| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
නමො තස්ස භගවතො අරහතො සම්මාසම්බුද්ධස්ස. त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला माझा नमस्कार असो. පයොගසිද්ධිපාළි प्रयोगसिद्धिपाळी 1. සඤ්ඤාදිකණ්ඩ १. संज्ञादिकांड සිද්ධ-ම්බත්ථුං සම්මා වන්දෙ सिद्ध अशा (बुद्ध) तत्त्वाला मी सम्यक् वंदन करतो. ගන්ථාරම්භකථා ग्रंथारंभकथा සිද්ධ+මිට්ඨදදං [Pg.1] බුද්ධං, ධම්මං මණිංව ස්වත්ථදං; සඞ්ඝඤ්ච සාදරං නත්වා, පයොගසිද්ධි වුච්චතෙ. इष्ट (कल्याण) प्रदान करणाऱ्या सिद्ध बुद्ध भगवंतांना, मण्याप्रमाणे कल्याण करणाऱ्या धम्माला आणि संघाला आदराने वंदन करून 'प्रयोगसिद्धि' सांगितली जात आहे. පභාවො මොග්ගල්ලානස්ස, බ්යාකරණෙ ච පෙටකෙ; නිස්සෙසෙව කබ්බාතිත්තො, අහො අච්ඡරියො වත. व्याकरण आणि पिटकांमध्ये मोग्गल्लानांचा प्रभाव संपूर्णपणे काव्याच्या पलीकडचा आहे, अहो! हे खरोखरच आश्चर्यकारक आहे. වුත්තඤ්හි පුබ්බසීහළාචරිය+පාචරියෙහි – कारण पूर्वीच्या सिंहली आचार्यांनी आणि प्राचीन आचार्यांनी असे म्हटले आहे – යා සත්ති පාණිනෙ යා ච, චන්ද්ර+කාත්යායනාදිසු; සා+යං මුත්තිමතී මඤ්ඤෙ, මොග්ගල්ලායනරූපිනී-ති. जी शक्ती पाणिनीमध्ये आणि जी चंद्र, कात्यायन इत्यादींमध्ये होती; तीच ही मूर्तिमंत शक्ती मोग्गल्लायनांच्या रूपाने अवतरली आहे, असे मी मानतो. සුත්තං වුත්ති ච තෙනෙව, කතා එකෙන පඤ්චිකා; තස්මා+ස්ස සත්ථ+මඤ්ඤෙහි, සුපසට්ඨං+තිසුන්දරං. सुत्त (सूत्र), वृत्ती आणि पंचिका हे सर्व त्यांनी एकट्यानेच रचले आहे; म्हणूनच त्यांचे हे शास्त्र इतरांपेक्षा अत्यंत प्रशंसनीय आणि अतिशय सुंदर आहे. තම්හි ච දුබ්බිධං ඤෙය්යං, සුත්තං කම්මත්ථභෙදතො; තෙස්වා+දි මීතිසද්දෙන, දුතියං තිප්පකාරතො. आणि त्यामध्ये, कार्य आणि अर्थाच्या भेदाने सुत्त (सूत्र) हे दोन प्रकारचे जाणावे; त्यांपैकी पहिले 'इति' शब्दाने आणि दुसरे तीन प्रकारांनी (जाणावे). සුවිසදං පකාසෙත්වා, සුබොධ+මාකුමාරකං; බ්යාපිකාවළියා කස්සං, තං සුණාථ සමාහිතාති. लहान मुलालाही सहज समजेल अशा प्रकारे अतिशय स्पष्टपणे प्रकाशित करून, मी ही 'व्यापिकावली' रचणार आहे; ती तुम्ही एकाग्र चित्ताने ऐका. 1. අආදයො තිතාලීස වණ්ණා १. 'अ' इत्यादी त्रेचाळीस वर्ण आहेत. අකාරාදයො [Pg.2] නිග්ගහීතන්තා තෙචත්තාලීසක්ඛරා වණ්ණා නාම හොන්ති. තං යථා අ, ආ, ඉ, ඊ, උ, ඌ, එ, ऐ, ඔ, औ, ක ඛ ග ඝ ඞ, ච ඡ ජ ඣ ඤ, ට ඨ ඩ ඪ ණ, ත ථ ද ධ න, ප ඵ බ භ ම, ය ර ලව ස හ ළ අං. තෙන ක්වත්ථො ‘‘එ ඔන+ම වණ්ණෙ’’ති. තිතාලීසාති වචනං කත්ථචි වණ්ණලොපං ඤාපෙති, තෙන ‘‘පටිසඞ්ඛා යොනිසො’’තිආදි සිද්ධං. 'अ' कारापासून सुरू होऊन निग्गहीतापर्यंत (अनुस्वारापर्यंत) संपणारे त्रेचाळीस अक्षरे 'वर्ण' म्हणून ओळखले जातात. ते याप्रमाणे आहेत: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, स, ह, ळ, अं. यामुळे काय साध्य होते? "ए ओ न म वर्णे" इत्यादी. 'त्रेचाळीस' हे वचन काही ठिकाणी वर्णाचा लोप दर्शवते, ज्यायोगे "पटिसंखा योनिसो" इत्यादी सिद्ध होते. අකාරො ආදි මරියාදභූතො යෙසං තෙ අආදයො. තයො ච චත්තාලීස චෙති තිතාලීස, ඉමිනා නිපාතනෙන වා චතභාගලොපො. වණ්ණීයති අත්ථො එතෙහීති වණ්ණා. 'अ' कार ज्यांच्या सुरुवातीला आणि मर्यादेत आहे ते 'अ-आदी' (अ इत्यादी). तीन आणि चाळीस मिळून त्रेचाळीस (तितालीस) होतात, किंवा या निपातनाने चतुर्थांशाचा लोप होतो. ज्यांच्याद्वारे अर्थाचे वर्णन केले जाते (वर्णिले जाते), ते 'वर्ण' होत. එත්ථා+හ – ‘‘කස්මා ආචරියකච්චායනාදීහි විය එකචත්තාලීසක්ඛරාන+මක්ඛරසඤ්ඤ+මකත්වා තිතාලීසක්ඛරානං වණ්ණසඤ්ඤා කතා’’ති. වුච්චතෙ – येथे विचारले आहे – "आचार्य कच्चायन इत्यादींप्रमाणे एकेचाळीस अक्षरांना 'अक्षर' अशी संज्ञा न देता, त्रेचाळीस अक्षरांना 'वर्ण' अशी संज्ञा का दिली गेली आहे?" याचे उत्तर दिले जाते – සා මාගධී මූලභාසා, නරා යායා+දිකප්පිකා; බ්රහ්මානො චා-සුතාලාපා, සම්බුද්ධා චාපි භාසරෙති – "ती मागधी ही मूळ भाषा आहे, जिच्यामध्ये कल्पारंभातील मनुष्य, मानवी संभाषण न ऐकलेले ब्रह्मदेव आणि सम्यक्संबुद्ध देखील बोलतात" – වචනතො මාගධිකානං එත්ථ, සෙය්යො, ඔට්ඨො, සොත්ථි-ත්යාදීසුපි අසෙසබ්යාපිකානං තිතාලීසක්ඛරානංව උජුකාන්වත්ථප්පක්ඛරගුණිකා, නෙව පන ‘රුක්ඛා වනං’ත්යාදො විය අවයවෙ සමුදායවොහාරො, ‘සමුද්දො මයා දිට්ඨො’ත්යාදො විය ච සමුදායෙ අවයවවොහාරොති දස්සෙතුං පච්චෙකං වණ්ණසඤ්ඤා කතාති. या वचनानुसार, येथे मागधी भाषिकांच्या 'सेय्यो', 'ओट्ठो', 'सोत्थि' इत्यादी शब्दांमध्येही सर्व त्रेचाळीस अक्षरांचा थेट, अन्वर्थक आणि संपूर्ण वापर होतो. हे 'रुक्खा वनं' (झाडे म्हणजे जंगल) याप्रमाणे अवयवासाठी समुदायाचा वापर करण्यासारखे नाही, किंवा 'समुद्दो मया दिट्ठो' (मी समुद्र पाहिला) याप्रमाणे समुदायासाठी अवयवाचा वापर करण्यासारखे नाही, हे दर्शवण्यासाठी प्रत्येक अक्षराला स्वतंत्रपणे 'वर्ण' ही संज्ञा दिली गेली आहे. ‘‘සක්කච්චසවනං බුද්ධසාසනසම්පත්තී’’ති ‘‘සිථිලධනිතාදි අක්ඛරවිපත්තියඤ්හි අත්ථස්ස දුන්නයතා හොතී’’ති ච යස්මා වුත්තං. कारण असे म्हटले आहे की, "आदरपूर्वक ऐकणे ही बुद्धशासनाची संपत्ती (प्राप्ती) आहे" आणि "शिथिल (अल्पप्राण) आणि धनित (महाप्राण) इत्यादी अक्षरांच्या विपत्तीमुळे (चुकीच्या उच्चारणामुळे) अर्थाचा चुकीचा बोध होतो." තස්මා [Pg.3] අක්ඛරකොසල්ලං, සම්පාදෙය්ය විචක්ඛණො; උපට්ඨහං ගරුං සම්මා, උට්ඨානාදීහි පඤ්චහි. म्हणून, चतुर (बुद्धिमान) मनुष्याने उठणे इत्यादी पाच प्रकारांनी गुरूंची योग्य सेवा करून अक्षरांचे कौशल्य प्राप्त करावे. තත්ථ අකාරාදීන+මනුක්කමො පනෙ+ස ඨානාදික්කමසන්නිස්සිතො. තථා හි ඨාන+කරණ+පයතනෙහි වණ්ණා ජායන්ති. තත්ථ ඡ ඨානානි කණ්ඨ+තාලු+මුද්ධ+දන්ත+ඔට්ඨ+නාසිකාවසෙන. त्यामध्ये, 'अ' इत्यादींचा हा क्रम स्थान इत्यादींच्या क्रमावर आधारित आहे. कारण स्थान, करण आणि प्रयत्न यांच्याद्वारे वर्णांची उत्पत्ती होते. त्यामध्ये कंठ, तालू, मूर्धा, दंत, ओष्ठ आणि नासिका यानुसार सहा स्थाने आहेत. තත්ථ අවණ්ණ+කවග්ග+හානං කණ්ඨො ඨානං, ඉවණ්ණ+චවග්ග+යානං තාලු, ටවග්ග+ර+ළානං මුද්ධා, තවග්ග+ල+සානං දන්තා, උවණ්ණ+පවග්ගානං ඔට්ඨො, එ වණ්ණස්ස කණ්ඨතාලූ, ඔ වණ්ණස්ස කණ්ඨො+ට්ඨා, වකාරස්ස දන්තො+ට්ඨා, නිග්ගහීතස්ස නාසිකා, ඞ, ඤ්ඤ, ණ, න, මානං සකඨානං නාසිකා ච. එත්ථ ච – त्यामध्ये, 'अ' वर्ण, 'क' वर्ग आणि 'ह' यांचे स्थान कंठ आहे; 'इ' वर्ण, 'च' वर्ग आणि 'य' यांचे स्थान तालू आहे; 'ट' वर्ग, 'र' आणि 'ळ' यांचे स्थान मूर्धा आहे; 'त' वर्ग, 'ल' आणि 'स' यांचे स्थान दंत आहे; 'उ' वर्ण आणि 'प' वर्ग यांचे स्थान ओष्ठ आहे; 'ए' वर्णाचे स्थान कंठ-तालू आहे; 'ओ' वर्णाचे स्थान कंठ-ओष्ठ आहे; 'व' काराचे स्थान दंत-ओष्ठ आहे; निग्गहीताचे (अनुस्वाराचे) स्थान नासिका आहे; आणि 'ङ', 'ञ', 'ण', 'न', 'म' यांचे स्थान आपापले स्थान आणि नासिका हे आहे. आणि येथे – හකාරො පඤ්චමෙහෙව, අන්තට්ඨාහි ච සංයුතො; ඔරසො ඉති විඤ්ඤෙය්යො, කණ්ඨජො තදසංයුතො. 'ह' कार जेव्हा (वर्गांच्या) पाचव्या अक्षरांशी आणि अंतस्थ (य, र, ल, व) अक्षरांशी संयुक्त असतो, तेव्हा तो उरस्य (छातीतून निघणारा) जाणावा; आणि त्यांच्याशी संयुक्त नसताना तो कंठज (कंठातून निघणारा) जाणावा. යථා අවඞ්හොති (අවඞ හොති., තඤ්හි, තණ්හා, පුබ්බන්හො, අම්හෙ, ගුය්හං, ගාරය්හා, ආරුල්හො, බහ්වක්ඛරන්ති. जसे की: अवङ्होति, तञ्हि, तण्हा, पुब्बण्हो, अम्हे, गुय्हं, गारय्हा, आरुळ्हो, बह्वक्खरं इत्यादी. කරණං – करण (उच्चारणाचे साधन) – ජිව්හාමජ්ඣං තාලුජානං,ජිව්හොපග්ගං මුද්ධජානං,ජිව්හග්ගං දන්තජානං සෙ-සා සකඨානකරණා. तालुज (तालव्य) वर्णांसाठी जिभेचा मध्य भाग; मूर्धज (मूर्धन्य) वर्णांसाठी जिभेचा उपभाग (टोकाचा जवळील भाग); दंतज (दंत्य) वर्णांसाठी जिभेचे टोक हे करण आहे; आणि उर्वरित वर्णांचे आपापले स्थान हेच करण आहे. වණ්ණානං උච්චාරණුස්සාහො පයතනං, තං කිං – සංවුතාදිකරණවිසෙසො, සංවුතත්ත+මකාරස්ස, විවටත්තං සෙසසරානං සකාර+හකාරානඤ්ච, ඵුට්ඨත්තං වග්ගානං, ඊසංඵුට්ඨත්තං ය+ර+ල+වානං. वर्णांच्या उच्चारणाचा उत्साह म्हणजे 'प्रयत्न' होय. तो काय आहे? तो संवृत इत्यादी क्रियांचा विशेष प्रकार आहे. 'अ' काराचा संवृत भाव; उर्वरित स्वर आणि 'स' व 'ह' कारांचा विवृत भाव; वर्गीय व्यंजनांचा स्पृष्ट भाव (स्पर्श); आणि 'य', 'र', 'ल', 'व' यांचा ईषत्-स्पृष्ट भाव (अल्प स्पर्श) होय. එවං ඨාන+කරණ+පයතන+සුති කාලභින්නෙසු අක්ඛරෙසු සරා නිස්සයා, ඉතරෙ නිස්සිතා. තත්ථ – अशा प्रकारे स्थान, करण, प्रयत्न, ध्वनी आणि काल यांमुळे भिन्न असलेल्या अक्षरांमध्ये स्वर हे आश्रय (निसय) आहेत आणि इतर (व्यंजने) हे आश्रित (निसित) आहेत. त्यामध्ये – නිස්සයා+දො [Pg.4] සරා වුත්තා, නිස්සිතා බ්යඤ්ජනා තතො; වග්ගෙ+කජා බහුත්තා+දො, තතො ඨාන+ලහුක්කමා. सुरुवातीला आश्रय असणारे स्वर सांगितले आहेत, त्यानंतर आश्रित असणारी व्यंजने. त्यांमध्ये एकाच वर्गात उत्पन्न होणारे वर्ण त्यांच्या बहुसंख्येमुळे आधी येतात, आणि त्यानंतर स्थानाच्या सुलभतेच्या (लघू) क्रमाने येतात. ‘‘අආදයො’’ති වත්තතෙ යාව ‘‘බින්දු නිග්ගහීත’’න්ති. තඤ්ච ඛො ‘‘අත්ථවසා විභත්තිවිපරිණාමො’’ති සත්තම්යන්ත+මභිසම්බන්ධීයතෙ, ‘‘වණ්ණා’’ති වත්තතෙ – "अ-आदी" (अ इत्यादी) हे "बिंदू निग्गहीत" पर्यंत अनुवृत्त होते. आणि ते "अत्थवसा विभत्तिविपरिणामो" (अर्थाच्या आवश्यकतेनुसार विभक्तीचा बदल) या नियमाने सप्तम्यंत रूपाशी जोडले जाते, आणि "वर्णा" हे अनुवृत्त होते – 2. දසා+දො සරා २. सुरुवातीचे दहा स्वर आहेत. අආදීස්වා+දිම්හි නිද්දිට්ඨා ඔදන්තා දස වණ්ණා සරා නාම හොන්ති. යථා අ ආ, ඉ ඊ, උ ඌ, එ ऐ, ඔ औ. සරන්ති=සප්පධානභාවෙන පවත්තන්ති, බ්යඤ්ජනෙ වා සාරෙන්තීති සරා. 'अ' इत्यादींमध्ये सुरुवातीला निर्देश केलेले आणि 'ओ' (किंवा 'औ') पर्यंत संपणारे दहा वर्ण 'स्वर' म्हणून ओळखले जातात. जसे की: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ. ते स्वतः स्वतंत्रपणे प्रवृत्त होतात (सरन्ति) किंवा व्यंजनांना गतिमान करतात (सारेंति), म्हणून त्यांना 'स्वर' म्हणतात. ‘‘දසා+දො සරා’’ති වත්තතෙ. "सुरुवातीचे दहा स्वर आहेत" हे अनुवृत्त होते. 3. ද්වෙ ද්වෙ සවණ්ණා ३. दोन-दोन (वर्ण) सवर्ण (समान वर्णाचे) असतात. අආදීස්වා+දිමෙසු දසසු ද්වෙ ද්වෙ සවණ්ණා නාම හොන්ති යථාක්කමං. යථා අ ආඉති, ඉ ඊඉති, උ ඌ ඉති, එ එඉති, ඔ, ඔඉති. සමානා සදිසා වණ්ණා සවණ්ණා, සමානත්තඤ්ච ඨානතො. ‘‘ද්වෙ ද්වෙ’’ති වත්තතෙ වක්ඛමානෙසු ද්වීසු. 'अ' इत्यादी पहिल्या दहा स्वरांमध्ये अनुक्रमाने दोन-दोन वर्ण 'सवर्ण' म्हणून ओळखले जातात. जसे की: अ-आ, इ-ई, उ-ऊ, ए-ए, ओ-ओ. समान आणि सदृश असणारे वर्ण म्हणजे 'सवर्ण' होत, आणि ही समानता स्थानावरून ठरते. "दोन-दोन" हे पुढे सांगण्यात येणाऱ्या दोन सूत्रांमध्ये अनुवृत्त होते. 4. පුබ්බො රස්සො ४. त्यांतील पहिला (पूर्व) र्हस्व असतो. තෙස්වෙව දසසු යෙ ද්වෙ ද්වෙ සවණ්ණා, තෙසු යො යො පුබ්බො, සො සො රස්සසඤ්ඤො හොති. යථා අ ඉ උ එ ඔ. තෙසු ‘සංයොගතො පුබ්බාව දිස්සන්ති ද්වෙ පනන්තිමා’ත දස්සෙතුං තත්ථ සාධුත්තා තෙසම්පි ඉධ සඞ්ගහො, යථා එත්ථ සෙය්යො ඔට්ඨො සොත්ථි. රස්සකාලයොගා තබ්බන්තතාය වා [Pg.5] රස්සා. රස්සකාලො නාම අච්ඡරාසඞ්ඝාතො අක්ඛිනිම්මිලනසඞ්ඛාතො වා කාලො, තෙන එකමත්තො රස්සො, ද්විමත්තො දීඝො, අඩ්ඪමත්තො බ්යඤ්ජනො. ඡන්දසි දියඩ්ඪමත්තම්පි රස්සන්ති ගණ්හන්ති ආචරියා. त्याच दहा स्वरांमध्ये जे दोन-दोन सवर्ण आहेत, त्यांपैकी जो जो पहिला (पूर्व) आहे, तो तो 'र्हस्व' संज्ञेचा होतो. जसे की: अ, इ, उ, ए, ओ. त्यांमध्ये "शेवटचे दोन (ए, ओ) केवळ संयोगाच्या पूर्वीच र्हस्व दिसतात" हे दर्शवण्यासाठी आणि तेथे त्यांच्या योग्यतेमुळे त्यांचाही येथे संग्रह केला आहे, जसे की: सेय्यो, ओट्ठो, सोत्थि. र्हस्व काळाशी संबंध असल्यामुळे किंवा त्या स्वरूपाचे असल्यामुळे ते 'र्हस्व' होत. र्हस्व काळ म्हणजे चुटकी वाजवण्याचा किंवा डोळे मिटण्याचा काळ होय; त्यामुळे र्हस्व हा एक मात्रा असलेला, दीर्घ हा दोन मात्रा असलेला आणि व्यंजन हे अर्धी मात्रा केलेले असते. छंदशास्त्रामध्ये आचार्य दीड मात्रेलाही र्हस्व मानतात. 5. පරො දීඝො ५. त्यांतील दुसरा (पर) दीर्घ असतो. අආදීස්වා+දිභූතෙසු දසසු යෙ ද්වෙ ද්වෙ සවණ්ණා, තෙසු යො යො පරො, සො සො දීඝසඤ්ඤො හොති. තං යථා ආ ඊ ඌ එ ඔ. දීඝකාලයොගා තබ්බන්තතාය වා දීඝා. 'अ' इत्यादी पहिल्या दहा स्वरांमध्ये जे दोन-दोन सवर्ण आहेत, त्यांपैकी जो जो दुसरा (पर) आहे, तो तो 'दीर्घ' संज्ञेचा होतो. जसे की: आ, ई, ऊ, ए, ओ. दीर्घ काळाशी संबंध असल्यामुळे किंवा त्या स्वरूपाचे असल्यामुळे ते 'दीर्घ' होत. 6. කාදයො බ්යඤ්ජනා ६. 'क' इत्यादी व्यंजने आहेत. අආදීසු කාදයො නිග්ගහීතපරියන්තා තෙත්තිංස බ්යඤ්ජනා නාම හොන්ති. යථා ක ඛ ග ඝ ඞ, ච ඡ ජ ඣ ඤ, ට ඨ ඩ ඪ ණ, ත ථ ද ධ න, ප ඵ බ භ ම, ය ර ලව ස හ ළ අං ඉති. බ්යඤ්ජීයති අත්ථො එතෙහීති බ්යඤ්ජනා. කකාරාදීස්ව+කාරො උච්චාරණත්ථො. ‘अ’ इत्यादी स्वरांच्या पुढे, ‘क’ पासून सुरू होऊन ‘निग्गहीत’ (अनुस्वार) पर्यंत संपणारे तेहतीस वर्ण ‘व्यंजने’ (ब्यंजन) म्हणून ओळखले जातात. जसे की: क, ख, ग, घ, ङ; च, छ, ज, झ, ञ; ट, ठ, ड, ढ, ण; त, थ, द, ध, न; प, फ, ब, भ, म; य, र, ल, व, स, ह, ळ, अं. ज्यांच्याद्वारे अर्थ स्पष्ट (व्यंजित) केला जातो, ती ‘व्यंजने’ होत. ‘क’ इत्यादी वर्णांमधील ‘अ’ हा स्वर केवळ उच्चारणासाठी आहे. ‘‘කාදයො’’ති වත්තතෙ. ‘कादयो’ (क इत्यादी) हा शब्द अनुवृत्त होतो. 7. පඤ්චපඤ්චකා වග්ගා ७. पाच-पाचचे वर्ग (वग्ग). අආදීසු කකාරාදයො මකාරන්තා පඤ්චපඤ්චකා වග්ගා නාම හොන්ති. යථා ක ඛ ග ඝ ඞ, ච ඡ ජ ඣ ඤ, ට ඨ ඩ ඪ ණ, ත ථ ද ධ න, ප ඵ බ භ ම ඉති. පඤ්ච පඤ්ච පරිමාණ+මෙසං පඤ්චපඤ්චකා. වජ්ජෙන්ති යකාරාදයොති වග්ගා. තෙ පන පඨමක්ඛරවසෙන [Pg.6] කවග්ග+චවග්ගාදිවොහාරං ගතා කුසලත්තිකාදයො විය. ‘अ’ इत्यादी स्वरांच्या पुढे, ‘क’ पासून सुरू होऊन ‘म’ पर्यंत संपणारे पाच-पाचचे समूह ‘वर्ग’ (वग्ग) म्हणून ओळखले जातात. जसे की: क, ख, ग, घ, ङ; च, छ, ज, झ, ञ; ट, ठ, ड, ढ, ण; त, थ, द, ध, न; प, फ, ब, भ, म. ज्यांचे परिमाण (संख्या) पाच-पाच आहे, ते ‘पंचपंचक’ होत. जे समूहात विभागले जातात, ते ‘वर्ग’ होत. आणि ते पहिल्या अक्षराच्या आधारे ‘क-वर्ग’, ‘च-वर्ग’ इत्यादी व्यवहाराला (संज्ञेला) प्राप्त होतात, जसे की ‘कुसलत्तिक’ (कुशल त्रिक) इत्यादी. 8. බින්දු නිග්ගහීතං ८. बिंदूला ‘निग्गहीत’ (अनुस्वार) म्हणतात. අකාරාදීස්ව+යං වණ්ණො බින්දුමත්තො, සො නිග්ගහීතසඤ්ඤො හොති. රස්සසරං නිස්සාය ගහිත+මුච්චාරිතං නිග්ගහීතං, කරණං නිග්ගහෙත්වා වා. ‘अ’ इत्यादी स्वरांच्या पुढे असलेला हा केवळ बिंदू स्वरूपातील वर्ण ‘निग्गहीत’ संज्ञेचा होतो. र्हस्व स्वराचा आश्रय घेऊन ग्रहण केला (उच्चारला) जातो म्हणून तो ‘निग्गहीत’ आहे, किंवा उच्चार स्थान (करण) नियंत्रित करून उच्चारला जातो म्हणून त्याला ‘निग्गहीत’ म्हणतात. කරණං නිග්ගහෙත්වාන, මුඛෙනා+විවටෙන යං; වුච්චතෙ නිග්ගහීතන්ති, වුත්තං බින්දු සරානුගං. उच्चार स्थान (करण) नियंत्रित करून, तोंड पूर्ण न उघडता जे उच्चारले जाते, त्याला ‘निग्गहीत’ म्हटले जाते; स्वराच्या मागे येणाऱ्या बिंदूला ‘निग्गहीत’ म्हटले गेले आहे. බහ්වක්ඛරසඤ්ඤාකරණං අන්වත්ථසඤ්ඤත්ථං, ඣ+ලාදයො තු රුළ්හීසඤ්ඤා. अनेक अक्षरी संज्ञा करणे हे अन्वर्थक (अर्थानुसार अर्थ स्पष्ट करणाऱ्या) संज्ञेसाठी आहे, तर ‘झ’, ‘ल’ इत्यादी संज्ञा केवळ रूळ्हीसंज्ञा (रूढ संज्ञा) आहेत. වණ්ණා සරා සවණ්ණා ච, රස්සා දීඝා ච බ්යඤ්ජනා; වග්ගා ච නිග්ගහීතන්ති, හොති සඤ්ඤාවිධික්කමො. वर्ण, स्वर, सवर्ण, र्हस्व, दीर्घ, व्यंजने, वर्ग आणि निग्गहीत, असा हा संज्ञा-विधानाचा (व्याकरणिक संज्ञा ठरवण्याचा) क्रम आहे. (සඤ්ඤාවිධානං.) (संज्ञा-विधान समाप्त.) සන්ධි වුච්චතෙ – आता संधी सांगितली जात आहे – ලොක අග්ගපුග්ගලො, පඤ්ඤා ඉන්ද්රියං, තීණි ඉමානි, නො හි එතං, භික්ඛුනී ඔවාදො, මාතු උපට්ඨානං, සමෙතු ආයස්මා, අභිභූ ආයතනං, ධනං මෙ අත්ථි, සබ්බෙ එව, තයො අස්සු ධම්මා, අසන්තො එත්ථ න දිස්සන්ති ඉතී+ධ සරසඤ්ඤායං – ‘लोक अग्गपुग्गलो’ (loka aggapuggalo), ‘पञ्ञा इन्द्रियं’ (paññā indriyaṃ), ‘तीणि इमानि’ (tīṇi imāni), ‘नो हि एतं’ (no hi etaṃ), ‘भिक्खुनी ओवादो’ (bhikkhunī ovādo), ‘मातु उपट्ठानं’ (mātu upaṭṭhānaṃ), ‘समेतु आयस्मा’ (sametu āyasmā), ‘अभिभू आयतनं’ (abhibhū āyatanaṃ), ‘धनं मे अत्थि’ (dhanaṃ me atthi), ‘सब्बे एव’ (sabbe eva), ‘तयो अस्सु धम्मा’ (tayo assu dhammā), ‘असन्तो एत्थ न दिस्सन्ति’ (asanto ettha na dissanti) इत्यादी उदाहरणांमध्ये स्वर-संज्ञा असताना – 26. සරො ලොපො සරෙ २६. स्वराच्या पुढे स्वर असल्यास स्वराचा लोप होतो. සරෙ සරො ලොපනීයො හොති. සරොති කාරියීනිද්දෙසො, ලොපොති කාරියනිද්දෙසො. ලොපො= අදස්සනං අනුච්චාරණං[Pg.7], සරොති ජාත්යෙකවචනවසෙන වුත්තං, සරෙති ඔපසිලෙසිකාධාරසත්තමී, තතො වණ්ණ කාල බ්යවධානෙ කාරියං න හොති, ත්ව+මසි, කතමා චානන්ද අනිච්චසඤ්ඤාති. එවං සබ්බසන්ධීසු. स्वर पुढे असताना स्वराचा लोप करावा. ‘सरो’ (स्वर) हा कार्यीचा (ज्यावर कार्य करायचे आहे त्याचा) निर्देश आहे, आणि ‘लोपो’ (लोप) हा कार्याचा (जे कार्य करायचे आहे त्याचा) निर्देश आहे. लोप म्हणजे अदृश्य होणे किंवा उच्चार न करणे. ‘सरो’ हा शब्द जाती-एकवचनाच्या अर्थाने वापरला आहे. ‘सरे’ ही औपश्लेषिक आधार सप्तमी विभक्ती आहे, त्यामुळे वर्ण किंवा काळाचे व्यवधान (अंतर) असल्यास हे कार्य होत नाही. जसे की: ‘त्वं असि’ (त्वमसि), ‘कतमा च आनन्द अनिच्चसञ्ञा’ इत्यादी. याचप्रमाणे सर्व संधींमध्ये समजावे. විධීති වත්තතෙ. ‘विधी’ हा शब्द अनुवृत्त होतो. 14. සත්තමියං පුබ්බස්ස १४. सप्तमी विभक्तीचा निर्देश असताना पूर्व स्वराचा लोप होतो. ථෙරයට්ඨින්යායෙන පවත්තතෙ පරිභාසා දුබ්බලවිධිනො පතිට්ඨාභාවතො. සත්තමීනිද්දෙසෙ පුබ්බස්සෙව විධීති පුබ්බසරලොපො. ලොකග්ගපුග්ගලො, පඤ්ඤින්ද්රියං, තීණිමානි, නො හෙතං, භික්ඛුනොවාදො, මාතුපට්ඨානං, සමෙතායස්මා, අභිභායතනං, ධනංමත්ථි, සබ්බෙව, තයස්සු ධම්මා, අසන්තෙ+ත්ථ න දිස්සන්ති. පුබ්බස්ස කාරියවිධානා සත්තමීනිද්දිට්ඨස්ස පරතා+ව ගම්යතෙති පරෙති පරවචනම්පි ඝටතෙ. ‘स्थविर-यष्टी’ (वृद्ध माणसाची काठी) या न्यायाने ही परिभाषा प्रवृत्त होते, कारण दुर्बल नियमाला स्वतःचा आधार नसतो. सप्तमी विभक्तीचा निर्देश असताना पूर्व स्वराचाच विधी (लोप) होतो, म्हणून पूर्व स्वराचा लोप होतो. उदाहरणे: ‘लोकग्गपुग्गलो’, ‘पञ्ञिन्द्रियं’, ‘तीणिमानि’, ‘नो हेतं’, ‘भिक्खुनोवादो’, ‘मातुपट्ठानं’, ‘समेतायस्मा’, ‘अभिभायतनं’, ‘धनमत्थि’, ‘सब्बेव’, ‘तयस्सु धम्मा’, ‘असन्तेत्थ न दिस्सन्ति’. पूर्व स्वरावर कार्य करण्याचे विधान असल्यामुळे, सप्तमीने निर्दिष्ट केलेल्या वर्णाची परता (नंतर असणे) आपोआपच समजली जाते, म्हणून ‘परे’ (नंतर असताना) हा शब्द देखील योग्य ठरतो. යස්ස ඉදානි, සඤ්ඤා ඉති, ඡායා ඉව, ඉති අපි, අස්සමණී අසි, චක්ඛු ඉන්ද්රියං, අකතඤ්ඤූ අසි, ආකාසෙ ඉව, තෙ අපි, වන්දෙ අහං, සො අහං, චත්තාරො ඉමෙ, වසලො ඉති, මොග්ගල්ලානො අසි බීජකො, කථා එව කා, පාතො එවාතී+ධ පුබ්බස්සරලොපෙ සම්පත්තෙ ‘‘සරො ලොපො සරෙ’’ ත්වෙව. ‘यस्स इदानि’, ‘सञ्ञा इति’, ‘छाया इव’, ‘इति अपि’, ‘अस्समणी असि’, ‘चक्खु इन्द्रियं’, ‘अकतञ्ञू असि’, ‘आकासे इव’, ‘ते अपि’, ‘वन्दे अहं’, ‘सो अहं’, ‘चत्तारो इमे’, ‘वसलो इति’, ‘मोग्गल्लानो असि बीजको’, ‘कथा एव का’, ‘पातो एव’ इत्यादी उदाहरणांमध्ये पूर्व स्वराचा लोप प्राप्त होत असताना, ‘सरो लोपो सरे’ या सूत्रानेच – 27. පරො ක්වචි २७. पर स्वराचा कधीकधी लोप होतो. සරම්හා පරො සරො ක්වචි ලොපනීයො හොති. යස්ස දානි, සඤ්ඤාති, ඡායාව, ඉතිපි, අස්සමණීසි, චක්ඛුන්ද්රියං, අකතඤ්ඤූසි, ආකාසෙව, තෙපි, වන්දෙහං, සොහං, චත්තාරොමෙ, වස- ලොභි[Pg.8], මොග්ගල්ලානොසි බීජකො, කථාව කා, පාතොව. ක්වචීති කිං, පඤ්ඤින්ද්රියං, පඤ්චින්ද්රියානි, සත්තුත්තමො, එකූනවීසති, යස්සෙතෙ, සුගතොවාදො, දිට්ඨාසවො, දිට්ඨොඝො, චක්ඛායතනං, තං කුතෙත්ථ ලබ්භා. ‘‘විවක්ඛාතො සන්ධයො භවන්තී’’ති ඤායා වත්තිච්ඡාපි ඉධ සිජ්ඣති. ක්වචීත්ය+ධිකාරො සබ්බසන්ධීසු, තෙන නාතිප්පසඞ්ගො. (ලොපසන්ධි). स्वराच्या पुढील पर स्वराचा कधीकधी लोप करावा. उदाहरणे: ‘यस्स दानि’, ‘सञ्ञाति’, ‘छायाव’, ‘इतिपि’, ‘अस्समणीसि’, ‘चक्खुन्द्रियं’, ‘अकतञ्ञूसि’, ‘आकासेव’, ‘तेपि’, ‘वन्देहा’, ‘सोहं’, ‘चत्तारोमे’, ‘वसलोभि’, ‘मोग्गल्लानोसि बीजको’, ‘कथाव का’, ‘पातोव’. ‘क्वचि’ (कधीकधी) असे का म्हटले आहे? (कारण जेथे लोप होत नाही:) ‘पञ्ञिन्द्रियं’, ‘पञ्चिन्द्रियानि’, ‘सत्तुत्तमो’, ‘एकूनवीसati’, ‘यस्सेते’, ‘सुगतोवादो’, ‘दिट्ठासवो’, ‘दिट्ठोघो’, ‘चक्खायतनं’, ‘तं कुतेत्थ लब्भा’ इत्यादी. ‘विवक्षेनुसार (बोलणाऱ्याच्या इच्छेनुसार) संधी होतात’ या न्यायाने वक्त्याची इच्छा देखील येथे सिद्ध होते. ‘क्वचि’ हा अधिकार सर्व संधींमध्ये लागू होतो, त्यामुळे अतिप्रसंग (नियमाचा अतिरेक) होत नाही. (लोपसंधी समाप्त). සරො පරො වෙති ච වත්තතෙ. ‘स्वर’, ‘पर’ आणि ‘वा’ (विकल्पाने) हे शब्द अनुवृत्त होतात. තස්ස ඉදං, වාත ඊරිතං, න උපෙති, වාම ඌරු, අති ඉව අඤ්ඤෙහි, වි උදකං ඉතීධ පුබ්බස්සරලොපෙ – ‘तस्स इदं’, ‘वात ईरितं’, ‘न उपेति’, ‘वाम ऊरु’, ‘अति इव अञ्ञेहि’, ‘वि उदकं’ इत्यादी उदाहरणांमध्ये पूर्व स्वराचा लोप झाल्यावर – 29. යුවණ්ණාන+මෙඔ ලුත්තා २९. पूर्व स्वराचा लोप झाल्यावर पुढील ‘इ-वर्ण’ (इ, ई) आणि ‘उ-वर्ण’ (उ, ऊ) यांचे अनुक्रमे ‘ए’ आणि ‘ओ’ होतात. ලුත්තා සරා පරෙසං ඉවණ්ණුවණ්ණානං එ+ඔ හොන්ති වා යථාක්කමං. යථාසංඛ්යානුද්දෙසො සමානානං. पूर्व स्वराचा लोप झाल्यावर पुढील ‘इ-वर्ण’ आणि ‘उ-वर्ण’ यांचे विकल्पाने अनुक्रमे ‘ए’ आणि ‘ओ’ होतात. समान संख्या असलेल्या घटकांचा निर्देश यथासंख्य (अनुक्रमे) होतो. 24. වණ්ණපරෙන සවණ්ණොපි २४. ‘वर्ण’ हा शब्द पुढे असल्यामुळे सवर्ण देखील ग्रहण केला जातो. වණ්ණසද්දො පරො යස්මා, තෙන සවණ්ණොපි ගය්හති සයඤ්ච රූපංති ඊඌනම්පි එ+ඔ. සබ්බත්ථ රස්සස්ස ජාතිනිද්දෙසෙ දීඝස්සාපි ගහණත්ථං ඉද+මාරද්ධං. තස්සෙදං, වාතෙරිතං, නොපෙති, වාමොරු, අතෙවඤ්ඤෙහි, වොදකං. ඉදඤ්ච පච්ඡිමොදාහරණද්වයං ‘‘අවණ්ණෙ ලුත්තෙ එව එ+ඔ හොන්තී’’ති ගාහස්ස නිසෙධනත්ථං. වාත්වෙව, තස්සිදං. කථං ‘‘පච්චොරස්මි’’න්ති, යොගවිභාගා. පති උරස්මින්ති විභජ්ජ ‘‘යවා සරෙ’’ති යකාරෙ ‘‘තවග්ගවරණා’’දිනා චො, ‘‘වග්ගලසෙහි තෙ’’ති පුබ්බරූපඤ්ච, ‘‘යුවණ්ණාන+මෙඔ’’ති (යොගවිභාගා) උස්ස ඔ ච. ලුත්තාති කිං, දස ඉමෙ [Pg.9] ධම්මා, යථා ඉදං, කුසලස්ස උපසම්පදා. අතිප්පසඞ්ගබාධකස්ස ක්වචිසද්දස්සානුවත්තනතො න විකප්පවිධි නියතා, තෙන උපෙතො, අවෙච්චාති එවමාදීසු විකප්පො. තාරකිතා, යස්සින්ද්රියානි, මහිද්ධිකො, සබ්බීතියො, තෙනුපසඞ්කමි, ලොකුත්තරොතිආදීසු විධි ච න හොති. ज्याअर्थी ‘वर्ण’ शब्द पुढे आहे, त्याअर्थी सवर्ण देखील ग्रहण केला जातो आणि स्वतःचे रूप देखील, म्हणून ‘ई’ आणि ‘ऊ’ यांचे देखील ‘ए’ आणि ‘ओ’ होतात. सर्वत्र र्हस्व स्वराचा जाती-निर्देश केला असता दीर्घाचे देखील ग्रहण व्हावे, यासाठी हे स्पष्ट केले आहे. उदाहरणे: ‘तस्सेदं’, ‘वातेरितं’, ‘नोपेति’, ‘वामोरु’, ‘अतेवञ्ञेहि’, ‘वोदकं’. आणि ही शेवटची दोन उदाहरणे ‘केवळ अ-वर्णाचा लोप झाल्यावरच ए आणि ओ होतात’ या आग्रहाचा निषेध करण्यासाठी आहेत. विकल्पानेच, जसे की: ‘तस्सिदं’. ‘पच्चोरस्मिं’ हे कसे सिद्ध होते? योगविभागाने (सूत्राचे तुकडे करून). ‘पति उरस्मिं’ अशी विभागणी करून, ‘यवा सरे’ या सूत्राने य-कार झाल्यावर, ‘तवग्गवरण...’ इत्यादी सूत्राने च-कार होतो, ‘वग्गलसेहि ते’ या सूत्राने पूर्वरूप होते, आणि ‘युवण्णानमेओ’ या सूत्राच्या योगविभागाने ‘उ’ चा ‘ओ’ होतो. ‘लुत्ता’ (लोप झाल्यावर) असे का म्हटले आहे? (कारण जेथे लोप होत नाही:) ‘दस इमे धम्मा’, ‘यथा इदं’, ‘कुसलस्स उपसम्पदा’. अतिप्रसंगाचा बाध करणाऱ्या ‘क्वचि’ या शब्दाच्या अनुवृत्तीमुळे हा विकल्प-विधी नियत (अनिवार्य) नाही, त्यामुळे ‘उपेतो’, ‘अवेच्च’ इत्यादींमध्ये विकल्प होतो. ‘तारकिता’, ‘यस्सिन्द्रियानि’, ‘महिद्धिको’, ‘सब्बीतियो’, ‘तेनुपसङ्कमि’, ‘लोकुत्तरो’ इत्यादींमध्ये हा विधी होत नाही. පටිසන්ථාරවුත්ති අස්ස, සබ්බවිත්ති අනුභූයතෙ, වි අඤ්ජනං, වි ආකතො, දාසී අහං, අහුවා පුරෙ, අනු අද්ධමාසං, අනු එති, සු ආගතං, සු ආකාරො, දු ආකාරො, චක්ඛු ආපාථං, බහු ආබාධො, පාතු අකාසි, න තු එව, භූ ආපනලානිලං ඉතී+ධ ‘‘යුවණ්ණානං’’ ‘‘වෙ’’ති ච වත්තතෙ, ‘पटिसन्थारवुत्ति अस्स’, ‘सब्बवित्ति अनुभूयते’, ‘वि अञ्जनं’, ‘वि आ कतो’, ‘दासी अहं’, ‘अहुवा पुरे’, ‘अनु अद्धमासं’, ‘अनु एति’, ‘सु आगतं’, ‘सु आकारो’, ‘दु आकारो’, ‘चक्खु आपाथं’, ‘बहु आबाधो’, ‘पातु अकासि’, ‘न तु एव’, ‘भू आपनलानिलं’ इत्यादी उदाहरणांमध्ये ‘युवण्णानं’ (इ-वर्ण आणि उ-वर्ण यांचे) आणि ‘वा’ (विकल्पाने) हे शब्द अनुवृत्त होतात – 30. යවා සරෙ ३०. स्वर पुढे असताना इ-वर्ण आणि उ-वर्ण यांचे अनुक्रमे ‘य’ आणि ‘व’ होतात. සරෙ පරෙ ඉවණ්ණුවණ්ණානං යකාර+වකාරා හොන්ති වා යථාක්කමං. පටිසන්ථාරවුත්යස්ස, සබ්බවිත්යනුභූයතෙ, බ්යඤ්ජනං, බ්යාකතො ‘‘බ්යඤ්ජනෙ දීඝරස්සා’’ති දීඝෙ දාස්යාහං, අහාපුරෙ, අන්වද්ධමාසං, අන්වෙති, ස්වාගතං, ස්වාකාරො, ද්වාකාරො, චක්ඛ්වාපාථං, බහ්වාබාධො, පාත්වාකාසි, න ත්වෙව, භ්වාපනලානිලං. වාත්වෙව, විආකතො, සාගතං. स्वर पुढे असताना इ-वर्ण आणि उ-वर्णांचे विकल्पाने अनुक्रमे ‘य-कार’ (य) आणि ‘व-कार’ (व) होतात. उदाहरणे: ‘पटिसन्थारवुत्यस्स’, ‘सब्बवित्यनुभूयते’, ‘ब्यञ्जनं’, ‘ब्याकतो’. ‘ब्यञ्जने दीघरस्सा’ या सूत्राने दीर्घ झाल्यावर ‘दास्याहं’, ‘अहापुरे’ (असे रूप होते). तसेच ‘अन्वद्धमासं’, ‘अन्वेति’, ‘स्वागतं’, ‘स्वाकारो’, ‘द्वाकारो’, ‘चक्ख्वापाथं’, ‘बह्वाबाधो’, ‘पात्वाकासि’, ‘न त्वेव’, ‘भ्वापनलानिलं’. विकल्पानेच होत असल्यामुळे (हा विधी न झाल्यास): ‘विआकतो’, ‘सागतं’ (अशी रूपे होतात). අධිගතො ඛො මෙ අයං ධම්මො, පුත්තො තෙ අහං, තෙ අස්ස පහීනා පඤ්ච, තෙ අහං, යෙ අස්ස, තෙ අජ්ජ, යාවතකො අස්ස කායො, තාවතකො අස්ස බ්යාමො, කො අත්ථො, අථ ඛො අස්ස, අහං ඛො අජ්ජ, සො අහං, සො අජ්ජ, සො එව, යතො අධිකරණං, සො අහං ඉතී+ධ ‘‘යවා සරෙ’’ ‘‘වෙ’’ති ච වත්තතෙ, ‘अधिगतो खो मे अयं धम्मो’ (हा धम्म खरोखर मला प्राप्त झाला आहे), ‘पुत्तो ते अहं’ (मी तुझा पुत्र आहे), ‘ते अस्स पहीना पञ्च’ (त्याचे ते पाच नष्ट झाले आहेत), ‘ते अहं’ (ते मी), ‘ये अस्स’ (जे त्याचे), ‘ते अज्ज’ (ते आज), ‘यावतको अस्स कायो’ (जेवढी त्याची काया आहे), ‘तावतको अस्स ब्यामो’ (तेवढा त्याचा हातभर विस्तार आहे), ‘को अत्थो’ (काय प्रयोजन), ‘अथ खो अस्स’ (त्यानंतर खरोखर त्याचे), ‘अहं खो अज्ज’ (मी खरोखर आज), ‘सो अहं’ (तो मी), ‘सो अज्ज’ (तो आज), ‘सो एव’ (तोच), ‘यतो अधिकरणं’ (ज्या अधिकरणापासून), ‘सो अहं’ इत्यादींमध्ये येथे “यवा सरे” आणि “वे” (वा) हे अनुवृत्त होते. 30. එඔනං ३०. ए आणि ओ यांचे (एओनम्). එඔනං [Pg.10] යකාර+වකාරා හොන්ති වා සරෙ පරෙ යථාක්කමං. ‘‘බ්යඤ්ජනෙ දීඝරස්සා’’ති දීඝෙ අධිගතො ඛො ම්යායං ධම්මො, පුත්තො ත්යාහං, ත්යාස්ස පහීනා පඤ්ච, ත්යාහං, ය්යස්ස, ත්යජ්ජ, යාවතක්වස්ස කායො, තාවතක්වස්ස බ්යාමො, ක්වත්ථො, අථ ඛ්වස්ස, අහං ඛ්වජ්ජ, ස්වාහං, ස්වජ්ජ, ස්වෙව, යත්වාධිකරණං, ස්වාහං. වාත්වෙව, තෙජ්ජ, සොහං. ක්වචි ත්වෙව, ධනමත්ථි, පුත්තාමත්ථි, තෙ නාගතා, අසන්තෙත්ථ, චත්තාරො ඉමෙ. स्वर पुढे असताना ‘ए’ आणि ‘ओ’ चे अनुक्रमे ‘य’कार आणि ‘व’कार होतात. “ब्यञ्जने दीघरस्सा” या सूत्राने दीर्घ केल्यावर— ‘अधिगतो खो म्यायं धम्मो’ (मे + अयं = म्यायं), ‘पुत्तो त्याहं’ (ते + अहं = त्याहं), ‘त्यास्स पहीना पञ्च’ (ते + अस्स = त्यास्स), ‘त्याहं’ (ते + अहं), ‘य्यस्स’ (ये + अस्स), ‘त्यज्ज’ (ते + अज्ज), ‘यावतक्वस्स कायो’ (को + अस्स = क्वस्स), ‘तावतक्वस्स ब्यामो’, ‘क्वत्थो’ (को + अत्थो), ‘अथ ख्वस्स’ (खो + अस्स), ‘अहं ख्वज्ज’ (खो + अज्ज), ‘स्वाहं’ (सो + अहं), ‘स्वज्ज’ (सो + अज्ज), ‘स्वेव’ (सो + एव), ‘यत्वाधिकरणं’ (यतो + अधिकरणं), ‘स्वाहं’ अशी रूपे होतात. ‘वा’ (पर्यायाने) असल्यामुळे— ‘तेज्ज’ (ते + अज्ज), ‘सोहं’ (सो + अहं) अशीही रूपे होतात. ‘क्वचि’ (काही ठिकाणी) मुळे— ‘धनमत्थि’, ‘पुत्तामत्थि’, ‘ते नागता’, ‘असन्तेत्थ’, ‘चत्तारो इमे’ अशी रूपे होतात. ගො එළකං, ගො අස්සං, ගො අජිනං ඉතී+ධ ‘‘සරෙ’’ති වත්තතෙ. ‘गो एळकं’, ‘गो अस्सं’, ‘गो अजिनं’ इत्यादींमध्ये येथे “सरे” (स्वर पुढे असताना) हे अनुवृत्त होते. 32. ගොස්සා+වඞ ३२. गो-शब्दाला ‘अवङ्’ आदेश होतो. සරෙ පරෙ ගොස්ස අවවාදෙසො හොති. ස ච ‘‘ටානුබන්ධානෙකවණ්ණා සබ්බස්සා’’ති සබ්බස්ස පසඞ්ගෙ ‘අන්තස්සා’’ති වත්තතෙ. स्वर पुढे असताना ‘गो’ शब्दाला ‘अव’ आदेश होतो. आणि तो “टानुबन्धानेकवण्णा सब्बस्स” या सूत्राने संपूर्ण शब्दाच्या जागी प्राप्त होत असताना, “अन्तस्स” (शेवटच्या वर्णाच्या जागी) हे अनुवृत्त होत असल्यामुळे (फक्त शेवटच्या वर्णाच्या जागी होतो). 18. ඞ+නුබන්ධො १८. ‘ङ’कार अनुबंध (इत्-संज्ञक) असलेला. ඞ-කාරො අනුබන්ධො යස්ස, සො අනෙකවණ්ණොපි අන්තස්ස හොතීති ඔකාරස්සෙව හොති. ‘‘සංකෙතො+නවයවො+නුබන්ධො’’ති වචනා ඞ-කාරස්සා+ප්පයොගො. උච්චාරිතානන්තරප්පධංසිනො හි අනුබන්ධා, පයොජනං අනුබන්ධොති සංකෙතො. ගවෙළකං, ගවාස්සං, ගවාජිනං. ज्याला ‘ङ’कार अनुबंध आहे, तो अनेक वर्णांचा (अनेकवण्ण) असला तरीही अंतिम वर्णाच्या जागीच होतो, म्हणून तो केवळ ‘ओ’कारच्या जागीच होतो. “सङ्केतोऽनवयवोऽनुबन्धो” (अनुबंध हा अवयव नसलेला केवळ संकेत आहे) या वचनानुसार ‘ङ’काराचा प्रयोग होत नाही. कारण उच्चारल्याबरोबर नष्ट होणारे ते अनुबंध असतात, आणि विशिष्ट प्रयोजनासाठी अनुबंध हा संकेत केला जातो. उदा. गवेळकं (गो + एळकं), gवास्सं (गो + अस्सं), गवाजिनं (गो + अजिनं). ඉති එවා+තී+ධ – ‘इति एव’ इत्यादींमध्ये येथे— 36. වී+තිස්සෙ+වෙ වා ३६. ‘वि’ हा ‘इति’च्या जागी ‘एव’ पुढे असताना पर्यायाने (वा) होतो. එවසද්දෙ පරෙ ඉතිස්ස වො හොති වා. ස ච – ‘एव’ शब्द पुढे असताना ‘इति’चा ‘वि’ (किंवा ‘व’) पर्यायाने होतो. आणि तो— 17. ඡට්ඨියන්තස්ස १७. षष्ठी विभक्तीने निर्दिष्ट केलेल्याच्या (अंतिम वर्णाच्या जागी). ඡට්ඨීනිද්දිට්ඨස්ස [Pg.11] යං කාරියං, ත+දන්තස්ස විඤ්ඤෙය්යන්ති ඉකාරස්සා+දෙසො. ආදෙසිට්ඨානෙ ආදිස්සතීති ආදෙසො. ඉත්වෙව. අඤ්ඤත්ර යාදෙසො, ‘‘තවග්ගවරණානං යෙ චවග්ගබයඤා’’ති තස්ස චො, ‘‘වග්ගලසෙහි තෙ’’ති යස්ස චකාරො, ඉච්චෙව. එවෙති කිං, ඉච්චාහ. (ආදෙසසන්ධි). षष्ठी विभक्तीने निर्दिष्ट केलेले जे कार्य आहे, ते त्याच्या अंतिम वर्णाच्या जागी होते असे समजावे; म्हणून हा ‘इ’काराचा आदेश आहे. मूळ वर्णाच्या जागी जो आदेशित केला जातो त्याला ‘आदेश’ म्हणतात. उदा. ‘इत्वेव’ (इति + एव). इतर ठिकाणी ‘य’कार आदेश होतो, “तवग्गवरणानं ये चवग्गबयञा” या सूत्राने त्याचा ‘च’कार होतो, आणि “वग्गलसेहि ते” या सूत्राने ‘य’काराचा ‘च’कार होऊन ‘इच्चेव’ असे रूप होते. ‘एव’ पुढे असतानाच का? (कारण इतर स्वरांच्या पुढे) ‘इच्चाह’ (इति + आह) असे रूप होते. (आदेशसंधी). ති අඞ්ගුලං,ති අඞ්ගිකං, භූ ආදයො, මිගී භන්තා උදික්ඛතිත්යාදිසන්ධයො වුච්චන්තෙ. ‘‘මයදා සරෙ’’ති වත්තතෙ. ‘ति अङ्गुलं’, ‘ति अङ्गिकं’, ‘भू आदयो’, ‘मिगी भन्ता उदिक्खति’ इत्यादी संधी सांगितले जात आहेत. येथे “मयदा सरे” हे अनुवृत्त होते. 45. වනතරගා චා+ගමා ४५. ‘व’, ‘न’, ‘त’, ‘र’, ‘ग’ हे देखील आगम होतात. එතෙ මයදා ච ආගමා හොන්ති වා සරෙ ක්වචි. ආගමිනො අනියමෙපි – हे (व, न, त, र, ग) आणि ‘म, य, द’ हे स्वर पुढे असताना काही ठिकाणी पर्यायाने आगम होतात. आगम होणाऱ्या शब्दाचा नियम नसला तरी— සරොයෙවා+ගමි හොති, වනාදිනන්තු ඤාපකා; අඤ්ඤථා හි පදාදීනං, යුකවිධාන+මනත්ථකං. केवळ स्वरच आगम स्वीकारणारा (आगमी) असतो, हे ‘व’ इत्यादींच्या ज्ञापकावरून सिद्ध होते; अन्यथा शब्दांच्या सुरुवातीला ‘य’ आणि ‘व’काराचे विधान निरर्थक ठरले असते. එත්ථා+ගමා අනියතාගමීනමෙව භවන්ති චෙ, යකාරාගමෙනෙව ‘‘නිපජ්ජ’’න්ති සිද්ධෙ ‘‘පදාදීනං ක්වචී’’ති බ්යඤ්ජනස්ස යුකා+ගමො නිරත්ථකොති අධිප්පායො. තිවඞ්ගුලං, තිවඞ්ගිකං, භූවාදයො, මිගී භන්තා වුදික්ඛති, පවුච්චති, පාගුඤ්ඤවුජුතා. ඉතො නායති, චිනිත්වා. යස්මාතිහ, තස්මාතිහ, අජ්ජතග්ගෙ. නිරන්තරං, නිරාලයො, නිරින්ධනො, නිරීහකං, නිරුත්තරො, නිරොජං, දුරතික්කමො, දුරාගතං, දුරුත්තරං, පාතුරහොසි, පුනරාගච්ඡෙය්ය, පුනරුත්තං, පුනරෙව, පුනරෙති, ධීරත්ථු, පාතරාසො, චතුරඞ්ගිකං, චතුරාරක්ඛං, චතුරිද්ධිපාදපටිලාභො, චතුරොඝනිත්ථරණත්ථං, භත්තුරත්ථෙ, වුත්තිරෙසා, පථවීධාතුරෙවෙසා[Pg.12], නක්ඛත්තරාජාරිව තාරකානං, විජ්ජුරිවබ්භකුටෙ, ආරග්ගෙරිව සාසපො, උසභොරිව, සබ්භිරෙව සමාසෙථ. පුථගෙව, රස්සෙ පගෙව. ලහුමෙස්සති, ගුරුමෙස්සති, ඉධමාහු, කෙන තෙ ඉධ මිජ්ඣති, භද්රො කසාමිව, ආකාසෙ මභිපූජයෙ, එකමෙකස්ස, යෙන මිධෙකච්චෙ. භාතියෙව, හොතියෙව, යථායිදං, යථායෙව, මායිදං, නයිදං, නයිධ, ඡයිමානි, නවයිමෙ ධම්මා, බොධියායෙව, පථවීයෙව ධාතු, තෙසුයෙව, තෙයෙව, සොයෙව, පාටියෙක්කං, වියඤ්ජනං, වියාකාසි, පරියන්තං, පරියාදානං, පරියුට්ඨානං, පරියෙසති, පරියොසානං, නියායොගො. උදග්ගො, උදයො, උදාහටං, උදිතො, උදීරිතං, උදෙති, සකිදෙව, කිඤ්චිදෙව, කෙනචිදෙව, කිස්මිඤ්චිදෙව, කොචිදෙව, සම්මදත්තො, සම්මදඤ්ඤා විමුත්තානං, සම්මදෙව, යාවදත්ථං, යාවදිච්ඡකං, යාවදෙව, තාවදෙව, පුනදෙව, යදත්ථං, යදන්තරං, තදන්තරං, තදඞ්ගවිමුත්ති, එතදත්ථං, අත්තදත්ථං, තදත්ථං, සදත්ථපසුතො සියා, අඤ්ඤදත්ථු, මනසාදඤ්ඤා විමුත්තානං, බහුදෙව රත්ති. වාත්වෙව, අත්තඅත්ථං, ද්වාධිට්ඨිතං, පාතුඅහොසි. වවත්ථිතවිභාසත්තා වාධිකාරස්ස බ්යඤ්ජනතොපි, භික්ඛුනීනං වුට්ඨාපෙය්ය, චිරං නායති, තංයෙව. येथे जर आगम केवळ अनियत आगमींनाच (ज्यांचा आगमी निश्चित नाही त्यांनाच) होत असते, तर ‘य’कार आगमानेच ‘निपज्ज’ रूप सिद्ध होत असताना, “पदादीनं क्वचि” या सूत्राने व्यंजनाचा ‘य’ आणि ‘व’कार आगम करणे निरर्थक ठरले असते, असा अभिप्राय आहे. उदा. तिवङ्गुलं (ति + अङ्गुलं), तिवङ्गिकं (ति + अङ्गिकं), भूवादयो (भू + आदयो), मिगी भन्ता वुदिक्खति (उदिक्खति च्या जागी वुदिक्खति), पवुच्चति (प + उच्चति), पागुञ्ञवुजुता (पागुञ्ञता + उजुता). इतो नायति (इतो + आयति), चिनित्वा (चि + इत्वा). यस्मातिह (यस्मा + इह), तस्मातिह (तस्मा + इह), अज्जतग्गे (अज्जा + अग्गे). निरन्तरं (नि + अन्तरं), निरालयो (नि + आलयो), निरिन्धनो (नि + इन्धनो), निरीहकं (नि + ईहकं), निरुत्तरो (नि + उत्तरो), निरोजं (नि + ओजं), दुरतिक्कमो (du + अतिक्कमो), दुरागतं (दु + आगतं), दुरुत्तरं (दु + उत्तरं), पातुरहोसि (पातु + अहोसि), पुनरागच्छेय्य (पुन + आगच्छेय्य), पुनरुत्तं (पुन + उत्तं), पुनरेव (पुन + एव), पुनरेति (पुन + एति), धीरत्थु (धी + अत्थु), पातरासो (पात + आसो), चतुरङ्गिकं (चतु + अङ्गिकं), चतुरा रक्खं (चतु + आरक्खं), चतुरिद्धिपादपटिलाभो (चतु + इद्धिपाद...), चतुरोघनित्थरणत्थं (चतु + ओघ...), भत्तुरत्थे (भत्तु + अत्थे), वुत्तिरेसा (वुत्ति + एसा), पठवीधातुरेवेसा (पठवीधातु + एव + एसा), नक्खत्तराजारिव तारकानं (नक्खत्तराजा + इव), विज्जुरिवब्भकुटे (विज्जु + इव), आरग्गेरिव सासपो (आरग्गे + इव), उसभोरिव (उसभो + इव), सब्भिरेव समासेथ (सब्भि + एव). पुथगेव (पुथ + एव), रस्से पगेव (प + एव). लहुमेस्सति (लहु + एस्सति), गुरुमेस्सति (गुरु + एस्सति), इधमाहु (इध + आहु), केन ते इध मिज्झति (इध + इज्झति), भद्रो कसामिव (कसा + इव), आकासे मभिपूजये (आकासे + अभिपूजये), एकमेकस्स (एक + एकस्स), येन मिधेकच्चे (येन + इध + एकच्चे). भातियेव (भाति + एव), होतियेव (होति + एव), यथायिदं (यथा + इदं), यथायेव (यथा + एव), मायिदं (मा + इदं), नयिदं (ना + इदं), नयिध (ना + इध), चयिमानि (च + इमानि), नवयिमे धम्मा (नवा + इमे), बोधियायेव (बोधिया + एव), पठवीयेव धातु (पठवी + एव), तेसुयेव (तेसु + एव), तेयेव (ते + एव), सोयेव (सो + एव), पाटियेक्कं (पाटि + एक्कं), वियञ्जनं (वि + अञ्जनं), वियाकासि (वि + अकासि), परियन्तं (परि + अन्तं), परियादानं (परि + आदानं), परियुट्ठानं (परि + उट्ठानं), परियेसति (परि + एसति), परियोसानं (परि + ओसानं), नियायोगो (नि + आयोगो). उदग्गो (उ + अग्गो), उदयो (उ + अयो), उदाहतं (उ + आहतं), उदितो (उ + इतो), उदीरितं (उ + ईरितं), उदेति (उ + एति), सकिदेव (सकि + एव), किञ्चिदेव (किञ्चि + एव), केनचिदेव (केनचि + एव), किस्मिञ्चिदेव (किस्मिञ्चि + एव), कोचिदेव (कोचि + एव), सम्मदत्तो (सम्मा + अत्तो), सम्मदञ्ञा विमुत्तानं (सम्मा + अञ्ञा), सम्मदेव (सम्मा + एव), यावदत्थं (याव + अत्थं), यावदिच्छकं (याव + इच्छकं), यावदेव (याव + एव), तावदेव (ताव + एव), पुनदेव (पुन + एव), यदत्थं (य + अत्थं), यदन्तरं (य + अन्तरं), तदन्तरं (त + अन्तरं), तदङ्गविमुत्ति (त + अङ्ग...), एतदत्थं (एत + अत्थं), अत्तदत्थं (अत्त + अत्थं), तदत्थं (त + अत्थं), सदत्थपसुतो सिया (स + अत्थ...), अञ्ञदत्थु (अञ्ञ + अत्थु), मनसादञ्ञा विमुत्तानं (मनसा + अञ्ञा), bahuदेव रत्ति (bahu + eva -> बहुदेव रत्ति). ‘वा’ (पर्यायाने) असल्यामुळे— अत्तअत्थं (अत्त + अत्थं), द्वाधिट्ठितं (द्वि + अधिट्ठितं), पातुअहोसि (पातु + अहोसि). ‘वा’ अधिकाराच्या व्यवस्थित विभाषेमुळे व्यंजनाच्या पुढे देखील— भिक्खुनीनं वुट्ठापेय्य (भिक्खुनीनं + उट्ठापेय्य), चिरं नायति (चिरं + आयति), तंयेव (तं + एव) अशी रूपे होतात. ඡ අභිඤ්ඤා, ඡ අඞ්ගං, ඡ අසීති, ඡ අංසා, ඡ ආයතනං ඉතී+ධ ‘‘වා සරෙ’’ ‘‘ආගමො’’ති ච වත්තතෙ. ‘छ अभिञ्ञा’, ‘छ अङ्गं’, ‘छ असीति’, ‘छ अंसा’, ‘छ आयतनं’ इत्यादींमध्ये येथे “वा सरे” आणि “आगमो” हे अनुवृत्त होते. 49. ඡා ළො ४९. ‘छ’ शब्दाच्या पुढे ‘ळ’कार होतो. ඡසද්දා පරස්ස සරස්ස ළකාරො ආගමො හොති වා. ඡාති අනුකරණත්තා එකවචනං. ඡළභිඤ්ඤා, ඡළඞ්ගං, ඡළසීති, ඡළංසා, ඡළායතනං. වාත්වෙව, ඡඅභිඤ්ඤා. (ආගමසන්ධි). ‘छ’ शब्दाच्या पुढील स्वराला ‘ळ’कार आगम पर्यायाने होतो. ‘छ’ हे अनुकरण असल्यामुळे एकवचनात आहे. उदा. चळभिञ्ञा (छ + अभिञ्ञा), चळङ्गं (छ + अङ्गं), चळसीति (छ + असीति), चळंसा (छ + अंसा), चळायतनं (छ + आयतनं). ‘वा’ (पर्यायाने) असल्यामुळे— छअभिञ्ञा असेही होते. (आगमसंधी). ලොපො [Pg.13] අදස්සනං, ඨානිං, ය+මාමද්දිය දිස්සති; ආදෙසො නාම සො යා තු, අසන්තුප්පත්ති ආගමො. लोप म्हणजे अदृश्य होणे; मूळ वर्णाच्या (स्थानीच्या) जागी जो बदल दिसून येतो त्याला ‘आदेश’ म्हणतात; आणि जे आधी अस्तित्वात नव्हते त्याचे नव्याने येणे म्हणजे ‘आगम’ होय. සරසන්ධි. स्वरसंधी. කඤ්ඤා ඉව, කඤ්ඤාව ඉච්චාදි සරසන්ධිනිසෙධො වුච්චති, පසඞ්ගපුබ්බකො හි පටිසෙධො. පුබ්බසරානං ලොපෙ සම්පත්තෙ ‘‘සරො’’ ‘‘වෙ’’ති ච වත්තතෙ. ‘कञ्ञा इव’, ‘कञ्ञाव’ इत्यादींमध्ये स्वरसंधीचा निषेध (प्रतिषेध) सांगितला आहे, कारण निषेध हा नेहमी प्रसंगाच्या (प्राप्तीच्या) अधीन असतो. पूर्व स्वराचा लोप प्राप्त होत असताना, येथे “सरो” आणि “वे” (वा) हे अनुवृत्त होते. 28. න ද්වෙ වා २८. दोन्ही (स्वर) पर्यायाने लुप्त होत नाहीत. පුබ්බපරස්සරා ද්වෙපි වා ක්වචි න ලුප්යන්තෙ. කඤ්ඤා ඉව, කඤ්ඤෙව, කඤ්ඤාව. पूर्व आणि पर दोन्ही स्वर काही ठिकाणी पर्यायाने लुप्त होत नाहीत. उदा. कञ्ञा इव, कञ्ञेव, कञ्ञाव. සාරිපුත්ත ඉධෙකච්චො, එහි සිවක උට්ඨෙහි, ආයස්මා ආනන්දො, ගාථා අභාසි, දෙවා ආභස්සරා යථා, තෙවිජ්ජා ඉද්ධිපත්තා ච, භගවා උට්ඨායාසනා, භගවා එත+දවොච, අභිවාදෙත්වා එකමන්තං අට්ඨාසි, ගන්ත්වා ඔලොකෙන්තො, භූතවාදී අත්ථවාදී, යං ඉත්ථී අරහං අස්ස, සාමාවතී ආහ, පාපකාරී උභයත්ථ තප්පති, නදී ඔත්ථරති, යෙ තෙ භික්ඛූ අප්පිච්ඡා, භික්ඛූ ආමන්තෙසි, භික්ඛූ උජ්ඣායිංසු, භික්ඛූ එව+මාහංසු, ඉමස්මිං ගාමෙ ආරක්ඛකා, සබ්බෙ ඉමෙ, කතමෙ එකාදස, ගම්භීරෙ ඔදකන්තිකෙ, අප්පමාදො අමතං පදං, සඞ්ඝො ආගච්ඡතු, කො ඉමං පථවිං විචෙස්සති, ආලොකො උදපාදි, එකො එකාය, චත්තාරො ඔඝා, අරෙ අහම්පි, සචෙ ඉමස්ස කායස්ස, නො අතික්කමො, අහො අච්ඡරියො, අථො අන්තො ච, අථ ඛො ආයස්මා, අථො ඔට්ඨව+චිත්තකා, තතො ආ- මන්තයි [Pg.14] සත්ථාති එවමාදයො ඉධ කාලබ්යවධානෙනෙව සිජ්ඣන්ති. ක්වචීති කිං, ආගතා+ත්ථ, ආගතා+ම්හා, කතම+ස්ස වාරො, අප්පස්සුතා+යං පුරිසො, චමරී+ව, සබ්බෙ+ව, ස්වෙ+ව, එසෙ+ව නයො, පරිසුද්ධෙ+ත්ථා+යස්මන්තො, නෙ+ත්ථ, කුතෙ+ත්ථ ලබ්භා, සචෙ+ස බ්රාහ්මණ, තථූ+පමං, යථා+හ, ජීව්හා+යතනං, අවිජ්ජො+ඝො, ඉත්ථින්ද්රියං, අභිභා+යතනං, භයතූ+පට්ඨානං, සද්ධී+ධ විත්තං පුරිසස්ස සෙට්ඨං. (සරසන්ධිනිසෙධො) सारिपुत्र, येथे एक जण (सारिपुत्त इधेकच्चो), ये सिवक, ऊठ (एहि सिवक उट्ठेहि), आयुष्यमान आनंद (आयस्मा आनन्दो), गाथा म्हणाले (गाथा अभासि), आभास्वर देवांप्रमाणे (देवा आभस्सरा यथा), त्रिविद्य आणि ऋद्धिप्राप्त (तेविज्जा इद्धिपत्ता च), भगवान आसनावरून उठून (भगवा उट्ठायासना), भगवान असे म्हणाले (भगवा एतदवोच), अभिवादन करून एका बाजूला उभे राहिले (अभिवादेत्वा एकमन्तं अट्ठासि), जाऊन पाहत असताना (गन्त्वा ओलोकेन्तो), सत्यवादी, अर्थवादी (भूतवादी अत्थवादी), जी स्त्री अर्हत असेल (यं इत्थी अरहं अस्स), सामावती म्हणाली (सामावती आह), पाप करणारा दोन्ही ठिकाणी संतापतो (पापकारी उभयत्थ तप्पति), नदी ओसंडून वाहते (नदी ओत्थरति), जे ते अल्पेच्छ भिक्खू (ये ते भिक्खू अप्पिच्छा), भिक्खूंना आमंत्रित केले (भिक्खू आमन्तेसि), भिक्खू संतापले (भिक्खू उज्झायिंसु), भिक्खू असे म्हणाले (भिक्खू एवमाहंसु), या गावात रक्षक (इमस्मिं गामे आरक्खका), हे सर्व (सब्बे इमे), कोणते अकरा (कतमे एकादस), खोल पाण्याच्या ठिकाणी (गम्भीरे उदकन्तिके), अप्रमाद हे अमृताचे पद आहे (अप्पमादो अमतं पदं), संघ येवो (सङ्घो आगच्छतु), या पृथ्वीला कोण जिंकणार (को इमं पठविं विचेस्सति), प्रकाश उत्पन्न झाला (आलोको उदापादि), एकटा एका स्त्रीसोबत (एको एकाय), चार ओघ (चत्तारो ओघा), अरे, मीसुद्धा (अरे अहम्पि), जर या शरीराचे (सचे इमस्स कायस्स), अतिक्रमण नाही (नो अतिक्कमो), अहो आश्चर्य (अहो अच्छरियो), आणि अंतसुद्धा (अथो अन्तो च), त्यानंतर आयुष्यमान (अथ खो आयस्मा), आणि उंट व चित्ता (अथो ओट्ठवचित्तका), त्यानंतर शास्त्यांनी आमंत्रित केले (ततो आमन्तयि सत्थाति) इत्यादी येथे कालव्यवधानानेच (काळाच्या अंतरानेच) सिद्ध होतात. 'क्वचि' (काही ठिकाणी) म्हणजे काय? आगतातत्थ (आगता + अत्थ), आगताम्हा (आगता + अम्हा), कतमस्स वारो (कतमो + अस्स वारो), अप्पस्सुतायं पुरिसो (अप्पस्सुतो + अयं पुरिसो), चमरीव (चमरी + इव), सब्बेव (सब्बे + एव), स्वेव (सवे + एव), एसेव नयो (एसो + एव नयो), परिसुद्धेत्थायस्मन्तो (परिसुद्धा + एत्थ + आयस्मन्तो), नेत्थ (न + एत्थ), कुतेत्थ लब्भा (कुतो + एत्थ लब्भा), सचेसो ब्राह्मण (सचे + एषो ब्राह्मण), तथूपमं (तथा + उपमं), यथाह (यथा + आह), जिव्हायतनं (जिव्हा + आयतनं), अविज्जोघो (अविज्जा + ओघो), इत्थिन्द्रियं (इत्थी + इन्द्रियं), अभिभायतनं (अभिभू + आयतनं), भयतुपट्ठानं (भय + उपट्ठानं), सद्धीध वित्तं पुरिसस्स सेट्ठं (सद्धा + इध वित्तं पुरिसस्स सेट्ठं). (स्वरसंधीचा निषेध). තත්ර අභිරති, තත්ර අයං, බුද්ධ අනුස්සති, ස අත්ථිකා, සඤ්ඤාවා අස්ස, තදා අහං, යානි ඉධ භූතානි, ගච්ඡාමි ඉති, අති ඉතො, කිකී ඉව, බහු උපකාරං, මධු උදකං, සු උපධාරිතං, සොපි අයං, ඉදානි අහං, සචෙ අයං, අප්පස්සුතො අයං, ඉතර ඉතරෙන, සද්ධා ඉධ විත්තං, කම්ම උපනිස්සයො, තථා උපමං, රත්ති උපරතො, වි උපසමො, ලොකස්ස ඉති, දෙව ඉති, වි අතිපතන්ති, වි අතිනාමෙන්ති, සඞ්ඝාටි අපි, ජීවිතහෙතු අපි, විජ්ජු ඉව, කිංසු ඉධ විත්තං, සාධු ඉති, තෙ අස්ස පහීනා, සො අස්ස, මධුවා මඤ්ඤති බාලො, එවං ගාමෙ මුනි චරෙ, ඛන්ති පරමං තපො තිතික්ඛා, න මංකු භවිස්සාමි, සු අක්ඛාතො, යො අහං, සො අහං, කාමතො ජායති සොකො, කාමතො ජායති භයං, සක්කො උජු ච සුහුජුච, අනුපඝාතො, දුරක්ඛං, දුරමං, දුභරතා. යිට්ඨං වා හුතං වා ලොකෙ, යදි වා සාවකෙ, පුග්ගලා ධම්මදසා තෙ, භොවාදී නාම සො හොති, යථාභාවී ගුණෙන සො, යථා ඉදං, සම්මා දක්ඛාතො, පරා කමො, තණ්හා ක්ඛයො, ඣානස්ස ලාභී අම්හි, ථුල්ලච්චයො ඉතී+ධ – तेथे अभिरती (तत्र अभिरति), तेथे हा (तत्र अयं), बुद्ध अनुस्मृती (बुद्ध अनुस्सति), ती अर्थयुक्त (सा अत्थिका), संज्ञावान असावा (सञ्ञावा अस्स), तेव्हा मी (तदा अहं), जे येथे प्राणी आहेत (यानि इध भूतानि), मी जातो असे (गच्छामि इति), याहून पलीकडे (अति इतो), किकी पक्ष्याप्रमाणे (किकी इव), बहु उपकारक (बहु उपकारं), मध आणि पाणी (मधु उदकं), सुयोग्य प्रकारे धारण केलेले (सु उपधारितं), तोसुद्धा हा (सोपि अयं), आता मी (इदानि अहं), जर हा (सचे अयं), अल्पश्रुत हा (अप्पस्सुतो अयं), इतराशी इतराने (इतर इतरेन), श्रद्धा हेच येथे मानवाचे श्रेष्ठ धन (सद्धा इध वित्तं), कर्माचा उपनिश्रय (कम्म उपनिस्सयो), त्याप्रमाणे उपमा (तथा उपमं), रात्री विरक्त झालेला (रत्ति उपरतो), विशेष उपशम (वि उपसमो), लोकाचे असे (लोकस्स इति), देव असे (देव इति), ते उल्लंघन करतात (वि अतिपतन्ति), ते काळ घालवतात (वि अतिनामेन्ति), संघातसुद्धा (सङ्घाटी अपि), जीवितहेतूसाठी सुद्धा (जीवितहेतु अपि), विजेप्रमाणे (विज्जु इव), येथे कोणते धन (किंसु इध वित्तं), साधू असे (साधु इति), त्याचे ते नष्ट झाले (ते अस्स पहीना), तो त्याचा (सो अस्स), मूर्ख मनुष्य मधासारखे मानतो (मधुवा मञ्ञति बालो), मुनीने गावात याप्रमाणे फिरावे (एवं गामे मुनि चरे), क्षमा हा परम तप आणि तितिक्षा आहे (खन्ति परमं तपो तितिक्खा), मी खिन्न होणार नाही (न मंकु भविस्सामि), सुविख्यात (सु अक्खातो), जो मी (यो अहं), तो मी (सो अहं), कामापासून शोक उत्पन्न होतो (कामतो जायति सोको), कामापासून भय उत्पन्न होते (कामतो जायति भयं), समर्थ, सरळ आणि अत्यंत सरळ (सक्को उजु च सुहुजु च), उपद्रव न करणे (अनुपघातो), रक्षण करण्यास कठीण (दुरक्खं), रमण्यास कठीण (दुरमं), पोषण करण्यास कठीण (दुभरता). जगात यज्ञ किंवा हवन (यिट्ठं वा हुतं वा लोके), किंवा श्रावकांमध्ये (यदि वा सावके), ते धर्म पाहणारे पुद्गल (पुग्गला धम्मदसा ते), तो 'भोवादी' नावाचा होतो (भोवादी नाम सो होति), तो गुणाने तसा असणारा (यथाभावी गुणेन सो), ज्याप्रमाणे हे (यथा इदं), सम्यक् प्रकारे आख्यात (सम्मा दक्खातो), पराक्रम (परा कमो), तृष्णाक्षय (तण्हा क्खयो), मी ध्यानाचा लाभ घेणारा आहे (झानस्स लाभी अम्हि), थुल्लच्चय (थुल्लच्चयो) इत्यादी येथे - 33. බ්යඤ්ජනෙ දීඝරස්සා ३३. व्यंजनावर (स्वर) दीर्घ आणि र्हस्व होतात. රස්ස+දීඝානං [Pg.15] ක්වචි දීඝ+රස්සා හොන්ති බ්යඤ්ජනෙ. තත්රාභිරති, තත්රායං, බුද්ධානුස්සති, සාත්ථිකා, සඤ්ඤාවා+ස්ස, තදාහං, යානී+ධ භූතානි, ගච්ඡාමීති, අතීතො, කිකීව, බහූපකාරං, මධූදකං, සූපධාරිතං, සොපායං, ඉදානාහං, සචායං, අප්පස්සුතායං, ඉතරීතරෙන, සද්ධීධ විත්තං, කම්මූපනිස්සයො, තථූපමං, රත්තූපරතො, වූපසමො, ලොකස්සාති, දෙවාති, වීතිපතන්ති, වීතිනාමෙන්ති, සඞ්ඝාටීපි, ජීවිතහෙතූපි, විජ්ජූව, කිංසූධ විත්තං, සාධූති, ත්යාස්ස පහීනා, ස්වාස්ස, මධුවා මඤ්ඤතී බාලො, එවං ගාමෙ මුනී චරෙ, ඛන්තී පරමං තපො තිතික්ඛා, න මංකූ භවිස්සාමි, ස්වාක්ඛාතො, ය්වාහං, ස්වාහං, කාමතො ජායතී සොකො, කාමතො ජායතී භයං, සක්කො උජූ ච සුහුජූ ච, අනූපඝාතො, දූරක්ඛං, දූරමං, දූභරතා. යිට්ඨංව හුතංව ලොකෙ, යදිව සාවකෙ, පුග්ගල ධම්මදසා තෙ, භොවාදි නාම සො හොති, යථාභාවි ගුණෙන සො, යථයිදං, සම්මදක්ඛාතො, පරක්කමො, තණ්හක්ඛයො, ඣානස්ස ලාභිම්හි, වසිම්හි, ථුල්ලච්චයො. ක්වචීති කිං, ත්යජ්ජ, ස්වස්ස, පතිලියතීති දීඝනිසෙධො, මායිදං, මනසාදඤ්ඤා විමුත්තානං, යථාක්කමං, ආරක්ඛාතීතං, දීයති, සූයතීති රස්සකාරියනිසෙධො. කථං යානිව අන්තලික්ඛෙති, ‘‘දීඝරස්සා’’ති යොගවිභාගා. (දීඝ+රස්සසන්ධි). व्यंजनावर र्हस्व आणि दीर्घ स्वरांचे काही ठिकाणी दीर्घ आणि र्हस्व होतात. (उदा.) तत्राभिरति (तत्र + अभिरति), तत्रायं (तत्र + अयं), बुद्धानुस्सति (बुद्ध + अनुस्सति), सात्थिका (सा + अत्थिका), सञ्ञावास्स (सञ्ञावा + अस्स), तदाहं (तदा + अहं), यानीध भूतानि (यानि + इध भूतानि), gachāmīti (गच्छामि + इति), अतीतो (अति + इतो), किकीव (किकी + इव), बहूपकारं (बहु + उपकारं), मधूदकं (मधु + उदकं), सूपधारितं (सु + उपधारितं), सोपायं (सोपि + अयं), इदानाहं (इदानि + अहं), सचायं (सचे + अयं), अप्पस्सुतायं (अप्पस्सुतो + अयं), इतरीतरेन (इतर + इतरेन), सद्धीध वित्तं (सद्धा + इध वित्तं), कम्मूपनिस्सयो (कम्म + उपनिस्सयो), तथूपमं (तथा + उपमं), रत्तूपरतो (रत्ति + उपरतो), वूपसमो (वि + उपसमो), लोकस्साति (लोकस्स + इति), देवाति (देव + इति), वीतिपतन्ति (वि + अतिपतन्ति), वीतिनामेन्ति (वि + अतिनामेन्ति), सङ्घाटीपि (सङ्घाटि + अपि), जीवितहेतूपी (जीवितहेतु + अपि), विज्जूव (विज्जु + इव), किंसूध वित्तं (किंसु + इध वित्तं), साधूती (साधु + इति), त्यास्स पहीना (ते + अस्स पहीना), स्वास्स (सो + अस्स), 'मूर्ख मनुष्य मधासारखे मानतो' (मधुवा मञ्ञती बालो - येथे 'मञ्ञति' चे 'मञ्ञती' होते), 'मुनीने गावात याप्रमाणे फिरावे' (एवं गामे मुनी चरे - येथे 'मुनि' चे 'मुनी' होते), 'क्षमा हा परम तप आणि तितिक्षा आहे' (खन्ती परमं तपो तितिक्खा - येथे 'खन्ति' चे 'खन्ती' होते), 'मी खिन्न होणार नाही' (न मंकू भविस्सामि - येथे 'मंकु' चे 'मंकू' होते), स्वाक्खातो (सु + अक्खातो), य्वाहं (यो + अहं), स्वाहं (सो + अहं), 'कामापासून शोक उत्पन्न होतो' (कामतो जायती सोको - येथे 'जायति' चे 'जायती' होते), 'कामापासून भय उत्पन्न होते' (कामतो जायती भयं - येथे 'जायति' चे 'जायती' होते), 'समर्थ, सरळ आणि अत्यंत सरळ' (सक्को उजू च सुहुजू च - येथे 'उजु' चे 'उजू' आणि 'सुहुजु' चे 'सुहुजू' होते), अनूपघातो (अनुपघातो -> अनूपघातो), दूरक्खं (दुरक्खं -> दूरक्खं), दूरमं (दुरमं -> दूरमं), दूभरता (दुभरता -> दूभरता). 'यज्ञ किंवा हवन जगात' (यिट्ठं व हुतं व लोके - येथे 'वा' चे 'व' होते), 'किंवा श्रावकांमध्ये' (यदिव सावके - येथे 'यदि वा' चे 'यदिव' होते), 'ते धर्म पाहणारे पुद्गल' (पुग्गल धम्मदसा ते - येथे 'पुग्गला' चे 'पुग्गल' होते), 'तो भोवादी नावाचा होतो' (भोवादि नाम सो होति - येथे 'भोवादी' चे 'भोवादि' होते), 'तो गुणाने तसा असणारा' (यथाभावि गुणेन सो - येथे 'यथाभावी' चे 'यथाभावि' होते), यथयिदं (यथा इदं -> यथयिदं), सम्मदक्खातो (सम्मा -> सम्म), परक्कमो (परा -> पर), तण्हक्खयो (तण्हा -> तण्ह), झानस्स लाभिम्हि (लाभी -> लाभि), वसिम्हि (वसी -> वसि), थुल्लच्चयो (थुल्ला -> थुल्ल). 'क्वचि' (काही ठिकाणी) असे का म्हटले आहे? त्यज्ज (ते + अज्ज), स्वस्स (सो + अस्स), पतिलीयति (पतिलीयती नाही) येथे दीर्घ स्वराचा निषेध होतो. मायिदं (मा + इदं), 'मनसादञ्ञा विमुत्तानं', 'यथाक्कमं', 'आरक्खातीतं', दीयति, सूयति येथे र्हस्व स्वराचा निषेध होतो. 'यानीव अन्तलिक्खे' हे कसे सिद्ध होते? 'दीघरस्सा' या योगविभागाने (सूत्राच्या विभागाने) सिद्ध होते. (दीर्घ-र्हस्व संधी). බ්යඤ්ජනෙති වත්තතෙ. 'व्यंजने' (व्यंजनावर) हा शब्द अनुवृत्त होतो. 34. සරම්හා ද්වෙ ३४. स्वराच्या पुढे (व्यंजनाचे) द्वित्व होते. සරම්හා පරස්ස බ්යඤ්ජනස්ස ක්වචි ද්වෙ රූපානි හොන්ති. එත්ථ ච ආවුත්තිද්විවචනං ඨානෙද්විවචනන්ති ද්වීසු ඨානෙද්විවචනං වෙදිතබ්බං. स्वराच्या पुढे असलेल्या व्यंजनाचे काही ठिकाणी द्वित्व (दोन रूपे) होते. येथे 'आवृत्तिद्विवचन' आणि 'स्थानद्विवचन' या दोन प्रकारच्या द्वित्वांचे ज्ञान करून घ्यावे. තානි [Pg.16] ච ප+පති+පටි+කම+කුස+කුධ+කී+ගහ+ජුත+ඤා+සි+ සු+සූ+සම්භූ+සර+සසාදීනමාදිබ්යඤ්ජනානඤ්ච හොති. ඉධ පමාදො=ඉධප්පමාදො, එවං අප්පමාදො, විප්පයුත්තො, සුප්පසන්නො, සම්මා පධානං=සම්මප්පධානං රස්සත්තං. අප්පතිවත්තියො, අධිප්පතිපච්චයො, සුප්පතිට්ඨිතො,. අප්පටිපුග්ගලො, විප්පටිසාරො, සුප්පටිපත්ති. පක්කමො, පටික්කමො, හෙතුක්කමො, ආකමති=අක්කමති, එවං පක්කමති, යථාක්කමං. අක්කොසති, පටික්කොසති, අනුක්කොසති, ආකොසති=අක්කොසති. අක්කුද්ධො, අභික්කුද්ධො. ධනක්කීතො, වික්කයො, අනුක්කයො. පග්ගහො, විග්ගහො, අනුග්ගහො, චන්දග්ගාහො, දිට්ඨිග්ගාහො. පජ්ජොතො, විජ්ජොතො, උජ්ජොතො. කතඤ්ඤූ, විඤ්ඤූ, පඤ්ඤාණං, විඤ්ඤාණං, අනඤ්ඤාණං. අවස්සයො, නිස්සයො, සමුස්සයො. අප්පස්සුතො, විස්සුතො, බහුස්සුතො. ආසවා=අස්සවා. පස්සම්භෙන්තො, විස්සම්භෙන්තො. අට්ටස්සරො, විස්සරති, අනුස්සරති, අනුස්සති. පස්සසන්තො, විස්සසන්තො, මුහුස්සසන්තො, ආසාසො=අස්සාසො. ආදිසද්දෙන අවිස්සජෙන්තො, විස්සජෙන්තො, අභික්කන්තතරො, පරිච්චජෙන්තො, උපද්දවො, උපක්කිලෙසො, මිත්තද්දුනො, ආයබ්යයො, අබ්බහි ඉච්චාදි. आणि ते (द्वित्व) प, पति, पटि, कम, कुस, कुध, की, गह, जुत, ञा, सि, सु, सू, सम्भू, सर, सस इत्यादींच्या आदि व्यंजनांचे होते. (उदा.) इध प्रमादो = इधप्पमादो (येथे प्रमाद), याचप्रमाणे अप्पमादो (अप्रमाद), विप्पयुत्तो (विप्रयुक्त), सुप्पसन्नो (सुप्रसन्न), सम्मा पधानं = सम्मप्पधानं (सम्यक् प्रधान - येथे र्हस्वत्व होते). अप्पतिवत्तियो (अप्रतिवर्त्य), अधिप्पतिपच्चयो (अधिप्रतिप्रत्यय), सुप्पतिट्ठितो (सुप्रतिष्ठित). अप्पटिपुग्गलो (अप्रतिपुद्गल), विप्पटिसारो (विप्रतिसार), सुप्पटिपत्ति (सुप्रतिपत्ति). पक्कमो (प्रक्रम), पटिक्कमो (प्रतिक्रम), हेतुक्कमो (हेतुक्रम), आकमति = अक्कमति (आक्रमण करतो), याचप्रमाणे पक्कमति (प्रस्थान करतो), यथाक्कमं (यथाक्रम). अक्कोसति (आक्रोश करतो/निंदा करतो), पटिक्कोसति (प्रत्याक्रोश करतो), अनुक्कोसति (अनुकंपेने आक्रोश करतो), आकोसति = अक्कोसति. अक्कुद्धो (अक्रुद्ध), अभिक्कुद्धो (अभिक्रुद्ध). धनक्कीतो (धनाने खरेदी केलेले), विक्कयो (विक्रय/विक्री), अनुक्कयो (अनुक्रय). पग्गहो (प्रग्रह), विग्गहो (विग्रह), अनुग्गहो (अनुग्रह), चन्दग्गाहो (चंद्रग्रहण), दिट्ठिग्गाहो (दृष्टिग्रह/चुकीचे मत धरून ठेवणे). पज्जोतो (प्रद्योत/प्रकाश), विज्जोतो (विद्योत), उज्जोतो (उद्योत). कतञ्ञू (कृतज्ञ), विञ्ञू (विज्ञ), पञ्ञाणं (प्रज्ञान), विञ्ञाणं (विज्ञान), अनञ्ञाणं (अज्ञान). अवस्सयो (अपश्रय/आश्रय), निस्सयो (निश्रय/आश्रय), समुस्सयो (समुच्छ्रय/उदय). अप्पस्सुतो (अल्पश्रुत), विस्सुतो (विश्रुत/प्रसिद्ध), बहुस्सुतो (बहुश्रुत). आसवा = अस्सवा (आस्रव). पस्सम्भन्तो (प्रश्रंभन करणारा/शांत होणारा), विस्सम्भन्तो (विश्वास ठेवणारा). अट्ठस्सरो (आर्तस्वर), विस्सरति (विसरतो), अनुस्सरति (अनुस्मरण करतो), अनुस्सति (अनुस्मृती). पस्ससन्तो (प्रश्वास घेणारा), विस्ससन्तो (विश्वास ठेवणारा), मुहुस्ससन्तो (क्षणोक्षणी श्वास घेणारा), आसासो = अस्सासो (आश्वास/श्वास). 'आदि' शब्दाने अविस्सजेन्तो (विसर्जन न करणारा), विस्सजेन्तो (विसर्जन करणारा), अभिक्कन्ततरो (अतिशय सुंदर), परिच्चजेन्तो (परित्याग करणारा), उपद्दवो (उपद्रव), उपक्किलेसो (उपक्लेश), मित्तद्दुनो (मित्रद्रोही), आयब्ययो (आय-व्यय/उत्पन्न आणि खर्च), अब्बही (उपसून काढले) इत्यादी. තික+තය+තිංස+වතාදීන+මාදිබ්යඤ්ජනස්ස ච. කුසලත්තිකං, පීතිත්තිකං, හෙතුත්තිකං. ලොකත්තයං, බොධිත්තයං, වත්ථුත්තයං. එකත්තිංස, ද්වත්තිංස, තෙත්තිංස, චතුත්තිංස. සීලබ්බතං, සුබ්බතො. සප්පීතිකො, සමන්නාගතො, පුනප්පුනං ඉච්චාදි. आणि तिक, तय, तिंस, वत इत्यादींच्या आदि व्यंजनांचेही (द्वित्व होते). (उदा.) कुसलत्तिकं (कुशल-त्रिक), पीतित्तिकं (प्रीति-त्रिक), हेतुत्तिकं (हेतु-त्रिक). लोकत्तयं (लोकत्रय), बोधित्तयं (बोधित्रय), वत्थुत्तयं (वस्तुत्रय). एकत्तिंस (एकतीस), द्वत्तिंस (बत्तीस), तेत्तिंस (तेहतीस), चतुत्तिंस (चौतीस). सीलब्बतं (शीलव्रत), सुब्बतो (सुव्रत). सप्पीतिको (सप्रीतिक), समन्नागतो (समन्वागत), पुनप्पुनं (पुन्हा पुन्हा) इत्यादी. වතු+වට+දිසාන+මන්තෙ, යථා වත්තති, වට්ටති, දස්සනං, ඵස්සො ඉච්චාදි. vatu, vaṭa, dis आणि mant यांच्या शेवटी, जसे की vattati, vaṭṭati, dassanaṃ, phasso इत्यादी. උ+දු+නිඋපසග්ග+ත+චතු+ඡ+සන්තසද්දාදෙසාදීහි [Pg.17] පරෙසඤ්ච. උකංසො=උක්කංසො, එවං දුක්කරං, නික්කඞ්ඛො, උග්ගතං, දුච්චරිතං, නිජ්ජටං, උජ්ජහං, උච්චඞ්ගං, උන්නමති, දුක්කරො, නිද්දරො, උන්නතො, දුප්පඤ්ඤො, නිම්මලො, උය්යුත්තො, දුල්ලභො, නිබ්බත්තො, උස්සාහො, නිස්සාරො. තක්කරො, තජ්ජො, තන්නින්නො, තප්පභවො, තම්මයො, චතුක්කං, චතුද්දිසං, චතුප්පදො, චතුබ්බිධං, චතුස්සාලං, ඡක්කං, ඡන්නවුති, ඡප්පදිකො, ඡබ්බස්සානි. සක්කාරො, සග්ගුණො, සන්දිට්ඨි, සප්පුරිසො, මහබ්බලො. u, du, ni हे उपसर्ग आणि ta, catu, cha, santa इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या व्यंजनांचे द्वित्व (किंवा आदेश) होते. जसे की, ukaṃso = ukkaṃso, तसेच dukkaraṃ, nikkaṅkho, uggataṃ, duccaritaṃ, nijjaṭaṃ, ujjahaṃ, uccaṅgaṃ, unnamati, dukkaro, niddaro, unnato, duppañño, nimmalo, uyyutto, dullabho, nibbatto, ussāho, nissāro. Takkaro, tajjo, tanninno, tappabhavo, tammayo, catukkaṃ, catuddisaṃ, catuppado, catubbidhaṃ, catussālaṃ, chakkaṃ, channavuti, chappadiko, chabbassāni. Sakkāro, sagguṇo, sandiṭṭhi, sappuriso, mahabbalo. අපදන්තආකාරවජ්ජිතදීඝතො යකාරස්ස ච, නිය්යාති, සුය්යති, අභිභුය්ය, විචෙය්ය, විනෙය්ය, ධෙය්යං, නෙය්යං, සෙය්යො, ජෙය්යො, වෙය්යාකරණො. ආකාරවජ්ජිතන්ති කිං, මාලාය, දොලාය, සමාදාය. पदाच्या शेवटी नसलेल्या 'आ' कार व्यतिरिक्त इतर दीर्घ स्वरापुढे 'य' (ya) काराचे द्वित्व होते, जसे की, niyyāti, suyyati, abhibhuyya, viceyya, vineyya, dheyyaṃ, neyyaṃ, seyyo, jeyyo, veyyākaraṇo. 'आकारवज्जित' (आ-कार वगळून) असे का म्हटले आहे? mālāya, dolāya, samādāya (यांच्यासाठी). ඡන්දානුරක්ඛණෙ-නප්පජහෙ වණ්ණබලං පුරාණං, උජ්ජුගතෙසු සෙය්යො, ගච්ඡන්ති සුග්ගතිං. සරම්හාති කිං, ඤායො, තංඛණං. ක්වචිත්වෙව, නිකායො, නිදානං, නිවාසො, තතො, ඡසට්ඨි, උපනීයති, සූයති. छंदाच्या (वृत्ताच्या) रक्षणासाठी (व्यंजनाचे द्वित्व होते) - जसे की, nappajahe vaṇṇabalaṃ purāṇaṃ, ujjugatesu seyyo, gacchanti suggatiṃ. 'स्वरापुढे' (saramhā) असे का म्हटले आहे? ñāyo, taṃkhaṇaṃ (यांच्यासाठी). 'क्वचितच' (kvacitveva) असे का? nikāyo, nidānaṃ, nivāso, tato, chasaṭṭhi, upanīyati, sūyati (यांच्यासाठी). 35. චතුත්ථදුතියෙස්වෙ+සං තතියපඨමා ३५. चौथ्या आणि दुसऱ्या व्यंजनांच्या जागी (द्वित्व होताना) अनुक्रमे तिसरे आणि पहिले व्यंजन होते. චතුත්ථදුතියෙසු පරෙස්වෙ+සං චතුත්ථදුතියානං තබ්බග්ගෙ තතියපඨමා හොන්ති පච්චාසත්යා. වග්ගෙ ඝ+ඣ+ඪ+ධ+භා චතුත්ථා, ඛ+ඡ+ඨ+ථ+ඵා දුතියා, ග+ජ+ඩ+ද+බා තතියා, ක+ච+ට+ත+පා පඨමා. ප+උ+දු-නිආදීහි පරෙසං ඝාදීනං ද්විභාවෙ තතියපඨමා හොන්ති. පගරති=පග්ඝරති, එවං උග්ඝරති, නිග්ඝොසො, උග්ඝාටෙති. එසොව තජ්ඣානඵලො, පඨමජ්ඣානං, අභිජ්ඣා-යති[Pg.18], උජ්ඣායති. දඩ්ඪො, බුඩ්ඪො. විද්ධංසෙති, උද්ධංසිතො, උද්ධාරො, නිද්ධනො, නිද්ධුතො. විබ්භන්තො, උබ්භන්තො, සමුබ්භන්තො, දුබ්භික්ඛං, නිබ්භයං, තබ්භාවො, චතුබ්භි. සද්ධා, සද්ධම්මො. මහබ්භයං. चौथ्या आणि दुसऱ्या व्यंजनांच्या जागी (द्वित्व होताना) त्यांच्याच वर्गातील अनुक्रमे तिसरे आणि पहिले व्यंजन जवळ असल्यामुळे होते. वर्गामध्ये gha, jha, ḍha, dha, bha हे चौथे; kha, cha, ṭha, tha, pha हे दुसरे; ga, ja, ḍa, da, ba हे तिसरे; आणि ka, ca, ṭa, ta, pa हे पहिले वर्ण आहेत. pa, u, du, ni इत्यादी उपसर्गांनंतर येणाऱ्या gha इत्यादी वर्णांचे द्वित्व होताना तिसरे आणि पहिले वर्ण होतात. जसे की, pagarati = paggharati, तसेच uggharati, nigghoso, ugghāṭeti. तसेच tajjhānaphalo, paṭhamajjhānaṃ, abhijjhāyati, ujjhāyati. Daḍḍho, buḍḍho. Viddhaṃseti, uddhaṃsito, uddhāro, niddhano, niddhuto. Vibbhanto, ubbhanto, samubbhanto, dubbhikkhaṃ, nibbhayaṃ, tabbhāvo, catubbhi. Saddhā, saddhammo. Mahabbhayaṃ. රස්සසරෙහි පරෙසං වග්ගදුතියානං ද්විභාවො චෙ, පඨමා. පඤ්චක්ඛන්ධා, එවං රූපක්ඛන්ධො, අක්ඛමො, අභික්ඛණං, අවික්ඛෙපො, ජාතික්ඛෙත්තං, ධාතුක්ඛොභො, ආයුක්ඛයො. සෙතච්ඡත්තං, එවං සබ්බච්ඡන්නං, විච්ඡන්නං, බොධිච්ඡායා, ජම්බුච්ඡායා, සමුච්ඡෙදො. තත්ර ඨිතො=තත්රට්ඨිතො, එවං ථලට්ඨං, ජලට්ඨං, අට්ඨිතං, නිට්ඨිතං, චත්තාරිට්ඨානානි, ගරුට්ඨානියො, සමුට්ඨිතො. සබ්බත්ථාමෙන, යසත්ථෙරො, පත්ථරති, විත්ථාරො, අභිත්ථුතො, විත්ථම්භිතො, අනුත්ථුනං. පප්ඵොටෙති, මහප්ඵලං, අනිප්ඵලං, විප්ඵාරො, පරිප්ඵුටෙය්ය, මධුප්ඵාණිතං. ආකාරතො, ආඛාතො=අක්ඛාතො, එවං තණ්හාක්ඛයො, ආණාක්ඛෙත්තං, සඤ්ඤාක්ඛන්ධො. ආඡාදයි=අච්ඡාදයි, එවං අච්ඡින්දති, නාවට්ඨං, අත්ථරති, අප්ඵොටෙති. ක්වචි ත්වෙව, පුවඛජ්ජකං, තස්ස ඡවිආදීනි ඡින්දිත්වා, යථාඨිතං, කම්මඵලං, සීලං තස්ස ඣායිනො, යෙ ඣානප්පසුතා ධීරා, නිධනං, මහාධනං. (ද්විභාවසන්ධි). ऱ्हस्व स्वरांनंतर येणाऱ्या वर्गातील दुसऱ्या व्यंजनांचे द्वित्व झाल्यास, पहिले व्यंजन होते. जसे की, pañcakkhandhā, तसेच rūpakkhandho, akkhamo, abhikkhaṇaṃ, avikkhepo, jātikkhettaṃ, dhātukkhobho, āyukkhayo. Setacchattaṃ, तसेच sabbacchannaṃ, vicchannaṃ, bodhicchāyā, jambucchāyā, samucchedo. Tatra ṭhito = tatraṭṭhito, तसेच thalaṭṭhaṃ, jalaṭṭhaṃ, aṭṭhitaṃ, niṭṭhitaṃ, cattāriṭṭhānāni, garuṭṭhāniyo, samuṭṭhito. Sabbatthāmena, yasatthero, pattharati, vitthāro, abhitthuto, vitthambhito, anutthunaṃ. Papphoṭeti, mahapphalaṃ, anipphalaṃ, vipphāro, paripphuṭeyya, madhupphāṇitaṃ. 'आ' कारानंतर, ākhāto = akkhāto, तसेच taṇhākkhayo, āṇākkhettaṃ, saññākkhandho. Āchādayi = acchādayi, तसेच acchindati, nāvaṭṭhaṃ, attharati, apphoṭeti. क्वचितच (kvaci tveva), puvakhajjakaṃ, tassa chaviādīni chinditvā, yathāṭhitaṃ, kammaphalaṃ, sīlaṃ tassa jhāyino, ye jhānappasutā dhīrā, nidhanaṃ, mahādhanaṃ. (द्वित्वसंधी). අකරම්හ සෙ තෙ, සො ඛො බ්යන්ති කාහිති, සො ගච්ඡං න නිවත්තති, එසො අත්ථො, එසො ආභොගො, එසො ඉදානි ඉතී+ධ ‘‘වෙ’’ති වත්තතෙ. akaramha se te, so kho byanti kāhiti, so gacchaṃ na nivattati, eso attho, eso ābhogo, eso idāni इत्यादींमध्ये येथे 've' चे अनुवर्तन होते. 37. එඔන+ම වණ්ණෙ ३७. ए आणि ओ यांच्या जागी 'अ' वर्ण होतो. එඔනං වණ්ණෙ ක්වචි අ හොති වා. අකරම්හ ස තෙ, අකරම්හ සෙ තෙ, එවං ස ඛො බ්යන්ති කාහිති, ස ගච්ඡං න නිවත්තති, එස අත්ථො[Pg.19], එස ආභොගො, එස ඉදානි. වණ්ණෙති කිං, අමොඝවචනො ච සො, ගන්ධබ්බානං අධිපති, මහාරාජා යසස්සි සොති. ‘‘න සන්ධිසමාසා වද්ධස්සා’’ති වුත්තත්තා ගාථාමජ්ඣෙ සන්ධි න හොතීති ‘‘තිවිධස්සා’’ති වුත්තතිම්හි පරෙපි වණ්ණො පරො නාම න ඉති. (සරබ්යඤ්ජනසන්ධි). ए आणि ओ यांच्या जागी व्यंजनापुढे क्वचित 'अ' होतो. जसे की, akaramha sa te (akaramha se te ऐवजी), तसेच sa kho byanti kāhiti, sa gacchaṃ na nivattati, esa attho, esa ābhogo, esa idāni. 'व्यंजनापुढे' (vaṇṇe) असे का म्हटले आहे? amoghavacano ca so, gandhabbānaṃ adhipati, mahārājā yasassi so. 'गाथेच्या मध्यभागी संधी आणि समास होत नाही' असे म्हटल्यामुळे 'tividhassā' असे म्हटले असतानाही पुढील वर्ण संधीयुक्त होत नाही. (स्वरव्यंजनसंधी). අත යන්තං, තථ යං, මද යං, බුධ යති, ධන යං, සෙව යො, පර යෙසනා, පොක්ඛරණ යො ඉතී+ධ – ata yaṃ, tatha yaṃ, mada yaṃ, budha yati, dhana yaṃ, seva yo, para yesanā, pokkharaṇa yo इत्यादींमध्ये - 48. තවග්ගවරණානං යෙ චවග්ග බයඤා ४८. त-वर्गातील वर्णांच्या जागी 'य' कार पुढे असताना अनुक्रमे च-वर्ग, 'ब' आणि 'ञ' होतात. තවග්ගවරණානං චවග්ගබයඤා හොන්ති යථාක්කමං යකාරෙ. ‘‘වග්ගලසෙහි තෙ’’ති පුබ්බරූපං. අච්චන්තං, තච්ඡං, මජ්ජං, බුජ්ඣති, ධඤ්ඤං, සෙබ්බො, පය්යෙසනා, පොක්ඛරඤ්ඤො. අපුච්චණ්ඩකායං, ජච්චන්ධො, යජ්ජෙවං, අජ්ඣගමා, අජ්ඣත්තං, අජ්ඣුපගතො, අජ්ඣොගාහෙත්වා, දිබ්බං. ක්වචිත්වෙව, රත්යා. त-वर्गातील वर्णांच्या जागी 'य' कार पुढे असताना अनुक्रमे च-वर्ग, 'ब' आणि 'ञ' होतात. 'Vaggalasehi te' या सूत्राने पूर्वरूप होते. जसे की, accantaṃ, tacchaṃ, majjaṃ, bujjhati, dhaññaṃ, sebbo, payyesanā, pokkharañño. तसेच apuccaṇḍakāyaṃ, jaccandho, yajjevaṃ, ajjhagamā, ajjhattaṃ, ajjhupagato, ajjhogāhetvā, dibbaṃ. क्वचितच (kvacitveva), ratyā. සක යතෙ, රුච යතෙ, පච යතෙ, අට යතෙ, ලුප යතෙ, කුප යතෙ, සල යතෙ, ඵල යතෙ, දිස යතෙ, අස යතෙ ඉතී+ධ ‘‘යෙ’’ති වත්තතෙ වක්ඛමානෙසු ද්වීසු. saka yate, ruca yate, paca yate, aṭa yate, lupa yate, kupa yate, sala yate, phala yate, disa yate, asa yate इत्यादींमध्ये पुढील दोन सूत्रांमध्ये 'ye' चे अनुवर्तन होते. 49. වග්ගලසෙහිතෙ ४९. वर्ग, ल आणि स यांच्यापुढे... වග්ගලසෙහි පරස්ස යකාරස්ස ක්වචි තෙ වග්ගලසා හොන්ති. සක්කතෙ, රුච්චතෙ, පච්චතෙ, අට්ටතෙ, ලුප්පතෙ, කුප්පතෙ, සල්ලතෙ, ඵල්ලතෙ, දිස්සතෙ, අස්සතෙ. ක්වචිත්වෙව, ක්යාහං. वर्ग, ल आणि स यांच्यापुढील 'य' काराचे क्वचित तेच वर्ग, ल आणि स होतात. जसे की, sakkate, ruccate, paccate, aṭṭate, luppate, kuppate, sallate, phallate, dissate, assate. क्वचितच (kvacitveva), kyāhaṃ. මුහ යති, ගුහ යති ඉතී+ධ – muha yati, guha yati इत्यादींमध्ये - 50. හස්ස විපල්ලාසො ५०. ह-काराचा विपर्यास (स्थानबदल) होतो. හස්ස [Pg.20] විපල්ලාසො හොති යකාරෙ. මුය්හති, ගුය්හති. 'य' कार पुढे असताना ह-काराचा विपर्यास (स्थानबदल) होतो. जसे की, muyhati, guyhati. බහු ආබාධො ඉතී+ධ උස්සවකාරෙ ‘‘හස්ස විපල්ලාසො’’ති වත්තතෙ. bahu ābādho इत्यादींमध्ये 'उ' स्वराच्या जागी 'व' कार झाल्यावर 'hassa vipallāso' (ह-काराचा विपर्यास) याचे अनुवर्तन होते. 51. වෙ වා ५१. 'व' कार पुढे असताना विकल्पे करून (होतो). හස්ස විපල්ලාසො හොති වා වකාරෙ. බව්හාබාධො. වාත්වෙව, බහ්වාබාධො. 'व' कार पुढे असताना ह-काराचा विकल्पे करून विपर्यास होतो. जसे की, bavhābādho. 'विकल्पे करून' (vā) म्हटल्यामुळे, bahvābādho (असेही होते). 52. තථනරානං ටඨණලා ५२. त, थ, न, र यांच्या जागी अनुक्रमे ट, ठ, ण, ल होतात. තථනරානං ටඨණලා හොන්ති වා යථාක්කමං. දුක්කතං=දුක්කටං, එවං සුකටං, පත්ථටො, පතටො, උද්ධටො, විසටො. අට්ඨකථා. පණිධානං, පණිපාතො, පණාමො, පණීතං, පරිණතො, පරිණාමො, දුණ්ණයො, නිණ්ණයො, ඔණතො. පරිපන්නො=පලිපන්නො, එවං පලිබොධො, පල්ලඞ්කං, තලුනො, මහාසාලො, මාලුතො, සුඛුමාලො. (බ්යඤ්ජනසන්ධි). त, थ, न, र यांच्या जागी विकल्पे करून अनुक्रमे ट, ठ, ण, ल होतात. जसे की, dukkataṃ = dukkaṭaṃ, तसेच sukaṭaṃ, patthaṭo, pataṭo, uddhaṭo, visaṭo. Aṭṭhakathā. Paṇidhānaṃ, paṇipāto, paṇāmo, paṇītaṃ, pariṇato, pariṇāmo, duṇṇayo, niṇṇayo, oṇato. Paripanno = palipanno, तसेच palibodho, pallaṅkaṃ, taluno, mahāsālo, māluto, sukhumālo. (व्यंजनसंधी). චක්ඛු උදපාදි, අක්ඛි රුජති, පුරිම ජාති, අණු ථූලානි, කත්තබ්බ කුසලං බහුං, ත සම්පයුත්තා, තත සභාවතො ඉතී+ධ ‘‘වෙ’’ති වත්තතෙ යාව ‘‘මයදා සරෙ’’ති. cakkhu udapādi, akkhi rujati, purima jāti, aṇu thūlāni, kattabba kusalaṃ bahuṃ, ta sampayuttā, tata sabhāvato इत्यादींमध्ये 'mayadā sare' या सूत्रापर्यंत 've' (विकल्पे करून) याचे अनुवर्तन होते. 38. නිග්ගහීතං ३८. निग्गहीत (अनुस्वार). නිග්ගහීතාගමො හොති වා ක්වචි. සාමත්ථියෙනා+ගමොව, ස ච රස්සසරස්සෙව හොති… තස්ස රස්සසරානුගතත්තා. ඨානීන+මාලිඞ්ඝිය ගච්ඡති පවත්තතීති ආගමො. චක්ඛුං උදපාදි, අක්ඛිං [Pg.21] රුජති, පුරිමං ජාති, අණුං ථූලානි, කත්තබ්බං කුසලං බහුං, තංසම්පයුත්තා, තංතංසභාවතො. වාග්ගහණෙන චක්ඛු උදපාදි ඉච්චාදි. අවංසිරො, යාවඤ්චිදංතිආදි නිච්චං… වවත්ථිතවිභාසත්තා වාධිකාරස්ස, වවත්ථිතස්ස ලක්ඛණස්සා+නුරොධෙන ලක්ඛණෙ පවත්තිතා විභාසා වවත්ථිතවිභාසා. වාසද්දො හි අත්ථද්වයෙ වත්තතෙ කත්ථචි විකප්පෙ, කත්ථචි යථාවවත්ථිතරූපපරිග්ගහෙති. යදා පච්ඡිමෙ, තදා නිච්ච+මනිච්ච+මසන්තඤ්ච විධිං දීපෙති. එත්ථ පන ක්වචිසද්දස්සා+නුවත්තනා තෙනෙවා+සන්තවිධි සිද්ධොති වාසද්දෙනි+තරද්වයං. ක්වචි ත්වෙව, න හි එතෙහි, ඉධ චෙව. निग्गहीत (अनुस्वार) चा आगम काही ठिकाणी विकल्पेकरून (किंवा) होतो. सामर्थ्याने तो आगमच असतो, आणि तो र्हस्व स्वराच्या नंतरच होतो... कारण तो र्हस्व स्वराचे अनुकरण करतो. मूळ वर्णाच्या स्थानाला व्यापून जो प्रवृत्त होतो (येतो) त्याला 'आगम' म्हणतात. उदा. चक्खुं उदपादि (चक्खु उदपादि), अक्खिं रुजति, पुरिमं जाति, अणुं थूलानि, कत्तब्बं कुसलं बहुं, तंसम्पयुत्ता, तंतंसभावतो. 'वा' च्या ग्रहणाने 'चक्खु उदपादि' इत्यादी रूपे होतात. अवंसिरो, यावञ्चिदं इत्यादींमध्ये हा आगम नित्य होतो... 'वा' अधिकाराच्या व्यवस्थितविभाषात्वामुळे, व्यवस्थित लक्षणाच्या अनुरोधाने लक्षणामध्ये प्रवृत्त झालेली विभाषा म्हणजे 'व्यवस्थितविभाषा' होय. कारण 'वा' शब्द दोन अर्थांमध्ये वापरला जातो - काही ठिकाणी विकल्प (पर्याय) आणि काही ठिकाणी यथाव्यवस्थितरूपाचा स्वीकार. जेव्हा तो दुसऱ्या अर्थात असतो, तेव्हा तो नित्य, अनित्य आणि असंत (अविद्यमान) विधी दर्शवतो. येथे 'क्वचि' शब्दाच्या अनुवृत्तीमुळे त्यानेच 'असंतविधी' सिद्ध होतो, म्हणून 'वा' शब्दाने इतर दोन (नित्य आणि अनित्य) सिद्ध होतात. 'क्वचि' मुळेच, यांच्यामध्ये होत नाही, येथेच होतो. සං රම්භො, සං රත්තො, සං රාගො, තාසං අහං සන්තිකෙ, එවං අයං, පුං ලිඞ්ගං, කිං අහං, තස්ස අදාසිං අහං ඉතී+ධ ‘‘නිග්ගහීතා’’ධිකාරො ආ ‘‘මයදා සරෙ’’ති. सं रम्भो, सं रत्तो, सं रागो, तासं अहं सन्तिके, एवं अयं, पुं लिङ्गं, किं अहं, तस्स अदासिं अहं इत्यादी उदाहरणांमध्ये 'निग्गहीत' हा अधिकार 'मयदा सरे' या सूत्रापर्यंत चालतो. 39. ලොපො ३९. लोप (होतो). නිග්ගහීතස්ස ලොපො හොති වා ක්වචි. දීඝෙ සාරම්භො සංරම්භො, සාරත්තො සංරත්තො, සාරාගො සංරාගො, පුබ්බස්සරලොපෙ තාසාහං සන්තිකෙ, එවායං, ද්විත්තෙ පුල්ලිඞ්ගං පුංලිඞ්ගං, ක්යාහං, තස්ස අදාසහං. පටිසල්ලානො, සල්ලෙඛො, පාතුකාමො, ගන්තුමනො, අරියසච්චාන දස්සනං, එතං බුද්ධාන සාසනං, අවිසාහාරො, චිරප්පවාසින්තිආදීසු නිච්චං. ක්වචීති කිං, එව+මයං, කි+මහං, එතං මඞ්ගල+මුත්තමං. निग्गहीतचा (अनुस्वाराचा) लोप काही ठिकाणी विकल्पेकरून होतो. स्वर दीर्घ झाल्यावर: सारम्भो (सं रम्भो), सारत्तो (सं रत्तो), सारागो (सं रागो). पूर्व स्वराचा लोप झाल्यावर: तासाहं सन्तिके (तासं अहं सन्तिके), एवायं (एवं अयं). द्वित्व झाल्यावर: पुल्लिङ्गं (पुं लिङ्गं), क्याहं (किं अहं), तस्स अदासहं (तस्स अदासिं अहं). पटिसल्लानो, सल्लेखो, पातुकामो, gन्तुमनो, अरियसच्चान दस्सनं, एतं बुद्धान सासनं, अविसाहारो, चिरप्पवासिं इत्यादींमध्ये हा लोप नित्य होतो. 'क्वचि' (काही ठिकाणी) असे का म्हटले आहे? (कारण येथे लोप होत नाही:) एवमयं, किमहं, एतं मङ्गलमुत्तमं. කතං ඉති, අභිනන්දුං ඉති, උත්තත්තං ඉව, චක්කං ඉව, කලිංඉව, හලං ඉදානි, කිං ඉදානි, ත්වං අසි, ඉදං අපි, උත්තරිං අපි, දාතුං අපි, සදිසං එව ඉතී+ධ – कतं इति, अभिनन्दुं इति, उत्तत्तं इव, चक्कं इव, कलिं इव, हलं इदानि, किं इदानि, त्वं असि, इदं अपि, उत्तरिं अपि, दातुं अपि, सदिसं एव इत्यादी उदाहरणांमध्ये - 40. පරසරස්ස ४०. परस्वराचा (पुढील स्वराचा). නිග්ගහීතම්හා [Pg.22] පරසරස්ස ලොපො හොති වා ක්වචි. කතන්ති, අභිනන්දුන්ති, උත්තත්තංව, චක්කංව, කලිංව, හලංදානි, කිංදානි, ත්වංසි, ඉදම්පි, උත්තරිම්පි, දාතුම්පි, සදිසංව. වාති කිං, කතංඉති, කිමිති, දාතුමපි, සදිසං එව. निग्गहीतच्या (अनुस्वाराच्या) पुढील परस्वराचा लोप काही ठिकाणी विकल्पेकरून होतो. उदा. कतन्ति (कतं इति), अभिनन्दुन्ति (अभिनन्दुं इति), उत्तत्तं व (उत्तत्तं इव), चक्कं व (चक्कं इव), कलिं व (कलिं इव), हलं दानि (हलं इदानि), किं दानि (किं इदानि), त्वं सि (त्वं असि), इदम्पि (इदं अपि), उत्तरिम्पि (उत्तरिं अपि), दातुम्पि (दातुं अपि), सदिसं व (सदिसं एव). 'वा' (विकल्पेकरून) असे का म्हटले आहे? (कारण येथे लोप होत नाही:) कतं इति, किमिति, दातुं अपि, सदिसं एव. පුප්ඵං අස්සා උප්පජ්ජති, එවං අස්ස තෙ ආසවා ඉතී+ධ පරස්සරලොපෙ – पुप्फं अस्सा उप्पज्जति, एवं अस्स ते आसवा इत्यादी उदाहरणांमध्ये परस्वराचा लोप झाल्यावर - 53. සංයොගාදිලොපො ५३. संयोगाच्या आदि वर्णाचा (पहिल्या व्यंजनाचा) लोप. අබ්යවහිතානං ද්වින්නං බ්යඤ්ජනානං එකත්ර ඨිති සංයොගො, තස්මිං සංයොගෙ යො ආදිභූතාවයවො, තස්ස වා ක්වචි ලොපො හොතීතිආදිබ්යඤ්ජනස්ස ලොපො. පුප්ඵංසා උප්පජ්ජති, එවංස තෙ ආසවා. තිණ්ණං සංයොගානං විසයෙ අග්යාගාරං, වුත්යස්ස ඉති හොති. कोणतेही व्यवधान नसलेल्या दोन व्यंजनांची एकत्र स्थिती म्हणजे 'संयोग' होय. त्या संयोगामध्ये जो आदिभूत अवयव (पहिला वर्ण) असतो, त्याचा काही ठिकाणी विकल्पेकरून लोप होतो, म्हणजेच आदि व्यंजनाचा लोप होतो. उदा. पुप्फं सा उप्पज्जति (पुप्फं अस्सा उप्पज्जति), एवं सा ते आसवा (एवं अस्स ते आसवा). तीन संयोगांच्या विषयात 'अग्यागारं', 'वुत्यस्स' असे रूप होते. තං කරොති, තං ඛණං, සං ගතො, තං ඝතං, ධම්මං චරෙ, තං ඡන්නං, තං ජාතං, තං ඣානං, තං ඤාණං, තං ඨානං, තං ඩහති, තං තනොති, තං ථිරං, තං දානං, තං ධනං, තං නිච්චුතං, තං පත්තො, තං ඵලං, තෙසං බොධො, සං භූතො, තං මිත්තං, කිං කතො, දාතුං ගතො ඉතී+ධ – तं करोति, तं खणं, सं गतो, तं घतं, धम्मं चरे, तं छन्नं, तं जातं, तं झानं, तं ञाणं, तं ठानं, तं डहति, तं तनोति, तं थिरं, तं दानं, तं धनं, तं निच्चुतं, तं पत्तो, तं फलं, तेसं बोधो, सं भूतो, तं मित्तं, किं कतो, दातुं गतो इत्यादी उदाहरणांमध्ये - 41. වග්ගෙ වග්ගන්තො ४१. वर्गात वर्गाचा अंत्य वर्ण (अनुनासिक होतो). නිග්ගහීතස්ස ඛො වග්ගෙ වග්ගන්තො වා හොතීති නිමිත්තානුස්සරානං පච්චාසත්යා තබ්බග්ගපඤ්චමො හොති. පච්චාසත්ති නාම ඨානතො ආසන්නතා ගුණතො වා, ගුණතොති වණ්ණසඤ්ඤාදිගුණතො. නිග්ගහීතස්ස [Pg.23] අනුසරීයතීති පච්ඡා කත්වා සරීයතීති අනුස්සරොතිපි වුච්චති. තඞ්කරොති=තං කරොති, එවං තඞ්ඛණං, සඞ්ගතො, තඞ්ඝතං. ධම්මඤ්චරෙ, තඤ්ඡන්නං, තඤ්ජාතං, තඤ්ඣානං, තඤ්ඤාණං. තණ්ඨානං, තණ්ඩහති. තන්තනොති, තන්ථිරං, තන්දානං, තන්ධනං, තන්නිච්චුතං, තම්පත්තො, තම්ඵලං, තෙසම්මොධො, සම්භූතො, තම්මිත්තං. කිඞ්කතො, දාතුඞ්ගතො, තණ්හඞ්කරො, රණඤ්ජහො, සණ්ඨිතො, ජුතින්ධරො, සම්මතොතිආදීසු නිච්චං. वर्गाचे व्यंजन पुढे असताना निग्गहीतचा (अनुस्वाराचा) विकल्पेकरून त्या वर्गाचा अंत्य वर्ण (अनुनासिक) होतो. निमित्त आणि अनुस्वार यांच्या निकटतेमुळे (सामीप्यामुळे) त्या वर्गाचा पाचवा वर्ण होतो. निकटता म्हणजे स्थानाची किंवा गुणाची समीपता होय; गुणाची म्हणजे वर्णसंज्ञा इत्यादी गुणांची समीपता. निग्गहीतचे अनुकरण केले जाते, म्हणजेच स्वराच्या नंतर उच्चारले जाते म्हणून त्याला 'अनुस्वार' असेही म्हणतात. उदा. तङ्करोति = तं करोति, तसेच तङ्खणं, सङ्गतो, तङ्घतं. धम्मञ्चरे, तञ्च्छन्नं, तञ्जातं, तञ्झानं, तञ्ञाणं. तण्ठानं, तण्डहति. तन्तनोति, तन्थिरं, तन्दानं, तन्धमं, तन्निच्चुतं, तम्पत्तो, तम्फलं, तेसम्मोधो, सम्भूतो, तम्मित्तं. किङ्कतो, दातुङ्गतो, तण्हङ्करो, रणञ्जहो, सण्ठितो, जुतिन्धरो, सम्मतो इत्यादींमध्ये हा नियम नित्य होतो. ආනන්තරිකං ය+මාහු, යං යදෙව, පච්චත්තං එව, තං හිඉතී+ධ – आनन्तरिकं यमाहु, यं यदेव, पच्चत्तं एव, तं हि इत्यादी उदाहरणांमध्ये - 42. යෙවහිසු ඤො ४२. य, एव आणि हि पुढे असताना (निग्गहीतचा) 'ञ' होतो. ය+එව+හිසද්දෙසු නිග්ගහීතස්ස වා ඤො හොති. ‘‘වග්ගලසෙහි තෙ’’ති යස්ස ඤකාරො. ආනන්තරිකඤ්ඤ+මාහු=ආනන්තරිකං ය+මාහු, යඤ්ඤදෙව=යංයදෙව, ඤස්ස ද්විත්තෙ පච්චත්තඤ්ඤෙව, පච්චත්තං එව, තඤ්හි, තඤ්හි. ‘‘අබ්යභිචාරිනා බ්යභිචාරී නියම්යතෙ’’ති ඤායා එවසද්දසහචරියා ‘‘ය’’ ඉති සබ්බාදියසද්දස්සෙව ගහණං. य, एव आणि हि हे शब्द पुढे असताना निग्गहीतचा विकल्पेकरून 'ञ' होतो. 'वग्गलसेहि ते' या सूत्राने 'य' चा 'ञ' कार होतो. उदा. आनन्तरिकञ्ञमाहु = आनन्तरिकं यमाहु, यञ्ञदेव = यं यदेव. 'ञ' चे द्वित्व झाल्यावर: पच्चत्तञ्ञेव (पच्चत्तं एव), तञ्हि (तं हि). 'अव्यभिचाऱ्याने व्यभिचारी नियमबद्ध केला जातो' या न्यायानुसार, 'एव' शब्दाच्या सहचर्यामुळे 'य' या शब्दाने केवळ सर्वनाम इत्यादी 'य' शब्दाचेच ग्रहण होते. සංයොගො, සංයොජනං, සංයතො, සංයාචිකාය ඉතී+ධ – संयोगो, संयोजनं, संयतो, संयाचिकाय इत्यादी उदाहरणांमध्ये - 43. යෙ සංස්ස ४३. य पुढे असताना 'सं' च्या (निग्गहीतचा 'ञ' होतो). සංසද්දස්ස යං නිග්ගහීතං, තස්ස වා ඤො හොති යකාරෙ. සඤ්ඤොගො=සංයොගො, එවං සංයොජනං, සඤ්ඤතො, සඤ්ඤාචිකාය. ඉධ යකාරමත්තොව ගය්හතෙ. සංස්සාති කිං, එතං යොජනං, තං යානං, තං සරණං යන්ති. 'सं' शब्दाचा जो निग्गहीत (अनुस्वार) आहे, त्याचा 'य' कार पुढे असताना विकल्पेकरून 'ञ' होतो. उदा. सञ्ञोगो = संयोगो, तसेच सञ्ञोजनं (संयोजनं), सञ्ञतो, सञ्ञाचिकाय. येथे केवळ 'य' कारच ग्रहण केला जातो. 'सं' च्या असे का म्हटले आहे? (कारण इतर शब्दांच्या निग्गहीतचा 'ञ' होत नाही:) एतं योजनं, तं यानं, तं सरणं यन्ति. තං [Pg.24] එව, තං අහං බ්රූමි, යං ආහු, ධනං එව, කිං එතං, නින්දිතුං අරහති, තං ඉදං, යං අනිච්චං, තං අනත්තා, එතං අවොච, එතං එව ඉතී+ධ – तं एव, तं अहं ब्रूमि, यं आहु, धनं एव, किं एतं, niन्दितुं अरहति, तं इदं, यं अनिच्चं, तं अनत्ता, एतं अवोच, एतं एव इत्यादी उदाहरणांमध्ये - 44. මයදා සරෙ ४४. स्वर पुढे असताना (निग्गहीतचे) म, य, द (हे वर्ण) होतात. නිග්ගහීතස්ස ම ය දා හොන්ති වා සරෙ ක්වචි. තමෙව තං එව, තමහං බ්රූමි=තං අහං බ්රූමි, යමාහු, ධනමෙව, කිමෙතං, නින්දිතුමරහති. තයිදං. යදනිච්චං, තදනත්තා, එතදවොච, එතදෙව. ‘‘මයදා’’ති යොගවිභාගා බුද්ධම සරණම ඉච්චාදි භවති. स्वर पुढे असताना निग्गहीतचे (अनुस्वाराचे) काही ठिकाणी विकल्पेकरून म, य, द हे वर्ण होतात. उदा. तमेव (तं एव), तमहं ब्रूमि = तं अहं ब्रूमि, यमाहु, धनमेव, किमेतं, निन्दितुमरहति. तयिदं. यदनिच्चं, तदनत्ता, एतदवोच, एतदेव. 'मयदा' या सूत्राच्या योगविभागाने (सूत्राचे तुकडे केल्याने) 'बुद्धम सरणम' इत्यादी रूपे देखील होतात. 47. තදමිනාදීනි ४७. तदमिन इत्यादी (रूपे सिद्ध होतात). තදමිනාදීනි නිප්පජ්ජන්ති. ‘‘ය+දලක්ඛණිකං, තං නිපාතනා’’ති ඤායා ලක්ඛණන්තරෙන අවිහිතා දෙස+ලොපා+ගම+විපල්ලාසා, සබ්බත්ථ ඉමිනාව දට්ඨබ්බා. ඉදඤ්ච පරෙසං පිසොදරාදිමිව දට්ඨබ්බං. ඵුසිතං=ජලබින්දු, ඵුසිත+මුදර+මස්ස පිසොදරං. ඉස්ස අකාරෙ තං ඉමිනා=තදමිනා, සකිං ආගාමී=සකදාගාමී, ධස්ස දකාරෙ එකං ඉධ අහං=එක+මිදා+හං, විධස්ස විදාදෙසො සංවිධාය අවහාරො=සංවිදාවහාරො, වාරිසද්දස්ස වකාරෙ, හස්ස ලකාරෙ ච කතෙ වාරිවාහකො=වලාහකො, ජීවනස්ස ජීආදෙසො, ජීවනස්ස මුතො=ජීමූතො. ඡවස්ස සුආදෙසෙ, සයනස්ස සානාදෙසෙ ච කතෙ ඡවස්ස සයනං=සුසානං. උද්ධස්ස උදුආදෙසෙ, ඛස්ස ඛලආදෙසෙ ච ‘‘සරම්හා ද්වෙ’’ති ද්විත්තාදිම්හි ච කතෙ උද්ධං ඛං අස්ස උදුක්ඛලං. පිසිතස්ස පිආදෙසෙ, අසස්ස සාචාදෙසෙ ච කතෙ පිසිතාසො=පිසාචො. यावरून 'तदमिना' (tadaminā) इत्यादी शब्द सिद्ध होतात. "जे अलक्षणिक (व्याकरण नियमांनी न ठरलेले) आहे, ते निपातनाने सिद्ध होते" या न्यायानुसार, इतर लक्षणांनी (नियमांनी) न सांगितलेले आदेश, लोप, आगम आणि विपर्यास (वर्णव्यत्यय) सर्व ठिकाणी याच सूत्राने जाणावेत. आणि हे इतरांच्या (संस्कृत व्याकरणातील) 'पृषोदरादि' गणानुसार समजले पाहिजे. फुसित (phusita) = पाण्याचा थेंब; फुसित (ठिपके असलेले) आहे उदर ज्याचे ते 'पिसोदर' (pisodara). 'इ' काराचा 'अ' कार होऊन 'तं इमिना' चे 'तदमिना' (tadaminā) होते. 'सकिं आगामी' चे 'सकदागामी' (sakadāgāmī) होते. 'ध' चा 'द' कार होऊन 'एकं इध अहं' चे 'एकमिदहं' (ekamidahaṃ) होते. 'विध' चा 'विदा' आदेश होऊन 'संविधाय अवहारो' चे 'संविदावहारो' (saṃvidāvahāro) होते. 'वारि' शब्दाचा 'व' कार आणि 'ह' चा 'ल' कार केल्यावर 'वारिवाहको' चे 'वलाहको' (valāhako) होते. 'जीवन' चा 'जी' आदेश होऊन 'जीवनस्स मुतो' चे 'जीमूतो' (jīmūto) होते. 'छव' चा 'सु' आदेश आणि 'सयन' चा 'सान' आदेश केल्यावर 'छवस्स सयनं' चे 'सुसानं' (susānaṃ) होते. 'उद्ध' चा 'उदु' आदेश आणि 'ख' चा 'खल' आदेश केल्यावर, तसेच "सरम्हा द्वे" या सूत्राने द्वित्व इत्यादी केल्यावर 'उद्धं खं अस्स' चे 'उदुक्खलं' (udukkhalaṃ) होते. 'पिसित' चा 'पि' आदेश आणि 'अस' चा 'साच' आदेश केल्यावर 'पिसितासो' चे 'पिसाचो' (pisāco) होते. මහීසද්දස්ස [Pg.25] මයූආදෙසෙ, රවතිස්ස රාදෙසෙ ච කතෙ මහියං රවතීති මයූරො. එව+මඤ්ඤෙපි පයොගතො+නුගන්තබ්බා. එත්ථ ච – 'मही' शब्दाचा 'मयू' आदेश आणि 'रवती' चा 'रा' आदेश केल्यावर 'महियं रवती' (पृथ्वीवर ओरडणारा) या अर्थी 'मयूरो' (mayūro) हा शब्द सिद्ध होतो. याचप्रमाणे इतरही शब्द प्रयोगावरून समजून घ्यावेत. आणि याविषयी – වණ්ණාගමො වණ්ණවිපරියායො,ද්වෙ චා+පරෙ වණ්ණවිකාර+නාසා; ධාතුස්ස අත්ථාතිසයෙන යොගො,ත+දුච්චතෙ පඤ්චවිධං නිරුත්තංති. वर्णागम (वर्णाचा आगम), वर्णविपर्यास (वर्णांची अदलाबदल), आणि इतर दोन म्हणजे वर्णविकार (वर्णाचा बदल) व वर्णनाश (वर्णाचा लोप); तसेच धातूचा अर्थाच्या अतिशयाशी योग (संबंध), याला पाच प्रकारचे 'निरुक्त' (शब्दांची व्युत्पत्ती) म्हटले जाते. යථා ද්වාරෙ නියුත්තො=දොවාරිකොති ඔකආගමො. හිංසසද්දස්ස සීහොති විපල්ලාසො. නිජකො=නියකොති විකාරො. මෙහනස්ස ඛස්ස මාලා මෙඛලාති වණ්ණලොපො, හ+න+මකාරානං ලොපො. මයූරොති අත්ථෙ රවතිස්ස අතිස්සයයොගොති. जसे, 'द्वारे नियुक्तो' चे 'दोवारिको' (dovāriko) येथे 'ओक' (oka) चा आगम होतो. 'हिंस' शब्दाचा 'सीहो' (sīho) असा विपर्यास (वर्णव्यत्यय) होतो. 'निजको' चे 'नियको' (niyako) असा विकार (बदल) होतो. 'मेहनस्स खस्स माला' चे 'मेखला' (mekhalā) येथे वर्णलोप होतो, म्हणजे 'ह', 'न' आणि 'म' या वर्णांचा लोप होतो. 'मयूरो' या अर्थामध्ये 'रवती' चा अतिशययोग (अर्थाचा अतिशय संबंध) आहे. යථරිව තථරිවෙති නිපාතාව. ‘‘ජරග්ගවා විචින්තෙසුං, වර+ම්හාකං භුසාමිවෙ’’ති එත්ථ ඉවසද්දො එවකාරත්ථො. නිග්ගහීතසන්ධි. 'यथरिव' (yathariva) आणि 'तथरिव' (tathariva) हे निपातच आहेत. "जरग्गवा विचिंतेसुं, वरंम्हाकं भुसामिव" येथे 'इव' (iva) हा शब्द 'एव' (eva) या अर्थी वापरला आहे. निग्गहीतसंधी (Niggahītasandhi). සන්ධිස්සරානං පටිසෙධසන්ධි,අථො බ්යඤ්ජන+සරබ්යඤ්ජනානං; සන්ධි ච+ථො නිග්ගහීතස්ස සන්ධි,භවන්ති සන්ධි පන පඤ්චධා වෙ. स्वरांचा संधी, प्रतिषेध संधी, तसेच व्यंजन संधी, स्वर-व्यंजन संधी आणि निग्गहीत संधी; अशा प्रकारे संधी निश्चितच पाच प्रकारचे असतात. ඉති පයොගසිද්ධියං සන්ධිකණ්ඩො පඨමො. अशा प्रकारे प्रयोगसिद्धीमधील पहिला संधीकांड समाप्त झाला. 2. නාමකණ්ඩ २. नामकांड (Nāmakaṇḍa) අථ [Pg.26] නාමානි වුච්චන්තෙ. තං අත්ථාභිමුඛං නමනතො, අත්තනා ච+ත්ථස්ස නාමනතො නාමං, දබ්බාභිධානං. තං දුවිධං සලිඞ්ගා+ලිඞ්ගතො, අන්වත්ථරුළ්හිතො ච, තිවිධං පුමි+ත්ථි+නපුංසකලිඞ්ගතො, රුක්ඛො, ලතා, වනන්ති. චතුබ්බිධං සාමඤ්ඤ+ගුණ+ක්රියා+යදිච්ඡානාමතො, රුක්ඛො, නීලො, පාචකො, සිරිවඩ්ඪොති. අට්ඨවිධං අවණ්ණි+වණ්ණු+වණ්ණො+කාර+නිග්ගහීතන්තපකතිභෙදතො, එත්ථ කිංසද්දො නිග්ගහීතන්තො. පච්චයා පඨමං කරීයතීති පකති, සද්දො, ධාතු ච. आता नामांविषयी सांगितले जात आहे. ते अर्थाकडे झुकणारे (नमन करणारे) असल्यामुळे आणि स्वतः अर्थाला नमविणारे (दर्शविणारे) असल्यामुळे त्याला 'नाम' (द्रव्याचे अभिधान/नाव) म्हणतात. ते सलिंग आणि अलिंग भेदाने, तसेच अन्वर्थ (सार्थक) आणि रूढ भेदाने दोन प्रकारचे आहे. पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आणि नपुंसकलिंग भेदाने ते तीन प्रकारचे आहे; जसे - रुक्खो (वृक्ष), लता, वनं (वन). सामान्यनाम, गुणनाम, क्रियानाम आणि यदृच्छानाम (स्वेच्छानाम) भेदाने ते चार प्रकारचे आहे; जसे - रुक्खो (वृक्ष), नीलो (निळा), पाचको (स्वयंपाकी), सिरिवड्ढो (श्रीवर्धन). अ-वर्णान्त, इ-वर्णान्त, उ-वर्णान्त, ओ-कारान्त आणि निग्गहीत-अन्त अशा प्रकृतीभेदाने ते आठ प्रकारचे आहे; येथे 'किं' (kiṃ) हा शब्द निग्गहीत-अन्त आहे. प्रत्ययांच्या आधी जे योजले जाते त्याला 'प्रकृती' म्हणतात; ती शब्द आणि धातू अशी असते. තත්ථ සලිඞ්ගෙසු තාව අකාරන්තතො පුල්ලිඞ්ගා සුගතසද්දා සත්ත විභත්තියො පරා යොජීයන්තෙ. සුගතඉති ඨිතෙ – त्यामध्ये सलिंग नामांपैकी प्रथम अ-कारान्त पुल्लिंगी 'सुगत' शब्दापुढे सात विभक्ती प्रत्यय जोडले जातात. 'सुगत' असा शब्द स्थित असताना – 1. ද්වෙ ද්වෙ+කානෙකෙසු නාමස්මා සියො අංයො නා හි ස නං ස්මා හි ස නං ස්මිං සු १. दोन दोन (प्रत्यय) अनुक्रमे एकवचन आणि बहुवचनात नामापुढे येतात: सि यो, अं यो, ना हि, स नं, स्मा हि, स नं, स्मिं सु. එතෙසං ද්වෙ ද්වෙ හොන්ති එකානෙකත්ථෙසු වත්තමානතො නාමස්මා යථාක්කමං. යතො ඉමෙ සත්ත දුකා හොන්ති, ‘‘අත්ථවන්ත+මධාතුක+මපච්චයං පාටිපදිකං කිතක+තද්ධිත+සමාසා චෙ’’ති වුත්තත්තා තං නාමං පාටිපදිකං නාම. කෙචි සකත්ථ+දබ්බ+ලිඞ්ග+සඞ්ඛ්යා+කම්මාදිපඤ්චකං පාටිපදිකන්ති වදන්ති. තෙනෙ+තං වුච්චති – एक आणि अनेक अर्थांमध्ये वर्तमान असलेल्या नामापुढे अनुक्रमे हे दोन-दोन (प्रत्यय) येतात. ज्या अर्थी हे सात जोडपे (द्विक) आहेत, आणि "अर्थवान, अधातुक, अप्रत्यय प्रातिपदिक तसेच कृदंत, तद्धित आणि समास" असे म्हटल्यामुळे त्या नामाला 'प्रातिपदिक' असे म्हणतात. काही आचार्य स्वार्थ, द्रव्य, लिंग, संख्या आणि कर्मादी या पाच गोष्टींना 'प्रातिपदिक' म्हणतात. म्हणूनच असे म्हटले आहे – සකත්ථ+දබ්බ+ලිඞ්ගානි, සද්දත්ථ+මබ්රවුං පරෙ; සඞ්ඛ්යා+කම්මාදිකානන්තු, විභත්ති වාචකා මතා. इतर आचार्य स्वार्थ, द्रव्य आणि लिंग यांना शब्दाचा अर्थ मानतात; तर संख्या आणि कर्मादी यांना विभक्तीचे वाचक मानले गेले आहे. සකත්ථ+දබ්බ+ලිඞ්ගානි, සඞ්ඛ්යා+කම්මාදිපඤ්චකං; සද්දත්ථ+මබ්රවුං කෙචි, විභත්ති පන ජොතකාති ච. आणि काही आचार्य स्वार्थ, द्रव्य, लिंग, संख्या आणि कर्मादी या पाचही गोष्टींना शब्दाचा अर्थ मानतात, तर विभक्तीला केवळ द्योतक (स्पष्ट करणारी) मानतात. තතො [Pg.27] එකම්හි වත්තබ්බෙ එකවචනං බහුම්හි වත්තබ්බෙ බහුවචනඤ්චාති අනියමෙන පසඞ්ගෙ ‘‘නාමස්මා’’ති අධිකාරො. त्यानंतर एक अर्थ सांगायचा असल्यास एकवचन आणि अनेक अर्थ सांगायचे असल्यास बहुवचन होते, अशा अनियमाचा प्रसंग उद्भवल्यास "नामास्मा" (नामापुढे) हा अधिकार लागू होतो. 37. පඨමා+ත්ථමත්තෙ ३७. प्रथमा केवळ अर्थाच्या ठिकाणी (Paṭhamātthamatte) නාමස්සා+භිධෙය්යමත්තෙ පඨමාවිභත්ති හොතීති වත්තිච්ඡාවසා පඨමායෙ+කවචනබහුවචනානි. සි යොඉති පඨමා. සිස්සි+කාරස්සා+නුබන්ධත්තා අප්පයොගො. පයොජනං ‘‘කි+මංසිසූ’’ති සංකෙතො, තථා අංවචනස්සා+කාරස්ස. එත්ථ තථාති වුත්තස්සාතිදෙසො අඤ්ඤදීයධම්මාන+මඤ්ඤත්ථපාපන+මතිදෙසො. එකම්හි වත්තබ්බෙ පඨමෙකවචනං සි. नामाच्या केवळ अभिधेय (अर्थ) मात्रेमध्ये प्रथमा विभक्ती होते, या बोलण्याच्या इच्छेनुसार प्रथमेचे एकवचन आणि बहुवचन प्रत्यय येतात. 'सि यो' ही प्रथमा विभक्ती आहे. 'सि' मधील 'इ' कार हा अनुबंध (इत्-संज्ञक) असल्यामुळे त्याचा प्रयोग होत नाही. त्याचे प्रयोजन "किंमंसिसु" या संज्ञेमध्ये आहे, तसेच 'अं' प्रत्ययातील 'अ' काराचेही आहे. येथे 'तथा' असे म्हटल्याने अतिदेश होतो; एका ठिकाणचे धर्म दुसऱ्या ठिकाणी लागू करणे म्हणजे 'अतिदेश' होय. एक अर्थ सांगायचा असल्यास प्रथमेचे एकवचन 'सि' (si) येते. අතොති වත්තතෙ, අතොති නාමවිසෙසනත්තා ‘‘විධිබ්බිසෙසනන්තස්සා’’ති පරිභාසතො අකාරන්තතො නාමස්මා විධි. 'अतो' (ato) चे अनुवर्तन होते. 'अतो' हे नामाचे विशेषण असल्यामुळे "विधिर्विशेषणान्तस्य" या परिभाषेनुसार अ-कारान्त नामापुढे हा विधी (नियम) लागू होतो. 109. සිස්සො १०९. सि-प्रत्ययाचा 'ओ' होतो (Sisso) අකාරන්තතො නාමස්මා සිස්ස ඔ හොති. පුබ්බසරලොපෙ සුගතො තිට්ඨති. බහුම්හි වත්තබ්බෙ බහුවචනං යො. එවං උපරිපි යොජෙතබ්බං. अ-कारान्त नामापुढील 'सि' प्रत्ययाचा 'ओ' होतो. पूर्व स्वराचा लोप केल्यावर 'सुगतो तिट्ठति' (सुगत उभे आहेत) असे रूप बनते. अनेक अर्थ सांगायचे असल्यास बहुवचनाचा 'यो' प्रत्यय येतो. पुढेही याचप्रमाणे योजना करावी. 41. අතො යොනං ටාටෙ ४१. अ-कारान्त नामापुढील 'यो' प्रत्ययाचा 'टा' आणि 'टे' होतो (Ato yonaṃ ṭāṭe) අකාරන්තතො නාමස්මා පඨමාදුතියායොනං ටාටෙ හොන්ති යථාක්කමං. ටකාරානුබන්ධත්තා ‘‘ටානුබන්ධා+නෙකවණ්ණා සබ්බස්සා’’ති සබ්බාදෙසො. සුගතා තිට්ඨන්ති. अ-कारान्त नामापुढील प्रथमा आणि द्वितीयेच्या 'यो' प्रत्ययांचे अनुक्रमे 'टा' (ṭā) आणि 'टे' (ṭe) होतात. 'ट' कार अनुबंध असल्यामुळे "टानुबंधानेकवर्णा सर्वस्य" या नियमाने हा सर्वादेश होतो. (उदा.) 'सुगता तिट्ठन्ति' (सुगत उभे आहेत). ‘‘පඨමා+ත්ථමත්තෙ’’ති වත්තතෙ. 'प्रथमात्थ मत्ते' (प्रथमा केवळ अर्थाच्या ठिकाणी) याचे अनुवर्तन होते. 38. ආමන්තණෙ ३८. आमंत्रणात (संबोधनात) (Āmantaṇe) ආමන්තණාධිකෙ [Pg.28] අත්ථමත්තෙ පඨමාවිභත්ති හොතීති එකස්මිං එකවචනං සි. आमंत्रण (संबोधन) अधिक असलेल्या केवळ अर्थाच्या ठिकाणी प्रथमा विभक्ती होते, म्हणून एकवचनात 'सि' प्रत्यय येतो. 112. ගො ස්යා+ලපනෙ ११२. संबोधनात 'सि' प्रत्ययाला 'ग' संज्ञा होते (Go syālapane) ආලපනෙ සි ගසඤ්ඤො හොති. आलपनात (संबोधनात) 'सि' प्रत्ययाला 'ग' संज्ञा होते. ‘‘ලොපො’’ති වත්තතෙ. 'लोपो' (लोप होतो) याचे अनुवर्तन होते. 117. ගසීනං ११७. ग-संज्ञक आणि सि-प्रत्ययाचा लोप (Gasīnaṃ) නාමස්මා ග+සීනං ලොපො හොති. භො සුගත චිරං තිට්ඨ. नामापुढील 'ग' संज्ञक 'सि' प्रत्ययाचा लोप होतो. (उदा.) 'भो सुगत चिरं तिट्ठ' (हे सुगत! आपण चिरकाळ राहावे). ‘‘ගෙ’’ති වත්තතෙ. 'गे' (ग-संज्ञक प्रत्यय परे असताना) याचे अनुवर्तन होते. 59. අයුනං වා දීඝො ५९. अ, इ, उ यांचा विकल्पे करून दीर्घ होतो (Ayunaṃ vā dīgho) අඉඋඉච්චෙතෙසං වා දීඝො හොති ගෙ පරෙ තිලිඞ්ගෙ+ති දීඝෙ භො සුගත සුගතා චිරං තිට්ඨ. සක්කතෙ සුගතාති දීඝං දූරාලපනෙයෙවි+ච්ඡන්ති, සමීපාලපනෙපි දස්සනතො තං න ගහෙතබ්බං. බහුවචනෙ යොස්ස ටා, සුගතා චිරං තිට්ඨථ. अ, इ, उ यांचा 'ग' संज्ञक प्रत्यय परे असताना तिन्ही लिंगांत विकल्पे करून दीर्घ होतो. दीर्घ केल्यावर 'भो सुगत, सुगता चिरं तिट्ठ' अशी रूपे होतात. संस्कृतमध्ये 'सुगता' हा दीर्घ केवळ दूरच्या संबोधनातच इच्छितात, परंतु जवळच्या संबोधनातही (पालीमध्ये) प्रयोग आढळत असल्यामुळे तो नियम येथे ग्राह्य धरू नये. बहुवचनात 'यो' प्रत्ययाचा 'टा' होऊन 'सुगता चिरं तिट्ठथ' (हे सुगतहो! आपण चिरकाळ राहावे) असे रूप बनते. 2. කම්මෙ දුතියා २. कर्म कारकात द्वितीया विभक्ती होते (Kamme dutiyā) තස්මිං කම්මකාරකෙ දුතියාවිභත්ති හොති. අංයොඉති දුතියා. එත්ථ දුතියාතතියාදිභාවො විභත්තිසුත්තෙ සියො ඉති පඨමාවිභත්යාදීනි+මුපාදාය වුච්චති, තං තං උපාදාය පඤ්ඤත්තත්තා. දුතියෙකවචනං අං, අකාරස්සා+පයොගො. සුගතං පස්ස. දුතියාබහුවචනං යො, තස්ස ටෙ, සුගතෙ පස්ස. त्या कर्म कारकामध्ये द्वितीया विभक्ती होते. 'अं यो' ही द्वितीया विभक्ती आहे. येथे द्वितीया, तृतीया इत्यादी संज्ञा विभक्ती सूत्रात 'सि यो' इत्यादी प्रथमा विभक्तीला आधार मानून सांगितल्या आहेत, कारण त्या-त्या आधारावरच त्यांची रचना केली आहे. द्वितीयेचे एकवचन 'अं' आहे, ज्यातील 'अ' काराचा प्रयोग होत नाही. (उदा.) 'सुगतं पस्स' (सुगतांना पहा). द्वितीयेचे बहुवचन 'यो' आहे, त्याचा 'टे' (ṭe) होऊन 'सुगते पस्स' (सुगतांना पहा) असे रूप बनते. 19. කත්තුකරණෙසු තතියා १९. कर्ता आणि करण कारकात तृतीया विभक्ती होते (Kattukaraṇesu tatiyā) තස්මිං [Pg.29] කත්තරි කරණෙ ච කාරකෙ තතියාවිභත්ති හොති. නා+හිඉති තතියාවිභත්ති. තතියාඑකවචනං නා. त्या कर्ता आणि करण कारकामध्ये तृतीया विभक्ती होते. 'ना हि' ही तृतीया विभक्ती आहे. तृतीयेचे एकवचन 'ना' आहे. ‘‘නාස්සා’’ති වත්තතෙ. 'नास्सा' (ना-प्रत्ययाचा) याचे अनुवर्तन होते. 108. අතෙ+න १०८. अ-कारान्त नामापुढील 'ना' चा 'एन' होतो (Atena) අකාරන්තතො නාමස්මා පරස්ස නාවචනස්ස එනාදෙසො හොති නිච්චං. සුගතෙන කතං. अ-कारान्त नामापुढील 'ना' प्रत्ययाचा नित्य 'एन' (ena) आदेश होतो. (उदा.) 'सुगतेन कतं' (सुगतांद्वारे केले गेले). 98. සුහිස්ව+ස්සෙ ९८. सु आणि हि प्रत्यय परे असताना अ-काराचा ए-कार होतो (Suhisvasse) අකාරන්තස්ස සුහිස්වෙ+හොති. සුගතෙහි. अ-कारान्त नामाचा 'सु' आणि 'हि' प्रत्यय परे असताना 'ए' होतो. (उदा.) 'सुगतेhi' (सुगतांद्वारे). ‘‘වෙ’’ති වත්තතෙ. 'वे' (किंवा) याचे अनुवर्तन होते. 95. ස්මාහිස්මිංනං ම්හාභිම්හි ९५. स्मा, हि आणि स्मिं प्रत्ययांचे अनुक्रमे म्हा, भि आणि म्ही होतात (Smāhismiṃnaṃ mhābhimhi) නාමස්මා පරෙසං ස්මාහිස්මිංනං ම්හාභිම්හි හොන්ති යථාක්කමංති හිස්ස භිආදෙසෙ සුගතෙභි. කරණෙ සුගතෙන ලොකො පුඤ්ඤං කරොති, සුගතෙහි සුගතෙහි වා. प्रातिपदिकानंतर (नामावरून) येणाऱ्या 'स्मा', 'हि', 'स्मिं' आणि 'नं' प्रत्ययांच्या जागी अनुक्रमे 'म्हा', 'भि' आणि 'म्हि' हे आदेश होतात. 'हि' च्या जागी 'भि' आदेश झाल्यावर 'सुगतेभि' असे रूप होते. करण कारकात (तृतीया विभक्तीत) 'सुगतेन लोको पुञ्ञं करोति' (जगत सुगतांच्या द्वारे पुण्य करते), किंवा 'सुगतेहि' अथवा 'सुगतेहि' (अशी रूपे होतात). 24. චතුත්ථී සම්පදානෙ २४. संप्रदान कारकात चतुर्थी विभक्ती होते. තස්මිං සම්පදානකාරකෙ චතුත්ථී සියා. ස+නංඉති චතුත්ථී. චතුත්ථෙ+කවචනං ස. විභත්තිසුත්තෙ ස්ස+නංති දීඝපාඨෙන සුගතස්සාති සිද්ධෙපි ‘‘ඣලා සස්ස නො’’ ත්යාදිකාරියසුත්තෙසු ස්සස්සාති අක්ඛරගාරවතා හොතීති ලාඝවත්ථ+මිද+මාරද්ධං – त्या संप्रदान कारकामध्ये चतुर्थी विभक्ती होते. 'स' आणि 'नं' हे चतुर्थीचे प्रत्यय आहेत. चतुर्थीचे एकवचन 'स' आहे. विभक्ती सूत्रात 'स्स' आणि 'नं' अशा दीर्घ पाठाने 'सुगतस्स' हे रूप सिद्ध होत असले, तरी 'झला सस्स नो' इत्यादी कार्यसूत्रांमध्ये 'स्स' च्या अक्षरगौरवामुळे (लाघवासाठी) हे सूत्र सुरू केले आहे – 51. සුඤ සස්ස ५१. 'स' प्रत्ययाला 'सुञ्' चा आगम होतो. නාමස්මා [Pg.30] පරස්ස සස්ස සුඤාගමො හොති. ස ච ‘‘ඡට්ඨියා’’ති වත්තමානෙ – प्रातिपदिकानंतर (नामावरून) येणाऱ्या 'स' प्रत्ययाला 'सुञ्' चा आगम होतो. आणि तो 'षष्ठीच्या' (षष्ठी विभक्तीच्या) अधिकारात – 1,20. ඤාකානු බන්ධා+ද්යන්තා १,२०. 'ञ' आणि 'क' हे अनुबंध (इत् संज्ञक) ज्यांचे आहेत, ते अनुक्रमे आदी (सुरुवातीला) आणि अंत (शेवटी) अवयव होतात. ඡට්ඨීනිද්දිට්ඨස්ස ඤානුබන්ධ+කානුබන්ධා ආද්යන්තාහොන්තීති ආද්යවයවො. උකාරො උච්චාරණත්ථො, ඤ්ඤකාරො අස්මිං සුත්තෙ සංකෙතත්ථො. සුගතස්ස දානං දෙති. षष्ठीने निर्दिष्ट केलेल्या शब्दाचे 'ञ' अनुबंध आणि 'क' अनुबंध असणारे अनुक्रमे आदी आणि अंत अवयव होतात, म्हणून हा आदी अवयव (सुरुवातीचा भाग) आहे. 'उ' कार हा उच्चारणासाठी आहे, आणि 'ञ' कार या सूत्रात संकेतासाठी आहे. 'सुगतस्स दानं देति' (सुगतांना दान देतो). 1,58. ‘‘බහුලං’’ත්ය+ධිකාරො १,५८. 'बहुलं' हा अधिकार आहे. බහුලාධිකාරං කප්පදුමමිව මඤ්ඤන්ති සද්දිකා. තඤ්ච – वैयाकरण 'बहुलं' या अधिकाराला कल्पवृक्षाप्रमाणे मानतात. आणि ते – ක්වචි පවත්ත්ය+පවත්ති, ක්වච+ඤ්ඤං ක්වචි වා ක්වචි; සියා බහුලසද්දෙන, විධි සබ්බො යථාගමංති – "कुठे प्रवृत्ती (नियम लागू होणे), कुठे अप्रवृत्ती (नियम लागू न होणे), कुठे दुसराच नियम, तर कुठे विकल्प होतो; 'बहुलं' या शब्दाने सर्व विधी आगमानुसार (परंपरेनुसार) होतात" – චතුබ්බිධං බහුලං සමික්ඛන්ති. अशा प्रकारे चार प्रकारच्या 'बहुला'चा विचार केला जातो. ‘‘අතො වා’’ත්වෙව, 'अतो वा' या सूत्रावरूनच, 44. සස්සාය චතුත්ථියා ४४. चतुर्थी विभक्तीच्या 'स' प्रत्ययाच्या जागी 'आय' आदेश होतो. අකාරන්තතො පරස්ස චතුත්ථියා සස්ස ආයො හොති වා බහුලං. සුගතාය. යෙභුය්යෙන තාදත්ථෙයෙවා+ය+මායො දිස්සතීති ඉතො පරං නො+දාහරීයතෙ. චතුත්ථීබහුවචනං නං, अ-कारान्त प्रातिपदिकानंतर येणाऱ्या चतुर्थीच्या 'स' प्रत्ययाच्या जागी 'आय' हा आदेश बहुधा (विकल्पाने) होतो. जसे – 'सुगताय'. बहुतांश करून हा 'आय' आदेश तादर्थ्य (त्याच्यासाठी या अर्थी) मध्येच दिसून येतो, म्हणून यापुढे याचे उदाहरण दिले जात नाही. चतुर्थीचे बहुवचन 'नं' आहे. ‘‘දීඝො’’ති වත්තතෙ. 'दीघो' (दीर्घ होणे) हा अधिकार अनुवृत्त होतो. 89. සුනංහිසු ८९. 'सु', 'नं' आणि 'हि' प्रत्यय पर असताना. නාමස්ස [Pg.31] දීඝො හොති සුනංහිසු. සුගතානං. 'सु', 'नं' आणि 'हि' प्रत्यय पर असताना प्रातिपदिकाचा (नामाचा) अंत्य स्वर दीर्घ होतो. जसे – 'सुगतानां'. 29. පඤ්චම්ය+වධිස්මා २९. अवधी (मर्यादा किंवा अपादान) कारकात पंचमी विभक्ती होते. එතස්මා අවධිකාරකා පඤ්චමීවිභත්ති හොති. ස්මා+හිඉති පඤ්චමී. පඤ්චම්යෙකවචනං ස්මා, या अवधी कारकामध्ये पंचमी विभक्ती होते. 'स्मा' आणि 'हि' हे पंचमीचे प्रत्यय आहेत. पंचमीचे एकवचन 'स्मा' आहे, ‘‘අතො’’ ‘‘ටාටෙ’’ ‘‘වෙ’’ති ච වත්තතෙ. 'अतो', 'टा-टे' आणि 'वे' (विकल्पाने) हे अनुवृत्त होतात. 43. ස්මා+ස්මිංනං ४३. 'स्मा' आणि 'स्मिं' प्रत्ययांच्या जागी... අකාරන්තතො නාමස්මා පරෙසං ස්මා+ස්මිංනං ටා+ටෙ හොන්ති වා යථාක්කමං. සුගතා අපෙහි සුගතම්හා සුගතස්මා වා. පඤ්චමීබහුවචනඤ්හි, සුගතෙභි සුගතෙහි. अ-कारान्त प्रातिपदिकानंतर येणाऱ्या 'स्मा' आणि 'स्मिं' प्रत्ययांच्या जागी अनुक्रमे 'टा' आणि 'टे' हे आदेश विकल्पाने होतात. जसे – 'सुगता अपेहि' (सुगतांपासून दूर जा), किंवा 'सुगतम्हा', 'सुगतस्मा'. पंचमीचे बहुवचन 'हि' आहे, ज्याची रूपे 'सुगतेभि', 'सुगतेहि' अशी होतात. 39. ඡට්ඨී සම්බන්ධෙ ३९. संबंध दर्शवण्यासाठी षष्ठी विभक्ती होते. කාරකෙහි අඤ්ඤො සම්බන්ධො, තත්ර ඡට්ඨීවිභත්ති හොති. ස+නංඉති ඡට්ඨී, ඡට්ඨෙකවචනං ස, සුගතස්ස විහාරො, ඡට්ඨීබහුවචනං නං, සුගතානං. कारकांपेक्षा भिन्न असणाऱ्या संबंधात षष्ठी विभक्ती होते. 'स' आणि 'नं' हे षष्ठीचे प्रत्यय आहेत. षष्ठीचे एकवचन 'स' आहे, जसे – 'सुगतस्स विहारो' (सुगतांचा विहार). षष्ठीचे बहुवचन 'नं' आहे, जसे – 'सुगतानां'. 14. සත්තම්යා+ධාරෙ १४. अधिकरण (आधार) कारकात सप्तमी विभक्ती होते. ආධාරකාරකෙ සත්තමීවිභත්ති හොති. ස්මිං+සුඉති සත්තමී. සත්තම්යෙකවචනං ස්මිං, සුගතෙ පතිට්ඨිතං සුගතම්හි සුගතස්මිං වා. සත්තමීබහුවචනං සු, ‘‘සු+හිස්ව+ස්සෙ’’ති එ, සුගතෙසු. आधार कारकामध्ये सप्तमी विभक्ती होते. 'स्मिं' आणि 'सु' हे सप्तमीचे प्रत्यय आहेत. सप्तमीचे एकवचन 'स्मिं' आहे, जसे – 'सुगते पतिट्ठितं' (सुगतांच्या ठिकाणी प्रतिष्ठित), किंवा 'सुगतम्हि', 'सुगतस्मिं'. सप्तमीचे बहुवचन 'सु' आहे, 'सु-हिस्व-स्से' या सूत्राने 'ए' होऊन 'सुगतेसु' असे रूप बनते. සුගතො, සුගතා. භො සුගත, භො සුගතා, භවන්තො සුගතා. සුගතං, සුගතෙ. සුගතෙන, සුගතෙභි[Pg.32], සුගතෙහි. කරණෙ සුගතෙන, සුගතෙභි, සුගතෙහි. සුගතස්ස, සුගතාය, සුගතානං. සුගතා, සුගතම්හා, සුගතස්මා, සුගතෙභි, සුගතෙහි. සුගතස්ස, සුගතානං. සුගතෙ, සුගතම්හි, සුගතස්මිං, සුගතෙසු. सुगतो, सुगता. भो सुगत, भो सुगता, भवन्तो सुगता. सुगतं, सुगते. सुगतेन, सुगतेभि, सुगतेहि. करण कारकात – सुगतेन, सुगतेभि, सुगतेहि. सुगतस्स, सुगताय, सुगतानां. सुगता, सुगतम्हा, सुगतस्मा, सुगतेभि, सुगतेहि. सुगतस्स, सुगतानां. सुगते, सुगतम्हि, सुगतस्मिं, सुगतेसु. සුගතො සුගතො. සුගතං නමති. සුගතෙන කතො. සුගතෙන ජිතො. සුගතස්ස දදෙ. සුගතා විගතො. සුගතස්ස සුතො. සුගතෙ රමතෙ. එවං – सुगतो सुगतो (सुगत ते सुगत आहेत). सुगतं नमति (सुगतांना नमस्कार करतो). सुगतेन कतो (सुगतांनी केलेले). सुगतेन जितो (सुगतांनी जिंकलेले). सुगतस्स ददे (सुगतांना द्यावे). सुगता विगतो (सुगतांपासून दूर गेलेला). सुगतस्स सुतो (सुगतांचा पुत्र / सुगतांकडून ऐकलेले). सुगते ramate (सुगतांच्या ठिकाणी रममाण होतो). याचप्रमाणे – සූරා+සුර+නරො+රග+නාග+යක්ඛා,ගන්ධබ්බ+කින්නර+මනුස්ස+පිසාච+පෙතා; මාතඞ්ග+ජඞ්ගම+තුරඞ්ග+වරාහ+සීහා,බ්යග්ඝ+ච්ඡ+කච්ඡප+තරච්ඡ+මිග+ස්ස+සොණා. शूर, असुर, नर, उरग (सर्प), नाग, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, मनुष्य, पिशाच, प्रेत; मातंग (हत्ती), जंगम, तुरंग (घोडा), वराह (डुक्कर), सिंह, व्याघ्र (वाघ), अच्छ (अस्वल), कच्छप (कासव), तरच्छ (तरस), मृग (हरिण), अस्स (घोडा), सोण (कुत्रा). ආලොක+ලොක+නිලයා+නිල+චාග+යොගා,වායාම+ගාම+නිගමා+ගම+ධම්ම+කාමා; සඞ්ඝො+ඝ+ඝොස+පටිඝා+සව+කොධ+ලොභා,සාරම්භ+ථම්භ+මද+මාන+පමාද+මක්ඛා. आलोक (प्रकाश), लोक, निलय (निवास), अनिल (वारा), चाग (त्याग), योग; व्यायाम (प्रयत्न), गाम (गाव), निगम (नगर), आगम, धम्म, काम; संघ, ओघ (प्रवाह), घोस (घोष/आवाज), पटिघ (प्रतिघ/द्वेष), आसव, कोध (क्रोध), लोभ; सारंभ (उद्धटपणा), थंभ (स्तंभ/ताठरपणा), मद, मान, पमाद (प्रमाद/बेसावधपणा), मक्ख (मत्सर). පුන්නාග+පූග+පනසා+සන+චම්පක+ම්බ-හින්තාල+තාල+වකුල+ජ්ජුන+කිංසුකා ච; මන්දාර+කුන්ද+පුචිමන්ද+කරඤ්ජ+රුක්ඛා,ඤෙය්යා මයූර+සකුණ+ණ්ඩජ+කොඤ්ච+හංසා. पुन्नाग, पूग (सुपारी), पणस (फणस), असन, चम्पक (चाफा), अम्ब (आंबा), हिंताल, taal (ताड), वकुल (बकुळ), अज्जुन (अर्जुन), किंसुक (पळस); मंदार, कुंद, पुचिमंद (कडुनिंब), करंज, रुक्ख (वृक्ष); तसेच मयूर (लांडोर/मोर), सकुण (पक्षी), अण्डज, कोञ्च (क्रौंच), हंस (हे सर्व शब्द याचप्रमाणे जाणावेत). සුගතසද්දොව, යතො සබ්බො සද්දො, න සද්දතාලිතත්ථොව, අථ ඛො සංයොගාදිවසෙනපි අත්ථං වදන්ති. තෙනෙ+තං වුච්චති – केवळ 'सुगत' शब्दाप्रमाणेच नव्हे, तर सर्वच शब्द केवळ त्यांच्या ध्वनीवरूनच अर्थ व्यक्त करत नाहीत, तर संयोग इत्यादींच्या आधारे देखील अर्थ व्यक्त करतात. म्हणूनच असे म्हटले आहे – සංයොගා විප්පයොගා ච, සාහචරියා+විරොධතො; අත්ථා පකරණා ලිඞ්ගා, සද්දන්තරසමීපතො. संयोग, विप्रयोग (वियोग), साहचर्य, विरोध, अर्थ, प्रकरण (संदर्भ), लिंग आणि दुसऱ्या शब्दाचे सान्निध्य, සාමත්ථ්යො+චිත්ර+දෙසෙහි[Pg.33], කාල+බ්යත්තා+නුරූපතො; උපචාර+කාකුභෙද, සම්බන්ධෙහු+පලක්ඛණා. सामर्थ्य, औचित्य, देश (स्थान), काळ, स्पष्टता, अनुरूपता, उपचार (लाक्षणिक प्रयोग), काकूभेद (स्वराचा चढ-उतार) आणि संबंध यांच्याद्वारे (शब्दांचे अर्थ) ओळखले जातात. වචනා ච තදඞ්ගත්තා, පධානත්තාතිආදිහි; සද්ද+ත්ථා පවිභජ්ජන්තෙ, න සද්දාදෙව කෙවලාති. वचन, तदंगता (त्याचा भाग असणे), प्रधानता इत्यादींच्या द्वारे शब्दांचे अर्थ विभागले जातात, केवळ शब्दावरूनच नव्हे. එත්ථ සංයොගතො තාව, ‘‘සකිසොරා ධෙනු දීයතූ’’ති, කිසොරො අස්සපොතකො, තංසංයොගතො වළවා එව පතීයතෙ. येथे प्रथम संयोगाचे उदाहरण म्हणजे – "सकिसोरा धेनु दीयतू" (शिंगरासहित घोडी दिली जावी). 'किसोर' म्हणजे घोड्याचे शिंगरू, त्याच्या संयोगामुळे येथे 'धेनु' शब्दाचा अर्थ 'घोडी' (वळवा) असाच समजला जातो. විප්පයොගතො – ‘‘අකිසොරා ආනීයතූ’’ති තප්පටිසෙධා වළවා එව පතීයතෙ. विप्पयोग (वियोगा) मुळे – “अकिसोर (शिंगरू नसलेले) आणले जावे” असे म्हटल्यास, शिंगराचा निषेध केल्यामुळे केवळ घोडी (वळवा) असाच अर्थ समजला जातो. සහචරණතො – ‘‘රාම+ලක්ඛණ’’ඉති උභින්නං සහචරණෙන රාමොති දාසරථි එව රාමො, න අඤ්ඤාභිධානො ජාමදගන්යාදි. ලක්ඛණොපි සොමිත්ති එව, න තු යො කොචි ලක්ඛණො. सहचरण (सहचार्या) मुळे – “राम-लक्खण” (राम-लक्ष्मण) यामध्ये दोघांच्या सहचार्यामुळे ‘राम’ म्हणजे दशरथाचा पुत्र (दासरथी) रामच समजला जातो, जमदग्नीचा पुत्र (जामदग्न्य) इत्यादी इतर नावांचे नव्हे. तसेच ‘लक्खण’ म्हणजे सुमित्रेचा पुत्र (सौमित्र) हाच समजला जातो, इतर कोणताही लक्षण नावाचा व्यक्ती नव्हे. විරොධතො – ‘‘රාම+ජ්ජුනා’’ ඉති භග්ගවො සහස්සබාහු ච අඤ්ඤමඤ්ඤවිරුද්ධාති තෙ එව පතීයන්තෙ, න දාසරථි සබ්යසාචි ච. विरोधामुळे – “राम-अज्जुन” (राम आणि अर्जुन) यामध्ये भार्गव (परशुराम) आणि सहस्रबाहू हे एकमेकांचे विरोधी असल्यामुळे तेच समजले जातात, दासरथी (राम) आणि सव्यसाची (पांडव अर्जुन) नव्हेत. අත්ථතො – ‘‘සින්ධව+මානය, පවිසාමි රණඞ්ගණ’’මිති රණඞ්ගණපවෙසො වාහනවිසෙසෙන හොතීති අත්ථතො තුරඞ්ගපතීති, න තු ලවණවිසෙසං. अर्थामुळे (प्रयोजनामुळे) – “सिंधव (घोडा/मीठ) आणा, मी रणांगणात प्रवेश करतो” यामध्ये रणांगणात प्रवेश करणे हे एका विशिष्ट वाहनाने (घोड्याने) होत असल्यामुळे, अर्थावरून ‘घोडा’ (तुरङ्ग) असाच बोध होतो, मिठाचा (लवण) नव्हे. පකරණතො-භොජනවිධිම්හි උපසඞ්ඛරියමානෙ ‘‘සින්ධව+මානයෙ’’ති, අත්ර හි සද්දන්තරස්සා+භාවෙපි භොජනොපකරණසමවාය+මාලොකිතභාවතො ලවණෙ පටිපත්ති, තාදිසො හි පත්ථාවොති. प्रकरणावरून (प्रसंगानुसार) – भोजनाच्या वेळी वाढताना “सिंधव आणा” असे म्हटले असता, येथे इतर शब्दांचा अभाव असला तरीही भोजनाच्या साहित्याचा संबंध दिसत असल्यामुळे ‘मीठ’ असाच अर्थ समजला जातो, कारण तो तसा प्रसंग असतो. ලිඞ්ගතො [Pg.34] – ‘‘දෙවදත්තං පඨම+මුපවෙසය සමාරාධිතගුරුං’’ති, අත්ර සමාරාධිතගුරුත්තෙන ලිඞ්ගෙන තස්ස බාහුස්සච්ච+මවගම්යතෙ, න තු යො කොචි දෙවගුණො. लिंगावरून (चिन्हावरून) – “ज्याने गुरूंना संतुष्ट केले आहे अशा देवदत्ताला प्रथम बसवावे”, येथे ‘गुरूंना संतुष्ट करणे’ या चिन्हावरून त्याचे बहुश्रुतत्व (विद्वत्ता) समजते, कोणताही दैवी गुण नव्हे. සන්නිධානතො – ‘‘අජ්ජුනො කතවීරියොති’’ පතීයතෙ, නො අකතවීරියො අජ්ජුනොති. संनिधानामुळे (जवळकीमुळे) – “अज्जुन (अर्जुन) हा कृतवीर्यपुत्र आहे” असा बोध होतो, कृतवीर्यपुत्र नसलेला अज्जुन (पांडव अर्जुन) नव्हे. සාමත්ථියතො – ‘‘අනුදරා කඤ්ඤා’’ති උදරෙ අසති කඤ්ඤා එව නත්ථීති තස්සා කිසාඞ්ගියා මජ්ඣපදෙසොති පතීයතෙ. सामर्थ्यावरून (योग्यतेवरून) – “उदर नसलेली (बारीक कंबर असलेली) कन्या” असे म्हटले असता, उदर (पोट) नसल्यास कन्याच असणार नाही, म्हणून त्या कृशांगीच्या (बारीक शरीराच्या) मध्यभागाचा (कमरेचा) बारीकपणा असा अर्थ समजला जातो. ඔචිත්රතො – ‘‘රාමසදිසො+යං’’ ඉති, අත්ර හි රාමො පයුත්තදාසරථිස්මිං භිය්යො සාධාරණො පරිචයොති දාසරථි එව පතීයතෙ, න භග්ගවරාමො. औचित्यामुळे (योग्यतेमुळे) – “हा रामासारखा आहे” असे म्हटले असता, येथे ‘राम’ हा शब्द दासरथी (दशरथपुत्र राम) याच्यासाठी अधिक सामान्यपणे परिचयाचा असल्यामुळे दासरथी रामच समजला जातो, भार्गव राम (परशुराम) नव्हे. දෙසතො – ‘‘පොට්ඨපා’’ ඉති කිස්මිඤ්චි දෙසෙ පසංසාවචනං. කිස්මිඤ්චි අක්කොසවචනං. देशानुसार (प्रदेशानुसार) – “पोट्ठपा” हा शब्द काही प्रदेशात प्रशंसेचा शब्द आहे, तर काही प्रदेशात तो शिवीगाळ (निंदा) करणारा शब्द आहे. කාලතො – ‘‘පචෙ’’ති දක්ඛිණාපථෙ කත්ථචි පුබ්බණ්හෙ යාගුපාකෙ, සායණ්හෙ තු ඔදනපාකෙ. कालानुसार (वेळेनुसार) – “शिजवावे” (पचे) हा शब्द दक्षिणपथात (दक्षिण भारतात) काही ठिकाणी सकाळी पेज (यागु) शिजवण्यासाठी आणि संध्याकाळी भात (ओदन) शिजवण्यासाठी वापरला जातो. බ්යත්තිතො – ‘‘ගාමස්ස අද්ධ’’ මිති සමභාගෙ, නපුංසකත්තා. ‘‘ගාමස්ස අද්ධො’’ති පුමත්තෙන තු අසමභාගෙ. लिंगभेदावरून (व्यक्तीवरून) – नपुंसकलिंगी “गामस्स अद्धं” (गावाचा अर्धा भाग) म्हणजे समान अर्धा भाग; तर पुल्लिंगी “गामस्स अद्धो” म्हणजे असमान भाग असा अर्थ होतो. අනුරූපතො – ‘‘නරපති සාධු රක්ඛති ගොමණ්ඩල’’මිති මහීමණ්ඩලපාලනං රාජිනො+නුරූප+මිති මහීමණ්ඩලපාලනෙව පතීති, න තු ගොයූථරක්ඛනෙ. अनुरूपतेमुळे (योग्यतेमुळे) – “नरपती (राजा) गोमंडळाचे चांगले रक्षण करतो” यामध्ये पृथ्वीमंडळाचे पालन करणे हे राजाला अनुरूप असल्यामुळे पृथ्वीमंडळाचे रक्षण असाच अर्थ समजला जातो, गाईंच्या कळपाचे रक्षण नव्हे. උපචාරතො – අතංසභාවෙ තංසභාවාරොපන+මුපචාරො, ස ච තදට්ඨො, තද්ධම්මො, තංසහචරියො, තංසමීපොති චතුබ්බිධො[Pg.35], තත්ථ යථාක්කමං මඤ්චා උක්කොසන්ති, අග්ගි මාණවො, යට්ඨිං පවෙසය, ගඞ්ගායං වජොති. उपचारावरून (लाक्षणिक प्रयोगावरून) – जो स्वभाव (धर्म) ज्याचा नाही, त्यावर त्या स्वभावाचा आरोप करणे म्हणजे ‘उपचार’ होय. तो चार प्रकारचा असतो: तदर्थ (त्या प्रयोजनासाठी), तद्धर्म (त्या गुणासाठी), तत्सहचारी (त्याच्या सहचार्यासाठी) आणि तत्समीप (त्याच्या समीपतेसाठी). त्याचे अनुक्रमे उदाहरण असे: “मंचक ओरडतात” (मंचावरील लोक), “माणवक (मुलगा) अग्नी आहे”, “काठ्या आत आणा” (काठी घेतलेल्या लोकांना), आणि “गंगेवर गोठा आहे” (गंगेच्या तीरावर). කාකුතො-කාකුසද්දො ඉත්ථියං, ස ච විකාර+සොක+භීති+ධනිරූපෙසු දිස්සති, වත්තු කායවිකාරා කථඤ්චි තං අකතවාඅපි කෙනචි අඤ්ඤෙන ‘‘කිං ත්වං තං අකාසි ‘‘ඉති පුට්ඨො කොපෙන භමුභෙදා ‘‘අහං කතවා අම්හී’’ති කථෙති, තස්ස භමුභෙදක්රියා අක්රියාපටිඤ්ඤං සූචයති. काकूवरून (स्वराच्या चढ-उतारावरून) – ‘काकू’ हा शब्द स्त्रीलिंगी आहे. तो विकार, शोक, भीती आणि ध्वनीच्या रूपांमध्ये दिसून येतो. बोलणाऱ्याने शारीरिक विकारांमुळे एखादी गोष्ट केली नसली तरीही, दुसऱ्या कोणाकडून “तू ते केलेस का?” असे विचारले असता, क्रोधाने भुवया उंचावून तो म्हणतो, “मी केले आहे!” त्याची ही भुवया उंचावण्याची क्रिया त्याने ती गोष्ट न केल्याचे (अक्रिया-प्रतिज्ञा) सूचित करते. සම්බන්ධ තො – ‘‘මාතරි සම්මා වත්තිතබ්බං, පිතරි සුස්සූයිතබ්බං’’ ඉති, අත්ර හි සමාතරි සපිතරීති සම්බන්ධිසද්දාභාවෙපි සා මාතා සො පිතා ච අස්ස පුත්තස්සාති පතීයතෙ. संबंधावरून – “मातेशी योग्य वर्तन करावे, पित्याची सेवा करावी” यामध्ये ‘स्वतःची माता’ किंवा ‘स्वतःचा पिता’ असे संबंधवाचक शब्द नसले तरीही, ती माता आणि तो पिता त्या पुत्राचेच आहेत असा बोध होतो. උපලක්ඛණතො – ‘‘කාකෙහි රක්ඛිතබ්බං දධී’’ති කාකසද්දො සබ්බෙස+මුපඝාතකානං සාමඤ්ඤං උපලක්ඛෙතීති සුනඛාදිසබ්බෙහිපි නිවාරීයතෙ. उपलक्षणावरून (लक्ष्यार्थावरून) – “दह्याचे कावळ्यांपासून रक्षण करावे” येथे ‘कावळा’ हा शब्द सर्व उपद्रवी प्राण्यांचे सामान्यपणे उपलक्षण करतो, म्हणून कुत्रे इत्यादी सर्व प्राण्यांपासूनही दह्याचे रक्षण केले जाते. වචනතො – ‘‘දාරා’’ඉති දාරසද්දො කලත්තෙ බහුවචනන්තො, අඤ්ඤත්ථ අනියතවචනො. वचनावरून – “दारा” (पत्नी) हा शब्द पत्नी या अर्थी नेहमी बहुवचनात असतो, इतर ठिकाणी त्याचे वचन अनियत (अनिश्चित) असते. තදඞ්ගත්තා – ‘‘සජ්ජිතං භොජන’’මිති වුත්තෙ තප්පරික්ඛාරත්තා තදුපකරණ ආසන, පාති, බ්යඤ්ජනාදීනං සම්පාදනම්පි පතීයතෙ. तदंगत्वामुळे (त्याचाच भाग असल्यामुळे) – “भोजन तयार आहे” असे म्हटले असता, त्याचे अंग असल्यामुळे आसन, ताट, व्यंजने (भाजी-चटणी इत्यादी) या साधनांची तयारी देखील झाली आहे असा बोध होतो. පධානභාවතො – ‘‘නිග්ගච්ඡති අවනිනාථො’’ති රඤ්ඤො නිග්ගමනෙන තදුපජීවීනම්පි නිග්ගමනං විඤ්ඤායති. प्रधानभावामुळे (मुख्यत्वामुळे) – “अवनिनाथ (राजा) बाहेर पडत आहे” असे म्हटले असता, राजाच्या बाहेर पडण्याने त्याच्यावर अवलंबून असलेल्या सेवकांचेही बाहेर पडणे समजले जाते. වුත්තඤ්ච – आणि म्हटले आहे की – නෙය්යනීතත්ථසුත්තෙසු[Pg.36], ඤෙය්යං සද්දත්ථමත්තකං; නෙ+ත්ථ වත්තබ්බඅත්ථෙන, සුත්තං නීතත්ථකං භවෙති. नेय्यार्थ (ज्याचा अर्थ लावायचा आहे) आणि नीतार्थ (ज्याचा अर्थ स्पष्ट आहे) सूत्रांमध्ये केवळ शब्दाचा अर्थच जाणावा; येथे सांगण्याच्या अर्थाने सूत्र नीतार्थ होत नाही. එව+මඤ්ඤෙසම්පි අකාරන්තානං පුල්ලිඞ්ගානං සද්දානං රූපනයො ක්රියා+භිසම්බන්ධො ච. සුගතසද්දතො යස්ස සද්දස්ස විසෙසො අත්ථි, තං වක්ඛාම. ඉතො පරං ඡට්ඨියා චතුත්ථීසමත්තා පඤ්චමීබහුවචනස්ස ච තතියාබහුවචනෙන සමත්තා න තා දස්සියන්තෙ. याचप्रमाणे इतर अ-कारान्त पुल्लिंगी शब्दांचे रूप आणि क्रियापदाशी असलेला संबंध जाणावा. ‘सुगत’ शब्दापेक्षा ज्या शब्दांमध्ये काही विशेष फरक आहे, ते आम्ही सांगू. यापुढे, षष्ठी विभक्तीची चतुर्थी विभक्तीशी असलेली समानता आणि पंचमी बहुवचनाची तृतीया बहुवचनाशी असलेली समानता दर्शविली जाणार नाही. ගුම්බ සි, ‘‘අතො’’ ‘‘සිස්සා’’ති ච වත්තතෙ. ‘गुम्ब’ शब्दाला ‘सि’ प्रत्यय लागल्यास, “अतो” आणि “सिस्सा” हे अधिकार अनुवृत्त होतात. 110. ක්වචෙ+වා. ११०. काही ठिकाणीच. අකාරන්තතො නාමස්මා පරස්ස සිස්ස එ හොති වා ක්වචි. ගුම්බෙ ගුම්බො, ගුම්බා. භො ගුම්බ ගුම්බා, භවන්තො ගුම්බා ඉච්චාදි සුගතසමං. එවං ඵුස්සිතග්ගෙ ඵුස්සිතග්ගො, වත්තබ්බෙ වත්තබ්බො ඉච්චාදි. සිස්සො+කාරස්ස නිච්චත්තා කත්ථචි පක්ඛෙ එකාරත්ත+මිද+මාරද්ධන්ති සිස්සො+කාරපක්ඛෙ එව භවතීති ‘‘අං නපුංසකෙ’’ති අ+මාදෙසෙන එකාරස්ස නපුංසකවිසයෙ බාධිතත්තා ‘‘බහුලං’’ විධානා නපුංසකෙපි සුඛෙ දුක්ඛෙති ක්වචි හොතෙව. अ-कारान्त नामापुढे असलेल्या ‘सि’ प्रत्ययाचा काही ठिकाणी ‘ए’ होतो. जसे – गुम्बे, गुम्बो, गुम्बा. भो गुम्ब, गुम्बा, भवन्तो गुम्बा इत्यादी ‘सुगत’ शब्दाप्रमाणे चालतात. याचप्रमाणे फुस्सितग्गे, फुस्सितग्गो; वत्तब्बे, वत्तब्बो इत्यादी. ‘सि’ प्रत्ययाच्या ‘ओ’ काराच्या नित्यत्वामुळे काही ठिकाणी पर्यायाने ‘ए’ कार करण्यासाठी हा नियम सुरू केला आहे, तो ‘सि’ च्या ‘ओ’ कार पक्षाच्या वेळीच होतो. “अं नपुंसके” या सूत्राने ‘अं’ आदेश झाल्यामुळे नपुंसकलिंगात ‘ए’ काराचा बाध होत असला, तरी “बहुलं” या विधानामुळे नपुंसकलिंगातही ‘सुखे’, ‘दुक्खे’ असे काही ठिकाणी रूपे होतातच. ‘‘යොස්ස’’ ‘‘ටෙ’’ති ච වත්තතෙ. “योस्स” आणि “टे” हे अनुवृत्त होतात. 135. එකච්චාදීහ+තො १३५. अ-कारान्त ‘एकच्च’ इत्यादी शब्दांनंतर. අකාරන්තෙහි එකච්චාදීහි යොනං ටෙ හොති. එකච්චො, එකච්චෙ. භො එකච්ච එකච්චා, එකච්චෙ. එකච්චං, එකච්චෙ. එවං එස+ස+පඨමසද්දානං. अ-कारान्त ‘एकच्च’ इत्यादी शब्दांनंतर ‘यो’ प्रत्ययाचा ‘टे’ (ए) होतो. जसे – एकच्चो, एकच्चे. भो एकच्च, एकच्चा, एकच्चे. एकच्चं, एकच्चे. याचप्रमाणे ‘एस’, ‘स’, ‘पठम’ या शब्दांचे रूप होते. කොධො[Pg.37], කොධා. භො කොධ කොධා, කොධා. කොධං, කොධෙ. कोधो, कोधा. भो कोध, कोधा, कोधा. कोधं, कोधे. ‘‘නාස්ස’’ ‘‘සා’’ති ච වත්තතෙ. “नास्स” आणि “सा” हे अनुवृत्त होतात. 107. කොධාදීහි १०७. ‘कोध’ इत्यादी शब्दांनंतर. කොධාදීහි නාස්ස සා හොති වා. කොධසා කොධෙන. අත්ථසා අත්ථෙන. ‘‘යෙ උත්තමත්ථානි තයි ලභිම්හා’’ති අත්ථසද්දො නපුංසකලිඞ්ගොපි දිස්සති. ‘कोध’ इत्यादी शब्दांनंतर ‘ना’ प्रत्ययाचा पर्यायाने ‘सा’ होतो. जसे – कोधसा, कोधेन. अत्थसा, अत्थेन. “ये उत्तमत्थानि तयि लभिम्हा” यामध्ये ‘अत्थ’ शब्द नपुंसकलिंगातही आढळतो. ‘‘ස්මිනො ටී’’ති ච වත්තතෙ. “स्मिनो टि” हे अनुवृत्त होते. 175. දිවාදිතො १७५. ‘दिव’ इत्यादी शब्दांनंतर. දිවාදීහි නාමෙහි ස්මිනො ටි හොති නිච්චං. දිවි, එවං භුවි. එත්ථටිම්හි නිච්චං වකාරාගමො රස්සො ච. එත්ථ භූසද්දො වධූසද්දසමං. ‘दिव’ इत्यादी नामांनंतर ‘स्मिं’ प्रत्ययाचा नित्य ‘टि’ (इ) होतो. जसे – दिवि, याचप्रमाणे भुवि. येथे ‘टि’ प्रत्यय असताना नित्य ‘व’ कार आगम आणि र्हस्व होतो. येथे ‘भू’ शब्द ‘वधू’ शब्दाप्रमाणे आहे. ‘‘වෙ’’ති වත්තතෙ. “वे” (पर्यायाने) हे अनुवृत्त होते. 144. මනාදීහි ස්මිං+සං+නා+ස්මානං සි+සො+ඔ+සා+සා १४४. ‘मन’ इत्यादी शब्दांनंतर ‘स्मिं’, ‘स’, ‘ना’, ‘स्मा’ यांच्या जागी अनुक्रमे ‘सि’, ‘सो’, ‘ओ’, ‘सा’, ‘सा’ हे आदेश होतात. මනාදීහි ස්මි+මාදීනං සි+සො+ඔ+සා+සා හොන්ති වා යථාක්කමං. මනො, මනා. භො මන මනා, මනා. මනො, මනං, මනෙ. මනසා මනෙන, මනෙහි මනෙභි. මනසො මනස්ස, මනානං. මනසා මනා මනම්හා මනස්මා, මනෙහි මනෙභි. මනසි මනම්හි මනස්මිං, මනෙසු. ‘मन’ इत्यादी शब्दांनंतर ‘स्मिं’ इत्यादी प्रत्ययांच्या जागी अनुक्रमे ‘सि’, ‘सो’, ‘ओ’, ‘सा’, ‘सा’ हे आदेश पर्यायाने होतात. जसे – मनो, मना. भो मन, मना, मना. मनो, मनं, मने. मनसा, मनेन, मनेहि, मनेभि. मनसो, मनस्स, मनानं. मनसा, मना, मनम्हा, मनस्मा, मनेहि, मनेभि. मनसि, मनम्हि, मनस्मिं, मनेसु. එවං [Pg.38] වචො පයො තෙජො,තපො චෙතො තමො යසො. याचप्रमाणे वचो (वचस्), पयो (पयस्), तेजो (तेजस्), तपो (तपस्), चेतो (चेतस्), तमो (तमस्), यसो (यशस्) हे शब्द चालतात. අයො වයො සිරො සරො,උරො+ත්යෙ+තෙ මනාදයො. अयो (लोखंड), वयो (वय), सिरो (डोके), सरो (तलाव), उरो (छाती) इत्यादी हे 'मनादि' (मन इत्यादी) शब्द आहेत. රූපසිද්ධියං අහ+රහසද්දා මනාදීසු පඨිතා. අහස්ස ආපාදිත්තා රහොති නිපාතත්තා රහසීති විභත්යන්තපටිරූපකනිපාතත්තා ඉධ න ගහිතා. रूपसिद्धीमध्ये 'अह' आणि 'रह' हे शब्द 'मनादि' गणात पठित केले आहेत. 'अह' च्या जागी 'आपादि' होत असल्यामुळे आणि 'रह' हा निपात असल्यामुळे, तसेच 'रहसि' हा विभक्ती-प्रत्ययान्त सदृश निपात असल्यामुळे येथे ग्रहण केला नाही. ගච්ඡන්ත සි, ‘‘සිස්ස’’ ‘‘වෙ’’ති ච වත්තතෙ. පරතො භිය්යො නානුවත්තයිස්සාම, වුත්තියා එව අනුවත්තස්ස ගම්යමානත්තා. 'गच्छन्त' + 'सि' या स्थितीत, 'सि' प्रत्ययाचा आणि 'वा' (विकल्प) चा अधिकार येतो. यापुढे आम्ही वारंवार अनुवृत्ती करणार नाही, कारण वृत्तीवरूनच अनुवृत्तीचा अर्थ समजून येतो. 148. න්තස්සං १४८. न्तस्सं (न्त प्रत्ययाच्या जागी 'अं' होतो). සිම්හි න්තපච්චයස්ස අං හොති වා. ‘‘සුතානුමිතෙසු සුතසම්බන්ධොව බලවා’’ති ඤායා ‘‘න්තස්සා’’ති සුතත්තා න්තස්සෙව අං, න තදන්තස්ස අනුමිතස්ස සද්දස්ස. එව+මුපරිපි න්ත+න්තූනං ආදෙසවිධානට්ඨානෙසු. ‘‘ගසිනං’’ති සිලොපො. ගච්ඡං ගච්ඡන්තො. 'सि' प्रत्यय असताना 'न्त' प्रत्ययाच्या जागी विकल्पेकरून 'अं' आदेश होतो. 'ऐकलेल्या (श्रुत) आणि अनुमानावरील गोष्टींमध्ये श्रुत संबंधच बलवान असतो' या न्यायानुसार 'न्तस्स' असे प्रत्यक्ष ऐकले (सूत्रबद्ध) असल्यामुळे 'न्त' प्रत्ययालाच 'अं' होतो, त्या प्रत्ययाने अंत होणाऱ्या अनुमित शब्दाला नाही. याचप्रमाणे पुढेही 'न्त' आणि 'न्तु' प्रत्ययांच्या आदेश विधानाच्या ठिकाणी समजावे. 'गसिनं' या सूत्राने 'सि' चा लोप होतो. (उदा.) गच्छं, गच्छन्तो. 215. න්ත+න්තූනං න්තො යොම්හි පඨමෙ २१५. न्त-न्तूनं न्तो योम्हि पठमे (प्रथमेच्या 'यो' प्रत्ययामध्ये 'न्त' आणि 'न्तु' प्रत्ययांच्या जागी 'न्तो' होतो). පඨමෙ යොම්හි න්ත+න්තූනං සවිභත්තීනං න්තොඉච්චාදෙසො හොති වා. ස ච බහුලාධිකාරා පුමෙව, ගච්ඡන්තො ගච්ඡන්තා. प्रथमेच्या 'यो' प्रत्ययामध्ये विभक्तीसह 'न्त' आणि 'न्तु' प्रत्ययांच्या जागी विकल्पेकरून 'न्तो' हा आदेश होतो. आणि 'बहुळ' अधिकाराने तो केवळ पुल्लिंगातच होतो. (उदा.) गच्छन्तो, गच्छन्ता. 218. ට+ටා+අං ගෙ २१८. ट-टा-अं गे ('गि' किंवा 'गे' म्हणजे संबोधन एकवचनात 'ट', 'टा' आणि 'अं' आदेश होतात). ගෙ පරෙ න්ත+න්තූනං සවිභත්තීනං ට+ටා+අංඉච්චාදෙසා නිච්චං හොන්ති බහුලං. භො ගච්ඡ ගච්ඡා ගච්ඡං, ගච්ඡන්තො ගච්ඡන්තා. 'गे' (संबोधन एकवचन) नंतर असताना विभक्तीसह 'न्त' आणि 'न्तु' प्रत्ययांच्या जागी 'ट', 'टा' आणि 'अं' हे आदेश बहुधा नित्य होतात. (उदा.) भो गच्छ, गच्छा, गच्छं; गच्छन्तो, गच्छन्ता. 92. න්තස්ස ච ට වං+සෙ ९२. न्तस्स च ट वं-से ('अं' आणि 'सि' प्रत्यय असताना 'न्त' च्या जागी 'ट' होतो). අංසෙසු [Pg.39] න්තපච්චයස්ස ට හොති වා න්තුස්ස ච. වවත්ථිතවිභාසා+යං. ගච්ඡං ගච්ඡන්තං, ගච්ඡන්තෙ. 'अं' आणि 'सि' प्रत्यय असताना 'न्त' प्रत्ययाच्या जागी आणि 'न्तु' च्या जागीही विकल्पेकरून 'ट' होतो. हा व्यवस्थित विकल्प (व्यवस्थितविभाषा) आहे. (उदा.) गच्छं, गच्छन्तं; गच्छन्ते. 217. තො+තා+ති+තා ස+ස්මා+ස්මිං නාසු २१७. तो-ता-ति-ता स-स्मा-स्मिं नासु ('स', 'स्मा', 'स्मिं' आणि 'ना' प्रत्यय असताना अनुक्रमे 'तो', 'ता', 'ति', 'ता' हे आदेश होतात). ස+ස්මා+ස්මිං+නාසු න්ත+න්තූනං සවිභත්තීනං තො+තා+ති+තා හොන්ති වා යථාක්කමං. ගච්ඡතා ගච්ඡන්තෙන, ගච්ඡන්තෙහි ගච්ඡන්තෙභි. ගච්ඡතො ගච්ඡස්ස ගච්ඡන්තස්ස. 'स', 'स्मा', 'स्मिं' आणि 'ना' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'न्त' आणि 'न्तु' प्रत्ययांच्या जागी अनुक्रमे 'तो', 'ता', 'ति' आणि 'ता' हे आदेश विकल्पेकरून होतात. (उदा.) गच्छता, गच्छन्तेन; गच्छन्तेहि, गच्छन्तेभि; गच्छतो, गच्छस्स, गच्छन्तस्स. 216. තං නංම්හි २१६. तं नंम्हि ('नं' प्रत्यय असताना 'तं' होतो). නංම්හි න්ත+න්තූනං සවිභත්තීනං තං වා හොති. ගච්ඡතං ගච්ඡන්තානං. ගච්ඡතා ගච්ඡන්තා ගච්ඡන්තම්හා ගච්ඡන්තස්මා. ගච්ඡති ගච්ඡන්තෙ ගච්ඡන්තම්හි ගච්ඡන්ථස්මිං, ච්ඡෙන්තෙසු. 'नं' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'न्त' आणि 'न्तु' प्रत्ययांच्या जागी विकल्पेकरून 'तं' होतो. (उदा.) गच्छतं, गच्छन्तानं. गच्छता, गच्छन्ता, गच्छन्तम्हा, गच्छन्तस्मा. गच्छति, गच्छन्ते, गच्छन्तम्हि, गच्छन्तस्मिं, गच्छन्तेसु. එවං මහං චරං තිට්ඨං, දදං භුඤ්ජං සුණං පචං; ජයං ජීරං වචං පීයං, සරං කුබ්බං ජපං වජං. याचप्रमाणे महं (महान), चरं (चालणारा), तिट्ठं (उभा राहणारा), ददं (देणारा), भुञ्जं (खाणारा), सुणं (ऐकणारा), पचं (शिजवणारा); जयं (जिंकणारा), जीरं (जीर्ण होणारा), वचं (बोलणारा), पीयं (पिणारा), सरं (स्मरण करणारा), कुब्बं (करणारा), जपं (जप करणारा), वजं (जाणारा). ඉච්චාදයො. इत्यादी. භවන්ත සි, 'भवन्त' + 'सि' या स्थितीत, 149. භූතො १४९. भूतो (भू धातूपासून). නියමසුත්ත+මිදං. භූධාතුතො න්තස්ස අං හොති සිම්හි නිච්චං පුනබ්බිධානා. භවං. हे नियमसूत्र आहे. 'भू' धातूपासून 'सि' प्रत्यय असताना 'न्त' च्या जागी पुनर्विधानामुळे नित्य 'अं' होतो. (उदा.) भवं. 146. භවතො වා භොන්තොග+යො+නා+සෙ १४६. भवतो वा भोन्तोग-यो-ना-से ('भवन्त' शब्दाच्या जागी 'भोन्त' आदेश विकल्पेकरून होतो 'गि', 'यो', 'ना' आणि 'स' प्रत्यय असताना). භවන්තසද්දස්ස භොන්තාදෙසො වා හොති ග+යො+නා+සෙ. න්තොආදෙසො, භොන්තො භොන්තා භවන්තො භවන්තා. ගෙ [Pg.40] පන භො භොන්ත භොන්තා භව භවා භවං, භොන්තො භොන්තා භවන්තො භවන්තා. භොන්තාදෙසපක්ඛෙ ට+ටා+අංආදෙසා බහුලාධිකාරා න හොන්ති. භවං භවන්තං, භොන්තෙ භවන්තෙ. භොතා භොන්තෙන භවතා භවන්තෙන, භවන්තෙහි භවන්තෙභි. භොතො භොන්තස්ස භවතො භවස්ස භවන්තස්ස, භවතං භවන්තානං. භවතා ඉච්චාදි ගච්ඡන්තසමං. 'भवन्त' शब्दाच्या जागी 'गि' (संबोधन एकवचन), 'यो', 'ना' आणि 'स' प्रत्यय असताना विकल्पेकरून 'भोन्त' आदेश होतो. 'न्तो' आदेश झाल्यावर - भोन्तो, भोन्ता, भवन्तो, भवन्ता. 'गे' (संबोधन) मध्ये - भो, भोन्त, भोन्ता, भव, भवा, भवं; भोन्तो, भोन्ता, भवन्तो, भवन्ता. 'भोन्त' आदेशाच्या पक्षात 'बहुळ' अधिकाराने 'ट', 'टा', 'अं' हे आदेश होत नाहीत. (द्वितीयेत) भवं, भवन्तं; भोन्ते, भवन्ते. (तृतीयेत) भोता, भोन्तेन, भवता, भवन्तेन; भवन्तेहि, भवन्तेभि. (चतुर्थी/षष्टीत) भोतो, भोन्तस्स, भवतो, भवस्स, भवन्तस्स; भवतं, भवन्तानं. 'भवता' इत्यादी रूपे 'गच्छन्त' शब्दाप्रमाणेच होतात. භොඉති ආමන්තණෙ නිපාතො, ‘‘කුතො නු ආගච්ඡථ භො තයො ජනා’’ති බහුවචනෙපි දස්සනතො. එවං භන්තෙති. භද්දෙති භද්දසද්දන්තරෙන සිද්ධං. භද්දන්තඉති දස්ස ද්විභාවෙන. 'भो' हा संबोधनाचा निपात आहे, 'कुतो नु आगच्छथ भो तयो जना' (हे लोकांनो, तुम्ही तिघे कुठून येत आहात?) या वाक्यात बहुवचनातही त्याचा प्रयोग दर्शविला आहे. याचप्रमाणे 'भन्ते' हा शब्द समजावा. 'भद्दे' हा शब्द 'भद्द' या दुसऱ्या शब्दाने सिद्ध होतो. 'भद्दन्त' हा शब्द 'द' कार द्वित्त होऊन सिद्ध होतो. සං සන්තො, සන්තො සන්තා. භො ස සා සං, සන්තො සන්තා. සං සන්තං ‘‘සංයොගාදිලොපොති නස්ස ලොපෙ ‘‘යං යඤ්හි රාජ භජති, සන්තං වා යදි වා අසං’’, සන්තෙ. සතා සන්තෙන. (सन्त शब्दाची रूपे) सं, सन्तो; सन्तो, सन्ता. (संबोधनात) भो स, सा, सं; सन्तो, सन्ता. (द्वितीयेत) सं, सन्तं. 'संयोगादिलोपो' या सूत्राने 'न' चा लोप झाल्यावर 'यं यञ्हि राज भजति, सन्तं वा यदि वा असं' (हे राजा, मनुष्य ज्या चांगल्या किंवा वाईट माणसाची संगत करतो...) असे रूप होते; सन्ते. (तृतीयेत) सता, सन्तेन. 145. සතො සබ භෙ १४५. सतो सब भे ('भ' प्रत्यय असताना 'सन्त' शब्दाच्या जागी 'स' किंवा 'सब्ब' होतो). සන්තසද්දස්ස සබ භවති භකාරෙ. සබ්භි සන්තෙහි. නිච්චත්තා සන්තෙභීති න හොති. සතො සස්ස සන්තස්ස ඉච්චාදි ගච්ඡන්තසමං. 'सन्त' शब्दाच्या जागी 'भ' कार (भि, भ्यस् प्रत्यय) नंतर असताना 'स' (किंवा सब्) होतो. (उदा.) सब्भि, सन्तेहि. नित्यत्वामुळे 'सन्तेभि' असे रूप होत नाही. सतो, सस्स, सन्तस्स इत्यादी रूपे 'गच्छन्त' शब्दाप्रमाणेच होतात. 150. මහන්තා+රහන්තානං ටා වා १५०. महन्ता-रहन्तानं टा वा ('सि' प्रत्यय असताना 'महन्त' आणि 'अरहन्त' शब्दांच्या 'न्त' च्या जागी विकल्पेकरून 'टा' होतो). සිම්හි මහන්තා+රහන්තානං න්තස්ස ටා වා හොති. මහා මහං මහන්තො, මහන්තො මහන්තා. අරහා අරහං, අරහන්තො අරහන්තා ඉච්චාදි ගච්ඡන්තසමං. 'सि' प्रत्यय असताना 'महन्त' आणि 'अरहन्त' शब्दांच्या 'न्त' च्या जागी विकल्पेकरून 'टा' (म्हणजे 'आ') होतो. (उदा.) महा, महं, महन्तो; महन्तो, महन्ता. अरहा, अरहं; अरहन्तो, अरहन्ता इत्यादी रूपे 'गच्छन्त' शब्दाप्रमाणेच होतात. අස්ම සි, 'अस्म' + 'सि' या स्थितीत, 154. රාජාදීයුවාදිත්වා १५४. राजादीयुवादित्वा ('राज' आणि 'युव' इत्यादी शब्दांनंतर 'सि' प्रत्ययाचा 'आ' होतो). රාජාදීහි [Pg.41] යුවාදීහි ච පරස්ස සිස්ස ආ හොති. අස්මා, 'राज' इत्यादी आणि 'युव' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'सि' प्रत्ययाच्या जागी 'आ' होतो. (उदा.) अस्मा. 156. යොන+මානො १५६. योना-मानो ('राज' आणि 'युव' इत्यादी शब्दांनंतर 'यो' प्रत्ययाच्या जागी विकल्पेकरून 'आनो' होतो). රාජාදීහි යුවාදීහි ච යොන+මානො වා හොති. අස්මානො අස්මා. භො අස්ම අස්මා, අස්මානො අස්මා. 'राज' इत्यादी आणि 'युव' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'यो' प्रत्ययाच्या जागी विकल्पेकरून 'आनो' होतो. (उदा.) अस्मानो, अस्मा. (संबोधनात) भो अस्म, अस्मा; अस्मानो, अस्मा. 155. වා+ම්හා+නඞ १५५. वा-म्हा-नङ ('अं' प्रत्यय असताना 'राज' आणि 'युव' इत्यादी शब्दांना विकल्पेकरून 'आनङ' आगम होतो). රාජාදීනං යුවාදීනඤ්ච ආනඞ හොති වා අංම්හි. අස්මානං අස්මං, අස්මානො අස්මෙ. 'अं' प्रत्यय असताना 'राज' इत्यादी आणि 'युव' इत्यादी शब्दांना विकल्पेकरून 'आनङ' (आन) आगम होतो. (उदा.) अस्मानं, अस्मं; अस्मानो, अस्मे. 80. නාස්සෙ+නො ८०. नास्से-नो ('कम्म' इत्यादी शब्दांनंतर 'ना' प्रत्ययाच्या जागी विकल्पेकरून 'एन' होतो). කම්මාදිතො නාවචනස්ස එනො වා හොති. අස්මෙන අස්මනා, අස්මෙහි අස්මෙභි. අස්මස්ස, අස්මානං. අස්මා අස්මම්හා අස්මස්මා ඉච්චාදි. 'कम्म' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'ना' प्रत्ययाच्या जागी विकल्पेकरून 'एन' होतो. (उदा.) अस्मेन, अस्मना; अस्मेहि, अस्मेभि. (चतुर्थी/षष्टीत) अस्मस्स, अस्मानं. (पंचमीत) अस्मा, अस्मम्हा, अस्मस्मा इत्यादी. 79. කම්මාදිතො ७९. कम्मादितो ('कम्म' इत्यादी शब्दांनंतर 'स्मिं' प्रत्ययाच्या जागी विकल्पेकरून 'नि' होतो). කම්මාදිතො ස්මිනො නි හොති වා. අස්මනි අස්මෙ අස්මම්හි අස්මස්මිං, අස්මෙසු. කම්ම චම්ම වෙස්ම භස්ම බ්රහ්ම අත්ත ආතුම ඝම්ම මුද්ධඉති කම්මාදයො. මුද්ධ ගණ්ඩිවධන්ව අණිම ලඝිමාදයො අස්මසමා. රාජ බ්රහ්ම සඛ අත්ත ආතුම ගණ්ඩිවධන්ව අස්ම අණිම ලඝිමාදයො රාජාදයො. 'कम्म' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'स्मिं' प्रत्ययाच्या जागी विकल्पेकरून 'नि' होतो. (उदा.) अस्मनि, अस्मे, अस्मम्हि, अस्मस्मिं; अस्मेसु. कम्म (कर्म), चम्म (चर्म/कातडे), वेस्म (गृह), bhsस्म (राख), ब्रह्म (ब्रह्म), अत्त (आत्म/स्वतः), आतुम (स्वतः), घम्म (उष्णता), मुद्धा (मस्तक) इत्यादी 'कम्मादि' शब्द आहेत. मुद्धा, गण्डिवधन्व, अणिम, लघिम इत्यादी शब्द 'अस्म' शब्दाप्रमाणे चालतात. राज, ब्रह्म, सख, अत्त, आतुम, गण्डिवधन्व, अस्म, अणिम, लघिम इत्यादी 'राजादि' शब्द आहेत. ‘‘ධම්මො වා+ඤ්ඤත්ථෙ’’ති ගණසුත්තෙන රාජාදීසු පට්ඨිතත්තා දළධම්මො දළධම්මාති වා හොති. යුව සා සුවා මඝව පුම [Pg.42] වත්තහාති යුවාදයො. රාජා, රාජානො රාජා. භොරාජ රාජා, රාජානො රාජා. රාජානං රාජං, රාජානො රාජෙ. 'धम्मो वाञ्ञत्थे' या गणसूत्राने 'राजादि' गणात पठित असल्यामुळे 'दळधम्मो' किंवा 'दळधम्मा' असे रूप होते. युव, सा, सुवा, मघव, पुम, वत्तहा इत्यादी 'युवादि' शब्द आहेत. (उदा. राज शब्दाची रूपे) राजा, राजानो, राजा. (संबोधनात) भो राज, राजा; राजानो, राजा. (द्वितीयेत) राजानं, राजं; राजानो, राजे. 123. රාජස්සි නාම්හි १२३. 'ना' प्रत्यय असताना 'राज' शब्दाला 'इ' होतो. ‘‘සබ්බදත්තෙන රාජිනා’’ති පාඨම්පති ඉද+මාරද්ධං. රාජස්සි වා හොති නාම්හි. රාජිනා. “सब्बदत्तेन राजिना” हा पाठही मिळतो, यासाठी हे (सूत्र) सुरू केले आहे. 'ना' प्रत्यय असताना 'राज' शब्दाला 'इ' विकल्पेकरून होतो. (उदा.) राजिना. 222. නා+ස්මාසු රඤ්ඤා २२२. 'ना' आणि 'स्मा' प्रत्यय असताना 'रञ्ञा' असा आदेश होतो. නා+ස්මාසු රාජස්ස සවිභත්තිස්ස රඤ්ඤා හොති නිච්චං. අනෙකවණ්ණත්තා සබ්බස්ස. රඤ්ඤා. 'ना' आणि 'स्मा' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'राज' शब्दाला 'रञ्ञा' हा आदेश नित्य होतो. अनेक वर्ण असल्यामुळे हा संपूर्ण शब्दाच्या जागी होतो. (उदा.) रञ्ञा. 124. සු+නං+හිසූ १२४. 'सु', 'नं' आणि 'हि' प्रत्यय असताना. රාජස්ස ඌ හොති වා සු+නං+හිසු. ‘‘ඡට්ඨියන්තස්සාති අන්තස්ස හොති. රාජූහි රාජෙහි රාජූභි රාජෙභි. 'सु', 'नं' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'राज' शब्दाला विकल्पेकरून 'ऊ' होतो. 'षष्ठीच्या अंताला' या नियमाने हा अंत्य स्वराला होतो. (उदा.) राजूहि, राजेहि, राजूभि, राजेभि. 223. රඤ්ඤො+රඤ්ඤස්ස+රාජිනො සෙ २२३. 'स' प्रत्यय असताना 'रञ्ञो', 'रञ्ञस्स' आणि 'राजिनो' हे आदेश होतात. සෙ රාජස්ස සවිභත්තිස්ස එතෙ ආදෙසා හොන්ති. රඤ්ඤො රඤ්ඤස්ස රාජිනො, රාජූනං. 'स' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'राज' शब्दाला हे आदेश होतात. (उदा.) रञ्ञो, रञ्ञस्स, राजिनो. (बहुवचनात) राजूनां. 221. රාජස්ස රඤ්ඤං २२१. 'राज' शब्दाला 'रञ्ञं' होतो. නංම්හි රාජස්ස සවිභත්තිස්ස රඤ්ඤං වා හොති. රඤ්ඤං. රඤ්ඤා, රාජූහි රාජෙහි රාජූභි රාජෙභි. 'नं' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'राज' शब्दाला विकल्पेकरून 'रञ्ञं' होतो. (उदा.) रञ्ञं. (तृतीया/पंचमी एकवचनात) रञ्ञा, (बहुवचनात) राजूहि, राजेहि, राजूभि, राजेभि. 224. ස්මිම්හි රඤ්ඤෙ+රාජිනි २२४. 'स्मिं' प्रत्यय असताना 'रञ्ञे' आणि 'राजिनि' हे आदेश होतात. ස්මිම්හි රාජස්ස සවිභත්තිස්ස රඤ්ඤෙ+රාජිනි හොන්ති නිච්චං. රඤ්ඤෙ රාජිනි, රාජූසු රාජෙසු. 'स्मिं' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'राज' शब्दाला 'रञ्ञे' आणि 'राजिनि' हे आदेश नित्य होतात. (उदा.) रञ्ञे, राजिनि. (बहुवचनात) राजूसु, राजेसु. 225. සමාසෙ වා २२५. समासामध्ये विकल्पेकरून (होते). ඉති [Pg.43] ගණසුත්තෙන රාජස්ස නා+ස්මා+ස්මිංසු යං වුත්තං, තං වා හොති. කාසිරඤ්ඤා කාසිරාජිනා කාසිරාජෙන, කාසිරාජූභි කාසිරාජෙභි කාසිරාජූහි කාසිරාජෙහි. කාසිරඤ්ඤො කාසිරඤ්ඤස්ස කාසිරාජිනො කාසිරාජස්ස. කාසිරඤ්ඤා කාසිරාජස්මා. කාසිරාජූනං කාසිරාජානං. කාසිරඤ්ඤෙ කාසිරාජිනි කාසිරාජෙ කාසිරාජම්හි කාසිරාජස්මිං, කාසිරාජූසු කාසිරාජෙසු. या गणसूत्रानुसार 'राज' शब्दाला 'ना', 'स्मा' आणि 'स्मिं' प्रत्यय असताना जे सांगितले आहे, ते विकल्पेकरून होते. (उदा.) कासिरञ्ञा, कासिराजिना, कासिराजेन; कासिराजूभि, कासिराजेभि, कासिराजूहि, कासिराजेहि; कासिरञ्ञो, कासिरञ्ञस्स, कासिराजिनो, कासिराजस्स; कासिरञ्ञा, कासिराजस्मा; कासिराजूनां, कासिराजानां; कासिरञ्ञे, कासिराजिनि, कासिराजे, कासिराजम्हि, कासिराजस्मिं; कासिराजूसु, कासिराजेसु. අද්ධා, අද්ධානො අද්ධා. භො අද්ධ අද්ධා, අද්ධානො අද්ධා. අද්ධානං අද්ධං, අද්ධානො අද්ධෙ. अद्धा (प्रथमा एकवचन), अद्धानो, अद्धा (प्रथमा बहुवचन). भो अद्ध, अद्धा (संबोधन एकवचन), अद्धानो, अद्धा (संबोधन बहुवचन). अद्धानं, अद्धं (द्वितीया एकवचन), अद्धानो, अद्धे (द्वितीया बहुवचन). 192. පුම+කම්ම+ථාම+ද්ධානං ස+ස්මාසු ච १९२. 'पुम', 'कम्म', 'थाम' आणि 'अद्धान' शब्दांना 'स' आणि 'स्मा' प्रत्यय असताना (आणि 'ना' प्रत्यय असतानाही)... පුමාදීන+මු හොති වා ස+ස්මාසු නාම්හි චෙ+ති උත්තෙ අද්ධුනා, කම්මාදිත්තා ‘‘නාස්සෙ+නො’’ති වා එනො, අද්ධෙන අද්ධනා, අද්ධෙහි අද්ධෙභි. සෙ උකාරෙ ච – 'पुम' इत्यादी शब्दांना 'स', 'स्मा' आणि 'ना' प्रत्यय असताना विकल्पेकरून 'उ' होतो असे म्हटले असता, (उदा.) 'अद्धुना' (असे रूप बनते). 'कम्म' इत्यादी शब्दांप्रमाणे 'नास्सेनो' या सूत्राने विकल्पेकरून 'एन' आदेश होऊन 'अद्धेन', 'अद्धना'; 'अद्धेहि', 'अद्धेभि' (अशी रूपे होतात). 'स' प्रत्यय असताना आणि 'उ' कार असताना देखील - 1,9. ඉයුවණ්ණා ඣලා නාමස්ස+න්තෙ १,९. नामाच्या शेवटी असणारे 'इ' आणि 'उ' वर्ण अनुक्रमे 'झ' आणि 'ल' संज्ञक होतात. නාමං පාටිපදිකං, තස්ස අන්තෙ වත්තමානා ඉවණ්ණුවණ්ණා ඣලසඤ්ඤා හොන්ති යථාක්කමං. ඉ ච උ ච ඉයු, ඉයු ච තෙ වණ්ණා චෙති ඉයුවණ්ණා, ‘‘ද්වන්දන්තෙ සූයමානං පච්චෙක+මභිසම්බන්ධිය තෙ’’ති වුත්තත්තා වණ්ණසද්දං පච්චෙක+මභිසම්බන්ධිය ‘‘ඉවණ්ණුවණ්ණා’’ති වුත්තං. नाम म्हणजे प्रातिपदिक, त्याच्या शेवटी असणारे 'इ-वर्ण' आणि 'उ-वर्ण' अनुक्रमे 'झ' आणि 'ल' संज्ञक होतात. 'इ' आणि 'उ' मिळून 'इयु' होते, आणि ते वर्ण म्हणजे 'इयुवर्ण'. 'द्वंद्वाच्या शेवटी ऐकू येणारा शब्द प्रत्येकाशी जोडला जातो' या नियमानुसार 'वर्ण' हा शब्द प्रत्येकाशी जोडून 'इ-वर्ण' आणि 'उ-वर्ण' असे म्हटले आहे. 81. ඣලා සස්ස නො ८१. 'झ' आणि 'ल' संज्ञक वर्णांनंतर येणाऱ्या 'स' प्रत्ययाला विकल्पेकरून 'नो' आदेश होतो. ඣලතො සස්ස නො වා හොති. අද්ධුනො අද්ධුස්ස අද්ධස්ස, අද්ධානං. 'झ' आणि 'ल' संज्ञक वर्णांनंतर येणाऱ्या 'स' प्रत्ययाला विकल्पेकरून 'नो' होतो. (उदा.) अद्धुनो, अद्धुस्स, अद्धस्स. (बहुवचनात) अद्धानं. 82. නා ස්මාස්ස ८२. 'झ' आणि 'ल' संज्ञक वर्णांनंतर येणाऱ्या 'स्मा' प्रत्ययाला विकल्पेकरून 'ना' आदेश होतो. ඣලතො [Pg.44] ස්මාස්ස නා හොති වා, අද්ධුනා අද්ධුම්හා අද්ධුස්මා අද්ධා අද්ධම්හා අද්ධස්මා. ‘‘කම්මාදිතො’’ති ස්මිනො නි, අද්ධනි අද්ධෙ අද්ධම්හි අද්ධස්මිං, අද්ධෙසු. අද්ධසද්දො චෙ+ත්ථකාල+ද්ධානවාචි, න භාගවාචී. 'झ' आणि 'ल' संज्ञक वर्णांनंतर येणाऱ्या 'स्मा' प्रत्ययाला विकल्पेकरून 'ना' होतो. (उदा.) अद्धुना, अद्धुम्हा, अद्धुस्मा, अद्धा, अद्धम्हा, अद्धस्मा. 'कम्मादितो' या सूत्राने 'स्मिं' प्रत्ययाला 'नि' आदेश होऊन 'अद्धनि', 'अद्धे', 'अद्धम्हि', 'अद्धस्मिं'; (बहुवचनात) 'अद्धेसु' (अशी रूपे होतात). येथे 'अद्ध' शब्द काळ आणि मार्ग (अध्वन्) वाचक आहे, भागवाचक नाही. අත්තා, අත්තානො ඉච්චාදි යාව දුතියා රාජාව, කම්මාදිත්තා එනෙ අත්තෙන අත්තනා. 'अत्ता' (आत्मा), 'अत्तानो' इत्यादी रूपे द्वितीया विभक्तीपर्यंत 'राज' शब्दाप्रमाणेच होतात. 'कम्म' इत्यादी शब्दांप्रमाणे 'एन' आदेश होऊन 'अत्तेन', 'अत्तना' (अशी रूपे होतात). 195. සු+හිසු නක १९५. 'सु' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'नक' आगम होतो. අත්ත+ආතුමානං සු+හිසු නකාගමො හොති. ‘‘ඤකානුබන්ධා+ද්යන්තා’’ති පරිභාසතො කකාරො අන්තාවයවත්ථො, අත්තනෙහි අත්ථෙහි අත්තනෙභි අත්තෙභි. 'अत्त' आणि 'आतुम' शब्दांना 'सु' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'नक' आगम होतो. 'ञकार आणि ककार अनुबंध असणारे अनुक्रमे आदी आणि अंत अवयव होतात' या परिभाषेनुसार ककार हा अंत्य अवयव आहे. (उदा.) अत्तनेहि, अत्तेहि, अत्तनेभि, अत्तेभि. 194. නො+ත්තාතුමා १९४. 'अत्त' आणि 'आतुम' शब्दांनंतर येणाऱ्या 'स' प्रत्ययाला विकल्पेकरून 'नो' आदेश होतो. අත්ත+ආතුමෙහි සස්ස නො වා හොති. අත්තනො අත්තස්ස, අත්තානං. 'अत्त' आणि 'आतुम' शब्दांनंतर येणाऱ्या 'स' प्रत्ययाला विकल्पेकरून 'नो' होतो. (उदा.) अत्तनो, अत्तस्स. (बहुवचनात) अत्तानं. 196. ස්මාස්ස නා බ්රහ්මා ච १९६. 'ब्रह्म', 'अत्त' आणि 'आतुम' शब्दांनंतर येणाऱ्या 'स्मा' प्रत्ययाला नित्य 'ना' आदेश होतो. බ්රහ්මා අත්ත+ආතුමෙහි ච පරස්ස ස්මාස්ස නා හොති නිච්චං. අත්තනා. ස්මිම්හි කම්මාදිත්තා නි, අත්තනි අත්තෙ අත්තම්හි අත්තස්මිං, අත්තනෙසු අත්තෙසු. ආතුමා අත්තාව. 'ब्रह्म', 'अत्त' आणि 'आतुम' शब्दांनंतर येणाऱ्या 'स्मा' प्रत्ययाला नित्य 'ना' होतो. (उदा.) अत्तना. 'स्मिं' प्रत्यय असताना 'कम्म' इत्यादी शब्दांप्रमाणे 'नि' आदेश होऊन 'अत्तनि', 'अत्ते', 'अत्तम्हि', 'अत्तस्मिं'; (बहुवचनात) 'अत्तनेसु', 'अत्तेसु' (अशी रूपे होतात). 'आतुमा' हा शब्द 'अत्ता' प्रमाणेच चालतो. බ්රහ්මා, බ්රහ්මානො බ්රහ්මා, ‘‘බ්රහ්මස්සු වා’’ති සුත්තෙ ‘‘බ්රහ්මස්සූ’’ති යොගවිභාගා ආනොම්හි බ්රහ්මස්ස උ, පරස්සරලොපෙ බ්රහ්මුනොතිපි සිජ්ඣති. අයඤ්ච බ්රහ්මසංයුත්තෙ දිස්සති. බ්රහ්මා ගෙ- 'ब्रह्मा' (प्रथमा एकवचन), 'ब्रह्मानो', 'ब्रह्मा' (प्रथमा बहुवचन). 'ब्रह्मस्सु वा' या सूत्रातील 'ब्रह्मस्सू' या योगविभागामुळे 'आनो' प्रत्यय असताना 'ब्रह्म' शब्दाला 'उ' होतो आणि पर स्वराचा लोप होऊन 'ब्रह्मुनो' असे रूप देखील सिद्ध होते. हे रूप ब्रह्मसंयुत्तात आढळते. 'ब्रह्मा'... 60. ඝ+බ්රහ්මාදිතෙ ६०. 'घ' संज्ञक आणि 'ब्रह्म' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'सि' प्रत्ययाला 'ए' होतो. ආකතිගණො+යං[Pg.45], ආකතීති ජාති, ජාතිපධානගණොත්ය+ත්ථො. ඝසඤ්ඤතො බ්රහ්ම+කත්තු+ඉසි+සඛාදීහි ච ගස්සෙ+වා හොති. භො බ්රහ්මෙ බ්රහ්මා, බ්රහ්මානො බ්රහ්මා. බ්රහ්මානං බ්රහ්මං, බ්රහ්මානො බ්රහ්මෙ. हा आकृतिगण आहे. 'आकृति' म्हणजे जात (प्रकार), म्हणजेच हा प्रकारप्रधान गण आहे असा अर्थ आहे. 'घ' संज्ञक शब्दांनंतर आणि 'ब्रह्म', 'कत्तु', 'इसि', 'सखा' इत्यादी शब्दांनंतर 'सि' प्रत्ययाला 'ए' होतो. (उदा.) भो ब्रह्मे, ब्रह्मा (संबोधन एकवचन); ब्रह्मानो, ब्रह्मा (संबोधन बहुवचन). ब्रह्मानं, ब्रह्मं (द्वितीया एकवचन); ब्रह्मानो, ब्रह्मे (द्वितीया बहुवचन). 191. නාම්හි १९१. 'ना' प्रत्यय असताना. බ්රහ්මස්සු හොති නාම්හි නිච්චං. බ්රහ්මුනා, බ්රහ්මෙහි බ්රහ්මෙභි. 'ना' प्रत्यय असताना 'ब्रह्म' शब्दाला नित्य 'उ' होतो. (उदा.) ब्रह्मुना, ब्रह्मेहि, ब्रह्मेभि. 190. බ්රහ්මස්සු වා १९०. 'स' आणि 'नं' प्रत्यय असताना 'ब्रह्म' शब्दाला विकल्पेकरून 'उ' होतो. බ්රහ්මස්සු වා හොති ස+නංසු. ‘‘ඣලා සස්ස නො’’ති නො. බ්රහ්මුනො බ්රහ්මුස්ස බ්රහ්මස්ස, බ්රහ්මූනං බ්රහ්මානං. ‘‘ස්මාස්ස නා බ්රහ්මා චෙ’’ති ස්මාස්ස නා, උකාරෙ බ්රහ්මුනා. ‘‘අම්බ්වාදීහි’’ති ස්මිනො නි, ඉමස්ස ආකතිගණත්තා බ්රහ්මස්ස කම්මාදිත්තෙපි එත්ථ වුත්තා. බ්රහ්මනි බ්රහ්මෙ බ්රහ්මම්හි බ්රහ්මස්මිං, බ්රහ්මෙසු. 'स' आणि 'नं' प्रत्यय असताना 'ब्रह्म' शब्दाला विकल्पेकरून 'उ' होतो. 'झला सस्स नो' या सूत्राने 'नो' होतो. (उदा.) ब्रह्मुनो, ब्रह्मुस्स, ब्रह्मस्स; ब्रह् मूनं, ब्रह्मानं. 'स्मास्स ना ब्रह्मा च' या सूत्राने 'स्मा' प्रत्ययाला 'ना' होतो आणि 'उ' कार असताना 'ब्रह्मुना' (असे रूप बनते). 'अम्ब्वदीहि' या सूत्राने 'स्मिं' प्रत्ययाला 'नि' होतो. हा आकृतिगण असल्यामुळे 'ब्रह्म' शब्दाचे 'कम्म' इत्यादी शब्दांप्रमाणे होणारे रूप देखील येथे सांगितले आहे. (उदा.) ब्रह्मनि, ब्रह्मे, ब्रह्मम्हि, ब्रह्मस्मिं; (बहुवचनात) ब्रह्मेसु. සඛා, රාජාදිත්තා ආ. 'सखा' (प्रथमा एकवचन), 'राजादितो आ' या सूत्राने 'आ' होतो. 2,157. ආයො නො ච සඛා २,१५७. 'सखा' शब्दाहून येणाऱ्या 'यो' प्रत्ययाला विकल्पेकरून 'आयो', 'नो' आणि 'आनो' हे आदेश होतात. සඛතො යොන+මායො නො හොන්ති වා ආනො ච. සඛායො සඛානො. 'सखा' शब्दाहून येणाऱ्या 'यो' प्रत्ययाला विकल्पेकरून 'आयो', 'नो' आणि 'आनो' हे आदेश होतात. (उदा.) सखायो, सखानो. 159. නො+නා+සෙස්වි १५९. 'नो', 'ना' आणि 'सु' प्रत्यय असताना. සඛස්ස ඉ හොති නිච්චං නො+නා+සෙසු. සඛිනො. 'सखि' शब्दाच्या 'इ' काराचा 'नो', 'ना' आणि 'सु' प्रत्यय असताना नित्य (बदल) होतो. जसे की, 'सखिनो'. 161. යො+ස්වං+හිසු චා+රඞ १६१. 'यो', 'सु', 'अं' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'आरङ्' आदेश होतो. සඛස්ස වා ආරඞ හොති යො+ස්වං+හිසු ස්මා+නංසුච. 'सखि' शब्दाला 'यो', 'सु', 'अं', 'हि', 'स्मा' आणि 'नं' प्रत्यय असताना विकल्पेकरून 'आरङ्' आदेश होतो. 171. ආරඞස්මා १७१. 'आरङ्' आदेशानंतर. ආරවාදෙසතො [Pg.46] පරෙසං යොනං ටො හොති. සඛාරො සඛා. ගෙ තු ‘‘ඝ+බ්රහ්මාදිතෙ’’ති එ, සඛෙ සඛ සඛා. බහුවචනං පඨමා විය. අංම්හි ‘‘වා+ම්හා+නඞ’’ති ආනඞ, සඛානං සඛාරං සඛං, සඛායො සඛානො සඛිනො. 'आर' आदेशानंतर येणाऱ्या 'यो' प्रत्ययाचा 'टो' होतो. 'सखारो', 'सखा'. 'गि' (संबोधन एकवचन) प्रत्यय असताना "घ-ब्रह्मादिते" या सूत्राने 'ए' होतो - 'सखे', 'सख', 'सखा'. बहुवचन हे प्रथमेप्रमाणेच होते. 'अं' प्रत्यय असताना "वा म्हा नङ्" या सूत्राने 'आनङ्' होतो - 'सखानं', 'सखारं', 'सखं', 'सखायो', 'सखानो', 'सखिनो'. 172. ටො ටෙ වා १७२. 'टो' आणि 'टे' विकल्पेकरून होतात. ආරවාදෙසම්හා යොනං ටො ටෙ වා හොන්ති යථාක්කමංති ටෙ. අඤ්ඤත්ථ ‘‘ආරඞස්මා’’ති ටො. සඛාරෙ සඛාරො සඛෙ. ටොග්ගහණං ලාඝවත්ථං. සඛිනා, සඛාරෙහි සඛෙහි. ‘‘ඣලා සස්ස නො’’ති ඣතො සස්ස නො, සඛිනො සඛිස්ස, සඛාරානං. 'आर' आदेशानंतर 'यो' प्रत्ययाचा अनुक्रमे 'टो' आणि 'टे' विकल्पेकरून होतो. इतर ठिकाणी "आरङ्स्मा" सूत्राने 'टो' होतो. 'सखारे', 'सखारो', 'सखे'. 'टो' चे ग्रहण संक्षेपासाठी (लाघवासाठी) आहे. 'सखिना', 'सखारेहि', 'सखेहि'. "झला सस्स नो" या सूत्राने 'झ' संज्ञक शब्दापुढील 'स' प्रत्ययाचा 'नो' होतो - 'सखिनो', 'सखिस्स', 'सखारानं'. 160. ස්මා+නංසු වා १६०. 'स्मा', 'नं' आणि 'सु' प्रत्यय असताना विकल्पेकरून (वा) होतो. සඛස්ස වා ඉ හොති ස්මා+නංසු. සඛීනං සඛානං. 'सखि' शब्दाच्या 'इ' काराचा 'स्मा', 'नं' आणि 'सु' प्रत्यय असताना विकल्पेकरून दीर्घ 'ई' होतो. 'सखीनं', 'सखानं'. 171. ටා නා+ස්මානං १७१. 'ना' आणि 'स्मा' प्रत्ययांचा 'टा' होतो. ආරවාදෙසම්හා නා+ස්මානං ටා හොති නිච්චං. සඛාරා, බහුලාධිකාරා සඛාරස්මා. ‘‘නා ස්මාස්සා’’ති නා, සඛිනා සඛිස්මා සඛා සඛම්හා සඛස්මා. 'आर' आदेशानंतर 'ना' आणि 'स्मा' प्रत्ययांचा नित्य 'टा' होतो. 'सखारा', बहुल अधिकारामुळे 'सखारस्मा' देखील होतो. "ना स्मास्सा" सूत्राने 'ना' होतो - 'सखिना', 'सखिस्मा', 'सखा', 'सखम्हा', 'सखस्मा'. 158. ටෙ ස්මිනො १५८. 'स्मिं' प्रत्ययाचा 'टे' होतो. සඛතො ස්මිනො ටෙ හොති නිච්චං. සඛෙ, සඛාරෙසු සඛෙසු. සඛි සඛීති ඉත්ථියංයෙව පයොගො දිස්සති, තස්මා ‘‘නදාදිතො ඞී’’ති වීම්හි ආලපනත්තා වා රස්සො. 'सखि' शब्दापुढील 'स्मिं' प्रत्ययाचा नित्य 'टे' होतो. 'सखे', 'sakhāresu' (सखारेसु), 'सखेसु'. 'सखि' आणि 'सखी' हा प्रयोग केवळ स्त्रीलिंगातच दिसतो, म्हणून "नदादितो ङी" सूत्राने 'वी' प्रत्यय असताना संबोधनात विकल्पेकरून र्हस्व होतो. යුවාදිත්තා [Pg.47] ආ, යුවා. 'युव' इत्यादी शब्दांच्या शेवटी 'आ' होतो, जसे की 'युवा'. 181. යොනං නො+නෙ වා १८१. 'यो' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'नो' आणि 'ने' होतो. යුවාදීහි යොනං නො+නෙ වා හොන්ති යථාක්කමං. ‘‘යොන+මානො’’ති ආනොම්හි සිද්ධෙපි ‘‘දුතියස්ස නෙ’’ති ගන්ථගාරවො හොතීති යථාක්කමංපති ලාඝවත්ථං නොග්ගහණං. 'युव' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'यो' प्रत्ययाचा अनुक्रमे 'नो' आणि 'ने' विकल्पेकरून होतो. "योनामानी" सूत्राने 'आन' सिद्ध होत असतानाही, "दुतियस्स ने" या सूत्राने ग्रंथाचा गौरव (विस्तार) टाळण्यासाठी आणि लाघवासाठी (संक्षेपासाठी) 'न' चे ग्रहण केले आहे. 179. නො+නා+නෙස්වා १७९. 'नो', 'ना' आणि 'ने' प्रत्यय असताना 'आ' होतो. නො+නා+නෙසු යුවාදීන+මා හොති. යුවානො යුවා. භො යුව යුවා, යුවානො යුවා. යුවානං යුවං, යුවානො යුවානෙ යුවෙ. යුවානා. 'नो', 'ना' आणि 'ने' प्रत्यय असताना 'युव' इत्यादी शब्दांच्या शेवटी 'आ' होतो. 'युवानो', 'युवा'. 'भो युव', 'युवा', 'युवानो', 'युवा'. 'युवानं', 'युवं', 'युवानो', 'युवाने', 'युवे'. 'युवाना'. 178. යුවාදීනං සු+හිස්වා+නඞ १७८. 'सु' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'युव' इत्यादी शब्दांना 'आनङ्' आदेश होतो. සු+හිසු යුවාදීන+මානඞ හොති. යුවානෙහි යුවානෙභි. 'सु' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'युव' इत्यादी शब्दांना 'आनङ्' आदेश होतो. 'युवानेहि', 'युवानेभि'. 193. යුවා සස්සි+නො १९३. 'युव' शब्दापुढील 'स' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'इनो' होतो. යුවා සස්ස වා ඉනො හොති. යුවිනො යුවස්ස, යුවානං. 'युव' शब्दापुढील 'स' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'इनो' होतो. 'युविनो', 'युवस्स', 'युवानं'. 180. ස්මා+ස්මිංනං නා+නෙ १८०. 'स्मा' आणि 'स्मिं' प्रत्ययांचा अनुक्रमे 'ना' आणि 'ने' होतो. යුවාදහි ස්මා+ස්මිංනං නා+නෙ නිච්චං හොන්ති යථාක්කමං. යුවානා, යුවානෙහි යුවානෙභි. යුවානෙ, යුවානෙසු. මඝව+පුම+වත්තහසද්දා යුවසද්දසමා. අයං විසෙසො – 'युव' इत्यादी शब्दांनंतर 'स्मा' आणि 'स्मिं' प्रत्ययांचा अनुक्रमे 'ना' आणि 'ने' नित्य होतो. 'युवाना', 'युवानेहि', 'युवानेभि'. 'युवाने', 'युवानेसु'. 'मघव', 'पुम' आणि 'वत्तह' हे शब्द 'युव' शब्दाप्रमाणेच चालतात. हा विशेष फरक आहे - 187. ගස්සං १८७. 'ग' प्रत्ययाचा 'अं' होतो. පුමසද්දතො ගස්ස අං වා හොති. පුමං පුම පුමා, පුමානො පුමා. පුමානං පුමං, පුමානො පුමානෙ පුමෙ. 'पुम' शब्दापुढील 'ग' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'अं' होतो. 'पुमं', 'पुम', 'पुमा', 'पुमानो', 'पुमा'. 'पुमानं', 'पुमं', 'पुमानो', 'पुमाने', 'पुमे'. 185. නාම්හි १८५. 'ना' प्रत्यय असताना. පුමස්සා [Pg.48] හොති නාම්හි. පුමානා. ‘‘ලක්ඛණිකපටිපදොත්තෙසු පටිපදොත්තස්සෙව ගහණං, න ලක්ඛණිකස්සා’’ති ඤායා පටිපදොත්තනාවිභත්ති එව ගය්හති, න නාස්මාස්ස, කතලක්ඛණිකත්තා. පටිපදන්ති ච ‘‘නාම්හී’’ති නාවිභත්තියා පටිපදභූතො අනුකරණසද්දො. න ලක්ඛණිකො නා. ‘‘පුම+කම්ම+ථාම+ද්ධානං වා ස+ස්මාසු චෙ’’ති වා උත්තෙ පුමුනා පුමෙන. පුමුනො පුමුස්ස පුමස්ස. පුමුනා පුමා. 'पुम' शब्दाला 'ना' प्रत्यय असताना 'आ' होतो. 'पुमाना'. "लक्षणिक आणि प्रतिपदोक्त यांमध्ये प्रतिपदोक्ताचेच ग्रहण करावे, लाक्षणिकाचे नाही" या न्यायाने प्रतिपदोक्त विभक्तीच घेतली जाते, 'ना-स्मा-स' ची नाही, कारण ती लाक्षणिक आहे. प्रतिपद म्हणजे "नाम्हि" या सूत्रातील 'ना' विभक्तीचा प्रतिपदभूत अनुकरण शब्द होय, लाक्षणिक 'ना' नव्हे. "पुम-कम्म-थाम-द्धानं वा स-स्मासु चे" या सूत्राने विकल्पेकरून 'उ' कार झाल्यास 'पुमुना', 'पुमेन'. 'पुमुनो', 'पुमुस्स', 'पुमस्स'. 'पुमुना', 'पुमा'. 184. පුමාති १८४. 'पुम' शब्दाच्या बाबतीत. ස්මිනො නෙ වා හොති. පුමානෙ පුමෙ පුමම්හි පුමස්මිං. 'स्मिं' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'ने' होतो. 'पुमाने', 'पुमे', 'पुमम्हि', 'पुमस्मिं'. 186. සුම්හා ච १८६. 'सु' प्रत्ययानंतर देखील. පුමස්ස සුම්හි පුමාදීනං යං නිච්චං වුත්තං, තං වා හොතීති ආනඞ වා හොති ආ ච. පුමානෙසු පුමාසු පුමෙසු. වත්තහා, වත්තහානො වත්තහා ඉච්චාදි යුවසද්දසමං. 'पुम' शब्दाला 'सु' प्रत्यय असताना 'पुम' इत्यादी शब्दांसाठी जे नित्य सांगितले आहे, ते विकल्पेकरून होते, म्हणजेच 'आनङ्' आणि 'आ' विकल्पेकरून होतात. 'पुमानेसु', 'पुमासु', 'पुमेसु'. 'वत्तहा', 'वत्तहानो', 'वत्तहा' इत्यादी रूपे 'युव' शब्दाप्रमाणेच होतात. 189. වත්තහා ස+නංනං නො+නානං १८९. 'वत्तह' शब्दापुढील 'स' आणि 'नं' प्रत्ययांचा अनुक्रमे 'नो' आणि 'नानं' नित्य होतो. වත්තහා සනංනං නොනානං නිච්චං හොන්ති යථාක්කමං. වත්තහානො වත්තහානානං. 'वत्तहानो', 'वत्तहानानं'. අකාරන්තං. अकारान्त (शब्द समाप्त). සා සි, 'सा' आणि 'सि' प्रत्यय. 64. එකවචන+යොස්ව+ඝොනං ६४. एकवचन आणि 'यो' प्रत्यय असताना 'अघ' संज्ञक शब्दांचा. ඝො ච ඔ ච ඝො, න ඝො අඝො. ‘‘අඝොනං’’ති ඝප්පටිසෙධෙ අකතෙ ස්ස+මාදීසු පරෙසු ඝස්ස විකප්පෙන රස්සො, එකවචනාදීසු [Pg.49] යොසු ච පරෙසු ඝස්ස නිච්චෙන රස්සොති විරුද්ධත්ථගහණනිවත්තනත්ථො ඝපටිසෙධො. ඔග්ගහණ+මුත්තරත්ථං. එකවචනෙ යොසු ච ඝ+ඔකාරන්තවජ්ජිතානං නාමානං රස්සො හොති තිලිඞ්ගෙති රස්සෙ සම්පත්තෙ – 'घ' आणि 'ओ' मिळून 'घो' होतो, जो 'घो' नाही तो 'अघो'. "अघोनं" यामध्ये 'घ' चा निषेध न केल्यास 'स्स' इत्यादी प्रत्यय पुढे असताना 'घ' चा विकल्पेकरून र्हस्व होतो, आणि एकवचन इत्यादी तसेच 'यो' प्रत्यय पुढे असताना 'घ' चा नित्य र्हस्व होतो, या परस्परविरोधी अर्थांचे निवारण करण्यासाठी 'घ' चा निषेध केला आहे. 'ओ' चे ग्रहण पुढील सूत्रासाठी आहे. एकवचन आणि 'यो' प्रत्यय पुढे असताना 'घ' आणि 'ओ' कारान्त वगळता इतर नामांचा तिन्ही लिंगांत र्हस्व होतो, असा र्हस्व प्राप्त झाला असता - 66. සිස්මිං නා+නපුංසකස්සති ६६. 'सि' प्रत्यय असताना नपुंसकलिंगी शब्दाचा नाही. අනපුංසකස්ස රස්සො න හොතීති සිම්හි තු න රස්සො. සා. ‘‘පජ්ජුන්නොව ලක්ඛණපවුත්ති ජලෙපි වස්සති, ථලෙපි වස්සතී’’ති ඤායා යුවාදිත්තා සිස්ස ආ. යොසු රස්සෙ ‘‘යොනං නො+නෙ වා’’ති යොස්ස නො. ‘‘නො නානෙස්වා’’ති ආ, සානො. නොත්තාභාවපක්ඛෙ ‘‘යොන+මානො’’ති වාධිකාරස්ස වවත්ථිතවිභාසත්තා නිච්ච+මානො, තස්මා නො+නෙඅභාවපක්ඛෙ සා, සෙති රූපපසඞ්ගො න හොති. සානො. තථා නෙත්තාභාවපක්ඛෙ. "नपुंसकलिंगी नसलेल्या शब्दाचा स्वर र्स्व होत नाही" या नियमाने 'सि' प्रत्यय पर असताना र्स्व होत नाही. 'सा' (कुत्रा) असे रूप होते. "पर्जन्याप्रमाणे लक्षणाची प्रवृत्ती पाण्यातही वर्षते आणि जमिनीवरही वर्षते" या न्यायाने 'युवा' इत्यादी शब्दांप्रमाणे 'सि' प्रत्ययाच्या जागी 'आ' होतो. 'यो' प्रत्यय पर असताना र्स्व झाल्यावर "योनां नो-ने वा" या सूत्राने 'यो' च्या जागी 'नो' होतो. "नो नानेस्वा" या सूत्राने 'आ' होऊन 'सानो' असे रूप बनते. 'नो' चा अभाव असलेल्या पक्षात "योनाम आनो" या सूत्रातील 'वा' च्या अधिकाराच्या व्यवस्थित विभाषेमुळे 'आनो' हा नित्य होतो, त्यामुळे 'नो' आणि 'ने' च्या अभावाच्या पक्षात 'सा' किंवा 'से' अशी रूपे होण्याचा प्रसंग येत नाही. 'सानो' असे रूप बनते. त्याचप्रमाणे 'ने' च्या अभावाच्या पक्षातही जाणावे. 188. සාස්සං+සෙ චා+නඞ १८८. 'सा' शब्दाला 'अं', 'से' आणि 'गे' प्रत्यय पर असताना नित्य 'आनङ' आदेश होतो. සාසද්දස්ස ආනඞ හොති අං+සෙ ගෙ ච නිච්චං. භො සාන සානා, සානො. සානං, සානෙ සානො. සානා, සානෙහි සානෙභි. සානස්ස, සානං. සානා, සානෙහි සානෙභි. සානෙ, සානෙසු. 'सा' शब्दाला 'अं', 'से' आणि 'गे' प्रत्यय पर असताना नित्य 'आनङ' आदेश होतो. जसे – भो सान, भो साना, सानो (संबोधन). सानं, साने, सानो (द्वितीया). साना, सानेहि, सानेभि (तृतीया). सानस्स, सानां (चतुर्थी). साना, सानेहि, सानेभि (पंचमी). साने, सानेसु (सप्तमी). සුවා යුවාව. ‘‘එකවචනයොස්ව+ඝොනං’’ති රස්සත්තං විසෙසො. ගෙ තු – 'सुवा' (कुत्रा) हा शब्द 'युवा' शब्दाप्रमाणे चालतो. "एकवचनयोस्वघोनां" या सूत्राने होणारे र्स्वत्व हाच यात विशेष फरक आहे. परंतु 'गे' (संबोधनात) असताना – 130. ගෙ වා १३०. 'गे' प्रत्यय पर असताना विकल्पाने (र्स्व होतो). අඝොනං ගෙ වා රස්සො හොති තිලිඞ්ගෙ. භො සුව සුවා. तिन्ही लिंगांत 'अघोन्' शब्दांचा 'गे' प्रत्यय पर असताना विकल्पाने र्स्व होतो. जसे – भो सुव, भो सुवा. ආකාරන්තං. आ-कारान्त (प्रकरण समाप्त). මුනි [Pg.50] සිලොපො. ඣෙ කතෙ – 'मुनि' शब्दाच्या 'सि' प्रत्ययाचा लोप होतो. 'झि' संज्ञा झाल्यावर – 93. යොසු ඣිස්ස පුමෙ ९३. पुल्लिंगात 'यो' प्रत्यय पर असताना 'झि' संज्ञा असलेल्या 'इ' कारच्या जागी विकल्पाने 'ट' आदेश होतो. ඣසඤ්ඤස්ස ඉස්ස යොසු වා ට හොති පුල්ලිඞ්ගෙ. මුනයො, ඣග්ගහණං කිං, ඉකාරන්තසමුදායස්ස මා සියා. ඉග්ගහණං කිං, ඊකාරස්ස වාති. අතොති සාමඤ්ඤනිද්දෙසා ලක්ඛණිකඅකාරතො යොනං ටාටෙ සම්පත්තාපි අවිධානසාමත්ථියා න හොන්ති. සාමත්ථියඤ්ච අඤ්ඤථා අනුපපත්ති. पुल्लिंगात 'यो' प्रत्यय पर असताना 'झि' संज्ञा असलेल्या 'इ' कारच्या जागी विकल्पाने 'ट' आदेश होतो. जसे – 'मुनयो'. 'झि' चे ग्रहण कशासाठी? जेणेकरून संपूर्ण इ-कारान्त समुदायाला हा नियम लागू होऊ नये. 'इ' चे ग्रहण कशासाठी? जेणेकरून 'ई' कारला हा नियम लागू होऊ नये. 'अतो' या सामान्य निर्देशामुळे लाक्षणिक 'अ' काराहून 'यो' प्रत्ययाच्या जागी 'टा' आणि 'टे' प्राप्त होत असले, तरी विधानाच्या सामर्थ्यामुळे ते होत नाहीत. आणि हे सामर्थ्य अन्य प्रकारे सिद्ध होऊ शकत नाही. 114. ලොපො ११४. लोप (प्रत्ययाचा लोप होतो). ඣලතො යොනං ලොපො හොතීති යොලොපෙ – 'झ' आणि 'ल' संज्ञक स्वरांच्या पुढे येणाऱ्या 'यो' प्रत्ययाचा लोप होतो. 'यो' चा लोप झाल्यावर – 88. යොලොප+නිසු දීඝො ८८. 'यो' प्रत्ययाचा लोप झाला असता आणि 'नि' प्रत्यय पर असताना (पूर्व स्वराचा) दीर्घ होतो. යොනං ලොපෙනිසු ච දීඝො හොති. මුනි. මුනයොති එත්ථ යොලොපො කිමත්ථං න හොති, අක්කෙන ඣත්තස්ස නාසිතත්තා. කින්ති පඨමං න හොති, අන්තරඞ්ගත්තා ඣත්තස්ස. භො මුනි මුනී, මුනයො මුනී. මුනිං, මුනයො මුනී. මුනිනා, මුනීහි මුනීභි. ‘‘යොලොපනිසු’’ ‘‘වීමන්තුවන්තූන’’ මිච්චාදිඤාපකා ඉකාරුකාරානං සුනංහිසු දීඝස්සා+නිච්චත්තා මුනිහි මුනිනං මුනිසු ඉතිපි හොති. ‘‘ඣලා සස්ස නො’’ති නො, මුනිනො මුනිස්ස, මුනීනං. ‘‘නාස්මාස්සා’’ති නා, මුනිනා මුනිම්හා මුනිස්මා. මුනිම්හි මුනිස්මිං, මුනීසු. ‘‘ඉතො ක්වචි සස්ස ටානුබන්ධො’’ (ගණසුත්ත)ති බ්රහ්මාදීසු පාඨා ‘‘යො ච සිස්සො මහාමුනෙ’’ති එත්ථ ‘‘ඝ+බ්රහ්මාදිතෙ’’ති සස්ස එට. 'यो' आणि 'सु' प्रत्यय असताना आणि 'यो' चा लोप झाला असता (इकार-उकारांचा) दीर्घ होतो. 'मुनि' (muni). 'मुनयो' येथे 'यो' चा लोप का होत नाही? कारण 'अक्क' सूत्राने 'झ' संज्ञेचा बाध (नाश) होतो म्हणून. 'किन्ति' (का बरे) आधी होत नाही? कारण 'झ' संज्ञा अंतरंग असल्यामुळे. 'भो मुनि', 'मुनी'; 'मुनयो', 'मुनी'. 'मुनिं', 'मुनयो', 'मुनी'. 'मुनिना', 'मुनीहि', 'मुनीभि'. “योलोपनिषु” आणि “वीमन्तुवन्तूनं” इत्यादी ज्ञापकांमुळे 'सु' आणि 'नं' प्रत्यय असताना इकार आणि उकार यांचा दीर्घ होणे अनित्य असल्यामुळे 'मुनिहि', 'मुनिनं', 'मुनिसु' अशी रूपे देखील होतात. “झला सस्स नो” या सूत्राने 'नो' होतो; 'मुनिनो', 'मुनिस्स', 'मुनीनं'. “नास्मास्सा” या सूत्राने 'ना' होतो; 'मुनिना', 'मुनिम्हा', 'मुनिस्मा'. 'मुनिम्हि', 'मुनिस्मिं', 'मुनीसु'. “इतो क्वचि सस्स ठानुबन्धो” (गणसूत्र) या सूत्राने 'ब्रह्मा' इत्यादी शब्दांच्या पाठात “यो च सिस्सो महामुने” येथे “घ+ब्रह्मादिते” या सूत्राने 'स' प्रत्ययाचा 'ए' (एत्व) होतो. එවං – याचप्रमाणे – ජොති [Pg.51] පාණි ගණ්ඨි මුට්ඨි, කුච්ඡි වත්ථි සාලි වීහි; බ්යාධි ඔධි බොධි සන්ධි, රාසි කෙසි සාති දීපි. जोति, पाणि, गण्ठि, मुट्ठि, कुच्छि, वत्थि, सालि, वीहि; ब्याधि, ओधि, बोधि, सन्धि, रासि, केसि, साति, दीपि. ඉසි ගිනි මණි ධනි, ගිරි රවි කවි කපි; අසි මසි නිධි විධි, අහි කිමි පති හරි. इसि, गिनि, मणि, धनि, गिरि, रवि, कवि, कपि; असि, मसि, निधि, विधि, अहि, किमि, pati, हरि. අරි තිමි කලි බලි, ජලධි ච ගහපති; උරමිති වරමති, නිරුපධි අධිපති; අඤ්ජලි සාරථි අතිථි, සමාධි උදධිප්පභුතයො. अरि, तिमि, कलि, बलि, जलधि आणि गहपति; उरमिति, वरमति, निरुपधि, अधिपती; अञ्जलि, सारथि, अतिथि, समाधि, उदधि इत्यादी. අග්ගි+ඉසීනං අයං විසෙසො – 'अग्गि' (aggi) आणि 'इसि' (isi) या शब्दांचा हा विशेष नियम आहे – 147. සිස්සා+ග්ගිතො නි १४७. सिस्सा+ग्गितो नि අග්ගිස්මා සිස්ස නි හොති වා. අග්ගිනි අග්ගි, අග්ගයො ඉච්චාදි මුනිසද්දසමං. 'अग्गि' शब्दाहून 'सि' प्रत्ययाचा 'नि' विकल्पेकरून होतो. 'अग्गिनि', 'अग्गि', 'अग्गयो' इत्यादी रूपे 'मुनि' शब्दाप्रमाणे होतात. 133. ටෙ සිස්සි+සිස්මා १३३. टे सिस्सि+सिस्मा ඉසිස්මා සිස්ස ටෙ වා හොති. ඉසෙ ඉසි. ‘‘ඝ+බ්රහ්මාදිතෙ’’ති ගස්ස එ වා, භො ඉසෙ ඉසි, ඉසයො ඉසී. ඉසිං. 'इसि' शब्दाहून 'सि' प्रत्ययाचा 'टे' विकल्पेकरून होतो. 'इसे', 'इसि'. “घ+ब्रह्मादिते” या सूत्राने 'घ' चा 'ए' विकल्पेकरून होतो; 'भो इसे', 'इसि', 'इसयो', 'इसी'. 'इसिं' (द्वितीया एकवचन). 134. දුතියස්ස යොස්ස १३४. दुतियस्स योस्स ‘‘දුතියා යොස්සා’’ති අවත්වා ‘‘දුතියස්ස යොස්සා’’ති විසුං කරණං ‘‘එකයොගනිද්දිට්ඨාන+මප්යෙ+කදෙසො+නුවත්තතෙ, න [Pg.52] ත්වෙ+කවිභත්තියුත්තානං’’ති ඤායා දුතියායොස්සාති නානුවත්තිය යොස්සාති සාමඤ්ඤෙන අනුවුත්තිය එකච්චාදිතො පඨමා යොස්සාපි ටෙවිධානත්ථං. ඉසිස්මා පරස්ස දුතියා යොස්ස ටෙ වා හොති. ඉසෙ ඉසයො ඉසී, සෙසං මුනිසමං. “दुतिया योस्सा” असे न म्हणता “दुतियस्स योस्सा” असे वेगळे करणे हे “एकयोगनिर्दिष्टानामप्येकदेशोऽनुवर्तते, न त्वेकविभक्तियुक्तानाम्” (एकाच सूत्रात निर्दिष्ट केलेल्यांपैकी एका भागाची अनुवृत्ती होते, परंतु समान विभक्ती असलेल्यांची होत नाही) या न्यायानुसार आहे. त्यामुळे 'दुतियायोस्सा' याची अनुवृत्ती न होता, केवळ 'योस्सा' अशी सामान्य अनुवृत्ती घेऊन काही शब्दांनंतर प्रथमेच्या 'यो' प्रत्ययाचाही 'टे' आदेश व्हावा यासाठी हे आहे. 'इसि' शब्दाहून पर असलेल्या द्वितीयेच्या 'यो' प्रत्ययाचा 'टे' विकल्पेकरून होतो. 'इसे', 'इसयो', 'इसी'; उर्वरित रूपे 'मुनि' शब्दाप्रमाणे होतात. ආදි, ආදයො ඉච්චාදි, ස්මිම්හි – 'आदि', 'आदयो' इत्यादी रूपे होतात. 'स्मिं' (सप्तमी एकवचन) प्रत्यय असताना – 55. රත්යාදීහි ටො ස්මිනො ५५. रत्यादीहि टो स्मिनो රත්යාදීහි ස්මිනො ටො වා හොති. ආදො ආදිම්හි ආදිස්මිං, ආදීසු. 'रति' इत्यादी शब्दांनंतर 'स्मिं' प्रत्ययाचा 'टो' (ओ) विकल्पेकरून होतो. 'आदो', 'आदिम्हि', 'आदिस्मिं'; (बहुवचन) 'आदीसु'. සමාසෙ ඉකාරන්තතො යො+ස්මිංසු විසෙසො. समासामध्ये इकारान्त शब्दांनंतर 'यो' आणि 'स्मिं' प्रत्यय असताना होणारा विशेष नियम. 182. ඉතො+ඤ්ඤත්ථෙ පුමෙ १८२. इतो+ञ्ञत्थे पुमे අඤ්ඤත්ථෙ වත්තමානතො ඉකාරන්තතො නාමස්මා යොනං නො+නෙ වා හොන්ති යථාක්කමං පුල්ලිඞ්ගෙ. අරියවුත්තිනො අරියවුත්තයො අරියවුත්තී. භො අරියවුත්ති අරියවුත්තී, අරියවුත්තිනො අරියවුත්තයො අරියවුත්තී. අරියවුත්තිං, අරියවුත්තිනො අරියවුත්තයො අරියවුත්තී. අරියවුත්තිනා ඉච්චාදි තු මුනිසද්දසමං. अन्य अर्थामध्ये (बहुव्रीहि समासात) वर्तमान असलेल्या इकारान्त नामाहून पर असलेल्या 'यो' प्रत्ययांचे पुल्लिंगात अनुक्रमे 'नो' आणि 'ने' विकल्पेकरून होतात. 'अरियवुत्तिनो', 'अरियवुत्तयो', 'अरियवुत्ती'. 'भो अरियवुत्ति', 'अरियवुत्ती'; 'अरियवुत्तिनो', 'अरियवुत्तयो', 'अरियवुत्ती'. 'अरियवुत्तिं', 'अरियवुत्तिनो', 'अरियवुत्तयो', 'अरियवुत्ती'. 'अरियवुत्तिना' इत्यादी रूपे तर 'मुनि' शब्दाप्रमाणेच होतात. 183. නෙ ස්මිනො ක්වචි १८३. ने स्मिनो क्वचि අඤ්ඤත්ථෙ ඉකාරන්තතො නාමස්මා ස්මිනො නෙ වා හොති ක්වචි. අරියවුත්තිනෙ අරියවුත්තිම්හි අරියවුත්තිස්මිං, අරියවුත්තීසු. එවං තොමරඞ්කුසපාණිනො සාරමතිනො ඉච්චාදි. ක්වචිග්ගහණා න සබ්බත්ථ නෙආදෙසො. अन्य अर्थातील इकारान्त नामाहून पर असलेल्या 'स्मिं' प्रत्ययाचा क्वचित (कधीकधी) 'ने' विकल्पेकरून होतो. 'अरियवुत्तिने', 'अरियवुत्तिम्हि', 'अरियवुत्तिस्मिं'; (बहुवचन) 'अरियवुत्तीसु'. याचप्रमाणे 'तोमरङ्कुसपाणिनो', 'सारमतिनो' इत्यादी रूपे होतात. 'क्वचि' (क्वचित) या ग्रहणामुळे सर्व ठिकाणी 'ने' आदेश होत नाही. ඉකාරන්තං. इकारान्त प्रकरण समाप्त. දණ්ඩී[Pg.53], සිලොපො. ‘‘එකවචනෙ’’ ච්චාදිනා රස්සෙ සම්පත්තෙ අනපුංසකත්තා ‘‘සිස්මිංනා+නපුංසකස්සා’’ති නිසෙධො. යොම්හි එකවචනෙ ච සබ්බත්ථ රස්සො. 'दण्डी' (daṇḍī) शब्द; 'सि' प्रत्ययाचा लोप होतो. “एकवचने” इत्यादी सूत्राने रस्व प्राप्त होत असताना, नपुंसकलिंगी नसल्यामुळे “सिस्मिंनानपुंसकस्स” या सूत्राने रस्वाचा निषेध होतो. 'यो' प्रत्यय असताना आणि एकवचनात सर्वत्र रस्व होतो. 75. යොනං නො+නෙ පුමෙ ७५. योनां नो+ने पुमे ඣසඤ්ඤිතො යොනං නො+නෙ වා හොන්ති යථාක්කමං පුල්ලිඞ්ගෙ. දණ්ඩිනො. 'झ' संज्ञा असलेल्या (ईकारान्त) शब्दाहून पर असलेल्या 'यो' प्रत्ययांचे पुल्लिंगात अनुक्रमे 'नो' आणि 'ने' विकल्पेकरून होतात. 'दण्डिनो'. 115. ජන්තුහෙත්වීඝපෙහි වා ११५. जन्तुहेत्वीघपेहि वा ජන්තු+හෙතූහි ඊකාරන්තෙහි ඝ+පසඤ්ඤෙහි ච පරෙසං යොනං වා ලොපො හොති. ‘‘යොලොපනිසු දීඝො’’ති දීඝෙ දණ්ඩී දණ්ඩියො. ගෙ තු ‘‘ගෙ වා’’ති වා රස්සො. භො දණ්ඩි දණ්ඩී, දණ්ඩිනො දණ්ඩී දණ්ඩියො. 'जन्तु', 'हेतु', ईकारान्त शब्द आणि 'घ' व 'प' संज्ञा असलेल्या शब्दांनंतर पर असलेल्या 'यो' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून लोप होतो. “योलोपनिषु दीर्घो” या सूत्राने दीर्घ होऊन 'दण्डी', 'दण्डियो' अशी रूपे होतात. 'ग' (संबोधन) प्रत्यय असताना “गे वा” या सूत्राने विकल्पेकरून रस्व होतो. 'भो दण्डि', 'दण्डी'; 'दण्डिनो', 'दण्डी', 'दण्डियो'. 74. නං ඣීතො ७४. नं झीतो ඣසඤ්ඤීතො අංවචනස්ස නං වා හොති. දණ්ඩිනං දණ්ඩිං, දණ්ඩිනෙ. 'झ' संज्ञा असलेल्या शब्दाहून पर असलेल्या 'अं' प्रत्ययाचा 'नं' विकल्पेकरून होतो. 'दण्डिनं', 'दण्डिं', 'दण्डिने'. 76. නො ७६. नो ඣීතො යොනං නො වා හොති පුල්ලිඞ්ගෙ. දණ්ඩිනො දණ්ඩී දණ්ඩියො. දණ්ඩිනා, දණ්ඩීහි දණ්ඩීභි. ‘‘ඣලා සස්ස නො’’ති නොම්හි කතෙ දණ්ඩිනො දණ්ඩිස්ස, දණ්ඩීනං. ‘‘නා ස්මාස්සා’’ති ස්මාස්ස නා, දණ්ඩිනා දණ්ඩිම්හා දණ්ඩිස්මා. 'झ' संज्ञा असलेल्या शब्दाहून पर असलेल्या 'यो' प्रत्ययाचा पुल्लिंगात विकल्पेकरून 'नो' होतो. 'दण्डिनो', 'दण्डी', 'दण्डियो'. 'दण्डिना' (तृतीया एकवचन), 'दण्डीहि', 'दण्डीभि' (बहुवचन). “झला सस्स नो” या सूत्राने 'नो' आदेश केल्यावर 'दण्डिनो', 'दण्डिस्स' (चतुर्थी/षष्ठी एकवचन) आणि 'दण्डीनं' (बहुवचन) अशी रूपे होतात. “ना स्मास्सा” या सूत्राने 'स्मा' चा 'ना' होतो; 'दण्डिना', 'दण्डिम्हा', 'दण्डिस्मा' (पंचमी एकवचन). 77. ස්මිනො නි ७७. स्मिनो नि ඣීතො ස්මිංවචනස්ස නි හොති වා. දණ්ඩිනි දණ්ඩිස්මිං, දණ්ඩීසු, බහුලාධිකාරා ස්මිම්හි ගාමණී+සෙනානී+සුධීපභුතීනං නිආදෙසාභාවො ච විසෙසො. එවං – 'झ' संज्ञा असलेल्या शब्दाहून पर असलेल्या 'स्मिं' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'नि' होतो. 'दण्डिनि', 'दण्डिस्मिं'; (बहुवचन) 'दण्डीसु'. 'बहुलाधिकारा'मुळे 'स्मिं' प्रत्यय असताना 'गामणी', 'सेनानी', 'सुधी' इत्यादी शब्दांना 'नि' आदेश न होणे हा विशेष नियम आहे. याचप्रमाणे – ධම්මී [Pg.54] සඞ්ඝී ඤාණී හත්ථී, චක්කී පක්ඛී දාඨී රට්ඨී; ඡත්තී මාලී චම්මී යොගී, භාගී භොගී කාමී සාමී. धम्मी, सङ्घी, ञाणी, हत्थी, चक्की, पक्खी, दाठी, रट्ठी; छत्ती, माली, चम्मी, योगी, भागी, भोगी, कामी, सामी. ධජී ගණී සසී කුට්ඨී, ජටී යානී සුඛී සිඛී; දන්තී මන්තී කරී චාගී, කුසලී මුසලී බලී; (වාචී, රූ) धजी, गणी, ससी, kuट्ठी, जटी, यानी, सुखी, सिखी; दन्ती, मन्ती, करी, चागी, कुसली, मुसली, बली; (वाची, रूप). පාපකාරී සත්තුඝාතී, මාල්යකාරී දීඝජීවී; ධම්මවාදී සීහනාදී, භූමිසායී සීඝයායී. पापकारी, सत्तुघाती, माल्यकारी, दीघजीवी; धम्मवादी, सीहनादी, भूमिसायी, सीघयायी. ඊකාරන්තං. ईकारान्त प्रकरण समाप्त. භික්ඛු, සිලොපො. ලසඤ්ඤායං – 'भिक्खु' (bhikkhu) शब्द; 'सि' प्रत्ययाचा लोप होतो. 'ल' संज्ञा असताना – 83. ලා යොනං වො පුමෙ ८३. ला योनां वो पुमे ලතො යොනං වො හොති වා පුල්ලිඞ්ගෙ. 'ल' संज्ञा असलेल्या शब्दाहून पर असलेल्या 'यो' प्रत्ययाचा पुल्लिंगात विकल्पेकरून 'वो' होतो. 94. වෙ+වොසු ලුස්ස ९४. वे+वोसु लुस्स ලසඤ්ඤස්ස උස්ස වෙ+වොසු ට හොති. එත්ථ ‘‘පුමාලපනෙ වෙවො’’ ත්ය+ත්ර වොස්ස සහචරිතඤායා අනිස්සිතත්තා ජාතිවසෙන ‘‘ලා යොනං’’ ත්යාදො වො ච ගය්හති. භික්ඛවො. අඤ්ඤත්ර ‘‘ලොපො’’ති යොලොපො. ‘‘යොලොපනිසු දීඝො’’ති දීඝෙ භික්ඛූ. භො භික්ඛු භික්ඛූ. 'ल' संज्ञा असलेल्या उकाराचा 'वे' आणि 'वो' प्रत्यय असताना 'अ' (अकार) होतो. येथे “पुमालपने वेवो” या सूत्रातील 'वो' च्या सहचर्य-न्यायाने अनिश्चित असल्यामुळे, जातिविशिष्टतेने “ला योनां” इत्यादी सूत्रातील 'वो' देखील ग्रहण केला जातो. 'भिक्खवो'. इतर ठिकाणी “लोपो” या सूत्राने 'यो' चा लोप होतो. “योलोपनिषु दीर्घो” या सूत्राने दीर्घ होऊन 'भिक्खू' रूप होते. 'भो भिक्खु', 'भिक्खू'. 96. පුමා+ලපනෙ වෙවො ९६. पुमा+लपने वेवो ලසඤ්ඤතො උතො යොස්සා+ලපනෙ වෙ+වො හොන්ති වා පුල්ලිඞ්ගෙ. භික්ඛවෙ භික්ඛවො භික්ඛූ. භික්ඛුං, භික්ඛවො භික්ඛූ. භික්ඛුනා[Pg.55], භික්ඛූහි භික්ඛූභි. ‘‘ඣලා සස්ස නො’’ති ලතො සස්ස නො වා, භික්ඛුනො භික්ඛුස්ස, භික්ඛූනං. ‘‘නා ස්මාස්සා’’ති ලතො වා ස්මාස්ස නා, භික්ඛුනා භික්ඛුම්හා භික්ඛුස්මා. භික්ඛුම්හි භික්ඛුස්මිං. එවං – 'ल' संज्ञा असलेल्या उकारान्त शब्दाहून पर असलेल्या 'यो' प्रत्ययाचा संबोधनात पुल्लिंगात विकल्पेकरून 'वे' आणि 'वो' होतात. 'भिक्खवे', 'भिक्खवो', 'भिक्खू'. 'भिक्खुं' (द्वितीया एकवचन), 'भिक्खवो', 'भिक्खू'. 'भिक्खुना' (तृतीया एकवचन), 'भिक्खूहि', 'भिक्खूभि' (बहुवचन). “झला सस्स नो” या सूत्राने 'ल' संज्ञक शब्दाहून पर असलेल्या 'स' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'नो' होतो; 'भिक्खुनो', 'भिक्खुस्स' (चतुर्थी/षष्ठी एकवचन) आणि 'भिक्खूनं' (बहुवचन). “ना स्मास्सा” या सूत्राने 'ल' संज्ञक शब्दाहून पर असलेल्या 'स्मा' चा विकल्पेकरून 'ना' होतो; 'भिक्खुना', 'भिक्खुम्हा', 'भिक्खुस्मा' (पंचमी एकवचन). 'भिक्खुम्हि', 'भिक्खुस्मिं' (सप्तमी एकवचन). याचप्रमाणे – සෙතු කෙතු රාහු භාණු, සංකු උච්ඡු වෙළු මච්චු. (පඞ්ගු, රූ) සින්ධු බන්ධු නෙරු මෙරු, සත්තු කාරු හෙතු ජන්තු. රුරු පටු – ඉච්චාදයො. सेतु, केतु, राहु, भाणु, सङ्कु, उच्छु, वेळु, मच्चु. (पङ्गु, रूप) सिन्धु, बन्धु, नेरु, मेरु, सत्तु, कारु, हेतु, जन्तु. रुरु, पटु – इत्यादी. ජන්තු+හෙතූනං යොස්ව+යං භෙදො. ‘‘ජන්තු+හෙත්වී+ඝ+පෙහි වා’’ති යොලොපෙ – 'जन्तु' आणि 'हेतु' शब्दांच्या 'यो' प्रत्ययामध्ये हा भेद आहे. “जन्तुहेत्वीघपेहि वा” या सूत्राने 'यो' चा लोप झाला असता – 84. ජන්ත්වාදිතො නො ච ८४. जन्त्वादितो नो च ජන්ත්වාදිතො යොනං නො හොති වො ච පුල්ලිඞ්ගෙ. ජන්තුනො ජන්තවො ජන්තුයො. භො ජන්තු ජන්තූ, ජන්තුනො, ‘‘පුමාලපනෙ වෙවො’’ති වෙ+වො, ජන්තවෙ ජන්තවො ජන්තුයො. ජන්තුං, ජන්තූ ජන්තුනො ජන්තවො ජන්තුයො. සෙසං භික්ඛුසමං. 'जन्तु' इत्यादी शब्दांनंतर पर असलेल्या 'यो' प्रत्ययाचा पुल्लिंगात 'नो' आणि 'वो' होतो. 'जन्तुनो', 'जन्तवो', 'जन्तुयो'. 'भो जन्तु', 'जन्तू'; 'जन्तुनो'; “पुमालपने वेवो” या सूत्राने 'वे' आणि 'वो' होऊन 'जन्तवे', 'जन्तवो', 'जन्तुयो'. 'जन्तुं', 'जन्तू', 'जन्तुनो', 'जन्तवो', 'जन्तुयो'. उर्वरित रूपे 'भिक्खु' शब्दाप्रमाणे होतात. හෙතු, හෙතූ හෙතවො. ‘‘යොම්හි වා ක්වචී’’ති ලසඤ්ඤස්ස උස්ස වා ටාදෙසො, හෙතයො. යොම්හි අන්තරඞ්ගත්තා පඨමං ටාදෙසෙ කතෙ පච්ඡා යොලොපාභාවො, තථා හි අන්තරඞ්ග+බාහිරඞ්ගවිධානෙස්ව+න්තරඞ්ගවිධියෙව බලවා. එත්ථ ච පකතිනිස්සිත+මන්තරඞ්ගං, පච්චයනිස්සිතං බාහිරඞ්ගං. හෙතුයො. භො හෙතු, හෙතූ හෙතවෙ හෙතවො හෙතයො හෙතුයො. සෙසං පුබ්බසමං. हेतु, हेतू, हेतवो. 'यो' विभक्तीमध्ये 'योम्हि वा क्वचि' या सूत्राने 'ल' संज्ञा असलेल्या 'उ' काराचा विकल्पाने 'त' (किंवा 'अ') आदेश होऊन 'हेतयो' रूप बनते. 'यो' विभक्तीमध्ये अंतरंगत्वामुळे प्रथम 'त' आदेश केल्यावर नंतर 'यो' चा लोप होत नाही, कारण अंतरंग आणि बहिरंग नियमांमध्ये अंतरंग नियमच बलवान असतो. आणि येथे प्रकृतीवर (मूळ शब्दावर) आश्रित असलेला नियम अंतरंग आहे, तर प्रत्ययावर आश्रित असलेला नियम बहिरंग आहे. 'हेतुयो'. 'भो हेतु, हेतू, हेतवे, हेतवो, हेतयो, हेतुयो'. उर्वरित रूपे पूर्वीप्रमाणेच (भिक्खु शब्दाप्रमाणे) समजावीत. බහුතො [Pg.56] නංම්හි – 'बहु' शब्दापुढे 'नं' विभक्ती आल्यास – 48. බහුකතින්නං ४८. "बहुकतिन्नं" (हे सूत्र आहे). නංම්හි බහුනො කතිස්ස ච නුක හොති තිලිඞ්ගෙ. බහුන්නං. සෙසං භික්ඛුසමං. 'नं' विभक्तीमध्ये तिन्ही लिंगांत 'बहु' आणि 'कति' शब्दांना 'नुक' (न्) आगम होतो. 'बहुन्नं'. उर्वरित रूपे 'भिक्खु' शब्दाप्रमाणे समजावीत. වත්තු සි, 'वत्तु' (वक्ता) शब्दापुढे 'सि' विभक्ती आल्यास, 57. ල්තු+පිතාදීන+මා සිම්හි ५७. "ल्तु-पितादीनमा सिम्हि" (हे सूत्र आहे). ල්තුපච්චයන්තානං පිතු+මාතු+භාතු+ධීතු+දුහිතු+ජාමාතු+නත්තු+හොතු+පොතූනඤ්චා හොති සිම්හි. වත්තා. ‘‘කත්තරි ල්තු+ණකා’’ති විහිතල්තුපච්චයස්ස ගහණා යතො ධාතුතො හි සො විහිතො, ‘‘පච්චයග්ගහණෙ යස්මා සො විහිතො, තදාදිනො තදන්තස්ස ච ගහණං’’ති ඤායා තදවිනාභාවතො තදන්තධාතුනොපි ගහණංති ල්තුපච්චයන්තානංති වුත්තං. 'ल्तु' (ltu) प्रत्ययान्त शब्दांना आणि पितु, मातु, भातु, धीतु, दुहितु, जामातु, नत्तु, होतु, पोतु यांना 'सि' विभक्तीमध्ये 'आ' होतो. 'वत्ता'. 'कत्तरि ल्तु-णका' या सूत्राने विहित केलेल्या 'ल्तु' प्रत्ययाचे ग्रहण केल्यामुळे, ज्या धातूपासून तो विहित केला आहे, 'प्रत्ययग्रहणे यस्मात् स विहितस्तदादेस्तदन्तस्य च ग्रहणम्' या न्यायाने त्याच्याशी अविनाभाव संबंध असल्यामुळे तदन्त धातूचेही ग्रहण होते, म्हणूनच 'ल्तुप्रत्ययान्तांना' असे म्हटले आहे. 162. ල්තු+පිතාදීන+ම සෙ १६२. "ल्तु-पितादीनम से" (हे सूत्र आहे). ල්තුපච්චයන්තානං පිතාදීනඤ්චා+රඞ හොති සතො+ඤ්ඤත්ර. ‘‘ආරඞස්මා’’ති ටො, වත්තාරො. 'ल्तु' प्रत्ययान्त शब्दांना आणि पितु इत्यादी शब्दांना 'स' विभक्तीशिवाय इतर विभक्तींमध्ये 'आर' (आरण) आदेश होतो. 'आरणस्मा' या सूत्राने 'यो' चा 'ओ' होऊन 'वत्तारो' रूप बनते. 58. ගෙ අ ච ५८. "गे अ च" (हे सूत्र आहे). ගෙල්තු+පිතාදීනං අ හොති ආ ච. භො වත්ත වත්තා, වත්තාරො. වත්තාරං, වත්තාරෙ වත්තාරො. නාවචනස්ස ‘‘ටා නාස්මානං’’ති ටා, වත්තාරා. 'गि' (संबोधन एकवचन) विभक्तीमध्ये 'ल्तु' प्रत्ययान्त आणि पितु इत्यादी शब्दांच्या शेवटी 'अ' आणि 'आ' होतो. 'भो वत्त, वत्ता', 'वत्तारो'. 'वत्तारं', 'वत्तारे, वत्तारो'. तृतीयेच्या 'ना' विभक्तीच्या ठिकाणी 'ता नास्मानं' या सूत्राने 'ता' (आ) होऊन 'वत्तारा' रूप बनते. 166. සු+හිස්වා+රඞ १६६. "सु-हिस्वा रण" (हे सूत्र आहे). සු+හිසු ල්තු+පිතාදීන+මාරඞ වා හොති. වත්තාරෙහි වත්තාරෙභි වත්තූහි වත්තූභි. 'सु' आणि 'हि' विभक्तींमध्ये 'ल्तु' प्रत्ययान्त आणि पितु इत्यादी शब्दांना 'आर' (आरण) आदेश पर्यायाने (विकल्पाने) होतो. 'वत्तारेहि, वत्तारेभि, वत्तूहि, वत्तूभि'. 165. සලොපො १६५. "सलोपो" (हे सूत्र आहे). ල්තු+පිතාදීහි [Pg.57] සස්ස ලොපො වා හොති. වත්තු වත්තුනො වත්තුස්ස. 'ल्तु' प्रत्ययान्त आणि पितु इत्यादी शब्दांपुढील 'स' विभक्तीचा विकल्पाने लोप होतो. 'वत्तु, वत्तुनो, वत्तुस्स'. 163. නංම්හි වා १६३. "नंम्हि वा" (हे सूत्र आहे). නංම්හි ල්තු+පිතාදීන+මාරඞ වා හොති. වත්තාරානං. 'नं' विभक्तीमध्ये 'ल्तु' प्रत्ययान्त आणि पितु इत्यादी शब्दांना विकल्पाने 'आर' (आरण) आदेश होतो. 'वत्तारानं'. 164. ආ १६४. "आ" (हे सूत्र आहे). නංම්හි ල්තු+පිතාදීන+මා වා හොති. වත්තානං වත්තූනං. ස්මාස්ස ටා, වත්තාරා. 'नं' विभक्तीमध्ये 'ल्तु' प्रत्ययान्त आणि पितु इत्यादी शब्दांना विकल्पाने 'आ' होतो. 'वत्तानं, वत्तूनं'. 'स्मा' विभक्तीच्या ठिकाणी 'ता' (आ) होऊन 'वत्तारा' रूप बनते. 174. ටි ස්මිනො १७४. "ति स्मिनो" (हे सूत्र आहे). ආරවා+දෙසම්හා ස්මිනො ටි හොති. 'आर' आदेशानंतर येणाऱ्या 'स्मिं' विभक्तीच्या ठिकाणी 'इ' (ति) आदेश होतो. 176. රස්සා+රඞ १७६. "रस्सा रण" (हे सूत्र आहे). ස්මිම්හි ආරො රස්සො හොති. වත්තරි, වත්තාරෙසු වත්තූසු වත්තුසු. එවං – 'स्मिं' विभक्तीमध्ये 'आर' चा 'अर' (ऱ्हस्व) होतो. 'वत्तरि', 'वत्तारेसु, वत्तूसु, वत्तुसु'. याचप्रमाणे – එවං භත්තු කත්තු නෙතු, සොතු ඤාතු ජෙතු ඡෙත්තු; භෙත්තු දාතු ධාතු බොද්ධු, විඤ්ඤාපෙතාදයොපි ච. याचप्रमाणे भत्तु (भर्ता), कत्तु (कर्ता), नेतु (नेता), सोतु (श्रोता), ञातु (ज्ञाता), जेतु (जेता), छेत्तु (छेत्ता), भेत्तु (भेत्ता), दातु (दाता), धातु (धाता), बोद्धु (बोद्धा), विञ्ञापेतु (विज्ञापयिता) इत्यादी शब्दांची रूपे होतात. සත්ථුසද්දස්ස පන නාම්හි බහුලාධිකාරා ‘‘ල්තු+පිතාදීන+මසෙ’’ති වා ආරවාදෙසෙ සත්ථාරා සත්ථුනා. සෙසං වත්තුසමං. परंतु 'सत्थु' (शास्ता/गुरु) शब्दाच्या बाबतीत, 'ना' विभक्तीमध्ये 'बहुलाधिकार' असल्यामुळे 'ल्तु-पितादीनमसे' या सूत्राने विकल्पाने 'आर' आदेश होऊन 'सत्थारा' आणि 'सत्थुना' अशी रूपे बनतात. उर्वरित रूपे 'वत्तु' शब्दाप्रमाणेच असतात. සිම්හි ආ, පිතා. ‘‘ල්තු+පිතාදීන+මසෙ’’ති ආරවාදෙසෙ – 'सि' विभक्तीमध्ये 'आ' होऊन 'पिता' रूप बनते. 'ल्तु-पितादीनमसे' या सूत्राने 'आर' आदेश झाल्यावर – 177. පිතාදීන+මනත්වාදීනං १७७. "पितादीनमनत्वादीनं" (हे सूत्र आहे). නත්වාදිවජ්ජිතානං [Pg.58] පිතාදීන+මාරො රස්සො හොති සබ්බාසු විභත්තීසු. ‘‘ල්තු+පිතාදීන+මසෙ’’ ‘‘සු+හිස්වා+රඞ’’ ‘‘නංම්හි වා’’ති එත්ථ වුත්තවිභත්තීසු පරෙසු ආරඞ හොතීති තා විභත්තියො පටිච්ච සබ්බාසූති වුත්තං. පිතරො. භො පිත පිතා, පිතරො. පිතරං, පිතරෙ පිතරො. පිතරා, පිතරෙහි පිතරෙභි පිතූහි පිතූභි. පිතු පිතුනො පිතුස්ස, පිතරානං පිතූනං. ‘‘පිතුන්නං’’ති නංම්හි දීඝෙ රස්ස+ද්විත්තානීති වුත්තං. ‘‘සානුවුත්තං සුත්තං’’ති ඤායා ‘‘බහුකතින්නං’’ති එත්ථ නුක-ඉති යොගවිභාගෙනපි සිජ්ඣති එත්ථ අනුවත්තිතනංම්හි. පඤ්චමීඡට්ඨී තතියාචතුත්ථීසමං. පිතරි, පිතරෙසු පීතූසු, රස්සාභාවො. නත්තා, නත්තාරො. භො නත්ත නත්තා, නත්තාරො ඉච්චාදි වත්තුසමං. 'नत्तु' इत्यादी शब्द वगळून 'पितु' इत्यादी शब्दांच्या 'आर' चा सर्व विभक्तींमध्ये ऱ्हस्व (अर) होतो. 'ल्तु-पितादीनमसे', 'सु-हिस्वा रण', 'नंम्हि वा' या सूत्रांमध्ये सांगितलेल्या विभक्ती पुढे असताना 'आर' आदेश होतो, म्हणून त्या विभक्तींच्या संदर्भात 'सर्व विभक्तींमध्ये' असे म्हटले आहे. 'पितरो'. 'भो पित, पिता', 'पितरो'. 'पितरं', 'पितरे, पितरो'. 'पितरा', 'पितरेहि, पितरेभि, पितूहि, पितूभि'. 'पितु, पितुनो, पितुस्स', 'पितरानं, पितूनं'. 'पितुन्नं' या रूपामध्ये 'नं' विभक्ती पुढे असताना दीर्घ स्वराचा ऱ्हस्व होऊन द्वित्व होते असे म्हटले आहे. 'सानुवृत्तं सूत्रं' या न्यायाने 'बहुकतिन्नं' या सूत्रातील 'नुक' या पदाच्या योगविभागाने देखील येथे अनुवृत्ती आलेल्या 'नं' विभक्तीमध्ये हे रूप सिद्ध होते. पंचमी आणि षष्ठी विभक्तीची रूपे अनुक्रमे तृतीया आणि चतुर्थी विभक्तीसारखीच असतात. 'पितरि', 'पितरेसु, पितूसु' (येथे ऱ्हस्वाचा अभाव होतो). 'नत्ता', 'नत्तारो'. 'भो नत्त, नत्ता', 'नत्तारो' इत्यादी रूपे 'वत्तु' शब्दाप्रमाणेच होतात. ගුණවන්තු සි, 'गुणवन्तु' शब्दापुढे 'सि' विभक्ती आल्यास, 151. න්තුස්ස १५१. "न्तुस्सा" (हे सूत्र आहे). සිම්හි න්තුස්ස ටා හොති. ගුණවා. යොම්හි ‘‘න්තන්තූනං න්තො යොම්හි පඨමෙ’’ති සවිභත්තිස්ස න්තුස්ස න්තො හොති. එත්ථ ච ‘‘න්තු වන්තු+මන්තා+වන්තු+තවන්තුසම්බන්ධී’’ති පරිභාසතො න්තු ච වන්ත්වාදිසම්බන්ධීයෙව ගය්හතෙ, න ජන්තු තන්තාදීනං. ගුණවන්තො. අඤ්ඤත්ර – 'सि' विभक्तीमध्ये 'न्तु' चा 'आ' (ता) होतो. 'गुणवा'. 'यो' विभक्तीमध्ये 'न्तन्तूनं न्तो योम्हि पठमे' या सूत्राने सविभक्तिक 'न्तु' चा 'न्तो' होतो. आणि येथे 'न्तु वन्तु-मन्ता-वन्तु-तवन्तुसम्बन्धी' या परिभाषेनुसार 'न्तु' हा वन्तु, मन्तु इत्यादी प्रत्ययांशी संबंधितच घेतला जातो, 'जन्तु', 'तन्तु' इत्यादी शब्दांमधील नाही. 'गुणवन्तो'. इतर ठिकाणी – 91. ය්වාදො න්තුස්ස ९१. "य्वादो न्तुस्स" (हे सूत्र आहे). යොආදීසු න්තුස්ස අ හොති. ගුණවන්තඉති අකාරන්තා ටා+ටෙආදෙසා හොන්ති, ගුණවන්තා. ‘‘ටටාඅං ගෙ’’ති ටාදයො[Pg.59], භො ගුණව ගුණවා ගුණවං, ගුණවන්තො ගුණවන්තා. ‘‘න්තස්ස ච ට වං+සෙ’’ති අංසෙසු න්තස්ස ටො වා, ගුණවං ගුණවන්තං, ගුණවන්තෙ. ‘‘තො+තා+ති+තා ස+ස්මා+ස්මිං+නාසූ’’ති තාආදයො හොන්ති, ගුණවතා ගුණවන්තෙන, ගුණවන්තෙහි ගුණවන්තෙභි. ‘‘ලක්ඛණිකපටිපදොත්තෙසු පටිපදොත්තස්සෙව ගහණං, න ලක්ඛණිකස්සා’’ති ඤායා ‘‘න ලක්ඛණිකස්සා’’ති වුත්තබ්යත්තිපක්ඛ+මනපෙක්ඛිත්වා ‘‘අතො’’ති රස්සාකාරජාතියා පෙක්ඛිතත්තා ගුණවන්තෙනාති ‘‘අතෙනා’’ ත්ය+නෙන සිජ්ඣති. ජාති=සාමඤ්ඤං, බ්යත්ති=විසෙසො. ගුණවතො ගුණවස්ස ගුණවන්තස්ස, ‘‘තං නංම්හි’’ති නංම්හී තං වා, ගුණවතං ගුණවන්තානං. ගුණවතා ගුණවන්තා ගුණවන්තම්හා ගුණවන්තස්මා. ගුණවති ගුණවන්තෙ ගුණවන්තම්හි ගුණවන්තස්මිං, ගුණවන්තෙසු. ‘‘න්තස්ස ච ට වා’’ති යොගවිභාගා යොසු ච න්තුස්ස වා ටාදෙසෙ කතෙ යොස්ස ටා, ‘‘චක්ඛුමා අන්ධිතා හොන්ති’’, ‘‘වග්ගුමුදාතීරියා භික්ඛු වණ්ණවා’’ ඉච්චාදී හොන්ති. 'यो' इत्यादी विभक्तींमध्ये 'न्तु' चा 'अ' होतो. 'गुणवन्त' अशा अकारान्त शब्दाला 'ता' आणि 'ते' आदेश होतात, 'गुणवन्ता'. 'तताअं गे' या सूत्राने 'ता' इत्यादी आदेश होऊन 'भो गुणव, गुणवा, गुणवं', 'गुणवन्तो, गुणवन्ता' अशी रूपे बनतात. 'न्तस्स च त वं-से' या सूत्राने 'अं' आणि 'सि' विभक्तींमध्ये 'न्तु' चा विकल्पाने 'त' होऊन 'गुणवं, गुणवन्तं', 'गुणवन्ते' रूपे बनतात. 'तो-ता-ति-ता स-स्मा-स्मिं-नासू' या सूत्राने 'ता' इत्यादी आदेश होऊन 'गुणवता, गुणवन्तेन', 'गुणवन्तेहि, गुणवन्तेभि' रूपे बनतात. 'लाक्षणिकप्रतिपदोक्तेषु प्रतिपदोक्तस्यैव ग्रहणं, न लाक्षणिकस्य' या न्यायानुसार 'न लाक्षणिकस्य' या सांगितलेल्या व्यक्तिपक्षाची उपेक्षा करून, 'अतो' या सूत्राने ऱ्हस्व अकार जातीची अपेक्षा असल्यामुळे 'गुणवन्तेन' हे रूप 'अतेन' या सूत्राने सिद्ध होते. येथे जाती म्हणजे सामान्य आणि व्यक्ती म्हणजे विशेष होय. 'गुणवतो, गुणवस्स, गुणवन्तस्स'. 'तं नंम्हि' या सूत्राने 'नं' विभक्तीमध्ये विकल्पाने 'तं' होऊन 'गुणवतं, गुणवन्तानं' रूपे बनतात. 'गुणवता, गुणवन्ता, गुणवन्तम्हा, गुणवन्तस्मा'. 'गुणवति, गुणवन्ते, गुणवन्तम्हि, गुणवन्तस्मिं', 'गुणवन्तेसु'. 'न्तस्स च त वा' या योगविभागाने 'यो' विभक्तीमध्ये देखील 'न्तु' चा विकल्पाने 'त' आदेश केल्यावर 'यो' चा 'आ' होऊन 'चक्खुमा अन्धिता होन्ति', 'वग्गुमुदातीरिया भिक्खु वण्णवा' इत्यादी रूपे सिद्ध होतात. එවං ගණවා කුලවා ඵලවා යසවා ධනවා සුතවා භගවා හිමවා බලවා සීලවා පඤ්ඤවා ඉච්චාදී. याचप्रमाणे गणवा (गणवान्), कुलवा (कुलवान्), फलवा (फलवान्), यसवा (यशस्वी), धनवा (धनवान्), सुतवा (श्रुतवान्), भगवा (भगवान्), हिमवा (हिमवान्), balavā (बलवान्), सीलवा (शीलवान्), पञ्ञवा (प्रज्ञावान्) इत्यादी शब्दांची रूपे होतात. 153. හිමවතො වා ඔ १५३. "हिमवतो वा ओ" (हे सूत्र आहे). හිමවතො සිම්හි න්තුස්ස ඔ වා හොති, හිමවන්තො හිමවා. සෙසං පුරිමසමං. 'हिमवन्तु' शब्दाच्या पुढे 'सि' विभक्ती आल्यास 'न्तु' चा विकल्पाने 'ओ' होतो, 'हिमवन्तो, हिमवा'. उर्वरित रूपे पूर्वीप्रमाणेच असतात. ආයස්මන්තුසද්දො කම්මවාචාය ක්වචි බහුලාධිකාරා ද්විවචනෙන ආයස්මන්තා, තිණ්ණං වචනෙන ආයස්මන්තොති දිස්සති. 'आयुस्मन्तु' (आयुष्मान्) शब्द कर्मवाच्य प्रयोगात काही ठिकाणी बहुलाधिकारामुळे द्विवचनात 'आयुस्मन्ता' आणि बहुवचनात (तीन किंवा अधिक वचनात) 'आयुस्मन्तो' असा दिसून येतो. එවං [Pg.60] සතිමා ධිතිමා ගතිමා මුතිමා මතිමා ජුතිමා සිරිමා හිරිමා ථුතිමා රතිමා යතිමා සුචිමා කලිමා බලිමා කසිමා රුචිමා බුද්ධිමා චක්ඛුමා බන්ධුමා හෙතුමා සෙතුමා කෙතුමා රාහුමා භාණුමා ඛාණුමා විජ්ජුමා ඉච්චාදයො. याचप्रमाणे सतिमा (स्मृतिमान्), धितिमा (धैर्यवान्), गतिमा (गतिमान्), मुतिमा (मतिमान्), मतिमा (बुद्धिमान्), जुतिमा (द्युतिमान्), सिरिमा (श्रीमान्), हिरिमा (ह्रीमान्/लज्जावान्), थुतिमा (स्तुतिमान्), रतिमा (रतिमान्), यतिमा (यत्नवान्), सुचिमा (शुचिमान्), कलिमा (कलिमान्), बलिमा (बलिमान्), कसिमा (कृषिमान्), रुचिमा (रुचिमान्), बुद्धिमा (बुद्धिमान्), चक्खुमा (चक्षुमान्), बन्धुमा (बन्धुमान्), हेतुमा (हेतुमान्), सेतुमा (सेतुमान्), केतुमा (केतुमान्), राहुमा (राहुमान्), भाणुमा (भानुमान्), खाणुमा (स्थाणुमान्), विज्जुमा (विद्युत्मान्) इत्यादी शब्दांची रूपे होतात. උකාරන්තං. उकारान्त शब्द समाप्त. වෙස්සභූ සිලොපො. තෙ ච රස්සාභාවොව විසෙසො. ‘‘එකවචනයොස්ව+ඝොනං’’ති රස්සෙ ‘‘ලා යොනං වො පුමෙ’’ති වො, වෙස්සභුවො, ‘‘වෙවොසු ලුස්සා’’ති වුත්තත්තා න ටාදෙසො, ‘‘ලොපොති යොලොපෙ වෙස්සභූ. ‘‘ගෙ වා’’ති වා රස්සෙ භො වෙස්සභු වෙස්සභූ, වෙස්සභුවො වෙස්සභූ. වෙස්සභුං, වෙස්සභුවො වෙස්සභූ. වෙස්සභුනා ඉච්චාදි භික්ඛුසමං. එවං සයම්භූ පරාභිභූ අභිභූආදයො. ගොත්රභූ+සහභූසද්දෙහි පන යොනං ‘‘ජන්ත්වාදිතො නො වා’’ති නො, වො වා, ගොත්රභුනො ගොත්රභුවො ගොත්රභූ. සහභුනො සහභුවො සහභූ, සෙසං වෙස්සභූසමං. 'वेस्सभू' शब्दापुढील 'सि' विभक्तीचा लोप होतो. आणि त्यामध्ये ऱ्हस्वाचा अभाव असणे हाच विशेष आहे. 'एकवचनयोस्वघोनं' या सूत्राने ऱ्हस्व झाल्यावर 'ला योनं वो पुमे' या सूत्राने 'वो' होऊन 'वेस्सभुवो' रूप बनते. 'वेवोसु लुस्सा' असे म्हटले असल्यामुळे येथे 'ता' आदेश होत नाही. 'लोपो' या सूत्राने 'यो' चा लोप झाल्यावर 'वेस्सभू' रूप बनते. 'गे वा' या सूत्राने विकल्पाने ऱ्हस्व झाल्यावर 'भो वेस्सभु, वेस्सभू', 'वेस्सभुवो, वेस्सभू' अशी रूपे बनतात. 'वेस्सभुं', 'वेस्सभुवो, वेस्सभू'. 'वेस्सभुना' इत्यादी रूपे 'भिक्खु' शब्दाप्रमाणेच होतात. याचप्रमाणे सयम्भू (स्वयंभू), पराभिभू, अभिभू इत्यादी शब्दांची रूपे होतात. परंतु 'गोत्रभू' आणि 'सहभू' शब्दांच्या पुढे येणाऱ्या 'यो' विभक्तीच्या ठिकाणी 'जन्त्वादितो नो वा' या सूत्राने विकल्पाने 'नो' किंवा 'वो' होऊन 'गोत्रभुनो, gotrabhuvo, गोत्रभू' आणि 'सहभुनो, sahabhuvo, सहभू' अशी रूपे बनतात. उर्वरित रूपे 'वेस्सभू' शब्दाप्रमाणेच असतात. 85. කූතො ८५. कूतो කූපච්චයන්තතො යොනං නො වා හොති පුල්ලිඞ්ගෙ. සබ්බඤ්ඤුනො. අඤ්ඤත්ර ‘‘ලා යොනං වො පුමෙ’’ති න වො, ‘‘කූතො’’ති ජන්ත්වාදීහි පුථක්කරණා. යොලොපෙ සබ්බඤ්ඤූ. භො සබ්බඤ්ඤු සබ්බඤ්ඤූ, සබ්බඤ්ඤුනො සබ්බඤ්ඤූ ඉච්චාදි. पुल्लिंगात 'कूपच्चय' (कूप्रत्यय) शेवटी असलेल्या शब्दांनंतर येणाऱ्या 'यो' विभक्ती प्रत्ययाचा 'नो' हा आदेश पर्यायाने होतो. जसे - 'सब्बञ्ञुनो' (सब्बञ्ञू - सर्वज्ञ). 'ला योनां वो पुमे' या सूत्राशिवाय 'वो' आदेश होत नाही, कारण 'कूतः' या सूत्राने 'जन्तु' इत्यादी शब्दांपासून याचे पृथक्करण केले आहे. 'यो' चा लोप झाल्यावर 'सब्बञ्ञू' असे रूप होते. संबोधनात 'भो सब्बञ्ञु', 'सब्बञ्ञू' आणि बहुवचनात 'सब्बञ्ञुनो', 'सब्बञ्ञू' इत्यादी रूपे होतात. එවං මග්ගඤ්ඤූ ධම්මඤ්ඤූ අත්ථඤ්ඤූ කාලඤ්ඤූ රත්තඤ්ඤූ මත්තඤ්ඤූ කතඤ්ඤූ කථඤ්ඤූ විඤ්ඤූ විදූ ඉච්චාදයො. එත්ථ ‘‘විදා කූ’’ ‘‘විතො ඤාතො’’ [Pg.61] ‘‘කම්මා’’ති තීසු සුත්තෙසු කූපච්චයස්ස ගහිතත්තා වෙදගූආදයො රූපච්චයන්තා න ගහිතා. याचप्रमाणे मग्गञ्ञू (मार्गज्ञ), धम्मञ्ञू (धम्मज्ञ), अत्थञ्ञू (अर्थज्ञ), कालञ्ञू (कालज्ञ), रत्तञ्ञू (रात्रज्ञ/अनुभवी), मत्तञ्ञू (प्रमाण जाणणारे), कतञ्ञू (कृतज्ञ), कथञ्ञू (कथाज्ञ), viञ्ञू (विज्ञ), विदू (विद्वान) इत्यादी रूपे होतात. येथे 'विदा कू', 'वितो ञातो', 'कम्मा' या तीन सूत्रांमध्ये 'कूपच्चय' (कूप्रत्यय) ग्रहण केल्यामुळे 'वेदगू' इत्यादी 'रुपच्चय' (रुप्रत्यय) शेवटी असणारे शब्द ग्रहण केले जात नाहीत. ඌකාරන්තං. ऊकारान्त (पुल्लिंग समाप्त). ගො, සි, සිලොපො. ගො. 'गो' शब्दाहून 'सि' प्रत्यय आल्यावर 'सि' चा लोप होतो. रूप बनते - 'गो'. 67. ගොස්සා+ග+සි+හි+නංසු ගාව+ගවා ६७. 'गो' शब्दाच्या जागी 'गावे' आणि 'गवा' हे आदेश 'सि', 'हि', 'नं' आणि 'सु' प्रत्यय वगळता इतर प्रत्यय असताना होतात. ග+සි+හි+නංවජ්ජිතාසු විභත්තීසු ගොසද්දස්ස ගාව+ගවා හොන්ති නිච්චං. 'ग', 'सि', 'हि' आणि 'नं' वर्जित (वगळता) इतर विभक्ती प्रत्यय असताना 'गो' शब्दाचे 'गावे' आणि 'गवा' हे आदेश नित्य (नेहमी) होतात. 170. උභ+ගොහි ටො १७०. 'उभ' आणि 'गो' शब्दांनंतर येणाऱ्या 'यो' प्रत्ययाचा 'टो' आदेश होतो. උභ+ගොහි යොනං ටො හොති. ගාවො ගවො. භො ගො, ගාවො ගවො. 'उभ' आणि 'गो' शब्दांनंतर येणाऱ्या 'यो' प्रत्ययाचा 'टो' आदेश होतो. रूपे होतात - 'गावो', 'गवो'. संबोधनात - 'भो गो', 'गावो', 'गवो'. 72. ගාවු+ම්හි ७२. 'अं' प्रत्यय असताना 'गो' शब्दाचा 'गावु' आदेश होतो. අංවචනෙ ගොස්ස ගාවු වා හොති. ගාවුං ගාවං ගවං, ගාවො ගවො. 'अं' विभक्ती प्रत्यय असताना 'गो' शब्दाचा 'गावु' हा आदेश पर्यायाने होतो. रूपे होतात - 'गावुं', 'गावं', 'गवं'; बहुवचनात - 'गावो', 'गवो'. 71. නාස්සා ७१. 'गो' शब्दाहून येणाऱ्या 'ना' प्रत्ययाचा 'आ' आदेश होतो. ගොතො නාස්ස ආ හොති වා. එකවණ්ණත්තා න සබ්බාදෙසො. ‘‘පඤ්චමියං පරස්සෙ’’ති වත්තන්තෙ ‘‘ආදිස්සා’’ති නාස්ස ආ හොති, පරලොපො, ගාවා ගාවෙන ගවා ගවෙන, ගොහි ගොභි. 'गो' शब्दाहून येणाऱ्या 'ना' प्रत्ययाचा 'आ' आदेश पर्यायाने होतो. एकाक्षरी (एकवर्ण) असल्यामुळे संपूर्ण आदेश होत नाही. 'पञ्चमियं परस्स' हे सूत्र लागू असताना 'आदिस्सा' या सूत्राने 'ना' प्रत्ययाचा 'आ' होतो आणि पर-लोप होतो. रूपे होतात - 'गावा', 'गावेन', 'गवा', 'गवेन'; बहुवचनात - 'गोहि', 'गोभि'. 69. ගවං සෙන ६९. 'स' प्रत्ययासोबत 'गो' शब्दाचा 'गवं' आदेश होतो. ගොස්ස සෙ වා ගවං හොති සහ සෙන. ගවං ගාවස්ස ගවස්ස. කච්චායනෙ ‘‘ගවං චෙ තරමානානං’’ති පාළිං පටිච්ච නංම්හි බහුවචනමෙව සාධිතං, ඉධ ‘‘ගවංව සිඞ්ගිනො සඞ්ගං’’ති දස්සනතො එකවචනඤ්ච. 'गो' शब्दाचा 'स' प्रत्ययासोबत पर्यायाने 'गवं' आदेश होतो. रूपे होतात - 'गवं', 'गावस्स', 'गवस्स'. कच्चायन व्याकरणात 'गवं चे तरमानानं' या पाळी (पाठा) च्या आधारे 'नं' प्रत्ययात केवळ बहुवचनच सिद्ध केले आहे, परंतु येथे 'गवं व सिंगिनो संगं' या प्रयोगावरून एकवचन देखील सिद्ध होते. 70. ගුන්නඤ්ච නංනා ७०. 'नं' प्रत्ययासोबत 'गो' शब्दाचा 'गुन्नं' आणि 'गवं' हा आदेश होतो. නංවචනෙන [Pg.62] සහ ගොස්ස ගුන්නං හොති ගවඤ්ච වා. ගුන්නං ගවං ගොනං. ගාවා ගාවම්හා ගාවස්මා ගවා ගවම්හා ගවස්මා. ගාවෙ ගාවම්හි ගාවස්මිං ගවෙ ගවම්හි ගවස්මිං. 'नं' विभक्ती प्रत्ययासोबत 'गो' शब्दाचा 'गुन्नं' आणि पर्यायाने 'गवं' हा आदेश होतो. रूपे होतात - 'गुन्नं', 'गवं', 'गोनं'. पंचमी एकवचनात - 'गावा', 'गावम्हा', 'गावस्मा', 'गवा', 'गवम्हा', 'गवस्मा'. सप्तमी एकवचनात - 'गावे', 'गावम्हि', 'गावस्मिं', 'गवे', 'गवम्हि', 'गवस्मिं'. 68. සුම්හි වා ६८. 'सु' प्रत्यय असताना 'गो' शब्दाचे 'गावे' आणि 'गवा' हे आदेश पर्यायाने होतात. සුම්හි ගොස්ස ගාව+ගවා හොන්ති වා. ගාවෙසු ගවෙසු ගොසු. ගොස්ස ගොණාදෙසො න කතො, සද්දන්තරත්තා. ගොණසද්දො හි සත්තසු විභත්තීසු දිස්සතීති. 'सु' प्रत्यय असताना 'गो' शब्दाचे 'गावे' आणि 'गवा' हे आदेश पर्यायाने होतात. रूपे होतात - 'गावेsu', 'गवेसु', 'गोसु'. 'गो' शब्दाचा 'गोण' हा आदेश येथे केला नाही, कारण तो एक भिन्न शब्द आहे. 'गोण' शब्द हा साती विभक्तींमध्ये आढळतो. උසු+භූමි+පසු+රංසි-දිසා+වාචා+ම්බු+චක්ඛුසු; දසස්ව+ත්ථෙසු ගො වුත්තො, ලග්ගෙ ච වජිරෙ ඉති. 'गो' हा शब्द बाण (उषु), भूमी, पशू, किरण (रंसि), दिशा, वाणी (वाचा), पाणी (अम्बु), डोळा (चक्खु), स्वर्ग (लग्ग) आणि वज्र (वजिर) या दहा अर्थांमध्ये वापरला जातो. ඔකාරන්තං. ओ-कारान्त समाप्त. ඉති පුල්ලිඞ්ගං. अशा प्रकारे पुल्लिंग समाप्त झाले. කඤ්ඤා, සිලොපො. 'कञ्ञा' (कन्या), 'सि' प्रत्ययाचा लोप होतो. 1,11. ඝා १,११. घा (संज्ञा). ඉත්ථියං වත්තමානස්ස නාමස්ස+න්තෙ වත්තමානො ආකාරො ඝසඤ්ඤො හොති. ‘‘ජන්තු+හෙත්වී+ඝ+පෙහි වා’’ති යොලොපො වා. කඤ්ඤා කඤ්ඤායො. ‘‘ඝ+බ්රහ්මාදිතෙ’’ති ගස්ස එ වා, කඤ්ඤෙ කඤ්ඤා, යොම්හි කඤ්ඤා කඤ්ඤායො. ‘‘ඝො ස්සං+ස්සා යං+තිංසූ’’ති අංම්හි රස්සො. කඤ්ඤං, කඤ්ඤා කඤ්ඤායො. स्त्रीलिंगात असलेल्या नामाच्या शेवटी येणाऱ्या 'आ' काराला 'घ' संज्ञा (घसञ्ञा) होते. "जन्तु-हेत्वी-घ-पेहि वा" या सूत्राने 'यो' प्रत्ययाचा वैकल्पिक लोप होतो. (उदा.) कञ्ञा, कञ्ञायो. "घ-ब्रह्मादिते" या सूत्राने 'ग' (संबोधन एकवचन) च्या जागी वैकल्पिक 'ए' होतो, (उदा.) कञ्ञे, कञ्ञा; 'यो' प्रत्यय असताना कञ्ञा, कञ्ञायो. "घो स्सं-स्सा यं-तिंसू" या सूत्राने 'अं' प्रत्यय असताना र्हस्व होतो. (उदा.) कञ्ञं, कञ्ञा, कञ्ञायो. 45. ඝ+පතෙ+කස්මිං නාදීනං ය+යා ४५. घ-पते-कस्मिं नादीनं य-या (हे सूत्र आहे). ඝපතො [Pg.63] ස්මිංවිභත්තිපරියන්තානං එකත්තෙ නාදීනං ය+යා හොන්ති යථාක්කමං. කඤ්ඤාය, කඤ්ඤාභි කඤ්ඤාහි. කඤ්ඤාය, කඤ්ඤානං. 'घ' आणि 'प' संज्ञक शब्दांनंतर, 'स्मिं' विभक्तीपर्यंतच्या एकवचनात 'ना' इत्यादींच्या जागी अनुक्रमे 'य' आणि 'या' होतात. (उदा.) कञ्ञाय (तृतीया/पंचमी/सप्तमी एकवचन), कञ्ञाभि, कञ्ञाहि (तृतीया/पंचमी बहुवचन). कञ्ञाय (चतुर्थी/षष्ठी एकवचन), कञ्ञानं (चतुर्थी/षष्ठी बहुवचन). 103. යං १०३. यं (सूत्र). ඝපතො ස්මිනො යං වා හොති. කඤ්ඤායං කඤ්ඤාය. ‘‘ඝ+ පතෙ+කස්මිං නාදීනං ය+යා’’ ‘‘යං’’ති ච ඉමෙසං අපවාදාදීනං විසයෙ ම්හිස්ස උස්සග්ගත්තා පවත්ති නත්ථීති ස්මිනො බහුලාධිකාරා ‘‘ස්මා+හි+ස්මින්න’’ මිච්චාදිනා ම්හිකතෙ ‘‘දසසහස්සිම්හි ධාතුම්හී’’ති සිජ්ඣති. කඤ්ඤාසු. එවං – 'घ' आणि 'प' संज्ञक शब्दांनंतर 'स्मिं' विभक्तीच्या जागी वैकल्पिकरित्या 'यं' होतो. (उदा.) कञ्ञायं, कञ्ञाय. "घ-पते-कस्मिं नादीनं य-या" आणि "यं" या अपवाद सूत्रांच्या विषयात 'म्हि' प्रत्ययाची सामान्य प्रवृत्ती होत नसल्यामुळे, 'स्मिं' च्या बहुल अधिकारामुळे "स्मा-हि-स्मिन्न..." इत्यादी सूत्राने 'म्हि' प्रत्यय केल्यावर "दससहस्सिम्हि धातुम्हि" असे रूप सिद्ध होते. कञ्ञासु (सप्तमी बहुवचन). याप्रमाणे - සද්ධා මෙධා පඤ්ඤා විජ්ජා, චින්තා මන්තා තණ්හා වීණා; ඉච්ඡා මුච්ඡා එජා මායා, මෙත්තා මත්තා සික්ඛා භික්ඛා. सद्धा (श्रद्धा), मेधा, पञ्ञा (प्रज्ञा), विज्जा (विद्या), चिन्ता, मन्ता (मंत्र/प्रज्ञा), तण्हा (तृष्णा), वीणा; इच्छा, मुच्छा (मूर्च्छा), एजा (तृष्णा/कंपन), माया, मेत्ता (मैत्री), मत्ता (मात्रा/प्रमाण), सिक्खा (शिक्षा/प्रशिक्षण), भिक्खा (भिक्षा). ජඞ්ඝා ගීවා ජීව්හා වාචා, ඡායා ආසා ගඞ්ගා නාවා; ගාථා සෙනා ලෙඛා සාලා, මාලා වෙලා පූජා ඛිඩ්ඩා. जङ्घा (जंघा/पाय), गीवा (ग्रीवा/मान), जीव्हा (जीभ), वाचा (वाणी), छाया, आसा (आशा), गङ्गा (गंगा), नावा (नाव); गाथा, सेना, लेखा (रेघ/लेखन), साला (शाळा/दालन), माला (माळ), वेला (वेळ/वेळा), पूजा, खिड्ढा (क्रीडा/खेळ). පිපාසා වෙදනා සඤ්ඤා, චෙතනා තසිනා පජා; දෙවතා වට්ටකා ගොධා, බලාකා පරිසා සභා. पिपासा (तहान), वेदना, सञ्ञा (संज्ञा), चेतना, तसिना (तृष्णा), पजा (प्रजा); देवता, वट्टका (लावा पक्षी), गोधा (घोरपड), बलाका (बगळा), परिसा (परिषद), सभा. ඌකා සෙඵාලිකා ලඞ්කා, සලාකා වාලුකා සිඛා; විසාඛා විසිඛා සාඛා, වාචා වඤ්ඣා ජටා ඝටා. ऊका (ऊ), सेफालिका (पारिजातक), लङ्का, सलाका (सळई), वालुका (वाळू), सिखा (शिखा/शेंडा); विसाखा (विशाखा), विसिखा (गल्ली/रस्ता), साखा (शाखा/फांदी), वाचा (वाणी), वञ्झा (वांझ), जटा, घटा (गर्दी/घट). ජෙට්ඨා සොණ්ඩා විතණ්ඩා ච, කරුණා වනිතා ලතා; කථා නිද්දා සුධා රාධා, වාසනා සිංසපා පපා. जेट्ठा (ज्येष्ठा), सोण्डा (सोंड/दारुडी स्त्री), वितण्डा (वितंडवाद), करुणा, वनिता, लता; कथा, निद्दा (झोप), सुधा (अमृत/चुना), राधा, वासना, सिंसपा (शिसवीचे झाड), पपा (पानपोई). පභා [Pg.64] සීමා ඛමා ඡායා, ඛත්තියා සක්ඛරා සුරා; දොලා තුලා සිලා ලිලා, ලාලෙ+ලා මෙඛලා කලා. पभा (प्रभा/प्रकाश), सीमा, khama (क्षमा/पृथ्वी), छाया, खत्तिया (क्षत्रिय स्त्री), सक्खरा (साखर/खडी), सुरा (दारू); दोला (झोपाळा), तुला (तराजू), सिला (शिला/दगड), लीला, लाला (लाळ), एला (वेलची), मेखला (कमरपट्टा), कला. වළවා+ලම්බුසා මූසා, මඤ්ජුසා සුලසා දිසා; නාසා ජුණ්හා ගුහා ඊහා, ලසිකා වසුධාදයො. वळवा (घोडी), लम्बुसा (एक प्रकारचे गवत/अप्सरा), मूसा (मुशी/ओतण्याचे पात्र), मञ्जुसा (पेटी), सुलसा (तुळस/सुलसा), दिसा (दिशा); नासा (नाक), जुण्हा (चांदणे), guha (गुहा), ईहा (चेष्टा/इच्छा), लसिका, वसुधा (पृथ्वी) इत्यादी. ‘‘න+ම්මාදීහී’’ති අම්මා+අන්නා+අම්බාහි ගස්ස එකාරා+භාවෙ – "न-म्मादीहि" या सूत्राने अम्मा, अन्ना, अम्बा या शब्दांनंतर 'ग' (संबोधन) च्या जागी 'ए' कार होत नसल्यामुळे - 62. රස්සො වා ६२. वैकल्पिक र्हस्व होतो. අම්මාදීනං ගෙ රස්සො වා හොති. අම්ම අම්මා ඉච්චාදි. සෙසං කඤ්ඤාව. එවං අන්නා අම්බා. සභාපරිසාහි ස්මිනො ‘‘තිං සභාපරිසායා’’ති තිං වා හොති. ‘‘ඝොස්ස’’ මාදිනා රස්සෙ සභතිං සභායං සභාය. පරිසතිං පරිසායං පරිසාය. अम्मा इत्यादी शब्दांनंतर 'ग' (संबोधन) मध्ये वैकल्पिक र्हस्व होतो. (उदा.) अम्म, अम्मा इत्यादी. उर्वरित रूपे 'कञ्ञा' प्रमाणेच होतात. याचप्रमाणे अन्ना, अम्बा. 'सभा' आणि 'परिसा' शब्दांनंतर 'स्मिं' विभक्तीच्या जागी "तिं सभापरिसाया" या सूत्राने वैकल्पिकरित्या 'तिं' होतो. "घोस्स..." इत्यादी सूत्राने र्हस्व झाल्यावर सभतिं, सभायं, सभाय; आणि परिसतिं, परिसायं, परिसाय अशी रूपे होतात. ආකාරන්තං. आ-कारान्त समाप्त. මති, යොම්හි – 'मति' (बुद्धी), 'यो' प्रत्यय असताना - 1,10. පි+ත්ථියං १,१०. पित्थियं (सूत्र). ඉත්ථියං වත්තමානස්ස නාමස්ස+න්තෙ වත්තමානා ඉවණ්ණු+වණ්ණා පසඤ්ඤා හොන්ති. स्त्रीलिंगात असलेल्या नामाच्या शेवटी येणाऱ्या 'इ-वर्ण' (इ, ई) आणि 'उ-वर्ण' (उ, ऊ) यांना 'प' संज्ञा (पसञ्ञा) होते. 116. යෙ පස්සි+වණ්ණස්ස ११६. ये पस्सिवण्णस्स (सूत्र). පසඤ්ඤස්ස ඉවණ්ණස්ස ලොපො හොති වා යකාරෙ. ‘‘පරො ක්වචී’’ති අනුවත්තිතක්වචිග්ගහණා යෙ පරෙ ච-කාර+පුබ්බරූපා- නි [Pg.65] න හොන්ති. මත්යො. අඤ්ඤත්ර ‘‘ජන්ත්වා’’දිනා යොලොපො, දීඝො, මතී මතියො. භො මති මතී, මත්යො මතී මතියො. මතිං, මත්යො මතී මතියො. මතියා, මතීහි මතීභි. මත්යා මතියා, මතීනං. ස්මිනො යං, මත්යං මතියං මත්යා මතියා, මතීසු. එවං – 'प' संज्ञक 'इ-वर्णा'चा 'य' कार पुढे असताना वैकल्पिक लोप होतो. "परो क्वचि" या सूत्रातील 'क्वचि' च्या अनुवृत्तीमुळे 'य' पुढे असताना 'च' कार इत्यादी पूर्व रूप होत नाहीत. (उदा.) मत्यो. इतर ठिकाणी "जन्त्वा..." इत्यादी सूत्राने 'यो' चा लोप आणि दीर्घ होऊन मती, मतियो अशी रूपे होतात. संबोधन: भो मति, मती; मत्यो, मती, मतियो. द्वितीया: मतिं; मत्यो, मती, मतियो. तृतीया/पंचमी: मतिया; मतीहि, मतीभि. चतुर्थी/षष्ठी: मत्या, मतिया; मतीनं. सप्तमी: 'स्मिं' च्या जागी 'यं' होऊन मत्यं, मतियं, मत्या, मतिया; मतीसु अशी रूपे होतात. याप्रमाणे - පත්ති යුත්ති වුත්ති කිත්ති, මුත්ති තිත්ති ඛන්ති කන්ති; සන්ති තන්ති සිද්ධි සුද්ධි, ඉද්ධි වුද්ධි බුද්ධි බොධි. पत्ति (पायदळ/प्राप्ती), युत्ति (युक्ती/योग्यत्व), वुत्ति (वृत्ती/स्पष्टीकरण), कित्ति (कीर्ती), मुत्ति (मुक्ती), तित्ति (तृप्ती), खन्ति (क्षांती/सहनशीलता), कन्ति (कांती/शोभा); सन्ति (शांती), तन्ति (तंतू/तंत्री), सिद्धि, सुद्धि (शुद्धी), इद्धि (ऋद्धी/आत्मिक शक्ती), वुद्धि (वृद्धी), बुद्धि, बोधि. භූමි ජාති පීති සුති, නන්දි සන්ධි සොණි කොටි; දිට්ඨි වුට්ඨි තුට්ඨි යට්ඨි, පාළි ආළි නාළි කෙළි. भूमि (भूमी), जाति (जात/जन्म), पीति (प्रीती/आनंद), सुति (श्रुती/ऐकणे), नन्दि (नंदी/आनंद), सन्धि (संधी), सोणि (कमर/नितंब), कोटि (कोटी/शिखर); दिट्ठि (दृष्टी), वुट्ठि (वृष्टी/पाऊस), तुट्ठि (तुष्टी/संतोष), यट्ठि (यष्टी/काठी), पाळि (पाळी/ओळ), आळि (आळ/ओळ), नाळि (नळी/माप), केळि (क्रीडा/खेळ). සති මුති ගති චුති, ධිති යුවති විකති; රති රුචි රස්මි අසනි, වසනි ඔසධි අඞ්ගුලි; ධූලි දුද්රභි දොණි, අටවි ඡවි ඉච්චාදි. सति (स्मृती), मुति (मती/समज), गति, चुति (च्युती/मृत्यू), धिति (धृती/धैर्य), युवति (युवती), विकति (विकृती/प्रकार); रति, रुचि, रस्मि (किरण), असनि (वीज/वज्र), वसनि (वस्त्र), ओसधि (औषधी), अङ्गुलि (बोट); धूलि (धूळ), दुद्रभि (दुंदुभी/नगारा), दोणि (द्रोणी/नाव), अटवि (अटवी/जंगल), छवि (त्वचा/कांती) इत्यादी. 55. රත්යාදීහි ටො ස්මිනො ५५. रत्यादीहि टो स्मिनो (सूत्र). රත්යාදීහි ස්මිනො ටො වා හොති. රත්තො රත්යං රත්තියං රත්යා රත්තියා, රත්තීසු. සෙසං මතිසමං. 'रत्ति' इत्यादी शब्दांनंतर 'स्मिं' विभक्तीच्या जागी वैकल्पिकरित्या 'तो' होतो. (उदा.) रत्तो, रत्यं, रत्तियं, रत्या, रत्तिया; रत्तीसु (सप्तमी बहुवचन). उर्वरित रूपे 'मति' शब्दाप्रमाणेच होतात. ඉකාරන්තං. इ-कारान्त समाप्त. දාසී, සිලොපො. ‘‘එකවචනෙ’’ච්චාදිනා රස්සො. ‘‘යෙ පස්සි+වණ්ණස්සා’’ති ඊලොපො, දාස්යො. ‘‘ජන්ත්වා’’ දිනා යොලොපො. දාසී දාසියො. ‘‘ගෙ වා’’ති රස්සො. භො දාසි දාසී, දාස්යො දාසී දාසියො. 'दासी', 'सि' प्रत्ययाचा लोप होतो. "एकवचने..." इत्यादी सूत्राने र्हस्व होतो. "ये पस्सिवण्णस्स" या सूत्राने 'ई' चा लोप होऊन दास्यो असे रूप होते. "जन्त्वा..." इत्यादी सूत्राने 'यो' चा लोप होतो. (उदा.) दासी, दासियो. "गे वा" या सूत्राने र्हस्व होतो. संबोधन: भो दासि, दासी; दास्यो, दासी, दासियो. 73. යං පිතො ७३. यं पितो (सूत्र). පසඤ්ඤීතො අංවචනස්ස යං වා හොති. දාස්යං දාසියං දාසිං, දාස්යො දාසී දාසියො. ‘‘ඝපතෙකා’’දිනා යා. දාස්යා දාසියා[Pg.66], දාසීහි දාසීභි. දාස්යා දාසියා, දාසීනං. දාස්යං දාසියං දාස්යා දාසියා, දාසීසු. එවං – 'प' संज्ञक 'ई' कारानंतर 'अं' विभक्तीच्या जागी वैकल्पिकरित्या 'यं' होतो. (उदा.) दास्यं, दासियं, दासिं; दास्यो, दासी, दासियो. "घपतेका..." इत्यादी सूत्राने 'या' होतो. (उदा.) दास्या, दासिया; दासीहि, दासीभि. दास्या, दासिया; दासीनं. दास्यं, दासियं, दास्या, दासिया; दासीसु. याप्रमाणे - මහී වෙතරණී වාපී, පාටලී කදලී ඝටී; නාරී කුමාරී තරුණී, වාරුණී බ්රාහ්මණී සඛී. मही (पृथ्वी/नदी), वेतरणी, वापी (विहीर/तलाव), पाटली (पाडळ वृक्ष), कदली (केळी), घटी (घडा/घटिका); नारी, कुमारी, तरुणी, वारुणी (दारू), ब्राह्मणी, सखी (मैत्रीण). ගන්ධබ්බී කින්නරී නාගී, දෙවී යක්ඛී අජී මිගී; වානරී සූකරී සීහී, හංසී කාකී ච කුක්කුටී. गन्धब्बी (गंधर्व स्त्री), किन्नरी, नागी (नाग स्त्री), देवी, यक्खी (यक्षिणी), अजी (शेळी), मिगी (हरिणी); वानरी, सूकरी (डुकरीण), सीही (सिंहीण), हंसी (हंसिणी), काकी (कावळीण) आणि कुक्कुटी (कोंबडी). ඉච්චාදයො. इत्यादी. එත්ථ ච ඊකාරලොපෙ ඤ්ඤකාරපුබ්බරූපො, වෙතරඤ්ඤො වෙතරණියො. වෙතරඤ්ඤං වෙතරණියං වෙතරණිං, වෙතරඤ්ඤො වෙතරණියො ඉච්චාදි. යොසු – आणि येथे 'ई' काराचा लोप झाल्यावर 'ञ्ञ' काराचे पूर्वरूप होऊन वेतरञ्ञो, वेतरणियो; वेतरञ्ञं, वेतरणियं, वेतरणिं; वेतरञ्ञो, वेतरणियो इत्यादी रूपे होतात. 'यो' प्रत्यय असताना - 167. නජ්ජා ධයාස්වාම १६७. नज्जा धयास्वाम (सूत्र). යොසු නදීසද්දස්ස ආම වා හොති. සුඤ+නක+ආම ඉත්යාදි ඤ්ඤකාර+කකාර+මකාරා ආගමලිඞ්ගා. ස ච ‘‘මානුබන්ධො සරාන+මන්තා පරො’’ති මානුබන්ධත්තා සරාන+මන්තා පරො හොතීති ඊකාරා පරො. ‘‘යවා සරෙ’’ති යෙ දස්ස ජො, යස්ස ච පුබ්බරූපං, නජ්ජායො. වා ප-ලොප+යොලොපෙසු නජ්ජො නදී නදියො ඉච්චාදි. 'यो' प्रत्यय असताना 'नदी' शब्दाला 'आम' (āma) हा आदेश विकल्पेकरून होतो. 'सुञ', 'नका', 'आम' इत्यादींमध्ये ञकार, ककार आणि मकार हे आगम दर्शवणारे आहेत. आणि तो (आम) "मानुबन्धो सरानामन्ता परो" या सूत्रानुसार 'म' अनुबन्ध असल्यामुळे स्वरांच्या शेवटी येतो, म्हणजेच 'ई' कारानंतर येतो. "यवा सरे" या सूत्राने 'य' च्या जागी 'ज' होतो, आणि त्याचे पूर्वरूप होऊन 'नज्जायो' (najjāyo) बनते. विकल्पेकरून 'प' चा लोप आणि 'यो' चा लोप झाल्यावर 'नज्जो' (najjo), 'नदी' (nadī), 'नदियो' (nadiyo) इत्यादी रूपे होतात. ඊකාරන්තං. ई-कारान्त (स्त्रीलिंगी समाप्त). යාගු, යාගූ යාගුයො. භො යාගු, යාගූ යාගුයො. යාගුං, යාගූ යාගුයො. යාගුයා, යාගූහි යාගූභි. යාගුයා, යාගූනං. යාගුයං යාගුයා, යාගූසු. එවං ධාතු+ධෙනු+කාසු+දද්දු+කණ්ඩු+කච්ඡු+රජ්ජු+කරෙණු+සස්සු+පියඞ්ගු [Pg.67] ආදයො. यागु, यागू, यागुयो (प्रथमा). भो यागु, यागू, यागुयो (संबोधन). यागुं, यागू, यागुयो (द्वितीया). यागुया, यागूहू, यागूब्हि (तृतीया/पंचमी). यागुया, यागूनं (चतुर्थी/षष्ठी). यागुयं, यागुया, यागूसु (सप्तमी). याचप्रमाणे धातु, धेनु, कासु, दद्दु, कण्डु, कच्छु, रज्जु, करेणु, सस्सु, पियङ्गु इत्यादी शब्द चालतात. එත්ථ ධාතුසද්දො ‘‘මනොධාතුනා’’ති අභිධම්මාවතාරෙ වුත්තත්තා පුල්ලිඞ්ගෙපි දිස්සති, තං සක්කටමතෙන වුත්තන්ති කෙචි. येथे 'धातु' शब्द 'अभिधम्मावतार' ग्रंथात "मनोधातुना" असे म्हटल्यामुळे पुल्लिंगातही आढळतो; काही विद्वानांच्या मते ते संस्कृतच्या मतानुसार (संस्कृत व्याकरणाच्या प्रभावामुळे) म्हटले गेले आहे. මාතා, මාතරො. භො මාත මාතා, මාතරො. මාතරං, මාතරෙ මාතරො. මාතරා, නාස්ස යාදෙසෙ ‘‘යෙ පස්සා’’ති යොගවිභාගා පලොපො, අනුඤ්ඤාතො අහං මත්යා, අඤ්ඤත්ර මාතුයා, මාතරෙහි මාතරෙභි මාතූහි මාතූභි. සලොපෙ මාතු, පසඤ්ඤත්තා ‘නො’ න හොති, මත්යා මාතුයා, මාතරානං මාතානං මාතූනං. ඡට්ඨිවිසයෙ ‘‘මාතුස්ස සරතී’’තිපි දිස්සති. මාතරි, මාතරෙසු මාතූසු. විසෙසා+ඤ්ඤත්ර පිතුසමං. එවං ධීතු+දුහිතුසද්දා. माता, मातरो (प्रथमा). भो मात, माता, मातरो (संबोधन). मातरं, मातरे, मातरो (द्वितीया). मातरा, 'ना' प्रत्ययाचा 'या' आदेश झाल्यावर "ये पस्सा" या सूत्राच्या योगविभागाने 'प' चा लोप होतो, (उदा.) 'अनुञ्ञातो अहं मत्या' (मला आईने परवानगी दिली आहे), इतर ठिकाणी 'मातुया'. मातरेहि, मातरेभि, मातूहू, मातूभि (तृतीया/पंचमी). 'स' चा लोप झाल्यावर 'मातु' होते, 'प' संज्ञा असल्यामुळे 'नो' होत नाही, 'मत्या', 'मातुया'. मातराणं, माताणं, मातूर्णं (षष्ठी/चतुर्थी). षष्ठीच्या विषयात "मातुस्स सरति" (आईची आठवण काढतो) असेही दिसते. मातरी, मातरेसु, मातूसु (सप्तमी). विशेष नियम वगळता इतर रूपे 'पितु' शब्दाप्रमाणे होतात. याचप्रमाणे 'धीतु' आणि 'दुहितु' शब्द चालतात. උකාරන්තං. उ-कारान्त (स्त्रीलिंगी समाप्त). රස්සනිසෙධෙ සිලොපෙ ච කතෙ ජම්බූ. ‘‘ජන්ත්වා’’දිනා යොලොපෙ, ජම්බූ ජම්බුයො. ‘‘ගෙ වා’’ති රස්සෙ භො ජම්බු, ජම්බූ ජම්බුයො. ජම්බුං, ජම්බූ ජම්බුයො. ජම්බුයා, ජම්බූහි ජම්බූභි. ජම්බුයා, ජම්බූනං. ජම්බුයං ජම්බුයා, ජම්බූසු. र्हस्व होण्यास प्रतिबंध केल्यावर आणि 'सि' चा लोप केल्यावर 'जम्बू' रूप होते. "जन्त्वा" इत्यादी सूत्राने 'यो' चा लोप झाल्यावर 'जम्बू', 'जम्बुयो' रूपे होतात. "गे वा" या सूत्राने र्हस्व झाल्यावर 'भो जम्बु', 'जम्बू', 'जम्बुयो' (संबोधन). जम्बुं, जम्बू, जम्बुयो (द्वितीया). जम्बुया, जम्बूहू, जम्बूब्हि (तृतीया/पंचमी). जम्बुया, जम्बूनं (चतुर्थी/षष्ठी). जम्बुयं, जम्बुया, जम्बूसु (सप्तमी). එවං වධූ ච සරභූ, සරබූ සුතනූ චමූ; වාමූරූ නාගනාසුරූ, සමානා ඛලු ජම්බුයා. याचप्रमाणे वधू, सरभू, सरबू, सतनू, चमू, वामूरू, नागनासुरू हे शब्द खरोखर 'जम्बू' शब्दाप्रमाणेच चालतात. ඌකාරන්තං. ऊ-कारान्त (स्त्रीलिंगी समाप्त). ගො, ගාවො ගවො ඉච්චාදි පුල්ලිඞ්ගසමං. 'गो' (गाय), 'गावो', 'गवो' इत्यादी रूपे पुल्लिंगाप्रमाणेच होतात. ඉත්ථිලිඞ්ගං. स्त्रीलिंग समाप्त. නපුංසක[Pg.68], සි – नपुंसकलिंग, 'सि' प्रत्यय – 111. අං නපුංසකෙ १११. "अं नपुंसके" (नपुंसकलिंगात 'अं' होतो). අකාරන්තතො නාමස්මා සිස්ස අං හොති නපුංසකෙ. නපුංසකං. अ-कारान्त नामाहून नपुंसकलिंगात 'सि' प्रत्ययाचा 'अं' होतो. (उदा.) 'नपुंसकं'. 112. යොනං නි ११२. "योनां नि" ('यो' प्रत्ययांच्या जागी 'नि' होतो). අකාරන්තතො යොනං නි හොති නපුංසකෙ. නීනං නිච්චවිධානෙපි ‘‘නිනං වා’’ති පක්ඛෙ ටාටෙ හොන්ති, දීඝෙ නපුංසකා නපුංසකානි. භො නපුංසක නපුංසකා, නපුංසකා නපුංසකානි. නපුංසකං, නපුංසකෙ නපුංසකානි. නපුංසකෙන, ඉච්චාදි සුගතසද්දසමං. එවං – अ-कारान्त नामाहून नपुंसकलिंगात 'यो' प्रत्ययांच्या जागी 'नि' होतो. 'नि' चा नित्य विधी असतानाही "निनां वा" या सूत्राने पर्यायी पक्षात 'टा' आणि 'ते' (किंवा दीर्घत्व) होतात, आणि दीर्घ केल्यावर 'नपुंसका', 'नपुंसकानि' अशी रूपे होतात. भो नपुंसक, नपुंसका, नपुंसका, नपुंसकानि (संबोधन). नपुंसकं, नपुंसके, नपुंसकानि (द्वितीया). नपुंसकेन, इत्यादी रूपे 'सुगत' शब्दाप्रमाणेच होतात. याचप्रमाणे – පුඤ්ඤ+පාප+ඵල+රූප+සාධනං,සොත+ඝාන+සුඛ+දුක්ඛ+කාරණං; දාන+සීල+ධන+ඣාන+ලොචනං,මූල+කූල+බල+ජාල+මඞ්ගලං. पुञ्ञ (पुण्य), पाप, फल (फळ), रूप, साधनं (साधन), सोत (कान), घान (नाक), सुख, दुक्ख (दुःख), कारणं (कारण), दान, सील (शील), धन, झान (ध्यान), लोचनं (डोळा), मूल (मूळ), कूल (काठ), बल (बळ), जाल (जाळे), मङ्गलं (मंगल). නළින+ලිඞ්ග+මුඛ+ඞ්ග+ජල+ම්බුජං,පුලින+ධඤ්ඤ+හිරඤ්ඤ+ඵලා+මතං; පදුම+පණ්ණ+සුසාන+වනා+යුධං,හදය+චීවර+වත්ථ+කුලි+න්ද්රියං. नळिन (कमळ), लिङ्ग (लिंग), मुख, अङ्ग (अंग), जल (पाणी), अम्बुजं (कमळ), पुलिन (वाळूचा किनारा), धञ्ञ (धान्य), हिरञ्ञ (सोने), फल (फळ), अमतं (अमृत), पदुम (कमळ), पण्ण (पान), सुसान (स्मशान), वन (जंगल), आयुधं (शस्त्र), हदय (हृदय), चीवर (चीवर), वत्थ (वस्त्र), कुल (कुळ), इन्द्रियं (इंद्रिय). නයන+වදන+යානො+දන+සොපාන+පානං,භවන+භුවන+ලොහා+ලාත+තුණ්ඩ+ණ්ඩ+පීඨං,කරණ+මරණ+ඤාණා+රම්මණා+රඤ්ඤ+තාණං,තගර+නගර+තීර+ච්ඡත්ත+ඡිද්දො+දකානි.ඉච්චාදි; नयन (डोळा), वदन (मुख), यान (वाहन), ओदन (भात), सोपान (पायरी), पानं (पेय), भवन (घर), भुवन (विश्व), लोह (लोखंड), अळात (कोलती), तुण्ड (चोच), अण्ड (अंडे), पीठं (आसन), करण (साधन), मरण, ञाण (ज्ञान), आरम्मण (आलंबन), अरञ्ञ (अरण्य), ताणं (रक्षण), तगर (तगर वनस्पती), नगर, तीर (काठ), छत्त (छत्र), छिद्द (छिद्र), उदकानि (पाणी) इत्यादी; එකච්චං, 'एकच्च' (काही/एक) शब्द, 136. න [Pg.69] නිස්ස ටා १३६. "न निस्स टा" (नि प्रत्ययाचा 'टा' आदेश होत नाही). එකච්චාදීහි පරස්ස නිස්ස ටා න හොති, එකච්චානි. භො එකච්ච, එකච්චා එකච්චානි. එකච්චං, එකච්චෙ එකච්චානි. සෙසං නපුංසකංව. 'एकच्च' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'नि' प्रत्ययाचा 'टा' आदेश होत नाही, म्हणून 'एकच्चानि' असे रूप होते. भो एकच्च, एकच्चा, एकच्चानि (संबोधन). एकच्चं, एकच्चे, एकच्चानि (द्वितीया). उर्वरित रूपे नपुंसकलिंगाप्रमाणेच होतात. එවං පඨමං, පඨමානි ඉච්චාදි. පදං, පදා පදානි ඉච්චාදි නපුංසකසමං. නාස්මිංසු භෙදො. याचप्रमाणे 'पठमं', 'पठमानि' इत्यादी रूपे होतात. 'पदं', 'पदा', 'पदानि' इत्यादी रूपे नपुंसकलिंगाप्रमाणेच होतात. 'ना' आणि 'स्मिं' प्रत्ययांमध्ये भेद (विशेष बदल) होतो. 106. නාස්ස සා १०६. "नास्स सा" ('ना' प्रत्ययाचा 'सा' होतो). පදාදීහි නාස්ස සා හොති වා. පදසා පදෙන. 'पद' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'ना' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'सा' होतो. (उदा.) 'पदसा', 'पदेन'. 105. පදාදීහි १०५. "पदादीहि" ('पद' इत्यादी शब्दांनंतर). පදාදීහි ස්මිනො සි හොති වා. පදසි පදෙ පදම්හි පදස්මිං, පදෙසු. එවං බිලසද්දො. 'पद' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'स्मिं' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'सि' होतो. (उदा.) 'पदसि', 'पदे', 'पदम्हि', 'पदस्मिं' (सप्तमी एकवचन); 'पदेसु' (सप्तमी बहुवचन). याचप्रमाणे 'बिल' (बीळ) शब्द चालतो. කම්මසද්දතො නාස්ස ‘‘නාස්සෙ+නො’’ති එනො වා, කම්මෙන, ‘‘පුමකම්මථාමා’’දිනා උත්තෙ කම්මුනා කම්මනා. ඉමිනාව සස්මාසු උත්තං, උස්ස ලසඤ්ඤායං ස+ස්මානං යථායොගං නො+නා නිච්චං, වවත්ථිතවිභාසත්තා වාධිකාරස්ස. කම්මුනො කම්මස්ස. කම්මුනා කම්මා කම්මම්හා කම්මස්මා. ‘‘කම්මාදිතො’’ති ස්මිනො වා නිම්හි කම්මනි කම්මෙ කම්මම්හි කම්මස්මිං, සෙසං නපුංසකසමං. චම්ම+වෙස්ම+භස්මාදයො කම්මසමා උත්තතො+ඤ්ඤත්ර. 'कम्म' शब्दाहून येणाऱ्या 'ना' प्रत्ययाचा "नास्सेनो" या सूत्राने विकल्पेकरून 'एन' आदेश होतो, (उदा.) 'कम्मेन'; "पुमकम्मथामा" इत्यादी सूत्राने उ-कार झाल्यावर 'कम्मुना', 'कम्मना' अशी रूपे होतात. याच सूत्राने 'स' आणि 'स्मा' प्रत्यय असताना उ-कार होतो; 'उ' ची 'ल' संज्ञा झाल्यावर 'स' आणि 'स्मा' प्रत्ययांचे अनुक्रमे 'नो' आणि 'ना' हे आदेश नित्य होतात, कारण 'वा' (विकल्प) या अधिकाराची व्यवस्था मर्यादित आहे. (उदा.) 'कम्मुनो', 'कम्मस्स' (षष्ठी/चतुर्थी). 'कम्मुना', 'कम्मा', 'कम्मम्हा', 'कम्मस्मा' (पंचमी). "कम्मादितो" या सूत्राने 'स्मिं' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'नि' आदेश झाल्यावर 'कम्मनि', 'कम्मे', 'कम्मम्हि', 'कम्मस्मिं' (सप्तमी) अशी रूपे होतात. उर्वरित रूपे नपुंसकलिंगाप्रमाणेच होतात. 'चम्म' (चामडे), 'वेस्म' (घर), 'भस्म' (राख) इत्यादी शब्द उ-कार होण्याव्यतिरिक्त इतर बाबतीत 'कम्म' शब्दाप्रमाणेच चालतात. ගච්ඡන්ත, සි. ‘‘න්තස්සං’’ති වා අංම්හි සිලොපො ගච්ඡං. අඤ්ඤත්ර සිස්ස දං, ගච්ඡන්තං, ගච්ඡන්තා ගච්ඡන්තානි. භො ගච්ඡ ගච්ඡා ගච්ඡං, ගච්ඡන්තා ගච්ඡන්තානි. ගච්ඡං ගච්ඡන්තං, ගච්ඡන්තෙ ගච්ඡන්තානි. ගච්ඡතා ගච්ඡන්තෙනෙ+ච්චාදි පුල්ලිඞ්ගසමං. එවං යජන්ත+වජන්තාදයො. 'गच्छन्त' शब्द, 'सि' प्रत्यय असताना – "न्तस्सं" या सूत्राने विकल्पेकरून 'अं' आदेश झाल्यावर 'सि' चा लोप होऊन 'गच्छं' रूप होते. इतर पक्षात 'सि' चा 'दं' (किंवा अं) होऊन 'गच्छन्तं', 'गच्छन्ता', 'गच्छन्तानि' रूपे होतात. भो गच्छ, गच्छा, गच्छं, गच्छन्ता, गच्छन्तानि (संबोधन). गच्छं, गच्छन्तं, गच्छन्ते, गच्छन्तानि (द्वितीया). गच्छता, गच्छन्तेन इत्यादी रूपे पुल्लिंगाप्रमाणेच होतात. याचप्रमाणे 'यजन्त' (यज्ञ करणारा), 'वजन्त' (जाणारा) इत्यादी शब्द चालतात. අකාරන්තං. अ-कारान्त (नपुंसकलिंगी समाप्त). අට්ඨි[Pg.70], සිලොපො. 'अट्ठि' (हाड) शब्द, 'सि' चा लोप होतो. 113. ඣලා වා ११३. "झला वा" ('झ' आणि 'ल' संज्ञक स्वरांहून विकल्पेकरून). ඣලතො යොනං නි හොති වා නපුංසකෙ. අට්ඨීනි. ‘‘ලොපො’’ති යොලොපෙ දීඝො, අට්ඨී. භො අට්ඨි අට්ඨී, අට්ඨීනි අට්ඨී. අට්ඨිං, අට්ඨීනි අට්ඨී. අට්ඨිනා ඉච්චාදි මුනිසද්දසමං. එවං පච්ඡි+අක්ඛි+දධි+සත්ථි+වාරි+අච්චිආදයො. 'झ' आणि 'ल' संज्ञक स्वरांहून नपुंसकलिंगात 'यो' प्रत्ययांच्या जागी विकल्पेकरून 'नि' होतो. (उदा.) 'अट्ठीनि'. "लोपो" या सूत्राने 'यो' चा लोप झाल्यावर दीर्घ होऊन 'अट्ठी' रूप होते. भो अट्ठि, अट्ठी, अट्ठीनि, अट्ठी (संबोधन). अट्ठिं, अट्ठीनि, अट्ठी (द्वितीया). अट्ठिना इत्यादी रूपे 'मुनि' शब्दाप्रमाणेच होतात. याचप्रमाणे 'पच्छि' (टोपली), 'अक्खि' (डोळा), 'दधि' (दही), 'सत्थि' (मांडी), 'वारि' (पाणी), 'अच्चि' (ज्वाला) इत्यादी शब्द चालतात. ඉකාරන්තං. इ-कारान्त (नपुंसकलिंगी समाप्त). දණ්ඩි, නපුංසකත්තා ‘‘එකවචනෙ’’ච්චාදිනා රස්සෙ සිලොපො. දණ්ඩීනි දණ්ඩී. ‘‘ගෙ වා’’ති රස්සෙ භො දණ්ඩි දණ්ඩී, දණ්ඩීනි දණ්ඩී. ‘‘නං ඣීතො’’ති නං. දණ්ඩිනං දණ්ඩිං, දණ්ඩීනි දණ්ඩී. සෙසං පුල්ලිඞ්ගෙ දණ්ඩීසමං. එවං සුඛකාරී+සීඝයායීආදයො. 'दण्डी' शब्द, नपुंसकलिंग असल्यामुळे "एकवचने..." इत्यादी सूत्राने र्हस्व झाल्यावर 'सि' चा लोप होतो. 'दण्डीनि', 'दण्डी' रूपे होतात. "गे वा" या सूत्राने र्हस्व झाल्यावर 'भो दण्डि', 'दण्डी', 'दण्डीनि', 'दण्डी' (संबोधन). "नं झीतो" या सूत्राने 'नं' प्रत्यय असताना 'दण्डिनं', 'दण्डिं', 'दण्डीनि', 'दण्डी' (द्वितीया) रूपे होतात. उर्वरित रूपे पुल्लिंगातील 'दण्डी' शब्दाप्रमाणेच होतात. याचप्रमाणे 'सुखकारी' (सुख देणारा), 'सीघयायी' (वेगाने जाणारा) इत्यादी शब्द चालतात. ඊකාරන්තං. ई-कारान्त (नपुंसकलिंगी समाप्त). චක්ඛු, චක්ඛූනි චක්ඛූ. සෙසං අට්ඨිසමං. එවං ආයු+වසු+ධනු+දාරු+තිපු+මධු+සිඞ්ගු+හිඞ්ගු+වත්ථු+ජතු+අම්බු+ අස්සුආදීනි. ආයුසද්දතො නාස්ස කොධාදිත්තා සාව විසෙසො. 'चक्खु' (डोळा) शब्द, 'चक्खूनि', 'चक्खू' रूपे होतात. उर्वरित रूपे 'अट्ठि' शब्दाप्रमाणेच होतात. याचप्रमाणे आयु (आयुष्य), वसु (धन), धनु (धनुष्य), दारु (लाकूड), तिपु (कथील), मधु (मध), सिङ्गु (शेवगा), हिङ्गु (हिंग), वत्थु (वस्तू), जतु (लाख), अम्बु (पाणी), अस्सु (अश्रू) इत्यादी शब्द चालतात. 'आयु' शब्दाहून येणाऱ्या 'ना' प्रत्ययाचा 'कोधादि' गणामध्ये असल्यामुळे 'सा' होतो, हाच विशेष फरक आहे. උකාරන්තං. उ-कारान्त (नपुंसकलिंगी समाप्त). ගොත්රභු, රස්සෙ සිලොපො. ගොත්රභූනි ගොත්රභූ. භො ගොත්රභු ගොත්රභූ, ගොත්රභූනි ගොත්රභූ. ගොත්රභුං, ගොත්රභූනි ගොත්රභූ ඉච්චාදි පුල්ලිඞ්ගෙ වෙස්සභූසමං. එවං සයම්භූ+අභිභූ+ධම්මඤ්ඤූ ආදයො. 'गोत्रभू' शब्द, र्हस्व झाल्यावर 'सि' चा लोप होतो. 'गोत्रभूनि', 'गोत्रभू' रूपे होतात. भो गोत्रभु, गोत्रभू, गोत्रभूनि, गोत्रभू (संबोधन). गोत्रभुं, गोत्रभूनि, गोत्रभू (द्वितीया) इत्यादी रूपे पुल्लिंगातील 'वेस्सभू' शब्दाप्रमाणेच होतात. याचप्रमाणे 'सयम्भू' (स्वयंभू), 'अभिभू' (अभिभूत करणारा), 'धम्मञ्ञू' (धर्म जाणणारा) इत्यादी शब्द चालतात. ඌකාරන්තං. ऊ-कारान्त (नपुंसकलिंगी समाप्त). විසදා+විසදාකාර-වොහාරො+භයමුත්තකො[Pg.71]; පුමාදිජානනෙ හෙතු-භාවතො ලිඞ්ග+මීරිතො. स्पष्ट आणि अस्पष्ट आकाराचा व्यवहार आणि या दोन्हीहून मुक्त असणे, जे पुल्लिंग इत्यादी ओळखण्याचे कारण बनते, त्याला 'लिंग' (व्याकरणातील लिंग) म्हटले जाते. ථන+කෙසාවතී නාරී, මස්සුවා පුරිසො සියා; උභින්න+මන්තරං එතං, ඉතරො+භයමුත්තකො. स्तन आणि लांब केस असणारी ती 'नारी' (स्त्री) आणि दाढी-मिशा असणारा तो 'पुरुष' असतो; हा या दोघांमधील फरक आहे, तर इतर (नपुंसकलिंग) या दोन्ही लक्षणांपासून मुक्त असते. එසෙ+සා එත+මීති ච,පසිද්ධිඅත්ථෙසු යෙසු ලොකස්ස; ථී+පුම+නපුංසකානී+ති,වුච්චන්තෙ තානි නාමානි. 'एषः' (हा), 'एषा' (ही) आणि 'एतत्' (हे) या लोकप्रसिद्ध अर्थांमध्ये जे शब्द वापरले जातात, त्यांना अनुक्रमे स्त्री, पुरुष आणि नपुंसकलिंगी नामे म्हटले जाते. නපුංසකලිඞ්ගං. नपुंसकलिंग. අථ සබ්බාදීනං රූපනයො නිද්දිසියතෙ, आता 'सब्ब' (सर्व) इत्यादी शब्दांच्या रूपांची पद्धत दर्शविली जात आहे. සබ්බ කතර කතම උභය ඉතර අඤ්ඤ අඤ්ඤතර අඤ්ඤතම, පුබ්බ+පරා+පර+දක්ඛිණු+ත්තරා+ධරානි වවත්ථාය+මසඤ්ඤායං. ‘‘ඌනපූරත්ථ+මධිකපදොදාහරණ+මජ්ඣාහාරො’’ති ඤායා සබ්බාදීසු පඨීයන්තෙති යොජෙතබ්බං. ය ත්ය ත එත ඉම අමු කිං එක තුම්හ අම්හ ඉච්චෙතෙ සබ්බාදයො. කච්චායනෙ අදස්සිතස්සාපි ත්යසද්දස්ස – सब्ब (सर्व), कतर, कतम, उभय, इतर, अञ्ञ (अन्य), अञ्ञतर, अञ्ञतम, पुब्ब (पूर्व), पर, अपर, दक्खिण (दक्षिण), उत्तर, अधर - हे शब्द संज्ञा (नाव) नसताना आणि मर्यादा दर्शविताना (सर्वनाम संज्ञक होतात). 'ऊनपूरत्थं अधिकपदोदाहरणं मज्झाहारो' या न्यायानुसार हे शब्द 'सब्ब' इत्यादी गणात वाचले जातात, असे जाणावे. य, त्य, त, एत, इम, अमु, किं, एक, तुम्ह, अम्ह हे 'सब्ब' इत्यादी (सर्वनाम) शब्द आहेत. कच्चायन व्याकरणात 'त्य' शब्द दर्शविला नसला तरी - ඛිඩ්ඩා පණිහිතා ත්යාසු, රති ත්යාසු පතිට්ඨිතා; බීජානි ත්යාසු රුහන්ති, යදිදං සත්තා පජායරෙති – 'त्यांच्यामध्ये क्रीडा स्थापित आहे, त्यांच्यामध्ये रती (प्रीती) प्रतिष्ठित आहे; त्यांच्यामध्ये बीजे रुजतात, ज्यांच्यापासून हे प्राणी जन्माला येतात' - පාළියං දිස්සමානත්තා ඉධ සඞ්ගහො. पाळी (त्रिपिटक) साहित्यात हा प्रयोग दिसत असल्यामुळे येथे त्याचा संग्रह (समावेश) केला आहे. තත්ථ සබ්බසද්දො නිරවසෙසත්ථො. කතර+කතමසද්දා පුච්ඡනත්ථා. උභයසද්දො ද්විඅවයවසමුදායවචනො. ඉතරසද්දො වුත්තපටියොගීවචනො. අඤ්ඤසද්දො අධිකතාපරවචනො. අඤ්ඤ- තර+අඤ්ඤතමසද්දා [Pg.72] අනියමත්ථා. පුබ්බාදයො දිසාදිවවත්ථාවචනා. යසද්දො අනියමත්ථො. ත්ය+තසද්දා පරම්මුඛවචනා. එත+ඉම+අමු+කිං ඉච්චෙතෙ සමීප+අච්චන්තසමීප+දූර+පුච්ඡනත්ථවචනා. එකසද්දො සංඛ්යාදිවචනො. තුම්හ+අම්හසද්දා පර+අත්ත නිද්දෙසවචනා. त्यामध्ये, 'सब्ब' शब्द संपूर्ण (निरवशेष) अर्थ व्यक्त करतो. 'कतर' आणि 'कतम' हे शब्द प्रश्नार्थक आहेत. 'उभय' शब्द दोन अवयवांच्या समूहाचा वाचक आहे. 'इतर' शब्द आधी सांगितलेल्याच्या विरोधी (किंवा भिन्न) अर्थाचा वाचक आहे. 'अञ्ञ' शब्द अधिक किंवा दुसऱ्या अर्थाचा वाचक आहे. 'अञ्ञतर' आणि 'अञ्ञतम' हे शब्द अनिश्चित अर्थाचे वाचक आहेत. 'पुब्ब' इत्यादी शब्द दिशा इत्यादींच्या मर्यादेचे वाचक आहेत. 'य' शब्द अनिश्चित अर्थाचा वाचक आहे. 'त्य' आणि 'त' हे शब्द परोक्ष (तिसऱ्या व्यक्तीच्या) अर्थाचे वाचक आहेत. 'एत', 'इम', 'अमु' आणि 'किं' हे शब्द अनुक्रमे जवळ, अत्यंत जवळ, दूर आणि प्रश्नार्थक अर्थाचे वाचक आहेत. 'एक' शब्द संख्या इत्यादींचा वाचक आहे. 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' हे शब्द अनुक्रमे मध्यम पुरुष (दुसरा) आणि उत्तम पुरुष (स्वतः) यांचे वाचक आहेत. සබ්බො, සිස්ස ඔ, 'सब्बो' - 'सि' प्रत्ययाचा 'ओ' होतो. 138. යොන+මෙට १३८. अकारान्त 'सब्ब' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'यो' प्रत्ययाचा 'एत' (ए) आदेश होतो. අකාරන්තෙහි සබ්බාදීහි යොනං එට හොති නිච්චං. සබ්බෙ. භො සබ්බ සබ්බා, සබ්බෙ. සබ්බං, සබ්බෙ. සබ්බෙන, සබ්බෙහි සබ්බෙභි. එවං කරණෙ. සබ්බස්ස. अकारान्त 'सब्ब' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'यो' प्रत्ययाचा 'एत' आदेश नित्य होतो. रूप बनते - 'सब्बे'. संबोधनात - 'भो सब्ब', 'सब्बा', 'सब्बे'. द्वितीयेत - 'सब्बं', 'सब्बे'. तृतीयेत - 'सब्बेन', 'सब्बेहि', 'सब्बेभि'. याचप्रमाणे करणात (तृतीयेत) रूपे होतात. चतुर्थी एकवचनात - 'सब्बस्स'. 99. සබ්බාදීනං නංම්හි ච ९९. 'नं' प्रत्यय असताना देखील 'सब्ब' इत्यादी शब्दांच्या शेवटी 'ए' होतो. අකාරන්තානං සබ්බාදීනං එ හොති නංම්හි සු+හිසු ච. එත්ථ ආදිසද්දො අවයවෙ, වුත්තඤ්හි – अकारान्त 'सब्ब' इत्यादी शब्दांच्या शेवटी 'नं', 'सु' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'ए' होतो. येथे 'आदि' शब्द अवयव अर्थाचा वाचक आहे, कारण म्हटले आहे की - මරියාදායං පකාරෙ ච, සමීපෙ+වයවෙ තථා; චතූස්ව+ත්ථෙසු මෙධාවී, ආදිසද්දං පකාසයෙති. 'मर्यादा, प्रकार, समीपता आणि अवयव (भाग) या चार अर्थांमध्ये बुद्धिमान लोक 'आदि' शब्दाचा प्रयोग करतात.' 100. සං+සානං १००. 'सब्ब' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'नं' प्रत्ययाचा 'सं' आणि 'सानं' आदेश होतो. සබ්බාදිතො නංවචනස්ස සං+සානං හොන්ති. සබ්බෙසං සබ්බෙසානං. සබ්බා සබ්බම්හා සබ්බස්මා. සබ්බෙ සබ්බම්හි සබ්බස්මිං, සබ්බෙසු. 'सब्ब' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'नं' विभक्ती प्रत्ययाचा 'सं' आणि 'सानं' आदेश होतो. रूपे होतात - 'सब्बेसं', 'सब्बेसानं'. पंचमी एकवचनात - 'सब्बा', 'सब्बम्हा', 'सब्बस्मा'. सप्तमी एकवचनात - 'सब्बे', 'सब्बम्हि', 'सब्बस्मिं'; बहुवचनात - 'सब्बेसु'. ඉත්ථියං ‘‘ඉත්ථිය+මත්වා’’ති ආපච්චයෙ තස්ස ඝසඤ්ඤා. සෙසං කඤ්ඤාව. සබ්බා, සබ්බා සබ්බායො. භො සබ්බෙ, සබ්බා සබ්බායො. ‘‘ඝො ස්සං+ස්සා+ස්සායං+තිං සූ’’-ති රස්සෙ [Pg.73] සබ්බං, සබ්බා සබ්බායො. සබ්බාය, සබ්බාහි සබ්බාභි. स्त्रीलिंगात 'इत्थिय मत्वा' या सूत्राने 'आ' प्रत्यय लागून त्याची 'घ' संज्ञा होते. उर्वरित रूपे 'कञ्ञा' (कन्या) प्रमाणे होतात. रूपे होतात - 'सब्बा', 'सब्बा', 'सब्बायो'. संबोधनात - 'भो सब्बे', 'सब्बा', 'सब्बायो'. 'घो स्सं+स्सा+स्सायं+तिं सु' या सूत्राने र्हस्व होऊन - 'सब्बं', 'सब्बा', 'सब्बायो'. तृतीयेत - 'सब्बाय', 'सब्बाहि', 'सब्बाभि'. 101. ඝපා සස්ස ස්සා වා १०१. 'घ' आणि 'प' संज्ञक शब्दांनंतर येणाऱ्या 'स' प्रत्ययाचा 'स्सा' आदेश पर्यायाने होतो. සබ්බාදීනං ඝපතො සස්ස ස්සා වා හොති. අමුස්සාති රූපස්ස ‘‘ස්සා වා තෙ+ති+මා+මූහී’’ති ස්සාදෙසෙන සිද්ධත්තා වාග්ගහණ+මුත්තරත්ථං. රස්සෙ සබ්බස්සා සබ්බාය, සබ්බාසං සබ්බාසානං. පඤ්චමියං සබ්බාය. 'सब्ब' इत्यादी 'घ' आणि 'प' संज्ञक शब्दांनंतर येणाऱ्या 'स' प्रत्ययाचा 'स्सा' आदेश पर्यायाने होतो. 'अमुस्सा' हे रूप 'स्सा वा ते+ति+मा+मूही' या सूत्राने 'स्सा' आदेश होऊन सिद्ध होत असल्यामुळे, येथे 'वा' चे ग्रहण पुढील सूत्रांसाठी आहे. र्हस्व झाल्यावर रूपे होतात - 'सब्बस्सा', 'सब्बाय'; बहुवचनात - 'सब्बासं', 'सब्बासानं'. पंचमीत - 'सब्बाय'. 102. ස්මිනො ස්සං १०२. 'घ' आणि 'प' संज्ञक शब्दांनंतर येणाऱ्या 'स्मिं' प्रत्ययाचा 'स्सं' आदेश पर्यायाने होतो. සබ්බාදීනං ඝපතො ස්මිනො ස්සං වා හොති. සබ්බස්සං සබ්බායං සබ්බාය, සබ්බාසු. 'सब्ब' इत्यादी 'घ' आणि 'प' संज्ञक शब्दांनंतर येणाऱ्या 'स्मिं' प्रत्ययाचा 'स्सं' आदेश पर्यायाने होतो. रूपे होतात - 'सब्बस्सं', 'सब्बायं', 'सब्बाय'; बहुवचनात - 'सब्बासु'. නපුංසකෙ සබ්බං. ‘‘යොනං නී’’ති නපුංසකෙ යොස්ස නිම්හි – nपुंसकलिंगात 'सब्बं' रूप होते. 'योनां नी' या सूत्राने नपुंसकलिंगात 'यो' प्रत्ययाचा 'नि' आदेश झाल्यावर - 137. සබ්බාදීහි १३७. 'सब्ब' इत्यादी शब्दांनंतर - සබ්බාදීහි පරස්ස නිස්ස ටා න හොති. දීඝෙ සබ්බානි. භො සබ්බ සබ්බා, සබ්බානි. සබ්බං, සබ්බෙ සබ්බානි. නාදීසු පුමෙව. කතරකතමඋභයා තීසු ලිඞ්ගෙසු සබ්බසමා. එවං ඉතරඅඤ්ඤසද්දා. ස්සා+ස්සංසු විසෙසො. 'सब्ब' इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'नि' प्रत्ययाचा 'टा' आदेश होत नाही. दीर्घ झाल्यावर रूप बनते - 'सब्बानि'. संबोधनात - 'भो सब्ब', 'सब्बा', 'सब्बानि'. द्वितीयेत - 'सब्बं', 'सब्बे', 'सब्बानि'. तृतीया इत्यादी विभक्तींमध्ये पुल्लिंगाप्रमाणेच रूपे होतात. 'कतर', 'कतम' आणि 'उभय' हे शब्द तिन्ही लिंगांत 'सब्ब' शब्दाप्रमाणेच चालतात. याचप्रमाणे 'इतर' आणि 'अञ्ञ' शब्द देखील चालतात. 'स्सा' आणि 'स्सं' प्रत्ययांमध्ये काही विशेष फरक आहे. 52. ස්සං+ස්සා+ස්සායෙස්වි-තරෙ+ක+ඤ්ඤෙ+ති+මාන+මි ५२. 'स्सं', 'स्सा' आणि 'स्साय' प्रत्यय असताना 'इतर', 'एक', 'अञ्ञ', 'एत' आणि 'इम' या शब्दांच्या शेवटी 'इ' हा आदेश नित्य होतो. ස්සමාදීසු ඉතර+එක+අඤ්ඤ+එත+ඉම ඉච්චෙතෙසං ඉ හොති නිච්චං. ඉතරිස්සා ඉතරාය, අඤ්ඤිස්සා අඤ්ඤාය, අඤ්ඤාසං [Pg.74] අඤ්ඤාසානං. අඤ්ඤිස්සං අඤ්ඤායං අඤ්ඤාය. අඤ්ඤතර+ඤ්ඤතමා ලිඞ්ගත්තයෙ සබ්බසමා. 'स्सं' इत्यादी प्रत्यय असताना 'इतर', 'एक', 'अञ्ञ', 'एत' आणि 'इम' या शब्दांच्या शेवटी 'इ' हा आदेश नित्य होतो. रूपे होतात - 'इतरिस्सा', 'इतराय'; 'अञ्ञिस्सा', 'अञ्ञाय'; बहुवचनात - 'अञ्ञासं', 'अञ्ञासानं'. सप्तमीत - 'अञ्ञिस्सं', 'अञ्ञायं', 'अञ्ञाय'. 'अञ्ञतर' आणि 'अञ्ञतम' हे शब्द तिन्ही लिंगांत 'सब्ब' शब्दाप्रमाणेच चालतात. පුබ්බො, 'पुब्बो' (पूर्व) - 143. පුබ්බාදීහි ඡහි १४३. 'पुब्ब' इत्यादी सहा शब्दांनंतर - එතෙහි ඡහි සවිසයෙ එට වා හොතීති යොස්ස එට, පුබ්බෙ පුබ්බා. භො පුබ්බ පුබ්බා, පුබ්බෙ පුබ්බා. පුබ්බං, පුබ්බෙ. පුබ්බෙන. සෙසං සබ්බලිඞ්ගෙ සබ්බසමං. එවං පරාදයො පඤ්ච. या सहा शब्दांनंतर आपल्या विषयात 'यो' प्रत्ययाचा 'एत' आदेश पर्यायाने होतो, म्हणून 'पुब्बे', 'पुब्बा' अशी रूपे होतात. संबोधनात - 'भो पुब्ब', 'पुब्बा', 'पुब्बे', 'पुब्बा'. द्वितीयेत - 'पुब्बं', 'पुब्बे'. तृतीयेत - 'पुब्बेन'. उर्वरित रूपे सर्व लिंगांत 'सब्ब' शब्दाप्रमाणेच होतात. याचप्रमाणे 'पर' इत्यादी इतर पाच शब्द देखील चालतात. 139. නා+ඤ්ඤඤ්ච නාම+ප්පධානා १३९. नाम (संज्ञा) बनलेल्या आणि अप्रधान असलेल्या 'सब्ब' इत्यादी शब्दांचे 'सब्ब' प्रमाणे कार्य (सर्वनाम कार्य) होत नाही. තංනාමභූතෙහි අප්පධානෙහි ච සබ්බාදීහි සබ්බාදිකාරියං න හොති. තෙ සබ්බා, සබ්බනාමා තෙති අත්ථො. තෙ පියසබ්බා, තෙ අතිසබ්බා. නාමභූතෙ ච අඤ්ඤපදත්ථාදො අප්පධානවිසයෙ ච සබ්බාදිකාරියනිසෙධෙන ‘‘පරමසබ්බෙ තිට්ඨන්ති’’ ත්යාදිතො පධානපදන්තතො එටආදයො හොන්ති, විසෙසනසමාසස්ස උත්තරපදත්ථපධානත්තා. नाम बनलेल्या आणि अप्रधान असलेल्या 'सब्ब' इत्यादी शब्दांचे सर्वनाम कार्य होत नाही. जसे - 'ते सब्बा' (ते सर्व), येथे 'सब्ब' हे नाम आहे असा अर्थ आहे. 'ते पियसब्बा', 'ते अतिसब्बा'. नाम बनलेल्या आणि अन्यपदार्थ इत्यादी अप्रधान विषयात सर्वनाम कार्याचा निषेध असल्यामुळे, 'परमसब्बे तिट्ठन्ति' इत्यादी ठिकाणी प्रधान पदाच्या शेवटी 'एत' इत्यादी आदेश होतात, कारण विशेषण समासात उत्तरपदाचा अर्थ प्रधान असतो. 140. තතියත්ථයොගෙ १४०. तृतीया विभक्तीच्या अर्थाच्या योगात - තතියත්ථෙන යොගෙ ච සබ්බාදිකාරියං න හොති. මාසෙන පුබ්බා මාසපුබ්බා ඉච්චාදි. तृतीयार्थाच्या योगात 'सब्बादि' (सर्व इत्यादी शब्दांचे) कार्य होत नाही. जसे की, 'मासेन पुब्बा' (महिन्याने पूर्व) = 'मासपुब्बा' इत्यादी. 141. චත්ථසමාසෙ १४१. च-अर्थ समासात (द्वंद्व समासात). චත්ථසමාසවිසයෙ සබ්බාදිකාරියං න හොති. දක්ඛිණුත්තරපුබ්බානන්තිආදි. च-अर्थ समासाच्या विषयात 'सब्बादि' कार्य होत नाही. जसे की, 'दक्खिणुत्तरपुब्बानं' इत्यादी. 142. වෙ+ට १४२. वे+ट. ඉති [Pg.75] චත්ථසමාසෙ සබ්බාදිකාරියං න හොති, නිච්චෙන එටආදෙසප්පසඞ්ගෙ අයං සම්පත්තවිභාසා. පුබ්බුත්තරෙ පුබ්බුත්තරා. සෙසං සුගතසමං. अशा प्रकारे च-अर्थ समासात 'सब्बादि' कार्य होत नाही; नित्य 'एत' आदेशाचा प्रसंग असताना हा प्राप्त विकल्प आहे. 'पुब्बुत्तरे', 'पुब्बुत्तरा'. उर्वरित भाग सुगत-समान (आधी सांगितल्याप्रमाणे) आहे. යො, යෙ. යා, යායො. යං, යානි ඉච්චාදි සබ්බසමං. යාදීන+මාලපනෙ රූපං න සම්භවති. 'यो', 'ये'. 'या', 'यायो'. 'यं', 'यानि' इत्यादी सर्व 'सब्ब' शब्दाप्रमाणेच आहेत. 'य' इत्यादी शब्दांचे संबोधन विभक्तीत रूप संभवत नाही. ත්ය සි – त्य सि – 128. ත්ය+තෙ+තානං තස්ස සො १२८. त्य, ते आणि त यांच्या 'त' चा 'सो' होतो. ත්ය+තෙ+තාන+මනපුංසකානං තස්ස සො හොති සිම්හි. ස්යො, ත්යෙ. ස්යා, ත්යා, ත්යායො. ත්යං, ත්යානි ඉච්චාදි සබ්බසමං. त्य, ते आणि त या नपुंसकेतर (पुल्लिंगी व स्त्रीलिंगी) शब्दांच्या 'त' चा 'सि' प्रत्यय असताना 'सो' होतो. स्यो, त्ये. स्या, त्या, त्यायो. त्यं, त्यानि इत्यादी सर्व समान आहे. සො, सो, 131. තතස්ස නො සබ්බාසු १३१. त-शब्दाच्या 'त' चा सर्व विभक्तींमध्ये 'न' होतो. තසද්දස්ස තස්ස නො වා හොති සබ්බාසු විභත්තීසු. ‘‘ත්ය+තෙ+තානං තස්සා’’ති ච එත්ථ ත්යාදීනං තකාරග්ගහණං ස්යා සා එසා නායොති ඉත්ථියං සබ්බසමා හොතීති. නෙ තෙ. නං තං, නෙ තෙ. නෙන තෙනෙ, නෙහි නෙභි තෙහි තෙභි. त-शब्दाच्या 'त' चा सर्व विभक्तींमध्ये विकल्पेकरून 'न' होतो. 'त्य+ते+तानं तस्स' यामध्ये 'त्य' इत्यादींच्या त-काराचे ग्रहण केल्यामुळे 'स्या, सा, एसा, नायो' असे स्त्रीलिंगात सर्व समान होते. ने, ते. नं, तं, ने, ते. नेन, तेने, नेहि, नेभि, तेहि, तेभि. 132. ට සස්මාස්මිංස්සායස්සංස්සාසංම්හාම්හිස්වි+මස්ස ච १३२. टा, स, स्मा, स्मिं, स्साय, स्सं, स्सा, सं, म्हा, म्ही, सु प्रत्यय असताना 'इम' आणि 'त' च्या त-काराचा 'ट' होतो. ‘‘ට ස+ස්මා+ස්මිං+නංස්මි+මස්ස චා’’ති වුත්තෙපි තෙසං විභත්තීනං ආදෙසෙසු ස්සායාදීසු පරෙසු ‘‘තදාදෙසා තදිව [Pg.76] භවන්තී’’ති ඤායා ටාදෙසෙ සිද්ධෙපි යාදිආදෙසන්තරෙ පරෙ නිවත්තනත්ථං ස්සාදීනං ගහණං. जरी 'टा, स, स्मा, स्मिं, नं, स्मि आणि इम चा' असे म्हटले असले, तरी त्या विभक्तींच्या आदेशांमध्ये 'स्साय' इत्यादी पर असताना 'त्यांचे आदेश त्यांच्यासारखेच होतात' या न्यायाने 'ट' आदेश सिद्ध होत असला, तरी इतर 'य' इत्यादी आदेश पर असताना (त्याची) निवृत्ती करण्यासाठी 'स्सा' इत्यादींचे ग्रहण केले आहे. සාදීස්වි+මස්ස තසද්දතකාරස්ස ච ටො වා හොති. පුබ්බස්සරලොපො. එව+මුපරිපි. අස්ස නස්ස තස්ස, නෙසං නෙසානං තෙසං තෙසානං. අම්හා අස්මා නම්හා නස්මා තම්හා තස්මා. අම්හි අස්මිං නම්හි නස්මිං තම්හි තස්මිං, නෙසු තෙසු. 'स' इत्यादी प्रत्यय पर असताना 'इम' आणि 'त' शब्दाच्या त-काराचा विकल्पेकरून 'ट' होतो. पूर्वस्वराचा लोप होतो. पुढेही याचप्रमाणे. अस्स, नस्स, तस्स; नेसं, नेसानं, तेसं, तेसानं. अम्हा, अस्मा, नम्हा, नस्मा, तम्हा, तस्मा. अम्हि, अस्मिं, नम्हि, नस्मिं, तम्हि, तस्मिं; नेसु, तेसु. ඉත්ථියං සා, නා නායො තා තායො. නං තං, නා නායො තා තායො. නාම්හි – स्त्रीलिंगात - सा, ना, नायो, ता, तायो. नं, तं, ना, नायो, ता, तायो. 'ना' प्रत्यय असताना - 46. ස්සා වා තෙ+ති+මා+මූහි ४६. त, एत, इम आणि अमू या शब्दांनंतर विकल्पेकरून 'स्सा' होतो. ඝපසඤ්ඤෙහි ත+එත+ඉම+අමූහි එකත්තෙ නාදීනං ස්සා වා හොති. අන්තස්සරානං ඝපවොහාරෙන තංසහචරිතාපි සද්දා ‘‘කුන්තෙ පවෙසයා’’ති ඤායා ගය්හන්තීති ‘‘ඝපසඤ්ඤෙහි ත+එත+ඉම+අමූහී’’ති වුත්තං. වාටාදෙසෙ අස්සා නස්සා නාය. घप-संज्ञक 'त', 'एत', 'इम' आणि 'अमू' या शब्दांनंतर एकवचनात 'ना' इत्यादींचा विकल्पेकरून 'स्सा' होतो. अंत्य स्वरांच्या 'घप' संज्ञेच्या व्यवहाराने त्यांच्याशी सहचरित असलेले शब्द देखील 'कुंते पवेसय' (भाले प्रवेश करवा) या न्यायाने घेतले जातात, म्हणून 'घप-संज्ञक त, एत, इम, अमू' असे म्हटले आहे. विकल्पेकरून 'ट' आदेश झाल्यावर - अस्सा, नस्सा, नाय. 53. තාය වා ५३. विकल्पेकरून 'ताय' होतो. ස්සංස්සාස්සා යෙසු තස්ස වා ඉ හොති. තිස්සා තස්සා තාය, නාහි නාභි තාහි තාභි. සස්ස වා ස්සාම්හි අස්සා නස්සා තිස්සා තස්සා. 'स्सं', 'स्सा', 'स्साय' पर असताना 'त' चा विकल्पेकरून 'इ' होतो. तिस्सा, तस्सा, ताय; नाहि, नाभि, ताहि, ताभि. 'स' प्रत्यय असताना विकल्पेकरून 'स्सा' झाल्यावर - अस्सा, नस्सा, तिस्सा, तस्सा. 54. තෙ+ති+මාතො සස්ස ස්සාය ५४. त, एत आणि इम या शब्दांनंतर 'स' प्रत्ययाचा 'स्साय' होतो. තා+එතා+ඉමාතො සස්ස ස්සායො හොති වා. අස්සාය නස්සාය තිස්සාය තස්සාය, ‘‘ඝපතෙ’’ච්චාදිනා යාදෙසෙ [Pg.77] නාය තාය. නංවචනස්ස ස+මාදෙසෙ තකාරස්ස ච වා ටාදෙසෙ ආසං නාසං නාසානං තාසං තාසානං. සත්තමියං අස්සං අස්සා නස්සං නස්සා නායං නාය තිස්සං තිස්සා තස්සං තස්සා තායං තාය, නාසු තාසු. ता, एता, इमा या शब्दांनंतर 'स' प्रत्ययाचा विकल्पेकरून 'स्साय' होतो. अस्साय, नस्साय, तिस्साय, तस्साय. 'घपतो' इत्यादी सूत्राने 'य' आदेश झाल्यावर - नाय, ताय. 'नं' वचनाचा 'सं' आदेश झाल्यावर आणि त-काराचा विकल्पेकरून 'ट' आदेश झाल्यावर - आसं, नासं, नासानं, तासं, तासानं. सप्तमीत - अस्सं, अस्सा, नस्सं, नस्सा, नायं, नाय, तिस्सं, तिस्सा, तस्सं, तस्सा, तायं, ताय; नासु, तासु. නපුංසකෙ නං තං, නානි තානි. නං තං, නෙ නානි තෙ තානි. සෙසං පුමෙව. नपुंसकलिंगात - नं, तं, नानि, तानि. नं, तं, ने, नानि, ते, तानि. उर्वरित रूपे पुल्लिंगाप्रमाणेच असतात. ‘‘යංතංසද්දා නිච්චසම්බන්ධා’’ති ඤායා යංසද්දෙන අනියමිතත්ථං තංසද්දො නියමෙති. 'यं आणि तं हे शब्द नित्य संबंध दाखवणारे असतात' या न्यायाने, 'यं' शब्दाने दर्शवलेला अनिश्चित अर्थ 'तं' शब्द निश्चित करतो. පසිද්ධෙ අනුභූතත්ථෙ, පක්කන්තවිසයෙ තථා; යංසද්ද+මනපෙක්ඛෙව, තංසද්දො යුජ්ජතෙ සදාති – प्रसिद्ध आणि अनुभवलेल्या अर्थामध्ये, तसेच प्रकृत विषयात, 'यं' शब्दाची अपेक्षा न ठेवताही 'तं' शब्दाचा नेहमी प्रयोग केला जातो - වුත්තත්තා එත්ථෙව තංසද්දො යංසද්දං නාපෙක්ඛති. යථාක්කමං තත්රි+ද+මුදාහරණං – असे म्हटल्यामुळे, येथे 'तं' शब्द 'यं' शब्दाची अपेक्षा करत नाही. त्याचे अनुक्रमे उदाहरण खालीलप्रमाणे आहे - (.) ‘‘නමො තස්සා’’ති ච, (.) ‘‘අග්ගිම්ප+ක්ඛිනා…පෙ… ඤාතකාරී හි සො ජිනො’’ති ච, (..) පුරිමගාථාය වුත්තමුනිසද්ද+මපෙක්ඛිත්වා ‘‘සවාසනෙ කිලෙසෙ සො’’ති ච. (.) १. 'नमो तस्स' (त्यांना नमस्कार असो) असे, २. 'अग्गिम्पक्खिना...पे... ज्ञातकारी हि सो जिनो' (तो जिन ज्ञानी आहे) असे, आणि ३. पूर्व गाथेतील 'मुनि' शब्दाची अपेक्षा करून 'सवासने किलेसे सो' असे. එසො, එතෙ. එසා, එතා එතායො, එතං, එතානි ඉච්චාදි ට+නාදෙසාභාවොව විසෙසො. एसो, एते. एसा, एता, एतायो, एतं, एतानि इत्यादी. यात 'ट' आणि 'न' आदेशांचा अभाव असणे हाच विशेष फरक आहे. ඉම සි, इम शब्दाला 'सि' प्रत्यय असताना, 127. සිම්හ+නපුංසකස්සා+යං १२७. 'सि' प्रत्यय असताना नपुंसकेतर 'इम' शब्दाचा 'अयं' होतो. ඉමසද්දස්ස අනපුංසකස්ස අයං හොති සිම්හි. අයං, ඉමෙ. ඉමං, ඉමෙ. इम या नपुंसकेतर (पुल्लिंगी व स्त्रीलिंगी) शब्दाचा 'सि' प्रत्यय असताना 'अयं' होतो. अयं, इमे. इमं, इमे. 126. නාම්හ+නි+මි १२६. 'ना' प्रत्यय असताना 'अन' आणि 'इमि' आदेश होतात. ඉමසද්දස්ස [Pg.78] අනිත්ථියං නාම්හි අන+ඉමිඉච්චාදෙසා හොන්ති. ‘‘අතෙ+නා’’ති එනෙ අනෙන ඉමිනා. හිම්හි – इम या स्त्रीलिंगेतर (पुल्लिंगी व नपुंसकलिंगी) शब्दाचा 'ना' प्रत्यय असताना 'अन' आणि 'इमि' हे आदेश होतात. 'अतेना' या सूत्राने 'एने' होऊन - अनेन, इमिना. 'हि' प्रत्यय असताना - 125. ඉමස්සා+නිත්ථියං ටෙ १२५. स्त्रीलिंगेतर 'इम' शब्दाचा 'टे' होतो. ඉමස්සා+නිත්ථියං ටෙ හොති වා සු+නං+හිසු. ‘‘නාමග්ගහණෙ ලිඞ්ගවිසිට්ඨස්සාපි ගහණං’’ති ඤායා ‘අනිත්ථියං’ති ඉත්ථිලිඞ්ගනිසෙධා ඉමස්සාති නාමග්ගහණවිසයෙ ලිඞ්ගවිසෙසිතස්ස ඉමසද්දස්සාපි ගහණං. තස්ස ඵලං ‘‘තතස්ස නො සබ්බාසු’’ ත්යාදො ලිඞ්ගත්තයෙ කාරියසිද්ධි. එහි එභි ඉමෙහි ඉමෙභි. ‘‘ට සස්මාස්මි’’මිච්චාදිනා සබ්බස්සි+මස්ස වා ටාදෙසෙ අස්ස ඉමස්ස, වා ටෙ එසං එසානං ඉමෙසං ඉමෙසානං. අම්හා අස්මා ඉමම්හා ඉමස්මා. අම්හි අස්මිං ඉමම්හි ඉමස්මිං, එසු ඉමෙසු. सु, नं आणि हि प्रत्यय पर असताना स्त्रीलिंगेतर 'इम' शब्दाचा विकल्पेकरून 'टे' होतो. 'नामाच्या ग्रहणात लिंगविशिष्ट शब्दाचेही ग्रहण होते' या न्यायाने 'अनित्थियं' (स्त्रीलिंगेतर) असा स्त्रीलिंगाचा निषेध केल्यामुळे, 'इमस्स' या नामग्रहणाच्या विषयात लिंगविशेष असलेल्या 'इम' शब्दाचेही ग्रहण होते. त्याचे फळ म्हणजे 'ततस्स नो सम्बासु' इत्यादींमध्ये तिन्ही लिंगांत कार्यसिद्धी होते. एहि, एभि, इमेहि, इमेभि. 'टा सस्मास्मिं' इत्यादी सूत्राने संपूर्ण 'इम' शब्दाचा विकल्पेकरून 'ट' आदेश झाल्यावर - अस्स, इमस्स; विकल्पेकरून 'टे' झाल्यावर - एसं, एसानं, इमेसं, इमेसानं. अम्हा, अस्मा, इमम्हा, इमस्मा. अम्हि, अस्मिं, इमम्हि, इमस्मिं; एसु, इमेसु. ඉත්ථියං අයං, ඉමා ඉමායො. ඉමං, ඉමා ඉමායො. නා ‘‘ස්සා වා තෙ+ති+මා+මූහී’’ති ස්සා වා, වා ටාදෙසෙ ‘‘ස්ස’’ මිච්චාදිනා ඉආදෙසෙ ච කතෙ අස්සා ඉමිස්සා ඉමාය, ඉමාහි ඉමාභි. අස්සා ඉමිස්සා අස්සාය ඉමිස්සාය ඉමාය. නංවචනස්ස ස+මාදෙසෙ ඉමස්ස ච වා ටාදෙසෙ අස්ස ‘‘සුනංහි සූ’’ති දීඝෙ ච කතෙ ආසං, අඤ්ඤත්ර ඉමාසං ඉමාසානං. සත්තමියං අස්සං ඉමිස්සං අස්සා ඉමිස්සා ඉමායං ඉමාය, ඉමාසු. स्त्रीलिंगात - अयं, इमा, इमायो. इमं, इमा, इमायो. 'ना' प्रत्यय असताना 'स्सा वा तेतिमामूहि' या सूत्राने विकल्पेकरून 'स्सा' होतो, विकल्पेकरून 'ट' आदेश झाल्यावर आणि 'स्स' इत्यादी सूत्राने 'इ' आदेश झाल्यावर - अस्सा, इमिस्सा, इमाय; इमाहि, इमाभि. अस्सा, इमिस्सा, अस्साय, इमिस्साय, इमाय. 'नं' वचनाचा 'सं' आदेश झाल्यावर आणि 'इम' चा विकल्पेकरून 'ट' आदेश झाल्यावर 'अस्स' होऊन 'सुनंहीसु' या सूत्राने दीर्घ केल्यावर - आसं, इतर ठिकाणी - इमासं, इमासानं. सप्तमीत - अस्सं, इमिस्सं, अस्सा, इमिस्सा, इमायं, इमाय; इमासु. නපුංසකෙ – नपुंसकलिंगात - 201. ඉමස්සි+දං වා २०१. इम शब्दाचा विकल्पेकरून 'इदं' होतो. අංසිසු [Pg.79] සහ තෙහි ඉමස්සි+දං හොති වා නපුංසකෙ. ඉදං ඉමං, ඉමෙ ඉමානි. ඉදං ඉමං, ඉමෙ ඉමානි. අනෙන ඉමිනා ඉච්චාදි පුල්ලිඞ්ගසමං. नपुंसकलिंगात 'अं' आणि 'सि' प्रत्यय पर असताना त्यांच्यासह 'इम' शब्दाचा विकल्पेकरून 'इदं' होतो. इदं, इमं, इमे, इमानि. इदं, इमं, इमे, इमानि. अनेन, इमिना इत्यादी रूपे पुल्लिंगाप्रमाणेच असतात. 197. ඉමෙ+තාන+මෙනා+න්වාදෙසෙ දුතියායං १९७. अन्वादेशात (पुन्हा उल्लेख करताना) द्वितीया विभक्तीमध्ये 'इम' आणि 'एत' शब्दांचा 'एन' आदेश होतो. ඉමඑතසද්දානං කථිතානුකථනවිසයෙ දුතියාය+මෙනාදෙසො හොති. ඉමං භික්ඛුං විනය+මජ්ඣාපය, අථො එනං ධම්ම+මජ්ඣාපය. ඉමෙ භික්ඛූ විනය+මජ්ඣාපය, අථො එනෙ ධම්ම+මජ්ඣාපය. එව+මෙතස්ස ච යොජනීයං. इम आणि एत या शब्दांचा आधी उल्लेख केलेल्याच्या पुन्हा उल्लेख करण्याच्या विषयात (अन्वादेशात) द्वितीया विभक्तीमध्ये 'एन' आदेश होतो. (उदा.) 'इमं भिक्खुं विनयं मज्झापय, अथो एनं धम्मं मज्झापय' (या भिक्खूला विनयाचे अध्यापन कर, आणि नंतर त्याला धम्माचे अध्यापन कर). 'इमे भिक्खू विनयं मज्झापय, अथो एने धम्मं मज्झापय' (या भिक्खूंना विनयाचे अध्यापन कर, आणि नंतर त्यांना धम्माचे अध्यापन कर). याचप्रमाणे 'एत' शब्दाचेही योजन करावे. අමු සි, अमू शब्दाला 'सि' प्रत्यय असताना, 129. මස්සා+මුස්ස १२९. अमू शब्दाच्या 'म' चा 'स' होतो. අනපුංසකස්සා+මුස්ස මකාරස්ස සො හොති සිම්හි. අසු, යො – नपुंसकेतर 'अमू' शब्दाच्या म-काराचा 'सि' प्रत्यय असताना 'स' होतो. असु. 'यो' प्रत्यय असताना - 86. ලොපො+මුස්මා ८६. 'अमू' शब्दाहून पर असलेल्या 'यो' प्रत्ययाचा लोप होतो. නියමසුත්ත+මිදං, අමුසද්දතො යොනං ලොපො හොති නිච්චං පුල්ලිඞ්ගෙ. දීඝෙ අමූ. ඣලතො යොනං ‘‘ලොපො’’ති ලොපෙ සිද්ධෙපි වො+පවාදො+ය+මාරම්භො. हे नियमसूत्र आहे, पुल्लिंगात 'अमू' शब्दाहून पर असलेल्या 'यो' प्रत्ययाचा नित्य लोप होतो. दीर्घ केल्यावर - अमू. 'झलतो योनं लोपो' या सूत्राने लोप सिद्ध होत असला, तरी हा आरंभ त्याचा अपवाद आहे. ආරම්භො වචනම්පත්ති, ලක්ඛණං යොගලක්ඛණං; වාක්යං සත්ථඤ්ච ඉච්චාදි, සුත්තාන+මභිධායකා. 'आरंभ', 'वचनपत्ती', 'लक्षण', 'योगलक्षण', 'वाक्य' आणि 'शास्त्र' इत्यादी सूत्रांचे वाचक (पर्यायवाची) शब्द आहेत. අමුං, අමූ. අමුනා, අමූහි අමූභි. अमुं, अमू। अमुना, अमूहि, अमूभि। 87. න නො සස්ස ८७. ‘न नो सस्स’ අමුස්මා [Pg.80] සස්ස නො න හොති. අමුස්ස, අමූසං අමූසානං. ‘‘නාස්මාස්සා’’ති ලතො ස්මාස්ස නා, අමුනා අමුම්හා අමුස්මා. අමුම්හි අමුස්මිං, අමූසු. अमुस्मा (पंचमी एकवचन) मध्ये ‘स’ प्रत्ययाचा ‘नो’ होत नाही. अमुस्स, अमूसं, अमूसानं. ‘नास्मास्सा’ या सूत्राने ‘ल’ नंतर ‘स्मा’ चा ‘ना’ होतो, (त्यामुळे) अमुना, अमुम्हा, अमुस्मा. अमुम्हि, अमुस्मिं, अमूसु. ඉත්ථියං අසු, අමූ අමුයො. අමුං, අමූ අමුයො. නා, ‘‘ස්සා වා තෙ+ති+මා+මූහී’’ති නාද්යෙකවචනානං ස්සා වා, අමුස්සා අමුයා, අමූහි අමූභි. අමුස්සා අමුයා, අමූසං අමූසානං. සත්තමියං අමුස්සං අමුස්සා අමුයං අමුයා, අමූසු. स्त्रीलिंगात – असु, अमू, अमुयो. अमुं, अमू, अमुयो. ‘ना’ प्रत्यय असताना, ‘स्सा वा ते+ति+मा+मूही’ या सूत्राने ‘ना’ इत्यादी एकवचनांच्या जागी विकल्पेकरून ‘स्सा’ होतो, (त्यामुळे) अमुस्सा, अमुया, अमूहि, अमूभि. अमुस्सा, अमुया, अमूसं, अमूसानं. सप्तमी विभक्तीत – अमुस्सं, अमुस्सा, अमुयं, अमुया, अमूसु. නපුංසකෙ – नपुंसकलिंगात – 202. අමුස්සා+දුං २०२. ‘अमुस्सा+दुं’ අංසිසු සහ තෙහි අමුස්ස අදුං හොති වා නපුංසකෙ. අදුං, සිලොපො, අමුං. ‘‘ඣලා වා’’ති වානිආදෙසෙ අමූනි අමූ. අදුං අමුං, අමූනි අමූ. අමුනා ඉච්චාදි පුල්ලිඞ්ගසමං. नपुंसकलिंगात ‘अं’ आणि ‘सि’ प्रत्यय असताना त्यांच्यासह ‘अमु’ शब्दाचा विकल्पेकरून ‘अduं’ असा आदेश होतो. ‘अदुं’ (सि-लोप झाल्यावर) आणि ‘अमुं’. ‘झला वा’ या सूत्राने ‘नि’ आदेश झाल्यावर ‘अमूनि’, ‘अमू’. अदुं, अमुं; अमूनि, अमू. ‘अमुना’ इत्यादी पुढील रूपे पुल्लिंगाप्रमाणेच असतात. ‘‘සකත්තෙ’’ති කපච්චයෙ – ‘सकत्थे’ (स्वतःच्या अर्थात) ‘क’ प्रत्यय लागल्यास – 130. කෙ වා १३०. ‘के वा’ අමු එව අමුකොති සකත්ථෙ කපච්චයෙ තද්ධිතවුත්තිත්තා ‘‘එකත්ථතායං’’ති සිලොපෙ ච කතෙ ‘‘නිමිත්තාභාවෙ නෙමිත්තිකස්සාභාවො’’ති ඤායා නිමිත්තභූතස්ස සිස්සා+භාවෙ නෙමිත්තිකස්ස ‘‘මස්සා+මුස්සා’’ති කත්තබ්බස්ස සකාරස්ස නිවුත්තීති ‘කෙ වා’ති විකප්පෙන මස්ස සකාරත්ථ+ මිද+මාරද්ධං[Pg.81]. අමුස්ස මස්ස කෙ ස හොති වා. අසුකො අමුකා, අසුකා අමුකා. අසුකං අමුකං ඉච්චාදි. ‘अमु’ म्हणजेच ‘अमुको’ अशा स्वतःच्या अर्थात ‘क’ प्रत्यय लागल्यामुळे तद्धित वृत्ती असल्यामुळे ‘एकत्थतायं’ या सूत्राने ‘सि’ चा लोप झाल्यावर, ‘निमित्ताभावे नैमित्तिकस्याभावः’ (निमित्त नसताना नैमित्तिकाचाही अभाव होतो) या न्यायाने, निमित्तभूत असलेल्या ‘सि’ चा अभाव झाल्यामुळे नैमित्तिक ‘मस्स+मुस्स’ या सूत्राने होणाऱ्या ‘स’ काराची निवृत्ती होते. म्हणून ‘के वा’ या सूत्राने विकल्पेकरून ‘म’ च्या जागी ‘स’ कार करण्यासाठी हा नियम सुरू केला आहे. ‘अमु’ च्या ‘म’ च्या जागी ‘क’ प्रत्यय असताना विकल्पेकरून ‘स’ होतो. (त्यामुळे) असुको, अमुको; असुका, अमुका. असुकं, अमुकं इत्यादी रूपे होतात. කිං සි. ‘किं’ शब्दाला ‘सि’ प्रत्यय लागल्यास. 198. කිස්ස කො සබ්බාසු १९८. ‘किस्स को सब्बासु’ සබ්බාසු විභත්තීසු කිස්ස කො හොති. සිස්සො, කො, කෙ. කං, කෙ. කෙන, කෙහි කෙභි. सर्व विभक्तींमध्ये ‘किं’ शब्दाचा ‘को’ आदेश होतो. ‘सि’ चा लोप झाल्यावर – को, के. कं, के. केन, केहि, केभि. 199. කි සස්මිංසු වා නිත්ථියං १९९. ‘कि सस्मिंसु वा नित्थियं’ අනිත්ථියං කිස්ස කි වා හොති සස්මිංසු. කිස්ස කස්ස, කෙසං කෙසානං. කම්හා කස්මා. කිම්හි කිස්මිං කම්හි කස්මිං, කෙසු. स्त्रीलिंग सोडून (पुल्लिंग व नपुंसकलिंगात) ‘किं’ शब्दाचा ‘स’ आणि ‘स्मिं’ प्रत्यय असताना विकल्पेकरून ‘कि’ आदेश होतो. (त्यामुळे) किस्स, कस्स; केसं, केसानं. कम्हा, कस्मा. किम्हि, किस्मिं, कम्हि, कस्मिं; केसु. ඉත්ථියං විභත්තීසු පරෙසු කාදෙසෙ කතෙ අකාරන්තත්තා මජ්ඣෙ ආපච්චයකරණ+මවිරුද්ධන්ති ආ, කා, කායො. කං, කා කායො ඉච්චාදි සබ්බාව. स्त्रीलिंगात विभक्ती प्रत्यय पुढे असताना ‘का’ आदेश झाल्यावर, अकारान्त असल्यामुळे मध्ये ‘आ’ प्रत्यय करणे अविरुद्ध (योग्य) ठरते. म्हणून – का, कायो. कं, का, कायो इत्यादी सर्व रूपे होतात. නපුංසකෙ – नपुंसकलिंगात – 200. කි+මංසිසු සහ නපුංසකෙ २००. ‘कि+मंसिसु सह नपुंसके’ අංසිසු සහ තෙහි කිං සද්දස්ස කිංහොති නපුංසකෙ. කාදෙසස්ස සාමඤ්ඤත්තා ‘‘විසෙසවිහිතා විධයො සාමඤ්ඤවිධයො නිසෙධෙන්තී’’ති ඤායා කිංආදෙසෙන කාදෙසනිවුත්ති. කිං, කානි. කිං, කෙ කානි. කෙනෙ+ච්චාදි පුබ්බෙව. नपुंसकलिंगात ‘अं’ आणि ‘सि’ प्रत्यय असताना त्यांच्यासह ‘किं’ शब्दाचा ‘किं’ असाच आदेश होतो. ‘का’ आदेश सामान्य असल्यामुळे ‘विशेषविहिता विधयो सामान्यविधीन् निषेधन्ति’ (विशेष नियम सामान्य नियमांचा बाध करतात) या न्यायाने ‘किं’ आदेशामुळे ‘का’ आदेशाची निवृत्ती होते. (त्यामुळे) किं, कानि. किं, के, कानि. केन इत्यादी पुढील रूपे पूर्वीप्रमाणेच होतात. එකසද්දො [Pg.82] සංඛ්යා+තුල්ය+ඤ්ඤ+සහායවචනො. යදා සංඛ්යාවචනො, තදා එකවචනන්තො, අත්ර එකසද්දො සංඛ්යෙය්යවාපී. අඤ්ඤත්ර තුල්යාදීසු බහුවචනන්තොපි. එකො, එකෙ. එකා, එකා එකායො. එකං, එකානි+ච්චාදි සබ්බසමං තිලිඞ්ගෙ. ‘एक’ शब्द हा संख्या, तुल्य (समान), अन्य (इतर) आणि सहाय (मित्र/सोबत) या अर्थांचा वाचक आहे. जेव्हा तो संख्यावाचक असतो, तेव्हा तो एकवचनातच असतो; येथे ‘एक’ शब्द संख्या मोजण्यायोग्य वस्तूचाही वाचक आहे. इतर अर्थांमध्ये (तुल्य इत्यादींमध्ये) तो बहुवचनातही असू शकतो. (पुल्लिंगात) एको, एके. (स्त्रीलिंगात) एका, एका, एकायो. (नपुंसकलिंगात) एकं, एकानि इत्यादी तिन्ही लिंगांत सर्व रूपे सारखीच असतात. තුල්යෙ එකො විලාසො ද්වින්නං කුමාරානං, එකෙ වණ්ණසද්දා ද්වින්නං කුමාරානං. අඤ්ඤත්ථෙ එකො ආචරියො එව+මාහ, එකෙ ආචරියා එව+මාහංසු. අසහායතෙ එකොව අරඤ්ඤං පවිසිත්වා. तुल्य (समान) अर्थात – ‘एको विलासो द्विन्नं कुमारानां’ (दोन कुमारांचा एकच विलास/समान विलास), ‘एके वण्णसद्दा द्विन्नं कुमारानां’ (दोन कुमारांचे समान वर्णशब्द). अन्य (इतर) अर्थात – ‘एको आचरियो एवमाह’ (एक आचार्य असे म्हणाले), ‘एके आचरिया एवमाहंसु’ (काही आचार्य असे म्हणाले). असहाय (एकटेपणा) अर्थात – ‘एकोव अरञ्ञं पविसित्वा’ (एकटाच अरण्यात प्रवेश करून). එකො, එකෙ. එකා, එකා එකායො. එකං එකානි+ච්චාදි සබ්බසමං තිලිඞ්ගෙ. ස්සා+ස්සංසු පන ‘‘ස්ස’’මාදිනා ඉ, එකිස්සා එකාය, එකිස්සං එකායං එකාය. एको, एके. एका, एका, एकायो. एकं, एकानि इत्यादी तिन्ही लिंगांत सर्व रूपे सारखीच असतात. परंतु ‘स्सा’ आणि ‘स्सं’ प्रत्यय असताना ‘स्स’ इत्यादी सूत्राने ‘इ’ कार होऊन – एकिस्सा, एकाय; एकिस्सं, एकायं, एकाय. ඉධ අත්තපරගාරවවසෙන එකස්සාපි ‘‘අම්හාකං රඤ්ඤො’’තිපි ‘‘එකෙ ආචරියා’’තිපි බහුවචනස්ස ලොකෙන ඉච්ඡිතත්තා බහුලවිධානා බහුවචනෙනෙව සිජ්ඣති. येथे स्वतःबद्दल किंवा दुसऱ्याबद्दल आदर व्यक्त करण्यासाठी एकवचन असतानाही ‘अम्हाकं रञ्ञो’ (आमचे राजे) किंवा ‘एके आचरिया’ (काही आचार्य) असे बहुवचन वापरणे लोकव्यवहारात इष्ट मानले गेल्यामुळे, ‘बहुल’ विधानाने बहुवचनाचीच रूपे सिद्ध होतात. තුම්හ+අම්හසද්දා අලිඞ්ගා, තථා උභ+කති+ද්විසද්දා, පඤ්චාදයො අට්ඨාරසන්තා ච. තුම්හ සි, අම්හ සි. ‘तुम्ह’ (तू) आणि ‘अम्ह’ (मी) हे शब्द लिंगविरहित (अलिंगी) आहेत; तसेच ‘उभ’, ‘कति’, ‘द्वि’ हे शब्द आणि ‘पञ्च’ (पाच) पासून ‘अट्ठाठारस’ (अठरा) पर्यंतचे संख्यावाचक शब्दही अलिंगी आहेत. ‘तुम्ह’ शब्दाला ‘सि’ प्रत्यय आणि ‘अम्ह’ शब्दाला ‘सि’ प्रत्यय लागल्यास – 212. තුම්හස්ස තුවංත්ව+මම්හි ච २१२. ‘तुम्हस्स तुवंत्त्वमम्हि च’ අම්හි සිම්හි ච තුම්හස්ස සවිභත්තිස්ස තුවං+ත්වං හොන්ති. තුවං ත්වං. ‘अं’ आणि ‘सि’ प्रत्यय असताना विभक्तीसह ‘तुम्ह’ शब्दाचे ‘तुवं’ आणि ‘त्वं’ हे आदेश होतात. (त्यामुळे) तुवं, त्वं. 211. සිම්හ+හං २११. ‘सिम्हा+हं’ සිම්හි අම්හස්ස සවිභත්තිස්ස අහං හොති. අහං, යෙවස්වෙ+ට, තු ම්හෙ. ‘सि’ प्रत्यय असताना विभक्तीसह ‘अम्ह’ शब्दाचा ‘अहं’ असा आदेश होतो. (त्यामुळे) अहं. ‘यो’ प्रत्यय असताना ‘तुम्ह’ शब्दाचे ‘तुम्हे’ असे रूप होते. 2,209. මය+මස්මා+ම්හස්ස २,२०९. ‘मय+मस्मा+म्हस्स’ යොස්ව+ම්හස්ස [Pg.83] සවිභත්තිස්ස මය+මස්මා වා හොන්ති යථාක්කමං. මයං අම්හෙ. ‘यो’ प्रत्यय असताना विभक्तीसह ‘अम्ह’ शब्दाचे अनुक्रमे ‘मय’ आणि ‘मस्मा’ (असे आदेश) विकल्पेकरून होतात. (त्यामुळे) मयं, अम्हे. 227. අංම්හි තං+මං+තවං+මමං २२७. ‘अंम्हि तं+मं+तवं+ममं’ අංම්හි තුම්හඅම්හසද්දානං සවිභත්තීනං තං+මං+තවං+මමං හොන්ති යථාක්කමං. තං, මං, තවං, මමං. ‘अं’ प्रत्यय असताना ‘तुम्ह’ आणि ‘अम्ह’ या शब्दांचे विभक्तीसह अनुक्रमे ‘तं’, ‘मं’, ‘तवं’, ‘ममं’ हे आदेश होतात. (त्यामुळे) तं, मं, तवं, ममं. 231. දුතියා යොම්හි වා २३१. ‘दुतिया योम्हि वा’ තුම්හඅම්හසද්දානං සවිභත්තීනං පච්චෙකං ඞං+ඞාකං වා හොන්ති යොම්හි දුතියෙ, තුම්හං තුම්හාකං තුම්හෙ, අම්හං අම්හාකං අම්හෙ. द्वितीयेच्या ‘यो’ प्रत्ययात ‘तुम्ह’ आणि ‘अम्ह’ या शब्दांच्या विभक्तीसह प्रत्येकी विकल्पेकरून ‘णं’ आणि ‘णाकं’ हे आदेश होतात; (त्यामुळे) तुम्हं, तुम्हाकं, तुम्हे; अम्हं, अम्हाकं, अम्हे. 228. නාස්මාසු තයා+මයා २२८. ‘नास्मासु तया+मया’ නාස්මාසු තුම්හඅම්හසද්දානං සවිභත්තීනං තයා+මයා හොන්ති යථාක්කමං. ‘‘නාස්මාසූ’’ති බහුවචනෙසුපි විභත්තික්කම+මනපෙක්ඛිත්වා සද්දක්කමෙන පච්චෙකං ද්වෙ ද්වෙ හොන්ති. ‘ना’ आणि ‘स्मा’ प्रत्यय असताना ‘तुम्ह’ आणि ‘अम्ह’ या शब्दांच्या विभक्तीसह अनुक्रमे ‘तया’ आणि ‘मया’ हे आदेश होतात. ‘नास्मासु’ या बहुवचनातही विभक्तीच्या क्रमाची अपेक्षा न ठेवता, शब्दांच्या क्रमानुसार प्रत्येकी दोन-दोन रूपे होतात. 213. තයාතයීනං ත්ව වා තස්ස २१३. ‘तयातयीनं त्व वा तस्स’ තුම්හස්ස තයාතයීනං තකාරස්ස ත්ව හොති වා. ත්වයා තයා, මයා. තුම්හෙහි තුම්හෙභි, අම්හෙහි අම්හෙභි. ‘तुम्ह’ शब्दाच्या ‘तया’ आणि ‘तयी’ मधील ‘त’ काराचा विकल्पेकरून ‘त्व’ होतो. (त्यामुळे) त्वया, तया; मया. (बहुवचनात) तुम्हेहि, तुम्हेभि; अम्हेहि, अम्हेभि. 229. තව+මම+තුය්හං+මය්හං සෙ २२९. ‘तव+मम+तुय्हं+मय्हं से’ සෙ තුම්හඅම්හසද්දානං සවිභත්තීනං එතෙ ආදෙසා හොන්ති යථාක්කමං. තව තුය්හං, මම මය්හං. ‘स’ प्रत्यय असताना ‘तुम्ह’ आणि ‘अम्ह’ या शब्दांच्या विभक्तीसह अनुक्रमे हे (तव, मम, तुय्हं, मय्हं) आदेश होतात. (त्यामुळे) तव, तुय्हं; मम, मय्हं. 211. නංසෙස්ව+ස්මාකං+මමං. २११. 'नं' आणि 'स' प्रत्यय असताना 'अस्माकं' आणि 'ममं' हे आदेश होतात. නංසෙස්ව+ම්හස්ස [Pg.84] සවිභත්තිස්ස අස්මාකං+මමං හොන්ති යථාක්කමං. මමං. 'नं' आणि 'स' प्रत्यय असताना, विभक्तीसह 'अम्ह' शब्दाच्या जागी अनुक्रमे 'अस्माकं' आणि 'ममं' हे आदेश होतात. (उदा.) ममं. 230. ඞං+ඞාකං නංම්හි २३०. 'नं' प्रत्यय असताना 'ङं' आणि 'ङाकं' हे आदेश होतात. නංම්හි තුම්හඅම්හසද්දානං සවිතත්තීනං ඞං+ඞාකං හොන්ති පච්චෙකං. තුම්හං තුම්හාකං අම්හං අම්හාකං අස්මාකං. කච්චායනෙ එකවචනස්ස අංවිධානත්ථං සුත්ත+මාරද්ධං, එත්ථ පන අත්තගාරවවසෙන අංම්හි තුම්හං අම්හංභි සිජ්ඣන්ති බහුලාධිකාරා. 'नं' प्रत्यय असताना, विभक्तीसह 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांच्या जागी प्रत्येकी 'ङं' आणि 'ङाकं' हे आदेश होतात. (उदा.) तुम्हं, तुम्हाकं, अम्हं, अम्हाकं, अस्माकं. कच्चायनामध्ये एकवचनासाठी 'अं' विधानाच्या उद्देशाने सूत्र सुरू केले आहे, परंतु येथे आत्मगौरवाच्या (स्वतःबद्दल आदर दर्शवण्याच्या) भावनेमुळे 'अं' प्रत्यय असताना 'तुम्हं' आणि 'अम्हं' ही रूपे 'बहुलाधिकार' (बहुळ नियमाच्या) अधिकाराने सिद्ध होतात. 214. ස්මාම්හි ත්වම්හා २१४. 'स्मा' प्रत्यय असताना 'त्वम्हा' हा आदेश होतो. ස්මාම්හි තුම්හස්ස සවිතත්තිස්ස ත්වම්හා හොති වා. ත්වම්හා ත්වයා තයා, මයා. 'स्मा' प्रत्यय असताना, विभक्तीसह 'तुम्ह' शब्दाच्या जागी 'त्वम्हा' हा आदेश पर्यायाने (विकल्पाने) होतो. (उदा.) त्वम्हा, त्वया, तया; (अम्ह शब्दाचे) मया. 226. ස්මිම්හි තුම්හම්හානං තයි+මයි २२६. 'स्मिं' प्रत्यय असताना 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांच्या जागी अनुक्रमे 'तयि' आणि 'मयि' हे आदेश होतात. ස්මිම්හි තුම්හඅම්හසද්දානංසවිභත්තීනං තයි+මයි හොති යථාක්කමං. ත්වයි තයි, මයි. තුම්හෙසු. 'स्मिं' प्रत्यय असताना, विभक्तीसह 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांच्या जागी अनुक्रमे 'तयि' आणि 'मयि' हे आदेश होतात. (उदा.) त्वयि, तयि; मयि. (बहुवचनात) तुम्हेसु. 203. සුම්හා+ම්හස්සා+ස්මා २०३. 'सु' प्रत्यय असताना 'अम्ह' शब्दाच्या जागी 'अस्मा' हा आदेश पर्यायाने होतो. අම්හස්ස අස්මා හොති වා සුම්හි. අස්මාසු අම්හෙසු. සබ්බාදයො වුත්ත+මපෙක්ඛන්තා වක්ඛමානං වාති ඉද+මෙසං ලක්ඛණං. 'सु' प्रत्यय असताना 'अम्ह' शब्दाच्या जागी 'अस्मा' हा आदेश विकल्पाने (पर्यायाने) होतो. (उदा.) अस्मासु, अम्हेसु. 'सब्ब' इत्यादी सर्वनामे आधी सांगितलेल्या आणि पुढे सांगण्यात येणाऱ्या नियमांची अपेक्षा ठेवणारी असतात, म्हणून 'वा' (विकल्पाने) हे त्यांचे लक्षण आहे. 232. අපාදාදො පදතෙ+කවාක්යෙති २३२. 'अपादादो पदतो एकवाक्ये' (पादाच्या सुरुवातीला नसलेल्या, पदाच्या पुढे असलेल्या आणि एकाच वाक्यात असलेल्या). අධිකාරො. එත්ථ පාදො නාම ගාථාය චතුත්ථංසො, තස්මා ‘‘තුම්හෙහි පුඤ්ඤං පසුතං අනප්පකං’’ති එත්ථ වො න හොති. එත්ථ පදන්ති වුත්ත සද්දො සභාවතො – हा अधिकार (नियम) आहे. येथे 'पाद' म्हणजे गाथेचा चौथा भाग (चरण), म्हणूनच “तुम्हेहि पुञ्ञं पसुतं अनप्पकं” (तुम्ही विपुल पुण्य मिळवले आहे) येथे 'वो' हा आदेश होत नाही. येथे 'पद' असे म्हटलेला शब्द स्वभावतः – ආකාසවායුප්පභවො [Pg.85] සරීරා,සමුච්චරං වත්ත+මුපෙති නාදො; ඨානන්තරෙ සුප්පටිහඤ්ඤමානො,වණ්ණත්ත+මාගච්ඡති සො තු සද්දොති – “आकाश आणि वायूपासून उत्पन्न होणारा, शरीरातून बाहेर पडणारा नाद (ध्वनी) वाणीचे रूप धारण करतो; वेगवेगळ्या उच्चारण स्थानांवर आदळून तो अक्षरांचे (वर्णांचे) रूप प्राप्त करतो, त्यालाच 'सद्द' (शब्द) असे म्हणतात” – වුත්තත්තා එකෙකො වණ්ණො සද්දො නාම, තබ්බණ්ණසමූහො පදං, තප්පදසමූහො වාක්යඤ්ච. තථා හි – असे म्हटल्यामुळे प्रत्येक एक-एक वर्ण म्हणजे 'सद्द' (शब्द) होय, त्या वर्णांचा समूह म्हणजे 'पद' होय, आणि त्या पदांचा समूह म्हणजे 'वाक्य' होय. तसेच – විතත්යන්තං පදං තස්ස, ච යො වාක්යන්ති මන්වයං; උපචාරා වණ්ණසද්ද-වාච්චං තං න පරිච්චජෙ. विभक्तीने अंत होणारे ते 'पद' आणि त्यांचा जो समूह ते 'वाक्य' असा संकेत आहे; उपचाराने (लाक्षणिक अर्थाने) वर्ण आणि शब्द या संज्ञेने जे व्यक्त होते, त्याचा त्याग करू नये. තං පදඤ්ච – आणि ते 'पद' – පදං චතුබ්බිධං වුත්තං, නාමා+ඛ්යාතො+පසග්ගජං; නිපාතජඤ්ච තඤ්ඤූ හි, අස්සො ඛල්වා+භිධාවතීති. “पद चार प्रकारचे सांगितले आहे: नाम, आख्यात (क्रियापद), उपसर्ग आणि निपात; व्याकरण जाणणारे याचे उदाहरण देतात, जसे की 'अस्सो खल्वाभिधावति' (घोडा खरोखर वेगाने धावतो).” තං වාක්යඤ්ච – आणि ते 'वाक्य' – එකාඛ්යාතො පදච්චයො, සියා වාක්යං සකාරකොති – “एक क्रियापद (आख्यात) आणि कारकांसह असलेला पदांचा समूह म्हणजे 'वाक्य' होय” – වුත්තං. තස්මා ‘‘විභත්යන්තං පදං, පදසමූහො වාක්ය’’න්ති ච වුච්චති. असे म्हटले आहे. म्हणूनच “विभक्तीने अंत होणारे ते पद, आणि पदांचा समूह म्हणजे वाक्य” असेही म्हटले जाते. 233. යොනංහිස්ව+පඤ්චම්යා වො+නො २३३. पंचमी (अपादान) सोडून इतर 'यो', 'नं' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'वो' आणि 'नो' हे आदेश होतात. අපඤ්චමියායොනංහිස්ව+පාදාදො වත්තමානානං පදස්මා පරෙස+මෙකවාක්යෙ ඨිතානං තුම්හඅම්හසද්දානං සවිභත්තීනං වො+නො හොන්ති වා යථාක්කමං. ගාමං වො ගච්ඡෙය්යාථ, ගාමං තුම්හෙ ගච්ඡෙය්යාථ. ගාමං නො ගච්ඡෙය්යාම, ගාමං අම්හෙ ගච්ඡෙය්යාම. පහාය වො ගමිස්සාමි, මා නො විකන්තිංසු. දීයතෙ වො, දීයතෙ තුම්හං. දීයතෙ [Pg.86] නො, දීයතෙ අම්හං. තුට්ඨො+ස්මි වො පකතියා, තුට්ඨො+ස්මි තුම්හං. සත්ථා නො භගවා, එසො අම්හාකං සත්ථා. කතං වො, කතං තුම්හෙහි. කතං නො, කතං අම්හෙහි. पंचमी विभक्ती सोडून, 'यो', 'नं' आणि 'हि' प्रत्यय असताना, पादाच्या सुरुवातीला नसलेल्या, दुसऱ्या पदाच्या पुढे असलेल्या आणि एकाच वाक्यात असलेल्या 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांच्या जागी विभक्तीसह अनुक्रमे 'वो' आणि 'नो' हे आदेश विकल्पाने (पर्यायाने) होतात. जसे की – “गामं वो गच्छेय्याथ” किंवा “गामं तुम्हे गच्छेय्याथ” (तुम्ही गावात जावे). “गामं नो गच्छेय्याम” किंवा “गामं अम्हे गच्छेय्याम” (आम्ही गावात जावे). “पहाय वो गमिस्सामि” (तुम्हाला सोडून मी जाईन), “मा नो विकन्तिंसु” (ते आम्हास कापू नयेत). “दीयते वो” किंवा “दीयते तुम्हं” (तुम्हाला दिले जाते). “दीयते नो” किंवा “दीयते अम्हं” (आम्हाला दिले जाते). “तुट्ठोऽस्मि वो पकतिया” किंवा “तुट्ठोऽस्मि तुम्हं” (मी तुमच्यावर स्वभावानेच प्रसन्न आहे). “सत्था नो भगवा” (भगवान आमचे शास्ता आहेत) किंवा “एसो अम्हाकं सत्था” (हे आमचे शास्ता आहेत). “कतं वो” किंवा “कतं तुम्हेहि” (तुम्ही केले आहे). “कतं नो” किंवा “कतं अम्हेहि” (आम्ही केले आहे). 234. තෙ+මෙ නාසෙ २३४. 'ना' आणि 'स' प्रत्यय असताना 'ते' आणि 'मे' हे आदेश होतात. නාම්හි සෙ ච අපාදාදො වත්තමානානං දස්මා පරෙස+මෙකවාක්යෙ ඨිතානං තුම්හඅම්හසද්දානං සවිභත්තීනං තෙ+මෙ වා හොන්ති යථාක්කමං. කතං තෙ, කතං තයා. කතං මෙ, කතං මයා. දීයතෙ තෙ, දීයතෙ තව. දීයතෙ මෙ, දීයතෙ මම. ධනං තෙ, ධනං තව. ධනං මෙ, ධනං මම. 'ना' आणि 'स' प्रत्यय असताना, पादाच्या सुरुवातीला नसलेल्या, दुसऱ्या पदाच्या पुढे असलेल्या आणि एकाच वाक्यात असलेल्या 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांच्या जागी विभक्तीसह अनुक्रमे 'ते' आणि 'मे' हे आदेश विकल्पाने होतात. जसे की – “कतं ते” किंवा “कतं तया” (तू केले आहेस). “कतं मे” किंवा “कतं मया” (मी केले आहे). “दीयते ते” किंवा “दीयते तव” (तुला दिले जाते). “दीयते मे” किंवा “दीयते मम” (मला दिले जाते). “धनं ते” किंवा “धनं तव” (तुझे धन). “धनं मे” किंवा “धनं मम” (माझे धन). 237. න ච+වා+හා+හෙ+වයොගෙ २३७. 'च', 'वा', 'हा', 'हे', 'एव' यांच्याशी योग (संबंध) असताना हे आदेश होत नाहीत. චාදීහි යොගෙ තුම්හඅම්හසද්දානං වො+නො, තෙ+මෙ න හොන්ති. ගච්ඡාම තුම්හෙ ච මයඤ්ච, පස්සති තුම්හෙ ච අම්හෙ ච, කතං තුම්හෙහි ච අම්හෙහි ච, දීයතෙ තුම්හඤ්ච අම්හඤ්ච, ධනං තුම්හඤ්ච අම්හඤ්ච, කතං තයා ච මයා ච, දීයතෙ තව ච මම ච, ධනං තව ච මම ච. එවං වාදියොගෙපි. 'च' इत्यादींशी योग असताना 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांच्या जागी 'वो', 'नो', 'ते', 'मे' हे आदेश होत नाहीत. जसे की – “गच्छाम तुम्हे च मयञ्च” (तुम्ही आणि आम्ही जातो), “पस्सति तुम्हे च अम्हे च” (तो तुम्हाला आणि आम्हाला पाहतो), “कतं तुम्हेहि च अम्हेहि च” (तुम्ही आणि आम्ही केले आहे), “दीयते तुम्हञ्च अम्हञ्च” (तुम्हाला आणि आम्हाला दिले जाते), “धनं तुम्हञ्च अम्हञ्च” (तुमचे आणि आमचे धन), “कतं तया च मया च” (तू आणि मी केले आहे), “दीयते तव च मम च” (तुला आणि मला दिले जाते), “धनं तव च मम च” (तुझे आणि माझे धन). याचप्रमाणे 'वा' इत्यादींच्या योगातही (हे आदेश होत नाहीत). 235. අන්වාදෙසෙ २३५. अन्वादेशात (पुन्हा उल्लेख करताना). කථිතානුකථිතවිසයෙ තුම්හඅම්හසද්දානං ආදෙසා නිච්චං හොන්ති පුනබ්බිධානා. ගාමො තුම්හං පරිග්ගහො, අථො ජනපදො වො පරිග්ගහො. අන්වාදෙසෙ අථො අථොති වාරද්වයාභාවා නිච්චන්ති වුත්තං. අථොසද්දො කථිතස්සෙව පුන කථනතො අන්වාදෙසජොතකො. आधी सांगितलेल्या गोष्टीचा पुन्हा उल्लेख करण्याच्या विषयात (अन्वादेशात), 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांचे आदेश पुन्हा विधान केल्यामुळे नित्य (अनिवार्य) होतात. जसे की – “गामो तुम्हं परिग्गहो, अथो जनपदो वो परिग्गहो” (गाव हा तुमचा ताबा आहे, आणि प्रांतही तुमचाच ताबा आहे). अन्वादेशात 'अथो' हा शब्द दोनदा वापरला जात नसल्यामुळे हा नियम 'नित्य' आहे असे म्हटले आहे. 'अथो' हा शब्द आधी सांगितलेल्या गोष्टीचा पुन्हा उल्लेख करत असल्यामुळे तो अन्वादेशाचा द्योतक (दर्शक) आहे. 236. සපුබ්බා පඨමන්තා වා २३६. पूर्वपद असलेल्या प्रथमान्त पदाच्या पुढे 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांचे आदेश विकल्पाने होतात. විජ්ජමානපුබ්බස්මා [Pg.87] පඨමන්තා පරෙසං තුම්හාම්හානං ආදෙසා වා හොන්ති අන්වාදෙසෙ. ගාමෙ පටො තුම්හාකං අථො නගරෙ කම්බලො වො අථො නගරෙ කම්බලො තුම්හාකං, අථොති අනුකථනවාරද්වයත්තා විකප්පො සපුබ්බාති කිං, පටො තුම්හාකං, අථො කම්බලො වො. පඨමන්තාති කිං, පටො නගරෙ තුම්හාකං, අථො කම්බලො ගාමෙ වො. विद्यमान पूर्वपद असलेल्या प्रथमान्त पदाच्या पुढे 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांचे आदेश अन्वादेशात विकल्पाने (पर्यायाने) होतात. जसे की – “गामे पटो तुम्हाकं अथो नगरे कम्बलो वो” किंवा “अथो नगरे कम्बलो तुम्हाकं” (गावातील वस्त्र तुमचे आहे आणि शहरातील घोंगडीही तुमचीच आहे). येथे 'अथो' या शब्दाने दोनदा पुन्हा कथन केल्यामुळे विकल्प होतो. 'सपुब्बा' (पूर्वपद असलेले) असे का म्हटले आहे? “पटो तुम्हाकं, अथो कम्बलो वो” (वस्त्र तुमचे आहे, आणि घोंगडीही तुमची आहे). 'पठमन्ता' (प्रथमान्त पदाच्या पुढे) असे का म्हटले आहे? “पटो नगरे तुम्हाकं, अथो कम्बलो गामे वो” (शहरातील वस्त्र तुमचे आहे, आणि गावातील घोंगडीही तुमची आहे). 238. දස්සනත්ථෙ+නාලොචනෙ २३८. दर्शन (पाहणे) या अर्थी, परंतु आलोचन (दिसणे/दाखवणे) नसताना. දස්සනත්ථෙ ආලොවචනවජ්ජිතෙ පයුජ්ජමානෙ තුම්හඅම්හාන+මාදෙසා න හොන්ති. ගාමො තුම්හෙ උද්දිස්ස ආගතො, ගාමො අම්හෙ උද්දිස්ස ආගතො. අනාලොචනෙති කිං, ගාමො වො ආලොචෙති, ගාමො නො ආලොචෙති. आलोचन (दिसणे/दाखवणे) वर्ज्य करून, दर्शन (पाहणे) या अर्थी प्रयोग केला असता 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांचे आदेश होत नाहीत. जसे की – “गामो तुम्हे उद्दिस्स आगतो” (गाव तुमच्या उद्देशाने आला आहे), “गामो अम्हे उद्दिस्स आगतो” (गाव आमच्या उद्देशाने आला आहे). 'अनालोचने' (आलोचन नसताना) असे का म्हटले आहे? “गामो वो आलोचेति” (गाव तुम्हाला पाहतो/दाखवतो), “गामो नो आलोचेति” (गाव आम्हाला पाहतो/दाखवतो). 239. ආමන්තණං පුබ්බ+මසන්තංව २३९. पूर्वपदी असलेले संबोधन हे (आदेश करण्याच्या बाबतीत) जणू काही अस्तित्वात नसल्यासारखे मानले जाते. ආමන්තණං පුබ්බ+විජ්ජමානං විය හොති තුම්හාම්හාන+මාදෙසවිසයෙ. දෙවදත්ත තව පරිග්ගහො. ආමන්තණන්ති කිං, කම්බලො තෙ පරිග්ගහො. 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांच्या आदेशाच्या बाबतीत, पूर्वपदी असलेले संबोधन हे जणू काही अस्तित्वात नसल्यासारखे मानले जाते. जसे की – “देवदत्त तव परिग्गहो” (हे देवदत्त, हा तुझा ताबा आहे - येथे 'देवदत्त' हे संबोधन असल्यामुळे ते नसल्यासारखे मानले जाते, त्यामुळे 'तव' च्या जागी 'ते' हा आदेश होत नाही कारण तो सुरुवातीला येतो). 'आमन्तणं' (संबोधन) असे का म्हटले आहे? “कम्बलो ते परिग्गहो” (घोंगडी हा तुझा ताबा आहे - येथे 'कम्बलो' हे संबोधन नाही, म्हणून 'ते' हा आदेश होतो). 240. න සාමඤ්ඤවචන+මෙකත්ථෙ २४०. एकाच अर्थी (समानाधिकरण) असलेले सामान्यवाचक संबोधन असल्यास ते (अस्तित्वात नसल्यासारखे) होत नाही. සමානාධිකරණෙ පරතො සාමඤ්ඤවචන+මාමන්තණං එකත්ථෙ අසන්තං විය න හොති මාණවක ජටිලක තෙ පරිග්ගහො. පරාමන්ථණෙ අසතිපි පුබ්බ+මුපාදාය ආදෙසො. समानाधिकरण (एकाच अर्थी) असलेले सामान्यवाचक संबोधन पुढे असताना, ते जणू काही अस्तित्वात नसल्यासारखे होत नाही. जसे की – “माणवक जटिलक ते परिग्गहो” (हे माणवका, हे जटिला, हा तुझा ताबा आहे - येथे 'जटिलक' हे सामान्यवाचक संबोधन असल्यामुळे ते नसल्यासारखे मानले जात नाही, म्हणून 'ते' हा आदेश होतो). दुसरे संबोधन नसले तरीही पूर्वपदाचा आधार घेऊन आदेश होतो. 241. බහූසු වා २४१. बहुवचनात विकल्पाने (पर्यायाने) होते. බහූසු [Pg.88] වත්තමාන+මාමන්තණං සාමඤ්ඤවචන+මෙකත්ථෙ අසන්තං විය වා න හොති. ‘‘සිද්ධෙ සත්යාරම්භො නීයමාය වා විකප්පායවා’’ති වුත්තත්තා විකප්පත්ථ+මිදං. බ්රාහ්මණා ගුණවන්තො තුම්හාකං පරිග්ගහො, බ්රාහ්මණා ගුණවන්තො වො පරිග්ගහො. बहुवचनात असलेले सामान्यवाचक संबोधन एकाच अर्थी असताना, ते जणू काही अस्तित्वात नसल्यासारखे विकल्पाने (पर्यायाने) होत नाही. “सिद्ध गोष्ट असताना नवीन नियम सुरू करणे हे एकतर नियमासाठी असते किंवा विकल्पासाठी असते” असे म्हटल्यामुळे हा नियम विकल्पासाठी आहे. जसे की – “ब्राह्मणा गुणवन्तो तुम्हाकं परिग्गहो” किंवा “ब्राह्मणा गुणवन्तो वो परिग्गहो” (हे गुणवान ब्राह्मणांनो, हा तुमचा ताबा आहे). උභ+කතිසද්දා බහුවචනන්තා. ‘‘උභ+ගොහි ටො’’ති යොනං ටො, උභො. කථං ‘‘උභයො වසෙමසෙ’’ති, ටොම්හි යකාරාගමො. උභො. 'उभ' आणि 'कति' हे शब्द नेहमी बहुवचनात असतात. “उभगोहि टो” या सूत्राने 'यो' प्रत्ययाच्या जागी 'टो' आदेश होऊन 'उभो' असे रूप बनते. “उभयो वसेमसे” (आम्ही दोघे राहतो) हे रूप कसे सिद्ध होते? तर 'टो' प्रत्यय असताना 'य' काराचा आगम (यकार-आगम) होतो. उभो. 59. සුහිසු+භස්සො ५९. 'सु' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'उभ' शब्दाच्या जागी 'ओ' हा आदेश होतो. උභස්ස සුහිස්වො හොති. උභොහි උභොභි. 'उभ' शब्दाच्या पुढे 'सु' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'ओ' (o) होतो. (उदा.) उभोहि, उभोभि. 50. උභි+න්නං ५०. उभिन्नं (दोन्हींना/दोन्हींचे). උභා නංවචනස්ස ඉන්නං හොති. උභින්නං, උභොසු. 'उभ' शब्दाच्या पुढे 'नं' (naṃ) प्रत्यय असताना 'इन्नं' (innaṃ) आदेश होतो. (उदा.) उभिन्नं, उभोसु. 168. ටි කතිම්හා १६८. 'कति' शब्दाच्या पुढे 'टि' (ṭi) होतो. කතිම්හා යොනං ටි හොති. කති, කති. ඣතො යොලොපපසඞ්ගෙ දීඝනිවත්තනත්ථං ටිආදෙසො. කතීහි කතීභි. ‘‘බහුකතින්නං’’ති නුක, කතින්නං, කතීසු. 'कति' शब्दाच्या पुढे 'यो' प्रत्ययाचा 'टि' (ṭi) होतो. कति, कति. 'झ' संज्ञक (इ-कारान्त) शब्दाच्या पुढे 'यो' चा लोप होण्याचा प्रसंग असताना, दीर्घत्व रोखण्यासाठी 'टि' आदेश केला आहे. कतीहि, कतीभि. "बहुकतिन्नं" या सूत्राने 'नुक' (नु-आगम) होऊन 'कतिन्नं' आणि 'कतीसु' असे रूप होते. 1,54. විච්ඡා+භික්ඛඤ්ඤෙසු ද්වෙ १,५४. वीप्सा (पुनरावृत्ती) आणि आभीक्ष्ण्य (सतत घडणे) या अर्थांमध्ये शब्दाचे द्वित्व (दोन रूपे) होते. විච්ඡාය+මාභික්ඛඤ්ඤෙ ච ද්වෙ රූපානි හොන්ති. ක්රියා+ගුණ+දබ්බෙහි බ්යාපෙතු+මිච්ඡා විච්ඡා. රුක්ඛං රුක්ඛං සිඤ්චන්ති, ගාමො ගාමො රමණීයො, ගාමෙ ගාමෙ පානීයං. ආභික්ඛඤ්ඤං=පොනොපුඤ්ඤං, පචති පචති, පපචති පපචති. वीप्सा आणि आभीक्ष्ण्य यामध्ये दोन रूपे (द्वित्व) होतात. क्रिया, गुण आणि द्रव्य यांच्याद्वारे व्यापण्याची इच्छा म्हणजे 'वीप्सा' होय. (उदा.) रुक्खं रुक्खं सिंचन्ति (प्रत्येक झाडाला पाणी घालतात), गामो गामो रमणीयो (प्रत्येक गाव रमणीय आहे), गामे गामे पानीयं (प्रत्येक गावात पाणी आहे). आभीक्ष्ण्य म्हणजे वारंवारता (पुनःपुन्हा घडणे), जसे की - पचति पचति (रांधतो रांधतो), पपचति पपचति. 1,55. ස්යාදිලොපො පුබ්බස්සෙ+කස්ස १,५५. द्वित्व झालेल्या शब्दांपैकी पहिल्या शब्दाच्या 'स्यादि' (विभक्ती) प्रत्ययाचा लोप होतो. විච්ඡාය+මෙකස්ස [Pg.89] ද්විත්තෙ පුබ්බස්ස ස්යාදිලොපො හොති. එකස්ස එකස්සාති ද්විත්තෙ එකෙකස්ස. කථං ‘‘මත්ථකමත්ථකෙනා’’ති, ‘‘ස්යාදිලොපො පුබ්බස්සා’’ති යොගවිභාගා, යොගවිභාගා ච ඉට්ඨපසිද්ධීති. वीप्सा अर्थामध्ये 'एक' शब्दाचे द्वित्व झाल्यावर पहिल्या शब्दाच्या 'स्यादि' प्रत्ययाचा लोप होतो. 'एकस्स एकस्स' चे द्वित्व होऊन 'एकेकस्स' (ekekassa) बनते. "मत्थकमत्थकेन" (डोक्यावर डोके) हे रूप कसे सिद्ध होते? "स्यादिलोपो पुब्बस्स" या सूत्राच्या योगविभागामुळे (सूत्र विभागल्यामुळे) आणि योगविभागाद्वारे इष्ट रूपांची सिद्धी होते. 1,56. සබ්බාදීනං වීතිහාරෙ १,५६. 'सब्ब' इत्यादी शब्दांचे व्यतिहार (परस्पर क्रिया) अर्थामध्ये द्वित्व होते. සබ්බාදීනං වීතිහාරෙ ද්වෙ භවන්ති. පුබ්බස්ස ස්යාදිලොපො ච, අඤ්ඤස්ස අඤ්ඤස්ස භොජකා අඤ්ඤමඤ්ඤස්ස භොජකා, එවං ඉතරීතරස්ස. व्यतिहार अर्थामध्ये 'सब्ब' इत्यादी शब्दांचे द्वित्व होते आणि पहिल्या शब्दाच्या 'स्यादि' प्रत्ययाचा लोप होतो. जसे की, 'अञ्ञस्स अञ्ञस्स भोजका' चे 'अञ्ञमञ्ञस्स भोजका' (एकमेकांना भोजन देणारे) होते. याचप्रमाणे 'इतरीतरस्स' (itarītarassa) बनते. 1,57. යාවබොධං සම්භමෙ १,५७. संभ्रमात (घाईघाईत किंवा भीतीने) आकलन होईपर्यंत शब्दांची पुनरावृत्ती होते. තුරිතෙනා+පායහෙතුපදස්සනං සම්භමො, තස්මිං සති වත්තු යාවන්තෙහි සද්දෙහි සො+ත්ථො විඤ්ඤායතෙ, තාවන්තො පයුජ්ජන්තෙ. සප්පො සප්පො සප්පො, බුජ්ඣස්සු බුජ්ඣස්සු බුජ්ඣස්සු, භින්නො භික්ඛුසඞ්ඝො, භින්නො භික්ඛුසඞ්ඝො. घाईघाईने अपायकारक (धोक्याचे) कारण दाखवणे म्हणजे 'संभ्रम' होय. तो असताना, वक्त्याला जोपर्यंत अर्थ समजेल असे वाटते, तोपर्यंत शब्दांचा प्रयोग केला जातो. जसे की - सप्पो सप्पो सप्पो (साप! साप! साप!), बुज्झस्सु बुज्झस्सु बुज्झस्सु (जागे व्हा! जागे व्हा! जागे व्हा!), भिण्णो भिक्खुसंघो, भिण्णो भिक्खुसंघो (भिक्खू संघात फूट पडली, भिक्खू संघात फूट पडली). භයෙ කොධෙ පසංසායං, තුරිතෙ කොතූහල+ච්ඡරෙ; හාසෙ සොකෙ පසාදෙ ච, කරෙ ආමෙඩිතං බුධො. भय, क्रोध, प्रशंसा, घाई, कुतूहल, आश्चर्य, हर्ष, शोक आणि प्रसन्नता (प्रसाद) यामध्ये विद्वानांनी शब्दांचे द्वित्व (आम्रेडित) करावे. සඞ්ඛ්යාකණ්ඩ संख्याकांड (संख्या प्रकरण). අථ සඞ්ඛ්යාසද්දා වුච්චන්තෙ. එකාදයො අට්ඨාරසන්තා සඞ්ඛ්යෙය්යවචනා. වීසතිආදයො ‘‘භික්ඛූනං වීසතී’’තිආදීසු සඞ්ඛ්යාවචනා, ‘‘වීසති භික්ඛවො’’තිආදීසු සඞ්ඛ්යෙය්යවචනා. එකසද්දො සබ්බාදීසු වුත්තොව. ද්වාදයො අට්ඨාරසන්තා බහුවචනන්ථාව. आता संख्यावाचक शब्दांचे विवेचन केले जात आहे. 'एक' पासून 'अठ्ठारस' (अठरा) पर्यंतचे शब्द हे संख्या मोजल्या जाणाऱ्या वस्तूंचे वाचक (संख्येयवाचक) असतात. 'वीसति' (वीस) इत्यादी शब्द "भिक्खूनां वीसति" (भिक्खूंची वीस संख्या) इत्यादींमध्ये संख्यावाचक असतात, आणि "वीसति भिक्खवो" (वीस भिक्खू) इत्यादींमध्ये संख्येयवाचक असतात. 'एक' हा शब्द 'सब्बादि' (सर्वनाम) गणात आधीच सांगितला आहे. 'द्वि' (दोन) पासून 'अठ्ठारस' (अठरा) पर्यंतचे शब्द केवळ बहुवचनातच असतात. 219. යොම්හි ද්වින්නං දුවෙ+ද්වෙ २१९. 'यो' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'द्वि' शब्दाचे 'दुवे' आणि 'द्वे' असे आदेश होतात. යොම්හි [Pg.90] ද්විස්ස සවිභත්තිස්ස දුවෙ+ද්වෙ හොන්ති පච්චෙකං. දුවෙ ද්වෙ, දුවෙ ද්වෙ, ද්වීහි ද්වීභි. 'यो' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'द्वि' शब्दाचे अनुक्रमे 'दुवे' आणि 'द्वे' हे आदेश होतात. (उदा.) दुवे, द्वे; दुवे, द्वे; द्वीहि, द्वीभि. 220. දුවින්නං නංම්හි වා २२०. 'नं' (naṃ) प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'द्वि' शब्दाचे पर्यायाने (विकल्पाने) 'दुविन्नं' असे रूप होते. නංම්හි ද්විස්ස සවිභත්තිස්ස දුවින්නං හොති වා. දුවින්නං, අඤ්ඤත්ර – 'दुविन्नं' होते, इतर ठिकाणी (दुसऱ्या पक्षी) – 47. නංම්හි නුක ද්වාදීනං සත්තරසන්නං ४७. 'नं' प्रत्यय असताना 'द्वि' पासून सुरू होणाऱ्या सतरा संख्यावाचक शब्दांना 'नुक' (नु-आगम) होतो. ද්වාදීනං සත්තරසන්නං සඞ්ඛ්යානං නුක හොති නංම්හි විභත්තිම්හි. උකාරො උච්චාරණත්ථො, කකාරො අන්තාවයවත්ථො. එත්ථ නාගමො විභත්තිස්ස ආද්යාවයවො චෙ, ‘‘ආගමා තග්ගුණීභූතා තග්ගහණෙන ගය්හන්තෙ’’ති ඤායා නාගමොපි තංගහණෙන ගය්හතීති ‘‘සුනංහිසූ’’ති දීඝප්පසඞ්ගෙ පකතියා අන්තාවයවභූතෙ සරන්තතා නත්ථීති න දීඝො. ද්වින්නං, ද්වීසු. 'द्वि' पासून सुरू होणाऱ्या सतरा संख्यावाचक शब्दांच्या पुढे 'नं' विभक्ती प्रत्यय असताना 'नुक' (नु-आगम) होतो. यातील 'उ' हा उच्चारणासाठी आहे आणि 'क' हा अंत-अवयव (शेवटचा भाग) दर्शवण्यासाठी आहे. येथे जर 'न' हा आगम विभक्तीचा आदि-अवयव (सुरुवातीचा भाग) मानला, तर "आगमा तग्गुणीभूता तग्गहणेन गय्हन्ते" (आगम हे ज्याचे असतात त्याचेच अंग बनतात आणि त्याच्याच ग्रहणाने ग्रहण केले जातात) या न्यायानुसार 'न' आगम देखील विभक्तीच्या ग्रहणाने ग्रहण केला जातो. त्यामुळे "सुनंहीसु" या सूत्राने दीर्घ होण्याचा प्रसंग आला असता, तो प्रकृतीचा (शब्दाचा) अंत-अवयव असल्यामुळे आणि स्वरान्त नसल्यामुळे दीर्घ होत नाही. (उदा.) द्विन्नं, द्वीसु. 207. පුමෙ තයො+චත්තාරො २०७. पुल्लिंगात 'यो' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'ति' आणि 'चतु' शब्दांचे अनुक्रमे 'तयो' आणि 'चत्तारो' हे आदेश होतात. යොම්හි සවිභත්තීනං ති+චතුන්නං තයො+චත්තාරො හොන්ති යථාක්කමං පුල්ලිඞ්ගෙ. තයො, තයො, තීහි තීභි. पुल्लिंगात 'यो' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'ति' आणि 'चतु' शब्दांचे अनुक्रमे 'तयो' आणि 'चत्तारो' हे आदेश होतात. (उदा.) तयो, तयो; तीहि, तीभि. 49. ණ්ණං+ණ්ණන්නං තිතො ඣා ४९. 'झ' संज्ञक 'ति' शब्दाच्या पुढे 'नं' प्रत्ययाचे 'ण्णं' (ṇṇaṃ) आणि 'ण्णन्नं' (ṇṇannaṃ) हे आदेश होतात. ඣසඤ්ඤිතො තිතො නංවචනස්ස ණ්ණං+ණ්ණන්නං හොන්ති. තිණ්ණං තිණ්ණන්නං, තීසු. 'झ' संज्ञक 'ति' शब्दाच्या पुढे 'नं' प्रत्ययाचे 'ण्णं' आणि 'ण्णन्नं' हे आदेश होतात. (उदा.) तिण्णं, तिण्णन्नं; तीसु. ඉත්ථියං – स्त्रीलिंगात – 205. තිස්සො චතස්සො යොම්හි සවිභත්තීනං २०५. स्त्रीलिंगात 'यो' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'ति' आणि 'चतु' शब्दांचे अनुक्रमे 'तिस्सो' आणि 'चतस्सो' हे आदेश होतात. විභත්තිසහිතානං තිචතුන්නං යොම්හි තිස්සො+චතස්සො හොන්ති ඉත්ථියං යථාක්කමං. තිස්සො, තිස්සො, තීහි තීභි. स्त्रीलिंगात 'यो' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'ति' आणि 'चतु' शब्दांचे अनुक्रमे 'तिस्सो' आणि 'चतस्सो' हे आदेश होतात. (उदा.) तिस्सो, तिस्सो; तीहि, तीभि. 204. නංම්හි තිචතුන්න+මිත්ථියං තිස්ස+චතස්සා २०४. स्त्रीलिंगात 'नं' प्रत्यय असताना 'ति' आणि 'चतु' शब्दांचे अनुक्रमे 'तिस्स' आणि 'चतस्स' हे आदेश होतात. නංම්හි [Pg.91] තිචතුන්නං තිස්ස+චතස්සා හොන්ති+ත්ථියං යථාක්කමං. නංම්හීති චතුත්ථීඡට්ඨීනං සාමඤ්ඤවචනං, නො චෙ නංසූති වදති, යථාක්කමංති සද්දද්වයාපෙක්ඛං. එව+මීදිස+මඤ්ඤම්පි. තිස්සන්නං තීසු. स्त्रीलिंगात 'नं' प्रत्यय असताना 'ति' आणि 'चतु' शब्दांचे अनुक्रमे 'तिस्स' आणि 'चतस्स' हे आदेश होतात. 'नं' (naṃmhi) हा चतुर्थी आणि षष्ठी विभक्तीचा सामान्य निर्देश आहे, अन्यथा 'नंसु' असे म्हटले असते. 'यथाक्रमं' हा शब्द दोन्ही शब्दांच्या अपेक्षेने आहे. इतरही अशाच प्रकारे समजावे. (उदा.) तिस्सन्नं, तीसु. 206. තීණි+චත්තාරි නපුංසකෙ २०६. नपुंसकलिंगात 'यो' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'ति' आणि 'चतु' शब्दांचे अनुक्रमे 'तीणि' आणि 'चत्तारि' हे आदेश होतात. යොම්හි සවිභත්තීනං තිචතුන්නං යථාක්කමං තීණි+චත්තාරි හොන්ති නපුංසකෙ. තීණි, තීණි, තීහි ඉච්චාදි පුල්ලිඞ්ගෙව. नपुंसकलिंगात 'यो' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'ति' आणि 'चतु' शब्दांचे अनुक्रमे 'तीणि' आणि 'चत्तारि' हे आदेश होतात. (उदा.) तीणि, तीणि; तीहि इत्यादी रूपे पुल्लिंगाप्रमाणेच होतात. චතු යො, 'चतु' शब्दाच्या पुढे 'यो' प्रत्यय असताना – 208. චතුරො වා චතුස්ස २०८. विभक्तीसह 'चतु' शब्दाचा 'यो' प्रत्यय असताना पर्यायाने 'चतुरो' आदेश होतो. චතුස්ස සවිභත්තිස්ස යොම්හි චතුරො හොති වා පුල්ලිඞ්ගෙ. චතුරො චත්තාරො. කථං ‘‘චතුරො නිමිත්තෙ නාද්දසාසි’’න්ති, ලිඞ්ගවිපල්ලාසෙන සිද්ධං, චත්තාරි නිමිත්තානීති අත්ථො. විපල්ලාසො තිවිධො ලිඞ්ගවිපල්ලාසො වචනවිපල්ලාසො විභත්තිවිපල්ලාසොති. චතූහි චතූභි. චතුන්නං, චතූසු. पुल्लिंगात 'यो' प्रत्यय असताना विभक्तीसह 'चतु' शब्दाचे पर्यायाने 'चतुरो' हे रूप होते. (उदा.) चतुरो, चत्तारो. "चतुरो निमित्ते नाद्दसासि" (चार निमित्त पाहिले नाहीत) हे रूप कसे सिद्ध होते? तर हे लिंगविपर्यासामुळे (लिंग बदलल्यामुळे) सिद्ध होते, ज्याचा अर्थ 'चत्तारि निमित्तानि' (नपुंसकलिंगी) असा आहे. विपर्यास तीन प्रकारचा असतो: लिंगविपर्यास, वचनविपर्यास आणि विभक्तीविपर्यास. (उदा.) चतूहि, चतूबि; चतुन्नं, चतूसु. ඉත්ථියං චතස්සො. චතස්සො. චතූහි චතූභි. චතස්සන්නං. චතස්සන්නං. චතූසු. स्त्रीलिंगात - चतस्सो, चतस्सो; चतूहि, चतूबि; चतस्सन्नं, चतस्सन्नं; चतूसु. නපුංසකෙ චත්තාරි. චත්තාරි. චතූහි චතූභි. ඉච්චාදි පුමෙව. नपुंसकलिंगात - चत्तारि, चत्तारि; चतूहि, चतूबि; इत्यादी रूपे पुल्लिंगाप्रमाणेच होतात. 169. ට පඤ්චාදීහි චුද්දසහි १६९. 'पंच' (पाच) इत्यादी चौदा संख्यावाचक शब्दांच्या पुढे 'ट' (ṭa) होतो. ‘‘සුත්තෙ ලිඞ්ගවචනමත්ත’’න්ති ඤායා ට-ඉති වුත්තං. පඤ්චාදීහි චුද්දසහි සඞ්ඛ්යාහි යොනං ට හොති. පඤ්ච. පඤ්ච. යොනං ටා+ටෙනිවත්ථනත්ථං ට-විධානං. "सुत्ते लिंगवचनमत्तं" (सूत्रात लिंग आणि वचन केवळ निर्देशमात्र असतात) या न्यायाने 'ट' असे म्हटले आहे. 'पंच' इत्यादी चौदा संख्यावाचक शब्दांच्या पुढे 'यो' प्रत्ययाचा 'ट' होतो. (उदा.) पंच, पंच. 'यो' प्रत्ययाचे 'टा' किंवा 'टे' होणे रोखण्यासाठी 'ट' चे विधान केले आहे. 90. පඤ්චාදීනං චුද්දසන්න+ම ९०. पञ्च इत्यादी चौदा संख्यावाचक शब्दांच्या शेवटी 'म' होतो. පඤ්චාදීනං [Pg.92] චුද්දසන්නං සුනංහිස්ව හොති. එත්ත+දීඝාපවාදො+යං. අපවාදති බාධෙතීති අපවාදො. තස්මා ‘‘පකප්යාපවාදවිසයමුස්සග්ගා අභිනිවිසන්තෙ’’ති ඤායා ‘‘සුහිස්ව+ස්සෙ’’ ‘‘සුනංහිසු’’ති ච උස්සග්ගා ‘‘පඤ්චාදීනං චුද්දසන්න+ම’’ ඉති අපවාදවිසයං න පවිසන්ති, සාමඤ්ඤත්තා. එව+මුපරිපි ‘‘පඤ්චමියං පරස්ස’’ ‘‘ආදිස්සා’’ති. පඤ්චහි පඤ්චභි පඤ්චන්නං. පඤ්චන්නං. පඤ්චසු. එවං ඡාදයො අට්ඨාරසන්තා. पञ्च इत्यादी चौदा संख्यावाचक शब्दांच्या पुढे 'सु', 'नं' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'म' होतो. येथे हा दीर्घाचा अपवाद आहे. जो बाध करतो (नियम रोखतो) त्याला अपवाद म्हणतात. म्हणून 'अपवादाचा विषय सोडून सामान्य नियम प्रवृत्त होतात' या न्यायाने, 'सुहिस्वेस्से' आणि 'सुनंहीसु' हे सामान्य नियम (उत्सर्ग) 'पञ्चादीनं चुद्दसन्नम' या अपवाद विषयात प्रवेश करत नाहीत, कारण ते सामान्य आहेत. याचप्रमाणे पुढेही 'पञ्चमियं परस्स' आणि 'आदिस्सा' हे नियम लागू होतात. उदा. पञ्चहि, पञ्चभि, पञ्चन्नं, पञ्चन्नं, पञ्चसु. याचप्रमाणे 'छ' (सहा) इत्यादी अठरापर्यंतचे शब्द चालतात. ‘‘චත්ථෙ’’ති එකො ච දස චාති චත්තසමාසෙ ‘‘අමාදී’’ති එකෙන අධිකා දසාති තතියාසමාසෙ වා කතෙ ‘‘එකත්ථතාය’’න්ති විභත්තිලොපො. එව+මුපරි ච. 'चत्थे' यामध्ये 'एको च दसो च' असा द्वंद्व समास केल्यावर, किंवा 'एकेन अधिका दसा' असा तृतीया तत्पुरुष समास केल्यावर, 'एकत्थताय' (एकार्थतेमुळे) विभक्तीचा लोप होतो. पुढेही याचप्रमाणे समजावे. 3,102. එකට්ඨාන+මා ३,१०२. एकट्ठानाम आ එකඅට්ඨානං ආ හොති දසෙ පරෙ. 'दस' (दहा) शब्द पुढे असताना 'एक' आणि 'अट्ठ' (अष्ट) यांच्या जागी 'आ' होतो. 3,103. ර සංඛ්යාතො වා ३,१०३. र संख्यातो वा සංඛ්යාතො පරස්ස දසස්ස ර හොති විභාසා. ස ච ‘‘පඤ්චමියං පරස්සා’’ති වත්තමානෙ ‘‘ආදිස්සා’’ති දකාරස්සෙව හොති. එකාරස එකාදස. එකාරසහි එකාදසහි. එකාරසන්නං එකාදසන්නං. එකාරසසු එකාදසසු. එව+මෙකාදසඉච්චාදිපි. संख्यावाचक शब्दाच्या पुढील 'दस' च्या जागी विकल्पेकरून 'र' होतो. आणि तो 'पञ्चमियं परस्स' आणि 'आदिस्सा' या सूत्रांच्या अधिकारात 'द' काराच्या जागीच होतो. उदा. एकारस, एकादस (अकरा). एकारसहि, एकादसहि; एकारसन्नं, एकादसन्नं; एकारससु, एकादससु. याचप्रमाणे 'एकादस' इत्यादी रूपे होतात. 3,94. ආ සංඛ්යායා සතාදො නාඤ්ඤත්ථෙ ३,९४. आ संख्याया सतादो नाञ्ञत्थे සංඛ්යාය+මුත්තරපදෙ [Pg.93] ද්විස්සා හොති අසතාදො නාඤ්ඤත්ථෙ. शंभर इत्यादी सोडून इतर संख्यावाचक उत्तरपद पुढे असताना 'द्वि' च्या जागी 'आ' होतो, इतर अर्थी नाही. ආවිට්ඨලිඞ්ගත්තා සංඛ්යායං උත්තරපදෙ සලිඞ්ගෙනෙව විසෙසනං භවති. 'आविट्ठलिंग' (प्रकट लिंग) असल्यामुळे, संख्यावाचक उत्तरपद पुढे असताना आपल्या लिंगानुसारच विशेषण होते. සුද්ධං මිස්සඤ්ච සංකිණ්ණං, උපසජ්ජනමෙව ච; ආවිට්ඨ+මථ වා+බ්යත්තං, ඡධා ලිඞ්ගං විවංයතෙ. शुद्ध, मिश्र, संकीर्ण, उपसर्जन, आविट्ठ आणि अव्यक्त अशा सहा प्रकारे लिंगाचे विभाजन केले जाते. එත්ථ යථාක්කමං රුක්ඛො ලතා පණ්ණංති සුද්ධං. ඝටො ඝටී, වජිරො වජිරං, වෙදනා වෙදනංති මිස්සං. තටො තටී තටංති සංකිණ්ණං. සුක්කො පටො, සුක්කා පටි, සුක්කං වත්ථංති උපසජ්ජනං. රාජා සරණං, ගුණො පමාණංති ආවිට්ඨං. තුවං අහං කති පඤ්චාති අබ්යත්තං. ඉති ලිඞ්ගං වෙදිතබ්බං. ද්වාදස. येथे अनुक्रमे 'रुक्खो' (वृक्ष), 'लता', 'पण्णं' (पान) हे 'शुद्ध' लिंग आहे. 'घटो-घटी', 'वजिरो-वजिरं', 'वेदना-वेदनं' हे 'मिश्र' लिंग आहे. 'तटो-तटी-तटं' हे 'संकीर्ण' लिंग आहे. 'सुक्को पटो', 'सुक्का पटि', 'सुक्कं वत्थं' हे 'उपसर्जन' लिंग आहे. 'राजा सरणं', 'गुणो पमाणं' हे 'आविट्ठ' लिंग आहे. 'तुवं', 'अहं', 'कति', 'पञ्च' हे 'अव्यक्त' लिंग आहे. अशा प्रकारे लिंग समजून घ्यावे. उदा. द्वादस (बारा). 3,98. බා චත්තාලීසා දො ३,९८. बा चत्तालीसा दो ද්විස්ස බා වා හොති චත්තාලීසා දො නාඤ්ඤත්ථෙ. රාදෙ සෙ බාරස. चाळीस इत्यादी सोडून इतर ठिकाणी 'द्वि' च्या जागी विकल्पेकरून 'बा' होतो. 'र' आदेश झाल्यावर 'बारस' (बारा) रूप बनते. 3,95. තිස්සෙ ३,९५. तिस्से සංඛ්යාය+මුත්තරපදෙ තිස්ස එ හොත+සතාදො නා+ඤ්ඤත්ථෙ. शंभर इत्यादी सोडून इतर संख्यावाचक उत्तरपद पुढे असताना 'ति' च्या जागी 'ए' होतो, इतर अर्थी नाही. 3,104. ඡතීහි ළො ච ३,१०४. छतीहि ळो च ඡතීහි පරස්ස දසස්ස ළො හොති රො ච. තෙළස තෙරස. 'छ' आणि 'ति' च्या पुढील 'दस' च्या जागी 'ळ' आणि 'र' होतो. उदा. तेळस, तेरस (तेरा). 3,100. චතුස්ස චුචො දසෙ ३,१००. चतुस्स चुचो दसे චතුස්ස චු+චො හොන්ති වා දසෙ පරෙ. ද්විත්තෙ චුද්දස චොද්දස චතුද්දස. 'दस' पुढे असताना 'चतु' च्या जागी विकल्पेकरून 'चु' आणि 'चो' होतो. द्वित्व झाल्यावर 'चुद्दस', 'चोद्दस', 'चतुद्दस' (चौदा) अशी रूपे होतात. 3,99. වීසතිදසෙසු පඤ්චස්ස පණ්ණ+පන්නා ३,९९. वीसतिदसेसु पञ्चस्स पण्णपन्ना වීසති [Pg.94] සෙසු පරෙසු පඤ්චස්ස පණ්ණ+පන්නා හොන්ති යථාක්කමං. පන්නරස පඤ්චදස. 'वीसति' आणि 'दस' पुढे असताना 'पञ्च' च्या जागी अनुक्रमे 'पण्ण' आणि 'पन्न' होतो. उदा. पन्नरस, पञ्चदस (पंधरा). 3,101. ඡස්ස සො ३,१०१. छस्स सो ඡස්ස සො-ඉච්ච+ය+මාදෙසො හොති සෙ පරෙ. සොළස සොරස. සත්තරස සත්තදස. ‘‘එකට්ඨාන+මා’’ති ආ, අට්ඨාරස අට්ඨාදස. 'दस' (ज्याचा 'स' उरतो) पुढे असताना 'छ' च्या जागी 'सो' हा आदेश होतो. उदा. सोळस, soळस (सोळा). सत्तरस, सत्तदस (सतरा). 'एकट्ठानाम आ' या सूत्राने 'आ' होऊन अठ्ठारस, अठ्ठादस (अठरा) अशी रूपे होतात. ඌනා ච සා වීසති චාති ‘‘විසෙසන+මෙකත්ථෙනෙ’’ති විසෙසනසමාසෙ ‘‘ඉත්ථියං භාසිතපුමි+ත්ථී පුමෙ+වෙකත්ථෙ’’ති පුමත්තෙ ච කතෙ එකෙන ඌනා වීසතීති තතියාසමාසෙ එකූනවීසති. 'ऊना च सा वीसति चाति' असा 'विसेसणमेकत्थेन' या सूत्राने विशेषण समास केल्यावर, आणि 'इत्थियं भासितपुमित्थी पुमेवेकत्थे' या सूत्राने पुल्लिंग भाव केल्यावर, 'एकेन ऊना वीसति' असा तृतीया तत्पुरुष समास केल्यावर 'एकूनावीसति' (एकोणीस) रूप बनते. වීසතිආදයො ආනවුතියා ඉත්ථිලිඞ්ගෙ+කවචනා. භො එකූනවීසති. එකූනවීසතිං. එකූනවීසත්යා එකූනවීසතියා. එකූනවීසත්යං එකූනවීසතියං එකූනවීසත්යා එකූනවීසතියා. මතිසමං. 'वीसति' (वीस) पासून 'नवुति' (नव्वद) पर्यंतचे शब्द स्त्रीलिंगी आणि एकवचनी असतात. उदा. भो एकूनावीसति, एकूनावीसतिं, एकूनावीसत्या/एकूनावीसतिया, एकूनावीसत्यं/एकूनावीसतियं/एकूनावीसत्या/एकूनावीसतिया. हे 'मति' शब्दाप्रमाणे चालतात. එවං වීසති, එකවීසති, ද්වාවීසති බාවීසති, තෙවීසති චතුවීසතිප්පභුතයො. පණ්ණආදෙසෙ පණ්ණවීසති පඤ්චවීසති. එවං ඡබ්බීසති, සත්තවීසති, අට්ඨවීසති. याचप्रमाणे वीसति (वीस), एकवीसति (एकवीस), द्वावीसति/बावीसति (बावीस), तेवीसति (तेवीस), चतुवीसति (चौवीस) इत्यादी रूपे होतात. 'पण्ण' आदेश झाल्यावर पण्णवीसति, पञ्चवीसति (पंचवीस) रूपे होतात. याचप्रमाणे छब्बीसति (सव्वीस), सत्तवीसति (सत्तावीस), अट्ठवीसति (अठ्ठावीस) रूपे होतात. එකෙන ඌනා තිංසති තිංසා වාති එකූනතිංසති එකූනතිංසා වා. කරණෙ එකූනතිංසාය. එකූනතිංසාය, එකූනතිංසාය, එකූනතිංසාය, එකූනතිංසායං. එවං තිංසතිණිංසාවභුතයො[Pg.95]. තිංසාසද්දස්ස පන සිලොපෙ ‘‘දීඝස්සො’’ති යොගවිභාගා රස්සො, තිංස. නිග්ගහීතාගමො, තිංසං. භොතිංසෙ+ච්චාදි පුමෙව. 'एकेन ऊना तिंसति तिंसा वा' यावरून 'एकूनतिंसति' किंवा 'एकूनतिंसा' (एकोणतीस) रूपे होतात. तृतीया विभक्तीत 'एकूनतिंसाय'. चतुर्थी, पंचमी, षष्ठीत 'एकूनतिंसाय', सप्तमीत 'एकूनतिंसायं'. याचप्रमाणे तिंसति (तीस) इत्यादी रूपे होतात. 'तिंसा' शब्दाचा 'सि' प्रत्ययाचा लोप झाल्यावर 'दीघस्सो' या सूत्राच्या योगविभागाने र्हस्व होऊन 'तिंस' रूप बनते. निग्गहीत (अनुस्वार) आगम होऊन 'तिंसं' रूप बनते. 'भो तिंसे' इत्यादी रूपे पुल्लिंगाप्रमाणे होतात. චත්තාලීසාදීසුපි යථාසම්භවං එවමෙව. ද්විත්තෙ එකත්තිංසති එකත්තිංසා. රස්සද්විත්තෙ ද්වත්තිංසති ද්වත්තිංස. එවං තෙත්තිංසති තෙත්තිංසාදයො යාව එකූනචත්තාලීසති එකූනචත්තාලීසා. චත්තාලීසාය සිම්හි චත්තාරීසා චත්තාලීසා චත්තාලීසං, භො චත්තාලීසෙ+ච්චාදි හොති. එවං එකචත්තාරීසා. चत्तालीस (चाळीस) इत्यादी शब्दांमध्येही यथासंभव याचप्रमाणे रूपे होतात. द्वित्व झाल्यावर एकत्तिंसति, एकत्तिंसा (एकतीस). र्हस्व आणि द्वित्व झाल्यावर द्वत्तिंसति, द्वत्तिंसा (बत्तीस). याचप्रमाणे तेत्तिंसति, तेत्तिंसा (तेहतीस) इत्यादी रूपे एकूनचत्तालीसति, एकूनचत्तालीसा (एकोणचाळीस) पर्यंत होतात. 'चत्तालीसा' शब्दाला 'सि' प्रत्यय लागल्यावर चत्तरीसा, चत्तालीसा, चत्तालीसं, 'भो चत्तालीसे' इत्यादी रूपे होतात. याचप्रमाणे एकचत्तरीसा (एकचाळीस) रूप होते. 3,97. ද්වීස්සා ච ३,९७. द्वीस्सा च අසතාදො නාඤ්ඤත්ථෙ චත්තාලීසාදො ද්විස්ස එ වා හොති ආ ච. ද්වෙචත්තාලීසා ද්වෙචත්තාලීස ද්වෙචත්තාලීසං, එවං ද්වාචත්තාලීස-ඉච්චාදි. ද්වෙචත්තාරීසා ද්වෙචත්තාරීස ද්වෙචත්තාරීසං, එවං ද්වාචත්තාරීසා ද්වාචත්තාරීස ඉච්චාදි. චත්තාලීසති එකචත්තාලීසති ද්වෙචත්තාලීසති ද්වාචත්තාලීසති ඉච්චාදි එකූනවීසතිසමං. शंभर इत्यादी सोडून इतर ठिकाणी, चत्तालीस इत्यादी पुढे असताना 'द्वि' च्या जागी विकल्पेकरून 'ए' आणि 'आ' होतो. उदा. द्वेचत्तालीसा, द्वेचत्तालीस, द्वेचत्तालीसं; याचप्रमाणे द्वाचत्तालीस इत्यादी. द्वेचत्तरीसा, द्वेचत्तरीस, द्वेचत्तरीसं; याचप्रमाणे द्वाचत्तरीसा, द्वाचत्तरीस इत्यादी. चत्तालीसति, एकचत्तालीसति, द्वेचत्तालीसति, द्वाचत्तालीसति इत्यादी रूपे एकूनावीसति शब्दाप्रमाणे चालतात. 3,98. චත්තාලීසාදො වා ३,९८. कत्तालीसादो वा අසතාදො නාඤ්ඤත්ථෙ චත්තාලීසාදො තිස්සෙ හොති වා. තෙචත්තාලීසා තෙචත්තාලීස තෙචත්තාලීසං. භො තෙචත්තාලීසෙ ඉච්චාදි හොති. එවං තිචත්තාලීසා තෙචත්තාරීසා තිචත්තාරීසා ඉච්චාදි, තෙචත්තාලීසති තිචත්තාලීසති ඉච්චාදි පුබ්බෙව. शंभर इत्यादी सोडून इतर ठिकाणी, चत्तालीस इत्यादी पुढे असताना 'ति' च्या जागी विकल्पेकरून 'ते' होतो. उदा. तेचत्तालीसा, तेचत्तालीस, तेचत्तालीसं. 'भो तेचत्तालीसे' इत्यादी रूपे होतात. याचप्रमाणे तिचत्तालीसा, तेचत्तरीसा, तिचत्तरीसा इत्यादी; आणि तेचत्तालीसति, तिचत्तालीसति इत्यादी रूपे पूर्वीप्रमाणेच होतात. එවං චතුචත්තාලීසා පඤ්චචත්තාලීසා චතුචත්තාලීසති පඤ්චචත්තාලීසති ඉච්චාදි යාව එකූනපඤ්ඤාසා. याचप्रमाणे चतुचत्तालीसा (चव्वेचाळीस), पञ्चचत्तालीसा (पंचेचाळीस), चतुचत्तालीसति, पञ्चचत्तालीसति इत्यादी रूपे एकूनपञ्ञासा (एकोणपन्नास) पर्यंत होतात. පඤ්ඤාසා [Pg.96] පඤ්ඤාස පඤ්ඤාසං ඉච්චාදි හොති. එවං ද්වෙපඤ්ඤාසා ද්වාපඤ්ඤාසා ද්විපඤ්ඤාසා ද්වෙපණ්ණාසා ද්වාපණ්ණාසා ද්විපණ්ණාසා. තෙපඤ්ඤාසා තිපඤ්ඤාසා තිපඤ්ඤාසං තෙපණ්ණාසා තිපණ්ණාසා. චතුපණ්ණාසා පඤ්චපණ්ණාසා ඉච්චාදි යාව එකූනසට්ඨි. पञ्ञासा, पञ्ञास, पञ्ञासं (पन्नास) इत्यादी रूपे होतात. याचप्रमाणे द्वेपञ्ञासा, द्वापञ्ञासा, द्विपञ्ञासा, द्वेपण्णासा, द्वापण्णासा, द्विपण्णासा (बावन). तेपञ्ञासा, तिपञ्ञासं, तेपण्णासा, तिपण्णासा (त्रेपन्न). |चतुपण्णासा (चोपन्न), पञ्चपण्णासा (पंचावन्न) इत्यादी रूपे एकूनसट्ठि (एकोणसाठ) पर्यंत होतात. එවං සට්ඨි, එකසට්ඨි, ද්වෙසට්ඨි ද්වාසට්ඨි ද්විසට්ඨි, තෙසට්ඨි තිසට්ඨි, චතුසට්ඨි පඤ්චසට්ඨි ඉච්චාදි යාව එකූනසත්තති. याचप्रमाणे सट्ठि (साठ), एकसट्ठि (एकसष्ट), द्वेसट्ठि/द्वासट्ठि/द्विसट्ठि (बासष्ट), तेसट्ठि/तिसट्ठि (त्रेसष्ट), चतुसट्ठि (चौसष्ट), पञ्चसट्ठि (पाचसष्ट) इत्यादी रूपे एकोनसत्तति (एकोणसत्तर) पर्यंत होतात. සත්තති, එකසත්තති, ද්වෙසත්තති ද්වාසත්තති ද්විසත්තති, තෙසත්තති තිසත්තති. ද්වෙසත්තරි ද්වාසත්තරි ද්විසත්තරි, චතුසත්තති, පඤ්චසත්තති, චතුසත්තරි, පඤ්චසත්තරීති යාව එකූනාසීති. सत्तति (सत्तर), एकसत्तति (एकहत्तर), द्वेसत्तति/द्वासत्तति/द्विसत्तति (ब्याहत्तर), तेसत्तति/तिसत्तति (त्र्याहत्तर). द्वेसत्तरि/द्वासत्तरि/द्विसत्तरि (ब्याहत्तर), चतुसत्तति (चौऱ्याहत्तर), पञ्चसत्तति (पंच्याहत्तर), चतुसत्तरि, पञ्चसत्तरि इत्यादी रूपे एकूनासीति (एकोणऐंशी) पर्यंत होतात. අසීති, එකාසීති, ද්වාසීති, යාගමෙ ද්වියාසීති, තෙඅසීති තියාසීති, චතුරාසීති, පඤ්චාසීති ඉච්චාදි යාව එකූනනවුති. आसीति (ऐंशी), एकासीति (एक्याऐंशी), द्वासीति, 'य' आगम झाल्यावर द्वियासीति (ब्याऐंशी), तेआसीति/तियासीति (त्र्याऐंशी), चतुरासीति (चौऱ्याऐंशी), पञ्चासीति (पंच्याऐंशी) इत्यादी रूपे एकूननवुति (एकोणनव्वद) पर्यंत होतात. නවුති, එකනවුති, ද්වෙනවුති ද්වානවුති ද්විනවුති, තෙනවුති තිනවුති, චතුනවුති, පඤ්චනවුති ඉච්චාදි යාව එකූනසතං, එතං නපුංසකලිඞ්ග+මෙකවචනන්තං. नवुति (नव्वद), एकनवुति (एक्क्याण्णव), द्वेनवुति/द्वानवुति/द्विनवुति (ब्याण्णव), तेनवुति/तिनवुति (त्र्याण्णव), चतुनवुति (चौऱ्याण्णव), पञ्चनवुति (पंच्याण्णव) इत्यादी रूपे एकूनसतं (एकोणशंभर) पर्यंत होतात. हे नपुंसकलिंगी आणि एकवचनात असते. සතං, භො සත සතා, සතං, සතං. සතෙන, කරණෙ සතෙන. සතස්ස, සතා සතම්හා සතස්මා, සතස්ස, සතෙ සතම්හි සතස්මිං. එවං එකසතතො පභුති යාව සහස්සං. सतं (शंभर), संबोधन - भो सत/सता, द्वितीया - सतं, तृतीया - सतेन, करण (तृतीया) - सतेन, चतुर्थी - सतस्स, पंचमी - सता/सतम्हा/सतस्मा, षष्ठी - सतस्स, सप्तमी - सते/सतम्हि/सतस्मिं. याचप्रमाणे एकसत (एकशे एक) पासून सहस्स (हजार) पर्यंतचे शब्द चालतात. කොටි පකොටි කොටිප්පකොටි අක්ඛොභිණියො ඉත්ථිලිඞ්ගෙ+කවචනන්තා. වග්ගභෙදෙ තු සබ්බාසම්පි සංඛ්යානං බහුවචනොපි හොතෙව ‘‘ද්වෙවීසතියො ජිනදන්තා’’ ‘‘තිස්සො වීසතියො දිනඝටිකා’’ ඉච්චාදි. कोटी (koṭi), पकोटी (pakoṭi), कोटीप्पकोटी (koṭippakoṭi) आणि अक्खोभिणी (akkhobhiṇī) इत्यादी संख्या स्त्रीलिंगी आणि एकवचनान्त असतात. परंतु, गटांच्या विभागात या सर्व संख्यांचे बहुवचन देखील होतेच; जसे की, "द्वेवीसतियो जिनदन्ता" (जिनांचे बावीस दात), "तिस्सो वीसतियो दिनघटिका" (दिवसाच्या तीन विसा [साठ] घटिका) इत्यादी. දසදසකං සතං නාම, දසසතං සහස්සං නාම, දසසහස්සං නහුතං, දසනහුතං ලක්ඛං, සතසහස්සන්තිපි වුච්චති. दहाचे दहा पट म्हणजे शंभर (सत), दहा शंभर म्हणजे हजार (सहस्स), दहा हजार म्हणजे नहुत, दहा नहुत म्हणजे लक्ष (लाख), याला 'सतसहस्स' (शतसहस्र) असेही म्हणतात. ලක්ඛසතං [Pg.97] කොටි, කොටිලක්ඛසතං පකොටි, පකොටිලක්ඛසතං කොටිප්පකොටි, එවං නහුතං, නින්නහුතං, අක්ඛොභිණී, බින්දු, අබ්බුදං, නිරබ්බුදං, අහහං, අබබං, අටටං, සොගණ්ඩිකං, උප්පලං, කුමුදං, පුණ්ඩරීකං, පදුමං, කථානං, මහාකථානං, අසඞ්ඛ්යෙය්යන්ති යථාක්කමං සතලක්ඛගුණං වෙදිතබ්බං. शंभर लक्ष म्हणजे कोटी, कोटीचे शंभर लक्ष म्हणजे पकोटी, पकोटीचे शंभर लक्ष म्हणजे कोटीप्पकोटी; याचप्रमाणे नहुत, निन्नहुत, अक्खोभिणी, बिन्दू, अब्बुद, निरब्बुद, अहह, अबब, अटट, सोगण्डिक, उप्पल, कुमुद, पुण्डरीक, पदुम, कथान, महाकथान आणि असंख्येय हे अनुक्रमे शंभर लक्ष (एक कोटी) पटीने गुणलेले समजावे. ඉච්චෙවං ඨානතො ඨානං, සතලක්ඛගුණං මතං; කොටිප්පභුතීනං වීස-සඞ්ඛ්යානඤ්ච යථාක්කමන්ති. अशा प्रकारे, स्थानानुसार (एका स्थानापासून दुसऱ्या स्थानापर्यंत) शंभर लक्ष (एक कोटी) पटीने गुणाकार मानला गेला आहे. कोटीपासून सुरू होणाऱ्या या वीस संख्या अनुक्रमे आहेत. අථා+සංඛ්යා වුච්චතෙ, අබ්යයන්ති ච වුච්චතෙ. තං පාදි චාදි, උපසග්ගනිපාතාති ච දුවිධං. आता अव्ययांचे वर्णन केले जात आहे, ज्याला 'अव्यय' (असंख्या) असेही म्हणतात. ते 'पादि' (प-इत्यादी) आणि 'चादि' (च-इत्यादी) म्हणजेच 'उपसर्ग' आणि 'निपात' अशा दोन प्रकारचे आहे. ප පරා අප සං අනු අව ඔ නි දු වි අධි අපි අති සු උ අභි පති පරි උප ආ ඉමෙ වීසති පාදයො. පාදයො හි ජොතකා, න වාචකා. प (pa), परा (parā), अप (apa), सं (saṃ), अनु (anu), अव (ava), ओ (o), नि (ni), दु (du), वि (vi), अधि (adhi), अपि (api), अति (ati), सु (su), उ (u), अभि (abhi), पति (pati), परि (pari), उप (upa), आ (ā) - हे वीस 'पादि' (उपसर्ग) आहेत. हे उपसर्ग केवळ द्योतक (अर्थ सूचित करणारे) असतात, वाचक (थेट अर्थ सांगणारे) नसतात. තත්ථ ප-සද්දො පකාරා+දිකම්ම, පධාන+න්තොභාව, වියොග, තප්පර, භුසත්ථ, සම්භව, තිත්ති, අනාවිල, පත්ථනාදීසු. යථා පකාරෙ-පඤ්ඤා. ආදිකම්මෙ-විප්පකතං, පධානෙ-පණීතං, අන්තොභාවෙ-පක්ඛිත්තං, ඛිත්තන්ති පෙරණං, පක්ඛිත්තන්ති අන්තොකරණං, ධාත්වත්ථස්ස බාධිතත්තා. වුත්ථඤ්හි – त्यापैकी, 'प' हा शब्द प्रकार (उत्कृष्टता), आदिकर्म (कृतीची सुरुवात), प्रधान (प्रमुखता), अंतोभाव (आत समाविष्ट करणे), वियोग (विरह), तत्पर (मग्न असणे), भूसत्थ (अतिशय/तीव्रता), संभव (उत्पत्ती), तित्ती (तृप्ती), अनाविल (स्वच्छता), पत्थना (आकांक्षा) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. जसे की: प्रकार अर्थी - 'पञ्ञा' (प्रज्ञा). आदिकर्मात - 'विप्पकतं' (सुरू केलेले/अपूर्ण). प्रधानात - 'पणीतं' (प्रणीत/उत्कृष्ट). अंतोभावात - 'पक्खित्तं' (आत टाकलेले); 'खित्त' म्हणजे फेकणे आणि 'पक्खित्त' म्हणजे आत टाकणे, कारण येथे धातूच्या मूळ अर्थाचा बाध होतो. कारण असे म्हटले आहे की – ධාත්වත්ථං බාධතෙ කොචි, කොචි තං අනුවත්තතෙ; තමෙව+ඤ්ඤො විසෙසෙති, උපසග්ගගතී තිධාති. "काही उपसर्ग धातूच्या अर्थाचा बाध करतात, काही त्याचे अनुकरण करतात, तर काही त्याच अर्थाला विशेष बनवतात; अशा प्रकारे उपसर्गांची गती तीन प्रकारची असते." එත්ථ ච ‘‘අනුරුද්ධකා මෙ සඞ්ගාමයුද්ධෙ’’ති ච ඉමෙ උපසග්ගා ධාත්වත්ථං විසෙසෙන්ති නාම. වියොගෙ-පවාසී, තප්පරෙ-පාචරියො, භුසත්ථෙ-පවුද්ධකායො, සම්භවෙ-හිමවන්තා ගඞ්ගා පභවති[Pg.98], තිත්තියං-පහූත+මන්නං, අනාවිලෙ-පසන්න+මුදකං, පත්ථනෙ-පණිහිතං. आणि येथे "अनुरुद्धका मे सङ्गामयुद्धे" यामध्ये हे उपसर्ग धातूच्या अर्थाला विशेष बनवतात. वियोगात - 'पवासी' (प्रवासी/परदेशी राहणारा). तत्पर अर्थी - 'पाचरियो' (प्राचार्य). भूसत्थ (तीव्रता) मध्ये - 'पवुद्धकायो' (पूर्ण वाढलेले शरीर). संभवात - 'हिमवन्ता गङ्गा पभवति' (हिमालयातून गंगा उत्पन्न होते). तृप्तीमध्ये - 'पहूतमन्नं' (प्रचूर अन्न). अनाविल (स्वच्छता) मध्ये - 'पसन्नमुदकं' (स्वच्छ पाणी). पत्थना (आकांक्षा) मध्ये - 'पणिहितं' (प्रणिहित/संकल्पित). පරාඉති පරිහානි, පරාජය, ගති, වික්කමා+මසනාදීසු. යථා පරිහානියං-පරාභවො. පරාජයෙ-පරාජිතො, ගතියං-පරායනං, වික්කමෙ-පරක්කමති, ආමසනෙ-අඞ්ගස්ස පරාමසනං. 'परा' हा उपसर्ग परिहानी (ऱ्हास), पराजय, गती, विक्रम (पराक्रम) आणि आमसन (स्पर्श करणे) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. जसे की: परिहानीमध्ये - 'पराभवो' (पराभव). पराजयात - 'पराजितो' (पराजित झालेला). गतीमध्ये - 'परायनं' (परायण/आश्रय). विक्रमात - 'परक्कमति' (पराक्रम करतो). आमसनात - 'अङ्गस्स परामसनं' (अवयवाला स्पर्श करणे). අපඉති අපගත, ගරහ, වජ්ජන, පූජා, පදුස්සනාදීසු. යථා අපගතෙ-අපමානො අපෙතො, ගරහෙ-අපගබ්භො, වජ්ජනෙ-අපසාලාය ආයන්ති වාණිජා, පූජායං-වුද්ධාපචායී, පදුස්සනෙ-අපරජ්ඣන්ති. 'अप' हा उपसर्ग अपगत (दूर गेलेले), गरहा (निंदा), वज्जन (वर्ज्य करणे), पूजा (आदर) आणि पदुस्सन (अपराध करणे) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. जसे की: अपगत मध्ये - 'अपमानो' (अपमान) किंवा 'अपेतो' (दूर गेलेला). निंदेमध्ये - 'अपगब्भो' (निर्लज्ज). वर्जनात - 'अपसालाय आयन्ति वाणिजा' (शाळेच्या बाहेरून व्यापारी येतात). पूजेमध्ये - 'वुद्धापचायी' (वृद्धांचा आदर करणारा). पदुस्सन (अपराधात) - 'अपरज्झन्ति' (ते अपराध करतात). සංඉති සමොධාන, සම්මාසම, සමන්තභාව, සංගත, සංඛෙප, භුසත්ථ, සහ+ප්පත්ථ, පභවා+භිමුඛභාව, විධාන, පුනප්පුන, කරණ, සමිද්ධාදීසු. යථා සමොධානෙ-සන්ධි, සම්මාසමෙ-සමාධි, සම්පයුත්තො, සමන්තභාවෙ-සංකිණ්ණං, සමුල්ලපනා, සංගතෙ-සඞ්ගමො, සංඛෙපෙ-සමාසො, භුසත්ථෙ-සාරත්ථො, සහත්ථෙ-සංවාසො, අප්පත්ථෙ-සමග්ඝො, පභවෙ-සම්භවො, අභිමුඛභාවෙ-සම්මුඛං. සංගතෙ-සංගණ්හාති, විධානෙ-සංවුතං, පුනප්පුනකරණෙ-සන්ධාවති, සමිද්ධියං-සම්පන්නො. 'सं' हा उपसर्ग समोधान (एकत्र आणणे), सम्मासम (सम्यक् समानता/एकाग्रता), समन्तभाव (सर्व बाजूंनी असणे), संगत (एकत्र येणे), संखेप (संक्षेप), भूसत्थ (अतिशय), सह (सोबत), अप्प (अल्प अर्थ), प्रभव (उत्पत्ती), अभिमुखभाव (समोर असणे), विधान (नियमन/संयम), पुनप्पुनकरण (पुन्हा पुन्हा करणे) आणि समिद्धी (समृद्धी) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. जसे की: समोधानात - 'सन्धि' (संधी). सम्मासम मध्ये - 'समाधि' (समाधी) किंवा 'सम्पयुत्तो' (संप्रयुक्त). समन्तभावात - 'संकिण्णं' (मिश्रित) किंवा 'समुल्लपना' (संभाषण). संगतात - 'sङ्गमो' (संगम). संक्षेपात - 'समासो' (समास). भूसत्थ मध्ये - 'सारत्tho' (अतिशय अर्थपूर्ण). सह अर्थी - 'संवासो' (सहवास). अल्प अर्थी - 'समग्घो' (स्वस्त). प्रभावात - 'सम्भवो' (संभव/उत्पत्ती). अभिमुखभावात - 'सम्मुखं' (संमुख/समोर). संगतात - 'संगण्हाति' (संग्रह करतो). विधानात - 'संवुतं' (संवर/संयमित). पुन्हा पुन्हा करण्यात - 'सन्धावति' (पुन्हा पुन्हा धावतो). समृद्धीमध्ये - 'सम्पन्नो' (संपन्न). අනුඉති අනුගතා+නුපච්ඡින්න, පච්ඡාත්ථ, භුසත්ථ, සාදිස්ස, හීන, තතියත්ථ, ලක්ඛණි+ත්ථම්භූතක්ඛාන, භාග, විච්ඡාදීසු. අනුගතෙ-අන්වෙති, අනුපච්ඡින්නෙ-අනුසයො, පච්ඡාත්ථෙ-අනුරථං, භුසත්ථෙ-අනුරත්තො, සාදිස්සෙ-අනුරූපං, හීනෙ-අනුසාරිපුත්තං පඤ්ඤවන්තො, තතියත්ථෙ-නදි+මන්වවසිතා සෙනා, ලක්ඛණෙරුක්ඛ+මනුවිජ්ජොතතෙ විජ්ජු, ඉත්ථම්භූතඛ්යානෙ-සාධු දෙවදත්තො මාතර+මනු[Pg.99], භාගෙ-ය+දෙත්ථ මං අනු සියා, තං දීයතු, විච්ඡායං-රුක්ඛං රුක්ඛං අනු විජ්ජොතතෙ චන්දො. 'अनु' हा उपसर्ग अनुगत (मागे जाणे), अनुपच्छिन्न (निरंतर), पश्चात् (नंतर), भूसत्थ (अतिशय), सादिस्स (सादृश्य), हीन (कमी दर्जाचा), ततीयार्थ (तृतीया विभक्तीचा अर्थ), लक्षण (चिन्ह), इत्थंभूताख्यान (अशा प्रकारची स्थिती सांगणे), भाग (हिस्सा) आणि विच्छा (पुनरावृत्ती) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. अनुगत मध्ये - 'अन्वेति' (मागे जातो). अनुपच्छिन्न मध्ये - 'अनुसयो' (अनुशय/सुप्त प्रवृत्ती). पश्चात् अर्थी - 'अनुरथं' (रथाच्या मागे). भूसत्थ मध्ये - 'अनुरत्तो' (अत्यंत आसक्त). सादृश्यात - 'अनुरूपं' (अनुरूप). हीन अर्थी - 'अनुसारिपुत्तं पञ्ञवन्तो' (सारिपुत्तांपेक्षा कमी प्रज्ञावान). तृतीयार्थी - 'nदिं अन्ववसिता सेना' (नदीच्या कडेने वसलेली सेना). लक्षणात - 'रुक्खं अनुविज्जोतते विज्जू' (झाडाजवळ वीज चमकते). इत्थंभूताख्यानात - 'साधु देवदत्तो मातरं अनु' (देवदत्त आपल्या आईशी चांगला वागतो). भागात - 'यं देत्थ मं अनु सिया, तं दीयतु' (यात जो माझा हिस्सा असेल, तो मला दिला जावा). विच्छेमध्ये - 'रुक्खं रुक्खं अनु विज्जोतते चन्दो' (चंद्र प्रत्येक झाडावर चमकतो). අවඉති අධොභාග, වියොග, පරිභව, ජානන, නිච්ඡය, දෙස, ථෙය්යාදීසු. අධොභාගෙ-අවක්ඛිත්තචක්ඛු, වියොගෙ-අවකොකිලං වනං, පරිභවෙ-අවජානනං, අවමඤ්ඤති, ජානනෙ-අවගච්ඡති., නිච්ඡයෙ-අවධාරණං, දෙසෙ-අවකාසො, ථෙය්යෙ-අවහාරො. 'अव' हा उपसर्ग अधोभाग (खालील दिशा), वियोग (विरह), परिभव (तिरस्कार), जानन (जाणणे), निश्चय (निश्चिती), देस (स्थान) आणि थेय्य (चोरी) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. अधोभागात - 'अवक्खित्तचक्खु' (खाली झुकलेले डोळे असलेला). वियोगात - 'अवकोकिलं वनं' (कोकिळ नसलेले वन). परिभवात - 'अवजाननं' (तिरस्कार करणे) किंवा 'अवमञ्ञति' (तुच्छ मानतो). जाणण्यात - 'अवगच्छति' (समजतो). निश्चयात - 'अवधारणं' (निश्चित करणे). स्थानात - 'अवकासो' (अवकाश/जागा). चोरीमध्ये - 'अवहारो' (चोरी). ඔඉති ඔරොහරණ, නීහරණ, සුද්ධිආදීසු දිස්සති. ඔරොහණෙ-පාසාදා ඔරොහති, නීහරණෙ-ඔමුක්කුපාහනො, සුද්ධියං-ඔදාතං. 'ओ' हा उपसर्ग ओरोहरण (खाली उतरणे), नीहरण (काढून टाकणे) आणि शुद्धी इत्यादी अर्थांमध्ये दिसून येतो. ओरोहरणात - 'पासादा ओरोhति' (महालावरून खाली उतरतो). नीहरणात - 'ओमुक्कुपाहनो' (ज्याने पादत्राणे काढून ठेवले आहेत असा). शुद्धीमध्ये - 'ओदातं' (पांढरे/शुद्ध). නිඉති, නිස්සෙස, නිග්ගත, නීහරණ,+න්තොපවෙසනා+භාව, නිසෙධන, නික්ඛන්ත, පාතුභාවා+වධාරණ, විභජන, උපමු+පධාරණා+වසාන, ඡෙක, නීහරණා+වරණාදීසු. නිස්සෙසෙ-නිරුත්ති, නිග්ගතෙ-නික්කිලෙසො, නිය්යාති, නීහරණෙ-නිද්ධාරණං, අන්තොපවෙසනෙ-නිඛාතො, අභාවෙ-නිම්මක්ඛිකං, නිසෙධෙ-නිවාරෙති, නික්ඛන්තෙ-නිබ්බානං, පාතුභාවෙ-නිම්මිතං, අවධාරණෙ-නිච්ඡයො, විභජනෙ-නිද්දෙසො. උපමායං-නිදස්සනං, උපධාරණෙ-නිසාමනං, අවසානෙ-නිට්ඨිතං, ඡෙකෙ-නිපුණො, නීහරණෙ-නීහරති, ඉස්ස දීඝො. ආවරණෙ-නීවරණං. 'नि' हा उपसर्ग निस्सेस (पूर्णपणे), निग्गत (बाहेर पडलेले), नीहरण (बाहेर काढणे), अंतोप्रवेशन (आत प्रवेश करणे), अभाव, निषेध (अटकाव करणे), निक्खन्त (मुक्त/बाहेर पडलेले), पातुभाव (प्रकट होणे), अवधारण (निश्चिती), विभाजन, opमा, उपधारण (चिंतन), अवसान (समाप्ती), छेक (कुशलता), नीहरण (बाहेर काढणे - यात 'इ' चा दीर्घ 'ई' होतो) आणि आवरण (अडथळा) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. निस्सेस मध्ये - 'निरुत्ति' (निरुक्ती). निग्गत मध्ये - 'निक्किलेसो' (क्लेशरहित) किंवा 'निय्याति' (बाहेर पडतो). नीहरणात - 'निद्धारणं' (निवडणे). अंतोप्रवेशनात - 'निखातो' (खणून पुरलेला). अभावात - 'निम् मक्खिकं' (माशा नसलेले ठिकाण). निषेधात - 'निवारीति' (अटकाव करतो). निक्खन्त मध्ये - 'निब्बानं' (निर्वाण). पातुभावात - 'निम्मितं' (निर्मित). निश्चयात - 'निच्छयो' (निश्चय). विभाजनात - 'निद्देसो' (निर्देश). उपमेमध्ये - 'निदस्सनं' (उदाहरण). उपधारणात - 'निसामनं' (अवलोकन करणे). अवसानात - 'निट्ठितं' (पूर्ण झालेले). कुशलतेत - 'निपुणो' (निपुण). नीहरणात - 'नीहरति' (बाहेर काढतो; येथे 'इ' चा दीर्घ 'ई' होतो). आवरणात - 'नीवरणं' (नीवरण/अडथळा). දුඉති අසොභණා+භාව, කුච්ඡිතා+සමිද්ධි, කිච්ඡ, විරූපතාදීසු. අසොභණෙ-දුග්ගන්ධො, අභාවෙ-දුබ්භික්ඛං, කුච්ඡිතෙ – දුක්කටං[Pg.100]. අසමිද්ධියං-දුස්සස්සං, කිච්ඡෙ-දුක්කරං, විරූපතායං-දුබ්බණ්ණො දුම්මුඛො. 'दु' हा उपसर्ग अशोभण (वाईट), अभाव, कुच्छित (निंद्य), असमृद्धी (अयशस्वी होणे), किच्छ (कठीण) आणि विरूपता इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. अशोभण मध्ये - 'दुग्gन्धो' (दुर्गंधी). अभावात - 'दुब्भिक्खं' (दुष्काळ). कुच्छित मध्ये - 'दुक्कटं' (दुष्कृत्य). असमृद्धीमध्ये - 'दुस्सस्सं' (वाईट पीक). कठीण अर्थी - 'दुक्करं' (दुष्कर). विरूपतेमध्ये - 'दुब्बण्णो' (कुरूप) किंवा 'दुम्मुखो' (दुर्मुखलेला). විඉති විසෙස, විවිධ, විරුද්ධ, විගත, වියොග, විරූපතාදීසු. විසෙසෙ-විමුත්ති, විසිට්ඨො, විවිධෙ-විමති, විරුද්ධෙ-විවාදො, විගතෙ-විමලං, වියොගෙ-විප්පයුත්තො, විරූපතායං-විරූපො. 'वि' हा उपसर्ग विशेष, विविध, विरुद्ध, विगत (मुक्त), वियोग आणि विरूपता इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. विशेषात - 'विमुत्ति' (विमुक्ती) किंवा 'विसिट्ठो' (विशिष्ट). विविधात - 'विमति' (शंका). विरुद्धाध्ये - 'विवादो' (विवाद). विगतात - 'विमलं' (विमल). वियोगात - 'विप्पयुत्तो' (विप्रयुक्त). विरूपतेमध्ये - 'विरूपो' (विरूप). අධිඉති අධිකි+ස්සරූ+පරිභාවා+ධිභවන+ජ්ඣායා+ධිට්ඨාන, නිච්ඡය, පාපුණනාදීසු. අධිකෙ-අධිසීලං, ඉස්සරෙ-අධිපති, අධි බ්රහ්මදත්තෙ පඤ්චාලා, උපරිභාවෙ-අධිරොහති, පථවිං අධිසෙස්සති, අධිභවනෙ-අධිභවති, අජ්ඣායනෙ-බ්යාකරණ+මධීතෙ, අධිට්ඨානෙ-භූමිකම්පාදිං අධිට්ඨාති, නිච්ඡයෙ-අධිමොක්ඛො, පාපුණනෙ-භොගක්ඛන්ධං අධිගච්ඡති. 'अधि' हा उपसर्ग अधिक (श्रेष्ठता), इस्सर (स्वामित्व), उपरिभाव (वर असणे), अधिभवन (वरचढ होणे), अज्झायन (अध्ययन करणे), अधिष्ठान (निश्चय/अधिष्ठित होणे), निश्चय आणि पापुणन (प्राप्त करणे) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. अधिक अर्थी - 'अधिसिलं' (अधिशील). स्वामित्वामध्ये - 'अधिपति' (अधिपती) किंवा 'अधि ब्रह्मदत्ते पञ्चाला' (ब्रह्मदत्ताच्या अधिपत्याखाली पांचाल देश आहे). उपरिभावात - 'अधिरोहति' (वर चढतो) किंवा 'पथविं अधिसेस्सति' (पृथ्वीवर शयन करेल). अधिभवनात - 'अधिभवति' (वरचढ होतो). अध्ययनात - 'ब्याकरणमधीते' (व्याकरणाचे अध्ययन करतो). अधिष्ठानात - 'भूमिकम्पादितं अधिट्ठाति' (भूकंप इत्यादी घडवून आणतो). निश्चयात - 'अधिmoक्खो' (अधिmoक्ष/दृढ निश्चय). प्राप्त करण्यामध्ये - 'भोगक्खन्धं अधिगच्छति' (भोगसमूहाला प्राप्त करतो). අපිඉති සම්භාවනා+පෙක්ඛා, සමුච්චය, ගරහ, පඤ්හාදීසු. සම්භාවනායං-අපි දිබ්බෙසු කාමෙසු, මෙරුම්පි විනිවිජ්ඣිත්වා ගච්ඡෙය්ය, අපෙක්ඛායං-අයම්පි ධම්මො අනියතො, සමුච්චයෙ-ඉතිපි අරහං, අන්තම්පි අන්තගුණම්පි ආදාය, ගරහෙ-අපි අම්හාකං පණ්ඩිතක, පඤ්හෙ-අපි භන්තෙ භික්ඛං ලභිත්ථ. 'अपि' हा अव्यय संभावन (शक्यता), अपेक्षा, समुच्चय (एकत्र करणे), गरहा (निंदा), प्रश्न इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. संभावनेमध्ये (शक्यता दर्शवताना) - 'अपि दिब्बेसु कामेसु' (दिव्य कामांमध्येही), 'मेरुम्पि विनिविज्झित्वा गच्छेय्य' (मेरू पर्वतालाही भेदून जाऊ शकेल). अपेक्षेमध्ये - 'अयम्पि धम्मो अनियतो' (हा धर्म देखील अनियत/अनिश्चित आहे). समुच्चयामध्ये - 'इतिपि अरहं' (अशा प्रकारे देखील ते अर्हत आहेत), 'अन्तम्पि अन्तगुणम्पि आदाय' (आतडे आणि आतड्याचे वेष्टन या दोन्हीला घेऊन). गरहेमध्ये (निंदेमध्ये) - 'अपि अम्हाकं पण्डितक' (अरे, आमचा हा मूर्ख पंडित!). प्रश्नामध्ये - 'अपि भन्ते भिक्खं लभित्थ' (भंते, आपल्याला भिक्षा मिळाली का?). අතිඉති අතික්කමනා+තික්කන්තා+තිසය, භුසත්ථාදීසු. අතික්කමෙ-අතිරොචති අම්හෙහි, අතීතො, අතික්කන්තෙ-අච්චන්තං, අතිසයෙ-අතිකුසලො, භුසත්ථෙ-අතිකොධො, අතිවුද්ධි. 'अति' हा उपसर्ग अतिक्रमण (ओलांडणे), अतिक्रांत (गेलेला काळ), अतिशय (उत्कृष्टता), भृशार्थ (तीव्रता/अतिरेक) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. अतिक्रमणामध्ये - 'अतिरोचति अम्हेहि' (तो आमच्यापेक्षा अधिक चमकतो), 'अतीतो' (गेलेला/अतीत). अतिक्रांतामध्ये - 'अच्चन्तं' (अत्यंत/अतिशय). अतिशयामध्ये - 'अतिकुसलो' (अतिशय कुशल). भृशार्थामध्ये (तीव्रतेमध्ये) - 'अतिकोधो' (अतिशय क्रोध), 'अतिवुद्धि' (अतिवृद्धी/अतिशय वाढ). සුඉති සොභණ, සුට්ඨු, සම්මා, සමිද්ධි, සුඛත්ථාදීසු. සොභණෙ-සුගන්ධො, සුට්ඨු+සම්මාදත්ථෙසු-සුට්ඨු ගතො සුගතො, සම්මා [Pg.101] ගතොතිපි සුගතො, සමිද්ධියං-සුභික්ඛං, සුඛත්ථෙ-සුකරො. 'सु' हा उपसर्ग शोभन (सुंदर/चांगले), सुष्ठु (चांगल्या प्रकारे), सम्मा (सम्यक/योग्य प्रकारे), समृद्धी, सुखार्थ (सहजता/सुख) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. शोभनामध्ये - 'सुगन्धो' (सुगंध). सुष्ठु आणि सम्यक अर्थांमध्ये - 'सुट्ठु गतो सुगतो' (चांगल्या प्रकारे गेलेले ते सुगत), 'सम्मा गतोतिपि सुगतो' (सम्यक प्रकारे गेलेले ते देखील सुगत). समृद्धीमध्ये - 'सुभिक्खं' (सुभिक्ष/धान्याची सुबत्ता). सुखार्थामध्ये - 'सुकरो' (करणे सोपे असलेले/सुकर). උඉති උග්ගතු+ද්ධකම්ම, පධාන, වියොග, සම්භව, අත්තලාභ, සත්ති, සරූපකථනාදීසු. උග්ගතෙ-උග්ගච්ඡති, උද්ධකම්මෙ-ආසනා උට්ඨිතො, උක්ඛෙපො, පධානෙ-උත්තමො, ලොකුත්තරො, වියොගෙ-උබ්භාසිතො, සම්භවෙ-උබ්භුතො, අත්තලාභෙ-උප්පන්නං ඤාණං, සත්තියං-උස්සහති ගන්තුං, සරූපකථනෙ-උද්දිසති සුත්තං. 'उ' (किंवा उद्) हा उपसर्ग उद्गत (वर जाणे), ऊर्ध्वकर्म (वरची क्रिया), प्रधान (मुख्य), वियोग (प्रकाशन/वेगळे होणे), संभव (उत्पत्ती), आत्मलाभ (प्राप्ती), शक्ती (सामर्थ्य), स्वरूपकथन (वर्णन करणे) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. उद्गतामध्ये - 'उग्गच्छति' (वर जातो/उदय पावतो). ऊर्ध्वकर्मामध्ये - 'आसना उट्ठितो' (आसनावरून उठलेले), 'उक्खेपो' (वर फेकणे/उचलणे). प्रधानामध्ये - 'उत्तमो' (उत्तम/सर्वश्रेष्ठ), 'लोकुत्तरो' (लोकोत्तर/लोकातीत). वियोगामध्ये - 'उब्भासितो' (प्रकाशित झालेला). संभवामध्ये - 'उब्भुतो' (उत्पन्न झालेला). आत्मलाभामध्ये - 'उप्पन्नं ञाणं' (उत्पन्न झालेले ज्ञान). शक्तीमध्ये - 'उस्सहित गन्तुं' (जाण्यासाठी उत्सुक असणे/सामर्थ्य असणे). स्वरूपकथनामध्ये - 'उद्दिसति सुत्तं' (सुत्ताचा उद्देश करणे/वाचन करणे). අභිඉති අභිමුඛභාව, විසිට්ඨා+ධිකු+ද්ධකම්ම, කුල, සාරුප්ප, වන්දන, ලක්ඛණි+ත්ථම්භූතක්ඛාන, විච්ඡාදීසු. අභිමුඛභාවෙ-අභිමුඛො, අභික්කමති, විසිට්ඨෙ-අභිධම්මො, අධිකෙ-අභිවසති, උද්ධකම්මෙ-අභිරුහති. කුලෙ-අභිජාතො, සාරුප්පෙ-අභිරූපො, වන්දනෙ-අභිවාදෙති, ලක්ඛණාදීසු පුරිමසමං. 'अभि' हा उपसर्ग अभिमुखभाव (समोर असणे), विशिष्ट (विशेष), अधिक, ऊर्ध्वकर्म (वर चढणे), कुल (उच्च कुळात जन्म), सारूप्य (योग्य/सुंदर रूप), वंदन (नमस्कार), लक्षण, इत्थंभूताख्यान (अशा प्रकारची स्थिती सांगणे), वीप्सा (पुनरावृत्ती) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. अभिमुखभावामध्ये - 'अभिमुखो' (समोर असलेला), 'अभिक्कमति' (पुढे जातो). विशिष्टामध्ये - 'अभिधम्मो' (अभिधम्म - विशेष धर्म). अधिकामध्ये - 'अभिवसति' (वास्तव्य करतो). ऊर्ध्वकर्मामध्ये - 'अभिरुहति' (वर चढतो). कुळामध्ये - 'अभिजातो' (उच्च कुळात जन्मलेला). सारूप्यामध्ये - 'अभिरूपो' (रूपवान/सुंदर). वंदनामध्ये - 'अभिवादेति' (अभिवादन करतो/नमस्कार करतो). लक्षणादींमध्ये - पूर्वीप्रमाणेच (पुरिमसमं) समजावे. පතිඉති පටිගත, පටිලොම, පටිනිධි, පටිදාන, නිසෙධ, නිවත්තන, සාදිස්ස, පටිකරණා+දාන, පටිබොධ, පටිච්ච, ලක්ඛණිත්ථම්භූතක්ඛාන, භාග, විච්ඡාදීසු. පටිගතෙ-පච්චක්ඛං, පටිලොමෙ-පටිසොතං, පටිනිධිම්හි-ආචරියතො පති සිස්සො, පටිදානෙ-තෙලත්ථිකස්ස ඝතං පටිදදාති, නිසෙධෙ-පටිසෙධෙති, නිවත්තනෙ-පටික්කමති, සාදිස්සෙ-පටිරූපකං, පටිකරණෙ-පටිකාරො, ආදානෙ-පටිග්ගණ්හාති, පටිබොධෙ-පටිවෙධො, පටිච්චෙ-පච්චයො, ලක්ඛණාදීසු පුරිමසමං. 'पति' (किंवा पटि) हा उपसर्ग प्रतिगत (विरुद्ध/समोर), प्रतिलोम (उलटे), प्रतिनिधी (बदली), प्रतिदान (बदल्यात देणे), निषेध (मज्जाव), निवर्तन (मागे फिरणे), सादृश्य (सारखेपणा), प्रतिकरण (प्रतिकार/उपाय), आदान (स्वीकारणे), प्रतिबोध (साक्षात्कार/बोध), प्रतीत्य (अवलंबून असणे), लक्षण, इत्थंभूताख्यान, भाग, वीप्सा इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. प्रतिगतामध्ये - 'पच्चक्खं' (प्रत्यक्ष/डोळ्यांसमोर). प्रतिलोमामध्ये - 'पटिसोतं' (प्रवाहाच्या विरुद्ध). प्रतिनिधीमध्ये - 'आचरियतो पति सिस्सो' (आचार्यांच्या ऐवजी शिष्य). प्रतिदानामध्ये - 'तेलत्थिकस्स घतं पटिददाति' (तेलाची इच्छा करणाऱ्याला बदल्यात तूप देतो). निषेधामध्ये - 'पटिसेधेति' (प्रतिबंध करतो/मज्जाव करतो). निवर्तनामध्ये - 'पटिक्कमति' (मागे फिरतो). सादृश्यतेमध्ये - 'पटिरूपकं' (सारखे दिसणारे/प्रतिरूप). प्रतिकरणामध्ये - 'पटिकारो' (प्रतिकार/उपाय). आदानामध्ये - 'पटिग्गण्हाति' (स्वीकार करतो/ग्रहण करतो). प्रतिबोधामध्ये - 'पटिवेधो' (प्रतिवेध/साक्षात्कार). प्रतीत्यमध्ये - 'पच्चयो' (प्रत्यय/कारण). लक्षणादींमध्ये - पूर्वीप्रमाणेच (पुरिमसमं) समजावे. පරිඉති සමන්තතොභාව, පරිච්ඡෙද, වජ්ජනා+ලිඞ්ගන, නිවසන, පූජා, භොජනා+වජානන, දොසක්ඛාන, ලක්ඛණාදීසු. සමන්ථ- තොභාවෙ-පරිවුතො[Pg.102], පරිච්ඡෙදෙ-පරිඤ්ඤෙය්යං, වජ්ජනෙ-පරිහරති, ආලිඞ්ගනෙ-පරිස්සජති, නිවසනෙ-යො වත්ථං පරිදහෙස්සති, පූජායං-පරිචරියා, භොජනෙ-භික්ඛුං පරිවිසති, අවජානනෙ-පරිභවති. දොසක්ඛානෙ-පරිභාසති, ලක්ඛණාදීසු-රුක්ඛං පරි විජ්ජොතතෙ විජ්ජු ඉච්චාදි. 'परि' हा उपसर्ग समंततोभाव (सर्व बाजूंनी/पूर्णपणे), परिच्छेद (मर्यादा/निश्चिती), वर्जन (टाळणे), आलिंगन (मिठी मारणे), निवसन (वस्त्र परिधान करणे), पूजा (सेवा), भोजन (वाढणे), अवज्ञान (अपमान/तुच्छ लेखणे), दोषाख्यान (दोष दाखवणे/निंदा करणे), लक्षण इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. समंततोभावामध्ये - 'परिवुतो' (वेढलेला/परिवृत). परिच्छेदामध्ये - 'परिञ्ञेय्यं' (पूर्णपणे जाणण्यायोग्य). वर्जनामध्ये - 'परिहरति' (टाळतो/त्याग करतो). आलिंगनामध्ये - 'परिस्सजति' (आलिंगन देतो). निवसनमध्ये - 'यो वत्थं परिदहेस्सति' (जो वस्त्र परिधान करेल). पूजेमध्ये - 'परिचरिया' (परिचर्या/सेवा). भोजनामध्ये - 'भिक्खुं परिविसति' (भिक्खूला भोजन वाढतो). अवज्ञानामध्ये - 'परिभवति' (अपमान करतो/तुच्छ मानतो). दोषाख्यानामध्ये - 'परिभासति' (शिवीगाळ करतो/भर्त्सना करतो). लक्षणादींमध्ये - 'रुक्खं परि विज्जोतते विज्जु' (झाडाच्या भोवती वीज चमकते) इत्यादी. උපඉති උපගමන, සමීපූ+පපත්ති, සාදිස්සා+ධිකු+පරිභාවා+නසන, දොසක්ඛාන, සඤ්ඤා, පුබ්බකම්ම, පූජා, ගය්හාකාර, භුසත්ථාදීසු. උපගමනෙ-නිසින්නං වා උපනිසීදෙය්ය, සමීපෙ-උපනගරං, උපපත්තියං-සග්ගං ලොකං උපපජ්ජති, අථ වා උපපත්ති=යුත්ති, යථා උපපත්තිතො ඉක්ඛතීති උපෙක්ඛා, සාදිස්සෙ-උපමානං, උපමා, අධිකෙ-උපඛාරියං දොණො, උපරිභාවෙ-උපසම්පන්නො, අනසනෙ-උපවාසො, දොසක්ඛානෙ-පරං උපවදති, සඤ්ඤායං-උපධා, උපසග්ගො, පුබ්බකම්මෙ-උපක්කමො, උපකාරො, පූජායං-බුද්ධුපට්ඨාකො, මාතුපට්ඨානං, ගය්හාකාරෙ-සොචෙය්යපච්චුපට්ඨානං, භුසත්ථෙ-උපාදානං, උපායාසො, උපනිස්සයොති. 'उप' हा उपसर्ग उपगमन (जवळ जाणे), समीप (जवळ असणे), उपपत्ती (उत्पत्ती/जन्म किंवा युक्ती), सादृश्य (सारखेपणा), अधिक, उपरिभाव (वर असणे/श्रेष्ठत्व), अनशन (उपवास), दोषाख्यान (दोष दाखवणे), संज्ञा (नाव/संकेत), पूर्वकर्म (प्रयत्न/मदत), पूजा (सेवा), गृह्याकार (ग्रहण करण्याची पद्धत), भृशार्थ (तीव्रता/अतिरेक) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. उपगमनामध्ये - 'निसिन्नं वा उपनिसीदेय्य' (बसलेल्या व्यक्तीच्या जवळ बसावे). समीपमध्ये - 'उपनगरं' (उपनगर/नगराजवळ). उपपत्तीमध्ये - 'सग्गं लोकं उपपज्जति' (स्वर्गलोकात उत्पन्न होतो/जन्म घेतो), किंवा उपपत्ती = युक्ती (तर्क), जसे की 'उपपत्तितो इक्खतीति उपेक्खा' (तर्कशुद्ध किंवा तटस्थपणे पाहणे म्हणजे उपेक्षा). सादृश्यतेमध्ये - 'उपमानं' (उपमान), 'उपमा' (उपमा). अधिकामध्ये - 'उपखारियं दोणो' (खारीपेक्षा अधिक असलेला द्रोण मापाचा भाग). उपरिभावामध्ये - 'उपसम्पन्नो' (उपसंपदा प्राप्तलेला/दीक्षित). अनशनामध्ये - 'उपवासो' (उपवास). दोषाख्यानामध्ये - 'परं उपवदति' (दुसऱ्याची निंदा करतो). संज्ञेमध्ये - 'उपधा' (उपाधी/आश्रय), 'उपसग्गो' (उपसर्ग). पूर्वकर्मामध्ये - 'उपक्कमो' (उपक्रम/प्रयत्न), 'उपकारो' (उपकार/मदत). पूजेमध्ये - 'बुद्धुपट्ठाको' (बुद्धांचे सेवक/उपस्थायक), 'मातुपट्ठानं' (मातेची सेवा करणे). गृह्याकारामध्ये - 'सोचेय्यपच्चुपट्ठानं' (शुचितेचे प्रकटीकरण). भृशार्थामध्ये (तीव्रतेमध्ये) - 'उपादानं' (उपादान/तीव्र आसक्ती), 'उपायआसो' (उपायास/अतिशय दुःख), 'उपनिस्सयो' (उपनिषय/प्रबळ कारण) असे समजावे. ආඉති අභිමුඛභාවු+ද්ධකම්ම+මරියාදා+භිවිධි, පත්ති+ච්ඡා, පරිස්සජන, ආදිකම්ම, ගහණ, නිවාසන, සමීප, ආව්හානාදීසු. අභිමුඛභාවෙ-ආගච්ඡන්ති, උද්ධකම්මෙ-ආරොහති, මරියාදායං-ආපබ්බතා ඛෙත්තං, අභිවිධිම්හි-ආකුමාරං යසො කච්චායනස්ස, පත්තියං-ආපත්තිං ආපන්නො, ඉච්ඡායං-ආකඞ්ඛා, පරිස්සජනෙ-ආලිඞ්ගනං, ආදිකම්මෙ-ආරම්භො, ගහණෙ-ආදීයති, ආලිඞ්ගති, (ආලිම්පති, රූ), නිවාසෙ-ආවසථො, ආවාසො, සමීපෙ-ආසන්නං, ආව්හානෙ-ආමන්තෙති. 'आ' हा उपसर्ग उपसर्ग अभिमुखभाव (समोर येणे), ऊर्ध्वकर्म (वर चढणे), मर्यादा (सीमा), अभिविधी (व्याप्ती/समावेश), प्राप्ती (पडणे), इच्छा, परिष्वजन (आलिंगन), आदिकर्म (आरंभ), ग्रहण (घेणे), निवास (राहणे), समीप (जवळ), आव्हान (बोलवणे/आमंत्रित करणे) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. अभिमुखभावामध्ये - 'आगच्छन्ति' (ते येतात). ऊर्ध्वकर्मामध्ये - 'आरोहति' (वर चढतो). मर्यादेमध्ये - 'आपब्बता खेत्तं' (पर्वतापर्यंत शेत आहे). अभिविधीमध्ये - 'आकुमारं यसो कच्चायनस्स' (कच्चायनाची कीर्ती लहान मुलांपर्यंत पसरली आहे). प्राप्तीमध्ये - 'आपत्तिं आपत्तिं आपन्नो' (आपत्तीमध्ये/गुन्ह्यामध्ये पडलेला). इच्छेमध्ये - 'आकङ्खा' (आकांक्षा/इच्छा). परिष्वजनामध्ये - 'आलिङ्गनं' (आलिंगन). आदिकर्मामध्ये - 'आरम्भो' (आरंभ/सुरुवात). ग्रहणामध्ये - 'आदीयति' (घेतो), 'आलिङ्गति' (आलिंगन देतो), 'आलिम्पति' (लेपन करतो). निवासामध्ये - 'आवासो' (आवास/घर), 'आवसथो' (धर्मशाळा/निवासस्थान). समीपमध्ये - 'आसन्नं' (जवळ/निकट). आव्हानामध्ये - 'आमन्तेति' (आमंत्रित करतो/संबोधित करतो). ප [Pg.103] පරා+ප ස+මන්ව+ව, ඔ නි දු රභි බ්යා+ධිසු; අති නි ප්පති පරි අපයො, උප ආ ඉති වීසති; එස හි භො උපසග්ග-විධි+ක්කමතො කථිතො. प, परा, अप, सं, अनु, अव, ओ, नि, दु, वि, अभि, अधि, अति, नि, अपि, पति (प्रति), परि, उप, आ - हे वीस उपसर्ग आहेत. हेच, हे भद्र पुरुषो! उपसर्गांचे विधान क्रमाने सांगितले आहे. එත්ථ ච – आणि येथे – උපසග්ග+නිපාතා ච, පච්චයා ච ඉමෙ තයො; නෙකෙ+නෙකත්ථවාචකා, ඉති නෙරුත්තිකා+බ්රවුං. उपसर्ग, निपात आणि प्रत्यय हे तिन्ही अनेक अर्थांचे वाचक असतात, असे निरुक्तकारांनी (व्याकरणकारांनी) सांगितले आहे. 118. අසංඛ්යෙහි සබ්බාසං ११८. असंख्यांनंतर (संख्या नसलेल्या अव्ययांच्या नंतर) सर्व (विभक्तींचा लोप होतो). අවිජ්ජමානසංඛ්යෙහි පරාසං සබ්බාසං විභත්තීනං ලොපො හොති. න සන්ති එකවචනාදිසංඛ්යා එතෙසන්ති අසංඛ්යා, තෙසං අසංඛ්යානං විභත්තීනං භෙදෙ අසතිපි ස්යාදිවිධානං ‘‘මා නො අජ්ජ විකන්තිංසූ’’තිආදො විභත්යන්තත්තා පදත්තසිද්ධීති වො+නොආදීනං සිද්ධියා ච තෙසං පඨමාදිඅත්ථෙ දස්සනතො ච හොති. පහාරො පරාභවො අපහාරො සංහාරො අවහාරො ඔහාරො ඉච්චාදි හොති. ज्यांच्यामध्ये संख्या (एकवचन, बहुवचन) विद्यमान नसते, अशा शब्दांनंतर येणाऱ्या सर्व विभक्तींचा लोप होतो. ज्यांच्यामध्ये एकवचन इत्यादी संख्या नसतात ते 'असंख्या' (अव्यय) होत. त्या असंख्यांच्या विभक्तींमध्ये भेद नसला तरी, 'मा नो अज्ज विकन्तिंसू' (आज आम्हाला कापू नका) इत्यादी उदाहरणांमध्ये विभक्तीच्या अंतामुळे पदत्व सिद्ध होते, आणि 'वो', 'नो' इत्यादी शब्दांच्या सिद्धीसाठी आणि त्यांच्या प्रथमा इत्यादी अर्थांमध्ये प्रयोगामुळे देखील (विभक्तीचा लोप) होतो. प्रहार (पहारो), पराभव (पराभवो), अपहार (अपहारो), संहार (संहारो), अवहार (अवहारो), ओहार (ओहारो) इत्यादी रूपे होतात. උපෙච්ච+ත්ථං සජන්තීති, උපසග්ගා හි පාදයො; චාදී පදාදිමජ්ඣන්තෙ, නිපාතා නිපතන්තීති. अर्थाच्या जवळ जाऊन त्याला चिकटतात (किंवा अर्थ बदलतात) म्हणून 'प' इत्यादींना 'उपसर्ग' म्हणतात. 'च' इत्यादी शब्द पदाच्या सुरुवातीला, मध्ये किंवा शेवटी पडतात (येतात) म्हणून त्यांना 'निपात' म्हणतात. ඔපසග්ගිකපදං. औपसर्गिक पद (उपसर्गयुक्त शब्द). සමුච්චය+විකප්පන+පටිසෙධ+පූරණාදිඅත්ථං අසත්තවාචිකං නෙපාතිකං. समुच्चय (एकत्र करणे), विकल्प (पर्याय), प्रतिषेध (मज्जाव/नकार), पूरण (वाक्य पूर्ण करणे) इत्यादी अर्थ असणारे आणि द्रव्यवाचक नसलेले (अद्रव्यवाचक) पद म्हणजे 'निपात' होय. ච-ඉති සමුච්චයා+න්වාචය+ඉතරෙතරයොග+සමාහාරා+වධාරණාදීසු. වා-ඉති විකප්පනු+පමාන+සමුච්චය+වවත්ථිතවිභාසාදීසු. න, නො, මා, අ, අලං, හලං ඉච්චෙතෙ පටිසෙධෙ[Pg.104]. ‘‘ද්වෙ පටිසෙධා පකතිඅත්ථං ගමයන්තී’’ති ඤායා ‘‘න තෙසං පන රූපානං පච්චයා න ච හොන්තී’’ති එත්ථ න ච න හොන්ති-හොන්තෙවාති පකතිඅත්ථං ගමයති. අලං පරියත්ති+භූසනෙසු ච. 'च' हा निपात समुच्चय, अन्वाचय (दुय्यम जोडणी), इतरेतरयोग, समाहार, avadhāraṇa (निश्चय) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'वा' हा निपात विकल्प (पर्याय), उपमान (तुलना), समुच्चय, व्यवस्थित विभाषा (निश्चित पर्याय) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'न', 'नो', 'मा', 'अ', 'अलं', 'हलं' हे शब्द प्रतिषेध (नकार) दर्शवण्यासाठी वापरले जातात. 'दोन नकार मूळ अर्थाकडे (होकाराकडे) नेतात' (द्वे पटिसेधा पकतियत्थं गमयन्ति) या न्यायानुसार, 'न तेसं पन रूपानं पच्चया न च होन्ति' यामध्ये 'न च न होन्ति' म्हणजेच 'होन्तेव' (ते होतातच) असा मूळ अर्थ प्राप्त होतो. 'अलं' हा शब्द पर्याप्तता (क्षमता/पुरेसे असणे) आणि भूषण (अलंकार) या अर्थांमध्ये देखील वापरला जातो. පූරණත්ථං දුවිධං අත්තපූරණං පදපූරණඤ්ච, තත්ථ අථ, ඛලු, වත, අථො, අස්සු, යග්ඝෙ, හි, චරහි, නං, තං, ච, තු, වා, වො, පන, හවෙ, කීව, හ, තතො, යථා, සුදං, ඛො, වෙ, හං, එනං, (එවං, රූ) සෙය්යථිදං ඉච්චෙවමාදි පදපූරණෙ. තත්ථ අථ-ඉති පඤ්හා+නන්තරියා+ධිකාරාදීසු ච. ඛලු-ඉති පටිසෙධා+වධාරණ, පසිද්ධීසු ච. වත+ඉති එකංස, ඛෙදා+නුකම්ප, සංකප්පෙසු ච. අථො-ඉති අන්වාදෙසෙ ච. හි-ඉති හෙතු, අවධාරණෙසු ච. තු-ඉති විසෙස, හෙතු, නිවත්තනාදීසු ච. පන-ඉති විසෙසෙපි. හවෙ+වෙ ඉච්චෙතෙ එකංසත්ථෙපි. හං-විසාද, විම්හෙසුපි. (විසාද, සම්භවෙසු, රූ). සෙය්යථිදංති තං කතමංති අත්ථෙපි. अर्थ पूर्ण करणे (पूरणार्थ) दोन प्रकारचे आहे - अर्थपूरण (स्वतःचा अर्थ पूर्ण करणे) आणि पदपूरण (शब्दाची पूर्तता करणे). त्यापैकी 'अथ', 'खलु', 'वत', 'अतो', 'अस्सु', 'यग्घे', 'हि', 'चरहि', 'नं', 'तं', 'च', 'तु', 'वा', 'वो', 'पन', 'हवे', 'कीव', 'ह', 'ततो', 'यथा', 'सुदं', 'खो', 'वे', 'हं', 'एनं', (एवं, रू) 'सेय्यथिदं' इत्यादी पदपूरणामध्ये (शब्दाची पूर्तता करण्यासाठी) वापरले जातात. त्यामध्ये 'अथ' हा प्रश्न, आनंतर्य (लगेचच नंतर घडणारी क्रिया), अधिकार इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'खलु' हा निषेध, अवधारण (निश्चय) आणि प्रसिद्धी या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'वत' हा एकांश (निश्चितता), खेद, अनुकंपा (दया) आणि संकल्प या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'अथो' हा अन्वादेश (पुनरुल्लेख) या अर्थात वापरला जातो. 'हि' हा हेतू (कारण) आणि अवधारण (निश्चय) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'तु' हा विशेष, हेतू, निवर्तन (निवृत्ती) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'पन' हा विशेष अर्थातही वापरला जातो. 'हवे' आणि 'वे' हे एकांश (निश्चितता) अर्थात वापरले जातात. 'हं' हा विषाद (दुःख) आणि विस्मय (आश्चर्य) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. (रूपावतारात 'विषाद आणि संभव' असा पाठ आहे). 'सेय्यथिदं' हा 'ते कोणते?' (तं कतमं) या अर्थातही वापरला जातो. අත්ථපූරණං දුවිධං විභත්තියුත්තං අවිභත්තියුත්තඤ්ච. අත්ථි, සක්කා, ලබ්භා ඉච්චෙතෙ පඨමායං. ආවුසො අම්භො හම්භො අරෙ හරෙ රෙ ජෙ ඉච්චෙතෙ ආමන්තණෙ. දිවා භිය්යො (නමො, රූ) ඉච්චෙතෙ පඨමාදුතියාසු. සයං සාමං සං සම්මා කින්ති ඉච්චෙතෙ තතියත්ථෙ. සො+තො+ධාපච්චයන්තා ච සුත්තසො පදසො අනිච්චතො දුක්ඛතො එකධා ද්විධා ඉච්චාදි. තවෙ+තුං පච්චයන්තා චතුත්ථියාව, කාතවෙ දාතවෙ, කාතුං කාරෙතුං, (දාතුං, රූ) දාපෙතුං ඉච්චාදි. සො+තොපච්චයන්තා පඤ්චමියත්ථෙ, දීඝසො ඔරසො රාජතො වා චොරතො වා ඉච්චාදි. තො සත්ත- ම්යත්ථෙපි [Pg.105] ත්ර+ත්ථාදිපච්චයන්තා ච, එකතො පුරතො පච්ඡතො පස්සතො පිට්ඨිතො පාදතො සීසතො අග්ගතො මූලතො, යත්ර යත්ථ යහිං තත්ර තත්ථ තහිං ඉච්චාදි. සමන්තා සාමන්තා පරිතො අභිතො සමන්තතො එකජ්ඣං එකමන්තං හෙට්ඨා උපරි උද්ධං අධො තිරියං සම්මුඛා පරමුඛා ආවි රහො තිරො උච්චං නීචං අන්තො අන්තරා අන්තරං අජ්ඣත්තං බහිද්ධා බාහිරා බාහිරං බහි ඔරං පාරං ආරා ආරකා පච්ඡා පුරෙ හුරං පෙච්ච ඉච්චෙතෙ සත්තමියා. සම්පති ආයති අජ්ජ අපරජ්ඣ සුවෙ ස්වෙ උත්තරසුවෙ (කිසු, රූ) හිය්යො පරෙ (පරසුවෙ, රූ) සජ්ජු සායං පාතො කාලං කල්ලං දිවා රත්තං නිච්චං සතතං අභිණ්හං අභික්ඛණං මුහුං මුහුත්තං භූතපුබ්බං පුරා යදා තදා (කදා, රූ) ඉච්චාදයො කාලසත්තමියං. ඉති විභත්තියුත්තානි. अर्थपूरण दोन प्रकारचे आहे - विभक्तियुक्त (विभक्ती प्रत्यय लागलेले) आणि अविभक्तियुक्त (विभक्ती प्रत्यय नसलेले). 'अत्थि', 'सक्का', 'लब्भा' हे प्रथमा विभक्तीमध्ये वापरले जातात. 'आवुसो', 'अम्भो', 'हम्भो', 'अरे', 'हरे', 'रे', 'जे' हे आमंत्रणात (संबोधनात) वापरले जातात. 'दिवा', 'भिय्यो' (रूपावतारात 'नमो') हे प्रथमा आणि द्वितीया विभक्तीमध्ये वापरले जातात. 'सयं', 'सामं', 'सं', 'सम्मा', 'किन्ति' हे तृतीया विभक्तीच्या अर्थात वापरले जातात. 'सो', 'तो' आणि 'धा' प्रत्ययान्त शब्द जसे की 'सुत्तसो', 'पदसो', 'अनिच्चतो', 'दुक्खतो', 'एकधा', 'द्विधा' इत्यादी. 'तवे' आणि 'तुं' प्रत्ययान्त शब्द चतुर्थी विभक्तीच्या अर्थातच वापरले जातात, जसे की 'कातवे', 'दातवे', 'कातुं', 'कारेतुं', (रूपावतारात 'दातुं') 'दापेतुं' इत्यादी. 'सो' आणि 'तो' प्रत्ययान्त शब्द पंचमी विभक्तीच्या अर्थात वापरले जातात, जसे की 'दीघसो', 'ओरसो', 'राजतो वा चोरतो वा' इत्यादी. 'तो' प्रत्यय सप्तमी विभक्तीच्या अर्थातही वापरला जातो, तसेच 'त्र', 'त्थ' इत्यादी प्रत्ययान्त शब्दही, जसे की 'एकतो', 'पुरतो', 'पच्छतो', 'पस्सतो', 'पिट्ठितो', 'पादतो', 'सीसतो', 'अग्गतो', 'मूलतो', 'यत्र', 'यत्थ', 'यहिं', 'तत्र', 'तत्थ', 'तहिं' इत्यादी. 'समन्ता', 'सामन्ता', 'परितो', 'अभितो', 'समन्ततो', 'एकज्झं', 'एकमन्तं', 'हेट्ठा', 'उपरि', 'उद्धं', 'अधो', 'तिरियं', 'सम्मुखा', 'परमुखा', 'आवि', 'रहो', 'तिरो', 'उच्चं', 'नीचं', 'अन्तो', 'अन्तरा', 'अन्तरं', 'अज्झत्तं', 'बहिद्धा', 'बाहिरा', 'बाहिरं', 'बहि', 'ओरं', 'पारं', 'आरा', 'आरका', 'पच्छा', 'पुरे', 'हुरं', 'पेच्च' हे सप्तमी विभक्तीच्या अर्थात वापरले जातात. 'सम्पति', 'आयति', 'अज्ज', 'अपरज्झ', 'सुवे', 'स्वे', 'उत्तरसुवे', (रूपावतारात 'किसु') 'हिय्यो', 'परे', (रूपावतारात 'परसुवे') 'सज्जु', 'सायं', 'पातो', 'कालं', 'कल्लं', 'दिवा', 'रत्तं', 'निच्चं', 'सततं', 'अभिण्हं', 'अभिक्खणं', 'मुहुं', 'मुहुत्तं', 'भूतपुब्बं', 'पुरा', 'यदा', 'तदा', (रूपावतारात 'कदा') इत्यादी कालवाचक सप्तमीमध्ये (कालसप्तमी) वापरले जातात. हे विभक्तियुक्त शब्द आहेत. අවිභත්තියුත්තෙසු අප්පෙව අප්පෙවනාම නු ඉච්චෙතෙ සංසයත්ථෙ. අද්ධා අඤ්ඤදත්ථු තග්ඝ ජාතු කාමං සසක්කං ඉච්චෙතෙ එකංසත්ථෙ. එවං ඉති අවධාරණෙ. කච්චි නු නනු කථං (කිංසු, රූ) කිං ඉච්චෙතෙ පුච්ඡනත්ථෙ. එවං ඉති ඉත්ථං ඉච්චෙතෙ නිදස්සනත්ථෙ. ඉති හෙතු+වාක්යපරිසමත්තීසු ච. යාව තාව යාවතා තාවතා කිත්තාවතා එත්තාවතා කීව ඉච්චෙතෙ පරිච්ඡෙදනත්ථෙ. එවං සාහු ලහු ඔපායිකං පටිරූපං ආම සාධු ඉච්චෙතෙ සම්පටිච්ඡනත්ථෙ. තථා යථා යථෙව තථෙව එවං එවමෙව එවම්පි යථාපි සෙය්යථාපි සෙය්යථාපිනාම විය ඉව යථරිව තථරිව යථානාම තථානාම යථාහි තථාහි යථාච තථාච ඉච්චෙතෙ පටිභාගත්ථෙ. යථාඉති යොග්ගතා+විච්ඡා+පදත්ථානතිවත්ති+නිදස්සනෙසු ච. එවංඉති [Pg.106] උපදෙස+පඤ්හාදීසු ච. කිඤ්චාපිඉති අනුග්ගහත්ථෙ. ධිඉති ගරහෙ. අහොඉති ගරහ+පසංසන+පත්ථනෙසු. නාමඉති ගරහ+පසංසන+සඤ්ඤා+පඤ්හෙසු. සාධූති පසංසන+යාචනෙසු. ඉඞ්ඝ හන්ද ඉච්චෙතෙ චොදනත්ථෙ. සාධු සුට්ඨු එවමෙතංති අනුමොදනෙ. කිරඉති අනුස්සවන+අසද්ධෙය්යෙසු. නුනඉති අනුමානා+නුස්සරණ+පරිවිතක්කෙසු. කස්මාති කාරණපුච්ඡනෙ. යස්මා තස්මා තථා හි තෙන ඉච්චෙතෙ කාරණච්ඡෙදනත්ථෙ. සහ සද්ධිං අමා (සමං, රූ) ඉති සමක්රියායං. විනා රිතෙ විප්පයොගෙ. නානා පුථු බහුපකාරෙ. පුථු විසුං අසඞ්ඝාතෙ ච. දුට්ඨු කු කුච්ඡායං (ජිගුච්ඡායං, රූ). පුන අප්පඨමෙ. කථං චිකිච්ඡත්ථෙ. ධා ක්ඛත්තුං සො කිඤ්චඉති සංඛ්යාවිභාගෙ. ඊසකං අප්පමානෙසු (අප්පමත්තෙ, රූ). සණිකං මන්දත්ථෙ. ඛිප්පං අරං ලහුං ආසු තුණ්හං අචිරං සීඝත්ථෙ. චිරං චිරස්සං දීඝකාලෙ. චෙ යදි සංකා+වට්ඨානෙ. ධුරං ථිරා+වධාරණෙසු (ධුවං ථිරා+වධාරණෙසු, රූ). හා විසාදෙ. තුණ්හී අභාසනෙ. සච්ඡි පච්චක්ඛෙ. මුසා මිච්ඡාඅලිකං අසච්චෙ. සුවත්ථි ආසිට්ඨෙ ඉච්චාදි. अविभक्तियुक्त शब्दांमध्ये 'अप्पेव', 'अप्पेवनाम', 'नु' हे संशयाच्या (संशयार्थ) अर्थात वापरले जातात. 'अद्धा', 'अञ्ञदत्थु', 'तग्घ', 'जातु', 'कामं', 'ससक्कं' हे एकांश (निश्चितता) अर्थात वापरले जातात. 'एवं' हा अवधारण (निश्चय) अर्थात वापरला जातो. 'कच्चि', 'नु', 'ननु', 'कथं', (रूपावतारात 'किंसु') 'किं' हे प्रश्न विचारण्याच्या (प्रश्नार्थ) अर्थात वापरले जातात. 'एवं', 'इत्थं' हे निदर्शन (उदाहरण दाखवणे) अर्थात वापरले जातात. 'इति' हा हेतू आणि वाक्यसमाप्ती या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'याव', 'ताव', 'यावता', 'तावता', 'कित्तावता', 'एत्तावता', 'कीव' हे परिच्छेद (मर्यादा किंवा सीमा) अर्थात वापरले जातात. 'एवं', 'साहु', 'लहु', 'ओपायिकं', 'पटिरूपं', 'आम', 'साधु' हे संप्रतिच्छन (स्वीकृती किंवा संमती) अर्थात वापरले जातात. 'तथा', 'यथा', 'यथेव', 'तथेव', 'एवं', 'एवमेव', 'एवम्पि', 'यथापि', 'सेय्यथापि', 'सेय्यथापिनाम', 'विय', 'इव', 'यथरिव', 'तथरिव', 'यथानाम', 'तथानाम', 'यथाहि', 'तथाहि', 'यथाच', 'तथाच' हे प्रतिभागाच्या (सादृश्य किंवा उपमा) अर्थात वापरले जातात. 'यथा' हा योग्यता, वीप्सा (पुनरावृत्ती), पदार्थानतिवृत्ती (मर्यादेचे उल्लंघन न करणे) आणि निदर्शन या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'एवं' हा उपदेश, प्रश्न इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'किञ्चापि' हा अनुग्रह (सवलत) अर्थात वापरला जातो. 'धि' हा गर्हा (धिक्कार) अर्थात वापरला जातो. 'अहो' हा गर्हा, प्रशंसा आणि प्रार्थना या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'नाम' हा गर्हा, प्रशंसा, संज्ञा (नाव) आणि प्रश्न या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'साधु' हा प्रशंसा आणि याचना (विनंती) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'इङ्घ', 'हन्द' हे चोदना (प्रेरणा किंवा आज्ञा) अर्थात वापरले जातात. 'साधु', 'सुट्ठु', 'एवमेतं' हे अनुमोदन (संमती किंवा कौतुक) अर्थात वापरले जातात. 'किर' हा अनुश्रवण (ऐकीव गोष्ट) आणि अश्रद्धेय (अविश्वासार्ह गोष्ट) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'नून' हा अनुमान, अनुस्मरण आणि परवितर्क (विचार) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'कस्मा' हा कारण विचारण्याच्या अर्थात वापरला जातो. 'यस्मा', 'तस्मा', 'तथा हि', 'तेन' हे कारण निश्चित करण्याच्या (कारणच्छेद) अर्थात वापरले जातात. 'सह', 'सद्धिं', 'अमा' (रूपावतारात 'समं') हे समक्रिया (एकत्र क्रिया करणे) या अर्थात वापरले जातात. 'विना', 'रिते' हे विप्रयोग (वियोग किंवा विरहित) अर्थात वापरले जातात. 'नाना', 'पुथु' हे बहुप्रकार (विविध प्रकार) अर्थात वापरले जातात. 'पुथु', 'विसुं' हे असंघात (वेगळे असणे) अर्थात वापरले जातात. 'दुट्ठु', 'कु' हे कुत्सा (निंदा किंवा तिरस्कार) अर्थात वापरले जातात (रूपावतारात 'जिगुच्छा' असा पाठ आहे). 'पुन' हा अप्रथम (पुन्हा एकदा) अर्थात वापरला जातो. 'कथं' हा चिकित्सा (संशय किंवा चौकशी) अर्थात वापरला जातो. 'धा', 'क्खत्तुं', 'सो', 'किञ्च' हे संख्याविभागात वापरले जातात. 'ईसकं' हा अल्प प्रमाणात (अप्पमान) वापरला जातो (रूपावतारात 'अप्पमत्त' असा पाठ आहे). 'सणिकं' हा मंद (हळूवार) अर्थात वापरला जातो. 'खिप्पं', 'अरं', 'लहुं', 'आसु', 'तुण्हं' हे शीघ्र (लवकर) अर्थात वापरले जातात. 'चिरं', 'चिरस्सं' हे दीर्घकाळ अर्थात वापरले जातात. 'चे', 'यदि' हे शंका आणि अवस्थापना (अट किंवा शक्यता) या अर्थांमध्ये वापरले जातात. 'धुरं' हा स्थिरता आणि अवधारण या अर्थांमध्ये वापरला जातो (रूपावतारात 'धुवं' असा पाठ आहे). 'हा' हा विषाद (दुःख) अर्थात वापरला जातो. 'तुण्ही' हा अभाषण (मौन) अर्थात वापरला जातो. 'सच्छि' हा प्रत्यक्ष अर्थात वापरला जातो. 'मुसा', 'मिच्छा', 'अलिकं' हे असत्य अर्थात वापरले जातात. 'सुवत्थि' हा आशिष (कल्याण असो) अर्थात वापरला जातो, इत्यादी. තුන+ක්ත්වාන+ක්ත්වාපච්චයන්තා උස්සුක්කනත්ථෙ භවන්ති. යථා පස්සිතුන පස්සිය පස්සිත්වාන පස්සිත්වා, දිස්වා දිස්වාන දස්සෙත්වා දාතුන දත්වාන දත්වා උපාදාය දාපෙත්වා විඤ්ඤාය විචෙය්ය විනෙය්ය සමෙච්ච නිහච්ච උපෙච්ච ආරබ්භ ආගම්ම ඉච්චාදි. 'तुन', 'क्त्वान' आणि 'क्त्वा' प्रत्ययान्त शब्द उत्सुकता (किंवा तत्परता) या अर्थात होतात. जसे की 'पस्सितुन', 'पस्सिय', 'पस्सित्वान', 'पस्सित्वा', 'दिस्वा', 'दिस्वान', 'दस्सेत्वा', 'दातुन', 'दत्वान', 'दत्वा', 'उपादाय', 'दापेत्वा', 'विञ्ञाय', 'विचेय्य', 'विनेय्य', 'समेच्च', 'निहच्च', 'उपेच्च', 'आरब्भ', 'आगम्म' इत्यादी. විභත්තියා [Pg.107] කතො භෙදො, සලිඞ්ගානං භවෙ තථා; තුම්හාදීනං ත්ව+ලිඞ්ගෙසු, නෙව+ත්ථි පාදි+චාදිනං. विभक्तीने केलेला भेद जसा सलिंग (लिंग असलेल्या) शब्दांमध्ये होतो, तसा तो 'तुम्ह' इत्यादी लिंगरहित शब्दांमध्ये आणि 'पादि' (प्र, परा इत्यादी उपसर्ग) इत्यादींमध्ये मुळीच होत नाही. එවං නාමාඛ්යාතොපසග්ගෙහි විනිමුත්තං එතං නිපාතපදං වෙදිතබ්බං. अशा प्रकारे, नाम, आख्यात (क्रियापद) आणि उपसर्ग यांच्यापासून मुक्त असलेल्या शब्दाला 'निपात पद' (अव्यय) समजावे. නෙපාතිකපදං. निपात पद (अव्यय प्रकरण). පුල්ලිඞ්ගං ඉත්ථිලිඞ්ගඤ්ච, නපුංසක+මථා+පරං; තිලිඞ්ගඤ්ච අලිඞ්ගඤ්ච, නාමිකං පඤ්චධා ඨිතං. पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आणि त्यानंतर नपुंसकलिंग; तसेच त्रिलिंग (तिन्ही लिंगांत चालणारे) आणि अलिंग (लिंगरहित); अशा पाच प्रकारे नाम (नामिक) विभागलेले आहे. ඉති පයොගසිද්ධියං නාමකණ්ඩො දුතියො. अशा प्रकारे प्रयोगसिद्धीमधील 'नामकांड' नावाचा दुसरा अध्याय समाप्त झाला. 3. කාරකකණ්ඩ ३. कारककांड (कारकांचा अध्याय). අථ [Pg.108] විභත්තීන+මත්ථභෙදා වුච්චන්තෙ. आता विभक्तींच्या अर्थांचे भेद सांगितले जात आहेत. තත්ථ එකම්පි අත්ථං කම්මාදිවසෙන එකත්තාදිවසෙන ච විභජන්තීති විභත්තියො, ස්යාදයො. තා පන පඨමාදිභෙදෙන සත්තවිධා. තා යථා ‘‘පඨමා+ත්ථමත්තෙ’’ති පඨමාවිභත්ති හොති. සිස්ස ඔකාර+ලොප+අ-මාදෙසෙසු නරො ඉත්ථී නපුංසකං. त्यामध्ये, एकाच अर्थाला कर्म इत्यादींच्या द्वारे आणि एकवचन इत्यादींच्या द्वारे ज्या विभागतात, त्या 'विभक्ती' (सि, यो इत्यादी प्रत्यय) होत. त्या प्रथमा इत्यादी भेदांनी सात प्रकारच्या आहेत. जसे की, "केवळ प्रातिपदिकार्थात" प्रथमा विभक्ती होते. 'सि' प्रत्ययाचा ओकार, लोप आणि अ-कार आदेश झाल्यावर 'नरो' (पुरुष), 'इत्थी' (स्त्री), 'नपुंसकं' (नपुंसक) अशी रूपे बनतात. සකත්ථ+දබ්බ+ලිඞ්ගානි, සංඛ්යා+කම්මාදිපඤ්චකං; නාමත්ථො තස්ස සාමඤ්ඤ-මත්ථමත්ථං පවුච්චතෙ. स्वार्थ (स्वतःचा अर्थ), द्रव्य (वस्तू), लिंग, संख्या आणि कर्म इत्यादी हे पाच नामाचे अर्थ (नामार्थ) आहेत; त्याचा सामान्य अर्थ 'केवळ अर्थ' (अर्थमात्र) म्हटला जातो. සො නාමත්ථො ච – आणि तो नामाचा अर्थ (नामार्थ) असा आहे – ජාති ක්රියා ගුණො දබ්බං, තථා නාමන්ති පඤ්චධා; සද්දස්ස+ත්ථො ස සද්දොපි, පඤ්චධාව+ත්ර භිජ්ජතෙ. जाती (वर्ग), क्रिया, गुण, द्रव्य आणि नाम (संज्ञा) अशा पाच प्रकारे शब्दाचा अर्थ होतो; आणि तो शब्द देखील येथे पाच प्रकारेच विभागला जातो. කථං ජාතිසද්දො ගුණසද්දොත්යාදිනා. ते कसे? जातीवाचक शब्द, गुणवाचक शब्द इत्यादींद्वारे. භින්නෙස්ව+භින්නධී+සද්දා, සබලාදීසු යබ්බලා; වත්තන්තෙ ජාති එසා+ස්ස, මාලා සුත්ත+මිවා+න්විතා. वेगवेगळ्या असलेल्या चित्कबरी (सबल) इत्यादी गाईंमध्ये जी शक्ती अभिन्न बुद्धी आणि अभिन्न शब्द निर्माण करते, ती 'जाती' होय; ती त्यामध्ये माळेतील सूत्राप्रमाणे (धाग्याप्रमाणे) ओवलेली असते. අදබ්බභූතං කත්තාදි-කාරකග්ගාමසාධියං; පදත්ථං කත්තුකම්මට්ඨං, ක්රිය+මිච්ඡන්ති තබ්බිදූ. जे त्या (व्याकरण) शास्त्राचे ज्ञाते आहेत, ते कर्ता इत्यादी कारकसमूहाद्वारे साध्य होणाऱ्या, अद्रव्यरूप (द्रव्य नसलेल्या) आणि कर्ता किंवा कर्माच्या ठिकाणी राहणाऱ्या शब्दार्थाला 'क्रिया' असे मानतात. දබ්බස්සිතො තතො භින්නො, නිමිත්තො තප්පතීතියා; විනස්සනසභාවො ච, නිග්ගුණොව ගුණො+ච්චතෙ. जो द्रव्याच्या आश्रयाने राहतो, त्याहून भिन्न असतो, त्याच्या ज्ञानाचे (प्रतीतीचे) कारण असतो, विनाशशील स्वभावाचा असतो आणि स्वतः गुणरहित असतो, त्याला 'गुण' असे म्हटले जाते. එත්ථ [Pg.109] පටො සුක්කොති විනස්සනසභාවො ච චසද්දෙන විපුලො ආකාසොති අවිනස්සනසභාවො ච අත්තනි විසුං ගුණරහිතො ගුණො+ච්චතෙ ත්යත්ථො. येथे "वस्त्र पांढरे आहे" (पटो सुक्को) हा विनाशशील स्वभाव आहे, आणि 'च' (ca) शब्दाने "विशाल आकाश" (विपुलो आकासो) हा अविनाशशील स्वभाव दर्शविला आहे; जो स्वतःमध्ये स्वतंत्रपणे गुणरहित असतो, त्याला 'गुण' म्हटले जाते, असा याचा अर्थ आहे. යං යං විසෙස්සතෙ කිඤ්චි, තං තං දබ්බ+මිහො+ච්චතෙ; ජාත්යාදිනොප්ය+තො තාදි, දබ්බත්තං පරිකප්පතෙ. ज्या ज्या कशाचेही विशेषण केले जाते (ज्याला विशेषित केले जाते), त्याला येथे 'द्रव्य' म्हटले जाते; म्हणूनच जाती इत्यादींना देखील अशाच प्रकारे द्रव्यत्व कल्पिले जाते. එත්ථ ගොජාති අස්සජාතීති වුත්තෙ ජාති දබ්බං. නීලො ගුණොති ච ගුණො දබ්බං. පචනක්රියාති ච ගමනාදික්රියාතො විසෙසියතීති ක්රියාව දබ්බං. येथे "गो-जाती" (गाईची जात) किंवा "अश्व-जाती" (घोड्याची जात) असे म्हटले असता 'जाती' हे द्रव्य ठरते. "निळा गुण" (नीलो गुणो) असे म्हटले असता 'गुण' हे द्रव्य ठरते. आणि "स्वयंपाक करण्याची क्रिया" (पचनक्रिया) असे म्हटले असता, ती गमन इत्यादी क्रियांपासून विशेषित केली जात असल्यामुळे 'क्रिया' हेच द्रव्य ठरते. නාමරූපෙන සදබ්බෙ, ක්වචි සඤ්ඤී කථීයතෙ; නාමන්ති තං යථා චිත්තො, සඤ්ඤා සද්දො තු තද්ධනී. नाम आणि रूपाने युक्त असलेल्या द्रव्यामध्ये कधीकधी संज्ञा असणाऱ्याला (संज्ञीला) 'नाम' म्हटले जाते, जसे की 'चित्त' (एका व्यक्तीचे नाव); परंतु संज्ञा-शब्द (नाव दर्शवणारा शब्द) हा त्याचा ध्वनी असतो. නාමස්ස දබ්බත්තෙපි චිත්තොත්යාදි නාමෙනෙව පසිජ්ඣති, නො ඝට+පටාදයොව දබ්බත්තෙන, තස්මා නාම+මිති සඤ්ඤී කථීයතෙ, තංවාචකත්තා තබ්බතී චිත්තාදි සඤ්ඤාසද්දොති නිච්ඡියතෙය්ය+ධිප්පායො. नामाचे द्रव्यत्व असले तरी 'चित्त' इत्यादी नामानेच सिद्ध होतात, घट-पट (घडा-वस्त्र) इत्यादींसारखे केवळ द्रव्यत्वामुळे नाही. म्हणून संज्ञीला (नाव धारण करणाऱ्याला) 'नाम' म्हटले जाते, आणि त्याचा वाचक असल्यामुळे 'चित्त' इत्यादी संज्ञा-शब्द त्या अर्थाने युक्त ठरतात, असा हा अभिप्राय निश्चित केला पाहिजे. අයං පඤ්චවිධොපි අත්ථො සද්දත්ථො චෙව සාමත්ථියා ගම්යමානත්ථො චාති දුබ්බිධො. තථා හි ‘‘පීනො දිවා න භුඤ්ජෙය්ය’’මිති භුත්තිනිරාකති සද්දත්ථො. රත්තිභුත්ති තු සාමත්ථියා+වගම්යතෙ. තෙනෙ+තං වුච්චති – हा पाच प्रकारचा अर्थ देखील दोन प्रकारचा आहे: शब्दार्थ (शब्दाने व्यक्त होणारा अर्थ) आणि सामर्थ्याने (व्यंजनेने) समजणारा अर्थ. जसे की, "लठ्ठ माणूस दिवसा जेवत नाही" यामध्ये दिवसा जेवणाचा निषेध करणे हा 'शब्दार्थ' आहे. परंतु रात्री जेवणे हे सामर्थ्याने (अर्थापत्तीने) समजून येते. म्हणूनच असे म्हटले आहे – අත්ථප්පතීතියං සද්ද-බ්යාපාරො තිවිධො භවෙ; මුඛ්යො ලක්ඛණ+බ්යඤ්ජන-සභාවො චාති එත්ථ තු. अर्थाच्या प्रतीतीमध्ये शब्दाचा व्यापार (कार्य) तीन प्रकारचा असतो: मुख्य (अभिधा), लक्षण (लक्षणा) आणि व्यंजन (व्यंजना) स्वभाव. येथे – මුඛ්යො තු නිරන්තරත්ථෙ, ලක්ඛණො තු තිරොහිතෙ; අත්ථෙ+තරො තු වාක්යස්ස, අත්ථෙයෙව පවත්තති. मुख्य व्यापार हा थेट (व्यवहित नसलेल्या) अर्थामध्ये प्रवृत्त होतो, लक्षण व्यापार हा परोक्ष (लपलेल्या) अर्थामध्ये प्रवृत्त होतो, आणि दुसरा (व्यंजन व्यापार) हा वाक्याच्या अर्थामध्येच प्रवृत्त होतो. ‘‘මඤ්චෙ’’ති [Pg.110] නිරන්තරත්ථෙ වත්තමානො මුඛ්යො, ‘‘මඤ්චා උග්ඝොසන්තී’’ති තිරොහිතත්ථෙ වත්තමානො ලක්ඛණො, ගාථාදිසකලවාක්යස්ස+ත්ථෙ වත්තමානො බ්යඤ්ජනසභාවො. "मंचावर" (मंचे) हा थेट अर्थामध्ये प्रवृत्त होणारा 'मुख्य' व्यापार आहे, "मंच ओरडत आहेत" (मंचा उग्घोसन्ती) हा परोक्ष अर्थामध्ये (मंचावरील लोक ओरडत आहेत या अर्थी) प्रवृत्त होणारा 'लक्षण' व्यापार आहे, आणि गाथा इत्यादी संपूर्ण वाक्याच्या अर्थामध्ये प्रवृत्त होणारा 'व्यंजन' स्वभाव आहे. බ්යාපාරස්ස පභෙදෙන, තිධා සද්දොපි වාචකො; ලක්ඛණිකො බ්යඤ්ජකොති, තදත්ථොපි තිධා මතො. व्यापाराच्या भेदानुसार शब्द देखील तीन प्रकारचा असतो: वाचक, लाक्षणिक आणि व्यंजक; आणि त्याचा अर्थ देखील तीन प्रकारचा मानला गेला आहे. වච්චො ලක්ඛණිකො බ්යඞ්ග්යො, චෙවං සද්දො සුවාචකො; වුත්තකමෙන ජාත්යාදි-භෙදෙන පඤ්චධා භවෙති. वाच्य, लाक्षणिक आणि व्यंग्य अशा प्रकारे सुवाचक शब्द, सांगितलेल्या क्रमाने जाती इत्यादी भेदांमुळे पाच प्रकारचा होतो. 38. ආමන්තණෙ – ३८. संबोधन (आमंत्रण) अर्थी – ති ආමන්තණාධිකෙ අත්ථමත්තෙ පඨමාවිභත්ති හොති. භො නර, භො ඉත්ථි, භො නපුංසක. अशा प्रकारे, संबोधन अधिक असलेल्या केवळ अर्थामध्ये प्रथमा विभक्ती होते. जसे की – हे नरा (भो नर), हे स्त्री (भो इत्थी), हे नपुंसका (भो नपुंसक). සද්දෙනා+භිමුඛීකාරො, විජ්ජමානස්ස වත්ථුනො; ආමන්තණං විධාතබ්බෙ, නත්ථි ‘‘රාජා භවෙ’’ති+දං. शब्दाद्वारे विद्यमान (हजर असलेल्या) वस्तूला आपल्याकडे अभिमुख करणे म्हणजे 'संबोधन' होय. जे विधान करायचे आहे, त्यामध्ये "तो राजा होवो" (राजा भवे) असे संबोधन नसते. ක්රියා නිමිත්තං කාරකන්තු කම්ම, කත්තු, කරණ, සම්පදාන, අවධි, ආධාරභෙදෙන ඡබ්බිධං, තං යථා – क्रियेचे निमित्त असणारे 'कारक' हे कर्म, कर्ता, करण, संप्रदान, अवधी (अपादान) आणि आधार (अधिकरण) या भेदांनी सहा प्रकारचे असते, ते खालीलप्रमाणे – 2,2. කම්මෙ දුතියා २,२. कर्मामध्ये द्वितीया विभक्ती होते. කරීයති කත්තුකිරියාය සම්බන්ධීයතීති කම්මං, තස්මිං කම්මකාරකෙ දුතියාවිභත්ති හොති. තං තිවිධං නිබ්බත්ති, විකති, පත්ති භෙදෙන, තත්ථ නිබ්බත්තිකම්මෙ මාතා පුත්තං විජායති, ආහාරො සුඛං ජනයති, කටං කරොති දත්තො. විකතියං කට්ඨ+මඞ්ගාරං කරොති, සුවණ්ණං කටකං කරොති, වීහයො ලුනාති. පත්තියං දත්තො ඝරං පවිසති, ආදිච්චං පස්සති, ධම්මං සුණාති, පණ්ඩිතෙ පයිරුපාසති. जे केले जाते, म्हणजेच कर्त्याच्या क्रियेशी संबंधित असते, ते 'कर्म' होय. त्या कर्म कारकामध्ये द्वितीया विभक्ती होते. ते निर्वृत्ती (उत्पत्ती), विकृती (रूपांतर) आणि प्राप्ती या भेदांनी तीन प्रकारचे असते. त्यापैकी निर्वृत्ती कर्मामध्ये – "माता पुत्राला जन्म देते" (माता पुत्तं विजायति), "अन्न सुखाला जन्म देते" (आहारो सुखं जनयति), "दत्त चटई बनवतो" (कटं करोति दत्तो). विकृती कर्मामध्ये – "तो लाकडाचा कोळसा करतो" (कट्ठं अङ्गारं करोति), "तो सोन्याचे कडे करतो" (सुवण्णं कटकं करोति), "तो भात (धान्य) कापतो" (वीहयो लुनाति). प्राप्ती कर्मामध्ये – "दत्त घरात प्रवेश करतो" (दत्तो घरं पविसति), "तो सूर्याला पाहतो" (आदिच्चं पस्सति), "तो धम्म ऐकतो" (धम्मं सुणाति), "तो पंडितांची संगत करतो" (पण्डिते पयिरुपासति). වුත්තඤ්ච [Pg.111] – आणि असे म्हटले आहे – නිබ්බත්ති+විකති+පත්ති-භෙදා කම්මං තිධා මතං; කත්තුක්රියාභිගම්මන්තං, සුඛ+මඞ්ගාරං+ඝරං යථාති. कर्त्याच्या क्रियेद्वारे प्राप्त होणारे कर्म हे निर्वृत्ती, विकृती आणि प्राप्ती या भेदांनी तीन प्रकारचे मानले गेले आहे; जसे की अनुक्रमे 'सुख' (सुखं), 'कोळसा' (अङ्गारं) आणि 'घर' (घरं). කටං කරොති විපුලං දස්සනීයන්ති අත්ථෙව ගුණයුත්තස්ස කම්මතා, විපුලං කරොති, දස්සනීයං කරොතීති ක්රියාය සම්බන්ධියමානත්තා. ඔදනො පච්චතෙති ඔදනසද්දතො කම්මතා නප්පතීයතෙ, කිඤ්චරහි ආඛ්යාතතො. "तो मोठी, प्रेक्षणीय चटई बनवतो" (कटं करोति विपुलां दस्सनीयं) यामध्ये गुणांनी युक्त असलेल्याची कर्मता सिद्ध होतेच, कारण "मोठी करतो", "प्रेक्षणीय करतो" या रूपाने ते क्रियेशी संबंधित आहे. "भात शिजवला जातो" (ओदनो पच्चते) यामध्ये 'ओदन' (भात) या शब्दावरून कर्मता समजत नाही, तर ती आख्यात प्रत्ययावरून (क्रियापदावरून) समजते. ඉච්ඡිතකම්මං යථා-ගාවුං පයො දොහති, ගොමන්තං ගාවං යාචති, ගාව+මව රුන්ධති වජං, මාණවකං මග්ගං පුච්ඡති, ගොමන්තං ගාවං භික්ඛතෙ, රුක්ඛ+මවචිනාති ඵලානි, රුක්ඛාත්යත්ථො. සිස්සං ධම්මං බ්රූතෙ. එත්ථ පයො, ගාවං ඉච්චාදි ඉච්ඡිතං, ගාවුං, ගොමන්ත+මිච්චාදි අනිච්ඡිතං. එව+මනිච්ඡිතෙපි කණ්ටකං මද්දති, විසං ගිලති. යං නෙවි+ච්ඡිතං, නාපි අනිච්ඡිතං, තත්රාපි ගාමං ගච්ඡන්තො රුක්ඛමූල+මුපසප්පති. इच्छित कर्म जसे की – "तो गाईचे दूध काढतो" (गावुं पयो दोहति), "तो गोपाळाकडे गाईची याचना करतो" (गोमन्तं गावं याचति), "तो गाईला गोठ्यात कोंडतो" (गावमवरुन्धति वजं), "तो मुलाला रस्ता विचारतो" (माणवकं मग्गं पुच्छति), "तो गोपाळाकडे गाईची भिक्षा मागतो" (गोमन्तं गावं भिक्खते), "तो झाडावरून फळे गोळा करतो" (रुक्खमवचिनाति फलानि – येथे 'झाडावरून' असा अर्थ आहे), "तो शिष्याला धम्म सांगतो" (सिस्सं धम्मं ब्रूते). येथे 'दूध' (पयो), 'गाईची' (गावं) इत्यादी इच्छित कर्मे आहेत, तर 'गाईचे' (गावुं), 'गोपाळाकडे' (गोमन्तं) इत्यादी अनिच्छित (गौण) कर्मे आहेत. तसेच अनिच्छित कर्मामध्ये देखील – "तो काट्यावर पाय देतो" (कण्टकं मद्दति), "तो विष गिळतो" (विसं गिलति). जे इच्छितही नाही आणि अनिच्छितही नाही, अशा ठिकाणी देखील – "गावाला जात असताना तो झाडाच्या मुळाशी (सावलीत) जातो" (गामं गच्छन्तो रुक्खमूलमुपसप्पति). ආධාරෙ අධිසි+ඨා+සානං පයොගෙ ච, පථවිං අධිසෙස්සති, ගාම+මධිතිට්ඨති, රුක්ඛ+මජ්ඣාසතෙති. එත්ථ පථවින්ති පථවියන්ති අත්ථො. එව+මභි, නිපුබ්බවිසස්සාපි, ධම්ම+මභිනිවිසතෙ, ධම්මෙ වා. තථා උප, න්ව+ජ්ඣා+පුබ්බවසතිස්ස, ගාම+මුපවසති, ගාම+මනුවසති, විහාර+මධිවසති, ගාම+මාවසති, අගාරං අජ්ඣවසති, එත්ථ ගාමන්ති ගාමෙත්යත්ථො. තථා තප්පානා+චාරෙපි, නදිං පිබති, ගාමං චරති, නදියංත්යත්ථො. සචෙ මං නාලපිස්සතීති මයා සද්ධිංත්යත්ථො. විහිතාව පටි-යොගෙපි දුතියා, පටිභන්තු තං චුන්ද බොජ්ඣඞ්ගා, තම්පටි බොජ්ඣඞ්ගා භාසන්තූති අත්ථො. උපමා මං පතිභාති[Pg.112], උපමා මං උපට්ඨාතිත්යත්ථො. ධාතුනායුත්තෙ ‘‘තස්ස නප්පටිභාතී’’ති ඡට්ඨී. आधार (अधिकरण) अर्थी 'अधि' उपसर्गपूर्वक 'सि' (झोपणे), 'ठा' (उभे राहणे) आणि 'आस' (बसणे) यांच्या प्रयोगात द्वितीया विभक्ती होते; जसे की – "तो पृथ्वीवर झोपेल" (पथविं अधिसेस्सति), "तो गावात राहतो" (गाममधितिट्ठति), "तो झाडावर बसतो" (रुक्खमज्झासते). येथे 'पथविं' म्हणजे 'पथवियं' (पृथ्वीवर) असा अर्थ आहे. तसेच 'अभि' आणि 'नि' उपसर्गपूर्वक 'विस' (प्रवेश करणे) धातूच्या प्रयोगात देखील – "तो धम्मामध्ये प्रवेश करतो" (धम्ममभिनिविसते किंवा धम्मे). तसेच 'उप', 'अनु', 'अधि' आणि 'आ' उपसर्गपूर्वक 'वस' (राहणे) धातूच्या प्रयोगात – "तो गावात राहतो" (गाममुपवसति), "तो गावानुसारी राहतो" (गाममनुवसति), "तो विहारात राहतो" (विहारमधिवासति), "तो गावात राहतो" (गाममावसति), "तो घरात राहतो" (अगारं अज्झावसति); येथे 'गामं' म्हणजे 'गामे' (गावात) असा अर्थ आहे. तसेच पिणे आणि फिरणे या अर्थी देखील – "तो नदीचे पाणी पितो" (नदिं पिबति), "तो गावात फिरतो" (गामं चरति); येथे 'नदीमध्ये' (नदियं) असा अर्थ आहे. "जर तो माझ्याशी बोलणार नाही" (सचे मं नालपिस्सति); येथे 'माझ्यासोबत' (मया सद्धिं) असा अर्थ आहे. 'पटि' च्या योगात देखील द्वितीया विहित आहे – "हे चुन्द, तुला बोज्झंग स्पष्ट होवोत" (पटिभन्तु तं चुन्द बोज्झङ्गा); येथे 'तुझ्याप्रती बोज्झंग भासूत' असा अर्थ आहे. "मला उपमा सुचते" (उपमा मं पटिभाति); येथे 'उपमा माझ्यासमोर उपस्थित होते' असा अर्थ आहे. धातूशी संबंध नसताना (किंवा विशिष्ट प्रयोगात) "त्याला सुचत नाही" (तस्स नप्पटिभाति) येथे षष्ठी विभक्ती होते. 3. කාලද්ධාන+මච්චන්තසංයොගෙ ३. काळ आणि मार्ग (अंतर) यांच्या अत्यंत संयोगात (सतत संबंधात) द्वितीया विभक्ती होते. කාලද්ධානං දබ්බ+ගුණ+ක්රියාහි අච්චන්තසංයොගෙ තෙහි කාලද්ධානවාචීහි දුතියා හොති. කාලෙ-සත්තාහං ගවපානං, මාසං මංසොදනං, සරදං රමණීයා නදී, සබ්බකාලං රමණීයං නන්දනං, තයො මාසෙ අභිධම්මං දෙසෙති. අද්ධනි-යොජනං වනරාජි, යොජනං දීඝො පබ්බතො, කොසං සජ්ඣායති. काळ आणि मार्ग (अंतर) यांचा द्रव्य, गुण किंवा क्रियेशी अत्यंत संयोग (सतत संबंध) असताना, त्या काळ आणि मार्गवाचक शब्दांनंतर द्वितीया विभक्ती होते. काळाच्या बाबतीत – "सात दिवस दुधाचे पान" (सत्ताहं गवपानं), "महिनाभर मांस-भात" (मासं मंसोदनं), "शरद ऋतूत नदी रमणीय असते" (सरदं रमणीया नदी), "नंदनवन सर्वकाळ रमणीय असते" (सब्बकालं रमणीयं नन्दनं), "तो तीन महिने अभिधम्म देशना करतो" (तयो मासे अभिधम्मं देसेति). मार्गाच्या (अंतराच्या) बाबतीत – "एक योजनभर वनराई" (योजनं वनराजि), "एक योजन लांब पर्वत" (योजनं दीघो पब्बतो), "तो एक कोसभर पाठ करतो" (कोसं सज्झायति). පුබ්බන්හසමයං නිවාසෙත්වා, එකං සමයං භගවා, ඉමං රත්තිං චත්තාරො මහාරාජානොති එවමාදීසු කාලවාචීහි අච්චන්තසංයොගෙ දුතියා, බහුලංවිධානා විභත්තිවිපල්ලාසො වා. මාසෙනා+නුවාකො+ධීතො, කොසෙනා+නුවාකො+ධීතොති කරණත්ථෙ තතියා. "पूर्वाह्नसमयी (सकाळी) वस्त्र परिधान करून" (पुब्बन्हसमयं निवासेत्वा), "एका समयी भगवान" (एकं समयं भगवा), "या रात्री चार महाराज" (इमं रत्तिं चत्तारो महाराजानो) इत्यादींमध्ये काळवाचक शब्दांनंतर अत्यंत संयोगात द्वितीया विभक्ती होते, जी बहुल विधानामुळे किंवा विभक्तीच्या विपर्यासाने (बदलाने) होते. "एका महिन्यात अनुवाक (पाठ) शिकला" (मासेनानुवाको अधीतो), "एक कोसात अनुवाक शिकला" (कोसेनानुवाको अधीतो) येथे करण अर्थी तृतीया विभक्ती होते. 4. ගතිබොධාහාරසද්දත්ථාකම්මකභජ්ජාදීනං පයොජ්ජෙ ४. गमन (गती), ज्ञान (बोध), आहार (भोजन), शब्दार्थ, अकर्मक आणि 'भज्' इत्यादी धातूंच्या प्रयोज्य कर्त्याच्या योगात (द्वितीया विभक्ती होते). ගත්යත්ථානං බොධත්ථානං ආහාරත්ථානං සද්දත්ථාන+මකම්මකානං භජ්ජාදීනඤ්ච පයොජ්ජෙ කත්තරි දුතියා හොති. දත්තො ගමයති මාණවකං ගාමං, යාපයති වා. ගුරු බොධයති මාණවකං ධම්මං, වෙදයති වා. මාතා භොජයති පුත්ත+මොදනං, ආසයති වා. ගුරු අජ්ඣාපයති සිස්සං වෙදං, පාඨයති වා. පයොජ්ජතො+ඤ්ඤත්ර කම්මෙ දුතියා. පොසො ආසයති දත්තං, සායයති වා. පොසො අඤ්ඤං භජ්ජාපෙති, අඤ්ඤං කොට්ටාපෙති, අඤ්ඤං සන්ථරාපෙති. गमनार्थक (गती दर्शवणारे), बोधार्थक (ज्ञान देणारे), आहारार्थक (भोजन दर्शवणारे), शब्दार्थक (ध्वनी करणारे), अकर्मक आणि 'भज्' (भाजणे) इत्यादी धातूंच्या प्रयोज्य कर्त्यामध्ये द्वितीया विभक्ती होते. जसे की, दत्त माणवकाला (तरुणाला) गावात पाठवतो किंवा जाण्यास प्रवृत्त करतो. गुरु माणवकाला धम्माचे आकलन करून देतात किंवा जाणवून देतात. माता पुत्राला भात भरवते किंवा खाऊ घालते. गुरु शिष्याला वेदाचे अध्ययन करवतात किंवा शिकवतात. प्रयोज्य कर्त्याव्यतिरिक्त कर्मामध्ये द्वितीया विभक्ती होते. पुरुष दत्ताला खाऊ घालतो किंवा चव चाखवतो. पुरुष दुसऱ्याकडून भाजून घेतो, दुसऱ्याकडून कुटून घेतो, दुसऱ्याकडून अंथरून घेतो. 5. හරාදීනං වා ५. 'हर्' (हरण करणे) इत्यादी धातूंच्या बाबतीत विकल्पेकरून (द्वितीया विभक्ती होते). හරාදීනං [Pg.113] පයොජ්ජෙ කත්තරි දුතියා හොති වා. පොසො හාරෙති භාරං දත්තං, දත්තෙනෙති වා. දස්සයතෙ ජනං රාජා, ජනෙනෙති වා. අභිවාදයතෙ ගුරුං දත්තං, දත්තෙනෙති වා. අජ්ඣොහාරෙති සත්තුං දත්තං, දත්තෙනෙති වා. කාරෙති දත්තො දත්තං, දත්තෙනෙති වා. පක්ඛෙ සබ්බත්ර කත්තරි තතියා. 'हर्' इत्यादी धातूंच्या प्रयोज्य कर्त्यामध्ये विकल्पेकरून द्वितीया विभक्ती होते. जसे की, पुरुष दत्ताकडून ओझे वाहून नेतो (दत्ताला ओझे वाहण्यास लावतो) किंवा दत्ताद्वारे. राजा लोकांना दर्शन देतो किंवा लोकांद्वारे. तो दत्ताला गुरूंना अभिवादन करायला लावतो किंवा दत्ताद्वारे. तो दत्ताला सत्तू खाऊ घालतो किंवा दत्ताद्वारे. दत्त दत्ताकडून काम करवून घेतो किंवा दत्ताद्वारे. दुसऱ्या पक्षात (विकल्पात) सर्वत्र कर्त्यामध्ये तृतीया विभक्ती होते. 6. න ඛාදාදීනං ६. 'खाद्' (खाणे) इत्यादी धातूंच्या बाबतीत (प्रयोज्य कर्त्यामध्ये द्वितीया विभक्ती) होत नाही. ඛාදාදීනං පයොජ්ජෙ කත්තරි දුතියා න හොති. ගත්යත්ථාදීසු ක්වචි පටිසෙධත්ථ+මිදං. ඛාදයති දත්තො දත්තෙන, ආදයති දත්තෙන, අව්හාපයති දත්ථෙන, සද්දායයති දත්තෙන, නායයති දත්තෙන, කන්දයති දත්තෙන. 'खाद्' इत्यादी धातूंच्या प्रयोज्य कर्त्यामध्ये द्वितीया विभक्ती होत नाही. गमनार्थक इत्यादी धातूंच्या बाबतीत काही ठिकाणी निषेध करण्यासाठी हा नियम आहे. जसे की, दत्त दत्ताद्वारे खाऊ घालतो, दत्ताद्वारे ग्रहण करवतो, दत्ताद्वारे बोलावतो, दत्ताद्वारे आवाज करवतो, दत्ताद्वारे नेववतो, दत्ताद्वारे रडवतो. 7. ඣාදීහි යුත්තා ७. 'धि' (धिक्कार असो) इत्यादी शब्दांच्या योगाने (द्वितीया विभक्ती होते). ධිආදීහි යුත්තතො දුතියා හොති. ධි+රත්ථු+මං පුතිකායං, අන්තරා ච රාජගහං අන්තරා ච නාලන්දං, රාජගහස්ස ච නාලන්දස්ස ච විවරභූතෙ මජ්ඣෙති අත්ථො. සමාධාන+මන්තරෙන, මුචලින්ද+මභිතො සරං. ඡට්ඨ්යත්ථෙ+යං දුතියා. 'धि' इत्यादी शब्दांच्या योगाने द्वितीया विभक्ती होते. जसे की, 'धि रत्थु मं पूतिकायं' (या दुर्गंधीयुक्त शरीराला धिक्कार असो!), 'अंतरा च राजगहं अंतरा च नालंदं' (राजगृह आणि नालंदा यांच्या दरम्यान; राजगृह आणि नालंदा यांच्यामधील मोकळ्या जागेत म्हणजेच मध्यभागी असा अर्थ आहे), 'समाधानमंतरेण' (समाधानाशिवाय/समाधीशिवाय), 'मुचलिंदमभितो सरं' (मुचलिंद सरोवराच्या सभोवताली). ही द्वितीया विभक्ती षष्ठी विभक्तीच्या अर्थात आहे. 8. ලක්ඛණිත්ථම්භූතවිච්ඡාස්ව+භිනා ८. लक्षण, इत्थंभूत (अशा प्रकारचा भाव) आणि वीप्सा (पुनरावृत्ती) या अर्थांमध्ये 'अभि' च्या योगाने (द्वितीया विभक्ती होते). ලක්ඛණාදීස්ව+ත්ථෙසු අභිනා යුත්තම්හා දුතියා හොති. රුක්ඛ+මභිවිජ්ජොතතෙ චන්දො, එත්ථ රුක්ඛො ලක්ඛණං, චන්දො ලක්ඛිතබ්බො, තත්ර අභිනා රුක්ඛස්ස ලක්ඛණවුත්තිතා පකාසීයතීති රුක්ඛො අභිනා යුත්තො නාම. සාධු දෙවදත්තො මාතර+මභි, මාතරි සාධුත්තං පත්තොත්යත්ථො. රුක්ඛං රුක්ඛංඅභි විජ්ජොතතෙ චන්දො, රුක්ඛෙ රුක්ඛෙත්යත්ථො. लक्षण इत्यादी अर्थांमध्ये 'अभि' च्या योगाने द्वितीया विभक्ती होते. जसे की, 'रुक्खमभिविज्जोतते चंदो' (चंद्र झाडाकडे चमकतो); येथे झाड हे लक्षण (चिन्ह) आहे आणि चंद्र हा लक्षित होणारा आहे. तेथे 'अभि' मुळे झाडाचे लक्षणत्व प्रकट होते, म्हणून झाड हे 'अभि' ने युक्त आहे. 'साधु देवदत्तो मातरमभि' (देवदत्त मातेच्या प्रति चांगला आहे); मातेच्या बाबतीत त्याने चांगुलपणा प्राप्त केला आहे असा अर्थ आहे. 'रुक्खं रुक्खंअभि विज्जोतते चंदो' (चंद्र प्रत्येक झाडावर चमकतो); प्रत्येक झाडावर असा अर्थ आहे. 9. පතිපරීහි භාගෙ ච ९. लक्षण इत्यादी अर्थांमध्ये आणि 'भाग' (हिस्सा) या अर्थात 'पति' आणि 'परि' च्या योगाने देखील (द्वितीया विभक्ती होते). පතිපරීහි [Pg.114] යුත්තතො ලක්ඛණාදීසු භාගෙ ච+ත්ථෙ දුතියා හොති. රුක්ඛංපති විජ්ජොතතෙ, සාධු දෙවදත්තො මාතරංපති, රුක්ඛං රුක්ඛංපති තිට්ඨති, ය+දෙත්ථ මං පති සියා, යො මම භාගො, සො දීයතුත්යත්ථො. එවං රුක්ඛංපරිත්යාදිපි. 'पति' आणि 'परि' च्या योगाने लक्षण इत्यादी अर्थांमध्ये आणि 'भाग' (हिस्सा) या अर्थात द्वितीया विभक्ती होते. जसे की, 'रुक्खंपति विज्जोतते' (झाडाकडे चमकतो), 'साधु देवदत्तो मातरंपति' (देवदत्त मातेच्या प्रति चांगला आहे), 'रुक्खं रुक्खंपति तिट्ठति' (प्रत्येक झाडाजवळ उभा राहतो), 'यदेत्थ मं पति सिया' (येथे जे माझ्या वाट्याला येईल, म्हणजेच जो माझा हिस्सा असेल, तो दिला जावा असा अर्थ आहे). याचप्रमाणे 'रुक्खं परि' इत्यादी देखील समजावे. 10. අනුනාති १०. 'अनु' च्या योगाने देखील (द्वितीया विभक्ती होते). ලක්ඛණාදීසු දුතියා. රුක්ඛමනු විජ්ජොතතෙ, සච්චකිරිය+මනු වස්සි, හෙතු ච ලක්ඛණං භවති, සාධු දෙවදත්තො මාතර+මනු, රුක්ඛං රුක්ඛ+මනු විජ්ජොතතෙ, යදෙත්ථ මංඅනු සියා. लक्षण इत्यादी अर्थांमध्ये ('अनु' च्या योगाने) द्वितीया विभक्ती होते. जसे की, 'रुक्खमनु विज्जोतते' (झाडाच्या अनुषंगाने चमकतो), 'सच्चकिरियं अनु वस्सि' (सत्यक्रियेच्या अनुषंगाने पाऊस पडला; येथे हेतू देखील लक्षण बनतो), 'साधु देवदत्तो मातरमनु' (देवदत्त मातेच्या प्रति चांगला आहे), 'रुक्खं रुक्खंअनु विज्जोतते' (प्रत्येक झाडाच्या अनुषंगाने चमकतो), 'यदेत्थ मंअनु सिया' (येथे जे माझ्या वाट्याला येईल). 11. සහත්ථෙ ११. सह (सोबत) या अर्थात 'अनु' च्या योगाने द्वितीया विभक्ती होते. සහත්ථෙ අනුනා යුත්තම්හා දුතියා. පබ්බත+මනු තිට්ඨති, පබ්බතෙන සහ ත්යත්ථො. सह (सोबत) या अर्थात 'अनु' च्या योगाने द्वितीया विभक्ती होते. जसे की, 'पब्बतमनु तिट्ठति' (पर्वताच्या बाजूला उभा आहे); पर्वताच्या सोबत असा अर्थ आहे. 12. හීනෙ १२. हीन (कमीपणा) या अर्थात 'अनु' च्या योगाने द्वितीया विभक्ती होते. හීනත්ථෙ අනුනා යුත්තම්හා දුතියා. අනුසාරිපුත්තං පඤ්ඤවන්තො භික්ඛූ, සාරිපුත්තතො පඤ්ඤාය හීනාත්යත්ථො. हीन (कमीपणा) या अर्थात 'अनु' च्या योगाने द्वितीया विभक्ती होते. जसे की, 'अनुसारिपुत्तं पञ्ञवन्तो भिक्खू' (बुद्धिमान भिक्खू सारिपुत्तांपेक्षा कमी आहेत); सारिपुत्तांपेक्षा प्रज्ञेने हीन (कमी) आहेत असा अर्थ आहे. 13. උපෙන १३. हीन (कमीपणा) या अर्थात 'उप' च्या योगाने द्वितीया विभक्ती होते. හීනත්ථෙ උපෙන යුත්තම්හා දුතියා. උපසාරිපුත්තං පඤ්ඤවන්තො. हीन (कमीपणा) या अर्थात 'उप' च्या योगाने द्वितीया विभक्ती होते. जसे की, 'उपसारिपुत्तं पञ्ञवन्तो' (बुद्धिमान लोक सारिपुत्तांपेक्षा कमी आहेत). 16. කත්තුකරණෙසු තතියා १६. कर्ता आणि करण या कारकांमध्ये तृतीया विभक्ती होते. කත්තරි කරණෙ ච කාරකෙ තතියා හොති. ජිනෙන දෙසිතො ධම්මො, බුද්ධෙන ජිතො මාරො, අහිනා දට්ඨො නරො. යත්ථ [Pg.115] කාරණකාරණම්පි කාරණවසෙන වුච්චති, තත්ථාපි තතියා, චොරෙහි ගාමො දඩ්ඪො, තිණෙහි භත්තං සිද්ධං, සද්ධෙහි කාරිතා විහාරා. कर्ता आणि करण या कारकांमध्ये तृतीया विभक्ती होते. जसे की, 'जिनेन देसितो धम्मो' (जिनांद्वारे (बुद्धांद्वारे) धम्म देशित केला गेला), 'बुद्धेन जितो मारो' (बुद्धांद्वारे मार जिंकला गेला), 'अहिना दट्ठो नरो' (सर्पाद्वारे मनुष्य दंशित झाला). जिथे कारणाचे कारण देखील कारणाच्या रूपाने सांगितले जाते, तिथेही तृतीया विभक्ती होते. जसे की, 'चोरेहि गामो दड्ढो' (चोरांद्वारे गाव जाळले गेले), 'तिणेहि भत्तं सिद्धं' (गवताने (इंधनाने) भात शिजवला गेला), 'सद्धेहि कारिता विहारा' (श्रद्धाळू लोकांद्वारे विहार बांधले गेले). අත්තපධානො කිරියං, යො නිබ්බත්තෙති කාරකො; අපයුත්තො පයුත්තො වා, ස කත්තාති පවුච්චති. जो कारक स्वतः प्रधान (स्वतंत्र) राहून क्रिया पूर्ण करतो, मग तो स्वतः प्रवृत्त असो वा दुसऱ्याने प्रवृत्त केलेला असो, त्याला 'कर्ता' असे म्हटले जाते. කරණෙ-තං පන දුවිධං අජ්ඣත්තිකබාහිරවසෙන, යථා හත්ථෙන කම්මං කරොති, චක්ඛුනා රූපං පස්සති, මනසා ධම්මං විඤ්ඤායති. දත්තෙන විහයො ලුනාති, අග්ගිනා කුටිං ඣාපෙති. करण (साधन) हे आंतरिक आणि बाह्य अशा दोन प्रकारचे असते. जसे की, हाताने काम करतो, डोळ्याने रूप पाहतो, मनाने धम्म जाणतो. विळ्याने भात कापतो, आगीने कुटी जाळतो. බාහිරඤ්ච තථා+ජ්ඣත්තං, කරණං දුවිධං යථා; වීහිං ලුනාති දත්තෙන, නෙත්තෙන චන්ද+මික්ඛතෙ. अशा प्रकारे करण (साधन) बाह्य आणि आंतरिक असे दोन प्रकारचे असते; जसे की, विळ्याने भात कापतो आणि डोळ्याने चंद्र पाहतो. පකතියා අභිරූපො, ගොත්තෙන ගොතමො ඉච්චාදි භූධාතුස්ස සම්භවා කරණෙ තතියා. තථා සාරිපුත්තොති නාමෙන විස්සුතො, ජාතියා ඛත්තියො බුද්ධො, ජාතියා සත්තවස්සිකො, සිප්පෙන නළකාරො සො, එකූනතිංසො වයසා, එවං සමෙන ධාවති, විසමෙන ධාවති, ද්විදොණෙන ධඤ්ඤං කිණාති. 'पकतिया अभिरूपो' (स्वभावाने/प्रकृतीने सुंदर), 'गोत्तेन गोतमो' (गोत्राने गोतम) इत्यादी उदाहरणांमध्ये 'भू' धातूच्या संबंधामुळे करणात तृतीया विभक्ती होते. तसेच, 'सारिपुत्तोति नामेन विस्सुतो' (नावाने सारिपुत्त म्हणून प्रसिद्ध), 'जातिया खत्तियो बुद्धो' (जन्माने क्षत्रिय असलेले बुद्ध), 'जातिया सत्तवस्सिको' (वयाने सात वर्षांचा), 'सिप्पेन नळकारो सो' (व्यवसायाने तो टोपल्या विणणारा), 'एकूनतिंसो वयसा' (वयाने एकोणतीस वर्षांचा), याचप्रमाणे 'समेन धावति' (सपाट जमिनीवरून धावतो), 'विसमेन धावति' (विषम जमिनीवरून धावतो), 'द्विदोणेन धञ्ञं किणाति' (दोन द्रोण मापाने धान्य खरेदी करतो). 17. සහත්ථෙන १७. सह (सोबत) या अर्थाच्या योगाने तृतीया विभक्ती होते. සහත්ථෙන යොගෙ තතියා සියා. තතියාපි ඡට්ඨීව අප්පධානෙ එව භවති. පුත්තෙන සහා+ගතො, පුත්තෙන සද්ධිං ආගතො, විතක්කෙන සහ වත්තති, පුත්තෙන සහ ථූලො, නිසීදි භගවා සද්ධිං භික්ඛුසඞ්ඝෙන, සහස්සෙන සමං මිතා, සබ්බෙහි මෙ පියෙහි මනාපෙහි නානාභාවො. सह (सोबत) या अर्थाच्या योगाने तृतीया विभक्ती होते. तृतीया विभक्ती देखील षष्ठी विभक्तीप्रमाणे केवळ अप्रधान (गौण) पदातच होते. जसे की, 'पुत्तेन सहागतो' (पुत्रासह आला), 'पुत्तेन सद्धिं आगतो' (पुत्रासोबत आला), 'वितक्केन सह वत्तति' (वितर्कासह वर्ततो), 'पुत्तेन सह थूलो' (पुत्रासह स्थूल), 'निसीदि भगवा सद्धिं भिक्खुसङ्घेन' (भगवान भिक्खू संघासोबत बसले), 'सहस्सेन समं मिता' (हजाराच्या समान मोजलेले), 'सब्बेहि मे पियेहि मनापेहि नानाभावो' (माझ्या सर्व प्रिय आणि मनपसंत गोष्टींपासून वियोग). 18. ලක්ඛණෙ १८. लक्षण (चिन्ह किंवा वैशिष्ट्य) दर्शवताना तृतीया विभक्ती होते. ලක්ඛණෙ [Pg.116] වත්තමානතො තතියා. භින්නෙන සීසෙන පග්ඝරන්තෙන ලොහිතෙන පටීවිස්සකෙ උජ්ඣාපෙසි, ඌනපඤ්චබන්ධනෙන පත්තෙන අඤ්ඤං නවං පත්තං චෙතාපෙය්ය, තිදණ්ඩකෙන පරිබ්බාජක+මද්දක්ඛි, අක්ඛිනා කාණො, හත්ථෙන කුණී, පාදෙන ඛඤ්ජො, පිට්ඨියා ඛුජ්ජො. තෙන හි විකලඞ්ගෙන විකලඞ්ගිනො විකාරො ලක්ඛියතෙ. लक्षण (वैशिष्ट्य) दर्शवताना तृतीया विभक्ती होते. जसे की, 'भिन्नेन सीसेन पग्घरन्तेन लोहितेन पटीविस्सके उज्झापेसि' (फुटलेल्या डोक्याने आणि वाहणाऱ्या रक्ताने त्याने शेजाऱ्यांना त्रास दिला), 'ऊनपञ्चबन्धनेन पत्तेन अञ्ञं नवं पत्तं चेतापेय्य' (पाचपेक्षा कमी सांधे असलेल्या पात्राच्या ऐवजी दुसरे नवीन पात्र मिळवावे), 'तिदण्डकेन परिब्बाजकमद्दक्खि' (त्रिदंडावरून त्याने परिव्राजकाला पाहिले), 'अक्खिना काणो' (डोळ्याने काणा), 'हत्थेन कुणी' (हाताने लुळा), 'पादेन खञ्जो' (पायाने लंगडा), 'पिट्ठिया खुज्जो' (पाठीने कुबडा). कारण, त्या विकृत अवयवावरूनच विकलांगाचा विकार ओळखला जातो. 19. හෙතුම්හි १९. हेतू किंवा कारणाच्या अर्थात तृतीया विभक्ती होते. වාසාදිලක්ඛණක්රියාය හෙතුතො තතියා. අන්නෙන වසති, විජ්ජාය වසති, න ජච්චා වසලො හොති, කම්මුනා වසලො හොති, දානෙන භොගවා, ආචාරෙන කුලං, තෙන පාණි කාමදදො. राहणे इत्यादी लक्षणरूप क्रियेच्या हेतूमध्ये तृतीया विभक्ती होते. जसे की, 'अन्नेन वसति' (अन्नाच्या कारणाने राहतो), 'विज्जाय वसति' (विद्येच्या कारणाने राहतो), 'न जच्चा वसलो होति' (जन्माने कोणीही वृषल (हीन) होत नाही), 'कम्मुना वसलो होति' (कर्मानेच मनुष्य वृषल होतो), 'दानेन भोगवा' (दानाने मनुष्य ऐश्वर्यसंपन्न होतो), 'आचारेन कुलं' (आचरणाने कुळाची श्रेष्ठता ठरते), 'तेन पाणि कामददो' (त्यामुळे तो हात इच्छा पूर्ण करणारा आहे). 20. පඤ්චමී+ණෙ වා २०. ऋण (कर्ज) या हेतूच्या अर्थात विकल्पेकरून पंचमी विभक्ती होते (किंवा तृतीया होते). ඉණෙ හෙතුම්හි පඤ්චමී වා. සතස්මා බද්ධො, සතෙන වා. ऋण (कर्ज) या हेतूच्या अर्थात विकल्पेकरून पंचमी विभक्ती होते. जसे की, 'सतस्मा बद्धो' (शंभर नाण्यांच्या कर्जामुळे बांधला गेला आहे) किंवा 'सतेन वा' (तृतीयेमध्ये: शंभराने). 21. ගුණෙ २१. गुण या अर्थात (तृतीया किंवा पंचमी विभक्ती होते). පරඞ්ගභූතෙ හෙතුම්හි පඤ්චමී හොති වා. ජළත්තා බද්ධො, ජළත්තෙනවා, පඤ්ඤාය මුත්තො, හුත්වා අභාවතො අනිච්චා, සඞ්ඛාරනිරොධා විඤ්ඤාණනිරොධො. බහුලංවිධානා සත්තම්යත්ථෙහිපි, තෙන සමයෙන, කාලෙන ධම්මසාකච්ඡා, පුරත්ථිමෙන ධතරට්ඨො, දක්ඛිණෙන විරූළ්හකො, උත්තරෙන කපිලවත්ථු, යෙන භගවා, තෙනුපසඞ්කමි, සො වො මම+ච්චයෙන සත්ථාති. මාසෙන භුඤ්ජති, එකාහෙනෙව බාරාණසිං පාවිසි, නවහි මාසෙහි විහාරං කාරාපෙසි[Pg.117], කහාපණෙන ඌනො, ධනෙන විකලො, අසිනා කලහො, ආචාරෙන නිපුණො, ගුළෙන මිස්සකං, වාචාය සඛිලො, මණිනා අත්ථො, ධනෙන අත්ථො, යොජනෙන ගච්ඡති ඉච්චාදි හෙතුම්හි කරණෙ වා තතියා. අත්තනාව අත්තානං සම්මන්නතීති පච්චත්තෙ බහුලංවිධානා කත්තරි තතියා. එවං තිලෙහි ඛෙත්තෙ වපතීති කම්මත්ථෙ, සුමුත්තා මයං තෙන මහාසමණෙනාති පඤ්චම්යත්ථෙ ච. दुसऱ्या अंगात (वाक्यात) असलेल्या हेतूच्या अर्थी पंचमी विभक्ती विकल्पेकरून (किंवा) होते. जसे की: 'जळत्ता बद्धो' (मूर्खत्वामुळे बांधला गेला - पंचमी), किंवा 'जळत्तेन वा' (मूर्खत्वाने - तृतीया), 'पञ्ञाय मुत्तो' (प्रज्ञेने मुक्त झाला), 'हुत्वा अभावतो अनिच्चा' (होऊन नष्ट होत असल्यामुळे अनित्य), 'sङ्खारनिरोधा विञ्ञाणनिरोधो' (संस्कारांच्या निरोधाने विज्ञानाचा निरोध होतो). 'बहुलंविधाना' (विविध नियमांनुसार) सप्तमीच्या अर्थी देखील तृतीया विभक्ती होते, जसे की: 'तेन समयेन' (त्या वेळी), 'कालेन धम्मसाकच्छा' (योग्य वेळी धम्मचर्चा), 'पुरत्थिमेन धतरट्ठो' (पूर्वेला धृतराष्ट्र), 'दक्खिणेन विरूळ्हको' (दक्षिणेला विरूळ्हक), 'उत्तरेन कपिलवत्थु' (उत्तरेला कपिलवस्तू), 'येन भगवा, तेनुपसङ्कमि' (जेथे भगवान होते, तेथे तो गेला), 'सो वो ममाच्चयेन सत्था' (माझ्या मृत्यूनंतर तो तुमचा शास्ता असेल). 'मासेन भुञ्जति' (एका महिन्यात जेवतो), 'एकाहेनेव बाराणसिं पाविसि' (एकाच दिवसात वाराणसीत प्रवेश केला), 'नवहि मासेहि विहारं कारापेसि' (नऊ महिन्यांत विहार बांधवला), 'कहापणेन ऊनो' (कहापणाने कमी), 'धनेन विकलो' (धनाने वंचित), 'असिना कलहो' (तलवारीने कलह), 'आचारेन निपुणो' (आचरणाने निपुण), 'गुळेन मिस्सकं' (गुळाने मिश्रित), 'वाचाय सखिलो' (वाणीने मधुर), 'मणिना अत्थो' (मण्याने प्रयोजन), 'धनेन अत्थो' (धनाने प्रयोजन), 'योजनेन गच्छति' (योजनाने चालतो) इत्यादी उदाहरणांमध्ये हेतू किंवा करण अर्थी तृतीया विभक्ती होते. 'अत्तनाव अत्तानं सम्मन्नति' (स्वतःच स्वतःला संमत करतो) या अर्थी 'पच्चत्त' (स्वतःच्या) अर्थी बहुल विधानामुळे कर्त्यामध्ये तृतीया विभक्ती होते. याचप्रमाणे 'तिलेहि खेत्ते वपति' (तिळांनी शेत पेरतो) यात कर्म अर्थी, आणि 'सुमुत्ता मयं तेन महासमणेन' (आम्ही त्या महाश्रमणापासून चांगल्या प्रकारे मुक्त झालो आहोत) यात पंचमीच्या अर्थी तृतीया विभक्ती होते. 24. චතුත්ථී සම්පදානෙ २४. संप्रदानात चतुर्थी विभक्ती होते. අචෙතනං සචෙතනං වා පටිග්ගාහකභාවෙනා+පෙක්ඛිතං, තං සම්පදානං, තඤ්ච දා-දානෙති ධාතුතො බ්යප්පෙන යුත්තමෙව, තත්ථ චතුත්ථී හොති. තඤ්ච දීයමානස්ස වත්ථුනො අනිවාරණ+ජ්ඣෙසනා+නුමතිතො තිවිධො, යථා බුද්ධස්ස පුප්ඵං දෙති, බොධිරුක්ඛස්ස ජලං දෙති, යාචකස්ස ධනං දෙති, භික්ඛූනං දානං දෙති. अचेतन किंवा सचेतन जे स्वीकारण्याच्या भावाने (प्रतिग्राहक भावाने) अपेक्षित असते, त्याला 'संप्रदान' म्हणतात. आणि ते 'दा-दाने' (देणे) या धातूच्या अर्थाशी जोडलेले असते, तिथे चतुर्थी विभक्ती होते. आणि ते दिल्या जाणाऱ्या वस्तूच्या अनिवारण (न रोखणे), अध्येषणा (प्रार्थना) आणि अनुमती (संमती) यावरून तीन प्रकारचे असते. जसे की: 'बुद्धस्स पुप्फं देति' (बुद्धांना फूल देतो), 'बोधिरुक्खस्स जलं देति' (बोधिवृक्षाला पाणी देतो), 'याचकस्स धनं देति' (याचकाला धन देतो), 'भिक्खूनं दानं देति' (भिक्खूंना दान देतो). අනිරාකරණා+රාධ-න+බ්භනුඤ්ඤවසෙන හි; සම්පදානං තිධා වුත්තං, රුක්ඛ+යාචක+භික්ඛවො. अनिराकरण (नकार न देणे), आराधना (प्रसन्न करणे) आणि अभ्यनुज्ञा (अनुमती) यांच्या वशामुळे संप्रदान तीन प्रकारचे सांगितले आहे; जसे की अनुक्रमे वृक्ष, याचक आणि भिक्खू. ආධාරවිවක්ඛායං සත්තමීපි, සඞ්ඝෙ ගොතමි දෙහි, සඞ්ඝෙ දින්නෙ අහඤ්චෙව පූජිතො භවිස්සාමි, යා පලාලමයං මාලං, නාරී දත්වාන චෙතියෙති. आधार सांगण्याची इच्छा (विवक्षा) असल्यास सप्तमी विभक्ती देखील होते; जसे की: 'sङ्घे गोतमि देहि' (हे गौतमी! संघात दान दे), 'sङ्घे दिन्ने अहञ्चेव पूजितो भविस्सामि' (संघात दिले असता मी देखील पूजित होईन), 'या पलालमयं मालं, नारी दत्वान चेतियेति' (जी स्त्री पेंढ्याची माळ चैत्याला अर्पण करते). 25. තාදත්ථ්යෙ २५. तादर्थ्य (त्याच्यासाठी असणे या अर्थी चतुर्थी विभक्ती होते). තාදත්ථ්යෙ චතුත්ථී සියා. තදත්ථස්ස භාවෙ, තාදත්ථ්යං, තස්මිං තදත්ථභාවෙ ජොතනීයෙව චතුත්ථී සියා. තදත්ථස්ස භාවොති නිමිත්තනිමිත්තීසම්බන්ධෙ [Pg.118] ඡට්ඨී, තස්මා ඡට්ඨාපවාදො+යං. සමෙපි නිමිත්තනිමිත්තීනං සම්බන්ධෙ නිමිත්තභූතයූපතොව චතුත්ථී, නො නිමිත්තීභූතදාරුතො. යූපාය දාරු, පාකාය වජති, බුද්ධස්සත්ථාය ජීවිතං පරිච්චජාමි, නෙව දවාය, න මදාය, ඌනස්ස පාරිපූරියා, අත්ථාය හිතාය සුඛාය සංවත්තති, ලොකානුකම්පාය, ඵාසු විහාරාය. तादर्थ्य अर्थी चतुर्थी विभक्ती होते. 'तदर्थ'चा भाव म्हणजे 'तादर्थ्य', त्या तदर्थभावाचे द्योतन करण्यासाठी चतुर्थी विभक्ती होते. 'तदर्थाचा भाव' म्हणजे निमित्त आणि निमित्ती यांच्या संबंधात षष्ठी विभक्ती प्राप्त होते, म्हणून हा षष्ठीचा अपवाद आहे. निमित्त आणि निमित्ती यांच्या संबंधात समानता असली तरी, निमित्तभूत असलेल्या 'यूप' (खांब) शब्दालाच चतुर्थी लागते, निमित्तीभूत असलेल्या 'दारू' (लाकूड) शब्दाला नाही. जसे की: 'यूपाय दारु' (यूपसाठी लाकूड), 'पाकाय वजति' (स्वयंपाकासाठी जातो), 'बुद्धस्सत्थाय जीवितं परिच्चजामि' (बुद्धांच्या कार्यासाठी मी जीवनाचा त्याग करतो), 'नेव दवाय, न मदाय' (खेळण्यासाठी नाही, मदासाठी नाही), 'ऊनस्स पारिपूरियां' (कमी असलेल्याच्या परिपूर्तीसाठी), 'अत्थाय हिताय सुखाय संवत्तति' (हितासाठी, कल्याणासाठी, सुखासाठी कारणीभूत ठरते), 'लोकानुकम्पाय' (जगावरील अनुकंपेसाठी), 'फासु विहाराय' (सुखपूर्वक विहारासाठी). ඉච්චායං කච්චායනෙ උපරි වක්ඛමානස්ස චතුත්ථීති සාධිතත්තා ඉධ ඡට්ඨීති දීපනත්ථං වුච්චතෙ – कच्चायन व्याकरणात पुढे सांगितल्या जाणाऱ्या सूत्रात चतुर्थी सिद्ध होत असल्यामुळे, येथे षष्ठी विभक्ती दर्शवण्यासाठी असे म्हटले आहे – කස්ස සාදු නරුච්චති, මා අයස්මන්තානම්පි සඞ්ඝභෙදො රුච්චිත්ථ, ඛමති සඞ්ඝස්ස, භත්ත+මස්ස නච්ඡාදෙතීති ඡට්ඨී සම්බන්ධවචනිච්ඡායං, න චෙ+වං විරොධො සියා, සදිසරූපත්තා, එවංවිධෙසු ච සම්බන්ධස්ස සද්දිකානුමතත්තා. තථා හි භාගවුත්තියා ‘‘උපපදවිභත්ති ඡට්ඨියා+පවාදා’’ති වුත්තං, සද්දන්තරෙ විහිතා විභත්ති උපපදවිභත්ති. 'कस्स सादु न रुच्चति' (कोणाला गोड आवडत नाही?), 'मा आयस्मन्तानम्पि sङ्घभेदो रुच्चित्थ' (आयुष्मानांना देखील संघभेद आवडू नये), 'खमति sङ्घस्स' (संघाला क्षम्य वाटते), 'भत्तमस्स नच्छादेति' (त्याला भात आवडत नाही) - येथे संबंध सांगण्याच्या इच्छेमुळे षष्ठी विभक्ती होते. आणि यात कोणताही विरोध नाही, कारण रूपे समान आहेत, आणि अशा प्रकारच्या प्रयोगांमध्ये संबंधाला शाब्दिक मान्यता आहे. तसेच भागवृत्तीमध्ये म्हटले आहे की 'उपपदविभक्ती ही षष्ठीचा अपवाद आहे', दुसऱ्या शब्दाच्या योगाने विहित केलेली विभक्ती म्हणजे उपपदविभक्ती होय. කස්ස වා ත්වං ධම්මං රොචෙසීති අත්ථමත්තෙ පඨමා, කස්ස වා තුය්හන්ති අවත්වා කස්ස වා ත්වං ධම්මං රොචෙසීති අත්ථමත්තෙ පඨමාවසෙන බ්යභිචාරදස්සනා. එව+මඤ්ඤාපි විඤ්ඤෙය්යා, පරතොපි යථාගමං. 'कस्स वा त्वं धम्मं रोचेसि' (किंवा तू कोणाचा धम्म पसंत करतोस?) यात केवळ अर्थाच्या दृष्टीने प्रथमा विभक्ती होते. 'कस्स वा तुय्हं' (तुला कोणाचा) असे न म्हणता 'कस्स वा त्वं धम्मं रोचेसि' असे केवळ अर्थाच्या दृष्टीने प्रथमा विभक्तीच्या वापरामुळे व्यभिचार (अपवाद) दिसून येतो. याचप्रमाणे इतरही उदाहरणे समजून घ्यावीत, आणि पुढेही आगमानुसार (परंपरेनुसार) जाणावे. රඤ්ඤො සතං ධාරෙති රඤ්ඤො ඡත්තං ධාරෙතීති සම්බන්ධෙ ඡට්ඨීව. සිලාඝ=කථනෙ, එවං රඤ්ඤො සිලාඝතෙ ඉච්චාදි, ථුතිං කරොතීත්යත්ථො. හනු=අපනයනෙ, රඤ්ඤො හනුතෙ, වඤ්චෙතීත්යත්ථො. උපතිට්ඨෙය්ය සක්යපුත්තානං වඩ්ඪකී, උපගච්ඡෙය්යාත්යත්ථො. සප=අක්කොසෙ, මය්හං සපතෙ, සච්චං කුරුතෙත්යත්ථො[Pg.119]. ධර=ධාරණෙ, සුවණ්ණං තෙ ධාරයතෙ, ඉණං තෙ ධාරයති, අස්ස රඤ්ඤො නාගං ධාරයාම. පිහ=ඉච්ඡායං, දෙවාපි තස්ස පිහයන්ති තාදිනො, තෙසං පිහයන්ති සම්බුද්ධානං සතීමතං, පිහයන්ති=පත්ථෙන්ති. තස්ස කුජ්ඣ මහාවීර, යදි+හං තස්ස පකුප්පෙය්යං, දුභයති දිසානං මෙඝො, යො මිත්තානං න දූභති, යො අප්පදුට්ඨස්ස නරස්ස දුස්සති. ඉස්ස=ඉස්සායං, තිත්ථියා ඉස්සයන්ති සමණානං. උසූය=දොසාවිකරණෙ, දුජ්ජනා ගුණවන්තානං උස්සූයන්ති, කා උසුයා විජානතං. ඉධ+සිධ+රාධ+සාධ=සංසිද්ධියං, ආරාධො මෙ රඤ්ඤො, රඤ්ඤො භාග්ය+මාරජ්ඣති, ක්යා+හං අය්යානං අපරජ්ඣාමි, ආයස්මතො උපාලිත්ථෙරස්ස උපසම්පදාපෙක්ඛො උපතිස්සො. භික්ඛූ භගවතො පච්චස්සොසුං, ආසුණන්ති බුද්ධස්ස භික්ඛූ, තස්ස භික්ඛුනො ජනොඅනුගිණාති, පතිගිණාති, සාධුකාරදානාදිනා තං උස්සහතීත්යත්ථො. ආරොචයාමි වො භික්ඛවෙ, පටිවෙදයාමි වො, ආමන්තයාමි තෙ මහාරාජ, ධම්මං තෙ දෙසිස්සාමි, දෙසෙතු භන්තෙ භගවා ධම්මං භික්ඛූනං, යථා නො භගවා බ්යාකරෙය්ය, නිරුත්තිං තෙ පවක්ඛාමි, අලං මෙ රජ්ජං, අලං භික්ඛු පත්තස්ස, අලං මල්ලො මල්ලස්ස, අරහති මල්ලො මල්ලස්ස, අලං තෙ ඉධ වාසෙන, කිං මෙ එකෙන තිණ්ණෙනාති සබ්බත්ථ සම්බන්ධෙ ඡට්ඨී. 'रञ्ञो सतं धारेति' (राजाचे शंभर रुपये धारित करतो/ऋणी आहे), 'रञ्ञो छत्तं धारेति' (राजाचे छत्र धारण करतो) यात संबंध अर्थी षष्ठीच होते. 'सिलाघ' म्हणजे सांगणे/स्तुती करणे, जसे की 'रञ्ञो सिलाघते' इत्यादी, याचा अर्थ स्तुती करतो असा आहे. 'हनु' म्हणजे दूर करणे/लपवणे, 'रञ्ञो हनुते' म्हणजे फसवितो असा अर्थ आहे. 'उपतिट्ठेय्या सक्यपुत्तानं वड्ढकी' म्हणजे सुतार शाक्यपुत्रांकडे उपस्थित व्हावा, याचा अर्थ जवळ जावा असा आहे. 'सप' म्हणजे शिवीगाळ करणे/शपथ घेणे, 'मय्हं स पते' म्हणजे शपथ घेतो असा अर्थ आहे. 'धर' म्हणजे धारण करणे/कर्ज असणे, 'सुवण्णं ते धारयते' (तुला सोने देतो/तुझे सोने धारण करतो), 'इणं ते धारयति' (तुझे कर्ज धारण करतो), 'अस्स रञ्ञो नागं धारयाम' (आम्ही या राजाचा हत्ती सांभाळतो). 'पिह' म्हणजे इच्छा करणे, 'देवापि तस्स पिहयन्ति तादिनो' (त्या तादी पुरुषाची देवही इच्छा करतात), 'तेसं पिहयन्ति सम्बुद्धानं सतीमतं' (त्या स्मृतिमान संबुद्धांची ते इच्छा करतात), 'पिहयन्ति' म्हणजे प्रार्थना करतात/इच्छा करतात. 'तस्स कुज्झ महावीर' (हे महावीरा, त्यावर रागवा), 'यदिहं तस्स पकुप्पेय्यं' (जर मी त्यावर रागवलो), 'दुभयति दिसानं मेघो' (दिशांना मेघ द्रोह करतो), 'यो मित्तानं न दूभति' (जो मित्रांशी द्रोह करत नाही), 'यो अप्पदुट्ठस्स नरस्स दुस्सति' (जो निष्पाप माणसाचा द्वेष करतो). 'इस्स' म्हणजे ईर्ष्या करणे, 'तित्थिया इस्सयन्ति समणानं' (तीर्थक श्रमणांचा हेवा करतात). 'उसूय' म्हणजे दोष दाखवणे, 'दुज्जना गुणवन्तानं उस्सूंयन्ति' (दुर्जन गुणवानांचे दोष काढतात), 'का उसुया विजानतं' (जाणणाऱ्याला काय ईर्ष्या?). 'इध, सिध, राध, साध' म्हणजे सिद्धी मिळवणे, 'आराधो मे रञ्ञो' (राजा माझ्यावर प्रसन्न आहे), 'रञ्ञो भाग्यमारज्झति' (राजाचे भाग्य सिद्ध होते), 'क्याहं अय्यानं अपराज्झामि' (मी आर्यांचा काय अपराध केला आहे?), 'आयस्मतो उपालित्थेरस्स उपसम्पदापेक्खो उपतिस्सो' (आयुष्मान उपालि थेरांच्या उपसंपदेची अपेक्षा करणारा उपतिस्स आहे). 'भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं' (भिक्खूंनी भगवंतांचे ऐकले/होकार दिला), 'आसुणन्ति बुद्धस्स भिक्खू' (भिक्खू बुद्धांचे ऐकतात), 'तस्स भिक्खुनो जनो अनुगिणाति, पतिगिणाति' (त्या भिक्खूचे लोक अनुमोदन करतात, स्वीकार करतात, साधुकार देणे इत्यादींनी त्याला प्रवृत्त करतात असा अर्थ आहे). 'आरोचयामि वो भिक्खवे' (हे भिक्खूंनो, मी तुम्हाला सांगतो), 'पटिवेदयामि वो' (तुम्हाला कळवतो), 'आमन्तयामि ते महाराज' (हे महाराजा, मी तुम्हाला आमंत्रित करतो), 'धम्मं ते देसिस्सामि' (तुला धम्माचा उपदेश करीन), 'देसेतु भन्ते भगवा धम्मं भिक्खूनं' (भन्ते, भगवंतांनी भिक्खूंना धम्माचा उपदेश करावा), 'यथा नो भगवा ब्याकरेय्य' (जसे भगवंत आम्हाला स्पष्ट करतील), 'निरुत्तिं ते पवक्खामि' (तुला निरुक्ती सांगेन), 'अलं मे रज्जं' (मला राज्य पुरेसे आहे), 'अलं भिक्खु पत्तस्स' (भिक्खूच्या पात्रासाठी पुरेसे आहे), 'अलं मल्लो मल्लस्स' (मल्ल मल्लासाठी पुरेसा आहे), 'अरहति मल्लो मल्लस्स' (मल्ल मल्लासाठी योग्य आहे), 'अलं ते इध वासेन' (तुला येथे राहणे पुरेसे आहे), 'किं मे एकेन तिण्णेनाति' (मी एकट्याने तरून काय करायचे?) या सर्व ठिकाणी संबंध अर्थी षष्ठी विभक्ती होते. එවං ආයු භොතො හොතු, චිරං ජීවිතං, භද්දං, කල්යාණං, අත්ථං, පයොජනං, කුසලං, අනාමයං, හිතං, පත්ථං, සුඛං, සාතං, භොතො හොතු, සාධු සම්මුති මෙ තස්ස, පුත්තස්සා+විකරෙය්ය ගුය්හ+මත්ථං, තස්ස මෙ සක්කො පාතුරහොසි, තස්ස පහිණෙය්ය, භික්ඛූනං දූතං පාහෙසි, කප්පති සමණානං ආයොගො[Pg.120], එකස්ස ද්වින්නං තිණ්ණං වා පහොති, උපමං තෙ කරිස්සාමි, අඤ්ජලිංතෙ පග්ගණ්හාමි, තස්ස ඵාසු, ලොකස්ස+ත්ථො, නමො තෙ පුරිසාජඤ්ඤ, සොත්ථි තස්ස, සමත්ථො මල්ලො මල්ලස්ස, තස්ස හිතං, තස්ස සුඛං, ස්වාගතං තෙ මහාරාජාති සබ්බත්ථ සම්බන්ධෙ ඡට්ඨී. याचप्रमाणे 'आयु भोतो होतु' (आपले आयुष्य असो), 'चिरं जीवितं' (दीर्घ आयुष्य), 'भद्दं' (कल्याण), 'कल्याणं' (मंगल), 'अत्थं' (हित), 'पयोजनं' (प्रयोजन), 'कुसलं' (कुशल), 'अनामयं' (आरोग्य), 'हितं' (हित), 'पत्थं' (पथ्य), 'सुखं' (सुख), 'सातं' (शांती/सुख आपले असो), 'साधु सम्मुति मे तस्स' (त्याच्याबद्दल माझी चांगली संमती आहे), 'पुत्तस्साविकरेय्य गुय्हमत्थं' (पुत्राला गुप्त गोष्ट प्रकट करावी), 'तस्स मे सक्को पातुरहोसि' (त्या माझ्यासमोर शक्र प्रकट झाला), 'तस्स पहिणेय्य' (त्याला पाठवावे), 'भिक्खूनं दूतं पाहेसि' (भिक्खूंना दूत पाठवला), 'कप्पति समणानं आयोगो' (श्रमणांना योग योग्य आहे), 'एकस्स द्विन्नं तिण्णं वा पहोति' (एकाला, दोघांना किंवा तिघांना पुरेसे होते), 'उपमं ते करिस्सामि' (तुला उपमा देईन), 'अञ्जलिं ते पग्गण्हामि' (तुला अंजली जोडतो), 'तस्स फासु' (त्याला सुखकारक), 'लोकस्सत्थो' (जगाचे कल्याण), 'नमो ते पुरिसाजञ्ञ' (हे पुरुषश्रेष्ठा, तुला नमस्कार असो), 'सोत्थि तस्स' (त्याचे कल्याण असो), 'समत्थो मल्लो मल्लस्स' (मल्ल मल्लासाठी समर्थ आहे), 'तस्स हितं' (त्याचे हित), 'तस्स सुखं' (त्याचे सुख), 'स्वागतं ते महाराजा' (हे महाराजा, आपले स्वागत असो) या सर्व ठिकाणी संबंध अर्थी षष्ठी विभक्ती होते. 26. පඤ්චම්ය+වධිස්මා २६. अवधीपासून (मर्यादेपासून) पंचमी विभक्ती होते. පදත්ථාවධිස්මා පඤ්චමීවිභත්ති හොති. पदाच्या अर्थाच्या अवधीपासून (मर्यादेपासून) पंचमी विभक्ती होते. සමෙප්ය+පගමෙ ද්වින්නං, පුබ්බරූපා ය+දච්චුතං; වුච්චතෙ ත+දපාදානං, තං චලාචලතො ද්විධා; යථා+ස්සා ධාවතා පොසො, පතො, රුක්ඛාඵලන්ති ච. दोन वस्तूंच्या दूर जाण्यात (अपगमात) समानता असली तरी, जे स्थिर राहते (न ढळणारे असते), त्याला 'अपादान' म्हटले जाते. ते चल आणि अचल अशा दोन प्रकारचे असते. जसे की: 'अस्सा धावता पोसो पतो' (धावत्या घोड्यावरून माणूस पडतो - चल अपादान), आणि 'रुक्खा फलं' (वृक्षावरून फळ पडते - अचल अपादान). තත්ථ චලාවධි ධාවතා අස්සා පුරිසො පතති, අචලාවධි පබ්බතා ඔතරන්ති වනචාරකාති. त्यामध्ये, चल-अवधी (गतिमान मर्यादा) म्हणजे 'धावत्या घोड्यावरून माणूस पडतो' आणि अचल-अवधी (स्थिर मर्यादा) म्हणजे 'पर्वतावरून वनचारी खाली उतरतात'. තඤ්ච අවධි විසයක්රියාවිසෙසස්ස නිද්දිට්ඨත්තා නිද්දිට්ඨවිසයං, යත්ථ අප අපගමනක්රියං උපාත්තං=අජ්ඣාහටං විසයං කත්වා පවත්තති, තං උපාත්තං. යං කෙනචි ගුණෙන උක්කංසියති, තං අනුමෙය්යං. යථා ගාමා අපෙන්ති මුනයො, නගරා නිග්ගතො රාජා, පාපා චිත්තං නිවාරෙන්ති. වලාහකා විජ්ජොතතෙ, කුසුලතො පචතීති. එත්ථ ච වළාහකා නික්ඛම්ම, කුසුලතො අපනෙත්වාති ච පුබ්බක්රියා අජ්ඣාහරීයති. මථුරා පාටලිපුත්තකෙහි අභිරූපාති අනුමීයති. වුත්තඤ්හි – आणि तो अवधी (मर्यादा) क्रियाविशेषाच्या स्पष्ट निर्देशामुळे 'निर्दिष्टविषय' असतो; जेथे 'अप' (दूर जाणे) ही अपगमन क्रिया अध्याहृत (गृहीत) धरून विषय बनवून प्रवृत्त होते, तो 'उपात्त' विषय होय; आणि जे कोणत्यातरी गुणाने श्रेष्ठ ठरवले जाते, तो 'अनुमेय' विषय होय. जसे की, 'गावातून मुनी दूर जातात', 'नगरातून राजा बाहेर पडला', 'पापापासून चित्त परावृत्त करतात'. 'वळाहाकातून (ढगातून) वीज चमकते', 'कणगीतून (धान्य काढून) शिजवतो'. येथे 'वळाहाकातून निघून' आणि 'कणगीतून बाहेर काढून' अशी पूर्वक्रिया अध्याहृत धरली जाते. 'मथुरा ही पाटलीपुत्रातील लोकांपेक्षा अधिक सुंदर आहे' यावरून अनुमान केले जाते. कारण असे म्हटले आहे – නිද්දිට්ඨවිසයං කිඤ්චි, උපාත්තවිසයං තථා; අනුමෙය්යවිසයඤ්චෙති, තිධා+හු අවධිං බුධාති. "काही निर्दिष्टविषय, तसेच उपात्तविषय आणि अनुमेयविषय अशा तीन प्रकारचा अवधी (मर्यादा) विद्वानांनी सांगितला आहे." භයහෙතුම්හි-චොරා [Pg.121] භයං ජායති, තණ්හාය ජායති භයං, පාපතො උත්තසති, නත්ථි සොකො කුතො භයං. අක්ඛාතරි-උපජ්ඣායා සික්ඛං ගණ්හාති, ආචරියම්හා අධීතො සුණාති වා. බුද්ධස්මා පරාජෙන්ති අඤ්ඤතිත්ථියා, පරාජිතා භවන්තීත්යත්ථො. හිමවතා පභවති ගඞ්ගා, අචිරවතියා පභවන්ති කුන්නදියො. උරස්මා ජාතො පුත්තො, කම්මතො ජාතං ඉන්ද්රියං, උපජ්ඣායා අන්තරධායති සිස්සො, මාතාපිතූහි අන්තරධාරයති පුත්තො, නිලීයතීත්යත්ථො. දූරත්ථයොගෙකීවදූරො ඉතො නළකාරගාමො, තතො හවෙ දූරතරං වදන්ති, ගාමතො නාතිදූරෙ, ආරකා තෙ මොඝපුරිසා ඉමස්මා ධම්මවිනයා, ආරකා තෙහි භගවා දූරතොව නමස්සන්ති, අද්දස දූරතොව ආගච්ඡන්තං. අන්තිකත්ථයොගෙ-අන්තිකං ගාමා, ආසන්නං ගාමා, සමීපං ගාමා. පරිමාණෙ-ඉතො මථුරාය චතූසු යොජනෙසු සංකස්සං, රාජගහතො පඤ්චචත්තාලීසයොජනමත්ථකෙ සාවත්ථි. කාලපරිමාණෙ-ඉතො එකනවුතිකප්පමත්ථකෙ, ඉතො වස්සසතසහස්සස්ස අච්චයෙන බුද්ධො ලොකෙ උප්පජ්ජිස්සති. පාසාදා සංකමෙය්ය, පාසාදං අභිරුහිත්වා සංකමෙය්යාති අත්ථො, තථා හත්ථික්ඛන්ධා සංකමෙය්ය, අභිධම්මා පුච්ඡන්ති, අභිධම්මං සුත්වාති අත්ථො, ආසනා වුට්ඨහෙය්ය. දිසත්ථවාචීහි යොගෙ-ඉතො සා පුරිමා දිසා, ඉතො සා දක්ඛිණා දිසා, අවීචිතො යාව භවග්ගං, උද්ධං පාදතලා, අධො කෙසමත්ථකා. විභජනෙ-යතො පණීතතරො වා විසිට්ඨතරො වා නත්ථි, අත්තදන්තො තතො වරං, කිඤ්චාපි දානතො සීලං වරං, තතො මයා බහුතරං සුතං, සීලමෙව සුතා සෙය්යො. ආරතිප්පයොගෙ-ආරති විරති පාපා, පාණාතිපාතා [Pg.122] වෙරමණි, අදින්නාදානා පටිවිරතො, අප්පටිවිරතා මුසාවාදා. සුද්ධත්ථයොගෙ-ලොභනීයෙහි ධම්මෙහි සුද්ධො, මාතුතො ච පිතුතො ච සුද්ධො අනුපක්කුට්ඨො. පමොචනත්ථයොගෙ-පරිමුත්තො දුක්ඛස්මාති වදාමි, මුත්තො+ස්මි මාරබන්ධනා, න තෙ මුච්චන්ති මච්චුනා, මුත්තො+හං+සබ්බපාසෙහි. විවෙචනෙ-විවිච්චෙව කාමෙහි, විවිච්ච අකුසලෙහි ධම්මෙහි. පමාණත්ථෙ-ආයාමතො ච විත්ථාරතො ච යොජනං, ගම්භීරතො ච පුථුලතො ච යොජනං චන්දභාගාය පරිමාණං, පරික්ඛෙපතො නවයොජනසතපරිමාණො මජ්ඣිමදෙසො. පුබ්බාදියොගෙ-පුබ්බෙව මෙ භික්ඛවෙ සම්බොධා, ඉතො පුබ්බෙ නාහොසි, තතො පරං පච්චන්තිමා ජනපදා, තතො අපරෙන සමයෙන. පඤ්හෙ-කුතො+සි ත්වං, කුතො භවං, පාටලිපුත්තතො. කිච්ඡා ලද්ධන්ති ගුණෙ පඤ්චමී, කිච්ඡෙන මෙ අධිගතන්ති හෙතුම්හි කරණෙ වා තතියා, එවං ථොකා මුත්තො, ථොකෙන මුත්තොති. भयाच्या कारणात - चोरापासून भय निर्माण होते (corā bhayaṃ jāyati), तृष्णेपासून भय निर्माण होते (taṇhāya jāyati bhayaṃ), पापापासून भयभीत होतो (pāpāto uttasati), शोक नाही तर भय कुठून असणार? (natthi soko kuto bhayaṃ). शिकवणाऱ्याच्या योगात - उपाध्यायांकडून शिक्षण ग्रहण करतो (upajjhāyā sikkhaṃ gaṇhāti), आचार्यांकडून शिकतो किंवा ऐकतो (ācariyamhā adhīto suṇāti vā). बुद्धांकडून अन्यतीर्थीय पराभूत होतात (Buddhasmā parājenti aññatitthiyā), म्हणजेच पराजित होतात असा अर्थ आहे. हिमालयातून गंगा उगम पावते (Himavatā pabhavati gaṅgā), अचिरावती नदीतून लहान नद्या उगम पावतात (aciravatiyā pabhavanti kunnadiyo). छातीतून जन्मलेला पुत्र (urasmā jāto putto), कर्मापासून उत्पन्न झालेली इंद्रिये (kammato jātaṃ indriyaṃ), उपाध्यायांच्या दृष्टीआड शिष्य होतो (upajjhāyā antaradhāyati sisso), मातापित्यांच्या दृष्टीआड पुत्र होतो (mātāpitūhi antaradhārayati putto), म्हणजेच लपतो असा अर्थ आहे. दूर या अर्थाच्या योगात - येथून नळकारग्राम किती दूर आहे? (kīvadūro ito naḷakāragāmo), त्यापेक्षा नक्कीच अधिक दूर असल्याचे म्हणतात (tato have dūrataraṃ vadanti), गावापासून फार दूर नाही (gāmato nātidūre), ते मोघपुरुष या धम्मविनयापासून दूर आहेत (ārakā te moghapurisā imasmā dhammavinayā), त्यांच्यापासून भगवान दूर आहेत, ते दूरूनच नमस्कार करतात (ārakā tehi bhagavā dūratova namassanti), दूरूनच येत असताना पाहिले (addasa dūratova āgacchantaṃ). जवळ या अर्थाच्या योगात - गावाच्या जवळ (antikaṃ gāmā), गावाच्या समीप (āsannaṃ gāmā), गावाच्या जवळ (samīpaṃ gāmā). परिमाणात - येथून मथुरेच्या चार योजने अंतरावर संकस्स आहे (ito mathurāya catūsu yojanesu saṃkassaṃ), राजगृहापासून पंचेचाळीस योजने अंतरावर सावत्थी आहे (rājagahato pañcacattālīsayojanamatthake sāvatthi). काळ परिमाणात - येथून ९१ कल्प आधी (ito ekanavutikappamatthake), येथून एक lakh वर्षांच्या समाप्तीनंतर जगात बुद्ध उत्पन्न होतील (ito vassasatasahassassa accayena buddho loke uppajjissati). प्रासादावरून संक्रमण करावे (pāsādā saṃkameyya), म्हणजेच प्रासादावर चढून संक्रमण करावे असा अर्थ आहे; तसेच हत्तीच्या खांद्यावरून संक्रमण करावे (hatthikkhandhā saṃkameyya); अभिधम्मावरून विचारतात (abhidhammā pucchanti), म्हणजेच अभिधम्म ऐकून विचारतात असा अर्थ आहे; आसनावरून उठावे (āsanā vuṭṭhaheyya). दिशावाचक शब्दांच्या योगात - येथून ती पूर्व दिशा आहे (ito sā purimā disā), येथून ती दक्षिण दिशा आहे (ito sā dakkhiṇā disā), अवीची नरकापासून भवाग्रापर्यंत (avīcito yāva bhavaggaṃ), पावलांच्या तळव्यापासून वर (uddhaṃ pādatalā), केसांच्या शिखरापासून खाली (adho kesamatthakā). विभाजनात (तुलनेत) - ज्यापेक्षा अधिक प्रणीत किंवा विशिष्ट काही नाही (yato paṇītataro vā visiṭṭhataro vā natthi), स्वतः संयमित असणारा त्यापेक्षा श्रेष्ठ आहे (attadanto tato varaṃ), दानापेक्षा शील श्रेष्ठ आहे (kiñcāpi dānato sīlaṃ varaṃ), त्यापेक्षा मी अधिक ऐकले आहे (tato mayā bahutaraṃ sutaṃ), श्रुतापेक्षा शीलच अधिक श्रेयस्कर आहे (sīlameva sutā seyyo). विरतीच्या योगात - पापापासून आरती आणि विरती (ārati virati pāpā), प्राणातिपातापासून विरती (pāṇātipātā veramaṇi), अदत्तादानापासून परावृत्त (adinnādānā paṭivirato), असत्य भाषणापासून परावृत्त न झालेले (appaṭiviratā musāvādā). शुद्ध या अर्थाच्या योगात - लोभ निर्माण करणाऱ्या धर्मांपासून शुद्ध (lobhanīyehi dhammehi suddho), आई आणि वडिलांच्या बाजूने शुद्ध व दोषरहित (mātuto ca pituto ca suddho anupakkuṭṭho). मुक्त होणे या अर्थाच्या योगात - दुःखापासून पूर्णपणे मुक्त झाला आहे असे मी सांगतो (parimutto dukkhasmāti vadāmi), मी मारबंधनातून मुक्त झालो आहे (mutto smi mārabandhanā), ते मृत्यूपासून मुक्त होत नाहीत (na te muccanti maccunā), मी सर्व पाशांमधून मुक्त झालो आहे (mutto haṃ sabbapāsehi). विवेक (अलिप्तता) या अर्थात - कामांपासून अलिप्त होऊनच (vivicceva kāmehi), अकुशल धर्मांपासून अलिप्त होऊन (vivicca akusalehi dhammehi). प्रमाणाच्या अर्थात - लांबीने आणि रुंदीने एक योजन (āyāmato ca vitthārato ca yojanaṃ), खोलीने आणि रुंदीने चंद्रभागा नदीचे परिमाण एक योजन आहे (gambhīrato ca puthulato ca yojanaṃ candabhāgāya parimāṇaṃ), परिवेष्टनाने (घेरावाने) नऊशे योजने परिमाण असलेला मध्यमदेश (parikkhepato navayojanasataparimāṇo majjhimadeso). पूर्व इत्यादींच्या योगात - भिक्खूंनो, माझ्या संबोधीच्या पूर्वीच (pubbeva me bhikkhave sambodhā), यापूर्वी नव्हते (ito pubbe nāhosi), त्यानंतर सीमावर्ती जनपद आहेत (tato paraṃ paccantimā janapadā), त्यानंतरच्या काळात (tato aparena samayena). प्रश्नात - तू कुठून आहेस? (kuto si tvaṃ), आपण कुठून आहात? (kuto bhavaṃ), पाटलीपुत्रातून (pāṭaliputtato). 'किच्छा लद्धं' (कष्टाने मिळालेले) या गुणामध्ये पंचमी विभक्ती होते; 'किच्छेन मे अधिगतं' (कष्टाने मला प्राप्त झाले) यामध्ये हेतू किंवा करणात तृतीया विभक्ती होते; अशा प्रकारे 'थोका मुत्तो' (थोडक्यात सुटला) आणि 'थोकेन मुत्तो' (थोडक्याने सुटला) असे होते. කථං ‘‘ථොකං චලතී’’ති, ක්රියාවිසෙසනෙ කම්මනි දුතියා, ථොකං චලනං කරොතීත්යත්ථො, ථොකන්ති චලනක්රියාය විසෙසනත්තා ක්රියාවිසෙසනං. 'थोकं चलती' (थोडं हलतो) हे कसे? क्रियाविशेषण कर्मामध्ये द्वितीया विभक्ती होते; 'थोडं हलण्याची क्रिया करतो' असा याचा अर्थ आहे. 'थोकं' हे हलण्याच्या क्रियेचे विशेषण असल्यामुळे क्रियाविशेषण आहे. ක්රියාවිසෙසනං නාම, කම්මත්තෙ+කත්තසණ්ඨිතා; න්යායසිද්ධං යතො තස්මා, තදත්ථං න විසුං විධි. "क्रियाविशेषण हे कर्मत्व आणि एकत्व यामध्ये स्थित असते; कारण ते तर्कसिद्ध (न्यायसिद्ध) आहे, म्हणून त्यासाठी वेगळा नियम नाही." න්යායසිද්ධංව=චලනන්ති යස්මා භාවෙ අනො, තස්මා භාවස්සෙ+කත්තා එකවචනන්ති ඤායා එකත්තඤ්ච, භාවෙ අනත්තා නපුංසකත්තඤ්ච, කරොතික්රියාය සම්බන්ධෙන කම්මත්තඤ්ච සිජ්ඣතීති. කර+භූධාතවො ච – तर्कसिद्धच आहे, कारण 'चलनं' यामध्ये भाव अर्थात 'अन' प्रत्यय आहे, म्हणून 'भावाचा एकच कर्ता असतो म्हणून एकवचन' या न्यायाने एकत्व, आणि भाव अर्थात 'अन' प्रत्यय असल्यामुळे नपुंसकलिंगत्व, आणि 'करोति' (करतो) या क्रियेच्या संबंधाने कर्मत्व सिद्ध होते. आणि 'कर' व 'भू' धातू सुद्धा – කාරියරූපාභිධාත්වත්ථා[Pg.123], සබ්බෙ සත්තාය යුජ්ජරෙ; තතො ක්රියා ච භාවො ච, සාමඤ්ඤං තෙසු ගම්යතෙ – "कार्यरूपाने व्यक्त होणारे सर्व धातूंचे अर्थ अस्तित्वाशी जोडलेले असतात; त्यावरून क्रिया आणि भाव हे त्यांच्यातील सामान्य रूप म्हणून जाणले जाते –" ති වුත්තත්තා යුජ්ජන්ති. असे म्हटल्यामुळे ते जोडले जातात. ථොකත්ථෙ-ථොකා මුච්චති. සබ්බත්ථ සවිසයෙ පඤ්චමී. එත්ථ ‘‘විවක්ඛා ලොකිකා සා ච, න සක්කා අනිවත්තිතුං’’ති වුත්තත්තා අනිට්ඨප්පසඞ්ගො න සියා. මරියාදායං-ආපබ්බතා ඛෙත්තං. අභිවිධිම්හි-ආබ්රහ්මලොකා සද්දො අබ්භුග්ගච්ඡති, පබ්බතං වජ්ජෙත්වා, බ්රහ්මලොකම්හි බ්යාපෙත්වාති ච අත්ථො. එත්ථ වජ්ජමානසීමා මරියාදා, ගය්හමානසීමා අභිවිධි. थोड्या अर्थात - 'थोका मुच्चति' (थोडक्यात मुक्त होतो). सर्वत्र आपापल्या विषयात पंचमी विभक्ती होते. येथे "विवक्षा (बोलण्याची इच्छा) ही लौकिक असते आणि ती टाळता येणे शक्य नाही" असे म्हटल्यामुळे अनिष्ट प्रसंग उद्भवणार नाही. मर्यादेमध्ये - 'आपब्बता खेत्तं' (पर्वतापर्यंत शेत). अभिविधीमध्ये (व्याप्तीमध्ये) - 'आब्रह्मलोका सद्दो अब्भुग्गच्छति' (ब्रह्मलोकापर्यंत आवाज पोहोचतो), पर्वत वगळून आणि ब्रह्मलोकात व्यापून असा अर्थ आहे. येथे वगळली जाणारी सीमा म्हणजे 'मर्यादा' आणि समाविष्ट केली जाणारी सीमा म्हणजे 'अभिविधी' होय. 27. අපපරීහි වජ්ජනෙ २७. 'अप' आणि 'परी' यांच्या योगात वर्जनात (वगळण्यात). වජ්ජනෙ වත්තමානෙහී අපපරීහි යොගෙ පඤ්චමී හොති. අපසාලාය ආයන්ති වාණිජා, පරිසාලාය ආයන්ති වාණිජා, සාලං වජ්ජෙත්වාති අත්ථො. वर्जनाच्या (वगळण्याच्या) अर्थात प्रवृत्त होणाऱ्या 'अप' आणि 'परी' यांच्या योगात पंचमी विभक्ती होते. जसे की, 'अपसालाय आयन्ति वाणिजा', 'परिसालाय आयन्ति वाणिजा' (शाळा वगळून व्यापारी येतात), शाळा वगळून असा याचा अर्थ आहे. 28. පටිනිධිපතිදානෙසු පතිනා २८. प्रतिनिधी आणि प्रतिदान (बदल्यात देणे) यामध्ये 'पति' च्या योगात. පටිනිධිම්හි පතිදානෙ ච වත්තමානෙන පතිනා යොගෙ නාමස්මා පඤ්චමී හොති. බුද්ධස්මා පති සාරිපුත්තො, ඝත+මස්ස තෙලස්මා පති දදාති. प्रतिनिधी आणि प्रतिदान या अर्थात प्रवृत्त होणाऱ्या 'पति' च्या योगात नामाहून पंचमी विभक्ती होते. जसे की, 'बुद्धस्मा पति सारिपुत्तो' (बुद्धांचे प्रतिनिधी सारिपुत्त आहेत), 'घत मस्स तेलस्मा पति ददाति' (तो तेलाच्या बदल्यात तूप देतो). 29. රිතෙ දුතියා ච २९. 'ऋते' (शिवाय) च्या योगात द्वितीया विभक्ती सुद्धा होते. රිතෙසද්දයොගෙ නාමස්මා දුතියා හොති පඤ්චමී ච. රිතෙ සද්ධම්මා, රිතෙ සද්ධම්මං. 'ऋते' शब्दाच्या योगात नामाहून द्वितीया आणि पंचमी विभक्ती होते. जसे की, 'ऋते सद्धम्मा' (सद्धम्माशिवाय) आणि 'ऋते सद्धम्मं' (सद्धम्माशिवाय). 30. විනා+ඤ්ඤත්ර තතියා ච ३०. 'विना' आणि 'अञ्ञत्र' (शिवाय/खेरीज) च्या योगात तृतीया विभक्ती सुद्धा होते. විනා+ඤ්ඤත්රයොගෙ [Pg.124] නාමස්මා තතියා දුතියා පඤ්චමී ච. විනා වාතෙන, විනා වාතං, විනා වාතස්මා. අඤ්ඤත්ර එකෙන පිණ්ඩපාතනීහාරකෙන, අඤ්ඤත්ර ධම්මං, අඤ්ඤත්ර ධම්මා. 'विना' (शिवाय) आणि 'अञ्ञत्र' (खेरीज/शिवाय) यांच्या योगात नामाहून तृतीया, द्वितीया आणि पंचमी विभक्ती होते. उदा. विना वातेन (वाऱ्याशिवाय - तृतीया), विना वातं (द्वितीया), विना वातस्मा (पंचमी). अञ्ञत्र एकेन पिण्डपातनीहारकेन (एका पिंडपात वाहून नेणाऱ्याखेरीज - तृतीया), अञ्ञत्र धम्मं (धम्माखेरीज - द्वितीया), अञ्ञत्र धम्मा (धम्माखेरीज - पंचमी). 31. පුථනානාහි ३१. 'पुथ' आणि 'नाना' यांच्या योगात. එතෙහි යොගෙ තතියා හොති පඤ්චමී ච. භින්නයොගකරණං දුතියානිවත්තනත්ථං. පුථගෙව ජනෙන, පුථගෙව ජනස්මා, ජනෙන නානා, ජනස්මා නානා. यांच्या योगात तृतीया आणि पंचमी विभक्ती होते. भिन्न सूत्राची रचना ही द्वितीया विभक्तीचा निषेध करण्यासाठी (वगळण्यासाठी) आहे. उदा. पुथगेव जनेन (लोकांपासून वेगळेच - तृतीया), पुथगेव जनस्मा (पंचमी), जनेन नाना (लोकांपासून भिन्न - तृतीया), जनस्मा नाना (पंचमी). 39. ඡට්ඨී සම්බන්ධෙ ३९. संबंधाच्या अर्थी षष्ठी विभक्ती होते. සම්බන්ධෙ ඡට්ඨී හොති. රඤ්ඤො පුරිසොති වුත්තෙ යස්මා රාජා දදාති, පුරිසො ගණ්හාති, තස්මා රාජපුරිසොති විඤ්ඤායති. එවමෙව යො යස්ස ආයත්තො සෙවකාදිභාවෙන භණ්ඩභාවෙන වා සමීප+සමූහා+වයව+විකාර+කාරිය+අවත්ථා+ජාති+ගුණ+ක්රියාදිවසෙන වා, ඨානීවසෙන වා, ආගමීවසෙන වා, සො තිවිධොපි අත්ථො සම්බන්ධො නාම. වුත්තඤ්හි – संबंधाच्या अर्थी षष्ठी विभक्ती होते. 'रञ्ञो पुरिसो' (राजाचा माणूस) असे म्हटले असता, ज्याअर्थी राजा देतो आणि माणूस स्वीकारतो, त्याअर्थी 'राजपुरिसो' (राजाचा माणूस) असे समजले जाते. त्याचप्रमाणे, जो ज्याच्या अधीन असतो—सेवक इत्यादी भावाने किंवा वस्तूच्या भावाने, अथवा समीपता (जवळ असणे), समूह, अवयव (भाग), विकार (रूपांतर), कार्य, अवस्था, जाती, गुण, क्रिया इत्यादींच्या द्वारे, किंवा स्थानी (ṭhānī) भावाने, किंवा आगमी (āgamī) भावाने—तो त्रिविध अर्थ म्हणजेच 'संबंध' होय. कारण असे म्हटले आहे की— ක්රියාකාරකසඤ්ජාතො, අස්සෙ+දංභාවහෙතුකො; සම්බන්ධො නාම සො අත්ථො, තත්ථ ඡට්ඨී විධීයතෙ. क्रिया आणि कारकांपासून उत्पन्न होणारा, आणि 'हे याचे आहे' या भावाचा हेतू असणारा जो अर्थ, त्याला 'संबंध' असे म्हणतात; त्या अर्थी षष्ठी विभक्ती विहित केली जाते. පාරතන්ත්යඤ්හි සම්බන්ධො, තත්ථ ඡට්ඨී භවෙ තිතො; උපාධි+ඨාන්යා+ගමිතො, න විසෙස්සාදිතො තිතොති. परावलंबित्व (परतंत्रता) म्हणजेच संबंध होय, त्या अर्थी षष्ठी विभक्ती होते; ती उपाधी, स्थानी आणि आगम यांच्याद्वारे जाणली जाते, विशेष्य इत्यादींद्वारे नाही. උපාධිසඞ්ඛාතවිසෙසනතො තාව-රඤ්ඤො පුරිසො. එත්ථ ච බ්රාහ්මණාදිසාමිතො නිවත්තෙතීති රාජා විසෙසනං, පුරිසො තෙන [Pg.125] විසෙසියතීති විසෙස්සො. භණ්ඩසම්බන්ධතො-පහුතං මෙ ධනං සක්ක, එකස්ස පටිවීසො, භික්ඛුස්ස පත්තචීවරං. සමීපතො-අම්බවනස්ස අවිදූරෙ, නිබ්බානස්සෙව සන්තිකෙ. සමූහෙ-සුවණ්ණස්ස රාසි, භික්ඛූනං සමූහො. අවයවෙ-මනුස්සස්සෙව තෙ සීසං, රුක්ඛස්ස සාඛා. විකාරෙ-සුවණ්ණස්ස විකති, භට්ඨධඤ්ඤානං සත්තු. කාරියෙ-යවස්ස අඞ්කුරො, මෙඝස්ස සද්දො, පුත්තාපි තස්ස බහවො, කම්මානං ඵලං විපාකො. අවත්ථායං-ඛන්ධානං පාතුභාවො, ජරා, භෙදො වා. ජාතියං-මනුස්සස්ස භාවො, මනුස්සානං ජාති. ගුණෙ-සුවණ්ණස්ස වණ්ණො, වණ්ණො න ඛීයෙථ තථාගතස්ස බුද්ධස්ස ගුණඝොසො, පුප්ඵානං ගන්ධො, ඵලානං රසො, චිත්තස්ස ඵුසනා, සිප්පිකානං සතං නත්ථි, තිලානං මුට්ඨි, තෙසං සමායොගො, සන්ධිනො විමොක්ඛො, තථාගතස්ස පඤ්ඤාපාරමිං ආරබ්භ, සුඛං තෙ, දුක්ඛං තෙ, චෙතසො පරිවිතක්කො උදපාදි, පඤ්ඤාය පටුභාවො, රූපස්ස ලහුතා, මුදුතා වා, උපචයො වා. ක්රියාසම්බන්ධෙ-පාදස්ස උක්ඛෙපනං, අවක්ඛෙපනං වා, හත්ථස්ස සමිඤ්ජනං, දානං, පසාරණං, ධාතූනං ගමනං, ඨානං, නිසජ්ජා, සයනං වා, තථාගතස්ස නාමගොත්තාදි, තස්ස කාරණං, තස්ස මාතාපිතරො, තස්ස පුරතො පාතුරහොසි, නගරස්ස දක්ඛිණතො, වස්සානං තතියෙ මාසෙ, න තස්ස උපමා, කුවෙරස්ස බලි ඉච්චාදි. අපි ච – प्रथम, उपाधी नावाच्या विशेषणाने—'रञ्ञो पुरिसो' (राजाचा माणूस). येथे ब्राह्मणादी मालकी वगळली जाते म्हणून 'राजा' हे विशेषण आहे, आणि 'माणूस' हा त्याच्याद्वारे विशेषित केला जातो म्हणून तो विशेष्य आहे. वस्तूच्या संबंधाने—'पहुतं मे धनं सक्क' (हे शक्रा, माझ्याकडे भरपूर धन आहे), 'एकस्स पटिवीसॉ' (एकाचा हिस्सा), 'भिक्खुस्स पत्तचीवरं' (भिक्खूचे पात्र आणि चीवर). समीपतेने—'अम्बवनस्स अविदूरे' (आम्रवनापासून जवळच), 'निब्बानस्सेव सन्तिके' (निर्वाणाच्याच जवळ). समूहाने—'सुवण्णस्स रासि' (सोन्याचा ढीग), 'भिक्खूनं समूहो' (भिक्खूंचा समूह). अवयवाने (भागाने)—'मनुस्सस्सेव ते सीसं' (तुझे डोके माणसाचेच आहे), 'रुक्खस्स साखा' (झाडाची फांदी). विकाराने (रूपांतराने)—'सुवण्णस्स विकति' (सोन्याचा विकार/दागिना), 'भट्ठधञ्ञानं सत्तु' (भाजलेल्या धान्याचे पीठ). कार्याने—'यवस्स अङ्कुरो' (यवाचा अंकुर), 'मेघस्स सद्दो' (मेघाचा आवाज), 'पुत्तापि तस्स बहवो' (त्याला अनेक पुत्र आहेत), 'कम्मानं फलं विपाको' (कर्मांचे फळ आणि विपाक). अवस्थेने—'खन्धानं पातुभावो, जरा, भेदो वा' (स्कंधांचा प्रादुर्भाव, जरा किंवा भेद/नाश). जातीने—'मनुस्सस्स भावो' (मनुष्यत्व), 'मनुस्सानं जाति' (मनुष्यांची जात/जन्म). गुणाने—'सुवण्णस्स वण्णो' (सोन्याचा रंग), 'वण्णो न खीयेत तथागतस्स बुद्धस्स गुणघोसो' (ज्यांचा वर्ण क्षीण होत नाही अशा तथागत बुद्धांच्या गुणांचा घोष), 'पुप्फानं गन्धो' (फुलांचा सुगंध), 'फलानं रसो' (फळांचा रस), 'चित्तस्स फुसना' (चित्ताचा स्पर्श), 'सिप्पिकानं सतं नत्थि' (शिंपल्यांचे शंभर नाही), 'तिलानं मुट्ठि' (तिळांची मूठ), 'तेसं समायोगो' (त्यांचा संयोग), 'सन्धिनो विमोक्खो' (सांध्यांची सुटका), 'तथागतस्स पञ्ञापारमिं आरब्भ' (तथागतांच्या प्रज्ञापारमितेला उद्देशून), 'सुखं ते' (तुला सुख लाभो), 'दुक्खं ते' (तुला दुःख होवो), 'चेतसो परिवितक्को उदपादि' (मनात विचार उत्पन्न झाला), 'पञ्ञाय पटुभावो' (प्रज्ञेचे प्रगटीकरण), 'रूपस्स लहुता, मुदुता वा, उपचयो वा' (रूपाची लघुता, मृदुता किंवा उपचय/वाढ). क्रियासंबंधाने—'पादस्स उक्खेपनं, अवक्खेपनं वा' (पाऊल उचलणे किंवा खाली ठेवणे), 'हत्थस्स समिञ्जनं, दानं, पसारणं' (हात आकुंचन करणे, देणे किंवा पसरवणे), 'धातूनं गमनं, ठानं, निसज्जा, सयनं वा' (धातूंचे गमन, उभे राहणे, बसणे किंवा निजणे), 'तथागतस्स नामगोत्तादि' (तथागतांचे नाव, गोत्र इत्यादी), 'तस्स कारणं' (त्याचे कारण), 'तस्स मातापितरो' (त्यांचे माता-पिता), 'तस्स पुरतो पातुरहोसि' (त्यांच्या समोर प्रकट झाले), 'नगरस्स दक्खिणतो' (नगराच्या दक्षिणेला), 'वस्सानं ततिये मासे' (वर्षावासाच्या तिसऱ्या महिन्यात), 'न तस्स उपमा' (त्याला उपमा नाही), 'कुवेरस्स बलि' (कुबेराचा बळी/नैवेद्य) इत्यादी. आणखीही — ගාවස්ස ජාති, ධවලො, ගති, සිඞ්ගං, නාමන්ති+ධ; දබ්බස්සාපි ච ජාත්යාදි, විසෙස්සා හොන්ති කාමතො. येथे गाईची जात, पांढरा रंग, गती, शिंग आणि नाव; तसेच द्रव्याची जात इत्यादी देखील इच्छेनुसार विशेष्य होतात. ගොත්තඤ්ච [Pg.126] සබලොදිස්ස, පාක+මන්නස්ස සුක්කතා; පටස්ස, සිඞ්ගංමෙණ්ඩස්ස, නා+ඤ්ඤෙසංති විසෙස්සතෙ. आणि सबलाचे गोत्र, अन्नाचे शिजणे, वस्त्राचा पांढरेपणा, मेंढ्याचे शिंग, इतरांचे नाही, असे विशेषित केले जाते. ඨානිතො-යුවණ්ණාන+මෙඔ ලුත්තා. ආගමිතො-සුඤ සස්ස. සාමියොගෙ-දෙවාන+මින්දො, මිගානං රාජා. රුජාදියොගෙ-දෙවදත්තස්ස රුජති, තස්ස රොගො උප්පජ්ජි, මහාසෙනාපතීනං උජ්ඣාපෙතබ්බං, රජකස්ස වත්ථං දදාති, මුසාවාදස්ස ඔත්තප්පං ඉච්චාදි. යජස්ස යොගෙ-පුප්ඵස්ස බුද්ධස්ස යජති, පුප්ඵෙනාත්යත්ථො. එවං ඝතස්ස අග්ගිං ජුහති. සුහිතත්ථෙ-පත්තං ඔදනස්ස පූරෙත්වා, පූරං නානාපකාරස්ස අසුචිනො, පූරං හිරඤ්ඤසුවණ්ණස්ස, පූරති බාලො පාපස්ස. කිතකප්පයොගෙ-බහුලංවිධානා ඡට්ඨී, රඤ්ඤො සම්මතො, පූජිතො, සක්කතො, අපචිතො, මානිතො වා, අමතං තෙසං භික්ඛවෙ අපරිභුත්තං, යෙසං කායගතා සති අපරිභුත්තා, සාධුසම්මතො බහුජනස්ස, සුප්පටිවිද්ධා බුද්ධානං ධම්මධාතු, ධම්මස්ස ගුත්තො මෙධාවී. කම්මත්ථෙ-තස්ස භවන්ති වත්තාරො, සහසා කම්මස්ස කත්තාරො, අමතස්ස දාතා, භින්නානං සන්ධාතා, සහිතානං අනුප්පදාතා, බොධෙතා පජාය, කම්මස්ස කාරකො නත්ථි, විපාකස්ස ච වෙදකො, අවිසංවාදකො ලොකස්ස, චතුන්නං මහාභූතානං උපාදාය පසාදො. සරති+ච්ඡායොගෙ-මාතු සරති, න තෙසං කොචි සරති, සත්තානං කම්මපච්චයා, පුත්තස්ස ඉච්ඡති. කරොතිස්ස (යොගෙ) – උදකස්ස පතිකුරුතෙ, කණ්ඩස්ස පතිකුරුතෙ, අභිසඞ්ඛරොතීත්යත්ථො. පඤ්චමියත්ථෙ පරිහානිභයත්ථයොගෙපි ඡට්ඨී, අස්සවනතාය ධම්මස්ස පරියායන්ති, කින්නු ඛො අහං තස්ස සුඛස්ස භායාමි, සබ්බෙ තසන්ති දණ්ඩස්ස, සබ්බෙ භායන්ති [Pg.127] මච්චුනො, භීතො චතුන්නං ආසීවිසානං ඝොරවිසානං ඉච්චාදි. स्थानी भावाने—'युवण्णानमेव लुत्ता' (यु आणि वर्ण यांच्या 'ए' आणि 'ओ' चा लोप). आगम भावाने—'सुञ्ञ सस्स' ('सुञ्ञ' ला 'स' चा आगम). स्वामी (मालकी) योगात—'देवानमिन्दो' (देवांचा इंद्र), 'मिगानं राजा' (श्वापदांचा/मृगांचा राजा). रुजती (दुखणे) इत्यादींच्या योगात—'देवदत्तस्स रुजति' (देवदत्ताला दुखते), 'तस्स रोगो उप्पज्जि' (त्याला रोग उत्पन्न झाला), 'महासेनापतीनं उज्झापेतब्बं' (महासेनापतींकडे तक्रार केली पाहिजे), 'रजकस्स वत्थं ददाति' (धोब्याला वस्त्र देतो), 'मुसावादस्स ओत्तप्पं' (असत्य बोलण्याची भीती/लज्जा) इत्यादी. यज (यज्ञ/अर्पण करणे) च्या योगात—'पुप्फस्स बुद्धस्स यजति' (बुद्धांना फुले अर्पण करतो), येथे 'पुप्फेन' (फुलांनी) असा अर्थ आहे. याचप्रमाणे 'घतस्स अग्गिं जुहति' (अग्नीत तूप अर्पण करतो). तृप्ती/पूर्णतेच्या अर्थी—'पत्तं ओदनस्स पूरेत्वा' (पात्र भाताने भरून), 'पूरं नानापकारस्स असुचिनो' (विविध प्रकारच्या अशुचीने/घाणीने भरलेले), 'पूरं हिरञ्ञसुवण्णस्स' (सोने-नाण्यांनी भरलेले), 'पूरति बालो पापस्स' (मूर्ख माणूस पापाने भरून जातो). कृदन्त (कित) योगात—बहुतांश विधानात षष्ठी विभक्ती होते: 'रञ्ञो सम्मतो' (राजाला संमत), 'पूजितो' (पूजित), 'सक्कतो' (सत्कृत), 'अपचितो' (आदरणीय), 'मानितो वा' (किंवा मानित), 'अमतं तेसं भिक्खवे अपरिभुत्तं, yeसं कायगता सति अपरिभुत्ता' (हे भिक्खूंनो, ज्यांनी कायगता सतीचा उपभोग घेतला नाही, त्यांनी अमृताचा उपभोग घेतला नाही), 'साधुसम्मतो बहुजनस्स' (बहुजनांना चांगला संमत असलेला), 'सुप्पटिविद्धा बुद्धानं धम्मधातु' (बुद्धांनी धम्मधातूचे चांगल्या प्रकारे आकलन केले आहे), 'धम्मस्स गुत्तो मेधावी' (धम्माद्वारे रक्षित असलेला बुद्धिमान). कर्माच्या अर्थी—'तस्स भवन्ति वत्तारो' (ते त्याचे वक्ते होतात), 'सहसा कम्मस्स कत्तारो' (घाईघाईने कर्म करणारे), 'अमतस्स दाता' (अमृताचा दाता), 'भिन्नानं सन्धाता' (भेद झालेल्यांना जोडणारा), 'सहितानं अनुप्पदाता' (एकत्र आलेल्यांना पाठबळ देणारा), 'बोधेता पजाय' (प्रजेला जागृत करणारा), 'कम्मस्स कारको नत्थि, विपाकस्स च वेदको' (कर्माचा कोणी कर्ता नाही आणि विपाकाचा कोणी भोक्ता नाही), 'अविसंवादको लोकस्स' (जगाशी प्रतारणा न करणारा), 'चतुन्नं महाभूतानं उपादाय प्रसादो' (चार महाभूतांवर आधारित असलेली प्रसन्नता). स्मरण (सरति) आणि इच्छा (इच्छति) यांच्या योगात—'मातु सरति' (आईची आठवण काढतो), 'न तेसं कोचि सरति' (त्यांची कोणी आठवण काढत नाही), 'सत्तानं कम्मपच्चया' (प्राण्यांच्या कर्म-प्रत्ययामुळे), 'पुत्तस्स इच्छति' (पुत्राची इच्छा करतो). 'करोति' च्या योगात—'उदकस्स प्रतिकुरुते' (पाण्याचा प्रतिकार करतो), 'कण्डस्स प्रतिकुरुते' (बाणाचा प्रतिकार करतो), म्हणजेच 'अभिसंखरोति' (प्रतिकार/संस्कार करतो) असा अर्थ आहे. पंचमीच्या अर्थी, तसेच हास (पर्िहानि) आणि भीती (भय) यांच्या योगातही षष्ठी विभक्ती होते—'अस्सवणताय धम्मस्स परियायन्ति' (धम्म न ऐकल्यामुळे ते धम्मापासून भ्रष्ट होतात), 'किन्नु खो अहं तस्स सुखस्स भाय्यामि' (मी त्या सुखाला का बरे भ्यावे?), 'सब्बे तसन्ति दण्डस्स' (सर्वजण दंडाला घाबरतात), 'सब्बे भायन्ति मच्चुनो' (सर्वजण मृत्यूला घाबरतात), 'भीतो चतुन्नं आसीविसानं घोरविसानं' (चार घोर विषारी सर्पांना घाबरलेला) इत्यादी. 40. තුල්යත්ථෙන වා තතියා ४०. 'तुल्य' (समान) या अर्थी तृतीया विभक्ती देखील होते. තුල්යත්ථෙන යොගෙ වා ඡට්ඨී හොති තතියා ච. පිතු තුල්යො, පිතරා වා, මාතු තුල්යො, මාතරා වා. 'तुल्य' (समान) या अर्थाच्या योगात षष्ठी आणि तृतीया विभक्ती होते. उदा. पितु तुल्यो (वडिलांसारखा - षष्ठी), पितरा वा (किंवा वडिलांसारखा - तृतीया), मातु तुल्यो (आईसारखा - षष्ठी), मातरा वा (किंवा आईसारखा - तृतीया). 32. සත්තම්යා+ධාරෙ ३२. आधाराच्या अर्थी सप्तमी विभक्ती होते. කත්තුකම්මට්ඨානං නිසජ්ජ+පචනාදික්රියානං යො ආධාරො, තං ආධාරකාරකං නාම. කථං කටෙ නිසීදති දෙවදත්තො, ථාලියං ඔදනං පචති, දෙවදත්ත+තණ්ඩුලානං කත්තු+කම්මානං ධාරණතො තදට්ඨආසන+පචනක්රියං කට+ථාලියො ධාරෙන්ති නාම, තස්මිං සත්තමීවිභත්ති හොති. कर्ता आणि कर्माच्या ठिकाणी राहणाऱ्या बसणे, शिजवणे इत्यादी क्रियांचा जो आधार असतो, त्याला 'आधारकारक' असे म्हणतात. कसे ते पहा—'कटे निसीदति देवदत्तो' (देवदत्त चटईवर बसतो), 'थालियं ओदनं पचति' (तो भांड्यात भात शिजवतो). येथे कर्ता देवदत्त आणि कर्म तांदूळ (भात) यांना धारण करत असल्यामुळे, चटई आणि भांडे हे अनुक्रमे बसणे आणि शिजवणे या क्रियांना धारण करतात; म्हणून त्यांच्यामध्ये सप्तमी विभक्ती होते. සො බ්යාපිකො, ඔපසිලෙසිකො, වෙසයිකො, සාමීපිකොති චතුබ්බිධො. තත්ථ යො ආධෙය්යස්ස නිස්සෙසාධාරභූතො, සො බ්යාපිකො, යථා තිලෙසු තෙලං අත්ථි, ඛීරෙසු ජලං, දධිම්හි සප්පි. පච්චෙකසිද්ධානං භාවානං යං ආධෙය්යභාවෙන උපසිලෙසනං අල්ලීයනං අත්ථි, සො ඔපසිලෙසිකො. යථා ආසනෙ නිසින්නො සඞ්ඝො, ථාලියං ඔදනං පචති, ඝටෙ උදක+මත්ථි, දූරෙ ඨිතො, සමීපෙ ඨිතො. යත්ථ සමීපෙ සමීපීවොහාරං කත්වා තදායත්තතාදීපනත්ථං ආධාරභාවො උපචරීයති, තං සාමීපිකං, යථා ගඞ්ගායං ඝොසො, ගඞ්ගාය සමීපෙ වජොත්යත්ථො. සාවත්ථියං විහරති ජෙතවනෙ. යත්ථ අඤ්ඤථාභාවවසෙන දෙසන්තරාවච්ඡෙදවසෙන වා ආධාරපරිකප්පො[Pg.128], සො වෙසයිතො. යථා ආකාසෙ සකුණා චරන්ති, භූමියං මනුස්සා, ජලෙ මච්ඡා, පාසාදෙසු පතිතො, පාපස්මිං රමතී මනො, පසන්නො බුද්ධසාසනෙ, පඤ්ඤාය සාධු, විනයෙ නිපුණො, මාතරි සාධු, පිතරි නිපුණො. तो (आधार) व्यापी (व्यापिक), औपश्लेषिक (उपश्लेषिक), वैषयिक आणि सामीपिक अशा चार प्रकारचा आहे. त्यापैकी जो आधेयाचा (आश्रिताचा) पूर्ण आधार बनतो, तो 'व्यापी' होय; जसे तिळामध्ये तेल असते, दुधामध्ये पाणी असते, दह्यामध्ये तूप असते. स्वतंत्रपणे सिद्ध असलेल्या पदार्थांचे आधेयभावाने जे एकमेकांशी जोडले जाणे किंवा चिकटणे असते, तो 'औपश्लेषिक' होय; जसे आसनावर बसलेला संघ, पातेल्यात भात शिजवतो, घागरीत पाणी आहे, दूर उभा असलेला, जवळ उभा असलेला. जेथे जवळ असण्याच्या संबंधावरून जवळच्या वस्तूचा व्यवहार करून, त्यावर अवलंबून असणे दर्शवण्यासाठी आधारभावाचा उपचार केला जातो, तो 'सामीपिक' होय; जसे गंगेवर (गंगेच्या काठावर) घोष (गोकुळ) आहे, याचा अर्थ गंगेच्या जवळ गोकुळ आहे असा होतो. श्रावस्तीमध्ये जेतवनात विहार करतात. जेथे अन्य भावामुळे किंवा देशान्तराच्या (स्थानाच्या) मर्यादेमुळे आधाराची कल्पना केली जाते, तो 'वैषयिक' होय; जसे आकाशात पक्षी उडतात, भूमीवर मनुष्य राहतात, पाण्यात मासे असतात, महालावरून पडलेला, पापात मन रमते, बुद्धशासनात प्रसन्न असलेला, प्रज्ञेमध्ये चांगला, विनयात निपुण, मातेच्या ठिकाणी चांगला वागणारा, पित्याच्या ठिकाणी निपुण. කිරියා කත්තු+කම්මට්ඨා, ආධාරීයති යෙන සො; ආධාරො චතුධා වුත්තො, බ්යාපකාදිප්පභෙදතො. कर्ता आणि कर्माच्या ठिकाणी राहणारी क्रिया ज्याच्याद्वारे आधारभूत केली जाते, तो 'आधार' होय. व्यापी इत्यादी भेदांमुळे तो आधार चार प्रकारचा सांगितला आहे. බ්යාපකො තිලඛීරාදි, කටො ඔපසිලෙසිකො; සාමීපිකො තු ගඞ්ගාදි, ආකාසො විසයො මතො. व्यापक (उदा. तिळात तेल, दुधात तूप इत्यादी), औपश्लेषिक (उदा. चटईवर बसणे), सामीपिक (उदा. गंगेच्या काठी इत्यादी) आणि विषय (उदा. आकाशात) हे आधार मानले जातात. 33. නිමිත්තෙ ३३. निमित्त अर्थी (निमित्तामध्ये) නිමිත්තත්ථෙ සත්තමී හොති. අජිනම්හි හඤ්ඤතෙ දීපි, කුඤ්ජරො දන්තෙසු හඤ්ඤතෙ, අණුමත්තෙසු වජ්ජෙසු භයදස්සාවී, සම්පජානමුසාවාදෙ පාචිත්තියං. සබ්බත්ථ නිමිත්යත්ථො. निमित्त अर्थी सप्तमी विभक्ती होते. जसे की, 'कातडीसाठी (अजिनामध्ये) बिबट्या मारला जातो', 'दंतांसाठी (दातात) हत्ती मारला जातो', 'अणुमात्र दोषांमध्येही (वज्जेसु) भय पाहणारा', 'जाणूनबुजून खोटे बोलण्यात (मुसावादे) पाचित्तिय (प्रायश्चित्त) होते'. या सर्व ठिकाणी निमित्त अर्थ आहे. 34. යබ්භාවො භාවලක්ඛණං ३४. ज्याचा भाव (क्रिया) हा दुसऱ्या भावाचे लक्षण असतो. යස්ස භාවො භාවන්තරස්ස ලක්ඛණං භවති, තතො සත්තමී. කාලෙ ගාවීසු දුය්හමානාසුගතො, දුද්ධාසු ආගතො. එත්ථගමනක්රියාය දොහනක්රියාචිහනං, ආගමනක්රියාය දුද්ධාක්රියාචිහනං, එව+මුපරිපි. පුබ්බණ්හසමයෙ ගතො, සායන්හසමයෙ ආගතො, ජායමානෙ ඛො සාරිපුත්ත බොධිසත්තෙ අයං දසසහස්සී ලොකධාතු සම්පකම්පි. ज्याचा भाव (क्रिया) दुसऱ्या भावाचे (क्रियेचे) लक्षण (चिन्ह) बनतो, त्यापासून सप्तमी विभक्ती होते. जसे की, 'गाईंचे दूध काढले जात असताना (गाई दुभत्या असताना) तो गेला', 'दूध काढून झाल्यावर तो आला'. येथे जाण्याच्या क्रियेचे चिन्ह दूध काढण्याची क्रिया आहे, आणि येण्याच्या क्रियेचे चिन्ह दूध काढून झाल्याची क्रिया आहे; पुढेही असेच समजावे. 'सकाळच्या वेळी तो गेला, संध्याकाळच्या वेळी तो आला.' 'हे सारिपुत्त, बोधिसत्तांचा जन्म होत असताना (जायमाने) ही दहा हजारांची लोकधातू कंपित झाली.' පාසාණා සක්ඛරා චෙව, කඨලා ඛාණුකණ්ටකා; සබ්බෙ මග්ගා විවජ්ජන්ති, ගච්ඡන්තෙ ලොකනායකෙ. दगड, गोटे, खडे, खुंट आणि काटे—हे सर्व मार्ग सोडून दूर होतात, जेव्हा लोकनायक (बुद्ध) चालतात. ඉමස්මිං [Pg.129] සති ඉදං හොති ඉච්චාදි. ‘‘අකාලෙ වස්සතී තස්ස, කාලෙ තස්ස න වස්සතී’’ති විසයසත්තමී. 'हे असताना हे होते' इत्यादी. 'त्याच्यासाठी अवेळी पाऊस पडतो, वेळी पाऊस पडत नाही' ही विषय-सप्तमी आहे. 35. ඡට්ඨී චා+නාදරෙ ३५. अनादर अर्थी षष्ठी सुद्धा होते. යස්ස භාවො භාවන්තරස්ස ලක්ඛණං භවති, තතො ඡට්ඨී හොති සත්තමී චා+නාදරෙ ගම්යමානෙ. අකාමකානං මාතාපිතූනං රුදන්තානං පබ්බජි, මාතාපිතූසු රුදන්තෙසු වා. ‘‘ආකොටයන්තො සො නෙති, සිවිරාජස්ස පෙක්ඛතෙ’’, ‘‘මච්චු ආදාය ගච්ඡති, පෙක්ඛමානෙ මහාජනෙ’’. ज्याचा भाव दुसऱ्या भावाचे लक्षण बनतो, त्यापासून अनादर दर्शविला जात असताना षष्ठी आणि सप्तमी विभक्ती होते. जसे की, 'अनिच्छुक माता-पिता रडत असतानाच तो प्रव्रजित झाला' (षष्ठी: अकामकानं मातापितूनं रुदंतानं पब्बजि, किंवा सप्तमी: मातापितूसु रुदंतेसु वा). 'तो त्याला मारत घेऊन जातो, आणि शिविराज पाहत राहतो', 'मृत्यू (प्राण्याला) घेऊन जातो, आणि महाजन (लोक) पाहत राहतात'. ගුන්නං සාමීති සම්බන්ධෙ ඡට්ඨී, ගොසු සාමීති විසයසත්තමී. එවං ගුන්නමිස්සරො, ගොස්වි+ස්සරො, ගුන්නං අධිපති, ගොසු අධිපති, ගුන්නං දායාදො, ගොසු දායාදො, ගුන්නං සක්ඛී, ගොසු සක්ඛී, ගුන්නං පතිභූ, ගොසු පතිභූ, ගුන්නං පසුතො, ගොසු පසුතො, කුසලා නච්චගීතස්ස, කුසලා නච්චගීතෙ, ආයුත්තො කටකරණස්ස, ආයුත්තො කටකරණෙ. තථා ආධාරවචනිච්ඡායං සත්තමී, භික්ඛූසු අභිවාදෙන්ති, මුද්ධනි චුම්බිත්වා, බාහාසු ගහෙත්වා, හත්ථෙසු පිණ්ඩාය චරන්ති, කදලීසු ගජෙ රක්ඛන්ති, ඤාණස්මිං පසන්නො, ඤාණස්මිං උස්සුක්කොති විසයසත්තමී. 'गुन्नं स्वामी' (गाईंचा स्वामी) यात संबंध अर्थी षष्ठी आहे, 'गोसु स्वामी' यात विषय-सप्तमी आहे. याचप्रमाणे: गुन्नमिस्सरो / गोस्विस्सरो (गाईंचा ईश्वर), गुन्नं अधिपती / गोसु अधिपती (गाईंचा अधिपती), गुन्नं दायादो / गोसु दायादो (गाईंचा वारसदार), गुन्नं सक्खी / गोसु सक्खी (गाईंचा साक्षीदार), गुन्नं पतिभू / गोसु पतिभू (गाईंचा जामीनदार), गुन्नं पसुतो / गोसु पसुतो (गाईंच्या पालनात मग्न), कुसला नच्चगीतस्स / कुसला नच्चगीते (नृत्य-गीतात कुशल), आयुत्तो कटकरणस्स / आयुत्तो कटकरणे (चटई बनवण्यात गुंतलेला). तसेच, आधार सांगण्याची इच्छा असल्यास सप्तमी होते, जसे की: 'भिक्खूंना अभिवादन करतात' (भिक्खूसु अभिवादेन्ति), 'मस्तकावर चुंबन घेऊन' (मुद्धनि चुम्बित्वा), 'बाहूंना धरून' (बाहासु गहेत्वा), 'हातांनी भिक्षेसाठी फिरतात' (हत्थेसु पिण्डाय चरन्ति), 'केळीच्या बागेत हत्तींचे रक्षण करतात' (कदलीसु गजे रक्खन्ति), 'ज्ञानावर प्रसन्न' (ञाणस्मिं पसन्नो), 'ज्ञानाविषयी उत्सुक' (ञाणस्मिं उस्सुक्को) ही विषय-सप्तमी आहे. 36. යතො නිද්ධාරණං ३६. ज्यापासून निर्धारण (निवड) केले जाते. ජාතිගුණක්රියාහි සමුදායතෙ+කදෙසස්ස පුථක්කරණං නිද්ධාරණං, යතො තං කරීයති, තතො ඡට්ඨීසත්තමියො හොන්ති. සාලයො සූකධඤ්ඤානං පථ්යතමා, සූකධඤ්ඤෙසු සාලයො පථ්යතමා. කණ්හා ගාවීනං සම්පන්නඛීරතමා, කණ්හා ගාවීසු [Pg.130] සම්පන්නඛීරතමා. ගච්ඡතං ධාවන්තො සීඝතමා, ගච්ඡන්තෙසු ධාවන්තො සීඝතමා. जाती, गुण आणि क्रिया यांच्याद्वारे समूहातून एका भागाला वेगळे करणे म्हणजे 'निर्धारण' (निद्धारण) होय. ज्याच्यापासून ते केले जाते, त्या शब्दापासून षष्ठी आणि सप्तमी विभक्ती होतात. जसे की, 'धान्यांमध्ये तांदूळ सर्वात पथ्यकर आहे' (षष्ठी: सूकधञ्ञानं सालयो पथ्यतमा, किंवा सप्तमी: सूकधञ्ञेसु सालयो पथ्यतमा). 'गाईंमध्ये काळी गाय सर्वात जास्त दूध देणारी आहे' (षष्ठी: गावीनं कण्हा सम्पन्नखीरतमा, किंवा सप्तमी: गावीसु कण्हा सम्पन्नखीरतमा). 'जाणाऱ्यांमध्ये धावणारा सर्वात वेगवान असतो' (षष्ठी: गच्छतं धावन्तो सीघतमो, किंवा सप्तमी: गच्छन्तेसु धावन्तो सीघतमो). 14. සත්තම්යා+ධික්යෙ १४. अधिक (श्रेष्ठत्व) अर्थी सप्तमी होते. ආධික්යෙ අත්ථෙ උපෙන යුත්තම්හා සත්තමී හොති. උපඛාරියං දොණො, ඛාරියා දොණො අධිකොත්යත්ථො. තථා උපනික්ඛෙ කහාපණං. अधिक (श्रेष्ठत्व) अर्थी 'उप' शब्दाशी युक्त असलेल्या शब्दापासून सप्तमी विभक्ती होते. जसे की, 'उपखारियं दोणो' म्हणजे खारीपेक्षा दोण अधिक आहे. तसेच 'उपनि क्खे कहापणं' (निक्खापेक्षा कहापण अधिक आहे). 15. සාමිත්ථෙ+ධිනා १५. स्वामित्व (मालकी) अर्थी 'अधि' शब्दाशी युक्त असलेल्या शब्दापासून सप्तमी होते. සාමිභාවත්ථෙ අධිනා යුත්තම්හා සත්තමී හොති. අධිබ්රහ්මදත්තෙ පඤ්චාලා, අධිපඤ්චාලෙසු බ්රහ්මදත්තො, බ්රහ්මදත්තිස්සරා පඤ්චාලාති අත්ථො. අධිදෙවෙසු බුද්ධො, සම්මුතිදෙවාදීහි බුද්ධො අධිකොත්යත්ථො. स्वामित्व अर्थी 'अधि' शब्दाशी युक्त असलेल्या शब्दापासून सप्तमी विभक्ती होते. जसे की, 'अधिब्रह्मदत्ते पञ्चाला' किंवा 'अधिपञ्चालेसु ब्रह्मदत्तो', याचा अर्थ ब्रह्मदत्त हा पंचालांचा स्वामी आहे असा होतो. 'अधिदेवेसु बुद्धो' म्हणजे संमृति-देव इत्यादींपेक्षा बुद्ध श्रेष्ठ आहेत असा अर्थ होतो. එත්ථ ච යථාවුත්තෙසු අත්ථෙසු අයං භෙදො – आणि येथे, वर सांगितलेल्या अर्थांमध्ये हा भेद (फरक) आहे – කාරකං සාධකං නිබ්බත්තකං ක්රියානිමිත්තන්ති අත්ථතො එකමෙව, තඤ්ච දණ්ඩො, ධවලො, පචනං, චිත්තො, ගොති දබ්බ+ගුණ+ක්රියා+නාම+ජාතිභෙදෙන පඤ්චවිධම්පි කම්ම+කත්තාදිවසෙන ඡබ්බිධං, තං සත්තිකාරකං, තදාධාරභූතදබ්බාදයො තත්රට්ඨකාරකං, න මුඛ්යතො. මුඛ්යතො චෙ හොන්ති, තෙසං සත්තිදබ්බානං අඤ්ඤමඤ්ඤබ්යාවටරූපත්තා යො ආධාරො, සො ආධාරොයෙව, කිස්මිඤ්චිකාලෙ කරණං වා කත්තුරූපභූතො වා න හොති, තස්මා ථාලි පචති, ථාලියා පචති, ථාලියං පචතීත්යාදිනා එකස්ස වත්ථුනො කත්තු+කරණා+ධාරභෙදො න සියා. සත්තිපක්ඛෙ පන දබ්බාදීනං අනෙකසත්තියා ආධාරත්තා සත්තියා දබ්බාදයො විවක්ඛිතා තං තං කාරකං හොතීති දබ්බාදීනං අභෙදෙපි කාරකභෙදො යුජ්ජතෙ. වුත්තඤ්හි – कारक, साधक, निब्बत्तक (उत्पादक) आणि क्रियानिमित्त हे अर्थाच्या दृष्टीने एकच आहेत. आणि ते द्रव्य, गुण, क्रिया, नाम आणि जाती या भेदांमुळे पाच प्रकारचे असूनही, कर्म, कर्ता इत्यादींच्या रूपाने सहा प्रकारचे आहे. ते 'शक्ती-कारक' (सत्तिकारक) आहे, आणि त्याचे आधारभूत असलेले द्रव्यादी हे 'तत्रस्थ-कारक' (तत्रट्ठकारक) आहेत, मुख्य रूपाने नव्हे. जर ते मुख्य रूपाने असते, तर त्या शक्तीयुक्त द्रव्यांच्या परस्परांहून भिन्न स्वरूपामुळे जो आधार आहे तो केवळ आधारच राहिला असता; तो कधीही करण किंवा कर्ता बनू शकला नसता. त्यामुळे, 'भांडे शिजवते' (थाली पचति), 'भांड्याने शिजवते' (थालिया पचति), 'भांड्यात शिजवते' (थालियं पचति) इत्यादी प्रकारे एकाच वस्तूचे कर्ता, करण आणि आधार असे भेद होऊ शकले नसते. परंतु, शक्तीच्या पक्षात (सत्तिपक्खे) द्रव्यादी हे अनेक शक्तींचे आधार असल्यामुळे, जेव्हा त्या शक्तींच्या रूपाने द्रव्यादी विवक्षित (इच्छित) असतात, तेव्हा ते ते कारक बनतात; म्हणून द्रव्यादींमध्ये अभेद असतानाही कारकांचा भेद योग्य ठरतो. कारण असे म्हटले आहे – විචිත්තකත්තුආදීහි[Pg.131], සංයොගා එකවත්ථුනො; නානාත්තං යුජ්ජතෙ නාට්ය-භෙදෙන නටකස්සි+වාති. विविध कर्ता इत्यादींच्या संयोगाने एकाच वस्तूचे अनेकत्व (विविध रूपे) योग्य ठरते, ज्याप्रमाणे नाटकातील विविध पात्रांच्या भेदाने एकाच नटाचे अनेक रूपे होतात. ථාලි වත්ථුතො එකා චෙදපි සත්තිකාරකභූතකත්තු+කරණා+ධාරාදීනං භෙදෙන භෙද+මුපයාති, කිමිව රාම+රාවණාදිවෙසධාරීනටකො තෙසං නාමවසෙන රාමො, රාවණොති භෙද+මුපයාති, ත+මිවාති අධිප්පායො. भांडे (थाली) हे वस्तूच्या रूपाने एकच असले, तरी शक्ती-कारकरूप कर्ता, करण, आधार इत्यादींच्या भेदाने ते भिन्नता प्राप्त करते. जसे की, राम, रावण इत्यादींचे वेष धारण करणारा नट त्यांच्या नावावरून 'राम' किंवा 'रावण' अशा भेदाला प्राप्त होतो, त्याचप्रमाणे हा अभिप्राय आहे. පුන+රපි – पुन्हा असेही – යථෙ+කොපි පටො සුත්ත, පීතාදිගුණසංයුතො; සුක්කො පටොති පීතොති, භෙදං යාත්යෙ+වමෙව+යං. ज्याप्रमाणे एकच वस्त्र सुताने आणि पिवळ्या इत्यादी गुणांच्या संयोगाने 'पांढरे वस्त्र' किंवा 'पिवळे वस्त्र' अशा भेदाला प्राप्त होते, त्याचप्रमाणे हेही आहे. එත්ථ ච සත්තිභූතකත්තාදයො මුඛ්යකාරකං, තංයොගෙන දබ්බභූතථාලී ගුණකාරකං, තෙ ච කථං ක්රියාය කාරකා හොන්ති. කත්තා අත්තනා පතිට්ඨිතාය හසති+නච්චතිච්චාදික්රියාය නිමිත්තං හොති. කම්මඤ්ච අත්තනා පතිට්ඨිතක්රියාය තදත්ථභූතඉන්ධනාදීනි පවත්තෙන්තං ‘‘ඔදනං පචතී’’ත්යාදො නිමිත්තං. ‘කට්ඨෙහි පච්චතී’ත්යාදො කට්ඨානි ජලනක්රියාය සාධෙතබ්බපාකස්ස අඞ්ගභාවෙන නිමිත්තං. ‘ඵරසුනා ඡින්දතී’ත්යාදො ඵරසු ච කට්ඨානං ද්විධාපවත්තියා නිමිත්තං. කම්මඤ්ච ක්රියාය සම්බන්ධීයමානබ්යාප්යෙ සති නිමිත්තභාවෙන ක්රියාය නිමිත්තං. තථා සම්පදානා+වධි+ආධාරානං ‘ගාවො දදාති’ ‘ගාමස්මා අපනයති’ ‘ථාලියං පචතී’ත්යාදීසු ගොදානා+පනයන+පචනක්රියානං නිමිත්තත්තා ක්රියාය නිමිත්තානි හොන්ති. තෙසං යථාසකං ක්රියාය පවත්තකො කත්තා, තස්මා ස එව පධානො කත්තාති වොහාරං [Pg.132] ලභති, අඤ්ඤෙසං කරණාදීනං කත්තුභාවෙ සතිපි අප්පධානත්තා තං න ලභති. आणि येथे शक्तीरूप कर्ता इत्यादी मुख्य कारक आहेत, त्यांच्या योगाने द्रव्यरूप असलेले भांडे (थाली) हे गौण कारक आहे. आणि ते क्रियेचे कारक कसे बनतात? कर्ता स्वतःमध्ये प्रतिष्ठित असलेल्या हसणे, नाचणे इत्यादी क्रियेचे निमित्त बनतो. आणि कर्म स्वतःमध्ये प्रतिष्ठित असलेल्या क्रियेद्वारे, त्याच्यासाठी उपयुक्त असलेल्या इंधनादींना प्रवृत्त करत 'भात शिजवतो' (ओदनं पचति) इत्यादींमध्ये निमित्त बनते. 'लाकडांनी शिजवले जाते' (कट्ठेहि पच्चति) इत्यादींमध्ये लाकडे जळण्याच्या क्रियेद्वारे साध्य होणाऱ्या पाकाचे अंग बनून निमित्त होतात. 'कुऱ्हाडीने कापतो' (फरसुना छिन्दति) इत्यादींमध्ये कुऱ्हाड लाकडांचे दोन भाग करण्याच्या क्रियेचे निमित्त बनते. आणि कर्म क्रियेशी संबंधित आणि व्याप्य असताना निमित्तभावाने क्रियेचे निमित्त बनते. तसेच संप्रदान, अपादान (अवधी) आणि आधार हे 'गाई दान करतो' (गावो ददाति), 'गावातून दूर करतो' (गामस्मा अपनयति), 'भांड्यात शिजवतो' (थालियं पचति) इत्यादींमध्ये गोदान, दूर करणे आणि शिजवणे या क्रियांचे निमित्त असल्यामुळे क्रियेचे निमित्त बनतात. त्या-त्या क्रियेला प्रवृत्त करणारा कर्ता असतो, म्हणून त्यालाच 'प्रधान कर्ता' असे म्हटले जाते; इतर करण इत्यादींमध्ये कर्तृत्व असले तरी गौणत्वामुळे त्यांना ते नाव मिळत नाही. චොදකෙන වුත්තඤ්හි – शंकाकाराने (चोदकाने) म्हटलेच आहे – නනු සාමග්යමීනායං, ක්රියාසිද්ධි කථං වද; එකස්ස කත්තුනො එව, සබ්බෙසං කත්තුතං විනා. सर्व साधनांच्या समूहामध्ये (सामग्रीमध्ये) क्रियेची सिद्धी कशी होते ते सांगा; केवळ एकाच कर्त्याच्या कर्तृत्वाने, सर्वांच्या कर्तृत्वाशिवाय ती कशी घडू शकते? සබ්බෙසං කරණාදීනං, කත්තුතාය වියොගතො; කරණාදීනං අභාවත්තා, කාරකං න හි ඡබ්බිධන්ති. सर्व करण इत्यादींचा कर्तृत्वाशी वियोग झाल्यामुळे आणि करण इत्यादींचा अभाव झाल्यामुळे कारक सहा प्रकारचे असूच शकत नाही. වුච්චතෙ – यावर उत्तर दिले जाते – යද්යප්ය+ත්ථි හි කත්තුත්තං, සභාවා කරණාදිසු; ක්රියාසිද්ධ්යා තථාප්යෙ+ත+මප්පධානං පරඞ්ගතො. जरी क्रिया सिद्ध करण्यासाठी करण इत्यादींमध्ये स्वभावतः कर्तृत्व असते, तरीही ते दुसऱ्याच्या (प्रधान कर्त्याच्या) अधीन असल्यामुळे गौण (अप्रधान) मानले जाते. එතං සභාවතො උපලබ්භමානං කරණාදීසු කත්තුත්තං පරෙසං කරණාදීනං ජලන+ධාරණාදික්රියාය අඞ්ගං උපායති අප්පධානන්ති අධිප්පායො. स्वभावाने उपलब्ध होणारे हे करण इत्यादींमधील कर्तृत्व, इतर करण इत्यादींच्या प्रज्वलन, धारण इत्यादी क्रियेचे अंग (साधन) बनते आणि ते अप्रधान असते, असा अभिप्राय आहे. කාරකං ඡබ්බිධං සඤ්ඤා-වසා ඡබ්බීසතිවිධං; පභෙදා සත්තධා කම්මං, කත්තා පඤ්චවිධො භවෙ. कारक हे सहा प्रकारचे आहे, संज्ञेच्या (नावाच्या) आधारे ते सव्वीस प्रकारचे होते; कर्माचे सात भेद आहेत आणि कर्ता पाच प्रकारचा असतो. කරණං දුවිධං හොති, සම්පදානං තිධා මතං; අපාදානං පඤ්චවිධං, ආධාරො තු චතුබ්බිධො. करण दोन प्रकारचे असते, संप्रदान तीन प्रकारचे मानले गेले आहे; अपादान पाच प्रकारचे आणि आधार चार प्रकारचा असतो. විභත්තියො පන – आणि विभक्ती तर – පච්චත්ත+මුපයොගඤ්ච, කරණං සම්පදානියං; නිස්සක්කං සාමිවචනං, භුම්ම+මාලපන+ට්ඨමංති. पच्चत्त (प्रथमा), उपयोग (द्वितीया), करण (तृतीया), संप्रदान (चतुर्थी), निस्सक्क (पंचमी), सामीवचन (षष्ठी), भुम्म (सप्तमी) आणि आठवे आलपन (संबोधन) आहेत. ඉති පයොගසිද්ධියං කාරකකණ්ඩො තතියො. अशा प्रकारे प्रयोगसिद्धीमधील हा तिसरा कारककांड समाप्त झाला. 4. සමාසකණ්ඩ ४. समासकांड අථ [Pg.133] නාමානමෙව අඤ්ඤමඤ්ඤසම්බන්ධීනං සමාසොති නාමනිස්සිතත්තා, සයඤ්ච නාමිකත්තා නාමානන්තරං සමාසො වුච්චතෙ. आता, परस्परांशी संबंधित असलेल्या नामांचाच समास होत असल्यामुळे, आणि तो नामावर आश्रित असल्यामुळे व स्वतः नामरूप असल्यामुळे, नामानंतर समासाचे वर्णन केले जाते. 1. ස්යාදි ස්යාදිනෙ+කත්ථන්ති १. ‘स्यादि स्यादिनेकतथं’ (स्यादि प्रत्ययान्त शब्दाचा दुसऱ्या स्यादि प्रत्ययान्त शब्दाशी एका अर्थी होणे) हे सूत्र – ඉද+මධිකතං වෙදිතබ්බං. පුබ්බෙ වුත්තවිධිග්ගහණඤායෙන ස්යාදීති තදන්තස්ස ගහණං. සො ච භින්නත්ථානං නාමාන+මෙකත්ථීභාවො සමාසොති වුච්චතෙ. हे अधिकारसूत्र म्हणून जाणावे. पूर्वी सांगितलेल्या विधीच्या ग्रहण करण्याच्या नियमाने 'स्यादि' याने तदन्त (त्या प्रत्ययाने अंत होणाऱ्या) शब्दांचे ग्रहण होते. आणि भिन्न अर्थ असलेल्या नामांचे एकार्थी होणे याला 'समास' असे म्हटले जाते. 2. අසඞ්ඛ්යං විභත්ති+සම්පත්ති+සමීප+සාකල්යා+භාව+යථා+ පච්ඡා+යුගපදත්ථෙ २. असंख्या (अव्ययीभाव समास) हा विभक्ती, समृद्धी, समीप, साकल्य (पूर्णता), अभाव, यथा (योग्यता इत्यादी), पश्चात् (नंतर) आणि युगपत् (एकाच वेळी) या अर्थांमध्ये होतो. පුබ්බස්ස+ත්ථපරං යස්ස, අඤ්ඤත්ථපරමඤ්ච යං; නපුංසකං භවෙ යඤ්ච, ත+දාසංඛ්ය+මිහෙ+ස්සතෙ. ज्या समासात पूर्वपदाचा अर्थ मुख्य असतो, किंवा जो अन्य अर्थाला प्राधान्य देणारा असतो, आणि जो नपुंसकलिंगी होतो, त्याला येथे 'असंख्या' (अव्ययीभाव) मानले जाते. සත්ථන්තරෙ පසිද්ධං යං, අබ්යයීභාවනාමතො; උපකුම්භං තිට්ඨගු ච, පාතමෙඝංති තං යථා. इतर शास्त्रांमध्ये जे 'अव्ययीभाव' या नावाने प्रसिद्ध आहे; जसे की 'उपकुंभं', 'तिट्ठगु' आणि 'पातमेघं' इत्यादी. අසඞ්ඛ්යං ස්යාද්යන්තං විභත්යාදීන+මත්ථෙ වත්තමානං ස්යාද්යන්තෙන සහෙ+කත්ථං භවති. ‘‘අවිග්ගහො නිච්චසමාසො, පදන්තරවිග්ගහො චෙ’’ති පදන්තරවිග්ගහො. ඉත්ථීසු තථා පවත්තාති විග්ගය්හ විභත්යත්ථෙ සමාසෙ කතෙ – विभक्ती इत्यादी अर्थांमध्ये वर्तमान असलेला 'असंख्या' (अव्ययीभाव) हा स्यादि-प्रत्ययान्त शब्द दुसऱ्या स्यादि-प्रत्ययान्त शब्दासोबत एकार्थी (एकपद) होतो. 'ज्याचा विग्रह होत नाही तो नित्य समास, किंवा ज्याचा दुसऱ्या पदाने विग्रह होतो' या नियमाने येथे दुसऱ्या पदाने विग्रह होतो. 'इत्थीसु तथा पवत्ता' (स्त्रियांच्या बाबतीत तसे घडले) असा विग्रह करून विभक्तीच्या अर्थात समास केला असता – 2,119. එකත්ථතායං २,११९. ‘एकरूपता किंवा एकार्थी होणे’ या अर्थी – එකො අත්ථො යස්ස පකතිපච්චයාදිසමුදායස්ස සො එකත්ථො. තස්ස භාවො පවත්තිනිමිත්තං එකත්ථතා, ඊයාදි+ණාදි+සමාසවිධානං, තස්මිං සති ස්යාදිලොපො හොති. ज्या प्रकृती-प्रत्यय इत्यादींच्या समूहाचा एकच अर्थ असतो, तो 'एकार्थ' होय. त्याचा भाव किंवा प्रवृत्तीचे निमित्त म्हणजे 'एकात्मता' (एकार्थता) होय. जसे ईय-प्रत्यय, ण-प्रत्यय आणि समास यांचे विधान केले असता, 'स्यादि' प्रत्ययांचा लोप होतो. 9. තං නපුංසකන්ති ९. ‘ते नपुंसकलिंगी होते’ या नियमाने – නපුංසකලිඞ්ගෙ [Pg.134] ච ‘‘පුබ්බස්මා+මාදිතො’’ති සබ්බවිභත්තීනං ලොපෙ ච කතෙ අධිත්ථි තිට්ඨති, භො අධිත්ථි, අධිත්ථි පස්ස, අධිත්ථි කතං, අධිත්ති චරති, අධිත්ථි දෙහි, අධිත්ථි අපෙහි, අධිත්ථි ආයත්තං, අධිත්ථි පතිට්ඨිතං. එවං අධිකුමාරි, අන්තභූතස්ස අප්පධානස්ස ඝපස්ස ‘‘ඝපස්ස+න්තස්සා+ප්පධානස්සා’’ති පස්ස රස්සො. नपुंसकलिंगात आणि 'पुब्बस्मा मादितो' या सूत्राने सर्व विभक्तींचा लोप केला असता 'अधित्थि' (स्त्रियांच्या विषयी) असे रूप राहते. जसे: 'भो अधित्थि' (हे अधित्थि!), 'अधित्थि पस्स' (अधित्थि पहा), 'अधित्थि कतं' (अधित्थि केले), 'अधित्थि चरति' (अधित्थि चालते), 'अधित्थि देहि' (अधित्थि दे), 'अधित्थि अपेहि' (अधित्थिपासून दूर हो), 'अधित्थि आयत्तं' (अधित्थिच्या अधीन), 'अधित्थि पतिट्ठितं' (अधित्थिमध्ये प्रतिष्ठित). याचप्रमाणे 'अधिकुमारि' हे रूप बनते. येथे अंतर्भूत असलेल्या अप्रधान 'घप' संज्ञक दीर्घ स्वराचा 'घपस्सन्तस्साप्पधानस्स' या सूत्राने र्हस्व होतो. සහ=සම්පන්නං බ්රහ්මං සබ්රහ්මං. වුත්තනයෙන එත්ථ ච උපරි ච සමාසාදයො හොන්ති, එත්ථ ‘‘අකාලෙ සතත්ථෙ’’ති සහස්ස සාදෙසො. ස්යාදිම්හි කතෙ ‘‘පුබ්බස්මා+මාදිතො’’ති ස්යාදීනං ලොපෙ ච සම්පත්තෙ ‘‘නා+තො+මපඤ්චමියා’’ති අපඤ්චමියා පටිසෙධො ච අකාරන්තඅසංඛ්යසමාසතො පරාසං සබ්බවිභත්තීනං අංආදෙසො ච හොති. එව+මුපරිපි. ब्रह्माने युक्त किंवा संपन्न म्हणजे 'सब्रह्मं'. सांगितलेल्या नियमाने येथे आणि पुढेही समास इत्यादी होतात. येथे 'अकाले सतत्थे' या सूत्राने 'सह' च्या जागी 'स' असा आदेश होतो. 'स्यादि' प्रत्यय लावल्यावर 'पुब्बस्मा मादितो' या सूत्राने स्यादि प्रत्ययांचा लोप प्राप्त झाला असता, 'nā+to+mapañcamiyā' (नातो मपंचमिया) या सूत्राने पंचमी सोडून इतर विभक्तींच्या लोपाचा निषेध होतो आणि अकारान्त असंख्या (अव्ययीभाव) समासाच्या पुढील सर्व विभक्तींच्या जागी 'अं' आदेश होतो. पुढेही याचप्रमाणे समजावे. භික්ඛානං සමිද්ධි සුභික්ඛං, එත්ථ ඝස්ස රස්සො. සුභික්ඛං තිට්ඨති භො සුභික්ඛං, සුභික්ඛං පස්ස. නා+ස්මිංසු ‘‘වා තතියා සත්තමීනං’’ති විකප්පෙන අං, සුභික්ඛං සුභික්ඛෙන වා කතං, සුභික්ඛං සුභික්ඛෙන වා චරති, සුභික්ඛං දෙහි. පඤ්චමියං අ+මබ්භාවා සුභික්ඛා අපගච්ඡ, සුභික්ඛ+මායත්තං, සුභික්ඛං සුභික්ඛෙ වා පතිට්ඨිතං. भिक्षूंची समृद्धी म्हणजे 'सुभिक्खं' (सुभिक्ष), येथे 'घ' चा र्हस्व होतो. 'सुभिक्खं तिट्ठति' (सुभिक्ष राहते), 'भो सुभिक्खं' (हे सुभिक्ष!), 'सुभिक्खं पस्स' (सुभिक्ष पहा). तृतीया आणि सप्तमी विभक्तीमध्ये 'वा ततीया सत्तमीनं' या सूत्राने पर्यायाने 'अं' आदेश होतो; जसे 'सुभिक्खं' किंवा 'सुभिक्खेन कतं' (सुभिक्षाने केले), 'सुभिक्खं' किंवा 'सुभिक्खेन चरति' (सुभिक्षाने चालते), 'सुभिक्खं देहि' (सुभिक्ष दे). पंचमी विभक्तीमध्ये 'अं' भाव न झाल्यामुळे 'सुभिक्खा अपगच्छ' (सुभिक्षापासून दूर जा), 'सुभिक्खमायत्तं' (सुभिक्षाच्या अधीन), 'सुभिक्खं' किंवा 'सुभिक्खे पतिट्ठितं' (सुभिक्षामध्ये प्रतिष्ठित) अशी रूपे होतात. සමීපත්ථෙ-කුම්භස්ස සමීපං උපකුම්භං, එවං උපනගරං, භො උපකුම්භං ඉච්චාදි. समीप (जवळ) या अर्थी – कुंभाच्या (घड्याच्या) जवळ ते 'उपकुंभं', याचप्रमाणे 'उपनगरं', 'भो उपकुंभं' इत्यादी. සාකල්යෙ-තිණම්පි අසෙසෙත්වාති සතිණං, තිණම්පි අසෙසෙත්වා අජ්ඣොහරණීය+මජ්ඣොහරතීත්යත්ථො. සෙසං සබ්රහ්මසමං[Pg.135]. අග්ගිම්පි අසෙසෙත්වාති සාග්ගි, අග්ගිගන්ථංපි අසෙසෙත්වා අධීතෙත්යත්ථො. වාරග්ගහණං අධිත්ථිසමං. साकल्य (पूर्णता) या अर्थी – गवतही न उरवता (सर्व गवत खाणे) म्हणजे 'सतिणं'. गवतही न उरवता खाण्यायोग्य वस्तू खातो असा याचा अर्थ आहे. उर्वरित रूपे 'सब्रह्मं' प्रमाणे होतात. अग्नीलाही न उरवता (पूर्ण अग्नीग्रंथ) शिकणे म्हणजे 'साग्गि'. अग्नीग्रंथही न उरवता अभ्यास करतो असा याचा अर्थ आहे. 'वारि' शब्दाचे रूप 'अधित्थि' प्रमाणे होते. අභාවො සම්බන්ධීභෙදා බහුවිධො, තත්ර ඉද්ධාභාවෙවිගතා ඉද්ධි=විභූති සද්දිකානන්ති දුස්සද්දිකං. අත්ථාභාවෙමක්ඛිකානං අභාවො නිම්මක්ඛිකං, නිද්දරථං, නිම්මසකං. අතික්කමාභාවෙ-අතිගතානි තිණානි නිත්තිණං. උපභොගසම්බන්ධීවත්තමානකාලස්ස අභාවෙ-අතිගතං ලහුපාවුරණං අතිලහුපාවුරණං, ලහුපාවුරණස්ස නා+යං උපභොගතා ලොති අත්ථො. अभाव हा संबंधांच्या भेदांमुळे अनेक प्रकारचा असतो. त्यापैकी समृद्धीच्या अभावामध्ये – 'शब्दांची समृद्धी (कीर्ती) निघून गेली आहे ज्यांची' ते 'दुस्सद्दिकं'. अर्थाच्या (वस्तूच्या) अभावामध्ये – माश्यांचा अभाव म्हणजे 'निम्मक्खिकं' (मक्षिकाविरहित), 'निद्दरथं' (पीडारहित), 'निम्मसकं' (डासविरहित). ओलांडून जाण्याच्या अभावामध्ये – गवत ओलांडून गेलेले ते 'नित्तिणं' (तृणरहित). उपभोगाशी संबंधित वर्तमान काळाच्या अभावामध्ये – हलके पांघरूण ओलांडून गेले ते 'अतिलहुपावरणं', याचा अर्थ आता हलक्या पांघरूणाचा उपभोग घेण्याची वेळ निघून गेली आहे असा होतो. යථාත්ථො+නෙකවිධො, තත්ර යොග්ගතායං-යොග්ගං රූප+මනුරූපං. විච්ඡායං-අද්ධමාසං අද්ධමාසං අනු අන්වද්ධමාසං, එවං පච්චත්තං. අත්ථානතිවත්තියං-සත්තිං අනතික්කම්ම යථාසත්ති. එවං යථාක්කමං, යථාබලං. බහුලාධිකාරා යා යා පරිසා යථාපරිසා. සදිසත්ථෙ-කිඛියා කණ්හවිච්ඡිතධෙනුයා සදිසො සකිඛි, සහස්ස සාදෙසො. ආනුපුබ්බියං-ජෙට්ඨානුක්කමෙන අනුජෙට්ඨං. 'यथा' चा अर्थ अनेक प्रकारचा आहे. त्यापैकी योग्यतेच्या अर्थी – रूपाला योग्य ते 'अनुरूपं'. वीप्सा (पुनरावृत्ती) या अर्थी – प्रत्येक पंधरवड्याला ते 'अन्वड्ढमासं', याचप्रमाणे 'पच्चत्तं' (प्रत्येक आत्म्याला/स्वतःला). अर्थाचे उल्लंघन न करणे या अर्थी – शक्तीचे उल्लंघन न करता ते 'यथासत्ति' (यथाशक्ती). याचप्रमाणे 'यथाक्कमं' (यथाक्रम), 'यथाबलं' (यथाबल). बहुल अधिकाराने – जी जी परिषद ती 'यथापरिसा'. सादृश्य (सारखेपणा) या अर्थी – 'किखि' नावाच्या काळ्या ठिपक्यांच्या गाईसारखा तो 'सकिखि', येथे 'सह' च्या जागी 'स' आदेश होतो. आनुपूर्वी (क्रमवारी) या अर्थी – ज्येष्ठाच्या क्रमाने ते 'अनुजेट्ठं'. පච්ඡාඅත්ථෙ-රථස්ස පච්ඡා අනුරථං. पश्चात् (मागे) या अर्थी – रथाच्या मागे ते 'अनुरथं'. යුගපදත්ථෙ-චක්කෙන සහ=එකකාලං සචක්කං, චක්කෙන එකක්ඛණෙ නිධෙතීති අත්ථො. युगपत् (एकाच वेळी) या अर्थी – चक्रासह एकाच वेळी ते 'सचक्कं', याचा अर्थ चक्राच्या सोबत एकाच क्षणी ठेवतो असा होतो. 3. යථා න තුල්යෙ ३. तुलना (सादृश्य) नसलेल्या अर्थी 'यथा' चा प्रयोग होतो. යථාසද්දො තුල්යත්ථෙ වත්තමානො ස්යාද්යන්තෙන සහෙ+කත්ථො න භවති. යථා දෙවදත්තො, තථා යඤ්ඤදත්තො. එත්ථ උපමානභූතො යථාසද්දො ‘තථා යඤ්ඤදත්තො’ති උපමෙය්ය+මපෙක්ඛති, තස්මා ‘‘සාපෙක්ඛ+මසමත්ථං භවතී’’ති ඤායා අසමාසෙ [Pg.136] ‘‘න තුල්යෙ’’ති පටිසෙධො කිමත්ථ+මිති චෙ. යස්මා ‘‘යථා දෙවදත්තො’’ති සමුදායමෙව උපමානං භවති, න විසුං යථාසද්දො, තස්මා සමුදායස්සෙව උපමෙය්යසාපෙක්ඛත්තෙ න අසාමත්ථියතා න විසුං යථාසද්දස්ස, තස්මා සාදිස්සෙ පත්තසමාසස්ස පටිසෙධත්ථ+මිදං. තුල්යත්ථෙති වත්තබ්බෙ තුල්යං විනා තුල්යතා නත්ථීති තුල්යත්ථෙති අවත්වා තුල්යෙති වුත්තං. 'यथा' हा शब्द 'तुल्य' (समान) या अर्थी वर्तत असताना 'सि' आदि प्रत्ययान्त (सुबन्त) शब्दासोबत एकार्थी (समासयुक्त) होत नाही. जसे 'यथा देवदत्तो, तथा यञ्ञदत्तो' (जसा देवदत्त, तसा यज्ञदत्त). येथे उपमानभूत असलेला 'यथा' शब्द 'तथा यञ्ञदत्तो' या उपमेयाची अपेक्षा करतो, म्हणून 'सापेक्ष असमर्थ असते' या न्यायाने समास न होता 'न तुल्ये' (तुल्य अर्थी नाही) हा निषेध कशासाठी आहे? असे विचारल्यास: कारण 'यथा देवदत्तो' हा समुदायच उपमान होतो, केवळ 'यथा' हा शब्द स्वतंत्रपणे नाही. म्हणून समुदायालाच उपमेयाची अपेक्षा असल्यामुळे असमर्थता येत नाही, केवळ 'यथा' शब्दाला स्वतंत्रपणे नाही. म्हणून सादृश्यामध्ये प्राप्त होणाऱ्या समासाचा निषेध करण्यासाठी हे आहे. 'तुल्य अर्थी' असे म्हणायचे असताना, 'तुल्य' शिवाय 'तुल्यता' नसते, म्हणून 'तुल्य अर्थी' असे न म्हणता 'तुल्य' असे म्हटले आहे. යථාකථඤ්චි සාදිස්සං, ඤායතෙ යත්ථ සම්භවං; උපමා නාම සා තස්සා, පපඤ්චො බහුධා භවෙ. ज्या ठिकाणी जसे काही सादृश्य (समानता) संभवते असे समजते; तिला 'उपमा' असे म्हणतात, तिचा विस्तार अनेक प्रकारे होतो. 4. යාවා+වධාරණෙ ४. 'याव' हा शब्द अवधारण (मर्यादा निश्चित करणे) अर्थी असताना. යාවසද්දො අවධාරණෙ වත්තමානො ස්යාද්යන්තෙන සහෙ+කත්ථො භවති. අවධාරණං=එත්තකතාපරිච්ඡෙදො. යාවන්තානි අමත්තානි=භාජනානි යාවාමත්තං, ඉමිනා සමාසෙ කතෙ සෙසං පුබ්බසමං. ජීවස්ස යත්තකො පරිච්ඡෙදො යාවජීවං. යාවතායුකං, ‘‘සකත්ථෙ’’ති කපච්චයො. යත්තකෙන අත්ථො යාවදත්ථං. 'याव' हा शब्द अवधारण (मर्यादा निश्चित करणे) अर्थी वर्तत असताना सुबन्तासोबत एकार्थी (समासयुक्त) होतो. अवधारण म्हणजे एवढेच अशी मर्यादा निश्चित करणे. 'यावन्तानि अमत्तानि' = जेवढी भांडी (अमत्त = भांडी) तेवढी 'यावामत्तं'. या सूत्राने समास केल्यावर उर्वरित कार्य पूर्वीप्रमाणेच होते. जीवनाची जेवढी मर्यादा ते 'यावजीवं' (आयुष्यभर). 'यावतायुकं' यामध्ये 'स्वार्थे' या अर्थी 'क' प्रत्यय लागला आहे. जेवढ्याशी अर्थ (गरज) ते 'यावदत्थं' (गरजेनुसार). 5. පය්යපා බහි තිරො පුරෙ පච්ඡා වා පඤ්චම්යා ५. परि, अप, आ, बहि, तिरो, पुरे, पच्छा हे शब्द पंचम्यन्त (पंचमी विभक्ती असलेल्या) शब्दासोबत विकल्प करून एकार्थी (समासयुक्त) होतात. පරිආදයො පඤ්චම්යන්තෙන සහෙ+කත්ථා හොන්ති වා. පරි පබ්බතා පරිපබ්බතං. වාස්ස වාක්යවිකප්පත්ථත්තා පරි පබ්බතා ඉච්චාදයොපි හොන්ති. අප පබ්බතා අපපබ්බතං, ආ පාටලිපුත්තා ආපාටලිපුත්තං, බහි ගාමා බහිගාමං, තිරො පබ්බතා තිරොපබ්බතං, පුරෙ භත්තා පුරෙභත්තං, පච්ඡා භත්තා පච්ඡාභත්තං, සබ්බං උපකුම්භසමං, ඉමිනා සමාසො විසෙසො. එව+මුපරිසුත්තෙපි. 'परि' इत्यादी शब्द पंचम्यन्त शब्दासोबत विकल्प करून एकार्थी होतात. 'परि पब्बता' चे 'परिपब्बतं' (पर्वताच्या भोवती). 'वा' (विकल्प) हा वाक्याच्या विकल्पासाठी असल्यामुळे 'परि पब्बता' इत्यादी वाक्ये देखील होतात. 'अप पब्बता' चे 'अपपब्बतं', 'आ पाटलिपुत्ता' चे 'आपाटलिपुत्तं', 'बहि गामा' चे 'बहिगामं', 'तिरो पब्बता' चे 'तिरोपब्बतं', 'पुरे भत्ता' चे 'पुरेभत्तं', 'पच्छा भत्ता' चे 'पच्छाभत्तं' होते. हे सर्व 'उपकुंभ' प्रमाणेच आहे, या सूत्राने होणारा समास हा विशेष आहे. पुढील सूत्रातही असेच समजावे. වාත්ය+ධිකාරො [Pg.137] – 'वा' हा अधिकार सूत्र आहे – 6. සමීපා+යාමෙස්ව+නු ६. समीप (जवळ) आणि आयाम (लांबी/विस्तार) या अर्थांमध्ये 'अनु' हा शब्द (पंचम्यन्त शब्दासोबत विकल्प करून एकार्थी होतो). ‘‘අසංඛ්ය’’මිච්චාදිනා නිච්චසමාසස්ස විකප්පත්ථං සමීපග්ගහණං. අනුසද්දො සාමීප්යෙ ආයාමෙ ච වත්තමානො ස්යාද්යන්තෙන සහෙ+කත්ථො වා හොති. එත්ථ සමීපග්ගහණස්ස භාවප්පධානත්තා සාමීප්යමෙව ගම්යතෙති සාමීප්යෙති වුත්තං. වනස්ස අනු=සමීපං අනුවනං, ගඞ්ගාය අනු=ආයාමො අනුගඞ්ගං, ගඞ්ගාය අනු වා බාරාණසී. 'असंख्य' इत्यादी सूत्राने होणाऱ्या नित्य समासाला विकल्प देण्यासाठी 'समीप' चे ग्रहण केले आहे. 'अनु' हा शब्द सामीप्य (जवळ असणे) आणि आयाम (लांबी) या अर्थी वर्तत असताना सुबन्तासोबत विकल्प करून एकार्थी होतो. येथे 'समीप' या ग्रहणात भावप्रधानता असल्यामुळे 'सामीप्य' असाच अर्थ घेतला जातो, म्हणून 'सामीप्य' असे म्हटले आहे. 'वनस्स अनु' = वनाच्या जवळ ते 'अनुवनं', 'गङ्गाय अनु' = गंगेच्या लांबीनुसार ते 'अनुगङ्गं', किंवा 'गङ्गाय अनु वा बाराणसी' (गंगेच्या जवळ वाराणसी). 7. තිට්ඨග්වාදීනි ७. 'तिट्ठगु' इत्यादी शब्द (अव्ययीभाव समासात निपातनाने सिद्ध होतात). තිට්ඨගුආදීනි අඤ්ඤත්ථෙන සිද්ධාපි අස්මිං අසංඛ්යසමාසෙ නිපාතියන්ති. තිට්ඨන්ති ගාවො යස්මිං කාලෙති තිට්ඨන්තසද්ද+ගොසද්දෙහි පඨමායොම්හි කතෙ ‘‘වා+නෙකඤ්ඤත්ථෙ’’ති සමාසො, ඉමිනා නිපාතනා ලොපෙ නපුංසකත්ථෙ ච කතෙ සිම්හි ගොස්ස ‘‘ගොස්සු’’ති උකාරෙ ‘‘පුබ්බස්මා+මාදිතො’’ති විභත්තිලොපො. එවං වහන්තී ගාවො යස්මිං කාලෙති වහග්ගු ඉච්චාදි. වෙලාප්පකාසකපාතොආදීනම්පි එත්ථෙව සඞ්ගහො, පාතො නහානන්ති සත්තමීඅමාදිසමාසෙ පාතනහානං, එවං සායනහානං, පාතකාලං, සායකාලං, පාතමෙඝං, සායමෙඝං, පාතමග්ගං, සායමග්ගං, එත්ථ ‘‘එඔන+ම වණ්ණෙ’’ති අකාරො, නිග්ගහීතස්ස ලොපො ච හොති. 'तिट्ठगु' इत्यादी शब्द अन्य अर्थी सिद्ध होत असले तरी या अव्ययीभाव (असंख्य) समासात निपातनाने सिद्ध केले जातात. ज्या काळात गाई उभ्या राहतात तो काळ, अशा अर्थी 'तिट्ठन्त' शब्द आणि 'गो' शब्द यांच्या प्रथमा विभक्तीमध्ये 'वाऽनेकमन्यपदार्थे' या सूत्राने समास झाल्यावर, या निपातनाने लोप आणि नपुंसकलिंग केल्यावर, 'सि' प्रत्यय असताना 'गो' शब्दाच्या ओ-काराचा 'उ' कार होऊन 'तिट्ठगु' बनते आणि 'पुब्बस्मामादितो' या सूत्राने विभक्तीचा लोप होतो. याचप्रमाणे ज्या काळात गाई वाहतात (चालतात) तो काळ 'वहग्गु' इत्यादी रूपे बनतात. वेळ दर्शवणाऱ्या 'पातो' (सकाळी) इत्यादी शब्दांचाही येथेच संग्रह होतो. 'पातो नहानं' (सकाळचे स्नान) या सप्तमी तत्पुरुष समासात 'पातनहानं' होते, तसेच 'सायनहानं' (संध्याकाळचे स्नान), 'पातकालं', 'सायकालं', 'पातमेघं', 'सायमेघं', 'पातमग्गं', 'सायमग्गं' होते. येथे 'एओनम वण्णे' या सूत्राने अ-कार होतो आणि निग्गहीताचा (अनुस्वाराचा) लोप होतो. 8. ඔරෙ+පරි+පටි+පාරෙ+මජ්ඣෙ+හෙට්ඨු+ද්ධා+ධො+න්තො වා ඡට්ඨියා. ८. ओर, उपरि, पटि, पार, mज्झ, हेट्ठा, उद्धं, अधो, अन्तो हे शब्द षष्ठ्यन्त (षष्ठी विभक्ती असलेल्या) शब्दासोबत विकल्प करून एकार्थी (समासयुक्त) होतात. ඔරාදයො සද්දා ඡට්ඨියන්තෙන සහෙ+කත්ථා වා හොන්ති. ඔරං ගඞ්ගාය ඔරෙගඞ්ගා, උපරි සිඛරස්ස උපරිසිඛරං, පටි=මුඛං සොතස්ස [Pg.138] පටිසොතං, පාරං යමුනාය පාරෙයමුනං, මජ්ඣං ගඞ්ගාය මජ්ඣෙගඞ්ගං, හෙට්ඨා පාසාදස්ස හෙට්ඨාපාසාදං, උද්ධං ගඞ්ගාය උද්ධගඞ්ගං, අධො ගඞ්ගාය අධොගඞ්ගං, අන්තො පාසාදස්ස අන්තොපාසාදං. ඉමිනා නිපාතනාව නිග්ගහීතලොපෙ ච එකාරෙ ච කතෙ ඔරෙච්චාදි හොති. 'ओर' इत्यादी शब्द षष्ठ्यन्त शब्दासोबत विकल्प करून एकार्थी होतात. गंगेच्या अलीकडे ते 'ओरेगङ्गा' (किंवा ओरगङ्गा), शिखराच्या वर ते 'उपरिसिखरं', प्रवाहाच्या विरुद्ध ते 'पटिसोतं', यमुनेच्या पलीकडे ते 'पारेयमुनं', गंगेच्या मध्ये ते 'मज्झेगङ्गा', प्रासादाच्या (महालाच्या) खाली ते 'हेट्ठापासादं', गंगेच्या वर ते 'उद्धगङ्गा', गंगेच्या खाली ते 'अधोगङ्गा', प्रासादाच्या आत ते 'अन्तोपासादं'. या निपातनानेच निग्गहीताचा लोप आणि ए-कार झाल्यावर 'ओरे' इत्यादी रूपे सिद्ध होतात. 10. අ+මාදි १०. 'अं' (द्वितीया विभक्तीचा प्रत्यय) इत्यादी अंत असणारे शब्द. අ+මාදිස්යාද්යන්තං ස්යාද්යන්තෙන සහ බහුල+මෙකත්තං හොති. 'अं' इत्यादी सुबन्त शब्द दुसऱ्या सुबन्त शब्दासोबत बहुधा एकार्थी (समासयुक्त) होतात. උත්තරස්ස පදස්ස+ත්ථො, පධානං ලිඞ්ග+මස්ස ච; දුතියන්තාදිපදෙකත්ථො, බහුධා තං විභජ්ජතෙ. ज्या समासात उत्तर पदाचा अर्थ आणि त्याचे लिंग प्रधान असते; द्वितीयान्त इत्यादी पदांचा एकार्थी होणारा तो (तत्पुरुष) समास अनेक प्रकारे विभागला जातो. පරෙස+මිස්සතෙ තඤ්ච, භිය්යො තප්පුරිසා+ඛ්යයා; තං යථා+ත්ර රාජාපච්චං, කත්ථචීති+මිතීදිසං. आणि तो समास इतरांमध्ये मिसळतो, त्याला प्रामुख्याने 'तत्पुरुष' या नावाने ओळखले जाते; जसे की येथे 'राजापच्चं' (राजाचे अपत्य), काही ठिकाणी अशा प्रकारे रूपे होतात. අ+මාද්යන්තානං කාරකානං අකාරකානඤ්ච සමාසො කත්ථචිමෙව වා හොති. තඤ්ච බහුලංවිධානෙනාති දට්ඨබ්බං. 'अं' इत्यादी अंत असणाऱ्या कारक आणि अकारक शब्दांचा समास काही ठिकाणीच विकल्प करून होतो. आणि तो 'बहुळ' विधानाने होतो असे समजावे. තත්ථ දුතියාතප්පුරිසො අමාදි ගත+නිස්සිතා+තීතා+තික්කන්ත+පත්තා+පන්නාදීහි භවති. සරණං ගතොති සමාසෙ කතෙ ‘‘එකත්ථතායං’’ති විභත්තිලොපාදි උපරි සබ්බත්ථ පුබ්බසමං. සරණගතො, සරණගතා. සරණගතා, සරණගතායො. සරණගතං කුලං, සරණගතානි කුලානි ඉච්චාදි. අරඤ්ඤගතො, භූමිගතො. ධම්මං නිස්සිතො ධම්මනිස්සිතො, අත්ථනිස්සිතො. භවං අතීතො භවාතීතො, කාලාතීතො. පමාණං අතික්කන්තං පමාණාතික්කන්තං, ලොකාතික්කන්තං. සුඛං පත්තො සුඛප්පත්තො, දුක්ඛප්පත්තො. සොතං ආපන්නො සොතාපන්නො, නිරොධසමාපන්නො, මග්ගප්පටිපන්නො. රථං ආරුළ්හො රථාරුළ්හො[Pg.139]. සබ්බරත්තිං සොභණො සබ්බරත්තිසොභණො, මුහුත්තසුඛං. අකාරකානං සමාසො අච්චන්තසංයොගෙ. වුත්තියෙවො+පපදසමාසෙ, තස්ස නිච්චත්තා. යථා කම්මං කරොතීති කම්මකාරො, කුම්භකාරො, අත්ථං කාමෙතීති අත්ථකාමො, ධම්මකාමො, ධම්මං ධාරෙතීති ධම්මධරො, විනයධරො. සානං පචතීති සපාකො, තන්තං වායතීති තන්තවායො, වරං ආහරතීති වරාහරො. න්ත+මාන+ක්තවන්තෙහි වාක්යමෙව. ධම්මං සුණන්තො, ධම්මං සුණමානො, ඔදනං භුත්තවා. त्यामध्ये द्वितीया तत्पुरुष समास हा 'अं' इत्यादी द्वितीयान्त शब्दांचा 'गत', 'निस्सित', 'अतीत', 'अतिक्कन्त', 'पत्त', 'आपन्न' इत्यादी शब्दांसोबत होतो. 'सरणं गतो' (शरणागत) असा समास केल्यावर 'एकत्थतायं' या सूत्राने विभक्तीचा लोप इत्यादी कार्ये पुढे सर्वत्र पूर्वीप्रमाणेच होतात. सरणगतो (पुल्लिंगी एकवचन), सरणगता (स्त्रीलिंगी एकवचन). सरणगता (पुल्लिंगी बहुवचन), सरणगतायो (स्त्रीलिंगी बहुवचन). सरणगतं कुलं (नपुंसकलिंगी एकवचन), सरणगतानि कुलानि (नपुंसकलिंगी बहुवचन) इत्यादी. अरञ्ञगतो (अरण्यात गेलेला), भूमिगतो (भूमीवर गेलेला). धम्मं निस्सितो = धम्मनिस्सितो (धर्माचा आश्रय घेतलेला), अत्थनिस्सितो (अर्थाचा आश्रय घेतलेला). भवं अतीतो = भवातीतो (भवाच्या पलीकडे गेलेला), कालातीतो (काळाच्या पलीकडे गेलेला). पमाणं अतिक्कन्तं = पमाणातिक्कन्तं (प्रमाणाचे उल्लंघन केलेले), लोकातिक्कन्तं (लोकांचे उल्लंघन केलेले). सुखं पत्तो = सुखप्पत्तो (सुखाला प्राप्त झालेला), दुक्खप्पत्तो (दुःखाला प्राप्त झालेला). सोतं आपन्नो = सोतापन्नो (स्रोतात आपन्न झालेला/प्रविष्ट झालेला), निरोधसमापन्नो (निरोध समापत्तीला प्राप्त झालेला), मग्गप्पटिपन्नो (मार्गावर आरूढ झालेला). रथं आरुळ्हो = रथारुळ्हो (रथावर चढलेला). सब्बरत्तिं सोभणो = सब्बरत्तिसोभणो (रात्रभर शोभणारा), मुहुत्तसुखं (क्षणभराचे सुख). अकारकांचा (क्रियापदाशी थेट संबंध नसलेल्या शब्दांचा) समास अत्यंत संयोगात (काळ किंवा मार्गाच्या निरंतर संबंधात) होतो. उपपद समासात केवळ वृत्तीच (समासयुक्त रूपच) असते, कारण तो नित्य समास असतो. जसे की - कम्मं करोतीति = कम्मकारो (कर्म करणारा), कुंभकारो (कुंभार), अत्थं कामेतीति = अत्थकामो (अर्थाची इच्छा करणारा), धम्मकामो (धर्माची इच्छा करणारा), धम्मं धारेतीति = धम्मधरो (धर्माला धारण करणारा), विनयधरो (विनयाला धारण करणारा). सानं पचतीति = सपाको (कुत्र्याचे मांस शिजवणारा/चांडाल), तन्तं वायतीति = तन्तवायो (विणकर), वरं आहरतीति = वराहरो (वर आणणारा). 'न्त' (कृदन्त), 'मान' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययान्त शब्दांसोबत केवळ वाक्यच राहते (समास होत नाही). जसे की - धम्मं सुणन्तो (धर्म ऐकणारा), धम्मं सुणमानो (धर्म ऐकणारा), ओदनं भुत्तवा (भात खाल्लेला). තතියාතප්පුරිසො කිතක+පුබ්බ+සදිස+සමො+නත්ථ+කලහ+නිපුණ+මිස්ස+සඛිලාදීහි. බුද්ධෙන භාසිතො බුද්ධභාසිතො ධම්මො, එවං ජිනදෙසිතො. සත්ථාරා වණ්ණිතො සත්ථුවණ්ණිතො. විඤ්ඤූහි ගරහිතො විඤ්ඤුගරහිතො, විඤ්ඤුප්පසත්ථො, ඉස්සරකතං, සයං කතං, සුකෙහි ආහටං සුකාහටං, රඤ්ඤා හතො රාජහතො, රාජපීළිතො. අග්ගිනා දඩ්ඪො අග්ගිදඩ්ඪො, සප්පෙන දට්ඨො සප්පදට්ඨො, සල්ලෙහි විද්ධො සල්ලවිද්ධො, ඉච්ඡාය පකතො ඉච්ඡාපකතො, සීලසම්පන්නො. එවං සුඛසහගතං, ඤාණසම්පයුත්තං, මිත්තසංසග්ගො, පියවිප්පයොගො, ජාතිථද්ධො, ගුණහීනො, ගුණවුද්ධො, චතුවග්ගකරණීයං, චතුවග්ගාදිකත්තබ්බං. කාකෙහි පෙය්යා කාකපෙය්යා, නදී. ක්වචි වුත්තියෙව, උරසා ගච්ඡතීති උරගො, පාදෙන පිවතීති පාදපො. ක්වචි වාක්යමෙව, ඵරසුනා ඡින්නවා, කාකෙහි පාතබ්බා, දස්සනෙන පහාතබ්බා. පුබ්බාදියොගෙ-මාසෙන පුබ්බො මාසපුබ්බො. එවං මාතුසදිසො, මාතුසමො. එකූනවීසති, සීලවිකලො, අසිකලහො, වාචානිපුණො, යාවකාලිකසම්මිස්සං, වාචාසඛිලො[Pg.140]. සත්ථාරා සදිසො සත්ථුසදිසො, සත්ථුකප්පො, පුඤ්ඤෙන අත්ථිකො පුඤ්ඤත්ථිකො, ගුණාධිකො. දධිනා උපසිත්තං භොජනං දධිභොජනං, ගුළෙන සංසට්ඨො ඔදනො ගුළොදනො. කාරකසම්බන්ධො ක්රියාය කතො, උපසිත්තාදික්රියානං අපඤ්ඤායනෙපි වුත්තියෙවො+පසිත්තාදික්රියාන+මාඛ්යාපනතො නත්ථා+යුත්තත්ථතා. එවං ඛීරොදනො. අස්සෙන යුත්තො රථො අස්සරථො, මග්ගචිත්තං, ජම්බුයා පඤ්ඤාතො ලක්ඛිතො දීපො ජම්බුදීපො, එකෙන අධිකා දස එකාදස, ජාතියා අන්ධො ජච්චන්ධො, පකතියා මෙධාවී පකතිමෙධාවී ඉච්චාදි. तृतीया तत्पुरुष समास हा कृदंत (कितक), पुब्ब (पूर्व), sadis (सदृश), सम, ऊन (उणे/कमी), कलह, निपुण, मिस्स (मिश्र), सखिल (मधुरभाषी) इत्यादी शब्दांच्या योगात होतो. जसे - 'बुद्धेन भासितो' = 'बुद्धभासितो धम्मो' (बुद्धांनी उपदेशिलेला धम्म), याचप्रमाणे 'जिनदेसितो' (जिनांनी उपदेशिलेला). 'सत्थारा वण्णितो' = 'सत्थुवण्णितो' (शास्त्यांनी प्रशंसिलेला). 'विञ्ञूहि गरहितो' = 'विञ्ञुगरहितो' (विद्वानांनी निंदिलेला), 'विञ्ञुप्पसत्थो' (विद्वानांनी प्रशंसिलेला), 'इस्सरकतं' (ईश्वराने केलेले), 'सयं कतं' (स्वतः केलेले), 'सुकेहि आहटं' = 'सुकाहटं' (पोपटांनी आणलेले), 'रञ्ञा हतो' = 'राजहतो' (राजाने मारलेला), 'राजपीळितो' (राजाने पीडित केलेला). 'अग्गिना दड्ढो' = 'अग्गिदड्ढो' (अग्नीने जळालेला), 'सप्पेन दट्ठो' = 'सप्पदट्ठो' (सर्पाने दंश केलेला), 'sallehi viddho' = 'सल्लविद्धो' (शल्यांनी/बाणांनी विंधलेला), 'इच्छाय पकतो' = 'इच्छापकतो' (इच्छेने वश झालेला), 'सीलसम्पन्नो' (शीलसंपन्न). याचप्रमाणे 'सुखसहगतं' (सुखसहगत), 'ञाणसम्पयुत्तं' (ज्ञानसंप्रयुक्त), 'मित्तसंसग्गो' (मित्रांचा संसर्ग), 'पियविप्पयोगो' (प्रियांचा वियोग), 'जातिथद्धो' (जातीचा अभिमान असलेला), 'गुणहीनो' (गुणहीन), 'गुणवुद्धो' (गुणांनी वृद्ध), 'चतुवग्गकरणीयं' (चार वर्गांनी करण्याजोगे), 'चतुवग्गादिकत्तब्बं' (चार वर्गांनी कर्तव्य). 'काकेहि पेय्या' = 'काकपेय्या नदी' (कावळ्यालाही सहज पाणी पिता येईल अशी काठोकाठ भरलेली नदी). काही ठिकाणी केवळ वृत्ती (समास) च होते, जसे - 'उरसा गच्छतीति उरगो' (छातीने चालणारा तो उरग/सर्प), 'पादेन पिवतीति पादपो' (पायाने/मुळांनी पाणी पिणारे ते पादप/झाड). काही ठिकाणी केवळ वाक्यच असते, जसे - 'फरसुना छिन्नवा' (कुऱ्हाडीने तोडलेला), 'काकेहि पातब्बा' (कावळ्यांनी पिण्याजोगी), 'दस्सनेन पहातब्बा' (दर्शनाने नष्ट करण्याजोगी). 'पुब्ब' इत्यादींच्या योगात - 'मासेन पुब्बो' = 'मासपुब्बो' (एका महिन्याने पूर्व/आधीचा). याचप्रमाणे 'मातुसदिसो' (मातेसारखा), 'मातुसमो' (मातेसमान). 'एकूनवीसति' (एकोणीस), 'सीलविकलो' (शीलाने विकल), 'असिकलहो' (तलवारीने कलह), 'वाचानिपुणो' (वाणीत निपुण), 'यावकालिकसमिस्सं' (यावकालिक मिश्रित), 'वाचासखिलो' (वाणीने मधुर). 'सत्थारा सदिसो' = 'सत्थुसदिसो' (शास्त्यांसारखा), 'सत्थुकप्प' (शास्त्यांसमान), 'पुञ्ञेन अत्थिको' = 'पुञ्ञत्थिको' (पुण्यार्थी/पुण्याची इच्छा करणारा), 'गुणाधिको' (गुणांनी अधिक). 'दधिना उपसित्तं भोजनं' = 'दधिभोजनं' (दह्याने कालवलेले भोजन), 'गुळेन संसट्ठो ओदनो' = 'गुळोदनो' (गुळाने मिश्रित भात). कारक संबंध हा क्रियेने सिद्ध होतो, 'उपसित्त' (कालवलेले) इत्यादी क्रिया स्पष्ट दिसत नसतानाही वृत्ती (समास) होतेच, कारण 'उपसित्त' इत्यादी क्रियांचा बोध होत असल्यामुळे ते निरर्थक ठरत नाही. याचप्रमाणे 'खीरोदनो' (दुधात शिजवलेला भात). 'अस्सेन युत्तो रथो' = 'अस्सरथो' (घोड्यांनी जोडलेला रथ), 'मग्गचित्तं' (मार्गचित्त), 'जम्बुया पञ्ञातो लक्खितो दीपो' = 'जम्बुदीपो' (जांभळीच्या झाडाने ओळखला जाणारा द्वीप - जंबूद्दीप), 'एकेन अधिका दसा' = 'एकादस' (एकाने अधिक दहा म्हणजे अकरा), 'जातिया अन्धो' = 'जच्चन्धो' (जन्मांध), 'पकतिया मेधावी' = 'पकतिमेधावी' (स्वभावाने बुद्धिमान) इत्यादी. චතුත්ථීතප්පුරිසො තදත්ථ+අත්ථ+හිත+දෙය්යාදීහි. තදත්ථෙ-කථිනස්ස දුස්සං කථිනදුස්සං, කථිනචීවරස්සාති අත්ථො. එවං චීවරදුස්සං, චීවරමූලං, යාගුයා අත්ථාය තණ්ඩුලා යාගුතණ්ඩුලා, භත්තතණ්ඩුලා, සඞ්ඝස්ස අත්ථාය භත්තං සඞ්ඝභත්තං, ආගන්තුකභත්තං, එවං ගමිකභත්තං, පාසාදාය දබ්බං පාසාදදබ්බං. එත්ථ චා+යං නිච්චසමාසො, තස්ස තිලිඞ්ගතා ච-භික්ඛුසඞ්ඝස්ස අත්ථො විහාරො භික්ඛුසඞ්ඝත්ථො විහාරො, භික්ඛුසඞ්ඝත්ථා යාගු, භික්ඛුසඞ්ඝත්ථං චීවරං. යස්ස අත්ථො යදත්ථො, යදත්ථා, යදත්ථං. එවං තදත්ථො, තදත්ථා, තදත්ථං. තථා ලොකහිතො. බුද්ධස්ස දෙය්යං බුද්ධදෙය්යං පුප්ඵං. සඞ්ඝදෙය්යං චීවරං. ඉධ න හොති ‘‘සඞ්ඝස්ස දාතබ්බං’’. चतुत्थी तत्पुरुष (चतुर्थी तत्पुरुष) समास हा तदर्थ (त्याच्यासाठी), अर्थ (साठी), हित, देय इत्यादी शब्दांसोबत होतो. तदर्थ या अर्थी - कठिन (कठिन संस्कारासाठी) वस्त्र म्हणजे 'कठिनदुस्स' (कठिनवस्त्र), याचा अर्थ कठिनचीवरासाठी असा आहे. याचप्रमाणे 'चीवरदुस्स' (चीवरासाठी वस्त्र), 'चीवरमूल' (चीवरासाठी मूल्य), यागूसाठी (पेजेसाठी) तांदूळ ते 'यागुतण्डुल', भातासाठी तांदूळ ते 'भत्ततण्डुल', संघासाठी भोजन ते 'सङ्घभत्त' (संघभोजन), आगंतुकांसाठी भोजन ते 'आगन्तुकभत्त', याचप्रमाणे जाणाऱ्यांसाठी भोजन ते 'गमिकभत्त', प्रासादासाठी (इमारतीसाठी) साहित्य ते 'पासाददब्ब' (प्रासादद्रव्य). येथे हा नित्य समास आहे, आणि त्याचे तिन्ही लिंगांत रूप होते - भिक्खूसंघासाठी असलेला विहार तो 'भिक्खुसङ्घत्तो विहारो', भिक्खूसंघासाठी असलेली यागू ती 'भिक्खुसङ्घत्था यागु', भिक्खूसंघासाठी असलेले चीवर ते 'भिक्खुसङ्घत्थं चीवरं'. ज्याच्यासाठी तो 'यदत्तो', 'यदत्था', 'यदत्थं'. याचप्रमाणे 'तदत्तो', 'तदत्था', 'तदत्थं'. तसेच 'लोकहितो' (लोकांसाठी हितकारक). बुद्धांना देण्यायोग्य ते 'बुद्धदेय्यं' पुष्प. संघाला देण्यायोग्य ते 'सङ्घदेय्यं' चीवर. येथे "सङ्घस्स दातब्बं" (संघाला दिले पाहिजे) असा समास होत नाही. පඤ්චමීතප්පුරිසො අපගමන+භය+විරති+මොචනත්ථාදීහි. මෙථුනස්මා අපෙතො මෙථුනාපෙතො, එවං පලාපගතො, නගරනිග්ගතො, පිණ්ඩපාතපටික්කන්තො, කාමතො නික්ඛන්තං කාමනික්ඛන්තං, රුක්ඛග්ගා පතිතො රුක්ඛග්ගපතිතො, සාසනච්චුතො, ආපත්ති- වුට්ඨානං[Pg.141], ධරණීතලග්ගතො, සබ්බභවෙහි නිස්සටො සබ්බභවනිස්සටො. භයතාදියොගෙ-රාජතො භයං රාජභයං, චොරභයං, අමනුස්සභයං, අග්ගිභයං, පාපභීතො, පාපභීරුකො. අකත්තබ්බතො විරති අකත්තබ්බවිරති, එවං කායදුච්චරිතවිරති, වචීදුච්චරිතවිරති. බන්ධනා මුත්තො බන්ධනමුත්තො, වනමුත්තො, බන්ධනමොක්ඛො. කම්මසමුට්ඨිතං, උක්කට්ඨුක්කට්ඨං, ඔමකොමකං. ක්වචි වුත්තියෙව, කම්මතො ජාතං කම්මජං, එවං චිත්තජං, උතුජං, ආහාරජං. ඉධ න හොති ‘පාසාදා පතිතො’. पंचमी तत्पुरुष समास हा अपगमन (दूर जाणे), भय, विरती (दूर राहणे), मोचन (मुक्त होणे) इत्यादी अर्थांच्या शब्दांसोबत होतो. मैथुनापासून दूर गेलेला तो 'मेथुनापेतो'. याचप्रमाणे 'पलापगतो' (पळून गेलेला), 'नगरनिग्गतो' (नगरातून बाहेर पडलेला), 'पिण्डपातपटिक्कन्तो' (पिंडपातावरून परतलेला), कामापासून (वासनेपासून) निष्क्रांत झालेला तो 'कामनिक्खन्तं', वृक्षाच्या शेंड्यावरून पडलेला तो 'रुक्खग्गपतितो', शासनातून च्युत झालेला तो 'सासनच्चुतो', आपत्तीतून उठणे (मुक्त होणे) ते 'आपत्तिवुट्ठाणं', धरणीतलावरून गेलेला तो 'धरणीतलग्गतो', सर्व भावांपासून (अस्तित्वापासून) मुक्त झालेला तो 'सब्बभवनिसटो'. भय इत्यादींच्या योगाने - राजापासून भय ते 'राजभयं', 'चोरभयं' (चोरापासून भय), 'अमनुस्सभयं' (अमानवापासून भय), 'अग्गiभयं' (अग्नीपासून भय), पापाला भिलेला तो 'पापभीतो', पापाची भीती बाळगणारा तो 'पापभीरुको'. न करण्यायोग्य गोष्टींपासून विरती ती 'अकत्तब्बविरति'. याचप्रमाणे 'कायदुच्चरितविरति' (कायिक दुश्चरित्रापासून विरती), 'वचीदुच्चरितविरति' (वाचिक दुश्चरित्रापासून विरती). बंधनातून मुक्त तो 'बन्धनमुत्तो', वनातून मुक्त तो 'वनमुत्तो', बंधनातून मोक्ष (मुक्ती) तो 'बन्धनमोक्खो'. कर्मापासून समुत्थित (उत्पन्न झालेले) ते 'कम्मसमुट्ठितं', उत्कृष्टातून उत्कृष्ट ते 'उक्कट्टुक्कट्टं', कनिष्ठातून कनिष्ठ ते 'ओमकोमकं'. काही ठिकाणी केवळ वृत्तीच (समास) होते, जसे - कर्मापासून उत्पन्न झालेले ते 'कम्मजं', याचप्रमाणे 'चित्तजं' (चित्तापासून उत्पन्न), 'उतुजं' (ऋतूपासून उत्पन्न), 'आहारजं' (आहारापासून उत्पन्न). येथे "पासादा पतितो" (प्रासादावरून पडलेला) असा समास होत नाही. ඡට්ඨීතප්පුරිසො රඤ්ඤො පුත්තො රාජපුත්තො, එවං රාජපුරිසො, ආචරියපූජකො, බුද්ධසාවකො, බුද්ධරූපං, ජිනවචනං, සමුද්දඝොසො, ධඤ්ඤානං රාසි ධඤ්ඤරාසි, පුප්ඵගන්ධො, ඵලරසො, කායස්ස ලහුතා කායලහුතා. මරණස්සති, රුක්ඛමූලං, අයස්ස පත්තො අයොපත්තො, එත්ථ ‘‘මනාද්යාපාදීන+මො මයෙ චෙ’’ති ඔ. එවං සුවණ්ණකටාහං, පානීයථාලකං, සප්පිකුම්භො, දෙවානං රාජා දෙවරාජා. පුමස්ස ලිඞ්ගං පුල්ලිඞ්ගං, ‘‘පුං පුමස්සවා’’ති පුමස්ස පුං, නිග්ගහීතලොපො, ලස්ස ද්විභාවො ච. හත්ථිපදං, ඉත්ථිරූපං, භික්ඛුනිසඞ්ඝො, ජම්බුසාඛා, එත්ථ ඊකාරූකාරානං රස්සො. බහුලාධිකාරා න්ත+මාන+නිද්ධාරිය+පූරණ+භාව+තිත්තත්ථෙහි න හොති. මමා+නුකුබ්බං, මමා+නුකුරුමානො, ගුන්නං කණ්හා සම්පන්නඛීරතමා, සිස්සානං පඤ්චමො, පටස්ස සුත්තතා. ක්වචි හොතෙව ‘වත්තමානසාමීප්යං’. බ්රාහ්මණස්ස සුක්කා දන්තාති සාපෙක්ඛතාය න හොති. ඵලානං තිත්තො, ඵලාන+මාසිතො, ඵලානං සුහිතො. ‘‘බ්රාහ්මණස්ස උච්චං ගෙහං’’ති සාපෙක්ඛතාය න හොති. ‘‘රඤ්ඤො පාටලිපුත්තකස්ස ධනං’’ති ධනසම්බන්ධෙ [Pg.142] ඡට්ඨීති පාටලිපුත්තකෙන සම්බන්ධාභාවා න හොති. ‘‘රඤ්ඤො ගො ච අස්සො ච පුරිසො චා’’ති භින්නත්ථතාය වාක්යමෙව. රඤ්ඤො ගවස්සපුරිසා රාජගවස්සපුරිසාති වුත්ති හොතෙව, එකත්ථීභාවා. සම්බන්ධීසද්දානං පන නිච්චසාපෙක්ඛත්තෙපි ගමකත්තා සමාසො, ගමකත්තම්පි හි සමාසස්ස නිබන්ධනං, යථා දෙවදත්තස්ස ගුරුකුලං, භගවතො සාවකසඞ්ඝොතිආදි. षष्ठी तत्पुरुष समास - राजाचा पुत्र तो 'राजपुत्तो'. याचप्रमाणे 'राजpuriso' (राजाचा माणूस), 'आचरियपूजको' (आचार्यांची पूजा करणारा), 'बुद्धसावको' (बुद्धांचा श्रावक), 'बुद्धरूपं' (बुद्धांचे रूप), 'जिनवचनं' (जिनांचे वचन), 'समुद्दघोसो' (समुद्राचा घोष), धान्यांची रास ती 'धञ्ञरासि', 'पुप्फगन्धो' (फुलांचा गंध), 'फलरसो' (फळांचा रस), शरीराची लघुता ती 'कायळहुता'. 'मरणस्सति' (मरणाची स्मृती), 'रुक्खमूलं' (वृक्षाचे मूळ), लोहाचे पात्र ते 'अयोपत्तो', येथे "मनाद्यापादीनमो मये चे" या सूत्राने 'ओ' होतो. याचप्रमाणे 'सुवण्णकटाहं' (सोन्याची कढई), 'पानीयथालकं' (पिण्याच्या पाण्याचे भांडे), 'सप्पिकुम्भो' (तुपाचा घडा), देवांचा राजा तो 'देवराजा'. पुरुषाचे लिंग ते 'पुल्लिङ्गं', "पुं पुमस्सवा" या सूत्राने 'पुम' च्या जागी 'पुं' होतो, निग्गहीताचा लोप होतो आणि 'ल' चे द्वित्व होते. 'हत्थिपदं' (हत्तीचे पाऊल), 'इत्थिरूपं' (स्त्रीचे रूप), 'भिक्खुनीसङ्घो' (भिक्षुणींचा संघ), 'जम्बुसाखा' (जांभळाची फांदी), येथे ईकार आणि ऊकार यांचा र्हस्व होतो. 'बहुलाधिकार' असल्यामुळे -न्त, -मान, निर्धारण, पूरण, भाव आणि तृप्त अर्थाच्या शब्दांसोबत षष्ठी तत्पुरुष समास होत नाही. जसे - 'ममानुकुब्बं' (माझे अनुकरण करणारा), 'ममानुकुरुमानो' (माझे अनुकरण करणारा), 'गुन्नं कण्हा सम्पन्नखीरतमा' (गाईंमध्ये काळी गाय सर्वात जास्त दूध देणारी आहे - निर्धारण), 'सिस्सानं पञ्चमो' (शिष्यांमध्ये पाचवा - पूरण), 'पटस्स सुत्तता' (वस्त्राची सूतता - भाव). काही ठिकाणी 'वर्तमानसामीप्य' असताना समास होतोच. "ब्राह्मणस्स सुक्का दन्ता" (ब्राह्मणाचे पांढरे दात) येथे सापेक्षता असल्यामुळे समास होत नाही. "फळानं तित्तो" (फळांनी तृप्त), "फळानमासितो" (फळांनी तृप्त), "फळानं सुहितो" (फळांनी तृप्त) [येथे तृप्त अर्थ असल्यामुळे समास होत नाही]. "ब्राह्मणस्स उच्चं गेहं" (ब्राह्मणाचे उंच घर) येथे सापेक्षता असल्यामुळे समास होत नाही. "रञ्ञो पाटलिपुत्तकस्स धनं" (पाटलिपुत्रक राजाचे धन) येथे धनाचा संबंध राजाशी असल्यामुळे षष्ठी आहे, पाटलिपुत्रकाशी थेट संबंध नसल्यामुळे समास होत नाही. "रञ्ञो गो च अस्सो च पुरिसो च" (राजाची गाय, घोडा आणि माणूस) येथे भिन्न अर्थ असल्यामुळे हे केवळ वाक्यच राहते. परंतु "रञ्ञो गवस्सपुरिसा" यांचा 'राजगवस्सपुरिसा' असा समास होतोच, कारण येथे एकार्थीभाव आहे. परंतु संबंधी शब्दांच्या बाबतीत नित्य सापेक्षता असली तरी 'गमकत्व' (बोधकता) असल्यामुळे समास होतो; कारण गमकत्व हे देखील समासाचे कारण आहे. जसे - 'देवदत्तस्स गुरुकुलं' (देवदत्ताचे गुरुकुल), 'भगवतो सावकसङ्घो' (भगवंतांचा श्रावकसंघ) इत्यादी. සත්තමීතප්පුරිසො රූපෙ සඤ්ඤා රූපසඤ්ඤා, එවං රූපසඤ්චෙතනා, සංසාරදුක්ඛං. චක්ඛුම්හි සන්නිස්සිතං විඤ්ඤාණං චක්ඛුවිඤ්ඤාණං. ධම්මෙ රතො ධම්මරතො, ධම්මාභිරති, ධම්මරුචි, ධම්මගාරවො, ධම්මෙසු නිරුත්ති ධම්මනිරුත්ති, දානාධිමුත්ති, භවන්තරකතං. දස්සනෙ අස්සාදො දස්සනස්සාදො. අරඤ්ඤෙ වාසො අරඤ්ඤවාසො, විකාලභොජනං, කාලවස්සං, වනපුප්ඵං, වනමහිසො, ගාමසූකරො, සමුද්දමච්ඡා, ආවාටකච්ඡපො, ආවාටමණ්ඩූකො, කූපමණ්ඩූකො, තිත්ථනාවා. ඉත්ථීසු ධුත්තො ඉත්ථිධුත්තො, අක්ඛධුත්තො. ඡායායං සුක්ඛො ඡායාසුක්ඛො, අඞ්ගාරපක්කං, චාරකවනො. ක්වචි වුත්තියෙව, වනෙ චරතීති වනචරකො, කුච්ඡිම්හි සයන්තීති කුච්ඡිසයා, ථලෙ තිට්ඨතීති ථලට්ඨො, ජලට්ඨො, පබ්බතට්ඨො, මග්ගට්ඨො. පඞ්කෙ ජාතං පඞ්කජං, සරොරුහ+මිච්චාදි. ඉධ න හොති, භොජනෙ මත්තඤ්ඤුතා, ඉන්ද්රියෙසු ගුත්තද්වාරතා, ආසනෙ නිසින්නො, ආසනෙ නිසීදිතබ්බං. सप्तमी तत्पुरुष समास - रूपामध्ये संज्ञा ती 'रूपसञ्ञा' (रूपसंज्ञा). याचप्रमाणे 'रूपसञ्चेतना' (रूपाविषयीची संचेतना), 'संसारदुक्खं' (संसारातील दुःख). चक्षूवर (डोळ्यावर) संश्रित असलेले विज्ञान ते 'चक्खुविञ्ञाणं' (चक्षुर्विज्ञान). धम्मामध्ये रत तो 'धम्मरतो', 'धम्माभिरति' (धम्मामध्ये अभिरती), 'धम्मरुचि' (धम्माची आवड), 'धम्मगारवो' (धम्माविषयी आदर), धम्मांमधील निरुक्ती ती 'धम्मनिरुत्ति', 'दानाधिमुत्ति' (दानाविषयी श्रद्धा), 'भवन्तरकतं' (दुसऱ्या भवात केलेले). दर्शनामध्ये आस्वाद तो 'दस्सनस्सादो'. अरण्यात वास तो 'अरञ्ञवासो', 'विकालभोजनं' (अवेळी भोजन), 'कालवस्सं' (योग्य वेळी पाऊस पडणे), 'वनपुप्फं' (वनातील फूल), 'वनमहिंसो' (रानरेडा), 'गामसूकरो' (गावातील डुक्कर), 'समुद्दमच्छा' (समुद्रातील मासे), 'आवाटकच्छपो' (खड्ड्यातील कासव), 'आवाटमण्डूको' (खड्ड्यातील बेडूक), 'कूपमण्डूको' (विहिरीतील बेडूक), 'तित्थनावा' (घाटावरील नाव). स्त्रियांमध्ये आसक्त तो 'इत्थिधुत्तो', 'अक्खधुत्तो' (जुगारात आसक्त). छायेत सुकलेला तो 'छायासुक्खो', 'अङ्गारपक्कं' (कोळशावर शिजवलेले), 'चारकवनं' (तुरुंगातील वन). काही ठिकाणी केवळ वृत्तीच (समास) होते, जसे - वनात फिरणारा तो 'वनचरको', गर्भात निजलेली ती 'कुच्छिसया', जमिनीवर राहणारा तो 'थलट्ठो', 'जलट्ठो' (जलात राहणारा), 'पब्बतट्ठो' (पर्वतावर राहणारा), 'मग्गट्ठो' (मार्गावर असलेला). चिखलात जन्मलेले ते 'पङ्कजं' (कमळ), 'सरोरुहं' (तलावात उगवणारे) इत्यादी. येथे सप्तमी तत्पुरुष समास होत नाही - "भोजने मत्तञ्ञुता" (भोजनात मात्रा जाणणारा), "इन्द्रियेसु गुत्तद्वारता" (इंद्रियांमध्ये संयमित असणारा), "आसने निसिन्नो" (आसनावर बसलेला), "आसने निसीदितब्बं" (आसनावर बसावे). 11. විසෙසන+මෙකත්ථෙන ११. विशेषण एका अर्थाच्या (शब्दासोबत समासाला प्राप्त होते). විසෙසනං ස්යාද්යන්තං විසෙස්සෙන ස්යාද්යන්තෙන සමානාධිකරණෙනසහෙ+කත්ථං හොති. 'सि' इत्यादी विभक्ती प्रत्यय लागलेले विशेषण पद, 'सि' इत्यादी विभक्ती प्रत्यय लागलेल्या आणि समान अधिकरण असलेल्या विशेष्य पदासोबत एकार्थी (समासयुक्त) होते. සමානත්ථෙ [Pg.143] පදෙ යත්ථ, භෙද්යභෙදකවාචකෙ; විසෙසනසමාසො+යං, විසෙස්සත්ථපධානතො. जेथे समान अर्थाची पदे भेदक (विशेषण) आणि भेद्य (विशेष्य) यांचे वाचक असतात, तेथे विशेष्य पदाच्या अर्थाची प्रधानता असल्यामुळे हा 'विशेषण समास' होतो. විසෙස්සගත+මෙව+ත්ර, ලිඞ්ග+මෙතං පරං තතො; කම්මධාරය+මිච්චෙ+ස, සමාසො+ඤ්ඤෙහි සඤ්ඤිතො. येथे (या समासात) विशेष्याचेच लिंग प्राप्त होते आणि नंतर ते परपदाप्रमाणे होते; इतरांनी या समासाला 'कर्मधारय' अशी संज्ञा दिली आहे. සුත්තෙ විසෙස්සෙනාති අවුත්තෙපි විසෙසනස්ස සම්බන්ධීසද්දත්තා සාමත්ථියතො ලබ්භමානආකඩ්ඪිතසද්දං පති ‘‘විසෙස්සෙනා’’ති වුත්තං. වුත්තඤ්ච – सूत्रात "विशेष्येण" (विशेष्यासोबत) असे म्हटले नसले तरी, विशेषण हा संबंधी शब्द असल्यामुळे सामर्थ्याने प्राप्त होणाऱ्या आकृष्ट शब्दाच्या प्रति "विशेष्येण" असे म्हटले आहे. आणि म्हटले देखील आहे - සාමඤ්ඤවත්ථු යා වත්ථ+න්තරතො තු විසෙසිය; එකප්පකාරෙ ඨපනා, විසෙසන+මිතී+රිතං. सामान्य वस्तूला इतर वस्तूंपेक्षा वेगळे करून एकाच प्रकारात स्थापित करणे, याला 'विशेषण' असे म्हटले जाते. එකප්පකාරගං වත්ථු, විසෙස්සන්ති පවුච්චති; පදානි යානි යානෙව, සම්බන්ධ+මුපයන්ති+හ; ගම්යතෙ කාමචාරෙන, විසෙසන+විසෙස්සතාති. एकाच प्रकारात असलेल्या वस्तूला 'विशेष्य' असे म्हटले जाते. येथे जी जी पदे संबंधाला प्राप्त होतात, त्यांमध्ये इच्छेनुसार विशेषण-विशेष्य भाव समजला जातो. එත්ථ ච උප්පලදබ්බං රත්තුප්පලාදිතො විසෙසයතීති නීලසද්දො විසෙසනං. තෙන විසෙසියතීති උප්පලසද්දො විසෙස්සං. අපි ච භමර+ඞ්ගාරාදිසාමඤ්ඤ නීලත්ථතො විසෙසියතීති නීලං විසෙස්සං. න වත්ථාදීනං, උප්පලස්සෙවාති විසෙසනතො උප්පලං විසෙසනංති කාමචාරෙනෙති වුත්තං. අපි ච – आणि येथे उत्पल (कमळ) द्रव्याला रक्तोत्पल (लाल कमळ) इत्यादींपासून वेगळे करतो म्हणून 'नील' (निळा) हा शब्द विशेषण आहे. त्याच्याद्वारे जे विशेषित केले जाते तो 'उत्पल' शब्द विशेष्य आहे. शिवाय, भ्रमर, कोळसा इत्यादींच्या सामान्य नीलत्वापासून वेगळे केले जाते म्हणून 'नील' हे विशेष्य आहे. वस्त्रादींचे नव्हे, तर केवळ उत्पलाचेच विशेषण असल्यामुळे उत्पल हे विशेषण आहे, म्हणूनच "इच्छेनुसार" असे म्हटले आहे. शिवाय - පරිතො අයන්ත්ය+නෙන+ත්ථා, පරියායොති වුච්චති; ගොවාචාති පවුත්තෙ තු, වාචත්ථො තු විසෙසනං. ज्याच्याद्वारे अर्थ चहूबाजूंनी प्राप्त केला जातो त्याला 'पर्याय' असे म्हणतात. जेव्हा "गो-वाचा" (गाईची वाणी) असे म्हटले जाते, तेव्हा वाणीचा अर्थ हे विशेषण असते. විසෙස්සෙ දිස්සමානා යා, ලිඞ්ග+සංඛ්යා+විභත්තියො; තුල්යාධිකරණෙ භිය්යො, කත්තබ්බා තා විසෙසනෙති – विशेष्यामध्ये जे लिंग, संख्या आणि विभक्ती दिसून येतात, समान अधिकरण असताना बहुतांश करून तेच विशेषणामध्ये देखील योजले पाहिजेत. වුත්තත්තා මහන්තො+ච්චාදීසු සමානලිඞ්ගාදයො දට්ඨබ්බා. භිය්යොති කිං, දෙවා පමාණං ඉච්චාදි. 'महन्तो' (महान) इत्यादींमध्ये समान लिंग इत्यादी पाहावे, असे म्हटले असल्यामुळे. 'भिय्यो' (अधिक) म्हणजे काय? 'देवा पमाणं' (देव हेच प्रमाण आहेत) इत्यादी. සො [Pg.144] ච ඡබ්බිධො විසෙසනපුබ්බපදො, විසෙසනුත්තරපදො, විසෙසනොභයපදො, උපමානුත්තරපදො, සම්භාවනාපුබ්බපදො, අවධාරණපුබ්බපදොති. आणि तो (कर्मधारय समास) सहा प्रकारचा आहे: विसेसनपुब्बपद (विशेषणपूर्वपद), विसेसनुत्तरपद (विशेषणोत्तरपद), विसेसनोभयपद (विशेषणोभयपद), उपमानुत्तरपद (उपमानोत्तरपद), सम्भावनावुब्बपद (संभावनापूर्वपद) आणि अवधारणपुब्बपद (अवधारणपूर्वपद). තත්ථ විසෙසනපුබ්බපදෙ තාව-මහන්තො ච සො පුරිසො චාති වාක්යෙ ඉමිනා සුත්තෙන සමාසො. ‘‘ට න්ත+න්තූනං’’ති න්තස්ස ටාදෙසෙ දීඝො හොති, මහාපුරිසො, මහාපුරිසා ඉච්චාදි. त्यापैकी, प्रथम 'विसेसनपुब्बपद' (विशेषणपूर्वपद) समासात—'महन्तो च सो पुरिसो च' (तो महान आहे आणि तो पुरुष आहे) या वाक्यात या सूत्राने समास होतो. "ट न्त-न्तूनं" या सूत्राने 'न्त' च्या जागी 'ट' आदेश होऊन दीर्घ होतो, जसे—'महापुरिसो' (महापुरुष), 'महापुरिसा' इत्यादी. වාක්යෙ තුල්යාධිකරණභාව පකාසනත්ථං ච+ත-සද්දපයොගො. වුත්තියන්තු සමාසෙනෙව තප්පකාසනතො න තප්පයොගො. එව+මඤ්ඤත්රාපි වුත්තත්ථාන+මප්පයොගො. එවං මහාවීරො, මහාමුනි. මහන්තඤ්ච තං බලඤ්චාති මහාබලං, මහබ්භයං. සන්තො ච සො පුරිසො චාති සප්පුරිසො. තථා පුබ්බපුරිසො, අපරපුරිසො, පඨමපුරිසො, මජ්ඣිමපුරිසො, උත්තමපුරිසො, පරපුරිසො, සෙතහත්ථී, කණ්හසප්පො, නීලුප්පලං, රත්තුප්පලං, ලොහිතචන්දනං. ක්වචි න හොති, පුණ්ණො මන්තානීපුත්තො, චිත්තො ගහපති. පුමා ච සො කොකිලො චාති පුඞ්කොකිලො, උත්තරපදෙ පුමස්ස පුං හොති. එවං පුන්නාගො. वाक्यामध्ये सामानाधिकरण्य (समान विभक्ती असणे) दर्शवण्यासाठी 'च' आणि 'त' या शब्दांचा प्रयोग केला जातो. परंतु वृत्तीमध्ये (समासामध्ये) समासाद्वारेच ते प्रकट होत असल्यामुळे त्यांचा प्रयोग केला जात नाही. याचप्रमाणे इतर ठिकाणीही आधीच व्यक्त झालेल्या अर्थाचा पुन्हा प्रयोग केला जात नाही. जसे—'महावीरो' (महावीर), 'महामुनि' (महामुनी). 'महन्तञ्च तं बलञ्च' म्हणजे 'महाबलं' (महाबल), 'महब्भयं' (महाभय). 'सन्तो च सो पुरिसो च' म्हणजे 'सप्पुरिसो' (सत्पुरुष). तसेच 'पुब्बपुरिसो' (पूर्वपुरुष), 'अपरpuriso' (अपरपुरुष), 'पठमपुरिसो' (प्रथमपुरुष), 'मज्झिमपुरिसो' (मध्यमपुरुष), 'उत्तमपुरिसो' (उत्तमपुरुष), 'परपुरिसो' (परपुरुष), 'सेतहत्यी' (श्वेतहत्ती), 'कण्हसप्पो' (कृष्णसर्प/काळा साप), 'नीलुप्पलं' (नीलोत्पल/निळे कमळ), 'रत्tuप्पलं' (रक्तोत्पल/लाल कमळ), 'लोहितचन्दनं' (लाल चंदन). काही ठिकाणी समास होत नाही, जसे—'पुण्णो मन्तानीपुत्तो' (पुण्ण मन्तानीपुत्त), 'चित्तो गहपति' (चित्त गृहपती). 'पुमा च सो कोकिलो च' म्हणजे 'पुङ्कोकिलो' (नर कोकिळा); उत्तरपद असताना 'पुम' शब्दाचा 'पुं' होतो. याचप्रमाणे 'पुन्नागो' (पुन्नाग). ඛත්තියා ච සා කඤ්ඤා චාති ඛත්තියකඤ්ඤා. 'खत्तिया च सा कञ्ञा च' (ती क्षत्रिय आहे आणि ती कन्या आहे) म्हणजे 'खत्तियकञ्ञा' (क्षत्रियकन्या). 67. ඉත්ථියං භාසිතපුමි+ත්ථී පුමෙවෙ+කත්ථෙති ६७. स्त्रीलिंगात, ज्या शब्दाचे पुल्लिंगी रूपही उपलब्ध असते (भाषितपुंस्का) आणि जो त्याच अर्थाचा वाचक असतो, तो पुल्लिंगाप्रमाणेच होतो. භාසිතපුමා ඉත්ථී පුමෙව හොතීති පුම්භාවා ඉත්ථිපච්චයානං නිවත්ති හොති. එවං රත්තලතා, දුතියභික්ඛා. බ්රාහ්මණී ච සා දාරිකා චාති බ්රාහ්මණදාරිකා, නාගමාණවිකා. ඉත්ථියන්ති කිං, කුමාරිරතනං, සමණිපදුමං. භාසිතපුමාති කිං, ගඞ්ගානදී, තණ්හානදී[Pg.145], පථවීධාතු. පුරත්ථිමො ච සො කායො චාති පුරත්ථිමකායො. එත්ථ ච කායෙකදෙසෙ කායසද්දො. එවං පච්ඡිමකායො, උපරිමකායො, හෙට්ඨිමකායො, සබ්බකායො, නවාවාසො, කතරනිකායො, හෙතුපච්චයො. ජීවිතප්පධානං නවකං ජීවිතනවක+මිච්චාදි. 'भाषितपुंस्का स्त्रीलिंगी शब्द पुल्लिंगाप्रमाणेच होतो' याचा अर्थ असा की, पुल्लिंगी भाव (पुंभाव) झाल्यामुळे स्त्रीलिंगी प्रत्ययांची निवृत्ती (लोप) होते. जसे—'रत्तलता' (लाल वेल), 'दुतियभिक्खा' (दुसरी भिक्षा). 'ब्राह्मणी च सा दारिका च' म्हणजे 'ब्राह्मणदारिका' (ब्राह्मण मुलगी), 'नागमाणविका' (नागकन्या). "स्त्रीलिंगात" असे का म्हटले? 'कुमारिरतनं' (कुमारीरत्न), 'समणिपदुमं' (श्रमणीपद्म) यासाठी. "भाषितपुंस्का" असे का म्हटले? 'गङ्गानदी' (गंगानदी), 'तण्हानदी' (तृष्णानदी), 'पथवीधातु' (पृथ्वीधातू) यासाठी. 'पुरत्थिमो च सो कायो च' म्हणजे 'पुरत्थिमकायो' (शरीराचा पूर्वभाग). येथे 'काय' हा शब्द शरीराच्या एका भागासाठी वापरला आहे. याचप्रमाणे 'पच्छिमकायो' (पश्चिमभाग), 'उपरिमकायो' (वरचा भाग), 'हेट्ठिमकायो' (खालचा भाग), 'सब्बकायो' (पूर्ण शरीर), 'नवावासो' (नवीन निवास), 'कतरनिकायो' (कोणता निकाय), 'हेतुपच्चयो' (हेतुप्रत्यय). 'जीवितप्पधानं नवकं' म्हणजे 'जीवितनवकं' (जीवित-नवक) इत्यादी. විසෙසනුත්තරපදෙ ථෙරා+චරිය+පණ්ඩිතා විසෙසනං පරඤ්ච භවති. යථා සාරිපුත්තො ච සො ථෙරො චාති සාරිපුත්තත්ථෙරො, එවං මහාමොග්ගල්ලානත්ථෙරො, මහාකස්සපත්ථෙරො, බුද්ධඝොසාචරියො, ධම්මපාලාචරියො, ආචරියගුත්තිලො වා. මහොසධො ච සො පණ්ඩිතො චාති මහොසධපණ්ඩිතො, එවං විධුරපණ්ඩිතො. 'विसेसनुत्तरपद' (विशेषणोत्तरपद) समासात 'थेर' (स्थवीर), 'आचरिय' (आचार्य), 'पण्डित' (पंडित) इत्यादी विशेषणे नंतर येतात. जसे—'सारिपुत्तो च सो थेरो च' म्हणजे 'सारिपुत्तत्थेरो' (सारिपुत्त थेर). याचप्रमाणे 'महामोग्गल्लानत्थेरो' (महामोग्गल्लान थेर), 'महाकस्सपत्थेरो' (महाकस्सप थेर), 'बुद्धघोसाचरियो' (बुद्धघोषाचार्य), 'धम्मपालाचरियो' (धम्मपालाचार्य) किंवा 'आचरियगुत्तिलो' (आचार्य गुत्तिल). 'महोसधो च सो पण्डितो च' म्हणजे 'महोसधपण्डितो' (महोसध पंडित), याचप्रमाणे 'विधुरपण्डितो' (विधुर पंडित). විසෙසනොභයපදෙ යථා-සීතඤ්ච තං උණ්හඤ්චාති සීතුණ්හං, සිනිද්ධො ච සො උණ්හො චාති සිනිද්ධුණ්හො මාසො. ඛඤ්ජො ච සො ඛුජ්ජො චාති ඛඤ්ජඛුජ්ජො, එවං අන්ධබධිරො, කතාකතං, ඡිද්දාවඡිද්දං, උච්චාවචං, ඡින්නභින්නං, ගතපච්චාගතං. ක්වචි පුබ්බකාලස්සාපි පරනිපාතො, වාසිතො ච සො ලිත්තො චාති ලිත්තවාසිතො, එවං නග්ගමූසිතො, සිත්තසම්මට්ඨො, භට්ඨලුඤ්ජිතො. 'विसेसनोभयपद' (विशेषणोभयपद) समासात जसे—'सीतञ्च तं उण्हञ्च' म्हणजे 'सीतुण्हं' (शीतोष्ण/थंड आणि गरम). 'सिनिद्धो च सो उण्हो च' म्हणजे 'सिनिद्धुण्हो मासो' (स्निग्ध आणि उष्ण महिना). 'खञ्जो च सो खुज्जो च' म्हणजे 'खञ्जखुज्जो' (लंगडा आणि कुबडा). याचप्रमाणे 'अन्धबधिरो' (आंधळा आणि बहिरा), 'कताकतं' (केलेले आणि न केलेले), 'छिद्दावछिद्दं' (छिद्रयुक्त), 'उच्चावचं' (उंच-सखल/विविध), 'छिन्नभिन्नं' (छिन्नभिन्न), 'गतपच्चागतं' (गेलेले आणि परत आलेले). काही ठिकाणी पूर्वकालवाचक शब्दाचाही परनिपात (नंतर प्रयोग) होतो, जसे—'वासितो च सो लित्तो च' म्हणजे 'लित्तवासितो' (लेप लावलेला आणि सुवासित केलेला). याचप्रमाणे 'नग्गमूसितो' (नग्न आणि लुटलेला), 'सित्तसम्मट्ठो' (सिंचन केलेले आणि झाडलेले), 'भट्ठलुञ्जितो' (भाजलेला आणि उपटलेला). උපමනුත්තරපදෙ උපමානභූතං විසෙසනං පරං භවති, යථා සීහොති වුත්තෙ උපචරිතා+නුපචරිතසීහානං සාමඤ්ඤප්පතීතියං මුනිසද්දො විසෙසෙති. එත්ථ ච – 'उपमानुत्तरपद' (उपमानोत्तरपद) समासात उपमानभूत विशेषण नंतर येते. जसे—'सीहो' (सिंह) असे म्हटले असता, लाक्षणिक आणि वास्तविक सिंहांच्या सामान्य प्रतीतीमध्ये 'मुनि' हा शब्द त्याचे विशेषण बनतो. आणि येथे— උපමානො+පමෙය්යානං, සධම්මත්තං සියො+පමා. उपमान आणि उपमेय यांच्यातील समान धर्माला 'उपमा' असे म्हणतात. සා ච වත්ථු+වණ්ණ+ආකාරානං සාම්යෙන හොති. සීහොව සීහො, මුනි ච සො සීහො චාති මුනිසීහො, මුනිවසභො, මුනිපුඞ්ගවො[Pg.146], බුද්ධනාගො, බුද්ධාදිච්චො. රංසී විය රංසී, සද්ධම්මො ච සො රංසී චාති සද්ධම්මරංසී, එවං විනයසාගරො. පුණ්ඩරිකමිව පුණ්ඩරිකො, සමණො ච සො පුණ්ඩරිකො චාති සමණපුණ්ඩරිකො, සමණපදුමො. චන්දො විය චන්දො, මුඛඤ්ච තං චන්දො චාති මුඛචන්දො, මුඛපදුමං ඉච්චාදි. आणि ती (उपमा) वस्तू, वर्ण (रंग) किंवा आकाराच्या समानतेमुळे होते. सिंहासारखा सिंह, 'मुनि च सो सीहो च' म्हणजे 'मुनिसीहो' (मुनिसिंह), 'मुनिवसभो' (मुनिवृषभ), 'मुनिपुङ्गवो' (मुनिपुंगव), 'बुद्धनागो' (बुद्धनाग), 'बुद्धादिच्चो' (बुद्धादित्य/बुद्धरूपी सूर्य). किरणासारखा किरण, 'सद्धम्मो च सो रंसी च' म्हणजे 'सद्धम्मरंसी' (सद्धर्मरूपी किरण), याचप्रमाणे 'विनयसागरो' (विनयसागर). पुंडरीकासारखा (पांढऱ्या कमळासारखा) पुंडरीक, 'समणो च सो पुण्डरीको च' म्हणजे 'समणपुण्डरीको' (श्रमणपुंडरीक), 'समणपदुमो' (श्रमणपद्म). चंद्रासारखा चंद्र, 'मुखञ्च तं चन्दो च' म्हणजे 'मुखचन्दो' (मुखचंद्र), 'मुखपदुमं' (मुखपद्म) इत्यादी. සම්භාවනාපුබ්බපදෙ යථා-ධම්මොති බුද්ධි ධම්මබුද්ධි, එවං ධම්මසඤ්ඤා, ධම්මසඞ්ඛාතො, ධම්මසම්මතො, පාණසඤ්ඤිතා, අසුභසඤ්ඤා, අනිච්චසඤ්ඤා, ධාතුසඤ්ඤා, අත්තසඤ්ඤා, අත්තදිට්ඨි ඉච්චාදි. 'सम्भावनावुब्बपद' (संभावनापूर्वपद) समासात जसे—'धम्मो' अशी बुद्धी (विचार) म्हणजे 'धम्मबुद्धी'. याचप्रमाणे 'धम्मसञ्ञा' (धम्मसंज्ञा), 'धम्मसङ्खातो' (धम्मसंख्यात), 'धम्मसम्मतो' (धम्मसम्मत), 'पाणसञ्ञिता' (प्राणसंज्ञिता), 'असुभसञ्ञा' (अशुभसंज्ञा), 'अनिच्चसञ्ञा' (अनित्यसंज्ञा), 'धातुसञ्ञा' (धातू संज्ञा), 'अत्तसञ्ञा' (आत्मसंज्ञा), 'अत्तदिट्ठि' (आत्मदृष्टी) इत्यादी. අවධාරණපුබ්බපදෙ යථා-ගුණො එව ධනං ගුණධනං, එවං සද්ධාධනං, සීලධනං, පඤ්ඤාරතනං, චක්ඛු එව ඉන්ද්රියං චක්ඛුන්ද්රියං, එවං චක්ඛායතනං, චක්ඛුධාතු, චක්ඛුද්වාරං, රූපාරම්මණ+මිච්චාදි. 'अवधारणपुब्बपद' (अवधारणपूर्वपद) समासात जसे—'गुणो एव धनं' म्हणजे 'गुणधनं' (गुण हेच धन). याचप्रमाणे 'सद्धाधनं' (श्रद्धाधन), 'सीलधनं' (शीलधन), 'पञ्ञारतनं' (प्रज्ञारत्न). 'चक्खु एव इन्द्रियं' म्हणजे 'चक्खुन्द्रियं' (चक्षुरिंद्रिय). याचप्रमाणे 'चक्खायतनं' (चक्षुआयतन), 'चक्खुधातु' (चक्षुधातू), 'चक्खुद्वारं' (चक्षुद्वार), 'रूपारम्मणं' (रूपालंबन) इत्यादी. විසෙසන+විසෙස්සෙහි, ක්රියාය ච සහෙ+රිතො; තෙසං භාවං විවෙචෙතා, නිපාතො බ්යවච්ඡින්දති. विशेषण, विशेष्य आणि क्रिया यांच्यासोबत उच्चारलेला निपात (अव्यय) त्यांच्या भावाचे पृथक्करण करून त्यांना वेगळे (व्यवच्छेद) करतो. අයොග+මඤ්ඤයොගඤ්ච, අච්චන්තායොග+මෙවි+ති; විවක්ඛාතො පයුත්තොපි, එවත්ථො ඤායතෙ යතො. 'एव' (च) या शब्दाद्वारे अयोग (संबंध नसणे), अन्ययोग (दुसऱ्याशी संबंध असणे) आणि अत्यंत अयोग (अत्यंत संबंध नसणे) यांचा व्यवच्छेद होतो; कारण वक्त्याच्या विवक्षेनुसार 'एव' शब्दाचा प्रयोग न करताही त्याचा अर्थ समजला जातो. බ්යවච්ඡෙදඵලං වාක්යං, තතො චිත්තො ධනුද්ධරො; පාත්ථො ධනුද්ධරො නීලු+ප්පල+මත්ථීති තං යථා. वाक्याचे फळ व्यवच्छेद (नियमन/मर्यादा निश्चित करणे) हे असते. जसे की—'चित्तो धनुद्धरो' (चित्त धनुर्धारी आहे), 'पत्थो धनुद्धरो' (पार्थ धनुर्धारी आहे), 'नीलुप्पलं अत्थि' (निळे कमळ आहे) या उदाहरणांमध्ये. එත්ථ නිපාතොති එව-ඉතිනිපාතො, අප්පයුත්තොපි එවසද්දො එවං යොජෙතබ්බො – ‘‘චිත්තො ධනුද්ධරො එවා’’ති විසෙසනෙන යුත්තො අයොගවිවච්ඡෙදකො, ධනුනා යොගෙ පතිට්ඨාපනතො ‘‘පාත්ථො එව ධනුද්ධරො’’ති විසෙස්සෙන යුත්තො අඤ්ඤයොගවිවච්ඡෙදකො, ධනුද්ධරත්තස්ස පාත්ථසංඛාතඅජ්ජුනෙ එව පතිට්ඨාපනතො. ‘‘නීලුප්පල+මත්ථෙවා’’ති [Pg.147] ක්රියාය යුත්තො අච්චන්තායොගවිවච්ඡෙදකො, නීලුප්පලස්ස සබ්භාවෙයෙව පතිට්ඨාපනතො. येथे 'निपात' म्हणजे 'एव' हा निपात होय. प्रयोग न केला असला तरी 'एव' शब्दाची अशी योजना करावी—"चित्तो धनुद्धरो एव" (चित्त धनुर्धारीच आहे) हे विशेषणाशी युक्त असून 'अयोगव्यवच्छेदक' आहे, कारण धनुष्याशी त्याचा संबंध प्रस्थापित केला जातो. "पत्थो एव धनुद्धरो" (पार्थच धनुर्धारी आहे) हे विशेष्याशी युक्त असून 'अन्ययोगव्यवच्छेदक' आहे, कारण धनुर्धारी असणे हे केवळ पार्थ नावाच्या अर्जुनामध्येच प्रस्थापित केले जाते. "नीलुप्पलं अत्थेव" (निळे कमळ आहेच) हे क्रियेशी युक्त असून 'अत्यंतायोगव्यवच्छेदक' आहे, कारण निळ्या कमळाचे अस्तित्वच प्रस्थापित केले जाते. 21. සංඛ්යාදි २१. संख्यादी (संख्या इत्यादी). එකත්ථෙ සමාහාරෙ සංඛ්යාදි නපුංසකලිඞ්ගං භවති. තයො ලොකා සමාහටා=චිත්තෙන සම්පිණ්ඩිතා, තිණ්ණං ලොකානං සමාහාරොති වා වාක්යෙ විසෙසනසමාසෙ කතෙ ඉමිනා නපුංසකත්තං භවති. සමාහාරස්සෙ+කත්තා එකවචනමෙව, තිලොකං, භො තිලොක, තිලොකං, තිලොකෙන ඉච්චාදි. එවං තයො දණ්ඩා තිදණ්ඩං, තීණි මලානි සමාහටානි, තිණ්ණං මලානං සමාහාරොති වා තිමලං, තිලක්ඛණං, චතුසච්චං, පඤ්චසික්ඛාපදං, ඡට්ඨායතනං, සත්තාහං, අට්ඨසීලං, නවලොකුත්තරං, දසසීලං, සතයොජනං. ද්වෙ රත්තියො සමාහටා ද්විරත්තං. एकत्ववाचक समाहार (समूह) अर्थामध्ये संख्यादी शब्द नपुंसकलिंगी होतात. 'तयो लोका समाहटा' (तीन लोक एकत्र आलेले) म्हणजे मनाने एकत्र केलेले, किंवा 'तिण्णं लोकानां समाहारो' (तीन लोकांचा समूह) या वाक्यात विशेषण समास केल्यावर या सूत्राने नपुंसकलिंग होते. समाहाराच्या एकत्वामुळे केवळ एकवचनच होते, जसे—'तिलोकं' (त्रिलोक), 'भो तिलोक' (हे त्रिलोक!), 'तिलोकं', 'तिलोकेन' इत्यादी. याचप्रमाणे 'तयो दण्डा' म्हणजे 'तिदण्डं' (त्रिदंड). 'तीणि मलानि समाहटानि' किंवा 'तिण्णं मलानां समाहारो' म्हणजे 'तिमलं' (त्रिमल), 'तिलक्खणं' (त्रिलक्षण), 'चतुसच्चं' (चतुर्सत्य), 'पञ्चसिक्खापदं' (पंचशील/पंचशिक्षापद), 'छट्ठायातनं' (षडायतन), 'सत्ताहं' (सप्ताह/सात दिवस), 'अट्ठसीलं' (अष्टशील), 'नवलोकूत्तरं' (नऊ लोकोत्तर धर्म), 'दससीलं' (दशशील), 'सतयोजनं' (शंभर योजन). 'द्वे रत्तियो समाहटा' म्हणजे 'द्विरत्तं' (द्विरात्र/दोन रात्री). 12. නඤ १२. नञ् (नकारार्थी 'न' अव्यय). නඌච්චෙතං ස්යාද්යන්තං ස්යාද්යන්තෙන සහෙ+කත්ථං හොති. ඤ්ඤකාරො ‘‘ට නඤස්සා’’ති විසෙසනත්ථො ‘පාමනපුත්තාදීසු නස්ස ටො මා හොතූ’ති. න බ්රාහ්මණො අබ්රාහ්මණො, ‘‘ට නඤස්සා’’ති නස්ස ටාදෙසො. ඤ්ඤ-කාරො එත්ථෙව විසෙසනත්ථො. हे 'न' (नकारार्थी अव्यय) सुबन्त (विभक्ती प्रत्ययान्त) असून दुसऱ्या सुबन्तासोबत एकार्थी (समासयुक्त) होते. "ट नञस्स" या सूत्रातील 'ञ' कार हा विशेष स्पष्टतेसाठी आहे, जेणेकरून 'पामनपुत्त' इत्यादी शब्दांमध्ये 'न' च्या जागी 'ट' होऊ नये. 'न ब्राह्मणो' म्हणजे 'अब्राह्मणो' (अब्राह्मण). "ट नञस्स" या सूत्राने 'न' च्या जागी 'ट' (अ) आदेश होतो. येथे 'ञ' कार केवळ विशेष स्पष्टतेसाठी आहे. න-නිසෙධො සතො යුත්තො, දෙසාදිනියමං විනා; අසතො වා+ඵලො තස්මා, කථ+මබ්රාහ්මණොතිචෙ. देश (स्थान) इत्यादींच्या नियमाशिवाय विद्यमान (सत्) वस्तूचा निषेध करणे योग्य आहे; किंवा अविद्यमान (असत्) वस्तूचा निषेध निष्फळ ठरतो. म्हणून, 'अब्राह्मण' (ब्राह्मणेतर) असा शब्द कसा काय योग्य ठरेल? නිසෙධත්ථානුවාදෙන, පටිසෙධවිධි ක්වචි; පරස්ස මිච්ඡාඤාණත්තා+ඛ්යාපනායො+පපජ්ජතෙ. कधीकधी निषेधाच्या अर्थाचा अनुवाद करून प्रतिषेधाचा नियम (विधान) केला जातो, जो दुसऱ्याच्या मिथ्या ज्ञानाचे प्रकटीकरण करण्यासाठी योग्य ठरतो. දුවිධො [Pg.148] ච+ස්ස නස්ස අත්ථො පසජ්ජපටිසෙධ+පරියුදාසවසෙන. තත්ථ යො ‘‘අසූරිකපස්සාරාජදාරා’’තිආදීසු විය උත්තරපදත්ථස්ස සබ්බදා අභාවං දීපෙති, සො පසජ්ජපටිසෙධවාචී නාම. යො පන ‘‘අබ්රාහ්මණ+මානයා’’තිආදීසු විය උත්තරපදත්ථං පරියුදාසිත්වා පටික්ඛිපිත්වා තංසදිසෙ වත්ථුම්හි කාරියං පටිපාදයති, සො පරියුදාසවාචී නාම. වුත්තඤ්ච – आणि या 'न' (निषेधार्थक) शब्दाचा अर्थ 'प्रसज्यप्रतिषेध' आणि 'पर्युदास' या दोन प्रकारांनी होतो. त्यापैकी, जो 'असूर्यमपश्या राजदारा' (सूर्याला न पाहणाऱ्या राजाच्या स्त्रिया) इत्यादींप्रमाणे उत्तरपदाच्या अर्थाचा नेहमीच अभाव दर्शवतो, त्याला 'प्रसज्यप्रतिषेधवाची' म्हणतात. परंतु, जो 'अब्राह्मणमानय' (ब्राह्मणेतर व्यक्तीला घेऊन ये) इत्यादींप्रमाणे उत्तरपदाच्या अर्थाचा पर्युदास (वगळणे) करून किंवा नकार देऊन, त्याच्यासारख्याच दुसऱ्या वस्तूमध्ये कार्य सिद्ध करतो, त्याला 'पर्युदासवाची' म्हणतात. आणि असे म्हटले आहे की — පසජ්ජපටිසෙධස්ස, ලක්ඛණං වත්ථුනත්ථිතා; වත්ථුතො+ඤ්ඤත්ර යා වුත්ති, පරියුදාසලක්ඛණං. प्रसज्यप्रतिषेधाचे लक्षण म्हणजे वस्तूचा अभाव असणे होय; आणि वस्तूव्यतिरिक्त इतर ठिकाणी जी प्रवृत्ती (अस्तित्व) असते, ते पर्युदासाचे लक्षण आहे. යත්ර අබ්රාහ්මණාදීසු, වත්ථුං පරියුදස්සති; තක්රියායුත්තරාජාදිං, වදෙ සො පරියුදාසකො. जिथे 'अब्राह्मण' इत्यादी शब्दांमध्ये वस्तूचा पर्युदास (वगळणे) केला जातो आणि त्या क्रियेशी संबंधित राजा इत्यादींचा निर्देश केला जातो, त्याला 'पर्युदासक' म्हणतात. පසජ්ජපටිසෙධො තු, වත්ථන්තර+මනාදිය; කිඤ්චිවත්ථුනිසෙධස්ස, පසඞ්ගො න භවෙය්ය සො. परंतु प्रसज्यप्रतिषेध हा इतर कोणत्याही वस्तूचा स्वीकार न करता, केवळ एखाद्या वस्तूचा निषेध करतो, तिथे इतर कशाचाही संबंध येत नाही. තදඤ්ඤො ච තංවිරුද්ධො,තදභාවො ච නඤ්ඤත්ථො. त्याहून भिन्न (तदन्य), त्याच्या विरुद्ध (तद्विरुद्ध) आणि त्याचा अभाव (तदभाव) हे 'नञ्' चे (निषेधाचे) अर्थ आहेत. තදඤ්ඤත්ථෙ – අබ්රාහ්මණො, බ්රාහ්මණතො අඤ්ඤො තංසදිසොති වුත්තං හොති. එවං අමනුස්සො, අස්සමණො, න බ්යාකතා අබ්යාකතා ධම්මා. තබ්බිරුද්ධත්ථෙ-න කුසලා අකුසලා, කුසලපටිපක්ඛාති අත්ථො. එවං අලොභො, අමිත්තො, අයං පරියුදාසනයො. තදභාවෙ-න කත්වා අකත්වා, අකාතුන පුඤ්ඤං, අකරොන්තො, අභාවො භවති. අයං පසජ්ජපටිසෙධනයො. त्याहून भिन्न (तदन्य) या अर्थामध्ये – 'अब्राह्मण' म्हणजे ब्राह्मणापेक्षा भिन्न पण त्याच्यासारखाच, असे म्हटले जाते. याचप्रमाणे 'अमनुष्य' (मानवेतर), 'अश्रमण' (श्रमणेतर), 'न ब्याकता अब्याकता धम्मा' (जे अव्याकृत नाहीत ते अव्याकृत धर्म). त्याच्या विरुद्ध (तद्विरुद्ध) या अर्थामध्ये – 'न कुसला अकुसला' (जे कुशल नाहीत ते अकुशल), म्हणजे कुशलाच्या विरोधी असा अर्थ होतो. याचप्रमाणे 'अलोभ', 'अमित्र' (शत्रू), हा 'पर्युदास' नियम आहे. त्याच्या अभावाच्या (तदभाव) अर्थामध्ये – 'न कत्वा अकत्वा' (न करून), 'अकातुन पुञ्ञं' (पुण्य न करून), 'अकरोन्तो' (न करणारा), असा अभाव होतो. हा 'प्रसज्यप्रतिषेध' नियम आहे. එත්ථ [Pg.149] ච උභොසු පරියුදාසෙ බ්රාහ්මණා අඤ්ඤො බ්රාහ්මණධම්මෙ අප්පතිට්ඨිතො ඛත්තියාදි බ්රාහ්මණසදිසොව අබ්රාහ්මණොති වුත්තෙ පතීයතෙ. ඉතරස්මිං පන පක්ඛෙ කෙනචි සංසයනිමිත්තෙන ඛත්තියාදො බ්රාහ්මණොති වුත්තස්ස මිච්ඡාඤාණනිවුත්ති කරීයති ‘‘බ්රාහ්මණො+යං න භවති අබ්රාහ්මණො’’ති, බ්රාහ්මණත්තජ්ඣාසිතො න භවතීත්යත්ථො. තත්ථ සදිසත්තං විනා මිච්ඡාඤාණාසම්භවා පයොගසාමත්ථියා ච සදිසපටිපත්ති, තග්ගතා ච ලිඞ්ග+සඞ්ඛ්යා භවන්ති. අතොයෙව උච්චතෙ ‘‘නඤ්ඤිවයුත්ත+මඤ්ඤසදිසාධිකරණෙ, කථා හි අත්ථසම්පච්චයො’’ති. आणि येथे, पर्युदासाच्या दोन्ही प्रकारांमध्ये, 'अब्राह्मण' असे म्हटले असता, ब्राह्मणापेक्षा भिन्न असलेला, ब्राह्मणधर्मामध्ये प्रतिष्ठित नसलेला, क्षत्रिय इत्यादी जो ब्राह्मणासारखाच आहे, असा अर्थ समजला जातो. परंतु दुसऱ्या पक्षामध्ये (प्रसज्यप्रतिषेधात), संशयाच्या काही कारणामुळे क्षत्रिय इत्यादींना 'ब्राह्मण' म्हटल्यास, त्याच्या मिथ्या ज्ञानाची निवृत्ती केली जाते की, 'हा ब्राह्मण नाही, हा अब्राह्मण आहे', म्हणजेच त्याच्यामध्ये ब्राह्मणत्व नाही असा अर्थ होतो. तिथे सादृश्याशिवाय (सारखेपणाशिवाय) मिथ्या ज्ञान असणे अशक्य असल्यामुळे आणि प्रयोगाच्या सामर्थ्यामुळे सादृश्याची प्रतीती होते, आणि त्या वस्तूचेच लिंग व वचन लागू होते. म्हणूनच म्हटले आहे – 'नञ्-युक्त शब्द जेव्हा दुसऱ्या परंतु सदृश वस्तूच्या अधिकरणात असतो, तेव्हाच अर्थाचा योग्य बोध होतो.' 75. අන සරෙති ७५. स्वराच्या पुढे 'अन' होतो. නඤසද්දස්ස සරෙ අන, න අස්සො අනස්සො, න අරියො අනරියො. එවං අනිස්සරො, අනිට්ඨො, අනාසවො. න ආදාය අනාදාය, අනොලොකෙත්වා ඉච්ඡාදි. බහුලාධිකාරා අයුත්තත්ථෙහි කෙහිචි හොති. පුන න ගීයන්තීති අපුනගෙය්යා ගාථා, අනොකාසං කාරෙත්වා, අමූලාමූලං ගන්ත්වා, අචන්දමුල්ලොකිකානි මුඛානි, අසද්ධභොජී, අලවණභොජී. नञ् शब्दाच्या पुढे स्वर असल्यास 'अन' होतो, जसे – 'न अस्सो' चा 'अनस्सो' (घोडा नसलेला), 'न अरियो' चा 'अनरियो' (आर्य नसलेला). याचप्रमाणे 'अनिस्सरो' (ईश्वर नसलेला), 'अनिट्ठो' (अनिष्ट), 'अनासळो' (आसवरहित). 'न आदाय' चा 'अनादाय' (न घेता), 'अनोलोकेत्वा' (न पाहता) इत्यादी. 'बहुलाधिकार' असल्यामुळे काही अयोग्य अर्थांमध्येही हा होतो. पुन्हा न गायल्या जाणाऱ्या गाथा म्हणजे 'अपुनगेय्या गाथा', 'अनोकासं कारेत्वा' (संधी न देता), 'अमूलामूलं गत्वा' (मुळापर्यंत न जाता / मुळाशिवाय), 'अचन्दमुल्लोकि कानि मुखानि' (चंद्राकडे न पाहणारे चेहरे), 'अस्सद्धभोजी' (श्रद्धेशिवाय भोजन करणारा), 'अलवणभोजी' (मिठाशिवाय भोजन करणारा). 13. කුපාදයො නිච්ච+මස්යාදිවිධිම්හි १३. कु' इत्यादी आणि 'प' इत्यादी शब्द सुबन्त (विभक्ती प्रत्यय लागलेल्या) शब्दासोबत नेहमी नित्य समास बनवतात, 'अस्यादिविधी' (सुबन्त नसलेल्या विधी) व्यतिरिक्त. කුසද්දො පාදයො ච ස්යාද්යන්තෙන සහෙ+කත්ථා හොන්ති නිච්චං ස්යාදිවිධිවිසයතො+ඤ්ඤත්ථ. එත්ථ අබ්යභිචාරිපාදිසහචරණත්ථෙන කුඉති නිපාතොව, න පථවීවාචකො කුසද්දො. ස්යාදිවිධිවිසයො නාම ‘‘ලක්ඛණිත්ථම්භූතා’’ දිනා පතිආදීනං විසයෙ කතදුතියා, තඤ්ච අන්වද්ධමාසන්ති අසංඛ්යසමාස+මිව මා හොතූති ‘‘අස්යාදිවිධිම්හී’’ති නිසෙධො. කුච්ඡිතො බ්රාහ්මණො කුබ්රාහ්මණො, නිච්චසමාසත්තා අසපදෙන විග්ගහො. कु' शब्द आणि 'प' इत्यादी शब्द सुबन्त (विभक्ती प्रत्यय लागलेल्या) शब्दासोबत नेहमी एकार्थी (समास) होतात, 'स्यादिविधी'च्या विषयाव्यतिरिक्त इतर ठिकाणी. येथे अव्यभिचारी 'पादि'च्या सहचर्यामुळे 'कु' हा केवळ एक निपात आहे, पृथ्वीचा वाचक असलेला 'कु' शब्द नाही. 'स्यादिविधीचा विषय' म्हणजे 'लक्खणित्थम्भूता' इत्यादी सूत्राने 'पति' इत्यादींच्या विषयात होणारी द्वितीया विभक्ती होय; आणि 'अन्वद्धमासं' प्रमाणे तो असंख्या समास होऊ नये म्हणून 'अस्यादिविधिम्हि' असा निषेध केला आहे. निंदनीय ब्राह्मण तो 'कुब्राह्मणो'; नित्य समास असल्यामुळे याचा विग्रह असमर्थ (अस्वपद) शब्दाने होतो. 107. සරෙ කද කුස්සු+ත්තරත්ථෙ १०७. स्वराच्या पुढे 'कु' शब्दाच्या जागी 'कद' असा आदेश होतो, जेव्हा तो उत्तर अर्थामध्ये असतो. කුස්සු+ත්තරත්ථෙ [Pg.150] වත්තමානස්ස සරාදො උත්තරපදෙ කදාදෙසො හොති. ඊසකං උණ්හං කදුණ්හං, කුච්ඡිතං අන්නං කදන්නං, කදසනං. සරෙති කිං, කුපුත්තා, කුදාරා, කුදාසා, කුදිට්ඨි. उत्तर अर्थामध्ये असलेल्या 'कु' शब्दाच्या पुढे स्वरादी उत्तरपद आल्यास 'कद' असा आदेश होतो. थोडेसे गरम ते 'कदुण्हं' (कोमट), निंदनीय अन्न ते 'कदन्नं', 'कदसनं' (वाईट भोजन). 'स्वराच्या पुढे' (सरे) असे का म्हटले आहे? (कारण व्यंजन पुढे असल्यास बदल होत नाही, जसे) 'कुपुत्ता' (वाईट पुत्र), 'कुदारा' (वाईट पत्नी), 'कुदासा' (वाईट दास), 'कुदिट्ठि' (मिथ्या दृष्टी). 108. කා+ප්පත්ථෙ १०८. अल्प (कमी) अर्थामध्ये 'कु' च्या जागी 'का' असा आदेश होतो. අප්පත්ථෙ වත්තමානස්ස කුස්ස කා හොතු+ත්තරපදෙ. අප්පකං ලවණං කාලවණං. එවං කාපුප්ඵං. अल्प अर्थामध्ये असलेल्या 'कु' शब्दाच्या पुढे उत्तरपद आल्यास 'का' होतो. थोडेसे मीठ ते 'कालवणं'. याचप्रमाणे 'कापुप्फं' (अल्प किंवा क्षुद्र फूल). 109. පුරිසෙ වාති १०९. 'पुरिस' (पुरुष) शब्द पुढे असताना 'कु' च्या जागी 'का' हा आदेश पर्यायाने (वा) होतो. කුස්ස කා වා. කුච්ඡිතො පුරිසො කාපුරිසො, කුපුරිසො වා. පකට්ඨො නායකො පනායකො, පධානං වචනං පාවචනං භුසං වද්ධං පවද්ධං සරීරං, සමං සම්මා වා ආධානං සමාධානං, විවිධා මති විමති, විවිධො විසිට්ඨො වා කප්පො විකප්පො, අධිකො දෙවො අතිදෙවො, එවං අධිදෙවො, අධිසීලං. සුන්දරො ගන්ධො සුගන්ධො, කච්ඡිතො ගන්ධො දුග්ගන්ධො, සුට්ඨු කතං සුකතං, දුට්ඨු කතං දුක්කතං අභි සිඤ්චනං අභිසෙකොති සනන්තො, අතිසයෙන කත්වා, කතං පකරිත්වා, පකතං, අතිසයෙන ථුතං අතිත්ථුතං, අතික්කම්ම ථුතං අතිත්ථුතං, ඊසං කළාරො ආකළාරො, සුට්ඨු බද්ධො ආබද්ධො. 'कु' च्या जागी पर्यायाने 'का' होतो. निंदनीय पुरुष तो 'कापुरिसो' किंवा 'कुपुरिसो'. प्रकृष्ट (उत्कृष्ट) नायक तो 'पनायको', प्रधान वचन ते 'पावचनं' (प्रवचन), अत्यंत वाढलेले शरीर ते 'पवड्ढं सरीरं', सम किंवा सम्यक् प्रकारे धारण करणे ते 'समाधानं', विविध प्रकारची मती (बुद्धी) ती 'विमती', विविध किंवा विशिष्ट कल्प तो 'विकप्पो', अधिक देव तो 'अतिदेवो', याचप्रमाणे 'अधिदेवो', अधिसील (उच्च शील) ते 'अधिसीलं'. सुंदर गंध तो 'सुगन्धो', वाईट गंध तो 'दुग्गन्धो', चांगले केलेले ते 'सुकतं', वाईट केलेले ते 'दुक्कतं', सर्व बाजूंनी सिंचन करणे ते 'अभिसेको', अतिशयाने केलेले किंवा प्रकर्षाने केलेले ते 'पकतं', अतिशयाने स्तुती केलेले ते 'अतित्थुतं', मर्यादेचे उल्लंघन करून स्तुती केलेले ते 'अतित्थुतं', थोडेसे पिवळसर-काळे ते 'आकळारो', चांगल्या प्रकारे बांधलेले ते 'आबद्धो'. පාදයො ගතාද්යත්ථෙ පඨමාය 'प' इत्यादी उपसर्ग 'गेलेला' (गत) इत्यादी अर्थांमध्ये प्रथमा विभक्तीच्या शब्दासोबत समास बनवतात. පගතො ආචරියො පාචරියො, එවං පන්තෙවාසී. आगे गेलेले (श्रेष्ठ) आचार्य ते 'पाचरियो' (प्राचार्य), याचप्रमाणे 'पन्तेवासी' (जवळ राहणारा शिष्य). අච්චාදයො [Pg.151] කන්තාද්යත්ථෙ දුතියාය 'अति' इत्यादी उपसर्ग 'ओलांडून गेलेला' (क्रान्त) इत्यादी अर्थांमध्ये द्वितीया विभक्तीच्या शब्दासोबत समास बनवतात. අතික්කන්තො මඤ්චං අතිමඤ්චො. අතිමාලො, ‘‘ඝපස්ස+න්තස්සා+ප්පධානස්සා’’ති මාලාසද්දෙ ඝස්ස රස්සො. එව+මුපරිපි ඝපානං රස්සො. मंचाला (खाटेला) ओलांडून गेलेला तो 'अतिमञ्चो'. 'अतिमालो' (माळेला ओलांडून गेलेला), 'घपस्सन्तस्साप्पधानस्स' या सूत्राने 'माला' शब्दातील 'घ' प्रत्ययाचा र्हस्व होतो. याचप्रमाणे पुढेही 'घप' प्रत्ययांचा र्हस्व होतो. අවාදයො කුට්ඨාද්යත්ථෙ තතියාය 'अव' इत्यादी उपसर्ग 'कूजित' (कोकिळेचे कूजन) इत्यादी अर्थांमध्ये तृतीया विभक्तीच्या शब्दासोबत समास बनवतात. අවකුට්ඨං කොකිලාය වනං අවකොකිලං, අවමයූරං. අවකුට්ඨන්ති පරිච්චත්තං. कोकिळेने कूजन केलेले वन ते 'अवकोकिलं', 'अवमयूरं' (मोराने कूजन केलेले). 'अवकुट्ठं' म्हणजे परित्यक्त (सोडून दिलेले). පරියාදයො ගිලානාද්යත්ථෙ චතුත්ථියා 'परि' इत्यादी उपसर्ग 'ग्लान' (थकलेला) इत्यादी अर्थांमध्ये चतुर्थी विभक्तीच्या शब्दासोबत समास बनवतात. පරිගිලානො+ජ්ඣෙනාය පරියජ්ඣෙනො. अध्ययनासाठी अत्यंत थकलेला तो 'परियज्झेनो'. න්යාදයො කන්තාද්යත්ථෙ පඤ්චමියා 'नि' इत्यादी उपसर्ग 'बाहेर पडलेला' (क्रान्त/निर्गत) इत्यादी अर्थांमध्ये पंचमी विभक्तीच्या शब्दासोबत समास बनवतात. නික්ඛන්තො කොසම්බියා නික්කොසම්බි. අස්යාදිවිධිම්හීති කිං, රුක්ඛං පති විජ්ජොතතෙ. कोसंबीतून बाहेर पडलेला तो 'निक्कोसम्बि'. 'अस्यादिविधिम्हि' (सुबन्त नसलेल्या विधीव्यतिरिक्त) असे का म्हटले आहे? (कारण तिथे समास होत नाही, जसे) 'रुक्खं पति विज्जोतते' (झाडाकडे चमकते). 14. චී ක්රියත්ථෙහි १४. 'ची' प्रत्ययान्त शब्द क्रियावाचक सुबन्त शब्दांसोबत एकार्थी (समास) होतात. චීපච්චයන්තො ක්රියත්ථෙහි ස්යාද්යන්තෙහි සහෙ+කත්ථො හොති. අමලීනං මලීනං කරිත්වාති විග්ගය්හ ‘‘අභූතතබ්භාවෙ කරා+ස+භූයොගෙ විකාරාචී’’ති චීපච්චයෙකතෙ ඉමිනා සමාසො. එත්ථ ච-කාරො ‘‘චී ක්රියත්ථෙහී’’ති විසෙසනත්ථො. ‘‘ප්යො වා ත්වාස්ස සමාසෙ’’ති ප්ය හොති, ප-කාරො ‘‘ප්යෙ සිස්සා’’ති විසෙසනත්ථො. මලිනීකරිය. 'ची' प्रत्ययान्त शब्द क्रियावाचक सुबन्त शब्दांसोबत एकार्थी (समास) होतात. 'अमलीन (स्वच्छ) वस्तूला मलीन करून' असा विग्रह करून 'अभूततद्भावे करासभूयोगे विकाराची' या सूत्राने 'ची' प्रत्यय केल्यावर या सूत्राने समास होतो. येथे 'ची क्रियत्थेहि' मधील 'च' कार हा विशेषणासाठी आहे. 'प्यो वा त्वास्स समासे' या सूत्राने 'प्य' होतो, आणि 'प्ये सिस्सा' मधील 'प' कार हा विशेषणासाठी आहे. 'मलिनीकरिय' (मलीन करून). 15. භූසනා+දරා+නාදරෙස්ව+ලං+සා+සාති १५. भूषण (अलंकार), आदर आणि अनादर या अर्थांमध्ये 'अलम्', 'स', 'सा' इत्यादी शब्द एकार्थी (समास) होतात. භූසනාදීස්ව+ත්ථෙස්ව+ල+මාදයො සද්දා එකත්ථා හොන්ති. අලං කරිත්වා සක්කරිත්වා අසක්කරිත්වාති විග්ගය්හ සමාසෙ [Pg.152] කතෙ ප්යෙ ච ‘‘සා සාධිකරා ච චරිච්චා’’ති චාදෙසො පරරූපඤ්ච. අලංකරිය, සක්කච්ච, අසක්කච්ච. भूषण इत्यादी अर्थांमध्ये 'अलम्' इत्यादी शब्द एकार्थी (समास) होतात. 'अलं करित्वा' (अलंकृत करून), 'सक्करित्वा' (सत्कार करून), 'असक्करित्वा' (अनादर करून) असा विग्रह करून समास केल्यावर आणि 'प्य' प्रत्यय झाल्यावर 'सा साधिकरा च चरिच्चा' या सूत्राने 'च' आदेश आणि पररूप होते. 'अलंकरिय' (अलंकृत करून), 'सक्कच्च' (आदरपूर्वक/सत्कार करून), 'असक्कच्च' (अनादरपूर्वक/अनादर करून). 16. අඤ්ඤෙචා+ති සුත්තෙන සමාසෙ කතෙ… එත්ථ යථා ද්වාරං විවරාති වුත්තෙ පකරණතො අග්ගල+මිති විඤ්ඤායති, එව+මිධාපි නිපාතපභාවෙ අඤ්ඤෙ චාති සාමඤ්ඤං චෙ+ති ආගමානුසාරෙන ලබ්භමානවිභත්යන්තපටිරූපනිපාතාව විඤ්ඤායන්ති. අග්ගතො භවිත්වා පුරොභුය්ය, අන්තරහිතො හුත්වා තිරොභූය, අන්තරධානං කත්වා තිරොකරිය, උරසි කත්වා උරසිකරිය, මනසි කත්වා මනසිකරිය, මජ්ඣෙ කත්වා මජ්ඣෙකරිය, තුණ්හී භවිත්වා තුණ්හී භූය. १६. ‘अञ्ञे च’ (इतरही) या सूत्राने समास केला असता... येथे ज्याप्रमाणे ‘दार उघडा’ असे म्हटले असता प्रकरणावरून (संदर्भावरून) ‘कडी/अडसर’ (अग्गल) असा अर्थ समजला जातो, त्याचप्रमाणे येथेही निपाताच्या प्रभावाने ‘अञ्ञे च’ असे सामान्यपणे म्हटले असता, आगम परंपरेनुसार प्राप्त होणारे विभक्ती-प्रत्ययान्त-सदृश निपातच समजले जातात. जसे की— पुढे होऊन (अग्गतो भवित्वा) -> पुरोभुय्य, अंतर्धान पावून (अंतरहितो हुत्वा) -> तिरोभूय, अंतर्धान करून (अंतरधानं कत्वा) -> तिरोकरिय, उरात धरून/स्वीकारून (उरसि कत्वा) -> उरसिकरिय, मनात धरून/मनन करून (मनसि कत्वा) -> मनसिकरिय, मध्ये ठेवून (मज्झे कत्वा) -> मज्झेकरिय, मौन धारण करून (तुण्ही भवित्वा) -> तुण्ही भूय. 17. වා+නෙක+ඤ්ඤත්ථෙ १७. ‘वाऽनेकञ्ञत्थे’ (किंवा अनेक पदे अन्य अर्थामध्ये). අනෙකං ස්යාද්යන්තං අඤ්ඤස්ස පදස්ස අත්ථෙ එකත්ථං වා හොති. अनेक सुबन्त (विभक्तीप्रत्ययान्त) पदे अन्य पदाच्या अर्थामध्ये पर्यायाने एकार्थी (समासयुक्त) होतात. පදන්තරස්ස යස්ස+ත්ථො, පධානං ලිඞ්ග+මස්ස ච; සමාසො සො+ය+මඤ්ඤත්ථො, බහුබ්බීහිපරව්හයො. ज्या समासात अन्य पदाचा अर्थ प्रधान असतो आणि त्याचे लिंगही (त्या अन्य पदाप्रमाणेच) असते, तो ‘अन्यपदार्थ’ समास ‘बहुव्रीहि’ या नावाने ओळखला जातो. සො ච නවවිධො ද්විපදො, භින්නාධිකරණො, තිපදො, න-නිපාතපුබ්බපදො, සහපුබ්බපදො, උපමානපුබ්බපදො, සඞ්ඛ්යොභයපදො, දිසන්තරාලත්ථො, බ්යතිහාරලක්ඛණො චාති. आणि तो (बहुव्रीहि समास) नऊ प्रकारचा आहे: द्विपद (तुल्याधिकरण), भिन्नाधिकरण, त्रिपद, न-निपातपूर्वपद, सहपूर्वपद, उपमानपूर्वपद, संक्योभयपद (संख्यापूर्वपद/संख्याउभयपद), दिशांतराळार्थ आणि व्यतिहारलक्षण. 1. තත්ථ ද්විපදො තුල්යාධිකරණො කම්මාදීසු ඡසු විභත්යත්ථෙසු භවති. १. त्यामध्ये द्विपद तुल्याधिकरण (बहुव्रीहि समास) द्वितीया इत्यादी सहा विभक्तींच्या अर्थांमध्ये होतो. (ක) තත්ථ දුතියත්ථෙ තාව-ආගතා සමණා ඉමං සඞ්ඝාරාමන්ති ආගතසමණො සඞ්ඝාරාමො. සො ච දුවිධො තග්ගුණා+තග්ගුණවසෙන. වුත්තඤ්හි – (क) त्यामध्ये प्रथम द्वितीयेच्या अर्थात— ‘आगता समणा इमं संघारामं’ (या संघारामात श्रमण आले आहेत) तो ‘आगतसमणो संघारामों’ (ज्या संघारामात श्रमण आले आहेत तो संघाराम). आणि तो तद्गुण व अतद्गुण या भेदाने दोन प्रकारचा आहे. कारण असे म्हटले आहे— තග්ගුණො+තග්ගුණො [Pg.153] චෙ+ති,සො සමාසො ද්විධා මතො. ‘तद्गुण आणि अतद्गुण’ या भेदाने तो समास दोन प्रकारचा मानला गेला आहे. තං යථා ‘නීයතං ලම්බ-කණ්ණො+’ ‘යං දිට්ඨසාගරො’. जसे की— ‘लम्बकण्णो’ (लांब कानांचा - आणला जातो) आणि ‘दिट्ठसागरो’ (ज्याने समुद्र पाहिला आहे). තෙසු යත්ථ විසෙසනභූතො අත්ථො අඤ්ඤපදත්ථග්ගහණෙන ගය්හති, සො තග්ගුණසංවිඤ්ඤාණො, යථා ‘ලම්බකණ්ණ+මානයා’ති. යත්ථ පන න ගය්හති, සො අතග්ගුණසංවිඤ්ඤාණො, යථා ‘බහුධන+මානයා’ති. त्यांच्यापैकी ज्या समासात अन्य पदाचा अर्थ ग्रहण करताना विशेषणभूत अर्थाचेही ग्रहण होते, तो ‘तद्गुणसंविज्ञान’ (बहुव्रीहि) होय; जसे— ‘लम्बकण्णं आनय’ (लांब कानांच्या माणसाला आण - येथे माणसासोबत त्याचे कानही येतात). परंतु जेथे विशेषणभूत अर्थाचे ग्रहण होत नाही, तो ‘अतद्गुणसंविज्ञान’ होय; जसे— ‘bahudhana+mānayā’ti ऐवजी ‘बहुधनं आनय’ (पुष्कळ धन असलेल्या माणसाला आण - येथे माणसाला आणताना त्याचे धन सोबत आणले जात नाही). ඉධ විසෙසනස්ස පුබ්බනිපාතො. එත්ථ ච ආගතසද්දො ච සමණසද්දො ච අත්තනො අත්ථෙ අට්ඨත්වා දුතියාවිභත්යත්ථභූතෙ සඞ්ඝාරාමසඞ්ඛාතෙ අඤ්ඤපදත්ථෙ වත්තන්ති, තතො සමාසෙනෙව කම්මත්ථස්ස අභිහිතත්තා පුන දුතියා න හොති. තථා ආගතසමණා සාවත්ථි, ආගතසමණං ජෙතවනං. පටිපන්නා අද්ධිකා යං පටිපන්නද්ධිකො පථො, අභිරූළ්හාව, ණිජායං නාවං සා අභිරූළ්හවාණිජා නාවා. येथे विशेषणाचा पूर्वनिपात (आधी प्रयोग) होतो. आणि येथे ‘आगत’ शब्द आणि ‘समण’ शब्द आपापल्या अर्थावर न राहता, द्वितीया विभक्तीच्या अर्थरूप असलेल्या ‘संघाराम’ या अन्य पदाच्या अर्थाचे प्रतिपादन करतात; त्यामुळे समासानेच कर्म-अर्थाचे (द्वितीयेच्या अर्थाचे) कथन झाल्यामुळे पुन्हा द्वितीया विभक्ती होत नाही. त्याचप्रमाणे— ‘आगतसमणा सावत्थी’ (ज्या श्रावस्तीमध्ये श्रमण आले आहेत ती श्रावस्ती), ‘आगतसमणं जेतवनं’ (ज्या जेतवनात श्रमण आले आहेत ते जेतवन). ‘पटिपन्ना अद्धिका यं’ तो ‘पटिपन्नद्धिको पथो’ (ज्या मार्गावर प्रवासी चालू लागले आहेत तो मार्ग). ‘अभिरूळ्हा वाणिजा यं नावं सा’ ती ‘अभिरूळ्हवाणिजा नावा’ (ज्या नौकेवर व्यापारी चढले आहेत ती नौका). (ඛ) තතියත්ථෙ-ජිතානි ඉන්ද්රියානි යෙන සො ජිතින්ද්රියො සමණො, එවං දිට්ඨධම්මො, පත්තධම්මො, කතකිච්චො. විජිතා මාරා අනෙනාති විජිතමාරො භගවා, පටිවිද්ධසබ්බධම්මො. කරණත්ථෙ-ඡින්නො රුක්ඛො යෙන සො ඡින්නරුක්ඛො ඵරසු. (ख) तृतीयेच्या अर्थात— ‘जितानि इन्द्रियानि येन सो’ तो ‘जितिन्द्रियो समणो’ (ज्याने इंद्रियांवर विजय मिळवला आहे असा श्रमण). याचप्रमाणे— ‘दिट्ठधम्मो’ (ज्याने धम्म पाहिला आहे तो), ‘पत्तधम्मो’ (ज्याने धम्म प्राप्त केला आहे तो), ‘कतकिच्चो’ (ज्याने आपले कर्तव्य पूर्ण केले आहे तो). ‘विजिता मारा अनेनाति’ तो ‘विजितमारो भगवा’ (ज्यांनी मारावर विजय मिळवला आहे असे भगवान), ‘पटिविद्धसब्बधम्मो’ (ज्यांनी सर्व धम्मांचे आकलन/साक्षात्कार केला आहे ते). करण अर्थात (साधन अर्थात)— ‘छिण्णो रुक्खो येन सो’ तो ‘छिण्णरुक्खो फरसु’ (ज्या कुऱ्हाडीने झाड तोडले गेले आहे ती कुऱ्हाड). (ග) චතුත්ථියත්ථෙ-දින්නො සුඞ්කො යස්ස සො දින්නසුඞ්කො රාජා, දින්නං භොජනං අස්සාති දින්නභොජනො. (ग) चतुर्थीच्या अर्थात— ‘दिण्णो सुङ्को यस्स सो’ तो ‘दिण्णसुङ्को राजा’ (ज्या राजाला कर/शुल्क दिले गेले आहे तो राजा). ‘दिण्णं भोजनं अस्साति’ तो ‘दिण्णभोजनो’ (ज्याला भोजन दिले गेले आहे तो). (ඝ) පඤ්චමියත්ථෙ-නිග්ගතා ජනා යස්මා සො නිග්ගතජනො ගාමො, නිග්ගතො අයො=සුඛං යස්මාති නිරයො, නික්කිලෙ- සො[Pg.154]. අපෙතං විඤ්ඤාණං අස්මාති අපෙතවිඤ්ඤාණො මතකායො, අපගතභයභෙරවො අරහා. (घ) पंचमीच्या अर्थात— ‘निग्गता जना यस्मा सो’ तो ‘निग्गतजनो gāmo’ (ज्या गावातून लोक निघून गेले आहेत ते गाव). ‘निग्गतो अयो (सुखं) यस्माति’ तो ‘निरयो’ (नरक - ज्यातून सुख निघून गेले आहे). ‘निक्किलेसो’ (ज्यातून क्लेश निघून गेले आहेत असा - निष्क्लेश). ‘अपेतं विञ्ञाणं अस्माति’ तो ‘अपेतविञ्ञाणो मतकायो’ (ज्या मृत शरीरातून विज्ञान/चेतना निघून गेली आहे ते मृत शरीर). ‘अपगतभयभेरवो अरहा’ (ज्यांच्यामधून भय आणि त्रास निघून गेले आहेत असे अरहंत). (ඞ) ඡට්ඨියත්ථෙ-ඡින්නා හත්ථා යස්ස සො ඡින්නහත්ථො. එවං පරිපුණ්ණසඞ්කප්පො ඛීණාසවො, වීතො රාගො අස්සාති වීතරාගො. ද්වෙ පදානි අස්සාති ද්විපදො, ද්විහත්ථො පටො. තෙවිජ්ජොති එත්ථ තිවිජ්ජො එවාති සකත්ථෙ ණො වුද්ධි ච. චතුප්පදො, පඤ්ච චක්ඛූනි අස්සාති පඤ්චචක්ඛු භගවා, ඡළභිඤ්ඤො, ‘‘ඝපස්සා’’දිනා රස්සත්තං. නවඞ්ගං සත්ථුසාසනං. දසබලො, අනන්තඤාණො. තීණි දස පරිමාණ+මෙසංති තිදසා දෙවා, ඉධ පරිමාණසද්දසන්නිමානතො දසසද්දො සඞ්ඛ්යානෙ වත්තතෙ. අයං පච්චයො එතෙසන්ති ඉදප්පච්චයා, උත්තරපදෙ ‘‘ඉමස්සි+දං වා’’ති ඉමස්ස ඉදං. කො පභවො අස්සාති කිං පභවො කායො. විගතං මලං අස්සාති විමලො, සුන්දරො ගන්ධො අස්සාති සුගන්ධං චන්දනං, එවං සුසීලො, සුමුඛො, කුච්ඡිතො ගන්ධො අස්සාති දුග්ගන්ධං කුණපං, දුම්මුඛො, දුට්ඨු මනො අස්සාති දුම්මනො, එවං දුස්සීලො. තපො එව ධනං අස්සාති තපොධනො. ඛන්තිසඞ්ඛාතං බලං අස්සාති ඛන්තිබලො. ඉන්දොති නාමං එතස්සාති ඉන්දනාමො. (ङ) षष्ठीच्या अर्थात— ‘छिन्ना हत्था यस्स सो’ तो ‘छिण्णहत्थो’ (ज्याचे हात कापले गेले आहेत तो). याचप्रमाणे— ‘परिपुण्णसङ्कप्पो’ (ज्याचे संकल्प पूर्ण झाले आहेत तो), ‘खीणासवो’ (ज्याचे आसव नष्ट झाले आहेत असा क्षीणासव), ‘वीतो रागो अस्साति’ तो ‘वीतरागो’ (ज्याचा राग/आसक्ती निघून गेली आहे असा वीतराग). ‘द्वे पदानि अस्साति’ तो ‘द्विपदो’ (दोन पाय असलेला - द्विपद), ‘द्विहत्थो पटो’ (दोन हात लांबीचे वस्त्र). ‘तेविज्जो’ येथे ‘तिविज्जो एव’ (तीन विद्या असलेला) या अर्थात स्वार्थे ‘ण’ प्रत्यय आणि वृद्धी झाली आहे. ‘चतुप्पदो’ (चार पाय असलेला), ‘पञ्च चक्खूनि अस्साति’ तो ‘पञ्चचक्खु भगवा’ (ज्यांना पाच चक्षू आहेत असे भगवान), ‘छळभिञ्ञो’ (सहा अभिज्ञा असलेले), ‘घपस्सा’ इत्यादी सूत्राने र्हस्वत्व झाले आहे. ‘नवङ्गं सत्थुसासनं’ (शास्त्यांचे नऊ अंग असलेले शासन). ‘दसबलो’ (दशबल - दहा बळे असलेले), ‘अनन्तञाणो’ (अनंत ज्ञान असलेले). ‘तीणि दसा परिमाणमेसंति’ ते ‘तिदसा देवा’ (ज्यांचे परिमाण तीन वेळा दहा म्हणजे तीस आहे असे देव - तिदश देव); येथे परिमाण शब्दाच्या सान्निध्यामुळे ‘दस’ शब्द संख्येच्या अर्थात वापरला आहे. ‘अयं पच्चयो एतेसंति’ ते ‘इदप्पच्चया’ (हेच ज्यांचे प्रत्यय/कारण आहे ते - इदंप्रत्ययता), उत्तरपदात ‘इमस्सिदं वा’ या सूत्राने ‘इम’ च्या जागी ‘इदं’ झाले आहे. ‘को पभवो अस्साति’ तो ‘किं पभवो कायो’ (ज्याचा उगम काय आहे असा हा काय/शरीर). ‘विगतं मलं अस्साति’ तो ‘विमलो’ (ज्याचा मळ निघून गेला आहे असा विमल/स्वच्छ). ‘सुन्दरो गन्धो अस्साति’ ते ‘सुगन्धं चन्दनं’ (ज्याला सुंदर सुगंध आहे असे सुगंधी चंदन). याचप्रमाणे— ‘सुसीलो’ (सुशील), ‘सुमुखो’ (सुमुख). ‘कुच्छितो गन्धो अस्साति’ ते ‘दुग्गन्धं कुणपं’ (ज्याला दुर्गंध आहे असे प्रेत), ‘दुम्मुखो’ (दुर्मुख), ‘दुट्ठु मनो अस्साति’ तो ‘दुम्मनो’ (ज्याचे मन वाईट/दुःखी झाले आहे तो दुर्मन). याचप्रमाणे— ‘दुस्सीलो’ (दुःशील). ‘तपो एव धनं अस्साति’ तो ‘तपोधनो’ (तप हेच ज्याचे धन आहे असा तपोधन). ‘खन्तिसङ्खातं बलं अस्साति’ तो ‘खन्तिबलो’ (क्षमा हेच ज्याचे बल आहे असा क्षमाबल). ‘इन्दोति नामं एतस्साति’ तो ‘इन्दनामो’ (ज्याचे नाव इंद्र आहे तो). ඡන්දජාතාදීසු විසෙසනවිසෙසිතබ්බානං යථිච්ඡිතත්තා උභයං පුබ්බං නිපතති, කමාතික්කමෙ පයොජනාභාවා. ජාතො ඡන්දො අස්සාති ජාතඡන්දො, එවං ඡන්දජාතො. සඤ්ජාතපීතිසොමනස්සො, පීතිසොමනස්සසඤ්ජාතො. මාසජාතො, ජාතමාසො. ඡින්නහත්ථො, හත්ථඡින්නො. ‘छन्दजात’ इत्यादी शब्दांमध्ये विशेषण आणि विशेष्य यांचा क्रम ऐच्छिक असल्यामुळे दोन्हीपैकी कोणतेही पद आधी येऊ शकते, कारण क्रमाचे उल्लंघन करण्यात काही विशेष प्रयोजन नाही. ‘जातो छन्दो अस्साति’ तो ‘जातछन्दो’ किंवा ‘छन्दजातो’ (ज्याला छंद/इच्छा उत्पन्न झाली आहे तो). ‘सञ्जातपीतिसोमनस्सो’ किंवा ‘पीतिसोमनस्ससञ्जातो’ (ज्याला प्रीती आणि सोमनस्य उत्पन्न झाले आहे तो). ‘मासजातो’ किंवा ‘जातमासो’ (एक महिन्याचा झालेला). ‘छिण्णहत्थो’ किंवा ‘हत्थछिण्णो’ (ज्याचा हात कापला गेला आहे तो). දීඝාජඞ්ඝා [Pg.155] අස්සාති දීඝජඞ්ඝො, එත්ථ පුම්භාවො, ‘‘ඝපස්සා’’දිනා රස්සො ච. තථා පහූතජිව්හො. මහන්තී පඤ්ඤා අස්සාති මහාපඤ්ඤො. ‘‘ඉත්ථියං භාසිතපුමි+ත්ථී පුමෙ+වෙ+කත්ථෙ’’ති වීපච්චයාභාවෙන්තස්ස ටාදෙසො රස්සත්තඤ්ච. ඉත්ථියන්ති කිං, ඛමාධනො. භාසිතපුමාති කිං, සද්ධාධුරො. පඤ්ඤාපකතිකො, පඤ්ඤාවිසුද්ධිකො, එත්ථ ‘‘ල්ත්විත්ථියූහි කො’’ති කො. ගණ්ඩීවධන්වාති පකතන්තරෙන සිද්ධං. ‘दीघा जङ्घा अस्साति’ तो ‘दीघजङ्घो’ (ज्याचे पाय लांब आहेत तो); येथे पुंभाव (पुल्लिंगी रूप) आणि ‘घपस्सा’ इत्यादी सूत्राने र्हस्वत्व झाले आहे. त्याचप्रमाणे— ‘पहूतजिव्हो’ (ज्याची जीभ मोठी/विस्तीर्ण आहे तो). ‘महन्ती पञ्ञा अस्साति’ तो ‘महापञ्ञो’ (ज्याची प्रज्ञा महान आहे असा महाप्रज्ञ). ‘इत्थियं भासितपुमित्थी पुमेवेकत्थे’ या सूत्राने ‘वी’ प्रत्ययाच्या अभावी ‘टा’ आदेश आणि र्हस्वत्व होते. ‘इत्थियं’ (स्त्रीलिंगात) असे का म्हटले? ‘खमाधनो’ (क्षमा हेच ज्याचे धन आहे तो). ‘भासितपुमा’ (पुल्लिंगात बोलले गेलेले) असे का म्हटले? ‘सद्धाधुरो’ (श्रद्धा हीच ज्याची धुरा आहे तो). ‘पञ्ञापकतिको’ (स्वभावाने प्रज्ञावान), ‘पञ्ञाविसुद्धिको’ (प्रज्ञेने विशुद्ध असलेला); येथे ‘ल्त्वित्थियूहि को’ या सूत्राने ‘क’ प्रत्यय झाला आहे. ‘गण्डीवधन्वा’ हे अन्य प्रक्रियेने सिद्ध होते. නානා=ප්පකාරා දුමා නානාදුමා, නානාදුමෙහි පතිතානි නානාදුමපතිතානි, නානාදුමපතිතානි ච තානි පුප්ඵානි චෙති නානාදුමපතිතපුප්ඵානි, තෙහි වාසිතා නානාදුමපතිතපුප්ඵවාසිතා, නානාදුමපතිතපුප්ඵවාසිතාසානුයස්සසො නානාදුමපතිතපුප්ඵවාසිතසානු පබ්බතො, අයං විසෙසන+අමාදිසමාසගබ්භො තුල්යාධිකරණඅඤ්ඤපදත්ථො. ‘नाना-प्पकारा दुमा’ ते ‘नानादुमा’ (विविध प्रकारचे वृक्ष). ‘नानादुमेहि पतितानि’ ते ‘नानादुमपतितानि’ (विविध वृक्षांवरून पडलेली). ‘नानादुमपतितानि च तानि पुप्फानि च’ ते ‘नानादुमपतितपुप्फानि’ (विविध वृक्षांवरून पडलेली फुले). ‘तेहि वासिता’ ती ‘नानादुमपतितपुप्फवासिता’ (त्या फुलांनी सुवासित झालेली). ‘नानादुमपतितपुप्फवासिता सानू यस्स सो’ तो ‘नानादुमपतितपुप्फवासितसानू पब्बतो’ (ज्याचे पठार विविध वृक्षांवरून पडलेल्या फुलांनी सुवासित झाले आहे असा पर्वत). हा विशेषण इत्यादी समासांना उदरात सामावून घेणारा (गर्भित असलेला) तुल्याधिकरण अन्यपदार्थ (बहुव्रीहि) समास आहे. (ච) සත්තම්යත්ථෙ-සම්පන්නානි සස්සානි යස්මිං සො සම්පන්නසස්සො ජනපදො. සුලභො පිණ්ඩො ඉමස්මින්ති සුලභපිණ්ඩො දෙසො. ආකිණ්ණා මනුස්සා යස්සං සා ආකිණ්ණමනුස්සා රාජධානී. බහවො තාපසා එතස්මින්ති බහුතාපසො අස්සමො. උපචිතං මංසලොහිතං අස්මින්ති උපචිතමංසලොහිතං සරීරං. බහවො සාමිනො අස්මින්ති බහුසාමිකං නගරං, බහූ නදියො අස්මින්ති බහුනදිකො, ඊකාරන්තත්තා කපච්චයො. එවං බහුජම්බුකං වනං, බහවො කත්තාරො අස්මිං අස්ස වාති බහුකත්තුකො දෙසො, එවං බහුභත්තුකො, ‘‘ල්ත්විත්ථියූහි කො’’ති කො. (च) सप्तमीच्या अर्थात— ‘सम्पन्नानि सस्सानी यस्मिं सो’ तो ‘सम्पन्नसस्सो जनपदो’ (ज्या जनपदात पिके समृद्ध आहेत तो जनपद). ‘सुलभो पिण्डो इमस्मिन्ति’ तो ‘सुलभपिण्डो देसो’ (ज्या देशात भिक्षा सहज मिळते तो देश). ‘आकिण्णा मनुस्सा यस्सं सा’ ती ‘आकिण्णमनुस्सा राजधानी’ (ज्या राजधानीत लोकांची दाटी/गर्दी आहे ती राजधानी). ‘बहवो तापसा एतस्मिन्ति’ तो ‘बहुतापसो अस्समो’ (ज्या आश्रमात अनेक तपस्वी आहेत तो आश्रम). ‘उपचितं मंसलोहितं अस्मिन्ति’ ते ‘उपचितमंसलोहितं सरीरं’ (ज्या शरीरात मांस आणि रक्त वाढले/संचित झाले आहे ते शरीर). ‘बहवो सामिनो अस्मिन्ति’ ते ‘बहुसामिकं नगरं’ (ज्या नगरात अनेक स्वामी/मालक आहेत ते नगर). ‘बहू नदियो अस्मिन्ति’ तो ‘बहुनदिको’ (ज्यात अनेक नद्या आहेत तो देश - येथे ‘ई’कारान्त असल्यामुळे ‘क’ प्रत्यय झाला आहे). याचप्रमाणे— ‘बहुजम्बुकं वनं’ (ज्या वनात अनेक कोल्हे आहेत ते वन). ‘बहवो कत्तारो अस्मिं अस्स वाति’ तो ‘बहुकत्तुको देसो’ (ज्या देशात अनेक कर्ते आहेत तो देश). याचप्रमाणे— ‘बहुभत्तुको’ (ज्याला अनेक भक्त/सेवक आहेत तो); येथे ‘ल्त्वित्थियूहि को’ या सूत्राने ‘क’ प्रत्यय झाला आहे. 2. භින්නාධිකරණො [Pg.156] යථා-එකරත්තිං වාසො අස්සාති එකරත්තිවාසො, සමානෙන ජනෙන සද්ධිං වාසො අස්සාති සමානවාසො පුරිසො. උභතො බ්යඤ්ජන+මස්සාති උභතොබ්යඤ්ජනකො, විභත්යලොපො ‘‘වා+ඤ්ඤතො’’ති කො ච, ඡත්තං පාණිම්හි අස්සාති ඡත්තපාණි, එවං දණ්ඩපාණි, සත්ථපාණි, වජිරපාණි, ඛග්ගහත්ථො, පත්තහත්ථො, දානෙ අජ්ඣාසයො අස්සාති දානජ්ඣාසයො දානාධිමුත්තිකො, බුද්ධභත්තිකො, සද්ධම්මගාරවො ඉච්චාදි. २. भिन्न-अधिकरण (बहुव्रीहि समास) जसे की - 'एका रात्रीचा वास (मुक्काम) ज्याचा आहे तो' = 'एकरत्तिवासो' (एका रात्रीचा मुक्काम असलेला). 'समान (सारख्याच) माणसासोबत ज्याचा वास आहे तो पुरुष' = 'समानवासो पुरिसो' (समान वास असलेला पुरुष). 'दोन्ही व्यंजने (स्त्री-पुरुष दोन्ही जननेंद्रिये) ज्याला आहेत तो' = 'उभतोब्यञ्जनको' (उभयव्यंजनक), विभक्तीचा लोप आणि 'वा+ञ्ञतो' या सूत्राने 'क' प्रत्यय होतो. 'ज्याच्या हातात छत्री आहे तो' = 'छत्तपाणि' (छत्रपाणि). याचप्रमाणे 'दण्डपाणि' (हातात काठी असलेला), 'सत्थपाणि' (हातात शस्त्र असलेला), 'vajirapāṇi' -> 'वजिरपाणि' (हातात वज्र असलेला), 'खग्गहत्थो' (हातात तलवार असलेला), 'पत्तहत्थो' (हातात पात्र असलेला). 'दानामध्ये ज्याचा आशय (इच्छा) आहे तो' = 'दानज्झासयो' (दान-आशयी), 'दानाधिमुत्तिको' (दानात प्रवृत्त असलेला), 'बुद्धभत्तिको' (बुद्धभक्त), 'सद्धम्मगारवो' (सद्धम्माचा आदर करणारा) इत्यादी. 3. තිපදො යථා-පරක්කමෙනා+ධිගතා සම්පදා යෙහි තෙ පරක්කමාධිගතසම්පදා මහාපුරිසා. එවං ධම්මාධිගතභොගා. ඔනීතො පත්තතො පාණි යෙන සො ඔනීතපත්තපාණි. සීහස්ස පුබ්බද්ධමිව කායො අස්සාති සීහපුබ්බද්ධකායො. මත්තා බහවො මාතඞ්ගා අස්මින්ති මත්තබහුමාතඞ්ගං වනං. ३. त्रिपद (तीन पदांचा समास) जसे की - 'पराक्रमाने ज्यांनी संपत्ती (यश) प्राप्त केली आहे ते' = 'परक्कmaधिगतसम्पदा महापुरिसा' (पराक्रमाने संपत्ती प्राप्त केलेले महापुरुष). याचप्रमाणे 'धम्माधिगतभोगा' (धर्माने भोग प्राप्त केलेले). 'ज्याने पात्रातून आपला हात काढून घेतला आहे तो' = 'ओनीतपत्तपाणि' (पात्रातून हात काढलेला). 'सिंहाच्या पूर्वार्धासारखा (पुढच्या भागासारखा) ज्याचा काय (देह) आहे तो' = 'सीहपुब्बद्धकायो' (सिंहपूर्वार्धकाय). 'ज्या वनात अनेक मत्त हत्ती आहेत ते' = 'मत्तबहुमातङ्गं वनं' (मत्त हत्तींनी युक्त असलेले वन). 4. න-නිපාතපුබ්බපදො යථා-නත්ථි එතස්ස සමොති අස්සමො, ‘‘ට නඤස්සා’’ති නස්ස ටො. එවං අප්පටිපුග්ගලො, අපුත්තකො, අහෙතුකො, කපච්චයො, එව+මුපරිපි ඤෙය්යං. නත්ථි සංවාසො එතෙනාති අසංවාසො, න විජ්ජතෙ වුට්ඨි එත්ථාති අවුට්ඨිකො ජනපදො, අභික්ඛුකො විහාරො. එවං අනුත්තරො ‘‘අන සරෙ’’ති අන, එවං අනන්තං, අනාසවො. ४. 'न' निपात पूर्वपद असलेला (नञ्-बहुव्रीहि) जसे की - 'ज्याला कोणी समान नाही तो' = 'अस्समो' (असम), 'ट नञस्सा' या सूत्राने 'न' चा 'अ' होतो. याचप्रमाणे 'अप्पटिपुग्गलो' (अप्रतिपुद्गल - ज्याच्या तोडीचा दुसरा माणूस नाही), 'अपुत्तको' (पुत्र नसलेला), 'अहेतुको' (हेतू नसलेला), 'क' प्रत्यय लागतो, हे पुढेही असेच समजावे. 'ज्याच्याशी संवास (एकत्र राहणे) नाही तो' = 'असंवासो' (असंवास्य). 'जिथे पाऊस पडत नाही तो' = 'अवुट्ठिको जनपदो' (अनावृष्टी असलेला जनपद), 'भिक्खू नसलेला विहार' = 'अभिक्खुको विहारो'. याचप्रमाणे 'अनुत्तरो' (अनुत्तर - सर्वोत्तम), 'अन सरे' या सूत्राने 'अन' होतो, याचप्रमाणे 'अनन्तं' (अनंत), 'अनासवो' (आसव नसलेला). 5. පඨමාත්ථෙ සහපුබ්බපදො යථා-සහ හෙතුනා වත්තති සො සහෙතුකො සහෙතු වා, ‘‘සහස්ස සො+ඤ්ඤත්ථෙ’’ති සහස්ස සො, එවං සප්පීතිකා, සප්පච්චයා, සකිලෙසො, සඋපාදානො, සපරිවාරො සහපරිවාරො වා, සහ මූලෙන උද්ධටො සමූලුද්ධටො රුක්ඛො. ५. प्रथमा विभक्तीच्या अर्थात 'सह' पूर्वपद असलेला जसे की - 'जो हेतूने युक्त आहे तो' = 'सहेतुको' किंवा 'सहेतु' (सहेतुक). 'सहस्स सो+ञ्ञत्थे' या सूत्राने 'सह' चा 'स' होतो. याचप्रमाणे 'सप्पीतिका' (प्रीतीने युक्त), 'सप्पच्चया' (प्रत्ययाने/कारणाने युक्त), 'सकिलेसो' (क्लेशांनी युक्त), 'सउपादानो' (उपादानाने युक्त), 'सपरिवारो' किंवा 'सहपरिवारो' (परिवारासह). 'मुळासकट उपटून टाकलेला वृक्ष' = 'समूलुद्धटो रुक्खो' (समूलोद्धृत वृक्ष). 6. උපමානොපමෙය්යජොතකඉවයුත්තො [Pg.157] උපමානපුබ්බපදො පඨමාය යථා-නිග්රොධො ඉව පරිමණ්ඩලො යො සො නිග්රොධපරිමණ්ඩලො. සඞ්ඛො විය පණ්ඩරො අයන්ති සඞ්ඛපණ්ඩරො, කාකො විය සූරො අයන්ති කාකසූරො. චක්ඛු ඉව භූතො අයං පරමත්ථදස්සනතොති චක්ඛුභූතො භගවා. එවං අත්ථභූතො, ධම්මභූතො, බ්රහ්මභූතො, අන්ධභූතො. මුඤ්ජපබ්බජමිව භූතා අයං මුඤ්ජපබ්බජභූතා කුදිට්ඨි. තන්තාකුලමිව ජාතා අයංති තන්තාකුලජාතා. ६. उपमान आणि उपमेय दर्शवणाऱ्या 'इव' (सारखा) शब्दाने युक्त असलेला, प्रथमा विभक्तीतील उपमान-पूर्वपद जसे की - 'जो वडाच्या झाडासारखा परिमंडळ (गोलाकार) आहे तो' = 'निग्रोधपरिमण्डलो' (वटपरिमंडल). 'शंखासारखा पांढरा असलेला हा' = 'सङ्खपण्डरो' (शंखपांढरा). 'कावळ्यासारखा शूर असलेला हा' = 'काकसूरो' (काकशूर). 'परमार्थ दर्शवत असल्यामुळे जे डोळ्यासारखे झाले आहेत ते' = 'चक्खुभूतो भगवा' (चक्षुभूत भगवान). याचप्रमाणे 'अत्थभूतो' (अर्थभूत), 'धम्मभूतो' (धर्मभूत), 'ब्रह्मभूतो' (ब्रह्मभूत), 'अन्धभूतो' (अंधभूत). 'मुंज आणि पब्बज गवत एकत्र झाल्यासारखी झालेली ही' = 'मुञ्जपब्बजभूता कुदिट्ठी' (मुंजपब्बजभूत कुदृष्टी). 'कोळ्याच्या जाळ्यासारखी गुंतागुंतीची झालेली ही' = 'तन्ताकुलजाता' (तंतुव्याकुल झालेली). ඡට්ඨ්යත්ථෙ-සුවණ්ණස්ස වණ්ණො විය වණ්ණො යස්ස සො සුවණ්ණවණ්ණො භගවා, මජ්ඣපදලොපො. නාගස්ස ගති විය ගති අස්සාති නාගගති. එවං සීහගති, නාගවික්කමො, සීහවික්කමො, සීහහනු. එණිස්ස විය ජඞ්ඝා අස්සාති එණිජඞ්ඝො. බ්රහ්මුනො විය සරො අස්සාති බ්රහ්මස්සරො. षष्ठी विभक्तीच्या अर्थात - 'ज्यांचा वर्ण सोन्याच्या वर्णासारखा आहे ते' = 'सुवण्णवण्णो भगवा' (सुवर्णवर्णीय भगवान), येथे मध्यमपदलोप होतो. 'ज्याची गती हत्तीच्या गतीसारखी आहे तो' = 'नागगती' (नागगती). याचप्रमाणे 'सीहगती' (सिंहगती), 'नागविक्कमो' (नागविक्रम), 'सीहविक्कमो' (सिंहविक्रम), 'सीहहनु' (सिंहहनु - सिंहासारखा जबडा असलेला). 'हरिणीच्या जंघेसारखी (पिंडरीसारखी) ज्याची जंघा आहे तो' = 'एणिजङ्घो' (एणिजंघ). 'ब्रह्मदेवासारखा ज्याचा स्वर आहे तो' = 'ब्रह्मस्सरो' (ब्रह्मस्वर). 7. වාසද්දත්ථෙ සඞ්ඛ්යාඋභයපදො යථා-ද්වෙ වා තයො වා ද්වත්ති, ද්වත්තයො ච තෙ පත්තා චෙති ද්වත්තිපත්තා, ‘‘තිස්ව’’ඉති තිසද්දෙ පරෙ ද්විස්ස අත්තං. ද්වීහං වා තීහං වා ද්වීහතීහං, ඡ වා පඤ්ච වා වාචා ඡප්පඤ්චවාචා, එවං සත්තට්ඨමාසා, එකයොජනද්වියොජනානි. ७. 'वा' (किंवा) या अर्थातील दोन्ही पदे संख्या असलेले जसे की - 'दोन किंवा तीन' = 'द्वत्ति' (दोन-तीन), 'दोन किंवा तीन आणि ते पात्र' = 'द्वत्तिपत्ता' (दोन-तीन पात्रे), 'तिस्व' या सूत्राने 'ति' शब्द पुढे असताना 'द्वि' चा 'द्व' होतो. 'दोन दिवस किंवा तीन दिवस' = 'द्वीहतीहं' (दोन-तीन दिवस). 'सहा किंवा पाच वाचा (शब्दांचे वाक्य)' = 'छप्पञ्चवाचा' (पाच-सहा शब्द). याचप्रमाणे 'सत्तट्ठमासा' (सात-आठ महिने), 'एकयोजनद्वियोजनानि' (एक-दोन योजने). 8. දිසන්තරාලත්ථො යථා-පුබ්බස්සා ච දක්ඛිණස්සා ච දිසාය යදන්තරාලං සා පුබ්බදක්ඛිණා විදිසා. එත්ථ – ८. दिशांच्या दरम्यानचा भाग (उपदिशा) या अर्थात जसे की - 'पूर्व आणि दक्षिण या दिशांच्या मधील जो अंतराळ (भाग) आहे ती' = 'पुब्बदक्खिणा विदिसा' (आग्नेय उपदिशा). येथे - 69. සබ්බාදයො වුත්තිමත්තෙති ६९. 'सब्बाद्यो वृत्तिमात्रे...' (सर्व इत्यादी शब्द केवळ वृत्तीमध्ये...) ඉත්ථිවාචකා සබ්බාදයො වුත්තිමත්තෙ පුමෙව හොන්ති. එවං පුබ්බුත්තරා, අපරදක්ඛිණා, පච්ඡිමුත්තරා. පුබ්බා ච සා දක්ඛිණා චෙති වා. स्त्रीलिंगी वाचक असलेले 'सब्ब' इत्यादी शब्द केवळ वृत्तीमध्ये (समासात) पुल्लिंगीच होतात. याचप्रमाणे 'पुब्बुत्तरा' (ईशान्य), 'अपरदक्खिणा' (नैऋत्य), 'पच्छिमुत्तरा' (वायव्य). किंवा 'जी पूर्व आहे आणि जी दक्षिण आहे ती' (असाही विग्रह होतो). 9. බ්යතිහාරලක්ඛණො [Pg.158] යථා – ‘‘තත්ථ ගහෙත්වා තෙන පහරිත්වා යුද්ධෙ සරූපං’’ති සුත්තෙන සමාසෙ කතෙ කෙසෙසු ච කෙසෙසු ච ගහෙත්වා යුද්ධං පවත්තං කෙසාකෙසී, දණ්ඩෙහි ච දණ්ඩෙහි ච පහරිත්වා යුද්ධං පවත්තං දණ්ඩාදණ්ඩීති හොති. එත්ථ ච ‘‘චී වීතිහාරෙ’’ති චීපච්චයෙ ‘‘චිස්මිං’’ති ආකාරො, එවං මුට්ඨාමුට්ඨී. ९. व्यतिहार (परस्पर क्रिया) लक्षण असलेला जसे की - 'तत्थ गहेत्वा तेन पहरित्वा युद्धे सरूपं' या सूत्राने समास केल्यावर, 'केसांना आणि केसांना पकडून जे युद्ध झाले ते' = 'केसाकेसी' (केसाकेशी - एकमेकांचे केश पकडून केलेले युद्ध). 'काठ्यांनी आणि काठ्यांनी मारून जे युद्ध झाले ते' = 'दण्डादण्डी' (दंडादंडी - एकमेकांना काठ्यांनी मारून केलेले युद्ध) असे होते. आणि येथे 'ची वीतिहारे' या सूत्राने 'ची' प्रत्यय लागून 'चिस्मिं' या सूत्राने आकार (दीर्घ 'आ') होतो, याचप्रमाणे 'मुट्ठामुट्ठी' (मुठीमुठीने मारामारी). සොභණො ගන්ධො සුගන්ධො, සො අස්ස අත්ථීති සුගන්ධීහි අත්ථිඅත්ථෙ ඊපච්චයෙන සිද්ධං. යස්මා ච භද්දාය කාපිලානියා අපදානෙ ‘‘පුනො පත්තං ගහෙත්වාන, සොධයිත්වා සුගන්ධිනා’’ති වුත්තං, තස්මා වුත්තියං ඉකාරන්තස්ස අභාවදීපනත්ථං ‘‘සුගන්ධි දුග්ගන්ධීති පයොගා න දිස්සතී’’ති වුත්තං. සුගන්ධිනාති එකවචනෙ රස්සො. 'सुंदर (चांगला) गंध तो सुगंधी, तो ज्याच्याजवळ आहे तो' = 'सुगन्धी' (सुगंधी), हे अस्ति-अर्थात (असण्याच्या अर्थात) 'ई' प्रत्ययाने सिद्ध होते. आणि ज्याअर्थी भद्दा कापिळानीच्या अपदानात 'पुन्हा पात्र घेऊन, सुगंधी द्रव्याने स्वच्छ करून' असे म्हटले आहे, त्याअर्थी वृत्तीमध्ये इकारान्त शब्दाचा अभाव दर्शवण्यासाठी 'सुगन्धि दुग्गन्धी असे प्रयोग दिसत नाहीत' असे म्हटले आहे. 'सुगन्धिना' यामध्ये एकवचनात र्हस्व होतो. 19. චත්ථෙ १९. 'च' (आणि) च्या अर्थात. අනෙකංස්යාද්යන්තං චත්ථෙ එකත්ථං වා හොති. සමුච්චයො අන්වාචයො ඉතරීතරයොගො සමාහාරොති චසද්දස්ස අත්ථො චතුබ්බිධො. अनेक पदे शेवटी असलेला 'च' च्या अर्थातील समास एकार्थी होतो. समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग आणि समाहार असे 'च' या शब्दाचे चार प्रकारचे अर्थ आहेत. තත්ථ සමුච්චයා+න්වාචයෙසු සමාසො න හොති, ක්රියාසාපෙක්ඛතාය නාමානං අඤ්ඤමඤ්ඤං අයුත්තත්ථත්තා, යථා-චීවරං පිණ්ඩපාතඤ්ච පච්චයං සයනාසනං අදාසි, දානඤ්ච දෙහි, සීලඤ්චරක්ඛාහි. ඉතරීතරයොගෙ සමාහාරෙ ච අඤ්ඤමඤ්ඤාපෙක්ඛත්තා සමාසො. त्यापैकी समुच्चय आणि अन्वाचय यामध्ये समास होत नाही, कारण क्रियापदाच्या अपेक्षेमुळे नामांचा परस्परांशी संबंध जुळत नाही. जसे की - 'चीवर आणि पिंडपात, शयनासन हा प्रत्यय (साधन) दिला', 'दानही दे आणि शीलही राख'. इतरेतरयोग आणि समाहार यामध्ये मात्र परस्परांच्या अपेक्षेमुळे समास होतो. උභයත්ථපධානෙ චත්ථෙ කථ+මෙකත්ථීභාවො සම්භවෙ+ති චෙ, වුත්තඤ්හි – दोन्ही अर्थ प्रधान असलेल्या 'च' च्या अर्थात एकार्थीभाव कसा संभवतो? असे विचारल्यास, म्हटलेच आहे की - සප්පධානාපි යත්ථ+ත්ථා, මිථො සාපෙක්ඛතා ඉව; ක්රියාසම්බන්ධසාමඤ්ඤා, චත්ථෙ+කත්ථං ත+දුච්චතෙති. 'जिथे दोन्ही अर्थ प्रधान असूनही परस्परांवर अवलंबून असल्यासारखे असतात, आणि क्रियापदाशी त्यांचा संबंध समान असतो, तिथे 'च' च्या अर्थात एकार्थीभाव होतो असे म्हटले जाते.' යස්මා [Pg.159] එකත්ථීභාවෙපි සතීයසතීයත්ථෙ පධානං, තස්මා ඉදං වුච්චතෙ – ज्याअर्थी एकार्थीभाव असतानाही विद्यमान आणि अविद्यमान अर्थांमध्ये प्रधानता असते, त्याअर्थी हे म्हटले जाते - න+ඤ්ඤමඤ්ඤං විසෙසෙන්ති, චත්ථෙ අත්ථා පදානිව; සත්ථවුත්යී අතො තෙසං, පධානත්ථං+භියුජ්ජතෙ. 'ज्याप्रमाणे पदे परस्परांचे विशेषण बनत नाहीत, त्याचप्रमाणे 'च' च्या अर्थातील अर्थही परस्परांचे विशेषण बनत नाहीत. म्हणून त्यांच्या शब्दवृत्तीमध्ये प्रधान अर्थाचाच संबंध जोडला जातो.' ඉතරීතරයොගො ච, සමාහාරොත්ය+යං ද්විධා; සමාසො තු ඉමං අඤ්ඤෙ, ජානන්තෙ ද්වන්දනාමතො. 'इतरेतरयोग आणि समाहार अशा दोन प्रकारचा हा समास आहे; इतर विद्वान याला 'द्वंद्व' या नावाने ओळखतात.' ඉතරීතරයොගස්මිං+වයවත්ථස්ස සම්භවො; සමුදායතිරොභාවො, පරංව ලිඞ්ග+මස්ස ච. 'इतरेतरयोगामध्ये अवयवांच्या अर्थाचे अस्तित्व स्पष्ट असते आणि समुदायाचा (समूहाचा) तिरोभाव होतो, तसेच याचे लिंग उत्तरपदाप्रमाणे (शेवटच्या पदाप्रमाणे) असते.' සමුදායබ්භවො යස්මිං+වයවා ච තිරොහිතා; සමාහාරොත්ය+යං චත්ථො, සො ච හොති නපුංසකෙ. 'ज्यामध्ये समुदायाचे अस्तित्व स्पष्ट असते आणि अवयव तिरोहित (अदृश्य) होतात, तो 'च' चा अर्थ 'समाहार' होय, आणि तो नपुंसकलिंगात असतो.' ඉතරීතරයොගො යථා-සාරිපුත්තො ච මොග්ගල්ලානො ච සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානා, භො සාරිපුත්තමොග්ගල්ලානා ඉච්චාදි. අවයවපධානත්තා බහුවචනමෙව. සමණා ච බ්රාහ්මණා ච සමණබ්රාහ්මණා, එවං බ්රාහ්මණගහපතිකා, ඛත්තියබ්රාහ්මණා, දෙවමනුස්සා, චන්දිමසූරියා. इतरेतरयोग जसे की - 'सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान' = 'सारिपुत्तमोग्गल्लाना' (सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान), 'हे सारिपुत्त आणि मोग्गल्लान!' इत्यादी. अवयव प्रधान असल्यामुळे येथे बहुवचनच होते. 'श्रमण आणि ब्राह्मण' = 'समणब्राह्मणा' (श्रमण-ब्राह्मण). याचप्रमाणे 'ब्राह्मणगहपतिका' (ब्राह्मण आणि गृहपती), 'खत्तियब्राह्मणा' (क्षत्रिय आणि ब्राह्मण), 'देवमनुस्सा' (देव आणि मनुष्य), 'चन्दिमसुुरिया' (चंद्र आणि सूर्य). 64. විජ්ජායොනිසම්බන්ධීන+මා තත්ර චත්ථෙති ६४. 'विद्या आणि योनी (जन्म) संबंधितांच्या बाबतीत 'च' च्या अर्थात 'आ' होतो.' විජ්ජාසම්බන්ධීනං යොනිසම්බන්ධීනඤ්ච චත්ථෙ ආ හොතීති උකාරස්ස ආ, හොතා ච පොතා ච හොතාපොතාරො. එවං මාතාපිතරො. विद्यासंबंधी आणि योनिसंबंधी शब्दांच्या बाबतीत 'च' च्या अर्थात 'आ' होतो, म्हणजेच उकाराचा 'आ' होतो. जसे की - 'होता आणि पोता' = 'होतापोतारो'. याचप्रमाणे 'मातापितरो' (माता आणि पिता). 65. පුත්තෙති ६५. 'पुत्त' शब्द उत्तरपदी असताना. පුත්තෙ උත්තරපදෙ පිතාදීන+මා හොති චත්ථෙ. පිතා ච පුත්තො ච පිතාපුත්තා, එවං මාතාපුත්තා. 'पुत्त' शब्द उत्तरपदी (शेवटी) असताना 'च' च्या अर्थात पिता इत्यादी शब्दांच्या शेवटी 'आ' होतो. जसे की - 'पिता आणि पुत्र' = 'पितापुत्ता' (पिता-पुत्र). याचप्रमाणे 'मातापुत्ता' (माता-पुत्र). 78. ජායාය ජයං පතිම්හි ७८. 'पति' शब्द पुढे असताना 'जाया' शब्दाचा 'जय' होतो. පතිම්හි [Pg.160] පරෙ ජායාය ජයං හොති. ජායා ච පති ච ජයම්පතයො. ජානිපතීති පකතන්තරෙන සිද්ධං, ජානි ච පති ච ජානිපති. එවං ජම්පති දම්පතීති. 'पति' शब्द पुढे असताना 'जाया' शब्दाचा 'जय' होतो. जसे की - 'जाया (पत्नी) आणि पति' = 'जयम्पतयो' (जयापती/पती-पत्नी). 'जानिपति' हे दुसऱ्या रूपाने सिद्ध होते, 'जानी आणि पति' = 'जानिपति'. याचप्रमाणे 'जम्पति' (जंपती), 'दम्पती' (दंपती) असे होते. ක්වචි අප්පසරං පුබ්බං නිපතති, යථා-චන්දො ච සූරියො ච චන්දසූරියා, නිගමා ච ජනපදා ච නිගමජනපදා. එවං සුරාසුරගරුඩමනුජභුජගගන්ධබ්බා. काही ठिकाणी कमी स्वर असणारा शब्द आधी येतो, जसे - 'चन्दो च सूरियो च' = 'चन्दसूरिया' (चंद्र आणि सूर्य), 'निगमा च जनपदा च' = 'निगमजनपदा' (निगम आणि जनपद). याचप्रमाणे 'सुरासुरगरुडमनुजभुजगगन्धब्बा' (सूर, असुर, गरुड, मनुज, भुजंग आणि गंधर्व). ක්වචි ඉවණ්ණු+වණ්ණන්තානං පුබ්බනිපාතො, යථා-අග්ගිධුමා, ගතිබුද්ධිභුජපඨහරකරසයා, ධාතුලිඞ්ගානි. काही ठिकाणी 'इ' किंवा 'उ' शेवटी असणाऱ्या शब्दांचा पूर्वपात (आधी येणे) होतो, जसे - 'अग्गिधुमा' (अग्नी आणि धूर), 'गतिबुद्धिभुजपटहहरकरसया', 'धातुलिङ्गानि' (धातू आणि लिंग). ක්වචි සරාදිඅකාරන්තං පුබ්බං නිපතති, යථා-අත්ථධම්මා, අත්ථසද්දා, සද්දත්ථා වා. काही ठिकाणी स्वराने सुरू होणारे आणि अकारान्त असणारे शब्द आधी येतात, जसे - 'अत्थधम्मा' (अर्थ आणि धम्म), 'अत्थसद्दा' (अर्थ आणि शब्द) किंवा 'सद्दत्था' (शब्द आणि अर्थ). අඤ්ඤමඤ්ඤසාපෙක්ඛානමෙව තිරොහිතාවයවභෙදො සමුදායපධානො සමාහාරො, යථා-ඡත්තඤ්ච උපාහනා ච ඡත්තුපාහනං. परस्परांवर अवलंबून असणाऱ्या आणि ज्यांच्यातील वैयक्तिक अवयवांचा भेद लपलेला असून संपूर्ण समूह प्रधान असतो, त्याला 'समाहार' (समाहार द्वंद्व) म्हणतात, जसे - 'छत्तञ्च उपाहना च' = 'छत्तुपाहनं' (छत्री आणि जोडे यांचा समूह). 20. සමාහාරෙ නපුංසකන්ති २०. 'समाहारे नपुंसकं' - समाहार द्वंद्व समासात नपुंसकलिंग होते. සමාහාරෙ සබ්බත්ථ නපුංසකලිඞ්ගං භවති, සමාහාරස්සෙ+කත්තා එකවචනමෙව. समाहार समासात सर्वत्र नपुंसकलिंग होते आणि समाहाराच्या एकत्वामुळे (एक समूह असल्यामुळे) केवळ एकवचनच वापरले जाते. 23. ස්යාදීසු රස්සොති २३. 'स्यादीसु रस्सो' - 'सि' इत्यादी प्रत्यय असताना नपुंसकलिंगात र्हस्व होतो. නපුංසකෙ වත්තමානස්ස ස්යාදීසු රස්සො. භො ඡත්තුපාහන, ඡත්තුපාහනං, ඡත්තුපාහනෙන ඉච්චාදි. नपुंसकलिंगात वर्तमान असताना 'सि' इत्यादी प्रत्ययांच्या योगात र्हस्व होतो. जसे - 'भो छत्तुपाहन', 'छत्तुपाहनं', 'छत्तुपाहनेन' इत्यादी. තෙ [Pg.161] ච සමාහාරිතරීතරයොගා බහුලංවිධානා නියතවිසයායෙව හොන්ති, තත්රා+යං විසයවිභාගො-නිරුත්තිපිටකාගතො-පාණි+තූරිය+යොග්ග+සෙනඞ්ගානං, නිච්චවෙරීනං, සඞ්ඛ්යාපරිමාණසඤ්ඤානං, ඛුද්දජන්තුකානං, පචනචණ්ඩාලානං, චරණසාධාරණානං, එකජ්ඣායනපාවචනානං, ලිඞ්ගවිසෙසානං, විවිධවිරුද්ධානං, දිසානං, නදීනඤ්ච නිච්චසමාහාරෙකත්ථං භවති. आणि ते समाहार (एकत्र येणे) इतर योगांपेक्षा बहुतांश नियमांनी युक्त आणि निश्चित विषयांचेच असतात. त्यामध्ये हा विषयविभाग निरुत्तिपिटकातून आलेला आहे - प्राण्यंग (प्राण्यांचे अवयव), तूर्यांग (वाद्यांचे अवयव), योग्यांग (शेतीची साधने), सेनांग (सैन्याचे अवयव), नित्यवैरी (नेहमीचे शत्रू), संख्यापरिमाणसंज्ञा (संख्या आणि परिमाणांच्या संज्ञा), क्षुद्रजंतू (लहान जीव), पचनचांडाल (प्राण्यांची हत्या करणारे व चांडाल), चरणसाधारण (आचरणाने समान असणारे), एकध्यायनपावचन (एकाच अध्ययनाचे व प्रवचनाचे), लिंगविशेष (लिंगांचे भेद), विविधविरुद्ध (विविध प्रकारचे विरोधी), दिशा आणि नद्या यांचा नित्य समाहार एकवचनात होतो. පාණඞ්ගානං-චක්ඛු ච සොතඤ්ච චක්ඛුසොතං, මුඛඤ්ච නාසිකා ච මුඛනාසිකං, ‘‘ස්යාදීසු රස්සො’’ති නපුංසකෙ වත්තමානස්ස රස්සො. හනු ච ගීවා ච හනුගීවං, කණ්ණා ච නාසා ච කණ්ණනාසං, පාණි ච පාදො ච පාණිපාදං, ඡවි ච මංසඤ්ච ලොහිතඤ්ච ඡවිමංසලොහිතං, නාමඤ්ච රූපඤ්ච නාමරූපං, ජරා ච මරණඤ්ච ජරාමරණං. प्राण्यंगांचे (प्राण्यांच्या अवयवांचे उदाहरण) - चक्षु (डोळा) आणि श्रोत (कान) मिळून 'चक्खुसोतं' (चक्षुश्रोत्र), मुख आणि नासिका मिळून 'मुखनासिकं' (मुखनासिका); 'स्यादीसु रस्सो' या सूत्रानुसार नपुंसकलिंगात वर्तमान शब्दाचा र्हस्व होतो. हनु (हनुवटी) आणि ग्रीवा (मान) मिळून 'हनुगीवं', कर्ण (कान) आणि नासा (नाक) मिळून 'कण्णनासं', पाणि (हात) आणि पाद (पाय) मिळून 'पाणिपादं', छवी (त्वचा), मांस आणि लोहित (रक्त) मिळून 'छविमंसलोहितं', नाम आणि रूप मिळून 'नामरूपं', जरा आणि मरण मिळून 'जरामरणं' होते. තූරියඞ්ගානං-අලසො ච තාලම්බරො ච අලසතාලම්බරං, මුරජො ච ගොමුඛො ච මුරජගොමුඛං, සංඛො ච පණවො ච දෙණ්ඩිමො ච, සංඛා ච පණවා ච දෙණ්ඩිමා චාති වා සංඛපණවදෙණ්ඩිමං, පණවාදයො ද්වෙපි භෙරිවිසෙසා, මද්දවිකො ච පාණවිකො ච මද්දවිකපාණවිකං, ගීතඤ්ච වාදිතඤ්ච ගීතවාදිතං, සම්මඤ්ච තාළඤ්ච සම්මතාළං, සම්මංති කංසතාලං, තාළංති හත්ථතාළං. तूर्यांगांचे (वाद्यांच्या अवयवांचे उदाहरण) - अलस आणि तालंबर मिळून 'अलसतालंबरं', मुरज आणि गोमुख मिळून 'मुरजगोमुखं', शंख, पणव आणि डेंडिम मिळून किंवा शंखा, पणवा आणि डेंडिमा मिळून 'संखपणवदेण्डिमं' होते. पणव इत्यादी दोन्ही भेरीचे (नगार्याचे) विशेष प्रकार आहेत. मद्दविक आणि पाणविक मिळून 'मद्दविकपाणविकं', गीत आणि वादित (गायन आणि वादन) मिळून 'गीतवादितं', सम्म आणि ताळ मिळून 'सम्मताळं' होते. 'सम्मं' म्हणजे कांस्यताल (झांज) आणि 'ताळं' म्हणजे हस्तताळ (टाळी) होय. යොග්ගඞ්ගානං-ඵාලො ච පාචනඤ්ච ඵාලපාචනං, යුගඤ්ච නඞ්ගලඤ්ච යුගනඞ්ගලං. योग्यांगांचे (शेतीच्या साधनांचे उदाहरण) - फाळ आणि प्राचन (चाबूक/आर) मिळून 'फालपाचनं', जू आणि नांगर मिळून 'युगनंगलं' होते. සෙනඞ්ගානං-හත්ථිනො ච අස්සා ච හත්ථිඅස්සං, රථා ච පත්තිකා ච රථපත්තිකං, අසි ච සත්ති ච තොමරඤ්ච පිණ්ඩඤ්ච අසිසත්තිතොමරපිණ්ඩං, අසි ච චම්මඤ්ච අසිචම්මං, චම්මන්ති සරවාරණ-ඵලකං[Pg.162]. ධනු ච කලාපො ච ධනුකලාපං, කලාපො=තුණීරං. පහරණඤ්ච ආවරණඤ්ච පහරණාවරණං. सेनांगांचे (सैन्याच्या अवयवांचे उदाहरण) - हत्ती आणि घोडे मिळून 'हत्थिअस्सं', रथ आणि पायदळ मिळून 'रथपत्तिकं', तलवार, शक्ती (भाला), तोमर आणि पिंड मिळून 'असिसत्तितोमरपिण्डं', तलवार आणि चर्म (ढाल) मिळून 'असिचम्मं' होते; 'चम्म' म्हणजे बाण रोखणारी ढाल (फलक) होय. धनुष्य आणि कलाप मिळून 'धनुक्लापं' होते; 'कलाप' म्हणजे भाता (तुणीर). प्रहरण (शस्त्र) आणि आवरण (कवच) मिळून 'पहरणावरणां' होते. නිච්චවෙරීනං-අහි ච නකුලො ච, අහී ච නකුලා චාති වා අහිනකුලං. එවං බිළාරමූසිකං, අන්තස්ස රස්සත්තං. කාකොලුකං, සප්පමණ්ඩූකං, ගරුළසප්පං, නාගසුපණ්ණං. नित्यवैरींचे (नेहमीच्या शत्रूंचे उदाहरण) - सर्प आणि मुंगूस मिळून 'अहिनकुलं'. याचप्रमाणे मांजर आणि उंदीर मिळून 'biḷāramūsikaṃ' (बिळारमूसिकं) होते, येथे अंताचा र्हस्व होतो. कावळा आणि घुबड मिळून 'काकोलुकं', सर्प आणि बेडूक मिळून 'सप्पमण्डूकं', गरुड आणि सर्प मिळून 'गरुळसप्पं', नाग आणि सुपर्ण मिळून 'नागसुपण्णं' होते. සඞ්ඛ්යාපරිමාණසඤ්ඤානං-එකකඤ්ච දුකඤ්ච එකකදුකං. එවං, දුකතිකං, තිකචතුක්කං, චතුක්කපඤ්චකං. දසකඤ්ච එකාදසකඤ්ච දසෙකාදසකං, ‘‘තිතාලීස’’ ඉති චක-භාගලොපනිද්දෙසෙන කකාරස්ස ලොපො. संख्यापरिमाणसंज्ञांचे (संख्यांच्या संज्ञांचे उदाहरण) - एकक आणि द्विक मिळून 'एककदुकां'. याचप्रमाणे द्विक-त्रिक मिळून 'दुकतिकं', त्रिक-चतुष्क मिळून 'तिकचतुक्कं', चतुष्क-पंचक मिळून 'चतुक्कपञ्चकं'. दशक आणि एकादशक मिळून 'दसेकादसतं' होते. 'तितालीसं' यामध्ये 'चक' भागाचा लोप दर्शविल्याने 'क' काराचा लोप होतो. ඛුද්දජන්තුකානං-කීටා ච පටඞ්ගා ච කීටපටඞ්ගං, කීටා=කපාලපිට්ඨිකපාණා. එවං කුන්ථකිපිල්ලිකං, ඩංසා ච මකසා ච ඩංසමකසං, මක්ඛිකා ච කිපිල්ලිකා ච මක්ඛිකකිපිල්ලිකං, කීටා ච සරිංසපා ච කීටසරිංසපං. තත්ථ කුන්ථා=සුඛුමකිපිල්ලිකා. क्षुद्रजंतूंचे (लहान जीवांचे उदाहरण) - कीटक आणि पतंग मिळून 'कीटपटंगं'; 'कीटक' म्हणजे पाठीवर कडक कवच असणारे जीव. याचप्रमाणे कुंथ (बारीक मुंग्या) आणि मुंग्या मिळून 'कुंथकिपिल्लिकं', डास आणि माश्या मिळून 'डंसमकसं', माश्या आणि मुंग्या मिळून 'मक्खिककिपिल्लिकं', कीटक आणि सरपटणारे प्राणी मिळून 'कीटसरिंसपं' होते. त्यामध्ये 'कुंथ' म्हणजे अत्यंत सूक्ष्म मुंग्या होत. ඛුද්දජන්තු අනට්ඨී වා, අථ ඛො ඛුද්දකොපි වා; සතං වා පසතො යෙසං, කෙචි ආනතුලා ඉති. क्षुद्रजंतू म्हणजे हाडे नसलेले जीव किंवा जे आकाराने लहान असतात; ज्यांचे प्रमाण शंभर किंवा पसाभर असते, त्यांना काही आचार्य 'आनतुल' (अमर्याद) असे म्हणतात. පචනචණ්ඩාලානං-ඔරබ්භිකා ච සූකරිකා ච ඔරබ්භිකසූකරිකං, එවං සාකුන්තිකමාගවිකං. සපාකො ච චණ්ඩාලො ච සපාකචණ්ඩාලං, පුක්කුසඡවඩාහකං, වෙනරථකාරං, තත්ථ වෙනා=තච්ඡකා, රථකාරා=චම්මකාරා. पचनचांडालांचे (प्राण्यांची हत्या करणारे व चांडाल यांचे उदाहरण) - मेंढपाळ (खाटीक) आणि डुकरांचे मांस विकणारे मिळून 'ओरब्भिकसूकरिकं'. याचप्रमाणे पक्षी पकडणारे आणि शिकारी मिळून 'साकुन्तिकमागविकं'. श्वानपाचक (कुत्र्याचे मांस शिजवणारे) आणि चांडाल मिळून 'सपाकचण्डालं', पुक्कुस आणि प्रेत जाळणारे मिळून 'पुक्कुसछवडाहीकं', वेण आणि रथकार मिळून 'वेणरथकारं' होते. त्यामध्ये 'वेण' म्हणजे सुतार (तक्षक) आणि 'रथकार' म्हणजे चांभार (चर्मकार) होत. චරණසාධාරණානං-අතිසො ච භාරද්වාජො ච අතිසභාරද්වාජං, කට්ඨො ච කපාලො ච කට්ඨකපාලං, සීලඤ්ච පඤ්ඤාණඤ්ච සීලපඤ්ඤාණං, සමථො ච විපස්සනා ච සමථවිපස්සනං, විජ්ජා ච චරණඤ්ච විජ්ජාචරණං, එවං නාමරූපං, හිරොත්තප්පං, සතිසම්ප-ජඤ්ඤං[Pg.163], ලොභමොහං, දොසමොහං, අහිරිකානොත්තප්පං, ථිනමිද්ධං, උද්ධච්චකුක්කුච්ච+මිච්චාදි. सामान्य आचरणांचे (किंवा गुणांचे) - अतिस आणि भारद्वाज म्हणजे अतिसभारद्वाज, काष्ठ (लाकूड) आणि कपाल (खापर) म्हणजे काष्ठकपाल, शील आणि प्रज्ञा म्हणजे शीलप्रज्ञा, शमथ आणि विपश्यना म्हणजे शमथविपश्यना, विद्या आणि चरण म्हणजे विद्याचरण; याचप्रमाणे नामरूप, हिरोत्तप्प (ह्री व ओत्तप्प), सति-संपजन्य (स्मृती व संप्रजन्य), लोभमोह, द्वेषमोह, अहिरिक-अनोत्तप्प, थिनमिद्ध (स्त्यान व मिद्ध), उद्धच्च-कुक्कुच्च इत्यादी. එකජ්ඣායනපාවචනානං-දීඝො ච මජ්ඣිමො ච දීඝමජ්ඣිමං, එවං එකුත්තර සංයුත්තකං, ඛන්ධකවිභඞ්ගං. एकाच अध्ययनाच्या प्रवचनांचे (ग्रंथांचे) - दीघ (निकाय) आणि मज्झिम (निकाय) म्हणजे दीघमज्झिम; याचप्रमाणे एकुत्तर (अंगुत्तर) आणि संयुत्तक म्हणजे एकुत्तरसंयुत्तक, खन्धक आणि विभंग म्हणजे खन्धकविभंग. ලිඞ්ගවිසෙසානං-ඉත්ථී ච පුමා ච ඉත්ථිපුමං, දාසී ච දාසො ච දාසිදාසං, චීවරඤ්ච පිණ්ඩපාතො ච සෙනාසනඤ්ච ගිලානපච්චයභෙසජ්ජපරික්ඛාරො ච චීවරපිණ්ඩපාතසෙනාසනගිලානපච්චයභෙසජ්ජපරික්ඛාරං, තිණඤ්ච කට්ඨො ච සාඛා ච පලාසඤ්ච තිණකට්ඨසාඛාපලාසං. ‘‘ලාභී හොති චීවරපිණ්ඩපාතසෙනාසනගිලානපච්චයභෙසජ්ජපරික්ඛාරානං’’තිපි දිස්සති. लिंगभेदांचे (भिन्न लिंगी शब्दांचे) - स्त्री आणि पुरुष म्हणजे स्त्रीपुरुष, दासी आणि दास म्हणजे दासीदास, चीवर, पिंडपात, सेनासन आणि ग्लानप्रत्यय-भैषज्य-परिष्कार (औषधोपचार) म्हणजे चीवरपिंडपातसेनासनग्लानप्रत्ययभैषज्यपरिष्कार, तृण (गवत), काष्ठ (लाकूड), शाखा (फांदी) आणि पलाश (पाने) म्हणजे तृणकाष्ठशाखापलाश. “चीवर-पिंडपात-सेनासन-ग्लानप्रत्यय-भैषज्य-परिष्कारांचा लाभ घेणारा होतो” असेही दिसून येते. විවිධවිරුද්ධානං-කුසලඤ්ච අකුසලඤ්ච කුසලාකුසලං, එවං සාවජ්ජානවජ්ජං, හීනපණීතං, කණ්හසුක්කං, ඡෙකපාපකං, සුඛදුක්ඛං, අධමුත්තමං, පටිඝානුනයං, ඡායාතපං, ආලොකන්ධකාරං. රත්තිඤ්ච දිවා ච රත්තින්දිවං, ‘‘රත්තින්දිවදාරගවචතුරස්සා’’ති අපච්චයෙ කතෙ නුමආගමො. අහො ච රත්ති ච අහොරත්තං, ‘‘දීඝා+හොවස්සෙකදෙසෙහි ච රත්යා’’ති අපච්චයෙ කතෙ ‘‘මනාද්යාපාදීන+මො මයෙ චෙ’’ති ඔකාරො. विविध विरोधी शब्दांचे - कुशल आणि अकुशल म्हणजे कुशलाकुशल; याचप्रमाणे सावज्ज (सदोष) आणि अनवज्ज (निर्दोष) म्हणजे सावज्जानवज्ज, हीन आणि प्रणीत म्हणजे हीनप्रणीत, कण्ण्ह (कृष्ण) आणि सुक्क (शुक्ल) म्हणजे कण्ण्हसुक्क, चतुर (छेक) आणि पापी (पापक) म्हणजे छेकपापक, सुख आणि दुःख म्हणजे सुखदुःख, अधम आणि उत्तम म्हणजे अधमुत्तम, प्रतिघ आणि अनुनय म्हणजे प्रतिघानुनय, छाया आणि आतप (ऊन) म्हणजे छायाताप, आलोक (प्रकाश) आणि अंधकार म्हणजे आलोकांधकार. रात्र आणि दिवस म्हणजे रात्रंदिवस (रत्तिंदिवं); “रत्तिंदिवदारगवचतुरस्सा” या सूत्राने 'अ' प्रत्यय लागल्यावर 'नुम्' चा आगम होतो. दिवस आणि रात्र म्हणजे अहोरात्र (अहोरत्तं); “दीघा होवस्सेकदेसेहि च रत्या” या सूत्राने 'अ' प्रत्यय लागल्यावर “मनाद्यापादीन मो मये चे” या सूत्राने 'ओ' कार होतो. දිසානං-පුබ්බා ච අපරා ච පුබ්බාපරං, එවං පුරත්ථිමපච්ඡිමං, දක්ඛිණුත්තරං, පුබ්බදක්ඛිණං, පුබ්බුත්තරං, අපරදක්ඛිණං, අපරුත්තරං. दिशांचे - पूर्व आणि अपर (पश्चिम) म्हणजे पूर्वापर; याचप्रमाणे पुरत्थिम (पूर्व) आणि पच्छिम (पश्चिम) म्हणजे पुरत्थिमपच्छिम, दक्षिण आणि उत्तर म्हणजे दक्षिणोत्तर, पूर्व आणि दक्षिण म्हणजे पूर्वदक्षिण, पूर्व आणि उत्तर म्हणजे पूर्वोत्तर, अपर आणि दक्षिण म्हणजे अपरदक्षिण, अपर आणि उत्तर म्हणजे अपरउत्तर. නදීනං-ගඞ්ගා ච යමුනා ච ගඞ්ගායමුනං, එවං මහීසරභූ. नद्यांचे - गंगा आणि यमुना म्हणजे गंगा-यमुना; याचप्रमाणे मही आणि सरभू म्हणजे मही-सरभू. තිණ+රුක්ඛ+පසු+සකුණ+ධන+ඛඤ්ඤ+බ්යඤ්ජන+ජනපදානං වා. තිණවිසෙසානං-උසීරානි ච බීරණානි ච උසීරබීරණං උසීරබීරණානි වා. එවං මුඤ්ජපබ්බජං මුඤ්ජපබ්බජානි වා, කාසකුසං කාසකුසා වා. किंवा तृण (गवत), वृक्ष, पशू, पक्षी, धन, धान्य, व्यंजन आणि जनपद यांचे. तृणविशेषांचे (गवताच्या प्रकारांचे) - उशीर (वाळा) आणि बीरण म्हणजे उशीरबीरण किंवा उशीरबीरणाने; याचप्रमाणे मुंज आणि पब्बज म्हणजे मुंजपब्बज किंवा मुंजपब्बजाने, कास आणि कुस म्हणजे कासकुस किंवा कासकुसाने. රුක්ඛවිසෙසානං-අස්සත්ථා [Pg.164] ච කපිට්ඨා ච අස්සත්ථකපිට්ඨං අස්සත්ථකපිට්ඨා වා, එවං අම්බපනසං අම්බපනසා, ඛදිරපලාසං ඛදිරපලාසා, ධවාස්සකණ්ණං ධවාස්සකණ්ණා, පිලක්ඛනිග්රොධං පිලක්ඛනිග්රොධා, සාකසාලං සාකසාලා. वृक्षविशेषांच्या बाबतीत—अस्सत्थ (पिंपळ) आणि कपिट्ठ (कवठ) मिळून 'अस्सत्थकपिट्ठं' किंवा 'अस्सत्थकपिट्ठा' होते. याचप्रमाणे 'अम्बपनसं' किंवा 'अम्बपनसा' (आंबा आणि फणस), 'खदिरपलासं' किंवा 'खदिरपलासा' (खैर आणि पळस), 'धवास्सकण्णं' किंवा 'धवास्सकण्णा' (धाय आणि अर्जुन), 'पिलक्खनिग्रोधं' किंवा 'पिलक्खनिग्रोधा' (पिंपरी आणि वडाचे झाड), 'साकसालं' किंवा 'साकसाला' (सागवान आणि साल) असे होते. පසුවිසෙසානං-ගජා ච ගවජා ච ගජගවජං ගජගවජා වා, අජා ච එළකා ච අජෙළකං අජෙළකා, හත්ථී ච ගාවො ච අස්සා ච වළවා ච හත්ථීගවස්සවළවං හත්ථීගවස්සවළවා, රස්සත්තං. එවං ගොමහිසං ගොමහිසා, එණෙය්යවරාහං එණෙය්යවරාහා, සීහබ්යග්ඝතරච්ඡං සීහබ්යග්ඝතරච්ඡා, කුක්කුටසූකරං කුක්කුටසූකරා, එණෙය්යගොමහිසං එණෙය්යගොමහිසා. पशुविशेषांच्या बाबतीत—गज (हत्ती) आणि गवज (रानगवा) मिळून 'गजगवजं' किंवा 'गजगवजा' होते. अज (बोकड) आणि एळक (मेंढी) मिळून 'अजेळकं' किंवा 'अजेळका' होते. हत्ती, गायी, घोडे आणि घोडी मिळून 'हत्थीगवस्सवळवं' किंवा 'हत्थीगवस्सवळवा' होते, येथे र्हस्वत्व होते. याचप्रमाणे 'गोमहिसं' किंवा 'गोमहिसा' (गाय आणि म्हैस), 'एणेय्यवराहं' किंवा 'एणेय्यवराहा' (काळवीट आणि रानडुक्कर), 'सीहब्यग्घतरच्छं' किंवा 'सीहब्यग्घतरच्छा' (सिंह, वाघ आणि तरस), 'कुक्कुटसूकरं' किंवा 'कुक्कुटसूकरा' (कोंबडा आणि डुक्कर), 'एणेय्यगोमहिसं' किंवा 'एणेय्यगोमहिसा' (काळवीट, गाय आणि म्हैस) असे होते. සකුණවිසෙසානං-හංසා ච බකා ච හංසබකං හංසබකා. එවං කාරණ්ඩවචක්කවාකං කාරණ්ඩවචක්කවාකා, මයූරකොඤ්චං මයූරකොඤ්චා, සුකසාලිකං සුකසාලිකා, බකබලාකං බකබලාකා. पक्षीविशेषांच्या बाबतीत—हंस आणि बक (बगळा) मिळून 'हंसबकं' किंवा 'हंसबका' होते. याचप्रमाणे 'कारण्डवचक्कवाकं' किंवा 'कारण्डवचक्कवाका' (कारंडव आणि चक्रवाक), 'मयूराकोञ्चं' किंवा 'मयूराकोञ्चा' (मोर आणि क्रौंच), 'सुकसालिकं' किंवा 'सुकसालिका' (पोपट आणि साळुंकी), 'बकवलाकं' किंवा 'बकवलाका' (बगळा आणि बलाका) असे होते. ධනානං-හිරඤ්ඤඤ්ච සුවණ්ණඤ්ච හිරඤ්ඤසුවණ්ණං හිරඤ්ඤසුවණ්ණානි. එවං ජාතරූපරජතං ජාතරූපරජතානි, මණිසඞ්ඛමුත්තවෙළුරියං මණිසඞ්ඛමුත්තවෙළුරියා. धनाच्या बाबतीत—हिरण्य (नाणी नसलेले सोने) आणि सुवर्ण (सोन्याची नाणी) मिळून 'हिरण्यसुवण्णं' किंवा 'हिरण्यसुवण्णानि' होते. याचप्रमाणे 'जातरूपरजतं' किंवा 'जातरूपरजतानि' (सोने आणि चांदी), 'मणिसङ्खमुत्तवेळुरियं' किंवा 'मणिसङ्खमुत्तवेळुरिया' (मणी, शंख, मोती आणि वैडूर्य) असे होते. ධඤ්ඤානං-සාලී ච යවා ච සාලියවං සාලියවා වා. එවං තිලමුග්ගමාසං තිලමුග්ගමාසානි, නිප්පාවකුලත්ථං නිප්පාවකුලත්ථා. धान्यांच्या बाबतीत—साली (तांदूळ) आणि यव (जव) मिळून 'सालियवं' किंवा 'सालियवा' होते. याचप्रमाणे 'तिलमुग्गमासं' किंवा 'तिलमुग्गमासानि' (तीळ, मूग आणि उडीद), 'निप्पावकुलत्थं' किंवा 'निप्पावकुलत्था' (पावटा आणि हुलगा) असे होते. බ්යඤ්ජනානං-සාකො ච සුවා ච සාකසුවං සාකසුවා. එවං ගබ්යමාහිසං ගබ්යමාහිසා, එණෙය්යවරාහං එණෙය, වරාහා. මිගමයූරං මිගමයූරා. व्यंजनांच्या (खाद्यपदार्थांच्या) बाबतीत—शाक (भाजी) आणि सुवा (सूप/रस्सा) मिळून 'साकसुवं' किंवा 'साकसुवा' होते. याचप्रमाणे 'गब्यमाहिसं' किंवा 'गब्यमाहिसा' (गाईचे आणि म्हशीचे दूध/तूप), 'एणेय्यवराहं' किंवा 'एणेय्यवराहा' (काळवीट आणि डुकराचे मांस), 'मिगमयूरं' किंवा 'मिगमयूरा' (हरिण आणि मोर) असे होते. ජනපදානං-කාසි [Pg.165] ච කොසලා ච කාසිකොසලං කාසිකොසලා, වජ්ජී ච මල්ලා ච වජ්ජිමල්ලං වජ්ජිමල්ලා, අඞ්ගා ච මගධා ච අඞ්ගමගධං අඞ්ගමගධා, එවං චෙතිවංසං චෙතිවංසා, මච්ඡසූරසෙනං මච්ඡසූරසෙනා, කුරුපඤ්චාලං කුරුපඤ්චාලා. නාමඤ්ච රූපඤ්ච නාමරූපඤ්ච නාමරූපනාමරූපන්ති චතුරෙකපඤ්චවොකාරවසෙන වත්තබ්බෙ බහුලාධිකාරා සරූපෙකසෙසං කත්වා නාමරූපන්ති වුත්තං. जनपदांच्या (देशांच्या) बाबतीत—कासी आणि कोसल मिळून 'कासिकोसलं' किंवा 'कासिकोसला' होते. वज्जी आणि मल्ल मिळून 'वज्जिमल्लं' किंवा 'वज्जिमल्ला' होते. अंग आणि मगध मिळून 'अङ्गमगधं' किंवा 'अङ्गमगधा' होते. याचप्रमाणे 'चेतिवंसं' किंवा 'चेतिवंसा', 'मच्छसूरसेनं' किंवा 'मच्छसूरसेना', 'कुरुपञ्चालं' किंवा 'कुरुपञ्चाला' होते. 'नाम' आणि 'रूप' मिळून 'नामरूपं' होते. चार, एक आणि पाच वोकार (स्कंध) असलेल्या अस्तित्वाच्या संदर्भात बोलताना, 'बहुलाधिकार' नियमामुळे 'सरूपैकशेष' करून 'नामरूपं' असे म्हटले जाते. එතස්මිං එකත්ථීභාවකණ්ඩෙ යං වුත්තං පුබ්බං, තදෙව පුබ්බං නිපතති, කමාතික්කමෙ පයොජනස්සා+භාවා. ක්වචි විපල්ලාසොපි හොති, බහුලාධිකාරතො, දන්තානං රාජා රාජදන්තො. චත්ථෙ සමාහාරෙ ‘‘සභාපරිසායා’’ති ඤාපකා ක්වචි නපුංසකලිඞ්ගං න භවති, ආධිපච්චඤ්ච පරිවාරො ච ආධිපච්චපරිවාරො. එවං ඡන්දපාරිසුද්ධි, පටිසන්ධිපවත්තියං. या एकार्थीभावकांडात जे आधी सांगितले आहे, तेच आधी येते, कारण क्रमाचे उल्लंघन करण्यात काही प्रयोजन नसते. 'बहुलाधिकार' नियमामुळे काही ठिकाणी विपर्यास (क्रमबदल) देखील होतो, जसे की 'दन्तानं राजा' (दातांचा राजा) चा 'राजदन्तो' होतो. 'च' च्या अर्थातील समाहार समासात 'सभापरिसायं' या ज्ञापकावरून काही ठिकाणी नपुंसकलिंग होत नाही, जसे की 'आधिपच्चं च परिवारो च' मिळून 'आधिपच्चपरिवारो' होते. याचप्रमाणे 'छन्दपारिसुद्धि' आणि 'पटिसन्धिपवत्तियं' हे शब्द होतात. 40. සමාසන්ත්ව ४०. समासान्त प्रकरण. උපරි අය+මධිකරීයති. यापुढे याचा अधिकार चालतो. 41. පාපාදීහි භූමියා ४१. पाप इत्यादी शब्दांनंतर असलेल्या 'भूमी' शब्दाला... පාපාදීහි පරා යා භූමි, තස්සා සමාසන්තො අ හොති. පාපා භූමි යස්මින්ති පාපභූමං, ජාතියා උපලක්ඛිතා භූමි ජාතිභූමං. पाप इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'भूमी' शब्दाला समासाच्या शेवटी 'अ' प्रत्यय लागतो. 'पापा भूमी यस्मिं' (ज्यामध्ये पापी भूमी आहे) या अर्थी 'पापभूमं' होते. जातीने उपलक्षित असलेली भूमी म्हणजे 'जातिभूमं' होते. 42. සංඛ්යාහිති ४२. संख्यावाचक शब्दांनंतर... සංඛ්යාහි පරාය භූමියා අ හොති. ද්වෙ භූමියො අස්ස ද්විභූමං. එවං තිභූමං. संख्यावाचक शब्दांनंतर येणाऱ्या 'भूमी' शब्दाला 'अ' प्रत्यय लागतो. 'द्वे भूमियो अस्स' (ज्याला दोन मजले/भूमी आहेत) या अर्थी 'द्विभूमं' होते. याचप्रमाणे 'तिभूमं' (तीन मजले असलेला) होते. 43. නදීගොධාවරීනං ४३. नदी आणि गोदावरी शब्दांच्या बाबतीत... සංඛ්යාහි පරාසං නදීගොධාවරීනං සමාසන්තො අ හොති. පඤ්චන්නං නදීනං සමාහාරො පඤ්චනදං. එවං සත්තගොධාවරං. संख्यावाचक शब्दांनंतर येणाऱ्या 'नदी' आणि 'गोदावरी' शब्दांना समासाच्या शेवटी 'अ' प्रत्यय लागतो. 'पञ्चन्नं नदीनं समाहारो' (पाच नद्यांचा समूह) या अर्थी 'पञ्चनदं' होते. याचप्रमाणे 'सत्तगोधावरं' (सात गोदावरींचा समूह) होते. 44. අසංඛ්යෙහි චා+ඞ්ගුල්යා+නාඤ්ඤාසංඛ්යත්ථෙසුති ४४. असंख्यावाचक आणि संख्यावाचक शब्दांनंतर येणाऱ्या 'अंगुली' शब्दाला, इतर संख्यावाचक अर्थ नसताना... අසංඛ්යෙහි [Pg.166] සංඛ්යාහි ච පරාය අඞ්ගුලියා සමාසන්තො අ හොති. නිග්ගත+මඞ්ගුලීහි නිරඞ්ගුලං, ද්වෙ අඞ්ගුලියො සමාහටා ද්වඞ්ගුලං. අනඤ්ඤාසංඛ්යත්ථෙසූති කිං, පඤ්ච අඞ්ගුලියො අස්මිං හත්ථෙති පඤ්චඞ්ගුලි, අඞ්ගුලියා සමීපං උපඞ්ගුලි. असंख्यावाचक आणि संख्यावाचक शब्दांनंतर येणाऱ्या 'अंगुली' शब्दाला समासाच्या शेवटी 'अ' प्रत्यय लागतो. 'निग्गतं अङ्गुलीहि' (बोटांच्या बाहेर गेलेले) या अर्थी 'निरङ्गुलं' होते. 'द्वे अङ्गुुलियो समाहटा' (दोन बोटे एकत्र केलेली) या अर्थी 'द्वङ्गुुलं' होते. 'इतर संख्यावाचक अर्थ नसताना' असे का म्हटले आहे? कारण 'पञ्च अङ्गुुलियो अस्मिं हत्थे' (या हातात पाच बोटे आहेत) या अर्थी 'पञ्चङ्गुुलि' होते, आणि 'अङ्गुुलिया समीपं' (बोटाच्या जवळ) या अर्थी 'उपङ्गुुलि' होते. 45. දීඝාහොවස්සෙකදෙසෙහි ච රත්ත්යාති ४५. दीर्घ, अह (दिवस), वस्स (वर्षा) आणि एकदेश (भागाचा वाचक) या शब्दांनंतर येणाऱ्या 'रत्ती' (रात्र) शब्दाला... දීඝාදීහි පරාය රත්තියා අ හොති. දීඝා ච සා රත්ති චාති දීඝරත්තං. අහො ච රත්ති ච අහොරත්තං, ආපාදිත්තා ඔ. වස්සාසු රත්ති වස්සාරත්තං. පුබ්බා ච සා රත්ති චාති පුබ්බරත්තං. එවං අපරරත්තං, අඩ්ඪරත්තං, අතික්කන්තො රත්තිං අතිරත්තො. ද්වෙ රත්තියො සමාහටා ද්විරත්තං. අනඤ්ඤාසංඛ්යත්ථෙසු ත්වෙව, දීඝා රත්ති අස්මින්ති දීඝරත්ති, හෙමන්තො. රත්තියා සමීපං උපරත්ති. බහුලංවිධානා ක්වචි හොතෙව, රත්තිපරිමාණානුරූපං යථාරත්තං. दीर्घ इत्यादी शब्दांनंतर येणाऱ्या 'रत्ती' (रात्र) शब्दाला 'अ' प्रत्यय लागतो. 'दीघा च सा रत्ती च' (ती दीर्घ रात्र) या अर्थी 'दीघरत्तं' होते. 'अहो च रत्ती च' (दिवस आणि रात्र) या अर्थी 'अहोरत्तं' होते, येथे 'आ' चा 'ओ' होतो. 'वस्सासु रत्ती' (पावसाळ्यातील रात्र) या अर्थी 'वस्सारत्तं' होते. 'पुब्बा च सा रत्ती च' (रात्रीचा पूर्वभाग) या अर्थी 'पुब्बरत्तं' होते. याचप्रमाणे 'अपररत्तं' (रात्रीचा उत्तरभाग), 'अड्ढरत्तं' (मध्यरात्र), 'अतिक्कन्तो रत्तिं' (रात्र उलटून गेलेला) या अर्थी 'अतिरत्तो' होते. 'द्वे रत्तियो समाहटा' (दोन रात्रींचा समूह) या अर्थी 'द्विरत्तं' होते. 'इतर संख्यावाचक अर्थ नसताना' या नियमामुळेच, 'दीघा रत्ती अस्मिं' (ज्यामध्ये दीर्घ रात्र असते तो हेमंत ऋतू) या अर्थी 'दीघरत्ती' होते. 'रत्तिया समीपं' (रात्रीच्या जवळ) या अर्थी 'उपरत्ती' होते. 'बहुलाधिकार' नियमामुळे काही ठिकाणी हा प्रत्यय लागतोच, जसे की रात्रीच्या परिमाणानुसार 'यथारत्तं' होते. 46. ගොත්ව+චත්ථෙ චා+ලොපෙ ४६. लोप न होण्याच्या विषयात 'गो' शब्दाला आणि 'च' च्या अर्थातील समासात नसताना... ගොසද්දා අලොපවිසයෙ සමාසන්තො අ හොති න චෙ චත්ථාදීසු සමාසො. රඤ්ඤො ගො රාජගවො. පරමො ච සො ගො චාති පරමගවො. පඤ්චන්නං ගුන්නං සමාහාරො පඤ්චගවං, ‘‘ගොස්සා+වඞ’’ති අවඞ. තං ධන+මස්සාති පඤ්චගවධනො. දසගවං. लोप न होण्याच्या विषयात 'गो' शब्दाला समासाच्या शेवटी 'अ' प्रत्यय लागतो, जर तो 'च' च्या अर्थातील (द्वंद्व) समास नसेल तर. 'रञ्ञो गो' (राजाची गाय) या अर्थी 'राजगवो' होते. 'परमो च सो गो च' (उत्कृष्ट गाय) या अर्थी 'परमगवो' होते. 'पञ्चन्नं गुन्नं समाहारो' (पाच गाईंचा समूह) या अर्थी 'पञ्चगवं' होते, येथे 'गोस्सावण' सूत्राने 'अवण' आदेश होतो. 'ते धनं अस्स' (ते ज्याचे धन आहे तो) या अर्थी 'पञ्चगवधनो' होते. याचप्रमाणे 'दसंगवं' (दहा गाईंचा समूह) होते. 47. රත්තින්දිව+දාරගව+චතුරස්සා ४७. रत्तिंंदिव, दारगव आणि चतुरस्स हे शब्द... එතෙ සද්දා අ-අන්තා නිපච්චන්තෙ. රත්ති ච දිවා ච රත්තින්දිවං, ඉමිනාව නුමාග මා. දාරා ච ගවො ච දාරගවං. චතස්සො අස්සියො අස්ස චතුරස්සො. हे शब्द 'अ' कारान्त म्हणून निपातित (सिद्ध) केले जातात. 'रत्ती च दिवा च' (रात्र आणि दिवस) मिळून 'रत्तिंदिवं' होते, याच नियमाने 'नुम्' चा आगम होतो. 'दारा च गवो च' (पत्नी आणि गायी/मालमत्ता) मिळून 'दारगवं' होते. 'चतस्सो अस्सियो अस्स' (ज्याला चार कोन आहेत तो) या अर्थी 'चतुरस्सो' होते. 48. ආයාමෙ+නුගවං ४८. लांबी दर्शविताना 'अनुगवं' हा शब्द... අනුගවංති [Pg.167] නිපච්චතෙ ආයාමෙගම්යමානෙ. ගවස්ස ආයාමො අනුගවං සකටං, අසඞ්ඛ්යසමාසො. लांबीचा अर्थ प्रतीत होत असताना 'अनुगवं' हा शब्द निपातित होतो. 'गवस्स आयामो' (बैलगाडीची लांबी) या अर्थी 'अनुगवं सकटं' (बैलगाडीच्या लांबीची गाडी) होते, हा असंख्या (अव्ययीभाव) समास आहे. 49. අක්ඛිස්මා+ඤ්ඤත්ථෙ ४९. अन्य अर्थ असताना 'अक्खि' (डोळा) शब्दाला... අක්ඛිස්මා සමාසන්තො අ හොති අඤ්ඤත්ථෙ. විසාලානි අක්ඛීනි යස්ස සො විසාලක්ඛො. अन्य अर्थ (बहुव्रीहि समास) असताना 'अक्खि' (डोळा) शब्दाला समासाच्या शेवटी 'अ' प्रत्यय लागतो. 'विसालानि अक्खीनि यस्स सो' (ज्याचे डोळे मोठे आहेत तो) या अर्थी 'विसालक्खो' होते. 50. දාරුම්ය+ඞ්ගුල්යා ५०. लाकडाच्या अर्थी 'अंगुली' शब्दाला... අඞ්ගුලන්තා අඤ්ඤත්ථෙ දාරුම්හි සමාසන්තො අ හොති. ද්වෙ අඞ්ගුලියො අවයවා අස්සෙති ද්වඞ්ගුලං දාරු, එවං පඤ්චඞ්ගුලං. අඞ්ගුලිසදිසාවයවං ධඤ්ඤාදීනං වික්ඛෙපකං දාරූති වුච්චතෙ. अन्य अर्थ असताना लाकडाच्या संदर्भात 'अंगुली' अंत असलेल्या शब्दाला समासाच्या शेवटी 'अ' प्रत्यय लागतो. 'द्वे अङ्गुुलियो अवयवा अस्स' (दोन बोटांएवढा अवयव असलेले) या अर्थी 'द्वङ्गुुलं दारु' (दोन बोटांचे लाकूड) होते, याचप्रमाणे 'पञ्चङ्गुुलं' होते. धान्यादी विखुरण्यासाठी वापरल्या जाणाऱ्या बोटांसारख्या अवयवांच्या लाकडाला असे म्हटले जाते. 54. උත්තරපදෙ ५४. उत्तरपद असताना... ඉදං සබ්බත්ථ අධිකාතබ්බං. हा अधिकार सर्वत्र लागू होतो. 55. ඉමස්සි+දන්ති ५५. 'इम' शब्दाच्या जागी 'इदं'... උත්තරපදෙ ඉමස්ස ඉදං, ඉමාය අත්ථො ඉදමට්ඨො, ථස්ස ඨො, ඉදමට්ඨො අස්ස අත්ථීති ඉදමට්ඨී, ඉදමට්ඨිනො භාවො ඉදමට්ඨිතා. ඉමෙසං පච්චයා ඉදප්පච්චයා, නිග්ගහීතලොපො පස්ස ච ද්විභාවො. उत्तरपद असताना 'इम' शब्दाच्या जागी 'इदं' होते. 'इमाय अत्थो' (याचा अर्थ) या अर्थी 'इदमत्यो' होऊन 'थ' चा 'ठ' होतो आणि 'इदमट्ठो' बनते. 'इदमट्ठो अस्स अत्थी' (ज्याला हा अर्थ आहे तो) या अर्थी 'इदमट्ठी' होते, आणि 'इदमट्ठिनो भावो' (या अर्थाची अवस्था) या अर्थी 'इदमट्ठिता' होते. 'इमेसं पच्चया' (यांच्या प्रत्ययाने/कारणाने) या अर्थी 'इदप्पच्चया' होते, येथे निग्गहीताचा लोप होतो आणि 'प' चे द्वित्व होते. 57. ට න්තන්තූනන්ති ५७. 'नन्त' आणि 'तु' प्रत्ययांच्या जागी 'ट'... න්තන්තූනං උත්තරපදෙ ට හොති. භවන්තො පතිට්ඨා අම්හන්ති භවංපතිට්ඨා මයං, නිග්ගහීතාගමො, වග්ගන්තො, යොස්ස ටා ච. භගවා මූලං එතෙසංති භගවංමූලකා නො ධම්මා. उत्तरपद असताना 'नन्त' आणि 'तु' प्रत्ययांच्या जागी 'ट' होतो. 'भवन्तो पतिट्ठा अम्हं' (आपण आमचे आश्रय आहात) या अर्थी 'भवम्पतिट्ठा मयं' होते, येथे निग्गहीताचा आगम, वर्गान्त वर्ण आणि 'य' च्या जागी 'टा' होतो. 'भगवा मूलं एतेसं' (भगवान हे ज्यांचे मूळ आहेत) या अर्थी 'भगवम्मूलका नो धम्मा' (आमचे धर्म भगवान-मूलक आहेत) होते. 58. අ ५८. 'अ' प्रत्यय... ඉති [Pg.168] න්තන්තූනං අ හොති. ගුණවන්තො පතිට්ඨා මමාති ගුණවන්තපතිට්ඨො+ස්මි. अशा प्रकारे 'नन्त' आणि 'तु' प्रत्ययांच्या जागी 'अ' होतो. 'गुणवन्तो पतिट्ठा ममा' (गुणवान माझा आश्रय आहेत) या अर्थी 'गुणवन्तपतिट्ठोस्मि' (मी गुणवंतांच्या आश्रयाने आहे) होते. 60. පරස්ස සංඛ්යාසුති ६०. संख्यावाचक शब्दांच्या बाबतीत 'पर' शब्दाला... සංඛ්යාසු පරස්ස ඔ, පරො සතස්මා අධිකා පරොසතං. संख्यावाचक शब्दांच्या बाबतीत 'पर' शब्दाला 'ओ' होतो. 'परो सतस्मा अधिका' (शंभरापेक्षा अधिक) या अर्थी 'परोसतं' होते. 61. ජනෙ පුථස්සුති ६१. 'जन' शब्द उत्तरपद असताना 'पुथ' शब्दाला 'उ' होतो. පුථස්ස ජනෙ උ හොති. පුථගෙවා+යං ජනොති පුථුජ්ජනො, ජස්ස ද්විත්තං. 'पुथ' शब्दाला 'जन' शब्द उत्तरपद असताना 'उ' होतो. "हा पृथक् (वेगळा) च जन (लोक) आहे" म्हणून 'पुथुज्जनो' (पृथग्जन) असा शब्द बनतो, येथे 'ज' चे द्वित्व (दोन वेळा होणे) होते. 62. සො ඡස්සා+හා+යතනෙ වා ६२. 'अह' आणि 'आयतन' उत्तरपद असताना 'छ' (सहा) च्या जागी विकल्पेकरून 'स' होतो. අහෙ ආයතනෙ ච උත්තරපදෙ ඡස්ස සො හොති වා. සාහං ඡාහං, සළායතනං ඡළායතනං. (සම්බරං) 'अह' आणि 'आयतन' उत्तरपद असताना 'छ' च्या जागी विकल्पेकरून 'स' होतो. जसे - 'साहं' (सहा दिवस), 'छाहं'; 'सळायतनं' (सहा आयतने), 'छळायतनं'. (संवरण) 63. ල්තු+පිතාදීන+මාරවරඞ ६३. 'लतु' प्रत्ययान्त आणि 'पितृ' इत्यादी शब्दांना उत्तरपद असताना अनुक्रमे 'आर', 'अर' आणि 'अण' विकल्पेकरून होतात. ල්තුපච්චයන්තානං පිතාදීනඤ්ච යථාක්කම+මාරවරඞ වා හොන්තු+ත්තරපදෙ. සත්ථුනො දස්සනං සත්ථාරදස්සනං, කත්තාරනිද්දෙසො. මාතරපිතරො. වාත්වෙව, සත්ථුදස්සනං, මාතුජායො. 'लतु' प्रत्ययान्त शब्दांना आणि 'पितृ' (पिता) इत्यादी शब्दांना उत्तरपद असताना अनुक्रमे 'आर', 'अर' आणि 'अण' विकल्पेकरून होतात. जसे - 'सत्थुनो दस्सनं' = 'सत्थारदस्सनं' (शास्त्याचे दर्शन), 'कत्तारनिद्देसो' (कर्त्याचा निर्देश). 'मातरपितरो' (माता आणि पिता). विकल्पेकरून असल्यामुळे - 'सत्थुदस्सनं', 'मातुजायो'. 68. ක්වචි පච්චයෙති ६८. काही ठिकाणी प्रत्यय असताना सुद्धा (बदल होतो). පච්චයෙ පුමභාවෙ අතිසයෙන බ්යත්තා බ්යත්තතරා, බ්යත්තතමා. ‘‘තස්සං තත්ර, තාය තතො, තස්සං වෙලායං තදා’’ प्रत्यय असताना पुल्लिंगी भावात अतिशयार्थी 'ब्यत्ततरा' (अधिक स्पष्ट), 'ब्यत्ततमा' (सर्वात स्पष्ट) असे रूप होते. "तस्सं (तिच्यामध्ये) = तत्र, ताय (तिच्यापासून) = ततो, तस्सं वेलायं (त्या वेळी) = तदा". 71. සඤ්ඤාය+මුදො+දකස්ස ७१. संज्ञा (नाव) दर्शवायची असताना, उत्तरपद पुढे असल्यास 'उदक' शब्दाला 'उद' असा आदेश होतो. සඤ්ඤාය+මුදකස්සු+ත්තරපදෙ [Pg.169] උදාදෙසො හොති. උදධි, උදපානං. संज्ञा (नाव) दर्शवायची असताना, उत्तरपद पुढे असल्यास 'उदक' शब्दाला 'उद' असा आदेश होतो. जसे - 'उदधि' (समुद्र), 'उदपानं' (विहीर). 72. කුම්භාදීසු වා ७२. 'कुंभ' इत्यादी शब्द उत्तरपद असताना विकल्पेकरून 'उद' असा आदेश होतो. කුම්භාදීසු+ත්තරපදෙසු උදකස්ස උදාදෙසො වා හොති. උදකුම්භො, උදකකුම්භො. උදපත්තො උදකපත්තො. උදබින්දු උදකබින්දු. ආකතිගණො+යං. 'कुंभ' इत्यादी शब्द उत्तरपद असताना 'उदक' शब्दाला विकल्पेकरून 'उद' असा आदेश होतो. जसे - 'उदकुम्भो' किंवा 'उदककुम्भो' (पाण्याचा घडा); 'उदपत्तो' किंवा 'उदकपत्तो' (पाण्याचे भांडे); 'उदबिन्दु' किंवा 'उदकबिन्दु' (पाण्याचा थेंब). हा आकृतिगण आहे. 73. සොතාදීසූ+ලොපො ७३. 'सोत' (प्रवाह) इत्यादी शब्द उत्तरपद असताना 'उदक' मधील 'उ' चा लोप होतो. සොතාදීසු+ත්තරපදෙසු උදකස්ස උස්ස ලොපො හොති. දකසොතං, දකරක්ඛසො. 'सोत' इत्यादी शब्द उत्तरपद असताना 'उदक' शब्दातील 'उ' चा लोप होतो. जसे - 'दकसोतं' (पाण्याचा प्रवाह), 'दकरक्खसो' (जलराक्षस). 26. ඉත්ථිය+මත්වා २६. स्त्रीलिंगात अकारान्त नामाला 'आ' प्रत्यय होतो. ඉත්ථියං වත්තමානතො අකාරන්තතො නාමස්මා ආපච්චයො හොති. ධම්මදින්නා. स्त्रीलिंगी अर्थ व्यक्त करणाऱ्या अकारान्त नामाला 'आ' प्रत्यय होतो. जसे - 'धम्मदिन्ना'. 27. නදාදිතො ඞී २७. 'नदी' इत्यादी शब्दांना स्त्रीलिंगात 'ई' (ङी) प्रत्यय होतो. නදාදීහි ඉත්ථියං වීපච්චයො හොති. නදී මහී කුමාරී තරුණී වාරුණී ගොතමී. 'नदी' इत्यादी शब्दांना स्त्रीलिंगात 'ई' (ङी) प्रत्यय होतो. जसे - 'नदी', 'मही', 'कुमारी', 'तरुणी', 'वारुणी', 'गोतमी'. ගොතො වා 'गो' शब्दाला स्त्रीलिंगात विकल्पेकरून 'ई' प्रत्यय होतो. ගාවී ගො. ආකතිගණො+යං. ව-කාරො ‘‘න්තන්තූනං වීම්හි තො වා’’ති විසෙසනත්ථො. 'गावी' (गाय), 'गो'. हा आकृतिगण आहे. 'व' कार हा "न्तन्तूनं वीम्हि तो वा" या सूत्रातील विशेषणार्थासाठी आहे. 28. යක්ඛාදිත්වි+නී ච २८. 'यक्ख' (यक्ष) इत्यादी शब्दांना स्त्रीलिंगात 'इनी' आणि 'ई' प्रत्यय होतात. යක්ඛාදිතො [Pg.170] ඉත්ථියං ඉනී හොති වී ච. යක්ඛිනී යක්ඛී, නාගිනී නාගී, සීහිනී සීහී. 'यक्ख' इत्यादी शब्दांना स्त्रीलिंगात 'इनी' आणि 'ई' प्रत्यय होतात. जसे - 'यक्खिनी', 'यक्खी'; 'नागिनी', 'नागी'; 'सीहिनी', 'सीही'. 29. ආරාමිකාදීහි २९. 'आरामिक' इत्यादी शब्दांना स्त्रीलिंगात 'इनी' प्रत्यय होतो. ආරාමිකාදිතො ඉනී හොති+ත්ථියං. ආරාමිකිනී, අනන්තරායිකිනී. 'आरामिक' इत्यादी शब्दांना स्त्रीलिंगात 'इनी' प्रत्यय होतो. जसे - 'आरामिकिनी', 'अनन्तरायकिनी'. සඤ්ඤායං මානුසො මානුසිනී, අඤ්ඤත්ර මානුසී. संज्ञा (नाव) असताना 'मानुसो' चे 'मानुसिनी' होते, इतर ठिकाणी 'मानुसी' होते. 30. යුවණ්ණෙහි නී ३०. 'इ' आणि 'उ' वर्णांच्या शेवटी असणाऱ्या शब्दांना स्त्रीलिंगात बहुधा 'नी' प्रत्यय होतो. ඉත්ථිය+මිවණ්ණුවණ්ණන්තෙහි නී හොති බහුලං. සදාපයතපාණිනී, දණ්ඩිනී, භික්ඛුනී, ඛත්තබන්ධුනී, පරචිත්තවිදුනී. මාතුආදිතො කස්මා න හොති, ඉත්ථිපච්චයං විනාපි ඉත්ථත්තාභිධානතො. स्त्रीलिंगात 'इ-वर्ण' (इ, ई) आणि 'उ-वर्ण' (उ, ऊ) शेवटी असणाऱ्या शब्दांना बहुधा 'नी' प्रत्यय होतो. जसे - 'सदापयतपाणिनी', 'दण्डिनी', 'भिक्खुनी', 'खत्तबन्धुनी', 'परचित्तविदुनी'. 'मातु' (माता) इत्यादी शब्दांना का होत नाही? कारण स्त्रीलिंगी प्रत्ययाशिवाय देखील ते स्त्रीलिंगाचाच बोध करून देतात. 31. ත්තිම්හා+ඤ්ඤත්ථෙ ३१. 'ति' प्रत्ययान्त शब्दांनंतर अन्य अर्थी स्त्रीलिंगात बहुधा 'नी' प्रत्यय होतो. ත්තිම්හා+ඤ්ඤත්ථෙයෙව ඉත්ථියං නී හොති බහුලං. සා+හං අහිංසාරතිනී, තස්සා මුට්ඨස්සතිනියා, සා ගාවී වච්ඡගිද්ධිනී. අඤ්ඤත්ථෙති කිං, ධම්මරති. 'ति' प्रत्ययान्त शब्दांनंतर अन्य अर्थीच स्त्रीलिंगात बहुधा 'नी' प्रत्यय होतो. जसे - 'साहं अहिंसारतिनी' (ती मी अहिंसेत रमणारी), 'तस्सा मुट्ठस्सतिनिया' (त्या विस्मरणशील स्त्रीची), 'सा गावी वच्छगिद्धिनी' (ती वासरासाठी आसक्त असलेली गाय). 'अन्य अर्थी' असे का म्हटले आहे? (कारण मूळ अर्थात होत नाही, जसे) 'धम्मरति' (धर्मातील रती/प्रीती). 32. ඝරණ්යාදයොති ३२. 'घरणी' इत्यादी शब्द योग्य मानले जातात. ඝරණිපභුතයො නීපච්චයන්තා සාධවො හොන්ති. ඝර+මස්සා අත්ථීති ඊම්හි ‘‘යුවණ්ණෙහි නී’’ති නී, ඝරණී. ඉමිනා නස්ස ණො, ඊස්ස අත්තඤ්ච. 'घरणी' इत्यादी 'नी' प्रत्ययान्त शब्द योग्य मानले जातात. 'घरं अस्सा अत्थीति' (जिचे घर आहे ती) या अर्थी 'ई' प्रत्यय असताना "युवण्णेहि नी" या सूत्राने 'नी' प्रत्यय होऊन 'घरणी' बनते. या सूत्राने 'न' चा 'ण' होतो आणि 'ई' चा 'अ' होतो. ආචරියා [Pg.171] වා යලොපො ච ඉති ගණසුත්තෙන නියාමිතත්තා ඉමිනාව නීම්හි යලොපො ච, ආචරිනී ආචරියා. "आचरिया वा यलोपो च" या गणसूत्राने नियमन केल्यामुळे, यानेच 'नी' प्रत्यय असताना 'य' चा लोप देखील होतो; जसे - 'आचरिनी', 'आचरिया'. 33. මාතුලාදිත්වා+නී භරියායන්ති ३३. 'मातुल' (मामा) इत्यादी शब्दांना पत्नी या अर्थी 'आनी' प्रत्यय होतो. මාතුලාදිතො භරියාය+මානී හොති. මාතුලානී, වරුණානී, ගහපතානී, ආචරියානී. 'मातुल' इत्यादी शब्दांना पत्नी या अर्थी 'आनी' प्रत्यय होतो. जसे - 'मातुलानी' (मामी), 'वरुणानी' (वरुणाची पत्नी), 'गहपतानी' (गृहपतीची पत्नी), 'आचरियानी' (आचार्यांची पत्नी). අභරියායං ඛත්තියා වා ඉති ගණසුත්තෙන නියමිතත්තා ඉමිනා වා ආනී, ඛත්තියානී. නදාදිපාඨා භරියායන්තු ඊ, ඛත්තියී. पत्नी नसलेल्या अर्थी "खत्तिया वा" या गणसूत्राने नियमन केल्यामुळे, याने विकल्पेकरून 'आनी' प्रत्यय होऊन 'खत्तियानी' बनते. 'नदादि' पाठाने पत्नी या अर्थी 'ई' प्रत्यय होऊन 'खत्तियी' बनते. 34. උපමා+සංහිත+සහිත+සඤ්ඤත+සහ+සඵ+වාම+ලක්ඛණාදිතූ+රුතූති ३४. उपमा, संहित, सहित, संञत, सह, सफ, वाम, लक्षण इत्यादी शब्द पूर्वपद असताना 'ऊरु' शब्दाला स्त्रीलिंगात 'ऊ' प्रत्यय होतो. ඌරුසද්දතො ඉත්ථිය+මූ හොති. කරභො විය ඌරු යස්සා සා කරභොරූ, සංහිතො ඌරු අස්සාති සංහිතොරූ, එවං සහිතොරූ, සඤ්ඤතොරූ, සහොරූ, සඵොරූ, වාමොරූ, ලක්ඛණොරූ. ඌති යොගවිභාගා බ්රහ්මබන්ධූ. 'ऊरु' शब्दाला स्त्रीलिंगात 'ऊ' प्रत्यय होतो. जसे - 'करभो विय ऊरु यस्सा सा' = 'करभोरू' (जिची मांडी हत्तीच्या सोंडेसारखी आहे ती), 'संहितो ऊरु अस्साति' = 'संहितोरू' (जिच्या मांड्या जुळलेल्या आहेत ती), तसेच 'सहितोरू', 'सञ्ञतोरू', 'सहोरू', 'सफोरू', 'वामोरू', 'लक्खणोरू'. 'ऊ' या योगविभागाने 'ब्रह्मबन्धू' असा शब्द बनतो. 35. යුවාති ३५. 'युव' शब्दाला स्त्रीलिंगात 'ति' प्रत्यय होतो. යුවසද්දතොති හොති+ත්ථියං. යුවති. 'युव' शब्दाला स्त्रीलिंगात 'ति' प्रत्यय होतो. जसे - 'युवति'. 36. න්තන්තූනං වීම්හි තො වාති ३६. 'न्त' आणि 'तु' प्रत्ययान्त शब्दांना 'ई' प्रत्यय असताना विकल्पेकरून 'त' होतो. වීම්හි න්තන්තූනං තො වා හොති. ගච්ඡතී ගච්ඡන්තී, සීලවත සීලවන්තී. "वी" प्रत्यय असताना "न्त" अन्ताचा "त" विकल्पेकरून होतो. (उदा.) गच्छती - गच्छन्ती, सीलवती - सीलवन्ती. 37. භවතො භොතොති ३७. "भवतो भोतो" (हे सूत्र आहे). වීම්හි [Pg.172] භවතො භොතාදෙසො වා හොති. භොතී භවන්තී. "वी" प्रत्यय असताना "भवन्त" शब्दाचा "भोत" असा आदेश विकल्पेकरून होतो. (उदा.) भोती - भवन्ती. 39. පුථුස්ස පථවපුථවාති ३९. "पुथुस्स पथवपुथवा" (हे सूत्र आहे). වීම්හි පුථුස්ස පථවපුථවා හොන්ති. පථවී පුථවී, ඨෙ පථවී. "वी" प्रत्यय असताना "पुथु" शब्दाचे "पथव" आणि "पुथव" हे आदेश होतात. (उदा.) पथवी - पुथवी, (तसेच) "ठे" प्रत्यय असताना "पथवी". ඉති පයොගසිද්ධියං සමාසකණ්ඩො චතුත්ථො. अशा प्रकारे प्रयोगसिद्धीमध्ये "समासकाण्ड" नावाचा चौथा अध्याय समाप्त झाला. 5. ණාදිකණ්ඩ ५. णादिकाण्ड සමාසො [Pg.173] පදසංඛෙපො, පදපච්චයසංහිතං; තද්ධිතං නාම හොතීති, විඤ්ඤෙය්යං තෙස+මන්තරං. समास म्हणजे पदांचा संक्षेप होय, आणि पदांच्या प्रत्ययांनी युक्त असणाऱ्याला "तद्धित" असे म्हणतात; या दोन्हीमधील हा फरक समजून घेतला पाहिजे. 1. ණො වා+පච්චෙ १. "णो वापच्चे" (हे सूत्र आहे). ඡට්ඨීයන්තා නාමස්මා වා ණපච්චයො හොති අපච්චෙ+භිධෙය්යෙ. අපච්චසද්දසම්බන්ධිත්තෙන අපච්චවන්තතො කතසරපච්චයො සමත්ථ්යතො ඡට්ඨ්යන්තතො හොතීති ‘‘ඡට්ඨීයන්තා නාමස්මා’’ති සුත්තෙ අවුත්තම්පි වුත්තං. ණාදීනං තද්ධිතන්ති පුබ්බාචරියසඤ්ඤා. ණකාරො වුද්ධ්යත්ථො. එව+මඤ්ඤත්රාපි. ණාදිවුත්තිත්තා ‘‘එකත්ථතායං’’ති විභත්තිලොපො. षष्ठीविभक्तीने अन्त होणाऱ्या नामापासून "अपत्य" (संतती) हा अर्थ दर्शवायचा असताना "ण" प्रत्यय विकल्पेकरून होतो. अपत्य शब्दाशी संबंध असल्यामुळे, अपत्यवानापासून होणारा प्रत्यय सामर्थ्यामुळे षष्ठीविभक्त्यन्त नामापासून होतो, हे "छट्ठीयन्ता नामस्मा" या सूत्रात स्पष्टपणे न म्हटले असले तरी अभिप्रेत आहे. "ण" इत्यादी प्रत्ययांना "तद्धित" अशी पूर्वाचार्यांची संज्ञा आहे. "ण" हा वर्ण वृद्धीसाठी (स्वराच्या वृद्धीसाठी) आहे. इतर ठिकाणीही असेच समजावे. "णादि" वृत्ती असल्यामुळे "एकत्थतायं" या नियमाने विभक्तीचा लोप होतो. 124. සරාන+මාදිස්සා+යුවණ්ණස්සා+එඔ ණානුබන්ධෙ १२४. "सरामनादिस्सायुवण्णस्साएओ णानुबन्धे" (हे सूत्र आहे). සරාන+මාදිභූතා යෙ අකාරි+වණ්ණු+වණ්ණා, තෙසං ආ+එ+ඔ වා හොන්ති යථාක්කමං ණානුබන්ධෙති අකාරස්ස ආකාරො. ආ+එ+ඔනං වුද්ධීතිපි පුබ්බාචරියසඤ්ඤා. වසිට්ඨස්සා+පච්චං වාසිට්ඨො. වීම්හි වාසිට්ඨී. වෙති වසිට්ඨස්සා+පච්චංති වාක්යස්ස ච වසිට්ඨාපච්චංති සමාසස්ස ච විකප්පත්ථං. සො ච වාසද්දො යාව ‘‘සකත්ථෙ’’ති අධිකරීයති. स्वरांमध्ये जे आदिभूत (पहिले) असणारे "अ", "इ/ई" आणि "उ/ऊ" आहेत, त्यांच्या जागी "ण" अनुबंध असताना अनुक्रमे "आ", "ए" आणि "ओ" हे आदेश विकल्पेकरून होतात; म्हणजेच "अ" कारचा "आ" कार होतो. "आ", "ए", "ओ" यांना "वृद्धी" अशी पूर्वाचार्यांची संज्ञा आहे. वसिष्ठाचे अपत्य ते "वासिट्ठो" (वासिष्ठ). स्त्रीलिंगात "वी" प्रत्यय लागून "वासिट्ठी" (वासिष्ठी) होते. "वा" (विकल्पेकरून) हा शब्द "वसिट्ठस्स अपच्चं" या वाक्याच्या आणि "वसिट्ठापच्चं" या समासाच्या विकल्पासाठी आहे. आणि तो "वा" शब्द "सकत्थे" या सूत्रापर्यंत अधिकार म्हणून चालतो. නපුංසකෙන ලිඞ්ගෙන, සද්දො+දාහු පුමෙන වා; නිද්දිස්සතීති ඤාතබ්බ+මවිසෙසෙ පනි+ච්ඡිතෙති – "नपुंसकलिंगाने किंवा पुल्लिंगाने शब्दाचा निर्देश केला जात असला, तरी विशेष भेद नसताना दोन्हीही अभिप्रेत आहेत असे समजावे" - වුත්තත්ථා අපච්චසද්දස්ස නපුංසකත්ථෙපි පුත්තපුත්තීනං ද්වින්නම්පි වාචකො හොති. वरील अर्थानुसार "अपत्य" हा शब्द नपुंसकलिंगी असला तरी तो पुत्र आणि पुत्री (मुलगा आणि मुलगी) या दोघांचाही वाचक असतो. ණාදයො+භිධෙය්යලිඞ්ගා[Pg.174], අපච්චෙ ත්ව+නපුංසකා; නපුංසකෙ සකත්ථෙ ණ්යො, භිය්යො භාවසමූහජා; තා තු+ත්ථිය+මසංඛ්යානෙ, ත්වාදිචීපච්චයන්තකා. "ण" इत्यादी प्रत्यय हे विशेष्यलिंगी (ज्यांचे वर्णन करायचे आहे त्या लिंगाचे) असतात, परंतु "अपत्य" अर्थामध्ये ते नपुंसकलिंगी नसतात. स्वार्थामध्ये (सकत्थ) आणि नपुंसकलिंगात "ण्य" प्रत्यय होतो, जो बहुधा भाव (अवस्था) आणि समूह या अर्थांतून उत्पन्न होतो. "ता" प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिंगी असतात (संख्यावाचक नसताना), आणि "त्वा" इत्यादी तसेच "ची" प्रत्ययान्त शब्दही याचप्रमाणे असतात. භාරද්වාජස්ස අපච්චං=පුත්තො භාරද්වාජො, එවං වෙස්සාමිත්තො, ගොතමො. එත්ථ ච අ+යුවණ්ණන්තාභාවා ආ+එ+ඔනං න වුද්ධි. වාසුදෙවස්ස අපච්චං වාසුදෙවො, බලදෙවො. චිත්තකොතිආදීසු පන සංයොගන්තත්තා ‘‘සංයොගෙ ක්වචී’’ති ක්වචි න වුද්ධි. උපගුනො අපච්චං ඔපගවො ඔපගවී. එත්ථ ‘‘උවණ්ණස්සා+වඞ සරෙ’’ති උකාරස්ස අවඞ. भारद्वाजाचे अपत्य (पुत्र) तो "भारद्वाजो" (भारद्वाज); याचप्रमाणे "वेस्सामित्तो" (विश्वामित्र), "गोतमो" (गौतम). येथे "अ", "इ/ई", "उ/ऊ" वर्णांच्या अभावामुळे "आ", "ए", "ओ" ही वृद्धी होत नाही. वासुदेवाचे अपत्य ते "वासुदेवो" (वासुदेव), बलदेवाचे "बलदेवो" (किंवा बालदेव). "चित्तकोत" इत्यादी शब्दांमध्ये मात्र संयोगान्त असल्यामुळे "संयोगे क्वचि" या सूत्राने काही ठिकाणी वृद्धी होत नाही. उपगूचे अपत्य ते "ओपगवो" (औपगव), स्त्रीलिंगात "ओपगवी". येथे "उवण्णस्सावणं सरे" या सूत्राने "उ" कारचा "अवण्" (अव) आदेश होतो. වච්ඡස්සා+පච්චන්ති විග්ගය්හ පුබ්බසුත්තෙන ණපච්චයෙ කතෙ පුන වච්ඡස්සා+පච්චංති විග්ගහො. "वच्छस्स अपच्चं" (वत्साचे अपत्य) असा विग्रह करून पूर्वसूत्राने "ण" प्रत्यय केल्यावर, पुन्हा "वच्छस्स अपच्चं" असा विग्रह होतो. 2. වච්ඡාදිතො ණාන+ණායනා २. "वच्छादितो णानणायना" (हे सूत्र आहे). වච්ඡාදීහි අපච්චපච්චයන්තෙහි ගොත්තාදීහි ච සද්දෙහි ණාන+ණායනපච්චයා වා හොන්ති අපච්චෙ. වච්ඡානො, වච්ඡායනො, ‘‘සංයොගෙ ක්වචී’’ති න වුද්ධි. කතිස්සා+පච්චං කච්චො, ‘‘ණ්ය දිච්චාදීහී’’ති ණ්යො, ‘‘ලොපො+වණ්ණි+වණ්ණානං’’ති අකාරලොපෙ චවග්ගපුබ්බරූපානි. කච්චස්සා+පච්චං කච්චානො, කච්චායනො, යාගමෙ කාතියානො. මුග්ගස්සා+පච්චං=නත්තාදීති වාක්යෙ වුද්ධි+ඉකාරලොප+පුබ්බරූපානි. මොග්ගල්ලස්සා+පච්චංති පුනණාන+ණායනා හොන්ති, මොග්ගල්ලානො මොග්ගල්ලායනො. ඉමෙ චත්තාරො අපච්චපච්චයන්තා. ගොත්තාදිතො යථාසකටස්සා+පච්චං නත්තාදීහි සකටානො සකටායනො. කණ්හස්සා+පච්චං නත්තාදි කණ්හානො කණ්හායනො. එවං අග්ගිවෙස්සානො අග්ගිවෙස්සායනො[Pg.175], මුඤ්ජානො මුඤ්ජායනො, කුඤ්ජානො කුඤ්ජායනො. සබ්බත්ථ සංයොගත්තා න වුද්ධි. ආකතිගණො+යං. "वच्छ" (वत्स) इत्यादी अपत्य-प्रत्ययान्त शब्दांपासून आणि गोत्र इत्यादी शब्दांपासून "अपत्य" अर्थामध्ये "णान" आणि "णायन" हे प्रत्यय विकल्पेकरून होतात. (उदा.) वच्छानो, वच्छायनो; "संयोगे क्वचि" या सूत्राने येथे वृद्धी होत नाही. कतीचे अपत्य ते "कच्चो" (कात्य); "ण्य दिच्चादीहि" या सूत्राने "ण्य" प्रत्यय होतो, आणि "लोपो वण्णिवण्णानं" या सूत्राने "अ" कारचा लोप होऊन च-वर्ग आणि पूर्वरूप होते. कच्चाचे अपत्य ते "कच्चानो" (कात्यायन), "कच्चायनो"; "य" चा आगम झाल्यावर "कातियानो" (कात्यायन) होते. मुग्गाचे अपत्य = नातू इत्यादी, या वाक्यात वृद्धी, "इ" कारचा लोप आणि पूर्वरूप होते. मोग्गल्लाचे अपत्य या अर्थी पुन्हा "णान" आणि "णायन" प्रत्यय होऊन "मोग्गल्लानो" (मोग्गल्लायन), "मोग्गल्लायनो" हे रूप बनते. हे चार अपत्य-प्रत्ययान्त शब्द आहेत. गोत्रादी शब्दांपासून जसे सकटाचे अपत्य (नातू इत्यादी) "सकटानो", "सकटायनो" होते. कण्हाचे अपत्य (नातू इत्यादी) "कण्हानो", "कण्हायनो" होते. याचप्रमाणे अग्गिवेश्शानो - अग्गिवेश्शायनो, मुंजानो - मुंजायनो, kuñjāno - kuñjāyano (कुंजानो - कुंजायनो). सर्व ठिकाणी संयोग (जोडाक्षर) असल्यामुळे वृद्धी होत नाही. हा "आकृतिगण" आहे. 3. කත්තිකාවිධවාදීහි ණෙය්යණෙරා ३. "कत्तिकाविधवादीहि णेय्यणेरा" (हे सूत्र आहे). කත්තිකාදීහි විධවාදීහි ච ණෙය්යණෙරප්පච්චයා හොන්ති වා යථාක්කමං. කත්තිකාය අපච්චං කත්තිකෙය්යො, ගරුළො විනතාය=සුපණ්ණමාතුයා අපච්චං වෙනතෙය්යො. රොහිණියා අපච්චං රොහිණෙය්යො, ගඞ්ගාය අපච්චං ගඞ්ගෙය්යො. එවං භාගිනෙය්යො, නාදෙය්යො, අන්තෙය්යො, ආහෙය්යො, කාපෙය්යො, සුචියා අපච්චං සොචෙය්යො, බාලෙය්යො. ණෙරෙ-විධවාය අපච්චං වෙධවෙරො. බන්ධකියා=අභිසාරිකාය අපච්චං බන්ධ-කෙරො. සමණස්ස උපජ්ඣායස්සා+පච්චං සාමණෙරො, නාළිකෙරො ඉච්චාදි. "कत्तिका" इत्यादी आणि "विधवा" इत्यादी शब्दांपासून अनुक्रमे "णेय्य" आणि "णेर" हे प्रत्यय विकल्पेकरून होतात. कत्तिकाचे अपत्य ते "कत्तिकेय्यो" (कार्तिकेय); गरुड हा विनतेचा = सुपर्णमातेचा अपत्य असल्यामुळे "वेनतेyयो" (वैनतेय) होतो. रोहिणीचे अपत्य ते "रोहिणेय्यो" (रौहिणेय), गंगेचे अपत्य ते "गंगेय्यो" (गांगेय). याचप्रमाणे भागिनेय्यो (भाचा), नादेय्यो, अन्तेय्यो, आहेय्यो, कापेय्यो; सुचीचे अपत्य ते "सोचेय्यो" (सौचेय), बालेय्यो. "णेर" प्रत्यय असताना - विधवेचे अपत्य ते "वेधवेरो" (वैधवेय). बंधकीचे = अभिसारिकेचे अपत्य ते "बन्धकेरो". समणाच्या उपाध्यायाचे अपत्य (किंवा शिष्य) तो "सामणेरो" (श्रामणेर), नाळिकेरो (नारळ) इत्यादी. 4. ණ්ය දිච්චාදීහි ४. "ण्य दिच्चादीहि" (हे सूत्र आहे). දිතිප්පභුතීහි ණ්යො හොති අපච්චෙ. "दिति" इत्यादी शब्दांपासून "अपत्य" अर्थामध्ये "ण्य" प्रत्यय होतो. 125. සංයොගෙ ක්වචි १२५. "संयोगे क्वचि" (हे सूत्र आहे). සංයොගවිසයෙ ක්වචි ආ+එ+ඔවුද්ධියො හොන්ති ණානුබන්ධෙ. संयोग (जोडाक्षर) असताना "ण" अनुबंध असल्यास काही ठिकाणी "आ", "ए", "ओ" ही वृद्धी होते. 131. ලොපො+වණ්ණි+වණ්ණානං १३१. "लोपो वण्णिवण्णानं" (हे सूत्र आहे). අවණ්ණි+වණ්ණානං ලොපො හොති යකාරාදො පච්චයෙ. දිතියා=අසුරමාතුයා අපච්චං දෙච්චො ආදිච්චො. කුණ්ඩනියා අපච්චං කොණ්ඩඤ්ඤො, නස්ස ඤ්ඤෙ පුබ්බරූපං. අදිතීති දෙවමාතා. "य" कारने सुरू होणारा प्रत्यय पुढे असताना "अ" आणि "इ/ई" वर्णांचा लोप होतो. दितीचे = असुरमातेचे अपत्य ते "देच्चो" (दैत्य), "आदिच्चो" (आदित्य). कुण्डनीचे अपत्य ते "कोण्डञ्ञो" (कौंडिण्य), येथे "न" कारचे "ञ्ञ" असे पूर्वरूप होते. अदिती म्हणजे देवमाता होय. භාතුනො [Pg.176] අපච්චං භාතබ්යො, ‘‘යම්හි ගොස්ස චා’’ති යම්හි උස්ස අවඞ අකාරලොපපුබ්බරූපානි. भावाचे (भातु) अपत्य ते "भातब्यो" (पुतण्या); "यम्हि गोस्स चा" या सूत्राने "य" पुढे असताना "उ" कारचा "अवण्" (अव) आदेश होतो, आणि "अ" कारचा लोप होऊन पूर्वरूप होते. 5. ආ ණි ५. "आ णि" (हे सूत्र आहे). අකාරන්තතො ණි වා හොත+පච්චෙ බහුලං. ආ=ති නාමවිසෙසනත්තා අ-කාරන්තතොති වුත්තං. දක්ඛස්සා+පච්චං දක්ඛි, දත්ති, දොණි, වාසවි, වාරුණි. ජිනදත්තස්සා+පච්චං ජෙනදත්ති, සුද්ධොදනි, ආනුරුද්ධි ඉච්චාදි. अकारान्त शब्दापासून "अपत्य" अर्थामध्ये "णि" प्रत्यय बहुधा विकल्पेकरून होतो. "आ" हे नामाचे विशेषण असल्यामुळे "अकारान्त शब्दापासून" असे म्हटले आहे. दक्खाचे (दक्ष) अपत्य ते "दक्खि" (दाक्षि), दत्ति, दोणि, वासवि, वारुणि. जिनदत्ताचे अपत्य ते "जेनदत्ति", सुद्धोदनि, आनुरुद्धि इत्यादी. 6. රාජතො ඤ්ඤො ජාතියං ६. "राजतो ञ्ञो जातियं" (हे सूत्र आहे). රාජතො ඤ්ඤො වා හොත+පච්චෙ ඛත්ථියජාතියං ගම්යමානායං. රඤ්ඤො අපච්චං රාජඤ්ඤො. ජාතීයන්ති කිං, රාජාපච්චං. क्षत्रिय जात अभिप्रेत असताना "राजन्" शब्दापासून "अपत्य" अर्थामध्ये "ञ्ञ" प्रत्यय विकल्पेकरून होतो. राजाचे अपत्य ते "राजञ्ञो" (राजन्य). "जातीमध्ये" असे का म्हटले आहे? (कारण जात अभिप्रेत नसेल तर) "राजापच्चं" (राजाचे अपत्य) असे होईल. 7. ඛත්තා යි+යා ७. "खत्ता यिया" (हे सूत्र आहे). තිජාතියං අපච්චෙ ය+ඉයා හොන්ති. ඛත්තස්සා+පච්චං ඛත්යො ඛත්තියො. ජාතියං ත්වෙව, ඛත්ති. त्या जातीमध्ये "अपत्य" अर्थी "य" आणि "इय" हे प्रत्यय होतात. खत्ताचे (क्षत्रियाचे) अपत्य ते "खत्यो", "खत्तियो" (क्षत्रिय). जात अभिप्रेत असतानाच हे होते, (अन्यथा) "खत्ति" असे होईल. 8. මනුතො ස්ස+සණ ८. "मनुतो स्ससण" (हे सूत्र आहे). මනුතො ජාතිසමුදායෙ ස්ස+සණ හොන්තු+පච්චෙ. මනුනො අපච්චං මනුස්සො මානුසො, මනුස්සී මානුසී. ජාතියං ත්වෙව, මානවො, නස්ස ණො, මාණවො. "मनु" शब्दापासून मनुष्यजातीच्या समूहामध्ये "अपत्य" अर्थी "स्स" आणि "सण" हे प्रत्यय होतात. मनूचे अपत्य ते "मनुस्सो" (मनुष्य), "मानुसो" (मानुष); स्त्रीलिंगात "मनुस्सी" (मनुष्या), "मानुसी" (मानुषी). जात अभिप्रेत असतानाच हे होते, (अन्यथा) "मानवो" होते, आणि "न" कारचा "ण" कार होऊन "माणवो" (माणवक) असे रूप बनते. 9. ජනපදනාමස්මා ඛත්තියා රඤ්ඤෙ ච ණො ९. "जनपदनामस्मा khattiyā रञ्ञे च णो" (हे सूत्र आहे). ජනපදස්ස යං නාමං, තං නාමස්මා ඛත්තියා අපච්චෙ රඤ්ඤෙ ච ණො හොති. පඤ්චාලානං අපච්චං රාජා වා පඤ්චාලො, කොසලො[Pg.177], මාගධො, ඔක්කාකො. ජනපදනාමස්මාති කිං, දාසරථි. ඛත්තියාති කිං, පඤ්චාලස්ස බ්රාහ්මණස්සා+පච්චං පඤ්චාලි. जनपदाचे (देशाचे) जे नाव असेल, त्या नामापासून क्षत्रिय अपत्य आणि राजा या अर्थांमध्ये "ण" प्रत्यय होतो. पंचालांचे अपत्य किंवा राजा तो "पञ्चालो" (पांचाल), "कोसलो" (कोसल), "मागधो" (मागध), "ओक्काको" (इक्ष्वाकु). "जनपदाच्या नामापासून" असे का म्हटले आहे? (कारण व्यक्तीचे नाव असल्यास) "दासरथि" (दशरथाचा पुत्र) असे होईल. "क्षत्रिय" असे का म्हटले आहे? (कारण क्षत्रिय नसलेल्या) पंचालातील ब्राह्मणाच्या अपत्याला "पञ्चालि" असे म्हणतात. 10. ණ්ය කුරුසිවීහි १०. "ण्य कुरुसिवीहि" (हे सूत्र आहे). කුරුසිවීහි අපච්චෙ රඤ්ඤෙ ච ණ්යො හොති. කුරූනං අපච්චං රාජා වා කොරබ්යො. ‘‘යම්හි ගොස්ස චා’’තිමිනා අවඞ, බකාරපුබ්බරූපානි. සෙබ්බො, ඉලොපො. (අපච්චතද්ධිතං). "कुरु" आणि "सिवि" शब्दांपासून अपत्य आणि राजा या अर्थांमध्ये "ण्य" प्रत्यय होतो. कुरूंचे अपत्य किंवा राजा तो "कोरब्यो" (कौरव्य). "यम्हि गोस्स चा" या सूत्राने "अवण्" (अव) आदेश होतो आणि "ब" कारचे पूर्वरूप होते. सिविचे अपत्य "सेब्बो" (शैब्य), येथे "इ" कारचा लोप होतो. (हे अपत्य-तद्धित प्रकरण आहे). 11. ණ රාගා තෙන රත්තං ११. रंगावाचक शब्दापासून 'त्याने रंगवलेले' या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. රාගවාචීතතියන්තතො රත්ත+මිච්චෙ+තස්මිං අත්තෙ ණො හොති. කුසුම්භාදීහි වණ්ණන්තරපත්තං රත්තං නාම. කසාවෙන රත්තං කාසාවං. එවං කුසුම්භෙන රත්තං කොසුම්භං, හාලිද්දං, පත්තඞ්ගං, මඤ්ජෙට්ඨං, කුඞ්කුමං. ඉධ න හොති නීලං පීතන්ති, ගුණවචනත්තා ණෙන විනාපි දබ්බස්සා+භිධානතො. रंगवाचक तृतीयान्त शब्दापासून 'रंगवलेले' या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. कुसुंभ (करडई) इत्यादींद्वारे दुसरा रंग प्राप्त झालेल्या वस्तूला 'रंगवलेले' (रत्तं) असे म्हणतात. काषाय (काढ्याने) रंगवलेले ते 'कासावं' (काषाय वस्त्र). याचप्रमाणे कुसुंभाने रंगवलेले ते 'कोसुंभं', हळदीने रंगवलेले ते 'हालिद्दं', पतंगाने रंगवलेले ते 'पत्तंगं', मंजिष्ठाने रंगवलेले ते 'मंजेठ्ठं', कुंकुमाने रंगवलेले ते 'कुंकुमं'. येथे 'नीलं' (निळे), 'पीतं' (पिवळे) इत्यादींमध्ये हा प्रत्यय होत नाही, कारण हे गुणवाचक शब्द असल्याने 'ण' प्रत्ययाशिवाय देखील द्रव्याचा (वस्तूचा) बोध होतो. 12. නක්ඛත්තෙනි+න්දුයුත්තෙන කාලෙ १२. चंद्राशी युक्त असलेल्या नक्षत्रावाचक तृतीयान्त शब्दापासून त्या नक्षत्राने लक्षित (दर्शविलेल्या) काळाच्या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. තතියන්තතො නක්ඛත්තා තෙන ලක්ඛිතෙ කාලෙ ණො හොති, තං චෙ නක්ඛත්ත+මින්දුයුත්තං හොති. ඵුස්සෙන ඉන්දුයුත්තෙන ලක්ඛිතා පුණ්ණමාසී ඵුස්සී රත්ති, ඵුස්සො අහො, මඝාය ඉන්දුයුත්තාය ලක්ඛිතා පුණ්ණමාසී මාඝී, මාඝො. तृतीयान्त नक्षत्रवाचक शब्दापासून त्याने लक्षित काळाच्या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो, जर ते नक्षत्र चंद्राशी युक्त असेल. चंद्राशी युक्त असलेल्या पुष्य नक्षत्राने लक्षित पौर्णिमा म्हणजे 'फुस्सी' रात्र, 'फुस्सो' दिवस; मघा नक्षत्राशी युक्त चंद्राने लक्षित पौर्णिमा म्हणजे 'माघी', 'माघो' (मघा नक्षत्रयुक्त दिवस). 13. සා+ස්ස දෙවතා පුණ්ණමාසී १३. प्रथमान्त शब्दापासून 'ती त्याची देवता आहे' किंवा 'ती त्याची पौर्णिमा आहे' या षष्ठीच्या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. සෙති පඨමන්තා අස්සෙති ඡට්ඨියත්ථෙ ණො හොති, යං පඨමන්තං, සා චෙ දෙවතා පුණ්ණමාසී වා. සුගතො දෙවතා අස්ස සොගතො, මාහින්දො, යාමො, වාරුණො. බුද්ධො අස්ස දෙවතාති [Pg.178] බුද්ධො. ඵුස්සී පුණ්ණමාසී අස්ස සම්බන්ධිනීති ඵුස්සො මාසො. එවං මාඝො, ඵග්ගුනො, චිත්තො, වෙසාඛො, ජෙට්ඨමූලො, ආසාළ්හො, සාවණො, පොට්ඨපාදො, අස්සයුජො, කත්තිකො, මාගසිරො. පුණ්ණමාසී ච භතකමාසසම්බන්ධිනී න හොති, පුණ්ණො මා අස්සන්ති නිබ්බචනා, අතො එව නිපාතනා ණො, සාගමො ච. 'सा' या प्रथमान्त शब्दापासून 'त्याची' (अस्स) या षष्ठीच्या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो, जर तो प्रथमान्त शब्द देवता किंवा पौर्णिमा असेल. सुगत ही ज्याची देवता आहे तो 'सोगतो', महेंद्र ही ज्याची देवता आहे तो 'माहिंदो', यम ही ज्याची देवता आहे तो 'यामो', वरुण ही ज्याची देवता आहे तो 'वारुणो'. बुद्ध ही ज्याची देवता आहे तो 'बुद्धो'. पुष्य पौर्णिमा ज्याच्याशी संबंधित आहे तो 'फुस्सो' महिना. याचप्रमाणे माघो, फग्गुनो, चित्तो, वेसाखो, जेट्ठमूलो, आसाळ्हो, सावणो, पोट्ठपादो, अस्सयुजो, कत्तिको, मागसिरो. आणि पौर्णिमा ही केवळ भृतक (वेतन) महिन्याशी संबंधित नसते, तर 'पुण्णो मा अस्सं' (ज्यामध्ये चंद्र पूर्ण असतो) अशा व्युत्पत्तीमुळे, म्हणूनच निपातनाने 'ण' प्रत्यय आणि 'स' चा आगम होतो. 14. ත+මධීතෙ තං ජානාති ක+ණිකා ච १४. द्वितीयान्त शब्दापासून 'तो ते शिकतो' किंवा 'तो ते जाणतो' या अर्थांमध्ये 'क' आणि 'णिक' प्रत्यय होतात. දුතියන්තතො ත+මධීතෙ තං ජානාතීති එතෙස්ව+ත්ථෙසු ණො හොති කො ණිකො ච. එත්ථ චසද්දො කො චණිකො ච හොතීති සමුච්චිනො, නො ණපච්චයං. බ්යාකරණ+මධීතෙ ජානාතීති වා වෙය්යාකරණො, වි+ආ+කරණන්ති විච්ඡිජ්ජ කතයාදෙසස්සි+කාරස්ස ‘‘තදාදෙසා තදීව භවන්තී’’ති ඤායා ‘‘සරාන’’මිච්චාදිනා එකාරෙ යාගමද්විත්තානි. එවං මොහුත්තො, නෙමිත්තො, අඞ්ගවිජ්ජො, වත්ථුවිජ්ජො, ඡන්දසො, ‘‘මනා, දීනං සක’’ ඉති සකාගමො. කමකො, පදකො, වෙනයිකො, සුත්තන්තිකො, ආභිධම්මිකො. ද්විතග්ගහණං අජ්ඣෙනජානනෙ ච විසුං විසුං පච්චයවිධානත්ථං, අජ්ඣෙනවිසයදස්සනත්ථං, පසිද්ධුපසංහරණත්ථඤ්ච. द्वितीयान्त शब्दापासून 'तो ते शिकतो' किंवा 'तो ते जाणतो' या अर्थांमध्ये 'ण', 'क' आणि 'णिक' प्रत्यय होतात. येथे 'च' शब्द 'क' आणि 'णिक' प्रत्यय देखील होतात हे एकत्रित करण्यासाठी आहे, केवळ 'ण' प्रत्यय नाही. व्याकरण शिकतो किंवा जाणतो तो 'वेय्याकरणो'. 'वि + आ + करणं' अशी फोड करून 'इ' काराचा 'य' आदेश केल्यावर 'तदादेशा तदीव भवन्ति' या न्यायाने 'सराणं...' इत्यादी सूत्राने 'ए' कार होऊन 'य' चा आगम आणि द्वित्व होते. याचप्रमाणे मोहुत्तो (मुहूर्त जाणणारा), नेमित्तो (निमित्त जाणणारा), अंगविज्जो (अंगविद्या जाणणारा), वत्थुविज्जो (वास्तुविद्या जाणणारा), छन्दसो (छंद जाणणारा), 'मना, दीनं सक' या सूत्राने 'स' चा आगम होतो. कमको, पदको, वेनयिको, सुत्तन्तिको, आभिधम्मिको. येथे दोन वेळा ग्रहण (द्वित्व ग्रहण) हे अध्ययन आणि ज्ञान या दोन्ही अर्थांमध्ये स्वतंत्रपणे प्रत्यय विधान करण्यासाठी, अध्ययनाचा विषय दाखवण्यासाठी आणि प्रसिद्धीचा उपसंहार करण्यासाठी आहे. 15. තස්ස විසයෙ දෙසෙ १५. षष्ठ्यन्त शब्दापासून 'त्याचा विषय' असलेल्या देशाच्या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. ඡට්ඨියන්තා විසයෙ දෙසසරූපෙ ණො හොති. වසාතීනං විසයො දෙසො වාසාතො. දෙසෙති කිං, චක්ඛුස්ස විසයො රූපං, දෙවදත්තස්ස විසයො+නුවාකො. षष्ठ्यन्त शब्दापासून देशरूप विषयाच्या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. वसाती लोकांचा विषय (देश) तो 'वासातो'. 'देश' असे का म्हटले? डोळ्याचा विषय 'रूप' आहे, देवदत्ताचा विषय 'अनुवाक' आहे (येथे प्रत्यय होणार नाही). 16. නිවාසෙ තන්නාමෙ १६. त्याच नावाच्या निवासस्थान असलेल्या देशाच्या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. ති තන්නාමෙ [Pg.179] නිවාසෙ දෙසෙ ණො හොති. සිවීනං නිවාසො දෙසො සෙබ්බො. එත්ථ ‘‘යවා සරෙ’’ති යකාරෙ බකාරපුබ්බරූපානි. වාසාතො. त्याच नावाच्या निवासस्थान असलेल्या देशाच्या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. शिबी लोकांचे निवासस्थान असलेला देश तो 'सेब्बो'. येथे 'यवा सरे' या सूत्राने 'य' काराचे 'ब' कारात पूर्वरूप होते. वासातो. 17. අදූරභවෙති १७. 'जवळच असलेल्या' (अदूरभव) या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. ණො, විදිසාය අදූරභවං වෙදිසං. 'ण' प्रत्यय होतो; विदिशा नगरीच्या जवळ असलेले ते 'वेदिसां'. 18. තෙන නිබ්බත්තෙති १८. तृतीयान्त शब्दापासून 'त्याने निर्माण केलेले' (निबत्त) या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. තතියන්තා නිබ්බත්තත්ථෙ ණො හොති. කුසම්බෙන නිබ්බත්තා කොසම්බී නගරං, එවං කාකන්දී, මාකන්දී, සහස්සෙන නිබ්බත්තා සාහස්සී පරිඛා, හෙතුම්හි කත්තරි කරණෙ ච යථායොගං තතියා. तृतीयान्त शब्दापासून 'निर्माण केलेले' या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. कुसंब राजाने निर्माण केलेले ते 'कोसम्बी' नगर; याचप्रमाणे काकंदी, माकंदी; एक हजाराने निर्माण केलेली ती 'साहस्सी' खंदक. येथे हेतू, कर्ता आणि करण या अर्थांमध्ये योग्यतेनुसार तृतीया विभक्ती होते. 19. ත+මිධ+ත්ථි १९. 'ते येथे आहे' या अर्थात प्रथमान्त शब्दापासून सप्तमीच्या अर्थातील देशवाचक नावामध्ये 'ण' प्रत्यय होतो, जर ते प्रथमान्त तेथे अस्तित्वात असेल. තන්ති පඨමන්තා ඉධාති සත්තම්යත්ථෙ දෙසෙ තන්නාමෙ ණො හොති, යං තං පඨමන්ත+මත්ථි චෙ. උදුම්බරා අස්මිං දෙසෙ සන්තීති ඔදුම්බරො, බාදරො, පබ්බජො. 'तं' या प्रथमान्त शब्दापासून 'येथे' (इध) या सप्तम्यर्थी देशवाचक नावामध्ये 'ण' प्रत्यय होतो, जर तो प्रथमान्त शब्द तेथे अस्तित्वात असेल. उदुंबर (उंबर) या देशात आहेत तो 'ओदुंबरो' देश; याचप्रमाणे बादरो, पब्बजो. 20. තත්ර භවෙති २०. सप्तम्यन्त शब्दापासून 'तेथे उत्पन्न झालेले किंवा असलेले' (भव) या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. සත්තම්යන්තා භවත්ථෙ ණො. උදකෙ භවො ඔදකො, ඔරසො, ජානපදො, මාගධො, කාපිලවත්ථවො, කොසම්බො, මනසි භවං මානසං සුඛං, සකාගමො. සාරසො සකුණො, සාරසී සකුණී, සාරසං පුප්ඵං. මිත්තෙ භවා මෙත්තා මෙත්තී වා. පුරෙ භවා පොරී වාචා. පාවුසෙ භවො පාවුසො මෙඝො. පාවුසා [Pg.180] රත්ති, පාවුසං අබ්භං. සාරදො, සාරදා, සාරදං පුප්ඵං. මාධුරො ජනො, මාධුරා ගණිකා, මාධුරං වත්ථං. सप्तम्यन्त शब्दापासून 'उत्पन्न झालेले/असलेले' या अर्थात 'ण' प्रत्यय होतो. पाण्यात उत्पन्न झालेले ते 'ओदको', छातीत (उरसि) उत्पन्न झालेला तो 'ओरसो' (औरस पुत्र), जनपदात राहणारा तो 'जानपदो', मगधात राहणारा तो 'मागधो', कपिलवस्तूमध्ये राहणारा तो 'कापिलवत्थवो', कोसंबीत राहणारा तो 'कोसम्बो', मनात उत्पन्न झालेले ते 'मानसं' सुख; येथे 'स' चा आगम होतो. सरोवरात राहणारा तो 'सारसो' पक्षी, 'सारसी' मादी पक्षी, सरोवरात उमललेले ते 'सारसं' फूल. मित्राच्या ठिकाणी असणारी ती 'मेत्ता' (मैत्री) किंवा 'मेत्ती'. नगरात (पुरे) बोलली जाणारी ती 'पोरी' भाषा/वाणी. पावसाळ्यात (पावुसे) असणारा तो 'पावुसो' मेघ. पावसाळ्यातील ती 'पावुसा' रात्र, पावसाळ्यातील ते 'पावुसं' ढग. शरद ऋतूत होणारा 'सारदो', 'सारदा', शरद ऋतूतील ते 'सारदं' फूल. मथुरेचा मनुष्य तो 'माधुरो' जन, मथुरेची ती 'माधुरा' गणिका, मथुरेचे ते 'माधुरं' वस्त्र. 21. අජ්ජාදීහි තනොති २१. 'अज्ज' (आज) इत्यादी शब्दांपासून 'उत्पन्न झालेले/असलेले' या अर्थात 'तन' प्रत्यय होतो. භවත්ථෙ තනො. අජ්ජ භවො අජ්ජතනො, ස්වාතනො, හිය්යතනො. ‘‘එඔන+ම වණ්ණෙ’’ති එඔනං අ හොති. असलेले/उत्पन्न झालेले या अर्थात 'तन' प्रत्यय होतो. आजचे ते 'अज्जतनो', उद्याचे ते 'स्वातनो', कालचे ते 'हिय्यतनो'. 'एओनं अ वण्णे' या सूत्राने 'ए' आणि 'ओ' चा 'अ' होतो. 22. පුරාතො ණො චති २२. 'पुरा' (पूर्वी) या शब्दापासून 'उत्पन्न झालेले/असलेले' या अर्थात 'ण' आणि 'तन' प्रत्यय होतात. භවත්ථෙ ණො තනො ච. එත්ථ ණකාරො අවයවො, නෙවා+නුබන්ධො. පුරාණො, පුරාතනො. असलेले/उत्पन्न झालेले या अर्थात 'ण' आणि 'तन' प्रत्यय होतात. येथे 'ण' कार हा अवयव आहे, अनुबंध नाही. पूर्वीचे ते 'पुराणो' आणि 'पुरातनो'. 23. අමාත්ව+ච්චොති २३. 'अमा' (सोबत) या शब्दापासून 'उत्पन्न झालेले/असलेले' या अर्थात 'अच्च' प्रत्यय होतो. භවත්ථෙ අච්චො හොති. අමා=සහ භවො අමච්චො. असलेले/उत्पन्न झालेले या अर्थात 'अच्च' प्रत्यय होतो. 'अमा' म्हणजे सोबत राहणारा तो 'अमच्चो' (अमात्य/मंत्री). 24. මජ්ඣාදිත්වි+මොති २४. 'मज्झ' (मध्य) इत्यादी शब्दांपासून 'उत्पन्न झालेले/असलेले' या अर्थात 'इम' प्रत्यय होतो. භවත්ථෙ ඉමො, මජ්ඣෙ භවො මජ්ඣිමො. එවං අන්තිමො, හෙට්ඨිමො, උපරිමො, ඔරිමො, පාරිමො, පච්ඡිමො, අබ්භන්තරිධො, පච්චන්තිමො. असलेले/उत्पन्न झालेले या अर्थात 'इम' प्रत्यय होतो; मध्ये असलेले ते 'मज्झिमो'. याचप्रमाणे अन्तिमो (शेवटचे), हेट्ठिमो (खालचे), उपरिमो (वरचे), ओरिमो (अलीकडचे), पारिमो (पलीकडचे), पच्छिमो (मागचे/पश्चिम), अब्भन्तरिमो (आतील), पच्चन्तिमो (सीमावर्ती). 25. කණ+ණෙය්ය+ණෙය්යක+යි+යාති २५. 'उत्पन्न झालेले/असलेले' या अर्थात 'कण', 'णेय्य', 'णेय्यक', 'य' आणि 'इय' प्रत्यय होतात. භවත්ථෙ කණආදයො හොන්ති. කණ-කුසිනාරායං භවො කොසිනාරකො, මාගධකො, ආරඤ්ඤකො විහාරො, රාජගහකො, කොසම්බකො, ඉන්දපත්තකො, කාපිලකො, භාරුකච්ඡකො, නාගරකො. අඞ්ගෙසු ජාතො අඞ්ගකො, කොසලකො, වෙදෙහකො, කම්බොජකො, ගන්ධාරකො, සොවීරකො, සින්ධවකො, අස්සකො ඉච්චාදි. ණෙය්ය-ගඞ්ගෙය්යො, පබ්බතෙය්යො, වානෙය්යො. ණෙය්යක-කොසලෙය්යකො[Pg.181], බාරාණසෙය්යකො, චම්පෙය්යකො, සිලාය ජාතං සෙලෙය්යකං, මිථිලෙය්යකො. බාරාණසෙය්යකොත්යාදීසු ‘‘දිස්සන්ත+ඤ්ඤෙපි පච්චයා’’ති එය්යකො, එවං උපරි සුත්තෙ දස්සිතපච්චයතො විසුං පච්චයෙ දස්සිතෙ ඉමිනා සුත්තෙනාති දට්ඨබ්බං. ය-ගම්මො, යම්හි අකාරලොපෙ පුබ්බරූපං රස්සො ච. දිබ්බො. ඉය-උදරියො, දිවියො, පඤ්චාලියො, බොධිපක්ඛියො, ලොකියො. असलेले/उत्पन्न झालेले या अर्थात 'कण' इत्यादी प्रत्यय होतात. कण प्रत्यय - कुसिनारा येथे उत्पन्न झालेला तो 'कोसिनारको', मगधातील तो 'मागधको', अरण्यातील तो 'आरञ्ञको' विहार, राजगृहातील तो 'राजगहको', कोसंबीतील तो 'कोसम्बको', इंद्रप्रस्थातील तो 'इन्दपत्तको', कपिलवस्तूतील तो 'कापिलको', भरुकच्छातील तो 'भारुकच्छको', नगरातील तो 'नागरको'. अंग देशात जन्मलेला तो 'अंगको', कोसलातील तो 'कोसलको', विदेहातील तो 'वेदेहको', कंबोजातील तो 'कम्बोजको', गंधारातील तो 'गन्धारको', सोवीरातील तो 'सोवीरको', सिंधूतील तो 'सिन्धवको', अस्सकातील तो 'अस्सको' इत्यादी. णेय्य प्रत्यय - गंगेत उत्पन्न झालेला तो 'गंगेय्यो', पर्वतावरील तो 'पब्बतेय्यो', वनातील तो 'वानेय्यो'. णेय्यक प्रत्यय - कोसलातील तो 'कोसलेय्यको', वाराणसीतील तो 'बाराणसेय्यको', चंपेतील तो 'चम्पेय्यको', शिळेवर (दगडावर) उत्पन्न झालेले ते 'सेलेय्यकं', मिथिला येथील तो 'मिथिलेय्यको'. वाराणसेय्यको इत्यादींमध्ये 'दिस्सन्ति अञ्ञेपि पच्चया' या सूत्राने 'एय्यक' प्रत्यय होतो; अशा प्रकारे वरील सूत्रात दर्शविलेल्या प्रत्ययाव्यतिरिक्त स्वतंत्र प्रत्यय दर्शविला असता तो याच सूत्राने झाला आहे असे समजावे. य प्रत्यय - 'य' प्रत्यय लागल्यावर अ-काराचा लोप होऊन पूर्वरूप आणि र्हस्व होते, जसे 'दिब्बो' (दिव्य). इय प्रत्यय - उदरियो (उदरातील), दिवियो (स्वर्गातील), पञ्चालियो (पंचालातील), बोधिपक्खियो (बोधिपक्षीया), lokiyo (लौकिक). 26. ණිකො २६. सप्तम्यन्त शब्दापासून 'तेथे उत्पन्न झालेले/असलेले' या अर्थात 'णिक' प्रत्यय होतो. සත්තම්යන්තා භවත්ථෙ ණිකො හොති. සරදෙ භවො සාරදිකො දිවසො, සාරදිකා රත්ති. सप्तम्यन्त शब्दापासून 'उत्पन्न झालेले/असलेले' या अर्थात 'णिक' प्रत्यय होतो. शरद ऋतूत असणारा तो 'सारदिको' दिवस, शरद ऋतूतील ती 'सारदिका' रात्र. 27. ත+මස්ස සිප්පං සීලං පණ්යං පහරණං පයොජනං २७. प्रथमान्त शब्दापासून 'ते त्याचे शिल्प (कला), शील (स्वभाव/व्रत), पण्य (व्यापाराची वस्तू), प्रहरण (शस्त्र) किंवा प्रयोजन आहे' या षष्ठीच्या अर्थात 'णिक' प्रत्यय होतो. පඨමන්තා සිප්පාදිවාචකා අස්සෙති ඡට්ඨ්යත්ථෙ ණිකො හොති. වීණාවාදනං සිප්ප+මස්ස වෙණිකො, වීණාවාදනං අභෙදොපචාරෙන වීණා නාම. මොදිඞ්ගිකො, වංසිකො. පංසුකූලධාරණං සීල+මස්ස පංසුකූලිකො, තෙචීවරිකො. ගන්ධො පණ්ය+මස්ස ගන්ධිකො, තෙලිකො, ගොළිකො, පූවිකො, පණ්ණිකො, තම්බුලිකො, ලොණිකො. චාපොපහරණ+මස්ස චාපිකො, තොමරිකො, මුග්ගරිකො, මොසලිකො. උපධි=ක්ඛන්ධාදි පයොජන+මස්ස ඔපධිකං, සාතිකං, සාහස්සිකං. प्रथमान्त शिल्प इत्यादी वाचक शब्दांपासून 'त्याचे' या षष्ठीच्या अर्थात 'णिक' प्रत्यय होतो. वीणा वाजवणे हे ज्याचे शिल्प (कला) आहे तो 'वेणिको'; येथे अभेदापचाराने वीणा वाजवण्यालाच 'वीणा' म्हटले आहे. मृदंग वाजवणारा तो 'मोदिङ्गिको', बासरी वाजवणारा तो 'वंसिको'. पांसुकूल (चिंध्यांचे वस्त्र) धारण करणे हे ज्याचे शील (व्रत) आहे तो 'पंसुकूलिको', तीन वस्त्रे धारण करणे हे ज्याचे शील आहे तो 'तेचीवरिको'. सुगंधित द्रव्ये ही ज्याची व्यापाराची वस्तू आहे तो 'गन्धिको', तेल विकणारा तो 'तेलिको', गूळ विकणारा तो 'गोळिको', पुवे (मालपुवे) विकणारा तो 'पूविको', पाने विकणारा तो 'पण्णिको', तांबूल (विडा) विकणारा तो 'तम्बुलिको', मीठ विकणारा तो 'लोणिको'. धनुष्य हे ज्याचे प्रहरण (शस्त्र) आहे तो 'चापिको', तोमर हे ज्याचे शस्त्र आहे तो 'तोमरिको', मुद्गर (गदा) हे ज्याचे शस्त्र आहे तो 'मुग्गरिको', मुसळ हे ज्याचे शस्त्र आहे तो 'मोसलिको'. उपाधी (स्कंध इत्यादी) हे ज्याचे प्रयोजन आहे ते 'ओपधिकं', शंभर हे ज्याचे प्रयोजन आहे ते 'सातिकं', हजार हे ज्याचे प्रयोजन आहे ते 'साहस्सिकं'. 28. තං හන්ත+රහති ගච්ඡතු+ඤ්ඡති+චරති २८. द्वितीयान्त शब्दापासून 'तो त्याला मारतो' (हन्त), 'तो त्याला पात्र आहे' (अरहति), 'तो तिकडे जातो' (गच्छति), 'तो त्याची इच्छा करतो/शोधतो' (उच्छति) किंवा 'तो त्यात आचरण करतो' (चरति) या अर्थांमध्ये 'णिक' प्रत्यय होतो. දුතියන්තා හන්තීති එවමාදීස්ව+ත්ථෙසු ණිකො හොති. පක්ඛිනො හන්තීති පක්ඛිකො, සාකුණිකො, මායූරිකො, මච්ඡෙ හන්තීති මච්ඡිකො, මෙනිකො. මිගෙ හන්තීති මාගවිකො, වකාරාගමො[Pg.182]. මිගස්ස ‘‘තදමිනා’’දිනා මගවාදෙසෙපි මාගවිකො. ඔරබ්භිකො, හාරිණිකො. සූකරිකොති ඉකො. සත+මරහතීති සාතිකං, සන්දිට්ඨිකං, එහි පස්ස විධිං අරහතීති එහිපස්සිකො. එත්ථ ත්යාද්යන්තසමුදායතො අනුකරණත්තා වා තද්ධිතස්ස අභිධානලක්ඛණත්තා වා බහුලංවිධානෙන වා පච්චයො. සාහස්සිකො, කුම්භිකො, දොණිකො, අද්ධමාසිකො, කහාපණිකො, ආසීතිකා ගාථා, නාවුතිකා. සහස්සියොති ඉයො. පරදාරං ගච්ඡතීති පාරදාරිකො, මග්ගිකො, පඤ්ඤාසයොජනිකො, පථිකො. බදරෙ උඤ්ඡතීති බාදරිකො, සාමාකිකො. ධම්මං චරතීති ධම්මිකො, අධම්මිකො. द्वितीयान्त (शब्दां)पासून 'मारतो' (हन्ति) इत्यादी अर्थांमध्ये 'णिक' प्रत्यय होतो. पक्षांना मारतो तो 'पक्खिक' (पक्षिक - पारधी), 'साकुणिक' (पक्षी पकडणारा), 'मायूरिक' (मोर मारणारा). माशांना मारतो तो 'मच्छिक' (कोळी), 'मेनिक' (धीवर). मृगांना (हरणांना) मारतो तो 'मागविक' (शिकारी), येथे 'व' काराचा आगम होतो. मृग शब्दाचा 'तदमिना' इत्यादी सूत्राने 'मगव' असा आदेश झाल्यावरही 'मागविक' असेच रूप बनते. 'ओरब्भिक' (मेंढपाळ/खाटीक), 'हारिणिक' (हरणाची शिकार करणारा). 'सूकरिक' (डुकरांना मारणारा) येथे 'इक' प्रत्यय होतो. शंभर (नाण्यांना) जो योग्य आहे ते 'सातिकं' (शंभराचे मूल्य असलेले), 'सन्दिट्टिकं' (प्रत्यक्ष दिसणारे), 'ये आणि पाहा' (एहि पस्स) या विधीला जो पात्र आहे तो 'एहिपस्सिको' (एहिपस्सिक). येथे 'ति' इत्यादी अन्ताच्या समुदायाचे अनुकरण असल्यामुळे किंवा तद्धिताच्या अभिधानलक्षणत्वामुळे किंवा बहुल विधानामुळे प्रत्यय होतो. 'साहस्सिको' (हजाराचा), 'कुम्भिको' (कुंभाच्या मापाचा), 'दोणिको' (द्रोण मापाचा), 'अद्धमासिको' (अर्धमासिक), 'कहापणिको' (कार्षापण मूल्य असलेला), 'आसीतिका गाथा' (ऐंशी गाथा असलेली), 'नावुतिका' (नव्वद वर्षे वयाची). 'सहस्सियो' येथे 'इय' प्रत्यय होतो. परदारांकडे (परस्त्रीकडे) जातो तो 'पारदारिको', 'मग्गिको' (मार्गाने जाणारा), 'पञ्ञासयोजनिको' (पन्नास योजन जाणारा), 'पथिको' (प्रवासी). बोरे गोळा करतो तो 'बादरिको', 'सामाकिको' (शामाक धान्य गोळा करणारा). धर्माचे आचरण करतो तो 'धम्मिको' (धार्मिक), अधर्माचे आचरण करतो तो 'अधम्मिको' (अधार्मिक). 29. තෙන කතං කීතං බද්ධ+මභිසඞ්ඛතං සංසට්ඨං හතං හන්ති ජිතං ජයති දිබ්බති ඛනති තරති චරති වහති ජීවතිති २९. त्याच्याद्वारे केलेले (कृत), खरेदी केलेले (क्रीत), बांधलेले (बद्ध), तयार केलेले (अभिसंखत), मिश्रित केलेले (संसट्ठ), मारलेले (हत), मारतो (हन्ति), जिंकलेले (जित), जिंकतो (जयति), खेळतो/क्रीडा करतो (दिब्बति), खणतो (खनति), पार करतो/तरतो (तरति), चालतो/आचरण करतो (चरति), वाहून नेतो (वहति), जगतो (जीवति) या अर्थांमध्ये... කතාදීස්ව+ත්ථෙසු ණිකො. කායෙන කතං කායිකං, වාචසිකං, මානසිකංති සකාගමො. වාතෙන කතො ආබාධො වාතිතො, සෙම්හිකො, පිත්තිකො. සතෙන කීතං සාතිකං, සාහස්සිකං, වත්ථෙන කීතං වත්ථිකං, කුම්භිකං, සොවණ්ණිකං, ඝාතිකං. මූලතොව පච්චයො, අමූලවාචිත්තා දෙවදත්තෙන කීතොති න හොති, තදත්ථාප්පතීතියා. වරත්ථාය බද්ධො වාරත්තිකො, ආයසිකො, පාසිකො, සුත්තිකො. ඝතෙන අභිසඞ්ඛතං සංසට්ඨං වා ඝාතිකං, ගොළිකං, දධිකං, මාරීචිකං. ජාලෙන හතො හන්තීති වා ජාලිකො, බාලිසිකො. අක්ඛෙහි ජිතං අක්ඛිකං ධනං, සාලාකිකං, තින්දුකිකො, අම්බඵලිකො. අක්ඛෙහි ජයති දිබ්බති වා අක්ඛිකො. ඛණිත්තියා ඛනතීති [Pg.183] ඛාණිත්තිකො, කුද්දාලිකො. දෙවදත්තෙන ජිතං, අඞ්ගුල්යා ඛනතීති න හොති, තදත්ථානවගමා. උළුම්පෙන තරතීති ඔළුම්පිකො, උළුම්පිකොති ඉකො. කුල්ලිකො, ගොපුච්ඡිකො, නාවිකො. සකටෙන චරතීති සාකටිකො, රථිකො. පරප්පිකොති ඉකො. ඛන්ධෙන වහතීති ඛන්ධිකො. අංසිකො, සීසිකොති ඉකො. වෙතනෙන ජීවතීති වෙතනිකො, භතිකො, කයිකො, වික්කයිකො, කයවික්කයිකොති ඉකො. केलेले (कृत) इत्यादी अर्थांमध्ये 'णिक' प्रत्यय होतो. कायेने (शरीराने) केलेले ते 'कायिकं' (कायिक), 'वाचसिकं' (वाचसिक), 'मानसिकं' (मानसिक) येथे 'स' काराचा आगम होतो. वातामुळे (वायूमुळे) झालेला आजार तो 'वातितो' (वाताचा), 'सेम्हिको' (कफाचा), 'पित्तिको' (पित्ताचा). शंभराने खरेदी केलेले ते 'सातिकं', 'साहस्सिकं' (हजाराने खरेदी केलेले), वस्त्राने खरेदी केलेले ते 'वत्थिकं', 'कुम्भिकं', 'सोवण्णिकं' (सोन्याने खरेदी केलेले), 'घातिकं' (तुपाने खरेदी केलेले). मूळ शब्दापासूनच प्रत्यय होतो, अमूलवाचक असल्यामुळे 'देवदत्ताने खरेदी केलेले' (देवदत्तेन कीतो) असे रूप होत नाही, कारण त्या अर्थाची प्रचीती येत नाही. चामड्याच्या वादीने बांधलेला तो 'वारत्तिको', 'आयसिको' (लोखंडाने बांधलेला), 'पासिको' (पाशाने बांधलेला), 'सुत्तिको' (सुताने बांधलेला). तुपाने तयार केलेले किंवा मिश्रित केलेले ते 'घातिकं', 'गोळिकं' (गुळाने मिश्रित), 'दधिकं' (दह्याने मिश्रित), 'मारीचिकं' (मरीचाने/मिरीने मिश्रित). जाळ्याने मारलेला किंवा मारतो तो 'जาลिको' (कोळी), 'बालिसिको' (गळाने मासे पकडणारा). फाशांनी जिंकलेले धन ते 'अक्खिकं धनं', 'सालाकिंकं', 'तिन्दुकिको', 'अम्बफलिको'. फाशांनी जिंकतो किंवा खेळतो तो 'अक्खिको'. कुदळीने खणतो तो 'खाणित्तिको', 'कुद्दालिको' (फावड्याने खणणारा). 'देवदत्ताने जिंकलेले', 'बोटाने खणतो' असे रूप होत नाही, कारण त्या अर्थाचा बोध होत नाही. तराफ्याने (उळुम्प) पार करतो तो 'ओळुम्पिको', 'उळुम्पिको' येथे 'इक' प्रत्यय होतो. 'कुल्लिको' (कौलाकडून पार करणारा), 'गोपुच्छिको' (गाईच्या शेपटीने पार करणारा), 'नाविको' (नाविक). गाडीने प्रवास करतो तो 'साकटिको', 'रथिको' (रथाने प्रवास करणारा). 'परप्पिको' येथे 'इक' प्रत्यय होतो. खांद्यावरून वाहून नेतो तो 'खन्धिको'. 'अंसिको' (खांद्याने वाहणारा), 'सीसिको' (डोक्याने वाहणारा) येथे 'इक' प्रत्यय होतो. वेतनावर (पगारावर) जगतो तो 'वेतनिको', 'भतिको' (मजुरीवर जगणारा), 'कयिको' (खरेदी करणारा), 'विक्कयिको' (विक्री करणारा), 'कयविक्कयिको' (खरेदी-विक्री करणारा) येथे 'इक' प्रत्यय होतो. 30. තස්ස සංවත්තති ३०. त्याच्यासाठी कारणीभूत ठरते (संवत्तति) චතුත්ථ්යන්තා සංවත්තතීති අස්මිං අත්ථෙණිකො හොති. පුනබ්භවාය සංවත්තතීති පොනොබ්භවිකො, ඉත්ථියං පොනොබ්භවිකා. ලොකාය සංවත්තතීති ලොකිකො. සුට්ඨු අග්ගොති සග්ගො, සග්ගාය සංවත්තතීති සොවග්ගිකො, සස්සො+වක තදමිනාදීපාඨා. ධනාය සංවත්තතීති ධඤ්ඤං. चतुर्थ्यन्त (शब्दां)पासून 'कारणीभूत ठरते' (संवत्तति) या अर्थामध्ये 'णिक' प्रत्यय होतो. पुनर्जन्मासाठी कारणीभूत ठरते ते 'पोनोब्भविको' (पुनर्भविक), स्त्रीलिंगात 'पोनोब्भविका'. लोकांसाठी (लौकिक कल्याणासाठी) कारणीभूत ठरते ते 'लोकिको' (लौकिक). जे अत्यंत श्रेष्ठ आहे ते 'सग्गो' (स्वर्ग), स्वर्गासाठी कारणीभूत ठरते ते 'सोवग्गिको', येथे 'तदमिना' इत्यादी पाठाने 'स' चा 'सोव' असा आदेश होतो. धनासाठी कारणीभूत ठरते ते 'धञ्ञं' (धान्य). 31. තතො සම්භූත+මාගතං ३१. त्याच्यापासून उत्पन्न झालेले (सम्भूत) किंवा आलेले (आगत) පඤ්චම්යන්තා සම්භූත+මාගතන්ති එතෙස්ව+ත්ථෙසු ණිකො හොති. මාතිතො සම්භූත+මාගතංවා+ති එත්ථ ‘‘මාතිතො ච භගිනියංච්ඡො’’ති ‘‘මාතිතො’’ති භාගෙන උස්ස ඉම්හි වාක්යං, රස්සද්විත්තෙසු මත්තිකං, පෙත්තිකං. ණ්ය+රියණ+ර්යපච්චයාපි දිස්සන්ති. සුරභිතො සම්භූතං සොරභ්යං. යම්හි ථඤ්ඤං. උභයත්ථ ‘‘ලොපො+වණ්ණි+වණ්ණානං’’ති ලොපො. රියණ-පිතුතො සම්භූතො පෙත්තියො, මාතියො, ‘‘රානුබන්ධෙ+න්තසරාදිස්සා’’ති උලොපො, මත්තියො. ර්යම්හි-උලොපො, චවග්ගපුබ්බරූපානි, මච්චො වා. पंचम्यन्त (शब्दां)पासून 'उत्पन्न झालेले' किंवा 'आलेले' या अर्थांमध्ये 'णिक' प्रत्यय होतो. आईपासून उत्पन्न झालेले किंवा आलेले या अर्थी, येथे 'मातितो च भगिनियं च्छो' या सूत्रातील 'मातितो' या भागाने 'उ' चा 'इ' झाल्यावर, र्हस्व आणि द्वित्व होऊन 'मत्तिकं' (मातृक), 'पेत्तिकं' (पैतृक) अशी रूपे बनतात. 'ण्य', 'रियण' आणि 'र्य' प्रत्यय देखील आढळतात. सुरभीपासून उत्पन्न झालेले ते 'सोरभ्यं'. 'य' प्रत्यय झाल्यावर 'थञ्ञं' (स्तन्य). दोन्ही ठिकाणी 'लोपो वण्णि वण्णानं' या सूत्राने लोप होतो. 'रियण' प्रत्यय झाल्यावर - पित्यापासून उत्पन्न झालेला तो 'पेत्तियो', 'मातियो', 'रानुबन्धेन्तसरादिस्सा' या सूत्राने 'उ' चा लोप होऊन 'मत्तियो' रूप बनते. 'र्य' प्रत्यय झाल्यावर 'उ' चा लोप होतो, चवर्ग आणि पूर्वरूप होऊन 'मच्चो' (मर्त्य) असे रूप बनते. 32. තත්ථ වසති විදිතො භත්තො නියුත්තො ३२. तेथे राहतो (वसति), ओळखला जातो (विदित), भक्त/अनुरक्त असलेला (भत्त), नियुक्त केलेला (नियुत्त) සත්තම්යන්තා [Pg.184] වසතීත්වෙවමාදීස්ව+ත්ථෙසු ණිකො හොති. රුක්ඛමූලෙ වසතීති රුක්ඛමූලිකො, ආරඤ්ඤිකො, රාජගහිකො, මාගධිකො, සොසානිකො. ලොකෙ විදිතො ලොකිකො. චතුමහාරාජෙසු භත්තා චාතුම්මහාරාජිකා. ද්වාරෙ නියුත්තො දොවාරිකො, දස්සොක තදමිනාදිපාඨා. භණ්ඩාගාරිකො. ඉකෙ-නවකම්මිකො, ආදිකම්මිකො. කියෙ-ජාතිකියො, අන්ධකියො. सप्तम्यन्त (शब्दां)पासून 'राहतो' इत्यादी अर्थांमध्ये 'णिक' प्रत्यय होतो. वृक्षाच्या मुळाशी (झाडाखाली) राहतो तो 'रुक्खमूलिको', 'आरञ्ञिको' (अरण्यात राहणारा), 'राजगहिको' (राजगृहात राहणारा), 'मागधिको' (मगधात राहणारा), 'सोसानिको' (स्मशानात राहणारा). लोकात प्रसिद्ध असलेला तो 'लोकिको' (लौकिक). चातुर्महाराजांचे भक्त (अनुयायी) ते 'चातुम्महाराजिका'. द्वारावर नियुक्त केलेला तो 'दोवारिको' (द्वारपाल), येथे 'तदमिना' इत्यादी पाठाने 'द' चा 'दो' असा आदेश होतो. 'भण्डागारिको' (भांडारगृह प्रमुख). 'इक' प्रत्यय झाल्यावर - 'नवकम्मिको' (नवीन कामात नियुक्त), 'आदिकम्मिको' (पहिल्या कामात नियुक्त). 'किय' प्रत्यय झाल्यावर - 'जातिकियो', 'अन्धकियो'. 33. තස්සි+දං ३३. हे त्याचे आहे (तस्सिदं) ඡට්ඨියන්තා ඉද+මිච්ච+ස්මිං අත්ථෙ ණිකො හොති. සඞ්ඝස්ස ඉදං සඞ්ඝිකං, පුග්ගලිකං, සක්යපුත්තිකො, නාටපුත්තිකො, ජෙනදත්තිකො. කියෙ-සස්ස ඉදං සකියො, පරකියො. නියෙඅත්තනියං. කෙ-සකො, රඤ්ඤො ඉදං රාජකං භණ්ඩං. षष्ठ्यन्त (शब्दां)पासून 'हे याचे आहे' या अर्थामध्ये 'णिक' प्रत्यय होतो. संघाचे जे आहे ते 'संघिकं' (सांघिक), 'पुग्गलिकं' (वैयक्तिक), 'सक्यपुत्तिको' (शाक्यपुत्राचा), 'नाटपुत्तिको' (नातपुत्ताचा), 'जेनदत्तिको' (जिनदत्ताचा). 'किय' प्रत्यय झाल्यावर - स्वतःचे जे आहे ते 'सकियो' (स्वकीय), दुसऱ्याचे जे आहे ते 'परकियो' (परकीय). 'निय' प्रत्यय झाल्यावर - 'अत्तलियं' (आत्मकीय/स्वतःचे). 'क' प्रत्यय झाल्यावर - 'सको' (स्वतःचा), राजाचे जे भांड (वस्तू) आहे ते 'राजकं भण्डं'. 34. ණො ३४. 'ण' प्रत्यय ඡට්ඨියන්තා ඉද+මිච්ච+ස්මිං අත්ථෙ ණො හොති. කච්චායනස්ස ඉදං කච්චායනං, බ්යාකරණං, සොගතං සාසනං, මාහිසං මංසාදි. षष्ठ्यन्त (शब्दां)पासून 'हे याचे आहे' या अर्थामध्ये 'ण' प्रत्यय होतो. कच्चायनाचे जे आहे ते 'कच्चायनं' (कच्चायन व्याकरण), 'सोगतं सासनं' (सुगतांचे/बुद्धांचे शासन), 'माहिसं मंसं' (म्हशीचे मांस) इत्यादी. 35. ගවාදීහි යො ३५. गवादि शब्दांपासून 'य' प्रत्यय ගවාදීහි ඡට්ඨියන්තෙහි ඉද+මිච්ච+ස්මිං අත්ථෙ යො හොති. ගුන්නං ඉදං ගබ්යං, අවඞ, මංසාදි. ඉලොපෙ කබ්බං. දුනො ඉදං දබ්බං. गवादि षष्ठ्यन्त शब्दांपासून 'हे याचे आहे' या अर्थामध्ये 'य' प्रत्यय होतो. गाईंचे जे आहे ते 'गब्यं' (गव्य - दूध, मांस इत्यादी), येथे 'अव' आदेश होतो. 'इ' चा लोप झाल्यावर 'कब्बं' (काव्य). द्रूचे (झाडाचे) जे आहे ते 'दब्बं' (द्रव्य). 36. පිතිතො භාතරි රෙය්යණ ३६. पितृ शब्दापासून भावाच्या अर्थी 'रेय्यण' प्रत्यय ‘‘පිතිතො [Pg.185] මාතිතො’’ති තෙන තෙන සුත්තනිපාතෙනෙව උස්ස ඉ. පිතුසද්දා තස්ස භාතරි රෙය්යණ. පිතු භාතා පෙත්තෙය්යො. 'पितितो मातितो' या त्या त्या सूत्रांच्या निपातानेच 'उ' चा 'इ' होतो. पितृ शब्दापासून त्याच्या भावाच्या अर्थी 'रेय्यण' प्रत्यय होतो. पित्याचा भाऊ तो 'पेत्तेय्यो' (चुलता). 37. මාතිතො ච භගිනියං ච්ඡො ३७. मातृ आणि पितृ शब्दांपासून त्यांच्या बहिणीच्या अर्थी 'च्छ' प्रत्यय होतो. මාතුතො ච පිතුතො ච තෙසං භගිනියං ච්ඡො හොති. මාතු භගිනි මාතුච්ඡා, පිතු භගිනි පිතුච්ඡා. කථං ‘‘මාතු භාතා මාතුලො’’ති, ‘‘මාතුලාදිත්වානී’’ති නිපාතනා ලපච්චයො. मातृ आणि पितृ शब्दांपासून त्यांच्या बहिणीच्या अर्थी 'च्छ' प्रत्यय होतो. मातेची बहीण ती 'मातुच्छा' (मावशी), पित्याची बहीण ती 'पितुच्छा' (आत्या). 'मातेचा भाऊ मातुल (मामा)' हे कसे सिद्ध होते? तर 'मातुलादित्वानी' या सूत्राच्या निपाताने 'ल' प्रत्यय होतो. 38. මාතාපිතූස්වා+මහො ३८. माता आणि पिता शब्दांपासून त्यांच्या माता-पित्यांच्या अर्थी 'आमह' प्रत्यय होतो. මාතාපිතූහි තෙසං මාතාපිතූස්වා+මහො හොති. මාතු මාතා මාතාමහී, මාතු පිතා මාතාමහො. පිතු මාතා පිතාමහී, පිතු පිතා පිතාමහො. න යථාසඞ්ඛ්යං පච්චෙකාභිසම්බන්ධතො විසුං විසුං මාතාපිතුසද්දෙහි තෙසං මාතාපිතුන්නං අත්ථෙ පච්චයො හොති. माता आणि पिता शब्दांपासून त्यांच्या माता-पित्यांच्या अर्थी 'आमह' प्रत्यय होतो. मातेची माता ती 'मातामही' (आजी), मातेचा पिता तो 'मातामहो' (आजोबा). पित्याची माता ती 'पितामही' (आजी), पित्याचा पिता तो 'पितामहो' (आजोबा). येथे यथासंख्य नियम लागू होत नाही, तर प्रत्येक शब्दाशी स्वतंत्र संबंध असल्यामुळे माता आणि पिता या शब्दांपासून त्यांच्या माता-पित्यांच्या अर्थी स्वतंत्रपणे प्रत्यय होतो. 39. හිතෙ රෙය්යණ ३९. हितकारक या अर्थी 'रेय्यण' प्रत्यय මාතාපිතූහි හිතෙ රෙය්යණ හොති. මාතු හිතො මත්තෙය්යො, පෙත්තෙය්යො. माता आणि पिता शब्दांपासून त्यांच्यासाठी हितकारक या अर्थी 'रेय्यण' प्रत्यय होतो. मातेसाठी हितकारक तो 'मत्तेय्यो' (मातृभक्त), पित्यासाठी हितकारक तो 'पेत्तेय्यो' (पितृभक्त). 40. නින්දා+ඤ්ඤාත+ප්ප පටිභාග රස්ස දයා සඤ්ඤාසු කො ४०. निंदा, अज्ञात, अल्प, सादृश्य (प्रतिभाग), र्हस्व, दया आणि संज्ञा या अर्थांमध्ये 'क' प्रत्यय होतो. නින්දාදීස්ව+ත්ථෙසු නාමස්මා කො හොති. නින්දායං-නින්දිතො මුණ්ඩො මුණ්ඩකො, එවං සමණකො, පණ්ඩිතකො, බ්රාහ්මණකො[Pg.186], වෙය්යාකරණකො. අඤ්ඤාතෙ-කස්සා+යං අස්සො අස්සකො, පයොගසාමත්ථියා සම්බන්ධිවිසෙසානාවගමො+වගම්යතෙ. අප්පත්ථෙ-අප්පකං තෙලං තෙලකං, ඝතකං. පටිභාගත්ථෙ-හත්ථී විය හත්ථිකො, අස්සකො, බලීබද්ධකො. ‘‘ඉමෙ නො හත්ථිකා අස්සා, බලීබද්ධා ච නො ඉමෙ’’ත්යාදිපාඨෙ ‘‘ලොපො’’ති කපච්චයලොපෙන වා අභෙදොපචාරෙන වා දට්ඨබ්බං, ඉමෙ ච දාරුආදීහි කතරූපානි. රස්සෙරස්සො මානුසො මානුසකො, රුක්ඛකො, පිලක්ඛකො. දයායං-දයිතො=නුකම්පිතො පුත්තො පුත්තකො, වච්ඡකො. සඤ්ඤායං-මොරො විය මොරකො, කතකො, භතකො. निंदा इत्यादी अर्थांमध्ये नामापासून 'क' प्रत्यय होतो. निंदा अर्थी - निंदित मुंड (बोडका) तो 'मुंडक' (मुण्डको), याचप्रमाणे 'समणक' (श्रमणक), 'पंडितक', 'ब्राह्मणक', 'वेय्याकरणक' (व्याकरणकार). अज्ञात अर्थी - "हा घोडा कोणाचा?" तो 'अस्सक' (अश्वक), प्रयोगाच्या सामर्थ्यामुळे संबंध-विशेषाचे अज्ञान समजले जाते. अल्प अर्थी - अल्प तेल ते 'तेलकर' (तेलुक/तेलकम), 'घतक' (तूप). सादृश्य (प्रतिभाग) अर्थी - हत्तीसारखा तो 'हत्थिक' (हस्तिक), 'अस्सक' (अश्वक), 'बलीबद्धक' (बैल). "इमे नो हत्थिका अस्सा, बलीबद्धा च नो इमे" (हे आमचे लाकडी हत्ती, घोडे आणि बैल आहेत) इत्यादी पाठात "लोपो" या सूत्राने 'क' प्रत्ययाचा लोप झाल्यामुळे किंवा अभेदाच्या उपचाराने (सादृश्यामुळे) असे समजावे; आणि हे लाकूड इत्यादींपासून बनवलेले आकार आहेत. ऱ्हस्व (लहान) अर्थी - लहान माणूस तो 'मानुसक' (मानुषको), 'रुक्खक' (वृक्षक), 'पिलक्खक' (पिंपळ). दया (अनुकंपा) अर्थी - दयेला पात्र असलेला (अनुकंपित) पुत्र तो 'पुत्तक' (पुत्रक), 'वच्छक' (वासरू). संज्ञा (नाव) अर्थी - मोरासारखा तो 'मोरक' (मयूरक), 'कतक' (एक वनस्पती/निवळी), 'भतक' (सेवक/भृतक). 41. ත+මස්ස පරිමාණං ණිකො ච ४१. "ते त्याचे परिमाण (मोजमाप) आहे" या अर्थी 'णिक' प्रत्यय होतो. පඨමන්තා අස්සෙති අස්මිං අත්ථෙ ණිකො හොති කො ච, තඤ්චෙ පඨමන්තං පරිමාණං භවති. දොණාදීනං පරිමිතවීහාදීනං කරණත්තා ‘‘පරිමීයන්ත්ය+නෙනාති පරිමාණ’’න්ති හොති. දොණො පරිමාණ+මස්සාති දොණිකො වීහි, ඛාරසතිකො, ඛාරසහස්සිකො, ආසීතිකො වයො, උපඩ්ඪකායො පරිමාණ+මස්ස උපඩ්ඪකායිකං බිම්බොහනං. පඤ්චකං, ඡක්කං. प्रथमान्त शब्दापासून "ते याचे (परिमाण) आहे" या अर्थी 'णिक' आणि 'क' प्रत्यय होतात, जर तो प्रथमान्त शब्द परिमाण (मोजमाप) दर्शवणारा असेल. द्रोण (एक माप) इत्यादींद्वारे भात (व्रीही) इत्यादी मोजले जात असल्यामुळे "ज्याद्वारे मोजले जाते ते परिमाण" अशी व्याख्या होते. द्रोण हे ज्याचे परिमाण आहे तो 'दोणिको वीहि' (द्रोणिक व्रीही - एक द्रोण भात), 'खारसतिको' (शंभर खार परिमाण असलेला), 'खारसहस्सिको' (हजार खार परिमाण असलेला), 'आसीतिको वयो' (ऐंशी वर्षे वय असलेला), अर्धे शरीर हे ज्याचे परिमाण आहे ते 'उपड्ढकायिकं बिम्बोहनं' (अर्ध्या शरीराच्या आकाराची उशी). 'पञ्चकं' (पाचचा समूह), 'छक्कं' (सहाचा समूह). 42. ය+තෙ+තෙහි+ත්තකො ४२. 'य', 'त' आणि 'एत' या प्रथमान्त शब्दांपासून 'त्तक' प्रत्यय होतो. යාදීහි පඨමන්තෙහි අස්සෙති ඡට්ඨ්යත්ථෙ ත්තකො හොති, තඤ්චෙ පඨමන්තං පරිමාණං භවති. යං පරිමාණ+මස්ස යත්තකං, තත්තකං, ‘‘එතස්සෙට ත්තකෙ’’ති එතස්ස එට, එත්තකං. ආවතකෙ-යං පරිමාණ+මස්ස යාවතකො, තාවතකො. 'य' इत्यादी प्रथमान्त शब्दांपासून "ते याचे (परिमाण) आहे" या षष्ठीच्या अर्थी 'त्तक' प्रत्यय होतो, जर तो प्रथमान्त शब्द परिमाण दर्शवणारा असेल. जेवढे याचे परिमाण ते 'यत्तकं' (जेवढे), 'तत्तकं' (तेवढे). "एतस्सेट त्तके" या सूत्राने 'एत' शब्दाला 'एट्ट' होऊन 'एत्तकं' (एवढे) असे रूप बनते. 'आवतक' प्रत्यय लागून - जेवढे याचे परिमाण तो 'यावतको' (जेवढा), 'तावतको' (तेवढा). 43. සබ්බා චා+වන්තු ४३. 'सब्ब' (सर्व) आणि 'य' इत्यादी प्रथमान्त शब्दांपासून 'आवन्तु' प्रत्यय होतो. සබ්බතො [Pg.187] පඨමන්තා යාදීහි ච අස්සෙති ඡට්ඨ්යත්ථෙ ආවන්තු හොති, තඤ්චෙ පඨමන්තං පරිමාණං භවති. සබ්බං පරිමාණ+මස්ස සබ්බාවන්තං, ‘‘අංඞං නපුංසකෙ’’ති අං. යාවන්තං, තාවන්තං. 'सब्ब' या प्रथमान्त शब्दापासून आणि 'य' इत्यादींपासून "ते याचे (परिमाण) आहे" या षष्ठीच्या अर्थी 'आवन्तु' प्रत्यय होतो, जर तो प्रथमान्त शब्द परिमाण दर्शवणारा असेल. सर्व याचे परिमाण ते 'सब्बावन्तं' (सर्व काही), "अंङं नपुंसके" या सूत्राने 'अं' प्रत्यय होतो. 'यावन्तं' (जेवढे), 'तावन्तं' (तेवढे). 44. කිම්හා රති+රීව+රීවතක+රිත්තකා ४४. 'किम्' (किं) या प्रथमान्त शब्दापासून 'रति', 'रीव', 'रीवतक' आणि 'रित्तक' प्रत्यय होतात. කිම්හා පඨමන්තා අස්සෙති ඡට්ඨ්යත්ථෙ රති+රීව+රීවතක+රිත්තකා හොන්ති. කිංසඞ්ඛ්යානං පරිමාණ+මෙසං කති, රානුබන්ධත්තා ඉංභාගලොපො. කීව, කීවතකං, කිත්තකං. රීවන්තො සභාවතො අසංඛ්යො. 'किम्' या प्रथमान्त शब्दापासून "ते याचे (परिमाण) आहे" या षष्ठीच्या अर्थी 'रति', 'रीव', 'रीवतक' आणि 'रित्तक' प्रत्यय होतात. किती संख्या हे ज्यांचे परिमाण आहे ते 'कति' (किती), 'र' अनुबंध असल्यामुळे 'इम्' भागाचा लोप होतो. 'कीव' (किती), 'कीवतकं' (किती प्रमाणात), 'कित्तकं' (किती). 'रीवन्त' (रीव प्रत्ययान्त शब्द) हा स्वभावानेच असंख्यात (मोजता न येणारा) असतो. 45. සඤ්ජාතං තාරකාදිත්වි+තොති ४५. "उत्पन्न झाले" या अर्थी 'तारका' इत्यादी शब्दांपासून 'इत' प्रत्यय होतो. සඤ්ජාතත්ථෙ ඉතො. තාරකා සඤ්ජාතා අස්ස තාරකිතං ගගනං, පුප්ඵානි සඤ්ජාතානි අස්ස පුප්ඵිතො රුක්ඛො, පල්ලවිතා ලතා. उत्पन्न झाले या अर्थी 'इत' प्रत्यय होतो. तारे ज्याच्यामध्ये उत्पन्न झाले आहेत ते 'तारकितं गगनं' (ताऱ्यांनी भरलेले आकाश), फुले ज्याच्यावर उत्पन्न झाली आहेत तो 'पुप्फितो रुक्खो' (फुललेला वृक्ष), 'पल्लविता लता' (पालवी फुटलेली वेल). 46. මානෙ මත්තො ४६. मान (मोजमाप) अर्थी प्रथमान्त शब्दापासून 'मत्त' प्रत्यय होतो. පඨමන්තා මානවුත්තිතො අස්සෙති අස්මිං අත්ථෙ මත්තො හොති. පලං උම්මාන+මස්ස පලමත්තං. හත්ථො පණාම+මස්ස හත්ථමත්තං. සතං මාන+මස්ස සතමත්තං. දොණො පරිමාණ+මස්ස දොණමත්තං. අභෙදොපචාරා දොණොතිපි හොති. මීයතෙ+නෙනාති මානං, මානස්ස සම්බන්ධිත්තා ඡට්ඨ්යන්තභූතානමෙව විධි හොති. එත්ථ ච – मान (मोजमाप) दर्शवणाऱ्या प्रथमान्त शब्दापासून "ते याचे (मान) आहे" या अर्थी 'मत्त' प्रत्यय होतो. पल (एक वजन) हे ज्याचे ऊर्ध्वमान (वजन) आहे ते 'पलमत्तं' (पलमात्र). हात हे ज्याचे परिमाण (लांबी) आहे ते 'हत्थमत्तं' (हातभर/हातमात्र). शंभर हे ज्याचे मान (संख्या) आहे ते 'सतमत्तं' (शंभरमात्र). द्रोण हे ज्याचे परिमाण आहे ते 'doṇamattaṃ' (द्रोणमात्र). अभेदोपचाराने 'दोण' असेही रूप होते. "ज्याद्वारे मोजले जाते ते मान", मानाशी संबंध असल्यामुळे षष्ठ्यन्त झालेल्या शब्दांनाच हा नियम लागू होतो. आणि येथे - උද්ධමානන්තු [Pg.188] උම්මානං, පරිමාණන්තු සබ්බතො; පමාණං හොති ආයාමො, සංඛ්යාසෙසො තු සබ්බතො. "ऊर्ध्वमान (वजन) म्हणजे 'उन्मान' (उम्मान), सर्व बाजूंनी मोजणे म्हणजे 'परिमाण'; लांबी मोजणे म्हणजे 'प्रमाण' आणि उर्वरित सर्व मोजमाप म्हणजे 'संख्या' होय." 47. තග්ඝො චු+ද්ධං ४७. ऊर्ध्वमान दर्शवणाऱ्या शब्दापासून 'तग्घ' आणि 'मत्त' प्रत्यय होतात. උද්ධමානවුත්තිතො තග්ඝො හොති මත්තො ච. ජණ්ණු පරිමාණ+මස්ස ජණ්ණුතග්ඝං, ජණ්ණුමත්තං. ऊर्ध्वमान दर्शवणाऱ्या शब्दापासून 'तग्घ' आणि 'मत्त' प्रत्यय होतात. गुडघा हे ज्याचे परिमाण (उंची) आहे ते 'जण्णुतग्घं' (गुडघाभर), 'जण्णुमत्तं' (गुडघ्याएवढे). 48. ණො ච පුරිසාති ४८. 'पुरिस' (पुरुष) शब्दापासून 'ण' प्रत्यय होतो आणि 'मत्त' इत्यादी प्रत्यय देखील होतात. පුරිසා ණො හොති මත්තාදයො ච. පුරිසො පරිමාණ+මස්ස පොරිසං, පුරිසමත්තං+පුරිසතග්ඝං. 'पुरिस' शब्दापासून 'ण' प्रत्यय होतो आणि 'मत्त' इत्यादी प्रत्यय देखील होतात. पुरुष हे ज्याचे परिमाण (उंची) आहे ते 'पोरिसं' (पुरुषभर उंचीचे), 'पुरिसमत्तं' (पुरुषमात्र), 'पुरिसतग्घं' (पुरुषभर). 49. අයු+භද්විතීහං+සෙ ४९. 'उभ', 'द्वि' आणि 'ति' या अवयववाचक शब्दांनंतर 'अय' प्रत्यय होतो. උභද්විතීහි අවයවවුත්තීහි අයො හොති. උභො අංසා අස්ස උභයං, ද්වයං, තයං. අංසසම්බන්ධෙන සමුදායෙ විධි හොතීති න උභයාදිතො බහුවචනන්ති චෙ, ‘‘රාහුනො සිරො’’ ත්යාදො අභෙදෙපි භෙදවිවක්ඛාය ලබ්භමානතො බහුවචනං හොතෙව. 'उभ', 'द्वि' आणि 'ति' या अवयववाचक शब्दांनंतर 'अय' प्रत्यय होतो. दोन्ही भाग (अवयव) आहेत ज्याचे ते 'उभयं' (दोन्ही), 'द्वयं' (दोनचा समूह), 'तयं' (तीनचा समूह). अवयवाच्या संबंधाने समुदायामध्ये हा नियम होत असल्यामुळे 'उभय' इत्यादी शब्दांनंतर बहुवचन होत नाही असे जर म्हटले, तर "राहुचे डोके" इत्यादी उदाहरणांप्रमाणे अभेद असतानाही भेदाची विवक्षा (इच्छा) असल्यामुळे बहुवचन होतेच. 50. සඞ්ඛ්යාය සච්චු+තී+සා+ස+දසන්තායා+ධිකා+ස්මිං සතසහස්සෙ ඩො ५०. 'सति' (ति), 'उति' (ति), 'ईस' (ईस), 'आस' (आस) आणि 'दस' (दश) शेवटी असलेल्या प्रथमान्त संख्येपासून "याच्यामध्ये" या सप्तमीच्या अर्थी 'डो' प्रत्यय होतो, जर ती संख्या अधिक (जास्त) असेल आणि ज्याच्यामध्ये अधिक आहे ते शंभर, हजार किंवा लाख असेल. සත්යන්තාය උත්යන්තාය ඊසන්තාය ආසන්තාය දසන්තාය සඞ්ඛ්යාය පඨමන්තාය අස්මින්ති සත්තම්යත්ථෙ ඩො හොති, සා චෙ [Pg.189] සඞ්ඛ්යා අධිකා හොති, ය+දස්මින්ති, තං චෙ සතං සහස්සං සතසහස්සං වා හොති. වීසති අධිකා අස්මිං සතෙති වීසංසතං. 'सति' (जसे वीसति), 'उति' (जसे नवुति), 'ईस' (जसे चत्तालीस), 'आस' (जसे पञ्ञास) आणि 'दस' (जसे एकादस) शेवटी असलेल्या प्रथमान्त संख्येपासून "याच्यामध्ये" या सप्तमीच्या अर्थी 'डो' प्रत्यय होतो, जर ती संख्या अधिक असेल आणि ज्याच्यामध्ये अधिक आहे ते शंभर, हजार किंवा लाख असेल. "शंभरामध्ये वीस अधिक आहेत" ते 'वीसंसतं' (एकशे वीस). 139. ඩෙ සතිස්ස තිස්සති १३९. 'ड' प्रत्यय पुढे असताना 'सति' च्या शेवटी असलेल्या 'ति' चा लोप होतो. ඩෙ පරෙ සත්යන්තස්ස තිකාරස්ස ලොපො හොති. එකවීසංසතං සහස්සං සතසහස්සං වා. තිංසති අධිකා අස්මිං සතාදිකෙති තිංසසතං එකතිංසසතං ඉච්චාදි. උත්යන්තායනවුති අධිකා අස්මිං සතාදිකෙති නවුතංසතං සහස්සං සතසහස්සං වා. ඊසන්තාය-චත්තාලීසං අධිකා අස්මිං සතෙ සහස්සෙ සතසහස්සෙති චත්තාලීසසත+මිච්චාදි. ආසන්තාය එවං, පඤ්ඤාසංසත+මිච්චාදි. දසන්තාය-එකාදසංසත+මිච්චාදි. 'ड' प्रत्यय पुढे असताना 'सति' शेवटी असलेल्या शब्दातील 'ति' या अक्षराचा लोप होतो. 'एकवीसंसतं' (एकशे एकवीस), हजार किंवा लाख. "शंभर इत्यादींमध्ये तीस अधिक आहेत" ते 'तिंससतं' (एकशे तीस), 'एकतिंससतं' (एकशे एकतीस) इत्यादी. 'उति' शेवटी असलेल्या शब्दाचे उदाहरण - "शंभर इत्यादींमध्ये नव्वद अधिक आहेत" ते 'नवुतंसतं' (एकशे नव्वद), हजार किंवा लाख. 'ईस' शेवटी असलेल्या शब्दाचे उदाहरण - "शंभर, हजार किंवा लाखामध्ये चाळीस अधिक आहेत" ते 'चत्तालीससतं' (एकशे चाळीस) इत्यादी. 'आस' शेवटी असलेल्या शब्दाचे उदाहरण - याचप्रमाणे 'पञ्ञासंसतं' (एकशे पन्नास) इत्यादी. 'दस' शेवटी असलेल्या शब्दाचे उदाहरण - 'एकादसंसतं' (एकशे अकरा) इत्यादी. 51. තස්ස පූරණෙ+කාදසාදිතො වා ५१. षष्ठ्यन्त असलेल्या 'एकादस' (अकरा) इत्यादी संख्यावाचक शब्दांपासून 'पूरण' (क्रमवाचक संख्या) अर्थी विकल्प करून 'डो' प्रत्यय होतो. ඡට්ඨියන්තායෙ+කාදසාදිකාය සංඛ්යාය ඩො හොති පූරණත්ථෙ විභාසා. සා සංඛ්යා පූරියතෙ යෙන තං පූරණං. එකාදසන්නං පූරණො එකාදසො. අඤ්ඤත්ර ‘‘ම පඤ්චාදිකතීහී’’ති මො, එකාදසමො. වීසතියා පූරණො වීසො වීසතිමො, තිංසො, තිංසතිමො. වාසද්දස්ස වවත්ථිතවිභාසත්තා නිච්චං චත්තාලීසො පඤ්ඤාසො. षष्ठ्यन्त असलेल्या 'एकादस' इत्यादी संख्यावाचक शब्दांपासून 'पूरण' अर्थी विकल्प करून 'डो' प्रत्यय होतो. ती संख्या ज्याच्याद्वारे पूर्ण केली जाते ते 'पूरण' (क्रमवाचक) होय. अकरांची संख्या पूर्ण करणारा तो 'एकादसो' (अकरावा). दुसऱ्या पक्षांत "म पञ्चादिकतीहि" या सूत्राने 'म' प्रत्यय होऊन 'एकादसमो' (अकरावा) असे रूप बनते. वीसची संख्या पूर्ण करणारा तो 'वीसो' किंवा 'वीसतिमो' (विसावा), 'तिंसो' किंवा 'तिंसतिमो' (तिसावा). 'वा' (विकल्प) हा शब्द व्यवस्थित विकल्प दर्शवणारा असल्यामुळे 'चत्तालीसो' (चाळिसावा) आणि 'पञ्ञासो' (पन्नासावा) ही रूपे नित्य (नियमितपणे) होतात. 52. ම පඤ්චාදිකතීහිති ५२. "म पञ्चादिकतीहि" या सूत्राने 'म' प्रत्यय होतो. මපච්චයෙ පඤ්චමො, පඤ්චමී. සත්තමො, සත්තමී. අට්ඨමො, අට්ඨමී. කතිමො, කතිමී ඉච්චාදි. 'म' प्रत्यय लागून - 'पञ्चमो' (पाचवा), 'पञ्चमी' (पाचवी). 'सत्तमो' (सातवा), 'सत्तमी' (सातवी). 'अट्ठमो' (आठवा), 'अट्ठमी' (आठवी). 'कतिमो' (कितवा), 'कतिमी' (कितवी) इत्यादी रूपे होतात. 53. සථාදීන+මි චති ५३. 'सत' (शंभर) इत्यादी शब्दांच्या शेवटी 'इ' आदेश होतो आणि 'म' प्रत्यय देखील होतो. සතාදීනං [Pg.190] මො ච අන්තාදෙසො ඉ ච. සතස්ස පූරණො සතිමො, සහස්සිමො. 'सत' इत्यादी शब्दांना 'म' प्रत्यय होतो आणि त्यांच्या अंत्य स्वराच्या जागी 'इ' आदेश होतो. शंभरची संख्या पूर्ण करणारा तो 'सतिमो' (शंभरावा), 'सहस्सिमो' (हजारावा). 54. ඡා ට්ඨ+ට්ඨමාති ५४. 'छ' (सहा) शब्दापासून पूरण अर्थी 'ट्ठ' आणि 'ट्ठम' प्रत्यय होतात. ඡසද්දා පූරණත්ථෙ ට්ඨ+ට්ඨමා. ඡන්නං පූරණො ඡට්ඨො, ඡට්ඨමො. ඉත්ථියං ඡට්ඨී, ඡට්ඨමී. ‘‘චතුත්ථදුතියෙස්වෙ+සං තතියපඨමා’’ති නිපාතනා පූරණත්ථෙ ද්විතො තියො ද්විස්ස දු ච, තිචතූහි තිස්ස අ, තිය+ත්ථා ච යථාක්කමං, දුතියො තතියො, චතුත්ථො. 'छ' शब्दापासून पूरण अर्थी 'ट्ठ' आणि 'ट्ठम' प्रत्यय होतात. सहाची संख्या पूर्ण करणारा तो 'छट्ठो' (सहावा), 'छट्ठमो' (सहावा). स्त्रीलिंगात 'छट्ठी' (सहावी), 'छट्ठमी' (सहावी). "चतुत्थदुतियेस्वेसं ततियपठमा" या निपातनामुळे पूरण अर्थी 'द्वि' शब्दापासून 'तिय' प्रत्यय होतो आणि 'द्वि' च्या जागी 'दु' होतो; 'ति' आणि 'चतु' शब्दांमध्ये 'ति' च्या जागी 'अ' होतो आणि अनुक्रमे 'तिय' व 'त्थ' प्रत्यय होतात; ज्यामुळे 'दुतियो' (दुसरा), 'ततियो' (तिसरा), 'चतुत्थो' (चौथा) अशी रूपे बनतात. 55. එකා කා+ක්ය+සහායෙ ५५. 'एक' शब्दापासून असहाय अर्थी 'क' आणि 'आकी' प्रत्यय होतात. ‘‘සති බ්යභිචාරෙ විසෙසනං සාත්ථකං’’ති ඤායා සංඛ්යාතො විසෙසෙතුං ‘‘අසහායෙ’’ති වුත්තං. එකස්මා අසහායත්ථෙ ක+ආකී හොන්ති වා. එකොව එකකො, එකාකී, එකො වා. "जेव्हा व्यभिचार (अपवाद) असतो तेव्हाच विशेषण सार्थ ठरते" या न्यायाने संख्यावाचक शब्दापासून वेगळे दर्शवण्यासाठी "असहारे" (असहाय अर्थी) असे म्हटले आहे. 'एक' शब्दापासून असहाय (एकटा) या अर्थी विकल्प करून 'क' आणि 'आकी' प्रत्यय होतात. एकटाच तो 'एकको' (एकटा), 'एकाकी' (एकाकी) किंवा 'एको' (एक). 56. වච්ඡාදීහි තනුත්තෙ තරො ५६. 'वच्छ' (वत्स/वासरू) इत्यादी शब्दांच्या स्वभावातील अल्पता (किंचित उरलेला भाग) दर्शवण्यासाठी 'तर' प्रत्यय होतो. වච්ඡාදීනං සභාවස්ස තනුත්තෙ=කිඤ්චිමත්තාවසෙසෙ තරො හොති. සො=සකො භාවො සභාවො අත්තනියපවත්තිනිමිත්තං. සුසුත්තස්ස තනුත්තෙ වච්ඡතරො, ඉත්ථියං වච්ඡතරී. යොබ්බනස්ස තනුත්තෙ ඔක්ඛතරො. ඔක්ඛා=දුතියවයට්ඨගොණො. අස්සභාවස්ස තනුත්තෙ අස්සතරො. ගාවොති ජාතිසාමත්ථියස්ස තනුත්තෙ උසභතරො. එත්ථ තනුත්තං අප්පබලතා. 'वच्छ' इत्यादी शब्दांच्या स्वभावातील अल्पता (किंचित उरलेला भाग) दर्शवण्यासाठी 'तर' प्रत्यय होतो. तो म्हणजे स्वतःचा भाव (स्वभाव), जो स्वतःच्या प्रवृत्तीचे कारण असतो. शिशुत्वाच्या (लहानपणाच्या) अल्पतेमध्ये 'वच्छतरो' (लहान वासरू), स्त्रीलिंगात 'वच्छतरी'. यौवनाच्या (तरुणपणाच्या) अल्पतेमध्ये 'ओक्खतरो' (तरुण बैल). 'ओक्खा' म्हणजे दुसऱ्या वयातील (तरुण) बैल. अश्वत्वाच्या (घोड्याच्या स्वभावाच्या) अल्पतेमध्ये 'अस्सतरो' (खच्चर/अश्वतर). 'गावो' (गाय/बैल) या जातीच्या सामर्थ्याच्या अल्पतेमध्ये 'उसभतरो' (लहान बैल/वृषभतर). येथे 'तनुत्ता' म्हणजे अल्पबलता (कमी ताकद) होय. 57. කිම්හා නිද්ධාරණෙ රතර+රතමා ५७. 'किम्' शब्दापासून निर्धारण अर्थी 'तर' आणि 'तम' प्रत्यय होतात. කිංසද්දා [Pg.191] නිද්ධාරණෙ රතර+රතමා හොන්ති. කො එවාති කතරො භවතං දෙවදත්තො, කතරො භවතං කට්ඨො. කතමො භවතං දෙවදත්තො, කතමො භවතං කට්ඨො. භාරද්වාජානං කතමො+සි බ්රහ්මෙ. 'किम्' शब्दापासून निर्धारण अर्थी 'तर' आणि 'तम' प्रत्यय होतात. 'कोण' या अर्थी 'कतर' आणि 'कतम' होतात. जसे - "तुमच्यापैकी देवदत्त कोणता (कतर)?", "तुमच्यापैकी लाकूड कोणते (कतर)?", "तुमच्यापैकी देवदत्त कोणता (कतम)?", "तुमच्यापैकी लाकूड कोणते (कतम)?", "हे ब्राह्मणा, भारद्वाजांपैकी तू कोणता (कतम) आहेस?" 58. තෙන දත්තෙ ලි+යාති ५८. 'त्याच्याद्वारे दिलेले' या अर्थी 'ल' आणि 'इय' प्रत्यय होतात. දත්තෙ+භිධෙය්යෙ ල+ඉයා හොන්ති බහුලාධිකාරා මනුස්සසඤ්ඤායං. දෙවෙන දත්තො දෙවලො දෙවියො, බ්රහ්මලො බ්රහ්මියො. සීවලො සීවියො සිස්ස දීඝො. දෙව+බ්රහ්ම+සිවාති තන්නාමකා මනුස්සා. (රත්තමිච්චාදිඅනෙකත්ථතද්ධිතං). 'दिलेले' या अर्थी मानवी नावांमध्ये बहुल अधिकाराने 'ल' आणि 'इय' प्रत्यय होतात. 'देवाने दिलेला' तो 'देवल' किंवा 'देविय'. 'ब्रह्मदेवाने दिलेला' तो 'ब्रह्मल' किंवा 'ब्रह्मिय'. 'शिवने दिलेला' तो 'सीवल' किंवा 'सीविय' (येथे 'सि' चा दीर्घ 'सी' होतो). देव, ब्रह्म, शिव ही त्या नावांची माणसे आहेत. (हे 'रत्त' इत्यादी अनेक अर्थांचे तद्धित रूप आहे). 59. තස්ස භාවකම්මෙසුත්ත+තා+ත්තන+ණ්ය+ණෙය්ය+ණි+ය+ණියා ५९. त्याच्या भाव आणि कर्म अर्थी 'त्त', 'ता', 'त्तन', 'ण्य', 'णेय्य', 'णि', 'य', 'णिय' प्रत्यय होतात. ඡට්ඨියන්තා භාවෙ කම්මෙ ච ත්තාදයො හොන්ති බහුලං. න සබ්බෙ පච්චයා සබ්බතො හොන්ති අඤ්ඤත්රත්ත+තාහි. භවන්ති එතස්මා බුද්ධිසද්දාති භාවො සද්දපවත්තිනිමිත්තං. වුත්තඤ්ච – षष्ठीविभक्तीच्या अंतापासून भाव आणि कर्म अर्थी 'त्त' इत्यादी प्रत्यय बहुधा होतात. 'त्त' आणि 'ता' प्रत्यय सोडून सर्व प्रत्यय सर्व शब्दांपासून होत नाहीत. 'ज्यापासून शब्द आणि बुद्धी निर्माण होते तो भाव' म्हणजे शब्दाच्या प्रवृत्तीचे निमित्त होय. आणि म्हटले आहे की - හොන්ත්ය+ස්මා සද්දබුද්ධීති, භාවො තං සද්දවුත්තියා; නිමිත්තභූතං නාමඤ්ච, ජාති දබ්බං ක්රියා ගුණොති. "ज्यापासून शब्द आणि बुद्धी निर्माण होते, तो शब्दाच्या प्रवृत्तीचा 'भाव' (निमित्त) आहे; तो निमित्तभूत असलेला नाम, जाती, द्रव्य, क्रिया आणि गुण होय." නීලස්ස පටස්ස භාවො නීලත්තං නීලතාති ගුණො භාවො. එත්ථ නීලගුණවසෙන පටෙ නීලසද්දස්ස වුත්තියා පටබුද්ධියා නිමිත්තං භාවො නාම. නීලස්ස ගුණස්ස භාවො නීලත්තං නීලතාති නීලගුණජාති, එත්ථ නීලගුණජාති නිමිත්තං හුත්වා නීලසද්දස්ස ගුණවුත්තියා [Pg.192] නීලගුණජාති නිමිත්තං. ගොත්තං ගොතාති ගොජාති, එත්ථ ජාතිසද්දානං දබ්බවුත්තියා සති ජාති නිමිත්තං. පාචකස්ස භාවො පාචකත්තංති ක්රියාසම්බන්ධිත්තං භාවො, එත්ථ පචනක්රියාසම්බන්ධිත්තං භාවො. දණ්ඩිත්තං විසාණිත්තං රාජපුරිසත්තංති දණ්ඩ+විසාණ+රාජදබ්බානං සම්බන්ධිත්තං භාවො, දණ්ඩීත්යාදිසද්දපවත්තියා නිමිත්තත්තා. 'निळ्या वस्त्राचा भाव' म्हणजे 'नीलत्व' (नीलत्तं) किंवा 'नीलता' (नीलता) हा गुणाचा भाव आहे. येथे नील गुणाच्या आधारे वस्त्रावर 'नील' शब्दाच्या प्रवृत्तीने वस्त्रबुद्धीचे जे निमित्त आहे, त्याला 'भाव' म्हणतात. 'निळ्या गुणाचा भाव' म्हणजे 'नीलत्व' किंवा 'नीलता' ही नील गुणाची जाती आहे; येथे नील गुणाची जाती निमित्त बनून 'नील' शब्दाच्या गुणप्रवृत्तीसाठी नील गुणाची जाती निमित्त ठरते. 'गोत्व' (गोत्तं) किंवा 'गोता' म्हणजे 'गो-जाती'; येथे जातीवाचक शब्दांच्या द्रव्यप्रवृत्तीमध्ये 'जाती' हे निमित्त असते. 'पाचकाचा (स्वयंपाक्याचा) भाव' म्हणजे 'पाचकत्व' (पाचकत्तं) हा क्रियेशी संबंधित भाव आहे; येथे स्वयंपाक करण्याच्या क्रियेशी संबंधित भाव आहे. 'दंडित्व', 'विषाणित्व', 'राजपुरुषत्व' म्हणजे दंड, विषाण (शिंग) आणि राजपुरुष या द्रव्यांशी संबंधित भाव आहे, कारण 'दंडी' इत्यादी शब्दांच्या प्रवृत्तीचे ते निमित्त आहे. දෙවදත්තස්ස භාවො දෙවදත්තත්තං, චන්දත්තං, සූරියත්තංති තදවත්ථා විසෙසසාමඤ්ඤං, දෙවදත්තස්ස බාලතාදිඅවත්ථාභෙදො, චන්දස්ස කලාදිඅවත්ථභෙදො ච, සූරියස්ස මන්දපටුතාදිඅවත්ථාභෙදො ච සාමඤ්ඤං, තදෙත්ථ නිමිත්තං. එත්ථ විජ්ජමානපදත්ථානං විසයභූතසඤ්ඤාසද්දානං පවත්තිනිමිත්තං වුත්තං. ආකාසත්තං අභාවත්තංති, තත්ථ ඝටාකාස+පීඨරාකාස, පටාභාව+ඝටාභාවාදිනා උපචරිතභෙදසාමඤ්ඤං භාවො. 'देवदत्ताचा भाव' म्हणजे 'देवदत्तत्व' (देवदत्तत्तं), 'चंद्रत्व' (चंदत्तं), 'सूर्यत्व' (सूरियत्तं) हे त्यांच्या अवस्थांच्या विशेषांचे सामान्य रूप आहे. देवदत्ताची बालपण इत्यादी अवस्थांचा भेद, चंद्राच्या कला इत्यादी अवस्थांचा भेद आणि सूर्याच्या मंद-तीव्र इत्यादी अवस्थांचा भेद हे सामान्य रूप आहे, ते येथे निमित्त आहे. येथे विद्यमान पदार्थांच्या विषय बनलेल्या संज्ञावाचक शब्दांच्या प्रवृत्तीचे निमित्त सांगितले आहे. 'आकाशत्व' (आकासत्तं), 'अभावत्व' (अभावत्तं) यामध्ये घट-आकाश, पीठ-आकाश, पट-अभाव, घट-अभाव इत्यादींच्या उपचरित (लाक्षणिक) भेदांचे सामान्य रूप हाच भाव आहे. ත්තන-පුථුජ්ජනත්තනං. වෙදනාය භාවො වෙදනත්තනං, රස්සො. එවං ජායත්තනං, ජාරත්තනං. 'त्तन' प्रत्यय - 'पुथुज्जनत्तनं' (पृथग्जनत्व). 'वेदनेचा भाव' म्हणजे 'वेदनात्तनं' (येथे र्हस्व होतो). याचप्रमाणे 'जायत्तनं' (पत्नीत्व), 'जारत्तनं' (जारत्व). ණ්ය-අලසස්ස භාවො කම්මං වා ආලස්යං, එත්ථ ‘‘ලොපො+වණ්ණි+වණ්ණානං’’ති අ-ලොපෙ ‘‘සරාන+මාදිස්සා’’දිනා ආකාරො, එව+මුපරි ච. බ්රාහ්මණස්ස භාවො බ්රහ්මඤ්ඤං, ඤ්ඤකාරපුබ්බරූපානි. චාපල්යං, නෙපුඤ්ඤං, පෙසුඤ්ඤං, රඤ්ඤො භාවො රජ්ජං, ආධිපච්චං, දායජ්ජං, වෙසම්මං, වෙසමං, ණපච්චයො. සඛිනො භාවො සඛ්යං, වාණිජ්ජං, ආරොග්යං, ඔදග්යං, ආනණ්යං, දුබ්බල්යං, බල්යං, පණ්ඩිච්චං, බාහුස්සච්චං, පොරොහිච්චං. මුට්ඨස්සතිස්ස භාවො මුට්ඨස්සච්චං, ඉලොපො. කොසල්ලං, වෙපුල්ලං. සමානස්ස භාවො සාමඤ්ඤං, පෙරිස්සං, සොමනස්සං, දොමනස්සං, සොවචස්සං, දොවචස්සං, නිපකස්ස [Pg.193] භාවො නෙපක්කං, ආධික්කං, දුභගස්ස භාවො දොභග්ගං, සරූපස්ස භාවො සාරුප්පං, ඔපම්මං, සොඛුම්මං, තථස්ස භාවො තච්ඡං. දුම්මෙධස්ස භාවො දුම්මෙජ්ඣං. භෙසජස්ස භාවො භෙසජ්ජං, බ්යාවටස්ස කම්මං වෙය්යාවච්චං යථා වෙය්යාකරණං. 'ण्य' प्रत्यय - 'अलस' (आळशी) चा भाव किंवा कर्म म्हणजे 'आलस्यं' (आळस). येथे "लोपो वण्णिवण्णानं" सूत्राने 'अ' चा लोप होऊन "सरानामदिस्सा" सूत्राने आद्य स्वराचा दीर्घ 'आ' होतो, आणि पुढेही असेच होते. 'ब्राह्मणाचा भाव' म्हणजे 'ब्रह्मञ्ञं' (ब्राह्मण्य), येथे 'ञ्ञ' चे पूर्वरूप होते. 'चापल्यं' (चपळता), 'नेपुञ्ञं' (निपुणता), 'पेसुञ्ञं' (चहाडी), 'राजाचा भाव' म्हणजे 'रज्जं' (राज्य), 'आधिपच्चं' (अधिपत्य), 'दायज्जं' (वारसा), 'वेसम्मं' किंवा 'वेसमं' (विषमता - येथे 'ण' प्रत्यय होतो). 'मित्राचा भाव' म्हणजे 'sख्यं' (सख्य), 'वाणिज्जं' (व्यापार), 'आरोग्यं' (आरोग्य), 'ओदग्यं' (आनंद), 'आनण्यं' (कर्जमुक्ती), 'दुब्बल्यं' (दुर्बळता), 'बल्यं' (बळ), 'पंडिच्चं' (पांडित्य), 'बाहुस्सच्चं' (बहुश्रुतता), 'पोरोहित्चं' (पुरोहितपण). 'मुट्ठस्सति' चा भाव म्हणजे 'मुट्ठस्सच्चं' (स्मृतीभ्रंश), येथे 'इ' चा लोप होतो. 'कोसल्लं' (कौशल्य), 'वेपुल्लं' (विपुलता). 'समान' चा भाव म्हणजे 'सामञ्ञं' (समानता/श्रामण्य), 'पेरिस्सं' (परिषदपण), 'सोमनस्सं' (सौमनस्य), 'दोमनस्सं' (दौर्मनस्य), 'सोवचस्सं' (सुवचत्व), 'दोवचस्सं' (दुर्वचत्व). 'निपक' चा भाव म्हणजे 'नेपक्कं' (निपुणता), 'आधिक्कं' (आधिक्य). 'दुभग' चा भाव म्हणजे 'दोभग्गं' (दुर्भाग्य). 'सरूप' चा भाव म्हणजे 'सारुप्पं' (सारूप्य). 'ओपम्मं' (औपम्य), 'सोखुम्मं' (सौक्ष्म्य). 'तथ' चा भाव म्हणजे 'तच्छं' (तथ्य). 'दुम्मेध' चा भाव म्हणजे 'दुम्मेज्झं' (दुर्बुद्धी). 'भेसज' चा भाव म्हणजे 'भेसज्जं' (औषध). 'व्यावट' चे कर्म म्हणजे 'वेय्यावच्चं' (सेवा), जसे 'वेय्याकरणं' (व्याकरण). ණෙය්ය-සුචිනො භාවො සොචෙය්යං, ආධිපතෙය්යං, කපිස්ස භාවො කාපෙය්යං. සඨස්ස භාවො කම්මං වා සාඨෙය්යං. 'णेय्य' प्रत्यय - 'सुचि' (पवित्र) चा भाव म्हणजे 'सोचेय्यं' (पवित्रता), 'आधिपतेय्यं' (अधिपत्य), 'कपि' (माकड) चा भाव म्हणजे 'कापेय्यं' (चंचलता). 'सठ' (धूर्त) चा भाव किंवा कर्म म्हणजे 'साठेय्यं' (धूर्तता). ණ-ගරූනං භාවො ගාරවං, උ අවඞ. පාටවං, අජ්ජවං, මද්දවං, ‘‘කොසජ්ජා’’දිනා උස්ස අත්තං ද්විත්තඤ්ච. පරමානං භාවො පාරමී, වීපච්චයො. සමග්ගානං භාවො සාමග්ගී. 'ण' प्रत्यय - 'गरु' (गुरू) चा भाव म्हणजे 'गारवं' (गौरव), येथे 'उ' चा 'अव' आदेश होतो. 'पाटवं' (पटुता), 'अज्जवं' (सरळपणा), 'मद्दवं' (मृदुता), "कोसज्जा" इत्यादी सूत्राने 'उ' चा 'अ' होतो आणि द्वित्व होते. 'परम' चा भाव म्हणजे 'पारमी' (पारमिता), येथे 'वी' प्रत्यय होतो. 'समग्र' चा भाव म्हणजे 'सामग्गी' (एकता). ඉය-අධිපතිනො භාවො අධිපතියං, පණ්ඩිතියං, බහුස්සුතියං, නග්ගියං, සූරියං. 'इय' प्रत्यय - 'अधिपति' चा भाव म्हणजे 'अधिपतियं' (अधिपत्य), 'पंडितियं' (पांडित्य), 'बहुस्suतियं' (बहुश्रुतता), 'नग्गियं' (नग्नता), 'सूरियं' (शौर्य). ණිය-අලසස්ස භාවො කම්මං වා ආලසියං, තාලුසියං, මන්දියං, දක්ඛියං, පොරොහිතියං, වෙය්යත්තියං. 'णिय' प्रत्यय - 'अलस' चा भाव किंवा कर्म म्हणजे 'आलसियं' (आळस), 'तालुसियं' (तालुभाव), 'मंदियं' (मंदता), 'दक्खियं' (दक्षता), 'पोरोहितियं' (पुरोहितपण), 'वेय्यत्तियं' (पात्रता). කථං රාමණීයකංති, සකත්ථෙ කන්තා ණෙන සිද්ධා. කම්මං=ක්රියා, තත්ථ අලසස්ස කම්මං අලසත්තං අලසතා අලසත්තනං ආලස්යං ආලසියං වා. 'रामणीयकं' (रमणीयता) कसे सिद्ध होते? स्वार्थ अर्थी 'कन्' प्रत्यय आणि 'ण' प्रत्ययाने ते सिद्ध होते. कर्म = क्रिया, त्यामध्ये 'अलस' चे कर्म म्हणजे 'अलसत्तं' (आळशीपणा), 'अलसता', 'अलसत्तनं', 'आलस्यं' किंवा 'आलसियं' होय. 122. සකත්ථෙති १२२. 'स्वार्थ अर्थी' (स्वतःच्याच अर्थात). සකත්ථෙපි යථායොගං ත්තාදයො හොන්ති. යථාභූතමෙව යථාභුච්චං, කාරුඤ්ඤං, පත්තකල්ලං. ආකාසානන්තමෙව ආකාසානඤ්චං, එත්ථ අකාරලොපො, තස්ස චෙ පුබ්බරූපෙ ච කතෙ ‘‘තදමිනා’’දිනා නස්ස ඤ්ඤො ච ලොපො ච හොති, කායපාගුඤ්ඤතා. स्वार्थ अर्थी सुद्धा योग्यतेनुसार 'त्त' इत्यादी प्रत्यय होतात. जसे - 'यथाभूत' चे 'यथाभुच्चं' (यथातथ्य), 'कारुञ्ञं' (कारुण्य), 'पत्तकल्लं' (प्राप्तकाल). 'आकाशानंत' चे 'आकासानञ्चं' (आकाशानंत्य), येथे 'अ' कारचा लोप होतो, आणि त्याचे पूर्वरूप झाल्यावर "तदमिना" इत्यादी सूत्राने 'न' चा 'ञ' होतो आणि लोप होतो, 'कायपागुञ्ञता' (शरीराची कुशलता). 60. බ්ය වද්ධදාසා වා ६०. 'वृद्ध' आणि 'दास' शब्दांपासून षष्ठीविभक्तीच्या अंती भाव आणि कर्म अर्थी 'ब्य' प्रत्यय विकल्प करून होतो. ඡට්ඨියන්තා [Pg.194] වද්ධා දාසා ච බ්යො හොති භාවකම්මෙසු. වද්ධස්ස භාවො කම්මං වා වද්ධබ්යං, වද්ධතා. දාසස්ස භාවො කම්මං වා දාසබ්යං, දාස්යං, දාසතා. කථං වද්ධවංති, ණෙ වාගමො. षष्ठीविभक्तीच्या अंतापासून 'वृद्ध' आणि 'दास' शब्दांना भाव आणि कर्म अर्थी 'ब्य' प्रत्यय होतो. 'वृद्धाचा भाव किंवा कर्म' म्हणजे 'वद्धब्यं' (वृद्धत्व) किंवा 'वद्धता'. 'दासाचा भाव किंवा कर्म' म्हणजे 'दासब्यं' (दासत्व), 'दास्यं' किंवा 'दासता'. 'वद्धवं' (वृद्धत्व) कसे सिद्ध होते? 'णे' प्रत्यय झाल्यावर 'व' चा आगम होतो. 61. නස යුවා බො ච වස්ස ६१. 'युवन्' शब्दापासून षष्ठीविभक्तीच्या अंती भाव आणि कर्म अर्थी 'न' प्रत्यय विकल्प करून होतो आणि 'व' चा 'ब' होतो. ඡට්ඨියන්තා යුවසද්දා භාවකම්මෙසු නණ වා හොති වස්ස බො ච. යුවස්ස භාවො යොබ්බනං, යුවත්තං යුවතා වා. षष्ठीविभक्तीच्या अंतापासून 'युव' शब्दाला भाव आणि कर्म अर्थी 'न' किंवा 'ण' प्रत्यय विकल्प करून होतो आणि 'व' चा 'ब' होतो. 'युवकाचा भाव' म्हणजे 'योब्बनं' (यौवन), किंवा 'युवत्तं' (युवत्व) किंवा 'युवता'. 62. අණ්වාදිත්වි+මොති ६२. 'अणु' इत्यादी शब्दांपासून भाव अर्थी 'इम' प्रत्यय विकल्प करून होतो. භාවෙ වා ඉමො. අණුනො භාවො අණිමා, ලඝිමා, මහතො භාවො මහිමා. කිසස්ස භාවො කසිමා. भाव अर्थी विकल्प करून 'इम' प्रत्यय होतो. 'अणूचा भाव' म्हणजे 'अणिमा' (अणुत्व), 'लघिमा' (लघुत्व), 'महानचा भाव' म्हणजे 'महिमा' (महत्त्व). 'कृश चा भाव' म्हणजे 'कसिमा' (कृशत्व). 133. කිස+මහත+මිමෙ කස, මහාති १३३. 'इम' प्रत्यय झाल्यावर 'महत्' चा 'मह' आणि 'कृश' चा 'कस' असा आदेश होतो. ඉමම්හි මහතො මහො ච කිසස්ස කසාදෙසො ච හොති. 'इम' प्रत्यय असताना 'महत्' चा 'मह' आणि 'कृश' चा 'कस' असा आदेश होतो. 63. භාවා තෙන නිබ්බත්තෙති ६३. 'त्याच्याद्वारे निष्पन्न झालेला' या अर्थी क्रियावाचक शब्दापासून 'इम' प्रत्यय होतो. ක්රියාවාචකසද්දතො ඉමො, පාකෙන නිබ්බත්තං පාකිමං, සෙකිමං. क्रियावाचक शब्दापासून 'इम' प्रत्यय होतो. जसे - 'पाकाने निष्पन्न झालेले' ते 'पाकिमं', 'सिंचनाने निष्पन्न झालेले' ते 'सेकिमं'. 127. කොසජ්ජා+ජ්ජව+පාරිසජ්ජ+සොහජ්ජ+මද්දවා+රිස්සා+සභා+ජඤ්ඤ+ථෙය්ය+ බාහුසච්චා १२७. कोसज्ज (आळस), अज्जव (सरळपणा), पारिसज्ज (परिषदपण), सोहज्ज (मैत्री), मद्दव (मृदुता), अरिस्सा (असूया नसणे), सभा, जञ्ञ (श्रेष्ठ), थेय्य (चोरी), बाहुसच्च (बहुश्रुतता). එතෙ සද්දා නිපච්චන්තෙ ණානුබන්ධෙ. කුසීතස්ස භාවොති භාවෙ ණ්යො හොති, ඉමිනා ඊස්ස අකාරෙ ච තස්ස ජෙ ච [Pg.195] කතෙ යස්ස පුබ්බරූපං, කොසජ්ජං. උජුනො භාවෙ අජ්ජවංති ණො, ඉමිනා උස්ස අත්තං, ‘‘උවණ්ණස්සා+වඞ සරෙ’’ති අවඞආදෙසෙ ජස්ස ද්විත්තං. පරිසාසු සාධූති වාක්යෙ ‘‘ණ්යො තත්ථ සාධූ’’ති ණ්යො, ඉමිනා ජාගමො ච, ‘‘බ්යඤ්ජනෙ දීඝරස්සා’’ති ආස්ස රස්සෙ ච කතෙ ජස්ස පුබ්බරූපං, පාරිසජ්ජො. ඉමිනා කමෙන වාක්යෙනෙව සද්දසිද්ධි වෙදිතබ්බා. සුහදයොව සුහජ්ජො, තස්ස භාවො සොහජ්ජං, ඉමිනා අයලොපො. මුදුනො භාවො මද්දවං, ඉමිනා උස්ස අත්තං. ඉසිනො ඉදං භාවො වා ආරිස්සං, ණ්යපච්චයෙ ඉමිනා ආරඤාගමෙ ‘‘ලොපො+වණ්ණි+වණ්ණානං’’ති අන්තඉකාරලොපො ච. උසභස්ස ඉදං භාවො වා ආසභං, ඉමිනා උස්ස ආ. ආජානීයස්ස භාවො ආජඤ්ඤං, ඉමිනා යලොපෙ ‘‘ලොපො+වණ්ණි+වණ්ණානං’’ති ඊකාරලොපො. ථෙනස්ස භාවො ථෙය්යං, ඉමිනා නස්ස යකාරො. බහුස්සුතස්ස භාවො බාහුසච්චං, ඉමිනා උස්ස අකාරො සංයොගාදිලොපො. (භාවතද්ධිතං). हे शब्द 'ण' अनुबंध असताना निपातित केले जातात. 'कुसीतस्स भावो' (आळशाचा भाव) या अर्थी 'ण्यो' प्रत्यय होतो, याने 'ई' चा 'अ' आणि 'त' चा 'ज' झाल्यावर 'य' चे पूर्वरूप होऊन 'कोसज्जं' (आळस) बनते. 'उजुनो भावो' (सरळपणाचा भाव) या अर्थी 'अज्जवं' मध्ये 'ण' प्रत्यय होतो, याने 'उ' चा 'अ' होतो, "उवण्णस्सा+वण सरे" या सूत्राने 'अवण' आदेश झाल्यावर 'ज' चे द्वित्व होते. 'परिसासु साधू' या वाक्यात "ण्यो तत्थ साधू" या सूत्राने 'ण्यो' प्रत्यय होतो, याने 'ज' चा आगम होतो, आणि "ब्यञ्जने दीघरस्सा" या सूत्राने 'आ' चा र्हस्व झाल्यावर 'ज' चे पूर्वरूप होऊन 'पारिसज्जो' बनते. याच क्रमाने वाक्याद्वारेच शब्दसिद्धी जाणावी. 'सुहदयो' म्हणजेच 'सुहज्जो' (मित्र), त्याचा भाव 'सोहज्जं' (मैत्री), यात 'अय' चा लोप होतो. 'मुदुनो भावो' (मृदूचा भाव) 'मद्दवं' (मृदुता), यात 'उ' चा 'अ' होतो. 'इसिनो इदं भावो वा' (ऋषीचे हे किंवा भाव) 'आरिस्सं', 'ण्य' प्रत्यय असताना याने 'आर' चा आगम आणि "लोपो+वण्णि+वण्णानं" या सूत्राने अंत्य 'इ' काराचा लोप होतो. 'उसभस्स इदं भावो वा' (वृषभाचे हे किंवा भाव) 'आसभं', यात 'उ' चा 'आ' होतो. 'आजानीयस्स भावो' (आजानीयचा भाव) 'आजञ्ञं', यात 'य' चा लोप झाल्यावर "लोपो+वण्णि+वण्णानं" या सूत्राने 'ई' काराचा लोप होतो. 'थेनस्स भावो' (चोराचा भाव) 'थेय्यं' (चोरी), यात 'न' चा 'य' कार होतो. 'बहुस्सुतस्स भावो' (बहुश्रुताचा भाव) 'बाहुसच्चं' (बहुश्रुतता), यात 'उ' चा 'अ' कार आणि संयोगादीचा लोप होतो. (भावतद्धित समाप्त). 64. තර+තමි+ස්සිකි+යි+ට්ඨා+තිසයෙ ६४. अतिशय (अधिकता) दर्शवण्यासाठी 'तर', 'तम', 'इस्सिक', 'इय' आणि 'इट्ठ' प्रत्यय होतात. අතිසයෙ වත්තමානතො හොන්තෙ+තෙ පච්චයා. අතිසයෙන පාපො පාපතරො පාපතමො පාපිස්සිතො පාපියො පාපිට්ඨො, ඉත්ථියං පාපතරා ඉච්චාදි. අතිසයප්පච්චයන්තාපි අතිසයප්පච්චයො, අතිසයෙන පාපිට්ඨො පාපිට්ඨතරො පාපිට්ඨතමො. එවං පටුතරො පටුතමො, පටිස්සිකො, පටියො, පටිට්ඨො, වරතරො ඉච්චාදි පණීතතරො ඉච්චාදි ච. अतिशय (अधिकता) अर्थ वर्तमान असताना हे प्रत्यय होतात. अतिशय पापी तो 'पापतरी' (अधिक पापी), 'पापतमो' (सर्वात पापी), 'पापिस्सितो', 'पापियो', 'पापिट्ठो'; स्त्रीलिंगात 'पापतरा' इत्यादी रूपे होतात. अतिशय प्रत्ययान्त शब्दांना देखील पुन्हा अतिशय प्रत्यय लागतो, जसे की अतिशय पापिट्ठ तो 'पापिट्ठतरो', 'पापिट्ठतमो'. याचप्रमाणे 'पटुतरो', 'पटुतमो', 'पटिस्सिको', 'पटियो', 'पटिट्ठो', 'वरतरो' इत्यादी आणि 'पणीततरो' इत्यादी रूपे होतात. 135. ජො වුද්ධස්සි+යි+ට්ඨෙසු १३५. 'इय' आणि 'इट्ठ' प्रत्यय परे असताना 'वुद्ध' शब्दाच्या जागी 'ज' आदेश होतो. වුද්ධස්ස [Pg.196] ජො හොති ඉයඉට්ඨෙසු. අතිසයෙන වුද්ධො ජෙය්යො ජෙට්ඨො, ජාදෙසෙ පුබ්බසරලොපෙ ලුත්තා සරා ඉස්ස එකාරෙ ච යස්ස ද්විත්තං. 'इय' आणि 'इट्ठ' प्रत्यय परे असताना 'वुद्ध' च्या जागी 'ज' होतो. अतिशय वृद्ध तो 'जेय्यो', 'जेट्ठो'. 'ज' आदेश झाल्यावर पूर्व स्वराचा लोप होतो, स्वर लुप्त झाल्यावर 'इ' चा 'ए' कार होतो आणि 'य' चे द्वित्व होते. 136. බාළ්හ+න්තික+පසත්ථානං සාධ+නෙද+සා १३६. 'इय' आणि 'इट्ठ' प्रत्यय परे असताना 'बाळ्ह', 'अन्तिक' आणि 'पसत्थ' यांच्या जागी अनुक्रमे 'साध', 'नेद' आणि 'स' हे आदेश होतात. ඉයඉට්ඨෙසු බාළ්හ+න්තික+පසත්ථානං සාධ+නෙද+සා හොන්ති යථාක්කමං. අතිසයෙන බාළ්හො සාධියො සාධිට්ඨො. අතිසයෙන අන්තිකො නෙදියො නෙදිට්ඨො. අතිසයෙන පසත්ථො සෙය්යො සෙට්ඨො, පුබ්බෙව සරෙ ලුත්තෙ ඉස්ස එ ද්විත්තඤ්ච. 'इय' आणि 'इट्ठ' प्रत्यय परे असताना 'बाळ्ह', 'अन्तिक' आणि 'पसत्थ' यांच्या जागी अनुक्रमे 'साध', 'नेद' आणि 'स' होतात. अतिशय दृढ (बाळ्ह) तो 'साधियो', 'साधित्ठो'. अतिशय जवळचा (अन्तिक) तो 'नेदियो', 'नेदिट्ठो'. अतिशय प्रशंसनीय (पसत्थ) तो 'सेय्यो', 'सेट्ठो'; येथे पूर्वीप्रमाणेच स्वराचा लोप झाल्यावर 'इ' चा 'ए' आणि द्वित्व होते. 137. කණ+කන+ප්ප+යුවානං १३७. 'इय' आणि 'इट्ठ' प्रत्यय परे असताना 'अप्प' आणि 'युव' यांच्या जागी अनुक्रमे 'कण' आणि 'कन' आदेश होतात. ඉයඉට්ඨෙසු අප්පයුවානං කණ+කනා හොන්ති යථාක්කමං. අතිසයෙන අප්පො කණියො කණිට්ඨො. අතිසයෙන යුවා කනියො කනිට්ඨො. 'इय' आणि 'इट्ठ' प्रत्यय परे असताना 'अप्प' आणि 'युव' यांच्या जागी अनुक्रमे 'कण' आणि 'कन' होतात. अतिशय अल्प (अप्प) तो 'कणियो', 'कणिट्ठो'. अतिशय तरुण (युवा) तो 'कनियो', 'कनिट्ठो'. 138. ලොපො වී+මන්තු+වන්තූනන්ති १३८. 'इय' आणि 'इट्ठ' प्रत्यय परे असताना 'वी', 'मन्तु' आणि 'वन्तु' प्रत्ययांचा लोप होतो. ඉයඉට්ඨෙසු වී+මන්තු+වන්තූනං ලොපො. අතිසයෙන මෙධාවී මෙධියො මෙධිට්ඨො. අතිසයෙන සතිමා සතියො සතිට්ඨො. අතිසයෙන ගුණවා ගුණියො ගුණිට්ඨො. එත්ථ යථාක්කමං මන්ත්වත්ථෙ වී+මන්තු+වන්තු හොති. 'इय' आणि 'इट्ठ' प्रत्यय परे असताना 'वी', 'मन्तु' आणि 'वन्तु' यांचा लोप होतो. अतिशय बुद्धिमान (मेधावी) तो 'मेधियो', 'मेधित्ठो'. अतिशय स्मृतिमान (सतिमा) तो 'सतियो', 'सतिट्ठो'. अतिशय गुणवान (गुणवा) तो 'गुणियो', 'गुणिट्ठो'. येथे अनुक्रमे 'मन्तु' (अस्तित्व) अर्थी 'वी', 'मन्तु' आणि 'वन्तु' प्रत्यय होतात. 65. තන්නිස්සිතෙ ල්ලො ६५. 'त्यावर आश्रित' या अर्थी द्वितीयान्त शब्दाहून 'ल्ल' प्रत्यय होतो. ල්ලපච්චයො [Pg.197] හොති දුතියන්තා තන්නිස්සිතත්ථෙ. වෙදං නිස්සිතං වෙදල්ලං. දුට්ඨු නිස්සිතං දුට්ඨුල්ලං. වෙදන්ති තුට්ඨි. ඉල්ලෙ සඞ්ඛාරං නිස්සිතං සඞ්ඛාරිල්ලං. 'त्यावर आश्रित' या अर्थी द्वितीयान्त शब्दाहून 'ल्ल' प्रत्यय होतो. वेदावर (ज्ञानावर/आनंदावर) आश्रित ते 'वेदल्लं'. दुष्टपणे आश्रित ते 'दुट्ठुल्लं'. 'वेद' म्हणजे तुट्ठि (संतुष्टी/आनंद). 'इल्ल' प्रत्यय असताना संस्कारावर आश्रित ते 'सङ्खारिल्लं'. 66. තස්ස විකාරාවයවෙසු ණ+ණික+ණෙය්ය+මයා ६६. 'त्याचा विकार किंवा अवयव' या अर्थी 'ण', 'णिक', 'णेय्य' आणि 'मय' प्रत्यय होतात. පකතියා උත්තර+මවත්ථන්තරං විකාරො. ඡට්ඨියන්තා නාමස්මා විකාරෙ+වයවෙ ච ණාදයො හොන්ති බහුලං. ණ-අයසො විකාරො ආයසං බන්ධනං, සකාගමො. උදුම්බරස්ස අවයවො විකාරො වා ඔදුම්බරං භස්මං පණ්ණං වා. කාපොතං මංසං සත්ති වා. ණික-කප්පාසස්ස විකාරො කප්පාසිකං වත්ථං. ණෙය්ය-එණිස්ස විකාරො+වයවො වා එණෙය්යං. කොසානං විකාරො කොසෙය්යං වත්ථං. මය-තිණානං විකාරො තිණමයං, දාරුමයං, නළමයං, මත්තිකාමයං, සුවණ්ණමයො රථො, රූපියමයං. ‘‘අඤ්ඤස්මිං’’ති මයො, ගුන්නං කරීසං ගොමයං. प्रकृतीची (मूळ रूपाची) पुढील अवस्था म्हणजे 'विकार' होय. षष्ठ्यन्त नामाहून विकार आणि अवयव या अर्थी 'ण' इत्यादी प्रत्यय बहुधा होतात. 'ण' प्रत्यय - लोहाचा (अयस) विकार ते 'आयसं' बंधन, यात 'स' चा आगम होतो. उदुंबराचा (उंबराचा) अवयव किंवा विकार ते 'ओदुम्बरं' भस्म किंवा पान. कबुतराचे (कपोत) मांस किंवा शक्ती ते 'कापोतं'. 'णिक' प्रत्यय - कापसाचा (कप्पास) विकार ते 'कप्पासिकं' वस्त्र. 'णेय्य' प्रत्यय - एणीचा (हरिणीचा) विकार किंवा अवयव ते 'एणेय्यं'. कोशांचा (रेशीम कीटकांच्या कोशांचा) विकार ते 'कोसेय्यं' वस्त्र. 'मय' प्रत्यय - तृणाचा (गवताचा) विकार ते 'तिणमयं', लाकडाचा विकार 'दारुमयं', नळाचा (लव्हाळ्याचा) विकार 'नळमयं', मातीचा विकार 'मत्तिकामयं', सोन्याचा रथ 'सुवण्णमयो रथो', चांदीचा 'रूपियमयं'. "अञ्ञस्मिं" या सूत्राने 'मय' प्रत्यय होतो, गाईचे शेण ते 'गोमयं'. 67. ජතුතො ස්සණ වා ६७. 'जतु' (लाख) शब्दाहून विकार आणि अवयव या अर्थी विकल्पेकरून 'स्सण' प्रत्यय होतो. විකාරාවයවෙසු ජතුතො ස්සණ වා හොති. එත්ථ ‘‘විකාරාවයවෙසූ’’ති වත්තන්තෙසුපි බහුලාධිකාරා විකාරෙයෙව හොති. ජතුනො විකාරො ජාතුස්සං ජතුමයං. विकार आणि अवयव या अर्थी 'जतु' शब्दाहून विकल्पेकरून 'स्सण' प्रत्यय होतो. येथे "विकारावयवेसु" चे अनुवर्तन होत असले तरी 'बहुलाधिकारा'मुळे केवळ विकार अर्थीच हा प्रत्यय होतो. जतूचा (लाखेचा) विकार तो 'जातुस्सं' किंवा 'जतुमयं'. 123. ලොපොති १२३. 'लोप' म्हणजे प्रत्ययाचा लोप होणे. බහුලං පච්චයලොපොපි. ‘‘ඵලිතස්ස රුක්ඛස්ස ඵල+මවයවො විකාරො ච, පල්ලවිතස්සෙව පල්ලවං’’ති වුත්තත්තා ඵලාදයො [Pg.198] අවයවා විකාරා ච හොන්ති, තස්මා ඉදං වුච්චති ඵලපුප්ඵමූලෙසු විකාරාවයවෙසු-පියාලස්ස ඵලානි පියාලානි, මල්ලිකාය පුප්ඵානි මල්ලිකා, උසීරස්ස මූලං උසීරං. තංසද්දෙන වා තදභිධානං අභෙදොපචාරෙන, තස්මා පච්චයලොපං විනාපි සිජ්ඣති. बहुधा प्रत्ययाचा लोप देखील होतो. "फळ आलेल्या वृक्षाचे फळ हा त्याचा अवयव आणि विकार आहे, तसेच पालवी फुटलेल्या वृक्षाची पालवी" असे म्हटले असल्यामुळे फळ इत्यादी अवयव आणि विकार असतात, म्हणून हे म्हटले जाते की फळ, फूल आणि मूळ (वनस्पतीचे मूळ) या विकार आणि अवयवांमध्ये - पियालची फळे ती 'पियालानि', मोगऱ्याची (मल्लिका) फुले ती 'मल्लिका', वाळ्याचे (उशीर) मूळ ते 'उसीरं'. किंवा त्या शब्दानेच अभेदोपचाराने त्याचे अभिधान (कथन) होते, म्हणून प्रत्ययलोपाशिवाय देखील सिद्धी होते. 68. සමූහෙ කණ+ණ+ණිකා ६८. 'समूह' या अर्थी षष्ठ्यन्त शब्दाहून 'कण', 'ण' आणि 'णिक' प्रत्यय होतात. ඡට්ඨියන්තා සමූහෙ කණ+ණ+ණිකා හොන්ති. ගොත්තපච්චයන්තා කණ-රාජඤ්ඤානං සමූහො රාජඤ්ඤකං, මානුසකං. උක්ඛාදීහි උක්ඛානං සමූහො ඔක්ඛකං, ‘‘සංයොගෙ ක්වචී’’ති ඔකාරො. ඔට්ඨකං. උරබ්භානං සමූහො ඔරබ්භකං. රාජකං, රාජපුත්තකං, හත්ථිකං, ධෙනුකං, මායූරකං, කාපොතකං, මාහිසකං. ණ-කාකානං සමූහො කාකං, භික්ඛං. ණික අචිත්තා-අපූපානං සමූහො ආපූපිකං, සංකුලිකං. षष्ठ्यन्त शब्दाहून समूह अर्थी 'कण', 'ण' आणि 'णिक' प्रत्यय होतात. गोत्रप्रत्ययान्त शब्दाहून 'कण' प्रत्यय - राजन्य लोकांचा समूह तो 'राजन्यकं', मनुष्यांचा समूह 'मानुसकं'. 'उक्ख' इत्यादी शब्दांपासून - उक्खांचा समूह 'ओक्खकं', "संयोगे क्वचि" या सूत्राने 'ओ' कार होतो. उंटांचा समूह 'ओट्ठकं'. मेंढ्यांचा (उरब्भ) समूह 'ओरब्भकं'. 'राजकं' (राजांचा समूह), 'राजपुत्तकं', 'हत्थिकं' (हत्तींचा समूह), 'धेनुकं' (गाईंचा समूह), 'मायूरकं' (मोरांचा समूह), 'कापोतकं' (कबुतरांचा समूह), 'माहिसकं' (म्हशींचा समूह). 'ण' प्रत्यय - कावळ्यांचा (काक) समूह तो 'काकं', भिक्षूंचा समूह 'भिक्खं'. 'णिक' प्रत्यय अचित्त (अचेतन) शब्दांपासून - अपूपांचा (अनारशांचा/पुऱ्यांचा) समूह तो 'आपूपिकं', संकुलिकांचा समूह 'सङ्कुलिकं'. 69. ජනාදීහි තාති ६९. 'जन' इत्यादी शब्दांपासून समूह अर्थी 'ता' प्रत्यय होतो. සමූහත්ථෙ තා. ජනානං සමූහො ජනතා, ගජතා, බන්ධුතා, ගාමතා, සහායතා, නාගරතා. තාන්තා සභාවතො ඉත්ථිලිඞ්ගා. समूह अर्थी 'ता' प्रत्यय होतो. जनांचा समूह तो 'जनता', हत्तींचा समूह 'गजता', बंधूंचा समूह 'बंधुता', गावांचा समूह 'गामता', सहायांचा (मित्रांचा) समूह 'सहायता', नागरिकांचा समूह 'नागरता'. 'ता' प्रत्ययान्त शब्द स्वभावाने स्त्रीलिंगी असतात. මදනීයන්ති කරණෙ+ධිකරණෙ වා අනීයෙන සිද්ධං. ධූමායිතත්තන්තික්තන්තා නාමධාතුතො ත්තෙන සිද්ධං, ධූමො විය ආචරතීති ‘‘කත්තුතා+යො’’ති ආයෙ ‘‘ගමනත්ථාකම්මකාධාරෙ චා’’ති ක්තපච්චයෙ ඌආගමෙ ච කතෙ ධූමායිතස්ස භාවොති ධූමායිතත්තං. 'मदनीयं' हे करण किंवा अधिकरण अर्थी 'अनीय' प्रत्ययाने सिद्ध होते. 'धूमायितत्तं' हे क्तान्त नामधातूपासून 'त्त' प्रत्ययाने सिद्ध होते; धुराप्रमाणे आचरण करतो या अर्थी "कत्तुता+यो" या सूत्राने 'आय' प्रत्यय, "गमनत्थाकम्मकाधारे चा" या सूत्राने 'क्त' प्रत्यय आणि 'ऊ' चा आगम झाल्यावर 'धूमायित' च्या भाव अर्थी 'धूमायितत्तं' (धूर निघण्याची अवस्था) सिद्ध होते. 70. ඉයො හිතෙති ७०. 'हित' (कल्याणकारक) या अर्थी 'इय' प्रत्यय होतो. හිතත්ථෙ [Pg.199] ඉයො. උපාදානානං හිතං උපාදානියං. हित अर्थी 'इय' प्रत्यय होतो. उपादानांसाठी जे हितकारक ते 'उपादानियं'. 71. චක්ඛාදිතො ස්සොති ७१. 'चक्खु' (चक्षू) इत्यादी शब्दांपासून हित अर्थी 'स्स' प्रत्यय होतो. හිතත්ථෙ ස්සො. චක්ඛුනො හිතං චක්ඛුස්සං, ආයුස්සං. हित अर्थी 'स्स' प्रत्यय होतो. चक्षूंसाठी (डोळ्यांसाठी) जे हितकारक ते 'चक्खुस्सं', आयुष्यासाठी जे हितकारक ते 'आयुस्सं'. 72. ණ්යො තත්ථ සාධු ७२. 'तेथे योग्य/कुशल' या अर्थी सप्तम्यन्त शब्दाहून 'ण्यो' प्रत्यय होतो. සත්තම්යන්තා තත්ථ සාධූති අස්මිං අත්ථෙ ණ්යො හොති. සාධූති කුසලො යොග්ගො හිතො වා. සභායං කුසලො සබ්භො, ආකාරලොපො. පරිසායං සාධු පාරිසජ්ජො, ‘‘කොසජ්ජා’’දිනා ජාගමෙ අකාරවුද්ධි. මෙධාය හිතං මෙජ්ඣං ඝතං. පාදානං හිතං පජ්ජං තෙලං. ‘‘අඤ්ඤස්මිං’’ති ණ්යො, රථං වහතීති රච්ඡා. सप्तम्यन्त शब्दाहून 'तेथे योग्य/कुशल' या अर्थी 'ण्यो' प्रत्यय होतो. 'साधू' म्हणजे कुशल, योग्य किंवा हितकारक. सभेत कुशल तो 'सब्भो' (सभ्य), यात 'आ' काराचा लोप होतो. परिषदेत (सभेत) योग्य तो 'पारिसज्जो', "कोसज्जा" इत्यादी सूत्राने 'ज' चा आगम आणि 'अ' काराची वृद्धी होते. मेधेसाठी (बुद्धीसाठी) जे हितकारक ते 'मेज्झं' तूप. पायांसाठी जे हितकारक ते 'पज्जं' तेल. "अञ्ञस्मिं" या सूत्राने 'ण्यो' प्रत्यय होतो, रथ वाहून नेणारा तो 'रच्छा' (रस्ता/रथ्या). 73. කම්මා නිය+ඤ්ඤාති ७३. 'कम्म' (कर्म) शब्दाहून योग्य अर्थी 'निय' आणि 'ञ्ञ' प्रत्यय होतात. කම්මසද්දා සාධ්වත්ථෙ නිය+ඤ්ඤා හොන්ති. කම්මෙ සාධු කම්මනියං කම්මඤ්ඤං. 'कम्म' शब्दाहून योग्य अर्थी 'निय' आणि 'ञ्ञ' प्रत्यय होतात. कर्मासाठी जे योग्य ते 'कमनियं' किंवा 'कम्मञ्ञं' (कर्मण्य/कार्यक्षम). 74. කථාදිත්වි+කොති ७४. 'कथा' इत्यादी शब्दांपासून 'इक' प्रत्यय होतो. ඉකො. කථායං කුසලො කථිකො. ධම්මකථිකො, සඞ්ගාමිකො, පවාසිකො, උපවාසිකො. 'इक' प्रत्यय होतो. कथेत कुशल तो 'कथिको' (कथक/वक्ता). 'धम्मकथिको' (धर्मोपदेशक), 'सङ्गामिको' (युद्धात कुशल), 'पवासिको' (प्रवासात राहणारा), 'उपवासिको' (उपवास करणारा). 75. පථාදීහි ණෙය්යොති ७५. 'पथ' इत्यादी शब्दांपासून 'णेय्य' प्रत्यय होतो. ණෙය්යො. පථෙ හිතං පාථෙය්යං, සපතිස්මිං හිතං සාපතෙය්යං ධනං. පදීපෙය්යං තෙලං. णेय्य (प्रत्यय). मार्गासाठी हितकारक ते 'पाथेय्य' (प्रवासातील शिदोरी), स्वतःच्या मालकीसाठी हितकारक ते 'सापतेय्य' धन (संपत्ती). दिव्यासाठी योग्य ते 'पदीपेय्य' तेल. 76. දක්ඛිණායා+රහෙති ७६. दक्षिणेसाठी (दानाचा स्वीकार करण्यास) पात्र असणे. අරහත්ථෙ [Pg.200] ණෙය්යො. දක්ඛිණං අරහතීති දක්ඛිණෙය්යො. 'पात्र असणे' या अर्थी 'णेय्य' प्रत्यय होतो. जो दक्षिणेस (दानास) पात्र आहे तो 'दक्षिणेय्य' (दक्खिणेय्य). 77. රායො තුමන්තාති ७७. 'रायो तुमन्ता' (हे सूत्र). අරහත්ථෙ තුමන්තා රායො වා. ඝාතෙතුං අරහතීති ඝාතෙතායං, ‘‘රානුබන්ධෙ+න්තසරාදිස්සා’’ති උංලොපො. ජාපෙතායං, පබ්බාජෙතායං. වාති කිං, ඝාතෙතුං. (සංකිණ්ණතද්ධිතං). 'पात्र असणे' या अर्थी 'तुमुन्' प्रत्ययान्तापुढे 'राय' (किंवा आय) प्रत्यय होतो. मारण्यास पात्र तो 'घातेताय', “रानूबन्धेन्तसरादिस्सा” या सूत्राने 'उं' चा लोप होतो. 'जापेताय' (पराजित करण्यास पात्र), 'पब्बाजेताय' (प्रव्रजित करण्यास/हद्दपार करण्यास पात्र). 'वा' (पर्यायी) कशासाठी? 'घातेतुं' (हे रूप देखील होण्यासाठी). (संकीर्णतद्धित). 78. ත+මෙත්ථ+ස්ස+ත්ථීති මන්තු ७८. “ते येथे आहे” किंवा “ते याचे आहे” या अर्थी 'मन्तु' प्रत्यय होतो. පඨමන්තා එත්ථ අස්ස අත්ථීති එතෙස්ව+ත්ථෙසු මන්තු හොති. ගාවො එත්ථ දෙසෙ අස්ස වා පුරිසස්ස සන්තීති ගොමා, ගොමන්තො ඉච්චාදි ගුණවන්තුසමං. प्रथमान्त शब्दाहून “येथे आहे” किंवा “याचे आहे” या अर्थांमध्ये 'मन्तु' प्रत्यय होतो. गायी या देशात आहेत किंवा या माणसाच्या आहेत म्हणून तो 'गोमा' (किंवा 'गोमन्तो' इत्यादी, जे 'गुणवन्तु' प्रमाणे चालतात). අත්ථීති වත්තමානකාලොපාදානතො භූතාහි භවිස්සන්තීහි වා ගොහි න ගොමා. කථං ගොමා ආසි, ගොමා භවිස්සතීති. තදාපි වත්තමානාහියෙව ගොහි ගොමා, ආසි භවිස්සතීති පදන්තරා කාලන්තරං. ඉතිසද්දතො විසයනියමො. වුත්තඤ්හි – 'अत्थि' (आहे) या वर्तमानकाळाच्या निर्देशामुळे भूतकाळातील किंवा भविष्यकाळातील गायींमुळे कोणी 'गोमा' (गायींचा मालक) ठरत नाही. मग “तो गोमा होता” (गोमा आसि) किंवा “तो गोमा होईल” (गोमा भविस्सति) असे कसे म्हटले जाते? तेव्हाही त्या त्या काळातील वर्तमान गायींमुळेच तो 'गोमा' असतो, आणि 'आसि' किंवा 'भविस्सति' या इतर पदांमुळे काळाचा बदल दर्शवला जातो. 'इति' या शब्दावरून विषयाचा नियम ठरतो. कारण असे म्हटले आहे – පහූතෙ ච පසංසායං, නින්දායඤ්චා+තිසායනෙ; නිච්චයොගෙ ච සංසග්ගෙ, හොන්ති+මෙ මන්තුආදයොති. “प्रचुरता (पुष्कळ असणे), प्रशंसा, निंदा, अतिशयता, नित्ययोग (नेहमीचा संबंध) आणि संसर्ग (संपर्क) या अर्थांमध्ये हे 'मन्तु' इत्यादी प्रत्यय होतात.” 134. ආයුස්සා+යස මන්තුම්හි १३४. 'मन्तु' प्रत्यय असताना 'आयुस्' शब्दाचा 'आयस' असा आदेश होतो. මන්තුම්හි ආයුස්ස ආයසාදෙසො හොති. ආයු අස්ස අත්ථීති ආයස්මා. ගො අස්සොති ජාතිසද්දානං දබ්බාභිධාන- සාමත්ථියා [Pg.201] මන්ත්වාදයො න හොන්ති, තථා ගුණසද්දානං සෙතො පටොති. යෙසං තු ගුණසද්දානං දබ්බාභිධානසාමත්ථියං නත්ථි, තෙහි හොන්තෙව, බුද්ධි අස්ස අත්ථීති බුද්ධිමා. ‘‘වන්ත්ව+වණ්ණා’’ති වන්තුම්හි රූපවා රසවා ගන්ධවා සද්දවා. ‘‘දණ්ඩාදිත්වි+කඊ වා’’ති ඉක+ඊ, රසී රසිකො, රූපී රූපිකො, ගන්ධී ගන්ධිකොති. 'मन्तु' प्रत्यय असताना 'आयुस्' शब्दाचा 'आयस' असा आदेश होतो. आयुष्य आहे ज्याचे तो 'आयुष्मान' (आयस्मा). 'गो' (गाय) इत्यादी जातीवाचक शब्दांना द्रव्याचे अभिधान करण्याचे सामर्थ्य असल्यामुळे 'मन्तु' इत्यादी प्रत्यय होत नाहीत; तसेच 'सेतो पटो' (पांढरे वस्त्र) यांसारख्या गुणवाचक शब्दांनाही होत नाहीत. परंतु ज्या गुणवाचक शब्दांमध्ये द्रव्याचे अभिधान करण्याचे सामर्थ्य नसते, त्यांच्यापुढे हे प्रत्यय होतातच; जसे की, बुद्धी आहे ज्याची तो 'बुद्धिमान' (बुद्धिमा). “वन्त्ववण्णा” या सूत्राने 'अ' किंवा 'आ' कारान्त शब्दांपुढे 'वन्तु' प्रत्यय होऊन 'रूपवा', 'रसवा', 'गन्धवा', 'सद्दवा' अशी रूपे होतात. “दण्डादित्विकई वा” या सूत्राने 'इक' आणि 'ई' प्रत्यय होऊन 'रसी', 'रसिको'; 'रूपी', 'रूपिको'; 'गन्धी', 'गन्धिको' अशी रूपे होतात. 79. වන්ත්ව+වණ්ණාති ७९. 'वन्त्ववण्णा' (हे सूत्र). වන්තු. පසත්ථං සීල+මස්ස අත්ථීති සීලවා. පහුතා පසත්ථා වා පඤ්ඤා අස්ස අත්ථීති පඤ්ඤවා. 'वन्तु' प्रत्यय. प्रशंसनीय शील आहे ज्याचे तो 'शीलवान' (सीलवा). प्रचुर किंवा प्रशंसनीय प्रज्ञा आहे ज्याची तो 'प्रज्ञावान' (पञ्ञवा). 80. දණ්ඩාදිත්වි+ක+ඊ වාති ८०. 'दण्डादित्विकई वा' (हे सूत्र). ඉක+ඊ හොන්ති වා මන්තත්ථෙ. බහුලංවිධානා කුතොචිසද්දතො ද්වෙ හොන්ති, කුතො චෙ+කමෙකංව. නිච්චයුත්තො දණ්ඩො අස්ස අත්ථීති දණ්ඩිකො දණ්ඩී. ගන්ධිකො ගන්ධී. වාත්වෙව, දණ්ඩවා. 'मन्तु' च्या अर्थी 'इक' आणि 'ई' हे प्रत्यय पर्यायाने होतात. 'बहुलं' विधानामुळे काही शब्दांपासून दोन्ही प्रत्यय होतात, तर काहींपासून एकच होतो. नेहमी दंड धारण करणारा तो 'दण्डिको' किंवा 'दण्डी'. 'गन्धिको' किंवा 'गन्धी'. 'वा' (पर्यायी) असल्यामुळेच 'दण्डवा' हे रूप देखील होते. ‘‘උත්තමිණෙව ධනා ඉකො’’ති ගණසුත්තෙන ඉකො ධනිකො. අඤ්ඤො ධනී ධනවා. “उत्तमिणेव धना इको” या गणसूत्राने 'धन' शब्दापासून केवळ धनको (कर्ज देणारा/ऋणको) या अर्थी 'इक' प्रत्यय होऊन 'धनिको' हे रूप बनते. इतर अर्थांमध्ये 'धनी' किंवा 'धनवा' (धनवान) अशी रूपे होतात. ‘‘අසන්නිහිතෙ අත්ථා’’ අසන්නිහිතො අත්ථො අස්ස අත්ථීති අත්ථිකො අත්ථී. සන්නිහිතෙ අත්ථවා. ‘‘තදන්තා ච’’ පුඤ්ඤත්ථො අස්ස අත්ථීති පුඤ්ඤත්ථිකො පුඤ්ඤත්ථී. “असन्निहिते अत्था” या सूत्राने संपत्ती किंवा प्रयोजन जवळ नसताना 'अत्थ' शब्दापासून 'इक' आणि 'ई' प्रत्यय होऊन 'अत्थिको' किंवा 'अत्थी' (गरजू/इच्छुक) अशी रूपे होतात. संपत्ती जवळ असताना 'अत्थवा' (धनवान) असे रूप होते. “तदन्ता च” या सूत्राने, पुण्याचा हेतू आहे ज्याचा तो 'पुञ्ञत्थिको' किंवा 'पुञ्ञत्थी' (पुण्याची इच्छा करणारा). ‘‘වණ්ණන්තා ඊයෙව’’. බ්රහ්මවණ්ණං අස්ස අත්ථීති බ්රහ්මවණ්ණී, දෙවවණ්ණී. “वण्णन्ता ईयेव” या सूत्राने 'वण्ण' (वर्ण) शेवटी असणाऱ्या शब्दांपुढे केवळ 'ई' प्रत्यय होतो. ब्रह्मवर्ण (श्रेष्ठ वर्ण) आहे ज्याचा तो 'ब्रह्मवण्णी', devavaṇṇī (देववर्ण आहे ज्याचा तो 'देववण्णी'). ‘‘හත්ථදන්තෙහි [Pg.202] ජාතියං’’. හත්ථ+මස්ස අත්ථීති හත්ථී, දන්තී. අඤ්ඤත්ර හත්ථවා දන්තවා. “हत्थदन्तेहि जातियं” या सूत्राने जातीवाचक (प्राणी) अर्थी 'हत्थ' (हस्त) आणि 'दन्त' शब्दांपुढे 'ई' प्रत्यय होऊन 'हत्थी' (हत्ती) आणि 'दन्ती' (सुळा असलेला हत्ती) अशी रूपे होतात. इतर अर्थांमध्ये 'हत्थवा' (हात असलेला) आणि 'दन्तवा' (दात असलेला) अशी रूपे होतात. ‘‘වණ්ණතො බ්රහ්මචාරිම්හි’’. වණ්ණො අස්ස අත්ථීති වණ්ණිකො බ්රහ්මචාරී. “वण्णतो ब्रह्मचारिम्हि” या सूत्राने ब्रह्मचारी अर्थी 'वण्ण' शब्दापुढे 'इक' प्रत्यय होऊन 'वण्णिको ब्रह्मचारी' असे रूप होते. ‘‘පොක්ඛරාදිතො දෙසෙ’’. පොක්ඛරං ජලං පදුමං වා අස්ස අත්ථීති පොක්ඛරී, ‘‘යුවණ්ණෙහි නී’’ති නීම්හි ‘‘ඝරණ්යාදයො’’ති ඊස්ස අත්තං, නස්ස ණො ච, පොක්ඛරණී, උප්පලිනී, කුමුදිනී, භිසිනී, මුලාලිනී, සාලුකිනී. “पोक्खरादितो देसे” या सूत्राने स्थान/प्रदेश या अर्थी 'पोक्खर' इत्यादी शब्दांपुढे 'ई' प्रत्यय होतो. 'पोक्खर' (पाणी किंवा कमळ) आहे ज्यामध्ये तो 'पोक्खरी'. “युवण्णेहि नी” या सूत्राने स्त्रीलिंगी 'नी' प्रत्यय लागल्यावर, “घरण्यादयो” या सूत्राने 'ई' चा 'अ' होतो आणि 'न' चा 'ण' होऊन 'पोक्खरणी' (कमळतळे), 'उप्पलिनी', 'कुमुदिनी', 'भिसिनी', 'मुलालिनी', 'सालुकिनी' अशी रूपे होतात. ‘‘ක්වචා+දෙසෙපි’’. පදුම+මස්ස අත්ථීති පදුමී පදුමිනී පදුමිනීපණ්ණං. දෙසතො+ඤ්ඤත්ර පොක්ඛරවා හත්ථී. “क्वचादेसेपि” या सूत्राने कधीकधी स्थान नसलेल्या अर्थी देखील हे प्रत्यय होतात; जसे की, 'पदुम' (कमळ) आहे ज्यामध्ये ती 'पदुमी', 'पदुमिनी', 'पदुमिनीपण्णं' (कमळाचे पान). स्थानाव्यतिरिक्त इतर अर्थी 'पोक्खरवा हत्थी' (ठिपके असलेला हत्ती) असे रूप होते. ‘‘නාවායි+කො’’ නාවිකො. සිඛී, බාලී, සීලී, බලී. “नावायिको” या सूत्राने 'नावा' शब्दापुढे 'इक' प्रत्यय होऊन 'नाविको' (नावाडी) असे रूप होते. तसेच 'सिखी' (शिखा असलेला/अग्नी), 'बाली' (केस किंवा शेपूट असलेला), 'सीली' (शीलवान), 'बली' (बलवान). ‘‘සුඛදුක්ඛා ඊ’’. සුඛී දුක්ඛී. ‘‘බලා බාහූරුපුබ්බා ච’’. බාහුබලී, ඌරුබලී. “सुखदुक्खा ई” या सूत्राने 'सुख' आणि 'दुक्ख' शब्दांपुढे 'ई' प्रत्यय होऊन 'सुखी', 'दुक्खी' अशी रूपे होतात. “बला बाहूरुपुब्बा च” या सूत्राने 'बाहु' किंवा 'ऊरु' पूर्वपद असलेल्या 'बल' शब्दापुढे 'ई' प्रत्यय होऊन 'बाहुबली' (बाहूंचे बल असलेला), 'ऊरुबली' (मांड्यांचे बल असलेला) अशी रूपे होतात. 81. තපාදීහි ස්සීති ८१. 'तपादीहि स्सी' (हे सूत्र). ස්සී. තපො අස්ස අත්ථීති තපස්සී, යසස්සී, තෙජස්සී, මනස්සී, පයස්සී. වාත්වෙව, යසවා. 'स्सी' प्रत्यय. तप आहे ज्याचे तो 'तपस्वी' (तपस्सी), 'यसस्सी' (यशस्वी), 'तेजस्सी' (तेजस्वी), 'मनस्सी' (मनस्वी), 'पयस्सी' (दूध असलेला). 'वा' (पर्यायी) असल्यामुळेच 'यसवा' (यशस्वी) हे रूप देखील होते. 82. මුඛාදිතො රොති ८२. 'मुखादितो रो' (हे सूत्र). රො. නින්දිතං මුඛ+මස්ස අත්ථීති මුඛරො. සුසි=ඡිද්දං අස්ස අත්ථීති සුසිරො. ඌසො=ඛාරමත්තිකා අස්මිං අත්ථීති ඌසරො[Pg.203]. මධුරො ගුළො, මධුරා සක්ඛරා, මධුරං ඛීරං. ඛං=ගීවාය විවරං අස්ස අත්ථීති ඛරො ගද්රභො. කුඤ්ජො=හනු අස්ස අත්ථීති කුඤ්ජරො. නගරො. 'र' प्रत्यय. निंद्य (वाईट) तोंड आहे ज्याचे तो 'मुखरो' (वाचाळ). 'सुसि' म्हणजे छिद्र, छिद्र आहे ज्याला ते 'सुसिरो' (पोकळ). 'ऊस' म्हणजे खारट माती, ती ज्या जमिनीत आहे ती 'ऊसरो' (खारट/नापीक जमीन). 'मधुरो गुळो' (गोड गूळ), 'मधुरा सक्खरा' (गोड साखर), 'मधुरं खीरं' (गोड दूध). 'खं' म्हणजे मानेची पोकळी आहे ज्याला तो 'खरो' (गाढव). 'कुञ्जो' म्हणजे हनुवटी आहे ज्याला तो 'कुञ्जरो' (हत्ती). 'नगरो' (नगर). ‘‘දන්තස්ස ච උන්නතදන්තෙ’’ති ගණසුත්තෙන දන්තස්ස උ ච, උන්නතං දන්ත+මස්ස අත්ථීති දන්තුරො. “दन्तस्स च उन्नतदन्ते” या गणसूत्राने 'दन्त' शब्दाच्या जागी 'उ' होतो आणि 'र' प्रत्यय लागून, पुढे आलेले (उंच) दात आहेत ज्याचे तो 'दन्तुरो' (दंतूर) असे रूप बनते. 83. තුට්ඨ්යාදීහි භොති ८३. 'तुट्ठ्यादीहि भो' (हे सूत्र). භො වා. තුට්ඨි අස්ස අත්ථීති තුට්ඨිභො, සාලිභො, වාලිභො. 'भ' प्रत्यय पर्यायाने होतो. तुष्टी (संतोष) आहे ज्याची तो 'तुट्ठिभो', 'सालिभो', 'वालिभो'. 84. සද්ධාදිත්ව ८४. 'सद्धादित्व' (हे सूत्र). ඉති වා අ හොති. අතිසයා සද්ධා අස්ස අත්ථීති සද්ධො, පඤ්ඤො, පඤ්ඤවා, සද්ධා කඤ්ඤා, සද්ධං කුලං. या सूत्राने पर्यायाने 'अ' प्रत्यय होतो. अतिशय श्रद्धा आहे ज्याची तो 'सद्धो' (श्रद्धाळू), 'पञ्ञो' (प्रज्ञावान), 'पञ्ञवा' (प्रज्ञावान); स्त्रीलिंगात 'सद्धा कञ्ञा' (श्रद्धाळू कन्या), नपुंसकलिंगात 'सद्धं कुलं' (श्रद्धाळू कुल). 85. ණො තපාති ८५. 'णो तपा' (हे सूत्र). ණො, තාපසො, සකාගමො. තාපසී. 'ण' प्रत्यय होऊन, 'स' च्या आगमासह 'तापसो' (तपस्वी) हे रूप बनते. स्त्रीलिंगात 'तापसी'. 86. ආල්ව+භිජ්ඣාදීහිති ८६. 'आल्वभिज्झादीहि' (हे सूत्र). ආලු වා. අභිජ්ඣා අස්ස අත්ථීති අභිජ්ඣාලු, සීතාලු, ධජාලු, දයාලු, දයාවා. අභිජ්ඣාලු එව අභිජ්ඣාලුකො. 'आलु' प्रत्यय पर्यायाने होतो. अभिध्या (लोभ) आहे ज्याची तो 'अभिज्झालु' (लोभी), 'सीतालु' (थंडी वाजणारा), 'धजालु' (ध्वज असलेला), 'दयालु' (दयाळू), 'दयावा' (दयाळू). 'अभिज्झालु' म्हणजेच 'अभिज्झालुको'. 87. පිච්ඡාදිත්වි+ලොති ८७. 'पिच्छादित्विलो' (हे सूत्र). ඉලො වා. පිච්ඡ+මස්ස අත්ථීති පිච්ඡිලො, පිච්ඡවා. ඵෙණිලො, ජටිලො, තුණ්ඩිලො. නින්දිතා වාචා අස්ස අත්ථීති වාචාලොති පරස්සරලොපො. 'इल' प्रत्यय पर्यायाने होतो. पिच्छ (पिसे/चिखल) आहे ज्याला तो 'पिच्छिलो', 'पिच्छवा'. 'फेणिलो' (फेसाळलेला), 'जटिलो' (जटा असलेला), 'तुण्डिलो' (तोंड किंवा पोट पुढे आलेला). निंद्य (वाईट) वाणी आहे ज्याची तो 'वाचालो' (वाचाळ), येथे परस्वराचा लोप होतो. 88. සීලාදිතො වොති ८८. 'सीलादितो वो' (हे सूत्र). වො [Pg.204] හොති වා. සීලවො, සීලවා. කෙසවො, කෙසවා. 'वो' (हा प्रत्यय) विकल्पाने होतो. सीलवो, सीलवा. केसवो, केसवा. ‘‘අණ්ණා නිච්චං’’ අණ්ණවො. ‘‘ගණ්ඩීරාජීහි සඤ්ඤායං’’ ගණ්ඩී=මෙණ්ඩසිඞ්ගං අස්ස අත්ථීති ගණ්ඩීවං ධනු, රාජීවං පඞ්කජං. "अण्णा निच्चं" या सूत्राने 'अण्णवो' (समुद्र) रूप सिद्ध होते. "गण्डीराजीहि सञ्ञायं" या सूत्राने, गण्डी = मेंढ्याचे शिंग ज्याला आहे ते 'गण्डीवं' (धनुष्य), आणि 'राजीवं' म्हणजे कमळ (ज्याला रेषा आहेत). 89. මායා මෙධාහි වීති ८९. 'माया' आणि 'मेधा' या शब्दांनंतर 'वी' (हा प्रत्यय होतो). වී. මායාවී, මෙධාවී පුමා. නීම්හි මෙධාවිනී. මෙධාවී කුලං, ‘‘එකවචනයොස්ව+ඝොනං’’ති සිම්හි රස්සො. එවං මායාවී. 'वी' प्रत्यय लागून पुल्लिंगात 'मायावी', 'मेधावी' अशी रूपे होतात. स्त्रीलिंगात 'नी' प्रत्यय लागून 'मेधाविनी' होते. नपुंसकलिंगात 'मेधावी कुलम्' होते, आणि "एकवचनयोस्व+घोनं" या सूत्राने 'सि' प्रत्यय असताना र्हस्व होतो. याचप्रमाणे 'मायावी' चे रूप होते. 90. සි+ස්සරෙ ආම්යු+වාමී ९०. स्वामित्व (ईश्वरत्व) अर्थी 'स' शब्दाहून 'आमी' आणि 'उवामी' हे प्रत्यय होतात. ඉස්සරෙ+භිධෙය්යෙ සසද්දා ආමී+උවාමී හොන්ති මන්ත්වත්ථෙ. සං=ආයත්තං අස්ස අත්ථීති සාමී සුවාමී. සුවාමිනී කඤ්ඤා. स्वामित्व (ईश्वरत्व) अर्थ व्यक्त करायचा असताना, 'स' शब्दाहून 'मन्तु' (मालकी) अर्थी 'आमी' आणि 'उवामी' हे प्रत्यय होतात. 'सं' म्हणजे स्वाधीन किंवा ज्याच्या अधीन आहे तो 'सामी' (स्वामी) किंवा 'सुवामी' (सुस्वामी) होय. स्त्रीलिंगात 'सुवामिनी कञ्ञा' असे रूप होते. 91. ලක්ඛ්යා ණො අ ච ९१. 'लक्खी' (लक्ष्मी) शब्दाहून 'मन्तु' अर्थी 'णो' प्रत्यय होतो आणि अंत्य स्वराच्या जागी 'अ' होतो. ලක්ඛීසද්දා ණො හොති මන්ත්වත්ථෙ අ ච+න්තස්ස. ලක්ඛී අස්ස අත්ථීති ලක්ඛණො. 'लक्खी' शब्दाहून 'मन्तु' अर्थी 'णो' प्रत्यय होतो आणि अंत्य स्वराच्या जागी 'अ' होतो. 'लक्खी' (लक्ष्मी किंवा शुभ लक्षणे) ज्याच्याजवळ आहेत तो 'लक्खणो' (लक्षणवान) होय. 92. අඞ්ගා නො කල්යාණෙති ९२. कल्याण (सुंदर) हा अर्थ विवक्षित असताना 'अङ्ग' शब्दाहून 'नो' प्रत्यय होतो. අඞ්ගස්මා නො හොති. කල්යාණානි සොභණානි අඞ්ගානි අස්සා අත්ථීති අඞ්ගනා. 'अङ्ग' शब्दाहून 'नो' प्रत्यय होतो. कल्याणकारी म्हणजे सुंदर अवयव (अंगे) जिचे आहेत ती 'अङ्गना' (स्त्री) होय. 93. සො ලොමාති ९३. 'लोम' शब्दाहून 'सो' प्रत्यय होतो. ලොමා [Pg.205] සො, පහූතා ලොමා අස්ස අත්ථීති ලොමසො, ලොමසා කඤ්ඤා. 'लोम' शब्दाहून 'सो' प्रत्यय होतो. पुष्कळ केस (लोम) ज्याला आहेत तो 'लोमसो' (लोमश/केसाळ) आणि स्त्रीलिंगात 'लोमसा कञ्ञा' (केसाळ कन्या) असे रूप होते. 94. ඉමි+යාති ९४. 'इम' आणि 'इय' हे प्रत्यय होतात. ඉම+ඉයා හොන්ති, පුත්තො අස්ස අත්ථීති පුත්තිමො, කිත්තිමො, පුත්තියො, කප්පියො, ජටියො, හානභාගියො, සෙනියො. (අත්ථ්යත්ථතද්ධිතං). 'इम' आणि 'इय' हे प्रत्यय होतात. पुत्र ज्याला आहे तो 'पुत्तिमो', कीर्ती ज्याला आहे तो 'कित्तिमो', तसेच 'पुत्तियो', 'कप्पियो' (कल्पिय), 'जटियो' (जटाधारी), 'हानभागियो' (हानीला कारणीभूत ठरणारा), 'सेनियो' (सैन्याचा स्वामी). (हे 'अत्थ्यत्थ-तद्धित' प्रत्यय आहेत). 95. තො පඤ්චම්යා ९५. पंचमी विभक्तीच्या अर्थी शब्दाहून 'तो' हा प्रत्यय बहुधा (विकल्पाने) होतो. පඤ්චම්යන්තා බහුලං තො හොති වා. තොආදිපච්චයන්තා නිප්ඵන්නනිපාතා, තෙහි පරාසං විභත්තීනං ‘‘අසංඛ්යෙහි සබ්බාසං’’ති ලොපොව. ගාමතො ආගච්ඡතීති ගාමස්මා ආගච්ඡති, චොරතො භායතීති චොරෙහි භායති, සත්ථතො පරිහීනො සත්ථා පරිහීනො. එවං පුරිසතො, රාජතො, අග්ගිතො, හත්ථිතො, හෙතුතො, යුත්තිතො, ඉත්ථිතො, භික්ඛුනිතො, යාගුතො, ජම්බුතො, චිත්තතො, ආයුතො. සබ්බාදිතො-සබ්බතො, යතො, තතො ඉච්චාදි. पंचम्यन्त शब्दांहून 'तो' प्रत्यय बहुधा विकल्पाने होतो. 'तो' इत्यादी प्रत्यय लागून बनलेले शब्द हे निपात (अव्यय) असतात, त्यामुळे त्यांच्यापुढील विभक्ती प्रत्ययांचा "असंख्येहि सब्बासं" या सूत्राने लोपच होतो. 'गामतो आगच्छति' म्हणजे 'गामस्मा आगच्छति' (गावाकडून येतो), 'चोरतो भायति' म्हणजे 'चोरेहि भायति' (चोरांपासून भितो), 'सत्थतो परिहीनो' म्हणजे 'सत्था परिहीनो' (सार्थापासून किंवा शास्त्यापासून वंचित झालेला). याचप्रमाणे पुरिसतो, राजतो, अग्गितो, हत्थितो, हेतुतो, युत्तितो, इत्थितो, भिक्खुनितो, यागुतो, जम्बुतो, चित्ततो, आयुतो ही रूपे होतात. सर्वादी (सर्व इत्यादी) शब्दांपासून - सब्बतो, यतो, tato इत्यादी रूपे बनतात. 96. ඉතො+තෙ+ත්තො කුතො ९६. 'इतो', 'अतो', 'एत्तो' आणि 'कुतो' ही रूपे सिद्ध होतात. තොම්හි ඉමස්ස ටි නිපච්චතෙ එතස්ස ට+එට කිං සද්දස්ස කුත්තඤ්ච. ඉතො ඉමස්මා, අතො එත්තො එතස්මා, කුතො කස්මා. 'तो' प्रत्यय असताना 'इम' च्या जागी 'इ' (टि-लोप होऊन) निपातित होतो, 'एत' च्या जागी 'अ' आणि 'एत' होतो, आणि 'किं' शब्दाच्या जागी 'कु' होतो. 'इतो' म्हणजे 'इमस्मा' (यापासून), 'अतो' किंवा 'एत्तो' म्हणजे 'एतस्मा' (त्यापासून), 'कुतो' म्हणजे 'कस्मा' (कशापासून/कोठून). 97. අභ්යාදීහිති ९७. 'अभि' इत्यादी अव्ययांहून ('तो' प्रत्यय होतो). තො. අභිතො, පරිතො, පච්ඡතො, හෙට්ඨතො. 'तो' प्रत्यय लागून - अभितो (समोर/जवळ), परितो (भोवताली), पच्छतो (मागून), हेट्ठतो (खालून) ही रूपे होतात. 98. ආද්යාදීහිති ९८. सप्तम्यन्त 'आदि' इत्यादी शब्दांहून 'तो' प्रत्यय होतो. සත්තම්යන්තෙහි [Pg.206] තො හොති. ආදො ආදිතො, මජ්ඣතො, අන්තතො, පිට්ඨිතො, පස්සතො, මුඛතො. පඨමන්තා යතො+දකං ත+දාදිත්තං, යං උදකං, තදෙවා+දිත්තන්ති අත්ථො. सप्तम्यन्त शब्दांहून 'तो' प्रत्यय होतो. 'आदो' पासून 'आदितो' (सुरुवातीला/सुरुवातीपासून), मज्झतो (मध्यावर), अन्ततो (शेवटी), पिट्ठितो (पाठीमागे), पस्सतो (बाजूला), मुखतो (मुखातून/समोर). प्रथमान्त शब्दापासून 'यतोदकं' (यतो + उदकं) आणि 'तदादित्तं' (तद् + आदित्तं) म्हणजे 'यं उदकं, तदेवाऽदित्तं' (जे पाणी आहे, तेच पेटलेले आहे) असा अर्थ होतो. 99. සබ්බාදිතො සත්තම්යා ත්ර+ත්ථා ९९. सप्तम्यन्त 'सर्वादी' (सर्व इत्यादी) शब्दांहून 'त्र' आणि 'त्थ' हे प्रत्यय विकल्पाने होतात. සබ්බාදීහි සත්තම්යන්තෙහි ත්ර+ත්ථා වා හොන්ති. සබ්බත්ර සබ්බත්ථ සබ්බස්මිං, යත්ර යත්ථ, තත්ර තත්ථ ඉච්චාදි. බහුලාධිකාරා න තුම්හඅම්හෙහි. सप्तम्यन्त 'सर्वादी' शब्दांहून 'त्र' आणि 'त्थ' हे प्रत्यय विकल्पाने होतात. 'सब्बत्र', 'सब्बत्थ' म्हणजे 'सब्बस्मिं' (सर्व ठिकाणी/सगळीकडे), 'यत्र', 'यत्थ' (ज्या ठिकाणी), 'तत्र', 'तत्थ' (त्या ठिकाणी) इत्यादी. 'बहुलाधिकारा'मुळे (नियम बहुधा लागू होत असल्यामुळे) 'तुम्ह' (तू) आणि 'अम्ह' (मी) या शब्दांहून हे प्रत्यय होत नाहीत. 100. කත්ථෙ+ත්ථ+කුත්රා+ත්ර ක්වෙ+හි+ධ १००. 'कत्थ', 'एत्थ', 'कुत्र', 'अत्र', 'क्व', 'इह' आणि 'इध' ही रूपे सिद्ध होतात. එතෙහි ‘‘සබ්බාදිතො’’තිආදිනා ත්ර+ත්ථා. සෙසාදෙසා ච පච්චයා ච ඉමිනාව නිපච්චන්තෙ. ඉමිනා කිස්ස ක+කු ච, එතස්ස ටෙ+ටා ච, වපච්චයෙ කිස්ස ඉලොපො ච, හ+ධපච්චයෙසු ඉමස්ස ටි ච නිපච්චතෙ. කස්මිං කත්ථ කුත්ර ක්ව, එතස්මිං එත්ථ අත්ර, ඉමස්මිං ඉහ ඉධ. "सब्बादितो" इत्यादी सूत्राने यांच्याहून 'त्र' आणि 'त्थ' प्रत्यय होतात. उर्वरित आदेश आणि प्रत्यय याच सूत्राने निपातित होतात. या सूत्राने 'किं' च्या जागी 'क' आणि 'कु' होतो; 'एत' च्या जागी 'ए' आणि 'अ' होतो; 'व' प्रत्यय असताना 'किं' मधील 'इ' चा लोप होतो; आणि 'ह' व 'ध' प्रत्यय असताना 'इम' च्या जागी 'इ' (टि-लोप होऊन) निपातित होतो. 'कस्मिं' च्या जागी 'कत्थ', 'कुत्र', 'क्व' (कोठे); 'एतस्मिं' च्या जागी 'एत्थ', 'अत्र' (येथे/तेथे); 'इमस्मिं' च्या जागी 'इह', 'इध' (येथे) अशी रूपे होतात. 101. ධි සබ්බා වාති १०१. 'सब्ब' शब्दाहून 'धि' प्रत्यय विकल्पाने होतो. සබ්බස්මා ධි වා. සබ්බස්මිං සබ්බධි සබ්බත්ර. 'सब्ब' शब्दाहून 'धि' प्रत्यय विकल्पाने होतो. 'सब्बस्मिं' च्या जागी 'सब्बधि' आणि 'सब्बत्र' [सर्व ठिकाणी] अशी रूपे होतात. 102. යා හින්ති १०२. 'य' शब्दाहून 'हिं' प्रत्यय होतो. යසද්දා හිං, යස්මිං යහිං යත්ර. 'य' शब्दाहून 'हिं' प्रत्यय होतो. 'यस्मिं' च्या जागी 'यहिं' आणि 'यत्र' [ज्या ठिकाणी] अशी रूपे होतात. 103. තා හඤ්චති १०३. 'त' शब्दाहून 'हं' आणि 'हिं' हे प्रत्यय होतात. තසද්දා හං හොති හිඤ්ච. තහං තහිං තත්ර. 'त' शब्दाहून 'हं' आणि 'हिं' हे प्रत्यय होतात. 'तहं', 'तहिं' आणि 'तत्र' [त्या ठिकाणी] अशी रूपे होतात. 104. කුහිං කහන්ති १०४. 'कुहिं' आणि 'कहं' ही रूपे सिद्ध होतात. හිං [Pg.207] හං නිපච්චන්තෙ කිස්ස කු+කා ච. කුහිං කහං. කුහිඤ්චනංති නිපාතන්තරං. 'हिं' आणि 'हं' प्रत्यय असताना 'किं' च्या जागी 'कु' आणि 'क' हे आदेश निपातित होतात. 'कुहिं', 'कहं' [कोठे]. 'कुहिञ्चनं' हे दुसरे निपात रूप आहे. 105. සබ්බෙ+ක+ඤ්ඤ+ය+තෙහි කාලෙ දා १०५. 'सब्ब' (सर्व), 'एक', 'अञ्ञ' (अन्य), 'य' आणि 'त' या शब्दांनंतर काळ (वेळ) दर्शवण्यासाठी 'दा' प्रत्यय विकल्पाने होतो. එතෙහි කාලෙ දා හොති වා. සබ්බස්මිං කාලෙ සබ්බදා, එකදා, අඤ්ඤදා, යදා, තදා. या शब्दांनंतर काळ दर्शवण्यासाठी 'दा' प्रत्यय विकल्पाने होतो. 'सब्बस्मिं काले' च्या जागी 'सब्बदा' (नेहमी/सर्वदा), 'एकदा', 'अञ्ञदा' (इतर वेळी), 'यदा' (जेव्हा), 'तदा' (तेव्हा) अशी रूपे होतात. 106. කදා කුදා සදා+ධුනෙ+දානි १०६. 'कदा', 'कुदा', 'सदा', 'अधुना' आणि 'इदानि' ही रूपे सिद्ध होतात. එතෙ සද්දා නිපච්චන්තෙ. කස්මිංකාලෙ කදා කුදා, සබ්බස්මිං කාලෙ සදා, ඉමස්මිං කාලෙ අධුනා ඉදානි. हे शब्द निपातनाने सिद्ध होतात. 'कस्मिं काले' च्या जागी 'कदा', 'कुदा' [केव्हा]; 'सब्बस्मिं काले' च्या जागी 'सदा' [नेहमी]; 'इमस्मिं काले' च्या जागी 'अधुना', 'इदानि' [आता/या वेळी] अशी रूपे होतात. 107. අජ්ජ සජ්ජ්ව+පරජ්ජ්වෙ+තරහි කරහා १०७. 'अज्ज', 'सज्जु', 'अपरज्जु', 'एतरहि' आणि 'करह' ही रूपे सिद्ध होतात. පකති පච්චයො ආදෙසො කාලවිසෙසොති සබ්බ+මෙතං නිපාතනා ලබ්භති. ඉමස්ස ටො ජ්ජො චා+හනි නිපච්චන්තෙ, අස්මිං අහනි අජ්ජ. සමානස්ස ස-භාවො ජ්ජු චා+හනි. සමානෙ අහනි සජ්ජු. අපරස්මා ජ්ජු, අපරස්මිං අහනි අපරජ්ජු. ඉමස්ස එතො, කාලෙ රහි ච, ඉමස්මිංකාලෙ එතරහි. කිං සද්දස්ස කො, රහ චා+නජ්ජතනෙ. කස්මිං කාලෙ කරහ. प्रकृती (मूळ शब्द), प्रत्यय, आदेश आणि विशिष्ट काळ हे सर्व निपातनाने प्राप्त होते. 'अहनि' (दिवस) हा अर्थ विवक्षित असताना 'इम' च्या जागी 'अ' आणि 'ज्ज' आदेश निपातित होतो, म्हणून 'अस्मिं अहनि' (या दिवशी) चे 'अज्ज' (आज) होते. 'समान' शब्दाच्या जागी 'स' भाव आणि 'अहनि' अर्थी 'ज्जु' प्रत्यय होऊन 'समाने अहनि' चे 'सज्जु' (त्याच दिवशी/त्वरित) होते. 'अपर' शब्दाहून 'ज्जु' प्रत्यय लागून 'अपरस्मिं अहनि' चे 'अपरज्जु' (दुसर्या दिवशी) होते. 'इम' च्या जागी 'एत' आणि काळ अर्थी 'रहि' प्रत्यय लागून 'इमस्मिं काले' चे 'एतरहि' (या वेळी/सध्या) होते. 'किं' शब्दाच्या जागी 'क' आणि अनद्यतन (आजचा नसलेला काळ) अर्थी 'रह' प्रत्यय लागून 'कस्मिं काले' चे 'करह' (केव्हा) असे रूप होते. 108. සබ්බාදීහි පකාරෙ ථා १०८. 'सब्ब' इत्यादी शब्दांहून प्रकार अर्थी 'था' प्रत्यय होतो. සාමඤ්ඤස්ස භෙදකො විසෙසො පකාරො, තස්මිං ථාපච්චයො හොති. සබ්බෙන පකාරෙන සබ්බථා, යථා, තථා. सामान्य धर्माचा भेद करणारा विशेष म्हणजे 'प्रकार' होय, त्या अर्थी 'था' प्रत्यय होतो. सर्व प्रकारे म्हणजे 'सब्बथा', ज्या प्रकारे म्हणजे 'यथा', त्या प्रकारे म्हणजे 'तथा'. 109. කථ+මිත්ථං १०९. 'कथं' आणि 'इत्थं'. කි+මිමෙහි [Pg.208] ථංපච්චයො, ක+ඉත්තං තෙසං යථාක්කමං. කෙන පකාරෙන කථං, ඉමිනා පකාරෙන ඉත්ථං. 'किं' आणि 'इम' या शब्दांहून 'थं' प्रत्यय होतो, आणि त्यांच्या जागी अनुक्रमे 'क' आणि 'इत्त' हे आदेश होतात. कोणत्या प्रकारे म्हणजे 'कथं', या प्रकारे म्हणजे 'इत्थं'. 110. ධා සඞ්ඛ්යාහිති ११०. संख्यावाचक शब्दांहून 'धा' प्रत्यय होतो. පකාරෙ ධා හොති. ද්වීහි පකාරෙහි ද්වෙ වා පකාරෙ කරොති ද්විධා කරොති, බහුධා කරොති, එකං රාසිං පඤ්චප්පකාරං කරොති පඤ්චධා කරොති. පඤ්චප්පකාර+මෙකප්පකාරං කරොති එකධා කරොති. प्रकार अर्थी 'धा' प्रत्यय होतो. दोन प्रकारे किंवा दोन प्रकार करतो म्हणजे 'द्विधा करोति', 'बहुधा करोति', एका राशीचे पाच प्रकार करतो म्हणजे 'पञ्चधा करोति'. पाच प्रकारच्या गोष्टीला एक प्रकार करतो म्हणजे 'एकधा करोति'. 111. වෙ+කා+ජ්ඣන්ති १११. 'एक' शब्दाहून 'ज्झं' प्रत्यय होतो. එකස්මා පකාරෙ ජ්ඣං වා හොති. එකෙන පකාරෙන එකං වා පකාරං කරොති එකජ්ඣං කරොති, එකධා කරොති වා. 'एक' शब्दाहून प्रकार अर्थी 'ज्झं' प्रत्यय विकल्पेकरून होतो. एका प्रकारे किंवा एक प्रकार करतो म्हणजे 'एकज्झं करोति' किंवा 'एकधा करोति'. 112. ද්විතීහෙ+ධාති ११२. 'द्वि' आणि 'ति' शब्दांहून 'एधा' प्रत्यय होतो. එධා වා. ද්වීහි පකාරෙහි ද්වෙ වා පකාරෙ කරොති ද්වෙධා, තෙධා. ද්විධා තිධා. 'एधा' प्रत्यय विकल्पेकरून होतो. दोन प्रकारे किंवा दोन प्रकार करतो म्हणजे 'द्वेधा', 'तेधा'. किंवा 'द्विधा', 'तिधा'. 113. තබ්බති ජාතියො ११३. 'तद्वती' (त्या प्रकारचा गुण असणारा) या अर्थी सामान्यवाचक शब्दांहून 'जातिय' प्रत्यय होतो. පකාරවති තංසාමඤ්ඤවාචකා සද්දා ජාතියො හොති. පටුජාතියො, මුදුජාතියො. प्रकारयुक्त अशा सामान्यवाचक शब्दांहून 'जातिय' प्रत्यय होतो. जसे की, 'पटुजातियो', 'मुदुजातियो'. 114. වාරසඞ්ඛ්යාය ක්ඛත්තුං ११४. वार (वेळा) दर्शवणाऱ्या संख्यावाचक शब्दाहून 'क्खत्तुं' प्रत्यय होतो. වාරසම්බන්ධිනියා සංඛ්යාය ක්ඛත්තුං හොති. ද්වෙ වාරෙ භුඤ්ජති ද්වික්ඛත්තුං දිවසස්ස භුඤ්ජති. වාරග්ගහණං කිං, පඤ්ච භුඤ්ජති. සඞ්ඛ්යායාති කිං, පහූතෙ වාරෙ භුඤ්ජති. वार (वेळा) दर्शवणाऱ्या संख्यावाचक शब्दाहून 'क्खत्तुं' प्रत्यय होतो. दोन वेळा जेवतो म्हणजे दिवसातून दोन वेळा जेवतो 'द्विक्खत्तुं दिवसस्स भुञ्जति'. 'वार' ग्रहण कशासाठी? 'पञ्च भुञ्जति'. 'संख्या' ग्रहण कशासाठी? 'पहूते वारे भुञ्जति'. 115. කතිම්හාති ११५. 'कति' शब्दाहून 'क्खत्तुं' प्रत्यय होतो. ක්ඛත්තුං [Pg.209] හොති. කති වාරෙ භුඤ්ජති කතික්ඛත්තුං භුඤ්ජති. 'क्खत्तुं' प्रत्यय होतो. किती वेळा जेवतो म्हणजे 'कतिक्खत्तुं भुञ्जति'. 116. බහුම්හා ධා ච පච්චාසත්තියං ११६. 'बहु' शब्दाहून 'धा' आणि 'क्खत्तुं' प्रत्यय होतात, जर वारंवारता (जवळपास घडणे) असेल तर. වාරසම්බන්ධිනියා බහුසංඛ්යාය ධා හොති ක්ඛත්තුඤ්ච, වාරානං චෙ පච්චාසත්ති හොති. බහුවාරෙ භුඤ්ජති බහුධා දිවසස්ස භුඤ්ජති, බහුක්ඛත්තුං වා. පච්චාසත්තියංති කිං, බහුක්ඛත්තුං මාසස්ස භුඤ්ජති. वार दर्शवणाऱ्या 'बहु' शब्दाहून 'धा' आणि 'क्खत्तुं' प्रत्यय होतात, जर वारांची (वेळांची) जवळीक (वारंवारता) असेल तर. अनेक वेळा जेवतो म्हणजे दिवसातून अनेक वेळा जेवतो 'बहुधा दिवसस्स भुञ्जति' किंवा 'बहुक्खत्तुं'. 'पच्चासत्तियं' (जवळीक) कशासाठी? 'बहुक्खत्तुं मासस्स भुञ्जति'. 117. ස කිං වාති ११७. 'एक' शब्दाहून 'किं' प्रत्यय होतो आणि 'एक' च्या जागी 'स' आदेश होतो. කිංපච්චයො එකස්ස සාදෙසො ච නිපච්චතෙ. එකං වාරං භුඤ්ජති සකිං භුඤ්ජති, එකක්ඛත්තුං වා. 'किं' प्रत्यय होतो आणि 'एक' च्या जागी 'स' आदेश निपातनाने होतो. एक वेळा जेवतो म्हणजे 'सकिं भुञ्जति' किंवा 'एकक्खत्तुं'. 118. සො විච්ඡා+පකාරෙසු ११८. वीप्सा (पुनरावृत्ती) आणि प्रकार अर्थी 'सो' प्रत्यय होतो. විච්ඡායං පකාරෙ ච සො හොති. ඛණ්ඩං ඛණ්ඩං කරොති ඛණ්ඩසො කරොති. පුථුප්පකාරෙන පුථුසො. සබ්බෙන පකාරෙන සබ්බසො. वीप्सा आणि प्रकार अर्थी 'सो' प्रत्यय होतो. तुकडा-तुकडा करतो म्हणजे 'खण्डसो करोति'. वेगवेगळ्या प्रकारे म्हणजे 'पुथुसो'. सर्व प्रकारे म्हणजे 'सब्बसो'. 119. අභූතතබ්භාවෙ කරා+ස+භූයොගෙ විකාරා චී ११९. अभूततद्भाव (जे पूर्वी नव्हते ते होणे) अर्थी, 'कर', 'अस' आणि 'भू' धातूंचा योग असताना विकारवाचक शब्दाहून 'ची' प्रत्यय होतो. අවත්ථාවතො+වත්ථන්තරෙනා+භූතස්ස තායා+වත්ථාය භාවෙ කරා+ස+භූහි සම්බන්ධෙ සති විකාරවාචකාචී හොති. අධවලං ධවලං කරොති ධවලී කරොති. අධවලො ධවලො සියා ධවලී සියා. අධවලො ධවලො භවති ධවලී භවති. අභූතතබ්භාවෙති කිං, ඝටං කරොති, දධි අත්ථි, ඝටො භවති[Pg.210]. කරාසභූයොගෙති කිං, අධවලො ධවලො ජායතෙ. විකාරාති කිං, පකතියා මා හොතු, සුවණ්ණං කුණ්ඩලී කරොති. (නිපාතතද්ධිතං). एका अवस्थेतून दुसऱ्या अवस्थेत जे पूर्वी नव्हते ते होणे या अर्थी, 'कर', 'अस' आणि 'भू' धातूंचा संबंध असताना विकारवाचक शब्दाहून 'ची' प्रत्यय होतो. जे पांढरे नव्हते ते पांढरे करतो म्हणजे 'धवली करोति'. जे पांढरे नव्हते ते पांढरे असावे म्हणजे 'धवली सिया'. जे पांढरे नव्हते ते पांढरे होते म्हणजे 'धवली भवति'. 'अभूततद्भाव' कशासाठी? 'घटं करोति', 'दधि अत्थि', 'घटो भवति'. 'कर-अस-भू' योग कशासाठी? 'अधवलो धवलो जायते'. 'विकार' कशासाठी? मूळ प्रकृतीमध्ये बदल नसावा, 'सुवण्णं कुण्डली करोति'. (हे निपाततद्धित आहे). 120. දිස්සන්ත+ඤ්ඤෙපි පච්චයාති १२०. सांगितलेल्या प्रत्ययांव्यतिरिक्त इतरही प्रत्यय आढळतात. වුත්තතො+ඤ්ඤෙපි පච්චයා දිස්සන්ති. විවිධා මාතරො විමාතරොති විසෙසනසමාසො, තාසං පුත්තා වෙමාතිකාති රිකණපච්චයෙ රානුබන්ධත්තා උලොපෙ වුද්ධිම්හි කතෙ වෙමාතිකා. පථං ගච්ඡන්තීති පථාවිනො, ආවී. ඉස්සා අස්ස අත්ථීති ඉස්සුකී, උකී. ධුරං වහන්තීති ධොරය්හා, ය්හණ. सांगितलेल्या प्रत्ययांव्यतिरिक्त इतरही प्रत्यय आढळतात. 'विविधा मातरो विमातरो' हा विशेषण समास आहे, त्यांचे पुत्र म्हणजे 'वेमातिका' - येथे 'रिकण' प्रत्यय होऊन, 'र' चा अनुबंध लोप पावल्याने आणि 'उ' चा लोप होऊन वृद्धी झाल्यावर 'वेमातिका' शब्द बनतो. मार्गाने जाणारे ते 'पथाविनो' - येथे 'आवी' प्रत्यय आहे. जिच्याजवळ ईर्ष्या आहे ती 'इस्सुकी' - येथे 'उकी' प्रत्यय आहे. धुरा वाहणारे ते 'धोरय्हा' - येथे 'य्हण' प्रत्यय आहे. සාමඤ්ඤඤ්ච විසෙසො ච, භාවජො ච නිපාතජො; ඉති විඤ්ඤූහි විඤ්ඤෙය්යො, තද්ධිතො තු චතුබ්බිධො. सामान्य, विशेष, भावज आणि निपातज; अशा प्रकारे तद्धित प्रत्यय चार प्रकारचे आहेत, असे विद्वानांनी जाणावे. ඉති පයොගසිද්ධියං ණාදිකණ්ඩො පඤ්චමො. अशा प्रकारे प्रयोगसिद्धीमध्ये 'णादि' नावाचा पाचवा कांड समाप्त झाला. 6. ත්යාදිකණ්ඩ ६. त्यादि कांड (तिङन्त प्रकरण). අථ [Pg.211] ත්යාදයො ක්රියාවාචීහි ධාතූහි වුච්චන්තෙ. आता क्रियावाचक धातूंहून 'ति' इत्यादी (त्यादि) प्रत्यय सांगितले जातात. ක්රියං ආචික්ඛතීති ආඛ්යාතන්ති ක්රියාපදස්ස පුබ්බාචරියසඤ්ඤා. කාල+කාරක+පුරිසපරිදීපකං ක්රියාලක්ඛණං ත්යාද්යන්තං අලිඞ්ගඤ්ච, වුත්තම්පි චෙ+තං – जे क्रियेचे कथन करते ते 'आख्यात' होय, ही क्रियापदाची पूर्वाचार्यांनी दिलेली संज्ञा आहे. काळ, कारक आणि पुरुष यांचे प्रकटीकरण करणारे, 'ति' इत्यादी प्रत्ययांनी युक्त असणारे आणि लिंगरहित असणारे हे क्रियेचे लक्षण आहे. असे म्हटलेही आहे की - යං තිකාලං තිපුරිසං, ක්රියාවාචී තිකාරකං; අතිලිඞ්ගං ද්විවචනං, ත+දාඛ්යාතන්ති වුච්චති. जे तीन काळ, तीन पुरुष यांनी युक्त, क्रियावाचक, तीन कारकांनी युक्त, लिंगरहित आणि दोन वचनांनी युक्त असते, त्याला 'आख्यात' असे म्हटले जाते. 14. ක්රියත්ථා බහුලං –ති १४. 'क्रियार्था बहुलं' हे सूत्र सर्वत्र लागू होते. ච සබ්බත්ථ වත්තතෙ. ක්රියා අත්ථො එතස්සාති ක්රියත්ථො ධාතු, සො ච දුවිධො සකම්මකා+කම්මකවසෙන. තත්ථ යස්මිං ක්රියත්ථෙ කත්තුවාචිම්හා කම්මං ගවෙසීයතෙ, සො සකම්මකො. ඉතරො අකම්මකො. आणि हे सर्वत्र लागू होते. ज्याचा अर्थ क्रिया आहे तो 'क्रियार्थ' म्हणजेच धातू होय. तो सकर्मक आणि अकर्मक अशा दोन प्रकारचा आहे. त्यापैकी, ज्या क्रियार्थामध्ये कर्त्याव्यतिरिक्त कर्माची अपेक्षा असते, तो सकर्मक होय. इतर तो अकर्मक होय. තත්ර සකම්මකා කම්මාපෙක්ඛං ක්රියං වදන්ති, යථා කටං කරොති, ගාමං ගච්ඡති, ඔදනං පචති. අකම්මකා කම්මනිරපෙක්ඛං ක්රියං වදන්ති, යථා අච්ඡති සෙති තිට්ඨති. ක්රියාති ච ගමනපචනාදිකො අසත්තසම්මතො කත්තරි කම්මෙ වා පතිට්ඨිතො කාරකසමූහසාධියො පදත්ථො වුච්චති. අපි ච – त्यापैकी, सकर्मक धातू कर्माची अपेक्षा असणारी क्रिया दर्शवतात, जसे की 'कटं करोति', 'गामं गच्छति', 'ओदनं पचति'. अकर्मक धातू कर्माची अपेक्षा नसलेली क्रिया दर्शवतात, जसे की 'अच्छति', 'सेति', 'तिट्ठति'. क्रिया म्हणजे गमन, पचन इत्यादी, जी द्रव्यरूप नसून कर्ता किंवा कर्मामध्ये प्रतिष्ठित असते आणि कारकांच्या समूहाने साध्य होणारा पदार्थ मानली जाते. आणखी असे की - කරණං භවනං චාපි, කර+භූහි කථීයතෙ; තතො ක්රියාදිවාචත්තං, පාකාදීනං කථං භවෙ. 'कर' आणि 'भू' धातूंनी करणे आणि होणे सांगितले जाते; मग पचन इत्यादी क्रियांचे क्रियावाचकत्व कसे सिद्ध होईल? කර+භූධාතූහි කරණඤ්ච භවනඤ්ච වුච්චති, පාක+ගමනාදීහි තෙසං ක්රියාභවනානං වාච්චත්තං කථං භවතීති වුත්තං හොති. පුනපි – 'कर' आणि 'भू' धातूंनी करणे आणि होणे सांगितले जाते, तर पाक, गमन इत्यादींद्वारे त्या क्रिया आणि भवनांचे वाचकत्व कसे होते, असे म्हटले आहे. पुन्हा - පාකාදීනඤ්හි [Pg.212] වාච්චත්තං, කරභූසු න යුජ්ජති; තං බහුතරවාච්චත්තං, පාකාදීසු න යුජ්ජති. कारण पाक इत्यादींचे वाचकत्व 'कर' आणि 'भू' धातूंमध्ये जुळत नाही; आणि त्यांचे अधिक व्यापक वाचकत्व पाक इत्यादींमध्ये जुळत नाही. තං නාම – ते म्हणजे - කාරියරූපා හි ධාත්වත්ථා, සත්තායුත්තා ච තෙ+ඛිලා; තතො ක්රියා ච භාවො ච, සාමඤ්ඤං තෙසු ගම්යතෙ. कारण धातूंचे अर्थ हे कार्यरूप असतात आणि ते सर्व सत्तेने (अस्तित्वाने) युक्त असतात; त्यामुळे त्यांच्यामध्ये क्रिया आणि भाव हे सामान्य रूपाने जाणवले जातात. 1. වත්තමානෙති අන්ති සි ථ මි ම තෙ අන්තෙ සෙ ව්හෙ එ ම්හෙ. १. वर्तमानकाळात (वत्तमाना विभक्तीमध्ये) ति, अन्ति, सि, थ, मि, म, ते, अन्ते, से, व्हे, ए, म्हे (हे प्रत्यय होतात). වත්තමානෙ ආරද්ධාපරිසමත්තෙ අත්ථෙ වත්තමානතො ක්රියත්ථා ත්යාදයො හොන්ති. ක්රියාධිකාරත්තා ‘‘ක්රියත්ථා’’ති වුත්තං. තෙස+මනියමෙ – सुरू झालेल्या परंतु पूर्ण न झालेल्या (आरब्ध-अपरिसमाप्त) वर्तमान अर्थामध्ये वर्तमानकाळातील क्रिया दर्शवणारे 'ति' इत्यादी प्रत्यय होतात. क्रिया-अधिकाराच्या संबंधामुळे त्यांना 'क्रियार्थ' (क्रीयत्था) असे म्हटले आहे. त्यांच्या अनियमामध्ये (नियम नसताना) – 14. පුබ්බපරච්ඡක්කාන+මෙකානෙකෙසු තුම්හා+ම්හ+සෙසෙසු ද්වෙ ද්වෙ මජ්ඣිමු+ත්තම+පඨමා १४. पूर्व (परस्मैपद) आणि पर (आत्मनेपद) या दोन्ही सहा-सहा प्रत्ययांच्या गटांमध्ये, एकवचन आणि अनेकवचनात, 'तुम्ह' (तू/तुम्ही), 'अम्ह' (मी/आम्ही) आणि उर्वरित (इतर नामे/सर्वनामे) कर्ते असताना, अनुक्रमे दोन-दोन प्रत्यय मध्यम, उत्तम आणि प्रथम पुरुषी होतात. එකානෙකෙසු තුම්හඅම්හසද්දවචනීයෙසු තදඤ්ඤසද්දවචනීයෙසු ච කාරකෙසු පුබ්බච්ඡක්කානං පරච්ඡක්කානඤ්ච මජ්ඣිමු+ත්තම+පඨමා ද්වෙ ද්වෙ හොන්ති යථාක්කමං. තත්ථති අන්තීති පඨමපුරිසො, ආදො නිද්දිට්ඨත්තා. සි ථ ඉති මජ්ඣිමපුරිසො, මජ්ඣෙ නිද්දිට්ඨත්තා. මි ම ඉති උත්තමපුරිසො. උත්තමසද්දො+යං සභාවතො තිපභුතීන+මන්ත+මාහ. පරච්ඡක්කෙපි තෙ අන්තෙතිආදිනා එවං යොජෙතබ්බං. එවං සෙසෙසු භවිස්සතිආදීසු සත්තසු පච්චයවිධානසුත්තෙසුපි යොජෙතබ්බං. एकवचन आणि अनेकवचनात 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांनी दर्शविल्या जाणाऱ्या आणि त्याव्यतिरिक्त इतर शब्दांनी दर्शविल्या जाणाऱ्या कारकांमध्ये (कर्त्यांमध्ये), पूर्व सहा (परस्मैपद) आणि पर सहा (आत्मनेपद) प्रत्ययांपैकी अनुक्रमे दोन-दोन प्रत्यय मध्यम, उत्तम आणि प्रथम पुरुषी होतात. त्यामध्ये, 'ति' आणि 'अन्ति' हे प्रथम पुरुष आहेत, कारण ते सुरुवातीला निर्दिष्ट केले आहेत. 'सि' आणि 'थ' हे मध्यम पुरुष आहेत, कारण ते मध्ये निर्दिष्ट केले आहेत. 'मि' आणि 'म' हे उत्तम पुरुष आहेत. हा 'उत्तम' शब्द स्वभावतः तीन पुरुषांच्या शेवटी येणाऱ्याला दर्शवतो. पर (आत्मनेपद) सहा प्रत्ययांमध्येही 'ते', 'अन्ते' इत्यादींच्या बाबतीत याच प्रकारे योजना करावी. याचप्रमाणे उर्वरित 'भविस्सती' इत्यादी सात प्रत्यय-विधान सूत्रांमध्येही योजना करावी. ඉදානි භූවාදීන+මට්ඨගණානං භූවාදිගණෙසු භූ=සත්තාය+මිති පඨමධාතුතො පරා ත්යාදයො යොජීයන්තෙ. තත්ථ ‘‘එකම්හි වත්තබ්බෙ [Pg.213] එකවචනං’’ති ත්යාදීසු පරභූතෙසු කත්තු+කම්ම+භාවෙසුයෙව ක්යවිකරණලවිකරණා හොන්තීති ‘‘ක්යො භාවකම්මෙස්ව+පරොක්ඛෙසු මාන+න්ත+ත්යාදීසු’’ ‘‘කත්තරි ලො’’ ඉච්චාදිනා තෙසං විකරණානං විධානා ත්යාදයො කත්තු+කම්ම+භාවෙස්වෙව විඤ්ඤායන්තීති කත්තරි තිම්හිලො. කෙ තෙ විකරණා – आता, 'भू' इत्यादी आठ गणांपैकी, 'भूवादि' गणातील 'भू' (अस्तित्व/सत्ता या अर्थी) या पहिल्या धातूच्या पुढे 'ति' इत्यादी प्रत्यय जोडले जातात. तिथे, 'एक सांगायचे असताना एकवचन' या नियमाने 'ति' इत्यादी प्रत्यय पुढे असताना, कर्ता, कर्म आणि भाव या अर्थांमध्येच 'क्य' आणि 'ल' हे विकरण प्रत्यय होतात. 'क्यो भावकम्मेस्वपरोक्खेसु मान-न्त-त्यादीसु' आणि 'कर्तरि लो' इत्यादी सूत्रांद्वारे त्या विकरणांचे विधान केले जात असल्यामुळे, 'ति' इत्यादी प्रत्यय कर्ता, कर्म आणि भाव या अर्थांमध्येच जाणले जातात; म्हणून कर्तरी प्रयोगात 'ति' इत्यादी प्रत्यय आणि 'ल' विकरण होते. ते विकरण कोणते आहेत? පුබ්බාපරභාගට්ඨානා, භින්නධාතුවිභත්තියො; නිස්සාය පච්චයා හොන්ති, එතෙ විකරණා සියුං. धातू आणि विभक्ती प्रत्यय यांच्या पूर्व व पर भागात राहून, त्यांना वेगळे करणारे आणि त्यांचा आश्रय घेऊन जे प्रत्यय होतात, त्यांना 'विकरण' असे म्हणतात. 5,82. යුවණ්ණාන+මෙ, ඔ පච්චයෙ ५,८२. प्रत्यय पुढे असताना 'इ' आणि 'उ' वर्णांच्या जागी अनुक्रमे 'ए' आणि 'ओ' होतात. ඉවණ්ණු+වණ්ණන්තානං ක්රියත්තානං එ+ඔ හොන්ති යථාක්කමං පච්චයෙති ඌස්සො+කාරො. 'इ' आणि 'उ' वर्णाने अंत होणाऱ्या क्रियावाचक धातूंच्या जागी प्रत्यय पुढे असताना अनुक्रमे 'ए' आणि 'ओ' होतात. 'पच्चये' या सूत्रात 'उ' चा 'ओ' कार होतो. 5,89. එඔන+මය+වා සරෙ ५,८९. स्वर पुढे असताना 'ए' आणि 'ओ' च्या जागी अनुक्रमे 'अय' आणि 'अव' होतात. සරෙ පරෙ එඔන+මයවා හොන්ති යථාක්කමංති ඔස්ස අවාදෙසො. සො පුරිසො සාධු භවති, සා ඉත්ථී සාධු භවති, චිත්තං සාධු භවති. स्वर पुढे असताना 'ए' आणि 'ओ' च्या जागी अनुक्रमे 'अय' आणि 'अव' आदेश होतात. या नियमाने 'ओ' चा 'अव' आदेश होतो. (उदा.) 'तो पुरुष चांगला होतो' (सो पुरिसो साधु भवति), 'ती स्त्री चांगली होते' (सा इत्थी साधु भवति), 'चित्त चांगले होते' (चित्तं साधु भवति). උත්තත්තා කත්තු ආඛ්යාතෙ, තතියා න ච කත්තරි; පඨමාවිභත්ති හොතෙව, අත්ථමත්තං අපෙක්ඛිය. आख्यात (क्रियापद) द्वारे कर्ता उक्त (व्यक्त) होत असल्यामुळे, कर्त्यामध्ये तृतीया विभक्ती होत नाही; केवळ अर्थाची अपेक्षा करून प्रथमा विभक्तीच होते. සතිපි ක්රියායෙකත්තෙ කත්තූනං බහුත්තා ‘‘බහුම්හි වත්තබ්බෙ බහුවචනං’’ති අන්ති. क्रिया एकवचनी असली तरी, कर्त्यांच्या बहुत्वामुळे (अनेकत्वामुळे) 'अनेक सांगायचे असताना अनेकवचन' या नियमाने 'अन्ति' प्रत्यय होतो. 161. ක්වචි විකරණානන්ති १६१. 'क्वचि विकरणानं' (कधीकधी विकरणांचा...) या सूत्राने - විකරණානං ක්වචි ලොපො හොතීති ලවිකරණස්ස ලොපො, සෙසං පුරිමසදිසං. තෙ පුරිසා භවන්ති. මජ්ඣිමපුරි- සෙකවචනං [Pg.214] සි, ත්වං භවසි. බහුවචනං ථපච්චයො, තුම්හෙ භවථ. උත්තමපුරිසෙකවචනං මිපච්චයො. 'कधीकधी विकरणांचा लोप होतो' या नियमाने 'ल' विकरणाचा लोप होतो, उर्वरित भाग पूर्वीप्रमाणेच राहतो. (उदा.) 'ते पुरुष होतात' (ते पुरिसा भवन्ति). मध्यम पुरुष एकवचनात 'सि' प्रत्यय होऊन 'तू होतोस' (त्वं भवसि) असे होते. अनेकवचनात 'थ' प्रत्यय होऊन 'तुम्ही होता' (तुम्हे भवथ) असे होते. उत्तम पुरुष एकवचनात 'मि' प्रत्यय होतो. 57. හිමිමෙස්ව+ස්ස ५७. 'हिमिमेसु अस्स' (हि, मि, म पुढे असताना 'अ' चा...) या सूत्राने - අකාරස්ස දීඝො හොති හිමිමෙසු. අහං භවාමි. බහුවචනං මපච්චයො, මයං භවාම. එවං පරච්ඡෙක්කෙපි-භවතෙ, භවන්තෙ. භවසෙ, භවව්හෙ. භවෙ, භවම්හෙ. කෙචි දීඝං කත්වා පඨන්ති, ‘‘බ්යඤ්ජනෙ දීඝරස්සා’’ති දීඝො, භවාම්හෙ. 'हि', 'मि' आणि 'म' पुढे असताना 'अ' काराचा दीर्घ होतो. (उदा.) 'मी होतो' (अहं भवामि). अनेकवचनात 'म' प्रत्यय होऊन 'आम्ही होतो' (मयं भवाम) असे होते. याचप्रमाणे पर (आत्मनेपद) प्रत्ययांमध्येही होते - भवते, भवन्ते. भवसे, भवव्हे. भवे, भवम्हे. काही लोक दीर्घ करून वाचतात, 'ब्यञ्जने दीघरस्सा' या सूत्राने दीर्घ होऊन 'भवाम्हे' असे होते. එත්ථ ච – आणि येथे – ලජ්ජා සත්තා ඨිති ජාගරණං,වුද්ධි ක්ඛය ජීවිත මරණං; කීළා රුචි රොචතෙ ඉත්යෙවං,වුත්තා අකම්මකධාතු සබ්බෙ. लज्जा (लाजणे), सत्ता (अस्तित्व), ठिती (थांबणे), जागरणं (जागे राहणे), वुद्धि (वाढणे), खय (क्षय होणे), जीवित (जपणे/जिवंत राहणे), मरणं (मरणे), कीळा (खेळणे), रुची (आवडणे), रोचते (शोभणे) इत्यादी सर्व अकर्मक धातू म्हटले आहेत. –ති වුත්තත්තා කම්මං දුතියා න. – 'ति' प्रत्ययाद्वारे (कर्म) उक्त (व्यक्त) होत असल्यामुळे, कर्मामध्ये द्वितीया विभक्ती होत नाही. පච=පාකෙ, අකාරො උච්චාරණත්ථො, එව+මුපරිපි. පච ඉති ඨිතෙ ලවිකරණං, විකරණලොපාදි පුරිමසමං. සො ඔදනං පචති, තෙ පචන්ති. ත්වං පචසි, තුම්හෙ පචථ. අහං පචාමි, මයං පචාම. පරච්ඡක්කෙ-පචතෙ, පචන්තෙ. පචසෙ, පචව්හෙ. පචෙ, පචාම්හෙ. 'पच' हा धातू शिजवणे (पाक) या अर्थी आहे. यातील 'अ' कार केवळ उच्चारणासाठी आहे, पुढेही असेच समजावे. 'पच' अशी स्थिती असताना 'ल' विकरण होते, आणि विकरणाचा लोप इत्यादी प्रक्रिया पूर्वीप्रमाणेच होते. (उदा.) 'तो भात शिजवतो' (सो ओदनं पचति), 'ते शिजवतात' (ते pचन्ति). 'तू शिजवतोस' (त्वं पचसि), 'तुम्ही शिजवता' (तुम्हे पचथ). 'मी शिजवतो' (अहं पचामि), 'आम्ही शिजवतो' (मयं पचाम). पर (आत्मनेपद) प्रत्ययांमध्ये - पचते, पचन्ते. पचसे, पचव्हे. पचे, पचाम्हे. 1,22. විප්පටිසෙධෙ १,२२. विप्रतिषेध (परस्पर विरोध) असताना – විප්පටිසෙධනං=අඤ්ඤමඤ්ඤපටිසෙධනං විප්පටිසෙධො. පඨමමජ්ඣිමපුරිසානං ද්වින්නං එකත්ථ පසඞ්ගෙ මජ්ඣිමපුරිසබහුවචනං ථපච්චයො. සො [Pg.215] ච පචති, ත්වඤ්ච පචසි, තුම්හෙ පචථ. තුල්යබලවිරොධිනො හි විප්පටිසෙධා පඨමමජ්ඣිමඋත්තමපුරිසානං තිණ්ණං එකත්ථ පසඞ්ගෙ උත්තමපුරිසබහුවචනං හොති, සො ච පචති, ත්වඤ්ච පචසි, අහඤ්ච පචාමි මයං පචාමාති භවති. विप्रतिषेध म्हणजे परस्पर विरोध (एकमेकांचा निषेध करणे). जेव्हा प्रथम पुरुष आणि मध्यम पुरुष या दोघांचा एकाच ठिकाणी प्रसंग येतो, तेव्हा मध्यम पुरुष अनेकवचनाचा 'थ' प्रत्यय होतो. (उदा.) 'तो शिजवतो आणि तू शिजवतोस = तुम्ही शिजवता' (सो च पचति, त्वञ्च पचसि = तुम्हे पचथ). समान बल असणाऱ्यांच्या विरोधात (विप्रतिषेधात) प्रथम, मध्यम आणि उत्तम या तिन्ही पुरुषांचा एकाच ठिकाणी प्रसंग आल्यास उत्तम पुरुष अनेकवचन होते. (उदा.) 'तो शिजवतो, तू शिजवतोस आणि मी शिजवतो = आम्ही शिजवतो' (सो च पचति, त्वञ्च पचसि, अहञ्च पचामि = मयं पचाम) असे होते. අම+ගම=ගමනෙ – 'गम' हा धातू जाणे (गमन) या अर्थी आहे – 5,173. ගම යමි+සා+ස දිසානං වා ච්ඡඞ ५,१७३. 'गम', 'यम', 'इसु', 'अस', 'दिस' या धातूंच्या जागी 'न्त', 'मान', 'ति' इत्यादी प्रत्यय पुढे असताना पर्यायाने 'च्छ' आदेश होतो. එතෙසං ධාතූනං ච්ඡඞ වා හොති න්ත+මාන+ත්යාදීසු. සො ගාමං ගච්ඡති. අන්ති – या धातूंच्या जागी 'न्त', 'मान', 'ति' इत्यादी प्रत्यय पुढे असताना पर्यायाने 'च्छ' आदेश होतो. (उदा.) 'तो गावात जातो' (सो गामं गच्छति). 'अन्ति' प्रत्यय पुढे असताना – 74. ගරුපුබ්බා රස්සා රෙ+න්තෙන්තීනං ७४. गुरु (दीर्घ) वर्ण पूर्वी असलेल्या र्हस्व स्वराच्या पुढे 'न्ते' आणि 'न्ती' च्या जागी पर्यायाने 'रे' होतो. ගරුපුබ්බස්මා රස්සා න්තෙ+න්තීනං රෙ වා හොති. गुरु वर्ण पूर्वी असलेल्या र्हस्व स्वराच्या पुढे 'न्ते' आणि 'न्ती' च्या जागी पर्यायाने 'रे' आदेश होतो. අක්ඛරනියමො ඡන්දං,ගරුලහුනියමො භවෙ වුත්ති; දීඝො සංයොගාදිපුබ්බො,රස්සො ගරු ලහු තු රස්සො. अक्षरांचा नियम म्हणजे छंद, आणि गुरु-लघूचा नियम म्हणजे वृत्ती होय. दीर्घ स्वर आणि जोडाक्षराच्या आधीचा स्वर 'गुरु' असतो, तर र्हस्व स्वर 'लघु' असतो. ගච්ඡරෙ ගච්ඡන්ති. ත්වං ගච්ඡසි, තුම්හෙ ගච්ඡථ. අහං ගච්ඡාමි, මයං ගච්ඡාම. ච්ඡාදෙසාභාවපක්ඛෙ ‘‘ඌ ලස්සෙ’’ති එකාරෙ ගමෙති. පරලොපෙ ගමෙන්ති. ගමෙසි, ගමෙථ. ගමෙමි, ගමෙම. පරච්ඡක්කෙපි සො ගච්ඡතෙ, ගච්ඡරෙ ගච්ඡන්තෙ. ගච්ඡසෙ, ගච්ඡව්හෙ. ගච්ඡෙ, ගච්ඡාම්හෙ. गच्छरे, गच्छन्ति. 'तू जातोस' (त्वं गच्छसि), 'तुम्ही जाता' (तुम्हे गच्छथ). 'मी जातो' (अहं गच्छामि), 'आम्ही जातो' (मयं गच्छाम). 'च्छ' आदेश न होण्याच्या पक्षात 'ऊ लस्से' या सूत्राने 'ए' कार होऊन 'गमेति' असे होते. पर-लोप झाल्यावर 'गमन्ति' होते. गमेसि, गमेथ. गमेमि, गमेम. पर (आत्मनेपद) प्रत्ययांमध्येही - सो गच्छते, गच्छरे, गच्छन्ते. गच्छसे, गच्छव्हे. गच्छे, गच्छाम्हे. පුරෙ අධම්මො දිබ්බති, පුරා මරාමීති ච තංසමීපෙ තබ්බොහාරූපචාරෙන වත්තමානවචනං. වුත්තඤ්හි – 'पूर्वी अधर्म वाढत असे' (पुरे अधम्मो दिब्बति) आणि 'लवकरच मी मरेन' (पुरा मरामि) या वाक्यांमध्ये, त्या काळाच्या समीपतेमुळे आणि व्यवहाराच्या उपचारामुळे वर्तमानकाळाचा प्रयोग केला जातो. कारण असे म्हटले आहे – ආරද්ධා+නිට්ඨිතං [Pg.216] කිච්චං, වත්තමානන්ති වුච්චති; වත්තමානසමීපඤ්ච, වත්තමානන්ති වුච්චති. सुरू केलेले परंतु पूर्ण न झालेले कार्य 'वर्तमान' म्हटले जाते; आणि वर्तमानकाळाच्या समीप असणाऱ्या काळालाही 'वर्तमान' म्हटले जाते. කිමිව තෙ – ते कशासारखे आहे? – ගඞ්ගාච තංසමීපඤ්ච, යතො ගඞ්ගාති ඤායතෙ; ගඞ්ගායං පාතු+මාගච්ඡ, ඝොසො ගඞ්ගාය+මිත්යපි. ज्याप्रमाणे गंगा नदी आणि तिच्या जवळचा प्रदेश या दोन्हीला 'गंगा' म्हणूनच ओळखले जाते; जसे की 'गंगेवर पाणी पिण्यासाठी ये' आणि 'गंगेवर (गंगेच्या काठावर) गवळ्यांची वस्ती आहे' असे म्हटले जाते. මුඛ්යා+මුඛ්යත්ථභෙදෙන, වත්තමානං තතො ද්විධා; මුඛ්යඤ්හි රුළ්හි+මාපන්නං, ත+දාරොපා අමුඛ්යතාති. म्हणून मुख्य आणि अमुख्य अर्थाच्या भेदाने वर्तमानकाळ दोन प्रकारचा आहे; मुख्य अर्थ रूढीने प्राप्त होतो, तर त्यावर आरोप केल्याने अमुख्य अर्थ प्राप्त होतो. පුරෙ+පුරාසද්දෙහි වා අනාගතතා ගම්යතෙ, තදා තස්ස වත්තමානත්තා. කාලබ්යත්තයො වා එසො, භවන්ත්යෙව හි කාලන්තරෙපි ත්යාදයො බාහුලකා ‘‘සන්තෙසු පරිගූහාමි’’ ‘‘කායස්ස භෙදා අභිසම්පරායං, සහබ්යතං ගච්ඡති වාසවස්ස’’ ‘‘අතිවෙලං නමස්සිස්සං’’ති. ‘‘කුතො නු ත්වං ආගච්ඡසි, රාජගහතො ආගච්ඡාමී’’තිආදීසු පන පච්චුප්පන්නසමීපෙ වත්තමානවචනං. किंवा 'पुरे' आणि 'पुरा' या शब्दांमुळे भविष्यकाळ समजला जातो, तेव्हा त्याला वर्तमानकाळ मानले जाते. किंवा हा काळाचा व्यत्यय (बदल) आहे, कारण बहुलतेमुळे इतर काळातही 'ति' इत्यादी प्रत्यय होतातच; जसे की 'सन्तेसु परिगूहामि', 'कायस्स भेदा अभिसम्परायं, सहब्यतं गच्छति वासवस्स', 'अतिवेलं नमस्सिस्सं'. परंतु 'तू कोठून येत आहेस? मी राजगृहाहून येत आहे' इत्यादी वाक्यांमध्ये वर्तमानकाळाचा प्रयोग वर्तमान समीप (नुकत्याच घडून गेलेल्या) अर्थात केला जातो. 5,175. ගම වද දානං ඝම්ම වජ්ජ දජ්ජා ५,१७५. 'गम', 'वद' आणि 'दान' (दा) यांच्या जागी 'न्त', 'मान', 'ति' इत्यादी प्रत्यय पुढे असताना अनुक्रमे 'घम्म', 'वज्ज' आणि 'दज्जा' हे आदेश होतात. ගමාදීනං ඝම්මාදයො වා හොන්ති න්ත+මාන+ත්යාදීසු. ඝම්මති, ඝම්මන්ති ඉච්චාදි. 'गम' इत्यादी धातूंच्या जागी 'न्त', 'मान', 'ति' इत्यादी प्रत्यय पुढे असताना पर्यायाने 'घम्म' इत्यादी आदेश होतात. जसे की - घम्मति, घम्मन्ति इत्यादी. කම්මෙ – कर्मणी प्रयोगात (कम्मे) – උපසග්ගවසා කොචි, අකම්මොපි සකම්මකො; යථා+භිභූයතෙ රාගො, තාපසෙන මහිද්ධිනාති – उपसर्गाच्या प्रभावामुळे एखादा अकर्मक धातू देखील सकर्मक होतो; जसे की 'महान ऋद्धीमान तपस्व्याद्वारे रागाचा पराभव केला जातो (अभिभूत केला जातो)' – වුත්තත්තා අකම්මකතො කම්මනි අනුපුබ්බා භූධාතුතො ත්යාදයො හොන්ති. असे म्हटले असल्यामुळे, अकर्मक धातूपासून कर्मणी प्रयोगात 'अनु' उपसर्गपूर्वक 'भू' धातूच्या पुढे 'ति' इत्यादी प्रत्यय होतात. 5,17. ක්යො [Pg.217] භාවකම්මෙස්ව+පරොක්ඛෙසු මාන+න්ත+ත්යාදීසු ५,१७. परोक्ष नसलेल्या (अपरोक्ष) भाव आणि कर्म अर्थांमध्ये, 'मान', 'अन्त', 'ति' इत्यादी प्रत्यय लागलेल्या धातूंनंतर 'क्य' प्रत्यय होतो. භාවකම්මවිහිතෙසු පරොක්ඛාවජ්ජිතෙසු මාන+න්ත+ත්යාදීසු පරෙසු ක්යො හොති ක්රියත්ථා. කකාරො+නුබන්ධකාරියත්ථො. ‘‘න තෙ කානුබන්ධ+නාගමෙසූ’’ති පටිසෙධා ඔකාරාභාවො. අනුභූයති සුඛං දෙවදත්තෙන. भाव आणि कर्म अर्थांमध्ये विहित केलेल्या, परोक्ष नसलेल्या (अपरोक्ष), 'मान', 'अन्त', 'ति' इत्यादी प्रत्यय लागलेल्या क्रियापदांनंतर 'क्य' प्रत्यय होतो. 'क'कार हा अनुबन्धकार्यासाठी आहे. “न ते कानुबन्धनागमेसू” या निषेधामुळे 'ओ'काराचा अभाव होतो. (उदा.) देवदत्ताद्वारे सुखाचा अनुभव घेतला जातो (अनुभूयति सुखं देवदत्तेन). එත්ථ ච – आणि येथे – ආඛ්යාතෙන අවුත්තත්තා, කත්තුතො තතියා න තු; දුතියා හොති කම්මස්ස, වුත්තත්තා පඨමාපි+ධ. आख्यात (क्रियापदा) द्वारे कर्ता उक्त (सांगितला) नसल्यामुळे कर्त्याची तृतीया विभक्ती होते, द्वितीया नाही; आणि कर्म उक्त असल्यामुळे येथे कर्माची प्रथमा विभक्ती होते. අනුභූයන්ති සම්පත්තියො තයා. අනුභූයසි ත්වං දෙවදත්තෙන. අනුභූයථ තුම්හෙ. අහං අනුභූයාමි, තයා මයං අනුභූයාම. ද්විත්තෙ අනුභුය්යති+ච්චාදි. එවං පරච්ඡක්කෙ. तुझ्याद्वारे संपत्तीचा अनुभव घेतला जातो (अनुभूयन्ति सम्पत्तियो तया). देवदत्ताद्वारे तुझा अनुभव घेतला जातो (अनुभूयसि त्वं देवदत्तेन). तुम्हाद्वारे अनुभव घेतला जातो (अनुभूयथ तुम्हे). माझा अनुभव घेतला जातो (अहं अनुभूयामि), तुझ्याद्वारे आमचा अनुभव घेतला जातो (तया मयं अनुभूयाम). द्वित्त्व झाल्यावर 'अनुभुय्यति' इत्यादी रूपे होतात. याचप्रमाणे परस्मैपदाच्या सहा प्रत्ययांमध्ये (परच्छक्के) रूपे होतात. භාවෙ අදබ්බවුත්තිනො භාවස්ස එකත්තා එකවචනමෙව. තඤ්ච පඨමපුරිසෙකවචනෙයෙව සම්භවති, නෙව+ඤ්ඤං, බහුලංවිධානා. භූයති භූයතෙ දෙවදත්තෙන, සම්පති භවනන්ත්යත්ථො. भाव (क्रिया) अर्थामध्ये, द्रव्यवाचक नसलेल्या भावाच्या एकत्वामुळे केवळ एकवचनच होते. आणि ते केवळ प्रथम पुरुष एकवचनातच संभवते, इतर कुठेही नाही, कारण बहुल विधानामुळे. (उदा.) देवदत्ताद्वारे अस्तित्त्व अनुभवले जाते (भूयति, भूयते देवदत्तेन), याचा अर्थ 'सध्या असणे' असा आहे. පචධාතුතො කම්මෙ ක්යො. 'पच्' धातूहून कर्म अर्थामध्ये 'क्य' प्रत्यय होतो. 37. ක්යස්සති ३७. क्यस्सति (क्य + सति) ක්රියත්ථා ක්යස්ස ඊඤ වා හොති. ඤො ආද්යාවයවත්ථො. දෙවදත්තෙන ඔදනො පචීයති පච්චති, රෙආදෙසෙ ඔදනා පචීයරෙ පචීයන්ති, පච්චරෙ පච්චන්ති. චවග්ගපුබ්බරූපානි. ත්වං පචීයසි පච්චසි, තුම්හෙ පචීයථ පච්චථ. අහං පචීයාමි පච්චාමි, මයං පචීයාම පච්චාම. පරච්ඡක්කෙ දෙවදත්තෙන ඔදනො පචීයතෙ ඉච්චාදි. क्रियापदाच्या 'क्य' प्रत्ययाला 'ईञ्' आदेश विकल्पेकरून होतो. 'ञ्' हा आदि-अवयवासाठी आहे. देवदत्ताद्वारे भात शिजवला जातो (देवदत्तेन ओदनो पचीयति, पच्चति). 'रे' आदेश झाल्यावर 'ओदना पचीयरे, पचीयन्ति, पच्चरे, पच्चन्ति' अशी रूपे होतात. च-वर्गाचे पूर्वरूप होते. तू शिजवला जातोस (त्वं पचीयसि, पच्चसि), तुम्ही शिजवले जाता (तुम्हे पचीयथ, पच्चथ). मी शिजवला जातो (अहं पचीयामि, पच्चामि), आम्ही शिजवले जातो (मयं पचीयाम, पच्चाम). आत्मनेपदाच्या सहा प्रत्ययांमध्ये (परच्छक्के) 'देवदत्तेन ओदनो पचीयते' इत्यादी रूपे होतात. ගමිතො [Pg.218] කම්මෙ ච්ඡඞ ච ඊඤආගමෙ ච කතෙ තෙන ගාමො ගච්ඡීයති, ගාමා ගච්ඡීයන්ති. ගච්ඡීයසි, ගච්ඡීයථ. ගච්ඡීයාමි, ගච්ඡීයාම. එවං පරච්ඡක්කෙ. ගමීයති ගම්මති, ගමීයන්ති ගම්මන්ති. ගමීයසි ගම්මසි, ගමීයථ ගම්මථ, ගමීයාමි ගම්මාමි, ගමීයාම ගම්මාම පරච්ඡක්කෙපි එවං. තථා ඝම්මීයති, ඝම්මීයන්ති ඉච්චාදි. 'गम्' धातूहून कर्म अर्थामध्ये 'च्छङ्' प्रत्यय आणि 'ईञ्' आगम केल्यावर 'तेन गामो गच्छीयति' (त्याच्याद्वारे गावात गेले जाते), 'गामा गच्छीयन्ति' अशी रूपे होतात. 'गच्छीयसि, गच्छीयथ'. 'गच्छीयामि, गच्छीयाम'. याचप्रमाणे आत्मनेपदाच्या सहा प्रत्ययांमध्ये (परच्छक्के) रूपे होतात. 'गमीयति, गम्मति', 'गमीयन्ति, गम्मन्ति'. 'गमीयसि, गम्मसि', 'गमीयथ, गम्मथ', 'गमीयामि, गम्मामि', 'गमीयाम, गम्माम' आणि आत्मनेपदाच्या सहा प्रत्ययांमध्येही याचप्रमाणे रूपे होतात. तसेच 'घम्मीयति, घम्मीयन्ति' इत्यादी रूपे होतात. ක්රියත්ථා කත්තරි ත්යාදි, කම්මස්මිඤ්ච සකම්මකා; භාවෙ වා+කම්මකා කම්මා+වචනිච්ඡාය මඤ්ඤතෙ. क्रियापदाचे 'ति' इत्यादी प्रत्यय कर्ता अर्थामध्ये होतात, आणि सकर्मक धातूंहून कर्म अर्थामध्ये होतात; अकर्मक धातूंहून भाव अर्थामध्ये किंवा कर्माची विवक्षा (बोलण्याची इच्छा) नसताना मानले जातात. තථා හි විජ්ජමානස්සාපි කම්මාස්ස අවචනිච්ඡායං ඉදං වුච්චති – कारण, कर्म विद्यमान (उपस्थित) असतानाही त्याची विवक्षा नसताना असे म्हटले जाते – සතොපි න විවක්ඛා+ස්ස, අසතොපි ච සා භවෙ; තං යථා+නුදරා කඤ්ඤා, වඤ්ඣාවද්ධිතකො යථා. विद्यमान असलेल्याचीही विवक्षा नसते, आणि अविद्यमान असलेल्याचीही विवक्षा असू शकते; जसे की 'अनुदरा कन्या' (पोट नसलेली मुलगी - बारीक पोटाची मुलगी) आणि 'वंध्येचा मुलगा' (वांझ स्त्रीचा वाढलेला मुलगा). විවක්ඛා ලොකිකා එසා, අසක්ය+මතිවත්තිතුං; කථ+මෙස විපරියාසො, ලොකො එවා+නයුජ්ජතෙ. ही विवक्षा लौकिक (लोकाचारातील) आहे, जिचे उल्लंघन करणे अशक्य आहे; हा विपर्यास (उलटा व्यवहार) कसा? कारण लोकच अशा प्रकारे व्यवहार करतात. (වත්තමානපච්චයනයො). (वर्तमानकाळ प्रत्यय पद्धती समाप्त). 2. භවිස්සති ස්සති ස්සන්ති ස්සති ස්සථ ස්සාමි ස්සාම ස්සතෙ ස්සන්තෙ ස්සසෙ ස්සව්හෙ ස්සං ස්සාම්හෙ २. भविष्यकाळ (भविस्सति): स्सति, स्सन्ति, स्ससि, स्सथ, स्सामि, स्साम, स्सते, स्सन्ते, स्ससे, स्सव्हे, स्सं, स्साम्हे. භවිස්සති=අනාරද්ධෙ අත්ථෙ වත්තමානතො ක්රියත්ථා ස්සත්යාදයො හොන්ති. भविष्यकाळ = न सुरू झालेल्या (अनागत/भविष्य) अर्थामध्ये वर्तमानकाळाच्या क्रियापदांनंतर 'स्सति' इत्यादी प्रत्यय होतात. 35. අ+ඊ+ස්සාදීනං බ්යඤ්ජනස්සිඤ ३५. 'अ', 'ई' आणि 'स्स' इत्यादी व्यंजनांना 'इञ्' आगम होतो. ක්රියත්ථා පරෙසං අආදීනං ඊආදීනං ස්සාදීනඤ්ච බ්යඤ්ජනස්සි+ඤ හොති විභාසා. වවත්ථිතවිභාසා+යං. ස්සෙති ස්සාදීනං ස්සතිආදීනඤ්චාවයවො ගහිතො, ‘‘ඌබ්යඤ්ජනස්සා’’ති සිද්ධෙපි [Pg.219] ත්යාදීසු එතෙසමෙවාති නියමත්ථො+ය+මාරම්භො. ලස්සාකාරලොපෙ ඔ+අවාදෙසෙ භවිස්සති, භවිස්සන්ති. භවිස්සසි, භවිස්සථ. භවිස්සාමි, භවිස්සාම. භවිස්සතෙ, භවිස්සන්තෙ. භවිස්සසෙ, භවිස්සව්හෙ. භවිස්සං, භවිස්සාම්හෙ. क्रियापदांनंतर येणाऱ्या 'अ' इत्यादी, 'ई' इत्यादी आणि 'स्स' इत्यादी व्यंजनांना विकल्पेकरून 'इञ्' आगम होतो. हा व्यवस्थित विकल्प (व्यवस्थितविभाषा) आहे. 'स्से' हा 'स्सति' इत्यादींचा अवयव घेतला आहे. “ऊव्यञ्जनस्सा” या सूत्राने सिद्ध होत असतानाही, 'ति' इत्यादी प्रत्ययांमध्ये केवळ यांचाच नियम करण्यासाठी हा आरंभ केला आहे. 'ल' च्या अकाराचा लोप आणि 'ओ' चा 'अव्' आदेश झाल्यावर 'भविस्सति, भविस्सन्ति', 'भविस्ससि, भविस्सथ', 'भविस्सामि, भविस्साम', 'भविस्सते, भविस्सन्ते', 'भविस्ससे, भविस्सव्हे', 'भविस्सं, भविस्साम्हे' अशी रूपे होतात. කම්මෙ – कर्म अर्थामध्ये – 49. ක්යස්ස ස්සෙ ४९. 'स्से' प्रत्यय असताना 'क्य' चा लोप होतो. ක්යස්ස වා ලොපො හොති ස්සෙ. සුඛං තයා අනුභවිස්සති, අනුභවිස්සන්ති. අනුභවිස්සසි, අනුභවිස්සථ. අනුභවිස්සාමි, අනුභවිස්සාම. අඤ්ඤත්ර අනුභූයිස්සති, අනුභූයිස්සන්ති ඉච්චාදි. එවං පරච්ඡක්කෙ. භාවෙ-භූයිස්සති භූයිස්සතෙ. 'स्से' प्रत्यय असताना 'क्य' चा विकल्पेकरून लोप होतो. तुझ्याद्वारे सुखाचा अनुभव घेतला जाईल (सुखं तया अनुभविस्सति, अनुभविस्सन्ति). 'अनुभविस्ससि, अनुभविस्सथ'. 'अनुभविस्सामि, अनुभविस्साम'. इतर ठिकाणी 'अनुभूयिस्सति, अनुभूयिस्सन्ति' इत्यादी रूपे होतात. याचप्रमाणे आत्मनेपदाच्या सहा प्रत्ययांमध्ये (परच्छक्के) रूपे होतात. भाव अर्थामध्ये - 'भूयिस्सति, भूयिस्सते' अशी रूपे होतात. කත්තරි-පචිස්සති, පචිස්සන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-පචිස්සති ඔදනො දෙවදත්තෙන, පචීයිස්සති, පච්චිස්සති. පච්චිස්සන්ති ඔදනා පචීයිස්සන්ති, පචීයිස්සරෙ, පච්චිස්සරෙ, පච්චිස්සන්ති. कर्ता अर्थामध्ये - 'पचिस्सति, पचिस्सन्ति' इत्यादी. कर्म अर्थामध्ये - देवदत्ताद्वारे भात शिजवला जाईल (पचिस्सति ओदनो देवदत्तेन, पचीयिस्सति, पच्चिस्सति). 'पच्चिस्सन्ति ओदना पचीयिस्सन्ति, पचीयिस्सरे, पच्चिस्सरे, पच्चिस्सन्ति'. ගමිතො කත්තරි-සො ගච්ඡිස්සති, තෙ ගච්ඡිස්සන්ති. ත්වං ගච්ඡිස්සසි, තුම්හෙ ගච්ඡිස්සථ. අහං ගච්ඡිස්සාමි, මයං ගච්ඡිස්සාම. ගච්ඡිස්සතෙ, ගච්ඡිස්සන්තෙ. ගච්ඡිස්සසෙ, ගච්ඡිස්සව්හෙ. ගච්ඡිස්සං, ගච්ඡිස්සාම්හෙ. සග්ගං ගමිස්සති, ගමිස්සන්ති. ගමිස්සසි, ගමිස්සථ. ගමිස්සාමි, ගමිස්සාම ඉච්චාදි. කම්මෙ-ගච්ඡියිස්සති, ගච්ඡියිස්සන්ති ඉච්චාදි. ක්යලොපෙ ගමිස්සති, ගමිස්සන්ති ඉච්චාදි. තථා ඝම්මිස්සති ඝම්මීයිස්සති, ඝම්මිස්සන්ති, ඝම්මීයිස්සන්ති ඉච්චාදි. 'गम्' धातूहून कर्ता अर्थामध्ये - तो जाईल (सो गच्छिस्सति), ते जातील (ते गच्छिस्सन्ति). तू जाशील (त्वं गच्छिस्ससि), तुम्ही जाल (तुम्हे गच्छिस्सथ). मी जाईन (अहं गच्छिस्सामि), आम्ही जाऊ (मयं गच्छिस्साम). 'गच्छिस्सते, gच्छिस्सन्ते'. 'गच्छिस्ससे, gच्छिस्सव्हे'. 'गच्छिस्सं, गच्छिस्साम्हे'. स्वर्गात जाईल (सग्गं गमिस्सति, गमिस्सन्ति). 'गमिस्ससि, गमिस्सथ'. 'गमिस्सामि, गमिस्साम' इत्यादी. कर्म अर्थामध्ये - 'गच्छियिस्सति, गच्छियिस्सन्ति' इत्यादी. 'क्य' चा लोप झाल्यावर 'गमिस्सति, गमिस्सन्ति' इत्यादी रूपे होतात. तसेच 'घम्मिस्सति, घम्मीयिस्सति', 'घम्मिस्सन्ति, घम्मीयिस्सन्ति' इत्यादी रूपे होतात. 3. නාමෙ ගරහාවිම්හයෙසු ३. 'नाम' शब्द असताना निंदा आणि आश्चर्य अर्थांमध्ये. නාමසද්දෙ [Pg.220] නිපාතෙ සති ගරහායං විම්හයෙ ච ගම්යමානෙ ස්සත්යාදයො හොන්ති. ඉමෙ හි නාම කල්යාණධම්මා පටිජානිස්සන්ති. එත්ථ ‘‘ජ්යාදීහි ක්නා’’ති ක්නාවිකරණෙ ‘‘ඤාස්සනෙ ජා’’ති ජාදෙසො. න හි නාම භික්ඛවෙ තස්ස මොඝපුරිසස්ස පාණෙසු අනුද්දයා භවිස්සති. කථඤ්හි නාම සො භික්ඛවෙ මොඝපුරිසො සබ්බමත්තිකාමයං කුටිකං කරිස්සති. විම්හයෙ-අච්ඡරියං වත භො, අබ්භුතං වත භො, සන්තෙන වත භො පබ්බජිතා විහාරෙන විහරන්ති, යත්ර හි නාම සඤ්ඤී සමානො ජාගරො පඤ්චමත්තානි සකටසතානි නිස්සාය නිස්සාය අතික්කන්තානි නෙව දක්ඛිති, න පන සද්දං සොස්සති. අච්ඡරියං අන්ධො නාම පබ්බත+මාරොහිස්සති, බධිරො නාම සද්දං සොස්සති. (භවිස්සන්තිපච්චයනයො). 'नाम' हा निपात शब्द असताना, निंदा आणि आश्चर्य व्यक्त होत असल्यास 'स्सति' इत्यादी प्रत्यय होतात. (उदा. निंदेमध्ये) "हे लोक स्वतःला कल्याणधर्मी म्हणवून घेतील!" (इमे हि नाम कल्याणधम्मा पटिजानिस्सन्ति). येथे “ज्यादीहि क्ना” या सूत्राने 'क्ना' विकरण झाल्यावर “ञास्सने जा” या सूत्राने 'जा' आदेश होतो. "भिक्खूंनो, त्या मोघपुरुषाच्या मनात प्राण्यांबद्दल दया नसेल काय!" (न हि नाम भिक्खवे तस्स मोघपुरिसस्स पाणेसु अनुद्दया भविस्सति). "भिक्खूंनो, तो मोघपुरुष संपूर्ण मातीची कुटी कशी काय बनवेल!" (कथञ्हि नाम सो भिक्खवे मोघपुरिसो सब्बमत्तिकामयं कुटिकं करिस्सति). आश्चर्यामध्ये - "अहो आश्चर्य! अहो अद्भुत! शांत विहाराने प्रव्रजित लोक विहार करत आहेत, जिथे संज्ञा असलेला आणि जागृत असलेला मनुष्य पाचशे गाड्या जवळून निघून गेल्या तरी त्या पाहणार नाही आणि त्यांचा आवाजही ऐकणार नाही!" (अच्छरियं वत भो, अब्भुतं वत भो, सन्तेन वत भो पब्बजिता विहारेन विहरन्ति, यत्र हि नाम सञ्ञी समानो जागरो पञ्चमत्तानि सकटसतानि निस्साय निस्साय अतिक्कन्तानि नेव दक्खिति, न पन सद्दं सोस्सति). "आश्चर्य आहे, आंधळा मनुष्य पर्वतावर चढेल (अच्छरियं अन्धो नाम पब्बतमारोहिस्सति), बहिरा मनुष्य आवाज ऐकेल (बधिरो नाम सद्दं सोस्सति)!" (भविष्यकाळ प्रत्यय पद्धती समाप्त). 4. භූතෙ ඊ උං ඔ ත්ථ ඉං ම්හා ආ ඌ සෙ ව්හං අ ම්හෙ ४. भूतकाळात (भूते): ई, उं, ओ, त्थ, इं, म्हा, आ, ऊ, से, व्हं, अ, म्हे. භූතෙ පරිසමත්තෙ අත්ථෙ වත්තමානතො ක්රියත්ථා ඊආදයො හොන්ති. භූතානජ්ජතනෙ උපරි වක්ඛමානත්තා ඉමෙ ඊආදයො භූතජ්ජතනෙ. ‘‘සුවො අහොසි ආනන්දො’’තිආදීසු භූතසාමඤ්ඤෙව භවන්ති. भूतकाळात, म्हणजेच समाप्त झालेल्या अर्थामध्ये वर्तमानकाळाच्या क्रियापदांनंतर 'ई' इत्यादी प्रत्यय होतात. अनद्यतन भूतकाळ पुढे सांगितला जाणार असल्यामुळे, हे 'ई' इत्यादी प्रत्यय अद्यतन भूतकाळात होतात. “सुवो अहोसि आनन्दो” (उद्या आनंद होईल - येथे भूतकाळाचा प्रयोग भविष्यासाठी झाला आहे) इत्यादींमध्ये ते सामान्य भूतकाळातच होतात. අහස්සු+භයතො අඩ්ඪ-රත්තං වා තදුපඩ්ඪතං; අන්තොකත්වාන විඤ්ඤෙය්යො, අහො අජ්ජතනො ඉති; තදඤ්ඤො පන යො කාලො, සො+නජ්ජතනසඤ්ඤිතො. दिवसाच्या दोन्ही बाजूंचे अर्धे रात्र किंवा त्याहून अर्धा भाग अंतर्भूत करून 'अद्यतन दिवस' (आजचा दिवस) समजावा; आणि त्याव्यतिरिक्त जो काळ आहे, त्याला 'अनद्यतन' संज्ञा दिली जाते. ඉති පඨමපුරිසෙකවචනං ඊ, अशा प्रकारे प्रथम पुरुष एकवचनाचा प्रत्यय 'ई' आहे, 15. ආ+ඊ+ස්සාදීස්ව+ඤ වා १५. 'आ', 'ई' आणि 'स्स' इत्यादी प्रत्यय असताना धातूच्या आधी विकल्पेकरून 'अञ्' (अ) आगम होतो. ආආදො [Pg.221] ඊආදො ස්සාදො ච ක්රියත්ථස්ස වා අඤ හොතීති ධාතුතො පුබ්බං අඤ. ‘‘කත්තරි ලො’’ති ලො, එකාර+අවාදෙසා ච. 'आ' इत्यादी, 'ई' इत्यादी आणि 'स्स' इत्यादी प्रत्यय असताना क्रियापदाला विकल्पेकरून 'अञ्' आगम होतो, म्हणजेच धातूच्या आधी 'अञ्' लागतो. “कत्तरि लो” या सूत्राने 'ल' चा लोप होतो, आणि एकाराचा 'अव्' आदेश होतो. 38. එය්යාථ+ස්සෙ+අ+ආ+ඊ+ථානං ඔ+අ+අං+ත්ථ+ත්ථො+ව්හොක ३८. 'एय्याथ', 'स्से', 'अ', 'आ', 'ई' आणि 'थ' यांच्या जागी अनुक्रमे 'ओ', 'अ', 'अं', 'त्थ', 'त्थो' आणि 'व्हो' हे आदेश विकल्पेकरून होतात. එය්යාථාදීනං ඔආදයො වා හොන්ති යථාක්කමංති ඊස්සත්ථො, අභවිත්ථො, භවිත්ථො, අභවත්ථො, භවත්ථො. ‘‘ආ ඊ ඌ ම්හා ස්සා ස්සම්හානං වා’’ති ඊස්ස රස්සත්තං. සො අභවි භවි, අභවී භවී. 'एय्याथ' इत्यादींच्या जागी अनुक्रमे 'ओ' इत्यादी आदेश विकल्पेकरून होतात, म्हणून 'ई' च्या जागी 'त्थ' आदेश होऊन 'अभवित्थो, भवित्थो, अभवत्थो, भवत्थो' अशी रूपे होतात. “आ ई ऊ म्हा स्सा स्सम्हानं वा” या सूत्राने 'ई' चा र्हस्व होतो. (उदा.) तो झाला (सो अभवि, भवि, अभवी, भवी). 39. උංස්සිං+ස්වං+සු ३९. 'उं' आणि 'सिं' च्या जागी 'सु' आदेश होतो. තිඋංස්ස ඉංසු+අංසු වා හොන්ති. අභවිංසු භවිංසු, අභවංසු භවංසු, අභවුං භවුං. 'ति' (ti) आणि 'उं' (uṃ) यांच्या जागी 'इंसु' (iṃsu) आणि 'अंसु' (aṃsu) हे प्रत्यय पर्यायाने होतात. उदा. अभविंसु (abhaviṃsu), भविंसु (bhaviṃsu), अभवंसु (abhavaṃsu), भवंसु (bhavasṃu), अभवुं (abhavuṃ), भवुं (bhavuṃ). 42. ඔස්ස අ+ඉ+ත්ථ+ත්ථො ४२. 'ओ' (o) च्या जागी 'अ' (a), 'इ' (i), 'त्थ' (ttha) आणि 'त्थो' (ttho) हे आदेश होतात. ඔස්ස අආදයො වා හොන්ති. අභව භව, අභවි භවි, ඉඤාගමෙ අභවිත්ථ භවිත්ථ, අභවත්ථ භවත්ථ, අභවිත්ථො භවිත්ථො, අභවත්ථො භවත්ථො. 'ओ' (o) च्या जागी 'अ' (a) इत्यादी प्रत्यय पर्यायाने होतात. उदा. अभव (abhava), भव (bhava), अभवि (abhavi), भवि (bhavi); 'इ' (i) आगम झाल्यावर - अभवित्थ (abhavittha), भवित्थ (bhavittha), अभवत्थ (abhavattha), भवत्थ (bhavattha), अभवित्तो (abhavittho), भवित्तो (bhavittho), अभवत्थो (abhavattho), भवत्थो (bhavattho). 43. සි ४३. 'सि' (si). ඔස්ස සි වා හොති. අභවිසි භවිසි, අභවසි භවසි. අභවො භවො. 'ओ' (o) च्या जागी पर्यायाने 'सि' (si) होतो. उदा. अभविसि (abhavisi), भविसि (bhavisi), अभवसि (abhavasi), भवसि (bhavasi). अभवो (abhavo), भवो (bhavo). 45. ම්හාත්ථාන+මුඤ ४५. 'म्ह' (mha) आणि 'त्थ' (ttha) यांच्या जागी 'उञ' (uña) होतो. එසං [Pg.222] උඤ වා හොති. ඊආදිසම්බන්ධීනමෙව ගහණං. අභවුත්ථ භවුත්ථ. यांच्या जागी पर्यायाने 'उञ' (uña) होतो. 'ई' (ī) इत्यादींशी संबंधित असलेल्यांचेच ग्रहण केले जाते. उदा. अभवुत्थ (abhavuttha), भवुत्थ (bhavuttha). 46. ඉංස්ස ච සිඤ ४६. आणि 'इं' (iṃ) च्या जागी 'सिञ' (siña) होतो. ඉංස්ස ච සිඤ වා හොති ම්හාත්ථානඤ්ච බහුලං. ඉකාරඤ්ඤකාරා උච්චාරණආද්යාවයවත්ථා. අභවසිත්ථ භවසිත්ථ, අභවිත්ථ භවිත්ථ, අභවත්ථ භවත්ථ, අභවිසිං භවිසිං, අභවසිං භවසිං, අභවිං භවිං. උඤාගමෙ ආස්ස රස්සො. අභවුම්හ භවුම්හ අභවුම්හා භවුම්හා. සිඤාගමෙ අභවසිම්හ භවසිම්හ අභවසිම්හා භවසිම්හා අභවිම්හ භවිම්හ අභවිම්හා භවිම්හා අභවම්හ භවම්හ අභවම්හා භවම්හා. පරච්ඡක්කෙ – ‘‘එය්යාථා’’දිනා ත්ථෙ අභවිත්ථ භවිත්ථ අභවත්ථ භවත්ථ. රස්සෙ අභවථ භවථ, අභවා භවා, අභවු භවු. අභවිසෙ භවිසෙ, අභවසෙ භවසෙ, අභවිව්හං භවිව්හං අභවව්හං භවව්හං, අස්ස අ+මාදෙසෙ අභවං භවං අභව භව, අභවිම්හෙ භවිම්හෙ අභවම්හෙ භවම්හෙ. කම්මෙ සුඛං තයා අනුභූයිත්ථො අන්වභූයත්ථො අනුභූයත්ථො අන්වභූසි අනුභූසී අන්වභූයී අනුභූයී, අන්වභූයිංසු අනුභූයිංසු අන්වභූයංසු අනුභූයංසු අන්වභූයුං අනුභූයුං ඉච්චාදි. භාවෙ-තෙන අභූයිත්ථො භූයිත්ථො අභූයත්ථො භූයත්ථො අභූයි භූයි අභූයී භූයී. තෙන අභූයත්ථ භූයත්ථ අභූය භූය අභූයා භූයා. 'इं' (iṃ) च्या जागी पर्यायाने 'सिञ' (siña) होतो आणि 'म्ह' (mha) व 'त्थ' (ttha) यांच्या जागी बहुधा होतो. 'इ'कार आणि 'ञ'कार हे केवळ उच्चारणासाठी आहेत. उदा. अभवसित्थ (abhavasittha), भवसित्थ (bhavasittha), अभवित्थ (abhavittha), भवित्थ (bhavittha), अभवत्थ (abhavattha), भवत्थ (bhavattha), अभविसिं (abhavisiṃ), भविसिं (bhavisiṃ), अभवसिं (abhavasiṃ), भवसिं (bhavasiṃ), अभविं (abhaviṃ), भविं (bhaviṃ). 'उञ' आगम झाल्यावर 'आ' चा र्हस्व होतो - अभवुम्ह (abhavumha), भवुम्ह (bhavumha), अभवुम्हा (abhavumhā), भवुम्हा (bhavumhā). 'सिञ' आगम झाल्यावर - अभवसिम्ह (abhavasimha), भवसिम्ह (bhavasimha), अभवसिम्हा (abhavasimhā), भवसिम्हा (bhavasimhā), अभविम्ह (abhavimha), भविम्ह (bhavimha), अभविम्हा (abhavimhā), भविम्हा (bhavimhā), अभवम्ह (abhavamha), भवम्ह (bhavamha), अभवम्हा (abhavamhā), भवम्हा (bhavamhā). परस्मैपद षट्कात – “एय्याथा” (eyyāthā) इत्यादी सूत्राने 'त्थ' (tthe) प्रत्यय असताना - अभवित्थ (abhavittha), भवित्थ (bhavittha), अभवत्थ (abhavattha), भवत्थ (bhavattha). र्हस्व झाल्यावर - अभवथ (abhavatha), भवथ (bhavatha), अभवा (abhavā), भवा (bhavā), अभवु (abhavu), भवु (bhavu). अभविसे (abhavise), भविसे (bhavise), अभवसे (abhavase), भवसे (bhavase), अभविव्हं (abhavivhaṃ), भविव्हं (bhavivhaṃ), अभवव्हं (abhavavhaṃ), भवव्हं (bhavavhaṃ). 'अ' च्या जागी 'म' आदेश झाल्यावर - अभवं (abhavaṃ), भवं (bhavaṃ), अभव (abhava), भव (bhava), अभविम्हे (abhavimhe), भविम्हे (bhavimhe), अभवम्हे (abhavamhe), भवम्हे (bhavamhe). कर्मणी प्रयोगात - 'सुखं तया अनुभूयित्थो' (sukhaṃ tayā anubhūyittho), 'अन्वभूयत्थो' (anvabhūyattho), 'अनुभूयत्थो' (anubhūyattho), 'अन्वभूसि' (anvabhūsi), 'अनुभूसी' (anubhūsī), 'अन्वभूयी' (anvabhūyī), 'अनुभूयी' (anubhūyī), 'अन्वभूयिंसु' (anvabhūyiṃsu), 'अनुभूयिंसु' (anubhūyiṃsu), 'अन्वभूयंसु' (anvabhūyaṃsu), 'अनुभूयंसु' (anubhūyaṃsu), 'अन्वभूयुं' (anvabhūyuṃ), 'अनुभूयुं' (anubhūyuṃ) इत्यादी. भावे प्रयोगात - 'तेन अभूयित्थो' (tena abhūyittho), 'भूयित्थो' (bhūyittho), 'अभूयत्थो' (abhūyattho), 'भूयत्थो' (bhūyattho), 'अभूयि' (abhūyi), 'भूयि' (bhūyi), 'अभूयी' (abhūyī), 'भूयी' (bhūyī). 'तेन अभूयत्थ' (tena abhūyattha), 'भूयत्थ' (bhūyattha), 'अभूय' (abhūya), 'भूय' (bhūya), 'अभूया' (abhūyā), 'भूया' (bhūyā). සො අපචිත්ථො පචිත්ථො ඉච්චාදි කත්තුසමං. කම්මෙ-අපචීයිත්ථො පචීයිත්ථො අපචීයත්ථො පචීයත්ථො. චවග්ගපුබ්බ- රූපෙ [Pg.223] අපච්චිත්ථො පච්චිත්ථො අපච්චත්ථො පච්චත්ථො අපචීයි පචීයි අපචීයී පචීයී අපච්චි පච්චි අපච්චී පච්චී, අපචීයිංසු පචීයිංසු අපචිංසු පචිංසු අපචීයංසු පචීයංසු අපච්චංසු පච්චංසු අපචීයුං පචීයුං අපච්චුං පච්චුං ඉච්චාදි කත්තුසමං, පුබ්බරූපොව විසෙසො. 'सो अपचित्थो' (so apacittho), 'पचित्थो' (pacittho) इत्यादी रूपे कर्तरी प्रयोगाप्रमाणे होतात. कर्मणी प्रयोगात - अपचीयित्थो (apacīyittho), पचीयित्थो (pacīyittho), अपचीयत्थो (apacīyattho), पचीयत्थो (pacīyattho). च-वर्गाचे पूर्वरूप झाल्यावर - अपच्चित्थो (apaccittho), पच्चित्थो (paccittho), अपच्चत्थो (apaccattho), पच्चत्थो (paccattho), अपचीयि (apacīyi), पचीयि (pacīyi), अपचीयी (apacīyī), पचीयी (pacīyī), अपच्चि (apacci), पच्चि (pacci), अपच्ची (apaccī), पच्ची (paccī), अपचीयिंसु (apacīyiṃsu), पचीयिंसु (pacīyiṃsu), अपचिंसु (apaciṃsu), पचिंसु (paciṃsu), अपचीयंसु (apacīyaṃsu), पचीयंसु (pacīyaṃsu), अपच्चंसु (apaccaṃsu), पच्चंसु (paccaṃsu), अपचीयुं (apacīyuṃ), पचीयुं (pacīyuṃ), अपच्चुं (apaccuṃ), पच्चुं (paccuṃ) इत्यादी रूपे कर्तरी प्रयोगाप्रमाणेच होतात, केवळ पूर्वरूप होणे हाच यात विशेष फरक आहे. සො ගාමං අගච්ඡිත්ථො ගච්ඡිත්ථො ඉච්චාදි පුරිමසමං. 'सो गामं अगच्छित्थो' (so gāmaṃ agacchittho), 'गच्छित्थो' (gacchittho) इत्यादी रूपे पूर्वीप्रमाणेच होतात. 30. ඩංසස්ස ච ඤ්ඡඞ ३०. 'दंस' (daṃs) धातूच्या जागी 'ञ्छङ' (ñchaṅa) आदेश होतो. ඩංසස්ස ච ගමිස්ස ච ඤ්ඡඞ වා හොති ආ+ඊආදීසු. අගඤ්ඡිත්ථො ගඤ්ඡිත්ථො අගඤ්ඡත්ථො ගඤ්ඡත්ථො අගඤ්ඡි ගඤ්ඡි අගඤ්ඡී ගඤ්ඡී ඉච්චාදි. 'दंस' (daṃs) आणि 'गम्' (gam) धातूंच्या जागी 'आ' (ā), 'ई' (ī) इत्यादी प्रत्यय असताना पर्यायाने 'ञ्छङ' (ñchaṅa) आदेश होतो. उदा. अगञ्छित्थो (agañchittho), गञ्छित्थो (gañchittho), अगञ्छत्थो (agañchattho), गञ्छत्तो (gañchattho), अगञ्छि (agañchi), गञ्छि (gañchi), अगञ्छी (agañchī), गञ्छी (gañchī) इत्यादी. 29. ගමිස්සා २९. 'गम्' (gam) धातूच्या जागी 'आ' (ā) होतो. ආආදො ඊආදො ච ගමිස්ස ආ හොති වා. සො අගා අගමි ගමි අගමිත්ථො ගමිත්ථො අගමත්ථො ගමත්ථො. ඊපච්චයෙ ලස්සාකාරස්ස ‘‘හිමිමෙස්ව+ස්සා’’ති එත්ථ ‘‘අස්සා’’ති යොගවිභාගා දීඝෙ ‘‘දීඝා ඊස්සා’’ති ඊස්ස සිආදෙසො, අගමාසි අගමි ගමි අගමී ගමී, අගමිංසු ගමිංසු අගමංසු ගමංසු අගමුං ගමුං. ඔස්ස අආදෙසෙ අජ්ඣගුං. ත්වං අජ්ඣගා පරස්ස ලොපො. තුම්හෙ අජ්ඣගුත්ථ. අහං අජ්ඣගං, මයං අජ්ඣගම්හ. පරච්ඡක්කෙ – ‘‘එය්යාථා’’දිනා ත්ථෙ සො අගච්ඡිත්ථ ගච්ඡිත්ථ අගඤ්ඡිත්ථ ගඤ්ඡිත්ථ අගමිත්ථ ගමිත්ථ අගම ගම අගමා ගමා. තෙ අගමූ ගමූ, ඔස්ස ආආදෙසෙ අජ්ඣගුං. ත්වං අගමිසෙ ගමිසෙ. තුම්හෙ අගමිව්හං. ‘‘එය්යාථා’’ දිනා අ+මාදෙසෙ අහං අගමං ගමං අජ්ඣගං. මයං අගමිම්හෙ ගමිම්හෙ. කම්මෙඅගච්ඡීයි අගමීයි, අගච්ඡියුං අගමියුං ඉච්චාදි. තථා අඝම්මී ඝම්මී ඉච්චාදි. 'आ' (ā) आणि 'ई' (ī) इत्यादी प्रत्यय असताना 'गम्' (gam) धातूच्या जागी पर्यायाने 'आ' (ā) होतो. उदा. सो अगा (so agā), अगमि (agami), गमि (gami), अगमित्तो (agamittho), गमित्तो (gamittho), अगमत्तो (agamattho), गमत्तो (gamattho). 'ई' (ī) प्रत्यय असताना र्हस्व अकाराचा “हिमिमेस्वेस्स” (himimesvassa) या सूत्रातील “अस्स” (assa) या योगविभागाने दीर्घ होतो आणि “दीघा ईस्स” (dīghā īssā) या सूत्राने 'ई' च्या जागी 'सि' (si) आदेश होतो, उदा. अगमासि (agamāsi), अगमि (agami), गमि (gami), अगमी (agamī), गमी (gamī), अगमिंसु (agamiṃsu), गमिंसु (gamiṃsu), अगमंसु (agamaṃsu), गमंसु (gamaṃsu), अगमुं (agamuṃ), गमुं (gamuṃ). 'ओ' (o) च्या जागी 'अ' (a) आदेश झाल्यावर - अज्झगुं (ajjhaguṃ). त्वं अज्झगा (tvaṃ ajjhagā) - येथे परलोप होतो. तुम्हे अज्झगुत्थ (tumhe ajjhaguttha). अहं अज्झगं (ahaṃ ajjhagaṃ), मयं अज्झगम्ह (mayaṃ ajjhagamha). परस्मैपद षट्कात – “एय्याथा” (eyyāthā) इत्यादी सूत्राने 'त्थ' (tthe) प्रत्यय असताना - सो अगच्छित्थ (so agacchittha), गच्छित्थ (gacchittha), अगञ्छित्थ (agañchittha), गञ्छित्थ (gañchittha), अगमित्थ (agamittha), गमित्थ (gamittha), अगम (agama), गम (gama), अगमा (agamā), गमा (gamā). ते अगमू (te agamū), गमू (gamū), 'ओ' (o) च्या जागी 'आ' (ā) आदेश झाल्यावर - अज्झगुं (ajjhaguṃ). त्वं अगमिसे (tvaṃ agamise), गमिसे (gamise). तुम्हे अगमिव्हं (tumhe agamivhaṃ). “एय्याथा” (eyyāthā) इत्यादी सूत्राने 'अ' आणि 'म' आदेश झाल्यावर - अहं अगमं (ahaṃ agamaṃ), गमं (gamaṃ), अज्झगं (ajjhagaṃ). मयं अगमिम्हे (mayaṃ agamimhe), गमिम्हे (gamimhe). कर्मणी प्रयोगात - अगच्छीयि (agacchīyi), अगमीयि (agamīyi), अगच्छीयुं (agacchīyuṃ), अगमीयुं (agamīyuṃ) इत्यादी. तसेच अघम्मी (aghammī), घम्मी (ghammī) इत्यादी. 13. මායොගෙ ඊ+ආආදී १३. 'मा' (mā) चा योग असताना 'ई' (ī), 'आ' (ā) इत्यादी प्रत्यय पर्यायाने होतात. මායොගෙ [Pg.224] සති ඊආදයො ආආදයො ච වා හොන්ති. සකකාලතො කාලන්තරෙපි පච්චයවිධානත්ථො+යං. මා භවං අභවිත්ථො ඉච්චාදි. වාවිධානාස්සත්යාදි+එය්යාදි+ත්වාදයොපි හොන්ති, මා භවං භවිස්සති, මා භවං භවෙය්ය, මා භවං භවතු ඉච්චාදි. (ඊආදිපච්චයනයො). 'मा' (mā) चा योग असताना 'ई' (ī) इत्यादी आणि 'आ' (ā) इत्यादी प्रत्यय पर्यायाने होतात. हा नियम स्वतःच्या काळाव्यतिरिक्त इतर काळातही प्रत्यय विधानासाठी आहे. उदा. मा भवं अभवित्थो (mā bhavaṃ abhavittho) इत्यादी. 'वा' या विधानामुळे भविष्यकाळ (स्सत्यादि), विध्यर्थ (एय्यादि) आणि आज्ञार्थ (त्वादय) प्रत्यय देखील होतात, उदा. मा भवं भविस्सति (mā bhavaṃ bhavissati), मा भवं भवेय्य (mā bhavaṃ bhaveyya), मा भवं भवतु (mā bhavaṃ bhavu) इत्यादी. (हा 'ई' इत्यादी प्रत्ययांचा विधी होय). 5. අනජ්ජතනෙ ආ ඌඔ ත්ථ අ ම්හා ත්ථ ත්ථුං සෙ ව්හං ඉං ම්හසෙ ५. अनद्यतन (आजचा नसलेला) भूतकाळात 'आ, ऊ, ओ, त्थ, अ, म्हा, त्थ, त्थुं, से, व्हं, इं, म्हेसे' हे प्रत्यय होतात. අවිජ්ජමානජ්ජතනෙ භූතත්ථෙ වත්තමානතො ක්රියත්ථා ආආදයො හොන්ති වා. ‘‘එය්යාථා’’දිනා ත්ථෙ ‘‘ආ ඊ ඌ ම්හා’’ ඉච්චාදිනා රස්සෙ ච සො අභවත්ථ භවත්ථ අභව භව අභවා භවා, තෙ අභවු භවු අභවූ භවූ. ඔ, ‘‘ඔස්සා’’තිආදිනා අආදයො, අභව භව අභවි භවි අභවත්ථ භවත්ථ අභවත්ථො භවත්ථො, සිආදෙසෙ අභවසි භවසි අභවො භවො. තුම්හෙ අභවත්ථ භවත්ථ. අහං අභවං භවං අභව භව, මයං අභවම්හ භවම්හ අභවම්හා භවම්හා. සො අභවත්ථ භවත්ථ. තෙ අභවත්ථුං භවත්ථුං. ත්වං අභවසෙ භවසෙ. තුම්හෙ අභවව්හං භවව්හං. ‘‘ඉස්ස ච සිඤ’’ති සිං, අහං අභවසිං භවසිං අභවිං භවිං. මයං අභවම්හසෙ භවම්හසෙ. කම්මෙ-ත්ථෙ සුඛං තයා අනුභූයිත්ථ, ඉඤාගමාභාවෙ අනුභූයත්ථ ඉච්චාදි. භාවෙ-අභූයත්ථ භූයත්ථ ඉච්චාදි. अनद्यतन (आजचा नसलेला) भूतकाळात क्रिया दर्शवण्यासाठी 'आ' इत्यादी प्रत्यय पर्यायाने होतात. “एय्याथा” (eyyāthā) इत्यादी सूत्राने 'त्थ' (tthe) प्रत्यय असताना आणि “आ ई ऊ म्हा” (ā ī ū mhā) इत्यादी सूत्राने र्हस्व झाल्यावर - सो अभवत्थ (so abhavattha), भवत्थ (bhavattha), अभव (abhava), भव (bhava), अभवा (abhavā), भवा (bhavā); ते अभवु (te abhavu), भवु (bhavu), अभवू (abhavū), भवू (bhavū). 'ओ' (o) च्या जागी “ओस्सा” (ossā) इत्यादी सूत्राने 'अ' इत्यादी आदेश झाल्यावर - अभव (abhava), भव (bhava), अभवि (abhavi), भवि (bhavi), अभवत्थ (abhavattha), भवत्थ (bhavattha), अभवत्त्थो (abhavattho), भवत्त्थो (bhavattho); 'सि' (si) आदेश झाल्यावर - अभवसि (abhavasi), भवसि (bhavasi), अभवो (abhavo), भवो (bhavo). तुम्हे अभवत्थ (tumhe abhavattha), भवत्थ (bhavattha). अहं अभवं (ahaṃ abhavaṃ), भवं (bhavaṃ), अभव (abhava), भव (bhava); मयं अभवम्ह (mayaṃ abhavamha), भवम्ह (bhavamha), अभवम्हा (abhavamhā), भवम्हा (bhavamhā). सो अभवत्थ (so abhavattha), भवत्थ (bhavattha). ते अभवत्थुं (te abhavatthuṃ), भवत्थुं (bhavatthuṃ). त्वं अभवसे (tvaṃ abhavase), भवसे (bhavase). तुम्हे अभवव्हं (tumhe abhavavhaṃ), भवव्हं (bhavavhaṃ). “इंस च सिञ” (iṃssa ca siña) या सूत्राने 'सिं' (siṃ) झाल्यावर - अहं अभवसिं (ahaṃ abhavasiṃ), भवसिं (bhavasiṃ), अभविं (abhaviṃ), भविं (bhaviṃ). मयं अभवम्हसे (mayaṃ abhavamhase), भवम्हसे (bhavamhase). कर्मणी प्रयोगात 'त्थ' (tthe) प्रत्यय असताना - 'सुखं तया अनुभूयित्थ' (sukhaṃ tayā anubhūyittha); 'इ' आगम न झाल्यास - 'अनुभूयत्थ' (anubhūyattha) इत्यादी. भावे प्रयोगात - अभूयत्थ (abhūyattha), भूयत्थ (bhūyattha) इत्यादी. සො [Pg.225] ඔදනං අපචත්ථ පචත්ථ ඉච්චාදි කත්තුසමං. කම්මෙ-අපචීයත්ථ පචීයත්ථ අපච්චත්ථ පච්චත්ථ අපචීය පචීය අපචීයා පචීයා අපච්ච පච්ච අපච්චා පච්චා. අපචීයු පචීයු අපචීයූ පචීයූ අපච්චු පච්චු අපච්චූ පච්චූ ඉච්චාදි. ‘‘මායොගෙ ඊ+ආආදී’’ති මායොගෙපි ආආදයො, මා භවං අපච්චත්ථ ඉච්චාදි. 'सो ओदनं अपचत्थ' (so odanaṃ apacattha), 'पचत्थ' (pacattha) इत्यादी रूपे कर्तरी प्रयोगाप्रमाणे होतात. कर्मणी प्रयोगात - अपचीयत्थ (apacīyattha), पचीयत्थ (pacīyattha), अपच्चत्थ (apaccattha), पच्चत्थ (paccattha), अपचीय (apacīya), पचीय (pacīya), अपचीया (apacīyā), पचीया (pacīyā), अपच्च (apacca), पच्च (pacca), अपच्चा (apaccā), पच्चा (paccā). अपचीयु (apacīyu), पचीयु (pacīyu), अपचीयू (apacīyū), पचीयू (pacīyū), अपच्चु (apaccu), पच्चु (paccu), अपच्चू (apaccū), पच्चू (paccū) इत्यादी. “मायोगे ई+आआदी” (māyoge ī+āādī) या सूत्राने 'मा' चा योग असताना देखील 'आ' इत्यादी प्रत्यय होतात, उदा. मा भवं अपच्चत्थ (mā bhavaṃ apaccattha) इत्यादी. තථා අගච්ඡත්ථ ගච්ඡත්ථ ඉච්චාදි පුරිමසමං. තථා අගමත්ථ ගමත්ථ ඉච්චාදිපි අඝම්මත්ථ ඝම්මත්ථ ඉච්චාදිපි. (අනජ්ජතනපච්චයනයො). तसेच अगच्छत्थ (agacchattha), गच्छत्थ (gacchattha) इत्यादी रूपे पूर्वीप्रमाणेच होतात. तसेच अगमत्थ (agamattha), गमत्थ (gamattha) इत्यादी आणि अघम्मत्थ (aghammattha), घम्मत्थ (ghammattha) इत्यादी रूपे देखील होतात. (हा अनद्यतन भूतकाळ प्रत्ययांचा विधी होय). 6. පරොක්ඛෙ අ උ එ ත්ථ අ ම්හ ත්ථ රෙ ත්ථො ව්හො ඉ ම්හෙ ६. परोक्ष (डोळ्यांसमोर नसलेल्या) भूतकाळात 'अ, उ, ए, त्थ, अ, म्ह, त्थ, रे, त्त्थो, व्हो, इ, म्हे' हे प्रत्यय होतात. අපච්චක්ඛෙ භූතානජ්ජතනෙ වත්තමානතො ක්රියත්ථා අආදයො හොන්ති. අක්ඛානං=ඉන්ද්රියානං පරං පරොක්ඛං. තස්මිං. ‘‘අපරොක්ඛෙසූ’’ති වචනා ක්ය+ලාදිවිකරණා න හොන්ති. प्रत्यक्ष नसलेल्या (अपरोक्ष) अनद्यतन भूतकाळात क्रिया दर्शवण्यासाठी 'अ' इत्यादी प्रत्यय होतात. 'अक्खाणं' (akkhānaṃ) म्हणजे इंद्रियांच्या पलीकडचे ते 'परोक्ष' (parokkhaṃ) होय. त्या अर्थी. “अपरोक्खेसु” (aparokkhesu) या वचनामुळे 'क्य' (kya) आणि 'ल' (la) इत्यादी विकरण प्रत्यय होत नाहीत. 5,71. පරොක්ඛායඤ්ච ५,७१. आणि परोक्ष काळात (द्वित्व होते). පරොක්ඛායං පඨම+මෙකස්සරං සද්දරූපං ද්වෙ භවති. ‘‘භූස්ස වුක’’ ඉතිආදීසු වුක, භූව භූව ඉති ද්විත්තෙ – परोक्ष काळात शब्दाचे पहिले एकाक्षरी (एक स्वर असलेले) रूप द्वित्व पावते (दोन वेळा होते). “भूस्स वुक” (bhūssa vuka) इत्यादी सूत्रांनी 'वुक' (vuka) आदेश होऊन, 'भूव भूव' (bhūva bhūva) असे द्वित्व झाल्यावर - 5,75. ලොපො+නාදිබ්යඤ්ජනස්ස ५,७५. अनादि व्यंजनाचा लोप होतो. ද්විත්තෙ පුබ්බස්ස ආදිතො+ඤ්ඤස්ස බ්යඤ්ජනස්ස ලොපො හොති. द्वित्व (द्विरुक्ती) झाल्यावर, पूर्व (पहिल्या) अक्षराच्या सुरुवातीच्या व्यंजनाखेरीज इतर व्यंजनाचा लोप होतो. 18. පුබ්බස්ස අ १८. पूर्व अक्षराचा 'अ' होतो. අආදීසු ද්විත්තෙ පුබ්බස්ස භූස්ස අ හොති. 'अ' इत्यादी प्रत्यय असताना द्वित्व झाल्यावर, पूर्व 'भू' धातूच्या स्वराचा 'अ' होतो. 5,78. චතුත්ථදුතියානං තතියපඨමා ५,७८. चौथ्या आणि दुसऱ्या व्यंजनांच्या जागी अनुक्रमे तिसरे आणि पहिले व्यंजन होते. ද්විත්තෙ [Pg.226] පුබ්බෙසං චතුත්ථදුතියානං තතියපඨමා හොන්ති යථාක්කමංති බකාරෙ සො බභූව කිර, තෙ බභුවු කිර. ත්වං බභුවෙ කිර, ඉඤ තුම්හෙ බභුවිත්ථ කිර. අහං බභුව කිර, මයං බභුවිම්හ කිර. සො බභුවිත්ථ කිර, තෙ බභුවිරෙ කිර. ත්වං බභුවිත්ථො කිර, තුම්හෙ බභුවිව්හො කිර. අහං බභුවි කිර, මයං බභුවිම්හෙ කිර. කම්මෙ-අනුපභුව කිර ඉච්චාදි. භාවෙබභුව බභුවිත්ථ කිර. द्वित्व झाल्यावर, पूर्व अक्षरांमधील चौथ्या आणि दुसऱ्या व्यंजनांच्या जागी अनुक्रमे तिसरे आणि पहिले व्यंजन होते. 'ब' कार झाल्यावर - 'सो बभूव किर' (तो झाला म्हणे), 'ते बभुवु किर' (ते झाले म्हणे). 'त्वं बभुवे किर' (तू झालास म्हणे), 'इञ्' आगम झाल्यावर 'तुम्हे बभुवित्थ किर' (तुम्ही झालात म्हणे). 'अहं बभूव किर' (मी झालो म्हणे), 'मयं बभुविम्ह किर' (आम्ही झालो म्हणे). 'सो बभुवित्थ किर' (तो झाला म्हणे - आत्मनेपद), 'ते बभुविरे किर' (ते झाले म्हणे). 'त्वं बभुवित्थो किर' (तू झालास म्हणे), 'तुम्हे बभुविव्हो किर' (तुम्ही झालात म्हणे). 'अहं बभुवि किर' (मी झालो म्हणे), 'मयं बभुविम्हे किर' (आम्ही झालो म्हणे). कर्मणी प्रयोगात - 'अनुपभूव किर' इत्यादी. भावे प्रयोगात - 'बभूव', 'बभुवित्थ किर'. පපච, පපචු. පපචෙ, ඉඤාගමෙ පපචිත්ථ. අඤ්ඤත්ර ‘‘සංයොගාදිලොපො’’ති ලොපො, පපචිත්ථ. පපච, පපචිම්හ. පපචිත්ථ, පපචිරෙ. පපචිත්ථො පපචිථො, පපචිව්හො. පපචි, පපචිම්හෙ. එවං කම්මෙ. 'पपच' (त्याने शिजवले म्हणे), 'पपचु' (त्यांनी शिजवले म्हणे). 'पपचे', 'इञ्' आगम झाल्यावर 'पपचित्थ'. इतर ठिकाणी "संयोगादिलोप" या सूत्राने लोप होऊन 'पपचित्थ' होते. 'पपच', 'पपचिम्ह'. 'पपचित्थ', 'पपचिरे'. 'पपचित्थो', 'पपचिथो', 'पपचिव्हो'. 'पपचि', 'पपचिम्हे'. कर्मणी प्रयोगातही याचप्रमाणे होते. අආදිපච්චයෙ ද්විභාවෙ අනාදිබ්යඤ්ජනලොපෙ පුබ්බස්ස ‘‘කවග්ගහානං චවග්ගජා’’ති චවග්ගජකාරෙ ‘‘බ්යඤ්ජනෙ දීඝරස්සා’’ති දීඝෙ ච කතෙ සො ගාමං ජගාම කිර, ජගමු. ජගමෙ, ජගමිත්ථ. ජගම, ජගමිම්හ. ජගමිත්ථ, ජගමිරෙ. ජගමිත්ථො, ජගමිව්හො. ජගමි, ජගමිම්හෙ. එවං කම්මෙ. 'अ' इत्यादी प्रत्यय असताना, द्वित्व झाल्यावर, अनादि व्यंजनाचा लोप झाल्यावर, पूर्व अक्षराच्या जागी "कवग्गहानं चवग्गजा" या सूत्राने च-वर्गातील वर्ण (ज्) झाल्यावर आणि "ब्यञ्जने दीघरस्सा" या सूत्राने दीर्घ झाल्यावर - 'सो गामं जगाम किर' (तो गावाला गेला म्हणे), 'जगमु'. 'जगमे', 'जगमित्थ'. 'जगम', 'जगमिम्ह'. 'जगमित्थ', 'जगमिरे'. 'जगमित्थो', 'जगमिव्हो'. 'जगमि', 'जगमिम्हे'. कर्मणी प्रयोगातही याचप्रमाणे होते. මූළ්හවික්ඛිත්තබ්යාසත්තචිත්තෙන අත්තනාපි ක්රියා කතා අභිනිබ්බත්තිකාලෙ+නුපලද්ධාසමානා ඵලෙනා+නුමීයමානා පරොක්ඛාව වත්ථුතො. තෙන උත්තමවිසයෙපි පයොගසම්භවො. (පරොක්ඛාපච්චයනයො). मोहग्रस्त, विक्षिप्त किंवा आसक्त चित्ताने स्वतः केलेली क्रिया देखील, ती घडत असताना प्रत्यक्ष न समजल्यामुळे, नंतर केवळ परिणामावरून अनुमानित केली जाते, ती प्रत्यक्षात 'परोक्षा' (परोक्ष भूतकाळ) च असते. त्यामुळे उत्तम पुरुषाच्या (प्रथम पुरुष - स्वतःच्या) बाबतीतही याचा प्रयोग संभवतो. (हा परोक्षा प्रत्यय विधी होय). 7. ය්යොදො [Pg.227] වා+තිපත්තියං ස්සා ස්සංසු ස්සෙ ස්සථ ස්සං ස්සම්හා ස්සථ ස්සිංසුස්සසෙස්සව්හෙස්සිං ස්සාම්හසෙ. ७. क्रियातिपत्ती (अतिपत्ती - अट किंवा संकेत) अर्थामध्ये 'एय्य' इत्यादींच्या जागी 'स्सा, स्संसु, स्से, स्सथ, स्सं, स्सम्ह, स्सथ, स्सिंसु, स्ससे, स्सव्हे, स्सिं, स्साम्हसे' हे प्रत्यय विकल्पेकरून होतात. එය්යාදො විසයෙ ක්රියාතිපත්තියං ස්සාදයො හොන්ති. විධුරපච්චයොපනිපාතතො කාරණවෙකල්ලතො වා ක්රියාතිපතන+මනිප්ඵත්ති ක්රියාතිපත්ති. එතෙ ච ස්සාදයො සාමත්ථියා අතීතානාගතෙස්වෙව හොන්ති, න වත්තමානෙ, තත්ර ක්රියාතිපත්යසම්භවා. ඉඤාගමෙ ස්සාස්ස වා රස්සෙ ච සචෙ සො පඨමවයෙ පබ්බජ්ජං අලභිස්ස, අරහා අභවිස්ස භවිස්ස අභවිස්සා භවිස්සා වා, තෙ ච තං අලභිස්සංසු, අරහන්තො අභවිස්සංසු භවිස්සංසු. ‘‘එය්යාථා’’දිනා ස්සෙස්ස වා අකාරෙ ත්වං අභවිස්ස භවිස්සෙ. තුම්හෙ අභවිස්සථ. අහං අභවිස්සං. රස්සෙ මයං අභවිස්සම්හ භවිස්සම්හ අභවිස්සම්හා භවිස්සම්හා. පරච්ඡක්කෙ-සො අභවිස්සථ, අභවිස්සිංසු. අභවිස්සසෙ, අභවිස්සව්හෙ. අභවිස්සිං, අභවිස්සාම්හසෙ. 'एय्य' इत्यादींच्या विषयात क्रियातिपत्ती (संकेतार्थ) असताना 'स्सा' इत्यादी प्रत्यय होतात. प्रतिकूल कारणांच्या उपस्थितीमुळे किंवा कारणांच्या अभावामुळे क्रियेची असिद्धी (पूर्ण न होणे) म्हणजेच 'क्रियातिपत्ती' होय. आणि हे 'स्सा' इत्यादी प्रत्यय स्वाभाविकपणे केवळ भूतकाळ आणि भविष्यकाळातच होतात, वर्तमानकाळात नाही; कारण वर्तमानकाळात क्रियातिपत्तीचा (क्रियेच्या असिद्धीचा) संभव नसतो. 'इञ्' आगम झाल्यावर, 'स्सा' चा विकल्पेकरून र्हस्व झाल्यावर - 'सचे सो पठमवये पब्बज्जं अलभिस्स, अरहा अभविस्स भविस्स अभविस्सा भविस्सा वा' (जर त्याने तरुण वयातच प्रव्रज्या घेतली असती, तर तो अर्हत झाला असता), 'ते च तं अलभिस्सुं, अरहन्तो अभविस्सुं भविस्सुं'. "एय्याथा" इत्यादी सूत्राने 'स्से' च्या जागी विकल्पेकरून 'अ' कार झाल्यावर - 'त्वं अभविस्स भविस्से'. 'तुम्हे अभविस्सथ'. 'अहं अभविस्सं'. र्हस्व झाल्यावर - 'मयं अभविस्सम्ह भविस्सम्ह अभविस्म्हा भविस्म्हा'. परस्मैपदाच्या सहा प्रत्ययांमध्ये - 'सो अभविस्सथ', 'अभविस्सिंसु'. 'अभविस्ससे', 'अभविस्सव्हे'. 'अभविस्सिं', 'अभविस्साम्हसे'. කම්මෙ-තෙන සුඛං අන්වභවිස්ස, අන්වභවිස්සංසු ක්යලොපො. අන්වභූයිස්ස අන්වභූයිස්සා ඉච්චාදි. භාවෙ-තෙන අභූයිස්ස භූයිස්ස අභූයිස්සා භූයිස්සා. අභූයිස්සථ භූයිස්සථ. कर्मणी प्रयोगात - 'तेन सुखं अन्वभविस्स' (त्याने सुखाचा अनुभव घेतला असता), 'अन्वभविस्सुं' ('क्य' चा लोप होऊन). 'अन्वभूयिस्स', 'अन्वभूयिस्सा' इत्यादी. भावे प्रयोगात - 'तेन अभूयिस्स', 'भूयिस्स', 'अभूयिस्सा', 'भूयिस्सा'. 'अभूयिस्सथ', 'भूयिस्सथ'. එවං තණ්ඩුලාදිසාධනං අලභිස්ස, ඔදනං අපචිස්ස පචිස්ස ඉච්චාදි. කම්මෙ-තෙන ඔදනො අපචිස්ස පචිස්ස අපචිස්සා පචිස්සා අපචීයිස්ස පචීයිස්ස අපචීයිස්සා පචීයිස්සා අපච්චිස්ස පච්චිස්ස අපච්චිස්සා පච්චිස්සා ඉච්චාදි. याचप्रमाणे - 'तण्डुलादिसाधनं अलभिस्स' (तांदूळ इत्यादी साधने मिळाली असती तर), 'ओदनं अपचिस्स', 'पचिस्स' (भात शिजवला असता) इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'तेन ओदनो अपचिस्स', 'पचिस्स', 'अपचिस्सा', 'पचिस्सा', 'अपचीयिस्स', 'पचीयिस्स', 'अपचीयिस्सा', 'पचीयिस्सा', 'अपच्चिस्स', 'पच्चिस्स', 'अपच्चिस्सा', 'पच्चिस्सा' इत्यादी. සො අගච්ඡිස්ස ගච්ඡිස්ස අගච්ඡිස්සා ගච්ඡිස්සා ඉච්චාදි. ච්ඡාදෙසා+භාවෙ අගමිස්ස ගමිස්ස අගමිස්සා ගමිස්සා ඉච්චාදි. කම්මෙ-අගච්ඡිස්ස [Pg.228] ගච්ඡිස්ස අගච්ඡීයිස්ස ඉච්චාදි. අගමිස්ස ගමිස්ස අගමීයිස්ස ඉච්චාදි. තථා අඝම්මිස්ස ඉච්චාදි. (ක්රියාතිපත්තිපච්චයනයො). 'सो अगच्छिस्स', 'गच्छिस्स', 'अगच्छिस्सा', 'गच्छिस्सा' इत्यादी. 'च्छ' आदेश न झाल्यास - 'अगमिस्स', 'गमिस्स', 'अगमिस्सा', 'गमिस्सा' इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'agacchissa' (अगच्छिस्स), 'गच्छिस्स', 'अगच्छीयिस्स' इत्यादी. 'अगमिस्स', 'गमिस्स', 'अगमीयिस्स' इत्यादी. तसेच 'अघम्मिस्स' इत्यादी. (हा क्रियातिपत्ती प्रत्यय विधी होय). 8. හෙතුඵලෙස්වෙ+ය්ය එය්යුං එය්යාසි එය්යාථ එය්යාමි එය්යාම එථ එරං එථො එය්යාව්හො එය්යං එය්යාම්හෙ. ८. कार्य-कारण (हेतू आणि फल) अर्थामध्ये 'एय्य, एय्युं, एय्यासि, एय्याथ, एय्यामि, एय्याम, एथ, एरं, एथो, एय्याव्हो, एय्यं, एय्याम्हे' हे प्रत्यय होतात. හෙතුභූතායං ඵලභූතායඤ්ච ක්රියායං වත්තමානතො ක්රියත්ථා එය්යාදයො හොන්ති වා. ලවිකරණවුද්ධිආදි පුබ්බසමං. පරිකප්පෙ – कारणरूप आणि फलरूप क्रियेमध्ये, वर्तमानकाळातील धातूंच्या पुढे क्रिया दर्शवणारे 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय विकल्पेकरून होतात. विकरण, वृद्धी इत्यादी कार्ये पूर्वीप्रमाणेच होतात. परिकल्प (तर्क किंवा कल्पना) अर्थामध्ये - 75. එය්යෙ+ය්යාසෙ+ය්යන්නං ටෙ ७५. 'एय्य', 'एय्यासि', 'एय्यं' यांच्या जागी विकल्पेकरून 'एय्य', 'एय्यासि', 'एय्यं' हेच होतात. එය්ය+එය්යාසි+එය්ය+මිච්චෙස+මෙ වා හොති. සො දානි කින්නු ඛො භවෙ, යදි සො පඨමවයෙ පබ්බජෙය්ය, අරහා භවෙය්ය. 'एय्य', 'एय्यासि', 'एय्य' हेच विकल्पेकरून होतात. "सो दानि किन्नु खो भवे, यदि सो पठमवये पब्बजेय्य, अरहा भवेय्य" (आता तो काय बरे असेल? जर त्याने तरुण वयातच प्रव्रज्या घेतली असती, तर तो अर्हत झाला असता). 47. එය්යුංස්සුං ४७. 'एय्युं' च्या जागी 'स्सुं' होतो. එය්යු+මිච්චස්ස ඤුං වා හොති. සචෙ සංඛාරා නිච්චා භවුං භවෙය්යුං, න නිරුජ්ඣෙය්යුං. යදි ත්වං භවෙ භවෙය්යාසි. ‘‘එය්යාථා’’ දිනා අස්ස ඔකාරෙ තුම්හෙ භවෙය්යාථො භවෙය්යාථ කථ+මහං දෙවො භවෙය්යාමි. 'एय्युं' च्या जागी विकल्पेकरून 'उं' होतो. "सचे संखारा निच्चा भवुं भवेय्युं, न निरुज्झेय्युं" (जर संस्कार नित्य असते, तर ते निरुद्ध झाले नसते). "यदि त्वं भवे भवेय्यासि" (जर तू असशील). "एय्याथ" इत्यादी सूत्राने 'अ' च्या जागी 'ओ' कार झाल्यावर - 'तुम्हे भवेय्याथो', 'भवेय्याथ'. "कथं अहं देवो भवेय्यामि" (मी देव कसा बरे होईन?). 78. එය්යාමස්සෙ+මු ච ७८. 'एय्याम' च्या जागी विकल्पेकरून 'एमु' आणि 'उ' कार होतो. එය්යාමස්ස එමු වා හොති උ ච. කින්නු ඛො මයං භවෙමු භවෙය්යාමු භවෙය්යාම. පරච්ඡක්කෙ-භවෙථ, භවෙරං. භවෙථො, භවෙය්යාව්හො. භවෙ භවෙය්යං, භවෙය්යාම්හෙ. කම්මෙ-සුඛං [Pg.229] තයා අනුභුය්යෙ අනුභුය්යෙය්ය, අනුභුය්යුං අනුභූයෙය්යුං. තෙන ත්වං අනුභූයෙ අනුභූයෙය්යාසි, තුම්හෙ අනුභූයෙය්යාථො අනුභූයෙය්යාථ. තෙනා+හං අනුභූයෙය්යාමි, මයං අනුභූයෙමු අනුභූයෙය්යාමු අනුභූයෙය්යාම. පරච්ඡක්කෙ-අනුභූයෙථ ඉච්චාදි. භාවෙ-භූයෙ භූයෙය්ය භූයෙථ. 'एय्याम' च्या जागी विकल्पेकरून 'एमु' आणि 'उ' होतो. "किन्नु खो मयं भवेमु भवेय्यामु भवेय्यामा" (आम्ही काय बरे असू?). आत्मनेपदाच्या सहा प्रत्ययांमध्ये - 'भवेथ', 'भवेरं'. 'भवेथो', 'भवेय्याव्हो'. 'भवे', 'भवेय्यं', 'भवेय्याम्हे'. कर्मणी प्रयोगात - 'सुखं तया अनुभुय्ये', 'अनुभुय्येय्य', 'अनुभुय्युं', 'अनुभूयेय्युं'. 'तेन त्वं अनुभूये', 'अनुभूयेय्यासि', 'तुम्हे अनुभूयेय्याथो', 'अनुभूयेय्याथ'. 'तेन अहं अनुभूयेय्यामि', 'मयं अनुभूयेमु', 'अनुभूयेय्यामु', 'अनुभूयेय्याम'. आत्मनेपदाच्या सहा प्रत्ययांमध्ये - 'अनुभूयेथ' इत्यादी. भावे प्रयोगात - 'भूये', 'भूयेय्य', 'भूयेथ'. විධිම්හි-සො ඔදනං පචෙ පචෙය්ය ඉච්චාදි. කම්මෙ-පචීයෙ පචීයෙය්ය පච්චෙ පච්චෙය්ය ඉච්චාදි. विधी (आज्ञा किंवा कर्तव्य) अर्थामध्ये - 'सो ओदनं पचे', 'पचेय्य' (त्याने भात शिजवावा) इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'पचीये', 'पचीयेय्य', 'पच्चे', 'पच्चेय्य' इत्यादी. අනුමතියං-සො ගාමං ගච්ඡෙ ගච්ඡෙය්ය ඉච්චාදි. අඤ්ඤත්ර ගමෙ ගමෙය්ය ඉච්චාදි. තථා ඝම්මෙ ඝම්මෙය්ය ඉච්චාදි. अनुमती (परवानगी) अर्थामध्ये - 'सो गामं गच्छे', 'गच्छेय्य' (तो गावाला जाऊ शकतो/जावो) इत्यादी. इतर ठिकाणी - 'गमे', 'गमेय्य' इत्यादी. तसेच 'घम्मे', 'घम्मेय्य' इत्यादी. පාතො පචෙය්ය චෙ භුඤ්ජෙ, ඉච්චෙ+ත්ථ පචනක්රියා; හෙතුභූතාති විඤ්ඤෙය්යා, ඵලං ත්ව+නුභවක්රියා. "जर तो सकाळी शिजवेल तर जेवेल", या वाक्यात शिजवण्याची क्रिया ही 'कारणरूप' (हेतू) आहे आणि जेवण्याची (अनुभव घेण्याची) क्रिया हे 'फलरूप' आहे, असे समजावे. 11. සත්ත්ය+රහෙස්වෙ+ය්යාදී ११. शक्ती (सामर्थ्य) आणि योग्यता (पात्रता) अर्थामध्ये 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय होतात. සත්තියං අරහතෙ ච ක්රියත්ථා එය්යාදයො හොන්ති. භවං ඛලු පත්තං පචෙය්ය, භවං සත්තො, භවං අරහො. सामर्थ्य आणि योग्यता अर्थामध्ये क्रिया दर्शवणारे 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय होतात. "भवं खलु पत्तं पचेय्य" (आपण खरोखरच अन्न शिजवण्यास समर्थ आहात / पात्र आहात), "भवं सत्तो" (आपण समर्थ आहात), "भवं अरहो" (आपण योग्य आहात). 12. සම්භාවනෙ වා १२. संभावन (शक्यता किंवा कल्पना) अर्थामध्ये विकल्पेकरून 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय होतात. සම්භාවනෙ ගම්යමානෙ ධාතුනා වුච්චමානෙ ච එය්යාදයො හොන්ති විභාසා. අපි භවං ගිලිතං පාසාණං පචෙය්ය උදරග්ගිනා, සම්භාවෙමි සද්දහාමි භවං පචෙය්ය, භවං පචිස්සති, භවං අපචි. संभावन (शक्यता) सूचित होत असताना किंवा धातूद्वारे व्यक्त होत असताना 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय विकल्पेकरून होतात. "अपि भवं गिलितं पासाणं पचेय्य उदरग्गिना" (काय आपण गिळलेला दगडही जठराग्नीने पचवू शकाल?), "संभावेमि सद्दहामि भवं पचेय्य" (मी अशी शक्यता मानतो/विश्वास ठेवतो की आपण शिजवू शकाल), 'भवं पचिस्सति' (आपण शिजवाल), 'भवं अपचि' (आपण शिजवले). 9. පඤ්හ+පත්ථනා+විධීසු ९. प्रश्न, प्रार्थना (इच्छा) आणि विधी (नियम/आज्ञा) अर्थांमध्ये 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय होतात. පඤ්හාදීසු ක්රියත්ථතො එය්යාදයො හොන්ති. प्रश्न इत्यादी अर्थांमध्ये क्रिया दर्शवणाऱ्या धातूंच्या पुढे 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय होतात. පඤ්හා [Pg.230] සංපුච්ඡනං, ඉට්ඨා-සිංසනං යාචනං දුවෙ; පත්ථනා, භත්තියා වා+ථ, න වා බ්යාපාරණා විධි. 'प्रश्न' म्हणजे विचारणे; 'प्रार्थना' म्हणजे इष्ट गोष्टीची आकांक्षा करणे आणि याचना करणे हे दोन प्रकार; किंवा भक्तीने केलेली विनंती; आणि 'विधी' म्हणजे एखाद्या कार्यात प्रवृत्त करणे (आज्ञा देणे). පඤ්හෙ-කිං සො භත්තං පචෙය්ය, උදාහු බ්යඤ්ජනං. පත්ථනායං-අහො වත සො පචෙය්ය චෙ. විධිම්හි-භවං පත්තං පචෙය්ය. (එය්යාදිපච්චයනයො). प्रश्न विचारताना - "किं सो भत्तं पचेय्य, उदाहु ब्यञ्जनं" (तो भात शिजवेल की भाजी?). प्रार्थनेमध्ये - "अहो वत सो पचेय्य चे" (अरेरे, त्याने शिजवले तर किती बरे होईल!). विधीमध्ये - "भवं पत्तं पचेय्य" (आपण अन्न शिजवावे). (हा एय्यादि प्रत्यय विधी होय). 10. තු අන්තු හි ථ මි ම තං අන්තං ස්සු ව්හො එ ආමසෙ १०. 'तु, अन्तु, हि, थ, मि, म' आणि 'तं, अन्तं, स्सु, व्हो, ए, आमसे' (हे पंचमी विभक्तीचे - आज्ञार्थाचे प्रत्यय आहेत). පඤ්හපත්ථනාවිධිස්වෙ+තෙ හොන්ති ක්රියත්ථතො. ආසිංසනත්ථෙ-සො සුඛී භවතු, තෙ සුඛිතා භවන්තු. प्रश्न, प्रार्थना आणि विधी (नियम) या अर्थांमध्ये क्रियापदाच्या रूपाने हे (प्रत्यय) होतात. आशीर्वाद (शुभेच्छा) देण्याच्या अर्थात - 'तो सुखी होवो' (so sukhī bhavatu), 'ते सुखी होवोत' (te sukhitā bhavantu). 48. හිස්ස+තො ලොපො ४८. 'अ' कारानंतर येणाऱ्या 'हि' प्रत्ययाचा लोप होतो. අතො පරස්ස හිස්ස වා ලොපො හොති. ත්වං සුඛී භව භවාහි, හිම්හි දීඝො. ‘‘එය්යාථා’’දිනා ව්හොක, තුම්හෙ සුඛිතා භවථව්හො භවථ. අහං සුඛී භවාමි, මයං සුඛිනො භවාම. පරච්ඡක්කෙ-තථා භවතං, භවන්තං. භවස්සු, භවව්හො. භවෙ භවාමසෙ. කම්මෙ-තයා අනුභූයතු, අනුභූයන්තු ඉච්චාදි. භාවෙ-භූයතු, භූයතං. 'अ' कारानंतर येणाऱ्या 'हि' प्रत्ययाचा वैकल्पिकरित्या लोप होतो. 'तू सुखी हो' (tvaṃ sukhī bhava / bhavāhi) - 'हि' प्रत्यय असताना दीर्घ होतो. 'एय्याथा' इत्यादी सूत्राने 'व्हो' चा 'क' होऊन, 'तुम्ही सुखी व्हा' (tumhe sukhitā bhavathavho / bhavatha). 'मी सुखी होवो' (ahaṃ sukhī bhavāmi), 'आम्ही सुखी होवो' (mayaṃ sukhino bhavāma). परपद (दुसऱ्या सहा प्रत्ययांमध्ये) - तसेच 'भवतं' (bhavataṃ), 'भवंतं' (bhavantaṃ) होते. 'भवस्सु' (bhavassu), 'भवव्हो' (bhavavho). भावे प्रयोगात 'भवामसे' (bhavāmase) होते. कर्मणी प्रयोगात - 'तया अनुभूयतु' (तुझ्याद्वारे अनुभवले जावो), 'अनुभूयन्तु' इत्यादी. भावे प्रयोगात - 'भूयतु' (bhūyatu), 'भूयतं' (bhūyataṃ). ආණත්තියං-දෙවදත්තො දානි ඔදනං පචතු, පචන්තු ඉච්චාදි. කම්මෙ-තෙන ඔදනො පච්චතු ඉච්චාදි. තථා සො ගාමං ගච්ඡතු ඉච්චාදි. ‘‘ඌ ලස්සෙ’’ති ලස්සෙ+කාරෙ ගමෙතු, ගමෙන්තු ඉච්චාදි. ඝම්මාදෙසෙ ඝම්මතු, ඝම්මන්තු ඉච්චාදි. කම්මෙ-ගච්ඡීයතු ඉච්චාදි. තථා ගමීයතු ඉච්චාදි. आज्ञा अर्थामध्ये - 'देवदत्त आता भात शिजवो' (devadatto dāni odanaṃ pacatu), 'शिजवोत' (pacantu) इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'त्याच्याद्वारे भात शिजवला जावो' (tena odano paccatu) इत्यादी. तसेच 'तो गावात जावो' (so gāmaṃ gacchatu) इत्यादी. 'ऊ लस्स' या सूत्राने 'ल' च्या जागी 'ए' कार होऊन 'गमेतु' (gametu), 'गमेन्तु' (gamentu) इत्यादी रूपे होतात. 'घम्म' आदेश झाल्यावर 'घम्मतु' (ghammatu), 'घम्मन्तु' (ghammantu) इत्यादी रूपे होतात. कर्मणी प्रयोगात - 'गच्छीयतु' (gacchīyatu) इत्यादी, तसेच 'गमीयतु' (gamīyatu) इत्यादी रूपे होतात. විධිම්හි-ලස්ස ලොපෙ ලුත්තෙ වුද්ධි, ඉධ පබ්බතො හොතු. विधी (नियम) अर्थामध्ये - 'ल' चा लोप झाल्यावर वृद्धी होते, जसे - 'येथे पर्वत असो' (idha pabbato hotu). නිමන්තනෙ-අධිවාසෙථ [Pg.231] තුම්හෙ භන්තෙ භගවා භොජනං, වසතිස්ස ‘‘චුරාදිතො ණී’’ති ණිම්හි ‘‘අස්සා ණානුබන්ධෙ’’ති ආ, ‘‘යුවණ්ණාන+මෙඔ පච්චයෙ’’ති එ ච හොති. ඉධ නිස්සීදතු භවං, සදස්ස ‘‘ජර+සදාන+මීම වා’’ති ඊම, මනුබන්ධත්තා අන්තසරතො ඊම. निमंत्रण अर्थात - 'भन्ते! भगवंतांनी भोजनाचा स्वीकार करावा' (adhivāsetha tumhe bhante bhagavā bhojanaṃ). 'वसति' धातूला 'चुरादितो णी' या सूत्राने 'णि' प्रत्यय लागून, 'अस्सा णानुबंधे' या सूत्राने 'आ' आणि 'युवण्णानमेओ पच्चये' या सूत्राने 'ए' होतो. 'आपण येथे बसावे' (idha nisīdatu bhavaṃ) - येथे 'सद्' धातूला 'जरासदानमीम वा' या सूत्राने 'ईम' आदेश होतो, आणि 'म्' अनुबंध असल्यामुळे अंत्य स्वराच्या नंतर 'ईम' होतो. අජ්ඣෙසනෙ-දෙසෙතු භන්තෙ භගවා ධම්මං, එත්ථ චුරාදිත්තා පුරිමසමං. अध्येषणा (याचना/विनंती) अर्थात - 'भन्ते! भगवंतांनी धम्माचा उपदेश करावा' (desetu bhante bhagavā dhammaṃ). येथे 'चुरादि' गण असल्यामुळे पूर्वीप्रमाणेच रूप होते. අනුමතියං-පුච්ඡ වාසව මං පඤ්හං, පවිසතු භවං. එත්ථ පුච්ඡතො හිස්ස ලොපො. එවං නිසීද. अनुमती (परवानगी) अर्थात - 'हे वासव! मला प्रश्न विचार' (puccha vāsava maṃ pañhaṃ), 'आपण प्रवेश करावा' (pavisatu bhavaṃ). येथे 'पुच्छ' नंतर 'हि' प्रत्ययाचा लोप होतो. याचप्रमाणे 'निसीद' (nisīda) होते. පත්ථනා=යාචනා, තත්ර-දද=දානෙ, දදාහි මෙ ගාමවරානි පඤ්ච, දාතො ලස්ස එකාරෙ ච එකං මෙ නයනං දෙහි. प्रार्थना म्हणजे याचना (मागणी). त्यामध्ये 'दद' धातू देण्याच्या अर्थात आहे - 'मला पाच श्रेष्ठ गावे द्या' (dadāhi me gāmavarāni pañca). 'दा' धातूच्या 'ल' प्रत्ययाचा 'ए' कार झाल्यावर 'मला एक डोळा द्या' (ekaṃ me nayanaṃ dehi) असे रूप होते. පත්තකාලෙ-සම්පත්තො තෙ කාලො කටකරණෙ, කටං කරොතු භවං. එත්ථ ‘‘තනාදිත්වො’’ති ඔ. योग्य वेळ (प्राप्तकाल) अर्थात - 'तुझ्यासाठी चटई बनवण्याची वेळ आली आहे, आपण चटई बनवावी' (kaṭaṃ karotu bhavaṃ). येथे 'तनादित्वो' या सूत्राने 'ओ' होतो. ත්වාදී එය්යාදයො වත්ත-මානා සම්පති,+නාගතෙ; භවිස්සති, පරොක්ඛාදි-චත්තාරො+තීතකාලිකා. 'तु' इत्यादी आणि 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय वर्तमानकाळ आणि भविष्यकाळात होतात; 'भविष्यन्ती' भविष्यकाळात आणि 'परोक्खा' इत्यादी चार भूतकाळात होतात. 5,173. ගම යමි+සා+ස දිසානං වා ච්ඡඞ ५,१७३. 'गम्', 'यम्', 'इष्', 'आस्' आणि 'दिश्' या धातूंना वैकल्पिकरित्या 'च्छ' आदेश होतो. එතෙසං වා ච්ඡඞ හොතින්ත+මාන+ත්යාදීසු. සො සග්ගං ගච්ඡති ගමෙති, ගච්ඡන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-ගච්ඡීයති ගමීයති ඉච්චාදි. යම=උපරමෙ, පරොක්ඛාඅනජ්ජතනරූපානි සබ්බත්ථ පයොග+මනුගම්ම යොජෙතබ්බානි. නිපුබ්බො, නියච්ඡති නියමති, නියච්ඡන්ති නියමන්ති. සංපුබ්බො, ‘‘යෙ සංස්සා’’ති ඤ්ඤත්තං, සඤ්ඤමති, සඤ්ඤමන්ති. කම්මෙ-නියච්ඡීයති නියමීයති නියම්මති, සඤ්ඤමීයති වා. තථා [Pg.232] නියච්ඡිස්සති, සඤ්ඤමිස්සති. නියච්ඡි, සංයමි. නියච්ඡිස්ස, සංයමිස්ස. නියච්ඡෙය්ය, සංයමෙය්ය. නියච්ඡතු, සඤ්ඤමතු. ඉස+සිංස=ඉච්ඡායං, සො සග්ගං ඉච්ඡති, ඉච්ඡන්ති ඉච්චාදි. ‘‘ලහුස්සුපන්තස්සා’’ති වුද්ධිම්හි එසති, එසන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-ඉච්ඡීයති, ‘‘වා ක්වචී’’ති වුද්ධිම්හි එසීයති. පුබ්බරූපෙ ඉස්සති ඉස්සතෙ ඉච්චාදි. ඉච්ඡිස්සති එසිස්සති ඉච්චාදි. ඉච්ඡි එසි. ඉච්ඡිස්ස එසිස්ස. ඉච්ඡෙය්ය එසෙය්ය. ඉච්ඡතු එසතු ඉච්චාදි. ආස=උපවෙසනෙ, සො ආසනෙ අච්ඡති ඉච්චාදි. ‘‘බ්යඤ්ජනෙ දීඝරස්සා’’ති රස්සො, උපපුබ්බො, තථා උපාසති. අච්ඡිස්සති උපාසිස්සති. අච්ඡි උපාසි. අච්ඡිස්ස උපාසිස්ස. අච්ඡෙය්ය උපාසෙය්ය. අච්ඡතු උපාසතු ඉච්චාදි. දිස=පෙක්ඛනෙ, දිච්ඡති දිච්ඡන්ති ඉච්චාදි සබ්බං පුරිමසමං. ලභ=ලාභෙ, ඉතො පරං විසෙසට්ඨානමෙවවක්ඛාම, සබ්බවාරො වුත්තානුසාරෙන ගහෙතබ්බො. ලභති, ලභන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-ක්යස්ස පුබ්බරූපාදිම්හි කතෙ ලබ්භති ඉච්චාදි. 'अन्त', 'मान', 'ति' इत्यादी प्रत्यय असताना या धातूंना वैकल्पिकरित्या 'च्छ' आदेश होतो. 'तो स्वर्गात जातो' (so saggaṃ gacchati / gameti), 'जातात' (gacchanti) इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'गच्छीयति' (gacchīyati), 'गमीयति' (gamīyati) इत्यादी. 'यम्' धातू उपरम (संयम/थांबणे) अर्थात आहे; परोक्खा आणि अनज्जतनी काळातील रूपे सर्वत्र प्रयोगाला अनुसरून योजावीत. 'नि' उपसर्ग असताना - 'नियच्छति' (niyacchati), 'नियमति' (niyamati), 'नियच्छन्ति' (niyacchanti), 'नियमन्ति' (niyamanti). 'सं' उपसर्ग असताना, 'ये संस्सा' या सूत्राने 'ञ्ञ' होऊन 'संञ्ञमति' (saññamati), 'संञ्ञमन्ति' (saññamanti) रूपे होतात. कर्मणी प्रयोगात - 'नियच्छीयति' (niyacchīyati), 'नियमीयति' (niyamīyati), 'नियम्मति' (niyammati) किंवा 'संञ्ञमीयति' (saññamīyati) रूपे होतात. तसेच 'नियच्छिस्सति' (niyacchissati), 'संञ्ञमिस्सति' (saññamissati). 'नियच्छि' (niyacchi), 'संयमि' (saṃyami). 'नियच्छिस्स' (niyacchissa), 'संयमिस्स' (saṃyamissa). 'नियच्छेय्य' (niyaccheyya), 'संयमेय्य' (saṃyameyya). 'नियच्छतु' (niyacchatu), 'संञ्ञमतु' (saññamatu). 'इष्' आणि 'सिंस्' धातू इच्छेच्या अर्थात आहेत - 'तो स्वर्गाची इच्छा करतो' (so saggaṃ icchati), 'इच्छा करतात' (icchanti) इत्यादी. 'लहुस्सुपन्तस्स' या सूत्राने वृद्धी झाल्यावर 'एसति' (esati), 'एसन्ति' (esanti) इत्यादी रूपे होतात. कर्मणी प्रयोगात - 'इच्छीयति' (icchīyati), 'वा क्वचि' या सूत्राने वृद्धी झाल्यावर 'एसीयति' (esīyati) होते. पूर्वरूप झाल्यावर 'इस्सति' (issati), 'इस्सते' (issate) इत्यादी. 'इच्छिस्सति' (icchissati), 'एसिस्सति' (esissati) इत्यादी. 'इच्छि' (icchi), 'एसि' (esi). 'इच्छिस्स' (icchissa), 'एसिस्स' (esissa). 'इच्छेय्य' (iccheyya), 'एसेय्य' (eseyya). 'इच्छतु' (icchatu), 'एसतु' (esatu) इत्यादी. 'आस्' धातू बसण्याच्या (उपवेशन) अर्थात आहे - 'तो आसनावर बसतो' (so āsane acchati) इत्यादी. 'ब्यञ्जने दीघरस्सा' या सूत्राने र्हस्व होतो; 'उप' उपसर्ग असताना 'उपासति' (upāsati) असे होते. 'अच्छिस्सति' (acchissati), 'उपासिस्सति' (upāsissati). 'अच्छि' (acchi), 'उपासि' (upāsi). 'अच्छिस्स' (acchissa), 'उपासिस्स' (upāsissa). 'अच्छेय्य' (accheyya), 'उपासेय्य' (upāseyya). 'अच्छतु' (acchatu), 'उपासतु' (upāsatu) इत्यादी. 'दिश्' धातू पाहण्याच्या (प्रेक्षण) अर्थात आहे - 'दिच्छति' (dicchati), 'दिच्छन्ति' (dicchanti) इत्यादी सर्व रूपे पूर्वीप्रमाणेच होतात. 'लभ्' धातू मिळवण्याच्या (लाभ) अर्थात आहे; यापुढे आम्ही केवळ विशेष रूपांविषयीच सांगू, सर्व प्रक्रिया पूर्वी सांगितल्याप्रमाणेच समजावी. 'लभति' (labhati), 'लभन्ति' (labhanti) इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'क्य' प्रत्ययाचे पूर्वरूप इत्यादी झाल्यावर 'लब्भति' (labbhati) इत्यादी रूपे होतात. 73. ලභා ඉං+ඊනං ථං ථා වා ७३. 'लभ्' धातूनंतर येणाऱ्या 'इं' आणि 'ई' प्रत्ययांच्या जागी वैकल्पिकरित्या 'थं' आणि 'था' आदेश होतात. ලභස්මා ඉං ඊනං ථං+ථා වා හොන්ති. සො අලභිත්ථ ලභිත්ථ අලභි ලභි ඉං පච්චයෙ අලත්ථං අලභිං ඉච්චාදි. 'लभ्' धातूनंतर येणाऱ्या 'इं' आणि 'ई' प्रत्ययांच्या जागी वैकल्पिकरित्या 'थं' आणि 'था' होतात. 'त्याने मिळवले' या अर्थात - 'अलभित्थ' (alabhittha), 'लभित्थ' (labhittha), 'अलभि' (alabhi), 'लभि' (labhi); 'इं' प्रत्यय असताना 'अलत्थं' (alatthaṃ), 'अलभिं' (alabhiṃ) इत्यादी रूपे होतात. 26. ලභ වස+ච්ඡිද භිද රුදානං ච්ඡඞ २६. 'लभ्', 'वस्', 'छिद्', 'भिद्' आणि 'रुद्' या धातूंना 'च्छ' आदेश होतो. ලභාදීනං ච්ඡඞ හොති ස්සෙන සහ. ලච්ඡති ලභිස්සති, ලච්ඡන්ති ලභිස්සන්ති ඉච්චාදි. ක්රියාතිපත්තියං ස්සාභාගස්ස ච්ඡඞාදෙසෙ අලච්ඡා අලභිස්ස ඉච්චාදි. වස=නිවාසෙ, වච්ඡති වසිස්සති. කම්මෙ-බහුලාධිකාරා ‘‘අස්සූ’’ති උකාරො[Pg.233], පුබ්බරූපෙ වුස්සති වුස්සිස්සති ඉච්චාදි. තථා අවච්ඡා අවසිස්සා. ඡිද=ද්වෙධාකරණෙ, ඡෙච්ඡති ඡින්දිස්සති, ‘‘මඤ්ච රුධාදීනං’’ති මං ලො ච. ලස්ස ලොපො ච. භිද=විදාරණෙ, භෙච්ඡති භින්දිස්සති. අභෙච්ඡා අභින්දිස්සා. රුද=රොදනෙ, රුච්ඡති රොදිස්සති. අරුච්ඡා අරොදිස්සා ඉච්චාදි. 'लभ्' इत्यादी धातूंना 'स्स' प्रत्ययासोबत 'च्छ' आदेश होतो. 'लच्छति' (lacchati) / 'लभिस्सति' (labhissati), 'लच्छन्ति' (lacchanti) / 'लभिस्सन्ति' (labhissanti) इत्यादी. क्रियातिपत्ती (अतिपत्ती) मध्ये 'स्स' भागाचा 'च्छ' आदेश झाल्यावर 'अलच्छा' (alacchā), 'अलभिस्स' (alabhissa) इत्यादी रूपे होतात. 'वस्' धातू राहण्याच्या (निवास) अर्थात आहे - 'वच्छति' (vacchati) / 'वसिस्सति' (vasissati). कर्मणी प्रयोगात - बहुलाधिकाराने 'अस्सू' या सूत्राने 'उ' कार होऊन, पूर्वरूप झाल्यावर 'वुस्सति' (vussati), 'वुस्सिस्सति' (vussissati) इत्यादी रूपे होतात. तसेच 'अवच्छा' (avacchā), 'अवसिस्सा' (avasissā). 'छिद्' धातू दोन तुकडे करण्याच्या (द्वेधाकरण) अर्थात आहे - 'छेच्छति' (checchati) / 'छिन्दिस्सति' (chindissati); 'मञ्च रुधादीनं' या सूत्राने 'म' आणि 'लो' होतो, तसेच 'ल' चा लोप होतो. 'भिद्' धातू फोडण्याच्या (विदारण) अर्थात आहे - 'भेच्छति' (bhecchati) / 'भिन्दिस्सति' (bhindissati). 'अभेच्छा' (abhecchā), 'अभिन्दिस्सा' (abhindissā). 'रुद्' धातू रडण्याच्या (रोदन) अर्थात आहे - 'रुच्छति' (rucchati) / 'रोदिस्सति' (rodissati). 'अरुच्छा' (arucchā), 'अरोदिस्सा' (arodissā) इत्यादी. අඤ්ඤපච්චයෙපි ඡිදස්ස ‘‘ච්ඡඞ’’ ඉති යොගවිභාගා ච්ඡඞ, භූතෙ ඌං පච්චයෙ අච්ඡෙච්ඡුං අච්ඡින්දිංසු. වුත්තතො අඤ්ඤධාතූනඤ්ච, ගම=ගමනෙ, ගච්ඡං ගච්ඡිස්සං. අඤ්ඤපච්චයෙපි වච=බ්යත්තවචනෙ ඉච්චාදි, කම්මෙ-බහුලාධිකාරා ත්යාදීසු පරභූතෙසුපි යථාගමං වචාදීනඤ්චස්ස ‘‘වචාදීනං වස්සුට වා’’ති කම්මෙ උට ච ‘‘අස්සූ’’ති අස්ස උ ච, තෙන ධම්මො උච්චති වුච්චති, වුච්චන්ති ඉච්චාදි, යස්ස ච පුබ්බරූපං. इतर प्रत्यय असतानाही 'छिद्' धातूला 'च्छङ' या योगविभागाने 'च्छ' होतो; भूतकाळात 'ऊं' प्रत्यय असताना 'अच्छेच्छुं' (acchecchuṃ), 'अच्छिन्दिंसु' (acchindiṃsu) रूपे होतात. आणि सांगितलेल्या धातूंव्यतिरिक्त इतर धातूंचेही, जसे 'गम्' धातू जाण्याच्या (गमन) अर्थात - 'गच्छं' (gacchaṃ), 'गच्छिस्सं' (gacchissaṃ). इतर प्रत्यय असतानाही 'वच्' धातू स्पष्ट बोलण्याच्या (व्यक्तवचन) अर्थात इत्यादी; कर्मणी प्रयोगात - बहुलाधिकाराने 'ति' इत्यादी प्रत्यय पर असतानाही नियमानुसार 'वच्' इत्यादी धातूंच्या 'अ' काराला 'वचादीनं वस्सुट वा' या सूत्राने कर्मणी प्रयोगात 'उट' आणि 'अस्सू' या सूत्राने 'अ' चा 'उ' होतो, त्यामुळे 'धम्मो उच्चति' (dhammo uccati) किंवा 'वुच्चति' (vuccati), 'वुच्चन्ति' (vuccanti) इत्यादी रूपे होतात, आणि 'य' चे पूर्वरूप होते. 27. භුජ මුච වච විසානං ක්ඛඞ २७. 'भुज्', 'मुच्', 'वच्' आणि 'विस्' या धातूंना 'क्ख' आदेश होतो. භුජාදීනං ක්ඛඞ හොති ස්සෙන සහ. වක්ඛති වචිස්සති, වක්ඛන්ති වචිස්සන්ති ඉච්චාදි. 'भुज्' इत्यादी धातूंना 'स्स' प्रत्ययासोबत 'क्ख' आदेश होतो. 'वक्खति' (vakkhati) / 'वचिस्सति' (vacissati), 'वक्खन्ति' (vakkhanti) / 'वचिस्सन्ति' (vacissanti) इत्यादी रूपे होतात. 21. ඊආදො වචස්සොම २१. 'ई' इत्यादी प्रत्यय पर असताना 'वच्' धातूच्या जागी 'ओम' आदेश होतो. ඊආදීසු වචස්ස ඔම හොති. මකාරානුබන්ධත්තා ‘‘මානුබන්ධො සරාන+මන්තා පරො’’ති පරිභාසතො සරා පරො. අවොචි, අවොචුං, අවොචො ඉච්චාදි. අනජ්ජතනෙ-අවච අවචා වචා ඉච්චාදි. ක්රියාතිපත්තියං-අවක්ඛා අවචිස්සා, අවක්ඛිංසු අවචිස්සිංසු ඉච්චාදි. වචෙය්ය ඉච්චාදි. කම්මෙ-වුච්චෙය්ය ඉච්චාදි. තථා වචතු, වුච්චතු ඉච්චාදි. 'ई' इत्यादी प्रत्यय पर असताना 'वच्' धातूच्या जागी 'ओम' होतो. 'म्' अनुबंध असल्यामुळे 'मानुबंधो सरानामन्ता परो' या परिभाषेनुसार तो अंत्य स्वराच्या नंतर होतो. 'अवोचि' (avoci), 'अवोचुं' (avocuṃ), 'अवोचो' (avoco) इत्यादी. अनज्जतनी काळात - 'अवच' (avaca), 'अवचा' (avacā), 'वचा' (vacā) इत्यादी. क्रियातिपत्तीमध्ये - 'अवक्खा' (avakkhā), 'अवचिस्सा' (avacissā), 'अवक्खिंसु' (avakkhiṃsu), 'अवचिस्सिंसु' (avacissiṃsu) इत्यादी. 'वचेय्य' (vaceyya) इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'वुच्चेय्य' (vucceyya) इत्यादी, तसेच 'वचतु' (vacatu), 'वुच्चतु' (vuccatu) इत्यादी रूपे होतात. භුජ=පාලනජ්ඣොහාරෙසු[Pg.234], ‘‘භුජා’’ දිනා ක්ඛවාදෙසෙ භොක්ඛති භුඤ්ජිස්සති. 'भुज्' धातू पालन आणि खाणे (अभ्यवहार) या अर्थांमध्ये आहे; 'भुजा' इत्यादी सूत्राने 'क्ख' आदेश झाल्यावर 'भोक्खति' (bhokkhati) / 'भुञ्जिस्सति' (bhuñjissati) रूपे होतात. කුස=අක්කොසෙ, ආපුබ්බො, තස්ස රස්සො ච, අක්කොසති ඉච්චාදි ඤෙය්යං, ලවිකරණලොපවුද්ධියො. 'कुस्' धातू शिवीगाळ करण्याच्या (आक्रोश) अर्थात आहे; 'आ' उपसर्ग असताना आणि त्याचा र्हस्व होऊन 'आक्कोसति' (akkosati) इत्यादी रूपे जाणावीत, येथे 'ल' विकरणाचा लोप आणि वृद्धी होते. 34. කුස+රුහෙහී+ස්ස ඡි ३४. 'कुस्' आणि 'रुह्' या धातूंनंतर येणाऱ्या 'ई' प्रत्ययाच्या जागी वैकल्पिकरित्या 'छि' होतो. කුසා රුහා ච පරස්ස ඊස්ස ඡි වා හොති. පරරූපපඨමක්ඛරානි, අක්කොච්ඡි අක්කොසි ඉච්චාදි. අභිපුබ්බො රුහ=රොහනෙ, අභිරුච්ඡි අභිරුහි ඉච්චාදි. 'कुस्' आणि 'रुह्' या धातूंनंतर येणाऱ्या 'ई' प्रत्ययाच्या जागी वैकल्पिकरित्या 'छि' होतो. पररूप आणि पहिले अक्षर होऊन - 'आक्कोच्छि' (akkocchi), 'आक्कोसि' (akkosi) इत्यादी. 'अभि' उपसर्ग असताना 'रुह्' धातू चढण्याच्या (रोहण) अर्थात आहे - 'अभिरुच्छि' (abhirucchi), 'अभिरुहि' (abhiruhi) इत्यादी रूपे होतात. වහ=පාපුණනෙ, වහති, වහන්ති. කම්මෙ-ක්යෙ ‘‘හස්ස විපල්ලාසො’’ති විපරියාසො, තෙන සො වුය්හති, ‘‘අස්සූ’’ති උත්තං. වහිස්සති, වුය්හිස්සති. අවහි, අවුය්හිත්ථ, අවුහි. අවහිස්සා, වුය්හීස්සා ඉච්චාදි. වහෙය්ය, වුය්හෙය්ය. වහතු, වුය්හතු ඉච්චාදි. वह = प्रापणे (प्राप्त करणे किंवा वाहून नेणे या अर्थी), वहति, वहन्ति. कर्मणि प्रयोगात 'क्य' प्रत्यय असताना 'ह चा विपर्यास (व्यत्यय)' होतो, त्यामुळे तो 'वुय्हति' असा होतो, 'अस्सु' सूत्राने उकार होतो. वहिस्सति, वुय्हिस्सति. अवहि, अवुय्हित्थ, अवुहि. अवहिस्सा, वुय्हिस्सा इत्यादी. वहेय्य, वुय्हेय्य. वहतु, वुय्हतु इत्यादी. ජර=ජීරණෙ, जर = जीरणे (जीर्ण होणे या अर्थी), 5,174. ජර මරාන+මීයඞ ५,१७४. जर आणि मर धातूंच्या जागी 'मीयङ' आदेश होतो. ජර මරානං ඊයඞ වා හොති මාන+න්ත+ත්යාදීසු. ජීයති. ‘‘ජර සදාන+මීම’’ති ඊමආගමො ලො ච, ජීරති. කම්මෙ-ජීරීයති ජීයීයති. එවං ජීයිස්සති ජීරිස්සති, ජීයීයිස්සති ජීරීයිස්සති. අජීයි අජීරි, අජීයීයි අජීරීයි. අජීයිස්සා අජීරිස්සා, අජීයීයිස්සා අජීරීයිස්සා අජීයිස්සා අජීරීයිස්සා ඉච්චාදි. මර=පාණචාගෙ, ඊයඞ, මීයති මරති, මීයන්ති මරන්ති ඉච්චාදි. मान, अन्त, ति इत्यादी प्रत्यय असताना जर आणि मर धातूंच्या जागी 'मीयङ' (किंवा 'ईयङ') विकल्पेकरून होतो. जीयति. 'जरसदानमीम' या सूत्राने 'ईम' आगम आणि 'ल' चा लोप होऊन 'जीरति' बनते. कर्मणि प्रयोगात - जीरीयति, जीयीयति. याचप्रमाणे जीयिस्सति, जीरिस्सति; जीयीयिस्सति, जीरीयिस्सति. अजीयि, अजीरि; अजीयीयि, अजीरीयि. अजीयिस्सा, अजीरिस्सा; अजीयीयिस्सा, अजीरीयिस्सा, अजीयिस्सा, अजीरीयिस्सा इत्यादी. मर = प्राणत्यागे (प्राण सोडणे या अर्थी), ईयङ प्रत्यय होऊन 'मीयति', 'मरति', 'मीयन्ति', 'मरन्ति' इत्यादी रूपे होतात. දිස=පෙක්ඛනෙ, दिस = पेक्खणे (पाहणे या अर्थी), 5,124. දිසස්ස [Pg.235] පස්ස දස්ස දස ද දක්ඛාති ५,१२४. दिस धातूच्या जागी पस्स, दस्स, दस, द, दक्ख हे आदेश होतात. එතෙ ආදෙසා දිසස්ස වා හොන්ති. අනෙකවණ්ණත්තා සබ්බාදෙසො. පස්සති පස්සන්ති, දක්ඛති දක්ඛන්ති. කම්මෙ-ක්යෙ පුබ්බරූපො, දිස්සති දිස්සන්ති, විපස්සීයති දක්ඛීයති ඉච්චාදි. हे आदेश 'दिस' धातूच्या जागी विकल्पेकरून होतात. अनेक वर्ण असल्यामुळे हा सर्वादेश (पूर्ण धातूच्या जागी) होतो. पस्सति, पस्सन्ति; दक्खति, दक्खन्ति. कर्मणि प्रयोगात - 'क्य' प्रत्यय असताना पूर्वरूप होऊन 'दिस्सति', 'दिस्सन्ति', 'विपस्सीयति', 'दक्खीयति' इत्यादी रूपे होतात. 6,69. දක්ඛ+ඛ+හෙති+හොහීති ලොපො ६,६९. दक्ख, ख, हेहिति, होहिति इत्यादींमध्ये 'स्स' चा लोप होतो. දක්ඛාදීහි ආදෙසෙහි පරස්ස ස්සස්ස ලොපො වා හොති. දක්ඛති දක්ඛිස්සති. අපස්සි පස්සි, අපස්සිංසු පස්සිංසු අපස්සො පස්සො, අපස්සිත්ථ පස්සිත්ථ. අපස්සිං පස්සිං, අපස්සිම්හ පස්සිම්හ. තථා අදස්සී දස්සී, අදස්සිංසු දස්සිංසු ඉච්චාදි. අනජ්ජතනෙ දසාදෙසො, අද්දසා අද්දස. අද්දා අද්ද ඉච්චාදි. අපස්සිස්ස දක්ඛිස්ස ඉච්චාදි. පස්සෙය්ය දක්ඛෙය්ය, පස්සතු දක්ඛතු ඉච්චාදි. दक्ख इत्यादी आदेशांनंतर येणाऱ्या 'स्स' चा विकल्पेकरून लोप होतो. दक्खति, दक्खिस्सति. अपस्सि, पस्सि; अपस्सिंसु, पस्सिंसु; अपस्सो, पस्सो; अपस्सित्थ, पस्सित्थ. अपस्सिं, पस्सिं; अपस्सिम्ह, पस्सिम्ह. तसेच अदस्सी, दस्सी; अदस्सिंसु, दस्सिंसु इत्यादी. अनद्यतन भूतकाळात 'दस' आदेश होऊन 'अद्दसा', 'अद्दस'; 'अद्द्वा', 'अद्द' इत्यादी रूपे होतात. अपस्सिस्स, दक्खिस्स इत्यादी. पस्सेय्य, दक्खेय्य; पस्सतु, दक्खतु इत्यादी. සද=විසරණගත්යාවසාදනාදානෙසු, නිපුබ්බො, ‘‘ජරසදාන+මීම වා’’ති ඊමආගමො. නිසීදති, නිසීදන්ති ඉච්චාදි. භාවෙ-නිසජ්ජති, නිසජ්ජතෙ. सद = विसरण, गती, अवसादन आणि आदान या अर्थी. 'नि' उपसर्ग असताना 'जरसदानमीम वा' या सूत्राने 'ईम' आगम होतो. निसीदति, niसीदन्ति इत्यादी. भावे प्रयोगात - निसज्जति, निसज्जते. යජ=දෙවපූජාසංගතිකරණදානෙසු, යජති, යජන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ – यज = देवपूजा, संगतीकरण आणि दान या अर्थी. यजति, यजन्ति इत्यादी. कर्मणि प्रयोगात - 5,113. යජස්ස යස්ස ටි+යීති ५,११३. यज धातूच्या 'य' च्या जागी 'इ' आणि 'यि' होतात. යජස්ස යස්ස ටි+යී හොන්ති කානුබන්ධෙති බහුලාධිකාරා ත්යාදිවිසයෙපි ක්යෙ පුබ්බරූපෙ ච ඉජ්ජති යිජ්ජති මයා බුද්ධො. සො යජිස්සති, තෙන ඉජ්ජිස්සතෙ යිජ්ජිස්සතෙ. සො යජී[Pg.236], තෙන ඉජ්ජි යිජ්ජි. සො යජිස්සා, තෙන ඉජ්ජිස්සා යිජ්ජිස්සා. සො යජෙය්ය, තෙන ඉජ්ජෙය්ය යිජ්ජෙය්ය. සො යජතු, තෙන ඉජ්ජතු යිජ්ජතු ඉච්චාදි. यज धातूच्या 'य' च्या जागी 'इ' आणि 'यि' होतात. 'क' अनुबंध असल्यामुळे बहुलाधिकाराने 'ति' इत्यादी प्रत्ययांच्या विषयातही आणि 'क्य' प्रत्यय असताना पूर्वरूप होऊन 'इज्जति', 'यिज्जति' (उदा. मया बुद्धो - माझ्याकडून बुद्धांचे यजन केले जाते) अशी रूपे होतात. तो यजन करील (सो यजिस्सति), त्याच्याकडून यजन केले जाईल (तेन इज्जिस्सते, यिज्जिस्सते). त्याने यजन केले (सो यजी), त्याच्याकडून यजन केले गेले (तेन इज्जि, यिज्जि). त्याने यजन केले असते (सो यजिस्सा), त्याच्याकडून यजन केले गेले असते (तेन इज्जिस्सा, यिज्जिस्सा). त्याने यजन करावे (सो यजेय्य), त्याच्याकडून यजन केले जावे (तेन इज्जेय्य, यिज्जेय्य). त्याने यजन करावे (सो यजतु), त्याच्याकडून यजन केले जावो (तेन इज्जतु, यिज्जतु) इत्यादी. වද=වචනෙ, ‘‘ගමවදා’’ දිනා වදස්ස වජ්ජාදෙසො වා, ලස්ස ‘‘ඌලස්සෙ’’ති ක්වචි එ ච, වජ්ජති වදෙති වදති, වජ්ජෙන්ති වදෙන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ – ‘‘ක්යස්සා’’ති ඊඤ, වජ්ජීයති වජ්ජති වදීයති, වජ්ජීයන්ති වජ්ජන්ති වදීයන්ති. වදිස්සති, වදිස්සන්ති. අවදී වදී, අවදිංසු වදිංසු. අවදිස්ස වදිස්ස. වජ්ජෙ වජ්ජෙය්ය වදෙ වදෙය්ය, වජ්ජෙය්යුං වදෙය්යුං. වජ්ජෙතු වදෙතු වදතු ඉච්චාදි යථාගමං ඤෙය්යං. वद = वचने (बोलणे या अर्थी). 'गमवदा' इत्यादी सूत्राने 'वद' च्या जागी विकल्पेकरून 'वज्ज' आदेश होतो. 'ल' च्या जागी 'ऊलस्स' सूत्राने काही ठिकाणी 'ए' होऊन 'वज्जति', 'वदेति', 'वदति'; 'वज्जन्ति', 'वदेन्ति', 'वदन्ति' इत्यादी रूपे होतात. कर्मणि प्रयोगात - 'क्यस्स' सूत्राने 'ईञ' होऊन 'वज्जीयति', 'वज्जति', 'वदीयति'; 'वज्जीयन्ति', 'वज्जन्ति', 'वदीयन्ति' अशी रूपे होतात. वदिस्सति, वदिस्सन्ति. अवदी, वदी; अवदिंसु, वदिंसु. अवदिस्स, वदिस्स. वज्जे, वज्जेय्य, वदे, वदेय्य; वज्जेय्युं, वदेय्युं. वज्जेतु, वदेतु, वदतु इत्यादी आगमानुसार जाणावे. කමු=පදවික්ඛෙපෙ, ‘‘පරොක්ඛායඤ්චා’’ති චග්ගහණෙන කම කම ඉති ද්විත්තෙ අනාදිබ්යඤ්ජනලොපෙ ලවිකරණෙ ‘‘කවග්ගහා’’ දිනා කස්ස චෙ නිග්ගහීතාගමෙ ච කතෙ චංකමති කමති ඉච්චාදි. චල=කම්පනෙ, චංචලති. ජල+දල=දිත්තියං, ද්විත්තෙ දද්දල්ලති ඉච්චාදි. (සවුද්ධිකභූවාදිනයො). कमु = पदविक्षेपे (पाऊल टाकणे या अर्थी). 'परोक्खायञ्च' या सूत्रातील 'च' च्या ग्रहणाने 'कम कम' असे द्वित्व होऊन, अनादी व्यंजनाचा लोप झाल्यावर आणि 'ल' विकरण प्रत्यय लागल्यावर 'कवग्गहा' इत्यादी सूत्राने 'क' च्या जागी 'च' आणि निग्गहीत (अनुस्वार) आगम झाल्यावर 'चङ्कमति', 'कमति' इत्यादी रूपे होतात. चल = कंपने (कापणे या अर्थी), चञ्चलति. जल + दल = दित्तियं (प्रकाशणे या अर्थी), द्वित्व होऊन 'दद्दल्लति' इत्यादी रूपे होतात. (सवृद्धिक भूवादि नय समाप्त). හූ+භූ=සත්තායං, ත්යාදීසු ‘‘කත්තරි ලො’’ති ලො, තස්ස ලොපෙ ‘‘යුවණ්ණාන+මෙඔ පච්චයෙ’’ති ඔකාරො. සො හොති, තෙ හොන්ති. හොසි, හොථ. හොමි, හොම ඉච්චාදි. භාවෙ-තෙන හූයති හූයතෙ. हू + भू = सत्तायं (अस्तित्व असणे या अर्थी). 'ति' इत्यादी प्रत्यय असताना 'कत्तरि लो' या सूत्राने 'ल' विकरण प्रत्यय होतो, त्याचा लोप झाल्यावर 'युवण्णानमेओ पच्चये' या सूत्राने ओकार होतो. सो होति (तो होतो), ते होन्ति (ते होतात). होसि, होथ. होमि, होम इत्यादी. भावे प्रयोगात - तेन हूयति, हूयते (त्याच्याकडून केले जाते/होते). 31. හූස්ස හෙ+හෙහි+හොහි ස්සත්යාදො ३१. हू धातूच्या जागी 'स्स' इत्यादी प्रत्यय असताना हे, हेहि, होहि हे आदेश होतात. හූස්ස හෙආදයො හොන්ති ස්සච්චාදො. හෙස්සති හෙහි ස්සති හොහිස්සති. हू धातूच्या जागी 'स्स' इत्यादी प्रत्यय असताना 'हे' इत्यादी आदेश होतात. हेस्सति, हेहिस्सति, होहिस्सति. 69. දක්ඛ+ඛ+හෙහි+හොහීහි ලොපොති ६९. दक्ख, ख, हेहि, होहि या आदेशांनंतर 'स्स' चा लोप होतो. දක්ඛාදීහි [Pg.237] ආදෙසෙහි පරස්ස ස්සස්ස වා ලොපො හොති. හෙහිති හෙහිස්සති, හොහිති හොහිස්සති. හෙහින්ති හෙහිස්සන්ති, හොහින්ති හොහිස්සන්ති ඉච්චාදි. අනජ්ජතනෙ ඊම්හි අඤාගමො, ‘‘පරො ක්වචී’’ති ඊස්ස ලොපො, සො අහු. වුද්ධිම්හි ‘‘දීඝා ඊස්ස’’ ඉති ඊස්ස සිආදෙසො, සුවො අහොසි ආනන්දො. दक्ख इत्यादी आदेशांनंतर येणाऱ्या 'स्स' चा विकल्पेकरून लोप होतो. हेहिति, हेहिस्सति; होहिति, होहिस्सति. हेहिन्ति, हेहिस्सन्ति; होहिन्ति, होहिस्सन्ति इत्यादी. अनद्यतन भूतकाळात 'ई' प्रत्यय असताना 'अ' चा आगम होतो, 'परो क्वचि' सूत्राने 'ई' चा लोप होऊन 'सो अहु' (तो झाला) असे रूप बनते. वृद्धी झाल्यावर 'दीघा ईस्स' या सूत्राने 'ई' च्या जागी 'सि' आदेश होऊन 'सुवो अहोसि आनन्दो' (आनंद सुखी झाला) असे रूप बनते. 41. හූතො රෙසුං ४१. हू धातूच्या पुढे 'उं' प्रत्ययाच्या जागी 'रेसुं' आदेश विकल्पेकरून होतो. හූතො පරස්ස උ+මිච්චස්ස රෙසුං වා හොති. රකාරානුබන්ධො ‘‘රානුබන්ධෙන්තසරාදිස්සා’’ති අන්තසරාදිස්ස ලොපො. අහෙසුං. ඔකාරවුද්ධි අවාදෙසෙ අහවුං. ඔස්ස සිආදෙසෙ අහොසි. हू धातूच्या पुढे असणाऱ्या 'उं' प्रत्ययाच्या जागी 'रेसुं' विकल्पेकरून होतो. 'र' कार अनुबंध असल्यामुळे 'रानुबन्धन्तसरादिस्सा' या सूत्राने अंत्य स्वरादीचा लोप होतो. अहेसुं. ओकार वृद्धी आणि 'अव' आदेश होऊन 'अहवुं' बनते. 'ओ' च्या जागी 'सि' आदेश होऊन 'अहोसि' बनते. 46. ඉංස්ස ච සිඤ ४६. आणि 'इं' प्रत्ययाच्या जागी 'सिञ' होतो. ඉමිච්චස්ස සිඤ හොති ම්හාත්ථානඤ්ච බහුලං. ඤාකාරො ආඛ්යාවයවත්ථො (උකාරො) ඉකාරො උච්චාරණත්ථො. ‘‘අඊස්සා’’ දිනා ඉඤාගමෙ තුම්හෙ අහොසිත්ථ, අහොසි. පරස්සරලොපෙ රස්සෙ ච අහුං, අහොසිම්හ, අහුම්හ, රස්සො. භාවෙ-අභවි, ආස්සත්ථාදෙසො, අභවිත්ථ. අනජ්ජතනෙ ආඌආදිපච්චයෙ කතෙ ‘‘යුවණ්ණාන+මිය ඞුවඞ සරෙ’’ති උවඞාදෙසෙ අහුවා, අහුවු, අහුවො, අහුවත්ථ. අස්ස අමාදෙසෙ අහුං අහුවං, අහුම්හ ඉච්චාදි. භාවෙ-තෙන අහුයි අහුයිත්ථ. අහවිස්සා, අහවිස්සංසු ඉච්චාදි. භාවෙ-අහුයිස්ස, අහුයිස්සථ. පුබ්බස්සරලොපො, හෙය්ය[Pg.238], හෙය්යුං ඉච්චාදි. භාවෙ-හූයෙය්ය, හූයෙථ. හොතු, හොන්තු ඉච්චාදි. භාවෙ-හූයතු, හූයතං. අනුපුබ්බෙ අනුභොති ඉච්චාදි සබ්බවාරෙසු යොජෙතබ්බං. භාවෙ රූපාභාවා. කම්මෙ-අනුභූයති ඉච්චාදි විසෙසො. 'इं' प्रत्ययाच्या जागी 'सिञ' होतो आणि 'म्ह' इत्यादींच्या जागी बहुधा होतो. 'ञ' कार आख्यात अवयवाच्या अर्थी आहे आणि 'इ' कार उच्चारणासाठी आहे. 'अईस्सा' इत्यादी सूत्राने 'इञ' आगम झाल्यावर 'तुम्हे अहोसित्थ', 'अहोसि' अशी रूपे होतात. पर स्वराचा लोप आणि र्हस्व झाल्यावर 'अहुं', 'अहोसिम्ह', 'अहुम्ह' (र्हस्व) अशी रूपे होतात. भावे प्रयोगात - 'अभवि', 'आस्सत' आदेश होऊन 'अभवित्थ' बनते. अनद्यतन भूतकाळात 'आ', 'ऊ' इत्यादी प्रत्यय लागल्यावर 'युवण्णानमिय ङुवण सरे' या सूत्राने 'उवण' आदेश होऊन 'अहुवा', 'अहुवु', 'अहुवो', 'अहुवत्थ' अशी रूपे होतात. 'अ' च्या जागी 'अं' आदेश झाल्यावर 'अहुं', 'अहुवं', 'अहुम्ह' इत्यादी रूपे होतात. भावे प्रयोगात - 'तेन अहुयि', 'अहुयित्थ'. अहविस्सा, अहविस्सुं इत्यादी. भावे प्रयोगात - 'अहुयिस्स', 'अहुयिस्सथ'. पूर्व स्वराचा लोप होऊन 'हेय्य', 'हेय्युं' इत्यादी. भावे प्रयोगात - 'हूयेय्य', 'हूयेथ'. होतु, होन्तु इत्यादी. भावे प्रयोगात - 'हूयतु', 'हूयतं'. 'अनु' उपसर्गाच्या मागे 'अनुभोति' इत्यादी सर्व रूपांमध्ये योजना करावी. भावे प्रयोगात रूपांचा अभाव असतो. कर्मणि प्रयोगात - 'अनुभूयति' इत्यादी विशेष रूपे होतात. සි=සයෙ, ලස්ස ලොපො වුද්ධි, සෙති. අයාදෙසෙ සයති, සෙන්ති සයන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-අතිපුබ්බො, ක්යෙ ‘‘දීඝො සරස්සා’’ති ඉස්ස දීඝෙ ච කතෙ තෙන අතිසීයති, අතිසීයන්ති ඉච්චාදි. භාවෙ-තෙන සීයති, සීයතෙ. තථා භවිස්සතිආදීසු. सि = सये (झोपणे या अर्थी). 'ल' चा लोप आणि वृद्धी होऊन 'सेति' बनते. 'अय' आदेश झाल्यावर 'सयति', 'सेन्ति', 'सयन्ति' इत्यादी रूपे होतात. कर्मणि प्रयोगात - 'अति' उपसर्ग असताना, 'क्य' प्रत्यय लागल्यावर 'दीघो सरस्सा' या सूत्राने 'इ' चा दीर्घ झाल्यावर 'तेन अतिसीयति', 'अतिसीयन्ति' इत्यादी रूपे होतात. भावे प्रयोगात - 'तेन सीयति', 'सीयते'. तसेच भविस्सति इत्यादी रूपांमध्ये जाणावे. නී=පාපනෙ, ද්විකම්මකො+යං, අජං ගාමං නෙති නයති, නෙන්ති නයන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-නීයතෙ ගාමං අජො දෙවදත්තෙන ඉච්චාදි. තථා සෙසෙසුපි යොජෙතබ්බං. नी = पापणे (नेणे या अर्थी). हा द्विकर्मक धातू आहे. 'अजं गामं नेति/नयति' (शेळीला गावात नेतो), 'नेन्ति', 'नयन्ति' इत्यादी. कर्मणि प्रयोगात - 'नीयते गामं अजो देवदत्तेन' (देवदत्ताकडून शेळी गावात नेली जाते) इत्यादी. तसेच उर्वरित रूपांमध्येही योजना करावी. ඨා=ගතිනිවත්තියං – ठा = गतिनिवत्तियं (गती थांबवणे किंवा उभे राहणे या अर्थी) - 5,175. ඨාපානං තිට්ඨපිවා ५,१७५. ठा आणि पा धातूंच्या जागी 'तिट्ठ' आणि 'पिब' हे आदेश विकल्पेकरून होतात. ඨාපානං තිට්ඨපිවාහොන්ති වා න්ත+මාන+ත්යාදීසු. ලස්ස ලොපෙ තිට්ඨති, තිට්ඨන්ති, ඨාති, ඨාන්ති. 'अन्त', 'मान', 'ति' इत्यादी प्रत्यय असताना ठा आणि पा धातूंच्या जागी 'तिट्ठ' आणि 'पिब' हे आदेश विकल्पेकरून होतात. 'ल' चा लोप झाल्यावर 'तिट्ठति', 'तिट्ठन्ति', 'ठाति', 'ठान्ति' अशी रूपे होतात. 5,131. පාදිතො ඨාස්ස වා ඨහො ක්වචිති ५,१३१. 'प' इत्यादी उपसर्गांनंतर येणाऱ्या 'ठा' धातूच्या जागी काही ठिकाणी विकल्पेकरून 'ठह' आदेश होतो. පාදිතො පරස්ස ඨාස්ස ක්වචි ඨහො හොති වා. සණ්ඨහති, සණ්ඨහන්ති. ලස්සෙ, අධිට්ඨෙති, අධිට්ඨෙන්ති. කම්මෙ – 'प' इत्यादी उपसर्गांनंतर येणाऱ्या 'ठा' धातूच्या जागी काही ठिकाणी विकल्पेकरून 'ठह' आदेश होतो. संठहति, संठहन्ति. 'ल' च्या जागी 'ए' झाल्यावर 'अधिट्ठेति', 'अधिट्ठेन्ति'. कर्मणि प्रयोगात - 5,137. අඤ්ඤාදිස්සා+ස්සී ක්යෙ ५,१३७. 'क्य' प्रत्यय असताना इतर आदेशांनंतर 'ई' होतो. ඤාදිතො+ඤ්ඤස්ස ආකාරන්තස්ස ක්රියත්ථස්ස ඊ හොති ක්යෙ. උපඨීයති, උපඨීයන්ති. ඨහාදෙසෙ ‘‘ක්යස්සා’’ති ඊඤ[Pg.239], තෙන පතිට්ඨහීයති, පතිට්ඨහීයන්ති. භාවෙ-ඊම්හි ඨීයති, ඨීයතෙ. තථා පපුබ්බෙ පතිට්ඨිස්සති පතිට්ඨහිස්සති. ඊස්ස සිම්හි අට්ඨාසි, අට්ඨංසු, සණ්ඨහි, සණ්ඨහිංසු. පතිට්ඨිස්ස පතිට්ඨහිස්ස. තිට්ඨෙ තිට්ඨෙය්ය, සණ්ඨෙ සණ්ඨෙය්ය, සණ්ඨෙය්යුං, සණ්ඨහෙ සණ්ඨහෙය්ය. තිට්ඨතු ඨාතු, සණ්ඨහතු ඉච්චාදි. 'ज्ञा' धातूव्यतिरिक्त इतर आकारांत क्रियावाचक धातूच्या जागी 'क्य' प्रत्यय असताना 'ई' होतो. जसे की, उपठीयति, उपठीयन्ति. 'ठह' आदेश असताना "क्यस्स..." सूत्राने 'ई' होतो, त्याने पतिट्ठहीयति, पतिट्ठहीयन्ति रूपे बनतात. भाववाच्य आणि 'ई' प्रत्यय असताना ठीयति, ठीयते रूपे होतात. तसेच 'प' (किंवा 'पति') उपसर्ग असताना पतिट्ठिस्सति, पतिट्ठहिस्सति रूपे होतात. 'ई' च्या जागी 'सि' प्रत्यय असताना अट्ठासि, अट्ठंसु, सण्ठहि, सण्ठहिंसु रूपे होतात. पतिट्ठिस्स, पतिट्ठहिस्स. तिट्ठे, तिट्ठेय्य, सण्ठे, सण्ठेय्य, सण्ठेय्युं, सण्ठहे, सण्ठहेय्य. तिट्ठतु, ठातु, सण्ठहतु इत्यादी. පා=පානෙ, පිවාදෙසෙ පිවති. ‘‘තවග්ගවරණා’’ දො ‘‘බයඤා’’ති යොගවිභාගෙන වස්ස බකාරො, පිබති. කම්මෙපීයති, පීයන්ති ඉච්චාදි. पा = पिणे या अर्थी, 'पिव' आदेश झाल्यावर 'पिवति' रूप बनते. "तवग्गवरणा..." सूत्रातील "बयञा" या योगविभागाने 'व' चा 'ब' होतो, (त्यामुळे) 'पिबति' रूप बनते. कर्मवाच्य मध्ये 'पीयति', 'पीयन्ति' इत्यादी रूपे होतात. අස=භුවි, अस = असणे (होणे) या अर्थी, 52. තස්ස ථොති ५२. 'त' च्या जागी 'थ' होतो. අත්ථිතො පරස්ස තස්ස ථො හොති. පරරූපෙ පඨමක්ඛරතකාරෙ ච අත්ථි. ‘‘න්ත+මාන+න්ති+යි+යුංස්වා+දිලොපො’’ති අස්ස ලොපො, සන්ති. 'अत्थि' (अस्) धातूच्या पुढील 'त' प्रत्ययाच्या जागी 'थ' होतो. पररूप आणि पहिल्या अक्षरातील 'त' कार असताना 'अत्थि' रूप बनते. "न्त+मान+न्ति+यि+युंस्वा..." सूत्राने 'अ' चा लोप होऊन 'सन्ति' रूप बनते. 53. සිහිස්ව+ට ५३. 'सि' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'अट' होतो. අත්ථිස්ස අට හොති සිහිසු. ටො සබ්බාදෙසත්ථො. ත්වං අසි. පරරූපාදිම්හි කතෙ ඉදානි තුම්හෙ අත්ථ. 'सि' आणि 'हि' प्रत्यय असताना 'अत्थि' च्या जागी 'अट' होतो. 'ट' हा सर्वादेशासाठी आहे. 'त्वं असि' (तू आहेस). पररूप इत्यादी कार्ये झाल्यावर आता 'तुम्हे अत्थ' (तुम्ही आहात) रूप बनते. 54. මිමානං වා ම්හිම්හා ච ५४. 'मि' आणि 'म' प्रत्ययांच्या जागी विकल्पेकरून 'म्हि' आणि 'म्ह' होतात. අසස්මා පරෙසං මිමානං ම්හිම්හා වා හොන්ති තංසන්නියොගෙන අසස්ස අට ච. අම්හි. 'अस्' धातूच्या पुढील 'मि' आणि 'म' प्रत्ययांच्या जागी विकल्पेकरून 'म्हि' आणि 'म्ह' होतात आणि त्यासोबतच 'अस्' च्या जागी 'अट' देखील होतो. (त्यामुळे) 'अम्हि' रूप बनते. 55. එසු ස ५५. या प्रत्ययांमध्ये 'स' होतो. එසු [Pg.240] මිමෙසු අසස්ස සො හොති, පරරූපබාධනත්ථං. අස්මි, අම්හ අස්ම. භවිස්සතිපච්චයෙ – या 'मि' आणि 'म' प्रत्ययांमध्ये पररूपाचा बाध करण्यासाठी 'अस्' च्या जागी 'स' होतो. 'अस्मि', 'अम्ह', 'अस्म'. भविष्यकाळ (भविस्सती) प्रत्यय असताना – 5,129. අ+ආ+ස්සආදීසු ५,१२९. 'अ', 'आ', 'स्स' इत्यादी प्रत्यय असताना. පරොක්ඛා අ-ආදො අනජ්ජතන ආ-ආදො ක්රියාතිපත්තිස්සා-ආදො භවිස්සතිස්සත්යාදො ච අත්ථිස්ස භු හොති. ආදෙසවිධානං අසස්සාපයොගත්ථං, කිස්මිඤ්චි පච්චයවිසෙසෙ, තස්මා අසිතබ්බන්තිආදි න භවති. භවිස්සති, භවිස්සන්ති. අභවා, අභවු. ක්රියාතිපත්තියං භුආදෙසෙ අභවිස්ස, අභවිස්සංසු ඉච්චාදි. එය්යාදිම්හි – परोक्षा विभक्तीच्या 'अ' इत्यादी प्रत्यय असताना, अनद्यतन विभक्तीच्या 'आ' इत्यादी प्रत्यय असताना, क्रियातिपत्तीच्या 'स्सा' इत्यादी प्रत्यय असताना आणि भविष्यकाळाच्या 'स्सति' इत्यादी प्रत्यय असताना 'अत्थि' च्या जागी 'भु' होतो. हा आदेशविधी विशिष्ट प्रत्ययांमध्ये 'अस्' चा प्रयोग न करण्यासाठी आहे, म्हणूनच 'असितब्बं' इत्यादी रूपे होत नाहीत. 'भविस्यति', 'भविस्यन्ति'. 'अभवा', 'अभवु'. क्रियातिपत्तीमध्ये 'भु' आदेश झाल्यावर 'अभविस्स', 'अभविस्संसु' इत्यादी रूपे होतात. 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय असताना – 50. අත්ථිතෙ+ය්යාදිච්ඡන්නං ස+සු+ස+සථ+සං+සාම ५०. 'अत्थि' च्या पुढील 'एय्य' इत्यादी सहा प्रत्ययांच्या जागी अनुक्रमे 'स', 'सु', 'स', 'सथ', 'सं', 'साम' हे आदेश होतात. අස=භුවි+ච්චස්මා පරෙසං එය්යාදිච්ඡන්නං සාදයො හොන්ති යථාක්කමං. පරරූපෙ සො අස්ස, තෙ අස්සු. ත්වං අස්ස, තුම්හෙ අස්සථ. අහං අස්සං, මයං අස්සාම. ත්වාදිම්හි සො අතු, අස්ස ලොපෙ සන්ථු, අයාදෙසෙ ත්වං අහි, තුම්හෙ අත්ථ. අම්හි, අම්හ, සාදෙසෙ අස්මි අස්ම. බහුලාධිකාරා අජ්ජතනෙ ආසි, ආසිංසු, ආසුං ඉච්චාදීපි හොන්ති. 'अस = असणे' या धातूच्या पुढील 'एय्य' इत्यादी सहा प्रत्ययांच्या जागी अनुक्रमे 'स' इत्यादी आदेश होतात. पररूप झाल्यावर 'सो अस्स' (तो असावा), 'ते अस्सु' (ते असावेत). 'त्वं अस्स' (तू असावास), 'तुम्हे अस्सथ' (तुम्ही असावेत). 'अहं अस्सं' (मी असावा), 'मयं अस्साम' (आम्ही असावे). 'तु' इत्यादी प्रत्यय असताना 'सो अतु' (तो असो), 'अस्' चा लोप झाल्यावर 'सन्तु' (ते असोत), 'अ' चा 'अ' आदेश झाल्यावर 'त्वं अही' (तू अस), 'तुम्हे अत्थ' (तुम्ही असा). 'अम्हि', 'अम्ह', आणि 'स' आदेश झाल्यावर 'अस्मि', 'अस्म' रूपे होतात. बहुल अधिकाराने अद्यतनी (भूतकाळात) 'आसि', 'आसिंसु', 'आसुं' इत्यादी रूपे देखील होतात. බ්රූ=වචනෙ, ब्रू = बोलणे या अर्थी, 36. බ්රූතො තිස්සීඤ ३६. 'ब्रू' धातूच्या पुढील 'ति' प्रत्ययाच्या जागी विकल्पेकरून 'ईञ' होतो. බ්රූතො පරස්ස තිස්ස ඊඤ වා හොති. වුද්ධිඅවාදෙසෙ ලස්ස ලොපෙ බ්රවීති. 'ब्रू' धातूच्या पुढील 'ति' प्रत्ययाच्या जागी विकल्पेकरून 'ईञ' होतो. वृद्धी आणि 'अव्' आदेश झाल्यावर, तसेच 'ल' चा लोप झाल्यावर 'ब्रवीति' रूप बनते. 5,97. න බ්රූස්සො ५,९७. व्यंजन प्रत्यय असताना 'ब्रू' च्या जागी 'ओ' होत नाही. බ්රූස්ස [Pg.241] ඔ න හොති බ්යඤ්ජනෙ. බ්රූති. උවඞාදෙසෙ බ්රූවන්ති. व्यंजन प्रत्यय असताना 'ब्रू' च्या जागी 'ओ' होत नाही. 'ब्रूति'. 'उवङ्' आदेश झाल्यावर 'ब्रूवन्ति' रूप बनते. 20. ත්ය+න්තීනං ට+ටූ २०. 'ति' आणि 'अन्ति' प्रत्ययांच्या जागी 'ट' आणि 'टू' होतात. ආහා පරෙසං ති+අන්තීනං ට+ටූ හොන්ති. ටකාරා සබ්බාදෙසත්ථා. අතොයෙව ආහා පරෙසං තිඅන්තීනං ටටූවිධානඤාපකා තිඅන්තීසු බ්රූස්ස ආහො. ආහ, ආහු. බ්රූසි, බ්රූථ. බ්රූමි, බ්රූම ඉච්චාදි. බ්රවිස්සති. අබ්රවි අබ්රවී, අබ්රවුං. අනජ්ජතනෙ අබ්රවා, අබ්රවු. පරොක්ඛායං – 'आह' च्या पुढील 'ति' आणि 'अन्ति' प्रत्ययांच्या जागी 'ट' आणि 'टू' होतात. 'ट' कार हा सर्वादेशासाठी आहे. यावरूनच 'आह' च्या पुढील 'ति' आणि 'अन्ति' प्रत्ययांच्या जागी 'ट' आणि 'टू' चे विधान ज्ञापक असल्यामुळे 'ति' आणि 'अन्ति' प्रत्यय असताना 'ब्रू' च्या जागी 'आह' आदेश होतो. 'आह', 'आहु'. 'ब्रूसि', 'ब्रूथ'. 'ब्रूमि', 'ब्रूम' इत्यादी. 'ब्रविस्सति'. 'अब्रवि', 'अब्रवी', 'अब्रवुं'. अनद्यतनी मध्ये 'अब्रवा', 'अब्रवु'. परोक्षा विभक्तीमध्ये – 16. අආදීස්වා+හො බ්රූස්ස १६. 'अ' इत्यादी प्रत्यय असताना 'ब्रू' च्या जागी 'आह' होतो. බ්රූස්ස ආහො හොති පරොක්ඛාඅආදීසු. සුපිනෙ කිර සො ආහ, තෙ ආහු ඉච්චාදි. අබ්රවිස්ස. බ්රවෙ බ්රවෙය්ය. වුද්ධිප්පටිසෙධෙ බ්රූතු, බ්රවන්තු ඉච්චාදි. परोक्षा विभक्तीच्या 'अ' इत्यादी प्रत्यय असताना 'ब्रू' च्या जागी 'आह' होतो. जसे की, "स्वप्नात तो म्हणाला (सो आह), ते म्हणाले (ते आहु)" इत्यादी. 'अब्रविस्स'. 'ब्रवे', 'ब्रवेय्य'. वृद्धीचा प्रतिषेध झाल्यावर 'ब्रूतु', 'ब्रवन्तु' इत्यादी रूपे होतात. හන=හිංසායං, තිම්හි විකරණලොපෙ සො හනති හන්ති. තෙ හනන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-යෙ නස්ස ඤ්ඤෙ පුබ්බරූපං, තෙන හඤ්ඤති, හඤ්ඤන්ති හඤ්ඤරෙ. තථා හනිස්සති ඉච්චාදි. हन = हिंसा करणे या अर्थी, 'ति' प्रत्यय असताना विकरण प्रत्ययाचा लोप झाल्यावर 'हनति', 'हन्ति' रूपे होतात. 'ते हनन्ति' इत्यादी. कर्मवाच्य मध्ये 'य' प्रत्यय असताना 'न' च्या जागी 'ञ्ञ' होऊन पूर्वरूप होते, त्याने 'हञ्ञति', 'हञ्ञन्ति', 'हञ्ञरे' रूपे होतात. तसेच 'हनिस्सति' इत्यादी रूपे होतात. 67. හනා ඡ+ඛා ६७. 'हन' च्या पुढील 'स्स' च्या जागी विकल्पेकरून 'छ' आणि 'ख' होतात. හනා ස්සාස්ස ඡ+ඛා වා හොන්ති. පටිහංඛාමි පටිහනිස්සාමි. හංඡෙම හනිස්සාම. අහනි, අහනිංසූතිආදි සබ්බත්ථ යොජෙතබ්බං. හුවාදයො 'हन' च्या पुढील 'स्स' च्या जागी विकल्पेकरून 'छ' आणि 'ख' होतात. 'पटिhंखामि', 'पटिहनिस्सामि'. 'हंचेम', 'हनिस्साम'. 'अहनि', 'अहनिंसु' इत्यादी सर्व ठिकाणी योजना करावी. हुवादी धातू. හු=හවනෙ[Pg.242]. ත්යාදීසු ලො. ‘‘පරොක්ඛායඤ්චා’’ති චග්ගහණෙන හු හුති ද්විත්තං, ‘‘කවග්ගහානං චවග්ගජා’’ති හස්ස ජො, ලලොපො වුද්ධි ච, ජුහොති අග්ගිං, අඤ්ඤත්ර ‘‘යවා සරෙ’’ති වකාරො, ජුහ්වති. ජුහොන්ති. ජුහ්වන්ති. ජුහොසි ජුහ්වසි, ජුහොථ ජුහ්වථ. ඉච්චාදි. කම්මෙ – ‘‘දීඝො සරස්සා’’ති දීඝෙ හූයති තෙන අග්ගි ඉච්චාදි. ජුහිස්සති, ජුහිස්සන්ති. අජුහවි අජුහොසි, අජුහවුං අජුහවිංසු අජුහවංසු අජුහොසුං. අජුහිස්ස, අජුහිස්සංස්සු. ජුහෙ ජුහෙය්ය. ජුහොතු, ජුහොන්තු ඉච්චාදි. हु = हवन करणे या अर्थी. 'ति' इत्यादी प्रत्यय असताना विकरणाचा लोप होतो. "परोक्खायञ्च..." या सूत्रातील 'च' कार ग्रहणाने 'हु' चे 'हु हु' असे द्वित्व होते. "कवग्गहानं चवग्गजा..." सूत्राने 'ह' च्या जागी 'ज' होतो, विकरणाचा लोप आणि वृद्धी होऊन 'जुहोति अग्गिं' (अग्नीमध्ये हवन करतो) रूप बनते. इतर ठिकाणी "यवा सरे" सूत्राने 'व' कार होऊन 'जुह्वति' रूप बनते. 'जुहोन्ति', 'जुह्वन्ति'. 'जुहोसि', 'जुह्वसि', 'जुहोथ', 'जुह्वथ' इत्यादी. कर्मवाच्य मध्ये – "दीघो सरस्स..." सूत्राने दीर्घ होऊन 'हूयति तेन अग्गि' इत्यादी रूपे होतात. 'जुहिस्सति', 'जुहिस्सन्ति'. 'अजुहवि', 'अजुहोसि', 'अजुहवुं', 'अजुहविंसु', 'अजुहवंसु', 'अजुहोसुं'. 'अजुहिस्स', 'अजुहिस्सं सु'. 'जुहे', 'जुहेय्य'. 'जुहोतु', 'जुहोन्तु' इत्यादी. හා=චාගෙ, පුරෙ විය ද්වෙභාවඡාදෙසලොපෙ ‘‘රස්සො පුබ්බස්සා’’ති පුබ්බස්ස ආස්ස රස්සො. ජහාති ඉච්චාදි. කම්මෙ – ‘‘අඤ්ඤාදිස්සා+ස්සී ක්යෙ’’ති ක්යෙ ආස්ස ඊ, හීයති ඉච්චාදි. ජහිස්සති. අජහාසි, ‘‘දීඝා ඊස්ස’’ ඉති සි, පජහි, අජහිංසු අජහංසු, පජහිංසු පජහුං. කම්මෙ-පහීයි පහීයිත්ථ. ස්සාදි+එය්යාදි+ත්වාදීසුපි ඤෙය්යා. हा = त्याग करणे या अर्थी. पूर्वीप्रमाणेच द्वित्व, 'छ' आदेश आणि लोप झाल्यावर "रस्सो पुब्बस्स..." सूत्राने पूर्व 'आ' चा र्हस्व होतो, (त्यामुळे) 'जहाति' इत्यादी रूपे होतात. कर्मवाच्य मध्ये – "अञ्ञादिस्सा..." सूत्राने 'क्य' प्रत्यय असताना 'आ' चा 'ई' होऊन 'हीयति' इत्यादी रूपे होतात. 'जहिस्सति'. 'अजहासि', "दीघा ईस्स" सूत्राने 'सि' प्रत्यय असताना 'पजहि', 'अजहिंसु', 'अजहंसु', 'पजहिंसु', 'पजहुं'. कर्मवाच्य मध्ये – 'पहीयि', 'पहीयित्थ'. 'स्सादि', 'एय्यादि' आणि 'त्त्वादि' प्रत्ययांमध्ये देखील असेच जाणावे. දා=දානෙ, ද්විභාවරස්සත්තානි, ලලොපො, දදාති, දදන්ති ඉච්චාදි. ‘‘ගමවදා’’ දිනා දජ්ජාදෙසෙ දජ්ජති, දජ්ජන්ති ඉච්චාදි. ලස්සෙ+කාරෙ දානං දෙති ඉච්චාදි. दा = दान देणे या अर्थी. द्वित्व, र्हस्वत्व आणि विकरणाचा लोप झाल्यावर 'ददाति', 'ददन्ति' इत्यादी रूपे होतात. "गमवदा..." सूत्राने 'दज्ज' आदेश झाल्यावर 'दज्जति', 'दज्जन्ति' इत्यादी रूपे होतात. 'ल' च्या जागी 'ए' कार झाल्यावर 'दानं देति' इत्यादी रूपे होतात. 22. දාස්ස දං වා මිමෙස්ව+ද්විත්තෙ २२. द्वित्व नसताना 'मि' आणि 'म' प्रत्यय असताना 'दा' च्या जागी विकल्पेकरून 'दं' होतो. අද්විත්තෙ වත්තමානස්ස දාස්ස දං හොති වා මිමෙසු. වග්ගන්තං, දම්මි දෙමි, දම්ම දෙම. ඊකාරෙ දීයති ඉච්චාදි. අනාගතත්ථෙ ඉඤාගමෙ සරණොපාදි, දදිස්සති, දදිස්සන්ති. දජ්ජිස්සති, දජ්ජිස්සන්ති. ලවිකරණෙ [Pg.243] දස්සති, දස්සන්ති. අජ්ජතනෙ-අදදි, අදදිංසු, අදජ්ජි, අදජ්ජිංසු, අදාසි, අදංසු. අනජ්ජතනෙ-අදදා, අදදු. කාලාතිපත්තියං-අදදිස්ස අදජ්ජිස්ස, ලෙ අදස්ස, දස්සංසු. එය්යාදිම්හි-දදෙ දදෙය්ය දජ්ජෙ දජ්ජෙය්ය. ‘‘ටා’’ති බහුලාධිකාරා දජ්ජාදෙසා පරස්ස එය්යස්ස ටා, දජ්ජා, දජ්ජුං දජ්ජෙය්යං දදෙය්යුං. ත්වාදීසු-දදාතු, දදන්තු, දජ්ජතු, දජ්ජන්තු, ලස්සෙ+කාරෙ දෙතු, දෙන්තු ඉච්චාදි. සබ්බත්ථ කම්මෙපි යොජනීයං. द्वित्व नसताना वर्तमानकाळात 'दा' च्या जागी 'मि' आणि 'म' प्रत्यय असताना विकल्पेकरून 'दं' होतो. वर्गान्त (अनुस्वार) झाल्यावर 'दम्मि', 'देमि', 'दम्म', 'देम' रूपे होतात. 'ई' कार असताना 'दीयति' इत्यादी. भविष्यकाळात 'इ' चा आगम आणि स्वराचा लोप इत्यादी झाल्यावर 'ददिस्सति', 'ददिस्सन्ति'. 'दज्जिस्सति', 'दज्जिस्सन्ति'. 'ल' विकरण असताना 'दस्सति', 'दस्सन्ति'. अद्यतनी (भूतकाळात) – 'अददि', 'अददिंसु', 'अदज्जि', 'अदज्जिंसु', 'अदासि', 'अदंसु'. अनद्यतनी मध्ये – 'अददा', 'अददु'. कालातिपत्तीमध्ये – 'अददिस्स', 'अदज्जिस्स', 'ल' असताना 'अदस्स', 'दस्सं सु'. 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय असताना – 'ददे', 'ददेय्य', 'दज्जे', 'दज्जेय्य'. "टा" या बहुल अधिकाराने 'दज्ज' आदेशाच्या पुढील 'एय्य' च्या जागी 'टा' होऊन 'दज्जा', 'दज्जुं', 'दज्जेय्यं', 'ददेय्युं' रूपे होतात. 'तु' इत्यादी प्रत्यय असताना – 'ददातु', 'ददन्तु', 'दज्जतु', 'दज्जन्तु', 'ल' च्या जागी 'ए' कार झाल्यावर 'देतु', 'देन्तु' इत्यादी. सर्व ठिकाणी कर्मवाच्य मध्ये देखील योजना करावी. ධා=ධාරණෙ, ත්යාදිම්හි චග්ගහණෙන ද්විත්තෙ පුබ්බාකාරස්ස රස්සත්තෙ ලලොපෙ ‘‘චතුත්ථදුතියානං තතියපඨමා’’ති පුබ්බධකාරස්ස දකාරෙ ච කතෙ දධාති, දධන්ති. පිපුබ්බො, ‘‘තදමිනා’’ දිනා ආස්ස ලොපො, ‘‘ධාස්ස හො’’ති ද්විත්තෙ පරස්ස ධාස්ස හකාරො, ද්වාරං පිදහති, පිදහන්ති. ලස්සෙ+කාරෙ නිධෙති, නිධෙන්ති. කම්මෙ-විධීයති, විධීයන්ති ඉච්චාදි. ධස්සති, පිදහිස්සති, පරිදහෙස්සති. අධාසි, පිදහි. අධස්ස, පිදහිස්ස. දධෙ දධෙය්ය, පිදහෙ පිදහෙය්ය. දදාතු, පිදහතු, නිධෙතු, නිධෙන්තු ඉච්චාදි. (ජුහොත්යාදයො). धा = धारण करणे या अर्थी. 'ति' इत्यादी प्रत्यय असताना 'च' कार ग्रहणाने द्वित्व, पूर्व आकाराचा र्हस्व आणि विकरणाचा लोप झाल्यावर, "चतुत्थदुतियानं ततियपठमा..." सूत्राने पूर्व 'ध' कारच्या जागी 'द' कार झाल्यावर 'दधाति', 'दधन्ति' रूपे होतात. 'पि' उपसर्ग असताना "तदमिना..." सूत्राने 'आ' चा लोप होतो, "धास्स हो" सूत्राने द्वित्व झाल्यावर पुढील 'धा' च्या जागी 'ह' कार होऊन 'द्वारं पिदहति' (दार बंद करतो), 'पिदहन्ति' रूपे होतात. 'ल' च्या जागी 'ए' कार झाल्यावर 'निधेति', 'निधेन्ति' रूपे होतात. कर्मवाच्य मध्ये – 'विधीयति', 'विधीयन्ति' इत्यादी. 'धस्सति', 'पिदहिस्सति', 'परिदहेस्सति'. 'अधासि', 'पिदहि'. 'अधस्स', 'पिदहिस्स'. 'दधे', 'दधेय्य', 'पिदहे', 'पिदहेय्य'. 'ददातु', 'पिदहतु', 'निधेतु', 'निधेन्तु' इत्यादी. (जुहोत्यादी धातू समाप्त). භූවාදි ච ජුහාදි ච, හුවාදිධාතවො චි+මෙ; සවුද්ධිකභූවාදීහි, තිධා භෙදං උපෙන්ති තෙ. भूवादि, जुहादि आणि हुवादि हे धातू आहेत; वृद्धीसह भूवादि धातूंचे तीन प्रकारे वर्गीकरण केले जाते. (භූවාදිනයො.) (भूवादि पद्धत.) අධුනා [Pg.244] විකරණපභෙදපකාසනත්ථං රුධාදීනං අට්ඨගණානං කානිචි රූපානි උදාහරියන්තෙ – आता विकरणांचे भेद स्पष्ट करण्यासाठी रुधादि इत्यादी आठ गणांची काही रूपे उदाहरणादाखल दिली जात आहेत – රුධ=ආවරණෙ, ත්යාදයො හොන්ති. එව+මුපරිපි සබ්බගණෙසු. रुध् = आवरण (रोखणे) या अर्थी, 'ति' इत्यादी प्रत्यय लागतात. याचप्रमाणे पुढील सर्व गणांमध्येही समजावे. 5,19. මඤ්ච රුධාදීනං ५,१९. रुधादि धातूंना 'म' (अनुस्वार) होतो. රුධාදිකො අපරොක්ඛෙසු කත්තුවිහිතමාන+න්ත+ත්යාදීසු ලො හොති මඤ්ච+න්තසරා පරො. නිග්ගහීතස්ස වග්ගන්තං, ‘‘ලහුස්සුපන්තස්සා’’ති සංයොගත්තා න වුද්ධි. සො මග්ගං රුන්ධති, රුන්ධන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-නිපුබ්බො ක්යො ධස්ස චවග්ග+පුබ්බරූප+තතියක්ඛරජකාරා, තෙන මග්ගො නිරුජ්ඣති ඉච්චාදි. ඉඤාගමෙ රුන්ධිස්සති, නිරුජ්ඣිස්සති. අරුන්ධි, අරුන්ධිංසු. නිරුජ්ඣිත්ථො, නිරුජ්ඣි, නිරුජ්ඣිංසු. අරුන්ධිස්ස, අරුන්ධිස්සංසු, නිරුජ්ඣිස්ස, නිරුජ්ඣිස්සංසු. රුන්ධෙ රුන්ධෙය්ය, නිරුජ්ඣෙ නිරුජ්ඣෙය්ය. රුන්ධතු, රුන්ධන්තු. ත්වං රුන්ධ රුන්ධාහි. නිරුජ්ඣතු, නිරුජ්ඣන්තු ඉච්චාදි. रुधादि धातूंच्या पुढे परोक्ष नसलेल्या, कर्त्यासाठी विहित केलेल्या 'ति' इत्यादी प्रत्ययांच्या वेळी 'ल' (विकरण) चा लोप होतो आणि अंत्य स्वराच्या पुढे 'म' (अनुस्वार) येतो. अनुस्वाराचा वर्गान्त (परसवर्ण) होतो. 'लहुस्स उपन्तस्स' या सूत्राने संयोगामुळे उपधा र्हस्व असल्याने वृद्धी होत नाही. जसे की - 'सो मग्गं रुन्धति' (तो मार्ग रोखतो), 'रुन्धन्ति' इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'नि' उपसर्गपूर्वक 'क्य' प्रत्यय लागल्यास 'ध' चा च-वर्ग, पूर्वरूप आणि तिसरा वर्ण 'ज' होतो, त्यायोगे 'मग्गो निरुज्झति' (मार्ग निरुद्ध होतो) इत्यादी रूपे बनतात. 'इ' आगम झाल्यास 'रुन्धिस्सति', 'निरुज्झिस्सति'. भूतकाळात 'अरुन्धि', 'अरुन्धिंसु'. कर्मणीत 'निरुज्झित्थो', 'निरुज्झि', 'निरुज्झिंसु'. संकेतार्थामध्ये 'अरुन्धिस्स', 'अरुन्धिस्संसु', 'निरुज्झिस्स', 'निरुज्झिस्संसु'. विध्यर्थात 'रुन्धे', 'रुन्धेय्य', 'निरुज्झे', 'निरुज्झेय्य'. आज्ञार्थामध्ये 'रुन्धतु', 'रुन्धन्तु'. 'त्वं रुन्ध', 'रुन्धाहि'. 'निरुज्झतु', 'निरुज्झन्तु' इत्यादी. ඡිද=ද්වෙධාකරණෙ, ඡින්දති, ඡින්දන්ති. කම්මෙ-ඡිජ්ජති, ඡිජ්ජන්ති. භවිස්සතිපච්චයෙ – ‘‘ලභ වසච්ඡිදා’’ දිනා ච්ඡඞාදෙසෙ ඡෙච්ඡති ඡින්දිස්සති. කම්මෙ-පුබ්බරූපං, ඡිජ්ජිස්සති, ඡිජ්ජිස්සන්ති. අඡින්දි ඡින්දි, අච්ඡෙජ්ජි, අච්ඡෙජ්ජිංසු. අච්ඡින්දිස්සා අඡිජ්ජිස්සා. ඡින්දෙ ඡින්දෙය්ය, ඡිජ්ජෙ ඡිජ්ජෙය්ය, ඡින්දතු, ඡින්දන්තු, ඡිජ්ජතු, ඡිජ්ජන්තු ඉච්චාදි. छिद् = द्वेधाकरण (दोन तुकडे करणे) या अर्थी, 'छिन्दति', 'छिन्दन्ति' अशी रूपे होतात. कर्मणी प्रयोगात - 'छिज्जति', 'छिज्जन्ति'. भविष्यकाळात - 'लभ वसच्छिदा' इत्यादी सूत्राने 'च्छ' आदेश होऊन 'छेच्छति', 'छिन्दिस्सति' अशी रूपे होतात. कर्मणीत पूर्वरूप होऊन 'छिज्जिस्सति', 'छिज्जिस्सन्ति' अशी रूपे होतात. भूतकाळात 'अछिन्दि', 'छिन्दि', 'अच्छेज्जि', 'अच्छेज्जिंसु'. संकेतार्थामध्ये 'अच्छिन्diस्सा', 'अछिज्जिस्सा'. विध्यर्थात 'छिन्दे', 'छिन्देय्य', 'छिज्जे', 'छिज्जेय्य'. आज्ञार्थामध्ये 'छिन्दतु', 'छिन्दन्तु', 'छिज्जतु', 'छिज्जन्तु' इत्यादी. භුජ=පාලනජ්ඣොහාරෙසු, භුඤ්ජති, භුඤ්ජන්ති ඉච්චාදි. භවිස්සතිම්හි ‘‘භුජ+මුච+වච+විසානං ක්ඛඞ’’ති ධාත්වන්තෙන සහ ස්සස්ස [Pg.245] ක්ඛඞාදෙසෙ වුද්ධි, භොක්ඛති, භුඤ්ජිස්සති, භොක්ඛන්ති, භුඤ්ජිස්සන්ති ඉච්චාදි. भुज् = पालन आणि उपभोग (खाणे) या अर्थी, 'भुञ्जति', 'भुञ्जन्ति' इत्यादी रूपे होतात. भविष्यकाळात 'भुज-मुच-वच-विसां क्खण' या सूत्राने धातूच्या अंत्य वर्णासह 'स्स' च्या जागी 'क्ख' आदेश होऊन वृद्धी होते, जसे की 'भोक्खति', 'भुञ्जिस्सति', 'भोक्खन्ति', 'भुञ्जिस्सन्ति' इत्यादी. මුච=මොචනෙ, මුච්චති, මුච්චන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-මුච්චති, මුච්චන්ති ඉච්චාදි. (රුධාදිනයො). मुच् = मोचन (मुक्त करणे) या अर्थी, 'मुच्चति', 'मुच्चन्ति' इत्यादी रूपे होतात. कर्मणी प्रयोगात - 'मुच्चति', 'मुच्चन्ति' इत्यादी रूपे होतात. (रुधादि पद्धत समाप्त). දිව=කීළා විජිගිංසා වොහාර ජුති ථුති ගතීසු, दिव् = क्रीडा (खेळणे), विजिगीषा (जिंकण्याची इच्छा), व्यवहार, द्युती (चमकणे), स्तुती आणि गती या अर्थांमध्ये, 5,21. දිවාදීහි යක ५,२१. दिवादि धातूंच्या पुढे 'यक' प्रत्यय होतो. දිවාදීහි කත්තරි ලවිසයෙ යක හොති. කකාරො කානුබන්ධකාරියත්ථො, එව+මුපරි ච. වස්ස බකාරෙ පුබ්බරූපං, සො ජුතං දිබ්බති, දිබ්බන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-ක්යෙ තෙන දිබ්බති, දිබ්බන්ති ඉච්චාදි. දිබ්බිස්සති, තෙන දිබ්බිස්සති. අදිබ්බි දිබ්බි. තෙන අදිබ්බි දිබ්බි. අදිබ්බිස්ස. තෙන අදිබ්බිස්ස. දිබ්බෙ දිබ්බෙය්ය. තෙන දිබ්බෙ දිබ්බෙය්ය. දිබ්බතු. තෙන දිබ්බතු ඉච්චාදි. दिवादि धातूंच्या पुढे कर्तरी प्रयोगात 'ल' च्या जागी 'यक' प्रत्यय होतो. 'क' हा अनुबंध कार्यासाठी आहे, आणि पुढेही असेच समजावे. 'व' च्या जागी 'ब' होऊन पूर्वरूप होते, जसे की - 'सो जुतं दिब्बति' (तो जुगार खेळतो), 'दिब्बन्ति' इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'क्य' प्रत्यय लागल्याने 'दिब्बति', 'दिब्बन्ति' इत्यादी रूपे होतात. भविष्यकाळात 'दिब्बिस्सति', कर्मणीत 'दिब्बिस्सति'. भूतकाळात 'अदिब्बि', 'दिब्बि'. कर्मणीत 'अदिब्बि', 'दिब्बि'. संकेतार्थात 'अदिब्बिस्स', कर्मणीत 'अदिब्बिस्स'. विध्यर्थात 'दिब्बे', 'दिब्बेय्य', कर्मणीत 'दिब्बे', 'दिब्बेय्य'. आज्ञार्थामध्ये 'दिब्बतु', कर्मणीत 'दिब्बतु' इत्यादी. සිව=තන්තුසන්තානෙ, සිබ්බති, සිබ්බන්ති ඉච්චාදි. පද=ගමනෙ, උපුබ්බො, චවග්ගපුබ්බරූපානි, උප්පජ්ජති, උප්පජ්ජරෙ උප්පජ්ජන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙක්යෙ තෙන පටිපජ්ජතෙ ඉච්චාදි. භාවෙ-උප්පජ්ජතෙ තයා. බුධ=අවගමනෙ, ඣකාරපුබ්බරූපානි යක්ඛරෙසු. ධම්මං බුජ්ඣති, බුජ්ඣරෙ බුජ්ඣන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-මයා ධම්මො බුජ්ඣතෙ ඉච්චාදි. යුධ=සම්පහාරෙ, යුජ්ඣති+ච්චාදි. නහ=බන්ධනෙ, ‘‘හස්ස විපල්ලාසො’’ති යෙ විපල්ලාසො, සන්නය්හති+ච්චාදි. මන=ඤාණෙ, ඤ්ඤකාර+පුබ්බරූපානි, මඤ්ඤති+ච්චාදි. තුස=තුට්ඨිම්හි, පුබ්බරූපෙ තුස්සති+ච්චාදි. සම=උපසමෙ, සම්මති+ච්චාදි. सिव् = तंतुसंतान (शिवणकाम करणे) या अर्थी, 'सिब्बति', 'सिब्बन्ति' इत्यादी रूपे होतात. पद् = गमन (जाणे) या अर्थी, 'उ' उपसर्गपूर्वक च-वर्गाचे पूर्वरूप होऊन 'उप्पज्जति', 'उप्पज्जरे', 'उप्पज्जन्ति' इत्यादी रूपे होतात. कर्मणीत 'क्य' प्रत्यय लागल्याने 'पटिपज्जते' इत्यादी रूपे होतात. भावे प्रयोगात - 'उप्पज्जते तया' (तुझ्याद्वारे उत्पन्न केले जाते). बुध् = अवगमन (जाणणे) या अर्थी, 'य' प्रत्यय असताना 'झ' चे पूर्वरूप होऊन 'धम्मं बुज्झति' (धम्म जाणतो), 'बुज्झरे', 'बुज्झन्ति' इत्यादी रूपे होतात. कर्मणीत - 'मया धम्मो बुज्झते' (माझ्याद्वारे धम्म जाणला जातो) इत्यादी. युध् = संप्रहार (युद्ध करणे) या अर्थी, 'युज्झति' इत्यादी. नह् = बंधन (बांधणे) या अर्थी, 'हस्स विपल्लासो' या सूत्राने 'ह' चा विपर्यास होऊन 'सन्नय्हति' इत्यादी. मन् = ज्ञान (जाणणे) या अर्थी, 'ञ' चे पूर्वरूप होऊन 'मञ्ञति' इत्यादी. तुष् = तुष्टी (संतुष्ट होणे) या अर्थी, पूर्वरूप होऊन 'तुस्सति' इत्यादी. शम् = उपशम (शांत होणे) या अर्थी, 'सम्मति' इत्यादी रूपे होतात. ජන=ජනනෙ[Pg.246], ‘‘ජනිස්සා’’ති ආ හොති කානුබන්ධෙ බහුලාධිකාරා, සො ජායති, ජායන්ති+ච්චාදි. කම්මෙ-ජනිතුං පයොජෙතීති ‘‘පයොජකබ්යාපාරෙ ණාපි චෙ’’ති ණිම්හි ‘‘අඤ්ඤත්රාපී’’ති වුද්ධිපටිසෙධෙ ක්යම්හි ‘‘දීඝො සරස්සා’’ති දීඝෙ ච කතෙ තෙන ජනීයති, ජනීයන්ති ඉච්චාදි. සො ජායිස්සති. තෙන ජනිස්සති. සො අජායි, තෙන අජනීයි. සො අජායිස්ස, තෙන අජනීයිස්ස. සො ජායෙ ජායෙය්ය, තෙන ජනීයෙය්ය. සො ජායතු, තෙන ජනීයතු ඉච්චාදි. (දිවාදිනයො). जन् = जनन (उत्पन्न होणे) या अर्थी, 'जनiस्सा' या सूत्राने 'आ' होतो, 'क' अनुबंधाच्या बहुल अधिकारामुळे 'सो जायति' (तो जन्म घेतो), 'जायन्ति' इत्यादी रूपे होतात. कर्मणी प्रयोगात - 'उत्पन्न करण्यास प्रवृत्त करतो' या अर्थी 'प्रयोजक व्यापारात णापि प्रत्यय असताना' 'णि' प्रत्यय लागल्यास 'अन्यत्रापि' या सूत्राने वृद्धीचा निषेध होतो आणि 'क्य' प्रत्यय लागल्यास 'दीघो सरस्स' या सूत्राने दीर्घ होऊन 'जनीयति', 'जनीयन्ति' इत्यादी रूपे होतात. भविष्यकाळात 'सो जायिस्सति', कर्मणीत 'जनिस्सति'. भूतकाळात 'सो अजायि', कर्मणीत 'अजनीयि'. संकेतार्थात 'सो अजायिस्स', कर्मणीत 'अजनीयिस्स'. विध्यर्थात 'सो जाये', 'जायेय्य', कर्मणीत 'जनीयय्य'. आज्ञार्थामध्ये 'सो जायतु', कर्मणीत 'जनीयतु' इत्यादी. (दिवादि पद्धत समाप्त). තුද=බ්යථනෙ, तुद् = व्यथन (पीडा देणे) या अर्थी, 5,22. තුදාදීහි කො ५,२२. तुदादि धातूंच्या पुढे 'को' प्रत्यय होतो. තුදාදීහි කත්තරි ලවිසයෙ කො හොති. තුදති, තුදන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-තුද්යති තුජ්ජති, තුද්යරෙ තුද්යන්ති, තුජ්ජරෙ තුජ්ජන්ති+ච්චාදි. තථා තුදිස්සති තුජ්ජිස්සති. අතුදි, අතුදිංසු, අතුජ්ජි. අතුදිස්ස අතුජ්ජිස්ස, තුදෙය්ය තුජ්ජෙය්ය. තුදතු, තුදන්තු, තුජ්ජතු ඉච්චාදි. तुदादि धातूंच्या पुढे कर्तरी प्रयोगात 'ल' च्या जागी 'को' प्रत्यय होतो. 'तुदति', 'तुदन्ति' इत्यादी रूपे होतात. कर्मणी प्रयोगात - 'तुद्यति' चे 'तुज्जति', 'तुद्यरे' चे 'तुज्जरे', 'तुद्यन्ति' चे 'तुज्जन्ति' इत्यादी रूपे होतात. तसेच भविष्यकाळात 'तुदिस्सति', 'तुज्जिस्सति'. भूतकाळात 'अतुदि', 'अतुदिंसु', 'अतुज्जि'. संकेतार्थात 'अतुदिस्स', 'अतुज्जिस्स'. विध्यर्थात 'तुदेय्य', 'तुज्जेय्य'. आज्ञार्थामध्ये 'तुदतु', 'तुदन्तु', 'तुज्जतु' इत्यादी. විස=පවෙසනෙ, පපුබ්බො. සො ගාමං පවිසති ඉච්චාදි. කම්මෙ-පවිසීයති ඉච්චාදි. පවිසිස්සති. පවිසීයිස්සති. පාවිසි, ඊම්හි ‘‘භුජමුචා’’ දිනා යොගවිභාගා ක්ඛඞ. පාවිසි, පවිසි පාවෙක්ඛි, පථවිං පාවිසිංසු පවිසිංසු. පාවිසීයි. පාවිසිස්ස පවිසිස්ස. පාවිසීයිස්ස. පවිසෙ පවිසෙය්ය, විකරණලොපො [Pg.247] පවිසීයෙය්ය. පවිසතු, පවිසීයතු ඉච්චාදි. නුදති. දිස=උච්චාරණෙ, උද්දිස්සති, ලිඛති, තුසති ඉච්චාදි. (තුදාදිනයො). विस् = प्रवेश करणे या अर्थी, 'प' उपसर्गपूर्वक 'सो गामं पविसति' (तो गावात प्रवेश करतो) इत्यादी रूपे होतात. कर्मणीत - 'पविसीयति' इत्यादी. भविष्यकाळात 'पविसिस्सति', कर्मणीत 'पविसीयिस्सति'. भूतकाळात 'पाविसि', 'ई' प्रत्यय असताना 'भुजमुच' इत्यादी सूत्राच्या योगविभागाने 'क्खण' आदेश होऊन 'पाविखि' किंवा 'पावेक्खि', 'पथविं पाविसिंसु', 'पविसiंसु' अशी रूपे होतात. कर्मणीत 'पाविसीयि'. संकेतार्थात 'पाविसiस्स', 'पविसiस्स', कर्मणीत 'पाविसीयिस्स'. विध्यर्थात 'पविसे', 'पविसेय्य', विकरणाचा लोप होऊन 'पविसीयेय्य'. आज्ञार्थामध्ये 'पविसतु', 'पविसीयतु' इत्यादी. 'नुदति'. दिश् = उच्चारण (सांगणे) या अर्थी, 'उद्दिसति', 'लिखति', 'तुसति' इत्यादी. (तुदादि पद्धत समाप्त). ජි=ජයෙ, जि = जय (जिंकणे) या अर्थी, 5,23. ජ්යාදීහි ක්නා ५,२३. ज्यादि धातूंच्या पुढे 'क्ना' प्रत्यय होतो. ජ්යාදීහි කත්තරි ලවිසයෙ ක්නා හොති. න වුද්ධි. කිලෙසෙ ජිනාති, ජිනන්ති. තෙන කිලෙසො ජීයති, ජීයන්ති, ක්යෙ දීඝො. ජිනිස්සති, ජිනිස්සන්ති. අජිනි ජිනි. අජීයි, අජීයිත්ථ. අජිනිස්ස. අජීයිස්ස. ජිනෙය්ය. ජිනාතු ඉච්චාදි. චි=චයෙ, තථා චිනාති, චිනන්ති ඉච්චාදි. ज्यादि धातूंच्या पुढे कर्तरी प्रयोगात 'ल' च्या जागी 'क्ना' प्रत्यय होतो. वृद्धी होत नाही. 'किलेसे जिनाति' (क्लेशांना जिंकतो), 'जिनान्ति'. कर्मणी प्रयोगात - 'किलेसो जीयति' (क्लेश जिंकला जातो), 'जीयन्ति', 'क्य' प्रत्यय असताना दीर्घ होतो. भविष्यकाळात 'जिनिस्सति', 'जिनिस्सन्ति'. भूतकाळात 'अजिनि', 'जिनि'. कर्मणीत 'अजीयि', 'अजीयित्थो'. संकेतार्थात 'अजिनिस्स', कर्मणीत 'अजीयिस्स'. विध्यर्थात 'जिनेय्य'. आज्ञार्थामध्ये 'जिनातु' इत्यादी. चि = चय (एकत्र करणे) या अर्थी, तसेच 'चिनाति', 'चिनान्ति' इत्यादी रूपे होतात. ඤා=අවබොධනෙ, ञा = अवबोधन (जाणणे) या अर्थी, 5,120. ඤාස්ස නෙ ජා ५,१२०. ञा धातूच्या जागी 'जा' होतो. ඤාධාතුස්ස ජා හොති නකාරෙ. විජානාති. ञा धातूच्या जागी 'न' प्रत्यय असताना 'जा' होतो. जसे की - 'विजानाति' (विशेष जाणतो). 61. ඤාස්ස සනාස්ස නායො තිම්හි ६१. ञा धातूच्या आणि 'सना' प्रत्ययाच्या जागी 'ति' प्रत्यय असताना 'नाय' होतो. සනාස්ස ඤාස්ස නායො වා හොති තිම්හි. නායති, විජානාති ඉච්චාදි. කම්මෙ-විඤ්ඤායති ඉච්චාදි. ක්යෙ ‘‘ආස්සෙ චා’’ති එත්ථ ‘‘ආස්සෙ’’ති යොගවිභාගා ආස්ස එ හොති, යස්ස ද්විත්තෙ ඤෙය්යති, ඤෙය්යන්ති ඉච්චාදි. විජානිස්සති, විජානිස්සන්ති. කම්මෙ – ‘‘ක්යස්ස ස්සෙ’’ති ක්යලොපෙ රස්සෙ ච කතෙ ඤාස්සති, ඤාස්සන්ති, විඤ්ඤායිස්සති, පඤ්ඤායිස්සති. ञा धातूच्या आणि 'सना' प्रत्ययाच्या जागी 'ति' प्रत्यय असताना पर्यायाने 'नाय' होतो. जसे की - 'नायति', 'विजानाति' इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'विञ्ञायति' इत्यादी. 'क्य' प्रत्यय असताना 'आस्से च' या सूत्रातील 'आस्से' या योगविभागाने 'आ' च्या जागी 'ए' होतो, आणि 'य' चे द्वित्व होऊन 'ञेय्यति', 'ञेय्यन्ति' इत्यादी रूपे होतात. भविष्यकाळात 'विजानिस्सति', 'विजानिस्सन्ति'. कर्मणी प्रयोगात - 'क्यस्स स्से' या सूत्राने 'क्य' चा लोप आणि र्हस्व होऊन 'ञास्सति', 'ञास्सन्ति', 'विञ्ञायिस्सति', 'पञ्ञायिस्सति' अशी रूपे होतात. 65. ස්සස්ස හි කම්මෙ ६५. कर्मणी प्रयोगात 'स्स' च्या जागी 'हि' होतो. ඤාතො පරස්ස ස්සස්ස හි වා හොති කම්මෙ, පඤ්ඤායිහිති, පඤ්ඤායිහින්ති. අඤාගමෙ සමජානි, සංජානි, සංජානිංසු. සමජා- නිංසු[Pg.248]. කම්මෙ-පඤ්ඤායි, පඤ්ඤායිංසු. අජානිස්ස. කම්මෙ-අඤ්ඤායිස්ස. ञा धातूच्या पुढील 'स्स' च्या जागी कर्मणी प्रयोगात पर्यायाने 'हि' होतो, जसे की - 'पञ्ञायिहिति', 'पञ्ञायिहिन्ति'. 'अ' आगम झाल्यावर 'समजानि', 'संजानि', 'संजानिंसु', 'समजानिंसु'. कर्मणी प्रयोगात - 'पञ्ञायि', 'पञ्ञायिंसु'. संकेतार्थात 'अजानिस्स'. कर्मणीत - 'अञ्ञायिस्स'. 63. එය්යස්සි+යාඤා වා ६३. विध्यर्थातील 'एय्य' च्या जागी पर्यायाने 'इया' आणि 'ञा' होतात. ඤාතො පරස්ස එය්යස්ස ඉයා+ඤා හොන්ති වා. ජානියා. ञा धातूच्या पुढील 'एय्य' च्या जागी पर्यायाने 'इया' आणि 'ञा' होतात. जसे की - 'जानिया'. 62. ඤාම්හි ජං ६२. ञा आदेश असताना 'जं' होतो. ඤාදෙසෙ සනාස්ස ඤාස්ස ජං වා හොති. ජඤ්ඤා, ජානෙය්ය, ජානෙය්යුං. කම්මෙ-පඤ්ඤායෙය්ය, පඤ්ඤායෙය්යුං. විජානාතු, විජානන්ථු. කම්මෙ-විඤ්ඤායතු ඉච්චාදි. ञा आदेश असताना 'सना' प्रत्यययुक्त 'ञा' च्या जागी पर्यायाने 'जं' होतो. जसे की - 'जञ्ञा', 'जानेय्य', 'जानेय्युं'. कर्मणी प्रयोगात - 'पञ्ञायेय्य', 'पञ्ञायेय्युं'. आज्ञार्थामध्ये 'विजानातु', 'विजानन्तु'. कर्मणीत - 'विञ्ञायतु' इत्यादी. මා=මානෙ, ‘‘ආ ඊ ස්සාදීනං බ්යඤ්ජනස්සිඤ’’ ඉති ඉඤඉති යොගවිභාගා ඉඤාගමෙ පුබ්බසරලොපො, මිනාති, මිනන්ති. කම්මෙ-මීයති ඉච්චාදි. ලූ=ඡෙදනෙ, ‘‘ක්ණාක්නාසු රස්සො’’ති ධාතුස්ස රස්සො, ලුනාති, ලුනන්ති. කම්මෙ-ලූයති ඉච්චාදි. ධු=කම්පනෙ, ධුනාති ඉච්චාදි. (ජ්යාදිනයො). मा = मोजणे (माने), “आ ई स्सादीनं ब्यञ्जनस्सिञ” या सूत्रातील 'इञ' या योगविभागाने 'इञ्' आगम झाल्यावर पूर्वस्वराचा लोप होतो, मिनाति, मिनन्ति. कर्मणी प्रयोगात - मीयति इत्यादी. लू = छेदणे (छेदने), “क्णाक्नासु रस्सो” या सूत्राने धातूचा र्हस्व होतो, लुनाति, लुनन्ति. कर्मणी प्रयोगात - लूयति इत्यादी. धु = कंप पावणे (कंपने), धुनाति इत्यादी. (ज्यादि-नय). කී=දබ්බවිනීමයෙ, की = वस्तूंचा विनिमय करणे (द्रव्यविनिमये), 24. ක්යාදීහි ක්ණා २४. क्यादि धातूंनंतर 'क्णा' प्रत्यय होतो. ක්යාදීහි ලවිසයෙ ක්ණා හොති. ‘‘ක්ණාක්නාසු රස්සො’’ති රස්සෙ කිණාති, කිණන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-වික්කීයති, වික්කීයන්ති. වික්කිණිස්සති, වික්කිණිස්සන්ති. වික්කීයිස්සති, වික්කීයිස්සන්ති. අකිණි, වික්කිණි, වික්කීයි. අකිණිස්ස, වික්කිණිස්ස. වික්කිණෙ වික්කිණෙය්ය. क्यादि धातूंनंतर 'ल' (लकार) च्या विषयात 'क्णा' प्रत्यय होतो. “क्णाक्नासु रस्सो” या सूत्राने र्हस्व झाल्यावर किणाति, किणन्ति इत्यादी रूपे होतात. कर्मणी प्रयोगात - विक्कीयति, विक्कीयन्ति. भविष्यकाळात - विक्किणिस्सति, विक्किणिस्सन्ति. कर्मणी भविष्यकाळात - विक्कीयिस्सति, विक्कीयिस्सन्ति. भूतकाळात - अकिणि, विक्किणि, विक्कीयि. क्रियातिपत्तीत - अकिणिस्स, विक्किणिस्स. विध्यर्थात - विक्किणे, विक्किणेय्य. වික්කීයෙ[Pg.249]. වික්කීයෙය්ය. වික්කිණාතු, වික්කිණන්තු, වික්කීයතු, වික්කීයන්තු ඉච්චාදි. සු=සවනෙ, සුණාති, සුණන්ති ඉච්චාදි. विक्कीये, विक्कीयेय्य. आज्ञार्थामध्ये - विक्किणातु, विक्किणन्तु, विक्कीयतु, विक्कीयन्तु इत्यादी. सु = ऐकणे (सवने), सुणाति, सुणन्ति इत्यादी. සක=සත්තියං, सक = सामर्थ्य असणे (सत्तियं), 5,121. සකා+පානං කුක+කු ණෙ ५,१२१. 'सक' धातू आणि 'आप' प्रत्यय यांना 'कुक' आणि 'कु' आगम होतात 'णे' प्रत्यय असताना. සක+ආපානං කුක+කුඉච්චෙතෙ ආගමා හොන්ති ණෙ. සක්කුණාති, සක්කුණන්ති. සක්කුනාති, සක්කුනන්ති. 'सक' आणि 'आप' यांना 'कुक' आणि 'कु' हे आगम होतात 'णे' प्रत्यय असताना. सक्कुणाति, सक्कुणन्ति. सक्कुनाति, सक्कुनन्ति. 53. ස්සෙ වා ५३. 'स्से' प्रत्यय असताना विकल्पे करून. සකස්මා ක්ණාස්ස ක්ඛො වා හොති ස්සෙ. සක්ඛිස්සති, සක්ඛිස්සන්ති. 'सक' धातूच्या 'क्णा' प्रत्ययाला 'स्से' प्रत्यय असताना विकल्पे करून 'क्खो' आदेश होतो. सक्खिस्सति, सक्खिस्सन्ति. 58. සකා ක්ණාස්ස ඛ ඊආදො ५८. 'सक' धातूच्या 'क्णा' प्रत्ययाला 'ई' इत्यादी प्रत्यय असताना 'ख' आदेश होतो. සකස්මා ක්ණාස්ස ඛො වා හොති ඊආදීසු. අසක්ඛි සක්ඛි, සක්ඛිංසු. අසක්ඛිස්ස, අසක්ඛිස්සංසු. සක්කුණෙ සක්කුණෙය්ය. සක්කුණාතු, සක්කුණන්තු. 'सक' धातूच्या 'क्णा' प्रत्ययाला 'ई' इत्यादी प्रत्यय असताना विकल्पे करून 'खो' आदेश होतो. असक्खि, सक्खि, सक्खिंसु. असक्खिस्स, असक्खिस्सिंसु. विध्यर्थात - सक्कुणे, सक्कुणेय्य. आज्ञार्थामध्ये - सक्कुणातु, सक्कुणन्तु. අප=පාපුණනෙ, පපුබ්බො, ‘‘සකා+පානං කුක+කු ණෙ’’ති කුකතෙ සම්පත්ති පාපුණාති, පාපුණන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙපාපීයති, පාපීයන්ති. පාපුණිස්සති, පාපුණිස්සන්ති. කම්මෙ-පාපීයිස්සති, පාපීයිස්සන්ති. පාපුණි, පාපුණිංසු. කම්මෙ-පාපීයි, පාපීයිත්ථ. අපාපුණිස්ස. කම්මෙ-අපාපීයිස්ස. පාපුණෙ, පාපුණෙය්ය. කම්මෙ-පාපීයෙය්ය. පාපුණාතු, පාපුණන්තු. කම්මෙ-පාපීයතු ඉච්චාදි. (ක්යාදිනයො). अप = प्राप्त करणे (पापुणने), 'प' उपसर्ग असताना, “सका+पानं कुक+कु णे” या सूत्राने 'कुक' आगम प्राप्त होऊन पापुणाति, पापुणन्ति इत्यादी रूपे होतात. कर्मणी प्रयोगात - पापीयति, पापीयन्ति. भविष्यकाळात - पापुणिस्सति, पापुणिस्सन्ति. कर्मणी भविष्यकाळात - पापीयिस्सति, पापीयिस्सन्ति. भूतकाळात - पापुणि, पापुणिंसु. कर्मणी भूतकाळात - पापीयि, पापीयित्थ. क्रियातिपत्तीत - अपापुणिस्स. कर्मणी क्रियातिपत्तीत - अपापीयिस्स. विध्यर्थात - पापुणे, पापुणेय्य. कर्मणी विध्यर्थात - पापीय्य्य. आज्ञार्थामध्ये - पापुणातु, पापुणन्तु. कर्मणी आज्ञार्थामध्ये - पापीयतु इत्यादी. (क्यादि-नय). සු=සවනෙ, सु = ऐकणे (सवने), 25. ස්වාදීහි ක්ණො २५. स्वादि धातूंनंतर 'क्णो' प्रत्यय होतो. සුආදීහි [Pg.250] ලවිසයෙ ක්ණො හොති. කානුබන්ධත්තා න වුද්ධි. ධම්මං සුණොති. පරස්සරලොපෙ සුණොන්ති. කම්මෙ-ක්යෙ දීඝෙ සූයති, සූයන්ති. ද්විත්තෙ සුය්යති සුය්යන්ති+ච්චාදි. ඉඤාගමෙ සුණිස්සති, සුණිස්සන්ති. කම්මෙ-ක්යලොපෙ වුද්ධි. සොස්සති, සොස්සන්ති ඉච්චාදි. අසුණි සුණි, අසුණිංසු සුණිංසු. स्वादि धातूंनंतर 'ल' (लकार) च्या विषयात 'क्णो' प्रत्यय होतो. 'क' हा अनुबंध असल्यामुळे वृद्धी होत नाही. धम्मं सुणोति. परस्वराचा लोप झाल्यावर सुणोन्ति. कर्मणी प्रयोगात - 'क्य' प्रत्यय असताना आणि दीर्घ झाल्यावर सूयति, सूयन्ति. द्वित्व झाल्यावर सुय्यति, सुय्यन्ति इत्यादी. 'इञ्' आगम झाल्यावर सुणिस्सति, सुणिस्सन्ति. कर्मणी प्रयोगात 'क्य' चा लोप झाल्यावर वृद्धी होते - सोस्सति, सोस्सन्ति इत्यादी. भूतकाळात - असुणि, सुणि, असुणिंसु, सुणिंसु. 60. තෙසු සුතො ක්ණො+ක්ණානං රොට ६०. त्या 'ई' इत्यादी प्रत्ययांमध्ये, 'सु' धातूच्या पुढील 'क्णो' आणि 'क्णा' प्रत्ययांना विकल्पे करून 'रोट' आदेश होतो. තෙසු ඊආදීසු සුතො පරෙසං ක්ණො+ක්ණානං රොට වා හොති. රකාරො අනුබන්ධො. ටො සබ්බාදෙසත්ථො. උස්ස ලොපෙ ද්විත්තං ඊස්ස සි ච. අස්සොසි, අස්සොසිංසු. ‘‘ඉංස්ස ච සිඤ’’ති යොගවිභාගා සිඤ, අස්සොසිංසු, පච්චස්සොසුං. අසුයි, අසුයිත්ථ. අසුණිස්ස, තෙන අසුයිස්ස. සුණෙ සුණෙය්ය, සුණෙය්යං. තෙන සූයෙ සූයෙය්ය. සුණාතු, සුණන්තු. සූයතු, සූයන්තු ඉච්චාදි. त्या 'ई' इत्यादी प्रत्ययांमध्ये, 'सु' धातूच्या पुढील 'क्णो' आणि 'क्णा' प्रत्ययांना विकल्पे करून 'रोट' आदेश होतो. 'र' हा अनुबंध आहे. 'ट' हा सर्वादेशासाठी आहे. 'उ' चा लोप झाल्यावर द्वित्व होते आणि 'ई' ला 'सि' आदेश होतो. अस्सोसि, अस्सोसिंसु. “इंस च सिञ” या योगविभागाने 'सिञ' आदेश होऊन अस्सोसिंसु, पच्चस्सोसुं. कर्मणी भूतकाळात - असुयि, असुयित्थ. क्रियातिपत्तीत - असुणिस्स, त्यामुळे असुयिस्स. विध्यर्थात - सुणे, सुणेय्य, सुणेय्यं. त्यामुळे सूये, सूयेय्य. आज्ञार्थामध्ये - सुणातु, सुणन्तु. कर्मणी आज्ञार्थामध्ये - सूयतु, सूयन्तु इत्यादी. ගි=සද්දෙ, ගිණොති. ගිණන්ති. ත්වං ගිණොසි. ගිණිස්සති, ගිණිස්සන්ති. අගිණිස්ස. ගිණෙය්ය. ගිණොතු ඉච්චාදි. වු=සංවරණෙ, ආවුණොති, ආවුණන්ති. ආවුණොසි ඉච්චාදි. සෙසෙසුපි යොජෙතබ්බං. (ස්වාදිනයො). गि = शब्द करणे (सद्दे), गिणोति, गिणन्ति. त्वं गिणोसि. भविष्यकाळात - गिणिस्सति, गिणिस्सन्ति. क्रियातिपत्तीत - अगिणिस्स. विध्यर्थात - गिणेय्य. आज्ञार्थामध्ये - गिणोतु इत्यादी. वु = झाकणे/आवरण करणे (संवरणे), आउणोति, आउणन्ति. आउणोसि इत्यादी. इतर धातूंमध्येही असेच योजावे. (स्वादि-नय). තන=විත්ථාරෙ, तन = विस्तार करणे (वित्थारे), 26. තනාදිත්වො २६. तनादि धातूंनंतर 'ओ' प्रत्यय होतो. තනාදිතො කත්තරි ලවිසයෙ ඔ හොති. කිත්තිං තනොති, තනොන්ති ඉච්චාදි. तनादि धातूंनंतर कर्तरी प्रयोगात 'ल' (लकार) च्या विषयात 'ओ' प्रत्यय होतो. कित्तिं तनोति, तनोन्ति इत्यादी. 76. ඔවිකරණස්සු පරච්ඡක්කෙ ७६. 'ओ' या विकरण प्रत्ययाला 'उ' होतो, परस्मैपद प्रत्ययांच्या (परच्छक्क) विषयात. ඔවිකරණස්ස [Pg.251] උ හොති පරච්ඡක්කවිසයෙ. තනුතෙ, තන්වන්තෙ. තනුසෙ, තනුව්හෙ. තන්වෙ, තන්වම්හෙ. කම්මෙ – 'ओ' या विकरण प्रत्ययाला परस्मैपद प्रत्ययांच्या विषयात 'उ' होतो. तनुते, तन्वन्ते. तनुसे, तनुव्हे. तन्वे, तन्वम्हे. कर्मणी प्रयोगात - 5,138. තනස්සා වා ५,१३८. 'तन' धातूच्या जागी विकल्पे करून 'आ' होतो 'क्य' प्रत्यय असताना. තනස්ස වා ආ හොති ක්යෙ. පපුබ්බො, පතායති. පතඤ්ඤති, පතායරෙ පතායන්ති පතඤ්ඤරෙ පතඤ්ඤන්ති+ච්චාදි. තථා විකරණලොපෙ ඉඤාගමෙ ච තනිස්සති, තනිස්සන්ති. පතායිස්සති. අතනි, අතනිංසු. අතනිස්ස. පතායිස්ස. තනෙය්ය, තනෙය්යුං. තනොතු, තනොන්තු ඉච්චාදි. 'तन' धातूच्या जागी 'क्य' प्रत्यय असताना विकल्पे करून 'आ' होतो. 'प' उपसर्ग असताना - पतायति. पतञ्ञति, पतायरे, पतायन्ति, पतञ्ञरे, पतञ्ञन्ति इत्यादी. तसेच विकरणाचा लोप झाल्यावर आणि 'इञ्' आगम झाल्यावर तनिस्सति, तनिस्सन्ति. पतायिस्सति. भूतकाळात - अतनि, अतनिंसु. क्रियातिपत्तीत - अतनिस्स. पतायिस्स. विध्यर्थात - तनेय्य, तनेय्युं. आज्ञार्थामध्ये - तनोतु, तनोन्तु इत्यादी. කර=කරණෙ, कर = करणे (करणे), 5,177. කරස්ස සොස්ස කුබ්බ+කුරු+කයිරා ५,१७७. 'कर' धातूच्या 'स' आणि 'ओ' कार यांच्या जागी 'कुब्ब', 'कुरु' आणि 'कयिर' हे आदेश विकल्पे करून होतात. කරස්ස ස ඔකාරස්ස කුබ්බාදයො වා හොන්ති න්ත+මාන+ත්යාදීසු. කුබ්බති, කුබ්බන්ති. කරොති, කරොන්ති. කරොසි, කරොථ. 'कर' धातूच्या 'स' आणि 'ओ' कार यांच्या जागी 'कुब्ब' इत्यादी आदेश विकल्पे करून होतात 'न्त', 'मान' आणि 'ति' इत्यादी प्रत्यय असताना. कुब्बति, कुब्बन्ति. करोति, करोन्ति. करोसि, करोथ. 23. කරස්ස සොස්ස කුං २३. 'कर' धातूच्या 'स' आणि 'ओ' कार यांच्या जागी 'कुं' आदेश विकल्पे करून होतो. කරස්ස ස ඔකාරස්ස කුං වා හොති මිමෙසු. කුම්මි කරොමි. කුම්ම කරොම. පරච්ඡක්කෙ කුරුතෙ කුබ්බතෙ, කුබ්බන්තෙ ඉච්චාදි. කයිරති, කයිරන්ති ඉච්චාදි. කම්මෙ-ක්යස්ස ද්විත්තෙ ඊස්ස රස්සො, කරිය්යති, කරීයති වා ඉච්චාදි. ‘‘තවග්ගවරණා’’ දිනා [Pg.252] යෙ රස්ස යකාරෙ කය්යති, කය්යන්ති. බහුලාධකාරා කම්මෙ ක්වචි ඉමිනා කයිරාදෙසෙ තෙන කයිරති, කයිරන්ති ඉච්චාදි. භවිස්සතිම්හි – 'कर' धातूच्या 'स' आणि 'ओ' कार यांच्या जागी 'मि' आणि 'म' प्रत्यय असताना विकल्पे करून 'कुं' आदेश होतो. कुम्मि, करोमि. कुम्म, करोम. परस्मैपद प्रत्ययांच्या विषयात - कुरुते, कुब्बते, कुब्बन्ते इत्यादी. कयिरति, कयिरन्ति इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - 'क्य' प्रत्ययाचे द्वित्व झाल्यावर आणि 'ई' चा र्हस्व झाल्यावर करिय्यति, किंवा करीयति इत्यादी. “तवग्गवरण” इत्यादी सूत्राने 'य' आणि र्हस्व 'य' कार असताना कय्यति, कय्यन्ति. बहुल अधिकारामुळे कर्मणी प्रयोगात काही ठिकाणी या सूत्राने 'कयिर' आदेश होऊन कयिरति, कयिरन्ति इत्यादी रूपे होतात. भविष्यकाळात - 25. හාස්ස චා+හඞ ස්සෙන २५. 'कर' धातूच्या 'स' आणि 'ओ' कार यांच्या जागी आणि 'हा' धातूच्या जागी 'आहङ' आदेश विकल्पे करून होतो 'स्से' प्रत्ययासोबत. කරස්ස සොස්ස හාස්ස ච ආහඞ වා හොති ස්සෙන සහ. කාහති, කාහන්ති ඉච්චාදි. ඉඤාගමෙ කාහිති, කාහින්ති ඉච්චාදි. ආහඞාදෙසාභාවපක්ඛෙ කරිස්සති, කරිස්සන්ති ඉච්චාදි. අජ්ජතනෙ – 'कर' धातूच्या 'स' आणि 'ओ' कार यांच्या जागी आणि 'हा' धातूच्या जागी 'स्से' प्रत्ययासोबत विकल्पे करून 'आहङ' आदेश होतो. काहति, काहन्ति इत्यादी. 'इञ्' आगम झाल्यावर काहिति, काहिन्ति इत्यादी. 'आहङ' आदेश न होण्याच्या पक्षात करिस्सति, करिस्सन्ति इत्यादी रूपे होतात. अद्यतनी भूतकाळात (अज्जतने) - 24. කා ඊආදීසු २४. 'कर' धातूच्या 'स' आणि 'ओ' कार यांच्या जागी 'ई' इत्यादी प्रत्यय असताना 'का' आदेश विकल्पे करून होतो. කරස්ස ස ඔකාරස්ස කා හොති වා ඊආදීසු. 'कर' धातूच्या 'स' आणि 'ओ' कार यांच्या जागी 'ई' इत्यादी प्रत्यय असताना विकल्पे करून 'का' आदेश होतो. 44. දීඝා ඊස්ස ४४. दीर्घ स्वराच्या पुढील 'ई' प्रत्ययाला विकल्पे करून 'सि' आदेश होतो. දීඝතො පරස්ස ඊස්ස සි වා හොති. අකාසි. ඊලොපෙ අකා, අකංසු. ඔස්ස සිආදෙසෙ අකාසි. සිඤාගමෙ අකාසිත්ථ. අකාසි, අකාසිං, අකාසිම්හ. අඤ්ඤත්ර අකරිකරි, අකරිංසු කරිංසු අකංසු ඉච්චාදි. තෙන අකරීයි ඉච්චාදි. අකරිස්ස ඉච්චාදි. කම්මෙ-අකරීයිස්ස ඉච්චාදි. එය්යාදිම්හි ‘‘ක්වචි විකරණානං’’ති ඔවිකරණලොපෙ කරෙකරෙය්ය, කරෙය්යුං ඉච්චාදි. කුබ්බෙ කුබ්බෙය්ය ඉච්චාදි. दीर्घ स्वराच्या पुढील 'ई' प्रत्ययाला विकल्पे करून 'सि' आदेश होतो. अकासि. 'ई' चा लोप झाल्यावर अका, अकंसु. 'ओ' ला 'सि' आदेश झाल्यावर अकासि. 'सिञ' आगम झाल्यावर अकासित्थ. अकासि, अकासिं, अकासिम्ह. इतर ठिकाणी अकरि, करि, अकरिंसु, करिंसु, अकंसु इत्यादी. त्यामुळे अकरीयि इत्यादी. क्रियातिपत्तीत - अकरिस्स इत्यादी. कर्मणी क्रियातिपत्तीत - अकरीयिस्स इत्यादी. 'एय्य' इत्यादी प्रत्यय असताना “क्वचि विकरणानं” या सूत्राने 'ओ' विकरणाचा लोप झाल्यावर करे, करेय्य, करेय्युं इत्यादी. कुब्बे, कुब्बेय्य इत्यादी. 71. ටා ७१. 'कयिर' च्या पुढील 'एय्य' प्रत्ययाला 'टा' आदेश होतो. කයිරා පරස්ස එය්යස්ස ටා හොති. සො කයිරා. 'कयिर' च्या पुढील 'एय्य' प्रत्ययाला 'टा' आदेश होतो. तो 'कयिरा' असा होतो. 70. කයිරෙ+ය්යස්සෙ+ය්යුමාදීනං ७०. 'कयिर' च्या पुढील 'एय्य' आणि 'एय्युं' इत्यादी प्रत्ययांच्या जागी... කයිරා [Pg.253] පරස්ස එය්යුමාදීනං එය්යස්ස ලොපො හොති. කයිරුං. ත්වං කයිරාසි, කයිරාථ. කයිරාමි, කයිරාම. 'कयिरा' च्या पुढे 'एय्युं' इत्यादी प्रत्ययांच्या 'एय्य' चा लोप होतो. उदा. कयिरुं. त्वं कयिरासि, कयिराथ. कयिरामी, कयिरामा. 72. එථස්සා ७२. एथस्सा කයිරා පරස්සෙ+ථස්ස ආ හොතීතිආදිස්ස එස්ස ආ හොති. කයිරාථ ධීරො. කම්මෙ-කරියෙය්ය, කරියෙය්යු+මිච්චාදි. කරොතු කුරුතු වා, කුබ්බන්තු කරොන්තු ඉච්චාදි. පරච්ඡක්කෙ-කුරුතං, කුබ්බන්තං. කුරුස්සු කරස්සු ඉච්චාදි. ‘‘එඔන+ම වණ්ණෙ’’ති අකාරො. කුරුව්හො, කුබ්බෙ, කුබ්බාමසෙ. කම්මෙ-කරීයතු ඉච්චාදි. 'कयिरा' च्या पुढील 'एथस्स' च्या 'एस्स' चा 'आ' होतो. उदा. कयिराथ धीरो. कर्मणी प्रयोगात - करियेय्य, करियेय्युं इत्यादी. करोतु किंवा कुरुतु, कुब्बन्तु, करोनतु इत्यादी. परस्मैपदाच्या दुसऱ्या त्रिकात - कुरुतं, कुब्बन्तं. कुरुस्सु, करस्सु इत्यादी. "एओनम वण्णे" या सूत्राने अकार होतो. कुरुव्हो, कुब्बे, कुब्वामसे. कर्मणी प्रयोगात - करीयतु इत्यादी. 5,133. කරොතිස්ස ඛො ५,१३३. करोतिस्स खो පාදිතො පරස්ස කරස්ස ක්වචි ඛ හොති. අභිසඞ්ඛරොති ඉච්චාදි. සබ්බත්ථ යොජෙතබ්බං. ‘‘තදමිනා’’දිනා ඛාදෙසෙ අභිසංඛාසීති විසෙසො. සක=සත්තියං, සක්කොති ඉච්චාදි. අප=පාපුණනෙ, පපුබ්බො, පප්පොති ඉච්චාදි. (තනාදිනයො). 'प' इत्यादी उपसर्गांच्या पुढे असलेल्या 'कर' धातूच्या जागी काही वेळा 'ख' होतो. उदा. अभिसङ्खरोति इत्यादी. हे सर्वत्र योजावे. "तदमिना" इत्यादी सूत्राने 'ख' च्या आदेशात 'अभिसङ्खासि' असा विशेष प्रयोग होतो. 'सक' (saka) धातू शक्ती (सामर्थ्य) या अर्थात - सक्कोति इत्यादी. 'अप' (apa) धातू प्राप्ती या अर्थात, 'प' उपसर्गासह - पप्पोति इत्यादी. (हा तनादि गण होय). චුර=ථෙය්යෙ, चुर (cura) = चोरी करणे (थेय्य) या अर्थात. 1,15. චුරාදිතො ණි १,१५. चुरादितो णि චුරාදීහි ක්රියත්ථෙහි සකත්ථෙ ණි පරො හොති. ‘‘ණිණාප්යාපීහි වා’’ති විකප්පෙන ලො. ධනං චොරයති චොරෙති ඉච්චාදි. කම්මෙ-චොරීයති ඉච්චාදි. චොරයිස්සති චොරෙස්සති [Pg.254] ඉච්චාදි. කම්මෙ-චොරීයිස්සති ඉච්චාදි. අචොරයි චොරයි අචොරෙසි චොරෙසි ඉච්චාදි. අචොරයිස්ස ඉච්චාදි. කම්මෙ-අචොරීයිස්ස ඉච්චාදි. චොරයෙ චොරයෙය්ය ඉච්චාදි. චොරෙතු චොරෙන්තු ඉච්චාදි. क्रियावाचक चुरादि धातूंहून स्वार्थात 'णि' प्रत्यय पुढे येतो. "णिणाप्यापीहि वा" या सूत्राने विकल्पाने (णि चा) लोप होतो. उदा. धनं चोरयति, चोरेति इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात - चोरीयति इत्यादी. भविष्यकाळात - चोरयिस्सति, चोरेस्सति इत्यादी. कर्मणी भविष्यकाळात - चोरीयिस्सति इत्यादी. भूतकाळात - अचोरयि, चोरयि, अचोरेसि, चोरेसि इत्यादी. क्रियातिपत्तीत - अचोरयिस्स इत्यादी. कर्मणी क्रियातिपत्तीत - अचोरीयिस्स इत्यादी. विध्यर्थात - चोरये, चोरयेय्य इत्यादी. आज्ञार्थात - चोरेतु, चोरेन्तु इत्यादी. චින්ත=චින්තායං, සංයොගත්තා න වුද්ධි, චින්තෙති චින්තයති, චින්තෙන්ති. කම්මෙ-චින්තීයති, චින්තීයන්ති ඉච්චාදි. මන්ත=ගුත්තභාසනෙ, මන්තෙති මන්තයති ඉච්චාදි. පාල=රක්ඛණෙ, සො ධම්මං පාලෙති පාලයති. තෙන පාලීයති+ච්චාදි. (චුරාදිනයො). चिन्त (cinta) = विचार करणे (चिन्ता) या अर्थात; संयोग (जोडाक्षर) असल्यामुळे वृद्धी होत नाही - चिन्तेति, चिन्तयति, चिन्तेन्ति. कर्मणी प्रयोगात - चिन्तीयति, चिन्तीयन्ति इत्यादी. मन्त (manta) = गुप्त संभाषण या अर्थात - मन्तेति, मन्तयति इत्यादी. पाल (pāla) = रक्षण करणे या अर्थात - सो धम्मं पालेति, पालयति. कर्मणी प्रयोगात - तेन पालीयति इत्यादी. (हा चुरादि गण होय). භූවාදි ච රුධාදි ච, දිවාදි ච තුදාදයො; ජ්යාදී කියාදී ස්වාදී ච, තනාදී ච චුරාදයො. भूवादि आणि रुधादि, दिवादि आणि तुदादि; ज्यादि, कियादि, स्वादि, तनादि आणि चुरादि (हे धातूंचे गण आहेत). (විකරණවිධානං). (विकरण विधान). 5,1. තිජ+මානෙහි ඛ+සා ඛමා+වීමංසාසු ५,१. तिजमानेहि खसा खमावीमंसासु (तिज आणि मान धातूंहून अनुक्रमे क्षमा आणि मीमांसा या अर्थांमध्ये 'ख' आणि 'स' प्रत्यय होतात). ඛන්තියං තිජා, වීමංසායං මානා ච ඛ+සපච්චයා හොන්ති යථාක්කමං. තිජ=නිසානෙ, අකාරස්සා+පයොගො. ඛෙ ‘‘ලහුස්සුපන්තස්සා’’ති පත්තෙ+කාරස්ස ‘‘අඤ්ඤත්රාපී’’ති පටිසෙධො. යකාරවජ්ජිතබ්යඤ්ජනස්ස ‘‘පරරූප+මයකාරෙ බ්යඤ්ජනෙ’’ති පරරූපඤ්ච. ‘‘චතුත්ථදුතියා’’ දිනා පඨමක්ඛරකකාරෙ ච ‘‘ඛඡසාන+මෙකස්සරො+දි ද්වෙ’’ති තික්ඛ තික්ඛ ඉති ද්විභාවෙ ‘‘ලොපො+නාදිබ්යඤ්ජනස්සා’’තිආදිතො+ඤ්ඤස්ස බ්යඤ්ජනස්ස ලොපෙ ච කතෙ තිතික්ඛාධාතුතො ත්යාදිපච්චය+ලවිකරණානි. තිතික්ඛති ඉච්චාදි පුරිමසමං[Pg.255]. කම්මෙ-තිතික්ඛීයති ඉච්චාදි. ඉතො පරං කම්මොදාහරණං න කරිස්සාම. क्षमा या अर्थात 'तिज' धातूहून आणि मीमांसा या अर्थात 'मान' धातूहून अनुक्रमे 'ख' आणि 'स' प्रत्यय होतात. तिज (tija) = तीक्ष्ण करणे या अर्थात, येथे अकाराचा प्रयोग होत नाही. 'ख' प्रत्यय असताना "लहुस्सुपन्तस्स" या सूत्राने प्राप्त होणाऱ्या एकाराचा "अञ्ञत्रापि" या सूत्राने निषेध होतो. यकार वगळता इतर व्यंजनांच्या बाबतीत "पररूपमयकारे ब्यञ्जने" या सूत्राने पररूप होते. "चतुत्थदुतिया" इत्यादी सूत्राने पहिल्या अक्षराचा ककार होतो आणि "खछसानमेकस्सरोदि द्वे" या सूत्राने 'तिक्ख तिक्ख' असे द्वित्व होते. "लोपोनादिब्यञ्जनस्स" इत्यादी सूत्राने आदि व्यंजनाव्यतिरिक्त इतर व्यंजनाचा लोप झाल्यावर 'तितिक्खा' धातू बनतो, ज्याला 'ति' इत्यादी प्रत्यय आणि 'अ' विकरण लागतात. 'तितिक्खति' इत्यादी रूपे पूर्वीप्रमाणेच होतात. कर्मणी प्रयोगात - 'तितिक्खीयति' इत्यादी. यापुढे आम्ही कर्मणी प्रयोगाची उदाहरणे देणार नाही. මාන=පූජායං+තිමස්මා සපච්චය, ද්විත්තාදිම්හි කතෙ ‘‘මානස්ස වී පරස්ස ච මං’’ති පුබ්බමානස්ස වී ච පරමානස්ස මඤ්ච හොති. වීමංසධාතුතො තිපච්චයාදිම්හි කතෙ වීමංසති ඉච්චාදි. තිතික්ඛිස්සති, වීමංසිස්සති ඉච්චාදි. එව+මුපරිපි අජ්ජතනාදීසුපි යොජෙතබ්බං. පයොජකත්තා ණි, ‘‘ණිණාප්යාපීහි වා’’ති ලවිකරණං, තෙජයති තෙජෙති. තථා චුරාදිත්තා න ලවිකරණං, මානයති මානෙති. मान (māna) = पूजा/आदर करणे या अर्थातील धातूहून 'स' प्रत्यय लागून, द्वित्व इत्यादी झाल्यावर "मानस्स वी परस्स च मं" या सूत्राने पूर्व 'मान' च्या जागी 'वी' आणि पर 'मान' च्या जागी 'मं' होतो. 'वीमंसा' धातूहून 'ति' प्रत्यय इत्यादी लागल्यावर 'वीमंसति' इत्यादी रूपे बनतात. भविष्यकाळात - तितिक्खिस्सति, वीमंसिस्सति इत्यादी. याचप्रमाणे पुढे अद्यतनी इत्यादींमध्येही योजना करावी. प्रयोजक अर्थात 'णि' प्रत्यय आणि "णिणाप्यापीहि वा" या सूत्राने 'अ' विकरण होऊन 'तेजयति', 'तेजेति' रूपे होतात. तसेच चुरादि गण असल्यामुळे 'अ' विकरण न होता 'मानयति', 'मानेति' अशी रूपे होतात. 5,2. කිතා තිකිච්ඡා+සංසයෙසු ඡො ५,२. किता तिकिच्छासं सयेसु छो (कित् धातूहून चिकित्सा आणि संशय या अर्थांमध्ये 'छ' प्रत्यय होतो). තිකිච්ඡායං සංසයෙ ච වත්තමානා කිතා ඡො හොති. කිත=නිවාසෙ, ඡපච්චයෙ පුබ්බෙව පරරූපාදිම්හි ච කතෙ ‘‘කිතස්සා+සංසයෙ වා’’ති ද්විත්තෙ පුබ්බස්ස තිආදෙසෙ තිකිච්ඡධාතුතො ත්යාදයො. තිකිච්ඡති, තිකිච්ඡන්ති+ච්චාදි. විපුබ්බතො කිතා ඡප්පච්චයාදිම්හි කතෙ ‘‘කවග්ගහානං චවග්ගජා’’ති ද්විත්තෙ පුබ්බස්ස කස්ස චො. විචිකිච්ඡති, විචිකිච්ඡන්ති+ච්චාදි. පයොජකත්තා කෙතයති+ච්චාදි පුරිමසමං. चिकित्सा आणि संशय या अर्थांमध्ये वर्तमान असलेल्या 'कित्' धातूहून 'छ' प्रत्यय होतो. कित (kita) = निवास करणे या अर्थात, 'छ' प्रत्यय लागल्यावर पूर्वीप्रमाणेच पररूप इत्यादी झाल्यावर "कितस्सासं सये वा" या सूत्राने द्वित्व होऊन पूर्व भागाला 'ति' आदेश होतो; या 'तिकिच्छा' धातूहून 'ति' इत्यादी प्रत्यय लागतात. उदा. तिकिच्छति, तिकिच्छन्ति इत्यादी. 'वि' उपसर्गासह 'कित्' धातूहून 'छ' प्रत्यय इत्यादी झाल्यावर "कवग्गहानं चवग्गजा" या सूत्राने द्वित्वामध्ये पूर्व ककाराचा चकार होतो. उदा. विचिकिच्छति, विचिकिच्छन्ति इत्यादी. प्रयोजक अर्थात 'केतयति' इत्यादी रूपे पूर्वीप्रमाणेच होतात. 5,3. නින්දායං ගුප+බධා බස්ස භො ච ५,३. निन्दायं गुपबधा बस्स भो च (निंदा या अर्थात गुप् आणि बध् धातूंहून 'छ' प्रत्यय होतो आणि 'ब' चा 'भ' होतो). නින්දායං ගුප+බධෙහි ඡො හොති බස්ස භො ච. ගුප=රක්ඛනෙ+තීමස්මා ඡප්පච්චයෙ ‘‘අඤ්ඤත්රාපී’’ති ඔත්තාභාවෙ ච පරරූපාදිම්හි ‘‘කවග්ගහා’’ දිනා ගස්ස ජෙ ච කතෙ ‘‘ගුපිස්සුස්සා’’ති ද්විත්තෙ පුබ්බස්ස උස්ස ඉ හොති. ත්යාදි+ලවිකරණාදිම්හි [Pg.256] ජිගුච්ඡති ඉච්චාදි. නින්දායං-බධ=බන්ධනෙ+තීමස්මා ඡප්පච්චයෙ ච ඉමිනාව බස්ස භකාරෙ ච පරරූපෙ පඨමක්ඛරෙ භච්ඡභච්ඡඉති ද්විත්තෙ අනාදිබ්යඤ්ජනස්ස ලොපෙ ‘‘චතුත්ථදුතියානං තතියපඨමා’’ති ද්විත්තෙ පුබ්බස්ස භස්ස බකාරෙ ‘‘ඛඡසෙස්වස්සී’’ති ඉකාරෙ දීඝෙ ච කතෙ බීභච්ඡධාතුතො ත්යාදයො හොන්ති. බීභච්ඡති, බීභච්ඡන්ති ඉච්චාදි. අඤ්ඤත්ර ගොපෙති+ච්චාදි. निंदा या अर्थात 'गुप्' आणि 'बध्' धातूंहून 'छ' प्रत्यय होतो आणि 'ब' चा 'भ' होतो. गुप (gupa) = रक्षण करणे या अर्थातील धातूहून 'छ' प्रत्यय लागल्यावर "अञ्ञत्रापि" या सूत्राने ओकार न होता आणि पररूप इत्यादी झाल्यावर "कवग्गहा" इत्यादी सूत्राने 'ग' चा 'ज' होतो; आणि "गुपिस्सुस्स" या सूत्राने द्वित्वामध्ये पूर्व 'उ' चा 'इ' होतो. 'ति' इत्यादी प्रत्यय आणि 'अ' विकरण लागून 'जिगुच्छति' इत्यादी रूपे बनतात. निंदा या अर्थात - बध (badha) = बांधणे या अर्थातील धातूहून 'छ' प्रत्यय लागल्यावर याच सूत्राने 'ब' चा 'भ' होतो आणि पररूप झाल्यावर पहिल्या अक्षराचे 'भच्छ भच्छ' असे द्वित्व होते; आदि व्यंजनाव्यतिरिक्त इतर व्यंजनाचा लोप झाल्यावर "चतुत्थदुतियानं ततियपटमा" या सूत्राने पूर्व 'भ' चा 'ब' होतो आणि "खछसेस्वस्सी" या सूत्राने इकार होऊन तो दीर्घ होतो; अशा प्रकारे 'बीभच्छा' धातू बनून त्याला 'ति' इत्यादी प्रत्यय लागतात. उदा. बीभच्छति, बीभच्छन्ति इत्यादी. इतर अर्थांमध्ये 'गोपेति' इत्यादी रूपे होतात. 5,4. තුංස්මා ලොපො චි+ච්ඡායං තෙ ५,४. तुंस्मा लोपो चिच्छायं ते (इच्छा या अर्थात 'तुं' प्रत्ययाचा लोप होतो आणि 'ते' म्हणजे ख, स, छ प्रत्यय होतात). තුමන්තතො ඉච්ඡාය+මත්ථෙ තෙ ඛ+ස+ඡා හොන්ති බහුලං, තුංපච්චයස්ස ලොපො ච හොති, සුතත්තා. භුජ=පාලන+ජ්ඣොහාරෙසු. භොජනායාති විග්ගය්හ ‘‘තුං+තායෙ’’ච්චාදිනා තුංපච්චයෙ ‘‘ලහුස්සුපන්තස්සා’’ති ඔකාරෙ පරරූපෙ ච කතෙ භොත්තු+මිච්ඡතීති විග්ගය්හ ඉමිනා ඛපච්චයෙ තුංපච්චයස්ස ඉමිනා ච ලොපෙ ‘‘නිමිත්තාභාවෙ නෙමිත්තිකස්සාපි ච අභාවො’’ති ඤායා පරරූපඔකාරානං අභාවෙ ඛස්ස පරරූප+ඛකාරාදිම්හි ච කතෙ භුක්ඛ භුක්ඛ ඉති ද්විත්තෙ තතියබකාරො හොති, බුභුක්ඛධාතුතො ත්යාදයො හොන්ති, බුභුක්ඛති, බුභුක්ඛන්ති ඉච්චාදි. 'तुं' प्रत्ययान्त शब्दाहून इच्छा या अर्थात 'ते' म्हणजे 'ख', 'स', 'छ' प्रत्यय बहुधा होतात आणि सूत्राच्या नियमानुसार 'तुं' प्रत्ययाचा लोप होतो. भुज (bhuja) = पालन करणे आणि खाणे या अर्थात. 'भोजनाय' असा विग्रह करून "तुं ताय" इत्यादी सूत्राने 'तुं' प्रत्यय लागून "लहुस्सुपन्तस्स" या सूत्राने ओकार आणि पररूप झाल्यावर 'भोत्तुं इच्छति' असा विग्रह करून या सूत्राने 'ख' प्रत्यय लागतो आणि 'तुं' प्रत्ययाचा लोप होतो. "निमित्ताभावे नैमित्तिकस्यापि च अभावो" या न्यायाने पररूप आणि ओकार यांचा अभाव होतो. 'ख' प्रत्यय असताना पररूप खकार इत्यादी झाल्यावर 'भुक्ख भुक्ख' असे द्वित्व होते आणि तिसरा वर्ण बकार होऊन 'बुभुक्खा' धातू बनतो; या धातूहून 'ति' इत्यादी प्रत्यय लागतात. उदा. बुभुक्खति, बुभुक्खन्ति इत्यादी. ජි=ජයෙ, ජයනාය ඉති විග්ගය්හ පුරෙ විය තුමාදිම්හි කතෙ ජෙතු+මිච්ඡතීති විග්ගය්හ සප්පච්චයෙ ජිස ජිස ඉති ද්විත්තෙ අනාදිබ්යඤ්ජනලොපෙ ද්විත්තෙ පරස්ස ජිස්ස ‘‘ජිහරානං ගිං’’ති ගිං. ජිගිංසධාතුතො ත්යාදීසු ජිගිංසති, ජිගිංසන්ති ඉච්චාදි. जि (ji) = जिंकणे या अर्थात. 'जयनाय' असा विग्रह करून पूर्वीप्रमाणे 'तुं' इत्यादी प्रत्यय लागल्यावर 'जेतुं इच्छति' असा विग्रह करून 'स' प्रत्यय लागतो; 'जिस जिस' असे द्वित्व होऊन आदि व्यंजनाव्यतिरिक्त व्यंजनाचा लोप झाल्यावर द्वित्वामध्ये पुढील 'जि' च्या जागी "जिहरानां गिं" या सूत्राने 'गिं' होतो. 'जिगींसा' धातूहून 'ति' इत्यादी प्रत्यय लागून जिगींसति, जिगींसन्ति इत्यादी रूपे बनतात. ඝස=අදනෙ[Pg.257], ඝසිතු+මිච්ඡති ඡප්පච්චයාදිම්හි පුරෙ විය කතෙ ඝස්ස ‘‘කවග්ගහා’’දිනා ඣෙ ඣස්ස ‘‘චතුත්ථදුතියා’’ දිනා ජකාරෙ ‘‘ඛඡසෙස්වස්සී’’ති ඉකාරෙ ච කතෙ ජිඝච්ඡධාතුතො ත්යාදයො හොන්ති. ජිඝච්ඡති, ජිඝච්ඡන්ති+ච්චාදි. घस (ghasa) = खाणे या अर्थात. 'घसितुं इच्छति' असा विग्रह करून पूर्वीप्रमाणे 'छ' प्रत्यय इत्यादी झाल्यावर 'घस' च्या जागी "कवग्गहा" इत्यादी सूत्राने 'झ' होतो, 'झ' च्या जागी "चतुत्थदुतिया" सूत्राने जकार होतो आणि "खछसेस्वस्सी" सूत्राने इकार होऊन 'जिघच्छा' धातू बनतो; या धातूहून 'ति' इत्यादी प्रत्यय लागतात. उदा. जिघच्छति, जिघच्छन्ति इत्यादी. 5,5. ඊයො කම්මා ५,५. ईयो कम्मा (इच्छेच्या कर्माहून इच्छा या अर्थात 'ईय' प्रत्यय होतो). ඉච්ඡාකම්මතො ඉච්ඡාය+මත්ථෙ ඊයපච්චයො හොති. පුත්ත+මිච්ඡතීති ඊයපච්චයෙ ඊයාදිවුත්තිත්තා ‘‘එකත්ථතායං’’ති විභත්තිලොපො. පුත්තීයති, පුත්තීයන්ති+ච්චාදි. इच्छेच्या कर्माहून इच्छा या अर्थात 'ईय' प्रत्यय होतो. 'पुत्तं इच्छति' या अर्थात 'ईय' प्रत्यय लागल्यावर, 'ईय' इत्यादी प्रत्ययांच्या वृत्तीमुळे "एकत्थतायं" या सूत्राने विभक्तीचा लोप होतो. उदा. पुत्तीयति, पुत्तीयन्ति इत्यादी. 5,6. උපමානා+චාරෙ ५,६. उपमानाचारे (उपमानवाचक कर्माहून आचरण या अर्थात 'ईय' प्रत्यय होतो). කම්මතො උපමානා ආචාරත්ථෙ ඊයො හොති. පුත්ත+මිවා+චරති පුත්තීයති සිස්සං, පුත්තීයන්ති+ච්චාදි. उपमानवाचक कर्माहून आचरण या अर्थात 'ईय' प्रत्यय होतो. 'पुत्तं इव आचरति' या अर्थात 'पुत्तीयति सिस्सं', पुत्तीयन्ति इत्यादी. 5,7. ආධාරාති ५,७. आधाराति (आधारवाचक शब्दाहून...) ඊයො හොති. කුටිය+මිවා+චරති කුටීයති පාසාදෙ. පාසාදෙවා+චරති පාසාදීයති කුටියං, පාසාදීයන්ති+ච්චාදි. 'ईय' (प्रत्यय) होतो. कुटीप्रमाणे (झोपडीप्रमाणे) आचरण करतो म्हणून 'कुटीयति' (प्रासादात/महालात). प्रासादाप्रमाणे (महालाप्रमाणे) आचरण करतो म्हणून 'पासादीयति' (कुटीमध्ये), 'पासादीयन्ति' इत्यादी. 5,8. කත්තුතා+යො ५,८. कर्त्यापासून 'आय' (प्रत्यय होतो). කත්තුතො+පමානා ආචාරත්ථෙ ආයො හොති. පබ්බතො ඉවා+චරති සීලාදිගුණයොගතොති පබ්බතායති යොගී, පබ්බතායධාතුතො ත්යාදයො. कर्त्याच्या उपमेवरून आचरणाच्या अर्थात 'आय' प्रत्यय होतो. शील इत्यादी गुणांच्या योगामुळे पर्वताप्रमाणे आचरण करतो म्हणून 'पब्बतायति योगी' (योगी पर्वतासारखा आचरण करतो). 'पब्बताय' धातूपासून 'ति' इत्यादी प्रत्यय होतात. 5,9. ච්යත්ථෙ ५,९. 'च्वि' च्या अर्थात (अभूततद्भाव - जे आधी नव्हते ते होणे या अर्थात). කත්තුතො [Pg.258] අභූතතබ්භාවෙ ආයො හොති බහුලං. භුසොති පඨමන්තතො අභුසො භුසො භවතීති භුසායති, භුසායන්ති ඉච්චාදි. ‘‘විච්ඡාභික්ඛඤ්ඤෙසු ද්වෙ’’ති ආභික්ඛඤ්ඤත්ථෙ ද්විත්තෙ අපටපටා පටපටා භවතීති ආයෙ පටපටායති, පටපටායන්ති+ච්චාදි. අලොහිතො ලොහිතො භවති ලොහිතායති. कर्त्यापासून अभूततद्भाव (जे आधी नव्हते ते होणे) या अर्थात बहुधा 'आय' प्रत्यय होतो. 'भुसो' (तीव्र/अधिक) या प्रथमान्त शब्दापासून, जो आधी तीव्र नव्हता तो तीव्र होतो या अर्थात 'भुसायति', 'भुसायन्ति' इत्यादी रूपे होतात. “विच्छाभिक्खञ्ञेसु द्वे” या सूत्राने पौनःपुन्य (वारंवारता) अर्थात द्वित्व (दोनदा उच्चार) होऊन, जो 'पटपटा' असा आवाज करत नव्हता तो 'पटपटा' आवाज करतो या अर्थात 'आय' प्रत्यय लागून 'पटपटायति', 'पटपटायन्ति' इत्यादी रूपे होतात. जो लाल नव्हता तो लाल होतो म्हणून 'लोहितायति'. 5,10. සද්දාදීනි කරොති ५,१०. शब्द इत्यादी करतो (या अर्थात). සද්දාදීහි දුතියන්තෙහි කරොතීති අස්මිං අත්ථෙ ආයො හොති. සද්දං කරොති සද්දායති. එවං වෙරායති, කලහායති, ධූපායති+ච්චාදි. द्वितीयान्त 'सद्द' (शब्द) इत्यादी शब्दांपासून 'करतो' या अर्थात 'आय' प्रत्यय होतो. शब्द करतो म्हणून 'सद्दायति'. याचप्रमाणे 'वेरायति' (वैर करतो), 'कलहायति' (भांडण करतो), 'धूपायति' (धूर करतो) इत्यादी रूपे होतात. 5,11. නමොත්ව+ස්සො ५,११. 'नमो' शब्दापासून 'अस्स' प्रत्यय होतो. නමොඉච්චස්මා කරොතීති අස්මිං අත්ථෙ අස්සො හොති. නමො කරොතීති අස්මිං අත්ථෙ අස්සපච්චයෙ ත්යාදයො හොන්ති, තථාගතං නමස්සති, නමස්සන්ති ඉච්චාදි. 'नमो' या शब्दापासून 'करतो' या अर्थात 'अस्स' प्रत्यय होतो. 'नमन करतो' या अर्थात 'अस्स' प्रत्यय लागून 'ति' इत्यादी प्रत्यय होतात; जसे- 'तथागतं नमस्सति' (तथागतांना नमन करतो), 'नमस्सन्ति' इत्यादी. 5,12. ධාත්වත්ථෙ නාමස්මි ५,१२. धातूच्या अर्थात नामापासून (प्रत्यय होतो). නාමස්මා ධාත්වත්ථෙ බහුල+මි හොති. හත්ථිනා අතික්කමතීති ඉපච්චයෙ ලවිකරණ+එකාර+අයාදෙසෙසු කතෙසු අතිහත්ථයති. එවං වීණාය උපගායති උපවීණායති, විනයං දළ්හං කරොති දළ්හයති, විසුද්ධා හොති රත්ති විසුද්ධායති, කුසලං පුච්ඡති කුසලායති+ච්චාදි. नामापासून धातूच्या अर्थात बहुधा 'इ' प्रत्यय होतो. हत्तीने ओलांडून जातो (हत्तीवरून जातो) या अर्थात 'इ' प्रत्यय लागून, ल-विकरण, एकार आणि अयादेश झाल्यावर 'अतिहत्थयति' रूप बनते. याचप्रमाणे विणेच्या साथीने गातो म्हणून 'उपवीणायति', विनय दृढ करतो म्हणून 'दळ्हयति', रात्र विशुद्ध (स्वच्छ) होते म्हणून 'विसुद्धायति', कुशल विचारतो म्हणून 'कुसलायति' इत्यादी रूपे होतात. 5,13. සච්චාදීහා+පි ५,१३. 'सच्च' (सत्य) इत्यादी शब्दांपासून सुद्धा 'आपि' प्रत्यय होतो. සච්චාදීහි [Pg.259] ධාත්වත්ථෙ ආපි හොති. සච්ච+මාචික්ඛතීති ආපිම්හි ත්යාදිපච්චයෙ ‘‘ණි+ණාප්යා+දීහි වා’’ති ලවිකරණ+එ+අයාදෙසා. සච්චාපයති, සච්චාපෙති ඉච්චාදි. අත්ථ+මාචික්ඛති අත්ථාපයති. එවං වෙදාපයති. සුක්ඛං කරොතීති සුක්ඛාපයති සුක්ඛාපෙති ඉච්චාදි. 'सच्च' इत्यादी शब्दांपासून धातूच्या अर्थात 'आपि' प्रत्यय होतो. सत्य सांगतो (प्रकट करतो) या अर्थात 'आपि' प्रत्यय आणि 'ति' इत्यादी प्रत्यय लागल्यावर “णि+णाप्या+दीहि वा” या सूत्राने ल-विकरण, एकार आणि अयादेश होऊन 'सच्चापयति', 'सच्चापेति' इत्यादी रूपे होतात. अर्थ सांगतो म्हणून 'अत्थापयति'. याचप्रमाणे 'वेदापयति'. सुके करतो (वाळवतो) म्हणून 'सुक्खापयति', 'सुक्खापेति' इत्यादी रूपे होतात. 5,16. පයොජකබ්යාපාරෙ ණාපි ච ५,१६. आणि प्रयोजकाच्या व्यापारात (प्रेरणार्थक अर्थात) 'णापि' प्रत्यय होतो. කත්තාරං යො පයොජෙති, තස්ස බ්යාපාරෙ ක්රියත්ථා ණි+ණාපී හොන්ති බහුලං. जो कर्त्याला प्रेरित करतो (प्रयोजक), त्याच्या व्यापारात (प्रेरणार्थक अर्थात) क्रिया दर्शवण्यासाठी बहुधा 'णि' आणि 'णापि' प्रत्यय होतात. ණිපච්චයො උවණ්ණන්තා, ආතො ණාපෙව හොති+හ; ද්වෙ ද්වෙ+කො හොති වා සෙසෙ, බහුලංත්යනුවුත්තියා. 'उ' किंवा 'ऊ' कारान्त धातूंहून 'णि' प्रत्यय होतो, आणि 'आ' कारान्त धातूंहून येथे केवळ 'णापि' प्रत्ययच होतो. उर्वरित धातूंहून 'बहुलं' च्या अनुवृत्तीमुळे दोन्हीपैकी एक किंवा दोन्ही प्रत्यय विकल्पेकरून होतात. අකම්මකාපි හොන්තෙව, ණි+ණාප්යන්තා සකම්මකා; සකම්මකා ද්විකම්මා+ස්සු, ද්විකම්මා ච තිකම්මකා. 'णि' आणि 'णापि' प्रत्यय लागल्याने अकर्मक धातू देखील सकर्मक होतात; सकर्मक धातू द्विकर्मक होतात आणि द्विकर्मक धातू त्रिकर्मक होतात. තස්මා කත්තරි කම්මෙ ච, ණි+ණාපීනං තු සම්භවො; න භාවෙ සුද්ධකත්තා තු, කම්මං හොති පයොජකෙ. म्हणून कर्ता आणि कर्म यामध्येच 'णि' आणि 'णापि' प्रत्ययांचा संभव असतो, भाव प्रयोगात नाही. प्रयोजक (प्रेरणार्थक) रचनेत मूळ कर्ता हा कर्म बनतो. නයාදීනං පධානඤ්ච, අපධානං දුහාදිනං; සුද්ධකත්තා ණි+ණාපීසු, කම්ම+මක්ඛ්යාත ගොචරං. 'नी' इत्यादी धातूंचे मुख्य कर्म आणि 'दुह्' इत्यादी धातूंचे गौण कर्म; 'णि' आणि 'णापि' प्रत्यय लागल्यावर मूळ कर्ता हा आख्यात (क्रियापदाच्या) क्षेत्रातील कर्म बनतो. භවිතුං පයොජයතීති අත්ථෙ ඉමිනා ණිප්පච්චයො. ණකාරො ණානුබන්ධකාරියත්ථො. ‘‘යුවණ්ණාන+මෙ+ඔ පච්චයෙ’’ති ඔකාරෙ ‘‘ආයා+වා ණානුබන්ධෙ’’ති ණානුබන්ධෙ ආවාදෙසො. ත්යාදිම්හි ‘‘ණි+ණාප්යා+පීහි වා’’ති ලවිකරණෙ එකාරෙ ‘‘එඔන+මයවා සරෙ’’ති අයාදෙසො. සො සමාධිං භාවයති භාවෙති[Pg.260], භාවයන්ති භාවෙන්ති+ච්චාදි. කම්මෙ-තෙන සමාධි භාවීයති+ච්චාදි. එත්ථ ‘‘දීඝො සරස්සා’’ති ක්යෙ ඉකාරස්ස දීඝො. භාවයිස්සති භාවෙස්සති, භාවයිස්සන්ති භාවෙස්සන්ති+ච්චාදි. අජ්ජතනෙ ඊස්ස සිම්හි අභාවෙසි භාවෙසි, අභාවයි භාවයි, අභාවයිංසු භාවයිංසු. පරස්සරලොපෙ අභාවෙසුං භාවෙසුං, අභාවයංසු භාවයංසු, අභාවයුං භාවයුං ඉච්චාදි. කම්මෙ-අභාවීයි භාවීයි ඉච්චාදි. අභාවිස්ස අභාවයිස්ස, අභාවිස්සංසු අභාවයිස්සංසු. කම්මෙ-අභාවයිස්සං ඉච්චාදි. භාවෙ භාවෙය්ය ඉච්චාදි. කම්මෙ-භාවීයෙය්ය ඉච්චාදි. භාවයතු භාවෙතු ඉච්චාදි. කම්මෙ-භාවීයතු ඉච්චාදි. 'होण्यासाठी प्रेरित करतो' (अस्तित्वात आणतो/भावना करतो) या अर्थात या सूत्राने 'णि' प्रत्यय होतो. 'ण्' हा वर्ण 'ण्' अनुबंधाच्या कार्यासाठी आहे. “युवण्णानमेओ पच्चये” या सूत्राने ओकार झाल्यावर, “आयावा णानुबन्धे” या सूत्राने 'ण्' अनुबंध असताना 'आव' आदेश होतो. 'ति' इत्यादी प्रत्यय लागताना “णि+णाप्या+पीहि वा” या सूत्राने ल-विकरण आणि एकार झाल्यावर “एओनं अयवा सरे” या सूत्राने 'अय' आदेश होतो. तो समाधीची भावना करतो (समाधी विकसित करतो) म्हणून 'सो समाधिं भावयति', 'भावेति', 'भावयन्ति', 'भावेन्ति' इत्यादी रूपे होतात. कर्म प्रयोगात- 'तेन समाधि भावीयति' (त्याच्याद्वारे समाधीची भावना केली जाते) इत्यादी. येथे “दीघो सरस्स” या सूत्राने 'य' प्रत्यय असताना इकाराचा दीर्घ (ई) होतो. भविष्यकाळात- 'भावयिस्सति', 'भावेस्सति', 'भावयिस्सन्ति', 'भावेस्सन्ति' इत्यादी. अद्यतनी भूतकाळात (अज्जतनी)- 'ई' आणि 'सि' प्रत्यय असताना 'अभावेसि', 'भावेसि', 'अभावयि', 'भावयि', 'अभावयिंसु', 'भावयिंसु'. पर-स्वर लोप झाल्यावर 'अभावेसुं', 'भावेसुं', 'अभावयंसु', 'भावयंसु', 'अभावयुं', 'भावयुं' इत्यादी. कर्म प्रयोगात- 'अभावीयि', 'भावीयि' इत्यादी. संकेतार्थ (कालातिपत्ती)- 'अभाविस्स', 'अभावयिस्स', 'अभाविस्संस्', 'अभावयिस्संस्'. कर्म प्रयोगात- 'अभावयिस्सं' इत्यादी. विध्यर्थ (सत्तमी)- 'भावेय्य' इत्यादी. कर्म प्रयोगात- 'भावीयेय्य' इत्यादी. आज्ञार्थ (पञ्चमी)- 'भावयतु', 'भावेतु' इत्यादी. कर्म प्रयोगात- 'भावीयतु' इत्यादी. පචිතුං පයොජෙතීති අත්ථෙ ණි+ණාපී හොන්ති. සො දෙවදත්තෙන ඔදනං පාචයති පාචෙති ඉච්චාදි, තථා පාචාපයති පාචාපෙති+ච්චාදි. කම්මෙ-සො තෙන දෙවදත්තෙන ඔදනො පාචීයති පාචාපීයති+ච්චාදි, භවිස්සත්යාදීසුපි යොජෙතබ්බං. 'शिजवण्यासाठी प्रेरित करतो' (स्वयंपाक करवतो) या अर्थात 'णि' आणि 'णापि' प्रत्यय होतात. तो देवदत्ताकडून भात शिजवून घेतो या अर्थात 'सो देवदत्तेन ओदनं पाचयति', 'पाचेति' इत्यादी, तसेच 'पाचापयति', 'पाचापेति' इत्यादी रूपे होतात. कर्म प्रयोगात- 'सो तेन देवदत्तेन ओदनो पाचीयति', 'पाचापीयति' इत्यादी रूपे होतात. भविष्यकाळ इत्यादींमध्येही याचप्रमाणे योजना करावी. ගන්තුං පයොජෙතීති අත්ථෙ සො තං පුරිසං ගාමං ගමයති ගමෙති ගච්ඡාපයති ගච්ඡාපෙති+ච්චාදි. කම්මෙ-තෙන සො ගාමං ගමීයති ගච්ඡාපීයති+ච්චාදි. 'जाण्यासाठी प्रेरित करतो' (पाठवतो) या अर्थात, तो त्या माणसाला गावात पाठवतो म्हणून 'सो तं पुरिसं गामं गमयति', 'गमेति', 'गच्छापयति', 'गच्छापेति' इत्यादी रूपे होतात. कर्म प्रयोगात- 'तेन सो गामं गमीयति', 'गच्छापीयति' इत्यादी रूपे होतात. ගුහ=සංවරණෙ, ගුහිතුං පයොජෙතීති ණිම්හි ‘‘ගුහිස්ස සරෙ’’ති දීඝො. ගූහයති, ගූහයන්ති ඉච්චාදි. 'गुह' धातू आच्छादन (झाकणे/लपवणे) या अर्थात आहे. 'लपवण्यासाठी प्रेरित करतो' या अर्थात 'णि' प्रत्यय लागल्यावर “गुहिस्स सरे” या सूत्राने दीर्घ होऊन 'गूहयति', 'गूहयन्ति' इत्यादी रूपे होतात. දිස+දුස=අප්පීතියං, දුසිතුං පයොජෙතීති ණිම්හි ‘‘ණිම්හි දීඝො දුසස්සා’’ති දීඝෙ දූසයති+ච්චාදි. 'दिस' आणि 'दुस' धातू अप्रीती (नावड/द्वेष) या अर्थात आहेत. 'दूषित करण्यासाठी प्रेरित करतो' या अर्थात 'णि' प्रत्यय लागल्यावर “णिम्हि दीघो दुसस्स” या सूत्राने दीर्घ होऊन 'दूसयति' इत्यादी रूपे होतात. තථා ඉච්ඡන්තං පයොජයති ඉච්ඡාපයති ඉච්ඡාපෙති, එසයති එසෙති. නියච්ඡන්තං පයොජයති නියමයති නියමෙති. තථා ආසයති [Pg.261] ආසෙති, අච්ඡාපයති අච්ඡාපෙති. ලාභයති ලාභෙති, එවං වාසයති වාසෙති, වාසාපයති වාසාපෙති. වාහයති වාහෙති, වාහාපයති වාහාපෙති+ච්චාදි. එවං ජීරයති, මාරයති, දස්සයති ඉච්චාදි. හූ=සත්තායං, පහොන්තං පයොජයති පහාවයති පහාවෙති ඉච්චාදි. සායයති සායාපයති සායාපෙති. නායාපයති නායාපෙති. පතිට්ඨාපයති පතිට්ඨාපෙති. රස්සෙ පතිට්ඨපෙති. හන්තුං පයොජයතීති ණි+ණාපී, ‘‘හනස්ස ඝාතො ණානුබන්ධෙ’’ති ඝාතාදෙසෙ ඝාතයති ඝාතෙති. තථා ජුහාවයති ජුහාවෙති, ජහාපයති ජහාපෙති. හාපයති හාපෙති. දාපයති දාපෙති. විධාපයති විධාපෙති, පිදහාපයති පිදහාපෙති. (භූවාදිනයො). तसेच, 'इच्छा करणाऱ्याला प्रेरित करतो' या अर्थात 'इच्छापयति', 'इच्छापेति', 'एसयति', 'एसेति' रूपे होतात. 'नियमन करणाऱ्याला प्रेरित करतो' या अर्थात 'नियमयति', 'नियमेति'. तसेच 'आसयति', 'आसेति', 'अच्छापयति', 'अच्छापेति'. 'लाभयति', 'लाभेति'. याचप्रमाणे 'वासयति', 'वासेति', 'वासापयति', 'वासापेति'. 'वाहयति', 'वाहेति', 'वाहापयति', 'वाहापेति' इत्यादी. याचप्रमाणे 'जीरयति' (जीर्ण करवतो), 'मारयति' (मारवतो), 'दस्सयति' (दाखवतो) इत्यादी. 'हू' धातू सत्ता (अस्तित्व) या अर्थात आहे; 'समर्थ असणाऱ्याला प्रेरित करतो' या अर्थात 'पहावयति', 'पहावेति' इत्यादी रूपे होतात. 'साययति', 'सायापयति', 'सायापेति'. 'नायापयति', 'नायापेति'. 'पतिट्ठापयति', 'पतिट्ठापेति'. र्हस्व झाल्यावर 'पतिट्ठपेति'. 'मारण्यासाठी प्रेरित करतो' या अर्थात 'णि' आणि 'णापि' प्रत्यय लागून, “हनस्स घातो णानुबन्धे” या सूत्राने 'घात' आदेश होऊन 'घातयति', 'घातेति' रूपे होतात. तसेच 'जुहावयति', 'जुहावेति', 'जहापयति', 'जहापेति'. 'हापयति', 'हापेति'. 'दापयति', 'दापेति'. 'विधापयति', 'विधापेति', 'पिदहापयति', 'पिदहापेति'. (हा भूवादि गणाचा नियम आहे). ඉදානි රුධාදිඅට්ඨගණා දස්සීයන්තෙ-රොධයති රොධෙති. දෙවයති දෙවෙති. තොදයති තොදෙති. ජයාපයති ජයාපෙති. වික්කයති වික්කයාපෙති. සාවයති සාවෙති. විතානයති විතානෙති. චොරාපයති චොරාපෙති ඉච්චාදි. आता रुधादि इत्यादी आठ गण दर्शवले जात आहेत- 'रोधयति', 'रोधेति'. 'देवयति', 'देवेति'. 'तोदयति', 'तोदेति'. 'जयापयति', 'जयापेति'. 'विक्कयति', 'विक्कयापयति' (विक्री करवतो). 'सावयति', 'सावेति' (ऐकवतो). 'वितानयति', 'वितानेति'. 'चोरापयति', 'चोरापेति' इत्यादी. ඛාදීහි පච්චයන්තෙහි, අපි හොන්ති ණි+ණාපයො; ණි+ණාපිනා+නකානානං, දස්සනඤ්චෙත්ථ සාධනං. 'ख' इत्यादी प्रत्ययान्त शब्दांपासून देखील 'णि' आणि 'णापि' प्रत्यय होतात. येथे 'णि' आणि 'णापि' प्रत्ययांचे दर्शन आणि 'न' इत्यादींचा लोप होणे हेच साधन (सिद्धी) आहे. තිතික්ඛන්තං පයොජයති තිතික්ඛෙති තිතික්ඛාපෙති, තිකිච්ඡයති තිකිච්ඡෙති තිකිච්ඡාපයති තිකිච්ඡාපෙති. එවං බුභුක්ඛෙති බුභුක්ඛාපෙති. පබ්බතායයති. පුත්තීයයති ඉච්චාදි. (ඛාදිපච්චයනයො). 'सहन करणाऱ्याला प्रेरित करतो' या अर्थात 'तितिक्खेति', 'तितिक्खापेति'. 'चिकित्सा करणाऱ्याला प्रेरित करतो' या अर्थात 'तिकिच्छयति', 'तिकिच्छेति', 'तिकिच्छापयति', 'तिकिच्छापेति'. याचप्रमाणे 'बुभुक्खेति', 'बुभुक्खापेति'. 'पब्बताययति'. 'पुत्तीययति' इत्यादी. (हा 'ख' इत्यादी प्रत्ययांचा नियम आहे). ඉති පයොගසිද්ධියං ත්යාදිකණ්ඩො ඡට්ඨො. अशा प्रकारे प्रयोगसिद्धीमधील 'त्यादि' नावाचे सहावे कांड समाप्त झाले. 7. ඛාදිකණ්ඩ ७. खादि कांड (ख-इत्यादी प्रत्ययांचे कांड). අථ [Pg.262] ධාතූහියෙව භාව+කම්ම+කත්තු+කරණාදිසාධනසහිතං ඛාදිවිධානං ආරභීයතෙ – आता धातूंपासूनच भाव, कर्म, कर्ता, करण इत्यादी साधनांसह (सिद्धींसह) 'खादि' (ख-इत्यादी प्रत्ययांचे) विधान सुरू केले जात आहे – ‘‘තිජමානෙහි ඛසා ඛමාවීමංසාසු’’ ඉච්චාදීහි පච්චයවිධානඤ්ච පරරූපද්විත්තාදිකාරියඤ්ච ත්යාදිකණ්ඩෙ වුත්තනයෙනෙව ඤාතබ්බං. තිතික්ඛනං තිතික්ඛා, ‘‘ඉත්ථිය+මණක්තිකයකයා ච’’ ඉති සුත්තෙන අපච්චයො ච ‘‘ඉත්ථිය+මත්වා’’ති ආපච්චයො ච හොති. තථා වීමංසනං වීමංසා. ‘‘කිතා තිකිච්ඡාසංසයෙසු ඡො’’ති ඡප්පච්චයාදිම්හි කතෙ තිකිච්ඡනං තිකිච්ඡා, විචිකිච්ඡනං විචිකිච්ඡා. ගුප=ගොපනෙ, බධ=බන්ධනෙති ඉමෙහි ධාතූහි ‘‘නින්දායං ගුප+බධා බස්ස භො ච’’ ඉති ඡපච්චයාදිම්හි ච ද්විත්තෙ පරබකාරස්ස ඉමිනා භකාරෙ ච කතෙ අපච්චයාදි හොති. ජිගුච්ඡනං ජිගුච්ඡා, බීභච්ඡනං බීභච්ඡා. ‘‘තුංස්මා ලොපො චි+ච්ඡායං තෙ’’ ඉති ඉච්ඡාය+මත්ථෙ ඛ+ස+ඡප්පච්චයා හොන්ති. භුජ=පාලනජ්ඣොහාරෙසු, බුභුක්ඛනං බුභුක්ඛා. ජි=ජයෙ, ජිගිංසනං, ජිගිංසා. ඝස=අදනෙ, ජිඝච්ඡනං ජිඝච්ඡා. “तिजमानेहि खसा खमावीमंसासु” इत्यादी सूत्रांद्वारे प्रत्ययविधान आणि पररूप-द्वित्त्व इत्यादी कार्ये 'त्यादि' कांडात (आख्यात कांडात) सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणून घ्यावीत. तितिक्षण (सहन करणे) म्हणजे 'तितिक्खा' (तितिक्षा). “इत्थिय+मणक्तिकयकया च” या सूत्राने 'अ' प्रत्यय आणि “इत्थिय+मत्वा” याने 'आ' प्रत्यय होतो. तसेच विमंसन (विचार करणे) म्हणजे 'विमंसा' (विमर्शा/मीमांसा). “किता तिकिच्छासंसयेसु छो” या सूत्राने 'छ' प्रत्यय इत्यादी केल्यावर तिकिच्छन म्हणजे 'तिकिच्छा' (चिकित्सा), विचिकिच्छन म्हणजे 'विचिकिच्छा' (विचिकित्सा/शंका) होते. गुप = गोपने (रक्षण करणे), बध = बंधने (बांधणे) या धातूंपासून “निंदायं गुप+बधा बस्स भो च” या सूत्राने 'छ' प्रत्यय इत्यादी आणि द्वित्त्व झाल्यावर, पर-बकाराचा या सूत्राने 'भ'कार केल्यावर 'अ' प्रत्यय इत्यादी होतात. जिगुच्छन म्हणजे 'जिगुच्छा' (जुगुप्सा/घृणा), बीभच्छन म्हणजे 'बीभच्छा' (बीभत्सा). “तुंस्मा लोपो चि+च्छायं ते” या सूत्राने इच्छेच्या अर्थात 'ख', 'स', 'छ' प्रत्यय होतात. भुज = पालनाज्झोहारने (पालन व भक्षण करणे), बुभुक्खण (खाण्याची इच्छा) म्हणजे 'बुभुक्खा' (बुभुक्षा). जि = जये (जिंकणे), जिगींसन (जिंकण्याची इच्छा) म्हणजे 'जिगींसा' (जिगीषा). घस = अदने (खाणे), जिघच्छन (खाण्याची इच्छा) म्हणजे 'जिघच्छा' (जिघत्सा). 27. භාවකම්මෙසු තබ්බානීයා २७. भाव आणि कर्म अर्थांमध्ये 'तब्ब' आणि 'अनीय' प्रत्यय होतात. තබ්බඅනීයා ක්රියත්ථා පරෙ භාවකම්මෙසු භවන්ති, බහුලංවිධානා කත්තුකරණාදීසුපි. භූ=සත්තායං, ‘‘යුවණ්ණාන+මෙ ඔපච්චයෙ’’ති ඔකාරෙ ‘‘ඌබ්යඤ්ජනස්සා’’ති ඌආගමො, ඤ්ඤකාරො ආද්යාවයවත්ථො. ඔස්ස ‘‘එඔන+ මයවා [Pg.263] සරෙ’’ති අවාදෙසො, භූයතෙති භවිතබ්බං භවතා භවනීයං. භාවස්සෙ+කත්තා එකවචනමෙව, තඤ්ච නපුංසකලිඞ්ගං. 'तब्ब' आणि 'अनीय' हे प्रत्यय धातूंच्या पुढे भाव आणि कर्म अर्थांमध्ये होतात, आणि बहुल विधानामुळे कर्ता, करण इत्यादी अर्थांमध्येही होतात. भू = सत्तायां (अस्तित्व असणे), “युवण्णान+मे ओपच्चये” या सूत्राने 'ओ'कार झाल्यावर “ऊब्यञ्जनस्सा” या सूत्राने 'ऊ' आगम होतो, 'ञ्ञ'कार हा आद्य अवयवासाठी आहे. 'ओ'काराचा “एओन+ मयवा सरे” या सूत्राने 'अव्' आदेश होतो. 'भूयते' (अस्तित्व असणे) या अर्थी आपल्याद्वारे 'भवितब्बं' (व्हावे/असावे) किंवा 'भवनीयं' होते. भावामध्ये (भाववाच्य मध्ये) केवळ एकवचनच असते आणि ते नपुंसकलिंगी असते. තබ්බාද්යභිහිතො භාවො,දබ්බමිව පකාසතීති-බහුවචනඤ්ච හොති. 'तब्ब' इत्यादी प्रत्ययांनी सांगितलेला भाव द्रव्यासारखा भासतो, म्हणून बहुवचनही होते. කම්මෙ-අභිපුබ්බො, අභිභූයතෙ අභිභූයිත්ථ අභිභූයිස්සතෙති අභිභවිතබ්බො කොධො පණ්ඩිතෙන, අභිභවිතබ්බා තණ්හා, අභිභවිතබ්බං දුක්ඛං. එවං අභිභවනීයො අභිභවනීයා අභිභවනීයං, කම්මෙ අභිධෙය්යස්සෙව ලිඞ්ගවචනානි. कर्म अर्थामध्ये - 'अभि' उपसर्गपूर्वक, 'अभिभूयते' (पराभूत केले जाते), 'अभिभूयित्थ' (पराभूत केले गेले), 'अभिभूयिस्सते' (पराभूत केले जाईल) या अर्थी पंडिताने 'अभिभवितब्बो कोधो' (क्रोधावर विजय मिळवावा), 'अभिभवितब्बा तण्हा' (तृष्णेवर विजय मिळवावा), 'अभिभवितब्बं दुक्खं' (दुःखावर विजय मिळवावा). याचप्रमाणे 'अभिभवनीयो', 'अभिभवनीया', 'अभिभवनीयं' होतात. कर्म अर्थामध्ये अभिधेयाच्या (कर्मवाचक शब्दाच्या) अनुसारच लिंग आणि वचने होतात. විසෙස්සලිඞ්ගාතබ්බාදී, තත්ථා+දො පඤ්ච භාවජා; නපුංසකෙ සියුං භාවෙ, ක්තො චා+නො අකත්තරි. 'तब्ब' इत्यादी प्रत्यय विशेष्याच्या लिंगानुसार होतात. त्यामध्ये सुरुवातीचे पाच प्रत्यय भाववाचक असतात. भाव अर्थामध्ये ते नपुंसकलिंगात असतात, आणि 'क्त' (त) व 'अन' (यु) प्रत्यय कर्ता सोडून इतर कारकांमध्ये होतात. භාවස්මිං ඝණ පුමෙ එවං, ඉයුවණ්ණා ගහාදිජො; අපච්චයොපි වා+සංඛ්යා, තු+මාදිත්වන්තකා සියුං. भाव अर्थामध्ये 'घञ' प्रत्यय पुल्लिंगात होतो. याचप्रमाणे 'इ', 'उ' वर्णांत आणि 'गह' इत्यादी धातूंपासून 'अ' प्रत्यय देखील विकल्प करून होतो. संख्यावाचक शब्द आणि 'तुं' इत्यादी प्रत्ययांत शब्द अव्यय असतात. ඉතො පරං උපසග්ගපුබ්බතා ච කාලත්තයස්ස වාක්යගහණඤ්ච වුත්තනයෙන ඤාතබ්බං, තස්මා අනුරූපවාක්යමෙව දස්සයිස්සාම – यापुढे उपसर्गपूर्वकता, तिन्ही काळ आणि वाक्याचे ग्रहण सांगितलेल्या पद्धतीनेच जाणून घ्यावे, म्हणून आम्ही केवळ अनुरूप वाक्येच दाखवू – ආස=උපවෙසනෙ, ආසනෙ ආසිතබ්බං තයා ආසනීයං. කම්මෙ-උපාසීයතීති උපාසිතබ්බො ගුරු උපාසනීයො. සී=සයෙ, එ+අයාදෙසා, සයනං සයිතබ්බං සයනීයං තයා. අතිසීයතීති අතිසයිතබ්බො කටො තෙ අතිසයනීයො. පද=ගමනෙ, ‘‘පදාදීනං ක්වචී’’ති යුක, කකාරො කානුබන්ධකාරියත්ථො, උකාරො උච්චාරණත්ථො, දස්සජො පුබ්බරූපඤ්ච, උප්පජ්ජනං උප්පජ්ජිතබ්බං උප්පජ්ජනීයං. පටිපජ්ජීයතීති පටිපජ්ජිතබ්බො මග්ගො පටිපජ්ජනීයො. බුධ=ඤාණෙ, බුජ්ඣතෙති බුජ්ඣිතබ්බො [Pg.264] ධම්මො බුජ්ඣනීයො. සු=සවනෙ, සූයතෙති සොතබ්බො ධම්මො, ඤ්ඤිම්හි නාගමෙ ‘‘තථනරානං ටඨණලා’’ති ණෙ ච කතෙ ‘‘න තෙ කානුබන්ධ+නාගමෙසූ’’ති ඔකාරාභාවො. සුණිතබ්බො, සවනීයො. කර=කරණෙ – आस = उपवेशने (बसणे), आसनावर तुझ्याद्वारे 'आसितब्बं' (बसावे) किंवा 'आसनीयं'. कर्म अर्थामध्ये - 'उपासीयते' (सेवा केली जाते) या अर्थी 'उपासितब्बो गुरू' (गुरूंची सेवा करावी) किंवा 'उपासनीयो'. सी = शये (झोपणे), 'ए' आणि 'अय्' आदेश होऊन, तुझ्याद्वारे 'सयितब्बं' (झोपावे) किंवा 'सयनीयं'. 'अतिसीयते' (अतिशय झोपले जाते) या अर्थी तुझ्याद्वारे 'अतिसयितब्बो कटो' (चटईवर अतिशय झोपावे) किंवा 'अतिसयनीयो'. पद = गमने (जाणे), “पदादीनं क्वचि” या सूत्राने 'यु' प्रत्यय, 'क'कार हा 'क' अनुबंधाच्या कार्यासाठी आहे, 'उ'कार हा उच्चारणासाठी आहे, 'द'काराचा 'ज'कार आणि पररूप होऊन, 'उप्पज्जितब्बं' (उत्पन्न व्हावे) किंवा 'उप्पज्जनीयं'. 'पटिपज्जीयते' (आचरण केले जाते) या अर्थी 'पटिपज्जितब्बो मग्गो' (मार्गाचे आचरण करावे) किंवा 'पटिपज्जनीयो'. बुध = ज्ञाणे (जाणणे), 'बुज्झते' (जाणले जाते) या अर्थी 'बुज्झितब्बो धम्मो' (धम्म जाणावा) किंवा 'बुज्झनीयो'. सु = सवणे (ऐकणे), 'सूयते' (ऐकले जाते) या अर्थी 'सोतब्बो धम्मो' (धम्म ऐकावा), 'ञ्ञ' प्रत्यय असताना 'न' आगम आणि “तथनरानं ठठणला” या सूत्राने 'ण'कार केल्यावर “न ते कानुबंध+नागमेसू” या सूत्राने 'ओ'काराचा अभाव होतो. 'सुणितब्बो', 'सवनीयो'. कर = करणे – 95. පරරූප+මයකාරෙ බ්යඤ්ජනෙ ९५. मकार आणि यकार नसलेल्या व्यंजनावर पररूप होते. ක්රියත්ථාන+මන්තබ්යඤ්ජනස්ස පරරූපං හොති යකාරතො අඤ්ඤස්මිං බ්යඤ්ජනෙ. කරීයතීති කත්තබ්බො ධම්මො, කත්තබ්බා පූජා, කත්තබ්බං කුසලං. यकाराव्यतिरिक्त इतर व्यंजन पुढे असताना धातूंच्या अंतिम व्यंजनाचे पररूप होते. 'करीयते' (केले जाते) या अर्थी 'कत्तब्बो धम्मो' (धम्म करावा/आचरावा), 'कत्तब्बा पूजा' (पूजा करावी), 'कत्तब्बं कुसलं' (कुशल कर्म करावे). 119. තුං+තුන+තබ්බෙසු වා ११९. 'तुं', 'तुन' आणि 'तब्ब' प्रत्यय पुढे असताना 'कर' धातूच्या जागी विकल्प करून 'का' होतो. තුමාදීසු කරස්සා හොති වා. කාතබ්බං හිතං. 'तुं' इत्यादी प्रत्यय पुढे असताना 'कर' धातूच्या जागी विकल्प करून 'का' होतो. 'कातब्बं हितं' (हित करावे). 171. රා නස්ස ණො १७१. 'र' अंत असलेल्या धातूंच्या पुढील प्रत्ययाच्या 'न'काराचा 'ण'कार होतो. රන්තතො ක්රියත්ථා පච්චයනකාරස්ස ණ හොති. කරණීයො. 'र' अंत असलेल्या धातूंच्या पुढील प्रत्ययाच्या 'न'काराचा 'ण'कार होतो. 'करणीयो' (करावा). භර=භරණෙ, භරීයතීති භරිතබ්බො භරණීයො. ගහ=උපාදානෙ ‘‘මං වා රුධාදීනං’’ති අන්තසරා පරොමං වා හොති. මකාරො+නුබන්ධො. ‘‘ණො නිග්ගහීතස්සා’’ති නිග්ගහීතස්ස ණො, සංගය්හතීති සංගණ්හිතබ්බො සංගණ්හනීයො, ‘‘තථනරා’’දිනා ණකාරෙ ගහණීයො. රම=කීළායං, රමීයතීති රමණීයො විහාරො. ආප=පාපුණනෙ, ‘‘සකාපානං කුකකූ ණෙ’’ති එත්ථ ‘සකාපානං කුක+කූ’ති යොගවිභාගා කු, ඌආගමෙ නාගමස්ස ණෙ ච කතෙ පාපීයතීති පාපුණිතබ්බො. පරරූපෙ පත්තබ්බො, පාපුණනීයො, පාපනීයො. भर = भरणे (पोषण करणे), 'भरीयते' (पोषण केले जाते) या अर्थी 'भरितब्बो', 'भरणीयो'. गह = उपादाने (ग्रहण करणे), “मं वा रुधादीनं” या सूत्राने अंतिम स्वराच्या पुढे विकल्प करून 'मं' होतो. 'म'कार हा अनुबंध आहे. “णो निग्गहीतस्सा” या सूत्राने निग्गहीताचा 'ण'कार होतो. 'संगय्हते' (संग्रह केला जातो) या अर्थी 'संगण्हितब्बो', 'संगण्हनीयो', “तथनरा” इत्यादी सूत्राने 'ण'कार केल्यावर 'गहणीयो' होतो. रम = कीळायं (क्रीडा करणे/रमण करणे), 'रमीयते' (रमण केले जाते) या अर्थी 'रमणीयो विहारो' (रमणीय विहार). आप = पापुणने (प्राप्त करणे), “सकापानं कुककू णे” यामध्ये 'सकापानं कुक+कू' या योगविभागाने 'कु' आणि 'ऊ' आगम, 'न' आगम आणि 'ण'कार केल्यावर 'पापीयते' (प्राप्त केले जाते) या अर्थी 'पापुणितब्बो' होतो. पररूप झाल्यावर 'पत्तब्बो', 'पापुणनीयो', 'पापनीयो' होतात. 96. මනානං නිග්ගහීතං ९६. मकार आणि नकार अंत असलेल्या धातूंच्या जागी यकार नसलेल्या व्यंजनापुढे निग्गहीत (अनुस्वार) होतो. මකාර+නකාරන්තානං [Pg.265] ක්රියත්ථානං නිග්ගහීතං හොත්ය+යකාරෙ බ්යඤ්ජනෙ. වග්ගන්තං, ගමියතීති ගන්තබ්බො. ගමිතබ්බං ගමනීයං. ඛන=ඛණ=අවදාරණෙ, නිග්ගහීතං වග්ගන්තත්තඤ්ච, ඛඤ්ඤතෙති ඛන්තබ්බං ආවාටං ඛනිතබ්බං ඛනනීයං. හන=හිංසායං, හඤ්ඤතෙති හන්තබ්බං හනිතබ්බං හනනීයං. මන=ඤාණෙ, මඤ්ඤතෙති මන්තබ්බො මනිතබ්බො. ‘‘පදාදීනං ක්වචී’’ති යුක, චවග්ගාදිම්හි කතෙ මඤ්ඤිතබ්බං මඤ්ඤනීයං. मकार आणि नकार अंत असलेल्या धातूंच्या जागी यकार नसलेल्या व्यंजनापुढे निग्गहीत (अनुस्वार) होतो. वर्गांत (वर्ग-अनुनासिक) होऊन, 'गमीयते' (गेले जाते) या अर्थी 'गंतब्बो'. 'गमितब्बं', 'गमनीयं'. खन = खण = अवदारणे (खणणे), निग्गहीत आणि वर्गांत होऊन, 'खञ्ञते' (खणले जाते) या अर्थी 'खंतब्बं आवाटं' (खड्डा खणावा), 'खनितब्बं', 'खननीयं'. हन = हिंसायां (मारणे), 'हञ्ञते' (मारले जाते) या अर्थी 'हंतब्बं', 'हनितब्बं', 'हननीयं'. मन = ज्ञाणे (जाणणे), 'मञ्ञते' (मानले जाते) या अर्थी 'मंतब्बो', 'मनितब्बो'. “पदादीनं क्वचि” या सूत्राने 'यु' प्रत्यय आणि च-वर्ग इत्यादी झाल्यावर 'मञ्ञितब्बं', 'मञ्ञनीयं' होतात. පූජ=පූජායං, ‘‘චුරාදිතො ණී’’ති ණිම්හි ඤුකාරස්ස ගුරුත්තා ඔකාරාවුත්ති ‘‘යුවණ්ණාන+මෙඔ පච්චයෙ’’ති එකාරෙ පූජෙතබ්බො ඌම්හි අයාදෙසෙ පූජයිතබ්බො පූජනීයො භගවා. पूज = पूजायं (पूजा करणे), “चुरादितो णी” या सूत्राने 'णि' प्रत्यय झाल्यावर 'ञु'काराच्या गुरुत्वामुळे 'ओ'काराची आवृत्ती (गुण) होऊन आणि “युवण्णान+मेओ पच्चये” या सूत्राने 'ए'कार झाल्यावर 'पूजेतब्बो' होतो. 'ऊ' प्रत्यय असताना 'अय्' आदेश होऊन 'पूजयितब्बो', 'पूजनीयो भगवा' (भगवान पूजनीय आहेत) असे रूप होते. කත්තරි-යා=පාපුණනෙ, නීයතීති නිය්යානියො මග්ගො, ගච්ඡන්තීති ගමනීයා භොගා. කරණෙ-නහ=සොචෙය්යෙ, නහායන්ත්ය+නෙනාති නහානීයං චුණ්ණං. සම්පදානෙ-දා=දානෙ, සං+පපුබ්බො, සම්මා පදීයතෙ අස්සාති සම්පදානියො බ්රාහ්මණො. कर्ता अर्थामध्ये - या = पापुणने (प्राप्त करणे), 'नीयते' (नेला जातो) या अर्थी 'निय्यानीयो मग्गो' (मुक्तीकडे नेणारा मार्ग), 'गच्छन्ति' (जातात/नष्ट होतात) या अर्थी 'गमनीया भोगा' (नष्ट होणारे भोग). करण अर्थामध्ये - नह = सोचेय्ये (स्वच्छ करणे), 'नहायन्ति अनेन' (ज्याने स्नान करतात) या अर्थी 'नहानीयं चुण्णं' (स्नानाचे चूर्ण/उटणे). संप्रदान अर्थामध्ये - दा = दाने (देणे), 'सं' आणि 'प' उपसर्गपूर्वक, 'सम्मा पदीयते अस्सा' (ज्याला चांगल्या प्रकारे दिले जाते) या अर्थी 'संपदानीयो ब्राह्मणो' (दान देण्यास योग्य ब्राह्मण). 28. ඝ්යණ २८. 'घ्यण' प्रत्यय. භාවකම්මෙසු ක්රියත්ථා පරො ඝ්යණ හොති බහුලං. ඌම්හි කත්තබ්බං කාරියං. හර=හරණෙ, හරීයතීති හාරියං. භර=භරණෙ, භරිතබ්බං භාරියං. ලභ=ලාභෙ, ‘‘වග්ගලසෙහි තෙ’’ති පුබ්බරූපභකාරෙ ‘‘චතුත්ථදුතියා’’ දිනා තතියක්ඛරෙ ච කතෙ ලභිතබ්බං ලබ්භං. भाव आणि कर्म अर्थांमध्ये धातूंच्या पुढे 'घ्यण' प्रत्यय बहुधा (बहुल करून) होतो. 'ऊ' प्रत्यय असताना 'कत्तब्बं' (करावे) या अर्थी 'कारियं' (कार्य) होते. हर = हरणे (हरण करणे), 'हरीयते' (हरण केले जाते) या अर्थी 'हारियं'. भर = भरणे (पोषण करणे), 'भरितब्बं' (पोषण करावे) या अर्थी 'भारियं'. लभ = लाभे (मिळवणे), “वग्गलसेhi ते” या सूत्राने पूर्व रूप 'भ'कार झाल्यावर “चतुत्थदुतिया” इत्यादी सूत्राने तिसरे अक्षर (ब) झाल्यावर 'लभितब्बं' या अर्थी 'लब्भं' (मिळवण्याजोगे) होते. වච=බ්යත්තවචනෙ, वच = ब्यत्तवचने (स्पष्ट बोलणे), 98. කගා චජානං ඝානුබන්ධෙ ९८. 'घ' अनुबंध (इत्संज्ञक) असताना 'च'कार आणि 'ज'कार अंत असलेल्या धातूंच्या जागी अनुक्रमे 'क'कार आणि 'ग'कार होतात. ඝානුබන්ධෙ [Pg.266] චකාර+ජකාරන්තානං ක්රියත්ථානං ක+ගා හොන්ති යථාක්කමං. 'घ' अनुबंध असताना 'च'कार आणि 'ज'कार अंत असलेल्या धातूंच्या जागी अनुक्रमे 'क'कार आणि 'ग'कार होतात. 84. අස්සා ණානුබන්ධෙ ८४. 'ण' अनुबंध (इत्संज्ञक) असलेला प्रत्यय पुढे असताना उपधा (अंतिम अक्षराच्या आधीचा) 'अ'काराचा 'आ'कार होतो. ණකාරානුබන්ධෙ පච්චයෙ පරෙ උපන්තස්ස අකාරස්ස ආ හොති. වචනං වුච්චතෙති වාක්යං. භජ=සෙවායං, භජනීයං භාග්යං, ජස්ස ගකාරො. චි=චයෙ, චයනං චීයතීති වා චෙය්යං. යස්ස ද්විත්තං. 'ण'कार अनुबंध असलेला प्रत्यय पुढे असताना उपधा 'अ'काराचा 'आ'कार होतो. 'वचनं वुच्चते' (वचन बोलले जाते) या अर्थी 'वाक्यं' (वाक्य). भज = सेवायं (सेवा करणे), 'भजनीयं' या अर्थी 'भाग्यं' (भाग्य), येथे 'ज'काराचा 'ग'कार होतो. चि = चये (एकत्र करणे), 'चयनं चीयते' (एकत्र केले जाते) या अर्थी 'चेय्यं' होते, येथे 'य'काराचे द्वित्त्व होते. 5,122. නිතො චිස්ස ඡො ५,१२२. 'ञ' अनुबंध असताना 'चि' धातूच्या जागी 'छ'कार होतो. නිතො පරස්ස චිස්ස ඡො හොතීතිආදිචකාරස්ස ඡො. විනිච්ඡයතීති විනිච්ඡෙය්යං, නාගමෙ විනිච්ඡිනිතබ්බං. එ+අයාදෙසෙසු විනිච්ඡෙතබ්බං විනිච්ඡනීයං. නී=පාපනෙ, නීයතීති නෙය්යො නෙය්යා නෙය්යං, නෙතබ්බං. ‘नी’ धातूच्या पुढील ‘च’ चा ‘छ’ होतो, इत्यादी सूत्रातील ‘च’ कारामुळे ‘छ’ होतो. ‘विनिच्छयति’ (निर्णय करतो) म्हणून ‘विनिच्छेय्यं’ (निर्णय करण्यायोग्य), ‘न’ आगम झाल्यावर ‘विनिच्छिनितब्बं’ होते. ‘ए’ आणि ‘अय’ आदेश झाल्यावर ‘विनिच्छेतब्बं’ आणि ‘विनिच्छनीयं’ रूपे होतात. ‘नी’ = प्रापण (नेणे) या अर्थी, ‘नीयति’ (नेले जाते) म्हणून ‘नेय्यो’, ‘नेय्या’, ‘नेय्यं’ आणि ‘नेतब्बं’ रूपे होतात. 29. ආස්සෙ+ච २९. ‘आस्से च’ (हे सूत्र). ආකාරන්තතො ක්රියත්ථා ඝ්යණ හොති භාවකම්මෙසු ආස්ස එ ච. දා=දානෙ, දාතබ්බං දෙය්යං. පා=පානෙ, පීයතීති පෙය්යං. මා=මානෙ, මීයතීති මෙය්යං. ඤා=අවබොධනෙ, ඤායතීති ඤෙය්යං ඤාතබ්බං, ඌම්හි නාගමො ‘‘ඤාස්ස නෙ+ජා’’ති ඤාස්ස ජාදෙසෙ ජානිතබ්බං, විජානියං. ඛා=පකථනෙ, සංඛාතබ්බං සංඛෙය්යං. आकारांत क्रियावाचक धातूंहून भाव आणि कर्म अर्थांमध्ये ‘घ्यण’ प्रत्यय होतो आणि ‘आ’ चा ‘ए’ होतो. ‘दा’ = दान देणे या अर्थी, ‘दातब्बं’ आणि ‘देय्यं’ रूपे होतात. ‘पा’ = पिणे या अर्थी, ‘पीयति’ (पिले जाते) म्हणून ‘पेय्यं’ रूप होते. ‘मा’ = मोजणे या अर्थी, ‘मीयति’ (मोजले जाते) म्हणून ‘मेय्यं’ रूप होते. ‘ञा’ = जाणणे या अर्थी, ‘ञायति’ (जाणले जाते) म्हणून ‘ञेय्यं’ आणि ‘ञातब्बं’ रूपे होतात. ‘उ’ प्रत्यय असताना ‘न’ चा आगम होतो. ‘ञास्स ने+जा’ या सूत्राने ‘ञा’ चा ‘जा’ आदेश झाल्यावर ‘जानितब्बं’ आणि ‘विजानियं’ रूपे होतात. ‘खा’ = सांगणे या अर्थी, ‘संखातब्बं’ आणि ‘संखेय्यं’ रूपे होतात. 30. වදාදීහි යො ३०. ‘वदादीहि यो’ (हे सूत्र). වදාදීහි [Pg.267] ක්රියත්ථෙහි යො හොති බහුලං භාවකම්මෙසු. වද=වචනෙ, වදනං වජ්ජතීති වා වජ්ජං. මද=උම්මාදෙ, මදනං මජ්ජතෙ අනෙනාති වා මජ්ජං. ගමනං ගම්මතෙති වා ගම්මං. ගද=වචනෙ, ගජ්ජතෙ ගදනීයං වාති ගජ්ජං. පද=ගමනෙ, පජ්ජනීයං පජ්ජං ගාථා. අද+ඛාද=භක්ඛනෙ, ඛජ්ජතීති ඛජ්ජං ඛාදනීයං. දම=දමනෙ, දම්මතෙති දම්මො දමනීයො. ‘वद्’ इत्यादी क्रियावाचक धातूंहून भाव आणि कर्म अर्थांमध्ये बहुधा ‘य’ प्रत्यय होतो. ‘वद’ = बोलणे या अर्थी, ‘वदनं’ किंवा ‘वज्जति’ (बोलले जाते) म्हणून ‘वज्जं’ रूप होते. ‘मद’ = उन्माद या अर्थी, ‘मदनं’ किंवा ‘मज्जते अनेन’ (ज्याद्वारे मद चढतो) म्हणून ‘मज्जं’ रूप होते. ‘गमनं’ किंवा ‘गम्मते’ (जातात) म्हणून ‘गम्मं’ रूप होते. ‘गद’ = बोलणे या अर्थी, ‘गज्जते’ किंवा ‘गदनीयं’ म्हणून ‘गज्जं’ रूप होते. ‘पद’ = जाणे या अर्थी, ‘पज्जनीयं’ म्हणून ‘पज्जं’ (गाथा/पद्य) रूप होते. ‘अद’ आणि ‘खाद’ = भक्षण करणे या अर्थी, ‘खज्जति’ (खाल्ले जाते) म्हणून ‘खज्जं’ आणि ‘खादनीयं’ रूपे होतात. ‘दम’ = दमन करणे या अर्थी, ‘दम्मते’ म्हणून ‘दम्मो’ आणि ‘दमनीयो’ रूपे होतात. භුජා+න්නෙති ගණසුත්තෙන අන්නෙ වත්තබ්බෙ යපච්චයො. ‘भुजान्न’ या गणसूत्राने ‘अन्न’ अर्थ सांगायचा असताना ‘य’ प्रत्यय होतो. 83. ලහුස්සුපන්තස්සති ८३. ‘लहुस्सुपन्तस्स’ (हे सूत्र). ලහුභූතස්ස උපන්තස්ස ඉයුවණ්ණස්ස එඔ හොන්ති යථාක්කමං. යස්ස පුබ්බරූපෙ භුඤ්ජිතබ්බොති භොජ්ජො ඔදනො, භොජ්ජා යාගු. लघु असलेल्या उपान्त्य ‘इ’ आणि ‘उ’ वर्णांचे अनुक्रमे ‘ए’ आणि ‘ओ’ होतात. ‘य’ चे पूर्वरूप झाल्यावर, ‘भुंजितब्बं’ (खाण्यायोग्य) म्हणून ‘भोज्जो ओदनो’ (खाण्यायोग्य भात) आणि ‘भोज्जा यागु’ (पिण्यायोग्य पेज) अशी रूपे होतात. 31. කිච්ච ඝච්ච භච්ච භබ්බ ලෙය්යා ३१. ‘किच्च घच्च भच्च भब्ब लेय्या’ (हे सूत्र). එතෙ සද්දා යපච්චයන්තා නිපච්චන්තෙ. කර=කරණෙ, ඉමිනා නිපාතනා යෙ කිචාදෙසෙ ච කතෙ පුබ්බරූපං, කත්තබ්බං කිච්චං. හන=හිංසායං, ඝච්චාදෙසාදිම්හි කතෙ හනනං හඤ්ඤතෙති වා ඝච්චං. භර=භරණෙ, භච්චාදෙසාදිම්හි කතෙ භරණීයො භච්චො. භූ=සත්තායං, යම්හි ඔකාරෙ ඉමිනා අවාදෙසෙ භවතීති භබ්බො. ලිහ=අස්සාදනෙ, යම්හි ඉමිනා හස්ස යකාරෙ ලෙහිතබ්බං ලෙය්යං, එකාරවුද්ධි. हे शब्द ‘य’ प्रत्ययान्त निपातनाने सिद्ध होतात. ‘कर’ = करणे या अर्थी, या निपातनाने ‘य’ प्रत्यय आणि ‘किच्च’ आदेश झाल्यावर पूर्वरूप होते, ‘कत्तब्बं’ (करण्यायोग्य) म्हणून ‘किच्चं’ रूप होते. ‘हन’ = हिंसा करणे या अर्थी, ‘घच्च’ आदेश इत्यादी झाल्यावर ‘हननं’ किंवा ‘हञ्ञते’ (मारले जाते) म्हणून ‘घच्चं’ रूप होते. ‘भर’ = भरण-पोषण करणे या अर्थी, ‘भच्च’ आदेश इत्यादी झाल्यावर ‘भरणीयो’ म्हणून ‘भच्चो’ रूप होते. ‘भू’ = असणे या अर्थी, ‘य’ प्रत्यय असताना ‘ओ’ कार होऊन या सूत्राने ‘अव्’ आदेश झाल्यावर ‘भवति’ म्हणून ‘भब्बो’ रूप होते. ‘लिह’ = चाटणे या अर्थी, ‘य’ प्रत्यय असताना या सूत्राने ‘ह’ चा ‘य’ कार झाल्यावर ‘लेहितब्बं’ म्हणून ‘लेय्यं’ रूप होते, येथे ‘ए’ कार वृद्धी होते. 32. ගුහාදීහි යක ३२. ‘गुहादीहि यक’ (हे सूत्र). ගුහාදීහි [Pg.268] ක්රියත්ථෙහි භාවකම්මෙසු යක හොති. ගුහ=සංවරණෙ, ‘‘ලහුස්සුපන්තස්සා’’ති සම්පත්තස්ස ඔකාරස්ස ‘‘න තෙ කානුබන්ධනාගමෙසූ’’ති පටිසෙධො. ‘‘හස්ස විපල්ලාසො’’ති විපල්ලාසෙ ගුහනං ගුහිතබ්බං ගුය්හං. දුහ=පපූරණෙ, දොහනං දුය්හතීති වා දුය්හං. සාස=අනුසිට්ඨියං – ‘गुह’ इत्यादी क्रियावाचक धातूंहून भाव आणि कर्म अर्थांमध्ये ‘यक’ प्रत्यय होतो. ‘गुह’ = झाकणे या अर्थी, ‘लहुस्सुपन्तस्स’ या सूत्राने प्राप्त होणाऱ्या ‘ओ’ काराचा ‘न ते कानुबन्धनागमेसू’ या सूत्राने निषेध होतो. ‘हस्स विपल्लासो’ या सूत्राने विपर्यास झाल्यावर ‘गुहनं’ किंवा ‘गुहितब्बं’ म्हणून ‘गुय्हं’ रूप होते. ‘दुह’ = दोहन करणे या अर्थी, ‘दोहनं’ किंवा ‘दुय्हति’ म्हणून ‘दुय्हं’ रूप होते. ‘सास’ = उपदेश करणे या अर्थी - 117. සාසස්ස සිස වා ११७. ‘सासस्स सिस वा’ (हे सूत्र). සාසස්ස සිස වා හොති කානුබන්ධෙ. පුබ්බරූපං, සාසීයතීති සිස්සො. ‘क’ अनुबन्ध असताना ‘सास’ चा ‘सिस’ विकल्पेकरून होतो. पूर्वरूप झाल्यावर, ‘सासीयति’ (ज्याला उपदेश केला जातो) म्हणून ‘सिस्सो’ (शिष्य) रूप होते. සිද්ධා එවෙ+තෙ තබ්බාදයො පෙසා+තිසග්ග+ප්පත්තකාලෙසු ගම්යමානෙසුපි, සාමඤ්ඤෙන විධානතො. පෙසනං – ‘‘කත්තබ්බ+මිදං භවතා’’ති ආණාපනං අජ්ඣෙසනඤ්ච. අතිසග්ගො නාම ‘‘කි+මිදං මයා කත්තබ්බං’’ති පුට්ඨස්ස ‘‘පාණො න හන්තබ්බො’’තිආදිනා පටිපත්තිදස්සනමුඛෙන කත්තබ්බස්ස අනුඤ්ඤා. පත්තකාලො නාම සම්පත්තසමයො. යො කිච්චකරණසමයං උපපරික්ඛිත්වා කරොති, තස්ස සමයාරොචනං, න තත්ථ අජ්ඣෙසන+මත්ථි. භොතා ඛලු කටො කත්තබ්බො කරණීයො කාරියො කිච්චො’’ එවං ත්වයා කටො කත්තබ්බො, භොතො හි පත්තො කාලො කටකරණෙ. हे ‘तब्ब’ इत्यादी प्रत्यय प्रेषण (आज्ञा), अतिसर्ग (अनुज्ञा) आणि प्राप्तकाल (योग्य वेळ) हे अर्थ प्रतीत होत असतानाही सामान्य विधानामुळे सिद्धच आहेत. प्रेषण म्हणजे—‘आपल्याद्वारे हे केले जावे’ अशी आज्ञा देणे आणि प्रार्थना करणे. अतिसर्ग म्हणजे ‘माझ्याद्वारे काय केले जावे?’ असे विचारले असता, ‘प्राण्याची हिंसा करू नये’ इत्यादी प्रकारे आचरणाचा मार्ग दाखवून कर्तव्य करण्याची अनुमती देणे. प्राप्तकाल म्हणजे योग्य वेळ येणे. जो कार्य करण्याच्या वेळेचे परीक्षण करून करतो, त्याला वेळेची सूचना देणे, तिथे प्रार्थना नसते. ‘आपल्याद्वारे चटई विणली जावी (कत्तब्बो, करणीयो, कारियो, किच्चो)’ अशा प्रकारे ‘तुझ्याद्वारे चटई विणली जावी, कारण आपल्यासाठी चटई विणण्याची हीच योग्य वेळ आहे.’ එවං උද්ධමුහුත්තෙපි වත්තමානතො පෙසාදීසු සිද්ධා එව. තථා අරහෙ කත්තරි සත්තිවිසිට්ඨෙ ච පතීයමානෙ, ආවස්සකා+ධමීණතාවිසිට්ඨෙ ච භාවාදො සිද්ධා. උද්ධං මුහුත්තතො-භොතා කටො කත්තබ්බො. භොතා රජ්ජං කාතබ්බං, භවං අරහො. භොතා [Pg.269] භාරො වහිතබ්බො, භවං සක්කො. භොතා අවස්සං කටො කත්තබ්බො. භොතා නික්ඛො දාතබ්බො. याचप्रमाणे एका मुहूर्तानंतरच्या काळातही वर्तमानकाळाप्रमाणे प्रेषण इत्यादी अर्थांमध्ये हे सिद्धच आहेत. तसेच कर्ता योग्य (अर्ह) असताना, सामर्थ्य विशिष्ट असताना, आणि आवश्यक किंवा कर्जबाजारीपणा विशिष्ट असताना भाव इत्यादी अर्थांमध्ये हे सिद्ध होतात. एका मुहूर्तानंतर—‘आपल्याद्वारे चटई विणली जावी.’ ‘आपल्याद्वारे राज्य केले जावे, आपण यास योग्य आहात.’ ‘आपल्याद्वारे भार वाहिला जावा, आपण समर्थ आहात.’ ‘आपल्याद्वारे नक्कीच चटई विणली जावी.’ ‘आपल्याद्वारे सोन्याचे नाणे (निक्ख) दिले जावे.’ 33. කත්තරි ල්තු+ණ්කා ३३. ‘कत्तरि ल्तु-ण्का’ (हे सूत्र). කත්තරි කාරකෙ ක්රියත්ථා ල්තු+ණ්කා හොන්ති. කර=කරණෙ, පරරූපෙ ‘‘ල්තු+පිතාදීන+මා සිම්හී’’ති ආ සිලොපො ච. කරොතීති කත්තා. එවං භරතීති භත්තා. හරතීති හත්තා. භිදතීති භෙත්තා, එකාරො, ඌම්හි භෙදිතා. ඡින්දතීති ඡෙත්තා. භොජනස්ස දාතා භොජනදාතා. සන්ධාතීති සන්ධාතා. වචතීති වත්තා. ඔකාරපරරූපෙසු භුඤ්ජතීති භොත්තා. ‘‘පදාදීනං ක්වචී’’ති යුකාගමො, බුජ්ඣතීති බුජ්ඣිතා. ජානාතීති ඤාතා. ඡින්දතීති ඡෙතා. සුණාතීති සොතා. ‘‘ඌ+ලස්සෙ’’ති ඌස්ස එකාරෙ ගණ්හාතීති ගහෙතා. භවතීති භවිතා. සරතීති සරිතා. ‘‘මනානං නිග්ගහීතං’’ති මස්ස නිග්ගහීතෙ වග්ගන්තෙ ච ගච්ඡතීති ගන්තා. නකාරන්තානම්පි නිග්ගහීතං, ඛනතීති ඛන්තා. සනතීති සන්තා. මඤ්ඤතීති මන්තා. පාලෙතීති පාලයිතා පාලෙතා, එත්ථ චුරාදිත්තා ණි. कर्ता कारकामध्ये क्रियावाचक धातूंहून ‘ल्तु’ आणि ‘ण्क’ प्रत्यय होतात. ‘कर’ = करणे या अर्थी, पररूप झाल्यावर ‘ल्तु-पितादीन-मा सिम्ही’ या सूत्राने ‘आ’ कार आणि ‘सि’ चा लोप होतो. जो करतो तो ‘कत्ता’ (कर्ता). याचप्रमाणे जो भरण-पोषण करतो तो ‘भत्ता’ (भर्ता). जो हरण करतो तो ‘हत्ता’ (हर्ता). जो भेद करतो तो ‘भेत्ता’, येथे ‘ए’ कार होतो, ‘उ’ प्रत्यय असताना ‘भेदित्ता’ रूप होते. जो छेद करतो तो ‘छेत्ता’. भोजनाचा दाता तो ‘भोजनदाता’. जो सांधतो तो ‘संधाता’. जो बोलतो तो ‘वत्ता’ (वक्ता). ‘ओ’ कार आणि पररूप झाल्यावर, जो भोजन करतो तो ‘भोत्ता’ (भोक्ता). ‘पदादीनं क्वची’ या सूत्राने ‘यु’ चा आगम होऊन, जो जाणतो तो ‘बुज्झिता’. जो जाणतो तो ‘ञाता’ (ज्ञाता). जो छेद करतो तो ‘छेता’. जो ऐकतो तो ‘सोता’ (श्रोता). ‘ऊ-लस्से’ या सूत्राने ‘उ’ चा ‘ए’ कार झाल्यावर, जो ग्रहण करतो तो ‘गहेता’. जो होतो तो ‘भविता’. जो स्मरण करतो तो ‘सरिता’. ‘मनानं निग्गहीतं’ या सूत्राने ‘म’ चा निग्गहीत (अनुस्वार) आणि वर्गान्त वर्ण झाल्यावर, जो जातो तो ‘गन्ता’. नकारांत धातूंचाही निग्गहीत होतो, जो खणतो तो ‘खन्ता’. जो शब्द करतो तो ‘सन्ता’. जो मानतो तो ‘मन्ता’. जो पालन करतो तो ‘पालयिता’ किंवा ‘पालेता’, येथे चुरादि गणाचा असल्यामुळे ‘णि’ प्रत्यय होतो. ණිණාපීසු-භාවයතීති භාවයිතා භාවෙතා. එවං සාරයිතා සාරෙතා, දාපයිතා දාපෙතා, හාපයිතා හාපෙතා, නිරොධයිතා නිරොධෙතා, බොධයිතා බොධෙතා, ඤාපයිතා ඤාපෙතා, සාවයිතා සාවෙතා, ගාහයිතා ගාහෙතා, කාරයිතා කාරෙතා, කාරාපයිතා කාරාපෙතා ඉච්චාදි. ‘णि’ आणि ‘णापे’ प्रत्यय असताना—जो भावना करतो तो ‘भावयिता’ किंवा ‘भावेता’. याचप्रमाणे ‘सारयिता-सारेता’, ‘दापयिता-दापेता’, ‘हापयिता-हापेता’, ‘निरोधयिता-निरोधेता’, ‘बोधयिता-बोधेता’, ‘ञापयिता-ञापेता’, ‘सावयिता-सावेता’, ‘गाहयिता-गाहेता’, ‘कारयिता-कारेता’, ‘कारापयिता-कारापेता’ इत्यादी रूपे होतात. ණ්කපච්චයෙ-ණකාරො [Pg.270] වුද්ධ්යත්ථො. රථං කරොතීති රථකාරකො, ‘‘අස්සා ණානුබන්ධෙ’’ති ආ අමාදිසමාසො ච. අන්නං දදාතීති අන්නදායකො. ‘‘අධාතුස්ස කා+ස්යාදිතො ඝෙ+ස්සී’’ති ඝෙ පරෙ අස්ස ඉආදෙසො, අන්නදායිකා, අන්නදායකං කුලං. ‘‘ආස්සා+ණාපිම්හි යුක’’ ඉතිණාපිතො+ඤ්ඤත්ර යුක. ලොකං නෙතීති ලොකනායකො, එකාරෙ ‘‘ආයා+වා ණානුබන්ධෙ’’ති ආයාදෙසො. එවං විනෙතීති විනායකො. ‘ण्क’ प्रत्ययामध्ये ‘ण’ कार वृद्धीसाठी आहे. जो रथ बनवतो तो ‘रथकारको’ (रथकार), ‘अस्सा णानुबन्धे’ या सूत्राने ‘आ’ कार आणि अम-आदि समास होतो. जो अन्न देतो तो ‘अnnदायको’ (अन्नदाता). ‘अधातुस्स का-स्यादितो घे-स्सी’ या सूत्राने ‘घ’ प्रत्यय असताना ‘आ’ चा ‘इ’ आदेश होऊन स्त्रीलिंगात ‘अन्नदायिका’ आणि नपुंसकलिंगात ‘अन्नदायकं कुलं’ रूपे होतात. ‘आस्सा-णापिम्हि युक’ या सूत्राने ‘णापि’ प्रत्ययाव्यतिरिक्त ‘यु’ चा आगम होतो. जो लोकांचे नेतृत्व करतो तो ‘लोकनायको’ (लोकनायक), ‘ए’ कार असताना ‘आया-वा णानुबन्धे’ या सूत्राने ‘आय’ आदेश होतो. याचप्रमाणे जो विनय शिकवतो तो ‘विनायको’ (विनायक). අකම්මුපපදෙ-කරොතීති කාරකො, එවං දායකො නායකො, ඔකාරෙ ආවාදෙසෙ සුණාතීති සාවකො. පුරෙ විය ඉකාරෙ සාවිකා. ලුනාතීති ලාවකො. පු=පවනෙ, පුනාතීති පාවකො. භවතීති භාවකො, උපාසතීති උපාසකො. ගණ්හාතීති ගාහකො පාවකො, යාජකො. වධ=හිංසායං, වධෙතීති වධකො, ‘‘අඤ්ඤත්රාපී’’ති වුද්ධිපටිසෙධො. ‘‘හනස්ස ඝාතො ණානුබන්ධෙ’’ති ඝාතාදෙසො, හනතීති ඝාතකො. ‘‘මං වා රුධාදීනං’’ති මං, රුන්ධකො, ගුරුත්තා න වුද්ධි. තථා භුඤ්ජතීති භුඤ්ජකො. ආයස්ස රස්සෙ කිණාතීති කයකො. පාලෙතීති පාලකො. පූජෙතීති පූජකො. कर्म उपपद नसताना—जो करतो तो ‘कारको’ (कारक), याचप्रमाणे ‘दायको’ (दायक), ‘नायको’ (नायक). ‘ओ’ कार असताना ‘आव’ आदेश होऊन, जो ऐकतो तो ‘सावको’ (श्रावक). पूर्वीप्रमाणेच ‘इ’ कार झाल्यावर स्त्रीलिंगात ‘साविका’ (श्राविका) रूप होते. जो कापतो तो ‘लावको’. ‘पु’ = पवित्र करणे या अर्थी, जो पवित्र करतो तो ‘पावको’ (अग्नी). जो होतो तो ‘भावको’, जो उपासना करतो तो ‘उपासको’ (उपासक). जो ग्रहण करतो तो ‘गाहको’, ‘पावको’, जो यज्ञ करतो तो ‘याजको’. ‘वध’ = हिंसा करणे या अर्थी, जो वध करतो तो ‘वधको’, ‘अञ्ञत्रापी’ या सूत्राने वृद्धीचा निषेध होतो. ‘हनस्स घातो णानुबन्धे’ या सूत्राने ‘घात’ आदेश होऊन, जो मारतो तो ‘घातको’ (घातक). ‘मं वा रुधादीनं’ या सूत्राने ‘म’ चा आगम होऊन ‘रुन्धको’ रूप होते, गुरुत्वामुळे वृद्धी होत नाही. तसेच जो भोजन करतो तो ‘भुञ्जको’. ‘आय’ चा र्हस्व झाल्यावर, जो खरेदी करतो तो ‘कयको’. जो पालन करतो तो ‘पालको’ (पालक). जो पूजा करतो तो ‘पूजको’ (पूजक). ඛාදීසු-තිතික්ඛතීති තිතික්ඛකො. වීමංසතීති වීමංසකො ඉච්චාදි. පනුදතීති පනූදකො, ‘‘බ්යඤ්ජනෙ’’ච්චාදිනා දීඝො. ‘‘භීත්වා+නකො’’ති එත්ථ ‘ආනකො’ති යොගවිභාගා ආනකො, ආස්ස රස්සෙ නකාරාගමෙ ච ‘‘ඤාස්ස නෙ ජා’’ති ජාදෙසො, ජානනකො. ණාපිම්හි – खादने इत्यादींमध्ये सहन करतो तो 'तितिक्खको' (सहनशील). विचार करतो तो 'वीमंसको' (परीक्षक) इत्यादी. दूर करतो तो 'पनूदको' (दूर करणारा), 'ब्यञ्जने' इत्यादी सूत्राने दीर्घ होतो. 'भीत्वा+नको' यामध्ये 'आनको' हा योगविभागाने 'आनक' प्रत्यय होतो, 'आ' चा र्हस्व होऊन आणि 'न' काराचा आगम होऊन 'ञास्स ने जा' या सूत्राने 'जा' आदेश होतो, (त्यामुळे) 'जाननको' (जाणणारा) असा शब्द बनतो. 'णापि' प्रत्यय असताना – අණ-ඉති [Pg.271] දණ්ඩකධාතු, ආණාපෙතීති ආණාපකො. තථා සඤ්ඤාපකො, පතිට්ඨාපකො. සං+ප පුබ්බො ආප=පාපුණනෙ, නිබ්බානං සම්පාපෙතීති නිබ්බානසම්පාපකො. කාරාපකො, කාරාපිකා ඉච්චාදි. 'अण' हा दण्डकधातू आहे, आज्ञा देतो तो 'आणापको' (आज्ञा देणारा). त्याचप्रमाणे 'सञ्ञापको' (समजावून सांगणारा), 'पतिट्ठापको' (प्रतिष्ठापित करणारा). 'सं' आणि 'प' उपसर्ग पूर्व असलेला 'आप' (आप = प्राप्त करणे अर्थी) धातू, निर्वाण प्राप्त करून देतो तो 'निब्बानसम्पापको' (निर्वाण प्राप्त करून देणारा). 'कारापको' (करवून घेणारा), 'कारापिका' (करवून घेणारी) इत्यादी. බහුලංවිධානා කම්මෙපි-පාදෙහි හරීයතීති පාදහාරකො. චුප=මන්දගමනෙ, ගලෙ චුප්පතීති ගලචොපකො. 'बहुलं' विधानामुळे कर्म असतानाही - पायांनी नेले जाते ते 'पादहारको'. 'चुप' (मंद गमन अर्थी) धातू, गळ्यात हळूहळू जातो तो 'गलचोपको'. සිද්ධොව ල්තු අරහාදීසු ‘‘භවං ඛලු කඤ්ඤාය පරිග්ගහාරහො’’ති (පරිග්ගහිතා). සීලත්ථෙ-උපාදානසීලොති උපාදාතා. සාධු ගච්ඡතීති ගන්තා. මුණ්ඩනධම්මා මුණ්ඩනාචාරාති මුණ්ඩයිතාරො, එත්ථ ‘‘ධාත්වත්ථෙ නාමස්මී’’ති ඉම්හි ඌආගමෙ එ+අයාදෙසෙ මුණ්ඩයිතුසද්දම්හි ආරඞාදෙසෙ ච කතෙ යොස්ස ටො. 'अरह' इत्यादींमध्ये 'तु' (ल्तु) प्रत्यय सिद्धच आहे, जसे 'भवं खलु कञ्ञाय परिग्गहारहो' (परिग्गहिता - स्वीकारणारा). शील (स्वभाव) अर्थी - उपादान (ग्रहण) करण्याचा स्वभाव असलेला तो 'उपादाता'. चांगल्या प्रकारे जातो तो 'गन्ता'. मुंडण करण्याचा स्वभाव किंवा आचार असलेले ते 'मुण्डयितारो' (मुंडण करणारे); येथे 'धात्वत्थे नामस्मी' या सूत्राने 'ऊ' आगम, 'ए' चा 'अय' आदेश होऊन 'मुण्डयितु' शब्दात 'आरङ्' आदेश केल्यावर 'य' चा 'ट' होतो. 34. ආවී ३४. आवी ක්රියත්ථා ආවී හොති බහුලං කත්තරි. ‘‘දිසස්ස පස්ස+දස්ස=දස+ද+දක්ඛා’’ති දස්සාදෙසො, භයං පස්සතීති භයදස්සාවී. නීම්හි භයදස්සාවිනී. භයදස්සාවි චිත්තං. අප්පවිසයතාඤාපනත්ථං භින්නයොගකරණං. සාමඤ්ඤවිහිතත්තා සීලාදීසු ච හොතෙව. क्रियावाचक धातूंहून कर्ता अर्थी 'आवी' प्रत्यय बहुधा होतो. 'दिसस्स पस्स+दस्स=दस+द+दक्खा' या सूत्राने 'दस्स' आदेश होतो, भय पाहतो तो 'भयदस्सावी' (भय पाहणारा). 'नी' (स्त्रीलिंगी) प्रत्यय असताना 'भयदस्साविनी'. (नपुंसकलिंगात) 'भयदस्सावि चित्तं'. अल्पविषयत्व दर्शवण्यासाठी भिन्नयोग (सूत्राचे विभाजन) केले आहे. सामान्य विधान असल्यामुळे शील इत्यादी अर्थांमध्येही हा होतोच. 35. ආසිංසාය+මකො ३५. आसिंसायं + मको ආසිංසායං ගම්මමානායං ක්රියත්ථා අකො හොති කත්තරි. ජීව=පාණධාරණෙ, ජීවතූති ජීවකො. නන්ද=සමිද්ධියං, නන්දතූති නන්දකො. භවතූති භවකො. आकांक्षा (इच्छा) प्रतीत होत असताना क्रियावाचक धातूंहून कर्ता अर्थी 'अको' प्रत्यय होतो. 'जीव' (प्राणधारण अर्थी) धातू, तो जगो म्हणून 'जीवको'. 'नन्द' (समृद्धी अर्थी) धातू, तो आनंदी राहो म्हणून 'नन्दको'. तो होवो म्हणून 'भवको'. 36. කරා ණනො ३६. कर धातूहून णन प्रत्यय होतो කරතො [Pg.272] කත්තරි ණ නො හොති. කරොතීති කාරණං. කත්තරීති කිං, කරොති අනෙනාති කරණං. 'कर' धातूहून कर्ता अर्थी 'णन' प्रत्यय होतो. करतो तो 'कारणं'. 'कर्ता अर्थी' असे का म्हटले? ज्याच्याद्वारे केले जाते ते 'करणं' (साधन). 37. හාතො වීහි+කාලෙසු ३७. हा धातूहून व्रीही (धान्य) आणि काळ अर्थी णन प्रत्यय होतो හාතො වීහිස්මිං කාලෙ ච ණනො හොති. ‘‘ආස්සා’’ත්යාදිනා යුක, ජහන්ති උදකංති හායනා වීහයො. ජහාති භාවෙ පදත්ථෙති හායනො සංවච්ඡරො. වීහිකාලෙසූති කිං, ජහාතීති හාතා. 'हा' धातूहून व्रीही (धान्य) आणि काळ अर्थी 'णन' प्रत्यय होतो. 'आस्सा' इत्यादी सूत्राने 'युक्' आगम होऊन, जे पाणी सोडतात ते 'हायना' (हायण नावाचे) व्रीही (धान्य). जो पदार्थांना मागे टाकतो तो 'हायनो' (वर्ष/संवत्सर). 'व्रीही आणि काळ अर्थी' असे का म्हटले? जो सोडतो तो 'हाता'. 38. විදා කූ ३८. विद धातूहून कू प्रत्यय होतो විදස්මා කූ හොති කත්තරි. කකාරො ‘‘කූතො’’ති විසෙසනත්ථො. විදතීති විදූ, ලොකවිදූ. 'विद' धातूहून कर्ता अर्थी 'कू' प्रत्यय होतो. 'क' कार हा 'कूतो' या सूत्राने विशेष अर्थासाठी आहे. जाणतो तो 'विदू' (जाणकार), जसे 'लोकविदू' (लोकवेत्ता). 39. විතො ඤාතො ३९. वि पूर्व असलेल्या ञा धातूहून कू प्रत्यय होतो විපුබ්බා ඤාඉච්ච+ස්මා කූ හොති කත්තරි. විජානාතීති විඤ්ඤූ. 'वि' पूर्व असलेल्या 'ञा' धातूहून कर्ता अर्थी 'कू' प्रत्यय होतो. विशेष रूपाने जाणतो तो 'विञ्ञू' (विज्ञ/बुद्धिमान). 40. කම්මා ४०. कर्म उपपद असताना කම්මතො පරා ඤාඉච්ච+ස්මා කූ හොති කත්තරි. සබ්බං ජානාතීති සබ්බඤ්ඤූ. එවං මත්තඤ්ඤූ, ධම්මඤ්ඤූ, අත්ථඤ්ඤූ කාලඤ්ඤූ, කතඤ්ඤූ ඉච්චාදි. (භික්ඛූති පන ‘‘භරාදි’’ ණ්වාදිසුත්තෙන සිද්ධං). कर्म उपपदाच्या पुढे असलेल्या 'ञा' धातूहून कर्ता अर्थी 'कू' प्रत्यय होतो. सर्व काही जाणतो तो 'सब्बञ्ञू' (सर्वज्ञ). याचप्रमाणे 'मत्तञ्ञू' (प्रमाण जाणणारा), 'धम्मञ्ञू' (धम्म जाणणारा), 'अत्थञ्ञू' (अर्थ जाणणारा), 'कालञ्ञू' (काळ जाणणारा), 'कतञ्ञू' (कृतज्ञ) इत्यादी. ('भिक्खू' हा शब्द तर 'भरादि' उणादि सूत्राने सिद्ध होतो.) 41. ක්වචණ ४१. कधीकधी अण प्रत्यय होतो කම්මතො පරා ක්රියත්ථා ක්වචි අණ හොති කත්තරි. කුම්භං කරොතීති කුම්භකාරො, අමාදිසමාසො. ඉත්ථියං කුම්භකාරී. එවං කම්මකාරො, මාසාකාරො, කට්ඨකාරො, රථකාරො සුවණ්ණකාරො[Pg.273], සුත්තකාරො, වුත්තිකාරො, ටීකාකාරො. සරං ලුනාතීති සරලාවොති ඔ+අවාදෙසා. මන්තෙ අජ්ඣායතීති මන්ථජ්ඣායො, ඉ=අජ්ඣෙනගතීසු, අධිපුබ්බො, එ+අයාදෙසා, අධිනො ඉස්ස යකාර+චවග්ගාදයො ච. कर्म उपपदाच्या पुढे असलेल्या क्रियावाचक धातूहून कधीकधी कर्ता अर्थी 'अण' प्रत्यय होतो. कुंभ (घडा) बनवतो तो 'कुम्भकारो' (कुंभार), हा द्वितीया तत्पुरुष समास आहे. स्त्रीलिंगात 'कुम्भकारी'. याचप्रमाणे 'कम्मकारो' (काम करणारा), 'मासाकारो' (उडीद पिकवणारा), 'कट्ठकारो' (सुतार), 'रथकारो' (रथ बनवणारा), 'सुवण्णकारो' (सोनार), 'सुत्तकारो' (सूत्रकार), 'वुत्तिकारो' (वृत्तिकार), 'टीकाकारो' (टीकाकार). लव्हाळा कापतो तो 'सरलावो', येथे 'ओ' चा 'अव' आदेश होतो. मंत्रांचे अध्ययन करतो तो 'मन्थज्झायो'; येथे 'इ' (अध्ययन व गमन अर्थी) धातू 'अधि' पूर्व असलेला आहे, 'ए' चा 'अय' आदेश आणि 'अधि' मधील 'इ' चा यकार व चवर्ग इत्यादी आदेश होतात. බහුලාධිකාරා ඉහ න හොති ‘‘ආදිච්චං පස්සති, හිමවන්තං සුණොති, ගාමං ගච්ඡති’’. ක්වචීති කිං, කම්මකරො, එත්ථ අපච්චයො. 'बहुलं' च्या अधिकारामुळे येथे (अण प्रत्यय) होत नाही - 'आदिच्चं पस्सति' (सूर्याला पाहतो), 'हिमवन्तं सुणोति' (हिमालयाविषयी ऐकतो), 'गामं गच्छति' (गावाला जातो). 'क्वचि' असे का म्हटले? 'कम्मकरो' (काम करणारा), येथे 'अ' प्रत्यय होतो. 42. ගමා රූ ४२. गम धातूहून रू प्रत्यय होतो කම්මතො පරා ගමා රූ හොති කත්තරි. රානුබන්ධත්තා අමභාගලොපො. වෙදං ගච්ඡතීති වෙදගූ, එවං පාරගූ. कर्म उपपदाच्या पुढे असलेल्या 'गम' धातूहून कर्ता अर्थी 'रू' प्रत्यय होतो. 'र' कार अनुबंध असल्यामुळे 'अम' भागाचा लोप होतो. वेदाला (ज्ञानाला) प्राप्त करतो तो 'वेदगू' (ज्ञानवान), याचप्रमाणे 'पारगू' (पारंगत). සාමඤ්ඤවිධානතො සීලාදීසුපි හොති. භවපාරං ගච්ඡති සීලෙනාති භවපාරගූ. අන්තගමනසීලො අන්තගූ, එවං අද්ධගූ. सामान्य विधान असल्यामुळे शील (स्वभाव) इत्यादी अर्थांमध्येही हा प्रत्यय होतो. स्वभावाने भवाच्या पार जातो तो 'भवपारगू'. अंताप्रत जाण्याचा स्वभाव असलेला तो 'अन्तगू', याचप्रमाणे 'अद्धगू' (प्रवासी). 43. සමාන+ඤ්ඤ+භවන්ත+යාදිතූ+පමානා දිසා කම්මෙ රී+රික්ඛ+කා ४३. समान, अञ्ञ, भवन्त, यादि इत्यादी उपमानवाचक शब्दांच्या पुढे असलेल्या 'दिस' धातूहून कर्म कारकात 'री', 'रिक्ख' आणि 'क' प्रत्यय होतात සමානාදීහි යාදීහි චො+පමානෙහි පරා දිසා කම්මකාරකෙ රී+රික්ඛ+කා හොන්ති. ‘‘ස්යාදි ස්යාදිනෙ+කත්ථං’’ති සමාසෙ ‘‘රානුබන්ධෙ+න්තසරාදිස්සා’’ති දිසස්ස ඉසභාගලොපෙ ‘‘රීරික්ඛකෙසූ’’ති සමානස්ස සාදෙසෙ ච සමානො විය දිස්සතීති සදී, සදික්ඛො. කෙ – ‘‘න තෙ කානුබන්ධනාගමෙසූ’’ති එත්තාභාවො, සදිසො. 'समान' इत्यादी आणि 'यादि' इत्यादी उपमानवाचक शब्दांच्या पुढे असलेल्या 'दिस' धातूहून कर्म कारकात 'री', 'रिक्ख' आणि 'क' प्रत्यय होतात. 'स्यादि स्यादिने कत्थं' या सूत्राने समास झाल्यावर, 'रानुबन्धेन्तसरादिस्सा' या सूत्राने 'दिस' च्या 'इस' भागाचा लोप झाल्यावर आणि 'रीरिक्खकेसू' या सूत्राने 'समान' चा 'स' आदेश झाल्यावर, 'समानासारखा दिसतो तो' या अर्थी 'सदी', 'सदिक्खो' हे शब्द बनतात. 'क' प्रत्यय असताना - 'न ते कानुबन्धन आगमेसू' या सूत्राने 'ए'त्वाचा अभाव होतो, (त्यामुळे) 'सदिसो' असा शब्द बनतो. 125. සමානා රො රී+රික්ඛ+කෙසු १२५. री, रिक्ख आणि क प्रत्यय असताना समान शब्दाच्या पुढे असलेल्या दिस च्या जागी विकल्प करून र आदेश होतो සමානසද්දතො [Pg.274] පරස්ස දිසස්ස ර හොති වා රී+රික්ඛ+කෙසූති පක්ඛෙ දස්ස රාදෙසෙ සරී, සරික්ඛො, සරිසො. 'समान' शब्दाच्या पुढे असलेल्या 'दिस' च्या जागी 'री', 'रिक्ख' आणि 'क' प्रत्यय असताना विकल्प करून 'र' होतो; पक्षामध्ये 'द' चा 'र' आदेश झाल्यावर 'सरी', 'सरिक्खो', 'सरिसो' हे शब्द बनतात. 3,86. සබ්බාදීන+මා ३,८६. सब्ब इत्यादी शब्दांना आ होतो රී+රික්ඛ+කෙසු සබ්බාදීන+මා හොති. අඤ්ඤො විය දිස්සතීති අඤ්ඤාදී, අඤ්ඤාදික්ඛො, අඤ්ඤාදිසො. 'री', 'रिक्ख' आणि 'क' प्रत्यय असताना 'सब्ब' इत्यादी शब्दांच्या शेवटी 'आ' होतो. दुसऱ्यासारखा दिसतो तो 'अञ्ञादी', 'अञ्ञादिक्खो', 'अञ्ञादिसो'. 3,87. න්ත+කි+මි+මානං ටා+කී+ටී ३,८७. न्त, किं आणि इम शब्दांच्या जागी अनुक्रमे टा, की आणि टी आदेश होतात රී+රික්ඛ+කෙසු න්ත+කිං+ඉමසද්දානං ටා+කී+ටී හොන්ති යථාක්කමං. ටකාරා සබ්බාදෙසත්ථා. භවාදී භවාදික්ඛො භවාදිසො, කීදී කීදික්ඛො කීදිසො, අයමිව දිස්සතීති ඊදී ඊදික්ඛො ඊදිසො. ආකාරෙ යාදී යාදික්ඛො යාදිසො, ත්යාදී ත්යාදික්ඛො ත්යාදිසො ඉච්චාදි. 'री', 'रिक्ख' आणि 'क' प्रत्यय असताना 'न्त', 'किं' आणि 'इम' शब्दांच्या जागी अनुक्रमे 'टा', 'की' आणि 'टी' आदेश होतात. 'ट' कार हा सर्वादेशासाठी आहे. 'भवादी', 'भवादिक्खो', 'भवादिसो'; 'कीदी', 'कीदिक्खो', 'कीदिसो'; याच्यासारखा दिसतो तो 'इदी', 'इदिक्खो', 'इदिसो'. आकार असताना 'यादी', 'यादिक्खो', 'यादिसो', 'त्यादी', 'त्यादिक्खो', 'त्यादिसो' इत्यादी. 3,88. තුම්හාම්හානං තාමෙ+කස්මිං ३,८८. एकवचनात तुम्ह आणि अम्ह शब्दांच्या जागी अनुक्रमे ता आणि मा आदेश होतात රී+රික්ඛ+කෙසු තුම්හාම්හානං තාමා හොන්තෙ+කස්මිං යථාක්කමං. ත්වං විය දිස්සති, අයං විය දිස්සතීති තාදී මාදී ඉච්චාදි. එකස්මින්ති කිං, තුම්හාදිසො අම්හාදිසො. 'री', 'रिक्ख' आणि 'क' प्रत्यय असताना एकवचनात 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' शब्दांच्या जागी अनुक्रमे 'ता' आणि 'मा' आदेश होतात. तुझ्यासारखा दिसतो तो 'तादी', माझ्यासारखा दिसतो तो 'मादी' इत्यादी. 'एकवचनात' असे का म्हटले? 'तुम्हादिसो', 'अम्हादिसो'. 3,89. තං+ම+මඤ්ඤත්ර ३,८९. इतरत्र एकवचनात तुम्ह आणि अम्ह च्या जागी अनुक्रमे तं आणि मं आदेश होतात රීරික්ඛකන්තතො+ඤ්ඤස්මිං උත්තරපදෙ තුම්හාම්හාන+මෙකස්මිං තං+මං හොන්ති යථාක්කමං. ත්වං දීපො එසං, අහං දීපො එසංති අඤ්ඤපදත්ථෙ තංදීපා මංදීපා. ත්වං සරණ+මෙසං, අහං සරණ+ මෙසන්ති [Pg.275] තංසරණා මංසරණා. තයා යොගො තය්යොගො, මයා යොගො මය්යොගොති අමාදිසමාසෙ නිග්ගහීතලොපො. 'री', 'रिक्ख' आणि 'क' हून भिन्न उत्तरपद असताना एकवचनात 'तुम्ह' आणि 'अम्ह' च्या जागी अनुक्रमे 'तं' आणि 'मं' आदेश होतात. 'तू त्यांचा दीप आहेस', 'मी त्यांचा दीप आहे' अशा अन्यपदार्थाच्या अर्थी 'तंदीपा', 'मंदीपा' हे शब्द बनतात. 'तू त्यांचे शरण आहेस', 'मी त्यांचे शरण आहे' या अर्थी 'तंसरणा', 'मंसरणा'. 'तुझ्याशी योग' = 'तय्योगो', 'माझ्याशी योग' = 'मय्योगो', अशा द्वितीया इत्यादी समासात निग्गहीताचा (अनुस्वाराचा) लोप होतो. 3,90. වෙ+තස්සෙ+ට ३,९०. री, रिक्ख आणि क प्रत्यय असताना एतस् शब्दाच्या जागी विकल्प करून एत किंवा ए आदेश होतो රී+රික්ඛ+කෙසු එතස්ස එට වා හොති. එදී එතාදී, එදික්ඛො එතාදික්ඛො, එදිසො එතාදිසො. 'री', 'रिक्ख' आणि 'क' प्रत्यय असताना 'एतस्' शब्दाच्या जागी विकल्प करून 'एत' किंवा 'ए' होतो. 'एदी', 'एतादी'; 'एदिक्खो', 'एतादिक्खो'; 'एदिसो', 'एतादिसो'. 44. භාවකාරකෙ ස්ව+ඝණ ඝ කා ४४. भाव आणि कारक अर्थी अ, घण, घ आणि क प्रत्यय होतात භාවෙ කාරකෙ ච ක්රියත්ථා අ ඝණ ඝ කා හොන්ති බහුලං. भाव आणि कारक अर्थी क्रियावाचक धातूंहून 'अ', 'घण', 'घ' आणि 'क' प्रत्यय बहुधा होतात. අපච්චයො-පග්ගණ්හනං පග්ගහො, එවං නිග්ගහො, ධම්මං ධාරෙතීති ධම්මධරො, එවං විනයධරො. තථා තං කරොතීති තක්කරො, ද්විත්තං. එවං හිතකරො, දිවසකරො, දිනකරො, දිවාකරො, නිසාකරො, ධනුං ගණ්හීති ධනුග්ගහො. එවං කවචග්ගහො. දද=දානෙ, සබ්බකාමං දදාතීති සබ්බකාමදදො, සබ්බදදො. ආතො ‘‘පරොක්ඛායඤ්චා’’ති චග්ගහණෙන ද්විත්තෙ ‘‘රස්සො පුබ්බස්සා’’ති රස්සෙ ච අන්නං දදාතීති අන්නදදො, එවං ධනදො. සංපුබ්බො ධා=ධාරණෙ, සබ්බං සන්ධහතීති සබ්බසන්ධො. නී=පාපනෙ, විපුබ්බො, විනෙසි විනෙති විනෙස්සති එතෙන එත්ථාති වා විනයො, එ+අයාදෙසා. නයනං නයො. සි=සෙවායං, නිපුබ්බො, නිස්සීයතීති නිස්සයො. සි=සයෙ, අනුසයි අනුසෙති අනුසෙස්සතීති අනුසයො. ඉ=ගතිම්හි, පතිපුබ්බො, පටිච්ච එතස්මා ඵල+මෙතීති පච්චයො. සං+උපුබ්බො, දාගමෙ සමුදයො[Pg.276]. චි=චයෙ, විනිච්ඡයතෙ+නෙන විනිච්ඡයනං වා විනිච්ඡයො, ‘‘නිතො චිස්ස ඡො’’ති චිස්ස ඡො. උච්චයනං උච්චයො, සංචයො. ඛි=ඛයෙ, ඛයනං ඛයො. ජි=ජයෙ, විජයනං විජයො, ජයො. කී=දබ්බවිනීමයෙ, වික්කයනං වික්කයො, කයො. ලී=සිලෙසනෙ, අල්ලීයන්ති එත්ථාති ආලයො, ලයො. (ඉවණ්ණන්තා). ‘अ’ प्रत्यय लागून: प्रग्रहण (स्वीकारणे/उत्साहित करणे) म्हणजे ‘पग्गह’, याचप्रमाणे ‘निग्गह’. जो धम्माचे धारण करतो तो ‘धम्मधरो’, याचप्रमाणे ‘विनयधरो’. तसेच, ते करतो तो ‘तक्करो’ (तत्कर), येथे द्वित्व होते. याचप्रमाणे ‘हितकरो’, ‘दिवसकरो’, ‘दिनकरो’, ‘दिवाकरो’, ‘निशाकरो’. जो धनुष्य ग्रहण करतो तो ‘धनुग्गहो’. याचप्रमाणे ‘कवचग्गहो’. ‘दद’ धातू दानाच्या अर्थात; सर्व कामना देतो तो ‘सब्बकामददो’, सर्व काही देतो तो ‘सब्बददो’. ‘आ’ काराच्या जागी “परोक्खायञ्च” या सूत्रातील ‘च’ च्या ग्रहणाने द्वित्व झाल्यावर “रस्सो पुब्बस्स” या सूत्राने रस्व होऊन, अन्न देतो तो ‘अन्नददो’, याचप्रमाणे ‘धनदो’. ‘सं’ पूर्व ‘धा’ धातू धारण करण्याच्या अर्थात; सर्व सांधतो (एकत्र करतो) तो ‘सब्बसंधो’. ‘नी’ धातू नेण्याच्या (प्रापण) अर्थात, ‘वि’ पूर्व; ज्याच्याद्वारे किंवा ज्याच्यामध्ये विनय केला गेला, केला जातो किंवा केला जाईल तो ‘विनयो’, येथे ‘ए’ चा ‘अय’ आदेश होतो. नेणे म्हणजे ‘नयो’. ‘सि’ धातू सेवेच्या अर्थात, ‘नि’ पूर्व; ज्याचा आश्रय घेतला जातो तो ‘निस्सयो’. ‘सि’ (शी) धातू शयन करण्याच्या अर्थात; जो अनुशयन करतो, अनुशीत होतो किंवा अनुशीत होईल तो ‘अनुसयो’. ‘इ’ धातू गतीच्या अर्थात, ‘पति’ (प्रति) पूर्व; ज्याच्यावर अवलंबून राहून फळ प्राप्त होते तो ‘पच्चयो’. ‘सं’ आणि ‘उ’ पूर्व, ‘द’ चा आगम होऊन ‘समुदयो’. ‘चि’ धातू गोळा करण्याच्या (चयन) अर्थात; ज्याच्याद्वारे निश्चित केले जाते ते निश्चित करणे म्हणजे ‘विनिच्छयो’, “नितो चिस्स छो” या सूत्राने ‘चि’ च्या जागी ‘छ’ होतो. उच्चयन (एकत्र करणे) म्हणजे ‘उच्चयो’, ‘संचयो’. ‘खि’ (क्षि) धातू क्षयाच्या अर्थात; क्षय होणे म्हणजे ‘खयो’. ‘जि’ धातू विजयाच्या अर्थात; विजय मिळवणे म्हणजे ‘विजयो’, ‘जयो’. ‘क्री’ धातू वस्तूंच्या विनिमयाच्या (खरेदी-विक्रीच्या) अर्थात; विक्री करणे म्हणजे ‘विक्कयो’, खरेदी करणे म्हणजे ‘कयो’. ‘ली’ धातू चिकटण्याच्या (श्लेषण) अर्थात; ज्याच्यामध्ये लीन होतात (आश्रय घेतात) तो ‘आलयो’, ‘लयो’. (हे इ-वर्णान्त धातू आहेत). ආසුණන්තීති අස්සවා, ආස්ස රස්සො. පටිස්සවනං පටිස්සවො. සු=පස්සවනෙ, ආභවග්ගා සවන්තීති ආසවා. රු=සද්දො රවතීති රවො. භවතීති භවො. පභවති එතස්මාති පභවො. ලූ=ඡෙදනෙ, ලවනං ලවො. (උවණ්ණන්තා). जे ऐकतात ते ‘अस्सवा’ (आज्ञाधारक), येथे ‘आ’ चा रस्व होतो. प्रतिश्रवण (स्वीकारणे/प्रतिज्ञा करणे) म्हणजे ‘पटिस्सवो’. ‘सु’ (स्रु) धातू वाहण्याच्या (प्रस्रवण) अर्थात; भवाग्र (अस्तित्वाच्या शिखरा) पर्यंत जे वाहतात ते ‘आसवा’. ‘रु’ धातू शब्दाच्या अर्थात; जो आवाज करतो तो ‘रवो’. जो अस्तित्वात येतो तो ‘भवो’. ज्याच्यापासून उत्पन्न होतो तो ‘पभवो’. ‘लू’ धातू छेदण्याच्या (कापण्याच्या) अर्थात; कापणे म्हणजे ‘लवो’. (हे उ-वर्णान्त धातू आहेत). චර=චරණෙ, සංචරණං සංචරො. දර=විදාරණෙ, ආදරනං ආදරො. ආගච්ඡති ආගමනංති වා ආගමො. සප්ප=ගමනෙ, සප්පතීති සප්පො. දිබ්බතීති දෙවො. පක්කමනං පක්කමතීති වා පක්කමො, එවං වික්කමො. චර=චරණෙ, වනං චරතීති වනචරො. කාමො අවචරති එත්ථාති කාමාවචරො ලොකො, කාමාවචරා පඤ්ඤා, කාමාවචරං චිත්තං. ගාවො චරන්ති එත්ථාති ගොචරො. පාදෙන පිවතීති පාදපො. එවං කච්ඡපො. සිරස්මිං රුහතීති සිරොරුහො, මනාදිත්තා ඔ. ගුහායං සයතීති ගුහාසයං චිත්තං, එවං කුච්ඡිසයා වාතා. පබ්බතෙ තිට්ඨතීති පබ්බතට්ඨො පුරිසො, පබ්බතට්ඨා නදී, පබ්බතට්ඨං භස්මං. එවං ථලට්ඨං ජලට්ඨං. ‘चर’ धातू चालण्याच्या (चरण) अर्थात; संचरण करणे म्हणजे ‘संचरो’. ‘दर’ (दृ) धातू फाडण्याच्या (विदारण) अर्थात; आदर करणे म्हणजे ‘आदरो’. जो येतो किंवा येणे म्हणजे ‘आगमो’. ‘सप्प’ (सृप्) धातू गतीच्या (सरपटण्याच्या) अर्थात; जो सरपटतो तो ‘सप्पो’. जो क्रीडा करतो/चमकतो तो ‘देवो’. प्रस्थान करणे किंवा जो प्रस्थान करतो तो ‘पक्कमो’, याचप्रमाणे ‘विक्कमो’. ‘चर’ धातू फिरण्याच्या अर्थात; वनात फिरतो तो ‘वनचरो’. काम ज्याच्यामध्ये संचार करतो तो ‘कामावचरो लोको’ (कामावचर लोक), ‘कामावचरा पञ्ञा’ (कामावचर प्रज्ञा), ‘कामावचरं चित्तं’ (कामावचर चित्त). गाई जेथे चरतात तो ‘गोचरो’. जो पायाने (मुळांनी) पितो तो ‘पादपो’. याचप्रमाणे ‘कच्छपो’. डोक्यावर उगवतो तो ‘सिरोरुहो’ (केस), ‘मनादि’ गणातील असल्यामुळे ‘ओ’ होतो. गुहेत (हृदयगुहेत) शयन करते (राहते) ते ‘गुहासयं चित्तं’ (गुहाशय चित्त), याचप्रमाणे ‘कुच्छिसया वाता’ (पोटात राहणारे वायू). पर्वतावर उभा राहतो तो ‘पब्बतट्ठो पुरिसो’ (पर्वतस्थ पुरुष), पर्वतावर असणारी ‘पब्बतट्ठा नदी’ (पर्वतस्था नदी), पर्वतावर असणारी ‘पब्बतट्ठं भस्मं’ (पर्वतस्थ भस्म). याचप्रमाणे ‘थलट्ठं’ (स्थलस्थ), ‘जलट्ठं’ (जलस्थ). කිච්ඡත්ථෙ දුම්හි අකිච්ඡත්ථෙ සු+ඊසං+සුඛ උපපදෙසු-දුක්ඛෙන කරීයති කරණං වා දුක්කරං. එවං දුස්සයො, දුක්ඛෙන භරීයතීති දුබ්භරො මහිච්ඡො. එවං දුරක්ඛං චිත්තං, දුද්දසො ධම්මො, දුරනුබොධො ධම්මො. ඊසං සයතීති ඊසංසයො, එවං [Pg.277] සුඛසයො. ඊසං කරීයතීති ඊසක්කරං කම්මං. සුඛෙන කරීයතීති සුකරං පාපං බාලෙන. එවං සුභරො අප්පිච්ඡො, සුදස්සං පරවජ්ජං, සුබොධ+මිච්චාදි. සබ්බත්ථ පාදිඅමාදිසමාසා. कष्टाच्या अर्थात ‘दु’ उपपद असताना आणि अकष्टाच्या (सहजतेच्या) अर्थात ‘सु’, ‘ईसं’ (ईषत्) व ‘सुख’ हे उपपदे असताना - कष्टाने केले जाते किंवा कष्टाने करणे म्हणजे ‘दुक्करं’. याचप्रमाणे ‘दुस्सयो’ (कष्टाने आश्रय घेण्याजोगा); कष्टाने भरण-पोषण केले जाते तो ‘दुब्भरो’, जसे की ‘महिच्छो’ (अतिलोभी मनुष्य). याचप्रमाणे ‘दुरक्खं चित्तं’ (कठिनतेने रक्षण करण्याजोगे चित्त), ‘दुद्दसो धम्मो’ (कठिनतेने दिसणारा धर्म), ‘दुरनुबोधो धम्मो’ (कठिनतेने समजणारा धर्म). थोडे शयन करतो तो ‘ईसंसयो’, याचप्रमाणे ‘सुखसयो’. थोडे केले जाते ते ‘ईसक्करं कम्मं’. सुखाने (सहजतेने) केले जाते ते ‘सुकरं’; जसे मूर्खाकडून ‘सुकरं पापं’ (सहजतेने होणारे पाप). याचप्रमाणे ‘सुभरो अप्पिच्छो’ (सहजतेने भरण-पोषण होणारा अल्पेच्छ मनुष्य), ‘सुदस्सं परवज्जं’ (सहजतेने दिसणारा दुसऱ्याचा दोष), ‘सुबोधं’ इत्यादी. सर्व ठिकाणी ‘प्रादि’ इत्यादी समास होतात. ඝණ-භවතීති භාවො, ඔ+ආවාදෙසා. අය=ඉති දණ්ඩකධාතු, අයති ඉතොති ආයො, ආහරතීති ආහාරො. උපහනතීති උපඝාතො, ‘‘හනස්ස ඝාතො ණානුබන්ධෙ’’ති ඝාතාදෙසො. රඤ්ජතීති රාගො, ‘‘කගා චජානං ඝානුබන්ධෙ’’ති ජස්ස ගො. රඤ්ජන්ති අනෙනාති රාගො. ‘‘අස්සා ණානුබන්ධෙ’’ති ආ, පජ්ජතෙ+නෙනාති පාදො. තුද=බ්යථනෙ, පතුජ්ජතෙ+නෙනාති පතොදො. ජරීයති අනෙනාති ජාරො, එවං දාරො. භජීයතීති භාගො. එවං භාරො. ලබ්භතීති ලාභො. වි+ඔපුබ්බො, වොහරීයතීති වොහාරො. දිය්යතීති දායො, යුක. විහඤ්ඤති එතස්මාති විඝාතො. විහරන්ති එත්ථාති විහාරො. ආරමන්ති එතස්මින්ති ආරාමො. පචනං වා පාකො, චස්ස කො. චජනං චාගො. යජනං යාගො. රජනං රාගො. ‘घण’ प्रत्यय लागून: जो अस्तित्वात येतो तो ‘भावो’, येथे ‘ओ’ चा ‘आव’ आदेश होतो. ‘अय’ हा दण्डक धातू आहे; जो गमन करतो तो ‘आयो’ (आय/उत्पन्न), जो आणतो तो ‘आहारो’. जो उपघात करतो तो ‘उपघातो’, “हनस्स घातो णानुबन्धे” या सूत्राने ‘हन्’ च्या जागी ‘घात’ आदेश होतो. जो अनुरक्त होतो तो ‘रागो’, “कगा चजानं घानुबन्धे” या सूत्राने ‘ज’ च्या जागी ‘ग’ होतो; ज्याच्याद्वारे अनुरक्त होतात तो ‘रागो’. “अस्सा णानुबन्धे” या सूत्राने ‘अ’ चा ‘आ’ होतो; ज्याच्याद्वारे चालले जाते तो ‘पादो’ (पाय). ‘तुद’ धातू पीडा देण्याच्या (व्यथन) अर्थात; ज्याच्याद्वारे टोचले जाते तो ‘पतोदो’ (चाबूक). ज्याच्याद्वारे जीर्ण केले जाते तो ‘जारो’ (व्यभिचारी), याचप्रमाणे ‘दारो’ (पत्नी). जे विभागले जाते तो ‘भागो’, याचप्रमाणे ‘भारो’. जे प्राप्त केले जाते तो ‘लाभो’. ‘वि’ आणि ‘अव’ पूर्व; ज्याचा व्यवहार केला जातो तो ‘वोहारो’ (व्यवहार). जे दिले जाते तो ‘दायो’, येथे ‘यु’ चा आगम होतो. ज्याच्यापासून विनाश होतो तो ‘विघातो’. जेथे विहार करतात तो ‘विहारो’. ज्याच्यामध्ये रममाण होतात तो ‘आरामो’ (बाग). शिजवणे म्हणजे ‘पाको’, येथे ‘च’ च्या जागी ‘क’ होतो. त्याग करणे म्हणजे ‘चागो’. यज्ञ करणे म्हणजे ‘यागो’. रंगवणे म्हणजे ‘रागो’. 127. අන+ඝණස්වා+පරීහි ළො १२७. ‘अन’ आणि ‘घण’ प्रत्यय परे असताना, ‘आ’ आणि ‘परि’ यांच्यानंतर ‘ळ’ होतो. ආ+පරීහි පරස්ස දහස්ස ළො හොත+න+ඝණසු. පරිදහනං පරිළාහො. එවං දාහො. භඤ්ජනං සඞ්ගො. එවං සඞ්ගො. සංඛරනං සංඛාරො, ‘‘කරොතිස්ස ඛො’’ති කස්ස ඛො. එවං පරික්ඛාරො. ‘‘පුරස්මා’’ති කරස්ස ඛො, පුරෙක්ඛාරො, එත්තං තදමිනාදිපාඨා. එවං උපකාරො, ගාහො. ‘आ’ आणि ‘परि’ यांच्यानंतर येणाऱ्या ‘दह’ धातूच्या जागी ‘अन’ आणि ‘घण’ प्रत्यय परे असताना ‘ळ’ होतो. परिदहन (सर्व बाजूंनी जळणे) म्हणजे ‘परिळाहो’. याचप्रमाणे ‘दाहो’. भंजन म्हणजे ‘संगो’, याचप्रमाणे ‘संगो’. संस्कार करणे म्हणजे ‘संखारो’, “करोतिस्स खो” या सूत्राने ‘क’ च्या जागी ‘ख’ होतो. याचप्रमाणे ‘परिक्खारो’. “पुरस्मा” या सूत्राने ‘कर’ च्या जागी ‘ख’ होऊन ‘पुरेक्खारो’ (आदर) होतो, येथे ‘ए’ कार “तदमिनादि” पाठाने होतो. याचप्रमाणे ‘उपकारो’, ‘गाहो’. ඝ-වචතීති [Pg.278] වකො. සිච=පග්ඝරණෙ, සෙචනං සෙකො. එවං සොකො, එඔවුද්ධියො. යුඤ්ජනං යොගො. ‘घ’ प्रत्यय लागून: जो बोलतो तो ‘वको’ (बगळा). ‘सिच’ धातू पाझरण्याच्या (प्रस्रवण) अर्थात; सिंचन करणे म्हणजे ‘सेको’. याचप्रमाणे ‘सोको’, येथे ‘ए’ आणि ‘ओ’ ची वृद्धी होते. जोडणे म्हणजे ‘योगो’. ක-පී=තප්පනෙ, පීනෙතීති පීයො, කානුබන්ධත්තා න වුද්ධි, ‘‘යුවණ්ණාන+මියඞුවඞ සරෙ’’ති ඉයඞ. ඛිප=පෙරණෙ, ඛිපතීති ඛිපො. භුඤ්ජන්ත්ය+නෙනාති භුජො. යුධ=සම්පහාරෙ ආයුජ්ඣන්ති අනෙනාති ආයුධං. ‘क’ प्रत्यय लागून: ‘पी’ धातू तृप्त करण्याच्या अर्थात; जो तृप्त करतो तो ‘पीयो’ (प्रिय), ‘क’ अनुबन्ध असल्यामुळे वृद्धी होत नाही, “युवण्णानमियङुवण सरा” या सूत्राने ‘इयङ्’ आदेश होतो. ‘खिप’ (क्षिप्) धातू फेकण्याच्या (प्रेरण) अर्थात; जो फेकतो तो ‘खिपो’. ज्याच्याद्वारे उपभोग घेतला जातो तो ‘भुजो’ (बाहू). ‘युध’ धातू युद्धाच्या (संप्रहार) अर्थात; ज्याच्याद्वारे युद्ध केले जाते ते ‘आयुधं’ (शस्त्र). 45. දාධාත්වි ४५. ‘दा’ आणि ‘धा’ धातूंनंतर ‘इ’ प्रत्यय. දාධාතො බහුල+මි හොති භාවකාරකෙසු. දා=දානෙ, ආදියතීතිආදි. එවං උපාදි. ධා=ධාරණෙ, උදකං දධාතීති උදධි, ‘‘සඤ්ඤාය+මුදො+දකස්සා’’ති උදකස්ස උදාදෙසො. ජලං ධියතෙ අස්මින්ති ජලධි. වාලානි ධීයන්ති අස්මින්ති වාලධි. සන්ධීයති සන්ධාතීති වා සන්ධි. ධීයතීති ධි. විධීයති විධාති විධානං වා විධි. සම්මා සමං වා චිත්තං ආදධාතීති සමාධි. ‘दा’ आणि ‘धा’ धातूंनंतर भाव आणि कारक अर्थांमध्ये बहुधा ‘इ’ प्रत्यय होतो. ‘दा’ धातू दानाच्या अर्थात; जे ग्रहण केले जाते ते ‘आदि’ (आरंभ). याचप्रमाणे ‘उपादि’. ‘धा’ धातू धारण करण्याच्या अर्थात; जो पाणी धारण करतो तो ‘उदधि’ (समुद्र), “सञ्ञायमुदोदकस्स” या सूत्राने ‘उदक’ शब्दाचा ‘उद’ असा आदेश होतो. ज्याच्यामध्ये जल धारण केले जाते तो ‘जलधि’. ज्याच्यामध्ये केस धारण केले जातात ती ‘वालधि’ (शेपूट). जे सांधले जाते किंवा जो सांधतो तो ‘संधि’. जे धारण केले जाते ती ‘धि’ (बुद्धी). जे विहित केले जाते, विधान केले जाते किंवा विधान म्हणजे ‘विधि’. चित्ताला चांगल्या प्रकारे किंवा सम्यक रीतीने एकाग्र करतो तो ‘समाधि’. 46. වමාදීහ්ය+ථු ४६. ‘वम’ इत्यादी धातूंनंतर ‘अथु’ प्रत्यय होतो. වමාදීහි භාවකාරකෙස්ව+ථු හොති. වම=උග්ගිරණෙ, වමනං වමීයතීති වා වමථු. වෙප+කම්ප=චලනෙ, වෙපනං වෙපථු. ‘वम’ इत्यादी धातूंनंतर भाव आणि कारक अर्थांमध्ये ‘अथु’ प्रत्यय होतो. ‘वम’ धातू ओकण्याच्या (उद्गीरण) अर्थात; ओकणे किंवा जे ओकले जाते तो ‘वमथु’ (उलटी). ‘वेप’ आणि ‘कम्प’ धातू हलण्याच्या (चलन) अर्थात; कापणे म्हणजे ‘वेपछु’ (थरथराट). 47. ක්වි ४७. ‘क्वि’ प्रत्यय. ක්රියත්ථා ක්වි හොති බහුලං භාවකාරකෙසු. කකාරො කානුබන්ධකාරියත්ථො. क्रियावाचक धातूंनंतर भाव आणि कारक अर्थांमध्ये बहुधा ‘क्वि’ प्रत्यय होतो. ‘क’ कार हा ‘क’ अनुबन्धाचे कार्य करण्यासाठी आहे. 159. ක්විස්ස १५९. ‘क्वि’ प्रत्ययाचा. ක්රියත්ථා [Pg.279] පරස්ස ක්විස්ස ලොපො හොති. සම්භවතීති සම්භූ. එවං විභවතීති විභූ, අභිභූ, සයම්භූ. තථා ධු=කම්පනෙ, සන්ධුනාතීති සන්ධු. විභාතීති විභා. පභාතීති පභා. සංගම්ම භාසන්ති එත්ථාති සභා, ‘‘ක්විම්හි ලොපො+න්තබ්යඤ්ජනස්සා’’ති අන්තබ්යඤ්ජනස්ස ලොපො. භුජෙන ගච්ඡතීති භුජගො. එවං උරගො. තුරං=සීඝං ගච්ඡතීති තුරඞ්ගො. ඛෙන ගච්ඡතීති ඛගො. විහායසෙ ගච්ඡතීති විහගො, තදමිනාදිපාඨා විහාදෙසො. න ගච්ඡතීති නගො. එවං අගො, ‘‘නගො වා+ප්පාණිනී’’ති විකප්පෙන නඤසමාසෙ ටාදෙසනිසෙධො. ජන=ජනනෙ, කම්මතො ජාතොති කම්මජො, අමාදිසමාසො, කම්මජො විපාකො, කම්මජා පටිසන්ධි, කම්මජං රූපං. එවං චිත්තජං, උතුජං, ආහාරජං. අත්තජො පුත්තො, වාරිම්හි ජාතො වාරිජො. එවං ථලජො. පඞ්කජං. ජලජං. අණ්ඩජං. සරසිජං, උපපදසමාසෙ බහුලංවිධානා විභත්යලොපෙ ‘‘මනාදීහී’’තිආදිනා සිආදෙසො. ද්වික්ඛත්තුං ජාතො ද්විජො, ‘‘තදමිනා’’ දිනා ක්ඛත්තුංලොපො. පච්ඡා ජාතො අනුජො. සඤ්ජානාතීති සඤ්ඤා. පජානාතීති පඤ්ඤා. එවං පතිට්ඨාතීති පතිට්ඨා. ඣා=චින්තායං, පරසම්පත්තිං අභිජ්ඣායතීති අභිජ්ඣා. හිතෙසිතං උපට්ඨාපෙත්වා ඣායතීති උපජ්ඣා. සො එව උපජ්ඣායො, ‘‘සකත්ථෙ’’ති යො. සම්මා ඣායන්ති එත්ථාති සංඣා. ක්විදන්තා ධාත්වත්ථං න ජහන්ති, ලිඞ්ගත්ථං පටිපාදයන්ති. क्रियावाचक धातूच्या पुढे आलेल्या 'क्वि' (kvi) प्रत्ययाचा लोप होतो. 'संभवति' (उत्पन्न होतो) तो 'संभू' (sambhū). याचप्रमाणे 'विभवति' तो 'विभू', 'अभिभू', 'सयंभू' (स्वयंभू). तसेच 'धु' = कंपने (कंप पावणे), 'संधुनाति' तो 'संधु'. 'विभाति' ती 'विभा'. 'पभाति' ती 'पभा' (प्रभा). एकत्र येऊन जेथे भाषण करतात ती 'सभा', "क्विम्हि लोपोऽन्तब्यञ्जनस्स" या सूत्राने अंतिम व्यंजनाचा लोप होतो. भुजेने (वक्र गतीने) जातो तो 'भुजगो' (भुजंग/साप). याचप्रमाणे 'उरगो' (छातीने चालणारा). 'तुरं' = वेगाने जो जातो तो 'तुरङ्गो' (घोडा). 'खे' (आकाशात) जो जातो तो 'खगो' (पक्षी). 'विहायसे' (आकाशात) जो जातो तो 'विहगो', 'तदमिना' इत्यादी पाठाने 'विहा' चा आदेश होतो. जो जात नाही (स्थिर राहतो) तो 'नगो' (पर्वत). याचप्रमाणे 'अगो', "नगो वाऽप्पाणिनी" या सूत्राने विकल्पाने नञ्-समासात 'ट' आदेशाचा निषेध होतो. 'जन' = जनने (उत्पन्न होणे), कर्मापासून उत्पन्न होतो तो 'कम्मजो' (कर्मज), हा 'अम्' इत्यादींचा समास (उपपद समास) आहे; जसे - 'कम्मजो विपाको' (कर्मज विपाक), 'कम्मजा पटिसन्धि' (कर्मज प्रतिसंधी), 'कम्मजं रूपं' (कर्मज रूप). याचप्रमाणे 'चित्तजं' (चित्तज), 'उतुजं' (ऋतुज), 'आहारजं' (आहारज). स्वतःपासून उत्पन्न झालेला तो 'अत्तजो पुत्तो' (आत्मज पुत्र), पाण्यात उत्पन्न होतो तो 'वारिजो' (कमळ). याचप्रमाणे 'थलजो' (स्थलज), 'पङ्कजं' (पंकज), 'जलजं' (जलज), 'अण्डजं' (अंडज). 'सरसिजं' (तलावात उत्पन्न होणारे), उपपद समासात बहुल विधानामुळे विभक्तीचा लोप न होता "मनादीहि" इत्यादी सूत्राने 'सि' चा आदेश होतो. दोनदा जन्म घेणारा तो 'द्विजो' (द्विज), "तदमिना" इत्यादी सूत्राने 'क्खत्तुं' (वेळा) चा लोप होतो. नंतर जन्मलेला तो 'अनुजो' (अनुज). जी सम्यक प्रकारे जाणते ती 'सञ्ञा' (संज्ञा). जी प्रकृष्ट प्रकारे जाणते ती 'पञ्ञा' (प्रज्ञा). याचप्रमाणे जी प्रतिष्ठित होते ती 'पतिट्ठा' (प्रतिष्ठा). 'झा' = चिंतने (चिंतन करणे), दुसऱ्याच्या संपत्तीची जी अभिलाषा धरते ती 'अभिज्झा' (अभिध्या). हिताची इच्छा ठेवून जो ध्यान करतो (किंवा मार्गदर्शन करतो) तो 'उपज्झा' (उपाध्याय). तोच 'उपज्झायो' (उपाध्याय) होतो, "सकत्थे" या सूत्राने 'य' प्रत्यय लागतो. जेथे सम्यक प्रकारे ध्यान करतात ती 'संझा' (संध्या). 'क्वि' प्रत्ययान्त शब्द धातूचा अर्थ सोडत नाहीत, तर ते प्रातिपदिकार्थाचे (लिंगार्थाचे) प्रतिपादन करतात. 48. අනො ४८. 'अन' (ana) प्रत्यय. ක්රියත්ථා [Pg.280] භාවකාරකෙසු අනො හොති. නන්ද=සමිද්ධියං, භාවෙ-නන්දියතෙ නන්දනං. කම්මෙ-අනන්දීයිත්ථ නන්දීයති නන්දීයිස්සති නන්දිතබ්බන්ති වා නන්දනං වනං. ගහනං ගහනීයං වා ගහණං, ‘‘තථනරා’’ දිනා නස්ස ණො. ගණ්හනං, නිග්ගහීතස්ස නො. චරිතබ්බං චරණං. භුයතෙ භවනං. හුයතෙ හවනං. රුන්ධිතබ්බං රුන්ධනං රොධනං වා. භුඤ්ජිතබ්බං භුඤ්ජනං භොජනං වා. බුජ්ඣිතබ්බං බුජ්ඣනං, ‘‘පදාදීනං ක්වචී’’ති යුක. බොධනං වා. සුති සුය්යති වා සවනං. පාපීයතීති පාපුණනං, ‘‘සකාපානං කුක+කූ’’ති යොගවිභාගා කුආගමෙ නාගමෙ ච තස්ස ණො ච. පාලීයතීති පාලනං ඉච්චාදි. क्रियावाचक धातूंच्या पुढे भाव आणि कर्म कारकांमध्ये 'अन' (ana) प्रत्यय होतो. 'नन्द' = समृद्धी असणे/आनंदी असणे; भाव अर्थात - 'नन्दियते' (आनंदी होणे) ते 'नन्दनं' (नंदन). कर्म अर्थात - ज्याचा आनंद घेतला गेला, घेतला जातो, घेतला जाईल किंवा घेतला जावा ते 'नन्दनं वनं' (नंदनवन). ग्रहण करणे किंवा ग्रहण करण्यायोग्य ते 'गहणं' (ग्रहण), "तथ नरा" इत्यादी सूत्राने 'न' चा 'ण' होतो. 'गण्हनं' (ग्रहण करणे), येथे निग्गहीताचा (अनुस्वाराचा) 'न' होतो. आचरण करण्यायोग्य ते 'चरणं' (चरण/आचरण). जे होते (अस्तित्वात येते) ते 'भवनं' (भवन). जे हवन केले जाते ते 'हवनं' (हवन). रोखण्यायोग्य ते 'रुन्धनं' किंवा 'रोधनं'. उपभोगण्यायोग्य किंवा खाण्यायोग्य ते 'भुञ्जनं' किंवा 'भोजनं'. जाणण्यायोग्य ते 'बुज्झनं', "पदादीनं क्वचि" या सूत्राने 'यु' (अन) प्रत्यय होतो; किंवा 'बोधनं'. ऐकणे किंवा जे ऐकले जाते ते 'सवनं' (श्रवण). जे प्राप्त केले जाते ते 'पापुणनं' (प्राप्ती), "सकापानं कुक-कू" या योगविभागाने 'कु' आगम आणि 'न' आगम होऊन त्याचा 'ण' होतो. ज्याचे पालन केले जाते ते 'पालनं' (पालन) इत्यादी. කත්තරි-රජං හරතීති රජොහරණං තොයං. විජානාතීති විඤ්ඤාණං. ඝා=ගන්ධොපාදානෙ, ඝායතීති ඝානං. ඣා=චින්තායං, ඣායතීති ඣානං. කරොති අනෙනාති කාරණං, දීඝො. විආකරීයන්ති එතෙනාති බ්යාකරණං. පූරති+නෙනාති පූරණං. දීයතෙ+නෙනාති දානං. පමීයතෙ+නෙනාති පමාණං. වුච්චතෙ+නෙනාති වචනං. පනුදති පනුජ්ජතෙ+නෙනාති වා පනුදනං. සූද=පගරණෙ, සූදති සුජ්ජතෙ+නෙනාති වා සූදනො. සුණාති සුයතෙ+නෙනෙති වා සවනං. ලුයති ලුයතෙ+නෙනෙති වා ලවනං. එවං නයනං. පුනාති පුයතෙ+නෙනෙති වා පවනො. සමෙතීති සමණො සමනං වා. තථා භාවෙති භාවීයති එතායාති වා භාවනං. එවං පාචනං පාචාපනං ඉච්චාදි. ‘‘අන+සණස්වා පරීහි ළො’’ති ළො, ආළාහනං. कर्ता अर्थात - जे धूळ दूर करते ते 'रजोहरणं तोयं' (धूळ साफ करणारे पाणी). जे विशेष रूपाने जाणते ते 'विञ्ञाणं' (विज्ञान/चेतना). 'घा' = गंध ग्रहण करणे; जे गंध घेते ते 'घानं' (घ्राणेंद्रिय/नाक). 'झा' = चिंतन करणे; जे चिंतन करते (किंवा ज्याच्याद्वारे ध्यान केले जाते) ते 'झानं' (ध्यान). ज्याच्याद्वारे केले जाते ते 'कारणं' (कारण), येथे दीर्घ स्वर होतो. ज्याच्याद्वारे स्पष्टीकरण केले जाते ते 'ब्याकरणं' (व्याकरण). ज्याच्याद्वारे पूर्ण केले जाते ते 'पूरणं' (पूरण). जे दिले जाते ते 'दानं' (दान). ज्याच्याद्वारे मोजले जाते ते 'पमाणं' (प्रमाण). ज्याच्याद्वारे बोलले जाते ते 'वचनं' (वचन). जे दूर करते किंवा ज्याच्याद्वारे दूर केले जाते ते 'पनुदनं' (निवारण). 'सूद' = क्षरण/स्वयंपाक करणे; जे क्षरण करते किंवा ज्याच्याद्वारे क्षरण केले जाते ते 'सूदनो' (नाश करणारा/आचारी). जो ऐकतो किंवा ज्याच्याद्वारे ऐकले जाते ते 'सवनं' (श्रवण). जो कापतो किंवा ज्याच्याद्वारे कापले जाते ते 'लवनं' (कापणी). याचप्रमाणे 'नयनं' (डोळा/नेणे). जो पवित्र करतो किंवा ज्याच्याद्वारे पवित्र केले जाते तो 'पवरणो' (वारा). जो शांत करतो तो 'समणो' (श्रमण) किंवा 'समनं' (शमन). तसेच, जी भावना करते किंवा जिच्याद्वारे भावना केली जाते ती 'भावनं' (भावना/ध्यानभावना). याचप्रमाणे 'पाचनं' (पाचविणे), 'पाचापनं' (पाचवायला लावणे) इत्यादी. "अन-सणस्वा परीहि ळो" या सूत्राने 'ळ' होतो; जसे - 'आळाहनं' (स्मशान/दहनभूमी). අධිකරණෙ-තිට්ඨති අසින්ති ඨානං. එවං සයනං, සෙනං වා ආසනං. අධිකරීයති එත්ථාති අධිකරණං. अधिकरण (स्थान) अर्थात - जेथे उभे राहतात ते 'ठानं' (स्थान/ठिकाण). याचप्रमाणे 'सयनं' (शयन/झोपण्याची जागा), 'सेनं' (शय्या) किंवा 'आसनं' (आसन/बसण्याची जागा). जेथे अधिकरण (क्रिया) केली जाते ते 'अधिकरणं' (अधिकरण). සම්පදානාපාදානෙසු-සම්මා [Pg.281] පදීයතෙ යස්ස තං සම්පදානං. අපෙච්ච එතස්මා ආදදාතීති අපාදානං. බහුලාධිකාරා චලනාදීහිපි සීලසාධුධම්මෙසුපි අනො, චලති සීලෙනාති චලනො එවං ජලනො, කොධනො, කොපනො. මණ්ඩ=භුසනෙ, මණ්ඩෙති සීලෙනාති මණ්ඩනො. එවං භූසනො. ‘‘අඤ්ඤාත්රපී’’ති ඔකාරනිසෙධො. संप्रदान आणि अपादान अर्थांमध्ये - ज्याला सम्यक प्रकारे दिले जाते ते 'सम्पादनं' (संप्रदान). ज्याच्यापासून दूर होऊन ग्रहण केले जाते ते 'अपादानं' (अपादान). 'बहुल' अधिकाराने 'चल' इत्यादी धातूंपासून स्वभाव (शील) आणि उत्तम गुणांच्या अर्थातही 'अन' प्रत्यय होतो; जसे - स्वभावाने जो चंचल असतो तो 'चलनो' (चंचल). याचप्रमाणे 'जलनो' (जळणारा/अग्नी), 'कोधनो' (क्रोधी), 'कोपनो' (कोपिष्ट). 'मण्ड' = भूषविणे; स्वभावाने जो भूषवितो तो 'मण्डनो' (मंडन करणारा). याचप्रमाणे 'भूसनो' (भूषविणारा). "अञ्ञात्रपि" या सूत्राने 'ओ' काराचा निषेध होतो. 49. ඉත්ථිය+ම+ණ+ක්ති+ක+යක+යා ච ४९. स्त्रीलिंगात 'अ', 'ण', 'क्ति', 'क', 'यक' आणि 'या' प्रत्यय देखील होतात. ඉත්ථිලිඞ්ගෙ භාවෙ කාරකෙ ච ක්රියත්ථා අආදයො හොන්ති අනො ච බහුලං. स्त्रीलिंगात भाव आणि कारक अर्थांमध्ये क्रियावाचक धातूंच्या पुढे 'अ' इत्यादी प्रत्यय होतात आणि 'अन' प्रत्यय देखील बहुलतेने होतो. අ-ජර=වයොහානියං, ජිරති ජිරණං වා ජරා. ‘‘ඉත්ථිය+ම+ත්වා’’ති ආපච්චයො. පටිසම්භිජ්ජතීති පටිසම්භිදා. පටිපජ්ජති එතායාති පටිපදා. එවං සම්පදා, ආපදා. උපාදීයතීති උපාදා. ඉක්ඛ+චක්ඛ=දස්සනෙ, උපඉක්ඛතීති උපෙක්ඛා. ‘‘යුවණ්ණාන+මෙඔ ලුත්තා’’ති එකාරො. චින්තනං චින්තා. සික්ඛ=විජ්ජොපාදානෙ, සික්ඛනං සික්ඛීයන්තීති වා සික්ඛා. එවං භික්ඛා. ඉච්ඡනං ඉච්ඡා. ‘‘ගමයමි’’ච්චාදිනා ච්ඡඞාදෙසො. පුච්ඡ=පුච්ඡනෙ, පුච්ඡනං පුච්ඡා. මිධ+මෙධ=සඞ්ගමෙ, අපඨිතධාතු, මෙධනං මෙධා. එවං ගුධ=පරිවෙඨනෙ, ගොධනං ගොධා. තිතික්ඛනං තිතික්ඛා. එවං වීමංසා, ජිගුච්ඡා, පිපාසා, පුත්තියා. ඊහනං ඊහා. 'अ' प्रत्यय - 'जर' = वयाची हानी होणे; जीर्ण होणे किंवा जीर्ण होण्याची अवस्था म्हणजे 'जरा' (वृद्धत्व). "इत्थिय-म-त्वा" या सूत्राने 'आ' प्रत्यय होतो. जी विशेष रूपाने विभक्त (विश्लेषित) होते ती 'पटिसम्भिदा' (प्रतिसंभिदा). जिच्याद्वारे मार्गक्रमण केले जाते ती 'पटिपदा' (प्रतिपदा/मार्ग). याचप्रमाणे 'सम्पदा' (संपदा), 'आपदा' (आपत्ती). जे ग्रहण केले जाते ते 'उपादा' (उपादाय रूप). 'इक्ख' आणि 'चक्ख' = पाहणे; जी तटस्थतेने पाहते ती 'उपेक्खा' (उपेक्षा). "युवण्णान-मेओ लुत्ता" या सूत्राने 'ए' कार होतो. चिंतन करणे ती 'चिन्ता' (चिंता/विचार). 'सिक्ख' = विद्या ग्रहण करणे; शिकणे किंवा जे शिकले जाते ती 'सिक्खा' (शिक्षा/शिक्षण). याचप्रमाणे 'भिक्खा' (भिक्षा). इच्छा करणे ती 'इच्छा'. "गमयमि" इत्यादी सूत्राने 'च्छ' चा आदेश होतो. 'पुच्छ' = विचारणे; विचारणे ती 'पुच्छा' (प्रश्न). 'मिध' आणि 'मेध' = एकत्र येणे (हा अपठित धातू आहे); बुद्धीची धारणा ती 'मेधा' (बुद्धी). याचप्रमाणे 'गुध' = वेढणे; वेढणे ती 'गोधा' (घोरपड). सहन करणे ती 'तितिक्खा' (तितिक्षा/सहनशीलता). याचप्रमाणे 'वीमंसा' (विमर्शा/मीमांसा), 'जिगुच्छा' (जुगुप्सा/घृणा), 'पिपासा' (तहान), 'पुत्तिया' (पुत्राची इच्छा). चेष्टा/प्रयत्न करणे ती 'ईहा' (इच्छा/चेष्टा). ණ-කරණං කාරා, ‘‘අස්සා ණානුබන්ධෙ’’ති ආ හොති, එව+මුපරිපි. හරණං හාරා මුත්තාවලි. තරණං තාරා, ධරණං ධාරා. අරණං ආරා. 'ण' प्रत्यय - करणे ती 'कारा' (तुरुंग/क्रिया), "अस्सा णानुबन्धे" या सूत्राने 'आ' होतो, पुढेही याचप्रमाणे समजावे. हरण करणे (मन वेधून घेणे) ती 'हारा' (मोत्यांची माळ). तारण करणे (तारणारा तारा) ती 'तारा'. धारण करणे ती 'धारा'. टोचणे ते 'आरा' (सुई/आर). යථාකථඤ්චි සද්දම්හි, රුළ්හියා අත්ථනිච්ඡයො. शब्दांमध्ये जसा कसाही (व्युत्पत्तीने) अर्थ असला, तरी रूढीनेच अर्थाचा निश्चय होतो. ක්ති-සම්භුවනං [Pg.282] සම්භුති. ‘‘න තෙ’’ච්චාදිනා න වුද්ධි. සවනං සුති. නයනං නයති එතායාති වා නීති. මඤ්ඤතීති මති, ‘‘ගමාදිරානං ලොපොන්තබ්යඤ්ජනස්සා’’ති ගමාදිත්තා නලොපො. ගමනං ගන්තබ්බාති වා ගති. උපහනනං උපහති. රමන්ති එතාය රමනං වා රති. තනනං තති. නියමනං නියති. භුඤ්ජනං භුත්ති. යුඤ්ජනං යුත්ති, පරරූපං. එවං සමාපජ්ජනං සමාපජ්ජතෙති සමාපත්ති. සම්පත්ති. යජ=දෙවපූජාසඞ්ගතිකරණදානෙසු, යජනං ඉට්ඨි, ‘‘යජස්ස යස්ස ටියී’’ති ටිආදෙසො, ‘‘පුච්ඡාදිතො’’ති තස්ස ඨො, පරරූපපඨමක්ඛරා ච. සාසනං සිට්ඨි, ‘‘සාසස්ස සිස වා’’ති සිස, සානන්තරස්ස තස්ස ඨො’’ති ඨාදෙසො. භෙදනං භිජ්ජතෙති වා භිත්ති. භජ=සෙවායං, භජනං භත්ති. තන=විත්ථාරෙ, තනොතීති තන්ති, නස්ස නිග්ගහීතාදි. 'क्ति' प्रत्यय - उत्पन्न होणे ती 'सम्भूति' (संभूती). "न ते" इत्यादी सूत्राने वृद्धी होत नाही. ऐकणे ती 'सुति' (श्रुती). नेणे किंवा जिच्याद्वारे नेले जाते ती 'नीति' (नीती). जो विचार करतो ती 'मति' (मती), "गमादिरां लोपोन्तब्यञ्जनस्स" या सूत्राने गमादी धातूंच्या अंतिम व्यंजनाचा (न चा) लोप होतो. जाणे किंवा जेथे जावे ती 'गति' (गती). नष्ट करणे ती 'उपहति' (नाश). जिच्यामध्ये रममाण होतात किंवा रमणे ती 'रति' (रती/प्रीती). विस्तार करणे ती 'तति' (श्रेणी/विस्तार). नियमन करणे ती 'नियति' (नियती). उपभोग घेणे ते 'भुत्ति' (भुक्ती/भोग). जोडणे ती 'युत्ति' (युक्ती), येथे पररूप होते. याचप्रमाणे समापन्न होणे ती 'समापत्ति' (समापत्ती). 'सम्पत्ति' (संपत्ती). 'यज' = देवपूजा, संगतीकरण आणि दान; यज्ञ करणे ती 'इट्ठि' (इष्टी/यज्ञ), "यजस्स यस्स टियी" या सूत्राने 'टि' आदेश होतो, "पुच्छादितो" या सूत्राने 'त' चा 'ठ' होतो आणि पररूपाचे पहिले अक्षर होते. शासन करणे ती 'सिट्ठि' (शिष्टी/शासन), "सासस्स सिस वा" या सूत्राने 'सिस' आदेश होतो आणि 'स' नंतरच्या 'त' चा 'ठ' होऊन 'ठ' आदेश होतो. भेदणे किंवा जे भेदले जाते ती 'भित्ति' (भिंत). 'भज' = सेवा करणे; सेवा करणे ती 'भत्ति' (भक्ती). 'तन' = विस्तार करणे; जो विस्तार करतो ती 'तन्ति' (तंतू/तंत्री), येथे 'न' चा निग्गहीत (अनुस्वार) इत्यादी होतो. ක-ගුහන්තී එත්ථාති ගුහා, ඔකාරනිවුත්ති. රුජතීති රුජා. මොදන්ති එතායාති මුදා නාම මුදිතා. 'क' प्रत्यय - जेथे लपतात ती 'गुहा' (गुहा), येथे 'ओ' काराची निवृत्ती होते. जी पीडा देते ती 'रुजा' (रोग/पीडा). जिच्याद्वारे आनंदित होतात ती 'मुदा' म्हणजेच 'मुदिता' (आनंद). යක-විද=ඤාණෙ, විදනං විදන්ති එතායාති වා විජ්ජා, දස්ස ජෙ පුබ්බරූපං. යජනං ඉජ්ජා, ටිආදෙසො. 'यक' प्रत्यय - 'विद' = ज्ञान; जाणणे किंवा जिच्याद्वारे जाणतात ती 'विज्जा' (विद्या), येथे 'द' चा 'ज' होऊन पूर्वरूप होते. यज्ञ करणे ती 'इज्जा' (इज्या/यज्ञ), येथे 'टि' चा आदेश होतो. ය-සයන්ති එත්ථාති සෙය්යා, ද්විත්තං. අජ=වජ=ගමනෙ, සමජනං සමජන්ති එත්ථාති වා සමජ්ජා. පපුබ්බො, පබ්බජනං පබ්බජ්ජා. තවග්ගවරණා’’දිම්හි ‘‘චවග්ගබයඤා’’ති යොගවිභාගෙන වස්ස බෙ ද්විත්තං. ඌම්හි පරිචරණං පරිචරියා. ජාගරණං ජාගරියා. येथे निजतात (झोपतात) ती 'सेय्या' (शय्या), येथे द्वित्व होते. 'अज' आणि 'वज' हे गमन अर्थाचे धातू आहेत; जेथे लोक एकत्र जमतात ती 'समज्जा' (सभा/मेळावा). 'प' उपसर्ग पूर्वपद असताना, प्रव्रज्या (बाहेर पडणे) म्हणजे 'पब्बज्जा'. 'तवग्गवरणा' इत्यादी सूत्रातील 'चवग्गबयञा' या योगविभागाने 'व' चे 'ब' होऊन द्वित्व होते. 'ऊ' प्रत्यय असताना परिचरण म्हणजे 'परिचरिया'. जागरण म्हणजे 'जागरिया'. අන-පයොජකෙ [Pg.283] කාරියධාතුතො කත්තුං පයොජනං කාරණං, එකාරනිසෙධො නස්ස ණො ච. එවං හරිතුං පයොජනං හාරණං. විද=අනුභවෙ, විත්ති වෙදයතීති වා වෙදනා. වන්ද=අභිවාදනථුතීසු, වන්දනං වන්දනා. උපාසනං උපාසනා. චිත=සංචෙතනායං, චෙතයතීති චෙතනා. දෙසියතීති දෙසනා. භාවියතීති භාවනා. प्रयोजक नसताना 'अन' प्रत्यय लागून कार्य धातूपासून 'करण्याचे प्रयोजन' या अर्थी 'कारण' शब्द बनतो, येथे 'ए' काराचा निषेध होतो आणि 'न' चा 'ण' होतो. याचप्रमाणे 'हरणाचे प्रयोजन' म्हणजे 'हारण'. 'विद' धातू अनुभवाच्या अर्थात आहे; जाणीव (वित्ती) किंवा जे अनुभवले जाते ती 'वेदना'. 'वन्द' धातू अभिवादन आणि स्तुती या अर्थात आहे; वंदन म्हणजे 'वंदना'. उपासना म्हणजे 'उपासना'. 'चित' धातू संचेतनाच्या अर्थात आहे; जे चेतविते ती 'चेतना'. जे उपदेशिले जाते ती 'देसना' (देशना). जे भाविले जाते (विकसित केले जाते) ती 'भावना'. 50. ජාහාහි නි ५०. 'जा' आणि 'हा' धातूंपासून 'नि' प्रत्यय होतो. ජා=වයොහානිම්හි, හා=චාගෙ, ඉමෙහි ඉත්ථියං නි හොති. ජානං=වයපරිපාකො ජානි. හානං හානි. 'जा' धातू वयोवृद्धत्व (वयोहाणी) अर्थात आणि 'हा' धातू त्यागाच्या अर्थात आहे; या धातूंपासून स्त्रीलिंगात 'नि' प्रत्यय होतो. 'जानं' म्हणजे वयाचा परिपाक (वृद्धत्व) म्हणजेच 'जानि'. 'हानं' (हानी/नाश) म्हणजे 'हानि'. 51. කරා රිරියො ५१. 'कर' धातूपासून 'रिरिय' प्रत्यय होतो. කරතො රිරියො හොති+ත්ථියං. රානුබන්ධත්තා අරලොපෙ කරණං කිරියා. ‘‘ක්රියා’’ති ‘‘තුංතායෙ’’ච්චාදිම්හි ‘‘ක්රියායං’’ති යොගවිභාගා රියරම්හි අරලොපො, රිකාරො කකාරෙ+නුබන්ධො හොති. 'कर' धातूपासून स्त्रीलिंगात 'रिरिय' प्रत्यय होतो. 'र' चा अनुबंध असल्यामुळे 'अ' चा लोप होऊन 'करण' चे 'किरिया' बनते. 'क्रिया' या शब्दात 'तुंताय' इत्यादी सूत्रातील 'क्रियायं' या योगविभागाने 'रिय' प्रत्यय असताना 'अ' चा लोप होतो आणि 'ऋ' कार 'क' कारात अनुबद्ध होतो. 52. ඉ+කි+තී සරූපෙ ५२. धातूच्या स्वतःच्या स्वरूपाचा बोध करून देण्यासाठी 'इ', 'कि' आणि 'ति' हे प्रत्यय होतात. ධාතුස්ස සරූපෙ+භිධෙය්යෙ එතෙ හොන්ති. වචඉච්ච+යං ධාතු එව වචි. එවං යුධි. ‘‘කරොතිස්ස ඛො’’ති විකරණස්ස ඤාපිතත්තා ‘‘කත්තරි ලො’’ති ලො, පචති. අකාරො කකාරොති ඝණන්තෙන කාරසද්දෙන ඡට්ඨීසමාසො. धातूचे स्वतःचे स्वरूप सांगायचे असताना हे प्रत्यय होतात. 'वच' हा धातूच 'वचि' होतो. याचप्रमाणे 'युधि' होतो. 'करोतिस्स खो' या सूत्राने विकरणाचे ज्ञापन केल्यामुळे 'कत्तरि लो' या सूत्राने 'लो' प्रत्यय होऊन 'पचति' रूप बनते. 'अकार' आणि 'ककार' हे 'घण्' प्रत्ययान्त 'कार' शब्दासोबत षष्ठी तत्पुरुष समास आहेत. 53. සීලා+භික්ඛඤ්ඤා+වස්සකෙසු ණී ५३. शील (स्वभाव), आभीक्ष्ण्य (पुनःपुन्हा करणे) आणि आवश्यकता या अर्थांमध्ये 'णी' प्रत्यय होतो. ක්රියත්ථා [Pg.284] ණී හොති සීලාදීසු. සංස=පසංසනෙ, පියපුබ්බො, පියං පසංසති සීලෙනාති පියපසංසී රාජා. අථ වා පියං පසංසති සීලෙන වා ධම්මෙන වා තස්මිං සාධු වාති පියපසංසී, පියපසංසනී, පියපසංසි කුලං, ආවුද්ධිම්හි තථා සච්චවාදී, ධම්මවාදී. සීඝයායීති ‘‘අස්සා+ණාපිම්හී යුක’’ ඉති යුක. පාපකාරී, මාලකාරී ඉච්චාදි. උණ්හං භුඤ්ජති සීලෙනාති උණ්හභොජී, ‘‘ලහුස්සුපන්තස්සා’’ති ඔකාරො. शील इत्यादी अर्थांमध्ये क्रियावाचक धातूपासून 'णी' प्रत्यय होतो. 'शंस' धातू प्रशंसेच्या अर्थात आहे; 'पिय' पूर्वपद असताना, स्वभावाने प्रिय गोष्टीची प्रशंसा करतो तो 'पियपसंसी राजा' (प्रियप्रशंसी राजा). अथवा जो स्वभावाने किंवा धर्माने प्रिय गोष्टीची प्रशंसा करतो किंवा त्यात जो चांगला आहे तो 'पियपसंसी' (पुल्लिंग), 'पियपसंसनी' (स्त्रीलिंग), 'पियपसंसि कुल' (नपुंसकलिंग); वृद्धी झाल्यावर याचप्रमाणे 'सच्चवादी' (सत्यवादी), 'धम्मवादी' (धर्मवादी) रूपे बनतात. 'सीघयायी' (वेगाने जाणारा) यामध्ये 'अस्सा+णापिम्ही युक' या सूत्राने 'युक' आगम होतो. 'पापकारी', 'मालाकारी' इत्यादी. जो स्वभावाने गरम अन्न खातो तो 'उण्हभोजी' (उष्णभोजी), येथे 'लहुस्सुपन्तस्सा' या सूत्राने 'ओ' कार होतो. ආභික්ඛඤ්ඤෙ-පුනප්පුන ඛීරං පිවතීති ඛීරපායී, යුක. අවස්සං කරොතීති අවස්සකාරී. ‘‘ස්යාදි ස්යාදිනෙ+කත්ථං’’ති සමාසෙ විභත්තිලොපෙ ච කතෙ ‘‘ලොපො’’ති නිග්ගහීතලොපො. සතන්දායීති එත්ථ බහුලංවිධානා විභත්තිඅලොපෙ අමාදිසමාසපටිසෙධෙ ච කතෙ වග්ගන්තං. आभीक्ष्ण्य (पुनःपुन्हा करणे) अर्थात - जो पुन्हा पुन्हा दूध पितो तो 'खीरपायी' (दूध पिणारा), येथे 'युक' आगम होतो. जो अवश्य करतो तो 'avassakārī' (अवश्य करणारा). 'स्यादि स्यादिने+कत्थं' या सूत्राने समास आणि विभक्तीचा लोप झाल्यावर 'लोपो' या सूत्राने निग्गहीताचा (अनुस्वाराचा) लोप होतो. 'सतंदायी' यामध्ये बहुल विधानामुळे विभक्तीचा अलोप आणि 'अम्' इत्यादी समासाचा प्रतिषेध (निषेध) झाल्यावर वर्गाचा अंत्य वर्ण (अनुनासिक) होतो. අඤ්ඤස්මිං අත්ථෙපි ‘‘ණී’’ති යොගවිභාගෙන සිද්ධං. සාධුකාරී, බ්රහ්මචාරී, අස්සද්ධභොජී. පණ්ඩිතං අත්තානං මඤ්ඤතීති පණ්ඩිතමානී, බහුස්සුතධාරී ඉච්චාදි. इतर अर्थांमध्येही 'णी' या योगविभागाने रूप सिद्ध होते. जसे की - 'साधुकारी' (चांगले काम करणारा), 'ब्रह्मचारी', 'अस्सद्धभोजी' (श्रद्धा नसताना खाणारा). स्वतःला पंडित मानणारा तो 'पंडितमानी', 'बहुस्सुतधारी' (बहुश्रुत गोष्टी धारण करणारा) इत्यादी. සාධුකරණං සාධුකාරො, සො අස්ස අත්ථීති සාධුකාරීති ඝණන්තා ඊ. चांगले करणे म्हणजे 'साधुकार', तो ज्याच्याकडे आहे तो 'साधुकारी'; येथे 'घण्' प्रत्ययान्त शब्दाला 'ई' प्रत्यय लागतो. 54. ථාවරි+ත්තර භඞ්ගුර භිදුර භාසුර භස්සරා ५४. 'थावर', 'इत्तर', 'भङ्गुर', 'भिदुर', 'भासुर' आणि 'भस्सर' हे शब्द निपाताने सिद्ध होतात. එතෙ සද්දා නිපච්චන්තෙ සීලෙ ගම්යමානෙ. ඉමිනා නිපාතනා වරපච්චයො ච ථාස්ස ථො ච, තිට්ඨති සීලෙනාති ථාවරො. ඉ=අජ්ඣෙනගතීසු[Pg.285], ත්තරපච්චයො, ගච්ඡති සීලෙනාති ඉත්තරො. භඤ්ජ=ඔමද්දනෙ, භජ්ජතෙ සයමෙව භජ්ජති වා අත්තනා අත්තානන්ති භඞ්ගුරො, කම්මෙ කත්තරි වා ගුරපච්චයො. භිජ්ජතෙ සයමෙව භින්දති වා අත්තානන්ති භිදූරො, එත්ථ කූරපච්චයො, කකාරො+නුබන්ධො. පරභඤ්ජනවිසයෙසුපි උදාහරණෙසු න හොති. තත්ථාපි කෙචි ‘‘දොසන්ධකාරභිදූරො’’ති ඉදං සන්ධාය ඉච්ඡන්ති. භාසති දිප්පතීති භාසුරො, උරපච්චයො. සරපච්චයෙ භස්සරො, ‘‘බ්යඤ්ජනෙ දීඝරස්සා’’ති රස්සො. (තෙකාලිකප්පච්චයා). शील (स्वभाव) अर्थ प्रतीत होत असताना हे शब्द निपाताने सिद्ध होतात. या निपाताने 'वर' प्रत्यय होतो आणि 'था' चा 'थ' होतो; स्वभावाने जो स्थिर राहतो तो 'थावर' (स्थावर). 'इ' धातू अध्ययन आणि गमन अर्थात आहे, 'त्तर' प्रत्यय होऊन, स्वभावाने जो जातो तो 'इत्तर' (चंचल). 'भञ्ज' धातू मर्दनाच्या अर्थात आहे; जो स्वतःच मोडतो किंवा स्वतःलाच मोडतो तो 'भङ्गुर' (भंगुर); येथे कर्म किंवा कर्ता अर्थात 'गुर' प्रत्यय होतो. जे स्वतःच फुटते किंवा स्वतःलाच फोडते ते 'भिदूर', येथे 'कूर' प्रत्यय होतो आणि 'क' चा अनुबंध होतो. दुसऱ्याला मोडण्याच्या/फोडण्याच्या विषयातील उदाहरणांमध्ये हा प्रत्यय होत नाही. तरीही काही लोक 'दोसन्धकारभिदूरो' (दोषरूपी अंधकाराचा नाश करणारा) याला अनुसरून हा प्रत्यय मानतात. जो चमकतो तो 'भासुर', येथे 'उर' प्रत्यय होतो. 'सर' प्रत्यय असताना 'भस्सर' रूप बनते, 'ब्यञ्जने दीघरस्सा' या सूत्राने र्हस्व होतो. (हे त्रैकालिक प्रत्यय आहेत). 55. කත්තරි භූතෙ ක්තවන්තු+ක්තාවී ५५. भूतकाळात कर्ता अर्थी 'क्तवन्तु' आणि 'क्तावी' हे प्रत्यय होतात. භූතෙ අත්ථෙ වත්තමානතො ක්රියත්ථා ක්තවන්තු+ක්තාවී හොන්ති කත්තරි. විජිනීති විජිතවා විජිතාවී, කානුබන්ධත්තා න වුද්ධි. ගුණවන්තු දණ්ඩිසමං. හු=හවනෙ, අග්ගිං අහවීති හුතවා හුතාවී, හුතාවිනී හුතවානී. ‘‘භූතෙ’’ති යාව ‘‘ආහාරත්ථා’’ති අධිකාරො. भूतकाळात क्रियावाचक धातूपासून कर्ता अर्थी 'क्तवन्तु' आणि 'क्तावी' प्रत्यय होतात. ज्याने जिंकले तो 'विजितवा' किंवा 'विजितावी'; 'क' चा अनुबंध असल्यामुळे वृद्धी होत नाही. हे शब्द 'गुणवन्तु' आणि 'दण्डि' शब्दांसारखे चालतात. 'हु' धातू हवनाच्या अर्थात आहे; ज्याने अग्नीमध्ये हवन केले तो 'हुतवा' किंवा 'हुतावी'; स्त्रीलिंगात 'हुताविनी' किंवा 'हुतवानी' रूपे होतात. 'भूते' या सूत्रापासून 'आहारत्था' या सूत्रापर्यंत हा अधिकार चालतो. 56. ක්තො භාවකම්මෙසුති ५६. भाव (क्रिया) आणि कर्म अर्थी 'क्त' प्रत्यय होतो. භාවෙ කම්මෙ ච භූතෙ ක්තො හොති. අසනං ආසිතං භවතා, ඤි. කරීයිත්ථාති කතො කටො භවතා, ‘‘ගමාදිරානං’’ ත්යාදිනා රලොපො. එව+මුපරිපි. आपल्याद्वारे बसणे झाले ते 'आसितं'; येथे 'ञि' चा आगम होतो. आपल्याद्वारे चटई केली गेली ती 'कतो कटो' (केलेली चटई); 'गमादिराणं' इत्यादी सूत्राने 'र' चा लोप होतो. पुढेही याचप्रमाणे समजावे. 57. කත්තරි චා+රම්භෙ ५७. आणि क्रियेच्या आरंभाच्या अर्थी कर्ता कारकात 'क्त' प्रत्यय होतो. ක්රියාරම්භෙ කත්තරික්තො හොති යථාපත්තඤ්ච, පකරීති පකතො භවං කටං. පකරීයිත්ථාති පකතො කටො භවතා. පසුපීති [Pg.286] පසුත්තො භවං. පසුපීයිත්ථාති පසුත්තං භවතා, පරරූපං. क्रियेच्या आरंभाच्या अर्थी कर्ता कारकात योग्यतेनुसार 'क्त' प्रत्यय होतो; जसे - ज्याने चटई बनवण्यास सुरुवात केली तो 'पकतो भवं कटं' (आपण चटई बनवण्यास प्रवृत्त झालात). आपल्याद्वारे चटई बनवण्यास सुरुवात केली गेली ती 'पकतो कटो भवता'. जो झोपू लागला तो 'पसुत्तो भवं' (आपण झोपलात). आपल्याद्वारे झोपणे सुरू झाले ते 'पसुत्तं भवता'; येथे पररूप होते. 58. ඨා+ස වස සිලිස සී රුහ ජර ජනීහි ५८. 'ठा', 'स', 'वस', 'सिलिस', 'सी', 'रुह', 'जर' आणि 'जनी' या धातूंपासून कर्ता अर्थी 'क्त' प्रत्यय होतो. ඨාදීහි කත්තරි ක්තො හොති යථාපත්තඤ්ච. උපට්ඨාසීති උපට්ඨීතො භවං ගුරුං. උපට්ඨීයිත්ථාති උපට්ඨිතො ගුරු භොතා, ‘‘ඨාස්සී’’ති ඨාස්ස ඉ. එවං උපාසීති උපාසිතො. උපාසීයිත්ථාති උපාසිතො. ‘‘ඤි බ්යඤ්ජනස්සා’’ති ඤි. අනුවුසි අනුවුසීයිත්ථාති වා අනුවුසීතො. ‘‘අස්සූ’’ති අස්ස උකාරො. ආපුබ්බො සිලිස=ආලිඞ්ගනෙ, ආසිලෙසි ආසිලෙසීයිත්ථාති වා ආසිලිට්ඨො. ‘‘සානන්තරස්ස තස්ස ඨො’’ති ඨෙ පරරූපං පඨමක්ඛරඤ්ච. අධිසයි අධිසීයිත්ථාති වා අධිසයිතො ඛටොපිකං භවං, අධිසයිතා ඛටොපිකා භොතා. එවං ආරුහි ආරුහීයිත්ථාති වා ආරුළ්හො රුක්ඛං භවං, ආරුළ්හො රුක්ඛො භොතා, ‘‘රුහාදීහි හො ළ චා’’ති තස්ස හකාරො පුබ්බහකාරස්ස ච ළො. අනුජීරි අනුජීරීයිත්ථාති වා අනුජිණ්ණො වසලිං භවං, අනුජිණ්ණා වසලී භොතා, ‘‘තරාදීහි රිණ්ණො’’ති ක්තස්ස රිණ්ණාදෙසො ‘‘රානුබන්ධෙ’’ත්යාදිනා අරභාගස්ස ලොපො ච. අන්වජායි අන්වජායිත්ථාති වා අනුජාතො මාණවකො මාණවිකං, අනුජාතා මාණවිකා මාණවකෙන, ‘‘ජනිස්සා’’ති නස්ස ආ. 'ठा' इत्यादी धातूंपासून कर्ता कारकात योग्यतेनुसार 'क्त' प्रत्यय होतो. ज्याने गुरूंची सेवा केली तो 'उपट्ठितो भवं गुरुं' (आपण गुरूंची सेवा केली). आपल्याद्वारे गुरूंची सेवा केली गेली ती 'उपट्ठितो गुरु भोता'; 'ठास्सी' या सूत्राने 'ठा' च्या जागी 'इ' होतो. याचप्रमाणे 'उपासी' चे 'उपासितो' आणि 'उपासीयित्था' चे 'उपासितो' होते; 'ञि ब्यञ्जनस्सा' या सूत्राने 'ञि' चा आगम होतो. 'अनुवुसि' किंवा 'अनुवुसीयित्था' चे 'अनुवुसीतो' होते; 'अस्सू' या सूत्राने 'अ' चा 'उ' कार होतो. 'आ' पूर्वपद असलेला 'सिलिस' धातू आलिंगन अर्थात आहे; 'आसिलेस' किंवा 'आसिलेसीयित्था' चे 'आसिलिट्ठो' होते. 'सानन्तरस्स तस्स ठो' या सूत्राने 'त' चा 'ठ' होतो, पररूप होते आणि पहिले अक्षर द्वित्व होते. 'अधिसयि' किंवा 'अधिसयीयित्था' चे 'अधिसयितो खटोपिकं भवं' (आपण खाटेवर निजलात) किंवा 'अधिसयिता खटोपिका भोता' होते. याचप्रमाणे 'आरुहि' किंवा 'आरुहीयित्था' चे 'आरुळ्हो रुक्खं भवं' (आपण झाडावर चढलात) किंवा 'आरुळ्हो रुक्खो भोता' होते; 'रुहादीहि हो ळ च' या सूत्राने 'त' चा 'ह' कार होतो आणि पूर्व हकाराचा 'ळ' होतो. 'अनुजीरि' किंवा 'अनुजिरीयित्था' चे 'अनुजिण्णो वसलिं भवं' किंवा 'अनुजिण्णा वसली भोता' होते; 'तरादीहि रिण्णो' या सूत्राने 'क्त' प्रत्ययाचा 'रिण्ण' आदेश होतो आणि 'रानुबन्धे' इत्यादी सूत्राने 'अर' भागाचा लोप होतो. 'अnvajayic' किंवा 'अन्वजायित्था' चे 'अनुजातो माणवको माणविकं' किंवा 'अनुजाता माणविका माणवकेन' होते; 'जनिस्सा' या सूत्राने 'न' चा 'आ' होतो. 59. ගමනත්ථා+කම්මකා+ධාරෙ ච ५९. गमन अर्थाचे धातू, अकर्मक धातू आणि आधार (अधिकरण) अर्थी 'क्त' प्रत्यय होतो. ගමනත්ථතො [Pg.287] අකම්මකතො ච ක්රියත්ථා ආධාරෙ ක්තො හොති කත්තරි ච යථාපත්තඤ්ච. යා=පාපුණනෙ, යාතවන්තො අස්මින්ති යාතං ඨානං. යාතවන්තො යාතා, යානං යාතං. එත්ථ සන්තම්පි කම්මං අනිච්ඡිතං. යායිතාති යාතො පථො. ‘‘යෙ ගත්යත්ථා, තෙ බුද්ධ්යත්ථා. යෙ බුද්ධ්යත්ථා, තෙ ගත්යත්ථා’’ති වුත්තත්තා තථලක්ඛණං යාථාවතො ආගතො අභිසම්බුද්ධොති තථාගතො ඉතිපි හොති. ආසිතවන්තො අස්මින්ති ආසිතං. ආසිතවන්තො ආසිතා. ආසන+මාසිතං. गमन अर्थाच्या आणि अकर्मक क्रियावाचक धातूंपासून आधार (अधिकरण) आणि कर्ता अर्थी योग्यतेनुसार 'क्त' प्रत्यय होतो. 'या' धातू प्राप्त होण्याच्या (गमनाच्या) अर्थात आहे; ज्या ठिकाणी गेले ते 'यातं ठाणं' (गेलेले स्थान). जे गेले ते 'याता' (गेलेले लोक), गमन म्हणजे 'यातं'. येथे कर्म विद्यमान असूनही ते अनपेक्षित (विवक्षित नसलेले) आहे. ज्या मार्गाने गेले तो 'यातो पथो' (गेलेला मार्ग). 'जे गमन अर्थाचे धातू आहेत, ते ज्ञान अर्थाचे आहेत; जे ज्ञान अर्थाचे आहेत, ते गमन अर्थाचे आहेत' असे म्हटल्यामुळे, 'तथा' लक्षणाने यथार्थपणे आलेले आणि पूर्णपणे बुद्ध झालेले ते 'तथागत' असेही रूप बनते. ज्या ठिकाणी बसले ते 'आसितं' (आसन). जे बसले ते 'आसिता' (बसलेले लोक). आसन म्हणजे 'आसितं'. 60. ආහාරත්ථා ६०. आहार (खाणे/पिणे) अर्थाच्या धातूंपासून... අජ්ඣොහාරත්ථා ආධාරෙ ක්තො හොති යථාපත්තඤ්ච. භුත්තවන්තො+ස්මින්ති භුත්තං. එවං පීතං, ‘‘ගාපාන+මී’’ති ඊ. භුඤ්ජනං භුත්තං පානං පීතං. භුඤ්ජීයිත්ථාති භුත්තො ඔදනො. එවං පීතං උදකං. අකත්තත්ථං භින්නයොගකරණං. බහුලාධිකාරා කත්තරිපි ‘‘අපිවිංසූති පීතා ගාවො’’ති හොතෙව. සිද=පාකෙ, පස්සිජ්ජීති පස්සන්නො, ‘‘ගමනත්ථ’’ දිනා ක්තො, ‘‘භිදා’’ දිනා තස්ස නො පරරූපඤ්ච. අමඤ්ඤිත්ථාති මතො. ඉච්ඡීයිත්ථාති ඉට්ඨො. අබුජ්ඣිතාති බුද්ධො, ‘‘ධො ධහභෙහී’’ති තස්ස ධො. පූජීයිත්ථාති පූජිතො, චුරාදිත්තා ණි. එවං සීලීයිත්ථාති සීලිතො. රක්ඛීයිත්ථාති රක්ඛිතො. ඛමීයිත්ථාති ඛන්තො, මස්ස නිග්ගහීතං. අක්කොච්ඡීයිත්ථාති අක්කුට්ඨො, ආස්ස රස්සො. රුස=රොසෙ, අරොසීති රුට්ඨො, ‘‘ගමනත්ථා’’ දිනා කත්තරි ක්තො. ඤිම්හි රුසිතො. හර=හරණෙ, අභි+ වි+ආපුබ්බො[Pg.288], අභිබ්යාහරීයිත්ථාති අභිබ්යාහටො. දය=දානගතිහිංසාදානෙසු, අදයීයිත්ථාති දයිතො. හස=ආලික්යෙ, අහසීති හට්ඨො. කාමීයිත්ථාති කන්තො, ‘‘ණිණාපීනං තෙසූ’’ති එත්ථ ‘‘ණිණාපීනං’’ති යොගවිභාගා චුරාදිණිලොපො. සංයමීති සංයතො. නඤපුබ්බො, න මරීති අමතො, නඤසමාසෙ නස්ස ටො. गिळणे (अज्झोहार) या अर्थी आणि आधार अर्थी 'क्त' प्रत्यय होतो, तसेच योग्यतेनुसार (यथाप्राप्त) देखील होतो. 'आम्ही भोजन केले आहे' या अर्थी 'भुत्तं' (भोजन/खाल्लेले) असा प्रयोग होतो. याचप्रमाणे 'पीतं' (पिलेले), 'गापानमी' यामध्ये 'ई' होतो. खाणे म्हणजे 'भुत्तं' आणि पिणे म्हणजे 'पीतं'. 'जे खाल्ले गेले' तो 'भुत्तो ओदनो' (खाल्लेला भात). याचप्रमाणे 'पीतं उदकं' (पिलेले पाणी). अकर्तृक अर्थासाठी भिन्नयोग (सूत्राचा विभाग) केला जातो. 'बहुलाधिकारा'मुळे कर्त्यामध्ये देखील 'अपिविंसू' या अर्थी 'पीता गावो' (पिलेल्या गाई) असा प्रयोग होतोच. सिद = शिजणे/पक्व होणे या अर्थी, 'पस्सिज्जी' (प्रसन्न झाला/पक्व झाला) म्हणजे 'पसन्नो'. 'गमणत्था' इत्यादी सूत्राने 'क्त' प्रत्यय होतो, आणि 'भिदा' इत्यादी सूत्राने 'त' चा 'न' आणि पररूप होते. 'अमञ्ञित्थ' (मानले गेले) म्हणजे 'मतो' (मानलेला). 'इच्छीयित्थ' (इच्छिले गेले) म्हणजे 'इट्ठो' (इच्छित). 'अबुज्झित' (बुद्ध झाला/जाणले गेले) म्हणजे 'बुद्धो' (बुद्ध). 'धो धहभेही' या सूत्राने 'त' चा 'ध' होतो. 'पूजीयित्थ' (पूजिले गेले) म्हणजे 'पूजितो' (पूजित), चुरादिगणाचा असल्यामुळे 'णि' प्रत्यय होतो. याचप्रमाणे 'सिलीयित्थ' म्हणजे 'सीलितो'. 'रक्खीयित्थ' म्हणजे 'रक्खितो' (रक्षित). 'खमीयित्थ' म्हणजे 'खन्तो' (क्षमा केलेला), 'म' चा निग्गहीत (अनुस्वार) होतो. 'अक्कोच्छीयित्थ' म्हणजे 'अक्कुट्ठो' (आक्रोशिलेला/निंदिलेला), 'आ' चा र्हस्व होतो. रुस = रागवणे या अर्थी, 'अरोसी' (रागावला) म्हणजे 'रुट्ठो'. 'गमणत्था' इत्यादी सूत्राने कर्त्यामध्ये 'क्त' प्रत्यय होतो. 'ञि' प्रत्यय असताना 'रुसितो' होतो. हर = हरण करणे या अर्थी, 'अभि + वि + आ' पूर्वपद असताना, 'अभिब्याहरीयित्थ' म्हणजे 'अभिब्याहटो' (उच्चारलेला). दय = दान, गती, हिंसा आणि स्वीकार या अर्थी, 'अदयीयित्थ' म्हणजे 'दयितो' (प्रिय/दया केलेला). हस = आनंद/हसणे या अर्थी, 'अहसी' म्हणजे 'हट्ठो' (हर्षित). 'कामीयित्थ' म्हणजे 'कन्तो' (कांत/प्रिय). 'णिणापीनं तेसू' या सूत्रातील 'णिणापीनं' या योगविभागाने चुरादि 'णि' चा लोप होतो. 'संयमी' म्हणजे 'संयतो' (संयत). 'नञ्' पूर्वपद असताना, 'न मरी' (जो मरत नाही) म्हणजे 'अमतो' (अमृत), नञ् समासामध्ये 'न' चा 'अ' होतो. කට්ඨං දුක්ඛං ආපන්නොති ඵලභූතෙ දුක්ඛෙ කට්ඨසද්දස්ස වත්තනතො ඵලස්ස භාවිත්තා භූතෙයෙව ක්තො. කස=ගතිහිංසාවිලෙඛනෙසු, අකසි=හිංසීති කට්ඨං. 'कट्ठं दुक्खं आपन्नो' (कष्टप्रद दुःखाला प्राप्त झालेला) यामध्ये फलभूत दुःखासाठी 'कट्ठ' शब्दाचा वापर होत असल्यामुळे, फलाचा भाव असल्यामुळे भूतकाळातच 'क्त' प्रत्यय होतो. कस = गती, हिंसा आणि नांगरणे या अर्थी, 'अकसि' (हिंसा केली) म्हणजे 'कट्ठं' (कष्ट/दुःख). 150. භිදාදිතො නො ක්ත+ක්තවන්තූනං १५०. 'भिदा' इत्यादी धातूंहून पुढील 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांच्या 'त' चा 'न' होतो. භිදාදීහි පරෙසං ක්ත+ක්තවන්තූනං තස්ස නො හොති. ආකතිගණො+යං. ‘‘ක්තො භාවකම්මෙසූ’’ති කම්මෙ උපරි සබ්බත්ථ ක්තො. භිජ්ජිත්ථොති භින්නො, තස්ස නෙ පරරූපං. අභින්දීති භින්නවා, ‘‘කත්තරි භූතෙ’’ ච්චාදිනා ක්තවන්තු. එව+මුපරිපි. ඡිජ්ජිත්ථාති ඡින්නො. අඡින්දීති ඡින්නවා. ඡද=අපවාරණෙ, ඡාදීයිත්ථාති ඡන්නො. අඡාදයීති ඡන්නවා, චුරාදිත්තා ණි, තස්ස ‘‘ණිණාපීනං තෙසූ’’ති එත්ථ ‘‘ණි’’ ඉති යොගවිභාගා ලොපො. ඛිද=අසහනෙ, ඛිජ්ජීති ඛින්නො ඛින්නවා, කත්තරි. එව+මුපරිපි. උප්පජ්ජීති උප්පන්නො උප්පන්නවා. සිද=පාකෙ, අසිජ්ජීති සින්නො සින්නවා. සද=විසරණගත්ය වසාදනාදානෙසු, සිදීති සන්නො සන්නවා. පීනීති පීනො පීනවා. සූ=පසවෙ, සූනීති සූනො. පසවීති සූනවා. දී=ඛයෙ, දීයීති දීනො දීනවා. ඩී+ලී=ආකාසගමනෙ, ඩීයීති ඩීනො ඩීනවා. ලීයි [Pg.289] ලෙයි අලීයීති ලීනො ලීනවා. අලුයීති ලූනො ලූනවා. 'भिदा' इत्यादी धातूंहून पुढील 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांच्या 'त' चा 'न' होतो. हा 'आकृतिगण' आहे. 'क्तो भावकम्मेसू' या सूत्राने कर्म अर्थी पुढे सर्वत्र 'क्त' प्रत्यय होतो. 'भिज्जित्थो' (भेदले गेले) म्हणजे 'भिन्नो' (भिन्न/तुटलेला), त्याच्या 'त' चा 'न' होऊन पररूप होते. 'अभिन्दी' म्हणजे 'भिन्नवा' (भेदणारा), 'कर्तरि भूते' इत्यादी सूत्राने 'क्तवन्तु' प्रत्यय होतो. पुढेही याचप्रमाणे समजावे. 'छिज्जित्था' म्हणजे 'छिन्नो' (छिन्न/कापलेला). 'अछिन्दी' म्हणजे 'छिन्नवा'. छद = झाकणे या अर्थी, 'छादीयित्थ' म्हणजे 'छन्नो' (झाकलेला). 'अछादयी' म्हणजे 'छन्नवा', चुरादिगणाचा असल्यामुळे 'णि' प्रत्यय होतो, त्याचा 'णिणापीनं तेसू' या सूत्रातील 'णि' या योगविभागाने लोप होतो. खिद = सहन न करणे या अर्थी, 'खिज्जी' म्हणजे 'खिन्नो' आणि कर्त्यामध्ये 'खिन्नवा' होतो. पुढेही याचप्रमाणे समजावे. 'उप्पज्जी' म्हणजे 'उप्पन्नो' (उत्पन्न झालेला) आणि 'उप्पन्नवा'. सिद = शिजणे या अर्थी, 'असिज्जी' म्हणजे 'सिन्नो' (शिजलेला) आणि 'सिन्नवा'. सद = गती, अवसाद आणि स्वीकार या अर्थी, 'सिदी' म्हणजे 'सन्नो' (थकलेला/बसलेला) आणि 'सन्नवा'. 'पीनी' म्हणजे 'पीनो' (पुष्ट) आणि 'पीनवा'. सू = प्रसवणे या अर्थी, 'सूनी' म्हणजे 'सूनो' (पुत्र/उत्पन्न झालेला). 'पसवी' म्हणजे 'सूनवा'. दी = क्षय होणे या अर्थी, 'दीयी' म्हणजे 'दीनो' (दीन/दुर्बळ) आणि 'दीनवा'. डी + ली = आकाशगमन या अर्थी, 'डीयी' म्हणजे 'डीनो' (उडलेला) आणि 'डीनवा'. 'लीयि', 'लेयि', 'अलीयी' म्हणजे 'लीनो' (लीन झालेला) आणि 'लीनवा'. 'अलुयी' म्हणजे 'लूनो' (कापलेला) आणि 'लूनवा'. 151. දාත්වි+න්නො १५१. 'दा' धातूहून पुढील 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांच्या 'त' चा 'इन्न' होतो. දාතො ක්ත+ක්තවන්තූනං තස්ස ඉන්නො හොති. අදායිත්ථාති දින්නො. අද්දීති දින්නවා. 'दा' धातूहून पुढील 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांच्या 'त' चा 'इन्न' होतो. 'अदायित्थ' (दिले गेले) म्हणजे 'दिन्नो' (दिलेला). 'अद्दी' म्हणजे 'दिन्नवा' (देणारा). 152. කිරාදීහි ණොති १५२. 'किर' इत्यादी धातूंहून 'ण' होतो. ණො. උපරි සබ්බත්ථ ක්ත+ක්තවන්තූනංති යොජෙතබ්බං. කිර=විකිරණෙ, අකිරීයිත්ථාති කිණ්ණො. අකිරීති කිණ්ණවා. අපුරීති පුණ්ණො පුණ්ණවා. අඛීයිත්ථාති ඛීණො. අඛීයීති ඛීණවා. 'ण' होतो. पुढे सर्वत्र 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांचा संबंध जोडावा. किर = विखुरणे या अर्थी, 'अकिरीयित्थ' म्हणजे 'किण्णो' (विखुरलेला). 'अकिरी' म्हणजे 'किण्णवा'. 'अपुरी' म्हणजे 'पुण्णो' (पूर्ण/भरलेला) आणि 'पुण्णवा'. 'अखीयित्थ' म्हणजे 'खीणो' (क्षीण झालेला). 'अखीयी' म्हणजे 'खीणवा'. 153. තරාදීහි රිණ්ණොති १५३. 'तर' इत्यादी धातूंहून 'त' चा 'रिण्ण' होतो. තස්ස රිණ්ණො. රකාරො අන්තසරාදිලොපත්ථො. අතරීති තිණ්ණො තිණ්ණවා. අජීරීති ජිණ්ණො ජිණ්ණවා. පරිචීයිත්ථාති චිණ්ණො. පරිචීයීති චිණ්ණවා. එත්ථ චිස්ස විකප්පවිධානත්තා පන පරිචිත+උපචිතාදයොපි සිද්ධා එව. 'त' चा 'रिण्ण' होतो. 'र' कार हा अंत्य स्वरादीच्या लोपासाठी आहे. 'अतरी' म्हणजे 'तिण्णो' (तरलेला/पार झालेला) आणि 'तिण्णवा'. 'अजिरी' म्हणजे 'जिण्णो' (जीर्ण झालेला) आणि 'जिण्णवा'. 'परिचीयित्थ' म्हणजे 'चिण्णो' (आचरलेला/एकत्रित केलेला). 'परिचीयी' म्हणजे 'चिण्णवा'. येथे 'च' चा विकल्प विधानामुळे 'परिचित', 'उपचित' इत्यादी रूपे देखील सिद्ध होतातच. 154. ගො භඤ්ජාදීහිති १५४. 'भञ्ज' इत्यादी धातूंहून 'त' चा 'ग' होतो. භඤ්ජාදිතො තස්ස ග හොති. අභඤ්ජීති භග්ගො භග්ගවා. ‘‘ගමනත්ථා’’ දිනා කත්තරි ක්තපච්චයෙ තස්ස ඉමිනා ගකාරෙ පරරූපං නිග්ගහීතලොපො ච. ලග=සඞ්ගෙ, අලගීති ලග්ගො ලග්ගවා. මුජ්ජ=මුජ්ජනෙ, නිමුජ්ජීති නිමුග්ගො නිමුග්ගවා, එත්ථ සංයොගාදිලොපො. වීජ+භයචලනෙසු, සංපුබ්බො, සංවිජ්ජීති සංවිග්ගො සංවිග්ගවා. 'भञ्ज' इत्यादी धातूंहून 'त' चा 'ग' होतो. 'अभञ्जी' म्हणजे 'भग्गो' (भंगलेला/नष्ट झालेला) आणि 'भग्गवा'. 'गमणत्था' इत्यादी सूत्राने कर्त्यामध्ये 'क्त' प्रत्यय झाल्यावर, 'त' चा या सूत्राने 'ग' कार होऊन पररूप होते आणि निग्गहीताचा (अनुस्वाराचा) लोप होतो. लग = आसक्ती/चिकटणे या अर्थी, 'अलगी' म्हणजे 'लग्गो' (लागलेला/चिकटलेला) आणि 'लग्गवा'. मुज्ज = बुडणे या अर्थी, 'निमुज्जी' म्हणजे 'निमुग्गो' (बुडालेला) आणि 'निमुग्गवा', येथे संयोगादीचा लोप होतो. वीज = भय आणि कंपन या अर्थी, 'सं' पूर्वपद असताना, 'संविज्जी' म्हणजे 'संविग्गो' (उद्विग्न/भयभीत) आणि 'संविग्गवा'. 155. සුසා ඛොති १५५. 'सुस' धातूहून पुढील 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांच्या 'त' चा 'ख' होतो. සුසතො [Pg.290] පරෙසං ක්ත+ක්තවන්තූනං තස්ස ඛො හොති. සුස=සොසෙ. සුස්සීති සුක්ඛො සුක්ඛවා. 'सुस' धातूहून पुढील 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांच्या 'त' चा 'ख' होतो. सुस = सुकणे या अर्थी, 'सुस्सी' म्हणजे 'सुक्खो' (सुकलेला) आणि 'सुक्खवा'. 156. පචා කො १५६. 'पच' धातूहून पुढील 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांच्या 'त' चा 'क' होतो. පචා පරෙසං ක්ත+ක්තවන්තූනං තස්ස කො හොති. පච්චීති පක්කො. පචීති පක්කවා. 'पच' धातूहून पुढील 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांच्या 'त' चा 'क' होतो. 'पच्ची' म्हणजे 'पक्को' (पक्व झालेला/शिजलेला). 'पची' म्हणजे 'पक्कवा'. 157. මුචා වාති १५७. 'मुच' धातूहून पुढील 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांच्या 'त' चा विकल्प करून 'क' होतो. මුචා පරෙසං ක්ත+ක්තවන්තූනං තස්ස කො වා හොති. මුච=මොචනෙ, මුච්චීති මුක්කො මුත්තො. අමුචීති මුක්කවා මුත්තවා. සක්කො-තිණ්වාදීසු ‘‘ඉ භී කා’’ දිනා සිද්ධං. අසක්ඛීති සක්කො. ක්ත+ක්තවන්තූසු සත්තො සත්තවාත්වෙව හොති. 'मुच' धातूहून पुढील 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांच्या 'त' चा विकल्प करून 'क' होतो. मुच = मुक्त करणे या अर्थी, 'मुच्ची' म्हणजे 'मुक्को' किंवा 'मुत्तो' (मुक्त झालेला). 'अमुची' म्हणजे 'मुक्कवा' किंवा 'मुत्तवा'. 'सक्को' हे रूप तिण्-प्रत्यय इत्यादींमध्ये 'इ भी का' इत्यादी सूत्राने सिद्ध होते. 'असक्खी' म्हणजे 'सक्को' (समर्थ). 'क्त' आणि 'क्तवन्तु' प्रत्ययांमध्ये 'सत्तो' आणि 'सत्तवा' असेच रूप होते. 106. මුහ+බහානඤ්ච තෙ කානුබන්ධෙ+ත්වෙ १०६. 'मुह', 'बह' आणि 'दुह' धातूंच्या स्वराचा दीर्घ होतो, 'त' कार आधी असताना, 'क' अनुबंध असलेल्या प्रत्ययांमध्ये, 'त्वान' आणि 'त्वा' प्रत्यय वगळून. මුහ+බහානං දුහිස්ස ච දීඝො හොති තකාරාදො කානුබන්ධෙ ත්වාන+ත්වාවජ්ජිතෙ. මුහ=වෙචිත්තෙ, බහ+බ්රහ+බ්රූහ වුද්ධියං. මුය්හිත්ත බය්හිත්ථාති මූළ්හො බාළ්හො, ‘‘ගමනත්ථා’’ දිනා අකම්මකත්තා කත්තරි ක්තෙ දීඝො ‘‘රුහාදීහි හො ළ චා’’ති තස්ස හො ච හස්ස ළො ච හොති. එවං ගූළ්හො. ‘‘කානුබන්ධෙ+ත්වෙ’’ති යාව ‘‘සාසස්ස සිස වා’’ ත්ය+ධිකාරො. 'मुह', 'बह' आणि 'दुह' धातूंच्या स्वराचा दीर्घ होतो, 'त' कार आधी असताना, 'क' अनुबंध असलेल्या प्रत्ययांमध्ये, 'त्वान' आणि 'त्वा' प्रत्यय वगळून. मुह = व्याकुळता/भ्रम या अर्थी, बह, ब्रह, ब्रूह = वृद्धी या अर्थी. 'मुय्हित्त', 'बय्हित्थ' म्हणजे 'मूळ्हो' (मोहित झालेला) आणि 'बाळ्हो' (अतिशय/दृढ). 'गमणत्था' इत्यादी सूत्राने कर्त्यामध्ये 'क्त' प्रत्यय झाल्यावर दीर्घ होतो, आणि 'रुहादीहि हो ळ च' या सूत्राने 'त' चा 'ह' आणि 'ह' चा 'ळ' होतो. याचप्रमाणे 'गूळ्हो' (गुप्त) होतो. 'कानुबन्धेत्वे' हा अधिकार 'सासस्स सिस वा' या सूत्रापर्यंत चालतो. 107. වහස්සු+ස්ස १०७. 'वह' धातूच्या 'व' चा 'उ' होतो आणि तो दीर्घ होतो, 'त' कार आधी असताना. වහස්ස උස්ස දීඝො හොති තෙ. වුය්හිත්ථාති වූළ්හො, ‘‘අස්සූ’’ති උකාරෙ ඉමිනා දීඝො. 'वह' धातूच्या 'व' चा 'उ' होतो आणि तो 'त' कार आधी असताना दीर्घ होतो. 'वुय्हित्थ' म्हणजे 'वूळ्हो' (वहन केलेला), 'अस्सू' या सूत्राने उकार झाल्यावर या सूत्राने तो दीर्घ होतो. 108. ධාස්ස හි १०८. 'धा' धातूचा 'हि' होतो, 'त' कार आधी असताना. ධා=ධාරණෙ+තිමස්ස [Pg.291] හි හොති වා තෙ. නිධීයිත්ථාති නිහිතො. නිදහීති නිහිතවා නිහිතාවී. धा = धारण करणे या अर्थी असलेल्या या धातूचा 'त' कार आधी असताना विकल्प करून 'हि' होतो. 'निधीयित्थ' म्हणजे 'निहितो' (ठेवलेला/स्थापित). 'निदही' म्हणजे 'निहितवा' किंवा 'निहितावी'. 109. ගමාදිරානං ලොපො+න්තස්ස १०९. 'गम' इत्यादी आणि 'र' कारान्त धातूंच्या अंत्य वर्णाचा लोप होतो, 'त' कार आधी असताना. ගමාදීනං රකාරන්තානඤ්ච අන්තස්ස ලොපො හොති තෙ. අගමීති ගතො. ඛඤ්ඤිත්ථාති ඛතො, කම්මෙ. එවං හඤ්ඤිත්ථාති හතො. තන=විත්ථාරෙ, තඤ්ඤිත්ථාති තතො. යම=උපරමෙ, සංයමීති සඤ්ඤතො, ‘‘ගමනත්ථා’’ දිනා කත්තරි ක්තො, ‘‘යෙ සංස්සා’’ති නිග්ගහීතස්ස ඤො පුබ්බරූපඤ්ච. එවං අරමීති රතො. කරීයිත්ථාති කතො. 'गम' इत्यादी आणि 'र' कारान्त धातूंच्या अंत्य वर्णाचा लोप होतो, 'त' कार आधी असताना. 'अगमी' म्हणजे 'गतो' (गेलेला). 'खञ्ञित्थ' म्हणजे 'खतो' (खणलेला), कर्म अर्थी. याचप्रमाणे 'हञ्ञित्थ' म्हणजे 'हतो' (मारलेला). तन = विस्तार करणे या अर्थी, 'तञ्ञित्थ' म्हणजे 'ततो' (विस्तारलेला). यम = उपराम/संयम या अर्थी, 'संयमी' म्हणजे 'सञ्ञतो' (संयत), 'गमणत्था' इत्यादी सूत्राने कर्त्यामध्ये 'क्त' प्रत्यय होतो, आणि 'ये संस्सा' या सूत्राने निग्गहीताचा (अनुस्वाराचा) 'ञ' होऊन पूर्वरूप होते. याचप्रमाणे 'अरमी' म्हणजे 'रतो' (रक्त/लीन). 'करीयित्थ' म्हणजे 'कतो' (केलेला). 110. වචාදීනං වස්සු+ට වා ११०. 'वच' इत्यादी धातूंच्या 'व' चा विकल्प करून 'उ' होतो, 'त' कार आधी असताना, 'क' अनुबंध नसलेल्या प्रत्ययांमध्ये. වචාදීනං වස්ස උට වා හොති කානුබන්ධෙ අත්වෙ. වුච්චිත්ථාති උත්තං. අස්ස උ වුත්තං, උභයත්ථ පරරූපං. වස=නිවාසෙ, වසනං අවසි වසිංසු එත්ථාති වා උත්ථං වුත්ථං, ‘‘ගමනත්ථා’’ දිනා ක්තො, ‘‘සාස වස සංස සංසා ථො’’ති තස්ස ථො. 'वुच्चित्थ' म्हणजे 'उत्तं' (बोललेले). याच्या 'व' चा 'उ' होऊन 'वुत्तं' होते, दोन्ही ठिकाणी पररूप होते. वस = निवास करणे या अर्थी, राहणे किंवा 'अवसि' (राहिला), 'वसिंसू' (राहिले) यामध्ये 'उत्थं' किंवा 'वुत्थं' (राहिलेला) होते. 'गमणत्था' इत्यादी सूत्राने 'क्त' प्रत्यय होतो, आणि 'सास वस संस संसा थो' या सूत्राने 'त' चा 'थ' होतो. 112. වද්ධස්ස වා ११२. 'वद्ध' धातूच्या 'अ' चा विकल्प करून 'उ' होतो, 'त' कार आधी असताना, 'क' अनुबंध नसलेल्या प्रत्ययांमध्ये. වද්ධස්ස අස්ස වා උ හොති කානුබන්ධෙ අත්වෙ. අවද්ධීති වුද්ධො වද්ධො, කත්තරි ක්තෙ ‘‘ධො ධ+හභෙහී’’ති තස්ස ධො, තතියක්ඛරදො ච සංයොගාදිලොපො ච. වුත්තීති ‘‘සබ්බාදයො වුත්තිමත්තෙ’’ති යොගවිභාගා අස්ස උ. වත්තීතිපි යථාලක්ඛණං. 'अवद्धी' म्हणजे 'वुद्धो' (वृद्ध/वाढलेला) किंवा 'वद्धो'. कर्त्यामध्ये 'क्त' प्रत्यय झाल्यावर 'धो धहभेही' या सूत्राने 'त' चा 'ध' होतो, तिसरा अक्षर (द) होतो आणि संयोगादीचा लोप होतो. 'वुत्ती' हे रूप 'सब्बादयो वृत्तिमत्ते' या योगविभागाने 'अ' चा 'उ' होऊन सिद्ध होते. नियमानुसार 'वत्ती' असेही रूप होते. 113. යජස්ස යස්ස ටි+යී ११३. 'यज' धातूच्या 'य' चा 'इ' होतो, 'त' कार आधी असताना. යජස්ස [Pg.292] යස්ස ටි+යී හොන්ති කානුබන්ධෙ අත්වෙ. යජනංති ක්තො, ‘‘පුච්ඡාදිතො’’ති තස්ස ඨෙ පරරූපාදිම්හි කතෙ ඉට්ඨං යිට්ඨං. यज् धातूच्या 'य' च्या जागी 'इ' आणि 'यि' होतात, 'क' अनुबंध असलेल्या प्रत्ययामध्ये 'अत्व' नसताना. 'यजन' या अर्थी 'क्त' प्रत्यय लावल्यास, 'पुच्छादितो' या सूत्राने 'त' चा 'ठ' होऊन आणि पररूप इत्यादी कार्ये झाल्यावर 'इट्ठं' आणि 'यिट्ठं' अशी रूपे बनतात. 114. ඨාස්සි ११४. ठास्स इ ඨාස්ස ඉ හොති කානුබන්ධෙ අත්වෙ. අට්ඨාසීති ඨිතො. 'ठा' (स्था) धातूच्या जागी 'इ' होतो, 'क' अनुबंध असलेल्या प्रत्ययामध्ये 'अत्व' नसताना. 'अट्ठासि' म्हणजे 'ठितो' (स्थित/उभा असलेला). 115. ගා+පාන+මී ११५. गा-पान-मी ගා+පාන+මී හොති කානුබන්ධෙ අත්වෙ. ගානං ගීතං. පානං පීතං. බහුලාධිකාරා පිත්වා. 'गा' आणि 'पा' धातूंच्या जागी 'ई' होतो, 'क' अनुबंध असलेल्या प्रत्ययामध्ये 'अत्व' नसताना. 'गान' म्हणजे 'गीतं' (गालेले). 'पान' म्हणजे 'पीतं' (पिलेले). बहुल अधिकाराने 'पित्वा' (पिऊन) असे रूप होते. 116. ජනිස්සා ११६. जनिस्सा ජනිස්ස ආ හොති කානුබන්ධෙ අත්වෙ. අජනීති ජාතො, ‘‘ඡට්ඨියන්තස්සා’’ති අන්තස්ස ආ හොති. 'जनि' (जन्) धातूच्या जागी 'आ' होतो, 'क' अनुबंध असलेल्या प्रत्ययामध्ये 'अत्व' नसताना. 'अजनि' म्हणजे 'जातो' (जन्माला आलेला), 'छट्ठियन्तस्सा' या सूत्राने अन्त्य स्वराच्या जागी 'आ' होतो. 117. සාසස්ස සිස වා ११७. सासस्स सिस वा සාසස්ස සිස හොති කානුබන්ධෙ අත්වෙ. සාසනංති ක්තො, තස්ස ‘‘සාස වස සංස සසා ථො’’ති ථෙ පරරූපං පඨමක්ඛරො ච, ‘‘ත+ථ+න+රා’’ දිනා තස්ස ටො. ථස්ස ඨො, සිට්ඨං. අඤ්ඤත්ර සත්ථං. ‘‘ගුහාදීහි යක’’ ඉති යකපච්චයෙ සාසීයතීති සිස්සො. උම්හි සාසියො. 'सास्' धातूच्या जागी 'सिस' होतो, 'क' अनुबंध असलेल्या प्रत्ययामध्ये 'अत्व' नसताना. 'सासन' म्हणजे 'क्त' प्रत्यय लागल्यावर, त्याला 'सास वस संस ससा थो' या सूत्राने 'थ' झाल्यावर, पररूप आणि पहिला अक्षर लोप होऊन, 'त-थ-न-रा' इत्यादी सूत्राने 'त' चा 'ट' होतो. 'थ' चा 'ठ' होऊन 'सिट्ठं' रूप बनते. इतर ठिकाणी 'सत्थं' रूप बनते. 'गुहादीहि यक' या सूत्राने 'यक' प्रत्यय लागल्यास 'सासीयति' पासून 'सिस्सो' (शिष्य) रूप बनते. 'उ' प्रत्यय लागल्यास 'सासियो' रूप बनते. 140. සානන්තරස්ස තස්ස ඨො १४०. सानन्तरस्स तस्स ठो සකාරන්තා ක්රියත්ථා පරස්සා+නන්තරස්ස තස්ස ඨ හොති. තුස්සීති තුට්ඨො, ‘‘ගමනත්ථා’’ දිනා ක්තෙ ඉමිනා තස්ස ඨෙ [Pg.293] පරරූපාදි. එවං තුට්ඨවා. තබ්බ+ක්තීසු තොසනං තුට්ඨබ්බං, ‘‘අඤ්ඤත්රාපී’’ති ඔකාරාභාවො. එවං තුට්ඨි, කානුබන්ධත්තා න වුද්ධි. सकारान्त क्रियावाचक धातूनंतर लगेच येणाऱ्या 'त' च्या जागी 'ठ' होतो. 'तुस्सि' (तुष्) पासून 'तुट्ठो' (संतुष्ट) रूप बनते, 'गमणत्था' इत्यादी सूत्राने 'क्त' प्रत्यय लागल्यावर या सूत्राने 'त' चा 'ठ' होऊन पररूप इत्यादी कार्ये होतात. याचप्रमाणे 'तुट्ठवा' रूप बनते. 'तब्ब' आणि 'क्ति' प्रत्ययांमध्ये 'तोसन' (संतोष) अर्थी 'तुट्ठब्बं' रूप बनते, 'अञ्ञत्रापि' या सूत्राने ओ-कार होत नाही. याचप्रमाणे 'तुट्ठि' रूप बनते, 'क' अनुबंध असल्यामुळे वृद्धी होत नाही. 141. කසස්සි+ම ච වා १४१. कसस्सिम च वा කසස්මා පරස්සා+නන්තරස්ස තස්ස ඨ හොති කසස්ස වා ඉම ච. කසීයිත්ථාති කිට්ඨං. කිට්ඨාදිං විය දුප්පසුං, කම්මෙ ක්තො. ඉමාභාවෙ කට්ඨං, අකට්ඨපාකිමං සාලිං. 'कस्' (नांगरणे) धातूनंतर लगेच येणाऱ्या 'त' च्या जागी 'ठ' होतो आणि 'कस्' च्या जागी विकल्पेकरून 'इम' होतो. 'कसीयित्थ' (नांगरले गेले) या अर्थी 'किट्ठं' (पिकलेले शेत) रूप बनते. 'किट्ठ' इत्यादी प्रमाणे 'दुप्पसुं' रूप बनते, कर्मणी प्रयोगात 'क्त' प्रत्यय होतो. 'इम' चा अभाव असताना 'कट्ठं' (नांगरलेले) रूप बनते, जसे की 'अकट्ठपाकिमं सालिं' (न नांगरता पिकलेला शाली भात). 142. ධස්තො+ත්රස්තා १४२. धस्तो-त्रस्ता එතෙ සද්දා නිපච්චන්තෙ. ධංස+ධංසනෙ, ධංසීයිත්ථාති ධස්තො, බින්දුලොපො. උත්රසීති ඔත්රස්තො. हे शब्द निपातनाने सिद्ध होतात. 'धंस' (नाश पावणे) धातूपासून 'धंसीयित्थ' या अर्थी 'धस्तो' रूप बनते, येथे अनुस्वाराचा (बिंदूचा) लोप होतो. 'उत्रसि' (घाबरला) या अर्थी 'ओत्रस्तो' रूप बनते. 143. පුච්ඡාදිතො १४३. पुच्छादितो පුච්ඡාදීහි පරස්සා+නන්තරස්ස තස්ස ඨ හොති. පුච්ඡීයිත්ථාති පුට්ඨො. භජ්ජ=පාකෙ, භජීයිත්ථාති භට්ඨො, සංයොගාදිලොපො. යජිත්ථාති යිට්ඨො, ‘‘යජස්ස යස්ස ටි+යී’’ති යි. 'पुच्छीयित्थ' (विचारले गेले) या अर्थी 'पुट्ठो' (विचारलेला) रूप बनते. 'भज्ज' (भाजणे) धातूपासून 'भजीयित्थ' या अर्थी 'भट्ठो' रूप बनते, येथे संयोगादीचा लोप होतो. 'यजित्थ' (यज्ञ केला) या अर्थी 'यिट्ठो' रूप बनते, 'यजस्स यस्स टि-यी' या सूत्राने 'यि' होतो. 144. සාස වස සංස සසා ථො १४४. सास वस संस ससा थो එතෙහි පරස්සා+නන්තරස්ස තස්ස ථ හොති. සාසනං සාසීයිත්ථාති වා සත්ථං. වසනං වුත්ථං, ‘‘අස්සූ’’ති උ. පසංසනං පසංසීයිත්ථාති වා පසත්ථං. සස=ගති+හිංසා+පාණනෙසු, සසනං ගමනං හිංසනං ජීවනඤ්ච සත්ථං. අනුසාසීයිත්ථාති අනුසිට්ඨො, ත්ථස්ස ට්ඨො. या धातूंनंतर लगेच येणाऱ्या 'त' च्या जागी 'थ' होतो. 'सासन' किंवा 'सासीयित्थ' या अर्थी 'सत्थं' रूप बनते. 'वसन' (राहणे) पासून 'वुत्थं' रूप बनते, 'अस्सू' या सूत्राने 'उ' होतो. 'पसंसन' (प्रशंसा करणे) किंवा 'पसंसीयित्थ' या अर्थी 'पसत्थं' रूप बनते. 'सस्' (गती, हिंसा आणि प्राणन या अर्थी) धातूपासून 'ससन' म्हणजे गमन, हिंसा आणि जीवन या अर्थी 'सत्थं' रूप बनते. 'अनुसासीयित्थ' (अनुशासन केले गेले) या अर्थी 'अनुसिट्ठो' रूप बनते, येथे 'त्थ' च्या जागी 'ट्ठ' होतो. 145. ධො ධ+හ+තෙහි १४५. धो ध-ह-तेहि ධකාර [Pg.294] හකාර භකාරන්තෙහි පරස්ස තස්ස ධ හොති. වද්ධිත්ථාති කම්මෙ ක්තෙ තස්ස ධකාරාදිම්හි ච ‘‘වද්ධස්ස වා’’ති උකාරෙ කතෙ සංයොගාදිලොපො, වුද්ධො. දුය්හිත්ථාති දුද්ධං. ලභීයිත්ථාති ලද්ධං. धकार, हकार आणि भकार अन्त्य असलेल्या धातूंनंतर येणाऱ्या 'त' च्या जागी 'ध' होतो. 'वड्ढित्थ' (वाढला) या अर्थी कर्मणी प्रयोगात 'क्त' प्रत्यय लागल्यावर, त्याच्या धकारादीच्या जागी आणि 'वड्ढस्स वा' या सूत्राने 'उ' कार झाल्यावर, संयोगादीचा लोप होऊन 'वुद्धो' (वृद्ध) रूप बनते. 'दुय्हित्थ' (दुभले गेले) या अर्थी 'दुद्धं' रूप बनते. 'लभीयित्थ' (मिळाले) या अर्थी 'लद्धं' रूप बनते. 146. දහා ඪො १४६. दहा ढो දහා පරස්සා+නන්තරස්ස තස්ස ඪ හොති. දය්හිත්ථාති දඩ්ඪො, පරරූපාදිම්හි කතෙ ‘‘චතුත්ථදුතියෙ’’ ච්චාදිනා ඩකාරො. 'दह' (जळणे) धातूनंतर लगेच येणाऱ्या 'त' च्या जागी 'ढ' होतो. 'दय्हित्थ' (जळाले गेले) या अर्थी 'दड्ढो' (जळालेला) रूप बनते, पररूप इत्यादी कार्ये झाल्यावर 'चतुत्थदुतिये' इत्यादी सूत्राने 'ड' कार होतो. 147. බහස්සු+ම ච १४७. बहस्सु-म च බහා පරස්සා+නන්තරස්ස තස්ස ඪ හොති බහස්සු+ම ච ඪසන්නියොගෙන. බහ+බ්රහ+බ්රූහ=වුද්ධියං. අබහීති බුඩ්ඪො. 'बह' धातूनंतर लगेच येणाऱ्या 'त' च्या जागी 'ढ' होतो आणि 'ढ' च्या संयोगाने 'बह' च्या जागी 'उ' आणि 'म' होतो. 'बह', 'ब्रह', 'ब्रूह' हे वृद्धी (वाढणे) या अर्थी आहेत. 'अबहि' या अर्थी 'बुड्ढो' (वृद्ध) रूप बनते. 148. රුහාදීහි හො ළ ච १४८. रुहादीहि हो ळ च රුහාදීහි පරස්සා+නන්තරස්ස තස්ස හ හොති ළො ච+න්තස්ස. ආරුහීති ආරුළ්හො. ගුය්හිත්ථාති ගුළ්හො. අබහීති බාළ්හො. ද්වීසු ‘‘මුහබහා’’ දිනා දීඝො. 'रुह' इत्यादी धातूंनंतर लगेच येणाऱ्या 'त' च्या जागी 'ह' होतो आणि अन्त्य वर्णाच्या जागी 'ळ' होतो. 'आरुहि' (चढला) या अर्थी 'आरुळ्हो' रूप बनते. 'गुय्हित्थ' (गुप्त राहिले) या अर्थी 'गुळ्हो' रूप बनते. 'अबहि' या अर्थी 'बाळ्हो' रूप बनते. या दोन्हीमध्ये 'मुहबहा' इत्यादी सूत्राने दीर्घ होतो. 149. මුහා වාති १४९. मुहा वा ක්තතස්ස හකාරො අන්තස්ස වා ළො ච. අමොහීති මුළ්හො, මුද්ධො, තස්ස ධො. (අතීතකාලිකපච්චයවිධානං). 'क्त' प्रत्ययाच्या 'त' च्या जागी 'ह' होतो आणि अन्त्य वर्णाच्या जागी विकल्पेकरून 'ळ' होतो. 'अमोहि' (मोहित झाला) या अर्थी 'मुळ्हो' किंवा 'मुद्धो' रूप बनते, दुसऱ्या रूपामध्ये 'त' च्या जागी 'ध' होतो. (येथे भूतकाळी प्रत्ययांचे विधान समाप्त झाले). 64. න්තො කත්තරි වත්තමානෙ ६४. न्तो कत्तरि वत्तमाने වත්තමානත්ථෙ [Pg.295] වත්තමානතො ක්රියත්ථා න්තො හොති කත්තරි. තිට්ඨතීති තිට්ඨන්තො, ‘‘කත්තරි ලො’’ති ලො, ‘‘ඨාපානං තිට්ඨපිවා’’ති තිඨාදෙසො. කත්තරි මාන+න්ත+ත්යාදිසු ඉමිනාව ලො. वर्तमानकाळात क्रियावाचक धातूपासून कर्तरी प्रयोगात 'न्त' प्रत्यय होतो. 'तिट्ठति' (उभा राहतो) या अर्थी 'तिट्ठन्तो' रूप बनते, 'कत्तरि लो' या सूत्राने 'ल' (लकार) होतो, 'ठापानां तिट्ठपिवा' या सूत्राने 'तिट्ठ' आदेश होतो. कर्तरी प्रयोगात 'मान', 'न्त', 'ति' इत्यादी प्रत्ययांमध्ये याच सूत्राने 'ल' चा लोप होतो. 65. මානොති ६५. मानो කත්තරි මානො. තිට්ඨමානො. कर्तरी प्रयोगात 'मान' प्रत्यय होतो. जसे की, 'तिट्ठमानो' (उभा असलेला). 66. භාවකම්මෙසුති ६६. भावकम्मेसु භාවකම්මෙසු මානො. ඨානං ඨීයමානං. ‘‘ක්යො භාවකම්මෙස්ව+පරොක්ඛෙසු මාන+න්ත+ත්යාදීසූ’’ති භාවෙ කම්මෙ ච ක්යො. ‘‘ක්යස්සා’’ති ඊම. පචීයතීති පච්චමා නො. ක්යෙ පුබ්බරූපං. भाव आणि कर्म प्रयोगात 'मान' प्रत्यय होतो. 'ठानं' (स्थान) या अर्थी 'ठीयमानं' रूप बनते. 'क्यो भावकम्मेस्वपरोक्खेसु मानन्तत्यादीसू' या सूत्राने भाव आणि कर्म प्रयोगात 'क्य' प्रत्यय होतो. 'क्यस्सा' या सूत्राने 'ईम' होतो. 'पचीयति' (शिजवले जाते) या अर्थी 'पच्चमानो' रूप बनते. 'क्य' प्रत्यय असताना पूर्वरूप होते. 67. තෙ ස්සපුබ්බා+නාගතෙ ६७. ते स्सपुब्बानागते අනාගතෙ අත්ථෙ වත්තමානතො ක්රියත්ථා තෙන්තමානා ස්සපුබ්බා හොන්ති, ලෙ ආස්ස ලොපො, ඨස්සතීති ඨස්සන්තො ඨස්සමානො. ඨීයිස්සතීති ඨීයිස්සමානං, ක්යෙ ඊ, ‘‘ඤිබ්යඤ්ජනස්සා’’ති ඤි. අස්ස ත්යාදිවිසයත්තා ‘‘ආඊස්සා’’ දිනා ඉඤ න හොති, අඊහි සහචරිතත්තා ස්සාස්ස. පච්චිස්සතීති පච්චිස්සමානො ඔදනො. ‘‘රා නස්ස ණො’’ති ණෙ පත්තෙ – भविष्यकाळात क्रियावाचक धातूपासून 'स्स' पूर्वी असलेले 'न्त' आणि 'मान' प्रत्यय होतात, 'ल' चा लोप होतो. 'ठस्सति' (उभा राहील) या अर्थी 'ठस्सन्तो' आणि 'ठस्समानो' रूपे बनतात. 'ठीयिस्सति' या अर्थी 'ठीयिस्समानं' रूप बनते, 'क्य' प्रत्यय असताना 'ई' होतो, 'ञिब्यञ्जनस्सा' या सूत्राने 'ञि' होतो. 'अ' चा 'ति' इत्यादी विषयांमध्ये 'आईस्सा' इत्यादी सूत्राने 'इञ' होत नाही, 'अ' आणि 'इ' यांच्या सहचर्यामुळे 'स्स' चे कार्य होते. 'पच्चिस्सति' या अर्थी 'पच्चिस्समानो ओदनो' (शिजणारा भात) रूप बनते. 'रा नस्स णो' या सूत्राने 'ण' प्राप्त झाला असता - 5,172. න න්ත+මාන+ත්යාදීනං ५,१७२. न नन्तमानत्यादीनं රන්තතො [Pg.296] පරෙසං න්ත+මාන+ත්යාදීනං නස්ස ණො න හොති. කරොතීති කරොන්තො කුරුමානො, ‘‘තනාදිත්වො’’ති ඔ. 'र' कारान्त धातूनंतर yeणाऱ्या 'न्त', 'मान', 'ति' इत्यादी प्रत्ययांमधील 'न' चा 'ण' होत नाही. 'करोति' (करतो) या अर्थी 'करन्तो' आणि 'कुरुमानो' रूपे बनतात, 'तनादित्वो' या सूत्राने 'ओ' होतो. 5,173. ගම යමි+සාස දිසානං වා ච්ඡඞ ५,१७३. गम यमि-सास दिसानं वा च्छङ එතෙසං වා ච්ඡඞ හොති න්ත+මාන+ත්යාදීසු. ඞ-නුබන්ධත්තා අන්තස්ස හොති, ගච්ඡන්තො ගච්ඡමානො. යම=උපරමෙ, යච්ඡන්තො යච්ඡමානො. ඉච්ඡන්තො ඉච්ඡමානො. ආස=උපවෙසනෙ, අච්ඡන්තො අච්ඡමානො, ‘‘බ්යඤ්ජනෙ’’ච්චාදිනා රස්සො. දිස=අතිසජ්ජනෙ, දිච්ඡන්තො දිච්ඡමානො. වවත්ථිතවිභාසත්තා වාසද්දස්ස අඤ්ඤපච්චයෙසු ච ක්වචි, ඉච්ඡීයතීති ඉච්ඡිතබ්බං, ඉච්ඡනං ඉච්ඡා, ‘‘ඉත්ථිය+මණා’’ දිනා අප්පච්චයො. ඉච්ඡිතං, ඉච්ඡිතබ්බං, ඉච්ඡිතුං. අඤ්ඤෙසඤ්ච යොගවිභාගා, පවෙච්ඡන්තො. यांच्या जागी 'न्त', 'मान' इत्यादी प्रत्यय असताना 'च्छ' (ccha) आदेश होतो. 'ङ' अनुबंध असल्यामुळे अंत्य स्वराच्या जागी होतो, जसे की - गच्छन्तो (gacchanto), गच्छमानो (gacchamāno). 'यम' (yama) धातू उपरम (थांबणे) अर्थी असताना - यच्छन्तो (yacchanto), यच्छमानो (yacchamāno). इच्छन्तो (icchanto), इच्छमानो (icchamāno). 'आस' (āsa) धातू उपवेशन (बसणे) अर्थी असताना - अच्छन्तो (acchanto), अच्छमानो (acchamāno), 'ब्यञ्जने' (byañjane) इत्यादी सूत्राने र्हस्व होतो. 'दिस' (disa) धातू अतिसर्जन (दान देणे) अर्थी असताना - दिच्छन्तो (dicchanto), दिच्छमानो (dicchamāno). 'वा' शब्दाच्या व्यवस्थितविभाषात्वामुळे इतर प्रत्ययांमध्येही कधीकधी (हा आदेश होतो), जसे की - 'इच्छीयतीति इच्छितब्बं' (icchīyatīti icchitabbaṃ), 'इच्छनं इच्छा' (icchanaṃ icchā), 'इत्थिय+मणा' (itthiya+maṇā) इत्यादी सूत्राने 'अ' प्रत्यय होतो. इच्छितं (icchitaṃ), इच्छितब्बं (icchitabbaṃ), इच्छितुं (icchituṃ). आणि इतरांच्या बाबतीत योगविभागामुळे 'पवेच्छन्तो' (pavecchanto) असे होते. 174. ජර+මරාන+මීයඞ १७४. जर आणि मर धातूंच्या जागी 'ईयङ' (īyaṅa) आदेश होतो. එතෙස+මීයඞ වා හොති න්ත+මාන+ත්යාදීසු. ජීයන්තො. ‘‘ජරසදා’’ දිච්චාදිනා ඊම. ජීරන්තො. ජීයමානො ජීරමානො. මීයන්තො මරන්තො, මීයමානො මරමානො. 'न्त', 'मान' इत्यादी प्रत्यय असताना यांच्या जागी विकल्पेकरून 'ईयङ' (īyaṅa) आदेश होतो. जसे की - जीयन्तो (jīyanto). 'जरसदा' (jarasadā) इत्यादी सूत्राने 'ईम' (īma) किंवा 'ईर' (īra) होऊन - जीरन्तो (jīranto). जीयमानो (jīyamāno), जीरमानो (jīramāno). मीयन्तो (mīyanto), मरन्तो (maranto); मीयमानो (mīyamāno), मरमानो (maramāno). 175. ඨාපානං තිට්ඨපිවා १७५. 'ठा' (ṭhā) आणि 'पा' (pā) धातूंच्या जागी अनुक्रमे 'तिट्ठा' (tiṭṭha) आणि 'पिव' (piva) आदेश होतात. ඨාපානං තිට්ඨපිවා හොන්ති වා න්තාදීසු. තිට්ඨන්තො, තිට්ඨමානො. පිවන්තො පිවමානො. 'न्त' इत्यादी प्रत्यय असताना 'ठा' (ṭhā) आणि 'पा' (pā) धातूंच्या जागी विकल्पेकरून 'तिट्ठा' (tiṭṭha) आणि 'पिव' (piva) आदेश होतात. जसे की - तिट्ठन्तो (tiṭṭhanto), तिट्ठमानो (tiṭṭhamāno). पिवन्तो (pivanto), पिवमानो (pivamāno). 176. ගම+වද+දානං ඝම්ම+වජ්ජ+දජ්ජා १७६. 'गम' (gama), 'वद' (vada) आणि 'दा' (dā) धातूंच्या जागी अनुक्रमे 'घम्म' (ghamma), 'वज्ज' (vajja) आणि 'दज्ज' (dajja) आदेश होतात. ගමාදීනං [Pg.297] ඝම්මාදයො වා හොන්ති න්තාදීසු. ඝම්මන්තො ගච්ඡන්තො, වජ්ජන්තො වදන්තො, දජ්ජන්තො දදන්තො. 'न्त' इत्यादी प्रत्यय असताना 'गम' (gama) इत्यादी धातूंच्या जागी विकल्पेकरून 'घम्म' (ghamma) इत्यादी आदेश होतात. जसे की - घम्मन्तो (ghammanto) किंवा गच्छन्तो (gacchanto); वज्जन्तो (vajjanto) किंवा वदन्तो (vadanto); दज्जन्तो (dajjanto) किंवा ददन्तो (dadanto). 177. කරස්ස සොස්ස කුබ්බ කුරු කයිරා १७७. 'कर' (kara) धातूच्या जागी 'सोस्स' (sossa), 'कुब्ब' (kubba), 'कुरु' (kuru) आणि 'कयिर' (kayira) आदेश होतात. කරස්ස සඔකාරස්ස කුබ්බාදයො වා හොන්ති න්තාදීසු. කුබ්බන්තො කයිරන්තො කරොන්තො, එවං කුබ්බමානො ඉච්චාදි. අඤ්ඤත්ර ‘‘මානස්ස මස්සා’’ති මානස්ස මස්ස ලොපෙ කරාණො. ‘‘සොස්සා’’ති වුත්තත්තා කත්තරියෙව. 'ओ' कारयुक्त 'कर' (kara) धातूच्या जागी 'न्त' इत्यादी प्रत्यय असताना विकल्पेकरून 'कुब्ब' (kubba) इत्यादी आदेश होतात. जसे की - कुब्बन्तो (kubbanto), कयिरन्तो (kayiranto), करोन्तो (karonto); तसेच कुब्बमानो (kubbamāno) इत्यादी. इतर ठिकाणी 'मानस्स मस्सा' (mānassa massā) या सूत्राने 'मान' प्रत्ययाच्या 'म' चा लोप होऊन 'कराणो' (karāṇo) असे रूप बनते. 'सोस्सा' (sossā) असे म्हटल्यामुळे हे केवळ कर्तरि प्रयोगातच होते. 178. ගහස්ස ඝෙප්පො १७८. 'गह' (gaha) धातूच्या जागी 'घेप्प' (gheppa) आदेश होतो. ගහස්ස වා ඝෙප්පො හොති න්තාදීසු. ඝෙප්පන්තො ඝෙප්පමානො. 'न्त' इत्यादी प्रत्यय असताना 'गह' (gaha) धातूच्या जागी विकल्पेकरून 'घेप्प' (gheppa) आदेश होतो. जसे की - घेप्पन्तो (gheppanto), घेप्पमानो (gheppamāno). 179. ණො නිග්ගහීතස්ස १७९. निग्गहीतच्या (अनुस्वाराच्या) जागी 'ण' (ṇa) आदेश होतो. ගහස්ස නිග්ගහීතස්ස ණො හොති, ‘‘මං වා රුධාදීනං’’ති මං, ගණ්හිතබ්බං, ගණ්හිතුං, ගණ්හන්තො. 'गह' (gaha) धातूच्या निग्गहीतच्या जागी 'ण' (ṇa) होतो, 'मं वा रुधादीनं' (maṃ vā rudhādīnaṃ) या सूत्राने 'मं' (maṃ) प्रत्यय होऊन - गण्हितब्बं (gaṇhitabbaṃ), गण्हितुं (gaṇhituṃ), गण्हन्तो (gaṇhanto) अशी रूपे बनतात. 130. න්ත+මාන+න්ති+යි+යුංස්වා+දිලොපොති १३०. 'न्त', 'मान', 'न्ति', 'यि', 'युं' इत्यादी प्रत्यय असताना आदि-लोप (पहिल्या अक्षराचा लोप) होतो. ආදිලොපො. අස=භුවි, භවතීති සන්තො සමානො. आदि-लोप होतो. 'अस' (asa) धातू भू (अस्तित्व) अर्थी असताना, 'भवतीति सन्तो समानो' (bhavatīti santo samāno) - जो अस्तित्वात आहे तो 'सन्तो' (santo) किंवा 'समानो' (samāno) असे रूप बनते. 131. පාදිතො ඨාස්ස වා ඨහො ක්වචිති १३१. 'प' (pa) इत्यादी उपसर्गांनंतर 'ठा' (ṭhā) धातूच्या जागी कधीकधी विकल्पेकरून 'ठह' (ṭhaho) आदेश होतो. ඨාස්ස පාදීසු ඨහො. සණ්ඨහන්තො. සන්තිට්ඨන්තො. 'प' (pa) इत्यादी उपसर्गांनंतर 'ठा' (ṭhā) धातूच्या जागी 'ठह' (ṭhaho) आदेश होतो. जसे की - सण्ठहन्तो (saṇṭhahanto), सन्तिट्ठन्तो (santiṭṭhanto). (වත්තමානපච්චයන්තනයො). (वर्तमानकाळवाचक प्रत्ययांची पद्धत समाप्त). 61. තුං තායෙ තවෙ භාවෙ භවිස්සති ක්රියායං තදත්ථායං ६१. भविष्यकाळात, जेव्हा एखादी क्रिया दुसऱ्या क्रियेच्या उद्देशाने (हेतूने) केली जाते, तेव्हा भाव (क्रिया) अर्थी 'तुं' (tuṃ), 'ताये' (tāye) आणि 'तवे' (tave) हे प्रत्यय होतात. භවිස්සතිඅත්ථෙ [Pg.298] වත්තමානතො ක්රියත්ථා භාවෙ තුමාදයො හොන්ති ක්රියායං තදත්ථායං පතීයමානායං. කරණාය ගච්ඡති කාතුං ගච්ඡති. ‘‘තුංතුනතබ්බෙසු වා’’ති කරස්ස වා ආ හොති, පුබ්බරූපෙ කත්තායෙ. ‘‘කරස්සා තවෙ’’ති නිච්චං ආ, කාතවෙ. නිපාතත්තා ‘‘අසඞ්ඛ්යෙහි සබ්බාසං’’ති චතුත්ථීසස්ස ලොපො. එව+මුපරි තුනාදීසු. කත්තුං කාමෙතීති කත්තුකාමො, අභිසඞ්ඛරිතු+මාකඞ්ඛති. සද්ධම්මං සුණිතුං, ඤිම්හි නාගමෙ තස්ස ණො, නාගමත්තා න වුද්ධි. සොතවෙ සොතුං සුණිතුං වා පත්ථෙහි. එවං අනුභවිතුං, පචිතුං. ගන්තුං, ‘‘මනානං නිග්ගහීතං’’ති නිග්ගහීතං. ගමිතුං, ඛන්තුං, ඛනිතුං, හන්තුං, හනිතුං, මන්තුං, මනිතුං, හරිතුං, අනුස්සරිතුං ඉච්ඡති. තථා තුදිතුං, පවිසිතුං, උද්දිසිතුං, භොත්තුං, සයිතුං, නෙතුං, ජුහොතුං, පජහිතුං, පහාතුං, දාතුං, රොද්ධුං, රුන්ධිතුං, භොත්තුං, භුඤ්ජීතුං, ඡෙත්තුං, ඡින්දිතුං, සිබ්බිතුං, ඌම්හි වස්ස බො, ද්විත්තං, බුද්ධුං, තස්ස ධො. බුජ්ඣිතුං, යුක. ජානිතුං ඤා=අවබොධනෙ. ජනිතුං. ජෙතුං ජිනිතුං. පත්තුං පාපුණිතුං. කෙතුං කිණිතුං. විනිච්ඡෙතුං, ඉස්ස එ, විනිච්ඡිනිතුං. ගහෙතුං ගණ්හිතුං. චොරිතුං චොරෙතුං චොරයිතුං, පාලෙතුං පාලයිතුං. පයොජකෙ-භාවෙතුං භාවයිතුං, කාරෙතුං කාරයිතුං කාරාපෙතුං කාරාපයිතුං ඉච්ඡති+ච්චාදි. भविष्यकाळात वर्तमानकाळातील क्रियेच्या उद्देशाने दुसरी क्रिया प्रतीत होत असताना भाव अर्थी 'तुं' (tuṃ) इत्यादी प्रत्यय होतात. जसे की - 'करण्यासाठी जातो' या अर्थी 'कातुं गच्छति' (kātuṃ gacchati) असे होते. 'तुंतुनातब्बेसु वा' (tuṃtunatabbesu vā) या सूत्राने 'कर' (kara) धातूच्या जागी विकल्पेकरून 'आ' होतो, पूर्वरूप होऊन 'कत्ताये' (kattāye) बनते. 'करस्सा तवे' (karassā tave) या सूत्राने नित्य 'आ' होऊन 'कातवे' (kātave) बनते. निपातत्वामुळे 'असंख्येहि सब्बासं' (asaṅkhyehi sabbāsaṃ) या सूत्राने चतुर्थी विभक्तीच्या प्रत्ययाचा लोप होतो. पुढे 'तुन' (tuna) इत्यादी प्रत्ययांच्या बाबतीतही असेच समजावे. 'करण्याची इच्छा करतो' तो 'कत्तूकामो' (kattukāmo), 'अभिसंखरितुं आकङ्खति' (abhisaṅkharituṃ ākaṅkhati - अभिसंस्कार करण्याची आकांक्षा करतो). 'सद्धम्मं सुणितुं' (saddhammaṃ suṇituṃ - सद्धम्म ऐकण्यासाठी), 'ञि' प्रत्यय असताना 'ना' आगम होतो आणि त्याचा 'ण' होतो, 'ना' आगम झाल्यामुळे वृद्धी होत नाही. 'सोतवे' (sotave), 'सोतुं' (sotuṃ) किंवा 'सुणितुं' (suṇituṃ) अशी इच्छा कर. याचप्रमाणे - अनुभवितुं (anubhavituṃ), पचितुं (pacituṃ). गन्तुं (gantuṃ), 'मनानं निग्गहीतं' (manānaṃ niggahītaṃ) या सूत्राने निग्गहीत होतो. गमितुं (gamituṃ), खन्तुं (khantuṃ), खनितुं (khanituṃ), हन्तुं (hantuṃ), हनितुं (hanituṃ), मन्तुं (mantuṃ), मनितुं (manituṃ), हरितुं (harituṃ), अनुस्सरितुं इच्छति (anussarituṃ icchati). तसेच - तुदितुं (tudituṃ), पविसितुं (pavisituṃ), उद्दिसितुं (uddisituṃ), भोत्तुं (bhottuṃ), सयितुं (sayituṃ), नेतुं (netuṃ), जुहोतुं (juhotuṃ), पजहितुं (pajahituṃ), पहातुं (pahātuṃ), दातुं (dātuṃ), रोद्धुं (roddhuṃ), रुन्धितुं (rundhituṃ), भोत्तुं (bhottuṃ), भुञ्जीतुं (bhuñjītuṃ), छेत्तुं (chettuṃ), छिन्दितुं (chindituṃ), सिब्बिकुं (sibbituṃ), 'उ' प्रत्यय असताना 'व' चा 'ब' होतो, द्वित्व होऊन 'बुद्धुं' (buddhuṃ) बनते, त्याच्या जागी 'ध' होतो. बुज्झितुं (bujjhituṃ), 'यु' आगम. जानितुं (jānituṃ) - 'ञा' (ñā) धातू अवबोधन (जाणणे) अर्थी. जनितुं (janituṃ). जेतुं (jetuṃ), जिनितुं (jinituṃ). पत्तुं (pattuṃ), पापुणितुं (pāpuṇituṃ). केतुं (ketuṃ), किणितुं (kiṇituṃ). विनिच्छेतुं (vinicchetuṃ) - 'इ' चा 'ए' होतो, विनिच्छिनितुं (vinicchinituṃ). गहेतुं (gahetuṃ), गण्हितुं (gaṇhituṃ). चोरितुं (corituṃ), चोरेतुं (coretuṃ), चोरयितुं (corayituṃ); पालेतुं (pāletuṃ), पालयितुं (pālayituṃ). प्रयोजक (णिच्) अर्थी - भावेतुं (bhāvetuṃ), भावयितुं (bhāvayituṃ); कारेतुं (kāretuṃ), कारयितुं (kārayituṃ), कारापेतुं (kārāpetuṃ), कारापयितुं इच्छति (kārāpayituṃ icchati) इत्यादी. එවං ක්රියත්ථක්රියායං ගම්යමානායං, යථා සුබොද්ධුං වක්ඛාමි, එවං දට්ඨුං ගච්ඡති, ගන්තු+මාරභති, ගන්තුං පයොජෙති, දස්සෙතු+මාහ ඉච්චාදි. अशा प्रकारे क्रियार्थक क्रिया (दुसऱ्या क्रियेसाठी केलेली क्रिया) प्रतीत होत असताना, जसे की - 'सुबोद्धुं वक्खामि' (चांगले समजण्यासाठी मी सांगेन), तसेच 'दट्ठुं गच्छति' (पाहण्यासाठी जातो), 'गन्तुं आरभति' (जाण्यास सुरुवात करतो), 'गन्तुं पयोजेति' (जाण्यासाठी प्रवृत्त करतो), 'दस्सेतुं आह' (दाखवण्यासाठी म्हणाला) इत्यादी. අරහසක්කාදීසුපි [Pg.299] සිද්ධං, තථා කාල සමයවෙලාසු. කො තං නින්දිතු+මරහති, රාජා භවිතු+මරහති, අරහො භවං වත්තුං, සක්කා ජෙතුං ධනෙන වා, සක්කා ලද්ධුං, භස්ස ධො. කත්තුං සක්ඛිස්සති. භබ්බො නියාමං ඔක්කමිතුං, අභබ්බො කාතුං. අනුච්ඡවිකො භවං දානං පටිග්ගහෙතුං, ඉදං කාතුං අනුරූපං, දානං දාතුං යුත්තං, දාතුං වත්තුඤ්ච ලභති. එවං වට්ටති භාසිතුං, ඡින්දිතුං න ච කප්පති ඉච්චාදි. තථාකාලො භුඤ්ජිතුං, සමයො භුඤ්ජිතුං, වෙලා භුඤ්ජිතුං. 'अरह' (arahati), 'सक्का' (sakkā) इत्यादी शब्दांच्या योगात आणि तसेच 'काल' (kāla), 'समय' (samaya), 'वेला' (velā) या शब्दांच्या योगातही हे प्रत्यय सिद्ध होतात. जसे की - 'को तं निन्दितुं अरहति' (त्याची निंदा करण्यास कोण योग्य आहे?), 'राजा भवितुं अरहति' (तो राजा होण्यास योग्य आहे), 'अरहो भवं वत्तुं' (आपण बोलण्यास योग्य आहात), 'सक्का जेतुं धनेन वा' (धनाने जिंकणे शक्य आहे), 'सक्का लद्धुं' (मिळवणे शक्य आहे - येथे 'भ' च्या जागी 'ध' होतो), 'कत्तुं सक्खिस्सति' (करण्यास समर्थ होईल), 'भब्बो नियामं ओक्कमितुं' (नियमात प्रवेश करण्यास योग्य), 'अभब्बो कातुं' (करण्यास अयोग्य), 'अनुच्छविको भवं दानं पटिग्गहेतुं' (आपण दान स्वीकारण्यास योग्य आहात), 'इदं कातुं अनुरूपं' (हे करण्यास अनुरूप आहे), 'दानं दातुं युत्तं' (दान देणे योग्य आहे), 'दातुं वत्तुञ्च लभति' (देण्यास आणि बोलण्यास मिळतो). तसेच 'वट्टति भासितुं' (बोलणे योग्य आहे), 'छिन्दितुं न च कप्पति' (कापणे योग्य नाही) इत्यादी. तसेच 'कालो भुञ्जितुं' (जेवण्याची वेळ), 'समयो भुञ्जितुं' (जेवण्याचा समय), 'वेला भुञ्जितुं' (जेवण्याची वेळ). අලමත්ථෙපි සිද්ධං, අලමෙව දානානි දාතුං, අලමෙව පුඤ්ඤානි කාතුං. 'अलम्' (alam - पुरेसे/समर्थ) या अर्थी देखील हे प्रत्यय सिद्ध होतात. जसे की - 'अलमेव दानानि दातुं' (दान देण्यास समर्थच आहे), 'अलमेव पुञ्ञानि कातुं' (पुण्य करण्यास समर्थच आहे). 62. පටිසෙධෙ+ලංඛලූනං ක්තුන ක්ත්වාන ක්ත්වා වා ६२. प्रतिषेध (मनाई) अर्थी 'अलं' (alaṃ) आणि 'खलु' (khalu) या शब्दांच्या योगात विकल्पेकरून 'क्तुन' (ktuna), 'क्त्वान' (ktvāna) आणि 'क्त्वा' (ktvā) हे प्रत्यय होतात. අලං+ඛලුසද්දානං පටිසෙධනත්ථානං පයොගෙ ක්තුනාදයො වා හොන්ති භාවෙ. අලංපුබ්බො, සු=සවනෙ, අලං සවනං කත්වා ඛලු සවනං කත්වාති අලං සොතුන ඛලු සොතුන අලං සුත්වාන ඛලු සුත්වාන අලං සුත්වා ඛලු සුත්වා. නිපාතත්තා සිලොපො. प्रतिषेध (मनाई) अर्थ असलेल्या 'अलं' (alaṃ) आणि 'खलु' (khalu) या शब्दांच्या प्रयोगात भाव अर्थी विकल्पेकरून 'क्तुन' (ktuna) इत्यादी प्रत्यय होतात. 'अलं' पूर्वपद असताना, 'सु' (su) धातू श्रवण (ऐकणे) अर्थी - 'अलं सवणं कत्वा' (ऐकणे पुरे झाले) किंवा 'खलु सवणं कत्वा' (नक्कीच ऐकणे पुरे झाले) या अर्थी - अलं सोतुन (alaṃ sotuna), खलु सोतुन (khalu sotuna); अलं सुत्वान (alaṃ sutvāna), खलु सुत्वान (khalu sutvāna); अलं सुत्वा (alaṃ sutvā), खलु सुत्वा (khalu sutvā) अशी रूपे बनतात. निपातत्वामुळे 'सि' (si) प्रत्ययाचा लोप होतो. 63. පුබ්බෙ+කකත්තුකානං ६३. जेव्हा अनेक क्रियांचा कर्ता एकच असतो, तेव्हा पूर्वकाळात (आधी घडलेल्या क्रियेसाठी) भाव अर्थी हे प्रत्यय होतात. එකො කත්තා යෙසං බ්යාපාරානං, තෙසු යො පුබ්බො, තදත්ථතො ක්රියත්ථා තුනාදයො හොන්ති භාවෙ. ‘‘තුංතුනා’’ දිනා කරස්ස ආ, සො කාතුන කම්මං ගච්ඡති, අකාතුන පුඤ්ඤං කිලිස්සන්ති. රලොපෙ කම්මං කත්වාන භද්රකං, පුඤ්ඤානි කත්වා සග්ගං ගච්ඡති. අභිසඞ්ඛරණං කත්වා අභිසඞ්ඛරිත්වා කරිත්වා වා[Pg.300]. තථා සිබ්බිත්වා ඡාදයිත්වා ජානිත්වා ධම්මං සුත්වා සුත්වාන ධම්මං මොදති, සුණිත්වා, පත්වා පාපුණිත්වා, කිනිත්වා, ජෙත්වා ජිනිත්වා ජිත්වා, චොරෙත්වා චොරයිත්වා, පූජෙත්වා පූජයිත්වා, තථා මෙත්තං භාවෙත්වා භාවයිත්වා, විහාරං කාරෙත්වා කාරයිත්වා කාරාපෙත්වා කාරාපයිත්වා සග්ගං ගමිස්සන්ති+ච්චාදි. පුබ්බෙති කිං, භුඤ්ජති ච පචති ච. ‘‘අපත්වා නදිං පබ්බතො, අතික්කම්ම පබ්බතං නදී’’තිආදීසු භූධාතුස්ස සම්භවා එකකත්තුකතා පුබ්බකාලතා ච ගම්යතෙ. ‘‘භුත්වා භුත්වා ගච්ඡතී’’ති ඉමිනාව සිද්ධං, ආභික්ඛඤ්ඤන්තු ද්විබ්බචනාව ගම්යතෙ. කථං ‘‘ජීවග්ගාහං අගාහයි, කායප්පචාලකං ගච්ඡතී’’ති, ඝණන්තෙන ක්රියාවිසෙසනෙන සිද්ධං, යථා ඔදනපාකං සයතීති. ज्या क्रियांचा कर्ता एकच असतो, त्यांपैकी जी क्रिया आधी घडते, त्या अर्थी भाववाचक 'तुन' (tuna) इत्यादी प्रत्यय होतात. 'तुंतुना' (tuṃtunā) इत्यादी सूत्राने 'कर' (kara) धातूच्या जागी 'आ' होतो, जसे की - 'सो कातुन कम्मं गच्छति' (तो काम करून जातो), 'अकातुन पुञ्ञं किलिस्सन्ति' (पुण्य न केल्यामुळे क्लेश पावतात). 'र' चा लोप झाल्यावर - 'कम्मं कत्वान भद्रकं' (चांगले काम करून), 'पुञ्ञानि कत्वा सग्गं गच्छति' (पुण्य करून स्वर्गात जातो). अभिसंस्कार करून - 'अभिसंखरित्वा' (abhisaṅkharitvā) किंवा 'करित्वा' (karitvā). तसेच - सिब्बित्व (sibbitvā), छादेत्वा (chādayitvā), जानित्वा (jānitvā), 'धम्मं सुत्वा' (dhammaṃ sutvā) किंवा 'सुत्वान धम्मं मोदति' (धम्म ऐकून आनंदित होतो), सुणित्वा (suṇitvā), पत्त्वा (patvā), पापुणित्वा (pāpuṇitvā), किणित्वा (kiṇitvā), जेत्वा (jetvā), जिनित्वा (jinitvā), जित्वा (jitvā), चोरेत्वा (coretvā), चोरयित्वा (corayitvā), पूजेत्वा (pūjetvā), पूजयित्वा (pūjayitvā); तसेच 'मेत्तं भावेत्वा' (mettaṃ bhāvetvā), 'भावयित्वा' (bhāvayitvā), 'विहारं कारेत्वा' (vihāraṃ kāretvā), 'कारयित्वा' (kārayitvā), 'कारापेत्वा' (kārāpetvā), 'कारापयित्वा सग्गं गमिस्सन्ति' (विहार बनवून स्वर्गात जातील) इत्यादी. 'पूर्वे' (आधी घडलेली क्रिया) असे का म्हटले आहे? कारण 'भुञ्जति च पचति च' (तो जेवतो आणि शिजवतो - येथे पूर्वकाळ स्पष्ट नाही). 'अपत्त्वा नदिं पब्बतो, अतिक्कम्म पब्बतं नदी' (नदीला न पोहोचता पर्वत आहे, पर्वताला ओलांडून नदी वाहते) इत्यादी उदाहरणांमध्ये 'भू' (bhū) धातूच्या अस्तित्वामुळे एककर्तुकत्व आणि पूर्वकालत्व समजून येते. 'भुत्वा भुत्वा गच्छति' (पुन्हा पुन्हा जेवून जातो) हे यानेच सिद्ध होते, पौनःपुन्य (वारंवारता) दर्शवण्यासाठी द्वित्व (दोनदा उच्चारणे) केले जाते. मग 'जीवग्गाहं अगाही, कायप्पचालकं गच्छति' (जिवंत पकडले, शरीर हलवत जातो) हे कसे सिद्ध होते? हे 'घञ्' (ghaṇ) प्रत्ययान्त क्रियाविशेषणाने सिद्ध होते, जसे की 'ओदनपाकं सयति' (भात शिजवत असताना झोपतो). 164. ප්යො වා ත්වාස්ස සමාසෙ १६४. समासामध्ये 'त्वा' (tvā) प्रत्ययाच्या जागी विकल्पेकरून 'प्य' (pya) आदेश होतो. ත්වාස්ස වා ප්යො හොති සමාසෙ. පකාරො ‘‘ප්යෙ සිස්සා’’ති විසෙසනත්ථො. අභිපුබ්බො පාදිසමාසො, අභිවදනං කත්වා අභිවාදිය භාසිස්සං. තථා අභිභුය්ය, ද්විත්තරස්සානි. සි=සයෙ – समासामध्ये 'त्वा' प्रत्ययाचा पर्याय म्हणून 'प्य' होतो. 'प्ये सिस्सा' या सूत्रातील 'प' कार हा विशेष अर्थासाठी आहे. 'अभि' उपसर्गपूर्वक 'पादि' (प्रादि) समास होऊन, 'अभिवंदन करून' या अर्थी 'अभिवानिया' (अभिवंद्य) असा प्रयोग होईल. तसेच 'अभिभूय' (अभिभूत करून) असा प्रयोग होतो, येथे द्वित्व आणि र्हस्वत्व होते. 'सि' धातू शयन करणे या अर्थी आहे – 88. ප්යෙ සිස්සා ८८. प्ये सिस्सा සිස්ස ආ හොති ප්යාදෙසෙ. නිස්සයනං කත්වා නිස්සාය. පුබ්බරූපෙ විභජ්ජ විභජිය. දිස=අතිසජ්ජනෙ, උද්දිස්ස. පවිස්ස පවිසිය පවිසිත්වා, උපනය, අතිසෙය්ය අතිසයිත්වා, ඔහාය ඔහිත්වා. ආදාය, දාස්සි+යඞ, ආදිය. පට්ඨාය, විචෙය්ය, විඤ්ඤාය විජානිත්වා, සමාසෙති කිං, පත්වා. ක්වචා+ සමාසෙපි [Pg.301] බහුලාධිකාරා, ලතං දන්තෙහි ඡින්දිය. තථා භුඤ්ජිත්වා. 'प्य' आदेश असताना 'सिस्सा' चा 'आ' होतो. 'निश्रय करून' या अर्थी 'निस्साय' (निश्रित्य). पूर्वरूप झाल्यावर 'विभज्ज' किंवा 'विभजिय' (विभागून). 'दिस' धातू अतिसर्जन (त्याग/निर्देश) अर्थी आहे, 'उद्दिस्स' (उद्देशून). 'पविस्स', 'पविसिय', 'पविसित्वा' (प्रवेश करून), 'उपनय', 'अतिसेय्य', 'अतिसयित्वा' (अतिशय शयन करून), 'ओहाय', 'ओहित्वा' (त्याग करून). 'आदाय' (घेऊन), 'दास्सि+यङ', 'आदिय'. 'पट्ठाय' (प्रारंभ करून), 'विचेय्य' (विचार करून), 'विञ्ञाय', 'विजानित्वा' (जाणून). 'समासात' असे का म्हटले? 'पत्वा' (प्राप्त करून) यासाठी. 'क्वचा' सूत्राने समासात नसतानाही बहुल अधिकारामुळे 'लतां दन्तेहि छिन्दिय' (वेलीला दातांनी तोडून) असा प्रयोग होतो. तसेच 'भुञ्जित्वा' (भोजन करून). 165. තුං+යානා १६५. तुं+याना ත්වාස්ස වා තුං+යානා හොන්ති සමාසෙ ක්වචි. අභිහරණං කත්වා අභිහට්ඨුං, අභිහරිත්වා, පාදිසමාසො, ‘‘පුච්ඡාදිතො’’ති තස්ස ඨො පරරූපාදි ච. අනුමොදනං කත්වා අනුමොදියාන අනුමොදිත්වා වා, කානුබන්ධෙපි ‘‘වා ක්වචී’’ති විකප්පත්තා ‘‘ලහුස්සුපන්තස්සා’’ති ඔකාරො. ක්වචා+සමාසෙපි බහුලාධිකාරා, දට්ඨුං, දිසතො ත්වාස්ස තුමාදෙසෙ දිසස්ස දස. අඤ්ඤත්ර ‘‘දිසා වාන+වා ස චා’’ති ත්වාස්ස වාන+වා ස හොන්ති, දිස්වා. එවං ලභනං කත්වා ලද්ධා ධනංතිආදීසු තස්ස ධො භවති. समासामध्ये 'त्वा' प्रत्ययाचा पर्याय म्हणून काही वेळा 'तुं' आणि 'याना' हे प्रत्यय होतात. 'अभिहरण करून' या अर्थी 'अभिहट्ठुं', 'अभिहरित्वा' असा प्रादि समास होतो. 'पुच्छादितो' या सूत्राने 'त' चा 'ठ' आणि पररूप इत्यादी कार्ये होतात. 'अनुमोदन करून' या अर्थी 'अनुमोदियान' किंवा 'अनुमोदित्वा' असा प्रयोग होतो. 'क' अनुबंध असतानाही 'वा क्वचि' या सूत्राच्या विकल्पत्वामुळे 'लहुस्सुपन्तस्स' या सूत्राने 'ओ' कार होतो. समासात नसतानाही बहुल अधिकारामुळे 'दट्ठुं' (पाहण्यासाठी) असा प्रयोग होतो, 'दिस' धातूहून 'त्वा' प्रत्ययाचा 'तुं' आदेश झाल्यावर 'दिस' चा 'दस' होतो. इतर ठिकाणी 'दिसा वान+वा स चा' या सूत्राने 'त्वा' प्रत्ययाचे 'वान', 'वा' आणि 'स' हे आदेश होऊन 'दिस्वा' (पाहून) असा प्रयोग होतो. याचप्रमाणे 'लाभ करून' या अर्थी 'लद्धा धनं' (धन मिळवून) इत्यादींमध्ये 'त' चा 'ध' होतो. ඉති පයොගසිද්ධියං ඛාදිකණ්ඩො සත්තමො. अशा प्रकारे प्रयोगसिद्धीमधील सातवा 'खादिकांड' समाप्त झाला. පයොගසිද්ධි නිගමනං प्रयोगसिद्धी उपसंहार (निगमन) 1. १. යෙ [Pg.302] නන්තතන්තරතනාකරමන්ථනෙන,මන්ථාචලොල්ලසිතඤාණවරෙන ලද්ධා; සාරාමතා+තිසුඛිතා සුඛයන්ති ච+ඤ්ඤෙ,තෙ මෙ ජයන්ති ගුරවො ගුරවො ගුණෙහි. ज्यांनी अनंत शास्त्ररूपी रत्नाकराच्या (समुद्राच्या) मंथनाने, मन्दराचलाप्रमाणे शोभणाऱ्या आपल्या श्रेष्ठ ज्ञानाद्वारे श्रेष्ठ अमृतरूपी सार प्राप्त केले आहे, जे स्वतः अत्यंत सुखी आहेत आणि इतरांनाही सुखी करतात, ते गुणांनी थोर असणारे माझे गुरुदेव विजयी होवोत. 2. २. යස්ස සාධුගුණුබ්භූත-කිත්ති සබ්බත්ත පත්ථටා; මොග්ගල්ලානො මහාපඤ්ඤො, ජයතී සො හ සබ්බදා. ज्यांची सत्गुणांमुळे निर्माण झालेली कीर्ती सर्वत्र पसरलेली आहे, ते महाप्राज्ञ मोग्गल्लान (महाथेर) नेहमीच विजयी होवोत. 3. ३. පරමප්පිච්ඡතා+නෙක-සන්තොසූපසමෙසිනං; සුචිසලෙඛවුත්තීනං, සදා+රඤ්ඤනිවාසිනං. जे अत्यंत अल्पेच्छता (कमी इच्छा असणे), अनेक प्रकारचे समाधान आणि शांततेचे अभिलाषी आहेत, ज्यांचे वर्तन अत्यंत शुद्ध आणि संलेख (संयमपूर्ण) आहे, जे नेहमी अरण्यात निवास करणारे आहेत, 4. ४. සාසනුජොතකාරීන+මාචෙරත්ත+මුපාගතං; උදුම්බරගිරීඛ්යාතා+යතනං යතිපුඞ්ගවං. जे शासनाला (बुद्ध शासनाला) प्रकाशित करणारे आहेत, ज्यांनी आचार्यपद प्राप्त केले आहे, जे 'उदुंबरगिरी' या नावाने प्रसिद्ध असलेल्या आयतनाचे (विहाराचे) यतिश्रेष्ठ (संन्यासी श्रेष्ठ) आहेत, 5. ५. මෙධඞ්කරොති ආඛ්යාත-නාමධෙය්යං තපොධනං; ථෙරං ථිරදයා මෙධා-නිධානං සාධු පූජිතං. ज्यांचे नाव 'मेधंकर' असे प्रसिद्ध आहे, जे तपोधान आहेत, जे दृढ करुणा आणि प्रज्ञेचे भांडार आहेत, अशा साधू पूजित थेरांना, 6. ६. සිස්සං සහාය+මාගම්ම, කල්යාණමිත්ත+මත්තනො; සොධෙතුං සාසනං සත්ථු, පරක්කම+මකාසි යො. ज्यांनी आपल्या शिष्याला आणि कल्याणामित्राला सोबत घेऊन, शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) शासनाचे शुद्धीकरण करण्यासाठी पराक्रम (प्रयत्न) केला, 7. ७. සඞ්ඝරක්ඛිතනාමෙන, මහාථෙරෙන ධීමතා; නිවාසභූතෙනා+නෙක-ගුණාන+ප්පිච්ඡතාදිනං. अल्पेच्छता इत्यादी अनेक गुणांचे निवासस्थान असलेल्या, 'संघरक्षित' नावाच्या बुद्धिमान महाथेरांनी, 8. ८. මොග්ගල්ලානබ්යාකරණ-පයොගක්කමසාධකා; එත්තාවතා කතා එසා, පයොගසිද්ධි නිට්ඨිතා. मोग्गल्लान व्याकरणाच्या प्रयोगक्रमाला सिद्ध करणारी ही 'प्रयोगसिद्धी' एवढ्या भागासह रचली गेली असून ती येथे पूर्ण झाली आहे. 9. ९. තෙනෙව [Pg.303] රචිතා සාධු, සාසනොදයකාරිනා; ඛුද්දසික්ඛාය ටීකා ච, තථා සම්බන්ධචින්තනා. त्याच बुद्ध शासनाचा उदय करणाऱ्या (संघरक्षित महाथेरांनी) 'खुद्दसिक्खा' ची उत्तम टीका आणि तसेच 'संबंधचिंता' ची रचना केली. 10. १०. සුසද්දසිද්ධිං යො යොග-නිච්ඡයං සබ්භි වණ්ණිතං; අකා සුබොධාලඞ්කාරං, තථා සම්බන්ධචින්තනං. ज्यांनी सज्जनांद्वारे प्रशंसित अशा व्याकरण नियमांच्या निश्चयाने युक्त 'सुसद्दसिद्धी' ची रचना केली, तसेच 'सुबोधालंकार' आणि 'संबंधचिंता' ची रचना केली. 11. ११. සත්ථසඤ්චිතපුඤ්ඤෙන, නිබ්බානසාධකං හිතං; සාධෙන්තො ලොකනාථස්ස, සද්ධම්මො තිට්ඨතං චිරන්ති. या ग्रंथाच्या रचनेने संचित झालेल्या पुण्याच्या प्रभावाने, निर्वाण साधणारे हित साध्य करत, लोकनाथांचा (बुद्धांचा) सद्धम्म चिरकाळ टिकून राहो. ඉති සඞ්ඝරක්ඛිතමහාසාමිථෙරපාදවිරචිතා अशा प्रकारे महास्वामी संघरक्षित महाथेरांनी रचलेली පයොගසිද්ධි නිට්ඨිතා. प्रयोगसिद्धी समाप्त झाली. (විසෙසලක්ඛණං). යථාවුත්තානං පන පයොගසිද්ධිනිගමන ගාථානං එකාදසන්නං පුබ්බෙයෙව වක්ඛමානා ඉමා ගාථායො දිස්සන්ති පොරාණෙ සීහළමූලපයොගසිද්ධිපාඨෙ. තා ච ගාථායො පච්ඡා සීහළමූලපයොගසිද්ධිසංසොධකෙන මෙධඞ්කරොති ගරූහි ගහිතනාමධෙය්යෙන ථෙරෙන පක්ඛිත්තාති වෙදිතබ්බා, තස්මා මයං තා ගාථායො සබ්බපච්ඡායෙව ඉමස්මිං-ඨානෙ ඨපෙම. තා පන ගාථායො කතමාති චෙ – (विशेष लक्षण). पूर्वी सांगितलेल्या प्रयोगसिद्धीच्या उपसंहाराच्या अकरा गाथांच्या आधीच, प्राचीन सिंहळी मूळ प्रयोगसिद्धीच्या पाठात खालील गाथा दिसून येतात. त्या गाथा नंतर सिंहळी मूळ प्रयोगसिद्धीचे संशोधक आणि 'मेधंकर' हे नाव धारण करणाऱ्या पूज्य थेरांनी समाविष्ट केल्या आहेत असे समजावे. म्हणूनच आम्ही त्या गाथा सर्वात शेवटी या ठिकाणी ठेवत आहोत. त्या गाथा कोणत्या आहेत असे विचारल्यास – 1. १. චාගවික්කමසද්ධානු-සම්පන්නගුණසාමිනො; පරක්කමනරින්දස්ස, සීහළින්දස්ස ධීමතො. त्याग, पराक्रम आणि श्रद्धा यांनी संपन्न गुणांचे स्वामी असलेल्या, बुद्धिमान सिंहळ नरेश पराक्रम राजाच्या, 2. २. අත්රජෙනා+නුජාතෙන, භූපාලකුලකෙතුනා; දිසන්තපත්ථටොදාර-වික්කමෙන යසස්සිනා. त्यांच्या कुळात जन्मलेल्या, राजांच्या कुळाचे केतू (ध्वज) असलेल्या, ज्यांचा उदार पराक्रम दिशादिशांत पसरलेला आहे अशा यशस्वी, 3. ३. භුවනෙකභුජව්හෙන, මහාරාජෙන ධීමතා; චතුපච්චයදානෙන, සතතං සමුපට්ඨිතො. 'भुवनेकभुज' या नावाच्या बुद्धिमान महाराजांद्वारे चार प्रत्ययांच्या (चीवर, पिंडपात, सेनासन, ग्लानप्रत्यय-भैषज्य) दानाने सतत सेवा-उपासना केली गेलेले, 4. ४. ‘‘ජම්බුදොණී’’ති [Pg.304] විඛ්යාතා –වාසෙ නිවසතො සතො; සුමඞ්ගලමහත්ථෙර –සාමිනො සුචිවුත්තිනො. 'जंबुदोणी' या नावाने प्रसिद्ध असलेल्या निवासस्थानी राहणारे, अत्यंत शुद्ध चारित्र्य असलेले महास्वामी सुमंगल महाथेर, 5. ५. වංසෙ විසුද්ධෙ සංජාතො,පන්ථසෙනාසනෙ රතො; පරියත්තිමහාසින්ධු –නිය්යාමකධුරන්ධරො. विशुद्ध वंशात जन्मलेले, अरण्यवासात (पंथसेनासनात) रममाण असणारे, परियत्ती (बुद्धवचन) रूपी महासागराचे कुशल नावाडी (धुरंधर) असणारे, 5. ५. අප්පිච්ඡාදිගුණූපෙතො, ජිනසාසනමාමකො; වනෙරතමහත්ථෙරො, මෙධඞ්කරසමව්හයො. अल्पेच्छता इत्यादी गुणांनी युक्त, जिनशासनाचे (बुद्धशासनाचे) प्रेमी, अरण्यात रमणारे 'मेधंकर' नावाचे महाथेर, 6. ६. පාටවත්ථාය භික්ඛූනං, විනයෙ සුවිසාරදො; පයොගසිද්ධිං සොධයි, සදා සප්පඤ්ඤගොචරං. भिक्खूंच्या कौशल्यासाठी, विनयात अत्यंत विशारद (कुशल) असलेल्या त्यांनी, सुज्ञांच्या बुद्धीचा विषय असलेल्या या 'प्रयोगसिद्धी' चे संशोधन केले. 7. ७. ඉමං ලිඛිතපුඤ්ඤෙන, මෙත්තෙක්යං උපසංකමි; පතිට්ඨහිත්වා සරණෙ, සුප්පතිට්ඨාමි සාසනෙති. हा ग्रंथ लिहिण्याच्या पुण्याने मी मैत्रेय बुद्धांच्या चरणी जाईन आणि शरणामध्ये प्रतिष्ठित होऊन बुद्ध शासनात चांगल्या प्रकारे प्रतिष्ठित होईन. පයොගසිද්ධිසිද්ධං. प्रयोगसिद्धी सिद्ध झाली (पूर्ण झाली). | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
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| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |