရော ဝိသယော ယဿေတိ အာဒိမဇ္ဈန္တဂေါစရံ ဝိညေယျံ. ကေသံ ပါဒါနံ? ပစ္စေကံ စတုန္နံဂါထာဝယဝါနံ. သာပေက္ခတ္တေပိ သမာသော ဂမ္မကတ္တာ. २६. आता ते पूर्वोक्त अभिमत यमक दर्शवण्यासाठी 'अव्यपेत' इत्यादीने सुरुवात करतात. आवृत्त म्हणजे पुन्हा पुन्हा उच्चारलेले, अनेकांचे प्रतिरूप असल्यामुळे स्वर आणि व्यंजनांच्या रूपातील अनेक वर्ण (एक वर्ण नाही, कारण तो अनुप्रास होईल, आणि पुढे 'वर्णवृत्ती दुसरा जसा' असे सांगतीलच), त्यांच्यापासून उत्पन्न झालेले ते 'यमक' असे समजले जाते. त्याचे किती प्रकार पडतात? यावर 'अव्यपेत, व्यपेत आणि इतर' असे म्हणाले. त्यामध्ये जे इतर वर्णांच्या व्यवधानाशिवाय (अंतर न ठेवता) वर्णसमुदायाने युक्त असते, ते 'अव्यपेत' यमक होय. जे व्यवधानासह (अंतराने) असते, ते 'व्यपेत' यमक होय. आणि जे दोन्हीचे मिश्र असते, ते 'इतर' म्हणजे 'अव्यपेत-व्यपेत' होय, अशा प्रकारे यमकाचे तीन प्रकार पडतात. हे तीन प्रकारचे यमक विषयाच्या विभागणीच्या निरूपणामध्ये आदि, मध्य आणि अंत हा ज्याचा गोचर (विषय) आहे, असे 'आदिमध्यांतगोचर' समजावे. कोणत्या चरणांच्या? गाथेच्या चारही अवयवांच्या (चरणांच्या) प्रत्येकी. सापेक्षता असली तरी बोधगम्यतेमुळे येथे समास झाला आहे. တတ္ထ ပါဒစတုက္ကဿ အာဒိမဇ္ဈန္တဘာဝီနံ ယမကာနံ ယာဝန္တော ပကာရာ သမ္ဘဝန္တိ, တေ မူလာ သတ္တ. ကထံ? ဧကသ္မိံယေဝ ပါဒေ ကွစိ အာဒိယမကံ, ကွစိ မဇ္ဈယမကံ, ကွစိ အန္တယမကံ, ကွစိ မဇ္ဈန္တယမကံ, ကွစိ မဇ္ဈာဒိယမကံ, ကွစိ အာဒျန္တယမကံ, ကွစိ သဗ္ဗယမကန္တိ. ဧဝံ ပစ္စေကံ မူလဘူတာ သတ္တာတိ [Pg.49] စတူသု အဋ္ဌဝီသတိ ဟောန္တိ. ပါဒါဒိယမကဉ္စ ပဌမပါဒါဒိယမကမဗျပေတံ တထာ ဒုတိယတတိယစတုတ္ထပါဒါဒိယမကမဗျပေတံ ပဌမဒုတိယပါဒါဒိယမကမဗျပေတံ ပဌမတတိယပါဒါဒိယမကမဗျပေတံ ပဌမစတုတ္ထပါဒါဒိယမကမဗျပေတန္တိအာဒိနာ အနေကဓာ ပသံသန္တိ. ယဒါ စ သဗ္ဗတောယမကံ, တဒါ မဟာယမကာဒယော ဝိကပ္ပာ ဇာယန္တီတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. त्यामध्ये चार चरणांच्या आदि, मध्य आणि अंतात होणाऱ्या यमकांचे जेवढे प्रकार संभवतात, ते मूळ सात आहेत. कसे? एकाच चरणात कुठे आदि-यमक, कुठे मध्य-यमक, कुठे अंत-यमक, कुठे मध्य-अंत-यमक, कुठे मध्य-आदि-यमक, कुठे आदि-अंत-यमक, तर कुठे सर्व-यमक असते. अशा प्रकारे प्रत्येकी मूळ सात प्रकार असल्याने चार चरणांचे मिळून अठ्ठावीस प्रकार होतात. चरणाच्या सुरुवातीचे यमक, पहिल्या चरणाच्या सुरुवातीचे अव्यपेत यमक, तसेच दुसऱ्या, तिसऱ्या आणि चौथ्या चरणाच्या सुरुवातीचे अव्यपेत यमक, पहिल्या व दुसऱ्या चरणाच्या सुरुवातीचे अव्यपेत यमक, पहिल्या व तिसऱ्या चरणाच्या सुरुवातीचे अव्यपेत यमक, पहिल्या व चौथ्या चरणाच्या सुरुवातीचे अव्यपेत यमक इत्यादी प्रकारे अनेक प्रकारे प्रशंसा करतात. आणि जेव्हा सर्व बाजूंनी यमक असते, तेव्हा 'महायमक' इत्यादी भेद निर्माण होतात, असे समजावे. ၂၆. ဣဒါနိ အဘိမတယမကံ ဒီပေတိ ‘‘အဗျပေတေ’’စ္စာဒိနာ. အာဝုတ္တေဟိ ပုနပ္ပုနံ ဝုတ္တေဟိ အနေကဝဏ္ဏေဟိ သမုဒါယရူပတ္တာ အနေကေဟိ သရဗျဉ္ဇနသရီရေဟိ ဝဏ္ဏေဟိ ဇာတံ ယမကံ အညေဟိ ဝဏ္ဏေဟိ အဗျဝဟိတတ္တာ အဗျပေတံ, ဝဏ္ဏန္တရေဟိ ဗျဝဟိတတ္တာ ဗျပေတံ, ဥဘယမိဿကတ္တာ တေဟိ အညံ အဗျပေတဗျပေတဉ္စာတိ တိဝိဓံ ဟောတိ. တဉ္စ ယမကံ ဝိသယဝိဘာဂနိယမေန ဂါထာပါဒါနံ အာဒိဂေါစရံ မဇ္ဈဂေါစရံ အန္တဂေါစရမိတိ တိဝိဓံ ဟောတိ. ဧတ္ထ စသဒ္ဒေါ ဝတ္တဗ္ဗန္တရေ ပဝတ္တတိ, ဝတ္တဗ္ဗန္တရံ နာမ ယထာဝုတ္တအဗျပေတာဒိဘေဒတော အညံ ဝတ္တဗ္ဗတာယ သမုခီဘူတံ ပါဒါနံ အာဒိမဇ္ဈာဝသာနန္တရံ, ဥပနျာသော ဝါကျာရမ္ဘောတိ စ ဧတဿေဝ နာမံ. ဝိသဒိသေန ဝဏ္ဏေန အပေတံ ဗျပေတံ. တဗ္ဗိပရီတမဗျပေတံ. အဗျပေတဉ္စ ဗျပေတဉ္စ အညဉ္စာတိ သမာဟာရဒွန္ဒော. အနေကေ စ တေ ဝဏ္ဏာ စ, အာဝုတ္တာယေဝ အနေကဝဏ္ဏာ, တေဟိ ဇာတံ, အာဒိ စ မဇ္ဈော စ အန္တော စ, တေ ဂေါစရာ ယဿာတိ ဝိဂ္ဂဟော. २६. आता अभिमत यमक स्पष्ट करताना 'अव्यपेत' इत्यादी म्हणाले. आवृत्त म्हणजे पुन्हा पुन्हा म्हटलेल्या अनेक वर्णांच्या समुदाय रूपामुळे, अनेक स्वर आणि व्यंजनात्मक शरीराच्या वर्णांपासून उत्पन्न झालेले यमक हे इतर वर्णांच्या व्यवधानाशिवाय (अंतराशिवाय) असल्यामुळे 'अव्यपेत', इतर वर्णांच्या व्यवधानामुळे 'व्यपेत' आणि दोन्हीच्या मिश्रणामुळे 'इतर' म्हणजेच 'अव्यपेत-व्यपेत' अशा तीन प्रकारचे असते. आणि ते यमक विषयाच्या विभागणीच्या नियमाने गाथेच्या चरणांचे आदिगोचर, मध्यगोचर आणि अंतगोचर अशा तीन प्रकारचे असते. येथे 'च' हा शब्द दुसऱ्या वक्तव्याच्या संदर्भात आला आहे. दुसरे वक्तव्य म्हणजे पूर्वोक्त अव्यपेत इत्यादी भेदांपेक्षा वेगळे, सांगण्यासाठी समोर आलेले चरणांचे आदि, मध्य आणि अंतानंतरचे स्वरूप होय; यालाच 'उपन्यास' किंवा 'वाक्यारंभ' असेही म्हणतात. विजातीय (वेगळ्या) वर्णाने युक्त नसलेले ते 'व्यपेत' होय. त्याच्या विरुद्ध ते 'अव्यपेत' होय. अव्यपेत, व्यपेत आणि इतर यांचा समाहार द्वंद्व समास आहे. अनेक असलेले ते वर्ण आणि आवृत्त असलेले ते अनेक वर्ण, त्यांच्यापासून उत्पन्न झालेले; आदि, मध्य आणि अंत हे ज्याचे गोचर (विषय) आहेत, तो असा विग्रह आहे. တတ္ထ ပါဒစတုက္ကဿ အာဒိမဇ္ဈာဝသာနေသု လဗ္ဘမာနယမကဘေဒါ ဧကေကသ္မိံ ပါဒေ သတ္တ သတ္တ ဘဝန္တိ. ကထံ? ပါဒါဒိယမကံ ပါဒမဇ္ဈယမကံ ပါဒန္တယမကံ မဇ္ဈန္တယမကံ မဇ္ဈာဒိယမကံ အာဒျန္တယမကံ သဗ္ဗတောယမကန္တိ ဧဝံ ပစ္စေကံ သတ္တ သတ္တ ကတွာ စတူသု မူလဘူတယမကာ အဋ္ဌဝီသ [Pg.50] ဘဝန္တိ. ဧတ္ထ ပါဒါဒိယမကာဒိကမ္ပိ အဗျပေတပဌမပါဒါဒိယမကံ တထာ ဒုတိယတတိယစတုတ္ထပါဒါဒိယမကမိတိ စ အဗျပေတပဌမဒုတိယပါဒါဒိယမကံ တထာ ပဌမတတိယပါဒါဒိယမကံ ပဌမစတုတ္ထပါဒါဒိယမကမိတိ စ အဗျပေတဒုတိယတတိယပါဒါဒိယမကံ တထာ ဒုတိယစတုတ္ထပါဒါဒိယမကမိတိ စ အဗျပေတတတိယစတုတ္ထပါဒါဒိယမကမိတိ စ ဧဝမဗျပေတပါဒါဒိယမကာ ဒသ ဟောန္တိ. တထာ ဗျပေတာပိ ဒသာတိ ဝီသတိ, အဗျပေတပဌမပါဒမဇ္ဈယမကံ တထာ ဒုတိယပါဒမဇ္ဈယမကမိစ္စာဒိနာ မဇ္ဈယမကမ္ပိ ဝီသတိဝိဓံ ဟောတိ. အဗျပေတပဌမပါဒန္တယမကံ တထာ ဒုတိယပါဒန္တယမကမိစ္စာဒိနာ အန္တယမကမ္ပိ ဝီသတိဝိဓံ. သံသဂ္ဂဘေဒတော ပန အနေကဝိဓံ ဟောတိ. तेथे चार चरणांच्या (पादांच्या) सुरुवातीला, मध्ये आणि शेवटी मिळणारे यमकाचे भेद प्रत्येक चरणात सात-सात असतात. कसे? पादादियमक (चरणाच्या सुरुवातीचे यमक), पादमध्ययमक (चरणाच्या मधले यमक), पादान्तयमक (चरणाच्या शेवटीचे यमक), मध्यान्तयमक (मध्य आणि शेवटीचे यमक), मध्यादियमक (मध्य आणि सुरुवातीचे यमक), आद्यन्तयमक (सुरुवातीचे आणि शेवटीचे यमक) आणि सर्वतोयमक (सर्व ठिकाणी असणारे यमक) - अशा प्रकारे प्रत्येकी सात-सात करून चार चरणांमध्ये मूळ यमक अठ्ठावीस (२८) होतात. येथे पादादियमक इत्यादींमध्येही अव्यपेत (अखंड) प्रथम पादादियमक, तसेच द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ पादादियमक; आणि अव्यपेत प्रथम-द्वितीय पादादियमक, तसेच प्रथम-तृतीय पादादियमक, प्रथम-चतुर्थ पादादियमक; आणि अव्यपेत द्वितीय-तृतीय पादादियमक, तसेच द्वितीय-चतुर्थ पादादियमक; आणि अव्यपेत तृतीय-चतुर्थ पादादियमक - अशा प्रकारे अव्यपेत पादादियमक दहा होतात. तसेच व्यपेत (खंडित) देखील दहा मिळून वीस होतात. अव्यपेत प्रथम पादमध्ययमक, तसेच द्वितीय पादमध्ययमक इत्यादी प्रकारे मध्ययमक देखील वीस प्रकारचे असते. अव्यपेत प्रथम पादान्तयमक, तसेच द्वितीय पादान्तयमक इत्यादी प्रकारे अन्तयमक देखील वीस प्रकारचे असते. संसर्गाच्या (मिश्रणाच्या) भेदाने तर हे अनेक प्रकारचे होते. အဗျပေတပဌမပါဒါဒိယမကဝဏ္ဏနာ अव्यपेत-प्रथम-पादादि-यमक-वर्णन ၂၇. २७. သုဇနာ’သုဇနာ သဗ္ဗေ, ဂုဏေနာပိ ဝိဝေကိနော; ဝိဝေကံ န သမာယန္တိ, အဝိဝေကိဇနန္တိကေ. सज्जन आणि असज्जन हे सर्व गुणाने विवेकी (भिन्न) असूनही, अविवेकी लोकांच्या जवळ विवेक (भेद/भिन्नता) प्राप्त करत नाहीत. ၂၇. ‘‘သုဇနာ’’ဣစ္စာဒိ. သုဇနာ သဇ္ဇနာ, အသုဇနာ အသဇ္ဇနာတိ ဧတေ သဗ္ဗေ ဥဘယပက္ခပါတိနော ဝိသေသာ ဇနာ ဂုဏေန သီလာဒိနာ ကရဏဘူတေန, ဟေတုဘူတေန ဝါ ဝိဝေကိနောပိ သာဓူသု လဗ္ဘမာနာနမသာဓူသွနုပလဗ္ဘနတော ပုထုဘူတာပိ အဝိဝေကီနံ ဇနာနံ အန္တိကေ သမီပေ တေသံ သန္နိဓာနေ ဝိဝေကံ ဝိဘာဂံ န သမာယန္တိ နပါပုဏန္တိ, ဝိဘာဂဝိဇာနနပညာဝေကလ္လေန စ ဝိဝေကိနောပိ ဇနာ တေ ဧကတော ကတွာ ပဿန္တီတိ. ဣဒံ ပဌမပါဒါဒိယမကမဗျပေတံ. २७. “सुजना” इत्यादी. सुजन म्हणजे सज्जन, असुजन म्हणजे असज्जन, हे सर्व दोन्ही पक्षांतील विशेष लोक, शील इत्यादी साधनभूत किंवा हेतूभूत गुणांमुळे विवेकी (भिन्न) असूनही - कारण सज्जनांमध्ये जे गुण आढळतात ते असज्जनांमध्ये आढळत नसल्याने ते वेगळे झालेले असतात - तरीही अविवेकी लोकांच्या जवळ (समीप, त्यांच्या सान्निध्यात) विवेक म्हणजे विभाग (भेद) प्राप्त करत नाहीत (मिळवत नाहीत). विभाग समजून घेण्याच्या प्रज्ञेच्या अभावामुळे (अविवेकी लोक) त्या विवेकी लोकांनाही एकत्र करून (एकसारखेच) पाहतात. हे अव्यपेत प्रथम-पादादि-यमक आहे. ၂၇. ဣဒါနိ အဗျပေတပဌမပါဒါဒိယမကဿ မုခမတ္တံ ဒဿေတုမာဟ ‘‘သုဇနိ’’စ္စာဒိ. သုဇနာ သာဓုဇနာ, အသုဇနာ အသာဓုဇနာ စေတိ သဗ္ဗေ ဥဘယပက္ခိကာ သီလာဒိနာ, ပါဏာတိပါတာဒိနာ ဂုဏေန ဟေတုနာ ဝိဝေကိနော အပိ သာဓူသု [Pg.51] ပါဏာတိပါတာဒီနံ, အသာဓူသု သီလာဒီနံ အပ္ပဝတ္တိတော ဂုဏေန ပုထုဘူတာပိ အဝိဝေကိဇနန္တိကေ ဝိဝေကဉာဏရဟိတာနံ ဇနာနံ သန္တိကေ ဝိဝေကံ ဝိဘာဂံ န သမာယန္တိ န ပါပုဏန္တိ. ဝိဝေကော ဝိနာဘဝနမေတေသမတ္ထီတိ ဝိဝေကိနော. ဧတ္ထ ဝိသယောပစာရေန ဝိဝေကောတိ ပညာ, န ဝိဝေကိနောတိ အဝိဝေကိနော, တေယေဝ ဇနာ, တေသံ အန္တိကမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဣဒံ အဗျပေတပဌမပါဒါဒိယမကံ. २७. आता अव्यपेत प्रथम-पादादि-यमकाचे केवळ स्वरूप दाखवण्यासाठी “सुजन” इत्यादी म्हणतात. सुजन म्हणजे साधू (चांगले) लोक, असुजन म्हणजे असाधू (वाईट) लोक, हे सर्व दोन्ही पक्षांतील लोक शील इत्यादी किंवा प्राणातिपात (हिंसा) इत्यादी गुणांच्या (किंवा दोषांच्या) कारणाने विवेकी (भिन्न) असूनही - कारण साधू लोकांमध्ये प्राणातिपात इत्यादी प्रवृत्ती नसणे आणि असाधू लोकांमध्ये शील इत्यादी प्रवृत्ती नसणे या गुणांमुळे ते पृथक् (वेगळे) झालेले असतात - तरीही अविवेकी लोकांच्या जवळ (विवेकज्ञानाने रहित असलेल्या लोकांच्या समीप) विवेक म्हणजे विभाग (भेद) प्राप्त करत नाहीत. ज्यांच्यामध्ये विवेक (पृथक् भाव) असतो ते 'विवेकी' होत. येथे विषयाच्या उपचाराने 'विवेक' म्हणजे प्रज्ञा होय. जे विवेकी नाहीत ते 'अविवेकी', तेच लोक आणि त्यांचे समीप म्हणजे 'अविवेकी-जन-अन्तिक' असा विग्रह आहे. हे अव्यपेत प्रथम-पादादि-यमक आहे. အဗျပေတပဌမဒုတိယပါဒါဒိယမကဝဏ္ဏနာ अव्यपेत-प्रथम-द्वितीय-पादादि-यमक-वर्णन ၂၈. २८. ကုသလာ’ကုသလာ သဗ္ဗေ, ပဗလာ’ပဗလာ’ထဝါ; နော ယာတာ ယာဝ’ဟောသိတ္တံ, သုခဒုက္ခပ္ပဒါ သိယုံ. सर्व कुशल आणि अकुशल कर्मे, प्रबळ असोत अथवा दुर्बळ (अपबळ), जोपर्यंत 'अहोसिभाव' (अहोसिकर्म अवस्था) प्राप्त करत नाहीत, तोपर्यंत ती सुख आणि दुःख देणारी ठरतात. ၂၈. ‘‘ကုသလာ’’ဣစ္စာဒိ. ပဗလာ အာသေဝနပ္ပဋိလာဘဝသေန ဗလဝန္တော စ. အထာတိ အနန္တရတ္ထေ နိပါတော. အပဗလာ တဒဘာဝတော ဒုဗ္ဗလာ စ သဗ္ဗေ ကုသလာကုသလာ ဓမ္မာ ယာဝ ယတ္တကံ ကာလံ အဟောသိတ္တံ ဝိနာ ဥပ္ပတ္တိမတ္တံ ဖလဒါနာသမ္ဘဝတော ကေဝလံ ‘‘အဟောသီ’’တိ ဝစနီယတ္ထနိမိတ္တမတ္တကမ္မဘာဝေန အဟောသိကမ္မတ္တံ နော ယာတာ န သမ္ပတ္တာ, တာဝ တတ္တကံ ကာလံ သုခဉ္စ ဒုက္ခဉ္စ တံ ပဒန္တီတိ သုခဒုက္ခပ္ပဒါ သိယုံ. ယာဝ သံသာရပဝတ္တိ, တာဝ သုခဒုက္ခဒါယကာ ဟောန္တီတိ. ဣဒံ ပဌမဒုတိယပါဒါဒိယမကမဗျပေတံ. २८. “कुसला” इत्यादी. प्रबळ म्हणजे आसेवनाचा (पुन्हा पुन्हा करण्याच्या अभ्यासाचा) लाभ मिळाल्यामुळे बलवान असणारे. 'अथ' हा नंतरच्या अर्थातील निपात आहे. अपबळ म्हणजे त्याच्या अभावामुळे दुर्बळ असणारे. हे सर्व कुशल आणि अकुशल धर्म (कर्मे) जोपर्यंत (ज्या काळापर्यंत) 'अहोसिभाव' (अहोसिकर्म अवस्था) प्राप्त करत नाहीत - कारण केवळ उत्पत्ती झाल्याने फल देणे अशक्य असल्याने, केवळ 'ते होते' असे म्हणण्याच्या निमित्तमात्र कर्मभावाने अहोसिकर्मत्वाला प्राप्त होत नाहीत - तोपर्यंत (त्या काळापर्यंत) सुख आणि दुःख देतात म्हणून ते 'सुखदुःखप्रद' ठरतात. जोपर्यंत संसार चालू राहतो, तोपर्यंत ते सुख आणि दुःख देणारे असतात. हे अव्यपेत प्रथम-द्वितीय-पादादि-यमक आहे. ၂၈. ပဗလာ အာသေဝနာဒိပစ္စယလာဘေန ဗလဝန္တော ဝါ အထ အပဗလာ တဒဘာဝေန ဒုဗ္ဗလာ ဝါ သဗ္ဗေ ကုသလာကုသလာ အဟောသိတ္တံ ဖလဒါနာဘာဝတော ပဝတ္တိမတ္တတံ ယာဝ ယတ္တကံ ကာလံ နော ယာတာ အပ္ပတ္တာ, တာဝ တတ္တကံ သုခဒုက္ခပ္ပဒါ ယထာက္ကမံ သုခဒုက္ခပဒါယိနော သိယုံ ဘဝန္တိ. ဣဒံ အဗျပေတပဌမဒုတိယပါဒါဒိယမကံ. ကုသလပဋိပက္ခာ အကုသလာ. ‘‘အဟောသီ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗဿ ဘာဝေါ အဟောသိတ္တံ. ‘‘ဧဟိပဿိကော’’တိအာဒီသု ဝိယ ကြိယာပဒတောပိ ဏာဒိပစ္စယာ ဟောန္တိ. २८. प्रबळ म्हणजे आसेवन इत्यादी प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) लाभाने बलवान असणारे, किंवा अपबळ म्हणजे त्यांच्या अभावामुळे दुर्बळ असणारे. हे सर्व कुशल आणि अकुशल कर्मे, फल देण्याच्या अभावामुळे केवळ अस्तित्वात राहणे म्हणजेच 'अहोसिभाव' जोपर्यंत (ज्या काळापर्यंत) प्राप्त करत नाहीत (मिळवत नाहीत), तोपर्यंत त्या काळापर्यंत अनुक्रमे सुख आणि दुःख देणारे होतात. हे अव्यपेत प्रथम-Reacting-द्वितीय-पादादि-यमक आहे. कुशलांचे प्रतिपक्ष (विरोधी) ते अकुशल होत. 'अहोसि' (ते होते) असे म्हणण्याच्या भावाला 'अहोसिभाव' (अहोसित्तं) म्हणतात. 'एहिपस्सिको' इत्यादींप्रमाणे क्रियापदापासूनही 'णादि' प्रत्यय होतात. အဗျပေတပဌမဒုတိယတတိယပါဒါဒိယမကဝဏ္ဏနာ अव्यपेत-प्रथम-द्वितीय-तृतीय-पादादि-यमक-वर्णन ၂၉. २९. သာဒရံ သာ ဒရံ ဟန္တု, ဝိဟိတာ ဝိဟိတာ မယာ; ဝန္ဒနာ ဝန္ဒနာမာန-ဘာဇနေ ရတနတ္တယေ. वंदना आणि आदर-सन्मानाचे पात्र असलेल्या त्रिरत्नांच्या ठिकाणी माझ्याद्वारे आदरासहित केलेली ती वंदना (माझा तो नमस्कार) माझ्या शारीरिक व मानसिक संतापाचा (दराचा) नाश करो. ၂၉. ‘‘သာဒရ’’မိစ္စာဒိ. [Pg.52] ဝန္ဒနာ ဒွါရတ္တယောပဒဿိယမာနာ မာနော စ ပူဇာ, တေသံ ဘာဇနေ အာဓာရဘူတေ ရတိဇနနာဒိနာ အတ္ထေန ရတနသင်္ခါတာနံ ဗုဒ္ဓါဒီနံ တယေ သမူဟဘူတေ ရတနတ္တယေ သာဒရံ အာဒရသဟိတံ ကတွာ မယာ ဝိဟိတာ ကတာ, ဝိဟိတာ အလံသံသာရဒုက္ခဝိသဋနိရာကရဏတော ဝိသေသေန ဟိတာ ပဓျာ သာ ဝန္ဒနာ သော ပဏာမော ဒရံ ဒရထံ ကာယစိတ္တပရိဠာဟံ ဟန္တု ဟိံသတု. မယာတိ ဝုတ္တတ္တာ မေတိ အတ္ထတော ဝိညာယတိ. ဣဒံ ပန ပဌမဒုတိယတတိယပါဒါဒိယမကမဗျပေတံ. २९. “सादरं” इत्यादी. वंदना म्हणजे तीन द्वारांनी (काया, वाचा, मनाने) दर्शवली जाणारी आणि 'मान' म्हणजे पूजा, त्यांच्यासाठी भाजन (पात्र किंवा आधारभूत) असलेल्या, प्रीती उत्पन्न करणे इत्यादी अर्थाने 'रत्न' म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या बुद्ध इत्यादींच्या त्रयीत (समूहात) म्हणजेच त्रिरत्नांच्या ठिकाणी, आदरासहित माझ्याद्वारे केली गेलेली, आणि 'विहिता' म्हणजे संसाराच्या दुःखाचा विस्तार दूर करण्याच्या दृष्टीने विशेष हितकारक (पथ्यकारक) असलेली ती वंदना (तो नमस्कार) माझ्या 'दराला' म्हणजे शारीरिक व मानसिक संतापाला (परिळाहाला) नष्ट करो. 'मया' (माझ्याद्वारे) असे म्हटल्यामुळे 'मे' (माझा) हा अर्थ आपोआप समजतो. हे अव्यपेत प्रथम-द्वितीय-तृतीय-पादादि-यमक आहे. ၂၉. ဝန္ဒနာမာနဘာဇနေ ဒွါရတ္တယေန ဝိဓိယမာနပဏာမပူဇာနံ အာဓာရဘူတေ ရတနတ္တယေ ရတိဇနနာဒိအတ္ထေန ရတနသင်္ခါတာနံ ဗုဒ္ဓါဒီနံ တယေ မယာ ယာ ဝန္ဒနာ သာဒရံ အာဒရသဟိတံ ဝိဟိတာ ကတာ, ဝိဟိတာ လောကိယ လောကုတ္တရ သမ္ပတ္တိသာဓနတော ဝိသေသေန ဟိတာ သာ ဝန္ဒနာ ဒရံ မယှံ ကာယစိတ္တဒရထံ ဟန္တု ဝိနာသေတု. ဣဒံ အဗျပေတပဌမဒုတိယတတိယပါဒါဒိယမကံ. သဟ အာဒရေန ဝတ္တမာနံ သာဒရံ, ကြိယာဝိသေသနံ. ဧတ္ထ ကြိယာ နာမ ဝိဟိတာသဒ္ဒေန နိဒ္ဒိဋ္ဌကရဏံ. ကရဏဉှိ ဝိဟိတာသဒ္ဒဿ ဝုတ္တကမ္မတ္တေပိ အညထာနုပပတ္တိလက္ခဏသာမတ္ထိယတော ဘိဇ္ဇိတွာ ဝိဇ္ဇမာနံ ‘‘အကာသိ’’န္တိ ကြိယာယ သမ္ဗန္ဓမုပေန္တံ ကမ္မဉ္စ ဟောတိ, ဘာဝေ ဝိဟိတဿ ယုပစ္စယန္တဿ နပုံသကတ္တာ နပုံသကဉ္စ, သတ္တာယ ဧကတ္တာ ဧကဝစနဉ္စ တဗ္ဗိသေသနတ္တာ သာဒရသဒ္ဒေါပိ နပုံသကဒုတိယေကဝစနော ဟောတိ. २९. वंदना आणि आदर-सन्मानाचे पात्र असलेल्या, तीन द्वारांनी केल्या जाणाऱ्या नमस्कार व पूजेचे आधारभूत असलेल्या त्रिरत्नांच्या ठिकाणी - जे प्रीती उत्पन्न करणे इत्यादी अर्थाने 'रत्न' म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या बुद्ध इत्यादींचे त्रय (समूह) आहे - माझ्याद्वारे जी वंदना आदरासहित केली गेली आहे, आणि जी लौकिक व लोकोत्तर संपत्तीचे साधन असल्याने विशेष हितकारक आहे, ती वंदना माझ्या शारीरिक व मानसिक संतापाचा (दराचा) नाश करो. आदरासह वर्तमान असणारे ते 'सादर' (क्रियाविशेषण) होय. येथे क्रिया म्हणजे 'विहित' शब्दाने दर्शवलेले 'करणे' होय. कारण 'विहित' शब्दाचे कर्मत्व सांगितले असले तरी, अन्य प्रकारे सिद्ध न होण्याच्या लक्षणाच्या सामर्थ्यामुळे ते वेगळे होऊन 'केले' (अकासि) या क्रियेशी संबंध प्राप्त करणारे कर्म देखील होते. भावे प्रयोगात विहित असलेल्या 'यु' प्रत्ययान्त शब्दाच्या नपुंसकलिंगत्वामुळे नपुंसकलिंग आणि अस्तित्वाच्या एकत्वामुळे एकवचन होते, आणि त्याचे विशेषण असल्यामुळे 'सादर' शब्द देखील नपुंसकलिंगी द्वितीया विभक्तीचे एकवचन होतो. ‘‘ဝိသေသျေ [Pg.53] ဒိဿမာနာ ယာ,လိင်္ဂသင်္ချာဝိဘတ္တိယော; တုလျာဓိကရဏေ ဘိယျော,ကာတဗ္ဗာ တာ ဝိသေသနေ’’တိ. “विशेष्यामध्ये जे लिंग, वचन आणि विभक्ती दिसून येतात, समानाधिकरणामध्ये बहुधा तेच विशेषणामध्येही योजावेत.” ဟိ ဝုတ္တံ. ဧဝံ ကြိယာဝိသေသနေ ဂဟိတေ သာမတ္ထိယတော ‘‘မယာ’’တိ တတိယန္တဿ ပဌမန္တတ္တံ, ‘‘ဝန္ဒနာ’’တိ ပဌမန္တဿ ဆဋ္ဌုန္တဉ္စ ဟောတိ. ဝန္ဒနာ စ မာနော စ, တေသံ ဘာဇနံ. တိဏ္ဏံ သမူဟော တယံ, ရတနာနံ တယန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे क्रियाविशेषण ग्रहण केले असता, सामर्थ्यामुळे 'मया' (माझ्याद्वारे) या तृतीयान्त विभक्तीचे प्रथमान्त रूप होते, आणि 'वन्दना' या प्रथमान्त विभक्तीचे षष्ठ्यन्त रूप होते. वंदना आणि मान (आदर), त्यांचे भाजन (पात्र). तिन्हींचा समूह म्हणजे 'तय' (त्रय), आणि 'रत्नानां तयं' (रत्नांचे त्रय) असा विग्रह होतो. အဗျပေတစတုက္ကပါဒါဒိယမကဝဏ္ဏနာ अव्यपेत-चतुष्क-पादादि-यमक-वर्णन ၃၀. ३०. ကမလံ က’မလံ ကတ္တုံ-ဝနဒေါ ဝနဒေါ’မ္ဗရံ; သုဂတော သုဂတော လောကံ, သဟိတံ သဟိတံ ကရံ. कमळ पाण्याला सुशोभित करण्यासाठी, मेघ आकाशाला सुशोभित करण्यासाठी; सुगत (बुद्ध) जगाला सुशोभित करण्यासाठी, कल्याणासह कल्याण करणारे आहेत. ၃၀. ‘‘ကမလ’’မိစ္စာဒိ. ကမလံ အရဝိန္ဒံ ကံ ဇလံ အလင်္ကတ္တုံ သဇ္ဇနတ္ထာယ ဟောတိ, ဝိကသိတာရဝိန္ဒသန္ဒောဟသမ္ဘာဝိတောဒကဿ ဝါပါဒီသု တာဒိသရမဏီယတ္တသမ္ပတ္တိသမ္ဘဝတော, အဝနံ ရက္ခံ ဒဒါတိ သဿသမ္ပတျာဒိကာရဏဘာဝေနာတိ အဝနဒေါ. ဝနံ ဇလံ ဒဒါတိ န တုစ္ဆောတိ ဝနဒေါ မေဃော အမ္ဗရံ အာကာသံ ဇလဓာရဘာရဘရိတမ္ဗရကုဟရဿ ဒဿနီယတာဂုဏယောဂတော အလံကတ္တုန္တိ အဓိကတံ. သဟိတံ သမ္ပုဏ္ဏံ ဟိတံ အဘိဝုဒ္ဓိံ ကရံ ကရောန္တော သုဋ္ဌု ဂဒတီတိ သုဂတော မဉ္ဇုဘာဏီ ပုဗ္ဗဗုဒ္ဓါ ဝိယ နေက္ခမ္မာဒိနာ ကာမစ္ဆန္ဒာဒိကေ ပဇဟန္တော ဂန္တွာ အရဟတ္တမဂ္ဂေန သဝါသနသကလကိလေသေ သမုစ္ဆိန္ဒိတွာ သောဘနံ နိဗ္ဗာနပုရံ ဂတောတိ ဝါ သုဂတောတိ ဝုတ္တော သော မဟာမုနိ အတ္တနော အပရိမိတပါရမိတာသိမ္ပကစဂလိတတိလကဘာဝေန လောကံ လောကတ္တယံ, သဟိတံ လောကန္တိ ဝါ ယောဇနီယံ အလင်္ကတ္တုံ အလံကရဏာယာတိ. ဣဒံ ပါဒစတုက္ကာဒိယမကမဗျပေတံ. ३०. ‘कमलम्’ इत्यादी. ‘कमल’ म्हणजे कमळ (अरविंद), ‘कम्’ म्हणजे पाण्याला सुशोभित करण्यासाठी (सज्जित करण्यासाठी) असते, कारण विकसित कमळांच्या समूहाने युक्त असलेल्या पाण्याच्या विहिरी इत्यादींमध्ये तशा प्रकारच्या रमणीयतेची प्राप्ती संभवते. ‘अवन’ म्हणजे रक्षण देणारा, पीक-संपत्ती इत्यादींचे कारण असल्यामुळे रक्षण देणारा तो ‘अवनद’ होय. ‘वन’ म्हणजे पाणी देणारा, तुच्छ नसलेला तो ‘वनद’ म्हणजे मेघ (ढग), ‘अंबर’ म्हणजे आकाश, जलधारांच्या भाराने भरलेल्या आकाशाच्या गर्भाच्या (पोकळीच्या) दर्शनीयतेच्या गुणयोगामुळे सुशोभित करण्यासाठी, हे अधिकचे आहे. ‘सहित’ म्हणजे संपूर्ण हित आणि अभिवृद्धी करणारा, चांगल्या प्रकारे बोलणारा म्हणून ‘सुगत’ म्हणजे मधुर बोलणारा; किंवा पूर्व बुद्धांप्रमाणे नैष्क्रम्य (नेक्खम्म) इत्यादींद्वारे कामच्छंद इत्यादींचा त्याग करून जाणारा, अर्हतमार्गाने वासनेसह सर्व क्लेशांचा समूळ उच्छेद करून शोभिवंत अशा निर्वाणपुराला (निर्वाणनगराला) गेलेले म्हणून ‘सुगत’ असे म्हटलेले आहे. ते महामुनी आपल्या अपरिमित पारमितांच्या कौशल्यातून प्रकट झालेल्या श्रेष्ठत्वामुळे जगाला म्हणजे तिन्ही लोकांना, किंवा ‘सहित लोक’ (कल्याणासह असलेल्या जगाला) सुशोभित करण्यासाठी, असे जोडले पाहिजे. हे चारही चरणांच्या सुरुवातीचे अव्यपेत (अखंडित) यमक आहे. ၃၀. ကမလံ [Pg.54] ပဒုမံ ကံ ဇလံ အလင်္ကတ္တုံ ပဉ္စဝိဓပဒုမသဉ္ဆန္နဿ ဥဒကဿ ရမဏီယတ္တာ သဇ္ဇေတုံ ဟောတိ. အဝနဒေါ ကာလေ ဝုဋ္ဌိသမ္ပဒါယ သဿသမ္ပဒါဒီနံ ကာရဏတ္တာ အာရက္ခံ ဒေန္တော ဝနဒေါ မေဃော အမ္ဗရံ အာကာသံ အလင်္ကတ္တုံ ဇလဓာရဘာရဘရိတမ္ဗရကုစ္ဆိယာ ဒဿနီယတ္တာ သဇ္ဇေတုံ ဟောတိ, သဟိတံ သမ္ပုဏ္ဏံ ဟိတံ အဘိဝုဍ္ဎိံ ကရံ ကရောန္တော သုဂတော စိတြကထီ သုန္ဒရံ နိဗ္ဗာနံ ဂတော ဝါ သော သုဂတော သော တထာဂတော လောကံ လောကတ္တယံ, သဟိတံ လောကံ ဝါ အလင်္ကတ္တုံ စိတြကထာဒိကာရဏေဟိ တာဒိသဿ အညဿ စ လောကရာမဏေယျဿာဘာဝါ သဇ္ဇေတုံ ဟောတိ. သဗ္ဗပဒတ္ထာနံ သတ္တာဗျဘိစာရိတ္တာ ဟောတီတိ ဂမ္မံ. တတောယေဝ သဗ္ဗေ ပဌမန္တဘဝနကြိယာယ ယုဇ္ဇန္တီတိ ဝဒန္တိ. ဣဒံ အဗျပေတစတုက္ကပါဒါဒိယမကံ. ३०. ‘कमल’ म्हणजे पद्म (कमळ), ‘कम्’ म्हणजे पाण्याला सुशोभित करण्यासाठी, पाच प्रकारच्या कमळांनी आच्छादित पाण्याच्या रमणीयतेमुळे सजवण्यासाठी असते. ‘अवनद’ म्हणजे योग्य वेळी पर्जन्यवृष्टी करून पीक-संपत्ती इत्यादींचे कारण बनून रक्षण देणारा; ‘वनद’ म्हणजे मेघ, ‘अंबर’ म्हणजे आकाशाला सुशोभित करण्यासाठी, जलधारांच्या भाराने भरलेल्या आकाशाच्या उदराच्या (गर्भाच्या) दर्शनीयतेमुळे सजवण्यासाठी असतो. ‘सहित’ म्हणजे संपूर्ण हित आणि अभिवृद्धी करणारा, ‘सुगत’ म्हणजे चित्रकथी (विविध प्रकारे सुंदर उपदेश करणारे) किंवा सुंदर अशा निर्वाणाला गेलेले ते सुगत, ते तथागत जगाला म्हणजे तिन्ही लोकांना, किंवा कल्याणासह असलेल्या जगाला सुशोभित करण्यासाठी, चित्रकथा इत्यादी कारणांमुळे तशा प्रकारच्या इतर कोणत्याही जगाच्या रमणीयतेचा अभाव असल्यामुळे सजवण्यासाठी असतात. सर्व पदांच्या अर्थांचे अस्तित्व अव्यभिचारी (निश्चित) असल्यामुळे ‘होती’ (असते/आहे) हे अध्याहृत समजले जाते. म्हणूनच सर्व प्रथमान्त पदे ‘भवन’ (असणे/होणे) या क्रियेशी जोडली जातात, असे म्हणतात. हे अव्यपेत-चतुष्क-पादादि-यमक आहे. ၃၁. ३१. အဗျပေတာဒိယမက-ဿေသော လေသော နိဒဿိတော; ဉေယျာနိ’မာယေဝ ဒိသာ-ယ’ညာနိ ယမကာနိပိ. अव्यपेत-आदि-यमकाचा हा लेश (अल्प भाग) दर्शविला आहे; याच दिशेने (पद्धतीने) इतर यमके देखील जाणून घ्यावीत. ၃၁. ဣစ္စေဝမဘိမတယမကေ အဗျပေတပါဒါဒိယမကဿ ဒိသာမတ္တံ ဒဿေတွာ ဥပသံဟရတိ ‘‘အဗျပေတေ’’စ္စာဒိနာ. အဗျပေတဿ အဗျဝဟိတဿ စတုန္နံ ပါဒါနံ အာဒေါ, အာဒိဘူတဿ ဝါ ယမကဿ ဧသော ယထာဝုတ္တော လေသော ကောစိဒေဝ ဘေဒေါ နိဒဿိတော ဝိကပ္ပိတော. အပရာနိပိ ကိံ န ဝိကပ္ပိယန္တီတိစေတိ အာဟ ‘‘ဉေယျာနိ’’စ္စာဒိ. ဣမာယ ဒိသာယ ဣမိနာ ဥပါယေန မဂ္ဂေနေဝ အညာနိ ဝုတ္တတော အပရာနိ ဒုတိယပါဒါဒိယမကတတိယပါဒါဒိယမကစတုတ္ထပါဒါဒိယမကာဒီနိ အဗျပေတာနိပိ ပဌမဒုတိယပါဒါဒိယမကပဌမတတိယပါဒါဒိယမကာနိပိ ဗျပေတာနိ, ပဌမစတုတ္ထဒုတိယတတိယပါဒါဒိယမကာဒီနိပိ အဗျပေတဗျပေတာနိ, တထာ မဇ္ဈန္တပါဒယမကာနိ ဉေယျာနိ ဇာနိတဗ္ဗာနိ, ဝိညူနံ တာဒိသာယ ဒိသာယ ဒဿိတတ္တာတိ. တတ္ထ စ – ३१. अशा प्रकारे अभिमतात (इच्छित यमकात) अव्यपेत-पाद-आदि-यमकाची केवळ दिशा दाखवून ‘अव्यपेत’ इत्यादींद्वारे समारोप करतात. अव्यपेत म्हणजे अखंडित अशा चार चरणांच्या सुरुवातीला, किंवा सुरुवातीला असलेल्या यमकाचा हा वर सांगितलेला लेश म्हणजे काही भेद दर्शविला आहे, कल्पिला आहे. इतरही का कल्पिले जात नाहीत? म्हणून ‘ज्ञेयानि’ (जाणून घ्यावीत) इत्यादी म्हटले आहे. याच दिशेने, याच उपायाने किंवा मार्गाने, सांगितलेल्या व्यतिरिक्त इतर द्वितीय-पाद-आदि-यमक, तृतीय-पाद-आदि-यमक, चतुर्थ-पाद-आदि-यमक इत्यादी अव्यपेत यमके देखील, तसेच प्रथम-द्वितीय-पाद-आदि-यमक, प्रथम-तृतीय-पाद-आदि-यमक इत्यादी व्यपेत (खंडित) यमके देखील, आणि प्रथम-चतुर्थ-द्वितीय-तृतीय-पाद-आदि-यमक इत्यादी अव्यपेत-व्यपेत यमके देखील, तसेच मध्य आणि अंत्य पाद यमके देखील जाणून घ्यावीत, कारण विद्वानांना तशी दिशा दाखवून दिली आहे. आणि त्यामध्ये – ‘‘ဂုဏာဂုဏေန [Pg.55] သဟ တေ, သာဓဝေါ’သာဓဝေါ ဇနာ; ဝိဂါဟန္တေ သမံ နာထ, စိတ္တံ စိတ္တေ ကထံ နု တေ’’. “गुणांसह आणि अवगुणांसह ते सज्जन आणि दुर्जन लोक; हे नाथ! तुमच्या चित्तात एकत्र कसे काय प्रवेश करतात? (हे आश्चर्यकारक आहे!)” ဣစ္စာဒိနာ ဒုတိယပါဒါဒိယမကာဒီနိ အဗျပေတာနိ, इत्यादींद्वारे द्वितीय-पाद-आदि-यमक इत्यादी अव्यपेत यमके (जाणून घ्यावीत), ‘‘ပိယေန ဝစသာ သဗ္ဗေ,ပိယေန’ပ္ပိယဘာဏိနော; ပါဒါနတေ ဇိနောကာသိ,သော ဓမ္မော ဟန္တု ဝေါ’ပ္ပိယံ’’. “प्रिय वचनाने सर्व, अप्रिय बोलणाऱ्यांना देखील प्रिय बनवून; जिनांनी (बुद्धांनी) चरणांवर लीन केले, तो धम्म तुमचे अप्रिय नष्ट करो.” ဣစ္စာဒိနာ ပဌမဒုတိယပါဒါဒိယမကာဒီနိ အဗျပေတာနိ, इत्यादींद्वारे प्रथम-द्वितीय-पाद-आदि-यमक इत्यादी अव्यपेत यमके (जाणून घ्यावीत), ‘‘သ’မလံ သမလံ ကတ္တုံ, သုစိရံသုစိ ရံဇယေ; သုစိရံ သုစိရံဂံ တံ, သ’မလံ သမလံဘိ ယော’’. “मळासह असलेल्याला मळरहित करण्यासाठी, अत्यंत पवित्र अशाने दीर्घकाळ रंजन करावे; दीर्घकाळ सुंदर शरीर असलेल्या त्याला, ज्याने मळासह असलेल्याला चांगल्या प्रकारे प्राप्त केले.” ဣစ္စာဒိနာ ပဌမစတုတ္ထဒုတိယတတိယပါဒါဒိယမကာဒီနိ အဗျပေတဗျပေတာနိ, इत्यादींद्वारे प्रथम-चतुर्थ-द्वितीय-तृतीय-पाद-आदि-यमक इत्यादी अव्यपेत-व्यपेत यमके (जाणून घ्यावीत), ‘‘မနောဟရ ဟရ က္လေသံ, ဇိန စေတောဘဝံ မမ; နနု တွံ ပါရမီသာရာ-မတဘာဝိတမောသဓံ’’. “हे मनोहर जिन! माझ्या मनातील क्लेशांचे हरण करा; आपण पारमितांच्या साराने आणि अमृताने भावित केलेले औषध आहात ना?” ဣစ္စာဒိနာ မဇ္ဈပါဒယမကာနိ, इत्यादींद्वारे मध्य-पाद-यमके (जाणून घ्यावीत), ‘‘သာဓုနာ ရံဇယ ဇယ-ဒ္ဓနိနာ’ပူရယိ မဟိံ; ယော တံ ဇိနဝရံ ဓီရ-မတ္ထကာမောသိ စေ တုဝံ’’. “सज्जनाचे रंजन करा, ज्याने विजयाच्या घोषाने पृथ्वी भरून टाकली; जर तुम्ही त्या धीर जिनवराचे कल्याण इच्छिणारे असाल तर.” ဣစ္စာဒိနာ အန္တပါဒယမကာနိ ဇာနိတဗ္ဗာနိ. इत्यादींद्वारे अंत्य-पाद-यमके जाणून घ्यावीत. ၃၁. ဧဝံ အဘိမတယမကေန အဗျပေတယမကာနမုပါယာဒီနိ နိဂမေန္တော အာဟ ‘‘အဗျပေတိ’’စ္စာဒိ. အဗျပေတာဒိယမကဿ ဝိသဒိသဝဏ္ဏေဟိ အဗျဝဟိတာဒိယမကဿ, အဗျပေတပါဒါဒိယမကဿ ဝါ ဧသော လေသော ‘‘သုဇနိ’’စ္စာဒိကော အပ္ပကောဒါဟရဏနယော နိဒဿိတော နိဒ္ဒိဋ္ဌော. အညာနိ ယမကာနိပိ ဣမာယေဝ ဒိသာယ ဣမိနာ နယေနေဝ ဉေယျာနိ ဝိညူဟိ ဉာတဗ္ဗာနိ. အာဒေါ ယမကံ, အာဒိဘူတံ ဝါ ယမကံ, အဗျပေတဉ္စ တံ အာဒိယမကဉ္စာတိ ဝါကျံ. ဧဝံ ဒဿိတေန [Pg.56] ဣမိနာ ကမေန အဗျပေတဒုတိယပါဒါဒိယမကာဒယော ဉာတဗ္ဗာတိ အဓိပ္ပာယော. ३१. अशा प्रकारे अभिमतानुसार यमकाद्वारे अव्यपेत यमकांचे उपाय इत्यादींचा निष्कर्ष काढताना ‘अव्यपेत’ इत्यादी म्हणतात. अव्यपेत-आदि-यमकाचा, भिन्न वर्णांनी युक्त असलेल्या अखंडित आदि-यमकाचा, किंवा अव्यपेत-पाद-आदि-यमकाचा हा लेश म्हणजे ‘सुजन’ इत्यादी अल्प उदाहरणांचा मार्ग दर्शविला आहे, निर्दिष्ट केला आहे. इतर यमके देखील याच दिशेने, याच न्यायाने विद्वानांनी जाणून घ्यावीत. सुरुवातीला यमक, किंवा सुरुवातीला असलेले यमक, आणि ते अव्यपेत व आदि-यमक आहे, असे हे वाक्य आहे. अशा प्रकारे दर्शविलेल्या या क्रमाने अव्यपेत-द्वितीय-पाद-आदि-यमक इत्यादी जाणून घ्यावेत, असा अभिप्राय आहे. တတ္ထ အဗျပေတဒုတိယပါဒါဒိယမကမေဝံ ဝေဒိတဗ္ဗံ – त्यामध्ये अव्यपेत-द्वितीय-पाद-आदि-यमक अशा प्रकारे समजून घ्यावे – ဂုဏာဂုဏေန သဟ တေ, သာဓဝေါ’သာဓဝေါ ဇနာ; ဝိဂါဟန္တေ သမံ နာထ, စိတ္တံ စိတ္တေ ကထံ နု တေ. गुणांसह आणि अवगुणांसह ते सज्जन आणि दुर्जन लोक; हे नाथ! तुमच्या चित्तात एकत्र कसे काय प्रवेश करतात? (हे आश्चर्यकारक आहे!) ဘော နာထ တေ တုယှံ စိတ္တေ သာဓဝေါ အသာဓဝေါ တေ ဇနာ ဂုဏာဂုဏေန သကသကဂုဏေန အဂုဏေန စ သဟ သမံ ဧကဇ္ဈံ ကထံ နု ဝိဂါဟန္တေ, စိတ္တံ အစ္ဆရိယံ သုဇနဒုဇ္ဇနေသု သမမေတ္တာ အစ္ဆရိယာတိ အဓိပ္ပာယော. हे नाथ! तुमच्या चित्तात ते सज्जन आणि दुर्जन लोक आपापल्या गुणांसह आणि अवगुणांसह एकत्र कसे काय प्रवेश करतात? ‘चित्तम्’ म्हणजे आश्चर्य, सज्जन आणि दुर्जनांवर समान मैत्री असणे हे आश्चर्यकारक आहे, असा अभिप्राय आहे. အဗျပေတပဌမဒုတိယပါဒါဒိယမကမေဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ – अव्यपेत-प्रथम-द्वितीय-पाद-आदि-यमक अशा प्रकारे पाहावे – ပိယေန ဝစသာ သဗ္ဗေ, ပိယေန’ပ္ပိယဘာဏိနော; ပါဒါနတေ ဇိနောကာသိ, သော ဓမ္မော ဟန္တု ဝေါ’ပ္ပီယံ. प्रिय वचनाने सर्व, अप्रिय बोलणाऱ्यांना देखील प्रिय बनवून; जिनांनी (बुद्धांनी) चरणांवर लीन केले, तो धम्म तुमचे अप्रिय नष्ट करो. ဇိနော အပ္ပိယဘာဏိနောပိ သဗ္ဗေ ဇနေ ပိယေန ယေန ဝစသာ ပါဒါနတေ အကာသိ, သော ဓမ္မော ဝေါ အပ္ပိယံ ဟန္တု. ဧတ္ထ အပိသဒ္ဒပရိယာယဿ ပိသဒ္ဒဿ ဂဟိတတ္တာ ယတိဘင်္ဂေါ နတ္ထိ. जिनांनी (बुद्धांनी) अप्रिय बोलणाऱ्यांना देखील सर्व लोकांना ज्या प्रिय वचनाने चरणांवर लीन केले, तो धम्म तुमचे अप्रिय नष्ट करो. येथे ‘अपि’ शब्दाचा पर्याय असलेला ‘पि’ शब्द ग्रहण केल्यामुळे यतिभंग होत नाही. ပဌမစတုတ္ထဒုတိယတတိယပါဒါဒိအဗျပေတဗျပေတယမကမေဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ – प्रथम-चतुर्थ-द्वितीय-तृतीय-पाद-आदि-अव्यपेत-व्यपेत-यमक अशा प्रकारे पाहावे – သ’မလံ သမလံ ကတ္တုံ, သုစိရံသုစိ ရံဇယေ; သုစိရံ သုစိရံဂံ တံ, သ’မလံ သမလံဘိ ယောတိ. मळासह असलेल्याला मळरहित करण्यासाठी, अत्यंत पवित्र अशाने दीर्घकाळ रंजन करावे; दीर्घकाळ सुंदर शरीर असलेल्या त्याला, ज्याने मळासह असलेल्याला चांगल्या प्रकारे प्राप्त केले. ဧတ္ထ ‘‘သမလံ သမလံ, သုစိရံ သုစိရ’’န္တိ ဝိသဒိသဝဏ္ဏေဟိ အဗျဝဟိတတ္တာ အဗျပေတံ, ‘‘သမလံ သမလ’’န္တိ ပုဗ္ဗပရယုဂဠံ ‘‘ကတ္တု’’မိတိ ဘိန္နဝဏ္ဏေဟိ, ‘‘သုစိရံ သုစိရ’’န္တိ ပုဗ္ဗပရယုဂဠံ ‘‘ဇယေ’’တိ ဘိန္နဝဏ္ဏေဟိ စ ဗျဝဟိတတ္တာ ဗျပေတဉ္စ ဟောတိ. သုစိရံသုစိ သောဘနရံသိနာ ဥစိ ယုတ္တော ယော ဇိနော သံ [Pg.57] သန္တိံ နိဗ္ဗာနံ သမလံဘိ အလဘိ, အလံ အစ္စန္တံ အတိသယေန သုစိရံဂံ ဝိသုဒ္ဓဒေဟံ တံ ဇိနံ သမလံ ဇလ္လိကာသင်္ခါတေန, ရာဂါဒိကုစ္ဆိတသင်္ခါတေန ဝါ မလေန သဟိတံ သံ အတ္တာနံ အလံကတ္တုံ နိမ္မလံ ကတွာ သဇ္ဇေတုံ သုစိရံ သုစိရကာလံ ရံဇယေ အတ္တနိ အဘိရမာပေယျ. येथे "समलं समलं, सुचिरं सुचिरं" हे विसदृश वर्णांनी व्यवहित (अंतरित) न केल्यामुळे अव्यपेत (अव्यवहित) आहे, आणि "समलं समलं" हे पूर्व-पर युगळ (जोडी) "कत्तुं" या भिन्न वर्णांनी, तसेच "सुचिरं सुचिरं" हे पूर्व-पर युगळ "जये" या भिन्न वर्णांनी व्यवहित केल्यामुळे व्यपेत (व्यवहित) आहे. सुचिरं-शुचि म्हणजे सुंदर किरणांनी युक्त असलेले जे जिन (बुद्ध) आहेत, त्यांनी 'सं' म्हणजे शांती किंवा निर्वाण 'समलम्भी' म्हणजे प्राप्त केले. 'अलं' म्हणजे अत्यंत किंवा अतिशयाने 'सुचिरंगं' म्हणजे विशुद्ध देह असलेल्या त्या जिनाला 'समलं' म्हणजे मळ किंवा रागादी कुत्सित मळाने युक्त असलेल्या 'सं' म्हणजे स्वतःला 'अलंकरोतुं' म्हणजे निर्मळ करून सजवण्यासाठी 'सुचिरं' म्हणजे दीर्घकाळ 'रंजये' म्हणजे स्वतःमध्ये रमवावे. ပါဒမဇ္ဈယမကမေဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ – पादमध्ययमक (चरणाच्या मध्यभागी असणारे यमक) या प्रकारे समजावे – မနောဟရ ဟရ က္လေသံ, ဇိန စေတောဘဝံ မမ; နနု တွံ ပါရမီသာရာ-မတဘာဝိတမောသဓန္တိ. "हे मनोहर जिन! माझ्या मनातील क्लेशांचा नाश करा. आपण पारमितांच्या साररूपी अमृताने भावित (तयार केलेले) दिव्य औषधच आहात ना?" မနောဟရ ဇိန မမ စေတောဘဝံ က္လေသံ သန္တာပံ ဟရ အပနယ, တွံ ပါရမီသာရာမတဘာဝိတံ ဩသဓံ ဒိဗ္ဗောသဓံ နနု. हे मनोहर जिन! माझ्या मनातील क्लेश किंवा संतापाचा नाश करा, तो दूर करा. आपण पारमितांच्या साररूपी अमृताने भावित केलेले औषध, म्हणजेच दिव्य औषधच आहात ना! ပါဒန္တယမကမေဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ – पादांतयमक (चरणाच्या शेवटी असणारे यमक) या प्रकारे समजावे – သာဓုနာ ရံဇယ ဇယ-ဒ္ဓနိနာ’ပူရယိ မဟိံ; ယော တံ ဇိနဝရံ ဓီရ-မတ္ထကာမောသိ စေ တုဝန္တိ. "ज्यांनी सज्जनांच्या जयघोषाने पृथ्वी व्यापून टाकली, हे धीर पुरुषा! जर तू स्वतःचे कल्याण इच्छिणारा असशील, तर त्या श्रेष्ठ जिनाला प्रसन्न कर (त्यांच्या ठायी रममाण हो)." ယော ဇိနဝရော သာဓုနာ ဇယဒ္ဓနိနာ ဝေနေယျဇယဃောသေန မဟိံ အာပူရယိ, ဓီရံ တံ ဇိနဝရံ တုဝံ သပ္ပုရိသ စေ အတ္ထကာမော အသိ, ရံဇယ အဘိရမာပေဟိ. ဣမိနာ နိဒ္ဒိဋ္ဌယမကေဟေဝ အဝသေသာ တတိယပါဒါဒိယမကာဒယော ဝိညေယျာ. ज्या श्रेष्ठ जिनांनी सज्जनांच्या जयध्वनीने म्हणजेच विनेय (उपदेश देण्यास योग्य) जनांच्या जयघोषाने पृथ्वी व्यापून टाकली, हे सत्पुरुषा! जर तू स्वतःचे कल्याण इच्छिणारा असशील, तर त्या धीर श्रेष्ठ जिनाला प्रसन्न कर, त्यांच्या ठायी रममाण हो. या दर्शविलेल्या यमकांवरूनच उर्वरित तिसऱ्या चरणातील इत्यादी यमके समजून घ्यावीत. ၃၂. ३२. အစ္စန္တဗဟဝေါ တေသံ,ဘေဒါ သမ္ဘေဒယောနိယော; တတ္ထာပိ ကေစိ သုကရာ,ကေစိ အစ္စန္တဒုက္ကရာ. "त्यांचे भेद आणि संमिश्रणाचे प्रकार अत्यंत विपुल आहेत. तरीही त्यांपैकी काही सुकर (सोपे) आहेत, तर काही अत्यंत दुष्कर (कठीण) आहेत." ၃၂. ကိံ ပန သာကလ္လေန န ဝိကပ္ပိတာနီတိ အာဟ ‘‘အစ္စန္တိ’’စ္စာဒိ. တေသံ ဝိကပ္ပာနံ သမ္ဘေဒေါ သင်္ကရော မိဿတ္တမုစ္စာရဏပ္ပကာရော ယောနိ ပဘဝေါ ယေသံ တေ သမ္ဘေဒယောနိယော, ဘေဒါ ပကာရာ အစ္စန္တဗဟဝေါ အတိသယေန ဗဟုလာ ယထာဝုတ္တနယေန သမ္ဘဝန္တိ, တတ္ထာပိ တေသု ဝိကပ္ပေသုပိ ကေစိ ဝိကပ္ပာ သုခေန ကရီယန္တိ ပယုဇ္ဇန္တီတိ [Pg.58] သုကရာ, တဗ္ဗိပရီတော စ ကေစိ ဝိကပ္ပာ အစ္စန္တဒုက္ကရာ. ဣတိ ဒွိဓာ သင်္ဂယှန္တိ, တေသု သုကရာနံ ကေသဉ္စိ အဘိမတယမကာနံ မုခမတ္တံ ဒဿိတံ. ဣဒါနိ ဒုက္ကရာနံ ကေသဉ္စိ မုခမတ္တံ န သဗ္ဗမေဝံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ३२. मग ते सर्व पूर्णपणे का वर्गीकृत केले नाहीत? म्हणून 'अच्चन्ति' इत्यादी म्हटले आहे. त्या विकल्पांचे संमिश्रण, संकर किंवा उच्चारणाचा प्रकार हाच ज्यांचा उगम (योनी) आहे, ते 'संभेदयोनयो' होत. त्यांचे भेद किंवा प्रकार वर सांगितलेल्या पद्धतीने अत्यंत विपुल प्रमाणात संभवतात. तरीही त्या विकल्पांमध्ये काही विकल्प सहजपणे करता येतात किंवा योजता येतात म्हणून ते 'सुकर' आहेत, आणि याच्या उलट काही विकल्प अत्यंत कठीण आहेत. अशा प्रकारे त्यांचे दोन प्रकारांत वर्गीकरण होते. त्यांपैकी सुकर असलेल्या काही आवडत्या यमकांचे केवळ मुखमात्र (प्राथमिक स्वरूप) दर्शविले आहे. आता काही दुष्कर यमकांचे केवळ मुखमात्र दर्शविले जात आहे, सर्वच येथे समजू नये. သမုန္နတေန တေ သတာ,ကထံ န တေ န တေ သိယုံ; ယတော နတေနတေပိ’တော,သိယုံ န တေ နတေ သုဘာ. "हे सज्जना! उन्नत अशा तुमच्यामुळे ते तुमचे का बरे होणार नाहीत? कारण नम्र झालेल्या किंवा नम्र न झालेल्या लोकांमध्येही ते तुमचे शुभ (कल्याणकारी) का बरे होणार नाहीत?" ဣဒံ ပါဒစတုက္ကမဇ္ဈယမကမဗျပေတဗျပေတမေကရူပံ ဒုက္ကရံ. हे चारही चरणांच्या मध्यभागी असणारे, अव्यपेत-व्यपेत आणि एकरूप असलेले दुष्कर यमक आहे. န ဘာသုရာ တေပိ သုရာ ဝိဘူသိတာ,တထာသုရာ ဘူရိ သုရာပရာဇိတာ; သဘာသု ရာဇာပိ တထာ သုရာဇိတော,ယထာ သုရာဇန္တိ သုရာဝိနိဿဋာ. "विभूषित केलेले ते देवही तसे प्रकाशमान होत नाहीत, तसेच पुष्कळ मद्य पिऊन पराजित झालेले असुरही तसे दिसत नाहीत; आणि सभांमध्ये सुशोभित झालेला राजाही तसा शोभत नाही, ज्याप्रमाणे देवांच्या पलीकडे गेलेले (बुद्ध किंवा अर्हत) अत्यंत शोभून दिसतात." ဣဒံ စတုက္ကပါဒမဇ္ဈယမကမေကရူပဗျပေတံ. हे चारही चरणांच्या मध्यभागी असणारे, एकरूप आणि व्यपेत (व्यवहित) यमक आहे. ၃၂. သဗ္ဗမိဒမနုဒ္ဒိသိတွာ လက္ခဏာတိဒေသေန နိဂမနံ ကိမတ္ထမိစ္စာသင်္ကာယမာဟ ‘‘အစ္စန္တေ’’စ္စာဒိ. တေသံ ယမကာနံ သမ္ဘေဒယောနိယော ပဘေဒုပ္ပတ္တိကာရဏဘူတာ ဘေဒါ ဥစ္စာဝစပကာရာ အစ္စန္တဗဟဝေါ, တတ္ထာပိ တေသုပိ ကေစိ ယမကာ သုကရာ သုသာဓိယာ, ကေစိ အစ္စန္တဒုက္ကရာ အတိသယေန ဒုဿာဓိယာ. သမ္ဘေဒေါ ယောနိ ယေသန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. ३२. हे सर्व न सांगता केवळ लक्षणाच्या अतिदेशाने (विस्ताराने) उपसंहार कशासाठी केला, अशी शंका घेऊन 'अच्चन्ते' इत्यादी म्हटले आहे. त्या यमकांच्या उपभेदांच्या उत्पत्तीला कारणीभूत असलेले उच्च-नीच प्रकारचे भेद अत्यंत विपुल आहेत. तरीही त्यांमध्ये काही यमके सुकर म्हणजे सहज साध्य होणारी आहेत, तर काही अत्यंत दुष्कर म्हणजे साध्य करण्यास अत्यंत कठीण आहेत. 'संभेदः योनी येषाम्' (संमिश्रण हाच ज्यांचा उगम आहे) असा याचा विग्रह आहे. ဣဟ သုကရဿ ဥပဒိသိတတ္တာ ဒုက္ကရယမကပဝေသောပါယမတ္တမုပဒိသီယတေ – येथे सुकर यमकाचा उपदेश केल्यामुळे, आता दुष्कर यमकामध्ये प्रवेश करण्याचा केवळ उपाय (मार्ग) उपदेशिला जात आहे – ‘‘မနံ မနံ သတ္ထု ဒဒေယျ စေ ယော,မနံ မနံ ပီဏယတ’ဿ သတ္ထု; မနံ မနံ တေန ဒဒေယျ စေ န,မနံ မနံပ’ဿ န သာဓုပုဇ္ဇ’’န္တိ. "जो मनुष्य शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) चरणी आपले मन क्षणभरही समर्पित करतो, शास्ते त्या मनुष्याचे मन संतुष्ट करतात. जर त्याने आपले मन शास्त्यांच्या चरणी समर्पित केले नाही, तर त्याचे मन क्षणभरही सज्जनांकडून पूजनीय होत नाही." ဣဒံ ပါဒစတုက္ကာဒိယမကမေကရူပံ အဗျပေတဗျပေတံ. हे चारही चरणांच्या सुरुवातीला असणारे, एकरूप आणि अव्यपेत-व्यपेत यमक आहे. ယော [Pg.59] ပုဂ္ဂလော မနံ အတ္တနော စိတ္တံ သတ္ထု ဇိနဿ မနံ ခဏမတ္တမ္ပိ ဒဒေယျ စေ, သတ္ထု မုနိန္ဒဿ မနံ စိတ္တံ အဿ ပုဂ္ဂလဿ မနံ စိတ္တံ ပီဏယတိ သမ္ပီဏေတိ, တေန တသ္မာ မနံ မနံ စိတ္တံ စိတ္တံ ဒဒေယျ စေ န ယဒိ နော ဒဒေယျ, အဿ ပုဂ္ဂလဿ မနံ စိတ္တံ မနံပိ မုဟုတ္တမ္ပိ သာဓုပုဇ္ဇံ သာဓူဟိ ပူဇိတဗ္ဗံ န ဘဝတိ. जो मनुष्य आपले मन म्हणजे स्वतःचे चित्त शास्त्यांच्या (जिनांच्या) चरणी क्षणभरही समर्पित करतो, तेव्हा मुनींद्रांचे (बुद्धांचे) चित्त त्या मनुष्याच्या चित्ताला संतुष्ट करते. म्हणून, जर त्याने आपले चित्त समर्पित केले नाही, तर त्या मनुष्याचे चित्त क्षणभरही सज्जनांकडून पूजनीय (आदरणीय) ठरत नाही. ‘‘သမုန္နတေန တေ သတာ,ကထံ န တေ န တေ သိယုံ; ယတော နတေ’နတေပိ’တော,သိယုံ န တေ နတေ သုဘာ’’တိ. "हे सज्जना! उन्नत अशा तुमच्यामुळे ते तुमचे का बरे होणार नाहीत? कारण नम्र झालेल्या किंवा नम्र न झालेल्या लोकांमध्येही ते तुमचे शुभ (कल्याणकारी) का बरे होणार नाहीत?" ဣဒံ ပါဒစတုက္ကမဇ္ဈယမကမေကရူပမဗျပေတဗျပေတံ. हे चारही चरणांच्या मध्यभागी असणारे, एकरूप आणि अव्यपेत-व्यपेत यमक आहे. ယတော ယေန ကာရဏေန တေ တုယှံ သတာ သောဘနေန သမုန္နတေန သမ္မာ ဥန္နတေန ဟေတုနာ နတေပိ အဝနတေပိ အနတေပိ အနဝနတေပိ တေ တေ သုဘာ တေ တေ သောဘနာ န န သိယုံ, ဘဝန္တေဝ, အတော တေန ကာရဏေန တေ သုဘာ တေ သောဘနာ နတေ အဝနတေ ကထံ န သိယုံ, ဘဝန္တေဝ. ज्या कारणाने तुमचे ते सज्जन लोक, सुंदर आणि सम्यक् प्रकारे उन्नत अशा कारणाने, नम्र झालेल्यांमध्ये किंवा नम्र न झालेल्यांमध्येही ते ते शुभ (कल्याणकारी) किंवा शोभिवंत का बरे होणार नाहीत? ते नक्कीच होतात. म्हणून त्या कारणाने ते शुभ किंवा शोभिवंत लोक नम्र झालेल्यांमध्ये का बरे होणार नाहीत? ते नक्कीच होतात. ‘‘ဇိနံ ပဏာမောနတသဇ္ဇနံ ဇနံ,ဂုဏေ နိဝေသေန္တမသဇ္ဇနံ’ဇနံ; ဝေနေယျနေတ္တေ ဂုဏဘာဇနံ ဇနံ,နမေ မမေန္တံ ခလု သဇ္ဇနံဇန’’န္တိ. "जे वंदन करण्यासाठी नम्र झालेल्या सज्जन लोकांना आणि दुर्जनांनाही गुणांमध्ये (शीलादी गुणांमध्ये) प्रवृत्त करतात, जे विनेय जनांच्या डोळ्यांतील अंजनरूप आहेत, जे गुणांचे पात्र आहेत आणि जे सज्जन लोकांवर अत्यंत प्रेम करतात, त्या जिनांना मी निश्चितपणे नमन करतो." ဣဒံ ပါဒစတုက္ကန္တယမကမေကရူပမဗျပေတဗျပေတယမကံ ဒုက္ကရံ. हे चारही चरणांच्या शेवटी असणारे, एकरूप आणि अव्यपेत-व्यपेत असलेले दुष्कर यमक आहे. ပဏာမောနတသဇ္ဇနံ ပဏာမိတုကာမောနတသာဓုဇနဝန္တံ ဇနံ ဝေနေယျဇနံ အသဇ္ဇ ပမာဒမကတွာ ဂုဏေ သီလာဒိဂုဏေ နိဝေသေန္တံ နိယောဇေန္တံ ဝေနေယျနေတ္တေ အဉ္ဇနံ အဉ္ဇနဘူတံ ဂုဏဘာဇနံ ဂုဏာနမာဓာရဘူတံ သဇ္ဇနံဇနံ ဣမိနာ ကာရဏေန သာဓုဇနာနံ အဉ္ဇနဘူတံ ဇနံ သာဓုဇနံ ခလု ဧကန္တေန မမေန္တံ မမာယန္တံ နံ ဇိနံ နမေ နမာမိ. जे वंदन करण्याची इच्छा असणाऱ्या नम्र सज्जन लोकांना आणि विनेय (उपदेश देण्यास योग्य) लोकांना आळस न करता शीलादी गुणांमध्ये प्रवृत्त करतात, जे विनेय जनांच्या डोळ्यांतील अंजनरूप आहेत, जे गुणांचे आधार (पात्र) आहेत, आणि जे सज्जन लोकांचे अंजनरूप असून त्यांच्यावर अत्यंत प्रेम करतात, त्या जिनांना मी निश्चितपणे नमन करतो. ‘‘သာဘာသု [Pg.60] သာဘာ ဘုဝနေ ဇိနဿ,သာဘာယ သာ ဘာသတိယေဝ ဇာတု; သာဘာယ သာ ဘာတိ န စေ ကထံ န,သာဘာ သသာဘာနမတိစ္စ ဘာတီ’’တိ. "या जगात अस्तित्वात असलेल्या सर्व प्रभांमध्ये (प्रकाशात) जिनांची ती सुंदर प्रभा स्वतःच्याच प्रभेने निश्चितपणे प्रकाशमान होते. जर ती जिनांची प्रभा इतर प्रभांपेक्षा अधिक होऊन शोभून दिसत नसेल, तर स्वतःची प्रभा असणाऱ्या ब्रह्मादींच्या सुंदर प्रभांना मागे टाकून ती कशी बरे शोभणार? ती नक्कीच शोभते." ဣဒံ ပါဒစတုက္ကာဒိယမကေကရူပဗျပေတံ. हे चारही चरणांच्या सुरुवातीला असणारे, एकरूप आणि व्यपेत (व्यवहित) यमक आहे. ဘုဝနေ သတ္တလောကေ သာဘာသု ဝိဇ္ဇမာနာဘာသု ဇိနဿ သာဘာ သောဘနာ အာဘာ သာဘာယ ဝိဇ္ဇမာနာယ, သောဘနာယ ဝါ အာဘာယ အာဘာတော ဇာတု ဧကန္တေန ဘာသတိယေဝ ဒိပ္ပတေဝ, သာ ဇိနာဘာ သာဘာယ ဝိဇ္ဇမာနာဘာတော အဓိကာ ဟုတွာ စေ န ဘာတိ ယဒိ န ဘာသတိ, သသာဘာနံ ဝိဇ္ဇမာနသောဘနာဘာနံ ဗြဟ္မာဒီနံ သာဘာ သောဘနာဘာယော အတိစ္စ အတိက္ကမ္မ ကထံ န ဘာတိ, ဘာသတိယေဝ. या सत्वलोकात (जगात) अस्तित्वात असलेल्या सर्व प्रभांमध्ये जिनांची ती सुंदर प्रभा स्वतःच्याच सुंदर प्रभेने निश्चितपणे प्रकाशमान होते. जर ती जिनांची प्रभा इतर विद्यमान प्रभांपेक्षा अधिक होऊन शोभून दिसत नसेल, तर स्वतःची सुंदर प्रभा असणाऱ्या ब्रह्मादींच्या सुंदर प्रभांना मागे टाकून ती कशी बरे शोभणार नाही? ती नक्कीच शोभते. ‘‘န ဘာသုရာ တေပိ သုရာ ဝိဘူသိတာ,တထာသုရာ ဘူရိ သုရာပရာဇိတာ; သဘာသု ရာဇာပိ တထာ သုရာဇိတော,ယထာ သုရာဇန္တိ သုရာဝိနိဿဋာ’’တိ. "विभूषित केलेले ते देवही तसे प्रकाशमान होत नाहीत, तसेच पुष्कळ मद्य पिऊन पराजित झालेले असुरही तसे दिसत नाहीत; आणि सभांमध्ये सुशोभित झालेला राजाही तसा शोभत नाही, ज्याप्रमाणे देवांच्या पलीकडे गेलेले (बुद्ध किंवा अर्हत) अत्यंत शोभून दिसतात." ဣဒံ ပါဒစတုက္ကမဇ္ဈယမကေကရူပဗျပေတံ. हे चारही चरणांच्या मध्यभागी असणारे, एकरूप आणि व्यपेत (व्यवहित) यमक आहे. သုရာဝိနိဿဋာ သုရာပါနတော အပဂတာ ဇနာ ယထာ သုရာဇန္တိ, တထာ ဝိဘူသိတာ ဝိသေသေန အလင်္ကတာ တေပိ သုရာ တေ ဒေဝါ အပိ န ဘာသုရာ သောဘမာနာ န ဟောန္တိ, တထာ ဧဝံ သုရာပရာဇိတာ သုရာပါနဟေတု ပရာဇိတဘာဝံ ပတ္တာ ဘူရိ အသုရာ ဗဟဝေါ ဝေပစိတ္တိအာဒယော အသုရာပိ န ဘာသုရာ န သောဘန္တိ, တထာ ဧဝံ သုရာဇိတော သုဋ္ဌု အလင်္ကတော ရာဇာပိ သဘာသု န ဘာသုရော. ज्याप्रमाणे सुरापानापासून (मद्यपानापासून) दूर गेलेले लोक शोभून दिसतात, त्याप्रमाणे विशेष रूपाने विभूषित आणि अलंकृत असलेले ते 'सुर' (देव) देखील (मद्यपी असल्यास) तेजस्वी किंवा शोभिवंत दिसत नाहीत. त्याचप्रमाणे, सुरापानामुळे पराभूत झालेले (सुरा-पराजित), मद्यपानामुळे पराभवाला प्राप्त झालेले वेपचित्ती इत्यादी अनेक असुर देखील तेजस्वी दिसत नाहीत, शोभत नाहीत. तसेच, चांगल्या प्रकारे अलंकृत असलेला राजा देखील (मद्यपी असल्यास) सभांमध्ये शोभून दिसत नाही. ‘‘ဇိနာဏတ္တိယံ [Pg.61] ယော’ဟိတာသာ သိတာသာ,အဝဿံဝ တေ ဟောန္တျ’တာသာ ဟတာသာ; အတော သဗ္ဗပါပေ သတာသာ ဝတာသာ,ကရောန္တေဝ သန္တိဿိတာ သာမိတာသာ’’တိ. जे जिनांच्या (बुद्धांच्या) आज्ञेमध्ये अर्पित श्रद्धा असणारे आणि शुद्ध मनाचे आहेत, ते निश्चितपणे भयरहित आणि तृष्णारहित होतात; म्हणूनच सर्व पापांच्या बाबतीत भय बाळगणारे आणि व्रताचे पालन करणारे, शांतीचा आश्रय घेतलेले साधू स्वामी बनण्याची (मुक्तीची) आकांक्षा बाळगतात. ဣဒံ ပါဒစတုက္ကန္တယမကမေကရူပဗျပေတံ. हे चार चरणांचे यमक असून एकाच रूपाने युक्त (किंवा एका रूपाने विरहित) आहे. ယေ သပ္ပုရိသာ ဇိနာဏတ္တိယံ ဗုဒ္ဓဿ ဝိနယပညတ္တိသင်္ခါတာဏတ္တိယံ ဩဟိတာသာ အဝီတိက္ကမဝသေန ပတိဋ္ဌိတအာသာ ဟောန္တိ သိတာသာ ပရိသုဒ္ဓါသာ, တေ သာဓဝေါ ဟတာသာ အနုက္ကမေန ဟတတဏှာ အဝဿံဝ ဧကန္တေနေဝ အတာသာ ဘယရဟိတာ ယတော ဟောန္တိ, အတော တသ္မာ သဗ္ဗပါပေ သဗ္ဗာကုသလေ သတာသာ ဘယသဟိတာ ဝတာသာဝ နိရဝဇ္ဇဝတာဘိလာသဝန္တော သာဓုဇနာ သန္တိဿိတာ သန္တိနိဿိတာယော သာမိတာသာ သာမိဘာဝါသာယော ကရောန္တေဝ. जे सत्पुरुष जिनांच्या आज्ञेमध्ये म्हणजेच बुद्धांच्या विनयप्रज्ञप्ती नावाच्या आज्ञेमध्ये अर्पित श्रद्धा असणारे (नियम न मोडण्याच्या भावनेने प्रतिष्ठित असलेले) आणि शुद्ध मनाचे असतात, ते साधू अनुक्रमाने तृष्णेचा नाश झाल्यामुळे निश्चितपणे भयरहित होतात; म्हणूनच, सर्व पापांच्या व अकुशल कर्मांच्या बाबतीत भय बाळगणारे आणि दोषरहित व्रताची अभिलाषा बाळगणारे, शांतीचा (निर्वाणाचा) आश्रय घेतलेले साधू लोक स्वामीभावाची (मुक्तीची) आकांक्षा बाळगतातच. ၃၃. ३३. ယမကံ တံ ပဟေဠီ စ, နေကန္တမဓုရာနိ’တိ; ဥပေက္ခိယန္တိ သဗ္ဗာနိ, သိဿခေဒဘယာ မယာ. ते यमक आणि पहेळी (कोडे) पूर्णपणे मधुर नसतात; म्हणून शिष्यांच्या त्रासाच्या (खेदाच्या) भयामुळे माझ्याकडून त्या सर्वांची उपेक्षा केली जात आहे (म्हणजेच त्यांचा विस्तार केला जात नाही). ၃၃. နနု ယမကံ နာမ ကဝီနံ သာမတ္ထိယဝိသေသသူစကန္တိ တတ္ထ တံ သောပယောဂံ, ပဟေဠိကာ စ သောပယောဂါ ကီဠာဝိနောဒနေ သမ္ဗာဓဋ္ဌာနမန္တနေ ပရဗျာမောဟနေ စ, တသ္မာ တတ္ထ ကထမုပေက္ခာ ဘဝတောတိ အာဟ ‘‘ယမက’’န္တိအာဒိ. တံ ယထာဝုတ္တံ ယမကဉ္စ သုကရဒုက္ကရပ္ပဘေဒံ. ပဟေဠိကာ ပန ပုဗ္ဗာစရိယေဟိ သောဠသ နိဒ္ဒိဋ္ဌာ သမာဂတာဝဉ္စိတာဒိကာ. တတ္ထိဒံ လက္ခဏံ – ३३. यमक हे कवींच्या विशेष सामर्थ्याचे सूचक असते, त्यामुळे ते उपयुक्त आहे; आणि पहेळिका (कोडे) देखील क्रीडा-विनोदासाठी, गुप्त ठिकाणी विचारविनिमय करण्यासाठी आणि इतरांना भ्रमित करण्यासाठी उपयुक्त असते. मग त्यांची उपेक्षा कशी काय होऊ शकते? यावर उत्तर म्हणून 'यमक' इत्यादी म्हटले आहे. ते वर सांगितलेले यमक सुकर (सोपे) आणि दुष्कर (कठीण) अशा भेदांचे आहे. परंतु पूर्वाचार्यांनी 'समागता', 'वंचिता' इत्यादी सोळा प्रकारच्या पहेळिका सांगितल्या आहेत. त्यांचे लक्षण खालीलप्रमाणे आहे – သမာဂတာ နာမ သိယာ, ဂုဠှတ္ထာ ပဒသန္ဓိနာ; ဝဉ္စိတာညတ္ထ ရုဠှေန, ယတ္ထ သဒ္ဒေန ဝဉ္စနာ. पदसंधीमुळे (शब्दांच्या जोडणीमुळे) जिचा अर्थ गूढ होतो, ती 'समागता' नावाची पहेळिका होय. जिथे शब्दाच्या रूढ अर्थापेक्षा वेगळा अर्थ काढून शब्दाद्वारे फसवणूक केली जाते, ती 'वंचिता' होय. ဥက္ကန္တာတိဗျဝဟိတ-ပ္ပယောဂါ [Pg.62] မောဟကာရိနီ; သိယာ ပမုဿိတာ ယဿာ, ဒုဗ္ဗောဓတ္ထာ ပဒါဝလိ. अत्यंत विस्कळीत (दूरच्या) शब्दप्रयोगामुळे भ्रम निर्माण करणारी ती 'उत्क्रांता' होय. जिची पदावली (शब्दांची रचना) समजण्यास अत्यंत कठीण असते, ती 'प्रमुषिता' होय. သမာနရူပါ’မုချတ္ထာ-ရောပါဟိတပဒါ သိယာ; ဖရုသာ ပစ္စယာဒီဟိ, ဇာတသဒ္ဒါ ကထဉ္စိပိ. जिच्यामध्ये अमुख्य (गौण) अर्थाचा आरोप करून पदे योजलेली असतात, ती 'समानरूपा' होय. प्रत्यय इत्यादींच्या कठीण जोडणीमुळे कशीतरी क्लिष्ट शब्द बनवून जी तयार होते, ती 'परुषा' होय. သင်္ချာတာ နာမ သင်္ချာနံ, ယတ္ထ ဗျာမောဟကာရဏံ; အညထာ’ဘာသတေ ယတ္ထ, ဝါကျတ္ထော သာ ပကပ္ပိတာ. जिथे संख्या (मोजणी) ही भ्रमाचे कारण बनते, ती 'संख्याता' होय. जिथे वाक्याचा अर्थ प्रत्यक्षात वेगळाच भासतो, ती 'प्रकल्पिता' होय. သာ နာမန္တရိကာ ယဿာ, နာမေ နာနတ္ထကပ္ပနာ; နိဘူတာ’ဝဋ္ဌိတညတ္ထာ, တုလျတ္ထသုတိဟေတုတော. जिच्यामध्ये नामामध्ये (नावामध्ये) अनेक अर्थांची कल्पना केलेली असते, ती 'नामांतरिका' होय. समान अर्थाच्या श्रवणामुळे (ऐकण्यामुळे) जी दुसऱ्या अर्थावर स्थिर असते, ती 'निभूता' होय. သမာနသဒ္ဒါ သာ ဣဋ္ဌ-သဒ္ဒပရိယာယသာဓိတာ; သမ္မုဠှာ မူဠှတာယေဝ, နိဒ္ဒိဋ္ဌတ္ထာပိ သာဓုကံ. जी इच्छित शब्दाच्या पर्यायी शब्दांनी साधलेली असते, ती 'समानशब्दा' होय. जिचा अर्थ स्पष्टपणे सांगितलेला असूनही केवळ भ्रमामुळे (मूढतेमुळे) समजण्यास कठीण जाते, ती 'संमूढा' होय. ယဿာ သမ္ဗန္ဓဗာဟုလျာ, နာမံ သာ ပါရိဟာရိကီ; ဧကစ္ဆန္နာ ဘဝေ ဗျဉ္ဇာ-ဓေယျံ နိဿယဂေါပနာ. जिच्यामध्ये अनेक संबंधांच्या बाहुल्यामुळे नाव लपलेले असते, ती 'पारिहारिकी' होय. जिच्यामध्ये विशेषणांच्या आश्रयाने मुख्य वस्तू लपवली जाते, ती 'एकच्छन्ना' होय. သာ ဘဝေ ဥဘယစ္ဆန္နာ, ယဿာ ဥဘယဂေါပနာ; သံကိဏ္ဏာ နာမ သာ ယဿာ, နာနာလက္ခဏသင်္ကရောတိ. जिच्यामध्ये दोन्ही (विशेषण आणि विशेष्य) लपवलेले असतात, ती 'उभयच्छन्ना' होय. जिच्यामध्ये अनेक लक्षणांचे मिश्रण असते, ती 'संकीर्णा' होय. ဒေါသတ္တေပိ စေသံ သဗ္ဗေသံ ဥက္ကန္တာဒီသု ဒေါသဘာဝေ နာရောပိတဗ္ဗာ. ဧသာ ဟိ ‘‘ဗဟုဂုဏေ ပဏမတိ’’စ္စာဒိနာ ဝါကျသံကိဏ္ဏနာမေန န ဝုတ္တာ, ပကပ္ပိတာ စ သံသယဒေါသပရိဟာရေန ‘‘ယာတေ ဒုတိယံ နိလယ’’န္တိ အာဒိနာ နိဒ္ဒိဋ္ဌာ. या सर्वांमध्ये दोष असला तरी, उत्क्रांता इत्यादींमध्ये दोषारोप करू नये. कारण ही 'बहुगुणे पणमति' इत्यादी वाक्यांप्रमाणे 'वाक्यसंकीर्ण' नावाच्या दोषाने युक्त म्हटली जात नाही; आणि 'प्रकल्पिता' ही संशय दोषाचा परिहार करून 'याते दुतियं निलयं' इत्यादी उदाहरणांद्वारे दर्शवली गेली आहे. ‘‘ပဘဝါ’နတဝိတ္တိဏ္ဏာ, တဝါ’ဏာ မဟတီ သတိ; စိရာယ ဇယတံ နာထ, ပဟုတဖလသာဓနီ’’တိ. हे नाथ! प्रभावाने अत्यंत विस्तीर्ण आणि विपुल फळ देणारी तुमची महान आज्ञा दीर्घकाळ विजयी असो. အယံ သမာဂတာ. हे 'समागता' चे उदाहरण आहे. ‘‘ဘဒ္ဒမေဝေါ’ပသေဝေယျ, [Pg.63] ဝိဓူတမဒကိဗ္ဗိသံ; သမ္ပာပယေ ပုရံ ခေမံ, သ ဒန္တော’တ္တနိသေဝိန’’န္တိ. ज्याने मद आणि पाप नष्ट केले आहे अशा कल्याणाचीच सेवा करावी; तो स्वतःचे दमन करणारा आणि उत्तम पुरुषांची सेवा करणारा व्यक्ती क्षेम नगराला (निर्वाणाला) पोहोचवतो. အယံ ဝဉ္စိတာ. हे 'वंचिता' चे उदाहरण आहे. ပမုဿိတာဒယော တု လက္ခဏာနုသာရေန, တတ္ထောဒါဟရဏာနုသာရေန စ ဝေဒိတဗ္ဗာ. प्रमुषिता इत्यादी प्रकार तर लक्षणांनुसार आणि त्यांच्या उदाहरणांनुसार समजून घ्यावेत. ဧဝံ ပုဗ္ဗာစရိယေဟိ ပရိကပ္ပိတာ ပဟေဠိကာ စေတိ ဧတာနိ သဗ္ဗာနိ ဧကန္တေန နိယမေန န မဓုရာနိ အတ္ထရသဿ ဝါ သဒ္ဒရသဿ ဝါ ကဿစိ အဘာဝေန အဿာဒိတဗ္ဗာနိ န ဟောန္တီတိ ဣမိနာ ကာရဏေန သိဿာနမုပ္ပန္နော ခေဒေါယေဝ ဘယံ တတော တေသံ ခေဒတော ဝါ ဥပ္ပန္နဘယတော မယာ ဥပေက္ခိယန္တီတိ သမ္ဗန္ဓနီယံ. अशा प्रकारे पूर्वाचार्यांनी कल्पिलेल्या पहेळिका हे सर्व नियमतः पूर्णपणे मधुर नसतात; कारण अर्थरस किंवा शब्दरस यांपैकी कशाचाही अभाव असल्यामुळे ते आस्वाद घेण्यायोग्य नसतात. या कारणाने शिष्यांना होणारा त्रास (खेद) हेच भय आहे, किंवा त्या त्रासापासून उत्पन्न होणाऱ्या भयामुळे माझ्याकडून त्यांची उपेक्षा केली जात आहे, असा संबंध जोडला पाहिजे. ၃၃. ဧဝံ သုကရဒုက္ကရဝသေန ဒုဝိဓတ္တံ ဝတွာ ကဝီနံ သာမတ္ထိယပ္ပကာသနေ သပ္ပယောဇနယမကာနဉ္စ, ကီဠာဝိနောဒနေ သမ္ဗာဓဋ္ဌာနသမ္မန္တနေ ပရဗျာမောဟနေ စာတိ ဣမေသု သပ္ပယောဇနာနဉ္စ ပဟေဠိကာနမဝစနေ ကာရဏံ နိဒ္ဒိသတိ ‘‘ယမက’’မိစ္စာဒိနာ. တံ ယမကံ ယထာဝုတ္တံ သုကရဒုက္ကရာဒိဘေဒံ ယမကဇာတဉ္စ ပဟေဠိ စ ပုဗ္ဗာစရိယေဟိ နိဒ္ဒိဋ္ဌာ သမာဂဘာဒိကာ ပဟေဠိကာ စ ဣတိ ဣမာနိ သဗ္ဗာနိ ဧကန္တမဓုရာနိ န ဣတိ အဿာဒေတဗ္ဗဿ အတ္ထရသဿ, သဒ္ဒရသဿ ဝါ နိယမတော အဘာဝါ ဧကန္တေန အမဓုရာနိ, ဣတိ ဣမိနာ ကာရဏေန စ သိဿခေဒဘယာ သိဿာနံ အသဟနသင်္ခါတာယ အသဟနေန ဇာတာယ ဝါ ဘီတိယာ စ မယာ ဥပေက္ခီယန္တိ. သိဿာနံ ခေဒေါယေဝ ဘယံ, သိဿခေဒတော ဥပ္ပန္နံ ဝါ ဘယံ, တတောတိ ဝိဂ္ဂဟော. ३३. अशा प्रकारे सुकर आणि दुष्कर अशा दोन प्रकारांचे वर्णन करून, कवींचे सामर्थ्य प्रकट करण्यासाठी उपयुक्त असलेल्या यमकांचे, आणि क्रीडा-विनोद, गुप्त ठिकाणी विचारविनिमय आणि इतरांना भ्रमित करणे यांमध्ये उपयुक्त असलेल्या पहेळिकांचे वर्णन न करण्याचे कारण 'यमक' इत्यादी शब्दांनी स्पष्ट केले आहे. ते यमक वर सांगितल्याप्रमाणे सुकर आणि दुष्कर अशा भेदांचे यमक आहे, आणि पहेळिका म्हणजे पूर्वाचार्यांनी सांगितलेली समागता इत्यादी पहेळिका होय. हे सर्व पूर्णपणे मधुर नसतात, कारण आस्वाद घेण्यायोग्य अर्थरस किंवा शब्दरस यांचा नियमतः अभाव असल्यामुळे ते पूर्णपणे अमधुर असतात. आणि या कारणाने शिष्यांच्या त्रासाच्या भयामुळे (म्हणजेच शिष्यांच्या असहनशीलतेमुळे किंवा असहनशीलतेतून निर्माण झालेल्या भीतीमुळे) माझ्याकडून त्यांची उपेक्षा केली जात आहे. 'शिष्यांचा त्रास (खेद) हेच भय आहे' किंवा 'शिष्यांच्या त्रासापासून उत्पन्न झालेले भय' असा याचा विग्रह आहे. ဧတ္ထ ပဟေဠိကာ ဧဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ – येथे पहेळिका अशा प्रकारे समजून घ्याव्यात – သမာဂတာ စ ဝဉ္စိတု-က္ကန္တာ ပမုဿိတာပိ စ; သမာနရူပါ ဖရုသာ, သင်္ချာတာ စ ပကပ္ပိတာ. समागता, वंचिता, उत्क्रांता, pramuṣitā (प्रमुषिता), समानरूपा, परुषा, संख्याता आणि प्रकल्पिता. အထောပိ [Pg.64] နာမန္တရိကာ, နိဘူတာ စ ပဟေဠိကာ; အထော သမာနသဒ္ဒါ စ, သမ္မုဠှာ ပါရိဟာရိကီ; ဧကစ္ဆန္နောဘယစ္ဆန္နာ, သံကိဏ္ဏာတိ စ သောဠသာတိ. तसेच नामांतरिका, निभूता, समानशब्दा, संमूढा, पारिहारिकी, एकच्छन्ना, उभयच्छन्ना आणि संकीर्णा अशा या सोळा पहेळिका आहेत. တတြိဒံ လက္ခဏံ – त्याविषयीचे लक्षण खालीलप्रमाणे आहे – သမာဂတာ နာမ သိယာ, ဂုဠှတ္ထာ ပဒသန္ဓိနာ; ဝဉ္စိတာညတ္ထ ရုဠှေန, ယတ္ထ သဒ္ဒေန ဝဉ္စနာ. पदसंधीमुळे (शब्दांच्या जोडणीमुळे) जिचा अर्थ गूढ होतो, ती 'समागता' नावाची पहेळिका होय. जिथे शब्दाच्या रूढ अर्थापेक्षा वेगळा अर्थ काढून शब्दाद्वारे फसवणूक केली जाते, ती 'वंचिता' होय. ဥက္ကန္တာတိဗျဝဟိတ-ပ္ပယောဂါ မောဟကာရိနီ; သိယာ ပမုဿိတာ ယဿာ, ဒုဗ္ဗောဓတ္ထာ ပဒါဝလိ. अत्यंत विस्कळीत (दूरच्या) शब्दप्रयोगामुळे भ्रम निर्माण करणारी ती 'उत्क्रांता' होय. जिची पदावली (शब्दांची रचना) समजण्यास अत्यंत कठीण असते, ती 'प्रमुषिता' होय. သမာနရူပါ’မုချတ္ထာ-ရောပါဟိတပဒါ သိယာ; ဖရုသာ ပစ္စယာဒီဟိ, ဇာတသဒ္ဒါ ကထဉ္စိပိ. जिच्यामध्ये अमुख्य (गौण) अर्थाचा आरोप करून पदे योजलेली असतात, ती 'समानरूपा' होय. प्रत्यय इत्यादींच्या कठीण जोडणीमुळे कशीतरी क्लिष्ट शब्द बनवून जी तयार होते, ती 'परुषा' होय. သင်္ချာတာ နာမ သင်္ချာနံ, ယတ္ထ ဗျာမောဟကာရဏံ; အညထာ’ဘာသတေ ယတ္ထ, ဝါကျတ္ထော သာ ပကပ္ပိတာ. जिथे संख्या (मोजणी) ही भ्रमाचे कारण बनते, ती 'संख्याता' होय. जिथे वाक्याचा अर्थ प्रत्यक्षात वेगळाच भासतो, ती 'प्रकल्पिता' होय. သာ နာမန္တရိကာ ယဿာ, နာမေ နာနတ္ထကပ္ပနာ; နိဘူတာ’ဝဋ္ဌိတညတ္ထာ, တုလျတ္ထသုတိဟေတုတော. जिच्यामध्ये नामामध्ये (नावामध्ये) अनेक अर्थांची कल्पना केलेली असते, ती 'नामांतरिका' होय. समान अर्थाच्या श्रवणामुळे (ऐकण्यामुळे) जी दुसऱ्या अर्थावर स्थिर असते, ती 'निभूता' होय. သမာနသဒ္ဒါ သာ ဣဋ္ဌ-သဒ္ဒပရိယာယသာဓိတာ; သမ္မုဠှာ မူဠှတာယေဝ, နိဒ္ဒိဋ္ဌတ္ထာပိ သာဓုကံ. जी इच्छित शब्दाच्या पर्यायी शब्दांनी साधलेली असते, ती 'समानशब्दा' होय. जिचा अर्थ स्पष्टपणे सांगितलेला असूनही केवळ भ्रमामुळे (मूढतेमुळे) समजण्यास कठीण जाते, ती 'संमूढा' होय. ယဿာ သမ္ဗန္ဓဗာဟုလျာ, နာမံ သာ ပါရိဟာရိကီ; ဧကစ္ဆန္နာ ဘဝေ ဗျဉ္ဇာ-ဓေယျံ နိဿယဂေါပနာ. जिच्यामध्ये अनेक संबंधांच्या बाहुल्यामुळे नाव लपलेले असते, ती 'पारिहारिकी' होय. जिच्यामध्ये विशेषणांच्या आश्रयाने मुख्य वस्तू लपवली जाते, ती 'एकच्छन्ना' होय. သာ ဘဝေ ဥဘယစ္ဆန္နာ, ယဿာ ဥဘယဂေါပနာ; သံကိဏ္ဏာ နာမ သာ ယဿာ, နာနာလက္ခဏသင်္ကရောတိ. जिच्यामध्ये दोन्ही (विशेषण आणि विशेष्य) लपवलेले असतात, ती 'उभयच्छन्ना' होय. जिच्यामध्ये अनेक लक्षणांचे मिश्रण असते, ती 'संकीर्णा' होय. အယံ ပနေတ္ထ အတ္ထော – ပဒသန္ဓိနာ ပဒါနံ သန္ဓာနတော ဂုဠှတ္ထာ အပါကဋတ္ထာ သမာဂတာ နာမ သိယာ. ဂုဠှတ္ထာတိ ပသိဒ္ဓါနုဝါဒေန အပသိဒ္ဓါ သမာဂတာ ဝိဓီယတေ. ဣတော ပရမ္ပိ အနုဝါဒါနုဝါဒျဘာဝေါ ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗော. ယတ္ထ ပဟေဠိကာယံ အညတ္ထ ရုဠှေန သဒ္ဒေန အညသ္မိံ အတ္ထေ ပသိဒ္ဓေန ရုဠှိသဒ္ဒေန ဝဉ္စနာ ဝဉ္စိတာ နာမ သိယာ. येथे हा अर्थ आहे – पदसंधीने पदांच्या जोडणीमुळे गुप्त अर्थ असलेली किंवा अप्रकट अर्थ असलेली 'समागत' नावाची पहेळिका असू शकते. 'गुप्त अर्थ असलेली' म्हणजे प्रसिद्ध अनुवादाने अप्रसिद्ध अशी समागत विहित केली जाते. यापुढेही अनुवाद आणि अनुवाद्य भाव असाच समजला पाहिजे. ज्या पहेळिकेमध्ये दुसऱ्या अर्थासाठी रूढ असलेल्या शब्दाने, म्हणजेच दुसऱ्या अर्थामध्ये प्रसिद्ध असलेल्या रूढ शब्दाने फसवणूक केली जाते, ती 'वंचित' नावाची पहेळिका असू शकते. အတိဗျဝဟိတပ္ပယောဂါ [Pg.65] အတိသယေန အန္တရိတပယုဇ္ဇမာနပဒယုတ္တာ တတောယေဝ မောဟကာရိနီ သမ္မောဟကာရိကာ ပဟေဠိကာ ဥက္ကန္တာ နာမ. ယဿာ ပဟေဠိကာယ ပဒါဝလိ ပဒပန္တိ ဒုဗ္ဗောဓတ္ထာ ဒုရနုဗောဓာဘိဓေယျာ, သာ ပမုဿိတာ နာမ. अतिशय व्यवहित प्रयोगामुळे (म्हणजेच अत्यंत अंतराने वापरल्या गेलेल्या पदांनी युक्त असल्यामुळे) आणि म्हणूनच मोह निर्माण करणारी, संमोह निर्माण करणारी पहेळिका 'उत्क्रांत' (उक्कंत) नावाची असते. ज्या पहेळिकेची पदावली (पदपंक्ती) दुर्बोध अर्थाची (म्हणजेच समजण्यास कठीण अशा अभिधेयाची) असते, ती 'प्रमुषित' (पमुस्सित) नावाची असते. အမုချတ္ထာရောပါဟိတပဒါ အပ္ပဓာနတ္ထေ မုချတ္ထပကာသကသဒ္ဒါနံ ကိဉ္စိ သဓမ္မံ နိဿာယ အာရောပနတော ဥပဋ္ဌိတပဒယုတ္တာ သမာနရူပါ နာမ သိယာ. ပစ္စယာဒီဟိ ပစ္စယာဒေသာဒီဟိ ကထဉ္စိပိ ယေန ကေနစိ ပကာရေန ဇာတသဒ္ဒါ နိပ္ဖန္နသဒ္ဒါ ဖရုသာ နာမ. अमुख्य अर्थाच्या आरोपाने युक्त पदांची, म्हणजेच अप्रधान अर्थामध्ये मुख्य अर्थ प्रकट करणाऱ्या शब्दांच्या काही समान धर्माचा आश्रय घेऊन आरोप केल्यामुळे उपस्थित झालेल्या पदांनी युक्त असलेली 'समानरूपा' नावाची पहेळिका असू शकते. प्रत्यय इत्यादींमुळे (म्हणजेच प्रत्यय, आदेश इत्यादींमुळे) कशातरी प्रकारे (कोणत्याही प्रकारे) उत्पन्न झालेले शब्द किंवा निष्पन्न झालेले शब्द असलेली 'परुषा' (कठोर) नावाची असते. ယတ္ထ ယဿံ ပဟေဠိကာယံ သင်္ချာနံ ဂဏနံ ဝုတ္တမပိ ဗျာမောဟကာရဏံ ဟောတိ, သာ ပဟေဠိကာ သင်္ချာတာ နာမ သိယာ. ယတ္ထ ယဿံ ပဟေဠိကာယံ ဝါကျတ္ထော သမုဒါယတ္ထော အညထာ အညေန ပကာရေန အာဘာသတေ ဝိညာယတေ, သာ ပကပ္ပိတာ နာမ. ज्या पहेळिकेमध्ये संख्या किंवा गणना सांगितलेली असूनही ती व्यामोहाचे (भ्रमाचे) कारण बनते, ती पहेळिका 'संख्यात' नावाची असू शकते. ज्या पहेळिकेमध्ये वाक्याचा अर्थ (समुदाय अर्थ) दुसऱ्याच प्रकारे भासतो किंवा समजला जातो, ती 'प्रकल्पित' नावाची असते. ယဿာ ပဟေဠိကာယ နာမေ ပယုတ္တာဘိဓာနေ နာနတ္ထကပ္ပနာ ဝိဝိဓာဘိဓေယျကပ္ပနာ သမ္ဘဝတိ, သာ ပဟေဠိကာ နာမန္တရိကာ နာမ. တုလျတ္ထသုတိဟေတုတော သမာနတ္ထသဒ္ဒါနံ ပယောဂဟေတုယာ အဝဋ္ဌိတညတ္ထာ ပတိဋ္ဌိတအညတ္ထာ ဟောတိ, သာ နိဘူတာ နာမ. ज्या पहेळिकेमध्ये नावाच्या (वापरलेल्या संज्ञेच्या) बाबतीत नाना अर्थांची कल्पना (विविध अर्थांची कल्पना) संभवते, ती पहेळिका 'नामान्तरिका' नावाची असते. समान अर्थाच्या श्रवणामुळे (म्हणजेच समान अर्थाच्या शब्दांच्या प्रयोगामुळे) दुसरा अर्थ प्रस्थापित होतो, ती 'निभूत' नावाची असते. ယာ ပဟေဠိကာ ဣဋ္ဌသဒ္ဒပရိယာယသာဓိတာ ဣစ္ဆိတတ္ထသဒ္ဒဿ ဝေဝစနေဟိ နိပ္ဖာဒိတာ ဟောတိ, သာ သမာနသဒ္ဒါ နာမ. သာဓုကံ နိဒ္ဒိဋ္ဌတ္ထာပိ ဒဿိတအတ္ထယုတ္တာပိယာ မူဠှတာယေဝ သမ္မောဟဘာဝတ္ထံ ဧဝ ဘဝတိ, သာ သမ္မုဠှာ နာမ. जी पहेळिका इष्ट शब्दाच्या पर्यायांनी साधलेली (म्हणजेच इच्छित अर्थाच्या समानार्थी शब्दांनी निष्पन्न झालेली) असते, ती 'समानशब्दा' नावाची असते. जिचा अर्थ चांगल्या प्रकारे दर्शविलेला असूनही (किंवा दाखविलेल्या अर्थाने युक्त असूनही) केवळ मूढतेमुळेच (भ्रमामुळेच) संमोह निर्माण करणारी ठरते, ती 'संमूढा' नावाची असते. ယဿာ ပဟေဠိကာယ ဝိရစနေ နာမံ ဒဿိယမာနံ နာမံ သမ္ဗန္ဓဗာဟုလျာ သမ္ဗန္ဓဿ ဗဟုလဘာဝတော ဘဝတိ, သာ ပါရိဟာရိကီ နာမ. ယဿာ အာဓေယျံ ဗျဉ္ဇ အဘိဗျဉ္ဇိယ ပကာသေတွာ [Pg.66] နိဿယဂေါပနာ အာဓာရဂုတ္တိ ဘဝတိ, သာ ဧကစ္ဆန္နာ နာမ. ज्या पहेळिकेच्या रचनेत दर्शविले जाणारे नाव हे संबंधाच्या बाहुल्यामुळे (संबंधाच्या प्रचुरतेमुळे) असते, ती 'पारिहारिकी' नावाची असते. ज्या पहेळिकेमध्ये आधेय (आश्रित गोष्ट) स्पष्टपणे प्रकट करून आश्रयाचे गोपन (आधाराचे रक्षण) केले जाते, ती 'एकच्छन्ना' नावाची असते. ယဿာ ပယောဂေ ဥဘယဂေါပနာ ဥဘိန္နမာဓာရာဓေယျာနံ ဂေါပနာ ဘဝတိ, သာ ဥဘယစ္ဆန္နာ နာမ. ယဿာ နာနာလက္ခဏသင်္ကရော သမာဂတာဒိနာနာဝိဓလက္ခဏာနံ သင်္ကရော ဟောတိ, သာ သံကိဏ္ဏာ နာမ သိယာ. ज्या पहेळिकेच्या प्रयोगात उभयगोपन (म्हणजेच आधार आणि आधेय या दोन्हीचे गोपन) होते, ती 'उभयच्छन्ना' नावाची असते. ज्या पहेळिकेमध्ये नाना लक्षणांचा संकर (म्हणजेच समागत इत्यादी नाना प्रकारच्या लक्षणांचे मिश्रण) असतो, ती 'संकीर्ण' नावाची असू शकते. ဣဒါနိ သမာဂတာဒီနံ လက္ခိယံ ကမေန ဧဝံ ဉာတဗ္ဗံ – आता समागत इत्यादींचे उदाहरण क्रमाने याप्रमाणे समजून घ्यावे – ‘‘ပဘဝါ’နတဝိတ္တိဏ္ဏာ, တဝါ’ဏာ မဟတီ သတီ; စိရာယ ဇယတံ နာထ, ပဟုတဖလသာဓိနီ’’တိ. “हे नाथ! आपल्या प्रभावापासून पसरलेली, नम्र लोकांमध्ये विस्तारलेली, महान असलेली आपली आज्ञा विपुल फळ देणारी असून दीर्घकाळ विजयी असो.” အယံ သမာဂတာ. ही 'समागत' (पहेळिका) आहे. နာထ တဝ ပဘဝတော ပဋ္ဌာယ နတဝိတ္တိဏ္ဏာ ဩဏတဝသေန ပတ္ထဋာ, ဧဝံ သတိ နဒီ ဝိယ ဒိဿတိ. ပဘဝ ပကဋ္ဌတ္တ သောဘာဝန္တ. ဘော နာထ တဝ တုယှံ မဟတီ သတီ မဟန္တီ သမာနာ အာဏာ အာနတဝိတ္တိဏ္ဏာ အတ္တနိ နတေသု ဇနေသု ပတ္ထဋာ ပဟုတဖလသာဓိနီ ဗဟုလတ္ထနိပ္ဖာဒနီ စိရာယ စိရကာလံ ဇယတံ ဥက္ကံသဘာဝေန ပဝတ္တတု. ဧတ္ထ ပဘဝအာနတဣတိသန္ဓိနာ အတ္ထော ဂုဠှော. हे नाथ! आपल्या प्रभावापासून (उत्पत्तीपासून) नम्रतेने पसरलेली (विस्तारलेली), असे असताना ती नदीसारखी दिसते. 'प्रभव' म्हणजे उत्कृष्ट शोभा असणारे. हे नाथ! आपली (तुमची) महान असलेली आज्ञा, स्वतःकडे नम्र झालेल्या लोकांमध्ये पसरलेली, विपुल फळ देणारी (पुष्कळ अर्थ निष्पन्न करणारी) असून दीर्घकाळपर्यंत उत्कर्षाने प्रवृत्त राहो (विजयी असो). येथे 'प्रभव' आणि 'आनत' या संधीमुळे अर्थ गुप्त झाला आहे. ‘‘ဘဒ္ဒမေဝေါ’ပသေဝေယျ, ဝိဓူတမဒကိဗ္ဗိသံ; သမ္ပာပယေ ပုရံ ခေမံ, သ ဒန္တော’တ္တနိသေဝိတ’’န္တိ. “ज्याने मद आणि पाप धुवून टाकले आहे अशा भद्राचीच (कल्याणकारी पुरुषाची किंवा भद्र जातीच्या हत्तीची) सेवा करावी; तो दमित (संयमी किंवा प्रशिक्षित) असलेला आणि उत्तमांनी सेवित असलेला, सुरक्षित नगराप्रत पोहोचवतो.” အယံ ဝဉ္စိတာ. ही 'वंचित' (पहेळिका) आहे. ဝိဓူတမဒကိဗ္ဗိသံ ဝိနာသိတမဒဒေါသံ ဘဒ္ဒမေဝ မန္ဒပိယ – ဘဒ္ဒဇာတိကေသု ဟတ္ထီသု ဘဒ္ဒဇာတိကဟတ္ထိမေဝ ဥပသေဝေယျာတိ ဝုတ္တံ ဝိယ ဒိဿတိ. ဘဒ္ဒမေဝ ဥတ္တမပုရိသမေဝ သေဝေယျာတိ အတ္ထော. သေဝနံ ကိမတ္ထန္တိ စေ? ဟတ္ထိပက္ခေ ဒန္တော သိက္ခိတော သော ဟတ္ထိ အတ္တနိသေဝိတံ အတ္တာနံ ဘဇိတံ ဇနံ ခေမံ နိဗ္ဘယံ ပုရံ နဂရံ သမ္ပာပေတိ. ပုရိသပက္ခေ ပန [Pg.67] ဒန္တော ဒမိတော သော အရိယပုဂ္ဂလော အတ္တနိသေဝိတံ အတ္တာနမုပသေဝိတံ ဇနံ ခေမံ နိဒ္ဒုက္ခံ ပုရံ နိဗ္ဗာနပုရံ ပါပေတိ. ဧတ္ထ ကဝိစ္ဆိတဥတ္တမတ္ထတော အညေန ဟတ္ထိအတ္ထေ ရုဠှေန သဒ္ဒေန ဝဉ္စနာ နာမ. ज्याचा मद आणि दोष नष्ट झाला आहे अशा 'भद्र' (कल्याणकारी) चीच सेवा करावी – जणू काही भद्र जातीच्या हत्तींमध्ये भद्र जातीच्या हत्तीचीच सेवा करावी, असे म्हटल्यासारखे दिसते. परंतु 'भद्राचीच' म्हणजे 'उत्तम पुरुषाचीच सेवा करावी' असा अर्थ आहे. सेवा कशासाठी? असे विचारल्यास – हत्तीच्या पक्षात, 'दंत' म्हणजे प्रशिक्षित असलेला तो हत्ती स्वतःची सेवा करणाऱ्या (स्वेच्छेने आश्रय घेणाऱ्या) माणसाला सुरक्षित (भयमुक्त) अशा नगरात पोहोचवतो. तर पुरुषाच्या पक्षात, 'दंत' म्हणजे दमित (इंद्रियसंयम केलेले) ते आर्यपुद्गल स्वतःची सेवा करणाऱ्या (स्वतःचा आश्रय घेणाऱ्या) माणसाला सुरक्षित (दुःखरहित) अशा निर्वाणनगराप्रत पोहोचवतात. येथे कवीला अभिप्रेत असलेल्या उत्तम अर्थापेक्षा, हत्तीच्या अर्थात रूढ असलेल्या दुसऱ्या शब्दाने फसवणूक केली आहे. ‘‘ဗဟုဂုဏေ ပဏမတိ, ဒုဇ္ဇနာနံပျယံ ဇနော; ဟိတံ ပမုဒိတော နိစ္စံ, သုဂတံ သမနုဿရ’’န္တိ. “हा लोक दुर्जनांच्या देखील अनेक गुणांसमोर नतमस्तक होतो; म्हणून नेहमी प्रमुदित होऊन हितावह अशा सुगतांचे (बुद्धांचे) स्मरण करावे.” အယံ ဥက္ကန္တာ. ဣမဿတ္ထော ဥပရိ အာဂမိဿတိ. ही 'उत्क्रांत' (पहेळिका) आहे. याचा अर्थ पुढे येईल. ဗျာကိဏ္ဏဒေါသတ္တေ သတိပိ ပဟေဠိကာရုဠှတ္တာ ဧသာ ဣဋ္ဌာ. ဝုတ္တဉှိ ‘‘ပဟေဠိကာယမာရုဠှာ, န ဟိ ဒုဋ္ဌာ ကိလိဋ္ဌတာ’’တိ. ဣဟ သမ္ဗန္ဓီပဒါနံ အဋ္ဌာနဋ္ဌာပနေန ဗျဝဟိတတ္တံ ဟောတိ. व्याकीर्ण (विखुरलेले असणे) हा दोष असूनही पहेळिकेमध्ये रूढ असल्यामुळे ही इष्ट मानली जाते. कारण असे म्हटले आहे की – “पहेळिकेमध्ये रूढ झालेली क्लिष्टता दुष्ट (दोषयुक्त) मानली जात नाही.” येथे संबंधी पदांना अयोग्य ठिकाणी ठेवल्यामुळे व्यवहितत्व (अंतर) निर्माण होते. ‘‘မုခဖုလ္လံ ဂိင်္ဂမကံ, နိယုရုဂ္ဂတ္ထနုန္နတံ; ပဋစ္စရီ ဝရံ ပေါသော, ဘီရုယာ ဓာရယန္တိယာ’’တိ. “मुखफुल्ल, गिंगमक, नियुर, उग्गत्थन आणि उन्नत (असे अलंकार) धारण करणाऱ्या स्त्रीपेक्षा, जीर्ण वस्त्र परिधान करणारा पुरुष श्रेष्ठ आहे.” အယံ ပမုဿိတာ. ही 'प्रमुषित' (पहेळिका) आहे. မုခဖုလ္လံ တိလကာဒိံ ဂိင်္ဂမကံ ဧဝံနာမကံ ပသာဓနံ နိယုရုဂ္ဂတ္ထနုန္နတံ နိယုရံ ဝလယံ, ဥဂ္ဂတ္ထနံ ပယောဓရပဋံ, ဥန္နတံ နလာဋပဋာဒိကံ, မုခတော ဥန္နတာဘရဏဉ္စ ဓာရယန္တိယာ ဘီရုယာ ဣတ္ထိယာ ပဋစ္စရီ ဇိဏ္ဏဝတ္ထနိဝါသီ ပေါသော ပုရိသော ဝရံ ဥတ္တမော. ဧတ္ထ ဗဟုပယောဂရဟိတေဟိ သဒ္ဒေဟိ ရစိတတ္တာ အတ္ထဿ ဒုရဝဗောဓတာ. मुखफुल्ल म्हणजे टिळा इत्यादी, गिंगमक म्हणजे या नावाचे प्रसाधन, नियुर-उग्गत्थन-उन्नत म्हणजे नियुर म्हणजे कडे (वलय), उग्गत्थन म्हणजे स्तनपट (चोळी), उन्नत म्हणजे कपाळावरील पट्टी इत्यादी, आणि मुखावरील उन्नत आभूषणे धारण करणाऱ्या भिरू (स्त्री) पेक्षा पटच्चरी म्हणजे जीर्ण वस्त्र परिधान करणारा पोस (पुरुष) श्रेष्ठ (उत्तम) आहे. येथे व्यवहारात फारसे न वापरल्या जाणाऱ्या शब्दांनी रचना केल्यामुळे अर्थ समजणे कठीण झाले आहे. ‘‘နဝ’ဂ္ဂရတနာန’သ္မိံ, ဒိဿန္တိ ရတနာကရေ; ပုရိသာနေတ္ထ အဋ္ဌန္နံ, အဋ္ဌာ’သာဓာရဏာ’ပရ’’န္တိ. “या रत्नांच्या खाणीत नऊ श्रेष्ठ रत्ने दिसतात; त्यांपैकी आठ रत्ने आठ पुरुषांसाठी असाधारण आहेत आणि दुसरे (एक) साधारण आहे.” အယံ သမာနရူပါ. ही 'समानरूपा' (पहेळिका) आहे. အသ္မိံ ရတနာကရေ အဂ္ဂရတနာနိ နဝ ဒိဿန္တိ, ဧတ္ထ ဣမေသု ရတနေသု အဋ္ဌ ရတနာနိ အဋ္ဌန္နံ ပုရိသာနံ အသာဓာရဏာနိ, အပရံ ရတနံ သာဓာရဏံ. ဣမာနိ နဝ လောကုတ္တရာနိ စိတ္တီကတာဒိအတ္ထေန ‘‘ရတနာနီ’’တိ စ တပ္ပဘဝေါ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ [Pg.68]‘‘အာကရော’’တိ စ ကပ္ပိတောတိ အမုချတ္ထေသု ရတနာဒိသဒ္ဒါနမာရောပနံ ဟောတိ. या रत्नांच्या खाणीत नऊ श्रेष्ठ रत्ने दिसतात, येथे या रत्नांपैकी आठ रत्ने आठ पुरुषांसाठी असाधारण आहेत आणि दुसरे (एक) साधारण आहे. ही नऊ लोकोत्तर (धम्म) पूजनीयत्वाच्या अर्थाने 'रत्ने' आणि त्यांचा उगम असणारे सम्यक्संबुद्ध हे 'खाण' (आकर) आहेत अशी कल्पना केल्यामुळे अमुख्य अर्थांवर रत्ने इत्यादी शब्दांचा आरोप झाला आहे. ‘‘ဝိန္ဒန္တိ ဒေဝဂန္ဓဗ္ဗာ, ဟိမဝန္တမဟာတလေ; ရသဝန္တေ သရေ သတ္တ, န နာဂါပိ ဥပေါသထာ’’တိ. “देव आणि गंधर्व हिमालयाच्या विस्तीर्ण प्रदेशात रसयुक्त सरोवरांचा लाभ घेतात, परंतु उपोसथ नावाचे हत्ती (किंवा नाग) देखील तेथे जात नाहीत.” အယံ ဖရုသာ. ही 'परुषा' (पहेळिका) आहे. ဟိမဝန္တမဟာတလေ ဟိမာလယဿ မတ္ထကေ ရသဝန္တေ သောဒကေ သတ္တ သရေ အနောတတ္တာဒိကေ ဒေဝဂန္ဓဗ္ဗာ ဝိန္ဒန္တိ သေဝန္တိ, ဥပေါသထာ နာဂါပိ န ဝိန္ဒန္တိ. အယမပရတ္ထော. ဟိမဝန္တမဟာတလေ စန္ဒရံသိယုတ္တေ မဟာပါသာဒတလေ ဒေဝဂန္ဓဗ္ဗာ ကီဠမာနာ ဂန္ဓဗ္ဗာ ရသဝန္တေ မဓုရဂုဏယုတ္တေ သတ္တ သရေ ဝီဏာယ ဆဇ္ဇာဒိကေ သတ္တ သရေ ဝိန္ဒန္တိ, နာဂါပိ အရိယာပိ ဥပေါသထာပိ ဥပဝုတ္ထာပိ န ဝိန္ဒန္တိ နာနုဘဝန္တိ. ဧတ္ထ ဒိဗ္ဗန္တီတိ ဒေဝါ. ဥပေါသထော ဧတေသမတ္ထီတိ ဥပေါသထာတိ ဝိဂ္ဂဟော. လက္ခဏက္ကမတော ပသိဒ္ဓပစုရပယောဂတော အညဒတ္ထာ ယေန ကေနစိ လေသေန ပစ္စယာဒီနံ ဇာတသဒ္ဒဿ အတ္ထိတာ. हिमालय पर्वताच्या शिखरावर असलेल्या हिमवंताच्या विस्तीर्ण प्रदेशात, स्वादिष्ट आणि जलपूर्ण अशा अनोतत्त (अनवतप्त) इत्यादी सात सरोवरांचा देव आणि गंधर्व उपभोग घेतात व सेवा करतात, परंतु उपोसथ नाग देखील त्यांचा उपभोग घेत नाहीत. हा दुसरा अर्थ आहे. हिमवंताच्या विस्तीर्ण प्रदेशात, चंद्राच्या किरणांनी युक्त अशा महाप्रासादाच्या (भव्य वाड्याच्या) छतावर क्रीडा करणारे देव आणि गंधर्व, स्वादिष्ट व मधुर गुणांनी युक्त अशा सात स्वरांचा (सरोवरांचा) आणि वीणेच्या षड्ज इत्यादी सात स्वरांचा उपभोग घेतात; परंतु नाग, आर्य, उपोसथ किंवा उपवास करणारे देखील त्यांचा उपभोग घेत नाहीत, अनुभव घेत नाहीत. येथे जे क्रीडा करतात (किंवा प्रकाशतात) ते 'देव' होत. ज्यांच्याकडे उपोसथ (व्रत) आहे ते 'उपोसथ' होत, असा विग्रह आहे. लक्षणाच्या क्रमाने, प्रसिद्ध व विपुल प्रयोगामुळे आणि इतर कोणत्याही कारणाने किंवा प्रत्यय इत्यादींच्या योगाने 'जात' शब्दाचे अस्तित्व सिद्ध होते. ‘‘ဂီတသဒ္ဒေ သရာ ဒွေ ဒွေ, ဒွေ ဆဇ္ဇညတြ ဆဿရာ; ပဉ္စဝဏ္ဏံ ယထာ စက္ခု, ဆဗ္ဗဏ္ဏာ နာသိကာ တထာ’’တိ. “गीतस्वरांमध्ये दोन-दोन स्वर असतात, षड्ज वगळता इतर सहा स्वर दोन-दोन असतात; ज्याप्रमाणे डोळा पाच रंगांचा असतो, त्याचप्रमाणे नाक सहा रंगांचे असते.” အယံ သင်္ချာတာ. ही संख्याता (संख्याविषयक कूट) आहे. ဂီတသဒ္ဒေ သရာ ဒွေ ဟောန္တိ, ဆဇ္ဇ’ညတြ ဆဇ္ဇတော အညတြ ဆဇ္ဇံ ဝဇ္ဇေတွာ ဥသဘော ဂန္ဓာရော မဇ္ဈိမော ပဉ္စမော ဓေဝတော နိသာဒေါတိ. ဧတ္ထ ယုဂဠတော ဒွေ ဒွေ ဆဿရာ ဆသရဝန္တော. ယထာ စက္ခု ပဉ္စဝဏ္ဏံ ဟောတိ, တထာ ဧဝံ နာသိကာ ဆဗ္ဗဏ္ဏာ ဟောတိ, ဂီတသဒ္ဒေ ဤကာရအကာရသရဒွယသဗ္ဘာဝတော စ ဆဇ္ဇံ ဌပေတွာ ဥသဘာဒီသု သရာနံ တိဝိဓတ္တာ စ ‘‘စက္ခူ’’တိ သရဗျဉ္ဇနဝသေန ပဉ္စဝဏ္ဏာနံ သဗ္ဘာဝတော စ ‘‘နာသိကာ’’တိ ဆန္နံ သဗ္ဘာဝတော စ ဧဝံ ဝုတ္တံ. ဧတ္ထ ဝုတ္တသင်္ချာဂီတာဒိသဒ္ဒသန္နိဋ္ဌာနတော သမ္မောဟကာရိနီ ဟောတိ. गीतस्वरांमध्ये दोन स्वर असतात. 'षड्ज वगळता' म्हणजे षड्ज सोडून ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत आणि निषाद हे होत. येथे जोडीने दोन-दोन असे सहा स्वर आहेत. ज्याप्रमाणे डोळा पाच रंगांचा असतो, त्याचप्रमाणे नाक सहा रंगांचे असते. गीतशब्दात 'ई'कार आणि 'अ'कार या दोन स्वरांच्या अस्तित्वामुळे, आणि षड्ज वगळता ऋषभ इत्यादींमध्ये स्वरांच्या त्रिविधतेमुळे, तसेच 'चक्खु' (डोळा) या शब्दात स्वर आणि व्यंजनांच्या रचनेनुसार पाच वर्णांचे (अक्षरांचे) अस्तित्व असल्यामुळे आणि 'नासिका' (नाक) या शब्दात सहा वर्णांचे अस्तित्व असल्यामुळे असे म्हटले आहे. येथे सांगितलेली संख्या, गीत इत्यादी शब्दांच्या निश्चितीमुळे संभ्रम निर्माण करणारी ठरते. ‘‘ပါတု [Pg.69] ဝေါ ဥဒိတော ရာဇာ, သိရိမာ ရတ္တမဏ္ဍလော; သကန္တိဂဟနက္ခတ္တ-သံဃယုတ္တော သုလက္ခဏော’’တိ. “उदित झालेला, शोभासंपन्न, रक्तवर्ण मंडल (किंवा अनुरक्त राष्ट्रमंडल) असलेला, स्वतःच्या कांतीने आणि ग्रह-नक्षत्रांच्या समूहाने युक्त असलेला आणि शुभ लक्षणांनी युक्त असलेला राजा तुमचे रक्षण करो.” အယံ ပကပ္ပိတာ. ही प्रकल्पिता (कल्पित कूट) आहे. သိရိမာ သိရိမန္တော ရတ္တမဏ္ဍလော အနုရတ္တဇနပဒမဏ္ဍလော, အနုရတ္တအမစ္စမဏ္ဍလော ဝါ သကန္တိဂဟနက္ခတ္တသံဃယုတ္တော သကဿ အတ္တနော အန္တေ သမီပေ ဂဟနေဟိ အဝိရဠေဟိ ခတ္တသံဃေဟိ ခတ္တိယသမူဟေဟိ ယုတ္တော သံယုတ္တော သုလက္ခဏော ပသတ္ထပုရိသလက္ခဏော ဥဒိတော ပသိဒ္ဓေါ ရာဇာ နရိန္ဒော ဝေါ တုမှေ ပါတု ရက္ခတူတိ အယံ အနဓိပ္ပေတတ္ထော. သိရိမာ ‘‘လက္ခိယာ ဝါသဋ္ဌာနတ္တာ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ သိရိမန္တော ရတ္တမဏ္ဍလော ဥဂ္ဂမနေ ရတ္တမဏ္ဍလော သကန္တိဂဟနက္ခတ္တသံဃယုတ္တော ကန္တိသဟိတေဟိ ဂဟနက္ခတ္တတာရဂဏေဟိ ယုတ္တော သုလက္ခဏော သုဋ္ဌု သသလက္ခဏော ဥဒိတော ဥဂ္ဂတော ရာဇာ စန္ဒော ဝေါ တုမှေ ပါတူတိ ဥဘယပက္ခဿ သာဓာရဏဂုဏဂုဏီပဒပရိဂ္ဂဟေန ဣဓ ဝါကျတ္ထဿ အညထာ ဒိဿမာနတာ ဟောတိ. शोभासंपन्न म्हणजे ऐश्वर्यशाली; रक्तमंडल म्हणजे अनुरक्त (प्रेमळ) प्रजाजन असलेले मंडल किंवा अनुरक्त अमात्य (मंत्री) मंडल; स्वतःच्या कांतीने आणि ग्रह-नक्षत्रांच्या समूहाने युक्त म्हणजे स्वतःच्या जवळ दाट असलेल्या क्षत्रियांच्या समूहाने युक्त; शुभ लक्षणांनी युक्त म्हणजे प्रशंसनीय पुरुषलक्षणांनी युक्त; उदित झालेला म्हणजे प्रसिद्ध असलेला राजा (नरेंद्र) तुमचे रक्षण करो, हा येथे अनपेक्षित (गूढ) अर्थ आहे. 'लक्ष्मीचे निवासस्थान असल्यामुळे' शोभासंपन्न, उगवताना तांबडे मंडल असलेला, स्वतःच्या कांतीने आणि ग्रह, नक्षत्र व तारांच्या समूहाने युक्त असलेला, सशाच्या चिन्हाने (शशलक्षण) सुशोभित असलेला, उदित झालेला राजा चंद्र तुमचे रक्षण करो, असा दोन्ही पक्षांना लागू पडणारा साधारण गुण आणि गुणी पदांचा स्वीकार केल्यामुळे येथे वाक्याचा अर्थ वेगळा दिसून येतो. ‘‘ဝုစ္စတာ’ဒေါ ဣသိတျေ’ကော, သုမဟန္တောပကာရဝါ; သနာတနော စ န ဣသိ, န သခါ န သနာတနော’’တိ. “सुरुवातीला ज्याला 'इषि' (ऋषी) म्हटले जाते, जो अत्यंत उपकारक आहे, जो सनातन (शाश्वत) आहे, तरीही तो ऋषी नाही, मित्र नाही आणि सनातनही नाही.” အယံ နာမန္တရိကာ. ही नामन्तरिका (नावाच्या अंतर्गत अक्षरांचे कूट) आहे. ဧကော အာဒေါ ပုဗ္ဗေ ‘‘ဣသီ’’တိ ဝုစ္စတိ, သုမဟန္တောပကာရဝါ အတိမဟန္တောပကာရသမန္နာဂတော သနာတနော စ သဿတော စ ဟောတိ, တထာပိ န ဣသိ ဣသိ နာမ န ဟောတိ, န သခါ မိတ္တောပိ န ဟောတိ, န သနာတနော သဿတောပိ န ဟောတိ, အယံ ဂမျမာနတ္ထော. သုမဟာ အတိမဟန္တော ဧကော အာဒေါ နာမာဒိမှိ ဣသီတိ ဝုစ္စတိ, အန္တော မဇ္ဈေ ပကာရဝါ ပ-ကာရေန သမန္နာဂတော, သနာတနော စ သဿတော စ ဟောတိ, ဣသိပိ နာမ န ဟောတိ, မိတ္တောပိ န ဟောတိ, သော နာတနော တနဣတိ အက္ခရဒွယရဟိတော န [Pg.70] ဟောတိ. အာဒိမဇ္ဈာနံ ဝုတ္တတ္တာ အန္တေတိ ဉာယတိ, ‘‘ဣသိပတနဝိဟာရော’’တိ ဂဟေတဗ္ဗံ. တတ္ထ ဣသိပတနနာမေန ဣသိအာဒီနံ ဂမျမာနတ္ထတ္တာ နာနတ္ထကပ္ပနာ ဟောတိ. सुरुवातीला एकाला 'इषि' (ऋषी) म्हटले जाते, जो अत्यंत उपकारक आहे आणि सनातन (शाश्वत) आहे, तरीही तो ऋषी नाही, मित्र (सखा) नाही आणि सनातनही नाही, हा समजणारा अर्थ आहे. 'सुमहा' म्हणजे अत्यंत मोठा; सुरुवातीला 'इषि' असे म्हटले जाते, शेवटी आणि मध्ये 'पकारवान' म्हणजे 'प' कारने युक्त आहे, आणि तो सनातन (शाश्वत) आहे; तो ऋषीही नाही, मित्रही नाही, आणि तो 'नातन' म्हणजे 'तन' या दोन अक्षरांनी रहित नाही. सुरुवातीचे आणि मधले सांगितले असल्यामुळे शेवटी काय आहे हे समजते, म्हणून 'इसिपतन विहार' असा अर्थ घ्यावा. तेथे 'इसिपतन' या नावाने ऋषी इत्यादी अर्थ ध्वनित होत असल्यामुळे विविध अर्थांची कल्पना होते. ‘‘ဓာဝန္တံ ဥဒယာ အတ္ထံ, မုဟုတ္တံ န နိဝတ္တတိ; န စန္ဒမဏ္ဍလံ ဧတံ, နာပိ အာဒိစ္စမဏ္ဍလ’’န္တိ. “उदयापासून अस्त होईपर्यंत धावणारे, जे एका क्षणासाठीही थांबत नाही; ते चंद्राचे मंडल नाही आणि सूर्याचे मंडलही नाही.” အယံ နိဘူတာ. ही निभूता (गुप्त किंवा लपविलेले कूट) आहे. ဥဒယာ ဥဒယတော ပဘုတိ အတ္ထံ ယာဝ အတ္ထံ ဓာဝန္တံ ဇဝန္တံ မုဟုတ္တံ မုဟုတ္တကာလံ န နိဝတ္တတိ န ပုနာဝတ္တတိ. ဧတံ စန္ဒမဏ္ဍလမ္ပိ န ဟောတိ, အာဒိစ္စမဏ္ဍလမ္ပိ န ဟောတိ. ဥဒယာ ပဋိသန္ဓိတော အတ္ထံ ယာဝစုတိ. ဓာဝန္တန္တိ အာယုကိစ္စတော အာယုစန္ဒာဒီနမတ္ထာနံ, တပ္ပကာသကသဒ္ဒါနဉ္စ တုလျတ္တာ ဧတ္ထ ပတိဋ္ဌိတစန္ဒာဒိအတ္ထန္တရာနံ သမ္ဘဝေါ. उदयापासून म्हणजे उगवल्यापासून अस्तापर्यंत वेगाने धावणारे, जे एका क्षणासाठीही मागे फिरत नाही. हे चंद्रमंडलही नाही आणि सूर्यमंडलही नाही. 'उदय' म्हणजे प्रतिसंधी (जन्म) आणि 'अस्त' म्हणजे च्युती (मृत्यू). 'धावणारे' म्हणजे आयुष्याच्या कार्यामुळे आयुष्य, चंद्र इत्यादी अर्थांचे आणि ते प्रकट करणाऱ्या शब्दांचे साम्य असल्यामुळे, येथे चंद्र इत्यादी व्यतिरिक्त इतर अर्थांचा संभव होतो. ‘‘ဒေဝိံ ကိတ္တိမဟီနာမံ, ကဠာရတ္ထဝှယံ ပုရိံ; ဟိတွာ န သရိ သော ဓီရော, ကရောန္တောပျု’ယျမဝှယ’’န္တိ. “'कीर्तिमही' नावाच्या देवीचा आणि 'कळार' नावाच्या नगराचा त्याग करून, 'उय्यम' नावाचा प्रयत्न करत असतानाही त्या धीर पुरुषाने त्यांचे स्मरण केले नाही.” အယံ သမာနသဒ္ဒါ. ही समानशब्दा (समानार्थी शब्दांचे कूट) आहे. ကိတ္တိမဟီနာမံ ကိတ္တိမဟီနံ ဒွိန္နံ နာမေန သမန္နာဂတံ ဒေဝိံ အဂ္ဂမဟေသိံ ကဠာရတ္ထဝှယံ ပုရိံ ကဠာရအတ္ထာနံ ဒွိန္နံ နာမေန သမန္နာဂတံ ပုရိံ နဂရဉ္စ သော ဓီရော ဟိတွာ ပရိစ္စဇိတွာ ဥယျမဝှယံ ဥယျမနာမေန သမန္နာဂတံ ကရောန္တော အပိ န သရိ သမ္ပတ္တိံ နာနုသရိ, ယသောဓရာဒေဝိဉ္စ ကပိလဝတ္ထုပုရိဉ္စ ဟိတွာ ဝီရိယသင်္ခါတပဓာနံ ကရောန္တော မဟာသတ္တော သမ္ပတ္တိံ န သရိ, ဧတ္ထာဘိမတယသောဓရာဒိသဒ္ဒါနံ ပရိယာယေဟိ ကိတ္တိမဟီသဒ္ဒါဒီဟိ ရစိတတာ. कीर्तिमही म्हणजे 'कीर्ती' आणि 'मही' या दोन नावांनी युक्त असलेल्या देवीचा (अग्रमहिषीचा), आणि 'कळार' व 'अत्थ' या दोन नावांनी युक्त असलेल्या नगराचा त्याग करून, त्या धीर पुरुषाने 'उय्यम' (उद्योग/प्रयत्न) नावाचा पुरुषार्थ करत असतानाही त्या वैभवाचे स्मरण केले नाही. यशोधरा देवी आणि कपिलवस्तू नगर यांचा त्याग करून वीर्य (प्रयत्न) नावाचे प्रधान कार्य करत असताना महासत्त्वांनी (बोधिसत्त्वांनी) वैभवाचे स्मरण केले नाही. येथे अभिप्रेत असलेल्या यशोधरा इत्यादी शब्दांची रचना 'कीर्तिमही' इत्यादी पर्यायी शब्दांद्वारे केली गेली आहे. ‘‘စတုဒ္ဒိသာမုခါ ဗန္ဓာ, စတ္တာရော သိန္ဓဝါ သယံ; ပရိဘုဉ္ဇန္တိ နိက္ခိတ္တံ, တိဏံ မဇ္ဈေ ယထာသုခ’’န္တိ. “चारही दिशांकडे तोंड करून बांधलेले चार सिंधू घोडे, मध्ये टाकलेले गवत स्वतःच्या इच्छेनुसार आनंदाने खातात.” အယံ သမ္မုဠှာ. ही संमूढा (भ्रम निर्माण करणारे कूट) आहे. သိန္ဓဝါ [Pg.71] စတ္တာရော အဿာ စတုဒ္ဒိသာမုခါ ယထာ စတုဒ္ဒိသာသမ္မုခါ ဟောန္တိ, တထာ ဗန္ဓာ မဇ္ဈေ နိက္ခိတ္တံ တိဏံ သယံ ယထာသုခံ ပရိဘုဉ္ဇန္တိ, အညမညံ ပိဋ္ဌိံ ကတွာ ဗန္ဓာ ဝိယ ခါယတိ, တေ ပန သမ္မုခံ ကတွာ ဗန္ဓာ ဟောန္တိ. ဧတ္ထ ‘‘စတုဒ္ဒိသာမုခါဗန္ဓာ’’တိ နိဒ္ဒိဋ္ဌတ္တာ ပိဋ္ဌိံ ကတွာ ဗန္ဓာတိ သမ္မုဠှတာ ဟောတိ. चार सिंधू घोडे चारही दिशांकडे तोंड करून जसे बांधलेले असतात, तसेच ते मध्ये टाकलेले गवत स्वतःच्या इच्छेनुसार खातात. ते एकमेकांकडे पाठ करून बांधल्यासारखे वाटतात, परंतु प्रत्यक्षात ते एकमेकांसमोर तोंड करून बांधलेले असतात. येथे 'चारही दिशांकडे तोंड करून बांधलेले' असे म्हटल्यामुळे, ते एकमेकांकडे पाठ करून बांधले आहेत असा भ्रम निर्माण होतो. ‘‘ဇနော ဇီဝနဇာနန္ဒ-ကရဗန္ဓုဿ ဘာသိတံ; သက္ကရောန္တောဝ ပပ္ပောတိ, ပုညာရိက္ခယဂေါစရေ’’တိ. “लोक जीवनाला आनंद देणाऱ्या मित्राच्या (किंवा बंधूच्या) भाषणाचा आदर करतच पुण्य आणि अरि (शत्रू) यांच्या नाशाच्या स्थानाला (म्हणजेच निर्वाणाला) प्राप्त होतात.” အယံ ပါရိဟာရိကီ. ही 'पारिहारिकी' (पहेळिका) आहे. ဇီဝနဇာနန္ဒကရဗန္ဓုဿ ဇီဝနတော ဥဒကတော ဇာတာနံ ပဒုမာနံ အာနန္ဒကရဿ သူရိယဿ ဗန္ဓုဿ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဘာသိတံ ဝစနံ သက္ကရောန္တော ပူဇေန္တော ဇနော ပုညာရိက္ခယဂေါစရေ ပုညာနံ ပဋိပက္ခတ္တာ ပုညာရိသင်္ခါတာနံ အကုသလာနံ ခယဿ နိမိတ္တဘူတံ နိဗ္ဗာနမာရမ္မဏံ ကတွာ ဥပ္ပန္နေ မဂ္ဂဖလေ ပပ္ပောတိ ပါပုဏာတိ. ဧတ္ထ ဇီဝနဇာနံ အာနန္ဒကရဿ ဗန္ဓုဿေတိ စ, ပုညာရီနံ ခယနိမိတ္တံ အာရမ္မဏံ ကတွာ ပဝတ္တေတိ စ ဣမိနာ ဗုဒ္ဓေါ မဂ္ဂဖလာ စ ပါရမ္ပရိယေန သမ္ဗန္ဓေန ဝုတ္တာတိ သမ္ဗန္ဓာနံ ဗာဟုလ္လဘာဝေါ. पाण्यातून (जीवन) उत्पन्न झालेल्या कमळांना आनंद देणाऱ्या सूर्याचे जे बंधू (समान) आहेत, अशा सम्यक्संबुद्धांच्या भाषित वचनाचा सत्कार व पूजा करणारा मनुष्य, पुण्याच्या शत्रूंच्या (पुण्यारि म्हणजेच अकुशलांच्या) क्षयाच्या विषयात, पुण्याच्या विरोधी असलेल्या 'पुण्यारि' संज्ञक अकुशलांच्या क्षयाचे निमित्त असलेल्या निर्वाणाला आलंबन करून उत्पन्न झालेल्या मार्गफलाला प्राप्त करतो. येथे 'जिवनजांना (कमळांना) आनंद देणाऱ्याचा बंधू' आणि 'पुण्यारींच्या (अकुशलांच्या) क्षयाचे निमित्त आलंबन करून प्रवृत्त होणारे' याने बुद्ध आणि मार्गफल हे परंपरेच्या संबंधाने सांगितले आहेत, म्हणून संबंधांचे बाहुल्य आहे. ‘‘န ဂဏှာတိ မဟန္တမ္ပိ, သဒ္ဒံ န စ ဝိဘူသနံ; စတုပ္ပဒဿ ကဿာပိ, ကဏ္ဏောယံ န ကိလာဖလော’’တိ. “हा कोणत्याही चतुष्पादाचा (चार पायांच्या प्राण्याचा) कान मोठा आवाजही ग्रहण करत नाही आणि अलंकारही ग्रहण करत नाही, तरीही हा कान निष्फळ (अफल) नाही.” အယံ ဧကစ္ဆန္နာ. ही 'एकच्छन्ना' (एक गुप्त असलेली प्रहेलिका) आहे. ကဿာပိ စတုပ္ပဒဿ ကဏ္ဏော မဟန္တမ္ပိ သဒ္ဒံ န ဂဏှာတိ, အာရမ္မဏံ န ကရောတိ, ဝိဘူသနမ္ပိ န ဂဏှာတိ. တထာပိ အယံ ကဏ္ဏော အဖလော န ကိလ, သဖလတော နိပ္ဖလော န ဟောတိ ကိရ. အဿကဏ္ဏော ရုက္ခော. ဧတ္ထ ကဏ္ဏောတိ အာဓေယျံ ကတွာ တဒါဓာရဿ အဝစနတော နိဿယဂုတ္တိ. कोणत्याही चतुष्पादाचा कान मोठा आवाजही ग्रहण करत नाही, आलंबन करत नाही आणि अलंकारही ग्रहण करत नाही. तरीही हा कान निष्फळ नाही, सार्थ असल्यामुळे तो निरुपयोगी होत नाही. (तो म्हणजे) 'अश्वकर्ण' नावाचा वृक्ष होय. येथे 'कर्ण' (कान) हे आधेय करून त्याच्या आधाराचे (अश्व/घोड्याचे) ग्रहण न केल्यामुळे ही 'निस्रयगुत्ती' (आश्रयगुप्तता) आहे. ‘‘အလင်္ကရောန္တော [Pg.72] ဘုဝနံ, သဿိရိကော သဒေဝကံ; ကသ္မိံ သဉ္ဇာတသံဝဒ္ဓေါ, ကော ကေန နုပလိမ္ပတီ’’တိ. “देवांसह संपूर्ण भुवनाला सुशोभित करणारा, शोभायमान असणारा, कशामध्ये उत्पन्न होऊन वाढलेला कोण, कशाने लिप्त होत नाही?” အယံ ဥဘယစ္ဆန္နာ. ही 'उभयच्छन्ना' (दोन्ही गुप्त असलेली प्रहेलिका) आहे. သဿိရိကော သဒေဝကံ ဘုဝနံ အလင်္ကရောန္တောတိ ဗုဒ္ဓေါ ဝိယ ခါယတိ. ဘုဝနံ ဘုဝနသင်္ခါတံ ကံ ဇလံ သဒါ ဧဝ အလင်္ကရောန္တော သဿိရိကော လက္ခိယသမန္နာဂတော ကသ္မိံ ဇလေ သဉ္ဇာတသံဝဒ္ဓေါ ကော ကတရော ကေန ဇလေန န ဥပလိမ္ပတိ န လိမ္ပတိ. ပဒုမောတိ ဝိသဇ္ဇနံ. ပဒုမော ဟိ ပုံနပုံသကလိင်္ဂေါ. ဣဟ ဇလပဒုမာနံ ဒွိန္နမ္ပိ ဆာဒိတတ္တာ ဥဘယစ္ဆန္နာ နာမ. 'देवांसह भुवनाला सुशोभित करणारा शोभायमान' असे म्हटले असता ते बुद्धांप्रमाणे भासतात. 'भुवन' म्हणजे भुवनसंज्ञक 'क' (जल) याला नेहमी सुशोभित करणारा, शोभायमान व लक्षणांनी युक्त असलेला, कोणत्या पाण्यात उत्पन्न होऊन वाढलेला कोणता (पदार्थ) कोणत्या पाण्याने लिप्त होत नाही? 'पदुम' (कमळ) हे याचे उत्तर आहे. कारण 'पदुम' हा शब्द पुल्लिंगी व नपुंसकलिंगी दोन्ही आहे. येथे जल आणि कमळ या दोन्हीचे आच्छादन (गुप्तता) असल्यामुळे याला 'उभयच्छन्ना' म्हणतात. ‘‘အာဒေါ သောယေဝ ယော အန္တေ, မဇ္ဈိမဿာဒိ မဇ္ဈိမော; သိဒ္ဓန္တာဒီသု ဝတ္တန္တံ, အသင်္ခတပဒံ ဝဒါ’’တိ. “जो सुरुवातीला आहे तोच शेवटी आहे, जो मधल्या अक्षराचा सुरुवातीचा वर्ण आहे तोच मध्यभागी आहे; सिद्धांत इत्यादींमध्ये वर्तणारा, त्या असंस्कृत (असंखत) पदाला सांग.” အယံ သံကိဏ္ဏာ. ही 'संकीर्णा' (मिश्र प्रहेलिका) आहे. အန္တေ အဝသာနေ ယော ဟောတိ, အာဒေါပိ သောယေဝ ဟောတိ, မဇ္ဈိမဿ အာဒိဘူတော မဇ္ဈိမော ဧဝ ဟောတိ, သိဒ္ဓံ နိပ္ဖန္နံ တာဒီသု အရိယေသု ဝတ္တန္တံ အသင်္ခတပဒံ ဝဒ ကထေဟီတိ အယမပရတ္ထော. အာဒေါ အာဒိမှိ သောယေဝ သကာရော ဧဝ အန္တေ ပရိယောသာနေ ယော ယကာရောယေဝ, မဇ္ဈိမော မဇ္ဈိမဝဏ္ဏော မဇ္ဈိမဿ သဒ္ဒဿ အာဒိ မကာရော, သိဒ္ဓန္တာဒီသု မတသမယကာလာဒီသု ဝတ္တန္တံ ဝါစကဘာဝေန ပဝတ္တန္တံ အသင်္ခတပဒံ သင်္ခတတော အညတ္တာ အသင်္ခတဘူတံ ပညတ္တိံ ဝဒ ကထေဟီတိ. သမယသဒ္ဒေါ ဟိ နာမပညတ္တိ. ဧတ္ထ သိဒ္ဓန္တသဒ္ဒေန အာဒိသဒ္ဒဿ သင်္ဂဟိတတ္တာ တာဒိအတ္ထော လဗ္ဘတီတိ အတ္ထဿ ဂုဠှတာယ သမာဂတာလက္ခဏေန စ ‘‘သော’’တိ ‘‘ယော’’တိ ‘‘အသင်္ခတပဒ’’န္တိ အညတ္ထရုဠှသဒ္ဒေန ဝဉ္စိတတ္တာ ဝဉ္စိတာလက္ခဏေန စ သမယသဒ္ဒေ နာနတ္ထကပ္ပနတော နာမန္တရိကာလက္ခဏေန စာတိ တီဟိပိ လက္ခဏေဟိ မိဿိတောတိ. သေသေသုပိ သံကိဏ္ဏတ္တံ ဧဝမေဝ [Pg.73] ဝေဒိတဗ္ဗံ. တတ္ထ တတ္ထ ဝုတ္တလက္ခဏာနုသာရေနေဝ သမာဂတာဒီနံ အနွတ္ထသညတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. शेवटी (अंतामध्ये) जो असतो, सुरुवातीलाही तोच असतो; मधल्या अक्षराचा जो आदिभूत आहे तोच मध्यभागी असतो; सिद्ध (निष्पन्न) झालेल्या अशा अर्हतांमध्ये वर्तणाऱ्या असंस्कृत (असंखत) पदाला सांग (कथन कर) - हा दुसरा अर्थ आहे. सुरुवातीला (आदीमध्ये) जो 'स'कार आहे, तोच शेवटी (अंतामध्ये) 'य'कार आहे; मध्यभागी असलेला मध्यम वर्ण हा 'मज्झिम' शब्दाचा आदिभूत 'म'कार आहे; सिद्धांत इत्यादींमध्ये म्हणजेच मत, समय, काळ इत्यादींमध्ये वाचकभावाने वर्तणाऱ्या, संस्कृत (संखत) पेक्षा भिन्न असल्यामुळे असंस्कृत (असंखत) झालेल्या संज्ञेला (प्रज्ञप्तीला) सांग (कथन कर). कारण 'समय' हा शब्द नामप्रज्ञप्ती (संज्ञा) आहे. येथे 'सिद्धांत' शब्दाने 'आदि' शब्दाचा संग्रह झाल्यामुळे तसा अर्थ प्राप्त होतो, म्हणून अर्थाच्या गूढतेमुळे 'समागत लक्षण', तसेच 'सो' (तो), 'यो' (जो), 'असंखतपद' या अन्य अर्थांत रूढ असलेल्या शब्दांनी फसवणूक झाल्यामुळे 'वंचित लक्षण', आणि 'समय' शब्दात अनेक अर्थांची कल्पना केल्यामुळे 'नामान्तरिका लक्षण' अशा तिन्ही लक्षणांचे मिश्रण आहे. उरलेल्यांमध्येही संकीर्णता याच प्रकारे जाणावी. त्या त्या ठिकाणी सांगितलेल्या लक्षणानुसारच 'समागत' इत्यादींची सार्थ संज्ञा जाणावी. ၃၄. ३४. ဒေသကာလကလာလောက-ဉာယာဂမဝိရောဓိ ယံ; တံ ဝိရောဓိပဒံ စေ’တ-မုဒါဟရဏတော ဖုဋံ. “देश, काळ, कला, लोक, न्याय आणि आगम यांच्याशी जे विरोधी आहे, त्याला 'विरोधी पद' म्हणतात, आणि हे उदाहरणावरून स्पष्ट होते.” ၃၄. ‘‘ဒေသိ’’စ္စာဒိ. ဒေသော ထလဇလဒေသာဒိ. ကာလော ရတ္တိန္ဒိဝေါ. ကလာ နစ္စဂီတာဒယော. လောကော စရာစရဘူတပ္ပဝတ္တိ. ဉာယော ယုတ္တိ. အာဂမော ဣဓ ဗုဒ္ဓဝစနံ. အညတ္ထ တု သုတိဓမ္မသံဟိတာ, တေ စ. တေဟိ ဝိရောဓော အဿ အတ္ထီတိ ဒေသ…ပေ… ဝိရောဓိ. ယန္တိ အနုဝဒိတွာ. တံ ဝိရောဓိပဒန္တိ ဝိဓီယတေ. ဧတဉ္စ ပဒံ ဥဒါဟရဏတော လက္ခိယတော ဖုဋံ ပါကဋံ. ယတော ဇလဇာဒီနံ ထလာဒီသု ပါတုဘာဝါဒိ, ရတျာဒီသု သမ္ဘဝန္တာနံ ကုသုမာဒီနံ ဒိဝါဒီသု သမ္ဘဝေါ စ, ‘‘နစ္စဂီတာဒိစတုသဋ္ဌိယာ ကလာသု ဘိန္နဆဇ္ဇော နာမ သတ္တသရော’’တိအာဒိနာ ကလာသတ္ထာဘိဟိတလက္ခဏာတိက္ကမဝိရောဓော စ, ‘‘အဂ္ဂိသီတလော, နိဿာရော ခဒိရော’’တိအာဒိနာ လောကသီမာတိက္ကမော စ, ဝုတ္တာယပါ’နရုပ္ပတ္တသမုပ္ပတ္တိယာ မိဒ္ဓဿ ရူပဘာဝါပါဒနာဒိဉာယဝိရောဓော စ, ယထာသကမာဂမေန ဝိရောဓော စ သုခေန စ သက္ကာ ပါကဋတ္တာ ဝိညာတုံ, တတော သဗ္ဗမေတံ နောဒါဟဋန္တိ အဓိပ္ပာယော. ३४. 'देसि' इत्यादी. 'देश' म्हणजे स्थल, जल देश इत्यादी. 'काळ' म्हणजे रात्र आणि दिवस. 'कला' म्हणजे नृत्य, गीत इत्यादी. 'लोक' म्हणजे चराचर प्राण्यांची प्रवृत्ती. 'न्याय' म्हणजे युक्ती. 'आगम' म्हणजे येथे बुद्धवचन; अन्य ठिकाणी मात्र श्रुती आणि धर्मसंहिता इत्यादी. त्यांच्याशी ज्याचा विरोध आहे तो 'देश... इत्यादी विरोधी' होय. 'यम्' (जे) याचा अनुवाद करून 'ते विरोधी पद' असे विधान केले जाते. आणि हे पद उदाहरणावरून (लक्ष्यावरून) स्पष्ट व प्रकट होते. कारण जलज (पाण्यात उत्पन्न होणारे) इत्यादींचा स्थलावर प्रादुर्भाव होणे इत्यादी, रात्री उमलणाऱ्या फुलांचे दिवसा उमलणे इत्यादी, 'नृत्य, गीत इत्यादी चौसष्ट कलांमध्ये भिन्नषड्ज नावाचा सातवा स्वर आहे' इत्यादी कलाशास्त्रात सांगितलेल्या लक्षणांचे उल्लंघन केल्यामुळे होणारा विरोध, 'अग्नी शीतल आहे, खैर (खदिर) निस्सार आहे' इत्यादी लोकसीमेचे उल्लंघन करणे, सांगितलेल्या किंवा न सांगितलेल्या उत्पत्तीच्या संबंधाने 'मिद्ध' (आळस/तंद्रा) याला रूपभाव प्राप्त करून देणे इत्यादी न्यायविरोध, आणि आपापल्या आगमाशी होणारा विरोध हा स्पष्ट असल्यामुळे सहजपणे समजता येतो, म्हणून हे सर्व उदाहरणाने दाखवले नाही, असा अभिप्राय आहे. ၃၄. ဧဝံ ယမကပဟေဠိကာနမဒဿနေ ကာရဏံ ဝတွာ ဣဒါနိ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန သမ္ပတ္တဝိရောဓိဒေါသံ ‘‘ဒေသကာလိ’’စ္စာဒိနာ ဝဒတိ. ယံ ပဒံ ဒေသော ထလဇလပဗ္ဗတာဒိ. ကာလော ရတ္တိန္ဒိဝေါ ဟေမန္တာဒိဝသေန တိဝိဓော, ဝသန္တာဒိဝသေန ဆဗ္ဗိဓော. ကလာ နစ္စဂီတာဒိစတုသဋ္ဌိ. လောကော ထာဝရဇင်္ဂမဘူတပဝတ္တိသင်္ခါတော. ဉာယော ယုတ္တိ. အာဂမော ဣဟ ဗုဒ္ဓဝစနံ, အညတ္ထ ပန သုတိဓမ္မသံဟိတော စ. တေဟိ ဝိရောဓော အဿ အတ္ထီတိ ဒေသ…ပေ… ဝိရောဓိ. တံ ဝိရောဓိပဒံ နာမ. [Pg.74] ဧတံ ဝိရောဓိပဒံ ဥဒါဟရဏတော လက္ခိယတော ဖုဋံ ပရိဗျတ္တံ. ဝဿိကဇာတိသုမနာဒီနံ ဇလဇာဒိဘာဝေါ စ, ပဒုမကုမုဒါဒီနံ ထလဇာဒိဘာဝေါ စ, ရတ္တိအာဒီသု လဗ္ဘမာနာနံ ကုမုဒါဒီနံ ဒိဝါဒီသု သမ္ဘဝေါ စ, နစ္စဂီတာဒိစတုသဋ္ဌိယာ ကလာသု ‘‘ဆဇ္ဇော ဥသဘော ဂန္ဓာရော မဇ္ဈိမော ပဉ္စမော ဓေဝတော နိသာဒေါ’’တိ ဒဿိတသတ္တသရာနမေကဒေသဿ ဆဇ္ဇဿ ဘိန္နသတ္တသရော ဆဇ္ဇော နာမာတိ သမုဒါယဝသေန ဝေါဟာရကရဏာဒီဟိ သတ္ထာဂတတံ, လက္ခဏာတိက္ကမဉ္စ, ‘‘အဂ္ဂိ သီတလော, စန္ဒနံ ဥဏှံ, ခဒိရရုက္ခော နိဿာရော, ဧရဏ္ဍော သသာရော’’ ဣစ္စာဒိနာ လောကမရိယာဒါတိက္ကမော စ, မိဒ္ဓဿ အရူပဘာဝုပပတ္တိယာ ဝုတ္တာယပိ ရူပဘာဝသာဓနသဒိသယုတ္တိဝိရောဓိကထနဉ္စ, ယထာသကမာဂမမတိက္ကမ္မ ကထနဉ္စာတိ သဗ္ဗေသံ ဝိရုဒ္ဓသဘာဝဿ ပါကဋတ္တာ ဥဒါဟရဏံ န ဒဿယိဿာမာတိ အဓိပ္ပာယော. ဣမေသမေဝ ဒေသာဒိဝိရောဓီနမဝိရုဒ္ဓတ္တံ ဧတ္ထေဝ ဝိရောဓိပဒဒေါသပရိဟာရေ ‘‘ဗောဓိသတ္တပ္ပဘာဝေနာ’’တိစ္စာဒိနာ ဒိဿတိ. ဒေသ…ပေ… ဂမေဟိ ဝိရောဓော, သော အဿ အတ္ထီတိ ဒေသ…ပေ… ဝိရောဓိ. နိန္ဒာယံ အယမဿတ္ထီတိ ဝိဝစ္ဆိတာ. ३४. अशा प्रकारे यमक आणि प्रहेलिका न दाखवण्याचे कारण सांगून, आता उद्देशक्रमाने प्राप्त झालेल्या 'विरोध दोषा'ला 'देसकालि' इत्यादींद्वारे सांगतात. जे पद देश - स्थल, जल, पर्वत इत्यादी; काळ - रात्र आणि दिवस, जो हेमंत इत्यादींच्या भेदाने तीन प्रकारचा आणि वसंत इत्यादींच्या भेदाने सहा प्रकारचा आहे; कला - नृत्य, गीत इत्यादी चौसष्ट; लोक - स्थावर आणि जंगम प्राण्यांच्या प्रवृत्तीने युक्त असलेला; न्याय - युक्ती; आगम - येथे बुद्धवचन, आणि अन्य ठिकाणी श्रुती व धर्मसंहिता; यांच्याशी ज्याचा विरोध आहे तो 'देश... इत्यादी विरोधी' होय. त्याला 'विरोधी पद' म्हणतात. हे विरोधी पद उदाहरणावरून (लक्ष्यावरून) स्पष्ट व पूर्णपणे प्रकट होते. वर्षाऋतूत उमलणाऱ्या जाई, जुई इत्यादी फुलांना जलज (पाण्यात उत्पन्न होणारे) म्हणणे, आणि कमळ, कुमुद इत्यादींना स्थलज (जमिनीवर उत्पन्न होणारे) म्हणणे, रात्री उमलणाऱ्या कुमुद इत्यादींचे दिवसा उमलणे, नृत्य, गीत इत्यादी चौसष्ट कलांमध्ये 'षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, niṣāda' या दाखवलेल्या सात स्वरांपैकी एका भागाला (षड्जाला) 'भिन्नसप्तस्वर षड्ज' असे समुदाय रूपाने व्यवहार करणे इत्यादी शास्त्राविरुद्ध असणे आणि लक्षणांचे उल्लंघन करणे, 'अग्नी शीतल आहे, चंदन उष्ण आहे, खैराचे झाड निस्सार आहे, एरंड ससार (सारयुक्त) आहे' इत्यादी लोक मर्यादेचे उल्लंघन करणे, 'मिद्ध' (आळस/तंद्रा) हा अरूप (अमूर्त) धर्म असतानाही, त्याला रूपभाव (मूर्त रूप) सिद्ध करण्यासारखे युक्तीविरुद्ध कथन करणे, आणि आपापल्या आगमाचे उल्लंघन करून कथन करणे - या सर्वांचा विरुद्ध स्वभाव स्पष्ट असल्यामुळे मी याचे उदाहरण दाखवणार नाही, असा अभिप्राय आहे. याच देश इत्यादी विरोधकांचे अविरोधत्व येथेच विरोधी पद दोषाच्या परिहारामध्ये 'बोधिसत्त्वांच्या प्रभावाने...' इत्यादींद्वारे दिसून येते. देश... इत्यादी आगमांशी विरोध, तो ज्याच्यात आहे तो 'देश... विरोधी' होय. निंदेच्या अर्थात 'हा यात आहे' अशी विवक्षा आहे. ၃၅. ३५. ယ’ဒပ္ပတီတ’မာနီယ, ဝတ္တဗ္ဗံ နေယျမာဟု တံ; ယထာ သဗ္ဗာပိ ဓဝလာ, ဒိသာ ရောစန္တိ ရတ္တိယံ. जे अप्रतीत (अपरिचित किंवा न समजलेले) आणून सांगावे लागते, त्याला ‘नेय्य’ (अनुमानाने समजून घेण्याजोगे) म्हणतात; जसे की, ‘रात्रीच्या वेळी सर्व दिशा पांढऱ्या शुभ्र चमकतात’. ၃၅. ‘‘ယ’’မိစ္စာဒိ. အပ္ပတီတံ သဒ္ဒတော, အတ္ထတော ဝါ အနဓိဂတံ နဟျညထာဝဂမော ဂန္ထန္တရာဘာဝတော. ဝက္ခတိ ဟိ ‘‘ဒုလ္လဘာဝဂတီ သဒ္ဒ-သာမတ္ထိယဝိလင်္ဃိနီ’’တိ. ယံ ကိဉ္စိ ပဒံ သမာနီယ အာနေတွာ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ နေယျမာဟု. ယထေတျုဒါဟရတိ. သဗ္ဗာပိ သကလာပိ ဒိသာ ပုဗ္ဗဒိသာဒယော ဒသ ဒိသာ ရတ္တိယံ ရဇနျံ ဓဝလာ ဥဇ္ဇလာ ရောစန္တိ ဒိပ္ပန္တီတိ ဧတ္တကေ နိဒ္ဒိဋ္ဌေ စန္ဒမရီစိနော ဧတ္ထ နေယျတ္တံ. ३५. ‘यम्’ (जे) इत्यादी. ‘अप्रतीत’ म्हणजे शब्दाने किंवा अर्थाने न समजलेले, कारण इतर ग्रंथांच्या अभावामुळे त्याचे आकलन दुसऱ्या प्रकारे होऊ शकत नाही. पुढे म्हटलेच जाईल की, ‘शब्दाच्या सामर्थ्याचे उल्लंघन करणारे आकलन दुर्मिळ असते.’ जे काही पद आणून (जोडून) सांगावे लागते, त्याला ‘नेय्य’ म्हणतात. ‘यथा’ (जसे) याने उदाहरण दिले आहे. ‘सर्वही’ म्हणजे संपूर्ण दिशा, पूर्व इत्यादी दहा दिशा, ‘रात्री’ म्हणजे रात्रीच्या वेळी ‘पांढऱ्या’ म्हणजे उज्ज्वल होऊन ‘चमकतात’ म्हणजे प्रकाशित होतात. एवढेच निर्दिष्ट केले असता, येथे ‘चंद्राची किरणे’ हे नेय्य (अनुमेय किंवा अध्याहृत) ठरते. ၃၅. ဣဒါနိ နေယျဒေါသမုဒါဟရတိ ‘‘ယ’’မိစ္စာဒိနာ. ယံ ပဒံ အပ္ပတီတံ ပဒန္တရေန, တေနာဘိဟိတတ္ထေန ဝါ ‘‘ဣမဿတ္ထောယ’’မိတိ [Pg.75] အဝိညာတံ အာနီယ ဝတ္တဗ္ဗံ, တတောယေဝ ပဒန္တရမာနီယ ဝတ္တဗ္ဗံ ဟောတိ, တံ နေယျမာဟု ‘‘နေယျဒေါသော’’တိ ပေါရာဏာ အာဟု. ယထာ တတ္ထောဒါဟရဏမီဒိသံ ‘‘သဗ္ဗာပိ ဓဝလာ ဒိသာ ရောစန္တိ ရတ္တိယ’’န္တိ. သဗ္ဗာပိ ဒိသာ ပုဗ္ဗဒက္ခိဏာဒယော ဒသ ဒိသာ ဓဝလာ သေတာ ရတ္တိယံ ရဇနျံ ရောစန္တိ ဒိပ္ပန္တိ. ဧတ္ထ ဒိသာယ ဝိသေသနံ ဓဝလဂုဏံ ကေလာသကူဋသုဓာဘိတ္တိစန္ဒရံသိအာဒီသု ကုတော သဉ္ဇာတမိတိ အနိစ္ဆိတတ္တာ အညနိဝတ္တနတ္ထံ စန္ဒကိရဏာဒိဝါစကပဒံ အာနေတွာ ဓဝလတာ ဣမိနေတိ ဝတ္တဗ္ဗတ္တာ ဓဝလ ပဒံ နေယျဒေါသေန ဒုဋ္ဌံ ဟောတိ. ပတီတံ ဝိညာတံ, န ပတီတံ အပ္ပတီတံ. ဧတ္ထ အကာရော ပသဇ္ဇပဋိသေဓေ. ३५. आता ‘नेय्यदोष’ (अध्याहार दोष) ‘यम्’ इत्यादींद्वारे उदाहरणासह स्पष्ट करतात. जे पद दुसऱ्या पदाने किंवा त्याच्या अर्थाने ‘हा याचा अर्थ आहे’ असे समजले जात नाही (अप्रतीत असते) आणि ते आणून सांगावे लागते, तसेच त्याच कारणाने दुसरे पद आणून सांगावे लागते, त्याला प्राचीन आचार्य ‘नेय्य’ म्हणजेच ‘नेय्यदोष’ म्हणतात. त्याचे उदाहरण याप्रमाणे आहे— ‘रात्रीच्या वेळी सर्व दिशा पांढऱ्या शुभ्र चमकतात.’ सर्व दिशा म्हणजे पूर्व, दक्षिण इत्यादी दहा दिशा रात्रीच्या वेळी पांढऱ्या होऊन चमकतात (प्रकाशतात). येथे दिशांचे विशेषण असलेला ‘पांढरा’ (धवल) हा गुण कैलास शिखर, चुन्याची भिंत की चंद्राची किरणे इत्यादींपैकी कशामुळे निर्माण झाला आहे, हे निश्चित नसल्यामुळे, इतर गोष्टींचे निवारण करण्यासाठी ‘चंद्रकिरण’ इत्यादी वाचक पद आणून ‘या चंद्रकिरणांमुळे ही धवलता आहे’ असे सांगावे लागते. म्हणून ‘धवल’ हे पद ‘नेय्यदोषा’ने दूषित आहे. ‘प्रतीत’ म्हणजे जाणलेले, आणि जे प्रतीत नाही ते ‘अप्रतीत’. येथे ‘अ’ हा कार (नकारार्थी उपसर्ग) प्रसज्यप्रतिषेध (पूर्ण निषेध) दर्शवण्यासाठी आहे. ၃၆. ३६. နေဒိသံ ဗဟု မညန္တိ, သဗ္ဗေ သဗ္ဗတ္ထ ဝိညုနော; ဒုလ္လဘာ’ဝဂတီ သဒ္ဒ-သာမတ္ထိယဝိလင်္ဃိနီ. सर्व विद्वान लोक अशा प्रकारच्या (रचनेला) सर्वत्र फारसे मानत नाहीत (पसंत करत नाहीत); कारण शब्दाच्या सामर्थ्याचे उल्लंघन करणारे आकलन दुर्मिळ असते. ၃၆. အပ္ပတီတံ နိစ္ဆန္တိ ဝိညူတိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘နေ’’တိအာဒိ. ဤဒိသံ အနန္တရေ ဝုတ္တပ္ပကာရံ နေယျံ သဗ္ဗေပိ ဝိညုနော ဉေယျဝိဒူ သဗ္ဗတ္ထ ဂဇ္ဇာဒိကေ န ဗဟု မညန္တိ န သမ္ဘာဝေန္တိ နပ္ပယုဇ္ဇန္တိ. ကိံ န ဗဟုမညန္တီတိ စေ အာဟ ‘‘ဒုလ္လဘာ’’တိအာဒိ. တထာ ဟိ အဝဂတီ အတ္ထာဝဂမော သဒ္ဒံ ဝါစကံ, သာမတ္ထိယဉ္စ ဉာယံ ဝိလင်္ဃယတိ စဇတိ အနုပဒဿနတောတိ သဒ္ဒသာမတ္ထိယဝိလင်္ဃိနီ ဒုလ္လဘာ န လဘျတေ. ဉာယောပတ္ထော ဝါ သဒ္ဒေါပတ္ထော ဝါ ယောတ္ထော န ဟောတိ. သော နပ္ပတီယတေ ယထာ မနသိ အဝဋ္ဌိတမတ္တေနာတိ အတ္ထော. တသ္မာ သဒ္ဒတော, အတ္ထတော ဝါ ပတီတဗ္ဗမနေယျံ, တဗ္ဗိပရီတံ နေယျန္တိ ဝိညေယျံ. ३६. विद्वान लोक ‘अप्रतीत’ (अस्पष्ट) गोष्टी स्वीकारत नाहीत, हे दर्शवण्यासाठी ‘न’ इत्यादी म्हटले आहे. अशा प्रकारच्या, वर सांगितलेल्या ‘नेय्य’ रचनेला सर्वच विद्वान (ज्ञेय जाणणारे) गद्य इत्यादींमध्ये फारसे मानत नाहीत, तिचा आदर करत नाहीत आणि तिचा प्रयोग करत नाहीत. ते तिचा आदर का करत नाहीत? याचे उत्तर ‘दुल्लभा’ (दुर्मिळ) इत्यादी शब्दांनी दिले आहे. कारण, अर्थाचे आकलन (अवगती) हे वाचक शब्दाचे आणि त्याच्या तर्कशुद्ध सामर्थ्याचे उल्लंघन करते (त्याचा त्याग करते), म्हणून शब्दाच्या सामर्थ्याचे उल्लंघन करणारे आकलन दुर्मिळ असते, म्हणजेच ते प्राप्त होत नाही. जो अर्थ तर्काने किंवा शब्दाने सिद्ध होत नाही, तो केवळ मनात असल्यामुळे समजला जाऊ शकत नाही. म्हणून, शब्दाने किंवा अर्थाने जे सहज समजते ते ‘अनेय्य’ (अध्याहाररहित) होय, आणि याच्या उलट जे असते ते ‘नेय्य’ (अध्याहारयुक्त) समजावे. ၃၆. ဣမံ အပ္ပတီတပဒံ ဝိညူဟိ နာဘိမတန္တိ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘နေဒိသ’’မိစ္စာဒိ. ဤဒိသံ ယထာဝုတ္တပ္ပကာရံ နေယျံ သဗ္ဗေ ဝိညုနော သဗ္ဗတ္ထ ဂဇ္ဇပဇ္ဇာဒိကေ န ဗဟု မညန္တိ န သမ္ဘာဝေန္တိ နပ္ပယောဇေန္တိ. အဝဂတီ အတ္ထာဝဗောဓော သဒ္ဒသာမတ္ထိယဝိလင်္ဃိနီ [Pg.76] သဒ္ဒသင်္ခါတဝါစကဉ္စ သာမတ္ထိယသင်္ခါတဉာယဉ္စ အတိက္ကမ္မ ပဝတ္တိနီ ဒုလ္လဘာ တာဒိသပယောဂါဘာဝတော ဒုလ္လဘာ ဟောတိ. ယော အတ္ထော သဒ္ဒါဂတော, ဉာယာဂတော ဝါ န ဟောတိ, သော ကတ္တုနော မနသိ ပတိဋ္ဌိတမတ္တေန ပတီတော န ဟောတီတိ တံ ပဒံ နေယျဒေါသမိတိ သဗ္ဗေ ကဝိနော ပရိဟရန္တီတိ အဓိပ္ပာယော. ဗဟုမာနံ ကရောန္တီတိ ဝါကျေ ဗဟုမညန္တီတိ နာမဓာတု. သဒ္ဒသာမတ္ထိယံ ဝိလင်္ဃယတိ သီလေနာတိ သဒ္ဒသာမတ္ထိယဝိလင်္ဃိနီ. ३६. हे अप्रतीत पद विद्वानांना संमत नाही, हे दर्शवण्यासाठी ‘नेदिसम्’ (असे नाही) इत्यादी म्हटले आहे. अशा प्रकारच्या, वर सांगितलेल्या ‘नेय्य’ रचनेला सर्व विद्वान गद्य, पद्य इत्यादींमध्ये फारसे मानत नाहीत, तिचा आदर करत नाहीत आणि तिचा प्रयोग करत नाहीत. ‘अवगती’ म्हणजे अर्थाचा बोध. ‘सद्दसामत्थियविलङ्गिनी’ म्हणजे शब्द नावाच्या वाचकाचे आणि सामर्थ्य नावाच्या तर्काचे उल्लंघन करून प्रवृत्त होणारी; अशा प्रयोगांच्या अभावामुळे ती दुर्मिळ असते. जो अर्थ शब्दाने किंवा तर्काने सिद्ध होत नाही, तो केवळ कर्त्याच्या (लेखकाच्या) मनात असल्यामुळे प्रतीत (स्पष्ट) होत नाही; म्हणून सर्व कवी अशा पदाला ‘नेय्यदोष’ मानून त्याचा त्याग करतात, असा याचा अभिप्राय आहे. ‘बहुमान करतात’ या वाक्यात ‘बहुमञ्ञन्ति’ हा नामधातू आहे. शब्दाच्या सामर्थ्याचे उल्लंघन करणे जिचा स्वभाव आहे, ती ‘सद्दसामत्थियविलङ्गिनी’ होय. ၃၇. ३७. သိယာ ဝိသေသနာပေက္ခံ,ယံ တံ ပတွာ ဝိသေသနံ; သာတ္ထကံ တံ ယထာ တံ သော,ဘိယျော ပဿတိ စက္ခုနာ. काही पद विशेषणावर अवलंबून असणारे (विशेषणापेक्षी) असू शकते, जे विशेषण प्राप्त करून अर्थपूर्ण (सार्थक) बनते; जसे की, ‘तो डोळ्याने अधिक स्पष्टपणे पाहतो’. ၃၇. ‘‘သိယာ’’ဣစ္စာဒိ. ယံ ပဒံ ဝိသေသနံ ပတွာ အတ္ထေန သဟ ဝတ္တတီတိ သာတ္ထကံ. နိဗ္ဗိသေသနန္တု ဝုတ္တတ္ထမေဝ ဟောတိ. တံ ဝိသေသနာပေက္ခံ သိယာ. ‘‘တံ ယထေ’’တျာဒိနာ ဥဒါဟရတိ. ‘‘ပဿတီ’’တိ ဝုတ္တေ ‘‘စက္ခုနာ’’တိ လဗ္ဘတေဝ. ३७. ‘सिया’ (असू शकते) इत्यादी. जे पद विशेषण प्राप्त करून अर्थासह वर्तते, ते ‘सार्थक’ होय. परंतु विशेषणाशिवाय ते केवळ आधीच सांगितलेल्या अर्थाचेच असते. ते विशेषणावर अवलंबून असणारे (विशेषणापेक्षी) असू शकते. ‘तम् यथा’ इत्यादींद्वारे त्याचे उदाहरण दिले आहे. ‘पाहतो’ असे म्हटले असता ‘डोळ्याने’ हे आपोआपच प्राप्त होते. ၃၇. ‘‘သိယာ’’မိစ္စာဒိ. ယံ ပဒံ ဝိသေသနံ ပတွာ သာတ္ထကံ အတ္ထသဟိတံ, တဒဘာဝေ နိရတ္ထကံ ဟောတိ, တံ ဝိသေသနာပေက္ခံ နာမ သိယာ. တံ ယထာ တဿောဒါဟရဏမေဝံ ‘‘တံ သော ဘိယျော ပဿတိ စက္ခုနာ’’တိ. သော ပုရိသော တံ ပုရိသံ ဘိယျော ယေဘုယျသာ စက္ခုနာ ပဿတိ. ဧတ္ထ ‘‘ပဿတီ’’တိ ဝုတ္တေယေဝ ‘‘စက္ခုနာ’’တိ ဉာယတိ. စက္ခုနာတိ ဝိသေသျပဒံ ဝိသေသနံ လဒ္ဓါဝ သာတ္ထကံ ဟောတိ. ဝိသေသနေ အပေက္ခာ အဿာတိ စ, သဟ အတ္ထေန ဝတ္တမာနံ သာတ္ထကမိတိ စ သမာသော. ३७. ‘सिया’ इत्यादी. जे पद विशेषण प्राप्त करून सार्थक म्हणजे अर्थयुक्त होते आणि त्याच्या अभावी निरर्थक ठरते, त्याला ‘विशेषणापेक्षी’ म्हणतात. त्याचे उदाहरण याप्रमाणे आहे— ‘तो डोळ्याने अधिक स्पष्टपणे पाहतो.’ तो मनुष्य त्या मनुष्याला प्रामुख्याने डोळ्याने पाहतो. येथे ‘पाहतो’ असे म्हटले असता ‘डोळ्याने’ हे समजतेच. ‘डोळ्याने’ (चक्खुना) हे विशेष्य पद विशेषण मिळाल्यावरच सार्थक होते. ‘ज्याला विशेषणाची अपेक्षा आहे ते’ (विसेसने अपेक्खा अस्सा) आणि ‘अर्थासह वर्तमान असणारे ते सार्थक’ (सह अत्थेन वत्तमानं सात्थकम्) असा हा समास आहे. ၃၈. ३८. ဟီနံ ကရေ ဝိသေသျံ ယံ, တံ ဟီနတ္ထံ ဘဝေ ယထာ; နိပ္ပဘီကတခဇ္ဇောတော, သမုဒေတိ ဒိဝါကရော. जे विशेषण विशेष्याला हीन (तुच्छ किंवा कमी दर्जाचे) बनवते, ते ‘हीनार्थ’ ठरते; जसे की, ‘काजव्याला प्रभाहीन करणारा सूर्य उगवतो’. ၃၈. ‘‘ဟီန’’မိစ္စာဒိ[Pg.77]. ယံ ဝိသေသနပဒံ ဝိသေသျံ ဝိသေသိတဗ္ဗံ ဟီနံ လာမကံ ကရေ ကရေယျ, တံ ဝိသေသနပဒံ ဟီနတ္ထံ ဟီနော အတ္ထော ယဿ တံ ဟီနတ္ထံ နာမ ဘဝေယျ. ‘‘ယထာ’’ဣတျာဒိနာ ဥဒါဟရတိ. နိပ္ပဘီကတော ခဇ္ဇောတော ယေန သော ဒိဝါကရော ပဘာကရော သမုဒေတိ ဥပဂစ္ဆတီတိ. ဧတ္ထ ခဇ္ဇောတပ္ပဘာပဟရဏေ န ထုတိ ဒိဝါကရဿာတိ. ३८. ‘हीन’ इत्यादी. जे विशेषण पद विशेष्याला (ज्याचे विशेषण सांगायचे आहे त्याला) हीन किंवा तुच्छ बनवते, त्या विशेषण पदाला ‘हीनार्थ’ (ज्याचा अर्थ हीन आहे असे) म्हणतात. ‘यथा’ इत्यादींद्वारे त्याचे उदाहरण दिले आहे. ‘ज्याने काजव्याला प्रभाहीन केले आहे, असा सूर्य (दिवाकर) उगवतो.’ येथे काजव्याची प्रभा हिरावून घेण्यात सूर्याची काही स्तुती होत नाही. ၃၈. ‘‘ဟီနံ ကရေ’’စ္စာဒိ. ယံ ပဒံ ဝိသေသျံ ဟီနံ ကရောတိ, တံ ဟီနတ္ထံ ဘဝေ. ယထာ တတ္ထောဒါဟရဏမေဝံ ‘‘နိပ္ပဘီကတခဇ္ဇောတော, သမုဒေတိ ဒိဝါကရော’’တိ. ပဘာရဟိတကတာ ခဇ္ဇောတာ ယေန သော ဒိဝါကရော သူရိယော သမုဒေတိ ဥဂ္ဂစ္ဆတိ. ‘‘နိပ္ပဘီကတခဇ္ဇောတော’’တိ ဣမိနာ ဝိသေသနေန လာမကာလောကလဒ္ဓယုတ္တဿ ခဇ္ဇောပနကဿ အဘိဘဝနပ္ပကာသနံ သဟဿရံသိနော နိန္ဒာယေဝ, န ထုတီတိ ဝိသေသျံ ဟီနတ္ထံ ဟောတိ. ဟီနော အတ္ထော ယဿေတိ စ, နတ္ထိ ပဘာ ဧတေသန္တိ စ, နိပ္ပဘာ ကတာတိ စ, နိပ္ပဘီကတာ ခဇ္ဇောတာ ယေနာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३८. ‘हीनं करे’ इत्यादी. जे पद विशेष्याला हीन बनवते, ते ‘हीनार्थ’ ठरते. त्याचे उदाहरण याप्रमाणे आहे— ‘काजव्याला प्रभाहीन करणारा सूर्य उगवतो.’ ज्याने काजव्याला प्रकाशरहित केले आहे, असा सूर्य उगवतो. ‘निप्पभीकतखज्जोतो’ (काजव्याला प्रभाहीन करणारा) या विशेषणाद्वारे, अत्यंत अल्प प्रकाश असलेल्या काजव्याचा पराभव दाखवणे ही सहस्रकिरण सूर्याची निंदाच आहे, स्तुती नव्हे; त्यामुळे विशेष्य हीनार्थ ठरते. ‘ज्याचा अर्थ हीन आहे तो’ (हीनो अत्थो यस्स), ‘ज्यांना प्रभा नाही ते’ (नत्थि पभा एतेसं), ‘प्रभाहीन केलेले’ (निप्पभा कता), ‘ज्याने काजवे प्रभाहीन केले आहेत तो’ (निप्पभीकता खज्जोता yeन) असा याचा विग्रह आहे. ၃၉. ३९. ပါဒပူရဏမတ္တံ ယံ, အနတ္ထမိတိ တံ မတံ; ယထာ ဟိ ဝန္ဒေ ဗုဒ္ဓဿ, ပါဒပင်္ကေရုဟမ္ပိစ. जे केवळ पादपूर्तीसाठी (श्लोकाचे चरण पूर्ण करण्यासाठी) असते, त्याला ‘अनर्थक’ (निरर्थक) मानले जाते; जसे की, ‘मी बुद्धांच्या चरणकमलांना वंदन करतोच’ (येथे ‘हि’ आणि ‘अपि च’ हे शब्द केवळ पादपूर्तीसाठी आहेत). ၃၉. ဟိ အပိ စသဒ္ဒါနံ ပါဒပူရဏမတ္တတ္တာ အနတ္ထကတ္တံ. ဝိသေသနဝိသေသျပဒဒေါသော. ३९. ‘हि’, ‘अपि’ आणि ‘च’ हे शब्द केवळ पादपूर्तीसाठी असल्यामुळे निरर्थक आहेत. हा विशेषण आणि विशेष्य पदांचा दोष आहे. ၃၉. ‘‘ပါဒပူရဏိ’’စ္စာဒိ. ယံ ပဒံ ပါဒပူရဏမတ္တံ စတုတ္ထံသသင်္ခါတဿ ပါဒဿ ပူရဏမတ္တမေဝ ဟောတိ, တံ အနတ္ထမိတိ မတံ ဉာတံ. ယထာသဒ္ဒေါ ဝုတ္တတ္ထော. ဗုဒ္ဓဿ ပါဒပင်္ကေရုဟံ ပါဒမ္ဗုဇံ ဝန္ဒေတိ. ဧတ္ထ ဟိ အပိစာတိ ဣမေသံ သမတ္တနာဒိအတ္ထေသု အပ္ပဝတ္တိတော ကေဝလံ ပါဒပူရဏမတ္တတော အနတ္ထကတ္တံ. မတ္တသဒ္ဒေါ အဝဓာရဏေ. ဝိသေသနဝိသေသျပဒဒေါသော. ३९. “पादपूरण” इत्यादी. जे पद केवळ पादपूरण (श्लोकाचा चरण पूर्ण करणे) असते, म्हणजेच चतुर्थांश मानल्या गेलेल्या चरणाचे केवळ पूरण करणारे असते, ते अनर्थक (निरर्थक) मानले जाते, असे जाणावे. 'यथा' शब्दाचा अर्थ पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच आहे. बुद्धांच्या पादपंकजांना (चरणकमलांना) वंदन करतो. येथे 'अपि च' इत्यादी शब्दांचा समाप्ती इत्यादी अर्थांमध्ये उपयोग न झाल्यामुळे, केवळ पादपूरण मात्र असल्यामुळे निरर्थकत्व आले आहे. 'मत्त' (मात्र) हा शब्द अवधारण (मर्यादा निश्चित करणे) दर्शवण्यासाठी आहे. हा विशेषण-विशेष्य पददोष आहे. ပဒဒေါသနိဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. पददोषनिर्देशवर्णन समाप्त झाले. ဝါကျဒေါသနိဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ वाक्यदोषनिर्देशवर्णन. ၄၀. ४०. သဒ္ဒတော အတ္ထတော ဝုတ္တံ, ယတ္ထ ဘိယျောပိ ဝုစ္စတိ; တမေကတ္ထံ ယထာ’ဘာတိ, ဝါရိဒေါဝါရိဒေါ အယံ. शब्दाने किंवा अर्थाने जे आधीच सांगितले आहे, तेच जर पुन्हा (वाक्यात) सांगितले जात असेल, तर त्याला 'एकार्थ' (दोष) म्हणतात. जसे की— हा वारिद (मेघ) वारिद (मेघ) शोभत आहे. ၄၀. ‘‘သဒ္ဒတော’’ဣစ္စာဒိ. သဒ္ဒတော ဝါစကေန တသ္မိံယေဝတ္ထေ တဿေဝ သဒ္ဒဿ ပုန ပယောဂတော အတ္ထတော အဘိဓေယျေန ပုဗ္ဗပဋိပါဒိကဿေဝ ဝတ္ထုဿာဝိသေသေန ပုန ပဋိပါဒနတော ဝုတ္တံ ပယုတ္တံ ယံ ပဒတ္ထရူပံ ယတ္ထ ယသ္မိံ ဝါကျေ ဘိယျောပိ ဝုစ္စတိ ပုနပိ ပယုဇ္ဇတေ, တမေကတ္ထန္တိ အနုဝဒိတွာ ‘‘ယထေ’’စ္စာဒိနာ ဝိဓီယတေ. ဝါရိံ ဒဒါတီတိ ဝါရိဒေါ. အယံ ဝါရိဒေါ မေဃော အာဘာတိ ဒိပ္ပတီတိ. ဇလဒါနမတ္တာပေက္ခာယ ဣဒံ သဒ္ဒတော ဧကတ္ထံ. ४०. “शब्दाने” इत्यादी. शब्दाने म्हणजे वाचकाने, त्याच अर्थामध्ये त्याच शब्दाचा पुन्हा प्रयोग केल्यामुळे; आणि अर्थाने म्हणजे अभिधेयाने, पूर्वी प्रतिपादन केलेल्याच वस्तूचे कोणत्याही विशेषाशिवाय पुन्हा प्रतिपादन केल्यामुळे; जे पद किंवा अर्थाचे रूप आधीच सांगितले किंवा योजले गेले आहे, ते ज्या वाक्यात पुन्हा सांगितले जाते किंवा योजले जाते, त्याला 'एकार्थ' असे म्हणून “यथा” इत्यादींद्वारे स्पष्ट केले आहे. पाणी देतो तो 'वारिद' (मेघ). “हा वारिद (मेघ) शोभतो (प्रकाशतो)” असे. केवळ जल देण्याच्या अपेक्षेने हे शब्दाच्या दृष्टीने 'एकार्थ' आहे. ၄၀. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒိဋ္ဌက္ကမေန ဝါကျဒေါသံ နိဒ္ဒိသတိ ‘‘သဒ္ဒတော’’စ္စာဒိနာ. သဒ္ဒတော ဝါစကေန အတ္ထတော အဘိဓေယျေန ဝုတ္တံ ပယုတ္တံ ယံ ပဒတ္ထရူပံ ယတ္ထ ယသ္မိံ ဝါကျေ ဘိယျောပိ ပုနပိ ဝုစ္စတိ ယုဇ္ဇတေ, တံ ဝါကျံ ဧကတ္ထံ နာမ ဒေါသော. ဥဒါဟရဏံ ‘‘ယထိ’’စ္စာဒိ. ဝါရိဒေါ ဇလဒါယကော အယံ ဝါရိဒေါ မေဃော အာဘာတိ ဒိပ္ပတိ. သမ္ပတ္တိသာဓကံ ‘‘ဇလဒါယကော’’စ္စာဒိဝိသေသနံ ဝိနာ ဇလဒါနမတ္တဿ ဝုတ္တတ္တာ သဒ္ဒတော ဧကတ္ထံ နာမ ဟောတိ. ४०. आता उद्दिष्ट क्रमानुसार “शब्दाने” इत्यादींद्वारे वाक्यदोषाचा निर्देश करतात. शब्दाने (वाचकाने) किंवा अर्थाने (अभिधेयाने) जे पद किंवा अर्थाचे रूप आधीच सांगितले किंवा योजले गेले आहे, ते ज्या वाक्यात पुन्हा सांगितले जाते किंवा योजले जाते, त्या वाक्याला 'एकार्थ' नावाचा दोष म्हणतात. उदाहरण “यथा” इत्यादी. वारिद म्हणजे जल देणारा, हा वारिद (मेघ) शोभतो (प्रकाशतो). अर्थाची समृद्धी साधणाऱ्या “जलदायक” इत्यादी विशेषणाशिवाय केवळ जल देण्याचाच उल्लेख पुन्हा केल्यामुळे हा शब्दाच्या दृष्टीने 'एकार्थ' दोष होतो. ယထာ စ आणि जसे की— ၄၁. ४१. တိတ္ထိယင်္ကုရဗီဇာနိ, ဇဟံ ဒိဋ္ဌိဂတာနိ’ဟ; ပသာဒေတိ ပသန္နေ သော, မဟာမုနိ မဟာဇနေ. या जगात तीर्थंकररूपी अंकुरांचे बीज असलेल्या मिथ्या दृष्टींना नष्ट करत, ते महामुनी (बुद्ध) आधीच प्रसन्न असलेल्या महाजनांना प्रसन्न करतात. ၄၁. တိတ္ထိယသင်္ခါတာနံ အင်္ကုရာနံ ဗီဇာနိ ဥပ္ပတ္တိဟေတုဘူတာနိ ဒိဋ္ဌိဂတာနိ ဒွါသဋ္ဌိ ဒိဋ္ဌိယော ဇဟံ ဇဟန္တော ဒူရီကရောန္တော သော မဟာမုနိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ဣဟ လောကေ အတ္တနိ ပသန္နေ ပသာဒဗဟုလေ မဟာဇနေ ပသာဒေတီတိ အပရမုဒါဟရဏံ. [Pg.79] ပသာဒသင်္ခါတဿ အတ္ထဿ ‘‘ပသန္နေ ပသာဒေတီ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ ဣဒမတ္ထတော ဧကတ္ထံ. ४१. तीर्थंकर मानल्या गेलेल्या अंकुरांचे उत्पत्तीचे कारण (बीज) असलेल्या बासष्ट मिथ्या दृष्टींचा त्याग करत, त्यांना दूर करत, ते महामुनी सम्यक्संबुद्ध या लोकात स्वतःवर प्रसन्न (श्रद्धावान) असलेल्या महाजनांना प्रसन्न करतात. येथे 'प्रसन्न' या अर्थाचा “प्रसन्न असलेल्यांना प्रसन्न करतात” असा उल्लेख केल्यामुळे हा अर्थाच्या दृष्टीने 'एकार्थ' दोष आहे. ၄၁. ‘‘တိတ္ထိယိ’’စ္စာဒိ. သော မဟာမုနိ တိတ္ထိယင်္ကုရဗီဇာနိ တိတ္ထိယသင်္ခါတာနံ အင်္ကုရာနံ ဥပ္ပတ္တိကာရဏဘူတာနိ ဒိဋ္ဌိဂတာနိ သဿတာဒိဘေဒဘိန္နာ ဒွါသဋ္ဌိဒိဋ္ဌိယော ဇဟံ ဇဟန္တော အပနေန္တော ဣဟ လောကေ ပသန္နေ အတ္တနိ ပသန္နေ မဟာဇနေ ပသာဒေတိ. ပသန္နသဒ္ဒေန ဝုတ္တပ္ပသာဒသင်္ခါတဿ အတ္ထဿ ပသာဒေတီတိ ကြိယာပဒေနပိ ဝုတ္တတ္တာ သဒ္ဒေ ဘိန္နေပိ အတ္ထတော ဧကန္တိ အတ္ထတော ဧကတ္ထဿုဒါဟရဏံ. တိတ္ထိယာ ဧဝ အင်္ကုရာနိ, တေသံ ဗီဇာနိ, ဒိဋ္ဌီသု ဂတာနိ, ဒိဋ္ဌိယော ဧဝ ဂတာနီတိ ဝါ ဝိဂ္ဂဟော. ४१. “तीर्थंकर” इत्यादी. ते महामुनी, तीर्थंकर मानल्या गेलेल्या अंकुरांच्या उत्पत्तीचे कारण असलेल्या, शाश्वत इत्यादी भेदांनी युक्त बासष्ट मिथ्या दृष्टींचा त्याग करत, त्यांना दूर करत, या लोकात स्वतःवर प्रसन्न असलेल्या महाजनांना प्रसन्न करतात. 'प्रसन्न' या शब्दाने सांगितलेला प्रसन्नतेचा अर्थ 'प्रसन्न करतात' या क्रियापदानेही सांगितला गेल्यामुळे, शब्द भिन्न असले तरी अर्थ एकच आहे; म्हणून हे अर्थाच्या दृष्टीने 'एकार्थ' दोषाचे उदाहरण आहे. “तीर्थंकर हेच अंकुर, त्यांचे बीज” किंवा “दृष्टींमध्ये गेलेले” किंवा “दृष्टीच गेलेल्या” असा याचा विग्रह होतो. ၄၂. ४२. အာရဒ္ဓက္ကမဝိစ္ဆေဒါ, ဘဂ္ဂရီတိ ဘဝေ ယထာ; ကာပိ ပညာ, ကောပိ ဂုဏော, ပကတီပိ အဟော တဝ. आरंभिलेल्या क्रमाचा विच्छेद झाल्यामुळे 'भग्नरीती' (दोष) होतो, जसे की— “तुमची प्रज्ञा काही अपूर्वच आहे, तुमचा गुणही काही अपूर्वच आहे, आणि तुमचा स्वभावही (प्रकृतीही) अहो!” ၄၂. အာရဒ္ဓေါ ဝတ္တုမုပက္ကမန္တော, ကမော ဝစနပဋိပါဋိ. တဿ ဝိစ္ဆေဒေါ ဘင်္ဂေါ, တတော. ‘‘ယထေ’’တိအာဒိနာ ဥဒါဟရတိ. အဝုတ္တဿပိ ပသာဒဝသာ အဇ္ဈာဟာရောတိ. မဟာမုနိ တဝ တေ ပညာ ကာပိ သာတိသယတ္တာ အနိဒ္ဓါရိတံ သဘာဝဝိသေသာ ကာစိယေဝ, အဟော ပဝတ္တမာနာယပိ ဝသဘာဝဿာနိဒ္ဓါရိတတ္တာ အစ္ဆရိယန္တိ အတ္ထော. ဧတ္ထ ကာပိ ကောပီတိ သဗ္ဗနာမပဒက္ကမဿ ပကတီတိ ဧတ္ထ ဝိစ္ဆိန္နတ္တာ ဘဂ္ဂရီတိ. ४२. 'आरब्ध' म्हणजे बोलण्यास उपक्रम करणे, 'क्रम' म्हणजे शब्दांची मांडणी (रचना). त्याचा विच्छेद म्हणजे भंग, त्यावरून (हा दोष होतो). “यथा” इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. न सांगितलेल्या शब्दाचाही प्रसन्नतेमुळे अध्याहार होतो. हे महामुनी! तुमची प्रज्ञा काही अपूर्वच (अतिशययुक्त) आहे, जिचा स्वभावविशेष निश्चित करता येत नाही अशी ती काहीतरी वेगळीच आहे; आणि अहो! ती अस्तित्वात असूनही तिचा स्वभाव निश्चित न करता आल्यामुळे ती आश्चर्यकारक आहे, असा अर्थ आहे. येथे 'कापि' (काहीतरी), 'कोपि' (काहीतरी) या सर्वनाम पदांचा क्रम 'प्रकृती' (स्वभाव) या शब्दाच्या ठिकाणी तुटल्यामुळे (विच्छिन्न झाल्यामुळे) 'भग्नरीती' दोष आहे. ၄၂. ‘‘အာရဒ္ဓက္ကမိ’’စ္စာဒိ. အာရဒ္ဓက္ကမဝိစ္ဆေဒါ ဝတ္ထုမာရဒ္ဓပဒက္ကမဿ ဝိစ္ဆေဒဟေတု ဘဂ္ဂရီတိ ဘဝေ ဘဂ္ဂရီတိဝါကျဒေါသော ဘဝတိ. ဥဒါဟရတိ ‘‘ယထိ’’စ္စာဒိ. မဟာမုနိ တဝ တုယှံ ပညာ သာတိသယဘူတာ ပညာ ကာပိ ဝစနဝိသယာတိက္ကန္တတ္တာ ကာပိယေဝ. ဂုဏော သီလသမာဓိအာဒိအနညသာဓာရဏဂုဏသမူဟော ကောပိ ပမာဏပရိဂ္ဂဟဿ ကေနစိ [Pg.80] လေသေနပိ ကတ္တုမသက္ကုဏေယျတ္တာ ကောပိယေဝ. ပကတီပိ အစိန္တေယျဘူတာ ပကတီပိ ဧဝမေဝ အဟော ဝိဇ္ဇမာနာနံယေဝ ပညာဒီနံ သဘာဝါဝဗောဓဿ ဒုက္ကရတာ အစ္ဆရိယာ. ကာပိ ကောပီတိ ပဒက္ကမဿ ‘‘ပကတီ’’တိ ဧတ္ထ သုညတ္တာ ရီတိဘင်္ဂေါ. အာရဒ္ဓေါယေဝ ကမော, တဿ ဝိစ္ဆေဒေါ, ဘဂ္ဂါ ရီတိ အဿ, ဧတ္ထ ဝါတိ ဝိဂ္ဂဟော. ४२. “आरब्धक्रम” इत्यादी. आरंभिलेल्या पदक्रमाचा विच्छेद झाल्यामुळे 'भग्नरीती' नावाचा वाक्यदोष होतो. “यथा” इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. हे महामुनी! तुमची प्रज्ञा अतिशययुक्त आहे, ती वाणीच्या विषयापलीकडची असल्यामुळे काही अपूर्वच आहे. गुण म्हणजे शील, समाधी इत्यादी असाधारण गुणांचा समूह; तो कोणत्याही प्रकारे प्रमाणाने मोजता येणे अशक्य असल्यामुळे काही अपूर्वच आहे. प्रकृती (स्वभाव) देखील अचिंत्य असल्यामुळे तशीच आहे; अहो! विद्यमान असलेल्या प्रज्ञा इत्यादींचा स्वभाव समजणे कठीण असणे हे आश्चर्यकारक आहे. 'कापि', 'कोपि' या पदक्रमाचा 'प्रकृती' या शब्दाच्या ठिकाणी अभाव (शून्यता) असल्यामुळे रीतीचा भंग होतो. “आरंभिलेलाच क्रम, त्याचा विच्छेद” किंवा “ज्याची रीती भग्न झाली आहे तो” असा येथे विग्रह होतो. ၄၃. ४३. ပဒါနံ ဒုဗ္ဗိနိက္ခေပါ, ဗျာမောဟော ယတ္ထ ဇာယတိ; တံ ဗျာကိဏ္ဏန္တိ ဝိညေယျံ, တဒုဒါဟရဏံ ယထာ. पदांच्या चुकीच्या मांडणीमुळे (दुष्ट स्थापनेमुळे) जेथे संभ्रम (व्यामोह) निर्माण होतो, त्याला 'व्याकीर्ण' (दोष) समजावे. त्याचे उदाहरण जसे की— ၄၃. ‘‘ပဒါန’’မိစ္စာဒိ. ယတ္ထ ယသ္မိံ ဝါကျေ ပဒါနံ သျာဒျန္တာချာတိကာနံ ဒုဗ္ဗိနိက္ခေပါ ဒုဋ္ဌပနတော ဗျာမောဟော သံမုဠှတာ ဇာယတိ ဥပ္ပဇ္ဇတိ, တံ ဝါကျံ ဗျာကိဏ္ဏန္တိ ဝိညေယျံ ဉာတဗ္ဗံ. တဿ ဗျာကိဏ္ဏဿ ဥဒါဟရဏံ လက္ခိယံ ‘‘ယထေ’’တိ ဒဿေတိ. ယထာ ဣဒံ, တထာ အညမ္ပီတိ အတ္ထော. ४३. “पदानाम” इत्यादी. ज्या वाक्यात सुबंत आणि तिङंत पदांच्या चुकीच्या मांडणीमुळे (दुष्ट स्थापनेमुळे) संभ्रम (व्यामोह/मोह) निर्माण होतो, त्या वाक्याला 'व्याकीर्ण' समजावे, असे जाणावे. त्या व्याकीर्ण दोषाचे लक्ष्यभूत उदाहरण “यथा” इत्यादींद्वारे दाखवले आहे. जसे हे आहे, तसेच इतरही समजावे, असा अर्थ आहे. ၄၃. ‘‘ပဒါနိ’’စ္စာဒိ. ပဒါနံ သျာဒျန္တတျာဒျန္တပဒါနံ ဒုဗ္ဗိနိက္ခေပါ ဒုဋ္ဌပနတော ယတ္ထ ဝါကျေ ဗျာမောဟော သံမောဟော ဇာယတိ, တံ ဗျာကိဏ္ဏဒေါသောတိ ဝိညေယျံ. တဒုဒါဟရဏံ တဿ ဗျာကိဏ္ဏဒေါသဿ လက္ခိယံ ယထာ ဣမိနာ ဝက္ခမာနနယေန. ४३. “पदानि” इत्यादी. सुबंत आणि तिङंत पदांच्या चुकीच्या मांडणीमुळे ज्या वाक्यात संभ्रम (व्यामोह) निर्माण होतो, त्याला 'व्याकीर्णदोष' समजावे. त्या व्याकीर्णदोषाचे लक्ष्यभूत उदाहरण पुढे सांगण्यात येणाऱ्या पद्धतीने आहे. ၄၄. ४४. ဗဟုဂုဏေ ပဏမတိ, ဒုဇ္ဇနာနံ ပျယံ ဇနော; ဟိတံ ပမုဒိတော နိစ္စံ, သုဂတံ သမနုဿရံ. हा मनुष्य प्रसन्न होऊन, अनंत गुणांचे स्मरण करत, दुर्जनांचेही हित करणाऱ्या सुगतांना नेहमी वंदन करतो. ၄၄. ဗဟုအနန္တတ္တာ ဗဟုဘူတေ ဂုဏေ သီလာဒိကေ သမနုဿရံ သမ္မဒေဝ ဥဋ္ဌာယ သမုဋ္ဌာယ အနုဿရန္တော ဂုဏဝိသယသတိံ ပစ္စုပဋ္ဌာပေန္တော တေနေဝ ကာရဏေန ပမုဒိတော ဟဋ္ဌပဟဋ္ဌော အယံ ဇနော သဗ္ဗောပိ လောကော ဒုဇ္ဇနာနံ သုဇနေတရာနမ္ပိ ဒေဝဒတ္တာဒီနံ နိစ္စံ ကာလံ ဟိတံ သုဂတံ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓံ ပဏမတိ နမဿတီတိ အယံ အတ္ထော ကဝိဝဉ္စိတော. တတ္ထ ‘‘ဗဟုဂုဏေ ပဏမတီ’’တျာဒိ ဗျဝဟိတပဒပ္ပယောဂါ မောဟော ဇာယတီတိ ဗျာကိဏ္ဏံ. ४४. 'बहु' म्हणजे अनंत असल्यामुळे अनेक असलेल्या शील इत्यादी गुणांचे चांगल्या प्रकारे वारंवार स्मरण करत, गुणांविषयीची स्मृती जागृत करत; त्याच कारणाने प्रसन्न (हर्षित) झालेला; 'हा मनुष्य' म्हणजे सर्व लोक; दुर्जनांचे म्हणजे देवदत्त इत्यादी सुजनेतरांचेही नेहमी हित करणाऱ्या सुगतांना (सम्यक्संबुद्धांना) वंदन करतो, असा कवीला अभिप्रेत असलेला अर्थ आहे. परंतु तेथे “बहुगुणे पणमति” इत्यादी व्यवहित (दूर अंतरावर असलेल्या) पदांच्या प्रयोगामुळे संभ्रम निर्माण होतो, म्हणून हा 'व्याकीर्ण' दोष आहे. ၄၄. ‘‘ဗဟုဂုဏေ’’စ္စာဒိ. [Pg.81] ဗဟုဂုဏေ အနန္တတ္တာ ဗဟုဘူတေ သီလသမာဓိအာဒိဂုဏေ သမနုဿရံ ဝိသေသတော အနုဿရန္တော ပမုဒိတော တတောယေဝ ပဟဋ္ဌော အယံ ဇနော သတ္တနိကာယော ဒုဇ္ဇနာနမ္ပိ အသပ္ပုရိသာနမ္ပိ နိစ္စံ သတတံ ဟိတံ မိတ္တဘူတံ သုဂတံ သဗ္ဗညုံ ပဏမတိ ဝန္ဒတိ. ဧတ္ထ ပဒါနံ အဋ္ဌာနပယောဂတော ဗျာကိဏ္ဏတ္တံ ပဒတ္ထာနုသာရေနေဝ ဂမျတေ. ४४. “बहुगुणे” इत्यादी. 'बहुगुणे' म्हणजे अनंत असल्यामुळे विपुल झालेल्या शील, समाधी इत्यादी गुणांचे विशेष रूपाने अनुस्मरण करत प्रमुदित आणि त्यामुळेच प्रहर्षित झालेला हा जनसमूह (प्राणिमात्र), दुर्जनांचे व असत्पुरुषांचेही नित्य व सतत हित करणारे, मित्ररूप असणाऱ्या सुगतांना, सर्वज्ञांना प्रणाम करतो, वंदन करतो. येथे पदांच्या अयोग्य ठिकाणी प्रयोग केल्यामुळे झालेली व्याकीर्णता (अस्ताव्यस्तपणा) पदांच्या अर्थानुसारच समजली जाते. ၄၅. ४५. ဝိသိဋ္ဌဝစနာ’ပေတံ, ဂါမ္မံ’တျ’ဘိမတံ ယထာ; ကညေ ကာမယမာနံ မံ, န ကာမယသိ ကိံ နွိ’ဒံ. विशिष्ट वचनाने रहित असलेल्या वाक्याला 'ग्राम्य' (अशिष्ट) मानले जाते, जसे की— “हे कन्ये! तुझ्यावर प्रेम करणाऱ्या माझ्यावर तू प्रेम का करत नाहीस, हे काय आहे?” ၄၅. ဝိသိဋ္ဌဿ ကဿစိ အတ္ထဿ ဝစနတော ကထနတော အပေတံ ပရိစ္စတ္တံ. ကညေဣတျာမန္တနံ. အဟံ တံ ဣစ္ဆာမိ, တာဒိသံ မံ တွံ ကသ္မာ နိစ္ဆသိ, ဣဒံ ကိံ နု ဣတိ ဂါမိကဇနဝစနတ္တာ ‘‘ကညိ’’စ္စာဒိကံ ဂါမ္မံ. ४५. एखाद्या विशिष्ट अर्थाच्या कथनापासून रहित (सुटलेले) असणे. 'कन्ये' हे संबोधन आहे. “मी तुला इच्छितो, अशा माझ्यावर तू का प्रेम करत नाहीस, हे काय आहे?” अशा प्रकारच्या ग्रामीण लोकांच्या वचनामुळे “कन्ये” इत्यादी वाक्य 'ग्राम्य' (अशिष्ट) आहे. ၄၅. ‘‘ဝိသိဋ္ဌေ’’စ္စာဒိ. ဝိသိဋ္ဌဝစနာပေတံ ပိယဘူတေန ဥတ္တိဝိသေသေန ဝိသေသိတဗ္ဗဿ ကထနတော ပရိဟီနံ ဝါကျံ ‘‘ဂါမ္မဒေါသ’’န္တိ ကဝီဟိ အဘိမတံ. ဥဒါဟရတိ ‘‘ယထိ’’စ္စာဒိ. ကညေ ဟေ ကညေ ကာမယမာနံ မံ တုဝံ ဣစ္ဆယမာနံ မံ န ကာမယသိ တွံ န ဣစ္ဆသိ, ဣဒံ ကိံ နု. ဤဒိသေ ဣစ္ဆာဝိဃာတေ ဝုစ္စမာနေ ဧဝံ– ४५. “विशिष्ट” इत्यादी. प्रिय वाटणाऱ्या विशिष्ट उक्तीने (कथनाने) विशेषित करण्यायोग्य अशा कथनापासून रहित असलेल्या वाक्याला कवींनी 'ग्राम्यदोष' मानले आहे. “यथा” इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात— “कन्ये” म्हणजे हे कन्ये! तुझ्यावर प्रेम करणाऱ्या माझ्यावर तू प्रेम करत नाहीस, हे काय आहे? अशा प्रकारच्या इच्छाभंगाच्या प्रसंगी असे म्हणावे— ‘‘ယာစနာ မဒီယာ တဝ ကာရဏာယံ,ဒိနေ ဒိနေ နိပ္ဖလတံ ဥပေတိ; ဒက္ခော သဒါ မာနိနိမာနဘင်္ဂေ,သ မန္မထောနျတြ ဂတော မတော နု’’ဣတိ ဝိယ. “तुझ्यासाठी असणारी माझी याचना दिवसेंदिवस निष्फळ ठरत आहे. मानिनींच्या मानाचा भंग करण्यात सदैव चतुर असलेला तो मन्मथ (कामदेव) इतरत्र गेला आहे की मृत झाला आहे?” याप्रमाणे. ပိယတ္ထဿ ကထနာဘာဝတော ‘‘ကညေ’’တျာဒိကံ ဝစနံ မိလက္ခုကာနံ ဝစနတ္တာ ဂါမ္မံ. ဧတ္ထ ကညာသဒ္ဒေါ ဒသဝဿိကာယ ဝတ္တတီတိ နိယမော နတ္ထိ. ဝိသိဋ္ဌဿ အတ္ထဿ ဝစနတော အပေတန္တိ ဝါကျံ. प्रिय अर्थाच्या कथनाचा अभाव असल्यामुळे “कन्ये” इत्यादी वचन म्लेंच्छांच्या (असंस्कृत लोकांच्या) वचनासारखे असल्यामुळे 'ग्राम्य' आहे. येथे 'कन्या' शब्द केवळ दहा वर्षांच्या मुलीसाठीच वापरला जातो असा नियम नाही. हे वाक्य विशिष्ट अर्थाच्या वचनापासून रहित आहे. ၄၆. ४६. ပဒသန္ဓာနတော ကိဉ္စိ, ဒုပ္ပတီတိကရံ ဘဝေ; တမ္ပိ ဂါမ္မံတျ’ဘိမတံ, ယထာ ယာဘဝတော ပိယာ. पदांच्या संधीमुळे (जोडणीमुळे) जर एखादे वाक्य वाईट प्रतीती (अयोग्य अर्थ) देणारे होत असेल, तर त्यालाही 'ग्राम्य' मानले जाते, जसे की— “याभवतो प्रिया” (yā bhavato piyā). ၄၆. ‘‘ပဒေ’’စ္စာဒိ. ပဒသန္ဓာနတော ပုဗ္ဗာပရာနံ ပဒါနံ သန္ဓိဝသေန ယံ ကိဉ္စိ ဝါကျံ ဒုဋ္ဌု အသုတိသုဘဂံ ပတီတိမဝဗောဓံ ကရောတီတိ ကရံ ဘဝေ, တမ္ပိ ယထာဝုတ္တံ ဂါမ္မန္တျဘိမတံ. ယထာတျုဒါဟရတိ. ဘဝတော ယာ ကာစိ ဝနိတာ ပိယာ ဟောတီတိ ဧကောတ္ထော. ယဘ မေထုနေ. ယဘနံ ယာဘော. သော ဝိဇ္ဇတေ ယဿ သော ယာဘဝါ. တဿ ယာဘဝတော ပိယာဣတျပိ ဘဝတိ. ४६. “पदे” इत्यादी. पदांच्या संधीमुळे, म्हणजे पूर्व आणि उत्तर पदांच्या संधीमुळे जे काही वाक्य ऐकण्यास कटू आणि वाईट प्रतीती (बोध) करून देणारे होते, त्यालाही पूर्वोक्त 'ग्राम्य' मानले जाते. “यथा” इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात— “आपली जी कोणी प्रिय स्त्री आहे” हा एक अर्थ आहे. 'यभ्' धातू मैथुन अर्थात आहे. मैथुन करणे म्हणजे 'याभ'. तो ज्याच्याकडे आहे तो 'याभवान्'. त्याच्या 'याभवतो प्रिया' (मैथुन करणाऱ्याची प्रिया) असाही अर्थ होतो. ၄၆. ‘‘ပဒသန္ဓာနိ’’စ္စာဒိ. ကိဉ္စိ ဝါကျံ ပဒသန္ဓာနတော ပုဗ္ဗာပရပဒါနံ ဃဋနတော ဒုပ္ပတီတိကရံ ဘဝေ အသဗ္ဘဘူတဒုဋ္ဌတ္ထဿ ပကာသကော ဟောတိ, တမ္ပိ ဂါမ္မန္တိ ယထာဝုတ္တဂါမ္မဒေါသေန ဒူသိတန္တိ သဗ္ဗေဟိ ကဝီဟိ အဘိမတံ ဉာတံ. ယထာတိ ဥဒါဟရတိ. ဘဝတော ဘဝန္တဿ ယာ ကာစိ ဣတ္ထီ ပိယာ ဘဝတီတိ အယံ ကဝိနာ ဣစ္ဆိတတ္ထော. ယာဘဝတော မေထုနဝန္တဿ ပိယာတိပိ အတ္ထော. ‘‘ယဘ မေထုနေ’’တိ ဟိ ဓာတု. ယဘနံ ယာဘော, သော အဿ အတ္ထီတိ ယာဘဝါ, တဿ ယာဘဝတောတိ ဂဟိတေ အသောတဗ္ဗတ္တာ ဒုပ္ပတီတိကရတာ. ဒုဋ္ဌာယေဝ ပတီတိ အဝဗောဓော, တံ ကရောတီတိ ဝိဂ္ဂဟော. ४६. “पदसंधान” इत्यादी. पदांच्या संधीमुळे, म्हणजे पूर्व आणि उत्तर पदांच्या जोडणीमुळे एखादे वाक्य वाईट प्रतीती देणारे (अश्लील व दुष्ट अर्थ प्रकट करणारे) होते, त्यालाही 'ग्राम्य' म्हणजे पूर्वोक्त ग्राम्यदोषाने दूषित असे सर्व कवींनी मानले आहे, जाणले आहे. “यथा” इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात— “आपली (भवंतांची) जी कोणी स्त्री प्रिय आहे” हा कवीला अभिप्रेत असलेला अर्थ आहे. परंतु “याभवतो” म्हणजे “मैथुन करणाऱ्याची प्रिया” असाही अर्थ निघतो. कारण 'यभ्' हा धातू मैथुन अर्थात आहे. मैथुन म्हणजे 'याभ', तो ज्याच्याकडे आहे तो 'याभवान्', आणि 'याभवतः' असा शब्द ग्रहण केल्यास तो ऐकण्यास अयोग्य असल्यामुळे वाईट प्रतीती देणारा ठरतो. दुष्ट (वाईट) प्रतीती म्हणजे बोध करून देणारे, असा याचा विग्रह आहे. ၄၇. ४७. ဝုတ္တေသု သူစိတေ ဌာနေ, ပဒစ္ဆေဒေါ ဘဝေ ယတိ; ယံ တာယ ဟီနံ တံ ဝုတ္တံ, ယတိဟီနန္တိ သာ ပန. वृत्तांमध्ये निर्दिष्ट केलेल्या ठिकाणी जो पदांचा छेद (विराम) होतो, त्याला 'यती' म्हणतात. जे वाक्य त्या यतीने रहित असते, त्याला 'यतीहीन' म्हटले जाते. ၄၇. ‘‘ဝုတ္တေသွိ’’စ္စာဒိ. ဝုတ္တေသု ဆန္ဒောသတ္ထပရိနိဒ္ဒိဋ္ဌေသု အနုဋ္ဌုဘာဒီသု သူစိတေ ဌာနေ ‘‘ဧတ္ထယတီ’’တိ ဆန္ဒောဝိစိတိယာ ပကာသိတဋ္ဌာနေ ပဒါနံ သျာဒျန္တာနံ ဆေဒေါ ဝိစ္ဆိတိ ဝိဘာဂေါ အနုဝါဒေါ ယံ ယတိ ဘဝေတိ ဝိဓီယတိ. တာယ [Pg.83] ယတိယာ ဟီနံ ပရိဟီနံ ဝိရုဒ္ဓံ ယံ ဝါကျံ, တံ ယတိဟီနန္တိ ဝုတ္တံ, ‘‘ယမနံ ဝိရာမော ယတိ, သာ ဟီနာ ဧတ္ထာ’’တိ ကတွာ. ပနာတိ ဝိသေသေ, သာ ယတိ ပနာတိ သမ္ဗန္ဓော. ४७. “वृत्तेषु” इत्यादी. वृत्तांमध्ये, म्हणजे छंदःशास्त्रामध्ये निर्दिष्ट केलेल्या अनुष्टुभ् इत्यादी वृत्तांमध्ये सुचविलेल्या ठिकाणी, “येथे यती आहे” अशा छंदःशास्त्रात प्रकाशित केलेल्या ठिकाणी, सुबंत आणि तिङंत पदांचा जो छेद, विच्छेदन, विभाग किंवा विराम होतो, त्याला 'यती' असे म्हटले जाते. त्या यतीने रहित किंवा विरुद्ध असलेले जे वाक्य असते, त्याला 'यतीहीन' म्हटले जाते; कारण “नियमन किंवा विराम म्हणजे यती, आणि ती ज्यामध्ये हीन (रहित) आहे ते यतीहीन”. 'पन' हा शब्द विशेष अर्थात आहे, 'ती यती' असा संबंध आहे. ၄၇. ‘‘ဝုတ္တေသွ’’စ္စာဒိ. ဝုတ္တေသု ဆန္ဒောသတ္ထေ နိဒ္ဒိဋ္ဌအနုဋ္ဌုဘာဒီသု သူစိတေ ဌာနေ ‘‘အယမေတ္ထ ယတီ’’တိ ပကာသိတေ ဌာနေ ပဒစ္ဆေဒေါ သျာဒျန္တတျာဒျန္တာဒီနံ ပဒါနံ ဝိစ္ဆေဒေါ ယတိ နာမ ဘဝေ, တာယ ယတိယာ ယံ ဝါကျံ ဟီနံ အဘိမတဋ္ဌာနေ ဝဏ္ဏဝိစ္ဆေဒေန ပရိဟီနံ, တံ ဝါကျံ ယတိဟီနန္တိ ယတိဟီနဒေါသေန ဒုဋ္ဌန္တိ ဝိညူဟိ ဝုတ္တံ. ४७. “वृत्तेषु” इत्यादी. वृत्तांमध्ये, म्हणजे छंदःशास्त्रामध्ये निर्दिष्ट केलेल्या अनुष्टुभ् इत्यादी वृत्तांमध्ये सुचविलेल्या ठिकाणी, “येथे यती आहे” अशा प्रकाशित केलेल्या ठिकाणी, सुबंत आणि तिङंत इत्यादी पदांचा जो विच्छेद होतो, त्याला 'यती' असे म्हणतात. त्या यतीने रहित असलेले, म्हणजे इच्छित ठिकाणी वर्णविच्छेदाने रहित असलेले जे वाक्य असते, त्याला विद्वानांनी 'यतीहीन' म्हणजे यतीहीनदोषाने दूषित असे म्हटले आहे. ၄၈. ४८. ယတိ သဗ္ဗတ္ထ ပါဒန္တေ, ဝုတ္တဍ္ဎေ စ ဝိသေသတော; ပုဗ္ဗာပရာနေကဝဏ္ဏ-ပဒမဇ္ဈေပိ ကတ္ထစိ. यती सर्वत्र पादाच्या (चरणाच्या) शेवटी आणि विशेषतः वृत्ताच्या अर्ध्या भागामध्ये (अर्धभागाच्या शेवटी) असते; तसेच कधीकधी पूर्व आणि उत्तर अनेक वर्णांच्या पदांच्या मध्येही असते. ၄၈. ‘‘ယတိ’’စ္စာဒိ. သဗ္ဗတ္ထ ပါဒန္တေ သဗ္ဗသ္မိံ စတုတ္ထံသသင်္ခါတာနံ ဂါထာပါဒါနံ အန္တေ အဝသာနေ စ ဝိသေသတော ဝိသေသေန ဧကန္တေန ဝုတ္တဍ္ဎေ စ ဝုတ္တာနံ ပါဒဒွယသင်္ခါတေ အဍ္ဎေ စ, တဒဝသာနေ စာတိ အဓိပ္ပာယော. ‘‘သိယာ’’တိ သေသော. နနု ‘‘ပဒစ္ဆေဒေါ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ ပဒမဇ္ဈေ ယတိ န ဟောတေဝါတိ စေတိ အာဟ ‘‘ပုဗ္ဗ’’ဣစ္စာဒိ. ကတ္ထစိ ကိသ္မိဉ္စိ ဌာနေ, န သဗ္ဗတ္ထ. ပုဗ္ဗာပရာနေကဝဏ္ဏပဒမဇ္ဈေပိ ယတီတိ သမ္ဗန္ဓော. ပုဗ္ဗေ စ အပရေ စ ပုဗ္ဗာပရေ. အနေကေ ဝဏ္ဏာ အနေကဝဏ္ဏာ. ပုဗ္ဗာပရေ အနေကဝဏ္ဏာ ယဿ တံ တထာ. တဉ္စ တံ ပဒဉ္စ, တဿ မဇ္ဈေပိ. ४८. “यती” इत्यादी. सर्वत्र पादाच्या शेवटी, म्हणजे गाथेच्या चार चरणांपैकी प्रत्येक चरणाच्या शेवटी (अवसानात) आणि विशेषतः म्हणजे निश्चितपणे वृत्ताच्या अर्ध्या भागात, म्हणजे दोन चरणांच्या समाप्तीनंतर, त्याच्या शेवटी यती असते, असा अभिप्राय आहे. “असावी” हा शब्द अध्याहृत आहे. जर “पदाचा छेद” असे म्हटले आहे, तर पदाच्या मध्ये यती असूच शकत नाही का? यावर म्हणतात— “पूर्व” इत्यादी. “कत्थचि” म्हणजे काही ठिकाणी, सर्वत्र नाही. पूर्व आणि उत्तर अनेक वर्णांच्या पदांच्या मध्येही यती असते, असा संबंध आहे. पूर्व आणि उत्तर म्हणजे 'पूर्वापर'. अनेक वर्ण म्हणजे 'अनेकवर्ण'. ज्याच्या पूर्व आणि उत्तर भागात अनेक वर्ण आहेत ते 'पूर्वापर-अनेकवर्ण' पद होय, त्याच्या मध्येही (यती असते). ၄၈. ဣဒါနိ ယတိမှိ လဗ္ဘမာနံ သဗ္ဗဝိသယံ ဒဿေတိ ‘‘ယတိ’’စ္စာဒိနာ. သာ ပန ယတိ သဗ္ဗတ္ထ ပါဒန္တေ စတုတ္ထံသသင်္ခါတဂါထာပါဒါနံ အန္တေ စ ဝိသေသတော နိယမတော ဝုတ္တဍ္ဎေ စ ဝုတ္တာနံ ပါဒဒွယသင်္ခါတေ အဍ္ဎေ စ, တဒဝသာနေ စာတိ အဓိပ္ပာယော. ကတ္ထစိ ကိသ္မိဉ္စိ ဌာနေ ပုဗ္ဗာပရာနေကဝဏ္ဏပဒမဇ္ဈေပိ ပုဗ္ဗာပရဘူတအနေကဝဏ္ဏသမန္နာဂတပဒါနံ မဇ္ဈေ [Pg.84] စ သိယာ. ပဒစ္ဆေဒဿ ‘‘ယတီ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ ပဒမဇ္ဈေ န ဟောတီတိ သင်္ကာပရိဟရဏတ္ထံ ‘‘ပုဗ္ဗာပရာနေကဝဏ္ဏပဒမဇ္ဈေ’’တိ ဝုတ္တံ. ဧတ္ထ ပါဒန္တော, ဝုတ္တဍ္ဎော, ပဒမဇ္ဈဉ္စ ယတိဋ္ဌာနန္တိ. ပဒမဇ္ဈေယေဝ လဗ္ဘမာနာ ယတိ ကတ္ထစိ ဟောတိ, ဒွက္ခရတျက္ခရပဒမဇ္ဈေ ပန န ဟောတိ. ४८. आता “यती” इत्यादीद्वारे यतीचे सर्व विषय (स्थान) दाखवतात. ती यती सर्वत्र पादाच्या शेवटी, म्हणजे गाथेच्या चार चरणांपैकी प्रत्येक चरणाच्या शेवटी आणि विशेषतः म्हणजे नियमाने वृत्ताच्या अर्ध्या भागात, म्हणजे दोन चरणांच्या समाप्तीनंतर, त्याच्या शेवटी असते, असा अभिप्राय आहे. काही ठिकाणी पूर्व आणि उत्तर अनेक वर्णांनी युक्त असलेल्या पदांच्या मध्येही असू शकते. “पदाचा छेद म्हणजे यती” असे म्हटल्यामुळे पदाच्या मध्ये यती होत नाही, या शंकेचे निरसन करण्यासाठी “पूर्व आणि उत्तर अनेक वर्णांच्या पदांच्या मध्ये” असे म्हटले आहे. येथे पादाचा शेवट, वृत्ताचा अर्धा भाग आणि पदाचा मध्य ही यतीची स्थाने आहेत. पदाच्या मध्ये आढळणारी यती काही ठिकाणीच होते, परंतु दोन किंवा तीन अक्षरी पदांच्या मध्ये ती होत नाही. တတ္ထောဒါဟရဏပစ္စုဒါဟရဏာနိ ယထာ – त्याविषयी उदाहरणे आणि प्रत्युदाहरणे खालीलप्रमाणे आहेत— ၄၉. ४९. တံ နမေ သိရသာ စာမီ-ကရဝဏ္ဏံ တထာဂတံ; သကလာပိ ဒိသာ သိဉ္စ-တီဝ သောဏ္ဏရသေဟိယော. सुवर्णासारखा वर्ण असणाऱ्या त्या तथागतांना मी मस्तक झुकवून वंदन करतो; ते जणू सर्व दिशांना सुवर्णरसाने सिंचन करत आहेत. ၄၉. ဥဒါဟရီယတီတိ ဥဒါဟရဏံ. ပဋိပက္ခမုဒါဟရဏံ ပစ္စုဒါဟရဏံ. စာမီကရဿေဝ သုဝဏ္ဏဿ ဝိယ ဝဏ္ဏော ယဿ တံ တထာဂတံ သိရသာ နမာမိ. ကီဒိသံ? ယော တထာဂတော သကလာပိ ဒိသာ သဗ္ဗာယေဝ ဒသ ဒိသာ သောဏ္ဏရသေဟိ စာမီကရဝဏ္ဏတ္တာ ရသေဟိ သုဝဏ္ဏရသေဟိ သိဉ္စတီဝ သိဉ္စတီတိ မညေ, တံ တထာဂတန္တိ အပေက္ခတေ. ဧတ္ထ ပုဗ္ဗပါဒန္တေ ဝုတ္တဍ္ဎေ စ နိယတာ ယတိ. စာမီကရသဒ္ဒေါ စေတ္ထ စတုရက္ခရော. တတ္ထ စာမီဣတိ ပုဗ္ဗဘာဂေါ, ကရဣတိ ပရော. ဧတ္ထ ပုဗ္ဗာပရာနေကဝဏ္ဏပဒမဇ္ဈေ ယတိ. သိဉ္စတီတိ ဧတ္ထ ပန ပုဗ္ဗာပရာနေကဝဏ္ဏပဒမဇ္ဈတ္တာဘာဝါ သိဉ္စဣတျတြ ယတိ ဒုဋ္ဌာတိ. ဣဒံ ပစ္စုဒါဟရဏံ. ४९. जे उदाहृत केले जाते ते 'उदाहरण' होय. विरोधी उदाहरणाला 'प्रत्युदाहरण' (paccudāharaṇa) म्हणतात. ज्यांचा वर्ण चामीकर (शुद्ध सुवर्ण) सारखा आहे, त्या तथागतांना मी मस्तक नमवून वंदन करतो. कसे (तथागतांना)? जे तथागत सर्व दिशांना - सर्व दहाही दिशांना - सुवर्णरसाने, चामीकरवर्ण असल्यामुळे सुवर्णरसाने जणू सिंचन करीत आहेत असे मला वाटते, त्या तथागतांना (असे अपेक्षित आहे). येथे पूर्व चरणाच्या शेवटी आणि सांगितलेल्या अर्ध्या भागात यती निश्चित आहे. आणि येथे 'चामीकर' हा शब्द चार अक्षरी आहे. त्यामध्ये 'चामी' हा पूर्वभाग आहे आणि 'कर' हा उत्तरभाग आहे. येथे पूर्व आणि उत्तर अशा अनेक वर्णांच्या शब्दांच्या मध्ये यती आहे. परंतु 'सिञ्चति' (siñcati) येथे पूर्व आणि उत्तर अशा अनेक वर्णांच्या शब्दांच्या मध्यभागाचा अभाव असल्यामुळे, 'सिञ्च' (siñca) येथे यती दोषयुक्त आहे. हे प्रत्युदाहरण आहे. ၄၉. တတ္ထ ပါဒန္တဝုတ္တဍ္ဎေသု ယတိယာ ပါကဋတ္တာ တသ္မိံ ပဒမဇ္ဈေ ယတိယာ ဥဒါဟရဏပစ္စုဒါဟရဏာနိ ဣဋ္ဌောဒါဟရဏပဋိပက္ခောဒါဟရဏာနိ ယထာ. ‘‘တံ နမေ’’စ္စာဒိ. ယော တထာဂတော သကလာပိ ဒိသာ သောဏ္ဏရသေဟိ သုဝဏ္ဏရသဓာရာဟိ သိဉ္စတီဝ သိဉ္စတိ မညေ, ဣဝသဒ္ဒေါ ဝိတက္ကေ. စာမီကရဝဏ္ဏံ သုဝဏ္ဏဝဏ္ဏသဒိသဆဝိဝဏ္ဏံ တံ တထာဂတံ သိရသာ နမေ. ဧတ္ထ ‘‘စာမီကရဝဏ္ဏ’’န္တိ ယတိယာ စာမီတိ အက္ခရဒွယမတိက္ကမ္မ ဌိတတ္တာ အန္တေပိ ကရဣတိ အက္ခရဒွယေနာနူနတ္တာ [Pg.85] ပဒစ္ဆေဒဿ ပုဗ္ဗာပရဝဏ္ဏာနမနေကတ္တမိတိဋ္ဌောဒါဟရဏံ. သိဉ္စတီတိ ပဒေ သိဉ္စာတိ ဝဏ္ဏဒွယမတိက္ကမ္မ ယတိယာ ဒိဿမာနတ္တေပိ တိဣတိ ပရဘာဂေ ဧကဝဏ္ဏတ္တာ အနေကဝဏ္ဏာဘာဝေါတိ ပစ္စုဒါဟရဏံ. ဧတ္ထ အနေကဝဏ္ဏတ္တံ ပဒဝသေနေဝ ဉာတဗ္ဗံ. စာမီကရဿ ဝဏ္ဏော ဝိယ ဝဏ္ဏော ယဿ သောတိ ဝိဂ္ဂဟော. ४९. त्यामध्ये चरणाच्या शेवटी आणि सांगितलेल्या अर्ध्या भागात यती स्पष्ट असल्यामुळे, त्या शब्दाच्या मध्यभागातील यतीचे उदाहरण आणि प्रत्युदाहरण, तसेच इष्ट उदाहरण आणि विरोधी उदाहरण खालीलप्रमाणे आहेत. जसे की, 'तं नमे' (taṃ name) इत्यादी. जे तथागत सर्व दिशांना सुवर्णरसाने - सुवर्णरसाच्या धारांनी जणू सिंचन करीत आहेत असे मला वाटते, येथे 'इव' (iva) हा शब्द वितर्क (कल्पना) दर्शवतो. चामीकरवर्णासारखा, म्हणजे सुवर्णासारखा कांतीचा वर्ण असलेल्या त्या तथागतांना मी मस्तक नमवून वंदन करतो. येथे 'चामीकरवण्णं' (cāmīkaravaṇṇaṃ) यामध्ये यती 'चामी' या दोन अक्षरांचे उल्लंघन करून स्थित असल्यामुळे आणि शेवटीही 'कर' या दोन अक्षरांपेक्षा कमी नसल्यामुळे, पदच्छेदाच्या पूर्व आणि उत्तर वर्णांचे अनेकत्व (बहुत्व) सिद्ध होते, म्हणून हे 'इष्ट उदाहरण' आहे. 'सिञ्चति' (siñcati) या पदात 'सिञ्च' (siñca) या दोन वर्णांचे उल्लंघन करून यती दिसत असली, तरी 'ति' (ti) या उत्तर भागात केवळ एकच वर्ण असल्यामुळे अनेक वर्णांचा अभाव आहे, म्हणून हे 'प्रत्युदाहरण' आहे. येथे अनेकवर्णत्व हे पदाच्या आधारावरच समजून घ्यावे. 'चामीकराच्या वर्णासारखा ज्याचा वर्ण आहे तो' असा याचा विग्रह आहे. ၅၀. ५०. သရော သန္ဓိမှိ ပုဗ္ဗန္တော, ဝိယ လောပေ ဝိဘတ္တိယာ; အညထာ တွ’ညထာ တတ္ထ, ယာဒေသာဒိ ပရာဒိ’ဝ. विभक्तीचा लोप झाल्यावर संधीमध्ये स्वर हा पूर्वपदाच्या शेवटी असलेल्या स्वरासारखा (पूर्वन्त) होतो. अन्यथा (विभक्तीचा लोप न झाल्यास) तो तेथे वेगळ्या प्रकारे होतो, आणि 'य'कारादेश इत्यादी आदेश हे उत्तरपदाच्या सुरुवातीच्या स्वरासारखे (परादि) होतात. ၅၀. ‘‘သရော’’စ္စာဒိ. ဝိဘတ္တိယာ လောပေ သတိ သန္ဓိမှိ သံဟိတာယံ ကတာယံ သရော ပရပဒါဒိဘူတော ပုဗ္ဗန္တော ဝိယ ပုဗ္ဗပဒဿ အန္တဘူတော ယော သရော, သော ဝိယ ဟောတိ, အနေကဝဏ္ဏတ္တာဘာဝေပိ တတော ဝိဟိတယတိယာ နေဝတ္ထိ ဘင်္ဂေါတိ အဓိပ္ပာယော. အညထာ တု ဝိဘတ္တိယာ အလောပေ တု သတိ သံဟိတာယံ ကတာယံ ပုဗ္ဗပဒန္တဘူတော သရော စေ, အညထာ အညေန ပကာရေန ဟောတိ, ပရပဒဿာဒိသရော ဝိယ ဟောတီတိ အတ္ထော. တံ ဝိဘတ္တိယာ သဒ္ဓိံ ဝိဟာယ ကတယတိယာ နတ္ထိ ဘင်္ဂေါတိ အဓိပ္ပာယော. တတ္ထ တဿံ ယတိယံ ယာဒေသာဒိ ဣဝဏ္ဏာဒီနံ ကာတဗ္ဗော ယကာရာဒေသာဒိ ပရာဒိဝ ပရပဒဿ အာဒိသရော ဝိယ ဟောတိ. ကတယာဒေသာဒိသဟိတံ ဗျဉ္ဇနံ ဝိဟာယ ကတာယ ယတိယာ နတ္ထိ ဘင်္ဂေါတိ အဓိပ္ပာယော. ५०. 'सरो' (saro) इत्यादी. विभक्तीचा लोप झाला असता, संधीमध्ये (संहितेमध्ये) उत्तरपदाच्या सुरुवातीला असलेला स्वर हा पूर्वपदाच्या शेवटी असलेल्या स्वरासारखा (पूर्वन्त) होतो. त्यामुळे अनेक वर्णांचा अभाव असला तरी, तेथे केलेल्या यतीचा भंग होत नाही, असा अभिप्राय आहे. परंतु अन्यथा, म्हणजे विभक्तीचा लोप न होता संहिता केली असता, जर पूर्वपदाच्या शेवटी स्वर असेल, तर तो दुसऱ्या प्रकारे होतो, म्हणजेच तो उत्तरपदाच्या सुरुवातीच्या स्वरासारखा होतो, असा अर्थ आहे. त्या विभक्तीसह त्याला सोडून केलेल्या यतीचा भंग होत नाही, असा अभिप्राय आहे. तेथे त्या यतीमध्ये 'इ'कार इत्यादींच्या जागी होणारा 'य'कारादेश इत्यादी आदेश हे उत्तरपदाच्या सुरुवातीच्या स्वरासारखे (परादि) होतात. केलेल्या यकारादेशासह व्यंजनाला सोडून केलेल्या यतीचा भंग होत नाही, असा अभिप्राय आहे. ၅၀. ဣဒါနိ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တဿ ဝိရုဒ္ဓတ္တေပိ ယတိဘင်္ဂါဘာဝံ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘သရော’’စ္စာဒိ. ဝိဘတ္တိယာ လောပေ သန္ဓိမှိ သတိ သရော သန္ဓိသရော ပုဗ္ဗန္တော ဝိယ ပုဗ္ဗပဒဿ အန္တော ဝိယ ဟောတိ, အညထာ တု ဝိဘတ္တိယာ အလောပေ သံဟိတာယံ ကတာယံ အညထာ ဟောတိ, ပုဗ္ဗပဒန္တဘူတော သရော ပရပဒဿ အာဒိသရော ဝိယ ဟောတိ. တတ္ထ ယတိယံ ယာဒေသာဒိ [Pg.86] ဣဝဏ္ဏာဒီနံ ကတ္တဗ္ဗယကာရာဒေသာဒိ ပရာဒိဝ ပရပဒဿ အာဒိသရော ဝိယ ဟောတိ, ပုဗ္ဗန္တသဒိသသရမတိက္ကမိတွာပိ ပရပဒါဒိသရသဒိသဝဏ္ဏမာဂမ္မ တံ အနတိက္ကမိတွာပိ ပရပဒါဒိသရသဒိသယာဒေသာဒိမတိက္ကမိတွာပိ ယတိယာ ပယုတ္တာယ သတိ အနေကဝဏ္ဏတ္တာဘာဝေပိ ယတိဘင်္ဂေါ န ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. ပုဗ္ဗဿ အန္တောတိ စ, ယော စ သော အာဒေသော စ, သော အာဒိ ယဿ မကာရာဒိနောတိ စ, ပရဿ အာဒီတိ စ ဝါကျံ. ५०. आता खाली सांगितलेल्या नियमाच्या विरुद्ध असूनही यतीचा भंग होत नाही, हे दर्शवताना 'सरो' (saro) इत्यादी म्हणतात. विभक्तीचा लोप होऊन संधी झाली असता, संधीतील स्वर हा पूर्वपदाच्या शेवटी असलेल्या स्वरासारखा (पूर्वन्त) होतो. परंतु अन्यथा, विभक्तीचा लोप न होता संहिता केली असता तो वेगळ्या प्रकारे होतो, म्हणजे पूर्वपदाच्या शेवटी असलेला स्वर हा उत्तरपदाच्या सुरुवातीच्या स्वरासारखा होतो. तेथे यतीमध्ये 'इ'कार इत्यादींच्या जागी केला जाणारा 'य'कारादेश इत्यादी आदेश हे उत्तरपदाच्या सुरुवातीच्या स्वरासारखे होतात. पूर्वपदाच्या शेवटी असलेल्या स्वरासारख्या स्वराचे उल्लंघन करूनही, उत्तरपदाच्या सुरुवातीच्या स्वरासारख्या वर्णावर येऊन, त्याचे उल्लंघन न करता किंवा उत्तरपदाच्या सुरुवातीच्या स्वरासारख्या यकारादेशादींचे उल्लंघन करूनही यतीचा प्रयोग केला असता, अनेक वर्णांचा अभाव असला तरी यतीचा भंग होत नाही, असा अभिप्राय आहे. 'पूर्वपदाचा अंत' (pubbassa anto), 'जो आदेश आहे आणि जो म-कार इत्यादींचा आदि आहे' आणि 'उत्तरपदाचा आदि' (parassa ādi) असे हे वाक्य आहे. ၅၁. ५१. စာဒီ ပုဗ္ဗပဒန္တာဝ, နိစ္စံ ပုဗ္ဗပဒဿိတာ; ပါဒယော နိစ္စသမ္ဗန္ဓာ, ပရာဒီဝ ပရေန တု. 'च' (ca) इत्यादी निपात हे नेहमी पूर्वपदावर आश्रित असल्यामुळे पूर्वपदाचे अंतिम अवयव (पूर्वन्तासारखे) मानले जातात. तर 'प्र' (pa) इत्यादी उपसर्ग हे उत्तरपदाशी नेहमी जोडलेले असल्यामुळे उत्तरपदाचे सुरुवातीचे अवयव (परादीसारखे) मानले जातात. ၅၁. နိစ္စံ အနဝရတံ ပုဗ္ဗပဒံ သိတာ နိဿိတာ စာဒီ စကာရာဒယော နိပါတာ ပုဗ္ဗဿ ပဒဿ အန္တာ အဝယဝါ ဝိယ ဟောန္တိ, တေ အန္တော ကတွာ ယတိ ကာတဗ္ဗာတိ အဓိပ္ပာယော. ပရေန ပရပဒေန နိစ္စသမ္ဗန္ဓာ သတတယောဂိနော, တုသဒ္ဒေါ အဋ္ဌာနပ္ပယုတ္တော, ပါဒယော တု ပရာဒီဝ ပရပဒဿ အာဒီ အဝယဝါ ဝိယ ဟောန္တိ, တံ ဝိဟာယ ပုဗ္ဗပဒန္တေ ယတိ ကာတဗ္ဗာတိ အဓိပ္ပာယော. ५१. नेहमी निरंतर पूर्वपदावर आश्रित असलेले 'च' इत्यादी निपात हे पूर्वपदाचे अंतिम अवयव असल्यासारखे असतात, त्यांना शेवटी ठेवून यती करावी, असा अभिप्राय आहे. उत्तरपदाशी नेहमी जोडलेले (सतत संबंध असलेले) 'प्र' इत्यादी उपसर्ग हे उत्तरपदाचे सुरुवातीचे अवयव असल्यासारखे असतात (येथे 'तु' शब्द अयोग्य ठिकाणी वापरला आहे), त्यांना सोडून पूर्वपदाच्या शेवटी यती करावी, असा अभिप्राय आहे. ၅၁. ‘‘စာဒိ’’စ္စာဒိ. နိစ္စံ သတတံ ပုဗ္ဗပဒဿိတာ ပုဗ္ဗပဒံ နိဿာယ ပဝတ္တာ စာဒီ စကာရာဒိနိပါတာ ပုဗ္ဗပဒန္တာဝ ပုဗ္ဗပဒဿ အန္တာ အဝယဝါ ဝိယ ဟောန္တိ, ပရေန ပရပဒေန နိစ္စသမ္ဗန္ဓာ နိရန္တရယောဂိနော ပါဒယော တု ပါဒိဥပသဂ္ဂါ ပန ပရာဒီဝ ပရပဒဿ အာဒီ အဝယဝါဝိယ ဟောန္တိ. စာဒယော အာဂမ္မ တေ ဗဟိ ကတွာပိ ပါဒယော အာဂမ္မ တေ အန္တော ကတွာပိ ပဝတ္တော ဝိရာမော ယတိဘင်္ဂေါတိ အဓိပ္ပာယော. စောအာဒိ ယေသန္တိ စ, ပုဗ္ဗပဒံ သိတာတိ စ, ပေါ အာဒိ ယေသန္တိ စ, နိစ္စံ သမ္ဗန္ဓာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဧတ္ထ စ တဂ္ဂုဏသံဝိညာဏတ္တာ စကာရပကာရာဒီနမ္ပိ ပရိဂ္ဂဟော. ५१. 'चादि' (cādi) इत्यादी. नेहमी निरंतर पूर्वपदावर आश्रित असलेले 'च' इत्यादी निपात हे पूर्वपदाचे अंतिम अवयव असल्यासारखे असतात. उत्तरपदाशी नेहमी जोडलेले 'प्र' इत्यादी उपसर्ग हे उत्तरपदाचे सुरुवातीचे अवयव असल्यासारखे असतात. 'च' इत्यादी निपातांना सोडून (त्यांना बाहेर ठेवून) किंवा 'प्र' इत्यादी उपसर्गांना समाविष्ट करून (त्यांना आत ठेवून) घेतलेला विराम हा यतीभंग मानला जातो, असा अभिप्राय आहे. 'च हा ज्यांचा आदि आहे ते', 'पूर्वपदावर आश्रित असलेले', 'प हा ज्यांचा आदि आहे ते' आणि 'नेहमी जोडलेले' असा याचा विग्रह आहे. आणि येथे तद्गुणसंविज्ञानामुळे 'च'कार आणि 'प'कार इत्यादींचाही स्वीकार होतो. သဗ္ဗတ္ထောဒါဟရဏာနိ ယထာ सर्व ठिकाणची उदाहरणे खालीलप्रमाणे आहेत: ၅၂. ५२. နမေ တံ သိရသာ သဗ္ဗော-ပမာတီတံ တထာဂတံ; ယဿ လောကဂ္ဂတံ ပတ္တ-ဿော’ပမာ န ဟိ ယုဇ္ဇတိ. सर्व उपमांच्या पलीकडे असलेल्या त्या तथागतांना मी मस्तक नमवून वंदन करतो; ज्यांच्या लोकोत्तर श्रेष्ठत्वाला कोणतीही उपमा लागू पडत नाही. ၅၃. ५३. မုနိန္ဒံ တံ သဒါ ဝန္ဒာ-မျ’နန္တမတိ’မုတ္တမံ; ယဿ ပညာ စ မေတ္တာ စ, နိဿီမာတိ ဝိဇမ္ဘတိ. अनंत बुद्धी असलेल्या आणि सर्वश्रेष्ठ अशा त्या मुनींद्रांना (मुनींच्या राजाला) मी नेहमी वंदन करतो; ज्यांची प्रज्ञा आणि मैत्री असीम होऊन विस्तारत आहे. ၅၂-၅၃. သဗ္ဗတ္ထာတိ [Pg.87] ပုဗ္ဗန္တသဒိသာဒီသု. ‘‘နမေတ’’န္တိအာဒိဂါထာဒွယေ ပဒတ္ထော ပါကဋော, အဓိပ္ပာယော တု ယတော လောကဂ္ဂတံ ပတ္တော, တတော သဗ္ဗောပမာတီတော, ယတော ပညာမေတ္တာ လောကေ နိရန္တရမိဝ ဝတ္တန္တိ, တတော အနန္တမတိ, ဥတ္တမော စာတိ. ဧတ္ထ ‘‘သဗ္ဗာ ဥပမာ’’တိ သမာသံ ကတွာ ဝိဘတ္တိလောပေ သံဟိတာယဉ္စ ကတာယံ ပရပဒါဒိဥကာရော ပုဗ္ဗပဒန္တဗ္ဗကာရဋ္ဌအကာရော ဝိယ ဟောတီတိ သဗ္ဗော ဣစ္စတြ ပါဒန္တယတိ. ပတ္တဿောပမာ ဣစ္စတြ ယကာရာဒေသဿ ပရာဒိသဒိသဘာဝေါ ဝိယ ဟောတိ, ဝိဘတ္တိယာ အလောပေ သံဟိတာယံ ကတာယံ သဝိဘတ္တိယာ အကာရော ပရပဒါဒိ ဥကာရော ဝိယ ဟောတီတိ တံဝိဘတ္တိယာ ပသိဒ္ဓံ ဝိဟာယ ပတ္တဣစ္စတြ ပါဒန္တယတိ. တထာ ဝန္ဒာမျနန္တဣစ္စတြ ယကာရာဒေသဿ ပရာဒိသဒိသဘာဝေါ ဝိဟိတောတိ မျသဒ္ဒံ ဝဇ္ဇေတွာ ဝန္ဒာဣစ္စတြ ပါဒန္တယတိ. ပုဗ္ဗပဒဿိတာနံ စာဒီနံ ပုဗ္ဗပဒန္တသဒိသတာ ဝုတ္တာတိ မေတ္တာ စာတိ စသဒ္ဒတော ယတိ, အပရပဒသမ္ဗန္ဓာ ပါဒယော ပရပဒါဒိသဒိသာ ဟောန္တီတိ နိဿီမာတိ ဧတ္ထ နိသဒ္ဒံ ဝိဟာယ တတော အာဒိမှိ ယတိ. ५२-५३. 'सब्बत्थाति' म्हणजे पूर्वान्तसदृश इत्यादींमध्ये. 'नमे तं' इत्यादी दोन गाथांमध्ये पदांचा अर्थ स्पष्ट आहे, परंतु अभिप्राय असा आहे की ज्या अर्थी ते (भगवान) लोकाग्रतेला (लोकोत्तर श्रेष्ठत्वाला) प्राप्त झाले आहेत, त्या अर्थी ते सर्व उपमांच्या अतीत आहेत; ज्या अर्थी त्यांची प्रज्ञा आणि मैत्री जगात निरंतरपणे प्रवृत्त होते, त्या अर्थी ते अनंतमती आणि उत्तम आहेत. येथे 'सब्बा उपमा' असा समास करून, विभक्तीचा लोप आणि संहिता (संधी) केली असता, परपदाचा आदि 'उ'कार हा पूर्वपदाच्या शेवटी असलेल्या 'ब्ब' कारामधील 'अ'कारासारखा होतो, म्हणून 'सब्बो' येथे पादाचा अंत होतो. 'पत्तस्सोपमा' येथे 'य'कारादेशाचा पर-आदि-सदृश भाव असल्यासारखा होतो; विभक्तीचा लोप न करता संहिता केली असता, विभक्तीसह असलेला 'अ'कार हा परपदाच्या आदि 'उ'कारासारखा होतो, म्हणून त्या विभक्तीची प्रसिद्धी सोडून 'पत्त' येथे पादाचा अंत होतो. तसेच 'वन्दाम्यनन्त' येथे 'य'कारादेशाचा पर-आदि-सदृश भाव विहित असल्यामुळे 'म्य' हा शब्द वर्ज्य करून 'वन्दा' येथे पादाचा अंत होतो. पूर्वपदावर आश्रित असलेल्या 'च' इत्यादींची पूर्वपद-अंत-सदृशता सांगितली असल्यामुळे 'मेत्ता च' येथील 'च' शब्दापासून यती होते. अपरपदाच्या संबंधामुळे 'प' इत्यादी परपदाच्या आदि सारखे होतात, म्हणून 'निस्सीमा' येथे 'नि' शब्द सोडून त्याच्या सुरुवातीला यती होते. ၅၂-၅၃. သဗ္ဗတ္ထ ယထာဝုတ္တပုဗ္ဗန္တသဒိသသရာဒီသု ပဉ္စသု ဥဒါဟရဏာနိယထာ. ‘‘နမေ တ’’မိစ္စာဒိ, လောကဂ္ဂတံ ပတ္တဿ ယဿ ဗုဒ္ဓဿ ဥပမာ န ဟိ ယုဇ္ဇတိ သကလပဒတ္ထာနံ အတိက္ကမ္မ ဌိတတ္တာ န ဟိ ယုဇ္ဇတိ. သဗ္ဗောပမာတီတံ တံ တထာဂတံ သိရသာ နမေ နမာမိ. သဗ္ဗောတိ ဧတ္ထ ဩကာရဿ ပုဗ္ဗပဒန္တသရသဒိသတ္တာ တတော ပရာယ ယတိယာ စ ဿောပမာတိ ပရပဒါဒိသဒိသံ [Pg.88] ဝဏ္ဏမနတိက္ကမ္မ ဌိတာယ ယတိယာ စ ဥဒါဟရဏံ. ५२-५३. सर्वत्र यथावक्त पूर्वान्तसदृश स्वरादी पाच उदाहरणे खालीलप्रमाणे आहेत. 'नमे तं' इत्यादी, लोकाग्रतेला प्राप्त झालेल्या ज्या बुद्धांची उपमा योग्य ठरत नाही, कारण ते सर्व पदार्थांचे अतिक्रमण करून स्थित आहेत, म्हणून ती योग्य ठरत नाही. सर्व उपमांच्या अतीत असलेल्या त्या तथागतांना मी मस्तक नमवून नमन करतो. 'सब्बो' येथे 'ओ'कार पूर्वपदाच्या अंतिम स्वरासारखा असल्यामुळे त्यापुढील यतीचे, आणि 'स्सोपमा' हे परपदाच्या आदि वर्णासारख्या वर्णाचे अतिक्रमण न करता राहिलेल्या यतीचे उदाहरण आहे. ‘‘မုနိန္ဒေ’’စ္စာဒိ. ယဿ သမ္ဗုဒ္ဓဿ ပညာ စ မေတ္တာ စနိဿီမာ အနန္တသတ္တအနန္တဉေယျဝိသယကရဏတော သီမာရဟိတာ အတိဝိဇမ္ဘတိ. အနန္တမတိံ ဥဒယဗ္ဗယသမ္ဘဝေပိ ဉေယျဿာနန္တတ္တာ ဝိသယိမှိ ဝိသယဝေါဟာရေန အနန္တပညာယ သမန္နာဂတံ ဥတ္တမံ တတော ဧဝ ပဝရံ တံ မုနိန္ဒံ သဒါ ဝန္ဒာမိ, ယာဒေသဿ ပရာဒိသဒိသတ္တာ တမနာဂမ္မ ယတိ ဘဝတိ. မေတ္တာစနိဿီမာတိ ဧတ္ထ စာဒီနံ ပုဗ္ဗပဒန္တသဒိသတ္တာစ ပါဒီနံ ပရပဒါဒိသဒိသတ္တာ စ ‘‘စာ’’တိ ‘‘နီ’’တိ ဣမေသမ္ပိ ယတိ ဘဝတိ. 'मुनिन्द' इत्यादी. ज्या सम्यक्संबुद्धांची प्रज्ञा आणि मैत्री अनंत प्राणी आणि अनंत ज्ञेय विषयांना ग्रहण करणारी असल्यामुळे सीमारहित होऊन अत्यंत शोभून दिसते. उदय आणि व्यय (उत्पत्ती आणि विनाश) होत असतानाही ज्ञेयाच्या अनंततेमुळे विषयीमध्ये विषयाच्या व्यवहाराने अनंत प्रज्ञेने युक्त असलेल्या, उत्तम आणि म्हणूनच प्रवर (श्रेष्ठ) अशा त्या मुनींद्रांना मी सदा वंदन करतो. 'य'कारादेशाचा पर-आदि-सदृश भाव असल्यामुळे त्याला न अनुसरता यती होते. 'मेत्ता च निस्सीमा' येथे 'च' इत्यादी पूर्वपदाच्या अंतिम वर्णासारखे असल्यामुळे आणि 'प' इत्यादी परपदाच्या आदि वर्णासारखे असल्यामुळे 'चा' आणि 'नी' यांची देखील यती होते. စာဒိပါဒီသု ပစ္စုဒါဟရဏာနိ ယထာ 'च' आणि 'प' इत्यादींच्या बाबतीत प्रत्युदाहरणे खालीलप्रमाणे आहेत: ၅၄. ५४. မဟာမေတ္တာ မဟာပညာ, စ ယတ္ထ ပရမောဒယာ; ပဏမာမိ ဇိနံ တံ ပ-ဝရံ ဝရဂုဏာလယံ. महामैत्री आणि महाप्रज्ञा जेथे परम उदय (उत्कर्ष) पावतात, त्या श्रेष्ठ गुणांचे आलय असलेल्या प्रवर (उत्तम) अशा त्या जिनांना (बुद्धांना) मी प्रणाम करतो. ၅၄. ‘‘မဟာ’’ဣစ္စာဒိ. ယတ္ထာတိ ယသ္မိံ ဇိနေ. ပရမောဒယာတိ မဟာမေတ္တာဒယော ဥက္ကဋ္ဌာဘိဝုဍ္ဎိယော. တတောယေဝ ဝရဂုဏာလယံ, တေနေဝ ပဝရံ ဥတ္တမံ တံ ဇိနန္တိ သမ္ဗန္ဓော. ဧတ္ထ ပုဗ္ဗပဒနိဿိတံ စကာရံ ပရပဒါဒိဘူတံ ကတွာ တတော ပုဗ္ဗေ ကတာ ယတိ စ, ပရပဒါဒိသမ္ဗန္ဓပကာရံ ပုဗ္ဗပဒန္တဘူတံ ကတွာ ပကာရတော ပရံ ကတာ ယတိ စ ဝိရုဒ္ဓါတိ ဥဘယတ္ထ ပစ္စုဒါဟရဏံ. ५४. 'महा' इत्यादी. 'यत्थ' म्हणजे ज्या जिनांच्या ठिकाणी. 'परमोदया' म्हणजे महामैत्री इत्यादींचा उत्कृष्ट विकास (अभिवृद्धी). म्हणूनच ते 'वरगुणालयं' (श्रेष्ठ गुणांचे आलय) आहेत, आणि म्हणूनच ते 'पवरं' (उत्तम) आहेत, अशा त्या 'जिनं' (जिनांना) असा संबंध आहे. येथे पूर्वपदावर आश्रित असलेल्या 'च' काराला परपदाचा आदि करून त्याच्यापूर्वी केलेली यती, आणि परपदाशी संबंधित असलेल्या 'प' काराला पूर्वपदाचा अंत करून 'प' कारानंतर केलेली यती विरुद्ध आहे, म्हणून दोन्ही ठिकाणी हे प्रत्युदाहरण आहे. ၅၄. စာဒိပါဒီသု ဝိသယဘူတေသု ပစ္စုဒါဟရဏံ ယထာ. ‘‘မဟာမေတ္တိ’’စ္စာဒိ. ယတ္ထ ယသ္မိံ ဇိနေ မဟာမေတ္တာ စ မဟာပညာ စ ဣမာ ပရမောဒယာ ဥက္ကဋ္ဌာဘိဝုဍ္ဎိယော ဟောန္တိ. ဝရဂုဏာလယံ ဥတ္တမဂုဏာကရံ ပဝရံ တတောယေဝ ဥတ္တမံ တံ ဇိနံ ပဏမာမိ. ဧတ္ထ စကာရံ ပရပဒါဒိံ ကတွာ ပကာရံ ပုဗ္ဗပဒန္တံ ကတွာ ယတိယာ ပဝတ္တတ္တာ ‘‘စ ယတ္ထ, တံ ပါ’’တိဒွယမပိ ပစ္စုဒါဟရဏံ. ५४. 'च' आणि 'प' इत्यादी विषयभूत असलेल्या बाबतीत प्रत्युदाहरण खालीलप्रमाणे आहे. 'महामेत्ति' इत्यादी. जेथे ज्या जिनांच्या ठिकाणी महामैत्री आणि महाप्रज्ञा या परम उदय (उत्कृष्ट अभिवृद्धी) पावलेल्या असतात. श्रेष्ठ गुणांची खाण असलेल्या, म्हणूनच प्रवर (उत्तम) अशा त्या जिनांना मी प्रणाम करतो. येथे 'च' काराला परपदाचा आदि करून आणि 'प' काराला पूर्वपदाचा अंत करून यती प्रवृत्त झाल्यामुळे 'च यत्थ' आणि 'तं पा' हे दोन्ही प्रत्युदाहरण आहेत. ၅၅. ५५. ပဒတ္ထက္ကမတော [Pg.89] မုတ္တံ, ကမစ္စုတမိဒံ ယထာ; ခေတ္တံ ဝါ ဒေဟိ ဂါမံ ဝါ, ဒေသံ ဝါ မမ သောဘနံ. पदांच्या अर्थाच्या क्रमापासून सुटलेले (भ्रष्ट झालेले) हे वाक्य 'क्रमच्युत' दोषयुक्त मानले जाते, जसे की: 'मला सुंदर शेत द्या, किंवा गाव द्या, किंवा देश द्या.' ၅၅. ‘‘ပဒ’’ဣစ္စာဒိ. ပဒါနံ အတ္ထက္ကမတော မုတ္တံ ဂဠိတံ ကမစ္စုတမိဒန္တိ ဝိဓီယတေ. ခေတ္တံ ဝါ ဣစ္စာဒိနာ အရုစိတောယံ ယာစနက္ကမော ဝတ္တုနော အဝိညုတံ ဂမေတိ. ယော ဟိ ခေတ္တမ္ပိ ဒါတုံ နိစ္ဆတိ, ကထံ သော ဂါမာဒိကံ ဒဿတီတိ. ५५. 'पद' इत्यादी. पदांच्या अर्थाच्या क्रमापासून सुटलेले, गळून पडलेले हे वाक्य 'क्रमच्युत' नावाचे ठरते. 'खेत्तं वा' (शेत किंवा) इत्यादी याचना करण्याचा हा अयोग्य क्रम बोलणाऱ्याच्या अज्ञानाला दर्शवतो. कारण जो शेत देखील देण्यास इच्छित नाही, तो गाव इत्यादी कसा देईल? ၅၅. ‘‘ပဒတ္ထိ’’စ္စာဒိ. ပဒတ္ထက္ကမတော ပဒါနံ အတ္ထက္ကမတော မုတ္တံ ဂဠိတံ ဣဒံ ဝါကျံ ကမစ္စုတံ နာမ. ဥဒါဟရတိ ‘‘ယထိ’’စ္စာဒိ. မမ သောဘနံ ခေတ္တံ ဝါ ဂါမံ ဝါ ဒေသံ ဝါ ဇနပဒံ ဝါ ဒေဟိ. ဧတ္ထ ခေတ္တမိစ္စာဒိ ယာစနက္ကမော ဝတ္တုနော အဝိညုဘာဝံ ဝိနာ ဥစိတပဒတ္ထက္ကမံ နပ္ပကာသေတိ, တထာ ဟိ ခေတ္တမပိ ဒါတုမနိစ္ဆန္တော ဂါမနိဂမဇနပဒါဒိံ ကထံ ဒဿတီတိ ကမဟာနိ. ५५. 'पदत्थ' इत्यादी. पदांच्या अर्थाच्या क्रमापासून सुटलेले, गळून पडलेले हे वाक्य 'क्रमच्युत' नावाचे आहे. उदाहरण देतात 'यथि' इत्यादी. 'मला सुंदर शेत किंवा गाव किंवा देश किंवा जनपद द्या.' येथे शेत इत्यादी मागण्याचा क्रम बोलणाऱ्याच्या अज्ञतेशिवाय योग्य पद-अर्थ-क्रम प्रकट करत नाही. कारण शेत देखील देण्यास अनइच्छुक असलेला व्यक्ती गाव, निगम, जनपद इत्यादी कसा देईल? म्हणून येथे क्रमाची हानी (क्रमभंग) आहे. ၅၆. ५६. လောကိယတ္ထ’မတိက္ကန္တံ, အတိဝုတ္တံ မတံ ယထာ; အတိသမ္ဗာဓ’မာကာသ-မေတိဿာ ထနဇမ္ဘနေ. लौकिक अर्थाचे अतिक्रमण करणारे वाक्य 'अतिवृत्त' (अतिशयोक्ती दोषयुक्त) मानले जाते, जसे की: 'तिच्या स्तनांच्या वाढीमुळे आकाश अत्यंत संकुचित झाले आहे.' ၅၆. ‘‘လောကိ’’စ္စာဒိ. လောကေ ဝိဒိတော လောကိယော, တံ လောကိယတ္ထမဘိဓေယျံ အတိက္ကန္တံ အနနုဝုတ္တံ ယံ တံ အတိဝုတ္တံ မတန္တိ ဝိဓီယတေ. ယထေတျာဒိနာ ဥဒါဟရတိ. ဧတိဿာ ဝနိတာယ ထနာနံ ပယောဓရာနံ ဇမ္ဘနေ ဗျာပနေ အာကာသံ ဂဂနံ အတိသမ္ဗာဓံ အစ္စန္တပ္ပကံ. ५६. 'लोकि' इत्यादी. लोकात जे प्रसिद्ध आहे ते लौकिक; त्या लौकिक अर्थाचे (वाच्यार्थाचे) अतिक्रमण करणारे, त्याचे अनुसरण न करणारे जे वाक्य आहे, ते 'अतिवृत्त' मानले जाते. 'यथ' इत्यादीने उदाहरण देतात. या स्त्रीच्या स्तनांच्या विस्ताराने (वाढीने) आकाश अत्यंत संकुचित (अतिशय लहान) झाले आहे. ၅၆. ‘‘လောကိယတ္ထိ’’စ္စာဒိ. လောကိယတ္ထံ လောကေ ပသိဒ္ဓမဘိဓေယျံ အတိက္ကန္တံ ကထနာကာရေန အတိက္ကမိတံ ဝါကျံ အတိဝုတ္တမိတိ မတံ. ဥဒါဟရတိ ‘‘ယထိ’’စ္စာဒိ. ဧတိဿာ ထနဇမ္ဘနေ ထနာနံ ဝိဇမ္ဘနေ အာကာသံ အတိသမ္ဗာဓံ အနောကာသံ. ဧတ္ထ ပယောဓရာနံ မဟန္တတ္တံ ဝဒါမာတိ လောကေ မဟန္တန္တိ [Pg.90] ပသိဒ္ဓံ ဂဂနမပိ အတိက္ကန္တတ္တာ ဝါကျမတိဝုတ္တဒေါသေန ဒူသိတံ. ५६. 'लोकियत्थ' इत्यादी. लौकिक अर्थाचे म्हणजे लोकात प्रसिद्ध असलेल्या वाच्यार्थाचे कथन करण्याच्या पद्धतीने अतिक्रमण केलेले वाक्य 'अतिवृत्त' मानले जाते. उदाहरण देतात 'यथि' इत्यादी. या स्त्रीच्या स्तनांच्या वाढीमुळे आकाश अत्यंत संकुचित (जागा नसलेले) झाले आहे. येथे स्तनांचे मोठेपण सांगताना, लोकात जे सर्वात मोठे म्हणून प्रसिद्ध आहे अशा आकाशाचेही अतिक्रमण केले गेल्यामुळे हे वाक्य 'अतिवृत्त' दोषाने दूषित झाले आहे. ၅၇. ५७. သမုဒါယတ္ထတော’ပေတံ, တံ အပေတတ္ထကံ ယထာ; ဂါဝိပုတ္တော ဗလီဗဒ္ဓေါ, တိဏံ ခါဒီ ပိဝီ ဇလံ. समुदायाच्या अर्थापासून रहित असलेले वाक्य 'अपेतार्थक' मानले जाते, जसे की: 'गाईचा पुत्र बैल गवत खाल्ला, पाणी प्यायला.' ၅၇. ‘‘သမုဒါယိ’’စ္စာဒိ. သမုဒါယဿ ပကရဏတော ပဒသန္ဓိနော ဝါကျဿ အတ္ထော အဘိဓေယျံ အင်္ဂင်္ဂိဘူတံ ကြိယာကာရကသမ္ဗန္ဓီဝိသေသလက္ခဏံ သံဝေါဟာရိကံ, တတော အပေတံ အပဂတံ သုညံ, ဝိနာ ပဒတ္ထမတ္တေန တဿ ကတ္ထစိ ဗျဘိစာရာဘာဝတော ဧတာဒိသံ ယံ တမပေတတ္ထကန္တိ ဝိဓိ. န ဟိ ‘‘ဂါဝိပုတ္တော’’စ္စာဒီသု သမုဒါယတ္ထော သမ္ဘဝတိ. ५७. 'समुदायि' इत्यादी. प्रकरणावरून किंवा पदांच्या संधानाने बनलेल्या वाक्याचा जो समुदाय-अर्थ (एकत्रित अर्थ) असतो, जो अंग-अंगी भावाने युक्त, क्रिया-कारक संबंधाचे विशेष लक्षण असलेला आणि व्यावहारिक असतो; त्या अर्थापासून जे रहित, अपगत (दूर गेलेले) किंवा शून्य असते, केवळ स्वतंत्र पदांच्या अर्थाव्यतिरिक्त ज्याचा कुठेही मेळ बसत नाही, अशा वाक्याला 'अपेतार्थक' म्हटले जाते. कारण 'गाविपुत्तो' (गाईचा पुत्र) इत्यादी वाक्यांमध्ये समुदाय-अर्थ संभवत नाही. ၅၇. ‘‘သမုဒါယိ’’စ္စာဒိ. သမုဒါယတ္ထတော ဝိသေသနဝိသေသျဘူတကြိယာကာရကသမ္ဗန္ဓေဟိ ယုတ္တဝါကျသင်္ခါတပဒသမုဒါယဿ သမ္ဗန္ဓပဒတ္တာ ဝေါဟာရာနုရူပအတ္ထတော အပေတံ အပဂတံ, အဝယဝတ္ထမတ္တဿ ဝါ သဗ္ဗတ္ထ လဗ္ဘမာနတ္တာ သမုဒါယတ္ထတော သုညံ, တံ ဝါကျံ အပေတတ္ထကံ နာမ. ယထိစ္စာဒိနာ ဥဒါဟရတိ ‘‘ဂါဝိပုတ္တော ဗလီဗဒ္ဓေါ ဥသဘော တိဏံ ခါဒိ, ဇလံ ပိဝီ’’တိ. ဧတ္ထ အဝယဝတ္ထမတ္တေန ဝိနာ သမုဒါယေန ဂမျမာနဿ ကဿစိ ဝိသေသတ္ထဿ အဘာဝါ သမုဒါယတ္ထတော အပဂတံ နာမ ဟောတိ. ५७. "समुदायी" इत्यादी. विशेषण-विशेष्य भाव आणि क्रिया-कारक संबंधांनी युक्त असलेल्या वाक्यात समाविष्ट असलेल्या पद-समुदायाच्या (शब्दांच्या समूहाच्या) संबंध पदांच्या व्यवहारानुरूप अर्थापासून दूर गेलेले (अपगत झालेले), किंवा केवळ अवयवांच्या (प्रत्येक शब्दाच्या स्वतंत्र) अर्थाची सर्वत्र प्राप्ती होत असल्यामुळे जो समुदाय-अर्थापासून शून्य असतो, त्या वाक्याला 'अपेतार्थक' (अर्थहीन) असे म्हणतात. 'यथा' (जसे की) इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात: "गाईचा मुलगा, बैल, वळू गवत खातो, पाणी पितो." येथे केवळ अवयवांच्या (शब्दांच्या स्वतंत्र) अर्थाव्यतिरिक्त, संपूर्ण समुदायाद्वारे (वाक्याद्वारे) समजणाऱ्या कोणत्याही विशेष अर्थाचा अभाव असल्यामुळे, ते समुदाय-अर्थापासून अपगत (रहित) मानले जाते. ၅၈. ५८. ဗန္ဓေ ဖရုသတာ ယတ္ထ, တံ ဗန္ဓဖရုသံ ယထာ; ခရာ ခိလာ ပရိက္ခီဏာ, ခေတ္တေ ခိတ္တံ ဖလတျ’လံ. ज्या रचनेत (बंधात) कठोरता असते, त्याला 'बंधपरुष' (रचना-कठोर) म्हणतात, जसे की: "कठोर आणि नापीक (खिळ) जमीन नष्ट झाली आहे, शेतात पेरलेले (बीज) भरपूर फळ देते." ၅၈. ‘‘ဗန္ဓေ’’စ္စာဒိ. [Pg.91] ခရာဣစ္စာဒိကံ ဗန္ဓဖရုသံ သုတိသုဘဂတ္တာဘာဝတော ခရာ ကက္ကသာ ခိလာ ခါဏုကာဒယော ပရိက္ခီဏာ ခယံ ပတ္တာ ယတော, တသ္မာ ခေတ္တေ ကေဒါရေ ခိတ္တံ ဝုတ္တံ အလမစ္စန္တံ ဖလတိ နိပ္ဖဇ္ဇတိ. ဝါကျဒေါသော. ५८. "बंधे" इत्यादी. 'खरा' इत्यादी हे ऐकण्यास सुखद (श्रुतिसुभग) नसल्यामुळे 'बंधपरुष' (रचना-कठोर) आहे. कारण 'खरा' म्हणजे कठोर, 'खिला' म्हणजे खुंट इत्यादी नष्ट झाले आहेत (क्षयाला प्राप्त झाले आहेत), त्यामुळे शेतात (केदारात) पेरलेले बीज अत्यंत फलद्रूप होते (उत्पन्न होते). हा वाक्यदोष आहे. ၅၈. ‘‘ဗန္ဓေ’’စ္စာဒိ. ဗန္ဓေ ဗန္ဓသရီရေ ဖရုသတာ သုတိသုခတာဘာဝတော ဖရုသဘာဝေါ ယတ္ထ ဝါကျေ ဘဝတိ, တံ ဝါကျံ ဗန္ဓဖရုသံ နာမ ဟောတိ. ယထာတိ ဥဒါဟရတိ. ခရာ ကက္ကသာ ခိလာ ခါဏုကာဒယော ပရိက္ခီဏာ ယသ္မာ ခီဏာ ဟောန္တိ, တသ္မာ ခေတ္တေ ခိတ္တံ ဝုတ္တံ ဗီဇံ အလံ အတိသယေန ဖလတိ နိပ္ဖဇ္ဇတိ. ५८. "बंधे" इत्यादी. बंधात म्हणजे रचनेच्या शरीरात, ऐकण्यास सुखद नसल्यामुळे (श्रुतिसुखत्वाच्या अभावामुळे) ज्या वाक्यात कठोरता (परुषभाव) असते, त्या वाक्याला 'बंधपरुष' असे म्हणतात. 'यथा' (जसे की) असे उदाहरण देतात. 'खरा' म्हणजे कठोर, 'खिला' म्हणजे खुंट इत्यादी ज्या अर्थी नष्ट झाले आहेत, त्या अर्थी शेतात पेरलेले बीज अत्यंत विपुल प्रमाणात फलद्रूप होते (उत्पन्न होते). ဝါကျဒေါသနိဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. वाक्यदोष-निर्देश-वर्णन समाप्त झाले. ဝါကျတ္ထဒေါသနိဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ वाक्यार्थदोष-निर्देश-वर्णन. ၅၉. ५९. ဉေယျံ လက္ခဏမနွတ္ထ-ဝသေနာ’ပက္ကမာဒိနံ; ဥဒါဟရဏမေတေသံ, ဒါနိ သန္ဒဿယာမျ’ဟံ. 'अपक्रम' इत्यादींचे लक्षण त्यांच्या अन्वर्थाच्या (शब्दाच्या अर्थाच्या अनुसरणाच्या) वशाने जाणून घ्यावे. आता मी यांचे उदाहरण स्पष्ट करून दाखवतो. ၅၉. ‘‘ဉေယျ’’မိစ္စာဒိ. အပက္ကမာဒီနံ ယထာဥဒ္ဒိဋ္ဌာနံ လက္ခီယတိ ဥဒါဟရဏမနေနာတိ အတ္ထေန လက္ခဏံ အနွတ္ထဝသေန အပဂတော ကမော ယတ္ထ တံ အပက္ကမန္တိအာဒိနာ အတ္ထာနုဂမနဝသေန ဉေယျံ ဝိညာတဗ္ဗံ. ဣဒါနိ ဝါကျဒေါသေ နိဒ္ဒိသိတွာ အဝသရပ္ပတ္တေ ဣမသ္မိံ ကာလေ ဧတေသံ အပက္ကမာဒီနံ ဥဒါဟရဏံ လက္ခိယံ အဟံ သန္ဒဿယာမိ ပကာသေဿာမိ. ५९. "ज्ञेय्यं" इत्यादी. 'अपक्रम' इत्यादींचे, जसे निर्दिष्ट केले आहे तसे, ज्याद्वारे लक्षण दर्शविले जाते त्या अर्थाने 'लक्षण' होय. अन्वर्थाच्या वशाने, म्हणजे ज्यामध्ये क्रम निघून गेला आहे (अपगत झाला आहे) तो 'अपक्रम' इत्यादी अर्थाच्या अनुसरणाने जाणून घ्यावे (समजून घ्यावे). आता वाक्यदोषांचे निर्देश केल्यानंतर, प्राप्त झालेल्या या प्रसंगी मी या अपक्रम इत्यादींचे लक्षणीय उदाहरण स्पष्ट करून दाखवतो (प्रकाशित करतो). ၅၉. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနုက္ကမေန အပက္ကမာဒိအတ္ထဒေါသာနိ ဝိဘာဝေတိ ‘‘ဉေယျ’’မိစ္စာဒိနာ. အပက္ကမာဒီနံ အပက္ကမောစိတျဟီနာဒီနံ လက္ခဏံ အပက္ကမာဒိဝိသယဗုဒ္ဓိယာ အဝိပရီတဝုတ္တိယာ ပဝတ္တိကာရဏံ အနွတ္ထဝသေန အပဂတော ကမော ယတ္ထိစ္စာဒိဝစနတ္ထာနုဂတဉာဏဝသေန ဉေယျံ ဉာတဗ္ဗံ, ဝိသုံ လက္ခဏံ န ဝဒါမာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဣဒါနိ အဟံ ဧတေသံ အပက္ကမာဒီနံ ဥဒါဟရဏံ လက္ခိယံ သန္ဒဿယာမိ. အတ္ထာနုဂတမနွတ္ထံ အနွတ္ထဿ ဉာဏဿ ဝသောတိ ဝိဂ္ဂဟော. ५९. आता निर्दिष्ट केलेल्या क्रमाने अपक्रम इत्यादी अर्थदोषांचे स्पष्टीकरण "ज्ञेय्यं" इत्यादीद्वारे करतात. अपक्रम, औचित्यहीन इत्यादींचे लक्षण हे अपक्रम इत्यादी विषयांच्या बुद्धीच्या अविपरीत (यथार्थ) प्रवृत्तीचे कारण आहे. अन्वर्थाच्या वशाने, म्हणजे "ज्यामध्ये क्रम निघून गेला आहे" इत्यादी वचनांच्या अर्थाचे अनुसरण करणाऱ्या ज्ञानाच्या वशाने ते जाणून घ्यावे, त्यांचे वेगळे लक्षण सांगत नाही, असे म्हटले आहे. आता मी या अपक्रम इत्यादींचे लक्षणीय उदाहरण स्पष्ट करून दाखवतो. अर्थाचे अनुसरण करणारे ते 'अन्वर्थ' होय, आणि 'अन्वर्थाच्या ज्ञानाच्या वशाने' असा याचा विग्रह आहे. တတ္ထာပက္ကမံ ယထာ त्यामध्ये 'अपक्रम' जसे की: ၆၀. ६०. ဘာဝနာဒါနသီလာနိ, သမ္မာ သမ္ပာဒိတာနိ’ဟ; ဘောဂသဂ္ဂါဒိနိဗ္ဗာန-သာဓနာနိ န သံသယော. भावना (ध्यान), दान आणि शील यांचे येथे योग्य प्रकारे संपादन केले असता, ते भोग, स्वर्ग आणि निर्वाण यांचे साधन बनतात, यात संशय नाही. ၆၀. ‘‘ဘာဝနာ’’ဣစ္စာဒိ. [Pg.92] သမ္မာ အလောဘာဒိဟေတုသမ္ပတ္တိယာ သက္ကစ္စံ သမ္ပာဒိတာနိ နိပ္ဖာဒိတာနိ. ဧတ္ထ ဘောဂသဂ္ဂါဒိနိဗ္ဗာနာနံ ဟေတဝေါ ယထာက္ကမံ ဒါနသီလဘာဝနာယော, န တု ဘာဝနာဒါနသီလာနိ. ६०. "भावना" इत्यादी. 'सम्यक' म्हणजे अलोभ इत्यादी हेतूंच्या संपत्तीने आदरपूर्वक संपादित केलेले (निष्पादित केलेले). येथे भोग, स्वर्ग आणि निर्वाण यांचे हेतू अनुक्रमे दान, शील आणि भावना हे आहेत, न की भावना, दान आणि शील. ၆၀. တတ္ထ တေသု အပက္ကမာဒီသု အပက္ကမံ ယထာ အပက္ကမဿောဒါဟရဏမေဝံ. ဩစိတျဟီနံ ယထာတျာဒီသုပိ ဧဝမတ္ထော ဝေဒိတဗ္ဗော. ‘‘ဘာဝနိ’’စ္စာဒိ. ဣဟ ဣမသ္မိံ အတ္တဘာဝေ သမ္မာ သမ္ပာဒိတာနိ အလောဘာဒိဟေတုသမ္ပတ္တိယာ သက္ကစ္စံ သမ္ပာဒိတာနိ ရာသိကတာနိ ဘာဝနာဒါနသီလာနိ ဘောဂသဂ္ဂါဒိနိဗ္ဗာနသာဓနာနိ ဥပဘောဂပရိဘောဂါနိ, သဂ္ဂုပ္ပတ္တိအာယုအာရောဂျာဒီနိ, နိဗ္ဗာနဉ္စေတိ ဧတေသံ သာဓကာနိ. န သံသယော သဒိသဝိသဒိသဝိပါကဒါနေ သံသယော နာမ နတ္ထိ. ဧတ္ထ ဘောဂသဂ္ဂနိဗ္ဗာနာနံ ဟေတုဘူတာ ပန ကမတော ဒါနသီလဘာဝနာယော ဘဝန္တီတိ ဖလက္ကမဿ ဟေတုက္ကမံ ဝိရုဒ္ဓမိတိ ကမာပေတံ နာမ ဟောတိ. ६०. त्यामध्ये, त्या अपक्रम इत्यादींमध्ये 'अपक्रम' जसे की, हे अपक्रमाचेच उदाहरण आहे. 'औचित्यहीन' इत्यादींमध्येही असाच अर्थ समजून घ्यावा. "भावना" इत्यादी. येथे या आत्मभावात (जीवनात) सम्यक प्रकारे संपादित केलेले, म्हणजे अलोभ इत्यादी हेतूंच्या संपत्तीने आदरपूर्वक संपादित केलेले आणि संचय केलेले भावना, दान आणि शील हे भोग, स्वर्ग आणि निर्वाण यांचे साधन आहेत. उपभोग-परिभोग, स्वर्गाची उत्पत्ती, आयुष्य, आरोग्य इत्यादी आणि निर्वाण यांचे ते साधक आहेत. 'संशय नाही' म्हणजे सदृश आणि विसदृश विपाक (फळ) देण्यामध्ये कोणताही संशय नाही. परंतु येथे भोग, स्वर्ग आणि निर्वाण यांचे हेतू अनुक्रमे दान, शील आणि भावना हे आहेत. त्यामुळे फळाच्या क्रमाशी हेतूचा क्रम विरुद्ध ठरतो, म्हणून याला 'क्रमापेत' (अपक्रम) असे म्हणतात. ဩစိတျဟီနံ ယထာ 'औचित्यहीन' जसे की: ၆၁. ပူဇနီယတရော လောကေ, အဟ’မေကော နိရန္တရံ.မယေကသ္မိံ ဂုဏာ သဗ္ဗေ, ယတော သမုဒိတာ အဟုံ. ६१. "या जगात मी एकटाच निरंतर अत्यंत पूजनीय आहे. कारण माझ्या एकट्यामध्येच सर्व गुण एकत्रित झाले आहेत." ၆၁. ‘‘ပူဇနီယိ’’စ္စာဒိ. ယတော ယသ္မာ ကာရဏာ သဗ္ဗေ ဂုဏာ သီလာဒယော ဧကသ္မိံ ကေဝလေ မယိ ဧဝ သမုဒိတာ ရာသိဘူတာ အဟုံ အဟေသုံ, တသ္မာ ကာရဏာ ဣမသ္မိံ သတ္တလောကေ ဧကော ကေဝလော အဟမေဝ နိရန္တရံ သတတံ ပူဇနီယတရော အတိသယေန ပုဇ္ဇောတိ. ဧဝမတ္တပသံသနမရုစိတံ သပ္ပုရိသဿ. ६१. "पूजनीय" इत्यादी. 'यतो' म्हणजे ज्या कारणाने सर्व गुण, शील इत्यादी, केवळ माझ्या एकट्यामध्येच एकत्रित (राशीभूत) झाले आहेत, त्या कारणाने या सत्वलोकात (जगात) मी एकटाच निरंतर (सतत) अत्यंत पूजनीय (अतिशयाने पूज्य) आहे. अशा प्रकारे स्वतःची प्रशंसा करणे सत्पुरुषाला शोभत नाही (अरुचिकर आहे). ၆၁. ‘‘ပူဇနီယတရေ’’စ္စာဒိ. [Pg.93] ယတော ယသ္မာ သဗ္ဗေ ဂုဏာ သီလာဒယော ဧကသ္မိံ မယိ အဒုတိယေ မယိ ဧဝ သမုဒိတာ ရာသိဘူတာ အဟုံ အဟေသုံ, တသ္မာ လောကေ သတ္တလောကေ ဧကော အဒုတိယော အဟမေဝ နိရန္တရံ သတတံ ပူဇနီယတရော အတိသယေန ပူဇနီယော. ဧဝံ အတ္တပ္ပသံသနတော ဥစိတတာယ ပရိဟာနီတိ ဩစိတျဟီနံ နာမ. ६१. "पूजनीयतरो" इत्यादी. 'यतो' म्हणजे ज्या अर्थी सर्व गुण, शील इत्यादी, माझ्या एकट्यामध्येच, अद्वितीय अशा माझ्यामध्येच एकत्रित (राशीभूत) झाले आहेत, त्या अर्थी जगात (सत्वलोकात) मी एकटाच अद्वितीय निरंतर (सतत) अत्यंत पूजनीय आहे. अशा प्रकारे स्वतःची प्रशंसा केल्यामुळे औचित्याचा ऱ्हास होतो, म्हणून याला 'औचित्यहीन' असे म्हणतात. ယထာ စ आणि जसे की: ၆၂. ६२. ယာစိတောဟံ ကထံ နာမ, န ဒဇ္ဇာမျပိ ဇီဝိတံ; တထာပိ ပုတ္တဒါနေန, ဝေဓတေ ဟဒယံ မမ. "याचकांनी याचना केली असता, मी माझे जीवनही का बरे देणार नाही? तरीही, पुत्राचे दान करताना माझे हृदय कंपित होत आहे." ၆၂. ‘‘ယာစိတော’’ဣစ္စာဒိ. ဧတ္ထ ‘‘ယဒိ ယာစိံသု, ဇီဝိတမ္ပိ ယာစကာနံ ဒဇ္ဇာမီ’’တိ ဒဿိတောဒါရတာယာနုစိတံ ပုတ္တဒါနေ ဟဒယပဝေဓနကထနံ ဝေဿန္တရဿ ယဇ္ဇေဝမဝေါစ. ६२. "याचितो" इत्यादी. येथे "जर त्यांनी याचना केली, तर मी याचकांना माझे जीवनही देईन" या दर्शविलेल्या औदार्याला अनुचित असे, पुत्राचे दान करताना हृदयाच्या कंपनाचे कथन वेस्संतराने (वेस्सांतर राजाने) केले आहे, जे त्याने असे म्हटले. ၆၂. ယထာ စ, ဧဝမ္ပိ ဩစိတျဟီနဿ ဥဒါဟရဏံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ ‘‘ယာစိတော’’စ္စာဒိ. ယာစိတော ယာစကေဟိ ယာစိတော အဟံ ဇီဝိတမပိ ကထံ နာမ န ဒဇ္ဇာမိ, တထာပိ ဧဝံ ဒါနဇ္ဈာသယေ သတိပိ ပုတ္တဒါနေန မမ ဟဒယံ ဝေဓတေ ကမ္ပတေ. ဧတ္ထ ဝေဿန္တရဿ ‘‘ယဒိ ယာစေယျုံ, ဇီဝိတမပိ ယာစကာနံ ဒဇ္ဇာမီ’’တိ ကတပဋိညာယ ပုတ္တဒါနေန ဟဒယကမ္ပနဿ ကထနံ စာဂါတိသယယောဂသင်္ခါတဥဒါရဂုဏဿ အနနုစ္ဆဝိကန္တိ ဩစိတျဟီနံ. ६२. आणि जसे की, अशा प्रकारेही औचित्यहीनाचे उदाहरण "याचितो" इत्यादीद्वारे पाहावे. 'याचितो' म्हणजे याचकांनी याचना केली असता, मी माझे जीवनही का बरे देणार नाही? तरीही, अशी दानाची तीव्र इच्छा असतानाही, पुत्राच्या दानाने माझे हृदय 'वेधते' म्हणजे कंपित होते. येथे वेस्संतराच्या "जर त्यांनी याचना केली, तर मी याचकांना माझे जीवनही देईन" या केलेल्या प्रतिज्ञेच्या विरुद्ध, पुत्राच्या दानाने हृदयाच्या कंपनाचे कथन करणे हे त्याच्या अतिशय त्यागाच्या (त्यागातिशयाच्या) उदात्त गुणाला न शोभणारे (अननुरूप) आहे, म्हणून हे 'औचित्यहीन' आहे. ဘဂ္ဂရီတိ ယထာ 'भग्नरीती' (रचनाभंग) जसे की: ၆၃. ६३. ဣတ္ထီနံ ဒုဇ္ဇနာနဉ္စ, ဝိဿာသော နောပပဇ္ဇတေ; ဝိသေ သိင်္ဂိမှိ နဒိယံ, ရောဂေ ရာဇကုလမှီ စ. "स्त्रियांवर आणि दुर्जनांवर विश्वास ठेवणे योग्य नाही; तसेच विषामध्ये, शिंगे असलेल्या प्राण्यांमध्ये, नदीमध्ये, रोगामध्ये आणि राजकुलामध्ये (विश्वास ठेवणे योग्य नाही)." ၆၃. ‘‘ဣတ္ထီန’’မိစ္စာဒိ. နောပပဇ္ဇတေ န ယုဇ္ဇတိ. ဧတ္ထ သမ္ဗန္ဓေ ဆဋ္ဌိယာ ပရိစ္စာဂေန ဝိသေဣစ္စာဒိနာ အာဓာရေ သတ္တမီနိဒ္ဒေသော [Pg.94] အတ္ထရီတိယာ ဘင်္ဂေါ. အာဒေါ မဇ္ဈေ စ စကာရပရိစ္စာဂါ သဒ္ဒရီတိယာ ဘင်္ဂေါ, ရီတီနံ အနန္တတ္တာ ဘင်္ဂါပျနန္တာ. ဥဒါဟရဏံ တု ဒိသာမတ္တံ. ६३. "इत्थीनां" इत्यादी. 'नोपपज्जते' म्हणजे योग्य नाही (जुळत नाही). येथे संबंध दर्शविणाऱ्या षष्ठी विभक्तीचा त्याग करून 'विसे' (विषामध्ये) इत्यादीद्वारे आधारात सप्तमी विभक्तीचा निर्देश करणे हा अर्थरीतीचा भंग आहे. सुरुवातीला आणि मध्ये 'च' (आणि) काराचा त्याग केल्यामुळे शब्दरीतीचा भंग आहे. रीती अनंत असल्यामुळे त्यांचे भंगही अनंत आहेत. हे उदाहरण केवळ दिशा दाखवण्यासाठी (दिग्दर्शनार्थ) आहे. ၆၃. ‘‘ဣတ္ထီန’’မိစ္စာဒိ. ဣတ္ထီနဉ္စ ဒုဇ္ဇနာနဉ္စ ဝိဿာသော သဟဝါသာဒီဟိ ဝိဿာသော နောပပဇ္ဇတေ အနတ္ထသံသယာနိဝတ္တိကာရဏတ္တာ န ယုဇ္ဇတိ. ဝိသေ ဂရဠေ စ သိင်္ဂိမှိ သိင်္ဂဝတိ မဟိံ သာဒေါ စ နဒိယဉ္စ ရောဂေ ဝဍ္ဎမာနကေ ရောဂေ စ ရာဇကုလမှိ စ ဝဓဗန္ဓနာဒိကာရကေ ရာဇကုလေ စ ဝိဿာသော နောပပဇ္ဇတေ. ဧတ္ထ အာဒေါ သမ္ဗန္ဓေ ဆဋ္ဌိယာ အာရဘိတွာ တံ ပဟာယ သတ္တမိယာ ဝုတ္တတ္တာ အတ္ထရီတိ စ, အာဒိမဇ္ဈေသု စသဒ္ဒပရိစ္စာဂတော သဒ္ဒရီတိ စ ဘိန္နာ. စသဒ္ဒံ ပယုဉ္ဇန္တေန အာဒေါ ဧဝ ဝါ အန္တေ ဧဝ ဝါ ပစ္စေကံ ဝါ ယောဇေတဗ္ဗံ ဟောတိ. ဤဒိသော ပယောဂေါ ရီတိဘင်္ဂေါ နာမ ဟောတိ. ရီတီနံ ဗဟုတ္တာ ရီတိဘင်္ဂဒေါသာပိ ဗဟုဝိဓာ. ဣဒံ ပန မုခမတ္တနိဒဿနံ. ६३. “इत्थीनां” (स्त्रियांचा) इत्यादी. स्त्रियांवर आणि दुर्जनांवर सहवास इत्यादींमुळे विश्वास ठेवणे योग्य नाही, कारण त्यामुळे अनर्थ आणि संशय निर्माण होतो, म्हणून ते अयोग्य आहे. विषामध्ये (गरळ), शिंगे असलेल्या प्राण्यांमध्ये (शिंगी), पृथ्वीवर (मही), नदीमध्ये, वाढत जाणाऱ्या रोगामध्ये आणि वध-बंधनादी करणाऱ्या राजकुलामध्ये विश्वास ठेवणे योग्य ठरत नाही. येथे सुरुवातीला संबंध दर्शवण्यासाठी षष्ठी विभक्तीने सुरुवात करून, नंतर ती सोडून सप्तमी विभक्ती वापरल्यामुळे अर्थरीती आणि सुरुवातीला व मध्ये 'च' शब्दाचा त्याग केल्यामुळे शब्दरीती भिन्न झाली आहे. 'च' शब्दाचा प्रयोग करणाऱ्याने तो एकतर सुरुवातीलाच किंवा शेवटीच किंवा प्रत्येकासोबत जोडला पाहिजे. अशा प्रकारच्या प्रयोगाला 'रीतीभंग' म्हणतात. रीती अनेक प्रकारच्या असल्यामुळे रीतीभंग दोषही अनेक प्रकारचे असतात. हे केवळ एक प्रातिनिधिक उदाहरण (मुखमात्रनिदर्शन) आहे. သသံသယံ ယထာ संशयात्मक (ससंशय) जसे की - ၆၄. ६४. မုနိန္ဒစန္ဒိမာလောက-ရသလောလဝိလောစနော; ဇနော’ဝက္ကန္တပန္ထော’ဝ, ဂေါပဒဿနပီဏိတော. मुनींद्ररूपी चंद्राच्या दर्शनाच्या रसाने (अनुरागाने) चंचल डोळे असलेला मनुष्य, जणू मार्गावर आलेला आणि गो-पद (किंवा किरणांच्या दर्शनाने / गाईच्या पावलांच्या खुणांच्या दर्शनाने) आनंदित झालेल्या प्रवाशासारखा आहे. ၆၄. ‘‘မုနိန္ဒိ’’စ္စာဒိ. [Pg.95] စန္ဒိမာ ဝိယ စန္ဒိမာ, မုနိန္ဒောယေဝ စန္ဒိမာ, တဿ အာလောကနံ ဒဿနံ, အာလောကော ပကာသော ဝါ, တသ္မိံ ရသော အနုရာဂေါ, တေန လောလာနိ စပလာနိ လောစနာနိ အက္ခီနိ ယဿ သော ဇနော အဝက္ကန္တော ဩက္ကန္တော ပဝိဋ္ဌော ပန္ထော မဂ္ဂေါ ယေန အဝက္ကန္တပန္ထော ဧဝ ဂုန္နံ ရံသီနံ, ဣဋ္ဌတ္ထနိပ္ဖတ္တိသူစကဘာဝေန ဂေါပဒတ္ထဿ ဝါ ပဒဿနေန ပီဏိတော မုဒိတောတိ ဧတ္ထ ဂေါရူပဿ ပဒဿနေနာတိပိ ဝိညာယတီတိ သန္ဒေဟော. ६४. “मुनींदी” इत्यादी. चंद्रासारखा चंद्र, मुनींद्र (मुनींचे इंद्र - बुद्ध) हेच चंद्र आहेत, त्यांचे आलोक म्हणजे दर्शन किंवा आलोक म्हणजे प्रकाश, त्यामध्ये रस म्हणजे अनुराग (प्रेम), त्यामुळे लोल म्हणजे चंचल झाले आहेत लोचने (डोळे) ज्याचे असा तो मनुष्य. 'अवक्कंतपंथो' म्हणजे ज्याने मार्गात प्रवेश केला आहे असा मार्गस्थ. 'गोपदस्सनपीणितो' म्हणजे किरणांच्या (किंवा गाईच्या पावलांच्या) दर्शनाने, इष्ट अर्थाच्या सिद्धीचे सूचक असल्यामुळे किंवा 'गोपद' (गाईचे पाऊल) च्या दर्शनाने आनंदित (मुदित) झालेला. येथे 'गो' रूपाच्या दर्शनाने असाही अर्थ समजला जात असल्यामुळे संशय निर्माण होतो. ၆၄. ‘‘မုနိန္ဒိ’’စ္စာဒိ. မုနိန္ဒစန္ဒိမာလောကရသလောလဝိလောစနော မုနိန္ဒသင်္ခါတဿ စန္ဒိမဿ အာလောကေ ဒဿနေ ပါတုဘာဝေ ဝါ ရသေန အာလယေန စဉ္စလနေတ္တော ဇနော အဝက္ကန္တပန္ထောဝ ဩတိဏ္ဏမဂ္ဂေါဝ ဗုဒ္ဓဿ ဒဿနတ္ထာယ မဂ္ဂမောတိဏ္ဏောတိ အဓိပ္ပာယော. ဂေါပဒဿနပီဏိတော ဂေါသင်္ခါတရံသိပဒဿနေန, အဘိမင်္ဂလသမ္မတဂေါပဒဿနေန ဝါ သန္တုဋ္ဌော ဟောတိ. ဧတ္ထ ဂေါပဒဿနေနာတိ စ အတ္ထဿ ဂမျမာနတ္တာ ဝိညာတုံ သံသယော ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ သသံသယံ နာမ. အဝက္ကန္တော ပန္ထော ယေနာတိ စ, ဂုန္နံ ရံသီနံ, ဂါဝဿ ဝါ ပဒဿနန္တိ စ, ဂေါပဒဿနေန ပီဏိတောတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ६४. “मुनींदी” इत्यादी. 'मुनिंदचंदिमालोकरसलोलविलोचनो' म्हणजे मुनींद्र नावाच्या चंद्राच्या आलोक (दर्शन किंवा प्राकट्य) मधील रसाने (आसक्तीने) चंचल नेत्र असलेला मनुष्य. 'अवक्कंतपंथो व' म्हणजे मार्गावर उतरलेला, बुद्धांच्या दर्शनासाठी मार्गावर उतरलेला मनुष्य असा अभिप्राय आहे. 'गोपदस्सनपीणितो' म्हणजे 'गो' संज्ञक किरणांच्या दर्शनाने किंवा अत्यंत मंगल मानल्या गेलेल्या गाईच्या पावलांच्या दर्शनाने संतुष्ट झालेला. येथे 'गोपदस्सन' या शब्दाचा अर्थ समजण्यात संशय निर्माण होत असल्यामुळे याला 'ससंशय' (संशयात्मक दोष) म्हणतात. 'अवक्कंतो पंथो येन' (ज्याने मार्गावर प्रवेश केला आहे), 'गुन्नं रंसीनं' (किरणांचे) किंवा 'गावस्स वा पदस्सनं' (गाईचे पाऊल पाहणे) आणि 'गोपदस्सनेन पीणितो' (गोपद दर्शनाने आनंदित) असा याचा विग्रह आहे. ၆၅. ६५. ဝါကျတ္ထတော ဒုပ္ပတီတိ-ကရံ ဂါမ္မံ မတံ ယထာ; ပေါသော ဝီရိယဝါသော’ယံ, ပရံ ဟန္တွာန ဝိဿမိ. वाक्याच्या अर्थावरून जो कठीण किंवा अयोग्य बोध करून देतो, त्याला 'ग्राम्य' (अश्लील किंवा अशिष्ट) मानले जाते, जसे की - "हा पराक्रमी पुरुष शत्रूला मारून विसावला." ၆၅. ‘‘ဝါကျ’’ဣစ္စာဒိ. ပရံ သတ္တုံ ဟန္တွာန ပဟရိတွာ ဝီရိယဝါ သူရော သောယံ ပေါသော ပုရိသော ဝိဿမိ ဝိဿတ္ထော. အယမတ္ထော တာဝ န ဒုပ္ပတီတော. ပရံ အစ္စန္တံ ဟန္တွာန ဝီရိယဝါ ဥစိတသမ္ဘဝေါ သောယံ ပေါသော ဝိဿမီတိ ဒုပ္ပတီတောယမတ္ထော. ६५. “वाक्य” इत्यादी. 'परं' म्हणजे शत्रूला, 'हंत्वान' म्हणजे मारून किंवा प्रहार करून, 'वीरियवा' म्हणजे शूर, 'सो अयं पोसो' म्हणजे तो हा पुरुष, 'विस्समि' म्हणजे विसावला किंवा निश्चिंत झाला. हा अर्थ तर कठीण (अयोग्य) वाटत नाही. परंतु, 'परं' म्हणजे अत्यंत, 'हंत्वान' म्हणजे मैथुन करून, 'वीरियवा' म्हणजे वीर्यवान (शुक्रयुक्त), 'सो अयं पोसो' म्हणजे तो हा पुरुष, 'विस्समि' म्हणजे शिथिल झाला (थकला), हा अर्थ मात्र अयोग्य (ग्राम्य) वाटतो. ၆၅. အနွတ္ထဝသေန လက္ခဏဿ အပါကဋတ္တာ သလက္ခဏံ လက္ခိယမုဒါဟရတိ ‘‘ဝါကျတ္ထတော’’စ္စာဒိနာ. ဝါကျတ္ထတော ဒုပ္ပတီတိကရံ ဝိရုဒ္ဓပ္ပကာသကံ ဂါမ္မန္တိ မတံ. ယထာတိ ဥဒါဟရတိ. ပရံ သတ္တုံ ဟန္တွာန မာရေတွာန ဝီရိယဝါ သူရော သော အယံ ပေါသော ဝိဿမိ ဝိဂတပရိဿမော အဟောသိ, အယမတ္ထော ဣဋ္ဌော. ပရံ အတိသယေန ဟန္တွာန ဝီတိက္ကမံ ကတွာ ဝီရိယဝါ ဥပစိတသမ္ဘဝေါ ဥပစိတသုက္ကော သော အယံ ပုရိသော ဝါယာမေန ဝိဿမိ ဝိဂတဝါယာမော အဟောသီတိ. ဣမဿတ္ထဿ အသဗ္ဘာရဟတ္တာ ဂါမ္မတ္တံ. ဝီရိယံ ဥဿာဟော သမ္ဘဝေါ ဝါ အဿ အတ္ထီတိ ဝိဂ္ဂဟော. ६५. अन्वर्थाच्या (शब्दाच्या अर्थाच्या) अनुषंगाने लक्षण स्पष्ट नसल्यामुळे, लक्षणासह उदाहरणाचे स्पष्टीकरण "वाक्यत्थतो" इत्यादींद्वारे दिले आहे. वाक्याच्या अर्थावरून जो अयोग्य किंवा विरुद्ध अर्थ प्रकट करतो, त्याला 'ग्राम्य' मानले जाते. 'यथा' द्वारे उदाहरण दिले आहे. 'परं' म्हणजे शत्रूला, 'हंत्वान' म्हणजे मारून, 'वीरियवा' म्हणजे शूर, 'सो अयं पोसो' म्हणजे तो हा पुरुष, 'विस्समि' म्हणजे श्रमविरहित झाला (विसावला), हा अर्थ इष्ट (योग्य) आहे. परंतु, 'परं' म्हणजे अतिशय, 'हंत्वान' म्हणजे उल्लंघन (मैथुन) करून, 'वीरियवा' म्हणजे संचित वीर्य (शुक्र) असलेला, 'सो अयं पुरिसो' म्हणजे तो हा पुरुष, व्यायामाने (श्रमाने) 'विस्समि' म्हणजे वीर्य गमावून शिथिल झाला, असा अर्थ निघतो. हा अर्थ असभ्य (अश्लील) असल्यामुळे यात 'ग्राम्यत्व' दोष आहे. 'वीर्य' म्हणजे उत्साह किंवा वीर्य (धातू) ज्याच्याकडे आहे, असा याचा विग्रह आहे. ၆၆. ६६. ဒုဋ္ဌာလင်္ကရဏံ [Pg.96] တေတံ, ယတ္ထာလင်္ကာရဒူသနံ; တဿာလင်္ကာရနိဒ္ဒေသေ, ရူပမာဝီဘဝိဿတိ. ज्या वाक्यात अलंकाराचा दोष (दूषण) असतो, त्याला 'दुष्टालंकार' म्हणतात. त्याचे स्वरूप 'अलंकारनिर्देश' नावाच्या परिच्छेदात स्पष्ट होईल. ၆၆. ‘‘ဒုဋ္ဌာ’’ဣစ္စာဒိ. ယတ္ထ ယသ္မိံ ဝါကျေ အလင်္ကာရာနံ ဒူသနံ ဝိကဋတာ, ဧတန္တု ဒုဋ္ဌာလင်္ကရဏံ ဒုဋ္ဌာလင်္ကရဏံ နာမ, တဿ ဒုဋ္ဌာလင်္ကာရဿ ရူပံ သရူပံ အလင်္ကာရနိဒ္ဒေသေ တံနာမကေ ပရိစ္ဆေဒေ အာဝီဘဝိဿတိ ပကာသိဿတိ, တတ္ထေဝ တံ ဒဿယိဿာမီတိ အဓိပ္ပာယော. ६६. “दुट्ठा” इत्यादी. ज्या वाक्यात अलंकारांचे दूषण म्हणजे विकृतता असते, त्याला 'दुष्टालंकार' म्हणतात. त्या दुष्टालंकाराचे स्वरूप 'अलंकारनिर्देश' नावाच्या परिच्छेदात प्रकट होईल (प्रकाशित होईल), तिथेच ते मी दाखवीन असा अभिप्राय आहे. ၆၆. ‘‘ဒုဋ္ဌာလင်္ကရိ’’စ္စာဒိ. ယတ္ထ ဝါကျေ အလင်္ကာရဒူသနံ အလင်္ကာရာနံ ဝိရောဓော ဟောတိ, ဧတံ ဝါကျတ္ထနိဿိတံ ဧတံ ဝါကျံ ဒုဋ္ဌာလင်္ကရဏံ ဒုဋ္ဌာလင်္ကာရော နာမ, တဿ ဒုဋ္ဌာလင်္ကရဏဒေါသောပလက္ခိတဝါကျဿ ရူပံ သရူပံ လက္ခိယံ အလင်္ကာရနိဒ္ဒေသေ အလင်္ကာရာနံ နိဒဿနဋ္ဌာနဘူတေ ပရိစ္ဆေဒေ အာဝီဘဝိဿတိ. ဧတ္ထ ဝုတ္တေပိ ပုန တတ္ထာပိ ဝတ္တဗ္ဗံ သိယာတိ န ဝုတ္တန္တိ အဓိပ္ပာယော. ဥဒ္ဒေသေ ‘‘ဒုဋ္ဌာလင်္ကတီ’’တိ ဝတွာ ဣဒါနိ ‘‘ဒုဋ္ဌာလင်္ကရဏ’’န္တိ ဝစနံ အလင်္ကတိ အလင်္ကရဏအလင်္ကာရသဒ္ဒါနံ တုလျတ္ထတ္တာ န ဝိရုဇ္ဈတိ. ६६. “दुट्ठांलकारि” इत्यादी. ज्या वाक्यात अलंकाराचे दूषण म्हणजे अलंकारांचा विरोध असतो, ते वाक्यार्थावर आधारित वाक्य 'दुष्टालंकार' नावाचा दोष ठरते. त्या दुष्टालंकार दोषाने युक्त असलेल्या वाक्याचे स्वरूप 'अलंकारनिर्देश' नावाच्या, अलंकारांचे उदाहरण देणाऱ्या परिच्छेदात प्रकट होईल. येथे सांगितले तरी पुन्हा तिथेही सांगावे लागेल, म्हणून येथे सांगितले नाही असा अभिप्राय आहे. उद्देशात (प्रस्तावनेत) "दुट्ठांलकती" असे म्हणून आता "दुट्ठांलकरणं" असे म्हणणे विरुद्ध ठरत नाही, कारण अलंकती, अलंकरण आणि अलंकार हे शब्द समान अर्थाचे आहेत. ၆၇. ६७. ကတော’တြ သင်္ခေပနယာ မယာ’ယံ,ဒေါသာနမေသံ ပဝရော ဝိဘာဂေါ; ဧသော’ဝ’လံ ဗောဓယိတုံ ကဝီနံ,တမတ္ထိ စေ ခေဒကရံ ပရမ္ပိ. येथे माझ्याद्वारे संक्षेप पद्धतीने या दोषांचे श्रेष्ठ वर्गीकरण केले गेले आहे. कवींना समजण्यासाठी एवढेच पुरेसे आहे, कारण यापेक्षा अधिक (विस्तृत वर्णन) क्लेशकारक ठरेल. ဣတိ သံဃရက္ခိတမဟာသာမိပါဒဝိရစိတေ သုဗောဓာလင်္ကာရေ इति संघरक्षित महास्वामीपादांनी रचलेल्या 'सुबोधालंकार' मधील - ဒေါသာဝဗောဓော နာမ 'दोषावबोध' नावाचा - ပဌမော ပရိစ္ဆေဒေါ. पहिला परिच्छेद समाप्त. ၆၇. ဧဝံ ‘‘သောဒါဟရဏမေတေသံ, လက္ခဏံ ကထယာမျဟ’’န္တိ ကတပဋိညာနုရူပံ ပဋိပဇ္ဇ ဒါနိ ‘‘ကတောတြိ’’စ္စာဒိနာ နိက္ခိပနနယံ သင်္ခိပတိ. အတြ ဣမသ္မိံ အဓိကာရေ, ပရိစ္ဆေဒေ [Pg.97] ဝါ ဧသံ ယထာဝုတ္တာနံ ဒေါသာနံ ပဒဒေါသာဒီနံ ပဝရော ဥတ္တမော ဝိဘာဂေါ ဝိဘဇနံ သင်္ခေပနယာ သင်္ခေပက္ကမေန, န ဝိတ္ထာရတော, ယတော အပရိသင်္ချေယျာနံ နတ္ထိ ပရိယန္တော မယာ ကတော နိဋ္ဌာပိတော. နနု ‘‘သင်္ခေပနယာ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ ပုရာတနေဟိ ဒီပိတာ သန္တိ ဗဟူ ဒေါသာ, တေ ပရိစ္စတ္တာ သိယုန္တိ? ဧတ္ထ ဝုစ္စတေ, ဝိတ္ထာရက္ကမဿ အနဓိပ္ပေတတ္တာ ‘‘သင်္ခေပနယာ’’တိ ဝုတ္တံ, န ပန သဗ္ဗထာ ပရိစ္စာဂေန. တထာ ဟိ– ६७. अशा प्रकारे, "मी उदाहरणांसह यांचे लक्षण सांगतो" या केलेल्या प्रतिज्ञेनुसार आचरण करून, आता "कतोऽत्र" इत्यादी गाथेने ग्रंथाचा समारोप संक्षेपाने करत आहेत. 'अत्र' म्हणजे या अधिकारात किंवा परिच्छेदात, 'एसां' म्हणजे या पूर्वोक्त पददोषादी दोषांचे 'पवरो विभागो' म्हणजे श्रेष्ठ वर्गीकरण 'संखेपनया' म्हणजे संक्षेप पद्धतीने, विस्ताराने नाही (कारण असंख्य दोषांना अंत नाही), माझ्याद्वारे केले गेले आहे (पूर्ण केले गेले आहे). जर कोणी विचारले की, "संक्षेप पद्धतीने" असे म्हटल्यामुळे प्राचीन आचार्यांनी सांगितलेले अनेक दोष सुटले असतील का? तर त्यावर सांगितले जाते की, विस्तार पद्धती अभिप्रेत नसल्यामुळे "संक्षेप पद्धतीने" असे म्हटले आहे, परंतु त्यांचा पूर्णपणे त्याग केलेला नाही. ते खालीलप्रमाणे आहे - ‘‘နိဟန္တု သောယံ ဇလိတံ, ပတင်္ဂေါ အရိပါဝက’’န္တိအာဒီနံ "तो पतंग (कीटक) पेटलेल्या शत्रूरूपी अग्नीला नष्ट करो" इत्यादींमध्ये - အက္ခမတ္ထန္တရာဒိကံ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရာနုဂတန္တိ စ. ဧတ္ထ ဟိ ပတင်္ဂသဒ္ဒေန ဇောတိရိင်္ဂဏသင်္ခါတမတ္ထန္တရမသမတ္ထမိစ္ဆိတတ္ထေ ‘‘ဝစန္တိ ဂဏ္ဍာ’’တျေဝမာဒိကံ အမင်္ဂလအပယုတ္တပဒါဒိကံ ကိလိဋ္ဌေ အန္တောဂဓန္တိ စ. असमर्थ अर्थादी दोष 'विरुद्धार्थान्तरागत' दोषात समाविष्ट होतात. कारण येथे 'पतंग' शब्दाने काजवा (ज्योतीरिंगण) हा दुसरा अर्थ निघत असल्यामुळे तो इच्छित अर्थ व्यक्त करण्यास असमर्थ ठरतो. "वचन्ति गण्डा" इत्यादी अमंगल आणि अयोग्य पदादी दोष 'क्लिष्ट' दोषात समाविष्ट होतात. ဂဇဟေသာဒိ သမ္ဗန္ဓဒူသိတံ လောကဝိရောဓိ, သောဂတာဂမာဒီသု ပသိဒ္ဓံ ရူပက္ခန္ဓာဒိကမညတြ ဝုတ္တံ အပ္ပတီတံ နာမ. ဣဒံ အာဂမဝိရောဓိဣတိ, သမ္ဗန္ဓဒူသိတပ္ပတီတာဒိကံ ဝိရောဓိမှိ ပဝိဋ္ဌန္တိ စ, အာနေတဗ္ဗဟေတုတ္တာ ဟေတွပေက္ခံ နေယျတော န ဗျတိရိစ္စတီတိ စ. हत्तीचे हसणे इत्यादी संबंधदूषित गोष्टी 'लोकविरोधी' दोषात येतात. बौद्ध आगमांमध्ये (शास्त्रांमध्ये) प्रसिद्ध असलेले 'रूपस्कंध' इत्यादी इतर ठिकाणी वापरल्यास त्याला 'अप्रतीत' म्हणतात. हा 'आगमविरोधी' दोष आहे. अशा प्रकारे संबंधदूषित आणि अप्रतीत इत्यादी दोष 'विरोधी' दोषात समाविष्ट होतात. तसेच, ज्यासाठी हेतू आणावा लागतो अशा हेतूची अपेक्षा असणारा दोष 'नेय्यार्थ' दोषापेक्षा वेगळा नाही. ‘‘ဒေဝေါ ဝေါဟရတု က္လေသံ, ရာဟုခိန္နော ဒိဝါကရော’’ “देव (मेघ) क्लेशांचे वहन करो, जसा राहूने ग्रस्त केलेला सूर्य.” ဣစ္စာဒိကံ အသာမတ္ထျာဘိဓေယျာဒိကံ ဩစိတျဟီနေ သင်္ဂဟိတန္တိ စ. ဇိဂုစ္ဆအသဗ္ဘသံသူစကအတ္ထန္တရကဉ္စ ဂါမ္မံ ဒုပ္ပတီတိကရေ သင်္ဂယှတီတိ စ. ( ) သဗန္ဓဖရုသမေဝေတိ စ. इत्यादी असमर्थ-अभिधेय इत्यादींचा 'औचित्यहीन' मध्ये समावेश होतो. आणि घृणास्पद व अश्लील अर्थ सूचित करणारे 'ग्राम्य' हे 'दुःप्रतीतिकर' मध्ये समाविष्ट केले जाते. आणि तसेच 'सबंधपरुष' (कठोर रचना) देखील. ဧတ္ထ ပန ဩစိတျဟီနဒုပ္ပတီတိကရာနံ ဝါကျတ္ထဒေါသတ္တေပိ ဖန္ဓဖရုသဿ စ ဝါကျဒေါသတ္တေ ပဒပဒတ္ထာနံ ဒေါသတော ဝါကျမေဝ ဒုဋ္ဌံ သိယာ, ဝါကျဉ္စ ပဒေဟိ ဝိရိစ္စတေ, ပဒေ ဒုဋ္ဌေ ဝါကျတ္ထော စ ဒုဋ္ဌော သိယာ. ပဒဒေါသတော ဝါကျဝါကျတ္ထာနံ နာနာဘာဝါဘာဝဉာပနတ္ထံ အသာမတ္ထိယာဘိဓေယျာဒိကံ ပဒံ ဩစိတျဟီနာဒိဝါကျတ္ထဒေါသာဒီသု [Pg.98] အန္တော ကထိတံ. တထာ ဟိ ပုရာတနေဟိ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရာဒီဟိ ပဒေဟိ ဝိရစိတံ ဝါကျံ ဝိရုဒ္ဓန္တိအာဒိနာ ဗဟူနိ ဒုဋ္ဌာနိ ဝါကျာနိ ဒဿိတာနိ. ‘‘ဟရိသမာနယီ’’တိ ဧတ္ထ ဟပုဗ္ဗံ ရိသ’မာနယီတိ ဣစ္ဆိတတ္ထာ ပရိ ဘဋ္ဌံ ဘဋ္ဌံ. နာနတ္ထမပ္ပသိဒ္ဓေဟိ ယုတ္တံ ဂုဠှံ, ယထာ ‘‘သက္ကော သဟဿဂူ’’တိ. ဣတိ ဘဋ္ဌဂုဠှတ္ထာဒယော ပသာဒါလင်္ကာရဝိရုဒ္ဓါတိ စ. येथे औचित्यहीन आणि दुःप्रतीतिकर हे वाक्यार्थाचे दोष असले तरी, आणि बंधपरुष (कठोर रचना) हा वाक्याचा दोष असला तरी, पद आणि पदाच्या अर्थाच्या दोषामुळे वाक्यच दोषयुक्त होते; कारण वाक्य हे पदांनी बनलेले असते, आणि पद दोषयुक्त असल्यास वाक्याचा अर्थही दोषयुक्त होतो. पदाच्या दोषामुळे वाक्य आणि वाक्यार्थ यांच्यात भिन्नता नाही हे दर्शवण्यासाठी, असमर्थ-अभिधेय इत्यादी पदांचा औचित्यहीन इत्यादी वाक्यार्थदोषांमध्ये अंतर्भाव करून सांगण्यात आले आहे. तसेच प्राचीन आचार्यांनी विरुद्ध-अर्थाच्या इत्यादी पदांनी रचलेले वाक्य 'विरुद्ध' इत्यादी म्हणून अनेक दोषयुक्त वाक्ये दर्शविली आहेत. 'हरिसमानयी' (harisamānayī) येथे 'ह' पूर्वी असून 'रिसमानयी' असा इच्छित अर्थापासून भ्रष्ट झालेला अर्थ होतो. अनेक अर्थ असणाऱ्या आणि अप्रसिद्ध शब्दांनी युक्त असलेले 'गूढ' असते, जसे की 'सक्को सहस्सगू' (हजार किरण असलेला इंद्र/सूर्य). अशा प्रकारे भ्रष्ट आणि गूढ अर्थ इत्यादी हे 'प्रसाद' अलंकाराच्या विरुद्ध आहेत. ဝါကျေပိ ဝိသန္ဓိကမိဟာနုပယောဂီတိ စ, ဝါကျန္တရောပဂတံ ဝါကျံ ဝါကျဂဗ္ဘံ, ဝါကျန္တရပဒသမ္မိဿံ ‘‘အပါထျမေသော ဒိဿတိ, ဝေဇ္ဇံ ခါဒတျနာရတ’’မိစ္စာဒိကံ ဝါကျသံကိဏ္ဏဉ္စ ဗျာကိဏ္ဏေ သမောဟိတန္တိ စ. वाक्यात देखील 'विसंधिक' (संधी नसलेले) हे येथे निरुपयोगी आहे, दुसऱ्या वाक्याच्या अंतर्गत आलेले वाक्य हे 'वाक्यगर्भ' असते, आणि दुसऱ्या वाक्याच्या पदांशी संमिश्र झालेले जसे की 'अपथ्यमेसो दिस्सति, वेज्जं खादत्यनारतं' (हा अपथ्य खाताना दिसतो, वैद्याला सतत खातो) इत्यादी 'वाक्यसंकीर्ण' हे 'व्याकीर्ण' दोषात समाविष्ट केले जाते. ‘‘ကာစုယျာနေ မယာ ဒိဋ္ဌာ, ဝလ္လရီ ပဉ္စပလ္လဝါ; ပလ္လဝေ ပလ္လဝေ မုဓာ, ယဿာ ကုသုမမဉ္စရီ’’တိ. “कोणत्यातरी एका उद्यानात मी पाच पानांची एक वेल पाहिली; जिच्या प्रत्येक पानावर निरर्थकपणे फुलांचा गुच्छ होता.” ဣဒမဝါစကံ ပဟေဠိကာယ ပမုဿိတာသန္နိဿိတန္တိ စ, တတ္ထ စ ကဝိနာ ဥယျာနသဒ္ဒေန ဂေဟံ, လတာဝါစိနာ ဝလ္လရီသဒ္ဒေန အင်္ဂနာ, ပလ္လဝသဒ္ဒေန ကရစရဏဒသနစ္ဆဒါ, မဉ္စရီသဒ္ဒေန နခသောဘာ ဒန္တကန္တိယော စ ဝတ္တုမိစ္ဆိတာ, ဝါကျတ္ထေပိ ပဒုမိနီနံ ရတ္တိယမုန္နိဒ္ဒတာဒိကံ ဝိရုဒ္ဓံ ဝိရောဓိနိလီနန္တိ စ နာတျနုညာတာ, န တု သဗ္ဗထာ ပရိစ္စာဂေန. ဧသောဝ ဧဝံ ယထာဝုတ္တနယေန နိဋ္ဌာပိတော အယံ သင်္ခေပနယော ဧဝ ကဝီနံ ပဏ္ဍိတဇနာနံ ခေဒကရံ ‘‘ကထံ နာမ ဗန္ဓေပီဒိသံ သတိ သန္တီ’’တိ ဧဝမာသုဟနောပဇနံ ပရံ ပဒဒေါသေ အသာဓုသန္ဒိဒ္ဓပရိယာယ ဉေယျအပ္ပတီတတ္ထအပ္ပယောဇက ဒုဗ္ဗောဓဒေသိယာဒိကံ, ဝါကျဒေါသေ အဓိကဦနဘဂ္ဂစ္ဆန္ဒာဒိကံ, ဝါကျတ္ထဒေါသေ ဥပက္ကမောပသံဟာရဝိသမဉ္စေတိ ဣစ္စေဝမာဒိကမပရမ္ပိ ဒူသနံ အတ္ထိ စေ ယဒိ ဘဝေယျ, တမ္ပိ ဗောဓယိတုမဝဂမေတုံ အလံ သမတ္ထံ ယထာဝုတ္တဒေါသာနုသာရေန ဗုဒ္ဓိမန္တေဟိ သက္ကာ ဦဟိတုန္တိ. हे 'अवाचक' (अर्थ व्यक्त न करणारे) कोडे (प्रहेलिका) विस्मृती किंवा चुकीच्या संदर्भावर आधारित आहे. तेथे कवीला 'उद्यान' शब्दाने 'घर', लतावाचक 'वल्लरी' शब्दाने 'स्त्री', 'पल्लव' शब्दाने 'हात, पाय आणि ओठ', आणि 'मंजरी' शब्दाने 'नखांची शोभा व दातांची कांती' असे म्हणायचे आहे. वाक्यार्थामध्ये देखील कमळिणींचे रात्री उमलणे इत्यादी विरुद्ध असणे हे 'विरोधनिलीन' म्हणून पूर्णपणे मान्य नाही, परंतु सर्वथा त्याग करण्यायोग्यही नाही. अशा प्रकारे, यथावक्त पद्धतीने पूर्ण केलेला हा संक्षेप मार्गच कवींना आणि पंडितांना खेद निर्माण करणारा आहे की, 'रचनेत असे दोष असताना कसे काय बरे लिहावे?' अशी शंका उत्पन्न करणारा आहे. याशिवाय पददोषांमध्ये असाधु, संदिग्ध, पर्यायज्ञेय, अप्रतीतार्थ, अप्रयोजक, दुर्बोध, देशीय इत्यादी; वाक्यदोषांमध्ये अधिक, ऊन, भग्नच्छंद इत्यादी; आणि वाक्यार्थदोषांमध्ये उपक्रम-उपसंहार-विषम इत्यादी इतरही दोष जर असतील, तर ते देखील समजून घेण्यास हा संक्षेप मार्ग समर्थ आहे. यथावक्त दोषांच्या अनुषंगाने बुद्धिमान लोकांनी स्वतः तर्क करून ते समजून घ्यावे. ဧဝံ [Pg.99] ဝဒတော စ ဂန္ထကာရဿာယမဓိပ္ပာယော – ယေ ဒေါသာ ဝိဘာဂသော န ဝုတ္တာ, တေ မယာ ဂန္ထဂါရဝဘယာ သင်္ခေပိတာ, လက္ခဏတော တု သင်္ဂဟိတာ. န ဟိ တေသမန္တံ ကော ဇဟာပေတိ. असे म्हणणाऱ्या ग्रंथकाराचा हा अभिप्राय आहे की – जे दोष विभागवार सांगितले नाहीत, ते मी ग्रंथाच्या विस्ताराच्या भयाने संक्षिप्त केले आहेत, परंतु लक्षणानुसार त्यांचा समावेश केला आहे. कारण त्यांचा अंत कोण करू शकतो? တတ္ထ သဒ္ဒသတ္ထဝိရုဒ္ဓမသာဓု. ယံ ကြိယာဒိနိမိတ္တမုပါဒါယ အတ္ထန္တရေပိ ဝတ္တတေ, တံ သညာဘာဝေနေဝ ပယုတ္တံ သန္ဒိဒ္ဓံ, ယထာ ‘‘ရဝိမှိဟိမဟာ’’တိ, ဣဒံ ပန ဝိသေသနတ္ထေ သာဓု ဟောတိ. ပသိဒ္ဓသညာသဒ္ဒဿ ပရိယာယန္တရေန ပရိကပ္ပိတပဒံ ပရိယာယဉေယျံ, ယထာ ‘‘ဝဠဝါမုခေနေ’’တိ ဧတ္ထ ‘‘အဿဝနိတာနနေန’’ ဣတိ. ယံ အစ္စန္တာဗျဘိစာရီဘာဝေန ဝိသေသျဿ ဂုဏံ ဝဒတိ, တံ အပ္ပတီတတ္ထံ, ယထာ ‘‘ကဏှမသီ’’တိ. အဓိဂတတ္ထာနုပယောဂံ အပ္ပယောဇကံ, ယထာ ‘‘အတိဖေနိလံ သာဂရမလင်္ဃီ’’တိ. ‘‘မနုညဒ္ဓနယော ပါဒေ, ခါဒယော ကနိ ဘန္တိ တေ’’ ဣစ္စာဒိကော ဒုဗ္ဗောဓော, ကနိ ကညေ ခါဒယော ဂဂ္ဃရိကာ. ‘‘ဣမေ လာဝဏျတလ္လာ တေ, ဂလ္လာ လောလဝိလောစနေ’’ဣစ္စာဒိကော ဒေသိယော, တလ္လော ဇလာသယဝိသေသော, ဂလ္လော ကပေါလော. ‘‘သဂ္ဂသေဝီနံ ရိပူနမိတ္ထီနမကင်္ကဏော ပါဏိ. နေတ္တမနဉ္ဇန’’န္တိအာဒိကံ အဓိကံ. ‘‘အကင်္ကဏော ပါဏီ’’တိအာဒိနာ ဝေဓဗျဿ ဂမ္မမာနတ္တာ ‘‘သဂ္ဂသေဝီန’’န္တိ အဓိကန္တိ. ယတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗဿ ဦနတာ, တံ ဦနံ, ယထာ ‘‘တိလောကတိလကံ မုနိ’’န္တိအာဒိ. ဧတ္ထ ‘‘ဝန္ဒာမီ’’တိ ဦနံ, ဆန္ဒောဘင်္ဂါနွိတံ ဝစော ဘဂ္ဂစ္ဆန္ဒံ ပါကဋံ. အာရမ္ဘာဝသာနေန ဝိသမံ ဥပက္ကမောပသံဟာရဝိသမံ, တံ ပန အာရဒ္ဓက္ကမပရိစ္စာဂေနာပရေန နိက္ခိပနံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. त्यामध्ये, व्याकरणशास्त्राच्या विरुद्ध असलेले ते 'असाधु' होय. जे क्रिया इत्यादी निमित्ताने दुसऱ्या अर्थातही वापरले जाते, ते संज्ञा (नाव) नसतानाही वापरल्यास 'संदिग्ध' होते, जसे की 'रविम्हिहिमहा' (ravimhihimahā); परंतु हे विशेषण अर्थात योग्य ठरते. प्रसिद्ध संज्ञेच्या शब्दाच्या पर्यायाने कल्पिलेले पद म्हणजे 'पर्यायज्ञेय' होय, जसे की 'वळवामुखेन' (vaḷavāmukhena) ऐवजी 'अस्सवनिताननेन' (घोड्याच्या स्त्रीच्या मुखाने) असे वापरणे. जे अत्यंत अव्यभिचारी भावाने विशेष्याचा गुण सांगते, ते 'अप्रतीतार्थ' होय, जसे की 'कण्हमसी' (kaṇhamasī - काळी राख/अग्नी). समजलेल्या अर्थासाठी निरुपयोगी असणारे ते 'अप्रयोजक' होय, जसे की 'अतिफेनिलं सागरमलङ्घी' (अतिशय फेसाळलेला समुद्र ओलांडला). 'मनुञ्ञद्धनयो पादे, खादयो कनि भन्ति ते' इत्यादी 'दुर्बोध' (समजण्यास कठीण) आहे, येथे 'कनि' म्हणजे कन्या आणि 'खादयो' म्हणजे घुंगरू. 'इमे लावण्यतल्ला ते, गल्ला लोलविलोचने' इत्यादी 'देशीय' (प्रांतिक) आहे, येथे 'तल्ल' म्हणजे विशिष्ट जलाशय आणि 'गल्ल' म्हणजे कपोल (गाल). 'सग्गसेवीनं रिपूनमित्थीनाम कङ्कणो पाणि, नेत्तमनञ्जनं' इत्यादी 'अधिक' (गरजेपेक्षा जास्त) आहे. 'अकङ्कणो पाणि' (हातात कडे नसणे) यावरून वैधव्य सूचित होत असल्याने 'सग्गसेवीनं' (स्वर्गवासी शत्रूंच्या) हा शब्द अधिकचा आहे. जेथे सांगण्याच्या गोष्टीची कमतरता असते, ते 'ऊन' होय, जसे की 'तिलोकतलिकं मुनिं' इत्यादी. येथे 'वंदामि' (मी वंदन करतो) हा शब्द कमी आहे. छंदोभंगाने युक्त असलेले वचन 'भग्नच्छंद' म्हणून स्पष्ट आहे. सुरुवातीच्या आणि शेवटाच्या विसंगतीमुळे जे विषम असते, ते 'उपक्रम-उपसंहार-विषम' होय; ते सुरू केलेल्या क्रमाचा त्याग करून दुसऱ्याच क्रमाने मांडणे असे समजावे. ဣတိ သုဗောဓာလင်္ကာရေ မဟာသာမိနာမိကာဋီကာယံ अशा प्रकारे सुबोधालंकार ग्रंथाच्या 'महास्वामी' नावाच्या टीकेमध्ये ဒေါသာဝဗောဓပရိစ္ဆေဒေါ. दोष-अवबोध नावाचा परिच्छेद समाप्त झाला. ၆၇. ဧဝံ ‘‘သောဒါဟရဏမေတေသံ, လက္ခဏံ ကထယာမျဟ’’န္တိ ကတပဋိညာနုရူပံ သမ္ပာဒေတွာ ဣဒါနိ ‘‘ကတောတြေ’’စ္စာဒိနာ နိဂမေန္တော ဒေါသေ သင်္ခိပတိ. အတြ ဣမသ္မိံ အဓိကာရေ, [Pg.100] ပရိစ္ဆေဒေ ဝါ ဧသံ ဒေါသာနံ ယထာဝုတ္တပဒဒေါသာဒီနံ ပဝရော လက္ခဏာဝိရောဓလက္ခိယတော ဥတ္တမော ဝိဘာဂေါ အသင်္ကရတော ဝိဘဇနံ သင်္ခေပနယာ ဝိတ္ထာရာပနိယသင်္ခေပက္ကမေန မယာ ကတော ဝုတ္တော ဧသောဝ ယထာဝုတ္တော ဧသော သင်္ခေပက္ကမော ဧဝ ကဝီနံ ဝိရစယန္တာနံ ခေဒကရံ ဗန္ဓသရီရေ ဤဒိသံ ဤဒိသပ္ပယောဂံ ကထံ နာမ ကရောမီတိ ဧဝံ ပဝတ္တခေဒမုပ္ပာဒယန္တံ ပရမ္ပိ အသာဓုသန္ဒိဒ္ဓါဒိ အညမ္ပိ ဒူသနမတ္ထိ စေ, တံ သဗ္ဗံ ဗောဓယိတုံ ဗောဓေတုံ အလံ သမတ္ထော ဟောတိ. နိယတိ အဝုတ္တောပိ အတ္ထော ဧတေနာတိ စ, သင်္ခေပေါ စ သော နယော စာတိ ဝိဂ္ဂဟော. ६७. अशा प्रकारे 'मी उदाहरणांसह यांचे लक्षण सांगतो' या केलेल्या प्रतिज्ञेनुसार पूर्ण करून, आता 'कतोत्र' इत्यादी श्लोकाने समारोप करताना दोषांचा संक्षेप करतात. येथे या अधिकारात किंवा परिच्छेदात, या दोषांचा, म्हणजे यथावक्त पददोषादींचा श्रेष्ठ विभाग (लक्षणविरोधाच्या लक्ष्यावरून उत्तम विभागणी) न मिसळता संक्षेप मार्गाने, विस्ताराचा त्याग करून संक्षेप क्रमाने माझ्याद्वारे केला गेला आहे. हाच यथावक्त संक्षेप क्रम कवींना रचना करताना खेद निर्माण करणाऱ्या, 'रचनेच्या शरीरात असा असा प्रयोग कसा बरे करू?' असा खेद उत्पन्न करणाऱ्या, इतरही असाधु-संदिग्ध इत्यादी दोषांना समजून घेण्यास पूर्णपणे समर्थ आहे. न सांगितलेला अर्थही याने निश्चित केला जातो, आणि 'संक्षेप असलेला तोच मार्ग' असा याचा विग्रह आहे. ဣဟာနိဒ္ဒိဋ္ဌံ येथे जे निर्दिष्ट केलेले नाही ‘‘နိဟန္တု သောယံ ဇလိတံ, ပတင်္ဂေါ အရိပါဝက’’န္တိအာဒိကံ “तो प्रज्वलित पतंग (सूर्य/कीटक) शत्रूरूपी अग्नीचा नाश करो” इत्यादी အက္ခမတ္ထန္တရာဒိကံ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရေ အနုပတတ္တာ န ဝုတ္တံ, ဧတ္ထ သူရိယဝါစကော ပတင်္ဂသဒ္ဒေါ ဇောတိရိင်္ဂဏဝါစကောပိ ဟောတီတိ ဝတ္တုမိစ္ဆိတအမိတ္တဂ္ဂိဝိနာသေ အသမတ္ထညတ္ထော ဟောတိ. अक्षम-अर्थांतर इत्यादी हे 'विरुद्ध-अर्थांतर' मध्ये समाविष्ट होत असल्याने सांगितले नाही. येथे सूर्यवाचक असलेला 'पतंग' शब्द काजवावाचक देखील होतो, त्यामुळे इच्छित असलेल्या शत्रूरूपी अग्नीचा नाश करण्यास तो असमर्थ असा दुसरा अर्थ देणारा ठरतो. ‘‘ဝစန္တိ ဂဏ္ဍိ’’စ္စာဒိကံ အာဂမေ အပ္ပသိဒ္ဓံ လက္ခဏမတ္တေန သာဓိယံ. အပ္ပယုတ္တပဒါဒိဒေါသော ကိလိဋ္ဌပဒဒေါသေ အန္တောဂဓော ဟောတီတိ န ဝုတ္တော. “वचन्ति गण्डि” इत्यादी आगम-विरोध हे केवळ लक्षणानेच सिद्ध केले जावे. अप्रयुक्त पद इत्यादी दोष हे क्लिष्ट पद दोषात समाविष्ट होत असल्याने सांगितले नाहीत. ဂဇဟေသာတုရင်္ဂကောဉ္စနာဒါဒိသမ္ဗန္ဓဒူသိတဉ္စ. ဇိနာဂမာဒီသု ပသိဒ္ဓရူပက္ခန္ဓာဒိကမညတြ ပယုတ္တမပ္ပတီတန္နာမာတီဒံ ဒွယံ ယထာက္ကမံ လောကဝိရောဓမာဂမဝိရောဓဉ္စ ဟောတီတိ ဝိရောဓိပဒေ အန္တောဂဓံ ဟောတိ. ဟေတွပေက္ခံ အာနေတဗ္ဗဟေတုတ္တာ နေယျေ အန္တောဂဓန္တိ န ဝုတ္တံ. हत्तीची गर्जना, घोड्याचे खिंकाळणे आणि क्रौंच पक्षाचा आवाज इत्यादींच्या चुकीच्या संबंधाने दूषित झालेले; आणि जिनागम (बुद्धवचन) इत्यादींमध्ये प्रसिद्ध असलेले रूपस्कंध इत्यादी इतर ठिकाणी वापरल्यास त्याला 'अप्रतीत' (अपरिचित) म्हटले जाते. हे दोन्ही अनुक्रमे 'लोकविरोध' आणि 'आगमविरोध' ठरतात, म्हणून त्यांचा 'विरोधी' या दोषामध्ये अंतर्भाव होतो. हेतूची अपेक्षा असणारे आणि सिद्ध करण्यासाठी हेतू आणावा लागणारा असल्यामुळे, त्याला 'नेय्य' (नेयार्थ) मध्ये समाविष्ट केले आहे असे म्हटले नाही. ‘‘ဒေဝေါ ဝေါဟရတု က္လေသံ, ရာဟုခိန္နော ဒိဝါကရော’’ “देव (मेघ) क्लेश दूर करो, (परंतु) सूर्य राहूने ग्रस्त आहे.” ဣစ္စာဒိကံ အသမတ္ထာဘိဓာယိစ္စာဒိ ဩစိတျဟီနေ အန္တောဂဓန္တိ န ဝုတ္တံ. ဧတ္ထ ဒိဝါကရော သယံ ရာဟုဂဟိတော အညေသံ ကိလေသာပနယနေ [Pg.101] အသမတ္ထောတိ တမသာမတ္ထိယံ ဝိသေသနဘူတေန ‘‘ရာဟုခိန္နော’’တိ ပဒေန ဉာယတိ. इत्यादींना 'असमर्थ-अभिधायी' (असमर्थ वाचक) म्हटले जाते, त्यांचा 'औचित्यहीन' मध्ये अंतर्भाव होतो असे म्हटले नाही. येथे सूर्य स्वतः राहूने ग्रस्त असल्यामुळे इतरांचे क्लेश दूर करण्यास असमर्थ आहे, ही त्याची असमर्थता 'राहूखिन्न' (राहूने ग्रस्त) या विशेषण रूपातील पदावरून समजते. ဇိဂုစ္ဆာဝမင်္ဂလအသဗ္ဘာနံ တိဏ္ဏမညတြဿ ဇောတကံ ဝါစကံ ဝါ အတ္ထန္တရံ ဝါ ဂါမ္မံ ဒုပ္ပတီတိကရတ္တာ ဝါကျတ္ထဂါမ္မဒေါသေယေဝ အန္တောဂဓန္တိ န ဝုတ္တံ. ဒုရုစ္စာရဏဘူတလက္ခဏံ ကဋ္ဌံ ဗန္ဓဖရုသတော အဗျတိရိတ္တန္တိ န ဝုတ္တန္တိ. ‘‘ဟရိသမာနယီ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗေ ဟပုဗ္ဗံ ရိသ’မာနယိဣစ္စာဒိကံ ဣစ္ဆိတတ္ထတော ပရိဘဋ္ဌတ္တာ ဘဋ္ဌဉ္စ ‘‘သက္ကော သဟဿဂူ’’ဣစ္စာဒိကံ အပသိဒ္ဓဝိသယေ ပရိယုတ္တဂုဠှဉ္စေတိ ဣမေ အတ္ထဂုဠှာဒယော ပသာဒါလင်္ကာရဝိရုဒ္ဓတ္တာ ပသာဒဂုဏာဒါနေနေဝ ပရိစ္စတ္တာတိ န ဝုတ္တံ. ဧတ္ထ ဟိ သဟဿံ ဂါဝေါ စက္ခူနိ အဿာတိ သဟဿဂူတိ သက္ကဿ နာမံ ဂုဠှံ နာမ ဟောတိ. जुगुप्सा (घृणा), अमंगल आणि असभ्य या तिन्हींपैकी एकाचे द्योतक, वाचक किंवा अन्य अर्थ असणारे 'ग्राम्य' पद समजण्यास कठीण असल्यामुळे, त्याचा 'वाक्यार्थ-ग्राम्य' दोषामध्येच अंतर्भाव होतो असे म्हटले नाही. उच्चारण्यास कठीण असणारे 'कष्ट' पद हे 'बंधपरुष' (रचनेची कठोरता) पेक्षा भिन्न नसल्यामुळे त्याचा वेगळा उल्लेख केला नाही. “हरिसमानयी” (हरीला घेऊन ये) असे म्हणायचे असताना, 'ह' पूर्वी ठेवून 'रिसमानयी' इत्यादी म्हणणे हे इच्छित अर्थापासून भ्रष्ट झाल्यामुळे 'भ्रष्ट' दोष आहे; आणि “सक्क (इंद्र) हा सहस्सगू आहे” इत्यादी अप्रसिद्ध विषयात वापरलेले 'गूढ' पद आहे. हे 'अर्थगूढ' इत्यादी दोष 'प्रसाद' अलंकाराच्या विरुद्ध असल्यामुळे, 'प्रसाद गुणा'चा स्वीकार केल्यानेच त्यांचा त्याग होतो, म्हणून त्यांचा वेगळा उल्लेख केला नाही. कारण येथे 'ज्याला हजार डोळे (किंवा किरण) आहेत तो सहस्सगू' हे शक्राचे नाव अत्यंत गूढ आहे. ဝါကျဒေါသေပိ ဝိသန္ဓိဝါကျံ ဣဓ အနုပယောဂိတ္တာ န ဝုတ္တံ. ဝါကျမဇ္ဈပတိတဝါကျယုတ္တံ ဝါကျဂဗ္ဘဉ္စ, ဝါကျန္တရပဒသမ္မိဿံ. वाक्यदोषांमध्ये देखील 'विसंधी वाक्य' येथे निरुपयोगी असल्यामुळे सांगितले नाही. वाक्याच्या मध्ये दुसरे वाक्य आल्यास त्याला 'वाक्यगर्भ' म्हणतात, आणि दुसऱ्या वाक्यातील पदांचे मिश्रण झाल्यास त्याला 'वाक्यसंकीर्ण' म्हणतात. ‘‘အပါထျမေသော ဒိဿတိ, ဝေဇ္ဇံ ခါဒတျနာရတံ’’ “हा अपथ्य (अहितकारक) सांगताना दिसतो, वैद्याला सतत खातो (त्रास देतो).” ဣစ္စာဒိကံ ဝါကျသံကိဏ္ဏဉ္စ ဗျာကိဏ္ဏေ အန္တောဂဓန္တိ န ဝုတ္တံ. ဧတ္ထ ဧသော ဘိသက္ကော အနာရတံ နိစ္စံ အပါထျံ ရောဂဿ အဟိတံ ဒိဿတိ ဝဒတိ. ဧသော ရောဂီ အနာရတံ သတတံ အပါထျံ အဟိတံ ခါဒတိ. ဝေဇ္ဇံ ဘိသက္ကံ ဒိဿတိ ကုဇ္ဈတိ. ဧဝံ အနေကဝါကျေဟိပိ သန္ဓိဝါကျံ သံကိဏ္ဏံ နာမ. इत्यादी 'वाक्यसंकीर्ण' दोषाचा 'व्याकीर्ण' दोषामध्ये अंतर्भाव होतो असे म्हटले नाही. येथे “हा वैद्य सतत रोगासाठी अहितकारक असणारे अपथ्य सांगतो. हा रोगी सतत अपथ्य खातो. वैद्याला पाहून रागवतो.” अशा प्रकारे अनेक वाक्यांच्या मिश्रणाने बनलेल्या वाक्याला 'संकीर्ण' म्हणतात. ‘‘ကာစုယျာနေ မယာ ဒိဋ္ဌာ, ဝလ္လရီ ပဉ္စပလ္လဝါ; ပလ္လဝေ ပလ္လဝေ မုဓာ, ယဿာ ကုသုမမဉ္စရီ’’တိ. “कोणत्यातरी उद्यानात मी पाच पानांची एक लता पाहिली; जिच्या प्रत्येक पानावर निरर्थकपणे फुलांचा गुच्छ होता.” ဣဒမဝါစကံ ပဟေဠိကာသု ပမုဿိတာသန္နိဿိတမိတိ န ဝုတ္တံ. နနု စေတ္ထ အတ္တနာ ပဟေဠိကာယ အဒဿိတတ္တာ အဝါစကဿ ပမုဿိတာယ အန္တောဂဓကရဏံ အသိဒ္ဓေန အသိဒ္ဓသာဓနန္တိ? နယိဒမေဝံ, ‘‘ဥပေက္ခိယန္တိ သဗ္ဗာနိ, သိဿခေဒဘယာ မယာ’’တိ စ ဥပရိ ကိလိဋ္ဌပဒဒေါသပရိဟာရေ ‘‘ပဟေဠိကာယမာရုဠှာ, န ဟိ ဒုဋ္ဌာ ကိလိဋ္ဌတာ’’တိ စေတိ ဣမိနာ [Pg.102] ပုရာတနေဟိ နိဒ္ဒိဋ္ဌသောဠသပဟေဠိကာယောပိ ဒဿိတာတိ သိဒ္ဓေန အသိဒ္ဓသာဓနံ ဟောတိ. တတ္ထ ကဝိနာ ဥယျာနသဒ္ဒေန ဂေဟဉ္စ လတာပရိယာယဝလ္လရီသဒ္ဒေန အင်္ဂနာ စ ပလ္လဝသဒ္ဒေန ကရစရဏာဓရာ စ မဉ္စရီသဒ္ဒေန နခဒန္တကန္တိယော စ ဝတ္တုမိစ္ဆိတာ. हे 'अवाचक' पद कोड्यांमध्ये 'प्रमुषित' (विसरलेल्या) वर आधारित असल्यामुळे सांगितले नाही. शंका: येथे स्वतः कोड्याचे प्रदर्शन न केल्यामुळे, 'अवाचक' पदाचा 'प्रमुषित' मध्ये अंतर्भाव करणे हे 'असिद्धाने असिद्ध साध्य करणे' होणार नाही का? उत्तर: असे नाही, कारण “शिष्यांच्या त्रासाच्या भीतीने मी या सर्वांची उपेक्षा केली आहे” आणि पुढे क्लिष्ट पददोषाच्या परिहारासाठी “कोड्यांमध्ये आलेली क्लिष्टता दोषयुक्त मानली जात नाही” असे म्हटले आहे. याद्वारे प्राचीन आचार्यांनी दर्शविलेल्या सोळा प्रकारच्या कोड्यांचेही स्पष्टीकरण होत असल्यामुळे, हे सिद्धानेच सिद्ध होते. त्या कोड्यामध्ये कवीला 'उद्यान' शब्दाने 'घर', 'वल्लरी' (लता) शब्दाने 'स्त्री', 'पल्लव' शब्दाने 'हात, पाय व ओठ' आणि 'मंजरी' शब्दाने 'नखे व दातांची कांती' असे सुचवायचे आहे. ဝါကျတ္ထဒေါသေပိ ပဒုမိနီနံ ရတ္တိယံ ပဗုဇ္ဈနာဒိကံ ဝိရုဒ္ဓံ ဝိရောဓိပဒေယေဝ အန္တောဂဓတ္တာ န ဝုတ္တန္တိ ဒဿေတုံ ‘‘ကတောတြ သင်္ခေပနယာ’’တိ ဝုတ္တံ, န ပန တေသံ သဗ္ဗထာ ပရိစ္စတ္တတ္တာတိ. ဧတ္ထ ဩစိတျဟီနဒုပ္ပတီတိကရာနံ ဒွိန္နံ ဝါကျတ္ထဒေါသတ္တေ သတိ ဗန္ဓဖရုသဿ ဝါကျဒေါသတ္တေ သတိ ဝိရောဓိနော ပဒဒေါသတ္တေ သတိ ‘‘အသမတ္ထာဘိဓာယိ’’အာဒိပဒံ, ‘‘ဇိဂုစ္ဆာဒိတ္တယပကာသကာ’’ဒိပဒံ, ကဋ္ဌပဒံ, ပဒုမိနီနံ ရတ္တိယံ ဖုလ္လတာဒိ ဝါကျတ္ထဉ္စေတိ ဣမေ စတ္တာရော ဒေါသာ ဘိန္နဇာတိကေသု ဩစိတျာဒီသု ကထံ သင်္ဂဟိတာတိ? သစ္စံ, တထာပိ ပဒါနံ ဒုဋ္ဌတ္တေ သတိ ဝါကျဝါကျတ္ထာနမဒုဋ္ဌတာ နာမ နတ္ထီတိ ပဒဒေါသေန သန္ဓိဝါကျဝါကျတ္ထဒေါသာနမနညတ္တံ သိဿာနံ ဉာပနတ္ထံ ပဒဒေါသာဒိကံ ဝါကျတ္ထဒေါသာဒီသု သင်္ဂဟိတန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. ဣမိနာယေဝ ပုရာတနေဟိ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရာဒိပဒေဟိ ဝိစရိတံ ဝါကျံ ဝိရုဒ္ဓန္တိအာဒိနာ ဒုဋ္ဌာနိ ဗဟူနိ ဝါကျာနိ ဒဿိတာနီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. वाक्यार्थदोषांमध्ये देखील कमळिणींचे रात्री उमलणे इत्यादी विरुद्ध गोष्टींचा 'विरोधी' पददोषामध्येच अंतर्भाव होत असल्यामुळे ते सांगितले नाही, हे दर्शवण्यासाठी “येथे संक्षेप मार्ग केला आहे” असे म्हटले आहे, परंतु त्यांचा पूर्णपणे त्याग केला आहे असे नाही. येथे 'औचित्यहीन' आणि 'दुष्प्रतीतिकर' हे दोन वाक्यार्थदोष असताना, 'बंधपरुष' हा वाक्यदोष असताना आणि 'विरोधी' हा पददोष असताना; “असमर्थ-अभिधायी” इत्यादी पद, “जुगुप्सा इत्यादी तिन्हींचे प्रकाशक” इत्यादी पद, “कष्ट” पद आणि “कमळिणींचे रात्री उमलणे” इत्यादी वाक्यार्थ, हे चार दोष भिन्न जातीच्या औचित्य इत्यादींमध्ये कसे समाविष्ट केले गेले? हे खरे आहे, तरीही पदांमध्ये दोष असल्यास वाक्य आणि वाक्यार्थ दोषरहित असू शकत नाहीत. म्हणून पददोषामुळे संधिव्याकरण आणि वाक्यार्थदोषांचे अभिन्नत्व शिष्यांना समजण्यासाठी, पददोषादींचा वाक्यार्थदोषादींमध्ये अंतर्भाव केला आहे असे समजावे. याच कारणाने प्राचीन आचार्यांनी 'विरुद्ध', 'अर्थांतर' इत्यादी पदांनी युक्त असलेल्या वाक्याला 'विरुद्ध वाक्य' इत्यादी म्हणून अनेक दोषयुक्त वाक्ये दर्शविली आहेत, असे समजावे. ဣမာယေဝ ဂါထာယ ‘‘တမတ္ထိ စေ ခေဒကရံ ပရမ္ပီ’’တိ ဧတ္ထ ပရသဒ္ဒေနအသာဓုသန္ဒိဒ္ဓပရိယာယဉေယျာပ္ပတီတတ္ထအပ္ပယောဇက- ဒုဗ္ဗောဓဒေသိယာဒိပဒဒေါသေ စ အဓိကဦနဘဂ္ဂစ္ဆန္ဒာဒိဝါကျဒေါသေ စ ဥပက္ကမောပသံဟာရဝိသမသင်္ခါတေ ဝါကျတ္ထဒေါသေ စ ပရိဂ္ဂဏှာတိ. ဧတ္ထ သဒ္ဒသတ္ထဝိရုဒ္ဓမသာဓု နာမ. ကြိယာနိပ္ဖတ္တိကာရဏမုပါဒါယ အတ္ထန္တရေ ပဝတ္တနာမံ ဝိသေသနတ္ထေန ဝိနာ သညာဘာဇနေ ပယုတ္တံ သန္ဒိဒ္ဓံ နာမ, ယထာ ‘‘ရဝိမှိ ဟိမဟာ’’တိ. ဧတ္ထ ဟိမဟာ ရဝီတိ ဝိသေသနေ ကတေ ဒေါသော [Pg.103] နတ္ထိ. ပသိဒ္ဓသညာသဒ္ဒဿ ပရိယာယနာမေန ကပ္ပိတပဒံ ပရိယာယဉေယျံ နာမ, ယထာ ‘‘ဝဠဝါမုခဿ အဿဝနိတာနန’’န္တိ. အတိသယာ ဝိနာ ဘာဝိတတ္ထေန ဝိသေသျဿ ဂုဏဝါစကံ ပဒံ အပ္ပတီတတ္ထံ နာမ, ယထာ ‘‘ကဏှမသီ’’တိ. အဓိဂတတ္တာနုပယောဂိပဒံ အပ္ပယောဇကံ နာမ, ယထာ ‘‘အတိဖေနိလံ သာဂရမလင်္ဃီ’’တိ. အပ္ပသိဒ္ဓဝစနံ ဒုဗ္ဗောဓံ နာမ, ယထာ– याच गाथेतील “जर ते क्लेशकारक असेल तर इतरही...” यातील 'पर' (इतर) शब्दाने असाधू (अपशब्द), संदिग्ध, पर्यायज्ञेय, अप्रतीतार्थ, अप्रयोजक, दुर्बोध, देशीय इत्यादी पददोषांचे; अधिक, ऊन (कमी), भग्नच्छंद इत्यादी वाक्यदोषांचे; आणि उपक्रम-उपसंहार-विषम-संख्यात इत्यादी वाक्यार्थदोषांचे ग्रहण केले जाते. येथे व्याकरणशास्त्राच्या विरुद्ध असणाऱ्याला 'असाधू' म्हणतात. क्रिया पूर्ण होण्याचे कारण घेऊन दुसऱ्या अर्थात प्रवृत्त होणारे नाव, विशेषण अर्थाशिवाय केवळ संज्ञेसाठी वापरल्यास त्याला 'संदिग्ध' म्हणतात, जसे की “रविमहि हिमहा” (सूर्यामध्ये बर्फ नष्ट करणारा). येथे “हिमहा रवी” (बर्फ नष्ट करणारा सूर्य) असे विशेषण केल्यास दोष राहत नाही. प्रसिद्ध संज्ञा शब्दाच्या पर्यायी नावाने कल्पिलेल्या पदाला 'पर्यायज्ञेय' म्हणतात, जसे की “वडवामुखाला 'अश्ववनितानन' (घोडीचे तोंड) म्हणणे”. अतिशयोक्तीशिवाय केवळ सामान्य अर्थात विशेष्याचे गुणवाचक पद वापरल्यास त्याला 'अप्रतीतार्थ' म्हणतात, जसे की “कृष्णमसी” (काळी शाई). प्राप्त झालेल्या अर्थासाठी निरुपयोगी असणाऱ्या पदाला 'अप्रयोजक' म्हणतात, जसे की “अतिशय फेसाळलेला समुद्र ओलांडला”. अत्यंत अप्रसिद्ध वचनाला 'दुर्बोध' म्हणतात, जसे की– ‘‘မနုညဒ္ဓနယော ပါဒေ, ခါဒယော ကနိ ဘန္တိ တေ’’တိ. “हे कन्ये! तुझ्या पायातील मनोहर आवाज करणारे घुंगरू शोभून दिसत आहेत.” ကနိ ဟေ ကညေ တေ တဝပါဒေ မနုညဒ္ဓနယော မနောဟရသဒ္ဒသမန္နာဂတာ ခါဒယော ဂဂ္ဃရိကာ ဘန္တိ ဒိဗ္ဗန္တီတိ. ကိသ္မိဉ္စိ ဒေသေယေဝ သိဒ္ဓနာမံ ဒေသိယံ နာမ. ယထာ– 'कनी' म्हणजे हे कन्ये! 'ते' म्हणजे तुझ्या पायात, 'मनुज्ञध्वनी' म्हणजे मनोहर आवाजाने युक्त असलेले, 'खादयो' म्हणजे घुंगरू (घागरी) 'भांती' म्हणजे शोभून दिसतात (चमकतात). एखाद्या विशिष्ट प्रदेशातच प्रसिद्ध असलेल्या नावाला 'देशीय' म्हणतात. जसे की– ‘‘ဣမေ လာဝဏျတလ္လာ တေ, ဂလ္လာ လောလဝိလောစနေ’’တိ. “हे चंचल डोळ्यांच्या कन्ये! तुझे हे गाल लावण्ययुक्त तलाव आहेत.” ဟေ လောလဝိလောစနေ တေ တဝ ဣမေ ဂလ္လာ ကပေါလာ လာဝဏျတလ္လာ မနုညတလ္လာ ဇလာသယဝိသေသာ ဘဝန္တိ. ကေနစိ လေသေန ပကာသိတမတ္ထမုပါဒါယ ပယုတ္တမဓိကံ နာမ. ယထာ– हे चंचल डोळ्यांच्या कन्ये! तुझे हे गाल (कपोल) लावण्यतल्ल म्हणजे मनोहर जलाशयासारखे आहेत. कोणत्यातरी निमित्ताने प्रकाशित झालेला अर्थ घेऊन वापरलेल्या अधिक पदाला 'अधिक' म्हणतात. जसे की– ‘‘တွယိ ရာဇတိ ရာဇိန္ဒ, ရိပူနံ သဂ္ဂသေဝိနံ; ထီနံ အကင်္ကဏော ပါဏိ, သိယာ နေတ္တမနဉ္ဇန’’န္တိ. “हे राजाधिराज! तू राज्य करत असताना, स्वर्गात गेलेल्या शत्रूंच्या स्त्रियांचे हात कंकणरहित आणि डोळे काजळरहित झाले आहेत.” ဧတ္ထ ‘‘အကင်္ကဏော ပါဏိ, နေတ္တမနဉ္ဇန’’န္တိ ဣမိနာယေဝထီနံ ဝိဓဝတ္တံ ဂမျမာနံ ဟောတီတိ တပ္ပကာသနတ္ထံ ပယုတ္တံ ‘‘သဂ္ဂသေဝိန’’န္တိ ဣဒံ အဓိကံ နာမ. ဝတ္တဗ္ဗယုတ္တတော ဦနံ ဝါကျံ ဦနံ နာမ. ‘‘တိလောကတိလကံ မုနိ’’န္တိ ဧတ္ထ ‘‘ဝန္ဒာမီ’’တိ ဝတ္တဗ္ဗဿ အဝုတ္တတ္တာ ဦနံ. ဆန္ဒောဟာနိသံယုတ္တံ ဘဂ္ဂစ္ဆန္ဒံ နာမ. ဣဒံ တေသံ တေသံ ဆန္ဒာနံ အက္ခရဂဏနတော ဦနာဓိကဝသေန ပါကဋံ ဟောတိ. အာဒျန္တတော ဝိသမံ ဥပက္ကမောပသံဟာရဝိသမံ နာမ. ဣဒံ အာရဒ္ဓက္ကမံ ပရိစ္စဇိတွာ ကမန္တရေန နိယမန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. येथे 'अकंकणो पाणि, नेत्तममंजनं' (कंकणरहित हात, अंजनरहित डोळे) यानेच स्त्रियांचे वैधव्य सूचित होत असताना, ते प्रकट करण्यासाठी वापरलेले 'सग्गसेविनं' (स्वर्गसेवन करणारी) हे 'अधिक' नावाचा दोष आहे. सांगण्यास योग्य असलेल्या भागापेक्षा कमी असलेले वाक्य 'ऊन' (न्यून) नावाचा दोष आहे. 'तिलोकतितकं मुनिं' (त्रिलोकतिलक मुनींना) येथे 'वंदामि' (मी वंदन करतो) हे सांगण्याजोगे पद न म्हटल्यामुळे हे 'ऊन' (न्यून) आहे. छंदाच्या हानीने युक्त असणे म्हणजे 'भग्नच्छंद' होय. हे त्या त्या छंदांच्या अक्षरांच्या आणि गणांच्या कमी-अधिकतेमुळे स्पष्ट होते. सुरुवातीपासून शेवटपर्यंत विषम असणे म्हणजे 'उपक्रमोपसंहारविषम' होय. हे सुरू केलेला क्रम सोडून दुसऱ्या क्रमाने नियमन करणे होय असे समजावे. ဣတိ သုဗောဓာလင်္ကာရနိဿယေ अशा प्रकारे 'सुबोधालंकार-निस्यय' मध्ये ပဌမော ပရိစ္ဆေဒေါ. पहिला परिच्छेद. ၂. ဒေါသပရိဟာရာဝဗောဓပရိစ္ဆေဒဝဏ္ဏနာ २. दोषपरिहार-अवबोध परिच्छेदाचे वर्णन. ၆၈. ६८. ကဒါစိ ကဝိကောသလ္လာ, ဝိရောဓော သကလောပျ’ယံ; ဒေါသသင်္ချမတိက္ကမ္မ, ဂုဏဝီထိံ ဝိဂါဟတေ. कधीकधी कवीच्या कौशल्यामुळे, हा सर्व विरोध दोषांची संख्या (दोषत्व) ओलांडून गुणांच्या मार्गात प्रवेश करतो. ၆၉. ६९. တေန ဝုတ္တဝိရောဓာန-မဝိရောဓော ယထာ သိယာ; တထာ ဒေါသပရိဟာရာ-ဝဗောဓော ဒါနိ နီယတေ. त्यामुळे, सांगितलेल्या विरोधांचा अविरोध (दोषरहितता) जसा होईल, तसा दोषपरिहाराचा बोध आता प्रस्तुत केला जात आहे. ၆၈-၆၉. ဣစ္စေဝံ [Pg.104] ဒေါသဝိဘာဂံ ပရိစ္ဆိဇ္ဇ ဣဒါနိ ယထာဝုတ္တဒေါသပရိဟာရက္ကမမုပဒိသိတုမာဟ ‘‘ကဒါစီ’’တျာဒိ. သကလောပိ အယံ ဝိရောဓော ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရာဒိကတော န ကောစိ ဧကော ဧဝ ဒေါသေသု, ဒေါသာနံ ဝါ သင်္ချံ ဂဏနံ ဒေါသဘာဝံ အတိက္ကမ္မ ပရိစ္ဆိဇ္ဇ ဂုဏာနံ ဝီထိံ ပဒဝိံ ဂုဏသဘာဝတံ ဝိဂါဟတေ အဗ္ဘုပဂစ္ဆတိ ကဒါစိ, န သဗ္ဗဒါ. ကဝိနော ပယုဇ္ဇကဿ ကောသလ္လာ တာဒိသဝိသယပရိဂ္ဂဟလက္ခဏနေပုညကာရဏာ, န တု ယထာ တထာ စေတိ. ‘‘တေနေ’’စ္စာဒိ. ယေနေဝံ, တေန ကာရဏေန ဝုတ္တာနံ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရာဒီနံ ဝိရောဓာနံ ယထာ ယေန ပကာရေန အဝိရောဓော နိဒ္ဒေါသတာ သိယာ ဘဝေယျ, တထာ တေန ပကာရေန ဒေါသာနံ ပရိဟာရော ဒူရီကရဏံ အဝဗုဇ္ဈတိ ဉာယတိ ဧတေနာတိ အဝဗောဓော, တဿ အဝဗောဓော, တန္နာမိကော ပရိစ္ဆေဒေါ ဣဒါနိ နီယတေ အာနီယတေ ဝုစ္စတေတိ အတ္ထော. ६८-६९. अशा प्रकारे दोषांचे वर्गीकरण निश्चित करून, आता सांगितलेल्या दोषांच्या परिहाराचा क्रम उपदेश करण्यासाठी 'कदाचि' इत्यादी म्हटले आहे. हा सर्व विरोध (विरुद्धार्थता इत्यादींमुळे होणारा) दोषांमधील कोणताही एकच नव्हे, तर दोषांची संख्या म्हणजे गणना किंवा दोषभाव ओलांडून (निश्चित करून) गुणांच्या मार्गावर, म्हणजेच गुणांच्या पदावर किंवा गुणस्वभावामध्ये कधीतरी प्रवेश करतो (स्वीकारतो), नेहमी नाही. हे कवीच्या (रचनाकाराच्या) कौशल्यामुळे, म्हणजेच तशा विषयाचे ग्रहण करण्याच्या निपुणतेच्या कारणामुळे होते, सहजपणे नाही. 'तेन' इत्यादी. ज्या कारणाने असे आहे, त्या कारणाने सांगितलेल्या विरुद्धार्थता इत्यादी विरोधांचा ज्या प्रकारे अविरोध (दोषरहितता) होईल, त्या प्रकारे दोषांचा परिहार (दूर करणे) ज्याद्वारे समजला जातो तो 'अवबोध' होय, त्याचा अवबोध करून देणारा त्या नावाचा परिच्छेद आता आणला जात आहे (सांगितला जात आहे) असा अर्थ आहे. ၆၈-၆၉. ဧဝံ ဒေါသဝိဘာဂံ ပရိစ္ဆိန္ဒိတွာ ဣဒါနိ ယထာဝုတ္တဒေါသာနံ ပရိဟာရတ္ထမာရဘန္တော ‘‘ကဒါစီ’’တျာဒိမာဟ. သကလောပိ အယံ ဝိရောဓော ပဒဒေါသာဒိကော ဒေါသသင်္ချံ ဒေါသာနံ, ဒေါသေသု ဝါ ဂဏနံ ဒေါသဘာဝံ အတိက္ကမ္မ ကဒါစိ ကဝိကောသလ္လာ ကဝိနော ဗျာကရဏာဘိဓာနဆန္ဒောအလင်္ကတိအာဒီသု ပရိစယလက္ခဏေန ပညာပါဋဝေန ယတော ဂုဏဝီထိံ ဂုဏပဒဝိံ ကေဝလံ ဂုဏသဘာဝံ ဝိဂါဟတေ အဗ္ဘုပဂစ္ဆတိ, တေန ကာရဏေန ဝုတ္တဝိရောဓာနံ ယထာဝုတ္တပဒဒေါသာဒိဝိရောဓာနံ အဝိရောဓော အဝိရုဒ္ဓတာ ယထာ [Pg.105] သိယာ ယေန ပကာရေန ဘဝေယျ, တထာ တေန ပကာရေန ဒေါသပရိဟာရာဝဗောဓော ယထာဝုတ္တပဒဒေါသာဒိသမ္ဗန္ဓိနော ပရိဟရဏက္ကမဿ အဝဗောဓကာရဏတ္တာ တန္နာမိကပရိစ္ဆေဒေါ ဣဒါနိ လဒ္ဓါဝသရေ နီယတေ ဝုစ္စတေ. ယထာဝုတ္တဒေါသာ ကဝိသာမတ္ထိယေန နိဒ္ဒေါသတ္တံ ဘဇန္တိ, တဿ သာမတ္ထိယဿ ဥပဒေသံ ဒဿာမာတိ အဓိပ္ပာယော. ६८-६९. अशा प्रकारे दोषांचे वर्गीकरण निश्चित करून, आता सांगितलेल्या दोषांच्या परिहारासाठी प्रारंभ करताना 'कदाचि' इत्यादी म्हटले आहे. हा सर्व विरोध (पददोष इत्यादी) दोषांची संख्या म्हणजे दोषांची गणना किंवा दोषभाव ओलांडून, कधीतरी कवीच्या कौशल्यामुळे—म्हणजेच कवीच्या व्याकरण, अभिधान (कोश), छंद, अलंकार इत्यादींमधील परिचयरूप प्रज्ञा-चातुर्यामुळे—गुणांच्या मार्गात, म्हणजेच गुणांच्या पदावर किंवा केवळ गुणस्वभावामध्ये प्रवेश करतो (स्वीकारतो). त्या कारणाने, सांगितलेल्या विरोधांचा (म्हणजेच सांगितलेल्या पददोषादी विरोधांचा) अविरोध (दोषरहितता) ज्या प्रकारे होईल, त्या प्रकारे दोषपरिहार-अवबोध—म्हणजेच सांगितलेल्या पददोषादींशी संबंधित परिहार-क्रमाचा बोध करून देणारा असल्यामुळे त्या नावाचा परिच्छेद—आता योग्य संधी मिळाल्यावर सादर केला जात आहे (सांगितला जात आहे). सांगितलेले दोष कवीच्या सामर्थ्याने दोषरहितता प्राप्त करतात, त्या सामर्थ्याचा उपदेश आम्ही दाखवू, असा अभिप्राय आहे. ပဒဒေါသပရိဟာရဝဏ္ဏနာ पददोष-परिहाराचे वर्णन. တတ္ထ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရဿ ပရိဟာရော ယထာ – त्यामध्ये विरुद्धार्थाच्या (विरुद्धार्थता दोषाच्या) परिहाराचे उदाहरण खालीलप्रमाणे आहे – ၇၀. ७०. ဝိန္ဒန္တံ ပါကသာလီနံ, သာလီနံ ဒဿနာ သုခံ; တံ ကထံ နာမ မေဃော’ယံ, ဝိသဒေါ သုခယေ ဇနံ. पिकलेल्या भाताची शेते (किंवा लज्जाशील स्त्रिया) पाहिल्याने सुख मिळवणाऱ्या त्या माणसाला हा शुभ्र (किंवा विष देणारा) मेघ कसा बरे सुखी करेल? ၇၀. ‘‘ဝိန္ဒန္တ’’မိစ္စာဒိ. ပါကေန ပရိဏတဘာဝေန သာလီနံ ယုတ္တာနံ, မနုညာနံ ဝါ သာလီနံ ရတ္တသာလိအာဒီနံ သာလိဇာတီနံ ဒဿနာ သုခံ စေတသိကံ သောမနဿံ ဝိန္ဒန္တံ တံ ဇနံ ဝိသဒေါ အယံ မေဃော အမ္ဗုဒေါ ကထံ နာမ သုခယေတိ. ဧတ္ထ တာဒိသဿ ဇနဿ အသုခပ္ပဒါနံ ဂရဠဿ မေဃဿာနုရူပန္တိ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရတာ ပရိဟဋာ. ७०. 'विंदन्तं' इत्यादी. पाकाने (पिकलेल्या अवस्थेने) युक्त असलेल्या, किंवा सुंदर अशा तांबड्या तांदळादी (रक्तशालि इत्यादी) भाताच्या जातींच्या दर्शनाने सुख (मानसिक आनंद/सौमनस्य) मिळवणाऱ्या त्या माणसाला हा 'विसद' (शुभ्र किंवा विष देणारा) मेघ (ढग) कसा बरे सुखी करेल? येथे अशा माणसाला सुख न देणे हे विषारी (गरळयुक्त) मेघाला अनुरूपच आहे, अशा प्रकारे 'विरुद्धार्थता' हा दोष दूर केला गेला आहे. ၇၀. တတ္ထ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရဿ ပရိဟာရော ယထာ ဧဝံ. ‘‘ဝိန္ဒန္တိ’’စ္စာဒိ. ပါကသာလီနံ ပရိဏာမေန ယုတ္တာနံ, မနုညာနံ ဝါ သာလီနံ ရတ္တသာလိအာဒီနံ ဒဿနာ ဒဿနဟေတု သုခံ စေတသိကသောမနဿံ ဝိန္ဒန္တံ အနုဘောန္တံ တံ ဇနံ တံ ကဿကဇနံ ဝိသဒေါ ဇလဒါယကော အယံ မေဃော ကထံ နာမ သုခယေ, န သုခယတေဝ. တာဒိသဿ ဇနဿ ဒုက္ခဒါနံ ဂရဠဒါယကဿ မေဃဿာပိ အနုရူပမိတိ ဝိရုဒ္ဓညတ္ထော အပနီတော ဟောတိ. ပါကေန သာလိနောတိ ဝိဂ္ဂဟော. သုခံ ကရောတီတိ သုခယေတိ နာမဓာတု. ७०. त्यामध्ये विरुद्धार्थाच्या परिहाराचे उदाहरण अशा प्रकारे आहे. 'विंदन्ति' इत्यादी. पाकाने (पिकण्याने) युक्त असलेल्या, किंवा सुंदर अशा तांबड्या तांदळादी भाताच्या जातींच्या दर्शनामुळे सुख (मानसिक सौमनस्य) मिळवणाऱ्या, अनुभवणाऱ्या त्या माणसाला—त्या शेतकरी माणसाला—हा 'विसद' (जल देणारा किंवा विष देणारा) मेघ कसा बरे सुखी करेल? तो सुखी करतच नाही. अशा माणसाला दुःख देणे हे विष देणाऱ्या मेघालाही अनुरूपच आहे, अशा प्रकारे विरुद्ध अर्थ दूर केला जातो. 'पाकेन शालिनः' (पाकेन शालिनो) असा विग्रह आहे. 'सुखं करोति' या अर्थी 'सुखये' हा नामधातू आहे. ယထာ ဝါ – किंवा जसे – ၇၁. ७१. ဝိနာယကောပိ [Pg.106] နာဂေါသိ,ဂေါတမောပိ မဟာမတိ; ပဏီတောပိ ရသာပေတော,စိတ္တာ မေ သာမိ တေ ဂတိ. हे स्वामी! आपण विनायक (गरुड किंवा बुद्ध) असूनही नाग (सर्प किंवा निष्पाप) आहात; आपण गोतम (हीन पशू किंवा बुद्ध) असूनही महामती (महाबुद्धीमान) आहात; आपण प्रणीत (मधुर किंवा उत्तम) असूनही रसापेत (रसरहित किंवा रागादी रसांपासून मुक्त) आहात; आपली गती (लीला/अवस्था) माझ्यासाठी आश्चर्यकारक आहे. ၇၁. ‘‘ဝိနာယကောပိ’’စ္စာဒိ. ဝီနံ ပက္ခီနံ နာယကော, ဂရုဠော, သတ္တေ ဝိနေတီတိ ဝိနာယကော, ဝုဒ္ဓေါ, ဘဂဝါ စ. တတ္ထ ယဒါ ဝိနာယကော ဂရုဠော, တဒါ တု နာဂေါ ပန္နဂေါသီတိ ဝိရုဒ္ဓံ, ပက္ခန္တရေ တွဝိရုဒ္ဓံ ဘဂဝတော အာဂုဿ ရာဂါဒိနော အဘာဝတော. ဣမေသံ ဂုန္နံ အတိသယေန ဂေါ ဂေါတမော ဟီနပသု, ဂေါတမဝံသာဝတိဏ္ဏတ္တာ ဂေါတမော ဘဂဝါ စ. ဟီနပသု စ တွံ မဟာမတိ အသီတိ ဝိရုဒ္ဓံ အစ္စန္တဟီနပသုနော မဟတိယာ ပညာယ အဘာဝတော. ပက္ခန္တရေ တု န ဗျာဃာတော. ပဏီတော မဓုရော ရသော, ဥတ္တမော စ သုဂတော. တတ္ထ မဓုရရသတော အပေတော အပဂတောသီတိ ဝိရုဇ္ဈတိ, ဘဂဝတော တု ရသေဟိ သိင်္ဂါရာဒီဟိ အပေတောတိ ယုဇ္ဇတိ. မေ မမ. သာမီတိ အာမန္တနံ. တေ တဝ ဂတိ ပဝတ္တိ စိတ္တာ အဗ္ဘုတာတိ. ဧတ္ထ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရံ ဝိရောဓာလင်္ကာရံ သိလာဃနီယန္တိ တေန တံ ပရိဟဋံ. ७१. 'विनायकोपि' इत्यादी. 'वी' म्हणजे पक्ष्यांचा नायक तो गरुड; प्राण्यांचे दमन (विनय) करतो तो विनायक, म्हणजेच बुद्ध आणि भगवान होय. तेथे जेव्हा 'विनायक' म्हणजे गरुड असा अर्थ घेतला जातो, तेव्हा 'नाग' म्हणजे सर्प असा विरोध होतो; परंतु दुसऱ्या बाजूने (भगवंतांच्या पक्षात) विरोध होत नाही, कारण भगवंतांच्या ठिकाणी 'आगु'चा (पापाचा किंवा रागादींचा) अभाव असतो. या गाईंमध्ये अतिशय श्रेष्ठ अशी 'गो' म्हणजे गोतम (हीन पशू), आणि गौतम वंशात अवतीर्ण झाल्यामुळे 'गोतम' म्हणजे भगवान बुद्ध होय. 'तू हीन पशू असून महामती (महाबुद्धीमान) आहेस' हा विरोध आहे, कारण अत्यंत हीन पशूमध्ये महान प्रज्ञेचा अभाव असतो. परंतु दुसऱ्या बाजूने (भगवंतांच्या पक्षात) कोणताही व्याघात (विरोध) होत नाही. 'प्रणीत' म्हणजे मधुर रस, आणि उत्तम असा सुगत (बुद्ध). तेथे 'तू मधुर रसापासून दूर गेला आहेस' असा विरोध होतो, परंतु भगवंतांच्या बाबतीत शृंगारादी रसांपासून मुक्त (अपेतो) असणे योग्यच ठरते. 'मे' म्हणजे माझे. 'सामि' हे संबोधन आहे. 'ते' म्हणजे आपली 'गती' (प्रवृत्ती) 'चित्ता' म्हणजे अद्भुत आहे. येथे 'विरुद्धार्थता' हा दोष प्रशंसनीय अशा 'विरोधाभास अलंकारा'मध्ये बदलतो, त्यामुळे तो दोष दूर केला गेला आहे. ၇၁. ယထာ ဝါ ဥတ္တဒေါသဿ ပရိဟာရော ဤဒိသော ဝါ. ‘‘ဝိနာယကော’’စ္စာဒိ. ဟေ သာမိ တွံ ဝိနာယကောပိ ဂရုဠောပိ နာဂေါသိ ပန္နဂေါ အသိ. နော စေ, ဝိနာယကောပိ သတ္တေ ဝိနေန္တော ဧဝ နာဂေါသိ နိက္ကိလေသော အသိ. ဂေါတမောပိ ပသုတမောပိ မဟာမတိ မဟာပညဝါသိ. နော စေ, ဂေါတမောပိ ဂေါတ္တတော ဂေါတမောယေဝ မဟာမတိ မဟာပညဝါသိ. ပဏီတောပိ မဓုရောပိ ရသာပေတော မဓုရရသတော အပဂတောသိ. နော စေ, ပဏီတောပိ ဥတ္တမော ဧဝ ရသာပေတော သိင်္ဂါရာဒိရသတော အပဂတောသိ. တေ တုယှံ ဂတိ ပဝတ္တိ မေ မယှံ စိတ္တာ အစ္ဆရိယာ. [Pg.107] ဧတ္ထ ဂရုဠဿ နာဂတ္တဉ္စ ပသုတမဿ ပညဝန္တတ္တဉ္စ ပဏီတဿ နိရသတ္တဉ္စ ဝိရုဒ္ဓံ, တထာပိ အညပက္ခဿ အဝိရုဒ္ဓတ္တာ ဝိရုဒ္ဓတ္ထန္တရဒေါသော ပသတ္ထေန ဝိရုဒ္ဓါလင်္ကာရေန နိရာကတော. ဝီနံ ပက္ခီနံ နာယကော, ဂရုဠော. သတ္တေ ဝိနေတီတိ ဝိနာယကော, ဗုဒ္ဓေါ. နတ္ထိ အာဂု ဧတဿာတိ နာဂေါ, ဗုဒ္ဓေါ. ဂုန္နမတိသယေန ဂေါတမော, ပသု. မဟတီ မတိ အဿာတိ မဟာမတိ, ဗုဒ္ဓေါ. ပဓာနတ္တံ နီတော ပဏီတော, မဓုရော ရသော. ရသတော အပေတောတိ ရသာပေတော, ဗုဒ္ဓေါတိ ဝိဂ္ဂဟော. ७१. किंवा जसे कथित दोषाचे परिहार (निवारण) असे आहे. "विनायको" इत्यादी. "हे स्वामी! आपण विनायक (विशिष्ट नायक/पक्षीराज) आहात, गरुड आहात, नाग आहात आणि सर्प आहात. जर असे नसेल, तर विनायक (प्राण्यांना विनीत करणारे/मार्गदर्शन करणारे) असूनही प्राण्यांना विनीत करणारेच आहात, नाग (पापरहित) असून निष्किलेश आहात. आपण गोतम (उत्कृष्ट बैल) असूनही पशुतुल्य आहात, महामती आणि महाप्रज्ञावान आहात. जर असे नसेल, तर गोत्राने गोतम असूनही महामती आणि महाप्रज्ञावान आहात. आपण प्रणीत (उत्कृष्ट) असूनही मधुर आहात, रसापेत (रसापासून दूर गेलेले) असून मधुर रसापासून दूर गेलेले आहात. जर असे नसेल, तर प्रणीत (उत्कृष्ट) असूनही उत्तमच आहात, रसापेत असून शृंगारादी रसांपासून अलिप्त आहात. आपली ती गती (प्रवृत्ती) माझ्या चित्ताला आश्चर्यकारक वाटते." येथे गरुडाचे नाग असणे, पशुतुल्य असणाऱ्याचे प्रज्ञावान असणे आणि प्रणीत (उत्कृष्ट) असणाऱ्याचे नीरस असणे हे विरुद्ध आहे, तरीही दुसऱ्या बाजूने (दुसऱ्या अर्थाने) अविरुद्ध असल्यामुळे, 'विरुद्धार्थान्तर दोष' हा प्रशंसनीय अशा 'विरोधाभास अलंकारा'ने दूर केला गेला आहे. 'वीनां' म्हणजे पक्षांचा नायक तो गरुड. 'सत्ते विनेती' म्हणजे प्राण्यांना सन्मार्गावर आणणारे ते 'विनायक' (बुद्ध). 'नत्थि आगु एतस्सा' म्हणजे ज्यांच्यामध्ये पाप नाही ते 'नाग' (बुद्ध). 'गुन्नमतिसयेन' म्हणजे गाईंमध्ये श्रेष्ठ तो 'गोतम' (पशू). 'महती मति अस्सा' म्हणजे ज्यांची बुद्धी महान आहे ते 'महामती' (बुद्ध). 'प्रधानत्वं नीतो' म्हणजे श्रेष्ठत्वाला प्राप्त झालेले ते 'प्रणीत' (मधुर रस). 'रसतो अपेतो' म्हणजे रसापासून अलिप्त असलेले ते 'रसापेत' (बुद्ध) असा विग्रह आहे. အဈတ္ထဿ ယထာ – अधिकार्थाचे (अजहत्थाचे) उदाहरण जसे – ၇၂. ७२. ကထံ တာဒိဂုဏာဘာဝေ,လောကံ တောသေတိ ဒုဇ္ဇနော; ဩဘာသိတာသေသဒိသော,ခဇ္ဇောတော နာမ ကိံ ဘဝေ. तशा गुणांच्या अभावी दुर्जन लोकांना कसा संतुष्ट करू शकेल? सर्व दिशांना प्रकाशित करणारा काजवा कसा बरे असू शकेल? ၇၂. ‘‘ကထ’’မိစ္စာဒိ. ဒုဇ္ဇနော တာဒိနော ဂုဏာ လောကံ တောသေန္တိ, တာဒီနံ ဂုဏာနံ အတ္တနိ အဘာဝေ သတိ လောကံ သတ္တလောကံ ကထံ တောသေတိ, န တောသေတီတိ အတ္ထော. ဝုတ္တမေဝတ္ထန္တရေန သာဓေတိ ‘‘ခဇ္ဇောတော နာမ ဩဘာသိတာ ဒီပိတာ အသေသဒိသာ ယေန တထာဝိဓော ကိံ ဘဝေ, န ဘဝေယျ တာဒိနော ဂုဏဿ အဘာဝတော’’တိ. ဧတ္ထ ခဇ္ဇောတဿ အဓိကတ္ထဘာဝေန သိတော ဩဘာသိတာသေသဒိသတ္တဒေါသော ‘‘ကထံ တာဒိဂုဏာဘာဝေ’’တိအာဒိဝစောဘင်္ဂိယာ ပရိဟဋော. ७२. "कथं" इत्यादी. दुर्जन व्यक्तीमध्ये तसे गुण (जे लोकांना संतुष्ट करतात) स्वतःमध्ये नसताना, तो लोक म्हणजेच प्राणीलोकाला कसा संतुष्ट करू शकेल? तो संतुष्ट करू शकत नाही, असा अर्थ आहे. हीच गोष्ट दुसऱ्या अर्थाने सिद्ध करतात – "काजवा सर्व दिशांना प्रकाशित करणारा कसा बरे असू शकेल? तशा गुणाच्या अभावामुळे तो तसा असू शकत नाही." येथे काजव्याच्या अधिकार्थभावामुळे आलेला 'सर्व दिशांना प्रकाशित करणे' हा दोष "कथं तादिगुणाभावे" इत्यादी वचनशैलीने दूर केला गेला आहे. ၇၂. အဈတ္ထဿ ယထာတိ ဧတ္ထ ပရိဟာရော အဇ္ဈာဟာရော, ဧဝမုပရိပိ. ‘‘ကထိ’’စ္စာဒိ. ဒုဇ္ဇနော ဂုဏဟီနဇနော တာဒိဂုဏာဘာဝေ သန္တောသဇနနကာရဏာနံ တာဒိသာနံ သီလာဒိဂုဏာနံ [Pg.108] အတ္တနိ အဝိဇ္ဇမာနတ္တေ သတိ လောကံ သတ္တလောကံ ကထံ တောသေတိ, န တောသေတိယေဝ, တထာ ဟိ ခဇ္ဇောတော နာမ ဩဘာသိတာသေသဒိသော ကိံ ဘဝေ, န ဘဝတျေဝ. ဧတ္ထ ခဇ္ဇောတဿ သကလဒိသောဘာသနသင်္ခါတမဓိကတ္ထဒေါသော ‘‘ကထံ တာဒိဂုဏာဘာဝေ’’စ္စာဒိဝါကျလီလာယ နိရာကတော. တာဒီ စ တေ ဂုဏာ စေတိ ဝိဂ္ဂဟော. ७२. "अजहत्थस्स यथा" येथे परिहार (निवारण) हा अध्याहार आहे, पुढेही असेच समजावे. "कथं" इत्यादी. दुर्जन म्हणजे गुणहीन मनुष्य, तशा गुणांच्या अभावी म्हणजे संतोष निर्माण करणाऱ्या तशा शील इत्यादी गुणांच्या स्वतःमध्ये अभावी, लोक म्हणजेच प्राणीलोकाला कसा संतुष्ट करू शकेल? तो संतुष्ट करूच शकत नाही. तसेच, काजवा सर्व दिशांना प्रकाशित करणारा कसा बरे असू शकेल? तो मुळीच असू शकत नाही. येथे काजव्याच्या सर्व दिशांना प्रकाशित करण्याच्या स्वरूपातील 'अधिकार्थ दोष' हा "कथं तादिगुणाभावे" इत्यादी वाक्यरचनेच्या कौशल्याने दूर केला गेला आहे. 'तादी च ते गुणा च' (ते आणि तसे गुण) असा विग्रह आहे. ၇၃. ७३. ပဟေဠိကာယမာရုဠှာ, န ဟိ ဒုဋ္ဌာ ကိလိဋ္ဌတာ; ပိယာ သုခါ’လိင်္ဂိတံ က-မာလိင်္ဂတိ နု နော ဣတိ. प्रहेलिकेमध्ये (कोड्यात) आलेली क्लिष्टता (क्लिष्ट पददोष) दुष्ट (दोषयुक्त) मानली जात नाही. जसे की, "प्रिया सुखाने आलिंगन दिलेल्या कोणत्या पुरुषाला आलिंगन देत नाही?" ၇၃. ‘‘ပဟေဠိကာယံ’’ဣစ္စာဒိ. ကိလိဋ္ဌတာ ကိလိဋ္ဌပဒဒေါသော ပဟေဠိကာယ ဝိသယေ အာရုဠှာ သဟီ န ဟိ နော ဒုဋ္ဌော သိယာ. ကီဒိသီတိ အာဟ ‘‘ပိယေ’’စ္စာဒိ. ဣတီတိ နိဒဿနေ. ပိယာ ဝလ္လဘာယ အာလိင်္ဂိတံ ကံ ဇနံ သုခံ ကာယိကံ စေတသိကဉ္စ နော အာလိင်္ဂတိ န သံယုဇ္ဇတိ နု. နုဣတိ ပရိဝိတက္ကေ နိပါတော. ဧတ္ထ ပိယာတိ ကိလိဋ္ဌံ ပဟေဠိကာယ သမာရောပေန ပရိဟဋံ. ७३. "पहेळिकायं" इत्यादी. क्लिष्टता म्हणजे क्लिष्ट पददोष प्रहेलिकेच्या (कोड्याच्या) विषयात आलेला असेल, तर तो दोषयुक्त ठरत नाही. तो कसा? हे सांगताना "पिया" इत्यादी म्हटले आहे. 'इति' हे उदाहरणासाठी आहे. प्रिया (प्रियतमा) हिने आलिंगन दिलेल्या कोणत्या मनुष्याला शारीरिक आणि मानसिक सुख प्राप्त होत नाही? 'नु' हा वितर्काचा निपात आहे. येथे 'पिया' हे क्लिष्ट पद प्रहेलिकेच्या उपयोगामुळे दोषमुक्त झाले आहे. ၇၃. ‘‘ပဟေဠိကေ’’စ္စာဒိ. ကိလိဋ္ဌတာ ကိလိဋ္ဌပဒဒေါသသင်္ခါတာ ပဟေဠိကာယံ ဝိသယေ အာရုဠှာ စေ, န ဟိ ဒုဋ္ဌာ ဒုဋ္ဌာ န ဟောတိ. ကိမုဒါဟရဏံ? ပိယာ သုခါလိင်္ဂိတံ ကမာလိင်္ဂတိ နု နော ဣတိ, ဣတိသဒ္ဒဿ နိဒဿနတ္ထတ္တာ သေသဥဒါဟရဏာနမေတမုပလက္ခဏန္တိ ဉာတဗ္ဗံ. နော စေ, ဧဝံပကာရာနမုဒါဟရဏာနမပရိဂ္ဂဟေတဗ္ဗတ္တာ ဣတိသဒ္ဒေါ ပကာရတ္ထောတိ. ပိယာ ဝလ္လဘာယ အာလိင်္ဂိတံ ဥပဂုဟိတံ ကံ နာမ ဇနံ သုခံ ကာယိကမာနသိကံ နော အာလိင်္ဂတိ နု, အာလိင်္ဂတေဝါတိ. ဧတ္ထ ပိယာတိ ကိလိဋ္ဌပဒံ ပဟေဠိကာယမာရောပနေန နိရာကတံ ဟောတိ. ७३. "पहेळिके" इत्यादी. क्लिष्ट पददोष स्वरूपातील क्लिष्टता जर प्रहेलिकेच्या विषयात आलेली असेल, तर ती दुष्ट (दोषयुक्त) ठरत नाही. उदाहरण काय? "प्रिया सुखाने आलिंगन दिलेल्या कोणत्या पुरुषाला आलिंगन देत नाही?" येथे 'इति' शब्द उदाहरणाचे निदर्शक असल्यामुळे इतर उदाहरणांचेही हे उपलक्षण आहे असे समजावे. जर असे नसेल, तर अशा प्रकारच्या उदाहरणांचा स्वीकार न करता आल्यामुळे 'इति' शब्द प्रकारवाचक ठरतो. प्रिया (प्रियतमा) हिने आलिंगन दिलेल्या कोणत्या बरं मनुष्याला शारीरिक आणि मानसिक सुख प्राप्त होत नाही? ते प्राप्त होतेच. येथे 'पिया' हे क्लिष्ट पद प्रहेलिकेच्या उपयोगामुळे दूर केले गेले आहे. ၇၄. ७४. ယမကေ နော ပယောဇေယျ, ကိလိဋ္ဌပဒ’မိစ္ဆိတေ; တတော ယမက’မညံ တု, သဗ္ဗမေတံမယံ ဝိယ. इच्छित यमकामध्ये क्लिष्ट पदाचा प्रयोग करू नये. परंतु, त्याव्यतिरिक्त इतर सर्व यमक तर या क्लिष्ट पदानेच युक्त असल्यासारखे वाटते. ၇၄. ‘‘ယမကေ’’စ္စာဒိ. [Pg.109] တတော အညန္တိ ဣစ္ဆိတယမကတော အညံ. တုဣတိ ဝိသေသဇောတကော. ဧတံမယံ ဝိယာတိ ဧတေန ကိလိဋ္ဌပဒေန နိဗ္ဗတ္တံ ဝိယ. ७४. "यमके" इत्यादी. 'ततो अञ्ञं' म्हणजे इच्छित यमकाव्यतिरिक्त इतर. 'तु' हा विशेष दर्शवणारा आहे. 'एतंमयं विय' म्हणजे या क्लिष्ट पदानेच निर्माण झाल्यासारखे. ၇၄. ‘‘ယမကေ’’စ္စာဒိ. ကိလိဋ္ဌပဒံ ဣစ္ဆိတေ ယမကေ ဣဋ္ဌယမကေ နော ပယောဇေယျ နပ္ပယုဇ္ဇေယျ, တတော ဣဋ္ဌယမကတော အညံ သဗ္ဗံ ယမကံ ပန ဧတံမယံ ဝိယ ဣမိနာ ကိလိဋ္ဌပဒဒေါသေန ကတံ ဝိယ ဟောတိ. ဧတ္ထ ဣဋ္ဌယမကံ ဝုတ္တနယေန ဉာတဗ္ဗံ, ဧတေန နိဗ္ဗတ္တံ ဧတံမယန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. ७४. "यमके" इत्यादी. इच्छित यमकामध्ये (इष्ट यमकामध्ये) क्लिष्ट पदाचा प्रयोग करू नये. त्या इष्ट यमकाव्यतिरिक्त इतर सर्व यमक तर या क्लिष्ट पददोषानेच युक्त असल्यासारखे (त्याच्यापासूनच बनल्यासारखे) होते. येथे इष्ट यमक पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीने समजून घ्यावे. 'एतेन निब्बत्तं एतंमयं' (याच्यापासून बनलेले ते एतन्मय) असा विग्रह आहे. ဒေသဝိရောဓိနော ယထာ – देशविरोधाचे उदाहरण जसे – ၇၅. ७५. ဗောဓိသတ္တပ္ပဘာဝေန, ထလေပိ ဇလဇာနျ’ဟုံ; နုဒန္တာနိ’ဝ သုစိရာ-ဝါသက္လေသံ တဟိံ ဇလေ. बोधिसत्त्वांच्या प्रभावाने जमिनीवरही जलज (कमळे) उत्पन्न झाली, जणू काही ती त्या पाण्यातील दीर्घकाळाच्या वास्तव्याचा क्लेश दूर करत होती. ၇၅. ‘‘ဗောဓိသတ္တေ’’စ္စာဒိ. ဗောဓိသတ္တဿ မာယာဒေဝိယာ သုတဿ ဝက္ခမာနဿ ဝိသေသဿ တဒုပ္ပန္နဒိနေ သမ္ဘဝါ ပဘာဝေန ပုညပ္ပဘာဝတော ဇလဇာနိ အမ္ဗုဇာနိ ထလေပိ အဟုံ အဟေသုံ အစိန္တနီယတ္တာ ပုညပ္ပဘာဝဿ. ကိံ ပန ဝါပျာဒီသု ကိံ ကရောန္တာဝ တဟိံ တသ္မိဉ္စ ဇလေ သုစိရံ သဗ္ဗဒါဝ အာဝသနမာဝါသော တေန ဇာတော က္လေသော တံ နုဒန္တာနိဝ ဒူရတော ဇဟန္တာနိဝေတိ. အစိန္တနီယတ္တာ ပုညပ္ပဘာဝဿ ဤဒိသမ္ပိ အစ္ဆရိယမဟောသီတိ န ဒေသဝိရောဓော. ७५. "बोधिसत्ते" इत्यादी. मायादेवींचे पुत्र असलेल्या बोधिसत्त्वांच्या जन्माच्या दिवशी त्यांच्या पुण्यप्रभावामुळे जमिनीवरही जलज (कमळे) उत्पन्न झाली; कारण पुण्यप्रभाव अचिंत्य असतो. मग तलाव इत्यादींमध्ये काय सांगावे! ती कमळे त्या पाण्यात दीर्घकाळ राहिल्यामुळे झालेला त्रास दूर करत असल्यासारखी वाटत होती. पुण्यप्रभावाच्या अचिंत्यतेमुळे असे आश्चर्य घडले, म्हणून येथे देशविरोध दोष नाही. ၇၅. ဗောဓိသတ္တပ္ပဘာဝေန ဗောဓိသတ္တဿ အစိန္တေယျာနုဘာဝေန ဇလဇာနိ ဇလဇသဒိသတ္တာ တန္နာမကာနိ ပဒုမကေရဝါဒီနိ တဟိံ ဇလေ ဝိသယတ္တေန ပသိဒ္ဓေ တသ္မိံ ဥဒကေ သုစိရာဝါသက္လေသံ အတိစိရံ နိဝါသတော ဇာတအာယာသံ နုဒန္တာနိ ဣဝ စဇန္တာနိ ဣဝ ထလေပိ အဟုံ အဟေသုံ, ဝါပိအာဒီသု ကာ ကထာ. ဧတ္ထ ဇလဇာနံ ထလုပ္ပတ္တိကထနသင်္ခါတံ ဒေသဝိရောဓံ အစိန္တေယျပုညပ္ပဘာဝေန ဤဒိသာနံ [Pg.110] အစ္ဆရိယာနံ ပါတုဘာဝတော ‘‘ဗောဓိသတ္တပ္ပဘာဝေနာ’’တိ ဣမိနာ နိရာကရောတိ. ဗောဓိယံ စတုမဂ္ဂပညာယံ သတ္တောတိ စ, တဿ ပဘာဝေါတိ စ, သုစိရံ အာဝါသောတိ စ, တေန ဘူတော က္လေသောတိ စ ဝါကျံ. ७५. बोधिसत्त्वांच्या अचिंत्य प्रभावामुळे, जलज (पाण्यात उत्पन्न होणारी कमळे, कुमुद इत्यादी) त्या पाण्यात (जे त्यांचे प्रसिद्ध निवासस्थान आहे) दीर्घकाळ राहिल्यामुळे झालेला त्रास दूर करत असल्यासारखी जमिनीवरही उत्पन्न झाली; मग तलाव इत्यादींमध्ये काय सांगावे! येथे कमळांचे जमिनीवर उत्पन्न होणे या स्वरूपातील 'देशविरोध दोष' हा अचिंत्य पुण्यप्रभावामुळे अशा आश्चर्यांचा प्रादुर्भाव होत असल्यामुळे "बोधिसत्तप्पभावेन" या शब्दाने दूर केला गेला आहे. 'बोधि' म्हणजे चार मार्गज्ञान, त्यात 'सत्त' (आसक्त/लीन असणारे) आणि त्यांचा 'प्रभाव', तसेच 'सुचिरं आवास' (दीर्घकाळ वास्तव्य) आणि त्यामुळे झालेला 'क्लेश' असा वाक्याचा अर्थ आहे. ကာလဝိရောဓိနော ယထာ – कालविरोधाचे उदाहरण जसे – ၇၆. ७६. မဟာနုဘာဝပိသုနော, မုနိနော မန္ဒမာရုတော; သဗ္ဗောတုကမယံ ဝါယိ, ဓုနန္တော ကုသုမံ သမံ. महात्म्या मुनींच्या प्रभावाची सूचना देणारा मंद वारा, सर्व ऋतूंतील फुलांना समान रीतीने हलवत वाहू लागला. ၇၆. ‘‘မဟာ’’ဣစ္စာဒိ. မန္ဒော မုဒုဘူတော မာရုတော အယံ သဗ္ဗောတုကံ သဗ္ဗေသု ဥတူသု ပုပ္ဖနကံ ကုသုမံ ပုပ္ဖံ သမံ ဧကတော ကတွာ ဓုနန္တော ဝိကိရန္တော မုနိနော မုနိသဒိသတ္တာ ဘဝိဿန္တမုနိဘာဝေန စ ဗောဓိသတ္တဿ, မုနိနောယေဝ ဝါ သမ္မာသမ္ဗောဓိသမဓိဂမသမယေ မဟာနုဘာဝဿ ပိသုနော သူစကော ဝါယိ ပဝါယတီတိ. ဧတ္ထ ယဒျပေကဒါ သဗ္ဗောတုကာသမ္ဘဝေါ နာနာဥတူသု နာနာကုသုမဿ သမ္ဘဝါ, တထာပိ ဘဂဝတော မဟာနုဘာဝပိသုနမီဒိသမေကပဒိကံ သမ္ဘဝတီတိ ကာလဝိရောဓော ဣမိနာ ပရိဟဋော. ७६. "महा" इत्यादी. हा मंद आणि कोमल वारा सर्व ऋतूंमध्ये फुलणारी फुले एकत्र करून, त्यांना हलवून आणि विखुरत, मुनींसारखे असण्यामुळे आणि भविष्यात मुनी होणार असल्यामुळे बोधिसत्त्वाच्या, किंवा सम्यक्संबोधित्व प्राप्त करण्याच्या वेळी मुनींच्या (बुद्धांच्या) महान प्रभावाचा सूचक होऊन वाहू लागला. येथे जरी एकाच वेळी सर्व ऋतूंचे असणे अशक्य असले, कारण वेगवेगळ्या ऋतूंमध्ये वेगवेगळी फुले उमलतात, तरीही भगवंतांच्या महान प्रभावाचे सूचक असे हे एकाच वेळी घडणे शक्य होते, अशा प्रकारे याने 'कालविरोध' (काळाचा विरोध) दूर केला आहे. ၇၆. ‘‘မဟာနုဘာဝေ’’စ္စာဒိ. အယံ မန္ဒမာရုတော အစဏ္ဍသမီရဏော သဗ္ဗောတုကံ ဝသန္တာဒီသု သဗ္ဗဥတူသု ဝိကသန္တံ ကုသုမံ ပုပ္ဖဇာတံ သမံ ဧကတော ကတွာ ဓုနန္တော ကမ္ပေန္တော မုနိနော ဧကန္တဘာဝိတ္တာ မုနိသင်္ခါတဿ ဗောဓိသတ္တဿ, သမ္မာသမ္ဗောဓိသမဓိဂမသမယေ ဘူတတ္တာ မုနိနော သဗ္ဗညုနော ဝါ မဟာနုဘာဝပိသုနော မဟန္တံ ပုညပ္ပဘာဝံ ပကာသေန္တော ဝါယိ သမ္ပဝါယီတိ. ဧတ္ထ နာနာကာလေ သမ္ဘဝန္တာနမ္ပိ ကုသုမာနံ ဧကကာလေ သမ္ဘဝဿ ကာလဝိရောဓတ္တေပိ ဘဂဝတော ပုညာနုဘာဝေါ တာဒိသမစ္ဆရိယမေကက္ခဏေ ဇနေတုံ သမတ္ထောတိ ကာလဝိရောဓံ ‘‘မဟာနုဘာဝပိသုနော’’တိ ဣမိနာ နိရာကရောတိ. မဟာနုဘာဝဿ, မဟာနုဘာဝံ ဝါ ပိသုနောတိ ဝါကျံ. ७६. "महानुभावे" इत्यादी. हा मंद वारा, जो तीव्र नाही, वसंत इत्यादी सर्व ऋतूंमध्ये फुलणारी फुले एकत्र करून, त्यांना हलवून आणि कंपित करत, एकांतभावी असल्यामुळे 'मुनी' म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या बोधिसत्त्वाच्या, किंवा सम्यक्संबोधित्व प्राप्त करण्याच्या वेळी सर्वज्ञ मुनींच्या महान प्रभावाचा सूचक होऊन, त्यांचा महान पुण्यप्रभाव प्रकट करत वाहू लागला. येथे वेगवेगळ्या काळात उमलणाऱ्या फुलांचे एकाच वेळी उमलणे हा जरी कालविरोध असला, तरी भगवंतांचा पुण्यप्रभाव असा चमत्कार एकाच क्षणात निर्माण करण्यास समर्थ आहे, म्हणून "महानुभावपिसुनो" (महानुभावसूचक) या शब्दाने कालविरोधाचे निराकरण केले आहे. 'महानुभावाचा' किंवा 'महानुभावाला' सूचक असे हे वाक्य आहे. ကလာဝိရောဓိနော ယထာ – कलाविरोधाचे उदाहरण जसे की – ၇၇. ७७. နိမုဂ္ဂမနသော [Pg.111] ဗုဒ္ဓ-ဂုဏေ ပဉ္စသိခဿပိ; တန္တိဿရဝိရောဓော သော, န သမ္ပီဏေတိ ကံ ဇနံ. बुद्धगुणांमध्ये मन मग्न झालेल्या पंचशिखाचा (गंधर्व देवपुत्राचा) देखील तो तंतूंच्या स्वराचा विरोध कोणत्या माणसाला आनंदित करणार नाही? (अर्थात तो सर्वांनाच आनंदित करतो). ၇၇. ‘‘နိမုဂ္ဂိ’’စ္စာဒိ. ဗုဒ္ဓဿ ဂုဏေ သီလာဒိကေ အပရိမာဏေ နိမုဂ္ဂံ ဩဂါဠှံ မနံ စိတ္တံ ယဿ တဿ ပဉ္စသိခဿ ဂန္ဓဗ္ဗဒေဝပုတ္တဿပိ ဝီဏာယ တန္တိယာ သရော ကိရိယာကာလမာနလက္ခဏဝိလမ္ဗိတဒုတမဇ္ဈဘေဒဘိန္နော ဆဇ္ဇာဒိကော တဿ ဝိရောဓော ကလာသတ္ထပရိနိဒ္ဒိဋ္ဌကမဝေသမံ ကံ ဇနံ န သမ္ပီဏေတိ, ပီဏေတိယေဝ. သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ လောကိယဂုဏာနုဗန္ဓဗုဒ္ဓီနံ ဝိက္ခေပပ္ပဝတ္တိပိ တထာဝိဓံ ပီဏေတီတိ. ‘‘ဗုဒ္ဓဂုဏေ နိမုဂ္ဂမနသော’’တိ ဣမိနာ ကလာဝိရောဓော ပရိဟဋော. ७७. "निमुग्ग" इत्यादी. बुद्धांच्या शील इत्यादी अपरिमित गुणांमध्ये ज्याचे मन (चित्त) मग्न झाले आहे, अशा पंचशिख गंधर्व देवपुत्राच्या देखील वीणेच्या तारेचा स्वर—जो क्रिया, काळ, मान यांच्या लक्षणांनी युक्त आणि विलंबित, द्रुत व मध्य अशा भेदांनी भिन्न असलेला षड्ज इत्यादी स्वर आहे—त्याचा विरोध (कलाशास्त्रात सांगितलेल्या क्रमाशी विसंगती) कोणत्या माणसाला आनंदित करणार नाही? तो आनंदित करतोच. सम्यक्संबुद्धांच्या लौकिक गुणांशी जोडलेल्या बुद्धीचा विक्षेप (विचलन) देखील तशा प्रकारे आनंद देतो. "बुद्धगुणे निमुग्गमनसो" या शब्दाने कलाविरोध दूर केला आहे. ၇၇. ‘‘နိမုဂ္ဂိ’’စ္စာဒိ. ဗုဒ္ဓဂုဏေ သဗ္ဗညုနော ဝိမှယဇနကသီလာဒိဂုဏသမ္ဘာရေ နိမုဂ္ဂမနသော ဩတိဏ္ဏစိတ္တဿ ပဉ္စသိခဿပိ ဂန္ဓဗ္ဗဒေဝပုတ္တဿာပိ သော တန္တိဿရဝိရောဓော ဝီဏာယ တန္တိယာ ဃဋ္ဋနကိရိယာ, အဒ္ဓမတ္တိကာဒိကာလော, ဟတ္ထာဒီနံ သန္နိဝေသလက္ခဏော မာနောတိ ဣမေဟိ တီဟိ လက္ခဏေဟိ ယုတ္တဿ မန္ဒသီဃမဇ္ဈိမပ္ပမာဏေဟိ ဘိန္နဿ ဆဇ္ဇာဒိသတ္တသရဿ ကလာသတ္ထာဂတက္ကမဿ ဝိနာသသင်္ခါတော ဝိရောဓော ကံ ဇနံ န သမ္ပီဏေတိ, သမ္ပီဏေတိ ဧဝ. ဧတ္ထ အကန္တိယာ ကာရဏဘူတော ကလာသတ္ထာဂတက္ကမဘင်္ဂေါ လောကုတ္တရဗုဒ္ဓဂုဏာနုဂတဗုဒ္ဓိယာ ဇာတောတိ သော ဘင်္ဂေါ ‘‘နိမုဂ္ဂမနသော ဗုဒ္ဓဂုဏေ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ ပီတိယာ ကာရဏမေဝေတိ န ဝိရောဓော. နိမုဂ္ဂေါ မနော အဿာတိ စ, တန္တိယာ သရောတိ စ, တေသံ ဝိရောဓောတိ စ ဝါကျံ. ७७. "निमुग्ग" इत्यादी. सर्वज्ञांच्या (बुद्धांच्या) विस्मयकारक शील इत्यादी गुणसमुदायात ज्याचे मन मग्न झाले आहे, अशा पंचशिख गंधर्व देवपुत्राचा देखील तो तंतूंच्या स्वराचा विरोध—जो वीणेच्या तारेची छेडण्याची क्रिया, अर्धमात्रा इत्यादी काळ आणि हातांच्या स्थितीचे लक्षण असलेले मान, या तीन लक्षणांनी युक्त असलेल्या आणि मंद, जलद व मध्यम प्रमाणाने भिन्न असलेल्या षड्ज इत्यादी सात स्वरांच्या कलाशास्त्रातील क्रमाचा भंग (विनाश) आहे—कोणत्या माणसाला आनंदित करणार नाही? तो आनंदित करतोच. येथे अप्रियतेचे कारण असलेला कलाशास्त्रातील क्रमाचा भंग हा लोकोत्तर बुद्धगुणांमध्ये मग्न असलेल्या बुद्धीमुळे झाला असल्याने, तो भंग "बुद्धगुणांमध्ये मग्न मन असलेला" असे म्हटल्यामुळे प्रीतीचे (आनंदाचे) कारणच ठरतो, म्हणून येथे विरोध नाही. 'ज्याचे मन मग्न आहे तो', 'तारेचा स्वर' आणि 'त्यांचा विरोध' असा या वाक्याचा विग्रह आहे. လောကဝိရောဓိနော ယထာ – लोकविरोधाचे उदाहरण जसे की – ၇၈. ७८. ဂဏယေ [Pg.112] စက္ကဝါဠံ သော, စန္ဒနာယပိ သီတလံ; သမ္ဗောဓိသတ္တဟဒယော, ပဒိတ္တင်္ဂါရပူရိတံ. ज्याचे हृदय संबोधीमध्ये (सम्यक्संबोधित्व मिळवण्यात) मग्न आहे, असा तो (बोधिसत्त्व) पेटलेल्या कोळशांनी भरलेल्या चक्रवाळाला (ब्रह्मांडाला) चंदनापेक्षाही शीतल मानतो. ၇၈. ‘‘ဂဏယေ’’စ္စာဒိ. စန္ဒနာယ အပိ သီတလံ ဂဏယေ စိန္တေသိ. ကိန္တံ? ပဒိတ္တင်္ဂါရပူရိတံ စက္ကဝါဠံ. ကော သော? သမ္ဗောဓိယံ သဗ္ဗညုတညာဏေ သတ္တံ ပရိဗဒ္ဓံ ဟဒယံ စိတ္တံ ယဿ သော. သဗ္ဗညုတညာဏာနုဗန္ဓဗုဒ္ဓိနော ဟိ တာဒိသော မနောဗန္ဓောတိ န လောကဝိရောဓော. ७८. "गणये" इत्यादी. चंदनापेक्षाही शीतल मानतो (विचार करतो). कशाला? पेटलेल्या कोळशांनी भरलेल्या चक्रवाळाला. तो कोण? संबोधीमध्ये म्हणजे सर्वज्ञतेच्या ज्ञानात ज्याचे हृदय (चित्त) आसक्त (बद्ध) झाले आहे असा तो. कारण सर्वज्ञतेच्या ज्ञानाशी जोडलेल्या बुद्धीचा असा मनोबंध असतो, म्हणून येथे लोकविरोध नाही. ၇၈. ‘‘ဂဏယေ’’စ္စာဒိ. သမ္ဗောဓိသတ္တဟဒယော သဗ္ဗညုတညာဏေ အာသတ္တစိတ္တော သော ဗောဓိသတ္တော ပဒိတ္တင်္ဂါရပူရိတံ အာဒိတ္တင်္ဂါရေဟိ ပရိပုဏ္ဏံ စက္ကဝါဠံ စက္ကဝါဠဂဗ္ဘံ စန္ဒနာယပိ စန္ဒနတော အပိ သီတလံ အတိသီတလံ ကတွာ ဂဏယေ စိန္တေယျာတိ. ဣဋ္ဌတ္ထလုဒ္ဓဿ စိတ္တပ္ပဝတ္တိယာ ဤဒိသတ္တာ အဂ္ဂိနော စန္ဒနတောပိ အဓိကသီတတ္တကပ္ပနာ ‘‘စန္ဒနံ သီတလံ, အဂ္ဂိ ဥဏှော’’တိ ပဝတ္တလောကသီမာယ ဝိရုဒ္ဓါ န ဟောတိ. သမ္ဗောဓိယံ သတ္တဟဒယံ ယဿေတိ စ, ပဒိတ္တာနိ အင်္ဂါရာနီတိ စ, တေဟိ ပူရိတန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ७८. "गणये" इत्यादी. संबोधीमध्ये म्हणजे सर्वज्ञतेच्या ज्ञानात ज्याचे चित्त आसक्त आहे असा तो बोधिसत्त्व, पेटलेल्या कोळशांनी पूर्ण भरलेल्या चक्रवाळाला (चक्रवाळगर्भाला) चंदनापेक्षाही अतिशय शीतल मानतो (विचार करतो). इष्ट ध्येयासाठी उत्सुक असलेल्या चित्ताच्या प्रवृत्तीमुळे अग्नीला चंदनापेक्षाही अधिक शीतल मानण्याची ही कल्पना "चंदन शीतल असते आणि अग्नी उष्ण असतो" या प्रचलित लोकसमजुतीच्या मर्यादेच्या विरुद्ध ठरत नाही. 'संबोधीमध्ये ज्याचे हृदय आसक्त आहे तो', 'पेटलेले कोळसे' आणि 'त्यांनी भरलेले' असा याचा विग्रह आहे. ဉာယဝိရောဓိနော ယထာ – न्यायविरोधाचे (तर्कविरोधाचे) उदाहरण जसे की – ၇၉. ७९. ပရိစ္စတ္တဘဝေါပိ တွ-မုပနီတဘဝေါ အသိ; အစိန္တျဂုဏသာရာယ, နမော တေ မုနိပုင်္ဂဝ. हे मुनिश्रेष्ठ! आपण भवाचा (संसाराचा) त्याग केला असूनही भवाला (लोकांच्या कल्याणाला/अभिवृद्धीला) जवळ आणणारे आहात. अचिंत्य गुणांचे सार असलेल्या आपल्याला नमस्कार असो. ၇၉. ‘‘ပရိစ္စတ္တေ’’စ္စာဒိ. မုနိပုင်္ဂဝ မုနီနံ ဥတ္တမ ပရိစ္စတ္တော ဝိသဋ္ဌော ဘဝေါ သုဂတိဒုဂ္ဂတိသင်္ခါတော ယေနာတိ ပရိစ္စတ္တဘဝေါပိ တွံ ဥပနီတော အာနီတော ပဝတ္တိတော ဘဝေါ ဝုဍ္ဎိ ယေနာတိ ဥပနီတဘဝေါ အသိ. တသ္မာ ကာရဏာ အစိန္တျဂုဏသာရာယ တေ နမော အတ္ထူတိ သေသော. ဤဒိသံ န ဉာယဝိရုဒ္ဓမေဝံဝိဓတ္တာ မုနိပုင်္ဂဝဿ. ७९. "परिच्चत्ते" इत्यादी. हे मुनिश्रेष्ठ (मुनींमध्ये उत्तम)! ज्यांनी सुगती आणि दुर्गती नावाच्या भवाचा (संसाराचा) त्याग केला आहे, असे भवाचा त्याग केलेले असूनही आपण, ज्यांनी लोकांची अभिवृद्धी (भव) आणली आहे, प्रवृत्त केली आहे, असे अभिवृद्धी आणणारे आहात. त्या कारणाने, अचिंत्य गुणांचे सार असलेल्या आपल्याला नमस्कार असो, हा उर्वरित अर्थ आहे. मुनिश्रेष्ठांचे स्वरूप असेच असल्यामुळे हे न्यायविरुद्ध (तर्कविरुद्ध) नाही. ၇၉. ‘‘ပရိစ္စတ္တေ’’စ္စာဒိ. မုနိပုင်္ဂဝ မုနိသေဋ္ဌ တွံ ပရိစ္စတ္တဘဝေါပိ အပနီတသုဂတိဒုဂ္ဂတိဘဝေါပိ ဥပနီတဘဝေါ လောကဿာနီတအဘိဝုဒ္ဓိကော အသိ ဘဝသိ, အစိန္တျဂုဏသာရာယ တတော ဧဝ စိန္တာဝိသယာတိက္ကန္တသာရဂုဏဿ တေ တုယှံ နမော အတ္ထူတိ သဗ္ဗာကာရတော ဘဝဿ ပရိစ္စတ္တတ္တာ အတ္တနိ အဝိဇ္ဇမာနံ [Pg.113] သုဂတိဘဝံ လောကဿ ဒေတီတိ ဧတံ ဉာယာဂတံ န ဟောတီတိ ပဋိဘာတိ, တထာပိ စ သဗ္ဗညူနံ ပဝတ္တိ ဤဒိသာယေဝါတိ ဉာယဝိရောဓော နိရာကတော. အစိန္တျာ ဂုဏသာရာ ယသ္မိန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. ७९. "परिच्चत्ते" इत्यादी. हे मुनिश्रेष्ठ! आपण भवाचा त्याग केलेले म्हणजे सुगती आणि दुर्गतीचा भव दूर केलेले असूनही, जगाला अभिवृद्धी (भव) प्राप्त करून देणारे आहात, म्हणूनच चिंतनाच्या विषयापलीकडे असलेल्या श्रेष्ठ गुणांचे सार असलेल्या आपल्याला नमस्कार असो. सर्व प्रकारे भवाचा त्याग केल्यामुळे स्वतःकडे नसलेला सुगतीचा भव ते जगाला देतात, हे न्यायाला (तर्काला) धरून नाही असे वाटते, तरीही सर्वज्ञांची प्रवृत्ती अशीच असते, म्हणून न्यायविरोध दूर केला आहे. 'ज्यांच्यामध्ये अचिंत्य गुणांचे सार आहे ते' असा याचा विग्रह आहे. အာဂမဝိရောဓိနော ယထာ – आगमविरोधाचे (शास्त्राविरोधाचे) उदाहरण जसे की – ၈၀. ८०. နေဝါလပတိ ကေနာပိ, ဝစီဝိညတ္တိတော ယတိ; သမ္ပဇာနမုသာဝါဒါ, ဖုသေယျာပတ္တိဒုက္ကဋံ. यती (भिक्खू) कोणाशीही बोलत नाही, तरीही वाचेच्या विज्ञापनामुळे (इशारा किंवा संकेतामुळे) जाणूनबुजून खोटे बोलल्यामुळे त्याला 'दुक्कट' (दुष्कृत) आपत्ती प्राप्त होऊ शकते. ၈၀. ‘‘နေဝေ’’တိအာဒိ. ယတီတိ ဘိက္ခု ကေနာပိ သဟ နေဝါလပတိ န ဝဒတျေဝ, တထာပိ ဝစီဝိညတ္တိတော စောပနဝါစာသင်္ခါတေန ဝစီဝိညတ္တိဟေတုနာ ပဝတ္တိတော သမ္ပဇာနန္တဿ မုသာဝါဒတော ကာရဏာ အာပတ္တိဒုက္ကဋံ ‘‘သမ္ပဇာနမုသာဝါဒဿ ဟောတီ’’တိ ဝုတ္တဒုက္ကဋာပတ္တိ ဖုသေယျ အာပဇ္ဇတီတိ. ဧတ္ထ အနာလပတော ဝစီဝိညတ္တိယာ ကထံ မုသာဝါဒေါတိ အဘိဓမ္မာပန္နဝိရောဓော နတ္ထိ, အပရဝစနတ္ထေ တွီဒိသော ဝိရုဇ္ဈတီတိ. ८०. "नेव" इत्यादी. 'यती' म्हणजे भिक्खू कोणाशीही बोलत नाही, तरीही वाचेच्या विज्ञापनामुळे (म्हणजे हालचाल किंवा संकेताने व्यक्त होणाऱ्या वाचेमुळे) जाणूनबुजून खोटे बोलल्याच्या कारणाने त्याला "जाणूनबुजून खोटे बोलणाऱ्याला दुक्कट आपत्ती होते" या नियमानुसार दुक्कट आपत्ती प्राप्त होऊ शकते. येथे न बोलता केवळ वाचेच्या विज्ञापनाने खोटे बोलणे कसे शक्य आहे? असा अभिधम्माशी विरोध नाही, परंतु इतर वचनांच्या संदर्भात असा विरोध येऊ शकतो. ၈၀. ‘‘နေဝိ’’စ္စာဒိ. ယတိ သမဏော ကေနာပိ ကေနစိ သဒ္ဓိံ နေဝါလပတိ နော ဘာသတိ, တထာပိ ဝစီဝိညတ္တိတော စောပနဝါစာသင်္ခါတဝိညတ္တိကာရဏာ ပဝတ္တနတော သမ္ပဇာနမုသာဝါဒါ သမ္ပဇာနန္တဿ မုသာဘဏနတော အာပတ္တိဒုက္ကဋံ ဒုက္ကဋာပတ္တိံ ဖုသေယျ အာပဇ္ဇေယျာတိ. ဧတ္ထ အနာလပန္တဿ ဝစီဝိညတ္တိတော မုသာဝါဒေါ ကထံ သမ္ဘဝတီတိ အဘိဓမ္မာပန္နဝိရောဓော, ‘‘သန္တိံ အာပတ္တိံ နာဝိကရေယျ, သမ္ပဇာနမုသာဝါဒ’ဿ ဟောတီ’’တိ နိဒါနုဒ္ဒေသေ နိဒ္ဒိဋ္ဌဝစီဒွါရေ အကိရိယသမုဋ္ဌာနာ ဒုက္ကဋာပတ္တိ ဟောတီတိ အာဂမဝိရောဓော နိရာကတော. မုသာဘဏနံ ဝိနာ အာပတ္တိ ကထံ ဘဝတီတိ? ယထာ ကာလေ အဝဿမာနမေဃတော သဉ္ဇာတဒုဗ္ဘိက္ခံ ‘‘မေဃကတံ ဒုဗ္ဘိက္ခ’’န္တိ ဝတ္တဗ္ဗံ ဟောတိ, ဧဝံ ကထေတဗ္ဗကာလေ အကထနတော သဉ္ဇာတာ ဝစီဒွါရေ အကိရိယသမုဋ္ဌာနာ ဒုက္ကဋာပတ္တိပိ [Pg.114] တတော သဉ္ဇာတာတိ ဝတ္တဗ္ဗာ ဟောတိ. သမ္ပဇာနန္တဿ မုသာဝါဒေါတိ စ, အာပတ္တိယေဝ ဒုက္ကဋန္တိ စ ဝါကျံ. ८०. “नेवि” इत्यादी. जरी एखादा श्रमण कोणाशीही बोलत नाही किंवा संभाषण करत नाही, तरीही वचीविज्ञप्तीमुळे (वाचेच्या हालचालीद्वारे होणाऱ्या अभिव्यक्तीमुळे) आणि जाणूनबुजून खोटे बोलल्यामुळे (संपजानमुसावादा), जाणूनबुजून असत्य बोलणाऱ्याला दुक्कट आपत्ती (दुष्कृत अपराध) प्राप्त होऊ शकते. येथे, न बोलणाऱ्याला वचीविज्ञप्तीद्वारे असत्य बोलण्याचा दोष कसा संभवतो? हा अभिधम्माशी विरोध आणि “विद्यमान आपत्ती प्रकट न केल्यास, त्याला संपजानमुसावाद (जाणूनबुजून खोटे बोलणे) होतो” या निदान-उद्देशात (पातिमोक्खाच्या प्रस्तावनेत) निर्दिष्ट केलेल्या वचीद्वारातील अक्रिया-समुत्थानामुळे दुक्कट आपत्ती होते, या आगम-विरोधाचे निराकरण केले आहे. असत्य भाषणाशिवाय आपत्ती कशी उद्भवू शकते? जसे योग्य वेळी पाऊस न पडल्यामुळे निर्माण झालेल्या दुष्काळाला “मेघकृत दुष्काळ” (ढगांमुळे झालेला दुष्काळ) म्हटले जाते, तसेच बोलण्याच्या वेळी न बोलल्यामुळे वचीद्वारात अक्रिया-समुत्थानामुळे निर्माण झालीली दुक्कट आपत्ती देखील त्यापासूनच (न बोलण्यापासून) उत्पन्न झाली आहे असे म्हटले पाहिजे. “संपजानंतस्स मुसावादो” (जाणूनबुजून खोटे बोलणे) आणि “आपत्तियेव दुक्कटं” (आपत्ती म्हणजेच दुक्कट) हे वाक्य आहे. နေယျဿ ယထာ – नेय्य (अन्वयार्थाची अपेक्षा असणारे) चे उदाहरण जसे – ၈၁. ८१. မရီစိစန္ဒနာလေပ-လာဘာ သီတမရီစိနော ; ဣမာ သဗ္ဗာပိ ဓဝလာ, ဒိသာ ရောစန္တိ နိဗ္ဘရံ. शीतल किरणांच्या चंद्राच्या किरणरूपी चंदनाचा लेप मिळाल्यामुळे, या सर्व दिशा अत्यंत धवल (पांढऱ्याशुभ्र) होऊन शोभून दिसत आहेत. ၈၁. ‘‘မရီစီ’’တျာဒိ. သီတမရီစိနော စန္ဒဿ မရီစိယော ဒီဓိတိယော ဧဝ စန္ဒနံ, တဿ အာလေပေါ ဥပဒေဟော, တဿ လာဘေန ဣမာ သဗ္ဗာပိ ဒိသာ နိဗ္ဘရမတိသယံ ဓဝလာ သေတာ ရောစန္တီတိ နတ္ထေတ္ထ နေယျတာ မရီစိယာ သဒ္ဒေါပါတ္တတ္ထာယ တု. ८१. “मरीची” इत्यादी. शीतल किरण असणाऱ्या चंद्राचे किरण (मरीची) म्हणजेच चंदन आहे, त्याचा लेप (अनुलेप) मिळाल्यामुळे या सर्व दिशा अत्यंत धवल म्हणजे पांढऱ्या होऊन शोभत आहेत. येथे 'मरीची' या शब्दाने थेट अर्थ व्यक्त होत असल्यामुळे 'नेय्यता' (अन्वयार्थाची अपेक्षा) दोष नाही. ၈၁. ‘‘မရီစိ’’စ္စာဒိ. သီတမရီစိနော စန္ဒဿ မရီစိစန္ဒနာလေပလာဘာ မရီစိသင်္ခါတစန္ဒနာလေပဿ ပဋိလာဘတော ဣမာ သဗ္ဗာပိ ဒိသာ နိဗ္ဘရမတိသယံ ဓဝလာ သေတာ ရောစန္တိ ဒိဗ္ဗန္တီတိ. ဒိသာနံ ဓဝလကာရဏဿ ‘‘မရီစိစန္ဒနာလေပလာဘာ သီတမရီစိနော’’တိ ဝုတ္တတ္တာ နေယျဒေါသော န ပတိဋ္ဌာတိ, စန္ဒနမိဝ စန္ဒနံ, မရီစိယောယေဝ စန္ဒနမိတိ စ, တဿ အာလေပေါတိ စ, တဿ လာဘောတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ८१. “मरीची” इत्यादी. शीतल किरण असणाऱ्या चंद्राच्या किरणरूपी चंदनाचा लेप मिळाल्यामुळे, म्हणजेच किरणरूपी चंदनाचा लेप प्राप्त झाल्यामुळे या सर्व दिशा अत्यंत धवल म्हणजे पांढऱ्या होऊन शोभत आहेत (चमकत आहेत). दिशांच्या धवलतेचे कारण “मरीचिचंदनालेपलाभा सीतमरीचिनो” असे सांगितल्यामुळे येथे 'नेय्यदोष' ठरत नाही. चंदनासारखे चंदन, किरण हेच चंदन, त्याचा लेप आणि त्याचा लाभ असा याचा विग्रह आहे. ယထာ ဝါ – किंवा जसे – ၈၁. ८१. မနောနုရဉ္ဇနော မာရ-င်္ဂနာသိင်္ဂါရဝိဗ္ဘမော; ဇိနေနာ’သမနုညာတော, မာရဿ ဟဒယာနလော. मनाला आनंद देणारा, मार-कन्यांच्या शृंगाराचा विलास, जो जिनांनी (बुद्धांनी) स्वीकारला नाही, तो माराच्या हृदयातील अग्नी (शोक) बनला. ၈၂. ‘‘မနော’’စ္စာဒိ. မနံ ပဿန္တာနမနုဿရန္တာနဉ္စ စိတ္တံ အနုရဉ္ဇေတီတိ မနောနုရဉ္ဇနော, မာရင်္ဂနာနံ သိင်္ဂါရကတော ဝိဗ္ဘမော ဝိလာသော ဇိနေန အသမနုညာတော အဗ္ဘုပဂတော မာရဿ ဝသဝတ္တိနော ဟဒယာနလော ဟဒယဂ္ဂိ ဇာတော. သောကော စေတ္ထ အနလတ္ထေ နိရုပ္ပိတော တဿ [Pg.115] တာဒိသတ္ထာနတိဝတ္တနတော, ကာရဏန္တုပစာရေနာတိ. ဧတ္ထ ယဇ္ဇပိ မာရင်္ဂနာပရာဇယော န သဒ္ဒေါပါတ္တတ္ထော, တထာပိ ‘‘သိင်္ဂါရဝိဗ္ဘမော မာရဿ ဟဒယဂ္ဂီ’’တိ ဝုတ္တေ သာမတ္ထိယာ မာရင်္ဂနာပရာဇယော ဂမျတေ, တထာဝိဓဿ မာရသောကဿ မာရင်္ဂနာပရာဇယာဗျဘိစာရတော. နေဝေဒိသဿ နေယျတာ, ဝင်္ကဝုတ္တီဒိသီ ဂုဏောယေဝ ဗန္ဓဿ. ८२. “मनो” इत्यादी. पाहणाऱ्यांच्या आणि स्मरण करणाऱ्यांच्या मनाचे रंजन करतो म्हणून 'मनोनुरंजन'. मार-कन्यांच्या शृंगारामुळे झालेला विलास (हावभाव) जिनांनी (बुद्धांनी) स्वीकारला नाही (अमान्य केला), त्यामुळे वशवर्ती माराच्या हृदयात अग्नी (हृदयाग्नी) उत्पन्न झाला. येथे शोक हा अग्नीच्या रूपात निरूपित केला आहे, कारण तो तशाच तीव्रतेचा असतो, आणि हा कारणाचा उपचाराने केलेला प्रयोग आहे. येथे जरी मार-कन्यांचा पराभव शब्दाने थेट व्यक्त केलेला नसला, तरी “शृंगारविलास हा माराच्या हृदयातील अग्नी बनला” असे म्हटल्याने सामर्थ्यामुळे मार-कन्यांचा पराभव सूचित होतो, कारण अशा प्रकारचा माराचा शोक मार-कन्यांच्या पराभवाशिवाय शक्य नाही. अशा ठिकाणी 'नेय्यता' दोष नसून, अशी वक्रोक्ती (वंकवृत्ती) हा काव्याचा गुणच आहे. ၈၂. ဝတ္တဗ္ဗဿ ဉာယောပါတ္တတ္တာ နေယျဒေါသပရိဟာရတ္ထမုဒါဟရတိ ‘‘မနော’’စ္စာဒိ. မနောနုရဉ္ဇနော ဒဿနသဝနာနုဿရဏံ ကရောန္တာနံ ဇနာနံ စိတ္တမတ္တနိ အနုရဉ္ဇန္တော မာရင်္ဂနာသိင်္ဂါရဝိဗ္ဘမော မာရဝဓူနံ ရတိကီဠာဟေတုဘူတကာမပတ္ထနာသင်္ခါတသိင်္ဂါရေန ကတလီလာ ဇိနေန ဇိတပဉ္စမာရေန သတ္ထုနာ အသမနုညာတော အနဗ္ဘုပဂတော အသမ္ပဋိစ္ဆိတော မာရဿ ဝသဝတ္တိနော ဟဒယာနလော ဟဒယဂ္ဂိ အဟောသီတိ. အနလတ္တေန ကပ္ပိတကာရိယဘူတော သောကော မာရင်္ဂနာသိင်္ဂါရဝိဗ္ဘမသင်္ခါတကာရဏေန သဒ္ဓိံ အဘေဒကပ္ပနာယ ‘‘ဂုဠော သေမှံ, တိပုသံ ဇရော’’တိအာဒီသု ဝိယ တုလျာဓိကရဏဘာဝေန ဝုတ္တော ဟောတိ. ဧတ္ထ ကိဉ္စာပိ မာရင်္ဂနာနံ ပရာဇယဝါစကော သဒ္ဒေါ နတ္ထိ, တထာပိ ‘‘သိင်္ဂါရဝိဗ္ဘမော မာရဿ ဟဒယာနလော’’တိ ဝုတ္တေ မာရင်္ဂနာပရာဇယံ ဝိနာ တာဒိသသောကုပ္ပတ္တိကာရဏဿ အနဓိဂတတ္တာ အညထာနုပပတ္တိလက္ခဏသာမတ္ထိယေန တာသံ ပရာဇယော ပကာသိတော ဟောတီတိ ဤဒိသဝင်္ကဝုတ္တိယာ ဗန္ဓဂုဏတ္တာ နေယျဒေါသော နိရာကတော ဟောတီတိ. မနော အနုရဉ္ဇေတီတိ စ, မာရင်္ဂနာနံ သိင်္ဂါရောတိ စ, တေန ကတော ဝိဗ္ဘမောတိ စ ဝါကျံ. ८२. जे सांगायचे आहे ते न्यायाने (तर्काने) प्राप्त होत असल्यामुळे 'नेय्यदोष' टाळण्यासाठी “मनो” इत्यादी उदाहरण देतात. मनोनुरंजन म्हणजे दर्शन, श्रवण आणि स्मरण करणाऱ्या लोकांचे चित्त स्वतःकडे आकर्षित करणारे; मार-कन्यांचा शृंगारविलास म्हणजे मार-कन्यांच्या रतिक्रीडेचे कारण असलेल्या काम-प्रार्थनारूपी शृंगाराने केलेली लीला, जी पाचही मारांवर विजय मिळवणाऱ्या जिनांनी (शास्त्यांनी) स्वीकारली नाही, मान्य केली नाही, ती वशवर्ती माराच्या हृदयातील अग्नी (हृदयाग्नी) झाली. अग्नीच्या रूपाने कल्पित केलेला कार्यरूप शोक आणि मार-कन्यांचा शृंगारविलास हे कारण, या दोघांमध्ये अभेद कल्पून “गूळ हा कफ आहे, काकडी हा ताप आहे” इत्यादींप्रमाणे सामानाधिकरण्य भावाने सांगितले आहे. येथे जरी मार-कन्यांच्या पराभवाचा वाचक शब्द नसला, तरी “शृंगारविलास हा माराच्या हृदयातील अग्नी झाला” असे म्हटल्याने, मार-कन्यांच्या पराभवाशिवाय अशा शोकाच्या उत्पत्तीचे कारण जुळत नसल्यामुळे, 'अन्यथानुपपत्ती' लक्षणाच्या सामर्थ्याने त्यांचा पराभव प्रकट होतो. अशा वक्रोक्तीमुळे (वंकवृत्तीमुळे) रचनेचा गुणच प्रकट होत असल्याने 'नेय्यदोष' दूर होतो. मनाचे रंजन करतो, मार-कन्यांचा शृंगार, आणि त्याने केलेला विलास असे हे वाक्य आहे. ဝိသေသနာပေက္ခဿ ယထာ – विशेषणाची अपेक्षा असणाऱ्या (विशेषणापेक्ष) दोषाचे उदाहरण जसे – ၈၃. ८३. အပယာတာပရာဓမ္ပိ, အယံ ဝေရီ ဇနံ ဇနော; ကောဓပါဋလဘူတေန, ဘိယျော ပဿတိ စက္ခုနာ. हा वैरी मनुष्य, ज्याचा अपराध दूर झाला आहे अशाही माणसाकडे, क्रोधाने लाल-पांढऱ्या झालेल्या डोळ्यांनी वारंवार पाहतो. ၈၃. ‘‘အပယာတေ’’စ္စာဒိ. [Pg.116] အယံ ဝေရီ ဇနော အပယာတာပရာဓမ္ပိ ဇနန္တိ သမ္ဗန္ဓော. အပယာတော အပဂတော အပရာဓော ယဿ တံ, ကောဓေန ပါဋလဘူတေန သေတရတ္တေန. ဣမိနာ ဝိသေသနာပေက္ခဒေါသော ပရိဟဋော. ८३. “अपयाते” इत्यादी. 'हा वैरी मनुष्य अपराध दूर झालेल्या माणसाकडे' असा संबंध आहे. 'अपयात' म्हणजे ज्याचा अपराध दूर झाला आहे तो. 'क्रोधाने पाटलभूत झालेल्या' म्हणजे पांढऱ्या-लाल झालेल्या. याने विशेषणाची अपेक्षा असणारा दोष दूर केला आहे. ၈၃. ‘‘အပယာတိ’’စ္စာဒိ. အယံ ဝေရီ ဇနော အပယာတာပရာဓမ္ပိ အပဂတာပရာဓမ္ပိ ဇနံ ကောဓပါဋလဘူတေန ကောဓေန ဘူတသေတလောဟိတဝဏ္ဏယုတ္တေန စက္ခုနာ ဘိယျော ယေဘုယျေန ပဿတီတိ. ‘‘ပဿတီ’’တိ ဝစနဿ ဝိဇ္ဇမာနတ္တေပိ ‘‘စက္ခုနာ’’တိ ဝိသေသျဝစနံ ‘‘ကောဓပါဋလဘူတေနာ’’တိ ဝိသေသနဿ လဗ္ဘမာနတ္တာ သာတ္ထကံ ဟောတီတိ ဝိသေသနာပေက္ခဒေါသော နိရာကတောတိ. အပယာတော အပဂတော အပရာဓော အသ္မာတိ စ, ကောဓေန ပါဋလဘူတန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ८३. “अपयाति” इत्यादी. हा वैरी मनुष्य, ज्याचा अपराध दूर झाला आहे (अपगत-अपराध) अशा माणसाकडे, क्रोधाने पाटलभूत झालेल्या म्हणजे क्रोधाने पांढऱ्या-लाल रंगाने युक्त झालेल्या डोळ्यांनी वारंवार पाहतो. “पाहतो” (पस्सति) हा शब्द विद्यमान असतानाही, “डोळ्यांनी” (चक्खुना) हे विशेष्य पद “क्रोधाने पाटलभूत झालेल्या” या विशेषणामुळे सार्थक ठरते, म्हणून विशेषणाची अपेक्षा असणारा दोष दूर होतो. ज्याचा अपराध दूर झाला आहे तो, आणि क्रोधाने पाटलभूत झालेला असा याचा विग्रह आहे. ဟီနတ္ထဿ ယထာ – हीनार्थ (कमी दर्जाचा अर्थ असणाऱ्या) दोषाचे उदाहरण जसे – ၈၄. ८४. အပ္ပကာနမ္ပိ ပါပါနံ,ပဘာဝံ နာသယေ ဗုဓော; အပိ နိပ္ပဘတာနီတ-ခဇ္ဇောတော ဟောတိ ဘာဏုမာ. बुद्धिमान माणसाने लहान पापांचाही प्रभाव नष्ट करावा; कारण सूर्य देखील काजव्याला प्रभाहीन (तेजहीन) करतो. ၈၄. ‘‘အပ္ပကာန’’မိစ္စာဒိ. ဗုဓော ပဏ္ဍိတပေါသော အပ္ပကာနံ ပါပါနမ္ပိ ကိမုတမဓိကာနံ ပဘာဝံ အာနုဘာဝံ နာသယေ အပ္ပဝတ္တိံ ပါပေယျ. တံ အတ္ထန္တရနျာသေန သာဓေတိ. ဘာဏုမာ သူရိယော နိပ္ပဘတံ အာနီတော ခဇ္ဇောတော ယေန တထာဝိဓော အပိ ဟောတိ. ‘‘မန္ဒပ္ပဘော အယ’’န္တိ ဇောတိရိင်္ဂဏမ္ပိ နောပေက္ခတိ စက္ကဝါဠကုဟရာနုစရိတမဟာနုဘာဝေါပီတိ. ဧတ္ထ အပီတျာဒိနာ ဝစောဘင်္ဂိယာ ဟီနတ္ထဒေါသော ပရိဟဋော. ८४. “अप्पकानं” इत्यादी. बुद्धिमान (पंडित) माणसाने लहान पापांचाही, मग मोठ्या पापांचा तर काय सांगावे, प्रभाव (अनुभाव) नष्ट करावा, म्हणजेच त्यांना प्रवृत्त होऊ देऊ नये. हे अर्थांतरन्यासाने सिद्ध केले आहे. सूर्य (भानुमान) काजव्याला तेजहीन करतो, असा तो देखील आहे. “हा मंद प्रकाशाचा आहे” म्हणून चक्रवाळ-विवरात संचार करणाऱ्या महान प्रभावशाली सूर्याने देखील काजव्याची उपेक्षा करू नये. येथे 'अपि' इत्यादी शब्दरचनेच्या कौशल्याने हीनार्थ दोष दूर केला आहे. ၈၄. ‘‘အပ္ပကာနိ’’စ္စာဒိ. ဗုဓော ပညဝါ အပ္ပကာနမ္ပိ အတိမန္ဒာနမ္ပိ ပါပါနံ အကုသလာနံ ပဘာဝံ ဝိပါကဒါနသာမတ္ထိယသင်္ခါတာနုဘာဝံ နာသယေ အဟောသိကမ္မတာပါဒနေန နာသေယျ, [Pg.117] ဗဟူနံ ပါပါနံ ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထိ. တမတ္ထမတ္ထန္တရနျာသာလင်္ကာရေန သမတ္ထေတိ အပိစ္စာဒိ. ဘာဏုမာ သူရိယော နိပ္ပဘတာနီတခဇ္ဇောတော အပိ နိပ္ပဘတမာပါဒိတဇောတိရိင်္ဂဏေဟိ သမန္နာဂတောပိ ဟောတီတိ. ဟီနပဘာဝေါ ဟောတိ ခဇ္ဇောပနကေ ပဟာယ အတ္တနော အာလောကံ ကရောန္တော န ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. ဧတ္ထ အပိ နိပ္ပဘတိစ္စာဒိဝစနဝိလာသဝသေန ဟီနပက္ခံ ဂဟေတွာပိ သူရိယဥဒါရတ္တဿေဝ ပေါသိတတ္တာ ‘‘နိပ္ပဘတာနီတခဇ္ဇောတော’’တိ ဝိသေသနပဒံ ဟီနတ္ထဒေါသံ န နိဿယတိ. နတ္ထိ ပဘာ ယေသန္တိ စ, တေသံ ဘာဝေါတိ စ, တံ အာနီတာ ခဇ္ဇောတာ ယေနေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ८४. "अप्पकानि" इत्यादी. बुद्ध (ज्ञानी) प्रज्ञावान पुरुष अल्प किंवा अत्यंत मंद अशाही पापांचा, अकुशलांचा प्रभाव - जो विपाक देण्याच्या सामर्थ्य रूपाने ओळखला जातो - तो अहोसिकम्म (अहोसि-कर्म) करून नष्ट करू शकतात, मग पुष्कळ पापांविषयी तर बोलण्याची गरजच नाही. याच अर्थाचे 'अर्थान्तरन्यास' अलंकाराने समर्थन करतात - 'अपिच्चादि' (इत्यादी). 'भानुमा' म्हणजे सूर्य, 'निप्पभतानीतखज्जोतो' म्हणजे ज्याची प्रभा नष्ट झाली आहे अशा काजव्यांनी युक्त असलेला असाही होतो. याचा अर्थ असा की, तो हीनप्रभ होतो, काजव्यांना सोडून स्वतःचा प्रकाश पाडणारा होत नाही, असा अभिप्राय आहे. येथे 'अपि निप्पभत' इत्यादी वचनविलासामुळे हीन पक्षाचा स्वीकार करूनही सूर्याच्या उदारतेचेच (महानतेचेच) पोषण केले गेल्यामुळे "निप्पभतानीतखज्जोतो" हे विशेषणपद 'हीनार्थ दोष' प्राप्त करत नाही. "ज्यांची प्रभा नाही ते" आणि "त्यांचा भाव" आणि "ज्याने काजवे आणले आहेत तो" असा विग्रह आहे. အနတ္ထဿ ယထာ – अनर्थाचे (निरर्थकतेचे) उदाहरण जसे - ၈၅. ८५. န ပါဒပူရဏတ္ထာယ, ပဒံ ယောဇေယျ ကတ္ထစိ; ယထာ ဝန္ဒေ မုနိန္ဒဿ, ပါဒပင်္ကေရုဟံ ဝရံ. पादपूर्तीसाठी (श्लोकाचे चरण पूर्ण करण्यासाठी) कुठेही पदाची योजना करू नये; जसे - "मी मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) श्रेष्ठ चरणकमलांना वंदन करतो." ၈၅. ‘‘န ပါဒေ’’စ္စာဒိ. ဧတ္ထ ဝန္ဒေဣစ္စာဒေါ ဟေဋ္ဌာ ဝိယ ပါဒပူရဏဿ ကဿစိ အဘာဝေန အနတ္ထာဘာဝေါ. ८५. "न पाद" इत्यादी. येथे 'वन्दे' इत्यादींमध्ये खालीलप्रमाणे पादपूर्तीसाठी कोणत्याही निरर्थक शब्दाचा अभाव असल्यामुळे 'अनर्थ' (निरर्थकता) हा दोष नाही. ၈၅. ‘‘န ပါဒိ’’စ္စာဒိ. ပါဒပူရဏတ္ထာယ ဂါထာပါဒါနံ ပူရဏသင်္ခါတပယောဇနတ္ထာယ ပဒံ နာမာဒိကံ ကတ္ထစိ န ယောဇေယျ ဝိညူတိ, ယထာ နိရတ္ထကပဒါယောဇနေ ဥဒါဟရဏမေဝံ ‘‘မုနိန္ဒဿ ဝရံ ပါဒပင်္ကေရုဟံ ဝန္ဒေ’’တိ. ဟေဋ္ဌာ ဒုဋ္ဌောဒါဟရဏေ ဝိယ ပါဒပူရဏတ္ထံ ကဿစိ ပဒဿ အယောဇိတတ္တာ သာတ္ထကပဒေဟိ နိရတ္ထကဒေါသော နိရာကတောတိ. မုဒုနိမ္မလသောဘာဒိသာဓာရဏဂုဏယောဂတော ပင်္ကေရုဟသဒိသံ ဥပစာရတော ပင်္ကေရုဟံ နာမ. ပါဒမေဝ ပင်္ကေရုဟန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. ဝိသေသနဝိသေသျပဒဒေါသပရိဟာရော. ८५. "न पादि" इत्यादी. पादपूर्तीसाठी म्हणजे गाथेचे चरण पूर्ण करण्याच्या प्रयोजनासाठी विद्वानाने नाम इत्यादी पदांची कुठेही योजना करू नये. जसे निरर्थक पदांच्या योजनेचे उदाहरण असे - "मुनींद्रांच्या श्रेष्ठ चरणकमलांना मी वंदन करतो." खालील दुष्ट (दोषयुक्त) उदाहरणाप्रमाणे पादपूर्तीसाठी कोणत्याही पदाची योजना न केल्यामुळे, सार्थ पदांद्वारे 'निरर्थक दोष' दूर केला गेला आहे. मृदुता, निर्मळता, शोभा इत्यादी साधारण गुणांच्या योगामुळे कमळासारखे असण्याला उपचाराने 'पङ्केरुह' (कमळ) म्हटले आहे. 'पाद (चरण) हेच पङ्केरुह (कमळ)' असा विग्रह आहे. हा विशेषण-विशेष्य पददोषाचा परिहार आहे. ၈၆. ८६. ဘယကောဓပသံသာဒိ-ဝိသေသော တာဒိသော ယဒိ; ဝတ္တုံ ကာမီယတေ ဒေါသော,န တတ္ထေ’ကတ္ထတာကတော. भय, क्रोध, प्रशंसा इत्यादी विशिष्ट भाव जर व्यक्त करायचे असतील, तर तेथे 'एकार्थता' (पुनरुक्ती) मुळे होणारा दोष मानला जात नाही. ၈၆. ‘‘ဘယေ’’စ္စာဒိ. [Pg.118] ဘယဉ္စ စိတ္တုတြာသော ကောဓော စ ဒေါသော ပသံသာ စ ထုတိ, တာ အာဒိ ယဿ တုရိတာဒိနော သော တာဒိသော ဝိသေသော ယဒိ ဝတ္တုံ ကာမီယတေ ဣစ္ဆီယတေ, တတ္ထ တသ္မိံ ဘယာဒိဝိသေသေ ဝိသယေ ဧကတ္ထတာယ ဧကတ္ထဘာဝေန ကတော ဒေါသော နတ္ထိ. ८६. "भये" इत्यादी. भय म्हणजे चित्ताचा त्रास (घाबरणे), क्रोध म्हणजे द्वेष आणि प्रशंसा म्हणजे स्तुती, हे ज्याच्या सुरुवातीला आहेत अशा घाई इत्यादी विशिष्ट भाव जर व्यक्त करण्याची इच्छा असेल, तर त्या भय इत्यादी विशिष्ट विषयांमध्ये 'एकार्थतेमुळे' (एकाच अर्थाच्या पुनरुक्तीमुळे) होणारा दोष नसतो. ၈၆. ဣဒါနိ ဝါကျဒေါသပရိဟာရတ္ထမာရဘတိ ‘‘ဘယကောဓေ’’စ္စာဒိ. ဘယကောဓပသံသာဒိ စိတ္တုတြာသပဋိဃထုတိအာဒီဟိ သမန္နာဂတော တာဒိသော ဝိသေသော ဝတ္တုံ ယဒိ ကာမီယတေ စေ ဝိညူဟိ ဣစ္ဆီယတေ, တတ္ထ ဘယကောဓာဒိကေ ဝိသေသေ ဧကတ္ထတာကတော ဧကတ္ထဘာဝေန ကတော ဒေါသော ဝါကျဒေါသော န ဘဝတိ. ဘယာဒိဝိသေသေ ဝတ္တုမိစ္ဆိတေ ပုဗ္ဗုစ္စာရိတပဒဿ ပုနုစ္စာရဏေ ဧကတ္ထဒေါသော န ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. ဘယဉ္စ ကောဓော စ ပသံသာ စာတိ စ, တာ အာဒိ ယဿ တုရိတကောတူဟလအစ္ဆရာဟာသသောကပသာဒသင်္ခါတဿ အတ္ထဝိသေသဿေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. တဂ္ဂုဏသံဝိညာဏအညပဒတ္ထသမာသတ္တာ ဘယာဒီသု ကထိတမပိ ဂဟေတွာ ပုနပ္ပုနံ ကထနမဝိရောဓံ. ဧကော အတ္ထော ယေသံ ပဒါဒီနံ တေ ဧကတ္ထာ, တေသံ ဘာဝေါ ဧကတ္ထတာ, တာယ ကတောတိ ဝိဂ္ဂဟော. ८६. आता वाक्यदोषाचा परिहार करण्यासाठी "भयकोध" इत्यादी सुरू करतात. भय, क्रोध, प्रशंसा इत्यादी म्हणजे चित्ताचा त्रास, प्रतिघ (राग), स्तुती इत्यादींनी युक्त असलेला तसा विशिष्ट भाव जर विद्वानांना व्यक्त करायचा असेल, तर त्या भय, क्रोध इत्यादी विशिष्ट भावांमध्ये एकार्थतेमुळे झालेला दोष हा वाक्यदोष ठरत नाही. भय इत्यादी विशिष्ट भाव व्यक्त करायचे असताना पूर्वी उच्चारलेल्या पदाचा पुन्हा उच्चार केल्यास 'एकार्थ दोष' (पुनरुक्ती दोष) होत नाही, असा अभिप्राय आहे. भय, क्रोध आणि प्रशंसा, आणि हे ज्याच्या सुरुवातीला आहेत अशा घाई, कुतूहल, आश्चर्य, हास्य, शोक, प्रसाद (प्रसन्नता) या अर्थविशेषांचा, असा विग्रह आहे. तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि समासामुळे भय इत्यादींमध्ये सांगितलेले देखील घेऊन वारंवार सांगणे हे अविरोध (दोषरहित) आहे. ज्या पदांचा एकच अर्थ आहे ते 'एकार्थ', त्यांचा भाव म्हणजे 'एकार्थता', तिच्यामुळे झालेला (दोष), असा विग्रह आहे. ယထာ – जसे - ၈၇. ८७. သပ္ပော သပ္ပော အယံ ဟန္ဒ, နိဝတ္တတု ဘဝံ တတော; ယဒိ ဇီဝိတုကာမော’သိ, ကထံ တမုပသပ္ပသိ. "साप! साप! हा पहा, आपण तेथून मागे फिरा; जर आपल्याला जगण्याची इच्छा असेल, तर आपण त्याच्याजवळ कसे जात आहात?" ၈၇. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ ‘‘သပ္ပော’’ဣစ္စာဒိ. ‘‘အယံ သပ္ပော သပ္ပော’’တိ ဘယေနာမေဍိတံ ဟန္ဒာတိ ခေဒေ တတော တမှာ ဌာနာ, သပ္ပတော ဝါ ဘဝံ ဘဝန္တော နိဝတ္တတု ဂတမဂ္ဂါဘိမုခေါ အာဝတ္တတု. တံ ဌာနံ, သပ္ပံ ဝါ. နတ္ထေတ္ထ ဧကတ္ထတာဒေါသော ဘယေနာမေဍိတပ္ပယောဂတော. ८७. "यथा" चे उदाहरण देतात - "सप्पो" इत्यादी. "हा साप, साप" असे भयामुळे द्विरुक्ती (आमेडित) केली आहे. 'हन्द' हे खेद दर्शवते. 'ततो' म्हणजे त्या स्थानावरून किंवा सापापासून 'भवं' (आपण) मागे फिरावे, आलेल्या मार्गाकडे वळावे. 'तं' म्हणजे त्या स्थानाकडे किंवा सापाकडे. येथे भयामुळे द्विरुक्तीचा प्रयोग केल्यामुळे 'एकार्थता दोष' नाही. ၈၇. ‘‘သပ္ပော’’စ္စာဒိ. [Pg.119] ဟန္ဒ နဋ္ဌော ဝတ, အယံ သပ္ပော သပ္ပော ဘဝံ တတော ဌာနတော, သပ္ပတော ဝါ နိဝတ္တတု အာဝတ္တတု ယဒိ ဇီဝိတုကာမော အသိ, တံ ဌာနံ, သပ္ပံ ဝါ ကထမုပသပ္ပသိ ကထမုပဂစ္ဆသီတိ. ဘယေ အာမေဍိတဝစနတ္တာ ဧကတ္ထတာဒေါသော နတ္ထိ, ဇီဝိတုကာမောသီတိ ဧတ္ထ ဗိန္ဒုလောပေါ. ८७. "सप्पो" इत्यादी. 'हन्द' म्हणजे अरेरे, नष्ट झाले! हा साप, साप! आपण त्या स्थानावरून किंवा सापापासून मागे फिरावे, जर आपल्याला जगण्याची इच्छा असेल. त्या स्थानाकडे किंवा सापाकडे आपण कसे जात आहात? भयामध्ये द्विरुक्तीचे वचन असल्यामुळे 'एकार्थता दोष' नाही. 'जीवितुकामोसि' येथे अनुस्वाराचा लोप (बिंदुलोप) झाला आहे. ပဒဒေါသပရိဟာရဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. पददोष-परिहार-वर्णन समाप्त झाले. ဝါကျဒေါသပရိဟာရဝဏ္ဏနာ वाक्यदोष-परिहार-वर्णन ဘဂ္ဂရီတိနော ယထာ – भग्नरीतीचे (रीतीभंग दोषाच्या अभावाचे) उदाहरण जसे - ၈၈. ८८. ယော ကောစိ ရူပါတိသယော,ကန္တိ ကာပိ မနောဟရာ; ဝိလာသာတိသယော ကောပိ,အဟော ဗုဒ္ဓမဟောဒယော. जो काही रूपाचा अतिशय (उत्कृष्टता), जी काही मनोहारी कांती (शोभा), जो काही विलासाचा अतिशय; अहो! बुद्धांचा हा महान उदय (अभ्युदय) किती आश्चर्यकारक आहे! ၈၈. ‘‘ယော’’ဣစ္စာဒိ. ရူပဿ အနုဗျဉ္ဇနေဟိ အနုဗျဉ္ဇိတဗာတ္တိံသဝရပုရိသလက္ခဏောပသောဘိတဿ ဗျာမပ္ပဘာကေတုမာလာဝိရာဇိတဿ အတိသယော အာဓိက္ကံ ဝါစာဂေါစရဘာဝါတိက္ကမေန အဝစနီယတ္တာ ယော ကောစိယေဝ. မနော အနေကလောကဿ စိတ္တံ ဟရတီတိ မနောဟရာ စိတ္တမဝဟရန္တီ ကန္တိ သောဘာ ကာပိ အဝစနပထာ ကာပိယေဝ. ဝိလာသဿ ဂတျာဒိနော အတိသယော ဝစနပထာတိက္ကန္တော ကောပိယေဝ, တသ္မာ ဗုဒ္ဓဿ မဟန္တော ဥဒယော အဘိဝုဍ္ဎိ အဟော အဗ္ဘုတောတိ. ဧတ္ထ ကိံသဒ္ဒေနာရဒ္ဓါ ရီတိ န ကတ္ထစိ ဘဂ္ဂါ. ८८. "यो" इत्यादी. अनुव्यंजनांनी अनुव्यंजित, बत्तीस श्रेष्ठ महापुरुष लक्षणांनी सुशोभित आणि व्यामप्रभा (शरीराभोवतीचे वलय) व केतुमालेने (मस्तकावरील प्रभेने) विराजमान असलेल्या रूपाचा अतिशय म्हणजे आधिक्य, जे वाणीच्या कक्षेच्या पलीकडे असल्यामुळे अवर्णनीय आहे, ते 'जो कोणी' (यो कोचि) असाच आहे. अनेक लोकांचे मन हरण करणारी म्हणून 'मनोहरा' म्हणजे चित्त वेधून घेणारी कांती (शोभा) ही 'कोणतीतरी' (कापि) म्हणजे शब्दांच्या पलीकडची अशीच आहे. गमन (चालणे) इत्यादी विलासाचा अतिशय हा वाणीच्या कक्षेच्या पलीकडे असलेला 'कोणतातरी' (कोपि) असाच आहे. म्हणूनच बुद्धांचा महान उदय म्हणजे अभिवृद्धी 'अहो अद्भुत' (किती आश्चर्यकारक) आहे! येथे 'किम्' शब्दाने सुरू झालेली रीती कुठेही भग्न झालेली नाही. ၈၈. ‘‘ယော ကောစိ’’စ္စာဒိ. ရူပါတိသယော သုပ္ပဟိဋ္ဌိတပါဒတာဒိဒွတ္တိံသပုရိသလက္ခဏေဟိ သောဘိတဿ စိတ္တင်္ဂုလိတာဒိအသီတိအနုဗျဉ္ဇနေဟိ [Pg.120] အလင်္ကတဿ ဗျာမပ္ပဘာကေတုမာလာဟိ ဥဇ္ဇလဿ ရူပကာယဿ အာဓိကျံ ယော ကောစိယေဝ မနောဂေါစရဘာဝံ ဝိနာ ဝစနဝိသယာတိက္ကန္တတ္တာ ယော ကောစိယေဝ. မနောဟရာ လောကဿ စိတ္တံ ဟရန္တီ ကန္တိ သောဘာ ကာပိယေဝ ဝစီဝိသယာတိက္ကန္တတ္တာ ကာပိယေဝ. ဝိလာသာတိသယော ဝိသယဘူတပိယဘာဝသင်္ခါတဿ ဂမနာဒိဝိလာသဿ အာဓိကျမ္ပိ ကောပိယေဝ ဝုတ္တကာရဏေနေဝကောပိယေဝ. တတော ဗုဒ္ဓမဟောဒယော ဗုဒ္ဓဿ မဟာဘိဝုဒ္ဓိသင်္ခါတော ဥဒယော အဟော အစ္ဆရိယောတိ. ဧတ္ထ သဗ္ဗနာမိကေန ကိံ သဒ္ဒေန ဝတ္တုမာရဒ္ဓက္ကမော န ကတ္ထစိ ဘိန္နောတိ ဘဂ္ဂရီတိဒေါသော နတ္ထီတိ. ८८. "यो कोचि" इत्यादी. रूपाचा अतिशय म्हणजे सुप्रतिष्ठित पाद (पाय) इत्यादी बत्तीस महापुरुष लक्षणांनी सुशोभित, चित्तांगुली (सुंदर बोटे) इत्यादी ऐंशी अनुव्यंजनांनी अलंकृत आणि व्यामप्रभा व केतुमालेने उज्ज्वल असलेल्या रूपकायाचे आधिक्य, जे मनाच्या कक्षेविना वाणीच्या विषयाच्या पलीकडे गेल्यामुळे 'जो कोणी' (यो कोचि) असाच आहे. लोकांचे मन हरण करणारी 'मनोहरा' कांती (शोभा) ही वाणीच्या विषयाच्या पलीकडे गेल्यामुळे 'कोणतीतरी' (कापि) अशीच आहे. प्रिय वाटणाऱ्या गमन (चालणे) इत्यादी विलासाचा अतिशय देखील पूर्वोक्त कारणामुळेच 'कोणतातरी' (कोपि) असाच आहे. त्यामुळे बुद्धांचा महान उदय म्हणजे महा-अभिवृद्धीरूप उदय 'अहो आश्चर्य' आहे! येथे सर्वनामरूप 'किम्' शब्दाने बोलण्याचा सुरू केलेला क्रम कुठेही खंडित होत नसल्यामुळे 'भग्नरीती दोष' नाही. ၈၉. ८९. အဗျာမောဟကရံ ဗန္ဓံ, အဗျာကိဏ္ဏံ မနောဟရံ; အဒူရပဒဝိနျာသံ, ပသံသန္တိ ကဝိဿရာ. जे बंधन (रचना) व्यामोह (गोंधळ) निर्माण न करणारे, अव्याकीर्ण (स्पष्ट), मनोहर आणि अदूराग्र पदविन्यास (जवळजवळ असलेल्या पदांची रचना) असलेले असते, त्याची कवीश्वर प्रशंसा करतात. ၈၉. ‘‘အဗျာမောဟ’’ဣစ္စာဒိ. နတ္ထိ ဒူရမေသန္တိ အဒူရာနိ, တာနိယေဝ ပဒါနိ, တေသံ ဝိနျာသော ယာထာဝတော ဌပနံ ယဿ တံ. တတောယေဝ အဗျာကိဏ္ဏော အသမ္မိဿော စ. သော အဗျာကိဏ္ဏတာယ ဧဝ မနောဟရော စာတိ အဗျာကိဏ္ဏံ မနောဟရံ. တေနေဝ ‘‘အယမေတ္ထ အတ္ထော အယံ ဝါ’’တိ ဧဝံ ဗျာမောဟံ န ကရောတီတိ အဗျာမောဟကရော, တံ. ပသာဒါလင်္ကာရာလင်္ကိတံ ဗန္ဓံ. ကဝီနံ ဣဿရာ ပဓာနာ. ယေ ကနိဋ္ဌင်္ဂုလိဂဏနာနိဋ္ဌာ, တေ ပသံသန္တိ ထုဝန္တိ တာဒိသဗန္ဓဂုဏဿာတိသယပသံသာရဟဘာဝေန. ८९. "अव्यामोह" इत्यादी. ज्यांच्यामध्ये अंतर नाही ते 'अदूर' शब्द, त्यांची योग्य प्रकारे केलेली मांडणी (विन्यास) ज्या रचनेत आहे ती. म्हणूनच ती अव्याकीर्ण (अमिश्रित) आहे. ती अव्याकीर्ण असल्यामुळेच मनोहर आहे, म्हणून 'अव्याकीर्ण मनोहर'. म्हणूनच "याचा हा अर्थ आहे की तो अर्थ आहे" असा संभ्रम (व्यामोह) निर्माण करत नाही, म्हणून 'अव्यामोहकर'. प्रसाद अलंकाराने सुशोभित अशा रचनेची, कवींचे ईश्वर म्हणजे जे श्रेष्ठ कवी करंगळीवर मोजण्याइतके श्रेष्ठ आहेत, ते अशा रचनागुणाच्या अतिशय प्रशंसनीयतेमुळे तिची प्रशंसा (स्तुती) करतात. ၈၉. ‘‘အဗျာမောဟေ’’စ္စာဒိ. အဒူရပဒဝိနျာသံ နာမာဒိပဒါနံ ဝေါဟာရကာလေ အဒူရသမ္ဗန္ဓော ယထာ သိယာ, တထာ ပဋိပါဋိယာ ပဒဋ္ဌပနေန သမန္နာဂတံ အဗျာကိဏ္ဏံ, တတောယေဝ အညသမ္ဗန္ဓီပဒေဟိ အသမ္မိဿံ မနောဟရံ, တတောယေဝ ဝိညူနံ စိတ္တမာရာဓေန္တံ အဗျာမောဟကရံ ‘‘ဣမဿတ္ထော ဣမဿတ္ထော ဧသော ဧသော ဝါ’’တိ သံသယမနုပ္ပာဒေန္တံ ဗန္ဓံ ပသာဒါလင်္ကာရသံယုတ္တံ ဗန္ဓနံ ကဝိဿရာ ကဝီနံ [Pg.121] ပဓာနာ ပဏ္ဍိဘဇနာ, ကနိဋ္ဌင်္ဂုလိယာ ဂဏိတဗ္ဗာ အဂ္ဂကဝိနောတိ အဓိပ္ပာယော. ပသံသန္တိ ထောမေန္တိ. ဗျာမောဟံ န ကရောတီတိ အဗျာမောဟကရော. ဝိ အာကိဏ္ဏော ဗျာကိဏ္ဏော, န ဗျာကိဏ္ဏော အဗျာကိဏ္ဏော. နတ္ထိ ဒူရံ ယေသံ, တာနိယေဝ ပဒါနိ, တေသံ ဝိနျာသော ဌပနံ ယဿ ဗန္ဓဿာတိ ဝိဂ္ဂဟော. ८९. "अव्यामोहे" इत्यादी. व्यवहाराच्या वेळी नाम इत्यादी शब्दांचा जवळचा संबंध असावा, अशा प्रकारे क्रमाने शब्दांची मांडणी केलेली, अव्याकीर्ण, म्हणूनच इतर असंबंधित शब्दांशी अमिश्रित आणि मनोहर, म्हणूनच विद्वानांच्या चित्ताला प्रसन्न करणारी, "याचा हा अर्थ आहे की तो अर्थ आहे" असा संशय निर्माण न करणारी (अव्यामोहकर) रचना, प्रसाद अलंकाराने युक्त अशा रचनेची, कवींचे ईश्वर म्हणजे कवींमध्ये श्रेष्ठ असलेले पंडित, जे करंगळीवर मोजण्याइतके अग्रगण्य कवी आहेत, ते प्रशंसा (स्तुती) करतात. जो संभ्रम निर्माण करत नाही तो 'अव्यामोहकर'. 'वि-आकीर्ण' म्हणजे व्याकीर्ण, जे व्याकीर्ण नाही ते 'अव्याकीर्ण'. 'ज्यांच्यामध्ये अंतर नाही ते शब्द, आणि त्यांची मांडणी ज्या रचनेत आहे ती' असा याचा विग्रह आहे. ယထာ – जसे की – ၉၀. ९०. နီလုပ္ပလာဘံ နယနံ,ဗန္ဓုကရုစိရော’ဓရော; နာသာ ဟေမင်္ကုသော တေန,ဇိနောယံ ပိယဒဿနော. नीलकमलासारखे सुंदर डोळे, बंधुक पुष्पासारखा (दुपारच्या फुलासारखा) सुंदर ओठ आणि सोन्याच्या अंकुशासारखे नाक, यामुळे हे जिन (बुद्ध) प्रियदर्शन आहेत. ၉၀. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ ‘‘နီလုပ္ပလာဘ’’မိစ္စာဒိ. ယဿ ဇိနဿ နယနံ နေတ္တံ နီလုပ္ပလာဘံ ဣန္ဒီဝရဒွယနိဘံ, အဓရော အဓရောဋ္ဌော ဗန္ဓုကမိဝ ဗန္ဓုကကုသုမမိဝ ရုစိရော ကန္တော, နာသာ နာသိကာ သယံ ဟေမင်္ကုသော သုဝဏ္ဏင်္ကုသောယေဝ, တေန ကာရဏေန အယံ ဇိနော ပိယံ မဓုရံ ဒဿနမဿာတိ ပိယဒဿနော. ဤဒိသော န ဗျာကိဏ္ဏဒေါသော, အဗျာကိဏ္ဏော ပသာဒေါယေဝါတိ. ९०. "यथा" असे उदाहरण देतात, "नीलुप्पल" इत्यादी. ज्या जिनांचे (बुद्धांचे) नेत्र नीलकमलासारखे आहेत, ओठ (अधरोष्ठ) बंधुक पुष्पासारखा सुंदर आणि कांतियुक्त आहे, नाक स्वतः सोन्याच्या अंकुशासारखेच आहे, त्या कारणाने हे जिन प्रिय आणि मधुर दर्शन असलेले (प्रियदर्शन) आहेत. अशी रचना व्याकीर्ण दोषाने युक्त नसते, तर ती अव्याकीर्ण आणि प्रसाद गुणाने युक्त असते. ၉၀. ဣဒါနိ ဗျာကိဏ္ဏဒေါသပရိဟာရံ ပရိဟရတိ ‘‘နီလုပ္ပလိ’’စ္စာဒိနာ. နယနံ ယဿ နေတ္တယုဂဠံ နီလုပ္ပလာဘံ နီလုပ္ပလဒလသဒိသံ, အဓရော အဓရောဋ္ဌော ဗန္ဓုကရုစိရော ဗန္ဓုကပုပ္ဖမိဝ မနုညော, နာသာ နာသိကာ ဟေမင်္ကုသော သုဝဏ္ဏင်္ကုသောယေဝ, တေန ကာရဏေန အယံ ဇိနော ပိယဒဿနော မနုညဒဿနော ဟောတီတိ. ဧတ္ထ ပသာဒါလင်္ကာရေန ယုတ္တတ္တာ န ဗျာကိဏ္ဏဒေါသော. အာဘာသဒ္ဒေါ နိဘာသဒ္ဒေါ ဝိယ ဣဝတ္ထော. နော စေ, ပဘာပရိယာယော ဝါ ဟောတိ. ဗန္ဓုကမိဝ ရုစိရောတိ စ, ပိယံ ဒဿနံ ယဿေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဣဟ ဒဿနဿ ကတ္တုဘူတသာဓုဇနသမ္ဗန္ဓတ္တေပိ ဝိသယတ္တေနေဝ [Pg.122] ဇိနသမ္ဗန္ဓော ဟောတီတိ အညပဒတ္ထေန တထာဂတော ဂဟိတောတိ. ९०. आता "नीलुप्पल" इत्यादींद्वारे व्याकीर्ण दोषाचा परिहार करतात. ज्यांचे नेत्रयुगल नीलकमलाच्या पाकळीसारखे आहे, ओठ बंधुक पुष्पासारखा मनोहर आहे, नाक सोन्याच्या अंकुशासारखेच आहे, त्या कारणाने हे जिन प्रियदर्शन (मनोहर दर्शन असलेले) आहेत. येथे प्रसाद अलंकाराने युक्त असल्यामुळे व्याकीर्ण दोष नाही. 'आभा' शब्द हा 'निभा' शब्दाप्रमाणे 'सारखा' या अर्थी आहे, किंवा तो 'प्रभा' (कांती) चा समानार्थी आहे. 'बंधुक पुष्पासारखा सुंदर' आणि 'ज्याचे दर्शन प्रिय आहे तो' असा याचा विग्रह आहे. येथे दर्शनाचा संबंध कर्ता असलेल्या साधुजनांशी असला, तरी विषय म्हणून त्याचा संबंध जिनांशीच येतो, म्हणून अन्यपदार्थाने तथागतांचे ग्रहण केले आहे. ၉၁. ९१. သမတိက္ကန္တဂါမ္မတ္တ-ကန္တဝါစာဘိသင်္ခတံ; ဗန္ဓနံ ရသဟေတုတ္တာ, ဂါမ္မတ္တံ အတိဝတ္တတိ. ग्राम्यत्वाचे (अशिष्टतेचे) पूर्णपणे उल्लंघन करणाऱ्या आणि सुंदर शब्दांनी रचलेली रचना रसाच्या (माधुर्याच्या) कारणामुळे ग्राम्यत्वाचे उल्लंघन करते. ၉၁. ‘‘သမတိက္ကန္တိ’’စ္စာဒိ. သမ္မာ အတိက္ကန္တံ နိဂ္ဂတံ. ဂါမ္မဿ ဘာဝေါ ဂါမ္မတ္တံ. ယာသံ ကန္တာနံ မဓုရာနံ ဝါစာနံ တာဟိ အဘိသင်္ခတံ ရစိတံ ဗန္ဓနံ ရသဿ မာဓုရိယဿ ဟေတုတ္တာ ကာရဏဘာဝေန ဂါမ္မတ္တံ ယထာဝုတ္တံ အတိဝတ္တတိ အတိက္ကမတိ. ९१. "समतिक्कंति" इत्यादी. 'समतिक्कांत' म्हणजे पूर्णपणे ओलांडलेले किंवा बाहेर पडलेले. 'ग्राम्यत्व' म्हणजे ग्राम्य असण्याचा भाव (अशिष्टता). ज्या सुंदर आणि मधुर वाणीने रचलेली रचना, ती रसाच्या म्हणजे माधुर्याच्या कारणामुळे वर सांगितलेल्या ग्राम्यत्वाचे उल्लंघन करते (ओलांडून जाते). ၉၁. ‘‘သမတိ’’စ္စာဒိ. သမတိက္ကန္တဂါမ္မတ္တကန္တဝါစာဘိသင်္ခတံ ဝိသေသတော အတိက္ကန္တဂါမ္မဘာဝါဟိ ကန္တဝါစာဟိ ရစိတံ ဗန္ဓနံ မုတ္တကာဒိဗန္ဓနံ ရသဟေတုတ္တာ ပဏ္ဍိတာနံ ပီတိရသဿ ကာရဏတ္တာ ယထာဝုတ္တဂါမ္မဒေါသံ အတိဝတ္တတိ အတိက္ကမ္မ ပဝတ္တတီတိ. သမ္မာ အတိက္ကန္တံ ဂါမ္မတ္တံ ယာသံ, တာဟိယေဝ ကန္တဝါစာဟိ အဘိသင်္ခတန္တိ စ, ရသဿ ဟေတု, တဿ ဘာဝေါတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ९१. "समति" इत्यादी. विशेषतः ग्राम्यभाव ओलांडलेल्या सुंदर शब्दांनी रचलेली रचना (मुक्तक इत्यादी रचना), पंडितांच्या प्रीतीरसाचे कारण असल्यामुळे वर सांगितलेल्या ग्राम्यदोषाचे उल्लंघन करून प्रवृत्त होते. 'ज्यांनी ग्राम्यत्वाचे पूर्णपणे उल्लंघन केले आहे अशा सुंदर शब्दांनी रचलेली' आणि 'रसाचे कारण, त्याचा भाव' असा याचा विग्रह आहे. ယထာ – जसे की – ၉၂. ९२. ဒုနောတိ ကာမစဏ္ဍာလော,သော မံ သဒယ နိဒ္ဒယော; ဤဒိသံ ဗျသနာပန္နံ,သုခီပိ ကိမုပေက္ခသေ. तो निर्दयी काम-चांडाळ मला पीडा देत आहे, हे दयाळू! अशा संकटात सापडलेल्या माझ्याकडे आपण स्वतः सुखी असूनही का दुर्लक्ष करत आहात? ၉၂. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ. ကာမာတုရာ ကာစိ ဝနိတာ အတ္တနော ပိယံ ပတိံ ဝိရဝတိ ‘‘ဒုနောတိ’’စ္စာဒိနာ. ဒယာယ သဟ ပဝတ္တီတိ သဒယဣတိ အနုနယဝသေန ပိယဿ အာမန္တနံ, သာနုနယာမန္တနဉှိ တတောနုဂ္ဂဟာဘိကင်္ခါယမစ္စန္တမုစိတံ, သော ကာမော ကန္ဒပ္ပော ဧဝ စဏ္ဍာလော အကဏ္ဍော [Pg.123] ဝါ အသယှောပတာပါဝဟတ္တာ. ကာမေ စဏ္ဍာလတ္တာရောပနဉ္စ ဥစိတမေဝ ယတောနေန ကယိရမာနမသဟနမုပတာပမသဟမာနာ တံ ပရိဘဝန္တံ ဝိပ္ပလပတိ, နိဒ္ဒယော နိက္ကရုဏော, ဣဒမပိ ဥစိတမုပတာပေ နိက္ကရုဏာနံ တာဒိသီ ဂတီတိ. မံ ဒုနောတိ အဓိကမုပတာပေတိ နိဒ္ဒယတ္တာ, န ဘဝန္တံ, တေနေဝ ဘဝံ သုခီ. ဣမိနာ အညာသတ္တတံ တဿ ဒီပေတိ. ယဒိ နာညာသတ္တောသိ, နာဟမေကာကိနီ ဘဝါမိ. အသဟာယာနဉှိ ပဋိသတ္တဝေါ ဟောန္တိ. ဧကာကိတ္တာယေဝါဟမပ္ပဋိသရဏတ္တာနေန ဒုသာမီတိ တဝ ကာမံ တွံ သုခီ ဟောသိ. သနာထာနံ တာဒိသီ ဝုတ္တီတိ ဧဝံ သုခီပိ တွံ ဤဒိသံ ဗျသနမာပန္နံ ကိံ ကသ္မာ ဥပေက္ခသေတိ. ဧဝမယံ ဝင်္ကဝုတ္တိယာ အတ္တနော, တံ ဝိသယမနုဘဝန္တဿ စ ဝိမုခတ္တံ နိဒဿေတီတီဒိသံ န ဂါမ္မံ. ९२. "जसे की" (यथा) असे उदाहरण दिले आहे. कामातुर झालेली एखादी स्त्री आपल्या प्रिय पतीला "दुःख देतो" (दुनोति) इत्यादी शब्दांनी आळवते. दयेसह प्रवृत्त होणारा तो 'सदय' (दयाळू), या अनुनयाच्या भावनेने प्रियकराला केलेले हे संबोधन आहे. कारण अनुनयपूर्वक केलेले संबोधन हे त्याच्याकडून अनुग्रहाची (कृपेची) आकांक्षा असताना अत्यंत योग्य असते. तो काम (मदन) हाच चंडाल किंवा अकंड (क्रूर) आहे, कारण तो असह्य संताप घडवून आणणारा आहे. कामावर चंडालत्वाचा आरोप करणे योग्यच आहे, कारण त्याच्याद्वारे केल्या जाणाऱ्या असह्य संतापाला सहन न करू शकल्यामुळे ती त्याचा तिरस्कार करत विलाप करते. 'निर्दय' म्हणजे कारुण्य नसलेला; संताप देण्याच्या बाबतीत निर्दयी लोकांची अशीच गती असते, म्हणून हे म्हणणेही योग्यच आहे. 'मला दुःख देतो' म्हणजे निर्दयीपणामुळे अधिक संताप देतो, 'आपल्याला नाही', म्हणूनच आपण सुखी आहात. याद्वारे ती त्याची दुसऱ्या स्त्रीवरील आसक्ती दर्शवते. जर आपण दुसऱ्या स्त्रीवर आसक्त नसता, तर मी अशी एकाकी राहिले नसते. कारण असहाय्य लोकांना शत्रू त्रास देतात. मी एकाकी आणि निराधार असल्यामुळेच याच्याकडून पीडित होत आहे, म्हणून आपल्या इच्छेनुसार आपण सुखी आहात. सनाथ (संरक्षित) लोकांची अशीच स्थिती असते, म्हणून आपण सुखी असूनही अशा संकटात सापडलेल्या माझ्याकडे का दुर्लक्ष करत आहात? अशा प्रकारे, ही वक्रोक्ती स्वतःची आणि त्या विषयाचा उपभोग घेणाऱ्या प्रियकराची विमुखता दर्शवते, म्हणून यात 'ग्राम्य दोष' (अश्लीलता किंवा गावंढळपणा) नाही. ၉၂. ဂါမ္မဒေါသပရိဟာရေ လက္ခိယံ ဒဿေတိ ‘‘ဒုနောတိ’’စ္စာဒိ. ကာမတဏှာဘိဘူတာ အင်္ဂနာ အတ္တနော ဝလ္လဘံ နိဿာယ ဧဝံ ဝိလပတိ ‘‘သဒယ ဟေ ကာရုဏိက သော ကာမစဏ္ဍာလော သော အနင်္ဂနီစော နိဒ္ဒယော နိက္ကာရုဏိကော မံ ဒုနောတိ ပီဠေတိ, သုခီပိ မမ ဝိယ အနာထဘာဝါဘာဝတော သုခိတောပိ တွံ ဤဒိသံ ဗျသနာပန္နံ ဧဝံ ကာမစဏ္ဍာလေန အကာရုဏေန ကတအသယှသန္တာပသင်္ခါတဗျသနမနုပ္ပတ္တံ မံ ကိမုပေက္ခသေ ကသ္မာ ဥဒါသီနောသီ’’တိ. အတ္တနော ဒုက္ခာတုရတ္တာ ဒုက္ခဒူရီကရဏံ ကာရုဏိကာနံယေဝ ဝိသယန္တိ ‘‘သဒယေ’’တိ အနုနယဝသေန အာမန္တနုစိတံ အတ္တနော ဒုက္ခာတုရတံ ပေါသေတုံ ပီဠာကာရကေ ကာမေ စဏ္ဍာလတ္တာရောပနဉ္စ နိဒ္ဒယတ္တကထနဉ္စ ဥစိတမေဝ အတ္တနိ ဥပေက္ခကတ္တာ. သုခီပီတိ ဣမိနာ တဿ ပရဝိသယာသတ္တတာယ အတိစာရံ အဗ္ဘုပဂမေတိ. ဧဝံ ဝင်္ကဝုတ္တိယာ အတ္တနော ဝလ္လဘေ သာနုရာဂတ္တဉ္စ အတ္တနိ တဿ တဒဘာဝတ္တဉ္စ ဒဿေတီတိ. ‘‘ကညေ ကာမယမာနံ မံ, န ကာမယသိ ကိံနွိဒ’’န္တိ ဧတ္ထ ဝိယ ဣဟ ဂါမ္မဒေါသော နတ္ထီတိ [Pg.124] ဂါမ္မဒေါသပရိဟာရမိဒံ. ကာမောယေဝ စဏ္ဍာလော ကာမစဏ္ဍာလော, သဟ ဒယာယ ယော ဝတ္တတီတိ စ, နတ္ထိ ဒယာ အဿေတိ စ, သုခမဿ အတ္ထီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. အပိသဒ္ဒေါ အက္ခမေ. ९२. ग्राम्य दोषाच्या परिहाराचे (निवारणाचे) लक्ष्य "दुनोति" (दुःख देतो) इत्यादी शब्दांनी दाखवले आहे. कामतृष्णेने ग्रस्त झालेली स्त्री आपल्या प्रियकराला उद्देशून असा विलाप करते: "हे सदय! हे कारुणिक! तो कामरूपी चंडाल, तो कामरूपी नीच, निर्दयी आणि निष्करुण मला दुःख देतो, पीडा देतो. माझ्यासारखा अनाथभाव नसल्यामुळे सुखी असलेले आपण, अशा संकटात सापडलेल्या, म्हणजेच त्या निष्करुण कामचंडालाने निर्माण केलेल्या असह्य संतापरूपी संकटाला प्राप्त झालेल्या माझ्याकडे का दुर्लक्ष करत आहात? आपण का उदासीन आहात?" स्वतः दुःखाने व्याकुळ असल्यामुळे दुःख दूर करणे हे कारुणिक लोकांचेच काम आहे, म्हणून "हे सदय!" असे अनुनयपूर्वक केलेले संबोधन योग्य आहे. स्वतःची दुःखावस्था दर्शवण्यासाठी पीडा देणाऱ्या कामावर चंडालत्वाचा आरोप करणे आणि त्याला निर्दयी म्हणणे योग्यच आहे, कारण तो स्वतःकडे दुर्लक्ष करत आहे. "सुखी असूनही" (सुखीपि) या शब्दाने ती त्याची दुसऱ्या विषयावरील आसक्तीमुळे झालेली प्रतारणा मान्य करते. अशा प्रकारे, वक्रोक्तीद्वारे ती आपल्या प्रियकराबद्दलचे प्रेम आणि प्रियकराचे स्वतःबद्दलचे उदासीनत्व दर्शवते. "हे कन्ये! माझ्यावर प्रेम करणाऱ्या माझ्यावर तू प्रेम का करत नाहीस?" या उदाहरणाप्रमाणे येथे ग्राम्य दोष नाही, म्हणून हा ग्राम्य दोषाचा परिहार आहे. काम हाच चंडाल तो 'कामचंडाल'. जो दयेसह वर्ततो तो 'सदय'. ज्याच्याकडे दया नाही तो 'निर्दय'. ज्याला सुख आहे तो 'सुखी' असा विग्रह आहे. 'अपि' शब्द असमर्थतेच्या अर्थात आहे. ၉၃. ९३. ယတိဟီနပရိဟာရော, န ပုနေ’ဒါနိ နီယတေ; ယတော န သဝနုဗ္ဗေဂံ, ဟေဋ္ဌာ ယေတံ ဝိစာရိတံ. यतीहीन दोषाचा परिहार (निवारण) आता पुन्हा येथे दिला जात नाही; कारण यामुळे ऐकणाऱ्याला कोणताही उद्वेग (त्रास) होत नाही आणि यावर खाली (पूर्वीच) विचार केला गेला आहे. ၉၃. ‘‘ယတိ’’စ္စာဒိ. ဝိစာရိတန္တိ ‘‘တံ နမေ သိရသာ စာမီ-ကရဝဏ္ဏံ တထာဂတ’’န္တိအာဒိနာ ဟေဋ္ဌာ ပကာသိတန္တိ အတ္ထော. ९३. "यती" इत्यादी. 'विचार केला आहे' (विचारितं) याचा अर्थ "त्या सुवर्णवर्णीय तथागतांना मी मस्तक नमवून वंदन करतो" इत्यादींद्वारे खाली (पूर्वीच) स्पष्ट केले आहे असा आहे. ၉၃. ‘‘ယတိဟီနိ’’စ္စာဒိ. ယတော ယသ္မာ သဝနုဗ္ဗေဂံ ‘‘ဒေါသာနမုဒ္ဒေသက္ကမေန ဒေါသပရိဟာရက္ကမော န ဝုတ္တော’’တိ ဧဝံ ဝိညူနမုပ္ပဇ္ဇမာနံ ဣမဿ ဂန္ထဿ သဝနာသဟနံ နတ္ထိ, တတော ယတိဟီနပရိဟာရော ယတိဟီနဒေါသဿ ပရိဟရဏဝသေန ပဝတ္တမုဒါဟရဏံ ဣဒါနိ ပုန န နီယတေ နာဟရီယတေတိ. ဣမိနာဓိဂတမာဒေါ ဝုတ္တတ္ထမေဝ သမတ္ထေတိ. ဟေဋ္ဌာ ယေတံ ဝိစာရိတန္တိ ဧဝံ ယတိဟီနဒေါသပရိဟရဏံ ဟေဋ္ဌာ အနန္တရပရိစ္ဆေဒေ ဝိစာရိတံ ‘‘တံ နမေ သိရသာ စာမီ-ကရဝဏ္ဏံ တထာဂတ’’န္တိအာဒိနာ ပကာသိတန္တိ. အာဒေါ ယတိဟီနဒေါသပါတုဘာဝေယေဝ ပရိဟာရက္ကမဿာပိ ဒဿိတတ္တာ ဣဟာဒဿနေပိ ဂန္ထဿ ဦနတာ နတ္ထီတိ အဓိပ္ပာယော. ယတိ ဟီနာ ဧတ္ထေတိ စ, တဿ ပရိဟာရောတိ စ, သဝနေ ဥဗ္ဗေဂန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ९३. "यतीहीन" इत्यादी. ज्या कारणाने ऐकणाऱ्याला उद्वेग होत नाही, "दोषांच्या निर्देशक्रमानुसार दोषपरिहाराचा क्रम सांगितला नाही" असा विद्वानांमध्ये निर्माण होणारा या ग्रंथाच्या श्रवणाचा असहिष्णुताभाव नाही, म्हणूनच यतीहीन दोषाच्या परिहाराच्या रूपाने प्रवृत्त झालेले उदाहरण आता पुन्हा दिले जात नाही. याद्वारे आधी सांगितलेल्या अर्थाचेच समर्थन केले आहे. 'खाली यावर विचार केला आहे' म्हणजे अशा प्रकारे यतीहीन दोषाचे निवारण खालील लगतच्या परिच्छेदात "त्या सुवर्णवर्णीय तथागतांना मी मस्तक नमवून वंदन करतो" इत्यादींद्वारे स्पष्ट केले आहे. सुरुवातीला यतीहीन दोषाच्या प्रकटीकरणाच्या वेळीच त्याच्या परिहाराचा मार्गही दाखवल्यामुळे, येथे तो न दाखवल्याने ग्रंथात कोणतीही उणीव राहत नाही, असा अभिप्राय आहे. 'जिथे यती हीन (त्रुटिपूर्ण) आहे' तो 'यतीहीन', त्याचा परिहार तो 'यतीहीनपरिहार', ऐकण्यात उद्वेग तो 'श्रवणोद्वेग' असा विग्रह आहे. ကမစ္စုတဿ ယထာ – क्रमच्युत (क्रमाचा भंग झालेल्या) दोषाचे निवारण जसे की – ၉၄. ९४. ဥဒါရစရိတော’သိ တွံ, တေနေဝါ’ရာဓနာ တွယိ; ဒေသံ ဝါ ဒေဟိ ဂါမံ ဝါ, ခေတ္တံ ဝါ မမ သောဘနံ. आपण उदार चरित्राचे आहात, म्हणूनच आपल्याकडे ही प्रार्थना आहे; मला एखादा देश द्या, किंवा एखादे गाव द्या, किंवा एखादे सुंदर शेत द्या. ၉၄. ‘‘ဥဒါရ’’ဣစ္စာဒိ. ဥဒါရံ ဥဒါရတ္တံ စာဂါတိသယသမ္ဗန္ဓတော စရိတံ အတိဂုဏပဝတ္တိ ယဿာတိ ဝိဂ္ဂဟော. ဧတ္ထ ဥစိတတ္တာ [Pg.125] ဒေသာဒီနံ ယာစနက္ကမဿ ကမစ္စုတဿ ပရိဟာရောယံ. ९४. "उदार" इत्यादी. उदार म्हणजे औदार्य, दातृत्वाच्या अतिशयाशी संबंधित असलेले चरित्र म्हणजे अत्यंत गुणवान प्रवृत्ती ज्याची आहे तो 'उदारचरित', असा विग्रह आहे. येथे देश इत्यादींच्या याचना करण्याचा क्रम योग्य असल्यामुळे हा क्रमच्युत दोषाचा परिहार आहे. ၉၄. ‘‘ဥဒါရိ’’စ္စာဒိ. တွံ ပုညဝန္တ ဥဒါရစရိတောသိ စာဂါတိသယယောဂတော ဝိသာရဒပဝတ္တိယုတ္တောသိ, တေနေဝ တေန ကာရဏေနေဝ အာရာဓနာ မမ ယာစနာ တွယိ ဟောတိ. ဒေသံ ဝါဇနပဒံ ဝါ, နော စေ, ဂါမံ ဝါ သံဝသထံ ဝါ, နော စေ, သောဘနံ ခေတ္တံ ဝါ ကေဒါရံ ဝါ မမ ဒေဟီတိ အနုပုဗ္ဗံ ဟီနပဒတ္ထယာစနာ ဒါယကဿ ဒါနဿာပိ ယာစကဿ ဣစ္ဆိတတ္ထပဋိလာဘဿာပိ အနုရူပတ္တာ ကမစ္စုတဒေါသမပနေတိ. ဥဒါရံ စရိတံ အဿာတိ ဝိဂ္ဂဟော. ९४. "उदार" इत्यादी. हे पुण्यवान! आपण उदार चरित्राचे आहात, दातृत्वाच्या अतिशयामुळे आपण अत्यंत उदार प्रवृत्तीचे आहात, म्हणूनच, त्याच कारणाने माझी आपल्याकडे ही याचना आहे. मला एखादा देश (जनपद) द्या, ते शक्य नसेल तर एखादे गाव (वस्ती) द्या, तेही शक्य नसेल तर एखादे सुंदर शेत (शेतजमीन) द्या, अशी अनुक्रमाने उतरत्या क्रमाने केलेली याचना देणाऱ्याच्या दानाला आणि याचकाच्या इच्छित वस्तूच्या प्राप्तीलाही अनुरूप असल्यामुळे क्रमच्युत दोष दूर करते. 'उदार आहे चरित्र ज्याचे' तो 'उदारचरित' असा विग्रह आहे. အတိဝုတ္တဿ ယထာ – अतिवृत्त (अतिशयोक्ती) दोषाचे निवारण जसे की – ၉၅. ९५. မုနိန္ဒစန္ဒသမ္ဘူတ-ယသောရာသိမရီစိနံ; သကလောပျ’ယမာကာသော,နာ’ဝကာသော ဝိဇမ္ဘနေ. मुनींद्ररूपी चंद्रापासून उत्पन्न झालेल्या कीर्तीसमूहाच्या किरणांना पसरण्यासाठी हा संपूर्ण आकाशही अपुरा पडत आहे (त्यात जागा उरलेली नाही). ၉၅. ‘‘မုနိန္ဒ’’ဣစ္စာဒိ. မုနိန္ဒောယေဝ စန္ဒော, တတော သမ္ဘူတာ ပါတုဘူတာ, ယသောရာသီ ဧဝ မရီစိယော, တာသံ. အယံ သကလော အာကာသောပိ ဂဂနမေဝ, န တဿေကော ပဒေသော. ဝိဇမ္ဘနေ ဗျာပနေ နာဝကာသော တာဒိသတ္တာ တာသံ မရီစိနန္တိ နာတိဝုတ္တံ. ९५. "मुनींद्र" इत्यादी. मुनींद्र (मुनींचे स्वामी) हेच चंद्र, त्यांच्यापासून उत्पन्न झालेल्या, कीर्तीसमूह हेच किरण, त्यांच्यासाठी. हा संपूर्ण आकाश म्हणजे गगनच, त्याचा कोणताही एक भाग नाही. पसरण्यासाठी (व्यापण्यासाठी) जागा नाही, कारण त्या किरणांचे स्वरूप तसे आहे, म्हणून यात अतिशयोक्ती (अतिवृत्त) दोष नाही. ၉၅. ‘‘မုနိန္ဒိ’’စ္စာဒိ. မုနိန္ဒစန္ဒသမ္ဘူတယသောရာသိမရီစိနံ မုနိန္ဒသင်္ခါတစန္ဒတော ပါတုဘူတာနံ ကိတ္တိသမူဟသင်္ခါတကိရဏာနံ ဝိဇမ္ဘနေ ဗျာပနေ အယံ သကလောပိ အာကာသော နာဝကာသော န ဩကာသော ဟောတီတိ. ဟေတုဖလာဒိဧကေကကာရဏေနာပိ အပ္ပမေယျာနံ သဗ္ဗညုဂုဏာနံ ပဝတ္တိယာ အပ္ပမေယျသာမညဘူတာကာသဿ နိရဝကာသဿ ဣဝ ကထနမုစိတန္တိ အတိဝုတ္တဒေါသော ဣဟ န ဘဝတိ. စန္ဒော ဣဝ [Pg.126] စန္ဒော, မုနိန္ဒော ဧဝ စန္ဒော, တတော သမ္ဘူတာနံယေဝ ယသာနံ ရာသီ စ တာ မရီစိယော စာတိ ဝိဂ္ဂဟော. ९५. "मुनींद्र" इत्यादी. मुनींद्ररूपी चंद्रापासून उत्पन्न झालेल्या कीर्तीसमूहरूपी किरणांच्या पसरण्यासाठी (व्यापण्यासाठी) हा संपूर्ण आकाशही अपुरा पडतो (जागा उरत नाही). हेतू आणि फल इत्यादींपैकी एका जरी कारणाने अमर्याद अशा सर्वज्ञ गुणांच्या प्रवृत्तीमुळे, अमर्याद आणि सामान्य असलेल्या आकाशालाही जणू जागा उरली नाही असे सांगणे योग्यच आहे, म्हणून येथे अतिवृत्त (अतिशयोक्ती) दोष होत नाही. चंद्रासारखा चंद्र, मुनींद्र हेच चंद्र, त्यांच्यापासून उत्पन्न झालेल्या कीर्तीचा समूह आणि त्या किरणांचा समूह असा विग्रह आहे. ၉၆. ९६. ဝါကျံ ဗျာပန္နစိတ္တာနံ, အပေတတ္ထံ အနိန္ဒိတံ; တေနု’မ္မတ္တာဒိကာနံ တံ, ဝစနာ’ညတြ ဒုဿတိ. चित्तभ्रम झालेल्या (वेड्या) लोकांचे वाक्य जरी अर्थहीन असले तरी ते निंदनीय मानले जात नाही; म्हणूनच, वेड्या इत्यादींच्या भाषणाव्यतिरिक्त इतर ठिकाणी (सामान्य लोकांच्या भाषणात) असे वाक्य दोषयुक्त ठरते. ၉၆. ‘‘ဝါကျ’’မိစ္စာဒိ. ဗျာပန္နံ နဋ္ဌံ အယထာပဝတ္တံ စိတ္တံ ယေသံ, တေသံ. ဝါကျံ ဝါကျလက္ခဏောပေတံ. အပေတော အပဂတော သုညော အတ္ထော အဘိဓေယျံ သံဝေါဟာရိကံ ယဿ, တံ. အနိန္ဒိတံ အဟီဠိတံ. တေန ယထာဝုတ္တေန ကာရဏေန. တံ ဝါကျံ ဥမ္မတ္တော ဓာတုက္ခောဘာဒိနာ ခိတ္တစိတ္တော, သော အာဒိ ယေသံ ဗာလာဒီနံ တေသံ ဝစနာ အသင်္ဂတာယ ဝါစာယ အညတြ အညသ္မိံ အဗျာပန္နစိတ္တဝိသယေ ဒုဿတိ ဒုဋ္ဌံ ဇာယတေ, ဥမ္မတ္တာဒီနံယေဝ တထာဝိဓာယ ဝါစာယ ဥစိတတ္တာတိ. ९६. "वाक्य" इत्यादी. ज्यांचे चित्त नष्ट झाले आहे किंवा विचलित झाले आहे, त्यांचे. वाक्य म्हणजे वाक्यलक्षणांनी युक्त. 'अपेतार्थ' म्हणजे ज्याचा व्यावहारिक अर्थ निघून गेला आहे किंवा जो अर्थशून्य आहे, ते. 'अनिंदित' म्हणजे ज्याची निंदा केली जात नाही. त्या वर सांगितलेल्या कारणाने. ते वाक्य, वात-पित्त इत्यादी धातूंच्या क्षोभामुळे ज्यांचे चित्त विचलित झाले आहे असा वेडा, आणि ज्यांच्या सुरुवातीला वेडे इत्यादी आहेत अशा बालकांच्या असंगत भाषणाव्यतिरिक्त, इतर ठिकाणी म्हणजे ज्यांचे चित्त विचलित झालेले नाही अशा लोकांच्या भाषणात दोषयुक्त (दुष्ट) ठरते; कारण वेड्या इत्यादींच्या बाबतीत अशा प्रकारचे भाषण योग्यच मानले जाते. ၉၆. ‘‘ဝါကျ’’မိစ္စာဒိ. ဗျာပန္နစိတ္တာနံ ဝိရုဒ္ဓဘာဝမာပန္နစိတ္တာနံ ဝါကျံ သျာဒျန္တတျာဒျန္တပဒသမုဒါယရူပံ ဝါကျံ အပေတတ္ထံ အပဂတသမုဒါယတ္ထံ အနိန္ဒိတံ ဝိညူဟိ ဂရဟိတံ န ဟောတိ, တေန ကာရဏေန ဥမ္မတ္တာဒိကာနံ ဥမ္မတ္တဝေဒနဋ္ဋာဒီနံ ဝစနာညတြ ဝစနံ ဝိနာ အနုမ္မတ္တာဒိဝစနေ တံ သမုဒါယတ္ထသမ္ဗန္ဓရဟိတံ ဝစနံ ဒုဿတိ ဒေါသဒုဋ္ဌံ ဟောတိ. ဗျာပန္နံ စိတ္တံ ယေသန္တိ စ, အပေတော အတ္ထော အဿာတိ စ, ဥမ္မတ္တော အာဒိ ယေသန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ९६. "वाक्य" इत्यादी. चित्तभ्रम झालेल्या (विकृत चित्त झालेल्या) लोकांचे वाक्य, जे सुबंत आणि तिङंत पदांचा समूह असते, ते अर्थहीन (समूहाचा अर्थ नसलेले) असूनही विद्वानांकडून निंदिले जात नाही. त्या कारणाने, वेडे किंवा वेदनेने व्याकुळ झालेल्या इत्यादींच्या भाषणाव्यतिरिक्त, म्हणजे जे वेडे नाहीत अशांच्या भाषणात, तो समूहाच्या अर्थाशी संबंध नसलेला शब्दप्रयोग दोषयुक्त ठरतो. 'ज्यांचे चित्त विचलित झाले आहे' ते 'व्यापन्नचित्त', 'ज्याचा अर्थ निघून गेला आहे' तो 'अपेतार्थ', 'वेडा आहे ज्यांच्या सुरुवातीला' ते 'उन्मत्तादी' असा विग्रह आहे. ယထာ – जसे की – ၉၇. ९७. သမုဒ္ဒေါ ပီယတေ သော’ယ-မဟ’မဇ္ဇ ဇရာတုရော; ဣမေ ဂဇ္ဇန္တိ ဇီမူတာ, သက္ကဿေ’ရာဝဏော ပိယော. हा तो समुद्र आज म्हातारपणाने व्याकुळ झालेल्या माझ्याकडून प्यायला जात आहे; हे ढग गर्जना करत आहेत; इंद्राचा ऐरावत प्रिय आहे. ၉၇. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ ‘‘သမုဒ္ဒေါ’’ဣစ္စာဒိ. န ဟေတ္ထ ‘‘သမုဒ္ဒေါ ပီယတေ’’ဣစ္စာဒိနော ပဒသမုဒါယဿ ကောစိ ဧကော အတ္ထော ဂယှတိ, ယော သော ဗန္ဓတ္ထော သိယာ. အဝယဝတ္ထာ [Pg.127] ဧဝ တု အယောသလာကာကပ္ပာပဋိဘန္တီတိ ဤဒိသမပေတတ္ထမနိန္ဒိတံ ဝိညေယျံ ဗျာပန္နစိတ္တာနံ. ९७. "जसे की" असे उदाहरण दिले जाते "समुद्र" इत्यादी. कारण येथे "समुद्र प्यायला जातो" इत्यादी शब्दसमूहाचा कोणताही एक अर्थ घेतला जात नाही, जो की रचनेचा अर्थ (बंधार्थ) असू शकेल. परंतु अवयवांचे अर्थच लोखंडी सळईसारखे भासतात, म्हणून व्याकुळ चित्त असलेल्यांचे असे अपेतार्थ (अर्थहीन) वाक्य अनिंदित समजावे. ၉၇. ‘‘သမုဒ္ဒေါ’’စ္စာဒိ. သော အယံ သမုဒ္ဒေါ ပီယတေ ယေန ကေနစိ ပီယတေ, အဟံ အဇ္ဇ ဇရာတုရော ဇရရောဂါဘိဘူတော, ဣမေ ဇီမူတာ မေဃာ ဂဇ္ဇန္တိ ထနယန္တိ. သက္ကဿ ဧရာဝဏော ပိယောတိ. ဣဒံ နိန္ဒိတာနိန္ဒိတာနံ ဒွိန္နမုဒါဟရဏံ. ဣဒံ ဝါကျံ အဝယဝတ္ထမန္တရေန သမုဒါယတော ဂမျမာနတ္ထဿာဘာဝါ အပေတတ္ထံ နာမ ဟောတိ. ဤဒိသံ ဝါကျံ ဥမ္မတ္တကာဒီဟိ ဝုတ္တမပ္ပီတိကရံ န ဟောတိ, အညေဟိ ဝုတ္တံ ပန ကဏ္ဏေ အယောသလာကာ ဝိယ အပ္ပီတိကရံ. ဇရာယ အာတုရောတိ ဝါကျံ. ९७. "समुद्र" इत्यादी. तो हा समुद्र प्यायला जातो, ज्या कोणाकडूनही प्यायला जातो; मी आज जरेने (वृद्धत्वाने) व्याकुळ आहे, जराव्याधीने ग्रस्त आहे; हे जीमूत (मेघ) गर्जना करत आहेत, गडगडत आहेत; शक्राचा (इंद्राचा) ऐरावत प्रिय आहे. हे निंदित आणि अनिंदित या दोन्हीचे उदाहरण आहे. हे वाक्य अवयवांच्या अर्थाशिवाय समूहातून समजणाऱ्या अर्थाच्या अभावामुळे 'अपेतार्थ' (अर्थहीन) नावाचे होते. असे वाक्य वेड्या इत्यादींनी बोलले असता अप्रिय वाटत नाही, परंतु इतरांनी बोलले असता कानात लोखंडी सळई घातल्यासारखे अप्रिय वाटते. 'जरेने व्याकुळ' हे वाक्य आहे. ၉၈. ९८. သုခုမာလာဝိရောဓိတ္တ-ဒိတ္တဘာဝပ္ပဘာဝိတံ; ဗန္ဓနံ ဗန္ဓဖရုသ-ဒေါသံ သံဒူသယေယျ တံ. सुकुमारतेशी अविरोध आणि दीप्तभावाने (तेजस्वी भावाने) प्रभावित झालेली रचना, त्या रचना-परुष (कठोर रचना) दोषाचा नाश करते. ၉၈. ‘‘သုခုမာလိ’’စ္စာဒိ. န ဝိရုဇ္ဈတိ သီလေနာတိ အဝိရောဓီ, တဿ ဘာဝေါ အဝိရောဓိတ္တံ. သုခုမာလဿ အဝိရောဓိတ္တံ ယဿ သော ဒိတ္တဘာဝေါ, တေန ပဘာဝိတံ ဝဍ္ဎိတံ သံယုတ္တံ တံ ဗန္ဓနံ ဗန္ဓဖရုသဒေါသံ သံဒူသယေယျ နာသယေတိ အတ္ထော. ९८. "सुकुमारी" इत्यादी. जे स्वभावाने विरुद्ध होत नाही ते 'अविरोधी', त्याचा भाव म्हणजे 'अविरोधित्व'. सुकुमाराचे अविरोधित्व ज्यामध्ये आहे तो 'दीप्तभाव', त्याने प्रभावित म्हणजे वाढवलेले किंवा युक्त असलेले ते बंधन (रचना) 'बंधपरुष' दोषाचा संदूषण करते म्हणजे नाश करते, असा अर्थ आहे. ၉၈. ‘‘သုခုမာလိ’’စ္စာဒိ. သုခုမာလာဝိရောဓိတ္တဒိတ္တဘာဝပ္ပဘာဝိတံ ‘‘အနိဋ္ဌုရက္ခရပ္ပာယေ’’စ္စာဒိနာ ဝုစ္စမာနသုခုမာလဂုဏဿ အဝိရုဒ္ဓဘာဝသမန္နာဂတေန ဝဏ္ဏာနံ အညမညသင်္ဂဘိလက္ခဏေန ဒိတ္တဘာဝေန ပိယဘာဝေန အနုဗြူဟိတံ တံ ဗန္ဓနံ ဗန္ဓဖရုသဒေါသံ ဗန္ဓဖရုသသင်္ခါတဒေါသံ သံဒူသယေယျ နာသေယျ, တံ ဗန္ဓဖရုသဒေါသန္တိ ဝါ သမ္ဗန္ဓောတိ. န ဝိရုဇ္ဈတိ သီလေနာတိ အဝိရောဓီ, တဿ ဘာဝေါတိ စ, သုခုမာလဿ အဝိရောဓိတ္တံ ယဿာတိ စ, သောယေဝ ဒိတ္တဿ ဘာဝေါတိ စ, တေန ပဘာဝိတန္တိ စ ဝါကျံ. ९८. "सुकुमारी" इत्यादी. सुकुमारतेशी अविरोध आणि दीप्तभावाने प्रभावित झालेले, "अकठोर अक्षरांचे प्राचुर्य" इत्यादींद्वारे सांगितले गेलेल्या सुकुमार गुणाच्या अविरुद्ध भावाने युक्त असलेल्या, वर्णांच्या परस्परांच्या संबंधाचे लक्षण असलेल्या दीप्तभावाने (तेजस्वी भावाने) किंवा प्रियभावाने पुष्ट झालेले ते बंधन (रचना) 'बंधपरुष' दोषाचा म्हणजे 'बंधपरुष' नावाच्या दोषाचा नाश करते, किंवा 'त्या बंधपरुष दोषाला' असा संबंध आहे. 'स्वभावाने विरुद्ध होत नाही तो अविरोधी', 'त्याचा भाव' असे, आणि 'सुकुमाराचे अविरोधित्व ज्यामध्ये आहे' असे, 'तोच दीप्तभाव' असे, आणि 'त्याने प्रभावित' असे हे वाक्य आहे. ယထာ – जसे की – ၉၉. ९९. ပဿန္တာ [Pg.128] ရူပဝိဘဝံ, သုဏန္တာ မဓုရံ ဂိရံ; စရန္တိ သာဓူ သမ္ဗုဒ္ဓ-ကာလေ ကေဠိပရမ္မုခါ. सम्यक्संबुद्धांच्या काळात सज्जन लोक (त्यांचे) रूपवैभव पाहत आणि मधुर वाणी ऐकत, क्रीडेकडे (खेळाकडे) पाठ फिरवून आचरण करतात. ၉၉. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ ‘‘ပဿန္တာ’’ဣစ္စာဒိ. ကေဠိယာ ကီဠာယ ပရမ္မုခါ ဝိဂတစ္ဆန္ဒာ စရန္တီတိ သမ္ဗန္ဓော. ९९. "जसे की" असे उदाहरण दिले जाते "पाहत" इत्यादी. 'केळिया' म्हणजे क्रीडेपासून पराङ्मुख, विरक्त होऊन आचरण करतात, असा संबंध आहे. ၉၉. ‘‘ပဿန္တေ’’စ္စာဒိ. သာဓူ သဇ္ဇနာ သမ္ဗုဒ္ဓကာလေ သမ္ဗုဒ္ဓဿ ဓရမာနကာလေ ရူပဝိဘဝံ တဿ ရူပသမ္ပတ္တိံ ပဿန္တာ စက္ခုံ သန္တပ္ပေတွာ ဩလောကေန္တာ မဓုရံ ဂိရံ တဿေဝ ဘဂဝတော အဋ္ဌင်္ဂသမန္နာဂတံ မဓုရဝစနံ သုဏန္တာ ကေဠိပရမ္မုခါ ကီဠာယ ဝိမုခါ ကီဠာဘိရတိရဟိတာ စရန္တိ ဂစ္ဆန္တိ ပဝတ္တန္တီတိ. ကေဝလံ ဖရုသသိထိလဝဏ္ဏေဟိ ဝိနာ သုခုစ္စာရဏီယဝဏ္ဏေဟိ သမ္ဘူတသုခုမာလဂုဏာဝိရောဓအညမညသင်္ဂတဝဏ္ဏဝိသဒပ္ပဝတ္တဂုဏယုတ္တတ္တာ ဧတ္ထ ဗန္ဓဖရုသဒေါသော နတ္ထိ. ကေဠိယာ ပရာနိ ပရိဝတ္တိတာနိ မုခါနိ ဧတေသန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. ဧတ္ထ ကာလောတိ ကိရိယာ. သာ စ အတ္ထတော တဒါကာရပ္ပဝတ္တသမ္ဗန္ဓောယေဝ. လောကော ပန ဝိသုံ ဧကော ပဒတ္ထောယေဝါတိ ဝေါဟရတိ. ဝါကျဒေါသပရိဟာရော. ९९. "पाहत" इत्यादी. सज्जन लोक सम्यक्संबुद्धांच्या काळात, म्हणजे सम्यक्संबुद्ध हयात असताना, त्यांचे रूपवैभव म्हणजे त्यांची रूपसंपत्ती पाहत, डोळे तृप्त करून पाहत, आणि त्याच भगवंतांची अष्टांगयुक्त मधुर वाणी ऐकत, क्रीडेपासून पराङ्मुख म्हणजे खेळापासून विमुख, क्रीडेतील आवडीशिवाय आचरण करतात, जातात किंवा प्रवृत्त होतात. केवळ कठोर आणि शिथिल वर्णांशिवाय, सुलभ उच्चारता येणाऱ्या वर्णांनी उत्पन्न झालेल्या सुकुमार गुणाशी अविरोध असलेल्या आणि परस्परांशी सुसंगत असलेल्या वर्णांच्या स्पष्ट प्रवृत्तीच्या गुणामुळे युक्त असल्यामुळे येथे 'बंधपरुष' दोष नाही. 'क्रीडेपासून ज्यांची मुखे परावृत्त झाली आहेत ते' असा विग्रह आहे. येथे 'काळ' ही क्रिया आहे. आणि ती अर्थाच्या दृष्टीने त्या प्रकारे प्रवृत्त होणारा संबंधच आहे. परंतु लोक स्वतंत्रपणे एकच पदार्थाचा अर्थ असा व्यवहार करतात. हा वाक्यदोषाचा परिहार आहे. ဝါကျဒေါသပရိဟာရဝဏ္ဏနာ နိဋ္ဌိတာ. वाक्यदोष परिहाराचे वर्णन समाप्त झाले. ဝါကျတ္ထဒေါသပရိဟာရဝဏ္ဏနာ वाक्यार्थदोष परिहाराचे वर्णन အပက္ကမဿ ယထာ – अपक्रम (क्रमभंग) दोषाचे उदाहरण जसे की – ၁၀၀. १००. ဘာဝနာဒါနသီလာနိ, သမ္မာ သမ္ပာဒိတာနိ’ဟ; နိဗ္ဗာနဘောဂသဂ္ဂါဒိ-သာဓနာနိ န သံသယော. या जगात सम्यक प्रकारे संपादन केलेली भावना, दान आणि शील हे अनुक्रमे निर्वाण, भोग आणि स्वर्ग इत्यादींचे साधन आहेत, यात संशय नाही. ၁၀၀. ‘‘ဘာဝနာ’’ဣစ္စာဒိ. ဧတ္ထ ဘာဝနာဒီနိ နိဒ္ဒိသိတွာ ယထာက္ကမံ နိဗ္ဗာနာဒီနံ နိဒ္ဒေသေန အပက္ကမဒေါသော ပရိဟဋော. १००. "भावना" इत्यादी. येथे भावना इत्यादींचा निर्देश करून यथाक्रमाने निर्वाण इत्यादींचा निर्देश केल्यामुळे अपक्रम (क्रमभंग) दोष दूर केला गेला आहे. ၁၀၀. ‘‘ဘာဝနေ’’စ္စာဒိ. [Pg.129] ဣဟ မနုဿလောကေ သမ္မာ သမ္ပာဒိတာနိ ကမ္မဖလံ သဒ္ဒဟိတွာ ယထာဝိဓိ သမ္ပာဒိတာနိ အတ္တနော သန္တာနေ ပဝတ္တာပိတာနိ ဘာဝနာဒါနသီလာနိ နိဗ္ဗာနဘောဂသဂ္ဂါဒိသာဓနာနိ ယထာက္ကမံ နိဗ္ဗာနဥပဘောဂပရိဘောဂသမ္ပတ္တိသဂ္ဂုပ္ပတ္တိအာဒီနံ ဟေတုဘာဝေန သာဓကာနိ ဟောန္တိ, ဧတ္ထ သာဓနေ န သံသယော ဟောတီတိ. ဣဟ ဘာဝနာဒယော ဥဒ္ဒိသိတွာ ဥဒ္ဒေသက္ကမံ အနတိက္ကမ္မ နိဗ္ဗာနာဒီနမနုဒ္ဒေသဿ ကတတ္တာ အပက္ကမဝါကျတ္ထဒေါသဿ ဩကာသော န ဟောတိ. १००. "भावना" इत्यादी. या मनुष्यलोकात सम्यक प्रकारे संपादन केलेली, म्हणजे कर्मफलावर श्रद्धा ठेवून यथाविधी संपादन केलेली आणि स्वतःच्या चित्तप्रवाहात प्रवृत्त केलेली भावना, दान आणि शील हे अनुक्रमे निर्वाण, उपभोग-परिभोग संपत्ती आणि स्वर्गाची उत्पत्ती इत्यादींचे हेतू म्हणून साधक होतात, या साधनात संशय नाही. येथे भावना इत्यादींचा उल्लेख करून, उल्लेखाच्या क्रमाचे उल्लंघन न करता निर्वाण इत्यादींचा अनुल्लेख (अनुक्रम) केल्यामुळे अपक्रम वाक्यार्थदोषाला वाव उरत नाही. ၁၀၁. १०१. ဥဒ္ဒိဋ္ဌဝိသယော ကောစိ, ဝိသေသော တာဒိသော ယဒိ; အနုဒ္ဒိဋ္ဌေသု နေဝ’တ္ထိ, ဒေါသော ကမဝိလင်္ဃနေ. जर पहिल्यांदा उल्लेख केलेल्या विषयाचा तसा काही विशेष असेल, तर नंतर उल्लेख न केलेल्यांमध्ये क्रमाचे उल्लंघन केल्यास कोणताही दोष नसतो. ၁၀၁. ‘‘ဥဒ္ဒိဋ္ဌေ’’စ္စာဒိ. ဥဒ္ဒိဋ္ဌာ ပဌမံ ယုတ္တာ အတ္ထာ ဝိသယော ဂေါစရော ယဿ ဥဒ္ဒေသာနုဒ္ဒေသသမ္ဗန္ဓဝိဇာနနလက္ခဏဿ ဝိသေသဿ သော တာဒိသော ကောစိ ဝိသေသော အနုဒ္ဒိဋ္ဌေသု ယထာက္ကမမုဒ္ဒေသကမာနမတိက္ကမေန ပုန အတ္ထန္တရနိဿယေန ပရာမဋ္ဌေသု ယဒိ ဘဝေယျ, ကမဿ ယထောဒ္ဒိဋ္ဌေသု အနုက္ကမဿ ဝိလင်္ဃနေ အတိက္ကမေ ဒေါသော နေဝတ္ထိ. १०१. "उद्दिष्ट" इत्यादी. पहिल्यांदा उल्लेख केलेले अर्थ ज्याचे विषय (गोचर) आहेत अशा उल्लेख आणि अनुल्लेख यांच्या संबंधाच्या ज्ञानाचे लक्षण असलेल्या विशेषाचा तसा कोणताही विशेष जर नंतर उल्लेख न केलेल्यांमध्ये, यथाक्रमाने उल्लेखाच्या क्रमाचे उल्लंघन करून पुन्हा दुसऱ्या अर्थाच्या आश्रयाने विचार केला असता जर असेल, तर जसे उल्लेख केले आहे त्या अनुक्रमाचे उल्लंघन केल्यास कोणताही दोष नसतो. ၁၀၁. ‘‘ဥဒ္ဒိဋ္ဌေ’’စ္စာဒိ. ဥဒ္ဒိဋ္ဌဝိသယော ပဌမံ ပယုတ္တတ္ထဝိသယော တာဒိသော ကောစိ ဝိသေသော ဥဒ္ဒေသာနုဒ္ဒေသာနံ ‘‘ဣဒမဿ ပုဗ္ဗကထနံ, ဣဒမဿ ပစ္ဆာကထန’’န္တိ ဧဝံ အညမညာပေက္ခလက္ခဏသမ္ဗန္ဓပရိဇာနနလက္ခဏော ဝိသေသော အနုဒ္ဒိဋ္ဌေသု အတ္ထန္တရံ နိဿာယ ပုန ဝုတ္တေသု ယဒိ ‘‘ဘဝေယျာ’’တိ သေသော. ကမဝိလင်္ဃနေ ဥဒ္ဒေသာနုဒ္ဒေသာနံ ကမာတိက္ကမေ ဒေါသော သတ္ထညူနံ သုတိကာလေ အသဟနကာရဏံ နေဝတ္ထီတိ. ဥဒ္ဒိဋ္ဌာ ပဌမုစ္စာရိတာ အတ္ထာ ဝိသယော ဂေါစရော အဿေတိ စ, ကမဿ ဝိလင်္ဃနန္တိ စ ဝါကျံ. १०१. "उद्दिष्ट" इत्यादी. पहिल्यांदा प्रयुक्त केलेल्या अर्थाचा विषय असलेला तसा कोणताही विशेष, जो उल्लेख आणि अनुल्लेखांच्या "हे याचे पूर्वकथन आहे, हे याचे पश्चात्कथन आहे" अशा परस्परांच्या अपेक्षेचे लक्षण असलेल्या संबंधाच्या ज्ञानाचे लक्षण असलेला विशेष आहे, तो जर नंतर उल्लेख न केलेल्यांमध्ये दुसऱ्या अर्थाचा आश्रय घेऊन पुन्हा सांगितला असता "असेल" (हा शब्द उरलेला आहे). क्रमाचे उल्लंघन केल्यास, म्हणजे उल्लेख आणि अनुल्लेखांच्या क्रमाचे उल्लंघन केल्यास, शास्त्र जाणणाऱ्यांना ऐकण्याच्या वेळी असह्य होण्याचे कारण असलेला दोष मुळीच नसतो. 'उद्दिष्ट म्हणजे पहिल्यांदा उच्चारलेले अर्थ ज्याचे विषय आहेत' असे, आणि 'क्रमाचे उल्लंघन' असे हे वाक्य आहे. ယထာ – जसे की – ၁၀၂. १०२. ကုသလာကုသလံ [Pg.130] အဗျာ-ကတ’မိစ္စေသု ပစ္ဆိမံ; အဗျာကတံ ပါကဒံ န, ပါကဒံ ပဌမဒွယံ. कुशल, अकुशल आणि अव्याकृत यांपैकी शेवटचे अव्याकृत हे विपाक देणारे (फळ देणारे) नाही, आणि पहिले दोन (कुशल व अकुशल) विपाक देणारे आहेत. ၁၀၂. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ ‘‘ကုသလေ’’စ္စာဒိ. ကုသလံ ကာမာဝစရာဒိကမေကဝီသတိဝိဓံ, အကုသလဉ္စ ဒွါဒသဝိဓံ, အဗျာကတံ ဝိပါကကြိယာသင်္ခါတမိတိ ဧတေသု တီသု ပစ္ဆိမံ အဗျာကတံ, ပါကံ ဝိပါကံ ဒဒါတီတိ ပါကဒံ. နေတိ နိပါတပဒံ. ပဌမဒွယံ ကုသလာကုသလံ ပါကံ ဒဒါတီတိ ပါကဒန္တိ. ဧတ္ထ အပါကဒတ္တံ အဗျာကတဿေဝ, ပါကဒတ္တံ တေသမေဝ ဒွိန္နန္တိ ဝိသေသော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. १०२. "जसे की" असे उदाहरण दिले जाते "कुशल" इत्यादी. कुशल हे कामावचर इत्यादी एकवीस प्रकारचे आहे, अकुशल बारा प्रकारचे आहे, आणि अव्याकृत हे विपाक व क्रिया नावाचे आहे. या तिन्हींमध्ये शेवटचे अव्याकृत आहे. 'पाक' म्हणजे विपाक देणारे ते 'पाकप्रद' (विपाक देणारे). 'नाही' (न) हे निपात पद आहे. पहिले दोन म्हणजे कुशल आणि अकुशल हे विपाक देतात म्हणून 'विपाक देणारे' आहेत. येथे विपाक न देणे हे केवळ अव्याकृताचेच आहे, आणि विपाक देणे हे त्या दोघांचेच आहे, हा विशेष पाहावा. ၁၀၂. ‘‘ကုသလေ’’စ္စာဒိ. ကုသလံ ကာမာဝစရာဒိဧကဝီသတိကုသလဉ္စ အကုသလံ ဒွါဒသဝိဓံ အကုသလဉ္စ အဗျာကတံ ဝိပါကကြိယာရူပနိဗ္ဗာနဝသေန စတုဗ္ဗိဓမဗျာကတဉ္စ ဣစ္စေသု ဧဝမေတေသု တီသု ပစ္ဆိမံ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန ပစ္ဆိမမဗျာကတံ ပါကဒံ န ဝိပါကဒါယကံ န ဟောတိ, ပဌမဒွယံ ကုသလာကုသလံ ပါကဒံ ယထာသကံ ဝိပါကဒါယကံ ဟောတီတိ. ‘‘ယထာသင်္ချမနုဒေသော သမာန’’န္တိ ဝုတ္တတ္တာ ဥဒ္ဒိဋ္ဌေဟိ သမာနမနုဒ္ဒိဋ္ဌာနမေဝ သမသင်္ချာယ လဗ္ဘမာနတ္တာ သင်္ချာယာနတိက္ကမော ဟောတိ. ဧတ္ထ ပန ကုသလာဒိသဘာဝတော တိဝိဓတ္တေပိ ဝိပါကဒါနာဒါနဝသေန ဒုဝိဓကုသလာကုသလာဒိဝိသယဘူတဝိသေသဿ ပဝတ္တိယာ ဝတ္တိစ္ဆာတော ပဌမံ ဝတ္တဗ္ဗတံ ဝိနာ ကမေန နိဿယနံ နာမ နတ္ထီတိ အပက္ကမဒေါသော န ဟောတီတိ. १०२. “कुसले” इत्यादी. कुशल म्हणजे कामावचर इत्यादी एकवीस प्रकारचे कुशल, अकुशल म्हणजे बारा प्रकारचे अकुशल, आणि अव्याकृत म्हणजे विपाक, क्रिया, रूप आणि निर्वाण यांच्या भेदाने चार प्रकारचे अव्याकृत. अशा या तिन्हींमध्ये, निर्देश केलेल्या क्रमानुसार शेवटचे अव्याकृत हे 'पाकदम' (विपाक देणारे) नसते, आणि पहिले दोन (कुशल व अकुशल) हे 'पाकदम' म्हणजे आपापल्या परीने विपाक देणारे असतात. “यथासंख्यानुदेशो समानं” (यथासंख्य अनुदेश समान असतो) असे म्हटल्यामुळे, निर्देश केलेल्यांच्या समान संख्येनेच अनुनिर्देश केलेल्यांची प्राप्ती होत असल्यामुळे संख्येचे उल्लंघन होत नाही. येथे कुशल इत्यादी स्वभावामुळे तीन प्रकार असले तरी, विपाक देणे आणि न देणे यानुसार दोन प्रकारच्या कुशल-अकुशल इत्यादी विषयांच्या विशेषाच्या प्रवृत्तीच्या विवक्षेमुळे (बोलण्याच्या इच्छेमुळे), पहिल्यांदा सांगण्यायोग्य गोष्टीशिवाय क्रमाने आश्रय घेणे शक्य नसल्यामुळे 'अपक्रम दोष' होत नाही. ၁၀၃. १०३. သဂုဏာနာ’ဝိကရဏေ, ကာရဏေ သတိ တာဒိသေ; ဩစိတျဟီနတာပတ္တိ, နတ္ထိ ဘူတတ္ထသံသိနော. तशा प्रकारचे कारण असताना स्वतःच्या गुणांचे प्रकटीकरण करण्यात, यथार्थ (सत्य) गोष्टी सांगणाऱ्याला औचित्यहीनतेची आपत्ती (दोष) येत नाही. ၁၀၃. ‘‘သဂုဏာန’’မိစ္စာဒိ. [Pg.131] သောတူနံ အတ္တတ္ထနိပ္ဖာဒနာဒိကေ တာဒိသေ ကာရဏေ ဟေတုမှိ သတိ ဘူတံ ယထာပဝတ္တံ အတ္ထံ အတ္တနော စရိတလက္ခဏံ သံသိနော ဝဒန္တဿ သဿ အတ္တနော, သာနံ ဝါ ဂုဏာနံ အာဝိကရဏေ အဓိကာရဝသေန ‘‘ပူဇနီယတရော လောကေ’’ဣစ္စာဒိကထနေ ဩစိကျဟီနတာယ အာပတ္တိ ပါပုဏနံ သမ္ဘဝေါ နတ္ထိ. १०३. “सगुणानां” इत्यादी. श्रोत्यांच्या स्वतःच्या कल्याणाची सिद्धी इत्यादी तशा प्रकारचे कारण किंवा हेतू असताना, यथार्थ, जसा घडला आहे तसा अर्थ किंवा स्वतःच्या चरित्राचे लक्षण सांगणाऱ्या वक्त्याला, स्वतःच्या किंवा आपल्या गुणांचे प्रकटीकरण करण्यात, अधिकाराच्या वशाने “लोकात अत्यंत पूजनीय” इत्यादी सांगण्यात औचित्यहीनतेची आपत्ती (दोष) प्राप्त होण्याचा संभव नसतो. ၁၀၃. ‘‘သဂုဏိ’’စ္စာဒိ. တာဒိသေ ကာရဏေ သတိ သောတူနံ အတ္တတ္ထနိပ္ဖာဒနာဒိကေ တာဒိသေ ဟေတုမှိ ဝိဇ္ဇမာနေ ဘူတတ္ထသံသိနော အတ္တနိ ဝိဇ္ဇမာနကာယာဒိသံဝရလက္ခဏဂုဏသင်္ခါတမတ္ထံ ‘‘ပူဇနီယတရော လောကေ အဟမေကော’’ဣစ္စာဒိနာ တာဒိသာဝသရေ ဝဒန္တဿ သဂုဏာနံ သဿ အတ္တနော, သာနံ ဝါ သကာနံ ဂုဏာနံ အာဝိကရဏေ ပါကဋီကရဏေ ဩစိတျဟီနတာပတ္တိ ဩစိတျဟီနသင်္ခါတဒေါသဿာပတ္တိ နတ္ထီတိ. သသဒ္ဒဿ အတ္တအတ္တနိယဝါစကတ္တာ သဿ အတ္တနော ဂုဏာ သေ စ တေ ဂုဏာ စေတိ ဝါ ဝိဂ္ဂဟော. ဘူတောယေဝ အတ္ထော, တံ သံသတိ ဝဒတိ သီလေနာတိ ဝိဂ္ဂဟော. १०३. “सगुणि” इत्यादी. तशा प्रकारचे कारण असताना, म्हणजे श्रोत्यांच्या स्वतःच्या कल्याणाची सिद्धी इत्यादी तसा हेतू विद्यमान असताना, यथार्थ सांगणाऱ्याला, स्वतःमध्ये विद्यमान असलेल्या काय-संवर (शारीरिक संयम) इत्यादी लक्षणयुक्त गुणांविषयी “या लोकात मी एकटाच अत्यंत पूजनीय आहे” इत्यादी प्रकारे तशा प्रसंगी सांगणाऱ्याला, स्वतःच्या किंवा आपल्या गुणांचे प्रकटीकरण करण्यात औचित्यहीनतेची आपत्ती म्हणजे औचित्यहीन नावाच्या दोषाची प्राप्ती होत नाही. 'स' हा शब्द स्वतः आणि स्वतःचे (आत्म आणि आत्मीय) यांचा वाचक असल्यामुळे, 'सस्स अत्तनो गुणा' (स्वतःचे गुण) किंवा 'से च ते गुणा च' असा विग्रह होतो. 'भूत' (यथार्थ) हाच अर्थ आहे, त्याला जो स्वभावतः सांगतो, तो 'भूतत्थसंसी' असा विग्रह होतो. ၁၀၄. १०४. ဩစိတျံ နာမ ဝိညေယျံ, လောကေ ဝိချာတမာဒရာ; တတ္ထော’ပဒေသပဘဝါ, သုဇနာ ကဝိပုင်္ဂဝါ. औचित्य हे लोकात आदराने प्रसिद्ध असलेले जाणावे; त्या औचित्यामध्ये उपदेशाचे उगमस्थान असणारे सज्जन हे श्रेष्ठ कवी (कविपुंगव) असतात. ၁၀၄. ‘‘ဩစိတျ’’မိစ္စာဒိ. လောကေ သတ္တလောကေ ဝိချာတံ ပသိဒ္ဓံ အာဗာလဇနံ ယထာသကမနုရူပံ ဝိဇာနနတော ဩစိတျံ ဥစိတဘာဝေါ နာမေတိ ပသိဒ္ဓိယံ အာဒရာ အာဒရေန ဥဿာဟေန တတော ပရမာဒရဏီယဿာဘာဝတော, န ဟိ အနုစိတံ ကိဉ္စိ ကေနာပျာဒရဏီယံ သဗ္ဗထာ အနဿာဒနီယတ္တာ, ဝိညေယျံ ‘‘သောတူန’’န္တိ သေသော. တတ္ထ တသ္မိံ ဩစိတျေ ဥပဒေသဿ ပဌမုစ္စာရဏဿ ဥဂ္ဂဏှာပနဝသေန ပဝတ္တဿ ပဘဝါ ဥပ္ပတ္တိဋ္ဌာနဘူတာ သုဇနာ သုဋ္ဌုဇနာ ကဝိပုင်္ဂဝါ ဥတ္တမာ, ကဝိသေဋ္ဌာတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. १०४. “औचित्य” इत्यादी. लोकात म्हणजे प्राणिमात्र लोकात प्रसिद्ध असलेले, बालकांपासून सर्वांना आपापल्या परीने योग्य वाटणारे 'औचित्य' म्हणजे योग्य भाव होय. 'आदरा' म्हणजे आदराने, उत्साहाने, कारण त्यापेक्षा अधिक आदरणीय काहीही नसते; कारण अनुचित गोष्टीचा कोणीही कधीही आदर करत नाही, कारण ती सर्वथा आस्वाद घेण्यायोग्य नसते. 'जाणावे' (विज्ञेय्यं), येथे “श्रोत्यांनी” हा शब्द अध्याहृत आहे. त्या औचित्यामध्ये, शिकवण्याच्या उद्देशाने प्रवृत्त झालेल्या उपदेशाचे (प्रथम उच्चारणाचे) जे उगमस्थान आहेत, ते सज्जन हे 'कविपुंगव' म्हणजे उत्तम कवी किंवा श्रेष्ठ कवी होत, असे म्हटले आहे. ၁၀၄. ‘‘ဩစိတျေ’’စ္စာဒိ. [Pg.132] လောကေ သတ္တလောကေ ဝိချာတံ အာဗာလပသိဒ္ဓံ ဩစိတျံ နာမ အာဒရာ ဂါရဝေန ဝိညေယျံ ဝိညူဟိ ဉာတဗ္ဗံ ဟောတိ, တတ္ထ ဩစိတျဝိသယေ ဥပဒေသပဘဝါ ပဌမုစ္စာရဏဿ ဥပ္ပတ္တိဋ္ဌာနဘူတာ သုဇနာ သာဓုဇနဘူတာ ကဝိပုင်္ဂဝါ ဥတ္တမကဝယော ဘဝန္တီတိ, ပသိဒ္ဓဩစိတျပဒေန ယုတ္တတ္တာ ဧတ္ထ နာမသဒ္ဒေါ ပသိဒ္ဓိယံ. ဥပဒေသဿ ပဘဝါတိ စ, ပုမာနော စ တေ ဂါဝေါ စေတိ စ, ကဝီနံ ပုင်္ဂဝါတိ စ ဝါကျံ. १०४. “औचित्ये” इत्यादी. लोकात म्हणजे प्राणिमात्र लोकात प्रसिद्ध असलेले, बालकांपासून सर्वांना ठाऊक असलेले 'औचित्य' हे आदराने, गौरवाने विद्वानांनी जाणण्यायोग्य असते. त्या औचित्यविषयात उपदेशाचे (प्रथम उच्चारणाचे) उगमस्थान असणारे सज्जन (साधू पुरुष) हे 'कविपुंगव' म्हणजे उत्तम कवी असतात. प्रसिद्ध औचित्य पदाशी युक्त असल्यामुळे येथे 'नाम' हा शब्द प्रसिद्धीच्या अर्थात आहे. 'उपदेशाचे उगमस्थान' (उपदेसस्स पभवा), 'पुंगव' म्हणजे बैल (पुमानो च ते गावो च), आणि 'कवींमध्ये श्रेष्ठ' (कवीनं पुंगवा) असे हे वाक्य आहे. ၁၀၅. १०५. ဝိညာတောစိတျဝိဘဝေါ-စိတျဟီနံ ပရိဟရေ; တတော’စိတျဿ သမ္ပောသေ,ရသပေါသော သိယာ ကတေ. ज्याने औचित्यरुपी संपत्ती जाणली आहे, त्याने औचित्यहीनतेचा (दोषाचा) त्याग करावा; त्यामुळे औचित्याचे संवर्धन केले असता, रसाचे संवर्धन (परिपोष) होते. ၁၀၅. ‘‘ဝိညာတ’’မိစ္စာဒိ. ဝိညာတော အဝဗုဒ္ဓေါ ယထာဝုတ္တကဝိဝရပသာဒါ ဩစိတျမေဝ ဝိဘဝေါ သမ္ပတ္တိ ယေန သော ဩစိတျဟီနံ နာမ ဒူသနံ ပရိဟရေ ပရိဝဇ္ဇေယျ. တတော တသ္မာ ပရိဟာရတော ဟေတုတော ဩစိတျဿ သမ္ပောသေ သုဋ္ဌု ဝဍ္ဎိဘာဝေ ဝဍ္ဎနေ ကတေ ရသဿ အဿာဒိတဗ္ဗတာသင်္ခါတဿ မာဓုရိယဿ သမ္ပောသော သိယာ ဘဝေယျ. १०५. “विज्ञातो” इत्यादी. ज्याने पूर्वोक्त श्रेष्ठ कवींच्या कृपेने औचित्य हीच संपत्ती आहे हे जाणले आहे, त्याने 'औचित्यहीन' नावाच्या दोषाचा त्याग करावा. त्या त्यागाच्या कारणाने औचित्याचे संवर्धन (चांगल्या प्रकारे वृद्धी) केले असता, आस्वाद घेण्यायोग्य अशा रसाच्या माधुर्याचे संवर्धन (परिपोष) होते. ၁၀၅. ‘‘ဝိညာတေ’’စ္စာဒိ. ဝိညာတောစိတျဝိဘဝေါ တာဒိသကဝီနမနုဂ္ဂဟေန ဝိညာတဩစိတျသင်္ခါတသမ္ပတ္တိသမန္နာဂတော ကဝိ ဩစိတျဟီနံ နာမ ဒူသနံ ပရိဟရေ နိရာကရေယျ, တတော ဒေါသပရိဟာရတော ဩစိတျဿ သမ္ပောသေ ဥပဗြူဟနေ ကတေ သတိ ရသပေါသော မာဓုရိယသင်္ခတဿ အဿာဒေတဗ္ဗဿ ပူရဏံ သိယာ ဘဝေယျာတိ. ဩစိတျမေဝ ဝိဘဝေါတိ စ, ဝိညာတော ဩစိတျဝိဘဝေါ ယေနေတိ စ, ရသဿ ပေါသော ပုဋ္ဌဘာဝေါ ပေါသေတဗ္ဗဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. १०५. “विज्ञाते” इत्यादी. ज्याने तशा कवींच्या अनुग्रहाने औचित्यरुपी संपत्ती प्राप्त केली आहे अशा कवीने, 'औचित्यहीन' नावाच्या दोषाचा त्याग करावा. त्या दोषपरिहारामुळे औचित्याचे संवर्धन (पुष्टी) केले असता, रसाचे संवर्धन म्हणजे आस्वाद घेण्यायोग्य माधुर्याची परिपूर्णता होते. 'औचित्य हाच विभव (संपत्ती)', 'ज्याने औचित्यरुपी संपत्ती जाणली आहे', आणि 'रसाचे संवर्धन म्हणजे पुष्ट होणे किंवा संवर्धित होणे' असे हे वाक्य आहे. ယထာ – जसे की – ၁၀၆. १०६. ယော [Pg.133] မာရသေနမာသန္န-မာသန္နဝိဇယုဿဝေါ; တိဏာယပိ န မညိတ္ထ, သော ဝေါ ဒေတု ဇယံ ဇိနော. ज्यांनी जवळ आलेल्या मारसेनेला, विजयाचा उत्सव जवळ आलेला असताना, तृणासारखेही (कस्पटासमान) मानले नाही, ते जिन (बुद्ध) तुम्हांला विजय देवोत. ၁၀၆. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ ‘‘ယော’’ဣစ္စာဒိ. ဝိဇယော ပရာဘိဘဝေါ အာသန္နော ဝိဇယော ဧဝ ဥဿဝေါ အဗ္ဘုဒယော နိပ္ပဋိပက္ခာ ပဝတ္တိ ယဿ ဧဒိသော ယော အာသန္နံ အတ္တနော သမီပမုပဂတံ မာရသေနံ တိဏာယပိ န မညိတ္ထ တိဏမ္ပိ န မညိတ္ထ, တိဏတောပိ ဟီနံ မညိတ္ထ, သော ဇိနော မာရဇိ ဝေါ တုမှာကံ ဇယံ ဒေတူတိ ဝိဒဓာတု. ဧတ္ထ ဇယာသီသနာ ‘‘ဇိနော’’တိ အစ္စန္တမုစိတံ, ယော အဇိနိ ပဉ္စမာရေတိ ဇိနော ပရာဘိဘဝေကရသော, တဿ ပရေသံ ဝိဇယပ္ပဒါနေ သာမတ္ထိယေကယောဂေါ သိယာတိ. ‘‘မာရသေနမာသန္နံ တိဏာယပိ န မညိတ္ထာ’’တိ ဣဒံ ပနေတ္ထ အတိသမုစိတံ ယတော သမီပမုပဂတမ္ပိ တာဒိသံ မာရသေနံ တိဏတောပိ ဟီနံ မညိ, တေနဿ ပရေသံ ဝိဇယပ္ပဒါနေကရသတာ ဝိသေသတော ယုတ္တာတိ. १०६. “यथा” असे उदाहरण देतात, “यो” इत्यादी. विजय म्हणजे शत्रूचा पराभव; ज्यांचा विजय हाच उत्सव म्हणजे अभ्युदय (प्रतिपक्षाशिवाय प्रवृत्ती) जवळ आला आहे, असे जे, ज्यांनी आपल्या जवळ आलेल्या मारसेनेला तृणासारखेही मानले नाही, म्हणजे तृणापेक्षाही हीन मानले, ते जिन (मारविजेते बुद्ध) तुम्हांला विजय देवोत. येथे विजयाची आकांक्षा करताना “जिन” हा शब्द अत्यंत योग्य आहे, कारण ज्यांनी पाच मारांवर विजय मिळवला आहे ते 'जिन' आहेत, त्यांच्यामध्ये इतरांना विजय देण्याचे सामर्थ्य असणे अत्यंत योग्य आहे. “जवळ आलेल्या मारसेनेला तृणासारखेही मानले नाही” हे येथे अत्यंत योग्य आहे, कारण जवळ आलेल्या अशा मारसेनेला त्यांनी तृणापेक्षाही हीन मानले, त्यामुळे इतरांना विजय देण्याची त्यांची क्षमता विशेषत्वाने योग्य ठरते. ၁၀၆. ဣဟ သတ္ထေ သဗ္ဗတ္ထ သင်္ခေပက္ကမမိစ္ဆန္တောပိ အာစရိယော ဩစိတျံ နာမ အာဒရေန သဂ္ဂရူဟိ ဥဂ္ဂဏှိတွာ ပယုဇ္ဇိတဗ္ဗမိစ္စေဝံ ဝိတ္ထာရေန သိဿေ အနုသာသိတွာ ဣဒါနိ ဩစိတျဟီနပရိဟရဏတ္ထံ ‘‘ယော မာရသေနမာသန္နေ’’စ္စာဒိနာ လက္ခိယမုဒါဟရတိ. အာသန္နဝိဇယုဿဝေါ အဒူရသတ္တုဝိဇယသင်္ခါတဥဿဝေါ, အထ ဝါ အစ္စာသန္နပဋိပက္ခဝိရဟပ္ပဝတ္တိသင်္ခါတအဘိဝုဒ္ဓိယာ သမန္နာဂတော ယော ဇိနော အာသန္နံ အနေကပ္ပကာရဘိံသနကရူပေန အတ္တနော သမီပမာဂတံ မာရသေနံ မာရဗလံ တိဏာယပိ တိဏလဝံ ကတွာပိ န မညိတ္ထ သလ္လက္ခဏံ နာကာသိ, သော ဇိနော သော ဇိတပဉ္စမာရော ဝေါ တုမှာကံ ဇယံ ဒေတူတိ. ဧတ္ထ ယော ပဉ္စမာရေ ဇိတတ္တာ ဇိနော နာမ ဟောတိ, သော ပရာဘိဘဝနေ အသဟာယကိစ္စတ္တာ ပရေသံ ဇယဒါနေ သာမတ္ထိယယုတ္တောတိ ‘‘ဇယံ ဒေတူ’’တိ ကတံ ဇယာသီသနမတိဥစိတံ [Pg.134] ဟောတိ, ဇယဒါနေ သာမတ္ထိယဿေဝ ပေါသကတ္တာ. ‘‘မာရသေနမာသန္နံ တိဏာယပိ န မညိတ္ထာ’’တိ ဣဒံ ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထီတိ. ဧဝံ အစ္စန္တဥစိတပယောဂေန ဩစိတျဟီနဒေါသော နိရာကတောတိ. ဝိဇယော ဧဝ ဥဿဝေါ, အာသန္နော ဝိဇယုဿဝေါ ယဿေတိ ဝိဂ္ဂဟော. १०६. या शास्त्रामध्ये सर्वत्र संक्षेपक्रम इच्छिणारे असूनही, आचार्यांनी 'औचित्य' हे आदराने आणि सन्मानाने शिकून घेऊन उपयोगात आणले पाहिजे, अशा प्रकारे शिष्यांना विस्ताराने उपदेश करून, आता औचित्यहीनतेचा परिहार करण्यासाठी 'यो मारसेनामसन्ने' इत्यादीद्वारे लक्ष्याचे उदाहरण दिले आहे. 'आसन्नविजयोत्सव' म्हणजे जवळच असलेल्या शत्रूवरील विजयरूपी उत्सव, किंवा अत्यंत जवळ असलेल्या प्रतिपक्षाच्या अभावामुळे प्राप्त झालेल्या अभिवृद्धीने युक्त असलेला जो जिन (बुद्ध), अत्यंत जवळ आलेल्या आणि अनेक प्रकारच्या भयानक रूपाने स्वतःच्या समीप आलेल्या मारसेनेला (मारबळाला) तृणासारखे (गवताच्या काडीसारखे) करूनही ज्यांनी काहीच मानले नाही, लक्ष दिले नाही, तो जिन, तो पंचमारांवर विजय मिळवणारा (बुद्ध) तुम्हांला विजय देवो. येथे जो पंचमारांवर विजय मिळवल्यामुळे 'जिन' या नावाने ओळखला जातो, तो इतरांचा पराभव करण्याच्या असहाय्य कार्यामुळे इतरांना विजय देण्यास सामर्थ्यवान आहे, म्हणून 'विजय देवो' असे केलेले विजयाचे आशिष अत्यंत योग्य आहे, कारण ते विजय देण्याच्या सामर्थ्यालाच पुष्टी देणारे आहे. 'जवळ आलेल्या मारसेनेला तृणासारखेही मानले नाही' हे तर सांगण्याची गरजच नाही. अशा प्रकारे अत्यंत योग्य प्रयोगाने औचित्यहीनतेचा दोष दूर केला गेला आहे. 'विजय हाच उत्सव, आणि ज्याचा विजयोत्सव जवळ आला आहे तो' असा विग्रह आहे. ၁၀၇. १०७. အာရဒ္ဓကတ္တုကမ္မာဒိ-ကမာတိက္ကမလင်္ဃနေ; ဘဂ္ဂရီတိဝိရောဓော’ယံ, ဂတိံ န ကွာပိ ဝိန္ဒတိ. सुरू केलेल्या कर्ता, कर्म इत्यादींच्या क्रमाचे उल्लंघन किंवा अतिक्रमण केल्यास, हा 'भग्गरीतिविरोध' (शैलीचा भंग होण्याचा दोष) होतो, ज्याला कुठेही स्थान (स्वीकृती) मिळत नाही. ၁၀၇. ‘‘အာရဒ္ဓ’’ဣစ္စာဒိ. ကတ္တာ စ ကမ္မဉ္စ တာနိ အာဒီနိ ယေသံ ကရဏာဒီနံ အာရဒ္ဓါနိ ဝတ္တုံ ပဋ္ဌပိတာနိ ကတ္တုကမ္မာဒီနိ တေသံ ကမော တဿ အတိက္ကမော ပရိစ္စာဂေါ တဿ လင်္ဃနေ သတိ, ဝတ္တုမာရဒ္ဓကတ္တုကမ္မာဒိကမာနတိက္ကမေတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. အယံ ယထာဝုတ္တော ဘဂ္ဂရီတိဝိရောဓော ကွာပိ ကတ္ထစိပိ ဌာနေ ဂတိံ န ဝိန္ဒတိ ပတိဋ္ဌံ န လဘတေ. १०७. 'आरद्ध' इत्यादी. कर्ता आणि कर्म हे ज्यांचे आदि (सुरुवात) आहेत अशा करण इत्यादींचे, जे सांगण्यासाठी सुरू केले गेले आहेत, त्या कर्ता-कर्म इत्यादींच्या क्रमाचे उल्लंघन म्हणजे त्याचा त्याग करणे, त्याचे उल्लंघन झाले असता, सांगण्यास सुरू केलेल्या कर्ता-कर्म इत्यादींच्या क्रमाचे उल्लंघन न करणे असे म्हटले आहे. हा वर सांगितलेला 'भग्गरीतिविरोध' कोणत्याही ठिकाणी गती प्राप्त करत नाही, म्हणजेच प्रतिष्ठा मिळवत नाही. ၁၀၇. ‘‘အာရဒ္ဓိ’’စ္စာဒိ. အာရဒ္ဓကတ္တုကမ္မာဒိကမာတိက္ကမလင်္ဃနေ ဝတ္တုမာရဒ္ဓကတ္တုကမ္မာဒီနံ ကမပရိစ္စာဂဿာတိက္ကမေ အယံ ယထာဝုတ္တဘဂ္ဂရီတိဝိရောဓော ကွာပိ ကတ္ထစိပိ ဌာနေ ဂတိံ ပတိဋ္ဌံ န ဝိန္ဒတိ န လဘတေတိ. အာရဒ္ဓါနိ စ တာနိ ကတ္တုကမ္မာဒီနိ ယေသံ ကရဏာဒီနံ တေသံ ကမဿ အတိက္ကမော တဿ လင်္ဃနန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. १०७. 'आरद्धि' इत्यादी. सुरू केलेल्या कर्ता, कर्म इत्यादींच्या क्रमाचे उल्लंघन किंवा अतिक्रमण केल्यास, म्हणजे सांगण्यास सुरू केलेल्या कर्ता, कर्म इत्यादींच्या क्रमाचा त्याग करण्याच्या उल्लंघनामध्ये, हा वर सांगितलेला 'भग्गरीतिविरोध' कोणत्याही ठिकाणी गती किंवा प्रतिष्ठा प्राप्त करत नाही, म्हणजेच मिळवत नाही. जे कर्ता, कर्म इत्यादी सुरू केले गेले आहेत, त्या करण इत्यादींच्या क्रमाचे उल्लंघन म्हणजे त्याचे अतिक्रमण, असा विग्रह आहे. ယထာ – जसे की – ၁၀၈. १०८. သုဇနညာန’မိတ္ထီနံ, ဝိဿာသော နော’ပပဇ္ဇတေ; ဝိသဿ သိင်္ဂိနော ရောဂ-နဒီရာဇကုလဿ စ. सज्जन नसलेले (दुर्जन), स्त्रिया, विष, शिंगे असलेले प्राणी, रोग, नदी आणि राजकुळ यांच्यावर विश्वास ठेवणे योग्य नाही. ၁၀၉. १०९. ဘေသဇ္ဇေ ဝိဟိတေ သုဒ္ဓ-ဗုဒ္ဓါဒိရတနတ္တယေ; ပသာဒ’မာစရေ နိစ္စံ, သဇ္ဇနေ သဂုဏေပိ စ. विहित (योग्य) औषधावर, शुद्ध बुद्ध इत्यादी त्रिरत्नांवर, सज्जनांवर आणि सद्गुणी लोकांवर नेहमीच प्रसन्नता (श्रद्धा) ठेवावी. ၁၀၈-၁၀၉. ဧတ္ထ စ ‘‘သုဇန’’မိစ္စာဒိကေ ‘‘ဘေသဇ္ဇေ’’ဣစ္စာဒိကေ စ ဂါထာဒွယေ ဆဋ္ဌိယာ, သတ္တမိယာ စ အပရိစ္စာဂေန နာတ္ထရီတိယာ ဘင်္ဂေါ, စကာရဿေကဿ ကတတ္တာ န သဒ္ဒရီတိယာ [Pg.135] ဘင်္ဂေါ. ဗဟူနမတ္ထာနဉှိ သမုစ္စယတ္ထံ ဝါကျေ ဧကော ဝါ စကာရော ကာတဗ္ဗော ပဋိပဒံ ဝါ. १०८-१०९. आणि येथे 'सुजन' इत्यादी आणि 'भेषज्ज' इत्यादी या दोन्ही गाथांमध्ये षष्ठी आणि सप्तमी विभक्तीचा त्याग न केल्यामुळे अर्थरीतीचा भंग होत नाही, आणि केवळ एकाच 'च' (आणि) शब्दाचा प्रयोग केल्यामुळे शब्दरीतीचाही भंग होत नाही. कारण अनेक अर्थांच्या समुच्चयासाठी (एकत्र जोडण्यासाठी) वाक्यात एकच 'च' कार वापरावा किंवा प्रत्येक पदाच्या मागे वापरावा. ၁၀၈. ‘‘သုဇနေ’’စ္စာဒိ. သုဇနညာနံ သဇ္ဇနေဟိ အညေသံ ဒုဇ္ဇနာနဉ္စ ဣတ္ထီနဉ္စ ဝိသဿ ဇီဝိတဟရဏသမတ္ထဿ သိင်္ဂိနော ဝိသာဏဝတော စ ရောဂနဒီရာဇကုလဿ စ ဝိဿာသော သံသဂ္ဂေါ န ဥပပဇ္ဇတေ ကိဉ္စိကာလေ ဝိရုဇ္ဈနတော န ယုဇ္ဇတေတိ. ဧတ္ထ အာရဒ္ဓဿ ဆဋ္ဌုန္တက္ကမဿ သဗ္ဗတ္ထ အပရိစ္စာဂတော အတ္ထရီတိဘင်္ဂေါ စ, ယုတ္တဋ္ဌာနေ ဧကဿေဝ စကာရဿ ယုတ္တတ္တာ သဒ္ဒရီတိဘင်္ဂေါ စ နတ္ထိ. စသဒ္ဒဿ အနေကတ္ထသမုစ္စယတ္တာ ‘‘သုဇနညာနဉ္စာ’’တိအာဒိမှိ ဝါ, ဣဟ ဝုတ္တနိယာမေန အဝသာနေ ဝါ, သဗ္ဗတ္ထ ဝါ ယောဇနမရဟတိ. १०८. 'सुजन' इत्यादी. सज्जनांशिवाय इतरांचा म्हणजे दुर्जनांचा, स्त्रियांचा, प्राणांचे हरण करण्यास समर्थ असलेल्या विषाचा, शिंगे असलेल्या प्राण्यांचा, रोग, नदी आणि राजकुळ यांचा विश्वास किंवा संसर्ग योग्य नाही, कारण ते कोणत्याही वेळी विरुद्ध होऊ शकतात म्हणून ते योग्य नाही. येथे सुरू केलेल्या षष्ठी विभक्तीच्या क्रमाचा सर्वत्र त्याग न केल्यामुळे अर्थरीतीचा भंग होत नाही, आणि योग्य ठिकाणी एकाच 'च' काराचा प्रयोग केल्यामुळे शब्दरीतीचाही भंग होत नाही. 'च' शब्दाचा अनेक अर्थांचा समुच्चय करण्यासाठी 'सुजनज्ञानांच' इत्यादींमध्ये किंवा येथे सांगितलेल्या नियमानुसार शेवटी किंवा सर्व ठिकाणी योजना करणे योग्य आहे. ၁၀၉. ‘‘ဘေသဇ္ဇေ’’စ္စာဒိဂါထာယမ္ပိ ဧသေဝ နယော သတ္တမီမတ္တမေဝ ဝိသေသော. ဝိဟိတေ ပထျေ ဘေသဇ္ဇေ ဩသဓေ စ သုဒ္ဓဗုဒ္ဓါဒိရတနတ္တယေ စ သဇ္ဇနေ သာဓုဇနေ စ အပိ ပုနပိ သဂုဏေ ဝိဇ္ဇမာနဂုဏေ စ ပသာဒံ အတ္တနော စိတ္တပသာဒံ နိစ္စံ သတတံ အာစရေ သပ္ပုရိသော ကရေယျ သေဝေယျာတိ. १०९. 'भेषज्जे' इत्यादी गाथेतही हाच नियम लागू होतो, फक्त सप्तमी विभक्तीचाच विशेष फरक आहे. विहित (पथ्यकारक) औषधावर, शुद्ध बुद्ध इत्यादी त्रिरत्नांवर, सज्जन (साधू) लोकांवर आणि सद्गुणी (विद्यमान गुण असलेल्या) लोकांवर सत्पुरुषाने नेहमीच स्वतःचा चित्तप्रसाद (श्रद्धा) ठेवावा किंवा त्याचे आचरण करावे. သသံသယဿ ယထာ – ससंशय (संशयाने युक्त) चे उदाहरण जसे की – ၁၁၀. ११०. မုနိန္ဒစန္ဒိမာလောက-ရသလောလဝိလောစနော; ဇနော’ဝက္ကန္တပန္ထော’ဝ,ရံသိဒဿနပီဏိတော. मुनींद्ररूपी चंद्राच्या प्रकाशाच्या रसाने चंचल झालेल्या डोळ्यांचा मनुष्य, जणू मार्गावरून बाजूला गेलेल्या प्रवाशाप्रमाणे, किरणांच्या दर्शनाने तृप्त झाला. ၁၁၀. ‘‘မုနိန္ဒေ’’စ္စာဒိ. ဧတ္ထ ရံသိသဒ္ဒေါ သသံသယံ ပရိဟရတိ. ११०. 'मुनींद्र' इत्यादी. येथे 'रंसि' (किरण) हा शब्द संशयाचे निवारण करतो. ၁၁၀. သသံသယပရိဟာရလက္ခိယဘူတာ ‘‘မုနိန္ဒိ’’စ္စာဒိဂါထာ အနန္တရပရိစ္ဆေဒေ ဝုတ္တတ္ထာဝ. ရံသိသဒ္ဒေါယေဝ ဟိ ဝိသေသော, ဧတ္ထ ရံသိသဒ္ဒေန သုဏန္တာနံ ဥပ္ပဇ္ဇမာနသံသယေန သသံသယဘူတံ ဗန္ဓဒေါသမောဟတီတိ. ११०. संशय निवारणाचे लक्ष्य असलेली 'मुनींद्र' इत्यादी गाथा पुढील परिच्छेदात सांगितलेल्या अर्थाचीच आहे. 'रंसि' (किरण) हा शब्दच विशेष आहे, येथे 'रंसि' शब्दाने ऐकणाऱ्यांच्या मनात निर्माण होणाऱ्या संशयामुळे संशयाने युक्त असलेला काव्यबंधाचा दोष दूर होतो. ၁၁၁. १११. သံသယာယေဝ [Pg.136] ယံ ကိဉ္စိ, ယဒိ ကီဠာဒိဟေတုနာ; ပယုဇ္ဇတေ န ဒေါသော’ဝ, သသံသယသမပ္ပိတော. जर खेळाच्या किंवा इतर कारणाने केवळ संशय निर्माण करण्यासाठीच काही प्रयोग केला गेला असेल, तर संशयाने युक्त असलेला तो प्रयोग दोष मानला जात नाही. ၁၁၁. ‘‘သံသယေ’’စ္စာဒိ. ကီဠာဒီတိ အာဒိသဒ္ဒေန အာကိဏ္ဏသမ္မန္တနာဒိံ သင်္ဂဏှာတိ, ကီဠာဒိဟေတုနာ ယံ ကိဉ္စိ သံသယာယေဝ ယဒိ ပယုဇ္ဇတေတိ သမ္ဗန္ဓော. १११. 'संशय' इत्यादी. 'क्रीडा' इत्यादी मधील 'आदि' शब्दाने गुप्त मसलत इत्यादींचा संग्रह होतो. क्रीडा इत्यादी कारणाने जर काही केवळ संशयासाठीच योजले गेले असेल, असा संबंध आहे. ၁၁၁. ‘‘သံသယာယေဝေ’’စ္စာဒိ. ကီဠာဒိဟေတုနာ ကီဠာသမ္ဗာဓသမ္မန္တနာဒိကာရဏေန ယံ ကိဉ္စိ သံသယုပ္ပာဒနသမတ္ထံ ယံ ကိဉ္စိ ပဒံ သံသယာယ ဧဝ သောတူနံ ဥပ္ပဇ္ဇမာနသံသယတ္ထမေဝ ယဒိ ပယုဇ္ဇတေ တသ္မိံ ဗန္ဓနေ ဝတ္တာရေဟိ ပယုဇ္ဇတေ စေ, သသံသယသမပ္ပိတော သသံသယဒေါသသဟိတော ဗန္ဓော န ဒေါသောဝ အဒုဋ္ဌောဝါတိ. သသံသယေန သမပ္ပိတောတိ ဝိဂ္ဂဟော. १११. 'संशयायैव' इत्यादी. क्रीडा इत्यादी कारणाने, म्हणजे खेळ किंवा गुप्त मसलत इत्यादी कारणाने, संशय निर्माण करण्यास समर्थ असलेले कोणतेही पद जर केवळ संशयासाठीच, म्हणजे ऐकणाऱ्यांच्या मनात संशय निर्माण करण्यासाठीच जर त्या रचनेत वक्त्यांकडून योजले गेले असेल, तर संशयाने युक्त असलेला (संशयदोषाने युक्त असलेला) तो काव्यबंध दोषयुक्त नसून अदोष (दोषरहित) आहे. 'ससंशयेन समर्पितः' (संशयाने युक्त असलेला) असा विग्रह आहे. ယထာ – जसे की – ၁၁၂. ११२. ယာတေ ဒုတိယံနိလယံ, ဂုရုမှိ သကဂေဟတော; ပါပုဏေယျာမ နိယတံ, သုခ’မဇ္ဈယနာဒိနာ. गुरू आपल्या स्वतःच्या घरातून दुसऱ्या घरी गेले असता, आम्ही निश्चितपणे अध्ययनाद्वारे सुख प्राप्त करू. ၁၁၂. ‘‘ယာတေ’’စ္စာဒိ. ဂုရုမှိ အဇ္ဈာပကေ သကဂေဟတော အတ္တနော မူလနိလယတော ဒုတိယံ နိလယံ ဒုတိယံ ဃရံ ယာတေ သတိ နိယတမေကန္တမဇ္ဈယနာဒိနာ သုခံ ပါပုဏေယျာမာတိ အယမနိစ္ဆိတတ္ထော. ဂုရုမှိ သုရာစရိယေ သကဂေဟတော အတ္တနော ဇာတရာသိတော ဒုတိယံ နိလယံ ဒုတိယံ ရာသိံ ယာတေ သတိ နိယတမဇ္ဈယနာဒိနာ သုခံ ပါပုဏေယျာမာတိ အယမေတ္ထ ဣစ္ဆိတတ္ထော. ११२. 'याते' इत्यादी. गुरू म्हणजे शिक्षक आपल्या स्वतःच्या घरातून (मूळ निवासस्थानातून) दुसऱ्या घरात गेले असता, आम्ही निश्चितपणे केवळ अध्ययनाद्वारे सुख प्राप्त करू, हा येथे अनपेक्षित (अनिच्छित) अर्थ आहे. गुरू म्हणजे बृहस्पती (देवगुरू) आपल्या स्वतःच्या घरातून (स्वतःच्या जन्मराशीतून) दुसऱ्या घरात (दुसऱ्या राशीत) गेले असता, आम्ही निश्चितपणे अध्ययनाद्वारे सुख प्राप्त करू, हा येथे अपेक्षित (इच्छित) अर्थ आहे. ၁၁၂. ‘‘ယာတေ’’စ္စာဒိ. ဂုရုမှိ အာစရိယေ သကဂေဟတော အတ္တနော ဝါသာဂါရတော ဒုတိယံ နိလယံ ဒုတိယံ ဃရံယာတေ သတိ, အယမနိစ္ဆိတတ္ထော. ဂုရုမှိ သုရာစရိယေ သကဂေဟတော အတ္တနော ဇာတရာသိတော ဒုတိယံ နိလယံ ဒုတိယံ [Pg.137] ရာသိံ ယာတေ ဂတေ သတိ အနုကူလတ္တာ နိယတမေကန္တေန အဇ္ဈယနာဒိနာ ဥဂ္ဂဟဏာဒိနာ သုခံ မာနသိကသုခံ, နော စေ သုခကာရဏံ ဂန္ထပရိသမတ္တိံ ပါပုဏေယျာမာတိ. ဥဘယပက္ခဿာပိ အပရတ္ထေ အတ္ထော သာဓာရဏော ဟောတိ. ဧတ္ထ အဇ္ဈယနသဒ္ဒသန္နိဓာနေန ပယုတ္တဂုရုသဒ္ဒဿ အာစရိယတ္ထဝါစကတ္တေပိ ဣစ္ဆိတတ္ထဂေါပနတ္ထံ ပယုတ္တတ္တာ အဒုဋ္ဌောတိ. ११२. "याते" इत्यादी. गुरू म्हणजे आचार्य आपल्या स्वतःच्या घरातून (निवासस्थानातून) दुसऱ्या निवासस्थानी (दुसऱ्या घरात) गेले असता, हा अनिष्ट अर्थ होतो. गुरू म्हणजे सुराचार्य (बृहस्पती) आपल्या स्वतःच्या राशीतून (जन्मराशीतून) दुसऱ्या राशीत गेले असता, अनुकूलतेमुळे निश्चितपणे अध्ययनादी व ग्रहणादी द्वारे सुख म्हणजे मानसिक सुख मिळते, आणि जर तसे नसेल तर सुखाचे कारण असलेल्या ग्रंथसमाप्तीला आपण प्राप्त करू. दोन्ही पक्षांमध्येही दुसऱ्या अर्थामध्ये अर्थ साधारण होतो. येथे 'अध्ययन' शब्दाच्या सान्निध्यामुळे प्रयुक्त झालेल्या 'गुरू' शब्दाचा अर्थ 'आचार्य' असा वाचक असला तरी, इच्छित अर्थाच्या गोपनासाठी प्रयुक्त झाल्यामुळे तो दोषरहित आहे. ၁၁၃. ११३. သုဘဂါ ဘဂိနီ သာ’ယံ, ဧတဿိ’စ္စေဝမာဒိကံ; န ‘‘ဂါမ္မ’’မိတိ နိဒ္ဒိဋ္ဌံ, ကဝီဟိ သကလေဟိပိ. "ती ही बहीण सुभगा (सुंदर) आहे, या पुरुषाची..." इत्यादी वाक्य सर्वच कवींनी "ग्राम्य" (ग्राम्य दोषयुक्त) म्हणून निर्दिष्ट केलेले नाही. ၁၁၃. ‘‘သုဘဂါ’’ဣစ္စာဒိ. ဣစ္စေဝမာဒိကံ ဘဂိနီဣစ္စေဝမာဒိကံ. ११३. "सुभगा" इत्यादी. "याप्रमाणे" इत्यादी म्हणजे "बहीण" इत्यादी होय. ၁၁၃. ‘‘သုဘဂေ’’စ္စာဒိ. ဧတဿ ပုရိသဿ သာ အယံ ဘဂိနီ သုဘဂါ သုန္ဒရာတိ ဣစ္စေဝမာဒိကံ သကလေဟိ ကဝီဟိ အပိ န ဂါမ္မမိတိ ဂါမ္မဒေါသေန န ဒုဋ္ဌမိတိ နိဒ္ဒိဋ္ဌန္တိ. သုဘံ သုန္ဒရဘာဝံ ဂတာတိ ‘‘သုဘဂါ’’တိ အဂ္ဂဟေတွာ ဗဟုဗ္ဗီဟိသမာသေ ကတေ လဗ္ဘမာနတ္ထဿ အသဗ္ဘဘာဝေပိ ကဝီနံ စိတ္တခေဒံ န ဇနေတီတိ အဓိပ္ပာယော. ဣတိ ဧဝံ အယံ ပကာရော အာဒိ အဿ ဤဒိသဿ ဝါကျဿာတိ ဝါကျံ. ११३. "सुभगा" इत्यादी. "या पुरुषाची ती ही बहीण सुभगा म्हणजे सुंदर आहे" इत्यादी वाक्य सर्व कवींनी "ग्राम्य नाही" म्हणजेच ग्राम्य दोषाने दूषित नाही असे निर्दिष्ट केले आहे. "शुभ म्हणजे सुंदर भावाला प्राप्त झालेली ती सुभगा" असा अर्थ न घेता, बहुव्रीहि समास केल्यावर मिळणाऱ्या अर्थाच्या असभ्यतेमध्येही कवींच्या मनात खेद निर्माण होत नाही, असा अभिप्राय आहे. अशा प्रकारे हा प्रकार ज्याच्या सुरुवातीला आहे अशा वाक्याला 'वाक्य' म्हणतात. ၁၁၄. ११४. ဒုဋ္ဌာလင်္ကာရဝိဂမေ, သောဘနာလင်္ကတိက္ကမော; အလင်္ကာရပရိစ္ဆေဒေ, အာဝိဘာဝံ ဂမိဿတိ. दुष्ट (दोषयुक्त) अलंकाराचा नाश झाल्यावर, शोभन (सुंदर) अलंकारांची प्रवृत्ती अलंकार परिच्छेदामध्ये प्रकट होईल. ၁၁၄. ‘‘ဒုဋ္ဌ’’ဣစ္စာဒိ. ဒုဋ္ဌာလင်္ကာရဿ ဒေါသဒူသိတဿ အလင်္ကာရဿ ဝိဂမေ အပဂမေ သတိ. ११४. "दुष्ट" इत्यादी. दुष्ट अलंकाराचा म्हणजे दोषाने दूषित झालेल्या अलंकाराचा नाश (अपगम) झाला असता. ၁၁၄. ‘‘ဒုဋ္ဌိ’’စ္စာဒိ. ဒုဋ္ဌာလင်္ကာရဝိဂမေ ဒေါသဒုဋ္ဌဿ အလင်္ကာရဿ အပဂမေ သတိ သောဘနာလင်္ကတိက္ကမော ပသတ္ထာနမလင်္ကာရာနံ ပဝတ္တိအာကာရော အလင်္ကာရပရိစ္ဆေဒေ အလင်္ကာရပကာသကတ္တာ တန္နာမကေ ပရိစ္ဆေဒေ အာဝိဘာဝံ ပကာသတ္တံ ဂမိဿတိ ပါပုဏိဿတီတိ. ပရိစ္ဆိဇ္ဇတီတိ ပရိစ္ဆေဒေါ. အလင်္ကာရပကာသကတ္တာ တဒတ္ထေန အလင်္ကာရော စ သော ပရိစ္ဆေဒေါ စေတိ ဝိဂ္ဂဟော. ११४. "दुष्ट" इत्यादी. दुष्ट अलंकाराचा नाश झाल्यावर म्हणजे दोषाने दूषित अलंकाराचा अपगम झाला असता, शोभन अलंकारांचे अतिक्रमण म्हणजे प्रशंसनीय अलंकारांच्या प्रवृत्तीचा प्रकार, अलंकार परिच्छेदामध्ये म्हणजे अलंकारांचे प्रकाशन करणाऱ्या त्या नावाच्या परिच्छेदामध्ये आविर्भाव म्हणजे प्रकटता प्राप्त करेल. ज्याचे वर्गीकरण (परिच्छेदन) केले जाते तो 'परिच्छेद' होय. अलंकारांचे प्रकाशन करणारा असल्यामुळे त्या अर्थाने 'तो अलंकार आणि तो परिच्छेद' असा विग्रह होतो. ၁၁၅. ११५. ဒေါသေ [Pg.138] ပရီဟရိတုမေသ ဝရော’ပဒေသော,သတ္ထန္တရာနုသရဏေန ကတော မယေဝံ; ဝိညာယိ’မံ ဂုရုဝရာန’ဓိကပ္ပသာဒါ,ဒေါသေ ပရံ ပရိဟရေယျ ယသောဘိလာသီ. दोषांचे परिहार करण्यासाठी हा उत्तम उपदेश इतर शास्त्रांच्या अनुसरणाने माझ्याद्वारे असा केला गेला आहे; श्रेष्ठ गुरूंच्या अत्यंत कृपेने (प्रसादाने) हा जाणून, यशाची अभिलाषा धरणाऱ्याने दोषांचा पूर्णपणे परिहार करावा. ဣတိ သံဃရက္ခိတမဟာသာမိပါဒဝိရစိတေ अशा प्रकारे संघरक्षित महास्वामीपादांनी रचलेल्या... သုဗောဓာလင်္ကာရေ सुबोधालंकारामध्ये... ဒေါသပရိဟာရာဝဗောဓော နာမ 'दोषपरिहारावबोध' नावाचा... ဒုတိယော ပရိစ္ဆေဒေါ. दुसरा परिच्छेद. ၁၁၅. ‘‘ဒေါသေ’’ဣစ္စာဒိ. ဒေါသေ ယထာဝုတ္တေ ပဒဒေါသာဒိကေ ပရိဟရိတုံ ပရိစ္စဇိတုံ ဧသော ဝရော ဥတ္တမော ဥပဒေသော သတ္ထန္တရာနံ ဗဟူနံ အနုသရဏေန အနုဂမေန မယာ ဧဝံ ကတော နိပ္ဖာဒိတော, ဣမံ ဥပဒေသံ ဂုရုဝရာနံ အဓိကပ္ပသာဒါ မဟတာ ပသာဒေန န အပ္ပကေန, တထာဝိဓေန တာဒိသဿ မဟတော အတ္ထဿ အပသိဇ္ဈနတော, ဝိညာယ ဇာနိတွာ အာဒရတော ကရေယျ ဒေါသေ ယထာဝုတ္တေ ဒေါသေ ယသော ပရိသုဒ္ဓဗန္ဓနံ ကြိယာလက္ခဏတော ဧကန္တေန ကိတ္တိဟေတုတ္တာ, တံသဗ္ဘာဝါ ကိတ္တိ ဝါ, တံ အဘိလသတိ သီလေနေတိ ယသောဘိလာသီ ပရံ အစ္စန္တမေဝ ပရိဟရေယျ ဒူရတော ကရေယျ. ११५. "दोषांना" इत्यादी. वर सांगितलेल्या पददोषादी दोषांचा परिहार करण्यासाठी (त्याग करण्यासाठी) हा श्रेष्ठ म्हणजे उत्तम उपदेश इतर अनेक शास्त्रांच्या अनुसरणाने (अनुगमनाने) माझ्याद्वारे असा केला (निर्माण केला) गेला आहे. हा उपदेश श्रेष्ठ गुरूंच्या अधिक प्रसादाने (मोठ्या कृपेने, अल्प नव्हे, कारण अशा प्रकारच्या मोठ्या अर्थाची सिद्धी त्याशिवाय होत नाही) जाणून (समजून) आदराने करावा. वर सांगितलेल्या दोषांमध्ये, यश म्हणजे क्रियालक्षणाने निश्चितपणे कीर्तीचे कारण असल्यामुळे अत्यंत शुद्ध रचना, किंवा त्या स्वरूपाची कीर्ती, तिची स्वभावाने इच्छा करणारा 'यशोभिलाषी' दोषांचा अत्यंत परिहार करेल म्हणजे त्यांना दूर करेल. ဣတိ သုဗောဓာလင်္ကာရေ မဟာသာမိနာမိကာယံ ဋီကာယံ अशा प्रकारे 'सुबोधालंकार' या महास्वामी नावाच्या टीकेमध्ये... ဒေါသပရိဟာရာဝဗောဓပရိစ္ဆေဒေါ ဒုတိယော. दोषपरिहारावबोध नावाचा दुसरा परिच्छेद समाप्त. ၁၁၅. ‘‘ဒေါသေ’’စ္စာဒိ. ဒေါသေ ယထာဝုတ္တပဒဒေါသာဒိကေ ပရိဟရိတုမပနေတုံ ဝရော ဥတ္တမော ဧသော ဥပဒေသော သတ္ထန္တရာနုသရဏေန ဗဟူနံ ဗာဟိရသတ္ထာနံ အနုဿတိယာ မယာ ဧဝံ အနန္တရုဒ္ဒိဋ္ဌက္ကမေန ကတော ဝိရစိတော, ဣမံ ဥပဒေသံ ဂုရုဝရာနံ အဓိကပ္ပသာဒါ အဓိကပ္ပသာဒေန ဝိညာယ သဘာဝတော ဉတွာ ယသောဘိလာသီ ယသပဋိလာဘကာရဏတ္တာ [Pg.139] ကာရဏေ ကာရိယောပစာရေန ဒေါသာပဂမေန ပရိသုဒ္ဓဗန္ဓနံ ဝါ တာဒိသဗန္ဓနဟေတု ဥပ္ပဇ္ဇမာနကိတ္တိံ ဝါ ဣစ္ဆန္တော ပညဝါ ဒေါသေ ယထာဝုတ္တဒေါသေ ပရံ အတိသယေန ပရိဟရေယျ ဒူရတော ကရေယျာတိ. ဧတ္ထ ပုဗ္ဗဒ္ဓေန ဒေါသပရိဟာရပရိစ္ဆေဒဿ ပသတ္ထဘာဝေါ ဒဿိတော, အပရဒ္ဓေန သိဿဇနာနုသာသနံ ဒဿိတံ ဟောတိ. တထာ ပုဗ္ဗဒ္ဓေန ကရုဏာပုဗ္ဗင်္ဂမပညာကိစ္စံ ဒဿိတံ, အပရဒ္ဓေန ပညာပုဗ္ဗင်္ဂမကရုဏာကိစ္စံ ဒဿိတံ. တထာ ပုဗ္ဗဒ္ဓေန အတ္တဟိတသမ္ပတ္တိ, အပရဒ္ဓေန ပရဟိတသမ္ပတ္တိ ဒဿိတာတိ. ဧဝမနေကာကာရဒီပိကာယ ဣမာယ ဂါထာယ ပရိစ္ဆေဒံ နိဂမေတိ. အညေ သတ္ထာ သတ္ထန္တရာ, အန္တရသဒ္ဒေါ ဟိ အညသဒ္ဒပရိယာယော. ယထာ ‘‘ဂါမန္တရံ န ဂစ္ဆေယျာ’’တိ. ယသံ အဘိလသတိ သီလေနာတိ ဝါကျံ. ११५. "दोषांना" इत्यादी. वर सांगितलेल्या पददोषादी दोषांचा परिहार करण्यासाठी (दूर करण्यासाठी) हा श्रेष्ठ म्हणजे उत्तम उपदेश इतर शास्त्रांच्या अनुसरणाने (अनेक बाह्य शास्त्रांच्या स्मरणाने) माझ्याद्वारे अशा प्रकारे आधी सांगितलेल्या क्रमाने रचला गेला आहे. हा उपदेश श्रेष्ठ गुरूंच्या अधिक प्रसादाने (कृपेने) जाणून (स्वभावाने समजून), यशाची प्राप्ती करून देणारा असल्यामुळे, कारणात कार्याच्या उपचाराने, दोषांच्या अभावाने शुद्ध रचना किंवा अशा रचनेमुळे उत्पन्न होणारी कीर्ती इच्छिणारा प्रज्ञावान मनुष्य वर सांगितलेल्या दोषांचा अत्यंत परिहार करेल म्हणजे त्यांना दूर करेल. येथे पूर्वार्धाने दोषपरिहार परिच्छेदाची प्रशंसनीयता दर्शवली आहे, आणि उत्तरार्धाने शिष्यांना दिलेला उपदेश दर्शवला आहे. तसेच पूर्वार्धाने करुणेने युक्त प्रज्ञेचे कार्य दर्शवले आहे, आणि उत्तरार्धाने प्रज्ञेने युक्त करुणेचे कार्य दर्शवले आहे. तसेच पूर्वार्धाने आत्महितसंपत्ती आणि उत्तरार्धाने परहितसंपत्ती दर्शवली आहे. अशा प्रकारे अनेक अर्थ प्रकाशित करणाऱ्या या गाथेने परिच्छेदाचा उपसंहार केला आहे. इतर शास्त्रे म्हणजे 'शास्त्रान्तरे', कारण 'अन्तर' शब्द हा 'अन्य' शब्दाचा पर्यायवाची आहे. जसे "दुसऱ्या गावात जाऊ नये" (गामन्तरं न गच्छेय्य). यशाची स्वभावाने इच्छा करतो, असे हे वाक्य आहे. ဣတိ သုဗောဓာလင်္ကာရနိဿယေ अशा प्रकारे 'सुबोधालंकार' निसयामध्ये... ဒုတိယော ပရိစ္ဆေဒေါ. दुसरा परिच्छेद समाप्त. ၃. ဂုဏာဝဗောဓပရိစ္ဆေဒ ३. गुणावबोध परिच्छेद အနုသန္ဓိဝဏ္ဏနာ अनुसंधिवर्णन ၁၁၆. ११६. သမ္ဘဝန္တိ ဂုဏာ ယသ္မာ,ဒေါသာနေ’ဝ’မတိက္ကမေ; ဒဿေဿံ တေ တတော ဒါနိ,သဒ္ဒေ သမ္ဘူသယန္တိ ယေ. ज्या अर्थी दोषांचे उल्लंघन (त्याग) केल्यावरच गुणांची उत्पत्ती होते, त्या अर्थी आता मी त्या गुणांचे वर्णन करीन जे शब्दांना सुशोभित करतात. ၁၁၆. ဧဝံ ဒေါသပရိဟာရောပဒေသံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ဒေါသပရိဟာရာ သမုပဂတဂုဏံ ဥပဒဿိတုမဓိကာရံ ဝိရစယန္တော အာဟ ‘‘သမ္ဘဝန္တိ’’ဣစ္စာဒိ. ဒေါသာနံ ယထာဝုတ္တာနံ ပဒဒေါသာဒီနံ ဧဝံ ယထာဝုတ္တနယေန အတိက္ကမေ သတိ ဂုဏာ ဓမ္မာ [Pg.140] သဒ္ဒါလင်္ကာရသဘာဝါ ပသာဒါဒယော ယသ္မာ ကာရဏာ သမ္ဘဝန္တိ သိဇ္ဈန္တိ, တဉ္စ ‘‘ပသာဒေါ ကိလိဋ္ဌာဒီနံ ဝဇ္ဇနာ သမ္ဘဝတီ’’တျာဒိနာ ယထာယောဂံ ဝိညေယျံ, တတော တသ္မာ ကာရဏာ ယေ ဂုဏာ သဒ္ဒေ သမ္ဘူသယန္တိ အလင်္ကရောန္တိ, တေ သဒ္ဒါလင်္ကာရသင်္ခါတေ ဂုဏေ ဣဒါနိ ဒဿေဿံ ဥပဒိသိဿာမိ. ११६. अशा प्रकारे दोषपरिहाराचा उपदेश दाखवून, आता दोषपरिहाराने प्राप्त होणाऱ्या गुणांचे प्रदर्शन करण्याचा अधिकार रचताना "संभवन्ति" इत्यादी म्हणाले. वर सांगितलेल्या पददोषादी दोषांचे अशा प्रकारे सांगितलेल्या पद्धतीने उल्लंघन (त्याग) झाले असता, ज्या कारणाने शब्दालंकार स्वरूप असलेले प्रसाद इत्यादी गुणधर्म संभवतात (सिद्ध होतात), आणि ते "क्लिष्ट इत्यादींच्या वर्जनाने प्रसाद संभवतो" इत्यादींद्वारे योग्य प्रकारे जाणून घ्यावे, त्या कारणाने जे गुण शब्दांना सुशोभित (अलंकृत) करतात, त्या शब्दालंकार संज्ञक गुणांना आता मी दाखवीन (उपदेश करीन). ၁၁၆. ဧဝံ ဒေါသပရိဟာရပဝေသောပါယံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ယထာဝုတ္တဒေါသာနံ ပရိဟာရေန ‘‘ဗန္ဓနိဿိတဂုဏာ ဧတေ’’တိ ဒဿေတုံ ပုဗ္ဗာပရပရိစ္ဆေဒါနံ သမ္ဗန္ဓံ ဃဋေန္တော ‘‘သမ္ဘဝန္တိ’’စ္စာဒိဂါထမာဟ. ဒေါသာနံ နိဒ္ဒိဋ္ဌပဒဒေါသာဒီနံ ဧဝံ အနန္တရပရိစ္ဆေဒေ နိဒ္ဒိဋ္ဌက္ကမေန အတိက္ကမေ သတိ ဂုဏာ ပသာဒါဒိသဒ္ဒါလင်္ကာရသင်္ခါတာ ပသာဒါဒယော သဒ္ဒဓမ္မာ ယသ္မာ သမ္ဘဝန္တိ, တတော ယေ သဒ္ဒဓမ္မာ သဒ္ဒေ သမ္ဘူသယန္တိ သဇ္ဇန္တိ, တေ သဒ္ဒဓမ္မေ ဒဿေဿံ ပကာသိဿာမီတိ. ဧတ္ထ ကိလိဋ္ဌဒေါသဗျာကိဏ္ဏဒေါသပရိဟာရေဟိ ပသာဒါလင်္ကာရော သိဇ္ဈတိ, သေသာပိ ယထာလာဘတော ဉာတဗ္ဗာ. ११६. अशा प्रकारे दोषपरिहार प्रवेशाचा उपाय दाखवून, आता वर सांगितलेल्या दोषांच्या परिहाराने "हे रचनेवर आधारित गुण आहेत" हे दाखवण्यासाठी पूर्व आणि उत्तर परिच्छेदांचा संबंध जोडताना "संभवन्ति" इत्यादी गाथा म्हणाले. निर्दिष्ट केलेल्या पददोषादी दोषांचे अशा प्रकारे पुढील परिच्छेदात निर्दिष्ट केलेल्या क्रमाने उल्लंघन झाले असता, ज्या कारणाने प्रसादादी शब्दालंकार संज्ञक प्रसादादी शब्दधर्म संभवतात, त्या कारणाने जे शब्दधर्म शब्दांना सुशोभित (सज्जित) करतात, त्या शब्दधर्मांना मी दाखवीन (प्रकाशित करीन). येथे क्लिष्ट दोष आणि व्याकीर्ण दोषांच्या परिहाराने प्रसादांलकार सिद्ध होतो, आणि उर्वरित देखील यथालाभ जाणून घ्यावेत. သဒ္ဒါလင်္ကာရဥဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ शब्दालंकार उद्देश वर्णन ၁၁၇. ११७. ပသာဒေါ’ဇော မဓုရတာ,သမတာ သုခုမာလတာ; သိလေသော’ဒါရတာ ကန္တိ,အတ္ထဗျတ္တိသမာဓယော. प्रसाद, ओज, मधुरता, समता, सुकुमारता, श्लेष, उदारता, कान्ति, अर्थव्यक्ति आणि समाधी. ၁၁၇. ဣဒါနိ တေ ဝိဘဇတိ ‘‘ပသာဒေါ’’ဣစ္စာဒိနာ ပသတ္ထိ ပသာဒေါ ပကာသတ္ထတာ, ဩဇော သမာသဝုတ္တိဗာဟုလ္လံ အတ္ထပါရိဏတျဉ္စ, မဓုရတာ သဒ္ဒါနံ ရသဝန္တတာ, သမတာ ပဇ္ဇာပေက္ခာယ စတုန္နံ ပါဒါနမေကဇာတိယသမ္ဗန္ဓတာ, ဂဇ္ဇာပေက္ခာယ တု ပဒါနံ, သုခုမာလတာ အဖရုသက္ခရဗာဟုလ္လံ, သိလေသနံ သိလေသော ဗန္ဓဂါရဝံ, ဥဒါရတာ ဥက္ကံသတာ ကေနစိ အတ္ထေန သနာထတာ ဝိသိဋ္ဌဝိသေသနယုတ္တတာ စ, ကန္တိ သဗ္ဗလောကမနောဟရတာ, အတ္ထဗျတ္တိ သိဒ္ဓေန [Pg.141] ဉာယေန ဝါ အဘိဓေယျဿ ဂဟဏံ, သမာဓိ လောကပ္ပတီတျနုသာရိအမုချတ္ထတာ, တေသု ဩဇဥဒါရတာ သဒ္ဒတ္ထဂုဏာ, သမာဓိ အတ္ထဂုဏော, အတ္ထာနုဂါမိတ္တာ ဧတ္ထ သဒ္ဒါနံ, အညေ တု သဒ္ဒဂုဏာဝ. ११७. आता ते (ग्रंथकार) 'प्रसाद' इत्यादींद्वारे त्यांचे वर्गीकरण करतात—प्रसाद म्हणजे अर्थाची स्पष्टता (प्रकटता); ओज म्हणजे समासांचा विपुल वापर आणि अर्थाची परिपक्वता; मधुरता म्हणजे शब्दांची रसमयता; समता म्हणजे पद्याच्या संदर्भात चारही चरणांचा एकाच प्रकारचा संबंध असणे आणि गद्याच्या संदर्भात पदांचा (शब्दांचा) समान संबंध असणे; सुकुमारता म्हणजे कठोर नसलेल्या अक्षरांचा विपुल वापर; श्लेष म्हणजे शब्दांचे परस्परांशी घट्ट जोडले जाणे (बंधाची दृढता); उदारता म्हणजे उत्कटता, विशिष्ट अर्थाने युक्त असणे आणि विशिष्ट विशेषणांनी युक्त असणे; कान्ति म्हणजे सर्व लोकांचे मन हरण करणारी मनोहरता; अर्थव्यक्ति म्हणजे प्रस्थापित नियमाने किंवा न्यायाने वाच्यार्थाचे सहज ग्रहण होणे; समाधी म्हणजे लोकप्रसिद्धीनुसार अमुख्य अर्थाचा (लक्ष्यार्थाचा) स्वीकार करणे. त्यांपैकी 'ओज' आणि 'उदारता' हे शब्द आणि अर्थ दोन्हीचे गुण आहेत, 'समाधी' हा अर्थाचा गुण आहे कारण येथे शब्द अर्थाचे अनुकरण करतात, आणि इतर सर्व केवळ शब्दगुणच आहेत. ၁၁၇. ဣဒါနိ ‘‘ပသာဒေါဇော’’ဣစ္စာဒိနာ တေ သဒ္ဒါလင်္ကာရေ ကမေန ဝိဘဇိတုံ ဥဒ္ဒိသတိ. ပသာဒေါ ပသန္နဖဠိကာဝလိ အတ္တနိ အာဝုနိတရတ္တကမ္ဗလသုတ္တမိဝ သဒ္ဒါနံ အတ္ထဿ ပသာဒနသင်္ခါတော ပသာဒါလင်္ကာရော စ, ဩဇော သမာသဝုတ္တိဗာဟုလျအတ္ထပါရိဏတျသင်္ခတော သဒ္ဒတ္ထာနံ ဂုဏော စ, မဓုရတာ သဒ္ဒါနံ ရသဝန္တဘာဝသင်္ခါတကဏ္ဏမဓုရတာ စ, သမတာ ပဇ္ဇေ ပါဒဿ သုတိတော သဒိသတာ စ, ဂဇ္ဇေ ပဒါနံ တထေဝ သဒိသတာတိ ဧဝံ ပါဒါနံ ပဒါနဉ္စ တုလျဂုဏတာ စ, သုခုမာလတာ ဝဏ္ဏာနံ အတိဖရုသအတိသိထိလဘာဝံ ဝိနာ သမပ္ပမာဏမုဒုဂုဏော စ, သိလေသော ဌာနကရဏာဒိသမ္ဘူတသဘာဂဝဏ္ဏသုတီဟိ အစ္ဆိဒ္ဒဂုရုဂုဏော စ, ဥဒါရတာ ဥက္ကဋ္ဌေန ကေနစိ အတ္ထေန ဗန္ဓဿ သဇ္ဇိတဘာဝေါ စ, ဝိသိဋ္ဌဝိသေသနပဒေန ယုတ္တတာ စ, ကန္တိ သဗ္ဗေသံ ပိယဂုဏတာ စ, အတ္ထဗျတ္တိ ဣစ္ဆိတတ္ထဿ သိဒ္ဓေန ဝါ နျာယေန ဝါ သုပါကဋဘာဝေါ စ, သမာဓယော လောကပ္ပတီတိအနတိက္ကန္တအညဓမ္မာရောပနေန အမုချတ္ထတာ စာတိ ဣမေ သဒ္ဒတ္ထဂုဏာ ဒသ ဟောန္တိ. ‘‘သမာဓယော’’တိ တဿေဝ ဗဟုတ္တံ ဒီပေတိ, ဣမေသု ဒသသု ဩဇောဒါရတာတိ ဒွေ သဒ္ဒတ္ထဂုဏာ, သမာဓိ အတ္ထဂုဏော ပရိယာယေန တဒတ္ထဇောတကသဒ္ဒဂုဏောပိ, သေသာ သတ္တ သဒ္ဒဂုဏာ ဧဝ, ဧတေ သဗ္ဗေပိ အလင်္ကရောန္တိ ဗန္ဓမနေနာတိ ဝါကျေန အလင်္ကာရာ နာမ. ११७. आता 'प्रसाद, ओज' इत्यादींद्वारे त्या शब्दालंकारांचे क्रमाने वर्गीकरण करण्याचा उद्देश आहे. 'प्रसाद' म्हणजे जसे स्वच्छ स्फटिकांच्या माळेत ओवलेला लाल लोकरीचा दोरा स्पष्ट दिसतो, त्याप्रमाणे शब्दांच्या अर्थाची स्पष्टता दर्शवणारा 'प्रसाद अलंकार' होय; 'ओज' म्हणजे समासांचा विपुल वापर आणि अर्थाची परिपक्वता याने युक्त असलेला शब्द आणि अर्थाचा गुण होय; 'मधुरता' म्हणजे शब्दांच्या रसमयतेमुळे कानांना गोड वाटणारा गुण (कर्णमधुरता) होय; 'समता' म्हणजे पद्यामध्ये चरणांच्या ऐकण्यातील समानता आणि गद्यामध्ये शब्दांची तशीच समानता, अशा प्रकारे चरणांची आणि शब्दांची समान गुणयुक्तता होय; 'सुकुमारता' म्हणजे वर्णांमध्ये अत्यंत कठोर किंवा अत्यंत शिथिल भाव नसलेला, योग्य प्रमाणातील मृदुपणाचा गुण होय; 'श्लेष' म्हणजे उच्चारण स्थान आणि प्रयत्न इत्यादींमुळे निर्माण होणाऱ्या समान वर्णांच्या श्रवणाने अखंड आणि भारदस्त वाटणारा गुण होय; 'उदारता' म्हणजे एखाद्या उत्कृष्ट अर्थाने रचनेची सजावट असणे आणि विशिष्ट विशेषण पदांनी युक्त असणे होय; 'कान्ति' म्हणजे सर्वांना प्रिय वाटणारा गुण होय; 'अर्थव्यक्ति' म्हणजे इच्छित अर्थाचा प्रस्थापित नियमाने किंवा न्यायाने अत्यंत स्पष्ट होणारा भाव होय; 'समाधी' म्हणजे लोकप्रसिद्धीचे उल्लंघन न करता इतर गुणांच्या आरोपाने अमुख्य अर्थ (लक्ष्यार्थ) प्रकट करणे होय. हे शब्द आणि अर्थाचे दहा गुण आहेत. 'समाधयो' हा शब्द त्याचाच बहुविधपणा दर्शवतो. या दहा गुणांमध्ये 'ओज' आणि 'उदारता' हे दोन शब्द आणि अर्थाचे गुण आहेत; 'समाधी' हा अर्थाचा गुण आहे आणि पर्यायाने त्या अर्थाला प्रकट करणारा शब्दगुणही आहे; उर्वरित सात केवळ शब्दगुणच आहेत. हे सर्व या रचनेला सुशोभित करतात, म्हणून या नियमाने यांना 'अलंकार' असे म्हटले जाते. သဒ္ဒါလင်္ကာရပယောဇနဝဏ္ဏနာ शब्दालंकाराच्या प्रयोजनाचे वर्णन. ၁၁၈. ११८. ဂုဏေဟေ’တေဟိ သမ္ပန္နော, ဗန္ဓော ကဝိမနောဟရော; သမ္ပာဒယတိ ကတ္တူနံ, ကိတ္တိမစ္စန္တနိမ္မလံ. या गुणांनी संपन्न असलेली आणि कवींचे मन हरण करणारी रचना, तिच्या कर्त्यांना (रचनाकारांना) अत्यंत निर्मळ कीर्ती मिळवून देते. ၁၁၈. ‘‘ဂုဏေဟိ’’စ္စာဒိ. [Pg.142] ဧတေဟိယေဝ ဝုတ္တေဟိ ဒသဟိ ဂုဏေဟိ ဓမ္မေဟိ သဒ္ဒါလင်္ကာရသဗ္ဘာဝေဟိ သမ္ပန္နော ယုတ္တော သမိဒ္ဓေါ ဝါ ကဝီနံ မနော ဟရတိ သဝသေ ဝတ္တေတီတိ ကဝိမနောဟရော ကဝိဟဒယဟိလာဒကာရီ ဗန္ဓော ကတ္တူနံ ဗန္ဓန္တာနံ ကဝီနံ အစ္စန္တနိမ္မလံ အတိသယပရိသုဒ္ဓံ အဂုဏလေသေနာပ’နာလိမ္ပတ္တာ ကိတ္တိံ ဂုဏဃောသံ သမ္ပာဒယတိ နိပ္ဖာဒေတိ. ११८. 'गुणेहि' इत्यादी. वर सांगितलेल्या या दहा गुणांनी, धर्मांनी किंवा शब्दालंकारांच्या अस्तित्वाने संपन्न, युक्त किंवा समृद्ध असलेली आणि कवींचे मन हरण करणारी, त्यांना आपल्या वशमध्ये करणारी, म्हणजेच कवींच्या हृदयाला आनंद देणारी रचना (काव्यबंध), रचना करणाऱ्या कवींना अत्यंत निर्मळ, अतिशय शुद्ध, दोषांच्या लेशानेही कलंकित न झालेली कीर्ती (गुणांचा घोष) मिळवून देते किंवा निर्माण करते. ၁၁၈. ‘‘ဂုဏေ’’စ္စာဒိ. ဧတေဟိ ဂုဏေဟိ ဣမေဟိ သဒ္ဒါလင်္ကာရသင်္ခါတဒသဝိဓသဒ္ဒဓမ္မေဟိ သမ္ပန္နော သမန္နာဂတော သမိဒ္ဓေါ ဝါ ဗန္ဓော ပဇ္ဇာဒိဗန္ဓော ကဝိမနောဟရော အတ္တနော နိရဝဇ္ဇတ္တာ ကဝီနံ စိတ္တံ ပီဏေန္တော ကတ္တူနံ ရစယန္တာနံ အစ္စန္တနိမ္မလံ အပ္ပကဒေါသေနာပိ အသမ္မိဿတ္တာ အတိပရိသုဒ္ဓံ ကိတ္တိံ ဗန္ဓနဝိသယဘူတယသောရာသိံ သမ္ပာဒယတိ နိပ္ဖာဒေတီတိ. ဣမိနာ ကာရဏေန ဗန္ဓဿ ယထာဝုတ္တဒသဝိဓဂုဏပရိဂ္ဂဟော သဥဿာဟံ ကာတဗ္ဗောတိ အဓိပ္ပာယော. မနော ဟရတီတိ မနောဟရော, ကဝီနံ မနောဟရော ကဝိမနောဟရောတိ ဝိဂ္ဂဟော. ११८. 'गुणे' इत्यादी. या गुणांनी, म्हणजेच शब्दालंकार म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या दहा प्रकारच्या शब्दधर्मांनी संपन्न, युक्त किंवा समृद्ध असलेली पद्यादी रचना, आपल्या निर्दोषत्वामुळे कवींचे मन हरण करणारी आणि कवींच्या चित्ताला आनंद देणारी असून, रचना करणाऱ्या कर्त्यांना, अल्पशा दोषानेही अमिश्रित असल्यामुळे अत्यंत निर्मळ, अतिशय शुद्ध अशी कीर्ती (रचनेच्या संदर्भातील यशोवृद्धी) मिळवून देते किंवा निर्माण करते. या कारणास्तव, रचनेमध्ये वर सांगितलेल्या दहा प्रकारच्या गुणांचा स्वीकार उत्साहाने केला पाहिजे, असा याचा अभिप्राय आहे. 'मन हरण करते ते मनोहर' आणि 'कवींचे मनोहर ते कवीमनोहर' असा याचा विग्रह आहे. သဒ္ဒါလင်္ကာရနိဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ शब्दालंकाराच्या निर्देशाचे वर्णन. ၁၁၉. ११९. အဒူရာဟိတသမ္ဗန္ဓ-သုဘဂါ ယာ ပဒါဝလိ; သုပသိဒ္ဓါဘိဓေယျာ’ယံ, ပသာဒံ ဇနယေ ယထာ. ज्या पदांच्या मालिकेत (शब्दांच्या रचनेत) जवळच संबंध प्रस्थापित झाल्यामुळे सौंदर्य आले आहे, आणि जिचा वाच्यार्थ अत्यंत सुप्रसिद्ध (सहज समजणारा) आहे, ती 'प्रसाद' नावाचा गुण निर्माण करते. जसे की... ၁၁၉. ဣဒါနိ ယထောဒ္ဒေသာနမေသံ နိဒ္ဒေသံ သောဒါဟရဏံ ကရောန္တော အာဟ ‘‘အဒူရ’’ဣစ္စာဒိ. အဒူရေ အာသန္နေ အဒူရေန ဝါ အဒူရာဟိတကြိယာကတ္တုကမ္မာဒိပဒဝသေန အာဟိတော ဌပိတော ကတော သမ္ဗန္ဓော အနွယော, တေန သုဘဂါ မနောဟရာ သုပသိဒ္ဓေါ သုပ္ပကာသော သုဂမ္မော အဘိဓေယျော အတ္ထော ယဿာ သာတိ တထာ, န တု ဘာဝတ္ထော တဿ သဘာဝဂမ္ဘီရတ္တာ. ဝုတ္တဉှိ – ११९. आता उद्देशानुसार यांचे उदाहरणसहित स्पष्टीकरण करताना 'अदूर' इत्यादी म्हणतात. 'अदूर' म्हणजे जवळ किंवा जवळच प्रस्थापित केलेल्या क्रियापद, कर्ता, कर्म इत्यादी पदांच्या आधारे प्रस्थापित केलेला संबंध किंवा अन्वय, त्याने सुभग म्हणजे मनोहर झालेली; जिचा अभिधेय अर्थ (वाच्यार्थ) अत्यंत प्रसिद्ध, स्पष्ट आणि सुगम आहे ती तशी (पदमालिका), परंतु भावार्थ नव्हे, कारण तो स्वभावानेच गंभीर असतो. कारण असे म्हटले आहे की— ‘‘ကဝီန’ဓိပ္ပာယ’မသဒ္ဒဂေါစရံ,[Pg.143] ပဒေ ဖုရန္တံ မုဒုကမှိ ကေဝလံ; ဝိသန္တိ ဘာဝါဝဂမာ ကတဿမာ,ပကာသယန္တျာ’ကတိယော တု တာဒိသာ’’တိ. "कवींचा अभिप्राय जो शब्दांच्या कक्षेबाहेरचा आहे आणि केवळ मृदू पदांमध्ये स्फुरणारा आहे, त्यात परिश्रम केलेले लोकच भावाचे आकलन करून प्रवेश करतात; परंतु सामान्य लोक तशा प्रकारचा अर्थ प्रकट करू शकत नाहीत." တာဒိသာ ယာ ပဒါဝလိ ပဒပန္တိ အယံ ပသာဒံ တန္နာမကံ ဂုဏံ ဇနယေ ဥပ္ပာဒယတိ. ယထာတိ တမုဒါဟရတိ. तशा प्रकारची जी पदांची मालिका (शब्दांची रचना) आहे, ती 'प्रसाद' नावाचा गुण निर्माण करते (उत्पन्न करते). 'जसे की' याद्वारे त्याचे उदाहरण दिले जाते. ၁၁၉. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန ဧတေသံ သဒ္ဒါလင်္ကာရာဒီနံ နိဒ္ဒေသံ သောဒါဟရဏံ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘အဒူရာဟိတေ’’စ္စာဒိ. အဒူရေ အာသန္နပဒေသေ တဒုပစာရေန အာသန္နေ ဝါ အာဟိတော ကြိယာယ, လဒ္ဓကြိယာယောဂကတ္တုကမ္မာဒိပဒါနံ ဝသေန စ ကတော, နော စေ ဝိနျာသဝသေန ဌပိတော ဝါ သမ္ဗန္ဓော ဣစ္ဆိတတ္ထပတီတိက္ကမေန အညမညာပေက္ခလက္ခဏကြိယာကာရကယောဂေါ တေန သုဘဂါ မနောဟရာ, သုပသိဒ္ဓေါ ပသိဒ္ဓတ္ထဝိသယေ သဒ္ဒပယောဂတော အတိပါကဋော အဘိဓေယျော သဒ္ဒတ္ထော ယဿာ သာ အယံ ပဒါဝလိ ပဒပန္တိ ပသာဒံ ပသာဒနာမကံ ဂုဏံ ဇနယေ ဥပ္ပာဒယတိ. ယထာတိ လက္ခိယံ ဒဿေတိ. အဒူရေ အာဟိတောတိ ဝါ, ဥပစရိတတ္တာ အဒူရော စ သော အာဟိတော စာတိ ဝါ, သော စ သော သမ္ဗန္ဓော စေတိ စ, တေန သုဘဂါတိ စ, သု အတိသယေန ပသိဒ္ဓေါတိ စ, သော အဘိဓေယျော အဿေတိ စ ဝါကျံ. ဧတ္ထ သုပသိဒ္ဓေါ နာမ သဒ္ဒတ္ထော, အဓိပ္ပာယတ္ထော ပန ပကတိဂမ္ဘီရော. ဝုတ္တဉှိ – ११९. आता उद्देशाच्या क्रमानुसार या शब्दालंकार इत्यादींचे उदाहरणसहित स्पष्टीकरण देताना 'अदूराहिते' इत्यादी म्हणतात. 'अदूर' म्हणजे जवळच्या प्रदेशात किंवा उपचाराने जवळ असलेल्या ठिकाणी, क्रियेद्वारे प्रस्थापित केलेला, आणि क्रियापदाशी संबंध असलेल्या कर्ता, कर्म इत्यादी पदांच्या आधारे केलेला, किंवा रचनेच्या क्रमाने ठेवलेला संबंध (अन्वय), जो इच्छित अर्थाच्या प्रतीतीच्या क्रमाने परस्परांच्या अपेक्षेचे लक्षण असलेल्या क्रिया आणि कारकांच्या योगाने युक्त असतो, त्याने सुभग म्हणजे मनोहर झालेली; जिचा अभिधेय शब्दार्थ प्रसिद्ध अर्थाच्या बाबतीत शब्दांच्या प्रयोगामुळे अत्यंत स्पष्ट असतो, अशी ही पदांची मालिका (शब्दांची रचना) 'प्रसाद' नावाचा गुण निर्माण करते (उत्पन्न करते). 'जसे की' याद्वारे त्याचे लक्षण (उदाहरण) दाखवले जाते. 'अदूर' मध्ये प्रस्थापित केलेला, किंवा उपचाराने जो जवळ आहे आणि प्रस्थापित केला आहे तो, आणि तोच तो संबंध, त्याने सुभग झालेली, आणि अतिशय प्रसिद्ध असलेला, आणि तोच जिचा अभिधेय अर्थ आहे, असे हे वाक्य आहे. येथे 'सुप्रसिद्ध' म्हणजे शब्दाचा अर्थ (वाच्यार्थ) होय, परंतु अभिप्रेत अर्थ (अभिप्राय) हा स्वभावानेच गंभीर असतो. कारण असे म्हटले आहे की— ‘‘ကဝီန’ဓိပ္ပာယ’မသဒ္ဒဂေါစရံ,ပဒေ ဖုရန္တံ မုဒုကမှိ ကေဝလံ; ဝိသန္တိ ဘာဝါဝဂမာ ကတဿမာ,ပကာသယန္တျာ’ကတိယော တု တာဒိသာ’’တိ. "कवींचा अभिप्राय जो शब्दांच्या कक्षेबाहेरचा आहे आणि केवळ मृदू पदांमध्ये स्फुरणारा आहे, त्यात परिश्रम केलेले लोकच भावाचे आकलन करून प्रवेश करतात; परंतु सामान्य लोक तशा प्रकारचा अर्थ प्रकट करू शकत नाहीत." တဿတ္ထော – အသဒ္ဒဂေါစရံ သဒ္ဒဿ အဝိသယံ ဟုတွာ မုဒုကမှိ ပဒေ ကေဝလံ ဝိသုံ ဖုရန္တံ စာပေန္တံ ကဝီနဓိပ္ပာယံ ကဝီနမဇ္ဈာသယံ [Pg.144] ကတဿမာ သဒ္ဒတ္ထဝိသယေ ကတပရိစယာ ပဏ္ဍိတာ ဘာဝါဝဂမာ ပဒတ္ထာဝဗောဓေန ဝိသန္တိ ပဝိသန္တိ, တာဒိသာ အာကတိယော တု သဒ္ဒသဒ္ဒတ္ထာနံ အာကာရာ ပကာသယန္တိ အဓိပ္ပာယတ္ထံ ဇောတေန္တီတိ. त्याचा अर्थ असा – शब्दाचा विषय न होता (शब्दाच्या कक्षेबाहेर राहून) केवळ कोमल पदांमध्ये स्वतंत्रपणे स्फुरण पावणारे आणि वळण घेणारे, कवींचे अभिप्राय आणि कवींचे आशय असणारे, ज्यांनी शब्द आणि अर्थाच्या विषयात अभ्यास व परिचय केला आहे असे पंडित लोक भावाच्या आकलनाने आणि पदांच्या अर्थाच्या बोधाने (त्यात) प्रवेश करतात. अशा प्रकारच्या आकृती (स्वरूप) शब्द आणि शब्दांच्या अर्थांचे आकार प्रकाशित करतात आणि अभिप्रेत अर्थाला उजळून टाकतात. ၁၂၀. १२०. အလင်္ကရောန္တာ ဝဒနံ, မုနိနော’ဓရရံသိယော; သောဘန္တေ’ရုဏရံသီ’ဝ, သမ္ပတန္တာ’မ္ဗုဇောဒရေ. मुनींच्या (बुद्धांच्या) मुखाला अलंकृत करणाऱ्या त्यांच्या ओठांच्या किरणांची प्रभा, कमळाच्या गर्भात पडणाऱ्या बालसूर्याच्या (अरुणाच्या) किरणांप्रमाणे शोभून दिसते. ၁၂၀. ‘‘အလင်္ကရောန္တာ’’ဣစ္စာဒိ. မုနိနော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဝဒနံ သဘာဝမဓုရပကတိမုခံ အလင်္ကရောန္တာ သဇ္ဇန္တာ သောဘယမာနာ အဓရာနံ ရံသိယော သုပက္ကဗိမ္ဗဖလောပမဩဋ္ဌယုဂဠဝိနိဿဋဗဟုတရကန္တိစ္ဆိတာဘာ မုနိနောတိ ဝိညာယတိ သုတတ္တာ. အမ္ဗုဇောဒရေ တာ ကာလောပနတပုပ္ဖကာသရမဏီယေ ပဒုမဗ္ဘန္တရေ သမ္ပတန္တာ ပဝတ္တမာနာ အရုဏရံသီဝ ဗာလသူရိယရံသိယော ဝိယ သောဘန္တေ ဝိရာဇန္တိ. १२०. ‘अलङ्करोन्ता’ इत्यादी. मुनींच्या म्हणजेच सम्यक्संबुद्धांच्या स्वाभाविकपणे मधुर आणि सुंदर असणाऱ्या मुखाला अलंकृत करणारे, सुशोभित करणारे; पिकलेल्या तोंडलीच्या (बिंब) फळासारख्या ओठद्वयीतून बाहेर पडणारे आणि विपुल कांतीने युक्त असणारे ओठांचे किरण – येथे ‘मुनींचे’ असे ऐकले गेल्यामुळे समजते. कमळाच्या गर्भात, म्हणजेच योग्य वेळी उमललेल्या फुलाच्या रमणीय अशा कमळाच्या आत पडणारे (किरण), बालसूर्याच्या किरणांप्रमाणे (अरुणकिरणांप्रमाणे) शोभून दिसतात, विराजतात. ၁၂၀. ‘‘အလင်္ကရောန္တေ’’စ္စာဒိ. မုနိနော ဝဒနံ ပကတိသုန္ဒရမုခံ အလင်္ကရောန္တာ သဇ္ဇန္တာ အဓရရံသိယော တဿေဝ မုနိနော ဩဋ္ဌဒွယတော နိက္ခန္တကန္တိသမူဟာ အမ္ဗုဇောဒရေ ဝိကသနာနုရူပကာလာဘိမုခေ ပဒုမဂဗ္ဘေ ဥပဍ္ဎဝိကသိတေတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. သမ္ပတန္တာ ပဝတ္တမာနာ အရုဏရံသီ ဣဝ ဗာလသူရိယရံသီဝ သောဘန္တေ ဒိဗ္ဗန္တီတိ. ဧတ္ထ အဒူရသမ္ဗန္ဓံ ပသိဒ္ဓတ္ထဉ္စ နိဿာယ ပသာဒဂုဏော ပါကဋော. အဓရရံသီနံ မုနိသမ္ဗန္ဓော သုတာနုမိတသမ္ဗန္ဓေသု သုတသမ္ဗန္ဓဿ ဗလဝတ္တာ, ကာကက္ခိဂေါဠကနယေန ဝါ လဗ္ဘတီတိ. အဓရေ ရံသီတိ စ, အမ္ဗုဇဿ ဥဒရန္တိ စ ဝါကျံ. १२०. ‘अलङ्करोन्ते’ इत्यादी. मुनींच्या स्वाभाविकपणे सुंदर मुखाला अलंकृत करणारे, सुशोभित करणारे; त्याच मुनींच्या ओठद्वयीतून बाहेर पडलेले कांतीचे समूह असणारे ओठांचे किरण, कमळाच्या गर्भात – म्हणजेच उमलण्याच्या काळाला अनुकूल अशा अर्धविकसित कमळाच्या आत – पडणारे, बालसूर्याच्या किरणांप्रमाणे शोभून दिसतात, प्रकाशतात. येथे जवळचा संबंध आणि प्रसिद्ध अर्थाचा आश्रय घेतल्यामुळे ‘प्रसाद गुण’ स्पष्ट होतो. ओठांच्या किरणांचा मुनींशी असणारा संबंध हा ‘ऐकलेल्या’ आणि ‘अनुमान केलेल्या’ संबंधांमध्ये ऐकलेल्या संबंधाच्या बलवत्तेमुळे किंवा ‘काकाक्षिगोलक न्यायाने’ (कावळ्याच्या डोळ्याच्या बुबुळाच्या न्यायाने) प्राप्त होतो. ‘अधरे रंसी’ (ओठांवर किरण) आणि ‘अम्बुजस्स उदरं’ (कमळाचा गर्भ) असे हे वाक्य आहे. ၁၂၁. १२१. ဩဇော သမာသဗာဟုလျ-မေသော ဂဇ္ဇဿ ဇီဝိတံ; ပဇ္ဇေပျ’နာကုလော သော’ယံ,ကန္တော ကာမီယတေ ယထာ. समासांचे बाहुल्य (प्रमाण जास्त असणे) म्हणजे ‘ओज’ होय. हे गद्याचे जीवन (प्राण) आहे. पद्यामध्येही जर ते व्याकुळता नसलेले (स्पष्ट) असेल, तर ते एखाद्या प्रियकराप्रमाणे प्रिय मानले जाते. ၁၂၁. ‘‘ဩဇော’’ဣစ္စာဒိ. [Pg.145] သမာသဿ ဧကတ္ထဝုတ္တိယာ ဗာဟုလျံ ဘိယျောဘာဝေါ ဣတျနုဝဒိတွာ ပုန ဩဇော ဝိဓီယတေ, ဧသော ဩဇော သမာသဗာဟုလ္လလက္ခဏော ဂဇ္ဇဿ ဝုတ္တိရူပဿ ဇီဝိတံ ဟဒယံ သာရံ တပ္ပဓာနတ္တာ ဂဇ္ဇဿ, န ပဇ္ဇဿ, သောယံ ဩဇော အနာကုလော အဂဟနော အတောယေဝ ကန္တော ဟဒယင်္ဂမော, ပဇ္ဇေပိ န ကေဝလံ ဂဇ္ဇေ ကာမီယတေ ပယုဇ္ဇတေ. ယထေတျုဒါဟရတိ. १२१. ‘ओजो’ इत्यादी. समासाच्या एकार्थी वृत्तीचे बाहुल्य म्हणजे अधिकता, असा अनुवाद करून पुन्हा ‘ओज’ विहित केला जातो. समासाच्या बाहुल्याचे लक्षण असलेला हा ओज गुण, गद्यबंधाचे जीवन, हृदय आणि सार आहे; कारण गद्यामध्ये त्याचे प्राधान्य असते, पद्यात नाही. तो हा ओज गुण व्याकुळता नसलेला (स्पष्ट), अगहन (सुलभ) आणि म्हणूनच कांत (हृदयस्पर्शी) असून, केवळ गद्यातच नव्हे तर पद्यातही इच्छिला जातो, म्हणजेच वापरला जातो. ‘यथा’ (जसे की) असे म्हणून ते उदाहरण देतात. ၁၂၁. ဣဒါနိ ဩဇဂုဏံ ဒဿေတိ ‘‘ဩဇော’’စ္စာဒိနာ. ဩဇော နာမ သမာသဗာဟုလျံ ဘိန္နတ္ထေသု ပဝတ္တသဒ္ဒါနံ ဧကတ္ထပဝတ္တိလက္ခဏဿ သမာသဿ ဗဟုလတာ, ဧသော ဩဇော ဂဇ္ဇဿ ဂဇ္ဇဗန္ဓဿ ဇီဝိတံ ဟဒယံ, ဇီဝိတသီသေန ဟဒယသင်္ခတံ စိတ္တံ ဝုတ္တန္တိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. သော အယံ ဩဇော အနာကုလော နိဗျာကုလော ကန္တော တတောယေဝ ဝိညူနံ ပိယဘူတော ပဇ္ဇေပိ ပဇ္ဇဗန္ဓေပိ ကာမီယတေ ကဝီဟိ ပယုဇ္ဇတေတိ. ဗဟုလဿ ဘာဝေါ ဗာဟုလျံ, သမာသဿ ဗာဟုလျန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. ဂဇ္ဇဗန္ဓာဓိကာရဿာဘာဝါ ပဇ္ဇဝိသယဿ ဩဇဂုဏဿ လက္ခိယံ ဒဿေတိ ‘‘ယထေ’’စ္စာဒိနာ. १२१. आता ‘ओजो’ इत्यादींद्वारे ओज गुणाचे दर्शन घडवितात. ओज म्हणजे समासांचे बाहुल्य; वेगवेगळ्या अर्थांमध्ये प्रवृत्त होणाऱ्या शब्दांच्या एकाच अर्थातील प्रवृत्तीचे लक्षण असलेल्या समासाची प्रचुरता होय. हा ओज गुण गद्याचा, म्हणजेच गद्यबंधाचा प्राण किंवा हृदय आहे; येथे ‘प्राण’ या शब्दाने हृदयरूप चित्त अभिप्रेत आहे, असे समजावे. तो हा ओज गुण व्याकुळता नसलेला (स्पष्ट), निर्व्याकुळ, कांत आणि म्हणूनच विद्वानांना प्रिय असणारा असून, पद्यातही म्हणजेच पद्यबंधातही कवींद्वारे इच्छिला जातो व वापरला जातो. ‘बहुलाचा भाव म्हणजे बाहुल्य’ आणि ‘समासाचे बाहुल्य’ असा याचा विग्रह आहे. गद्यबंधाचा अधिकार नसल्यामुळे, पद्यविषयक ओज गुणाचे लक्ष्य ‘यथा’ इत्यादींद्वारे दाखवितात. ၁၂၂. १२२. မုနိန္ဒမန္ဒသဉ္ဇာတ-ဟာသစန္ဒနလိမ္ပိတာ; ပလ္လဝါ ဓဝလာ တဿေ-ဝေကောနာ’ဓရပလ္လဝေါ. मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) मंदहास्यरूपी चंदनाने लिप्त झालेले सर्व पल्लव (झाडांची पाने) पांढरे झाले; परंतु केवळ त्यांचा एकच अधरपल्लव (ओठरूपी कोवळे पान) पांढरा झाला नाही. ၁၂၂. ‘‘မုနိန္ဒ’’ဣစ္စာဒိ. မုနိန္ဒဿ မန္ဒံ ဤသကံ သဉ္ဇာတော ပဝတ္တော တံသဘာဝတ္တာ ဘဂဝတော ဟာသဿ ဟာသော ဟသိတံ သောဝ စန္ဒနမိဝ စန္ဒနံ ဓဝလတ္တရူပတ္တာ, တေန လိမ္ပိတာ ဥပဒေဟိတာ ပလ္လဝါ သဗ္ဗာနိ ကိလသယာနိ ‘‘ဣဒမေဝေ’’တိ နိယမာဘာဝတော, ဓဝလာ ပကတိဝဏ္ဏပရိစ္စာဂေန သုက္ကာ အဟေသုံ ဂါဟာပိတတ္တာ သဂုဏဿ တာဒိသဝိသိဋ္ဌဿ ပဋိလာဘတော, ဧဝံ သန္တေပိ တဿ မုနိန္ဒဿေဝ ဧကော အညဿ တာဒိသဿာဘာဝါ အဓရပလ္လဝေါ န ဓဝလော [Pg.146] ဓဝလော နာဟောသိ. အစ္စာသန္နဒေသိယောပိ ဗဟုမန္တဗ္ဗော’ယ’မဿာနုဘာဝေါတိ. १२२. ‘मुनिन्द’ इत्यादी. मुनींद्रांचे मंद म्हणजे थोडेसे उत्पन्न झालेले, त्यांच्या स्वभावामुळे भगवंतांचे जे हास्य (हसणे) आहे, तेच पांढऱ्या रंगामुळे चंदनासारखे आहे. त्याने लिप्त झालेले, माखलेले पल्लव म्हणजे सर्व कोवळी पाने (‘हेच’ असा नियम नसल्यामुळे), आपल्या नैसर्गिक रंगाचा त्याग करून पांढरे झाले; कारण त्यांना तशा विशिष्ट गुणाची प्राप्ती झाली होती. असे असूनही, त्या मुनींद्रांचाच एक (कारण दुसऱ्या कोणाचा तसा नाही) अधरपल्लव (ओठरूपी पान) पांढरा झाला नाही. अत्यंत जवळ असूनही पांढरा न होणे, हा त्यांचा प्रभाव अत्यंत आदरणीय मानला पाहिजे. ‘‘ပေမာဝဗန္ဓဟဒယေ သဒယေ ဇိနသ္မိံ,တသ္မိံ နု ကိံ ကုမတယော ဘဝထ’ပ္ပသန္နာ; ကိံ တေန ဝေါ န ဝိဟိတံ ဟိတ’မုဂ္ဂဒုဂ္ဂ-သံသာရသာဂရသမုတ္တရဏာဝသာနံ’’. ज्यांचे हृदय प्रेमाने बांधलेले आहे आणि जे अत्यंत दयाळू आहेत, अशा त्या जिनांच्या (बुद्धांच्या) विषयी, हे दुर्बुद्धी लोकांनो, तुम्ही अप्रसन्न का आहात? अत्यंत दुर्गम अशा संसारसागरातून पार होण्यापर्यंतचे कोणते हित त्यांनी तुमच्यासाठी केले नाही? ဣစ္စပရမုဒါဟရဏံ. ဧဝမေတာဒိသော အနာကုလော ကန္တော ဩဇော ဇာနိတဗ္ဗောတိ. နနု စ ယ-တသဒ္ဒါနံ နိစ္စော သမ္ဗန္ဓော, တသ္မာ ကထံ ‘‘တဿေဝေကော နာဓရပလ္လဝေါ’’တိ ဧတ္ထ ယသဒ္ဒါဘာဝေါတိ? သစ္စံ, ကိန္တု ပက္ကန္တဝိသယော, တထာ ပသိဒ္ဓဝိသယော, အနုဘူတဝိသယော စ တသဒ္ဒေါ ယသဒ္ဒံ နာပေက္ခတေ. ယထာ – हे दुसरे उदाहरण आहे. अशा प्रकारे, हा व्याकुळता नसलेला (स्पष्ट) आणि कांत ओज गुण जाणावा. शंका अशी की, ‘यद्’ (जो) आणि ‘तद्’ (तो) या शब्दांचा नित्य संबंध असतो, मग ‘तस्सेवेको नाधरपल्लवो’ यामध्ये ‘यद्’ शब्दाचा अभाव कसा? हे सत्य आहे, परंतु प्रकृत विषय (प्रस्तुत विषय), प्रसिद्ध विषय आणि अनुभूत विषय असणारा ‘तद्’ शब्द ‘यद्’ शब्दाची अपेक्षा ठेवत नाही. जसे की – ‘‘သဝါသနေ ကိလေသေ သော, ဧကော သဗ္ဗေ နိဃာတိယ; အဟု သုသုဒ္ဓသန္တာနော, ပူဇာနဉ္စ သဒါရဟော’’. त्यांनी (बुद्धांनी) एकट्यानेच वासनेसह सर्व क्लेशांचा नाश करून, अत्यंत शुद्ध चित्तसंतती प्राप्त केली आणि ते सदैव पूजेस पात्र झाले. ဣစ္စာဒိ. ဧတ္ထ ဗုဒ္ဓေါ ‘‘ဗုဒ္ဓါနုဿတိမာဒိတော’’တိ ပက္ကန္တော. इत्यादी. येथे ‘बुद्धानुस्मृतीच्या सुरुवातीपासून’ बुद्ध हा प्रकृत (प्रस्तुत) विषय आहे. ပသိဒ္ဓဝိသယော ယထာ – प्रसिद्ध विषय जसे की – ‘‘အဂ္ဂိံ ပက္ခန္ဒ’ အထ ဝါ, ‘ပဗ္ဗတဂ္ဂါ ပတေ’တိ ဝါ; ယဒိ ဝက္ခတိ ကတ္တဗ္ဗံ, ဉာတကာရီဟိ သော ဇိနော’’. ‘अग्नीत उडी घे’ किंवा ‘पर्वताच्या शिखरावरून खाली पड’ असे जरी त्यांनी सांगितले, तरी ज्ञात्यांनी (हित जाणणाऱ्यांनी) त्या जिनांच्या (बुद्धांच्या) आज्ञेचे पालन केले पाहिजे. ဣစ္စာဒိ. इत्यादी. အနုဘူတဝိသယော ယထာ – अनुभूत विषय जसे की – ‘‘အတီတံ နာနုသောစာမိ, နပ္ပဇပ္ပာမ’နာဂတံ; ပစ္စုပ္ပန္နေန ယာပေမိ, တေန ဝဏ္ဏော ပသီဒတိ’’. मी भूतकाळाचा शोक करत नाही, भविष्यकाळाची आकांक्षा धरत नाही; मी वर्तमानकाळात जगतो, म्हणूनच माझा वर्ण प्रसन्न दिसतो. ဣစ္စာဒိ. इत्यादी. ယသဒ္ဒေါ တုတ္တရဝါကျဋ္ဌော ပုဗ္ဗဝါကျေ တသဒ္ဒမေဝ ဂမယတိ. ယထာ – परंतु उत्तर वाक्यात (पुढील वाक्यात) असलेला ‘यद्’ शब्द पूर्व वाक्यात (मागील वाक्यात) ‘तद्’ शब्दाचाच बोध करून देतो. जसे की – ‘‘ဗောဓိံ [Pg.147] နမာမိ နတိဘာဇနမစ္စုဠာရံ,ပုညာကရံ ဘုဝနမဏ္ဍလသောတ္ထိဘူတံ; ယော စက္ခုသောတသတိဂေါစရတံ သမေတော,ဒေါသာရိဒပ္ပမထနေ’ကရသော ဗုဓာနံ’’. मी त्या अत्यंत उदात्त, वंदनीय, पुण्याचा ठेवा असणाऱ्या आणि जगतासाठी कल्याणकारी असणाऱ्या बोधीला (बोधीवृक्षाला किंवा ज्ञानाला) नमन करतो; जी डोळे, कान आणि स्मृतीच्या कक्षेत आली आहे आणि जी विद्वानांच्या दोषांरूपी शत्रूंच्या गर्वाचे मर्दन करण्यात एकरस (तत्पर) आहे. ဣစ္စာဒိ. इत्यादी. ပုဗ္ဗဝါကျောပါတ္တော တု ယသဒ္ဒေါ ဥတ္တရဝါကျေတသဒ္ဒေါပါဒါနံ ဝိနာ သာကင်္ခေ ဝါကျဿ ဦနတ္တံ ဇနေတိ. ဧတ္ထ ပက္ကန္တဝိသယော တသဒ္ဒေါ. परंतु पूर्व वाक्यात वापरलेला ‘यद्’ शब्द जर उत्तर वाक्यात ‘तद्’ शब्दाचा प्रयोग न करता आला, तर तो आकांक्षेसह वाक्यात अपूर्णता निर्माण करतो. येथे ‘तद्’ शब्द प्रकृत (प्रस्तुत) विषय आहे. ၁၂၂. မုနိန္ဒဿ မန္ဒံ ဤသကံ သဉ္ဇာတော ပဝတ္တော ဟာသောယေဝ သိတံ စန္ဒနစုဏ္ဏမိဝ တေန လိမ္ပိတာ အာလေပိတာ ပလ္လဝါ ရုက္ခလတာဒီနံ ပကတိရတ္တာနိ ကိသလယာနိ ဓဝလာ သဂုဏပရိစ္စာဂေန သေတာ အဟေသုံ, တထာပိ တဿေဝ တထာဂတဿ ဧကော အတုလော အသဟာယော ဝါ အဓရပလ္လဝေါ ဒန္တာဝရဏသင်္ခါတပလ္လဝေါ န ရံသိသံသဋ္ဌောပိ သမီပဋ္ဌောပိ ဓဝလော သေတော နာဟောသိ. ဧဝမေတ္ထ အဂဟနသမာသဗာဟုလျံ ဒီပိတံ ဟောတိ. १२२. मुनींद्रांचे मंद म्हणजे थोडेसे उत्पन्न झालेले जे हास्य आहे, तेच पांढऱ्या चंदनाच्या उटीसारखे आहे. त्याने लिप्त झालेल्या, माखलेल्या पल्लवांनी – म्हणजे वृक्ष-वेलींच्या नैसर्गिकरीत्या तांबड्या असणाऱ्या कोवळ्या पानांनी – आपल्या नैसर्गिक रंगाचा त्याग करून पांढरा रंग धारण केला; तरीसुद्धा, त्याच तथागतांचा एक अतुलनीय किंवा अद्वितीय असा अधरपल्लव (ओठरूपी पान), जो दातांचे आवरण आहे, तो किरणांच्या संपर्कात असूनही आणि अत्यंत जवळ असूनही पांढरा झाला नाही. अशा प्रकारे, येथे सुबोध (व्याकुळता नसलेल्या) समासांचे बाहुल्य स्पष्ट केले आहे. ‘‘ပေမာဝဗန္ဓဟဒယေ သဒယေ ဇိနသ္မိံ,တသ္မိံ နု ကိံ ကုမတယော ဘဝထ’ပ္ပသန္နာ; ကိံ တေန ဝေါ န ဝိဟိတံ ဟိတ’မုဂ္ဂဒုဂ္ဂ-သံသာရသာဂရသမုတ္တရဏာဝသာန’’န္တိ. “ज्यांचे हृदय प्रेमाने बांधलेले आहे आणि जे अत्यंत दयाळू आहेत, अशा त्या जिनांच्या (बुद्धांच्या) विषयी, हे दुर्बुद्धी लोकांनो, तुम्ही अप्रसन्न का आहात? अत्यंत दुर्गम अशा संसारसागरातून पार होण्यापर्यंतचे कोणते हित त्यांनी तुमच्यासाठी केले नाही?” အပရမုဒါဟရဏံ. တဿတ္ထော – ကုမတယော ဟေ အညာဏာ! ပေမာဝဗန္ဓဟဒယေ သဗ္ဗေသု တုမှေသု နိစ္စံ ပဝတ္တိတဒဠှပေမာနုဗန္ဓစိတ္တေ သဒယေ တတောယေဝ ဒယာသဟိတေ တသ္မိံ ဇိနသ္မိံ ဝိသယဘူတေ ကိံ နု ကသ္မာ အပ္ပသန္နာ ဘဝထ, တထာ ဟိ ဝေါ တုမှာကံ တေန ဇိနေန ဥဂ္ဂေါ ဒါရုဏော စ, ဒုဂ္ဂေါ ဂန္တုမသက္ကုဏေယျော စ, သောယေဝ သံသာရသာဂရော တဿ သမုတ္တရဏံ ပရိယန္တပ္ပတ္တိယေဝ အဝသာနံ ယဿ တံ န ဝိဟိတံ အကတံ ဟိတံ ဝုဒ္ဓိ နာမ ကိံ ဟောတိ, န [Pg.148] ဟောတေဝ. ဧတ္ထာပိ သမာသဿ ပါကဋတ္တာ ဩဇော ဂုဏော ကန္တော ဟောတီတိ. दुसरे उदाहरण. त्याचा अर्थ असा – हे अज्ञानी लोकांनो! प्रेमाचे बंधन असलेल्या हृदयात, तुमच्या सर्वांमध्ये नेहमी दृढ प्रेमाचा अनुबंध असणाऱ्या आणि म्हणूनच दयाळू असलेल्या त्या जिनांच्या (बुद्धांच्या) बाबतीत तुम्ही का बरे प्रसन्न होत नाही? कारण तुमच्यासाठी त्या जिनांनी जो उग्र (भयानक) आणि दुर्गम (पार करण्यास कठीण) असा हा संसारसागर आहे, त्याचे पार जाणे म्हणजेच ज्याचा अंत आहे, ते जर केले नाही, तर तुमचे हित किंवा कल्याण काय होणार? काहीच होणार नाही. येथेही समासाच्या स्पष्टतेमुळे 'ओज' गुण प्रिय वाटतो. နနု ယ-တသဒ္ဒါနံ နိစ္စသမ္ဗန္ဓောတိ ကထံ ‘‘တဿေဝေကော’’တိ စ ‘‘တသ္မိံ နု ကိံ ကုမတယော’’တိ စ ဣစ္စာဒီသု ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တယသဒ္ဒေါ နတ္ထီတိ? သစ္စံ, တထာပိ ပက္ကန္တတ္ထဝိသယော, ပသိဒ္ဓတ္ထဝိသယော, အနုဘူတတ္ထဝိသယော ဝါ တသဒ္ဒေါ ယသဒ္ဒံ နာပေက္ခတိ. တထာ ဟိ – शंका: 'य' आणि 'त' या शब्दांचा नित्य संबंध असतो, तर मग "त्याचाच एक" (तस्सेवेको) आणि "त्याच्याविषयी का, हे अज्ञानी लोकांनो!" (तस्मिं नु किं कुमतयो) इत्यादींमध्ये खाली (पूर्वी) सांगितलेला 'य' शब्द का नाही? उत्तर: हे खरे आहे, तरीही प्रकृत विषयाशी संबंधित असलेला, प्रसिद्ध विषयाशी संबंधित असलेला किंवा अनुभवलेल्या विषयाशी संबंधित असलेला 'त' शब्द 'य' शब्दाची अपेक्षा करत नाही. जसे की – ‘‘သဝါသနေ ကိလေသေ သော, ဧကော သဗ္ဗေ နိဃာတိယ; အဟု သုသုဒ္ဓသန္တာနော, ပူဇာနဉ္စ သဒါရဟော’’တိ. "त्यांनी (बुद्धांनी) एकट्यानेच वासनेसह सर्व क्लेशांचा नाश करून, अत्यंत शुद्ध अंतःकरण धारण केले आणि ते नेहमी पूजेस पात्र झाले." ဧဝမာဒီသု ‘‘သော’’တိ နိဒ္ဒိဋ္ဌတသဒ္ဒေါ ‘‘ဗုဒ္ဓါနုဿတိမာဒိတော’’တိ ဧတ္ထ အတီတေန ဗုဒ္ဓသဒ္ဒေန ဝစနီယဝိသယော ဟောတိ. इतक्यादींमध्ये "ते" (सो) या शब्दाने दर्शवलेला 'त' शब्द "बुद्धानुस्मृतीच्या सुरुवातीला" यातील पूर्वी आलेल्या 'बुद्ध' शब्दाने व्यक्त होणाऱ्या विषयाला दर्शवतो. ‘‘အဂ္ဂိံ ပက္ခန္ဒ’ အထဝါ, ‘ပဗ္ဗတဂ္ဂါ ပတေ’တိ ဝါ; ယဒိ ဝက္ခတိ ကတ္တဗ္ဗံ, ဉာတကာရီဟိ သော ဇိနော’’တိ. "अग्नीत उडी घे किंवा पर्वताच्या शिखरावरून खाली पड, असे जर ते करायला सांगतील, तर जाणकारांनी ते केले पाहिजे, कारण ते जीन (बुद्ध) जाणणारे आहेत." ဧဝမာဒီသု တသဒ္ဒေါ ဉာတကာရီဟိ ကတ္တဗ္ဗတ္တာ ပသိဒ္ဓဗုဒ္ဓပဒတ္ထဝိသယော. इतक्यादींमध्ये 'त' शब्द जाणकारांनी करण्यायोग्य असल्यामुळे प्रसिद्ध असलेल्या 'बुद्ध' या पदाच्या अर्थाचा विषय आहे. ‘‘အတီတံ နာနုသောစာမိ, နပ္ပဇပ္ပာမ’နာဂတံ; ပစ္စုပ္ပန္နေန ယာပေမိ, တေန ဝဏ္ဏော ပသီဒတီ’’တိ. "मी भूतकाळाचा शोक करत नाही, भविष्याची आकांक्षा धरत नाही; मी वर्तमानात जगतो, म्हणूनच माझा वर्ण प्रसन्न दिसतो." ဧဝမာဒီသု တသဒ္ဒေါ အနနုသောစနနပ္ပဇပ္ပနယာပနသင်္ခါတဝိဇာနနဝသေန အနုဘူတတ္ထဝိသယော, တသ္မာ တီသုပိ ဌာနေသု တသဒ္ဒေါ ယသဒ္ဒံ နာပေက္ခတေ. ဧတ္ထ ပန ပက္ကန္တဝိသယော တသဒ္ဒေါ အဓိပ္ပေတော. အပိစ ဥတ္တရဝါကျေ ဌိတော ယသဒ္ဒေါ ပုဗ္ဗဝါကျေ တသဒ္ဒေ အသတိပိ တမေဝ ဒီပေတိ. တထာ ဟိ – इतक्यादींमध्ये 'त' (तेन) हा शब्द शोक न करणे, आकांक्षा न ठेवणे आणि वर्तमानात जगणे या रूपाने अनुभवलेल्या विषयाशी संबंधित आहे, म्हणून तिन्ही ठिकाणी 'त' शब्द 'य' शब्दाची अपेक्षा करत नाही. परंतु येथे प्रकृत विषयाशी संबंधित असलेला 'त' शब्द अभिप्रेत आहे. शिवाय, नंतरच्या वाक्यात असलेला 'य' शब्द आधीच्या वाक्यात 'त' शब्द नसला तरी त्यालाच दर्शवतो. जसे की – ဗောဓိံ နမာမိ နတိဘာဇနမစ္စုဠာရံ,ပုညာကရံ ဘုဝနမဏ္ဍလသောတ္ထိဘူတံ; ယော စက္ခုသောတသတိဂေါစရတံ သမေတော,ဒေါသာရိဒပ္ပမထနေ’ကရသော ဗုဓာနန္တိ. "मी त्या अत्यंत श्रेष्ठ, वंदनीय, पुण्याचा उगम असलेल्या आणि संपूर्ण जगासाठी कल्याणकारी असलेल्या बोधीला वंदन करतो; जी विद्वानांच्या डोळ्यांचा, कानांचा आणि स्मृतीचा विषय झाली आहे, आणि जी दोषांरूपी शत्रूंचा गर्व नष्ट करण्यात एकमेव रस (मुख्य कार्य) असणारी आहे." ယော [Pg.149] ဗုဓာနံ စက္ခုသောတသတီနံ ဂေါစရတံ ဝိသယဘာဝံ သမေတော ပတ္တော, တေသံယေဝ ဒေါသာရီနံ ကိလေသပစ္စတ္ထိကာနံ ဒပ္ပမထနေ ဒပ္ပမဒ္ဒနေ ဧကရသော ပဓာနကိစ္စော သမိဒ္ဓိဝန္တော ဝါ ဟောတိ, တံ ဗောဓိံ နမာမီတိ သမ္ဗန္ဓော. ပုဗ္ဗဝါကျေ ပယောဇိတော ယသဒ္ဒေါ ဥတ္တရဝါကျေ တသဒ္ဒေါပါဒါနေ အသတိ သံသယမုပ္ပာဒယမာနော ဝါကျဿ ဦနတ္တံ ကရောတိ. ဥဒါဟရဏံ ပန ပါကဋံ. "जी विद्वानांच्या डोळ्यांचा, कानांचा आणि स्मृतीचा विषय झाली आहे, आणि क्लेशांरूपी शत्रूंचा गर्व नष्ट करण्यात एकमेव रस असणारी किंवा मुख्य कार्य करणारी आहे, त्या बोधीला मी वंदन करतो" असा संबंध आहे. पहिल्या वाक्यात वापरलेला 'य' शब्द नंतरच्या वाक्यात 'त' शब्दाचा प्रयोग न केल्यास संशय निर्माण करतो आणि वाक्यात उणीव निर्माण करतो. याचे उदाहरण स्पष्टच आहे. ၁၂၃. १२३. ပဒါဘိဓေယျဝိသယံ,သမာသဗျာသသမ္ဘဝံ; ယံ ပါရိဏတျံ ဟောတိ’ဟ,သောပိ ဩဇောဝ တံ ယထာ. शब्द आणि अर्थ यांच्या विषयात, समास किंवा व्यासापासून (विस्तारापासून) उत्पन्न होणारी जी परिपक्वता येथे दिसून येते, ती देखील 'ओज' गुणच आहे, जसे की – ၁၂၃. ‘‘ပဒိ’’စ္စာဒိ. ပဒဿ အဘိဓေယျော အတ္ထော သော ဝိသယော ယဿ. ယတ္ထ ပစုရသဒ္ဒါဘိဓေယျော အတ္ထော သံခိတ္တပဒေဟိ ဝုစ္စတေ, သော သမာသော. ယတ္ထပ္ပကေဟိ ပဒေဟိ အဘိဓေယျတ္ထော ပစုရပဒေဟိ ဝုစ္စတေ, သော ဗျာသော. တတော သမာသဗျာသတော သမ္ဘဝေါ ယဿ. တံ တထာဝိဓံ ယံ ပါရိဏတျံ ပရိဏတဘာဝေါ ဟောတီတိ အနုဝဒိတွာ သောပိ ဣဟ သသတ္ထေ ဩဇောဝါတိ ဝိဓီယတေ. တံ ယထေတျုဘယမ္ပိ ဥဒါဟရတိ. १२३. 'पदि' इत्यादी. पदाचा जो अभिधेय (वाच्य) अर्थ आहे, तो ज्याचा विषय आहे. जेथे पुष्कळ शब्दांनी सांगण्याचा अर्थ संक्षिप्त पदांनी सांगितला जातो, तो 'समास' होय. जेथे थोड्या पदांनी सांगण्याचा अर्थ विस्तृत पदांनी सांगितला जातो, तो 'व्यास' (विस्तार) होय. त्या समास आणि व्यासापासून ज्याची उत्पत्ती होते. त्या प्रकारची जी 'पारिणत्य' म्हणजे परिणत अवस्था (परिपक्वता) होते, असा अनुवाद करून, तो देखील येथे स्वार्थात 'ओज' (ओजोगुण) म्हणून विहित केला जातो. 'तं यथा' (ते जसे) याने त्या दोन्हीचे उदाहरण दिले जाते. ၁၂၃. ‘‘ပဒေ’’စ္စာဒိ. ပဒါနံ ဗဟူနံ အပ္ပကာနံ ဝါ ပဒါနံ အဘိဓေယျဝိသယံ ဝိတ္ထာရသံခိတ္တတ္ထဝိသယဝန္တံ သမာသဗျာသသမ္ဘဝံ ယထာက္ကမံ သင်္ခေပဝိတ္ထာရဒွယေန နိပ္ဖန္နံ နိပ္ဖတ္တိဝန္တံ ဝါ ယံ ပါရိဏတျံ ကတ္တူနံ ဂန္ထဝိသယေ ပရိဏတိပ္ပကာသကော ယော သဒ္ဒဓမ္မော အတ္ထဓမ္မော ဟောတိ, သဒ္ဒဂုဏော အတ္ထဂုဏောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ, သောပိ ဣဟ သုဗောဓာလင်္ကာရေ ဩဇော နာမ သဒ္ဒဂုဏော အတ္ထဂုဏော. တံ ယထာတိ ဒွီသု လက္ခိယံ ဒဿေတိ, ပဒါနံ အဘိဓေယျော ဝိသယော ယဿ ပါရိဏတျဿေတိ စ, သမာသော စ ဗျာသော စာတိ စ, တတော သမ္ဘဝန္တိ စ, တတော သမ္ဘဝေါ အဿာတိ စ, ပရိဏတဿ [Pg.150] ကတ္တုနော ဂန္ထဿ ဧဝ ဝါ ဘာဝေါတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ကတ္တု ပါရိဏတျပက္ခေ တပ္ပကာသကဂန္ထဿ တဒတ္ထေန ပါရိဏတျံ သိဒ္ဓံ. १२३. 'पदे' इत्यादी. अनेक पदांचा किंवा थोड्या पदांचा जो अभिधेय विषय आहे, जो विस्तार आणि संक्षेप अर्थाचा विषय असलेला, समास आणि व्यासापासून उत्पन्न होणारा, अनुक्रमे संक्षेप आणि विस्तार या दोन्हींद्वारे निष्पन्न झालेला किंवा निष्पत्ती असलेला जो 'पारिणत्य' (परिपक्वता) आहे, जो कर्त्यांच्या ग्रंथाच्या विषयात परिणती (परिपक्वता) प्रकाशित करणारा शब्दधर्म किंवा अर्थधर्म असतो, ज्याला शब्दगुण किंवा अर्थगुण म्हटले जाते, तो देखील येथे 'सुबोधालंकार' ग्रंथात 'ओज' नावाचा शब्दगुण आणि अर्थगुण आहे. 'तं यथा' (ते जसे) याने दोन्ही लक्ष्यांमध्ये दाखवले जाते. 'पदांचा अभिधेय विषय आहे ज्या पारिणत्याचा' असा, आणि 'समास आणि व्यास' असा, 'त्यापासून उत्पन्न होतात' असा, 'त्यापासून ज्याची उत्पत्ती आहे' असा, आणि 'परिणत झालेल्या कर्त्याच्या ग्रंथाचाच भाव' असा विग्रह आहे. कर्त्याच्या पारिणत्य पक्षाच्या बाबतीत, त्याला प्रकाशित करणाऱ्या ग्रंथाचे त्या अर्थाने पारिणत्य सिद्ध होते. ၁၂၄. १२४. ဇောတယိတွာန သဒ္ဓမ္မံ,သန္တာရေတွာ သဒေဝကေ; ဇလိတွာ အဂ္ဂိခန္ဓော’ဝ,နိဗ္ဗုတော သော သသာဝကော. सद्धम्माला प्रकाशित करून, देवलोकांसह सर्व प्राण्यांना (संसारसागरातून) तारून, अग्नीच्या विशाल समूहाप्रमाणे प्रज्वलित होऊन, ते (भगवान) आपल्या श्रावकांसह परिनिर्वाण पावले. ၁၂၄. ‘‘ဇောတယိတွာနေ’’စ္စာဒိ. ဣမိနာ ဟေဋ္ဌာ ပစုရပဒါဘိဟိတော ဗုဒ္ဓဝံသော သင်္ခေပရူပေန ဝုတ္တော. १२४. 'जोतयित्वान' इत्यादी. याद्वारे खाली अनेक पदांनी सांगितलेला बुद्धवंश संक्षेप रूपाने सांगितला आहे. ၁၂၄. ‘‘ဇောတယိ’’စ္စာဒိ. သော တထာဂတော သဒ္ဓမ္မံ သပရိယတ္တိကံ နဝလောကုတ္တရသဒ္ဓမ္မံ ဇောတယိတွာန ဉာဏာလောကေန ဩဘာသေတွာ သဒေဝကေ သတ္တေ သန္တာရေတွာ သံသာရသာဂရပရိယန္တမုပနေတွာ အဂ္ဂိခန္ဓောဝ မဟာတေဇေန အဂ္ဂိက္ခန္ဓော ဝိယ ဇလိတွာ အနညသာဓာရဏရူပကာယသမ္ပတ္တိယာ ပဇ္ဇလိတွာ အန္တေ သသာဝကော သာဝကေဟိ သဟ နိဗ္ဗုတော ခန္ဓပရိနိဗ္ဗာနေန ပရိနိဗ္ဗုတောတိ. ဣမိနာ သကလဗုဒ္ဓဝံသေ ဗဟူဟိ ပဒေဟိ ဝုတ္တတ္ထော သင်္ခေပက္ကမေန ဝုတ္တော. သတံ ဓမ္မော, သန္တော သံဝိဇ္ဇမာနော ဝါ ဓမ္မောတိ စ, သဟ ဒေဝေဟိ ဝတ္တမာနာတိ စ, သဟ သာဝကေဟိ ဝတ္တမာနောတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १२४. 'जोतयि' इत्यादी. त्या तथागतांनी सपरियत्तिक (परियत्तीसह) नवलोकुत्तर सद्धम्माला प्रकाशित करून, ज्ञानाच्या प्रकाशाने उजळून, देवलोकांसह सर्व प्राण्यांना तारून, संसारसागराच्या पैलतीराला पोहोचवून, अग्नीच्या विशाल समूहाप्रमाणे महातेजाने प्रज्वलित होऊन, असाधारण रूपकाय संपत्तीने देदीप्यमान होऊन, शेवटी आपल्या श्रावकांसह 'खंडपरिनिर्वाणा'ने (स्कंधपरिनिर्वाणाने) परिनिर्वाण प्राप्त केले. याद्वारे संपूर्ण बुद्धवंशात अनेक पदांनी सांगितलेला अर्थ संक्षेप क्रमाने सांगितला आहे. 'सत्पुरुषांचा धम्म' किंवा 'विद्यमान असलेला धम्म' म्हणजे सद्धम्म, 'देवांसह वर्तमान असलेले' म्हणजे सदेवक, आणि 'श्रावकांसह वर्तमान असलेले' म्हणजे सश्रावक, असा विग्रह आहे. ၁၂၅. १२५. မတ္ထကဋ္ဌီ မတဿာပိ, ရဇောဘာဝံ ဝဇန္တု မေ; ယတော ပုညေန တေ သေန္တိ, ဇေနပါဒမ္ဗုဇဒွယေ. मृत्यूनंतरही माझ्या मस्तकाची हाडे धूळ बनून जावोत; जेणेकरून पुण्याच्या प्रभावाने ती धूळ जिनांच्या (बुद्धांच्या) दोन्ही चरणकमलांवर स्थिरावेल. ၁၂၅. ‘‘မတ္ထကဋ္ဌီ’’ဣစ္စာဒိ. မတဿာပိ မရဏမာပန္နဿာပိ မေ မတ္ထကေ မုဒ္ဓနိ အဋ္ဌီ ရဇောဘာဝံ ဓူလိတ္တံ ဝဇန္တု ပါပုဏန္တု. ကသ္မာတိ စေ? ယတော ယသ္မာ ကာရဏာ ပုညေန ကုသလေန ကမ္မေန ဟေတုနာ တေ ရဇာ ဇိနဿ ဣမေ ဇေနာ, ပါဒါ, တေယေဝ အမ္ဗုဇာနိဝ အမ္ဗုဇာနိ, တေသံ ဒွယေ [Pg.151] သေန္တိ ပဝတ္တန္တိ, တထာ ဟောတု ဝါ မာ ဝါ, ပဏတိဂေဓေနေဝ ဝဒတိ. ဧတ္ထ ‘‘ကထမဟံ ဘဂဝတော ပါဒေ နိစ္စံ သိရသာ ပဏမာမီ’’တျဓိပ္ပာယော ဝိတ္ထာရေန ဝုတ္တော. १२५. 'मत्थकट्ठी' इत्यादी. मृत झालेल्या म्हणजे मरणाला प्राप्त झालेल्या माझ्या मस्तकावरील हाडे धूळ बनून जावोत (धुलिकण होवोत). असे का? कारण ज्या पुण्याच्या म्हणजे कुशल कर्माच्या हेतूने ते धुलिकण जिनांच्या (बुद्धांच्या) या चरणकमलांच्या जोडीवर पडतील (स्थिरावतील). असे होवो वा न होवो, केवळ वंदनेच्या तीव्र इच्छेनेच ते असे म्हणतात. येथे 'मी भगवंतांच्या चरणांवर नित्य मस्तक ठेवून कशा प्रकारे वंदन करू?' हा अभिप्राय विस्ताराने सांगितला आहे. ၁၂၅. ‘‘မတ္ထကိ’’စ္စာဒိ, မတဿာပိ မေ မယှံ မတ္ထကဋ္ဌီ မုဒ္ဓနိ အဋ္ဌီနိ ရဇောဘာဝံ အတိသုခုမရဇတ္တံ ဝဇန္တု ပါပုဏန္တု. ကသ္မာ အာသီသနံ ကရောတီတိ စေ? ယတော ယသ္မာ ကာရဏာ ပုညေန မယှံ တထာဝိဓေန ကုသလကမ္မေန ဟေတုနာ တေ ရဇာ ဇေနပါဒမ္ဗုဇဒွယေ ဇိနပဋိဗဒ္ဓစရဏပဒုမယုဂဠေ သေန္တိ ပဝတ္တန္တိ, ဗုဒ္ဓဿ သိရိပါဒေ ကိဉ္စိပိ ရဇောဇလ္လံ န ဥပလိမ္ပတေဝ, တထာပိ ဝန္ဒနာဘိလာသေန ဧဝံ ဝုတ္တံ. ဧတ္ထ ‘‘ကထမဟံ ဘဂဝတော သိရိပါဒေ မုဒ္ဓနာ နိစ္စံ ပဏမာမီ’’တျဘိလာသော ဝိတ္ထာရေန ဝုတ္တော. မတ္ထကေ အဋ္ဌီတိ စ, ရဇသော ဘာဝေါတိ စ, ဇိနဿ ဣမေတိ စ, ဇေနာ စ တေ ပါဒါ စေတိ စ, တေယေဝ အမ္ဗုဇာနီတိ စ, တေသံ ဒွယန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १२५. “मत्थकि” इत्यादी, माझ्या मृत्यूनंतरही माझ्या डोक्यातील हाडे (मत्थकट्ठी) धुलिकण बनोत (अतिसूक्ष्म धुलिकण होवोत). अशी आकांक्षा का केली जात आहे? कारण ज्या पुण्यामुळे, माझ्या तशा प्रकारच्या कुशल कर्माच्या हेतूने, ते धुलिकण जिनांच्या (बुद्धांच्या) चरणकमलद्वयावर (जिनांशी संबंधित चरणकमलयुगुलावर) पडतील (किंवा राहतील). बुद्धांच्या श्रीचरणांवर कोणताही धुलिकण किंवा मळ लिप्त होत नाही, तरीही वंदनेच्या इच्छेने असे म्हटले आहे. येथे “मी भगवंतांच्या श्रीचरणांवर डोके ठेवून निरंतर कशा प्रकारे वंदन करू?” ही इच्छा विस्ताराने सांगितली आहे. 'मत्थके अट्ठी' (डोक्यातील हाडे), 'रजसो भावो' (धुलिकण होणे), 'जिनस्स इमे' (जिनांचे हे), 'जेना च ते पादा च' (जे जिन आहेत आणि त्यांचे पाय), 'तेयेव अम्बुजानि' (तेच कमळ), 'तेसं द्वयं' (त्यांचे द्वय) असा विग्रह आहे. ၁၂၆. १२६. ဣစ္စတြ နိစ္စံပဏတိ-ဂေဓော သာဓု ပဒိဿတိ; ဇာယတေ’ယံ ဂုဏော တိက္ခ-ပညာန’မဘိယောဂတော. अशा प्रकारे येथे निरंतर वंदन करण्याची तीव्र इच्छा (आसक्ती) चांगल्या प्रकारे दिसून येते; हा गुण तीक्ष्ण प्रज्ञा असलेल्यांच्या (तीव्र बुद्धिमत्ता असलेल्यांच्या) सततच्या अभ्यासाने (प्रयत्नाने) उत्पन्न होतो. ၁၂၆. ဗျာသတ္တမေဝဿ ဝိဝရတိ ‘‘ဣစ္စတြိ’’စ္စာဒိနာ. ဣစ္စေဝံ အတြ ဂါထာယံ ပဏတိယံ ပဏာမေ ဂေဓော အဓိကစ္ဆန္ဒော သာဓု သုန္ဒရံ ပဒိဿတိ ဝိညာယတေ, အယံ ယထာဝုတ္တော ဩဇော ဂုဏော ပရိဏတဘာဝသင်္ခါတော တိက္ခပညာနံ သာတိသယမတီနံ ဧဝံ သန္တေပိ အဘိယောဂတော ပုနပ္ပုနပ္ပဝတ္တိတပရိစယဗလေန ဇာယတေ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. १२६. याचाच विस्तार “इच्चत्र” इत्यादीने स्पष्ट केला आहे. अशा प्रकारे या गाथेमध्ये वंदना करण्याविषयीची तीव्र इच्छा (अधिक छंद) चांगल्या प्रकारे (सुंदर रीतीने) दिसून येते (किंवा समजते). हा पूर्वोक्त 'ओज' गुण, जो परिपक्व भावाने युक्त आहे, तो तीक्ष्ण प्रज्ञा असलेल्यांच्या (अतिशय बुद्धिमान लोकांच्या) सततच्या अभ्यासाने आणि वारंवार केलेल्या सरावाच्या बळावर उत्पन्न होतो. ၁၂၆. ဣဒါနိ သံခိတ္တဿတ္ထဿ ဝိတ္ထာရေန ပကာသိတဘာဝံ ‘‘ဣစ္စတြ’’ဣစ္စာဒိနာ နိဒ္ဒိသတိ. ဣတိ ဣမိနာ အနန္တရဂါထာယံ ဝုတ္တက္ကမေန အတြ ဣမိဿံ ဂါထာယံ နိစ္စံပဏတိဂေဓော နိရန္တရပဏာမေ အဓိကကတ္တုကာမတာကုသလစ္ဆန္ဒော သာဓု ဝိဘူတော ဝိဘူတံ ဝါ ပဒိဿတိ ပညာယတိ, အယံ [Pg.152] ဂုဏော ယထာဝုတ္တော အယံ ပရိဏတဘာဝသင်္ခါတော ဩဇော နာမ သဒ္ဒတ္ထဂုဏော တိက္ခပညာနံ သုခုမဗုဒ္ဓိမန္တာနံ အဘိယောဂတော ဂန္ထဝိသယဘူတေန နိရန္တရာဘျာသေနေဝ ဇာယတေ သိဇ္ဈတိ, ဝတ္တု ပါရိဏတျေနေဝ ဘဝနတော ယေသံ ကေသဉ္စိ ယေန ကေနစိ ပကာရေန န သိဇ္ဈတီတိ. နိစ္စံ ပဝတ္တာ ပဏတီတိ စ, တဿံ ဂေဓောတိ စ, တိက္ခာ ပညာ ယေသန္တိ စ, အဘိ ပုနပ္ပုနံ ယောဂေါ ယုဉ္ဇနန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १२६. आता संक्षेपाने सांगितलेल्या अर्थाचा विस्ताराने प्रकाश पाडणारा भाव “इच्चत्र” इत्यादीने दर्शवितात. अशा प्रकारे, या आधीच्या गाथेत सांगितलेल्या क्रमाने, या गाथेत निरंतर वंदन करण्याची तीव्र इच्छा (अधिक करण्याची इच्छा असलेला कुशल छंद) चांगल्या प्रकारे स्पष्टपणे दिसून येते (किंवा समजते). हा पूर्वोक्त गुण, जो परिपक्व भावाने युक्त असलेला 'ओज' नावाचा शब्दार्थ गुण आहे, तो तीक्ष्ण प्रज्ञा असलेल्या (सूक्ष्म बुद्धिमत्ता असलेल्या) लोकांच्या ग्रंथाच्या विषयातील निरंतर अभ्यासानेच उत्पन्न होतो (किंवा सिद्ध होतो). वक्त्याच्या परिपक्वतेमुळेच तो होत असल्याने, इतर कोणाही द्वारे कोणत्याही प्रकारे तो सिद्ध होत नाही. 'निच्चं पवत्ता पणती' (निरंतर चालणारे वंदन), 'तस्सं गेधो' (त्यात असलेली तीव्र इच्छा), 'तिक्खा पञ्ञा येसं' (ज्यांची प्रज्ञा तीक्ष्ण आहे), 'अभि पुनप्पुनं योगो युञ्जनं' (वारंवार अभ्यास करणे किंवा जोडणे) असा विग्रह आहे. ၁၂၇. १२७. မဓုရတ္တံ ပဒါသတ္တိ-ရနုပ္ပာသဝသာ ဒွိဓာ; သိယာ သမသုတိ ပုဗ္ဗာ, ဝဏ္ဏာဝုတ္တိ ပရော ယထာ. मधुरता (माधुर्य गुण) ही पदांची आसत्ती (जवळ असणे) आणि अनुप्रास या दोन कारणांमुळे दोन प्रकारची असते; पहिली (पदांची आसत्ती) ही 'समश्रुती' (समान ऐकू येणारी) असावी आणि दुसरी (अनुप्रास) ही 'वर्णावृत्ती' (वर्णांची पुनरावृत्ती) असावी, जसे की... ၁၂၇. မာဓုရိယမဝဓာရယမာဟ ‘‘မဓုရတ္တ’’မိစ္စာဒိ. သဝနီယတ္တေန မနောဟရတ္တံ မဓုရတ္တံ. တံ ပဒါနိ ဝါကျာလင်္ကာရာနိ သမာနာနိ ဥတ္တရုတ္တရေဟိ, တေသံ အာသတ္တိ ဌာနာဒိနာယထာကထဉ္စိ သမသုတီနံ အာသန္နတာ ပဒါသတ္တိ, ပဌမပ္ပယုတ္တဿက္ခရဿ ပစ္ဆာ ပါသော ပက္ခေပေါ အနုပ္ပာသော, ပဒါသတ္တိ စ အနုပ္ပာသော စ, တေသံ ဝသေန ဒွိဓာ ဟောတိ. ‘‘ကီဒိသာ တေ’’တိ အာဟ ‘‘သိယာ’’တိအာဒိ. ပုဗ္ဗာ ပဌမာဘိဟိတာ ပဒါသတ္တိ သမာ ယေန ကေနစိ ဌာနမတ္တာသံယောဂါဒိနာ ပဒန္တရေန သုတိ ဝဏ္ဏော ယဿာ သာ သိယာ ဘဝေယျ, ပရော ပစ္ဆိမော အနုပ္ပာသော တု ဝဏ္ဏဿ သရဗျဉ္ဇနလက္ခဏဿ အာဝုတ္တိ ပုနပ္ပုနုစ္စာရဏံ သိယာတိ. ဧဝံ ကတ္ထစိ ဗန္ဓေ သမာနပဒါသတ္တိ ကတ္ထစိ အနုပ္ပာသော ကတ္ထစိ တဒုဘယံ, ဒွယေန ရဟိတော ဝိရသော ဗန္ဓော နဿာဒီယတေ ကဝီဟိ, တာဒိသံ မဓုရတ္တံ ဒုဝိဓံ ပဋိပဇ္ဇိတဗ္ဗံ, သိလေသသမတာနွိတန္တုစ္စန္တမေဝ ရမဏီယံ သိယာတိ လက္ခဏံ ဒဿေတွာ ‘‘ယထေ’’တိ လက္ခိယမုဘယတ္ထောဒါဟရတိ ‘‘ယဒေ’’စ္စာဒိနာ, ‘‘မုနိန္ဒိ’’စ္စာဒိနာ စ. १२७. माधुर्य निश्चित करताना “मधुरत्तं” इत्यादी म्हटले आहे. ऐकण्यास योग्य असल्याने जे मनोहारी असते, ते 'मधुरत्व' (माधुर्य) होय. ते वाक्य अलंकारयुक्त आणि पुढील पदांशी समान असणारे पद होय; त्यांची उच्चारण स्थान इत्यादींच्या आधारे कोणत्याही प्रकारे समान ऐकू येण्याची जी जवळीक असते, ती 'पदासत्ती' होय. पहिल्यांदा वापरलेल्या अक्षराचा नंतर पुन्हा प्रयोग करणे (फेकणे) म्हणजे 'अनुप्रास' होय. अशा प्रकारे 'पदासत्ती' आणि 'अनुप्रास' यांच्यामुळे ते दोन प्रकारचे असते. “ते कसे असावेत?” यावर “सिया” इत्यादी म्हटले आहे. पहिली, म्हणजेच आधी सांगितलेली 'पदासत्ती' ही उच्चारण स्थान, मात्रा किंवा संयोगाच्या आधारे दुसऱ्या पदाशी समान ऐकू येणारा वर्ण असणारी असावी. तर दुसरी, म्हणजेच नंतरचा 'अनुप्रास' हा स्वर आणि व्यंजनांच्या स्वरूपातील वर्णांची पुनरावृत्ती (वारंवार उच्चारण) असावा. अशा प्रकारे काही रचनांमध्ये समान पदासत्ती असते, काही ठिकाणी अनुप्रास असतो, तर काही ठिकाणी दोन्ही असतात. या दोन्ही गोष्टींनी रहित असलेली नीरस रचना कवींकडून स्वीकारली जात नाही. अशा प्रकारचे माधुर्य दोन प्रकारे समजून घेतले पाहिजे. श्लेष आणि समतेने युक्त असलेली रचनाच अत्यंत रमणीय असते, असे लक्षण दाखवून “यथा” या शब्दाने दोन्ही उदाहरणे “यदा” इत्यादी आणि “मुनिन्द” इत्यादी गाथांद्वारे स्पष्ट केली आहेत. ၁၂၇. ဣဒါနိ မဓုရဂုဏံ ဒဿေတိ ‘‘မဓုရိ’’စ္စာဒိနာ. မဓုရတ္တံ သဝနီယဘာဝတော မနောဟရတ္တံ မဓုရဂုဏံ, ပဒါနံ ဝါကျာဝယဝသင်္ခါတာနံ သျာဒျန္တာဒီနံ ဥပရူပရိပဒေဟိ သမာနာနံ [Pg.153] အာသတ္တိ ဌာနကရဏာဒိနာ ယေန ကေနစိ ပကာရေန အညမညံ အာသန္နတာ, အနုပ္ပာသော ပုဗ္ဗုစ္စာရိတဝဏ္ဏာနံ ပုန ပက္ခိပနဉ္စာတိ ဒွိန္နံ ဝသာ ဝိဘာဂေန ဒွိဓာ ဟောတိ. တတ္ထ ပုဗ္ဗာ ပဒါသတ္တိ သမသုတိ သိယာ, ပုဗ္ဗာပရဝဏ္ဏာနံ ဌာနမတ္တာကရဏာဒီဟိ အာသန္နသုတိသင်္ခတဝဏ္ဏဝုတ္တိ ဟောတိ, ပရော အနုပ္ပာသော ပန ဝဏ္ဏာဝုတ္တိ သရဗျဉ္ဇနသဘာဝါနံ ပုဗ္ဗုစ္စာရိတဝဏ္ဏာနံ ပုနပ္ပုနုစ္စာရဏံ သိယာတိ. ယထာတိ ဒွီသု ဥဒါဟရဏမာဒိသတိ. ဧဝံ ကတ္ထစိ ဗန္ဓေ ပဒါသတ္တိ ကတ္ထစိ အနုပ္ပာသော ကတ္ထစိ တဒုဘယံ, ဒွီဟိ ဝိနိမုတ္တော ပန ဗန္ဓော ဝိညူဟိ အဿာဒနီယော န ဟောတိ. ဥပရိ ဝက္ခမာနာဟိ သိလေသသမတာဟိ ယုတ္တံ မဓုရတ္တံ ပန ဝိသေသတော အဿာဒနီယံ ဟောတီတိ. မဓုရဿ ဗန္ဓဿ ဘာဝေါတိ စ, ပဒါနံ အာသတ္တီတိ စ, အနု ပစ္ဆာ ပါသော ပက္ခေပေါတိ စ, ပဒါသတ္တိ စ အနုပ္ပာသော စာတိ စ, တေသံ ဝသော ဘေဒေါတိ စ, သမာ သုတိ ဝဏ္ဏော ယဿာတိ စ, ဝဏ္ဏဿ အာဝုတ္တီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १२७. आता “मधुर” इत्यादीने माधुर्य गुण दाखवितात. ऐकण्यास योग्य असल्यामुळे जे मनोहारी असते, ते 'मधुरत्व' म्हणजेच 'माधुर्य गुण' होय. वाक्याचे अवयव मानल्या गेलेल्या सुबंत-तिङंत इत्यादी पदांची पुढील पदांशी उच्चारण स्थान, करण इत्यादींच्या आधारे कोणत्याही प्रकारे परस्परांशी असणारी जवळीक (आसत्ती), आणि आधी उच्चारलेल्या वर्णांचा पुन्हा प्रयोग करणे म्हणजे 'अनुप्रास' होय. या दोन्हीच्या प्रभावाने विभागणीनुसार ते दोन प्रकारचे असते. त्यामध्ये पहिली 'पदासत्ती' ही 'समश्रुती' असावी, म्हणजेच पूर्व आणि पर वर्णांच्या उच्चारण स्थान, मात्रा, करण इत्यादींच्या आधारे जवळच्या श्रुतींनी युक्त असणारी वर्णावृत्ती होय. तर दुसरा 'अनुप्रास' म्हणजे वर्णावृत्ती होय, जी स्वर आणि व्यंजनांच्या स्वरूपातील आधी उच्चारलेल्या वर्णांची वारंवार होणारी पुनरावृत्ती असावी. “यथा” (जसे की) असे म्हणून दोन्ही उदाहरणे दर्शवितात. अशा प्रकारे काही रचनांमध्ये पदासत्ती असते, काही ठिकाणी अनुप्रास असतो, तर काही ठिकाणी दोन्ही असतात. या दोन्ही गोष्टींनी विरहित असलेली रचना विद्वानांना आस्वाद घेण्यायोग्य वाटत नाही. पुढे सांगितल्या जाणाऱ्या श्लेष आणि समतेने युक्त असलेले माधुर्य विशेषतः आस्वाद घेण्यायोग्य असते. 'मधुरस्स बंधस्स भावो' (मधुर रचनेचा भाव), 'पदानं आसत्ती' (पदांची जवळीक), 'अनु पच्छा पासो पक्खेपो' (नंतर पुन्हा प्रयोग करणे), 'पदासत्ती च अनुप्रासो च' (पदासत्ती आणि अनुप्रास), 'तेसं वसो भेदो' (त्यांचा भेद), 'समा सुति वण्णो यस्सा' (ज्याची श्रुती किंवा वर्ण समान आहे), 'वण्णस्स आवुत्ती' (वर्णाची पुनरावृत्ती) असा विग्रह आहे. ၁၂၈. १२८. ယဒါ ဧသော’ဘိသမ္ဗောဓိံ,သမ္ပတ္တော မုနိပုင်္ဂဝေါ; တဒါ ပဘုတိ ဓမ္မဿ,လောကေ ဇာတော မဟုဿဝေါ. जेव्हा या मुनिश्रेष्ठांनी (मुनिपुंगवांनी) अभिसंबोधी (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त केली; तेव्हापासून जगात धर्माचा मोठा उत्सव (महोत्सव) सुरू झाला. ၁၂၈. ဧသော မုနိပုင်္ဂဝေါ ယဒါ ယတော ပဘုတိ အဘိသမ္ဗောဓိံ သဗ္ဗညုတညာဏံ သမ္ပတ္တော သမဓိဂတော, တဒါ ပဘုတိ တတော အာရဗ္ဘ ဓမ္မဿ စတုသတိပဋ္ဌာနာဒိဘေဒဿ သတ္တတိံသဗောဓိပက္ခိယသင်္ခါတဿ မဟုဿဝေါ မဟန္တော အဗ္ဘုဒယော နိပ္ပဋိပက္ခာ ပဝတ္တိ လောကေ တိဝိဓေ ဇာတော အဟောသီတိ. ဣဟ ကွစိ ဒီဃတာကတံ သဒိသတ္တံ, ကွစိ ဌာနကတံ, ကွစိ သံယောဂကတံ, ကွစိ အညထာ, တေနာဟ ‘‘သိယာ သမသုတိ ပုဗ္ဗာ’’တိ. १२८. जेव्हापासून या मुनिश्रेष्ठांनी अभिसंबोधी म्हणजेच सर्वज्ञता-ज्ञान प्राप्त केले, तेव्हापासून आरंभ करून, चार स्मृतिप्रस्थान इत्यादी भेदांनी युक्त आणि सदतीस बोधिपाक्षिक धर्मांच्या स्वरूपातील धर्माचा मोठा उत्सव (महान अभ्युदय आणि निष्कंटक प्रवृत्ती) तिन्ही प्रकारच्या लोकांमध्ये (लोकात) उत्पन्न झाला. येथे काही ठिकाणी दीर्घत्वामुळे समानता आहे, काही ठिकाणी स्थानामुळे, काही ठिकाणी संयोगामुळे, तर काही ठिकाणी इतर कारणांमुळे आहे; म्हणूनच “सिया समसुति पुब्बा” (पहिली समश्रुती असावी) असे म्हटले आहे. ၁၂၈. ‘‘ယဒိ’’စ္စာဒိ. [Pg.154] ဧသော မုနိပုင်္ဂဝေါ ယဒါ အဘိသမ္ဗောဓိံ သဗ္ဗညုတံ သမ္ပတ္တော သသန္တာနေ ဥပ္ပာဒနဝသေန သမ္ပာပုဏိ, တဒါ ပဘုတိ တတော ပဋ္ဌာယ ဓမ္မဿ ကာယာနုပဿနာသတိပဋ္ဌာနာဒိပဘေဒဿ သတ္တတိံသဗောဓိပက္ခိယဓမ္မဿ မဟုဿဝေါ မဟာဘိဝုဒ္ဓိ လောကေ ကာမာဒိလောကတ္တယေ ဇာတောတိ. ဣဟ ‘‘ယဒါ ဧသော’’တိ ဒီဃကာလဝသေန အာသန္နတာ, ‘‘ယ ဧ’’တိ ဌာနဝသေန အာသန္နတာ, ‘‘အဘိသမ္ဗောဓိံ သမ္ပတ္တော’’တိ သံယောဂဝသေန အာသန္နတာ, ‘‘ဘိ ဓိ’’န္တိ ဓနိတတော အာသန္နတာတိ ဣစ္စာဒိနာ ပဒါသတ္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. အဘိသမ္ဗုဇ္ဈတိ ဧတာယာတိ စ, ပုမာ စ သော ဂေါစေတိ စ, မုနီနံ ပုင်္ဂဝေါတိ စ, မဟန္တော စ သော ဥဿဝေါ စာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १२८. "यदि" इत्यादी. जेव्हा या मुनिश्रेष्ठाने (मुनिपुंगवाने) स्वतःच्या चित्तसंततीमध्ये उत्पन्न होण्याच्या रूपाने अभिसंबोधी म्हणजेच सर्वज्ञता प्राप्त केली, तेव्हापासून या लोकामध्ये (कामलोकादी तिन्ही लोकांमध्ये) कायानुपस्सना सतिपट्ठान इत्यादी प्रकारच्या सदतीस बोधिपक्खिय धम्माचा मोठा उत्सव म्हणजेच मोठी अभिवृद्धी झाली. येथे "यदा एसो" या शब्दांमध्ये दीर्घ काळाच्या दृष्टीने निकटता (आसन्नता) आहे, "य ए" मध्ये स्थानाच्या दृष्टीने निकटता आहे, "अभिसंबोधिं संपत्तो" मध्ये संयोगाच्या दृष्टीने निकटता आहे, "भि धि" मध्ये ध्वनीच्या दृष्टीने निकटता आहे, अशा प्रकारे पदांची आसत्ती (निकटता) पाहावी. "अभिसम्बुज्झति एतायाति" (ज्याद्वारे अभिसंबुद्ध होतात ती), "पुमा च सो गोचेति च" (तो पुरुष आणि श्रेष्ठ आहे), "मुनीनं पुङ्गवोति" (मुनींमध्ये श्रेष्ठ), आणि "महन्तो च सो उस्सवाे चाति" (तो मोठा उत्सव आहे) असा विग्रह आहे. ၁၂၉. १२९. မုနိန္ဒမန္ဒဟာသာ တေ, ကုန္ဒသန္ဒောဟဝိဗ္ဘမာ; ဒိသန္တ’မနုဓာဝန္တိ, ဟသန္တာ စန္ဒကန္တိယော. कुंदाच्या फुलांच्या समूहासारखी शोभा असणारे ते मुनींद्रांचे (बुद्धांचे) मंदहास्य, चंद्राच्या किरणांना हसवत (त्यांच्यावर मात करत) दिशांच्या अंतापर्यंत धावत जाते (सर्व दिशांना पसरते). ၁၂၉. ကုန္ဒာနံ ကုသုမာနံ သန္ဒောဟော သမူဟော, တဿ ဝိဗ္ဘမော ယေသံ တေ, မုနိန္ဒဿ မန္ဒဟာသာ မနုညာ ဟသိတာနိ စန္ဒဿ ကန္တိယော သောဘာယော ဟသန္တာ ဝိဍမ္ဗယန္တာ ဒိသန္တမနုဓာဝန္တိ အနုဝိစရန္တိ. ဣစ္စတြ နကာရသဟိတဿ ဒကာရဿ, တကာရဿ စာနုဝတ္တနံ. १२९. कुंद फुलांचा संदोह म्हणजे समूह, त्याची शोभा ज्यांच्यामध्ये आहे ते; मुनींद्रांचे (बुद्धांचे) मंदहास्य म्हणजे मनोहर हास्य, चंद्राच्या कांतीला (शोभेला) हसवत म्हणजेच तिचे विडंबन करत (तिच्यावर मात करत) दिशांच्या अंतापर्यंत धावते म्हणजेच सर्वत्र पसरते. येथे 'न' कारयुक्त 'द' कार आणि 'त' कार यांची अनुवृत्ती (पुनरावृत्ती) आहे. ‘‘ဣန္ဒနီလဒလဒွန္ဒ-သုန္ဒရံ သိရိမန္ဒိရံ; မုနိန္ဒနယနဒွန္ဒံ, ဝိန္ဒတိ’န္ဒီဝရဇ္ဇုတိံ’’. "इंद्रनील मण्याच्या दोन पाकळ्यांप्रमाणे सुंदर आणि सौंदर्याचे मंदिर (निवासस्थान) असलेले मुनींद्रांचे (बुद्धांचे) दोन्ही नेत्र, नीलकमलाची कांती (शोभा) प्राप्त करतात." ဣစ္စပရမုဒါဟရဏံ. हे दुसरे उदाहरण आहे. ၁၂၉. ‘‘မုနိန္ဒိ’’စ္စာဒိ. ကုန္ဒသန္ဒောဟဝိဗ္ဘမာ သုပုပ္ဖိတကုန္ဒကုသုမရာသိသဒိသလီလာဝန္တာ တေ မုနိန္ဒမန္ဒဟာသာ ဗုဒ္ဓဿ မနုညာ ဟသိတာ စန္ဒကန္တိယော နိမ္မလစန္ဒကိရဏေ ဟသန္တာ နိန္ဒန္တာ ဒိသန္တံ တံ တံ ဒိသံ, ဒိသာပရိယန္တံ ဝါ အနုဓာဝန္တိ ဝိဓာဝန္တီတိ. ဧတ္ထ နကာရသဟိတဒကာရဿ, နကာရသဟိတတကာရဿ စ အာဝုတ္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. မန္ဒာ စ တေ ဟာသာ စေတိ [Pg.155] စ, မုနိန္ဒဿ မန္ဒဟာသာတိ စ, ကုန္ဒာနံ သန္ဒောဟောတိ စ, တဿ ဝိဗ္ဘမော ယေသန္တိ စ, ဒိသာယေဝ ဒိသန္တံ, ဒိသာနံ ဝါ အန္တန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १२९. "मुनिन्द" इत्यादी. कुंद फुलांच्या समूहाच्या शोभेसारखी, म्हणजेच चांगल्या फुललेल्या कुंद फुलांच्या राशीसारखी विलास असणारे ते मुनींद्रांचे मंदहास्य, बुद्धांचे मनोहर हास्य, चंद्राच्या कांतीला म्हणजेच निर्मळ चंद्रकिरणांना हसवत (त्यांच्यावर मात करत) दिशांच्या अंतापर्यंत म्हणजेच त्या त्या दिशेला किंवा दिशांच्या मर्यादेपर्यंत धावते (पसरते). येथे 'न' कारयुक्त 'द' कार आणि 'न' कारयुक्त 'त' कार यांची आवृत्ती (पुनरावृत्ती) पाहावी. "मन्दा च ते हासा चेति" (ते मंद आणि हास्य आहेत), "मुनिन्दस्स मन्दहासाति" (मुनींद्रांचे मंदहास्य), "कुन्दानां संदोहोति" (कुंदांचा समूह), "तस्स विब्भमो yeसन्ति" (त्याची शोभा ज्यांच्यामध्ये आहे ते), "दिसायेव दिसन्तं" किंवा "दिसानं वा अन्तान्ति" (दिशांचा अंत) असा विग्रह आहे. ‘‘ဣန္ဒနီလဒလဒွန္ဒ-သုန္ဒရံ သိရိမန္ဒိရံ; မုနိန္ဒနယနဒွန္ဒံ, ဝိန္ဒတိ’န္ဒီဝရဇ္ဇုတိ’’န္တိ. "इंद्रनील मण्याच्या दोन पाकळ्यांप्रमाणे सुंदर आणि सौंदर्याचे मंदिर असलेले मुनींद्रांचे दोन्ही नेत्र, नीलकमलाची कांती प्राप्त करतात." ဣဒမ္ပိ နကာရသဟိတဒကာရဝဏ္ဏာဝုတ္တိယာ အပရမုဒါဟရဏံ. हे देखील 'न' कारयुक्त 'द' कार या वर्णाच्या आवृत्तीचे दुसरे उदाहरण आहे. တတ္ထ ဣန္ဒနီလဒလဒွန္ဒသုန္ဒရံ ဣန္ဒနီလမဏိသကလိကာယုဂဠမိဝ မနောဟရံ သိရိမန္ဒိရံ တတောယေဝ သောဘာယ နိဝါသဋ္ဌာနဘူတံ မုနိန္ဒနယနဒွန္ဒံ ဣန္ဒီဝရဇ္ဇုတိံ နီလုပ္ပလကန္တိံ ဝိန္ဒတိ အနုဘောတိ, ဣန္ဒီဝရဇ္ဇုတိသမာနာတိ အဓိပ္ပာယော. त्यामध्ये, 'इंद्रनीलदलद्वंद्वसुंदरम्' म्हणजे इंद्रनील मण्याच्या दोन तुकड्यांप्रमाणे (पाकळ्यांप्रमाणे) मनोहर, 'सिरिमंदिरम्' म्हणजे त्याच शोभेचे निवासस्थान असलेले मुनींद्रांचे (बुद्धांचे) दोन्ही नेत्र, 'इंदीवरज्जुतिम्' म्हणजे नीलकमलाची कांती प्राप्त करतात (अनुभवतात); नीलकमलाच्या कांतीसमान आहेत, असा अभिप्राय आहे. ၁၃၀. १३०. သဗ္ဗကောမလဝဏ္ဏေဟိ, နာ’နုပ္ပာသော ပသံသိယော; ယထာ’ယံ မာလတီမာလာ, လိနလောလာလိမာလိနီ. केवळ सर्व कोमल वर्णांनी केलेला अनुप्रास प्रशंसनीय मानला जात नाही; जसे की ही मालतीची माळ, जिच्यावर लीन (बसलेले) आणि लोल (लोभी) असलेले भ्रमर माळेसारखे (रांगेत) आहेत. ၁၃၀. ယေဟိ ကေဟိစိ အာဝုတ္တိတော အနုပ္ပာသောတိ စေ? နေတျာဟ ‘‘သဗ္ဗ’’ဣစ္စာဒိ. သဗ္ဗေဟိ ကောမလေဟိ သုကုမာရေဟိ ဝဏ္ဏေဟိ အက္ခရေဟိ အနုပ္ပာသော န ပသံသိယော သိလာဃနီယော န ဟောတိ သိလေသဝိရောဓိတ္တာ. ‘‘ယထေ’’တိ တံ ဥဒါဟရတိ. အယံ မာလတီမာလာ ဇာတိကုသုမဒါမံ လိနာနံ ဗျာဓိတာနံ လောလာနံ [Pg.156] ကုသုမရသာရဗ္ဘ လောလုပါနံ အလီနံ ဘမရာနံ မာလာ ပန္တိ သာ အဿာ အတ္ထီတိ လိနလောလာလိမာလိနီ. १३०. कोणत्याही वर्णांच्या आवृत्तीने अनुप्रास होतो का? तर नाही, असे सांगण्यासाठी "सब्ब" इत्यादी म्हटले आहे. सर्व कोमल म्हणजेच सुकुमार वर्णांनी (अक्षरांनी) केलेला अनुप्रास प्रशंसनीय (श्लाघनीय) नसतो, कारण तो श्लेष अलंकाराच्या विरुद्ध असतो. "यथा" या शब्दाने त्याचे उदाहरण देतात. ही मालतीची माळ म्हणजे जाईच्या फुलांचा हार; लीन झालेल्या (बसलेल्या), लोल (फुलांच्या रसासाठी हपापलेल्या) भ्रमरांच्या (अलिंच्या) माळा (रांगा) जिच्यावर आहेत, ती 'लीनलोलालिमालिनी' होय. ၁၃၀. ဝုတ္တာနုပ္ပာသောပိ သဗ္ဗကောမလဝဏ္ဏေဟိ ဝိရစိတော န ပသံသိယောတိ ဒဿေတုံ ‘‘သဗ္ဗကောမလဝဏ္ဏေဟီ’’တိအာဒိမာဟ. သဗ္ဗကောမလဝဏ္ဏေဟိ သဗ္ဗေဟိ သုကုမာရက္ခရေဟိ ကတော အနုပ္ပာသော ဝဏ္ဏာဝုတ္တိလက္ခဏော န ပသံသိယော သိလေသာလင်္ကာရဝိရုဒ္ဓတ္တာ ပသတ္ထော န ဟောတိ. ‘‘ယထာ’’တိ တမုဒါဟရတိ. အယံ မာလတီမာလာ ဧသာ ဇာတိသုမနမာလိကာ လိနာနံ ဗျာဝဋာနံ ပတန္တာနံ လောလာနံ ဂန္ဓလုဒ္ဓါနံ အလီနံ ဘမရာနံ မာလိနီ ပန္တိယုတ္တာတိ. ဧတ္ထ လကာရဿေဝ ပုနပ္ပုနပ္ပယောဂေန ကောမလဝဏ္ဏာဝုတ္တိ. မာလတီနံ မာလာတိ စ, လောလာ စ တေ အလယော စာတိ စ, လိနာ စ တေ လောလာလယော စာတိ စ, တေသံ မာလာတိ စ, သာ အဿ အတ္ထီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १३०. सांगितलेला अनुप्रास देखील सर्व कोमल वर्णांनी रचलेला असल्यास प्रशंसनीय नसतो, हे दर्शवण्यासाठी "सब्बकोमलवण्णेहि" इत्यादी म्हटले आहे. सर्व कोमल म्हणजेच सुकुमार अक्षरांनी केलेला अनुप्रास (जो वर्ण-आवृत्तीच्या लक्षणाचा असतो) प्रशंसनीय नसतो, कारण तो श्लेष अलंकाराच्या विरुद्ध असल्यामुळे प्रशस्त मानला जात नाही. "यथा" या शब्दाने त्याचे उदाहरण देतात. ही मालतीची माळ म्हणजे जाईच्या फुलांची माळ; लीन झालेल्या (गुंतलेल्या/पडणाऱ्या), लोल (गंधाचे लोभी असलेल्या) भ्रमरांच्या (अलिंच्या) माळेने (रांगेने) युक्त आहे. येथे 'ल' काराच्याच वारंवार प्रयोगाने कोमल वर्णाची आवृत्ती झाली आहे. "मालतीनां माला" (मालतीची माळ), "लोला च ते अलयो च" (लोल असलेले भ्रमर), "लीना च ते लोलालयो च" (लीन आणि लोल असलेले भ्रमर), "तेसां माला" (त्यांची माळ) आणि "सा अस्स अत्थि" (ती जिच्याजवळ आहे) असा विग्रह आहे. ၁၃၁. १३१. မုဒူဟိ ဝါ ကေဝလေဟိ,ကေဝလေဟိ ဖုဋေဟိ ဝါ; မိဿေဟိ ဝါ တိဓာ ဟောတိ,ဝဏ္ဏေဟိ သမတာ ယထာ. केवळ मृदू वर्णांनी, किंवा केवळ स्फुट (स्पष्ट/कठीण) वर्णांनी, अथवा मिश्र वर्णांनी अशा तीन प्रकारे वर्णांच्या द्वारे 'समता' (समता गुण) होते; जसे की... ၁၃၁. သမတံ သမ္ဘာဝေတိ ‘‘မုဒူဟိ’’စ္စာဒိနာ. ကေဝလေဟိ ကေဝလဖုဋာဒိဘာဝါပဝတ္တေဟိ သကလေဟိ မုဒူဟိ စတူသုပိ ပါဒေသု သဇာတိယေဟိ အသိထိလကောမလေဟိ ဝါ ကကာရာဒီဟိ ဝါ သိထိလကောမလဿ သိလေသပဋိပက္ခတ္တာ ကေဝလေဟိ ဖုဋေဟိ ဝါ အဓိမတ္တသုတီဟိ ဘကာရာဒီဟိ ဝါ အကိစ္ဆဝစနီယေ ကိစ္ဆဝစနီယဿ သုခုမာလဝိပရိယယတ္တာ မိဿေဟိ ဝါ မဇ္ဈိမသုတီဟိ မုဒုဘူတသံသဋ္ဌေဟိ ဝါ ဝဏ္ဏေဟိ အက္ခရေဟိ ကရဏဘူတေဟိ သမတာ တိဓာ ဟောတိ ဂဇ္ဇေ ပဇ္ဇေ ဝါ. ‘‘ယထေ’’တိ တိဝိဓမုဒါဟရတိ. १३१. "मुदूहि" इत्यादींद्वारे समता गुणाचे प्रतिपादन करतात. केवळ स्फुट इत्यादी भावांपासून रहित असलेल्या सर्व मृदू (चारही चरणांमध्ये सजातीय असलेल्या, अशथिल आणि कोमल अशा 'क' कार इत्यादी) वर्णांनी - कारण शिथिल-कोमल वर्ण हे श्लेषाचे विरोधी असतात; किंवा केवळ स्फुट (अतिशय स्पष्ट ऐकू येणाऱ्या 'भ' कार इत्यादी कठीण उच्चारणीय) वर्णांनी - कारण सुकुमारतेच्या विरुद्ध कठीण उच्चारणीय वर्ण असतात; किंवा मिश्र (मध्यम स्वरूपाच्या, मृदू आणि स्फुट यांच्या संमिश्रणाने बनलेल्या) वर्णांनी (अक्षरांनी) गद्यात किंवा पद्यात समता तीन प्रकारची होते. "यथा" या शब्दाने तिन्ही प्रकारची उदाहरणे देतात. ၁၃၁. ဣဒါနိ သမတံ ဝိဘာဝေတုံ ‘‘မုဒူဟိ’’စ္စာဒိမာဟ. ကေဝလေဟိ ဖုဋမိဿေဟိ အညတ္တာ သကလေဟိ မုဒူဟိ သိထိလကောမလေဟိ ဝဏ္ဏေဟိ ကကာရာဒီဟိ ဝါ ကေဝလေဟိ ဖုဋေဟိ ကေဝလကောမလဝဏ္ဏရဟိတတ္တာ သကလေဟိ အကိစ္ဆုစ္စာရဏီယေဟိ အဓိမတ္တသုတီဟိ ဘကာရာဒီဟိ ဝဏ္ဏေဟိ ဝါ မိဿေဟိ ယထာဝုတ္တမုဒုဖုဋသမ္မိဿေဟိ ဝဏ္ဏေဟိ ဝါ ကရဏဘူတေဟိ သမတာ ဂဇ္ဇေ ဝါ ပဇ္ဇေ ဝါ တိဓာ ဟောတီတိ. ယဒိ သိထိလကောမလဝဏ္ဏေဟိ ဝိစရိတံ သိလေသာလင်္ကာရဿ, ကိစ္ဆုစ္စာရဏီယေဟိ ဖုဋဝဏ္ဏေဟိ ကတံ သုခုမာလာလင်္ကာရဿ [Pg.157] စ ဝိရုဇ္ဈတီတိ. ‘‘ယထာ’’တိ တိဝိဓမုဒါဟရတိ. १३१. आता समता गुणाचे स्पष्टीकरण करण्यासाठी "मुदूहि" इत्यादी म्हटले आहे. स्फुट आणि मिश्र वर्णांशिवाय इतर केवळ मृदू (शिथिल आणि कोमल अशा 'क' कार इत्यादी) वर्णांनी; किंवा केवळ स्फुट (केवळ कोमल वर्णांशिवाय असलेल्या, सहज उच्चारता न येणाऱ्या, अतिशय स्पष्ट ऐकू येणाऱ्या 'भ' कार इत्यादी) वर्णांनी; किंवा मिश्र (वर सांगितलेल्या मृदू आणि स्फुट यांच्या संमिश्रणाने बनलेल्या) वर्णांनी गद्यात किंवा पद्यात समता तीन प्रकारची होते. जर शिथिल-कोमल वर्णांनी रचना केली तर ती श्लेष अलंकाराच्या विरुद्ध होते, आणि कठीण उच्चारणीय स्फुट वर्णांनी रचना केली तर ती सुकुमार अलंकाराच्या विरुद्ध होते. "यथा" या शब्दाने तिन्ही प्रकारची उदाहरणे देतात. ကေဝလမုဒုသမတာ केवळ मृदू समता (केवळ कोमल वर्णांची समता) ၁၃၂. १३२. ကောကိလာလာပသံဝါဒီ,မုနိန္ဒာလာပဝိဗ္ဘမော; ဟဒယင်္ဂမတံ ယာတိ,သတံ ဒေတိ စ နိဗ္ဗုတိံ. कोकिळेच्या सुरावटीशी सुसंवाद साधणारा, मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) वाणीचा विलास सज्जनांच्या हृदयाला भिडतो (हृदयंगम होतो) आणि त्यांना निब्बान (शांती) प्रदान करतो. ၁၃၂. ‘‘ကောကိလေ’’စ္စာဒိ. ကောကိလာနံ ကရဝီကသကုဏာနံ အာလာပေါ ကူဇိတံ, တံ သံဝဒတိ ပကာသတိ သီလေနာတိ ကောကိလာလာပသံဝါဒီ, တံသဒိသောတိ အတ္ထော, မုနိန္ဒဿ အာလာပေါ ဝိသဋ္ဌာဒိအဋ္ဌင်္ဂိကော သရော တဿ ဝိဗ္ဘမော ဝိလာသော သတံ သပ္ပုရိသာနံ ဟဒယင်္ဂမတံ မနောနုသာရိတံ မဓုရဘာဝံ ယာတိ, နိဗ္ဗုတိံ နိဗ္ဗာနဉ္စ တေသံ ဒေတိ. १३२. "कोकिल" इत्यादी. कोकिळा म्हणजेच करवीक पक्ष्यांचे कूजन (गाणे), त्याच्याशी जो सुसंवाद साधतो (त्याच्यासारखा भासतो) तो 'कोकिलालापसंवादी' म्हणजे त्याच्यासारखा, असा अर्थ आहे. मुनींद्रांचा (बुद्धांचा) आलाप म्हणजेच स्पष्ट इत्यादी आठ अंगांनी युक्त असलेला स्वर, त्याचा विलास (सौंदर्य) सज्जनांच्या (सत्पुरुषांच्या) मनाला भिडणारा (हृदयंगम) म्हणजेच मनाला अनुकूल वाटणारा मधुर भाव प्राप्त करतो आणि त्यांना निब्बुती म्हणजेच निब्बान (निर्वाण) प्रदान करतो. ၁၃၂. ‘‘ကောကိလိ’’စ္စာဒိ. ကောကိလာနံ ကရဝီကသကုဏာနံ အာလာပံ နာဒလီလံ သံဝါဒီ ပကာသနသီလော, တံသဒိသောတိ အဓိပ္ပာယော, မုနိန္ဒဿ သဗ္ဗညုနော အာလာပဿ ဝိသဋ္ဌာဒိအဋ္ဌင်္ဂိကနာဒဿ ဝိဗ္ဘမော ဝိလာသော သတံ သပ္ပုရိသာနံ ဟဒယင်္ဂမတံ စိတ္တာရာဓိတဘာဝံ ယာတိ စ, နိဗ္ဗုတိံ သုတသမ္ဗန္ဓေန တေသံယေဝ သာဓူနံ နိဗ္ဗာနံ ဒေတိ စ ဒေန္တောပိ ဟောတီတိ. ဧတ္ထ ကောကိလာလာပသဒ္ဒေန နိဿိတေ နိဿယဝေါဟာရေန လီလာ ဂဟိတာ. १३२. “कोकिलि” इत्यादी. कोकिळा आणि करवीक पक्ष्यांच्या आलापाशी (नादलीलेशी) सुसंगत असणारा, तो प्रकट करण्याचा स्वभाव असलेला, त्याच्यासारखा असा अभिप्राय आहे. सर्वज्ञ मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) आलापाचा (स्पष्ट इत्यादी आठ अंगांनी युक्त अशा नादाचा) विलास (सौंदर्य) सत्पुरुषांच्या हृदयाला भिडणारा आणि चित्ताला प्रसन्न करणारा ठरतो, आणि श्रवणाच्या संबंधाने त्या सज्जनांना निब्बान (निर्वाण) देणारा ठरतो. येथे 'कोकिलालाप' या शब्दाने आश्रित अशा उपचाराने (लक्षणावृत्तीने) 'लीला' हा अर्थ घेतला आहे. ကေဝလဖုဋသမတာ केवळस्फुटसमता ၁၃၃. १३३. သမ္ဘာဝနီယသမ္ဘာဝံ,ဘဂဝန္တံ ဘဝန္တဂုံ; ဘဝန္တသာဓနာကင်္ခီ,ကော န သမ္ဘာဝယေ ဝိဘုံ. आदरणीय अशा उत्तम अभिप्राय असणाऱ्या, संसाराचा अंत करणाऱ्या (निब्बानाला गेलेल्या) आणि सामर्थ्यशाली अशा भगवंतांचा, संसाराचा अंत (निब्बान) साधण्याची आकांक्षा बाळगणारा कोणता पुरुष आदर करणार नाही? (अर्थात सर्वच करतील.) ၁၃၃. ‘‘သမ္ဘာဝနီယေ’’စ္စာဒိ. [Pg.158] သမ္ဘာဝနီယော အာဒရဏီယော. သဒေဝကေ လောကေ သန္တော သောဘနော ဘာဝေါ အဓိပ္ပာယော ယဿ တံ. ဘဝန္တံ နိဗ္ဗာနံ ဂတောတိ ဘဝန္တဂု, တံ ဝိဘုံ. ဘဂဝန္တံ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓံ. ဘဝဿ သံသာရဿ အန္တော အဝသာနံ နိဗ္ဗာနံ, တဿ သာဓနံ သမ္ပာဒနမာကင်္ခတိ သီလေနာတိ ဘဝန္တသာဓနာကင်္ခီ, ကော နာမ သံသာရဝတ္တိဇနော. န သမ္ဘာဝယေ အာဒရံ န ကရေယျ, ကရောတျေဝါတိ အတ္ထော. १३३. “संभावनीये” इत्यादी. 'संभावनीय' म्हणजे आदरणीय. देवलोकासह संपूर्ण जगात ज्यांचा उत्तम व शोभिवंत भाव (अभिप्राय) आहे त्यांना. 'भवन्तगु' म्हणजे संसाराचा अंत करणाऱ्या निब्बानाला गेलेले, त्या 'विभु' म्हणजे सामर्थ्यशाली अशा भगवंत सम्यक्संबुद्धांना. 'भव' म्हणजे संसाराचा अंत (समाप्ती) म्हणजेच निब्बान, त्याचे साधन (प्राप्ती) करण्याची ज्याचा स्वभावतःच आकांक्षा आहे तो 'भवंतसाधनाकांक्षी' होय. संसारात फिरणारा असा कोणता मनुष्य असेल जो आदर करणार नाही? अर्थात तो आदर करतोच, असा अर्थ आहे. ၁၃၃. ‘‘သမ္ဘာဝနီယိ’’စ္စာဒိ. သမ္ဘာဝနီယသမ္ဘာဝံ သဒေဝကေန လောကေန အာဒရဏီယသောဘနာဓိပ္ပာယံ ဘဝန္တဂုံ ဘဝဿ အန္တသင်္ခါတံ နိဗ္ဗာနံ ဂတံ ဝိဘုံ ပဘုံ ဘဂဝန္တံ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓံ ဘဝန္တသာဓနာကင်္ခီ နိဗ္ဗာနသာဓနာဘိလာသီ ကော ကတမော သံသာရဝတ္တိဇနော န သမ္ဘာဝယေ အာဒရံ န ကရေယျ, ကရောတျေဝ. သန္တော စ သော ဘာဝေါ စာတိ စ, သမ္ဘာဝနီယော သမ္ဘာဝေါ ယဿေတိ စ, ဘဝဿ အန္တန္တိ စ, ဘဝန္တံ ဂတောတိ စ, တဿ သာဓနန္တိ စ, တံ အာကင်္ခတိ သီလေနာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १३३. “संभावनीय” इत्यादी. 'संभावनीयसंभाव' म्हणजे देवलोकासह संपूर्ण जगाकडून आदरणीय व शोभिवंत अभिप्राय असलेले. 'भवन्तगु' म्हणजे संसाराचा अंत म्हटल्या गेलेल्या निब्बानाला गेलेले. 'विभु' म्हणजे प्रभू (सामर्थ्यशाली) अशा भगवंत सम्यक्संबुद्धांचा, 'भवंतसाधनाकांक्षी' म्हणजे निब्बान साधण्याची अभिलाषा बाळगणारा कोणता संसारी मनुष्य आदर करणार नाही? अर्थात तो आदर करतोच. 'संतो च सो भावो चाति च' (तो भाव शांत आणि शोभिवंत आहे), 'संभावनीयो संभावो यस्सेति च' (ज्याचा अभिप्राय आदरणीय आहे), 'भवस्स अंतन्ति च' (संसाराचा अंत), 'भवन्तं गतोति च' (संसाराच्या अंताला गेलेले), 'तस्स साधनन्ति च' (त्याचे साधन), 'तं आकङ्खति सीलेनाति च' (स्वभावतः त्याची आकांक्षा बाळगणारा) असा विग्रह आहे. မိဿကသမတာ मिश्रकसमता ၁၃၄. १३४. လဒ္ဓစန္ဒနသံသဂ္ဂ-သုဂန္ဓိမလယာနိလော; မန္ဒ’မာယာတိ ဘီတောဝ, မုနိန္ဒမုခမာရုတာ. चंदनाच्या वृक्षांच्या संपर्काने सुगंधी झालेला मलय पर्वतावरील वारा, मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) मुखातून निघणाऱ्या वायूला (श्वासाला) जणू काही घाबरूनच हळूहळू वाहत येत आहे. ၁၃၄. ‘‘လဒ္ဓိ’’စ္စာဒိ. လဒ္ဓေါ စန္ဒနတရူနံ သံသဂ္ဂေါ ပရိစယော တေန သောဘနော ဂန္ဓော အဿာတိ သုဂန္ဓီ သုရဘိ မလယာနိလောဒက္ခိဏပဝမာနော မုနိန္ဒဿ မုခမာရုတာ ဘီတောဝ တာဒိသမုဒုတ္တသီတလတ္တသုဂန္ဓသမ္ပတ္တိယာ အတ္တနော ဒူရတရတ္တာ အာယာတိ အနုဝတ္တတိ. မန္ဒန္တိ အာဂမနကြိယာဝိသေသနံ. १३४. “लद्धि” इत्यादी. चंदनाच्या वृक्षांचा संपर्क (परिचय) मिळाल्यामुळे ज्याला उत्तम सुगंध प्राप्त झाला आहे असा सुगंधी, सुवासिक मलय पर्वतावरून येणारा दक्षिण वारा (मलय अनिल), मुनींद्रांच्या मुखातून निघणाऱ्या वायूला जणू घाबरूनच, तशा प्रकारच्या कोमलता, शीतलता आणि सुगंधाच्या समृद्धीपासून स्वतः खूप दूर असल्यामुळे हळूहळू येतो (अनुसरण करतो). 'मंदं' हे येण्याच्या क्रियेचे विशेषण (क्रियाविशेषण) आहे. ၁၃၄. ‘‘လဒ္ဓိ’’စ္စာဒိ. [Pg.159] လဒ္ဓစန္ဒနသံသဂ္ဂသုဂန္ဓိမလယာနိလော ပဋိလဒ္ဓစန္ဒနတရုသာရသမဝါယေန သောဘနဂန္ဓသမန္နာဂတော မလယဒေသတော အာဂစ္ဆမာနမာလုတော မုနိန္ဒမုခမာရုတာ ဗုဒ္ဓဿ မုခသုရဘိဝါသိတပဝနတော ဘီတော ဣဝ တာဒိသမုဒုသုရဘိသီတလတ္တဿ အတ္တနိ အသမ္ဘဝတော ဘီတောဝ မန္ဒံ သဏိကံ ယာတိ အဘိမုခမေတီတိ. စန္ဒနာနံ သံသဂ္ဂေါတိ စ, လဒ္ဓေါ စ သော စန္ဒနသံသဂ္ဂေါတိ စ, သောဘနော ဂန္ဓော ယဿာတိ စ, လဒ္ဓစန္ဒနသံသဂ္ဂေန သုဂန္ဓီတိ စ, မလယတော အာဂတော အနိလောတိ စ, မုနိန္ဒမုခတော နိက္ခန္တော မာရုတောတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. မန္ဒန္တိ ကြိယာဝိသေသနံ. ဧတ္ထ တိဝိဓသမတာယံ ‘‘ကောကိလာလာပသံဝါဒိ’’စ္စာဒိတိဝိဓလက္ခိယဿာပိ ‘‘မုဒူဟိ ဝါ ကေဝလေဟိ’’စ္စာဒိနာ ဒဿိတလက္ခဏတ္တယေန တုလျတာ သုပါကဋာဝါတိ. १३४. “लद्धि” इत्यादी. 'लद्धचंदनसंसग्गसुगंधिमलयानिलो' म्हणजे चंदनाच्या वृक्षाच्या साराच्या संपर्कामुळे उत्तम सुगंधाने युक्त होऊन मलय देशाकडून येणारा वारा, मुनींद्रांच्या मुखातून निघणाऱ्या वायूला म्हणजेच बुद्धांच्या मुखातील सुगंधी श्वासाला जणू घाबरूनच, तशा प्रकारची कोमलता, सुवासिकता आणि शीतलता स्वतःमध्ये नसल्यामुळे घाबरल्यासारखा हळूहळू, सावकाश समोर येतो. 'चंदनानां संसग्गो' (चंदनाचा संपर्क), 'लद्धो च सो चंदनसंसग्गो' (मिळालेला तो चंदनाचा संपर्क), 'सोभनो गंधो यस्स' (ज्याला उत्तम सुगंध आहे), 'लद्धचंदनसंसग्गेन सुगंधी' (चंदनाच्या संपर्काने सुगंधी झालेला), 'मलयतो आगतो अनिलो' (मलय पर्वतावरून आलेला वारा), 'मुनींदमुखतो निक्खंतो मारुतो' (मुनींद्रांच्या मुखातून निघालेला वायू) असा विग्रह आहे. 'मंदं' हे क्रियाविशेषण आहे. येथे तीन प्रकारच्या समतेमध्ये "कोकिलालापसंवादी" इत्यादी तीन प्रकारच्या लक्ष्यांची देखील "मदूही वा केवलेही" इत्यादी सूत्राने दर्शविलेल्या तीन लक्षणांशी समानता स्पष्टपणे दिसून येते. ၁၃၅. १३५. အနိဋ္ဌုရက္ခရပ္ပာယာ, သဗ္ဗကောမလနိဿဋာ; ကိစ္ဆမုစ္စာရဏာပေတ-ဗျဉ္ဇနာ သုခုမာလတာ. ज्यामध्ये कठोर नसलेले (मृदू) वर्ण बहुसंख्येने असतात, जे सर्व कोमल वर्णांनी युक्त असते आणि कष्टाने उच्चारल्या जाणाऱ्या व्यंजनांनी जे रहित असते, त्याला 'सुकुमारता' (सौकुमार्य) म्हणतात. ၁၃၅. သုခုမာလတာ ကထီယတိ ‘‘အနိဋ္ဌုရက္ခရေ’’စ္စာဒိနာ. အနိဋ္ဌုရာနိ အဖရုသာနိ အက္ခရာနိ ဝဏ္ဏာနိ ပါယာနိ ဗဟူနိ ယဿာ သာ တထာ, ‘‘နိဋ္ဌုရာနိ အပ္ပကာနီ’’တိ ပါယဂ္ဂဟဏေန သူစိတံ, တတောယေဝ သဗ္ဗေဟိ ကေဝလေဟိ ကောမလေဟိ သိထိလေဟိ လဃူဟိ အက္ခရေဟိ နိဿဋာ နိဂ္ဂတာ ကိစ္ဆေန ဒုက္ခေန ဥစ္စာရဏာ တတော အပေတာနိ အပဂတာနိ ဗျဉ္ဇနာနိ ယဿာ သာတိ အနုဝဒိတွာ သုခုမာလတာ ဝိဓီယတေ. १३५. “अनिठ्ठुरक्खरे” इत्यादी सूत्राने सुकुमारतेचे कथन केले जाते. 'अनिठ्ठुर' म्हणजे जे कठोर नसलेले वर्ण (अक्षर) बहुसंख्येने ज्यात आहेत ती तशी. 'कठोर वर्ण अल्प प्रमाणात आहेत' हे 'प्राय' (बहुतांश) या शब्दाच्या ग्रहणाने सूचित होते. म्हणूनच केवळ सर्व कोमल, शिथिल आणि लघु अक्षरांनी युक्त (निर्गत) असलेली, आणि कष्टाने (दुःखाने) होणाऱ्या उच्चारापासून दूर गेलेली व्यंजने ज्यात आहेत, अशा रचनेला 'सुकुमारता' असे म्हटले जाते. ၁၃၅. ဣဒါနိ သုခုမာလတံ ဒဿေတိ ‘‘အနိဋ္ဌုရေ’’စ္စာဒိနာ. အနိဋ္ဌုရက္ခရပ္ပာယာ အကက္ကသဝဏ္ဏဗဟုလာ သဗ္ဗကောမလနိဿဋာ အနိဋ္ဌုရက္ခရာနံ ယေဘုယျဂ္ဂဟဏတောယေဝ သကလသိထိလဝဏ္ဏဝိရဟိတာ ကိစ္ဆမုစ္စာရဏာပေတဗျဉ္ဇနာ ဒုက္ခုစ္စာရဏီယဝဏ္ဏေဟိ ဝိဂတအက္ခရသမန္နာဂတာ သုခုမာလတာ နာမာတိ. အနိဋ္ဌုရာနိ အက္ခရာနိ ပါယာနိ ဗဟူနိ ယဿန္တိ စ, သဗ္ဗေ စ တေ ကောမလာ စေတိ စ, တေဟိ နိဿဋာတိ [Pg.160] စ, ကိစ္ဆေန ဥစ္စာရဏာတိ စ, တေဟိ အပေတာနီတိ စ, တာနိ ဗျဉ္ဇနာနိ ယဿာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. နိဂ္ဂဟီတာဂမော. १३५. आता “अनिठ्ठुरे” इत्यादी सूत्राने सुकुमारता दर्शवितात. 'अनिठ्ठुरक्खरप्पाया' म्हणजे अकर्कश (मृदू) वर्णांची बहुलता असलेली. 'सब्बकोमलनिस्सटा' म्हणजे कठोर नसलेल्या वर्णांच्या बहुतांश ग्रहणामुळेच सर्व शिथिल वर्णांनी युक्त असलेली. 'किच्छमुच्चारणापेतब्यंजना' म्हणजे कष्टाने उच्चारल्या जाणाऱ्या वर्णांपासून मुक्त अशा अक्षरांनी युक्त असलेली रचना म्हणजे 'सुकुमारता' होय. 'अनिठ्ठुरानि अक्खरानि पायानि बहूनि यस्स' (ज्यात कठोर नसलेली अक्षरे बहुसंख्येने आहेत), 'सब्बे च ते कोमला चेति च' (आणि ते सर्व कोमल आहेत), 'तेहि निस्सटा' (त्यांच्यापासून निघालेली), 'किच्छेन उच्चारणा' (कष्टाने उच्चार करणे), 'तेहि अपेतानि' (त्यांच्यापासून दूर गेलेली), 'तानि ब्यंजनानि यस्स' (ती व्यंजने ज्यात आहेत) असा विग्रह आहे. येथे निग्गहीताचा (अनुस्वाराचा) आगम झाला आहे. ၁၃၆. १३६. ပဿန္တာ ရူပဝိဘဝံ, သုဏန္တာ မဓုရံ ဂိရံ; စရန္တိ သာဓူ သမ္ဗုဒ္ဓ-ကာလေ ကေဠိပရမ္မုခါ. सम्यक्संबुद्धांच्या काळात सज्जन लोक (बुद्धांचे) रूपसौंदर्य पाहत आणि मधुर वाणी ऐकत, क्रीडा-प्रमोदाकडे पाठ फिरवून आचरण करतात. ၁၃၆. ဥဒါဟရတိ ‘‘ပဿန္တာ’’ဣစ္စာဒိ. ရူပဝိဘဝံ ရူပသမ္ပတ္တိံ ပဿန္တာ မဓုရံ ဂိရံ ဝါစံ သုဏန္တာ သာဓဝေါ ကေဠိပရမ္မုခါ ကီဠာယ နိစ္ဆန္တာ စရန္တီတိ သမ္ဗန္ဓော. ကတ္ထာတိ အာဟ ‘‘သမ္ဗုဒ္ဓကာလေ’’တိ. १३६. “पस्संता” इत्यादी उदाहरणाने स्पष्ट करतात. रूपवैभव (रूपसंपत्ती) पाहत आणि मधुर वाणी ऐकत सज्जन लोक क्रीडा-प्रमोदाकडे पाठ फिरवून (क्रीडेची इच्छा न बाळगता) आचरण करतात, असा संबंध आहे. कोठे? तर त्यावर म्हणतात— “संबुद्धकाले” (सम्यक्संबुद्धांच्या काळात). ၁၃၆. ‘‘ပဿန္တိ’’စ္စာဒိနာ လက္ခိယမုဒါဟရတိ, တံ ဝုတ္တတ္ထမေဝ. १३६. “पस्संति” इत्यादी सूत्राने लक्ष्याचे उदाहरण देतात, त्याचा अर्थ वर सांगितल्याप्रमाणेच आहे. ၁၃၇. १३७. အလင်္ကာရဝိဟီနာပိ, သတံ သမ္မုခတေ’ဒိသီ; အာရောဟတိ ဝိသေသေန, ရမဏီယာ တဒုဇ္ဇလာ. अलंकारांनी विरहित असली तरी अशी सुकुमारता सज्जनांच्या (विद्वानांच्या) समोर येते (त्यांच्या आदरास पात्र ठरते); आणि जर ती अलंकारांनी उज्ज्वल असेल, तर ती विशेष रूपाने रमणीय ठरते. ၁၃၇. ဝိသိဋ္ဌဿာညဓမ္မဿ အဘာဝေပိမိနာဝေါပါဒေယော ဗန္ဓောတိ အာဟ ‘‘အလင်္ကာရေ’’စ္စာဒိ. အလင်္ကာရေဟိ ဝိဟီနာပိ ဧဒိသီ သုခုမာလတာ သတံ ပဏ္ဍိတဇနာနံ သမ္မုခတံ အဘိမုခဘာဝံ ဝါစာဂေါစရတ္တံ အာရောဟတိ ဥပဂစ္ဆတိ, ကိမုတအတ္ထာလင်္ကာရာလင်္ကိတေတျပိသဒ္ဒေါ. တေန သဘာဝဝုတျာဒိနာ အလင်္ကာရေန ဥဇ္ဇလာ ဒိတ္တာ ပန ဝိသေသေနာတိသယေန ရမဏီယာ မနုညာတိ. १३७. विशिष्ट अशा दुसऱ्या गुणाच्या अभावी देखील या गुणानेच रचना स्वीकारार्ह ठरते, म्हणून “अलंकारे” इत्यादी म्हणतात. अलंकारांनी विरहित असली तरी अशी सुकुमारता सज्जन पंडितांच्या समोर येते (त्यांच्या वाणीचा विषय बनते), मग अर्थालंकाराने अलंकृत असल्यास काय सांगावे! हा 'अपि' शब्दाचा अर्थ आहे. म्हणून स्वभावोक्ती इत्यादी अलंकारांनी उज्ज्वल (प्रकाशित) झालेली रचना विशेष रूपाने अत्यंत रमणीय व मनवेधक ठरते. ၁၃၇. ‘‘အလင်္ကာရေ’’စ္စာဒိ. ဧဒိသီ ဧဝံဝိဓာ သုခုမာလတာ အလင်္ကာရဝိဟီနာပိ အတ္ထာလင်္ကာရဝိရဟိတာပိ သတံ ပညဝန္တာနံ သမ္မုခတံ အဘိမုခဘာဝံ တေသံ ဝစနဝိသယဘာဝန္တိ အတ္ထော အာရောဟတိ ပါပုဏာတိ. တဒုဇ္ဇလာ တေန သဘာဝဝုတ္တိဝင်္ကဝုတ္တိသမ္ဘူတေန အတ္ထာလင်္ကာရေန ဇောတမာနာ ဝိသေသေန အတိသယေန ရမဏီယာ မနုညာ ဟောတိ. အလင်္ကာရေဟိ ဝိဟီနာတိ စ, တေန ဥဇ္ဇလာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १३७. “अलंकारे” इत्यादी. अशी या प्रकारची सुकुमारता अलंकारांशिवाय देखील (अर्थालंकाराने विरहित असली तरी) सज्जन प्रज्ञावंतांच्या समोर येते, म्हणजेच त्यांच्या वाणीचा विषय बनते, असा अर्थ आहे. 'तदुज्जला' म्हणजे स्वभावोक्ती आणि वक्रोक्ती इत्यादींनी उत्पन्न झालेल्या अर्थालंकाराने प्रकाशित होणारी रचना विशेष रूपाने अत्यंत रमणीय व मनवेधक ठरते. 'अलंकारेहि विहीना' (अलंकारांनी विरहित) आणि 'तेन उज्झला' (त्याने उज्ज्वल) असा विग्रह आहे. ၁၃၈. १३८. ရောမဉ္စပိဉ္ဆရစနာ, [Pg.161] သာဓုဝါဒါဟိတဒ္ဓနီ; လဠန္တိ’မေ မုနီမေဃု-မ္မဒါ သာဓု သိခါဝလာ. रोमांचाने पुलकित झालेल्या शरीराची रचना असणारे, 'साधु-साधु' अशा उद्घोषाचा नाद करणारे आणि मुनींद्ररूपी (बुद्धरूपी) मेघाने हर्षित झालेले हे सज्जनरूपी मयूर सुंदर क्रीडा करत आहेत। ၁၃၈. တမုဒါဟရတိ ‘‘ရောမဉ္စေ’’စ္စာဒိနာ. ရောမဉ္စာ လောမဟံသာ ဣဝ ရောမဉ္စာ ဧဝ ဝါ, ပိဉ္ဆာနိ ဗရိဟာနိ တေသံ ရစနာ ဆတ္တာကာရေန ဝိဓာနံ ယေသံ တေ တထာ, ‘‘သာဓူ’’တိ ဝါဒေါ ဝစနံ တံသဒိသောယေဝ ဝါ, အာဟိတော ဓနိ ကေကာသင်္ခါတော ယေသံ တေ တထာ, မုနိမေဃေန မုနိသဒိသေန မုနိသင်္ခါတေန ဝါ ဝါရိဒေန ဥမ္မဒါ မတ္တာ သာဓုသဒိသာ သာဓု ဧဝ ဝါ သိခါဝလာ မယူရာ လဠန္တိ လီလောပေတာ ဝိစရန္တိ, အညမညံ ရမန္တီတိ အတ္ထော. १३८. ते 'रोमञ्चे' इत्यादींद्वारे त्याचे उदाहरण देतात. रोमाञ्च म्हणजे अंगावर रोमांच उभे राहण्यासारखे किंवा रोमाञ्चच; पिच्छ म्हणजे मोरपिसे, त्यांची रचना छत्रीच्या आकारासारखी मांडणी ज्यांची आहे ते तसे; 'साधू' (उत्तम) असा वाद म्हणजे वचन किंवा त्याच्यासारखेच; ज्यांच्यामध्ये केकारव नावाचा ध्वनी निर्माण झाला आहे ते तसे; मुनींसारख्या किंवा मुनी म्हटल्या गेलेल्या मेघाने (मेघरूपी मुनीने) उन्मत्त (हर्षित) झालेले, सज्जनांसारखे किंवा उत्तमच असलेले शिखावळ म्हणजे मयूर (मोर) विलासपूर्वक (लीलेने) वावरतात, परस्परांमध्ये रममाण होतात, असा अर्थ आहे. ၁၃၈. အတ္ထာလင်္ကာရယုတ္တသုခုမာလတမုဒါဟရတိ ‘‘ရောမေ’’စ္စာဒိနာ. ရောမဉ္စပိဉ္ဆရစနာ လောမဟံသသဒိသာ ရောမာ ဧဝ ဝါ ပိဉ္ဆာနံ ဗရိဟာနံ ရစနာ ဆတ္တာကာရေန ဝိတ္ထာရဝန္တာ သာဓုဝါဒါဟိတဒ္ဓနီ ‘‘သာဓူ’’တိ ဝစနသဒိသေဟိ သာဓုဝါဒေဟိ ဝါ ပဝတ္တကေကာနိန္နာဒေဟိ သမန္နာဂတာ မုနိမေဃုမ္မဒါ မုနိသဒိသေန မုနိသင်္ခါတေန ဝါ မေဃေန သဉ္ဇာတမဒါ ဣမေ သာဓုသိခါဝလာ သဇ္ဇနသဒိသာ သာဓုနော ဧဝ ဝါ မယူရာ လဠန္တိ လီလောပေတာ ဘဝန္တီတိ. ဣဒံ အသေသဝတ္ထုဝိသယံ သမာသရူပကံ အမုချပက္ခေ ‘‘ရောမဉ္စာ ဝိယ သာဓုဝါဒေါ ဝိယ မုနိ ဝိယ သာဓဝေါ ဝိယာ’’တိ စ, မုချပက္ခေ ‘‘ပိဉ္ဆရစနာ ဝိယ အာဟိတဒ္ဓနီ ဝိယ မေဃော ဝိယ သိခါဝလာ ဝိယာ’’တိ ဥပစရိတဗ္ဗံ. ရောမဉ္စာ ဧဝ ပိဉ္ဆာနီတိ စ, တေသံ ရစနာ ယေသန္တိ စ, ‘‘သာဓု’’ဣတိ ဝါဒေါတိ စ, အာဟိတော စ သော ဓနိ စေတိ စ, သာဓုဝါဒေါ အာဟိတဒ္ဓနိ ယေသန္တိ စ, မုနိ ဧဝ မေဃောတိ စ, တေန ဥမ္မဒါတိ စ, သာဓဝေါ ဧဝ သိခါဝလာတိ စ ဝါကျံ. ‘‘မုနီမေဃော’’တိ ဧတ္ထ ဒီဃတ္တံ ဆန္ဒာနုရက္ခဏတ္ထံ. १३८. अर्थालंकाराने युक्त अशा सुकुमारतेचे 'रोम' इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. रोमाञ्चपिच्छरचना म्हणजे अंगावर रोमांच उभे राहण्यासारखे रोम किंवा पिच्छांची (मोरपिसांची) रचना छत्रीच्या आकारासारखी विस्तारलेली; साधुवादाने युक्त ध्वनी म्हणजे 'साधू' (उत्तम) अशा वचनासारख्या साधुवादांनी किंवा प्रवृत्त झालेल्या केकारवाच्या ध्वनींनी युक्त; मुनीमेघोन्मत्त म्हणजे मुनींसारख्या किंवा मुनी म्हटल्या गेलेल्या मेघाने ज्यांच्यामध्ये मद (हर्ष) उत्पन्न झाला आहे असे; हे साधुशिखावळ म्हणजे सज्जनांसारखे किंवा उत्तमच असलेले मयूर (मोर) विलासपूर्वक (लीलेने) वावरतात. हे संपूर्ण वस्तूच्या विषयाचे 'समासरूपक' आहे. अमुख्य पक्षामध्ये 'रोमाञ्चाप्रमाणे, साधुवादाप्रमाणे, मुनींप्रमाणे, सज्जनांप्रमाणे' असे आणि मुख्य पक्षामध्ये 'पिच्छरचनेप्रमाणे, उत्पन्न झालेल्या ध्वनीप्रमाणे, मेघाप्रमाणे, शिखावळांप्रमाणे (मोरांप्रमाणे)' असे लाक्षणिक अर्थाने ग्रहण केले पाहिजे. 'रोमाञ्च हेच पिच्छ (पिसे)' आणि 'त्यांची रचना ज्यांची आहे ते', 'साधू असा वाद (वचन)', 'आणि तो उत्पन्न झालेला ध्वनी', 'साधुवाद आणि उत्पन्न झालेला ध्वनी ज्यांच्यामध्ये आहे ते', 'मुनी हाच मेघ', 'त्याच्यामुळे उन्मत्त (हर्षित)', 'सज्जन हेच शिखावळ (मोर)' असे हे वाक्य आहे. 'मुनीमेघो' येथे 'नी' चे दीर्घत्व छंदाच्या रक्षणासाठी (वृत्तबद्धतेसाठी) आहे. ၁၃၉. १३९. သုခုမာလတ္တမတ္ထေဝ, ပဒတ္ထဝိသယမ္ပိ စ; ယထာ မတာဒိသဒ္ဒေသု, ကိတ္တိသေသာဒိကိတ္တနံ. सुकुमारता ही अर्थामध्येही असते, तसेच ती पदांच्या अर्थाच्या विषयातही असते; जसे 'मृत' इत्यादी शब्दांच्या ऐवजी 'कीर्तिशेष' इत्यादी शब्दांचे कथन करणे. ၁၃၉. န [Pg.162] ကေဝလံ သုခုမာလတာ သဒ္ဒေဝ, အတ္ထေပီတိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘သုခုမာလတ္တ’’မိစ္စာဒိ. အတ္ထေဝါတိ ဝိဇ္ဇတေဝ, တံ တု အနောစိတျဂါမ္မာဒိဝဇ္ဇနာ သမ္ဘဝတိ. ‘‘ယထေ’’တိ တမုဒါဟရတိ. မတာဒိသဒ္ဒေသု ဝတ္တဗ္ဗေသု ကိတ္တိသေသာဒီနံ သဒ္ဒါနံ ကိတ္တနံ ကထနံ. १३९. सुकुमारता केवळ शब्दातच नसते, तर अर्थातही असते, हे दर्शवण्यासाठी 'सुकुमारत्तं' इत्यादी म्हणतात. 'अर्थातच असते' म्हणजे विद्यमानच असते, आणि ती अनौचित्य, ग्राम्यत्व इत्यादी दोषांच्या वर्जनाने (टाळण्याने) संभवते. 'यथा' (जसे) याद्वारे त्याचे उदाहरण देतात. 'मृत' इत्यादी शब्द बोलायचे असताना 'कीर्तिशेष' इत्यादी शब्दांचे कीर्तन म्हणजे कथन करणे. ၁၃၉. အယံ သုခုမာလတာ န ကေဝလံ သဒ္ဒေဝ, အတ္ထေပီတိ ဒဿေတုံ အာဟ ‘‘သုခုမာလတ္တ’’မိစ္စာဒိ. သုခုမာလတ္တမတ္ထေဝ ပဒတ္ထဝိသယမ္ပိ စ ပဒါဘိဓေယျဂေါစရမ္ပိ သုခုမာလတ္တံ အတ္ထေဝ, တဉ္စ ဩစိတျဟီနဂါမ္မဒေါသပရိဟာရေန သိဇ္ဈတိ. ‘‘ယထာ’’တိ တမုဒါဟရတိ. မတာဒိသဒ္ဒေသု ဝတ္တဗ္ဗေသု ကိတ္တိသေသာဒိသဒ္ဒါနံ ကိတ္တနံ ကထနန္တိ. မတော ဣတိအာဒိ ယေသံ ‘‘ဇီဝိတက္ခယံ ပတ္တော’’ ဣစ္စာဒီနမိတိ စ, ကိတ္တိသေသော ဣတိအာဒိယေသံ ‘‘ဒေဝတ္တံ ဂတော, သဂ္ဂကာယမလင်္ကရီ’’တျာဒီနမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १३९. ही सुकुमारता केवळ शब्दातच नसते, तर अर्थातही असते, हे दर्शवण्यासाठी 'सुकुमारत्तं' इत्यादी म्हणतात. 'सुकुमारता अर्थातच असते आणि पदांच्या अर्थाच्या विषयातही' म्हणजे पदांच्या अभिधेय (वाच्य) विषयामध्येही सुकुमारता असतेच, आणि ती अनौचित्य व ग्राम्यत्व या दोषांच्या परिहाराने (टाळण्याने) सिद्ध होते. 'यथा' (जसे) याद्वारे त्याचे उदाहरण देतात. 'मृत' इत्यादी शब्द बोलायचे असताना 'कीर्तिशेष' इत्यादी शब्दांचे कीर्तन म्हणजे कथन करणे. 'मृत' इत्यादी ज्यांचा अर्थ 'जीवनाचा क्षय झालेला' इत्यादी असा आहे, आणि 'कीर्तिशेष' इत्यादी ज्यांचा अर्थ 'देवत्वाला प्राप्त झालेला, स्वर्गलोकाला अलंकृत करणारा' इत्यादी असा आहे, असा विग्रह आहे. ၁၄၀. १४०. သိလိဋ္ဌပဒသံသဂ္ဂ-ရမဏီယဂုဏာလယော; သဗန္ဓဂါရဝေါ သော’ယံ,သိလေသော နာမ တံ ယထာ. श्लिष्ट (परस्परांशी घट्ट जोडलेल्या) पदांच्या संसर्गाने रमणीय अशा गुणांचे जे स्थान (आलय) आहे, आणि जो बंधाच्या गौरवाने (रचनेच्या दृढतेने) युक्त आहे, तो हा 'सिलेस' (श्लेष) नावाचा गुण आहे; त्याचे उदाहरण खालीलप्रमाणे आहे. ၁၄၀. သိလေသံ ဒဿေတိ ‘‘သိလိဋ္ဌေ’’စ္စာဒိနာ. သိလိဋ္ဌာနံ ဗန္ဓလာဃဝါဘာဝေန အညမညံ သိလိဋ္ဌာနံ ပဒါနံ သံသဂ္ဂေန ရမဏီယော မနုညော ဂုဏော တဿ အာလယော ပဝတ္တိဋ္ဌာနံ. ဗန္ဓဿ ရစနာယ ဂါရဝေါ အသိထိလတာ, သဟ တေန ဝတ္တတီတိ သဗန္ဓဂါရဝေါတိ အနုဝဒိတွာ သောယံ သိလေသော နာမာတိ ဝိဓီယတေ. ‘‘တံ ယထေ’’တျုဒါဟရတိ. ယထာ အယံ သိလေသော, တထာ အညောပိ တာဒိသော ဒဋ္ဌဗ္ဗော, န တွယမေဝေတိ ‘‘တံ ယထာ’’ သဒ္ဒဿတ္ထော. १४०. ते 'सिलीठ' इत्यादींद्वारे सिलेस (श्लेष) दर्शवतात. श्लिष्ट म्हणजे बंधाच्या शिथिलतेच्या अभावामुळे परस्परांशी घट्ट जोडलेल्या पदांच्या संसर्गाने रमणीय, मनोहर अशा गुणाचे जे आलय म्हणजे प्रवृत्तीचे स्थान आहे. बंधाच्या रचनेचा गौरव म्हणजे अशिथिलता (दृढता), त्याने युक्त असलेला तो 'सबन्धगौरव' होय, असा अनुवाद करून 'तो हा सिलेस नावाचा गुण आहे' असे विधान केले जाते. 'तं यथा' (त्याचे उदाहरण खालीलप्रमाणे) याद्वारे उदाहरण देतात. जसा हा सिलेस आहे, तसाच दुसराही तशाच प्रकारचा समजावा, केवळ हा एकच नाही, असा 'तं यथा' या शब्दाचा अर्थ आहे. ၁၄၀. ဣဒါနိ သိလေသံ နိဒ္ဒိသတိ ‘‘သိလိဋ္ဌေ’’စ္စာဒိနာ. သိလိဋ္ဌပဒသံသဂ္ဂရမဏီယဂုဏာလယော ဌာနကရဏာဒီဟိ အာသန္နဝဏ္ဏာနံ [Pg.163] ဝိနျာသဟေတု အညမညနိဿိတာနံ ပဒါနံ သမဝါယေန မနုညဂုဏဿ ပဝတ္တိဋ္ဌာနဘူတော သဗန္ဓဂါရဝေါ ဗန္ဓဂါရဝသင်္ခါတရစနာယ အသိထိလဘာဝေန သဟ ပဝတ္တော သော အယံ ဗန္ဓော သိလေသော နာမာတိ. သိလေသော နာမ ဗန္ဓဂါရဝေါ, တပ္ပဋိပါဒကဗန္ဓောပျေတ္ထ သိလေသောတိ ဝုစ္စတိ. သိလိဋ္ဌာ စ တေ ပဒါ စေတိ စ, တေသံ သံသဂ္ဂေါတိ စ, တေန ရမဏီယောတိ စ, သော ဧဝ ဂုဏောတိ စ, တဿ အာလယောတိ စ, ဗန္ဓဿ ဂုရုနော ဘာဝေါတိ စ, တေန သဟ ပဝတ္တတီတိ စ ဝါကျံ. တံ ယထာ ‘‘ဗာလိန္ဒု’’ဣစ္စာဒိ. १४०. आता 'सिलीठ' इत्यादींद्वारे सिलेसचे (श्लेषाचे) निर्देश करतात. श्लिष्टपदांच्या संसर्गाने रमणीय गुणांचे आलय म्हणजे स्थान, करण इत्यादींमुळे जवळ असलेल्या वर्णांच्या विन्यासामुळे (रचनेमुळे) परस्परांवर आश्रित असलेल्या पदांच्या समवायाने (एकत्र येण्याने) मनोहर गुणाचे प्रवृत्तीचे स्थान बनलेला; सबन्धगौरव म्हणजे बंधगौरव नावाच्या रचनेच्या अशिथिलतेने (दृढतेने) युक्त असलेला, तो हा बंध 'सिलेस' नावाचा आहे. सिलेस म्हणजे बंधगौरव होय, आणि त्याचे प्रतिपादन करणारा बंधही येथे 'सिलेस' म्हटला जातो. 'श्लिष्ट आणि ती पदे' आणि 'त्यांचा संसर्ग', 'त्याच्यामुळे रमणीय', 'तोच गुण', 'त्याचे आलय', 'बंधाच्या गुरुत्वाचा (गौरवाचा) भाव', 'त्याच्यासह प्रवृत्त होतो' असे हे वाक्य आहे. त्याचे उदाहरण जसे 'बालिन्दु' इत्यादी. ၁၄၁. १४१. ဗာလိန္ဒုဝိဗ္ဘမစ္ဆေဒိ-နခရာဝလိကန္တိဘိ; သာ မုနိန္ဒပဒမ္ဘောဇ-ကန္တိ ဝေါ ဝလိတာ’ဝတံ. बालचंद्राच्या विलासाचा (सौंदर्याचा) पराभव करणाऱ्या नखपंक्तींच्या कांतींनी (शोभेने) युक्त असलेली, मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) चरणकमलांची ती कांती तुमचे रक्षण करो. ၁၄၁. ‘‘ဗာလိန္ဒု’’ဣစ္စာဒိ. ဗာလိန္ဒုနော ပဉ္စမီ ပဉ္စဒသကလဿ ဝိဗ္ဘမော မနောဟရတ္တံ, တံ ဆိန္ဒတိ သီလေနာတိ ဗာလိန္ဒုဝိဗ္ဘမစ္ဆေဒိယော ပဉ္စမီစန္ဒဿ ကလာသန္နိဘာနံ နခရာနံ နခါနံ အာဝလိယော တာသံ ကန္တိဘိ သောဘာဟိ သဟ ဝလိတာ သံယုတ္တာ သာ, မုနိန္ဒဿ ပဒါနိယေဝ အမ္ဘောဇာနိ ပဒုမာနိ တေသံ ကန္တိ. ဝေါ တုမှေ သာမညေန ဝဒတိ. အဝတံ ပါလယတု. १४१. 'बालिन्दु' इत्यादी. बालचंद्र म्हणजे पंचमीच्या किंवा पंधरा कळांच्या चंद्राचा विलास म्हणजे मनोहरता, तिचा स्वभावतःच छेद (पराभव) करतात म्हणून 'बालिन्दुविब्भमच्छेदी' (बालचंद्रविलासच्छेदी); पंचमीच्या चंद्राच्या कळेसारख्या असलेल्या नखांच्या पंक्ती, त्यांच्या कांतींनी म्हणजे शोभेने युक्त (वेढलेली) असलेली ती, मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) पाय हेच अंबुज म्हणजे कमळ, त्यांची कांती (शोभा) होय. 'वो' म्हणजे तुम्हांला, असे सामान्यपणे म्हणतात. 'अवतं' म्हणजे रक्षण करो. ၁၄၁. ဗာလိန္ဒု…ပေ… ကန္တိဘိ တရုဏစန္ဒဝိလာသဝိနာသနသဘာဝသမန္နာဂတနခပန္တိသောဘာဟိ သဟ ဝလိတာ သံယုတ္တာ သာ မုနိန္ဒပဒမ္ဘောဇကန္တိ သာ သမ္ဗုဒ္ဓပါဒပဒုမသောဘာ ဝေါ တုမှေ အဝတံ ရက္ခတူတိ. ဗာလော စ သော ဣန္ဒု စာတိ စ, တဿ ဝိဗ္ဘမောတိ စ, တံ ဆိန္ဒတိ သီလေနာတိ စ, နခါနံ အာဝလိယောတိ စ, တာသံ ကန္တီတိ စ, ဗာလိန္ဒုဝိဗ္ဘမစ္ဆေဒိယော စ တာ နခရာဝလိကန္တိယော စာတိ စ, မုနိန္ဒဿ ပဒါနီတိ စ, တာနိယေဝ အမ္ဘောဇာနီတိ စ, တေသံ ကန္တီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १४१. 'बालिन्दु... पे... कांतीभि' म्हणजे तरुण चंद्राच्या विलासाचा विनाश करण्याच्या स्वभावाने युक्त असलेल्या नखपंक्तींच्या शोभेने युक्त (वेढलेली) असलेली ती मुनींद्र-पद-अंबुज-कांती म्हणजे संबुद्धांच्या पादपद्मांची शोभा 'वो' म्हणजे तुमचे 'अवतं' म्हणजे रक्षण करो. 'बाल आणि तो चंद्र' (बालचंद्र), 'त्याचा विलास', 'त्याचा स्वभावतः छेद करणारा', 'नखांची पंक्ती', 'त्यांची कांती', 'बालचंद्रविलासच्छेदी आणि त्या नखपंक्तींच्या कांती', 'मुनींद्रांचे पाय', 'तेच अंबुज (कमळ)', 'त्यांची कांती' असा विग्रह आहे. ၁၄၂. १४२. ဥက္ကံသဝန္တော [Pg.164] ယော ကောစိ,ဂုဏော ယဒိ ပတီယတေ; ဥဒါရော’ယံ ဘဝေ တေန,သနာထာ ဗန္ဓပဒ္ဓတိ. जर कोणताही उत्कर्षयुक्त (श्रेष्ठ) गुण प्रतीत होत असेल, तर त्याच्यामुळे हा 'उदार' नावाचा गुण होतो, ज्याच्याने रचनापद्धती सनाथ (समृद्ध) होते. ၁၄၂. ဥဒါရတ္တမဝဓာရယမာဟ ‘‘ဥက္ကံသဝန္တော’’ဣစ္စာဒိ. ယော ကောစိ ‘‘ဣဒမေဝေ’’တိ နိယမာဘာဝါ ဂုဏော စာဂါတိသယာဒိကော ဥက္ကံသဝန္တော အဓိမတ္တော ယဒိ ပတီယတေ ဝိညာယတေ ဗန္ဓေတိ ဝိညာယတိ ‘‘ဗန္ဓပဒ္ဓတီ’’တိ ဝက္ခမာနတ္တာ, အယံ ဥဒါရော ဘဝေတိ ဝိဓိ. ဥဒါရောယံ ဟောတု, ကိံ တတော သိယာတိ အာဟ ‘‘တေနိ’’စ္စာဒိ. တေန ဥက္ကံသဝတာ ဂုဏေန ဗန္ဓပဒ္ဓတိ ရစနက္ကမော နာထဘူတေန ဥဒါရဂုဏေန သဟ ဝတ္တတီတိ သနာထာ, သမ္ပဒါဝါတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. १४२. उदारतेची निश्चिती करत 'उक्कंसवन्तो' इत्यादी म्हणतात. 'हाच' असा नियम नसल्यामुळे कोणताही त्याग इत्यादींचा अतिशय असलेला उत्कर्षयुक्त, श्रेष्ठ गुण जर प्रतीत होतो म्हणजे जाणवला जातो—'रचनेमध्ये' असे जाणवले जाते, कारण पुढे 'बंधपद्धती' असे म्हटले जाणार आहे—तर हा 'उदार' गुण होतो, असा नियम आहे. हा उदार गुण असो, पण त्याने काय होईल? म्हणून 'तेन' इत्यादी म्हणतात. त्या उत्कर्षयुक्त गुणाने रचनापद्धती म्हणजे रचनेचा क्रम, जो नाथभूत (रक्षक) अशा उदार गुणाने युक्त असतो, म्हणून ती 'सनाथ' म्हणजे समृद्ध होते, असे म्हटले आहे. ၁၄၂. ဣဒါနိ ဥဒါရတ္တမုဒ္ဒိသတိ ‘‘ဥက္ကံသေ’’စ္စာဒိနာ. ဥက္ကံသဝန္တော အတိသယဝါ ယောကောစိ ဂုဏော စာဂါတိသယာဒိကော သဒ္ဒါဝလိယာ ပဋိပါဒနီယော အာနုဘာဝေါ ယဒိ ပတီယတေ သစေ ကတ္ထစိ ဗန္ဓေ ဝိညာယတေ, အယံ ယထာဝုတ္တဂုဏော ဥဒါရော နာမ ဘဝေ. တေန ကိံ ပယောဇနန္တိ စေ? ဗန္ဓဗန္ဓတိ ပဒါဝလိ တေန ဥက္ကံသဝတာ ဂုဏေန သနာထာ သပ္ပတိဋ္ဌာ ဟောတိ. ဥက္ကံသော အဿ အတ္ထီတိ စ, နာထေန သဟ ဝတ္တတီတိ စ, ဗန္ဓဿ ပဒ္ဓတီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १४२. आता 'उदारत्व' (उदात्तता) 'उक्कंसे' इत्यादींद्वारे दर्शवितात. शब्दावलीद्वारे प्रतिपादन करण्याजोगा कोणताही उत्कर्षयुक्त किंवा अतिशय गुण, जसे की दानाचा अतिशय (त्यागाची पराकाष्ठा) इत्यादी किंवा प्रभाव जर कुठे रचनेत (काव्यात) समजून येत असेल किंवा प्रतीत होत असेल, तर हा पूर्वोक्त गुण 'उदार' नावाचा होतो. त्याने काय प्रयोजन आहे? तर, शब्दांची रचना (पदावली) त्या उत्कर्षयुक्त गुणाने सनाथ (युक्त) आणि सुप्रतिष्ठित होते. 'उत्कर्ष ज्याचा आहे तो' (उक्कंसो अस्स अत्थीति), 'नाथासह (रक्षकासह) राहतो तो' (नाथेन सह वत्ततीति) आणि 'रचनेची पद्धती' (बंधस्स पद्धतीति) असा याचा विग्रह आहे. ၁၄၃. १४३. ပါဒမ္ဘောဇရဇောလိတ္တ-ဂတ္တာ ယေတဝ ဂေါတမ; အဟော တေ ဇန္တဝေါ ယန္တိ, သဗ္ဗထာ နိရဇတ္တနံ. हे गोतम! ज्यांचे शरीर आपल्या चरणकमलांच्या धुळीने माखलेले आहे; अहो! ते प्राणी सर्व प्रकारे पूर्णपणे रज-रहिततेला (निष्क्लेशतेला) प्राप्त होतात. ၁၄၃. တမုဒါဟရတိ ‘‘ပါဒေ’’စ္စာဒိနာ. ဂေါတမာတိ ဘဂဝန္တံ ဂေါတ္တေန အာလပတိ. တဝ ဘဂဝတော ပါဒမ္ဘောဇာနံ ရဇာနိ ရေဏဝေါ, တေဟိ လိတ္တာနိ ဥပဒေဟိတာနိ ဂတ္တာနိ ယေသန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. ယေ ဇနာ တေ ဇန္တဝေါ သဗ္ဗပ္ပကာရေန ရဇောလဝေနာပျနုပလိတ္တတ္တာ ရဇေဟိ ကိလေသသင်္ခါတေဟိ [Pg.165] နိဂ္ဂတာ နိရဇာ, တေသံ ဘာဝေါ နိရဇတ္တနံ နိက္ကိလေသဘာဝံ ယန္တိ ပါပုဏန္တိ. အဟော အစ္ဆရိယံ ယတော ရဇသာ လိတ္တာ နာမ သံကိလိဋ္ဌာယေဝ သိယုံ, ဘဝံ ပန ပါဒရဇသာ ဝိလေပနေ ဇနေ နိရဇေ ကရောတိ. အစ္ဆရိယံ ဘဝတော ဣဒန္တိ အတ္ထော. १४३. 'पादे' इत्यादींद्वारे त्याचे उदाहरण देतात. 'गोतम' या गोत्राने ते भगवंतांना संबोधित करतात. 'आपल्या (भगवंतांच्या) चरणकमलांची धूळ (रेणू), ज्यांनी आपले शरीर माखले आहे' असा विग्रह आहे. जे लोक म्हणजेच प्राणी, सर्व प्रकारे धुळीच्या कणानेही न माखल्यामुळे, क्लेशरूपी धुळीपासून मुक्त (निरज) होतात, त्यांची ती अवस्था म्हणजे 'निरजत्तनं' (निष्क्लेश भाव) प्राप्त करतात. अहो आश्चर्य! कारण जे धुळीने माखलेले असतात ते तर मलीनच (संक्लिष्ट) असायला हवेत, परंतु आपण मात्र चरणांच्या धुळीच्या विलेपनाने लोकांना निष्क्लेश (निरज) करता. हे आपले आश्चर्य आहे, असा याचा अर्थ आहे. ၁၄၃. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ပါဒမ္ဘောဇေ’’စ္စာဒိနာ. ဘော ဂေါတမ ယေ သတ္တာ တဝ တုယှံ ပါဒမ္ဘောဇရဇောလိတ္တဂတ္တာ ပါဒပဒုမရေဏုလိတ္တမတ္ထကနလာဋာဒိသရီရာဝယဝယုတ္တာ တေ ဇန္တဝေါ သတ္တာ သဗ္ဗထာ ကိလေသသင်္ခါတရဇောဇလ္လေဟိ အနုပလိတ္တတ္တာ သဗ္ဗပ္ပကာရေန နိရဇတ္တနံ ဝိဂတကိလေသရဇောဘာဝံ ယန္တိ ပါပုဏန္တိ, အဟော အစ္ဆရိယံ. ရဇောလိတ္တာ နာမ သံကိလိဋ္ဌာ သိယုံ, တွံ ပန ပါဒရဇသာ ဥပလိတ္တေပိ သတ္တေ နိရဇေ ကရောသီတိ ဘာဝေါ. ဣဟ ဘဂဝတော ဥက္ကံသဂုဏော ဒီပိတော ဟောတိ. ပါဒါနိယေဝ အမ္ဘောဇာနီတိ စ, တေသံ ရဇာနီတိ စ, တေဟိ လိတ္တာနိ ဂတ္တာနိ ယေသန္တိ စ, ရဇေဟိ ကိလေသေဟိ နိဂ္ဂတာတိ စ, တေသံ ဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. १४३. आता 'पादंभोजे' इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. हे गोतम! जे प्राणी आपल्या चरणकमलांच्या धुळीने माखलेल्या शरीराचे आहेत, म्हणजेच ज्यांचे मस्तक, कपाळ इत्यादी शरीराचे अवयव चरणकमलांच्या परागाने माखलेले आहेत, ते प्राणी सर्व प्रकारे क्लेशरूपी मळ-धुळीने न माखल्यामुळे, सर्व प्रकारे 'निरजत्तनं' म्हणजे क्लेशरूपी धुळीने रहित अशा अवस्थेला प्राप्त होतात, अहो आश्चर्य! धुळीने माखलेले लोक तर मलीन असायला हवेत, परंतु आपण मात्र चरणांच्या धुळीने माखलेल्या प्राण्यांनाही निष्क्लेश (निरज) करता, असा भाव आहे. येथे भगवंतांचा उत्कर्ष-गुण प्रकाशित होतो. 'चरण हेच कमल' (पादानियेव अंभोजानीति), 'त्यांची धूळ' (तेसं रजानीति), 'त्यांनी ज्यांचे शरीर माखले आहे ते' (तेहि लित्तानि गत्तानि येसन्ति), 'क्लेशरूपी धुळीपासून मुक्त' (रजेहि किलेसेहि निग्गताति) आणि 'त्यांची अवस्था' (तेसं भावोति) असे हे वाक्य आहे. ၁၄၄. १४४. ဧဝံ ဇိနာနုဘာဝဿ, သမုက္ကံသော’တြဒိဿတိ; ပညဝါ ဝိဓိနာ’နေန, စိန္တယေ ပရမီဒိသံ. अशा प्रकारे, येथे जिनांच्या (बुद्धांच्या) प्रभावाचा उत्कर्ष दिसून येतो; प्रज्ञावानाने या पद्धतीने अशाच इतर गोष्टींचा विचार करावा. ၁၄၄. ကော ပနေတ္ထ ဥက္ကံသဝန္တော ဂုဏော ယေန ဗန္ဓော သနာထော သိယာတိ စေ? အာဟ ‘‘ဧဝ’’မိစ္စာဒိ. ဧဝမိတိ ဇိနာနုဘာဝဿ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓပဘာဝဿ သမုက္ကံသော အတိသယော ဒိဿတိ ပဒိဿတေ အတြ ဗန္ဓေ, တသ္မာ ဇိနာနုဘာဝေန ဥက္ကံသဝတာ ဂုဏေန ဗန္ဓော သနာထော သိယာတိ. ပကာရမိမမညတြပိအတိဒိသန္တော အာဟ ‘‘ပညဝါ’’တိအာဒိ. ပညဝါ ပညာသမ္ပန္နော အနေန ဝိဓိနာ ဣမိနာ ပကာရေန ဧဒိသံ ဧဝရူပံ ပရံ အညံ စိန္တယေ ဝိတက္ကေယျ. १४४. येथे असा कोणता उत्कर्षयुक्त गुण आहे, ज्याने रचना सनाथ (युक्त) होईल? असे विचारल्यास ते 'एवं' इत्यादी म्हणतात. 'एवं' म्हणजे जिनांच्या प्रभावाचा म्हणजेच सम्यक्संबुद्धांच्या प्रभावाचा उत्कर्ष (अतिशय) या रचनेत दिसून येतो, म्हणून जिनांच्या प्रभावरूपी उत्कर्षयुक्त गुणाने रचना सनाथ होते. हाच प्रकार इतरत्रही लागू करताना ते 'पञ्ञवा' (प्रज्ञावान) इत्यादी म्हणतात. प्रज्ञावान म्हणजे प्रज्ञेने संपन्न असलेल्याने या पद्धतीने (या प्रकारे) अशाच प्रकारच्या इतर गोष्टींचा विचार करावा. ၁၄၄. ဣဒါနိ [Pg.166] ယထာဝုတ္တဂုဏနိဒဿနဉ္စ သိဿာနုသာသနဉ္စ ဒဿေတိ ‘‘ဧဝ’’မိစ္စာဒိနာ. အတြ ဣမိဿံ အနန္တရဂါထာယံ ဧဝံ ယထာဝုတ္တက္ကမေန ဇိနာနုဘာဝဿ တထာဂတပ္ပဘာဝဿ သမုက္ကံသော အာဓိက္ကံ ဒိဿတိ ပဒိဿတေ, တသ္မာ ဇိနာနုဘာဝသင်္ခါတေန ဥက္ကံသဝတာ ဂုဏေန ဗန္ဓော သနာထော ဘဝေယျ. ပညဝါ ပသတ္ထဉာဏဝန္တော အနေန ဝိဓိနာ ဣမိနာ ကမေန ဤဒိသံ ပရံ အညံ စိန္တယေ ကပ္ပေယျ. १४४. आता पूर्वोक्त गुणाचे उदाहरण आणि शिष्यांना उपदेश 'एवं' इत्यादींद्वारे दर्शवितात. येथे या नंतरच्या गाथेमध्ये, अशा प्रकारे पूर्वोक्त क्रमाने जिनांच्या प्रभावाचा म्हणजेच तथागतांच्या प्रभावाचा उत्कर्ष (अधिक्य) दिसून येतो, म्हणून जिनांच्या प्रभावरूपी उत्कर्षयुक्त गुणाने रचना सनाथ व्हावी. प्रज्ञावान म्हणजे प्रशंसनीय ज्ञान असलेल्याने या पद्धतीने (या क्रमाने) अशाच प्रकारच्या इतर गोष्टींची कल्पना करावी (विचार करावा). ၁၄၅. १४५. ဥဒါရော သောပိ ဝိညေယျော,ယံ ပသတ္ထဝိသေသနံ; ယထာ ကီဠာသရော လီလာ-ဟာသ ဟေမင်္ဂဒါဒယော. ज्याला प्रशंसनीय विशेषण जोडलेले असते, तो देखील 'उदार' समजावा; जसे की 'क्रीडासरोवर' (क्रीडासर), 'लीलाहास' (विलासयुक्त हास्य), 'हेमांगद' (सोन्याचे बाजूबंद) इत्यादी. ၁၄၅. အပရမုဒါရပ္ပကာရံ ဒဿေတုမာဟ ‘‘ဥဒါရော’’ဣစ္စာဒိ. ယံ ပသတ္ထံ သိလာဃနီယံ ဝိသေသနံ ဥပါဒိယတိ, သောပိ န ပန ယထာဝုတ္တောဝ ဥဒါရော ဝိညေယျော. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ. ကီဠာယ ကီဠတ္ထံ သရော, လီလာယ ယုတ္တော ဟာသော, ဟေမံ ဟေမမယမင်္ဂဒန္တိ သမာသော, တံ အာဒိ ယေသန္တိ ဗာဟိရတ္ထော. အာဒိသဒ္ဒေန ကုသုမဒါမမဏိမေခလာဒီနံ သင်္ဂဟော. အယံ တု ဗန္ဓဖရုသဂါမ္မပရိစ္စာဂါ သမ္ဘဝတိ. १४५. उदार गुणाचा दुसरा प्रकार दर्शविण्यासाठी 'उदारो' इत्यादी म्हणतात. जे प्रशंसनीय म्हणजेच श्लाघनीय विशेषण ग्रहण करते, तो देखील—केवळ पूर्वोक्तच नव्हे तर—'उदार' समजावा. 'यथा' द्वारे उदाहरण देतात. 'क्रीडेसाठी असलेला सरोवर' (कीळासरो), 'लीलेने (विलासाने) युक्त असलेले हास्य' (लीलाहासो), 'सोने म्हणजेच सुवर्णमय बाजूबंद' (हेमांगद) असा हा समास आहे, आणि 'ज्यांच्या सुरुवातीला हे आहेत' असा बाह्य अर्थ आहे. 'इत्यादी' (आदि) शब्दाने फुलांचे हार, मणीमय मेखला (कमरपट्टा) इत्यादींचा संग्रह होतो. हा गुण मात्र रचनेतील कठोरता आणि ग्राम्यता (अशिष्टता) यांच्या त्यागामुळे संभवतो. ၁၄၅. အညမပိ ဥဒါရံ ဒဿေတိ ‘‘ဥဒါရော’’စ္စာဒိနာ. ယံ ပသတ္ထဝိသေသနံ ပသံသနီယဝိသေသနံ ဟောတိ, သောပိ ဥဒါရောတိ ဝိညေယျော. ‘‘ယထာ’’တိ တမုဒါဟရတိ. ကီဠာသရော ကီဠာယ ကတော သရော. လီလာဟာသော လီလာယ ယုတ္တော ဟာသော. ဟေမင်္ဂဒါဒယော သုဝဏ္ဏကေယူရာဣစ္စာဒယောတိ. ကီဠတ္ထာယ သရောတိ စ, လီလာယ ယုတ္တော ဟာသောတိ စ, ဟေမံ ဟေမမယံ အင်္ဂဒန္တိ စ, လီလာဟာသော စ ဟေမင်္ဂဒဉ္စာတိ စ, တာနိ အာဒီနိ ယေသံ ကုသုမဒါမမဏိမေခလာဒီနန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. အယမုဒါရော ဗန္ဓဖရုသဂါမ္မာဒိဒေါသပရိစ္စာဂေန သိဇ္ဈတိ. १४५. दुसराही उदार गुण 'उकारो' इत्यादींद्वारे दर्शवितात. जे प्रशंसनीय विशेषण असते, तो देखील 'उदार' म्हणून समजावा. 'यथा' द्वारे त्याचे उदाहरण देतात. 'क्रीडासरोवर' म्हणजे क्रीडेसाठी बनवलेला सरोवर. 'लीलाहास' म्हणजे लीलेने युक्त असलेले हास्य. 'हेमांगदादयो' म्हणजे सोन्याचे बाजूबंद इत्यादी. 'क्रीडेसाठी सरोवर' (कीळत्थाय सरोति), 'लीलेने युक्त हास्य' (लीलाय युत्तो हासोति), 'सोने म्हणजेच सुवर्णमय बाजूबंद' (हेमं हेममयं अंगदन्ति), 'लीलाहास आणि हेमांगद' (लीलाहासो च हेमांगदञ्चाति) आणि 'ज्यांच्या सुरुवातीला हे आहेत, जसे की फुलांचे हार, मणीमय मेखला इत्यादी' (तानि आदीनि येसं कुसुमहाममणिमेखलादीनन्ति) असा विग्रह आहे. हा 'उदार' गुण रचनेतील कठोरता आणि ग्राम्यता इत्यादी दोषांच्या त्यागामुळे सिद्ध होतो. ၁၄၆. १४६. လောကိယတ္ထာနတိက္ကန္တာ,[Pg.167] ကန္တာ သဗ္ဗဇနာနပိ; ကန္တိ နာမာ’တိဝုတ္တဿ,ဝုတ္တာ သာ ပရိဟာရတော. लौकिक (लोकप्रसिद्ध) अर्थाचे उल्लंघन न करणारी आणि सर्व लोकांना प्रिय वाटणारी ती 'कांती' (सौंदर्य/मनोहरता) होय; ती अतिशयोक्तीच्या (अतिवृत्त दोषाच्या) परिहाराने (टाळण्याने) निर्माण होते असे म्हटले आहे. ယထာ ‘‘မုနိန္ဒ’’ဣစ္စာဒိ. जसे की 'मुनिंद' (मुनींद्र) इत्यादी. ၁၄၆. ကန္တိံ ကထယတိ ‘‘လောကိယိ’’စ္စာဒိနာ. လောကေ ဝိဒိတော လောကိယော, တံ လောကိယံ အတ္ထံ အဘိဓေယျံ အနတိက္ကန္တာ အနတီတာ သဗ္ဗေသံ ကဝီနမိတရေသံ ဝါ ဇနာနံ ဧဝ ကန္တာ မနောဟရာ ကန္တိ နာမာတိ ဝုစ္စတိ. အယံ ပန သဒ္ဒဂုဏော အတိဝုတ္တဿ ဝါကျဒေါသဿ ပရိစ္စာဂေန သမ္ဘဝတိ. တေနာဟ ‘‘အတိဝုတ္တဿာ’’တိအာဒိ. ဥဒါဟရဏတ္ထော ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တောယေဝ. १४६. 'कांती' इत्यादींद्वारे 'कांती' गुणाचे वर्णन करतात. लोकात प्रसिद्ध असलेला तो 'लौकिक' होय. त्या लौकिक अर्थाचे (अभिधेय अर्थाचे) उल्लंघन न करणारी आणि सर्व कवींना किंवा इतर लोकांनाही प्रिय (मनोहर) वाटणारी ती 'कांती' नावाची म्हटली जाते. हा शब्दगुण मात्र 'अतिवृत्त' (अतिशयोक्ती) या वाक्यदोषाच्या त्यागामुळे संभवतो. म्हणूनच ते 'अतिवृत्तस्स' इत्यादी म्हणतात. उदाहरणाचा अर्थ खाली सांगितलेलाच आहे. ၁၄၆. ဣဒါနိ ကန္တိံ ဒဿေတိ ‘‘လောကိယိ’’စ္စာဒိနာ. လောကိယတ္ထာနတိက္ကန္တာ လောကေ ပသိဒ္ဓသဒ္ဒတ္ထမနတိက္ကန္တာ သဗ္ဗဇနာနံ သကလကဝီနံ ကန္တာ မနုညာ ကန္တိ နာမ ဝုစ္စတေ, သာ အတိဝုတ္တဿ အတိဝုတ္တဒေါသဿ ပရိဟာရတော ဝုတ္တာ ဒေါသပရိဟာရပရိစ္ဆေဒေ ကထိတာ ဟောတိ. အတိဝုတ္တဒေါသပရိဟာရတော ဧဝ ကန္တိယာ သိဒ္ဓတ္တာ တဿ လက္ခိယော ဧဝ ဧတိဿာ ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. လောကေ ဝိဒိတောတိ စ, သော စ သော အတ္ထော စေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ‘‘ယထာ’’တိ ကန္တိယာ ဥဒါဟရဏံ ဒဿေတိ ‘‘မုနိန္ဒ’’ဣစ္စာဒိ. တံ ဝုတ္တမေဝ. १४६. आता 'लोकियि' इत्यादींद्वारे 'कांती' दर्शवितात. लौकिक अर्थाचे उल्लंघन न करणारी, म्हणजेच लोकात प्रसिद्ध असलेल्या शब्दार्थाचे उल्लंघन न करणारी आणि सर्व लोकांना म्हणजेच सर्व कवींना प्रिय (मनोहर) वाटणारी ती 'कांती' म्हटली जाते. ती 'अतिवृत्त' (अतिशयोक्ती) दोषाच्या परिहाराने (टाळण्याने) होते, असे दोषपरिहार परिच्छेदात सांगितले आहे. अतिवृत्त दोषाच्या परिहारानेच कांती सिद्ध होत असल्यामुळे, तिचे लक्षण हेच ठरते, असा अभिप्राय आहे. 'लोकात प्रसिद्ध असलेला' (लोके विदितोति) आणि 'तोच तो अर्थ' (सो च सो अत्थो चेति) असा विग्रह आहे. 'यथा' द्वारे कांतीचे उदाहरण 'मुनिंद' इत्यादी दर्शवितात. ते आधीच सांगितले आहे. ၁၄၇. १४७. အတ္ထဗျတ္တာ’ဘိဓေယျဿာ-နေယျတာ သဒ္ဒတော’တ္ထတော; သာ’ယံ တဒုဘယာ နေယျ-ပရိဟာရေ ပဒဿိတာ. शब्दावरून आणि अर्थावरून अभिधेय (व्यक्त होणाऱ्या) अर्थाची सहज सुबोधता (अनेय्यता - क्लिष्टतेचा अभाव) म्हणजे 'अर्थव्यक्ती' होय. ती या दोन्ही प्रकारच्या 'नेय्य' (क्लिष्टता) दोषाच्या परिहारात दर्शविली आहे. ယထာ ‘‘မရီစိ’’စ္စာဒိ စ, ‘‘မနောနုရဉ္ဇနော’’စ္စာဒိ စ. जसे की 'मरीचि' इत्यादी आणि 'मनोनुरंजनो' इत्यादी. ၁၄၇. အတ္ထဗျတ္တိံ [Pg.168] ဗျဉ္ဇယတိ ‘‘အတ္ထဗျတ္တာဘိဓေယျိ’’စ္စာဒိနာ. အဘိဓေယျဿ သမ္ဗန္ဓအတ္ထဿ သဒ္ဒတော အတ္ထတော ဝါ သာမတ္ထိယတော ဝါ အနေယျတာ ပတီတိ အညထာ ဝဂမော ဂတျန္တရာဘာဝါ, ယတော ဝုတ္တံ ‘‘ဒုလ္လဘာဝဂတီ သဒ္ဒ-သာမတ္ထိယဝိလင်္ဃိနီ’’တိ. တမနုဝဒိတွာ အတ္ထဗျတ္တိ ဝိဓီယတေ. သာ ပန ဗျာကိဏ္ဏနေယျာဒိဒေါသဝဇ္ဇနာယ ဇာယတေ. တဒုဘယာ ဇာတာ သာယံ အနေယျတာ နေယျပရိဟာရေ ပဒဿိတာ ပကာသိတာ. ပဌမဒုတိယောဒါဟရဏဿတ္ထော ဝုတ္တော. १४७. "अर्थब्यत्ति" (अर्थाची स्पष्टता) चे स्पष्टीकरण "अत्थब्यत्ताभिधेय्यि" इत्यादींद्वारे केले आहे. अभिधेय (वाच्य) असलेल्या संबंधित अर्थाची शब्दावरून, अर्थावरून किंवा सामर्थ्यावरून 'अनेय्यता' (दुसऱ्या अर्थाची गरज नसणे) म्हणजेच प्रतीती (स्पष्ट आकलन) होय; कारण दुसरा मार्ग नसल्यामुळे अन्यथा समजणे अशक्य असते. म्हणूनच म्हटले आहे - "शब्दाच्या सामर्थ्याचे उल्लंघन करणारी समजूत दुर्मिळ असते." त्याचा अनुवाद करून 'अर्थब्यत्ति'चे विधान केले जाते. ती (अर्थब्यत्ति) व्याकीर्ण (विखुरलेले) आणि नेय्य (अध्याहार्य) इत्यादी दोषांच्या वर्जनाने उत्पन्न होते. त्या दोन्ही प्रकारांनी उत्पन्न झालेली ही 'अनेय्यता' (अनेय्यत्व) 'नेय्यपरिहार' (नेय्य दोषाचे निवारण) मध्ये दर्शविली आहे, प्रकाशित केली आहे. पहिल्या आणि दुसऱ्या उदाहरणाचा अर्थ सांगितला आहे. ၁၄၇. ဣဒါနိ အတ္ထဗျတ္တိံ ဒဿေတိ ‘‘အတ္ထဗျတ္တိ’’စ္စာဒိနာ. အဘိဓေယျဿ အတ္ထဿ သဒ္ဒတော အတ္ထတော အတ္ထသာမတ္ထိယတော စ အနေယျတာ တတ္ထေဝ ဝိဇ္ဇမာနတ္တာ သဒ္ဒဿ အတ္ထဿ ဝါ အာဟရိတွာ ဝတ္တဗ္ဗဿ အဘာဝေါ အတ္ထဗျတ္တိ နာမ, တဒုဘယာ တေဟိ ဒွီဟိ ဇာတာ သာ အယံ အနေယျတာသင်္ခတာ အတ္ထဗျတ္တိ နေယျပရိဟာရေ နေယျဒေါသပရိဟာရပဒေသေ ပဒဿိတာ ပကာသိတာတိ. ‘‘ဒုလ္လဘာဝဂတီ သဒ္ဒ-သာမတ္ထိယဝိလင်္ဃိနီ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ အတ္ထပတီတိ ပန ဝိနာ သဒ္ဒဉ္စ သာမတ္ထိယဉ္စ အညထာနုပလဗ္ဘတီတိ ဣဟ ‘‘သဒ္ဒတော အတ္ထတော’’တိ ဝုတ္တံ. အတ္ထဿ ဗျတ္တိ ပတီတီတိ စ, နတ္ထိ နေယျံ အာဟရိတဗ္ဗံ အဿ အဘိဓေယျဿာတိ စ, တဿ ဘာဝေါတိ စ, တေ စ တေ ဥဘော သဒ္ဒတ္ထာ စာတိ စ, တေ အဝယဝါ ဧတိဿာတိ စ, နေယျဿ ပရိဟာရောတိ စ ဝါကျံ. ဣဒါနိ ‘‘ယထေ’’စ္စာဒိနာ ဒွိပ္ပကာရာယ အတ္ထဗျတ္တိယာ ယထာက္ကမံ ဥဒါဟရဏမနုဿာရေတိ ‘‘မရိ’’စ္စာဒိဂါထာဒွယေန, တံ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တမေဝ. १४७. आता "अत्थब्यत्ति" इत्यादींद्वारे अर्थब्यत्ति दर्शवितात. अभिधेय अर्थाची शब्दावरून, अर्थावरून आणि अर्थसामर्थ्यावरून 'अनेय्यता' (दुसऱ्या अर्थाची गरज नसणे) म्हणजेच तिथेच विद्यमान असल्यामुळे शब्दाचा किंवा अर्थाचा बाहेरून आणून सांगण्याचा अभाव असणे, याला 'अर्थब्यत्ति' म्हणतात. त्या दोन्ही प्रकारांनी (म्हणजे त्या दोन कारणांनी) उत्पन्न झालेली ही 'अनेय्यता' नावाची अर्थब्यत्ति 'नेय्यपरिहार' (नेय्य दोष परिहार क्षेत्रात) दर्शविली आहे, प्रकाशित केली आहे. "शब्दाच्या सामर्थ्याचे उल्लंघन करणारी समजूत दुर्मिळ असते" असे म्हटल्यामुळे, अर्थाची प्रतीती शब्दाशिवाय आणि सामर्थ्याशिवाय इतर प्रकारे प्राप्त होत नाही, म्हणून येथे "शब्दावरून, अर्थावरून" असे म्हटले आहे. "अर्थाची ब्यत्ति (स्पष्टता) म्हणजे प्रतीती", "या अभिधेयासाठी बाहेरून आणण्यासारखे काही नेय्य (अध्याहार्य) नाही", "त्याचा भाव", "ते दोन्ही शब्द आणि अर्थ", "ते अवयव हिचे आहेत", "नेय्यचा परिहार" हे वाक्य आहे. आता "यथा" इत्यादींद्वारे दोन प्रकारच्या अर्थब्यत्तीचे अनुक्रमे उदाहरण "मरि" इत्यादी दोन गाथांद्वारे आठवण करून देतात, जे आधीच सांगितले आहे. ပုန အတ္ထေန ယထာ – पुन्हा अर्थाच्या दृष्टीने जसे - ၁၄၈. १४८. သဘာဝါမလတာ ဓီရ,မုဓာ ပါဒနခေသု တေ; ယတော တေ’ဝနတာနန္တ-မောဠိစ္ဆာယာ ဇဟန္တိ နော. "हे धीर (बुद्ध)! आपल्या पायांच्या नखांमधील नैसर्गिक निर्मळता व्यर्थ आहे; कारण ती नखे लवलेल्या अनंत (नागराजांच्या) मुकुटांची सावली सोडत नाहीत." ၁၄၈. ပုန [Pg.169] ဒုတိယေ တု ဓီရာတိ အာမန္တနံ. တေ တဝ ပါဒနခေသု သဘာဝါမလတာ ပကတိပရိသုဒ္ဓတာ မုဓာ တုစ္ဆာ. ကသ္မာတိ စေ? ယတော ယသ္မာ ကာရဏာ တေ ပါဒနခါ အဝနတဿ သန္နတဿ အနန္တဿ နာဂရာဇဿ မောဠိနော ကိရီဋဿ အဝနတာနံ ဝါ နရမရာနံ အနန္တာနံ မောဠီနံ ဆာယာ ဆဝိယော နော ဇဟန္တိ န ပရိစ္စဇန္တိ, သဉ္ဆဝိယော ပန ဇဟန္တီတိ. ဧတ္ထ နခေသု သဉ္ဆဝိတ္တာ ပါဒနခဿ မောဠီနံ နိရန္တရပ္ပဏာမာဗျဘိစာရာနရမရာဒီနံ ဘဂဝတော ပါဒါရဝိန္ဒဝန္ဒနံ သာမတ္ထိယာ ဖုဋံ ဂမျတေ. १४८. पुन्हा दुसऱ्या गाथेत "धीरा" हे संबोधन आहे. "ते" म्हणजे आपल्या पायांच्या नखांमधील "सभावमलता" म्हणजे नैसर्गिक निर्मळता "मुधा" म्हणजे व्यर्थ, तुच्छ आहे. का? कारण ज्या कारणाने ते पायांचे नख लवलेल्या, नम्र झालेल्या अनंत नागराजाच्या मुकुटाची (किरीटाची) किंवा लवलेल्या अनंत देव-मनुष्यांच्या मुकुटांची सावली (कांती) सोडत नाहीत, त्याग करत नाहीत; परंतु स्वतःची कांती सोडतात. येथे नखांमध्ये मुकुटांची सावली पडल्यामुळे, पायांच्या नखांवर मुकुटांचे निरंतर नमन करण्याच्या न चुकणाऱ्या क्रियेवरून देव-मनुष्यादींद्वारे भगवंतांच्या चरणकमलांचे वंदन सामर्थ्याने स्पष्टपणे समजून येते. ၁၄၈. ‘‘ပုန အတ္ထေန ယထာ သဘာဝိ’’စ္စာဒိ. ဓီရ တေ တဝ ပါဒနခေသု သဘာဝါမလတာ ပကတိပရိသုဒ္ဓတာ မုဓာ တုစ္ဆာ. ကသ္မာတိ စေ? ယတော ယသ္မာ တေ စရဏနခါ အဝနတာနန္တမောဠိစ္ဆာယာ ပါဒါနတဿ အနန္တနာဂရာဇဿ ကိရီဋဿ သမ္ဗန္ဓိနီ, အဝနတာနံ ဝါ အနန္တာနံ ဒေဝမနုဿာနံ မောဠီနံ ဆာယာ ကန္တိယော နော ဇဟန္တိ န ဝိဇဟန္တိ, ပကတိဝဏ္ဏံ ပဟာယ ကိရီဋကန္တိသဒိသာ တေ ဟောန္တိ, တသ္မာ ဧတ္ထ စန္ဒကိရဏသန္နိဘာနံ နခရံသီနံ သမီပေ မောဠီနံ နခရံသီဟိ အမဒ္ဒိတသကကန္တိယုတ္တဘာဝမာပဇ္ဇနံ တာဒိသာနံ နိရန္တရပ္ပဏာမာဘာဝါဘာဝတော ခတ္တိယာဒီနံ မုနိန္ဒပါဒါရဝိန္ဒဒွန္ဒေ နိရန္တရပ္ပဏာမော သာမတ္ထိယာ ဝိဘူတံ ဂမျတေ. သဿ ဘာဝေါတိ စ, တေန အမလာတိ စ, တေသံ ဘာဝေါတိ စ, ပဌမပက္ခေ အဝနတော စ သော အနန္တော စာတိ စ, တဿ မောဠီတိ စ, တဿ ဆာယာယောတိ စ, ဒုတိယပက္ခေ အနန္တာ စ တေ မောဠီ စေတိ စ, အဝနတာနံ အနန္တမောဠီတိ စ, တေသံ ဆာယာယောတိ စ ဝါကျံ. १४८. "पुन्हा अर्थाच्या दृष्टीने जसे स्वभाव..." इत्यादी. हे धीर! आपल्या पायांच्या नखांमधील नैसर्गिक निर्मळता व्यर्थ, तुच्छ आहे. का? कारण ज्या कारणाने ते चरणनख लवलेल्या अनंत नागराजाच्या मुकुटाशी संबंधित किंवा लवलेल्या अनंत देव-मनुष्यांच्या मुकुटांची सावली (कांती) सोडत नाहीत, त्याग करत नाहीत; नैसर्गिक रंग सोडून ते मुकुटाच्या कांतीसारखे होतात. म्हणून येथे चंद्रकिरणांसारख्या नखांच्या किरणांच्या जवळ मुकुटांच्या नखकिरणांनी न दबलेल्या स्वतःच्या कांतीयुक्त भावाला प्राप्त होणे, अशा प्रकारच्या निरंतर नमनाच्या अभावाचा अभाव असल्यामुळे (म्हणजे निरंतर नमन असल्यामुळे) क्षत्रिय आदींचे मुनींद्रांच्या चरणकमलद्वयीवर निरंतर नमन सामर्थ्याने स्पष्टपणे समजून येते. "त्याचा भाव", "त्याच्यामुळे निर्मळ", "त्यांचा भाव", पहिल्या पक्षात "जो लवलेला आणि अनंत आहे तो", "त्याचा मुकुट", "त्याच्या सावलीत", दुसऱ्या पक्षात "जे अनंत आणि मुकुट आहेत ते", "लवलेल्यांचे अनंत मुकुट", "त्यांच्या सावलीत" हे वाक्य आहे. ၁၄၉. १४९. ‘‘ဗန္ဓသာရော’’တိ မညန္တိ, ယံ သမဂ္ဂါပိ ဝိညုနော; ဒဿနာဝသရံ ပတ္တော, သမာဓိ နာမ’ယံ ဂုဏော. "ज्याला सर्वच विद्वान काव्यबंधाचा सार (प्राण) मानतात, तो 'समाधी' नावाचा गुण आता दर्शविण्याच्या प्रसंगी प्राप्त झाला आहे." ၁၄၉. သမာဓိဖလံ ကိစ္စာဟ ‘‘ဗန္ဓေ’’စ္စာဒိ. ယန္တိ ယံ သမာဓိံ ဗန္ဓဿ ဂဇ္ဇပဇ္ဇမိဿဘာဝဿ သာရောတိ သဗ္ဗဿ ဇီဝိတံ [Pg.170] တပ္ပရာယတ္တာ ဗန္ဓဿ သမဂ္ဂါပိ ဝိညုနော သဗ္ဗေပိ ကဝိနော မညန္တိ စိန္တေန္တိ ဇာနန္တိ, အယံ သမာဓိ နာမ သမာဓိချော ဂုဏော ဒဿနေ ပကာသနေ အဝသရံ ဩကာသံ အနောတ္တရတ္တာ ပရဿ သမ္ပတ္တော ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနုက္ကမေနာတိ. १४९. समाधीचे फल आणि कार्य सांगतात - "बंध" इत्यादी. "यं" म्हणजे ज्या समाधीला गद्य-पद्य मिश्रित अशा काव्यबंधाचा सार म्हणजे सर्व जीवन (प्राण) मानतात, कारण तो बंध त्यावरच अवलंबून असतो, सर्वच विद्वान म्हणजे सर्व कवी मानतात, विचार करतात, जाणतात; हा 'समाधी' नावाचा गुण दर्शविण्याच्या (प्रकाशित करण्याच्या) प्रसंगी (संधीला) अनुत्तर असल्यामुळे दुसऱ्याच्या पुढे निर्दिष्ट केलेल्या क्रमाने प्राप्त झाला आहे. ၁၄၉. ဣဒါနိ သမာဓယော နိဒ္ဒိသတိ ‘‘ဗန္ဓိ’’စ္စာဒိနာ. သမဂ္ဂါ အပိ ဝိညုနော သဗ္ဗေပိ ကဝယော ယံ သမာဓိံ ‘‘ဗန္ဓသာရော’’တိ ပဇ္ဇဂဇ္ဇဝိမိဿသင်္ခါတဿ ဗန္ဓဿ ဇီဝိတမိတိ မညန္တိ, အယံ သမာဓိ နာမ ဂုဏော ဒဿနာဝသရံ ပတ္တော ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနုက္ကမေန ဒဿနောကာသံ ပတ္တော ဟောတိ. ဗန္ဓဿ သာရောတိ စ, ဒဿနေ အဝသရန္တိ စ, တံ ပတ္တောတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १४९. आता "बंध" इत्यादींद्वारे समाधीचे निर्देश करतात. सर्वच विद्वान म्हणजे सर्व कवी ज्या समाधीला "बंधसार" म्हणजे पद्य-गद्य मिश्रित अशा काव्यबंधाचे जीवन (प्राण) मानतात, हा 'समाधी' नावाचा गुण दर्शविण्याच्या प्रसंगी म्हणजे निर्दिष्ट केलेल्या क्रमाने दर्शविण्याच्या संधीला प्राप्त झाला आहे. "बंधाचा सार", "दर्शविण्याचा प्रसंग", "त्याला प्राप्त झालेला" हा विग्रह आहे. ၁၅၀. १५०. အညဓမ္မော တတော’ညတ္ထ,လောကသီမာနုရောဓတော; သမ္မာ အာဓီယတေ’စ္စေ’သော,သမာဓီတိ နိရုစ္စတိ. "जेव्हा एकाचा धर्म (गुण) दुसऱ्यामध्ये, लोकव्यवहाराच्या मर्यादेचे पालन करण्यासाठी, योग्य प्रकारे प्रस्थापित केला जातो, तेव्हा त्याला 'समाधी' असे म्हटले जाते." ၁၅၀. ကထမယံ သဒ္ဒဝေါဟာရော ဗန္ဓေ ‘‘သမာဓီ’’တိ ဝုစ္စတီတျာဟ ‘‘အညေ’’စ္စာဒိ. အညဿ ဝတ္ထုနော ပကတာပေက္ခာယ ဓမ္မော ဂုဏော ပသိဒ္ဓေါ, တတော တသ္မာ မုချဝိသယာ အညတ္ထ အမုချေ ဝိသယေ လောကသီမာနုရောဓတော လောကပ္ပတီတျနုဝတ္တနေန သမ္မာ သာဓု လောကသီမာနုဝတ္တနမေဝေဟ သာဓုတ္တံ အာဓီယတေ အာရောပျတေ, ဣတိ ဣမိနာ ကာရဏေန ဧသော ဧဝံဝိဓော ဓမ္မော ‘‘သမာဓီ’’တိ နိရုစ္စတီတိဓ သမ္မာ အာဓီယတီတိ ဧဝံ နီဟရိတွာ ဝုစ္စတီတိ အတ္ထော. १५०. काव्यबंधात "समाधी" हा शब्दव्यवहार कसा केला जातो, हे सांगतात - "अञ्ञ" इत्यादी. दुसऱ्या वस्तूचा (प्रस्तुताच्या अपेक्षेने) धर्म म्हणजे प्रसिद्ध गुण, त्या मुख्य विषयावरून दुसऱ्या अमूख्य विषयात लोकव्यवहाराच्या मर्यादेचे पालन करण्यासाठी (लोकप्रसिद्धीचे अनुकरण करून) योग्य प्रकारे (चांगल्या प्रकारे, येथे लोकव्यवहाराचे अनुकरण करणे हेच योग्यत्व आहे) प्रस्थापित केला जातो (आरोपिला जातो); या कारणाने असा हा धर्म "समाधी" असा म्हटला जातो. येथे "योग्य प्रकारे प्रस्थापित केला जातो" (सम्मा आधीयति) असा अर्थ काढून सांगितला आहे. ၁၅၀. ‘‘သမာဓီ’’တိ အယံ ဝေါဟာရော ဗန္ဓဝိသယေ ကထံ ပဝတ္တတီတိ အာသင်္ကာယံ ပဌမံ နိဗ္ဗစနံ ဒဿေတုံ အာဟ ‘‘အညိ’’စ္စာဒိ. ယသ္မာ အညဓမ္မော သမာဓာနဿ ဝိသယဘူတအမုချတော အညဿ မုချဝတ္ထုနော ပသိဒ္ဓဂုဏော, တတော [Pg.171] မုချဝိသယတော အညတ္ထ အမုချဝိသယေ လောကသီမာနုရောဓတော လောကဝေါဟာရမရိယာဒါဝိရောဓဘာဝေန လောကပ္ပတီတျနုဝတ္တနေနေဝ သမ္မာ အာဓီယတိ ဌပီယတိ, ဣတိ ဣမိနာ ကာရဏေန ဧသော ယထာဝုတ္တဂုဏော ‘‘သမာဓီ’’တိ နိရုစ္စတိ ဝုစ္စတီတိ. အညဿ ဓမ္မောတိ စ, လောကဿ သီမာတိ စ, တဿာ အနုရောဓောတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १५०. काव्यबंधाच्या विषयात "समाधी" हा व्यवहार कसा प्रवृत्त होतो, या शंकेचे निरसन करण्यासाठी पहिले निर्वचन दर्शविताना सांगतात - "अञ्ञ" इत्यादी. ज्या कारणाने दुसऱ्याचा धर्म म्हणजे समाधानाचा विषय असलेल्या अमूख्य वस्तूव्यतिरिक्त दुसऱ्या मुख्य वस्तूचा प्रसिद्ध गुण, त्या मुख्य विषयावरून दुसऱ्या अमूख्य विषयात लोकव्यवहाराच्या मर्यादेच्या अविरोध भावाने (लोकप्रसिद्धीचे अनुकरण करूनच) योग्य प्रकारे प्रस्थापित केला जातो (ठेवला जातो); या कारणाने हा पूर्वोक्त गुण "समाधी" असा म्हटला जातो. "दुसऱ्याचा धर्म", "लोकाची मर्यादा", "तिचे पालन (अनुरोध)" हा विग्रह आहे. သမာဓိဥဒ္ဒေသ समाधीचे प्रकार (समाधी-उद्देश) ၁၅၁. १५१. အပါဏေ ပါဏိနံ ဓမ္မော, သမ္မာ အာဓီယတေ ကွစိ; နိရူပေ ရူပယုတ္တဿ, နိရသေ သရသဿ စ. "कधी निर्जीवामध्ये सजीवाचा धर्म योग्य प्रकारे प्रस्थापित केला जातो, कधी अमूर्तामध्ये मूर्ताचा, तर कधी नीरसात सरसाचा धर्म प्रस्थापित केला जातो." ၁၅၂. १५२. အဒြဝေ ဒြဝယုတ္တဿ, အကတ္တရိပိ ကတ္တုတာ; ကဌိနဿာ’သရီရေပိ, ရူပံ တေသံ ကမာ သိယာ. "कधी अद्रवात द्रायुक्ताचा धर्म, कधी अकर्त्यामध्ये कर्तेपणा, तर कधी अशरीरीमध्ये कठीणतेचे रूप अनुक्रमे प्रस्थापित केले जाते." ၁၅၁-၁၅၂. သမာဓာနဝိသယမာဟ ‘‘အပါဏေ’’ဣစ္စာဒိ. ကွစိ ဌာနေ ပါဏိနံ ပါဏဝန္တာနံ ပဒတ္ထာနံ ဓမ္မော ဂုဏော အပါဏေ ပါဏဝိရဟိတေ ဝတ္ထုနိ သမ္မာ လောကပတီတျနုဝတ္တနေန အာဓီယတေ အာရောပျတေ, ဧဝမုပရိပိ ယထာနုရူပံ. နိရူပေတိ ရူပဝိရဟိတေ ဝတ္ထုနိ, ကွစီတိ သဗ္ဗတ္ထ အနုဝတ္တတိ. အသရီရေ အဃနေ အသံဟတေ ဝတ္ထုနိ ကဌိနဿ ဒဠှဿ, တေသံ ယထာဝုတ္တာနံ သမာဓီနံ ရူပံ ဥဒါဟရဏံ ကမာ ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနုက္ကမေန. १५१-१५२. समाधानाचा (समाधी अलंकाराचा) विषय सांगताना 'अपाणे' इत्यादी म्हणतात. काही ठिकाणी सजीवांचा (प्राणवंतांचा) धर्म किंवा गुण हा लोकप्रसिद्धीच्या अनुसरणाने निर्जीव (प्राणरहित) वस्तूवर योग्य प्रकारे आरोपित केला जातो, याचप्रमाणे पुढेही योग्यतेनुसार समजून घ्यावे. 'निरूपे' म्हणजे रूपरहित वस्तूमध्ये. 'क्वचि' (काही ठिकाणी) हा शब्द सर्वत्र लागू होतो. 'अशरीर' म्हणजे अमूर्त किंवा असंघात वस्तूमध्ये कठीण किंवा दृढ वस्तूचा धर्म आरोपित केला जातो. त्या पूर्वोक्त समाधींचे स्वरूप आणि उदाहरण अनुक्रमे दिले आहे. ၁၅၁-၁၅၂. ဥဒ္ဒေသေ ‘‘သမာဓယော’’တိ ဗဟုဝစနေန နိဒ္ဒိဋ္ဌာနံ သမာဓီနံ ဝိသယမုပဒဿေတိ ‘‘အပါဏေ’’စ္စာဒိနာ. ကွစိ ကိသ္မိဉ္စိ ဌာနေ ပါဏိနံ ဓမ္မော ဣန္ဒြိယဗဒ္ဓါနံ ဂုဏော အပါဏေ ပါဏရဟိတဝတ္ထုမှိ သမ္မာ လောကပတီတိအနုသာရေန အာဓီယတေ အာရောပျတေ, ကွစိ ရူပယုတ္တဿ ရူပဝန္တဝတ္ထုနော ဓမ္မော နိရူပေ ရူပရဟိတဝတ္ထုမှိ, ကွစိ သရသဿ ရသဝန္တဿ ဝတ္ထုနော ဓမ္မော နိရသေ ရသရဟိတေ စ, ကွစိ ဒြဝယုတ္တဿ ဒြဝဝန္တဝတ္ထုနော ဓမ္မော အဒြဝေ ဒြဝရဟိတေ စ, [Pg.172] ကွစိ ကတ္တုတာ ကတ္တုဂုဏော အကတ္တရိပိ, ကွစိ ကဌိနဿ ထဒ္ဓဿ ဝတ္ထုနော ဓမ္မော အသရီရေပိ သရီရရဟိတေပိ သမ္မာ အာဓီယတေ. တေသံ ဆန္နံ သမာဓီနံ ရူပံ ဥဒါဟရဏံ ကမာ ‘‘အပါဏေ ပါဏိန’’န္တိ ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနုက္ကမေန သိယာ ဘဝေယျာတိ. န သန္တိ ပါဏာ အဿေတိ စ, ရူပါ နိဂ္ဂတောတိ စ, ရူပေန ယုတ္တောတိ စ, ရသာ နိဂ္ဂတောတိ စ, ရသေန သဟ ဝတ္တမာနောတိ စ, ဒြဝါအညောတိ စ, ဒြဝေန ဒြဝဘာဝေန ယုတ္တောတိ စ, ကတ္တုတော အညောတိ စ, ကတ္တုနော ဘာဝေါတိ စ, နတ္ထိ သရီရံ အဿာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १५१-१५२. उद्देशात 'समाधयो' या बहुवचनाने निर्दिष्ट केलेल्या समाधींचा विषय 'अपाणे' इत्यादीद्वारे दर्शविला आहे. काही ठिकाणी सजीवांचा (इंद्रियबद्ध प्राण्यांचा) धर्म किंवा गुण हा लोकप्रसिद्धीच्या अनुसरणाने निर्जीव (प्राणरहित) वस्तूवर योग्य प्रकारे आरोपित केला जातो; काही ठिकाणी रूपयुक्त (साकार) वस्तूचा धर्म रूपरहित (निराकार) वस्तूवर; काही ठिकाणी सरस (रसयुक्त) वस्तूचा धर्म नीरस (रसरहित) वस्तूवर; काही ठिकाणी द्रवयुक्त वस्तूचा धर्म अद्रव (द्रवरहित) वस्तूवर; काही ठिकाणी कर्त्याचा धर्म (कर्तृत्व) अकर्त्यावरही; आणि काही ठिकाणी कठीण (दृढ) वस्तूचा धर्म अशरीर (शरीररहित/अमूर्त) वस्तूवर योग्य प्रकारे आरोपित केला जातो. त्या सहा प्रकारच्या समाधींचे स्वरूप आणि उदाहरण अनुक्रमे 'अपाणे पाणिनं' इत्यादी क्रमाने असावे. 'ज्याला प्राण नाहीत तो' (अपाण), 'ज्यातून रूप निघून गेले आहे तो' (निरूप), 'रूपाने युक्त तो' (रूपवान), 'ज्यातून रस निघून गेला आहे तो' (नीरस), 'रसासह वर्तमान असलेला तो' (सरस), 'द्रवापेक्षा भिन्न तो' किंवा 'द्रवाने (द्रवभावाने) युक्त तो' (द्रववान), 'कर्त्यापेक्षा भिन्न तो' किंवा 'कर्त्याचा भाव तो' (कर्तृत्व), 'ज्याला शरीर नाही तो' (अशरीर) असा विग्रह आहे. သမာဓိနိဒ္ဒေသ समाधी-निर्देश အပါဏေ ပါဏိနံ ဓမ္မော अप्राण (निर्जीव) वस्तूवर प्राण्यांचा (सजीवांचा) धर्म (आरोपित करणे) ၁၅၃. १५३. ဥဏ္ဏာပုဏ္ဏိန္ဒုနာ နာထ, ဒိဝါပိ သဟ သင်္ဂမာ; ဝိနိဒ္ဒါ သမ္ပမောဒန္တိ, မညေ ကုမုဒိနီ တဝ. हे नाथ! आपल्या ऊर्णा-पूर्णचंद्राशी (कपाळावरील ऊर्णा-लोमयुक्त पूर्णचंद्राशी) दिवसाही झालेल्या संगमामुळे (भेटीमुळे) या कुमुदिनी (कमळिणी) निद्रा सोडून (विकसित होऊन) अत्यंत आनंदित होत आहेत, असे मला वाटते. ၁၅၃. ‘‘ဥဏ္ဏာ’’ဣစ္စာဒိ. နာထာတိ လောကတ္တယေကပဋိသရဏဘူတတာယ ဘဂဝန္တံ အာလပတိ. တဝ ဥဏ္ဏာရောမဓာတုသင်္ခါတေန ပုဏ္ဏိန္ဒုနာ သဟ သင်္ဂမာ သံယောဂေန ကုမုဒိနီ ကုမုဒိနိယော ကုမုဒါကရာ ဒိဝါပိ ဝိနိဒ္ဒါ ဝိဂတသောပ္ပာ သမ္ပမောဒန္တိ မညေ သုဋ္ဌုယေဝ ပမောဒန္တီတိ ပရိကပ္ပေမီတိ. ဧတ္ထ ပါဏိဓမ္မဿ သုရတရူပဿ သင်္ဂမဿ ဝိနိဒ္ဒါယ သမ္ပီဏနဿ စ အပါဏိနိ အာရောပိတပုမ္ဘာဝေ ဥဏ္ဏာပုဏ္ဏိန္ဒုမှိ, တထာ အာရောပိတဣတ္ထိဘာဝါသု ကုမုဒိနီသု လောကသီမာနုရောဓေန သမာဓာနတော သောယံ ပသိဒ္ဓေါ ဓမ္မော ‘‘သမာဓီ’’တိ ဝုစ္စတိ. တဒဘိဓာယီ သဒ္ဒေါ စ ဥပစာရတော အတ္ထာနုဂါမိတ္တာ သဒ္ဒိကဝေါဟာရံ ဒဿေတိ, ဧဝမုပရိပိ ယထာယောဂံ. १५३. 'ऊर्णा' इत्यादी. 'नाथ' या शब्दाने तिन्ही लोकांचे एकमेव शरण असलेल्या भगवंतांना संबोधित केले आहे. आपल्या ऊर्णा-रोमधातू नावाच्या पूर्णचंद्राशी झालेल्या संगमामुळे (संयोगामुळे) कुमुदिनी (कमळिणी) दिवसाही निद्रारहित (विकसित) होऊन अत्यंत आनंदित होत आहेत, अशी मी कल्पना करतो. येथे सजीवांचा धर्म असलेल्या संभोगरूप संगम, निद्रानाश आणि आनंदित होणे यांचा, निर्जीव असूनही पुरुषभाव आरोपित केलेल्या 'ऊर्णा-पूर्णचंद्रावर' तसेच स्त्रीभाव आरोपित केलेल्या 'कुमुदिनींवर' लोकव्यवहाराच्या मर्यादेनुसार योग्य प्रकारे आरोप केल्यामुळे हा प्रसिद्ध धर्म 'समाधी' (समाधी अलंकार) म्हटला जातो. त्याचा वाचक शब्द उपचाराने अर्थाचे अनुकरण करत असल्यामुळे शाब्दिक व्यवहार दर्शवतो; पुढेही याचप्रमाणे योग्यतेनुसार समजून घ्यावे. ၁၅၃. တေသု ပါဏိဓမ္မသမာဓိနော ဥဒါဟရဏမာဒိသတိ ‘‘ဥဏ္ဏာ’’ဣစ္စာဒိနာ. နာထ တဝ တုယှံ ဥဏ္ဏာပုဏ္ဏိန္ဒုနာ ဥဏ္ဏာရောမမဏ္ဍလသင်္ခါတပုဏ္ဏစန္ဒေန သဟ သင်္ဂမာ အညမညသမဝါယဟေတုနာ ကုမုဒိနီ ကေရဝါကရသင်္ခါတာ ကုမုဒိနိယော ဒိဝါပိ [Pg.173] ဝိနိဒ္ဒါ ဝိကသိတာ သမ္ပမောဒန္တိ မညေ အတိသန္တုဋ္ဌာ ဟောန္တီတိ ကပ္ပေမီတိ ဣန္ဒုသမ္ပမောဒေါ သဟသဒ္ဒေန ဉာယတေ. ဧတ္ထ ပါဏိဓမ္မသင်္ခါတော သုရတသင်္ဂမော စ နိဒ္ဒါပဂမော စ သမ္ပမောဒနဉ္စာတိ တိဏ္ဏံ ဥဏ္ဏာပုဏ္ဏိန္ဒုကုမုဒိနီသင်္ခါတေသု အပါဏေသု လောကဝေါဟာရာနတိက္ကမ္မ ဗုဒ္ဓိယာ အာရောပနေန ပါဏိဓမ္မတော ပသိဒ္ဓါ တယော အတ္ထာ ဣဓ သမာဓယော နာမ, တပ္ပဋိပါဒကဂန္ထောပိ အတ္ထာနုဂါမိတ္တာ တဒုပစာရေန သမာဓီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ပုဏ္ဏော စ သော ဣန္ဒု စေတိ စ, ဥဏ္ဏာ ဧဝ ပုဏ္ဏိန္ဒု စာတိ စ, ဝိဂတာ နိဒ္ဒါ ယေဟီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १५३. त्यांपैकी सजीव-धर्म-समाधीचे उदाहरण 'ऊर्णा' इत्यादीद्वारे दाखवले आहे. हे नाथ! आपल्या ऊर्णा-रोममंडळ नावाच्या पूर्णचंद्राशी झालेल्या संगमामुळे (परस्पर संबंधाच्या कारणामुळे) कुमुदिनी (कमळिणी) दिवसाही निद्रारहित (विकसित) होऊन अत्यंत आनंदित होत आहेत, अशी मी कल्पना करतो. चंद्राचा आनंद 'सह' (सोबत) या शब्दाने समजला जातो. येथे सजीवांचा धर्म मानला गेलेला संभोगरूप संगम, निद्रानाश आणि आनंदित होणे या तिन्हींचा, ऊर्णा-पूर्णचंद्र आणि कुमुदिनी या निर्जीव वस्तूंवर लोकव्यवहाराचे उल्लंघन न करता बुद्धीने आरोप केल्यामुळे, सजीव धर्मामुळे प्रसिद्ध असलेले हे तीन अर्थ येथे 'समाधी' नावाचे आहेत. त्याचे प्रतिपादन करणारा ग्रंथही अर्थाचे अनुकरण करत असल्यामुळे उपचाराने 'समाधी' समजावा. 'जो पूर्ण आहे तो चंद्र' (पूर्णेन्दु), 'ऊर्णा हाच पूर्णचंद्र' (ऊर्णापूर्णेन्दु), 'ज्यांची निद्रा निघून गेली आहे ते' (विनिद्रा) असा विग्रह आहे. နိရူပေ ရူပယုတ္တဿ रूपरहित (निराकार) वस्तूवर रूपयुक्त (साकार) वस्तूचा धर्म (आरोपित करणे) ၁၅၄. १५४. ဒယာရသေသု မုဇ္ဇန္တာ, ဇနာ’မတရသေသွိ’ဝ; သုခိတာ ဟတဒေါသာ တေ, နာထ ပါဒမ္ဗုဇာနတာ. हे नाथ! आपल्या चरणकमलांना वंदन करणारे लोक, अमृताच्या रसात बुडाल्याप्रमाणे आपल्या दयारूपी रसात (करुणारसात) बुडून, दोषमुक्त होऊन सुखी होतात. ၁၅၄. ‘‘ဒယာ’’ဣစ္စာဒိ. နာထ တေ ပါဒမ္ဗုဇေသု အာနတာ ပဏာမဝသေန ဇနာ တိလောကကုဟရပဝတ္တိနော သတ္တာ အမတရသေသွိဝ ပီယူသရသေသု ဝိယ ဒယာရသေသု ကရုဏာရသေသု ဂုဏေသု. ‘‘သိင်္ဂါရာဒေါ ဝိသေ ဝီရိယေ, ဂုဏေ ရာဂေ ဒြဝေ ရသော’’တိ ဟိ နိဃဏ္ဋု. မုဇ္ဇန္တာ နိမုဇ္ဇမာနာ ဟတာ နဋ္ဌာ ဒေါသာ ဝါတာဒယော အမတပက္ခေ, အညတ္ထ တု ဟတာ နဋ္ဌာ ဒေါသာ ရာဂါဒယော ယေသန္တိ ဝိဂ္ဂဟော, တတောယေဝ သုခိတာ သုခံ ကာယိကစေတသိကသုခံ ဣတာ ပတ္တာ ဂတာတိ အတ္ထော. १५४. 'दया' इत्यादी. हे नाथ! आपल्या चरणकमलांना नमस्कार करणाऱ्या भावाने वंदन करणारे लोक म्हणजे तिन्ही लोकांमध्ये राहणारे प्राणी, अमृताच्या रसात म्हणजे पीयूषरसात बुडाल्याप्रमाणे दयारूपी रसात म्हणजे करुणारूपी गुणांमध्ये बुडतात. कारण 'शृंगार इत्यादींमध्ये, विषात, वीर्यात, गुणात, रागात आणि द्रवात रस शब्द वापरला जातो' असा निघंटु (कोश) आहे. 'मुज्जन्ता' म्हणजे बुडणारे. अमृताच्या पक्षात 'हतदोष' म्हणजे वात इत्यादी दोष नष्ट झालेले; तर दुसऱ्या पक्षात (दयारूपी रसाच्या पक्षात) ज्यांचे राग (आसक्ती) इत्यादी दोष नष्ट झाले आहेत असा विग्रह आहे. म्हणूनच ते सुखी होतात, म्हणजेच कायिक आणि चैतसिक सुखाला प्राप्त होतात असा अर्थ आहे. ၁၅၄. ဣဒါနိ ရူပဓမ္မသမာဓိနော ဥဒါဟရဏံ ဥဒ္ဒိသတိ ‘‘ဒယာ’’ဣစ္စာဒိနာ. နာထ တေ တဝ ပါဒမ္ဗုဇာနတာ စရဏပဒုမေ ပဏတာ ဇနာ ဒေဝမနုဿာ အမတရသေသု ဣဝ သုဓာဇလေသု ဝိယ ဒယာရသေသု အနညသာဓာရဏကရုဏာဂုဏေသု မုဇ္ဇန္တာ နိမုဇ္ဇမာနာ ဟတဒေါသာ ဝိနဋ္ဌဝါတပိတ္တာဒယော ဝိနဋ္ဌရာဂါဒိဒေါသာ ဝါ သုခိတာ တတောယေဝ အဇရာမရသင်္ခါတသုခံ [Pg.174] ဣတာ ပတ္တာတိ. ဧတ္ထ ရူပယုတ္တဇလေ လဗ္ဘမာနံ မုဇ္ဇနံ နိရူပေ ဒယာဂုဏေ အာရောပိတံ ဟောတိ. ဒယာ ဧဝ ရသာ ဂုဏာတိ စ, အမတာ ဧဝ ရသာတိ စ, ဟတာ ဝါတာဒယော ရာဂါဒယော ဝါ ဒေါသာ ယေသန္တိ စ, ပါဒါနိ ဧဝ အမ္ဗုဇာနီတိ စ, တေသု အာနတာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १५४. आता रूप-धर्म-समाधीचे उदाहरण 'दया' इत्यादीद्वारे दाखवले आहे. हे नाथ! आपल्या चरणकमलांना वंदन करणारे लोक (देव आणि मनुष्य), अमृताच्या रसात म्हणजे सुधाजलात बुडाल्याप्रमाणे आपल्या असाधारण अशा दयारूपी रसात (करुणारूपी गुणांमध्ये) बुडणारे, ज्यांचे वात-पित्त इत्यादी दोष किंवा राग इत्यादी दोष नष्ट झाले आहेत असे ते सुखी होतात, म्हणजेच अजर-अमर अशा सुखाला प्राप्त होतात. येथे रूपयुक्त पाण्यात शक्य असलेले 'बुडणे' हे रूपरहित दयागुणावर आरोपित केले आहे. 'दया हाच रस (गुण)' (दयारस), 'अमृत हाच रस' (अमतरस), 'ज्यांचे वात इत्यादी किंवा राग इत्यादी दोष नष्ट झाले आहेत ते' (हतदोष), 'चरण हेच कमळ' (पादाम्बुज), 'त्यांना वंदन करणारे' (पादाम्बुजानत) असा विग्रह आहे. ‘‘သိင်္ဂါရာဒေါဝိသေ ဝီရိယေ, ဂုဏေ ရာဂေ ဒြဝေရသော’’တိ ဧတ္ထ ရသသဒ္ဒေါ ဂုဏဇလေသု ဝတ္တတိ. 'शृंगार इत्यादींमध्ये, विषात, वीर्यात, गुणात, रागात आणि द्रवात रस शब्द वापरला जातो' यामध्ये 'रस' हा शब्द गुण आणि जल (पाणी) या दोन्ही अर्थांत वापरला जातो. နိရသေ သရသဿ नीरस (रसरहित) वस्तूवर सरस (रसयुक्त) वस्तूचा धर्म (आरोपित करणे) ၁၅၅. १५५. မဓုရေပိ ဂုဏေ ဓီရ, နပ္ပသီဒန္တိ ယေ တဝ; ကီဒိသီမနသော ဝုတ္တိ, တေသံ ခါရဂုဏာနဘော. हे धीर (बुद्धिमान)! जे आपल्या मधुर गुणांवरही प्रसन्न होत नाहीत, त्यांच्या मनाची वृत्ती कशी असेल? ती खारट गुणांसारखी (नीरस) आहे. ၁၅၅. ‘‘မဓုရေ’’စ္စာဒိ. ဓိယာ ဤရတီတိ ဓီရော, ဘော ဓီရ တဝ မဓုရေပိ မနောဟရေပိ ဂုဏေ ကရုဏာဒိကေ ယေ နပ္ပသီဒန္တိ ပသာဒံ န ကရောန္တိ, ခါရဂုဏာနံ အမဓုရဂုဏာနံ တေသံ ဇနာနံ မနသော ဝုတ္တိ စိတ္တပ္ပဝတ္တိ ကီဒိသီတိ ကိမိဝ ဒိဿတိ, န ဝိညာယတေ ‘‘ဤဒိသီ’’တိ. ယတော တာဒိသဂုဏာဝဗောဓပရမ္မုခါ မောဟန္ဓကာရသမ္ဗန္ဓိတာတိ. १५५. 'मधुर' इत्यादी. 'बुद्धीने जो प्रेरित करतो तो धीर'. हे धीर! आपल्या मधुर आणि मनोहर अशा करुणा इत्यादी गुणांवर जे प्रसन्न होत नाहीत (श्रद्धा ठेवत नाहीत), खारट गुणांनी युक्त (अमधुर गुणांनी युक्त) असलेल्या त्या लोकांच्या मनाची वृत्ती (चित्तप्रवृत्ती) कशी असेल? ती कशी दिसते? 'ती अशी आहे' हे समजणे कठीण आहे. कारण ते अशा गुणांच्या आकलनापासून पराङ्मुख असून मोहाच्या अंधकारात बुडालेले असतात. ၁၅၅. ဣဒါနိ သရသဓမ္မသမာဓိနော ဥဒါဟရဏမုဒ္ဒိသတိ ‘‘မဓုရိ’’စ္စာဒိနာ. ဘော ဓီရ တဝ တေ မဓုရေ အပိ ဂုဏေ ပကတိသုန္ဒရေ ကရုဏာပညာဂုဏေပိ ယေ ဟီနာဓိမုတ္တိကာ ဇနာ နပ္ပသီဒန္တိ, ခါရဂုဏာနံ အမဓုရဂုဏာနံ တေသံ ဇနာနံ မနသော ဝုတ္တိ စိတ္တပ္ပဝတ္တိ ကီဒိသီ ကထံ ရုဟတိ. ဓိယာ ဤရတိ ပဝတ္တတီတိ စ, ကာ ဝိယ သာ ဒိဿတီတိ စ, ခါရာ ဂုဏာ ယေသန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဧတ္ထ သမာဓိ နာမ ရသဟီနေ အာရောပိတရသယုတ္တဓမ္မဘူတံ မဓုရခါရဂုဏဒွယံ. १५५. आता 'मधुरि' इत्यादींद्वारे सरस-धर्म-समाधीचे (सजल किंवा रसाळ गुणांच्या समाधीचे) उदाहरण दर्शवितात. हे धीर (विद्वान)! आपल्या त्या मधुर आणि स्वभावतः सुंदर असलेल्या गुणांवर, तसेच करुणा व प्रज्ञा या गुणांवरही जे हीन प्रवृत्तीचे (हीन-अधिमुक्तिक) लोक प्रसन्न होत नाहीत, त्या खारट (कटू) गुणांच्या, अमधुर गुणांच्या लोकांच्या मनाची वृत्ती किंवा चित्ताची प्रवृत्ती कशी असेल, ती कशी उत्पन्न होईल? 'धिया ईरति' (बुद्धीने प्रवृत्त होते) आणि ती कशी दिसते, तसेच 'खारट गुण ज्यांचे आहेत' असा विग्रह आहे. येथे समाधी म्हणजे रसरहित वस्तूवर आरोपित केलेल्या रसयुक्त धर्मरूप मधुर आणि खारट अशा दोन्ही गुणांचा मेळ होय. အဒြဝေ ဒြဝယုတ္တဿ द्रवरहित (कोरड्या) वस्तूमध्ये द्रवयुक्त (द्रवपदार्थाने युक्त) गुणाचा आरोप करणे. ၁၅၆. १५६. သဗ္ဗတ္ထသိဒ္ဓ [Pg.175] စူဠက-ပုဋပေယျာ မဟာဂုဏာ; ဒိသာ သမန္တာ ဓာဝန္တိ, ကုန္ဒသောဘာသလက္ခဏာ. हे सर्वार्थसिद्ध (बुद्ध)! आपल्या अंजळीने प्राशन करण्याजोगे, कुंदाच्या फुलासारखी शोभा व लक्षणे असलेले महान गुण सर्व दिशांना पसरत आहेत. ၁၅၆. ‘‘သဗ္ဗတ္ထသိဒ္ဓိ’’စ္စာဒိ. သဗ္ဗတ္ထသိဒ္ဓဿ မဟာမုနိနော စူဠကပုဋေန ပေယျာ ပါတဗ္ဗာ ကုန္ဒသောဘာသလက္ခဏာ ကုန္ဒကုသုမဿ သောဘာသဝန္တာ ဇုတိဝိဇမ္ဘိနော မဟာဂုဏာ သမန္တာ ပရိတော ဒိသာ ဒိသန္တာနိ ဓာဝန္တိ. १५६. 'सर्वार्थसिद्धी' इत्यादी. सर्वार्थसिद्ध अशा महामुनींच्या (बुद्धांच्या) अंजळीने प्राशन करण्याजोगे, कुंदाच्या फुलासारखी शोभा व लक्षणे असलेले, कुंदपुष्पाच्या शोभेप्रमाणे चमकणारे आणि पसरणारे महान गुण सर्व बाजूंनी दिशा-दिशात धावत आहेत (पसरत आहेत). ၁၅၆. ဣဒါနိ ဒြဝယုတ္တသမာဓိနော ဥဒါဟရဏမုဒ္ဒိသတိ ‘‘သဗ္ဗတ္ထိ’’စ္စာဒိနာ. သဗ္ဗတ္ထသိဒ္ဓ သဗ္ဗကိစ္စေ ပရိနိပ္ဖန္န, နိပ္ဖန္နေဟိ သဗ္ဗတ္ထေဟိ ဝါ သမန္နာဂတ ဟေ တထာဂတ တဝ စူဠကပုဋပေယျာ စူဠကပုဋေန ပါတဗ္ဗာ ကုန္ဒသောဘာသလက္ခဏာ ကုန္ဒသောဘာဟိ သမာနလက္ခဏာ ကုန္ဒသောဘာသဒိသာ ဝါ မဟာဂုဏာ သင်္ချာမဟန္တတ္တာ အာနုဘာဝမဟန္တတ္တာ ဝါ မဟန္တာ ဝါ အရဟတ္တာဒယော ဂုဏာ သမန္တာ သမန္တတော ဒိသာ ဒသဒိသာသု ဓာဝန္တီတိ. ဧတ္ထ ဒြဝယုတ္တဂုဏဘူတော စူဠကပုဋပေယျဘာဝေါ ဒြဝရဟိတေ ဂုဏေ အာရောပိတော သမာဓိ နာမ ဟောတိ. သဗ္ဗေ စ တေ အတ္ထာ စေတိ စ, တေ သိဒ္ဓါ ယဿေတိ စ, စူဠကမေဝ ပုဋမိတိ စ, တေန ပေယျာတိ စ, မဟန္တာ စ တေ ဂုဏာ စေတိ စ, ကုန္ဒာနံ သောဘာတိ စ, တာဟိ သမာနံ လက္ခဏံ ယေသန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १५६. आता 'सब्बत्थि' इत्यादींद्वारे द्रवयुक्त-समाधीचे उदाहरण दर्शवितात. हे सर्वार्थसिद्ध! सर्व कार्ये पूर्ण केलेल्या किंवा पूर्ण झालेल्या सर्व अर्थांनी युक्त अशा हे तथागत! आपले अंजळीने प्राशन करण्याजोगे, कुंदाच्या शोभेसारखे लक्षण असलेले किंवा कुंदाच्या शोभेसारखे असणारे, संख्येच्या मोठेपणामुळे किंवा प्रभावाच्या मोठेपणामुळे महान असलेले अर्हत्त्व इत्यादी महान गुण सर्व बाजूंनी दहाही दिशांमध्ये धावत आहेत (पसरत आहेत). येथे द्रवयुक्त गुण असलेला 'अंजळीने प्राशन करण्याजोगा भाव' हा द्रवरहित गुणावर आरोपित केला आहे, यालाच समाधी म्हणतात. 'सर्व आणि ते अर्थ' आणि 'ते ज्याचे सिद्ध झाले आहेत', 'अंजळी हेच पात्र' आणि 'त्याने प्राशन करण्याजोगे', 'महान आणि ते गुण', 'कुंदांची शोभा' आणि 'त्यांच्यासारखे लक्षण ज्यांचे आहे' असा विग्रह आहे. အကတ္တရိ ကတ္တုတာ अकर्त्यामध्ये कर्तृत्वाचा आरोप करणे. ၁၅၇. १५७. မာရာရိဗလဝိဿဋ္ဌာ, ကုဏ္ဌာ နာနာဝိဓာ’ယုဓာ; လဇ္ဇမာနာ’ညဝေသေန, ဇိန ပါဒါနတာ တဝ. हे जिन (विजेते बुद्ध)! माररूपी शत्रूच्या सैन्याने सोडलेली, बोथट झालेली विविध प्रकारची शस्त्रे लज्जित होऊन दुसऱ्या वेषात आपल्या चरणी लीन झाली आहेत. ၁၅၇. ‘‘မာရာ’’ဣစ္စာဒိ. မာရောယေဝ အရိ သတ္တူတိ မာရာရီ, တေန, ဗလေန အတ္တနော သတ္တိယာ, တဿ ဝါ ဗလေန သေနာယ ဝိဿဋ္ဌာ အဘိမုခံ ဆဍ္ဍိတာ နာနာဝိဓာ အနေကပ္ပကာရာ [Pg.176] အာယုဓာ ဘိန္ဒိဝါဠာဒယော ကုဏ္ဌာ ပရိစ္စတ္တတိခိဏဘာဝါ တာယေဝ ကုဏ္ဌဘာဝပ္ပတ္တိယာ လဇ္ဇမာနာ ‘‘လောကပ္ပတီတာနုဘာဝါနမမှာကမ္ပိ ဧဝရူပံ ဇာတ’’န္တိ လဇ္ဇန္တာ အညဝေသေန ‘‘ကထံ နာမ ပရေ အမှေ န ဇာနေယျု’’န္တိ အတ္တနော အာဝုဓဝေသံ ပရိဝတ္တိတွာ ကုသုမဝေသေန, ဇိနာတိ အာမန္တနံ, တဝ ပါဒါနတာ ပါဒေသု သန္နတာ. १५७. 'मारात' इत्यादी. मार हाच शत्रू म्हणजे 'मारारी', त्याने किंवा त्याच्या सैन्याच्या बळाने समोर फेकलेली विविध प्रकारची भिंदिपाल इत्यादी शस्त्रे बोथट झाली, म्हणजेच त्यांनी आपले तीक्ष्णत्व सोडले. त्या बोथटपणामुळे लज्जित होऊन, 'जगात प्रसिद्ध प्रभाव असलेल्या आमचीही अशी अवस्था झाली!' असे वाटून लज्जित होत, 'इतरांना आमची ओळख पटू नये' म्हणून स्वतःचा शस्त्राचा वेष बदलून फुलांचा वेष धारण करून, हे जिन! आपल्या चरणी लीन झाली, म्हणजेच चरणांजवळ नम्र झाली. ၁၅၇. ဣဒါနိ ကတ္တုဓမ္မသမာဓိနော ဥဒါဟရဏမုဒ္ဒိသတိ ‘‘မာရာရိ’’စ္စာဒိနာ. ဟေ ဇိန မာရာရိဗလဝိဿဋ္ဌာ မာရသတ္တုနာ အတ္တနော သတ္တိယာ ဝိဿဋ္ဌာ, မာရာရိနော ဝါ သေနာယ ဝိဿဋ္ဌာ အဘိမုခေ ပါတိတာ နာနာဝိဓာယုဓာ အနေကပ္ပကာရဘိန္ဒိဝါဠဥသုသတ္တိတောမရာဒယော အာဝုဓာ ကုဏ္ဌာ အတိခိဏာ လဇ္ဇမာနာ ‘‘ကသ္မာ ဧဝံ လောကပသိဒ္ဓါနုဘာဝါနမမှာကမ္ပိ ဤဒိသံ ဝိပ္ပကာရမဟောသီ’’တိ လဇ္ဇန္တာ အညဝေသေန ‘‘ကထမမှေ ပရေ န ဇာနေယျု’’န္တိ အာဝုဓဝေသံ ဟိတွာ တဒညဘူတေန ပုပ္ဖဝေသေန တဝ ပါဒါနတာ ပါဒသမီပေ နတာ အဟေသုန္တိ. ဧတ္ထ ကတ္တုဓမ္မဘူတံ လဇ္ဇနဉ္စ အညဝေသေန ပရိဝတ္တနဉ္စ အာနတဉ္စေတိ ဣမေ လဇ္ဇနာဒီနံ အကတ္တုဘူတေသု ဝိသယေသု အာရောပိတာ သမာဓယော နာမ ဟောန္တိ. မာရော ဧဝ အရီတိ စ, ဗလေန ဝိဿဋ္ဌာတိ စ, မာရာရိနာ ဗလဝိဿဋ္ဌာတိ စ မာရာရိနော ဗလံ သေနာတိ စ, တေန ဝိဿဋ္ဌာတိ စ, နာနာ အနေကဝိဓာ ပကာရာ ယေသန္တိ စ, အညေသံ ဝေသောတိ စ, အညော စ သော ဝေသော စာတိ စ, ပါဒေသု အာနတာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १५७. आता 'मारारी' इत्यादींद्वारे कर्तृधर्म-समाधीचे उदाहरण दर्शवितात. हे जिन! माररूपी शत्रूने आपल्या शक्तीने सोडलेली किंवा मारशत्रूच्या सैन्याने समोर फेकलेली विविध प्रकारची भिंदिपाल, बाण, शक्ती, तोमर इत्यादी शस्त्रे बोथट (अतीक्ष्ण) झाली आणि 'जगात प्रसिद्ध प्रभाव असलेल्या आमचीही अशी दुर्दशा का झाली?' म्हणून लज्जित होत, 'इतरांनी आम्हाला ओळखू नये' म्हणून शस्त्राचा वेष सोडून त्याहून भिन्न अशा फुलांचा वेष धारण करून आपल्या चरणांजवळ नम्र झाली. येथे कर्ता नसलेल्या शस्त्रांवर 'लज्जित होणे', 'दुसरा वेष धारण करणे' आणि 'नम्र होणे' या कर्तृधर्मांचा आरोप केला आहे, यालाच समाधी म्हणतात. 'मार हाच शत्रू', 'बळाने सोडलेले', 'मारशत्रूने बळाने सोडलेले', 'मारशत्रूचे बळ म्हणजे सेना' आणि 'त्याने सोडलेले', 'अनेक प्रकार ज्यांचे आहेत', 'दुसऱ्यांचा वेष', 'दुसरा आणि तो वेष' आणि 'चरणांवर नम्र झालेले' असा विग्रह आहे. ကဌိနဿ အသရီရေ कठीण (मूर्त) धर्माचा अमूर्त (शरीररहित) वस्तूवर आरोप करणे. ၁၅၈. १५८. မုနိန္ဒဘာဏုမာ ကာလော-ဒိတော ဗောဓောဒယာစလေ; သဒ္ဓမ္မရံသိနာ ဘာတိ,ဣန္ဒမန္ဓတမံ ပရံ. बोधिरूपी उदयाचलावर (उदय पर्वतावर) योग्य वेळी उदित झालेले मुनींद्ररूपी सूर्य आपल्या सद्धम्मरूपी किरणांनी अत्यंत दाट अंधकाराचा नाश करत शोभून दिसत आहेत. ၁၅၈. ‘‘မုနိန္ဒ’’ဣစ္စာဒိ. [Pg.177] ဗောဓော သဗ္ဗညုတညာဏသဒိသော သောယေဝ ဝါ ဥဒယာစလော ဥဒယပဗ္ဗတော တသ္မိံ ကာလေ ရတ္တိပရိယန္တေ အဘိနိက္ခန္တသမယေ ဥဒိတော ပါတုဘူတော မုနိန္ဒော မုနိန္ဒသဒိသော သောယေဝ ဝါ ဘာဏုမာ သူရိယော အန္ဓတမံ အန္ဓကာရံ မောဟံ ဝါ ပရံ အစ္စန္တမေဝ သဒ္ဓမ္မရံသိနာ သဒ္ဓမ္မသဒိသေန သဒ္ဓမ္မသင်္ခတေန ဝါ ရံသိနာ ဘိန္ဒံ ပဒါလေန္တော ဘာတိ သောဘတီတိ. १५८. 'मुनींद्र' इत्यादी. बोधी म्हणजे सर्वज्ञता-ज्ञानासारखा किंवा तोच उदय पर्वत (उदयाचल), त्यावर योग्य वेळी म्हणजे रात्रीच्या शेवटी, गृहत्यागाच्या वेळी उदित झालेले, मुनींद्रांसारखे किंवा मुनींद्र हेच सूर्य, सद्धम्मरूपी किंवा सद्धम्मासारख्या किरणांनी दाट अंधकाराचा किंवा मोहाचा अत्यंत नाश करत शोभून दिसत आहेत. ၁၅၈. ဣဒါနိ ကဌိနဓမ္မသမာဓိနော ဥဒါဟရဏမုဒ္ဒိသတိ ‘‘မုနိန္ဒိ’’စ္စာဒိနာ. ဗောဓောဒယာစလေ သဗ္ဗညုတညာဏသဒိသေ သဗ္ဗညုတညာဏသင်္ခါတေ ဝါ ဥဒယပဗ္ဗတေ ကာလောဒိတော ရတ္တိက္ခယေ မာရပရာဇိတသမယေ ဝါ ဥဒိတော ပါတုဘူတော မုနိန္ဒဘာနုမာ မုနိန္ဒသဒိသော မုနိန္ဒောယေဝ ဝါ သူရိယော အန္ဓတမံ ပကတိဃနန္ဓကာရံ ဗဟလမောဟန္ဓကာရံ သဒ္ဓမ္မရံသိနာ သဒ္ဓမ္မသဒိသေန သဒ္ဓမ္မဘူတေန ဝါ ကိရဏေန ပရမတိသယေန ဘိန္ဒံ ပဒါလေန္တော ဘာတိ သောဘတီတိ. ဧတ္ထ ထဒ္ဓဓမ္မဘူတံ ဘေဒနံ အသရီရဘူတေ အန္ဓကာရေ ဗုဒ္ဓိယာ အာရောပိတံ သမာဓိ နာမ ဟောတိ. မုနီနံ ဣန္ဒောတိ စ, သောယေဝ ဘာနုမာတိ စ, ဗောဓော ဧဝ ဥဒယာစလောတိ စ, သဒ္ဓမ္မော ဧဝ ရံသီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १५८. आता 'मुनींद्र' इत्यादींद्वारे कठीणधर्म-समाधीचे उदाहरण दर्शवितात. सर्वज्ञता-ज्ञानासारख्या किंवा सर्वज्ञता-ज्ञानरूपी उदय पर्वतावर (बोधोदयाचलावर) योग्य वेळी म्हणजे रात्रीच्या समाप्तीला, मार-पराजयाच्या वेळी उदित झालेले मुनींद्ररूपी सूर्य, सद्धम्मरूपी किंवा सद्धम्मासारख्या किरणांनी दाट नैसर्गिक अंधकाराचा किंवा दाट मोहांधकाराचा अत्यंत नाश करत शोभून दिसत आहेत. येथे कठीण (मूर्त) धर्म असलेला 'भेदनाचा' (नाश करण्याचा) गुण शरीररहित (अमूर्त) अशा अंधकारावर बुद्धीने आरोपित केला आहे, यालाच समाधी म्हणतात. 'मुनींचा इंद्र', 'तोच सूर्य', 'बोधी हाच उदय पर्वत' आणि 'सद्धम्म हाच किरण' असा विग्रह आहे. ၁၅၉. १५९. ဝမနုဂ္ဂိရနာဒျေ’တံ, ဂုဏဝုတျပရိစ္စုတံ; အတိသုန္ဒရမညံ တု, ကာမံ ဝိန္ဒတိ ဂါမ္မတံ. ओकणे (वमन), बाहेर टाकणे (उद्गीरण) इत्यादी शब्द जर गौण अर्थाने वापरले गेले, तर ते अत्यंत सुंदर वाटतात; परंतु मुख्य अर्थाने वापरल्यास ते निश्चितच ग्राम्यतेला (अशिष्टतेला) प्राप्त होतात. ၁၅၉. ကောစိ ဓမ္မော အမုချဝိသယေ ဗန္ဓေ သောဘတေ, န မုချဝိသယေတိ ဒဿန္တော အာဟ ‘‘ဝမနံ’’ဣစ္စာဒိ. ဝမနဉ္စ ဥဂ္ဂိရနဉ္စ, အာဒိသဒ္ဒေန ဝိရေစနာဒိပရိဂ္ဂဟော. ဧတံ ယထာဝုတ္တံ ဂုဏာ ပဓာနေတရာ ပသိဒ္ဓဝိသယာ ဝိသယန္တရပရိဂ္ဂဟလက္ခဏာ ဝုတ္တိ ပယောဂရူပါ, တတော အပရိစ္စုတံ အပရိဂဠိတံ သန္တံ အမုချဘူတံ အတိသုန္ဒရံ အစ္စန္တမနောဟရမလင်္ကာရရူပတ္တာ, အညံ တု ဣတရံ ပန မုချန္တိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ကာမံ ဧကန္တေန [Pg.178] ဂါမ္မတံ အသဗ္ဘသဘာဝံ ဗန္ဓေ တဿာနုစိတဘာဝတော ဝိန္ဒတိ ပဋိလဘတိ ပသဝတီတိ အတ္ထော. १५९. काही शब्द मुख्य विषयात नव्हे, तर अमुख्य (गौण) विषयात रचनेत शोभून दिसतात, हे दर्शविताना 'वमन' इत्यादी म्हणतात. वमन (ओकणे) आणि उद्गीरण (बाहेर टाकणे), 'इत्यादी' शब्दाने विरेचन (जुलाब) इत्यादींचा स्वीकार होतो. हे वर सांगितल्याप्रमाणे गौण अर्थाच्या प्रसिद्ध विषयापेक्षा इतर विषयाचा स्वीकार करण्याच्या लक्षणाने युक्त असलेले प्रयोगरूप कार्य आहे. त्यापासून च्युत न झालेले (गौण राहिलेले) हे रूप अलंकाररूप असल्यामुळे अत्यंत सुंदर आणि मनोहर वाटते. परंतु 'इतर' म्हणजे मुख्य अर्थाने वापरल्यास, रचनेत अयोग्य असल्यामुळे ते निश्चितच ग्राम्यता (अशिष्टता) प्राप्त करते, असा अर्थ आहे. ၁၅၉. ဣဒါနိ ဣမေသုယေဝ ပါဏိဓမ္မာဒီသု ကောစိ ဓမ္မော အမုချဝိသယေ ပယုတ္တော ပသတ္ထော, မုချဝိသယေ ပယုတ္တော အပသတ္ထောတိ ဒဿေန္တော ‘‘ဝမနုဂ္ဂိ’’စ္စာဒိမာဟ. ဧတံ ဝမနုဂ္ဂိရနာဒိ ဝမနဥဂ္ဂိရနဝိရေစနာဒိကံ ဂုဏဝုတျပရိစ္စုတံ အမုချပယောဂတော အဂဠိတံ အမုချဘူတံ အတိသုန္ဒရံ သဗ္ဗေသံ အတိပိယံ ဟောတိ, အညံ တု ဥတ္တတော ဗျတိရေကံ မုချဝိသယေ ပယုတ္တံ ဝမနုဂ္ဂိရနာဒိကံ ပန ကာမံ ဧကန္တေန ဂါမ္မတံ သဘာဝအပ္ပိယဂါမ္မဒေါသတံ ဝိန္ဒတိ သေဝတီတိ. ဝမနဉ္စ ဥဂ္ဂိရနဉ္စေတိ စ, တာနိ အာဒီနိ ယဿေတိ စ, ဂုဏာ အပ္ပဓာနာ ဝုတ္တီတိ စ, တတော အပရိစ္စုတန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १५९. आता या प्राणधर्मादींमध्येच एखादा धर्म अमुख्य विषयात प्रयुक्त केल्यास प्रशंसनीय ठरतो, आणि मुख्य विषयात प्रयुक्त केल्यास अप्रशंसनीय ठरतो, हे दर्शविताना 'वमनुग्गि' इत्यादी म्हटले आहे. हे वमन-उद्गीरण (ओकणे व थुंकणे) इत्यादी, वमन-उद्गीरण-विरेचन इत्यादी गुणवृत्तीपासून च्युत न झालेले (अपरीच्युत), अमुख्य प्रयोगामुळे न गळलेले, अमुख्य झालेले, अतिशय सुंदर आणि सर्वांना अत्यंत प्रिय असते. परंतु याच्या उलट, मुख्य विषयात प्रयुक्त केलेले वमन-उद्गीरण इत्यादी मात्र निश्चितपणे पूर्णपणे ग्राम्यता (अशिष्टता) आणि स्वभावतः अप्रिय अशा ग्राम्य दोषाला प्राप्त होते किंवा त्याचे सेवन करते. 'वमन च उद्गीरण च' (ओकणे आणि थुंकणे), ते आहेत आदी ज्याचे ते, 'गुणा अप्पधाना वृत्ती' (गौण अर्थाची वृत्ती) आणि 'त्यापासून च्युत न झालेले' असा याचा विग्रह आहे. ၁၆၀. १६०. ကန္တီနံ ဝမနဗျာဇာ, မုနိပါဒနခါဝလီ; စန္ဒကန္တီ ပိဝန္တီဝ, နိပ္ပဘံ တံ ကရောန္တိယော. मुनींच्या (बुद्धांच्या) पादनखांची पंक्ती जणू काही आपल्या कांतीचे (तेजाचे) वमन करण्याच्या बहाण्याने, चंद्राला प्रभाहीन (तेजहीन) करत, चंद्रकिरणांचे प्राशनच करत आहे. ၁၆၀. ဥဒါဟရတိ ‘‘ကန္တီန’’မိစ္စာဒိ. မုနိနော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ပါဒနခါနံ အာဝလီ သေဏိယော ကန္တီနံ အတ္တနော နိရန္တရံ နိဿရန္တီနံ သောဘာဝိသေသာနံ ဝမနဗျာဇာ ဥဂ္ဂိရနလေသေန စန္ဒကန္တီ စန္ဒစ္ဆဝိယော သဗ္ဗတ္ထ ပတ္ထဋတ္တာ ပိဝန္တီဝ ပါနံ ကရောန္တီတိ တက္ကေမိ. ကီဒိသီ ဝိယာတိ ပရိကပ္ပနာဗီဇမာဟ ‘‘နိပ္ပဘ’’န္တိအာဒိ. တံ စန္ဒံ နိပ္ပဘံ ပဘာဝိရဟိတံ ကရောန္တိယော ဝိဒဟမာနာ. ဣဒဉှိ ကပ္ပနာဗီဇံ ယတော နခသောဘာလိင်္ဂနေန စန္ဒဿ သောဘာဝတော နိပ္ပဘတ္တံ ပဿိတွာ မဟတ္တဉ္စ တဿာ နခါဝလိယော စန္ဒကန္တီ ပိဝန္တီတိ ပရိကပ္ပေတိ ကန္တီနဉ္စ ဝမနဗျာဇံ. १६०. 'कांतीनं' इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. मुनींच्या म्हणजे सम्यक्संबुद्धांच्या पादनखांची आवली म्हणजे पंक्ती, स्वतःमधून निरंतर बाहेर पडणाऱ्या विशेष शोभांच्या (कांतीच्या) वमनाच्या बहाण्याने (उद्गीरणाच्या मिषाने), सर्वत्र पसरलेली असल्यामुळे चंद्रकांतीचे म्हणजे चंद्राच्या तेजाचे जणू प्राशन करत आहेत, असा मी तर्क करतो. ती कशी आहे? हे कल्पनेचे बीज सांगताना 'निप्पभं' इत्यादी म्हटले आहे. त्या चंद्राला प्रभाहीन म्हणजे तेजरहित करणाऱ्या. हेच कल्पनेचे बीज आहे, कारण नखांच्या शोभेच्या संपर्कामुळे चंद्राच्या शोभेपेक्षा त्याचे प्रभाहीनत्व पाहून आणि तिचे मोठेपण पाहून, नखांची पंक्ती चंद्रकांतीचे प्राशन करत आहे आणि कांतीचे वमन करण्याचा बहाणा करत आहे, अशी कवी कल्पना करतो. ၁၆၀. ဣဋ္ဌဝိသယေ ပယုတ္တဝမနုဂ္ဂိရနာဒီနမုဒါဟရဏမုဒ္ဒိသတိ ‘‘ကန္တီန’’မိစ္စာဒိနာ. မုနိပါဒနခါဝလီ မုနိပါဒနခသေဏိယော ကန္တီနံ အတ္တနော စန္ဒမရီစိသဒိသသောဘာနံ ဝမနဗျာဇာ ဥဂ္ဂိရနလေသေန တံ နိမ္မလစန္ဒံ နိပ္ပဘံ ကရောန္တိယော အတ္တနော သဗ္ဗတ္ထ ပတ္ထဋတ္တာ နိပ္ပဘံ ကရောန္တိယော စန္ဒကန္တီ စန္ဒရံသိယော [Pg.179] ပိဝန္တိ မညေ. နခရံသီနံ သဗ္ဗတ္ထ ပတ္ထဋတ္တာ သပ္ပဘဿာပိ စန္ဒဿ နိပ္ပဘတ္တဉ္စ နခရံသီနံ အဓိကတ္တဉ္စ ဒိသွာ စန္ဒကန္တီ ပိဝန္တိ ဣဝေတိ နခါဝလီနံ စန္ဒကန္တိပိဝနဉ္စ သကကန္တိဝမနဉ္စ ပကတိ န ဟောတိ, ဗျာဇမိတိ ကဝိနာ ပရိကပ္ပိတံ ဟောတိ. ဧတ္ထ ဘတ္တသိတ္ထာဒိမုချဝိသယတော အညကန္တိသင်္ခတအမုချဝိသယေ ပယုတ္တံ ဝမနံ ဂုဏဝုတ္တီတိ ဉာတဗ္ဗံ. ဝမနမေဝ ဗျာဇမိတိ စ, မုနိနော ပါဒါတိ စ, တေသု နခါတိ စ, တေသံ အာဝလိယောတိ စ, စန္ဒဿ ကန္တိယောတိ စ, နိဂ္ဂတော ပဘာဟီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १६०. इष्ट विषयात प्रयुक्त केलेल्या वमन-उद्गीरण इत्यादींचे उदाहरण 'कांतीनं' इत्यादीद्वारे दर्शवितात. मुनींच्या पादनखांची पंक्ती (नखश्रेणी), स्वतःच्या चंद्रकिरणांसारख्या शोभेच्या वमनाच्या बहाण्याने, त्या निर्मळ चंद्राला प्रभाहीन करत, स्वतः सर्वत्र पसरल्यामुळे चंद्रकांतीचे (चंद्रकिरणांचे) जणू प्राशन करत आहे, असे मला वाटते. नखांचे किरण सर्वत्र पसरल्यामुळे, सप्रभ (तेजस्वी) असलेल्या चंद्राचेही प्रभाहीनत्व आणि नखकिरणांचे आधिक्य पाहून, 'चंद्रकांतीचे प्राशन करत आहेत' असे नखपंक्तीचे चंद्रकांती-प्राशन आणि स्वतःच्या कांतीचे वमन करणे हे नैसर्गिक नसून, तो एक बहाणा (व्याज) आहे, अशी कवीने कल्पना केली आहे. येथे भाताचे शीत (कण) इत्यादी मुख्य विषयापेक्षा भिन्न अशा कांती नावाच्या अमुख्य विषयात प्रयुक्त केलेले 'वमन' हे गुणवृत्ती आहे, असे जाणावे. 'वमनच व्याज' (वमन हाच बहाणा), 'मुनींचे पाद' (पाय), 'त्यांमधील नखे', 'त्यांची आवली' (पंक्ती), 'चंद्राची कांती' आणि 'निर्गत झाली आहे प्रभा ज्याची तो' (प्रभाहीन) असा याचा विग्रह आहे. ၁၆၁. १६१. အစိတ္တကတ္တုကံ ရုဈ-မိစ္စေဝံ ဂုဏကမ္မ တံ ; သစိတ္တကတ္တုကံ ပေ’တံ, ဂုဏကမ္မံ ယဒု’တ္တမံ. अचेतन (अचित्तक) कर्ता असलेले आणि गुणकर्म असलेले ते वमन इत्यादी रचना सुंदर (रुचकर) असते; आणि सचेतन (सचित्तक) कर्ता असलेले गुणकर्म देखील उत्तम (श्रेष्ठ) असते. ၁၆၁. ယထာဝုတ္တံ နိဂမေတိ ‘‘အစိတ္တ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဣစ္စေဝံ အစိတ္တော ကတ္တာ ယဿ တံ အစိတ္တကတ္တုကံ. ဂုဏော ကမ္မံ ယဿ တံ ဂုဏကမ္မံ. တဉ္စ ဝမနာဒိ ရုဈမတိမနောဟရံ ဘဝတိ ဗန္ဓောစိတတ္တာ. နခါဝလိယော ဟိ အစိတ္တကတ္တာရော, ကန္တိယော ဂုဏကမ္မန္တိ ဝမနမတြာတိသုန္ဒရံ. နေဒမေဝ ရုဈန္တိ အာဟ ‘‘သစိတ္တ’’ဣစ္စာဒိ. ဧတံ ဝမနာဒိကံ သစိတ္တကတ္တုကမ္ပိယဒိဂုဏကမ္မံ, ဥတ္တမံ သေဋ္ဌံ ဗန္ဓောစိတတ္တာ. १६१. सांगितलेल्या विषयाचा उपसंहार 'अचित्त' इत्यादीद्वारे करतात. अशा प्रकारे, ज्याचा कर्ता अचेतन (अचित्त) आहे ते 'अचित्तकत्तुक' होय. गुण हेच ज्याचे कर्म आहे ते 'गुणकर्म' होय. आणि ते वमन इत्यादी, रचनेला योग्य असल्यामुळे 'रुझं' म्हणजे अत्यंत मनोहर असते. कारण नखपंक्ती या अचेतन कर्त्या आहेत आणि कांती हे गुणकर्म आहे, म्हणून येथे 'वमन' अतिशय सुंदर आहे. केवळ हेच मनोहर आहे असे नाही, म्हणून 'सचित्त' इत्यादी म्हटले आहे. हे वमन इत्यादी सचेतन कर्ता असलेले देखील जर गुणकर्म असेल, तर ते रचनेला योग्य असल्यामुळे उत्तम म्हणजे श्रेष्ठ असते. ၁၆၁. အနန္တရောဒါဟရဏဿ ပသတ္ထတ္တဉ္စ ကမ္မနိ ဂုဏေ သတိ သစိတ္တကတ္တုကဝမနာဒိကဉ္စ ဣဋ္ဌမိတိ ဒဿေန္တော ‘‘အစိတ္တကတ္တုက’’မိစ္စာဒိမာဟ. ဣစ္စေဝံ ဣမိနာ ပကာရေန အစိတ္တကတ္တုကံ နခါဝလိသင်္ခါတအဝိညာဏကကတ္တုဝန္တံ ဂုဏကမ္မံ နခကန္တိသင်္ခါတအပ္ပဓာနကမ္မဝန္တံ ဝမနာဒိကံ ရုဈံ ရစနာယ ဥစိတတ္တာ ရုစိဇနကံ ဟောတိ, ဧတံ ဝမနာဒိကံ သစိတ္တကတ္တုကမ္ပိ သဝိညာဏကကတ္တုဝန္တမ္ပိ ယဒိ ဂုဏကမ္မံ အမုချကမ္မံ စေ, ဥတ္တမံ ဝိသိဋ္ဌမေဝ, ‘‘ကန္တီန’’န္တိ ဘာဝသမ္ဗန္ဓေ ဆဋ္ဌိယာ သတိပိ ဝမနကြိယာယ ကမ္မတ္တံ နာတိဝတ္တတိ. နတ္ထိ စိတ္တံ ယေသန္တိ စ, အစိတ္တာ ကတ္တာရော ယဿာတိ စ, ဂုဏော ကမ္မံ ယဿေတိ စ, သဟ [Pg.180] စိတ္တေန ဝတ္တမာနောတိ စ ဝါကျံ. ဣတိ နိဒဿနေ ဧဝံ ပကာရေ နိပါတော, အထ ဝါ ဝစနဝစနီယာနံ နိဂမာရမ္ဘေ နိပါတသမုဒါယော. १६१. मागील उदाहरणाची प्रशंसनीयता आणि कर्मामध्ये गुण असताना सचेतन कर्ता असलेले वमन इत्यादी देखील इष्ट असते, हे दर्शविताना 'अचित्तकत्तुकं' इत्यादी म्हटले आहे. अशा प्रकारे, या पद्धतीने अचेतन कर्ता असलेले म्हणजे नखपंक्ती नावाचा अविज्ञानक (अचेतन) कर्ता असलेले, आणि गुणकर्म असलेले म्हणजे नखकांती नावाचे अप्रधान कर्म असलेले वमन इत्यादी, रचनेसाठी योग्य असल्यामुळे 'रुझं' म्हणजे रुची उत्पन्न करणारे (मनोहेर) असते. हे वमन इत्यादी सचेतन कर्ता असलेले (सविज्ञानक कर्ता असलेले) देखील जर गुणकर्म म्हणजे अमुख्य कर्म असेल, तर ते उत्तम म्हणजे विशिष्टच असते. 'कांतीनं' यामध्ये भावसंबंधात षष्ठी विभक्ती असली, तरी वमनक्रियेच्या कर्मत्त्वाचे उल्लंघन होत नाही. 'ज्यांना चित्त नाही ते' (अचित्त), 'अचित्त कर्ते आहेत ज्याचे ते', 'गुण हेच कर्म आहे ज्याचे ते', 'चित्तासह वर्तमान असलेला' असा वाक्याचा विग्रह आहे. 'इति' हा निदर्शन (उदाहरण) किंवा अशा प्रकारे या अर्थाचा निपात आहे, अथवा बोलल्या गेलेल्या शब्दांच्या उपसंहाराच्या आरंभी वापरलेला निपातसमूह आहे. ၁၆၂. १६२. ဥဂ္ဂိရန္တောဝ သ သ္နေဟ-ရသံ ဇိနဝရော ဇနေ; ဘာသန္တော မဓုရံ ဓမ္မံ, ကံ န သမ္ပီဏယေ ဇနံ. ते जिनवर (बुद्ध) लोकांवर जणू आपल्या स्नेहरसाचे (प्रेमाचे) वमन करत, मधुर धर्माचा उपदेश करत, कोणत्या बरं मनुष्याला संतुष्ट करणार नाहीत? (अर्थात सर्वांनाच संतुष्ट करतात.) ၁၆၂. တဒုဒါဟရတိ ‘‘ဥဂ္ဂိရန္တောဝါ’’တိအာဒိနာ. သော ဇိနဝရော ဇနေ သကလသတ္တနိကာယေ သ္နေဟရသံ အတ္တနော ပေမသင်္ခါတံ အနုရာဂံ ဥဂ္ဂိရန္တောဝ ဝမန္တော ဝိယ မဓုရံ အတိပဏီတံ ဓမ္မံ ဘာသန္တော ကံ ဇနံ န သမ္ပီဏယေ, သဗ္ဗမေဝ သမ္ပီဏေတိ. ဧတ္ထ ဇိနဝရော ကတ္တာ သစိတ္တော, သ္နေဟရသော ဂုဏကမ္မံ. १६२. त्याचे उदाहरण 'उग्गिरंतो व' इत्यादीद्वारे देतात. ते जिनवर (बुद्ध) लोकांवर म्हणजे संपूर्ण प्राणिमात्र समूहावर आपल्या स्नेहरसाचे म्हणजे स्वतःच्या प्रेमरूपी अनुरागाचे जणू वमन करत (बाहेर टाकत), मधुर म्हणजे अत्यंत प्रणीत धर्माचा उपदेश करत कोणत्या मनुष्याला संतुष्ट करणार नाहीत? सर्वांनाच संतुष्ट करतात. येथे 'जिनवर' हे सचेतन (सचित्त) कर्ते आहेत आणि 'स्नेहरस' हे गुणकर्म आहे. ၁၆၂. ဣဒါနိ သစိတ္တကကတ္တုပက္ခေ ဥဒါဟရဏမုဒ္ဒိသတိ ‘‘ဥဂ္ဂိရန္တော’’စ္စာဒိနာ. သော ဇိနဝရော ဇနေ သကလသတ္တနိကာယေ သ္နေဟရသံ အတ္တနော ပေမသင်္ခါတအနုရာဂံ ဥဂ္ဂိရန္တော ဣဝ ဝမန္တော ဝိယ မဓုရံ အာဒိကလျာဏာဒိဘာဝေန ပဏီတံ ဓမ္မံ သဒ္ဓမ္မံ ဘာသန္တော ဒေသေန္တော ယထာသယံ ဝဒန္တော ကံ ဇနံ ကီဒိသံ ပုဂ္ဂလံ န သမ္ပီဏယေ, ပီဏေတိ ဧဝါတိ. ဧတ္ထ ဥဂ္ဂိရနံ ဇိနဝရသင်္ခတသစိတ္တကကတ္တုဝန္တမ္ပိ သ္နေဟရသသင်္ခါတအမုချကမ္မယုတ္တတ္တာ ပသတ္ထံ ဟောတိ. သ္နေဟော ဧဝ ရသော အနုရာဂေါတိ ဝိဂ္ဂဟော. १६२. आता सचेतन कर्त्याच्या पक्षात उदाहरण 'उग्गिरंतो' इत्यादीद्वारे दर्शवितात. ते जिनवर (बुद्ध) लोकांवर म्हणजे संपूर्ण प्राणिमात्र समूहावर आपल्या स्नेहरसाचे म्हणजे स्वतःच्या प्रेमरूपी अनुरागाचे जणू वमन करत, मधुर म्हणजे आदिकल्याण इत्यादी भावाने प्रणीत अशा सद्धर्माचा उपदेश करत, देशना देत, आपल्या आशयानुसार बोलत कोणत्या मनुष्याला, कशा प्रकारच्या पुद्गलाला (व्यक्तीला) संतुष्ट करणार नाहीत? संतुष्ट करतातच. येथे 'उद्गीरण' (वमन) हे जिनवर नावाच्या सचेतन कर्त्याचे असले, तरी स्नेहरस नावाच्या अमुख्य कर्माशी युक्त असल्यामुळे प्रशंसनीय ठरते. 'स्नेह हाच रस (अनुराग)' असा याचा विग्रह आहे. ၁၆၃. १६३. ယော သဒ္ဒသတ္ထကုသလော ကုသလော နိဃဏ္ဋု-ဆန္ဒောအလင်္ကတိသု နိစ္စကတာဘိယောဂေါ; သော’ယံ ကဝိတ္တဝိကလောပိ ကဝီသု သင်္ချ-မောဂယှ ဝိန္ဒတိ ဟိ ကိတ္တိ’မမန္ဒရူပံ. जो शब्दशास्त्रात (व्याकरणात) कुशल आहे, निघंटू (कोश), छंद आणि अलंकार शास्त्रात कुशल आहे, आणि ज्याने यामध्ये निरंतर अभ्यास (अभियोग) केला आहे; तो मनुष्य स्वतः कवित्वापासून (काव्यप्रतिभेपासून) विरहित असला तरीही, कवींमध्ये गणना प्राप्त करून अत्यंत विपुल कीर्ती मिळवतो. ဣတိ သံဃရက္ခိတမဟာသာမိပါဒဝိရစိတေ अशा प्रकारे संघरक्षित महास्वामींच्या चरणांनी रचित (संघरक्षित महास्वामींनी रचलेल्या) သုဗောဓာလင်္ကာရေ सुबोधालंकार या ग्रंथातील ဂုဏာဝဗောဓော နာမ တတိယော ပရိစ္ဆေဒေါ. 'गुणावबोध' नावाचा तिसरा परिच्छेद समाप्त झाला. ၁၆၃. ဂန္ထန္တရာဟိတဝါသနာယ, [Pg.181] တဒနုဗန္ဓပဋိဘာနေ စာဝိဇ္ဇမာနေပိ သုတေန အဘိယောဂဗလေန ကဝိတာ ကိတ္တိ စ တဒနုဂတာ သမုပလဗ္ဘတီတိ သမနုသာသတိ ‘‘ယော’’ဣစ္စာဒိနာ. သဒ္ဒသတ္ထေ ဗျာကရဏေ ကိသ္မိဉ္စိ ‘‘ဣဒမေဝေ’’တိ နိယမာဘာဝါ ကုသလော ဆေကော နိဃဏ္ဋုမှိ အဘိဓာနသတ္ထေ စ ဆန္ဒသိ ဝုတ္တိဇာတိပ္ပပဉ္စပကာသကဆန္ဒောဝိစိတိသတ္ထေ စ အလင်္ကတိသု အလင်္ကာရသတ္ထေ စ ကုသလော န ကေဝလံ သဒ္ဒသတ္ထေယေဝ, အထ စ ပန နိစ္စမနဝရတံ ဒိဝါ စ ရတ္တော စ ကတော အဘိယောဂေါ ဝါယာမော ရစနာဝိသယေ ယဿ သောယံ ကဝိတ္တဝိကလောပိ ဗန္ဓကရဏသင်္ခါတကဝိဂုဏပရိဟီနောပိ ကဝီသု ကဝိဂုဏောပေတေသု သင်္ချံ ဂဏနံ ဩဂယှ ပဋိလဘိတွာ အမန္ဒရူပံ အတိဗဟုံ ကိတ္တိံ ပရိသုဒ္ဓဗန္ဓရစနာလက္ခဏံ တပ္ပဘဝံ ချာတံ ဝိန္ဒတိ ပဋိလဘတေဝါတိ. १६३. इतर ग्रंथांच्या अभ्यासाने निर्माण झालेल्या संस्कारांच्या (वासना) आणि त्यासंबंधीच्या प्रतिभेच्या अभावी देखील, केवळ श्रवण (बहुश्रुतता) आणि सततच्या अभ्यासाच्या (अभियोग) बळावर कवित्व आणि त्या अनुषंगाने येणारी कीर्ती प्राप्त होते, असा उपदेश 'यो' इत्यादी शब्दांनी केला आहे. शब्दशास्त्रामध्ये म्हणजेच व्याकरणात 'हेच असावे' असा कोणताही नियम नसल्यामुळे, जो कुशल आणि चतुर आहे, जो निघंटूमध्ये (अभिधानशास्त्रात), छंदशास्त्रामध्ये (वृत्त आणि जातींच्या विस्ताराचा प्रकाश करणाऱ्या छंदोविचिती शास्त्रामध्ये) आणि अलंकारांमध्ये (अलंकारशास्त्रामध्ये) कुशल आहे—केवळ शब्दशास्त्रामध्येच नव्हे; तर ज्याने दिवस-रात्र निरंतर रचना करण्याच्या बाबतीत अभ्यास (अभियोग) आणि प्रयत्न केला आहे, तो स्वतः कवित्वाचा अभाव असलेला असला तरी, किंवा काव्यरचना करण्याच्या गुणांनी रहित असला तरी, कविगुणांनी युक्त असलेल्या कवींच्या समूहात गणना प्राप्त करून, अत्यंत विपुल अशी कीर्ती, जी शुद्ध रचनाशैलीचे लक्षण आहे आणि त्यापासून उत्पन्न होणारी प्रसिद्धी प्राप्त करतोच. ဣတိ သုဗောဓာလင်္ကာရေ မဟာသာမိနာမိကာယံ अशा प्रकारे महासामी नावाच्या सुबोधालंकारात... သုဗောဓာလင်္ကာရဋီကာယံ सुबोधालंकारटीकेमध्ये ဂုဏာဝဗောဓပရိစ္ဆေဒေါ တတိယော. गुणबोध नावाचा तिसरा परिच्छेद समाप्त. ၁၆၃. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန သဒ္ဒါလင်္ကာရေ နိဒ္ဒိသိတွာ ဗျာကရဏနိဃဏ္ဋုဆန္ဒောပရိဝါရိတေ ဣမသ္မိံ နိရန္တရာဘိယောဂေါ ဣဟလောကိယာဒိမဟန္တယသဿ ကာရဏမိတိ သိဿာနမနုသာသန္တော ‘‘ယော သဒ္ဒသတ္ထကုသလော’’စ္စာဒိမာဟ. ယော ထေရနဝမဇ္ဈိမေသု ကောစိ သဒ္ဒသတ္ထကုသလော သဒ္ဒါနုသာသနဗျာကရဏဝိသယေ ပကတိပစ္စယာဒိဝိဘာဂကပ္ပနာယ ဆေကော နိဃဏ္ဋုဆန္ဒောအလင်္ကတီသု အဘိဓာနဆန္ဒောအလင်္ကာရသတ္ထေသုပိ ကုသလော တံတံဝိဘာဂဗုဒ္ဓီနံ ပဋိပါဒနေန ဆေကော နိစ္စကတာဘိယောဂေါ ဓာရဏမနသိကာရဝသေန နိစ္စံ ကတုဿာဟော ဟောတိ. သော အယံ အပ္ပမာဒီ ကဝိတ္တဝိကလောပိ ပကတိသိဒ္ဓကဗ္ဗရစနဂုဏရဟိတောပိ ကဝီသု သင်္ချံ ကဗ္ဗကတ္တူသု ဂဏနံ ဩဂယှ ကဗ္ဗကရဏဋီကာကရဏာဒိပကာရေန ဩဂါဟေတွာ တံ ဂဏနံ ပါပုဏိတွာ [Pg.182] အမန္ဒရူပံ အနပ္ပကသဘာဝံ အတိဗဟုံ ကိတ္တိံ နိဒ္ဒေါသံ သတ္ထရစနလက္ခဏံ ပုညသဉ္စယံ, တပ္ပဘဝံ ပသိဒ္ဓိံ ဝါ ဝိန္ဒတိ လဘတေဝါတိ. ယထာဝုတ္တသတ္ထေသု အဘိယောဂေါ ဗန္ဓဿ ဧကန္တကာရဏမေဝ. ဝုတ္တံ ဟိ– १६३. आता उद्देशक्रमानुसार शब्दालंकारांचे निर्देश करून, व्याकरण, निघंटू आणि छंदाने वेढलेल्या या शास्त्रामध्ये निरंतर अभ्यास करणे हे इहलोकातील महान यशाचे कारण आहे, असा शिष्यांना उपदेश करताना 'यो सद्दसत्थकुसलो' (जो शब्दशास्त्रात कुशल आहे) इत्यादी गाथा म्हटली आहे. जो थेर (स्थवीर), नव किंवा मध्यम भिक्खूंपैकी कोणीही शब्दशास्त्रात कुशल असेल, शब्दशासनाच्या (व्याकरणाच्या) विषयात प्रकृती-प्रत्यय इत्यादी विभागांच्या कल्पनेत चतुर असेल, निघंटू, छंद आणि अलंकारांमध्ये म्हणजेच अभिधान, छंद आणि अलंकारशास्त्रामध्येही कुशल असेल, त्या त्या विभागांच्या बुद्धीचे प्रतिपादन करण्यात चतुर असेल, आणि धारणा व मनसिकाच्या (मनन) बळावर निरंतर अभ्यास करणारा व नेहमी उत्साही असणारा असेल; तो हा अप्रमादी (जागरूक) पुरुष स्वतः कवित्वाचा अभाव असलेला असला तरी, किंवा नैसर्गिक काव्यरचना करण्याच्या गुणांनी रहित असला तरी, कवींच्या (काव्यकर्त्यांच्या) समूहात गणना प्राप्त करून, काव्यरचना आणि टीकालेखन इत्यादी प्रकारे त्यात प्रवेश करून, ती गणना प्राप्त करतो आणि अत्यंत विपुल अशी कीर्ती, जी निर्दोष शास्त्ररचनेचे लक्षण आहे, पुण्याचा संचय आणि त्यापासून उत्पन्न होणारी प्रसिद्धी प्राप्त करतोच. वर सांगितलेल्या शास्त्रांमधील अभ्यास हा काव्यरचनेचे एकमेव कारण आहे. कारण असे म्हटले आहे की– ‘‘သာဘာဝိကီ စ ပဋိဘာ,သုတဉ္စ ဗဟုနိမ္မလံ; အမန္ဒော စာဘိယောဂေါ’ယံ,ဟေတု ဟောတိ’ဟ ဗန္ဓနေ’’တိ. 'स्वाभाविक प्रतिभा, अत्यंत निर्मळ बहुश्रुतता (श्रुत) आणि तीव्र अभ्यास (अभियोग), हेच येथे काव्यरचनेचे (बंधनाचे) कारण ठरतात.' တတ္ထ သာဘာဝိကီ သဘာဝသိဒ္ဓါ ပဋိဘာ စ ပညာ စ ဗဟု နိမ္မလံ အနပ္ပကံ နိဇ္ဇဋံ သုတဉ္စ အမန္ဒော အဘိယောဂေါ စ အနပ္ပကော အဘျာသော စေတိ အယမေသော သဗ္ဗောပိ ဣဟ ဗန္ဓနေ ဣမိဿံ ကဗ္ဗရစနာယံ ဟေတု ဟောတိ ကာရဏံ ဘဝတီတိ. သဒ္ဒေ သာသတိ ဧတ္ထ ဧတေနာတိ ဣမသ္မိံ အတ္ထေ တပ္ပစ္စယဉ္စ တဿ ထာဒေသဉ္စ ကတွာ သဒ္ဒသတ္ထန္တိ ဉာတဗ္ဗံ, သဒ္ဒသတ္ထေ ကုသလောတိ စ, နိဃဏ္ဋု စ ဆန္ဒော စ အလင်္ကတိ အလင်္ကာရဉ္စေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော, ဧတ္ထ အလင်္ကတိသဒ္ဒေါ သတ္ထာပေက္ခာယ နပုံသကော ဟောတိ, နိစ္စံ ကတော အဘိယောဂေါ အဿေတိ စ, ကဝိနော ဘာဝေါတိ စ, တေန ဝိကလောတိ စ, အမန္ဒံ ရူပံ သဘာဝေါ ယဿေတိ စ ဝါကျံ. त्यात 'स्वाभाविक' म्हणजे स्वभावसिद्ध प्रतिभा आणि प्रज्ञा; 'अत्यंत निर्मळ' म्हणजे विपुल आणि दोषरहित बहुश्रुतता; आणि 'तीव्र अभ्यास' म्हणजे निरंतर केलेला सराव. हे सर्व मिळून येथे 'बंधनात' म्हणजेच या काव्यरचनेत हेतू किंवा कारण ठरतात. 'सद्दे सासति एत्थ एतेnaति' (ज्याद्वारे शब्दांचे शासन केले जाते) या अर्थाने प्रत्यय लावून आणि त्याचा 'था' आदेश करून 'सद्दसत्थ' (शब्दशास्त्र) असे जाणावे. 'शब्दशास्त्रात कुशल' (सद्दसत्थे कुसलो) आणि 'निघंटू, छंद आणि अलंकार' असा विग्रह करावा. येथे 'अलंकार' हा शब्द शास्त्राच्या अपेक्षेने नपुंसकलिंगी होतो. 'ज्याने निरंतर अभ्यास केला आहे तो' आणि 'कवीचा भाव (कवित्व)' आणि 'त्याने रहित असलेला (विकल)' आणि 'ज्याचा स्वभाव मंद नाही (अमंद रूप)' असे हे वाक्य आहे. ဣတိ သုဗောဓာလင်္ကာရနိဿယေ अशा प्रकारे सुबोधालंकार निश्रयात... တတိယော ပရိစ္ဆေဒေါ. तिसरा परिच्छेद समाप्त. ၄. အတ္ထာလင်္ကာရာဝဗောဓပရိစ္ဆေဒ ४. अर्थालंकारबोध परिच्छेद ၁၆၄. १६४. အတ္ထာလင်္ကာရသဟိတာ, သဂုဏာ ဗန္ဓပဒ္ဓတိ; အစ္စန္တကန္တာ ကန္တာဝ, ဝုစ္စန္တေတေ တတော’ဓုနာ. अर्थालंकाराने युक्त आणि गुणांनी संपन्न असलेली काव्यरचना (बंधपद्धती), अत्यंत प्रिय पत्नीप्रमाणे अत्यंत सुंदर वाटते; म्हणून आता त्यांचे वर्णन केले जात आहे. ၁၆၄. ဧဝံ [Pg.183] သဒ္ဒါလင်္ကာရေ ပရိစ္ဆိဇ္ဇ သမ္ပတျတ္ထာလင်္ကာရံ ဗောဓယိတုမာဟ ‘‘အတ္ထာလင်္ကာရ’’ဣစ္စာဒိ. သဂုဏာ ယထာဝုတ္တေဟိ ပသာဒါဒီဟိ သဒ္ဒဂုဏေဟိ သဟိတာ ဗန္ဓပဒ္ဓတိ ကဗ္ဗရစနံ. အလင်္ကရီယတိ ကန္တိံ နီယတိ ဗန္ဓော ဧတေဟိ သရီရမိဝ ဟာရာဒီဟီတိ အလင်္ကာရာ, တေဟိ အတ္ထာလင်္ကာရေဟိ ဇာတျာဒိလက္ခဏေဟိ သဟိတာ သံယုတ္တာ သတီ သဂုဏာ ပတိဗ္ဗတာဒိဂုဏောပေတာ အတ္ထေန ဓနေန အလင်္ကာရေန အာဘရဏေန သဟိတာ ယုတ္တာ ကန္တာဝ အင်္ဂနာ ဝိယ. ယတော အစ္စန္တကန္တာ အတိသယရမဏီယာ သိယာ, တတော တေန ကာရဏေန ယေ အတ္ထာလင်္ကာရာ အဝသရံ ပတ္တာ, တေ အဓုနာ ဣဒါနိ ဝုစ္စန္တေ ကထီယန္တိ. १६४. अशा प्रकारे शब्दालंकारांचे वर्गीकरण करून, आता अर्थालंकाराचा बोध करून देण्यासाठी 'अर्थालंकार' इत्यादी गाथा म्हटली आहे. 'सगुणा' म्हणजे वर सांगितलेल्या प्रसाद इत्यादी शब्दगुणांनी युक्त असलेली 'बंधपद्धती' म्हणजेच काव्यरचना. ज्यांच्याद्वारे काव्याची शोभा वाढवली जाते, जसे हारादी अलंकारांनी शरीराची शोभा वाढवली जाते, त्यांना 'अलंकार' म्हणतात. त्या जाती इत्यादी लक्षणांनी युक्त असलेल्या अर्थालंकारांनी युक्त असलेली काव्यरचना, जशी पतीव्रता इत्यादी गुणांनी युक्त आणि धन (अर्थ) व आभूषणांनी (अलंकारांनी) नटलेली एखादी प्रिय स्त्री (कांता) असते, त्याप्रमाणे अत्यंत रमणीय (अत्यंत कांत) असते. म्हणून, त्या कारणाने जे अर्थालंकार येथे प्रस्तुत आहेत, ते आता सांगितले जात आहेत. ၁၆၄. ဧဝံ သဒ္ဒါလင်္ကာရဝိဘာဂံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ တန္နိဿယံယေဝ အတ္ထာလင်္ကာရဗန္ဓမာရဘန္တော ‘‘အတ္ထာလင်္ကာရိ’’စ္စာဒိမာဟ. သဂုဏာ ယထာဝုတ္တပသာဒါဒိသဒ္ဒဂုဏယုတ္တာ ဗန္ဓပဒ္ဓတိ ပဇ္ဇဂဇ္ဇာဒိပဘေဒါ ရစနာဝလိ အတ္ထာလင်္ကာရသဟိတာ သဘာဝဝုတ္တိဝင်္ကဝုတ္တိသင်္ခါတေန အတ္ထာလင်္ကာရေန သံယုတ္တာ သဂုဏာ အတ္ထာလင်္ကာရသဟိတာ ကန္တာ ဣဝ ပတိဗ္ဗတာဒီဟိ ဂုဏေဟိ ယုတ္တာ သုဝဏ္ဏရဇတမဏိမုတ္တာဒိဓနေဟိ ဂီဝေယျကဋကနူပုရာဒီဟိ အာဘရဏေဟိ စ ယုတ္တာ အင်္ဂနာဝ အစ္စန္တကန္တာ ယတော အတိသယေန ရမဏီယာ, တတော တသ္မာ တေ အတ္ထာလင်္ကာရာ အဓုနာ ဒါနိ ဝုစ္စန္တေ. အလင်္ကရောန္တိ ဗန္ဓံ သရီရံ ဝါ ဧတေဟီတိ စ, အတ္ထဿ အလင်္ကာရာတိ စ, တေဟိ သဟိတာတိ စ, ဂုဏေဟိ သဟ ဝတ္တတီတိ စ, ဗန္ဓဿ ပဒ္ဓတီတိ စ, အစ္စန္တံ အတိသယေန ကန္တာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १६४. अशा प्रकारे शब्दालंकारांचे वर्गीकरण दाखवून, आता त्यावरच आधारित अर्थालंकारांच्या रचनेचा प्रारंभ करताना 'अर्थालंकार' इत्यादी गाथा म्हटली आहे. 'सगुणा' म्हणजे वर सांगितलेल्या प्रसाद इत्यादी शब्दगुणांनी युक्त असलेली 'बंधपद्धती' म्हणजेच पद्य-गद्य इत्यादी प्रकारची रचनामालिका. ती 'अर्थालंकाराने युक्त' म्हणजे स्वभावोक्ती आणि वक्रोक्ती नावाच्या अर्थालंकारांनी युक्त असते. जशी पतीव्रता इत्यादी गुणांनी युक्त आणि सोने, चांदी, मणी, मोती इत्यादी धनाने तसेच कंठाभरण, कडे, नूपुर इत्यादी आभूषणांनी नटलेली स्त्री अत्यंत रमणीय असते, त्याचप्रमाणे ही रचना अत्यंत सुंदर असते. म्हणून, ते अर्थालंकार आता सांगितले जात आहेत. 'ज्यांच्याद्वारे काव्याची किंवा शरीराची शोभा वाढवली जाते ते अलंकार', 'अर्थाचे अलंकार', 'त्यांनी युक्त', 'गुणांसह वर्तमान असणारी', 'काव्याची पद्धती' आणि 'अत्यंत रमणीय' असा हा विग्रह आहे. ၁၆၅. १६५. သဘာဝဝင်္ကဝုတ္တီနံ, ဘေဒါ ဒွိဓာ အလံကြိယာ; ပဌမာ တတ္ထ ဝတ္ထူနံ, နာနာဝတ္ထာဝိဘာဝိနီ. स्वभावोक्ती आणि वक्रोक्ती या भेदांमुळे अलंकार दोन प्रकारचे आहेत. त्यातील पहिला (स्वभावोक्ती) हा वस्तूंच्या विविध अवस्थांचे प्रकटीकरण करणारा आहे. ၁၆၅. ကတိပ္ပဘေဒါ တေ ဣစ္စာဟ ‘‘သဘာဝ’’ဣစ္စာဒိ. သဘာဝဝုတ္တိ ဝင်္ကဝုတ္တီတိ ဣမေသံ ဘေဒါ ပဘေဒေန အလံကြိယာ အတ္ထာလင်္ကာရာဒွိဓာဒွိပ္ပကာရာ. [Pg.185] တေသု သဘာဝဝုတ္တိ ကီဒိသီတိ အာဟ ‘‘ပဌမာ’’တိအာဒိ. တတ္ထ တာသု ပဌမာ သဘာဝဝုတ္တိ ဝတ္ထူနံ ပဒတ္ထာနံ ဇာတိဂုဏကြိယာဒဗ္ဗသဘာဝါနံ နာနာ ဝိစိတ္တာ, န ဒွေကာဝ အဝတ္ထာ အဝသရာ ဝိဘာဝိနီ ပကာသိကာ ဝိညေယျာ. ဇာတျာဒီနံ ပဒတ္ထာနံ ယထာသဘာဝမနေကပ္ပကာရံ သမ္မဒေဝ ဝိဝရန္တီ သဘာဝံ ပဒတ္ထာနံ ဝိစိတ္တံ ဝဒတီတိ သဘာဝဝုတ္တိ နာမာတိ အဓိပ္ပာယော, သာဝ ဇာတိယာ ပဒတ္ထသရူပဿ တထာတထာပဋိပါဒကတ္တေန ဝုတ္တိယာ ဇာတိပိ ဝုစ္စတိ. १६५. ते किती प्रकारचे आहेत, हे सांगताना 'स्वभाव' इत्यादी गाथा म्हटली आहे. स्वभावोक्ती (स्वभाववृत्ती) आणि वक्रोक्ती (वक्रवृत्ती) या भेदांमुळे अलंकार म्हणजेच अर्थालंकार दोन प्रकारचे आहेत. त्यापैकी स्वभावोक्ती कशी आहे, हे सांगताना 'पठमा' (पहिली) इत्यादी म्हटले आहे. त्यामध्ये पहिली स्वभावोक्ती म्हणजे वस्तूंच्या (पदार्थांच्या) जाती, गुण, क्रिया आणि द्रव्याच्या स्वभावाची विविध आणि विचित्र अवस्था प्रकट करणारी आहे, असे जाणावे. जाती इत्यादी पदार्थांच्या स्वाभाविक स्वरूपाचे अनेक प्रकारे योग्य प्रकारे वर्णन करून, पदार्थांच्या विचित्र स्वभावाचे कथन करते म्हणून तिला 'स्वभाववृत्ती' (स्वभावोक्ती) असे म्हणतात, असा अभिप्राय आहे. तीच जातीच्या द्वारे पदार्थाच्या स्वरूपाचे तशा प्रकारे प्रतिपादन करत असल्यामुळे तिला 'जाती' असेही म्हटले जाते. ၁၆၅. ပသတ္ထာလင်္ကာရာ ပဘေဒတော ဧတ္တကာတိ ဒဿေန္တော ‘‘သဘာဝိ’’စ္စာဒိမာဟ. အလံကြိယာ အတ္ထာလင်္ကာရာ သဘာဝဝင်္ကဝုတ္တီနံ ဘေဒါ ပဘေဒတော ဒွိဓာ ဒွိပ္ပကာရာ ဟောန္တိ. တတ္ထ တာသုဒွီသု ပဌမာ သဘာဝဝုတ္တိ ဝတ္ထူနံ ဇာတိဂုဏကြိယာဒဗ္ဗလက္ခဏာနံ ပဒတ္ထာနံ နာနာဝတ္ထာဝိဘာဝိနီ အနေကပ္ပကာရဿ ပကာသိနီ ဟောတိ. ဧတ္ထ ဇာတျာဒီနံ ပဒတ္ထာနံ အနေကပ္ပကာရသဘာဝပကာသိနီ သဘာဝဝုတ္တိ နာမ. ဧသာဝ ဇာတိ ဂုဏာဒိစတုဗ္ဗိဓပဒတ္ထာနံ သရူပသင်္ခါတဇာတိယာ တေဟိ အာကာရေဟိ ပဋိပါဒနတော ဥပစာရတော ဇာတိ နာမ ဟောတိ. ဇာတျာဒိပဒတ္ထာနံယေဝ ယထာသဘာဝံ ဟိတွာ ဝတ္ထုပရိကပ္ပိတအတိသယောပမာရူပကာဒိသရူပသင်္ခါတံ ဝင်္ကသဘာဝံ ပကာသေန္တီ ဝင်္ကဝုတ္တိ နာမ. ယဘာဝေါ စ ဝင်္ကော စာတိ စ, တေသံ ဝုတ္တီတိ စ, အလံကရောန္တိ ဧတာဟီတိ စ, နာနာ အနေကာ စ သာ အဝတ္ထာ စာတိ စ ဝါကျံ. १६५. प्रशस्त अलंकारांचे प्रभेदानुसार इतके प्रकार आहेत हे दर्शविताना 'स्वभावी' इत्यादी म्हटले आहे. अलंकार म्हणजेच अर्थालंकार हे स्वभाववृत्ती आणि वक्रवृत्ती या भेदांमुळे प्रभेदानुसार दोन प्रकारचे असतात. त्या दोन्हीमध्ये पहिली 'स्वभाववृत्ती' ही वस्तूंच्या जाती, गुण, क्रिया आणि द्रव्य या लक्षणांच्या पदार्थांच्या विविध अवस्थांचे प्रकटीकरण करणारी, म्हणजेच अनेक प्रकारांना प्रकाशित करणारी असते. येथे जाती इत्यादी पदार्थांच्या अनेक प्रकारच्या स्वभावाला प्रकाशित करणारी ती 'स्वभाववृत्ती' होय. हीच जाती, गुण इत्यादी चार प्रकारच्या पदार्थांच्या स्वरूपसंज्ञक जातीच्या त्या त्या आकारांनी प्रतिपादन केल्यामुळे उपचाराने 'जाती' या नावाने ओळखली जाते. जाती इत्यादी पदार्थांचाच यथास्वभाव सोडून, वस्तूच्या कल्पनेने सिद्ध झालेल्या अतिशयोक्ती, उपमा, रूपक इत्यादी स्वरूपसंज्ञक वक्र स्वभावाला प्रकाशित करणारी ती 'वक्रवृत्ती' होय. 'जो भाव आहे आणि जो वक्र आहे', 'त्यांची वृत्ती' आणि 'ज्यांच्याद्वारे अलंकारित केले जाते' आणि 'ती विविध व अनेक अवस्था आहे' असे हे वाक्य आहे. ယထာ – जसे की – ၁၆၆. १६६. လီလာဝိကန္တိသုဘဂေါ,ဒိသာထိရဝိလောကနော; ဗောဓိသတ္တင်္ကုရော ဘာသံ,ဝိရောစိ ဝါစမာသဘိံ. लीलायुक्त विलासाने सुशोभित, दिशांकडे स्थिर दृष्टीने पाहणारे, ते बोधिसत्त्व अंकुर (बाळ बोधिसत्त्व) गर्जनायुक्त (उत्कृष्ट) वाणी बोलत शोभून दिसले. ၁၆၆. ‘‘ယထေ’’တိ တံ ဥဒါဟရတိ. လီလာယ ဝိလာသေန ဝိဟိတာယ ဝိကန္တိယာ ဂမနေန သတ္တပဒဝီတိဟာရသင်္ခါတေန သုဘဂေါ သုန္ဒရော ဒိသာသု ဒသသု ထိရမစလံ ဝိလောကနံ ယဿ သော ဗောဓိသတ္တင်္ကုရော တဒဟုဇာတော မဟာဗောဓိသတ္တော အာသဘိံ ဝါစံ ‘‘အဂ္ဂေါဟမသ္မီ’’တိအာဒိကမုတ္တမံ နိဗ္ဘယဝစနံ ဘာသံ ဝဒန္တော ဝိရောစိ ဝိသေသေန ရမဏီယတ္တံ ပတ္တော. အယံ သဘာဝဝုတ္တိ. ဧဝံ ဇာတိသဘာဝဝုတျာဒယောပိ ပရိကပ္ပနီယာ. १६६. 'जसे की' या शब्दाने त्याचे उदाहरण देतात. लीलेने म्हणजेच विलासाने केलेल्या गतीने, सात पावले चालण्याने सुशोभित व सुंदर, दहा दिशांमध्ये स्थिर व अचल दृष्टी असणारे ते बोधिसत्त्व अंकुर, म्हणजेच त्या दिवशी जन्मलेले महाबोधिसत्त्व, 'मी सर्वश्रेष्ठ आहे' इत्यादी उत्तम व निर्भय अशी 'आसभी' (श्रेष्ठ) वाणी बोलत विशेष रूपाने शोभून दिसले (रमणीयतेला प्राप्त झाले). ही स्वभाववृत्ती आहे. याचप्रमाणे जाती-स्वभाववृत्ती इत्यादींचीही कल्पना करावी. ၁၆၆. ဣဒါနိ သဘာဝဝုတ္တိယာ ဥဒါဟရဏံ အာဟ ‘‘ယထာ – လီလာဝိကန္တိ’’စ္စာဒိ. လီလာဝိကန္တိသုဘဂေါ ဝိလာသဂမနေန သတ္တပဒဝီတိဟာရေန သုန္ဒရော ဒိသာထိရဝိလောကနော ဒသဒိသာသု အစလဩလောကနော ဗောဓိသတ္တင်္ကုရော မဟာဗောဓိသတ္တင်္ကုရော အာသဘိံ ဝါစံ ‘‘အဂ္ဂေါဟမသ္မီ’’တိအာဒိနာ အဘီတဝစနံ ဘာသံ ဝဒန္တော ဝိရောစိ အသောဘီတိ. ဣဟ ဗောဓိသတ္တသင်္ခါတဿ ဒဗ္ဗဿ လီလာဝိကန္တိဒိသာထိရဝိလောကနဝစောနိစ္ဆာရဏသင်္ခတာနံ အဝတ္ထာနံ ပကာသိတတ္တာ ဒဗ္ဗသဘာဝဝုတ္တီတိ ဉာတဗ္ဗာ. ဧသာယေဝ ဒဗ္ဗဂတဂတျာဒိဝိစိတြသရူပံ အလင်္ကရဏတော အလင်္ကာရော နာမ, ဒဗ္ဗဂတဂတျာဒယော ပန အလံကိရိယမာနတ္တာ အလံကိရိယာ နာမ. ဇာတိဂုဏကြိယာသဘာဝဝုတ္တိယောပိ ဧဝမေဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. လီလာယ ယုတ္တာ ဝိကန္တီတိ စ, တာယ သုဘဂေါတိ စ, ဒိသာသု ထိရံ ဝိလောကနံ ယဿေတိ စ, ဗောဓိယာ ပညာယ သတ္တောတိ စ, သောယေဝ အင်္ကုရောတိ စ, ဥသဘဿ ဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. ဥသဘဿ ဘာဝသင်္ခါတာ အကမ္ပနီယာ ဌိတိ အာသဘံ နာမ, အကမ္ပဘာဝတော တေန သမာပိ ဝါစာ ဥပစာရတော အာသဘီ နာမ ဟောတိ. १६६. आता स्वभाववृत्तीचे उदाहरण 'जसे – लीलाविकंती' इत्यादीद्वारे सांगतात. लीलायुक्त विलासाने सुशोभित म्हणजेच विलासपूर्ण गतीने सात पावले चालण्याने सुंदर, दिशांकडे स्थिर दृष्टीने पाहणारे म्हणजेच दहा दिशांमध्ये अचल दृष्टी असणारे, बोधिसत्त्व अंकुर म्हणजेच महाबोधिसत्त्व अंकुर, 'मी सर्वश्रेष्ठ आहे' इत्यादी अभय वाणी बोलत शोभून दिसले. येथे बोधिसत्त्व नावाच्या द्रव्याच्या लीलायुक्त गमन, दिशांकडे स्थिर दृष्टी आणि वाणीचा उच्चार या अवस्थांचे प्रकटीकरण केल्यामुळे ही 'द्रव्यस्वभाववृत्ती' आहे असे समजावे. हीच द्रव्याच्या गती इत्यादी विचित्र स्वरूपाला अलंकृत करत असल्यामुळे 'अलंकार' या नावाने ओळखली जाते, आणि द्रव्याची गती इत्यादी अलंकृत होत असल्यामुळे त्यांना 'अलंकरणीय' म्हटले जाते. जाती, गुण आणि क्रिया यांच्या स्वभाववृत्ती देखील याचप्रमाणे समजाव्यात. 'लीलेने युक्त गती', 'तिच्यामुळे सुशोभित', 'दिशांमध्ये स्थिर दृष्टी आहे ज्याची तो', 'बोधी म्हणजेच प्रज्ञेने युक्त सत्त्व', 'तोच अंकुर', 'ऋषभाचा भाव' असे हे वाक्य आहे. ऋषभाच्या भावासारखी अकंपनीय (अचल) स्थिती म्हणजे 'आसभ' होय, आणि अकंप भावामुळे तिच्याशी समान असलेली वाणी उपचाराने 'आसभी' (निर्भय वाणी) म्हटली जाते. ၁၆၇. १६७. ဝုတ္တိ ဝတ္ထုသဘာဝဿ, ယာ’ညထာ သာ ပရာဘဝေ; တဿာ’နန္တဝိကပ္ပတ္တာ, ဟောတိ ဗီဇောပဒဿနံ. वस्तूच्या स्वभावाचे जे वर्णन असते, त्याहून जे वेगळे असते ते दुसऱ्या (वक्रवृत्ती) मध्ये असते. तिचे अनंत प्रकार असल्यामुळे, येथे केवळ बीजाचे (मूलभूत तत्त्वाचे) दर्शन घडवले आहे. ၁၆၇. ဒုတိယမာဟ [Pg.186] ‘‘ဝုတ္တိ’’စ္စာဒိနာ. ဝတ္ထုနော ဇာတျာဒိရူပဿ ပဒတ္ထဿ သဘာဝေါ ယဿံ အဝတ္ထာယံ ယာဒိသံ ရူပံ တဿ အညထာဘာဝေန တဿ ရူပဿ တထေတံ ဒဗ္ဗာပနေန ဝုတ္တိ ဝစနံ. ပရာ ဘဝေ အညာ ဝင်္ကဝုတ္တိ နာမ သိယာ. ကိံ သာ သာကလ္လေန ဝတ္တုံ သက္ကာတိ အာဟ ‘‘တဿာ’’ဣစ္စာဒိ. တဿာ ဝင်္ကဝုတ္တိယာ အနန္တဝိကပ္ပတ္တာ အပရိမိတဘေဒကတ္တာ ဗီဇဿ ကာရဏတ္တာ သကလဗျတ္တိဗျာပိသာမညရူပဿ ယတော ပရေ ဝိစိတ္တာလင်္ကာရာ ပသဝန္တိ, ဥပဒဿနံ ကထနံ ဟောတိ နိရဝသေသာဘိဓာနဿ ကေနာပျသက္ကုဏေယျတ္တာ. १६७. दुसऱ्या प्रकाराविषयी 'वृत्ती' इत्यादीद्वारे सांगतात. वस्तूच्या जाती इत्यादी रूपाच्या पदार्थाचा स्वभाव ज्या अवस्थेत ज्या रूपाचा असतो, त्याच्या अन्यथाभावाने (वेगळ्या रूपाने) त्या रूपाचे तेथे प्रतिपादन करणे म्हणजे वृत्ती किंवा वचन होय. 'दुसऱ्या प्रकारात' म्हणजे दुसरी 'वक्रवृत्ती' होय. ती संपूर्णपणे सांगणे शक्य आहे का? यावर 'तिचे' इत्यादी म्हणतात. त्या वक्रवृत्तीचे अनंत प्रकार असल्यामुळे, म्हणजेच अमर्याद भेद असल्यामुळे, आणि बीज हे कारण असल्यामुळे, ज्या सामान्य रूपापासून पुढे विविध अलंकार निर्माण होतात, त्याचे केवळ 'उपदर्शन' म्हणजेच कथन केले आहे; कारण तिचे पूर्णपणे वर्णन करणे कोणालाही शक्य नाही. ၁၆၇. ဣဒါနိ ဝင်္ကဝုတ္တိံ ဒဿေတိ ‘‘ဝုတ္တိ’’စ္စာဒိနာ. ဝတ္ထုသဘာဝဿ ဇာတျာဒိပဒတ္ထသမ္ဗန္ဓိနော တာသု တာသု အဝတ္ထာသု ယော သဘာဝေါ ဝိဇ္ဇတိ, တဿ သဘာဝဿ အညထာ ဝိဇ္ဇမာနာကာရံ ဟိတွာ ဝတ္တုပရိကပ္ပိတေန အတိသယဥပမာရူပကာဒိအညပကာရေန ယာ ဝုတ္တိ ယံ ကထနံ အတ္ထိ, သာ ပရာဘဝေ သဘာဝဝုတ္တိတော အညာ ဝင်္ကဝုတ္တိ နာမ သိယာ. တဿာ ဝင်္ကဝုတ္တိယာ အနန္တဝိကပ္ပတ္တာ အပ္ပမာဏပက္ခတ္တာ ကထနေန ပရိသမာပေတုံ အသက္ကုဏေယျတ္တာ နယတော တဿ အနန္တပက္ခဿ ပရိဂ္ဂဟဏတ္ထံ ဗီဇောပဒဿနံ ကာရဏမတ္တဿ နိဒဿနံ ဟောတိ. ဝက္ခမာနဘေဒတော ဧကမေကမ္ပိ အတ္တနာ သဒိသံ အနန္တဘေဒပရိဂ္ဂဟဇာနနတ္ထံ ပဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. ဝတ္ထူနံ သဘာဝေါတိ စ, အနန္တာ ဝိကပ္ပာ ယဿ သဘာဝဿေတိ စ, တဿ ဘာဝေါတိ စ, ဗီဇဿ ဥပဒဿနန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १६७. आता 'वृत्ती' इत्यादीद्वारे वक्रवृत्ती दर्शवितात. वस्तूच्या स्वभावाच्या, म्हणजेच जाती इत्यादी पदार्थांशी संबंधित वेगवेगळ्या अवस्थांमध्ये जो स्वभाव असतो, त्या स्वभावाचा प्रत्यक्ष विद्यमान आकार सोडून, वस्तूच्या कल्पनेने अतिशयोक्ती, उपमा, रूपक इत्यादी दुसऱ्या प्रकारे जे वर्णन (वृत्ती) केले जाते, ती दुसऱ्या प्रकारात म्हणजेच स्वभाववृत्तीपेक्षा भिन्न असलेली 'वक्रवृत्ती' होय. त्या वक्रवृत्तीचे अनंत प्रकार असल्यामुळे, म्हणजेच अमर्याद भेद असल्यामुळे, कथनाने ती पूर्ण करणे अशक्य असल्याने, त्या अनंत पक्षांचे ग्रहण करण्यासाठी 'बीजोपदर्शन' म्हणजेच केवळ कारणाचे दिग्दर्शन केले आहे. पुढे सांगण्यात येणाऱ्या भेदांपैकी प्रत्येक भेद देखील स्वतःसारख्या अनंत भेदांचे ग्रहण समजण्यासाठी पुरेसा आहे, असा याचा अभिप्राय आहे. 'वस्तूंचा स्वभाव', 'ज्या स्वभावाचे अनंत प्रकार आहेत तो', 'त्याचा भाव' आणि 'बीजाचे उपदर्शन' असा हा विग्रह आहे. ဝင်္ကဝုတ္တိအတ္ထာလင်္ကာရဥဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ वक्रवृत्ती अर्थालंकार उद्देश वर्णन ၁၆၈. १६८. တတ္ထာ’တိသယဥပမာ-ရူပကာဝုတ္တိဒီပကံ; အက္ခေပေါ’တ္ထန္တရနျာသော,ဗျတိရေကော ဝိဘာဝနာ. त्यामध्ये अतिशयोक्ती, उपमा, रूपक, आवृत्ती, दीपक, आक्षेप, अर्थान्तरन्यास, व्यतिरेक, विभावना, ၁၆၉. १६९. ဟေတုက္ကမော [Pg.187] ပိယတရံ, သမာသပရိကပ္ပနာ; သမာဟိတံ ပရိယာယ-ဝုတ္တိဗျာဇောပဝဏ္ဏနံ. हेतू, क्रम, प्रियतर, समासोक्ती (समास), परिकल्पना, समाहित, पर्यायोक्ती (पर्यायवृत्ती), व्याजोक्ती (व्याजवर्णन), ၁၇၀. १७०. ဝိသေသ ရုဠှာဟင်္ကာရာ,သိလေသော တုလျယောဂိတာ; နိဒဿနံ မဟန္တတ္တံ,ဝဉ္စနာ’ပ္ပကတတ္ထုတိ. विशेष, रूळ्हाहंकार, अहंकार, श्लेष, तुल्ययोगिता, निदर्शना, महत्ता (महंतत्व), वंचना, अप्रस्तुतप्रशंसा (अप्रकृतस्तुती), ၁၇၁. १७१. ဧကာဝလိ အညမညံ, သဟဝုတ္တိ ဝိရောဓိတာ; ပရိဝုတ္တိဗ္ဘမောဘာဝေါ, မိဿ’မာသီ ရသီ ဣတိ. एकावळी, अन्योन्य, सहवृत्ती, विरोध, परिवृत्ती, भ्रम, भाव, संसृष्टी (मिश्र), आशिष आणि रसी (रसवत्) हे आहेत. ၁၇၂. १७२. ဧတေ ဘေဒါ သမုဒ္ဒိဋ္ဌာ, ဘာဝေါ ဇီဝိတမုစ္စတေ; ဝင်္ကဝုတ္တီသု ပေါသေတိ, သိလေသော တု သိရိံ ပရံ. हे भेद सांगितले आहेत. 'भाव' हा काव्याचा प्राण (जीवित) म्हटला जातो. वक्रवृत्तींमध्ये श्लेष हा अत्यंत शोभा (सौंदर्य) वाढवतो. ၁၆၈-၁၇၂. ယထောဒ္ဒေသံ နိဒ္ဒိသိတုကာမော ဥဒ္ဒိသတိ ‘‘တတ္ထေ’’စ္စာဒိ. တတ္ထာတိ တဿံ ဝင်္ကဝုတ္တိယံ ‘‘ဧတေ ဘေဒါ သမုဒ္ဒိဋ္ဌာ’’တိ ဣမိနာ သမ္ဗန္ဓော. သမုဒ္ဒိဋ္ဌာတိ သင်္ခေပနယေန ဝုတ္တာ. အတိသယော ဥပမာ ရူပကံ အာဝုတ္တိ ဒီပကဉ္စ, သမာသော သမာသဝုတ္တိ ပရိကပ္ပနာ စ, ဝိသေသော ရုဠှာဟင်္ကာရော စ, ဇီဝိတမုစ္စတေတိ တဒဘာဝေ ဗန္ဓဿ ဆဝဿေဝ ဟေယျတ္တာ ဝုတ္တံ, သိလေသော တု ဝင်္ကဝုတ္တီသု သဘာဝဝုတ္တိံ ဟိတွာ ဝတ္ထုသဘာဝတော အညထာ ယထာ တထာ ပရိကပ္ပနရူပါသု အတိသယာဒီသု ဝုတ္တီသု ပရံ သိရိံ ကန္တိံ ပေါသေတိ တံ ပူရေတိ အာဝဟတီတိ. १६८-१७२. उद्देशानुसार (क्रमानुसार) निर्देश करण्याची इच्छा असणारे 'तेथे' इत्यादीद्वारे उद्देश करतात. 'तेथे' म्हणजे त्या वक्रवृत्तीमध्ये, याचा 'हे भेद सांगितले आहेत' याच्याशी संबंध आहे. 'सांगितले आहेत' म्हणजे संक्षेप रूपाने सांगितले आहेत. अतिशयोक्ती, उपमा, रूपक, आवृत्ती आणि दीपक; समास म्हणजेच समासोक्ती आणि परिकल्पना; विशेष, रूळ्हाहंकार आणि अहंकार; 'प्राण (जीवित) म्हटले जाते' कारण त्याच्या अभावी काव्यरचना ही प्रेतासारखी त्याज्य ठरते म्हणून असे म्हटले आहे. श्लेष हा वक्रवृत्तींमध्ये स्वभाववृत्ती सोडून वस्तूच्या स्वभावापेक्षा वेगळ्या प्रकारे जशी कल्पना केली जाते अशा अतिशयोक्ती इत्यादी वृत्तींमध्ये अत्यंत शोभा म्हणजेच कांती वाढवतो, ती पूर्ण करतो किंवा प्राप्त करून देतो. ၁၆၈-၁၇၂. ဘေဒဝန္တာနံ ပဒတ္ထာနံ သဘာဝကထနံ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန ပါကဋံ ဟောတီတိ ဝတ္တမာနေဟိ အလင်္ကာရေဟိ ဥဒ္ဒိသန္တော ‘‘တတ္ထာတိသယ…ပေ… ရသီ’’တိ ဂါထာစတုက္ကမာဟ. တတ္ထ တတ္ထာတိ တိဿံ ဝင်္ကဝုတ္တိယံ ဣတိ ဧဝံ ဧတေ ပဉ္စတိံသ ဘေဒါ သမုဒ္ဒိဋ္ဌာ သင်္ခေပေန ဝုတ္တာတိ. ဧတေသံ ပန ပဒါနံ အတ္ထော နိဒ္ဒေသေ အာဝိဘဝိဿတိ. ဣမိနာ ဘာဝေါ စ သိလေသော စ အတိပ္ပသတ္ထောတိ ဒီပေတိ. ဘာဝေါ ဘာဝါလင်္ကာရော ဇီဝိတံ ဗန္ဓဿ ပါဏဘူတောတိ ဝုစ္စတေ, [Pg.188] ဘာဝရဟိတဿ ဗန္ဓဿ ဆဝသရီရဿ ဝိယ အနုပါဒေယျတ္တာ, သိလေသော တု သိလေသာလင်္ကာရော ပန ဝင်္ကဝုတ္တီသု အတိသယောပမာဒိဝင်္ကဝုတ္တီသု ပရမုက္ကံသဘူတံ သိရိံ သောဘံ ပေါသေတိ ပူရေတိ. १६८-१७२. भेदयुक्त पदार्थांचे स्वभावकथन उद्देशक्रमाने स्पष्ट होते, हे सध्याच्या अलंकारांद्वारे दर्शविताना 'तत्रातिशय...पे... रसी' ही चार गाथांची मालिका (गाथाचतुष्क) सांगितली आहे. तेथे 'तत्र' म्हणजे त्या वक्रवृत्तीमध्ये, अशा प्रकारे हे पस्तीस भेद संक्षेपाने सांगितले आहेत. या पदांचा अर्थ निर्देशात (स्पष्टीकरणात) प्रकट होईल. याद्वारे 'भाव' आणि 'श्लेष' हे अत्यंत प्रशंसनीय आहेत हे दर्शविले आहे. 'भाव' म्हणजे भावालांकार हा काव्याचा (बंधाचा) प्राण किंवा जीवन मानला जातो, कारण भावरहित काव्य हे मृत शरीराप्रमाणे निरुपयोगी असते. तर 'श्लेष' म्हणजे श्लेषांकार हा वक्रवृत्तींमध्ये, विशेषतः अतिशयोक्ती आणि उपमा इत्यादी वक्रवृत्तींमध्ये परम उत्कर्षरूप शोभा किंवा सौंदर्य वाढवतो आणि पूर्ण करतो. နိဒ္ဒေသဝဏ္ဏနာ निर्देशवर्णन ၁၇၃. १७३. ပကာသိကာ ဝိသေသဿ,သိယာ’တိသယဝုတ္တိ ယာ; လောကာတိက္ကန္တဝိသယာ,လောကိယာတိ စ သာ ဒွိဓာ. जी वैशिष्ट्य प्रकट करणारी असते, ती 'अतिशयवृत्ती' (अतिशयोक्ती) होय. ती लोकातिक्रांतविषया (लोकोत्तर) आणि लौकिक अशी दोन प्रकारची असते. ၁၇၃. တတ္ထာတိသယဝုတ္တီနံ တာဝ နိဒ္ဒိသန္တော အာဟ ‘‘ပကာသိကာ’’ဣစ္စာဒိ. ဝိသေသဿ ဝတ္ထုဂတဿာတိမတ္တဿ ပကာသိကာယာတိ အနုဝဒိတွာ သာ အတိသယဝုတ္တိ သိယာတိ ဝိဓီယတေ, အတိသယဿ ဝတ္ထုနော ဥက္ကံသဿ ပဋိပါဒိကာ ဝုတ္တိ အတိသယဝုတ္တိ. သာ စ ဒုဝိဓာတိ အာဟ ‘‘လောက’’ဣစ္စာဒိ. လောကံ လောကပ္ပတီတိံ အတိက္ကန္တော ဝိသယော ဂေါစရော ယဿာ သာ လောကာတိက္ကန္တဝိသယာ စ လောကေ ဘဝါ လောကဌိတိမနတိက္ကန္တတ္တာတိ လောကိယာ စာတိ အတိသယဝုတ္တိ ဒွိဓာ ဒွိပ္ပကာရာ ဘဝတိ. १७३. त्यामध्ये प्रथम अतिशयवृत्तीचा निर्देश करताना 'प्रकाशिका' इत्यादी म्हटले आहे. वस्तूमध्ये असलेल्या अतिशय वैशिष्ट्याला प्रकट करणारी, असा अनुवाद करून ती 'अतिशयवृत्ती' असावी असा नियम केला आहे. अतिशय वस्तूच्या उत्कर्षाचे प्रतिपादन करणारी वृत्ती म्हणजे अतिशयवृत्ती होय. ती दोन प्रकारची आहे हे सांगताना 'लोक' इत्यादी म्हटले आहे. लोकप्रसिद्धीचे उल्लंघन करणारा जिचा विषय किंवा गोचर आहे ती 'लोकातिक्रांतविषया' (लोकोत्तर) आणि लोकात असणारी, लोकस्थितीचे उल्लंघन न करणारी ती 'लौकिक' होय. अशा प्रकारे अतिशयवृत्ती दोन प्रकारची असते. ၁၇၃. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန အတိသယဝုတ္တိံ ဒဿေတိ ‘‘ပကာသိ’’စ္စာဒိနာ. ဝိသေသဿ ဇာတျာဒိပဒတ္ထဂတအဓိကဝိသေသဿ ယာ ဝုတ္တိ ပကာသိကာ, သာ အတိသယဝုတ္တိ နာမ သိယာ, သာ အတိသယဝုတ္တိ လောကာတိက္ကန္တဝိသယာ စ ဇာတျာဒိပဒတ္ထာနံ ယထာသဘာဝသင်္ခတလောကဌိတျာတိက္ကန္တဝိသယတ္တာ လောကာတိက္ကန္တ ဝိသယာတိ စ လောကိယာတိ စ ယထာဝုတ္တလောကမနတိက္ကမ္မ ပဝတ္တနတော လောကိယာတိ စေဝံ ဒွိဓာ ဒွိပ္ပကာရာ ဟောန္တိ. ဝဒတီတိ ဝုတ္တိ, အတိသယဿ ဝုတ္တီတိ စ, လောကံ အတိက္ကန္တော ဝိသယော ဧတိဿာတိ စ, လောကေ ဘဝါတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ‘‘ဝိသေသဿ ပကာသိကာ’’တိ ပသိဒ္ဓဂုဏာနုဝါဒေန [Pg.189] သာ အတိသယဝုတ္တိ သိယာတိ အပသိဒ္ဓံ အတိသယဝုတ္တိဝိဓာနံ ကရောတိ, ယထာ ‘‘ယော ကုဏ္ဍလီ, သော ဒေဝဒတ္တော’’တိ. အနုဝါဒကအနုဝါဒနီယဘေဒေါ ဥပရိပျေဝမေဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. १७३. आता उद्देशक्रमाने अतिशयवृत्ती दर्शविताना 'प्रकाशी' इत्यादी म्हटले आहे. जाती इत्यादी पदार्थांमधील अधिक वैशिष्ट्य प्रकट करणारी जी वृत्ती आहे, ती 'अतिशयवृत्ती' होय. ती अतिशयवृत्ती लोकातिक्रांतविषया (जाती इत्यादी पदार्थांच्या स्वाभाविक लोकस्थितीचे उल्लंघन करणारा विषय असल्यामुळे लोकातिक्रांतविषया) आणि लौकिक (पूर्वोक्त लोकाचे उल्लंघन न करता प्रवृत्त होणारी असल्यामुळे लौकिक) अशा दोन प्रकारची असते. 'जी बोलते (प्रतिपादन करते) ती वृत्ती', 'अतिशयाची वृत्ती', 'लोकाचे उल्लंघन करणारा जिचा विषय आहे ती' आणि 'लोकात असणारी' असा विग्रह आहे. 'वैशिष्ट्य प्रकट करणारी' या प्रसिद्ध गुणाच्या अनुवादाने ती 'अतिशयवृत्ती असावी' असे अप्रसिद्ध अतिशयवृत्तीचे विधान केले जाते, जसे की 'जो कुंडल परिधान केलेला आहे, तो देवदत्त आहे'. अनुवादक आणि अनुवाद्य यांमधील भेद पुढेही याच प्रकारे समजून घ्यावा. ၁၇၄. १७४. လောကိယာတိသယဿေ’တေ,ဘေဒါ ယေ ဇာတိအာဒယော; ပဋိပါဒီယတေ တွ’ဇ္ဇ,လောကာတိက္ကန္တဂေါစရာ. लौकिक अतिशयाचे हे जे जाती इत्यादी भेद आहेत; परंतु आज (आता) लोकातिक्रांतगोचर (लोकोत्तर) अतिशयवृत्तीचे प्रतिपादन केले जात आहे. ၁၇၄. အယံ ဒွိပ္ပကာရာ အတိသယဝုတ္တိ သဘာဝဝုတျာဒီဟိ ဘိန္နာတိ စေ? အာဟ ‘‘လောက’’ဣစ္စာဒိ. ဇာတိအာဒယော ယတော ပဒတ္ထဿ ဝိစိတ္တံ သရူပံ ဝဒတီတိ ဝိစိတ္တသရူပပဋိပါဒိကာ သဘာဝဝုတ္တိပိ အလင်္ကာရော, အလင်္ကာရိယံ တု ဝတ္ထုမတ္တံ, တတော သဘာဝဝုတျာဒယော ယေ ဘေဒါ ဝိသေသာ, ဧတေ လောကိယာတိသယဿ ဘေဒါ, ယထာ သရီရေ ယံ သဟဇံ သုန္ဒရတ္တံ, တဿ ပေါသကာပိ မုတ္တာဝလိပ္ပဘုတိ အလင်္ကာရောတိ ဝုစ္စတိ, ဧဝံ ဗန္ဓေပျလင်္ကာရိယဝတ္ထုနိမိတ္တံ ဓမ္မတ္တံ ယာယ ဥက္ကံသီယတိ, သာ ဥက္ကံသောတိ ဝုစ္စတိ. သာ စ ဝုတ္တိ အလင်္ကာရသဒ္ဒေန ဝုစ္စတေ. သာ ပန အတိသယဝုတ္တိယေဝ. တေနေဝါဟ ‘‘လောကိယာတိသယဿေတေ, ဘေဒါ ယေ ဇာတိအာဒယော’’တိ. ယတော ဧဝံ, တတော လောကာတိက္ကန္တဝိသယာ စ ဝိသုံ ဒဿနီယာတိ အာဟ ‘‘ပဋီ’’တိအာဒိ. တုသဒ္ဒေါ ဘေဒေ. အဇ္ဇ တု ဣဒါနိ ပန လောကာတိက္ကန္တဂေါစရာ ပဋိပါဒီယတေတိ သမ္ဗန္ဓော. १७४. ही दोन प्रकारची अतिशयवृत्ती स्वभाववृत्ती इत्यादींपेक्षा भिन्न आहे का? यावर 'लोक' इत्यादी म्हटले आहे. जाती इत्यादी पदार्थांचे विचित्र (विविध) स्वरूप सांगणारी स्वभाववृत्ती देखील अलंकार आहे, तर अलंकार्य (ज्याला अलंकृत करायचे आहे) ती केवळ वस्तू आहे. म्हणून स्वभाववृत्ती इत्यादी जे भेद (विशेष) आहेत, ते लौकिक अतिशयाचे भेद आहेत. ज्याप्रमाणे शरीराचे जे सहज सौंदर्य असते, त्याचे पोषण करणारी मुक्ताहार (मोत्यांची माळ) इत्यादी देखील अलंकार म्हटले जातात, त्याचप्रमाणे काव्यातही अलंकार्य वस्तूच्या निमित्ताने ज्या धर्माचा उत्कर्ष केला जातो, त्याला उत्कर्ष म्हटले जाते. ती वृत्ती 'अलंकार' या शब्दाने ओळखली जाते. ती तर अतिशयवृत्तीच आहे. म्हणूनच म्हटले आहे— 'लौकिक अतिशयाचे हे जे जाती इत्यादी भेद आहेत'. यामुळेच लोकातिक्रांतविषया अतिशयवृत्ती स्वतंत्रपणे दाखविली पाहिजे, म्हणून 'पटी' (प्रतिपाद्यते) इत्यादी म्हटले आहे. 'तु' हा शब्द भेदासाठी आहे. 'आज (आता) तर लोकातिक्रांतगोचर अतिशयवृत्तीचे प्रतिपादन केले जात आहे' असा संबंध आहे. ၁၇၄. ဣဒါနိ ဧသာ ဒွိပ္ပကာရာပိ အတိသယဝုတ္တိသဘာဝဝုတျာဒီဟိ အနညာတိ ဒဿေတုံ ‘‘လောကိယေ’’စ္စာဒိမာဟ. ဇာတိအာဒယော ဇာတိဂုဏာဒိပဒတ္ထဂတဝိစိတ္တသရူပဿ ပကာသနတော နိဿယဝေါဟာရေန ‘‘ဇာတျာဒယော’’တိ နိဒ္ဒိဋ္ဌာ ဇာတိသဘာဝဝုတ္တိဂုဏသဘာဝဝုတျာဒယော ယေ ဘေဒါ [Pg.190] ဝိသေသာ, ဧတေ လောကိယာတိသယဿ လောကိယာတိသယဝုတ္တိယာယေဝ ဘေဒါ အဝယဝါ. တတ္ထ လောကိယာတိသယဝုတ္တိ နာမ ဇာတိသဘာဝဝုတ္တိဂုဏသဘာဝဝုတျာဒယောယေဝါတိ. ဧသာယေဝ ဝိစိတြရူပပဋိပါဒိကာ ဥက္ကံသာတိ စ ဝုစ္စတိ. ဧဝံ လောကိယာတိသယဝုတ္တိယာ ‘‘လီလာဝိကန္တိသုဘဂေါ’’တိ ဥဒါဟရဏဿ ဂမျမာနတ္တာ ဝက္ခမာနံ ပဋိဇာနာတိ ‘‘ပဋိပါဒီယတေ’’စ္စာဒိနာ. အဇ္ဇ တု ဣဒါနိ ပန လောကာတိက္ကန္တဂေါစရာ အတိသယဝုတ္တိ ပဋိပါဒီယတေ ဥဒါဟရဏတော နိပ္ဖာဒီယတိ. လောကေ ဘဝေါတိ စ, တဿ အတိသယော အာဓိက္ကမိတိ စ ဝါကျံ. १७४. आता ही दोन्ही प्रकारची अतिशयवृत्ती स्वभाववृत्ती इत्यादींपेक्षा भिन्न नाही, हे दर्शविण्यासाठी 'लोकीय' इत्यादी म्हटले आहे. जाती, गुण इत्यादी पदार्थांच्या विचित्र स्वरूपाचे प्रकाशन करत असल्यामुळे आश्रय व्यवहाराने 'जाती इत्यादी' असे निर्दिष्ट केलेले जाती-स्वभाववृत्ती, गुण-स्वभाववृत्ती इत्यादी जे भेद आहेत, ते लौकिक अतिशयाचे म्हणजेच लौकिक अतिशयवृत्तीचेच भेद (अवयव) आहेत. तेथे लौकिक अतिशयवृत्ती म्हणजे जाती-स्वभाववृत्ती, गुण-स्वभाववृत्ती इत्यादीच होत. हिलाच विचित्र रूपाचे प्रतिपादन करणारी 'उत्कर्ष' असेही म्हटले जाते. अशा प्रकारे लौकिक अतिशयवृत्तीचे 'लीलाविकान्तिसुभगो' हे उदाहरण समजले जात असल्यामुळे, पुढे सांगण्यात येणाऱ्या गोष्टीची प्रतिज्ञा 'प्रतिपाद्यते' इत्यादींद्वारे केली आहे. 'आज (आता) तर लोकातिक्रांतगोचर अतिशयवृत्तीचे प्रतिपादन केले जात आहे' म्हणजे उदाहरणाद्वारे सिद्ध केले जात आहे. 'लोकात असणारा' आणि 'त्याचा अतिशय म्हणजे आधिक्य' असे हे वाक्य आहे. ၁၇၅. १७५. ပိဝန္တိ ဒေဟကန္တီ ယေ,နေတ္တဉ္ဇလိပုဋေန တေ; နာ’လံ ဟန္တုံ ဇိနေ’သံ တွံ,တဏှံ တဏှာဟရောပိ ကိံ. हे जिन! जे लोक आपल्या नेत्ररूपी अंजलीपुटाने (डोळ्यांच्या द्रोणाने) आपल्या देहाची कांती (सौंदर्य) पितात, त्यांची तृष्णा (तहान किंवा लोभ) दूर करण्यास आपण तृष्णा नष्ट करणारे असूनही का समर्थ नाही? ၁၇၅. တမုဒါဟရတိ ‘‘ပိဝန္တိ’’စ္စာဒိနာ. ဇိန တေ ဒေဟကန္တီ သရီရသောဘာယော ယေ ဇနာ နေတ္တဉ္ဇလိပုဋေန အတ္တနော နယနဒွန္ဒသင်္ခါတေန အဉ္ဇလိပုဋေန ပိဝန္တိ, ဧသံ ဇနာနံ တဏှံ ပိပါသံ လောဘမေဝ ဝါ ဟရတိ အနုပတတိ. တဏှာဟရောပိ သမာနော တွံ ဟန္တုံ နိဝတ္တိတုံ ကိံ နာလံ ကသ္မာ အသမတ္ထောသိ. တဏှာဟရာ နာမ တဏှမေဝ နုဒန္တိ. အတြ ဟနန္တာမပိဟ သမ္ပနုဒတိ လောကဌိတိံ အတိက္ကမ္မ ဒေဟကန္တိယာ ဗဟုတ္တနဓမ္မော ဝုတ္တော. १७५. तेच उदाहरणाने स्पष्ट करताना 'पिबन्ति' इत्यादी म्हटले आहे. हे जिन! आपल्या देहाची कांती म्हणजे शरीराची शोभा जे लोक नेत्ररूपी अंजलीपुटाने—म्हणजे आपल्या दोन्ही डोळ्यांच्या अंजलीपुटाने पितात, त्या लोकांची तृष्णा म्हणजे तहान किंवा लोभ आपण दूर करता. तृष्णा नष्ट करणारे असूनही आपण ती नष्ट करण्यास (निवृत्त करण्यास) का समर्थ नाही, म्हणजेच असमर्थ का आहात? तृष्णा नष्ट करणारे हे तृष्णेचेच निवारण करतात. येथे तृष्णा नष्ट करणाऱ्याचेही निवारण केले जात असल्यामुळे, लोकस्थितीचे उल्लंघन करून देहकांतीच्या विपुलतेचा धर्म सांगितला आहे. ၁၇၅. ဣဒါနိ ပဋိညာတာနုသာရေန ပဋိပါဒေတိ ‘‘ပိဝန္တိ’’စ္စာဒိနာ. ဘော ဇိန တေ တုယှံ ဒေဟကန္တီ သရီရသောဘာယော ယေ ဇနာ နေတ္တဉ္ဇလိပုဋေန နေတ္တသင်္ခါတေန ဟတ္ထပုဋေန ပိဝန္တိ, ဧသံ သာဓုဇနာနံ တဏှံ ပိပါသံ လောဘမေဝ [Pg.191] ဝါ တဏှာဟရောပိ တွံ သဗ္ဗေသံ တဏှာဝိနာသကောပိ ဟန္တုံ နိဝါရေတုံ ကိံ နာလံ ကသ္မာ အသမတ္ထောသီတိ. ဧတ္ထ ပိဝနံ နာမ ပိပါသံ ဝိနေတီတိ လောကသဘာဝေါ. တဏှံ ဟန္တုံ နာလမိတိ လောကသဘာဝမတိက္ကန္တတ္ထော. ကန္တီနံ အဓိကပိယတာ အတိသယဓမ္မော, တဿ ဝုတ္တိ ပန တဏှံ ဟန္တုံ နာလမိတိ လောကာတိက္ကန္တအတ္ထံ ဝိသယံ ကတွာ ပဝတ္တော ဟောတိ. သာ ပန ကထေတုမိစ္ဆိတံ ကန္တီနံ အဓိကပိယတံ တဏှာဟနနေ အသမတ္ထံ ဝတွာ ဒီပေတီတိ ဝင်္ကဝုတ္တိ နာမ. ဝုစ္စမာနာနံ ဥပမာရူပကာဒီနမ္ပိ ဝင်္ကဝုတ္တိတာ ဣစ္ဆိတတ္ထဿ ပကာရန္တရေန ပကာသနတောယေဝ. ယထာ နာမ သရီရသဟဇံ ပီနတ္တာဒိသုန္ဒရတ္တံ ဥဒ္ဒီပနာကာရေန ဌိတာ ကဋကဥဏှီသဟာရာဒယော အလင်္ကာရာ နာမ ဘဝန္တိ, ဧဝံ ဗန္ဓသရီရသင်္ခါတေ အလင်္ကရဏီယဝတ္ထုမှိ ဝိဇ္ဇမာနအတိပိယတာဒိမေဝ ဥဒ္ဒီပေတွာ အလင်္ကုရုမာနာ ‘‘တဏှာဟရောသိ တွံ ဧသံ ကန္တီ ပိဝန္တာနံ တဏှံ ဟန္တုံ နာလ’’မိတိ ဝါစာဘင်္ဂီ အလင်္ကာရော နာမ. အလင်္ကာရိယံ နာမ အလင်္ကာတဗ္ဗကန္တိပိယတာယ ဗဟုတ္တန္တိ. ဥတ္တရိပိ အလင်္ကာရအလင်္ကာရိယဝိဘာဂေါ စ အနုရူပတော ယောဇနက္ကမော စ ဧဝမေဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဒေဟေ ကန္တီတိ စ, အဉ္ဇလီယေဝ ပုဋောတိ စ, နေတ္တာနိယေဝ အဉ္ဇလိပုဋောတိ စ, တဏှံ ဟရတီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. १७५. आता प्रतिज्ञेनुसार (वचनानुसार) 'पिबन्ति' (पितात) इत्यादींद्वारे प्रतिपादन करतात. हे जिन! आपल्या देहकांतीला, शरीराच्या शोभेला जे लोक नेत्ररूप अंजलीपुटाने (डोळ्यांच्या ओंजळीने) पितात, त्या साधुजनांची तृष्णा (तहान) किंवा लोभ नष्ट करण्यास, सर्व तृष्णेचा विनाश करणारे असूनही आपण का समर्थ नाही? आपण का असमर्थ आहात? येथे 'पिणे' म्हणजे तहान शमवणे हा लोकस्वभाव (लौकिक नियम) आहे. 'तृष्णा नष्ट करण्यास असमर्थ असणे' हा लोकस्वभावाचे उल्लंघन करणारा (लोकोत्तर) अर्थ आहे. कांतीची (तेजाची) अतिशय प्रियता हा अतिशय धर्म आहे, आणि त्याची प्रवृत्ती 'तृष्णा नष्ट करण्यास असमर्थ असणे' या लोकोत्तर अर्थाला विषय करून प्रवृत्त होते. ती (प्रवृत्ती) सांगू इच्छिलेल्या कांतीच्या अतिशय प्रियतेला तृष्णा नष्ट करण्यास असमर्थ असे सांगून प्रकाशित करते, म्हणून तिला 'वक्रवृत्ती' (वक्रोक्ती) म्हणतात. सांगितले जाणारे उपमा, रूपक इत्यादींची वक्रवृत्ती सुद्धा इच्छित अर्थाला दुसऱ्या प्रकारे प्रकाशित करण्यामुळेच असते. ज्याप्रमाणे शरीराचे सहज पुष्टता इत्यादी सौंदर्य उद्दीपित करणाऱ्या रूपात असलेले कडे (वलय), मुकुट, हार इत्यादी अलंकार असतात, त्याचप्रमाणे काव्यबंधरूप शरीरामध्ये अलंकार देण्यायोग्य असलेल्या विषयातील अत्यंत प्रियतेलाच उद्दीपित करून सुशोभित करणारी 'आपण तृष्णा हरण करणारे आहात, तरीही या कांतीचे पान करणाऱ्यांची तृष्णा नष्ट करण्यास समर्थ नाही' अशी ही वचनरचना (वाचाभंगी) 'अलंकार' होय. 'अलंकार्य' म्हणजे अलंकार देण्यायोग्य अशा कांतीच्या प्रियतेचे बाहुल्य (अतिशयता) होय. पुढेही अलंकार आणि अलंकार्य यांचा विभाग आणि योग्य योजनेचा क्रम याचप्रमाणे समजला पाहिजे. 'देहे कांती' (देहातील कांती), 'अंजलीच पुट' (अंजलीपुट), 'नेत्रच अंजलीपुट' (नेत्रांजलीपुट) आणि 'तृष्णा हरण करतो तो' (तृष्णाहर) असा विग्रह आहे. ၁၇၆. १७६. ဥပမာနောပမေယျာနံ, သဓမ္မတ္တံ သိယော’ပမာ; သဒ္ဒတ္ထဂမ္မာ ဝါကျတ္ထ-ဝိသယာတိ စ သာ တိဓာ. उपमान आणि उपमेय यांच्यातील समान धर्म असणे (समानता असणे) ही 'उपमा' होय. ती (उपमा) शब्दगम्या, अर्थगम्या आणि वाक्यार्थविषया अशी तीन प्रकारची (त्रिधा) असते. ၁၇၆. ဥပမံ နိဒ္ဒိသတိ ‘‘ဥပမာနေ’’စ္စာဒိနာ. ဥပမီယတေ အနေနာတိ ဥပမာနံ, ပဒုမာဒိကဝတ္ထု. ပဒုမာဒိကော တု သဒ္ဒေါ ဥပမာနဝါစကော. ဥပမီယတီတိ ဥပမေယျံ, မုခါဒိကဝတ္ထု. မုခါဒိကော သဒ္ဒေါ တု ဥပမေယျဝါစကော. တေသံ ဥပမာနောပမေယျာနံ ပဒုမာဒိမုခါဒိဝတ္ထူနဉ္စ. သဓမ္မတ္တန္တိ သမာနော ဓမ္မော ကန္တိမန္တတာ ယဿ သော သဓမ္မော, တဿ ဘာဝေါ သဓမ္မသဒ္ဒဿ ပဝတ္တိနိမိတ္တသမာနေန ဓမ္မေန သဟ သမ္ဗန္ဓော သဓမ္မတ္တံ [Pg.192] ဥပမာနောပမေယျပတိဋ္ဌိတံ ဥပမာ သိယာ, ဥပမီယတိ ယထာဝုတ္တော သမ္ဗန္ဓောတိ ကတွာ. သာ ပနာလင်္ကာရိယဿ ဓမ္မဿာတိသယပဋိပါဒနပ္ပကာရော. ကတိဝိဓာ သာတိ အာဟ ‘‘သဒ္ဒ’’ဣစ္စာဒိ. သဒ္ဒေါ စ အတ္ထော စ, တေဟိ ဂမ္မာ ပတီယမာနာ သဒ္ဒတ္ထဂမ္မာ. ဝါကျံ ပဒသမုဒါယော. တဿ အတ္ထော ဝိသယော ဂေါစရော ယဿာ ဝါကျတ္ထဝိသယာတိ စ သာ ဥပမာ တိဝိဓာ သဒ္ဒဂမ္မအတ္ထဂမ္မဝါကျတ္ထဝိသယာတိ တိဓာ ဟောတိ. १७६. 'उपमान' इत्यादींद्वारे उपमेचे निर्देश (लक्षण) करतात. ज्याच्याद्वारे तुलना केली जाते ते 'उपमान' होय, जसे की कमळ इत्यादी वस्तू. कमळ इत्यादी शब्द तर उपमानवाचक आहेत. ज्याची तुलना केली जाते ते 'उपमेय' होय, जसे की मुख इत्यादी वस्तू. मुख इत्यादी शब्द तर उपमेयवाचक आहेत. त्या उपमान आणि उपमेय असलेल्या कमळ आणि मुख इत्यादी वस्तूंचा. 'सधर्मत्व' म्हणजे ज्याचा समान धर्म (जसे की कांतीमान असणे) आहे तो सधर्म, त्याचा भाव (अस्तित्व) म्हणजे सधर्म शब्दाच्या प्रवृत्तीनिमित्तभूत समान धर्माशी असलेला संबंध म्हणजे सधर्मत्व होय. उपमान आणि उपमेय यांच्यावर अधिष्ठित असलेला हा संबंध म्हणजेच 'उपमा' होय, कारण येथे पूर्वोक्त संबंधाची तुलना केली जाते. ती (उपमा) अलंकार्य धर्माच्या अतिशयतेचे प्रतिपादन करण्याचा एक प्रकार आहे. ती किती प्रकारची आहे? हे सांगताना 'सद्द' (शब्द) इत्यादी म्हणतात. शब्द आणि अर्थ, यांच्याद्वारे जाणली जाणारी (प्रतीत होणारी) ती 'शब्दार्थगम्या' (शब्दगम्या आणि अर्थगम्या) होय. वाक्य म्हणजे पदांचा समूह. त्याचा अर्थ हा जिचा विषय किंवा गोचर (क्षेत्र) आहे ती 'वाक्यार्थविषया' होय. अशा प्रकारे ती उपमा शब्दगम्या, अर्थगम्या आणि वाक्यार्थविषया अशी तीन प्रकारची (त्रिधा) असते. ၁၇၆. ဣဒါနိ ဥပမာလင်္ကာရံ နိဒ္ဒိသတိ ‘‘ဥပမာနော’’စ္စာဒိနာ. ဥပမာနောပမေယျာနံ စန္ဒနီလုပ္ပလဒလာဘာဒီနံ အာနနနယနာဒီနဉ္စ ပဒတ္ထာနံ သဓမ္မတ္တံ ကန္တိမန္တတာပီနတာဒိတုလျဓမ္မသမ္ဗန္ဓော ဥပမာ နာမ သိယာ, သာ အလင်္ကရဏီယဝတ္ထုနော အာဓိက္ကပဋိပါဒနပ္ပကာရာ ဥပမာ သဒ္ဒတ္ထဂမ္မာ သဒ္ဒဂမ္မာ စ အတ္ထဂမ္မာ စ ဝါကျတ္ထဝိသယာ စ, ဣတိ ဧဝံ တိဓာ တိပ္ပကာရာ ဟောတိ. ဧတ္ထ ဥပမာနောပမေယျဘူတာနံ စန္ဒာနနာဒိပဒတ္ထာနံ သဓမ္မသင်္ခတော အညမညတုလျကန္တိမန္တတာပီနတာဒိဓမ္မယောဂေါ ပဒတ္ထာနံ ဥပမတ္ထဿ ပတိဋ္ဌိတတ္တာ ဥပဋ္ဌာနတာယ ဥပမာ နာမ ဟောတိ, တန္နိဿယစန္ဒာဒယော ပန နိဿိတဝေါဟာရေန ဥပမာ နာမ ဟောတိ, ဥပမာနဘူတစန္ဒာဒိအတ္ထပဋိပါဒကော စန္ဒိမာဒိသဒ္ဒေါပိ တဒတ္ထေန ဥပမာ နာမ ဟောတိ, ဥပမေယျုပမေယျနိဿယတပ္ပဋိပါဒကာနမ္ပိ ဥပမေယျဘာဝေါ ဧဝမေဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဥပမီယတေ အနေနာတိ ဥပမာနန္တိ ကတွာ စန္ဒာဒိ ဥပမာနံ ဝုစ္စတိ, ဥပမီယတီတိ ဥပမေယျံ, အာနနာဒိ, ဥပမာနဉ္စ ဥပမေယျဉ္စာတိ စ, သမာနော စ သော ဓမ္မော စေတိ စ, တဿ ဘာဝေါတိ စ, သဒ္ဒေါ စ အတ္ထော စာတိ စ, တေဟိ ဂမ္မာတိ စ, ဝါကျဿ အတ္ထောတိ စ, သော ဝိသယော ယဿာ ဥပမာယာတိ စ ဝါကျံ. १७६. आता 'उपमान' इत्यादींद्वारे उपमालंकाराचे निर्देश करतात. चंद्र, नीलकमलाचे दल (पाकळी) इत्यादी उपमान आणि मुख, नेत्र इत्यादी उपमेय असलेल्या पदार्थांचे सधर्मत्व म्हणजे कांतीमानता, पुष्टता इत्यादी समान धर्मांचा संबंध म्हणजेच 'उपमा' होय. ती अलंकार देण्यायोग्य वस्तूच्या अतिशयतेचे प्रतिपादन करणारी उपमा शब्दार्थगम्या (शब्दगम्या आणि अर्थगम्या) आणि वाक्यार्थविषया अशा तीन प्रकारची असते. येथे उपमान आणि उपमेयरूप असलेल्या चंद्र, मुख इत्यादी पदार्थांचा सधर्मसंज्ञक असा परस्परांशी असलेला समान कांतीमानता, पुष्टता इत्यादी धर्मांचा संबंध, पदार्थांमध्ये उपमेचा अर्थ प्रतिष्ठित असल्यामुळे आणि तो प्रकट होत असल्यामुळे 'उपमा' या नावाने ओळखला जातो. परंतु त्यावर आश्रित असलेले चंद्र इत्यादी (पदार्थ) आश्रित व्यवहाराने 'उपमा' (उपमान) म्हटले जातात. उपमानभूत चंद्र इत्यादी अर्थांचे प्रतिपादन करणारा 'चंद्र' इत्यादी शब्द देखील त्या अर्थामुळे 'उपमा' (उपमानवाचक) म्हटला जातो. उपमेय, उपमेयाचा आश्रय आणि त्याचे प्रतिपादन करणारे शब्द यांच्या बाबतीतही उपमेयभाव याचप्रमाणे समजला पाहिजे. 'ज्याच्याद्वारे तुलना केली जाते ते उपमान' या व्युत्पत्तीनुसार चंद्र इत्यादींना उपमान म्हटले जाते; 'ज्याची तुलना केली जाते ते उपमेय' या व्युत्पत्तीनुसार मुख इत्यादींना उपमेय म्हटले जाते. 'उपमान आणि उपमेय', 'समान असलेला धर्म', 'त्याचा भाव' (सधर्मत्व), 'शब्द आणि अर्थ', 'त्यांच्याद्वारे जाणली जाणारी' (शब्दार्थगम्या), 'वाक्याचा अर्थ' आणि 'तो जिचा विषय आहे ती' (वाक्यार्थविषया) असा वाक्याचा विग्रह आहे. ၁၇၇. १७७. သမာသပစ္စယေဝါဒီ, သဒ္ဒါ တေသံ ဝသာ တိဓာ; သဒ္ဒဂမ္မာ သမာသေန, မုနိန္ဒော စန္ဒိမာနနော. समास, प्रत्यय आणि 'इव' (सारखा) इत्यादी शब्द; त्यांच्या प्रभावाने (शब्दांच्या आधारे) ती (शब्दगम्या उपमा) तीन प्रकारची होते. समासाद्वारे होणारी शब्दगम्या उपमा, जसे की 'मुनिन्दो चन्दिमाननो' (चंद्रमुख मुनींद्र). ၁၇၇. တတ္ထ [Pg.193] သဒ္ဒဂမ္မာပိ တိဓာ သိယာတိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘သမာသ’’ဣစ္စာဒိ. သမာသော စ ပစ္စယော စ ဣဝါဒိ စ, တေ သဒ္ဒါ နာမ, သဒ္ဒသဒ္ဒေန သမာသာဒယော ဝတ္တုမဓိပ္ပေတာတိ အတ္ထော. တေသံ သမာသာဒီနံ ဝသာ သဒ္ဒဂမ္မာ တိဓာ ဟောတိ သမာသသဒ္ဒဂမ္မာ ပစ္စယသဒ္ဒဂမ္မာ ဣဝါဒိသဒ္ဒဂမ္မာတိ, သမာသေန သမာသသဒ္ဒေန ဂမ္မာ ဥပမာ ဝုစ္စတီတိ သေသော. ဥဒါဟရတိ ‘‘မုနိန္ဒော စန္ဒိမာနနော’’တိ, စန္ဒိမာ ဝိယ ရုစိရမာနနံ မုခံ ယဿ သော စန္ဒိမာနနော. ဧတ္ထ စ စန္ဒိမံ ဥပမာနံ, အာနနံ ဥပမေယျံ, ရုစိရတ္တံ ဓမ္မော, စန္ဒိမာနနာနံ သမာနဓမ္မသမ္ဗန္ဓိဇောတကော ဝိယသဒ္ဒေါ, တေသု သာဓာရဏဓမ္မဝါစကဿ ဝိယသဒ္ဒဿ စောပမာဇောတကဿာပ္ပယောဂေါ သမာသေနေဝ ဝုတ္တတ္တာ, ဧတ္ထ ပန ဝိယသဒ္ဒေါ စန္ဒိမာသဒ္ဒေန ဥပမာနဝါစကေန သမ္ဗန္ဓမုပဂတော စန္ဒဂတမေဝ သဒိသတ္တံ ဝဒတိ, မုခဂတံ ပန သာမတ္ထိယာ ပဒီယတေ, ဧဝမီဒိသံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. १७७. त्यामध्ये शब्दगम्या उपमा देखील three प्रकारची असू शकते, हे दर्शवण्यासाठी 'समास' इत्यादी म्हणतात. समास, प्रत्यय आणि 'इव' इत्यादी; त्यांना 'शब्द' म्हटले आहे. 'शब्द' या शब्दाने समास इत्यादी अभिप्रेत आहेत, असा अर्थ आहे. त्या समास इत्यादींच्या प्रभावाने शब्दगम्या उपमा तीन प्रकारची होते: समास-शब्दगम्या, प्रत्यय-शब्दगम्या आणि इवादि-शब्दगम्या. समासाद्वारे म्हणजे समासयुक्त शब्दाने जाणली जाणारी उपमा सांगितली जात आहे, हा उर्वरित अर्थ आहे. उदाहरण देतात: 'मुनिन्दो चन्दिमाननो' (चंद्रमुख मुनींद्र) - चंद्राप्रमाणे सुंदर मुख आहे ज्यांचे, ते 'चन्दिमाननो' (चंद्रमुख). आणि येथे चंद्र हे उपमान आहे, मुख हे उपमेय आहे, सौंदर्य (रुचिरत्व) हा धर्म आहे, आणि 'इव' (सारखा) हा शब्द चंद्र आणि मुख यांच्यातील समान धर्माच्या संबंधाचा द्योतक आहे. त्यांच्यामध्ये साधारण धर्मवाचक शब्दाचा आणि उपमाद्योतक 'इव' शब्दाचा प्रयोग न करणे हे समासाद्वारेच व्यक्त झाले असल्यामुळे आहे. येथे 'इव' हा शब्द उपमानवाचक 'चंद्र' शब्दाशी संबंधित होऊन चंद्राच्या ठिकाणी असलेले सादृश्य सांगतो, तर मुखाच्या ठिकाणी असलेले सादृश्य सामर्थ्याने (अर्थापत्तीने) प्रकट होते. अशा प्रकारे हे समजून घेतले पाहिजे. ၁၇၇. တေသု ယထာဝုတ္တေသု သဒ္ဒဂမ္မဿ တိဝိဓတ္တံ ဒဿေတုံ အာဟ ‘‘သမာသေ’’စ္စာဒိ. သမာသပစ္စယေဝါဒီ သမာသော, အာယာဒိပစ္စယာ, ဣဝါဒယော စ သဒ္ဒါ နာမ, တေသံ သမာသာဒီနံ ဝသာ ဘေဒေန သဒ္ဒဂမ္မာ တိဓာ သမာသသဒ္ဒဂမ္မာ ပစ္စယသဒ္ဒဂမ္မာ ဣဝါဒိသဒ္ဒဂမ္မာတိ တိဝိဓာ ဟောတိ. သမာသေန သမာသသဒ္ဒေန ဂမ္မောပမာ ဝုစ္စတိ ‘‘မုနိန္ဒော စန္ဒိမာနနော’’တိ. မုနိန္ဒော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ စန္ဒိမာနနော စန္ဒသမာနမနောဟရမုခမဏ္ဍလေန ယုတ္တော ဟောတိ, သမာသော စ ပစ္စယော စ ဣဝဣတိ ဣဒံ အာဒိ ယေသံ ဝါဒီနန္တိ စ, သဒ္ဒေန ဂမ္မာတိ စ, မုနီနံ ဣန္ဒောတိ စ, စန္ဒိမာ ဝိယ ရုစိရံ အာနနံ မုခံ ယဿေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဧတ္ထ ‘‘စန္ဒိမာ’’တိ ဥပမာနံ, ‘‘အာနန’’န္တိ ဥပမေယျံ, ရုစိရတ္တံ ဥပမာနောပမေယျာနံ သာဓာရဏဓမ္မော, ‘‘ဝိယာ’’တိ သဒ္ဒေါ စန္ဒာနနာနံ ဒွိန္နံ အာနနဂတရုစိရတ္တံ စန္ဒေ စ, စန္ဒဂတရုစိရတ္တံ အာနနေ စ အတ္ထီတိ သမာနဓမ္မသမ္ဗန္ဓံ [Pg.194] ဇောတေတိ, ဣဟ သာဓာရဏဓမ္မဝါစကဿ ရုစိရသဒ္ဒဿ, တုလျဓမ္မသင်္ခါတောပမာဇောတကဿ ဝိယသဒ္ဒဿ စ အပ္ပယောဂေါ တေသံ အတ္ထာနံ သမာသေန ဝုတ္တတ္တာ. ဧတ္ထ ဥပမာနဝါစကေန စန္ဒိမာသဒ္ဒေန ယုတ္တော ဝိယ သဒ္ဒေါ စန္ဒဂတသဒိသတ္တံ ဇောတေတိ, မုခဂတသဒိသတ္တံ ပန သာမတ္ထိယာ ပတီယတေ. တထာ ဟိ မုခံ စန္ဒသမာနမာဂစ္ဆန္တံ စန္ဒဿ မုခသဒိသတ္တံ ဝိနာ န ဘဝတီတိ အညထာနုပပတ္တိ သာမတ္ထိယန္တိ. १७७. त्या पूर्वोक्त (शब्दांपैकी) 'सद्दगम्म' (शब्दाने गम्य असणाऱ्या उपमेचे) चे त्रिविधत्व (तीन प्रकार) दर्शवण्यासाठी "समासे..." इत्यादी म्हटले आहे. समास, प्रत्यय आणि 'इव' इत्यादी शब्द; त्या समास इत्यादींच्या भेदाने 'सद्दगम्मा' (शब्दाने गम्य असणारी उपमा) तीन प्रकारची होते: 'समाससद्दगम्मा' (समास-शब्दगम्य), 'पच्चयसद्दगम्मा' (प्रत्यय-शब्दगम्य) आणि 'इवादिसद्दगम्मा' (इवादि-शब्दगम्य). समासाने किंवा समासशब्दाने गम्य असणाऱ्या उपमेला "मुनिन्दो चन्दिमाननो" (मुनींद्र चंद्रमुख आहेत) असे म्हटले जाते. 'मुनिन्दो' म्हणजे सम्यक्संबुद्ध. 'चन्दिमाननो' म्हणजे चंद्रासारख्या मनोहर मुखमंडलाने युक्त असलेले. 'समास, प्रत्यय आणि इव हे ज्यांचे आदि (सुरुवात) आहे ते' असा, आणि 'शब्दाने गम्य' असा, 'मुनींचा इंद्र (मुनिंद)' असा, आणि 'चंद्राप्रमाणे सुंदर मुख (आनन) आहे ज्याचे' असा विग्रह आहे. येथे "चन्दिमा" (चंद्र) हे उपमान आहे, "आननं" (मुख) हे उपमेय आहे, 'रुचिरत्व' (सौंदर्य) हा उपमान आणि उपमेयाचा साधारण धर्म आहे. "विय" (प्रमाणे) हा शब्द चंद्र आणि मुख या दोन्हीमधील, मुखातील सौंदर्य चंद्रात आहे आणि चंद्रातील सौंदर्य मुखात आहे, असा समान धर्माचा संबंध प्रकट करतो. येथे साधारण धर्म दर्शवणाऱ्या 'रुचिर' शब्दाचा आणि तुल्यधर्म दर्शवणाऱ्या उपमावाचक 'विय' शब्दाचा प्रयोग केलेला नाही, कारण त्यांचे अर्थ समासानेच व्यक्त झाले आहेत. येथे उपमानवाचक 'चन्दिमा' शब्दाशी जोडलेला 'विय' (सारखा) शब्द चंद्रातील सादृश्यता प्रकट करतो, तर मुखातील सादृश्यता सामर्थ्याने (अर्थापत्तीने) समजून येते. कारण, मुख चंद्रासमान होणे हे चंद्राच्या मुखसदृशतेशिवाय शक्य नाही, हीच सामर्थ्याची (अर्थापत्तीची) अनुपपत्ती आहे. ၁၇၈. १७८. အာယာဒီ ပစ္စယာ တေဟိ, ဝဒနံ ပင်္ကဇာယတေ; မုနိန္ဒနယနဒွန္ဒံ, နီလုပ္ပလဒလီယတိ. 'आय' इत्यादी प्रत्ययांनी, मुख कमळासारखे आचरण करते (कमळासारखे दिसते); मुनींद्रांचे नेत्रयुगळ नीलकमळाच्या पाकळीसारखे आचरण करते (नीलकमळाच्या पाकळीसारखे दिसते). ၁၇၈. ဣဒါနိ ပစ္စယသဒ္ဒဂမ္မံ ဒဿေတိ ‘‘အာယာဒိ’’စ္စာဒိနာ. အာယာဒီတိ အာယဤယကပစ္စယာဒယော ပစ္စယာ ပစ္စယသဒ္ဒါ နာမ, တေဟိ ပစ္စယသဒ္ဒေဟိ ဂမ္မာ ဥပမာ ဝုစ္စတိ. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဝဒန’’မိစ္စာဒိ. ပင်္ကဇမိဝ ရုစိရမာစရတိ ပင်္ကဇာယတေ. ဧတ္ထာပိ ပင်္ကဇမုပမာနံ, အာစရဏကြိယာယ ကတ္တုဘူတံ အာနနမုပမေယျံ, ရုစိရတ္တံ သဓမ္မော, ပင်္ကဇာနနာနံ သမာနဓမ္မသမ္ဗန္ဓဇောတကော ဣဝသဒ္ဒေါ. တတ္ထ ရုစိရ ဣဝသဒ္ဒါနံ ပုဗ္ဗေ ဝိယာပ္ပယောဂေါ ပစ္စယေန ဝုတ္တတ္တာတိ သဗ္ဗတ္ထ ဝိညေယျံ. ဧဝမုပရိပိ. १७८. आता "आयादि..." इत्यादींद्वारे प्रत्यय-शब्दगम्य उपमा दर्शवितात. 'आयादि' म्हणजे 'आय', 'ईय', 'क' इत्यादी प्रत्यय हे प्रत्यय-शब्द होत. त्या प्रत्यय-शब्दांनी गम्य असणाऱ्या उपमेला प्रत्यय-शब्दगम्य उपमा म्हणतात. "वदनं..." इत्यादी उदाहरण देतात. कमळाप्रमाणे सुंदर आचरण करते ते 'पंकजाते' (कमळासारखे भासते). येथेही 'पंकज' (कमळ) हे उपमान आहे, आचरण क्रियेचा कर्ता असलेले 'आनन्' (मुख) हे उपमेय आहे, 'रुचिरत्व' (सौंदर्य) हा समान धर्म आहे, आणि 'इव' शब्द हा पंकज व मुख यांच्यातील समान धर्माचा संबंध दर्शवणारा आहे. तेथे 'रुचिर' आणि 'इव' या शब्दांचा पूर्वीप्रमाणेच अप्रयोग (वापर न करणे) आहे, कारण तो अर्थ प्रत्ययानेच सांगितले गेले आहे, असे सर्वत्र समजावे. पुढेही असेच आहे. ၁၇၈. ဣဒါနိ ပစ္စယသဒ္ဒဂမ္မောပမံ နိဒဿေတိ ‘‘အာယာဒိ’’စ္စာဒိနာ. အာယာဒီ ‘‘အာယ ဤယ က’’ဣတိအာဒယော ပစ္စယာ ပစ္စယသဒ္ဒါ နာမ, တေဟိ ပစ္စယသဒ္ဒေဟိ ဂမ္မောပမာ ဝုစ္စတိ ‘‘ဝဒနံ…ပေ… ဒလီယတီ’’တိ. ဝဒနံ မုခံ ပင်္ကဇာယတေ ပဒုမမိဝ ရုစိရံ အာစရတိ. မုနိန္ဒနယနဒွန္ဒံ သဗ္ဗညုနော နေတ္တယုဂဠံ နီလုပ္ပလဒလီယတိ နီလုပ္ပလပတ္တမိဝ ရုစိရမာစရတိ. အာယော အာဒိ ယေသံ ဤယာဒီနန္တိ စ, ပင်္ကဇမိဝ ရုစိရမာစရတိ ပဝတ္တတီတိ စ, မုနိန္ဒဿ နယနဒွန္ဒမိတိ စ, နီလုပ္ပလဿ ဒလမိတိ စ, တမိဝ ရုစိရမာစရတီတိ စ ဝါကျံ. ဧတ္ထ ‘‘ပင်္ကဇ’’မိတိ စ ‘‘နီလုပ္ပလ’’မိတိ စ ဥပမာနံ, အာစရဏကြိယာယ ကတ္တုဘူတံ ဝဒနံ [Pg.195] နယနဒွန္ဒဉ္စ ဥပမေယျံ, ရုစိရတ္တံ ဥပမာနောပမေယျာနံ သဓမ္မော, ဥပမာနောပမေယျာနံ သမာနဓမ္မဇောတကော ဣဝသဒ္ဒေါ, တေသံ အတ္ထာနံ ပစ္စယေန ဝုတ္တတ္တာ တေသမပ္ပယောဂေါ. ဧဝရူပေသု အညေသုပိ ဧဝမေဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. १७८. आता "आयादि..." इत्यादींद्वारे प्रत्यय-शब्दगम्य उपमेचे स्पष्टीकरण करतात. 'आयादि' म्हणजे 'आय', 'ईय', 'क' इत्यादी प्रत्यय हे प्रत्यय-शब्द होत. त्या प्रत्यय-शब्दांनी गम्य असणाऱ्या उपमेला "वदनं...पे... दलीयति" असे म्हणतात. 'वदनं' म्हणजे मुख, 'पंकजाते' म्हणजे कमळाप्रमाणे सुंदर आचरण करते. मुनींद्रांचे नेत्रयुगळ म्हणजे सर्वज्ञांचे नेत्रयुगळ, 'नीलुप्पलदलीयति' म्हणजे नीलकमळाच्या पाकळीप्रमाणे सुंदर आचरण करते. 'आय' हा ज्यांचा आदि आहे अशा 'ईय' इत्यादींचा, 'कमळाप्रमाणे सुंदर आचरण करते किंवा प्रवर्तते', 'मुनींद्रांचे नेत्रयुगळ', 'नीलकमळाचे दल (पाकळी)', 'त्याच्याप्रमाणे सुंदर आचरण करते' असा वाक्याचा विग्रह आहे. येथे 'पंकज' आणि 'नीलोत्पल' हे उपमान आहेत; आचरण क्रियेचा कर्ता असलेले 'वदन' (मुख) आणि 'नयनद्वंद्व' (नेत्रयुगळ) हे उपमेय आहेत; 'रुचिरत्व' हा उपमान आणि उपमेयाचा समान धर्म आहे; 'इव' हा उपमान आणि उपमेयाचा समान धर्म दर्शवणारा शब्द आहे; आणि त्यांचा अर्थ प्रत्ययानेच सांगितला गेल्यामुळे त्यांचा प्रयोग केलेला नाही. अशा प्रकारच्या इतर उदाहरणांमध्येही याचप्रमाणे समजून घ्यावे. ၁၇၉. १७९. ဣဝါဒီ ဣဝ ဝါ တုလျ-သမာန နိဘ သန္နိဘာ; ယထာသင်္ကာသ တုလိတ-ပ္ပကာသ ပတိရူပကာ. इव, वा, तुल्य, समान, निभ, संनिभ, यथा, संकाश, तुलित, प्रकाश, प्रतिरूपक; ၁၈၀. १८०. သရီသရိက္ခ သံဝါဒီ, ဝိရောဓီ သဒိသာ ဝိယ; ပဋိပက္ခပစ္စနီက-သပက္ခော’ပမိတော’ပမာ. सरी, सरिक्ख, संवादी, विरोधी, सदिस, विय, प्रतिपक्ष, प्रत्यनीक, सपक्ष, उपमित, उपमा; ၁၈၁. १८१. ပဋိဗိမ္ဗ ပဋိစ္ဆန္န-သရူပ သမ သမ္မိတာ; သဝဏ္ဏာ’ဘာ ပဋိနိဓိ, သဓမ္မာဒိ သလက္ခဏာ. प्रतिबिंब, प्रतिच्छन्न, सरूप, सम, संमित, सवर्ण, आभा, प्रतिनिधि, सधर्मा, सलक्षणा; ၁၈၂. १८२. ဇယတျ’က္ကောသတိ ဟသတိ, ပတိဂဇ္ဇတိ ဒူဘတိ; ဥသူယတျ’ဝဇာနာတိ, နိန္ဒတိ’ဿတိ ရုန္ဓတိ. जयति (जिंकतो), अक्कोसति (आक्रोश करतो/निंदा करतो), हसति (हसतो), पतिगज्जति (प्रतिगर्जना करतो), दूभति (द्रोह करतो), उसूयति (असूया करतो), अवजानाति (अवमान करतो), निन्दति (निंदा करतो), इस्सति (ईर्ष्या करतो), रुन्धति (अडवतो); ၁၈၃. १८३. တဿ စောရေတိ သောဘဂ္ဂံ, တဿ ကန္တိံ ဝိလုမ္ပတိ; တေန သဒ္ဓိံ ဝိဝဒတိ, တုလျံ တေနာဓိရောဟတိ. त्याचे सौभाग्य चोरतो, त्याची कांती लुटतो, त्याच्याशी विवाद करतो, त्याच्याशी समानतेवर चढतो (त्याच्या बरोबरीचा होतो); ၁၈၄. १८४. ကစ္ဆံဝိဂါဟတေ တဿ, တမနွေတျ’နုဗန္ဓတိ; တံသီလံ, တံ နိသေဓေတိ, တဿ စာနုကရောတိ’မေ. त्याच्या कक्षेत प्रवेश करतो, त्याचे अनुकरण करतो, त्याच्या मागे जातो, त्याचे शील (स्वभाव) धारण करतो, त्याला निषेध करतो (त्याच्यापेक्षा श्रेष्ठ ठरतो), आणि त्याचे अनुकरण करतो; हे (सर्व शब्द उपमावाचक आहेत). ၁၇၉-၁၈၄. ဣဝါဒီ ဣဝါဒယော နာမ ဣမေတိ သမ္ဗန္ဓော. ဣဝေါ စ ဝါ စ တုလျော စ သမာနော စ နိဘော စ သန္နိဘော စာတိ ဒွန္ဒေ ဣဝ…ပေ… သန္နိဘာ. သဒ္ဒမပေက္ခိယ ပုလ္လိင်္ဂတာ. ဧဝမုပရိပိ ယထာယောဂံ. ‘‘သဓမ္မာဒီ’’တိ အာဒိသဒ္ဒေန သာဓာရဏသစ္ဆာယာဒီနံ ပရိဂ္ဂဟော. ဇယတိစ္စာဒီသု ကမ္မံ. १७९-१८४. 'इवादि' म्हणजे 'इव' इत्यादी; 'इमे' (हे) याच्याशी याचा संबंध आहे. 'इव', 'वा', 'तुल्य', 'समान', 'निभ' आणि 'संनिभ' यांचा द्वंद्व समास होऊन 'इव...पे... संनिभा' असा शब्द बनतो. शब्दाच्या अपेक्षेने पुल्लिंगी रूप आहे. पुढेही योग्यतेनुसार असेच समजावे. "सधर्मा..." यातील 'आदि' शब्दाने 'साधारण', 'सच्छाया' इत्यादींचा स्वीकार होतो. 'जयति' इत्यादींमध्ये कर्म अभिप्रेत आहे. ၁၇၉- ၁၈၄. ဣဝါဒိသဒ္ဒဂမ္မောပမာဓိကာရေ ပဌမံ တာဝ ‘‘ဣဝါဒယော နာမ ဧတေ’’တိ ဒဿေတိ ‘‘ဣဝါဒိ’’စ္စာဒိနာ. ဣဝါဒီတိ ပဒဿ ဆဋ္ဌမဂါထာယ ဣမေတိ ဣမိနာ သမ္ဗန္ဓော, တဿ စာတိ စသဒ္ဒံ ယုဇ္ဇနဋ္ဌာနေ ယောဇေတွာ သန္နိဘာ စာတိအာဒယော ယောဇေတဗ္ဗာ. ‘‘သဓမ္မာဒီ’’တိအာဒိသဒ္ဒေန သာဓာရဏသစ္ဆာယာဒယော ဂဟိတာ. နိန္ဒတိ ဣဿတီတိ ပဒစ္ဆေဒေါ, ဣမေ [Pg.196] ဒွေပညာသ ဣဝါဒယော နာမ. ‘‘ဇယတိ အက္ကောသတိ ဟသတိ’’ဣစ္စာဒိကံ တံတံကြိယာပဒသင်္ခတအနုကာရိယာနံ အနုကရဏန္တိ ကတွာ ဒွန္ဒောယေဝ, ‘‘သန္ဓိသမာသာ အဒ္ဓဿာ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ သန္ဓိသမာသာနံ ဂါထဒ္ဓဿ ဝိနာ ဥဘယဒ္ဓမဇ္ဈေ အလဗ္ဘနတော ဒူဘတိပဒတော ပုဗ္ဗေယေဝ သမာသော ကာတဗ္ဗော, နော စေ, အသမာသောတိ ဂဟေတဗ္ဗော. တဿ စောရေတိ သောဘဂ္ဂမိစ္စာဒိကမ္ပိ ဝါကျာနုကရဏန္တိ ကတွာ တတ္ထ သမာသော, ဝါကျေ ကေဝလပဒါနီတိ ဝါ ဂဟေတဗ္ဗော. ဣမေသံ သဗ္ဗေသမ္ပိ ဣဝ သဒ္ဒပရိယာယတ္တာ သဒိသတ္ထာတိ သဗ္ဗတ္ထ ဘာဝတ္ထော, အဝယဝတ္ထော ပန ပါကဋောယေဝ. १७९- १८४. 'इवादि-शब्दगम्य उपमा' या अधिकारात सर्वप्रथम "हे इव इत्यादी शब्द आहेत" हे दर्शवण्यासाठी "इवादि..." इत्यादी म्हटले आहे. 'इवादि' या पदाचा सहाव्या गाथेतील 'इमे' या शब्दाशी संबंध आहे. 'तस्स च' मधील 'च' शब्द योग्य ठिकाणी जोडून 'संनिभा च' इत्यादी जोडले पाहिजेत. "सधर्मा..." यातील 'आदि' शब्दाने 'साधारण', 'सच्छाया' इत्यादी शब्द घेतले आहेत. 'निन्दति इस्सति' असा पदच्छेद आहे. हे बावन्न (५२) 'इवादि' शब्द आहेत. "जयति अक्कोसति हसति" इत्यादी त्या-त्या क्रियापदांच्या अनुकरणाने बनलेला द्वंद्व समास आहे. "संधी आणि समास अर्ध्या गाथेचे..." असे म्हटल्यामुळे, संधी आणि समासांचा गाथेच्या अर्ध्या भागाशिवाय दोन्ही अर्ध्या भागांच्या मध्ये लाभ होत नसल्याने, 'दूभति' पदाच्या आधीच समास केला पाहिजे; तसे नसेल तर तो असमस्त (समास नसलेला) मानला पाहिजे. "तस्स चोरेति सोभग्गं" इत्यादी देखील वाक्याचे अनुकरण असल्यामुळे तेथे समास आहे, किंवा वाक्यात केवळ स्वतंत्र पदे आहेत असे मानले पाहिजे. या सर्वांचाच 'इव' शब्दाचे पर्यायवाची असल्यामुळे 'सादृश्य' हाच अर्थ सर्वत्र भावार्थ आहे, तर अवयवार्थ (प्रत्येक शब्दाचा स्वतंत्र अर्थ) स्पष्टच आहे. ၁၈၅. १८५. ဥပမာနောပမေယျာနံ, သဓမ္မတ္တံ ဝိဘာဝိဟိ; ဣမေဟိ ဥပမာဘေဒါ, ကေစိ နိယျန္တိ သမ္ပတိ. उपमान आणि उपमेयाचा समान धर्म स्पष्ट करून; आता या शब्दांद्वारे उपमेचे काही भेद सांगितले जात आहेत. ၁၈၅. ဣဝါဒီနံ ဝိနိယောဂဝိသယံ ဒဿေတွာ ဥပမာဘေဒံ ဒဿေတုံ ပဋိဇာနာတိ ‘‘ဥပမာန’’ဣစ္စာဒိ. ကေစီတိ ဣမိနာ အပရိယန္တတ္တမေသံ ဒဿေတိ. တထာ စ ဝက္ခတိ ‘‘ပရိယန္တော ဝိကပ္ပာန’’န္တိအာဒိ. နိယျန္တိ ဥဒါဟရီယန္တိ. १८५. 'इव' इत्यादींच्या विनियोगाचा (वापराचा) विषय दर्शवून, उपमेचे भेद दर्शवण्यासाठी "उपमान..." इत्यादी प्रतिज्ञा करतात. 'केचि' (काही) या शब्दाने त्यांची अमर्यादितता (अनंतत्व) दर्शविली आहे. आणि तसेच पुढे "परियन्तो विकप्पानां..." (विकल्पांचा अंत नाही) इत्यादी सांगतील. 'निय्यन्ति' म्हणजे उदाहरणांद्वारे स्पष्ट केले जातात. ၁၈၅. ဣဒါနိ ဣဝါဒိသဒ္ဒဂမ္မောပမံ ဒဿေတုံ ပဋိဇာနာတိ ‘‘ဥပမာနော’’စ္စာဒိနာ. ဥပမာနောပမေယျာနံ သဓမ္မတ္တံ သမာနဓမ္မသမ္ဗန္ဓော. ဝိဘာဝိဟိ ပကာသကေဟိ. ဣမေဟိ ဣဝါဒီဟိ သဒ္ဒေဟိ ဇာနိတဗ္ဗာ ကေစိ ဥပမာဘေဒါ အပရိယန္တတ္တာ သမ္ပတိ ဒါနိ လဒ္ဓါဝသရေ နိယျန္တိ ဥဒါဟရဏမတ္တေန ပဋိပါဒီယန္တိ. १८५. आता 'इव' इत्यादी शब्दांद्वारे समजली जाणारी उपमा दर्शवण्यासाठी 'उपमानो' इत्यादींद्वारे प्रतिज्ञा केली जाते. उपमान आणि उपमेय यांचे 'सधर्मत्व' म्हणजे समान धर्माचा संबंध होय. 'विभाविहि' म्हणजे स्पष्ट करणाऱ्या शब्दांद्वारे. या 'इव' इत्यादी शब्दांद्वारे जाणले जाणारे काही उपमाभेद, जे अमर्याद आहेत, ते आता योग्य संधी मिळाल्यामुळे केवळ उदाहरणांच्या माध्यमातून मांडले जात आहेत. ၁၈၆. १८६. ဝိကာသိပဒုမံ’ဝါ’တိ-သုန္ဒရံ သုဂတာနနံ; ဣတိ ဓမ္မောပမာ နာမ, တုလျဓမ္မနိဒဿနာ. उमललेल्या कमळाप्रमाणे सुगतांचे (बुद्धांचे) मुख सुंदर आहे; याला 'धर्मोपमा' असे म्हणतात, कारण यात समान धर्माचे (गुणाचे) दर्शन घडवले जाते. ၁၈၆. ‘‘ဝိကာသိ’’စ္စာဒိ. သုဂတာနနံ မုနိန္ဒဿ ဝဒနံ အတိသုန္ဒရံ အစ္စန္တရမဏီယံ. ကိမိဝ? ဝိကာသိပဒုမံဝ ပဗုဇ္ဈမာနပဒုမံဝိယ. ဣတိ အယမေဝံဝိဓာ ဓမ္မောပမာ နာမ ဟောတိ. ကသ္မာ? [Pg.197] အာနနပဒုမာနံ သမာနဿ ဓမ္မဿ ဂုဏဿ သုန္ဒရဿ လက္ခဏဿ နိဒဿနာ သုန္ဒရတ္တန္တိ ပဋိပါဒနတော. १८६. 'विकार्सि' इत्यादी. 'सुगतानन' म्हणजे मुनींद्रांचे (बुद्धांचे) मुख अत्यंत सुंदर, अत्यंत रमणीय आहे. कशासारखे? उमललेल्या कमळाप्रमाणे. अशा प्रकारे ही अशा प्रकारची 'धर्मोपमा' होते. का? कारण मुख आणि कमळ यांच्यातील समान धर्म, गुण किंवा सुंदर लक्षणाचे दर्शन 'सुंदरता' या शब्दाने प्रतिपादित केले गेल्यामुळे. ၁၈၆. ဥဒါဟရဏမာဟ ‘‘ဝိကာသိ’’စ္စာဒိနာ. သုဂတာနနံ ဘဂဝတော မုခံ ဝိကာသိပဒုမံဝ ဗုဇ္ဈမာနပင်္ကဇမိဝ အတိသုန္ဒရံ ဟောတိ. ဣတိ ဤဒိသာ ဥပမာ တုလျဓမ္မနိဒဿနာ အတိသုန္ဒရမိတိ သမာနဂုဏဒဿနေန ဓမ္မောပမာ နာမ ဟောတိ. ပဒုမာနနာနံ သာဓာရဏဂုဏဿ ပကာသနတော အတိသုန္ဒရမိတိ တုလျဓမ္မော နာမ ဟောတိ. ဧတ္ထ ပဒုမဂတတုလျဓမ္မသမ္ဗန္ဓသင်္ခါတာယ ဥပမာယ ဣဝသဒ္ဒေန ဇောတိယမာနတ္တေပိ အတိသုန္ဒရန္တိ ဝုတ္တတ္တာ ယထာဝုတ္တောပမာယ ဓမ္မေန ယုတ္တတ္တာ ဓမ္မောပမာ နာမ ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. १८६. 'विकार्सि' इत्यादी गाथेने उदाहरण दिले आहे. 'सुगतानन' म्हणजे भगवंतांचे मुख उमललेल्या कमळाप्रमाणे अत्यंत सुंदर आहे. अशा प्रकारे, अशी उपमा समान धर्माचे दर्शन घडवणारी असल्याने, 'अत्यंत सुंदर' या समान गुणाच्या दर्शनामुळे 'धर्मोपमा' ठरते. कमळ आणि मुख यांच्यातील साधारण गुणाचे प्रकटीकरण केल्यामुळे 'अत्यंत सुंदर' हा 'तुल्यधर्म' (समान धर्म) ठरतो. येथे कमळामध्ये असलेल्या समान धर्माच्या संबंधात्मक उपमेला 'इव' शब्दाने प्रकाशित केले गेले असले, तरी 'अत्यंत सुंदर' असे म्हटल्यामुळे, पूर्वोक्त उपमा धर्माने युक्त असल्याने तिला 'धर्मोपमा' म्हटले जाते, असा अभिप्राय आहे. ၁၈၇. १८७. ဓမ္မဟီနာ မုခ’မ္ဘောဇ-သဒိသံ မုနိနော ဣတိ; ဝိပရီတောပမာ တုလျ-မာနနေန’မ္ဗုဇံ တဝ. 'मुनींचे मुख कमळासारखे आहे' ही धर्महीन उपमा (धर्महीना) आहे; 'हे मुनी, तुमच्या मुखाशी कमळ समान आहे' ही विपरीत उपमा (विपरीतोपमा) आहे. ၁၈၇. ‘‘ဓမ္မ’’ဣစ္စာဒိ. မုနိနော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ မုခံ အမ္ဘောဇေန ပဒုမေန သဒိသံ သမာနံ. ဣတိ အယံ ဓမ္မဟီနောပမာ နာမ သုန္ဒရသင်္ခါတဿ ဂုဏဿ အနိဒ္ဒိဋ္ဌတ္တာ, သာ တု အတ္ထဝသာ ဂမျတေ. ကထမညထာ ယုဇ္ဇတီတိ? ဧတ္ထ ပန သဒိသသဒ္ဒေါ ဥပမေယျဿ မုခဿ ဝိသေသနန္တိ မုခဂတမေဝ သဒိသတ္တံ ဝဒတိ, အမ္ဘောဇဂတံ တု သာမတ္ထိယာ ဂမျတေ. ဧဝမီဒိသံ ဉေယျံ. ‘‘ဝိပရီတေ’’စ္စာဒိ. မုနီတိ ဂမျတေ သုတတ္တာ, ဘော မုနိ တဝ အာနနေန မုခေန အမ္ဗုဇံ တုလျန္တိ အယံ ဝိပရီတောပမာ. ဓမ္မဟီနတ္တေပိ ပသိဒ္ဓိဝိပရိယယေနာဘိဟိတတ္တာ တန္နာမေနေဝ ဝုတ္တာ. ဧဝမုပရိပိ. १८७. 'धम्म' इत्यादी. मुनींचे म्हणजे सम्यक्संबुद्धांचे मुख अंभोजाशी (कमळाशी) सदृश म्हणजे समान आहे. अशा प्रकारे ही 'धर्महीनोपमा' आहे, कारण यात 'सुंदर' नावाच्या गुणाचा स्पष्ट उल्लेख केलेला नाही, परंतु तो अर्थाच्या सामर्थ्याने समजला जातो. अन्यथा ते कसे जुळणार? येथे 'सदृश' हा शब्द उपमेय असलेल्या मुखाचे विशेषण असल्याने तो मुखातील सादृश्य सांगतो, तर कमळातील सादृश्य सामर्थ्याने समजले जाते. अशा प्रकारे हे जाणावे. 'विपरीते' इत्यादी. ऐकल्यामुळे 'मुनी' असा अर्थ समजतो; 'हे मुनी, तुमच्या आननाने (मुखाने) कमळ समान आहे' ही 'विपरीत उपमा' आहे. धर्महीन असूनही, लोकप्रसिद्धीच्या विपर्यासाने सांगितल्यामुळे तिला त्याच नावाने म्हटले आहे. पुढेही असेच जाणावे. ၁၈၇. ‘‘ဓမ္မဟီနေ’’စ္စာဒိ. ‘‘မုခမ္ဘောဇသဒိသံ မုနိနော’’တျယံ ဥပမာ. ဓမ္မဟီနာ တုလျဓမ္မပကာသကသုန္ဒရာဒိသဒ္ဒဟီနတ္တာ ဓမ္မဟီနာ နာမ. ဝါစကာဘာဝေ တုလျဓမ္မော ကထံ ပတီယတီတိ စေ? မုနိနော မုခံ ဝဒနံ အမ္ဘောဇသဒိသံ ပဒုမသဒိသမိတိ. ဧတ္ထ မုခဿ အမ္ဘောဇသမာနတ္တံ မုခမ္ဘောဇာနံ သာဓာရဏဓမ္မေ အသတိ [Pg.198] ကထံ ဘဝတီတိ? အညထာနုပပတ္တိလက္ခဏသာမတ္ထိယာတိ, ဣဝပရိယာယော သဒိသသဒ္ဒေါ မုခဿ ဝိသေသနံ ယသ္မာ ဟောတိ, တသ္မာ မုခဂတသဒိသတ္တံ ဝဒတိ, အမ္ဘောဇဂတသဒိသတ္တံ ပန သာမတ္ထိယာ ဧဝ ဝိညာယတေ. ဟေ မုနိ တဝ တုယှံ အာနနေန အမ္ဘောဇံ တုလျံ သမာနန္တိ အယံ ဝိပရီတောပမာ. ‘‘အမ္ဗုဇေန အာနနံ တုလျ’’န္တိ လောကပ္ပသိဒ္ဓိယာ ဝိပရိယယေန ‘‘အာနနေန အမ္ဗုဇံ တုလျ’’န္တိ ဝုတ္တတ္တာ ဓမ္မဟီနတ္တေ သတိပိ ဝိပရီတောပမာ နာမ ဟောတိ. ‘‘သုတာနုမိတေသု သုတသမ္ဗန္ဓော ဗလဝါ’’တိ ဝုတ္တတ္တာ ဧတ္ထ ‘‘မုနီ’’တိ အဝိဇ္ဇမာနေပိ ပုဗ္ဗဒ္ဓေ ‘‘မုနိနော’’တိ သုတတ္တာ လဗ္ဘမာနော ‘‘တဝါ’’တိ တုမှသဒ္ဒသန္နိဓာနေန အာမန္တနတ္ထော ဝိညာယတိ. ဧတ္ထ ဣဝပရိယာယော တုလျသဒ္ဒေါ အမ္ဗုဇဝိသေသနဘူတော အမ္ဗုဇဂတသဒိသတ္တံ ဝဒတိ, အာနနဂတသဒိသတ္တဉ္စ အမ္ဗုဇာနနာနံ သာဓာရဏဓမ္မော စ သာမတ္ထိယာ ဉာယတိစ္စာဒိကံ ဝုတ္တနယေန ဉာတဗ္ဗံ. ဥပရိပိ ပါကဋဋ္ဌာနံ ယထာရဟံ ယောဇေတဗ္ဗံ. १८७. 'धम्महीने' इत्यादी. 'मुनींचे मुख कमळासारखे आहे' ही उपमा होय. समान धर्म प्रकाशित करणाऱ्या 'सुंदर' इत्यादी शब्दांचा अभाव असल्यामुळे हिला 'धर्महीना' म्हणतात. वाचक शब्दाचा अभाव असताना समान धर्म कसा समजणार, असे विचारल्यास: मुनींचे मुख अंभोजसदृश (कमळासारखे) आहे. येथे मुख आणि कमळ यांच्यात साधारण धर्म नसताना मुखाचे कमळाशी साम्य कसे असू शकते? 'अन्यथानुपपत्ति' (दुसऱ्या प्रकारे सिद्ध न होणे) या लक्षणाच्या सामर्थ्यामुळे; 'इव' चा पर्यायी असलेला 'सदृश' शब्द मुखाचे विशेषण असल्यामुळे तो मुखातील सादृश्य सांगतो, तर कमळातील सादृश्य सामर्थ्यानेच समजले जाते. 'हे मुनी, तुमच्या मुखाशी कमळ समान आहे' ही 'विपरीत उपमा' आहे. 'कमळाशी मुख समान आहे' या लोकप्रसिद्धीच्या उलट 'मुखाशी कमळ समान आहे' असे म्हटल्यामुळे, धर्महीनता असली तरीही ही 'विपरीत उपमा' ठरते. 'ऐकलेल्या आणि अनुमान केलेल्या गोष्टींमध्ये ऐकलेला संबंध बालवान असतो' या नियमानुसार, येथे 'मुनी' हा शब्द थेट नसला तरी पूर्वार्धात 'मुनिनो' असे ऐकले गेल्यामुळे, 'तव' (तुमच्या) या शब्दाच्या सान्निध्याने संबोधनाचा अर्थ समजतो. येथे 'इव' चा पर्यायी असलेला 'तुल्य' शब्द कमळाचे विशेषण बनून कमळातील सादृश्य सांगतो, आणि मुखातील सादृश्य तसेच कमळ व मुख यांतील साधारण धर्म सामर्थ्याने समजला जातो, हे पूर्वोक्त पद्धतीने जाणावे. पुढेही स्पष्ट असलेल्या ठिकाणी योग्यतेनुसार योजना करावी. ၁၈၈. १८८. တဝါနန’မိဝ’မ္ဘောဇံ, အမ္ဘောဇ’မိဝ တေ မုခံ; အညမညောပမာ သာ’ယံ, အညမညောပမာနတော. तुमच्या मुखासारखे कमळ आहे, आणि कमळासारखे तुमचे मुख आहे; परस्पर उपमान बनविल्यामुळे ही 'परस्परोपमा' (अन्योन्योपमा) आहे. ၁၈၈. ‘‘တဝ’’ဣစ္စာဒိ. အညမညောပမာနတောတိ အညမညဿ မုခဿ အမ္ဘောဇဿ စ အညမညေန တံဒွယေန ဥပမာနတော. १८८. 'तव' इत्यादी. 'परस्पर उपमान बनविल्यामुळे' म्हणजे मुख आणि कमळ या दोन्हींचे परस्परांशी उपमान म्हणून वर्णन केल्यामुळे. ၁၈၈. ‘‘တဝါနနိ’’စ္စာဒိ. ‘‘အမ္ဘောဇံ တဝါနနမိဝ, တေ မုခံ အမ္ဘောဇမိဝါ’’တိ အယမုပမာ. အညမညောပမာနတော အညမညဿ ဥပမာနတ္တာ အညမညောပမာ နာမ ဟောတိ. အညမညဿ ဥပမာတိ စ, အညမညဿ ဥပမာနန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဝိဂ္ဂဟဒွယေပိ ပုဗ္ဗဝိဘတ္တိလောပေါ. သဗ္ဗာဒီနံ ဗျတိဟာရလက္ခဏေန ဥတ္တရဝိဘတ္တိလောပေါ. သမာသလက္ခဏေန အညတ္ထဿ အပေက္ခာသိဒ္ဓတ္တာ [Pg.199] မုခါပေက္ခာယ အညံ အမ္ဘောဇဉ္စ, အမ္ဘောဇာပေက္ခာယ အညံ မုခဉ္စ ကမေန ဥပမေယျာ နာမ. အမ္ဘောဇာပေက္ခာယ အညံ မုခဉ္စ, မုခါပေက္ခာယ အညံ အမ္ဘောဇဉ္စ ဥပမာနံ နာမ. १८८. 'तवानन' इत्यादी. 'कमळ तुमच्या मुखासारखे आहे, आणि तुमचे मुख कमळासारखे आहे' ही उपमा होय. परस्परांचे उपमान बनविल्यामुळे हिला 'परस्परोपमा' (अन्योन्योपमा) म्हणतात. 'परस्परांची उपमा' आणि 'परस्परांचे उपमान' असा याचा विग्रह होतो. दोन्ही विग्रहांमध्ये पूर्व विभक्तीचा लोप होतो. 'सर्वादि' शब्दांच्या व्यतिहार लक्षणामुळे उत्तर विभक्तीचा लोप होतो. समास लक्षणामुळे अन्य अर्थाची अपेक्षा सिद्ध होत असल्याने, मुखाच्या अपेक्षेने दुसरे कमळ, आणि कमळाच्या अपेक्षेने दुसरे मुख हे क्रमाने 'उपमेय' ठरतात. कमळाच्या अपेक्षेने दुसरे मुख, आणि मुखाच्या अपेक्षेने दुसरे कमळ हे 'उपमान' ठरतात. ၁၈၉. १८९. ယဒိ ကိဉ္စိ ဘဝေ’မ္ဘောဇံ,လောစနဗ္ဘမုဝိဗ္ဘမံ; ဓာရေတုံ မုခသောဘံ တံ,တဝေ’တိ အဗ္ဘုတောပမာ. जर डोळे आणि भुवयांच्या विलासाने युक्त असे एखादे कमळ अस्तित्वात असेल, तरच ते तुमच्या मुखाची शोभा धारण करू शकेल; ही 'अद्भुत उपमा' (अद्भुतोपमा) आहे. ၁၈၉. ‘‘ယဒိ’’စ္စာဒိ. လောစနာနိ စ ဘမုယော စ, တာသံ ဝိဗ္ဘမော ယသ္မိံ, တံ, တာဒိသမမ္ဘောဇံ ကိဉ္စိ ကိမပိ ယဒိ ဘဝေ. တမီဒိသမမ္ဘောဇံ တဝ မုခသောဘံ ဝဒနကန္တိံ ဓာရေတုံ နိသိဇ္ဈတေ. ကိံ နွစ္ဆရိယမီဒိသန္တိ အဗ္ဘုတတ္ထဝိဘာဝနေန ဝဒနမမ္ဗုဇေနောပမီယတီတိ အယမဗ္ဘုတောပမာ ဉာတဗ္ဗာတိ. १८९. 'यदि' इत्यादी. डोळे आणि भुवया, ज्यांच्यामध्ये त्यांचा विलास आहे, असे तसले एखादे कमळ जर अस्तित्वात असेल, तर तसले कमळ तुमच्या मुखाची शोभा (वदनकांती) धारण करण्यास समर्थ ठरेल. 'हे केवढे आश्चर्य आहे!' अशा अद्भुत अर्थाच्या प्रकटीकरणाने मुखाची कमळाशी उपमा दिली जात असल्याने, ही 'अद्भुत उपमा' (अद्भुतोपमा) जाणावी. ၁၈၉. ‘‘ယဒိ’’စ္စာဒိ. လောစနဗ္ဘမုဝိဗ္ဘမံ လောစနဘမူနံ လီလာဝန္တံ ကိဉ္စိ အမ္ဘောဇံ ကိဉ္စိ အစ္ဆရိယံ ပဒုမံ ယဒိ ဘဝေ စေ သိယာ, တမမ္ဘောဇံ တဝ မုခသောဘံ ဝဒနကန္တိံ ဓာရေတုံ သမတ္ထော ဟောတိ. ဣတိ ဤဒိသီ ဥပမာ အဗ္ဘုတောပမာ အဗ္ဘုတဓမ္မပကာသကတ္တာ အဗ္ဘုတောပမာ နာမ. ဧတ္ထ အဝိဇ္ဇမာနောပိ ဝိဇ္ဇမာနတ္တေန ပရိကပ္ပိတော ပဒုမဂတော လောစနဗ္ဘမုဝိဗ္ဘမသမ္ဗန္ဓော အမ္ဘောဇဝိသေသနေန ‘‘လောစနဗ္ဘမုဝိဗ္ဘမ’’န္တိ ဣမိနာ ဇောတိတော. တသ္မာ အမ္ဘောဇံ လောစနဗ္ဘမုဝိဗ္ဘမသမ္ဗန္ဓသင်္ခတဥပမာယ ဇောတကတ္တာ နိဿိတဝေါဟာရေန ဥပမာ, မုခံ ဥပမေယျန္တိ မုခဂတော လောစနဗ္ဘမုဝိဗ္ဘမသမ္ဗန္ဓော ယဒိ မုခေ န ဘဝေယျ, တာဒိသံ မုခသောဘံ ဓာရေတုံ ကထံ သမတ္ထောတိ သာမတ္ထိယာ ဉာယတိ. လောစနဗ္ဘမုဝိဗ္ဘမသင်္ခါတသာဓာရဏဓမ္မော ပန ‘‘လောစနာနိ စ ဘမုယော စေတိ စ, တာသံ ဝိဗ္ဘမော ယသ္မိ’’န္တိ စ ဝိဂ္ဂဟေ နိပ္ဖန္နေန [Pg.200] ဘိန္နာဓိကရဏအညပဒတ္ထသမာသေန ဂုဏီဘူတဿပိ ဂဟိတတ္တာ ဝိညာယတိ. १८९. ‘यदि’ इत्यादी. डोळे आणि भुवयांचे विलास (सौंदर्य) असलेले एखादे आश्चर्यकारक कमळ जर अस्तित्वात असेल, तर ते कमळ तुझ्या मुखाची शोभा (चेहऱ्याची कांती) धारण करण्यास समर्थ होईल. अशा प्रकारची उपमा ही 'अद्भुतोपमा' (अब्भुतोपमा) होय, कारण ती एका अद्भुत (असामान्य) गोष्टीचे प्रकटीकरण करते. येथे प्रत्यक्षात अस्तित्वात नसलेला परंतु अस्तित्वात असल्यासारखा कल्पिलेला, कमळामध्ये असलेला डोळे आणि भुवयांच्या विलासाचा संबंध 'लोचनब्भमुविब्भमं' (डोळे आणि भुवयांचा विलास असलेले) या कमळाच्या विशेषणाद्वारे दर्शविला आहे. म्हणून, डोळे आणि भुवयांच्या विलासाच्या संबंधाने युक्त अशा उपमेचे द्योतक असल्यामुळे कमळ हे उपमान (औपचारिक व्यवहाराने) ठरते आणि मुख हे उपमेय ठरते. जर मुखामध्ये असलेला डोळे आणि भुवयांच्या विलासाचा संबंध मुखात नसता, तर ते तशी मुखशोभा धारण करण्यास कसे समर्थ झाले असते, हे सामर्थ्यावरून समजते. 'लोचनब्भमुविब्भम' नावाचा साधारण धर्म तर 'डोळे आणि भुवया, आणि ज्यांच्यामध्ये त्यांचा विलास आहे' अशा विग्रहाने निष्पन्न झालेल्या भिन्नाधिकरण बहुव्रीहि समासाद्वारे (bhinnādhikaraṇaaññapadatthasamāsa) गौण झालेल्या अर्थाचे ग्रहण केल्यामुळे समजला जातो. ၁၉၀. १९०. သုဂန္ဓိ သောဘသမ္ဗန္ဓိ, သိသိရံသုဝိရောဓိ စ; မုခံ တဝ’မ္ဗုဇံဝေ’တိ, သာ သိလေသောပမာ မတာ. सुगंधी, शोभेशी संबंधित (सुंदर) आणि चंद्राशी विरोध असणारे तुझे मुख कमळासारखेच आहे, अशी ही 'सिलेसौपमा' (श्लेषोपमा) मानली जाते. ၁၉၀. ‘‘သုဂန္ဓိ’’စ္စာဒိ. တဝ မုခံ အမ္ဘောဇမိဝ သိသိရံသုနောစန္ဒဿ ဝိရောဓိ ပစ္စနီကံ, မုခံ တံသမာနကန္တိတ္တာ အမ္ဗုဇဉ္စ တဒုဒယေ သင်္ကောစဘဇနတော. သောဘသမ္ဗန္ဓိ ကန္တိယုတ္တံ, မုခမမ္ဗုဇဉ္စ. သုဂန္ဓော အဿ အတ္ထီတိ သုဂန္ဓိ စ ဒွယမပီတိ ဧဝံ သိလေသပရိဂ္ဂဟေန မုခမ္ဗုဇာနံ ဥပမာယောဂတော သာ ယထာဝုတ္တာ သိလေသောပမာ မတာ. १९०. ‘सुगंधी’ इत्यादी. तुझे मुख कमळाप्रमाणे 'सिसिरंसु' म्हणजेच चंद्राचे विरोधी (शत्रू) आहे; मुख हे चंद्रासारखीच कांती असणारे असल्यामुळे (चंद्राशी स्पर्धा करते म्हणून) आणि कमळ हे चंद्राच्या उदयाने संकोच पावणारे (मिटणारे) असल्यामुळे विरोधी आहे. 'सोभसम्बन्धी' म्हणजे कांतीयुक्त, मुख आणि कमळ दोन्हीही कांतीयुक्त आहेत. ज्याला सुवास आहे ते 'सुगंधी' होय, हे दोन्हीही (मुख आणि कमळ) सुगंधी आहेत. अशा प्रकारे श्लेषाच्या (द्विअर्थी शब्दांच्या) ग्रहणाने मुख आणि कमळ यांच्यात उपमेचा संबंध जोडला गेल्यामुळे, ती पूर्वोक्त 'सिलेसौपमा' (श्लेषोपमा) मानली जाते. ၁၉၀. ‘‘သုဂန္ဓိ’’စ္စာဒိ. တဝ မုခံ အမ္ဘောဇမိဝ သိသိရံသုဝိရောဓိ စန္ဒဿ ဝိရုဒ္ဓံ ဟောတိ တုလျတ္တာ. ပဒုမံ ပန စန္ဒောဒယေန အတ္တနော သင်္ကောစနတ္တာ တဿ ဝိရုဒ္ဓံ ဟောတိ. သောဘသမ္ဗန္ဓိ စ အနညသာဓာရဏမုခဂတကန္တိသမ္ဗန္ဓယုတ္တဉ္စ ဟောတိ. ပဒုမံ ပန ပဒုမဂတကန္တိသမ္ဗန္ဓိနာ ယုတ္တံ ဟောတိ. သုဂန္ဓိ စ စတုဇ္ဇာတိသုဂန္ဓဝဟနတော သုဂန္ဓိ စ ဟောတိ. အမ္ဗုဇံ ပန ပဒုမသုဂန္ဓေနေဝ ယုတ္တံ ဟောတိ. ဣတိ ဤဒိသီ ဥပမာ သိလေသောပမာ ဧကပဒါတိဟိတဥဘယတ္ထလက္ခဏေန သိလေသဝသေန ဝုတ္တတ္တာ သိလေသောပမာ နာမ ဟောတိ. သိသိရာ သီတလာ အံသု ကန္တိ အဿေတိ စ, တဿ ဝိရုဇ္ဈတိ သီလေနေတိ စ, ပစ္စယသာမတ္ထိယဝသေန ဒွိန္နံ ဒွိန္နံ အတ္ထာနံ လဗ္ဘနတော သိလိဿတိ အပရောပိ အတ္ထော ဧတ္ထ အလင်္ကာရေတိ စ, သိလေသဝသေန ဝုတ္တာ ဥပမာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဧတ္ထ သုဂန္ဓော စ သောတသမ္ဗန္ဓော စ သိသိရံသုဝိရောဓိတ္တဉ္စေတိ ဣမေ ဥပမာနောပမေယျာနမမ္ဗုဇမုခါနံ တုလျဓမ္မော, တေသု အမ္ဗုဇဂတတုလျဓမ္မသမ္ဗန္ဓော သဓမ္မတ္တာ ဥပမာ နာမ ဟောတိ, သာ အမ္ဗုဇသမ္ဗန္ဓိနာ ဣဝသဒ္ဒေန ဇောတိတာ, [Pg.201] မုခဂတတုလျဓမ္မော ပန အဿတ္ထိတဿီလတ္ထေ ကတပစ္စယေ သတိပိ သာမတ္ထိယာယေဝ ဂမျတေ. १९०. ‘सुगंधी’ इत्यादी. तुझे मुख कमळाप्रमाणे 'सिसिरंसुविरोधी' म्हणजेच चंद्राच्या विरुद्ध आहे, कारण ते चंद्राच्या समान (सुंदर) आहे. परंतु कमळ हे चंद्राच्या उदयाने स्वतः संकुचित होत असल्यामुळे चंद्राच्या विरुद्ध असते. 'सोभसम्बन्धी' म्हणजे मुखाच्या बाबतीत ते अनन्यसाधारण अशा मुखाच्या कांतीच्या संबंधाने युक्त असते, तर कमळाच्या बाबतीत ते कमळाच्या कांतीच्या संबंधाने युक्त असते. 'सुगंधी' म्हणजे मुखाच्या बाबतीत ते चार प्रकारच्या सुवासाने (चतुर्जाति सुगंध) युक्त असल्यामुळे सुगंधी असते, तर कमळ हे केवळ कमळाच्याच सुगंधाने युक्त असते. अशा प्रकारची उपमा ही 'सिलेसौपमा' (श्लेषोपमा) होय, कारण ती एकाच पदात सामावलेल्या दोन्ही अर्थांच्या लक्षणांमुळे श्लेषाच्या (द्विअर्थीपणाच्या) आधारे सांगितली गेली आहे. 'शिशिर (शीतल) आहेत किरण (कांती) ज्याचे तो' (सिसिरंसु - चंद्र) आणि 'त्याच्याशी जो स्वभावतः विरोध करतो तो' (सिसिरंसुविरोधी), अशा प्रत्ययाच्या सामर्थ्यामुळे दोन-दोन अर्थ प्राप्त होत असल्यामुळे येथे श्लेष होतो आणि दुसरा अर्थही या अलंकाराला सुशोभित करतो; म्हणून श्लेषाच्या आधारे सांगितलेली उपमा म्हणजे 'सिलेसौपमा', असा याचा विग्रह आहे. येथे सुगंध, शोभेचा संबंध आणि चंद्राशी विरोध असणे हे कमळ आणि मुख या उपमान व उपमेयांचे समान धर्म (तुल्यधर्म) आहेत. त्यांपैकी कमळामध्ये असलेला समान धर्माचा संबंध हा समान धर्म असल्यामुळे 'उपमा' ठरतो, जो कमळाशी संबंधित 'इव' (सारखे) या शब्दाने दर्शविला आहे. मुखामध्ये असलेला समान धर्म मात्र 'अस्तित्व' आणि 'स्वभाव' या अर्थांमध्ये प्रत्यय लागलेला असूनही केवळ सामर्थ्यावरूनच समजला जातो. ၁၉၁. १९१. သရူပသဒ္ဒဝါစ္စတ္တာ, သာ သန္တာနောပမာ ယထာ; ဗာလာ’ဝု’ယျာနမာလာ’ယံ, သာလကာနနသောဘိနီ. समान रूपाच्या शब्दांनी व्यक्त होत असल्यामुळे ती 'संतानोपमा' (सन्तानोपमा) म्हटली जाते, जसे की: 'ही तरुणी (बाला) उद्यानाच्या माळेप्रमाणे (उद्यानपंक्तीप्रमाणे) अलकावलीने (केसांच्या रचनेने) युक्त अशा मुखाने शोभणारी आणि सालवृक्षांच्या वनाने शोभणारी आहे.' ၁၉၁. ‘‘သရူပ’’ဣစ္စာဒိ. အယမုယျာနမာလာ ဗာလာဝ ဣတ္ထီ ဝိယ. ကထံ? သာလကာနနသောဘိနီ ဗာလာ တာဝ သဟာလကေန ကေသသန္နိဝေသဝိသေသေန ဝတ္တတေ သာလကမာနနံ တေန သောဘတေ. သာလကာနနသောဘိနီ ဥယျာနမာလာပိ သာလာနံ ရုက္ခဝိသေသာနံ ကာနနေန ဂဟနေန သောဘတေ, ဧဝရူပါ သာ တာဒိသီ သန္တာနောပမာ အာချာယတေ, ကသ္မာ? သိလေသောပမတ္တသဘာဝေပိ သရူပေန သဒိသေန သဒ္ဒေန ‘‘သာလကာနနသောဘိနီ’’တွေဝံဝိဓေန သဒ္ဒသန္တာနေန ဝိသေသဘူတေန ဝါစ္စတ္တာ ပကာသိယတ္တာ တဿာဣတိ ဂမျတေ. ယထေတိ နိဒဿနေ. १९१. ‘सरूप’ इत्यादी. ही उद्यानाची माळ (रांग) एखाद्या तरुणीप्रमाणे (बालेप्रमाणे) आहे. कसे? 'साळकाननसोभिनी' - तरुणीच्या बाबतीत ती 'स-आलक' म्हणजे केसांच्या विशिष्ट रचनेने युक्त अशा मुखाने (आननाने) शोभून दिसते. उद्यानाच्या माळेच्या बाबतीत ती 'साल-कानन' म्हणजे साल नावाच्या विशिष्ट वृक्षांच्या दाट वनाने (अरण्याने) शोभून दिसते. अशा प्रकारची ती उपमा 'संतानोपमा' (सन्तानोपमा) म्हटली जाते. का? कारण श्लेषोपमेचा स्वभाव असूनही, समान रूपाच्या (सारख्याच) शब्दाने म्हणजेच 'साळकाननसोभिनी' अशा विशिष्ट शब्दसमूहाने (शब्दसंतानाने) ती व्यक्त होत असल्यामुळे, प्रकट होत असल्यामुळे तिला संतानोपमा म्हटले जाते, हे समजते. 'यथा' हे उदाहरणासाठी आहे. ၁၉၁. ‘‘သရူပေ’’စ္စာဒိ. သရူပသဒ္ဒဝါစ္စတ္တာ တုလျသုတိယာ အစ္ဆိန္နသမ္ဗန္ဓဝစနမာလာယ ဝုစ္စမာနတ္တာ သာ ဥပမာ သန္တာနောပမာ နာမ ဟောတိ, သိလေသတ္တေ သတိပိ ကတသမာသေဟိ ပဒသန္တာနေဟိ ဝုစ္စမာနတ္တာ သန္တာနောပမာ နာမ ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. ‘‘ယထေ’’တိ ဥဒါဟရတိ. အယံ ဥယျာနမာလာ ဧသာ ဥယျာနပန္တိ သာလကာနနသောဘိနီ အလကသင်္ခါတကေသသန္နိဝေသသဟိတေန မုခေန သောဘမာနာ ဗာလာဝ အင်္ဂနာ ဣဝ သာလကာနနသောဘိနီ သာလဝနေဟိ သောဘမာနာ ဟောတိ. ဥပမာနောပမေယျာနံ သမာနံ ရူပံ ယေသန္တိ စ, သရူပါ စ တေ သဒ္ဒါ စေတိ စ, တေဟိ ဝါစ္စာ ဥပမာတိ စ, တဿာ ဘာဝေါတိ စ, သန္တာနေန ယုတ္တာ ဥပမာတိ စ, ဥယျာနာနံ မာလာတိ စ, သဟ အလကေန ဝတ္တမာနန္တိ စ, တဉ္စ တံ အာနနဉ္စာတိ စ, တေန သောဘတိ သီလေနာတိ စ, သာလာနံ ကာနနန္တိ စ, တေန သောဘတိ သီလေနာတိ စ ဝါကျံ. १९१. ‘सरूपे’ इत्यादी. समान रूपाच्या शब्दांनी व्यक्त होत असल्यामुळे, म्हणजेच समान ऐकू येणाऱ्या आणि अखंड संबंध असलेल्या वचनमालेने (शब्दसमूहाने) सांगितली जात असल्यामुळे ती उपमा 'संतानोपमा' (सन्तानोपमा) ठरते. श्लेष असूनही, केलेल्या समासांच्या पदसमूहांद्वारे (पदासंततीद्वारे) ती सांगितली जात असल्यामुळे तिला 'संतानोपमा' म्हणतात, असा अभिप्राय आहे. 'यथा' द्वारे उदाहरण देतात. ही उद्यानाची माळ (उद्यानपंक्ती) 'साळकाननसोभिनी' म्हणजे केसांच्या रचनेने युक्त अशा मुखाने शोभणाऱ्या तरुणीप्रमाणे (बालेप्रमाणे) सालवृक्षांच्या वनाने शोभणारी आहे. उपमान आणि उपमेयांचे रूप ज्यांचे समान आहे ते 'सरूप', आणि ते शब्द म्हणजे 'सरूपशब्द', त्यांच्याद्वारे जी उपमा व्यक्त होते ती 'सरूपशब्दवाच्या उपमा' आणि तिचा भाव म्हणजे 'सरूपशब्दवाच्यता'. संतानाने (परंपरेने/समूहाने) युक्त असलेली उपमा म्हणजे 'संतानोपमा'. उद्यानांची माळ म्हणजे 'उद्यानमाला'. केसांच्या (अलक) रचनेसह असणारे म्हणजे 'स-अलक', आणि ते मुख (आनन) म्हणजे 'सालक-आनन', त्याने जी स्वभावतः शोभते ती 'साळकाननसोभिनी' (तरुणीच्या अर्थाने). सालवृक्षांचे वन म्हणजे 'साल-कानन', त्याने जी स्वभावतः शोभते ती 'साळकाननसोभिनी' (उद्यानाच्या अर्थाने), असा हा वाक्यविग्रह आहे. ၁၉၂. १९२. ခယီ [Pg.202] စန္ဒော ဗဟုရဇံ, ပဒုမံ တေဟိ တေ မုခံ; သမာနမ္ပိ သမုက္ကံသီ-တျ’ယံ နိန္ဒောပမာ မတာ. चंद्र क्षय पावणारा आहे आणि कमळ पुष्कळ परागकणांनी (धुळीने) युक्त आहे; तरीही त्यांच्याशी समान असणारे तुझे मुख अत्यंत श्रेष्ठ आहे, अशी ही 'निंदोपमा' (निन्दोपमा) मानली जाते. ၁၉၂. ‘‘ခယီ’’ဣစ္စာဒိ. စန္ဒော ခယီ ခယော အစ္စယော ယဿေတိ, ပဒုမံ ဗဟုရဇံ ဗဟူနိ ရဇာနိ ပရာဂါဝယဝါ ယသ္မိန္တိ, တေဟိ ဧဝံဘူတေဟိ စန္ဒပဒုမေဟိ ကန္တိအာဒိနာ သမာနမ္ပိ သဒိသမ္ပိ သန္တံ တဝ မုခံ သမုက္ကံသိ ပရမုက္ကံသဝန္တံ, ခယသဒ္ဒဿ စ ရဇဿ စ ဒေါသေပိ ဝတ္တနတော, သဒ္ဒစ္ဆလေန ခယဿ ဒေါသရူပဿ ဗဟုရဇတ္တဿ စ တတ္ထာဘာဝတောတိ. ဣတိ ဧဝရူပါ အယံ နိန္ဒောပမာ မတာ နိန္ဒိတေန စန္ဒာဒိနာ ခယဿောပမိတတ္တာ. १९२. ‘खयी’ इत्यादी. चंद्र हा 'क्षयी' (क्षय पावणारा) आहे, म्हणजेच ज्याचा क्षय (ऱ्हास) होतो तो; कमळ हे 'बहुरज' (अनेक परागकणांनी युक्त) आहे, म्हणजेच ज्याच्यामध्ये पुष्कळ परागकण आहेत ते. अशा दोषयुक्त चंद्र आणि कमळाशी कांती इत्यादी बाबतीत समान असूनही तुझे मुख 'समुक्कंसी' म्हणजे अत्यंत श्रेष्ठ (उत्कृष्ट) आहे. कारण 'क्षय' आणि 'रज' हे शब्द दोषांचेही वाचक आहेत, आणि शब्दांच्या छलाने (श्लेषाने) क्षयरूपी दोष आणि बहुरजत्व (अतिशय धूळ किंवा दोष) हे मुखामध्ये नसल्यामुळे मुख श्रेष्ठ ठरते. अशा प्रकारे, ही 'निंदोपमा' (निन्दोपमा) मानली जाते, कारण येथे निंद्य (दोषयुक्त) अशा चंद्र इत्यादींशी उपमा दिली गेली आहे. ၁၉၂. ‘‘ခယိ’’စ္စာဒိ. စန္ဒော ခယီ ပါဋိပဒတော ပဋ္ဌာယ ဒိနေ ဒိနေ ဧကမေကာယ ကလာယ သူရိယဿ အာသန္နဟေတု ခီယနသဘာဝယုတ္တော ဟောတိ, ပဒုမံ ဗဟုရဇံ ဗဟုရေဏုသမန္နာဂတံ ဟောတိ, တေဟိ စန္ဒပဒုမေဟိ သမာနမ္ပိ ကန္တိသုဂန္ဓာဒီဟိ သဒိသမ္ပိ တေ မုခံ တဝါနနံ သမုက္ကံသိ ခယရဇသဒ္ဒေဟိ ဒေါသဿာပိ ဝါစ္စတ္တာ သဒ္ဒစ္ဆလေဟိ ဂမျမာနဿ တာဒိသဿ ဒေါသဿ မုခေ အဝိဇ္ဇမာနတ္တာ အဓိကုက္ကံသဂုဏဝန္တံ ဟောတိ, ဣတိ ဤဒိသီ အယံ ဥပမာ နိန္ဒောပမာ နိန္ဒိတာနံ စန္ဒပဒုမာနံ မုခဿ ဥပမိတာတိ နိန္ဒောပမာ နာမ ဟောတိ, မုခဝိသေသနေန ဣဝသဒ္ဒပရိယာယေန သမာနသဒ္ဒေန မုခဂတသဓမ္မော ဇောတိတော ဟောတိ, ဥပမာသင်္ခတစန္ဒပဒုမဂတသဓမ္မောပိ ဒွီသု တုလျဓမ္မောပိ သာမတ္ထိယာ ဂမျတေ, အပိသဒ္ဒေါ စေတ္ထ ဝတ္တဗ္ဗန္တရသမုစ္စယေ, သမုက္ကံသောတိ ဝတ္တဗ္ဗန္တရော. १९२. "क्षयी" इत्यादी. चंद्र प्रतिपदेपासून सुरू करून दिवसागणिक एकेका कलेने सूर्याच्या निकट जाण्यामुळे क्षय पावण्याच्या स्वभावाचा असतो, कमळ हे पुष्कळ परागकणांनी (रजाने) युक्त असते. त्या चंद्र आणि कमळाशी समान असूनही, कांती आणि सुवासाने सदृश असूनही, आपले मुख (चेहरा) श्रेष्ठ आहे; कारण 'क्षय' आणि 'रज' या शब्दांद्वारे दोषांचेही वाचकत्व असल्यामुळे, शब्दच्छलाने प्रतीत होणारा तसा दोष मुखामध्ये विद्यमान नसल्यामुळे ते (मुख) अधिक उत्कृष्ट गुणांनी युक्त आहे. अशा प्रकारे ही उपमा 'निंदोपमा' आहे, कारण निंदित अशा चंद्र आणि कमळाशी मुखाची तुलना केली गेली आहे, म्हणून हिला निंदोपमा म्हणतात. मुखाच्या विशेषणाने, 'इव' (सारखे) शब्दाचा पर्याय असलेल्या 'समान' शब्दाने मुखातील समान धर्म प्रकाशित होतो. उपमारूप चंद्र आणि कमळ यांमधील समान धर्म देखील, दोन्हीमधील तुल्य धर्म सामर्थ्याने समजला जातो. आणि येथील 'अपि' शब्द हा दुसऱ्या वक्तव्याच्या समुच्चयासाठी आहे, 'समुत्कर्ष' (श्रेष्ठत्व) हे दुसरे वक्तव्य आहे. ၁၉၃. १९३. အသမတ္ထော မုခေနိ’န္ဒု, ဇိန တေ ပဋိဂဇ္ဇိတုံ; ဇဠော ကလင်္ကီ’တိ အယံ, ပဋိသေဓောပမာ သိယာ. हे जिन! आपल्या मुखाशी स्पर्धा करण्यास चंद्र असमर्थ आहे; कारण तो जड (शीतल/मूर्ख) आणि कलंकित आहे. ही 'प्रतिषेधोपमा' होय. ၁၉၃. ‘‘အသမတ္ထော’’ဣစ္စာဒိ. ဇိန တေ မုခေန ဇဠော သီတော အကုသလော စ ကလင်္ကော မိဂလဉ္ဆနလက္ခဏော ဒေါသော [Pg.203] အဿ အတ္ထီတိ ကလင်္ကီ. သဒ္ဒစ္ဆလေန ဒေါသကထနံ. တာဒိသော ဣန္ဒု စန္ဒော ပဋိဂဇ္ဇိတုံ ဝိဝဒိတုံ အသမတ္ထော, မုခန္တု ဝိသဒံ အလင်္ကတဉ္စေတိ ကထမနေနာယံ သဒိသောတိ နိသေဓဒွါရေန သဓမ္မတာဝ ဂမ္မတေ, အယံ ပဋိသေဓောပမာ သိယာ. १९३. "असमर्थ" इत्यादी. हे जिन! आपल्या मुखाशी (तुलना करता), 'जड' म्हणजे शीतल आणि अकुशल, आणि 'कलंक' म्हणजे मृगचिन्हरूपी दोष ज्याला आहे तो 'कलंकित' होय. हा शब्दच्छलाने केलेला दोषाचा निर्देश आहे. तसा चंद्र प्रतिगर्जना करण्यास (स्पर्धा करण्यास) किंवा वाद घालण्यास असमर्थ आहे. मुख तर स्वच्छ आणि अलंकृत आहे, मग हा (चंद्र) याच्याशी कसा समान असू शकेल? अशा प्रकारे निषेधाच्या द्वारे समान धर्मच प्रतीत होतो, म्हणून ही 'प्रतिषेधोपमा' होय. ၁၉၃. ‘‘အသမတ္ထော’’စ္စာဒိ. ဟေ ဇိန တေ တုယှံ မုခေန ပဋိဂဇ္ဇိတုံ ဝိဝဒိတုံ ဇဠော သီတလော အဝိသဒေါ ကလင်္ကီ သသလက္ခဏော ဝါ သဒေါသော ဝါ ဣန္ဒု စန္ဒော အသမတ္ထော ဟောတီတိ, အယံ ဧဒိသီ ဥပမာ ပဋိသေဓောပမာ နာမ. ကလင်္ကော အဿ အတ္ထီတိ ဝါကျံ. ဧတ္ထ ဝိသဒေန ကလင်္ကရဟိတေန မုခေန သီတလော အဝိသဒေါ သဒေါသော စန္ဒော သမာနော ဘဝိတုမသမတ္ထောတိ ဧဝံ ပဋိသေဓဒွယေန ဣန္ဒမုခသင်္ခါတာနံ ဥပမာနောပမေယျာနံ တုလျဓမ္မသမ္ဗန္ဓဿ ပကာသိတတ္တာ သတိပိ နိန္ဒောပမာဘာဝေ ပဋိသေဓောပမာ နာမ ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. ‘‘ပဋိဂဇ္ဇိတု’’န္တိ ဣဒံ စန္ဒဿ ဝိသေသနတ္တာ စန္ဒဂတသဓမ္မံ ဇောတေတိ. १९३. "असमर्थ" इत्यादी. हे जिन! आपल्या मुखाशी प्रतिगर्जना करण्यास किंवा वाद घालण्यास जड (शीतल, अस्वच्छ) आणि कलंकित (शशचिन्हयुक्त किंवा सदोष) असलेला चंद्र असमर्थ आहे; अशी ही उपमा 'प्रतिषेधोपमा' नावाचे आहे. 'ज्याला कलंक आहे तो' असे हे वाक्य आहे. येथे स्वच्छ आणि कलंकरहित मुखाशी शीतल, अस्वच्छ आणि सदोष चंद्र समान होण्यास असमर्थ आहे, अशा प्रकारे निषेधाच्या द्वारे चंद्र आणि मुख या संज्ञित उपमान व उपमेयांच्या समान धर्माचा संबंध प्रकाशित केल्यामुळे, निंदोपमेचा भाव असला तरीही ही 'प्रतिषेधोपमा' ठरते, असा अभिप्राय आहे. 'प्रतिगर्जना करणे' हे चंद्राचे विशेषण असल्यामुळे चंद्रातील समान धर्म प्रकाशित करते. ၁၉၄. १९४. ကစ္ဆံ စန္ဒာရဝိန္ဒာနံ, အတိက္ကမ္မ မုခံ တဝ; အတ္တနာဝ သမံ ဇာတ-မိတျ’သာဓာရဏောပမာ. चंद्र आणि कमळ यांच्या मर्यादेचे उल्लंघन करून आपले मुख स्वतःशीच समान झाले आहे; ही 'असाधारणोपमा' होय. ၁၉၄. ‘‘ကစ္ဆ’’မိစ္စာဒိ. စန္ဒဿ အရဝိန္ဒဿ စ ကစ္ဆံ ပဒဝိံ အတိက္ကမ္မ အဝတ္ထရိယ တေသ’မဝကံသတော, တဝ မုခံ အတ္တနော သရူပေနေဝ သမံ ဇာတမိတိ ဧဝရူပါ အသာဓာရဏတာဘိဓာနေန သဒိသတ္တပတီတိယာ အသာဓာရဏောပမေတိ နိဂဒျတေ. १९४. "कक्ष" इत्यादी. चंद्र आणि कमळ यांच्या कक्ष्येचे म्हणजे पदवीचे उल्लंघन करून, त्यांना मागे टाकून, आपले मुख स्वतःच्याच स्वरूपाशी समान झाले आहे, अशा प्रकारे असाधारणत्वाच्या कथनाने सादृश्याची प्रतीती होत असल्यामुळे हिला 'असाधारणोपमा' असे म्हटले जाते. ၁၉၄. ‘‘ကစ္ဆ’’မိစ္စာဒိ. ဟေ မုနိ တဝ မုခံ စန္ဒာရဝိန္ဒာနံ လောကပူဇိတာနံ သသိအမ္ဗုဇာနံ ကစ္ဆံ ပဒဝိံ အဝတ္ထံ ဝါ အတိက္ကမ္မ အတ္တနော အတုလျတ္တေန အတ္တနာ ဧဝ သမာနတ္တဝတ္ထုနော အဘာဝါ သမံ ဇာတံ, ဣတိ ဤဒိသာ ဥပမာ အသာဓာရဏောပမာ [Pg.204] အတုလျဓမ္မဘာဝဿ ပကာသနတော အသာဓာရဏောပမာ နာမ ဟောတိ. ဣဟ ဥပမာဘူတာနံ စန္ဒာရဝိန္ဒာနံ မုခဿ ဟီနဘာဝပဋိပါဒနဒွါရေန စန္ဒာရဝိန္ဒေဟိ မုခံ တုလျန္တိ ပညာပနတော စန္ဒာရဝိန္ဒာ အသာဓာရဏောပမာ နာမ ဟောတိ. သမသဒ္ဒေါ မုခဂတဿ သာဓာရဏဓမ္မံ ဇောတေတိ. သေသံ သုဝိညေယျံ. १९४. "कक्ष" इत्यादी. हे मुनी! आपले मुख, लोकांनी पूजिलेल्या चंद्र आणि कमळ यांच्या कक्ष्येचे म्हणजे पदवीचे किंवा अवस्थेचे उल्लंघन करून, स्वतःच्या अतुल्यतेमुळे, स्वतःशिवाय इतर कोणतीही समान वस्तू नसल्यामुळे, स्वतःशीच समान झाले आहे. अशी ही उपमा 'असाधारणोपमा' होय; कारण अतुल्य धर्मभावाचे प्रकाशन केल्यामुळे हिला असाधारणोपमा म्हणतात. येथे उपमारूप असलेल्या चंद्र आणि कमळांच्या तुलनेत मुखाच्या हीनभावाचे प्रतिपादन करण्याच्या द्वारे, चंद्र आणि कमळाशी मुख समान नाही हे दर्शविल्यामुळे ही 'असाधारणोपमा' ठरते. 'सम' हा शब्द मुखातील साधारण धर्म प्रकाशित करतो. उर्वरित भाग सहज समजण्यासारखा आहे. ၁၉၅. १९५. သဗ္ဗမ္ဘောဇပ္ပဘာသာရော, ရာသိဘူတောဝ ကတ္ထစိ; တဝါ’နနံ ဝိဘာတီတိ, ဟောတာ’ဘူတောပမာ အယံ. सर्व कमळांच्या कांतीचा सार जणू काही एका ठिकाणी गोळा (राशीभूत) झाला आहे, असे आपले मुख शोभून दिसते; ही 'अभूतोपमा' होय. ၁၉၅. ‘‘သဗ္ဗ’’ဣစ္စာဒိ. ကတ္ထစိ ဧကဋ္ဌာနေ ရာသိဘူတော သဗ္ဗေသမမ္ဘောဇာနံ ပဘာသာရောဝ တဝါနနံ ဝိဘာတီတိ ဧဝံဘူတာ အယံ အဘူတောပမာ ဟောတိ. १९५. "सर्व" इत्यादी. कुठे एका ठिकाणी गोळा झालेला सर्व कमळांच्या कांतीचा सारच जणू आपले मुख शोभून दिसते, अशा प्रकारची ही 'अभूतोपमा' होते. ၁၉၅. ‘‘သဗ္ဗ’’မိစ္စာဒိ. ကတ္ထစိ ဌာနေ ရာသိဘူတော သဗ္ဗမ္ဘောဇပ္ပဘာသာရောဝ သကလပဒုမာနံ ဥတ္တမကန္တိပုဉ္ဇော ဝိယ တဝါနနံ ဝိဘာတိ ဝိသေသေန ပဘာတိ, ဣတိ ဤဒိသီ ဥပမာ အဘူတောပမာ အဝိဇ္ဇမာနဝတ္ထုနော ဥပမိတတ္တာ အဘူတောပမာ နာမ ဟောတိ. အရာသိ ရာသိဘူတောတိ ဝိဂ္ဂဟော. ဧတ္ထ ယောဇနာဝိဘူတော တာဒိသပဘာသာရာဘာဝတော အဝိဇ္ဇမာနတ္ထေန ပရိကပ္ပိတော. १९५. "सर्व" इत्यादी. कोणत्यातरी ठिकाणी गोळा झालेला सर्व कमळांच्या कांतीचा सार, म्हणजेच सर्व कमळांच्या उत्तम कांतीचा समूह असल्यासारखे आपले मुख शोभते (विशेष रूपाने प्रकाशित होते). अशी ही उपमा 'अभूतोपमा' होय; कारण अविद्यमान (अस्तित्वात नसलेल्या) वस्तूशी तुलना केल्यामुळे हिला अभूतोपमा म्हणतात. 'जो राशी नव्हता तो राशीभूत झाला' (अराशी राशीभूतः) असा याचा विग्रह आहे. येथे योजनेनुसार तशा प्रकारच्या कांतीचा सार अस्तित्वात नसल्यामुळे, तो अविद्यमान अर्थाने कल्पिला गेला आहे. ၁၉၆. १९६. ပတီယတေ’တ္ထဂမ္မာ တု, သဒ္ဒသာမတ္ထိယာ ကွစိ; သမာသပ္ပစ္စယေဝါဒိ-သဒ္ဒယောဂံ ဝိနာ အပိ. परंतु 'अर्थगम्या' (अर्थातून समजणारी उपमा) ही कधीकधी समास, प्रत्यय किंवा 'इव' इत्यादी शब्दांच्या योगाशिवाय देखील शब्दांच्या सामर्थ्याने प्रतीत होते. ၁၉၆. အတ္ထဂမ္မောပမံ ဒဿေတိ ‘‘ပတီယတေ’’ဣစ္စာဒိ. အတ္ထဂမ္မာ တု’ပမာ ကွစိ ကိသ္မိဉ္စိ ဌာနေ သမာသာဒိသဒ္ဒါနံ ယောဂံ ဝိနာ အပိ သဒ္ဒါနံ ပယောဂဝိသေသာဒိဂါဠှေန အညထာနုပပတ္တိလက္ခဏေန သာမတ္ထိယေန ပတီယတေ. १९६. "प्रतीत होते" इत्यादीद्वारे अर्थगम्या उपमा दर्शवितात. अर्थगम्या उपमा तर कधीकधी कोणत्यातरी ठिकाणी समास इत्यादी शब्दांच्या योगाशिवाय देखील, शब्दांच्या प्रयोगविशेषाने दृढ झालेल्या आणि 'अन्यथा अनुपपत्ती' (दुसऱ्या प्रकारे सिद्ध न होणे) या लक्षणाने युक्त असलेल्या सामर्थ्याने प्रतीत होते. ၁၉၆. တိဝိဓံ သဒ္ဒဂမ္မောပမံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ အတ္ထဂမ္မောပမံ ဒဿေတိ ‘‘ပတီယတေ’’တျာဒိနာ. အတ္ထဂမ္မာ တု အတ္ထဂမ္မောပမာ [Pg.205] ပန ကွစိ ဌာနေ သမာသပစ္စယေဝါဒိသဒ္ဒယောဂံ ဝိနာပိ တေသံ သဒ္ဒါနံ သမ္ဗန္ဓံ ဟိတွာပိ သဒ္ဒသာမတ္ထိယာ သမ္ဗန္ဓေ ပယုတ္တာဝသေသသဒ္ဒါနံ အတ္ထသတ္တိယာ ပတီယတေ. သဒ္ဒါနံ သာမတ္ထိယန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. १९६. तीन प्रकारची शब्दगम्या उपमा दर्शवून आता "प्रतीत होते" इत्यादीद्वारे अर्थगम्या उपमा दर्शवितात. परंतु अर्थगम्या उपमा कधीकधी कोणत्यातरी ठिकाणी समास, प्रत्यय किंवा 'इव' इत्यादी शब्दांच्या योगाशिवाय देखील, त्या शब्दांचा संबंध सोडून देखील, शब्दांच्या सामर्थ्याने म्हणजे संबंधात वापरलेल्या उर्वरित शब्दांच्या अर्थशक्तीने प्रतीत होते. 'शब्दांचे सामर्थ्य' (शब्दसामर्थ्य) असा याचा विग्रह आहे. ၁၉၇. १९७. ဘိင်္ဂါနေ’မာနိ စက္ခူနိ, နာ’မ္ဗုဇံ မုခ’မေဝိ’ဒံ; သုဗျတ္တသဒိသတ္တေန, သာ သရူပေါပမာ မတာ. हे भ्रमर नाहीत, हे तर डोळे आहेत; हे कमळ नाही, हे तर मुखच आहे. अतिशय स्पष्ट सादृश्यामुळे ही 'स्वरूपोपमा' मानली जाते. ၁၉၇. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဘိင်္ဂေ’’စ္စာဒိနာ. န ဘိင်္ဂါ ဧတေ, ကိဉ္စရဟိ စက္ခူနိမာနိ, နမ္ဗုဇမေတံ, ကိန္တု မုခမေဝိဒန္တိ ဧဝရူပါ သာ သရူပေါပမာ မတာ ဘိင်္ဂါဒီနမဝိပရီတသရူပဿ ဒီပနတော. တေနာဟ ‘‘သုဗျတ္တေ’’တျာဒိ. သုဗျတ္တေန ဘိင်္ဂစက္ခူနံ အမ္ဗုဇမုခါနဉ္စ ပရိဖုဋေန သဒိသတ္တေန စဉ္စလတ္တကန္တျာဒိလက္ခဏေန တေနေဝါဘေဒသင်္ကာပုဗ္ဗမေဝ ဝိဝေစိတံ အညတြ စက္ခာဒီသု ယံ ဘိင်္ဂါဒိညာဏမုပ္ပန္နံ, တဿ ပစ္စက္ခာနတော ဥပမာဇောတကာနမိဝါဒီနမဘာဝေပိ ဘိင်္ဂလောစနာဒီနံ သဒိသတ္တံ ပတီယတေ သာမတ္ထိယတော. ဧဝမုပရိပိ ယထာယောဂံ. १९७. "भ्रमर" इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. हे भ्रमर नाहीत, तर मग काय आहेत? हे डोळे आहेत; हे कमळ नाही, तर हे मुखच आहे; अशा प्रकारची ती 'स्वरूपोपमा' मानली जाते, कारण भ्रमर इत्यादींच्या अविपरीत (यथार्थ) स्वरूपाचे प्रकाशन येथे होते. म्हणूनच "सुव्यत्त" (अतिशय स्पष्ट) इत्यादी म्हटले आहे. भ्रमर व डोळे आणि कमळ व मुख यांच्या चंचलत्व, कांती इत्यादी लक्षणांच्या अतिशय स्पष्ट आणि प्रगट सादृश्यामुळे, त्यांच्यातील अभेदशंकेचे आधीच निवारण करून, डोळे इत्यादींमध्ये जे भ्रमर इत्यादींचे ज्ञान उत्पन्न झाले होते, त्याचा नकार केल्यामुळे, 'इव' इत्यादी उपमावाचक शब्दांचा अभाव असूनही, सामर्थ्यामुळे भ्रमर व डोळे इत्यादींचे सादृश्य प्रतीत होते. पुढेही याचप्रमाणे योग्यतेनुसार समजून घ्यावे. ၁၉၇. ဣဒါနိ ဥဒါဟရဏမာဟရတိ ‘‘ဘိင်္ဂါနိ’’စ္စာဒိနာ. ဣမာနိ ဘိင်္ဂါနိ ဘမရာ န ဘဝန္တိ, ကိဉ္စရဟိ စက္ခူနိ. အမ္ဗုဇံ န ဣဒံ ပဒုမံ န ဟောတိ, ကိန္တု မုခမေဝါတိ. ဤဒိသီ သာ ဥပမာ သုဗျတ္တသဒိသတ္တေန သုပါကဋေန ဘိင်္ဂလောစနာနံ အမ္ဗုဇမုခါနဉ္စ တုလျဘာဝေန သရူပေါပမာ နာမ ဟောတိ. ဧတ္ထ သမာသပစ္စယဣဝါဒိသဒ္ဒပယောဂါဘာဝေပိ ‘‘ဘိင်္ဂါနေမာနိ စက္ခူနိ’’စ္စာဒိနာ စက္ခုမုခေသု ဘိင်္ဂအမ္ဗုဇန္တိ ဝိပရီတပဝတ္တဗုဒ္ဓိံ ပဋိသေဓေတွာ စက္ခုမုခဝိဓာနတော စဉ္စလတ္တကန္တိမတ္တာဒီသု သုဗျတ္တံ တုလျတ္တံ ဝိနာ စက္ခုမုခေသု ဘိင်္ဂမ္ဗုဇဗုဒ္ဓိံ ကီဒိသမုပ္ပဇ္ဇတီတိ အညထာနုပပတ္တိလက္ခဏသာမတ္ထိယာ ဥပမာနဘူတာနံ ဘိင်္ဂမ္ဗုဇာနံ ဥပမေယျဘူတာနံ စက္ခုမုခါနဉ္စ သဒိသတ္တံ ဉာယတိ. သုဋ္ဌု ဗျတ္တံ ပါကဋန္တိ စ, တဉ္စ တံ သဒိသတ္တဉ္စာတိ စ, သမာနံ ရူပံ သဘာဝေါ ယဿာ ဥပမာယာတိ စ, သာ စ သာ ဥပမာ စာတိ စ ဝါကျံ. १९७. आता 'भिंगानि' (bhiṅgāni - भ्रमर) इत्यादींद्वारे उदाहरण दिले जाते. हे भ्रमर (भिंगानि) नसून डोळे आहेत. हे कमळ (अम्बुज) नसून मुखच आहे. अशा प्रकारे, अत्यंत स्पष्ट सादृश्यामुळे (subyattasadisattena) आणि सुस्पष्टतेमुळे भ्रमररूप डोळे आणि कमळरूप मुख यांच्यातील समानतेमुळे ही 'सरूपोपमा' (sarūpopamā) ठरते. येथे समास, प्रत्यय किंवा 'इव' इत्यादी शब्दांचा प्रयोग नसतानाही, 'हे डोळे भ्रमर आहेत' इत्यादी वाक्यांद्वारे डोळे आणि मुख यांमध्ये भ्रमर आणि कमळ अशी विपरीत बुद्धी (गैरसमज) दूर करून, डोळे आणि मुखाच्या स्वरूपाचे प्रतिपादन केल्यामुळे, चंचलता आणि कांती इत्यादींमधील स्पष्ट समानतेशिवाय डोळे आणि मुखांमध्ये भ्रमर व कमळाची बुद्धी कशी उत्पन्न होऊ शकते? अशा 'अन्यथानुपपत्ती' (अशक्यतेच्या) लक्षणाच्या सामर्थ्याने उपमान बनलेल्या भ्रमर-कमळ आणि उपमेय बनलेल्या डोळे-मुख यांचे सादृश्य समजून येते. 'सुट्टु ब्यत्तं पाकटं' (अतिशय स्पष्ट व प्रकट) आणि ते सादृश्य, तसेच जिचा स्वभाव किंवा रूप समान आहे ती उपमा, असा या वाक्याचा विग्रह आहे. ၁၉၈. १९८. မယေဝ [Pg.206] မုခသောဘာ’ဿေ-တျလ’မိန္ဒု ဝိကတ္ထနာ; ယတော’မ္ဗုဇေပိသာ’တ္ထီတိ, ပရိကပ္ပောပမာ အယံ. “या (मुनींच्या) मुखाची शोभा केवळ माझ्यातच आहे, हे चंद्रा! तुझी ही बढाई आता पुरे झाली; कारण ती (शोभा) कमळातही आहे.” ही 'परिकल्पोपमा' (parikappopamā) आहे. ၁၉၈. ‘‘မယေဝိ’’စ္စာဒိ. ဣန္ဒု စန္ဒ, အဿ မုနိနော မုခသောဘာ ဝဒနဇုတိ မယေဝ, နာညတြာတိ ဧဝရူပါ ဝိကတ္ထနာ အတ္ထပသံသနေန အလမိတိ ပဋိသေဓော. ကိမိတိ? ယတော ယသ္မာ ကာရဏာ သာ မုခသောဘာ အမ္ဗုဇေပိ န ကေဝလမိန္ဒုမှိ အတ္ထိ, နော နတ္ထီတိ အသတောပိ တထာ ဝိကတ္ထနဿ ပရိကပ္ပနတော ဝဒနမိန္ဒုနောပမီယတီတိ ဧဝရူပါ အယံ ပရိကပ္ပောပမာ. १९८. “मयेव” इत्यादी. हे इंदू म्हणजे चंद्रा! या मुनींची मुखशोभा (वदनकांती) केवळ माझ्यातच आहे, इतर कोठेही नाही, अशी ही बढाई (आत्मप्रशंसा) 'अलम्' म्हणजे पुरे झाली, असा हा निषेध आहे. का बरे? कारण ती मुखशोभा केवळ चंद्रातच नाही, तर कमळातही आहे, असे नाही की ती तेथे नाही. अशा प्रकारे, नसलेल्या गोष्टीचीही तशी कल्पना (परिकल्पना) करून मुखाची चंद्राशी तुलना केली जात असल्यामुळे ही 'परिकल्पोपमा' आहे. ၁၉၈. ‘‘မယေ’’စ္စာဒိ. ဟေ ဣန္ဒု အဿ ဣမဿ လောကသာမိနော မုခသောဘာ ဝဒနကန္တိ ဧကကေ မယိ ဧဝ, ဤဒိသီ ဝိကတ္ထနာ အတ္တသိလာဃေန အလံ နိပ္ပယောဇနံ. ကသ္မာတိ စေ? ယတော သာ မုခသောဘာ အမ္ဗုဇေပိ အတ္ထိ, တသ္မာတိ. ဣတိ ဤဒိသာ အယံ ဥပမာ ပရိကပ္ပောပမာ နာမ ဟောတိ. ယတောတိ အနိယမနိဒ္ဒိဋ္ဌကာရဏံ ပန အမ္ဗုဇေပိ သာ အတ္ထီတိ ဒဿိယမာနံ ပဒုမေပိ တဿ အတ္ထိတ္တမေဝ. ပရိကပ္ပနာယ ဝုတ္တာ ဥပမာတိ ဝိဂ္ဂဟော. ဣဓ စန္ဒဿ အဝိဇ္ဇမာနဝိကတ္ထနဿ ဝိဇ္ဇမာနတ္တေန ပရိကပ္ပနတော သဓမ္မဇောတကသဒ္ဒန္တရေ အသတိပိ ဥပမာနဘူတဣန္ဒုနော စ ဥပမေယျဘူတမုခဿ စ သဒိသတ္တံ ဣမေသံ ဒွိန္နံ သဒိသတ္တံ ဝိနာ ဝတ္တုနော တာဒိသကပ္ပနာ ကထံ ဟောတီတိ ဣမာယ အတ္ထသတ္တိယာ ဂမျတေ. १९८. “मये” इत्यादी. हे चंद्रा! या लोकस्वामींच्या (बुद्धांच्या) मुखाची शोभा केवळ माझ्यातच आहे, अशी स्वतःची स्तुती करणारी बढाई आता पुरे, ती निरर्थक आहे. का बरे? कारण ती मुखशोभा कमळातही आहे, म्हणून. अशा प्रकारे ही उपमा 'परिकल्पोपमा' ठरते. 'यतो' (ज्या अर्थी) हे अनिश्चित कारण दर्शवले आहे, परंतु 'ती कमळातही आहे' असे दाखवून कमळामध्येही तिचे अस्तित्व सिद्ध केले आहे. 'परिकल्पनेने सांगितलेली उपमा' असा याचा विग्रह आहे. येथे चंद्राची नसलेली बढाई कल्पनेने अस्तित्वात आणल्यामुळे, समान धर्म दर्शवणारा दुसरा शब्द नसतानाही, उपमान असलेल्या चंद्राचे आणि उपमेय असलेल्या मुखाचे सादृश्य, या दोघांच्या सादृश्याशिवाय वक्त्याची अशी कल्पना कशी होऊ शकते? या अर्थसामर्थ्याने समजून येते. ၁၉၉. १९९. ကိံ ဝါ’မ္ဗုဇ’န္တောဘန္တာလိ,ကိံ လောလနယနံ မုခံ; မမ ဒေါလာယတေ စိတ္တ-မိစ္စ’ယံ သံသယောပမာ. “हे आत भ्रमर फिरणारे कमळ आहे की चंचल डोळे असलेले मुख आहे? माझे मन हिंदोळ्यासारखे (द्विधा मनःस्थितीत) डोलत आहे.” ही 'संशयोपमा' (saṃsayopamā) आहे. ၁၉၉. ‘‘ကိံ ဝါ’’ဣစ္စာဒိ. အန္တော ဘန္တာ အလီ ဘမရာ ယသ္မိံ, တမီဒိသမမ္ဗုဇံ ကိံ ဝါ. လောလာနိ စပလာနိ နယနာနိ ယသ္မိံ, တာဒိသံ ဝါ. ဇိန တဝေဒံ မုခံ ကိန္တိ မမ စိတ္တံ ဒေါလာယတေ [Pg.207] ဒေါလေဝါစရတိ. ဧဝံ ပက္ခဒွယပရိဂ္ဂဟေန သံသယတီတိ အတ္ထော. ဣစ္စယမီဒိသီ သံသယဝေသေန အမ္ဗုဇမုခါနမောပမာဝဂမာ သံသယောပမာ. १९९. “किं वा” इत्यादी. ज्याच्या आत भ्रमर फिरत आहेत असे हे कमळ आहे की काय? किंवा ज्यामध्ये चंचल डोळे आहेत असे हे मुख आहे काय? हे जिन (बुद्ध)! आपले हे मुख काय आहे, या संशयाने माझे मन हिंदोळ्याप्रमाणे डोलत आहे (आचरण करत आहे). अशा प्रकारे दोन्ही बाजूंचा स्वीकार केल्याने संशय निर्माण होतो, असा अर्थ आहे. अशा संशयाच्या रूपाने कमळ आणि मुख यांच्यातील उपमेचे ज्ञान होत असल्यामुळे ही 'संशयोपमा' आहे. ၁၉၉. ‘‘ကိံ ဝါ’မ္ဗုဇေ’’စ္စာဒိ. အန္တောဘန္တာလိ အဗ္ဘန္တရေ ဘမမာနဘမရဝန္တံ အမ္ဗုဇံ ကိံ ဝါ, တုယှံ လောလနယနံ စဉ္စလနေတ္တံ မုခံ ကိံ ဝါတိ မမ စိတ္တံ ဒေါလာယတေ ဥဘယသမ္ဘမဇနနတော ဒေါလာ ဝိယ ဟောတိ. ဣတိ အယံ ဧဝရူပါ ဥပမာ သံသယောပမာ ဒွိန္နံ သဒိသတ္တဿ သံသယေန ပကာသိတတ္တာ သံသယောပမာ နာမ ဟောတိ. အန္တော ဘန္တာ အလီ ယသ္မိန္တိ စ, လောလာနိ နယနာနိ ယသ္မိန္တိ စ, ဒေါလာ ဝိယ အာစရတီတိ စ, သံသယေန ဝုတ္တာ ဥပမာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဣဟာပိ သဓမ္မပကာသကေ သဒ္ဒန္တရေ အသတိပိ ယထာဝုတ္တဝိသေသနဒွယေန ဝိသိဋ္ဌာနံ ဒွိန္နံ အမ္ဗုဇမုခါနံ သံသယနိမိတ္တေ တုလျတ္တေ အသတိ ကထံ သံသယော ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ ဣမိနာ သာမတ္ထိယေနေဝ တုလျဓမ္မသမ္ဗန္ဓော ဂမျတေ. १९९. “किं वा अम्बुजे” इत्यादी. ज्याच्या आत भ्रमर फिरत आहेत असे कमळ आहे की काय, किंवा आपले चंचल डोळे असलेले मुख आहे काय, या विचाराने माझे मन डोलत आहे; कारण दोन्ही गोष्टींमुळे संभ्रम निर्माण होऊन ते हिंदोळ्यासारखे होते. अशा प्रकारे ही उपमा 'संशयोपमा' ठरते, कारण दोन्हीमधील सादृश्य संशयाद्वारे प्रकट केले गेले आहे. 'ज्याच्या आत भ्रमर फिरत आहेत ते' आणि 'ज्यात चंचल डोळे आहेत ते' आणि 'हिंदोळ्याप्रमाणे आचरण करते ते' आणि 'संशयाने सांगितलेली उपमा' असा याचा विग्रह आहे. येथेही समान धर्म प्रकट करणारा दुसरा शब्द नसतानाही, वर सांगितलेल्या दोन विशेषणांनी युक्त असलेल्या कमळ आणि मुख या दोन्हीमधील संशयाचे कारण असलेल्या समानतेशिवाय संशय कसा उत्पन्न होऊ शकतो? या सामर्थ्यानेच समान धर्माचा संबंध समजून येतो. ၂၀၀. २००. ကိဉ္စိ ဝတ္ထုံ ပဒဿေတွာ,သဓမ္မဿာ’ဘိဓာနတော; သာမျပ္ပတီတိသဗ္ဘာဝါ,ပတိဝတ္ထူပမာ ယထာ. एखादी वस्तू दर्शवून, तिच्याशी समान धर्म असलेल्या दुसऱ्या वस्तूचे कथन केल्यामुळे, त्यांच्यातील सादृश्याची प्रचिती (ज्ञान) होत असल्यामुळे ती 'प्रतिवस्तूपमा' (pativatthūpamā) ठरते, जसे की- ၂၀၀. ‘‘ကိဉ္စိ’’ဣစ္စာဒိ. ကိဉ္စိ ဝတ္ထုမိစ္ဆိတံ သမ္ဗုဒ္ဓါဒိကံ ဥပဒဿေတွာ သဓမ္မဿ တေန ဝတ္ထုနာ ကေနစိ အာကာရေန သဒိသဿ အညဿ ဝတ္ထုနော အဘိဓာနတော သာမျဿ တေသံ ဒွိန္နံ သဒိသတ္တဿ ပတီတိယာ အဝသာယဿ သမ္ဘာဝါ ဝိဇ္ဇမာနတ္တေန ပတိဝတ္ထူပမာ ဝုစ္စတေ. ပတိဝတ္ထုနာ တထာဝိဓေနာဓိဂတဿ ဝတ္ထုနော တုလျတာ ပဋိပါဒိတာ. ယထေတျုဒါဟရတိ. २००. “किंचि” इत्यादी. कोणतीही इष्ट वस्तू जसे की सम्यक्संबुद्ध इत्यादी दर्शवून, त्या वस्तूशी कोणत्या तरी प्रकारे समान असलेल्या दुसऱ्या वस्तूचे कथन केल्यामुळे, त्या दोन्हीमधील सादृश्याची प्रचिती (निश्चय) होत असल्यामुळे तिला 'प्रतिवस्तूपमा' म्हटले जाते. प्रतिवस्तूद्वारे (दुसऱ्या वस्तूद्वारे) तशा प्रकारे प्राप्त झालेल्या वस्तूची समानता प्रतिपादित केली जाते. 'यथा' (जसे की) द्वारे उदाहरण दिले जाते. ၂၀၀. ‘‘ကိဉ္စိ’’စ္စာဒိ. ကိဉ္စိ ဝတ္ထုမိစ္ဆိတံ ဇိနာဒိကိဉ္စိပဒတ္ထံ ဥပဒဿေတွာ ပဌမံ နိဒဿေတွာ သဓမ္မဿ ပဋိပါဒနီယအတ္ထေန သဟ [Pg.208] ကိဉ္စိ အာကာရေန သဒိသဘာဝဿ ကဿစိ ဝတ္ထုနော အဘိဓာနတော ကထနတော သာမျပ္ပတီတိသဗ္ဘာဝါ သဒိသတာသမ္ဗန္ဓိနော ပရိဇာနနဿ ဝိဇ္ဇမာနတ္တာ ပတိဝတ္ထူပမာ ဝတ္ထုနော ဥပဋ္ဌိတဿ ဇိနာဒိပဒတ္ထဿ တုလျတ္ထပကာသနတော နာမေန ပတိဝတ္ထူပမာ နာမ. သမာနော ဓမ္မော ယဿ ဝါ ပါရိဇာတာဒိနော ဣတိ စ, သမာနာနံ တုလျာနံ ဥပမာနောပမေယျာနံ ဘာဝေါတိ စ, သာမျဿ ပတီတိ စ, သာမျပ္ပတီတိယာ သဗ္ဘာဝေါတိ စ, ပတိဝတ္ထုနာ ဝုတ္တာ ဥပမာတိ စ ဝါကျံ. ယထာတိ ဥဒါဟရတိ. २००. “किंचि” इत्यादी. कोणतीही इष्ट वस्तू जसे की जिन (बुद्ध) इत्यादी पदार्थ प्रथम दर्शवून (उदाहरणादाखल मांडून), प्रतिपादन करावयाच्या अर्थाशी कोणत्या तरी प्रकारे समान भाव असलेल्या दुसऱ्या एखाद्या वस्तूचे कथन केल्यामुळे, सादृश्याच्या प्रचितीचे अस्तित्व (सादृश्याचे ज्ञान) असल्यामुळे ती 'प्रतिवस्तूपमा' ठरते. उपस्थित केलेल्या जिन इत्यादी पदार्थांच्या समान अर्थाचे प्रकाशन करणाऱ्या प्रतिवस्तूमुळे तिला 'प्रतिवस्तूपमा' हे नाव मिळाले आहे. 'ज्याचा समान धर्म आहे तो पारिजात इत्यादी' आणि 'समान असलेल्या उपमान व उपमेयांचा भाव' आणि 'सादृश्याची प्रचिती' आणि 'सादृश्याच्या प्रचितीचे अस्तित्व' आणि 'प्रतिवस्तूद्वारे सांगितलेली उपमा' असा या वाक्याचा विग्रह आहे. 'यथा' (जसे की) द्वारे उदाहरण दिले जाते. ၂၀၁. २०१. ဇနေသု ဇာယမာနေသု,နေ’ကောပိ ဇိနသာဒိသော; ဒုတိယော နနု နတ္ထေဝ,ပါရိဇာတဿ ပါဒပေါ. “उत्पन्न होणाऱ्या मानवांमध्ये एकही मनुष्य जिनांच्या (बुद्धांच्या) समान नाही; पारिजात वृक्षासारखा दुसरा वृक्ष खरोखर अस्तित्वातच नाही ना?” ၂၀၁. ‘‘ဇနေသု’’စ္စာဒိ. ဇာယမာနေသု ဇနေသု မဇ္ဈေ ဧကောပိ ဇနော ဂုဏဝါ ဇိနသာဒိသော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓသမာနော န ဝိဇ္ဇတီတျေကံ တာဝ ဝတ္ထု ဥပဒဿိတံ, ဒုတိယော ဣစ္စာဒိ ပတိဝတ္ထူပမဒဿနံ, နနူတျနုမတိယံ, ပါရိဇာတဿ ဒိဗ္ဗရုက္ခဝိသေသဿ ဒုတိယော သမာနော ပါဒပေါ နတ္ထေဝ. ပါရိဇာတောယေဝ ရုက္ခဇာတီသု ဥတ္တမော, တထာ ဇိနော ဇနေသူတိ. २०१. “जनेसु” इत्यादी. उत्पन्न होणाऱ्या मानवांमध्ये एकही गुणवान मनुष्य जिनांच्या समान (सम्यक्संबुद्धांच्या समान) नाही, ही पहिली वस्तू दर्शवली आहे. 'दुतियो' इत्यादी प्रतिवस्तूपमेचे दर्शन आहे. 'ननु' हा शब्द संमती दर्शवतो. पारिजात या दिव्य वृक्षविशेषासारखा दुसरा समान वृक्ष अस्तित्वातच नाही. वृक्षजातींमध्ये पारिजातच जसा उत्तम आहे, तसेच मानवांमध्ये जिन (बुद्ध) उत्तम आहेत. ၂၀၁. ‘‘ဇနေသု’’စ္စာဒိ. ဇာယမာနေသု ဇနေသု ဧကောပိ ဇိနသာဒိသော သမ္ဗုဒ္ဓသဒိသော နတ္ထိ, ပါရိဇာတဿ ရုက္ခဿ ဒုတိယော တေန သမော ဒုတိယော ပါဒပေါ ရုက္ခော နတ္ထိ ဧဝ နနု, နနူတိ အနုညာယံ. တေန သဗ္ဗညုနော အညေန အတုလျဘာဝံ အနုဇာနာတိ. ဣဟ ပါရိဇာတရုက္ခဿ အညေဟိ ရုက္ခေဟိ ဥတ္တမတ္တဉ္စ ဗုဒ္ဓဿ အညေသု သတ္တေသု ဥတ္တမတ္တဉ္စာတိ ဣဒံ ဒွယံ ဥပမာနောပမေယျဘူတာနံ ဒွိန္နံ ဝတ္ထူနံ သာမျံ နာမ, ဧတံ သာမျံ ဝုတ္တတ္ထဿ သမတ္ထနဝသေန ပတိဝတ္ထုဘူတပါရိဇာတဿ ရုက္ခေဟိ အသမာနတ္တကထနေနေဝ ဇောတိတံ ဟောတိ. २०१. “जनेसु” इत्यादी. जन्म घेणाऱ्या मनुष्यांमध्ये एकही जिनांसारखा (जिनांच्या सदृश) किंवा सम्यक्संबुद्धांसारखा नाही. पारिजात वृक्षासारखा दुसरा त्याच्याशी समान असणारा दुसरा वृक्ष नाहीच की! 'ननु' हा शब्द अनुमती (स्वीकृती) दर्शवण्यासाठी आहे. याद्वारे सर्वज्ञांचे (बुद्धांचे) इतरांशी असणारे अतुलनीयत्व मान्य केले जाते. येथे पारिजात वृक्षाचे इतर वृक्षांपेक्षा श्रेष्ठ असणे आणि बुद्धांचे इतर प्राण्यांपेक्षा श्रेष्ठ असणे, हे दोन्ही उपमान आणि उपमेय बनलेल्या दोन वस्तूंचे 'साम्य' (सारखेपणा) होय. हे साम्य, सांगितलेल्या अर्थाचे समर्थन करण्याच्या हेतूने, प्रतिवस्तू बनलेल्या पारिजात वृक्षाचे इतर वृक्षांशी असणारे असमानत्व सांगण्याद्वारेच प्रकट होते. ၂၀၂. २०२. ဝါကျတ္ထေနေဝ [Pg.209] ဝါကျတ္ထော,ယဒိ ကောစျု’ပမီယတေ; ဣဝယုတ္တဝိယုတ္တတ္တာ,သာ ဝါကျတ္ထောပမာ ဒွိဓာ. “जर वाक्यार्थानेच दुसऱ्या वाक्यार्थाची तुलना केली जात असेल, तर 'इव' (सारखा/प्रमाणे) शब्दाच्या योगाने (युक्त) आणि वियोगाने (वियुक्त) ती 'वाक्यार्थोपमा' दोन प्रकारची होते.” ၂၀၂. ဝါကျတ္ထဝိသယောပမံ ဒဿေတိ ‘‘ဝါကျတ္ထေနေဝိ’’စ္စာဒိနာ. ဝါကျတ္ထော ကြိယာကာရကသမ္ဗန္ဓဝိသေသော, တေနေဝ, န ပဒတ္ထမတ္တေန ဝါကျတ္ထော ဝုတ္တလက္ခဏော ကောစိ ဝတ္တုမိစ္ဆိတော ကောစိ ယဒိ ဥပမီယတေ သဒိသော ကထျတေ, သာ ဝါကျတ္ထောပမာ ဒွိဓာ ဘိဇ္ဇတေ. ကထံ? ယုတ္တာ စ ဝိယုတ္တာ စ ယုတ္တဝိယုတ္တာ, ဣဝေန အတ္ထနိဒ္ဒေသောယံ ယုတ္တဝိယုတ္တာ ဥပမာ, တဿာ ဘာဝါ ကာရဏာ ဒွိဓာတိ အဓိကတံ. २०२. “वाक्यार्थेनेच” इत्यादीद्वारे वाक्यार्थविषयक उपमा दर्शवितात. वाक्यार्थ म्हणजे क्रिया आणि कारक यांच्यातील विशिष्ट संबंध; केवळ शब्दाच्या अर्थाने (पदार्थाने) नव्हे, तर त्याच वाक्यार्थाने. जर पूर्वोक्त लक्षणांनी युक्त असा कोणताही सांगण्याची इच्छा असलेला वाक्यार्थ उपमेय केला जात असेल (म्हणजेच सदृश सांगितला जात असेल), तर ती वाक्यार्थोपमा दोन प्रकारांत विभागली जाते. कसे? युक्त (जोडलेली) आणि वियुक्त (विरहित) ती 'युक्तवियुक्त'. 'इव' शब्दाने अर्थाचा निर्देश करणारी ही युक्त-वियुक्त उपमा आहे. तिच्या अस्तित्वामुळे (किंवा कारणामुळे) ती दोन प्रकारची आहे, असे अधिक स्पष्ट केले आहे. ၂၀၂. ဣဒါနိ ဝါကျတ္ထဝိသယောပမံ ဒဿေတိ ‘‘ဝါကျတ္ထေ’’စ္စာဒိနာ. ဝါကျတ္ထေနေဝ ကြိယာကာရကသမ္ဗန္ဓဝိသေသသင်္ခတသမုဒါယဘူတေန ဝါကျတ္ထေန ကောစိ ဝတ္တုမိစ္ဆိတော ယော ကောစိ ဝါကျတ္ထော ဝုတ္တလက္ခဏော ယဒိ ဥပမီယတေ သဒိသဘာဝေန ကထီယတေ, သာ ဥပမာ ဝါကျတ္ထောပမာ နာမ ဟောတိ. ဣဝယုတ္တဝိယုတ္တတ္တာ ဣဝယုတ္တဝိယုတ္တဝသေန ဒွိဓာ ဒွိပ္ပကာရာ. ဧတ္ထ ‘‘ဣဝါ’’တိ ဣဝါဒီနမတ္ထဿ ဂဟိတတ္တာ ဣဝသဒ္ဒေါပိ တပ္ပရိယာယသဒ္ဒါပိ ဂယှန္တေ. २०२. आता “वाक्यार्थ” इत्यादीद्वारे वाक्यार्थविषयक उपमा दर्शवितात. क्रिया आणि कारक यांच्या विशिष्ट संबंधाने बनलेल्या समुदायस्वरूप वाक्यार्थानेच, जर पूर्वोक्त लक्षणांनी युक्त असा कोणताही सांगण्याची इच्छा असलेला वाक्यार्थ उपमेय केला जात असेल (म्हणजेच सदृश भावाने सांगितला जात असेल), तर ती उपमा 'वाक्यार्थोपमा' नावाची होते. 'इव' शब्दाच्या योगाने आणि वियोगाने ती दोन प्रकारची होते. येथे 'इव' या शब्दाने 'इव' इत्यादींच्या अर्थाचे ग्रहण केल्यामुळे 'इव' शब्द आणि त्याचे समानार्थी शब्द देखील घेतले जातात. ဣဝယုတ္တ इव-युक्त (इव शब्दाने युक्त) ၂၀၃. २०३. ဇိနော သံက္လေသတတ္တာနံ,အာဝိဘူတော ဇနာန’ယံ; ဃမ္မသန္တာပတတ္တာနံ,ဃမ္မကာလေ’မ္ဗုဒေါ ဝိယ. “संक्लेशांनी (क्लेशांनी) तप्त झालेल्या लोकांच्या कल्याणासाठी हे जिन (बुद्ध) प्रकट झाले आहेत; जसे उन्हाच्या तापाने तप्त झालेल्या लोकांसाठी उन्हाळ्यात मेघ (ढग) प्रकट होतो.” ၂၀၃. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဇိနော’’ဣစ္စာဒိ. သံက္လေသေဟိ ဒသဝိဓေဟိ တတ္တာနံ သန္တာပံ အနုပ္ပတ္တာနံ ဇနာနံ အယံ ဇိနော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ [Pg.210] အာဝိဘူတော ကတကိစ္စတ္တာ သမ္မာသမ္ဗောဓာဓိဂမေန လောကေ ပါတုဘူတော. ဧကံ တာဝ ဝါကျမုပမေယျဘူတံ. ကိမိဝေတျာဟ ‘‘ဃမ္မေ’’စ္စာဒိ. ဃမ္မသန္တာပေန တတ္တာနံ ဇနာနံ ဃမ္မကာလေ ဂိမှာနသမယေ အမ္ဗုဒေါ မေဃော ဝိယာတိ ဒုတိယဝါကျမုပမာနဘူတမိတျယမိဝယုတ္တာ ဝါကျတ္ထောပမာ. ဧတ္ထ ပုဗ္ဗုတ္တရဝါကျတ္ထာနံ ဝိသေသျဝိသေသနဘာဝေါ ဧကဝါကျတ္ထတ္တာဝ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဧဝမုပရိပိ. २०३. “जिनो” इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. दहा प्रकारच्या संक्लेशांनी (क्लेशांनी) तप्त झालेल्या आणि संतापाला प्राप्त झालेल्या लोकांसाठी हे जिन सम्यक्संबुद्ध प्रकट झाले आहेत, म्हणजेच कृतकृत्य झाल्यामुळे सम्यक्संबोधीच्या प्राप्तीने जगात प्रकट झाले आहेत. हे पहिले वाक्य उपमेयभूत आहे. कशाप्रमाणे? यावर “घम्म” इत्यादी म्हणतात. उन्हाच्या तापाने तप्त झालेल्या लोकांसाठी उन्हाळ्यात (ग्रीष्म ऋतूत) मेघ (ढग) जसा प्रकट होतो, हे दुसरे वाक्य उपमानभूत आहे. अशा प्रकारे ही 'इव-युक्त वाक्यार्थोपमा' आहे. येथे पूर्व आणि उत्तर वाक्यार्थांचा विशेष्य-विशेषण भाव हा एकाच वाक्यार्थाप्रमाणे समजला पाहिजे. पुढेही याचप्रमाणे समजावे. ၂၀၃. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဇိနော’’စ္စာဒိနာ. အယံ ဇိနော ဧသော ဇိတပဉ္စမာရော သတ္ထာ သံက္လေသတတ္တာနံ အနေကပ္ပကာရ ကိလေသသန္တာပတတ္တာနံ ဇနာနံ အာဝိဘူတော ကတကိစ္စော ဟုတွာ သဗ္ဗညုတညာဏာဓိဂမေန လောကေ ဥပဋ္ဌိတော. ကေန သန္တတ္တဿ ကဿစိ ကိမိဝေတိ စေ? ဃမ္မသန္တာပတတ္တာနံ ဇနာနံ ဃမ္မကာလေ ဂိမှသမယေ အမ္ဗုဒေါဝိယ မေဃော ဣဝ. ဣဟ ဥတ္တရဝါကျတ္ထော ဘေဒကတ္တာ ဝိသေသနံ ဟောတိ, ပုဗ္ဗဝါကျတ္ထော ပန ဘေဒျတ္တာ ဝိသေသျော ဟောတိ. ဧဝံ ဝါကျဘေဒေ သတိပိ ဝါကျတ္ထော ဧကောဝေတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဧဝမုတ္တရတြာပိ. ဥတ္တရဝါကျေ ဣဝသဒ္ဒေါ တသ္မိံယေဝ ဂုဏဂုဏီပဒတ္ထာနံ သဒိသတ္တံ ဒီပေတိ, ပုဗ္ဗဝါကျေ ဂုဏဂုဏီနံ သဒိသတ္တံ ပန ဥတ္တရဝါကျတ္ထဿ ပုဗ္ဗဝါကျေန သမာနတ္တံ ဝိနာ အညထာနုပပတ္တိယာ ဉာယတိ. သံက္လေသေဟိ တတ္တာတိ စ, ဃမ္မော ဧဝ သန္တာပေါတိ စ, တေန တတ္တာတိ စ, ဃမ္မော ဧဝ ကာလောတိ စ ဝါကျံ. २०३. “जिनो” इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. हे जिन, ज्यांनी पाच मारांवर विजय मिळवला आहे असे शास्ता (बुद्ध), अनेक प्रकारच्या क्लेशांच्या संतापाने तप्त झालेल्या लोकांसाठी प्रकट झाले आहेत, म्हणजेच कृतकृत्य होऊन सर्वज्ञता-ज्ञानाच्या प्राप्तीने जगात उपस्थित झाले आहेत. कोणा तप्त झालेल्यासाठी कशाप्रमाणे? असे विचारल्यास, उन्हाच्या तापाने तप्त झालेल्या लोकांसाठी उन्हाळ्यात (ग्रीष्म ऋतूत) मेघाप्रमाणे (ढगाप्रमाणे). येथे उत्तर वाक्यार्थ भेदक असल्यामुळे विशेषण होतो, आणि पूर्व वाक्यार्थ भेद्य असल्यामुळे विशेष्य होतो. अशा प्रकारे वाक्यांमध्ये भेद असला तरी वाक्यार्थ एकच आहे असे समजावे. पुढेही याचप्रमाणे समजावे. उत्तर वाक्यातील 'इव' शब्द त्यातीलच गुण आणि गुणी या पदांच्या अर्थांचे सादृश्य दर्शवतो, तर पूर्व वाक्यातील गुण आणि गुणी यांचे सादृश्य हे उत्तर वाक्यार्थाच्या पूर्व वाक्यार्थाशी असणाऱ्या समानतेशिवाय इतर कोणत्याही प्रकारे सिद्ध होऊ शकत नसल्यामुळे (अन्यथानुपपत्तीने) समजून येते. “संक्लेशांनी तप्त”, “उष्णता हाच संताप”, “त्याने तप्त”, आणि “उन्हाळा हाच काळ” असा या वाक्याचा विग्रह आहे. ဣဝဝိယုတ္တ इव-वियुक्त (इव शब्दाने विरहित) ၂၀၄. २०४. မုနိန္ဒာနန’မာဘာတိ, ဝိလာသေကမနောဟရံ; ဥဒ္ဓံ သမုဂ္ဂတဿာပိ, ကိံ တေ စန္ဒ ဝိဇမ္ဘနာ. “सौंदर्याने अद्वितीय आणि मनोहर असणारे मुनींद्रांचे (बुद्धांचे) मुख शोभून दिसते; हे चंद्रा, तू आकाशात वर उदित झाला असलास तरी तुझ्या या गर्विष्ठ विहाराचा (प्रसार पाडण्याचा) काय उपयोग?” ၂၀၄. ဒုတိယမာဟ ‘‘မုနိန္ဒ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဝိလာသေန ဧကမတုလျံ မနောဟရံ ဒုတိယဿ တာဒိသဿာဘာဝတော မုနိန္ဒာနနံ [Pg.211] အာဘာတိ အတိသယေန သောဘတေတိ ဧကံ တာဝ ဝါကျမုပမေယျဘူတံ. ဘော စန္ဒ ဥဒ္ဓံ ဂဂနတလံ သမုဂ္ဂတဿာပိ အဗ္ဘုဋ္ဌိတဿာပိ တေ တဝ ဝိဇမ္ဘနာ သာဟံကာရပရိဗ္ဘမနေန ကိံ ပယောဇနံ န ကိံပိ, တံသဒိသသောဘာသမ္ပတ္တိယာဘာဝတော. အသဒိသတ္တံ မုနိန္ဒာနနဿ တဿ တတောပိ ဥဒ္ဓမုဂ္ဂစ္ဆတော ဝိလာသမတ္တမေဝ ဖလသမ္ဘဝတောတိ ဒုတိယဝါကျမုပမာနဘူတံ. တထာ ဟေတ္ထ သဗ္ဗထာ သဒိသတာပတီတိယာ ကရိယမာနာနမုဂ္ဂမနဝိဇမ္ဘနာနံ ပဋိက္ခေပေန ကထဉ္စိပိ မုခစန္ဒာနံ သာဓမ္မပတီတိ ဥပမာဝဂမောတိ အယမိဝဝိယုတ္တဝါကျတ္ထောပမာ. २०४. “मुनींद्र” इत्यादीद्वारे दुसरे उदाहरण सांगतात. सौंदर्याने अद्वितीय आणि मनोहर असणारे, तसेच त्याच्यासारखे दुसरे नसल्यामुळे मुनींद्रांचे मुख अत्यंत शोभून दिसते, हे पहिले वाक्य उपमेयभूत आहे. हे चंद्रा! आकाशात वर उदित झालेल्याही तुझ्या गर्विष्ठ विहाराचा (अहंकाराने फिरण्याचा) काय उपयोग? काहीच नाही, कारण तुझ्याकडे मुनींद्रांच्या मुखासारखी शोभा नाही. मुनींद्रांच्या मुखाचे असमानत्व आणि त्याहूनही वर जाणाऱ्या चंद्राच्या केवळ विलासाचाच संभव असणे, हे दुसरे वाक्य उपमानभूत आहे. कारण येथे सर्व प्रकारे सादृश्य प्रतीत व्हावे म्हणून केल्या जाणाऱ्या उदित होण्याच्या आणि विहाराच्या निषेधाद्वारे, मुख आणि चंद्र यांच्यातील साधर्म्याची प्रतीती होऊन उपमेचा बोध होतो, म्हणून ही 'इव-वियुक्त वाक्यार्थोपमा' आहे. ၂၀၄. ဣဒါနိ ဣဝဝိယုတ္တဝါကျတ္ထောပမံယေဝ ဥဒါဟရတိ ‘‘မုနိန္ဒာနနိ’’စ္စာဒိနာ. ဝိလာသေကမနောဟရံ လီလာယ အတုလျံ တတောယေဝ မနောဟရံ မုနိန္ဒာနနံ သဗ္ဗညုနော ဝဒနံ အာဘာတိ အတိဒိဗ္ဗတိ, တသ္မာ ဟေ စန္ဒ ဥဒ္ဓံ ဥစ္စံ နဘံ သမုဂ္ဂတဿာပိ တေ တုယှံ ဝိဇမ္ဘနာ အဟံကာရေန ပရိဗ္ဘမနေန ကိံ ပယောဇနံ. ဣဟ ပုဗ္ဗဝါကျတ္ထဿ ဥတ္တရဝါကျတ္ထော ဣဝဝိယုတ္တောပမာ နာမ ဟောတိ. တထာ ဟိ ‘‘သဗ္ဗထာ မုခေန သဒိသော ဘဝါမီ’’တိ မာနံ ကရောန္တဿ စန္ဒဿ ဂဂနတလာရောဟောပိ ဝိဇမ္ဘနဉ္စေတိ ဣမေသံ ဒွိန္နံ ပဋိက္ခေပေန မုခစန္ဒာနံ ဝိလာသေကမနောဟရတ္တံ ကန္တိမတ္တသင်္ခါတသဒိသတ္တံ ဣဝါဒီနမဘာဝေပိ ဝိညာယတီတိ ကတွာ ဥတ္တရဝါကျတ္ထော ပုဗ္ဗဝါကျတ္ထဿ ဥပမာ စ ဝိသေသနဉ္စ ဟောတိ. ဝိလာသေန ဧကမတုလျန္တိ စ, တဉ္စ တံ မနောဟရဉ္စာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. အပိသဒ္ဒေါ သမ္ဘာဝနတ္ထော. २०४. आता “मुनींद्रानन” इत्यादीद्वारे इव-वियुक्त वाक्यार्थोपमेचेच उदाहरण देतात. सौंदर्याने अद्वितीय आणि म्हणूनच मनोहर असणारे मुनींद्रांचे म्हणजेच सर्वज्ञांचे मुख अत्यंत शोभून दिसते. म्हणून हे चंद्रा! आकाशात वर उदित झालेल्याही तुझ्या गर्विष्ठ विहाराचा (अहंकाराने फिरण्याचा) काय उपयोग? येथे पूर्व वाक्यार्थासाठी उत्तर वाक्यार्थ हा 'इव-वियुक्त उपमा' नावाचा होतो. कारण “मी सर्व प्रकारे मुखासारखा होईन” असा अभिमान बाळगणाऱ्या चंद्राचे आकाशात चढणे आणि त्याचा विहार या दोन्ही गोष्टींच्या निषेधाद्वारे, मुख आणि चंद्र यांचे सौंदर्याने अद्वितीय असणे आणि कांतिमय असणे हे सादृश्य 'इव' इत्यादी शब्दांच्या अभावीही समजून येते; त्यामुळे उत्तर वाक्यार्थ हा पूर्व वाक्यार्थाची उपमा आणि विशेषण बनतो. “विलासाने अद्वितीय” आणि “तेच मनोहर” असा याचा विग्रह आहे. 'अपि' हा शब्द संभावनेच्या अर्थात आहे. ၂၀၅. २०५. သမုဗ္ဗေဇေတိ ဓီမန္တံ, ဘိန္နလိင်္ဂါဒိကံ တု ယံ; ဥပမာဒူသနာယာ’လ-မေတံ ကတ္ထစိ တံ ယထာ. “जे भिन्न लिंग इत्यादी दोषांनी युक्त असते, ते बुद्धिमान माणसाला उद्विग्न करते. हे काही ठिकाणी उपमेला दूषित करण्यासाठी पुरेसे असते, जसे की...” ၂၀၅. ဒေါသပရိစ္ဆေဒေ [Pg.212] ဒုဋ္ဌာလင်္ကတီတိမုပမာလင်္ကာရဒူသနံ ဒဿေတုမာဟ ‘‘သမုဗ္ဗေဇေတိ’’စ္စာဒိ. ယံ ဘိန္နလိင်္ဂါဒိကံ တု, အာဒိသဒ္ဒေန ဘိန္နဝစနဟီနတာအဓိကတာဒီနံ ပရိဂ္ဂဟော. တုသဒ္ဒေါ အတ္ထဇောတကော, တထာပီတိ အတ္ထော. ဓီမန္တံ မေဓာဝိံ သမုဗ္ဗေဇေတိ န ပီဏေတိ, ဧတံ ဘိန္နလိင်္ဂဒိကံ ကတ္ထစိ န သဗ္ဗတ္ထ ဥပမာဒူသနာယ ဝိရောဓတ္ထံ အလံ သမတ္ထံ. ‘‘တံ ယထေ’’တိ ဥဒါဟရတိ. २०५. दोषपरिच्छेदामध्ये 'दुष्ट अलंकार' या अंतर्गत उपमा अलंकारातील दोष दर्शवण्यासाठी “समुब्बेजेति” इत्यादी म्हणतात. जे भिन्न लिंग इत्यादी दोष आहेत, येथे 'आदि' शब्दाने भिन्न वचन, हीनता, अधिकता इत्यादींचे ग्रहण केले जाते. 'तु' हा शब्द अर्थाचा द्योतक आहे, त्याचा अर्थ 'तरीही' असा आहे. बुद्धिमान (मेधावी) माणसाला उद्विग्न करते, आनंदित करत नाही. हे भिन्न लिंग इत्यादी दोष काही ठिकाणी (सर्व ठिकाणी नव्हे) उपमेला दूषित करण्यासाठी किंवा विरोध निर्माण करण्यासाठी पुरेसे (समर्थ) असतात. “तम् यथा” (जसे की) असे म्हणून उदाहरण देतात. ၂၀၅. ဒေါသပရိစ္ဆေဒေ ဒေါသာနမနုဒ္ဒေသာဝသာနေ နိဒ္ဒိဋ္ဌာယ ဒုဋ္ဌာလင်္ကတိယာ ဒဿေတဗ္ဗဥဒါဟရဏေ – २०५. दोषपरिच्छेदात दोषांच्या निर्देशानंतर शेवटी दर्शविलेल्या दुष्टालंकाराचे (दोषयुक्त अलंकाराचे) उदाहरण दाखवताना – ‘‘ဒုဋ္ဌာလင်္ကရဏံ တေတံ, ယတ္ထာလင်္ကာရဒူသနံ; တဿာလင်္ကာရနိဒ္ဒေသေ, ရူပမာဝိဘဝိဿတီ’’တိ. “ते दुष्टालंकरण (दोषयुक्त अलंकार) आहे, जेथे अलंकाराचा दोष असतो; त्या अलंकाराच्या निर्देशात त्याचे रूप प्रकट होईल.” ကတပဋိညာနုသာရေန ဣဒါနိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘သမုဗ္ဗေဇေတိ’’စ္စာဒိ. ယံ ဘိန္နလိင်္ဂါဒိကံ တု ဝက္ခမာနံ ယံ ဘိန္နလိင်္ဂဝစနာဒိကံ ပန ဓီမန္တံ ပညဝန္တံ ကဝိံ သမုဗ္ဗေဇေတိ ‘‘ဧဝံ နာမ ဝတ္တဗ္ဗံ သိယာ’’တိ ဥဗ္ဗေဂံ ဇနေတိ, ဧတံ ဘိန္နလိင်္ဂါဒိကံ ဥပမာဒူသနာယ ယထာဝုတ္တဥပမာဝိနာသနတ္ထံ ကတ္ထစိ ‘‘ဣတ္ထီဝါယံ ဇနော ယာတိ’’ဣစ္စာဒိဝတ္တဗ္ဗဝိသယတော အညတ္ထ အလံ သမတ္ထံ. ‘‘တံ ယထာ’’တိ ဥဒါဟရတိ. ဘိန္နံ ဝိသဒိသဉ္စ တံ လိင်္ဂဉ္စေတိ စ, တံ အာဒိ ယဿ ဝိသဒိသဝစနာဒိနောတိ စ, ဥပမာယ ဒူသနမိတိ စ ဝါကျံ. केलेल्या प्रतिज्ञेनुसार आता दाखवण्यासाठी “समुब्बेजेति” (उद्वेग निर्माण करतो) इत्यादी म्हणतात. जे भिन्नलिंग इत्यादी पुढे सांगितले जाणार आहे, जे भिन्नलिंग आणि वचन इत्यादी बुद्धिमान, प्रज्ञावान कवीला उद्विग्न करते, “असे खरोखर म्हटले पाहिजे का?” असा उद्वेग निर्माण करते, ते भिन्नलिंग इत्यादी उपमेच्या दोषासाठी, वर सांगितलेल्या उपमेचा नाश करण्यासाठी, काही ठिकाणी “इत्थीवायं जनो याति” (हा मनुष्य स्त्रीप्रमाणे जातो) इत्यादी बोलण्याच्या विषयाव्यतिरिक्त इतर ठिकाणी समर्थ आहे. “ते जसे की” असे उदाहरण देतात. भिन्न आणि विसदृश असलेले ते लिंग, आणि विसदृश वचन इत्यादी ज्याच्या सुरुवातीला आहे ते, आणि उपमेचा दोष, असे हे वाक्य आहे. ၂၀၆. २०६. ဟံသီဝါ’ယံ သသီ ဘိန္န-လိင်္ဂါ’ကာသံ သရာနိဝ; ဝိဇာတိဝစနာ ဟီနာ,သာ’ဝ ဘတ္တော ဘဋော’ဓိပေ. “हा शशी (चंद्र) हंसासारखा (हंसिणीसारखा) आहे” हे भिन्नलिंग आहे; “आकाश सरोवरांसारखे आहे” हे विजातीवचन आहे; “स्वामीच्या ठिकाणी सेवक कुत्र्यासारखा निष्ठावान आहे” हे हीन (उपमा) आहे. ၂၀၆. ‘‘ဟံသီဝါယ’’န္တိ အယံ သသီ စန္ဒော ဟံသီဝ ဟံသီသဒိသော. ဘိန္နလိင်္ဂါ ဘိန္နလိင်္ဂေါပမာ. ‘‘အာကာသံ သရာနိဝါ’’တိ ဝိဇာတိဝစနာ ဝိသဒိသဝစနောပမာ. ‘‘ဘဋော အဓိပေ သာမိနိ သာဝ [Pg.213] ဘတ္တော’’တိ ဟီနာ ဟီနောပမာ ကုက္ကုရဿ ဟီနေန ဇာတျာဒိနာ အဓိကဿ ဥပမိတတ္တာ. २०६. “हंसीवायं” म्हणजे हा शशी (चंद्र) हंसीसारखा, हंसीसदृश आहे. (ही) भिन्नलिंगा म्हणजे भिन्नलिंग उपमा आहे. “आकासं सरानिव” ही विजातीवचना म्हणजे विसदृश वचन असलेली उपमा आहे. “भटो अधिपे सामिनि साव भत्तो” (स्वामीच्या ठिकाणी सेवक कुत्र्यासारखा भक्त/निष्ठावान आहे) ही हीना म्हणजे हीनोपमा आहे, कारण कुत्र्यासारख्या जातीने हीन असलेल्या प्राण्याशी श्रेष्ठ (मनुष्याची) उपमा दिली गेली आहे. ၂၀၆. ‘‘ဟံသိ’’စ္စာဒိ. အယံ သသီ စန္ဒော ဟံသီ ဣဝ ဟံသိဓေနူဝ ဟောတိ. ဣစ္စာဒိကောပမာ ဘိန္နလိင်္ဂါ ဥပမေယျတော ဘိန္နလိင်္ဂတ္တာ ဘိန္နလိင်္ဂေါပမာ နာမ ဟောတိ. အာကာသံ နဘံ သရာနိဝါတိ အယံ ဝိဇာတိဝစနာ ဥပမေယျေန ဝိသဒိသဝစနတ္တာ ဝိဇာတိဝစနောပမာ နာမ ဟောတိ. အဓိပေ သာမိနိ ဘဋော သေဝကော သာဝ သုနခေါ ဣဝ ဘတ္တောတိ အယံ ဟီနာ ဇာတိဟီနေန သုနခေန ဥတ္တမဿ ပုရိသဿ ဥပမိတတ္တာ ဟီနောပမာ နာမ ဟောတိ. ဘိန္နံ လိင်္ဂမေတိဿာတိ စ, ဝိဝိဓာ ဇာတိ သဘာဝေါ အဿေတိ စ, ဝိဇာတိ ဝစနံ အဿာ ဥပမာယာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २०६. “हंसी” इत्यादी. हा शशी (चंद्र) हंसीप्रमाणे, मादी हंसाप्रमाणे आहे. इत्यादी उपमा भिन्नलिंगा आहे, कारण उपमेयापेक्षा भिन्न लिंग असल्यामुळे तिला ‘भिन्नलिंगोपमा’ म्हणतात. “आकाश (नभ) सरोवरांसारखे आहे” ही विजातीवचना आहे, कारण उपमेयाशी विसदृश वचन असल्यामुळे तिला ‘विजातीवचनोपमा’ म्हणतात. “अधिपती (स्वामी) च्या ठिकाणी भट (सेवक) ‘सा’ म्हणजे कुत्र्याप्रमाणे भक्त (निष्ठावान) आहे” ही हीना आहे, कारण जातीने हीन असलेल्या कुत्र्याशी उत्तम पुरुषाची उपमा दिली गेल्यामुळे तिला ‘हीनोपमा’ म्हणतात. ‘भिन्न आहे लिंग जिचे ती’ आणि ‘विविध जाती (स्वभाव) आहे जिचा ती’, ‘विजाती वचन आहे ज्या उपमेचे ती’ असा विग्रह आहे. ၂၀၇. २०७. ခဇ္ဇောတော ဘာနုမာလီဝ,ဝိဘာတီတျဓိကောပမာ; အဖုဋ္ဌတ္ထာ ဗလမ္ဘောဓိ,သာဂရော ဝိယ သံခုဘိ. “काजवा सूर्यासारखा प्रकाशतो” ही अधिकोपमा आहे; “सैन्यरूपी समुद्र सागराप्रमाणे खवळला” ही अपुष्टार्था (अस्पष्ट अर्थाची उपमा) आहे. ၂၀၇. ‘‘ခဇ္ဇောတော’’ဣစ္စာဒိ. ခဇ္ဇောတော ဘာနုမာလီဝ သူရိယော ဝိယ ဝိဘာတီတျဓိကောပမာ အဓိကေန ဟီနဿ ဥပမိတတ္တာ. ဗလမ္ဘောဓိ သေနာသာဂရော သာဂရော ဝိယ သံခုဘီတိ အဖုဋ္ဌတ္ထောပမာ ‘‘ဗလမ္ဘောဓီ’’တိ ရူပကေန သေနာယ မဟန္တတ္တာဝဂမတော ပုန ‘‘သာဂရော ဝိယာ’’တိ ဥပမာယ ကဿစိ ဝိသေသတ္ထဿ အသံဖုဋ္ဌတ္တာ. २०७. “खज्जोतो” इत्यादी. काजवा भानुमाली (सूर्य) प्रमाणे प्रकाशतो, ही अधिकोपमा आहे, कारण हीन (कनिष्ठ) वस्तूची अधिक (श्रेष्ठ) वस्तूशी उपमा दिली आहे. “बलम्भोधि” म्हणजे सैन्यरूपी समुद्र सागराप्रमाणे खवळला, ही अपुष्टार्थोपमा आहे, कारण “बलम्भोधि” या रूपकाद्वारे सैन्याचे मोठेपण समजून आल्यानंतर पुन्हा “सागराप्रमाणे” या उपमेने कोणत्याही विशेष अर्थाचा स्पर्श (प्रकटीकरण) होत नाही. ၂၀၇. ‘‘ခဇ္ဇောတော’’စ္စာဒိ. ‘‘ခဇ္ဇောတော ဘာနုမာလီဝ ဝိဘာတီ’’တိ အယံ အဓိကောပမာ အဓိကာယ ဥပမာယ ဥပမိတတ္တာ အဓိကောပမာ နာမ ဟောတိ. ‘‘ဗလမ္ဘောဓိ သေနာသမုဒ္ဒေါ သာဂရော ဝိယ သံခုဘီ’’တိ အယံ အဖုဋ္ဌတ္ထာ သေနာယ မဟတ္တံ ‘‘ဗလမ္ဘောဓီ’’တိ တိရောဘူတဥပမာယေဝ အဝဂတံ, [Pg.214] တသ္မာ ပုန ‘‘သာဂရော ဝိယာ’’တိ ဥပမာယ ဖုသိတဗ္ဗတ္ထဿာဘာဝါ အဖုဋ္ဌတ္ထောပမာ နာမ ဟောတိ. အဖုဋ္ဌော အတ္ထော ဧတိဿာတိ စ, ဗလံ ဧဝ အမ္ဘောဓီတိ စ ဝါကျံ. २०७. “खज्जोतो” इत्यादी. “काजवा सूर्यासारखा प्रकाशतो” ही अधिकोपमा आहे, कारण अधिक (श्रेष्ठ) उपमानाशी उपमित केल्यामुळे तिला ‘अधिकोपमा’ म्हणतात. “सैन्यरूपी समुद्र सागराप्रमाणे खवळला” ही अपुष्टार्था आहे, कारण सैन्याचे मोठेपण “बलम्भोधि” या लुप्तोपमेनेच (रूपकाने) समजते, त्यामुळे पुन्हा “सागराप्रमाणे” या उपमेने स्पष्ट होण्यासारखा कोणताही अर्थ उरत नसल्याने तिला ‘अपुष्टार्थोपमा’ म्हणतात. ‘अपुष्ट (अस्पष्ट) आहे अर्थ जिचा ती’ आणि ‘बल (सैन्य) हाच समुद्र’ असे हे वाक्य आहे. ၂၀၈. २०८. စန္ဒေ ကလင်္ကော ဘိင်္ဂေါဝေ-တျု’ပမာပေက္ခိနီ အယံ; ခဏ္ဍိတာ ကေရဝါကာရော,သကလင်္ကော နိသာကရော. “चंद्रावरील डाग भ्रमरासारखा आहे” ही उपमापेक्षिणी आहे; “डागासहित असलेला निशाकर (चंद्र) कुमुदासारखा (कमळासारखा) आहे” ही खंडिता आहे. ၂၀၈. ‘‘စန္ဒေ’’ဣစ္စာဒိ. ကလင်္ကော ဘိင်္ဂေါ ဝိယာတျယမုပမာ ‘‘စန္ဒေ ကုသုမဂစ္ဆသဒိသေ’’ ဣတျုပမန္တရမပေက္ခတေတိ ယတော စန္ဒေ ဘိင်္ဂေါ န သမ္ဘဝတိ, ပုပ္ဖဂစ္ဆေ တု သမ္ဘဝတီတိ အယမုပမာ ဥပမာပေက္ခိနီ. သကလင်္ကော သသလက္ခဏော နိသာကရော စန္ဒော ကေရဝါကာရော ကုမုဒသန္နိဘောတိ ခဏ္ဍိတောပမာ ကေရဝဿ အန္တောကဏှတ္တံ ပဋိပါဒေတုံ ‘‘သဘိင်္ဂကေရဝါကာရော’’တိ ဝတ္တဗ္ဗတ္တာ. २०८. “चंदे” इत्यादी. “चंद्रावरील डाग भ्रमरासारखा आहे” ही उपमा “फूलझाडासारख्या चंद्रावर” अशा दुसऱ्या उपमेची अपेक्षा करते, कारण चंद्रावर भ्रमर असणे शक्य नाही, परंतु फूलझाडावर ते शक्य आहे; म्हणून ही उपमा ‘उपमापेक्षिणी’ आहे. डागासहित (शशलांछन असलेला) निशाकर चंद्र कुमुदासारखा (कमळासारखा) आहे, ही खंडितोपमा आहे, कारण कुमुदाच्या आतील काळेपणा दर्शवण्यासाठी “सभृंग-कुमुदासारखा” (भ्रमरासहित कमळासारखा) असे म्हणायला हवे होते. ၂၀၈. ‘‘စန္ဒေ’’စ္စာဒိ. ‘‘စန္ဒေ ကလင်္ကော ဘိင်္ဂေါ ဣဝါ’’တိ အယံ ဥပမာပေက္ခိနီ စန္ဒဿဥပမာဘူတပုပ္ဖဂစ္ဆကာဒိအပေက္ခနတော ဥပမာပေက္ခိနီ နာမ ဟောတိ. စန္ဒေ ဘိင်္ဂပဝတ္တိယာ အဘာဝတော တဿ ဝိသယဘူတပုပ္ဖဂစ္ဆကာဒိ စန္ဒဿ ဥပမတ္တေန ဂဟေတွာ အဝုတ္တတ္တာ ဒုဋ္ဌာတိ အဓိပ္ပာယော. သကလင်္ကော ကလင်္ကသဟိတော နိသာကရော စန္ဒော ကေရဝါကာရော ကုမုဒသဒိသောတိ အယံ ခဏ္ဍိတာ စန္ဒဂတံ ကဏှတ္တံ ပကာသေတုံ ‘‘သဘိင်္ဂကေရဝါကာရော’’တိ ဝတ္တဗ္ဗေ ဘိင်္ဂေါပမာဘာဝဿ ခဏ္ဍိတတ္တာ ခဏ္ဍိတောပမာ နာမ ဟောတိ. ဥပမံ အပေက္ခတီတိ စ, ခဏ္ဍံ ဣတာ ဂတာတိ စ, ခဏ္ဍေန ဣတာ ယုတ္တာ ဝါတိ စ, ကေရဝဿာကာရော အဿေတိ စ, သဟ ကလင်္ကေန ဝတ္တတီတိ စ ဝါကျံ. २०८. “चंदे” इत्यादी. “चंद्रावरील डाग भ्रमरासारखा आहे” ही उपमापेक्षिणी आहे, कारण ती चंद्राची उपमा असलेल्या फूलझाड इत्यादींची अपेक्षा करते, म्हणून तिला ‘उपमापेक्षिणी’ म्हणतात. चंद्रावर भ्रमराचे असणे अशक्य असल्याने, त्याचा विषय असलेले फूलझाड इत्यादी चंद्राचे उपमान म्हणून न सांगितल्यामुळे ती दोषयुक्त आहे, असा अभिप्राय आहे. डागासहित असलेला निशाकर चंद्र कुमुदासारखा (कमळासारखा) आहे, ही खंडिता आहे, कारण चंद्रातील काळेपणा प्रकट करण्यासाठी “सभृंग-कुमुदासारखा” असे म्हणायला हवे असताना भ्रमराच्या उपमेचा अभाव खंडित झाल्यामुळे तिला ‘खंडितोपमा’ म्हणतात. ‘उपमेची अपेक्षा करते ती’, ‘खंडाला प्राप्त झालेली’, ‘खंडाने युक्त असलेली’, ‘कुमुदासारखा आकार आहे जिचा ती’ आणि ‘डागासह वर्तमान असलेली’ असे हे वाक्य आहे. ၂၀၉. २०९. ဣစ္စေဝမာဒိရူပေသု, ဘဝန္တိ ဝိဂတာဒရာ; ကရောန္တိ စာ’ဒရံ ဓီရာ, ပယောဂေ ကွစိဒေဝ တု. अशा प्रकारच्या रूपांमध्ये (प्रयोगांमध्ये) विद्वान लोक अनादर दाखवतात; परंतु काही विशिष्ट प्रयोगांमध्ये मात्र ते आदरही दाखवतात. ၂၀၉. ဝုတ္တံ [Pg.215] နိဂမေတိ ‘‘ဣစ္စေဝ’’မာဒိနာ. ရူပေသု ပယောဂေသု. ဝိဂတော အပဂတော အာဒရော သမ္ဘာဝနာ ယေသံ တထာ ဘဝန္တိ. ကိံ ဘိန္နလိင်္ဂါဒိကံ နိယမေနာနာဒရဏီယမေဝ, အနိယမေနေတိ စေ ဂယှူပဂမ္ပိ အတ္ထီတိ အာဟ ‘‘ကရောန္တိ’’စ္စာဒိံ. ကွစိဒေဝ တု ပယောဂေ ဓီရာ ကဝယော အာဒရံ ကရောန္တိ စာတိ. စသဒ္ဒေါ ဝတ္တဗ္ဗန္တရတ္ထံ သမုစ္စိနောတိ. २०९. “इच्चेवम्” इत्यादींनी सांगितलेल्या विषयाचा उपसंहार करतात. रूपांमध्ये म्हणजे प्रयोगांमध्ये. ज्यांचा आदर (सन्मान) निघून गेला आहे, असे ते होतात. काय भिन्नलिंग इत्यादी नियमतः अनादरणीयच आहेत की अनियमतः? जर विचारले, तर ते स्वीकारण्यायोग्य देखील आहेत, म्हणून “करोन्ति” इत्यादी म्हणतात. काही विशिष्ट प्रयोगांमध्ये मात्र धीर (बुढीमान) कवी आदरही करतात. ‘च’ हा शब्द इतर सांगण्यायोग्य अर्थाचा समुच्चय करतो. ၂၀၉. ‘‘ဣစ္စေ’’စ္စာဒိ. ဣတိ အနန္တရံ နိဒ္ဒိဋ္ဌေသု ဧဝမာဒိရူပေသု ပယောဂေသု ဓီရာ ဝိဂတာဒရာ ဘဝန္တိ. ဣမေယေဝ ဓီရာ ကွစိဒေဝ တု ပယောဂေ ဘိန္နလိင်္ဂါဒိကေ အာဒရံ ကရောန္တိ စ. ဣတိ ဧဝံ အယံ ပကာရော အာဒိ ယေသမိတိ စ, တာနိ စ တာနိ ရူပါနိ စေတိ စ, ဝိဂတော အာဒရော ယေသမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. စသဒ္ဒေါ ဝါကျန္တရသမုစ္စယေ. တသ္မာ ဝိဂတာဒရတ္ထေန အညမာဒရကရဏံ ဝုစ္စမာနကထာသန္တတိံ အာကဍ္ဎတိ. २०९. “इच्चे” इत्यादी. याप्रमाणे नंतर निर्देशित केलेल्या अशा प्रकारच्या प्रयोगांमध्ये बुद्धिमान लोक अनादरयुक्त असतात. हेच बुद्धिमान लोक काही विशिष्ट प्रयोगांमध्ये भिन्नलिंग इत्यादींचा आदरही करतात. ‘इति’ म्हणजे अशा प्रकारे, हा प्रकार ज्यांच्या सुरुवातीला आहे ते, आणि ती ती रूपे, आणि ज्यांचा आदर निघून गेला आहे ते, असा विग्रह आहे. ‘च’ हा शब्द दुसऱ्या वाक्याच्या समुच्चयासाठी आहे. म्हणून अनादराच्या अर्थानंतर दुसऱ्या (आदर करण्याच्या) गोष्टीचा उल्लेख करणे हे चालू कथेचा प्रवाह पुढे नेते. ၂၁၀. २१०. ဣတ္ထီဝါ’ယံ ဇနော ယာတိ,ဝဒတျေသာ ပုမာ ဝိယ; ပိယော ပါဏာ ဣဝါ’ယံ မေ,ဝိဇ္ဇာ ဓနမိဝ’စ္စိတာ. “हा मनुष्य स्त्रीप्रमाणे चालतो”, “ही स्त्री पुरुषाप्रमाणे बोलते”, “हा मला प्राणासारखा प्रिय आहे”, “विद्या धनासारखी पूजनीय आहे”. ၂၁၀. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဣတ္ထိ’’စ္စာဒိ. အယံ ဇနော ဣတ္ထီဝ ယာတိ ကြိယာနုဝတ္တိတော. ဧသာ ဣတ္ထီ ပုမာဝ ပုရိသော ဝိယ ဝဒတိ တာဒိသဿ ပါဂဗ္ဘိယယောဂတော. ဧတ္ထ လိင်္ဂနာနတ္တမုပမာနောပမေယျာနံ. အယမိစ္ဆိတော ကောစိ မေ ပါဏာ ဣဝ ပိယော ဣဋ္ဌော, ဝိဇ္ဇာ ဗျာကရဏာဒယော ဓနမိဝ အစ္စိတာ ရာသိကတာတိ ဝစနဘေဒေါ. २१०. “इत्थि” इत्यादी उदाहरण देतात. हा मनुष्य क्रियेच्या अनुकरणामुळे स्त्रीप्रमाणे चालतो. ही स्त्री तशा प्रकारच्या धिटाईमुळे पुरुषाप्रमाणे बोलते. येथे उपमान आणि उपमेयाचे लिंग भिन्न आहे. हा माझा प्रिय कोणीतरी प्राणासारखा प्रिय (इष्ट) आहे, विद्या (व्याकरण इत्यादी) धनासारखी पूजनीय (संचित) आहे, हा वचनाचा भेद आहे. ၂၁၀. ဣဒါနိ ဘိန္နလိင်္ဂါနံ ဂဟေတဗ္ဗဝိသယံ ဒဿေတိ ‘‘ဣတ္ထီဝါ’ယ’’မိစ္စာဒိနာ. အယံ ဇနော ဣတ္ထီဝ အဝိသဒဂမနေန မဟိလာ [Pg.216] ဝိယ ယာတိ. ဧသာ ဣတ္ထီ ပုမာ ဝိယ တာဒိသပါဂဗ္ဘိယယုတ္တတ္တာ ပုရိသော ဝိယ ဝဒတီတိ. ဣဟ ဒွိန္နံ ဥပမာနောပမေယျာနံ လိင်္ဂဘေဒေ သတိပိ ကဝယော အာဒရံ ကရောန္တိ. အယံ ပုရိသော မေ မမ ပါဏာ ဣဝ အာယဝေါဝ ပိယော. အစ္စိတာ သဉ္စိတာ ဝိဇ္ဇာ ဗျာကရဏနိဃဏ္ဋုအာဒယော ဓနမိဝ ဟောန္တီတိ. ဧတ္ထ ဥပမာနောပမေယျာနံ ဝစနတော ဝိသေသတ္တေ သတိပိ ဣဋ္ဌမေဝ. २१०. आता भिन्न लिंगांच्या स्वीकारार्ह विषयाला "इत्थीवाऽयं" (itthīvā'yaṃ) इत्यादींद्वारे दर्शवितात. हा मनुष्य अस्पष्ट चालण्यामुळे स्त्रीसारखा (किंवा) महिलेसारखा चालतो. ही स्त्री पुरुषासारख्या धिटाईने युक्त असल्यामुळे पुरुषासारखी बोलते. येथे उपमान आणि उपमेय या दोन्हीमध्ये लिंगभेद असूनही कवी त्याचा आदर करतात (स्वीकार करतात). हा मनुष्य माझ्यासाठी माझ्या प्राणासारखा प्रिय आहे. पूजनीय आणि संचित केलेले व्याकरण, निघंटू इत्यादी विद्या धनासारख्या आहेत. येथे उपमान आणि उपमेय यांच्या वचनामध्ये भिन्नता (विशेषत्व) असूनही ते इष्टच (स्वीकारार्हच) आहे. ၂၁၁. २११. ဘဝံ ဝိယ မဟီပါလ, ဒေဝရာဇာ ဝိရာဇတေ; အလ’မံသုမတော ကစ္ဆံ, တေဇသာ ရောဟိတုံ အယံ. "हे महीपाल (पृथ्वीचे पालनकर्ते राजे)! आपल्यासारखे देवराज (इंद्र) शोभून दिसतात; हा (राजा) आपल्या तेजाने सूर्याच्या कक्षेत (तेजस्वीपणात) पोहोचण्यास समर्थ आहे." ၂၁၁. ဟီနာဓိကမုတ္တမုဒါဟရဏမာဟ ‘‘ဘဝံ ဝိယိ’’စ္စာဒိ. မဟီပါလေတျာမန္တနံ, ဒေဝရာဇာ ဘဝံ ဝိယ ဝိရာဇတေ. ဣတိ ဟီနေနာပိ ဟောတိ. ဧဝံဝိဓေ သမုစိတေ ဝိသယေ လိင်္ဂဝစနဘေဒါဒိကံ နောပမံ ဒူသေတီတိ. २११. "भवं विय" (bhavaṃ viya) इत्यादींद्वारे हीन, अधिक आणि उत्तम यांचे उदाहरण सांगतात. 'महीपाल' हे संबोधन आहे, देवराज आपल्यासारखे शोभून दिसतात. अशा प्रकारे हीन (उपमानाने) देखील होते. अशा प्रकारच्या योग्य विषयात लिंग, वचन इत्यादींचा भेद उपमेला दूषित करत नाही. ၂၁၁. ‘‘ဘဝ’’မိစ္စာဒိ. မဟီပါလ ဘော ရာဇ, ဒေဝရာဇာ သက္ကော ဒေဝရာဇာ ဘဝံ ဝိယ ဝိရာဇတေတိ. ဧတ္ထ သက္ကမုပါဒါယ ‘‘ဘဝံ ဝိယာ’’တိ ဟီနတ္တေပိ ဣဋ္ဌမေဝ. အယံ ရာဇာ အံသုမတော သူရိယဿ ကစ္ဆံ ပဒဝိံ တေဇသာ အာရောဟိတုံ ပတ္တုံ အလံ သမတ္ထောတိ. ဧတ္ထ တေဇသာ အဓိကောပိ သူရိယော ဥပမာဘူတော ဣဋ္ဌောဝ, ‘‘ကစ္ဆံ အာရောဟိတု’’န္တိ ဣဝသဒ္ဒပရိယာယော. ဤဒိသံ ဘိန္နလိင်္ဂါဒိကောပမာဒိကံ ဥပမာဒူသနံ န ကရောတိ. २११. "भवं" (bhavaṃ) इत्यादी. हे महीपाल म्हणजे हे राजा! देवराज शक्र आपल्यासारखे शोभून दिसतात. येथे शक्राचे ग्रहण करून "आपल्यासारखे" असे हीनत्व (कमीपणा) असूनही ते इष्टच आहे. हा राजा आपल्या तेजाने अंशुमान म्हणजेच सूर्याच्या कक्षेला (पदवीला) प्राप्त करण्यास समर्थ आहे. येथे तेजाने अधिक असलेला सूर्य उपमारूप असूनही इष्टच आहे, "कच्छं आरोहितुं" (कक्षेला प्राप्त करणे) हा 'इव' शब्दाचाच पर्याय आहे. अशा प्रकारचे भिन्न लिंग इत्यादी असलेले उपमान उपमेला दूषित करत नाही. ၂၁၂. २१२. ဥပမာနောပမေယျာနံ, အဘေဒဿ နိရူပနာ; ဥပမေဝ တိရောဘူတ-ဘေဒါ ရူပကမုစ္စတေ. उपमान आणि उपमेय यांच्यातील अभेदाचे (एकत्वाचे) निरूपण करणे, ज्यामध्ये उपमेतील भेद लुप्त (तिरोभूत) झालेला असतो, त्याला 'रूपक' (अलंकार) म्हटले जाते. ၂၁၂. ရူပကံ နိရူပယတိ ‘‘ဥပမာနေ’’စ္စာဒိနာ. ဥပမာနောပမေယျာနံ ယထာဝုတ္တာနံ အဘေဒဿ နာနတ္တာဘာဝဿ နိရူပနာ အာရောပနေန ဥပမာနောပမေယျာနမဘေဒံ ရူပယတိ ဒဿေတီတိ [Pg.217] ရူပကမုစ္စတေ. ဥပမာနဿ ဥပမာနောပမေယျာနမဘေဒါရောပနေန တိရောဘူတော အပါကဋော ဘေဒေါ နာနတ္တံ ယဿာတိ တာဒိသီ ဥပမေဝ ယထာဝုတ္တလက္ခဏာ ရူပကမုစ္စတေ ‘‘ရူပက’’န္တိ. ‘‘ပဒမ္ဗုဇ’’န္တိ ဧတ္ထ ပဒမေဝ အမ္ဗုဇသဒိသတ္တာ အမ္ဗုဇံ ရုပျတေ. ဣတျုပမေယျောပမာနဘူတာနံ ပဒမ္ဗုဇာနမဘေဒါရောပနေန ဥပမာနောပမေယျဂတသာဓမ္မသင်္ခါတာယပိ ဥပမာယ ဘေဒေါ ဝိဇ္ဇမာနောပိ တိရောဟိတော. န တု အာဝိဘူတော ‘‘ပဒံ အမ္ဗုဇမိဝေ’’တိ. သာ စောပမာ တထာဝိဓာ ဥပမာနောပမေယျာနမဘေဒမာယာတိ နာမာတိ ရူပကမုစ္စတေတိ အဓိပ္ပာယော. २१२. "उपमाने" इत्यादींद्वारे रूपकाचे निरूपण करतात. पूर्वोक्त उपमान आणि उपमेय यांच्यातील अभेदाचे म्हणजेच भिन्नतेच्या अभावाचे निरूपण आरोपाद्वारे उपमान आणि उपमेयाचा अभेद दर्शविते, म्हणून त्याला 'रूपक' म्हटले जाते. उपमान आणि उपमेय यांच्यातील अभेदाच्या आरोपामुळे ज्याचा भेद (भिन्नता) तिरोभूत (अस्पष्ट) झाला आहे, अशा पूर्वोक्त लक्षणांनी युक्त उपमेलाच 'रूपक' असे म्हणतात. "पदाम्बुज" (चरणकमळ) येथे चरणच कमळासारखे असल्यामुळे कमळरूपाने दर्शविले जाते. अशा प्रकारे उपमेय आणि उपमान असलेल्या चरण व कमळ यांच्यातील अभेदाच्या आरोपामुळे, उपमान आणि उपमेयातील समान धर्माने युक्त असलेल्या उपमेचा भेद विद्यमान असूनही तो लुप्त (तिरोहित) होतो. "पदं अम्बुजमिव" (चरण कमळासारखे आहे) याप्रमाणे तो प्रकट होत नाही. आणि ती उपमा अशा प्रकारे उपमान व उपमेयाच्या अभेदाला प्राप्त होते, म्हणून तिला 'रूपक' म्हटले जाते, असा अभिप्राय आहे. ၂၁၂. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒိဋ္ဌက္ကမေန ရူပကာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ဥပမာနော’’စ္စာဒိနာ. ဥပမာနောပမေယျာနံ အနန္တရနိဒ္ဒိဋ္ဌဥပမာနောပမေယျာနံ အဘေဒဿ သဘာဝတော ဘေဒေ သတိပိ ဝိဘူတသဒိသတ္တံ နိဿာယ ‘‘သော ဧသော, ဧသော သော’’တိ ဝတ္တာရေဟိ ပရိကပ္ပိတဿ အဘေဒဿ နိရူပနာ ဥပမာနောပမေယျပဒတ္ထေသု ဗုဒ္ဓိယာ အာရောပနံ နိဿာယ တိရောဘူတဘေဒါ ‘‘ပဒံ အမ္ဗုဇမိဝါ’’တိ ဧဝံ ပါကဋနာနတ္တံ ဝိနာ ‘‘ပဒမ္ဗုဇ’’န္တိ တိရောဟိတဘေဒါ ဥပမေဝ ပဒတ္ထာနံ သာဓမ္မသင်္ခါတာ ဥပမာ ဧဝ ရူပကံ ဣတိ ဝုစ္စတေ. ဝိဘူတသဒိသတ္တံ နိဿာယ ဥပမာနောပမေယျဝတ္ထူနိ အဘေဒေန ဂယှန္တိ. တေသမဘေဒဂ္ဂဟဏေနေဝ တေ နိဿာယ ပဝတ္တမာနဘိန္နသာဓမ္မသင်္ခါတာယ ဥပမာယပိ ဘေဒေါ တိရောဟိတော ဟောတိ. ဧဝံ တိရောဘူတနာနတ္တဝန္တသာဓမ္မသင်္ခါတာ ဥပမာ ဧဝ ဝတ္ထူနမဘေဒံ ဒီပေတီတိ ရူပကံ နာမ ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. တိရောဘူတော ဘေဒေါ ယဿေတိ စ, အဘေဒံ ရူပယတိ ပကာသေတီတိ စ ဝါကျံ. २१२. आता निर्दिष्ट केलेल्या क्रमाने "उपमानो" इत्यादींद्वारे रूपक अलंकाराला दर्शवितात. नुकत्याच सांगितलेल्या उपमान आणि उपमेय यांच्यात स्वाभाविकपणे भेद असूनही, त्यांच्यातील अतिशय सादृश्याचा आश्रय घेऊन "तो हाच आहे, हा तोच आहे" अशा प्रकारे वक्त्यांनी कल्पिलेल्या अभेदाचे निरूपण करणे, म्हणजेच उपमान आणि उपमेय यांच्या पदार्थांवर बुद्धीने केलेल्या आरोपाचा आश्रय घेऊन, ज्याचा भेद लुप्त झाला आहे, "पदं अम्बुजमिव" (चरण कमळासारखे आहे) याप्रमाणे प्रकट भिन्नतेशिवाय "पदाम्बुज" (चरणकमळ) याप्रमाणे लुप्त भेद असलेली उपमेयाची आणि उपमानाची समानधर्माने युक्त असलेली उपमाच 'रूपक' म्हटली जाते. अतिशय सादृश्याचा आश्रय घेऊन उपमान आणि उपमेय वस्तू अभेदाने ग्रहण केल्या जातात. त्यांच्या अभेदग्रहणामुळेच, त्यांचा आश्रय घेऊन प्रवृत्त होणाऱ्या भिन्न समानधर्माने युक्त असलेल्या उपमेचा भेद देखील लुप्त होतो. अशा प्रकारे लुप्त भिन्नता असलेल्या समानधर्माने युक्त असलेली उपमाच वस्तूंचा अभेद प्रकाशित करते, म्हणून त्याला 'रूपक' म्हणतात, असा अभिप्राय आहे. "ज्याचा भेद लुप्त झाला आहे" आणि "अभेदाचे रूपण करतो म्हणजेच प्रकट करतो" असा विग्रह आहे. ၂၁၃. २१३. အသေသဝတ္ထုဝိသယံ, ဧကဒေသဝိဝတ္တိ စ; တံ ဒွိဓာ ပုန ပစ္စေကံ, သမာသာဒိဝသာ တိဓာ. ते (रूपक) 'अशेषवस्तुविषय' (सर्व वस्तूंच्या स्वरूपात रूपक करणे) आणि 'एकदेशविवर्ती' (काही भागांत रूपक न करणे) अशा दोन प्रकारचे आहे. पुन्हा ते प्रत्येक स्वतंत्रपणे समास इत्यादींच्या आधारे तीन प्रकारचे होते. ၂၁၃. တဿ [Pg.218] ဘေဒံ နိဒ္ဒိသတိ ‘‘အသေသ’’ဣစ္စာဒိနာ. အသေသဝတ္ထု ဝိသယော ယဿ တံ တထာဝိဓဉ္စ, ဧကဒေသေ အဝယဝေ ဝိဝတ္တတီတိ ဧကဒေသဝိဝတ္တိ စေတိ တံ ရူပကံ ဒွိဓာ, ပုန ပစ္စေကံ ဝိသုံ ဝိသုံ သမာသာဒိဝသာ ဥပမာနောပမေယျာနံ ကတသမာသတ္တာ သမာသရူပက အသမာသရူပက သမာသာသမာသရူပကဝသေန တိဓာ သိယာ. २१३. "अशेष" इत्यादींद्वारे त्याचे भेद दाखवितात. सर्व वस्तू ज्याचा विषय आहेत ते 'अशेषवस्तुविषय' आणि एका भागात (अवयवात) जे निवृत्त होते ते 'एकदेशविवर्ती' अशा प्रकारे ते रूपक दोन प्रकारचे आहे. पुन्हा ते प्रत्येक स्वतंत्रपणे समास इत्यादींच्या आधारे, उपमान आणि उपमेयाचा समास केल्यामुळे 'समासरूपक', 'असमासरूपक' आणि 'समासासमासरूपक' या भेदाने तीन प्रकारचे होते. ၂၁၃. ‘‘အသေသိ’’စ္စာဒိ. တံ ရူပကံ အသေသဝတ္ထုဝိသယံ ဧကဒေသဝိဝတ္တိ စာတိ ဒွိဓာ ဟောတိ, ပုန ပစ္စေကံ တံ ဒွယမ္ပိ သမာသာဒိဝသာ သမာသရူပကံ အသမာသရူပကံ သမာသာသမာသရူပကဉ္စေတိ ဣမေသံ ဘေဒေန တိဓာ ဟောတိ. အသေသံ ဝတ္ထု ဝိသယော အဿေတိ စ, ဧကဒေသေ ဝိဝတ္တတီတိ စ, ဧကံ ဧကံ ပတီတိ စ, သမာသော သမာသရူပကံ အာဒိ ယေသမိတိ စ, တေသံ ဝသော ဘေဒေါတိ စ, တီဟိ ပကာရေဟီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २१३. "अशेष" इत्यादी. ते रूपक 'अशेषवस्तुविषय' आणि 'एकदेशविवर्ती' अशा दोन प्रकारचे असते. पुन्हा ते दोन्ही प्रत्येक स्वतंत्रपणे समास इत्यादींच्या आधारे 'समासरूपक', 'असमासरूपक' आणि 'समासासमासरूपक' या भेदाने तीन प्रकारचे होते. "अशेष (सर्व) वस्तू ज्याचा विषय आहेत", "एका भागात निवृत्त होते", "प्रत्येकाला उद्देशून", "समास म्हणजेच समासरूपक आहे आदी ज्यांचे", "त्यांचा वश म्हणजेच भेद", "तीन प्रकारांनी" असा विग्रह आहे. အသေသဝတ္ထုဝိသယသမာသ अशेषवस्तुविषय-समास (रूपक) ၂၁၄. २१४. အင်္ဂုလီဒလသံသောဘိံ, နခဒီဓိတိကေသရံ; သိရသာ န ပိဠန္ဓန္တိ, ကေ မုနိန္ဒပဒမ္ဗုဇံ. बोटांच्या पाकळ्यांनी सुशोभित असणाऱ्या आणि नखांच्या किरणांचेच केशर असणाऱ्या, मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) चरणकमळाला कोणते लोक आपल्या डोक्यावर धारण करत नाहीत? (अर्थात सर्वच जण धारण करतात.) ၂၁၄. ဥဒါဟရတိ ‘‘အင်္ဂုလိ’’စ္စာဒိ. အင်္ဂုလီဟိယေဝ ဥပမာနဂမ္မတ္တာ သိနိဒ္ဓတမ္ဗာဟိ ဒလေဟိ ပတ္တေဟိ သံသောဘိံ အစ္စန္တံ ဝိရောစမာနံ နခါနံ ဒီဓိတိယော ကိရဏာ ဧဝ ကေသရာနိ ယတ္ထ တာဒိသံ မုနိန္ဒဿ ပဒမေဝ အမ္ဗုဇံ သိရသာ မုဒ္ဓနာ ကေ နာမ ဇနာ န ပိဠန္ဓန္တိ ပသာဓနဝသေန န ဓာရေန္တီတိ. ဣဒမသေသဝတ္ထုဝိသယံ သမာသရူပကံ အင်္ဂိနော ပဒဿ အင်္ဂါနမင်္ဂုလျာဒီနမသေသာနံ ရူပနတော. ဧဝမုပရိပိ ယထာယောဂံ. २१४. "अंगुलि" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. बोटांच्याच उपमानत्वामुळे स्निग्ध व तांबूस अशा पाकळ्यांनी (पत्रांनी) सुशोभित असणाऱ्या, अत्यंत शोभून दिसणाऱ्या आणि नखांचे किरण हेच ज्यामध्ये केशर आहेत, अशा मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) चरणरूपी कमळाला कोणते लोक आपल्या मस्तकावर आभूषणाप्रमाणे धारण करत नाहीत? हे 'अशेषवस्तुविषय समासरूपक' आहे, कारण मुख्य अवयवी असलेल्या चरणाच्या बोटे इत्यादी सर्व अवयवांचे रूपक केले गेले आहे. यापुढेही योग्यतेनुसार असेच समजावे. ၂၁၄. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘အင်္ဂုလိ’’စ္စာဒိ. အင်္ဂုလီဒလသံသောဘိံ အင်္ဂုလိသင်္ခတေဟိ ပတ္တေဟိ သံသောဘိံ နခဒီဓိတိကေသရံ နခရံသိသင်္ခတကေသရံ မုနိန္ဒပဒမ္ဗုဇံ သိရသာ ကေ [Pg.219] န ပိဠန္ဓန္တိ. ဝိသေသျဘူတံ စရဏံ ဝိသေသနဘူတာ အင်္ဂုလီ နခဒီဓိတိ စေတိ ဣမေသံ ဥပမာဘူတေဟိ အမ္ဗုဇဒလကေသရေဟိ အဘေဒကပ္ပနာယ ဧကတ္တံ ဂဟေတွာ သမာသေနေဝ နိဒ္ဒိဋ္ဌတ္တာ ဣဒံ အသေသဝတ္ထုဝိသယသမာသရူပကံ နာမ. အင်္ဂုလိယော ဧဝ ဒလာနီတိ စ, တေဟိ သံသောဘီတိ စ, နခေသု ဒီဓိတိယောတိ စ, တာ ဧဝ ကေသရာနိ အဿေတိ စ ဝါကျံ. २१४. आता "अंगुलि" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. बोटारूपी पाकळ्यांनी सुशोभित असणाऱ्या, नखांच्या किरणरूपी केशरांनी युक्त असणाऱ्या मुनींद्रांच्या चरणकमळाला मस्तकावर कोण धारण करत नाही? विशेष्य असलेला चरण आणि विशेषण असलेली बोटे व नखांचे किरण, यांचे उपमारूप असलेल्या कमळ, पाकळ्या आणि केशर यांच्याशी अभेद कल्पून, एकत्व मानून समासानेच निर्देश केला गेल्यामुळे, याला 'अशेषवस्तुविषय समासरूपक' म्हणतात. "बोटेच पाकळ्या आहेत", "त्यांनी सुशोभित", "नखांमधील किरण", "तेच त्याचे केशर आहेत" असा विग्रह आहे. အသေသဝတ္ထုဝိသယအသမာသ अशेषवस्तुविषय-असमास (रूपक) ၂၁၅. २१५. ရတနာနိ ဂုဏာ ဘူရီ, ကရုဏာ သီတလံ ဇလံ; ဂမ္ဘီရတ္တမဂါဓတ္တံ, ပစ္စက္ခော’ယံ ဇိနော’မ္ဗုဓိ. गुण हेच विपुल रत्ने आहेत, करुणा हेच शीतल जल आहे, गंभीरपणा हाच अगाधपणा आहे; हे प्रत्यक्ष जिन (बुद्ध) हेच महासागर आहेत. ၂၁၅. ‘‘ရတနာနိ’’ဣစ္စာဒိ. အယံ ဇိနော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ, ပစ္စက္ခော န ပရောက္ခော အမှာကံ အမ္ဗုဓိ သာဂရော. ကထံ? ယေ တဿ ဘူရီ ဗဟဝေါ ဂုဏာ မေတ္တာဒယော, တေ ရတနာနိ အတုလျဒုလ္လဘဒဿနာဒိသာဓမ္မေန. ယာ တဿ ကရုဏာ, သာ သီတလံ ဇလံ သကလဇနသန္တာပါပဟတ္တသာဓမ္မေန. ယံ တဿ ဂမ္ဘီရတ္တမနုတ္တာနတာ လာဘာဒီသု, တံ အဂါဓတ္တမကလလမ္ဘသော အမ္ဗုဓိဋ္ဌတာသာဓမ္မေနာတိ ဣဒမသေသဝတ္ထုဝိသယံ အသမာသရူပကံ. २१५. "रतनानि" इत्यादी. हे जिन सम्यक्संबुद्ध आपल्यासाठी प्रत्यक्ष आहेत, परोक्ष नाहीत, ते जणू महासागर आहेत. कसे? त्यांचे जे विपुल आणि अनेक मैत्री इत्यादी गुण आहेत, ते अतुलनीय आणि दुर्लभ दर्शनादी समानतेमुळे 'रत्ने' आहेत. त्यांची जी करुणा आहे, ती सर्व लोकांचा संताप दूर करण्याच्या समानतेमुळे 'शीतल जल' आहे. लाभ इत्यादींमध्ये त्यांचे जे गंभीरपण (अचंचलता) आहे, ते अगाधतेमुळे आणि कलंकविरहिततेमुळे महासागराच्या स्थितीशी समान असल्यामुळे 'अगाधता' आहे. हे 'असेसवत्थुविसय असमासरूपक' आहे. ၂၁၅. ‘‘ရတနာနိ’’စ္စာဒိ. အယံ ဇိနော အမှာကံ ပစ္စက္ခော အမ္ဗုဓိ သာဂရော, တထာ ဟိ တဿ ဘူရီ ဂုဏာ သီလသမာဓိအာဒယော ရတနာနိ စိတ္တီကတာဒိသာဓမ္မတော ရတနာနေဝ, ကရုဏာ အနညသာဓာရဏကရုဏာ သီတလံ ဇလံ သန္တာပဝိနောဒနသာဓမ္မေန သီတလဇလမေဝ ဟောတိ, ဂမ္ဘီရတ္တံ လာဘာလာဘာဒီသု ဧကာကာရတာ အဂါဓတ္တံ ဂမ္ဘီရတာ ဧဝ ဟောတိ. ဣဒံ အသေသဝတ္ထုဝိသယအသမာသရူပကံ. ‘‘ဘူရီ’’တိ အဗျယံ. २१५. "रतनानि" इत्यादी. हे जिन आपल्यासाठी प्रत्यक्ष महासागर आहेत, कारण त्यांचे शील, समाधी इत्यादी विपुल गुण हे आदरणीयत्व इत्यादी समानतेमुळे 'रत्नेच' आहेत; त्यांची असाधारण करुणा ही संताप दूर करण्याच्या समानतेमुळे 'शीतल जलच' आहे; लाभ-अलाभ इत्यादींमध्ये एकसारखे राहणे हे गंभीरपण म्हणजेच 'अगाधताच' आहे. हे 'असेसवत्थुविसय असमासरूपक' आहे. "भूरि" हे अव्यय आहे. အသေသဝတ္ထုဝိသယမိဿက असेसवत्थुविसयमिस्सक ၂၁၆. २१६. စန္ဒိကာ [Pg.220] မန္ဒဟာသာ တေ, မုနိန္ဒ ဝဒနိန္ဒုနော; ပဗောဓယတျ’ယံ သာဓု-မနောကုမုဒကာနနံ. हे मुनींद्र! आपल्या वदनचंद्राचे मंदहास्य हीच चांदणी आहे, जी सज्जनांच्या मनरूपी कुमुदांच्या (कमळांच्या) वनाला प्रफुल्लित करते. ၂၁၆. ‘‘စန္ဒိကာ’’ဣစ္စာဒိ. ‘‘မုနိန္ဒ’’ဣစ္စာမန္တနံ, တေ ဝဒနမေဝ ဣန္ဒု ဝဒနိန္ဒုနော ဣတိ သမာသရူပကံ, အယံ မန္ဒဟာသာ စန္ဒိကာ စန္ဒကန္တိယော, အသမာသရူပကံ. သာဓူနံ မနာနိယေဝ ကုမုဒါနိ ကေရဝါနိ, သမာသရူပကံ. တေသံ ကာနနံ ဝနံ, ပဗောဓယတိ ဝိကာသယတီတိ ဣဒံ သမာသာသမာသရူပကံ. २१६. "चंदिका" इत्यादी. "मुनिंद" हे संबोधन आहे. आपले वदन (मुख) हाच चंद्र म्हणजे 'वदनिंदु' हे समासरूपक आहे. हे मंदहास्य म्हणजेच चांदणी (चंद्रप्रकाश) हे असमासरूपक आहे. सज्जनांची मने हीच कुमुदे (कमळे) हे समासरूपक आहे. त्यांचे कानन म्हणजे वन, त्याला प्रफुल्लित करते म्हणजे विकसित करते. म्हणून हे 'समासासमासरूपक' आहे. ၂၁၆. ‘‘စန္ဒိ’’စ္စာဒိ. ဟေ မုနိန္ဒတေ တုယှံ ဝဒနိန္ဒုနော မုခစန္ဒဿ မန္ဒဟာသာ မန္ဒမိဟိတဘူတာ စန္ဒိကာ စန္ဒကန္တိယော, ‘‘အယ’’န္တိ ဇာတျေကဝစနေန မန္ဒဟာသစန္ဒိကာ နိဒ္ဒိဋ္ဌာ. အထ ဝါ အယံ ဝဒနိန္ဒု. သာဓုမနောကုမုဒကာနနံ သပ္ပုရိသာနံ စိတ္တသင်္ခါတကေရဝကာနနံ ပဗောဓယတိ ဝိကာသယတိ. ‘‘စန္ဒိကာ မန္ဒဟာသာ’’တိ အသမာသရူပကံ. ‘‘ဝဒနိန္ဒုနော’’တိ စ ‘‘မနောကုမုဒကာနန’’န္တိ စ သမာသရူပကံ. တသ္မာ ဣဒံ အသေသဝတ္ထုဝိသယသမာသာသမာသရူပကံ. မန္ဒာ စ တေ ဟာသာ စာတိ စ, ဝဒနမေဝ ဣန္ဒူတိ စ, သာဓူနံ မနာနီတိ စ, တာနိယေဝ ကုမုဒါနီတိ စ, တေသံ ကာနနမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २१६. "चन्दि" इत्यादी. हे मुनींद्र! आपल्या वदनचंद्राचे (मुखचंद्राचे) मंदहास्य हेच चांदणी (चंद्रप्रकाश) आहे. येथे "अयं" या जाती-एकवचनाने मंदहास्यरूपी चांदणी दर्शविली आहे. किंवा हा वदनचंद्र सज्जनांच्या मनरूपी कुमुदांच्या वनाला प्रफुल्लित करतो म्हणजे विकसित करतो. "चंदिका मंदहासा" हे असमासरूपक आहे. "वदनिंदु" आणि "मनोकुमुदकानन" हे समासरूपक आहेत. म्हणून हे 'असेसवत्थुविसय समासासमासरूपक' आहे. 'मंद च ते हासा च' (मंदहास्य), 'वदनमेव इंदु' (वदनचंद्र), 'साधूनं मनानि' (सज्जनांची मने), 'तानेव कुमुदानि' (तीच कुमुदे) आणि 'तेषां काननम्' (त्यांचे वन) असा विग्रह आहे. ၂၁၇. २१७. အသေသဝတ္ထုဝိသယေ, ပဘေဒေါ ရူပကေ အယံ; ဧကဒေသဝိဝတ္တိမှိ, ဘေဒေါ ဒါနိ ပဝုစ္စတိ. असेसवत्थुविसय रूपकाचा हा भेद आहे. आता 'एकदेसविवात्ति' रूपकाचा भेद सांगितला जात आहे. ၂၁၇. နိဂမယတိ ‘‘အသေသိ’’စ္စာဒိနာ. ဒုတိယဿ ပဘေဒံ ဝတ္တုံ ပဋိဇာနာတိ ‘‘ဧကိ’’စ္စာဒိနာ. २१७. "असेस" इत्यादींद्वारे उपसंहार करतात. "एकि" इत्यादींद्वारे दुसऱ्या भेदाचे वर्णन करण्याची प्रतिज्ञा करतात. ၂၁၇. ‘‘အသေသေ’’စ္စာဒိ. အသေသဝတ္ထုဝိသယေ ရူပကေ အယံ ‘‘အင်္ဂုလီဒလသံသောဘိံ’’ဣစ္စာဒိကံ ဥဒါဟရဏတ္တယံ ပဘေဒေါ ဟောတိ. ဣဒါနိ ဧကဒေသဝိဝတ္တိမှိ ရူပကေ ဘေဒေါ ဝိသေသော ပဝုစ္စတိ. २१७. "असेस" इत्यादी. असेसवत्थुविसय रूपकामध्ये "अंगुलीदलसंसोभिं" इत्यादी तीन उदाहरणे हा त्याचा भेद आहे. आता 'एकदेसविवात्ति' रूपकाचा विशेष भेद सांगितला जात आहे. ဧကဒေသဝိဝတ္တိသမာသ एकदेसविवात्ति समास ၂၁၈. २१८. ဝိလာသဟာသကုသုမံ, [Pg.221] ရုစိရာဓရပလ္လဝံ; သုခံ ကေ ဝါ န ဝိန္ဒန္တိ, ပဿန္တာ မုနိနော မုခံ. ज्यांचे विलासमय हास्य हेच पुष्प आहे आणि सुंदर ओठ हेच पल्लव (कोवळी पाने) आहेत, अशा मुनींचे मुख पाहताना कोणत्या बरं लोकांना सुख प्राप्त होणार नाही? (अर्थात सर्वांनाच प्राप्त होईल). ၂၁၈. ‘‘ဝိလာသ’’ဣစ္စာဒိ. ဝိလာသေန ယုတ္တော ဟာသောယေဝ ကုသုမံ ယဿ. ရုစိရော မနုညော အဓရောယေဝ ပလ္လဝေါ ယဿ. တာဒိသံ မုနိနော မုခံ ပဿန္တာ ကေ နာမ ဇနာ သုခံ န ဝိန္ဒန္တိ သဗ္ဗေပီတိ. ဣဒံ အင်္ဂါနိ ဟာသာဒီနိ ရူပယိတွာ မုခမင်္ဂိ န ရူပိတန္တိ ဧကဒေသဝိဝတ္တိသမာသရူပကံ. ဧဝံ ဥပရိပိ ယထာယောဂံ. २१८. "विलास" इत्यादी. विलासाने युक्त असलेले हास्य हेच ज्यांचे पुष्प आहे. सुंदर आणि मनोहर ओठ हेच ज्यांचे पल्लव आहेत. अशा मुनींचे मुख पाहताना कोणते लोक सुख प्राप्त करत नाहीत? सर्वच करतात. येथे हास्य इत्यादी अंगांवर (पुष्प इत्यादींचे) रूपक केले आहे, परंतु अंगी असलेल्या मुखावर रूपक केलेले नाही, म्हणून हे 'एकदेसविवात्ति समासरूपक' आहे. पुढेही याचप्रमाणे योग्यतेनुसार समजून घ्यावे. ၂၁၈. ‘‘ဝိလာသိ’’စ္စာဒိ. ဝိလာသဟာသကုသုမံ လီလာယုတ္တဟာသသင်္ခတပုပ္ဖံ ရုစိရာဓရပလ္လဝံ မနုညအဓရသင်္ခါတကိသလယံ မုနိနော မုခံ ပဿန္တာ ကေ ဝါ ကေ နာမ ဇနာ သုခံ န ဝိန္ဒန္တိ ပီတိသုခံ နာနုဘောန္တိ, အနုဘဝန္တေဝ. ဝိသေသနဘူတာနံ ဟာသအဓရာနံ ဥပမာဘူတကုသုမပလ္လဝေဟိ အဘေဒံ ဒဿေတွာ ဝိသေသျဘူတဿ မုခဿ အညတရဥပမာဝတ္ထုနာ အဘေဒေန အဝုတ္တတ္တာ အဘေဒါရောပနံ ဧကဒေသေယေဝ ဝိဝတ္တီတိ ဣဒံ ဧကဒေသဝိဝတ္တိသမာသရူပကံ. ဝိလာသေန ယုတ္တော ဟာသောတိ စ, သောယေဝ ကုသုမံ အဿေတိ စ, ရုစိရော စ သော အဓရော စေတိ စ, သောယေဝ ပလ္လဝေါ အဿေတိ စ ဝါကျံ. २१८. "विलासि" इत्यादी. विलासमय हास्यरूपी पुष्प आणि सुंदर ओठरूपी पल्लव असलेल्या मुनींचे मुख पाहताना कोणते लोक सुख प्राप्त करत नाहीत, म्हणजेच प्रीतीसुखाचा अनुभव घेत नाहीत? सर्वच अनुभवतात. येथे विशेषण असलेल्या हास्य आणि ओठांचा उपमान असलेल्या पुष्प व पल्लवांशी अभेद दाखवला आहे, परंतु विशेष्य असलेल्या मुखाचा इतर कोणत्याही उपमानाशी अभेद न सांगितल्यामुळे, अभेदाचा आरोप केवळ एकाच भागात (एकदेशात) राहतो, म्हणून हे 'एकदेसविवात्ति समासरूपक' आहे. 'विलासाने युक्त हास्य', 'तेच ज्याचे पुष्प आहे', 'सुंदर असलेला ओठ', 'तोच ज्याचा पल्लव आहे' असा वाक्याचा विग्रह आहे. ဧကဒေသဝိဝတ္တိအသမာသ एकदेसविवात्ति असमास ၂၁၉. २१९. ပါဒဒွန္ဒံ မုနိန္ဒဿ, ဒဒါတု ဝိဇယံ တဝ; နခရံသီ ပရံ ကန္တာ, ယဿ ပါပဇယဒ္ဓဇာ. मुनींद्रांचे चरणयुगल तुम्हाला विजय प्रदान करोत, ज्यांच्या नखांची अत्यंत सुंदर प्रभा (किरणे) ही पापांवर विजय मिळवणारे ध्वज आहेत. ၂၁၉. ‘‘ပါဒ’’ဣစ္စာဒိ. မုနိန္ဒဿ ဝိဇယိနော ပါဒဒွန္ဒံ တဝ ဝိဇယံ ပဋိပက္ခပရာဘဝံ ဒဒါတု. ကီဒိသံ? ယဿ ပရမစ္စန္တံ ကန္တာ မနုညာ နခရံသီ ပါပါနံ လောဘာဒီနံ ဇယေ ဥဿိတာ ဓဇာ ကေတဝေါတိ. ဣဒမေကဒေသဝိဝတ္တိအသမာသရူပကံ. २१९. "पाद" इत्यादी. विजयी मुनींद्रांचे चरणयुगल तुम्हाला विजय म्हणजेच शत्रूंचा (क्लेशांचा) पराभव प्रदान करोत. कसे? ज्यांच्या नखांची अत्यंत सुंदर आणि मनोहर प्रभा ही पापांच्या (लोभ इत्यादींच्या) विजयासाठी उभारलेले ध्वज आहेत. हे 'एकदेसविवात्ति असमासरूपक' आहे. ၂၁၉. ‘‘ပါဒေ’’စ္စာဒိ.[Pg.222] ယဿ သမ္ဗုဒ္ဓဿ ပရံ အတိသယေန ကန္တာ မနုညာ နခရံသီ စရဏနခကန္တိယော ပါပဇယဒ္ဓဇာ ပါပဝိဇယေ ဥဿာပိတဓဇာယေဝ ဟောန္တိ, တဿ မုနိန္ဒဿ ပါဒဒွန္ဒံ စရဏယုဂဠံ တဝ တုယှံ ဝိဇယံ ပဋိပက္ခပရာဘဝံ ဒဒါတူတိ. နခရံသီနံ ဥပမာဘူတဓဇေဟိ အဘေဒမာရောပေတွာ ‘‘ပါဒဒွန္ဒ’’မိတိ အနိရူပိတတ္တာ ဧကဒေသဝိဝတ္တိအသမာသရူပကံ နာမ. ပါပါနံ ဇယောတိ စ, တသ္မိံ ဓဇာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २१९. "पादे" इत्यादी. ज्या सम्यक्संबुद्धांच्या नखांची अत्यंत सुंदर आणि मनोहर प्रभा ही पापांवर विजय मिळवण्यासाठी उभारलेले ध्वजच आहेत, त्या मुनींद्रांचे चरणयुगल तुम्हाला विजय म्हणजेच शत्रूंचा पराभव प्रदान करोत. येथे नखांच्या प्रभेवर उपमान असलेल्या ध्वजांचा अभेद आरोपिला आहे, परंतु "चरणयुगल" यावर रूपक न केल्यामुळे याला 'एकदेसविवात्ति असमासरूपक' म्हणतात. 'पापांचा विजय' आणि 'त्यातील ध्वज' असा विग्रह आहे. ဧကဒေသဝိဝတ္တိမိဿက एकदेसविवात्ति मिस्सक ၂၂၀. २२०. သုနိမ္မလကပေါလဿ, မုနိန္ဒဝဒနိန္ဒုနော; သာဓုပ္ပဗုဒ္ဓဟဒယံ, ဇာတံ ကေရဝကာနနံ. ज्यांचे कपोल (गाल) अत्यंत निर्मळ आहेत, अशा मुनींद्र वदनचंद्राच्या प्रभावाने सज्जनांचे प्रबुद्ध हृदय हेच कुमुदांचे (कमळांचे) वन बनले आहे. ၂၂၀. ‘‘သုနိမ္မလ’’ဣစ္စာဒိ. သုနိမ္မလော ကပေါလော ယဿ, တဿ မုနိန္ဒဝဒနိန္ဒုနော သာဓူနံ ပဗုဒ္ဓံ ဓမ္မာဝဗောဓဝသေန ဝိကသိတံ ဟဒယံ စိတ္တံ ကေရဝကာနနံ ဇာတန္တိ ဧကဒေသဝိဝတ္တိသမာသာသမာသရူပကံ. २२०. "सुनिम्मल" इत्यादी. ज्यांचे कपोल अत्यंत निर्मळ आहेत, अशा मुनींद्र वदनचंद्राच्या प्रभावाने सज्जनांचे प्रबुद्ध म्हणजे धम्माच्या अवबोधामुळे विकसित झालेले हृदय (चित्त) हेच कुमुदांचे वन बनले आहे. हे 'एकदेसविवात्ति समासासमासरूपक' आहे. ၂၂၀. ‘‘သုနိမ္မလိ’’စ္စာဒိ. သုနိမ္မလကပေါလဿ မုနိန္ဒဝဒနိန္ဒုနော သာဓုပ္ပဗုဒ္ဓဟဒယံ သဇ္ဇနာနံ စတုသစ္စာဝဗောဓေန ပသန္နမာနသံ ကေရဝကာနနံ ကုမုဒဝနံ ဇာတန္တိ. ဝဒနဟဒယာနံ ဥပမာဘူတေဟိ ဣန္ဒုကေရဝေဟိ အဘေဒါရောပနံ ကတွာ ကပေါလဿ မဏ္ဍလာဒီဟိ ဥပမာဝိသေသေဟိ အနိရူပိတတ္တာ ဧကဒေသဝိဝတ္တိသမာသာသမာသရူပကံ. ဧတ္ထ သမာသော နာမ ဝဒနိန္ဒူနမေဝ. အသမာသော နာမ ဟဒယကေရဝါနမေဝါတိ. တထာ ဟိ ရူပကဝိသယေ သမာသာသမာသတ္တံ ဥပမာနောပမေယျပဒါနံ ဒွိန္နမေဝါတိ. သုဋ္ဌု နိမ္မလောတိ စ, သော ကပေါလော အဿာတိ စ, မုနိန္ဒဝဒနမေဝ ဣန္ဒူတိ စ, ပဗုဒ္ဓဉ္စ တံ ဟဒယဉ္စာတိ စ, သာဓူနံ ပဗုဒ္ဓဟဒယမိတိ စ, ကေရဝါနံ ကာနနမိတိ စ ဝါကျံ. २२०. “सुनिम्मली” इत्यादी. अत्यंत निर्मळ गाल असलेल्या मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) मुखरूपी चंद्राचे, सज्जनांचे उत्तम प्रकारे प्रबुद्ध झालेले हृदय, जे चतुरार्यसत्याच्या अवबोधामुळे (ज्ञानामुळे) प्रसन्न मनाचे झाले आहे, ते कुमुदवन (कमळांचे वन) झाले आहे. मुख आणि हृदय यांच्या उपमाभूत असलेल्या चंद्र आणि कुमुद (कमळ) यांच्याशी अभेद आरोप करून, गालाच्या मंडल इत्यादी उपमाविशेषांनी निरूपण न केल्यामुळे हे 'एकदेशविवर्ति-समासासमास-रूपक' आहे. येथे 'समास' म्हणजे केवळ 'वदनिंदू' (मुखचंद्र) यांचेच होय. 'असमास' म्हणजे केवळ 'हदयकेरवा' (हृदयकमळ) यांचेच होय. कारण रूपकाच्या विषयात समास आणि असमास असणे हे उपमान आणि उपमेय या दोन्ही पदांचेच असते. 'अत्यंत निर्मळ' आणि 'तो गाल ज्याचा आहे तो', 'मुनींद्रांचे मुख हेच चंद्र', 'प्रबुद्ध आणि ते हृदय', 'सज्जनांचे प्रबुद्ध हृदय' आणि 'कुमुदांचे वन' असे हे वाक्य आहे. ၂၂၁. २२१. ရူပကာနိ [Pg.223] ဗဟူနျေဝ, ယုတ္တာယုတ္တာဒိဘေဒတော; ဝိသုံ န တာနိ ဝုတ္တာနိ, ဧတ္ထေ’ဝ’န္တောဂဓာနိ’တိ. युक्त आणि अयुक्त इत्यादी भेदांमुळे रूपक अलंकार अनेक प्रकारचेच आहेत; ते येथेच (या रूपकातच) अंतर्भूत असल्यामुळे त्यांचे स्वतंत्रपणे वर्णन केलेले नाही. ၂၂၁. २२१. ဧတ္တကောယေဝ ကိံ ရူပကဘေဒေါတိ အာဟ‘‘ရူပကာနိ’’စ္စာဒိ; သုဗောဓံ; တတ္ထ – रूपकाचे भेद एवढेच आहेत काय? म्हणून 'रूपकानि' इत्यादी म्हटले आहे. हे सुबोध (स्पष्ट) आहे. त्यामध्ये - ‘‘သိတပုပ္ဖုဇ္ဇလံ လောလ-နေတ္တဘိင်္ဂံ တဝါနနံ; ကဿ နာမ မနော ဓီရ, နာကဍ္ဎတိ မနောဟရ’’န္တိ. “हे धीर! पांढऱ्या फुलांनी उज्ज्वल आणि चंचल नेत्ररूपी भ्रमरांनी युक्त असलेले आपले हे मनोहर मुख कोणाचे मन बरे आकर्षित करून घेत नाही?” ယုတ္တရူပကံ ယုတ္တတ္တာ ပုပ္ဖဘိင်္ဂါနံ, တဒနုသာရေန အယုတ္တရူပကာဒိပိ ဝိညေယျန္တိ. फुले आणि भ्रमर यांच्या योग्य संबंधामुळे (युक्तत्वामुळे) हे 'युक्त रूपक' आहे, आणि त्यानुसार 'अयुक्त रूपक' इत्यादी देखील समजून घ्यावे. ၂၂၁. ရူပကာနိ ပုနပိ သန္တီတိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘ရူပကာနိ’’စ္စာဒိ. ရူပကာနိ ယုတ္တာယုတ္တာဒိဘေဒတော ယုတ္တရူပကအယုတ္တရူပကာဒိဘေဒေန ဗဟူနိ ဧဝ ဟောန္တိ, တာနိ ရူပကာနိ ဧတ္ထေဝ ရူပကေ အန္တောဂဓာနိ. ဣတိ တသ္မာ ကာရဏာ တာနိ ဝိသုံ န ဝုတ္တာနိ. အန္တော မဇ္ဈေ ဂဓာနိ ပဝတ္တာနီတိ ဝိဂ္ဂဟော. २२१. रूपकाचे आणखीही प्रकार आहेत हे दर्शवण्यासाठी 'रूपकानि' इत्यादी म्हटले आहे. युक्त आणि अयुक्त इत्यादी भेदांमुळे, म्हणजेच युक्त रूपक, अयुक्त रूपक इत्यादी भेदांमुळे रूपक अनेक प्रकारचेच असतात. ते सर्व रूपक येथेच (या रूपकातच) अंतर्भूत आहेत. म्हणूनच त्यांचे स्वतंत्रपणे वर्णन केलेले नाही. 'अंतो' म्हणजे मध्ये, 'गधानि' म्हणजे प्रवृत्त झालेले (अंतर्भूत झालेले) असा विग्रह आहे. ‘‘သိတပုပ္ဖုဇ္ဇလံ လောလ-နေတ္တဘိင်္ဂံ တဝါနနံ; ကဿ နာမ မနော ဓီရ, နာကဍ္ဎတိ မနောဟရ’’န္တိ. “हे धीर! पांढऱ्या फुलांनी उज्ज्वल आणि चंचल नेत्ररूपी भ्रमरांनी युक्त असलेले आपले हे मनोहर मुख कोणाचे मन बरे आकर्षित करून घेत नाही?” ဧတ္ထ ပုပ္ဖဘိင်္ဂါနံ အညမညယုတ္တတ္တာ ယုတ္တရူပကံ နာမ. येथे फुले आणि भ्रमर यांच्या परस्परांशी असलेल्या योग्य संबंधामुळे (युक्तत्वामुळे) याला 'युक्त रूपक' म्हणतात. ဟေ ဓီရ သိတပုပ္ဖုဇ္ဇလံ မန္ဒဟသိတသင်္ခါတေဟိ ကုသုမေဟိ ဝိဇောတန္တံ လောလနေတ္တဘိင်္ဂံ မနောဟရံ တဝါနနံ ကဿ နာမ မနော နာကဍ္ဎတီတိ. ဣမဿ ပဋိပက္ခတော အယုတ္တရူပကံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. हे धीर! मंदहास्यरूपी फुलांनी प्रकाशमान असणारे आणि चंचल नेत्ररूपी भ्रमरांनी युक्त असलेले आपले मनोहर मुख कोणाचे मन बरे आकर्षित करून घेत नाही? याच्या उलट (प्रतिपक्षावरून) 'अयुक्त रूपक' समजून घ्यावे. ၂၂၂. २२२. စန္ဒိမာ’ကာသပဒုမ-မိစ္စေတံ ခဏ္ဍရူပကံ; ဒုဋ္ဌ’မမ္ဘောရုဟဝနံ, နေတ္တာနိ’စ္စာဒိ သုန္ဒရံ. “'चंद्र हा आकाशरूपी कमळ आहे' हे खंड रूपक दोषयुक्त आहे. परंतु 'नेत्र हे कमळांचे वन आहे' इत्यादी (वचनभेद असूनही) सुंदर आहे.” ၂၂၂. ရူပကဿ ဝိရောဓာဝိရောဓော ဥပမာယမိဝေါ’ဟိတုံ သက္ကာတိ ဥပလက္ခေတိ ‘‘စန္ဒိမာ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဧတ္ထ အာကာသဿ တဠာကေ ရူပိတေ စန္ဒဿ ပဒုမတ္တံ ရူပကံ ယုတ္တန္တိ ဧတံ [Pg.224] ခဏ္ဍရူပကံ ဒုဋ္ဌံ, ‘‘အမ္ဘောရုဟဝနံ နေတ္တာနိ’’စ္စာဒိ တု ဝစနဘေဒေပိ သုန္ဒရံ. २२२. रूपकाचा विरोध आणि अविरोध हा उपमेप्रमाणेच समजून घेता येतो, हे दर्शवण्यासाठी 'चंदिमा' इत्यादी म्हटले आहे. येथे आकाशावर तलावाचा आरोप न करता चंद्रावर कमळाचा आरोप करणे अयोग्य असल्यामुळे हे 'खंड रूपक' दोषयुक्त आहे. परंतु 'कमळांचे वन हे नेत्र आहेत' इत्यादी रूपक मात्र वचनभेद असूनही सुंदर आहे. ၂၂၂. ရူပကေ ဒေါသာဒေါသံ ဥပမာယံ ဝိယ ပရိကပ္ပေတွာ ဂဟေတဗ္ဗန္တိ ဥပဒိသန္တော အာဟ ‘‘စန္ဒိမိ’’စ္စာဒိ. ‘‘စန္ဒိမာ စန္ဒော အာကာသပဒုမ’’န္တိ ဧတံ ခဏ္ဍရူပကံ အာကာသဿ တဠာကတ္တေန အနိရူပိတတ္တာ ခဏ္ဍရူပကံ နာမ. ဒုဋ္ဌံ ခဏ္ဍိတောပမာ ဝိယ ဒေါသဒုဋ္ဌံ နာမ. ‘‘အမ္ဘောရုဟဝနံ နီလုပ္ပလဝနံ နေတ္တာနီ’’တိအာဒိကံ ဥပမာနောပမေယျာနံ ဝစနနာနတ္တေပိ သုန္ဒရမေဝ. २२२. रूपकातील दोष आणि अदोष (गुण) हे उपमेप्रमाणेच कल्पून ग्रहण करावेत, असा उपदेश करताना 'चंदिमा' इत्यादी म्हटले आहे. 'चंद्र हा आकाशरूपी कमळ आहे' हे खंड रूपक आहे, कारण आकाशाचे तलावाच्या रूपाने निरूपण केलेले नाही, म्हणून याला 'खंड रूपक' म्हणतात. हे खंडितोपमेप्रमाणे दोषयुक्त आहे. 'कमळांचे वन (किंवा नीलकमळांचे वन) हे नेत्र आहेत' इत्यादी रूपक उपमान आणि उपमेय यांच्यात वचनभेद (वचनाची भिन्नता) असूनही सुंदरच आहे. ၂၂၃. २२३. ပရိယန္တော ဝိကပ္ပာနံ, ရူပကဿော’ပမာယ စ; နတ္ထိ ယံ တေန ဝိညေယျံ, အဝုတ္တ’မနုမာနတော. रूपक आणि उपमेच्या भेदांचा (विकल्पांचा) अंत नाही. म्हणूनच, जे येथे सांगितले नाही, ते अनुमानाने समजून घ्यावे. ၂၂၃. ကိမေတ္တကာ ဧဝေါပမာရူပကဘေဒါ? နေတိ ပရိဒီပေန္တော အဝုတ္တံ အတိဒိသတိ ‘‘ပရိယန္တော’’ဣစ္စာဒိနာ. ရူပကဿ ဥပမာယ စ ဝိကပ္ပာနံ ပဘေဒါနံ ပရိယန္တော အဝသာနံ နတ္ထိ ယံ ယသ္မာ ကာရဏာ, တေန ကာရဏေန အဝုတ္တံ ဣဟာနုပါတံ ဝိကပ္ပဇာတံ သဗ္ဗဝိကပ္ပဗျာပကသာမညလက္ခဏာနုဂတရူပကဝိကပ္ပာနုသာရေန ဝိညေယျံ. ကသ္မာ? အနုမာနတော ယထာဝုတ္တဝိကပ္ပသင်္ခါတလိင်္ဂတော အဝုတ္တသေသရူပကာဝဂမသင်္ခါတေန အနုမာနဉာဏေနာတိ အတ္ထော. २२३. उपमा आणि रूपकाचे भेद एवढेच आहेत काय? 'नाही' असे स्पष्ट करत, न सांगितलेल्या गोष्टींचा अतिदेश करण्यासाठी 'परियंतो' इत्यादी म्हटले आहे. रूपक आणि उपमेच्या विकल्पांचा (भेदांचा) अंत (शेवट) नाही, म्हणूनच येथे न सांगितलेले विविध भेद, सर्व विकल्पांना व्यापणाऱ्या सामान्य लक्षणाने युक्त अशा रूपक-विकल्पांच्या अनुषंगाने समजून घ्यावेत. कशावरून? अनुमानावरून, म्हणजेच सांगितलेल्या विकल्पांच्या चिन्हांवरून (लिंगावरून) उर्वरित न सांगितलेल्या रूपकांचे ज्ञान करून घेणाऱ्या अनुमानज्ञानाने, असा अर्थ आहे. ၂၂၃. ဣဒါနိ ဣမေသမေဝ ဥပမာရူပကာနံ အဝုတ္တာနန္တဘေဒေါ ဝုတ္တာနုသာရေနေဝ ဉာတဗ္ဗောတိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘ပရိယန္တော’’ဣစ္စာဒိ. ရူပကဿ စ ရူပကာလင်္ကာရဿ စ ဥပမာယ စ ဥပမာလင်္ကာရဿ စ ဝိကပ္ပာနံ ဝိဝိဓာကာရေန ကပ္ပိတပက္ခာနံ ပရိယန္တော ကောဋိ ယံ ယသ္မာ နတ္ထိ, တေန ကာရဏေန အဝုတ္တံ ဣမသ္မိံ သုဗောဓာလင်္ကာရေ အဝုတ္တပက္ခံ သမူဟံ အနုမာနတော အနုမာနဉာဏေန ဝိညေယျန္တိ. ဥပမာရူပကာနံ သကလမဝုတ္တပက္ခံ ဗျာပေတွာ ဌိတံ သာမညလက္ခဏံ အနတိက္ကမိတွာ ဝုတ္တေဟိ တေဟိ တေဟိ ပက္ခသင်္ခါတေဟိ လိင်္ဂေဟိ [Pg.225] သိဒ္ဓါနုမာနဉာဏေန သာမညလက္ခဏေ အန္တောဂဓာနမနုတ္တရူပကသင်္ခါတာနုမေယျာနံ အဝဗောဓော သက္ကာတိ အဓိပ္ပာယော. ရူပကဿ ပန ဥပမန္တောဂဓတ္တာ ဥပမာယ နိဒ္ဒိဋ္ဌဒေါသာဒေါသံ ဒွိန္နမပိ ဥတ္တာနုတ္တပက္ခဿ သာဓာရဏံ ဟောတိ. २२३. आता याच उपमा आणि रूपकांचे न सांगितलेले अनंत भेद सांगितलेल्या भेदांच्या अनुषंगानेच जाणून घ्यावेत, हे दर्शवण्यासाठी 'परियंतो' इत्यादी म्हटले आहे. रूपक अलंकाराच्या आणि उपमा अलंकाराच्या विविध प्रकारे कल्पिलेल्या पक्षांचा (भेदांचा) अंत किंवा मर्यादा नसल्यामुळे, या 'सुबोधालंकार' ग्रंथात न सांगितलेला भाग अनुमानाने (अनुमानज्ञानाने) समजून घ्यावा. उपमा आणि रूपकाच्या न सांगितलेल्या सर्व पक्षांना व्यापून राहणाऱ्या सामान्य लक्षणाचे उल्लंघन न करता, सांगितलेल्या त्या त्या पक्षांच्या चिन्हांवरून (लिंगांवरून) सिद्ध होणाऱ्या अनुमानज्ञानाने, सामान्य लक्षणात अंतर्भूत असलेल्या आणि न सांगितलेल्या रूपकरूपी अनुमेयांचे ज्ञान करून घेणे शक्य आहे, असा अभिप्राय आहे. रूपक हे उपमेतच अंतर्भूत असल्यामुळे, उपमेचे जे दोष आणि अदोष (गुण) सांगितले आहेत, ते दोन्ही अलंकारांच्या सांगितलेल्या आणि न सांगितलेल्या पक्षांना समान रीतीने लागू होतात. ၂၂၄. २२४. ပုနပ္ပုနမုစ္စာရဏံ, ယ’မတ္ထဿ ပဒဿ စ; ဥဘယေသဉ္စ ဝိညေယျာ, သာ’ယ’မာဝုတ္တိ နာမတော. अर्थाची, शब्दाची किंवा या दोघांचीही जी वारंवार पुनरावृत्ती (उच्चारण) होते, तिला 'आवृत्ती' (आवृत्ती अलंकार) म्हणून ओळखावे. ၂၂၄. အာဝုတ္တိမဓိကိစ္စာဟ ‘‘ပုန’’ဣစ္စာဒိနာ. အတ္ထဿ အဘိဓေယျဿ ပဒဿ သဒ္ဒဿ စ ဥဘယေသံ အတ္ထပဒါနဉ္စ ပုနပ္ပုနံ ဘိယျော ဘိယျော ယံ ဥစ္စာရဏံ, သာယံ တိဝိဓာ နာမတော အာဝုတ္တိ ဝိညေယျာ, ဥစ္စာရဏဝသေန အာ ပုနပ္ပုနံ ဝတ္တနမာဝုတ္တီတိ. २२४. आवृत्तीच्या संदर्भात 'पुन' इत्यादी म्हटले आहे. अर्थाचे (वाच्यार्थाचे), शब्दाचे किंवा अर्थ आणि शब्द या दोघांचेही जे वारंवार (पुन्हा पुन्हा) उच्चारण होते, ती ही तीन प्रकारची 'आवृत्ती' म्हणून जाणावी. वारंवार उच्चारण करण्याच्या क्रियेमुळे पुन्हा पुन्हा प्रवृत्त होणे म्हणजे 'आवृत्ती' होय. ၂၂၄. ဣဒါနိ အာဝုတ္တိံ ဒဿေတိ ‘‘ပုနပ္ပုနေ’’စ္စာဒိနာ. အတ္ထဿ သဒ္ဒါဘိဟိတအတ္ထဿ စ ပဒဿ စ ဥဘယေသံ အတ္ထပဒါနဉ္စ ယံ ပုနပ္ပုနုစ္စာရဏံ, သာ အယံ တိဝိဓာ နာမတော အာဝုတ္တိ ဣတိ ဝိညေယျာ. ပုနပ္ပုနေတိ ဧတဒဗျယံ ကြိယာဗာဟုလျေ ဝတ္တတေ. ဥစ္စာရဏဝသေန အာ ပုနပ္ပုနံ ဝတ္တနမာဝုတ္တိ. २२४. आता आवृत्ती दर्शवतात, 'पुनप्पुन' इत्यादींद्वारे. अर्थाचे (शब्दाने सांगितलेल्या अर्थाचे), शब्दाचे किंवा अर्थ आणि शब्द या दोघांचेही जे वारंवार उच्चारण होते, ती ही तीन प्रकारची 'आवृत्ती' म्हणून जाणावी. 'पुनप्पुन' हे अव्यय क्रियेच्या वारंवारतेसाठी (बाहुल्यासाठी) वापरले जाते. वारंवार उच्चारण करण्याच्या क्रियेमुळे पुन्हा पुन्हा प्रवृत्त होणे म्हणजे 'आवृत्ती' होय. အတ္ထာဝုတ္တိ अर्थावृत्ती ၂၂၅. २२५. မနော ဟရတိ သဗ္ဗေသံ, အာဒဒါတိ ဒိသာ ဒသ; ဂဏှာတိ နိမ္မလတ္တဉ္စ, ယသောရာသိ ဇိနဿ’ယံ. “जिनांचा (बुद्धांचा) हा यशोसमूह सर्वांचे मन हरण करतो, दहाही दिशांना व्यापून टाकतो आणि निर्मळता ग्रहण करतो.” ၂၂၅. ဥဒါဟရတိ ‘‘မနော’’ဣစ္စာဒိ. ဇိနဿ အယံ ယသောရာသိ သဗ္ဗေသံ ဇနာနံ မနော စိတ္တံ ဟရတိ, ဒသ ဒိသာ အာဒဒါတိ သဗ္ဗဒါ တံဝိသယတ္တာ, နိမ္မလတ္တံ နိမ္မလဘာဝံ ဂဏှာတိ, ဧတ္ထ ဂဟဏလက္ခဏဿ အတ္ထဿ အနေကေဟိ ပရိယာယဝစနေဟိ အာဝတ္တိတတ္တာ အယံ အတ္ထာဝုတ္တိ. २२५. उदाहरण देतात, 'मनो' इत्यादी. जिनांचा (बुद्धांचा) हा यशोसमूह सर्व लोकांचे मन (चित्त) हरण करतो, दहाही दिशांना व्यापून टाकतो (नेहमी त्या विषयाशी संबंधित असल्यामुळे) आणि निर्मळता (निर्मळ भाव) ग्रहण करतो. येथे 'ग्रहण करणे' या अर्थाची अनेक पर्यायी शब्दांद्वारे पुनरावृत्ती झाल्यामुळे ही 'अर्थावृत्ती' आहे. ၂၂၅. ဥဒါဟရတိ [Pg.226] ‘‘မနော ဟရတိ’’စ္စာဒိနာ. ဇိနဿ အယံ ယသောရာသိ သဗ္ဗေသံ သတ္တာနံ မနော စိတ္တံ ဟရတိ ဂဏှာတိ, ဒသ ဒိသာ အာဒဒါတိ အဝိသယဋ္ဌာနာဘာဝတော ဂဏှာတိ, နိမ္မလတ္တဉ္စ ဘူတပရိသုဒ္ဓဂုဏေန နိပ္ဖန္နတ္တာ ဂဏှာတိ. ဧတ္ထ ‘‘ဂဏှာတီ’’တိ ဧကဿေဝတ္ထဿ ‘‘ဟရတိ, အာဒဒါတိ, ဂဏှာတီ’’တိ အညေဟိ ပရိယာယဝစနေဟိ အာဝတ္တိတတ္တာ အယမတ္ထာဝုတ္တိ နာမ. နိဂ္ဂတော မလေဟီတိ စ, တဿ ဘာဝေါတိ စ, ယသသော ရာသိဣတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २२५. 'मनो हरति' इत्यादीने उदाहरण देतात. जिनांचा (बुद्धांचा) हा यशोसमूह सर्व प्राण्यांचे मन (चित्त) हरण करतो (आकर्षित करतो), दहाही दिशांना व्यापून घेतो (अविषय स्थान नसल्यामुळे ग्रहण करतो), आणि वास्तविक अत्यंत शुद्ध गुणाने निष्पन्न झाल्यामुळे निर्मळत्व ग्रहण करतो. येथे 'ग्रहण करतो' या एकाच अर्थाची 'हरति' (हरण करतो), 'आददाति' (स्वीकारतो), 'गण्हाति' (ग्रहण करतो) या इतर पर्यायी शब्दांनी पुनरावृत्ती झाल्यामुळे याला 'अर्थावृत्ती' म्हणतात. 'मळापासून मुक्त झालेला' म्हणजे निर्मळ, त्याचा भाव म्हणजे निर्मळत्व, आणि 'यशाचा समूह' म्हणजे यशोराशी, असा विग्रह आहे. ပဒါဝုတ္တိ पदावृत्ती (शब्दांची पुनरावृत्ती) ၂၂၆. २२६. ဝိဘာသေန္တိ ဒိသာ သဗ္ဗာ, မုနိနော ဒေဟကန္တိယော; ဝိဘာ သေန္တိ စ သဗ္ဗာပိ, စန္ဒာဒီနံ ဟတာ ဝိယ. मुनींच्या शरीराची कांती सर्व दिशांना प्रकाशित करते; आणि चंद्र इत्यादींची सर्व प्रभा (कांती) जणू नष्ट झाल्यासारखी फिकट पडते. ၂၂၆. ‘‘ဝိဘာသေန္တိ’’စ္စာဒိ. မုနိနော ဒေဟကန္တိယော သဗ္ဗာ ဒိသာ ဝိဘာသေန္တိ ဝိသေသေန ဒီပေန္တိ, ယတော ဧဝံ တသ္မာ ကာရဏာ စန္ဒာဒီနံ သဗ္ဗာပိ ဝိဘာ သောဘာ ဟတာ ပဟတာ ဝိယ သေန္တိ ပဝတ္တန္တီတိ ပဒါဝုတ္တိ. २२६. 'विभासेन्ति' इत्यादी. मुनींच्या शरीराची कांती सर्व दिशांना विशेष रूपाने प्रकाशित करते, ज्या कारणाने चंद्र इत्यादींची सर्व प्रभा (शोभा) नष्ट झाल्यासारखी फिकट पडते, ही 'पदावृत्ती' आहे. ၂၂၆. ‘‘ဝိဘာသေန္တိ’’စ္စာဒိ. မုနိနော ဒေဟကန္တိယော သဗ္ဗာ ဒိသာ ဝိဘာသေန္တိ ယသ္မာ ဝိသေသေန ပကာသေန္တိ, တသ္မာ စန္ဒာဒီနံ သဗ္ဗာပိ ဝိဘာ ကန္တိယော ဟတာ ပဟတာ ဝိယ သေန္တိ ပဝတ္တန္တိ စ, ‘‘ဝိဘာသေန္တီ’’တိ ပဒဿေဝ အာဝတ္တနတော အယံ ပဒါဝုတ္တိ နာမ. ဒေဟေ ကန္တိယောတိ ဝါကျံ. २२६. 'विभासेन्ति' इत्यादी. मुनींच्या शरीराची कांती सर्व दिशांना विशेष रूपाने प्रकाशित करते, म्हणून चंद्र इत्यादींची सर्व प्रभा (कांती) नष्ट झाल्यासारखी फिकट पडते. येथे 'विभासेन्ति' या पदाचीच पुनरावृत्ती झाल्यामुळे याला 'पदावृत्ती' म्हणतात. 'शरीरावरील कांती' असा वाक्यप्रयोग आहे. ဥဘယာဝုတ္တိ उभयावृत्ती (शब्द आणि अर्थ या दोन्हीची पुनरावृत्ती) ၂၂၇. २२७. ဇိတွာ ဝိဟရတိ က္လေသ-ရိပုံ လောကေ ဇိနော အယံ; ဝိဟရတျာ’ရိဝဂ္ဂေါ’ယံ, ရာသီဘူတောဝ ဒုဇ္ဇနေ. क्लेशरूपी शत्रूला जिंकून हे जीन (बुद्ध) लोकात विहरतात (राहतात); आणि हा शत्रूंचा समूह दुर्जन माणसांमध्ये एकत्र आल्यासारखा विहरतो (राहतो). ၂၂၇. ‘‘ဇိတွာ’’ဣစ္စာဒိ. အယံ ဇိနော က္လေသရိပုံ ဇိတွာ လောကေ ဝိဟရတိ ပဝတ္တတိ, အယံ တေန ဇိတော အရိဝဂ္ဂေါ သတ္တုသမူဟော [Pg.227] ဒုဇ္ဇနေ ရာသီဘူတော ဝိယ တတော အလဒ္ဓပ္ပတိဋ္ဌတ္တာ. ‘‘ဝိဟရတီ’’တိ အတ္ထဿ ပဒါနဉ္စ အာဝုတ္တိတော ဥဘယာဝုတ္တိ. २२७. 'जित्वा' इत्यादी. हे जीन (बुद्ध) क्लेशरूपी शत्रूला जिंकून लोकात विहरतात (राहतात). त्यांच्याद्वारे पराभूत झालेला हा शत्रूंचा समूह दुर्जनांमध्ये एकत्र आल्यासारखा राहतो, कारण त्याला तेथे (सज्जनांमध्ये) स्थान मिळत नाही. येथे 'विहरति' या अर्थाची आणि पदाची पुनरावृत्ती झाल्यामुळे ही 'उभयावृत्ती' आहे. ၂၂၇. ‘‘ဇိတွာ’’ဣစ္စာဒိ. အယံ ဇိနော က္လေသရိပုံ ဇိတွာ လောကေ ဝိဟရတိ, အယံ အရိဝဂ္ဂေါ က္လေသရိပုသမူဟော ဒုဇ္ဇနေ ရာသီဘူတောဝ ဝိဟရတီတိ. ဝါသသင်္ခတဿ အတ္ထဿ စ ‘‘ဝိဟရတီ’’တိ ပဒဿ စ ပုန ဥစ္စာရဏတော အယံ ဥဘယာဝုတ္တိ နာမ ဟောတိ. က္လေသော ဧဝ ရိပူတိ စ, အရီနံ ဝဂ္ဂေါတိ စ, အရာသိ ရာသိ အဘဝီတိ စ, ကုစ္ဆိတော ဇနောတိ စ ဝါကျံ. २२७. 'जित्वा' इत्यादी. हे जीन (बुद्ध) क्लेशरूपी शत्रूला जिंकून लोकात विहरतात, आणि हा क्लेशरूपी शत्रूंचा समूह दुर्जनांमध्ये एकत्र आल्यासारखा विहरतो. येथे विहारात्मक अर्थाची आणि 'विहरति' या पदाची पुन्हा उच्चारणा झाल्यामुळे ही 'उभयावृत्ती' आहे. 'क्लेश हाच शत्रू', 'शत्रूंचा समूह', 'जो समूह नव्हता तो समूह बनला', आणि 'निंद्य मनुष्य (दुर्जन)' असा वाक्यविग्रह आहे. ၂၂၈. २२८. ဧကတ္ထ ဝတ္တမာနမ္ပိ, သဗ္ဗဝါကျောပကာရကံ; ဒီပကံ နာမ တဉ္စာဒိ-မဇ္ဈန္တဝိသယံ တိဓာ. एकाच ठिकाणी विद्यमान असूनही जे संपूर्ण वाक्याला उपकारक ठरते, त्याला 'दीपक' (अलंकार) म्हणतात. ते वाक्याच्या सुरुवातीला, मध्ये आणि शेवटी येण्याच्या भेदाने तीन प्रकारचे असते. ၂၂၈. ဒီပကံ ပရိဒီပယမာဟ ‘‘ဧကတ္ထေ’’စ္စာဒိ. ဧကတ္ထ ဝါကျဿာဒေါ မဇ္ဈေ အန္တေ ဝါ ဝတ္တမာနမ္ပိ ကြိယာဇာတျာဒိကံ သဗ္ဗဿ အဘိမတဿ ကဿစိ ဝါကျဿ ကြိယာကာရကသမ္ဗန္ဓာဘိဓာယိနော ပဒသန္တာနဿ ဥပကာရကံ ဝါကျတ္ထာနွယဝသေန ဒီပကံ နာမ, ဒီပေါ ဝိယ ဧကဒေသေ ဝတ္တိတောပိ သကလပဒတ္ထဝသေန သဗ္ဗဝါကျံ ဒီပယတိ ပကာသေတီတိ. တဉ္စ ဒီပကံ အာဒိ စ မဇ္ဈဉ္စ အန္တဉ္စ ဝိသယော ဂေါစရော ယဿ တာဒိသံ တိဓာ အာဒိဒီပကံ မဇ္ဈဒီပကံ အန္တဒီပကန္တိ တိဝိဓံ ဟောတီတိ အတ္ထော, တမ္ပိ ကြိယာဒီနံ ဝသေန ပစ္စေကံ တိဝိဓံ ဟောတိ. २२८. दीपक अलंकाराचे स्पष्टीकरण करताना 'एकत्थ' इत्यादी म्हणतात. वाक्याच्या सुरुवातीला, मध्ये किंवा शेवटी एकाच ठिकाणी विद्यमान असलेली क्रिया, जात इत्यादी, क्रिया आणि कारकाचा संबंध दर्शवणाऱ्या कोणत्याही इष्ट वाक्याच्या पदसमूहाला वाक्यार्थाच्या अन्वयाने उपकारक ठरते, त्याला 'दीपक' म्हणतात. ज्याप्रमाणे दिवा एका कोपऱ्यात ठेवला तरी तो आपल्या प्रकाशाने संपूर्ण घराला प्रकाशित करतो, त्याचप्रमाणे हे संपूर्ण वाक्याला प्रकाशित करते. ते दीपक अलंकार सुरुवातीला, मध्ये आणि शेवटी येण्याच्या स्थानानुसार तीन प्रकारचे असते: 'आदिदीपक', 'मध्यदीपक' आणि 'अंतदीपक'. क्रिया इत्यादींच्या भेदाने हे प्रत्येक पुन्हा तीन प्रकारचे होते, असा अर्थ आहे. ၂၂၈. ဣဒါနိ ဒီပကာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ဧကတ္ထေ’’စ္စာဒိနာ. ဧကတ္ထ ဝါကျဿ အာဒိမဇ္ဈာဝသာနေသွေကသ္မိံ ဝတ္တမာနမ္ပိ ကြိယာဇာတိဂုဏတ္တယံ သဗ္ဗဝါကျောပကာရကံ ဝတ္တုမိစ္ဆိတကြိယာကာရကသမ္ဗန္ဓပ္ပကာသကပဒသန္တာနသင်္ခါတဝါကျဿ ဝါကျတ္ထာဝဗောဓဝသေန ပယောဇနံ ဒီပကံ နာမ ဧကဋ္ဌာနေ [Pg.228] ဌတွာ ဝိသယီဘူတသဗ္ဗဋ္ဌာနဂတဒဗ္ဗပကာသကပဒီပသမာနတ္တာ ဒီပကံ နာမ ဟောတိ. တဉ္စ ဒီပကံ အာဒိမဇ္ဈန္တဝိသယံ ဝါကျဿ အာဒိဝိသယံ မဇ္ဈဝိသယံ အန္တဝိသယဉ္စေတိ တိဓာ ဟောတိ. ဧတေသု ဧကေကမပိ ကြိယာဇာတိဂုဏဘေဒေန ပုနပိ တိဝိဓံ ဟောတီတိ ဝိညေယျံ. ဒီပေတီတိ ဒီပေါ, ပဒီပေါ. ပဋိဘာဂတ္ထေ ကပ္ပစ္စယေန ဒီပေါ ဝိယာတိ ဒီပကံ. ဝါကျဿ အာဒိ စ မဇ္ဈဉ္စ အန္တဉ္စေတိ စ, တံ ဝိသယော အဿေတိ စ ဝါကျံ. २२८. आता 'एकत्थ' इत्यादीने दीपक अलंकार दाखवतात. वाक्याच्या सुरुवातीला, मध्ये किंवा शेवटी एकाच ठिकाणी विद्यमान असलेले क्रिया, जात आणि गुण हे तिन्ही, संपूर्ण वाक्याला उपकारक ठरतात. सांगू इच्छिलेल्या क्रिया-कारक संबंधाला प्रकाशित करणाऱ्या पदसमूहरूपी वाक्याच्या अर्थाचे आकलन करून देण्याच्या प्रयोजनामुळे याला 'दीपक' म्हणतात. एका ठिकाणी राहून सर्व ठिकाणी असलेल्या वस्तू प्रकाशित करणाऱ्या दिव्याप्रमाणे असल्यामुळे याला 'दीपक' नाव दिले आहे. ते दीपक वाक्याच्या सुरुवातीला, मध्ये आणि शेवटी येण्याच्या स्थानानुसार तीन प्रकारचे असते. यातील प्रत्येक प्रकार क्रिया, जात आणि गुणाच्या भेदाने पुन्हा तीन प्रकारचा होतो, असे समजावे. जे प्रकाशित करते तो 'दीप' किंवा 'प्रदीप' होय. सादृश्यार्थात 'क' प्रत्यय लागून 'दिव्यासारखा' म्हणून 'दीपक' शब्द बनतो. 'वाक्याची सुरुवात, मध्य आणि अंत' असा, आणि 'तो ज्याचा विषय आहे' असा वाक्यविग्रह आहे. အာဒိဒီပက आदिदीपक (सुरुवातीला येणारा दीपक अलंकार) ၂၂၉. २२९. အကာသိ ဗုဒ္ဓေါ ဝေနေယျ-ဗန္ဓူနမမိတောဒယံ; သဗ္ဗပါပေဟိ စ သမံ-နေကတိတ္ထိယမဒ္ဒနံ. बुद्धांनी विनेय (उपदेशास पात्र असलेल्या) बांधवांचा अमर्याद उत्कर्ष केला; आणि त्याच वेळी सर्व पापांसह अनेक तीर्थकांचे (पाखंडींचे) दमन केले. ၂၂၉. ဥဒါဟရတိ ‘‘အကာသိ’’စ္စာဒိ. ဗုဒ္ဓေါ ဝေနေယျာ ဝိနေတဗ္ဗာယေဝ ဗန္ဓဝေါ တေသံ အမိတမပရိမိတံ ဥဒယမဘိဝုဒ္ဓိံ အကာသိ. န ကေဝလံ တမေဝ, သဗ္ဗပါပေဟိ သမံ ဧကတော အနေကာနံ တိတ္ထိယာနံ မဒ္ဒနဉ္စ အကာသီတိ. ဣဟ ‘‘အကာသီ’’တိ ကြိယာပဒေနာဒိဝတ္တိနာ သဗ္ဗမေဝ ဝါကျံ ဒီပယတီတိ ကြိယာဒိဒီပကမေတံ. २२९. 'अकासि' इत्यादीने उदाहरण देतात. बुद्धांनी विनेय म्हणजे उपदेशास पात्र असलेल्या बांधवांचा अमित म्हणजे अमर्याद उदय (अभ्युदय/उत्कर्ष) केला. केवळ एवढेच नाही, तर सर्व पापांसह एकाच वेळी अनेक तीर्थकांचे दमन देखील केले. येथे सुरुवातीला आलेल्या 'अकासि' (केला) या क्रियापदाने संपूर्ण वाक्य प्रकाशित होत असल्यामुळे हा 'क्रिया-आदिदीपक' अलंकार आहे. ၂၂၉. ‘‘အကာသိ’’စ္စာဒိ. ဗုဒ္ဓေါ ဝေနေယျဗန္ဓူနံ အမိတောဒယံ ပမာဏရဟိတာဘိဝုဒ္ဓိံ အကာသိ. န ကေဝလံ တမေဝ, သမံ ဧကက္ခဏေ သဗ္ဗပါပေဟိ သဟာနေကတိတ္ထိယမဒ္ဒနဉ္စ အကာသီတိ. ဝါကျာဒိမှိ ကြိယာယ ဌိတတ္တာ ဣဒံ ကြိယာဒိဒီပကံ နာမ. အမိတော စ သော ဥဒယော စေတိ စ, အနေကာ စ တေ တိတ္ထိယာ စေတိ စ, တေသံ မဒ္ဒနမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २२९. 'अकासि' इत्यादी. बुद्धांनी विनेय बांधवांचा अमितोदय म्हणजे प्रमाणरहित (अमर्याद) उत्कर्ष केला. केवळ एवढेच नाही, तर एकाच क्षणी सर्व पापांसह अनेक तीर्थकांचे दमन देखील केले. वाक्याच्या सुरुवातीला क्रियापद असल्यामुळे याला 'क्रिया-आदिदीपक' म्हणतात. 'अमित असलेला उदय' असा, 'अनेक असलेले तीर्थक' असा, 'त्यांचे दमन' असा विग्रह आहे. မဇ္ဈေဒီပက मध्यदीपक (मध्ये येणारा दीपक अलंकार) ၂၃၀. २३०. ဒဿနံ မုနိနော သာဓု-ဇနာနံ ဇာယတေ’မတံ; တဒညေသံ တု ဇန္တူနံ, ဝိသံ နိစ္စောပတာပနံ. मुनींचे दर्शन सज्जनांसाठी अमृत (निर्वाण) ठरते; परंतु इतर प्राण्यांसाठी मात्र ते निरंतर संताप देणारे विष ठरते. ၂၃၀. ‘‘ဒဿန’’မိစ္စာဒိ. [Pg.229] မုနိနော ဒဿနံ သာဓုဇနာနံ အမတံ နိဗ္ဗာနံ နာမ ဇာယတေ အမတဿ သာဓနတော, တေဟိ သာဓုဇနေဟိ အညေသံ ဇန္တူနံ နိစ္စမုပတာပေတီတိ နိစ္စောပတာပနံ ဝိသံ ဇာယတေ, တသ္မိံ မနောပဒေါသဿ ဝိသသဒိသတ္တာ နိရယာဒိဒုက္ခာဝဟဘာဝတောတိ. ကြိယာမဇ္ဈဒီပကမေတံ. २३०. 'दस्सनं' इत्यादी. मुनींचे दर्शन सज्जनांसाठी अमृत म्हणजे निर्वाण ठरते, कारण ते अमृताचे साधन आहे. त्या सज्जनांशिवाय इतर प्राण्यांसाठी मात्र ते निरंतर संताप देणारे विष ठरते, कारण त्यांच्या मनात निर्माण होणारा द्वेष हा विषासारखा असून तो नरक इत्यादी दुःखांना कारणीभूत ठरतो. हा 'क्रिया-मध्यदीपक' अलंकार आहे. ၂၃၀. ‘‘ဒဿန’’မိစ္စာဒိ. မုနိနော ဒဿနံ သာဓုဇနာနံ အမတံ အမတသင်္ခါတနိဗ္ဗာနဿ ဧကန္တကာရဏတ္တာ ကာရိယောပစာရေန အမတံ ဘူတံ ဇာယတေ, တဒညေသံ တေဟိ သာဓုဇနေဟိ အညေသံ ဇန္တူနံ တု နိစ္စောပတာပနံ သတတမုပတာပကရဏတော ဝိသံ ဇာယတေ ဝိသတုလျပဋိဃကာရဏတ္တာ ကာရိယောပစာရေန ဝိသံ ဘဝတီတိ. ဣဒံ ကြိယာယ မဇ္ဈေ ဌိတတ္တာ ကြိယာမဇ္ဈဒီပကံ. သာဓဝေါ စ တေ ဇနာ စေတိ စ, တေဟိ အညေတိ စ ဝါကျံ. २३०. 'दस्सनं' इत्यादी. मुनींचे दर्शन सज्जनांसाठी अमृत ठरते, कारण ते अमृतसंज्ञक निर्वाणाचे एकमेव कारण असल्यामुळे कार्योपचाराने अमृतच बनते. त्या सज्जनांशिवाय इतर प्राण्यांसाठी मात्र ते निरंतर संताप देणारे विष ठरते, कारण ते विषासारख्या द्वेषाचे कारण असल्यामुळे कार्योपचाराने विष बनते. हे क्रियापद वाक्याच्या मध्ये असल्यामुळे 'क्रिया-मध्यदीपक' आहे. 'जे सज्जन आहेत ते लोक' असा, आणि 'त्यांच्याहून इतर' असा वाक्यविग्रह आहे. အန္တဒီပက अंतदीपक (शेवटी येणारा दीपक अलंकार) ၂၃၁. २३१. အစ္စန္တကန္တလာဝဏျ-စန္ဒာတပမနောဟရော; ဇိနာနနိန္ဒု ဣန္ဒု စ, ကဿ နာ’နန္ဒကော ဘဝေ. अत्यंत सुंदर आणि लावण्यमयी चांदण्याप्रमाणे मनोहर असलेला जिनांचा (बुद्धांचा) मुखचंद्र आणि प्रत्यक्ष चंद्र, कोणाला आनंद देणारा ठरणार नाही? ၂၃၁. ‘‘အစ္စန္တေ’’စ္စာဒိ. အစ္စန္တံ ကန္တံ မနုညံ လာဝဏျံ ပိယဘာဝေါ, တမေဝ, တမိဝ ဝါစန္ဒာတပေါ စန္ဒိကာ, တေန မနောဟရော ဇိနာနနိန္ဒု ဣန္ဒု စန္ဒော စ ကဿ ဇနဿ အာနန္ဒကော န ဘဝတီတိ. ကြိယာန္တဒီပကံ. २३१. 'अच्चन्त' इत्यादी. अत्यंत कांत म्हणजे मनोहर लावण्य (प्रियभाव), तेच किंवा त्यासारखी चांदणी (चंद्रप्रकाश), त्याने मनोहर असलेला जिनांचा मुखचंद्र आणि प्रत्यक्ष चंद्र कोणत्या मनुष्याला आनंद देणारा ठरणार नाही? हा 'क्रिया-अंतदीपक' अलंकार आहे. ၂၃၁. ‘‘အစ္စန္တိ’’စ္စာဒိ. အစ္စန္တကန္တလာဝဏျစန္ဒာတပမနောဟရော အတိသယေန မနုညပိယဘာဝသင်္ခါတဝိလာသနာမကေန စန္ဒကိရဏေန, နော စေ, အတိသယေန မနုညပိယတာသင်္ခါတဝိလာသသဒိသေန စန္ဒကိရဏေန မနောဟရော ဇိနာနနိန္ဒု သမ္ဗုဒ္ဓဿ မုခစန္ဒော စ ဣန္ဒု စ ပကတိစန္ဒော စ ကဿ အာနန္ဒကော န ဘဝေ. ဣဒံ ကြိယာယ အန္တေ ဌိတတ္တာ ကြိယာန္တဒီပကံ နာမ. အန္တံ အတိက္ကန္တန္တိ စ, တဉ္စ တံ ကန္တဉ္စေတိ စ, [Pg.230] လဝဏဿ ဘာဝေါ လာဝဏျံ, မဓုရဘာဝေါ, တံသဒိသတ္တာ အစ္စန္တကန္တဉ္စ တံ လာဝဏျဉ္စာတိ စ, စန္ဒဿ အာတပေါ ကိရဏောတိ စ, အစ္စန္တကန္တလာဝဏျမေဝ စန္ဒာတပေါတိ စ, စန္ဒပက္ခေ အစ္စန္တကန္တလာဝဏျမိဝ စ သော စန္ဒာတပေါ စာတိ စ, တေန မနောဟရောတိ စ, ဇိနာနနမေဝ ဣန္ဒူတိ စ ဝါကျံ. ဣမိနာ ကြိယာဒီပကတ္တယေနေဝ အဝုတ္တဇာတိဒီပကဂုဏဒီပကာနိပိ ဉာတဗ္ဗာနိ. २३१. 'अच्चन्ति' इत्यादी. अत्यंत कांत आणि लावण्यमयी चांदण्याने मनोहर असलेला म्हणजे अतिशय मनोहर प्रियभावरूपी विलास नावाच्या चंद्रकिरणाने, किंवा अतिशय मनोहर प्रियतेच्या विलाससदृश चंद्रकिरणाने मनोहर असलेला संबुद्धांचा मुखचंद्र आणि प्रत्यक्ष चंद्र कोणाला आनंद देणारा ठरणार नाही? हे क्रियापद वाक्याच्या शेवटी असल्यामुळे याला 'क्रिया-अंतदीपक' म्हणतात. 'मर्यादेचे उल्लंघन केलेले' असा, 'ते आणि कांत केलेले' असा, 'लवणाचा भाव म्हणजे लावण्य (मधुरता)', 'त्याच्या सादृश्यामुळे अत्यंत कांत आणि लावण्य' असा, 'चंद्राचा प्रकाश म्हणजे किरण' असा, 'अत्यंत कांत लावण्य हेच चांदणे' असा, आणि चंद्राच्या पक्षात 'अत्यंत कांत लावण्यासारखे ते चांदणे' असा, 'त्याने मनोहर' असा, 'जिनांचे मुख हाच चंद्र' असा वाक्यविग्रह आहे. या तीन क्रियादीपक अलंकारांवरूनच येथे न सांगितलेले 'जातीदीपक' आणि 'गुणदीपक' अलंकार देखील समजून घ्यावेत. မာလာဒီပက मालादीपक (मालेसारखा दीपक अलंकार) ၂၃၂. २३२. ဟောတာ’ဝိပ္ပဋိသာရာယ,သီလံ ပါမောဇ္ဇဟေတု သော; တံ ပီတိဟေတု, သာ စာ’ယံ,ပဿဒ္ဓါဒိပသိဒ္ဓိယာ. शील हे पश्चात्ताप न होण्यासाठी (अविप्पटिसार) असते, ते (अविप्पटिसार) प्रमोदाचे (आनंदाचे) कारण बनते; तो प्रमोद प्रीतीचे कारण बनतो, आणि ती प्रीती शांतता (पस्सद्धि) इत्यादींच्या सिद्धीसाठी कारणीभूत ठरते. ၂၃၂. အာဒိဒီပကာဒီသုပိ တေသု ပယောဂက္ကမေန ပကာရန္တရမတ္ထီတိ ဝဒတိ ‘‘ဟောတိ’’စ္စာဒိ. သီလံ ပဉ္စသီလာဒိကံ, အဝိပ္ပဋိသာရာယ ပစ္ဆာနုတာပါဘာဝါယ ဟောတိ, သော အဝိပ္ပဋိသာရော ပါမောဇ္ဇဿ ဥပ္ပန္နမတ္တာယ ပီတိယာ ဟေတု ဟောတိ, တံ ပါမောဇ္ဇံ ပီတိယာ ဗလဝဘူတာယ ဟေတု ဟောတိ, သာ စာယံ ပီတိ ပဿဒ္ဓါဒီနံ ပဿဒ္ဓိသုခါဒီနံ ပသိဒ္ဓိယာ နိပ္ဖတ္တိယာ ဟောတီတိ ယောဇနီယံ. २३२. त्या आदिदीपक इत्यादींमध्ये सुद्धा प्रयोगाच्या क्रमाने दुसरा प्रकार अस्तित्वात आहे, हे दर्शवण्यासाठी 'होती' (होते) इत्यादी म्हणतात. शील म्हणजे पंचशील इत्यादी, अविप्पटिसार (पश्चात्ताप न होणे) यासाठी कारणीभूत ठरते. तो अविप्पटिसार प्रामोद्यासाठी (आनंदासाठी) आणि उत्पन्न झालेल्या प्रीतीसाठी कारण ठरतो. ते प्रामोद्य बलवान झालेल्या प्रीतीचे कारण बनते. आणि ती प्रीती पस्सद्धि (प्रश्रब्धी) इत्यादींच्या म्हणजे पस्सद्धि आणि सुख इत्यादींच्या सिद्धीसाठी (उत्पत्तीसाठी) कारणीभूत ठरते, अशी योजना करावी. ၂၃၂. ဣဒါနိ နဝသု ဒီပကေသု ပယောဂဝိသေသေန သာဓေတဗ္ဗေ အညပ္ပကာရေ ဒဿေတိ ‘‘ဟောတိ’’စ္စာဒိနာ. သီလံ သုရက္ခိတံ ပဉ္စင်္ဂဒသင်္ဂါဒိသီလံ အဝိပ္ပဋိသာရာယ ဟောတိ, သော အဝိပ္ပဋိသာရော ပါမောဇ္ဇဟေတု ဟောတိ ဥပ္ပန္နမတ္တာယ တရုဏပီတိယာ ကာရဏံ ဘဝတိ, တံ ပါမောဇ္ဇံ ပီတိဟေတု ဗလဝပီတိကာရဏံ ဟောတိ, သာ အယဉ္စ ပီတိ ပဿဒ္ဓါဒိပသိဒ္ဓိယာ ကာယပဿဒ္ဓိစိတ္တပဿဒ္ဓိအာဒီနံ သိဒ္ဓိယာ ဟေတု ဟောတိ. န ဝိပ္ပဋိသာရော အဝိပ္ပဋိသာရော, နသဒ္ဒေါ ပသဇ္ဇပဋိသေဓေ ဝတ္တတေ. ပမုဒိတဿ ဘာဝေါတိ စ, တဿ ဟေတူတိ [Pg.231] စ, ပဿဒ္ဓိ အာဒိ ယေသံ သုခါဒီနန္တိ စ, တေသံ ပသိဒ္ဓီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २३२. आता नऊ दीपकांमध्ये प्रयोगाच्या विशेषाने साध्य करण्यायोग्य इतर प्रकार 'होती' इत्यादीद्वारे दाखवतात. सुरक्षित राखलेले पंचशील, दशशील इत्यादी शील हे अविप्पटिसारासाठी (पश्चात्ताप न होण्यासाठी) असते. तो अविप्पटिसार प्रामोद्याचे कारण होतो आणि उत्पन्न झालेल्या प्राथमिक (तरुण) प्रीतीचे कारण बनतो. ते प्रामोद्य प्रीतीचे कारण म्हणजे बलवान प्रीतीचे कारण होते. आणि ती ही प्रीती पस्सद्धि इत्यादींच्या सिद्धीसाठी, म्हणजेच कायपस्सद्धि (कायेची शांतता) आणि चित्तपस्सद्धि (चित्ताची शांतता) इत्यादींच्या सिद्धीसाठी कारण ठरते. विप्पटिसार नसणे म्हणजे अविप्पटिसार; येथे 'न' शब्द प्रसज्यप्रतिषेध (निषेध) अर्थी वापरला आहे. प्रमुदिताचा भाव (प्रामोद्य) आणि त्याचे कारण, तसेच पस्सद्धि आहे आदी ज्यांच्यात अशा सुख इत्यादींची सिद्धी, असा विग्रह आहे. ၂၃၃. २३३. ဣစ္စာ’ဒိဒီပကတ္တေပိ, ပုဗ္ဗံ ပုဗ္ဗမပေက္ခိနီ; ဝါကျမာလာ ပဝတ္တာတိ, တံ မာလာဒီပကံ မတံ. अशा प्रकारे आदिदीपकत्व असूनही, पूर्वीच्या पूर्वीच्या वाक्याची अपेक्षा ठेवणारी वाक्यमाला प्रवृत्त होते, म्हणून त्याला 'मालादीपक' मानले जाते. ၂၃၃. ကိမိဒံ တဝ ပကာရန္တရမိစ္စာဟ ‘‘ဣစ္စာဒိ’’စ္စာဒိ. ဣစ္စေဝမိမံ ယံ တံ မာလာဒီပကံ မတံ. နနု ကြိယာဒိဒီပကမေတမိစ္စာဟ ‘‘အာဒိဒီပကတ္တေပီ’’တိ. ယဇ္ဇပျာဒိဒီပကမေတံ ပုဗ္ဗံ ပုဗ္ဗံ ဝါကျံ ‘‘ဟောတာဝိပ္ပဋိသာရာယ သီလ’’န္တိအာဒိကံ အပေက္ခိနီ အပေက္ခမာနာ ဝါကျာနံ ယထာဝုတ္တာနံ မာလာ ပရမ္ပရာ ပဝတ္တာတိ. တံ ယထာဝုတ္တံ မာလာဒီပကံ မတံ, နာဒိဒီပကန္တိ. २३३. हा तुमचा दुसरा प्रकार कोणता? यावर 'इत्यादी' असे म्हणतात. हे जे आहे, त्याला 'मालादीपक' मानले जाते. 'पण हे क्रिया-आदिदीपक नाही का?' यावर 'आदिदीपकत्व असूनही' असे म्हणतात. जरी हे आदिदीपक असले, तरी पूर्वीच्या पूर्वीच्या वाक्याची, जसे की 'शील अविप्पटिसारासाठी होते' इत्यादींची अपेक्षा ठेवणारी, सांगितलेल्या वाक्यांची माळ (परंपरा) प्रवृत्त होते. म्हणून त्याला पूर्वोक्त 'मालादीपक' मानले जाते, केवळ आदिदीपक नाही. ၂၃၃. ‘‘ဣစ္စာဒိ’’စ္စာဒိ. အာဒိဒီပကတ္တေပိ ကြိယာဒိဒီပကဘာဝေ သတိပိ ဝါကျမာလာ အနေကဝါကျေန သမ္ဗဇ္ဈမာနာ ပရမ္ပရာ ပုဗ္ဗံ ပုဗ္ဗံ ‘‘ဟောတာဝိပ္ပဋိသာရာယာ’’တိအာဒိကံ ဝါကျံ အပေက္ခိနီ ပဝတ္တာ. ဣတိ ဣဒံ အနန္တရဂတပ္ပကာရံ ဒီပကံ ‘‘မာလာဒီပက’’န္တိ မတန္တိ. အာဒိမှိ ဒီပကမိတိ စ, ဝိသယောပစာရေန အာဒိ စ တံ ဒီပကဉ္စာတိ စ, မာလာ ဧဝ ဒီပကမိတိ စ ဝါကျံ. २३३. 'इत्यादी' इत्यादी. आदिदीपकत्व असूनही, म्हणजे क्रिया-आदिदीपक भाव असतानाही, अनेक वाक्यांशी जोडली गेलेली वाक्यमाला (परंपरा), पूर्वीच्या पूर्वीच्या 'अविप्पटिसारासाठी होते' इत्यादी वाक्यांची अपेक्षा ठेवून प्रवृत्त होते. म्हणून या नंतर आलेल्या दीपक प्रकाराला 'मालादीपक' मानले जाते. 'सुरुवातीला दीपक' आणि विषयाच्या उपचाराने 'जे आदि आहे तेच दीपक' आणि 'माला हेच दीपक' असे हे वाक्य आहे. ၂၃၄. २३४. အနေနေဝ ပကာရေန, သေသာနမပိ ဒီပကေ; ဝိကပ္ပာနံ ဝိဓာတဗ္ဗာ-နုဂတီ သုဒ္ဓဗုဒ္ဓိဘိ. याच प्रकारे, दीपकातील उर्वरित प्रकारांचे (विकल्पांचे) आकलन शुद्ध बुद्धी असलेल्यांनी करावे. ၂၃၄. အဝုတ္တေ ဒီပကဝိကပ္ပေ အတိဒိသန္တော နိဂမေတိ ‘‘အနေနိ’’စ္စာဒိနာ. အနေနေဝ အနန္တရာ ဝုတ္တေန ပကာရေန ဝိဓိနာ ဒီပကေ ဒီပကဝိသယေ သေသာနမဝုတ္တာနံ ဝိကပ္ပာနံ ဇာတျာဒိဒီပကာဒိဘေဒါနံ အနုဂတိ အဝဗောဓော သုဒ္ဓဗုဒ္ဓိဘိ ပရိသုဒ္ဓမတီဟိ ကဝီဟိ ဝိဓာတဗ္ဗာ ကာတဗ္ဗာတိ. २३४. न सांगितलेल्या दीपक प्रकारांचा अतिदेश (विस्तार) करत 'याच प्रकारे' इत्यादींद्वारे समारोप करतात. याच, नुकत्याच सांगितलेल्या प्रकाराने (विधीने) दीपकाच्या विषयात, उर्वरित न सांगितलेल्या विकल्पांचे (प्रकारांचे), जसे की जाती-दीपक इत्यादी भेदांचे आकलन (बोध) शुद्ध बुद्धी असलेल्या, अत्यंत निर्मळ मती असलेल्या कवींनी करावा. ၂၃၄. ဣဒါနိ အဝုတ္တဒီပကာနိပိ အတိဒိသတိ ‘‘အနေနေဝိ’’စ္စာဒိနာ. အနေနေဝ ပကာရေန ယထာဝုတ္တဒီပကပ္ပကာရေန ဒီပကေ ဒီပကဝိသယေ သေသာနံ အပိ ဝိကပ္ပာနံ အဝုတ္တဇာတိဒီပကဂုဏဒီပကသင်္ခါတာနံ [Pg.232] ပက္ခာနံ ဇာတျာဒိဒီပကဂုဏာဒိဒီပကာဒီနံ ဆန္နံ မာလာဒီပကာနဉ္စ အနုဂတိ အဝဗောဓော သုဒ္ဓဗုဒ္ဓိဘိ ကဝီဟိ ဝိဓာတဗ္ဗာ ဝုတ္တာနုသာရေနေဝ ကာတဗ္ဗာ. ဝိသေသတော အသင်္ကရတော ကပ္ပီယန္တီတိ စ, သုဒ္ဓါ ဗုဒ္ဓိ ယေသန္တိ စ ဝါကျံ. २३४. आता न सांगितलेल्या दीपकांचाही अतिदेश 'याच प्रकारे' इत्यादींद्वारे करतात. याच प्रकारे, पूर्वोक्त दीपक प्रकाराप्रमाणे, दीपकाच्या विषयात, उर्वरित विकल्पांचे (प्रकारांचे) सुद्धा, जे न सांगितलेले जाती-दीपक, गुण-दीपक म्हणून ओळखले जाणारे पक्ष आहेत, त्या जाती-दीपक, गुण-दीपक इत्यादींचे आणि सहा प्रकारच्या मालादीपकांचे आकलन (बोध) शुद्ध बुद्धी असलेल्या कवींनी सांगितलेल्या पद्धतीनुसारच करावा. 'विशेषतः संकर न करता कल्पिले जातात' आणि 'ज्यांची बुद्धी शुद्ध आहे' असे हे वाक्य आहे. ၂၃၅. २३५. ဝိသေသဝစနိစ္ဆာယံ,နိသေဓဝစနံ တု ယံ; အက္ခေပေါ နာမ သော’ယဉ္စ,တိဓာ ကာလပ္ပဘေဒတော. विशेष सांगण्याच्या इच्छेने जे निषेधाचे वचन असते, त्याला 'आक्षेप' म्हणतात; आणि तो काळाच्या भेदावरून तीन प्रकारचा असतो. ၂၃၅. အက္ခေပမုပက္ခိပတိ ‘‘ဝိသေသိ’’စ္စာဒိနာ. ဝိသေသဿ ယဿ ကဿစိ ဝစနိစ္ဆာယံ ယံ နိသေဓဿ ပဋိသေဓဿ ဝစနံ ဝုတ္တိ, သော အက္ခေပေါ နာမ အက္ခိပနံ ပဋိသေဓောတိ ကတွာ. သောယမက္ခေပေါ စ ကာလပ္ပဘေဒတော အတီတာဒိတော တိဓာ တိပ္ပကာရော. २३५. 'विशेष' इत्यादींद्वारे आक्षेपाची मांडणी करतात. कोणत्याही विशेषाचे कथन करण्याच्या इच्छेने जे निषेधाचे किंवा प्रतिषेधाचे वचन (कथन) असते, त्याला 'आक्षेप' म्हणतात, कारण तो आक्षेप घेणे किंवा प्रतिषेध करणे होय. आणि हा आक्षेप काळाच्या भेदावरून, म्हणजे भूतकाळ इत्यादींवरून तीन प्रकारचा असतो. ၂၃၅. ဣဒါနိ အက္ခေပံ ဒဿေတိ ‘‘ဝိသေသေ’’စ္စာဒိနာ. ဝိသေသဝစနိစ္ဆာယံ တု ယဿ ကဿစိ ပဒတ္ထဝိသေသဿ ကထနိစ္ဆာယ ဧဝ ယံ နိသေဓဝစနံ ပဋိသေဓဝစနံ အတ္ထိ, သော ပဋိသေဓော အက္ခေပေါ နာမ အက္ခေပါလင်္ကာရော နာမ. အယဉ္စ အက္ခေပေါ ကာလပ္ပဘေဒတော အတီတာဒိကာလဝိသေသေန တိဓာ ဟောတိ. ဝိသေသဿ ကဿစိ ဝစနန္တိ စ, တသ္မိံ ဣစ္ဆာတိ စ, နိသေဓဿ ပဋိသေဓဿ ဝစနမိတိ စ, အက္ခိပနံ ပဋိက္ခိပနန္တိ စ, ကာလဿ ကြိယာယ ဝါ ပဘေဒေါတိ စ ဝါကျံ. २३५. आता 'विशेष' इत्यादींद्वारे आक्षेप दर्शवतात. कोणत्याही पदार्थाच्या विशेषाचे कथन करण्याच्या इच्छेनेच जे निषेधवाचक किंवा प्रतिषेधवाचक वचन असते, त्या प्रतिषेधाला 'आक्षेप' किंवा 'आक्षेप अलंकार' म्हणतात. आणि हा आक्षेपकाळाच्या भेदावरून, म्हणजे भूतकाळ इत्यादी काळाच्या विशेषाने तीन प्रकारचा असतो. 'कोणत्याही विशेषाचे वचन' आणि 'त्याची इच्छा', 'निषेधाचे किंवा प्रतिषेधाचे वचन', 'आक्षेप घेणे किंवा नाकारणे', आणि 'काळाचा किंवा क्रियेचा भेद' असे हे वाक्य आहे. ၂၃၆. २३६. ဧကာကီ’နေကသေနံ တံ, မာရံသဝိဇယီဇိနော; ကထံ တ’မထ ဝါ တဿ, ပါရမီဗလမီဒိသံ. एकटे असूनही अनेक सेना असलेल्या त्या मारावर विजय मिळवणाऱ्या जिनांनी (बुद्धांनी) ते कसे केले? अथवा त्यांच्या पारमितांचे बल असे (अद्भूत) होते. အတီတက္ခေပေါ. अतीत-आक्षेप (भूतकालीन आक्षेप). ၂၃၆. ‘‘ဧကာကိ’’စ္စာဒိ. သော ဇိနော ဧကာကီ ဧကော သမာနော အနေကသေနံ တံ မာရံ ဝိဇယိ ပရာဇေသိ, တံ ကထံ ယုဇ္ဇတေ. [Pg.233] အထ ဝါ ကိံ န ယုဇ္ဇတေ, ယတော တဿ ဇိနဿ ပါရမီ သမတိံသဝိဓာ ပါရမိတာ ဧဝ ဗလံ ဤဒိသံ ယာဒိသံ တဿ ဝိဇယကာရဏန္တိ. ဧတ္ထ ဧကာကိတ္တကာရဏသာမတ္ထိယာ မာရဝိဇယာယောဂဗုဒ္ဓိ ‘‘သသေနံ မာရံ ဝိဇိတဝါတိ ကထံ ယုဇ္ဇတီ’’တိ ဧဝမာကာရာ အတီတာ အက္ခိတ္တာတိ အတီတက္ခေပေါယံ. २३६. 'एकटे' इत्यादी. ते जीन (बुद्ध) एकटे असताना, अनेक सेना असलेल्या त्या माराचा त्यांनी पराभव केला, ते कसे योग्य ठरते? अथवा का योग्य ठरणार नाही? कारण त्या जिनांचे पारमितांचे बल, म्हणजे तीस प्रकारच्या पारमितांचे बल असे होते, जे त्यांच्या विजयाचे कारण ठरले. येथे एकटे असण्याच्या कारणाच्या सामर्थ्यामुळे मार-विजयाच्या अयोग्यतेची बुद्धी, 'ससैन्य माराला जिंकले हे कसे योग्य ठरते?' अशा प्रकारची भूतकालीन शंका आक्षिप्त केली गेली आहे, म्हणून हा 'अतीत-आक्षेप' आहे. ၂၃၆. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ဧကာကိ’’စ္စာဒိနာ. သ ဇိနော သော သဗ္ဗညူ ဧကာကီ အသဟာယော အဒုတိယော အနေကသေနံ တံ မာရံ ဝိဇယီ အဇိနီတိ, တံ ကထံ ယုဇ္ဇတိ. အထ ဝါ ယုဇ္ဇတေဝ, တဿ ဇိနဿ ပါရမီဗလံ သမတိံသပါရမီဗလံ သမတိံသပါရမီတာသင်္ခတသေနာ ဤဒိသမီဒိသာတိ. ဗုဒ္ဓဿ အဒုတိယဘာဝဉ္စ မာရဿ သပရိဝါရဘာဝဉ္စ နိဿာယ ကဿစိ ဥပ္ပန္နာ ‘‘ဧကာကိနာ ကထမနေကသေနော မာရော ဇိတော’’တိ ဝိပရီတဗုဒ္ဓိ အတီတမာရဝိဇယဝိသယတ္တာ အတီတာ ဟောတိ, ‘‘တဿ ပါရမီဗလံ ဤဒိသ’’န္တိ အတ္ထဝိသေသဿ ကထနိစ္ဆာယ ‘‘အထ ဝါ’’တိ နိဒ္ဒိဋ္ဌပဋိသေဓဝစနေန အက္ခိတ္တန္တိ အတီတဿ အက္ခေပနတော အတီတက္ခေပေါ နာမ. २३६. आता 'एकटे' इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. ते जीन, ते सर्वज्ञ, एकटे, असहाय (सोबत कोणी नसलेले), अद्वितीय असताना, अनेक सेना असलेल्या त्या माराला जिंकते झाले, ते कसे योग्य ठरते? अथवा ते योग्यच आहे, कारण त्या जिनांचे पारमितांचे बल, म्हणजे तीस पारमितांचे बल, जी तीस पारमितांची सेनाच होती, ती अशी अशी होती. बुद्धांचे अद्वितीयत्व (एकटे असणे) आणि माराचे सपरिवारत्व (सैन्य असणे) यावर आधारित, कोणाच्या मनात उत्पन्न झालेली 'एकट्याने अनेक सेना असलेल्या माराला कसे जिंकले?' ही विपरीत बुद्धी (शंका), भूतकाळातील मार-विजयाच्या विषयाशी संबंधित असल्याने भूतकालीन असते. 'त्यांचे पारमिता बल असे होते' या अर्थविशेषाचे कथन करण्याच्या इच्छेने, 'अथवा' या निर्दिष्ट प्रतिषेध वचनाद्वारे ती आक्षिप्त केली गेली आहे, म्हणून भूतकाळाचा आक्षेप घेतल्यामुळे याला 'अतीत-आक्षेप' म्हणतात. ၂၃၇. २३७. ကိံ စိတ္တေ’ဇာသမုဂ္ဃာတံ,အပ္ပတ္တော’သ္မိတိ ခိဇ္ဇသေ; ပဏာမော နနု သောယေဝ,သကိမ္ပိ သုဂတေ ကတော. हे चित्ता, एजा (तृष्णेचा) समूळ नाश मी मिळवला नाही म्हणून का खेद करतोस? सुगतांच्या (बुद्धांच्या) चरणी एकदा जरी केलेला प्रणाम तोच (तृष्णेचा नाश) नाही का? ဝတ္တမာနက္ခေပေါ. वर्तमान-आक्षेप (वर्तमानकालीन आक्षेप). ၂၃၇. ‘‘ကိံ စိတ္တေ’’စ္စာဒိ. စိတ္တ ဧဇာယ တဏှာယ သမုဂ္ဃာတံ သဗ္ဗထာ အပ္ပဝတ္တိံ အပ္ပတ္တောသ္မီတိ ကိံ ခိဇ္ဇသေ, တုစ္ဆော တဝ ခေဒေါ. သုဂတေ သကိမ္ပိ ဧကဝါရမ္ပိ ကတော ပဏာမော သောယေဝ တဏှာယ သမုဂ္ဃာတောယေဝ နနု ဧကန္တကာရဏတ္တာ တဿာတိ ဝတ္တမာနက္ခေပေါယံ ဝတ္တမာနဿ ခေဒဿာက္ခိတတ္တာ. २३७. 'का चित्ता' इत्यादी. हे चित्ता, एजा म्हणजे तृष्णेचा समूळ नाश (सर्वथा अप्रवृत्ती) मी मिळवला नाही म्हणून का खेद करतोस? तुझा खेद व्यर्थ आहे. सुगतांच्या चरणी एकदा जरी केलेला प्रणाम हाच तृष्णेचा समूळ नाश नाही का? कारण तो त्याचा निश्चित कारण आहे. वर्तमानकालीन खेदाचा आक्षेप घेतल्यामुळे हा 'वर्तमान-आक्षेप' आहे. ၂၃၇. ‘‘ကိံ စိတ္တေ’’စ္စာဒိ. [Pg.234] ဟေ စိတ္တ ဧဇာသမုဂ္ဃာတံ ဧဇာသင်္ခတာယ တဏှာယ သမုစ္ဆေဒပဟာနံ အပ္ပတ္တောသ္မီတိ ကိံ ခိဇ္ဇသေ, တုစ္ဆော တဝ ခေဒေါ. တထာ ဟိ သုဂတေ ဗုဒ္ဓဝိသယေ သကိမ္ပိ ကတော ပဏာမော သောယေဝ နနု တဏှာသမုစ္ဆေဒဿ ဧကန္တကာရဏတ္တာ ကာရဏကာရိယာနမဘေဒဗုဒ္ဓိယာ သော ဧဇာသမုဂ္ဃာတောယေဝ ကိံ န ဘဝတိ, ဘဝတျေဝ. ‘‘ပဏာမော’’တျာဒိဝိသေသကထနာဓိပ္ပာယေန ‘‘ကိံ ခိဇ္ဇသေ’’တိ စိတ္တဿ ဝတ္တမာနခေဒဿ ပဋိသေဓိတတ္တာ အယံ ဝတ္တမာနက္ခေပေါ နာမ. ဧဇာယ သမုဂ္ဃာတောတိ ဝါကျံ. २३७. 'का चित्ता' इत्यादी. हे चित्ता, एजा-समूळ नाश म्हणजे एजा नावाच्या तृष्णेचा समूळ उच्छेद (प्रहाण) मी मिळवला नाही म्हणून का खेद करतोस? तुझा खेद व्यर्थ आहे. कारण सुगतांच्या म्हणजे बुद्धांच्या विषयात एकदा जरी केलेला प्रणाम हाच तृष्णेच्या समूळ उच्छेदाचे निश्चित कारण असल्याने, कारण आणि कार्य यांच्या अभेद बुद्धीने तो एजा-समूळ नाशच का होणार नाही? तो नक्कीच होईल. 'प्रणाम' इत्यादी विशेष सांगण्याच्या अभिप्रायाने 'का खेद करतोस' याद्वारे चित्ताच्या वर्तमानकालीन खेदाचा प्रतिषेध (निषेध) केल्यामुळे याला 'वर्तमान-आक्षेप' म्हणतात. 'एजेचा समूळ नाश' असे हे वाक्य आहे. ၂၃၈. २३८. သစ္စံ န တေ ဂမိဿန္တိ, သိဝံ သုဇနဂေါစရံ; မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိပရိက္ကန္တ-မာနသာ ယေ သုဒုဇ္ဇနာ. हे सत्य आहे की, जे अत्यंत दुर्जन आहेत आणि ज्यांचे मन मिथ्यादृष्टीने ग्रासलेले आहे, ते सज्जनांचा विषय असलेल्या शिव (कल्याणकारी शांत) पदाला जाणार नाहीत. အနာဂတက္ခေပေါ. अनागत-आक्षेप (भविष्यकालीन आक्षेप). ၂၃၈. ‘‘သစ္စ’’မိစ္စာဒိ. သုဇနဂေါစရံ သိဝံ သန္တိပဒံ တေ သစ္စံ နိယတံ န ဂမိဿန္တိ. ယေ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိယာ သဿတာဒိကာယ ပရိက္ကန္တံ အဘိဘူတံ မာနသံ စိတ္တံ ယေသံ တာဒိသာ သုဋ္ဌု အတိသယေန ဒုဇ္ဇနာတိ ယောဇနီယံ. အယမနာဂတက္ခေပေါ ဘာဝိနော ဂမနဿာက္ခိတ္တတ္တာ. २३८. 'सत्य' इत्यादी. सज्जनांचा विषय असलेल्या शिव म्हणजे शांतीपदाला ते निश्चितपणे जाणार नाहीत. जे शाश्वत इत्यादी मिथ्यादृष्टीने ग्रासलेले (अभिभूत झालेले) मन किंवा चित्त असलेले, अत्यंत दुर्जन आहेत, अशी योजना करावी. भविष्यातील जाण्याचा (गमनाचा) आक्षेप घेतल्यामुळे हा 'अनागत-आक्षेप' आहे. ‘‘ဇီဝိတာသာ ဗလဝတီ, ဓနာသာ ဒုဗ္ဗလာ မမ; ဂစ္ဆ ဝါ တိဋ္ဌ ဝါ ကန္တ, မမာဝတ္ထာ နိဝေဒိတာ’’တိ. माझी जगण्याची आशा बलवान आहे, धनाची आशा दुर्बळ आहे; हे प्रियकरा, तू जा किंवा राहा, माझी अवस्था मी तुला सांगितली आहे. အယမနာဒရက္ခေပေါတိ ဧဝမာဒယော တု တဗ္ဘေဒါယေဝါတိ ဥပေက္ခိတာ. हा अनादर-आक्षेप आहे, इत्यादी प्रकार तर त्याचेच भेद असल्याने (येथे स्वतंत्रपणे न सांगता) दुर्लक्षित केले आहेत. ၂၃၈. ‘‘သစ္စ’’မိစ္စာဒိ. သုဇနဂေါစရံ သာဓူနံ ဝိသယဂတံ သိဝံ သန္တိပဒံ တေ သစ္စမေကန္တေန န ဂမိဿန္တိ. ကေ? ယေ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိပရိက္ကန္တမာနသာ သုဒုဇ္ဇနာ, တေယေဝါတိ. ‘‘မိစ္ဆာဒိဋ္ဌီ’’တိအာဒိဝိသေသဿ ကထနာဓိပ္ပာယေန ‘‘တေ န ဂမိဿန္တီ’’တိ တိတ္ထိယာနံ ဘာဝိနော နိဗ္ဗာနဂမနဿ ဗုဒ္ဓိယာ ပဋိသိဒ္ဓတ္တာ [Pg.235] အယံ အနာဂတက္ခေပေါ နာမ. မိစ္ဆာ ဝိပရီတာ စ သာ ဒိဋ္ဌိ စာတိ စ, တာယ ပရိက္ကန္တံ မာနသံ ယေသန္တိ စ ဝါကျံ. २३८. 'सत्य' इत्यादी. सज्जनांच्या, साधूंच्या विषयात असलेले शिव म्हणजे शांतीपदाला ते निश्चितपणे जाणार नाहीत. कोण? जे मिथ्यादृष्टीने ग्रासलेले मन असलेले अत्यंत दुर्जन आहेत, तेच. 'मिथ्यादृष्टी' इत्यादी विशेष सांगण्याच्या अभिप्रायाने 'ते जाणार नाहीत' याद्वारे तीर्थिकांच्या भविष्यातील निर्वाण-गमनाचा बुद्धीने प्रतिषेध केल्यामुळे याला 'अनागत-आक्षेप' म्हणतात. 'मिथ्या म्हणजे विपरीत आणि ती दृष्टी' आणि 'तिच्याद्वारे ग्रासलेले मन ज्यांचे आहे' असे हे वाक्य आहे. ‘‘ဇီဝိတာသာ ဗလဝတီ, ဓနာသာ ဒုဗ္ဗလာ မမ; ဂစ္ဆ ဝါ တိဋ္ဌ ဝါ ကန္တ, မမာဝတ္ထာ နိဝေဒိတာ’’ – माझी जगण्याची आशा बलवान आहे, धनाची आशा दुर्बळ आहे; हे प्रियकरा, तू जा किंवा राहा, माझी अवस्था मी तुला सांगितली आहे - တျာဒိကော အနာဒရက္ခေပေါပိ ဒဿိတာတီတက္ခေပါဒီဟိ အနညတ္တာ ဝိသုံ န ဝုတ္တော. အယံ ပနေတ္ထ အတ္ထော – ဟေ ကန္တ ဝလ္လဘ မမ ဇီဝိတာသာ ဗလဝတီ ဟောတိ, ဓနာသာ ဒုဗ္ဗလာ, တွံ ဂစ္ဆ ဝါ တိဋ္ဌ ဝါ, မမာဝတ္ထာ မမ ပကတိ နိဝေဒိတာ ဝိညာပိတာ. ‘‘ဧတ္ထ မမာဝတ္ထာ နိဝေဒိတာ’’တိ ဝိသေသဿ ကထနာဓိပ္ပာယေန ‘‘ဂစ္ဆ ဝါ တိဋ္ဌ ဝါ’’တိ ဣမိနာ အနာဒရဝစနေန အတ္တနော ဝလ္လဘဿ ဝတ္တမာနဿ အနာဂတဿ ဝါ ဂမနဿ ပဋိသေဓိတတ္တာ ဝတ္တမာနက္ခေပေါ ဝါ အနာဂတက္ခေပေါ ဝါ ဟောတိ. इत्यादी प्रकारचा अनादर-आक्षेप सुद्धा दर्शवलेल्या अतीत-आक्षेप इत्यादींपेक्षा वेगळा नसल्याने स्वतंत्रपणे सांगितलेला नाही. येथे हा अर्थ आहे - हे प्रियकरा (वल्लभा), माझी जगण्याची आशा बलवान आहे, धनाची आशा दुर्बळ आहे, तू जा किंवा राहा, माझी अवस्था (माझी प्रकृती) मी तुला सांगितली आहे (निवेदन केली आहे). 'येथे माझी अवस्था सांगितली आहे' हा विशेष सांगण्याच्या अभिप्रायाने, 'जा किंवा राहा' या अनादर वचनाद्वारे आपल्या प्रियकराच्या वर्तमानकालीन किंवा भविष्यकालीन गमनाचा (जाण्याचा) प्रतिषेध केल्यामुळे हा वर्तमान-आक्षेप किंवा अनागत-आक्षेप होतो. ၂၃၉. २३९. ဉေယျော သောတ္ထန္တရနျာသော,ယော’ညဝါကျတ္ထသာဓနော; သဗ္ဗဗျာပီ ဝိသေသဋ္ဌော,ဟိဝိသိဋ္ဌ’ဿ ဘေဒတော. जो दुसऱ्या वाक्याच्या अर्थाचे साधन (समर्थन) करतो, तो अर्थांतरन्यास समजावा; तो सर्वव्यापी (सामान्य) आणि विशेष अर्थाचा असतो, आणि 'हि' शब्दाने विशिष्ट असणे हे त्याचे भेद आहेत. ၂၃၉. အတ္ထန္တရနျာသံ နျာသယတိ ‘‘ဉေယျိ’’စ္စာဒိနာ. အညဝါကျတ္ထသာဓနော အညဿ ဝတ္တုမိစ္ဆိတဿ ကဿစိ ဝါကျတ္ထဿ သာဓနော သမတ္ထကော ကဿစိဒေဝ အတ္ထဿ ပရဿ နျာသော ယော, သော အတ္ထန္တရနျာသော ဉေယျော အတ္ထန္တရဿ ကဿစိ ဝတ္ထုနော နျာသော ပယောဂေါတိ ကတွာ. တဿ ဘေဒမာဟ ‘‘သဗ္ဗေ’’စ္စာဒိနာ. အဿ အတ္ထန္တရနျာသဿ ဘေဒတော ဝိကပ္ပတော ဟိဝိသိဋ္ဌာ ဟိသဒ္ဒေန ဝိသေသိတာ သဗ္ဗဗျာပီ စ ဝိသေသဋ္ဌော စာတိ ဣမေ ဘဝန္တိ. နနု ပတိဝတ္ထူပမာယ ဣမဿ စ ကော ဘေဒေါတိ? သစ္စံ, တထာပိ ဥဘယတ္ထ အတ္ထန္တရနျာသမတ္တေန သဒိသတ္တေပိ ယတ္ထ မုချတော သာမျပ္ပတီတိသဗ္ဘာဝေါ, သာ ပတိဝတ္ထူပမာ. ယတ္ထ ပန သာဓနရူပဿေဝတ္ထန္တရနျာသော, သော အတ္ထန္တရနျာသောတိ ပါကဋောယေဝုဘိန္နံ ဘေဒေါတိ. २३९. 'समजावा' इत्यादींद्वारे अर्थांतरन्यासाची मांडणी करतात. दुसऱ्या वाक्याच्या अर्थाचे साधन म्हणजे सांगण्याची इच्छा असलेल्या दुसऱ्या कोणत्याही वाक्याच्या अर्थाचे साधन किंवा समर्थक असणारा, दुसऱ्या कोणत्याही अर्थाचा जो न्यास (मांडणी) आहे, तो अर्थांतरन्यास समजावा; कारण तो दुसऱ्या अर्थाच्या किंवा वस्तूचा न्यास (प्रयोग) करणे होय. त्याचे भेद 'सर्व' इत्यादींद्वारे सांगतात. या अर्थांतरन्यासाच्या भेदावरून (विकल्पावरून) 'हि' शब्दाने विशिष्ट (विशेषित), सर्वव्यापी (सामान्य) आणि विशेष अर्थाचे, हे भेद होतात. 'पण प्रतिवस्तूपमा आणि यामध्ये काय भेद आहे?' हे सत्य आहे की, दोन्ही ठिकाणी केवळ अर्थांतरन्यास असल्यामुळे साम्य असले, तरी जिथे प्रामुख्याने साम्याची प्रचिती असते, ती प्रतिवस्तूपमा होय. पण जिथे साधनरूपानेच अर्थांतरन्यास असतो, तो अर्थांतरन्यास होय, असा या दोघांमधील भेद स्पष्टच आहे. ၂၃၉. ဣဒါနိ အတ္ထန္တရနျာသံ ဒဿေတိ ‘‘ဉေယျ’’စ္စာဒိနာ. ယော အညဝါကျတ္ထသာဓနော အညဝါကျတ္ထဿ သာဓနော ဟောတိ, အညဝါကျတ္ထံ သာဓေတိ, သော အတ္ထန္တရနျာသော သာဓိယဝါကျတ္ထတော အညတ္ထဿ ဌပနံ ကထနံ ‘‘အတ္ထန္တရနျာသော’’တိ ဉေယျော, အဿ အတ္ထန္တရနျာသဿ ဘေဒတော ပဘေဒေန သဗ္ဗဗျာပီ ဝိသေသဋ္ဌော စ, ဧတေယေဝ ဟိဝိသိဋ္ဌာ စာတိ စတ္တာရော ဘဝန္တိ. အတ္ထော စ သော အန္တရော အညော စေတိ စ, တဿ နျာသောတိ စ, သဗ္ဗံ ဗျာပေတိ သီလေနာတိ စ, ဝိသေသေ ပဒေသေ တိဋ္ဌတီတိ စ, ဟိသဒ္ဒေန ဝိသိဋ္ဌာတိ စ ဝါကျံ. २३९. आता "ञेय्य" (ज्ञेय) इत्यादींद्वारे अत्थन्तरन्यास दर्शवितात. जो दुसऱ्या वाक्याच्या अर्थाचे साधन (सिद्ध करणारा) असतो, दुसऱ्या वाक्याच्या अर्थाला सिद्ध करतो, तो अत्थन्तरन्यास होय. साध्य वाक्याच्या अर्थापेक्षा दुसऱ्या अर्थाची स्थापना करणे किंवा सांगणे म्हणजे "अत्थन्तरन्यास" असे जाणावे. या अत्थन्तरन्यासाचे भेदांच्या प्रभेदाने - सब्बब्यापी (सर्वव्यापी), विसेसट्ठ (विशेषार्थ) आणि हेच दोन्ही 'हि' (शब्दाने) विसिठ्ठ (विशिष्ट) असे चार प्रकार होतात. 'अत्थ' (अर्थ) आणि तो 'अन्तर' (दुसरा) आणि 'त्याचा न्यास', 'स्वभावाने सर्वांना व्यापणारा' आणि 'विशेष प्रदेशात राहणारा' आणि 'हि' शब्दाने विशिष्ट, असे हे वाक्य आहे. ဟိ-ရဟိတသဗ္ဗဗျာပီ 'हि'-विरहित सर्वव्यापी (हि-रहितसब्बब्यापी) ၂၄၀. २४०. တေပိ လောကဟိတာသတ္တာ, သူရိယော စန္ဒိမာ အပိ ; အတ္ထံ ပဿ ဂမိဿန္တိ, နိယမော ကေန လင်္ဃျတေ. ते देखील जे जगाच्या हितामध्ये मग्न आहेत, सूर्य आणि चंद्र सुद्धा; अस्ताला (नाशाला) जातील, पहा! हा नियम कोणाकडून ओलांडला जाऊ शकतो? ၂၄၀. ဥဒါဟရတိ ‘‘တေပိ’’စ္စာဒိ. လောကဿ ဟိတေ အဘိဝုဒ္ဓိယံ အာသတ္တာ အဘိရတ္တာ သူရိယော စန္ဒိမာ အပီတိ တေ မဟန္တာပိ အတ္ထံ ဥဒယဝိပရိယာသ’မဘာဝံ ဂမိဿန္တိ, န တထေဝ တိဋ္ဌန္တိ, ‘‘ပဿေ’’တိ တမဝဗောဓယတိ. တထာ ဟိ နိယမော ‘‘ဘာဝေါ နာမ န ပါယိနိ. သဗ္ဗေ သင်္ခါရာ ဝယဓမ္မိနော’’တိ အယံ နိယတိ. ကေန နာမ ဝတ္ထုနာ လင်္ဃျတေ အတိက္ကမိတုံ သက္ကာတိ. အယံ ဟိသဒ္ဒရဟိတော သဗ္ဗဗျာပီ အတ္ထန္တရနျာသော တာဒိသဿ နိယမဿ သဗ္ဗဂတတ္တာ. २४०. "तेपि" (ते देखील) इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. जगाच्या हितामध्ये, अभिवृद्धीमध्ये आसक्त (मग्न) असलेले सूर्य आणि चंद्र सुद्धा, ते महान असूनही अस्ताला म्हणजे उदयाच्या उलट अशा अभावाला प्राप्त होतील, तसेच टिकून राहणार नाहीत, "पहा" (पस्स) याद्वारे हे बोधित करतात. कारण की नियम असा आहे - "उत्पन्न झालेली कोणतीही गोष्ट नष्ट न होणारी नाही. सर्व संस्कार (सङ्खार) व्ययधर्मी (नाशवंत) आहेत" हाच नियम आहे. कोणत्या बरं वस्तूने हा नियम ओलांडला जाऊ शकतो, म्हणजेच याचे उल्लंघन करणे शक्य आहे? हा 'हि' शब्दरहित सर्वव्यापी अत्थन्तरन्यास आहे, कारण असा नियम सर्वत्र लागू पडणारा (सब्बगत) आहे. ၂၄၀. ‘‘တေပိ’’စ္စာဒိ. လောကဟိတာသတ္တာ လောကာဘိဝုဒ္ဓိယံ လဂ္ဂါ သူရိယော အပိ စန္ဒိမာ အပိ တေပိ မဟာနုဘာဝါ အတ္ထံ ဝိနာသံ ဂမိဿန္တိ, ပဿ ဧတေသံ ပါကဋံ ဝိနာသံ [Pg.237] ဩလောကေဟိ. တထာ ဟိ နိယမော ‘‘သဗ္ဗေ သင်္ခါရာ အနိစ္စာ’’တိ သဗ္ဗပဒတ္ထမနတိက္ကမ္မ ပဝတ္တနိယမော ကေန လင်္ဃျတေ ပစ္စယသမုပ္ပန္နေန ကေန ပဒတ္ထေန အတိက္ကမျတေတိ. အယံ ဟိသဒ္ဒရဟိတော အတ္ထဂမနသင်္ခါတော နိယမော သဗ္ဗတ္ထ ဂတောတိ သဗ္ဗဗျာပီ အတ္ထန္တရနျာသော. ပတိဝတ္ထူပမာယ စ အတ္ထန္တရနျာသဿ စ အတ္ထန္တရနျာသတ္တေန တုလျတ္တေပိ တတ္ထ သာဓမ္မပကာသတ္တသဘာဝေါ, ဧတ္ထ ဝုတ္တတ္ထဿ သာဓနသဘာဝေါတိ ဧဝမိမေသံ နာနတ္တံ သုဗျတ္တံ. အပီတိ သမ္ဘာဝနာယံ, ဒုတိယော အပိသဒ္ဒေါ သမုစ္စယေ. २४०. "तेपि" इत्यादी. जगाच्या हितामध्ये आसक्त, जगाच्या अभिवृद्धीमध्ये लागलेले सूर्य आणि चंद्र सुद्धा, ते महानुभाव देखील अस्ताला म्हणजे विनाशाला प्राप्त होतील; पहा, त्यांचा हा उघड विनाश डोळे उघडून पहा. कारण की नियम असा आहे - "सर्व संस्कार अनित्य आहेत" (सब्बे सङ्खारा अनिच्चा), सर्व पदार्थांचे उल्लंघन न करता प्रवृत्त होणारा हा नियम कोणत्या प्रत्ययसमुत्पन्न (पच्चयसमुप्पन्न) पदार्थाने ओलांडला जाऊ शकतो? हा 'हि' शब्दरहित, अस्ताला जाणे रूपी नियम सर्वत्र लागू पडणारा असल्याने 'सब्बब्यापी अत्थन्तरन्यास' (सर्वव्यापी अर्थान्तरन्यास) आहे. प्रतिवस्तूपमा आणि अत्थन्तरन्यास या दोन्हीमध्ये अत्थन्तरन्यासत्वामुळे समानता असली, तरी तिथे (प्रतिवस्तूपमेत) समान धर्माचे प्रकाशन करण्याचा स्वभाव असतो, तर येथे (अत्थन्तरन्यासात) सांगितलेल्या अर्थाचे साधन (सिद्ध करणे) हा स्वभाव असतो; अशा प्रकारे या दोघांमधील भेद स्पष्ट आहे. 'अपि' हा शब्द संभावनेसाठी आहे, आणि दुसरा 'अपि' शब्द समुच्चयासाठी (एकत्र करण्यासाठी) आहे. ဟိ-သဟိတသဗ္ဗဗျာပီ 'हि'-सहित सर्वव्यापी (हि-सहितसब्बब्यापी) ၂၄၁. २४१. သတ္ထာ ဒေဝမနုဿာနံ, ဝသီ သောပိ မုနိဿရော; ဂတောဝ နိဗ္ဗုတိံ သဗ္ဗေ, သင်္ခါရာ န ဟိ သဿတာ. देव आणि मनुष्यांचे शास्ता (सत्था), इंद्रियांवर ताबा मिळवलेले (वसी) ते मुनीश्वर (बुद्ध) देखील निर्वाणाला (निब्बुती) प्राप्त झाले; कारण सर्व संस्कार (सङ्खार) निश्चितच शाश्वत नाहीत. ၂၄၁. ‘‘သတ္ထာ’’ဣစ္စာဒိ. ဒေဝမနုဿာနံ ဒေဝါနဉ္စ မနုဿာနဉ္စ ဥက္ကဋ္ဌပရိစ္ဆေဒဝသေန သတ္ထာ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသမ္ပရာယိကေဟိ ပရမတ္ထေဟိ ယထာရဟံ အနုသာသတီတိ, ဝသီ ပဉ္စဟိ ဝသိတာဟိ အတိသယဝသီဟိ ဝသိပ္ပတ္တော သောပိ မုနိဿရော နိဗ္ဗုတိံ ခန္ဓပရိနိဗ္ဗာနသင်္ခါတံ ဂတော ပတ္တောယေဝ, ဟိသဒ္ဒေါ သမတ္ထနေ. သဗ္ဗေ သင်္ခါရာ ပစ္စယသမုပ္ပန္နာ န သဿတာ န နိစ္စာ ဥပ္ပာဒဝယဓမ္မတ္တာ အနိစ္စာ. အယမ္ပိ ဟိသဒ္ဒသဟိတသဗ္ဗဗျာပီ အတ္ထန္တရနျာသော အနိစ္စတာယ သဗ္ဗဂတတ္တာတိ. २४१. "सत्था" इत्यादी. देव आणि मनुष्यांचे, देव आणि मनुष्यांच्या उत्कृष्ट मर्यादेनुसार शास्ता (शासक/गुरु), जे ऐहिक (दिट्ठधम्मिक), पारलौकिक (सम्परायिक) आणि परमार्थाने योग्य प्रकारे उपदेश करतात; 'वसी' म्हणजे पाच वशतेने अत्यंत वशता प्राप्त केलेले ते मुनीश्वर (बुद्ध) देखील निर्वाणाला म्हणजे स्कंधपरिनिर्वाणाला (खन्धपरिनिब्बान) प्राप्त झाले आहेत. 'हि' शब्द समर्थनासाठी आहे. सर्व संस्कार प्रत्ययसमुत्पन्न (पच्चयसमुप्पन्न) असून शाश्वत नाहीत, नित्य नाहीत, कारण ते उत्पाद-व्यय-धर्मी (उत्पत्ती आणि नाश होणारे) असल्याने अनित्य आहेत. हा देखील 'हि' शब्दाने युक्त असलेला सर्वव्यापी अत्थन्तरन्यास आहे, कारण अनित्यता सर्वव्यापी आहे. ၂၄၁. ‘‘သတ္ထာ’’ဣစ္စာဒိ. ဒေဝမနုဿာနံ ဥက္ကဋ္ဌဝသေန သတ္ထာ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသမ္ပရာယိကတ္ထေဟိ ယထာရဟမနုသာသကော ဝသီ ဝုဋ္ဌာနအဓိဋ္ဌာနာဒီသု ပဉ္စသု ဝသိဘာဝေသု သာတိသယံ ဣဿရိယဝါ သော မုနိဿရော အပိ နိဗ္ဗုတိံ ခန္ဓနိဗ္ဗာနံ ဂတော ဧဝ. ဟိ တထေဝ, သဗ္ဗေ သင်္ခါရာ သဿတာ န ဟောန္တီတိ. အယံ ဟိသဒ္ဒသဟိတော အနိစ္စတာယ သဗ္ဗဂတတ္တာ သဗ္ဗဗျာပီ အတ္ထန္တရနျာသော. ဝသော အဿ အတ္ထီတိ ဝါကျံ. २४१. "सत्था" इत्यादी. देव आणि मनुष्यांचे उत्कृष्टतेने शास्ता, ऐहिक आणि पारलौकिक अर्थांनी योग्य प्रकारे उपदेश करणारे, 'वसी' म्हणजे उठणे (वुट्ठाण), अधिष्ठान इत्यादी पाच वशभावांमध्ये अत्यंत ऐश्वर्यवान असलेले ते मुनीश्वर देखील निर्वाणाला म्हणजे स्कंधनिर्वाणाला प्राप्त झाले आहेत. 'हि' शब्द तसाच आहे, सर्व संस्कार शाश्वत नसतात. हा 'हि' शब्दाने युक्त, अनित्यता सर्वव्यापी असल्यामुळे 'सब्बब्यापी अत्थन्तरन्यास' आहे. 'वश ज्याच्याजवळ आहे तो' असा याचा विग्रह आहे. ဟိ-ရဟိတဝိသေသဋ္ဌ 'हि'-विरहित विशेषार्थ (हि-रहितविसेसट्ठ) ၂၄၂. २४२. ဇိနော [Pg.238] သံသာရကန္တာရာ, ဇနံ ပါပေတိ နိဗ္ဗုတိံ; နနု ယုတ္တာ ဂတိ သာ’ယံ, ဝေသာရဇ္ဇသမင်္ဂိနံ. जिन (बुद्ध) लोकांना संसाररूपी अरण्यातून निर्वाणाला पोहोचवतात; वैशारद्याने (निर्भयतेने) युक्त असलेल्यांसाठी ही गती (प्रवृत्ती) योग्यच आहे ना? ၂၄၂. ‘‘ဇိနော’’ဣစ္စာဒိ. ဇိနော သံသာရောယေဝ ကန္တာရော ဒုဂ္ဂမတ္တာ, တတော ဇနံ သကလမ္ပိ လောကံ နိဗ္ဗုတိံ ပါပေတိ. နနု ပသိဒ္ဓိယမနုမတိယံ ဝါ. သာယံ ဂတိ နိဗ္ဗုတိပါပနသင်္ခါတာ ပဝတ္တိ, ဝိဂတော သာရဒေါ ဘယမဿာတိ ဝိသာရဒေါ, တဿ ဘာဝေါ နိဗ္ဘယတာ ဝေသာရဇ္ဇံ, တေန သမင်္ဂီနံ ယုတ္တာနံ. ယုတ္တာတိ အနုရူပါတိ. အယံ ဟိသဒ္ဒဝိရဟိတော ဝိသေသဋ္ဌော အတ္ထန္တရနျာသော, ဝေသာရဇ္ဇသမင်္ဂီနမေဝ တထာဘာဝတော န သဗ္ဗဗျာပီ. २४२. "जिनो" इत्यादी. जिन (बुद्ध) संसाररूपी दुर्गम अरण्यातून लोकांना, संपूर्ण जगाला निर्वाणाला पोहोचवतात. 'ननु' हा शब्द प्रसिद्धी किंवा अनुमती दर्शवण्यासाठी आहे. 'सा अयम् गती' म्हणजे निर्वाणप्राप्ती रूपी प्रवृत्ती; ज्याचे भय निघून गेले आहे तो 'विशारद' (विसारद), त्याचा भाव म्हणजे निर्भयता म्हणजेच 'वैशारद्य' (वेसारज्ज), त्याने युक्त असलेल्यांना योग्य आहे. 'युत्ता' म्हणजे अनुरूप. हा 'हि' शब्दरहित विशेषार्थ अत्थन्तरन्यास आहे, कारण केवळ वैशारद्याने युक्त असलेल्यांचाच असा स्वभाव असतो, हा सर्वव्यापी नाही. ၂၄၂. ‘‘ဇိနော’’ဣစ္စာဒိ. ဇိနော ဇနံ သတ္တလောကံ သံသာရကန္တာရာ နိဗ္ဗုတိံ ပါပေတိ, သာ အယံ ဂတိ ပဝတ္တိ ဝေသာရဇ္ဇသမင်္ဂီနံ စတုဝေသာရဇ္ဇဂုဏသမန္နာဂတာနံ တထာဂတာနံ ယုတ္တာ နနူတိ. အယံ ဇနာနံ နိဗ္ဗာနံ ပါပနာ ဝေသာရဇ္ဇသမင်္ဂီနံယေဝ အာဝေဏိကတ္တာ ဝိသေသဋ္ဌော ဟိသဒ္ဒရဟိတော အတ္ထန္တရနျာသော. ဝိဂတော သာရဒေါ ဘယံ အဿေတိ စ, ကဿ ဘာဝေါတိ စ, တေန သမင်္ဂိနောတိ စ ဝါကျံ. နနူတိ ပသိဒ္ဓိယံ အနုမတိယံ ဝါ ဝတ္တတေ. ဒွိန္နမ္ပိ အတ္ထော ဝုတ္တနယေန ဉာတဗ္ဗော. २४२. "जिनो" इत्यादी. जिन लोकांना, प्राणीमात्रांना संसाररूपी अरण्यातून निर्वाणाला पोहोचवतात, ही गती म्हणजे प्रवृत्ती चार वैशारद्य गुणांनी युक्त असलेल्या तथागतांना योग्यच आहे ना? लोकांना निर्वाण मिळवून देणे हे केवळ वैशारद्याने युक्त असलेल्यांचेच असाधारण (आवेणिक) वैशिष्ट्य असल्यामुळे हा 'हि' शब्दरहित विशेषार्थ अत्थन्तरन्यास आहे. 'ज्याचे भय निघून गेले आहे', 'त्याचा भाव' आणि 'त्याने युक्त असलेला' असा हा विग्रह आहे. 'ननु' हा शब्द प्रसिद्धी किंवा अनुमती दर्शवण्यासाठी वापरला जातो. दोन्हीचा अर्थ सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणावा. ဟိ-သဟိတဝိသေသဋ္ဌ 'हि'-सहित विशेषार्थ (हि-सहितविसेसट्ठ) ၂၄၃. २४३. သုရတ္တံ တေ’ဓရပုဋံ, ဇိန ရဉ္ဇေတိ မာနသံ; သယံ ရာဂပရီတာ ဟိ, ပရေ ရဉ္ဇေန္တိ သင်္ဂတေ. हे जिन! आपले अत्यंत लाल ओठ पाहणाऱ्यांचे मन रंजित (आनंदित) करतात; कारण जे स्वतः रागाने (लाल रंगाने किंवा प्रेमाने) युक्त असतात, ते आपल्याशी जोडल्या गेलेल्या इतरांनाही रंजित करतात. ၂၄၃. ‘‘သုရတ္တ’’မိစ္စာဒိ. ဇိန တေ တဝ သုရတ္တံ ဗိမ္ဗဖလသမာနဝဏ္ဏတ္တာ အဓရပုဋံ မာနသံ ပဿတံ ယေသံ ကေသဉ္စိ ရဉ္ဇေတိ ပီဏေတီတိ. ဟိ သမတ္ထနေ, တထာ ဟီတိ အတ္ထော. သယံ [Pg.239] ယေန ကေနစိ ရာဂေန ရတ္တဝဏ္ဏေန အနုရာဂေန ဝါ ပရီတာ ဂတာ သင်္ဂတေ အတ္တနာ သံသဋ္ဌေ ပရေ အညေ ရဉ္ဇေန္တိ ရတ္တဝဏ္ဏေ အနုရတ္တေ ဝါ ကရောန္တီတိ သသိလေသော သာဓနော. အယဉ္စ ဟိသဒ္ဒသဟိတော ဝိသေသဋ္ဌော အတ္ထန္တရနျာသော တထာဘာဝဿ တထာဝိဓာနမေဝ သမ္ဘဝတော. २४३. "सुरत्तम्" इत्यादी. हे जिन! आपले तोंडाचे बिंबफळासारखे लाल असलेले ओठ पाहणाऱ्यांच्या मनाला रंजित करतात, आनंदित करतात. 'हि' शब्द समर्थनासाठी आहे, 'तथा हि' (कारण की) असा याचा अर्थ आहे. जे स्वतः कोणत्या तरी रागाने म्हणजे लाल रंगाने किंवा प्रेमाने युक्त असतात, ते आपल्याशी जोडल्या गेलेल्या इतरांना रंजित करतात, म्हणजेच लाल रंगाचे किंवा प्रेमयुक्त करतात, असा हा श्लेषासह (ससिट्ठो) साधलेला अर्थ आहे. आणि हा 'हि' शब्दाने युक्त असलेला विशेषार्थ अत्थन्तरन्यास आहे, कारण असा स्वभाव केवळ तशाच प्रकारच्या व्यक्तींमध्ये संभवतो. ၂၄၃. ‘‘သုရတ္တ’’မိစ္စာဒိ. ဘော ဇိန တေ တဝ သုရတ္တံ အဓရပုဋံ ဩဋ္ဌယုဂဠံ မာနသံ ပဿန္တာနံ စိတ္တံ ရဉ္ဇေတိ ပီဏယတိ. ဟိ တထေဝ, သယံ ရာဂပရီတာ ရတ္တဝဏ္ဏေန အနုရာဂေန ဝါ ယုတ္တာ သင်္ဂတေ အတ္တနာ သံသဋ္ဌေ ပရေ အညေ ရဉ္ဇေန္တိ ရတ္တဝဏ္ဏေ အနုရတ္တေ ဝါ ကရောန္တိ. ဣဒံ တေသံ သဘာဝမေဝေတိ. အယံ ဤဒိသာနမေဝ အာဝေဏိကတ္တာ ဝိသေသဋ္ဌော ဟိသဒ္ဒသဟိတော အတ္ထန္တရနျာသော. ပုဋသဒိသတ္တာ အဓရော ဧဝ ပုဋမိတိ စ, ရာဂေန ပရီတာ ယုတ္တာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २४३. "सुरत्तम्" इत्यादी. हे जिन! आपले अत्यंत लाल ओठ पाहणाऱ्यांच्या चित्ताला रंजित करतात, आनंदित करतात. 'हि' शब्द तसाच आहे, जे स्वतः रागाने म्हणजे लाल रंगाने किंवा प्रेमाने युक्त असतात, ते आपल्याशी जोडल्या गेलेल्या इतरांना रंजित करतात, म्हणजेच लाल रंगाचे किंवा प्रेमयुक्त करतात. हा त्यांचा स्वभावच आहे. हा तशाच प्रकारच्या लोकांचे असाधारण (आवेणिक) वैशिष्ट्य असल्यामुळे 'हि' शब्दाने युक्त असलेला विशेषार्थ अत्थन्तरन्यास आहे. 'पुटासारखे असल्यामुळे ओठ हेच पुट' आणि 'रागाने युक्त' असा हा विग्रह आहे. ၂၄၄. २४४. ဝါစ္စေ ဂမ္မေ’ထ ဝတ္ထူနံ,သဒိသတ္တေ ပဘေဒနံ; ဗျတိရေကော’ယ’မပျေ’ကော-ဘယဘေဒါ စတုဗ္ဗိဓော. वस्तूंच्या समानतेमध्ये, ती शब्दाने व्यक्त (वाच्च) असो किंवा अर्थावरून समजणारी (गम्म) असो, त्यांच्यातील भेद दाखवणे म्हणजे व्यतिरेक (ब्यतिरेक) अलंकार होय. हा व्यतिरेक देखील एक आणि दोन्हीच्या भेदाने चार प्रकारचा होतो. ၂၄၄. ဗျတိရေကဝိကပ္ပမာဟ ‘‘ဝါစ္စေ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဝတ္ထူနံ ဝတ္တုမိစ္ဆိတာနံ ကေသဉ္စိ ဝတ္ထူနံ သဒိသတ္တေ ကထဉ္စိ ဝတ္ထူနံ တုလျတ္တေ ဝါစ္စေ သဒ္ဒေန ဝါစကေန ပဋိပါဒိတေ အထ ဂမ္မေ အသဒ္ဒပဋိပါဒိတေ သဗ္ဗတ္ထဗလေန ပကရဏာဒိနာ ဉာတေ ဝါ, န ကေဝလံ သဒ္ဒပဋိပါဒိတေ. ပဘေဒနံ တေသမေဝ ဝတ္ထူနံ ဝိသေသကထနံ ဗျတိရေကော ဗျတိရေစနံ ပုထက္ကရဏန္တိ ကတွာ. အယံ ဗျတိရေကောပိ ဧကောဘယဘေဒါ ဧကဗျတိရေကော ဥဘယဗျတိရေကောတိ ဝါစ္စဂမ္မာနံ ပစ္စေကံ ဝိသေသေန စတုဗ္ဗိဓော. २४४. "वाच्चे" इत्यादींद्वारे व्यतिरेकाचे प्रकार सांगतात. सांगू इच्छिलेल्या काही वस्तूंच्या समानतेमध्ये, म्हणजेच वस्तूंच्या तुल्यतेमध्ये, ती शब्दाने (वाचक शब्दाने) प्रतिपादित (वाच्च) असो किंवा शब्दाने प्रतिपादित न करता सामर्थ्याने, प्रकरणाने इत्यादींद्वारे समजणारी (गम्म) असो, केवळ शब्दाने प्रतिपादित नसून; त्यांच्यातील भेद दाखवणे, म्हणजेच त्या वस्तूंचे विशेष कथन करणे म्हणजे व्यतिरेक (ब्यतिरेक) होय, ज्याचा अर्थ वेगळे करणे असा होतो. हा व्यतिरेक देखील एक आणि दोन्हीच्या भेदाने, म्हणजेच एकव्यतिरेक आणि उभयव्यतिरेक या रूपाने, वाच्च आणि गम्म यांच्या प्रत्येकी विशेष रूपाने चार प्रकारचा होतो. ၂၄၄. ဣဒါနိ [Pg.240] ဗျတိရေကံ ဒဿေတိ ‘‘ဝါစ္စေ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဝတ္ထူနံ ဝတ္တုမိစ္ဆိတာနံ ကေသဉ္စိ ပဒတ္ထာနံ သဒိသတ္တေ ယေန ကေနစိ အာကာရေန သမာနတ္တေ ဝါစ္စေ ဝါစကသဒ္ဒေန ပဋိပါဒနီယေ အထ ပုန ဂမ္မေ တသ္မိံယေဝ သဒိသတ္တေ အတ္ထသတ္တိသင်္ခါတသာမတ္ထိယေန ဂမ္မမာနေ ပဘေဒနံ တေသံယေဝ ဝတ္ထူနံ နာနတ္တကထနံ ဗျတိရေကော နာမ. အယမ္ပိ ဗျတိရေကော ဧကောဘယဘေဒါ ဗျတိရေစနသင်္ခါတပုထက္ကရဏသာမညေန အဘိန္နောပိ ဝါစ္စဂမ္မာနံ ဒွိန္နံ ပစ္စေကမေဝ ဧကဗျတိရေကော ဥဘယဗျတိရေကောတိ ဝိသေသေန စတုဗ္ဗိဓော ဟောတိ. သဒိသာနံ ဘာဝေါတိ စ, ပကာရေန ဘေဒနံ ကထနမိတိ စ, ဗျတိရေစနံ ပုထက္ကရဏမိတိ စ, ဧကော စ ဥဘယော စာတိ စ, တေသံ ဘေဒေါ ဝိသေသနန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २४४. आता "वाच्चे" इत्यादींद्वारे व्यतिरेक दर्शवितात. सांगू इच्छिलेल्या काही पदार्थांच्या समानतेमध्ये, म्हणजेच कोणत्याही प्रकारे समानतेमध्ये, ती वाचक शब्दाने प्रतिपादन करण्यायोग्य (वाच्च) असो किंवा पुन्हा त्या समानतेमध्ये अर्थाच्या शक्तीरूप सामर्थ्याने समजणारी (गम्म) असो, त्यांच्यातील भेद दाखवणे, म्हणजेच त्या वस्तूंचे नानात्व (भिन्नत्व) सांगणे म्हणजे व्यतिरेक होय. हा व्यतिरेक देखील एक आणि दोन्हीच्या भेदाने, वेगळे करणे रूपी सामान्य अर्थाने अभिन्न असला तरी, वाच्च आणि गम्म या दोघांच्या प्रत्येकी एकव्यतिरेक आणि उभयव्यतिरेक या रूपाने विशेषतः चार प्रकारचा होतो. 'समानांचा भाव', 'प्रकाराने भेद सांगणे', 'वेगळे करणे' आणि 'एक आणि दोन्ही', 'त्यांचा भेद म्हणजे विशेष' असा हा विग्रह आहे. ဝါစ္စဧကဗျတိရေက वाच्च एकव्यतिरेक (वाच्चएकब्यतिरेक) ၂၄၅. २४५. ဂမ္ဘီရတ္တမဟတ္တာဒိ-ဂုဏာ ဇလဓိနာ ဇိန; တုလျော တွ’မသိ ဘေဒေါ တု,သရီရေနေ’ဒိသေန တေ. हे जिन! आपण गांभीर्य, मोठेपणा इत्यादी गुणांमुळे समुद्रासारखे आहात; परंतु आपल्या या अशा शरीरामुळे आपल्यात आणि समुद्रात भेद आहे. ၂၄၅. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဂမ္ဘီရ’’ဣစ္စာဒိ. တွံ ဂမ္ဘီရတ္တံ အဂါဓတာ အဇ္ဈာသယဝိသိဋ္ဌတာ စ မဟတ္တံ ဝေပုလ္လံ ဂုဏမဟန္တတာ စ တံ အာဒိ ယဿ ဥပကာရိတာဒိနော, တသ္မာ ဂုဏာ ဇလဓိနာ သာဂရေန တုလျော. ‘‘အသီ’’တိသဒ္ဒပဋိပါဒိတံ သဒိသတ္တံ ဝုတ္တံ. ဘေဒံ ဒဿေတိ ‘‘ဘေဒေါ တု’’ဣစ္စာဒိနာ. ဘေဒေါ တု ဝိသေသော ပန သာဂရေန သဟ ဤဒိသေန ဒိဿမာနေန ကရစရဏာဒိမတာ ရုစိရေန တေ သရီရေနေဝ ဟေတုနာ, နာညထာ, တဿေဒိသံ သရီရံ နတ္ထီတိ. သဒိသတ္တေ ပဋိပါဒိတေ ဧကဗျတိရေကောယံ ဧကသ္မိံ ဇိနေ ဝတ္တမာနေန ဓမ္မေန ဥပမေယျောပမာနဘူတဇိနသာဂရာနံ တဿ ဘေဒဿ ပတီယမာနတ္တာ. २४५. "गम्भीर" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. आपण गांभीर्य म्हणजे अगाधता आणि आशयाची विशिष्टता, आणि मोठेपणा म्हणजे विपुलता आणि गुणांचे मोठेपण, इत्यादी उपकारित्व ज्याचे आदि आहे, त्या गुणांमुळे समुद्राशी (जलधीशी) तुल्य आहात. "असि" (आहात) या शब्दाने प्रतिपादित केलेली समानता सांगितली आहे. "भेदो तु" इत्यादींद्वारे भेद दर्शवितात. परंतु समुद्राशी असलेला भेद (विशेष) आपल्या या अशा दिसणाऱ्या, हात-पाय इत्यादींनी युक्त आणि सुंदर शरीरामुळेच आहे, इतर कशामुळे नाही; कारण समुद्राला असे शरीर नाही. समानता प्रतिपादित केली असता हा एकव्यतिरेक आहे, कारण एका जिनांमध्ये असलेल्या धर्मामुळे उपमेय आणि उपमान बनलेल्या जिन आणि समुद्राचा हा भेद प्रतीत होतो. ၂၄၅. ဣဒါနိ [Pg.241] တမုဒါဟရတိ ‘‘ဂမ္ဘီရတ္တိ’’စ္စာဒိနာ. ဟေ ဇိန တွံ ဂမ္ဘီရတ္တမဟတ္တာဒိဂုဏာ ဇလဓိနာ တုလျော အသိ. ဣမိနာ ဝါကျေန ဇိနသာဂရာနံ ဒွိန္နံ သဒ္ဒေန ဝါစ္စသဒိသတ္တံ ဝုတ္တံ. ဘေဒေါ တု သာဂရေန သဟ တဝ ဝိသေသော ပန တေ တုယှံ ဤဒိသေန ဧဝရူပေန ဒိဿမာနဟတ္ထပါဒါဒိအဝယဝယုတ္တေန သရီရေန သရီရဟေတုနာ ဟောတိ. ဒွိန္နံ ဝတ္ထူနံ ဝတ္တဗ္ဗသဒိသတ္တံ ဝတွာ ဣမိနာ ဝါကျေန ‘‘ဤဒိသေန သရီရေနာ’’တိ ဧကသ္မိံယေဝ ဇိနပဒတ္ထေ ဝိသေသကထနေန ဇလဓိတော ဇိနပဒတ္ထဿ ဝိသုံ ကတတ္တာ သဒိသတ္တေ သဒ္ဒေန ဝါစ္စေ သတိ အယမေကဗျတိရေကော နာမ. ဂမ္ဘီရဿ ဂမ္ဘီရဂုဏယုတ္တဿ သာဂရဿ ဝါ ဂမ္ဘီရဇ္ဈာသယသမင်္ဂိနော ဇိနဿ ဝါ ဘာဝေါတိ စ, မဟတော ပကတိယာ မဟတော သာဂရဿ ဝါ ဂုဏေဟိ မဟတော ဇိနဿ ဝါ ဘာဝေါတိ စ, ဂမ္ဘီရတ္တဉ္စ မဟတ္တဉ္စာတိ စ, တံ အာဒိ ယဿ ဥပကာရိတာဒိနောတိ စ, သော စ သော ဂုဏော စေတိ စ ဝါကျံ. २४५. आता त्याचे उदाहरण "गम्भीर" इत्यादींद्वारे देतात. हे जिन! आपण गांभीर्य, मोठेपणा इत्यादी गुणांमुळे समुद्राशी तुल्य आहात. या वाक्याने जिन आणि समुद्र या दोघांची शब्दाने व्यक्त होणारी समानता सांगितली आहे. परंतु समुद्राशी असलेला आपला भेद (विशेष) आपल्या अशा दिसणाऱ्या हात-पाय इत्यादी अवयवांनी युक्त असलेल्या शरीरामुळे, शरीराच्या हेतूने होतो. दोन वस्तूंची सांगण्यायोग्य समानता सांगून या वाक्याने "अशा शरीरामुळे" असे एकाच जिन रूपी पदार्थात विशेष कथन केल्याने समुद्रापासून जिन रूपी पदार्थाला वेगळे केले असल्यामुळे, समानता शब्दाने व्यक्त (वाच्च) असताना हा 'एकव्यतिरेक' होय. 'गंभीर असलेल्या गंभीर गुणयुक्त समुद्राचा किंवा गंभीर आशयाने युक्त असलेल्या जिनांचा भाव', 'स्वभावाने महान असलेल्या समुद्राचा किंवा गुणांनी महान असलेल्या जिनांचा भाव', 'गांभीर्य आणि मोठेपणा', 'ते ज्याचे आदि आहे ते उपकारित्व इत्यादी' आणि 'तोच तो गुण' असे हे वाक्य आहे. ဝါစ္စဥဘယဗျတိရေက वाच्च उभयव्यतिरेक (वाच्चउभयब्यतिरेक) ၂၄၆. २४६. မဟာသတ္တာ’တိဂမ္ဘီရာ, သာဂရော သုဂတောပိ စ; သာဂရော’ဉ္ဇနသင်္ကာသော, ဇိနော စာမီကရဇ္ဇုတိ. समुद्र आणि सुगत (बुद्ध) हे दोन्ही महासत्त्व (महान प्राणी किंवा महान सत्त्व असलेले) आणि अत्यंत गंभीर आहेत; परंतु समुद्र काजळासारखा (काळा) आहे आणि जिन सुवर्णासारख्या कांतीचे आहेत. ၂၄၆. ‘‘မဟာ’’ဣစ္စာဒိ. သာဂရော သုဂတောပိ စာတိ တေ ဥဘော မဟန္တာ သတ္တာ မကရာဒယော ယတ္ထ သာဂရေ, မဟန္တံ ဝါ သတ္တံ သမ္မပ္ပဓာနံ ယဿ သုဂတဿ, အတိဂမ္ဘီရာ အတိသယေန အဂါဓာ ဣတိ. သဒိသတာဘေဒမာဟ ‘‘သာဂရော’’ဣစ္စာဒိနာ. သာဂရော အဉ္ဇနသင်္ကာသော အဉ္ဇနေန တုလျော, ကဏှောတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဇိနော တု စာမီကရဿ သုဝဏ္ဏဿေဝ ဇုတိ သောဘာ အဿေတိ စာမီကရဇ္ဇုတိ. ဝါစ္စေ သဒိသတ္တေ ဥဘယဗျတိရေကောယံ ဥဘယတ္ထ ဝတ္တမာနေန ဂုဏေန ဥဘိန္နမုပမာနောပမေယျာနံ ဘေဒဿ ပတီယမာနတ္တာ. २४६. "महा" इत्यादी. समुद्र आणि सुगत देखील, ते दोन्ही - ज्या समुद्रात मगरी इत्यादी मोठे प्राणी (सत्त) आहेत, किंवा ज्या सुगतांचे सत्त्व (चित्त) महान आणि सम्यक् प्रधान आहे, ते अत्यंत गंभीर म्हणजे अतिशय अगाध आहेत. समानतेमधील भेद "सागरा" इत्यादींद्वारे सांगतात. समुद्र अंजनसदृश म्हणजे काजळासारखा आहे, म्हणजेच तो काळा आहे असे सांगितले आहे. परंतु जिनांची कांती सुवर्णासारखी (चामीकर) आहे, म्हणजेच त्यांना सुवर्णासारखी शोभा आहे. समानता शब्दाने व्यक्त (वाच्च) असताना हा उभयव्यतिरेक आहे, कारण दोन्ही ठिकाणी असलेल्या गुणांमुळे उपमान आणि उपमेय या दोघांचा भेद प्रतीत होतो. ၂၄၆. ‘‘မဟာ’’ဣစ္စာဒိ. [Pg.242] သာဂရော သုဂတောပိ စာတိ ဣမေ ဒွေ မဟာသတ္တာ ကမေန တိမိတိမိင်္ဂလာဒိမဟာသတ္တာ စ, လာဘာလာဘာဒီသု အနညသာဓာရဏတ္တာ မဟန္တတာဒိဘာဝသင်္ခါတသဒိသတ္တယုတ္တာ စ, အတိဂမ္ဘီရာ အဝဂါဟိတုမသက္ကုဏေယျတ္တာ စ, အဇ္ဈာသယဂမ္ဘီရတ္တာ စ ဒွေပိ အတိဂမ္ဘီရာ ဟောန္တိ. တေသု သာဂရော အဉ္ဇနသင်္ကာသော, ဇိနော စာမီကရဇ္ဇုတိ သုဝဏ္ဏသဒိသကန္တိယုတ္တော ဟောတိ. ဧတ္ထ ပုဗ္ဗဒ္ဓေန ဒွိန္နံ ဝတ္ထူနံ သဒိသတ္တံ ဝတွာ အပရဒ္ဓေန တဒုဘယဝတ္ထုဂတဝိသေသေန တေသံ ဒွိန္နမညမညတော ဝိသေသိတတ္တာ သဒိသတ္တေ သဒ္ဒေန ဝတ္တဗ္ဗေ သတိ အယံ ဥဘယဗျတိရေကော နာမ. မဟန္တာ သတ္တာ မစ္ဆကစ္ဆပါဒယော ယတ္ထ သာဂရေတိ ဝါ, မဟန္တံ သတ္တံ သမာနဘာဝေါ ယဿ သုဂတဿာတိ ဝါ, အတိသယေန ဂမ္ဘီရာတိ စ, အဉ္ဇနေန သင်္ကာသော သဒိသောတိ စ, စာမီကရဿ ဣဝ ဇုတိ အဿေတိ စ ဝါကျံ. २४६. "महा" इत्यादी. सागर आणि सुगत (बुद्ध) हे दोन्ही महासत्त्व अनुक्रमे तिमितिमिंगळ इत्यादी महाप्राणी आणि लाभ-अलाभ इत्यादींमध्ये इतरांपेक्षा वेगळे असल्यामुळे मोठेपणा इत्यादी भावाने युक्त आणि समान आहेत. तसेच ते अत्यंत गंभीर आहेत, कारण सागराचे आकलन करणे कठीण आहे आणि सुगतांचा आशय (अभिप्राय) अत्यंत गंभीर आहे, त्यामुळे दोन्ही अत्यंत गंभीर आहेत. त्यापैकी सागर अंजन (काजळ) सारखा काळा आहे आणि जिन (बुद्ध) सुवर्णासारख्या कांतीने युक्त आहेत. येथे पूर्वार्धाने दोन्ही वस्तूंचे सादृश्य सांगून, उत्तरार्धाने त्या दोन्ही वस्तूंमधील विशेषांमुळे त्या दोघांचे एकमेकांपासून वेगळेपण दाखवले आहे. सादृश्य शब्दाने व्यक्त करायचे असताना याला 'उभयव्यतिरेक' (दोन्हीमधील भेद) असे म्हणतात. ज्या सागरामध्ये मासे, कासव इत्यादी मोठे प्राणी राहतात किंवा ज्या सुगतांचा स्वभाव थोर प्राण्यांसारखा (महासत्त्वांसारखा) आहे, ते अत्यंत गंभीर आहेत, अंजनसदृश आहेत आणि सुवर्णासारखी ज्यांची कांती आहे, असे हे वाक्य आहे. ဂမ္မဧကဗျတိရေက गम्यैकव्यतिरेक ၂၄၇. २४७. န သန္တာပါပဟံ နေဝိ-စ္ဆိတဒံ မိဂလောစနံ; မုနိန္ဒ နယနဒွန္ဒံ, တဝ တဂ္ဂုဏဘူသိတံ. हे मुनींद्र! हरिणीचे डोळे संताप (क्लेश) दूर करत नाहीत आणि इच्छित (स्वर्ग-मोक्ष संपत्ती) देत नाहीत; परंतु आपले दोन्ही नयन मात्र त्या गुणांनी सुशोभित आहेत. ၂၄၇. ‘‘နိ’’စ္စာဒိ. မိဂဿ လောစနံ သန္တာပံ ကိလေသပရိဠာဟံ အပဟနတိ ဟိံသတီတိ သန္တာပါပဟံ န ဘဝတိ. နေဝ ဣစ္ဆိတံ သဂ္ဂမောက္ခသမ္ပတ္တိံ ဒဒါတီတိ နေဝိစ္ဆိတဒံ. မုနိန္ဒ တဝ နယနာနံ ဒွန္ဒံ ယုဂဠံ တု တေဟိ ယထာဝုတ္တေဟိ သန္တာပါပဟတ္တဣစ္ဆိတဒတ္တဂုဏေဟိ ဘူသိတမလင်္ကတံ. ဧတ္ထ ပန မိဂလောစနနယနာနံ ဒီဃတ္တာဒိနာ သဒိသတ္တံ ပတီယတေ. ဂမ္မေ သဒိသတ္တေ ဧကဗျတိရေကောယံ ဝုတ္တနယေန. २४७. "नि" इत्यादी. हरिणीचे डोळे संताप म्हणजे क्लेशांचा दाह नष्ट करत नाहीत, म्हणून ते 'संतापपह' नाहीत. तसेच ते इच्छित स्वर्ग आणि मोक्ष संपत्ती देत नाहीत, म्हणून ते 'इच्छितद' नाहीत. हे मुनींद्र! आपल्या नयनांचे युगळ (दोन्ही डोळे) मात्र वर सांगितलेल्या संताप दूर करणे आणि इच्छित प्रदान करणे या गुणांनी भूषित (अलंकृत) आहे. येथे हरिणीचे डोळे आणि मुनींद्रांचे नयन यांच्यातील दीर्घत्व इत्यादींमुळे सादृश्य प्रतीत होते. गम्य सादृश्यामध्ये हा सांगितलेल्या पद्धतीने 'एकव्यतिरेक' आहे. ၂၄၇. ‘‘န သန္တာ’’ဣစ္စာဒိ. မိဂလောစနံ မိဂပေါတကစက္ခုယုဂဠံ သန္တာပါပဟံ ကိလေသသန္တာပါပဟံ န ဟောတိ. ဣစ္ဆိတဒံ လောကေဟိ ပတ္ထိတလောကိယလောကုတ္တရတ္ထာနံ ဒါယကံ [Pg.243] န ဟောတိ. ဟေ မုနိန္ဒ တဝ နယနဒွန္ဒံ ပန တဂ္ဂုဏဘူသိတံ ဇနသန္တာပါပဟာနာဒိယထာဝုတ္တဂုဏေဟိ သောဘိတံ ဟောတိ, ဣဟ သန္တာပါပဟနနာဒီနံ ပဋိသေဓဒွါရေန ဥပမာနောပမေယျဘူတဥဘယလောစနသင်္ခါတဝတ္ထူနံ ဒီဃပုထုလတာဒိသဒိသဓမ္မံ သာမတ္ထိယေန ပကာသေတွာ အပရဒ္ဓေန သန္တာပါပဟနနာဒိဂုဏဟေတု ဇိနနယနာနံ ဝိသုံ ကတတ္တာ သဒိသတ္တေ ဂမ္မမာနေ အယမေကဗျတိရေကော နာမ. သန္တာပံ အပဟနတိ ဟိံ သတီတိ စ, ဣစ္ဆိတံ ဒဒါတီတိ စ, တေ စ တေ ဂုဏာ စာတိ စ, တေဟိ ဘူသိတန္တိ စ ဝါကျံ. २४७. "न संता" इत्यादी. हरिणीचे डोळे म्हणजे हरिणशावकाच्या डोळ्यांचे युगळ क्लेशांचा संताप दूर करणारे नसते. ते लोकांद्वारे इच्छित लौकिक आणि लोकोत्तर अर्थांचे (फळांचे) दान देणारे नसते. परंतु, हे मुनींद्र! आपले नयनयुगळ मात्र त्या गुणांनी सुशोभित आहे, म्हणजेच लोकांचा संताप दूर करणे इत्यादी वर सांगितलेल्या गुणांनी शोभिवंत आहे. येथे संताप दूर करणे इत्यादींच्या निषेधाद्वारे उपमान आणि उपमेय असलेल्या दोन्ही डोळ्यांमधील दीर्घत्व, विशालत्व इत्यादी समान धर्म सामर्थ्याने प्रकट करून, उत्तरार्धात संताप दूर करणे इत्यादी गुणांच्या कारणाने जिनांच्या (बुद्धांच्या) नयनांचे वेगळेपण दाखवले आहे. सादृश्य गम्य (प्रतीत) होत असताना याला 'एकव्यतिरेक' असे म्हणतात. संताप दूर करतो (नष्ट करतो) आणि इच्छित देतो, आणि ते जे गुण आहेत, त्यांनी सुशोभित आहे, असे हे वाक्य आहे. ဂမ္မဥဘယဗျတိရေက गम्योभयव्यतिरेक ၂၄၈. २४८. မုနိန္ဒာနန’မမ္ဘောဇ-မေသံ နာနတ္တ’မီဒိသံ; သုဝုတ္တာမတသန္ဒာယိ, ဝဒနံ နေ’ဒိသ’မ္ဗုဇံ. मुनींद्रांचे मुख आणि कमळ यांच्यातील भेद असा आहे: मुनींद्रांचे मुख सुभाषितरूपी अमृताचा वर्षाव करणारे आहे, परंतु कमळ तसे (अमृताचा वर्षाव करणारे) नाही. ၂၄၈. ‘‘မုနိန္ဒ’’ဣစ္စာဒိ. မုနိန္ဒာနနံ အမ္ဘောဇဉ္စေတိ ယာနိ ဝတ္ထူနိ ကန္တာဒိနာ ပတီယမာနတ္တာ သဒိသတ္ထာနိ, ဧသံ နာနတ္တံ ဘေဒေါ ဤဒိသံ. ကထံ? ဝဒနံ သုဝုတ္တာမတံ သဒ္ဓမ္မာမတံ သန္ဒဒါတီတိ သုဝုတ္တာမတသန္ဒာယိ, အမ္ဗုဇံ တု နေဒိသန္တိ. ဣမိနာ ဘေဒေန ဣမေသံ ဝိသဒိသတ္တာ ‘‘ဧသ’’န္တျာဒိနာဟု. ပတီယမာနေန သဒိသာနီတိ ဂမ္မေ သဒိသတ္တေ ဥဘယဗျတိရေကောယံ ဝုတ္တနယေနေတိ. २४८. "मुनींद्र" इत्यादी. मुनींद्रांचे मुख आणि कमळ या वस्तू त्यांच्या कांती इत्यादींमुळे समान अर्थाच्या (सदृश) वाटतात, त्यांच्यातील भेद (नानात्व) असा आहे. कसा? मुख हे सुभाषितरूपी अमृत म्हणजे सद्धम्मरूपी अमृत प्रदान करणारे आहे, म्हणून ते 'सुवृत्तामृतसंदायी' आहे, परंतु कमळ तसे नाही. या भेदाने त्यांचे वेगळेपण असल्यामुळे "एषं" इत्यादी म्हटले आहे. प्रतीत होणाऱ्या सादृश्यामुळे गम्य सादृश्यात हा सांगितलेल्या पद्धतीने 'उभयव्यतिरेक' आहे. ၂၄၈. ‘‘မုနိန္ဒ’’ဣစ္စာဒိ. မုနိန္ဒာနနံ အမ္ဘောဇဉ္စေတိ ဣမေသံ ဒွိန္နံ နာနတ္တံ ဤဒိသံ. ကထန္တိ စေ? ဧသံ ဒွိန္နံ ဝဒနံ သုဝုတ္တာမတသန္ဒာယိ သုဋ္ဌု ဝုတ္တတ္တာ သုဝုတ္တသင်္ခါတဿ သဒ္ဓမ္မာမတဿ ဒါယကံ ဟောတိ, အမ္ဗုဇံ တု ဧဒိသံ န ဤဒိသံ န ဟောတိ, တာဒိသံ ဓမ္မာမတံ န ဒဒါတီတိ အဓိပ္ပာယော. ‘‘ဧသံ နာနတ္တမီဒိသ’’န္တိ ဝစနေန သုဂန္ဓကန္တိမတ္တာဒီဟိ ဂုဏေဟိ ဒွိန္နမ္ပိ ဘေဒေါ နတ္ထီတိ ဂမ္မမာနတ္တာ တံ ပကာသေတွာ အပရဒ္ဓေန ဝဒနတော အမ္ဗုဇဿ, အမ္ဗုဇတော ဝဒနဿ ဝိသုံ ကတတ္တာ သဒိသတ္တေ ဂမ္မမာနေ အယမုဘယဗျတိရေကော နာမ. နာနာ အနေကပ္ပကာရာနံ [Pg.244] ဘာဝေါတိ စ, သာဓု ဝုတ္တမိတိ စ, တမေဝ အမတန္တိ စ, တံ သမ္မာ ဒေတိ သီလေနာတိ စ ဝါကျံ. २४८. "मुनींद्र" इत्यादी. मुनींद्रांचे मुख आणि कमळ या दोघांमधील भेद असा आहे. कसा? या दोघांपैकी मुख हे सुभाषितरूपी अमृत देणारे आहे, कारण ते उत्तम प्रकारे बोलले गेल्यामुळे 'सुवृत्त' संज्ञक सद्धम्मरूपी अमृताचे दान देणारे आहे. परंतु कमळ तसे नाही, ते तशा प्रकारचे धम्माचे अमृत देत नाही, असा अभिप्राय आहे. "एषं नानात्वमीदृशं" या वचनाने सुगंध, कांती इत्यादी गुणांमुळे दोघांमध्ये कोणताही भेद नाही, हे गम्य (प्रतीत) होत असल्यामुळे ते प्रकट करून, उत्तरार्धात मुखापासून कमळाचे आणि कमळापासून मुखाचे वेगळेपण दाखवले आहे. सादृश्य गम्य असताना याला 'उभयव्यतिरेक' असे म्हणतात. नाना म्हणजे अनेक प्रकारचा भाव, साधू (चांगले) बोलले गेले ते, आणि तेच अमृत, आणि ते जे स्वभावाने चांगल्या प्रकारे देते, असे हे वाक्य आहे. ၂၄၉. २४९. ပသိဒ္ဓံ ကာရဏံ ယတ္ထ, နိဝတ္တေတွာ’ညကာရဏံ; သာဘာဝိကတ္တ’မထ ဝါ, ဝိဘာဗျံ သာ ဝိဘာဝနာ. जेथे प्रसिद्ध कारणाचा निषेध करून अन्य कारण किंवा स्वाभाविकत्व दर्शवले जाते, ती 'विभावना' (विभावना अलंकार) होय. ၂၄၉. ဝိဘာဝနံ သမ္ဘာဝေတိ ‘‘ပသိဒ္ဓ’’မိစ္စာဒိနာ. ယတ္ထ အလင်္ကတိယံ ပသိဒ္ဓံ လောကပ္ပတီတံ ကာရဏံ ကိဉ္စိ နိဝတ္တေတွာ နိရသျ အညံ ကာရဏံ ပသိဒ္ဓကာရဏတော အညံ နိမိတ္တံ ဝိဘာဗျံ အဝဂမျတေ. ယတ္ထ ကာရဏန္တရံ နတ္ထိ, တတ္ထ ကာ ဂတီတိ အာဟ ‘‘သာဘာဝိကတ္တ’’န္တိအာဒိ. အထ ဝါ ပက္ခန္တရေ, သာဘာဝိကံ ဓမ္မတာသိဒ္ဓံ, တဿ ဘာဝေါ သာဘာဝိကတ္တံ ဝိဘာဗျံ, သာ တာဒိသီ ဝိဘာဝနာ ဝိညေယျာ, ဝိဘာဝီယတေ ပကာသီယတေ ကာရဏန္တရံ သာဘာဝိကတ္တံ ဝါ ဧတာယာတိ, ဧတိဿန္တိ ဝါ ကတွာ. २४९. विभावना स्पष्ट करताना "प्रसिद्ध" इत्यादी म्हटले आहे. ज्या अलंकारामध्ये प्रसिद्ध, लोकमान्य असे एखादे कारण नाकारून (निषेध करून) दुसरे कारण, म्हणजेच प्रसिद्ध कारणाव्यतिरिक्त अन्य निमित्त समजून घेतले जाते. जेथे दुसरे कारण नसते, तेथे काय गती असते? म्हणून "स्वाभाविकत्व" इत्यादी म्हटले आहे. अथवा दुसऱ्या पक्षात, स्वाभाविक म्हणजे धम्मतेने (निसर्गतः) सिद्ध असलेले, त्याचा भाव म्हणजे स्वाभाविकत्व प्रकट केले जाते, ती तशा प्रकारची 'विभावना' समजावी. जिच्याद्वारे अन्य कारण किंवा स्वाभाविकत्व प्रकट केले जाते, ती विभावना होय. ၂၄၉. ဣဒါနိ ဝိဘာဝနံ ဒဿေတိ ‘‘ပသိဒ္ဓ’’မိစ္စာဒိနာ. ယတ္ထ အလင်္ကာရေ ပသိဒ္ဓံ လောကပ္ပတီတံ ကာရဏံ တံတံဂုဏသာဓနဟေတုံ နိဝတ္တေတွာ ပဋိသေဓေတွာ အညကာရဏံ လောကပ္ပသိဒ္ဓကာရဏတော အညံ ကာရဏံ, အထ ဝါ နော စေ ပသိဒ္ဓကာရဏတော အညကာရဏေ လဗ္ဘမာနေ သာဘာဝိကတ္တံ ဓမ္မတာသိဒ္ဓဂုဏံ ဝိဘာဗျံ ပကာသနီယံ ဟောတိ, သာ ဝိဘာဝနာ နာမ ဟောတိ, ကာရဏန္တရဝိဘာဝနာ သာဘာဝိကဝိဘာဝနာတိ ဒုဝိဓာ ဟောတီတိ အဓိပ္ပာယော. အညဉ္စ တံ ကာရဏဉ္စေတိ စ, သဿ အတ္တနော ဘာဝေါတိ စ, တေန သမ္ဘူတမိတိ စ, တဿ ဘာဝေါတိ စ, ဝိဘာဝီယတိ အညကာရဏံ သာဘာဝိကတ္တံ ဝါ ဧတာယ ဝိဘာဝနာယ, ဧတိဿံ ဝိဘာဝနာယန္တိ စ ဝါတိ ဝိဂ္ဂဟော. २४९. आता विभावना दर्शवितात "प्रसिद्ध" इत्यादीद्वारे. ज्या अलंकारामध्ये प्रसिद्ध, लोकमान्य कारण जे त्या त्या गुणांचे साधन किंवा हेतू आहे, त्याचा निषेध करून अन्य कारण म्हणजे लोकप्रसिद्ध कारणाव्यतिरिक्त दुसरे कारण दर्शवले जाते; अथवा जर प्रसिद्ध कारणाव्यतिरिक्त अन्य कारण मिळत नसेल, तर स्वाभाविकत्व म्हणजे धम्मतेने सिद्ध असलेला गुण प्रकट केला जातो, ती 'विभावना' होय. ही विभावना 'कारणान्तरविभावना' आणि 'स्वाभाविकविभावना' अशी दोन प्रकारची असते, असा अभिप्राय आहे. अन्य आणि ते कारण, स्वतःचा भाव, आणि त्याने उत्पन्न झालेले, आणि त्याचा भाव, जिच्याद्वारे अन्य कारण किंवा स्वाभाविकत्व प्रकट केले जाते ती विभावना, असा याचा विग्रह आहे. ကာရဏန္တရဝိဘာဝနာ कारणान्तरविभावना ၂၅၀. २५०. အနဉ္ဇိတာ’သိတံ [Pg.245] နေတ္တံ, အဓရော ရဉ္ဇိတာ’ရုဏော; သမာနတာ ဘမု စာ’ယံ, ဇိနာ’နာဝဉ္ဆိတာ တဝ. हे जिन! आपले नेत्र अंजन न लावताही काळे आहेत, अधर (ओठ) रंग न लावताही तांबडे आहेत, आणि ही भुवई न वाकवताही सुंदर वक्र (वाकलेली) आहे. ၂၅၀. ဥဒါဟရတိ ‘‘အနဉ္ဇိတ’’ဣစ္စာဒိ. ဇိန တဝ နေတ္တဉ္စ အနဉ္ဇိတံ အဉ္ဇနသလာကာယ ယဝတဋ္ဌီနမဖုဋ္ဌမေဝ အသိတံ ကဏှံ, အဓရော စ အနဉ္ဇိတောယေဝ လာခါရာဂါဒိနာ အရုဏော ရတ္တော, အယံ ဘမု စ အနာဝဉ္ဆိတာ ဥဿာဟေန ယေန ကေနစိ အနာမိတာ သမာနာ သမာနတာ သုဋ္ဌု အာနတာ, တတော သဗ္ဗံ လောကိယံ တဝေတိ. ဧတ္ထ ပသိဒ္ဓကာရဏမဉ္ဇနာဒိ, တန္နိဝတ္တနေပိ ကာရဏန္တရမတ္ထာဒိနာဝဂမျတေ, တဉ္စ ကမ္မံ, ကာရိယဿ အကာရဏတ္တာယောဂတောတိ ကာရဏန္တရဝိဘာဝနာ’ယံ. २५०. "अनंजित" इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. हे जिन! आपले नेत्र अंजन न लावता, म्हणजेच अंजनाच्या शलाकेने न शिवताही काळे आहेत. अधर देखील लाक्षा (रंग) इत्यादींनी न रंगवताही तांबडे आहेत. आणि ही भुवई कोणत्याही प्रयत्नाने न वाकवताही सुंदर वक्र आहे. त्यामुळे आपले सर्व काही अलौकिक आहे. येथे प्रसिद्ध कारण अंजन इत्यादी आहे, त्याचा निषेध केला तरी अर्थावरून दुसरे कारण समजून येते, आणि ते कारण म्हणजे 'कम्म' (कर्म) आहे, कारण कारणाशिवाय कार्य घडू शकत नाही. म्हणून ही 'कारणान्तरविभावना' आहे. ၂၅၀. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘အနဉ္ဇိ’’စ္စာဒိနာ. ဟေ ဇိန တဝ နေတ္တံ ပကတိမဓုရံ နယနယုဂဠဉ္စ အနဉ္ဇိတံ ဝိလောစနာနံ ကဏှတ္တသာဓနတ္ထံ လောကပ္ပသိဒ္ဓအဉ္ဇနေဟိ အနဉ္ဇိတံ သမာနံ အသိတံ ဘဝန္တရသိဒ္ဓေန ကုသလကမ္မေန နီလံ ဟောတိ, အဓရော စ အရဉ္ဇိတော ကေနစိ ရာဂေန အရဉ္ဇိတော သမာနော အရုဏော ရတ္တောဟောတိ, အယံ ဘမု စ အနာဝဉ္ဆိတာ ကေနစိ ဝါယာမေန အနာမိတာ သမာနာ သမာနတာ သုဋ္ဌု အာနတာ ဟောတီတိ. ဧတ္ထ နယနအဓရဘမူနံ ကဏှရတ္တကုဋိလဂုဏသာဓနေ လောကပ္ပသိဒ္ဓါနိ အဉ္ဇနာနိ ကာရဏာနိ ပဋိသေဓေတွာ နေတ္တာဒီနံ အသိတာဒိဘာဝကထနေနေဝ ကာရဏဝိနိမုတ္တဿ ကာရိယဿ လောကေ အဝိဇ္ဇမာနတ္တာ အတ္ထပ္ပကရဏာဒိနာ အသိတာဒိဘာဝဿ ကာရဏံ နာမ ပုဗ္ဗဇာတိယံ သိဒ္ဓကုသလကမ္မမေဝါတိ ပတီယမာနတ္တာ အယံ ကာရဏန္တရဝိဘာဝနာ နာမ. န အဉ္ဇိတန္တိ စ, န ရဉ္ဇိတောတိ စ, န အာဝဉ္ဆိတောတိ စ ဝါကျံ. နသဒ္ဒေါ ပသဇ္ဇပဋိသေဓေ ဝတ္တတေ. သံ သမ္မာ အာနတာတိ ဝိဂ္ဂဟော. २५०. आता "अनंजि" इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. हे जिन! आपले निसर्गतः सुंदर असलेले नयनयुगळ अंजन न लावता, म्हणजेच डोळ्यांच्या काळेपणासाठी लोकप्रसिद्ध असलेल्या अंजनाने न माखताही, पूर्वजन्मात संपादन केलेल्या कुशल कर्मामुळे काळे (नील) आहे. अधर देखील कोणत्याही रंगाने न रंगवता तांबडे आहेत. आणि ही भुवई कोणत्याही प्रयत्नाने न वाकवताही सुंदर वक्र आहे. येथे डोळे, ओठ आणि भुवया यांच्या काळेपणा, तांबडेपणा आणि वक्रता या गुणांच्या सिद्धीसाठी लोकप्रसिद्ध असलेली अंजनादी कारणे नाकारून, नेत्रादींच्या काळेपणा इत्यादींचे कथन केल्याने, कारणाशिवाय कार्य जगात अस्तित्वात असू शकत नसल्यामुळे, अर्थावरून या काळेपणा इत्यादींचे कारण पूर्वजन्मात सिद्ध झालेले कुशल कम्म (कर्म) हेच आहे असे प्रतीत होते. म्हणून ही 'कारणान्तरविभावना' होय. अंजन न लावलेले, न रंगवलेले, न वाकवलेले असे हे वाक्य आहे. 'न' शब्द हा निषेध दर्शवण्यासाठी वापरला आहे. चांगल्या प्रकारे वाकलेली असा याचा विग्रह आहे. သာဘာဝိကဝိဘာဝနာ स्वाभाविकविभावना ၂၅၁. २५१. န [Pg.246] ဟောတိ ခလု ဒုဇ္ဇနျ-မပိ ဒုဇ္ဇနသင်္ဂမေ; သဘာဝနိမ္မလတရေ,သာဓုဇန္တူန စေတသိ. दुर्जनांच्या संगतीत असूनही, सज्जनांच्या स्वभावाने अत्यंत निर्मळ असलेल्या चित्तात दुर्जनता (दुष्टपणा) खरोखर कधीही निर्माण होत नाही. ၂၅၁. ‘‘န ဟောတိ’’စ္စာဒိ. ဒုဇ္ဇနေဟိ သဟ သင်္ဂမေ သမာဂမေ သတျပိ သာဓုဇန္တူနံ သပ္ပုရိသာနံ သဘာဝေန တာဒိသေန ပယောဂေန ဝိနာဝ နိမ္မလတရေ အတိသယေန နိမ္မလေ စေတသိ ဒုဇ္ဇနျံ သုဇနေတရဘာဝေါ န ဟောတိ တာဒိသာတိသယသာဓုတ္တသမာယောဂတောတိ. ဣဟ ကိဉ္စာပိ သဘာဝသဒ္ဒေန သဗ္ဗထာ ဟေတုနိဝတ္တနံ ကတံ, တထာပိ ယောနိသောမနသိကာရာဒိတထာဝိဓနိမိတ္တမတ္ထေဝ. တထာပိ လောကော တမနပေက္ခမာနော, ပသိဒ္ဓဉ္စ ကာရဏံ တာဒိသမပဿန္တော သာဘာဝိကံ ဖလံ ဝေါဟရတိ, တဒနုသာရေန စ သာဘာဝိကံ ဖလံ ဝိဘာဗျတေတိ, အယံ သာဘာဝိကဖလဝိဘာဝနာ. २५१. "न होति" इत्यादी. दुर्जनांच्या संगतीत (संपर्कात) असूनही, सज्जनांच्या स्वभावाने, म्हणजेच कोणत्याही बाह्य प्रयत्नाशिवाय अत्यंत निर्मळ असलेल्या चित्तात दुर्जनता म्हणजे दुष्टपणा निर्माण होत नाही, कारण ते अत्यंत साधुत्वाने (सज्जनतेने) युक्त असतात. येथे जरी 'स्वभाव' शब्दाने सर्व प्रकारे हेतूचा निषेध केला असला, तरी योनिसोमनसिकार (योग्य विचार) इत्यादींसारखे निमित्त अस्तित्वात असतेच. तरीही लोक त्याकडे दुर्लक्ष करून आणि प्रसिद्ध कारण न पाहता, स्वाभाविक फळाचा व्यवहार करतात. त्यानुसार स्वाभाविक फळ प्रकट केले जात असल्यामुळे ही 'स्वाभाविकफलविभावना' आहे. ၂၅၁. ‘‘န ဟောတိ’’စ္စာဒိ. ဒုဇ္ဇနသင်္ဂမေ အပိ ဒုဇ္ဇနေဟိ သဟ ဝါသေ သတိပိ သာဓုဇန္တူနံ သဘာဝနိမ္မလတရေ ကိဉ္စိ ပယောဂံ ဝိနာ ပကတိယာ ဧဝ အတိနိမ္မလေ စေတသိ ဒုဇ္ဇနျံ ဒုဇ္ဇနဂုဏံ ခလု ဧကန္တေန န ဟောတီတိ. ဣဟ စိတ္တနိမ္မလဟေတုဘူတာနံ ယောနိသောမနသိကာရာဒီနံ ဝိဇ္ဇမာနတ္တေပိ လောကေန တံ ကာရဏံ အနပေက္ခိတွာ အညမ္ပိ ပသိဒ္ဓကာရဏံ စိတ္တနိမ္မလကာရဏမဒိသွာ သဘာဝသိဒ္ဓံ နိမ္မလန္တိ ဝေါဟရိယမာနတ္တာတေနေဝ လောကဝေါဟာရာနုသာရေန ‘‘သဘာဝနိမ္မလတရေ’’တိ သဗ္ဗာကာရေန ကာရဏံ ပဋိသေဓံ ကတွာ သဘာဝသိဒ္ဓနိမ္မလတ္တသင်္ခါတဖလဿ ပကာသိတတ္တာ အယံ သာဘာဝိကဖလဝိဘာဝနာ နာမ. ဒုဇ္ဇနာနံ ဘာဝေါတိ စ, သဿ အတ္တနော ဘာဝေါတိ စ, တေန နိမ္မလတရန္တိ စ ဝါကျံ. २५१. "न होति" इत्यादी. दुर्जनांच्या संगतीत म्हणजे दुर्जनांसोबत राहूनही, सज्जनांच्या कोणत्याही बाह्य प्रयत्नाशिवाय निसर्गतःच अत्यंत निर्मळ असलेल्या चित्तात दुर्जनता म्हणजे दुर्जनांचे गुण खरोखर कधीही निर्माण होत नाहीत. येथे चित्ताच्या निर्मळतेचे हेतू असलेले योनिसोमनसिकार इत्यादी विद्यमान असूनही, लोक त्या कारणाचा विचार न करता आणि चित्त निर्मळ करण्याचे इतर कोणतेही प्रसिद्ध कारण न पाहता, स्वभावानेच निर्मळ असा व्यवहार करतात. म्हणूनच लोकव्यवहारानुसार "स्वभावनिर्मळतरे" असे म्हणून सर्व प्रकारे कारणाचा निषेध करून, स्वभावसिद्ध निर्मळतारूपी फळ प्रकट केले गेले असल्यामुळे ही 'स्वाभाविकफलविभावना' होय. दुर्जनांचा भाव, स्वतःचा भाव, आणि त्याने अत्यंत निर्मळ, असे हे वाक्य आहे. ၂၅၂. २५२. ဇနကော [Pg.247] ဉာပကော စေတိ,ဒုဝိဓာ ဟေတဝေါ သိယုံ; ပဋိသင်္ခရဏံ တေသံ,အလင်္ကာရတယော’ဒိတံ. जनक (उत्पादक) आणि ज्ञापक (बोधक) असे दोन प्रकारचे हेतू असतात; त्यांचे सुशोभीकरण (विशेष रूपाने कथन करणे) हाच अलंकार मानला गेला आहे. ၂၅၂. ဟေတုံ နိဒ္ဒိသတိ ‘‘ဇနကော’’ဣစ္စာဒိနာ. ဇနကော ဘာဝါဘာဝရူပဿ နိဗ္ဗတျာဒိကာရိယဿ ကာရကော ဉာပကော ဝိဇ္ဇမာနဿေဝ ကဿစိ သမ္ဗန္ဓတော ကုတောစိ ပဋိဗောဓကော စာတိ ဟေတဝေါ ဒုဝိဓာ သိယုံ. နနု ကိမေတ္ထ အသနံ, ကေဝလံ ‘‘အနေနေတံ ကရီယတီ’’တိ သရူပကထနမတ္တ, ဝိသေသော တု န ကောစိ ဝိသေသရူပေါ ဝါစာလင်္ကာရောတိ ဝိသေသံ ယောဇယတိ ‘‘ပဋီ’’တိအာဒိနာ. တေသံ ကာရိယုပ္ပာဒယောဂီနံ ဟေတူနံ ပဋိသင်္ခရဏံ ဥပဗြူဟနံ ဝိသိဋ္ဌဘာဝေန ပရိဖုဋံ ကတွာ ယာထာဝတော ကထနံ အလင်္ကာရတာယ ဗန္ဓဘူသနရူပေန ဥဒိတံ အဘိဟိတံ ဝိသေသရူပတ္တာ, န ပနေတေနေတံ ကရီယတီတိ. २५२. हेतूचे निर्देश करताना "जनको" इत्यादी म्हटले आहे. भावाभाव रूपातील उत्पत्ती इत्यादी कार्याचा कर्ता असलेला 'जनक' आणि विद्यमान असलेल्या कशाच्या तरी संबंधाने बोध करून देणारा 'ज्ञापक' असे दोन प्रकारचे हेतू असतात. परंतु येथे काय विशेष आहे? केवळ "याने हे केले जाते" असे स्वरूपाचे कथन मात्र आहे, यात कोणताही विशेष वागलंकार नाही, म्हणून "पटी" इत्यादीद्वारे विशेष जोडतात. कार्य उत्पन्न करणाऱ्या त्या हेतूंचे 'प्रतिसंखरण' म्हणजे पुष्टीकरण करून, विशिष्ट भावाने स्पष्ट करून यथार्थपणे सांगणे, यालाच रचनेचे भूषण (अलंकार) म्हटले गेले आहे, कारण ते विशेष रूपाने असते, केवळ "याने हे केले जाते" एवढ्यापुरतेच मर्यादित नसते. ၂၅၂. ဣဒါနိ ဟေတွာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ဇနကော’’စ္စာဒိနာ. ဇနကော စ ကဿစိ ‘‘သတ္တာ အသတ္တာ’’တိ ဝုတ္တဿ ဘာဝါဘာဝသင်္ခါတကာရိယဿ ဇနကဟေတု စ ဉာပကော စ ကဿစိ ဝိဇ္ဇမာနတ္တံ အညေန ကေနစိ သမ္ဗန္ဓေန အဝဗောဓေန္တော ဉာပကဟေတု စာတိ ဧဝံ ဟေတဝေါ ဒုဝိဓာ သိယုံ. ဣဟ ဖလပကာသကဟေတုမှိ ဝုစ္စမာနေ ‘‘ဣမိနာ ဟေတုနာ ဣဒံ ဖလံ ဇာတ’’န္တိ သရူပကထနမတ္တံ ဝိနာ ဝိသေသရူပါလင်္ကာရော ဣဓ နတ္ထီတိ အာသင်္ကိယ အလင်္ကာရသရူပဝိသေသော ဧသောတိ ဒဿေတုမပရဒ္ဓမာဟ. တေသံ ဖလပကာသနခမာနံ ဟေတူနံ ပဋိသင်္ခရဏံ ဝိသိဋ္ဌဘာဝေန ပကာသံ ကတွာ တတွတော ကထနံ အလင်္ကာရတာယ အလင်္ကာရသဘာဝေန ဥဒိတံ ပသိဒ္ဓံ ဟောတိ, ကဝီဟိ ပတ္ထိတံ ဝါ ဟောတိ. သာလိအင်္ကုရာဒီနံ သာလိဗီဇာဒယော ဝိယ ဇနျဿ အစ္စန္တောပကာရကော ဇနကဟေတု [Pg.248] နာမ, ဝိဇ္ဇမာနအဂ္ဂိအာဒီနံ ဓူမာဒယော ဝိယ ကဿစိ ဝိဇ္ဇမာနတ္တဉာပကော ဉာပကဟေတု နာမ. အလင်္ကာရဿ ဘာဝေါ အလင်္ကာရတာ. အလင်္ကာရတယာတိ ဆန္ဒံ နိဿာယ မတ္တာဟာနိ. २५२. आता "जनको" इत्यादींद्वारे हेतू अलंकार (hetvālaṅkāra) दाखवितात. जनक (उत्पादक) आणि ज्ञापक (बोध करून देणारा) असे दोन प्रकारचे हेतू असतात. एखाद्या गोष्टीच्या अस्तित्वाला किंवा नास्तित्वाला (भाव-अभाव) उत्पन्न करणारा तो 'जनक हेतू' आणि एखाद्या विद्यमान गोष्टीचे दुसऱ्या संबंधाने ज्ञान करून देणारा तो 'ज्ञापक हेतू' होय. येथे फलप्रकाशक हेतूविषयी सांगताना, "या हेतूने हे फल उत्पन्न झाले" एवढेच केवळ स्वरूपकथन करण्याव्यतिरिक्त येथे कोणताही विशेष रूप अलंकार नाही, अशी शंका घेऊन, हा अलंकाराचा एक विशेष प्रकार आहे हे दर्शविण्यासाठी पुढील गाथा म्हटली आहे. फल प्रकाशित करण्यास समर्थ असणाऱ्या त्या हेतूंचे वैशिष्ट्यपूर्ण रीतीने प्रकटीकरण करून त्यांचे यथार्थ कथन करणे, याला अलंकारत्वामुळे (अलंकार स्वभावामुळे) अलंकार म्हटले जाते किंवा कवींद्वारे ते इच्छिलेले असते. जसे भाताच्या अंकुरासाठी भाताचे बी इत्यादी अत्यंत उपकारक असते, त्याला 'जनक हेतू' म्हणतात; आणि विद्यमान अग्नी इत्यादींसाठी धूर इत्यादी जसे त्याच्या अस्तित्वाचे ज्ञान करून देतात, त्याला 'ज्ञापक हेतू' म्हणतात. अलंकाराचा भाव म्हणजे अलंकारता. 'अलंकारतया' हा शब्द छंदाच्या गरजेनुसार मात्रा कमी करून वापरला आहे. ၂၅၃. २५३. ဘာဝါဘာဝကိစ္စဝသာ,စိတ္တဟေတုဝသာပိ စ; ဘေဒါ’နန္တာ ဣဒံ တေသံ,မုခမတ္တနိဒဿနံ. भाव आणि अभाव यांच्या कार्याच्या प्रभावाने, तसेच चित्रहेतूच्या (आश्चर्यकारक हेतूच्या) प्रभावाने देखील याचे अनंत भेद होतात; हे त्यांचे केवळ मुखमात्र (प्राथमिक) दर्शन आहे. ၂၅၃. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဘာဝ’’ဣစ္စာဒိ. ဘာဝေါ သတ္တာ စ, အဘာဝေါ အသတ္တာ စ, တေယေဝ ကိစ္စာနိ တေသံ ဝသေန စ, စိတ္တာ ပသိဒ္ဓဟေတုဝိပရီတာ အစ္ဆရိယာရဟာ ဟေတဝေါ တေသံ ဝသေနာပိ စ ဘေဒါ ဟေတုဝိကပ္ပာ အနန္တာ အနဝဝိယော, ယတော ဧဝံ တသ္မာ တေသံ ဟေတူနံ ဣဒံ မုခမတ္တနိဒဿနံ, တသ္မာ တမ္မုခေန သက္ကာ ဟေတုဝိသေသေ ပဝိသိတုန္တိ. २५३. "भाव" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. भाव म्हणजे अस्तित्व आणि अभाव म्हणजे नास्तित्व, हीच त्यांची कार्ये आहेत आणि त्यांच्या प्रभावाने; तसेच 'चित्र' म्हणजे प्रसिद्ध हेतूच्या विपरीत असणारे आश्चर्यकारक हेतू, त्यांच्या प्रभावाने देखील हेतूंचे भेद (प्रकार) अनंत म्हणजेच अमर्याद आहेत. ज्याअर्थी असे आहे, त्याअर्थी त्या हेतूंचे हे केवळ मुखमात्र (प्राथमिक) दर्शन आहे, म्हणून त्याद्वारे हेतूंच्या विशेष भेदांमध्ये प्रवेश करणे शक्य आहे. ၂၅၃. ‘‘ဘာဝါ’’ဣစ္စာဒိ. ဘာဝါဘာဝကိစ္စဝသာ ဘာဝအဘာဝသင်္ခတသတ္တာအသတ္တာကြိယာဝသေန စ, စိတ္တဟေတုဝသာပိ စ ပသိဒ္ဓဟေတုနော ဝိရုဒ္ဓေန အစ္ဆရိယဟေတူနံ ပဘေဒေန စ, ဘေဒါ ဟေတုဝိသေသာ အနန္တာ ယသ္မာ အပရိယန္တာ ဟောန္တိ, တသ္မာ ဣဒံ ဝက္ခမာနံ တေသံ ဟေတူနံ မုခမတ္တနိဒဿနံ အဝသေသဟေတူနံ ဩဂါဟဏဒွါရမတ္တဿ နိဒဿနံ ဟောတိ. ဘာဝေါ စ အဘာဝေါ စာတိ စ, တေယေဝ ကိစ္စာနီတိ စ, တေသံ ဝသော ဘေဒေါတိ စ, စိတ္တာ ဝိစိတ္တာ စ တေ ဟေတဝေါ စာတိ စ, တေသံ ဝသောတိ စ, မုခမေဝ မုခမတ္တံ, မုခဉ္စ တံ ဝါ မတ္တံ သာမညဉ္စေတိ စ, တဿ နိဒဿနမိတိ စ ဝါကျံ. မတ္တသဒ္ဒေါ အဝဓာရဏေ သာမညေ ဝါ ဝတ္တတေ. २५३. "भावा" इत्यादी. 'भावाभावकृत्यवशात्' म्हणजे भाव आणि अभावाने युक्त अशा अस्तित्व व नास्तित्वाच्या क्रियांच्या प्रभावाने, आणि 'चित्रहेतूवशात्' म्हणजे प्रसिद्ध हेतूच्या विरुद्ध असणाऱ्या आश्चर्यकारक हेतूंच्या भेदांमुळे, हेतूंचे विशेष भेद अनंत म्हणजेच अमर्याद असतात. म्हणून, पुढे सांगितले जाणारे हे त्या हेतूंचे केवळ मुखमात्र दर्शन (प्राथमिक उदाहरण) आहे, जे उर्वरित हेतूंमध्ये प्रवेश करण्यासाठी केवळ एका द्वारासारखे दर्शन आहे. 'भाव आणि अभाव', 'तीच त्यांची कार्ये', 'त्यांचा प्रभाव म्हणजेच भेद', 'चित्र म्हणजे विविध आणि ते हेतू', 'त्यांचा प्रभाव', 'मुख हेच मुखमात्र', 'ते मुख आणि ते मात्र (सामान्य)', आणि 'त्याचे दर्शन' असे हे वाक्य आहे. 'मात्र' हा शब्द अवधारण (निश्चय) किंवा सामान्य अर्थाने वापरला जातो. ၂၅၄. २५४. ပရမတ္ထပကာသေက-[Pg.249] ရသာ သဗ္ဗမနောဟရာ; မုနိနော ဒေသနာ’ယံ မေ,ကာမံ တောသေတိ မာနသံ. परमार्थ प्रकाशित करणे हाच जिचा एकमेव रस (प्रयोजन) आहे, जी सर्वांचे मन हरण करणारी आहे, अशी मुनींची (बुद्धांची) ही देशना माझ्या मनाला पूर्णपणे संतुष्ट करते. ဘာဝကိစ္စော ကာရကဟေတု. भावकृत्य कारकहेतू (उत्पादक हेतू). ၂၅၄. ဥဒါဟရတိ ‘‘ပရမတ္ထ’’ဣစ္စာဒိ. ပရမတ္ထသဘာဝဿ နာမရူပါဒိနော ပကာသောယေဝ ဧကရသော အသဟာယကိစ္စံ ယဿာ သာ တာဒိသီ. သဗ္ဗေသံ မနော ဟရတီတိ သဗ္ဗမနောဟရာ မုနိနော အယံ ဒေသနာ မေ မာနသံ စိတ္တံ ကာမမေကန္တေန တောသေတီတိ အယံ ဘာဝကိစ္စော ကာရကဟေတု သန္တောသသတ္တာယ ကာရဏတော. २५४. "परमत्थ" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. नाम-रूप इत्यादी परमार्थ स्वभावाचे प्रकटीकरण करणे हाच जिचा एकमेव रस (अद्वितीय कार्य) आहे, अशी ती आहे. सर्वांचे मन हरण करते म्हणून 'सर्वमनोहरा'. मुनींची ही देशना माझ्या मानसाला म्हणजेच चित्ताला पूर्णपणे संतुष्ट करते. हा 'भावकृत्य कारकहेतू' आहे, कारण तो संतोषाच्या अस्तित्वाचे कारण आहे. ၂၅၄. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ပရမတ္ထ’’ဣစ္စာဒိနာ. ပရမတ္ထပကာသေကရသာ နာမရူပခန္ဓအာယတနာဒိဥတ္တမတ္ထာနံ ပကာသနသင်္ခါတ အသဟာယကိစ္စဝတီ သဗ္ဗမနောဟရာ ဝေါဟာရာနုရူပေန ဝိသယဘာဝူပဂမနေန သဗ္ဗေသံ မနောဟရာ မုနိနော အယံ ဒေသနာ မေ မယှံ မာနသံ ကာမံ ဧကန္တေန တောသေတီတိ. ဗုဒ္ဓဿ ဓမ္မဒေသနာ ပုဗ္ဗေ အဝိဇ္ဇမာနဿ သန္တောသဿ သတ္တာသင်္ခါတသမုပ္ပာဒံ ကရောတီတိ ကာရကဟေတု နာမ ဟောတိ. သာ စ ဒေသနာ ‘‘မာနသံ တောသေတီ’’တိ ဧတ္တကေန အဒဿေတွာ ‘‘ပရမတ္ထပကာသေကရသာ’’တိ သဝိသေသနံ ကတွာ ဝုတ္တတ္တာ အလင်္ကာရောတိ အဘိမတာ. ဧကော စ သော ရသော စေတိ စ, ပရမတ္ထပကာသောယေဝ ဧကရသော ဧကကိစ္စမဿေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဘာဝကိစ္စော ဘာဝသင်္ခါတံ သတ္တာကိစ္စံ ကတွာ ပဝတ္တော ကာရကဟေတု ဇနကဟေတု. २५४. आता "परमत्थ" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. 'परमत्थपकासेकरसा' म्हणजे नाम, रूप, स्कंध, आयतन इत्यादी उत्तम अर्थांचे प्रकटीकरण करणे हेच जिचे एकमेव कार्य आहे अशी; 'सब्बमनोहरा' म्हणजे व्यवहाराला अनुसरून विषयाच्या स्वरूपात प्राप्त झाल्यामुळे सर्वांचे मन हरण करणारी; मुनींची ही देशना माझ्या मनाला पूर्णपणे संतुष्ट करते. बुद्धांची धम्मदेशना पूर्वी अस्तित्वात नसलेल्या संतोषाच्या उत्पत्तीला (अस्तित्वाला) कारणीभूत ठरते, म्हणून तिला 'कारकहेतू' म्हणतात. आणि ती देशना केवळ "मनाला संतुष्ट करते" एवढेच न दाखवता "परमार्थ प्रकाशित करणे हाच जिचा एकमेव रस आहे" असे विशेषणासह सांगितल्यामुळे तिला अलंकार मानले गेले आहे. 'एक आणि तो रस', 'परमार्थ प्रकटीकरण हाच जिचा एकमेव रस (एकच कार्य) आहे' असा याचा विग्रह आहे. भावकृत्य म्हणजे अस्तित्वाचे कार्य करून प्रवृत्त होणारा कारकहेतू म्हणजेच 'जनकहेतू' होय. ၂၅၅. २५५. ဓီရေဟိ သဟ သံဝါသာ, သဒ္ဓမ္မဿာ’ဘိယောဂတော; နိဂ္ဂဟေနိ’န္ဒြိယာနဉ္စ, ဒုက္ခဿု’ပသမော သိယာ. धीर (ज्ञानी) पुरुषांच्या सहवासाने, सद्धम्माच्या अभ्यासाने (सतत चिंतनाने) आणि इंद्रियांच्या निग्रहाने दुःखाचा उपशम (नाश) होतो. အဘာဝကိစ္စော ကာရကဟေတု. अभावकृत्य कारकहेतू. ၂၅၅. ‘‘ဓီရေဟိ’’စ္စာဒိ. [Pg.250] ဓီရေဟိ သပ္ပညေဟိ သဟ သံဝါသာ သံသဂ္ဂေန စ, သဒ္ဓမ္မဿ သမ္ဗုဒ္ဓဒေသိတဿ အဘိယောဂတော အဘျာသေန စ, ဣန္ဒြိယာနံ စက္ခာဒီနံ နိဂ္ဂဟေန ဝိသယပ္ပဝတ္တိနိရောဓရူပေန ဝိဇယေန စ ဟေတုနာ ဒုက္ခဿ ပဉ္စက္ခန္ဓသင်္ခတဿ အနုပ္ပာဒနိရောဓသင်္ခါတော ဥပသမော သိယာ ဘဝေယျာတိ အယံ အဘာဝကိစ္စော ကာရကဟေတု အနုပ္ပာဒနိရောဓသင်္ခါတဿ အဘာဝဿ ကာရဏတော. २५५. "धीरेहि" इत्यादी. धीर म्हणजे प्रज्ञावंतांच्या सहवासाने, संबुद्धांनी उपदेशिलेल्या सद्धम्माच्या अभ्यासाने (सतत चिंतनाने), आणि चक्षु इत्यादी इंद्रियांच्या निग्रहाने (विषयांकडे जाण्यापासून रोखण्याच्या रूपातील विजयाने) या हेतूंमुळे, पंचस्कंधात्मक दुःखाचा अनुत्पाद-निरोध रूप उपशम होतो. हा 'अभावकृत्य कारकहेतू' आहे, कारण तो अनुत्पाद-निरोध रूप अभावाचे कारण आहे. ၂၅၅. ‘‘ဓီရေဟိ’’စ္စာဒိ. ဓီရေဟိ သဟ သံဝါသာ သမဂ္ဂဝါသေန စ, သဒ္ဓမ္မဿ ဗုဒ္ဓဒေသိတဿ အဘိယောဂတော နိရန္တရာဘျာသေန စ, ဣန္ဒြိယာနံ စက္ခုအာဒီနံ နိဂ္ဂဟေန ရူပါဒိအာရမ္မဏေသု သုဘာဒိဂ္ဂဟဏဿ နိဝါရဏေန စာတိ ဣမေဟိ ကာရဏေဟိ ဒုက္ခဿ ခန္ဓာယတနာဒိကဿ ဥပသမော အနုပ္ပာဒနိရောဓော ခန္ဓပရိနိဗ္ဗာနံ ဝါ သိယာတိ. အဘိဏှသော ယောဂေါတိ ဝိဂ္ဂဟော. အဘာဝကိစ္စော ဒုက္ခဿ ဥပသမသင်္ခါတံ အသတ္တာကိစ္စံ ကတွာ ပဝတ္တော ကာရကဟေတု အဝိဇ္ဇမာနသင်္ခါတာယ အသတ္တာယ ဥပ္ပာဒနတော ဇနကဟေတု နာမ. အဘာဝေါ ကိစ္စမဿေတိ စ, ကာရကော စ သော ဟေတု စာတိ စ ဝါကျံ. ဘာဝကိစ္စောပိ ဝုတ္တဗျတိရေကတော ဉာယတိ. २५५. "धीरेहि" इत्यादी. धीर पुरुषांच्या सहवासाने (एकत्र राहण्याने), बुद्धांनी उपदेशिलेल्या सद्धम्माच्या अभ्यासाने (निरंतर अभ्यासाने), आणि चक्षु इत्यादी इंद्रियांच्या निग्रहाने (रूप इत्यादी आलंबनांमध्ये शुभ इत्यादी ग्रहण करण्याचे निवारण केल्याने) या कारणांमुळे स्कंध, आयतन इत्यादी दुःखाचा उपशम म्हणजेच अनुत्पाद-निरोध किंवा स्कंधपरिनिर्वाण होते. 'अभिक्ष्णशः योगः' (सतत अभ्यास) असा विग्रह आहे. अभावकृत्य म्हणजे दुःखाचा उपशम नावाचे नास्तित्व-कार्य करून प्रवृत्त होणारा कारकहेतू, जो पूर्वी नसलेल्या अभावाच्या उत्पत्तीमुळे 'जनकहेतू' म्हटला जातो. 'अभाव हेच जिचे कार्य आहे', 'तो कारक आणि तो हेतू' असे हे वाक्य आहे. भावकृत्य देखील याच्या उलट समजले जाते. ၂၅၆. २५६. မုနိန္ဒ စန္ဒသံဝါဒိ-ကန္တဘာဝေါပသောဘိနာ; မုခေနေဝ သုဗောဓံ တေ, မနံ ပါပါဘိနိဿဋံ. हे मुनींद्र! चंद्राशी संवाद साधणाऱ्या (चंद्रासारख्या) सुंदर भावाने सुशोभित असणाऱ्या आपल्या मुखावरूनच, आपले मन पापांपासून (क्लेशांपासून) पूर्णपणे मुक्त झाले आहे हे सहज समजते. ဘာဝကိစ္စော ဉာပကဟေတု. भावकृत्य ज्ञापकहेतू. ၂၅၆. ‘‘မုနိန္ဒိ’’စ္စာဒိ. မုနိန္ဒေတိ အာမန္တနံ. တေ တဝ စန္ဒသံဝါဒိနာ စန္ဒသဒိသေန ကန္တဘာဝေန ဥပသောဘိနာ သောဘမာနေန မုခေနေဝ ပါပေဟိ ရာဂါဒီဟိ အဘိနိဿဋံ ဗျပဂတံ မနံ စိတ္တံ သုဗောဓံ သုဋ္ဌု ဝိညာယတီတိ အယံ ဘာဝကိစ္စော ဉာပကဟေတု အဝဗောဓသတ္တာယ ဉာပနတော. २५६. "मुनिंद" इत्यादी. 'मुनिंद' हे संबोधन आहे. 'ते' म्हणजे आपले. चंद्राशी संवाद साधणाऱ्या (चंद्रासारख्या) सुंदर भावाने सुशोभित असणाऱ्या मुखावरूनच, पापांपासून म्हणजेच राग इत्यादी क्लेशांपासून मुक्त झालेले आपले मन (चित्त) सहज समजते (चांगल्या प्रकारे जाणले जाते). हा 'भावकृत्य ज्ञापकहेतू' आहे, कारण तो ज्ञानाच्या अस्तित्वाचा बोध करून देतो. ၂၅၆. ‘‘မုနိန္ဒ’’ဣစ္စာဒိ. ဟေ မုနိန္ဒ တေ တဝ စန္ဒသံဝါဒိကန္တဘာဝေါပသောဘိနာ စန္ဒကန္တဘာဝသဒိသေန ကန္တဘာဝေန သောဘမာနေန မုခေန မနံ တုယှံ စိတ္တံ ပါပါဘိနိဿဋံ ရာဂါဒီဟိ ကိလေသေဟိ နိက္ခန္တန္တိ သုဗောဓံ သုဋ္ဌု ဝိညာယတီတိ. ဣဟ မုခံ မနကန္တဘာဝသမ္ဗန္ဓေန သမန္နာဂတံ သယံ ဝိဇ္ဇမာနမေဝ ကိလေသာပဂမဿ အဝဗောဓသတ္တံ ဉာပေတီတိ ဘာဝကိစ္စော ဉာပကဟေတု နာမ ဇာတော. စန္ဒေန အဘေဒေါပစာရတော စန္ဒလာဝဏျေန သံဝါဒီ သဒိသောတိ စ, သော စ သော ကန္တဘာဝေါ စေတိ စ, တေန ဥပသောဘိတောတိ စ, ပါပေဟိ အဘိနိဿဋန္တိ စ ဝါကျံ. २५६. "मुनिंदा" इत्यादी. हे मुनींद्र! चंद्राशी संवाद साधणाऱ्या सुंदर भावासारख्या सुंदर भावाने सुशोभित असणाऱ्या आपल्या मुखावरून आपले मन (चित्त) पापांपासून म्हणजेच राग इत्यादी क्लेशांपासून मुक्त झाले आहे हे सहज समजते. येथे मुख हे मनाच्या सुंदर भावाच्या संबंधाने युक्त असून, स्वतः विद्यमान असतानाच क्लेशांच्या नाशाच्या ज्ञानाचा बोध करून देते, म्हणून हा 'भावकृत्य ज्ञापकहेतू' झाला आहे. चंद्राशी अभेदोपचाराने चंद्राच्या लावण्याशी संवाद साधणारे (समान) असणारे, 'तो आणि तो सुंदर भाव', 'त्याने सुशोभित', 'पापांपासून मुक्त' असे हे वाक्य आहे. ၂၅၇. २५७. သာဓုဟတ္ထာရဝိန္ဒာနိ, သင်္ကောစယတိတေ ကထံ; မုနိန္ဒ စရဏဒွန္ဒ-ရာဂဗာလာတပေါ ဖုသံ. हे मुनींद्र! आपल्या चरणयुगुळांच्या लालीरूपी कोवळ्या उन्हाचा स्पर्श सुजनांच्या हस्तकमळांना संकुचित (हात जोडण्यास प्रवृत्त) कसा करतो? အယုတ္တကာရီ စိတ္တဟေတု. अयुक्तकारी चित्रहेतू (अयोग्य कार्य करणारा आश्चर्यकारक हेतू). ၂၅၇. ‘‘သာဓု’’ဣစ္စာဒိ. မုနိန္ဒ တေ စရဏာနံ ဒွန္ဒဿ ရာဂေါ ဗာလော စ သော အာတပေါ စေတိ ရာဂဗာလာတပေါ တရုဏကိရဏသမူဟော လောဟိတတ္တာဒိနာ သာဓူနံ ဟတ္ထာရဝိန္ဒာနိ ကန္တာဒိနာ ဖုသံ ဝိသာရိတ္တေနာ’မသန္တော ကထံ သင်္ကောစယတိ မကုလယတိ, အဉ္ဇလိပဏာမဗန္ဓေန အယုတ္တမေတံ. ဗာလာတပေါ ဟိ ပဒုမာနမုမ္မီလနဟေတု, အယံ တု အပုဗ္ဗော ဗာလာတပေါ ယော ပဒုမာနိ နိမီလေတီတိ အနုစိတကာရိယကာရဏာ အယုတ္တကာရီ စိတ္တဟေတု, ဧဝံဝိဓော ဝိညေယျော ဘာဝကိစ္စတ္တေပီတိ. २५७. "साधु" इत्यादी. हे मुनींद्र! आपल्या चरणयुगुळांची लाली आणि कोवळा ऊन म्हणजेच 'रागबालातप' (तरुण किरणसमूह), जो लाल रंगाने युक्त असल्यामुळे सुजनांच्या हस्तकमळांना स्पर्श करून (हात जोडण्याच्या रूपाने) कसा संकुचित करतो (मिटवतो)? कोवळा ऊन तर कमळांना उमलविणारा असतो, परंतु हा एक अपूर्व कोवळा ऊन आहे जो कमळांना मिटवतो, म्हणून अयोग्य कार्य करण्याच्या कारणामुळे हा 'अयुक्तकारी चित्रहेतू' आहे. भावकृत्यामध्येही असाच प्रकार समजून घ्यावा. ၂၅၇. ‘‘သာဓု’’ဣစ္စာဒိ. ဟေ မုနိန္ဒ တေ တဝ စရဏဒွန္ဒရာဂဗာလာတပေါ ပါဒယုဂဠဿ အရုဏဝဏ္ဏသင်္ခတအဘိနဝသူရိယကိရဏော သာဓုဟတ္ထာရဝိန္ဒာနိ သုဇနာနံ ကရပဒုမာနိ ဖုသံ အတ္တနော သဗ္ဗဗျာပိတ္တာ ဖုသန္တော ကထံ သင်္ကောစယတိ ကရသမ္ပုဋရူပေန မကုလယတီတိ. ဗာလာတပေါ နာမ ပဒုမဝိကသနံ ဝိနာ သင်္ကောစနံ န ကရောတိ, ဧသော အာတပေါ အစ္ဆရိယော ဝိစိတ္တောတိ ဂမျမာနတ္တာ အယုတ္တသင်္ကောစသတ္တာကရဏတော အယံ အယုတ္တကာရီ စိတ္တဟေတု [Pg.252] နာမ. အယုတ္တံ ကရောတီတိ စ, စိတ္တဉ္စ တံ ဟေတု စာတိ စ ဝါကျံ. २५७. "साधु" इत्यादी. हे मुनींद्र! आपल्या चरणयुगुळांच्या लालीरूपी कोवळ्या उन्हाचा (पायांच्या तांबड्या रंगासारख्या नवीन सूर्यकिरणांचा) स्पर्श सुजनांच्या हस्तकमळांना (हात जोडण्याच्या रूपाने) कसा संकुचित करतो? कोवळा ऊन कमळांना उमलविण्याऐवजी कधीही संकुचित करत नाही, परंतु हा ऊन आश्चर्यकारक व विचित्र वाटत असल्यामुळे आणि अयोग्य संकोच घडवून आणत असल्यामुळे याला 'अयुक्तकारी चित्रहेतू' म्हणतात. 'अयोग्य करतो तो' आणि 'चित्र असलेला तो हेतू' असे हे वाक्य आहे. ၂၅၈. २५८. သင်္ကောစယန္တိ ဇန္တူနံ, ပါဏိပင်္ကေရုဟာနိ’ဟ; မုနိန္ဒစရဏဒွန္ဒ-နခစန္ဒာန’မံသဝေါ. या जगात मुनींद्रांच्या चरणयुगुळांच्या नखरूपी चंद्रांचे किरण प्राण्यांच्या हस्तकमळांना संकुचित करतात (हात जोडण्यास प्रवृत्त करतात). ယုတ္တကာရီ စိတ္တဟေတု. युक्तकारी चित्रहेतू (योग्य कार्य करणारा आश्चर्यकारक हेतू). ၂၅၈. ‘‘သင်္ကောစယန္တိ’’စ္စာဒိ. မုနိန္ဒဿ ပါဒါနံ ဒွန္ဒေ နခါ ဧဝ စန္ဒာ ကန္တာဒိနာ တေသံ အံသဝေါ ကိရဏာ ဣဟ လောကေ ဇန္တူနံ သတ္တာနံ ပါဏယော ဧဝ ပင်္ကေရုဟာနိ ကန္တာဒိနာ သင်္ကောစယန္တိ ပဏာမကရဏသမ္ပုဋရူပေန မိလီယန္တီတိ ယုတ္တကာရီ စိတ္တဟေတု စန္ဒတော ပင်္ကဇသင်္ကောစဿ ဥစိတတ္တာ. ဝုတ္တနယေပီတိ. २५८. "संकोचयन्ति" इत्यादी. मुनींद्रांच्या चरणांमधील नख हेच चंद्र आहेत, त्यांचे किरण या जगात प्राण्यांच्या हस्तकमलांना संकुचित करतात (हात जोडण्याच्या रूपाने मिटवतात). चंद्राच्या किरणांमुळे कमळांचे संकुचित होणे योग्यच असल्यामुळे हा 'युक्तकारी चित्रहेतू' आहे. पूर्वी सांगितलेल्या पद्धतीनेच हे समजून घ्यावे. ၂၅၈. ‘‘သင်္ကော’’ဣစ္စာဒိ. မုနိန္ဒစရဏဒွန္ဒနခစန္ဒာနံ သမ္ဗုဒ္ဓဿ ပါဒဒွန္ဒေ နခါဝလိသင်္ခါတာနံ စန္ဒာနံ အံသဝေါ ရံသယော ဣဟ လောကေ ဇန္တူနံ ပါဏိပင်္ကေရုဟာနိ သင်္ကောစယန္တိ ကရသမ္ပုဋာကာရေန သင်္ကောစယန္တိ မကုလံ ကရောန္တီတိ. စန္ဒကိရဏေဟိ ကတ္တဗ္ဗာယ ဧဝ ပဒုမသင်္ကောစသတ္တာယ ကတတ္တာ စ, ပကတိစန္ဒကိရဏကတ္တဗ္ဗကိစ္စဿ စန္ဒမရီစိသမာနအညာဒိဋ္ဌပုဗ္ဗဝိစိတြအံသူဟိ ကတတ္တာ စ အယံ ယုတ္တကာရီ စိတ္တဟေတု နာမ. ပါဏယော စ တေ ပင်္ကေရုဟာနိ စေတိ စ, မုနိန္ဒဿ စရဏဒွန္ဒမိတိ စ, တသ္မိံ နခါနီတိ စ, တေဝ စန္ဒာတိ စ ဝါကျံ. २५८. "संको" इत्यादी. संबुद्धांच्या चरणयुगुळांमधील नखरूपी चंद्रांचे किरण या जगात प्राण्यांच्या हस्तकमळांना संकुचित करतात (हात जोडण्याच्या रूपाने मिटवतात). चंद्रकिरणांमुळे कमळांचे संकुचित होणे स्वाभाविक असल्यामुळे, आणि नैसर्गिक चंद्रकिरणांचे कार्य चंद्रकिरणांसारख्या इतर अपूर्व व विचित्र किरणांद्वारे केले गेल्यामुळे हा 'युक्तकारी चित्रहेतू' आहे. 'हात हेच कमळ', 'मुनींद्रांचे चरणयुगुल', 'त्यातील नखे' आणि 'तीच चंद्र' असे हे वाक्य आहे. ၂၅၉. २५९. ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနံ ပဒတ္ထာနံ, အနုဒ္ဒေသော ယထာက္ကမံ; သင်္ချာန’မိတိ နိဒ္ဒိဋ္ဌံ, ယထာသင်္ချံ ကမောပိ စ. पूर्वी उल्लेखिलेल्या पदार्थांचा (गोष्टींचा) अनुक्रमे (त्यांच्या क्रमानुसार) पुन्हा निर्देश करणे, याला 'संख्यान', 'यथासंख्या' किंवा 'क्रम' असे म्हटले जाते. ၂၅၉. ကမံ ဝိဝရိတုမုပက္ကမတိ ‘‘ဥဒ္ဒိဋ္ဌာန’’မိစ္စာဒိ. ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနံ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တာနံ ပဒတ္ထာနံ ဝတ္ထူနံ ကေသဉ္စိ ယထာက္ကမံ ဥဒ္ဒေသက္ကမာနတိက္ကမေန [Pg.253] အနုဒ္ဒေသော ပုန အတ္ထန္တရနိဒ္ဒေသနယေန အနုကထနံ ‘‘သင်္ချာန’’မိတျပိ စ, ‘‘ယထာသင်္ချ’’မိတျပိ စ နိဒ္ဒိဋ္ဌံ ဝုတ္တံ. ဝိဓေယျတ္တာ တေသံ ပဓာနတ္တမိတိ တဒပေက္ခာယ နပုံသကတ္တံ, အနုဝဒိတဗ္ဗတ္တာနုဒ္ဒေသဿာပ္ပဓာနတ္တမိတိ န ပုလ္လိင်္ဂပရိဂ္ဂဟော. ‘‘ကမော’’ဣစ္စပိ နိဒ္ဒိဋ္ဌောတိ လိင်္ဂဝိပရိဏာမော. २५९. क्रमाचे स्पष्टीकरण करण्यासाठी "उद्दिठ्ठानं" इत्यादींनी सुरुवात करतात. पूर्वी उल्लेखिलेल्या काही पदार्थांचा (वस्तूंचा) त्यांच्या क्रमानुसार (उदेश क्रमाचे उल्लंघन न करता) पुन्हा दुसऱ्या अर्थाने निर्देश करणे, याला 'संख्यान' किंवा 'यथासंख्या' असे म्हटले जाते. विधेय असल्यामुळे त्यांचे प्राधान्य आहे, म्हणून त्या अपेक्षेने नपुंसकलिंग वापरले आहे; आणि अनुवाद्य असल्यामुळे अनुद्देशाचे अप्राधान्य आहे, म्हणून पुल्लिंगाचा स्वीकार केलेला नाही. "क्रमो" असे देखील म्हटले आहे, हा लिंगविपरिणाम (लिंग बदल) आहे. ၂၅၉. ဣဒါနိ ကမာလင်္ကာရံ ဥဒ္ဒိသတိ ‘‘ဥဒ္ဒိဋ္ဌာန’’မိစ္စာဒိနာ. ဥဒ္ဒိဋ္ဌာနံ ပဌမကထိတာနံ ပဒတ္ထာနံ ယထာက္ကမံ ဥဒ္ဒိဋ္ဌက္ကမမနတိက္ကမ္မ အနုဒ္ဒေသော အတ္ထန္တရံ နိဿာယ ပုနကထနံ ‘‘သင်္ချာန’’မိတိ စ, ‘‘ယထာသင်္ချ’’မိတိ စ နိဒ္ဒိဋ္ဌံ, ကမောပိ စ နိဒ္ဒိဋ္ဌော. ဧတ္ထ ပသိဒ္ဓံ အနုဒ္ဒေသံ ပုဗ္ဗဒ္ဓေန အနုဝဒိတွာ အပ္ပသိဒ္ဓံ ကမမ္ပိ ကမပရိယာယံ သင်္ချာနယထာသင်္ချဒွယမ္ပိ အပရဒ္ဓေန ဝိဒဓာတိ. ဧတ္ထ ဝိဓာတဗ္ဗံ ဒဿေတုံ အနုဝါဒဿ အာဟရိယမာနတ္တာ အနုဝါဒေါ အပ္ပဓာနော, ဝိဓာတဗ္ဗော ပဓာနော. ယဉှိ ဝိဓာတဗ္ဗံ, တံ ပဓာနံ, ဣတရမပ္ပဓာနန္တိ ဣမိနာ ကာရဏေန ဝုစ္စတိ. တသ္မာ ‘‘နိဒ္ဒိဋ္ဌ’’န္တိ ‘‘သင်္ချာနံ, ယထာသင်္ချ’’န္တိ ဒွယံ အပေက္ခာယ (တဿ အပ္ပဓာနတ္တာ) နပုံသကံ ဟောတိ. ‘‘ကမော’’တိ အပေက္ခာယ ‘‘နိဒ္ဒိဋ္ဌော’’တိ ပုလ္လိင်္ဂေါ ဟောတိ. အပ္ပဓာနော အနုဒ္ဒေသောတိ နာပေက္ခတိ. ကမမနတိက္ကမ္မာတိ စ, သင်္ချာယ အနဘိက္ကမောတိ စ ဝါကျံ. २५९. आता 'क्रमालंकारा'चे (कम-अलंकार) निर्देश 'उद्दिष्टानं' इत्यादींद्वारे करतात. पहिल्यांदा सांगितलेल्या पदार्थांच्या उद्दिष्ट क्रमाचे उल्लंघन न करता, यथाक्रमाने दुसऱ्या अर्थाचा आश्रय घेऊन पुन्हा सांगणे म्हणजे 'अनुद्देश' होय. यालाच 'संख्यान' आणि 'यथासंख्य' असेही म्हटले आहे, आणि 'क्रम' देखील निर्दिष्ट केला आहे. येथे पूर्वार्धाने प्रसिद्ध अनुद्देशाचा अनुवाद करून, उत्तरार्धाने क्रम, क्रमाचा पर्याय आणि संख्यान व यथासंख्य या दोन्हीचे विधान केले आहे. येथे जे विधान करायचे आहे ते दर्शवण्यासाठी अनुवादाचा उपयोग केला गेल्यामुळे अनुवाद हा अप्रधान आहे आणि विधान करायचे आहे ते प्रधान आहे. कारण जे विधान करायचे असते ते प्रधान असते आणि इतर अप्रधान असते, असे या कारणाने म्हटले जाते. म्हणून 'निर्दिष्टम्' (niddiṭṭhaṃ) हे 'संख्यान' आणि 'यथासंख्य' या दोन्हींच्या अपेक्षेने (त्याच्या अप्रधानतेमुळे) नपुंसकलिंगी होते. 'क्रमः' (kamo) च्या अपेक्षेने 'निर्दिष्टः' (niddiṭṭho) हे पुल्लिंगी होते. अप्रधान असलेला अनुद्देश अपेक्षा करत नाही. 'क्रमाचे उल्लंघन न करता' आणि 'संख्येचे उल्लंघन न करता' असे हे वाक्य आहे. ၂၆၀. २६०. အာလာပဟာသလီလာဟိ, မုနိန္ဒ ဝိဇယာ တဝ; ကောကိလာ ကုမုဒါနိ စော-ပသေဝန္တေ ဝနံ ဇလံ. हे मुनींद्र! आपल्या संभाषण आणि हास्याच्या विलासाने (लीलेने) पराभूत होऊन, कोकिळ आणि कमळे अनुक्रमे वन आणि जलाचा आश्रय घेतात. ၂၆၀. တမုဒါဟရတိ ‘‘အာလာပိ’’စ္စာဒိနာ. မုနိန္ဒ တဝ အာလာပဟာသာ စ တေသံ လီလာဟိ, ဥဒ္ဒေသောယံ. ဝိဇယာ ကောကိလကုမုဒါနံ ပရာဘဝေန ကောကိလာ ကရဝီကာ ကုမုဒါနိ စ, ယထောဒ္ဒေသမနုဒ္ဒေသောယံ ဝုတ္တာပေက္ခာယ. ဝက္ခမာနာပေက္ခာယ တု အယမ္ပိ ဥဒ္ဒေသောဝ, ‘‘ကောကိလာ ဝနံ, ကုမုဒါနိ ဇလ’’မိတိ ယထောဒ္ဒေသမနုဒ္ဒေသောယံ. ဥပသေဝန္တေ ဣဝ နိဿယန္တိ မညေ. ဣတိ ဝတ္ထုတော ဧဝ သမ္ဘဝေါ ဣဝေတိ [Pg.254] ပရိကပ္ပတေ. ယဇ္ဇေဝံ ပရိကပ္ပနာယ ကထံ ယထာသင်္ချန္တိ စေ? အတြောစ္စတေ – ယတ္ထာလင်္ကာရန္တရမပိ ပတီယတေ. တတ္ထုဒ္ဒေသာနုရူပါနုဒ္ဒေသသမ္ဘဝေ သင်္ချာနမေဝါလင်္ကာရော ဝေါဟရီယတေ တဿေဝ မုချတော ဝတ္တုမိစ္ဆိတတ္တာ. ယတ္ထာလင်္ကာရန္တရံ န ဂမျတေ, တတ္ထ အစ္စန္တမေဝ ကမောတိ ဝိညေယျံ. २६०. त्याचे उदाहरण 'आलाप...' इत्यादींद्वारे देतात. हे मुनींद्र! आपल्या संभाषण आणि हास्याच्या विलासाने, हा 'उद्देश' आहे. विजयामुळे म्हणजे कोकिळ आणि कमळांच्या पराभवामुळे, कोकिळ (करवीक पक्षी) आणि कमळे, हा पूर्वोक्ताच्या अपेक्षेने 'यथाउद्देश अनुद्देश' आहे. परंतु पुढे सांगायच्या अपेक्षेने हा देखील 'उद्देशच' आहे, जसे 'कोकिळ वनाचे आणि कमळे जलाचे' हा यथाउद्देश अनुद्देश आहे. 'सेवन करतात' म्हणजे जणू आश्रय घेतात असे वाटते. अशा प्रकारे वस्तूच्या स्वरूपावरूनच 'जणू' (इव) अशी कल्पना केली जाते. जर अशी कल्पना केली जाते, तर 'यथासंख्य' कसे होईल? यावर सांगितले जाते – जेथे दुसरा अलंकार देखील प्रतीत होतो, तेथे उद्देशाला अनुरूप अनुद्देशाचा संभव असल्यामुळे 'संख्यान' हाच अलंकार मानला जातो, कारण प्रामुख्याने तेच सांगण्याची इच्छा असते. जेथे दुसरा अलंकार जाणवत नाही, तेथे केवळ 'क्रम' (क्रमांलकार) आहे असे समजावे. ၂၆၀. ဥဒါဟရတိ ‘‘အာလာပိ’’စ္စာဒိနာ. ဟေ မုနိန္ဒ တေ တဝ အာလာပဟာသလီလာဟိ မဓုရသရလီလာဟိ သဒ္ဓိံ မန္ဒဟသိတလီလာဟိ သဉ္ဇာတာ ဝိဇယာ ဇယဟေတု ကောကိလာ ကရဝီကာ စ ကုမုဒါနိ ကေရဝါနိ စ ဝနံ ဇလဉ္စ ကမေန ဥပသေဝန္တေ ဣဝ နိဿယံ ကရောန္တီတိ မညေတိ. ဧတ္ထ ‘‘အာလာပဟာသလီလာဟီ’’တိ ဥဒ္ဒေသော, ‘‘ကောကိလာ ကုမုဒါနီ’’တိ ဝုတ္တာပေက္ခာယ အနုဒ္ဒေသော, ‘‘ဝနံ ဇလ’’န္တိ ဝက္ခမာနာပေက္ခာယ ဥဒ္ဒေသောဝ ဟောတိ, တတွတော ဤဒိသဝိဇယေန ကောကိလာဒီနံ ဝနာဒိနိဿယကာရဏာဘာဝတော ဣဝသဒ္ဒပယောဂေန နိဒ္ဒိဋ္ဌော. ဧဝံ သတိ အယံ ပရိကပ္ပနာ န ဘဝတိ. ကသ္မာ? နာနာလင်္ကာရသန္နိပါတေ သတိ ယော ယော အလင်္ကာရော ဝတ္တုနာ ဣစ္ဆိတော, တဿေဝ မုချတော ဝေါဟရီယမာနတ္တာ. ဧဝံ ပရိကပ္ပနာလင်္ကာရသံသဂ္ဂေ သတိပိ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန ဒဿိတဿ အနုဒ္ဒေသဿ မုချတ္တာ အယံ ကမာလင်္ကာရော နာမ. ဤဒိသညမ္ပိ ဧဝမေဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. အာလာပေါ စ ဟာသော စေတိ စ, တေသံ လီလာယောတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २६०. 'आलाप...' इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. हे मुनींद्र! आपल्या संभाषण आणि हास्याच्या विलासाने म्हणजे मधुर संभाषणाच्या विलासासह मंदहास्याच्या विलासाने झालेल्या विजयामुळे (जयाच्या कारणाने), कोकिळ (करवीक) आणि कमळे (कैरव) अनुक्रमे वन आणि जलाचे जणू सेवन करतात, म्हणजे आश्रय घेतात असे वाटते. येथे 'आलाप-हास-लीलांनी' हा उद्देश आहे, 'कोकिळ आणि कमळे' हा पूर्वोक्ताच्या अपेक्षेने अनुद्देश आहे, आणि 'वन व जल' हा पुढे सांगायच्या अपेक्षेने उद्देशच होतो. वास्तव पाहता, अशा विजयामुळे कोकिळ इत्यादींना वनाचा आश्रय घेण्याचे कारण नसल्यामुळे 'इव' (जणू) शब्दाच्या प्रयोगाने ते निर्दिष्ट केले आहे. असे असताना ही केवळ कल्पना (उत्प्रेक्षा) होत नाही. का? कारण अनेक अलंकारांचा संकर असताना, वक्त्याला जो जो अलंकार अभिप्रेत असतो, तोच प्रामुख्याने व्यवहारात आणला जातो. अशा प्रकारे कल्पनेच्या (उत्प्रेक्षा अलंकाराच्या) संसर्गातही, उद्देशाच्या क्रमाने दर्शवलेल्या अनुद्देशाच्या मुख्यतेमुळे याला 'क्रमांलकार' (कम-अलंकार) असे म्हणतात. इतरही अशाच प्रकारे समजावे. 'आलाप आणि हास' आणि 'त्यांची लीला' असा याचा विग्रह आहे. ၂၆၁. २६१. သိယာ ပိယတရံ နာမ, အတ္ထရူပဿ ကဿစိ; ပိယဿာ’တိသယေနေ’ကံ, ယံ ဟောတိ ပဋိပါဒနံ. अतिशय प्रिय असलेल्या एखाद्या विषयाचे (अर्थरूपाचे) जे एक प्रकारे प्रतिपादन केले जाते, त्याला 'प्रियतर' (अलंकार) असे म्हणतात. ၂၆၁. ပိယတရမာဟရတိ ‘‘သိယာ’’ဣစ္စာဒိနာ. အတိသယေန ပိယဿ ကဿစိ အတ္ထရူပဿ အဘိဓေယျသဘာဝဿ ယံ ပဋိပါဒနမာချာနံ ဟောတိ, ဧတံ ပိယတရံ နာမ သိယာ. २६१. 'सिया...' इत्यादींद्वारे प्रियतर अलंकाराचे उदाहरण देतात. अतिशय प्रिय असलेल्या एखाद्या विषयाचे (अर्थरूपाचे किंवा अभिधेय स्वभावाचे) जे प्रतिपादन (कथन) केले जाते, त्याला 'प्रियतर' असे म्हणतात. ၂၆၁. ဣဒါနိ [Pg.255] ပိယတရာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘သိယာ’’ဣစ္စာဒိနာ, အတိသယေန ပိယဿ ကဿစိ အတ္ထရူပဿ အဘိဓေယျသဘာဝဿ ယံ ပဋိပါဒနံ ကထနံ ဟောတိ, ဧတံ ပဋိပါဒနံ ပိယတရံ နာမ ပိယတရာလင်္ကာရော နာမ ဟောတိ. အတိသယေန ပိယန္တိ စ, အတ္ထော ဧဝ ရူပံ သဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. २६१. आता 'सिया...' इत्यादींद्वारे प्रियतर अलंकाराचे दर्शन घडवतात. अतिशय प्रिय असलेल्या एखाद्या विषयाचे (अर्थरूपाचे किंवा अभिधेय स्वभावाचे) जे प्रतिपादन म्हणजे कथन केले जाते, त्या प्रतिपादनाला 'प्रियतर' किंवा 'प्रियतर अलंकार' असे म्हणतात. 'अतिशय प्रिय' आणि 'अर्थ हाच रूप म्हणजे स्वभाव' असे हे वाक्य आहे. ၂၆၂. २६२. ပီတိ ယာ မေ သမုပ္ပန္နာ, သန္တ သန္ဒဿနာ တဝ; ကာလေနာ’ယံ ဘဝေ ပီတိ, တဝေဝ ပုန ဒဿနာ. हे शांत (सत्पुरुष)! आपल्या दर्शनाने मला जी प्रीती (आनंद) उत्पन्न झाली आहे, तीच प्रीती भविष्यात केवळ आपल्याच पुन्हा दर्शनाने प्राप्त होवो. ၂၆၂. ဥဒါဟရတိ ‘‘ပီတိ’’စ္စာဒိ. သန္တ သပ္ပုရိသ မဟာမုနိ တဝ သန္ဒဿနာ စက္ခုပထာပါထမတ္တေန မဓုရကထာသဝနာ ယာ ပီတိ မေ မမ သမုပ္ပန္နာ, အယံ ပီတိ ကာလေန ဤဒိသေန သုခေန တဝေဝ နာညဿ ကဿစိ, ကော ဟိ နာမောညော တဝါဒိသောတိ, ပုန ဒဿနာ ဘဝေယျာတိ. २६२. 'पीति...' इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. हे शांत, सत्पुरुष, महामुनी! आपल्या दर्शनाने म्हणजे केवळ दृष्टीपथात येण्याने आणि मधुर कथा ऐकल्याने मला जी प्रीती (आनंद) उत्पन्न झाली आहे, ती प्रीती भविष्यात अशा सुखाने केवळ आपल्याच (दुसऱ्या कोणाच्याही नाही, कारण आपल्यासारखा दुसरा कोण असणार?) पुन्हा दर्शनाने प्राप्त होवो. ၂၆၂. ‘‘ပီတိ’’စ္စာဒိ. ဟေ သန္တ သပ္ပုရိသ တထာဂတ တဝ သန္ဒဿနာ မမ နေတ္တေ အာပါထဂမနတော ယာ ပီတိ မေ သမုပ္ပန္နာ, အယံ ပီတိ ကာလေန ဤဒိသက္ခဏေန တယာ သဒိသဿ အညဿာဘာဝါ တဝေဝ ပုန ဒဿနာ ဒဿနတော ဘဝေတိ. ဧတ္ထ ပီတိယာ’တိသယဟေတုဘူတံ အတိဣဋ္ဌာရမ္မဏဉ္စ ဒဿနေ အတိဂေဓဉ္စ ပကာသနေန အတိပီတီတိ ပဒတ္ထံ, ပကာသိတံ ဟောတိ. ‘‘အယံ ပီတိ ဘဝေ’’တိ ပုဗ္ဗကာလေ ဥပ္ပန္နပီတိယာ ပုနာသမ္ဘဝတော တံသဒိသာယေဝ ပီတိ ဂဟိတာ ယထာ ‘‘သောယေဝ ဝဋ္ဋကော, တာနိယေဝ ဩသဓာနီ’’တိ. २६२. 'पीति...' इत्यादी. हे शांत, सत्पुरुष, तथागत! आपल्या दर्शनाने म्हणजे माझ्या डोळ्यांच्या दृष्टीपथात येण्याने मला जी प्रीती उत्पन्न झाली आहे, ती प्रीती भविष्यात अशा क्षणी आपल्यासारखा दुसरा कोणी नसल्यामुळे केवळ आपल्याच पुन्हा दर्शनाने होईल. येथे प्रीतीच्या अतिशयतेचे कारण असलेले अत्यंत इष्ट आलंबन आणि दर्शनाची तीव्र लालसा प्रकट केल्यामुळे 'अतिप्रीती' हा पदार्थाचा अर्थ प्रकाशित होतो. 'ही प्रीती होवो' यामध्ये पूर्वीच्या काळी उत्पन्न झालेली प्रीती पुन्हा जशीच्या तशी संभवत नसल्यामुळे, तिच्यासारखीच दुसरी प्रीती ग्रहण केली आहे, जसे 'तोच लाव्हा पक्षी, तीच औषधे' असे म्हटले जाते. ၂၆၃. २६३. ဝဏ္ဏိတေနော’ပမာနေန, ဝုတျာ’ဓိပ္ပေတဝတ္ထုနော; သမာသဝုတ္တိ နာမာ’ယံ, အတ္ထသင်္ခေပရူပတော. वर्णन केलेल्या उपमानाद्वारे अभिप्रेत असलेल्या वस्तूचे (अर्थाचे) जे कथन केले जाते, त्याला अर्थाच्या संक्षेप रूपामुळे 'समासोक्ती' (समासवृत्ती) असे म्हणतात. ၂၆၃. သမာသဝုတ္တိံဝတ္တုမာဟ ‘‘ဝဏ္ဏိတေနိ’’စ္စာဒိ. ဝဏ္ဏိတေန ပသံသိတေန ဥပမာနေန အဓိပ္ပေတဿ မနသိ နိဟိတဿ ဝတ္ထုနော အတ္ထဿ ဝုတျာ ကထနေန အယံ ဝုတ္တလက္ခဏာ သမာသဝုတ္တိ နာမ. ကသ္မာ? အတ္ထဿ ဝတ္တုမိစ္ဆိတဿ သင်္ခေပေါ သင်္ခိပိတွာ [Pg.256] ကထနံ ရူပံ သဘာဝေါ, တသ္မာ တတောယမနွတ္ထသညာ သင်္ခေပဝုတ္တိ သမာသဝုတ္တီတိ ကတွာ. ကသ္မာ? အယံ ဂုဏီဘူတာ သကတ္ထာ အတ္ထန္တရံ ဝိဒဓာတိ, န တု သကတ္ထပဓာနာ. २६३. समासवृत्ती सांगण्यासाठी 'वर्णित...' इत्यादी म्हणतात. वर्णित म्हणजे प्रशंसित उपमानाद्वारे अभिप्रेत असलेल्या, मनात ठेवलेल्या वस्तूच्या अर्थाचे कथन केल्यामुळे याला पूर्वोक्त लक्षणाची 'समासवृत्ती' म्हणतात. का? कारण सांगू इच्छिलेल्या अर्थाचा संक्षेप (थोडक्यात सांगणे) हेच तिचे रूप किंवा स्वभाव आहे, म्हणून या सार्थ संज्ञेला संक्षेपवृत्ती किंवा समासवृत्ती म्हटले जाते. का? कारण ही स्वतःचा अर्थ गौण करून दुसऱ्या अर्थाचे विधान करते, स्वतःच्या अर्थाला प्रधान मानत नाही. ၂၆၃. ဣဒါနိ သမာသဝုတ္တိံ နိဒ္ဒိသတိ ‘‘ဝဏ္ဏိတေ’’စ္စာဒိနာ. ဝဏ္ဏိတေန ပသံသိတေန ဥပမာနေန ဥပမာနဝတ္ထုနာ ကရဏဘူတေန အဓိပ္ပေတဝတ္ထုနော ဣစ္ဆိတတ္ထဿ ဝုတျာ ကထနေန အတ္ထသင်္ခေပရူပတော ဝတ္တုမိစ္ဆိတတ္ထဿ သင်္ဂဟရူပတ္တာ အယံ ယထာဝုတ္တလက္ခဏာ သမာသဝုတ္တိ နာမ ဟောတိ. ဧတ္ထ ဝတ္တုမိစ္ဆိတတ္ထံ သင်္ဂဟေတွာ မနသိ ကတွာ တဿ ဥပမာဘူတတ္ထဿ ဝဏ္ဏနာယ မနသိ ကတဿ ပကာသနတော အယံ သမာသဝုတ္တိ နာမ. ဧတိဿာ ပဒါဘိဟိတော သကတ္ထော အပ္ပဓာနော, ဂမ္မမာနတ္ထော ပန ပဓာနော ဟောတိ. အဓိပ္ပေတဉ္စ တံ ဝတ္ထု စေတိ စ, သမာသေန သင်္ခေပေန ဝုတ္တိ ကထနမိတိ စ, သင်္ခေပေါယေဝ ရူပံ သရူပန္တိ စ, အတ္ထဿ သင်္ခေပရူပန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २६३. आता 'वर्णित...' इत्यादींद्वारे समासवृत्तीचे निर्देश करतात. वर्णित म्हणजे प्रशंसित उपमानाद्वारे (उपमान वस्तूच्या साहाय्याने) अभिप्रेत असलेल्या वस्तूच्या (इच्छित अर्थाच्या) कथनाने, अर्थाच्या संक्षेप रूपामुळे (सांगू इच्छिलेल्या अर्थाचा संग्रह असल्यामुळे) ही पूर्वोक्त लक्षणाची 'समासवृत्ती' होय. येथे सांगू इच्छिलेला अर्थ मनात संग्रहित करून, त्या उपमानभूत अर्थाच्या वर्णनाने मनात असलेल्या गोष्टीचे प्रकटीकरण होत असल्यामुळे याला समासवृत्ती म्हणतात. हिचा पदांनी सांगितलेला स्वतःचा अर्थ अप्रधान असतो, तर ध्वनित होणारा (गम्यमान) अर्थ प्रधान असतो. 'अभिप्रेत असलेली वस्तू', 'समासाने म्हणजे संक्षेपाने वृत्ती म्हणजे कथन', 'संक्षेप हेच रूप' आणि 'अर्थाचे संक्षेप रूप' असा याचा विग्रह आहे. ၂၆၄. २६४. သာ’ယံ ဝိသေသျမတ္တေန, ဘိန္နာ’ဘိန္နဝိသေသနာ; အတ္ထေဝ အပရာပျ’တ္ထိ, ဘိန္နာဘိန္နဝိသေသနာ. ती ही (समासवृत्ती) केवळ विशेष्यामुळे भिन्न आणि अभिन्न विशेषण असलेली असते; तसेच दुसरी देखील भिन्न आणि अभिन्न विशेषण असलेली असते. ၂၆၄. တဿာ ပဘေဒံ ဒဿေတိ ‘‘သာယ’’မိစ္စာဒိနာ. သာ အယံ သမာသဝုတ္တိ ယံကိဉ္စိ ဝတ္ထု သာမညာကာရပ္ပတီတံ ‘‘ဤဒိသမိဒံ နာညထာ’’တိ ကုတောစိ ဗျဝစ္ဆိဇ္ဇတေ ကေနစိ ဂုဏာဒိနာ ဝဝတ္ထာပီယတေ, တံ ဝိသေသျံ, တမေဝ မတ္တံ ဝိသေသနဘေဒဗျဝစ္ဆေဒတော, တေန. ဘိန္နာ အတုလျာ အဝယဝဓမ္မဿ သမုဒါယေ ဝတ္တနတော. အဘိန္နံ တုလျာကာရံ ဝိသေသနံ ယဿံ သာ အဘိန္နဝိသေသနာပိ အတ္ထေဝ. အပရာပျတ္ထိ, န ကေဝလံ သာယေဝ. ကီဒိသီ? ဘိန္နဉ္စ အဘိန္နဉ္စ ဝိသေသနံ ယဿန္တိ ဘိန္နာဘိန္နဝိသေသနာ. ဝိသေသျံ တု ဘိန္နန္တိ. २६४. तिचे प्रभेद 'सा अयम्...' इत्यादींद्वारे दर्शवतात. ती ही समासवृत्ती – जी कोणतीही वस्तू सामान्य रूपाने प्रतीत झाल्यावर 'हे असेच आहे, अन्यथा नाही' अशा प्रकारे कशाने तरी वेगळी केली जाते किंवा एखाद्या गुणाने प्रस्थापित केली जाते, त्याला 'विशेष्य' म्हणतात; केवळ त्या विशेष्याच्या आणि विशेषणाच्या भेदाच्या व्यवच्छेदामुळे. अवयवाचा धर्म समुदायामध्ये वर्तत असल्यामुळे ती 'भिन्न' म्हणजे अतुल्य असते. जिच्यामध्ये अभिन्न म्हणजे समान आकाराचे विशेषण असते, ती 'अभिन्नविशेषणा' देखील असतेच. दुसरी देखील आहे, केवळ तीच नाही. ती कशी? जिच्यामध्ये भिन्न आणि अभिन्न दोन्ही विशेषणे असतात, ती 'भिन्नाभिन्नविशेषणा' होय. परंतु विशेष्य मात्र भिन्न असते. ၂၆၄. ဣဒါနိ တဿာ သမာသဝုတ္တိယာ ဘေဒံ ဒဿေတိ ‘‘သာယ’’မိစ္စာဒိနာ. သာ အယံ သမာသဝုတ္တိ ဝိသေသျမတ္တေန ဂုဏာဒိသဒိသဓမ္မေန [Pg.257] ကရဏဘူတေန ကေနစိ ဥပမာနဝတ္ထုနာ မနသိ ကတံ ‘‘ဣဒံ ဥပမေယျဝတ္ထု ဤဒိသ’’န္တိ သာမညာဝတ္ထတော ဝိသုံ ကတဝိသေသျေန ဘိန္နာ ဝိသုံ ဇာတာ, တတ္တကေန အတုလျာ ဝါ, အဘိန္နဝိသေသနာ တုလျဝိသေသနယုတ္တာ အတ္ထေဝ ဘိန္နာဘိန္နဝိသေသနာ အတုလျတုလျဝိသေသနယုတ္တာ ဘိန္နဝိသေသျယုတ္တာ အပရာပိ အတ္ထိ. ဧဝံ သမာသဝုတ္တိ ဒွိဓာ ဟောတိ. ဝိသေသျမေဝ မတ္တမိတိ စ, အဝယဝေန သမ္ဘဝဘေဒသဘာဝဿ သမုဒါယေပိ ပဝတ္တတ္တာ ဘိန္နာတိ ဝုတ္တာ. အဘိန္နာနိ ဝိသေသနာနိ ယဿမိတိ စ, ဘိန္နာနိ စ အဘိန္နာနိ စေတိ စ, တာနိ ဝိသေသနာနိ ယဿမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २६४. आता त्या समासवृत्तीचा भेद 'सा अयम्...' इत्यादींद्वारे दर्शवतात. ती ही समासवृत्ती – गुणांसारख्या समान धर्माने युक्त असलेल्या एखाद्या उपमान वस्तूच्या साहाय्याने मनात घेतलेल्या 'हे उपमेय वस्तू अशा प्रकारची आहे' या सामान्य वस्तूपासून वेगळ्या केलेल्या विशेष्यामुळे भिन्न (वेगळी झालेली) किंवा तेवढ्यापुरती अतुल्य असते; आणि अभिन्न विशेषणांनी (समान विशेषणांनी) युक्त असलेली असते. तसेच, भिन्न-अभिन्न विशेषणांनी (अतुल्य-तुल्य विशेषणांनी) युक्त आणि भिन्न विशेष्य असलेली दुसरी देखील असते. अशा प्रकारे समासवृत्ती दोन प्रकारची असते. 'विशेष्यच केवळ' आणि अवयवाच्या संभवणाऱ्या भेदस्वभावाचा समुदायातही प्रवृत्ती होत असल्यामुळे तिला 'भिन्न' म्हटले आहे. 'जिच्यामध्ये अभिन्न विशेषणे आहेत' आणि 'भिन्न आणि अभिन्न' अशी ती विशेषणे जिच्यात आहेत, असा याचा विग्रह आहे. အဘိန္နဝိသေသန अभिन्नविशेषण ၂၆၅. २६५. ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယီ,ပသတ္ထရတနာလယော; ဂမ္ဘီရော စာ’ယ’မမ္ဘောဓိ,ပုညေနာ’ပါဒိတော မယာ. विशुद्ध अमृताचे दान देणारा, प्रशंसनीय रत्नांचे माहेरघर (आलय) आणि गंभीर असलेला हा समुद्र माझ्या पुण्याच्या प्रभावाने मला प्राप्त झाला आहे. ၂၆၅. ဥဘယမုဒါဟရတိ ‘‘ဝိသုဒ္ဓ’’ဣစ္စာဒိနာ. အယမမ္ဘောဓိ သာဂရော ပုညေန စိရာနုစိတကုသလမူလေန ဟေတုနာ မယာ အာပါဒိတော ပတ္တော, ကီဒိသော? ဝိသုဒ္ဓံ လောကဝေါဟာရတော ဒေဝါသုရာနံ မထနေ ဝိသေနာသမ္မိဿတ္တာ အမတံ ပီယူသံ သန္ဒဒါတီတိ ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယီ, အမ္ဘောဓိ. ဝိသုဒ္ဓံ ဒေါသလေသေနာပျသမ္ဖုဋ္ဌတ္တာ အစ္စန္တနိမ္မလံ အမတံ မရဏာဘာဝေန အမတသင်္ခါတံ နိဗ္ဗာနဓာတုံ သန္ဒဒါတိ ဥပဒေသကဘာဝေနာတိ ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယီ, သဒ္ဓမ္မော. ပသတ္ထာနိ နိရဝဇ္ဇတ္တာ ရတနာနိ မုတ္တာမဏိအာဒီနိ, တေသံ အာလယော ပဝတ္တိဋ္ဌာနံ, အမ္ဘောဓိ. ပသတ္ထာနိ ဗုဒ္ဓါဒီဟိ အနေကဓာ, ဝဏ္ဏိတာနိ ရတနာနိ သတ္တတိံသဗောဓိပက္ခိယဓမ္မသင်္ခတာနိ, တေသံ အာလယော, သဒ္ဓမ္မော. ဂမ္ဘီရော စ အဂါဓတ္တာ သာဂရော [Pg.258] သဒ္ဓမ္မော စ အယမာပါဒိတောတိ ပကတံ. အယံ ဝိသေသျမတ္တဘိန္နာ အဘိန္နဝိသေသနာ ဝိသေသျဿ အမ္ဘောဓိနော ဝိဝစ္ဆိတာ သဒ္ဓမ္မာ ဘိန္နတ္တာ, ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယိတ္တာဒိနော စ ဝိသေသနဿ ဝုတ္တေန ပကာရေနာဘိန္နတ္တာတိ. २६५. दोन्हींचे उदाहरण 'विशुद्ध...' इत्यादींद्वारे देतात. हा समुद्र (सागर) दीर्घकाळ संचित केलेल्या कुशलमुळांच्या (पुण्याच्या) प्रभावाने मला प्राप्त झाला आहे. तो कसा आहे? लोकव्यवहारानुसार देव आणि असुरांच्या समुद्रमंथनात विषाशी संमिश्रित न झाल्यामुळे जो विशुद्ध अमृताचे (पीयूषाचे) दान देतो, तो 'विशुद्धामृतसंदायी' समुद्र होय. दोषाच्या अंशानेही स्पर्श न झाल्यामुळे अत्यंत निर्मळ आणि मरणाचा अभाव असल्यामुळे अमृत संज्ञक अशा निर्वाणधातूचे उपदेशक रूपाने जे दान देतो, तो 'विशुद्धामृतसंदायी' सद्धम्म होय. दोषरहित असल्यामुळे प्रशंसनीय असलेली मुक्ता-मणी इत्यादी रत्ने, त्यांचे जे उत्पत्तीस्थान (आलय) आहे, तो समुद्र होय. बुद्धादींनी अनेक प्रकारे प्रशंसिलेली, सदतीस बोधीपाक्षिक धर्मांनी युक्त असलेली जी रत्ने आहेत, त्यांचे जे स्थान आहे, तो सद्धम्म होय. गंभीर म्हणजे अगाध असलेला सागर आणि सद्धम्म मला प्राप्त झाला आहे, हे स्पष्ट आहे. ही केवळ विशेष्यामुळे भिन्न आणि अभिन्न विशेषण असलेली समासवृत्ती आहे; कारण विशेष्य असलेला समुद्र हा विवक्षित सद्धम्मापेक्षा भिन्न आहे, आणि 'विशुद्धामृतसंदायी' इत्यादी विशेषणे सांगितलेल्या प्रकारे अभिन्न आहेत. ၂၆၅. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ဝိသုဒ္ဓါ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယီ လောကဝေါဟာရတော ဒေဝါသုရာနံ သမုဒ္ဒမထနေ ဝိသေန အမိဿတ္တာ ဝိသုဒ္ဓဘူတပီယူသဒါယကော, ဥပမာဘူတသမုဒ္ဒဝဏ္ဏနာယ ဗုဒ္ဓိယံ ဝတ္တမာနဿ သဒ္ဓမ္မဿ ပကာသနတော ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယီ ကာမာမိသာဒိဒေါသလဝေနာပိ အမိဿိတတ္တာ အတိနိမ္မလံ ဇရာမရဏရဟိတံ နိဗ္ဗာနံ ဥပဒေသဒါနေန ဝေနေယျာနံ ဒါယကော, ပသတ္ထရတနာလယော နိဒ္ဒေါသတ္တာ ပသတ္ထာနံ မုတ္တာမဏိအာဒီနံ ရတနာနံ ပဝတ္တိဋ္ဌာနဘူတော သမုဒ္ဒပက္ခေ, သဒ္ဓမ္မပက္ခေ ပန ပသတ္ထရတနာလယော ဗုဒ္ဓါဒီဟိ ပသတ္ထာနံ သတ္တတိံသဗောဓိပက္ခိယဓမ္မသင်္ခတရတနာနံ ပဝတ္တိဒေသဘူတော, ဂမ္ဘီရော ပကတိယာယေဝ အဂါဓော, ဧကတ္တနယာဒိစတုဗ္ဗိဓနယေဟိ ဂမ္ဘီရော အယံ အမ္ဘောဓိ စ ဧသော သမုဒ္ဒေါ စ, စိတ္တေန ဂဟိတသဒ္ဓမ္မော စ ပုညေန ဘဝန္တရောပစိတကုသလကမ္မေန မယာ အာပါဒိတော ပတ္တောတိ ဝိသေသျဘူတဿ အမ္ဘောဓိနော ဝတ္တုမိစ္ဆိတသဒ္ဓမ္မတော ဘိန္နတ္တာ စ, ‘‘ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယီ’’တိ ဣစ္စာဒိကာနံ ဝိသေသနာနံ ဥဘယဝိသေသျေပိ ယထာဝုတ္တနယေန အဘိန္နတ္တာ စ အယံ သမာသဝုတ္တိ ဝိသေသျမတ္တေန ဘိန္နာ အဘိန္နဝိသေသနာ ဟောတိ. २६५. आता "विसुद्धा" (विशुद्ध) इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. 'विशुद्ध-अमृत-प्रदाता' (विसुद्धाभतसन्दायी) म्हणजे लौकिक व्यवहारात देव आणि असुरांच्या समुद्रमंथनात विषाने अमिश्रित असल्यामुळे विशुद्ध असे पीयूष (अमृत) देणारा; उपमारूप समुद्राच्या वर्णनाने बुद्धीमध्ये विद्यमान असलेल्या सद्धम्माचे प्रकाशन केल्यामुळे 'विशुद्ध-अमृत-प्रदाता' म्हणजे काम-आमिष इत्यादी दोषांच्या अंशानेही अमिश्रित असल्यामुळे अत्यंत निर्मळ, जरामरणरहित अशा निर्वाणाचा उपदेशाद्वारे विनेय (शिष्य) जनांना दाता होय. 'प्रशस्त-रत्न-आलय' (पसत्थरतनालयो) म्हणजे निर्दोष असल्यामुळे समुद्राच्या पक्षात प्रशस्त अशा मुक्ता, मणी इत्यादी रत्नांचे उत्पत्तीस्थान; परंतु सद्धम्माच्या पक्षात 'प्रशस्त-रत्न-आलय' म्हणजे बुद्धादींनी प्रशस्त मानलेल्या सदतीस बोधिपाक्षिकधम्मरूपी रत्नांचे प्रवृत्तीस्थान (उत्पत्तीस्थान) होय. 'गंभीर' म्हणजे स्वभावानेच अगाध; एकत्वनय इत्यादी चार प्रकारच्या नयांनी गंभीर असा हा 'अंभोधी' (समुद्र) आणि हा समुद्र; आणि चित्ताने ग्रहण केलेला सद्धम्म हा पुण्याने, म्हणजेच जन्मांतरी संचित केलेल्या कुशल कर्माने माझ्याद्वारे प्राप्त केला गेला आहे. अशा प्रकारे विशेष्यभूत असलेल्या समुद्राचा, सांगू इच्छित असलेल्या सद्धम्मापासून भिन्न असल्यामुळे, आणि "विशुद्ध-अमृत-प्रदाता" इत्यादी विशेषणांचा दोन्ही विशेष्यांमध्ये पूर्वोक्त पद्धतीने अभिन्न असल्यामुळे, ही समासवृत्ती केवळ विशेष्यापुरती भिन्न आणि अभिन्न विशेषण असणारी (भिन्नाभिन्नविशेषणा) होते. ဘိန္နာဘိန္နဝိသေသန भिन्नाभिन्नविशेषण ၂၆၆. २६६. ဣစ္ဆိတတ္ထပဒေါ သာရော,ဖလပုပ္ဖောပသောဘိတော; သစ္ဆာယော’ယ’မပုဗ္ဗောဝ,ကပ္ပရုက္ခော သမုဋ္ဌိတော. इच्छित अर्थ प्रदान करणारा, श्रेष्ठ, फलपुष्पांनी सुशोभित, सुंदर छाया असलेला हा जणू अपूर्व कल्पवृक्षच उभा राहिला आहे. ၂၆၆. ‘‘ဣစ္ဆိတေ’’စ္စာဒိ. [Pg.259] အယမပုဗ္ဗောဝ ဝုတ္တဂုဏယောဂေန အစ္ဆရိယရူပတ္တာ ကပ္ပရုက္ခော သမုဋ္ဌိတော, ကီဒိသော? ဣစ္ဆိတံ လောကိယံ ယံ ကိဉ္စိ အတ္ထံ ပဒဒါတီတိ ဣစ္ဆိတတ္ထပဒေါ, ကပ္ပရုက္ခော. ဣစ္ဆိတံ လောကိယလောကုတ္တရံ ယံ ကိဉ္စိ အတ္ထံ ပဒဒါတီတိ ဣစ္ဆိတတ္ထပဒေါ, ဇိနော. သာရော သေဋ္ဌော, ကပ္ပရုက္ခော ဇိနော စ. ဖလာနိ ပုပ္ဖာနိ, တေဟိ ဥပသောဘိတော, ကပ္ပရုက္ခော. သဟ ဆာယာယ စန္ဒသူရိယာလောကဝိလောမရူပါယ ဝတ္တတေ သစ္ဆာယော, ကပ္ပရုက္ခော. ဇိနော တု ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တာယ ကာယကန္တာဒိရူပါယ ဆာယာယ ယုတ္တောတိ သစ္ဆာယောတိ. အယံ ဝိသေသျမတ္တဘိန္နာ ဘိန္နာဘိန္နဝိသေသနာ ဇိနတော ဝိသေသျဿ ကပ္ပရုက္ခဿ ဘိန္နတ္တာ, ဖလပုပ္ဖောပသောဘိတတ္ထဿ ကပ္ပရုက္ခေယေဝ သမ္ဘဝါ, ဣစ္ဆိတတ္ထပဒတ္ထဿ သာရတာယ သစ္ဆာယတာယ ဥဘယတ္ထေဝ ဘာဝတော ဝုတ္တဝိဓိနာတိ. २६६. "इच्छित" इत्यादी. हा अपूर्वच, कथित गुणांच्या योगाने आश्चर्यकारक रूप असल्यामुळे कल्पवृक्ष उभा राहिला आहे. तो कसा आहे? इच्छित असा कोणताही लौकिक अर्थ प्रदान करतो म्हणून 'इच्छितार्थप्रद' (इच्छितत्थपदो) - कल्पवृक्ष. इच्छित असा कोणताही लौकिक व लोकोत्तर अर्थ प्रदान करतो म्हणून 'इच्छितार्थप्रद' - जीन (बुद्ध). 'सार' म्हणजे श्रेष्ठ - कल्पवृक्ष आणि जीन दोन्ही. फळे आणि फुले यांनी सुशोभित - कल्पवृक्ष. चंद्र आणि सूर्याच्या प्रकाशाच्या विरुद्ध असणाऱ्या छायेशी युक्त असलेला 'सच्छाय' (सुंदर छाया असलेला) - कल्पवृक्ष. परंतु जीन (बुद्ध) हे पूर्वी सांगितलेलेल्या शरीरकांती इत्यादी रूपी छायेशी युक्त असल्यामुळे 'सच्छाय' होत. हे केवळ विशेष्यापुरते भिन्न आणि भिन्नाभिन्नविशेषण आहे; कारण जीन या विशेष्यापेक्षा कल्पवृक्ष हे विशेष्य भिन्न आहे, 'फलपुष्पांनी सुशोभित' हा अर्थ केवळ कल्पवृक्षाच्या बाबतीतच संभवतो, आणि 'इच्छितार्थप्रद', 'सार' व 'सच्छाय' हे अर्थ दोन्ही ठिकाणी (कल्पवृक्ष व जीन) विद्यमान असल्यामुळे पूर्वोक्त विधीनुसार हे सिद्ध होते. ၂၆၆. ‘‘ဣစ္ဆိတတ္ထိ’’စ္စာဒိ. ဣစ္ဆိတတ္ထပဒေါ သတ္တေဟိ ဣစ္ဆိတာနံ လောကိယအဝိညာဏကဝတ္ထာဘရဏာဒီနံ ဒါယကော ကပ္ပရုက္ခဝဏ္ဏနာယ စိတ္တေ ပတိဋ္ဌိတဿ ဇိနပဒတ္ထဿ ကထေတုကာမတာယ ဣစ္ဆိတတ္ထပဒေါ သတ္တေဟိ ပတ္ထိတာနံ လောကိယလောကုတ္တရာနံ သကလတ္ထာနံ အနုရူပဝသေန တေသံ တေသံ သတ္တာနံ ဒါယကော, သာရော ရုက္ခေသု ဤဒိသရုက္ခဿာဘာဝတော ဥတ္တမော, သာရော သဒေဝကာဒိသတ္တလောကေသု တာဒိသသတ္တဝိသေသာဘာဝတော ဥတ္တမော, ဖလပုပ္ဖောပသောဘိတော ကပ္ပဒ္ဒုမာနုရူပဖလေဟိ ပုပ္ဖေဟိ စ ဥပသောဘိတော, သစ္ဆာယော စန္ဒသူရိယာလောကေဟိ အာဝရဏီယရုက္ခစ္ဆာယာယ သမန္နာဂတော, သစ္ဆာယော နီလပီတာဒိဆဗ္ဗိဓရံသိဇာလေဟိ သမန္နာဂတော, အပုဗ္ဗော ပုဗ္ဗေ အသဉ္ဇာတော အယံ ကပ္ပရုက္ခော ဧသော ပစ္စက္ခော ကပ္ပပါဒပေါ သမုဋ္ဌိတော သတ္တာနံ ပုညာနုဘာဝေန လောကေ ပါတုဘူတောတိ. ဝတ္တုမိစ္ဆိတတ္ထဇိနပဒတ္ထတော ဝိသေသျဿ ကပ္ပရုက္ခဿ [Pg.260] ဘိန္နတ္တာ စ, ဣစ္ဆိတတ္ထဒါနသာရဘာဝသစ္ဆာယသင်္ခတာနံ ဝိသေသနာနံ ဥဘယသာဓာရဏတ္တာ စ, ဖလပုပ္ဖောပသောဘိတတာယ ရုက္ခဿေဝ ဝိသေသနတ္တာ စ အယံ သမာသဝုတ္တိ ဝိသေသျဘိန္နာဝ ဘိန္နာဘိန္နဝိသေသနာ ဟောတိ. ဣစ္ဆိတော စ သော အတ္ထော စေတိ စ, တံ ပဒဒါတီတိ စ, ဖလပုပ္ဖေဟိ ဥပသောဘိတောတိ စ, သဟ ဆာယာယ ဝတ္တမာနောတိ စ ဝါကျံ. २६६. "इच्छितार्थ" इत्यादी. 'इच्छितार्थप्रद' म्हणजे प्राण्यांनी इच्छिलेल्या लौकिक, अचेतन वस्तू, आभूषणे इत्यादींचा दाता - कल्पवृक्षाच्या वर्णनाद्वारे चित्तात प्रतिष्ठित असलेल्या 'जीन' (बुद्ध) या पदाच्या अर्थाचे कथन करण्याच्या इच्छेने; 'इच्छितार्थप्रद' म्हणजे प्राण्यांनी प्रार्थना केलेल्या लौकिक व लोकोत्तर अशा सर्व अर्थांचा त्या त्या प्राण्यांच्या अनुरूपतेनुसार दाता होय. 'सार' म्हणजे वृक्षांमध्ये अशा वृक्षाचा अभाव असल्यामुळे उत्तम; 'सार' म्हणजे सदेवकादी प्राणीलोकांमध्ये तशा विशिष्ट प्राण्याचा (बुद्धांचा) अभाव असल्यामुळे उत्तम. 'फलपुष्पसुशोभित' म्हणजे कल्पवृक्षाला अनुरूप अशा फळांनी आणि फुलांनी सुशोभित. 'सच्छाय' म्हणजे चंद्र-सूर्याच्या प्रकाशापासून संरक्षण करणाऱ्या वृक्षाच्या छायेने युक्त; 'सच्छाय' म्हणजे नील, पीत इत्यादी सहा प्रकारच्या रश्मीजालांनी (किरणांनी) युक्त. 'अपूर्व' म्हणजे पूर्वी कधीही उत्पन्न न झालेला हा कल्पवृक्ष, हा प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष उभा राहिला आहे, जो प्राण्यांच्या पुण्याच्या प्रभावाने जगात प्रकट झाला आहे. सांगू इच्छित असलेल्या 'जीन' या विशेष्यापेक्षा कल्पवृक्ष हे विशेष्य भिन्न असल्यामुळे, आणि 'इच्छितार्थदान', 'सारत्व' व 'सच्छायत्व' या संज्ञित विशेषणांच्या दोन्ही ठिकाणी साधारण (समान) असल्यामुळे, आणि 'फलपुष्पसुशोभितत्व' हे केवळ वृक्षाचेच विशेषण असल्यामुळे, ही समासवृत्ती विशेष्यभिन्न असून भिन्नाभिन्नविशेषणा होते. "इच्छित आणि तो अर्थ" असा, "तो प्रदान करतो" असा, "फळांनी व फुलांनी सुशोभित" असा, आणि "छायेशी युक्त असलेला" असा हा वाक्यविग्रह आहे. ၂၆၇. २६७. သာဂရတ္တေန သဒ္ဓမ္မော,ရုက္ခတ္တေနော’ဒိတော ဇိနော; သဗ္ဗေ သာဓာရဏာ ဓမ္မာ,ပုဗ္ဗတြာ’ညတြ တု’တ္တယံ. सागररूपाने सद्धम्म आणि कल्पवृक्षरूपाने जीन (बुद्ध) कथित केले आहेत; पहिल्या उदाहरणात सर्व धर्म (विशेषणे) साधारण आहेत, तर दुसऱ्या उदाहरणात तीन विशेषणे साधारण आहेत. ၂၆၇. တဒုဘယံ ဝိဝရတိ ‘‘သာဂရတ္တေနိ’’စ္စာဒိနာ. သဒ္ဓမ္မော သမ္ဗုဒ္ဓဘာသိတော သာဂရတ္တေန သာဂရဂုဏသဒိသတ္တာ သာဂရရူပေန ဥဒိတောတိ သမ္ဗန္ဓော, ကိတ္တိတောတိ အတ္ထော. ဇိနော ရုက္ခတ္တေန ယထာဝုတ္တနယေန ဥဒိတော တံ ပတ္တော အနုပေက္ခိတဿ ကက္ခဝုတ္တိယာ အမ္ဘောဓိအာဒိသဒ္ဒါနံ. ပကရဏာဒိနာ တု တထာ ပတီတျုဒယော, အညထာ ကထံ အမ္ဘောဓိအာဒိသဒ္ဒါနံ ဓမ္မာဒိသစ္ဆာယကတ္တံ သိယာ. ဘေဒေါ တု အယံ ပုဗ္ဗတြ ‘‘ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယိ’’စ္စာဒိကေ သဗ္ဗေ ယေ ကေစိ တတြောပါတ္တာ ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယိတ္တာဒယော သာဓာရဏာ တုလျာ ဓမ္မာ ဝိသေသနာနိ ဥဘယတြာပိ သမ္ဘဝါ, အညတြ တု အနန္တရဝုတ္တ ‘‘ဣစ္ဆိတတ္ထပဒေါ’’ဣစ္စာဒေါ ပန တယံ သာဓာရဏံ, အသာဓာရဏဉ္စ ဝိသေသနံ ဝုတ္တနယေနေတိ. २६७. त्या दोन्हीचे विवरण "सागररूपाने" इत्यादीद्वारे करतात. सम्यक्संबुद्धांनी भाषिलेला सद्धम्म सागररूपाने, म्हणजेच सागराच्या गुणांशी सदृश असल्यामुळे सागररूपाने कथित केला आहे, असा संबंध आहे; 'कीर्तित केला आहे' असा अर्थ आहे. जीन (बुद्ध) हे वृक्षरूपाने पूर्वोक्त पद्धतीने कथित केले आहेत, म्हणजेच त्या अवस्थेला प्राप्त झाले आहेत. प्रकरणादींच्या योगाने तशा अर्थाची प्रतीती होते; अन्यथा 'अंभोधी' (समुद्र) इत्यादी शब्दांचे सद्धम्मादींशी समान विशेषणत्व कसे बरे होईल? परंतु भेद हा आहे की, पहिल्या "विशुद्ध-अमृत-प्रदाता" इत्यादी उदाहरणात जे काही तिथे घेतलेले 'विशुद्ध-अमृत-प्रदातृत्व' इत्यादी सर्व धर्म (विशेषणे) आहेत, ते दोन्ही ठिकाणी संभवणारे साधारण व तुल्य धर्म आहेत. परंतु दुसऱ्या, नुकत्याच सांगितलेल्या "इच्छितार्थप्रद" इत्यादी उदाहरणात मात्र तीन विशेषणे साधारण आहेत आणि असाधारण विशेषण पूर्वोक्त पद्धतीने आहे. ၂၆၇. ဣဒါနိ တေဟိ ဒွီဟိ သမာသဝုတ္တေဟိ ဝုတ္တတ္ထဒွယံ ပကာသေတိ ‘‘သာဂရိ’’စ္စာဒိနာ. သာဂရတ္တေန သာဂရရူပေန သဒ္ဓမ္မော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေန ဒေသိတပရိယတ္တိသဒ္ဓမ္မော ဥဒိတော ကထိတော, ရုက္ခတ္တေန ဇိနော ဥဒိတော. သာဂရကပ္ပရုက္ခာဒိသဒ္ဒါ အတ္တနော အဘိဓေယျဘူတသာဂရရုက္ခာဒိကေ အတ္ထေ မုချဘာဝေန [Pg.261] အပဝတ္တိတွာ ဗုဒ္ဓိယံ ပဝတ္တအတ္ထဿာပိ သာဓာရဏဘူတဝိသေသနပရိဂ္ဂဟေန ဂမ္မမာနေ ဝတ္တုမိစ္ဆိတသဒ္ဓမ္မဇိနပဒတ္ထေယေဝ ပကရဏာဒိတော တာဒိသအတ္ထပ္ပတီတိယာသမ္ဘဝတော မုချဘာဝေန ပဝတ္တန္တီတိ အဓိပ္ပာယော. တထာ ဟိ ယဒိ ဧတေ မုချတ္ထေန န ပဝတ္တန္တိ, အမ္ဘောဓိကပ္ပရုက္ခသဒ္ဒါ သဒ္ဓမ္မဇိနပဒတ္ထေ ကထံ ပကာသေန္တီတိ တေသု ဒွီသု ဥဒါဟရဏေသု ပုဗ္ဗတြ ‘‘ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယီ’’ဣစ္စာဒိပုဗ္ဗုဒါဟရဏေ သဗ္ဗေ ဓမ္မာ ‘‘ဝိသုဒ္ဓါမတသန္ဒာယီ’’တိ သဗ္ဗေ ဝိသေသနဓမ္မာ သာဓာရဏာ အမ္ဘောဓိသဒ္ဓမ္မာနံ သမာနာ, အညတြ တု ‘‘ဣစ္ဆိတတ္ထပဒေါ’’တိအာဒိကေ အညသ္မိံ ဥဒါဟရဏေ ပန တယံ ‘‘ဣစ္ဆိတတ္ထပဒေါ, သာရော, သစ္ဆာယော’’တိ ဝိသေသနတ္တယံ သာဓာရဏံ. ဖလပုပ္ဖောပသောဘိတဘာဝေါ ပန ရုက္ခာဝေဏိကော, ‘‘အပုဗ္ဗော’’ဣစ္စာဒိကံ ဝိသေသနမေဝ. တထာ ဟိ ဣမိနာ ရုက္ခဓမ္မဘူတော ကောစိ ဝိသေသော ပကာသိတော န ဟောတီတိ ဝိသေသနတ္တံ အညေသုယေဝ ဝုတ္တံ. २६७. आता त्या दोन समासवृत्तींद्वारे कथित केलेल्या दोन अर्थांचे प्रकाशन "सागर" इत्यादीद्वारे करतात. सागररूपाने सद्धम्म, म्हणजेच सम्यक्संबुद्धांनी देशिलेला परियत्ति-सद्धम्म कथित (सांगितला) गेला आहे; वृक्षरूपाने जीन (बुद्ध) कथित केले गेले आहेत. सागर, कल्पवृक्ष इत्यादी शब्द आपल्या अभिधेयभूत (वाच्यार्थ) सागर, वृक्ष इत्यादी अर्थांमध्ये मुख्य रूपाने प्रवृत्त न होता, बुद्धीमध्ये प्रवृत्त झालेल्या अर्थाच्या देखील साधारण अशा विशेषणांच्या ग्रहणाने समजल्या जाणाऱ्या, सांगू इच्छित असलेल्या सद्धम्म आणि जीन या पदांच्या अर्थांमध्येच प्रकरणादींमुळे तशा अर्थाची प्रतीती संभवत असल्यामुळे मुख्य रूपाने प्रवृत्त होतात, असा अभिप्राय आहे. कारण जर हे मुख्य अर्थाने प्रवृत्त झाले नसते, तर अंभोधी आणि कल्पवृक्ष हे शब्द सद्धम्म आणि जीन यांच्या अर्थाला कसे बरे प्रकाशित करू शकले असते? म्हणून त्या दोन उदाहरणांपैकी पहिल्या "विशुद्ध-अमृत-प्रदाता" इत्यादी पूर्व उदाहरणात सर्व धर्म, म्हणजेच "विशुद्ध-अमृत-प्रदाता" इत्यादी सर्व विशेषणधर्म अंभोधी आणि सद्धम्म या दोघांचे साधारण (समान) आहेत. परंतु दुसऱ्या "इच्छितार्थप्रद" इत्यादी उदाहरणात मात्र "इच्छितार्थप्रद, सार, सच्छाय" हे तीन विशेषण साधारण आहेत. 'फलपुष्पसुशोभितत्व' हा धर्म मात्र वृक्षाचा असाधारण (आवेणिक) धर्म आहे, आणि "अपूर्व" इत्यादी केवळ विशेषणच आहे. कारण याने वृक्षधर्माशी संबंधित असलेला कोणताही विशेष अर्थ प्रकाशित होत नाही, म्हणून विशेषणत्व इतरांच्या बाबतीतच सांगितले आहे. ၂၆၈. २६८. ဝတ္ထုနော’ညပ္ပကာရေန, ဌိတာ ဝုတ္တိ တဒညထာ; ပရိကပ္ပီယတေ ယတ္ထ, သာ ဟောတိ ပရိကပ္ပနာ. वस्तूची स्थिती एका प्रकारे असताना, जिथे तिच्यापेक्षा भिन्न अशा दुसऱ्या प्रकारे तिची कल्पना केली जाते, ती 'परिकल्पना' (उत्प्रेक्षा) होय. ၂၆၈. ပရိကပ္ပနံ ပရိကပ္ပေတိ ‘‘ဝတ္ထုနော’’စ္စာဒိနာ. ဝတ္ထုနော သဇီဝဿ နိဇ္ဇီဝဿ ဝါ ဝုတ္တိ အဝတ္ထာ အညပ္ပကာရေန ဝတ္တုမိစ္ဆိတပ္ပကာရာပေက္ခာယ အညေနေဝ ရူပေန ဌိတာ, တဿေဝ တတော ယထာဝဋ္ဌိတပ္ပကာရတော အညထာ အညေန ပကာရေန ပရိကပ္ပီယတေ ယတ္ထ ဝုတ္တိယံ, သာ ပရိကပ္ပနာ ဟောတိ, ပရိကပ္ပီယတေ အညထာ ကရီယတေ ဝတ္ထုဋ္ဌိတိ ဧတိဿန္တိ ကတွာ. २६८. "वस्तूच्या" इत्यादीद्वारे परिकल्पनेचे लक्षण सांगतात. सजीव किंवा निर्जीव वस्तूची वृत्ती (अवस्था) एका प्रकारे, म्हणजेच सांगू इच्छित असलेल्या प्रकाराच्या अपेक्षेने दुसऱ्याच रूपाने स्थित असताना, तिची त्या वास्तविक स्थितीपेक्षा भिन्न अशा दुसऱ्या प्रकारे जिथे कल्पना केली जाते, ती 'परिकल्पना' होते; कारण "जिच्यामध्ये वस्तूची स्थिती अन्यथा (वेगळी) कल्पिली जाते" असा याचा विग्रह आहे. ၂၆၈. ဣဒါနိ ပရိကပ္ပနံ ဒဿေတိ ‘‘ဝတ္ထုနော’’ဣစ္စာဒိနာ. ဝတ္ထုနော ယဿ ကဿစိ သဝိညာဏကအဝိညာဏကပဒတ္ထဿ ဝုတ္တိ ပဝတ္တိ အညပ္ပကာရေန ကပ္ပနီယပ္ပကာရတော အညေန ဝိဇ္ဇမာနပ္ပကာရေန ဌိတာ ပဝတ္တမာနာ, တဒညထာ [Pg.262] တတော ဝိဇ္ဇမာနပ္ပကာရတော အညေနာဝိဇ္ဇမာနပ္ပကာရေန ယတ္ထ ဝုတ္တိယံ ပရိကပ္ပီယတေ, သာ ပရိကပ္ပနာ နာမ ဟောတိ. ပရိကပ္ပီယတေ အညထာ ကရီယတေ ဝတ္ထုဋ္ဌိတိ ဧတိဿမိတိ ဝိဂ္ဂဟော. २६८. आता "वस्तूच्या" इत्यादीद्वारे परिकल्पना दर्शवितात. कोणत्याही सचेतन किंवा अचेतन पदार्थाची वृत्ती (प्रवृत्ती) एका प्रकारे, म्हणजेच कल्पिलेल्या प्रकारापेक्षा भिन्न अशा विद्यमान प्रकाराने स्थित (प्रवृत्त) असताना, त्या विद्यमान प्रकारापेक्षा भिन्न अशा अविद्यमान प्रकाराने जिथे वृत्तीची कल्पना केली जाते, ती 'परिकल्पना' नावाचा अलंकार होय. "जिच्यामध्ये वस्तूची स्थिती अन्यथा (वेगळी) कल्पिली जाते" असा याचा विग्रह आहे. ၂၆၉. २६९. ဥပမာဗ္ဘန္တရတ္တေန, ကိရိယာဒိဝသေန စ; ကမေနော’ဒါဟရိဿာမိ, ဝိဝိဓာ ပရိကပ္ပနာ. उपमेचा अंतर्भाव असल्यामुळे आणि क्रिया इत्यादींच्या योगाने विविध प्रकारची असणारी परिकल्पना मी आता क्रमाने उदाहरणांसह स्पष्ट करेन. ၂၆၉. ဘေဒံ တဿာ ဒဿေတိ ‘‘ဥပမာ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဥပမာ အဗ္ဘန္တရေ ယဿာ, တဿာ ဘာဝေါ, တေန စ, ကိရိယာဒိဝသေန စ ဝိဝိဓာ နာနပ္ပကာရာ ပရိကပ္ပနာ ဣဒါနိ ကမေန ဥဒါဟရိဿာမိ. २६९. "उपमा" इत्यादीद्वारे तिचे भेद दर्शवितात. जिच्यामध्ये उपमा अंतर्भूत आहे तो भाव (उपमाभ्यंतरत्व) आणि क्रिया इत्यादींच्या योगाने विविध प्रकारची असणारी परिकल्पना मी आता क्रमाने उदाहरणांसह स्पष्ट करेन. ၂၆၉. ဣဒါနိ တဿ ဘေဒံ ဒဿေတိ ‘‘ဥပမာဗ္ဘန္တရေ’’စ္စာဒိနာ. ဥပမာဗ္ဘန္တရတ္တေန ဥပမာယ အဗ္ဘန္တရေ ဝိဇ္ဇမာနတ္တာ စ ကိရိယာဒိဝသေန စ ဝိဝိဓာ ပရိကပ္ပနာ ကမေန ဥဒါဟရိဿာမိ. ဥပမာ အဗ္ဘန္တရေ အဿာ ပရိကပ္ပနာယေတိ စ, တဿာ ဘာဝေါတိ စ, အနေကေ ဝိဓာ ပကာရာ ယာသမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २६९. आता तिचे भेद "उपमेचा अंतर्भाव" इत्यादीद्वारे दर्शवितात. उपमेचा अंतर्भाव असल्यामुळे, म्हणजेच उपमा अंतर्भूत असल्यामुळे आणि क्रिया इत्यादींच्या योगाने विविध प्रकारची असणारी परिकल्पना मी क्रमाने उदाहरणांसह स्पष्ट करेन. "जिच्यामध्ये उपमा अंतर्भूत आहे ती परिकल्पना" असा आणि "तिचा भाव" असा, तसेच "जिचे अनेक प्रकार आहेत ती" असा याचा विग्रह आहे. ဥပမာဗ္ဘန္တရပရိကပ္ပနာ उपमाभ्यंतरपरिकल्पना (उपमेचा अंतर्भाव असणारी परिकल्पना) ၂၇၀. २७०. ဣစ္ဆာဘင်္ဂါတုရာ’သီနာ,တာ’တိနိစ္စလ’မစ္ဆရာ; ဝသံ နေန္တီဝ ဓီရံ တံ,တဒါ ယောဂါဘိယောဂတော. इच्छाभंगामुळे व्याकुळ होऊन अत्यंत निश्चल बसलेल्या त्या अप्सरा, जणू योगाभ्यासाच्या बळाने त्या धीरगंभीर (बुद्धांना) आपल्या वशात आणत आहेत. ၂၇၀. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဣစ္ဆာ’’ဣစ္စာဒိ. ဣစ္ဆာဘင်္ဂေန ‘‘ဗုဒ္ဓံ ဘဂဝန္တံ ဝသေ ဝတ္တေဿာမာ’’တိ ဗောဓိမူလေ ကတာဘိလာသဝိနာသေန အာတုရာ ဒုက္ခိတာ အတိနိစ္စလသဘာဝပ္ပတ္တာ အတိနိစ္စလံ နာသိကဂ္ဂေ နယနေ ကတာနတာဝသေန အစ္စန္တမကြိယမာသီနာ နိသိန္နာ တာ အစ္ဆရာ ယောဂိနိသင်္ကာသာ မာရင်္ဂနာတိ [Pg.263] ယထာဝဋ္ဌိတာယ သစေတနာနံ မာရင်္ဂနာလက္ခဏာနံ ဝတ္ထူနံ ဝုတ္တိ ဝုတ္တာ, သာယမညထာ ပရိကပ္ပီယတေ. ဓီရံ ဒေဝင်္ဂနာနမ္ပိ သိင်္ဂါရဘာဝေါပစရိတဝိလာသာတိသယေနာပိ အကမ္ပတ္တာ. တံ ဘဂဝန္တံ. ယောဂေါ မန္တာနုဋ္ဌာနံ, တတ္ထ အဘိယောဂတော ယုဉ္ဇနေန ဝသမတ္တနော အာယတ္တဘာဝံ တဒါ နေန္တီဝ ဝဟန္တိ မညေတိ. ဧတ္ထ ဣဝ သဒ္ဒသုတိယာ ဥပမာသန္ဒေဟော န ကာတဗ္ဗော, သဝသာနယနမကုဗ္ဗန္တိယော မာရင်္ဂနာ ဝသံ နေန္တီဝါတိ ပရိကပ္ပီယန္တေ. ဟောတိ စ– २७०. "इच्छा" इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. इच्छाभंगामुळे, म्हणजेच "आम्ही बुद्ध भगवंतांना वश करू" या बोधीवृक्षाच्या मुळाशी केलेल्या इच्छेचा विनाश झाल्यामुळे व्याकुळ (दुःखित) झालेल्या, अत्यंत निश्चल स्वभावाला प्राप्त झालेल्या, नाकाच्या शेंड्यावर दृष्टी स्थिर करून खाली वाकल्यामुळे अत्यंत अक्रिय होऊन बसलेल्या त्या अप्सरा, म्हणजेच योगिनींसारख्या दिसणाऱ्या मारकन्या (मारेच्या कन्या) होत. अशा प्रकारे सचेतन असणाऱ्या मारकन्यांच्या लक्षणांची जशी स्थिती होती तशी ती सांगितली आहे, परंतु तिची येथे अन्यथा (वेगळ्या प्रकारे) कल्पना केली जात आहे. देवकन्यांच्या शृंगारभावाने युक्त अशा विलासांच्या अतिशयानेही जे कंपित झाले नाहीत अशा 'धीर' भगवंतांना. 'योग' म्हणजे मंत्रानुष्ठान, त्यात 'अभियोग' म्हणजे जोडल्या गेल्यामुळे (एकाग्रतेमुळे) जणू त्या भगवंतांना आपल्या वशात आणत आहेत, असे मानले जाते. येथे 'इव' (जणू) हा शब्द ऐकून उपमेचा संशय घेऊ नये; कारण स्वतःच्या वशात न आणू शकणाऱ्या मारकन्या जणू वशात आणत आहेत, अशी कल्पना केली जात आहे. आणि असे म्हटले आहे - ‘‘ဝသံ နေန္တီဝ ဓီရ’’န္တိ, နယနေ နော’ပမာနတာ; န ဟိ ကတ္တုကြိယာယ’တ္ထိ, ဥပမာနောပမေယျတာတိ. "धीर भगवंतांना जणू वशात आणत आहेत" या न्यायामध्ये उपमानत्व नाही; कारण कर्त्याच्या क्रियेमध्ये उपमान-उपमेयभाव नसतो. ကြိယာပရိကပ္ပတ္တေပိ အယမုပမာဗ္ဘန္တရာ ပရိကပ္ပနာ, န ကေဝလကြိယာပရိကပ္ပနာ မာရင်္ဂနာနမစလောပဝေသနဿ ယောဂါဘိယောဂေန သာမျသန္ဒဿနတော, တထာဘူတာယ စောပဝေသနကြိယာယ ဓီရဿာပိ တာဒိသဿ ဘဂဝတော အဝသာနယနတ္တန္တိ ပရိကပ္ပနတောတိ. क्रियापरिकल्पना असली तरीही ही उपमाभ्यंतर परिकल्पना आहे, केवळ क्रियापरिकल्पना नाही; कारण मारकन्यांच्या निश्चल बसण्याचा योगाभ्यासाशी (योगाभियोगाशी) साम्यसंबंध दिसून येतो, आणि तशा प्रकारच्या बसण्याच्या क्रियेने त्या धीरगंभीर अशा भगवंतांना देखील आपल्या वशात आणत आहेत, अशी कल्पना केली गेल्यामुळे हे सिद्ध होते. ၂၇၀. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ဣစ္ဆာ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဣစ္ဆာဘင်္ဂါတုရာ အဇပါလနိဂြောဓမူလေ နိသိန္နံ ဘဂဝန္တံ ‘‘ပလောဘေဿာမာ’’တိ မာရင်္ဂနာ အတ္တနာယေဝ ကတာယ ဣစ္ဆာယ အနိဗ္ဗတ္တိယာ ပီဠိတာ, အတိနိစ္စလံ ဟုတွာ နာသိကဂ္ဂေ ပတိတဒိဋ္ဌေဟိ သမန္နာဂတာနညဝုတ္တိယာ ကြိယန္တရဝိရဟတော. အာသီနာ ဈာယမာနာ နိသိန္နာ တာ အစ္ဆရာ ယောဂိနိသဒိသာ တဏှာအရတိရဂါသင်္ခါတာ မာရင်္ဂနာယော ဓီရံ သိင်္ဂါရာဓိပ္ပာယေန ကတာနေကလီလာဝိလာသေနာပိ အကမ္ပမာနံ တံ ဘဂဝန္တံ ယောဂါဘိယောဂတော မန္တဇပ္ပနသင်္ခါတယောဂေ ယုဉ္ဇနေန ဝသံ အတ္တနော ဝသံ တဒါ အတ္တနော ပရာဇိတကာလေ နေန္တီဝ ပါပေန္တိ မညေတိ. ဧတ္ထ ပုဗ္ဗဒ္ဓေန မာရင်္ဂနာသင်္ခါတသဇီဝပဒတ္ထာနံ ဝိဇ္ဇမာနပ္ပကာရံ ဒဿိတံ. [Pg.264] ပုန အပရဒ္ဓေန တေသမေဝ အဝိဇ္ဇမာနယောဂါဘိယောဂေန ဝသီကရဏံ ကပ္ပိတံ. မာရင်္ဂနာနံ နိစ္စလနိသဇ္ဇာယ ယောဂိနီနံ မန္တဇ္ဈယနသဒိသတ္တာ မာရင်္ဂနာနံ ယောဂိနီနံ ဥပမာနောပမေယျတ္တံ သာမတ္ထိယာ ဂမျတေတိ ဧသာ ဥပမာဗ္ဘန္တရပရိကပ္ပနာ နာမ. ‘‘နေန္တိ ဣဝါ’’တိ ပယောဂေ ကတေပိ ကြိယာပရိကပ္ပနံ န ဟောတေဝ. ဣစ္ဆာယ ဘင်္ဂေါတိ စ, တေန အာတုရာတိ စ, နိဂ္ဂတံ စလံ စလနံ အသ္မာ အာသနသ္မာတိ စ, အတိသယေန နိစ္စလန္တိ စ, ကြိယာဝိသေသနံ, ယောဂေ အဘိယောဂေါတိ စ ဝါကျံ. २७०. आता "इच्छा" इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. इच्छेच्या भंगाने व्याकुळ झालेल्या, अजपाल वडाच्या झाडाखाली बसलेल्या भगवंतांना "आम्ही भुरळ पाडू" अशा स्वतःच्याच इच्छेच्या अपूर्णतेने पीडित झालेल्या, अत्यंत निश्चल होऊन नाकाच्या शेंड्यावर दृष्टी स्थिर केलेल्या आणि इतर कोणत्याही क्रियेविना एकाग्र झालेल्या. ध्यान करत बसलेल्या, योगिनींसारख्या असणाऱ्या त्या तण्हा (तृष्णा), अरती आणि रागा नावाच्या मारकन्या (मारेच्या कन्या) त्या धीरगंभीर भगवंतांना शृंगारिक हेतूने केलेल्या अनेक लीला-विलासांनी देखील विचलित न करता, योगाभ्यासाने किंवा मंत्रजप रूपी योगात मग्न होऊन आपल्या वशमध्ये करत आहेत, म्हणजेच आपल्या पराभवाच्या वेळी त्यांना आपल्या अधीन करत आहेत असे वाटते. येथे पूर्वार्धाने मारकन्या नावाच्या सजीव पदार्थांची विद्यमान स्थिती दर्शविली आहे. पुन्हा उत्तरार्धाने त्यांच्या नसलेल्या योगाभ्यासाने वश करणे कल्पिले आहे. मारकन्यांचे निश्चल बसणे हे योगिनींच्या मंत्रध्यानासारखे असल्यामुळे मारकन्या आणि योगिनी यांच्यातील उपमान-उपमेय भाव सामर्थ्याने समजला जातो, म्हणून याला 'उपमाभ्यंतर परिकल्पना' म्हणतात. "नेतात जणू" (नेन्ती इव) असा प्रयोग केला असला तरी येथे क्रिया-परिकल्पना होत नाही. "इच्छेचा भंग" आणि "त्याने व्याकुळ", "आसनावरून हालचाल नाहीशी झाली आहे" आणि "अत्यंत निश्चल" हे क्रियाविशेषण आहे, आणि "योगात अभियोग" हे वाक्य आहे. ‘‘နေန္တိ ဣဝါ’’တိ ဣဓ ဣဝသဒ္ဒသုတိယာ ဥပမာဇောတနတ္ထံ စေတိ သံသယော န ကာတဗ္ဗော, သာဓမ္မသင်္ခါတဂုဏဝိသေသဿ သမ္ဗန္ဓေ အသတိ ကြိယာမတ္တဿ ဥပမာဘာဝတော. ဝုတ္တံ ဟိ– "नेतात जणू" (नेन्ती इव) येथे 'इव' शब्दाच्या श्रवणाने उपमा दर्शवण्यासाठी आहे अशी शंका घेऊ नये, कारण समान धर्म असलेल्या गुणविशेषाचा संबंध नसताना केवळ क्रियेची उपमा होऊ शकत नाही. कारण म्हटले आहे - ‘‘ဝသံ နေန္တီဝ ဓီရ’’န္တိ, နယေန နော’ပမာနတာ; န ဟိ ကတ္တုကြိယာယ’တ္ထိ, ဥပမာနောပမေယျတာတိ. "धीरगंभीर पुरुषाला वश करत आहेत जणू" यामध्ये नेण्याच्या क्रियेत उपमानत्व (उपमान भाव) नाही; कारण कर्त्याच्या क्रियेमध्ये उपमान-उपमेय भाव नसतो. ‘‘ဝသံ နေန္တီဝ ဓီရ’’န္တိ ဧတ္ထ နယနေ ဂမျမာနေ ပါပနေ ဥပမာနတာ ဥပမာနဘာဝေါ နတ္ထိ, ဟိ တထေဝ, ကတ္တုကြိယာယ ကတ္တုသမ္ဗန္ဓိယာ ကြိယာယ ဥပမာနောပမေယျတာ ဥပမာနဘာဝေါ ဥပမေယျဘာဝေါ နတ္ထီတိ အယံ ဟေတ္ထတ္ထော. "धीरगंभीर पुरुषाला वश करत आहेत जणू" येथे नेणे म्हणजेच प्राप्त करून देणे यात उपमानत्व किंवा उपमानभाव नाही, कारण कर्त्याशी संबंधित असलेल्या क्रियेमध्ये उपमानभाव आणि उपमेयभाव नसतो, हाच याचा अर्थ आहे. ကြိယာပရိကပ္ပနာ क्रियापरिकल्पना (क्रियेची कल्पना) ၂၇၁. २७१. ဂဇံ မာရော သမာရုဠှော, ယုဒ္ဓါယ’စ္စန္တ’မုန္နတံ; မဂ္ဂ’မနွေသတိ နူန, ဇိနဘီတော ပလာယိတုံ. युद्धासाठी अत्यंत उंच अशा हत्तीवर आरूढ झालेला मार, जिनांच्या (बुद्धांच्या) भयाने पळून जाण्यासाठी नक्कीच मार्ग शोधत आहे. ၂၇၁. ‘‘ဂဇ’’မိစ္စာဒိ. ယုဒ္ဓါယ အစ္စန္တမတိသယေန ဥန္နတမုစ္စံ ဂဇံ ဟတ္ထိံ သမာရုဠှော မာရော ဝသဝတ္တီ တံ ဇိနာတီတိ အတ္ထေန ဇိနတော ဘီတော ပလာယိတုံ ကိဉ္စိ နိလီယနဋ္ဌာနံ မဂ္ဂံ ပထံ အနွေသတိ နူန မညေ. ဣတိ ကြိယာပရိကပ္ပနာ အာရောဟနကြိယာယ မဂ္ဂမနွေသနတ္ထန္တိ ပရိကပ္ပိတတ္တာ. २७१. "गज" इत्यादी. युद्धासाठी अत्यंत म्हणजे अतिशय उंच अशा हत्तीवर आरूढ झालेला वशवर्ती मार, जो जिंकतो या अर्थाने 'जिन' असलेल्या भगवंतांच्या भयाने पळून जाण्यासाठी लपण्याची जागा किंवा मार्ग शोधत आहे असे वाटते. ही क्रियापरिकल्पना आहे, कारण हत्तीवर चढण्याची क्रिया ही मार्ग शोधण्यासाठी आहे अशी कल्पना केली आहे. ၂၇၁. ‘‘ဂဇ’’မိစ္စာဒိ. [Pg.265] ယုဒ္ဓါယ ယုဒ္ဓတ္ထံ အစ္စန္တံ အတိသယေန ဥန္နတံ ဒိယဍ္ဎသတယောဇနာယာမာနုရူပဥစ္စဂုဏသမန္နာဂတံ ဂဇံ ဂိရိမေခလံ သမာရုဠှော မာရော ဇိနာ ဘီတော ပလာယိတုံ မဂ္ဂံ နိဗ္ဘယံ ပထံ အနွေသတိ နူန ဂဝေသတိ မညေ. ယုဒ္ဓတ္ထံ ကုရုမာနော ဂဇာရောဟနံ မဂ္ဂါနွေသနတ္ထမိတိ ကဝိနာ ပရိကပ္ပိတတ္တာ ဧသာ ကြိယာပရိကပ္ပနာ နာမ. အစ္စန္တမိတိ အသင်္ချ သသင်္ချဘာဝေပိ ပကရဏတော အာဓိက္ကေ ဧဝ ဝတ္တတိ. २७१. "गज" इत्यादी. युद्धासाठी म्हणजे युद्धाच्या उद्देशाने अत्यंत म्हणजे अतिशय उंच, दीडशे योजन उंचीच्या गुणांनी युक्त अशा 'गिरीमेखल' नावाच्या हत्तीवर आरूढ झालेला मार, जिनांच्या (बुद्धांच्या) भयाने पळून जाण्यासाठी निर्भय मार्ग शोधत आहे असे वाटते. युद्धासाठी हत्तीवर चढणे हे मार्ग शोधण्यासाठी आहे अशी कवीने कल्पना केल्यामुळे याला 'क्रियापरिकल्पना' म्हणतात. 'अत्यंत' हा शब्द संख्या नसलेल्या किंवा संख्या असलेल्या दोन्ही बाबतीत संदर्भावरून अधिकता दर्शवण्यासाठीच वापरला जातो. ဂုဏပရိကပ္ပနာ गुणपरिकल्पना (गुणाची कल्पना) ၂၇၂. २७२. မုနိန္ဒ ပါဒဒွန္ဒေ တေ, စာရုရာဇီဝသုန္ဒရေ; မညေ ပါပါဘိသမ္မဒ္ဒ-ဇာတသောဏေန သောဏိမာ. हे मुनींद्र! सुंदर कमळासारख्या आपल्या दोन्ही चरणकमलांवरील लाल रंग, मला वाटते की, पापांच्या विमर्दाने (नाशाने) निघालेल्या रक्तामुळे लाल झाला आहे. ၂၇၂. မုနိန္ဒ တေ စာရု စ တံ ရာဇီဝံ ပဒုမဉ္စ တမိဝ သုန္ဒရံ တသ္မိံတေ ပါဒဒွန္ဒေ သောဏိမာ လောဟိတတ္တဂုဏော, ဣတိ ယထာဝဋ္ဌိတာ အစေတနဿ လောဟိတတ္တလက္ခဏဿ ဝတ္ထုနော ဝုတ္တိ ဝုတ္တာ, သာယမညထာ ပရိကပ္ပီယတေ. ပါပါနံ ကိလေသာရီနံ အဘိသမ္မဒ္ဒေန အတိသယံ သမ္ပိသနေန ဇာတံ သောဏံ ရုဓိရံ, တေန ဇာတောတိ မညေ. ဣတိ ဂုဏပရိကပ္ပနာ ပါဒဒွန္ဒသန္နိဟိတလောဟိတတ္တဂုဏဿ ‘‘ပါပါ…ပေ… သောဏေနေ’’တိ ပရိကပ္ပိတတ္တာ. २७२. हे मुनींद्र! आपल्या सुंदर कमळासारख्या दोन्ही चरणांमधील लालसरपणा हा लाल रंगाचा गुण आहे. अशा प्रकारे अचेतन वस्तूच्या लाल रंगाच्या लक्षणाची जशी आहे तशी स्थिती सांगितली आहे, तिची येथे दुसऱ्या प्रकारे कल्पना केली आहे. पापांच्या म्हणजेच क्लेशरूपी शत्रूंच्या विमर्दाने (चेंदामेंदा केल्याने) निघालेले लाल रक्त, त्याने तो लाल रंग निर्माण झाला आहे असे मला वाटते. ही गुणपरिकल्पना आहे, कारण चरणांवर असलेल्या लाल रंगाच्या गुणाची "पापांच्या... रक्ताने" अशी कल्पना केली आहे. ၂၇၂. ‘‘မုနိန္ဒေ’’စ္စာဒိ. ဟေ မုနိန္ဒ တေ တဝ စာရုရာဇီဝသုန္ဒရေ မနုညပဒုမသုန္ဒရေ ပါဒဒွန္ဒေ သောဏိမာ ရတ္တဝဏ္ဏံ ပါပါဘိသမ္မဒ္ဒဇာတသောဏေန မညေ သပရသန္တာနဂတပါပါနံ သမ္မဒ္ဒနေန ဇာတေန ရုဓိရေနာတိ မညေ. သဗ္ဗညုနော ပါဒေ ဘဝန္တရသိဒ္ဓပုညကမ္မာနုဘာဝေန ဇာတရတ္တဝဏ္ဏံ ‘‘ပါပါဘိသမ္မဒ္ဒနေနာ’’တိ ပရိကပ္ပိတတ္တာ အယံ ဂုဏပရိကပ္ပနာ နာမ. စာရု စ တံ ရာဇီဝဉ္စာတိ စ, ပါပါနံ အဘိသမ္မဒ္ဒေါတိ စ, တေန ဇာတဉ္စာတိ စ, တဉ္စ တံ သောဏဉ္စာတိ စ, သောဏဿ ဘာဝေါတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २७२. "मुनींद्र" इत्यादी. हे मुनींद्र! आपल्या सुंदर कमळासारख्या मनोहर दोन्ही चरणांमधील लाल रंग हा स्वतःच्या आणि इतरांच्या मनातील पापांच्या विमर्दाने निर्माण झालेल्या रक्तामुळे झाला आहे असे मला वाटते. सर्वज्ञांच्या (बुद्धांच्या) चरणांवर पूर्वजन्मीच्या पुण्यकर्माच्या प्रभावाने निर्माण झालेल्या लाल रंगाची "पापांच्या विमर्दाने" अशी कल्पना केल्यामुळे याला 'गुणपरिकल्पना' म्हणतात. "सुंदर आणि ते कमळ", "पापांचा विमर्द", "त्याच्याने निर्माण झालेले", "ते आणि ते रक्त", "रक्ताचा भाव" असा याचा विग्रह आहे. ၂၇၃. २७३. မညေသင်္ကေ [Pg.266] ဓုဝံ နူန-မိဝ’မိစ္စေဝမာဒိဟိ; သာ’ယံ ဗျဉ္ဇီယတေ ကွာပိ, ကွာပိ ဝါကျေန ဂမျတေ. मला वाटते (मञ्ञे), शंका वाटते (सङ्के), निश्चितच (धुवं), नक्कीच (नूनं), जणू (इव) इत्यादी शब्दांद्वारे ही परिकल्पना कधी व्यक्त केली जाते, तर कधी वाक्याद्वारे समजली जाते. ၂၇၃. ဝေါဟာရတ္ထံ ပရိကပ္ပနာသူစကေ သဒ္ဒေ ဒဿေန္တော အာဟ ‘‘မညေ’’ဣစ္စာဒိ. ဣတိ ဧဝရူပေါ သဒ္ဒရာသိ အာဒိ ယေသံ ‘‘တက္ကေမိ, ပရိကပ္ပေမိ, စိန္တယာမိ, ယထေ’’တျေဝမာဒီနံ, တေဟိ သာယံ ပရိကပ္ပနာ ကွာပိ ယထာဝုတ္တေ ဗျဉ္ဇီယတေ ပကာသီယတေ, ကွာပိ ကတ္ထစိ ပန ဝါကျေန ဂမျတေ မညေဣစ္စာဒီနမဘာဝေပီတိ. २७३. व्यवहारासाठी परिकल्पना सुचवणारे शब्द दाखवताना "मला वाटते" (मञ्ञे) इत्यादी म्हणतात. अशा प्रकारच्या शब्दांचा समूह ज्यांच्या सुरुवातीला आहे, जसे की "तर्क करतो", "कल्पना करतो", "विचार करतो", "जसे" इत्यादी, त्यांच्याद्वारे ही परिकल्पना कधी वर सांगितल्याप्रमाणे स्पष्ट केली जाते, तर कधी "मला वाटते" इत्यादी शब्द नसतानाही केवळ वाक्याद्वारे समजली जाते. ၂၇၃. ဝေါဟာရသုခတ္ထံ ပရိကပ္ပနာပကာသကေ သဒ္ဒေ ဒဿေတိ ‘‘မညေ’’စ္စာဒိနာ. မညေ, သင်္ကေ, ဓုဝံ, နူန, ဣဝ, ဧဝမာဒီဟိ သဒ္ဒေဟိ သာယံ ပရိကပ္ပနာ ကွာပိ ဧတ္ထ ဝိယ ကတ္ထစိ ဗျဉ္ဇီယတေ ပကာသီယတေ, ကွာပိ ကတ္ထစိ ဝါကျေန ကြိယာကာရကသမ္ဗန္ဓသဟိတပဒသမုဒါယေန ဂမျတေ ဣဝါဒိသဒ္ဒယောဂါဘာဝေပိ ကေဝလံ ဝါကျသာမတ္ထိယေနေဝ ဉာယတေ. ‘‘မညေ’’စ္စာဒိပဒပဉ္စကံဒွန္ဒသမာသေန နိဒ္ဒိဋ္ဌံ. ဣတိ ဧဝံ ပကာရော သဒ္ဒသမုဒါယော အာဒိ ယေသံ ‘‘တက္ကေမိ, ပရိကပ္ပေမိ, စိန္တယာမိ, ယထာ’’တိအာနီနန္တိ ဝိဂ္ဂဟော. २७३. व्यवहाराच्या सुलभतेसाठी परिकल्पना प्रकट करणारे शब्द दाखवताना "मला वाटते" (मञ्ञे) इत्यादी म्हणतात. मञ्ञे (मला वाटते), सङ्के (शंका वाटते), धुवं (निश्चितच), नूनं (नक्कीच), इव (जणू) इत्यादी शब्दांद्वारे ही परिकल्पना कधी येथे सांगितल्याप्रमाणे स्पष्ट केली जाते, तर कधी 'इव' इत्यादी शब्दांचा संबंध नसतानाही केवळ क्रिया आणि कारक यांच्या संबंधाने युक्त असलेल्या पदसमूहाच्या (वाक्याच्या) सामर्थ्यानेच समजली जाते. "मञ्ञे" इत्यादी पाच पदांचा द्वंद्व समासाने निर्देश केला आहे. अशा प्रकारचा शब्दसमूह ज्यांच्या सुरुवातीला आहे, जसे की "तर्क करतो", "कल्पना करतो", "विचार करतो", "जसे" इत्यादी, असा याचा विग्रह आहे. ဂမ္မပရိကပ္ပနာ गम्यपरिकल्पना (वाक्यावरून समजणारी कल्पना) ၂၇၄. २७४. ဒယာသဉ္စာရသရသာ, ဒေဟာ နိက္ခန္တကန္တိယော; ပီဏေန္တာ ဇိန တေ သာဓု-ဇနံ သရသတံ နယုံ. हे जिन! दयेच्या प्रवाहाने सरस (करुणेने ओथंबलेल्या) आपल्या शरीरातून निघालेली कांती (तेज) सज्जनांना तृप्त करत त्यांनाही सरसतेकडे (प्रेमाकडे) घेऊन गेली. ၂၇၄. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဒယာ’’ဣစ္စာဒိ. ရသော သိနေဟော, တေန သဟ ဝတ္တမာနော သရသော. ဒေဟော. ဒယာယ ကရုဏာယ သဉ္စာရော ဒုက္ခိတသတ္တဝိသယာ နိရန္တရပ္ပဝတ္တိ, တေန သရသော, တတော. ဇိန တေ ဒေဟာ သရီရတော နိက္ခန္တကန္တိယော သာဓုဇနံ ပီဏေန္တာ တပ္ပေန္တာ တမေဝ ဇနံ သရသတံ သပေမတံ နယုံ ပါပေသုံ, တာဒိသံ တထာဝိဓဒေဟနိက္ခန္တကန္တီ နံ သာဓုဇနံ ပီဏေန္တိ. ဂမ္မမာနပရိကပ္ပနာယံ ယတော ကန္တိယော [Pg.267] လဒ္ဓသရသသရီရသံသဂ္ဂါ သယမ္ပိ သရသာ ဣဝ အတ္တာနံ သေဝမာနမ္ပိ သာဓုဇနံ သရသတံ နေန္တီတိ ဂမျတေ. २७४. "दया" इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. रस म्हणजे स्नेह (प्रेम), त्याने युक्त असलेला तो 'सरस'. देह. दयेचा म्हणजेच करुणेचा संचार म्हणजे दुःखी प्राण्यांविषयी निरंतर प्रवृत्ती, त्याने सरस, त्यावरून. हे जिन! आपल्या शरीरातून निघालेली कांती सज्जनांना तृप्त करत, त्यांनाही सरसतेकडे म्हणजेच प्रेमाकडे घेऊन गेली, अशा प्रकारच्या शरीरातून निघालेल्या कांती सज्जनांना तृप्त करतात. गम्यमान परिकल्पनेमध्ये, ज्या अर्थी कांतीला सरस शरीराचा संसर्ग लाभल्यामुळे ती स्वतःही सरस असल्यासारखी आपली सेवा करणाऱ्या सज्जनांनाही सरस बनवते, असे समजते. ၂၇၄. ဝါကျဂမ္မပရိကပ္ပနမုဒါဟရတိ ‘‘ဒယေ’’စ္စာဒိနာ. ဟေ ဇိန တေ ဒယာသဉ္စာရသရသာ ဒုက္ခိတသတ္တဝိသယာယ ကရုဏာယ သဝိသယေ နိရန္တရပ္ပဝတ္တိယာ သဉ္ဇာတသ္နေဟတော ဒေဟာ သရီရတော နိက္ခန္တကန္တိယော ဒသဒိသာသု နိဂ္ဂတာ နီလာဒိဆဗ္ဗဏ္ဏရံသိယော သာဓုဇနံ ကတပုညံ ဥတ္တမဇနံ ပီဏေန္တာ သရသတံသသ္နေဟဘာဝံ ပေမသဟိတတ္တံ နယုံ တမေဝ သာဓုဇနံ ပါပေသုံ. ‘‘သရသတံ နယု’’န္တိ ဧတ္ထ ‘‘သာဓုဇန’’န္တိ သုတသမ္ဗန္ဓေန ဉာယတိ. ကရုဏာသိနေဟသောမ္မဒေဟသံသဂ္ဂတော ကန္တိယော သယမ္ပိ နိဿယဂုဏတော သောမ္မဘူတာ အတ္တာနံ ဝိသယံ ကတွာ ပဝတ္တဇနေပိ မုဒုံ ကရောန္တေဝါတိ ဣဝါဒီနံ အဘာဝေပိ ဝါကျဂမ္မပရိကပ္ပနာ. ဧတ္ထ အစေတနာနံ ကန္တိဝတ္ထူနံ ဇနပသာဒသင်္ခါတဝတ္ထုဋ္ဌိတိ ‘‘ဒယာသဉ္စာရသရသာ ဣဝါ’’တိ ဧဝမာဒိအညပ္ပကာရေန ပရိကပ္ပိတော. ဒယာယ သဉ္စာရော ပုနပ္ပုနံ ပဝတ္တီတိ စ, သဟ ရသေန သ္နေဟေန ဝတ္တမာနောတိ စ, ဒယာသဉ္စာရေန သရသောတိ စ, နိက္ခန္တာ စ တာ ကန္တိယော စေတိ စ, သာဓု စ သော ဇနော စေတိ စ, သရသဿ ဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. २७४. वाक्यगम्य परिकल्पनेचे उदाहरण "दया" इत्यादीद्वारे देतात. हे जिन! दयेच्या संचाराने सरस म्हणजे दुःखी प्राण्यांविषयीच्या करुणेच्या निरंतर प्रवृत्तीमुळे निर्माण झालेल्या स्नेहाने युक्त अशा आपल्या शरीरातून निघालेली कांती, जो दहा दिशांमध्ये पसरलेली निळ्या इत्यादी सहा रंगांची किरणे आहेत, ती सज्जनांना म्हणजेच पुण्यवान उत्तम लोकांना तृप्त करत सरसतेकडे म्हणजेच स्नेहभावाकडे किंवा प्रेमाकडे घेऊन गेली. "सरसतेकडे घेऊन गेली" येथे "सज्जनांना" हा संबंध ऐकल्याने समजतो. करुणेच्या स्नेहाने सौम्य झालेल्या शरीराच्या संसर्गामुळे कांती स्वतःही आश्रयाच्या गुणाने सौम्य होऊन, स्वतःला विषय बनवणाऱ्या लोकांनाही जणू कोमल बनवते, अशा प्रकारे 'इव' इत्यादी शब्द नसतानाही ही वाक्यगम्य परिकल्पना आहे. येथे अचेतन अशा कांतीरूपी वस्तूंची लोकांच्या प्रसन्नतेची स्थिती "दयेच्या संचाराने सरस असल्यासारखी" अशा दुसऱ्या प्रकारे कल्पिली आहे. "दयेचा संचार म्हणजे वारंवार प्रवृत्ती", "रसाने म्हणजेच स्नेहाने युक्त असलेला", "दयेच्या संचाराने सरस", "निघालेली ती कांती", "सज्जन तो माणूस", "सरस असण्याचा भाव" असा याचा विग्रह आहे. ၂၇၅. २७५. အာရဘန္တဿ ယံ ကိဉ္စိ, ကတ္တုံ ပုညဝသာ ပုန; သာဓနန္တရလာဘော ယော, တံ ဝဒန္တိ သမာဟိတံ. कोणतेही कार्य करण्यासाठी सिद्ध झालेल्या व्यक्तीला पुण्याच्या प्रभावाने (पुण्यबलाने) पुन्हा जे दुसरे साधन प्राप्त होते, त्याला 'समाहित' (अलंकार) म्हणतात. ၂၇၅. သမာဟိတံ သမာဟရတိ ‘‘အာရဘန္တဿိ’’စ္စာဒိနာ. ယံ ကိဉ္စိ ကာရိယံ ကတ္တုံ သတ္တုဘင်္ဂါဒိကံ အာရဘန္တဿ သဇ္ဇီဘူတဿ ယဿ ကဿစိ ပုမုနော ပုညဝသာ ကုသလဗလေန ကာရဏေန ကုသလသာမတ္ထိယေန ပုန သာဓျတေ သာဓိယမနေနေတိ သာဓနံ, တတော တမေဝ ဝါ အန္တရမညံ, တဿ လာဘော, အညကာရဏလာဘောတိ အတ္ထော. တံ သမာဟိတံ ဝဒန္တိ, သမာဓာနံ သမာဟိတံ. २७५. "आरभन्तस्स" इत्यादीद्वारे समाहित अलंकाराचे वर्णन करतात. शत्रूचा पराभव करणे इत्यादी कोणतेही कार्य करण्यासाठी सिद्ध झालेल्या कोणत्याही पुरुषाला पुण्याच्या प्रभावाने म्हणजे कुशल बलाच्या कारणाने किंवा कुशल सामर्थ्याने जे साध्य केले जाते ते साधन, किंवा त्याहून दुसरे साधन प्राप्त होते, म्हणजेच इतर कारणाची प्राप्ती होते. त्याला 'समाहित' म्हणतात, समाधानालाच समाहित म्हणतात. ၂၇၅. ဣဒါနိ [Pg.268] သမာဟိတာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘အာရဘ’’မိစ္စာဒိနာ. ယံ ကိဉ္စိ အမိတ္တဝိဇယာဒိကံ ကတ္တုံ အာရဘန္တဿ ယဿ ပုညဝသာ ကုသလဗလေန ပုန ယော သာဓနန္တရလာဘော တဿေဝ ကာရိယသိဒ္ဓိယာ ဥပကာရကဿ အညသာဓနဿ ယော လာဘော အတ္ထိ, တံ ကာရဏလာဘံ သမာဟိတံ ဝဒန္တိ တဿေဝ ကာရိယဿ သမာဓာနတ္တာ ပတိဋ္ဌိတတ္တာ သမာဟိတံ ဣတိ ကဝိနော ကထေန္တိ. သာဓျတေ သာဓိယမနေနေတိ စ, တဉ္စ တံ အန္တရမညဉ္စေတိ စ, တဿ လာဘောတိ စ, သမာဓာနမိတိ စ ဝါကျံ. २७५. आता 'समाहित' अलंकार दाखवतात. शत्रूवर विजय मिळवणे इत्यादी कोणतेही कार्य करण्यासाठी सिद्ध झालेल्या व्यक्तीला पुण्याच्या प्रभावाने म्हणजेच कुशल बलाने जे दुसरे साधन प्राप्त होते, म्हणजेच त्या कार्याच्या सिद्धीसाठी उपकारक असणाऱ्या इतर साधनाची जो प्राप्ती होते, त्या कारणाच्या प्राप्तीला 'समाहित' म्हणतात. त्या कार्याच्या समाधानामुळे म्हणजेच ते कार्य दृढ झाल्यामुळे कवी त्याला 'समाहित' म्हणतात. "ज्याद्वारे साध्य केले जाते ते", "ते आणि ते दुसरे", "त्याची प्राप्ती", "समाधान" असा याचा विग्रह आहे. ၂၇၆. २७६. မာရာရိဘင်္ဂါဘိမုခ-မနသော တဿ သတ္ထုနော; မဟာမဟီ မဟာရာဝံ, ရဝီ’ယ’မုပကာရိကာ. मारेकरी शत्रूचा (मारेचा) पराभव करण्यासाठी ज्यांचे मन तत्पर आहे, अशा त्या शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) उपकारकर्त्या या विशाल पृथ्वीने मोठा गर्जनायुक्त आवाज केला. ၂၇၆. ဥဒါဟရတိ ‘‘မာရ’’ဣစ္စာဒိ. မာရာရိနော မာရသတ္တုနော ဘင်္ဂေ အဘိဘဝေ အဘိမုခံ န ပရမ္မုခံ မနံ ယဿ တဿ သတ္ထုနော ဥပကာရိကာ အာရဒ္ဓမာရဘင်္ဂကြိယာနုဂ္ဂါဟိကာ မဟာမဟီ အယံ မဟာရာဝံ မာရာရိဒုဿဟံ မဟာနာဒံ ရဝီ အကာသိ. ဣဓ မာရာရိဘဉ္ဇနံ ကာရိယမာရဒ္ဓံ, တဿ ပုညဝသေနေဝ မဟီရာဝေါ အပရံ သာဓနံ သမာပန္နန္တိ လက္ခဏံ ယောဇနီယံ. २७६. "मार" इत्यादीद्वारे उदाहरण देतात. माररूपी शत्रूचा पराभव करण्यासाठी ज्यांचे मन सन्मुख आहे (पराङ्मुख नाही), अशा त्या शास्त्यांची (बुद्धांची) उपकारकर्ती, म्हणजेच सुरू केलेल्या मार-पराभवाच्या क्रियेला साहाय्य करणारी ही विशाल पृथ्वी माररूपी शत्रूला असह्य असा मोठा नाद (गर्जना) करती झाली. येथे मार-पराभव करण्याचे कार्य सुरू केले गेले आहे, आणि पुण्याच्या प्रभावानेच पृथ्वीची गर्जना हे दुसरे साधन प्राप्त झाले, असे लक्षण येथे योजावे. ၂၇၆. ‘‘မာရာရိ’’စ္စာဒိ. မာရာရိဘင်္ဂါဘိမုခမနသော မာရသင်္ခါတဿ သတ္တုနော မဒ္ဒနေ အဘိမုခစိတ္တဿ တဿ သတ္ထုနော ဥပကာရိကာ အာရဒ္ဓမာရဝိဇယဿ ဥပတ္ထမ္ဘိကာ အယံ မဟာမဟီ မဟာရာဝံ မာရဿ ဟဒယဝတ္ထုံ မဒ္ဒန္တော ဝိယ သဟိတုမသက္ကုဏေယျံ မဟာနာဒံ ရဝီ အကာသိ. ဧတ္ထ မာရဘင်္ဂဇနနံ သတ္ထူဟိ အာရဒ္ဓကာရိယံ, တဿေဝ သိဒ္ဓိယာ ဟေတုဘူတံ အညကာရဏံ နာမ မဟီရာဝေါ. မာရော ဧဝ အရိ သတ္တူတိ စ, တဿ ဘင်္ဂေါတိ စ, တသ္မိံ အဘိမုခံ မနံ ယဿေတိ စ, မဟန္တီ စ သာ မဟီ စေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २७६. "मारारि" इत्यादी. माररूपी शत्रूचे मर्दन करण्यासाठी ज्यांचे चित्त तत्पर आहे, अशा त्या शास्त्यांची (बुद्धांची) उपकारकर्ती, म्हणजेच सुरू केलेल्या मार-विजयाला साहाय्य करणारी ही विशाल पृथ्वी माराचे हृदय विदीर्ण करणारी, सहन न होणारी मोठी गर्जना करती झाली. येथे मार-पराभव करणे हे शास्त्यांनी (बुद्धांनी) सुरू केलेले कार्य आहे, आणि त्याच्याच सिद्धीसाठी कारणीभूत झालेले दुसरे कारण म्हणजे पृथ्वीची गर्जना होय. "मार हाच शत्रू", "त्याचा पराभव", "त्यात तत्पर असलेले मन ज्यांचे", "विशाल अशी ती पृथ्वी" असा याचा विग्रह आहे. ၂၇၇. २७७. အဝတွာ’ဘိမတံ [Pg.269] တဿ, သိဒ္ဓိယာ ဒဿန’ညထာ; ဝဒန္တိ တံ ပရိယာယ-ဝုတ္တီတိ သုစိဗုဒ္ဓယော. इच्छित गोष्ट थेट न सांगता, तिच्या सिद्धीसाठी दुसऱ्या प्रकारे दाखवणे, याला शुद्ध बुद्धीचे लोक 'पर्यायोक्ती' म्हणतात. ၂၇၇. ပရိယာယဝုတ္တိံ ပဋိပါဒေတိ ‘‘အဝတွာ’’ဣစ္စာဒိနာ. အဘိမတံ ကိဉ္စိ အတ္ထံ ဓနဒါနာဒိလက္ခဏံ အဝတွာ အဉ္ဇသာ ဝါစကဗျာပါရေန အနာချာယ တဿာဘိမတဿတ္ထဿ သိဒ္ဓိယာ နိပ္ဖာဒနတ္ထံ အညထာ အညေန ပကာရေန တန္နိဗ္ဗတ္တိအနုဂုဏေန ယံ ဒဿနံ ဝစနံ, တံ သုစိဗုဒ္ဓယော ပရိယာယဝုတ္တီတိ ဝဒန္တိ. ပရိယာယေန ဝစနံ ပရိယာယဝုတ္တီတိ. २७७. ‘अवात्वा’ (न बोलता) इत्यादींद्वारे पर्यायवृत्ती (pariyāyavutti) स्पष्ट केली जाते. इच्छित असलेला कोणताही अर्थ, जसे की धनदान इत्यादींचे लक्षण, थेट न सांगता, सरळ शब्दांच्या व्यापाराने व्यक्त न करता, त्या इच्छित अर्थाच्या सिद्धीसाठी किंवा निष्पत्तीसाठी दुसऱ्या प्रकारे, त्याच्या उत्पत्तीला अनुकूल अशा अन्य मार्गाने जे दर्शन किंवा वचन (कथन) केले जाते, त्याला शुद्ध बुद्धीचे लोक (विद्वान) ‘पर्यायवृत्ती’ असे म्हणतात. पर्यायाने (परोक्ष रीतीने) केलेले कथन म्हणजे ‘पर्यायवृत्ती’ होय। ၂၇၇. ဣဒါနိ ပရိယာယဝုတ္တိံ ဒဿေတိ ‘‘အဝတွာ’’ဣစ္စာဒိနာ. အဘိမတံ ဣဋ္ဌံ ဓနဒါနာဒိသရူပံ ယံ ကိဉ္စိ အတ္ထံ အဝတွာ ဥဇုမကထေတွာ တဿ အဘိမတတ္ထဿ သိဒ္ဓိယာ နိပ္ဖတ္တိယာ အညထာ ဝတ္တုမိစ္ဆိတတ္ထဿာနုရူပေနာညပ္ပကာရေန ဒဿနံ ယံ ကိဉ္စိ ဒဿနံ ကထနမတ္ထိ, သုစိဗုဒ္ဓယော ပရိယာယဝုတ္တီတိ တံ ဝဒန္တိ. ပရိယာယေန ဝုတ္တိ ကထနမိတိ စ, သုစိ ဗုဒ္ဓိ ယေသမိတိ စ ဝါကျံ. २७७. आता ‘अवात्वा’ इत्यादींद्वारे पर्यायवृत्ती दर्शविली जाते. इच्छित, इष्ट असलेले धनदान इत्यादी स्वरूपाचा कोणताही अर्थ थेट न सांगता, सरळ न बोलता, त्या इच्छित अर्थाच्या सिद्धीसाठी किंवा निष्पत्तीसाठी, बोलू इच्छिलेल्या अर्थाला अनुरूप अशा दुसऱ्या प्रकारे, अन्य मार्गाने जे काही दर्शन किंवा कथन केले जाते, त्याला शुद्ध बुद्धीचे लोक ‘पर्यायवृत्ती’ असे म्हणतात. ‘पर्यायाने वृत्ती म्हणजे कथन’ आणि ‘ज्यांची बुद्धी शुद्ध आहे ते’ (शुचिबुद्धी) असे हे वाक्य आहे। ၂၇၈. २७८. ဝိဝဋင်္ဂဏနိက္ခိတ္တံ, ဓန’မာရက္ခဝဇ္ဇိတံ; ဓနကာမ ယထာကာမံ, တုဝံ ဂစ္ဆ ယဒိ’စ္ဆသိ. उघड्या अंगणात ठेवलेले आणि रक्षणाशिवाय असलेले हे धन आहे; हे धनलोभी माणसा, जर तुझी इच्छा असेल, तर तू तुझ्या इच्छेनुसार जा (किंवा ते घेऊन जा). ၂၇၈. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဝိဝဋင်္ဂဏေ’’စ္စာဒိ. ဓနံ ဝိဝဋေ ကေနစိ အနာဝဋတ္တာ အင်္ဂဏေ ပကာသပ္ပဒေသေ နိက္ခိတ္တံ အထ စ ပန အာရက္ခဝဇ္ဇိတံ. ဓနံ ကာမေတီတိ ဓနကာမာတိ အာမန္တနံ. တုဝံ ယဒိ ဣစ္ဆသိ ဂန္တုံ ဓနံ ဝါ, ယထာကာမံ ဂစ္ဆေတိ ဓနာဝဟရဏမိစ္ဆိတမဉ္ဇသာ အဝတွာ တံသိဒ္ဓိယာ ဗျာဇေန ဝဒတိ. ပရိယာယဝုတ္တိ. २७८. ‘विवटंगणे’ इत्यादींद्वारे उदाहरण दिले जाते. धन हे उघड्या, कोणाकडूनही न झाकलेल्या अंगणात, उघड्या जागी ठेवलेले आहे आणि शिवाय ते रक्षणाशिवाय आहे. जो धनाची इच्छा करतो तो ‘धनकाम’ (धनलोभी), असे हे संबोधन आहे. ‘जर तुला जाण्याची किंवा धन घेण्याची इच्छा असेल, तर इच्छेनुसार जा,’ असे म्हणून, धनाचे हरण करण्याची इच्छा थेट न सांगता, त्या सिद्धीसाठी बहाण्याने बोलले जाते. ही पर्यायवृत्ती होय। ၂၇၈. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဝိဝဋ’’မိစ္စာဒိနာ. ဓနံ မုတ္တာမဏိအာဒိ ဝိဝဋင်္ဂဏနိက္ခိတ္တံ ပါကာရာဒိပရိက္ခေပရဟိတတ္တာ နိရာဝရဏဋ္ဌာနေ ယေန ကေနစိ ဌပိတံ အပိစ အာရက္ခဝဇ္ဇိတံ. ဘော ဓနကာမ တုဝံ ယဒိစ္ဆသိ ဓနံ ဂမနံ ဝါ, ယထာကာမံ ဂစ္ဆာတိ [Pg.270] စိတ္တေနိစ္ဆိတဓနာဝဟရဏဝိဓာနံ ‘‘ဓနမာဟရာ’’တိ ဥဇုမဝတွာ ဧဝံ ဗျာဇေန ဝုတ္တတ္တာ ဣဒံ ပရိယာယဝုတ္တိ နာမ. ဝိဝဋဉ္စ တံ အင်္ဂဏဉ္စေတိ စ, တသ္မိံ နိက္ခိတ္တန္တိ စ, အာရက္ခေန ဝဇ္ဇိတမိတိ စ, ဓနံ ကာမေတီတိ စ, ကာမံ တဏှံ တံသမ္ပယုတ္တံ ဝါ စိတ္တမနတိက္ကမ္မာတိ စ ဝါကျံ. २७८. ‘विवट’ इत्यादींद्वारे उदाहरण दिले जाते. मोती, मणी इत्यादी स्वरूपाचे धन, भिंत इत्यादी कुंपण नसल्यामुळे उघड्या अंगणात, निरावरण (उघड्या) ठिकाणी कोणाकडून तरी ठेवलेले आहे आणि शिवाय ते रक्षणाशिवाय आहे. ‘हे धनलोभी माणसा, जर तुला धन किंवा जाण्याची इच्छा असेल, तर इच्छेनुसार जा,’ असे म्हणून, मनात इच्छिलेले धनाचे हरण करण्याचे विधान ‘धन घेऊन जा’ असे थेट न सांगता, अशा बहाण्याने बोलल्यामुळे याला ‘पर्यायवृत्ती’ असे म्हणतात. ‘जे उघडे आहे ते अंगण’, ‘त्यात ठेवलेले’, ‘रक्षणाने विरहित’, ‘धनाची इच्छा करणारा’, आणि ‘इच्छा म्हणजे तृष्णा किंवा तिच्याशी संप्रयुक्त चित्ताचे उल्लंघन न करता’ असे हे वाक्य आहे। ၂၇၉. २७९. ထုတိံ ကရောတိ နိန္ဒန္တော, ဝိယ တံ ဗျာဇဝဏ္ဏနံ; ဒေါသာဘာသာ ဂုဏာ ဧဝ, ယန္တိ သန္နိဓိ’မတြဟိ. निंदा केल्यासारखे दाखवून जी स्तुती केली जाते, त्याला ‘व्याजवर्णन’ (byājavaṇṇana) म्हणतात; कारण येथे दोषांचा केवळ आभास होतो, प्रत्यक्षात गुणच जवळ येतात (प्रकट होतात). ၂၇၉. ဗျာဇဝဏ္ဏနံ ဝဏ္ဏေတိ ‘‘ထုတိ’’မိစ္စာဒိနာ. နိန္ဒန္တော ဝိယ ဒေါသံ နိဒဿေန္တော ဝိယ ထုတိံ ကရောတိ ဝဏ္ဏံ ဘာသတိ, တံ ဗျာဇထုတိလက္ခဏံ ဗျာဇဝဏ္ဏနံ နာမ. ကထမေတ္ထ ဂုဏာ ပတီယန္တီတိ အာဟ ‘‘ဒေါသိ’’စ္စာဒိ. အတြ ဝုတ္တိဝိသေသေ ဒေါသာ ဝိယ အာဘာသန္တိ ပဋိဘန္တိ. တာဒိသပဒါဒိနာ ဒေါသာဘာသာ ဂုဏာ ဧဝ ဣဒ္ဓိမန္တတာဒယော န ဒေါသောပိ ကောစိ သန္နိဓိမဝဋ္ဌာနံ ယန္တိ. ဟီတိ အဝဓာရဏေ အတြ ဗျာဇဝဏ္ဏနမေဝိဒံ, န နိန္ဒကမိတိ. २७९. ‘थुतिम्’ इत्यादींद्वारे व्याजवर्णनाचे वर्णन केले जाते. निंदा केल्यासारखे, दोष दाखविल्यासारखे करून जी स्तुती केली जाते, प्रशंसा केली जाते, त्या व्याजस्तुती-लक्षणाला ‘व्याजवर्णन’ असे म्हणतात. येथे गुण कसे प्रतीत होतात? यावर ‘दोसि’ इत्यादी म्हणतात. या विशिष्ट वृत्तीमध्ये दोष असल्यासारखे भासतात. तशा पदांमुळे दोषाभास असलेले ऋद्धिमत्ता इत्यादी गुणच जवळ येतात (प्रकट होतात), कोणताही दोष जवळ येत नाही. ‘हि’ हा शब्द निश्चयार्थक आहे; येथे हे केवळ व्याजवर्णनच आहे, निंदा नाही। ၂၇၉. ဣဒါနိ ဗျာဇဝဏ္ဏနံ ဒဿေတိ ‘‘ထုတိ’’စ္စာဒိနာ. နိန္ဒန္တော ဝိယ ဒေါသံ ဒဿေန္တော ဝိယ ထုတိံ ကရောတိ ဝဏ္ဏနံ ကရောတိ, တံ ဝဏ္ဏနာကရဏံ ဗျာဇဝဏ္ဏနံ နာမ ဟောတိ. နိန္ဒာသဘာဝေန ပဝတ္တထုတိတ္တာ နိန္ဒာ ဧဝေတိ စေ? အတြ အသ္မိံ ဝုတ္တိဝိသေသေ ဒေါသာဘာသာ ဒေါသာ ဝိယ ပဋိဘာသမာနာ ဂုဏာ ဧဝ တာဒိသပဒပ္ပယောဂေန ဣဒ္ဓိမန္တတာဒယော ဂုဏာဝ သန္နိဓိံ ဂုဏသဘာဝါဝဋ္ဌာနံ ယန္တိ ပါပုဏန္တီတိ. ဗျာဇေန ဝဏ္ဏနမိတိ စ, ဒေါသာ ဣဝ အာဘာသန္တိ ပဋိဘာသန္တီတိ စ ဝါကျံ. २७९. आता ‘थुति’ इत्यादींद्वारे व्याजवर्णन दर्शविले जाते. निंदा केल्यासारखे, दोष दाखविल्यासारखे करून जी स्तुती केली जाते, वर्णन केले जाते, त्या वर्णनाला ‘व्याजवर्णन’ असे म्हणतात. जर असे म्हटले की, निंदास्वभावाने प्रवृत्त झालेली स्तुती असल्यामुळे ही निंदाच आहे का? तर या विशिष्ट वृत्तीमध्ये दोषाभास असलेले, दोषासारखे भासणारे ऋद्धिमत्ता इत्यादी गुणच तशा पदांच्या प्रयोगाने जवळ येतात, म्हणजेच गुणस्वभावाच्या अवस्थेला प्राप्त होतात. ‘बहाण्याने केलेले वर्णन’ आणि ‘दोषांसारखे भासतात’ असे हे वाक्य आहे। ၂၈၀. २८०. သဉ္စာလေတု’မလံ တွံ’သိ, ဘုသံ ကုဝလယာ’ခိလံ; ဝိသေသံ တာဝတာ နာထ, ဂုဏာနံ တေ ဝဒါမ ကိံ. हे नाथा, आपण संपूर्ण कुवलय (कमळ किंवा पृथ्वीमंडल) अत्यंत हलविण्यास समर्थ आहात; केवळ तेवढ्यावरून, हे नाथा, आपल्या गुणांचे वैशिष्ट्य आम्ही काय सांगावे? ၂၈၀. ဥဒါဟရတိ ‘‘သဉ္စာလေတု’’မိစ္စာဒိနာ. နာထ တွံ အခိလံ ကုဝလယံ ဥပ္ပလံ ပထဝီဝလယဉ္စေတိ သိလိဋ္ဌံ သဉ္စာလေတုံ ဘမယိတုမိတော [Pg.271] စိတော စ ဘုသမစ္စန္တံ အလံ သမတ္ထောပိ တာဝတာ တံမတ္တေန တေ ဂုဏာနံ ဝိသေသံ အတိသယလက္ခဏံ ကိံ ကေန ကာရဏေန ဝဒါမ. ဣဟ ဥပ္ပလစာလနသာမတ္ထိယဝိဘာဝနဝသေန နိန္ဒတိ, တာဝ နိခိလဘူမဏ္ဍလသဉ္စာလာဝိကရဏတော ပရမာယ ထုတိယာ သံယောဇိတောယံ ဘဂဝါ မဟာနုဘာဝံ ဝိစိတဝါတိ ဘုဝနမဏ္ဍလသိခါမဏီတိ. ဗျာဇဝဏ္ဏနမီဒိသမစ္စန္တံ ရမဏီယံ, တဒိဒဉ္စ သဗ္ဗထာ သိလေသမုပဇီဝတိ. २८०. ‘संचालेतुम्’ इत्यादींद्वारे उदाहरण दिले जाते. हे नाथा, आपण संपूर्ण कुवलय—म्हणजेच कमळ आणि पृथ्वीमंडल या श्लिष्ट अर्थाने—हलविण्यास, इकडेतिकडे फिरविण्यास अत्यंत समर्थ असूनही, केवळ तेवढ्यावरून, आपल्या गुणांचे वैशिष्ट्य (अतिशय लक्षण) आम्ही कोणत्या कारणाने सांगावे? येथे कमळ हलविण्याच्या सामर्थ्याच्या प्रदर्शनाद्वारे निंदा केली जाते, परंतु संपूर्ण भूमंडलाला हलविण्याच्या सामर्थ्यामुळे ही परम स्तुती जोडली गेली आहे की, हे भगवान महानुभाव आणि भुवनमंडळाचे शिरोमणी आहेत. असे व्याजवर्णन अत्यंत रमणीय असते, आणि हे पूर्णपणे श्लेषावर (silesa) अवलंबून असते। ၂၈၀. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘သဉ္စာလေတု’’မိစ္စာဒိနာ. နာထ တွံ အခိလံ ကုဝလယံ နိဿေသံ နီလုပ္ပလဝနံ ပထဝီမဏ္ဍလံ ဝါ သဉ္စာလေတုံ ကမ္ပေတုံ ဘုသမတိသယေန အလံ သမတ္ထော, တာဝတာ တေ ဂုဏာနံ ဝိသေသမတိသယံ ကိံ ဝဒါမ ကထံ ဘဏာမာတိ. ကုဝလယသဒ္ဒဿ ဥပ္ပလဝိသေသဝါစကတ္တာ ပဌမံ နိန္ဒာဝ, တဿေဝ သဒ္ဒဿ ပထဝီမဏ္ဍလဝါစကတ္တာ ‘‘ဣဒ္ဓိမတော တဝ ဣဒံ ကိံ ဝိသေသ’’န္တိ ဥတ္တမဂုဏဝဏ္ဏနာ ကတာ ဟောတိ. ဤဒိသာ ဗျာဇဝဏ္ဏနာ ပသတ္ထာ, သာ စ သဗ္ဗထာ သိလေသံ နိဿာယ ပဝတ္တတီတိ. ကုယာ ပထဝိယာ ဝလယံ မဏ္ဍလမိတိ သမာသော. २८०. आता ‘संचालेtuम्’ इत्यादींद्वारे उदाहरण दिले जाते. हे नाथा, आपण संपूर्ण कुवलय—म्हणजेच संपूर्ण नीलकमळांचे वन किंवा पृथ्वीमंडल—हलविण्यास, कंपित करण्यास अत्यंत समर्थ आहात, केवळ तेवढ्यावरून आपल्या गुणांचे वैशिष्ट्य आम्ही काय सांगावे, कसे बोलावे? ‘कुवलय’ शब्दाचा अर्थ कमळविशेष असल्यामुळे प्रथम निंदाच वाटते, परंतु त्याच शब्दाचा अर्थ पृथ्वीमंडल असल्यामुळे ‘ऋद्धिवान असलेल्या आपल्यासाठी हे काय विशेष आहे?’ अशी उत्तम गुणांची प्रशंसा केली जाते. अशी व्याजवर्णना प्रशंसनीय आहे, आणि ती पूर्णपणे श्लेषाचा आश्रय घेऊन प्रवृत्त होते. ‘कु’ म्हणजे पृथ्वीचे ‘वलय’ म्हणजे मंडल, असा हा समास आहे। ၂၈၁. २८१. ဝိသေသိ’စ္ဆာယံ ဒဗ္ဗဿ, ကြိယာဇာတိဂုဏဿ စ; ဝေကလ္လဒဿနံ ယတြ, ဝိသေသော နာမ’ယံ ဘဝေ. द्रव्य, क्रिया, जाती आणि गुणांच्या विशेष इच्छेमध्ये, जेथे विकलता (अभाव) दर्शविली जाते, त्याला ‘विशेष’ (visesa) अलंकार म्हणतात। ၂၈၁. ဝိသေသဝုတ္တိံ ဝတ္တေတိ ‘‘ဝိသေသိစ္ဆာယ’’မိစ္စာဒိနာ. ဝိသေသေ အတိသယေ ကိသ္မိဉ္စိပိ ကာရိယဝိသေသေ ဣစ္ဆာယံ ဒဗ္ဗာဒီနံ ယတြ ဝေကလ္လဿ အဘာဝဿ ဒဿနံ ဝစနံ, အယံ ဝိသေသော နာမ ဝိသေသဝုတ္တိ နာမ ဘဝေ. २८१. ‘विसेसिच्छायम्’ इत्यादींद्वारे विशेषवृत्तीचे वर्णन केले जाते. विशेषात, म्हणजेच कोणत्याही अतिशय कार्यविशेषाच्या इच्छेमध्ये, जेथे द्रव्यादींच्या विकलतेचे (अभावाचे) दर्शन किंवा कथन केले जाते, त्याला ‘विशेष’ किंवा ‘विशेषवृत्ती’ असे म्हणतात। ၂၈၁. ဣဒါနိ ဝိသေသာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ဝိသေသိ’’စ္စာဒိနာ. ဝိသေသိစ္ဆာယံ အတိသယေ ကာရိယဝိသေသေ ဣစ္ဆာယံ သတိ ဒဗ္ဗဿ စ ကြိယာဇာတိဂုဏဿ စ ယတြ ယသ္မိံ ဝုတ္တိဝိသေသေ ဝေကလ္လဒဿနံ အဘာဝကထနမတ္ထိ, အယံ ဝိသေသော [Pg.272] နာမ ဘဝေ ဝိသေသဝုတ္တိ နာမ သိယာတိ. ဝိကလဿ ဘာဝေါတိ စ, တဿ ဒဿနမိတိ စ ဝါကျံ. २८१. आता ‘विसेसि’ इत्यादींद्वारे विशेषालंकार दर्शविला जातो. विशेषाची इच्छा असताना, म्हणजेच अतिशय कार्यविशेषाची इच्छा असताना, द्रव्य, क्रिया, जाती आणि गुणांचे जेथे, ज्या विशिष्ट वृत्तीमध्ये विकलतेचे दर्शन (अभावाचे कथन) असते, तो ‘विशेष’ किंवा ‘विशेषवृत्ती’ असावा. ‘विकालाचा भाव’ (विकलता) आणि ‘त्याचे दर्शन’ असे हे वाक्य आहे। ၂၈၂. २८२. န ရထာ န စ မာတင်္ဂါ, န ဟယာ န ပဒါတယော; ဇိတော မာရာရိ မုနိနာ, သမ္ဘာရာဝဇ္ဇနေန ဟိ. रथ नव्हते, हत्ती नव्हते, घोडे नव्हते आणि पायदळही नव्हते; तरीही मुनींनी (बुद्धांनी) केवळ संभारांच्या (पारमितांच्या) आवर्तनानेच मारशत्रूला जिंकले। ဒဗ္ဗဝိသေသဝုတ္တိ. द्रव्यविशेषवृत्ती। ၂၈၂. ဥဒါဟရတိ ‘‘န ရထာ’’ဣစ္စာဒိ. သုဗောဓံ. အတြ စ ဝိဇယောပကရဏစတုရင်္ဂါနီကလက္ခဏဒဗ္ဗာဘာဝေန သမတိံသပါရမိတာသင်္ခတသမ္ဘာရာဝဇ္ဇနဿေဝ မာရာရိဝိဇယလက္ခဏော ဝိသေသော ဝုတ္တော. २८२. ‘न रथा’ इत्यादींद्वारे उदाहरण दिले जाते. हे सुबोध आहे. आणि येथे विजयाचे साधन असलेल्या चतुरंग सेनेच्या स्वरूपातील द्रव्याच्या अभावाने, तीस पारमितांनी युक्त अशा संभारांच्या आवर्तनाचाच मारविजयरूपी विशेष सांगितला आहे। ၂၈၂. ‘‘န ရထာ’’ဣစ္စာဒိ. ရထာ တယော အန္တမသော သပရိဝါရာနံ တိဏ္ဏံ ရထာနံ အနီကဝေါဟာရတော တာဒိသာ တယော ရထာ စ နတ္ထိ. မာတင်္ဂါ တယော ဝုတ္တနယေန အနီကသင်္ခါတာ တယော မာတင်္ဂါ စ နတ္ထိ. န ဟယာ တယော တာဒိသာ အနီကသင်္ခါတာ တယော အဿာ စ နတ္ထိ. ပဒါ န အန္တမသော သာယုဓာနံ စတုန္နံ ပုရိသာနံ အနီကဝေါဟာရတော တာဒိသာ စတ္တာရော ပုရိသာ ပဒါ စ နတ္ထိ. တထာပိ မုနိနာ သမ္ဘာရာဝဇ္ဇနေန ဟိ သမတိံသပါရမိဓမ္မာနံ အာဘောဂကရဏေနေဝ မာရာရိ မာရပစ္စတ္တိကော ဇိတော အဘိဘဝိတော. ဣဟ ဇယောပကရဏဘာဝေန ဌိတာနံ ရထာနီကာဒီနံ ဒဗ္ဗာနံ ဝေကလ္လံ ဒဿေတွာ သတ္တုဝိဇယသဘာဝါနံ သမ္ဘာရာနံ အာဝဇ္ဇနဝိသေသဿ ဝုတ္တတ္တာ ဧသာ ဒဗ္ဗဝိသေသဝုတ္တိ နာမ. ရထော နာမ စတုပုရိသပရိဝါရော, တာဒိသံ ရထတ္တယံ ရထာနီကံ နာမ. ဟတ္ထီ ပန ဒွါဒသပုရိသပရိဝါရော ဟောတိ, တာဒိသံ ဟတ္ထိတ္တယံ ဟတ္ထာနီကံ နာမ. အဿော တိပုရိသပရိဝါရော, တာဒိသံ ဟယတ္တယံ ဟယာနီကံ နာမ. သာယုဓာ စတ္တာရော ပုရိသာ ပဒါနီကံ နာမ. ဣဟ ရထာဒီသု ဌိတာ ဝိယ သီဃံ ပါဒဗလေန ဂန္တွာ ယုဇ္ဈမာနာ ပုရိသာ ပါဒေါပစာရေန ‘‘ပါဒါ’’တိ ဝုတ္တာ. ရထာဒီနံ ပမာဏံ တယောတိ အနီကဋ္ဌာနေ [Pg.273] ဒဿေတွာ ပုရိသပမာဏဿာဝုတ္တေပိ အန္တမသော စတ္တာရော ပုရိသာ အနီကံ နာမ ဟောန္တီတိ ပကရဏတော စတ္တာရောတိ ဉာယတိ. နော စေ? သာဝုဓပုရိသဝါစကဿ ပဒါတိသဒ္ဒဿ ‘‘ပဒါတယော’’တိ ဗဟုဝစနေန ရူပသမ္ဘဝတော ‘‘ရထာ န, မာတင်္ဂါ န, ဟယာ န, ပဒါတယော န’’ ဣတိ သမ္ဗန္ဓော. ဒဗ္ဗဝိသေသဝုတ္တိ ဒဗ္ဗေန ဒဗ္ဗပဋိသေဓနတော ဝိသေသကထနံ ဝိသေသဿ ဝုတ္တီတိ စ, ဒဗ္ဗေန ဒဗ္ဗပဋိသေဓေန ဝိသေသဝုတ္တီတိ စ ဝါကျံ. ကြိယာဝိသေသဝုတျာဒိတ္တယမ္ပိ ဧဝမေဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. २८२. ‘न रथा’ इत्यादी. रथ तीन, अगदी कमीत कमी सपरिवारासह तीन रथांच्या सेनेच्या व्यवहाराने तसे तीन रथही नाहीत. हत्ती तीन, सांगितलेल्या पद्धतीने सेना संज्ञक तीन हत्तीही नाहीत. घोडे तीन, तसे सेना संज्ञक तीन घोडेही नाहीत. पायदळ नाही, अगदी कमीत कमी शस्त्रास्त्रांसह चार पुरुषांच्या सेनेच्या व्यवहाराने तसे चार पुरुष पायदळही नाहीत. तरीही मुनींनी (बुद्धांनी) संभारांच्या आवर्तनानेच, म्हणजेच तीस पारमिता धर्मांच्या चिंतनानेच मारशत्रूला जिंकले, पराभूत केले. येथे विजयाचे साधन म्हणून राहिलेल्या रथांच्या सेने इत्यादी द्रव्यांची विकलता (अभाव) दाखवून, शत्रूवर विजय मिळवून देणाऱ्या संभारांच्या आवर्तनाचा विशेष सांगितल्यामुळे ही ‘द्रव्यविशेषवृत्ती’ होय. रथ म्हणजे चार पुरुषांचा परिवार, तशा तीन रथांना ‘रथसेना’ (रथानीक) म्हणतात. हत्ती हा बारा पुरुषांचा परिवार असतो, तशा तीन हत्तींना ‘हत्तीसेना’ (हस्तीनीक) म्हणतात. घोडा हा तीन पुरुषांचा परिवार असतो, तशा तीन घोड्यांना ‘अश्वसेना’ (हयानीक) म्हणतात. शस्त्रास्त्रांसह चार पुरुष म्हणजे ‘पायदळ सेना’ (पदातीनीक) होय. येथे रथादींवर बसलेल्यांप्रमाणे वेगाने पायांच्या बळाने जाऊन युद्ध करणाऱ्या पुरुषांना उपचाराने ‘पादाः’ (पायदळ) म्हटले आहे. रथादींचे प्रमाण तीन आहे असे सेनेच्या ठिकाणी दाखवून, पुरुषांचे प्रमाण सांगितले नसले तरी कमीत कमी चार पुरुष सेना होतात, असे प्रकरणावरून चार हे समजते. जर असे नसेल, तर शस्त्रधारी पुरुषांच्या वाचक असलेल्या ‘पदाति’ शब्दाच्या ‘पदा तयो’ या बहुवचनाच्या रूपाच्या संभवामुळे ‘रथ नाहीत, हत्ती नाहीत, घोडे नाहीत, पायदळ नाही’ असा संबंध जोडला जातो. ‘द्रव्यविशेषवृत्ती’ म्हणजे द्रव्याने द्रव्याचा निषेध करून विशेष सांगणे, किंवा द्रव्याने द्रव्याच्या निषेधाद्वारे विशेषवृत्ती, असे हे वाक्य आहे. क्रियाविशेषवृत्ती इत्यादी तिन्ही प्रकारही याचप्रमाणे समजावेत। ၂၈၃. २८३. န ဗဒ္ဓါ ဘူကုဋိနေဝ, ဖုရိတော ဒသနစ္ဆဒေါ; မာရာရိဘင်္ဂဉ္စာ’ကာသိ, မုနိဝီရော ဝရော သယံ. भुवयांची आटणी घातली नाही, ओठही थरथरले नाहीत; तरीही श्रेष्ठ मुनिवीरांनी (बुद्धांनी) स्वतः मारशत्रूचा पराभव केला। ကြိယာဝိသေသဝုတ္တိ. क्रियाविशेषवृत्ती। ၂၈၃. ‘‘န ဗဒ္ဓါ’’ဣစ္စာဒိ. ဘူကုဋိ ဘမုဘင်္ဂေါ ကောပဇနိတော န ဗဒ္ဓါ န ရစိတာ, ဒသနစ္ဆဒေါ စာဓရော နေဝ ဖုရိတော နေဝ ကမ္ပိတော ကောပေန. တထာပိ စ ဝရော ဥတ္တမော မုနိဝီရော သယံ မာရာရိနော ဘင်္ဂံ ပရာဇယံ အကာသီတိ. ဘူကုဋိဗန္ဓနာဒိကြိယာဝိဂမေန နိဗ္ဗိကာရဝိဇယလက္ခဏော ဝိသေသော ဒဿိတော. २८३. ‘न बद्धा’ इत्यादी. भृकुटी म्हणजे कोपामुळे होणारा भुवयांचा भंग (आटणी) घातली नाही, रचली नाही, आणि दशनच्छद म्हणजे ओठही कोपामुळे थरथरले नाहीत, कंपित झाले नाहीत. तरीही श्रेष्ठ, उत्तम मुनिवीरांनी स्वतः मारशत्रूचा भंग (पराभव) केला. भृकुटी बांधणे इत्यादी क्रियांच्या अभावाने निर्विकार विजयरूपी विशेष दर्शविला आहे। ၂၈၃. ‘‘န ဗဒ္ဓါ’’ဣစ္စာဒိ. ဘူကုဋိ ကောပဝိကာရဘူတော ဘမုဘင်္ဂေါပိ န ဗဒ္ဓါ န ကတာ, ဒသနစ္ဆဒေါ ဒန္တာဝရဏော နေဝ ဖုရိတော န ကမ္ပာပိတော. တထာပိ ဝရော ဥတ္တမော မုနိဝီရော မုနိဂုဏဝီရဂုဏယုတ္တော တထာဂတော သယံ မာရာရိဘင်္ဂဉ္စ အကာသီတိ. ဧတ္ထ ဘမုဘင်္ဂရစနာဒိကံ ကြိယံ အကတွာ နိဗ္ဗိကာရဿ မာရဘင်္ဂသဘာဝဝိသေသဿ ဝုတ္တတ္တာ ဧသာ ကြိယာဝိသေသဝုတ္တိ နာမ. ဘူနံ ကုဋိ ဝင်္ကတာတိ စ, မာရော ဧဝ အရီတိ စ, တေသံ ဘင်္ဂေါတိ စ ဝါကျံ. २८३. ‘न बद्धा’ इत्यादी. भृकुटी म्हणजे कोपाचा विकार असलेला भुवयांचा भंगही घातला नाही, केला नाही, दशनच्छद म्हणजे दातांचे आवरण (ओठ) थरथरले नाही, कंपित केले नाही. तरीही श्रेष्ठ, उत्तम मुनिवीर, मुनींचे गुण आणि वीरांचे गुण यांनी युक्त अशा तथागतांनी स्वतः मारशत्रूचा पराभव केला. येथे भुवयांची आटणी घालणे इत्यादी क्रिया न करता, निर्विकार अशा मार-पराभवाच्या स्वभावविशेषाचे कथन केल्यामुळे ही ‘क्रियाविशेषवृत्ती’ होय. ‘भुवयांची वक्रता (कुटी)’, ‘मार हाच शत्रू (अरी)’, आणि ‘त्यांचा भंग’ असे हे वाक्य आहे। ၂၈၄. २८४. န [Pg.274] ဒိသာသု ဗျတ္တာ ရံသိ,နာ’လောကော လောကပတ္ထဋော; တထာပျ’န္ဓတမဟရံ,ပရံ သာဓုသုဘာသိတံ. दिशांमध्ये किरणे पसरली नव्हती, जगात प्रकाशही पसरला नव्हता; तरीही अत्यंत दाट अंधकार नष्ट करणारे सज्जनांचे सुभाषित (सद्धम्म) हे श्रेष्ठ आहे। ဇာတိဝိသေသဝုတ္တိ. जातिविशेषवृत्ती। ၂၈၄. ‘‘နိ’’စ္စာဒိ. ဒိသာသု ဒသသု ဗျတ္တာ ပတ္ထဋာ ရံသိ န ဘဝတိ. လောကေ သကလသ္မိံ ပတ္ထဋော ဝိတ္ထတော အာလောကောန ဘဝတိ. တထာပီတိ ဝိသေသနိစ္ဆာယံ, တဇ္ဇာတိကတ္တာဘာဝေပိ သာဓူနံ သုဘာသိတံ သဒ္ဓမ္မသင်္ခါတံ ပရမစ္စန္တမေဝ အန္ဓတမံ ဣဋ္ဌာနိဋ္ဌာဝေကလ္လတော ပညာစက္ခုဿ အန္ဓကာရံ မောဟန္ဓကာရံ ဟရတီတိ အန္ဓတမဟရန္တိ. ရံသိယာ အန္ဓကာရာပဟာရသမတ္ထာယ နိဝတ္တိယာ ဝိသေသော သုဘာသိတဿ ဒဿိတော. २८४. ‘नि’ इत्यादी. दहा दिशांमध्ये स्पष्टपणे पसरलेली किरणे नसतात. संपूर्ण जगात पसरलेला, विस्तृत प्रकाश नसतो. ‘तरीही’ हे विशेषाचा निश्चय करण्यासाठी आहे, त्या जातीचे (किरणांचे) कर्तृत्व नसतानाही, सज्जनांचे सुभाषित, जे सद्धम्म संज्ञक आहे, ते अत्यंत दाट अंधकार—म्हणजेच इष्ट-अनिष्टाच्या अभावामुळे प्रज्ञाचक्षूचा जो अंधकार आहे, तो मोहाचा अंधकार नष्ट करते, म्हणून त्याला ‘अंधतमहर’ (दाट अंधकार नष्ट करणारे) म्हणतात. अंधकार दूर करण्यास समर्थ असलेल्या किरणांच्या अभावी सुभाषिताचा हा विशेष दर्शविला आहे। ၂၈၄. ‘‘န ဒိသာသု’’ဣစ္စာဒိ. ဒိသာသု ဗျတ္တာ ပတ္ထဋာ ရံသိပိ နတ္ထိ, လောကပတ္ထဋော အာလောကောပိ နတ္ထိ. တထာပိ သာဓုသုဘာသိတံ သဒ္ဓမ္မော ပရမစ္စန္တံ အန္ဓတမဟရံ အတ္ထာနတ္ထတီရဏက္ခမဿ ပညာစက္ခုဿ အန္ဓကာရကမောဟတမံ ဟရံ ဟောတီတိ. ဣဓ အန္ဓကာရဝိဒ္ဓံသနေ သမတ္ထံ ရံသိဇာတျာဒိကံ ပဋိသေဓေတွာ သုဘာသိတဿ အန္ဓကာရာပဟရဏသင်္ခါတဿ ဝိသေသဿ ဝုတ္တတ္တာ အယံ ဇာတိဝိသေသဝုတ္တိ နာမ. လောကေ ပတ္ထဋောတိ စ, အန္ဓေတီတိ အန္ဓော မောဟော, တမသဒိသတ္တာ အန္ဓောယေဝ တမောတိ စ, တံ ဟရတီတိ စ, သာဓူနံ သုဘာသိတမိတိ စ ဝါကျံ. २८४. “दिशांमध्ये नाही” इत्यादी. दिशांमध्ये पसरलेले स्पष्ट किरणही नाहीत, आणि जगात पसरलेला प्रकाशही नाही. तरीही, सज्जनांचे सुभाषित असलेला सद्धम्म हा अत्यंत अंधकार नष्ट करणारा असून, हित आणि अहित यांचा निर्णय करण्यास समर्थ असलेल्या प्रज्ञाचक्षूचा अंधकाररूप मोहाचा नाश करणारा ठरतो. येथे अंधकार नष्ट करण्यास समर्थ असलेल्या किरणांच्या जाती इत्यादींचा निषेध करून, सुभाषिताच्या अंधकार दूर करण्याच्या विशिष्ट गुणाचे वर्णन केले असल्याने, याला ‘जातिविशेषवृत्ती’ (जतिविसेसवुत्ति) असे म्हणतात. “जगात पसरलेला” असे, “अंध करतो म्हणून अंध (मोह)”, “अंधकारासारखा असल्यामुळे अंधकारच”, “त्याचा नाश करतो म्हणून”, आणि “सज्जनांचे सुभाषित” असे हे वाक्य आहे. ၂၈၅. २८५. န ခရံ န ဟိ ဝါ ထဒ္ဓံ, မုနိန္ဒ ဝစနံ တဝ; တထာပိ ဂါဠှံ ခနတိ, နိမ္မူလံ ဇနတာမဒံ. हे मुनींद्र, आपले वचन कठोर नाही आणि कठीणही नाही; तरीही ते लोकांच्या मदाला (अहंकाराला) मुळासकट खोलवर उखडून टाकते. ဂုဏဝိသေသဝုတ္တိ. गुणविशेषवृत्ती. ၂၈၅. ‘‘န [Pg.275] ခရ’’မိစ္စာဒိ. မုနိန္ဒ တဝ ဝစနံ န ခရံ န လူခံ, န ထဒ္ဓံ ဝါ ကဌိနဉ္စ န ဟိ. တထာပိ တာဒိသခရတ္တာဒိဂုဏာဘာဝေပိ ဇနတာယ ဇနသမူဟဿ မဒံ ဂါဠှံ ဒဠှံ ကတွာ နိမ္မူလံ ခနတီတိ. အယောသင်္ကုမှိ ပသိဒ္ဓခရတ္တာဒိဂုဏနိသေဓေန မုနိန္ဒဝစနဿ ဝိသေသော အာဝိကတော. २८५. “कठोर नाही” इत्यादी. हे मुनींद्र, आपले वचन कठोर किंवा रूक्ष नाही, आणि कठीण किंवा वज्रतुल्यही नाही. तरीही, अशा कठोरता इत्यादी गुणांचा अभाव असतानाही, ते जनसमूहाच्या मदाला (अहंकाराला) अत्यंत दृढपणे मुळासकट उखडून टाकते. लोखंडाच्या खिळ्यामध्ये (किंवा पहारीमध्ये) प्रसिद्ध असलेल्या कठोरता इत्यादी गुणांचा निषेध करून मुनींद्रांच्या वचनाचे वैशिष्ट्य प्रकट केले गेले आहे. ၂၈၅. ‘‘န ခရ’’မိစ္စာဒိ. ဟေ မုနိန္ဒ တဝ ဝစနံ ခရံ ကက္ကသံ န ဟောတိ, ထဒ္ဓံ ဝါ န ဟောတိ. တထာပိ ဇနတာမဒံ ဇနသမူဟဿ ဇာတျာဒိံ နိဿာယ ပဝတ္တံ ဂဗ္ဗံ ဂါဠှံ ဒဠှံ ကတွာ နိမ္မူလံ မူလမသေသေတွာ ခနတီတိ. ခဏနက္ခမအယောသင်္ကုအာဒီသု လဗ္ဘမာနံ ခရတ္တာဒိဂုဏံ ပဋိသေဓေတွာ ဗုဒ္ဓဝစနဿ မဒခဏနသဘာဝသင်္ခါတဿ ဝိသေသဿ ဝုတ္တတ္တာ အယံ ဂုဏဝိသေသဝုတ္တိ နာမ ဟောတိ. နတ္ထိ မူလမဿ ခဏနဿာတိ စ, ဇနာနံ သမူဟောတိ စ, တာယ မဒေါတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ‘‘ဂါဠှံ နိမ္မူလ’’န္တိ ခဏနကြိယာယ ဝိသေသနတ္တာ ဂါဠှံ နိမ္မူလံ ခဏနံ ကရောတီတိ ယောဇနာ. २८५. “कठोर नाही” इत्यादी. हे मुनींद्र, आपले वचन कठोर किंवा कर्कश नाही, आणि कठीणही नाही. तरीही ते जनसमूहाच्या, जाती इत्यादींच्या आधारे निर्माण झालेल्या मदाला (अहंकाराला) अत्यंत दृढपणे मुळासकट (काहीही शिल्लक न ठेवता) उखडून टाकते. खोदण्यास समर्थ असलेल्या लोखंडाच्या पहारी इत्यादींमध्ये आढळणाऱ्या कठोरता इत्यादी गुणांचा निषेध करून, बुद्धवचनाच्या मद-उखडण्याच्या स्वभावरूप वैशिष्ट्याचे वर्णन केले असल्याने, याला ‘गुणविशेषवृत्ती’ (गुणविसेसवुत्ति) असे म्हणतात. “ज्या उखडण्याला मूळ उरले नाही ते”, “लोकांचा समूह” आणि “त्यांचा मद” असा विग्रह आहे. “खोलवर आणि मुळासकट” हे खोदण्याच्या क्रियेचे विशेषण असल्याने, “खोलवर मुळासकट उखडून टाकते” अशी योजना करावी. ၂၈၆. २८६. ဒဿီယတေ’တိဒိတ္တံ တု,သူရဝီရတ္တနံ ယဟိံ; ဝဒန္တိ ဝိညူ ဝစနံ,ရုဠှာဟင်္ကာရမီဒိသံ. ज्या वाक्यात अत्यंत प्रदीप्त असे शूरत्व आणि वीरत्व दर्शविले जाते, अशा वचनाला विद्वान लोक ‘रूढा अहंकार’ (रुळ्हाहंकार) असे म्हणतात. ၂၈၆. ရုဠှာဟင်္ကာရံ ဝဒန္တိ. २८६. रूढा अहंकार असे म्हणतात. ၂၈၆. ဣဒါနိ ရုဠှာဟင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ဒဿီယတေ’’ ဣစ္စာဒိနာ. သူရဝီရတ္တနံ သူရဘာဝဝီရဘာဝံ အတိဒိတ္တံ တု အတိသယေန ပန ဒိတ္တံ ယဟိံ ဝါကျေ ဒဿီယတေ, ဤဒိသံ ဝစနံ ဝိညူ ကဝယော ရုဠှာဟင်္ကာရမိတိ ဝဒန္တီတိ. သူရော စ ဝီရော စာတိ စ, တေသံ ဘာဝေါတိ စ, ရုဠှော ဥဂ္ဂတော အဟင်္ကာရော ဧတ္ထ ဝုတ္တိဝိသေသေတိ စ ဝါကျံ. २८६. आता ‘रूढा अहंकार’ दर्शवितात, “दस्सीयते” इत्यादींद्वारे. ज्या वाक्यात शूरभाव आणि वीरभाव अत्यंत प्रदीप्तपणे दर्शविला जातो, अशा वचनाला विद्वान कवी ‘रूढा अहंकार’ असे म्हणतात. “शूर आणि वीर” आणि “त्यांचा भाव”, “रूढ झालेला म्हणजेच प्रकट झालेला अहंकार येथे वृत्तीविशेष आहे” असे हे वाक्य आहे. ၂၈၇. २८७. ဒမေ [Pg.276] နန္ဒောပနန္ဒဿ,ကိံ မေ ဗျာပါရဒဿနာ; ပုတ္တာ မေ ပါဒသမ္ဘတ္တာ,သဇ္ဇာ သန္တေဝ တာဒိသေ. नंदोपनंद नागराजाच्या दमनात मला माझा पराक्रम दाखवण्याची काय गरज? माझे चरणांशी लीन असलेले पुत्र अशा कार्यात सज्ज आहेतच. ၂၈၇. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဒမေ’’ဣစ္စာဒိနာ. နန္ဒောပနန္ဒဿ နာဂရာဇဿ အပ္ပမေယျမဟာနုဘာဝဿ ဒမေ ဒမနေ မေ မမ နိရဝဓိသရန္တိပ္ပမေယျပ္ပဘာဝါနုစရိတကိတ္တိနောပိ ပရဿ ဗျာပါရဒဿနာ ပယောဂပဋိပါဒနေန ကိံ ပယောဇနံ, န ကိမ္ပိ, ယတော မေ ပါဒသမ္ဘတ္တာ ပါဒါဝနတာ တာဒိသေ ကမ္မနိ သဇ္ဇာ ဗဒ္ဓကစ္ဆာ သန္တေဝ ဝိဇ္ဇန္တေဝ, တတောတိ ယောဇနီယံ. २८७. “दमे” इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. अपार सामर्थ्यशाली अशा नंदोपनंद नागराजाच्या दमनामध्ये, ज्यांची कीर्ती आणि असीम प्रभाव सर्वत्र पसरलेला आहे अशा माझ्यासारख्याने स्वतःचा पराक्रम किंवा प्रयत्न दाखवण्याचे काय प्रयोजन? काहीच नाही. कारण माझे चरणांशी लीन असलेले (पुत्र) अशा कार्यात सज्ज (कमर कसून तयार) आहेतच, म्हणून अशी योजना करावी. ၂၈၇. ‘‘ဒမေ’’စ္စာဒိ. နန္ဒောပနန္ဒဿ နာဂရညော ဒမေ ဒမကရဏေ ဗျာပါရဒဿနာ ဘုဝနတ္တယေ ပဝတ္တမာနအာနုဘာဝေန စ သမ္ပဝတ္တိတကိတ္တိသမူဟေန စ သမန္နာဂတဿ မယှံ တာဒိသပယောဂဒဿနေန ကိံ ပယောဇနံ. ယသ္မာ မေ ပါဒသမ္ဘတ္တာ မယှံ စရဏာဝနတာ တာဒိသေ ကိစ္စေ သဇ္ဇာ သန္နဒ္ဓါ ပုတ္တာ ဗဟဝေါ သန္တိ ဧဝ, တသ္မာတိ. စေတောဝသိတာယ သူရဝီရဘာဝေါ ဣဟ အတိဒိတ္တော ဒဿိတော ဟောတိ. ဗျာပါရဿ ဒဿနမိတိ စ, ပါဒေသု သမ္ဘတ္တာတိ စ ဝါကျံ. २८७. “दमे” इत्यादी. नंदोपनंद नागराजाच्या दमनामध्ये, तिन्ही लोकांत पसरलेल्या प्रभावाने आणि कीर्तीने युक्त असलेल्या माझ्यासारख्याने स्वतःचा पराक्रम दाखवण्याचे काय प्रयोजन? कारण माझ्या चरणांशी लीन असलेले, अशा कार्यात सज्ज आणि कटिबद्ध असलेले अनेक पुत्र आहेतच, म्हणून. येथे चित्ताच्या वशतेमुळे शूरवीरभाव अत्यंत प्रदीप्तपणे दर्शविला गेला आहे. “व्यापाराचे (प्रयत्नाचे) दर्शन” आणि “चरणांशी लीन असलेले” असे हे वाक्य आहे. ၂၈၈. २८८. သိလေသော ဝစနာ’နေကာ-ဘိဓေယျေ’ကပဒါယုတံ; အဘိန္နပဒဝါကျာဒိ-ဝသာ တေဓာ’ယ’မီရိတော. एकाच पदाने युक्त असलेल्या आणि अनेक अर्थ व्यक्त करणाऱ्या वचनाला ‘श्लेष’ (सिलेस) म्हणतात. अभिन्नपद, भिन्नपद आणि वाक्य इत्यादींच्या भेदाने हा तीन प्रकारचा सांगितला आहे. ၂၈၈. သိလေသံ နိဒ္ဒိသတိ ‘‘သိလေသော’’ဣစ္စာဒိနာ. အနေကံ ဘိန္နမဘိဓေယျတ္ထော ယဿာတျနေကာဘိဓေယျံ. ဧကေန သမာနေန ပဒေန သရူပေန အာယုတမနွိတံ ယံ ဝစနံ ဝုတ္တီတိ အနုဝဒိတွာ သော သိလေသောတိ ဝိဓီယတေ, ယေန ကေနစိ [Pg.277] ရူပေန ဥပမာနောပမေယျလက္ခဏတ္ထာနံ သိလေသနတော. အယဉ္စေဝံလက္ခဏော သိလေသော တေဓာ ဤရိတော. ကထံ? အဘိန္နပဒဝါကျာဒိဝသာ အဘိန္နမေကံ ပဒံ သျာဒျန္တတျာဒျန္တရူပံ ယတြ, တမေဝ ဝါကျံ ဝါကျလက္ခဏောပေတတ္တာ. တံ အာဒိ ယေသံ, တေသံ ဝသာတိ အတ္ထော. २८८. “सिलेसो” इत्यादींद्वारे श्लेषाचे (सिलेस) निर्देश करतात. ज्याचे अनेक भिन्न अर्थ असतात ते ‘अनेकाभिधेय’. एकाच समान रूपाच्या पदाने युक्त असलेल्या वचनाला ‘श्लेष’ असे म्हणतात, कारण कोणत्याही रूपाने उपमान आणि उपमेय यांच्या अर्थांचे येथे श्लिष्टीकरण (एकत्रीकरण) होते. अशा लक्षणांनी युक्त असलेला श्लेष तीन प्रकारचा सांगितला आहे. कसा? अभिन्नपद, वाक्य इत्यादींच्या भेदाने. जेथे विभक्ती इत्यादी प्रत्ययांनी युक्त असलेले पद अभिन्न असते, आणि वाक्य हे वाक्याच्या लक्षणांनी युक्त असते, ते ज्यांच्या सुरुवातीला आहे त्यांच्या भेदाने, असा अर्थ आहे. ၂၈၈. ဣဒါနိ သိလေသာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘သိလေသော’’စ္စာဒိနာ. အနေကာဘိဓေယျံ ဧကပဒါယုတံ ဥဘယတ္ထ သာဓာရဏတ္တာ တုလျေန သဒ္ဒရူပေန ယုတ္တံ ယံ ဝစနံ အတ္ထိ, သော သိလေသော နာမ. သော ပန ယေန ကေနစိ သာဓမ္မရူပေန ဥပမာနောပမေယျဘူတာနမတ္ထာနံ သိလိဋ္ဌတ္တာ အညမညံ ဖုသိတွာ ဌိတတ္တာ သိလေသော နာမ. အယံ ဝုတ္တလက္ခဏော သိလေသော အဘိန္နပဒဝါကျာဒိဝသာ အကတဝိကာရာနံ သျာဒျန္တတျာဒျန္တပဒသမန္နာဂတာနံ ဝါကျလက္ခဏောပေတဝါကျာနံ ပဘေဒေန တေဓာ ဤရိတောတိ. အနေကမဘိဓေယျံ ယဿေတိ စ, ဧကဉ္စ တံ ပဒဉ္စေတိ စ, တေန အာယုတန္တိ စ, အဘိန္နာနိ ပဒါနိ ယသ္မိန္တိ စ, တဉ္စ တံ ဝါကျဉ္စာတိ စ, တံ အာဒိ ယေသံ အဘိန္နပဒဝါကျာနန္တိ စ, တေသံ ဝသော ဘေဒေါတိ စ ဝါကျံ. २८८. आता “सिलेसो” इत्यादींद्वारे श्लेषालंकार (सिलेसालंकार) दर्शवितात. दोन्ही अर्थांमध्ये साधारण असलेल्या समान शब्दरूपाने युक्त आणि अनेक अर्थ व्यक्त करणारे जे वचन असते, त्याला ‘श्लेष’ म्हणतात. तो कोणत्याही साधर्म्य रूपाने उपमान आणि उपमेय असलेल्या अर्थांच्या श्लिष्टतेमुळे (एकमेकांना स्पर्श करून राहिल्यामुळे) ‘श्लेष’ या नावाने ओळखला जातो. हा सांगितलेल्या लक्षणांचा श्लेष, अभिन्नपद आणि वाक्य इत्यादींच्या भेदाने, विकार न पावलेल्या विभक्ती व क्रियापद प्रत्ययांनी युक्त असलेल्या वाक्यांच्या प्रकारांनुसार तीन प्रकारचा सांगितला आहे. “ज्याचे अनेक अर्थ आहेत ते”, “एकच असलेले पद”, “त्याने युक्त असलेले”, “ज्यात पदे अभिन्न आहेत ते”, “तेच वाक्य”, “अभिन्नपद आणि वाक्य ज्यांच्या सुरुवातीला आहेत ते”, “त्यांचा भेद” असे हे वाक्य आहे. येथे दुसराही अर्थ श्लिष्ट होतो म्हणून तो श्लेष आहे. “भिन्नपदवाक्यश्लेष” इत्यादी देखील याच पद्धतीने समजून घ्यावे. ၂၈၉. २८९. အန္ဓန္တမဟရော ဟာရီ, သမာရုဠှော မဟောဒယံ; ရာဇတေ ရံသိမာလီ’ယံ, ဘဂဝါ ဗောဓယံ ဇနေ. अंधकार नष्ट करणारे, मनोहर, महाउदयाला (किंवा महान अभ्युदयाला) प्राप्त झालेले; हे किरणमाली (सूर्य) किंवा भगवान, लोकांना जागृत (किंवा प्रबुद्ध) करत शोभून दिसत आहेत. အဘိန္နပဒဝါကျသိလေသော. अभिन्नपदवाक्यश्लेष. ၂၈၉. ဥဒါဟရတိ ‘‘အန္ဓန္တမိ’’စ္စာဒိ. အယံ ဘဂဝါ သူရိယော မဟာမုနိ စ. တတ္ထ သူရိယော တာဝ အန္ဓန္တမဟရော ပကတိယန္ဓကာရောပဟာရီ, မဟာမုနိ တု အန္ဓကာရမောဟတမာပဟာရီ. ဟာရီ မနုညော သူရိယော မဟာမုနိ စ, သူရိယော [Pg.278] မဟောဒယံ မဟန္တံ ဥဒယံ ပဗ္ဗတံ သမာရုဠှော, မဟာမုနိ တု မဟောဒယံ မဟန္တမဗ္ဘုဒယံ သမ္မာသမ္ဗောဓိသမဓိဂမရူပံ သမာရုဠှော ပတ္တော. ရံသီနံ မာလာ, သာ အဿ အတ္ထီတိ ရံသိမာလီ, သူရိယော မဟာမုနိ စ. ဇနေ ဗောဓယံ နိဒ္ဒါပဂမနေန ကိလေသနိဒ္ဒါပဂမနေန ဝါ ပဗောဓယန္တော ရာဇတေ ဒိဗ္ဗတီတိ. အဘိန္နပဒဝါကျသိလေသော ဘင်္ဂေန ဝိနာ ယထာဝဋ္ဌာနမုဘယတ္ထ ပဒယောဇနတော. २८९. “अंधन्तमं” इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. हे भगवान म्हणजे सूर्य आणि महामुनी (बुद्ध) दोन्ही आहेत. त्यापैकी सूर्य हा नैसर्गिक अंधकार नष्ट करणारा आहे, तर महामुनी हे अज्ञानरूपी मोहाचा अंधकार नष्ट करणारे आहेत. ‘हारी’ म्हणजे मनोहर, सूर्य आणि महामुनी दोन्ही मनोहर आहेत. सूर्य हा ‘महोदय’ म्हणजे मोठ्या उदय पर्वतावर आरूढ झाला आहे, तर महामुनी हे ‘महोदय’ म्हणजे सम्यक्संबोधीच्या प्राप्तीरूप महान अभ्युदयाला प्राप्त झाले आहेत. किरणांची माला ज्याच्याजवळ आहे तो ‘किरणमाली’ (रश्मिमाली), सूर्य आणि महामुनी दोन्ही किरणमाली आहेत. लोकांना झोपेतून जागे करत किंवा क्लेशरूपी निद्रेतून प्रबुद्ध करत ते शोभून दिसत आहेत. पदांचे विभाजन न करता दोन्ही अर्थांमध्ये जशीच्या तशी पदयोजना होत असल्यामुळे हा ‘अभिन्नपदवाक्यश्लेष’ आहे. ၂၈၉. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘အန္ဓ’’မိစ္စာဒိနာ. မဟောဒယံ မဟန္တံ ဥဒယံ ပဗ္ဗတံ, သဗ္ဗညုပဒဝိသင်္ခါတမဟာဘိဝုဒ္ဓိံ ဝါ သမာရုဠှော အာရုဠှော, သမ္ပတ္တော ဝါ, အန္ဓန္တမဟရော စက္ကဝါဠဂဗ္ဘေ ပတ္ထဋပကတိဃနန္ဓကာရဿ, ဉာဏလောစနဿ အန္ဓကရဏတော အန္ဓကာရောတိ ဝုတ္တမောဟဿ ဝါ ဝိဒ္ဓံသကော, ဟာရီ တေနေဝ မနုညော ရံသိမာလီ အတ္တနော ရံသိမာလာယ သမန္နာဂတော ဇနေ ပကတိနိဒ္ဒါယ ကိလေသနိဒ္ဒါယ ဝါ သမန္နာဂတေ သတ္တေ ဗောဓယံ ဗောဓယန္တော အယံ ဘဂဝါ ဒိဝါကရော, ဆဟိ ဘဂဓမ္မေဟိ သမန္နာဂတော ဗုဒ္ဓေါ ဝါ ရာဇတေ ဒိဗ္ဗတီတိ. ဒွီသု ပက္ခေသု ပဒါနံ သမာနဘာဝေန ဌိတတ္တာ အယံ အဘိန္နပဒဝါကျသိလေသော. အန္ဓော စ သော တမော စေတိ စ, တံ ဟရတီတိ စ, မဟန္တော စ သော ဥဒယော ပဗ္ဗတော စာတိ စ, မဟန္တော စ သော ဥဒယော အဗ္ဘုဒယော အဘိဝုဒ္ဓိ စာတိ စ, ရံသီနံ မာလာတိ စ, သာ အဿ အတ္ထီတိ စ, ဘဂေါ သိရီ အဿ သူရိယဿ အတ္ထီတိ စ, ဘဂေါ သိရီကာမပယတနာဒိပ္ပကာရော အဿ သတ္ထုနော အတ္ထီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. အဘိန္နပဒဝါကျသင်္ခါတော သိလေသော. အပရောပိ အတ္ထော ဧတ္ထ သိလိဿတီတိ သိလေသော. ‘‘ဘိန္နပဒဝါကျသိလေသော’’တိအာဒိကမ္ပိ ဣမိနာ နယေန ဉာတဗ္ဗံ. २८९. आता “अंधं” इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. ‘महोदय’ म्हणजे मोठ्या उदय पर्वतावर आरूढ झालेला, किंवा सर्वज्ञतेच्या पदाने युक्त अशा महान अभिवृद्धीला प्राप्त झालेला. ‘अंधंतमहर’ म्हणजे चक्रवाळामध्ये पसरलेल्या नैसर्गिक दाट अंधकाराचा नाश करणारा, किंवा ज्ञानचक्षूला आंधळे करत असल्यामुळे अंधकार म्हटल्या गेलेल्या मोहाचा नाश करणारा. ‘हारी’ म्हणजे मनोहर, आपल्या किरणमालेने युक्त असलेला, लोकांना नैसर्गिक निद्रेतून किंवा क्लेशरूपी निद्रेत असलेल्या प्राण्यांना प्रबुद्ध करत असलेला हा भगवान सूर्य किंवा सहा भगधर्मांनी युक्त असलेले बुद्ध शोभून दिसत आहेत. दोन्ही बाजूंनी पदांची रचना समान राहिल्यामुळे हा ‘अभिन्नपदवाक्यश्लेष’ आहे. “तो अंधकाररूप मोह” आणि “त्याचा नाश करणारा”, “मोठा उदय पर्वत”, “महान अभ्युदय किंवा अभिवृद्धी”, “किरणांची माला” आणि “ती ज्याच्याजवळ आहे तो”, “ज्या सूर्याकडे ऐश्वर्य (भग) आहे तो”, “ज्या शास्त्यांकडे ऐश्वर्य, कीर्ती, काम, प्रयत्न इत्यादी प्रकारचा भग आहे तो” असा विग्रह आहे. हा ‘अभिन्नपदवाक्य’ नावाचा श्लेष आहे. येथे दुसराही अर्थ श्लिष्ट होतो म्हणून तो श्लेष आहे. “भिन्नपदवाक्यश्लेष” इत्यादी देखील याच पद्धतीने समजून घ्यावे. ၂၉၀. २९०. သာရဒါမလကာဘာသော, သမာနီတပရိက္ခယော; ကုမုဒါကရသမ္ဗောဓော, ပီဏေတိ ဇနတံ သုဓီ. शरद ऋतूतील निर्मल प्रकाशासारखा (किंवा निर्वाणरूपी सार देणारा आणि हस्तामलकासारखा ज्ञानप्रकाश असलेला), क्षय पावलेला (किंवा क्लेशांचा क्षय घडवून आणलेला); कुमुदांना (कमळांना) विकसित करणारा (किंवा पृथ्वीवरील लोकांना आनंदित करून चतुरार्यसत्याचा बोध करून देणारा) तो सुधी (चंद्र किंवा बुद्ध) जनसमूहाला आनंदित करतो. ဘိန္နပဒဝါကျသိလေသော. भिन्नपदवाक्यश्लेष. ၂၉၀. ‘‘သာရဒေ’’စ္စာဒိ. သုဓာ အဿ အတ္ထီတိ သုဓီ, စန္ဒော. သောဘနာ သဗ္ဗညုတညာဏရူပံ ဗုဒ္ဓိ အဿ အတ္ထီတိ သုဓီ, [Pg.279] သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ. သာရဒေါ သရဒကာလေ သမ္ဘူတော အမလကော နိမ္မလော အာဘာ သောဘာ ယဿ သော, စန္ဒော. ပရေသံ နိဗ္ဗာနသာရံ ဒဒါတီတိ သာရဒေါ, အမလကော အာဘာသော, အမလကဿ ဟတ္ထာမလကဿေဝ ဝါ အာဘာသော အသေသဉေယျာဝဗောဓော ယဿ သော, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ. သံ သမ္မာ ကမေနာနီယမာနတ္တာ အာနီတော ပရိက္ခယော ကဏှပက္ခော ယေန သော, စန္ဒော. သမံ ဝူပသမံ အာနီတော ပရိက္ခယော ဟာနိ ကိလေသသတ္တုကတော အဓိဂတက္ခယတ္တာ ယေနသော, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ. ကုမုဒါကရဿ ကုမုဒဿ ရံသိယာ သမ္ဗောဓိ ဝိကာသော ယဿ သော, စန္ဒော. ကုယာ ပထဝိယာ မုဒံ ပီတိံ ကရောတီတိ ကုမုဒါကရော, သမ္ဗောဓော စတုသစ္စာဝဗောဓော ယဿ သော, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ, ဇနတံ ဇနသမူဟံ ပီဏေတီတိ. အယံ ဘိန္နပဒဝါကျသိလေသော ဝုတ္တေန ဝိဓိနာ ပဒါနံ ဘိန္နတ္တာ. २९०. “सारद” इत्यादी. ज्याच्याकडे ‘सुधा’ (अमृत) आहे तो ‘सुधी’ म्हणजे चंद्र. ज्यांच्याकडे शोभन अशी सर्वज्ञताज्ञानाची बुद्धी आहे ते ‘सुधी’ म्हणजे सम्यक्संबुद्ध. ‘सारद’ म्हणजे शरद ऋतूत उत्पन्न झालेली, निर्मल अशी आभा (शोभा) ज्याची आहे तो चंद्र. इतरांना निर्वाणरूपी सार देतात म्हणून ‘सारद’, निर्मल आभास असलेले, किंवा हातावरील आवळ्याप्रमाणे (हस्तामलक) ज्यांना संपूर्ण ज्ञेय गोष्टींचा बोध झाला आहे ते सम्यक्संबुद्ध. ज्याच्याद्वारे कृष्णपक्षाचा क्षय योग्य क्रमाने आणला जातो तो चंद्र. ज्यांच्याद्वारे क्लेशरूपी शत्रूंचा क्षय करून शांतता (शम) प्राप्त केली गेली आहे ते सम्यक्संबुद्ध. कुमुदांच्या (कमळांच्या) समूहाचा आपल्या किरणांनी विकास (बोध) घडवून आणणारा तो चंद्र. ‘कु’ म्हणजे पृथ्वीवर ‘मुद’ म्हणजे आनंद निर्माण करणारे ते ‘कुमुदाकर’, आणि ज्यांना चतुरार्यसत्याचा बोध झाला आहे ते सम्यक्संबुद्ध, जनसमूहाला आनंदित करतात. सांगितलेल्या विधीनुसार पदांचे विभाजन होत असल्यामुळे हा ‘भिन्नपदवाक्यश्लेष’ आहे. ၂၉၀. ‘‘သာရ’’ဣစ္စာဒိ. သာရဒေါ သရဒကာလေ သမ္ဘူတော, ဝေနေယျာနံ နိဗ္ဗာနသာရဒါယကော ဝါ, အမလကာဘာသော နိမ္မလသောဘော, နိမ္မလကေတုမာလာသမန္နာဂတတ္တာ တာဒိသမတ္ထကသောဘော ဝါ, အထ ဝါ သာရဒါမလကာဘာသော သရဒကာလေ သဉ္ဇာတနိမ္မလသောဘော, ဝေနေယျာနံ နိဗ္ဗာနသာရဒါယကနိမ္မလသောဘော ဝါ, အထ ဝါ သာရဒအာမလကအာဘာသော နိဗ္ဗာနသာရဒါယကဟတ္ထာမလကသဒိသဉေယျာဝဗောဓော. သမာနီတပရိက္ခယော ကဏှပက္ခေ သုဋ္ဌု ကမေန အာနီတော ပရိက္ခယော ပရိပုဏ္ဏော ဝါ စန္ဒော, သမသင်္ခတသန္တိံ အာနီတကိလေသပရိဟာနိသင်္ခါတပရိက္ခယော ဝါ. ကုမုဒါကရသမ္ဗောဓော ကုမုဒဝိကာသနေန သမန္နာဂတော, ကုသင်္ခါတပထဝီနိဿိတာနံ ဇနာနံ ပီတိဇနနစတုသစ္စာဝဗောဓေန သမန္နာဂတော ဝါ. သုဓီ သုဓာသင်္ခါတအမတဝန္တတာယ [Pg.280] တန္နာမကော စန္ဒော, သုန္ဒရပညဝန္တတာယ တန္နာမကော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ဝါ. ဇနတံ ဇနသမူဟံ ပီဏေတီတိ. ဥဘယပက္ခေသု ပဒံ ဘိန္ဒိတွာ အတ္ထဿ ယောဇနတော အယံ ဘိန္နပဒဝါကျသိလေသော. သရဒေ ဘဝေါ သာရဒေါ, စန္ဒော. သာရံ ဒဒါတီတိ သာရဒေါ, ဘဂဝါ. ‘‘သာရဒေါ’’တိ ဣဒံ ‘‘အာဘာသော’’တိ ပဒဿ ဝိသေသနံ ဟောတိ. အမလကောနိမ္မလော အာဘာသော အဿ စန္ဒဿာတိ စ, ကမှိ မတ္ထကေ အာဘာသောတိ စ, အမလော ကာဘာသော အဿ သတ္ထုနောတိ စ, သာရဒေါ အမလကော အာဘာသော ယဿ စန္ဒဿ ဘဂဝတော ဝါတိ စ, သာရဒေါ အာမလကဿ ဝိယ အာဘာသော ဉေယျာဝဗောဓော အဿ ဘဂဝတောတိ စ, သံ သမ္မာ အာနီတော ပရိက္ခယော ကလာဟာနိ အနေနေတိ စ, သမံ ဝူပသမံ အာနီတော ပရိက္ခယော ဟာနိ ကိလေသသတ္တုတော ယေနေတိ စ, ကုမုဒါနံ အာကရောတိ စ, တေသံ သမ္ဗောဓော ဝိကာသော ယဿေတိ စ, မုဒံ ပီတိံ ကရောတီတိ မုဒါကရော. ကုယာ ပထဝိယာ မုဒါကရောတိ စ, သော သမ္ဗောဓော စတုသစ္စာဝဗောဓော ယဿေတိ စ, သုဓာ အမတံ အဿ စန္ဒဿ အတ္ထီတိ စ, သု သောဘနာ ဓီ ဗုဒ္ဓိ အဿ သမ္ဗုဒ္ဓဿာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २९०. “सार” इत्यादी. 'सारद' म्हणजे शरद ऋतूत उत्पन्न झालेला, किंवा विनेय (शिष्य) लोकांना निर्वाणरूपी सार देणारा. 'अमलकाभास' म्हणजे निर्मळ शोभा असलेला, किंवा निर्मळ केतुमाळेने (प्रभामंडळाने) युक्त असल्यामुळे तशा प्रकारच्या मस्तकावरील शोभेने युक्त असलेला. अथवा 'सारदामलकाभास' म्हणजे शरद ऋतूत उत्पन्न झालेली निर्मळ शोभा असलेला, किंवा विनेय लोकांना निर्वाणरूपी सार देणारी निर्मळ शोभा असलेला. अथवा 'सारद-आमलक-आभास' म्हणजे निर्वाणरूपी सार देणारा आणि हातावरील आवळ्याप्रमाणे ज्ञेय गोष्टींचे आकलन (अवबोध) करून देणारा. 'समानीतपरिक्षय' म्हणजे कृष्णपक्षात क्रमाने पूर्णपणे क्षयाला गेलेला किंवा पूर्ण झालेला चंद्र, अथवा सम (शांत) अशा निर्वाणरूपी शांतीला प्राप्त करून देणारा आणि क्लेशांच्या क्षयाने युक्त असलेला. 'कुमुदाकरसंबोध' म्हणजे कमळांच्या विकासाने (उमलण्याने) युक्त असलेला, किंवा 'कु' म्हणजे पृथ्वीवर आश्रित असलेल्या लोकांमध्ये प्रीती उत्पन्न करणाऱ्या चार आर्यसत्यांच्या अवबोधाने (ज्ञानाने) युक्त असलेला. 'सुधी' म्हणजे 'सुधा' नावाच्या अमृताने युक्त असल्यामुळे त्या नावाचा चंद्र, किंवा सुंदर प्रज्ञेने युक्त असल्यामुळे त्या नावाचे सम्यक्संबुद्ध. 'जनतम्' म्हणजे जनसमूहाला तृप्त करतो. दोन्ही बाजूंनी पदांचा विग्रह करून अर्थ लावल्यामुळे हा 'भिन्नपदवाक्यश्लेष' (भिन्नपदवाक्यसिलेस) आहे. शरद ऋतूत होणारा तो 'सारद' म्हणजे चंद्र. सार देणारा तो 'सारद' म्हणजे भगवान. 'सारद' हे 'आभास' या पदाचे विशेषण आहे. चंद्राची शोभा निर्मळ (अमल) आहे, आणि मस्तकावर (कम्-मध्ये) शोभा आहे, शास्त्यांची (बुद्धांची) शोभा निर्मळ आहे, चंद्र किंवा भगवान यांची शोभा शरद ऋतूतील आवळ्याप्रमाणे निर्मळ आहे, भगवंतांचे ज्ञेय वस्तूंचे आकलन शरद ऋतूतील आवळ्याप्रमाणे स्पष्ट आहे, ज्याच्याद्वारे कलेचा क्षय चांगल्या प्रकारे आणला गेला आहे, ज्याच्याद्वारे क्लेशरूपी शत्रूंचा क्षय किंवा उपशम केला गेला आहे, कमळांचा जो आकर (समूह) आहे आणि त्यांचा जो संबोध (विकास) आहे, जो मोद (आनंद) निर्माण करतो तो मुदाकर, 'कु' म्हणजे पृथ्वीवरील लोकांना आनंद देणारा आणि तो संबोध म्हणजे चार आर्यसत्यांचा अवबोध ज्याला झाला आहे तो, चंद्राकडे सुधा (अमृत) आहे, आणि सम्यक्संबुद्धांकडे सुंदर 'धी' (बुद्धी/प्रज्ञा) आहे, असा हा विग्रह आहे. ၂၉၁. २९१. သမာဟိတတ္တဝိနယော, အဟီနမဒမဒ္ဒနော; သုဂတော ဝိသဒံ ပါတု, ပါဏိနံ သော ဝိနာယကော. समाहितचित्त आणि संयमी (किंवा योग्य गतीने युक्त), गर्विष्ठांच्या गर्वाचे मर्दन करणारे; ते सुगत प्राण्यांचे स्पष्टपणे रक्षण करोत, जे प्राण्यांचे मार्गदर्शक (विनायक) आहेत. ဘိန္နာဘိန္နပဒဝါကျသိလေသော. भिन्नाभिन्नपदवाक्यश्लेष. ၂၉၁. ‘‘သမာဟိတေ’’စ္စာဒိ. သံ သမ္မာ အာဟိတော ပတိဋ္ဌာပိတော အတ္တဿ ဝိနယော ဝိနယနံ သဗ္ဗတ္ထ သဝိသယေ အပ္ပဋိဟတစာရဝသေန ယဿ သော, ဂရုဠော. ဝိနယနံ ပဝိဝိတ္တကာယစိတ္တပ္ပဝတ္တိဝသေန ဒမနံ ယဿ သော, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ. ဣတိ အဘိန္နပဒံ. အဟီနံ သပ္ပာနံ ဣနာ နာယကာ, တေသံ မဒံ မဒ္ဒတီတိ အဟီနမဒမဒ္ဒနော, ဂရုဠော. အဟီနာနမုတ္တမပုရိသာနမ္ပိ မဟာဗြဟ္မာဒီနံ မဒံ မဒ္ဒတီတိ အဟီနမဒမဒ္ဒနော, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ. သုန္ဒရံ ဂတံ ဂမနံ သမုဒ္ဒံ ဘိန္ဒိတွာ ဇလသင်္ဂမတော ပဌမမေဝဥဂ္ဂမနသာမတ္ထိယယောဂတော [Pg.281] ယဿ သော, ဂရုဠော. သုန္ဒရံ ဂမနမဿ နာဂဝိက္ကန္တစာရတ္တာ သုဂတော, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ. အဘိန္နပဒံ. သော ဝီနံ ပက္ခီနံ နာယကော, ဂရုဠော. ဝိသံ ဒဒါတီတိ ဝိသဒံ ပါဏိနံ နာဂလောကံ ပါတု အဟိံသနဝသေန ပါလယတု, သော ဝိနေတိ ဝေနေယျေတိ ဝိနာယကော, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ. ပါဏိနံ သကလသတ္တလောကံ ဝိသဒံ အသလ္လီနံ ပါတု. ဘိန္နာဘိန္နပဒဝါကျသိလေသောယံ ဝုတ္တနယေန ပဒါနံ ဥဘယမိဿတ္တာ. २९१. “समाहित” इत्यादी. ज्याने आपल्या विषयामध्ये अडथळा नसलेल्या गतीमुळे स्वतःचा विनय (संयम किंवा गती) चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित केला आहे तो गरुळ. काय आणि चित्त यांच्या एकांत प्रवृत्तीद्वारे ज्याचे दमन (संयम) झाले आहे ते सम्यक्संबुद्ध. हे 'अभिन्नपद' आहे. 'अहीन' म्हणजे सर्प, त्यांचे 'इन' म्हणजे नायक (राजे), त्यांच्या गर्वाचे मर्दन करतो तो 'अहीनमदमर्दन' म्हणजे गरुळ. 'अहीन' म्हणजे महाब्रह्मा इत्यादी उत्तम पुरुषांच्याही गर्वाचे मर्दन करतात ते 'अहीनमदमर्दन' म्हणजे सम्यक्संबुद्ध. समुद्राचे पाणी दुभंगून पाण्याच्या प्रवाहातून सर्वप्रथम वर येण्याच्या सामर्थ्यामुळे ज्याचे गमन सुंदर आहे तो गरुळ. नागविक्रांत गतीने चालत असल्यामुळे ज्यांचे गमन सुंदर आहे ते 'सुगत' म्हणजे सम्यक्संबुद्ध. हे 'अभिन्नपद' आहे. 'वी' म्हणजे पक्षी, त्यांचा जो नायक तो गरुळ. 'विष' देणारा जो 'विषद' म्हणजे नागलोक, त्याचे अहिंसेच्या द्वारे रक्षण करो, आणि जे विनेय (शिष्य) लोकांना सन्मार्गावर आणतात (विनेति) ते 'विनायक' म्हणजे सम्यक्संबुद्ध. ते संपूर्ण प्राणीलोकाचे स्पष्टपणे (विशदपणे) किंवा निर्भयपणे रक्षण करोत. पदांमधील दोन्ही प्रकारच्या (भिन्न आणि अभिन्न) मिश्रणामुळे सांगितलेल्या पद्धतीने हा 'भिन्नाभिन्नपदवाक्यश्लेष' आहे. ၂၉၁. ‘‘သမာဟိတေ’’စ္စာဒိ. သမာဟိတတ္တဝိနယော သမ္မာ အာဟိတာယ ဌပိတာယ သရီရဿ သဝိသယေ ဂတိယာ သမန္နာဂတော, သမ္မာ အာဟိတေန ဌပိတေန စိတ္တဒမနေန သမန္နာဂတော ဝါ, အဟီနမဒမဒ္ဒနော နာဂရာဇူနံ မဒမဒ္ဒနော, အဟီနာနံ ဥတ္တမာနံ ဗကဗြဟ္မာဒီနမ္ပိ မဒမဒ္ဒနော ဝါ, သုဂတော ပက္ခဝါတဝေဂေန သမုဒ္ဒဇလံ ဒွိဓာ ကတွာ တသ္မိံ ဇလေ အနေကီဘူတေယေဝ နာဂဘဝနံ ဂန္တွာ နာဂေ ဂဟေတွာ ဂမနေ သမတ္ထတ္တာ သုန္ဒရဂမနော, သမန္တဘဒ္ဒကအနေကပ္ပကာရဂမနော ဝါ, ဝိနာယကော ပက္ခီနံ နာယကော သော ဂရုဠရာဇာ ဝိသဒံ ဃောရဝိသတ္တာ ဝိသဒါယကံ ပါဏိနံ နာဂလောကံ ပါတု အဟိံသနဝသေန ပါလေတု. နော စေ, ဝိနာယကော ဝေနေယျေ ဝိနေန္တော သော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ပါဏိနံ သကလသတ္တလောကံ ဝိသဒံ ဝိသာရဒံ ကတွာ ပါတု အဟိတာပနယနဟိတောပနယနေန ရက္ခတူတိ. ဥဘယပက္ခေသု ‘‘အဟီနမဒမဒ္ဒနော’’ဣစ္စာဒိကေဟိ ဘိန္နေဟိ စ ‘‘သမာဟိတတ္တဝိနယော’’ဣစ္စာဒိကေဟိ အဘိန္နေဟိ စ ပဒေဟိ သမန္နာဂတတ္တာ အယံ ဘိန္နာဘိန္နပဒဝါကျသိလေသော. အတ္တဿ ဝိနယောတိ စ, သမာဟိတော အတ္တဝိနယော ယဿ ဂရုဠဿ တထာဂတဿ ဝါတိ စ, အဟီနံ ဣနာ နာယကာတိ စ, အဟီနာနံ နာဂရာဇူနံ မဒေါတိ စ, ဟီနေဟိ အညေ အဟီနာ ဥတ္တမာ, တေသံ မဒေါတိ [Pg.282] စ, တံ မဒ္ဒတီတိ စ, ဝီနံ ပက္ခီနံ နာယကောတိ စ, ဝေနေယျဇနေ ဝိနေတီတိ စ ဝါကျံ. ဒုတိယပက္ခေ ‘‘ဝိသဒ’’န္တိ ကြိယာဝိသေသနံ. २९१. “समाहित” इत्यादी. 'समाहितत्तविनय' म्हणजे शरीराच्या स्वतःच्या विषयांमधील गती चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित केलेल्या गतीने युक्त असलेला (गरुळ), किंवा चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित केलेल्या चित्तदमनाने युक्त असलेले (सम्यक्संबुद्ध). 'अहीनमदमर्दन' म्हणजे नागराजांच्या गर्वाचे मर्दन करणारा (गरुळ), किंवा 'अहीन' म्हणजे श्रेष्ठ अशा बकब्रह्मा इत्यादींच्याही गर्वाचे मर्दन करणारे (सम्यक्संबुद्ध). 'सुगत' म्हणजे पंखांच्या वाऱ्याच्या वेगाने समुद्राचे पाणी दुभंगून, त्या पाण्यात एकत्र असलेल्या नागभवनात जाऊन नागांना पकडून जाण्यास समर्थ असल्यामुळे सुंदर गमन करणारा (गरुळ), किंवा सर्व बाजूंनी कल्याणकारी अशा अनेक प्रकारच्या गमनाने युक्त असलेले (सम्यक्संबुद्ध). 'विनायक' म्हणजे पक्ष्यांचा नायक तो गरुळराज, घोर विषामुळे विष देणाऱ्या (विषद) प्राण्यांच्या नागलोकाचे अहिंसेच्या द्वारे रक्षण करो. अथवा, 'विनायक' म्हणजे विनेय लोकांना सन्मार्गावर आणणारे ते सम्यक्संबुद्ध संपूर्ण प्राणीलोकाला विशद (विशारद/भयमुक्त) करून त्यांचे रक्षण करोत, अहित दूर करून आणि हित प्रदान करून त्यांचे रक्षण करोत. दोन्ही बाजूंनी 'अहीनमदमर्दन' इत्यादी भिन्न पदांनी आणि 'समाहितत्तविनय' इत्यादी अभिन्न पदांनी युक्त असल्यामुळे हा 'भिन्नाभिन्नपदवाक्यश्लेष' आहे. स्वतःचा विनय असा विग्रह, किंवा ज्याचा आत्मसंयम समाहित आहे असा तो गरुळ किंवा तथागत. 'अहीन' म्हणजे सर्प आणि 'इन' म्हणजे नायक. 'अहीन' म्हणजे नागराजांचा गर्व. हीन लोकांशिवाय इतर ते 'अहीन' म्हणजे उत्तम लोक, त्यांचा गर्व, आणि त्याचे मर्दन करतो तो. 'वी' म्हणजे पक्षी, त्यांचा नायक. विनेय लोकांना सन्मार्गावर आणतो ते वाक्य. दुसऱ्या पक्षात 'विशदम्' हे क्रियाविशेषण आहे. ၂၉၂. २९२. ဝိရုဒ္ဓါဝိရုဒ္ဓါဘိန္န-ကမ္မာ နိယမဝါ ပရော; နိယမက္ခေပဝစနော, အဝိရောဓိ ဝိရောဓျ’ပိ. विरुद्धकर्म, अविरुद्धकर्म आणि अभिन्नकर्म श्लेष, तसेच दुसरा नियमवान श्लेष; नियमक्षेपवचन श्लेष, अविरोधी श्लेष आणि विरोधी श्लेष देखील आहेत. ၂၉၃. २९३. ဩစိတျသမ္ပောသကာဒိ, သိလေသော ပဒဇာဒိ’တိ ; ဧသံ နိဒဿနေသွေဝ, ရူပ’မာဝိဘဝိဿတိ. औचित्यसंपोषक इत्यादी श्लेष, आणि पदापासून उत्पन्न होणारे (पदजात) इत्यादी श्लेष; यांची रूपे (लक्षणे) यांच्या उदाहरणांमध्येच स्पष्ट होतील. ၂၉၂-၃. သိလေသဘေဒမညထာပိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘ဝိရုဒ္ဓ’’ဣစ္စာဒိ. ဝိရုဒ္ဓါနိ စာဝိရုဒ္ဓါနိ စ အညမဘိန္နဉ္စ, တာနိယေဝ ကမ္မာနိ ကြိယာနိ ယေသံ, တေ တယော သိလေသာ. နိယမော’ဝဓာရဏမသ္မိံ အတ္ထီတိ နိယမဝါ, ပရော အညော သိလေသောပိ. နိယမဿ အက္ခေပေါ နိသေဓနံ ယဿ, တံ ဝစနမဘိဓာနံ ယဿ, တာဒိသောပိ. နာဿ ဝိရောဓော အတ္ထီတျဝိရောဓိ, သောပိ. ဝိရောဓော အသင်္ဂတိ ဧတ္ထ ဝိဇ္ဇတီတိ ဝိရောဓိ, သောပိ. ဩစိတျံ သမ္ပောသေတီတိ ဩစိတျသမ္ပောသကော, သော အာဒိ ယဿ အလင်္ကာရန္တရဂေါစရဿ သိလေသဿ, သော ပဒတော ဇာတာဒိသိလေသောပိ. ဣတိတေ ပရေပိ သိလေသဘေဒါ သန္တိ. ဧသံ ယထာဝုတ္တာနံ နိဒဿနေသု ပယောဂေသွေဝ ရူပံ သဘာဝေါ လက္ခဏံ အာဝိဘဝိဿတီတိ. २९२-३. श्लेषाचे भेद इतर प्रकारेही दाखवण्यासाठी "विरुद्ध" इत्यादी म्हणाले. ज्यांचे कर्म म्हणजे क्रिया विरुद्ध, अविरुद्ध आणि अभिन्न आहेत, ते तीन श्लेष आहेत. 'नियम' म्हणजे अवधारण (निश्चिती) ज्यामध्ये आहे तो 'नियमवान' नावाचा दुसरा श्लेष आहे. नियमाचा आक्षेप म्हणजे निषेध ज्यामध्ये आहे, असे वचन (कथन) असणारा श्लेष देखील आहे. ज्यामध्ये विरोध नाही तो 'अविरोधी' श्लेष देखील आहे. ज्यामध्ये विरोध म्हणजे असंगती आढळते तो 'विरोधी' श्लेष देखील आहे. औचित्याचे पोषण करतो तो 'औचित्यसंपोषक' श्लेष, तो ज्याच्या सुरुवातीला आहे असा इतर अलंकारांच्या विषयात येणारा श्लेष, आणि पदापासून उत्पन्न होणारा (पदजात) इत्यादी श्लेष देखील आहेत. अशा प्रकारे श्लेषाचे इतरही भेद आहेत. या सांगितलेल्या श्लेषांचे रूप म्हणजे स्वभाव किंवा लक्षण त्यांच्या उदाहरणांमध्ये (प्रयोगांमध्ये) च स्पष्ट होईल. ၂၉၂-၃. အဝုတ္တသိလေသဝိသေသေ ဒဿေတုံ ဥဒ္ဒိသတိ ‘‘ဝိရုဒ္ဓါ’’ဣစ္စာဒိ. ဝိရုဒ္ဓါဝိရုဒ္ဓါဘိန္နကမ္မာ အပိ ဥဘယတ္ထဿ ဝိရုဒ္ဓေန စ အဝိရုဒ္ဓေန စ အဘိန္နေန စ ကမ္မေန သမနွိတာ တယော သိလေသာ စ, ပရော အညော နိယမဝါပိ အဝဓာရဏေန ယုတ္တသိလေသော စ, နိယမက္ခေပဝစနောပိ အဝဓာရဏဿ ပဋိသေဓပကာသကာဘိဓာနသိလေသော စ, အဝိရောဓိပိ ဥဘယပက္ခာဝိရောဓိသိလေသော စ, ဝိရောဓိအပိ ဥဘယတ္ထဿ [Pg.283] ဝိရောဓိသိလေသော စ, ပဒဇာဒိ ပဒေန ဇာတော ဝါကျေန ဇာတော ဩစိတျသမ္ပောသကာဒိသိလေသောပီတိ ဧသံ သိလေသာနံ နိဒဿနေသွေဝ နိဒဿနသင်္ခတဥဒါဟရဏေသွေဝ ရူပံ သရူပံ တေသံ လက္ခဏံ ဝါ အာဝိဘဝိဿတိ, နိဒဿိယမာနဥဒါဟရဏေနေဝ လက္ခဏဿ ဂမ္မမာနတ္တာ ဝိသုံ န ကထေဿာမီတိ အဓိပ္ပာယော. ဝိရုဒ္ဓါနိ စ အဝိရုဒ္ဓါနိ စ အဘိန္နဉ္စေတိ စ, တမေဝ ကမ္မံ ကြိယာ ယေသံ သိလေသာနမိတိ စ, နိယမော အဝဓာရဏံ အသ္မိံ အတ္ထီတိ စ, နိယမဿ အက္ခေပေါ ပဋိသေဓော အဿ အတ္ထီတိ စ, တံ ဝစနံ အဘိဓာနံ ယဿ သိလေသဿာတိ စ, နာဿ ဝိရောဓော အတ္ထီတိ စ, ဩစိတျံ သမ္ပောသေတီတိ စ, သော အာဒိ ယဿ ဥပမာသိလေသာဒိနောတိ စ, ပဒတော ဇာတောတိ စ, သော အာဒိ ယဿ ဝါကျဿာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २९२-३. न सांगितलेले श्लेषविशेष दाखवण्यासाठी "विरुद्ध" इत्यादी उद्दिष्ट केले आहे. दोन्ही अर्थांच्या विरुद्ध, अविरुद्ध आणि अभिन्न कर्माने (क्रियेने) युक्त असलेले 'विरुद्धकर्म', 'अविरुद्धकर्म' आणि 'अभिन्नकर्म' हे तीन श्लेष, आणि दुसरा 'नियमवान' म्हणजे अवधारणायुक्त श्लेष, तसेच 'नियमक्षेपवचन' म्हणजे अवधारणाचा प्रतिषेध (निषेध) प्रकट करणारे कथन असलेला श्लेष, दोन्ही पक्षांमध्ये विरोध नसलेला 'अविरोधी' श्लेष, दोन्ही अर्थांमध्ये विरोध असलेला 'विरोधी' शलेशन, आणि पदापासून उत्पन्न झालेला किंवा वाक्यापासून उत्पन्न झालेला 'औचित्यसंपोषक' इत्यादी श्लेष; या श्लेषांचे रूप म्हणजे त्यांचे स्वरूप किंवा लक्षण त्यांच्या उदाहरणांमध्येच (उदाहरणांच्या प्रयोगांमध्येच) स्पष्ट होईल. कारण उदाहरणांवरूनच लक्षण समजून येत असल्यामुळे मी ते स्वतंत्रपणे सांगणार नाही, असा अभिप्राय आहे. विरुद्ध, अविरुद्ध आणि अभिन्न असा विग्रह, आणि तीच क्रिया ज्या श्लेषांची आहे असा विग्रह. 'नियम' म्हणजे अवधारण ज्यामध्ये आहे, नियमाचा आक्षेप म्हणजे प्रतिषेध ज्याला आहे, आणि ते वचन (कथन) ज्या श्लेषाचे आहे, ज्याला विरोध नाही, जे औचित्याचे पोषण करते, तो ज्याच्या सुरुवातीला आहे असा उपमाश्लेष इत्यादी, पदापासून उत्पन्न झालेला, आणि तो ज्याच्या सुरुवातीला आहे असे वाक्य, असा हा विग्रह आहे. ဝိရုဒ္ဓကမ္မသိလေသ विरुद्धकर्मश्लेष ၂၉၄. २९४. သဝသေ ဝတ္တယံ လောကံ, အခိလံ ကလ္လဝိဂ္ဂဟော ; ပရာဘဝတိ မာရာရိ, ဓမ္မရာဇာ ဝိဇမ္ဘတေ. संपूर्ण जगाला आपल्या वशात ठेवणारे, सुंदर शरीर असलेले (किंवा सुंदर कलह करणारे); मारारी (मारशत्रू) पराभूत होतात आणि धर्मराज (बुद्ध) विजयी होतात. ၂၉၄. တတော ကမေန တေဒဿီယန္တိ ‘‘သဝသေ’’ဣစ္စာဒိ. အခိလံ လောကံ သဝသေ ဝတ္တယံ မာရာရိ ဓမ္မရာဇာ စ, ကလ္လော မနုညော ဝိဂ္ဂဟော ကလဟော ယဿ မာရာရိနော, ဝိဂ္ဂဟော သရီရသမ္ပဒါ ယဿ ဓမ္မရာဇဿ, တေသု မာရာရိ ပရာဘဝတိ ပရာဘဝမပေတိ ဗောဓိယံ ပဋိလဒ္ဓပရာဇယဝသေန, ဓမ္မရာဇာ သမန္တဘဒ္ဒေါ တု ဝိဇမ္ဘတေ လောကတ္တယဗျာပိသမုလ္လပိတဝိဇယဒ္ဓနိပဝတ္တိဝသေန သမံ ဘဝတီတိ အယံ ဝိရုဒ္ဓကမ္မသိလေသော ပရာဘဝဝိဇမ္ဘနာနမညောညဝိရောဓတော. २९४. त्यानंतर क्रमाने ते दाखवले जातात, "सवसे" इत्यादी. संपूर्ण जगाला आपल्या वशात ठेवणारे मारारी आणि धर्मराज; ज्या मारारीचा कलह (विग्रह) 'कल्ल' म्हणजे सुंदर आहे, आणि ज्या धर्मराजाचा विग्रह म्हणजे शरीरसंपदा सुंदर आहे; त्या दोघांमध्ये मारारी पराभूत होतो, म्हणजे बोधीच्या ठिकाणी मिळालेल्या पराजयामुळे पराभवाला प्राप्त होतो, आणि धर्मराज (बुद्ध) मात्र तिन्ही लोकांमध्ये पसरलेल्या विजयाच्या घोषणेमुळे विजयी होतात (विस्तारतात). पराभव आणि विजय (विजृंभण) या क्रियांच्या परस्परांमधील विरोधामुळे हा 'विरुद्धकर्मश्लेष' आहे. ၂၉၄. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန ဥဒါဟရတိ ‘‘သဝသေ’’ဣစ္စာဒိ. အခိလံ လောကံ သဝသေ ဝတ္တယံ အနတ္ထေ ယုဉ္ဇနတော အတ္တနော ဝသေ ဝတ္တယန္တော, နော စေ, သကလလောကံ ဟိတေ [Pg.284] ယုဉ္ဇနတော အတ္တနော ဝသေ ဝတ္တယန္တော ကလ္လဝိဂ္ဂဟော မနုညကလဟော, နော စေ, မနုညသရီရသမ္ပတ္တိယုတ္တော မာရာရိ ပရာဘဝတိ ဗောဓိမူလေ လဒ္ဓပရာဇယဝသေန ပရာဘဝံ ပါပုဏာတိ, ဓမ္မရာဇာ တထာဂတော ပန ဝိဇမ္ဘတေ လောကတ္တယေ ပတ္ထဋဇယဃောသဝသေန ဝိဇမ္ဘတီတိ. ပရာဘဝနဝိဇမ္ဘနကြိယာနံ အညမညဝိရုဒ္ဓတ္တာ အယံ ဝိရုဒ္ဓကမ္မသိလေသော နာမ. သဿ အတ္တနော ဝသော ဣဿရိယမိတိ စ, ကလ္လော မနုညော ဝိဂ္ဂဟော ဝိဝါဒေါ ဒေဟော ဝါ ယဿေတိ စ ဝါကျံ. २९४. आता उद्देशाच्या क्रमाने उदाहरण देतात, "सवसे" इत्यादी. संपूर्ण जगाला आपल्या वशात ठेवणारा, म्हणजे अनिष्ट गोष्टींमध्ये जोडल्यामुळे स्वतःच्या वशात ठेवणारा, अथवा संपूर्ण जगाला हितामध्ये जोडल्यामुळे स्वतःच्या वशात ठेवणारे; सुंदर कलह करणारा, अथवा सुंदर शरीरसंपत्तीने युक्त असलेले; मारारी बोधीवृक्षाच्या मुळाशी मिळालेल्या पराजयामुळे पराभूत होतो, म्हणजे पराभवाला प्राप्त होतो; परंतु धर्मराज तथागत तिन्ही लोकांमध्ये पसरलेल्या विजयघोषामुळे विजयी होतात (विस्तारतात). पराभव आणि विजय (विजृंभण) या क्रियांच्या परस्परांमधील विरोधामुळे याला 'विरुद्धकर्मश्लेष' म्हणतात. स्वतःचा वश म्हणजे ऐश्वर्य असा विग्रह, आणि 'कल्ल' म्हणजे सुंदर कलह किंवा शरीर ज्याचे आहे ते वाक्य. အဝိရုဒ္ဓကမ္မသိလေသ अविरुद्धकर्मश्लेष ၂၉၅. २९५. သဘာဝမဓုရံ ပုည-ဝိသေသောဒယသမ္ဘဝံ; သုဏန္တိ ဝါစံ မုနိနော, ဇနာ ပဿန္တိ စာ’မတံ. स्वभावानेच मधुर असलेली आणि पुण्यविशेषाच्या उदयाने उत्पन्न झालेली; मुनींची वाणी लोक ऐकतात आणि अमृताला (निर्वाणाला) पाहतात. ၂၉၅. ‘‘သဘာဝေ’’စ္စာဒိ. သဘာဝေနေဝ မဓုရာ ပိယာ ဝါစာ, မဓုရံ အမတံ, ပုညဝိသေသဿ ဥဒယော အဘိဝဍ္ဎိ, တေန သမ္ဘဝေါ, ယဿ ဝါ တံ, မုနိနော ဝါစံ သဒ္ဓမ္မသင်္ခါတံ ဇနာ သုဏန္တိ, တဿယံ အမတဉ္စ ပဿန္တီတိ အယမဝိရုဒ္ဓကမ္မသိလေသော သဝနဒဿနာနံ အဝိရုဒ္ဓတ္တာတိ. २९५. “स्वभावे” इत्यादी. स्वभावानेच मधुर म्हणजे प्रिय असलेली वाणी, मधुर असलेले अमृत, पुण्यविशेषाचा उदय म्हणजे अभिवृद्धी, त्याने उत्पन्न झालेली, किंवा ज्या मुनींची सद्धम्मरूपी वाणी लोक ऐकतात आणि त्याद्वारे अमृताला (निर्वाणाला) पाहतात. ऐकणे आणि पाहणे या क्रियांच्या परस्परांमध्ये विरोध नसल्यामुळे हा 'अविरुद्धकर्मश्लेष' आहे. ၂၉၅. ‘‘သဘာဝ’’မိစ္စာဒိ. သဘာဝမဓုရံ ‘‘ဝါစာမဓုရံ ကရိဿာမီ’’တိ ကတ္တဗ္ဗပယောဂံ ဝိနာပိ မဓုရတ္တာ ပကတိမဓုရံ, နော စေ, ကေနစိ ပစ္စယေန အနုပ္ပန္နတ္တာ သင်္ခရဝိသေသံ ဝိနာပိ ပကတိပဏီတံ, ပုညဝိသေသောဒယသမ္ဘဝံ ပုညဝိသေသဒေသကဿ မုနိနော ကဿစိ ကုသလဝိသေသဿ အဘိဝုဒ္ဓိယာ သမ္ဘူတံ, နော စေ, ဝေနေယျဇနာနံ နိဗ္ဗာနာဓိပ္ပာယေန ကတကုသလဝိသေသဿ အဘိဝုဒ္ဓိယာ အာရမ္မဏတ္တေန ပဋိလဒ္ဓံ မုနိနော ဝါစံ သဒ္ဓမ္မသင်္ခါတံ သုဏန္တိ, အမတံ နိဗ္ဗာနဉ္စ ဇနာ ဝေနေယျဇနာ ပဿန္တီတိ. သဝနဒဿနကြိယာနံ အညမညာဝိရုဒ္ဓတ္တာ အယံ အဝိရုဒ္ဓကမ္မသိလေသော. သဿ အတ္တနော ဘာဝေါတိ [Pg.285] စ, တေန မဓုရာ, မဓုရမိတိ စ, ပုညမေဝ ဝိသေသောတိ စ, တဿောဒယောတိ စ, တေန သမ္ဘဝေါ ယဿေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २९५. “स्वभावम्” इत्यादी. 'स्वभावमधुर' म्हणजे "मी वाणी मधुर करीन" अशा प्रकारच्या प्रयत्नाशिवाय मधुर असल्यामुळे निसर्गतःच मधुर, अथवा कोणत्याही प्रत्ययाने (कारणाने) उत्पन्न न झाल्यामुळे कोणत्याही संस्काराशिवाय निसर्गतःच प्रणीत (उत्कृष्ट); 'पुण्यविशेषोदयसंभव' म्हणजे पुण्यविशेषाचा उपदेश करणाऱ्या मुनींच्या कोणत्यातरी कुशलविशेषाच्या अभिवृद्धीने उत्पन्न झालेली, अथवा विनेय लोकांच्या निर्वाणाच्या उद्देशाने केलेल्या कुशलविशेषाच्या अभिवृद्धीने आलंबन म्हणून प्राप्त झालेली मुनींची सद्धम्मरूपी वाणी लोक ऐकतात, आणि विनेय लोक अमृत म्हणजे निर्वाणाला पाहतात. ऐकणे आणि पाहणे या क्रियांच्या परस्परांमध्ये विरोध नसल्यामुळे हा 'अविरुद्धकर्मश्लेष' आहे. स्वतःचा भाव असा विग्रह, आणि त्याने मधुर, मधुर असा विग्रह, पुण्य हाच विशेष, आणि त्याचा उदय, आणि त्याने ज्याची उत्पत्ती झाली आहे असा विग्रह आहे. အဘိန္နကမ္မသိလေသ अभिन्नकर्मश्लेष ၂၉၆. २९६. အန္ဓကာရာပဟာရာယ,သဘာဝမဓုရာယ စ; မနော ပီဏေတိ ဇန္တူနံ,ဇိနော ဝါစာယ ဘာယ စ. अंधकार दूर करण्यासाठी आणि स्वभावाने मधुर असणाऱ्या आपल्या वाणीने व प्रभेने (तेजाने) जिन (बुद्ध) प्राण्यांचे मन प्रसन्न करतात. ၂၉၆. ‘‘အန္ဓကာရေ’’စ္စာဒိ. အန္ဓကာရံ မောဟသင်္ခါတံ ပကတိအန္ဓကာရံ ဝါ အပဟရတီတိ အန္ဓကာရာပဟာရာ, ဝါစာ, ဘာ စ. တာယ သဘာဝဘာသာယ, သောဘာယ စ ဇိနော ဇန္တူနံ မနော စိတ္တံ ပီဏေတီတိ အယမဘိန္နကမ္မသိလေသော ပီဏနလက္ခဏာယေကာယ ကြိယာယ ဝါစာယ ဘာယ စ သမ္ပန္နောတိ. २९६. "अंधकारे" इत्यादी. मोह नावाचा अंधकार किंवा नैसर्गिक अंधकार दूर करणारी ती 'अंधकारापहार' (अंधकार दूर करणारी) वाणी आणि प्रभा (तेज) होय. त्या स्वाभाविक प्रकाशाने आणि शोभेने जिन (बुद्ध) प्राण्यांचे मन (चित्त) प्रसन्न करतात. प्रसन्न करण्याच्या एकाच क्रियेने वाणी आणि प्रभा या दोन्ही गोष्टी युक्त असल्यामुळे हा 'अभिन्नकर्मश्लेष' (अलंकार) आहे. ၂၉၆. ‘‘အန္ဓကာရာ’’ဣစ္စာဒိ. အန္ဓကာရာပဟာရာယ မောဟန္ဓကာရံ ပကတိအန္ဓကာရံ ဝါ အပဟရဏာယ သဘာဝမဓုရာယ စ သဘာဝတော ကဏ္ဏသုခါယ, သဘာဝတော နေတ္တာဘိရာမာယ ဝါစာယ ဘာယ သရီရကန္တိယာ စ ဇိနော ဇန္တူနံ မနော စိတ္တံ ဓိနောတိ ပီဏေတီတိ. ပီဏယနသဘာဝါယ ဧကာယ ကြိယာယ သဒ္ဓိံ ကရဏဘူတာနံ ဒွိန္နံ ဝါစာဘာနံ ယောဇိတတ္တာ အယံ အဘိန္နကမ္မသိလေသော. အန္ဓကာရ’မပဟရတီတိ စ, သဘာဝေန မဓုရာတိ စ ဝါကျံ. २९६. "अंधकारा" इत्यादी. मोहरूपी अंधकार किंवा नैसर्गिक अंधकार दूर करण्यासाठी, आणि स्वभावाने मधुर म्हणजे कानांना सुखद असणाऱ्या वाणीने आणि डोळ्यांना आनंद देणाऱ्या शरीराच्या प्रभेने (कांतीने) जिन प्राण्यांचे मन (चित्त) तृप्त करतात, प्रसन्न करतात. प्रसन्न करण्याच्या स्वभावाच्या एकाच क्रियेसोबत साधनभूत असणाऱ्या वाणी आणि प्रभा या दोन्ही गोष्टी जोडल्या गेल्या असल्यामुळे हा 'अभिन्नकर्मश्लेष' आहे. "अंधकार दूर करतो" आणि "स्वभावाने मधुर" असे हे वाक्य आहे. နိယမဝန္တသိလေသ नियमवत् श्लेष ၂၉၇. २९७. ကေသက္ခီနံဝ ကဏှတ္တံ, သမူနံယေဝ ဝင်္ကတာ; ပါဏိပါဒါဓရာနံဝ, မုနိန္ဒဿာ’တိရတ္တတာ. मुनींद्रांच्या केवळ केस आणि डोळ्यांमध्येच काळेपणा आहे (मनात नाही); केवळ भुवयांमध्येच वक्रता (वाकडेपणा) आहे (स्वभावात नाही); आणि केवळ हात, पाय व ओठांमध्येच अति-रक्तता (लाली) आहे (चित्तात राग/आसक्ती नाही). ၂၉၇. ‘‘ကေသိ’’စ္စာဒိ. [Pg.286] ကဏှတ္တံ ကေသက္ခီနံယေဝ, န မနသိ, ကဏှတ္တဂုဏော ပါပတ္တဉ္စ သိလိဋ္ဌံ. ဝင်္ကတာ ဘမူနံယေဝ, န အဇ္ဈာသယေ, ဝင်္ကတာနတတ္တံ သဌတ္တဉ္စ သိလိဋ္ဌံ. အတိရတ္တတာ ပါဏိပါဒါဓရာနံယေဝ, န စိတ္တေ, အတိရတ္တတာဂုဏော ရာဂေါ စ သိလိဿတေ. ‘‘မုနိန္ဒဿာ’’တိ ‘‘ကဏှတ္တ’’န္တိအာဒီသု သဗ္ဗတ္ထ သမ္ဗန္ဓနီယံ. နိယမဝါ သိလေသော ကေသက္ခီနံဝါတိ အဝဓာရဏပ္ပယောဂါတိ. २९७. "केसी" इत्यादी. काळेपणा केवळ केस आणि डोळ्यांमध्येच आहे, मनात नाही; येथे काळेपणाचा गुण आणि पापीपणा (दुष्टपणा) हे श्लिष्ट (एकत्रित) आहेत. वक्रता केवळ भुवयांमध्येच आहे, आशयात (स्वभावात) नाही; येथे वाकडेपणा आणि शठता (लबाडी) हे श्लिष्ट आहेत. अति-रक्तता (लाली) केवळ हात, पाय आणि ओठांमध्येच आहे, चित्तात नाही; येथे लाल रंगाचा गुण आणि राग (आसक्ती) हे श्लिष्ट आहेत. "मुनींद्रांच्या" हा शब्द "काळेपणा" इत्यादी सर्व ठिकाणी जोडला जावा. "केवळ केस आणि डोळ्यांमध्येच" अशा प्रकारच्या अवधारण (नियमन) प्रयोगामुळे हा 'नियमवंत श्लेष' आहे. ၂၉၇. ‘‘ကေသက္ခီန’’မိစ္စာဒိ. မုနိန္ဒဿ ကဏှတ္တံ ကေသက္ခီနံ ဧဝ ဟောတိ, ကဏှတ္တသင်္ခတမကုသလံ န စိတ္တေ. ဝင်္ကတာ ဘမူနံယေဝ, နဇ္ဈာသယေ. အတိရတ္တတာ ပါဏိပါဒါဓရာနံ ဧဝ, န ကေသုစိ ဝတ္ထူသူတိ. ‘‘ကေသက္ခီနံဝါ’’တိအာဒီသု နိယမသင်္ခါတအဝဓာရဏပဒဿ ဝိဇ္ဇမာနတ္တာ ကဏှဘာဝေန သဒ္ဓိံ ပါပတ္တဿ စ, ဝင်္ကဂုဏေန သဒ္ဓိံ သာဌေယျဿ စ, ရတ္တဂုဏေန သဒ္ဓိံ ရာဂဿ စ သိလိဋ္ဌတ္တာ အယံ နိယမဝန္တသိလေသော နာမ. ကေသာနိ စ အက္ခီနိ စေတိ စ, ကဏှဿ ဘာဝေါတိ စ, ဝင်္ကဿ ဘာဝေါတိ စ, ပါဏယော စ ပါဒါနိ စ အဓရာနိ စာတိ စ, အတိရတ္တဿ ဘာဝေါတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. २९७. "केसक्खीनं" इत्यादी. मुनींद्रांचा काळेपणा केवळ केस आणि डोळ्यांमध्येच असतो, काळेपणा नावाचे अकुशल त्यांच्या चित्तात नसते. वक्रता केवळ भुवयांमध्येच असते, आशयात (स्वभावात) नाही. अति-रक्तता केवळ हात, पाय आणि ओठांमध्येच असते, इतर कोणत्याही वस्तूंमध्ये नाही. "केस आणि डोळ्यांमध्येच" इत्यादी शब्दांत नियमन दर्शवणारा अवधारणवाचक शब्द असल्यामुळे आणि काळेपणासोबत पापीपणाचा, वक्रतेसोबत शठतेचा (लबाडीचा) आणि लाल रंगासोबत रागाचा (आसक्तीचा) श्लेष साधला गेल्यामुळे याला 'नियमवंत श्लेष' असे म्हणतात. "केस आणि डोळे", "काळेपणा", "वक्रता", "हात, पाय आणि ओठ" आणि "अति-रक्तता" असा याचा विग्रह आहे. နိယမက္ခေပသိလေသ नियमक्षेप श्लेष ၂၉၈. २९८. ပါဏိပါဒါဓရေသွေဝ, သာရာဂေါ တဝ ဒိဿတိ; ဒိဿတေ သော’ယ’မထ ဝါ, နာထ သာဓုဂုဏေသွပိ. हे नाथ! आपली अति-रक्तता (लाली/आसक्ती) केवळ आपले हात, पाय आणि ओठांवरच दिसते; किंवा मग ती सज्जनांच्या गुणांवरही दिसून येते. ၂၉၈. ‘‘ပါဏိ’’စ္စာဒိ. နာထ တဝ ပါဏိပါဒါဓရေသွေဝ သာရာဂေါ သောဘနော ရတ္တဝဏ္ဏော ဒိဿတိ, န စိတ္တေ, သာရာဂေါ ရတ္တဝဏ္ဏော ဆန္ဒရာဂေါ စာတိ သိလိဋ္ဌံ. အယံ နိယမော အက္ခိပျတေ. အထ ဝါ ကထံ နိယမျတေ, ယတော သော အယံ သာရာဂေါ သာဓူနံ ဂုဏေသွေဝ ဝိရာဂလက္ခဏော ဒိဿတေ ဣတိ. တသ္မာ ကထမဝဓာရီယတီတိ နိယမက္ခေပဝစနော သိလေသောယံ. २९८. "पाणि" इत्यादी. हे नाथ! आपली अति-रक्तता (सुंदर लाल रंग) केवळ आपले हात, पाय आणि ओठांवरच दिसते, चित्तात नाही; येथे 'साराग' म्हणजे लाल रंग आणि छंदराग (आसक्ती) हे श्लिष्ट आहेत. या नियमाचा येथे आक्षेप (अस्वीकार) केला जातो. किंवा मग नियम कसा लावता येईल, कारण हा 'साराग' (अनुराग/प्रेम) सज्जनांच्या गुणांवरही विराग-लक्षण रूपाने दिसून येतो. म्हणून याचे अवधारण (नियमन) कसे करता येईल? या कारणाने हा 'नियमक्षेपवाचक श्लेष' आहे. ၂၉၈. ‘‘ပါဏိ’’စ္စာဒိ. [Pg.287] ဟေ နာထ တဝ သာရာဂေါ သောဘနော ရတ္တဝဏ္ဏော ပါဏိပါဒါဓရေသွေဝ ဒိဿတိ, စိတ္တေ လောဘော ပန န ဒိဿတိ. အထ ဝါ သော အယံ သာရာဂေါ ကတ္တုကမျတာကုသလစ္ဆန္ဒဘူတော သာဓုဂုဏေသွပိ သဇ္ဇနာနံ သီလာဒိဂုဏေသုပိ ဒိဿတိ. ‘‘ဧဝါ’’တိ ဒဿိတနိယမဿ ပဋိသေဓကေန ‘‘အထ ဝါ’’တိ ဝစနေန သမန္နာဂတတ္တာ ရတ္တဝဏ္ဏသင်္ခါတရာဂေန လောဘဿ သိလိဋ္ဌတ္တာ စ အယံ နိယမက္ခေပဝစနသိလေသော. သံ သောဘနော ရာဂေါတိ ဝိဂ္ဂဟော. २९८. "पाणि" इत्यादी. हे नाथ! आपली अति-रक्तता (सुंदर लाल रंग) केवळ आपले हात, पाय आणि ओठांवरच दिसते, चित्तात मात्र लोभ दिसत नाही. किंवा मग हा 'साराग' (करावयाच्या इच्छेचा कुशल छंद) सज्जनांच्या शील इत्यादी गुणांवरही दिसून येतो. 'एव' (केवळ) या शब्दाने दर्शवलेल्या नियमाचा निषेध करणाऱ्या 'अथ वा' (किंवा मग) या शब्दाने युक्त असल्यामुळे आणि लाल रंगाच्या श्लेषाने लोभाचा श्लेष साधला गेल्यामुळे हा 'नियमक्षेपवाचक श्लेष' आहे. "सुंदर असा राग (रंग/अनुराग)" असा याचा विग्रह आहे. အဝိရောဓိသိလေသ अविरोधी श्लेष ၂၉၉. २९९. သလက္ခဏော’တိသုဘဂေါ,တေဇဿီ နိယတောဒယော; လောကေသော ဇိတသံက္လေသော,ဝိဘာတိ သမဏိဿရော. लक्षणांनी युक्त, अत्यंत भाग्यवान (सौंदर्यवान), तेजस्वी, निरंतर उदय पावणारे, लोकांचे स्वामी (लोकेश), संक्लेशांवर विजय मिळवणारे श्रमणेश्वर (श्रमणांचे स्वामी बुद्ध) शोभून दिसतात. ၂၉၉. ‘‘သလက္ခဏော’’ဣစ္စာဒိ. သဟ လက္ခဏေန သသရူပေန ဒွတ္တိံ သဝရပုရိသလက္ခဏေန ဝါ ဝတ္တမာနော သလက္ခဏော, စန္ဒော မုနိန္ဒော စ, အတိသုဘဂေါ သော စ, တေဇဿီ သူရိယော ပဘာဝိသေသယုတ္တော စ, နိယတော ပတိဒိနမုဒယော ပဘာလက္ခဏော ယဿ သော နိယတောဒယော, သူရိယော, နိယတော ထိရော ဥဒယော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ သမ္ဗောဓိရူပေါ ယဿ သော နိယတောဒယော, မုနိန္ဒော, လောကေသော ဗြဟ္မာ မုနိန္ဒော စ, ဇိတော သံက္လေသော ဈာနရတိဝသေန ကာယစိတ္တာဗာဓော ယေန သော, ဗြဟ္မာ, ဇိတော သံက္လေသော ဒသဝိဓော အဂ္ဂမဂ္ဂညာဏလာဘာ ယေန သော. သော မဏီနံ ဣဿရော ဥပမဏိ, သမဏာနံ ဣဿရော မုနိန္ဒော ဝိဘာတီတိ ယောဇ္ဇံ. အယမဝိရောဓိသိလေသော လက္ခဏသုဘဂါဒီနမုဘယတ္ထာပိ အဗျဝဟိတတ္တာ. २९९. "सलक्खणो" इत्यादी. स्वतःच्या रूपाने किंवा बत्तीस महापुरुष लक्षणांनी युक्त असणारा तो 'सलक्षण' (चंद्र आणि मुनींद्र); तो अत्यंत भाग्यवान (सौंदर्यवान) देखील आहे. 'तेजस्वी' म्हणजे सूर्य किंवा विशेष प्रभेने युक्त असणारा. 'नित्योदय' म्हणजे ज्याचा प्रकाशाचा उदय दररोज निश्चित आहे असा सूर्य, किंवा ज्यांचा सम्यक्संबुद्ध पदाचा (संबोधीचा) उदय निश्चित व स्थिर आहे असे मुनींद्र. 'लोकेश' म्हणजे ब्रह्मा आणि मुनींद्र. 'जितसंक्लेश' म्हणजे ध्यानाच्या आनंदाने ज्यांनी शारीरिक व मानसिक पीडा जिंकली आहे असा ब्रह्मा, किंवा ज्यांनी अग्र मार्गज्ञानाच्या (अर्हत मार्गाच्या) प्राप्तीने दहा प्रकारच्या संक्लेशांवर विजय मिळवला आहे असे मुनींद्र. ते मण्यांचे स्वामी (उत्कृष्ट मणी) किंवा श्रमणांचे स्वामी (मुनींद्र) शोभून दिसतात, अशी योजना करावी. लक्षण, सौभाग्य इत्यादी दोन्ही अर्थांमध्ये कोणताही विरोध नसल्यामुळे हा 'अविरोधी श्लेष' आहे. ၂၉၉. ‘‘သလက္ခဏော’’ဣစ္စာဒိ. [Pg.288] သလက္ခဏော လက္ခဏေန သဟိတော, အတိသုဘဂေါ အတိသုန္ဒရာယ လက္ခိယာ သမန္နာဂတော, နော စေ, ဒွတ္တိံသမဟာပုရိသလက္ခဏေဟိ သဟိတော အတိဝိယ သောဘာဒီဟိ ယုတ္တော, တေဇဿီ အန္ဓကာရဝိဓမနသင်္ခတမဟာနုဘာဝေန ယုတ္တော, နိယတောဒယော ပတိဒိနံ ပုဗ္ဗဏှကာလေ နိယမိတဂဂနုဂ္ဂမနော, နော စေ, နိရန္တရပဝတ္တဗုဒ္ဓတေဇသာ ယုတ္တော ထိရသဗ္ဗညုပဒဝိသင်္ခါတာဘိဝုဍ္ဎိယာ သမန္နာဂတော, လောကေသော ဗြဟ္မဘူတော, ဇိတသံက္လေသော ဈာနပီတိယာ ဝိဇိတကာယစိတ္တဒရထော, နော စေ, တိလောကဿ ဣဿရဘူတော စတုတ္ထမဂ္ဂညာဏေန ဟတဒသဝိဓသံကိလေသော, သမဏိဿရော သော ဥတ္တမော မဏိ ဝိဘာတိ သောဘတိ, နော စေ, သမဏာနံ ဣဿရော ဝိဘာတိ ဒိဗ္ဗတီတိ. ‘‘သလက္ခဏော သုဘဂေါ’’ဣစ္စာဒိကာနံ ဒွိန္နံ ပဒါနံ အဝိရုဒ္ဓတ္တာ စ, ပဌမပါဒေ စန္ဒေန ဒုတိယေ သူရိယေန တတိယေ ဗြဟ္မုနာ စတုတ္ထေ မဏိနာ စ သဗ္ဗညုပဒတ္ထဿ သိလိဋ္ဌတ္တာ စ အယံ အဝိရောဓိသိလေသော နာမ. သဟ လက္ခဏေန ဝတ္တမာနောတိ စ, အတိသောဘနော ဘဂေါ သိရီ ဝါ သိရီကာမပယတနာဒိကော ဝါ အဿာတိ စ, တေဇော အဿ အတ္ထီတိ စ, နိယတော ဥဒယော အဿေတိ စ, လောကဿ ဣသော ဣဿရောတိ စ, ဇိတော သံက္လေသော ယေနေတိ စ, မဏီနံ သမဏာနံ ဝါ ဣဿရောတိ စ ဝါကျံ. २९९. "सलक्खणो" इत्यादी. 'सलक्षण' म्हणजे लक्षणांनी युक्त; 'अतिसुभग' म्हणजे अत्यंत सुंदर लक्ष्मीने (शोभेने) युक्त, किंवा बत्तीस महापुरुष लक्षणांनी युक्त आणि अत्यंत शोभेने संपन्न; 'तेजस्वी' म्हणजे अंधकार नष्ट करणाऱ्या महान प्रभावाने युक्त, किंवा निरंतर प्रवृत्त असणाऱ्या बुद्ध-तेजाने युक्त; 'नित्योदय' म्हणजे दररोज सकाळी आकाशात निश्चितपणे उदय पावणारा, किंवा स्थिर अशा सर्वज्ञतेच्या पदाच्या वृद्धीने युक्त; 'लोकेश' म्हणजे ब्रह्मरूप असणारा, किंवा त्रिलोकाचा स्वामी असणारा; 'जितसंक्लेश' म्हणजे ध्यानाच्या प्रीतीने शारीरिक व मानसिक क्लेश जिंकणारा, किंवा चौथ्या मार्गज्ञानाने (अर्हत मार्गाने) दहा प्रकारच्या संक्लेशांचा नाश करणारा; 'श्रमणेश्वर' म्हणजे तो उत्तम मणी शोभतो, किंवा श्रमणांचे स्वामी (बुद्ध) शोभून दिसतात. "सलक्खणो सुभगो" इत्यादी पदांमध्ये कोणताही विरोध नसल्यामुळे आणि पहिल्या चरणात चंद्राशी, दुसऱ्यात सूर्याशी, तिसऱ्यात ब्रह्मदेवाशी आणि चौथ्यात मण्याशी सर्वज्ञ (बुद्ध) पदाचा श्लेष साधला गेल्यामुळे याला 'अविरोधी श्लेष' असे म्हणतात. "लक्षणांसह वर्तमान असणारा", "अत्यंत शोभिवंत भाग्य किंवा श्री असणारा", "ज्याला तेज आहे असा", "ज्याचा उदय निश्चित आहे असा", "लोकांचा ईश्वर (स्वामी)", "ज्याने संक्लेश जिंकले आहेत असा" आणि "मण्यांचा किंवा श्रमणांचा स्वामी" असा याचा विग्रह आहे. ဝိရောဓိသိလေသ विरोधी श्लेष ၃၀၀. ३००. အသမောပိ သမော လောကေ,လောကေသောပိ နရုတ္တမော; သဒယောပျ’ဒယော ပါပေ,စိတ္တာ’ယံ မုနိနော ဂတိ. अनुपमेय (अतुल्य) असूनही जे जगात सम (समान/रागद्वेषरहित) आहेत; लोकांचे स्वामी (लोकेश) असूनही जे नरोत्तम (मनुष्यश्रेष्ठ) आहेत; आणि दयाळू असूनही जे पापाच्या बाबतीत निर्दयी (कठोर) आहेत; मुनींची ही गती (अवस्था) खरोखरच आश्चर्यकारक आहे. ၃၀၀. ‘‘အသမောပိ’’စ္စာဒိ. နတ္ထိ သမော ရာဇဂုဏာဒီဟိ အဿာတိ အသမော, ကောစိ ရာဇာဒိ, ‘‘အသမော’’တိ လောကေကသိခါမဏိဘာဝေန [Pg.289] မုနိ. တတ္ထ ယဒါ အသမော ရာဇာဒိ, တဒါ လောကေ သမောတိ ဝိရုဒ္ဓံ အသမတ္တာ တဿ. အပိသဒ္ဒေါ ဝိရောဓံ ဇောတေတိ. ပက္ခန္တရေ တွဝိရုဒ္ဓံ, လောကေ ဒေဝဒတ္တာဒီနံ ဝိရောဓိသတ္တာနံ ရာဟုလာဒီနံ အဝိရောဓိသတ္တာနဉ္စ သမတ္တာ, တတောယေဝါယံ ဝိရောဓာဘာသာနဉ္စသာ ဝိရောဓောယေဝ. လောကေသော ဗြဟ္မာ မုနိ စ. တတ္ထ ‘‘ဗြဟ္မာ နရုတ္တမော’’တိ ဝိရုဒ္ဓံ ဒိဗ္ဗယောနိတ္တာ တဿ. ပက္ခန္တရေ တွဗျာဃာတော ဥတ္တမနရတ္တာ တဿ. ဒယော ဒါနံ, သဟ ဒယေနာတိ သဒယော, ကောစိ ပုရိသော. သဟ ဒယာယ ဝတ္တတီတိ သဒယော, မုနိ. တတ္ထ ပုရိသော ဒါယကော ပါပေ ဇနေ ကထမဒယောတိ ဝိရုဇ္ဈတိ. မုနိ ပါပေ ရာဂါဒိကေ အဒယောတိ ဝိရုဇ္ဈတိ. တသ္မာ မုနိနော အယံ ယထာဝုတ္တာ ဂတိ ပဝတ္တိ စိတ္တာ အဗ္ဘုတာတိ အယံ ဝုတ္တနယေန ဝိရောဓိသိလေသော ဥဒါဟဋော. ३००. "असमोपि" इत्यादी. ज्याला राजगुणादी बाबतीत कोणी समान नाही तो 'असम' (अतुल्य), जसे की एखादा राजा; आणि जगातील एकमेव शिरोमणी असल्यामुळे मुनी हे 'असम' आहेत. तेथे जेव्हा राजा असम असतो, तेव्हा तो जगात 'सम' (समान) आहे असे म्हणणे त्याच्या असमत्वामुळे विरुद्ध वाटते. 'अपि' हा शब्द विरोध दर्शवतो. दुसऱ्या बाजूने पाहिल्यास यात कोणताही विरोध नाही, कारण जगात देवदत्त इत्यादी विरोधी व्यक्ती आणि राहुल इत्यादी अनुकूल व्यक्ती यांच्याविषयी मुनींचे समत्व (समान भाव) असते; म्हणूनच हा केवळ विरोधाभास आहे, वास्तविक विरोध नाही. 'लोकेश' म्हणजे ब्रह्मा आणि मुनी. तेथे "ब्रह्मा नरोत्तम (मनुष्यश्रेष्ठ) आहे" असे म्हणणे त्याच्या दिव्य योनीतील जन्मामुळे विरुद्ध वाटते. दुसऱ्या बाजूने पाहिल्यास यात कोणताही अडथळा नाही, कारण मुनी हे श्रेष्ठ मनुष्य आहेत. 'दय' म्हणजे दान; दानासह असणारा तो 'सदय', जसे की एखादा मनुष्य. दयेसह (करुणेसह) राहणारे ते 'सदय' म्हणजे मुनी. तेथे दानशूर मनुष्य पापी लोकांच्या बाबतीत 'अदय' (निर्दयी) कसा असू शकतो? हा विरोध आहे. मुनी हे राग इत्यादी पापरूपी क्लेशांच्या बाबतीत 'अदय' (निर्दयी/कठोर) असतात. म्हणून मुनींची ही सांगितलेली गती (प्रवृत्ती) आश्चर्यकारक आहे. अशा प्रकारे सांगितलेल्या पद्धतीने हा 'विरोधी श्लेष' उदाहरणासह स्पष्ट केला आहे. ၃၀၀. ‘‘အသမော’’ဣစ္စာဒိ. အသမောပိ အတုလျောပိ ကောစိ ရာဇာဒိကော လောကေ သမော တုလျော, နော စေ, သဒိသပုဂ္ဂလရဟိတော ဧဝ ရာဟုလဘဒြဒေဝဒတ္တာဒိသဗ္ဗလောကေ အနုနယပဋိဃာဘာဝေန သမော ဟောတိ. လောကေသောပိ ဗြဟ္မဘူတောပိ နရုတ္တမော နရဝရော ဟောတိ, နော စေ, သကလလောကာဓိပတိ ဟုတွာ ဧဝ နရုတ္တမော. သဒယောပိ ယာစကေသု ဒယသင်္ခါတေန ဒါနေန ယုတ္တောပိ ပါပေ ပါပိဋ္ဌေ အဒယော ဒါနရဟိတော, နော စေ, ဒယာသဟိတော ဧဝ အကုသလေ နိဒ္ဒယော. မုနိနော အယံ ဂတိ ပဝတ္တိ စိတ္တာ ဝိစိတ္တာတိ ရာဇာဒိနော အသမသမတာ စ, ဗြဟ္မာ ဟုတွာ ဥတ္တမနရဘာဝေါ စ, ဒါနသဟိတဿ ကဿစိ ပုရိသဿ ဒါနရဟိတဘာဝေါ စ ဝိရုဒ္ဓေါ ဟောတိ. တသ္မာ ရာဇဗြဟ္မပုရိသေဟိ မုနိနော သိလိဋ္ဌတ္တာ အယံ ဝိရောဓိသိလေသော နာမ. ပုဗ္ဗပုဗ္ဗပက္ခေ ဝိရောဓော အပရာပရပက္ခေဟိ နိရာကတော ဟောတိ. ပုဗ္ဗပက္ခေ အပိသဒ္ဒေါ ဝိရောဓံ ဇောတေတိ, အပရပက္ခေ အဝဓာရဏန္တိ. [Pg.290] နတ္ထိ သမော ယဿေတိ စ, နရော စ သော ဥတ္တမော စေတိ စ, သဟ ဒယေန ဒယာယ ဝါ ဝတ္တမာနောတိ စ, နတ္ထိ ဒယော ဒယာ ဝါ အဿေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३००. "असमो" इत्यादी. अतुल्य असूनही एखादा राजा इत्यादी जगात समान असतो; किंवा मग, स्वतःच्या समान दुसरा कोणीही नसतानाही, राहुल, भद्र, देवदत्त इत्यादी संपूर्ण जगाविषयी अनुनय (आसक्ती) आणि प्रतिघ (द्वेष) नसल्यामुळे ते 'सम' (समान) असतात. लोकेश (ब्रह्मरूप) असूनही ते नरोत्तम (मनुष्यश्रेष्ठ) असतात; किंवा मग, संपूर्ण जगाचे अधिपती असूनही ते नरोत्तम आहेत. सदय असूनही म्हणजे याचकांना दयेने (दानाने) युक्त असूनही, पापी लोकांच्या बाबतीत ते 'अदय' (दानरहित) असतात; किंवा मग, दयेने युक्त असूनही अकुशलाच्या बाबतीत ते निर्दयी (कठोर) असतात. मुनींची ही गती (प्रवृत्ती) विचित्र (आश्चर्यकारक) आहे. राजाची असम-समता, ब्रह्मा असूनही नरोत्तम असणे, आणि दान देणाऱ्या व्यक्तीचे दानरहित असणे हे विरुद्ध वाटते. म्हणून राजा, ब्रह्मा आणि मनुष्य यांच्याशी मुनींचा श्लेष साधला गेल्यामुळे याला 'विरोधी श्लेष' असे म्हणतात. पूर्व-पूर्व पक्षातील विरोध उत्तर-उत्तर पक्षांद्वारे दूर केला जातो. पूर्वपक्षात 'अपि' हा शब्द विरोध दर्शवतो, तर उत्तरपक्षात तो अवधारण (नियमन) दर्शवतो. "ज्याला कोणी समान नाही तो", "जो मनुष्य असून श्रेष्ठ आहे तो", "दान किंवा दयेसह वर्तमान असणारा" आणि "ज्याला दान किंवा दया नाही तो" असा याचा विग्रह आहे. ဩစိတျသမ္ပောသကပဒသိလေသ औचित्यसंपोषक पदश्लेष ၃၀၁. ३०१. သံသာရဒုက္ခောပဟတာ-ဝနတာ ဇနတာ တွယိ; သုခ’မိစ္ဆိတ’မစ္စန္တံ, အမတန္ဒဒ ဝိန္ဒတိ. हे अमृत देणाऱ्या (किंवा निर्वाण देणाऱ्या बुद्धा)! संसाराच्या दुःखाने पीडित झालेले आणि आपल्या चरणी लीन झालेले लोक इच्छित असलेले अत्यंत (परम) सुख प्राप्त करतात. ၃၀၁. ဥဒါဟရတိ ‘‘သံသာရေ’’စ္စာဒိ. သံသာရော အဗ္ဗောစ္ဆိန္နံ ဝတ္တမာနာ ခန္ဓပဋိပါဋိယေဝ ဒုက္ခံ ဒုက္ခမတ္တာဒိနာ, တေန ဥပဟတာ ပဟဋာ ဇနတာ, အမတံ သုခံ အမတံ ဝါ နိဗ္ဗာနံ ဒဒါတီတိ အမတန္ဒဒါတိ အာမန္တနံ, တွယိ အဝနတာ ပဏာမဝသေန ဣစ္ဆိတမတိမတံ ဒုက္ခာပဂမနိဗ္ဗတ္တံ ကာယိကံ စေတသိကဉ္စ သုခံ အစ္စန္တံ ဝိန္ဒတိ ပဋိလဘတီတိ. ဧတ္ထ အမတံ သုဓာ နိဗ္ဗာနဉ္စ, အမတန္ဒဒေါ ဒုက္ခောပဟတေ သုခယတီတိ ဥစိတန္တိ ‘‘အမတံ ဒဒါတီ’’တိ ပဒမဓိဂတေ ဝတ္ထုနိ ဩစိတျံ သမ္ပောသယတီတိ ဩစိတျသမ္ပောသကော ပဒသိလေသောယံ. အာဒိသဒ္ဒေန ‘‘သုဂန္ဓိသောဘာသမ္ဗန္ဓီ’’တျာဒျုပမာသိလေသာဒယော သင်္ဂဟိတာတိ. ३०१. उदाहरण देतात: "संसारे" इत्यादी. संसार म्हणजे निरंतर चालणारी स्कंधांची मालिका, जी दुःखात्मक असल्यामुळे दुःखरूप आहे; त्याने पीडित झालेले लोक. "अमतंदद" हे संबोधन असून त्याचा अर्थ "अमृत देणारा किंवा निर्वाण देणारा" असा आहे. आपल्या चरणी नमस्कार करून लीन झालेले लोक दुःखाच्या निवृत्तीने उत्पन्न होणारे इच्छित असे अत्यंत शारीरिक व मानसिक सुख प्राप्त करतात. येथे 'अमृत' म्हणजे सुधा (अमृत) आणि निर्वाण होय. अमृत देणाऱ्याने दुःखी लोकांना सुखी करणे हे अत्यंत योग्य (उचित) आहे. म्हणून "अमृत देणारा" हे पद प्राप्त झालेल्या विषयातील औचित्याचे पोषण करते, म्हणून हा 'औचित्यसंपोषक पदश्लेष' आहे. 'इत्यादी' शब्दाने "सुगंधिशोभासंबंधी" इत्यादी उपमाश्लेष इत्यादींचा संग्रह होतो. ၃၀၁. ‘‘သံသာရ’’ဣစ္စာဒိ. သံသာရဒုက္ခောပဟတာ ခန္ဓဓာတုအာယတနာနံ နိရန္တရပဝတ္တိသင်္ခါတေန ဒုက္ခေန ဥပဟတာ ဇနတာ, အမတန္ဒဒ ဟေ သုဓာဒါယက နော စေ, နိဗ္ဗာနဒါယက တထာဂတ တွယိ အဝနတာ ပဏမနဝသေန ဩနတာ ဣစ္ဆိတံ အဘိမတံ သုခံ ကာယိကစေတသိကသုခံ အစ္စန္တံ အတိသယေန ဝိန္ဒတိ သေဝတီတိ. အမတဒါယကာ ဒုက္ခိတေ သုခိတေ ကရောန္တီတိ ဣဒံ ဥစိတမေဝေတိ ဥဘယတ္ထဿာပိ ဝါစကံ ‘‘အမတံ ဒဒါတီ’’တိ ပဒံ တာဒိသဇနဿ သုခဒါနေ ဩစိတျံ ပေါသေတီတိ အယံ ဩစိတျသမ္ပောသကပဒသိလေသော. သံသာရောယေဝ ဒုက္ခန္တိ စ, တေန ဥပဟတာတိ စ, အမတံ သုဓံ နိဗ္ဗာနံ ဝါ ဒဒါတီတိ စ ဝါကျံ. ३०१. "संसार" इत्यादी. संसाराच्या दुःखाने पीडित म्हणजे स्कंध, धातू आणि आयतनांच्या निरंतर प्रवृत्तीरूप दुःखाने पीडित झालेले लोक; हे अमतंदद म्हणजे हे सुधादायक (अमृत देणारे), किंवा हे निर्वाण देणारे तथागत! आपल्या चरणी नमस्कार करून लीन झालेले लोक इच्छित असे अत्यंत शारीरिक व मानसिक सुख प्राप्त करतात, त्याचा उपभोग घेतात. अमृत देणाऱ्यांनी दुःखी लोकांना सुखी करणे हे अत्यंत योग्यच आहे. म्हणून दोन्ही अर्थांचे वाचक असणारे "अमृत देणारा" हे पद अशा लोकांना सुख देण्यातील औचित्याचे पोषण करते, म्हणून हा 'औचित्यसंपोषक पदश्लेष' आहे. "संसार हेच दुःख", "त्याने पीडित" आणि "अमृत (सुधा) किंवा निर्वाण देणारा" असे हे वाक्य आहे. ၃၀၂. ३०२. ဂုဏယုတ္တေဟိ [Pg.291] ဝတ္ထူဟိ, သမံ ကတွာန ကဿစိ; သံကိတ္တနံ ဘဝတိ ယံ, သာ မတာ တုလျယောဂိတာ. गुणांनी युक्त असणाऱ्या वस्तूंसोबत एखाद्याची तुलना करून (समान करून) जे वर्णन केले जाते, त्याला 'तुल्ययोगिता' (अलंकार) मानले जाते. ၃၀၂. တုလျယောဂိတံ ယောဇယတိ ‘‘ဂုဏေ’’စ္စာဒိနာ. ဂုဏော ဓမ္မော သာဓု အသာဓု ဝါ, တေန ယုတ္တေဟိ ဝတ္ထူဟိ သဟ သမံ ကတွာန ဝတ္ထုတော အသာမျေပိ တထာဘာဝမာရောပျ ကဿစိ ပုရိသာဒိနော ထုတိနိန္ဒတ္ထံ ယံ ကိတ္တနမာချာနံ, သာ တုလျက္ခဏာ တုလျယောဂိတာ မတာ, ဝတ္တုမိစ္ဆိတေန ဂုဏေန တာဒိသာနံ တုလျယောဂိတာပဋိပါဒနတော တဒတ္ထိယေန တုလျယောဂိတာ တထာ ဒွိဓာ ဝတ္တတိ. ३०२. "गुणे" इत्यादींद्वारे 'तुल्ययोगिता' (अलंकार) जोडतात. गुण म्हणजे चांगला किंवा वाईट धर्म (स्वभाव), त्याने युक्त असलेल्या वस्तूंसोबत समान करून, वस्तूच्या दृष्टीने असमानता असली तरीही तशा भावाचा आरोप करून, एखाद्या पुरुषादींच्या स्तुती किंवा निंदेसाठी जे कीर्तन (वर्णन) किंवा आख्यान केले जाते, ती समान लक्षणे असलेली 'तुल्ययोगिता' मानली जाते. बोलण्याची इच्छा असलेल्या गुणाने तशा प्रकारच्या वस्तूंची तुल्ययोगिता प्रतिपादन केल्यामुळे, त्या अर्थाने तुल्ययोगिता अशा प्रकारे दोन प्रकारची असते. ၃၀၂. ဣဒါနိ တုလျယောဂိတာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ဂုဏယုတ္တေဟိ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဂုဏယုတ္တေဟိ သုန္ဒရာသုန္ဒရေဟိ ယေဟိ ကေဟိစိ ဂုဏေဟိ ယုတ္တေဟိ ဝတ္ထူဟိ, သမံ ကတွာန တတွတော အသမာနေသုပိ သမာနတ္တဗုဒ္ဓိယာ အာရောပနံ ကတွာ, ကဿစိ ပုရိသာဒိနော ထုတိံ နိန္ဒံ ဝါ နိဿာယ ယံ သံကိတ္တနံ ဂုဏာဂုဏကထနံ ဘဝတိ, သာ တုလျယောဂိတာတိ မတာတိ. ဂုဏေဟိ ယုတ္တာတိ စ, တုလျေန ဂုဏေန သဟ ယောဂေါတိ စ, သော ဧတေသံ ရံသိမာလီဘဂဝန္တာဒီနမတ္ထီတိ စ, တေသံ ဘာဝေါ တုလျဂုဏသမ္ဗန္ဓောတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဧတ္ထ တုလျဂုဏယုတ္တပဒတ္ထာနံ တဂ္ဂုဏသမ္ဗန္ဓဿ တုလျယောဂိတာဘာဝတော တပ္ပဋိပါဒကော ဥတ္တိဝိသေသော တဒတ္ထိယေန တုလျယောဂိတာတိ ဉေယျာ. ३०२. आता "गुणयुत्तेहि" इत्यादींद्वारे 'तुल्ययोगिता' अलंकार दाखवितात. गुणांनी युक्त असलेल्या, सुंदर किंवा असुंदर अशा कोणत्याही गुणांनी युक्त वस्तूंसोबत समान करून, तत्त्वतः असमान असतानाही समानतेच्या बुद्धीने आरोप करून, एखाद्या पुरुषादींच्या स्तुती किंवा निंदेचा आश्रय घेऊन जे संकीर्तन म्हणजे गुणावगुणांचे कथन होते, ती 'तुल्ययोगिता' मानली जाते. "गुणांनी युक्त" आणि "समान गुणाशी संबंध" आणि "तो या रश्मिमाली (सूर्य) आणि भगवान इत्यादींचा आहे" आणि "त्यांचा भाव म्हणजे तुल्यगुणसंबंध" असा विग्रह आहे. येथे समान गुणांनी युक्त असलेल्या पदार्थांच्या त्या गुणाच्या संबंधाची तुल्ययोगिता असल्यामुळे, त्याचे प्रतिपादन करणारा विशिष्ट उक्ती (कथन) त्या अर्थाने 'तुल्ययोगिता' समजावी. ၃၀၃. ३०३. သမ္ပတ္တသမ္မဒေါ လောကော,သမ္ပတ္တာလောကသမ္ပဒေါ; ဥဘောဟိ ရံသိမာလီ စ,ဘဂဝါ စ တမောနုဒေါ. संपन्न झालेल्या आनंदाने युक्त हा लोक (जग), प्रकाशाच्या संपत्तीला प्राप्त झाला आहे; कारण रश्मिमाली (सूर्य) आणि भगवान हे दोन्ही अंधकार दूर करणारे आहेत. ၃၀၃. ဥဒါဟရတိ ‘‘သမ္ပတ္တေ’’စ္စာဒိ. တမံ နုဒတီတိ တမောနုဒေါ. ရံသိမာလီ သူရိယော စ, အထ ဝါ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ စာတိ ဥဘောဟိ ကရဏဘူတေဟိ ဟေတုဘူတေဟိ ဝါ [Pg.292] လောကော သတ္တလောကော, သမ္ပတ္တော သမ္မဒေါ ပီတိ ယေန တထာဝိဓော စ, သမ္ပတ္တော အာလောကဿ သမ္ပဒါ ယေန တထာဝိဓော စာပီတိ. ဧတ္ထ ပီတိဒါနာဒိဂုဏယုတ္တေန ရံသိမာလိနာ သမံ ကတွာ ဘဂဝတော ထုတိဝသေန ကိတ္တနန္တိ လက္ခဏံ ယောဇနီယံ. ३०३. "संपत्ते" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. अंधकार दूर करतो तो 'तमोनुद' (अंधकार दूर करणारा). रश्मिमाली म्हणजे सूर्य आणि सम्यक्संबुद्ध हे दोन्ही कारणभूत किंवा हेतूभूत असल्यामुळे लोक म्हणजे सत्त्वलोक (प्राणिमात्र), ज्यांच्याद्वारे आनंद (प्रिती) प्राप्त झाला आहे असा आणि ज्यांच्याद्वारे प्रकाशाची संपत्ती प्राप्त झाली आहे असाही होतो. येथे प्रिती देणे इत्यादी गुणांनी युक्त असलेल्या सूर्याशी समान करून भगवंतांच्या स्तुतीरूपाने जे कीर्तन केले आहे, ते लक्षण योजावे. ၃၀၃. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘သမ္ပတ္တိ’’စ္စာဒိနာ. တမောနုဒေါ အန္ဓကာရံ ပဟရန္တော ရံသိမာလီ စ ဘဂဝါ စ ဥဘောဟိ ကရဏဘူတေဟိ ဟေတုဘူတေဟိ ဝါ, လောကော သတ္တလောကော သမ္ပတ္တသမ္မဒေါ ပဋိလဒ္ဓပီတိကော စ သမ္ပတ္တာလောကသမ္ပဒါ စ ဟောတီတိ. ဧတ္ထ ပီတိဒါနာလောကကရဏသင်္ခါတဂုဏယုတ္တေန သူရိယေန တုလျံ ကတွာ ဘဂဝတော ထုတိဝသေန ဂုဏကထနံ ဟောတိ. သမ္ပတ္တော သမ္မဒေါ ပီတိ ယေနေတိ စ, အာလောကဿ သမ္ပဒါတိ စ, သမ္ပတ္တာ အာလောကသမ္ပဒါ ယေနေတိ စ, တမံ နုဒတီတိ စ ဝါကျံ. ဥဒါဟရဏေ အဒဿိတေပိ အသာဓုဂုဏယုတ္တေန ကေနစိ ဝတ္ထုနာ သမံ ကတွာ ကဿစိ ကာတဗ္ဗနိန္ဒာပိ ဧဝမေဝ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. ३०३. आता "संपत्ति" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. अंधकार दूर करणारे रश्मिमाली (सूर्य) आणि भगवान या दोन्ही कारणभूत किंवा हेतूभूत घटकांमुळे, लोक म्हणजे सत्त्वलोक हा प्राप्त झालेल्या आनंदाने युक्त (प्रिती मिळवलेला) आणि प्रकाशाच्या संपत्तीला प्राप्त झालेला होतो. येथे प्रिती देणे आणि प्रकाश करणे या संज्ञेने युक्त असलेल्या सूर्याशी समान करून भगवंतांच्या स्तुतीरूपाने गुणकथन होते. "ज्यांच्याद्वारे आनंद प्राप्त झाला आहे तो", "प्रकाशाची संपत्ती", "ज्यांच्याद्वारे प्रकाशाची संपत्ती प्राप्त झाली आहे तो" आणि "अंधकार दूर करतो तो" असे वाक्य आहे. उदाहरणात दाखविले नसले तरी, वाईट गुणांनी युक्त असलेल्या एखाद्या वस्तूशी समान करून कोणाची तरी केली जाणारी निंदाही याच प्रकारे समजावी. ၃၀၄. ३०४. အတ္ထန္တရံ သာဓယတာ, ကိဉ္စိ တံသဒိသံ ဖလံ; ဒဿီယတေ အသန္တံ ဝါ, သန္တံ ဝါ တံ နိဒဿနံ. दुसरा अर्थ (विषय) सिद्ध करताना, त्याच्यासारखेच असणारे काही असत (अनिष्ट) किंवा सत (इष्ट) फल जे दाखविले जाते, ते 'निदर्शन' (अलंकार) होय. ၃၀၄. နိဒဿနံ ပဒဿေတိ ‘‘အတ္ထန္တရ’’မိစ္စာဒိနာ. အတ္ထန္တရံ နိဒဿေတဗ္ဗာပေက္ခာယ အညံ ကိဉ္စိ ဥစိတံ ကာရိယံ သာဓယတာ ကေနစိ ဝတ္ထုနာ ဟေတုဘူတေန, တေန အတ္ထန္တရေနေဝ သဒိသံ တုလျံ ဖလံ ကိဉ္စိ အသန္တံ အနိဋ္ဌံ ဝါ သန္တံ ဣဋ္ဌံ ဝါ ဒဿီယတေ ပဋိပါဒီယတေ, တံ ဧဝံလက္ခဏံ နိဒဿနံ သိယာ. ३०४. "अत्थन्तरं" इत्यादींद्वारे निदर्शन अलंकार दाखवितात. निदर्शन करण्याच्या अपेक्षेने दुसरा अर्थ म्हणजे इतर काही योग्य कार्य सिद्ध करणाऱ्या एखाद्या हेतूभूत वस्तूद्वारे, त्या दुसऱ्या अर्थासारखेच समान असणारे काही असत म्हणजे अनिष्ट किंवा सत म्हणजे इष्ट फल जे दाखविले जाते किंवा प्रतिपादन केले जाते, ते अशा लक्षणांचे 'निदर्शन' होय. ၃၀၄. ဣဒါနိ နိဒဿနာလင်္ကာရံ နိဒဿေတိ ‘‘အတ္ထန္တရိ’’စ္စာဒိနာ. အတ္ထန္တရံ နိဒ္ဒိသိတဗ္ဗတော အညံ ဥစိတကာရိယသင်္ခါတမတ္တံ သာဓယတာ သာဓယန္တေန ကေနစိ ဝတ္ထုနာ တံသဒိသံ [Pg.293] တေန အတ္ထန္တရေန သမာနံ အသန္တံ အနိဋ္ဌံ ဝါ သန္တံ ဣဋ္ဌံ ဝါ ကိဉ္စိ ဖလံ ဒဿီယတေ ဝတ္ထူဟိ ပဋိပါဒီယတေ, တံ တာဒိသံ ဖလံ နိဒဿနံ နာမာတိ. အတ္ထော စ သော အန္တရော အညော စာတိ စ, တေန အတ္ထန္တရေန သဒိသမိတိ စ, နိဒဿီယတေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३०४. आता "अत्थन्तरि" इत्यादींद्वारे निदर्शन अलंकार स्पष्ट करतात. निर्देश करण्यायोग्य गोष्टीपेक्षा दुसरा अर्थ म्हणजे केवळ योग्य कार्य सिद्ध करणाऱ्या एखाद्या वस्तूद्वारे, त्याच्यासारखेच म्हणजे त्या दुसऱ्या अर्थाशी समान असणारे असत (अनिष्ट) किंवा सत (इष्ट) असे काही फल वस्तूं द्वारे दाखविले किंवा प्रतिपादन केले जाते, त्या तशा प्रकारच्या फलाला 'निदर्शन' म्हणतात. "तो अर्थ जो दुसरा (अन्य) आहे" आणि "त्या दुसऱ्या अर्थाशी समान" आणि "दाखविले जाते" असा विग्रह आहे. အသန္တဖလနိဒဿန असत-फल-निदर्शन (अनिष्ट फल निदर्शन) ၃၀၅. ३०५. ဥဒယာ သမဏိန္ဒဿ, ယန္တိ ပါပါ ပရာဘဝံ; ဓမ္မရာဇဝိရုဒ္ဓါနံ, သူစယန္တာ ဒုရန္တတံ. श्रमणेंद्रांच्या (श्रमणश्रेष्ठांच्या) उदयाने पाप पराभवाला (नाशाला) प्राप्त होते; जे धर्मराजाशी विरोध करणाऱ्यांच्या वाईट अंताची (दुरांततेची) सूचना देते. ၃၀၅. ‘‘ဥဒယာ’’ဣစ္စာဒိ. သမဏိန္ဒဿ မဟာမုနိနော ဥဒယာ ပါတုဘာဝေန ပါပါ လောဘာဒယော ပရာဘဝံ နိဓနံ ယန္တိ, ပရာဘဝန္တီတိ ဝုတ္တံ ဟောတိ. ဥဒယပုဗ္ဗကေန ပါပပရာဘဝနတ္ထန္တရေန သဒိသံ ဖလံ နိဒဿေတိ. ကိံ ကရောန္တာ? ဓမ္မရာဇာ ဓမ္မာနပေတော ရာဇာ, မုနိန္ဒော စာတိ သိလိဋ္ဌံ, တေန ဝိရုဒ္ဓါနံ, ဒုဋ္ဌော ဝိရုဒ္ဓေါ အန္တော အဝသာနံ ယဿ, တဿ ဘာဝေါ, တံ သူစယန္တာတိ ဓမ္မရာဇဝိရောဓဟေတုကံ အသန္တဖလမေတံ နိဒဿနံ ပရာဘဝဿာနိဋ္ဌတ္တာ. ३०५. "उदया" इत्यादी. श्रमणेंद्र म्हणजे महामुनींच्या उदयाने (प्रकट होण्याने) पाप म्हणजे लोभ इत्यादी पराभवाला (नाशाला) प्राप्त होतात, म्हणजेच पराभूत होतात असे म्हटले आहे. उदयाने पूर्वगामी असलेल्या पापाच्या पराभवरूपी दुसऱ्या अर्थाशी समान फल दाखवितात. काय करत असताना? धर्मराज म्हणजे धर्माने युक्त असलेला राजा आणि मुनींद्र हे श्लिष्ट (एकत्रित) आहेत, त्यांच्याशी विरोध करणाऱ्यांच्या, ज्याचा अंत (शेवट) वाईट किंवा विरुद्ध आहे अशा भावाची सूचना देत असताना; हे धर्मराजाच्या विरोधाला कारणीभूत असणारे असत-फल निदर्शन आहे, कारण पराभव हा अनिष्ट असतो. ၃၀၅. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ဥဒယာ’’ဣစ္စာဒိနာ. သမဏိန္ဒဿ မုနိန္ဒဿ ဥဒယာ လောကေ ပါတုဘာဝေန ပါပါ လောဘာဒယော ဓမ္မရာဇဝိရုဒ္ဓါနံ ရာဇဓမ္မေဟိ သမန္နာဂတရာဇူဟိ, ဓမ္မာဓိပတိနာ မုနိန္ဒေန ဝါ ဝိရုဒ္ဓါနံ ဒုရန္တတံ အနိဋ္ဌာဝသာနတံ သူစယန္တာ ပကာသေန္တော ပရာဘဝံ ပရိဟာနိံ ယန္တိ ပါပုဏန္တီတိ. ဧတ္ထ ပုဗ္ဗဒ္ဓေန ဥဒယပုဗ္ဗကော ပါပပရာဘဝနသင်္ခါတော အတ္ထန္တရော ဒဿိတော, အပရဒ္ဓေန တံသဒိသဝိရောဓဟေတုကံ ဒုရန္တသင်္ခါတံ အသန္တဖလံ ဒဿေတိ. ဓမ္မရာဇဝိရောဓဟေတုကံ အသန္တဖလမေတံ ပရာဘဝဿာနိဋ္ဌတ္တာ. သမဏာနမိန္ဒောတိ စ, ဓမ္မေန ယုတ္တော ရာဇာတိ ဝါ ဓမ္မေသု ရာဇာတိ [Pg.294] ဝါတိ စ, တေန ဝိရုဒ္ဓါတိ စ, ဒုဋ္ဌော ဝိရူပေါ အန္တော ပရိယောသာနံ ယေသမိတိ စ, တေသံ ဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. ३०५. आता "उदया" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. श्रमणेंद्र म्हणजे मुनींद्रांच्या जगात उदयाने (प्रकट होण्याने) पाप म्हणजे लोभ इत्यादी, धर्मराजाशी विरोध करणाऱ्यांच्या—म्हणजे राजधर्माने युक्त असलेल्या राजांशी किंवा धर्माधिपती मुनींद्रांशी विरोध करणाऱ्यांच्या—दुरांततेला (अनिष्ट अंताला) सूचित किंवा प्रकाशित करत पराभवाला (हानीला) प्राप्त होतात. येथे पूर्वार्धाने उदयाने पूर्वगामी असलेला पापाचा पराभव नावाचा दुसरा अर्थ दाखविला आहे, आणि उत्तरार्धाने त्याच्याशी समान असलेल्या विरोधाला कारणीभूत असणारे दुरांत नावाचे असत-फल दाखविले आहे. पराभव अनिष्ट असल्यामुळे हे धर्मराज-विरोधाला कारणीभूत असणारे असत-फल आहे. "श्रमणांचा इंद्र (श्रेष्ठ)" आणि "धर्माने युक्त असलेला राजा" किंवा "धर्मामध्ये राजा" आणि "त्याच्याशी विरुद्ध असलेले" आणि "ज्यांचा अंत वाईट किंवा विरूप आहे" आणि "त्यांचा भाव" असे वाक्य आहे. သန္တဖလနိဒဿန सत-फल-निदर्शन (इष्ट फल निदर्शन) ၃၀၆. ३०६. သိရောနိက္ခိတ္တစရဏော-စ္ဆရိယာန’မ္ဗုဇာန’ယံ; ပရမဗ္ဘုတတံ လောကေ,ဝိညာပေတ’တ္တနော ဇိနော. ज्यांनी आश्चर्यकारक कमळांच्या डोक्यावर (मस्तकावर) आपले चरण ठेवले आहेत, असे हे जिन जगात स्वतःच्या परम अद्भुततेला प्रकट करतात. ၃၀၆. ‘‘သိရော’’စ္စာဒိ. အစ္ဆရိယာနံ ဘဂဝတော စရဏာရဝိန္ဒဒွန္ဒသမ္ပဋိဂ္ဂဟဏတ္ထံ ပထဝိံ ဘိန္ဒိတွာ သမုဂ္ဂတာနမစ္ဆရိယဂုဏောပေတာနမမ္ဗုဇာနံ သိရသိ မတ္ထကေ နိက္ခိတ္တာ စရဏာ ယေန သော ဇိနော. အမ္ဗုဇောပရိစရဏနိက္ခေပလက္ခဏေနတ္ထန္တရေန သဒိသံ ဖလံ ဒဿေတိ. အတ္တနော ပရမစ္ဆရိယဘာဝံ ဝိညာပေတိ. သန္တဖလမိဒံ နိဒဿနံ ဇိနဗ္ဘုတတ္ထဒီပနဿ ဣဋ္ဌတ္တာတိ. ३०६. "सिरो" इत्यादी. भगवंतांच्या दोन्ही चरणकमळांचे स्वागत करण्यासाठी पृथ्वी भेदून वर आलेल्या, आश्चर्यकारक गुणांनी युक्त अशा कमळांच्या डोक्यावर (मस्तकावर) ज्यांनी आपले चरण ठेवले आहेत, ते जिन होत. कमळांवर चरण ठेवण्याच्या लक्षणरूपी दुसऱ्या अर्थाशी समान फल दाखवितात. ते स्वतःच्या परम आश्चर्यकारक भावाला प्रकट करतात. जिनांच्या अद्भुततेचा अर्थ प्रकाशित करणे इष्ट असल्यामुळे हे सत-फल निदर्शन आहे. ၃၀၆. ‘‘သိရော’’ဣစ္စာဒိ. အယံ ဇိနော အစ္ဆရိယာနံ အတ္တနော ပါဒပဋိဂ္ဂဟဏတ္ထံ ပထဝိံ ဘိန္ဒိတွာ ဥဂ္ဂတတ္တာ အစ္ဆရာပဟရဏယောဂ္ဂါနံ အမ္ဗုဇာနံ သိရောနိက္ခိတ္တစရဏော မတ္ထကေ ဌပိတပါဒေါ လောကေ သတ္တလောကေ အတ္တနော ပရမဗ္ဘုတတံ အတိအစ္ဆရိယဂုဏံ ဝိညာပေတိ အဝဗောဓေတီတိ. ဧတ္ထ အစ္ဆရိယပဒုမာနံ မတ္ထကေ စရဏနိက္ခေပသင်္ခါတေန အတ္ထန္တရေန ပရမဗ္ဘုတတံ ဝိညာပေတီတိ အယံ သဒိသသန္တဖလံ ဇိနဗ္ဘုတတ္ထဒီပနဿ ဣဋ္ဌတ္တာ. သိရသိ နိက္ခိတ္တာနိ စရဏာနိ ယေနေတိ စ, အစ္ဆရံ အစ္ဆရာသံဃာတံ အရဟန္တီတိ စ, ပရမော ဥတ္တမော အဗ္ဘုတော ဂုဏော အဿေတိ စ, တဿ ဘာဝေါတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३०६. "सिरो" इत्यादी. हे जिन, आश्चर्यकारक अशा स्वतःच्या चरणांचे स्वागत करण्यासाठी पृथ्वी भेदून वर आल्यामुळे चुटकी वाजवण्यास (आश्चर्य व्यक्त करण्यास) योग्य असलेल्या कमळांच्या मस्तकावर चरण ठेवणारे (पाय ठेवलेले) असून, जगात (सत्त्वलोकात) स्वतःच्या परम अद्भुततेला म्हणजे अत्यंत आश्चर्यकारक गुणाला प्रकट करतात (जाणवून देतात). येथे आश्चर्यकारक कमळांच्या मस्तकावर चरण ठेवण्याच्या संज्ञारूपी दुसऱ्या अर्थाने परम अद्भुतता प्रकट करतात, हे जिनांच्या अद्भुततेचा अर्थ प्रकाशित करणे इष्ट असल्यामुळे त्याच्याशी समान असलेले सत-फल आहे. "ज्यांच्याद्वारे मस्तकावर चरण ठेवले गेले आहेत" आणि "जे चुटकी वाजवण्यास (आश्चर्य व्यक्त करण्यास) पात्र आहेत" आणि "ज्यांचा परम उत्तम अद्भुत गुण आहे" आणि "त्याचा भाव" असा विग्रह आहे. ၃၀၇. ३०७. ဝိဘူတိယာမဟန္တတ္တံ, အဓိပ္ပာယဿ ဝါ သိယာ; ပရမုက္ကံသတံ ယာတံ, တံ မဟန္တတ္တ’မီရိတံ. विभूतीची (वैभवाची) किंवा अभिप्रायाची (विचारांची/इच्छेची) जी परम उत्कटता (उत्कृष्टता) प्राप्त झालेली असते, त्याला 'महंतत्व' (उदात्तता) म्हटले आहे. ၃၀၇. မဟန္တတ္တမုပဒဿေတိ [Pg.295] ‘‘ဝိဘူတိယာ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဝိဘူတိယာ သမ္ပတ္တိယာ အဓိပ္ပာယဿ ဝါ အဇ္ဈာသယဿ ဝါ ပရမုက္ကံသတံ ပရမာတိသယဘာဝံ ယာတံ ဥပဂတံ မဟန္တတ္တံ နာမ ဤရိတံ ကထိတံ. ३०७. "विभूतीया" इत्यादींद्वारे महंतत्व दाखवितात. विभूतीच्या म्हणजे संपत्तीच्या किंवा अभिप्रायाच्या म्हणजे आशयाच्या परम उत्कर्षाला, परम अतिशय भावाला प्राप्त झालेल्या अवस्थेला 'महंतत्व' म्हटले किंवा सांगितले आहे. ၃၀၇. ဣဒါနိ မဟန္တတ္တာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ဝိဘူတိ’’ ဣစ္စာဒိနာ. ဝိဘူတိယာ သမ္ပတ္တိယာ ဝါ အဓိပ္ပာယဿ အဇ္ဈာသယဿ ဝါ ပရမုက္ကံသတံ အတျုက္ကံသဘာဝံ ယာတံ ယံ မဟန္တတ္တံ သိယာ, တံ မဟန္တတ္တမိတိ ဤရိတန္တိ. မဟတော ဘာဝေါတိ စ, ပရမော ဥက္ကံသော အတိသယော ယဿေတိ စ, တဿ ဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. ३०७. आता "विभूति" इत्यादींद्वारे महंतत्व अलंकार दाखवितात. विभूतीच्या म्हणजे संपत्तीच्या किंवा अभिप्रायाच्या म्हणजे आशयाच्या परम उत्कर्षाला (अत्युत्कृष्ट भावाला) प्राप्त झालेले जे महंतत्व असते, त्याला 'महंतत्व' असे म्हटले आहे. "महान असण्याचा भाव" आणि "ज्याचा परम उत्कर्ष किंवा अतिशय आहे" आणि "त्याचा भाव" असे वाक्य आहे. ဝိဘူတိမဟန္တတ္တ विभूती-महंतत्व (वैभवाची उदात्तता) ၃၀၈. ३०८. ကိရီဋရတနစ္ဆာယာ-နုဝိဒ္ဓါတပဝါရဏော; ပုရာ ပရံ သိရိံ ဝိန္ဒိ, ဗောဓိသတ္တော’ဘိနိက္ခမာ. मुकुटातील रत्नांच्या प्रभेने (कांतीने) युक्त असे छत्र धारण करणारे बोधिसत्व, अभिनिष्क्रमणापूर्वी पूर्वी परम वैभवाला (लक्ष्मीला) प्राप्त झाले होते. ၃၀၈. ဥဒါဟရတိ ‘‘ကိရီဋေ’’စ္စာဒိ. အဘိနိက္ခမာ ပုရာ ပုဗ္ဗေ ဗောဓိသတ္တော မာယာဒေဝိယာ ပုတ္တော ပရမုက္ကဋ္ဌံ အနာညသာဓာရဏံ သိရိံ ဝိဘူတိံ ဝိန္ဒိ ပဋိလဘိ. ကီဒိသော? ကိရီဋေ မကုဋေ ရတနာနံ ဆာယာဟိ သောဘာဟိ အနုဝိဒ္ဓေါ ဆုရိတော အာတပဝါရဏော သေတစ္ဆတ္တံ ယဿ သော တာဒိသောတိ ဝိဘူတိယာ မဟန္တတ္တံ ဝုတ္တံ ‘‘အာတပဝါရဏော ရတနစ္ဆာယာနုဝိဒ္ဓေါ’’တိ. ३०८. "किरीटे" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. अभिनिष्क्रमणापूर्वी पूर्वी बोधिसत्व म्हणजे मायादेवींचे पुत्र यांनी परम उत्कृष्ट आणि इतरांना असाधारण केलेले वैभव (श्री) प्राप्त केले होते. ते कसे होते? मुकुटातील रत्नांच्या छायांनी म्हणजे शोभेने युक्त (खचित) केलेले छत्र म्हणजे श्वेतछत्र ज्यांचे होते, ते तसे होते; अशा प्रकारे "रत्नांच्या छायेने युक्त छत्र असलेले" या शब्दांनी विभूतीचे महंतत्व सांगितले आहे. ၃၀၈. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ကိရီဋ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဗောဓိသတ္တော အန္တိမဇာတိယံ မဟာဗောဓိသတ္တော အဘိနိက္ခမာ အဘိနိက္ခမနတော ပုရာ ပုဗ္ဗေ ကိရီဋရတနစ္ဆာယာနုဝိဒ္ဓါတပဝါရဏော မောလိရတနရံသီဟိ ရဉ္ဇိတသေတစ္ဆတ္တော ပရမုက္ကဋ္ဌံ သိရိံ ဝိဘူတိံ ဝိန္ဒိ အနုဘဝီတိ. ဧတ္ထ မောလိရတနကန္တိယာ သေတစ္ဆတ္တဿ ဩဝိဒ္ဓဘာဝကထနေန ဝိဘူတိယာ မဟန္တတ္တံ ဟောတိ. ကိရီဋေ ရတနာနီတိ စ, တေသံ ဆာယာယောတိ [Pg.296] စ, တာဟိ အနုဝိဒ္ဓေါ ဆုရိတော အာတပဝါရဏော ယဿေတိ စ ဝါကျံ. ३०८. आता "किरीट" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. बोधिसत्व म्हणजे अंतिम जन्मातील महाबोधिसत्व, अभिनिष्क्रमणापूर्वी (गृहत्यागापूर्वी) मुकुटातील रत्नांच्या छायेने युक्त छत्र असलेले, म्हणजेच मुकुटातील रत्नांच्या किरणांनी सुशोभित श्वेतछत्र धारण करणारे असून, परम उत्कृष्ट वैभव (श्री) अनुभवत होते. येथे मुकुटातील रत्नांच्या कांतीने श्वेतछत्र सुशोभित असल्याच्या कथनाने विभूतीचे महंतत्व प्रकट होते. "मुकुटातील रत्ने" आणि "त्यांची छाया" आणि "त्यांनी युक्त (खचित) केलेले छत्र ज्यांचे आहे" असे वाक्य आहे. အဓိပ္ပာယမဟန္တတ္တ अभिप्राय-महंतत्व (आशयाची/विचारांची उदात्तता) ၃၀၉. ३०९. သတ္တော သမ္ဗောဓိယံ ဗောဓိ-သတ္တော သတ္တဟိတာယ သော; ဟိတွာ သ္နေဟရသာဗဒ္ဓ-မပိ ရာဟုလမာတရံ. ते बोधिसत्व प्राण्यांच्या (सत्त्वांच्या) हितासाठी, स्नेह रसाने बांधलेल्या राहुलमातेला (यशोधरेला) देखील सोडून, संबोधीमध्ये (सम्यक्संबोधीमध्ये) आसक्त (लीन) झाले. ၃၀၉. ‘‘သတ္တော’’ဣစ္စာဒိ. သ္နေဟေန ပိယဘာဝေန ဇာတေန ရသေန ရာဂေန အာဗဒ္ဓမတ္တနိ ရာဟုလမာတရံ ဗိမ္ဗာဒေဝိမ္ပိ, ကိမုတညံ ယုဝတိဇနံ, ဟိတွာ အနပေက္ခိတွာ အနာသတ္တော ဟုတွာ သတ္တာနံ ဟိတာယ လောကိယလောကုတ္တရာယ ဝဍ္ဎိယာ ဗောဓိသတ္တော သိဒ္ဓတ္ထော သမ္ဗောဓိယံ သဗ္ဗညုတညာဏေယေဝ သတ္တော အာသတ္တော, တတ္ထေဝ လဂ္ဂေါတိ အဓိပ္ပာယော. မဟန္တတ္တမုက္ကဋ္ဌံ တာဒိသဝနိတာရတနာနာသဇ္ဇနလက္ခဏမာလက္ခီယတီတိ. ३०९. "सत्तो" इत्यादी. स्नेहाने म्हणजे प्रियभावाने उत्पन्न झालेल्या रसाने (रागाने) स्वतःशी बांधलेल्या राहुलमाता बिंबादेवींना (यशोधरेला) देखील, मग इतर युवतींबद्दल काय बोलावे, सोडून (अपेक्षा न ठेवता) अनासक्त होऊन, प्राण्यांच्या हितासाठी म्हणजे लौकिक आणि लोकोत्तर वृद्धीसाठी, बोधिसत्व सिद्धार्थ हे संबोधीमध्ये म्हणजे सर्वज्ञताज्ञानामध्येच आसक्त (लीन) झाले, तिथेच रमले असा अभिप्राय आहे. अशा स्त्रीरत्नाविषयी अनासक्ती असण्याच्या लक्षणाने उत्कृष्ट महंतत्व दिसून येते. ၃၀၉. ‘‘သတ္တော’’ဣစ္စာဒိ. သော ဗောဓိသတ္တော သ္နေဟရသာဗဒ္ဓံ ပိယဘာဝသင်္ခါတရာဂေန အာဗဒ္ဓံ ရာဟုလမာတရံ အပိ ဗိမ္ဗာဒေဝိမ္ပိ ဟိတွာ သတ္တဟိတာယ သတ္တာနံ လောကိယလောကုတ္တရတ္ထာယ သမ္ဗောဓိယံ သဗ္ဗညုတညာဏေယေဝ သတ္တော လဂ္ဂေါတိ. တာဒိသဣတ္ထိရတနေပိ အလဂ္ဂတာကထနေန ဗောဓိသတ္တဿ ဥက္ကဋ္ဌဇ္ဈာသယမဟန္တတ္တံ ဝုတ္တံ ဟောတိ. သမ္မာ ဗုဇ္ဈတိ ဧတာယာတိ စ, ဗောဓိယံ သတ္တော လဂ္ဂေါတိ စ, သတ္တာနံ ဟိတမိတိ စ, သ္နေဟေန ပိယဘာဝေန ဇာတော ရသော ရာဂေါတိ စ, တေန အာဗဒ္ဓါတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३०९. "सत्तो" इत्यादी. ते बोधिसत्व, स्नेह रसाने बांधलेल्या म्हणजे प्रियभाव संज्ञेच्या रागाने बांधलेल्या राहुलमाता बिंबादेवींना देखील सोडून, प्राण्यांच्या हितासाठी म्हणजे प्राण्यांच्या लौकिक आणि लोकोत्तर कल्याणासाठी, संबोधीमध्ये म्हणजे सर्वज्ञताज्ञानामध्येच आसक्त (लीन) झाले. अशा स्त्रीरत्नामध्येही अनासक्तीच्या कथनाने बोधिसत्वांच्या उत्कृष्ट आशयाचे महंतत्व सांगितले गेले आहे. "ज्याद्वारे सम्यक जाणले जाते ती" आणि "बोधीमध्ये आसक्त (लीन)" आणि "प्राण्यांचे हित" आणि "स्नेहाने म्हणजे प्रियभावाने उत्पन्न झालेला रस म्हणजे राग" आणि "त्याने बांधलेली" असा विग्रह आहे. ၃၁၀. ३१०. ဂေါပေတွာ ဝဏ္ဏနီယံ ယံ,ကိဉ္စိ ဒဿီယတေ ပရံ; အသမံ ဝါ သမံ တဿ,ယဒိ သာ ဝဉ္စနာ မတာ. वर्णन करण्यास योग्य असलेल्या गोष्टीला लपवून (गोपित करून), जर त्याच्याशी असमान किंवा समान असणारे इतर काही दाखविले जात असेल, तर ती 'वंचना' (अलंकार) मानली जाते. ၃၁၀. ဝဉ္စနံ [Pg.297] ဝဒတိ ‘‘ဂေါပေတွာ’’ဣစ္စာဒိနာ, ဝဏ္ဏနီယံ ကိဉ္စိ ဝတ္ထုံ ဂေါပေတွာ နိရံကတွာ တဿ ဝဏ္ဏနီယဿ အသမံ ဝိသမံ ဝိသဒိသံ ပရမညံ ယံ ကိဉ္စိ ဝတ္ထု ယဒိ ဒဿီယတေ ကဝိနာတိ အနုဝဒိတွာ သာ ဝဉ္စနာ မတာတိ ဝိဓီယတေ. ३१०. "गोपेत्वा" इत्यादींद्वारे वंचना अलंकार सांगतात. वर्णन करण्यास योग्य असलेल्या एखाद्या वस्तूला लपवून (निराकृत करून), त्या वर्णनीय वस्तूशी असमान म्हणजे विषम किंवा विसदृश असणारी दुसरी कोणतीही वस्तू जर कवीद्वारे दाखविली जात असेल, तर ती 'वंचना' मानली जाते, असा नियम केला आहे. ၃၁၀. ဣဒါနိ ဝဉ္စနာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ဂေါပေတွာ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဝဏ္ဏနီယံ ကိဉ္စိ ဝတ္ထုံ ဂေါပေတွာ တဿ ဝဏ္ဏနီယဿ သမံ သဒိသံ ဝါ အသမံ ဝိသဒိသံ ဝါ ပရံ ယံ ကိဉ္စိ ဝတ္ထု ယဒိ ဒဿီယတေ ကဝိနာ, သာ ဝဉ္စနာဣတိ မတာတိ. ဝဉ္စေတိ ဝဏ္ဏနီယံ ဧတာယ ဝုတ္တိယာတိ ဝါကျံ. ३१०. आता "गोपेत्वा" (लपवून) इत्यादींद्वारे 'वंचना' (वंचनालंकार) दर्शवितात. वर्णन करण्यास योग्य असलेली कोणतीही वस्तू लपवून, त्या वर्णनीय वस्तूच्या समान (सदृश) किंवा असमान (विसदृश) अशी इतर कोणतीही वस्तू जर कवीद्वारे दर्शविली जात असेल, तर ती 'वंचना' मानली जाते. या रचनेद्वारे वर्णनीय वस्तू लपविली (वंचित केली) जाते, असा या वाक्याचा अर्थ आहे. အသမဝဉ္စနာ असमवंचना (असमान वंचना) ၃၁၁. ३११. ပုရတော န သဟဿေသု,န ပဉ္စေသု စ တာဒိနော; မာရော ပရေသု တဿေ’သံ,သဟဿံ ဒသဝဍ္ဎိတံ. त्या तादी (तथागत/बुद्ध) यांच्या समोर हजारांमध्येही नाही आणि पाचांमध्येही नाही; परंतु इतरांच्या बाबतीत मारचे ते बाण दहा पटीने वाढलेले हजार (म्हणजेच दहा हजार) होतात. ၃၁၁. ဥဒါဟရတိ ‘‘ပုရတော’’ဣစ္စာဒိ. မာရော ကာမော တာဒိနော လောဘာဒီသု တာဒိသတ္တာ မုနိနော ပုရတော သမ္မုခေ သဟဿံ ဣသဝေါ အဿာတိ သဟဿေသု စ န ဟောတိ. ပဉ္စ ဣသဝေါ အဿာတိ ပဉ္စေသု စ န ဟောတီတိ ဝဏ္ဏနီယော မာရောတြ ဂေါပျတေ. တဿ ယော တိဘုဝနံ ဇယီ. ပရေသု အညသတ္တေသု သရာဂေသု ဧသမိသူနံ ဒသဝဍ္ဎိတံ ဒသဟိ ဂုဏိတံ သဟဿံ, ကထမညထာဘုဝနတ္တယံ ဇယေယျာတိ မာရံ ဂေါပေတွာ ဒသသဟဿောပလက္ခိတဝတ္ထန္တရဿ ဒဿိတတ္တာ အသမဝဉ္စနာယံ. ३११. "पुरतो" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. मार म्हणजे काम (वासना). लोभ इत्यादींच्या बाबतीत 'तादी' (अविकारी) असल्यामुळे, मुनींच्या (बुद्धांच्या) समोर प्रत्यक्षपणे त्याचे हजार बाणही चालत नाहीत आणि पाच बाणही चालत नाहीत. येथे वर्णनीय अशा मारला लपविले गेले आहे. त्या तिन्ही लोकांवर विजय मिळविणाऱ्या माराचे, इतर रागी (आसक्त) प्राण्यांच्या बाबतीत, बाण दहा पटीने गुणिलेले हजार (म्हणजेच दहा हजार) होतात. अन्यथा तो तिन्ही लोकांवर कसा बरे विजय मिळवू शकेल? अशा प्रकारे मारला लपवून दहा हजारांनी युक्त अशा दुसऱ्या वस्तूचे दर्शन घडविले गेल्यामुळे हा 'असमवंचना' अलंकार आहे. ၃၁၁. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ပုရတော’’ဣစ္စာဒိနာ. မာရော တာဒိနော လာဘာလာဘာဒီသု အဝိကာရိနော တထာဂတဿ ပုရတော အဘိမုခေ သဟဿေသု စ သဟဿသရောပိ န ဟောတိ, ပဉ္စေသု ပဉ္စ ဣသု စ တာဒိသေ ဌပေတွာ ပဉ္စ ဣသု န ဟောတိ. [Pg.299] ပရေသု သုဂတသမ္မုခေ ဤဒိသေသုပိ အညေသု သံကိလေသေသု တဿ တိလောကဇေတုနော မာရဿ ဧသံ သရာနံ ဒသဝဍ္ဎိတံ ဒသဂဏနာယ ဝဍ္ဎိတံ သဟဿံ ဟောတိ ဒသသဟဿံ ဟောတီတိ. ဝဏ္ဏနီယံ မာရံ ဂေါပေတွာ ဒသသဟဿသင်္ချာဟိ ဂဏိတဿ အညဿ သရသင်္ခါတဝတ္ထုနော ဒဿိတတ္တာ အယံ အသမဝဉ္စနာ နာမ. သဟဿံ ဣသဝေါ အဿေတိ စ, ပဉ္စ ဣသဝေါ အဿေတိ စ, ဒသဟိ ဝဍ္ဎိတန္တိ စ ဝါကျံ. ३११. आता "पुरतो" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. लाभ-अलाभ इत्यादींमध्ये अविकारी असणाऱ्या 'तादी' तथागतांच्या समोर मारचे हजार बाणही चालत नाहीत, आणि अशा मुनींना सोडून इतरांच्या बाबतीत त्याचे पाच बाणही चालत नाहीत. सुगतांच्या (बुद्धांच्या) समोर असणाऱ्या अशा मुनींशिवाय इतर संक्लेशयुक्त (मलीन) प्राण्यांच्या बाबतीत, त्या त्रिलोकविजेत्या माराचे बाण दहाच्या संख्येने वाढविलेले हजार म्हणजेच दहा हजार होतात. येथे वर्णनीय अशा मारला लपवून, दहा हजार संख्येने मोजल्या जाणाऱ्या दुसऱ्या बाणरूपी वस्तूचे दर्शन घडविले गेल्यामुळे याला 'असमवंचना' असे म्हणतात. "ज्याचे हजार बाण आहेत", "ज्याचे पाच बाण आहेत" आणि "दहाने वाढविलेले" असा या वाक्याचा विग्रह आहे. သမဝဉ္စနာ समवंचना (समान वंचना) ၃၁၂. ३१२. ဝိဝါဒ’မနုယုဉ္ဇန္တော,မုနိန္ဒဝဒနိန္ဒုနာ; သမ္ပုဏ္ဏော စန္ဒိမာ နာ’ယံ; ဆတ္တ’မေတံ မနောဘုနော. मुनींद्रांच्या (बुद्धांच्या) मुखचंद्राशी वाद घालणारा हा पूर्ण चंद्र (वास्तविक) चंद्र नाही; तर हे कामदेवाचे (माराचे) छत्र आहे. ၃၁၂. ‘‘ဝိဝါဒ’’မိစ္စာဒိ. မနောဘုနောတိ ကာမဿ. သမဝဉ္စနာယံ ပုဏ္ဏစန္ဒံ နိရံကတွာ ဆတ္တဿ ဒဿိတတ္တာ. ३१२. "विवाद" इत्यादी. 'मनोभू' म्हणजे कामाचा (माराचा). समवंचना अलंकारामध्ये पूर्ण चंद्राचे निराकरण करून छत्राचे दर्शन घडविले गेले आहे. ၃၁၂. ‘‘ဝိဝါဒ’’ဣစ္စာဒိ. မုနိန္ဒဝဒနိန္ဒုနာ သဗ္ဗညုနော မုခစန္ဒေန ဝိဝါဒံ အနုယုဉ္ဇန္တော သမ္ပုဏ္ဏော အယံ ပစ္စက္ခော စန္ဒိမာ န ဟောတိ. ကိဉ္စရဟိ ဧတံ စန္ဒမဏ္ဍလံ မနောဘုနော အနင်္ဂဿ ဥဗ္ဘူတိယံ ဆတ္တံ သမုဿိတသေတစ္ဆတ္တန္တိ. ဝဏ္ဏနီယံ စန္ဒမဏ္ဍလံ ဌပေတွာ တတော အညဿ စန္ဒသဒိသဿ ဆတ္တဿ ဒဿိတတ္တာ အယံ ဝုတ္တိ သမဝဉ္စနာ နာမ. မုနီနံ ဣန္ဒောတိ စ, တဿ ဝဒနမိတိ စ, ဣန္ဒုသဒိသော ဣန္ဒု, မုနိန္ဒဝဒနမေဝ ဣန္ဒူတိ စ, သမန္တတော ပုဏ္ဏောတိ စ, မနသိ ဘူတောတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३१२. "विवाद" इत्यादी. मुनींद्रांच्या म्हणजेच सर्वज्ञांच्या मुखचंद्राशी वाद घालणारा हा प्रत्यक्ष दिसणारा पूर्ण चंद्र चंद्र नाही. तर मग हे काय आहे? हे चंद्रमंडळ म्हणजे मनोभूचे (कामदेवाचे) वर उभारलेले पांढरे छत्र (श्वेतछत्र) आहे. येथे वर्णनीय अशा चंद्रमंडळाला बाजूला ठेवून, त्यासारख्याच दुसऱ्या छत्राचे दर्शन घडविले गेल्यामुळे या रचनेला 'समवंचना' असे म्हणतात. "मुनींचा इंद्र" (मुनींद्र), "त्याचे मुख" (वदन), "चंद्रासारखा चंद्र" (इंदू), "मुनींद्रांचे मुख हाच चंद्र" (मुनींद्रवदनेंदू), "सर्व बाजूंनी पूर्ण" (संपूर्ण) आणि "मनात उत्पन्न झालेला" (मनोभू) असा याचा विग्रह आहे. ၃၁၃. ३१३. ပရာနုဝတ္တနာဒီဟိ, နိဗ္ဗိန္ဒေနိ’ဟ ယာ ကတာ; ထုတိရ’ပ္ပကတေ သာ’ယံ, သိယာ အပ္ပကတတ္ထုတိ. इतरांचे अनुकरण करणे इत्यादींमुळे निर्माण झालेल्या विरक्तीतून (कंटाळ्यातून) येथे जी अप्रस्तुताची स्तुती केली जाते, ती 'अप्रस्तुतस्तुती' (अप्पकतत्थुति) मानली जाते. ၃၁၃. အပ္ပကတတ္ထုတိံ ပကာသေတိ ‘‘ပရိ’’စ္စာဒိနာ. ပရေသံ ယေသံ ကေသဉ္စိ အနုဝတ္တနံ သေဝါ, တမာဒိ ယေသံ တေဟိ နိဗ္ဗိန္ဒေန ဝိရတ္တေန အပ္ပကတေ အသန္နိဟိတေ ဗုဒ္ဓိဝိသယေယေဝ ဣဟ ကိသ္မိဉ္စိ ဝတ္ထုမှိ ကတာ ယာ ထုတိ သံရာဓနံ, သာယံ အပ္ပကတတ္ထုတိ သိယာ. ३१३. "परि" इत्यादींद्वारे 'अप्रस्तुतस्तुती' स्पष्ट करतात. इतरांचे अनुकरण करणे म्हणजेच त्यांची सेवा करणे इत्यादी गोष्टींबद्दल विरक्त (कंटाळलेल्या) झालेल्या व्यक्तीने, येथे अप्रस्तुत (असंनिहित) अशा बुद्धविषयक कोणत्याही वस्तूची जी स्तुती किंवा आराधना केली आहे, ती 'अप्रस्तुतस्तुती' (अप्पकतत्थुति) होय. ၃၁၃. ဣဒါနိ အပ္ပကတတ္ထုတိံ ဒဿေတိ ‘‘ပရာနု’’စ္စာဒိနာ. ပရာနုဝတ္တနာဒီဟိ အညဿ ယဿ ကဿစိ အနုဝတ္တနာဒီဟိ နိဗ္ဗိန္ဒေန ဥဗ္ဗေဂံ ပတ္တေန အပ္ပကတေ အနဓိဂတေ ဗုဒ္ဓိဝိသယေ ဧဝ ဣဟ ဣမသ္မိံ ကိသ္မိဉ္စိ ဝတ္ထုမှိ ကတာ ယာ ထုတိ သံရာဓနသင်္ခါတာ ပသံသာ အတ္ထိ, သာ အယံ အပ္ပကတတ္ထုတိ နာမ သိယာတိ. ပရေသမနုဝတ္တနမိတိ စ, တံ အာဒိ ယေသံ ပရပီဠာဒီနမိတိ စ, န ပကတောတိ စ, ရကာရော သန္ဓိဇော, အပ္ပကတေ ကတာ ထုတီတိ စ ဝါကျံ. ३१३. आता "परानु" इत्यादींद्वारे 'अप्रस्तुतस्तुती' दर्शवितात. इतरांचे अनुकरण करणे म्हणजेच इतर कोणाचेही अनुकरण इत्यादींमुळे कंटाळलेल्या (उद्विग्न झालेल्या) व्यक्तीने, येथे या अप्रस्तुत (अप्राप्त) अशा बुद्धविषयक वस्तूची जी स्तुती किंवा आराधना केली आहे, ती 'अप्रस्तुतस्तुती' होय. "इतरांचे अनुकरण करणे", "इतरांना पीडा देणे इत्यादी ज्याच्या सुरुवातीला आहे", "जे प्रस्तुत नाही" (येथे 'र' हा संधीमुळे आलेला वर्ण आहे) आणि "अप्रस्तुताची केलेली स्तुती" असा या वाक्याचा विग्रह आहे. ၃၁၄. ३१४. သုခံ ဇီဝန္တိ ဟရိဏာ, ဝနေသွ’ပရသေဝိနော; အနာယာသောပလာဘေဟိ, ဇလဒဗ္ဗင်္ကုရာဒိဘိ. इतरांची सेवा न करणारे हरिण वनांमध्ये विनासायास मिळणारे पाणी, दर्भाचे अंकुर इत्यादींद्वारे सुखाने जीवन जगतात. ၃၁၄. ဥဒါဟရတိ ‘‘သုခ’’မိစ္စာဒိ. ဇလေဟိ ဒဗ္ဗင်္ကုရေဟိ ဒဗ္ဗတိဏုဂ္ဂမေဟိ. အာဒိသဒ္ဒေန တရုပလ္လဝါဒီဟိ. ကီဒိသေဟိ? အနာယာသေန သေဝါပရိက္လေသာဒိနာ ဝိနာ ဥပလာဘေဟိ ပါပုဏိတဗ္ဗေဟိ. ပရမညံ ကိဉ္စိ န သေဝန္တိ သီလေနေတိ အပရသေဝိနော. ပရစိတ္တာရာဓနဗျသနပရမ္မုခါ ဟရိဏာ ဝနေသု သုခံ နိရာကုလံ ဇီဝန္တီတိ. ဧတ္ထ ရာဇာနုဝတ္တနက္လေသနိဗ္ဗိန္ဒေန သန္နိဟိတာ မိဂဝုတ္တိ ပသံသိတာတိ. ३१४. "सुखं" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. पाणी आणि दर्भाचे अंकुर (दर्भाचे कोंब) यांच्याद्वारे. 'इत्यादी' शब्दाने झाडांचे कोवळे कोंब (पल्लव) इत्यादी अभिप्रेत आहेत. ते कसे आहेत? विनासायास म्हणजेच सेवा करण्याच्या त्रासाशिवाय मिळणारे आहेत. स्वभावाने इतर कोणाचीही सेवा न करणारे ते 'अपरसेविन्' (अपरसेविणो) होत. इतरांच्या मनाचे रंजन करण्याच्या त्रासापासून दूर असणारे हरिण वनांमध्ये सुखाने आणि निर्धास्तपणे जगतात. येथे राजाचे अनुकरण करण्याच्या त्रासाला कंटाळून, समोर असणाऱ्या हरिणांच्या जीवनपद्धतीची प्रशंसा केली गेली आहे. ၃၁၄. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘သုခ’’မိစ္စာဒိနာ. ဟရိဏာ မိဂါ အပရသေဝိနော ဝုတ္တိံ နိဿာယ ပရံ အသေဝမာနာ အနာယာသောပလာဘေဟိ ပရပရိဂ္ဂဟာဘာဝတော ပရသေဝါပရိဿမံ ဝိနာ လဗ္ဘနီယေဟိ ဇလဒဗ္ဗင်္ကုရာဒိဘိ ဥဒကဒဗ္ဗင်္ကုရရုက္ခလတာပလ္လဝါဒီဟိ ဝနေသု ဣစ္ဆိတိစ္ဆိတာရညေသု သုခံ ဇီဝန္တိ သုခဇီဝနံ ကရောန္တီတိ. ဧတ္ထ ရာဇသေဝါဗျသနပ္ပတ္တေန ကေနစိ အနဓိဂတာပိ မိဂဇီဝိကာ ပသံသိတာ ဟောတိ. ပရံ န သေဝန္တိ သီလေနာတိ စ, အဘာဝေါ အာယာသဿေတိ စ, [Pg.300] တေန ဥပလဘိတဗ္ဗာတိ စ, ဒဗ္ဗာနံ အင်္ကုရာနီတိ စ, ဇလဉ္စ ဒဗ္ဗင်္ကုရာနိ စေတိ စ, တာနိ အာဒိ ယေသံ ပလ္လဝါဒီနမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३१४. आता "सुखं" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. हरिण (मृग) हे इतर कोणाचीही सेवा न करता, दुसऱ्याच्या मालकीचा अभाव असल्यामुळे आणि सेवा करण्याच्या श्रमाशिवाय सहज मिळणारे पाणी, दर्भाचे अंकुर, झाडे व वेलींचे कोवळे कोंब इत्यादींद्वारे आपल्या आवडीच्या वनांमध्ये सुखाने जीवन जगतात. येथे राजसेवेच्या त्रासाने त्रस्त झालेल्या एखाद्या व्यक्तीद्वारे, स्वतःला प्राप्त नसलेल्या अशा हरिणांच्या जीवनपद्धतीची प्रशंसा केली गेली आहे. "स्वभावाने इतरांची सेवा न करणारे", "आयासाचा (कष्टाचा) अभाव", "त्याद्वारे प्राप्त होणारे", "दर्भाचे अंकुर", "पाणी आणि दर्भाचे अंकुर" आणि "कोवळे कोंब इत्यादी ज्यांच्या सुरुवातीला आहेत" असा याचा विग्रह आहे. ၃၁၅. ३१५. ဥတ္တရံ ဥတ္တရံ ယတ္ထ, ပုဗ္ဗပုဗ္ဗဝိသေသနံ; သိယာ ဧကာဝလီ သာ’ယံ, ဒွိဓာ ဝိဓိနိသေဓတော. जेथे प्रत्येक पुढील पद हे मागील पदाचे विशेषण असते, ती 'एकावली' (एकावली अलंकार) होय. विधी (विधान) आणि निषेध (नकार) या दोन प्रकारांमुळे ती दोन प्रकारची असते. ၃၁၅. ဧကာဝလိံ ကထယတိ ‘‘ဥတ္တရ’’မိစ္ဆာဒိနာ. ယတ္ထ ဝုတ္တိယံ ဥတ္တရံ ဥတ္တရံ ဥပရိဋ္ဌာနမုပရိဋ္ဌာနံ ပုဗ္ဗဿ ပုဗ္ဗဿ ဝိသေသနံ ဝိဓိနိသေဓနဝသေန ဧကာဝလိ နာမ သိယာ. အယံ ဧကာဝလိ ဝိဓိနိသေဓတော ဝိဓိဝသေန နိသေဓနဝသေန စ ဒွိဓာ. ३१५. "उत्तरं" इत्यादींद्वारे 'एकावली' सांगतात. ज्या रचनेमध्ये प्रत्येक पुढील (वरचे वरचे) पद हे मागील पदाचे विधी किंवा निषेधाच्या रूपाने विशेषण असते, ती 'एकावली' होय. ही एकावली विधी आणि निषेधाच्या रूपाने दोन प्रकारची असते. ၃၁၅. ဣဒါနိ ဧကာဝလိံ ဒဿေတိ ‘‘ဥတ္တရ’’မိစ္စာဒိနာ. ယတ္ထ ဥတ္တိယံ ဥတ္တရံ ဥတ္တရံ ဥပရူပရိဘဝံ ပဒံ ပုဗ္ဗပုဗ္ဗဝိသေသနံ ပုဗ္ဗပုဗ္ဗပဒဿ ဝိဓိနိသေဓနဝသေန ဝိသေသနံ ဟောတိ, သာ ဧကာဝလိ နာမ သိယာ. အယံ ဧကာဝလိ ဝိဓိနိသေဓတော ဝိဓိနိသေဓဝသေန ဒွိဓာ ဟောတီတိ. ဥတ္တရံ ပုဗ္ဗန္တိ ဌာနူပစာရေန ဌာနီဘူတံ ပဒမေဝ ဝုစ္စတိ. ပုဗ္ဗဿ ပုဗ္ဗဿ ဝိသေသနမိတိ စ, ဧကတော အာဝလိယန္တိ သံဝလိယန္တိ ပဒါနိ ဧတာယာတိ စ, ဝိဓိဝိဓာနဉ္စ နိသေဓော ပဋိသေဓော စာတိ စ ဝါကျံ. ဧတ္ထ ‘‘ဥတ္တရံ ဥတ္တရ’’န္တိ စ ‘‘ပုဗ္ဗဿ ပုဗ္ဗဿ’’ဣတိ စ ကမေန ဝိသေသနဝိသေသျဂုဏေန ဗျာပနိစ္ဆာယံ နိဗ္ဗစနံ, ဝိသေသျဂုဏံ ဂမ္မမာနမေဝ. ३१५. आता "उत्तरं" इत्यादींद्वारे 'एकावली' दर्शवितात. ज्या रचनेमध्ये प्रत्येक पुढील (वरचे वरचे) पद हे मागील पदाचे विधी किंवा निषेधाच्या रूपाने विशेषण असते, ती 'एकावली' होय. ही एकावली विधी आणि निषेधाच्या रूपाने दोन प्रकारची असते. 'उत्तर' आणि 'पूर्व' हे शब्दांच्या स्थानावरून त्यांच्या पदांनाच म्हटले जाते. "मागील पदाचे विशेषण", "ज्याद्वारे पदे एका माळेत गुंफली जातात" आणि "विधी (विधान) व निषेध (प्रतिषेध)" असा या वाक्याचा विग्रह आहे. येथे "उत्तरं उत्तरं" आणि "पुब्बस्स पुब्बस्स" हे अनुक्रमे विशेषण आणि विशेष्य यांच्या गुणांच्या व्याप्तीनुसार स्पष्ट केले आहे. ဝိဓိဧကာဝလိ विधी एकावली ၃၁၆. ३१६. ပါဒါ နခါလိရုစိရာ,နခါလီ ရံသိဘာသုရာ; ရံသီ တမောပဟာနေက -ရသာ သောဘန္တိ သတ္ထုနော. शास्त्यांचे (बुद्धांचे) चरण नखांच्या पंक्तीमुळे सुंदर आहेत, नखांची पंक्ती किरणांनी देदीप्यमान आहे, आणि ते किरण अंधकार नष्ट करण्याचे एकमेव कार्य करणारे असून शोभून दिसतात. ၃၁၆. ဥဒါဟရတိ [Pg.301] ‘‘ပါဒါ’’ဣစ္စာဒိ. သုဂမ္မံ. ဧတ္ထ ပါဒါဒီနံ ဝိသေသျာနံ နခါလိရုစိရတ္တာဒိဝိဓာနေန ဝိသေသနေန ဝိသေသိတဗ္ဗတ္တာ အယံ ဝိဓိဧကာဝလိ. ३१६. "पादा" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. हे समजण्यास सोपे आहे. येथे चरण इत्यादी विशेष्य पदांना नखांच्या पंक्तीमुळे सुंदर असणे इत्यादी विधी (विधानात्मक) विशेषणांद्वारे विशेषित केले गेल्यामुळे ही 'विधी एकावली' आहे. ၃၁၆. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ပါဒါ’’ဣစ္စာဒိနာ. သတ္ထုနော ပါဒါ နခါလိရုစိရာ နခပန္တီဟိ မနုညာ နခါလီ နခပန္တိယော ရံသိဘာသုရာ ရံသီဟိ ဒိဗ္ဗမာနာ ရံသီ ကန္တိယော တမောပဟာနေကရသာ အန္ဓကာရဝိဓမနေ အသဟာယကိစ္စာ ဟုတွာ သောဘန္တီတိ. ဧတ္ထ ပါဒါဒီနံ ပုဗ္ဗပဒါနံ နခါလိရုစိရတ္တာဒိဝိဓာယကေဟိ ဥတ္တရဥတ္တရဝိသေသနေဟိ ဝိသေသိတတ္တာ အယံ ဝိဓိဧကာဝလိ နာမ. နခါနံ အာလိ ပါဠီတိ စ, နခါလီဟိ ရုစိရာတိ စ, ရံသီဟိ ဘာသုရာတိ စ, တမသော အပဟာရော အပဟရဏမိတိ စ, သော ဧကော ရသော ကိစ္စံ ဧတာသံ ရံသီနမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३१६. आता "पादा" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. शास्त्यांचे (बुद्धांचे) चरण नखांच्या पंक्तीमुळे सुंदर आहेत, नखांची पंक्ती किरणांनी देदीप्यमान आहे, आणि ते किरण अंधकार नष्ट करण्याचे एकमेव कार्य करणारे असून शोभून दिसतात. येथे चरण इत्यादी पूर्वपदांना नखांच्या पंक्तीमुळे सुंदर असणे इत्यादी पुढील विशेषणांद्वारे विशेषित केले गेल्यामुळे ही 'विधी एकावली' होय. "नखांची पंक्ती", "नखांच्या पंक्तीमुळे सुंदर", "किरणांनी देदीप्यमान", "अंधकाराचा नाश करणे" आणि "तेच ज्या किरणांचे एकमेव कार्य आहे" असा याचा विग्रह आहे. နိသေဓဧကာဝလိ निषेध एकावली ၃၁၇. ३१७. အသန္တုဋ္ဌော ယတီ နေဝ,သန္တောသော နာ’လယာဟတော; နာ’လယော ယော သဇန္တူနံ,နာ’နန္တဗျသနာဝဟော. जो असंतुष्ट आहे तो भिक्खू (यती) असूच शकत नाही; जो तृष्णेने (आलयाने) ग्रस्त आहे तो संतोष असू शकत नाही; आणि जो प्राण्यांना अनंत संकटे आणणारा नाही तो आलय (तृष्णा) असू शकत नाही. ၃၁၇. ‘‘အသန္တုဋ္ဌော’’ဣစ္စာဒိ. အသန္တုဋ္ဌော စတုပစ္စယသန္တောသဝသေန ယော ကောစိ ယတိ နာမ နေဝ သိယာ. အာလယေန တဏှာယ အာဟတော စ ယော, သော သန္တောသော နာမ န ဟောတိ. ယော ဇန္တူနံ သတ္တာနံ အနန္တဗျသနာဝဟော န ဟောတိ, သော အာလယော နာမ န ဘဝတီတိ. အသန္တုဋ္ဌာဒီနံ ယတိတ္တာဒိနိသေဓနဝသေန ဝိသေသနာနံ ပဝတ္တိယာ နိသေဓဧကာဝလိ အယံ. ३१७. "असंतुट्ठो" इत्यादी. चार प्रत्ययांच्या (गरजांच्या) संतोषाच्या बाबतीत जो असंतुष्ट आहे, तो भिक्खू (यती) असूच शकत नाही. जो तृष्णेने (आलयाने) ग्रस्त आहे, तो संतोष असू शकत नाही. आणि जो प्राण्यांना अनंत संकटे आणणारा नाही, तो आलय (तृष्णा) असू शकत नाही. येथे असंतुष्ट इत्यादी पदांना भिक्खू असणे इत्यादींच्या निषेधाच्या रूपाने विशेषित केले गेल्यामुळे ही 'निषेध एकावली' आहे. ၃၁၇. ‘‘အသန္တုဋ္ဌော’’ဣစ္စာဒိ. အသန္တုဋ္ဌော စီဝရာဒီသု စတူသု ပစ္စယေသု ဒဿိတဒွါဒသဝိဓသန္တောသာနံ အညတရေန အသန္တုဋ္ဌော [Pg.302] ယတိ န ဧဝ ဘိက္ခု နာမ န ဟောတိ. အာလယာဟတော တဏှာယ ပဟတော သန္တောသော န ဟောတိ. ယော ဇန္တူနံ အနန္တဗျသနာဝဟော န ယော သတ္တာနံ အပရိယန္တပီဠာပါပကော န ဟောတိ, သော အာလယော န ဟောတီတိ. အသန္တုဋ္ဌာဒီနံ ယတိဘာဝါဒိပဋိသေဓဝသေန ဝိသေသနာနံ ပဝတ္တတ္တာ အယံ နိသေဓဧကာဝလိ နာမ. အသန္တုဋ္ဌပဒံ ယတိသဟိတသကလသတ္တသမုဒါယဿ သာဓာရဏဘာဝေန ဌိတံ, ယတိ န ဘဝတီတိ ယတိတော အညေသု သကလသတ္တသင်္ခါတေသု အဝယဝေသု ပတိဋ္ဌာပနတော ‘‘အသန္တုဋ္ဌော’’တိ ဝိသေသျော, ‘‘ယတိ နေ’’တိ ဣဒံ ဝိသေသနံ. သေသေသုပိ ဝိသေသနဝိသေသျတ္တံ ဝုတ္တနိယာမေန ယထာရဟံ ယောဇေတဗ္ဗံ. န သန္တုဿတီတိ စ, အာလယေန ဟတောတိ စ, နတ္ထိ အန္တော ဧတေသမိတိ စ, တာနိ စ တာနိ ဗျသနာနိ စေတိ စ, တာနိ အာဝဟတီတိ စ ဝါကျံ. ३१७. "असंतुट्ठो" इत्यादी. चीवर इत्यादी चार प्रत्ययांच्या बाबतीत दर्शविलेल्या बारा प्रकारच्या संतोषांपैकी कोणत्याही एका संतोषाने जो असंतुष्ट आहे, तो भिक्खू असूच शकत नाही. जो तृष्णेने (आलयाने) ग्रस्त आहे, तो संतोष असू शकत नाही. जो प्राण्यांना अनंत संकटे आणणारा नाही, तो आलय (तृष्णा) असू शकत नाही. येथे असंतुष्ट इत्यादी पदांना भिक्खू असणे इत्यादींच्या निषेधाच्या रूपाने विशेषित केले गेल्यामुळे ही 'निषेध एकावली' होय. "असंतुष्ट" हे पद भिक्खूंसह सर्व प्राण्यांच्या समुदायासाठी सामान्य रूपाने स्थित आहे, "तो भिक्खू होत नाही" असे म्हणून भिक्खूव्यतिरिक्त इतर सर्व प्राण्यांमध्ये त्याची स्थापना केली गेल्यामुळे "असंतुष्ट" हे विशेष्य आहे आणि "भिक्खू नाही" हे त्याचे विशेषण आहे. इतर पदांच्या बाबतीतही विशेषण आणि विशेष्य भाव सांगितलेल्या नियमानुसार योग्य प्रकारे जोडला पाहिजे. "जो संतुष्ट होत नाही", "जो तृष्णेने ग्रस्त आहे", "ज्याला अंत नाही", "ती आणि ती संकटे" आणि "ती संकटे आणणारा" असा याचा विग्रह आहे. ၃၁၈. ३१८. ယဟိံ ဘူသိယဘူသတ္တံ, အညမညံ တု ဝတ္ထုနံ; ဝိနာဝ သဒိသတ္တံ တံ, အညမညဝိဘူသနံ. जेथे कोणत्याही सादृश्याशिवाय (समानतेशिवाय) दोन वस्तूंमध्ये परस्परांना सुशोभित करण्याचा (अलंकार आणि अलंकृत होण्याचा) भाव असतो, तो 'अन्योन्यालंकार' (अञ्ञमञ्ञविभूसन) होय. ၃၁၈. အညမညမာဟ ‘‘ယဟိ’’မိစ္စာဒိနာ. ယဟိံ သဒိသတ္တံ ဝိနာ ဧဝ ဝတ္ထုနံ ပဒတ္ထာနံ အညမညံ ဘူသိယဘူသတ္တံ, တံ အညမညံ နာမ ဝိဘူသနမလင်္ကာရောတိ. ३१८. "यहिं" इत्यादींद्वारे 'अन्योन्यालंकार' सांगतात. जेथे सादृश्याशिवाय दोन वस्तूंच्या किंवा पदार्थांच्या बाबतीत परस्परांना सुशोभित करण्याचा भाव असतो, तो 'अन्योन्यालंकार' (परस्पर विभूषण) होय. ၃၁၈. ဣဒါနိ အညမညာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ယဟိ’’မိစ္စာဒိနာ. ယဟိံ အလင်္ကာရေ သဒိသတ္တံ ဝိနာ ဧဝ ဝတ္ထုနံ အညမညံ တု ဘူသိယဘူသတ္တံ အလင်္ကာရိယအလင်္ကာရတ္တံ ဟောတိ, တံ အညမညဝိဘူသနံ ဟောတီတိ. ဘူသိယဉ္စ ဘူသာ စာတိ စ, တာသံ ဘာဝေါတိ စ, အညဉ္စ အညဉ္စေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ‘‘အညမည’’န္တိ ဧတ္ထ ဆဋ္ဌုန္တအသင်္ချမဗျယံ, သသင်္ချေ စေတိ ‘‘ဘူသိယဘူသတ္တ’’န္တိ ဣမဿ ဝိသေသနံ ကတွာ ဝတ္တဗ္ဗံ. အလင်္ကာရိယမပေက္ခာယ အလင်္ကာရဝတ္ထု စ, တမပေက္ခာယ အလင်္ကာရိယဝတ္ထု စ အညမညံ နာမ. တန္ဒီပကာလင်္ကာရောပိ တဒတ္ထိယေန တန္နာမကော ဟောတိ. ३१८. आता "यहिं" इत्यादींद्वारे 'अन्योन्यालंकार' दर्शवितात. ज्या अलंकारामध्ये सादृश्याशिवाय दोन वस्तूंमध्ये परस्परांना सुशोभित करण्याचा म्हणजेच अलंकृत होण्याचा आणि अलंकृत करण्याचा भाव असतो, तो 'अन्योन्यालंकार' (परस्पर विभूषण) होय. "अलंकृत होणारे आणि अलंकृत करणारे", "त्यांचा भाव", "एक आणि दुसरे" असा याचा विग्रह आहे. येथे "अञ्ञमञ्ञं" हे अव्यय असून ते "भूषियभूषत्व" चे विशेषण म्हणून योजले पाहिजे. अलंकृत होणाऱ्याच्या अपेक्षेने अलंकार असणारी वस्तू आणि अलंकाराच्या अपेक्षेने अलंकृत होणारी वस्तू या परस्परांना 'अन्योन्य' म्हणतात. ၃၁၉. ३१९. ဗျာမံသုမဏ္ဍလံ [Pg.303] တေန, မုနိနာ လောကဗန္ဓုနာ; မဟန္တိံ ဝိန္ဒတီ ကန္တိံ, သောပိ တေနေဝ တာဒိသိံ. जगाचे बंधू असणाऱ्या त्या मुनींमुळे (बुद्धांमुळे) त्यांचे व्यामप्रभामंडल (शरीराभोवतीचे वलय) अत्यंत शोभा प्राप्त करते, आणि ते व्यामप्रभामंडल देखील त्यांच्यामुळे तशीच शोभा प्राप्त करते. ၃၁၉. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဗျာမံသု’’ဣစ္စာဒိနာ. သုဗောဓံ. ३१९. "ब्यामंसु" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. हे समजण्यास सोपे आहे. ၃၁၉. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ဗျာမံသု’’ဣစ္စာဒိနာ. ဗျာမံသုမဏ္ဍလံ ဗျာမပဘာမဏ္ဍလံ လောကဗန္ဓုနာ တေန မုနိနာ ကရဏဘူတေန မဟန္တိံ မဟတိံ ပူဇနီယံ ဝါ ကန္တိံ သောဘံ ဝိန္ဒတိ သေဝတိ, သောပိ မုနိ တေန ဧဝ ဗျာမံသုမဏ္ဍလေန တာဒိသိံ ကန္တိံ ဝိန္ဒတီတိ. အညမညံ အသဒိသာနံ ဗျာမံသုမဏ္ဍလမုနိသင်္ခါတာနံ ဒွိန္နံ ဝတ္ထူနံ ဗျာမံသုမဏ္ဍလံ ပဌမဝါကျေ အလင်္ကာရိယံ ဟောတိ, မုနိပဒတ္ထော အလင်္ကာရော ဟောတိ. အပရဝါကျေ ဣမေ ဒွေ ဝိပလ္လာသေန အလင်္ကာရိယအလင်္ကာရာ ဟောန္တိ. အံသူနံ မဏ္ဍလမိတိ စ, ဗျာမံ ဧဝ အံသုမဏ္ဍလမိတိ စ, လောကော ဗန္ဓု အဿေတိ စ, သာ ဝိယ ဒိဿတီတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३१९. आता "ब्यामंसु" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. व्यामप्रभामंडल हे त्या लोकबंधू मुनींच्या (बुद्धांच्या) माध्यमातून अत्यंत महान आणि पूजनीय अशी कांती किंवा शोभा प्राप्त करते, आणि ते मुनी देखील त्याच व्यामप्रभामंडलामुळे तशाच प्रकारची कांती प्राप्त करतात. परस्परांशी तुलना नसलेल्या व्यामप्रभामंडल आणि मुनी या दोन वस्तूंपैकी, पहिल्या वाक्यात व्यामप्रभामंडल हे 'अलंकार्य' (ज्याला अलंकृत करायचे आहे ते) आहे आणि 'मुनी' हा शब्दार्थ 'अलंकार' (अलंकृत करणारा) आहे. दुसऱ्या वाक्यात हे दोन्ही उलट होऊन (विपर्यास होऊन) अलंकार्य आणि अलंकार बनतात. 'किरणांचे मंडल' (अंसूनां मंडलं), 'व्याम (हात पसरल्यावर होणारे अंतर) हेच किरणमंडल' (ब्यामं एव अंसुमंडलं), 'लोक हाच ज्याचा बंधू आहे तो' (लोको बंधू अस्स) आणि 'त्याच्यासारखी दिसते' (सा विय दिस्सति) असा विग्रह आहे. ၃၂၀. ३२०. ကထနံ သဟဘာဝဿ, ကြိယာယ စ ဂုဏဿ စ; သဟဝုတ္တီတိ ဝိညေယျံ, တဒုဒါဟရဏံ ယထာ. क्रिया आणि गुण यांच्या सहभावाचे (एकत्र असण्याचे) जे कथन आहे, त्याला 'सहवृत्ती' (सहभावोक्ती) समजावे. त्याचे उदाहरण खालीलप्रमाणे आहे. ၃၂၀. သဟဝုတ္တိံ ဝဒတိ ‘‘ကထန’’မိစ္စာဒိနာ. သုဗောဓံ. ३२०. "कथनं" इत्यादींद्वारे सहवृत्तीचे वर्णन करतात. हे सुबोध (स्पष्ट) आहे. ၃၂၀. ဣဒါနိ သဟဝုတ္တိံ ဒဿေတိ ‘‘ကထန’’မိစ္စာဒိနာ. ကြိယာယ ဂုဏဿ စာတိ ဒွိန္နံ သဟဘာဝဿ သဟတ္တဿ ကထနံ သဟဝုတ္တီတိ ဝိညေယျံ. တဒုဒါဟရဏံ ယထာ တဿ ဥဒါဟရဏံ ဧဝံ ဝက္ခမာနနယေန ဒဋ္ဌဗ္ဗန္တိ. သဟ သဒ္ဓိံ ဘဝနမိတိ စ, သဟဘာဝဿ ဝုတ္တိ ကထနမိတိ စ, တဿ ဥဒါဟရဏမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. သဟဘာဝေါ စန္ဒရသ္မိနခံသုအာဒီနံ ပဒတ္ထာနံ. ဧဝံ သန္တေပိ တေသံ တံသဟတ္တံ ယဿံ ကြိယာယံ ဂုဏေ ဝါ ဘဝတီတိ သဟတ္တံ ကြိယာဂုဏာနံ ဟောတီတိ ကတွာ ‘‘ကထနံ သဟဘာဝဿ ကြိယာယ စ ဂုဏဿ စာ’’တိ ဝုတ္တံ. ३२०. आता "कथनं" इत्यादींद्वारे सहवृत्ती दर्शवितात. क्रिया आणि गुण या दोघांच्या सहभावाचे (एकत्र असण्याचे) जे कथन आहे, त्याला 'सहवृत्ती' समजावे. "तदुदाहरणं यथा" म्हणजे त्याचे उदाहरण पुढे सांगण्यात येणाऱ्या पद्धतीने पाहावे. 'सहा' म्हणजे सोबत असणे (भवन), 'सहभावाचे कथन' म्हणजे सहवृत्ती, आणि 'त्याचे उदाहरण' असा विग्रह आहे. हा सहभाव चंद्रकिरण आणि नखकिरण इत्यादी पदार्थांचा आहे. असे असले तरी, त्यांचे ते एकत्र असणे ज्या क्रियेत किंवा गुणात घडते, त्यावरून क्रिया आणि गुणांचे एकत्र असणे होते, म्हणून "क्रिया आणि गुण यांच्या सहभावाचे कथन" असे म्हटले आहे. ကြိယာသဟဝုတ္တိ क्रिया-सहवृत्ती (क्रिया-सहभावोक्ती) ၃၂၁. ३२१. ဇလန္တိ [Pg.304] စန္ဒရံသီဟိ, သမံ သတ္ထု နခံသဝေါ; ဝိဇမ္ဘတိ စ စန္ဒေန, သမံ တမ္မုခစန္ဒိမာ. चंद्राच्या किरणांसोबत शास्त्यांचे (बुद्धांचे) नखकिरण चमकतात, आणि चंद्रासोबत त्यांचा मुखचंद्र प्रफुल्लित होतो. ၃၂၁. ‘‘ဇလန္တိ’’ဣစ္စာဒိ. သမန္တိ သဟ, တဿ သတ္ထုနော မုခစန္ဒိမာ. သေသံ သုဗောဓံ. ဧတ္ထ ဇလနဝိဇမ္ဘနာနံ ဥဘယသာဓာရဏာနံ ကြိယာနံ သဟဘာဝေါ ဝိဟိတောတိ ကြိယာသဟဝုတ္တိ အယန္တိ. ३२१. "जलन्ति" इत्यादी. 'समं' म्हणजे सोबत, 'तस्स सत्थुनो मुखचन्दिमा' म्हणजे त्या शास्त्यांचा मुखचंद्र. उर्वरित भाग सुबोध आहे. येथे चमकणे (जलन) आणि प्रफुल्लित होणे (विजम्भन) या दोन्ही सामान्य क्रियांचा सहभाव दर्शविला असल्याने ही 'क्रिया-सहवृत्ती' आहे. ၃၂၁. ဣဒါနိ ယထာပဋိညာတဥဒါဟရဏံ ဒဿေတိ ‘‘ဇလန္တိ’’ဣစ္စာဒိနာ. သတ္ထု သတ္ထုနော နခံသဝေါ နခကိရဏာ စန္ဒရံသီဟိ သမံ ဇလန္တိ, တမ္မုခစန္ဒိမာ စ စန္ဒေန သမံ ဝိဇမ္ဘတီတိ. ဧတ္ထ ဥဘယပဒတ္ထာနံ သာဓာရဏဘူတဇလနဝိဇမ္ဘနကြိယာနံ သဟဘာဝဿ ဝုတ္တတ္တာ ဧသာ ကြိယာသဟဝုတ္တိ နာမ. စန္ဒဿ ရံသိယောတိ စ, နခါနံ အံသဝေါတိ စ, တဿ သတ္ထုနော မုခန္တိ စ, တမေဝ စန္ဒိမသဒိသတ္တာ စန္ဒိမာတိ စ ဝါကျံ. သမံဣတိ သဟပရိယာယော နိပါတော. ३२१. आता प्रतिज्ञा केल्याप्रमाणे "जलन्ति" इत्यादींद्वारे उदाहरण दर्शवितात. शास्त्यांचे (बुद्धांचे) नखकिरण चंद्राच्या किरणांसोबत चमकतात आणि त्यांचा मुखचंद्र चंद्रासोबत प्रफुल्लित होतो. येथे दोन्ही पदार्थांच्या सामान्य अशा चमकणे आणि प्रफुल्लित होणे या क्रियांच्या सहभावाचे कथन केल्यामुळे याला 'क्रिया-सहवृत्ती' म्हणतात. 'चंद्राचे किरण' (चन्दस्स रंसियो), 'नखांचे किरण' (नखानं अंसवो), 'त्या शास्त्यांचे मुख' (तस्स सत्थुनो मुखं) आणि 'ते चंद्रासारखे असल्यामुळे मुखचंद्र' (तमेव चन्दिमसदisत्ता चन्दिमा) असे वाक्य आहे. 'समं' हा 'सह' या अर्थाचा निपात (अव्यय) आहे. ဂုဏသဟဝုတ္တိ गुण-सहवृत्ती (गुण-सहभावोक्ती) ၃၂၂. ३२२. ဇိနောဒယေန မလိနံ, သဟ ဒုဇ္ဇနစေတသာ; ပါပံ ဒိသာ သုဝိမလာ, သဟ သဇ္ဇနစေတသာ. जिनांच्या (बुद्धांच्या) उदयाने दुर्जनांच्या चित्तासोबत पाप मलीन (नष्ट) झाले, आणि सज्जनांच्या चित्तासोबत सर्व दिशा अत्यंत विमल (स्वच्छ) झाल्या. ၃၂၂. ‘‘ဇိနောဒယေန’’စ္စာဒိ. ဇိနောဒယေန ကရဏဘူတေန, ဟေတုဘူတေန ဝါ ဒုဇ္ဇနစေတသာ သဟ ပါပံ မလိနံ ကိလိဋ္ဌံ, သဇ္ဇနစေတသာ သဟ ဒိသာ ဒသဝိဓာပိ သုဝိမလာ အစ္စန္တနိမ္မလာ သုဝိမလယသောမာလာဝလယိတတ္တာ သဇ္ဇနစေတော ပါပါပဂမေနေတိ. ဧတ္ထ မလိနတ္တဿ စ သုဝိမလတ္တဿ ဉာယသမ္ဗန္ဓိနော သဟဘာဝေါ ဝုတ္တောတိ အယံ ဂုဏသဟဝုတ္တိ. ३२२. "जिनोदयेन" इत्यादी. कारण किंवा हेतू असलेल्या जिनांच्या (बुद्धांच्या) उदयाने दुर्जनांच्या चित्तासोबत पाप मलीन (कलुषित) झाले, आणि सज्जनांच्या चित्तासोबत दशाही दिशा अत्यंत विमल (अतिशय निर्मळ) झाल्या; कारण सज्जनांचे चित्त पापनाशामुळे आणि त्यांच्या सुविमल यशरूपी मालेने वेढले गेल्यामुळे निर्मळ झाले. येथे मलीनता आणि सुविमलत्व या न्यायसंगत गुणांच्या सहभावाचे कथन केले असल्याने ही 'गुण-सहवृत्ती' आहे. ၃၂၂. ‘‘ဇိနော’’ဣစ္စာဒိ. ဇိနောဒယေန ဇိတမာရဿ ဘဂဝတော ပါတုဘာဝေန, ကရဏဘူတေန ဟေတုဘူတေန ဝါ [Pg.305] ပါပံ လောဘာဒိဓမ္မံ ဒုဇ္ဇနစေတသာ ဒုဇ္ဇနာနံ စိတ္တေန သဟ မလိနံ ကိလိဋ္ဌံ ဟောတိ. ဣမိနာယေဝ ဇိနောဒယေန ဒိသာ ဒသ ဒိသာယော သဇ္ဇနစေတသာ သဟ သုဝိမလာ သဇ္ဇနစေတသန္တာနတော ပါပါနံ အပဂမေန ကိတ္တိမာလာယ ဘုဝနတ္တယေ ပတ္ထဋတ္တာ အတိနိမ္မလာတိ ဥဘယပဒတ္ထာနံ သာဓာရဏဘူတမလိနဘာဝသုဝိမလဘာဝသင်္ခါတဿ ဂုဏဿ သဟဘာဝဿ ဝုတ္တတ္တာ ဧသာ ဂုဏသဟဝုတ္တိ နာမ. ဇိနဿ ဥဒယောတိ စ, ဒုဇ္ဇနာနံ စေတောတိ စ, ဝိဂတံ မလံ ဧတာဟိတိ စ, သု အတိသယေန ဝိမလာတိ စ, သန္တော စ တေ ဇနာ စေတိ စ, တေသံ စေတောတိ စ ဝါကျံ. ३२२. "जिनो" इत्यादी. जिनांच्या उदयाने म्हणजे मारविजेत्या भगवंतांच्या प्राकट्याने, जे कारण किंवा हेतू आहे, दुर्जनांच्या चित्तासोबत पाप (लोभादी धर्म) मलीन (कलुषित) होते. याच जिनांच्या उदयाने, सज्जनांच्या चित्तसंतानातील पापांच्या नाशामुळे आणि त्यांच्या कीर्तिमालेचा तिन्ही लोकांत विस्तार झाल्यामुळे, दशाही दिशा सज्जनांच्या चित्तासोबत अत्यंत विमल (अतिशय निर्मळ) होतात. अशा प्रकारे दोन्ही पदार्थांच्या सामान्य अशा मलीनभाव आणि सुविमलभाव या गुणांच्या सहभावाचे कथन केल्यामुळे याला 'गुण-सहवृत्ती' म्हणतात. 'जिनांचा उदय' (जिनस्स उदयो), 'दुर्जनांचे चित्त' (दुज्जनानं चेतो), 'ज्यांच्यातील मळ निघून गेला आहे अशा' (विगतं मलं एताहि), 'अतिशय विमल' (सु अतिसयेन विमला), 'जे संत (सज्जन) लोक आहेत ते' (सन्तो च ते जना च) आणि 'त्यांचे चित्त' (तेसं चेतो) असे वाक्य आहे. ၃၂၃. ३२३. ဝိရောဓီနံ ပဒတ္ထာနံ, ယတ္ထ သံသဂ္ဂဒဿနံ; သမုက္ကံသာဘိဓာနတ္ထံ, မတာ သာ’ယံ ဝိရောဓိတာ. जिथे परस्परविरोधी पदार्थांचा संबंध (संसर्ग) उत्कर्षाचे (अतिशयाचे) कथन करण्यासाठी दर्शविला जातो, त्याला 'विरोधिता' (विरोधाभास अलंकार) मानले जाते. ၃၂၃. ဝိရောဓံ ဝိဘာဝေတိ ‘‘ဝိရောဓီန’’မိစ္စာဒိ. ဝိရောဓီနံ အညမညဝိရုဒ္ဓါနံ ကြိယာဒီနံ ယတ္ထ ဝုတ္တိဝိသေသေ သံသဂ္ဂဿ သန္နိဓိနော ဒဿနံ, ကိမတ္ထံ? သမုက္ကံသဿ အတိသယဿ အဘိဓာနတ္ထံ ကထနတ္ထာယ, သာ အယံ ဝိရောဓိတာ ဝိရောဓီတိ မတာ. ३२३. "विरोधीनं" इत्यादींद्वारे विरोधाचे स्पष्टीकरण करतात. परस्परविरोधी अशा क्रिया इत्यादींचा जिथे विशिष्ट कथनात संसर्ग (जवळ असणे) दर्शविला जातो, कशासाठी? तर उत्कर्षाचे (अतिशयाचे) कथन करण्यासाठी; त्याला ही 'विरोधिता' किंवा 'विरोध' मानले जाते. ၃၂၃. ဣဒါနိ ဝိရောဓာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ဝိရောဓီန’’မိစ္စာဒိနာ. ယတ္ထ ဥတ္တိဝိသေသေ သမုက္ကံသာဘိဓာနတ္ထံ ဝဏ္ဏနီယဝတ္ထုဂတအဓိကကထနာယ ဝိရောဓီနံ အညမညဝိရုဒ္ဓါနံ ပဒတ္ထာနံ ကြိယာဂုဏာဒီနံ သံသဂ္ဂဒဿနံ သန္နိဋ္ဌာနဒဿနံ သမ္ဗန္ဓဒဿနံ ဟောတိ, သာ အယံ ဥတ္တိ ဝိရောဓိတာတိ မတာတိ. ဝိရောဓော ဧတေသံ ဂုဏာဒီနံ အတ္ထီတိ စ, သံသဂ္ဂဿ သမ္ဗန္ဓဿ ဒဿနမိတိ စ, သမုက္ကံသဿ အဓိကဿ အဘိဓာနန္တိ စ, ဝိရောဓီနံ ဘာဝေါ အသင်္ဂဟိတောတိ စ ဝါကျံ. ဝိရောဓိတာဒီပကဝုတ္တိ တဒတ္ထေန တန္နာမိကာ ဟောတိ. ३२३. आता "विरोधीनं" इत्यादींद्वारे विरोधांलकार दर्शवितात. ज्या विशिष्ट कथनात उत्कर्षाच्या कथनासाठी (वर्णन करायच्या वस्तूच्या अतिशयोक्तीसाठी) परस्परविरोधी अशा क्रिया, गुण इत्यादी पदार्थांचा संसर्ग (संबंध किंवा एकत्र असणे) दर्शविला जातो, त्या कथनाला 'विरोधिता' मानले जाते. 'या गुणादींचा विरोध आहे' (विरोधो एतेसं गुणादीनं अत्थि), 'संसर्गाचे म्हणजेच संबंधाचे दर्शन' (संसग्गस्स सम्बन्धस्स दस्सनं), 'उत्कर्षाचे म्हणजेच अधिकतेचे कथन' (समुक्कंसस्स अधिकस्स अभिधानं) आणि 'विरोधी असण्याचा भाव' (विरोधीनं भावो) असे वाक्य आहे. विरोधिता आणि दीपक वृत्ती त्यांच्या अर्थानुसार त्या नावाच्या होतात. ၃၂၄. ३२४. ဂုဏာ သဘာဝမဓုရာ, အပိ လောကေကဗန္ဓုနော; သေဝိတာ ပါပသေဝီနံ, သမ္ပဒူသေန္တိ မာနသံ. जगाचे एकमेव बंधू असलेल्या (बुद्धांचे) स्वभावतः मधुर असलेले गुण देखील, पापांचे सेवन करणाऱ्यांनी (दुर्जनांनी) सेवन केले असता, त्यांच्या मनाला अत्यंत दूषित करतात. ၃၂၄. ဥဒါဟရတိ [Pg.306] ‘‘ဂုဏာ’’ဣစ္စာဒိ. လောကေကဗန္ဓုနော လောကနာထဿ သဘာဝမဓုရာ သာဓုဇနသမ္ပီဏနေကစာတုရာ အပိ ဂုဏာ အရဟန္တတာဒယော သေဝိတာ ပါပသေဝီဟိ တေသံ ပါပသေဝီနံ မာနသံ သမ္ပဒူသေန္တိ ဒေါသဒုဋ္ဌာပါဒနဝသေနာဝိကရောန္တိ ‘‘တာဒိသော ဂုဏာတိသယော တဿာ’’တိ. ဧတ္ထ ဂုဏာနံ သဘာဝမဓုရာနံ ပီတိဝိသေသုပ္ပာဒနယောဂ္ဂါနံ သမ္ပဒူသနေန သဟ ဝိရောဓောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ३२४. "गुणा" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. जगाचे एकमेव बंधू असलेल्या लोकनाथांचे (बुद्धांचे) स्वभावतः मधुर आणि सज्जनांना संतुष्ट करण्यात चतुर असलेले अर्हत्त्व इत्यादी गुण देखील, पापांचे सेवन करणाऱ्यांनी सेवन केले असता, त्यांच्या मनाला अत्यंत दूषित करतात (दोषांमुळे कलुषित करतात), कारण "त्यांचा गुणातिशय तशा प्रकारचा आहे". येथे स्वभावतः मधुर आणि विशेष प्रीती उत्पन्न करण्यास योग्य असलेल्या गुणांचा 'दूषित करणे' या क्रियेशी विरोध आहे, असे पाहावे. ၃၂၄. ဥဒါဟရတိ ‘‘ဂုဏာ’’ဣစ္စာဒိနာ. လောကေကဗန္ဓုနော ဗုဒ္ဓဿ ဂုဏာ အရဟတ္တာဒယော သဘာဝမဓုရာ အပိ ပကတိမဓုရာ အပိ သေဝိတာ ပါပသေဝီဟိ သေဝိတာ သမာနာ ပါပသေဝီနံ မာနသံ သမ္ပဒူသေန္တိ အတိသယေန ကောပေန္တီတိ. ဧဝံ ဟီနာဓိမုတ္တိကေဟိ သဟိတုမသက္ကုဏေယျော တဿ ဂုဏာတိသယော ဝတ္တတိ. နနု သဘာဝမဓုရော ဂုဏော ပီတိံ ဝိနာ သမ္ပဒူသနံ န ကရေယျ, သမ္ပဒူသနမ္ပိ တာဒိသသဘာဝမဓုရံ ဝိနာ န ဘဝေယျာတိ အညောညဝိရုဒ္ဓါနမေသံ မဓုရဂုဏသမ္ပဒူသနကြိယာနံ သံသဂ္ဂဂုဏာဓိကဒဿနတ္ထန္တိ လက္ခဏေန ယောဇေတဗ္ဗံ. အပိသဒ္ဒေါ ဝိရောဓတ္ထေ ဝတ္တတေ. သဘာဝေန မဓုရာတိ စ, ဧကော စ သော ဗန္ဓု စာတိ စ, လောကဿ ဧကဗန္ဓူတိ စ, ပါပံ သေဝန္တိ သီလေနာတိ စ ဝါကျံ. ३२४. "गुणा" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. जगाचे एकमेव बंधू असलेल्या बुद्धांचे अर्हत्त्व इत्यादी गुण स्वभावतः मधुर (प्रकृतीने मधुर) असूनही, पापांचे सेवन करणाऱ्यांनी सेवन केले असता, त्यांच्या मनाला अत्यंत दूषित करतात (अतिशय क्रुद्ध करतात). अशा प्रकारे, हीन प्रवृत्तीच्या लोकांना सहन न होणारा त्यांचा गुणातिशय दिसून येतो. स्वभावतः मधुर असलेला गुण प्रीतीशिवाय दूषित करणार नाही, आणि दूषित करणे देखील तशा स्वभावतः मधुर गुणाशिवाय होणार नाही; म्हणून या परस्परविरोधी अशा मधुर गुण आणि दूषित करणे या क्रियेचा संसर्ग गुणांचा अधिक्य दर्शवण्यासाठी आहे, असे लक्षणाशी जोडले पाहिजे. 'अपि' हा शब्द विरोधाच्या अर्थात वापरला आहे. 'स्वभावाने मधुर' (सभावेन मधुरा), 'तो एकच बंधू आहे' (एको च सो बन्धु च), 'जगाचा एकमेव बंधू' (लोकस्स एकबन्धू) आणि 'स्वभावाने पापाचे सेवन करतात' (पापं sevanti सीलेन) असे वाक्य आहे. ၃၂၅. ३२५. ယဿ ကဿစိ ဒါနေန, ယဿ ကဿစိ ဝတ္ထုနော; ဝိသိဋ္ဌဿ ယ’မာဒါနံ, ပရိဝုတ္တီတိ သာ မတာ. कोणत्याही व्यक्तीला कोणत्याही वस्तूचे दान देऊन, त्यापेक्षा विशिष्ट (उत्कृष्ट) वस्तू ग्रहण करणे, याला 'परिवृत्ती' (परिवृत्ती अलंकार) मानले जाते. ၃၂၅. ပရိဝုတ္တိံ ပဝတ္တေတိ ‘‘ယဿ’’ဣစ္စာဒိနာ. ယဿ ကဿစီတိ ပဋိဂ္ဂါဟကံ ဒဿေတိ. ဝိသိဋ္ဌဿ ယံ အာဒါနန္တိ သမ္ဗန္ဓော. သေသံ သုဗောဓံ. ३२५. "यस्स" इत्यादींद्वारे परिवृत्तीचे वर्णन करतात. "यस्स कस्सचि" (ज्या कोणालाही) याद्वारे प्रतिग्राहक (दान घेणारा) दर्शविला आहे. "विशिष्ट वस्तूचे ग्रहण" (विसिट्ठस्स यं आदानं) असा संबंध आहे. उर्वरित भाग सुबोध आहे. ၃၂၅. ဣဒါနိ ပရိဝုတ္တိံ ဒဿေတိ ‘‘ယဿ ကဿစိ’’စ္စာဒိနာ. ယဿ ကဿစိ ဝတ္ထုနော ခုဒ္ဒကဝတ္ထုနော ယဿ ကဿစိ ပဋိဂ္ဂါဟကဿ ဒါနေန ဟေတုဘူတေန ဝိသိဋ္ဌဿ ဥတ္တမဝတ္ထုနော [Pg.307] ယံ အာဒါနံ ဂဟဏံ အတ္ထိ, သာ ပရိဝုတ္တီတိ မတာတိ. ဒါနဂ္ဂဟဏပရိဝုတ္တတ္တာ ပရိဝုတ္တိ နာမ. ३२५. आता "यस्स कस्सचि" इत्यादींद्वारे परिवृत्ती दर्शवितात. कोणत्याही लहान वस्तूचे कोणत्याही प्रतिग्राहकाला दान देणे हे कारण होऊन, त्या बदल्यात विशिष्ट (उत्कृष्ट) वस्तूचे जे ग्रहण (स्वीकार) करणे आहे, त्याला 'परिवृत्ती' मानले जाते. दान आणि ग्रहण यांच्या अदलाबदलीमुळे (परिवर्तनामुळे) याला 'परिवृत्ती' म्हणतात. ၃၂၆. ३२६. ပုရာ ပရေသံ ဒတွာန, မနုညံ နယနာဒိကံ; မုနိနာ သမနုပ္ပတ္တာ, ဒါနိ သဗ္ဗညုတာသိရီ. पूर्वी इतरांना आपले सुंदर नेत्र इत्यादी दान करून, आता मुनींनी (बुद्धांनी) सर्वज्ञतेची लक्ष्मी (सब्बञ्ञुतासिरी) प्राप्त केली आहे. ၃၂၆. ဥဒါဟရတိ ‘‘ပုရာ’’ဣစ္စာဒိ. သုဗောဓံ. ဧတ္ထ နယနာဒိဒါနေန သဗ္ဗညုတာသိရိယာ အာဒါနန္တိ ပရိဝုတ္တိ အယံ. ३२६. "पुरा" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. हे सुबोध आहे. येथे नेत्र इत्यादींच्या दानाने सर्वज्ञतेच्या लक्ष्मीचे ग्रहण झाले असल्याने ही 'परिवृत्ती' आहे. ၃၂၆. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ပုရာ’’ဣစ္စာဒိနာ. မုနိနာ ပုရာ ပုဗ္ဗေ ပရေသံ မနုညံ နယနာဒိကံ ဒတွာန ဣဒါနိ သဗ္ဗညုတာသိရီ သဗ္ဗညုတာသင်္ခါတာ အနညသာဓာရဏာ သိရီ သမနုပတ္တာတိ. ဣဟ ယဿ ဒိန္နံ တတော ဧဝ ဂဟဏေ ပရိဝုတ္တိသဒ္ဒဿ နိရုဠှတ္တာ နယနာဒီနံ ဒါနေန သဗ္ဗညုတာသိရိယာ အာဒါနတော, ဒါနာဘာဝေ အာဒါနာဘာဝတော စ ပဋိဂ္ဂါဟကဇနေ အဝိဇ္ဇမာနေပိ သဗ္ဗညုတာ ဝိဇ္ဇမာနတ္တေန ပရိကပ္ပိတာတိ ပရိဝုတ္တိ ဟောတိ. တေနေဝ ဒဏ္ဍိယံ– ३२६. आता "पुरा" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. मुनींनी पूर्वी इतरांना आपले सुंदर नेत्र इत्यादी दान करून, आता सर्वज्ञतारूपी असाधारण लक्ष्मी प्राप्त केली आहे. येथे ज्याला दिले आहे त्याच्याकडूनच ग्रहण करण्याच्या अर्थात 'परिवृत्ती' हा शब्द रूढ असल्यामुळे, नेत्रादींच्या दानाने सर्वज्ञतेच्या लक्ष्मीचे ग्रहण होते, आणि दानाच्या अभावी ग्रहण होत नाही; म्हणून प्रतिग्राहक लोकांमध्ये सर्वज्ञता नसली तरी ती असल्यासारखी कल्पिली गेल्यामुळे ही 'परिवृत्ती' होते. म्हणूनच दंडीने म्हटले आहे– ‘‘သတ္ထပ္ပဟရဏံ ဒတွာ, ဘုဇေန တဝ ရာဇုနံ; စိရံ စိတာဘဋော တေသံ, ယသော ကုမုဒပဏ္ဍရော’’တိ. "तुझ्या हाताने शत्रू राजांना शस्त्रांचे प्रहार देऊन, त्यांच्याकडून दीर्घकाळ संचित केलेले आणि कुमुदासारखे पांढरे शुभ्र असलेले यश मिळवले आहे." ဣမသ္မိံ ဥဒါဟရဏေ ပစ္စတ္ထိကာနံ အာယုဓပ္ပဟာရံ ဒတွာ တဝ ဗာဟုနာ တေသံ ရာဇူနံ စိရံ ရာသိကတော ကေရဝနိမ္မလော ယသော အာဘဋောတိ. ဒဒါတိ ကမ္မယုတ္တတော ဧဝ အာဒါနံ ဒဿေတွာ ပရိဝုတ္တိဖုဋာ ကတာ. နယနာနိ အာဒီနိ ယဿ ဥတ္တမင်္ဂါဒိနောတိ စ, သဗ္ဗံ ဇာနာတီတိ စ, တဿ ဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. या उदाहरणात शत्रूंना शस्त्रांचे प्रहार देऊन तुझ्या बाहूने त्या राजांचे दीर्घकाळ साठवलेले कुमुदासारखे निर्मळ यश मिळवले आहे, असे म्हटले आहे. देण्याच्या क्रियेशी जोडलेलेच ग्रहण दर्शवून परिवृत्ती स्पष्ट केली आहे. 'नेत्र इत्यादी ज्याचे उत्तम अंग (अवयव) आहेत' (नयनानि आदीनि यस्स उत्तमाङ्गादिनो), 'जो सर्व काही जाणतो' (सब्बं जानाति) आणि 'त्याचा भाव' (तस्स भावो) असे वाक्य आहे. ၃၂၇. ३२७. ကိဉ္စိ ဒိသွာန ဝိညာတာ,ပဋိပဇ္ဇတိ တံသမံ; သံသယာပဂတံ ဝတ္ထုံ,ယတ္ထ သော’ယံ ဘမော မတော. जिथे एखादी वस्तू पाहून जाणकार मनुष्य संशयरहित होऊन, तिच्यासारख्याच दुसऱ्या वस्तूला तीच समजतो, त्याला 'भ्रम' (भ्रान्तिमान अलंकार) मानले जाते. ၃၂၇. ဘမံ [Pg.308] သမ္ဘာဝေတိ ‘‘ကိဉ္စီ’’တိအာဒိနာ. ဝိညာတာ ပုရိသော ကိဉ္စိ ဒိသွာ ဥဇ္ဇလနာဒိကံ ဒိသွာန တံသမံ တဿ ပုရေ ဒိဿမာနဿ ပဒတ္ထဿ သဒိသမညံ ဝတ္ထုံ သံသယာပဂတံ အသန္နိဓိံ ကတွာ ပဋိပဇ္ဇတိ ဇာနာတိ ယတ္ထ ဝိသေသေ, သာယံ ဘမော မတော. ३२७. "किञ्चि" इत्यादींद्वारे भ्रमाचे स्पष्टीकरण करतात. जाणकार मनुष्य काहीतरी (चमकणे इत्यादी) पाहून, त्याच्यासारख्याच, समोर दिसणाऱ्या पदार्थाशी साम्य असलेल्या दुसऱ्या वस्तूला संशयरहित होऊन (संशय दूर करून) समजतो, त्या विशिष्ट स्थितीला 'भ्रम' मानले जाते. ၃၂၇. ဣဒါနိ ဘမာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ကိဉ္စိ’’ဣစ္စာဒိနာ. ယတ္ထ ဥတ္တိဝိသေသေ ဝိညာတာ အဝဗောဓကာရကော ကိဉ္စိ ဒိသာဝိလောစနာဒိကံ ဒိသွာန တံသမံ ဝတ္ထုံ တေန ဒိဿမာနဝတ္ထုနာ တုလျမညံ ဝတ္ထုံ သံသယာပဂတံ နိဿံသယံ ကတွာ ပဋိပဇ္ဇတိ ဇာနာတိ, သော အယံ အလင်္ကာရော ဘမောတိ မတောတိ. တေန တဿ ဝါ သမန္တိ စ, သံသယော အပဂတော ဧတသ္မာတိ စ, ဘမနံ အနဝဋ္ဌာနံ ဝတ္ထူနန္တိ စ ဝိဂ္ဂဟော. သံသယာပဂတန္တိ ကြိယာဝိသေသနံ. ३२७. आता "किञ्चि" इत्यादींद्वारे भ्रमालंकार दर्शवितात. ज्या विशिष्ट कथनात जाणकार मनुष्य काहीतरी (दिशांचे अवलोकन इत्यादी) पाहून, त्या दिसणाऱ्या वस्तूशी समान असलेल्या दुसऱ्या वस्तूला संशयरहित (निःसंशय) होऊन समजतो, तो अलंकार 'भ्रम' मानला जातो. 'त्याच्याशी समान' (तेन तस्स वा समं), 'ज्यातून संशय निघून गेला आहे' (संसयो अपगतो एतस्मा), आणि 'वस्तूंचे फिरणे किंवा अस्थिर असणे म्हणजे भ्रम' (भमणं अनवट्ठानं वत्थूनं) असा विग्रह आहे. 'संशयापगतं' हे क्रियाविशेषण आहे. ၃၂၈. ३२८. သမံ ဒိသာသု’ဇ္ဇလာသု, ဇိနပါဒနခံသုနာ; ပဿန္တာ အဘိနန္ဒန္တိ, စန္ဒာတပမနာ ဇနာ. जिनांच्या (बुद्धांच्या) पायांच्या नखकिरणांमुळे सर्व दिशा एकाच वेळी उजळून निघाल्या असता, त्या पाहणारे लोक त्यांना चांदणे समजून आनंदित होतात. ၃၂၈. ဥဒါဟရတိ ‘‘သမ’’မိစ္စာဒိ. ဇိနဿ ပါဒေသု နခံသုနာ ဒိသာသု သဗ္ဗာသု သမံ ဧကတော ဥဇ္ဇလာသု သဇောတီသု တာ ဥဇ္ဇလာ ဒိသာ ပဿန္တာ ဇနာ, စန္ဒာတပေါတိ မနော ယေသံ တေ တထာဝိဓာ. အဘိနန္ဒန္တိ သန္တုဿန္တီတိ. ३२८. "समं" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. जिनांच्या पायांच्या नखकिरणांमुळे सर्व दिशा एकाच वेळी उजळून निघाल्या असता, त्या उजळलेल्या दिशा पाहणारे लोक, ज्यांचे मन 'हे चांदणे आहे' असे समजते, ते आनंदित होतात (संतुष्ट होतात). ၃၂၈. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘သမ’’မိစ္စာဒိနာ. ဇိနပါဒနခံသုနာ ကရဏဘူတေန ဒိသာသု ဒသသု သမံ ဧကက္ခဏေ ဥဇ္ဇလာသု တာ ဥဇ္ဇလာ ဒိသာ ပဿန္တာ ဇနာ စန္ဒာတပမနာ စန္ဒာတပေါတိ ပဝတ္တစိတ္တာ အဘိနန္ဒန္တီတိ. ဝိဇ္ဇမာနနခမရီစိယံ ဗုဒ္ဓိမကတွာ စန္ဒာတပေ ဗုဒ္ဓိယာ ပဝတ္တာပနတော ဘမော နာမ. သမန္တိ အသင်္ချံ. စန္ဒာတပေါဣတိ မနော ယေသန္တိ ဝါကျံ. ३२८. आता "समं" इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. जिनांच्या पायांच्या नखकिरणांमुळे दशाही दिशा एकाच वेळी उजळून निघाल्या असता, त्या उजळलेल्या दिशा पाहणारे लोक 'हे चांदणे आहे' अशा विचाराने आनंदित होतात. प्रत्यक्ष असलेल्या नखकिरणांकडे लक्ष न देता, बुद्धी चांदण्याकडे वळल्यामुळे याला 'भ्रम' म्हणतात. 'समं' म्हणजे एकाच वेळी. 'चांदणे हेच ज्यांचे मन (विचार) आहे' (चन्दातपो इति मनो येसं) असे वाक्य आहे. ၃၂၉. ३२९. ပဝုစ္စတေ [Pg.309] ယံ နာမာဒိ,ကဝီနံ ဘာဝဗောဓနံ; ယေန ကေနစိ ဝဏ္ဏေန,ဘာဝေါနာမာ’ယ’မီရိတော. कवींच्या मनातील भाव (अभिप्राय) व्यक्त करणारे जे नाम इत्यादी (नाम, विशेषण इत्यादी) कोणत्याही प्रकारे (वर्णनाने) सांगितले जाते, त्याला 'भाव' (भावालंकार) असे म्हटले जाते. ၃၂၉. ဘာဝံ ဘာဝေတိ ‘‘ပဝုစ္စတေ’’စ္စာဒိနာ. ကဝီနံ ဘာဝေါ အဓိပ္ပာယော, တံ ဗောဓေတီတိ ဘာဝဗောဓနံ ယံ နာမာဒိ. အာဒိသဒ္ဒေန ဝိသေသနဝါကျာနံ ဂဟဏံ. ယေန ကေနစိ နိသေဓနရူပေန အာကာရေန ပဝုစ္စတေ, အယံ ဘာဝေါ နာမ ဤရိတောတိ. ३२९. 'पवुच्चते' (सांगितले जाते) इत्यादींद्वारे भावाचे स्पष्टीकरण केले जाते. कवींचा 'भाव' म्हणजे त्यांचा अभिप्राय (हेतू), तो जो प्रकट करतो तो 'भावबोधन' होय, जो नाम इत्यादी आहे. 'आदि' या शब्दाने विशेषण वाक्यांचे ग्रहण होते. ज्या कोणत्याही निषेधार्थक रूपाने किंवा प्रकारे सांगितले जाते, त्याला 'भाव' असे म्हटले जाते. ၃၂၉. ဣဒါနိ ဘာဝါလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ပဝုစ္စတေ’’ ဣစ္စာဒိနာ. ကဝီနံ ဝတ္တူနံ ဘာဝဗောဓနံ အဓိပ္ပာယပကာသကံ ယံ နာမာဒိ နာမပဒဝိသေသနပဒါဒိ ယေန ကေနစိ ဝဏ္ဏေန အာကာရေန သာဂရာဒိအတ္ထန္တရံ ပဋိသေဓေတွာ ဝါ နော ဝါ ပဝုစ္စတေ, အယံ ဘာဝေါ နာမာတိ ဤရိတောတိ. နာမံ အာဒိ ယဿ ဝိသေသနဝါကျဒွယဿေတိ စ, ဘာဝံ ဗောဓေတီတိ စ ဝါကျံ. ကဝီနံ အဓိပ္ပာယသင်္ခါတဘာဝပကာသကော ဥတ္တိဝိသေသော တဒတ္ထေန ဘာဝေါ နာမ, တဿ နိဿယဘူတံ နာမာဒိပဒသန္တာနံ ဣဟ နိဿိတောပစာရေန ဘာဝေါ နာမာတိ ဤရိတံ. ३२९. आता 'पवुच्चते' इत्यादींद्वारे भावालंकार दर्शवितात. कवींच्या वर्ण्य विषयांचा भाव प्रकट करणारे (अभिप्राय व्यक्त करणारे) जे नाम इत्यादी (नामपद, विशेषणपद इत्यादी) कोणत्याही प्रकारे, समुद्रासारख्या इतर अर्थांचा निषेध करून किंवा न करता सांगितले जाते, त्याला 'भाव' असे म्हटले जाते. 'नाम' ज्याच्या सुरुवातीला आहे अशा दोन विशेषण वाक्यांचा आणि 'भावाला प्रकट करतो' असा हा वाक्याचा अर्थ आहे. कवींचा अभिप्राय समजल्या जाणाऱ्या भावाला प्रकट करणारी विशिष्ट उक्ती (कथन) त्या अर्थाने 'भाव' आहे, आणि तिचा आधार असणारा नाम इत्यादी पदांचा समूह येथे उपचाराने (लाक्षणिक अर्थाने) 'भाव' म्हणून सांगितला गेला आहे. ၃၃၀. ३३०. နနု တေယေ’ဝ သန္တာ နော,သာဂရာ န ကုလာစလာ; မနမ္ပိ မရိယာဒံ ယေ,သံဝဋ္ဋေပိ ဇဟန္တိ နော. तेच खरे संत (सज्जन) आहेत, सागर किंवा कुलाचल (महान पर्वत) नव्हेत; जे प्रलयकाळातही आपल्या मर्यादेचा (सदाचाराच्या सीमेचा) यत्किंचितही त्याग करत नाहीत. ၃၃၀. ဥဒါဟရတိ ‘‘နနု’’စ္စာဒိ. မနမ္ပီတိ ဤသကမ္ပိ. မရိယာဒန္တိ အတ္တနော အာစာရသီမံ, သံဝဋ္ဋေပိ ပလယကာလေပိ. သေသံ သုဗောဓံ. ဧတ္ထ န ဣမေ ပကတိသမုဒ္ဒါဒယော သမုဒ္ဒါဒယော ဟောန္တိ, ယေ ပလယကာလေ အတ္တနော ဝေလာနုလ္လင်္ဃနသင်္ခါတံ အစလတ္တသင်္ခါတဉ္စ မရိယာဒံ ပရိစ္စဇန္တိ. ကိဉ္စရဟိ [Pg.310] သန္တာ ဧဝေတေ သမုဒ္ဒါဒယော, ယေ ယဒိ ပလယကာလေပိ သမာပတေယျုံ, တဒါပိ အတ္တနော မရိယာဒံ န မုဉ္စန္တိ. ကောစိ ဝိပတ္တိံ ပတ္တော နိရတိသယံ ဓီရတ္တမတ္တနောဝဗောဓေတီတိ အညနိသေဓေန ကထိတံ နာမံ ကဝိသဘာဝံ ယထာဝုတ္တံ ဗောဓေတီတိ ဘာဝေါယမိတိ. ३३०. 'ननु' इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. 'मनम्पि' म्हणजे यत्किंचितही (किंचितही). 'मरियादं' म्हणजे स्वतःच्या आचरणाची सीमा, 'संवट्टेपि' म्हणजे प्रलयकाळातही. उर्वरित भाग समजण्यास सोपा आहे. येथे हे नैसर्गिक समुद्र इत्यादी खरे समुद्र नव्हेत, जे प्रलयकाळात आपली मर्यादा (तट न ओलांडणे आणि अचल राहणे) सोडून देतात. तर मग खरे समुद्र इत्यादी ते संतच (सज्जन) आहेत, जे प्रलयकाळ आला तरी आपली मर्यादा सोडत नाहीत. संकटात सापडलेला कोणीतरी स्वतःचे अनुपम धैर्य प्रकट करतो, अशा प्रकारे इतरांच्या निषेधाद्वारे सांगितलेले नाम कवीच्या अभिप्रायाला यथायोग्य प्रकट करते, म्हणून हा 'भाव' (भावालंकार) आहे. ၃၃၀. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘နနု’’စ္စာဒိနာ. သာဂရာ သံဝဋ္ဋကာလေ တီရမရိယာဒံ အတိက္ကမေန္တာ ပကတိသမုဒ္ဒါ သာဂရာ န ဘဝန္တိ. ကုလာစလာ တာဒိသကာလေ အစလသင်္ခါတမရိယာဒမတိက္ကမေန္တာ သတ္တ ကုလပဗ္ဗတာ ကုလာစလာ နာမ န ဘဝန္တိ. ကိဉ္စရဟိ သာဂရာဒယော. ယေ သာဓဝေါ သံဝဋ္ဋေပိ သဗ္ဗဝတ္ထုဝိနာသကကပ္ပဝိနာသကာလေပိ မရိယာဒံ အတ္တနော အာစာရမရိယာဒံ မနမ္ပိ ဤသကမ္ပိ နော ဇဟန္တိ. သန္တာ ဧဝ တေ သာဂရာဒယော နာမ ဟောန္တိ နနူတိ. ကောစိ ဗျသနံ ပတ္တော အတ္တနော အနညသာဓာရဏံ ဓီရတ္တံ ပကာသေတီတိ ဣဟ သာဂရာဒိအတ္ထန္တရပဋိသေဓရူပေန ဒဿိတသာဂရာဒိနာ ဝတ္တုနော အကမ္ပနာဓိပ္ပာယံ အဝဗောဓေတီတိ အယံ ဘာဝါလင်္ကာရော နာမ. မနန္တိ အပ္ပကာလဝါစကမသင်္ချံ. အပီတိ သမ္ဘာဝနေ. ३३०. आता 'ननु' इत्यादींद्वारे उदाहरण स्पष्ट करतात. प्रलयकाळात आपल्या किनाऱ्याची मर्यादा ओलांडणारे नैसर्गिक समुद्र हे खरे 'सागर' नव्हेत. अशा वेळी आपल्या अचलतेची मर्यादा ओलांडणारे सात कुलपर्वत हे 'कुलाचल' नव्हेत. तर मग सागर इत्यादी कोण आहेत? जे सज्जन प्रलयकाळात (सर्व वस्तूंचा आणि कल्पचा नाश करणाऱ्या काळात) देखील आपली आचारमर्यादा यत्किंचितही सोडत नाहीत, तेच खरे सागर इत्यादी आहेत. संकटात सापडलेला कोणीतरी आपले असाधारण धैर्य प्रकट करतो; येथे सागर इत्यादी इतर अर्थांच्या निषेध रूपाने दर्शविलेल्या सागर इत्यादींद्वारे वर्ण्य विषयाचा अचल राहण्याचा अभिप्राय समजतो, म्हणून हा 'भावालंकार' होय. 'मनं' हा शब्द अल्प काळ किंवा अल्प प्रमाण दर्शवणारा आहे. 'अपि' हा शब्द संभावनेच्या अर्थात आहे. ၃၃၁. ३३१. အင်္ဂင်္ဂီဘာဝါ သဒိသ-ဗလဘာဝါ စ ဗန္ဓနေ; သံသဂ္ဂေါ’လင်္ကတီနံ ယော, တံ မိဿန္တိ ပဝုစ္စတိ. रचनेत (काव्यात) अलंकारांचा जो परस्पर संबंध (मिश्रण) अंग-अंगी भावामुळे (उपकारक-उपकार्य भावामुळे) किंवा समान बल असण्यामुळे होतो, त्याला 'मिश्र' (मिश्रालंकार) असे म्हटले जाते. ၃၃၁. မိဿံ ဒဿေတိ ‘‘အင်္ဂ’’ဣစ္စာဒိနာ. အင်္ဂမုပကာရကံ, အင်္ဂီ ဥပကာရိယံ, တေသံ ဘာဝေါ အင်္ဂင်္ဂိဘာဝေါ သာဓိယသာဓနတ္တံ, တတော စ. သဒိသံ သမံ ဗလံ ယေသံ တေ, တေသံ ဘာဝေါ အင်္ဂင်္ဂိဘာဝမန္တရေန အပ္ပဓာနဘာဝေနာဝဋ္ဌာနံ တတော စ ဟေတုတော. ဗန္ဓနေ ဝိသယေ, ယော အလင်္ကတီနံ သံသဂ္ဂေါ ဧကတ္ထ သန္နိဓာနံ, တံ မိဿန္တိ ပဝုစ္စတိ. ३३१. 'अंग' इत्यादींद्वारे मिश्रालंकार दर्शवितात. 'अंग' म्हणजे उपकारक (साधन) आणि 'अंगी' म्हणजे उपकार्य (साध्य), त्यांचा भाव म्हणजे 'अंग-अंगी भाव' (साध्य-साधन भाव) होय. ज्यांचे बल समान आहे, त्यांचा भाव म्हणजे अंग-अंगी भावाशिवाय अप्रधान रूपाने राहणे होय. काव्यरचनेच्या विषयात अलंकारांचा जो संसर्ग म्हणजे एकाच ठिकाणी एकत्र येणे होय, त्याला 'मिश्र' असे म्हटले जाते. ၃၃၁. ဣဒါနိ [Pg.311] မိဿာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘အင်္ဂင်္ဂီ’’စ္စာဒိနာ. အင်္ဂင်္ဂီဘာဝါ ဥပကာရကဥပကာရိယသင်္ခါတပဋိပါဒကပဋိပါဒနီယသဘာဝေန ဟေတုဘူတေန သဒိသဗလဘာဝါ စ သာဓိယသာဓနဘာဝံ ဝိနာ သမာနဗလဝန္တဘာဝေန စ ဗန္ဓနေ ပဇ္ဇာဒိဗန္ဓနဝိသယေ အလင်္ကတီနံ အလင်္ကာရာနံ ယော သံသဂ္ဂေါ သန္နိဓာနံ, တံ မိဿန္တိ ပဝုစ္စတီတိ. အင်္ဂံ သာဓနံ အဿ သာဓိယဿ အတ္ထီတိ စ, အင်္ဂဉ္စ အင်္ဂီ စေတိ စ, တေသံ ဘာဝေါ သာဓိယသာဓနသင်္ခါတော သမ္ဗန္ဓောတိ စ, သဒိသံ ဗလံ ယေသမလင်္ကာရာနမိတိ စ, တေသံ ဘာဝေါ အညမညနိရပေက္ခတာတိ စ, မိဿနံ မိဿီဘဝနမိတိ စ ဝါကျံ. ३३१. आता 'अंगांगी' इत्यादींद्वारे मिश्रालंकार दर्शवितात. उपकारक आणि उपकार्य (साधक आणि साध्य) या स्वरूपाच्या अंग-अंगी भावामुळे आणि साध्य-साधन भावाशिवाय समान बल असण्यामुळे, पद्य इत्यादी रचनेच्या विषयात अलंकारांचा जो संसर्ग (एकत्र येणे) होतो, त्याला 'मिश्र' असे म्हटले जाते. साध्याचे साधन म्हणजे 'अंग' होय, आणि 'अंग व अंगी' यांचा भाव म्हणजे साध्य-साधन नावाचा संबंध होय; ज्या अलंकारांचे बल समान आहे त्यांचा भाव म्हणजे परस्परांवरील निरपेक्षता होय; आणि 'मिसळणे' म्हणजे एकत्र येणे, असा या वाक्याचा अर्थ आहे. အင်္ဂင်္ဂိဘာဝမိဿ अंगांगीभाव मिश्र ၃၃၂. ३३२. ပသတ္ထာ မုနိနော ပါဒ-နခရံသိမဟာနဒီ; အဟော ဂါဠှံ နိမုဂ္ဂေပိ, သုခယတျေ’ဝ တေ ဇနေ. मुनींच्या (बुद्धांच्या) चरण-नखांच्या किरणांची महानदी प्रशंसनीय आहे; आश्चर्य आहे की, तिच्यात खोलवर बुडालेल्या लोकांनाही ती सुखीच करते! ၃၃၂. ဥဒါဟရတိ ‘‘ပသတ္ထာ မုနိ’’စ္စာဒိ. မုနိနော ပါဒေသု နခါ တေသံ ရံသိ ဧဝ မဟာနဒီသဒိသတ္တာ မဟာနဒီ, သာ ပသတ္ထာ အစ္ဆရိယပ္ပတ္တိသဗ္ဘာဝတော ဂါဠှမစ္စန္တံ နိမုဂ္ဂေပိ တေ ဇနေ သုခယတျေဝ, အဟော အစ္ဆရိယံ ယတော သေသနဒီဝိဓုရံ. ‘‘အယံ အတ္တနိ ဂါဠှံ နိမုဂ္ဂေပိ သုခယတီ’’တိ ဧတ္ထ ‘‘နိမုဂ္ဂေပီ’’တိ သမာဓိနော သာဓိယတ္တေနင်္ဂိတာယာဝဋ္ဌိတဿ ‘‘ပါဒနခရံသိမဟာနဒီ’’တိ ရူပကံ သာဓနတ္တေနင်္ဂတာယာဝဋ္ဌိတန္တိ မိဿမိဒမလင်္ကရဏံ. ३३२. 'पसत्था मुनि' इत्यादींद्वारे उदाहरण देतात. मुनींच्या चरणांतील नखे आणि त्यांचे किरण हे महानदीसारखे असल्यामुळे ती 'महानदी' आहे. ती तिच्या आश्चर्यकारक स्वरूपामुळे प्रशंसनीय आहे, कारण तिच्यात खोलवर बुडालेल्या लोकांनाही ती सुखीच करते. हे मोठे आश्चर्य आहे, कारण इतर नद्यांच्या बाबतीत याच्या उलट घडते. 'स्वतःमध्ये खोलवर बुडालेल्यांनाही सुखी करते' या वाक्यात 'निमुग्गेपि' (बुडालेल्यांनाही) हा 'समाधी' अलंकार साध्य (अंगी) रूपाने स्थित आहे, आणि 'पादनखरंसिमहानदी' हा 'रूपक' अलंकार साधन (अंग) रूपाने स्थित आहे; म्हणून हे अलंकारांचे मिश्रण (मिश्रालंकार) आहे. ၃၃၂. ဣဒါနိ ဥဒါဟရတိ ‘‘ပသတ္ထာ’’ ဣစ္စာဒိနာ. မုနိနော ပသတ္ထာ အစ္ဆရိယတ္တာ ပသံသနီယာ ပါဒနခရံသိမဟာနဒီ စရဏနခကိရဏသင်္ခါတမဟာဂင်္ဂါ ဂါဠှံ အတိသယေန နိမုဂ္ဂေပိ တေ ဇနေ သာဓုသပ္ပုရိသေ သုခယတိ ဧဝ သုခိတေ ကတော ဧဝ. အဟော အစ္ဆရိယံ သေသနဒီနမေသာ ပဝတ္တိ ဝိရုဒ္ဓါတိ. ဧတ္ထ သာဓနီယဘာဝေန အင်္ဂိနော ‘‘နိမုဂ္ဂေ’’တိ သမာဓိအလင်္ကာရဿ [Pg.312] ‘‘ပါဒနခရံသိမဟာနဒီ’’တိ ရူပကာလင်္ကာရော သာဓနဘာဝေန အင်္ဂန္တိ ကတွာ အင်္ဂါအင်္ဂီဘာဝေန ဣမေသံ အလင်္ကာရာနံ မိဿိတာ. ပါဒေသု နခါတိ စ, တေသံ ရံသီတိ စ, မဟတီ စ သာ နဒီ စေတိ စ, မဟာနဒီ ဝိယ မဟာနဒီ ပါဒနခရံသိယော ဧဝ မဟာနဒီတိ စ ဝါကျံ. ဂါဠှန္တိ ကြိယာဝိသေသနံ. ဂါဠှံ နိမုဇ္ဇနံ ယေ အကံသု, တေပီတိ ယောဇနာ. သုခသမင်္ဂိနော ဇနာ သုခိတေ သုခေ ကရောတီတိ ဝါကျံ. ३३२. आता 'पसत्था' इत्यादींद्वारे उदाहरण स्पष्ट करतात. मुनींची (बुद्धांची) प्रशंसनीय आणि आश्चर्यकारक अशी चरण-नख-किरणरूपी महानदी (नखांच्या किरणांची महागंगा) तिच्यात अत्यंत खोलवर बुडालेल्या सज्जन लोकांनाही सुखीच करते. हे मोठे आश्चर्य आहे, कारण इतर नद्यांची प्रवृत्ती याच्या विरुद्ध असते. येथे साध्य रूपाने मुख्य (अंगी) असलेल्या 'निमुग्गे' या 'समाधी' अलंकाराचा, 'पादनखरंसिमहानदी' हा 'रूपक' अलंकार साधन रूपाने अंग बनल्यामुळे, अंग-अंगी भावाने या अलंकारांचे मिश्रण झाले आहे. चरणांतील नखे, त्यांचे किरण आणि ती महानदी; चरण-नखांचे किरण हीच महानदी, असा या वाक्याचा अर्थ आहे. 'गाळ्हं' हे क्रियाविशेषण आहे. ज्यांनी खोलवर बुडी घेतली आहे, ते देखील, असा याचा संबंध आहे. सुखी लोकांना ती अधिक सुखी करते, असा या वाक्याचा अर्थ आहे. သဒိသဗလဘာဝမိဿ सदृशबलभाव मिश्र ၃၃၃. ३३३. ဝေသော သဘာဝမဓုရော, ရူပံ နေတ္တရသာယနံ; မဓူဝမုနိနော ဝါစာ, န သမ္ပီဏေတိ ကံ ဇနံ. मुनींचे (बुद्धांचे) रूप (वेष) स्वभावतःच मधुर आहे, त्यांचे सौंदर्य डोळ्यांसाठी रसायन (अमृत) आहे आणि त्यांची वाणी मधासारखी मधुर आहे; ती कोणत्या मनुष्याला आनंदित करत नाही? ၃၃၃. ‘‘ဝေသော’’ဣစ္စာဒိ သုဗောဓံ. ဣဒံ ပန သမာဓိရူပကောပမာမိဿသဒိသဗလန္တိ. ३३३. 'वेसो' इत्यादी समजण्यास सोपे आहे. हे मात्र समाधी, रूपक आणि opama या अलंकारांचे समान बल असणारे मिश्रण आहे. ၃၃၃. ‘‘ဝေသော’’ဣစ္စာဒိ. မုနိနော သဘာဝမဓုရော ပကတိမဓုရော ဝေသော ဇိနာဝေဏိကော ဗုဒ္ဓဝေသော စ နေတ္တရသာယနံ ရူပံ လက္ခဏာနုဗျဉ္ဇနသမ္ပန္နံ ရူပဉ္စ မဓူဝ မဓုရတ္တေန မဓုသမာနာ ဝါစာ ဘာရတီ စ ကံ ဇနံ န သမ္ပီဏေတီတိ. ‘‘သဘာဝမဓုရော’’တိ သမာဓိအလင်္ကာရော စ, ‘‘နေတ္တရသာယန’’န္တိ ရူပကာလင်္ကာရော စ, ‘‘မဓူဝါ’’တိ ဥပမာလင်္ကာရော စာတိ ဣမေ တယော ပီဏနေ အညမညာပေက္ခရဟိတတ္တာ တုလျဗလာတိ ဣမေသံ မိဿတ္တံ ဟောတိ. သဘာဝေန မဓုရောတိ စ, ရသီယတိ အဿာဒီယတီတိ စ, ရသော ရသဘူတော အာယနံ ဂတိ ပဝတ္တိ အဿာတိ ရသာယနံ, ရသဝတ္ထု. ရသာယနမိဝ ရူပံ ရသာယနံ, နေတ္တာနံ ရသာယနန္တိ စ ဝါကျံ. ३३३. 'वेसो' इत्यादी. मुनींचा (बुद्धांचा) स्वभावतःच मधुर असणारा वेष (बुद्धवेष) आणि लक्षणे व अनुव्यंजनांनी संपन्न असणारे डोळ्यांना तृप्त करणारे रूप, तसेच गोडीमुळे मधासारखी असणारी वाणी कोणत्या मनुष्याला आनंदित करत नाही? येथे 'सभावमधुरो' हा 'समाधी' अलंकार, 'नेत्तरसायनं' हा 'रूपक' अलंकार आणि 'मधूव' हा 'उपमा' अलंकार आहे. हे तिन्ही अलंकार आनंद देण्याच्या बाबतीत परस्परांवर अवलंबून नसल्यामुळे समान बल असणारे आहेत, म्हणून त्यांचे हे मिश्रण आहे. स्वभावाने मधुर; ज्याचा आस्वाद घेतला जातो तो रस; रसयुक्त असणारी प्रवृत्ती म्हणजे 'रसायन' (औषध किंवा अमृत). रसायनासारखे रूप ते रसायन, डोळ्यांचे रसायन, असा या वाक्याचा अर्थ आहे. ၃၃၄. ३३४. အာသီ နာမ သိယာ’တ္ထဿ,ဣဋ္ဌဿာ’သီသနံ ယထာ; တိလောကေကဂတီ နာထော,ပါတု လောက’မပါယတော. इच्छित वस्तूची प्रार्थना करणे (इच्छा करणे) म्हणजे 'आशी' (आशीरालंकार) होय. जसे की: तिन्ही लोकांचे एकमेव आश्रयस्थान असणारे नाथ (बुद्ध) जगाचे अपायापासून (संकटांपासून) रक्षण करोत. ၃၃၄. အာသိံ [Pg.313] ဒဿေတိ ‘‘အာသိ’’စ္စာဒိနာ. ဣဋ္ဌဿ အဘိမတဿ ဝတ္ထုနော အာသီသနံ ပတ္ထနမိတျနုဝဒိတွာ အာသီ နာမ သိယာတိ ဝိဓီယတေ. ‘‘ယထေ’’တျုဒါဟရတိ. တိလောကဿ လောကတ္တယဝတ္တိနော ဇနဿ ဧကဂတိ အသဟာယဂတိ ပဋိသရဏဘူတော နာထော လောကံ သတ္တလောကံ အပါယတော ပါတု ပါလေတူတိ. ဧတ္ထာတိလသိတံ ပါလနမာသီသိတန္တိ. ३३४. 'आसी' इत्यादींद्वारे आशीरालंकार दर्शवितात. इच्छित वस्तूची प्रार्थना किंवा इच्छा करणे याला 'आशी' असे म्हटले जाते. 'यथा' शब्दाने उदाहरण देतात. तिन्ही लोकांत राहणाऱ्या लोकांचे एकमेव आश्रयस्थान असणारे नाथ प्राणिमात्रांच्या जगाचे संकटांपासून रक्षण करोत. येथे अत्यंत इच्छित असलेल्या रक्षणाची प्रार्थना केली आहे. ၃၃၄. ဣဒါနိ အာသီအလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘အာသီ’’ ဣစ္စာဒိနာ. ဣဋ္ဌဿ အတ္ထဿ ဣစ္ဆိတဝတ္ထုနော အာသီသနာ ပတ္ထနာ အာသီ နာမ သိယာ. ယထာ တတ္ထောဒါဟရဏမေဝံ. တိလောကေကဂတိ တိဘဝဿ အသဟာယသရဏဘူတော နာထော လောကသာမိ လောကံ သတ္တလောကံ အပါယတော ပါတု ရက္ခတူတိ. အာသီ နာမ ပတ္ထနာ, တဒ္ဒီပိကာပိ ဥတ္တိ တန္နာမိကာဝ ဟောတိ. ‘‘တိလောကေကဂတီ’’တိ ဣမသ္မိံ ဥဒါဟရဏေ ပါလနံ အာသီသိတံ. တိဏ္ဏံ လောကာနံ သမာဟာရောတိ စ, ဧကောယေဝ ဂတိ ပဋိသရဏန္တိ စ, တိလောကဿ ဧကဂတီတိ စ ဝါကျံ. ३३४. आता 'आसी' इत्यादींद्वारे आशीरालंकार दर्शवितात. इच्छित वस्तूची प्रार्थना किंवा याचना करणे म्हणजे 'आशी' होय. त्याचे उदाहरण याप्रमाणे आहे. तिन्ही लोकांचे एकमेव आश्रयस्थान असणारे जगन्नाथ (बुद्ध) प्राणिमात्रांच्या जगाचे संकटांपासून रक्षण करोत. 'आशी' म्हणजे प्रार्थना, आणि ती प्रकट करणारी उक्ती देखील त्याच नावाने ओळखली जाते. 'तिलोकेकगती' या उदाहरणात रक्षणाची प्रार्थना केली आहे. तिन्ही लोकांचा समूह; एकमेव गती म्हणजे आश्रय; तिन्ही लोकांचे एकमेव आश्रयस्थान, असा या वाक्याचा अर्थ आहे. ၃၃၅. ३३५. ရသပ္ပတီတိဇနကံ, ဇာယတေ ယံ ဝိဘူသနံ; ရသဝန္တန္တိ တံ ဉေယျံ, ရသဝန္တဝိဓာနတော. जे अलंकार रसप्रतीती (रसाचा अनुभव) निर्माण करणारे ठरतात, त्यांना रसाच्या सादरीकरणामुळे 'रसवंत' (रसवंत अलंकार) म्हणून जाणावे. ၃၃၅. ရသဝန္တမုဒါဟရတိ ‘‘ရသ’’ဣစ္စာဒိနာ. ယံ ဝိဘူသနမလင်္ကရဏံ ရသာဘာသာဒိနော ပတီတိဇနကံ အဝဂမသမ္ပာဒကံ ဇာယတေ, တံ ဝိဘူသနံ ရသဝန္တဝိဓာနတော သမ္ပာဒနတော ‘‘ရသဝန္တ’’န္တိ ဝိညေယျံ ယထာ အတ္ထပ္ပတီတိ ဇနကော သဒ္ဒေါ ‘‘အတ္ထဝါ’’တိ. ३३५. 'रस' इत्यादींद्वारे रसवंत अलंकाराचे उदाहरण देतात. जे अलंकार रस किंवा रसाभास इत्यादींची प्रतीती (ज्ञान) करून देणारे ठरतात, ते अलंकार रसाच्या सादरीकरणामुळे 'रसवंत' म्हणून ओळखले जावे; ज्याप्रमाणे अर्थाची प्रतीती करून देणारा शब्द 'अर्थवान' म्हटला जातो. ၃၃၅. ဥဒ္ဒေသေ ရသီတိ ဥဒ္ဒိဋ္ဌရသာလင်္ကာရံ ဒဿေတိ ‘‘ရသ’’ဣစ္စာဒိနာ. ယံ ဝိဘူသနံ ဝုတ္တာလင်္ကာရာနမန္တရေ ယော ကောစိ အလင်္ကာရော ရသပ္ပတီတိဇနကံ သိင်္ဂါရာဒိနဝဝိဓရသေသု ဧကဿ ရသဿ ဝါ တဿေဝ ရသာဘာသဿ ဝါ [Pg.314] အဝဗောဓနံ သမ္ပာဒေန္တော ဇာယတေ, တံ ဝိဘူသနံ ရသဝန္တဝိဓာနတော အတ္တနော ရသသဟိတဘာဝဿ ပကာသနတော ရသဝန္တန္တိ ရသီတိ ဉေယျန္တိ. ယထာ အတ္ထပ္ပတီတိဇနကော သဒ္ဒေါ ‘‘အတ္ထဝါ’’တိ ဝုစ္စတိ, ဧဝံ ရသပ္ပတီတိဇနကော အလင်္ကာရော ရသဝန္တော ‘‘ရသီ’’တိ စ ဝုစ္စတိ. ရသဿ ပတီတိ စ, တံ ဇနေတီတိ စ, ရသော အဿ အတ္ထီတိ စ, ရသဝတော ဘာဝေါတိ စ, တဿ ဝိဓာနံ သမ္ပာဒနန္တိ စ ဝါကျံ. ३३५. उद्देशात 'रसी' म्हणून उल्लेखिलेल्या रसालंकाराला 'रस' इत्यादींद्वारे दर्शवितात. पूर्वी सांगितलेल्या अलंकारांपैकी जो कोणताही अलंकार रसप्रतीती निर्माण करणारा, म्हणजे शृंगार इत्यादी नऊ रसांपैकी एखाद्या रसाचे किंवा रसाभासाचे ज्ञान करून देणारा ठरतो, तो अलंकार रसाच्या सादरीकरणामुळे (स्वतःच्या रसयुक्त भावाला प्रकट केल्यामुळे) 'रसवंत' किंवा 'रसी' म्हणून जाणावा. ज्याप्रमाणे अर्थाची प्रतीती करून देणारा शब्द 'अर्थवान' म्हटला जातो, त्याचप्रमाणे रसप्रतीती करून देणारा अलंकार 'रसवंत' किंवा 'रसी' म्हटला जातो. रसाची प्रतीती; ती निर्माण करणारा; ज्याच्यात रस आहे तो; रसयुक्त असण्याचा भाव; आणि त्याचे सादरीकरण (निर्माण करणे), असा या वाक्याचा अर्थ आहे. ၃၃၆. ३३६. ရာဂါနတဗ္ဘုတသရောဇမုခံ ဓရာယ,ပါဒါ တိလောကဂုရုနော’ဓိကဗဒ္ဓရာဂါ; အာဒါယ နိစ္စသရသေန ကရေန ဂါဠှံ,သဉ္စုမ္ဗယန္တိ သတတာဟိတသမ္ဘမေန. तिन्ही लोकांचे गुरू असणाऱ्या बुद्धांचे अत्यंत लाल (किंवा अनुरागयुक्त) चरण, पृथ्वीच्या प्रेमाने लवलेल्या अद्भुत कमळरूपी मुखाला आपल्या नित्य सरस हाताने (किंवा किरणांनी) घट्ट पकडून, निरंतर आदरयुक्त उत्सुकतेने वारंवार चुंबन घेत आहेत. ၃၃၆. ဥဒါဟရတိ ‘‘ရာဂ’’ဣစ္စာဒိ. ဓရာယ ပထဝီအင်္ဂနာယ ရာဂေန အာနတံ, မုခံ. ရာဂံ ရတ္တဝဏ္ဏံ အာနတံ နိန္နမိတံ, သရောဇံ. ပဌမေ အဗ္ဘုတသရောဇသဒိသတာယ မုခံ, တေန သမာနာဓိကရဏန္တိ ရာဂါနတေန သမာသော. ဒုတိယေ တု ရာဂါနတဉ္စ တံ အဗ္ဘုတသရောဇံ ပထဝိံ ဘိန္ဒိတွာ သိရီပါဒသမ္ပဋိဂ္ဂဟဏတ္ထံ ဥဋ္ဌဟမစ္ဆရိယပဒုမဉ္စ, တမေဝ တဿာ မုခသဒိသတ္တာ မုခန္တိ ရာဂါနတဗ္ဘုတသရောဇမုခံ. တိလောကဂုရုနော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ပါဒါ. ကီဒိသာ? အဓိကဗန္ဓော ရာဂေါ အနုရာဂေါ, ရတ္တဝဏ္ဏော ဝါ ယေသံ တေ, တထာဝိဓာ. နိစ္စမနဝရတံ သရသေန ရသဝတာ ကရေန ဟတ္ထေန, ရံသိနာ ဝါ ဂါဠှံ အာဒါယ ဂဟေတွာ သတတံ နိစ္စံ အာဟိတော သမ္ဘမော အာဒရော, တဒဘိမုခတာ ဝါ, တေန သဉ္စုမ္ဗယန္တိ, နိက္ခိပန္တိ ဝါ. ဧတ္ထ သိလေသရူပကေဟိ သမ္ဘောဂသိင်္ဂါရရသာဘာသော ဇနျတေ. သိင်္ဂါရော ဒုဝိဓော ဝိပ္ပလမ္ဘော, သမ္ဘောဂေါ စေတိ. တေသု ဝိပ္ပလမ္ဘောဝ သမဂ္ဂဝဏ္ဏနာဓာရတ္တာ မနောဟရော, နေဒိသော သမ္ဘောဂေါ. သမ္ဘောဂါဘာသေ တု ဝတ္တဗ္ဗမေဝ နတ္ထိ. တထာပိ’ဟာ’ဓိဂတံ သမ္ဘောဂါဘာသောဒါဟရဏံ ဗာလပ္ပဗောဓနတ္ထံ ကိဉ္စိ ဝိစာရေဿာမ. တတြ ပါဒါနံ ကာမုကတ္တံ [Pg.315] ဓရာယ ကာမိနိတ္တဉ္စ ဝါကျသာမတ္ထိယာ ဝိညာယတေ. သဒ္ဒေန ဝုစ္စမာနံ ပုန ဝုတ္တံ သိယာ. အတြ ပါဒါနံ တံ ဝိညေယျံ, ရတျုက္ကံသာဘာသော ယဒိ ကဝိနာ ပဋိပါဒေတဗ္ဗော န ဘဝေယျ, တဒါ ဂါထာယမနနုပပန္နံ သိယာတိ ဧဝံဝိဓဝစနတောဝ ပါဒါ ရတျာဘာသဝန္တောတိ ဂမျတေ. ရတိယာ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝါဘာသော ဓရာကာမိနိ, ရမ္မဒေသာဒိဝိသေသာဘာဝေ အစ္ဆရိယပဒုမုဂ္ဂမနာဘာဝတော အဗ္ဘုတသရောဇသဒ္ဒသဝနေန ဂမ္မမာနာ ရမ္မဒေသာဒယော ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝါဘာသာ, ဗျဘိစာရီဘာဝါဘာသဗောဓကာနိ ကဝိဝစနာနိ အနုဘာဝါဘာသော. တထာ ဟိ ‘‘နိစ္စသရသေန ကရေန ဂါဠှံ အာဒါယာ’’တိ ကရဿ သရသတာဂါဠှဂ္ဂဟဏကထနေန ဟရိသာဒယော ဂမျန္တေ. ‘‘သတတာဟိတသမ္ဘမေနာ’’တိ ဣမိနာ ဥဿုက္ကတ္တာဒယော ပဟီယန္တီတိ ဧဝံ ဗန္ဓဝုတ္တီတိ ဝိဘာဝါဒီဟိ ဗန္ဓတ္ထာဘာသာနံ မနသိ ယော ဥပ္ပဇ္ဇတိ အာနန္ဒာဘာသော, သော ရသာဘာသော သမ္ဘောဂရသာဘာသော ဝုတ္တောတိ. ३३६. "राग" इत्यादी उदाहरणाद्वारे स्पष्ट करतात. पृथ्वीरूपी स्त्रीच्या (धरा) रागाने (प्रेमाने किंवा रंगाने) वाकलेले ते मुख. राग म्हणजे लाल रंग, वाकलेले म्हणजे खाली झुकलेले ते कमळ (सरोज). पहिल्या अर्थामध्ये, अद्भुत कमळासारखे मुख असल्यामुळे, त्याच्याशी समानाधिकरण करून 'रागानत' असा समास होतो. दुसऱ्या अर्थामध्ये, रागाने वाकलेले आणि ते अद्भुत कमळ, जे पृथ्वीला भेदून श्रीचरणांचे स्वागत करण्यासाठी उगवलेले आश्चर्यकारक कमळ आहे, आणि तेच तिच्या मुखासारखे असल्यामुळे मुख, असा 'रागानत-अद्भुत-सरोज-मुख' असा समास होतो. त्रिलोकगुरू सम्यक्संबुद्धांचे चरण. ते कसे आहेत? ज्यांच्यावर अत्यंत दृढ राग म्हणजे अनुराग (प्रेम) किंवा लाल रंग आहे, असे ते आहेत. नेहमी निरंतर, सरस म्हणजे रसयुक्त अशा कराने म्हणजे हाताने किंवा किरणाने घट्ट धरून, सतत नेहमी आदरयुक्त संभ्रम (आदर किंवा त्याकडे अभिमुखता) ठेवून चुंबन घेतात किंवा स्पर्श करतात. येथे श्लेष आणि रूपक अलंकारांद्वारे संभोग शृंगार रसाभास निर्माण होतो. शृंगार दोन प्रकारचा आहे - विप्रलंभ आणि संभोग. त्यापैकी विप्रलंभ शृंगारच संपूर्ण वर्णनाचा आधार असल्यामुळे मनोहर वाटतो, संभोग तसा नाही. संभोगाभासाविषयी तर काही बोलण्याची गरजच नाही. तरीही, येथे आलेल्या संभोगाभासाच्या उदाहरणाचा बालकांच्या (नवशिक्यांच्या) प्रबोधनासाठी थोडा विचार करूया. तेथे चरणांची कामुकता आणि पृथ्वीची कामिनी अवस्था वाक्याच्या सामर्थ्यावरून समजते. शब्दाने स्पष्टपणे सांगितले तर ती पुनरुक्ती होईल. येथे चरणांचे ते समजून घ्यावे. जर कवीला रतीचा उत्कर्षाभास प्रतिपादन करायचा नसता, तर गाथेचा अर्थ जुळला नसता; म्हणून अशा प्रकारच्या वचनावरूनच चरणांमध्ये रतीचा आभास आहे असे समजते. रतीचा आलंबन विभाव आभास म्हणजे पृथ्वीरूपी कामिनी होय. रम्य प्रदेश इत्यादींच्या अभावी आश्चर्यकारक कमळ उगवण्याचा आभास नसल्यामुळे, 'अद्भुत सरोज' हा शब्द ऐकल्याने समजणारे रम्य प्रदेश इत्यादी उद्दीपन विभाव आभास आहेत. व्यभिचारी भावाच्या आभासाचे बोध करून देणारे कवीचे वचन हे अनुभाव आभास आहे. जसे की, "नेहमी सरस हाताने घट्ट धरून" या विधानात हाताची सरसता आणि घट्ट पकडणे या कथनाने हर्ष इत्यादी भाव समजतात. "सतत आदरयुक्त संभ्रमाने" याने उत्सुकता इत्यादी नष्ट होतात, अशा प्रकारच्या रचनेमुळे विभाव इत्यादींद्वारे रचनेच्या अर्थाचा जो आभास मनात निर्माण होतो आणि जो आनंदाभास उत्पन्न होतो, त्याला रसाभास किंवा संभोग रसाभास म्हटले आहे. ၃၃၆. ဣဒါနိ ဥဒါဟရဏံ ဒဿေန္တော ဥတ္တရိပိ ဒဿေတဗ္ဗသိင်္ဂါရဟဿကရုဏာဒိရသုဒ္ဒေသဿ အနုရူပတော သိင်္ဂါရရသယုတ္တမေဝ ဒဿေတိ ‘‘ရာဂါ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဓရာယ မဟီအင်္ဂနာယ ရာဂါနတဗ္ဘုတသရောဇမုခံ ရာဂေန အနုရာဂေန အဘိမုခံ ကတွာ နမိတံ အစ္ဆရိယဂုဏောပေတပဒုမသဒိသာနနံ နော စေ, ရတ္တဝဏ္ဏံ အာနတံ အဗ္ဘုတသရောဇသင်္ခတမုခံ တိလောကဂုရုနော ဘုဝနတ္တယာနုသာသကဿ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ပါဒါ အဓိကဗဒ္ဓရာဂါ အဓိကဗဒ္ဓါနုရာဂဝန္တာ နော စေ, ပုဗ္ဗကမ္မေန ကတအဓိကရတ္တဝဏ္ဏာ နိစ္စသရသေန ကရေန သတတာနုရာဂယုတ္တေန ဟတ္ထေန နော စေ, အဝိကလတ္တာ သတတသမ္ပတ္တိသဟိတေန ကိရဏေန ဂါဠှံ အာဒါယ ဂါဠှံ ဂဟေတွာ နော စေ, ဖုသိတွာ သတတာဟိတသမ္ဘမေန နိစ္စံ ကတာဒရေန နော စေ, နိရန္တရာဟိတအဘိမုခဘာဝေန သဉ္စုမ္ဗယန္တိ [Pg.316] စုမ္ဗန္တိ နော စေ, ဌိတိကြိယာသာဓနတ္တေန ဖုသန္တီတိ. ३३६. आता उदाहरण दाखवताना, पुढे दाखवल्या जाणाऱ्या शृंगार, हास्य, करुण इत्यादी रसांच्या उद्देशाला अनुरूप असा शृंगाररसयुक्तच श्लोक "रागा..." इत्यादींद्वारे दाखवतात. पृथ्वीरूपी स्त्रीचे रागाने (प्रेमाने) वाकलेले अद्भुत कमळरूपी मुख, म्हणजे प्रेमाने अभिमुख करून नमविलेले, आश्चर्यकारक गुणांनी युक्त अशा कमळासारखे मुख; किंवा लाल रंगाने वाकलेले, अद्भुत कमळरूपी मुख. त्रिलोकगुरू, तिन्ही लोकांचे अनुशासक असणाऱ्या सम्यक्संबुद्धांचे चरण, जे अत्यंत दृढ अनुरागयुक्त (प्रेमयुक्त) आहेत; किंवा पूर्वकर्मामुळे अत्यंत लाल रंगाचे झालेले आहेत. नेहमी सरस असणाऱ्या कराने म्हणजे सतत अनुरागाने युक्त अशा हाताने; किंवा परिपूर्णतेमुळे सतत संपत्तीने युक्त अशा किरणाने घट्ट धरून म्हणजे घट्ट पकडून; किंवा स्पर्श करून, सतत आदरयुक्त संभ्रमाने म्हणजे नेहमी आदर दाखवून; किंवा निरंतर अभिमुख राहून चुंबन घेतात म्हणजे चुंबतात; किंवा स्थिर राहण्याच्या क्रियेचे साधन असल्यामुळे स्पर्श करतात. ရာဂေန အနုရာဂေန အာနတံ အဘိမုခီကတမိတိ စ, အဗ္ဘုတဉ္စ တံ သရောဇဉ္စေတိ စ, တေန သဒိသတာယ အဗ္ဘုတသရောဇဉ္စ တံ မုခဉ္စေတိ စ, ရာဂါနတဉ္စ တံ အဗ္ဘုတသရောဇမုခဉ္စေတိ စ, ရာဂံ ရတ္တဝဏ္ဏံ အာနတံ နိန္နမိတိ စ, တဉ္စ တံ အဗ္ဘုတသရောဇဉ္စေတိ စ, တမေဝ တာဒိသမုခသဒိသတ္တာ မုခမိတိ စ, တိလောကဿ ဂုရူတိ စ, အဓိကံ ကတွာ ဗဒ္ဓေါ, အတ္တနော ပုဗ္ဗကမ္မေန ဝါ ကတော, ရာဂေါ အနုရာဂေါ ရတ္တဝဏ္ဏော ဝါ ယေသမိတိ စ, ရသေန အနုရာဂေန သမ္ပတ္တိယာ ဝါ သဟ ဝတ္တမာနောတိ စ, အာဟိတော ဝိဟိတော စ သော သမ္ဘမော အာဒရော တဒဘိမုခဘာဝေါ ဝါ စေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. 'रागाने म्हणजे अनुरागाने वाकलेले (अभिमुख केलेले)', 'ते अद्भुत आणि कमळ (सरोज)', 'त्याच्याशी सादृश्यामुळे अद्भुत कमळ आणि ते मुख', 'रागाने वाकलेले आणि ते अद्भुत कमळरूपी मुख', 'राग म्हणजे लाल रंग आणि वाकलेले म्हणजे खाली झुकलेले', 'ते आणि ते अद्भुत कमळ', 'तेच तशा मुखाशी सादृश्य असल्यामुळे मुख', 'त्रिलोकाचे गुरू', 'अत्यंत दृढतेने बांधलेला किंवा स्वतःच्या पूर्वकर्मामुळे झालेला राग (अनुराग किंवा लाल रंग) ज्यांचा आहे ते', 'रसाने म्हणजे अनुरागाने किंवा संपत्तीने युक्त असणारा', 'आणि आदरयुक्त संभ्रम म्हणजे आदर किंवा त्याकडे अभिमुखता दाखवणे' - असा हा विग्रह आहे. ဧတ္ထ ‘‘ရာဂါနတာ’’တိအာဒိကေန သိလေသာလင်္ကာရေန စ ‘‘အဗ္ဘုတသရောဇမုခ’’န္တိ ရူပကာလင်္ကာရေန စ သမ္ဘောဂသိင်္ဂါရရသာဘာသော ဥပ္ပာဒီယတိ. တာဒိသံ ဣတ္ထိပုရိသာနံ သမ္ဘောဂါဘာဝေန, တဒါကာရေန စ ကပ္ပိတတ္တာ ရသာဘာသော နာမာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. သိင်္ဂါရဿ အာယောဂဝိပ္ပယောဂသမ္ဘောဂဝသေန တိဝိဓတ္တေပိ အာယောဂဝိပ္ပယောဂဒွယံ ဝိပ္ပလမ္ဘမေဝါတိ ဝိပ္ပလမ္ဘော, သမ္ဘောဂေါ စေတိ ဒုဝိဓော ဟောတိ. တေသု ဝိပ္ပလမ္ဘောဝ အနူနဝဏ္ဏနာယ ဘူမိတ္တာ မနောဟရော. သမ္ဘောဂေါ ပန တာဒိသော န ဟောတိ. သမ္ဘောဂါဘာသောပိ ဟီနော ဟောတိ. ဧဝံ သန္တေ ပယောဂံ ကတွာ ကုရုမာနာယ ဝဏ္ဏနာယ ဥစိတဘာဝေန ဣဟာဓိဂတသမ္ဘောဂသိင်္ဂါရရသာဘာသေန ရသိဘူတာလင်္ကာရဿ ဥဒါဟရဏေ ရသာဘာသော ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗော. ပါဒါနံ ကာမုကဘာဝါဘာသေ စ ဓရာယ ကာမိနီဘာဝါဘာသေ စ ဝါစကပဒေန အဝုတ္တေပိ ‘‘ဓရာယ ပါဒါ တိလောကဂုရုနော’’တိ ဣဒံ ဌပေတွာ ပါဏိဓမ္မပကာသကေဟိ အဝသေသပဒေဟိ ဉာယတေ. येथे "रागानत" इत्यादी श्लेष अलंकाराने आणि "अद्भुतसरोजमुख" या रूपक अलंकाराने संभोग शृंगार रसाभास उत्पन्न केला जातो. स्त्री-पुरुषांच्या संभोगाभासाने आणि त्या आकाराने कल्पित असल्यामुळे त्याला 'रसाभास' असे समजावे. शृंगाराचे अयोग, विप्रयोग आणि संभोग या भेदांमुळे तीन प्रकार असले, तरी अयोग आणि विप्रयोग हे दोन्ही विप्रलंभच असल्यामुळे, विप्रलंभ आणि संभोग असे दोनच प्रकार होतात. त्यापैकी विप्रलंभ शृंगारच संपूर्ण वर्णनाचा विषय असल्यामुळे मनोहर वाटतो. संभोग तसा नसतो. संभोगाभास तर त्याहूनही हीन असतो. असे असताना, प्रयोगाद्वारे केलेल्या वर्णनाच्या उचिततेमुळे येथे प्राप्त झालेल्या संभोग शृंगार रसाभासाने 'रसवत्' अलंकाराच्या उदाहरणात रसाभास असा समजला पाहिजे. चरणांचा कामुकभावाभास आणि पृथ्वीचा कामिनीभावाभास वाचक शब्दांनी स्पष्टपणे सांगितलेला नसला, तरी "त्रिलोकगुरूंचे चरण पृथ्वीचे..." हे सोडून, हस्तक्रिया प्रकट करणाऱ्या उर्वरित शब्दांवरून तो समजतो. ဒွိန္နံ [Pg.317] အညမညံ ရတိအာဘာသော ‘‘အဓိကဗဒ္ဓရာဂါ ရာဂါနတ’’န္တိ ဣမေဟိ ဝုတ္တော. အယံ ရတိအာဘာသော ဣဓ ဌာယီဘာဝေါ ပုရိသရတိယာ ဣတ္ထိယာ စ, ဣတ္ထိရတိယာ ပုရိသဿ စ အာလမ္ဗဏတ္တာ ပါဒကာမုကဓရာကာမိနိယော ဒွေ အညမညံ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝါဘာသာ ဟောန္တိ. ရမ္မဒေသာဒိဝိသေသံ ဝိနာ အစ္ဆရိယပဒုမောဒယဿ အဘာဝတော အဗ္ဘုတသရောဇသဒ္ဒဿ ဥစ္စာရဏေန ဂမ္မမာနာ ရမ္မဒေသာဒယော ရတိံ ဥဒ္ဒီပယန္တီတိ ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝါဘာသာ နာမ. ‘‘နိစ္စသရသေန ကရေန ဂါဠှမာဒါယာ’’တိ ဣမိနာ ကရဿ သရသဘာဝဿ စ ဂါဠှံ ဂဟဏဿ စ ဝုတ္တတ္တာ ဟရိသာဒယော ဉာယန္တေ. ‘‘သတတာဟိတသမ္ဘမေနာ’’တိ ဣမိနာ ဥဿာဟာဒယော ဉာယန္တိ. တတ္ထ ဟရိသဥဿာဟာဒယော ဗျဘိစာရီဘာဝါဘာသာ နာမ ဟောန္တိ. တေ ဗျဘိစာရီဘာဝါဘာသေ ပကာသေန္တာနိ ယထာဝုတ္တကဝိဝစနာနိ အနုဘာဝါဘာသာ နာမာတိ ဧဝံ ဗန္ဓေ ဒိဿမာနဌာယီဘာဝဗျဘိစာရီဘာဝဝိဘာဝအနုဘာဝေဟိ အတ္ထာဝဗောဓံ ကရောန္တာနံ ပဏ္ဍိတာနံ ဥပ္ပဇ္ဇမာနော ယော သန္တောသာဘာသသင်္ခါတော ရသာဘာသော အတ္ထိ, သော ဣဓ သမ္ဘောဂရသာဘာသောတိ ကထိတောတိ. ဌာယီဘာဝါဒယော ဥပရိ အာဝိဘဝိဿန္တိ. दोघांचा परस्परांवरील रतीचा आभास "अत्यंत दृढ अनुराग असलेले" आणि "रागाने वाकलेले" या शब्दांनी सांगितला आहे. हा रतीचा आभास येथे स्थायीभाव आहे. पुरुषाच्या रतीसाठी स्त्री आणि स्त्रीच्या रतीसाठी पुरुष आलंबन असल्यामुळे, कामुक चरण आणि कामिनी पृथ्वी हे दोन्ही परस्परांचे आलंबन विभाव आभास आहेत. रम्य प्रदेश इत्यादींच्या वैशिष्ट्याशिवाय आश्चर्यकारक कमळाचा उदय होणे अशक्य असल्याने, 'अद्भुत सरोज' या शब्दाच्या उच्चारणाने सूचित होणारे रम्य प्रदेश इत्यादी रतीला उद्दीपित करतात, म्हणून त्यांना उद्दीपन विभाव आभास म्हणतात. "नेहमी सरस हाताने घट्ट धरून" या विधानाने हाताची सरसता आणि घट्ट पकडणे सांगितले असल्याने हर्ष इत्यादी भाव समजतात. "सतत आदरयुक्त संभ्रमाने" याने उत्साह इत्यादी भाव समजतात. तेथे हर्ष, उत्साह इत्यादी व्यभिचारी भाव आभास आहेत. त्या व्यभिचारी भावांच्या आभासाला प्रकट करणारी कवीची वचने अनुभाव आभास आहेत. अशा प्रकारे, रचनेत दिसणाऱ्या स्थायीभाव, व्यभिचारी भाव, विभाव आणि अनुभाव यांच्याद्वारे अर्थाचे आकलन करणाऱ्या विद्वानांच्या मनात जो संतोषाभास नावाचा रसाभास उत्पन्न होतो, त्याला येथे 'संभोग रसाभास' म्हटले आहे. स्थायीभाव इत्यादींचे वर्णन पुढे येईल. ၃၃၇. ३३७. ဣစ္စာ’နုဂမ္မ ပုရိမာစရိယာနုဘာဝံ,သင်္ခေပတော နိဂဒိတော’ယ’မလင်္ကတီနံ; ဘေဒေါ’ပရူပရိ ကဝီဟိ ဝိကပ္ပိယာနံ,ကော နာမ ပဿိတု’မလံ ခလု တာသ’မန္တံ. अशा प्रकारे, पूर्व आचार्यांच्या प्रभावाचे अनुकरण करून, अलंकारांचे हे भेद संक्षेपाने सांगितले आहेत. कवींनी वेळोवेळी कल्पिलेल्या त्या अलंकारांचा अंत पाहण्यास खरोखर कोण समर्थ आहे? ဣတိ သံဃရက္ခိတမဟာသာမိပါဒဝိရစိတေ अशा प्रकारे संघरक्षित महास्वामीपादांनी रचलेल्या, သုဗောဓာလင်္ကာရေ 'सुबोधालंकार' या ग्रंथातील, အတ္ထာလင်္ကာရာဝဗောဓော နာမ 'अर्थालंकार बोध' नावाचा, စတုတ္ထော ပရိစ္ဆေဒေါ. चौथा परिच्छेद समाप्त झाला. ၃၃၇. ဧဝမုဒ္ဒေသာနုက္ကမေန ယထာပဋိညာတံ နိဋ္ဌပေတွာ ဣဒါနိ နိဂမနပုဗ္ဗကံ ဗဟုတ္တမေသံ နိဒ္ဒိသိတုမာဟ ‘‘ဣစ္စိ’’စ္စာဒိ. ဣတိ [Pg.318] ဣမိနာ ဝုတ္တပ္ပကာရေန ပုရိမာနံ ဒဏ္ဍီအာဒီနံ အာစရိယာနံ အာနုဘာဝံ ဗန္ဓလက္ခဏာနိ အနုဂမ္မ အနုဂန္တွာ အလင်္ကတီနမလင်္ကာရာနံ အယံ ဘေဒေါ သင်္ခေပတော နိဂဒိတော ကထိတော. သင်္ခေပတောတိ ဝုတ္တော, ကသ္မာတိ အာဟ ‘‘ဥပရူပရီ’’တိအာဒိ. ဥပရူပရိ ဒီဃကာလမာရဗ္ဘ ယာဝေဒါနိ မတ္ထကမတ္ထကေ ကဝီဟိ ဝိကပ္ပိယာနံ ပဘေဒိယမာနာနံ တာသမလင်္ကတီနံ အန္တံ ပရိယန္တံ ပဿိတုံ ခလု ဧကန္တေန ကော နာမ ဇနော အလံ သမတ္ထော. ३३७. अशा प्रकारे उद्देशाच्या अनुक्रमाने प्रतिज्ञा केल्याप्रमाणे समाप्त करून, आता उपसंहारासह त्यांची विपुलता दर्शवण्यासाठी "इति..." इत्यादी म्हणतात. 'इति' म्हणजे या सांगितलेल्या प्रकारे, पूर्वीच्या दंडी इत्यादी आचार्यांच्या प्रभावाचे म्हणजे रचना-लक्षणांचे अनुकरण करून अलंकारांचे हे भेद संक्षेपाने सांगितले आहेत. संक्षेपाने का सांगितले? म्हणून म्हणतात - "वेळोवेळी..." इत्यादी. दीर्घकाळापासून आजतागायत कवींनी वेळोवेळी कल्पिलेल्या आणि विभागलेल्या त्या अलंकारांचा अंत म्हणजे मर्यादा पाहण्यास खरोखर कोणता मनुष्य समर्थ आहे? ဣတိ မဟာသာမိနာမိကာယံ သုဗောဓာလင်္ကာရဋီကာယံ अशा प्रकारे 'महास्वामी' नावाच्या सुबोधालंकार टीकेतील, စတုတ္ထော ပရိစ္ဆေဒေါ. चौथा परिच्छेद समाप्त झाला. ၃၃၇. ဧဝံ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန ယထာပဋိညာတေ အတ္ထာလင်္ကာရေ နိဋ္ဌပေတွာ ဣဒါနိ နိဂမနမုခေန ဧသံ အတ္ထာလင်္ကာရာနံ ဗဟုဘာဝံ ဒဿေတိ ‘‘ဣစ္စာနုဂမ္မ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဣတိ ယထာဝုတ္တနယေန ပုရိမာစရိယာနုဘာဝံ ပုဗ္ဗကာလိကာနံ ဒဏ္ဍီဘဒ္ဒပါဏာဒီနံ အလင်္ကာရသတ္ထသင်္ခါတာနုဘာဝံ အနုဂမ္မ အလင်္ကတီနံ အယံ ဘေဒေါ သင်္ခေပတော နိဂဒိတော မယာ ဝုတ္တော သင်္ဂဟိတော. ကသ္မာတိ စေ? ဥပရူပရိ ဒီဃကာလတော ပဋ္ဌာယ ယာဝဇ္ဇတနာ ကဝီဟိ ရစနာကတ္တာရေဟိ ဝိကပ္ပိယာနံ အနေကပ္ပကာရတော ကပ္ပိယမာနတ္တာ ပုထက္ကရိယမာနာနံ တာသမလင်္ကတီနံ အန္တံ ပရိယန္တံ ပဿိတုံ ခလု ဧကန္တေန ကော နာမ ပုဂ္ဂလော အလံ သမတ္ထောတိ. သင်္ဂဟမနာဒိယိတွာ ကေနာပိ ပရိယန္တံ အဓိဂန္တုံ န သက္ကာတိ အဓိပ္ပာယော. ပုရေ ဘဝါတိ စ, ပုရိမာ စ တေ အာစရိယာ စေတိ စ, တေသမာနုဘာဝေါတိ စ, ဝိသေသတော အသင်္ကရတော ကပ္ပိယန္တိ စ ဝါကျံ. ३३७. अशा प्रकारे उद्देशाच्या क्रमाने प्रतिज्ञा केल्याप्रमाणे अर्थालंकार समाप्त करून, आता उपसंहाराच्या माध्यमातून या अर्थालंकारांची विपुलता "इच्चानुगम्म..." इत्यादींद्वारे दर्शवतात. 'इति' म्हणजे सांगितलेल्या पद्धतीने, पूर्वीच्या दंडी, भद्रपाणि इत्यादी आचार्यांच्या प्रभावाचे म्हणजे अलंकारशास्त्रातील ज्ञानाचे अनुकरण करून अलंकारांचे हे भेद माझ्याद्वारे संक्षेपाने सांगितले म्हणजे संग्रहित केले आहेत. का? कारण दीर्घकाळापासून आजतागायत कवींनी म्हणजे रचनाकारांनी अनेक प्रकारे कल्पिलेल्या आणि स्वतंत्र केलेल्या त्या अलंकारांचा अंत म्हणजे मर्यादा पाहण्यास खरोखर कोणता व्यक्ती समर्थ आहे? संक्षेपाचा आश्रय घेतल्याशिवाय कोणालाही त्याचा अंत गाठता येत नाही, असा याचा अभिप्राय आहे. 'पूर्वी झालेले' म्हणजे 'पूर्वीचे', 'ते आचार्य' म्हणजे 'पूर्वाचार्य', 'त्यांचा प्रभाव' म्हणजे 'त्यांचा प्रभाव', आणि 'विशेषतः संकर न करता कल्पिले जातात' असा या वाक्याचा अर्थ आहे. ဣတိ သုဗောဓာလင်္ကာရနိဿယေ अशा प्रकारे 'सुबोधालंकार निसय' मधील, စတုတ္ထော ပရိစ္ဆေဒေါ. चौथा परिच्छेद समाप्त झाला. ၅. ဘာဝါဝဗောဓပရိစ္ဆေဒ ५. भावबोध परिच्छेद. ၃၃၈. ३३८. ပဋိဘာနဝတာ [Pg.319] လောက-ဝေါဟာရ’မနုသာရိနာ; တတော’စိတျသမုလ္လာသ-ဝေဒိနာ ကဝိနာ ပရံ. प्रतिभावान, लोकव्यवहाराचे अनुकरण करणाऱ्या आणि त्यानंतर औचित्याचा उत्कर्ष जाणणाऱ्या कवीनेच केवळ (काव्यरचना करावी). ၃၃၈. တဒေဝ ယထာပဋိညာတမလင်္ကာရဝိဘာဂံ ဗောဓေတွာ သမ္ပတိ ရသဝန္တာလင်္ကာရပ္ပသင်္ဂေနာဓိဂတံ ရသံ သကလ သံသာရဒုက္ခနိဿ ရဏေကနိမိတ္တဝိမုတ္တိရသေကရသဝိသုဒ္ဓသဒ္ဓမ္မာဂမဝိဂ္ဂါဟသပ္ပီဏနောဏတမတီနံ ပရမသဒ္ဓါလူနမနဓိဂတတ္တေပိ လက္ခဏမတ္တေန လောကဝေါဟာရကောသလ္လမတ္တပရိဂ္ဂဟာယ ကိဉ္စိမတ္တမုပဒိသိတုံ န သာကလ္လေန ‘‘ပဋိဘာနဝတာ’’တိအာဒိမာဟ. ပဋိဘာနံ တံတံဌာနာနုရူပပ္ပဝတ္တာ ပညာ. သာ ဟိ သရသရစနာယစ္စန္တောပကာရိကာ, တတောဝ ကဗ္ဗံ ‘‘ပဋိဘာန’’န္တိ ဝုစ္စတိ. တေနာဟ ‘‘ပဋိဘာနဝတာ’’တိ. ကဝိနာ လောကဝေါဟာရာနုဂန္တဗ္ဗော. ယော ဟိ သကလံ လောကဝေါဟာရံ နာနုသရတိ, သော ကဝိယေဝ န ဟောတိ. တေနာဟ ‘‘လောကဝေါဟာရမနုသာရိနာ’’တိ. ယတော ဩစိတျံ နာမ ကဝီနံ ပရမံ ရဟဿံ လောကဝေါဟာရေပိ ဥစိတညူယေဝ ပသံသီယတေ, သမုစိတလောကဝေါဟာရာနုသာရေနေဝ စ ဝက္ခမာနာနုက္ကမေန ဝိရစိတာ ရစနာ သစေတနာနံ ရသဿာဒါယ သမ္ပဇ္ဇတေ, တသ္မာ ဩစိတျေ သမုလ္လသတ္တံ ဒိတ္တံ ဖုဋမေဝ ဗန္ဓနံ ကာတုံ ဝဋ္ဋတိ. တတောဝစ္စန္တမောစိတျသမုလ္လာသဝေဒိနာ ကဝိနာ ဘဝိတဗ္ဗံ. တေနာဟ ‘‘ပရံ ဩစိတျသမုလ္လာသဝေဒိနာ’’တိ. သဗ္ဗဉ္စေတံ ‘‘ကဝိနာ’’တိ ဧတ္ထ ဝိသေသနံ, ‘‘ကဝိနာ’’တိ စေတံ ‘‘နိဗန္ဓာ’’တိ ဧတ္ထ အဝုတ္တော ကတ္တာ. ३३८. अशा प्रकारे प्रतिज्ञा केल्याप्रमाणे अलंकारांचे वर्गीकरण स्पष्ट करून, आता रसवत् अलंकाराच्या प्रसंगाने प्राप्त झालेल्या रसाचे - जे संपूर्ण संसारदुःखातून मुक्त होण्याचे एकमेव कारण असलेल्या विमुक्तीरसरूपी शुद्ध सद्धर्माच्या आगमाच्या अवगाहनाने तृप्त आणि नम्र बुद्धी असलेल्या परम श्रद्धाळू लोकांना प्राप्त झाले नसले तरी - केवळ लक्षणांच्या द्वारे लोकव्यवहारातील कौशल्याचे ग्रहण करण्यासाठी, पूर्णपणे नव्हे तर थोडेसे उपदेश करण्यासाठी "प्रतिभावता..." इत्यादी म्हणतात. प्रतिभा म्हणजे त्या त्या प्रसंगाला अनुरूप अशी प्रवृत्त होणारी प्रज्ञा (बुद्धी) होय. ती सरस रचनेसाठी अत्यंत उपकारक असते, म्हणूनच काव्याला 'प्रतिभा' असे म्हटले जाते. म्हणून "प्रतिभावता" असे म्हटले आहे. कवीने लोकव्यवहाराचे अनुकरण केले पाहिजे. जो संपूर्ण लोकव्यवहाराचे अनुकरण करत नाही, तो कवीच होऊ शकत नाही. म्हणून "लोकव्यवहारानुसारी" असे म्हटले आहे. कारण औचित्य हे कवींचे परम रहस्य आहे, लोकव्यवहारातही योग्य जाणणाऱ्याचीच प्रशंसा केली जाते, आणि योग्य लोकव्यवहाराच्या अनुकरणानेच पुढे सांगण्यात येणाऱ्या अनुक्रमाने रचलेली रचना संवेदनशील लोकांच्या रसास्वादासाठी उपयुक्त ठरते; म्हणून औचित्यामध्ये स्पष्ट आणि प्रदीप्त अशीच रचना केली पाहिजे. म्हणूनच कवीने अत्यंत औचित्याचा उत्कर्ष जाणणारा असावे. म्हणून "केवळ औचित्याचा उत्कर्ष जाणणारा" असे म्हटले आहे. हे सर्व "कवीने" याचे विशेषण आहे, आणि "कवीने" हा "रचना करावी" या क्रियापदाचा येथे न सांगितलेला कर्ता आहे। ၃၃၈. ဧဝံ ယထာပဋိညာတာနမလင်္ကာရာနံ ဒဿနာဝသရေ ရသဝန္တာလင်္ကာရပ္ပသင်္ဂေနာဓိဂတနဝဝိဓသိင်္ဂါရာဒိရသေ သကလသံသာရဒုက္ခနိဿရဏအသဟာယကရဏဘူတဝိမုတ္တိရသေန ဧကရသဘူတေ အတိပဏီတေ သဒ္ဓမ္မာမတရသေယေဝ လုဒ္ဓါနံ သဒ္ဓါဗာဟုလ္လသုဒ္ဓသံယမာနံ ဝိမုခေပိ [Pg.320] လက္ခဏမတ္တပရိညာဏေန လောကဝေါဟာရေသု အသမ္မောဟတ္ထံ သင်္ခေပေန ဒဿေတုကာမော ဣဒါနိ ‘‘ပဋိဘာနဝတာ’’ဣစ္စာဒိမာဟ. ပဋိဘာနဝတာ သရသရစနာယ အစ္စန္တောပကာရဋ္ဌာနောစိတပညာဝိသေသဝတာ လောကဝေါဟာရမနုသာရိနာ သကလလောကေ ဝေါဟာရာနုရူပမနုဂတေန တတော ယသ္မာ ဩစိတျံ နာမ ဟဒယတော အဗဟိ ကာတဗ္ဗံ, ရဟဿမိဝ ဗန္ဓတော ဝိယောဇနီယံ န ဟောတိ. တသ္မာ ပရမတိသယေန ဩစိတျသမုလ္လာသဝေဒိနာ ဥစိတဘာဝေန ဝတ္တုမိစ္ဆိတတ္ထဿ ဥဒ္ဒီပနဿေဝ အနုရူပပ္ပကာရေန ဣဋ္ဌတ္ထဿ သမုလ္လာသနံ ဒိတ္တိံ ဇာနန္တေန ကဝိနာ ဗန္ဓကာရကေန နိဗန္ဓာတိ သမ္ဗန္ဓော. ပဋိဘာ ပဋိဘာနန္တိ ပညာယေတံ နာမံ, တတော ဇာတကဗ္ဗဿပိ ပဋိဘာတိ ဝုစ္စမာနတ္တာ အယံ ပညာဝိသေသော ရစနာယ အစ္စန္တောပကာရောတိ ဉာတဗ္ဗော. ပဋိဘာနမဿတ္ထီတိ စ, လောကဿ ဝေါဟာရောတိ စ, တံ အနုဂစ္ဆတိ သီလေနာတိ စ, ဩစိတျေန သမုလ္လာသောတိ စ, တံ ဝိဇာနာတိ သီလေနာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३३८. अशा प्रकारे, प्रतिज्ञा केल्याप्रमाणे अलंकारांचे दर्शन घडविण्याच्या प्रसंगी, रसवंत अलंकारांच्या प्रसंगाने प्राप्त झालेल्या नऊ प्रकारच्या शृंगारादी रसांमध्ये, संपूर्ण संसारदुःखातून मुक्त होण्यास एकमेव साहाय्यक ठरलेल्या विमुक्ती रसाने एकरस झालेल्या आणि अत्यंत प्रणीत अशा सद्धम्म-अमृत रसातच लुब्ध (आसक्त) असलेल्या, श्रद्धाबहुल व शुद्ध संयम राखणाऱ्या व्यक्ती जरी (काव्यादी लौकिक व्यवहारांपासून) विन्मुख असल्या, तरी केवळ लक्षणांच्या परिज्ञानाने लौकिक व्यवहारांमध्ये त्यांचा संमोह (भ्रम) होऊ नये या उद्देशाने, संक्षेपाने दर्शविण्याची इच्छा धरून आता "प्रतिभावता" (paṭibhānavatā) इत्यादी म्हणाले आहेत. 'प्रतिभावता' म्हणजे सरस रचनेसाठी अत्यंत उपकारक ठरणाऱ्या योग्य अशा प्रज्ञाविशेषाने युक्त असलेल्या, लौकिक व्यवहाराचे अनुसरण करणाऱ्या, संपूर्ण लोकात व्यवहाराला अनुरूप चालणाऱ्या; आणि ज्या कारणाने 'औचित्य' हे हृदयापासून बाहेर न टाकण्याजोगे असते, जसे की एखादे रहस्य बंधनातून सोडवण्याजोगे नसते. म्हणून, परम अतिशयाने औचित्याचा उल्हास जाणणाऱ्या, योग्य भावाने सांगू इच्छित असलेल्या अर्थाच्या उद्दीपनाप्रमाणेच अनुरूप प्रकारे इष्ट अर्थाचा उल्हास (प्रकाश) जाणणाऱ्या कवीने (रचनाकाराने) रचना करावी, असा संबंध आहे. 'प्रतिभा' किंवा 'प्रतिभान' हे प्रज्ञेचेच नाव आहे, आणि त्यापासून उत्पन्न होणाऱ्या काव्यालाही 'प्रतिभा' म्हटले जात असल्यामुळे, हा प्रज्ञाविशेष रचनेसाठी अत्यंत उपकारक आहे असे जाणावे. "प्रतिभान ज्याच्याकडे आहे तो", "लोकाचा व्यवहार", "त्याचे जो स्वभावाने अनुसरण करतो तो", "औचित्याने उल्हास", आणि "तो जो स्वभावाने जाणतो" असा विग्रह आहे. ၃၃၉. ३३९. ဌာယီသမ္ဗန္ဓိနော ဘာဝ-ဝိဘာဝါ သာနုဘာဝကာ; သမ္ပဇ္ဇန္တိ နိဗန္ဓာ တေ, ရသဿာဒါယ သာဓုနံ. स्थायी भावांशी संबंधित असलेले भाव आणि विभाव, जे अनुभावांसह (सहानुभावक) असतात; ते काव्यात गुंफलेले (निबद्ध केलेले) सज्जनांच्या रसास्वादासाठी कारणीभूत ठरतात. ၃၃၉. ‘‘ဌာယိ’’စ္စာဒိ. ဌာယိနော ဝက္ခမာနရတျာဒယော တေဟိ သဟ သမ္ဗန္ဓော ဝိဘာဝါဒီဟိ ယောဂေ ရတျာဒီနမဿာဒိယတ္တမာနီယမာနတ္တာ ဧတေသမတ္ထီတိ ဌာယီသမ္ဗန္ဓိနော. သဟ အနုဘာဝေဟိ ဝက္ခမာနလက္ခဏေဟီတိ သာနုဘာဝကာ, ဘာဝေါ ဝိဘာဝေါ စ, ဝက္ခမာနော ဘာဝေန ဘာဝါဘာသောပိ ဣမိနာဝ သင်္ဂဟိတော, ရသဿာဒါယ သမ္ပဇ္ဇန္တီတိ သမ္ဗန္ဓော. ३३९. "स्थायी" (ṭhāyi) इत्यादी. स्थायी म्हणजे पुढे सांगितले जाणारे रती इत्यादी भाव; त्यांच्याशी संबंध असणारे विभाव इत्यादींच्या योगाने रती इत्यादींना आस्वादयोग्यतेप्रत आणले जात असल्यामुळे ज्यांच्याकडे हा संबंध आहे ते 'स्थायीसंबंधी' (स्थायीशी संबंधित) होत. पुढे सांगितल्या जाणाऱ्या लक्षणांनी युक्त अशा अनुभावांसह असणारे ते 'सानुभावक' (अनुभावांसह असलेले) होत. भाव आणि विभाव; पुढे सांगितल्या जाणाऱ्या भावामध्ये भावाभास देखील याच संज्ञेने समाविष्ट होतो. 'रसास्वादासाठी कारणीभूत ठरतात' असा संबंध आहे. ၃၃၉. ‘‘ဌာယိ’’စ္စာဒိ. ဌာယီသမ္ဗန္ဓိနော ဌာယီပဒေန, တေန ဝါစ္စရတိဟာသာဒိအတ္ထေန ဝါ သမ္ဗန္ဓုပဂတာ သာနုဘာဝကာ ဝက္ခမာနာနုဘာဝေဟိ သဟ ပဝတ္တာ ဘာဝဝိဘာဝါ ဝက္ခမာနဘာဝဝိဘာဝါ နိဗန္ဓာ ဝုတ္တဂုဏောပေတကဝိနာ ဗန္ဓိတာ ဧကတ္ထ အာဟရိတွာ ဒဿိတာ သာဓုနံ ဣဿာဒိဒေါသရဟိတာနံ သဇ္ဇနာနံ ရသဿာဒါယ သိင်္ဂါရာဒိဝက္ခမာနရသဿ အဿာဒနတ္ထံ သမ္ပဇ္ဇန္တိ ပဝတ္တန္တီတိ. ဣမာယ ဂါထာယ ဌာယီဘာဝေါ ဗျဘိစာရီဘာဝေါ ကေဝလဘာဝေါ ဝိဘာဝေါ အနုဘာဝေါ ရသော စေတိ ဣမေ ဥဒ္ဒိဋ္ဌာ ဘဝန္တိ, ကထန္တိ စေ? ဘာဝဝိဘာဝါနံ ‘‘ဌာယီသမ္ဗန္ဓိနော’’တိ ဝိသေသနံ ဘဝတိ, တေန ဘာဝဿ ဌာယီ စ သော ဘာဝေါ စေတိ စ ဌာယီပဒေန သမ္ဗန္ဓတ္တာ ဌာယီဘာဝေါ စ, ပုန ဗျဘိစာရီဘာဝေ သတိ ‘‘ဌာယီဘာဝေါ’’တိ ဣမဿ သာဓကတ္တာ ဣမဿေဝ ဌာယီဘာဝပဒဿ ပယောဂသာမတ္ထိယေန ဂမ္မမာနော ဗျဘိစာရီဘာဝေါ စ, ပုန ဌာယီပဒေန သမာသမကတွာ ဝိသုံ ဒဿိတဘာဝသဒ္ဒသုတိယာ ဌာယီဘာဝဗျဘိစာရီဘာဝေဟိ အညော ဘာဝေါ စ, တထာ ဧဝ ဌာယီပဒေန ဝါစ္စရတိဟာသာဒိအတ္ထဿ ဥပ္ပတ္တိဥဒ္ဒီပနဒွယံ ဝိဘူတံ ကတွာ သဇ္ဇေတွာ ဌိတတ္တာ တေဟိ ရတိဟာသာဒီဟိ အတ္ထေဟိ သမ္ဗန္ဓိနော အာလမ္ဗဏဥဒ္ဒီပနသင်္ခတဝိဝိဓဝိဘာဝါ စ, ဧဝမေဝ သာနုဘာဝကပဒေန သမာယောဂေန ဒဿိတာနုဘာဝေါ စ, ‘‘ရသဿာဒါယာ’’တိ ဣမိနာ နိဒ္ဒိဋ္ဌရသော စာတိ ဧဝမိမေ ဌာယီဘာဝါဒယော ဥဒ္ဒိဋ္ဌာ ဟောန္တိ. ဌာယိနာ သဟ သမ္ဗန္ဓောတိ စ, သော ဧတေသမတ္ထီတိ စ, ဘာဝေါ စ ဝိဘာဝေါ စေတိ စ, သဟ အနုဘာဝေဟိ ဝတ္တန္တီတိ စ, ရသဿ အဿာဒေါတိ စ ဝါကျံ. ३३९. "स्थायी" इत्यादी. 'स्थायीसंबंधी' म्हणजे 'स्थायी' या पदाने किंवा त्या पदाने व्यक्त होणाऱ्या रती, हास इत्यादी अर्थाशी संबंध पावलेले; 'सानुभावक' म्हणजे पुढे सांगितल्या जाणाऱ्या अनुभावांसह प्रवृत्त झालेले; 'भाव-विभाव' म्हणजे पुढे सांगितले जाणारे भाव आणि विभाव; 'निबंध' म्हणजे सांगितलेल्या गुणांनी युक्त अशा कवीने रचलेले, एका ठिकाणी आणून दाखविलेले; 'सज्जनांच्या' म्हणजे ईर्ष्या इत्यादी दोषांनी रहित असलेल्या सज्जनांच्या; 'रसास्वादासाठी' म्हणजे शृंगार इत्यादी पुढे सांगितल्या जाणाऱ्या रसाच्या आस्वादासाठी 'कारणीभूत ठरतात' (प्रवृत्त होतात). या गाथेमध्ये स्थायीभाव, व्यभिचारीभाव, केवळ भाव, विभाव, अनुभाव आणि रस हे निर्दिष्ट केले आहेत. ते कसे? तर भाव आणि विभावांचे "स्थायीसंबंधी" असे विशेषण आहे; त्यामुळे भावाचा 'स्थायी' आणि 'तो भाव' असा 'स्थायी' पदाशी संबंध असल्यामुळे 'स्थायीभाव' होतो. पुन्हा, व्यभिचारीभाव असताना "स्थायीभाव" हा त्याचा साधक (पोषक) असल्यामुळे, याच स्थायीभाव पदाच्या प्रयोगसामर्थ्याने समजला जाणारा 'व्यभिचारीभाव' देखील येतो. पुन्हा, 'स्थायी' पदाशी समास न करता स्वतंत्रपणे ऐकू येणाऱ्या 'भाव' शब्दावरून स्थायीभाव व व्यभिचारीभावापेक्षा 'अन्य भाव' (केवळ भाव) देखील सूचित होतो. तसेच, 'स्थायी' पदाने व्यक्त होणाऱ्या रती, हास इत्यादी अर्थांची उत्पत्ती आणि उद्दीपन हे दोन्ही स्पष्ट करून सज्ज ठेवल्यामुळे, त्या रती, हास इत्यादी अर्थांशी संबंधित असलेले आलंबन व उद्दीपन संज्ञक 'विविध विभाव' देखील सूचित होतात. त्याचप्रमाणे 'सानुभावक' या पदाच्या संयोगाने दर्शविलेला 'अनुभाव' आणि "रसास्वादासाठी" या पदाने निर्दिष्ट केलेला 'रस' देखील सूचित होतो. अशा प्रकारे हे स्थायीभाव इत्यादी निर्दिष्ट केले आहेत. "स्थायीशी संबंध", "तो ज्यांच्याकडे आहे", "भाव आणि विभाव", "अनुभावांसह प्रवृत्त होतात", आणि "रसाचा आस्वाद" असा वाक्याचा विग्रह आहे. ဘာဝအဓိပ္ပာယ भाव-अभिप्राय (भावाचा अर्थ/अभिप्राय) ၃၄၀. ३४०. စိတ္တဝုတ္တိဝိသေသာ တု, ဘာဝယန္တိ ရသေ ယတော; ရတျာဒယော တတော ဘာဝ-သဒ္ဒေန ပရိကိတ္တိတာ. चित्ताच्या वृत्तींचे विशेष (विशिष्ट अवस्था) रती इत्यादी भाव ज्या कारणाने रसांना भावित (उत्पन्न) करतात, त्या कारणाने त्यांना 'भाव' या शब्दाने संबोधिले जाते. ၃၄၀. ဣဒါနိ ယထာဥဒ္ဒိဋ္ဌေသု ဌာယာဒီဟိ ဘာဝဝိဘာဝါနုဘာဝရသေသု ပဌမံ ဘာဝံ ဝိဘာဝေတုံ ဘာဝသဒ္ဒမနွတ္ထယတိ ‘‘စိတ္တ’’ဣစ္စာဒိနာ. စိတ္တဿ ဝုတ္တိယော ရမဏဟသနာဒိအာကာရေန ပဝတ္တိယော, တာဝ ဝိသေသာ ဝိသိဋ္ဌသဘာဝတ္ထာတိ စိတ္တဝုတ္တိဝိသေသာ. [Pg.322] ရတျာဒယော ဌာယီဗျဘိစာရီသာတ္တိကာ. တုသဒ္ဒေါ ဝိသေသေ. ယတော ရသေ သိင်္ဂါရာဒယော ဘာဝယန္တိ နိပ္ဖာဒေန္တိ. တတော ဘာဝသဒ္ဒေန ပရိကိတ္တိတာ ဘရတာဒီဟိ ကထိတာ. ဧတ္ထ ဟိ ဏျန္တော ဘူဓာတု ကရဏေ ဝတ္တတေ. ယတော စာယံ န ကေဝလံ ကရဏေယေဝ ဝတ္တတေ, အထ ခေါ ဗျာပနေ, ပဋိပါဒနေ စ, တသ္မာဿ ပဋိဘာနံ စိတ္တံ ဘာဝယန္တိ ဗျာပေန္တိ. အထ ဝါ ကဝိနော လောကဋ္ဌိတိဉာဏလက္ခဏံ အဓိပ္ပာယံ ဘာဝယန္တိ ပဋိပါဒေန္တီတိ ဘာဝါတိ ဧဝမေတ္ထ အတ္ထော ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ३४०. आता, निर्दिष्ट केलेल्या स्थायी इत्यादी भाव, विभाव, अनुभाव आणि रसांमध्ये पहिल्यांदा 'भाव' स्पष्ट करण्यासाठी "चित्त" इत्यादींद्वारे 'भाव' शब्दाचा अन्वर्थ (सार्थ अर्थ) सांगतात. चित्ताच्या वृत्ती म्हणजे रममाण होणे, हसणे इत्यादी रूपाने होणाऱ्या प्रवृत्ती; त्यांचे विशेष म्हणजे विशिष्ट स्वभाव केलेले, म्हणून 'चित्तवृत्तीविशेष'. रती इत्यादी स्थायी, व्यभिचारी आणि सात्त्विक भाव होत. 'तु' (tu) हा शब्द विशेषासाठी आहे. ज्या कारणाने रसांमध्ये शृंगार इत्यादी भावित करतात म्हणजे निष्पन्न (उत्पन्न) करतात, त्या कारणाने त्यांना 'भाव' या शब्दाने संबोधिले जाते, असे भरत इत्यादींनी म्हटले आहे. येथे 'णिच्' प्रत्ययान्त 'भू' धातू 'करण' (करविणे) या अर्थात वापरला आहे. आणि हा धातू केवळ 'करण' अर्थातच वापरला जात नाही, तर 'व्यापणे' (व्याप्त करणे) आणि 'प्रतिपादन करणे' या अर्थातही वापरला जातो; म्हणून ते प्रतिभावंताच्या चित्ताला भावित करतात म्हणजे व्यापून टाकतात. अथवा, कवीच्या लोकस्थितीच्या ज्ञानात्मक अभिप्रायाला भावित करतात म्हणजे प्रतिपादित करतात, म्हणून ते 'भाव' होत, असा येथे अर्थ समजला पाहिजे. ၃၄၀. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒိဋ္ဌေသု ဌာယီဘာဝါဒီသု ဌာယီအာဒီနံ တိဏ္ဏံ သာဓာရဏော ဘာဝေါ နာမ ဧသောတိ ဒဿေန္တော အနွတ္ထဝသေန ဒဿေတိ ‘‘စိတ္တ’’ဣစ္စာဒိ. စိတ္တဝုတ္တိဝိသေသာ တု စိတ္တဿ ဥတ္တရိ ဝက္ခမာနာရမ္မဏဟသနသောစနာဒီဟိ, နိဗ္ဗေဒါဒီဟိ, ထမ္ဘာဒီဟိ စ အာကာရေဟိ ပဝတ္တိသင်္ခါတာ အညမညံ အသင်္ကရာကာရသင်္ခါတာ ဝိသေသာ ပန ဌာယီဗျဘိစာရီသာတ္တိကာ ယတော ယသ္မာ ရသေ သိင်္ဂါရာဒိရသေ ဘာဝယန္တိ နိပ္ဖာဒေန္တိ ကရောန္တိ. နော စေ, ရသေ သိင်္ဂါရာဒိရသဝိသယေ ပဏ္ဍိတာနံ စိတ္တံ ဘာဝယန္တိ ဗျာပနံ ကရောန္တိ. နော စေ, တသ္မိံယေဝ ရသဝိသယေ ကဝိနော လောကသဘာဝံ ဝိသယံ ကတွာ ပဝတ္တဉာဏလက္ခဏံ အဓိပ္ပာယံ ဘာဝယန္တိ ပဋိပါဒနံ ကရောန္တိ. တတော ဘာဝသဒ္ဒေန ဟေတုကတ္တရိ နိပ္ဖန္နေန ရတျာဒယော ရတိဟာသာဒယော ပရိကိတ္တိတာ ဘရတာဒီဟိ ဝုတ္တာ ဟောန္တီတိ. ‘‘ရတျာဒယော’’တိ ဧတ္ထ အာဒိသဒ္ဒေန ဟာသာဒယော ဌာယီဘာဝါ စ, နိဗ္ဗေဒါဒယော ဗျဘိစာရီဘာဝါ စ, ထမ္ဘပလယာဒယော သာတ္တိကဘာဝါ စ သင်္ဂဟိတာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. စိတ္တဿ ဝုတ္တိယောတိ စ, တာ ဧဝ ဝိသေသာတိ စ, ဘာဝေါ ဣတိ သဒ္ဒေါတိ စ ဝါကျံ. ३४०. आता, निर्दिष्ट केलेल्या स्थायीभाव इत्यादींमध्ये स्थायी इत्यादी तिन्हींचा 'भाव' हा साधारण धर्म आहे, हे दर्शविताना अन्वर्थाच्या (सार्थतेच्या) आधारे "चित्त" इत्यादी सांगतात. 'चित्तवृत्तीविशेष' म्हणजे चित्ताच्या पुढे सांगितल्या जाणाऱ्या आलंबन, हास, शोक इत्यादींनी, निर्वेदादींनी आणि स्तंभादी आकारांनी होणाऱ्या प्रवृत्ती; परस्परांमध्ये संकर न होणाऱ्या आकाराच्या विशेष अशा स्थायी, व्यभिचारी आणि सात्त्विक वृत्ती ज्या कारणाने रसांमध्ये, म्हणजे शृंगार इत्यादी रसांमध्ये भावित करतात, निष्पन्न करतात, निर्माण करतात. किंवा, शृंगार इत्यादी रसांच्या विषयात पंडितांच्या चित्ताला भावित करतात म्हणजे व्यापून टाकतात. किंवा, त्याच रसविषयात कवीच्या लोकस्वभावाला विषय करून प्रवृत्त झालेल्या ज्ञानात्मक अभिप्रायाला भावित करतात म्हणजे प्रतिपादित करतात. म्हणून, 'भाव' या शब्दाने (जो णिच् प्रत्ययाने निष्पन्न होतो) रती, हास इत्यादी 'भाव' म्हणून संबोधिले जातात, असे भरत इत्यादींनी म्हटले आहे. "रती इत्यादी" यामध्ये 'इत्यादी' शब्दाने हास इत्यादी स्थायीभाव, निर्वेदादी व्यभिचारीभाव आणि स्तंभ, प्रलय इत्यादी सात्त्विक भाव समाविष्ट केले आहेत असे जाणावे. "चित्ताच्या वृत्ती", "त्याच विशेष", आणि "भाव असा शब्द" असा वाक्याचा विग्रह आहे. ဌာယီဘာဝအဓိပ္ပာယ स्थायीभाव-अभिप्राय (स्थायीभावाचा अर्थ/अभिप्राय) ၃၄၁. ३४१. ဝိရောဓိနာ’ညဘာဝေန,[Pg.323] ယော ဘာဝေါ န တိရောဟိတော; သီလေန တိဋ္ဌတိ’စ္စေ’သော,ဌာယီဘာဝေါတိ သဒ္ဒိတော. जो भाव विरोधी किंवा अन्य भावाने झाकला (तिरोहित केला) जात नाही, आणि जो आपल्या स्वभावाने टिकून राहतो, त्याला 'स्थायीभाव' असे म्हटले जाते. ၃၄၁. ဌာယာဒိကေ တိဝိဓေ ဘာဝေ ကမေနာဟ ‘‘ဝိရောဓိနာ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဝိရောဓိနာ အညေန ဇိဂုစ္ဆာဒိနာ ဘာဝေန ယော ဘာဝေါ ရတျာဒိကော န တိရောဟိတော နစ္ဆာဒိတော, ဧသော ဘာဝေါ အနုစ္ဆိဇ္ဇမာနတ္တာ ဧဝ တိဋ္ဌတိ သီလေနာတိ, ဌာယီ ဧဝ ဘာဝေါတိ ဌာယီဘာဝေါတိ သဒ္ဒိတော ကထိတော. ယော ဘာဝါဒီဟိ အာလောကိတဿာဒံ နီတော သမာနီတော, သော သာမာဇိကေဟိ အဿာဒိယမာနတ္တာ ရသောတိ ဝုစ္စတိ. ဝက္ခတိ ဟိ ‘‘သဝိဘာဝ’’ဣစ္စာဒိ. ३४१. स्थायी इत्यादी तीन प्रकारच्या भावांमध्ये क्रमाने "विरोधी" इत्यादींद्वारे सांगतात. विरोधी अशा दुसऱ्या जुगुप्सा (घृणा) इत्यादी भावाने जो रती इत्यादी भाव झाकला जात नाही, आच्छादित केला जात नाही; हा भाव नष्ट न होता आपल्या स्वभावाने टिकून राहतो म्हणून 'स्थायी' असलेला भाव म्हणजेच 'स्थायीभाव' असे म्हटले गेले आहे, सांगितले गेले आहे. जो भाव इत्यादींच्या योगाने आस्वादयोग्यतेप्रत आणला जातो, तो प्रेक्षकांद्वारे आस्वादला जात असल्यामुळे 'रस' म्हटला जातो. पुढे "सविभाव" इत्यादी सांगतीलच. ၃၄၁. ဣဒါနိ ဌာယီအာဒိကေ တိဝိဓဘာဝေ ကမေန နိဒ္ဒိသတိ ‘‘ဝိရောဓိ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဝိရောဓိနာ အညဘာဝေန ရတိဟာသာဒီနံ ဝိရုဒ္ဓေန ဇိဂုစ္ဆာဒိနာ အညဘာဝေန ယော ဘာဝေါ ရတိဟာသာဒိကော တိရောဟိတော န ဗျဝဟိတော န ဟောတိ, ဧသော ဝိရုဒ္ဓဘာဝေန အဗျဝဟိတော ဘာဝေါ တိဋ္ဌတိ သီလေနာတိ ဣမိနာ အတ္ထေန ဌာယီ နာမ ဟောတီတိ ကတွာ ဌာယီဘာဝေါတိ သဒ္ဒိတော ကထိတောတိ. ယော ဝိဘာဝါနုဘာဝါဒီဟိ အဿာဒနီယတ္တံ ပါပိတော သဗ္ဘေဟိ အဿာဒနီယတ္တာ ရသောတိ ဝုစ္စတိ, သော ဌာယီ နာမာတိ ဝုစ္စတိ. အညော စ သော ဘာဝေါ စေတိ စ, တိရော ကယိရိတ္ထာတိ စ, ဌာယီ စ သော ဘာဝေါ စေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३४१. आता, स्थायी इत्यादी तीन प्रकारच्या भावांचे क्रमाने निर्देश करतात "विरोधी" इत्यादींद्वारे. विरोधी अशा दुसऱ्या भावाने, म्हणजे रती, हास इत्यादींच्या विरुद्ध असलेल्या जुगुप्सा इत्यादी दुसऱ्या भावाने जो रती, हास इत्यादी भाव झाकला जात नाही, व्यवहित (बाधित) होत नाही; हा विरोधी भावाने अबाधित असलेला भाव आपल्या स्वभावाने टिकून राहतो, या अर्थाने तो 'स्थायी' होतो, म्हणून त्याला 'स्थायीभाव' असे म्हटले गेले आहे, सांगितले गेले आहे. जो विभाव, अनुभाव इत्यादींच्या योगाने आस्वाद घेण्यायोग्य स्थितीला पोहोचवला जातो आणि सर्वांद्वारे आस्वादला जात असल्यामुळे 'रस' म्हटला जातो, त्याला 'स्थायी' असे म्हणतात. "दुसरा आणि तो भाव", "झाकला जावा", आणि "स्थायी आणि तो भाव" असा विग्रह आहे. ဌာယီဘာဝပ္ပဘေဒဥဒ္ဒေသ स्थायीभावांच्या प्रभेदांचा (प्रकारांचा) उद्देश (कथन) ၃၄၂. ३४२. ရတိဟာသာ စ သောကော စ,ကောဓုဿာဟဘယ’မ္ပိ စ; ဇိဂုစ္ဆာဝိမှယာ စေဝ,သမော စ နဝ ဌာယိနော. रती, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय आणि शम (शांतता) हे नऊ स्थायीभाव आहेत. ၃၄၂. ရတျာဒီနံ [Pg.324] နဝန္နမေဝ ဌာယိတွံ သမ္ဘဝတီတျာဟ ‘‘ရတိ’’စ္စာဒိ. သမော စေတိ ဧဝံ ဌာယိနော နဝါတိ ယောဇနာ. နဝေဝေတေ သကသကဝိဘာဝါနုဘာဝေဟိ သမုလ္လာသိတာ ဝိသုမ္ပိ ဗန္ဓိတဗ္ဗာ ကဝိနာ, အဘိနေတဗ္ဗာ စ နဋေန, တထာ သေသဘာဝါပိ. တတ္ထ ယဒိ ပနာယံ ရတိ အသေသဣတ္ထိပုရိသဂုဏယုတ္တာနံ ဣတ္ထိပုရိသာနံ အညမညံ ဇနိတာ, စန္ဒာဒီဟိ ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝေဟိ ဥဒ္ဒီပိတာ, ဥဿုက္ကတာဒိဗာဓကေဟိ အနုဘာဝေဟိ ပရိပေါသိတာ, သကသကာနုဘာဝသာမတ္ထိယာ ပတီယမာနေဟိ အနေကရူပေဟိ ဗျဘိစာရီဟိ စိတ္တတာ သိယာ, တဒါ တု ဌာယီ ရတိ နဋာဘိနယေန, သုဗန္ဓသဝနေန ဝါ သဗ္ဘေဟိ အဿာဒိယမာနာ သိင်္ဂါရရသတ္တမာပဇ္ဇတေ. ဧဝံ ယထာယောဂံ ဟာသာဒိဌာယီဘာဝါနံ ဟဿရသာဒိဘာဝါပဇ္ဇနေ ယုတ္တိံ သမန္နေယျ. ३४२. रती इत्यादी नऊ भावांचेच स्थायीत्व संभवते, असे "रती" इत्यादींद्वारे सांगतात. 'शम' (samo) देखील, अशा प्रकारे नऊ स्थायीभाव आहेत, अशी योजना आहे. हे नऊही भाव आपापल्या विभाव आणि अनुभावांनी उल्लसित करून कवीने स्वतंत्रपणे काव्यात गुंफले पाहिजेत आणि नटाने अभिनित केले पाहिजेत, तसेच उर्वरित भाव देखील. त्यामध्ये, जर ही 'रती' सर्व स्त्री-पुरुष गुणांनी युक्त असलेल्या स्त्री-पुरुषांमध्ये परस्परांबद्दल उत्पन्न झाली असेल, चंद्र इत्यादी उद्दीपन विभावांनी उद्दीपित झाली असेल, उत्सुकता इत्यादी बाधक अनुभावांनी परिपुष्ट झाली असेल, आणि आपापल्या अनुभावांच्या सामर्थ्याने प्रतीत होणाऱ्या अनेक प्रकारच्या व्यभिचारी भावांनी चित्रविचित्र (विविध रूपांची) झाली असेल, तेव्हा ती स्थायी 'रती' नटाच्या अभिनयाने किंवा सुंदर काव्याच्या श्रवणाने सर्वांद्वारे आस्वादिली जात असताना 'शृंगार रस' बनते. अशा प्रकारे, योग्यतेनुसार हास इत्यादी स्थायीभावांचे हास्य इत्यादी रसांमध्ये रूपांतर होण्याबाबतची योजना समजावून घ्यावी. ၃၄၂. ဌာယီဘာဝေါ နာမ ရတျာဒယော နဝေဝေတိ ဒဿေတုံ ‘‘ရတိဟာသာ’’တိအာဒိမာဟ. ရတိဟာသာ စ သောကော စ ကောဓုဿာဟဘယမ္ပိ စ ဇိဂုစ္ဆာဝိမှယာ စေဝ သမော သန္တဂုဏော စာတိ ဧဝံ ဌာယိနော နဝ ဟောန္တိ. ဣမေသံ ရတျာဒီနံ နဝန္နံ သရူပကထနံ ‘‘သိင်္ဂါရဟဿကရုဏာ’’တိအာဒိကာယ ဥဒ္ဒေသဂါထာယ အနန္တရေ နိဒ္ဒေသေ ပါကဋော ဟောတိ. ရတိ စ ဟာသော စာတိ စ, ကောဓော စ ဥဿာဟော စ ဘယဉ္စေတိ စ, ဇိဂုစ္ဆာ စ ဝိမှယာ စေတိ စ ဝါကျံ. ဣမေ နဝ စ ဧဝံ ဗျဘိစာရီဘာဝသာတ္တိကာဘာဝေါ စေတိ ဣမေ ယထာသကမနုရူပဝိဘာဝါနုဘာဝေဟိ ဒိတ္တံ ကတွာ ပစ္စေကံ ကဝိနာ ဗန္ဓိတဗ္ဗာ, နဋေန ဂဟေတွာ ဒဿိတဗ္ဗာ စ. ဣမေသု တိဝိဓဘာဝေသု အယံ ရတိ အသေသပုမိတ္ထိဂုဏေဟိ ယုတ္တေဟိ နရနာရီဟိ အညမညံ ဥပ္ပာဒိတာ, စန္ဒာဒီဟိ ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝေဟိ ဥဒ္ဒီပိတာ, ဥဿာဟာဒိပကာသကကာယိကဝါစသိကပယောဂသင်္ခါတာနုဘာဝေန ပေါသိတာ, သကသကာနုဘာဝသာမတ္ထိယေဟိ ဂမ္မမာနာနေကပ္ပကာရဗျဘိစာရီဘာဝေဟိ ဝိစိတ္တကတာ [Pg.325] ဟောတိ. ဤဒိသာ’ယံ ရတိ နဋဿ အဘိနယေန စ ပသတ္ထဗန္ဓသဝနေန စ သဗ္ဘေဟိ အဿာဒိယမာနသိင်္ဂါရာဒိရသတ္တံ ပါပုဏာတီတိ ဝိညာတဗ္ဗာ. ဟာသာဒီနံ သေသဌာယီဘာဝါနံ ဟဿရသာဒိဘာဝါပတ္တိယံ ယုတ္တိ ဧဝံ ယထာရဟံ ဝေဒိတဗ္ဗာတိ. ३४२. स्थायीभाव म्हणजे रती इत्यादी नऊच आहेत हे दर्शविण्यासाठी "रती, हास" इत्यादी म्हणाले आहेत. रती, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय आणि शम म्हणजे शांत गुण, अशा प्रकारे नऊ स्थायीभाव असतात. या रती इत्यादी नऊ भावांचे स्वरूपकथन "शृंगार, हास्य, करुण" इत्यादी उद्देशगाथेच्या पुढील निर्देशात स्पष्ट होते. "रती आणि हास", "क्रोध, उत्साह आणि भय", "जुगुप्सा आणि विस्मय" असा वाक्याचा विग्रह आहे. हे नऊ आणि तसेच व्यभिचारीभाव व सात्त्विकभाव हे आपापल्या अनुरूप विभाव आणि अनुभावांनी प्रदीप्त करून कवीने स्वतंत्रपणे गुंफले पाहिजेत आणि नटाने ग्रहण करून दाखविले पाहिजेत. या तीन प्रकारच्या भावांमध्ये ही 'रती' सर्व स्त्री-पुरुष गुणांनी युक्त असलेल्या स्त्री-पुरुषांद्वारे परस्परांमध्ये उत्पन्न केली गेलेली, चंद्र इत्यादी उद्दीपन विभावांनी उद्दीपित केलेली, उत्साहादी प्रकट करणाऱ्या कायिक व वाचिक प्रयोगात्मक अनुभावांनी पोसलेली, आणि आपापल्या अनुभावांच्या सामर्थ्याने समजल्या जाणाऱ्या अनेक प्रकारच्या व्यभिचारी भावांनी चित्रविचित्र केलेली असते. अशी ही 'रती' नटाच्या अभिनयाने आणि प्रशस्त काव्याच्या श्रवणाने सर्वांद्वारे आस्वादिली जाणारी शृंगार इत्यादी रसरूपाला प्राप्त होते, असे जाणावे. हास इत्यादी उर्वरित स्थायीभावांचे हास्य इत्यादी रसांमध्ये रूपांतर होण्याची योजना देखील अशाच प्रकारे योग्यतेनुसार समजून घ्यावी. ဗျဘိစာရီဘာဝအဓိပ္ပာယ व्यभिचारी भावाचा अभिप्राय ၃၄၃. ३४३. တိရောဘာဝါဝိဘာဝါဒိ-ဝိသေသေနာ’ဘိမုချတော; ယေတေ စရန္တိ သီလေန,တေ ဟောန္တိ ဗျဘိစာရိနော. जे भाव तिरोभाव (लोप पावणे) आणि आविर्भाव (प्रकट होणे) इत्यादी विशेषांमुळे अभिमुख होऊन (स्थायीभावाच्या देशाने) स्वभावाने संचार करतात, ते 'व्यभिचारी' भाव असतात. ၃၄၃. ဗျဘိစာရိနော အာဟ ‘‘တိရောဘာဝ’’ဣစ္စာဒိနာ. တိရောဘာဝေါ ဌာယီနံ ဧကဿာပိ ဘာဝဿ နိဗ္ဗေဒါဒိနော အစိရဋ္ဌာယိတာ စ အာဝိဘာဝေါ ပါကဋတာ စ နာနာရသနိဿယတ္တာ တေ အာဒယော ယဿ. အာဒိသဒ္ဒေန ဌာယီဓမ္မဿ သုခဒုက္ခာဒိရူပဿ ဂဟဏံ, သောဝ ဝိသေသော, တေန. ဌာယီဓမ္မဿ သုခဒုက္ခရူပဿ ဂဟဏံ, အတ္တနော ဓမ္မဿ သုခဒုက္ခရူပဿ ဌာယိနိ သမာရောပနဉ္စာဘိမုချံ. တထာ ဟိ ရတိယံ ပရိသမော သုခါနုဝိဒ္ဓေါ ဘဝတိ, သောကေ ဒုက္ခာနုဝိဒ္ဓေါ. ရတိယံ သုခသဘာဝါပိ ဂိလာနိပ္ပဘုတယော ဗျဘိစာရိနော သကမ္မံ ဒုက္ခမိမံ သမာရောပယန္တေဝ. တတော တေန အဘိမုခဘာဝေန ယေ ဧတေ ဘာဝါ သီလေန စရန္တိ ပဝတ္တန္တိ, တေ ဗျဘိစာရိနော ဟောန္တီတိ. ३४३. ‘तिरोभाव’ इत्यादींद्वारे व्यभिचारी भावांचे वर्णन केले आहे. तिरोभाव म्हणजे स्थायी भावांपैकी एकाही भावाचा (उदा. निर्वेद इत्यादींचा) अल्पकाळ टिकणे (अचिरस्थायित्व) आणि आविर्भाव म्हणजे प्रकटता होय. विविध रसांच्या आश्रयाने राहिल्यामुळे हे ज्यांचे आदि (सुरुवात) आहेत. ‘आदि’ शब्दाने सुख-दुःखादी रूप असलेल्या स्थायी धर्माचे ग्रहण होते, तोच विशेष आहे, त्याने. सुख-दुःखरूप स्थायी धर्माचे ग्रहण करणे आणि आपल्या स्वतःच्या सुख-दुःखरूप धर्माचा स्थायी भावावर आरोप करणे हेच ‘अभिमुख्य’ (सन्मुख असणे) आहे. तसेच, रतीमध्ये (प्रेमात) थकवा (परिश्रम) सुखाने युक्त होतो, तर शोकामध्ये दुःखाने युक्त होतो. रतीमध्ये सुखस्वभावाचे असूनही, ग्लानी इत्यादी व्यभिचारी भाव आपल्या कार्याने या दुःखाचा आरोप करतातच. त्यामुळे, त्या अभिमुख भावाने जे हे भाव स्वभावाने वावरतात किंवा प्रवृत्त होतात, त्यांना ‘व्यभिचारी भाव’ असे म्हणतात. ၃၄၃. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒေသက္ကမေန ဗျဘိစာရီဘာဝေ လက္ခဏတော ဒဿေတိ ‘‘တိရောဘာဝါ’’ဣစ္စာဒိနာ. တိရောဘာဝါဝိဘာဝါဒိဝိသေသေန ဗျဘိစာရီဘာဝါနံ အတ္တနော အနေကရသံ နိဿာယ ပဝတ္တတ္တာ, လောကဿ ဘိန္နရုစိကတ္တာ စ ကိသ္မိဉ္စိ ဌာယီဘာဝေ ဗျဘိစာရီဘာဝါနမတ္တနော ဂုဏဿ လီနတ္တဉ္စ ကိသ္မိဉ္စိ တဿေဝ ဂုဏဿ ပါကဋတ္တဉ္စာတိအာဒိကေန ဝိသေသေန [Pg.326] အဘိမုချတော ဌာယီဘာဝါနံ သုခဒုက္ခရူပံ အတ္တနိ စ အတ္တနော သုခဒုက္ခရူပံ ဌာယီဘာဝေသု စ အာရောပနသင်္ခါတေန အဘိမုခဘာဝေန ယေတေ ဘာဝါ သီလေန စရန္တိ ပကတိယာ ပဝတ္တန္တိ, တေ ဘာဝါ ဗျဘိစာရိနော နာမ ဟောန္တီတိ. ဧဝမေဝ ပီဠာ သရူပေန ဧကော ပရိသမသင်္ခတဗျဘိစာရီဘာဝေါ ရတိယံ သဂုဏေန လီနော သုခါနုဝိဒ္ဓေါ ဟုတွာ, သောကေ သဂုဏေန ပါကဋော ဒုက္ခာနုဝိဒ္ဓေါ စ ဟုတွာ ပဝတ္တတေ. ဧဝမေဝ သုခသဘာဝရတိယံ ဂိလာနာဒယော ဗျဘိစာရိနော သကိယံ ဒုက္ခသရူပံ အာရောပေန္တီတိ ကတွာ တိရောဘာဝဝိဘာဝါဒိဝိသေသေန အဘိမုခံ ပဝတ္တန္တိ. တိရောဘဝနမိတိ စ, အာဝိဘဝနမိတိ စ, တိရောဘာဝေါ စ အာဝိဘာဝေါ စေတိ စ, တေ အာဒယော ယဿ ဌာယီဘာဝေသု ဝိဇ္ဇမာနာနံ သုခဒုက္ခသဘာဝါနံ အတ္တနိ အာရောပနဿေတိ စ, သောယေဝ ဝိသေသောတိ စ, အဘိမုခါနံ ဘာဝေါတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ဗျဘိစာရီပဒေ ဝိသဒ္ဒေါ ဝိသေသတ္ထေ အဘိသဒ္ဒေါ အဘိမုခဘာဝေ ဝတ္တတိ. ३४३. आता उद्देशक्रमानुसार ‘तिरोभाव’ इत्यादींद्वारे व्यभिचारी भावांचे लक्षणांसह दर्शन घडवितात. तिरोभाव आणि आविर्भाव इत्यादी विशेषांमुळे व्यभिचारी भावांचे स्वतःच्या अनेक रसांना आश्रय देऊन प्रवृत्त होणे, आणि लोकांच्या भिन्न आवडीनिवडींमुळे (रुचीमुळे) एखाद्या स्थायी भावामध्ये व्यभिचारी भावांच्या स्वतःच्या गुणांचे लीन असणे आणि एखाद्यामध्ये त्याच गुणाचे प्रकट असणे इत्यादी विशेषांमुळे, अभिमुखतेने स्थायी भावांचे सुख-दुःखरूप स्वतःमध्ये आणि स्वतःचे सुख-दुःखरूप स्थायी भावांमध्ये आरोप करण्याच्या संज्ञेने, अभिमुख भावाने जे हे भाव स्वभावाने वावरतात किंवा प्रकृतीने प्रवृत्त होतात, त्यांना ‘व्यभिचारी भाव’ असे म्हणतात. याचप्रमाणे, पीडा (त्रास) स्वतःच्या रूपाने एक ‘परिश्रम’ नावाचा व्यभिचारी भाव असून, तो रतीमध्ये स्वतःच्या गुणाने लीन होऊन सुखाने युक्त होतो, आणि शोकामध्ये स्वतःच्या गुणाने प्रकट होऊन दुःखाने युक्त होऊन प्रवृत्त होतो. याचप्रमाणे, सुखस्वभाव असलेल्या रतीमध्ये ग्लानी इत्यादी व्यभिचारी भाव स्वतःचे दुःखरूप आरोपित करतात, म्हणून ते तिरोभाव-आविर्भाव इत्यादी विशेषाने अभिमुख होऊन प्रवृत्त होतात. ‘तिरोभवन’ (अदृश्य होणे) आणि ‘आविर्भवन’ (प्रकट होणे), म्हणजेच तिरोभाव आणि आविर्भाव, हे ज्याचे आदि आहेत; स्थायी भावांमध्ये विद्यमान असलेल्या सुख-दुःख स्वभावाचा स्वतःमध्ये आरोप करणे, तोच विशेष आहे; आणि अभिमुखांचा भाव, असा याचा विग्रह आहे. ‘व्यभिचारी’ या पदामध्ये ‘वि’ हा शब्द विशेष अर्थात आणि ‘अभि’ हा शब्द अभिमुख भावाच्या अर्थात वापरला जातो. ဗျဘိစာရီဘာဝပ္ပဘေဒ व्यभिचारी भावांचे प्रकार ၃၄၄. ३४४. နိဗ္ဗေဒေါ တက္ကသင်္ကာ သမ-ဓိတိဇဠတာ ဒီနတုဂ္ဂါလသတ္တံ,သုတ္တံ တာသော ဂိလာနု’ဿုကဟရိသ-သတိဿာဝိသာဒါဗဟိတ္ထာ. निर्वेद (उदासीनता), तर्क, शंका, श्रम (थकवा), धृती (धैर्य/संतोष), जडता, दीनता, उग्रता, आळस, सुप्त (झोप), त्रास (भय), ग्लानी, उत्सुकता, हर्ष, स्मृती, ईर्ष्या, विषाद आणि अवहित्था (भाव लपवणे). စိန္တာ ဂဗ္ဗာ’ပမာရော’မရိသမဒ-မတုမ္မာဒမောဟာ ဝိဗောဓော,နိဒ္ဒါဝေဂါ သဗိဠံ မရဏ-သစပလာဗျာဓိ တေတ္တိံသမေ’တေ. चिंता, गर्व, अपस्मार (फेफरे), अमर्ष (असहशीलता), मद, मती (बुद्धी), उन्माद, मोह, विबोध (जागृती), निद्रा, आवेग, व्रीडा (लाज - ‘सबीळ’ म्हणजे लाजेसह), मरण, चपळता आणि व्याधी; हे तेहतीस (व्यभिचारी भाव) आहेत. ၃၄၄. တေ ဒဿေတိ ‘‘နိဗ္ဗေဒေါ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဒီနတုဂ္ဂါလသတ္တန္တိ ဒီနတာ စ ဥဂ္ဂတဉ္စ အာလသတ္တဉ္စ, ဂိလာနိ ဥဿုကဣတိ [Pg.327] ဥဿုက္ကံ. စပလဣတိ စာပလ္လံ, သဟ စပလေန သစပလော, သော စာယံ ဗျာဓိ စ, မရဏဉ္စ သစပလဗျာဓိ စ သမာဟာရေ. တဉ္စ သဟ ဗိဠာယ ဝတ္တတီတိ သဗိဠန္တိ ဧတေ ယထာဝုတ္တဗျဘိစာရီဘာဝါ တေတ္တိံသ ဟောန္တီတိ. ဥဿာဟဝတာ ဝီရရသော တံဝသေနေဝ အဿာဒီယတိ. ဘီရုနာ တု သောဝ ဘယာနကရသဝသေနေတိ လောကသဘာဝဿ အနေကတ္တာ တဒတ္ထမေတေ ဗျဘိစာရိနော ဧကေကဿရသဿ ဗဟဝေါ ဝဏ္ဏနီယာ, ယတော တံဝဏ္ဏနာဒွါရေန သဗ္ဗောပိ တေသု ကိဉ္စိ အဿာဒေတီတိ. တတ္ထ ယသ္မာ ပန မာရဏောပဂတဝေရိဒဿနမေကမေဝ တင်္ခဏေယေဝ ဘိန္နံ ပကတိဝသေန ဘီရုနော ဘယဿ ဟေတု, သင်္ဂါမလောလဿ တု ဥဿာဟနိမိတ္တံ သိယာ. တထာ နဋေန ကတံ ဝိကတမာဘရဏံ ကြိယာဝါ နီစပကတီနံ ဌာယိနော ဟာသဿ ဟေတု, ဂမ္ဘီရပကတီနံ ဗျဘိစာရိနော ဟာသဿ, တသ္မာ ဘာဝေ ဝဏ္ဏယတာ ကဝိနာ ဘာဝါ တထာ ဝဏ္ဏနီယာ, ယထောစိတျပရိပေါသော သိယာ. ဩစိတျဘင်္ဂေါ တု မဟတာ ဝါယာမေန ပရိဟရိတဗ္ဗော. ३४४. ते ‘निर्वेद’ इत्यादींद्वारे दाखवितात. ‘दीनतुग्गालसत्तं’ म्हणजे दीनता, उग्रता आणि आळस होय. ‘ग्लानी उत्सुक’ म्हणजे उत्सुकता होय. ‘चपल’ म्हणजे चपळता; चपळतेसह असणारा तो ‘सचपळ’ आणि तोच हा व्याधी आणि मरण; ‘सचपळव्याधी’ हा समाहार द्वंद्व समास आहे. आणि ते लाजेसह (व्रीडेसह) असते म्हणून ‘सबीळ’ (लाजेसह) म्हटले आहे; हे वर सांगितलेले तेहतीस व्यभिचारी भाव आहेत. उत्साही व्यक्तीद्वारे वीर रसाचा त्याच (उत्साहाच्या) प्रभावाने आस्वाद घेतला जातो. परंतु भित्रा मनुष्य त्याच वीर रसाचा भयानक रसाच्या प्रभावाने आस्वाद घेतो; अशा प्रकारे जगाचा स्वभाव अनेकविध असल्यामुळे, त्याकरिता हे व्यभिचारी भाव प्रत्येक रसाचे अनेक प्रकारे वर्णन करण्यायोग्य आहेत, कारण त्या वर्णनाद्वारे प्रत्येक जण त्यातील कशाचा ना कशाचा आस्वाद घेतो. त्यामध्ये, कारण मारण्यासाठी आलेल्या शत्रूचे दर्शन हे एकाच वेळी वेगवेगळ्या स्वभावामुळे भित्र्या माणसासाठी भयाचे कारण ठरते, तर युद्धाची आवड असणाऱ्यासाठी उत्साहाचे निमित्त ठरते. तसेच नटाने परिधान केलेले विकृत दागिने किंवा केलेली क्रिया ही हलक्या स्वभावाच्या लोकांच्या स्थायी हास्याचे कारण ठरते, तर गंभीर स्वभावाच्या लोकांच्या व्यभिचारी हास्याचे कारण ठरते. म्हणून भावांचे वर्णन करणाऱ्या कवीने भावांचे असे वर्णन केले पाहिजे, जेणेकरून औचित्याचा परिपोष होईल. औचित्याचा भंग मात्र मोठ्या प्रयत्नाने टाळला पाहिजे. တေသု နိဗ္ဗေဒေါ အတ္တာဝမာနနံ. တဿ စ ဣတ္ထီနဉ္စ နီစာနဉ္စ ဒါလိဒ္ဒိယံ ဝိဘာဝေါ, ယောဂီနံ တု တတွသံဝေဒနံ ဝိဘာဝေါ, အဿုပတနစိန္တာဒယော ဧတ္ထ အနုဘာဝါ. त्यापैकी ‘निर्वेद’ म्हणजे स्वतःचा अवमान करणे (स्वतःला कमी लेखणे). स्त्रिया आणि कनिष्ठ लोकांच्या बाबतीत दारिद्र्य हा त्याचा विभाव (कारण) आहे, तर योगी पुरुषांच्या बाबतीत तत्त्वज्ञान (सत्याची जाणीव) हा विभाव आहे; अश्रू ढाळणे, चिंता इत्यादी येथे अनुभाव (परिणाम) आहेत. တက္ကော ဝိတက္ကနံ. တဿ သန္ဒေဟော ဝိဘာဝေါ, သိရောကမ္ပာဒိ အနုဘာဝေါ. ‘तर्क’ म्हणजे विचार करणे. संशय हा त्याचा विभाव आहे, आणि डोके हलवणे इत्यादी अनुभाव आहेत. သင်္ကာယ ဝိရုဒ္ဓစရဏံ ဝိဘာဝေါ, ကမ္ပာဒယော အနုဘာဝေါ. ‘शंके’चा विभाव विरुद्ध वर्तन करणे हा आहे, आणि थरथरणे इत्यादी अनुभाव आहेत. သမော ခေဒေါ. တတ္ထ ဂတျာဒိ ဝိဘာဝေါ, သေဒါဒိ အနုဘာဝေါ. ‘श्रम’ म्हणजे थकवा. त्यामध्ये चालणे इत्यादी विभाव आहेत, आणि घाम येणे इत्यादी अनुभाव आहेत. ဓိတိ သန္တောသော. ဉာဏာဒိ ဝိဘာဝေါ, အနုဘာဝေါ ဘောဂါလောလတာဒိ. ‘धृती’ म्हणजे संतोष (समाधान). ज्ञान इत्यादी विभाव आहेत, आणि भोगांविषयी अनासक्ती इत्यादी अनुभाव आहेत. ဇဠတာ [Pg.328] အပ္ပဋိပတ္တိ. တဿာ ဣဋ္ဌာနိဋ္ဌဒဿနာဒိ ဝိဘာဝေါ, အနိမိသနယနာလောစနာဒိ အနုဘာဝေါ. ‘जडता’ म्हणजे अकार्यक्षमता (किंवा काही सुचू न देणे). इष्ट किंवा अनिष्ट गोष्टींचे दर्शन इत्यादी तिचा विभाव आहे, आणि पापणी न लववता एकटक पाहणे इत्यादी अनुभाव आहेत. ဒီနတာ စေတသော အနောဇတာ. တဿာ ဝိဘာဝေါ ဒုဂ္ဂတတာဒိ, အနုဘာဝေါ မလိနဝတ္ထတာဒိ. ‘दीनता’ म्हणजे मनाची दुर्बलता (उत्साहहीनता). दारिद्र्य इत्यादी तिचा विभाव आहे, आणि मळलेले कपडे घालणे इत्यादी अनुभाव आहेत. ဥဂ္ဂတာ ဒါရုဏတ္တံ. တဿာ ဝိဘာဝေါ ဗလဝါပရာဓာဒိ, တဿ အနုဘာဝေါ တဇ္ဇနာဒိ. ‘उग्रता’ म्हणजे क्रूरता (कठोरपणा). मोठा अपराध इत्यादी तिचा विभाव आहे, आणि धमकावणे इत्यादी तिचा अनुभाव आहे. အာလသတ္တဿ ပရိသမာဒိ ဝိဘာဝေါ, ဇိမှတာဒိ အနုဘာဝေါ. ‘आळसा’चा विभाव थकवा इत्यादी आहे, आणि आळस देणे (शरीर ताणणे) इत्यादी अनुभाव आहेत. သုတ္တဿ နိဒ္ဒါ ဝိဘာဝေါ, တဿာဒါဒယော အနုဘာဝေါ. ‘सुप्त’ (झोपणे) चा विभाव निद्रा आहे, आणि जांभई देणे इत्यादी अनुभाव आहेत. တာသော စိတ္တက္ခောဘော. ဝိဘာဝေါ အဿ ဂဇ္ဇိတာဒိ, ကမ္ပနာဒိ အနုဘာဝေါ. ‘त्रास’ म्हणजे मनाची खळबळ (भय). गर्जना इत्यादी त्याचा विभाव आहे, आणि थरथरणे इत्यादी अनुभाव आहेत. အာယာသပိပါသာဒိ ဝိဘာဝေါ ဂိလာနိယာ, ဝိဝဏ္ဏတာဒယော အနုဘာဝေါ. अतिश्रम, तहान इत्यादी ‘ग्लानी’चे विभाव आहेत, आणि चेहऱ्याचा रंग उडणे इत्यादी अनुभाव आहेत. ကာလက္ခမတာ ဥဿုကံ. ဝိဘာဝေါ တဿ ရမဏီယဒဿနိစ္ဆာဒိ, အနုဘာဝေါ တုရိတတာဒိ. ‘उत्सुकता’ म्हणजे वेळेची असहिष्णुता (घाई). रमणीय गोष्टी पाहण्याची इच्छा इत्यादी त्याचा विभाव आहे, आणि घाईगडबड करणे इत्यादी अनुभाव आहेत. စေတောပသာဒေါ ဟရိတော. တတြ ဥဿဝါဒိ ဝိဘာဝေါ, အဿုသေဒါဒယော အနုဘာဝေါ. ‘हर्ष’ म्हणजे मनाची प्रसन्नता. त्यामध्ये उत्सव इत्यादी विभाव आहेत, आणि अश्रू, घाम इत्यादी अनुभाव आहेत. သဒိသဒဿနာဒိ ဝိဘာဝေါ သတိယာ, အနုဘာဝေါ ဘမုသမုန္နမနာဒိ. सारख्या वस्तूचे दर्शन इत्यादी ‘स्मृती’चा विभाव आहे, आणि भुवया उंचावणे इत्यादी अनुभाव आहेत. ပရေသမုက္ကံသာသဟနတာ ဣဿာ. တဿာ ဒုဇ္ဇနတ္တဂဗ္ဗာဒယော ဝိဘာဝေါ, ဒေါသကထနာဝဇာနနာဒယော အနုဘာဝေါ. ‘ईर्ष्या’ म्हणजे इतरांचा उत्कर्ष सहन न होणे. दुर्जनता, गर्व इत्यादी तिचा विभाव आहे, आणि दोष सांगणे, अवहेलना करणे इत्यादी अनुभाव आहेत. ဝိသာဒေါ ခေဒေါ. ဝိဘာဝေါ တဿ အာရဒ္ဓကာရိယာသိဒ္ဓါဒိ, ဗာဓယတာပါဒိ အနုဘာဝေါ. ‘विषाद’ म्हणजे दुःख (खिन्नता). सुरू केलेले काम यशस्वी न होणे इत्यादी त्याचा विभाव आहे, आणि पीडा, संताप इत्यादी अनुभाव आहेत. အဗဟိတ္ထာ ကာယသံဝရဏံ. တဿာ ဝိဘာဝေါ လဇ္ဇာဒိ, အနုဘာဝေါ’ညဝိကြိယာ. ‘अवहित्था’ म्हणजे शरीराचे (भावांचे) गोपन करणे (लपवणे). लज्जा इत्यादी तिचा विभाव आहे, आणि अन्य प्रकारे हावभाव बदलणे हा अनुभाव आहे. စိန္တာ [Pg.329] ဣဋ္ဌာလာဘာဒီဟိ, အနုဘာဝေါ မုကုလိတနယနာဒိ. ‘चिंता’ ही इष्ट गोष्टी न मिळाल्यामुळे इत्यादी कारणांनी होते, आणि डोळे मिटणे इत्यादी अनुभाव आहेत. ဂဗ္ဗော အဘိမာနော. ဝိဘာဝေါဿ ဣဿရိယာဒိ, အနုဘာဝေါ အဝဇာနနာဒိ. ‘गर्व’ म्हणजे अभिमान. ऐश्वर्य इत्यादी त्याचा विभाव आहे, आणि दुसऱ्याची अवहेलना करणे इत्यादी अनुभाव आहेत. အပမာရော ဂါဟရုက္ခာဒီဟိ, ဘူပါတာဒယော ဧတ္ထ အနုဘာဝေါ. ‘अपस्मार’ (फेफरे) हा ग्रहबाधा, झाडावरून पडणे इत्यादींमुळे होतो, आणि जमिनीवर पडणे इत्यादी येथे अनुभाव आहेत. အမရိသော အက္ခမတာ. ဝိဘာဝေါ အဿာဝမာနနာဒိ, သိရောကမ္ပနတဇ္ဇနာဒယော အနုဘာဝေါ. ‘अमर्ष’ म्हणजे असहिष्णुता (राग). अपमान इत्यादी त्याचा विभाव आहे, आणि डोके हलवणे, धमकावणे इत्यादी अनुभाव आहेत. မဒေါ ပမာဒုက္ကံသော. တဿ ဝိဘာဝေါ ပါနံ, စလမာနင်္ဂဝစောဂတိဟာသာဒယော အနုဘာဝေါ. ‘मद’ म्हणजे मद्यपानामुळे आलेली धुंदी. मद्यपान हा त्याचा विभाव आहे, आणि लटपटणारे अवयव, अडखळणारे बोलणे, चालणे, हसणे इत्यादी अनुभाव आहेत. မတိ ကင်္ခစ္ဆေဒေါ. ဥပဒေသာဒိ ဝိဘာဝေါ, မုခဝိကာသာဒိ ဧတ္ထ အနုဘာဝေါ. ‘मती’ म्हणजे संशयाचे निरसन होणे. उपदेश इत्यादी विभाव आहेत, आणि चेहऱ्यावर आनंद पसरणे इत्यादी येथे अनुभाव आहेत. အသမေက္ခိတကာရိတာ ဥမ္မာဒေါ. တဿ ဝိဘာဝေါ သန္နိပါတဂဟဏာဒိ, အဋ္ဌာနရုဒိတဂီတဟာသာဒယော အနုဘာဝေါ. ‘उन्माद’ म्हणजे विचार न करता वागणे (वेडेपणा). सन्निपात (ज्वर), ग्रहबाधा इत्यादी त्याचा विभाव आहे, आणि अवेळी रडणे, गाणे, हसणे इत्यादी अनुभाव आहेत. မောဟော ဘယာဒီဟိ, အနုဘာဝေါ ထမ္ဘကမ္ပာဒိ. ‘मोह’ हा भय इत्यादींमुळे होतो, आणि स्तब्ध होणे, थरथरणे इत्यादी अनुभाव आहेत. ဒုရာစာရာဒီဟိ ဗိဠံ, အဓောမုခတာဒိ အနုဘာဝေါ. ‘व्रीडा’ (लाज) ही दुराचार इत्यादींमुळे उत्पन्न होते, आणि मान खाली घालणे इत्यादी अनुभाव आहेत. မရဏံ ဝိဘာဝအနုဘာဝေဟိ သုပသိဒ္ဓံ. ‘मरण’ हे विभाव आणि अनुभावांद्वारे सुप्रसिद्धच आहे. စပလတာ ရာဂဒေါသာဒီဟိ, သစ္ဆန္ဒစရဏာဒိ အနုဘာဝေါ. ဗျာဓိ ပါကဋော. ‘चपळता’ ही राग, द्वेष इत्यादींमुळे होते, आणि स्वैर वर्तन करणे इत्यादी अनुभाव आहेत. ‘व्याधी’ (आजार) हा स्पष्टच आहे. ယေ ဝါ ပနညေ ဣဓ နိဒ္ဒိဋ္ဌာ စိတ္တဝုတ္တိဝိသေသာပိ သံဝိဇ္ဇန္တိ သုခုမဘေဒါ, တေသု ကေစိ ဝုတ္တေသွန္တောဂဓာ ဟောန္တိ. ယထာ ဟိ ဣစ္ဆာသဘာဝါ သဗ္ဗေ ကာမာ ရတိယံ အန္တောဂဓာ, တထာ ဒေါသပ္ပကာရာ ကောဓာ မရိသဣဿာဒီသွန္တောဂဓာ, ဒုက္ခသဘာဝါ သောကသမဗျာဓိဂိလာနိ ဝိသာဒါဒီသွန္တောဂဓာ. ပီတျာဒယော သုခသဘာဝါ ဟရိသေတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. တေသု [Pg.330] ဘယာ တာသော အညော, သင်္ကာ တထာ အမရိသော. တသ္မာ ဣဿာ, တထာ ဂိလာနိတော သမော, နိဒ္ဒါယ သုတ္တံ, ဥဿုကာ စပလတာ, တထာ မောဟာ ပလယော ဝက္ခမာနော အညောတိ မန္တဗ္ဗံ. किंवा येथे जे इतर सूक्ष्म भेद असलेले चित्तवृत्तींचे विशेष सांगितले आहेत, त्यातील काही वर सांगितलेल्यांमध्येच अंतर्भूत होतात. ज्याप्रमाणे इच्छास्वभाव असलेले सर्व काम (वासना) रतीमध्ये अंतर्भूत होतात, त्याचप्रमाणे द्वेषयुक्त असलेले क्रोध हे अमर्ष, ईर्ष्या इत्यादींमध्ये अंतर्भूत होतात; दुःखस्वभाव असलेले शोक, श्रम, व्याधी, ग्लानी, विषाद इत्यादींमध्ये अंतर्भूत होतात. प्रीती इत्यादी सुखस्वभाव हे हर्षामध्ये अंतर्भूत होतात, असे समजावे. त्यामध्ये भयापेक्षा ‘त्रास’ वेगळा आहे, शंकेपेक्षा ‘अमर्ष’ वेगळा आहे. म्हणून ईर्ष्या, तसेच ग्लानीपेक्षा ‘श्रम’, निद्रेपेक्षा ‘सुप्त’, उत्सुकतेपेक्षा ‘चपळता’, तसेच मोहापेक्षा पुढे सांगितला जाणारा ‘प्रलय’ हा वेगळा आहे, असे मानले पाहिजे. ၃၄၄. ဣဒါနိ တေ ဗျဘိစာရီဘာဝေ သရူပေန ဒဿေတိ ‘‘နိဗ္ဗေဒေါ’’ဣစ္စာဒိနာ. နိဗ္ဗေဒေါ အတ္တနိန္ဒာသင်္ခတော စ, တက္ကသင်္ကာ စ, သမဓိတိဇဠတာ ပရိသမော သန္တောသလက္ခဏာ ဓိတိ ဇဠတာ စ, ဒီနတုဂ္ဂါလသတ္တံ ဒီနဘာဝဒါရုဏဘာဝအလသဘာဝါ စ, သုတ္တံ သယနဉ္စ, တာသော စိတ္တက္ခောဘော စ, ဂိလာနပရိမဒ္ဒိတဘာဝေါ စ, ဥဿုကဟရိသသတိဿာဝိသာဒါဗဟိတ္ထာ ဥဿာဟပိတိသတိဣဿာခေဒအာကာရသံဝရာ စ, စိန္တာ စ, ဂဗ္ဗော အဘိမာနော စ, အပမာရော စ, အမရိသမဒမတုမ္မာဒမောဟာ အက္ခန္တိပမာဒါဓိက္ကာ ကင်္ခစ္ဆေဒဥမ္မာဒမောဟာ စ, ဝိဗောဓော ပဗောဓော စ, နိဒ္ဒါဝေဂါ နိဒ္ဒါ စ, အာဝေဂသင်္ခါတော သမ္ဘမော စ, သဗိဠံ လဇ္ဇာသဟိတံ မရဏသစပလာဗျာဓိ မရဏဉ္စ စာပလျသဟိတာ ဗျာဓိ စေတိ. ဧတေ တေတ္တိံသ ဗျဘိစာရီဘာဝါ နာမ ဟောန္တိ. တက္ကော စ သင်္ကာ စေတိ စ, သမော စ ဓိတိ စ ဇဠတာ စေတိ စ, ဒီနတာ စ ဥဂ္ဂေါ စ အလသတ္တဉ္စာတိ စ, ဥဿုကဉ္စဟရိသော စ သတိ စ ဣဿာ စ ဝိသာဒေါ စ အဗဟိတ္ထာ စေတိ စ, အမရိသော စ မဒေါ စ မတိ စ ဥမ္မာဒေါ စ မောဟော စေတိ စ, နိဒ္ဒါ စ အာဝေဂေါ စေတိ စ, သဟ ဗိဠာယ ဝတ္တတီတိ စ, သဟ စပလေန စာပလျေန ဝတ္တတီတိ စ, သစပလော စ သော ဗျာဓိစေတိ စ, မရဏဉ္စ သစပလဗျာဓိ စေတိ စ ဝါကျံ. မရဏသစပလာဗျာဓီတိ သမာဟာရဒွန္ဒော. တသ္မာ ‘‘သဗိဠ’’န္တိ ပဒံ ဧတဿ ဝိသေသနံ ဟောတိ. ३४४. आता ते व्यभिचारी भाव स्वतःच्या रूपाने ‘निर्वेद’ इत्यादींद्वारे दाखवितात. निर्वेद म्हणजे आत्मनिंदा; तर्क आणि शंका; श्रम, धृती आणि जडता म्हणजे थकवा, संतोषरूप धृती आणि जडता; दीनता, उग्रता आणि आळस म्हणजे दीनभाव, क्रूरभाव आणि आळस; सुप्त म्हणजे झोपणे; त्रास म्हणजे मनाची खळबळ; ग्लानी म्हणजे थकलेला भाव; उत्सुकता, हर्ष, स्मृती, ईर्ष्या, विषाद आणि अवहित्था म्हणजे उत्साह, प्रीती, स्मृती, ईर्ष्या, खिन्नता आणि आकाराचे गोपन (भाव लपवणे); चिंता; गर्व म्हणजे अभिमान; अपस्मार; अमर्ष, मद, मती, उन्माद आणि मोह म्हणजे असहिष्णुता, प्रमदाची अधिकता, संशयाचे निरसन, उन्माद आणि मोह; विबोध म्हणजे जागृती; निद्रा आणि आवेग म्हणजे निद्रा आणि आवेगरूप संभ्रम; सबीळ म्हणजे लाजेसह असणारा; मरण, चपळता आणि व्याधी म्हणजे मरण आणि चपळतेसह असणारी व्याधी. हे तेहतीस व्यभिचारी भाव आहेत. तर्क आणि शंका; श्रम, धृती आणि जडता; दीनता, उग्रता आणि आळस; उत्सुकता, हर्ष, स्मृती, ईर्ष्या, विषाद आणि अवहित्था; अमर्ष, मद, मती, उन्माद आणि मोह; निद्रा आणि आवेग; लाजेसह असणारा; चपळतेसह असणारा; चपळ आणि व्याधी; मरण आणि चपळतेसह असणारी व्याधी, असे हे वाक्य आहे. ‘मरणसचपळव्याधी’ हा समाहार द्वंद्व समास आहे. म्हणून ‘सबीळ’ हे पद याचे विशेषण आहे. လောကသဘာဝဿ အနေကဝိဓတ္တာ ဧကောယေဝ ဝီရရသော ဥဿာဟဝတာ ဝီရရသာကာရေန အဿာဒနီယော ဟောတိ, သောယေဝ ဘီရုနာ ဘယာကာရေန အဿာဒနီယော ဟောတိ. [Pg.331] တသ္မာ ဧကေကဿ ရသဿ ဣမေ ဗဟူ ဗျဘိစာရိနော ဝဏ္ဏေတဗ္ဗာ ဟောန္တိ. ဧဝံ သတိ အနေကာဓိပ္ပာယကော လောကော တေသု ကိဉ္စိ အဿာဒေတိ. ဧဝံ သတိ ဗန္ဓော သဗ္ဗဇနဿ ကန္တော ဟောတိ. တဿံ ဘာဝဝဏ္ဏနာယံ ယသ္မာ မာရေတုမာဂစ္ဆန္တာနံ သတ္တူနံ ဒဿနမေကမေဝ တင်္ခဏေ ဇနာဓိပ္ပာယတော ဘိဇ္ဇိတွာ ပကတိဘီရူနံ ပုရိသာနံ ဘယဿ စ ယုဒ္ဓလောလဿ ဥဿာဟနဿ စ ကာရဏံ ဟောတိ. ဧဝံ နဋေန ဟသနတ္ထံ ကတဝိကတမာဘရဏဉ္စ တာဒိသကိရိယာ စ ဥတ္တာနပကတိကာနံ ပုရိသာနံ ဌာယီဟာသဿ စ ဂမ္ဘီရပကတိကာနံ ဗျဘိစာရီဟာသဿ စ ဟေတု ဘဝေယျ. တသ္မာ ဘာဝေ ဝဏ္ဏေန္တေန ကဝိနာ ဩစိတျဘင်္ဂမကတွာ သက္ကစ္စမောစိတျံ သဇ္ဇေတွာ ဘာဝပ္ပကာသကာနိ သဝိဘာဝါနုဘာဝကဝိဝစနာနိ ဝဏ္ဏေတဗ္ဗာနိ. ဧတ္ထ ဘာဝါဝဗောဓကဝိဘာဝါဒီနံ ဇာနိတဗ္ဗတ္တာ တေဟိ တေဟိ ဘာဝေဟိ သဒ္ဓိံ ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗာ. जगाचा स्वभाव अनेकविध असल्यामुळे, एकच वीर रस उत्साही व्यक्तीद्वारे वीर रसाच्या रूपाने आस्वाद घेण्याजोगा असतो, तर तोच भित्र्या व्यक्तीद्वारे भयाने आस्वाद घेण्याजोगा असतो. म्हणून प्रत्येक रसाचे हे अनेक व्यभिचारी भाव वर्णन करण्यायोग्य असतात. असे असताना, अनेक प्रकारच्या मतांचे लोग त्यातील कशाचा ना कशाचा आस्वाद घेतात. असे असताना, ही रचना सर्व लोकांसाठी प्रिय ठरते. त्या भावांच्या वर्णनामध्ये, कारण मारण्यासाठी येणाऱ्या शत्रूंचे दर्शन हे एकाच वेळी लोकांच्या अभिप्रायानुसार बदलून, स्वभावतः भित्र्या माणसांच्या भयाचे आणि युद्धाची आवड असणाऱ्यांच्या उत्साहाचे कारण ठरते. तसेच नटाने हसण्यासाठी परिधान केलेले विकृत दागिने आणि तशीच क्रिया ही उथळ स्वभावाच्या लोकांच्या स्थायी हास्याचे आणि गंभीर स्वभावाच्या लोकांच्या व्यभिचारी हास्याचे कारण ठरू शकते. म्हणून भावांचे वर्णन करणाऱ्या कवीने औचित्याचा भंग न करता, काळजीपूर्वक औचित्य साधून, भाव प्रकट करणारी आणि विभाव-अनुभावांसह असणारी कवीची वचने वर्णिली पाहिजेत. येथे भावांचे आकलन करून देणारे विभाव इत्यादी जाणून घेणे आवश्यक असल्यामुळे, त्या त्या भावांसह ते खालीलप्रमाणे समजून घ्यावेत. တေသု ဘာဝေသု အတ္တာဝမာနနလက္ခဏော နိဗ္ဗေဒေါ. ဣတ္ထီနံ, ဟီနာနံ ဝါ ဥပ္ပဇ္ဇတိ စေ, ဒါလိဒ္ဒိယံ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝေါ နာမ, ယောဂီနံ စေ, တထာဝဗောဓော အာလမ္ဗဏဝိဘာဝေါ, ဧတ္ထ အဿုပတနစိန္တာဒိကံ အနုဘာဝေါ နာမ. त्या भावांमध्ये स्वतःचा अवमान करण्याचे लक्षण असलेला तो ‘निर्वेद’ होय. जर तो स्त्रियांमध्ये किंवा कनिष्ठांमध्ये उत्पन्न झाला, तर दारिद्र्य हा ‘आलंबन विभाव’ होय; जर तो योगी पुरुषांमध्ये उत्पन्न झाला, तर तत्त्वज्ञान (सत्याची जाणीव) हा ‘आलंबन विभाव’ होय; येथे अश्रू ढाळणे, चिंता इत्यादी ‘अनुभाव’ आहेत. ဝိတက္ကဿ သန္ဒေဟော ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝေါ နာမ, သိရောကမ္ပာဒိကံ အနုဘာဝေါ နာမ. वितर्काचा (विचाराचा) संशय हा ‘उद्दीपन विभाव’ होय, आणि डोके हलवणे इत्यादी ‘अनुभाव’ होय. သင်္ကာယ ဝိရုဒ္ဓပ္ပဝတ္တိ ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝေါ, ကမ္ပာဒိကော အနုဘာဝေါ. ဥပရိ ‘‘ဝိဘာဝေါ’’တိ ဝုတ္တေ အာလမ္ဗဏုဒ္ဒီပနေသု ဒွီသု ယံ ယုဇ္ဇတိ, တံ ဂဟေတဗ္ဗံ. शंकेचा (सङ्का) विरुद्ध प्रवृत्ती हा उद्दीपन-विभाव आहे, आणि थरथरणे इत्यादी अनुभाव आहे. पुढे 'विभाव' असे म्हटले असता आलंबन आणि उद्दीपन या दोन्हीपैकी जे योग्य असेल, ते ग्रहण करावे. ခေဒလက္ခဏဿ သမဿ ဂမနာဒိကံ ဝိဘာဝေါ, သေဒါဒိ အနုဘာဝေါ. खिन्नता हे लक्षण असलेल्या श्रमाचा (सम) चालणे इत्यादी विभाव आहे, आणि घाम येणे इत्यादी अनुभाव आहे. သန္တောသလက္ခဏာယ ဓိတိယာ ဉာဏာဒိ ဝိဘာဝေါ, ဘောဂေသု အလောလဘာဝါဒိ အနုဘာဝေါ. संतोष हे लक्षण असलेल्या धैर्याचा (धृति) ज्ञान इत्यादी विभाव आहे, आणि भोगांमध्ये अलोलुपता इत्यादी अनुभाव आहे. အယောဂ္ဂတာလက္ခဏာယ [Pg.332] ဇဠတာယ ဣဋ္ဌာနိဋ္ဌာနံ အဇာနနာဒိ ဝိဘာဝေါ, ဝိဝဋနယနေဟိ အဘိမုခဝိလောကနတာဒိ အနုဘာဝေါ. अयोग्यता हे लक्षण असलेल्या जडतेचा (जळता) इष्ट आणि अनिष्ट न जाणणे इत्यादी विभाव आहे, आणि उघड्या डोळ्यांनी समोर पाहणे इत्यादी अनुभाव आहे. စိတ္တဿနိတ္တေဇလက္ခဏာယ ဒီနတာယ ဒုဂ္ဂတတာဒိ ဝိဘာဝေါ, မလိနဝတ္ထတာဒိ အနုဘာဝေါ. चित्ताचे निस्तेजपण हे लक्षण असलेल्या दीनतेचा (दीनता) दारिद्र्य इत्यादी विभाव आहे, आणि मळलेले वस्त्र परिधान करणे इत्यादी अनुभाव आहे. ဒါရုဏတာလက္ခဏဿ ဥဂ္ဂဘာဝဿာတိသယာပရာဓာဒိ ဝိဘာဝေါ, တဇ္ဇနာဒိ အနုဘာဝေါ. दारुणता हे लक्षण असलेल्या उग्रभावाचा (उग्गभाव) अतिशय मोठा अपराध इत्यादी विभाव आहे, आणि धमकावणे इत्यादी अनुभाव आहे. အလသတ္တဿ အဋ္ဌာနပရိသမာဒိ ဝိဘာဝေါ, ဝင်္ကိကဘာဝေါ အနုဘာဝေါ. आळशीपणाचा (अलसत्त) न उठणे, थकवा इत्यादी विभाव आहे, आणि शरीर वाकवणे हा अनुभाव आहे. သယနသင်္ခါတဿ သုတ္တဿ နိဒ္ဒါဒိ ဝိဘာဝေါ, အဿာဒါဒိ အနုဘာဝေါ. ဧတ္ထ အဿာဒနံ နာမ သေယျသုခပဿသုခါဒိကံ. शयन म्हटल्या गेलेल्या सुप्ततेचा (सुत्त) निद्रा इत्यादी विभाव आहे, आणि आस्वादन इत्यादी अनुभाव आहे. येथे आस्वादन म्हणजे शय्यासुख, कुशीवर वळण्याचे सुख इत्यादी होय. စိတ္တက္ခောဘသင်္ခါတဿ တာသဿ ဂဇ္ဇိတာဒိ ဝိဘာဝေါ, ဂဇ္ဇိတံ နာမ ဘယဇနကဝစနံ. ကောပေန ကမ္ပနာ အနုဘာဝေါ. चित्तक्षोभ म्हटल्या गेलेल्या त्रासाचा (तास) गर्जना इत्यादी विभाव आहे; गर्जना म्हणजे भय निर्माण करणारे वचन होय. क्रोधाने थरथरणे हा अनुभाव आहे. ပီဠာသင်္ခါတဿ ဂိလာနဿ အာယာသပိပါသာဒိ ဝိဘာဝေါ, ဒုဗ္ဗဏ္ဏတာဒိ အနုဘာဝေါ. पीडा म्हटल्या गेलेल्या आजारपणाचा (गिलाण) थकवा, तहान इत्यादी विभाव आहे, आणि विवर्णता इत्यादी अनुभाव आहे. အနုရူပကာလဿ အနောလောကနဿ ဥဿုက္ကဿ ရမ္မဝတ္ထုဒဿနိစ္ဆာဒိ ဝိဘာဝေါ, တုရိတတာဒိ အနုဘာဝေါ. योग्य काळाकडे न पाहणे हे स्वरूप असलेल्या उत्सुकतेचा (उस्सुक्क) रमणीय वस्तू पाहण्याची इच्छा इत्यादी विभाव आहे, आणि घाईगडबड इत्यादी अनुभाव आहे. စေတောပသာဒလက္ခဏဿ ဟရိသဿ မင်္ဂလကီဠာဒိ ဝိဘာဝေါ, သန္တောသဝစနာဒိ အနုဘာဝေါ. चित्तप्रसन्नता हे लक्षण असलेल्या हर्षाचा (हरिस) मंगल क्रीडा इत्यादी विभाव आहे, आणि संतोषाचे शब्द इत्यादी अनुभाव आहे. သရဏလက္ခဏာယ သတိယာ သညာဏဒဿနာဒိ ဝိဘာဝေါ, ဘမုက္ခေပါဒိ အနုဘာဝေါ. स्मरण हे लक्षण असलेल्या स्मृतीचा (सति) चिन्हांचे दर्शन इत्यादी विभाव आहे, आणि भुवया उंचावणे इत्यादी अनुभाव आहे. ပရသမ္ပတ္တိအသဟနလက္ခဏာယ ဣဿာယ ဒုဇ္ဇနဘာဝဂဗ္ဗာဒိ ဝိဘာဝေါ, ဒေါသကထနာဝဇာနနာဒိ အနုဘဝေါ. दुसऱ्याच्या संपत्तीबद्दल असहनशीलता हे लक्षण असलेल्या ईर्षेचा (इस्सा) दुर्जनपणा, गर्व इत्यादी विभाव आहे, आणि दोष सांगणे, अवहेलना करणे इत्यादी अनुभाव आहे. ခေဒလက္ခဏဿ ဝိသာဒဿ အာရဒ္ဓကာရိယာသိဒ္ဓိကာရိယဗျာပတ္တိအာဒိ ဝိဘာဝေါ, မနောသန္တာပါဒိ အနုဘာဝေါ. खिन्नता हे लक्षण असलेल्या विषादाचा (विसाद) सुरू केलेले कार्य सिद्ध न होणे, कार्यातील अपयश इत्यादी विभाव आहे, आणि मनस्ताप इत्यादी अनुभाव आहे. အာကာရသံဝရဏလက္ခဏာယ, [Pg.333] ရသသဘာဝပဋိစ္ဆာဒနလက္ခဏာယ ဝါ အဗဟိတ္ထယလဇ္ဇာဒိ ဝိဘာဝေါ, တဒညကြိယာကရဏံ, အဓောမုခကရဏံ, ပါဒေဟိ ဘူမိခဏနန္တိအာဒိ အနုဘာဝေါ. आकार लपवणे किंवा रसाचा स्वभाव झाकणे हे लक्षण असलेल्या अवहित्थेचा (अवहिट्ठ) लज्जा इत्यादी विभाव आहे, आणि त्याहून भिन्न क्रिया करणे, तोंड खाली करणे, पायांनी जमीन खाजवणे इत्यादी अनुभाव आहे. စိန္တာယ ဣဋ္ဌတ္ထာလာဘာဒီ ဝိဘာဝေါ, မကုလိတနယနာဒိ အဓောခိတ္တစက္ခာဒိ ဝါ အနုဘာဝေါ. चिंतेचा (चिन्ता) इष्ट वस्तूचा लाभ न होणे इत्यादी विभाव आहे, आणि अर्धोन्मीलित डोळे किंवा खाली झुकलेले डोळे इत्यादी अनुभाव आहे. ဂဗ္ဗဿ ဣဿရိယာဒိ ဝိဘာဝေါ, အဝဇာနနာဒိ အနုဘာဝေါ. गर्वाचा (गब्ब) ऐश्वर्य इत्यादी विभाव आहे, आणि अवहेलना करणे इत्यादी अनुभाव आहे. အပမာရဿ ယက္ခပီဠာဒိ ဝိဘာဝေါ, ဘူမိပတနာဒယော အနုဘာဝေါ. अपस्माराचा (अपमार) यक्षाची पीडा इत्यादी विभाव आहे, आणि जमिनीवर पडणे इत्यादी अनुभाव आहे. အက္ခမလက္ခဏဿ အမရိသဿ အဝမာနနာဒိ ဝိဘာဝေါ, သိရောကမ္ပနတဇ္ဇနာဒိ အနုဘာဝေါ. अक्षमता हे लक्षण असलेल्या अमर्षाचा (अमरिस) अवमान इत्यादी विभाव आहे, आणि डोके हलवणे, धमकावणे इत्यादी अनुभाव आहे. ပမာဒါဓိက္ကလက္ခဏဿ မဒဿ သန္တောသပါနံ ဝိဘာဝေါ, ကမ္ပမာနဟတ္ထပါဒဝစနဂမနဟာသာဒီ အနုဘာဝေါ. प्रमादाचा अतिरेक हे लक्षण असलेल्या मदाचा (मद) आनंदाने मद्यपान करणे इत्यादी विभाव आहे, आणि हात-पाय थरथरणे, बोलणे, चालणे, हसणे इत्यादी अनुभाव आहे. ကင်္ခါစ္ဆေဒနလက္ခဏာယ မတိယာ ဥပဒေသာဒိ ဝိဘာဝေါ, မုခသန္တောသာဒိ အနုဘာဝေါ. शंकेचे निरसन करणे हे लक्षण असलेल्या मतीचा (मति) उपदेश इत्यादी विभाव आहे, आणि चेहऱ्यावरील प्रसन्नता इत्यादी अनुभाव आहे. အနုပပရိက္ခကာရိတာလက္ခဏဿ ဥမ္မာဒဿ သန္နိပါတဇ္ဇရယက္ခာဒိ ဝိဘာဝေါ, အကာရဏရောဒနဟသနာဒိ အနုဘာဝေါ. विचार न करता कार्य करणे हे लक्षण असलेल्या उन्मादाचा (उन्माद) सन्निपात ज्वर, यक्ष इत्यादी विभाव आहे, आणि विनाकारण रडणे, हसणे इत्यादी अनुभाव आहे. မုယှနလက္ခဏဿ မောဟဿ အဓိကဘယာဒိ ဝိဘာဝေါ, သဘာဝါနဝဗောဓနာဒိ အနုဘာဝေါ. भ्रमित होणे हे लक्षण असलेल्या मोहाचा (मोह) अतिशय भय इत्यादी विभाव आहे, आणि वस्तूचा खरा स्वभाव न समजणे इत्यादी अनुभाव आहे. နိဒ္ဒါပဂမသင်္ခါတဿ ဝိဗောဓဿ ကာလပရိဏာမာဒိ အာလောကသရဏာဒိ ဝါ ဝိဘာဝေါ, အက္ခိမဒ္ဒနာဒိ အနုဘာဝေါ. निद्रेचा नाश म्हटल्या गेलेल्या विबोधाचा (विबोध) काळाचा परिणाम इत्यादी किंवा प्रकाशाचे स्मरण इत्यादी विभाव आहे, आणि डोळे चोळणे इत्यादी अनुभाव आहे. မနောသမ္ပီဠနလက္ခဏာယ နိဒ္ဒါယ ကဿစိ အစိန္တနအကရဏာဒိ ဝိဘာဝေါ, အက္ခိပိဒဟနာဒိ အနုဘာဝေါ. मनाचा थकवा हे लक्षण असलेल्या निद्रेचा (निद्दा) कशाचाही विचार न करणे, काहीही न करणे इत्यादी विभाव आहे, आणि डोळे मिटणे इत्यादी अनुभाव आहे. ဘယာဂမနလက္ခဏဿ အာဝေဂဿ ပစ္စတ္ထိကဒဿနာဒိ ဝိဘာဝေါ, ဥတြာသကမ္ပာဒိ အနုဘာဝေါ. भयाचे आगमन हे लक्षण असलेल्या आवेगाचा (आवेग) शत्रूचे दर्शन इत्यादी विभाव आहे, आणि भीती, थरथरणे इत्यादी अनुभाव आहे. လဇ္ဇာလက္ခဏာယ [Pg.334] ဗိဠာယ ဒုရာစာရာဒိ ဝိဘာဝေါ, အဓောမုခတာဒိ အနုဘာဝေါ. लज्जा हे लक्षण असलेल्या व्रीडेचा (विळा) दुराचार इत्यादी विभाव आहे, आणि तोंड खाली करणे इत्यादी अनुभाव आहे. မရဏဿ သတ္ထပဟာရရောဂါဒိ ဝိဘာဝေါ, မုခဝိကာရာဒိ အနုဘာဝေါ. मरणाचा (मरण) शस्त्राचा प्रहार, रोग इत्यादी विभाव आहे, आणि चेहऱ्याचा विकार इत्यादी अनुभाव आहे. စာပလ္လဿ ရာဂဒေါသာဒိ ဝိဘာဝေါ, အတ္တနော သစ္ဆန္ဒစရဏာဒိ အနုဘာဝေါ. चापल्याचा (चापल्ल) राग, द्वेष इत्यादी विभाव आहे, आणि स्वतःच्या इच्छेनुसार वागणे इत्यादी अनुभाव आहे. ဗျာဓိယာ ဝါတပိတ္တာဒီနံ ဥဿဒဘာဝါဒိ ဝိဘာဝေါ, နိတ္ထုနနာဒိ အနုဘာဝေါ. व्याधीचा (व्याधि) वात, पित्त इत्यादींचा उद्रेक इत्यादी विभाव आहे, आणि कण्हणे इत्यादी अनुभाव आहे. ဣမသ္မိံ သုဗောဓာလင်္ကာရေ အဒဿိတသုခုမဘေဒါ အညာပိ စိတ္တဝုတ္တိဝိသေသာ သန္တိ, တေသု ဣစ္ဆာသဘာဝါ သဗ္ဗေ ဘေဒါ ကာမရတိယဉ္စ, ဒေါသပကာရာ ကောဓအမရိသဣဿာဒီသု စ, ဒုက္ခသဘာဝါ သောကသမဗျာဓိဂိလာနဝိသာဒါဒီသု စ, ပိတိအာဒယော ဟရိသေ စ အန္တောဂဓာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဧဝံ သမာနာနံ သင်္ဂဟေ သတိပိ တာသတော ဘယဿ စ, သင်္ကာယ အမရိဿ စ, အမရိသတော ဣဿာယ စ, ဂိလာနတော သမဿ စ, နိဒ္ဒါယ သုတ္တဿ စ, ဥဿုက္ကတော စပလတာယ စ, မောဟတော ဝက္ခမာနပလယဿ စ ပါကဋဝိသေသေန အညထာ ဝိသုံ ဝိသုံ ဒဿိတန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. या सुबोधालंकारामध्ये न दाखवलेले सूक्ष्म भेद असलेले इतरही चित्तवृत्तींचे विशेष आहेत. त्यापैकी इच्छास्वभाव असलेले सर्व भेद कामरतीमध्ये, द्वेषाचे प्रकार क्रोध, अमर्ष आणि ईर्ष्या इत्यादींमध्ये, दुःखस्वभाव असलेले शोक, श्रम, व्याधी, ग्लानी, विषाद इत्यादींमध्ये, आणि प्रीती इत्यादी हर्षात अंतर्भूत आहेत असे जाणावे. अशा प्रकारे समान असलेल्यांचा संग्रह केला असला तरी, त्रासापासून भयाचा, शंकेपासून अमर्षाचा, अमर्षापासून ईर्षेचा, ग्लानीपासून श्रमाचा, निद्रेपासून सुप्ततेचा, उत्सुकतेपासून चंचलतेचा, आणि मोहापासून पुढे सांगण्यात येणाऱ्या प्रलयाचा स्पष्ट फरकामुळे वेगळा वेगळा निर्देश केला आहे असे समजावे. သာတ္တိကဘာဝအဓိပ္ပာယ सात्त्विकभावाचा अभिप्राय ၃၄၅. ३४५. သမာဟိတတ္တပ္ပဘဝံ, သတ္တံ တေနော’ပပါဒိတာ; သာတ္တိကာ’ပျ’နုဘာဝတ္တေ, ဝိသုံ ဘာဝါဘဝန္တိ တေ. समाहित (एकाग्र) चित्तापासून उत्पन्न होणारे सत्त्व आहे; त्या सत्त्वापासून उत्पन्न झालेले सात्त्विक भाव आहेत. ते अनुभाव असूनही स्वतंत्र भाव मानले जातात. ၃၄၅. သာတ္တိကေ ဝဒတိ ‘‘သမာဟိတေ’’စ္စာဒိနာ. သမာဟိတော ဧကဂ္ဂတာဘာဝါပါဒနေန ကတသမာဓာနော အတ္တာ စိတ္တံ တတော ပဘဝံ ဥပ္ပန္နံ ယံ, တံ သတ္တံ နာမ. တေန သတ္တေန ဥပပါဒိတာ နိဗ္ဗတ္တိတာ ထမ္ဘာဒယော သာတ္တိကာ ဝုစ္စန္တေ. တေ စ ပုန အနုဘာဝါပိ ဘဝန္တိ ထမ္ဘာဒိဘာဝသံသူစနသဘာဝဝိကာရရူပတ္တာ. တဉ္စ ‘‘စိတ္တဝုတ္တိဝိသေသတ္တာ’’ဣစ္စာဒိနာ ဝက္ခတိ. [Pg.335] တေနာဟ ‘‘အနုဘာဝတ္တေပီ’’တိ. ဧဝံ သတျပိ တေ သာတ္တိကာ ဝိသုံ ပုထဂေဝ ဘာဝါ ဘဝန္တိ, ဝုတ္တနယေန စိတ္တဘဝတ္တဝိရူပတ္တာ တေသန္တိ. ३४५. 'समाहित' इत्यादींद्वारे सात्त्विक भावांचे वर्णन करतात. 'समाहित' म्हणजे एकाग्रतेमुळे समाधी प्राप्त झालेले चित्त (अत्ता), त्यापासून जे उत्पन्न होते त्याला 'सत्त्व' म्हणतात. त्या सत्त्वापासून उत्पन्न झालेले स्तंभ इत्यादी भाव 'सात्त्विक' म्हटले जातात. आणि ते स्तंभ इत्यादी भावांचे सूचक असलेल्या शारीरिक विकारांच्या रूपाने पुन्हा अनुभावही होतात. हेच पुढे 'चित्तवृत्तींचे विशेष असल्यामुळे' इत्यादींद्वारे सांगितले जाईल. म्हणूनच 'अनुभाव असूनही' असे म्हटले आहे. असे असले तरी, हे सात्त्विक भाव स्वतंत्रपणे वेगळे भाव आहेत, कारण सांगितलेल्या पद्धतीने ते चित्ताच्या अवस्थांचे विकार आहेत. ၃၄၅. ဣဒါနိ ဥဒ္ဒေသက္ကမေနာဓိဂတကေဝလဘာဝသင်္ခါတံ သာတ္တိကာဘာဝံ ဒဿေတိ ‘‘သမာဟိတ’’ဣစ္စာဒိနာ. သမာဟိတတ္တပ္ပဘဝံ ဧကဂ္ဂတာဘာဝါပါဒနေန ကတသမာဓာနစိတ္တတော သမ္ဘူတံ သတ္တံ နာမ ဟောတိ. တေန လာဘာလာဘာဒီသု ဧကာကာရဿ ဟေတုနာ ထိရဘာဝေန ဥပပါဒိတာ နိပ္ဖာဒိတာ ထမ္ဘာဒယော သာတ္တိကာ နာမ ဘဝန္တိ. တေ သာတ္တိကာ အနုဘာဝတ္တေပိ စိတ္တာကာရသင်္ခါတထမ္ဘာဒိပကာသနသဘာဝဝိကာရသရူပတ္တာ အတ္တနော အနုဘာဝတ္တေ သတိပိ ဝိသုံ ဘာဝါ ဘဝန္တိ ယထာဝုတ္တ ‘‘စိတ္တဝုတ္တိဝိသေသာ တု, ဘာဝယန္တိ ရသေ ယတော’’တိအာဒိနာ ဘာဝါ နာမ ဟောန္တီတိ. ဣမေ သာတ္တိကာဘာဝါနုဘာဝဝသေန ဒုဝိဓာ ဟောန္တိ. သမာဟိတော စ သော အတ္တာ စေတိ စ, တတော ပဘဝမိတိ စ, သန္တော ဥပသန္တော စ သော အတ္တာ စေတိ စ, သတ္တတော ဘဝန္တီတိ စ, သတ္တေန ဥပ္ပာဒိတာတိ စ, အနုဘာဝါနံ ဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. အပီတိ အနုဂ္ဂဟတ္ထေ နိပါတော. ३४५. आता उद्देशक्रमानुसार शुद्ध भाव म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या सात्त्विक भावाचे दर्शन 'समाहित' इत्यादींद्वारे घडवतात. एकाग्रतेमुळे समाधी प्राप्त झालेल्या चित्तापासून जे उत्पन्न होते त्याला 'सत्त्व' म्हणतात. त्या सत्त्वामुळे, लाभ-हानी इत्यादींमध्ये एकसारखे राहण्याच्या कारणाने स्थिरभावाने उत्पन्न झालेले स्तंभ इत्यादी भाव 'सात्त्विक' नावाचे होतात. हे सात्त्विक भाव अनुभाव असूनही, चित्ताच्या अवस्था दर्शवणाऱ्या स्तंभ इत्यादींच्या शारीरिक विकारांच्या स्वरूपामुळे स्वतः अनुभाव असतानाही स्वतंत्र भाव होतात, जसे की 'चित्तवृत्तींचे विशेष रसांना भावित करतात' इत्यादींमध्ये सांगितले आहे. हे सात्त्विक भाव आणि अनुभाव या रूपाने दोन प्रकारचे असतात. 'समाहित आणि तो आत्मा (चित्त)', 'त्यापासून उत्पन्न होणारे', 'शांत व उपशांत आणि तो आत्मा', 'सत्त्वापासून होणारे', 'सत्त्वाने उत्पन्न केलेले', 'अनुभावांचा भाव' असे हे वाक्य आहे. 'अपि' हा निपात अनुग्रह (समावेश) अर्थाचा आहे. သာတ္တိကဘာဝပ္ပဘေဒ सात्त्विकभावांचे प्रभेद (प्रकार) ၃၄၆. ३४६. ထမ္ဘော ပလယရောမဉ္စာ,တထာ သေဒဿုဝေပထု; ဝေဝဏ္ဏိယံ ဝိဿရတာ,ဘာဝါ’ဋ္ဌေ’တေ တု သာတ္တိကာ. स्तंभ (थक्क होणे), प्रलय (मूर्च्छा), रोमांच, तसेच घाम, थरथरणे, विवर्णता (रंग बदलणे) आणि स्वरभंग (आवाज बदलणे) – हे आठ सात्त्विक भाव आहेत. ၃၄၆. တေ ဒဿေတိ ‘‘ထမ္ဘော’’ဣစ္စာဒိနာ. ဧတ္ထ ထမ္ဘော အဝိဿရကာယစိတ္တတာ. ပလယော အဿာသပဿာသမတ္တာဝသေသော သုတ္တာဝတ္ထာသဘာဝေါ နိဒ္ဒါပဘဝေါ. သုဗျတ္တလက္ခဏာ သေသာ. ३४६. ते 'स्तंभ' इत्यादींद्वारे दाखवतात. येथे 'स्तंभ' म्हणजे शरीर आणि चित्ताची निश्चलता. 'प्रलय' म्हणजे केवळ श्वासोच्छ्वास शिल्लक राहिलेली सुप्त अवस्था, जी निद्रेपासून उत्पन्न होते. उरलेल्यांचे लक्षण स्पष्ट आहे. ၃၄၆. ဣဒါနိ [Pg.336] သာတ္တိကေ ဒဿေတိ ‘‘ထမ္ဘော’’ဣစ္စာဒိနာ. ထမ္ဘော ကာယစိတ္တာနံ အဝိသရဘာဝသင်္ခါတော စ ပလယရောမဉ္စာ နိဒ္ဒါယ ဥပ္ပဇ္ဇမာနအဿာသပဿာသမတ္တာတိရိတ္တသုတ္တာဝတ္ထာ စ ပသာဒါဒိသမ္ဘဝေါ ရောမုဂ္ဂမော စ တထာ ဧဝံ သေဒဿုဝေပထု စ ဘယာဒီဟိ ဥပ္ပဇ္ဇမာနဒါဟော စ သန္တောသာဒီဟိ ဥပ္ပဇ္ဇမာနအဿု စ ကမ္ပာ စ ဝေဝဏ္ဏိယံ ဝိရူပတာ စ ဝိဿရတာ ဝိရူပသဒ္ဒတာ စာတိ ဧတေ အဋ္ဌ သာတ္တိကာ ဘာဝါ နာမ ဟောန္တိ. ရောမာနံ အဉ္စော ဥဂ္ဂမောတိ စ, ပလယော စ ရောမဉ္စော စေတိ စ, ဝေပနံ ကမ္ပနမိတိ စ, သေဒေါ စ အဿု စ ဝေပထု စာတိ စ, ဝိရူပေါ ဝဏ္ဏော အဿေတိ စ, တဿ ဘာဝေါတိ စ, ဝိရူပေါ သရော အဿေတိ စ, တဿ ဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. ३४६. आता सात्त्विक भाव 'स्तंभ' इत्यादींद्वारे दाखवतात. 'स्तंभ' म्हणजे शरीर आणि चित्ताची निश्चलता; 'प्रलय' म्हणजे निद्रेमुळे उत्पन्न होणारी आणि केवळ श्वासोच्छ्वास शिल्लक राहिलेली सुप्त अवस्था; 'रोमांच' म्हणजे हर्ष इत्यादींमुळे अंगावर काटा येणे; तसेच 'घाम' आणि 'थरथरणे' म्हणजे भयादींमुळे उत्पन्न होणारा दाह, संतोषादींमुळे येणारे 'अश्रू' आणि 'कंप'; 'विवर्णता' म्हणजे शरीराचा रंग बदलणे; आणि 'स्वरभंग' म्हणजे आवाजात विकृती येणे – हे आठ सात्त्विक भाव आहेत. 'रोमांचांचा उद्गम', 'प्रलय आणि रोमांच', 'कंपन म्हणजे थरथरणे', 'घाम, अश्रू आणि थरथरणे', 'ज्याचा रंग बदलला आहे तो' आणि 'त्याचा भाव', 'ज्याचा आवाज बदलला आहे तो' आणि 'त्याचा भाव' असे हे वाक्य आहे. ၃၄၇. ३४७. ယဒါ ရတျာဒယော ဘာဝါ,ဌိတိသီလာ န ဟောန္တိ စေ; တဒါ သဗ္ဗေပိ တေ ဘာဝါ,ဘဝန္တိ ဗျဘိစာရိနော. जेव्हा रती इत्यादी भाव स्थिर स्वभावाचे नसतात, तेव्हा ते सर्व भाव व्यभिचारी (संचारी) भाव होतात. ၃၄၇. န ကေဝလံ ဝုတ္တာယေဝ ဗျဘိစာရိနော, ရတျာဒယောပီတိ အာဟ ‘‘ယဒါ’’ဣစ္စာဒိ. ဘဝန္တိ ဗျဘိစာရိနောတိ ယထာယောဂံ ယထာသမ္ဗန္ဓံ ဗျဘိစာရိနော ဟောန္တီတိ အတ္ထော. သေသံ သုဗောဓံ. ३४७. केवळ आधी सांगितलेलेच व्यभिचारी भाव असतात असे नाही, तर रती इत्यादी देखील असतात, म्हणून 'जेव्हा' इत्यादी म्हटले आहे. 'व्यभिचारी होतात' म्हणजे योग्यतेनुसार आणि संबंधानुसार ते व्यभिचारी भाव होतात असा अर्थ आहे. उर्वरित भाग सुबोध आहे. ၃၄၇. ဣဒါနိ နိဗ္ဗေဒါဒယော ဝိယ ရတိဟာသာဒယောပိ ကိသ္မိဉ္စိ ကာလေ ဗျဘိစာရိနောပိ ဟောန္တီတိ ဒဿေတိ ‘‘ယဒါ’’ ဣစ္စာဒိနာ. ရတျာဒယော ရတိဟာသာဒယော ဘာဝါ နဝ ဌာယီဘာဝါ ယဒါ ဌိတိသီလာ န ဟောန္တိ စေ ဝိရောဓီဟိ တေဟိ တေဟိ ဘာဝန္တရေဟိ ဗျဝဟိတတ္တာ သဘာဝတော ဌိတိသဘာဝါ ယဒိ န ဟောန္တိ, တဒါ တေ ဘာဝါ ရတျာဒယော သဗ္ဗေပိ ဗျဘိစာရိနော ဘဝန္တီတိ. ယထာသကံ ဗျဘိစာရိတာနုရူပဝိဘာဝါနုဘာဝါနံ ယောဂါနုရူပေန ဗျဘိစာရီဘာဝါ ဟောန္တိ. ရတိအာဒိ ယေသံ ဟာသာဒီနမိတိ စ, ဌိတိ သီလံ ယေသံ ရတျာဒီနမိတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३४७. आता निर्वेदाप्रमाणेच रती, हास इत्यादी देखील काही प्रसंगी व्यभिचारी भाव होतात, हे 'जेव्हा' इत्यादींद्वारे दाखवतात. रती, हास इत्यादी नऊ स्थायीभाव जेव्हा विरोधी अशा वेगवेगळ्या इतर भावांमुळे खंडित झाल्याने स्वभावतः स्थिर राहणारे नसतात, तेव्हा ते रती इत्यादी सर्व भाव व्यभिचारी होतात. आपापल्या व्यभिचारी भावांना अनुरूप अशा विभाव आणि अनुभावांच्या संयोगाने ते व्यभिचारी भाव बनतात. 'रती इत्यादी ज्यांच्यामध्ये हास इत्यादी आहेत', 'स्थिर राहणे हा ज्यांचा स्वभाव आहे अशा रती इत्यादी' असा विग्रह आहे. ၃၄၈. ३४८. ဝိဘာဝေါ [Pg.337] ကာရဏံ တေသု’-ပ္ပတ္တိယု’ဒ္ဒီပနေ တထာ; ယော သိယာ ဗောဓကော တေသ-မနုဘာဝေါ’ယ’မီရိတော. त्यांच्या उत्पत्तीचे आणि उद्दीपनाचे जे कारण असते, तो विभाव होय; आणि जो त्यांचा बोधक (प्रकट करणारा) असतो, तो अनुभाव म्हटला गेला आहे. ၃၄၈. ဣဒါနိ ဝိဘာဝါနုဘာဝေ ဒဿေတိ ‘‘ဝိဘာဝေါ’’ဣစ္စာဒိနာ. တေသံ ရတျာဒီနံ ဘာဝါနံ ဥပ္ပတ္တိယာ, တထာ ဥဒ္ဒီပနေ စ ကာရဏံ အာလမ္ဗဏဥဒ္ဒီပနဝသေန ဒုဝိဓော ဝိဘာဝေါ နာမ. တတ္ထ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝေါ ကန္တာဒိ, ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝေါ စန္ဒာဒိ. တေသံ ဗောဓကော ဉာပကော ကာယိကော စ ဝါစသိကော စ ဗျာပါရော သိယာ, အယံ အနုဘာဝေါ ဤရိတော. ३४८. आता विभाव आणि अनुभाव 'विभाव' इत्यादींद्वारे दाखवतात. त्या रती इत्यादी भावांच्या उत्पत्तीचे आणि उद्दीपनाचे जे कारण असते, ते आलंबन आणि उद्दीपन या भेदाने दोन प्रकारचा विभाव आहे. त्यामध्ये आलंबन-विभाव म्हणजे कांता (प्रियतमा) इत्यादी, आणि उद्दीपन-विभाव म्हणजे चंद्र इत्यादी होय. त्यांचा बोधक (ज्ञापक) असलेला जो कायिक आणि वाचिक व्यापार असतो, तो अनुभाव म्हटला गेला आहे. ၃၄၈. ဣဒါနိ ဝိဘာဝါနုဘာဝေ ဒဿေတိ ‘‘ဝိဘာဝေါ’’ဣစ္စာဒိနာ. တေသံ ဌာယီဘာဝါဒီနံ တိဏ္ဏံ ဥပ္ပတ္တိယာ စ တထာ ဥဒ္ဒီပနေ စ ဥပ္ပန္နာနံ ဒီပနေ စ ကာရဏံ အာလမ္ဗဏဥဒ္ဒီပနဝသေန ဒုဝိဓော ဟေတု ဝိဘာဝေါ နာမ, တေသံ ဌာယီဘာဝါဒီနံ ဗောဓကော ကာယိကဝါစသိကော ယော သိယာ နဋကဝီနံ ဗျာပါရော အတ္ထိ, အယံ အနုဘာဝေါတိ ဤရိတောတိ. ဝိသေသေန ဘာဝေတိ ဝဍ္ဎေတီတိ ဝိဘာဝေါ. အနုဘာဝေတိ ဗောဓေတီတိ အနုဘာဝေါ. ဧတ္ထ ဝိဘာဝေါ နာမ ရတိဝိသယေ နရနာရီနံ အညမညံ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝေါ, စန္ဒရမ္မဒေသာဒိ ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝေါ စေတိ ဒုဝိဓော. ဟာသာဒီနမ္ပိ ဒုဝိဓဝိဘာဝံ ယထာရဟံ ယောဇေတဗ္ဗံ. အနုဘာဝေါ နာမ ဌာယီဘာဝါဒီနံ တေသံ တေသံ ဘာဝါနံ ပကာသကဝါစသိကဗျာပါရသင်္ခါတကဝိပယောဂေါ စ ကာယိကပယောဂဘူတော နဋာနံ အဘိနယသင်္ခါတော တံတံဘာဝသရူပနိရူပကော စေတိ ဒုဝိဓော ဗျာပါရော. ३४८. आता विभाव आणि अनुभाव 'विभाव' इत्यादींद्वारे दाखवतात. त्या स्थायीभाव इत्यादी तिन्हींच्या उत्पत्तीचे आणि उद्दीपनाचे (उत्पन्न झालेल्यांना तीव्र करण्याचे) जे कारण असते, ते आलंबन आणि उद्दीपन या भेदाने दोन प्रकारचा हेतू म्हणजेच विभाव होय. त्या स्थायीभाव इत्यादींचा बोधक असलेला नट आणि कवींचा जो कायिक व वाचिक व्यापार असतो, तो अनुभाव म्हटला गेला आहे. विशेष रूपाने भावित करतो (वाढवतो) तो विभाव. अनुभव करून देतो (बोध करून देतो) तो अनुभाव. येथे विभाव म्हणजे रतीच्या बाबतीत स्त्री-पुरुषांचे परस्परांवरील आलंबन-विभाव, आणि चंद्र, रमणीय स्थान इत्यादी उद्दीपन-विभाव असा दोन प्रकारचा आहे. हास इत्यादींचेही दोन्ही प्रकारचे विभाव योग्यतेनुसार जाणावेत. अनुभाव म्हणजे त्या त्या स्थायीभावांना प्रकट करणारा वाचिक व्यापार आणि नटांचा अभिनय म्हटला जाणारा कायिक व्यापार, जो त्या त्या भावांचे स्वरूप दर्शवतो, असा दोन प्रकारचा व्यापार आहे. ၃၄၉. ३४९. နေကဟေတုံ မနောဝုတ္တိ-ဝိသေသဉ္စ ဝိဘာဝိတုံ; ဘာဝံ ဝိဘာဝါနုဘာဝါ, ဝဏ္ဏိယာ ဗန္ဓနေ ဖုဋံ. अनेक कारणे असलेल्या आणि विशिष्ट चित्तवृत्ती स्वरूप असलेल्या भावाला स्पष्ट करण्यासाठी, काव्याच्या रचनेत विभाव आणि अनुभाव यांचे स्पष्टपणे वर्णन केले पाहिजे. ၃၄၉. ဝိဘာဝါဒိဝဏ္ဏနာယမေဝ [Pg.338] ဘာဝဝိသေသာဝဗောဓော သိယာ, အညထာ ‘‘ဒေဝဒတ္တဿ သာဿုလောစနယုဂံ သဉ္ဇာတ’’မိတိ ဝုတ္တေ သောကာ အာနန္ဒာ ရောဂါ စေတိ ကော နာမ သက္ကောတိ ကာရဏံ နိစ္ဆိတုံ, စိတ္တဝုတ္တိဝိသေသဉ္စ ဘာဝံ ဝိနာ ဝိဘာဝါနုဘာဝံ ကဝိ ဝဏ္ဏေတုံ နဋောဘိနေတုံ သာမဇ္ဇိကော ဝါ ဝိညာတုံ ကော သက္ကောတီတိ ဒဿေတုမာဟ ‘‘နေက’’ဣစ္စာဒိ. နေကဟေတုံ ဗဟုဟေတုံ မနောဝုတ္တိဝိသေသဉ္စ ဘာဝံ ဝိဘာဝိတုံ ပကာသေတုံ ဝိဘာဝါနုဘာဝါ ဝုတ္တလက္ခဏာ ဗန္ဓနေ သဘာဝနိရူပကပဒေ ဖုဋံ ဝဏ္ဏနီယာ, ဝိဘာဝါဒိရူပကေနေဝ အဝုတ္တမ္ပိ ကိဉ္စိ ပတီယတေ. ३४९. विभाव इत्यादींच्या वर्णनानेच भावविशेषाचे आकलन होऊ शकते. अन्यथा, 'देवदत्ताचे डोळे अश्रूंनी भरून आले' असे म्हटले असता, ते शोकामुळे, आनंदाने की रोगामुळे झाले आहे, याचे कारण निश्चित करण्यास कोण समर्थ होईल? आणि चित्तवृत्तीच्या विशेष भावाशिवाय कवी विभावाचे व अनुभावाचे वर्णन करण्यास, नट अभिनय करण्यास किंवा सामाजिक (प्रेक्षक) ते समजून घेण्यास कसा समर्थ होईल? हे दर्शवण्यासाठी 'नेक' इत्यादी म्हटले आहे. अनेक हेतू असलेल्या, बहुहेतुक आणि मनोवृत्तीच्या विशेष भावाला विभावित (प्रकट) करण्यासाठी, काव्यात स्वभाव-निरूपक पदांमध्ये कथित लक्षणांचे विभाव आणि अनुभाव स्पष्टपणे वर्णिले पाहिजेत. विभाव इत्यादींच्या रूपानेच न बोललेले देखील काहीतरी प्रतीत होते. ၃၄၉. ‘‘ဒေဝဒတ္တဿ စက္ခူနိ အဿုပုဏ္ဏာနီ’’တိ ဝုတ္တေ သောကေန သန္တောသေန ရောဂေန ဝါတိ ယထာ အဿုကာရဏကထနံ ဝိနာ န ဇာနာတိ, ဧဝံ စိတ္တဿ ပဝတ္တိသင်္ခါတာ ရတိဟာသာဒယော တေ တေ ဘာဝါ အတ္တနော ပတီတိယာနုရူပံ ဝိဘာဝါနုဘာဝကထနံ ဝိနာ ကဝီဟိ ဝဏ္ဏေတဗ္ဗာ, နဋေဟိ ဒဿေတဗ္ဗာ, သဗ္ဘေဟိ အဿာဒနီယာ နတ္ထီတိ ဌာယီအာဒီနံ ဝဏ္ဏနမေဝ ကာတဗ္ဗန္တိ ဣဒါနိ အနုသာသေန္တော အာဟ ‘‘နေက’’ဣစ္စာဒိ. နေကဟေတုံ တေသံ တေသံ ဘာဝါနံ ဥပ္ပတျာဒေါ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝါဒိဗဟုကာရဏဝန္တံ မနောဝုတ္တိဝိသေသံ ဘာဝဉ္စ စိတ္တဿ ပဝတ္တိဝိသေသသင်္ခါတဘာဝဉ္စ ဝိဘာဝိတုံ ပကာသေတုံ ဝိဘာဝါနုဘာဝါ အနန္တရနိဒ္ဒိဋ္ဌာ ဗန္ဓနေ ရသဘာဝပ္ပကာသနေ ဖုဋံ ပကာသံ ကတွာ ဝဏ္ဏိယာ ကဝိနာ ဝဏ္ဏနီယာ ဟောန္တီတိ. န ဧကောတိ စ, သော ဟေတု အဿေတိ စ, မနသော ဝုတ္တီတိ စ, တာယ ဝိသေသောတိ စ, ဝိဘာဝေါ စ အနုဘာဝေါ စေတိ စ ဝါကျံ. ३४९. 'देवदत्ताचे डोळे अश्रूंनी भरलेले आहेत' असे म्हटले असता, ते शोकामुळे, आनंदाने की रोगामुळे आहे, हे जसे अश्रूंच्या कारणाच्या कथनाशिवाय समजत नाही; त्याचप्रमाणे चित्ताची प्रवृत्ती समजले जाणारे रती, हास इत्यादी ते ते भाव आपापल्या प्रतीतीनुसार विभाव आणि अनुभावाच्या कथनाशिवाय कवींनी वर्णन करण्याजोगे, नटांनी दर्शवण्याजोगे आणि प्रेक्षकांनी आस्वाद घेण्याजोगे नसतात. म्हणून स्थायी इत्यादींचे वर्णनच केले पाहिजे, असा उपदेश करताना आता 'नेक' इत्यादी म्हटले आहे. अनेक हेतू असलेल्या, त्या त्या भावांच्या उत्पत्ती इत्यादींमध्ये आलंबन-विभाव इत्यादी अनेक कारणे असलेल्या मनोवृत्तीच्या विशेष भावाला आणि चित्ताच्या प्रवृत्तीविशेषरूप भावाला विभावित (प्रकट) करण्यासाठी, नंतर सांगितलेले विभाव आणि अनुभाव काव्यात रस व भाव प्रकट करताना स्पष्टपणे प्रकट करून कवीने वर्णिले पाहिजेत. 'एक नाही' (न एक), 'तो त्याचा हेतू आहे', 'मनाची वृत्ती', 'त्याचा विशेष', आणि 'विभाव व अनुभाव' असे हे वाक्य आहे. ၃၅၀. ३५०. သဝိဘာဝါနုဘာဝေဟိ, ဘာဝါ တေ တေ ယထာရဟံ; ဝဏ္ဏနီယာ ယထောစိတျံ, လောကရူပါနုဂါမိနာ. विभाव आणि अनुभावांसह ते ते भाव योग्यतेनुसार, लोकस्वभावाचे अनुसरण करणाऱ्या (कवीने) औचित्यानुसार वर्णिले पाहिजेत. ၃၅၀. ဣဒါနိ တေ ဘာဝါ လောကသဘာဝါနတိက္ကမေန ဝိဘာဝါဒီဟိ ဝဏ္ဏနီယာတိ အာဟ ‘‘သဝိဘာဝေ’’စ္စာဒိ. သဟ ဝိဘာဝေဟိ [Pg.339] သဝိဘာဝါ, တေ စ တေ အနုဘာဝါ စ, တေဟိ. ယထာရဟန္တိ အတ္တနော သမ္ဗန္ဓီနံ ဝသေန ယထာရဟံ ဝဏ္ဏနီယာ. ३५०. आता ते भाव लोकस्वभावाचे उल्लंघन न करता विभाव इत्यादींद्वारे वर्णिले पाहिजेत, हे सांगण्यासाठी 'सविभाव' इत्यादी म्हटले आहे. विभावांसह ते 'सविभाव' आणि तेच अनुभाव, त्यांच्याद्वारे. 'यथार्ह' म्हणजे आपापल्या संबंधांच्या वशने योग्यतेनुसार वर्णिले पाहिजेत. ၃၅၀. ဣဒါနိ ဝိဘာဝါနုဘာဝေ နိဿာယ ဝဏ္ဏနီယာ တေ ဘာဝါ လောကသဘာဝမနတိက္ကမ္မ ကာတဗ္ဗာတိ အနုသာသန္တော အာဟ ‘‘သဝိဘာဝါ’’ဣစ္စာဒိ. လောကရူပါနုဂါမိနာ လောကဝေါဟာရမနုဝတ္တမာနေန တေ တေ ဘာဝါ ဌာယီဘာဝါဒယော တယော ယထောစိတျံ ဩစိတျာနုရူပံ သဝိဘာဝါနုဘာဝေဟိ ဝိဘာဝသဟိတေဟိ အနုဘာဝေဟိ ကရဏဘူတေဟိ ယထာရဟံ တေဟိ တေဟိ ဘာဝေဟိ သမ္ဗန္ဓီနံ ဝိဘာဝါဒီနံ ဝသေန အနုရူပတော ဝဏ္ဏနီယာ ဝဏ္ဏေတဗ္ဗာ ဟောန္တီတိ. ဝိဘာဝေဟိ သဟ ယေ ဝတ္တန္တီတိ စ, တေ စ တေ အနုဘာဝါ စေတိ စ, အနတိက္ကမ္မ အရဟန္တိ စ, အနတိက္ကမ္မ ဩစိတျမိတိ စ, လောကဿ ရူပံ သရူပမိတိ စ, တံ အနုဂစ္ဆတိ သီလေနာတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. ३५०. आता विभाव आणि अनुभावांचा आश्रय घेऊन वर्णिले जाणारे ते भाव लोकस्वभावाचे उल्लंघन न करता व्यक्त केले पाहिजेत, असा उपदेश करताना 'सविभाव' इत्यादी म्हटले आहे. 'लोकरूपानुगामी' म्हणजे लोकव्यवहाराचे अनुसरण करणाऱ्या कवीने ते ते स्थायीभाव इत्यादी तिन्ही भाव औचित्यानुसार (योग्यतेनुसार) विभावयुक्त अनुभावांच्या द्वारे, त्या त्या भावांशी संबंधित असलेल्या विभाव इत्यादींच्या वशने अनुरूपतेने वर्णिले पाहिजेत. 'जे विभावांसह वर्ततात', 'ते आणि ते अनुभाव', 'उल्लंघन न करता योग्य असणे', 'औचित्याचे उल्लंघन न करणे', 'लोकाचे रूप म्हणजे त्याचे स्वरूप', आणि 'त्याचे शीलतः अनुसरण करणे' असा हा विग्रह आहे. ၃၅၁. ३५१. စိတ္တဝုတ္တိ ဝိသေသတ္တာ, မာနသာ သာတ္တိက’င်္ဂတော; ဗဟိနိဿဋသေဒါဒိ-အနုဘာဝေဟိ ဝဏ္ဏိယာ. चित्तवृत्तीच्या विशेषत्वामुळे मनात उत्पन्न होणारे सात्त्विक भाव, शरीरातून बाहेर पडणाऱ्या घाम (स्वेद) इत्यादी अनुभावांद्वारे वर्णिले पाहिजेत. ၃၅၁. သာတ္တိကာ ကထံ ဝဏ္ဏနီယာတိ အာဟ ‘‘စိတ္တေ’’စ္စာဒိ. စိတ္တဿ ဝုတ္တိဝိသေသော ယေသံ, တေသံ ဘာဝေါ, တသ္မာ မာနသာ မနသိ ဘဝါ သာတ္တိကာ အင်္ဂတော သရီရတော ဗဟိနိဿဋေဟိ နိဂ္ဂတေဟိ သေဒါဒီဟိ အနုဘာဝေဟိ ဝဏ္ဏနီယာ, န ပန သေဒသလိလမေဝ ဘာဝေါတိ အဓိပ္ပာယော. ३५१. सात्त्विक भाव कसे वर्णिले पाहिजेत, हे सांगण्यासाठी 'चित्त' इत्यादी म्हटले आहे. ज्यांचा चित्ताचा वृत्तीविशेष आहे, त्यांचा भाव; म्हणून 'मानसिक' म्हणजे मनात उत्पन्न होणारे सात्त्विक भाव शरीरातून बाहेर पडलेल्या घाम (स्वेद) इत्यादी अनुभावांद्वारे वर्णिले पाहिजेत, परंतु केवळ घामाचे पाणी म्हणजेच भाव नव्हे, असा अभिप्राय आहे. ၃၅၁. ဧဝံ သာမညေန ဘာဝဝဏ္ဏနက္ကမံ ဒဿေတွာ ဣဒါနိ ဝိသေသေန သာတ္တိကဘာဝဝဏ္ဏနာ ဤဒိသာတိ ဒဿေတိ ‘‘စိတ္တ’’ဣစ္စာဒိနာ. စိတ္တဝုတ္တိဝိသေသတ္တာ စိတ္တဿ ပဝတ္တိဝိသေသတ္တာ မာနသာ စိတ္တေ ဘဝါ သာတ္တိကာဘာဝါ အင်္ဂတော သရီရတော ဗဟိနိဿဋသေဒါဒိအနုဘာဝေဟိ ဗဟိနိက္ခန္တသေဒါဒီဟိ အနုဘာဝေဟိ ကရဏဘူတေဟိ ဝဏ္ဏိယာ ဝဏ္ဏနီယာ ဟောန္တီတိ, [Pg.340] အင်္ဂတော ဗဟိ နိဿဋန္တိ ဝိသေသနေန ဝိသိဋ္ဌဘူတသေဒါဒီနမေဝ ဘာဝါနုဘာဝတ္တံ ဝိနာ ကေဝလံ သေဒါဒယော ဝုတ္တာ သမာနာ ဘာဝါဒယော နာမ န ဟောန္တီတိ အဓိပ္ပာယော. စိတ္တဿ ဝုတ္တီတိ စ, သာ ဧဝ ဝိသေသော ယေသံ သာတ္တိကာနမိတိ စ, တေသံ ဘာဝေါတိ စ, မနသိ ဘဝါတိ စ, သေဒေါ အာဒိ ယေသံ ခေဠာဒီနမိတိ စ, နိဿဋာ နိဂ္ဂတာ စ တေ သေဒါဒယော စေတိ စ, တေ ဧဝ အနုဘာဝါတိ စ ဝါကျံ. ३५१. अशा प्रकारे सामान्यतः भाववर्णनाचा क्रम दाखवून, आता विशेष रूपाने सात्त्विक भावांचे वर्णन कसे असते, हे दर्शवण्यासाठी 'चित्त' इत्यादी म्हटले आहे. चित्तवृत्तीच्या विशेषत्वामुळे म्हणजेच चित्ताच्या प्रवृत्तीविशेषत्वामुळे मनात उत्पन्न होणारे सात्त्विक भाव शरीरातून बाहेर पडलेल्या घाम (स्वेद) इत्यादी अनुभावांच्या द्वारे वर्णिले पाहिजेत. 'शरीरातून बाहेर पडलेले' या विशेषणाने विशिष्ट झालेले घाम इत्यादीच भावांचे अनुभाव होतात; त्याशिवाय केवळ घाम इत्यादी म्हटले असता ते भाव इत्यादी होत नाहीत, असा अभिप्राय आहे. 'चित्ताची वृत्ती', 'तीच ज्या सात्त्विकांचा विशेष आहे', 'त्याचा भाव', 'मनात उत्पन्न होणारे', 'घाम इत्यादी ज्या लाळ इत्यादींचे आदि आहेत', 'बाहेर पडलेले ते घाम इत्यादी', आणि 'तेच अनुभाव' असे हे वाक्य आहे. ရသအဓိပ္ပာယ रसाचा अभिप्राय ၃၅၂. ३५२. သာမဇ္ဇိကာန’မာနန္ဒော, ယော ဗန္ဓတ္ထာနုသာရိနံ; ရသီယတီတိ တညူဟိ, ရသော နာမာ’ယ’မီရိတော. काव्याच्या अर्थाचे अनुसरण करणाऱ्या प्रेक्षकांच्या मनात जो आनंद निर्माण होतो, त्याचा आस्वाद घेतला जातो म्हणून त्याला रसज्ञांनी 'रस' असे म्हटले आहे. ၃၅၂. ဣဒါနိ ‘‘ရသဿာဒါယ သာဓူန’’န္တိ ဝုတ္တတ္တာ ရသေ နိဒ္ဒိသန္တော အာဟ ‘‘သာမဇ္ဇိကာန’’မိစ္စာဒိ. ဗန္ဓဿ အတ္ထော, တဒနုဿရန္တိ မနောဘာဝနာဝသေနာတိ ဗန္ဓတ္ထာနုသာရိနော, တေသံ သာမဇ္ဇိကာနံ သဗ္ဘာနံ မနသိ ယော အာနန္ဒော, အယံ လောကမဓုရာဒိရသော ဝိယ ဗန္ဓေ သိင်္ဂါရာဒိ ရသော နာမ ဤရိတော တညူဟိ ရသညူဟိ. ကထမိတျာဟ ‘‘ရသီယတီ’’တိ, အဿာဒီယတီတိ အတ္ထော. ကိဉ္စ? ယထာ နာနာဗျဉ္ဇနသင်္ခတမန္နံ ဘုဉ္ဇမာနာ ရသေ အဿာဒိယန္တိ သုမာနသာ ပုရိသာ သန္တောသဉ္စာဓိဂစ္ဆန္တိ, တထာ နာနာဘိနယဗျဉ္ဇိတေ ဝါစင်္ဂသတ္ထောပေတေ ဌာယီဘာဝေ အဿာဒေန္တိ သုမာနသာပေက္ခကာ, တသ္မာ ဧတေ နာဋျာတိပိ ဝုစ္စန္တိ. ३५२. आता 'सज्जनांच्या रसास्वादासाठी' असे म्हटल्यामुळे रसाचे निर्देश करताना 'सामाजिकान' इत्यादी म्हटले आहे. काव्याचा अर्थ, त्याचे मनोभावनेच्या वशने जे अनुसरण करतात ते 'बंधार्थानुसारी' (काव्यार्थानुसारी) होत. त्या सामाजिक (प्रेक्षक) सज्जनांच्या मनात जो आनंद होतो, तो लौकिक मधुर इत्यादी रसाप्रमाणे काव्यात शृंगार इत्यादी रस म्हणून रसज्ञांनी सांगितला आहे. तो कसा? तर 'रसीयती' म्हणजे त्याचा आस्वाद घेतला जातो, असा अर्थ आहे. आणखी काय? ज्याप्रमाणे विविध व्यंजनांनी युक्त अन्नाचे सेवन करताना प्रसन्न मनाचे लोक रसाचा आस्वाद घेतात आणि संतोष प्राप्त करतात, त्याचप्रमाणे विविध अभिनयांनी प्रकट केलेल्या, वाणी, अंग आणि शास्त्राने युक्त अशा स्थायीभावांचा प्रसन्न मनाचे प्रेक्षक आस्वाद घेतात; म्हणून यांना 'नाट्य' असेही म्हटले जाते. ၃၅၂. ဣဒါနိ ‘‘ရသဿာဒါယ သာဓူန’’န္တိ ဝတွာ ဥဒ္ဒိဋ္ဌက္ကမေန သမ္ပတ္တံ ရသံ ဒဿေတိ ‘‘သာမ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဗန္ဓတ္ထာနုသာရိနံ ဗန္ဓဿ အတ္ထာနုရူပသာရီနံ ဗုဒ္ဓိယာ ပဝတ္တာနံ သာမဇ္ဇိကာနံ သဗ္ဘာနံ စိတ္တေ ဘဝေါ ယော အာနန္ဒော သန္တောသော အတ္ထိ, အယံ လောကေ မဓုရာဒိရသော ဝိယ အဿာဒနီယော ဟောတီတိ အတ္ထယုတ္တေန ‘‘ရသီယတီ’’တိ ဣမိနာ ဝစနတ္ထေန ရသော နာမာတိ တညူဟိရသညူဟိ ဤရိတော ကထိတောတိ. [Pg.341] သမဇ္ဇာယံ နိယုတ္တာတိ စ, ဗန္ဓဿ အတ္ထောတိ စ, တံ အနုဿရန္တီတိ စ, တံ ဇာနန္တီတိ စ ဝါကျံ. ယထာ နာနာဗျဉ္ဇနေဟိ အဘိသင်္ခတမာဟာရံ ပရိဘုဉ္ဇန္တာ သတ္တာ လဝဏမ္ဗိလာဒယော တေ တေ ရသေ အဿာဒေယျုံ, သန္တုဋ္ဌာ စ ဘဝေယျုံ, ဧဝမေဝ နာနပ္ပကာရအဘိနယေဟိ ပကာသိတဝဏ္ဏနာယ အင်္ဂဘူတေဟိ အနုရူပေဟိ သတ္ထေဟိ ယုတ္တေ ဌာယီဘာဝေ ဣဿာဒိရဟိတပညဝန္တာ အဿာဒေန္တိ, တသ္မာ ဣမေ ဌာယီဘာဝါ နဋာဘိနယေဟိ ဗျဉ္ဇိတတ္တာ စ သဗ္ဘာနံ သန္တောသသင်္ခတရသဿ ဟေတုတ္တာ စ နဋရသာတိပိ ဝုစ္စန္တိ. ३५२. आता 'सज्जनांच्या रसास्वादासाठी' असे सांगून, उद्दिष्ट क्रमानुसार प्राप्त झालेल्या रसाला दर्शवण्यासाठी 'साम' इत्यादी म्हटले आहे. काव्याच्या अर्थानुरूप बुद्धीने प्रवृत्त होणाऱ्या सामाजिक (प्रेक्षक) सज्जनांच्या चित्तात जो आनंद किंवा संतोष उत्पन्न होतो, तो जगात मधुर इत्यादी रसाप्रमाणे आस्वाद घेण्याजोगा असतो, म्हणून अर्थयुक्त अशा 'रसीयती' (आस्वाद घेतला जातो) या शब्दाच्या अर्थाने त्याला 'रस' असे रसज्ञांनी म्हटले आहे. 'सभेत नियुक्त असलेले', 'काव्याचा अर्थ', 'त्याचे अनुसरण करतात', 'ते जाणतात' असे हे वाक्य आहे. ज्याप्रमाणे विविध व्यंजनांनी तयार केलेल्या आहाराचे सेवन करणारे प्राणी खारट, आंबट इत्यादी त्या त्या रसांचा आस्वाद घेतात आणि संतुष्ट होतात; त्याचप्रमाणे विविध प्रकारच्या अभिनयांनी प्रकट केलेल्या वर्णनाचे अंग असलेल्या आणि अनुरूप शास्त्रांनी युक्त अशा स्थायीभावांचा, ईर्ष्या इत्यादींनी रहित असलेले बुद्धिमान लोक आस्वाद घेतात. म्हणून हे स्थायीभाव नटांच्या अभिनयाने अभिव्यक्त होत असल्यामुळे आणि सज्जनांच्या संतोषरूप रसाचे हेतू असल्यामुळे त्यांना 'नटरस' असेही म्हटले जाते. ရသပ္ပဘေဒ रसाचे प्रकार ၃၅၃. ३५३. သဝိဘာဝါနုဘာဝေဟိ,သာတ္တိကာဗျဘိစာရိဟိ; အဿာဒိယတ္တ’မာနီယ-မာနော ဌာယေဝ သော ရသော. विभाव आणि अनुभावांसह, तसेच सात्त्विक व व्यभिचारी भावांसह आस्वाद घेण्याजोग्या अवस्थेला आणला जाणारा तो स्थायीभावच रस होय. ၃၅၃. ဌာယီနမေဝ ရသတ္တာပတ္တိမာဟ ‘‘သဝိဘာဝေ’’စ္စာဒိနာ. ဌာယေဝ သောတိ သော ယထာဝုတ္တော ရသော ဌာယီဘာဝေါယေဝ, နာညောတိ အတ္ထော. ३५३. स्थायीभावांनाच रसत्व प्राप्त होते हे सांगण्यासाठी 'सविभाव' इत्यादी म्हटले आहे. 'स्थायी एव सः' म्हणजे तो वर सांगितलेला रस स्थायीभावच आहे, दुसरा काही नाही, असा अर्थ आहे. ၃၅၃. ဣဒါနိ ဌာယီဘာဝါနမေဝ ရသသရူပဿ ပါပုဏနတ္ထံ ဝိဘာဝေတိ ‘‘သဝိဘာဝါ’’ဣစ္စာဒိနာ. သော ရသော အနန္တရနိဒ္ဒိဋ္ဌော သဝိဘာဝါနုဘာဝေဟိ တေသံ တေသံ ဌာယီနံ အနုရူပေဟိ ဝိဘာဝသဟိတေဟိ အနုဘာဝေဟိ စ, သာတ္တိကာဗျဘိစာရိဟိ ပကာသေတဗ္ဗဌာယီဘာဝဿေဝ အနုကူလသာတ္တိကဘာဝဗျဘိစာရီဘာဝေဟိ ကရဏဘူတေဟိ အဿာဒိယတ္တံ အာနီယမာနော ကဝိနော သာမတ္ထိယာ ပါပုဏိယမာနော ဌာယေဝ ဌာယီဘာဝေါ ဧဝါတိ ကာရိယောပစာရေန ရသော နာမာတိ ဝေဒိတဗ္ဗောတိ. သဟ ဘာဝေဟိ ပဝတ္တန္တီတိ စ, သဝိဘာဝါ စ တေ အနုဘာဝါ စေတိ [Pg.342] စ, သာတ္တိကာ စ ဗျဘိစာရိနော စေတိ စ, အဿာဒိယဿ ဘာဝေါတိ စ ဝါကျံ. ३५३. आता स्थायीभावांनाच रसरूप प्राप्त होण्यासाठी स्पष्टीकरण करताना 'सविभाव' इत्यादी म्हटले आहे. तो नंतर निर्दिष्ट केलेला रस, त्या त्या स्थायीभावांच्या अनुरूप अशा विभावयुक्त अनुभावांच्या द्वारे आणि प्रकट करावयाच्या स्थायीभावाच्याच अनुकूल असलेल्या सात्त्विक व व्यभिचारी भावांच्या द्वारे आस्वाद घेण्याजोग्या अवस्थेला आणला जात असताना, कवीच्या सामर्थ्याने प्राप्त केला जाणारा स्थायीभावच 'रस' या नावाने ओळखला पाहिजे, असे कार्याच्या उपचाराने समजावे. 'भावांसह जे प्रवृत्त होतात', 'विभावांसह ते आणि ते अनुभाव', 'सात्त्विक आणि व्यभिचारी', 'आस्वाद घेण्याचा भाव' असे हे वाक्य आहे. ၃၅၄. ३५४. သိင်္ဂါရဟဿကရုဏာ, ရုဒ္ဒဝီရဘယာနကာ; ဗီဘစ္ဆဗ္ဘုတသန္တာ စ, ရသာ ဌာယီန’နုက္ကမာ. शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत आणि शांत हे स्थायीभावांच्या अनुक्रमाने रस आहेत. ၃၅၄. တေသံ နာမဝသေန ဝိဘာဂမာဟ ‘‘သိင်္ဂါရေ’’စ္စာဒိနာ. ဌာယီနနုက္ကမာတိ ‘‘ရတိဟာသာ စ သောကော စာ’’တိအာဒိနာ ဝုတ္တာနံ ဌာယီဘာဝါနံ အနုက္ကမာ, ပဋိပါဋိယာတိ အတ္ထော. ३५४. त्यांच्या नावांच्या आधारे विभाग सांगण्यासाठी 'शृंगार' इत्यादी म्हटले आहे. 'स्थायींच्या अनुक्रमाने' म्हणजे 'रती, हास आणि शोक' इत्यादी रूपाने सांगितलेल्या स्थायीभावांच्या अनुक्रमाने, म्हणजेच परंपरेने, असा अर्थ आहे. ၃၅၄. ရသာဝတ္ထာသမ္ပတ္တရတိဟာသာဒီနံ ဌာယီဘာဝါနံ ဣဒါနိ ကမေန နာမန္တရံ ဒဿေတိ ‘‘သိင်္ဂါရ’’ဣစ္စာဒိနာ. ဌာယီနံ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တာနံ ရတိဟာသာဒိဌာယီဘာဝါနံ အနုက္ကမာ ပဋိပါဋိယာ သိင်္ဂါရဟဿကရုဏာ သိင်္ဂါရော ဟဿော ကရုဏာ စ ရုဒ္ဒဝီရဘယာနကာ ရုဒ္ဒေါ ဝီရော ဘယာနကော စ ဗီဘစ္ဆဗ္ဘုတသန္တာ စ ဗိဘစ္ဆော အဗ္ဘုတော သန္တော စေတိ နဝ ရသာ နာမ ဟောန္တီတိ. သိင်္ဂါရရသော ဟဿရသောတိအာဒိနာ ရသသဒ္ဒေါ ပစ္စေကံ ယောဇေတဗ္ဗော. သိင်္ဂါရော စ ဟဿော စ ကရုဏာ စေတိ စ ဝိဂ္ဂဟော. သေသေသုပိ လိင်္ဂသမာသာ ဣမေယေဝ. ဣမေ သိင်္ဂါရာဒီနံ ရတျာဒီဟိ အနညတ္တာ ဥပရိ ရတျာဒိဝိဝရဏေယေဝ ဉာတဗ္ဗာ. ३५४. रसावस्था प्राप्त झालेल्या रती, हास इत्यादी स्थायीभावांचे आता क्रमाने दुसरे नाव दर्शवण्यासाठी 'शृंगार' इत्यादी म्हटले आहे. खाली सांगितलेल्या रती, हास इत्यादी स्थायीभावांच्या अनुक्रमाने किंवा परंपरेने शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत आणि शांत हे नऊ रस होतात. 'शृंगाररस', 'हास्यरस' इत्यादींमध्ये 'रस' हा शब्द प्रत्येकाशी जोडला पाहिजे. 'शृंगार, हास्य आणि करुण' असा हा विग्रह आहे. इतरांमध्येही हेच लिंगसमास आहेत. हे शृंगार इत्यादी रती इत्यादींपेक्षा भिन्न नसून, पुढे रती इत्यादींच्या विवरणातच ते जाणले पाहिजेत. ၃၅၅. ३५५. ဒုက္ခရူပေ’ယ’မာနန္ဒော,ကထံ နု ကရုဏာဒိကေ; သိယာ သောတူန’မာနန္ဒော,သောကော ဝေဿန္တရဿ ဟိ. दुःखस्वरूप अशा करुण इत्यादींमध्ये हा आनंद कसा बरे असू शकेल? कारण वेस्संतराचा शोक हा श्रोत्यांसाठी आनंदच ठरतो. ၃၅၅. သောကာဒိရူပေါကရုဏာဒိ ကထံ ရသော သိယာတိ အာဟ ‘‘ဒုက္ခေ’’စ္စာဒိ. ဝေဿန္တရဿ ပုတ္တဒါရဝိယောဂါ ကရုဏာ သောကရူပေါ ဒုက္ခမေဝ အဟောသိ, သမ္ပတိ ပန သောတူနံ သဗ္ဘာနံ အာနန္ဒောယေဝါတိ ဧတ္ထာဓိပ္ပာယော. ३५५. शोकादिरूप असलेला करुण इत्यादी रस कसा असू शकतो, हे सांगण्यासाठी 'दुःखे' इत्यादी म्हटले आहे. वेस्संतराचा (वेस्सन्तर राजाचा) पुत्र आणि पत्नीच्या वियोगामुळे झालेला करुण शोक हा केवळ दुःखच होता, परंतु आता ऐकणाऱ्या सर्व सज्जनांसाठी तो आनंदच ठरतो, असा येथे अभिप्राय आहे. ၃၅၅. ဟေဋ္ဌာ [Pg.343] ဝုတ္တရသော သန္တောသောဝ, သောကကောဓာဒိလက္ခဏော ကရုဏာရုဒ္ဒါဒိကော ကထံ ရသော နာမ ဘဝေယျာတိ အာသင်္ကာယမာဟ ‘‘ဒုက္ခရူပေ’’ဣစ္စာဒိ. အယံ အာနန္ဒော ‘‘သာမဇ္ဇိကာနမာနန္ဒော’’တိအာဒိနာ နိဒ္ဒိဋ္ဌော ဒုက္ခရူပေ ဒုက္ခလက္ခဏေ ကရုဏာဒိကေ ကရုဏာရုဒ္ဒါဒိကေ ဝိသယေ ကထံ ဘဝေယျာတိ စေ, နေသ ဒေါသော ဟိ တထေဝ ဝေဿန္တရဿ ဗောဓိသတ္တဿ သောကော ပုတ္တဒါရဝိရဟတော ဇာတသောကော သောတူနံ ဣဒါနိ သုဏန္တာနံ သဗ္ဘာနံ အာနန္ဒော သိယာ အာနန္ဒဿ ကာရဏတ္တာ ကာရိယောပစာရေန သန္တောသော နာမ ဘဝေယျာတိ. ဝတ္တုနော သာမတ္ထိယာ ကရုဏာရသာဒိကံ ပါပေတွာ ပကာသိယမာနဿ သောကာဒိကဿ ဒုက္ခရူပေန ဌိတတ္တာ သုဏန္တာနံ ပီတိ ဥပ္ပာဒိယတေဝါတိ အဓိပ္ပာယော. ဒုက္ခံ ရူပံ သဘာဝေါ ယဿ ကရုဏာဒိနောတိ စ, ကရုဏာ အာဒိ ယဿ ရုဒ္ဒါဒိနောတိ စ ဝါကျံ. ३५५. खाली सांगितलेला रस हा संतोषच आहे, तर शोक, क्रोध इत्यादी लक्षणे असलेला करुण, रौद्र इत्यादी रस कसा बरे होऊ शकतो? अशी शंका आल्यावर 'दुःखरूपे' इत्यादी म्हटले आहे. 'सामाजिकानमानंदो' इत्यादींद्वारे निर्दिष्ट केलेला हा आनंद दुःखरूप किंवा दुःखलक्षण असलेल्या करुण, रौद्र इत्यादी विषयोंमध्ये कसा असू शकेल? असे विचारल्यास, यात काही दोष नाही. कारण त्याचप्रमाणे बोधिसत्त्व वेस्संतराचा पुत्र आणि पत्नीच्या विरहामुळे झालेला शोक, आता ऐकणाऱ्या सर्व सज्जनांसाठी आनंदच ठरतो. आनंदाचे कारण असल्यामुळे कार्याच्या उपचाराने त्याला संतोष म्हटले जाते. वक्त्याच्या सामर्थ्याने करुण रस इत्यादी अवस्थेला प्राप्त करून प्रकट केल्या जाणाऱ्या शोकादिकांचे स्वरूप दुःखरूप असले, तरी ऐकणाऱ्यांमध्ये प्रीती (आनंद) उत्पन्न होतेच, असा अभिप्राय आहे. 'दुःख हेच ज्याचे रूप किंवा स्वभाव आहे अशा करुण इत्यादींचा', आणि 'करुण ज्याचा आदि आहे अशा रौद्र इत्यादींचा' असे हे वाक्य आहे. ဌာယီဘာဝနိဒ္ဒေသ स्थायीभाव निर्देश ရတိဌာယီဘာဝ रती स्थायीभाव ၃၅၆. ३५६. ရမ္မဒေသကလာကာလ-ဝေသာဒိပဋိသေဝနာ; ယုဝါန’ညောညရတ္တာနံ, ပမောဒေါရတိ ရုစ္စတေ. रमणीय देश, कला, काळ, वेष इत्यादींचे सेवन करणाऱ्या आणि परस्परांवर अनुरक्त असलेल्या तरुणांच्या प्रमदाला (आनंदाला) रती म्हटले जाते. ၃၅၆. သိင်္ဂါရာဒယော ဝိဘာဂတော ဒဿေတုမာဟ ‘‘ရမ္မေ’’စ္စာဒိ. တတ္ထ ‘‘ရမ္မဒေသ’’ဣစ္စာဒိနာ ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝါ ဒဿိတာ. ‘‘ယုဝါန’’န္တိ ဣမိနာ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝေါ. ဣတ္ထီ ဟိ ပုရိသဿ, ပုရိသော ဣတ္ထိယာ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝေါ. ပမောဒေါတိ အညမညာဘိရမဏဝသေန အာမောဒရူပေါ. ३५६. शृंगार इत्यादींचे विभागांनुसार दर्शन घडवण्यासाठी 'रम्मे' इत्यादी म्हटले आहे. तेथे 'रम्यदेश' इत्यादींद्वारे उद्दीपन-विभाव दर्शविले आहेत. 'युवानं' या शब्दाने आलंबन-विभाव दर्शविला आहे. कारण स्त्री ही पुरुषासाठी आणि पुरुष हा स्त्रीसाठी आलंबन-विभाव असतो. 'प्रमोद' म्हणजे परस्परांच्या अभिरमणामुळे उत्पन्न होणारा आनंदस्वरूप भाव होय. ၃၅၆. ဣဒါနိ သိင်္ဂါရာဒိနာမကေ တေရတျာဒိကေ ကမေန နိဒ္ဒိသတိ ‘‘ရမ္မ’’ဣစ္စာဒိနာ. ရမ္မဒေသကလာကာလဝေသာဒိပဋိသေဝနာ ရမဏီယနိရာဝရဏသုစိပဝိတ္တဝါသာရဟဒေသော ရမ္မဂီတိကာဒိကလာ [Pg.344] ရတိဇနကဝသန္တာဒိအနုရူပကာလော မာလာဂန္ဓာဒိ ဥပသောဘိတကိရိယာဒိ မနုညဝေသော, အာဒိသဒ္ဒေန နိဒ္ဒိဋ္ဌဘာသိတမိဟိတာဒိစေတိ ဣမေသံ ဒိဋ္ဌသုတမုတာဒီသု ဒိဋ္ဌာဒိမတ္တမကတွာ ပညာယ တေန တေနာကာရေန ပုနပ္ပုနာနုဘဝနေန အညောညရတ္တာနံ အညမညံ နိမိတ္တာနုဗျဉ္ဇနသင်္ကပ္ပဝသေနာတိရတ္တာနံ ယုဝါနံ တရုဏိတ္ထိ ပုရိသာနံ ပမောဒေါ အဘိရမဏဝသေန သန္တောသော ပီတိ ရတိ ရုစ္စတေ ရုစ္စနတော ‘‘ရတီ’’တိ ဝုစ္စတီတိ. ဣမသ္မိံ ပက္ခေ ရကာရော သန္ဓိဇော. ဒေသော စ ကလာ စ ကာလော စ ဝေသော စေတိ စ, တေ အာဒယော ယေသမိတိ စ, ရမ္မာ စ တေ ဒေသ…ပေ… ဝေသာဒယော စေတိ စ, တေသံ ပဋိ ပုနပ္ပုနံ သေဝနမိတိ စ, အညော စ အညော စေတိ စ, တေသု ရတ္တာတိ စ ဝါကျံ. ३५६. आता सिंगार (शृंगार) इत्यादी नावांच्या आणि रती इत्यादी स्थायीभावांचे क्रमाने "रम्य" इत्यादी शब्दांनी निर्देश करतात. रम्य देश (स्थान), कला, काळ (वेळ), वेष इत्यादींचे सेवन करणे म्हणजे: रमणीय, अडथळामुक्त, स्वच्छ, पवित्र आणि राहण्यास योग्य असा देश; सुंदर गीते इत्यादी कला; रती (प्रेम) उत्पन्न करणारा वसंत ऋतू इत्यादी अनुकूल काळ; माळा, गंध इत्यादींनी सुशोभित क्रिया आणि मनोहर वेष; आणि 'आदि' शब्दाने निर्दिष्ट केलेले भाषण, स्मित इत्यादी. यांच्याविषयी केवळ पाहिलेले, ऐकलेले किंवा अनुभवलेले एवढेच न मानता, प्रज्ञेने त्या त्या प्रकारे वारंवार अनुभव घेतल्याने, परस्परांवर अनुरक्त असलेल्या आणि परस्परांच्या निमित्त (चिन्हे) व अनुव्यंजनांच्या (दुय्यम लक्षणे) संकल्पाने अत्यंत आसक्त झालेल्या तरुण स्त्री-पुरुषांचा जो प्रमोद (आनंद), अभिरमणामुळे मिळणारा संतोष, प्रीती आणि रती आहे, त्याला 'रुच्चते' (आवडणे) या अर्थावरून 'रती' असे म्हटले जाते. या पक्षात 'र' हा वर्ण संधीमुळे झालेला आहे. 'देश, कला, काळ आणि वेष' आणि 'ते आहेत आदी ज्यांचे', 'रम्य आहेत ते देश...पे... वेष इत्यादी', 'त्यांचे प्रति (वारंवार) सेवन करणे', आणि 'एक आणि दुसरा' (परस्पर), 'त्यांच्यामध्ये अनुरक्त' असे हे वाक्य आहे. ၃၅၇. ३५७. ယုတျာ ဘာဝါနုဘာဝါ တေ,နိဗန္ဓာ ပေါသယန္တိ နံ; သောပျာ’ယောဂဝိပ္ပယောဂ-သမ္ဘောဂါနံ ဝသာ တိဓာ. योग्यतेने ते भाव आणि अनुभाव, काव्याच्या रचनेने (निबंधाने) तिला (रतीला) पुष्ट करतात. तो देखील अयोग, विप्रयोग आणि संभोग यांच्या भेदाने तीन प्रकारचा आहे. ၃၅၇. ‘‘ယုတျာ’’ဣစ္စာဒိ. တေ ယထာဝုတ္တာ ဘာဝါနုဘာဝါ ယုတျာ အာလသိယဥဂ္ဂတာဇိဂုစ္ဆာဝဇ္ဇိတာ ယေ သင်္ကာဥဿုက္ကာဒယော ဘာဝါ တံဗျဉ္ဇကာ တဒနုရူပါ အနုဘာဝါ စ အယောဂါဒိကေ သိင်္ဂါရေ ယထာ ယထာ ယုဉ္ဇန္တိ, တာဒိသိယာဝ ယုတ္တိယာ နိဗန္ဓာ နံ ရတိံ သမ္ပောသယန္တိ, သောယေဝမေဝံ ပေါသိတော သိင်္ဂါရော နာမ ရသော သမ္ပဇ္ဇတေ. သောပိ တိဓာတိ သမ္ဗန္ဓော. တတ္ထ အယောဂေါ နာမ ပုဗ္ဗေ အသင်္ဂတာနံ အနုရာဂေန သင်္ဂမမိစ္ဆန္တာနံ ဣတ္ထိပုရိသာနမသင်္ဂမော. အတိသယဝိရုဠှပေမာနမုဘိန္နမ္ပိ သိလေသော ဝိပ္ပယောဂေါ. ဗလဝကာမာဝေသဝိသေသာနံ ကာမီနံ ဒဿနာဒိသမဉ္ဇနံ သမ္ဘောဂေါ. ३५७. “युत्या” (योग्यतेने) इत्यादी. ते वर सांगितलेले भाव आणि अनुभाव योग्यतेने आळस, उग्रता आणि जुगुप्सा (वीभत्सता) यांनी रहित असलेले जे शंका, उत्सुकता इत्यादी भाव आहेत, त्यांचे अभिव्यंजक आणि तदनुरूप अनुभाव अयोग इत्यादी सिंगारामध्ये जसे जसे जोडले जातात, तशाच प्रकारच्या योग्यतेने रचलेले काव्य (निबंध) त्या रतीला चांगल्या प्रकारे पुष्ट करतात. अशा प्रकारे पुष्ट झालेला तोच सिंगार नावाचा रस बनतो. 'तो देखील तीन प्रकारचा आहे' असा संबंध आहे. त्यामध्ये 'अयोग' म्हणजे पूर्वी एकत्र न आलेल्या, परंतु प्रेमामुळे मीलनाची इच्छा करणाऱ्या स्त्री-पुरुषांचे मिलन न होणे (असंगम). अत्यंत दृढ प्रेम असलेल्या दोघांचा विरह (विश्लेष) म्हणजे 'विप्रयोग' होय. तीव्र कामवासनेने युक्त असलेल्या प्रेमींचे दर्शन इत्यादींनी युक्त असणे म्हणजे 'संभोग' होय. ၃၅၇. ဣဒါနိ [Pg.345] ရတိယာ ပုဋ္ဌကာရဏံ ပုဋ္ဌပယောဂဉ္စ ဒဿေတိ ‘‘ယုတျာ’’ဣစ္စာဒိနာ. တေ ဘာဝါနုဘာဝါ နိဒ္ဒိဋ္ဌဗျဘိစာရီဘာဝေသု ရတျာနုရူပဗျဘိစာရီဘာဝေါ တပ္ပကာသကော အနုဘာဝေါ စေတိ ဣမေ ဒွေ ယုတျာ ဟေတုဘူတာယ အယောဂဝိပ္ပယောဂသမ္ဘောဂသင်္ခတာနံ တိဏ္ဏံ သိင်္ဂါရာနံ အနုကူလတ္ထေန ရတိယာ ဝိရုဒ္ဓတ္တာ အာလသိယဥဂ္ဂဇိဂုစ္ဆာဒိကေ ပရိဝဇ္ဇေတွာ သင်္ကာဥဿုက္ကာဒီနံ ရတျာနုကူလဘာဝါနံ ဝသေန ယထာယောဂံ နိဗန္ဓာ ကဝီဟိ ဗန္ဓာ နံ ရတိံ ပေါသယန္တိ ယထာ တပ္ပကာသနေန ပူရေန္တိ သဇ္ဇေန္တိ, ဧဝံ သဇ္ဇိတော ရတိသိင်္ဂါရော နာမ ရသော ဟောတိ. သောပိ သာမညေန နိဒ္ဒိဋ္ဌသိင်္ဂါရရသောပိ အယောဂဝိပ္ပယောဂသမ္ဘောဂါနံ သိင်္ဂါရာနံ ဝသာ ဘေဒေန တိဓာ ဘဝတီတိ. တတ္ထ အယောဂေါ နာမ ပုဗ္ဗေ အညမညသင်္ဂမရဟိတာနံ အဘိနဝါနုရာဂဗလေန သင်္ဂမံ ပတ္ထေန္တာနံ ထီပုမာနံ အသင်္ဂမော. ဝိပ္ပယောဂေါ နာမ သင်္ဂမာတိသယေန ဝိရုဠှပေမာနံ ထီပုမာနံ အညမညဝိသိလေသော. သမ္ဘောဂေါ နာမ ဗလဝကာမတဏှာဝိသေသဝသေန ယုတ္တာနံ ကာမိနိကာမုကာနံ အညမညံ ဒဿနာဒိအဿာဒေါ. ဘာဝေါ စ အနုဘာဝေါ စေတိ စ, အယောဂေါ စ ဝိပ္ပယောဂေါ စ သမ္ဘောဂေါ စေတိ စ ဝါကျံ. ३५७. आता रतीच्या पुष्टीचे कारण आणि पुष्टीचा प्रयोग "युत्या" इत्यादींनी दाखवतात. ते भाव आणि अनुभाव म्हणजे निर्दिष्ट केलेल्या व्यभिचारी भावांमध्ये रतीला अनुकूल असणारा व्यभिचारी भाव आणि त्याचा प्रकाशक अनुभाव, हे दोन्ही योग्यतेच्या कारणाने अयोग, विप्रयोग आणि संभोग नावाच्या तिन्ही सिंगारांच्या अनुकूल अर्थाने, रतीच्या विरुद्ध असल्यामुळे आळस, उग्रता, जुगुप्सा इत्यादींचा त्याग करून, शंका, उत्सुकता इत्यादी रतीला अनुकूल असणाऱ्या भावांच्या द्वारे योग्य रीतीने कवींनी रचलेल्या काव्याच्या (निबंधाच्या) बंधांनी त्या रतीला पुष्ट करतात, म्हणजेच तिच्या प्रकाशनाने ती पूर्ण व सज्ज करतात. अशा प्रकारे सज्ज झालेला रती-सिंगार नावाचा रस होतो. तो सामान्यपणे निर्दिष्ट केलेला सिंगार रस देखील अयोग, विप्रयोग आणि संभोग या सिंगारांच्या भेदाने तीन प्रकारचा होतो. त्यामध्ये 'अयोग' म्हणजे पूर्वी परस्परांच्या मीलनापासून रहित असलेल्या, नवीन प्रेमाच्या बळाने मीलनाची इच्छा करणाऱ्या स्त्री-पुरुषांचे मिलन न होणे (असंगम). 'विप्रयोग' म्हणजे मीलनाच्या अतिशयामुळे दृढ प्रेम झालेल्या स्त्री-पुरुषांचा परस्परांपासून विरह (विश्लेष). 'संभोग' म्हणजे तीव्र कामतृष्णेच्या विशेष प्रभावामुळे एकत्र आलेल्या प्रेमी आणि प्रेयसीचा परस्परांचे दर्शन इत्यादींचा आस्वाद घेणे. 'भाव आणि अनुभाव', 'अयोग, विप्रयोग आणि संभोग' असे हे वाक्य आहे. ဣမမလင်္ကာရံ ကရောန္တေန အာစရိယသံဃရက္ခိတမဟာသာမိပါဒေန ပန ပရမမဓုရသဒ္ဓမ္မာမတလုဒ္ဓသုဒ္ဓသန္တာနာနံ တပေါဓနာနံ အညရသာဝဗောဓနေ ပယောဇနာဘာဝေပိ လောကိယေသု တေသု တေသု ဝေါဟာရေသု အသမ္မောဟတ္ထံ သိင်္ဂါရာဒိနဝဝိဓရသာနံ လက္ခဏမတ္တဿေဝ ဒဿိတတ္တာ တဒနုရူပလက္ခိယပရိဂ္ဂဟေ အသတိ လက္ခဏာဝဗောဓဿ သုဗျတ္တာဘာဝတော ဝုတ္တလက္ခဏာဝဗောဓတ္ထံ တံတံလက္ခဏကထနာနန္တရံ တဿ တဿ လက္ခိယဿ မုခမတ္တံ ဒဿေတဗ္ဗံ ဟောတိ. ဟေဋ္ဌာ ‘‘ရာဂါနတဗ္ဘုတသရောဇမုခံ ဓရာယာ’’တိအာဒိနာ နိဒ္ဒိဋ္ဌသမ္ဘောဂသိင်္ဂါရရသာဘာသေနေဝ ဟသာဘာသာဒီနံ အဋ္ဌန္နံ [Pg.346] ရသာဘာသရူပဿ ဘာဝါဘာသဿ, ဝိဘာဝါဘာသဿ, အနုဘာဝါဘာသဿ စ ဉာတဗ္ဗတ္တာ သိင်္ဂါရရသဿ လက္ခိယမေဝံ ဝေဒိတဗ္ဗံ. हा अलंकार ग्रंथ रचणाऱ्या आचार्य संघरक्षित महास्वामीजींनी परम मधुर सद्धर्माच्या अमृताचे भुकेले असलेल्या शुद्ध अंतःकरणाच्या तपस्वींना इतर रसांच्या आकलनाचे काही प्रयोजन नसले, तरी लौकिक व्यवहारांमध्ये संभ्रम निर्माण होऊ नये म्हणून सिंगार इत्यादी नऊ प्रकारच्या रसांचे केवळ लक्षणच दाखवले आहे. परंतु, तदनुरूप उदाहरणांचे (लक्ष्य) ग्रहण केल्याशिवाय लक्षणाचे आकलन स्पष्ट होत नसल्यामुळे, सांगितलेल्या लक्षणाच्या आकलनासाठी त्या त्या लक्षणाच्या कथनानंतर त्या त्या उदाहरणाचा केवळ तोंडओळख (मुखमात्र) दाखवणे आवश्यक ठरते. खाली "रागानातब्भुतsarojamukhaṃ dharāyā" इत्यादींद्वारे निर्दिष्ट केलेल्या संभोग-सिंगार रसाभासाप्रमाणेच हासाभास इत्यादी आठ रसाभासांच्या रूपातील भावाभास, विभावाभास आणि अनुभावाभास जाणून घ्यायचे असल्यामुळे, सिंगार रसाचे उदाहरण (लक्ष्य) याप्रमाणे समजून घ्यावे. ဂီတဿရေန ဥပကဍ္ဎိယ နေတ္တရသ္မိ-ဗန္ဓံ ကရံဝ ဝိဝသဉ္စ ကရဂ္ဂဟေန; ယာ တာဒိသေပိ ဝိနိယောဇယိ ဒုက္ကရေ မံ,သေရန္ဒတီ အဓိဂတာ ဝိဓိနာ မယဇ္ဇာတိ. जिने मला गीताच्या स्वराने ओढून, डोळ्यांच्या किरणांच्या बंधनाने बांधून आणि हाताने पकडून विवश (परवश) केले; जिने मला अशा कठीण कार्यात प्रवृत्त केले, ती इरंदती आज मला भाग्याने प्राप्त झाली आहे. ဂီတဿရေန ဟတ္ထီနံ ဂီတိကာယ ပိယတ္တာ ဂီတိကာဓနိနာ ဥပကဍ္ဎိယ အတ္တနော သမီပံ အာကဍ္ဎိတွာ နေတ္တရသ္မိဗန္ဓံ နေတ္တသင်္ခါတဟတ္ထာစရိယဿ ရဇ္ဇုနာ ဗန္ဓံ ကရဂ္ဂဟေန ဟတ္ထဂ္ဂါဟေန သောဏ္ဍဂ္ဂဟဏေန ဝိဝသဉ္စ အပဂတဣစ္ဆာစာရံ ပရဝသံ ကရံ ဣဝ ဟတ္ထံ ဣဝ ဂီတဿရေန အတ္တနော လီလောပေတဂီတိကာဓနိနာ ဥပကဍ္ဎိယ အတ္တနော သမီပံ နေတွာ နေတ္တရသ္မိဗန္ဓံ အတ္တနော နယနကန္တိယာ ပဋိဗန္ဓံ ကရဂ္ဂဟေန ဟတ္ထဂ္ဂါဟေန ဝိဝသဉ္စ အပဂတဓိတိံ မူဠှံ မံ ယာ ကန္တာ တာဒိသေပိ ဒုက္ကရေ ဝိနိယောဇယိ, သာ ဣရန္ဒတီ ဣရန္ဒတီ နာမ နာဂမာနဝိကာ မယာ အဇ္ဇ ဝိဓိနာ ဘာဂျေန အဓိဂတာ လဒ္ဓါတိ. हत्तींना गाणे प्रिय असल्यामुळे गीताच्या स्वराने, म्हणजेच गायनाच्या ध्वनीने ओढून, स्वतःच्या जवळ खेचून, डोळ्यांच्या किरणांच्या बंधनाने म्हणजे डोळे नावाच्या हत्तीच्या माहुताच्या दोरीने बांधून, हाताने पकडून म्हणजे सोंड पकडून, विवश म्हणजे स्वतःची इच्छा नष्ट झालेल्या परवश हत्तीप्रमाणे, आपल्या विलासमय गायनाच्या स्वराने ओढून, स्वतःच्या जवळ नेऊन, डोळ्यांच्या किरणांच्या बंधनाने म्हणजे स्वतःच्या डोळ्यांच्या कांतीने बांधून, हाताने पकडून (हात धरून), विवश म्हणजे धैर्य गमावलेल्या आणि मोहित झालेल्या मला ज्या कांतेने (स्त्रीने) अशा कठीण कार्यात प्रवृत्त केले, ती 'इरंदती' नावाची नागकन्या आज मला भाग्याने (दैवाने) प्राप्त झाली आहे. ဧတ္ထ ဂီတဿရနေတ္တရသ္မိကရဂ္ဂဟသင်္ခတာဟိ ဣမာဟိ ပဒါဝလီဟိ ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝေါ ဒဿိတော. ထိယာ ပုရိသော စ, ပုရိသဿ ထီ စ အာလမ္ဗဏံ ဟောတီတိ ‘‘သာ ဣရန္ဒတီ မယာ’’တိ ဣမိနာ အာရမ္မဏဝိဘာဝေါ ဒဿိတော. ‘‘ဥပကဍ္ဎိယ ဗန္ဓံ ဝိဝသ’’န္တိ ဣမေဟိ ကာမေန ဥဒ္ဒီပိတဌာယီဘာဝသင်္ခတာ ရတိ ဒဿိတာ. ‘‘တာဒိသေပိ ဒုက္ကရေ ဝိနိယောဇယီ’’တိ ဣမေဟိ ဥဿာဟာဒိကာ စ ‘‘ဝိဓိနာ အဓိဂတာ မယဇ္ဇာ’’တိ ဣမေဟိ ဟရိသာဒိကာ စ ဗျဘိစာရီဘာဝါ ဒဿိတာ. ရတိယာ ဝိရုဒ္ဓေ နိဗ္ဗေဒအာလသိယဥဂ္ဂတဇိဂုစ္ဆာဒိကေ ဗျဘိစာရီဘာဝေ ဝဇ္ဇေတွာ ဝုတ္တပ္ပကာရဝိဘာဝါဒိကေ ပကာသန္တော ‘‘ဂီတဿရေနေ’’စ္စာဒိကာ ရတိပ္ပတီတိယာ အနုရူပံ ပယုတ္တာ ကဝိပ္ပယောဂါ ဣဓ အနုဘာဝါ နာမ ဟောန္တိ. နာဋကာဒိဒဿနီယသတ္ထေ အဘိနယော [Pg.347] အနုဘာဝေါ. ရမ္မဒေသရမ္မကာလရမ္မဝေသာဒယော တဒဘာဝေ ရတိယာ အနုပ္ပဇ္ဇနတော သာမတ္ထိယာ ဂမျာ ဘဝန္တီတိ ဧဝံ လက္ခဏာနုဂတလက္ခိယပရိဂ္ဂါဟော သဗ္ဗတ္ထ ကာတဗ္ဗော. ဧဝံ သတိဗန္ဓတ္ထာဝဗောဓကာနံ သဗ္ဘာနံ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာယပီတိယာ ကာရဏတ္တာ ကာရိယောပစာရေန ဧသော ဗန္ဓော ရသော နာမ ဟောတီတိ. ဥပရိပိ ဧဝမေဝ. येथे 'गीतस्वर, नेत्ररश्मी आणि करग्रह' (हात पकडणे) या पदसमूहांद्वारे 'उद्दीपन विभाव' दाखवला आहे. स्त्रीसाठी पुरुष आणि पुरुषासाठी स्त्री ही आलंबन असते, म्हणून "ती इरंदती माझ्याद्वारे" या शब्दांनी 'आलंबन विभाव' दाखवला आहे. "ओढून, बांधून आणि विवश" या शब्दांनी कामामुळे उद्दीपित झालेल्या स्थायीभावरूप 'रती' दाखवली आहे. "तशा कठीण कार्यात प्रवृत्त केले" याने उत्साह इत्यादी आणि "आज मला भाग्याने प्राप्त झाली" याने हर्ष इत्यादी व्यभिचारी भाव दाखवले आहेत. रतीच्या विरुद्ध असणारे निर्वेद, आळस, उग्रता, जुगुप्सा इत्यादी व्यभिचारी भाव वर्ज्य करून, वर सांगितलेल्या प्रकारच्या विभावांना प्रकाशित करणारा "गीतस्वराने" इत्यादी रतीच्या प्रतीतीला अनुकूल असा कवीचा प्रयोग येथे 'अनुभाव' ठरतो. नाटक इत्यादी दृश्य शास्त्रांमध्ये अभिनय हाच अनुभाव असतो. रम्य देश, रम्य काळ, रम्य वेष इत्यादी त्यांच्या अभावी रती उत्पन्न होत नसल्यामुळे सामर्थ्याने समजून घेण्याजोगे होतात; अशा प्रकारे लक्षणाला अनुसरून उदाहरणाचे ग्रहण सर्वत्र केले पाहिजे. अशा प्रकारे, काव्याच्या अर्थाचे आकलन करणाऱ्या सज्जनांना उत्पन्न होणाऱ्या प्रीतीचे (आनंदाचे) कारण असल्यामुळे, कार्याच्या उपचाराने हा बंध 'रस' या नावाने ओळखला जातो. पुढेही याचप्रमाणे समजून घ्यावे. ဟဿဌာယီဘာဝ हास्य स्थायीभाव ၃၅၈. ३५८. ဝိကာရာကတိအာဒီဟိ,အတ္တနော’ထ ပရဿ ဝါ; ဟာသော နိဒ္ဒါ သမာလသျ-မုစ္ဆာဒိဗျဘိစာရိဘိ; ပရိပေါသေ သိယာ ဟဿော,ဘိယျော’တ္ထိပဘုတီန သော. विकृत आकृती इत्यादींमुळे स्वतःचा किंवा दुसऱ्याचा जो हास (हास्य) उत्पन्न होतो, तो निद्रा, आळस, मूर्च्छा इत्यादी व्यभिचारी भावांनी पुष्ट झाल्यावर 'हास्य रस' बनतो. तो हास्य रस बहुतांश करून स्त्रिया आणि कनिष्ठ प्रकृतीच्या लोकांमध्ये आढळतो. ၃၅၈. ‘‘ဝိကာရေ’’စ္စာဒိ. ဝိကာရာကတိ ဒေသဝယာဒီနံ ဝိပရီတော ကေသဗန္ဓနာဒိ, သော အာဒိ ယေသံ အညာကတျာဒိနစ္စနာဒီနံ, တေဟိ ဝိဘာဝေဟိ ဟာသော စေတောဝိကာသော, သောပိ အတ္တနော သမ္ဗန္ဓီ ဝါ အထ ပရဿ သမ္ဗန္ဓီ ဝါ, တတ္ထ ယော ဝိဘာဝသာမတ္ထိယာယေဝါဘိဗျတ္တိံ ယာတိ, သော အတ္တဋ္ဌော. ယော ပန ဝိဘာဝဒဿနာ ဥပ္ပန္နာပိ ပုရိသဿ ဂမ္ဘီရတ္တာဒိနာ ဆာဒိတော သမာနော ပုရိသန္တရေ ဟသတျာဘိဗျတ္တော, သော ပရဋ္ဌော. သော ဟာသော နိဒ္ဒါဒီဟိ ဗျဘိစာရီဟိယေဝ, အနုဘာဝပက္ခေ အာဒိသဒ္ဒေန အက္ခိဖန္ဒနာဒယော ဂဟိတာ. ပရိပေါသေ သတိ ဟဿော နာမ ရသော သိယာ. သော ဟဿော ဘိယျော ဣတ္ထိပဘုတီနံ သိယာတိ သမ္ဗန္ဓော. ဧတ္ထ ပဘုတိသဒ္ဒေန နီစပကတယော သင်္ဂဏှန္တိ. ३५८. “विकार” इत्यादी. विकृत आकृती म्हणजे देश, वय इत्यादींच्या विपरीत असणारी केशरचना इत्यादी; ती आहे आदी ज्यांच्या अशा इतर आकृती, नृत्य इत्यादी विभावांनी जो 'हास' (चित्ताचा विकास) होतो, तो स्वतःशी संबंधित असतो किंवा दुसऱ्याशी संबंधित असतो. त्यामध्ये जो विभावाच्या सामर्थ्यानेच अभिव्यक्त होतो, तो 'आत्मस्थ' (स्वतःमध्ये असलेला) होय. परंतु, जो विभाव पाहिल्याने उत्पन्न होऊनही माणसाच्या गंभीरतेमुळे लपवला जातो आणि दुसऱ्या माणसाने हसल्यामुळे अभिव्यक्त होतो, तो 'परस्थ' (दुसऱ्यामध्ये असलेला) होय. तो हास निद्रा इत्यादी व्यभिचारी भावांनीच पुष्ट होतो; अनुभावाच्या पक्षात 'आदि' शब्दाने डोळे मिचकावणे इत्यादी घेतले जातात. पुष्टी झाल्यावर 'हास्य' नावाचा रस होतो. तो हास्य रस बहुतांश करून स्त्रिया इत्यादींमध्ये होतो, असा संबंध आहे. येथे 'प्रभृती' (इत्यादी) शब्दाने कनिष्ठ प्रकृतीचे (स्वभावाचे) लोक घेतले जातात. ၃၅၈. ဣဒါနိ ဟဿရသဿ ပေါသနာကာရံ ဒဿေတုမာဟ ‘‘ဝိကာရ’’ဣစ္စာဒိ. ဝိကာရာကတိအာဒီဟိ ဒေသဝယောလိင်္ဂါနံ [Pg.348] ဝိပရီတေဟိ ကေသဗန္ဓဂတိဋ္ဌိတိအာဒိကေဟိ, နစ္စဂီတအာဒိကေဟိ စ ဒုဝိဓေဟိ အာကတိသင်္ခတေဟိ ဟေတုဘူတေဟိ အတ္တနော ဝါ အထ ပရဿ ဝါ သမ္ဗန္ဓီ သော ဟာသော စေတော ဝိကာသလက္ခဏော နိဒ္ဒါသမာလသျမုစ္ဆာဒိဗျဘိစာရိဘိ နိဒ္ဒါသမအာလသျမုစ္ဆာအက္ခိဖန္ဒနာဒီဟိ အနုဘာဝေဟိ သုတသမ္ဗန္ဓေန တေဟေဝ နိဒ္ဒါသမာလသျမုစ္ဆာသင်္ခတဗျဘိစာရီဟိ ကရဏဘူတေဟိ ပရိပေါသေ သတိ ဟဿော ဟဿော နာမ ရသော သိယာ, သော ဟဿော ဘိယျော ဣတ္ထိပဘုတီနံ, နီစပကတီနဉ္စ သိယာတိ. ဝိကာရာ စ သာ အာကတိ စေတိ စ, သော အာဒိ ယေသန္တိ စ, နိဒ္ဒါ စ သမော စ အာလသျဉ္စ မုစ္ဆာ စေတိ စ, တေ အာဒိ ယေသံ အက္ခိဖန္ဒနာဒီနံ အနုဘာဝါနန္တိ စ, တေ စ ဗျဘိစာရိနော စေတိ စ, ဣတ္ထီ ပဘုတိ ယေသံ နီစပကတီနန္တိ စ ဝါကျံ. ३५८. आता हास्य रसाच्या पुष्टीचा प्रकार दाखवण्यासाठी "विकार" इत्यादी म्हणतात. देश, वय आणि लिंग यांच्या विपरीत असणाऱ्या केशरचना, चालणे, उभे राहणे इत्यादी आणि नृत्य, गीत इत्यादी अशा दोन प्रकारच्या आकृतीरूप कारणांमुळे स्वतःचा किंवा दुसऱ्याचा जो चित्तविकासरूप 'हास' उत्पन्न होतो, तो निद्रा, श्रम (थकवा), आळस, मूर्च्छा इत्यादी व्यभिचारी भावांनी आणि निद्रा, श्रम, आळस, मूर्च्छा, डोळे मिचकावणे इत्यादी अनुभावांनी, तसेच ऐकलेल्या संबंधाने निद्रा, श्रम, आळस, मूर्च्छा रूप व्यभिचारी भावांच्या कारणाने पुष्ट झाल्यावर 'हास्य' नावाचा रस होतो. तो हास्य रस बहुतांश करून स्त्रिया आणि कनिष्ठ प्रकृतीच्या लोकांमध्ये होतो. 'विकृत आहे ती आकृती', 'ती आहे आदी ज्यांच्या', 'निद्रा, श्रम आणि आळस व मूर्च्छा', 'ते आहेत आदी ज्यांच्या अशा डोळे मिचकावणे इत्यादी अनुभावांचे', 'आणि ते व्यभिचारी आहेत', 'स्त्री आहे आदी ज्यांच्या अशा कनिष्ठ प्रकृतीचे लोक' असे हे वाक्य आहे. ဟဿပ္ပဘေဒ हास्याचे प्रकार ၃၅၉. ३५९. သိတမိဟ ဝိကာသိနယနံ,ကိဉ္စာ’လက္ခိယဒိဇန္တု တံ ဟသိတံ; မဓုရဿရံ ဝိဟသိတံ,သံသသိရောကမ္ပမုပဟသိတံ. येथे (हास्यामध्ये) डोळे विकसित होणे म्हणजे 'स्मित' (सित) होय; दात थोडे दिसणे म्हणजे 'हसित' होय; मधुर स्वर असणे म्हणजे 'विहसित' होय; आणि खांदे व डोके हलवण्यासह असणे म्हणजे 'उपहसित' होय. ၃၆၀. ३६०. အပဟသိတံ သဉ္ဇလ’က္ခိ,ဝိက္ခိတ္တင်္ဂံ ဘဝတျ’တိဟသိတံ; ဒွေ ဒွေ ဟဿာ ကထိတာ စေ’သံ,ဇေဋ္ဌေ မဇ္ဈေ’ဓမေပိ စ ကမသော. डोळ्यांत पाणी (अश्रू) असणे म्हणजे 'अपहसित' होय; आणि शरीराचे अवयव इकडेतिकडे फेकणे (हातपाय झाडणे) म्हणजे 'अतिहसित' होय. या हास्यांपैकी दोन-दोन प्रकार क्रमाने ज्येष्ठ (उत्तम), मध्यम आणि अधम (कनिष्ठ) प्रकृतीच्या लोकांमध्ये सांगितले आहेत. ၃၅၉-၃၆၀. ဟဿေ ဘေဒမာဟ ‘‘သိတ’’မိစ္စာဒိနာ. ဣဟ ဟဿေ ဝိကာသီနိ နယနာနိ ယဿ တံ သိတံ, ကိဉ္စိ အာလက္ခိယာ ဒိဇာ ဒန္တာ ယဿ တံ ဟသိတံ. ဧဝံ မဓုရော သရော သဒ္ဒေါ ယဿ တံ ဝိဟသိတံ. အံသသိရောကမ္ပေန သဟ ဝတ္တမာနံ ဥပဟသိတံ, သဟ ဇလေန အဿုနာ ဝတ္တမာနာနိ အက္ခီနိ [Pg.349] ယဿ တံ အပဟသိတံ. ဝိက္ခိတ္တာနိ ဣတော တတော ပသာရိတာနိ အင်္ဂါနိ ယဿ တံ အတိဟသိတံ နာမ. ဧသဉ္စ သိတာဒီနံ မဇ္ဈေ ဒွေ ဒွေ ဟဿာ အာဒိတော ပဋ္ဌာယ ကမသော ယထာက္ကမေန ဇေဋ္ဌေ မဇ္ဈေ အဓမေပိ စ ကထိတာတိ သမ္ဗန္ဓော. ပုရာတနေဟီတိ ဝိညာယတိ. ३५९-३६०. “सित” (स्मित) इत्यादींद्वारे हास्याचे भेद सांगतात. येथे हास्यामध्ये ज्याचे डोळे विकसित होतात ते 'स्मित' (सित) होय; ज्याचे दात थोडे दिसतात ते 'हसित' होय. त्याचप्रमाणे ज्याचा स्वर (आवाज) मधुर असतो ते 'विहसित' होय. खांदे आणि डोके हलवण्यासह असणारे ते 'उपहसित' होय; डोळ्यांत पाण्यासह (अश्रूंसह) असणारे ते 'अपहसित' होय. इकडेतिकडे पसरवलेले (फेकलेले) अवयव असणारे ते 'अतिहसित' होय. आणि या स्मित इत्यादींपैकी सुरुवातीपासून दोन-दोन हास्य प्रकार क्रमाने ज्येष्ठ, मध्यम आणि अधम प्रकृतीच्या लोकांमध्ये सांगितले आहेत, असा संबंध आहे. 'प्राचीन आचार्यांनी' असे म्हटले आहे, असे समजले जाते. ၃၅၉-၃၆၀. ဣဒါနိ ဟဿဘေဒံ ဒဿေတိ ‘‘သိတ’’မိစ္စာဒိနာ. ဣဟ ဣမသ္မိံ ဟဿဝိသယေ ဝိကာသိနယနံ ဝိဝဋနယနံ သိတံ နာမ. ကိဉ္စိ အာလက္ခိယဒိဇံ တု ကိဉ္စိ ဒိဿမာနဒန္တံ, တံ ဟသိတံ နာမ. မဓုရဿရံ မဓုရနာဒံ ဝိဟသိတံ နာမ. သံသသိရောကမ္ပံ အံသသိရောကမ္ပသဟိတံ ဥပဟသိတံ နာမ. သဇလက္ခိ အဿုဝိလောစနသဟိတံ အပဟသိတံ နာမ. ဝိက္ခိတ္တင်္ဂံ အဋ္ဌာနေ ပသာရဏဝသေန ဝိက္ခိတ္တဟတ္ထပါဒါဒိအဝယဝဝန္တံ အတိဟသိတံ နာမ ဘဝတိ. ဧသံ ဆန္နံ ကမသော ကမေန ဒွေ ဒွေ ဇေဋ္ဌေ မဇ္ဈေ အဓမေပိ ဝိသယေ ကထိတာ ပုရာတနေဟိ ဘာသိတာတိ. ဝိကာသီနိ နယနာနိ အဿေတိ စ, ကိဉ္စိ ဤသကံ အာလက္ခိယာ ဒိဇာ ယဿေတိ စ, မဓုရော သရော အဿေတိ စ, အံသော စ သိရော စေတိ စ, အံသသိရသော ကမ္ပောတိ စ, တေန သဟ ဝတ္တတီတိ စ, သဟ ဇလေန ဝတ္တမာနာနိ အက္ခီနိ ယဿေတိ စ, အနုသွရာဂမော. ဝိက္ခိတ္တာနိ အင်္ဂါနိ ယဿေတိ စ ဝါကျံ. သိတဟသိတဒွယံ ဥတ္တမေ, ဝိဟသိတဥပဟသိတဒွယံ မဇ္ဈိမေ, အပဟသိတအတိဟသိတဒွယံ အဓမေ ဝတ္တတေ. ဧဝံ သိတာဒယော အနုရူပဝိဘာဝါဒိနာ ပယုတ္တာ ဣမေ ရသာ’ဝတ္ထံ ပါပုဏန္တီတိ အဓိပ္ပာယော. ३५९-३६०. आता "सित" इत्यादींद्वारे हास्यरसाचे भेद दाखवितात. येथे या हास्यविषयात डोळे प्रफुल्लित किंवा विकसित होणे म्हणजे 'सित' (मंदस्मित) होय. थोडे दात दिसणे म्हणजे 'हसित' (हसणे) होय. मधुर स्वर किंवा मधुर नाद असणे म्हणजे 'विहसित' होय. खांदे आणि डोके हलविण्यासह असणे म्हणजे 'उपहसित' होय. डोळ्यात पाणी किंवा अश्रू असणे म्हणजे 'अपहसित' होय. अयोग्य ठिकाणी हात-पाय इत्यादी अवयव पसरविल्यामुळे विखुरलेले अंग असणे म्हणजे 'अतिहसित' होय. या सहा प्रकारांचे क्रमाने दोन-दोन प्रकार उत्तम, मध्यम आणि अधम वर्गाच्या विषयात प्राचीन आचार्यांनी सांगितले आहेत. प्रफुल्लित डोळे असणे, थोडे दात दिसणे, मधुर स्वर असणे, खांदे आणि डोके हलविणे, डोळ्यात पाणी असणे आणि विखुरलेले अंग असणे हे यांचे स्पष्टीकरण आहे. 'सित' आणि 'हसित' हे दोन उत्तम पात्रांमध्ये, 'विहसित' आणि 'उपहसित' हे दोन मध्यम पात्रांमध्ये, तर 'अपहसित' आणि 'अतिहसित' हे दोन अधम पात्रांमध्ये आढळतात. अशा प्रकारे सितादी प्रकार योग्य विभाव इत्यादींनी युक्त होऊन रसावस्थेला प्राप्त होतात, असा अभिप्राय आहे. ဟဿရသဿ ဧဝမုဒါဟရဏံ ဉာတဗ္ဗံ – हास्यरसाचे उदाहरण याप्रमाणे जाणावे – ပူဇေသိ ကဏ္ဌမဏိနာ အပိ ယော ပသန္နော,ဓမ္မေ ပုရာ’သမဓုရံ ဝိဓုရံ သ ဟန္တုံ; ဂေါပေန္တိယာပိ ဝစနေန ထိယာ သဘာဝံ; ဘတ္တိံ အကာသိ ဖရုသေ မယိ နာဂရာဇာတိ. "जो पूर्वी धर्मावर प्रसन्न होऊन आपल्या कंठमण्यानेही पूजा करीत असे, तो नागराज आता स्वतःचा स्वभाव लपविणाऱ्या स्त्रीच्या शब्दांवर विश्वास ठेवून, अतुलनीय अशा विधुर पंडिताचा वध करण्यासाठी, माझ्यासारख्या क्रूर व्यक्तीवर भक्ती (विश्वास) करीत आहे." ယော [Pg.350] ပုရာ ပုဗ္ဗေ ဓမ္မေ တဿ ဓမ္မကထနေ ပသန္နော ကဏ္ဌမဏိနာ အပိ အတ္တနော အနဂ္ဃကဏ္ဌမဏိနာပိ တံ ပူဇေသိ, သော နာဂရာဇာ သဘာဝံ အတ္တနော အဓိပ္ပာယံ ဂေါပေန္တိယာ အပိ ထိယာ ဝစနေန ဣတ္ထိယာ ဝစနေန အသမဓုရံ တုလျရဟိတံ ဝိဓုရံ ဝိဓုရပဏ္ဍိတံ ဟန္တုံ ဝိနာသနတ္ထံ ဖရုသေ စဏ္ဍေ မယိ ဘတ္တိံ အကာသီတိ. ဣဟ ဧကသ္မိံယေဝ ဝတ္ထုနိ နာဂရာဇဿ ပသာဒဝဓဝိဓာနာဒိဝိပရီတပ္ပဝတ္တိ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝေါ, ပဌမံ အနဂ္ဃပိယဝတ္ထူဟိ ပူဇိတဘာဝေါ စ ဗောဓိသတ္တဿ အတုလျဘာဝေါ စ ဣတ္ထိဝစနဿ သမ္ပဋိစ္ဆနဘာဝေါ စ တဿာဓိပ္ပာယဿ အညာတဘာဝေါ စ ပုဏ္ဏကဿ စဏ္ဍဘာဝေါ စေတိ ဣမေဟိ သဗ္ဗဝစနေဟိ ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝေါ ဒဿိတော. ဣမေဟိ ဥဒ္ဒီပိတဌာယီဘာဝသင်္ခတော ဟာသော ဝါကျသာမတ္ထိယာ ပကာသိတော ဟာသဝိရောဓိနိဗ္ဗေဒါဒိဝဇ္ဇိတာ သမာလသိယသန္တောသအဿုဝေပထာဒိကာ ဗျဘိစာရီဘာဝါ သာတ္တိကာဘာဝါ စ ဧဝံ သာမတ္ထိယေန ဒီပိတာ. တဒနုရူပဝိဘာဝါဒိပကာသကာ ယထာဝုတ္တကဝိပ္ပယောဂါ အနုဘာဝါ နာမ ဟောန္တိ. ဟဿဘေဒေန မဇ္ဈိမေ ပုရိသေ ဝတ္တဗ္ဗာပိ ဟသိတဥပဟသိတာ ဒွေ ဣမာ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. जो पूर्वी धर्मावर आणि त्यांच्या धर्मकथनावर प्रसन्न होऊन आपल्या अमूल्य कंठमण्यानेही त्यांची पूजा करीत असे, तो नागराज स्वतःचा हेतू लपविणाऱ्या स्त्रीच्या शब्दांमुळे, अतुलनीय अशा विधुर पंडिताचा नाश करण्यासाठी माझ्यासारख्या क्रूर आणि उग्र व्यक्तीवर भक्ती (विश्वास) करीत आहे. येथे एकाच विषयात नागराजाची प्रसन्नता आणि वध करण्याची इच्छा ही विपरीत प्रवृत्ती 'आलंबन विभाव' आहे. सुरुवातीला अमूल्य व प्रिय वस्तूंनी केलेली पूजा, बोधिसत्त्वांचे अतुलनीयत्व, स्त्रीच्या शब्दांचा स्वीकार करणे, तिचा खरा हेतू न समजणे आणि पुण्णकाचा क्रूर स्वभाव या सर्व शब्दांद्वारे 'उद्दीपन विभाव' दर्शविला आहे. यांद्वारे उद्दीपित झालेला स्थायीभाव असलेला 'हास' (हास्य) वाक्याच्या सामर्थ्याने प्रकट होतो. हास्यविरोधी असलेल्या निर्वेदादी भावांनी रहित असलेले आळस, संतोष, अश्रू, कंप इत्यादी व्यभिचारी भाव आणि सात्त्विक भाव अशा प्रकारे सामर्थ्याने प्रकाशित होतात. त्याला अनुरूप असणारे विभाव इत्यादी प्रकट करणारे आणि वर सांगितलेल्या विप्रयोगाला दर्शविणारे 'अनुभाव' असतात. हास्यभेदांमध्ये मध्यम पुरुषांच्या बाबतीत 'हसित' आणि 'उपहसित' हे दोन प्रकार येथे पाहावे लागतात. ကရုဏာဌာယီဘာဝ करुण स्थायीभाव ၃၆၁. ३६१. သောကရူပေါ တု ကရုဏော-နိဋ္ဌပတ္တိဋ္ဌနာသတော; တတ္ထာ’နုဘာဝါ ရုဒိတ-ပလယတ္ထမ္ဘကာဒယော; ဝိသာဒါလသျမရဏ-စိန္တာဒီ ဗျဘိစာရိနော. अनिष्टाची प्राप्ती आणि इष्टाचा नाश यांमुळे शोक उत्पन्न होतो, तोच 'करुण' रस होय. तेथे रडणे, विलाप करणे, स्तब्ध होणे इत्यादी 'अनुभाव' आहेत; आणि विषाद, आळस, मरण, चिंता इत्यादी 'व्यभिचारी भाव' आहेत. ၃၆၁. ‘‘သောကေ’’စ္စာဒိ. အနိဋ္ဌဿ ပုတ္တဝိယောဂါဒိနော ဒေသနိက္ကဍ္ဎနာဒိနော ပတ္တိ စ ဣဋ္ဌဿ ဓမ္မဿ, ဓနာဒိနော ဝါ နာသော စ တတော ဝိဘာဝဘူတေဟိ သမ္ပန္နော သောကရူပေါ [Pg.351] သောကသဘာဝေါ တု ကရုဏော ရသော နာမ. တတ္ထ ဥတ္တမာနံ သောကော ပုတ္တဝိယောဂါဒိအနိဋ္ဌုပ္ပတ္တိတော, ဓမ္မာဒိဣဋ္ဌနာသတော စ ဇာယတေ. နီစာနံ တု ဒေသနိက္ကဍ္ဎနာဒိအနိဋ္ဌုပ္ပတ္တိတော, ဓနာဒိဣဋ္ဌနာသတော စ, ပရေသံ ဓနာဒိနာသတော တု ဥတ္တမဿေဝ မဟာကာရုဏိကတ္တာ, သေသံ သုဗောဓံ. အနုဘာဝေါ ပနေတ္ထ ယထောစိတျံ နိရူပယိတဗ္ဗော. ३६१. "सोके" इत्यादी. अनिष्टाची म्हणजे पुत्रवियोग, देशातून हाकलून देणे इत्यादींची प्राप्ती आणि इष्टाचा म्हणजे धर्म, धन इत्यादींचा नाश या विभावजन्य कारणांमुळे उत्पन्न होणारा शोकरूप किंवा शोकस्वभाव असलेला रस म्हणजे 'करुण रस' होय. तेथे उत्तम पुरुषांचा शोक हा पुत्रवियोगासारख्या अनिष्टाच्या प्राप्तीमुळे आणि धर्मासारख्या इष्टाच्या नाशामुळे उत्पन्न होतो. कनिष्ठ लोकांचा शोक हा देशातून हाकलून देण्यासारख्या अनिष्टाच्या प्राप्तीमुळे आणि धनासारख्या इष्टाच्या नाशामुळे उत्पन्न होतो. इतरांच्या धनादीच्या नाशामुळे होणारा शोक हा केवळ महाकारुणिक असल्यामुळे उत्तम पुरुषांनाच होतो. उर्वरित भाग समजण्यास सोपा आहे. येथे अनुभाव योग्यतेनुसार समजून घ्यावा. ၃၆၁. ဣဒါနိ ကရုဏာရသပေါသနက္ကမံ ဒဿေတိ ‘‘သောက’’ဣစ္စာဒိနာ. အနိဋ္ဌပ္ပတ္တိဋ္ဌနာသတော ပုတ္တဝိယောဂါဒိနော, ဒေသစာဂါဒိနော ဝါ အနိဋ္ဌဿ ဥပ္ပတ္တိ စ သီလာဒိနော, ဓနာဒိနော ဝါ ဣဋ္ဌဿ ကန္တိဝတ္ထုနော ဝိနာသော စာတိ ဣမေဟိ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝေဟိ ကရဏဘူတေဟိ ဥပ္ပန္နော သောကရူပေါ တု သောကသဘာဝေါ ပန ကရုဏော ကရုဏာရသော နာမ ဟောတိ. တတ္ထ ကရုဏာရသေ ရုဒိတပလယတ္ထမ္ဘကာဒယော ရုဒိတော ပလယော ထမ္ဘောတိအာဒယော အနုဘာဝါ နာမ ဘဝန္တီတိ. ထမ္ဘာဒီနံ သရူပေါ ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တောဝ. ဝိသာဒအာလသျမရဏစိန္တာဒယော ဗျဘိစာရိနော တသ္မိံယေဝ ဗျဘိစာရိနော ဘဝန္တိ. ဣဟ ပုတ္တဝိယောဂါဒိအနိဋ္ဌပ္ပတ္တိယာ စ သီလဓမ္မာဒိဣဋ္ဌနာသနေန စ ဥတ္တမာနံ သောကော ဥပ္ပဇ္ဇတိ, ဒေသစာဂါဒိအနိဋ္ဌပ္ပတ္တိယာ စ ဓနာဒိဣဋ္ဌနာသနေန စ နီစာနံ. အညေသံ ဓနာဒိဝိနာသနေန ပန မဟာကရုဏိကတ္တာ ဥတ္တမဿေဝ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. တသ္မိံ ဝိသယေ သော သောကော သေသာနံ နုပ္ပဇ္ဇတိ. တသ္မာ ယထာရဟံ ပယောဂေါ ကာတဗ္ဗော. သောကဿ ရူပေါ သဘာဝေါတိ စ, အနိဋ္ဌဿ ပတ္တီတိ စ, ဣဋ္ဌဿ နာသောတိ စ, အနိဋ္ဌပ္ပတ္တိ စ ဣဋ္ဌနာသော စေတိ စ, ရုဒိတဉ္စ ပလယော စ ထမ္ဘကော စေတိ စ, တေ အာဒိ ယေသမိတိ စ, ဝိသာဒေါ စ အာလသျဉ္စ မရဏဉ္စ စိန္တာ စေတိ စ, တာ အာဒိ ယေသမိတိ စ ဝါကျံ. ဣမဿ ကရုဏာရသဿ လက္ခိယမေဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ – ३६१. आता "शोक" इत्यादींद्वारे करुण रसाच्या पोषणाचा क्रम दाखवितात. अनिष्टाची प्राप्ती आणि इष्टाचा नाश म्हणजे पुत्रवियोग, देशत्याग इत्यादी अनिष्टांची उत्पत्ती आणि शील, धन इत्यादी प्रिय वस्तूंचा विनाश या आलंबन विभावांच्या कारणांमुळे उत्पन्न होणारा शोकरूप किंवा शोकस्वभाव असलेला रस म्हणजे 'करुण रस' होय. त्या करुण रसात रडणे, विलाप करणे, स्तब्ध होणे इत्यादी अनुभाव असतात. स्तब्धता इत्यादींचे स्वरूप खाली सांगितलेच आहे. विषाद, आळस, मरण, चिंता इत्यादी व्यभिचारी भाव त्यातच उत्पन्न होतात. येथे पुत्रवियोगासारख्या अनिष्टाच्या प्राप्तीमुळे आणि शीलधर्मासारख्या इष्टाच्या नाशामुळे उत्तम पुरुषांना शोक उत्पन्न होतो; तर देशत्यागासारख्या अनिष्टाच्या प्राप्तीमुळे आणि धनासारख्या इष्टाच्या नाशामुळे कनिष्ठ लोकांना शोक होतो. इतरांच्या धनादीच्या विनाशाने केवळ महाकारुणिक असल्यामुळे उत्तम पुरुषांनाच शोक उत्पन्न होतो. त्या विषयात इतरांना तो शोक उत्पन्न होत नाही. म्हणून योग्यतेनुसार त्याचा प्रयोग करावा. शोकाचे रूप किंवा स्वभाव, अनिष्टाची प्राप्ती, इष्टाचा नाश, अनिष्टप्राप्ती आणि इष्टनाश, रडणे, विलाप आणि स्तब्धता इत्यादी, विषाद, आळस, मरण आणि चिंता इत्यादी हे या वाक्यांचे स्पष्टीकरण आहे. या करुण रसाचे उदाहरण याप्रमाणे पाहावे – အာကဍ္ဎိတေ’ကသတရာဇပုရက္ခတော [Pg.352] ယော,ဓမ္မေန အာသနမလံကုရုတေ ဇိနောဝ; သော အဿဝါလမဝလမ္ဗိယ ဒါနိ နီတော,ယက္ခေန လောကတိလကော ကုရုတေ ကိမေကောတိ. "जो एकशे एक राजांनी वेढलेला असून, जिनाप्रमाणे (बुद्धाप्रमाणे) धर्माने (धर्माचरणाने किंवा धर्मोपदेशाने) आसनाला अलंकृत करीत असे; तो जगाचा टिळक (श्रेष्ठ पुरुष) आता यक्षाने ओढून नेला असून, घोड्याच्या शेपटीला लटकून काय बरे करीत असेल?" ယော ဧကသတရာဇပုရက္ခတော ရာဇူနံ ဧကသတေန ပရိဝါရိတော ဇိနော ဣဝ ဗုဒ္ဓေါ ဣဝ ဓမ္မေန မဓုရဓမ္မကထနေန အာသနံ ဓမ္မာသနံ အလံကုရုတေ သဇ္ဇေတိ, လောကတိလကော လောကဿ ပိယတာယ တိလကာလင်္ကာရဘူတော သော ဝိဓုရပဏ္ဍိတော ယက္ခေန ပုဏ္ဏကေန အာကဍ္ဎိတော ဟုတွာ နီတော အဿဝါလံ အဝလမ္ဗိယ ဣဒါနိ ဧကော ကိံ ကုရုတေတိ. ဣဟာနီတောတိ ဒဿိတပိယဝတ္ထုဝိယောဂေါ သောကဿ အာလမ္ဗဏဝိဘာဝေါ ဟောတိ. ‘‘အာကဍ္ဎိတေကသတရာဇေ’’စ္စာဒိနာ သကလေန ဝါကျေန ဥဒ္ဒီပနဝိဘာဝေါ ဒဿိတော, ဥဒ္ဒီပိတသောကသင်္ခါတဌာယီဘာဝေါ စ ဝိသာဒါလသျစိန္တာဒိကော ဗျဘိစာရီဘာဝေါ စ ရုဒိတပလယထမ္ဘကာဒိကာ ဝိဘာဝါဒိဗောဓကအနုဘာဝါ စ ဝါကျသာမတ္ထိယေန ဒီပိတာ ဟောန္တိ. जो एकशे एक राजांनी वेढलेला, जिनाप्रमाणे म्हणजेच बुद्धाप्रमाणे धर्माने (मधुर धर्मकथनाने) आसनाला (धर्मासनाला) अलंकृत करीत असे, जगाचा टिळक (लोकांचा प्रिय असल्यामुळे टिळकाप्रमाणे अलंकाररूप असलेला) तो विधुर पंडित यक्ष पुण्णकाने ओढून नेला असता, घोड्याच्या शेपटीला लटकून आता एकटा काय करीत असेल? येथे 'नेला गेला' यावरून दर्शविलेला प्रिय वस्तूचा वियोग हा शोकाचा 'आलंबन विभाव' आहे. "आकड्ढिते कसत राजे" इत्यादी संपूर्ण वाक्याने 'उद्दीपन विभाव' दर्शविला आहे. उद्दीपित झालेल्या शोकरूप स्थायीभाव, विषाद, आळस, चिंता इत्यादी व्यभिचारी भाव आणि रडणे, विलाप, स्तब्धता इत्यादी विभावबोधक अनुभाव वाक्याच्या सामर्थ्याने प्रकाशित होतात. ရုဒ္ဒဌာယီဘာဝ रौद्र स्थायीभाव ၃၆၂. ३६२. ကောဓော မစ္ဆရိယာဒီဟိ, ပေါသေ တာသမဒါဒိဘိ; နယနာရုဏတာဒီဟိ, ရုဒ္ဒေါ နာမ ရသော ဘဝေ. मत्सर इत्यादींमुळे क्रोध उत्पन्न होतो, तो त्रास, मद इत्यादींनी पुष्ट होतो आणि डोळे लाल होणे इत्यादी अनुभावांनी युक्त असतो, त्याला 'रौद्र' रस म्हणतात. ၃၆၂. ‘‘ကောဓော’’ဣစ္စာဒိ, သုဗောဓံ. ဧတ္ထ ပဌမေန အာဒိသဒ္ဒေန အဝိက္ခေပဥပဟာသာဒယော ဝိဘာဝါ ဂဟိတာ, ဒုတိယေန ဥဂ္ဂသမ္ဘမာဒယော ဗျဘိစာရိနော, တတိယေန ဘူကုဋိပုရဏဩဋ္ဌနိပ္ပီဠနာဒယော အနုဘာဝါ. ३६२. "कोधो" इत्यादी समजण्यास सोपे आहे. येथे पहिल्या 'आदि' शब्दाने अविक्षेप, उपहास इत्यादी विभाव घेतले आहेत; दुसऱ्याने उग्रता, संभ्रम इत्यादी व्यभिचारी भाव; आणि तिसऱ्याने भुवया चढवणे, ओठ दाबणे इत्यादी अनुभाव घेतले आहेत. ၃၆၂. ဣဒါနိ ရုဒ္ဒရသဿ ပေါသနက္ကမံ ဒဿေတိ ‘‘ကောဓော’’ဣစ္စာဒိနာ. ကောဓော မစ္ဆရိယာဒီဟိ မစ္ဆရိယအဝိက္ခေပဥပဟာသာဒီဟိ အာလမ္ဗဏာဒီဟိ ဝိဘာဝေဟိ စ ဟေတုဘူတေဟိ တာသမဒါဒီဟိ တာသမဒဥဂ္ဂတသမ္ဘမာဒီဟိ ဗျဘိစာရီဘာဝေဟိ [Pg.353] စ နယနာရုဏတာဒီဟိ နေတ္တရတ္တသုဘင်္ဂဩဋ္ဌပီဠနာဒီဟိ အနုဘာဝေဟိ စ ကရဏဘူတေဟိ ပေါသေ သတိ ရုဒ္ဒေါ နာမ ရသော ဘဝေတိ. မစ္ဆရိယံ အာဒိ ယေသန္တိ စ, တာသော စ မဒေါ စေတိ စ, တေ အာဒိ ယေသမိတိ စ, နယနာနိ စ တာနိ အရုဏာနိ စာတိ စ, တေသံ ဘာဝေါတိ စ, သာ အာဒိ ယေသမိတိ စ ဝါကျံ. ३६२. आता रौद्र रसाच्या पोषणाचा क्रम "कोधो" इत्यादींद्वारे दाखवितात. मत्सर, अविक्षेप, उपहास इत्यादी आलंबन विभाव कारणीभूत असताना, आणि त्रास, मद, उग्रता, संभ्रम इत्यादी व्यभिचारी भावांनी आणि डोळे लाल होणे, भुवया चढवणे, ओठ दाबणे इत्यादी अनुभावांनी पुष्ट झालेला क्रोध म्हणजेच 'रौद्र रस' होय. मत्सर इत्यादी, त्रास आणि मद इत्यादी, डोळे लाल होणे आणि त्यांची अवस्था इत्यादी हे या वाक्यांचे स्पष्टीकरण आहे. ရုဒ္ဒရသဿ ဥဒါဟရဏမေဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ – रौद्र रसाचे उदाहरण याप्रमाणे पाहावे – ယက္ခေန ဘော အဓိဂတောသိ မနုဿဘက္ခေ,နာ’ဿဿ ဝါလ’မဝလမ္ဗ ပုရံ အဝေက္ခ; ဝေရမ္ဘဝါတမုခစုဏ္ဏိတသဗ္ဗဂတ္တော,မစ္စော ကထံ ပုနပိ ပဿတိ ဇီဝလောကန္တိ. "हे माणसा, तू मनुष्यभक्षक यक्षाच्या हाती सापडला आहेस! आता घोड्याच्या शेपटीला लटकून आपल्या नगराकडे शेवटचे पाहून घे; कारण वेरंभ वाऱ्याच्या तडाख्याने ज्याचे सर्व शरीर चूर्ण झाले आहे, असा मनुष्य पुन्हा जिवंत लोकाला (या जगाला) कसा पाहू शकेल?" ဘော မနုဿဘက္ခေန ယက္ခေန အဓိဂတောသိ ဂဟိတော အသိ, အဿဿ ဝါလမဝလမ္ဗ ဝါလဓိံ ဂဟေတွာ ဣဒါနေဝ ပုရံ အဝေက္ခ တုယှံ နဂရံ ဩလောကေဟိ, တထေဝ ဟိ ဝေရမ္ဘဝါတမုခစုဏ္ဏိတသဗ္ဗဂတ္တော ဝေရမ္ဘဝါတဿ အဘိမုခိစုဏ္ဏိတသကလသရီရော မစ္စော မနုဿော ဇီဝလောကံ သတ္တလောကံ ပုနပိ ကထံ ပဿတီတိ. ဣဟ မစ္ဆရိယာဒိဝိဘာဝါ စ ကောဓာဒိသင်္ခါတော ဌာယီဘာဝေါ စ ဝါကျသာမတ္ထိယာ ဒီပိတာ ဟောန္တိ, အပရဒ္ဓေန တာသမဒဥဂ္ဂတာဒိဗျဘိစာရီဘာဝါ ဝိဘာဝိတာ ဟောန္တိ. သမုဒါယေန နယနာရုဏတာဒယော အနုဘာဝါ သူစိတာ ဟောန္တိ. "हे माणसा, तू मनुष्यभक्षक यक्षाच्या हाती सापडला आहेस (पकडला गेला आहेस), घोड्याची शेपटी धरून आताच तुझ्या नगराकडे पाहून घे (अवलोकन कर). कारण वेरंभ वाऱ्याच्या तडाख्याने ज्याचे सर्व शरीर चूर्ण झाले आहे, असा मनुष्य पुन्हा जिवंत लोकाला (प्राणिमात्रांच्या जगाला) कसा पाहू शकेल?" येथे मत्सर इत्यादी विभाव आणि क्रोधादी स्थायीभाव वाक्याच्या सामर्थ्याने प्रकाशित होतात. अपराधाने त्रास, मद, उग्रता इत्यादी व्यभिचारी भाव स्पष्ट होतात. एकत्रितपणे डोळे लाल होणे इत्यादी अनुभाव सूचित होतात. ဝီရဌာယီဘာဝ वीर स्थायीभाव ၃၆၃. ३६३. ပတာပဝိက္ကမာဒီဟု-ဿာဟော ဝိရောတိ သညိတော; ရဏဒါနဒယာယောဂါ, ဝီရော’ယံ တိဝိဓော ဘဝေ; တေဝါ’နုဘာဝါ ဓိတိမ-တျာဒယော ဗျဘိစာရိနော. प्रताप, पराक्रम इत्यादींमुळे उत्पन्न झालेला उत्साह 'वीर' रस म्हणून ओळखला जातो. युद्ध, दान आणि दया यांच्या योगाने हा वीर रस तीन प्रकारचा होतो. तेथे युद्ध करणे इत्यादी अनुभाव असतात आणि धृती (धैर्य), मती इत्यादी व्यभिचारी भाव असतात. ၃၆၃. ‘‘ပတာပိ’’စ္စာဒိ. ပတာပေါ သတ္တုသန္တာပကာရီ တေဇော, ဝိက္ကမော ပရမဏ္ဍလက္ကမန္တံ, တေ အာဒယော ယေသံ ဗလာဝိက္ခေပါဒီနံ [Pg.354] ပဋိပုဂ္ဂလဂတာနံ ဝိဘာဝါနံ, တေဟိ ဇာတော ဥဿာဟော ရသတ္တမာပန္နော ဝီရော ရသောတိ သညိတော, အယံ ဝီရော ရဏဒါနဒယာယောဂါ တိဝိဓော ဘဝေ ယုဒ္ဓဝီရော ဒါနဝီရော ဒယာဝီရောတိ, တေ ယုဒ္ဓကရဏာဒယော ဧဝ တတ္ထ အနုဘာဝါ ဘဝန္တိ. ဓိတိမတိဥဂ္ဂတာဒယော ဗျဘိစာရိနော ဘဝန္တီတိ. ३६३. "प्रताप" इत्यादी. प्रताप म्हणजे शत्रूला संताप देणारे तेज, पराक्रम म्हणजे शत्रूच्या राज्यावर आक्रमण करणे; हे ज्यांचे आदि आहेत अशा प्रतिपक्षाच्या बल, अविक्षेप इत्यादी विभावांमुळे उत्पन्न झालेला उत्साह जेव्हा रसावस्थेला प्राप्त होतो, तेव्हा त्याला 'वीर रस' असे म्हणतात. हा वीर रस युद्ध, दान आणि दया यांच्या योगाने तीन प्रकारचा होतो – युद्धवीर, दानवीर आणि दयावीर. तेथे युद्ध करणे इत्यादीच अनुभाव असतात. धृती, मती, उग्रता इत्यादी व्यभिचारी भाव असतात. ၃၆၃. ဣဒါနိ ဝီရရသဘေဒံ, ပေါသနက္ကမဉ္စ ဒဿေတိ ‘‘ပတာပ’’ဣစ္စာဒိနာ. ပတာပဝိက္ကမာဒီဟိ အညရာဇူနံ ဒဏ္ဍဇတေဇသင်္ခတပတာပေါ, တေသမေဝ ပရမဏ္ဍလက္ကမနသင်္ခါတဝိက္ကမော ဖလဘေဒေါ စေတိအာဒီဟိ ဥပ္ပန္နော ဥဿာဟော ဝီရောတိ ဝီရရသောတိ သညိတော ကဝီဟိ ဉာတော, အယံ ဝီရရသော ရဏဒါနဒယာယောဂါ ယုဒ္ဓစာဂကရုဏာယောဂေန ဟေတုဘူတေန တိဝိဓော ဘဝေ. တေ ဧဝ ရဏဒါနဒယာ ဧဝ ဣမာ အနုဘာဝါ နာမ ဟောန္တိ. ဓိတိမတျာဒယော ဓိတိမတိဥဂ္ဂတဂဗ္ဗာဒယော ဗျဘိစာရိနော ဘာဝါ ဟောန္တီတိ. ယုဒ္ဓဝီရဒါနဝီရဒယာဝီရဝသေန ဝီရရသော တိဝိဓော ဟောတိ. ပတာပေါ စ ဝိက္ကမော စေတိ စ, တေ အာဒိ ယေသမိတိ စ, ရဏော စ ဒါနဉ္စ ဒယာ စေတိ စ, တာဟိ ယောဂေါတိ စ, တယော ဝိဓာ ပကာရာ အဿာတိ စ, ဓိတိ စ မတိ စေတိ စ, တာ အာဒိ ယေသမိတိ စ ဝါကျံ. ३६३. आता वीर रसाचे भेद आणि त्याच्या पोषणाचा क्रम "प्रताप" इत्यादींद्वारे दाखवितात. प्रताप आणि पराक्रम इत्यादींमुळे म्हणजे इतर राजांच्या दंडात्मक तेजाला प्रताप म्हणतात, आणि त्यांच्याच परराज्यावरील आक्रमणाला पराक्रम म्हणतात, या फलभेदादींमुळे उत्पन्न झालेला उत्साह कवींनी 'वीर रस' म्हणून ओळखला आहे. हा वीर रस युद्ध, दान आणि दया यांच्या योगाने (युद्ध, त्याग आणि करुणा यांच्या कारणाने) तीन प्रकारचा होतो. युद्ध, दान आणि दया हेच येथे अनुभाव असतात. धृती, मती, उग्रता, गर्व इत्यादी व्यभिचारी भाव असतात. युद्धवीर, दानवीर आणि दयावीर या भेदांमुळे वीर रस तीन प्रकारचा होतो. प्रताप आणि पराक्रम इत्यादी, युद्ध, दान आणि दया इत्यादी, त्यांच्याशी योग, त्याचे तीन प्रकार, धृती आणि मती इत्यादी हे या वाक्यांचे स्पष्टीकरण आहे. ဝီရရသဿ ဥဒါဟရဏမေဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ – वीर रसाचे उदाहरण याप्रमाणे पाहावे – ဝိညာပေတွာ ကုဝေရံ သုမဟတိ-မပိ စေ’ကောဝကုမ္ဘဏ္ဍသေနံ,ဥတ္တာသေတွာ ဂဟေတွာ မဏိရတနဝရံလက္ခမာဓာယ ဇူတေ; ဇေတွာ ကောရဗျရာဇံ သစိဝရတန-မုဒ္ဓစ္စ ရညံ သတမှာ,ဧတ္ထာနေတွာ’ဒိယိဿံ သုယုဝတိရတနံကော မမေ’တ္ထ’တ္ထိ ဘာရောတိ. "कुबेराला विनंती करून किंवा कुंभंडाच्या विशाल सेनेला भयभीत करून श्रेष्ठ मणिरत्न प्राप्त करीन; द्युतात (जुगारात) लाख पणाला लावून, कौरव्य राजाला जिंकून आणि शंभर राजांमधून श्रेष्ठ अमात्याला (विधुर पंडिताला) सोडवून येथे आणून त्या सुंदर युवतीरत्नाला (इरंदतीला) प्राप्त करीन. यात माझ्यासाठी कोणता मोठा भार (कठीण काम) आहे?" ကုဝေရံ [Pg.355] ဝေဿဝဏမဟာရာဇံ ဝိညာပေတွာ ဗောဓေတွာ သုမဟတိမပိ ကုမ္ဘဏ္ဍသေနံ အတိမဟန္တိံ ကုမ္ဘဏ္ဍသေနံ ဧကောဝ ဥတ္တာသေတွာ ဘယံ ဇနေတွာ မဏိရတနဝရံ ဂဟေတွာ ဇူတေ အက္ခကီဠာယံ လက္ခံ အာဓာယ ဌပေတွာ ကောရဗျရာဇံ ဇေတွာ ရညံ သတမှာ ရာဇသမ္ဗန္ဓိနာ သတေန သစိဝရတနံ အမစ္စရတနံ ဥဒ္ဓစ္စ ဥဒ္ဓရိတွာ ဧတ္ထာနေတွာ သုယုဝတိရတနံ သောဘနဣတ္ထိရတနံ အာဒိယိဿံ ဂဏှိဿာမိ, ဧတ္ထ ယထာဝုတ္တေသု မမ ကော ဘာရော အတ္ထီတိ. ဧတ္ထ ‘‘ကော မမေတ္ထတ္ထိ ဘာရော’’တိ ဣမိနာ ဥဿာဟသင်္ခါတော ဌာယီဘာဝေါ ပကာသိတော. ဧတဿ ဥပ္ပတ္တိဥဒ္ဒီပနေသု ကာရဏဘူတဿ ဣတ္ထိရတနဿ အာဒါနချာတနာဂရာဇဂတပတာပဝိက္ကမာဒိဝိဘာဝေါ စ, တံတံရူပပ္ပကာသကကဝိဝစနသင်္ခါတာနုဘာဝေါ စ ‘‘ဝိညာပေတွာ’’ဣစ္စာဒိနာ ဝါကျသာမတ္ထိယေန ပဋိပါဒနီယာ ဟောန္တိ. ‘‘သုမဟတိမပိ ကုမ္ဘဏ္ဍသေနံ ဧကော’’တိ စ, ‘‘ရညံ သတမှာ သစိဝရတနမုဒ္ဓစ္စာ’’တိ စ ဣမေဟိ ဓိတိဥဂ္ဂတဂဗ္ဗာဒယော စ, ‘‘ဝိညာပေတွာ ကုဝေရ’’န္တိ စ, ‘‘ဥတ္တာသေတွာ ကောရဗျရာဇ’’န္တိ စ, ‘‘ဧတ္ထာနေတွာ ဣစ္စာဒယော’’တိ စ ဣမေဟိ မတျာဒယော စ ဗျဘိစာရိနော ဘာဝါ ဝိဘာဝိတာ ဟောန္တိ. ဣမေဟိ ဝိဘာဝါနုဘာဝဗျဘိစာရီဘာဝေဟိ ယုဒ္ဓဝီရရသော ပေါသိတောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ဣမိနာယေဝ နယေန ဒါနဝီရာဒယော ဝိညာတဗ္ဗာ. कुवेर वैश्रवण महाराजांना समजावून (विनंती करून) आणि बोध करून, अत्यंत विशाल अशा कुंभांड सेनेला, अतिशय मोठ्या कुंभांड सेनेला एकट्यानेच भयभीत करून, त्यांच्यात भीती निर्माण करून, श्रेष्ठ मणिरत्न घेऊन, द्यूत खेळात (फाशांच्या खेळात) लक्ष (लाख) पणाला लावून, कोरव्य राजाला जिंकून, राजाच्या शंभर नातेवाईक राजांमधून श्रेष्ठ अमात्यरत्न (विदुर पंडित) यांना खेचून काढून, येथे आणून, सुंदर युवतीरत्न (शोभन स्त्रीरत्न) मी प्राप्त करीन, ग्रहण करीन; यात वर सांगितलेल्या गोष्टींमध्ये माझा काय भार (कठीण काम) आहे? येथे 'यात माझा काय भार आहे?' याने उत्साहात्मक 'स्थायीभाव' प्रकट केला आहे. याच्या उत्पत्ती आणि उद्दीपनाला कारणीभूत असलेल्या स्त्रीरत्नाचे ग्रहण करणे, प्रसिद्ध नागराजाकडे जाणे, प्रताप, पराक्रम इत्यादी 'विभाव' आहेत; आणि त्या त्या रूपाला प्रकट करणाऱ्या कवीच्या वचनात्मक 'अनुभाव' हे 'विज्ञापेत्वा' (समजावून) इत्यादी वाक्यांच्या सामर्थ्याने प्रतिपादन केले जातात. 'अत्यंत विशाल कुंभांड सेनेला एकटाच' आणि 'राजाच्या शंभरामधून अमात्यरत्नाला खेचून काढून' यांद्वारे धृती (धैर्य), गर्व इत्यादी, आणि 'कुवेराला समजावून', 'कोरव्य राजाला भयभीत करून', 'येथे आणून' इत्यादींद्वारे मती (बुद्धी) इत्यादी 'व्यभिचारी भाव' स्पष्ट केले आहेत. या विभाव, अनुभाव आणि व्यभिचारी भावांद्वारे 'युद्धवीर रस' पोषित झाला आहे, असे समजावे. याच पद्धतीने दानवीर इत्यादी रसही समजून घ्यावेत. ဘယဌာယီဘာဝ भय स्थायीभाव ၃၆၄. ३६४. ဝိကာရိသနသတ္တာဒိ-ဘယုက္ကံသော ဘယာနကော; သေဒါဒယော’နုဘာဝေ’တ္ထ,တာသာဒီ ဗျဘိစာရိနော. विकारी आवाज, प्राणी इत्यादींमुळे भयाचा जो उत्कर्ष होतो, तो 'भयानक रस' होय. येथे घाम येणे इत्यादी 'अनुभाव' आहेत आणि त्रास (भीती) इत्यादी 'व्यभिचारी भाव' आहेत. ၃၆၄. ‘‘ဝိကာရိ’’စ္စာဒိ. ဝိကာရိ အသဘာဝပ္ပဝတ္တော ဝိရုဒ္ဓေါ သနော သဒ္ဒေါ သတ္တော စ, တေ အာဒယော ယေသံ သုညာရညာဒီနံ [Pg.356] ဣတ္ထိနီစပ္ပကတိသမ္ဘဝန္တာနံ, ဝိဘာဝါနံ, ဂုရုအာဒီနံ ဝါ ဥတ္တမာနံ, တေဟိ ဇာတဿ ဘယဿ, ကိတ္တိမဿ ဝါ ဥက္ကံသော ဘယာနကော နာမ ရသော. ဧတ္ထ သေဒကမ္ပနပါဒစလနာဒယော အနုဘာဝါ, တာသာဒယော ဗျဘိစာရိနော. ३६४. 'विकारी' इत्यादी. विकारी म्हणजे अस्वाभाविकपणे प्रवृत्त झालेला विरुद्ध आवाज (शब्द) आणि प्राणी, जे शून्य अरण्य इत्यादींमध्ये राहणारे, स्त्री किंवा नीच प्रकृतीच्या लोकांमध्ये उत्पन्न होणारे 'विभाव' आहेत, किंवा गुरु इत्यादी उत्तम लोकांच्या बाबतीत जे विभाव आहेत, त्यांच्यामुळे निर्माण झालेल्या स्वाभाविक किंवा कृत्रिम भयाचा उत्कर्ष म्हणजेच 'भयानक' नावाचा रस होय. येथे घाम येणे, थरथरणे, पाय लटपटणे इत्यादी 'अनुभाव' आहेत आणि त्रास (भीती) इत्यादी 'व्यभिचारी भाव' आहेत. ၃၆၄. ဣဒါနိ ဘယာနကရသဿ ပေါသနက္ကမံ ဒဿေတိ ‘‘ဝိကာရိ’’စ္စာဒိနာ. ဝိကာရိသနသတ္တာဒိဘယုက္ကံသော ပကတိဝိရဟေန ဝိကာရဝန္တေဟိ ဝိရုဒ္ဓေဟိ အသနိသဒ္ဒါဒိသဒ္ဒေဟိ, ရက္ခသာဒိသတ္တေဟိ ဝါ ဝိဘာဝေဟိ ဟေတုဘူတေဟိ သဉ္ဇာတော သာဘာဝိကော, ကိတ္တိမော ဝါ ဘယပဋိဗန္ဓော ဥက္ကံသော ဘယာနကရသော နာမ ဟောတိ. ဧတ္ထ ဘယာနကရသဝိသယေ သေဒါဒယော ဒါဟသရီရကမ္ပနာဒယော အနုဘာဝါ ကာယိကဝါစသိကပ္ပယောဂသင်္ခတာ အနုဘာဝါ ဟောန္တိ. တာသာဒီ ဗျဘိစာရိနော တာသသင်္ကာဒယော ဣဟ ဗျဘိစာရီဘာဝါ ဟောန္တီတိ. သနော စ သတ္တော စေတိ စ, ဝိကာရော ဧတေသံ အတ္ထီတိ စ, ဝိကာရိနော စ တေ သနသတ္တာ စေတိ စ, တေ အာဒယော ယေသံ သုညာရညာဒီနမိတိ စ, တေဟိ ဇာတံ ဘယမိတိ စ, မဇ္ဈေ ပဒလောပေါ, တဿ ဥက္ကံသောတိ စ, သေဒေါ အာဒိ ယေသံ ကမ္ပနာဒီနမိတိ စ, တာသော အာဒိ ယေသံ သင်္ကာဒီနမိတိ စ ဝါကျံ. ဣတ္ထိနီစပ္ပကတိကာနံ ဘယဟေတု ဝိကာရိသနသတ္တာဒိ, ဥတ္တမာနံ ဂုရုအာဒိ. ३६४. आता 'विकारी' इत्यादींद्वारे भयानक रसाच्या पोषणाचा क्रम दाखवितात. 'विकारिसनसत्तादिभयुक्कंसो' म्हणजे प्रकृतीचा (स्वाभाविकतेचा) अभाव असल्यामुळे विकारयुक्त, विरुद्ध अशा वीज कोसळण्याच्या आवाजासारख्या शब्दांमुळे किंवा राक्षस इत्यादी प्राण्यांसारख्या कारणीभूत असलेल्या 'विभावां'मुळे निर्माण झालेला स्वाभाविक किंवा कृत्रिम भयाशी संबंधित उत्कर्ष म्हणजेच 'भयानक रस' होय. येथे भयानक रसाच्या विषयात घाम येणे, दाह होणे, शरीर थरथरणे इत्यादी शारीरिक आणि वाचिक प्रयोगांनी युक्त असलेले 'अनुभाव' होतात. त्रास (भीती), शंका इत्यादी येथे 'व्यभिचारी भाव' होतात. 'सद्द' (आवाज) आणि 'सत्त' (प्राणी), ज्यांना विकार आहे ते 'विकारी', आणि ते विकारी आवाज व प्राणी इत्यादी ज्या शून्य अरण्यादींचे विभाव आहेत, त्यांच्यामुळे निर्माण झालेले भय (येथे मध्यमपदलोपी समास आहे), त्याचा उत्कर्ष; घाम येणे इत्यादी ज्या थरथरणे इत्यादींचे आदि आहे, त्रास ज्या शंका इत्यादींचे आदि आहे, असे हे वाक्य आहे. स्त्री आणि नीच प्रकृतीच्या लोकांच्या भयाचे कारण विकारी आवाज, प्राणी इत्यादी आहेत, तर उत्तम लोकांच्या भयाचे कारण गुरु इत्यादी आहेत. ဧတ္ထ လက္ခိယမေဝံ ဝေဒိတဗ္ဗံ – येथे याचे उदाहरण खालीलप्रमाणे समजून घ्यावे – ယံ ဒိဋ္ဌိသတ္ထပတနေန ပရိပ္ဖုရန္တီ,ကုမ္ဘဏ္ဍရက္ခသစမူ ဂမိတာ သမန္တာ; အာစက္ကဝါဠနဂ’မဿဂတံ ပုရီဝ,ဘောတော မုဟုံ မုဟု’မပဿိ သ ပုဏ္ဏကော’ဟန္တိ. दृष्टीरूपी शस्त्राच्या प्रहाराने थरथरणारी, कुंभांड आणि राक्षसांची सेना चहूबाजूंनी चक्रवाळ पर्वतापर्यंत पळवून लावली गेली; घोड्यावर बसलेल्या ज्या आपल्याकडे (पुण्णकाकडे) ती सेना एखाद्या नगराकडे पहावे तशी वारंवार पाहत होती, तो मी 'पुण्णक' नावाचा यक्ष आहे. ဒိဋ္ဌိသတ္ထပတနေန ဒိဋ္ဌိသလ္လသမ္ပာတနေန ပရိပ္ဖုရန္တီ ကမ္ပမာနာ သမန္တာ ပရိသမန္တတော အာစက္ကဝါဠနဂံ စက္ကဝါဠပဗ္ဗတာဝဓိ ဂမိတာ ပလာပိတာ ကုမ္ဘဏ္ဍရက္ခသစမူ ကုမ္ဘဏ္ဍရက္ခသာနံ [Pg.357] သေနာ ယံ အဿဂတံ အဿပိဋ္ဌေ နိသိန္နကံ ဘောတော ဘဝတံ တုမှာကံ ပုရီ ဣဝ ပုရိယာ ဒဿနမိဝ မုဟုံ မုဟုံ အပဿိ ခဏေ ခဏေ အပဿိတ္ထ, သော အဟံ ပုဏ္ဏကော နာမ ယက္ခောတိ. ဧတ္ထ ‘‘ဒိဋ္ဌိသတ္ထပတနေနာ’’တိ ဒိဋ္ဌိသတ္ထာရောပနေန စ ‘‘သ ပုဏ္ဏကော အဟ’’န္တိ ဣမိနာ စ ဘယဇနနဿ ဟေတုဘူတဝိရုဒ္ဓသတ္တသင်္ခါတာ ဝိဘာဝါ နိဒ္ဒိဋ္ဌာ, ‘‘မုဟုံ မုဟု’မပဿီ’’တိ ရသာဝတ္ထသမ္ပတ္တဘယုက္ကံသသင်္ခတော ဌာယီဘာဝေါ ဝိဘာဝိတော, ‘‘ကုမ္ဘဏ္ဍရက္ခသစမူ ဂမိတာ သမန္တာ အာစက္ကဝါဠနဂ’’န္တိ တာသသင်္ကာဒိကာ ဗျဘိစာရိနော ဘာဝါ ဇောတိတာ. ‘‘ပရိပ္ဖုရန္တီ’’တိ သေဒကမ္ပာဒယော အနုဘာဝါ ဒဿိတာ ဟောန္တိ. 'दिट्ठिसत्थपतननेन' म्हणजे दृष्टीरूपी शल्य (बाण) मारल्यामुळे 'परिप्फुरन्ती' म्हणजे थरथरणारी, 'समन्ता' म्हणजे चहूबाजूंनी 'आचक्कवाळनगं' म्हणजे चक्रवाळ पर्वताच्या मर्यादेपर्यंत 'गमिता' म्हणजे पळवून लावलेली 'कुम्भाण्डरक्खस चमू' म्हणजे कुंभांड आणि राक्षसांची सेना, 'अस्सगतं' म्हणजे घोड्याच्या पाठीवर बसलेल्या, 'भोतो' म्हणजे आपल्या, तुमच्याकडे 'पुरी इव' म्हणजे नगराच्या दर्शनाप्रमाणे 'मुहुं मुहुं अपस्सि' म्हणजे क्षणाक्षणाला पाहत होती, तो मी 'पुण्णक' नावाचा यक्ष आहे. येथे 'दिट्ठिसत्थपतननेन' म्हणजे दृष्टीरूपी शस्त्राचा रोख करण्याने आणि 'सो पुण्णको अहं' याने भय निर्माण करण्यास कारणीभूत असलेल्या विरुद्ध प्राण्यांच्या रूपातील 'विभाव' निर्दिष्ट केले आहेत. 'मुहुं मुहुं अपस्सि' याने रसावस्थेला प्राप्त झालेल्या भयाचा उत्कर्षरूपी 'स्थायीभाव' स्पष्ट केला आहे. 'कुम्भाण्डरक्खस चमू गमिता समन्ता आचक्कवाळनगं' याने त्रास, शंका इत्यादी 'व्यभिचारी भाव' प्रकट केले आहेत. 'परिप्फुरन्ती' याने घाम येणे, थरथरणे इत्यादी 'अनुभाव' दर्शविले आहेत. ဇိဂုစ္ဆာဌာယီဘာဝ जुगुप्सा (घृणा) स्थायीभाव ၃၆၅. ३६५. ဇိဂုစ္ဆာ ရုဓိရာဒီဟိ,ပူတျာဒီဟိ ဝိရာဂတော; ဗီဘစ္ဆော ခေါဘနု’ဗ္ဗေဂီ,ကမေန ကရုဏာယုတော; နာသာဝိကုနနာဒီဟိ,သင်္ကာဒီဟိ’ဿ ပေါသနံ. रक्त इत्यादींमुळे, कुजलेल्या गोष्टी इत्यादींमुळे आणि वैराग्यामुळे निर्माण झालेली 'जुगुप्सा' (घृणा) अनुक्रमे क्षोभक, उद्वेगजनक आणि करुणेने युक्त अशी 'बीभत्स रस' बनते. नाक मुरडणे इत्यादी 'अनुभावां'द्वारे आणि शंका इत्यादी 'व्यभिचारी भावां'द्वारे याचे पोषण होते. ၃၆၅. ‘‘ဇိဂုစ္ဆာ’’ဣစ္စာဒိ. ရုဓိရန္တာဒီဟိ ပူတိကိမိအာဒီဟိ ဝိရာဂတော စ ဇာတာ ဇိဂုစ္ဆာ ဂရဟာ ကမေန ခေါဘနော ဥဗ္ဗေဂီ ကရုဏာယုတော စ ဗီဘစ္ဆော ဘဝတိ, နာသာဝိကုနနမုခစ္ဆဒနာဒီဟိ အနုဘာဝေဟိ, သင်္ကာဝေဂါဒီဟိ ဗျဘိစာရီဟိ စ အဿ ပေါသနံ ဘဝတီတိ. ३६५. 'जिगुच्छा' इत्यादी. रक्त, आतडे इत्यादींमुळे, कुजलेले किडे इत्यादींमुळे आणि वैराग्यामुळे निर्माण झालेली 'जुगुप्सा' म्हणजे घृणा अनुक्रमे क्षोभक, उद्वेगजनक आणि करुणेने युक्त अशी 'बीभत्स रस' बनते. नाक मुरडणे, तोंड झाकणे इत्यादी 'अनुभावां'द्वारे आणि शंका, आवेग इत्यादी 'व्यभिचारी भावां'द्वारे याचे पोषण होते. ၃၆၅. ဣဒါနိ ဗီဘစ္ဆရသဿ ပေါသနက္ကမံ ဒဿေတိ ‘‘ဇိဂုစ္ဆာ’’ဣစ္စာဒိနာ. ရုဓိရာဒီဟိ ရတ္တန္တဂုဏာဒီဟိ စ, ပူတျာဒီဟိ ပူတိကိမိအာဒီဟိ စ, ဝိရာဂတော ဝိရတ္တဘာဝေန စာတိ ဣမေဟိ တီဟိ ဝိဘာဝေဟိ ဟေတုဘူတေဟိ ဥပ္ပဇ္ဇမာနာ ဇိဂုစ္ဆာ ကမေန ရုဓိရာဒီနံ တိဏ္ဏံ ဝိဘာဝါနံ ပဋိပါဋိယာ ခေါဘနော [Pg.358] အနဝဋ္ဌာနော အသမာဟိတော ဥဗ္ဗေဂီ ဥဗ္ဗေဂဝါ ကရုဏာယုတော သောကရူပေန သဟိတော စာတိ ဧဝံ ဗီဘစ္ဆော ရသော နာမ ဟောတိ. နာသာဝိကုနနာဒီဟိ နာသသင်္ကောစနမုခပိဒဟနာဒီဟိ အနုဘာဝေဟိ စ သင်္ကာဒီဟိ စ သင်္ကာအာဝေဂါဒီဟိ ဗျဘိစာရီဘာဝေဟိ စ ကရဏဘူတေဟိ အဿ ဗီဘစ္ဆရသဿ ပေါသနံ ဟောတီတိ. ရုဓိရာဒီသု တီသု ပဒေသု, ခေါဘနာဒီသု တီသု စ ဂမျမာနတ္တာ အဝုတ္တောပိ စသဒ္ဒေါ ယောဇေတဗ္ဗော, တသ္မာ ခေါဘနာဒီဟိ တီဟိ ယုတ္တောဝ ဗီဘစ္ဆရသော နာမာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ရုဓိရံ အာဒိ ယေသံ အန္တာဒီနမိတိ စ, ပူတိအာဒိ ယေသံ ကိမိအာဒီနမိတိ စ, ဥဗ္ဗေဂေါ အဿ ဗီဘစ္ဆဿ အတ္ထီတိ စ, ကရုဏေန အာယုတောတိ စ, နာသာယ ဝိကုနနံ သင်္ကောစနမိတိ စ, တံ အာဒိ ယေသံ မုခစ္ဆာဒနာဒီနမိတိ စ, သင်္ကာ အာဒိ ယေသံ အာဝေဂါဒီနမိတိ စ ဝါကျံ. ३६५. आता 'जिगुच्छा' इत्यादींद्वारे बीभत्स रसाच्या पोषणाचा क्रम दाखवितात. रक्त इत्यादी म्हणजे लाल रक्त, आतडे इत्यादींमुळे, कुजलेले इत्यादी म्हणजे कुजलेले किडे इत्यादींमुळे आणि वैराग्यामुळे म्हणजे विरक्त भावामुळे, या तीन कारणीभूत असलेल्या 'विभावां'मुळे उत्पन्न होणारी जुगुप्सा (घृणा) अनुक्रमे रक्त इत्यादी तीन विभावांच्या क्रमाने क्षोभक (अस्थिर, असमाहित), उद्वेगजनक (उद्वेगयुक्त) आणि करुणेने युक्त (शोकयुक्त) अशी होऊन 'बीभत्स रस' बनते. नाक मुरडणे इत्यादी म्हणजे नाक संकुचित करणे, तोंड झाकणे इत्यादी 'अनुभावां'द्वारे आणि शंका इत्यादी म्हणजे शंका, आवेग इत्यादी 'व्यभिचारी भावां'द्वारे या बीभत्स रसाचे पोषण होते. 'रुधिरादि' या तीन पदांमध्ये आणि 'खोभन' इत्यादी तीन पदांमध्ये अर्थ स्पष्ट होत असल्यामुळे न सांगितलेला देखील 'च' (आणि) शब्द जोडला पाहिजे, म्हणून क्षोभक इत्यादी तिन्हींनी युक्त असलेलाच 'बीभत्स रस' समजावा. रक्त ज्यांचे आदि आहे ते आतडे इत्यादी, कुजलेले ज्यांचे आदि आहे ते किडे इत्यादी, उद्वेग ज्या बीभत्साला आहे तो उद्वेगी, करुणेने युक्त तो करुणायुत, नाकाचे विकुंचन म्हणजे संकोच करणे, ते ज्यांचे आदि आहे ते तोंड झाकणे इत्यादी, शंका ज्यांचे आदि आहे ते आवेग इत्यादी, असे हे वाक्य आहे. ဣမဿ ဗီဘစ္ဆဿောဒါဟရဏမေဝံ ဝေဒိတဗ္ဗံ – या बीभत्स रसाचे उदाहरण खालीलप्रमाणे समजून घ्यावे – ယက္ခာ မစ္စကရင်္ကကင်္ကနဓရာ ယေ နိမ္မိတာ ပုဏ္ဏကေ-နု’တ္တံသီကတပါဏိပလ္လဝဓရာ ဟာရီကတန္တောရဂါ; လိတ္တာ လောဟိတကုင်္ကုမေဟိ ဝိဓုရေနေ’တေ ပိဝန္တာ ဝသာ-မဇ္ဇံ သီသကပါလပါတိဟိ ပုရေ ဓုတ္တာ ဝိယော’ပေက္ခိတာတိ. पुण्णकाने निर्माण केलेले जे यक्ष मानवी हाडांचे कडे (कंकण) धारण करणारे, हातांचे तळवे डोक्यावर माळेसारखे धारण करणारे, मानवी आतड्यांचे हार गळ्यात घालणारे, लाल रक्ताच्या कुंकुमाने माखलेले आणि डोक्याच्या कवटीच्या पात्रातून चरबीयुक्त मद्य समोर पिणारे होते; ते यक्ष विदुर पंडितांनी एखाद्या नगरातील मद्यपी धूर्तांप्रमाणे उपेक्षिले (उदासीनतेने पाहिले). ပုဏ္ဏကေန ယက္ခေန နိမ္မိတာ မစ္စကရင်္ကကင်္ကနဓရာ မနုဿဋ္ဌိသင်္ခါတကရဘူသနဓာရိနော ဥတ္တံသီကတပါဏိပလ္လဝဓရာ မတ္ထကမာလိကတဟတ္ထတလသင်္ခတပလ္လဝဓာရိနော ဟာရီကတန္တောရဂါ မုတ္တာဟာရီကတမနုဿန္တသင်္ခါတဥရဂသမ္ပယုတ္တာ လောဟိတကုင်္ကုမေဟိ ရုဓိရသင်္ခါတကုင်္ကုမကက္ကေဟိ လိတ္တာ သီသကပါလပါတိဟိ သီသကပါလသင်္ခါတေဟိ သရာဝေဟိ ဝသာမဇ္ဇံ ဝသာသင်္ခါတသုရံ ပုရေ အဘိမုခေ ပိဝန္တာ ယေ ယက္ခာ သိယုံ, ဧတေ ယက္ခာ ဝိဓုရေန ပဏ္ဍိတေန ဓုတ္တာ ဝိယ နဂရေ သုရာဓုတ္တာ ဝိယ ဥပေက္ခိတာ ဟောန္တီတိ. ဣဟ ‘‘လိတ္တာ လောဟိတကုင်္ကုမေဟီ’’တိ စ ‘‘ဥတ္တံသီကတပါဏိပလ္လဝဓရာ’’တိ စ [Pg.359] ‘‘ဟာရီကတန္တောရဂါ’’တိ စ ဣမေဟိ စိတ္တက္ခောဘကာရဏဘူတော ရုဓိရာဒိဝိဘာဝေါ စ, ‘‘မစ္စကရင်္ကကင်္ကနရော’’တိ စ ‘‘သီသကပါလပါတိဟိ ဝသာမဇ္ဇံ ပိဝန္တာ’’တိ စ ဣမေဟိ ဥဗ္ဗေဂဝန္တသဘာဝဿ ဟေတုဘူတော ပူတျာဒိဝိဘာဝေါ စ ပကာသိတော. ကရုဏာယုတသဘာဝဿ ကာရဏဘူတဝိရဇ္ဇနဝိဘာဝေါ စ နာသာဝိကုနနာဒိအနုဘာဝေါ စ သင်္ကာဝေဂါဒိဗျဘိစာရီဘာဝေါ စ ဗီဘစ္ဆသင်္ခါတဌာယီဘာဝေါ စာတိ ဣမေ သဗ္ဗေ ဝါကျသာမတ္ထိယေန ဂမ္မာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. पुण्णक यक्षाने निर्माण केलेले, 'मच्चकरङ्ककङ्कणधरा' म्हणजे मानवी हाडांचे हातातील भूषण धारण करणारे, 'उत्तंसीकतपाणिपल्लवधरा' म्हणजे डोक्यावर माळेसारखे हाताचे तळवे धारण करणारे, 'हारीकतन्तोरगा' म्हणजे मुक्ताहाराप्रमाणे मानवी आतड्यांचे हार गळ्यात घालणारे, 'लोहितकुङ्कुमेहि' म्हणजे रक्ताच्या कुंकुमाने माखलेले, 'सीसकपालपातीहि' म्हणजे डोक्याच्या कवटीच्या पात्रातून 'वसामज्जं' म्हणजे चरबीयुक्त मद्य समोर पिणारे जे यक्ष होते; ते यक्ष विदुर पंडितांनी एखाद्या नगरातील मद्यपी धूर्तांप्रमाणे उपेक्षिले (उदासीनतेने पाहिले). येथे 'लोहितकुंकुमाने माखलेले', 'डोक्यावर हाताचे तळवे धारण करणारे' आणि 'आतड्यांचे हार घालणारे' यांद्वारे चित्तक्षोभाला कारणीभूत असलेला रक्तादी 'विभाव' आणि 'मानवी हाडांचे कंकण धारण करणारे' व 'डोक्याच्या कवटीच्या पात्रातून चरबीयुक्त मद्य पिणारे' यांद्वारे उद्वेगजनक स्वभावाला कारणीभूत असलेला कुजलेला इत्यादी 'विभाव' प्रकट केला आहे. करुणेने युक्त स्वभावाला कारणीभूत असलेला वैराग्यरूपी विभाव, नाक मुरडणे इत्यादी अनुभाव, शंका, आवेग इत्यादी व्यभिचारी भाव आणि बीभत्स नावाचा स्थायीभाव, हे सर्व वाक्याच्या सामर्थ्याने समजून घ्यावेत. ဝိမှယဌာယီဘာဝ विस्मय (आश्चर्य) स्थायीभाव ၃၆၆. ३६६. အတိလောကပဒတ္ထေဟိ,ဝိမှယော’ယံ ရသော’ဗ္ဘုတော; တဿာ’နုဘာဝါ သေဒဿု-သာဓုဝါဒါဒယော သိယုံ; တာသာဝေဂဓိတိပ္ပညာ,ဟောန္တေ’တ္ထ ဗျဘိစာရိနော. लोकोत्तर (अलौकिक) गोष्टींमुळे निर्माण होणारा जो विस्मय आहे, तो 'अद्भुत रस' होय. घाम येणे, अश्रू येणे, 'साधू-साधू' म्हणणे (धन्यवाद देणे) इत्यादी त्याचे 'अनुभाव' आहेत; आणि त्रास (भीती), आवेग, धृती (धैर्य) व प्रज्ञा (बुद्धी) हे येथे 'व्यभिचारी भाव' होतात. ၃၆၆. ‘‘အတိ’’စ္စာဒိ. အတိလောကေဟိ လောကာတိဝုတ္တီဟိ မာယာဒိဗ္ဗဂေဟာရာမာဒီဟိ ပဒတ္ထေဟိ ဇာတော အယံ ဝိမှယော စိတ္တဝိကာရသင်္ခါတော ဌာယီဘာဝေါ အဗ္ဘုတော ရသော နာမ. သေဒအဿုသာဓုဝါဒရောမဉ္စာဒယော တဿ အနုဘာဝါ သိယုံ, တာသာဒယော ဗျဘိစာရိနော ဟောန္တီတိ. ३६६. 'अति' इत्यादी. अतिलोक म्हणजे लोकोत्तर अशा माया, दिव्य घरे, उद्याने इत्यादी गोष्टींमुळे निर्माण झालेला हा विस्मयरूपी चित्तविकारात्मक 'स्थायीभाव' म्हणजेच 'अद्भुत रस' होय. घाम येणे, अश्रू येणे, 'साधू-साधू' म्हणणे, रोमांच उभे राहणे इत्यादी त्याचे 'अनुभाव' आहेत आणि त्रास इत्यादी 'व्यभिचारी भाव' होतात. ၃၆၆. ဣဒါနိ ဝိမှယရသဿ ပေါသနက္ကမံ ဒဿေတိ ‘‘အတိ’’ဣစ္စာဒိနာ. အတိလောကပဒတ္ထေဟိ လောကဋ္ဌိတိမတိက္ကမ္မ ပဝတ္တေဟိ မာယာဒိဗ္ဗဘဝနအာရာမဝိမာနာဒိပဒတ္ထေဟိ ဟေတုဘူတေဟိ ဥပ္ပဇ္ဇမာနော အယံ ဝိမှယော စိတ္တဗျာပနသင်္ခါတော ဌာယီဘာဝေါ အဗ္ဘုတော ရသော အဗ္ဘုတရသော နာမ ဘဝေ, သေဒဿုသာဓုဝါဒါဒယော တဿ အဗ္ဘုတရသဿ အနုဘာဝါ သိယုံ, တာသာဝေဂဓိတိပ္ပညာ ဧတ္ထ [Pg.360] အဗ္ဘုတရသဝိသယေ ဗျဘိစာရိနော ဘာဝါ ဟောန္တီတိ. အတိက္ကန္တာ လောကမိတိ စ, တေ စ တေ ပဒတ္ထာ စေတိ စ, သာဓုဣတိ ဝါဒေါတိ စ, သေဒေါ စ အဿု စ သာဓုဝါဒေါ စေတိ စ, တေ အာဒိ ယေသံ ရောမဉ္စာဒီနမိတိ စ, တာသော စ အာဝေဂေါ စ ဓိတိ စ ပညာ စေတိ စ ဝါကျံ. ३६६. आता 'अति' इत्यादींद्वारे विस्मय रसाच्या (अद्भुत रसाच्या) पोषणाचा क्रम दाखवितात. 'अतिलोकपदार्थेहि' म्हणजे जगाच्या मर्यादेचे उल्लंघन करून अस्तित्वात असलेल्या माया, दिव्य भवन, उद्यान, विमान इत्यादी पदार्थांमुळे कारणीभूत होऊन उत्पन्न होणारा हा विस्मयरूपी चित्तव्यापनात्मक 'स्थायीभाव' म्हणजेच 'अद्भुत रस' होय. घाम येणे, अश्रू येणे, 'साधू-साधू' म्हणणे इत्यादी या अद्भुत रसाचे 'अनुभाव' होतात; आणि त्रास, आवेग, धृती व प्रज्ञा हे येथे अद्भुत रसाच्या विषयात 'व्यभिचारी भाव' होतात. जगाचे उल्लंघन केलेले ते 'अतिलोक', आणि ते पदार्थ म्हणजे 'अतिलोकपदार्थ'; 'साधू' असा वाद (म्हणणे) म्हणजे 'साधुवाद'; घाम, अश्रू आणि साधुवाद हे ज्यांचे आदि आहे ते रोमांच इत्यादी; त्रास, आवेग, धृती आणि प्रज्ञा, असे हे वाक्य आहे. ဣမဿ အဗ္ဘုတရသဿောဒါဟရဏမေဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ – या अद्भुत रसाचे उदाहरण खालीलप्रमाणे समजावे – သ ပုဏ္ဏကေနာ’ဟဋနေကဘိံသနေ-သွ’ဟော နဋေနေဝ သုနိစ္စလော’စလာ; နိပါတိတော တေန အဝံသိရောပတံ,အသန္တသံ တံ မိနိ ဒိဋ္ဌိယဋ္ဌိယာတိ. पुण्णकाने आणलेल्या अनेक भयानक घोड्यांवर बसून, अहो! नटाप्रमाणे अत्यंत निश्चल राहून, त्याने पर्वतावरून खाली डोके करून पाडलेल्या, परंतु भयभीत न झालेल्या त्या (विदुर पंडिताला) त्याने आपल्या दृष्टीच्या काठीने (नजरेने) मोजले. သော ဝိဓုရပဏ္ဍိတော ပုဏ္ဏကေန ယက္ခေန နဋေန ဣဝ အနေကဝိကာရဒဿနကေန နာဋကေန ဝိယ အာဟဋနေကဘိံသနေသု ဘယတ္တမာနီတာနေကဝိဓဘိံသနေသု ဝတ္တမာနေသု သုနိစ္စလော တေန ပုဏ္ဏကေန အစလာ သဋ္ဌိယောဇနုဗ္ဗေဓကာဠာဂိရိပဗ္ဗတမတ္ထကတော နိပါတိတော အဝံသိရောပတံ အဓောသီသံ ပတန္တော အသန္တသံ ဧဝံ အပ္ပတိဋ္ဌေပိ အနုတ္တသန္တော တံ ပဗ္ဗတံ ဒိဋ္ဌိယဋ္ဌိယာ မိနိ ပမာဏမကာသိ, အဟော အစ္ဆရိယန္တိ. ဧတ္ထ ဘယဟေတုမှိ သတိ ဘီတိယာ စ တတ္ထ ပရိဇာနနာဘာဝဿ စ လောကသဘာဝတ္တာ တမတိက္ကမ္မ ဘယကရဏေ အသန္တာသဿ စ ဒိဋ္ဌိယာ ပဗ္ဗတမိနနဿ စ ပဝတ္တဘာဝကထနေန လောကာတိက္ကန္တပဒတ္ထသင်္ခါတော ဝိဘာဝေါ ‘‘အသန္တသံ တံ မိနိ ဒိဋ္ဌိယဋ္ဌိယာ’’တိ ဣမိနာ ပကာသိတော. ‘‘အဟော’’တိ ဝစနေန, တဿ သာမတ္ထိယေန စ သာဓုဝါဒသေဒအဿုအာဒယော အနုဘာဝါ ဝိဘာဝိတာ. တာသအာဝေဂဓိတိစ္စာဒိဗျဘိစာရီဘာဝါ, ဝိမှယသင်္ခါတဌာယီဘာဝေါ စ သမုဒိတဝါကျသာမတ္ထိယေန ဇောတိတော. ते विधुरपंडित, पुण्णक यक्षाने नटाप्रमाणे अनेक विकारांचे प्रदर्शन करणाऱ्या नाटकासारखे आणलेल्या अनेक भयानक प्रसंगांमध्ये आणि भीती निर्माण करणाऱ्या अनेक प्रकारच्या भीषण गोष्टी घडत असतानाही अत्यंत निश्चल राहिले. त्या पुण्णकाने त्यांना साठ योजन उंचीच्या अचल अशा काळागिरी पर्वताच्या शिखरावरून खाली पाडले. डोके खाली करून खाली पडत असतानाही, ते अजिबात न घाबरता, अशा निराधार अवस्थेतही भयभीत न होता, त्यांनी त्या पर्वताला आपल्या दृष्टीरूपी काठीने मोजले, त्याचे प्रमाण मोजले, 'अहो आश्चर्य!' असे म्हटले. येथे भीतीचे कारण असतानाही भीती न वाटणे आणि तिथे अज्ञानाचा अभाव असणे हा लोकांचा स्वभाव असल्यामुळे, त्याचे उल्लंघन करून भय निर्माण करणाऱ्या प्रसंगातही भयभीत न होणे आणि दृष्टीने पर्वत मोजणे या घडलेल्या गोष्टीच्या कथनाने लोकातीत (लोकोत्तर) अर्थ असलेला विभाव 'असंतसं तं मिनि दिट्ठियट्ठिया' (न घाबरता त्यांनी त्याला दृष्टीरूपी काठीने मोजले) याद्वारे प्रकट केला आहे. 'अहो' या शब्दाने आणि त्याच्या सामर्थ्याने साधुवाद, घाम, अश्रू इत्यादी अनुभाव विभावित (प्रकट) झाले आहेत. त्रास (भीती), आवेग, धृती (धैर्य) इत्यादी व्यभिचारी भाव आणि विस्मय नावाचा स्थायीभाव या संपूर्ण वाक्याच्या सामर्थ्याने प्रकाशित झाला आहे. သမဌာယီဘာဝ शम स्थायीभाव ၃၆၇. ३६७. ဌာယီဘာဝေါ [Pg.361] သမော မေတ္တာ-ဒယာမောဒါဒိသမ္ဘဝေါ; ဘာဝါဒီဟိ တဒု’က္ကံသော,သန္တော သန္တနိသေဝိတော. मैत्री, दया, मोद (प्रमोद) इत्यादींपासून उत्पन्न होणारा 'शम' (शांती) हा स्थायीभाव आहे; भाव इत्यादींद्वारे त्याचा उत्कर्ष होतो, त्याला संतांनी (सत्पुरुषांनी) सेवन केलेला 'शांत रस' असे म्हणतात. ဣတိ သံဃရက္ခိတမဟာသာမိပါဒဝိရစိတေ अशा प्रकारे संघरक्षित महास्वामीपादांनी रचलेल्या သုဗောဓာလင်္ကာရေ सुबोधालंकारामध्ये ရသဘာဝါဝဗောဓော နာမ ပဉ္စမော ပရိစ္ဆေဒေါ. रसभावबोध नावाचा पाचवा परिच्छेद समाप्त. သုဗောဓာလင်္ကာရော သမတ္တော. सुबोधालंकार समाप्त झाला. ၃၆၇. ‘‘ဌာယိ’’စ္စာဒိ. မေတ္တာဒိသမ္ဘဝေါ သမော ဥပသမသင်္ခါတော ဌာယီဘာဝေါ ဘဝတိ, တဒနုရူပေဟိ ဘာဝါနုဘာဝေဟိ တဿ ဥက္ကံသော ယဿ, သော သန္တော နာမ ရသော ဘဝတိ, သော စ သန္တနိသေဝိတောတိ. ३६७. 'ठायी' इत्यादी. मैत्री इत्यादींपासून उत्पन्न होणारा, उपशम (शांती) नावाचा 'शम' हा स्थायीभाव होतो. त्याच्याशी सुसंगत अशा भाव आणि अनुभावांद्वारे ज्याचा उत्कर्ष होतो, तो 'शांत' नावाचा रस होतो, आणि तो संतांनी सेवन केलेला असतो. ဣတိ သုဗောဓာလင်္ကာရေ မဟာသာမိနာမိကာယံ ဋီကာယံ अशा प्रकारे सुबोधालंकारावरील 'महास्वामी' नावाच्या टीकेमध्ये ရသဘာဝါဝဗောဓော ပဉ္စမော ပရိစ္ဆေဒေါ. रसभावबोध नावाचा पाचवा परिच्छेद समाप्त. ၃၆၇. ဣဒါနိ သန္တရသဿ ပေါသနက္ကမံ ဒဿေတိ ‘‘ဌာယိ’’စ္စာဒိနာ. မေတ္တာဒယာမောဒါဒိသမ္ဘဝေါ မေတ္တာကရုဏာပီတိအာဒိဝိဘာဝေဟိ သမ္ဘူတော သမော ကာယစိတ္တောပသမော ဌာယီဘာဝေါ နာမ ဟောတိ, ဘာဝါဒီဟိ ဗျဘိစာရီဘာဝါဒီဟိ ကရဏဘူတေဟိ, အပိစ တဿ သမဿ အနုရူပေဟိ ဗျဘိစာရီဘာဝါနုဘာဝေဟိ တဒုက္ကံသော တဿ ဌာယီဘာဝဿ ဥက္ကံသယုတ္တော သန္တနိသေဝိတော သာဓူဟိ သေဝိတော သန္တော သန္တရသော နာမ ဟောတီတိ. မေတ္တာ စ ဒယာ စ မောဒေါ စေတိ စ, တေ အာဒယော ယေသမိတိ စ, တေဟိ သမ္ဘဝေါ ယဿေတိ စ, တဿ ဥက္ကံသော အဿ သန္တဿေတိ စ, သတံ နိသေဝိတောတိ စ ဝါကျံ. ३६७. आता 'ठायी' इत्यादींद्वारे शांत रसाच्या पोषणाचा क्रम दाखवितात. मैत्री, दया, मोद इत्यादींपासून उत्पन्न होणारा, म्हणजे मैत्री, करुणा, प्रीती इत्यादी विभावांद्वारे निर्माण झालेला, काय आणि चित्ताचा उपशम (शांती) असलेला 'शम' हा स्थायीभाव होतो. भाव इत्यादींद्वारे म्हणजे व्यभिचारी भाव इत्यादी कारणांद्वारे, तसेच त्या शम भावाच्या अनुरूप अशा व्यभिचारी भाव आणि अनुभावांद्वारे ज्याचा उत्कर्ष होतो, त्या स्थायीभावाच्या उत्कर्षाने युक्त असलेला, संतांनी म्हणजे सज्जनांनी सेवन केलेला रस 'शांत रस' होतो. मैत्री, दया आणि मोद, आणि ते ज्यांच्या सुरुवातीला आहेत ते, त्यांच्यापासून ज्याची उत्पत्ती होते तो, आणि ज्याचा उत्कर्ष या शांत रसाला प्राप्त होतो तो, आणि संतांनी सेवन केलेला, असे हे वाक्य आहे. အဿ [Pg.362] သန္တရသဿောဒါဟရဏမေဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ – या शांत रसाचे उदाहरण याप्रमाणे पाहावे – ဧန္တေသု ကေသရိကရီသွ’ပိ ဝေဌယန္တေ,နာဂေ နဂံ မဒဂဇေ ဝိယ ဝေဠုဂုမ္ဗံ; ယက္ခေ ဝိစာလယတိ နောစလိ ဤသကမ္ပိ,သန္တိံ ဂတောဝ ဝိဓုရော မဓုရာပိ ဘာဝေါတိ. सिंह आणि हत्ती जवळ येत असतानाही, सर्प शरीराला वेढत असतानाही, आणि मदोन्मत्त हत्ती बांबूच्या बेटाला हलवतो त्याप्रमाणे यक्ष (पुण्णक) पर्वताला हलवत असतानाही, विधुर पंडित थोडेही विचलित झाले नाहीत; जणू काही ते शांतीला (निर्वाणाला) प्राप्त झाले होते, आणि त्यांचा स्वभाव मधुरच राहिला. ကေသရိကရီသု သီဟဟတ္ထီသု ဧန္တေသု အပိ ဘိံသနာကာရေန သမီပမာဂစ္ဆန္တေသုပိ နာဂေ ဝေဌယန္တေပိ နာဂေသု သရီရံ ဝေဌယန္တေသုပိ. ဇာတျာပေက္ခာယေကဝစနံ, ဝေဠုဂုမ္ဗံ မဒဂဇေ ဝိယ ဝိစာလယတိ မဒဂဠိတဟတ္ထိမှိ စာလေန္တေ ဣဝ ယက္ခေ ပုဏ္ဏကေ နဂံ ကာဠာဂိရိပဗ္ဗတံ ဝိစာလယတိပိ အနေကပ္ပကာရေ စာလေန္တေပိ ဝိဓုရော ပဏ္ဍိတော သန္တိံ ဂတောဝ နိဗ္ဗာနံ အာလမ္ဗဏကရဏဝသေန သမ္ပတ္တော ဝိယ ဖလသမာပတ္တိသမာပန္နော ဣဝ အထ ဝါ ဒိဋ္ဌဓမ္မနိဗ္ဗာနသင်္ခတနိရောဓသမာပတ္တိသမာပန္နော ဝိယ ဤသကမ္ပိ အပ္ပကမ္ပိ မဓုရာ ဘာဝါ အပိ မဓုရသဘာဝတောပိ နော စလိ, နိသိန္နဋ္ဌာနတော ပဂေဝါတိ အဓိပ္ပာယော. ဧတ္ထ ဓာဝနရောဒနကမ္ပနာဒီနံ ကရဏဘူတံ သီဟာဒီနမာဂမနံ နာဂဝေဌနံ ပဗ္ဗတကမ္ပနန္တိအာဒီသု ဝတ္တမာနေသုပိ နိဗ္ဗိကာရတ္တေန သန္တိံ ဂတောတိ ဣမိနာ သန္တရသဿ ပကတိဘူတေ ဥဒ္ဒေသေ ဒဿိတော နဝမော ဌာယီဘာဝေါ ဒဿိတော ဟောတိ, ဧတဿ ဥပ္ပတ္တိဥဒ္ဒီပနာနံ ကာရဏဘူတာ မေတ္တာဒယာမောဒါဒိဝိဘာဝါ သာမတ္ထိယာ ဒဿိတာ ဟောန္တီတိ. ဓိတိမတိသတိအာဒယော တဒနုရူပဗျဘိစာရီဘာဝါ စ တာဒိသာနုဘာဝါ စ ‘‘ဧန္တေသု ဝေဌယန္တေ ဝိစာလယတီ’’တိ ဣမိနာ, သကလဝါကျသာမတ္ထိယေန စ ပကာသိတာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. सिंह आणि हत्ती जवळ येत असतानाही, म्हणजे भयानक रूपाने जवळ येत असतानाही, सर्प शरीराला वेढत असतानाही, म्हणजे नागांनी शरीराला वेढले असतानाही (येथे जातीच्या अपेक्षेने एकवचन वापरले आहे), मदोन्मत्त हत्तीने बांबूच्या बेटाला हलवावे त्याप्रमाणे यक्ष पुण्णकाने पर्वताला, म्हणजे काळागिरी पर्वताला हलवले तरी, अनेक प्रकारे हलवले तरीही, विधुर पंडित शांतीला प्राप्त झाल्यासारखे, म्हणजे निर्वाणाला आलंबन केल्यामुळे फळसमापत्तीला प्राप्त झाल्यासारखे, अथवा दृष्टधम्मनिर्वाण नावाच्या निरोधसमापत्तीला प्राप्त झाल्यासारखे, थोडेही, अगदी अल्पही, आपल्या मधुर स्वभावापासून विचलित झाले नाहीत, ते बसलेल्या जागेवरून हलणे तर दूरच राहिले, असा अभिप्राय आहे. येथे धावणे, रडणे, कापणे इत्यादींना कारणीभूत असणारे सिंहादींचे येणे, नागांचे वेढणे, पर्वताचे कंप पावणे इत्यादी घडत असतानाही, निर्विकार राहिल्यामुळे 'शांतीला प्राप्त झालेले' या शब्दाने शांत रसाचा मूळ असलेला नववा स्थायीभाव दर्शविला आहे. याच्या उत्पत्ती आणि उद्दीपनाला कारणीभूत असणारे मैत्री, दया, मोद इत्यादी विभाव सामर्थ्याने दर्शविले आहेत. धृती (धैर्य), मती, स्मृती इत्यादी तदनुरूप व्यभिचारी भाव आणि तशाच प्रकारचे अनुभाव 'एन्तेसु वेठयन्ते विचालयति' या शब्दाने आणि संपूर्ण वाक्याच्या सामर्थ्याने प्रकाशित झाले आहेत, असे समजावे. ဣတိ သုဗောဓာလင်္ကာရနိဿယေ अशा प्रकारे सुबोधालंकार निस्यामध्ये (टीकेमध्ये) ရသဘာဝါဝဗောဓော နာမ ပဉ္စမော ပရိစ္ဆေဒေါ. रसभावबोध नावाचा पाचवा परिच्छेद समाप्त. သုဗောဓာလင်္ကာရဋီကာ သမတ္တာ. सुबोधालंकार टीका समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
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| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
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| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |