| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส उन भगवान्, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। ปทรูปสิทฺธิ पदरूपसिद्धि คนฺถารมฺภ ग्रन्थारम्भ [ก] [क] วิสุทฺธสทฺธมฺมสหสฺสทีธิตึ[Pg.1],สุพุทฺธสมฺโพธิยุคนฺธโรทิตํ; ติพุทฺธเขตฺเตกทิวากรํ ชินํ,สธมฺมสงฺฆํ สิรสา’ภิวนฺทิย. विशुद्ध सद्धर्म रूपी सहस्र किरणों वाले, सुबुद्ध सम्बोधि रूपी युगन्धर पर्वत पर उदित, तीनों बुद्ध-क्षेत्रों के एकमात्र सूर्य, उन जिन (बुद्ध), सद्धर्म और संघ को सिर झुकाकर वन्दना कर। [ข] [ख] กจฺจายนญฺจาจริยํ นมิตฺวา,นิสฺสาย กจฺจายนวณฺณนาทึ; พาลปฺปโพธตฺถมุชุํ กริสฺสํ,พฺยตฺตํ สุกณฺฑํ ปทรูปสิทฺธึ. आचार्य कच्चायन को नमस्कार कर, कच्चायन-वर्णना आदि का आश्रय लेकर, बालकों (अल्पज्ञों) के प्रबोध के लिए, ऋजु (सरल), स्पष्ट और सुन्दर काण्डों वाली 'पदरूपसिद्धि' की रचना करूँगा। ๑. สนฺธิกณฺฑ १. सन्धि-काण्ड ตตฺถ ชินสาสนาธิคมสฺส อกฺขรโกสลฺลมูลกตฺตา ตํ สมฺปาเทตพฺพนฺติ ทสฺเสตุํ อภิเธยฺยปฺปโยชนวากฺยมิทมุจฺจเต. वहाँ, जिन-शासन के अधिगम (ज्ञान) का मूल अक्षरों की कुशलता होने के कारण, उसे सम्पादित करना चाहिए - यह दिखाने के लिए अभिधेय और प्रयोजन वाला यह वाक्य कहा जाता है। ๑. อตฺโถ อกฺขรสญฺญาโต. १. अर्थ अक्षरों से जाना जाता है। โย โกจิ โลกิยโลกุตฺตราทิเภโท วจนตฺโถ, โส สพฺโพ อกฺขเรเหว สญฺญายเต. สิถิลธนิตาทิอกฺขรวิปตฺติยญฺหิ อตฺถสฺส ทุนฺนยตา โหติ, ตสฺมา [Pg.2] อกฺขรโกสลฺลํ พหูปการํ พุทฺธวจเนสุ, เอตฺถ ปทานิปิ อกฺขรสนฺนิปาตรูปตฺตา อกฺขเรสฺเวว สงฺคยฺหนฺติ. जो कोई भी लौकिक और लोकोत्तर आदि भेदों वाला वचन का अर्थ है, वह सब अक्षरों के द्वारा ही जाना जाता है। शिथिल (अल्पप्राण), धनित (महाप्राण) आदि अक्षरों की विकृति होने पर अर्थ की दुर्बोधता होती है, इसलिए बुद्ध-वचनों में अक्षर-कौशल बहुत उपकारी है; यहाँ पद भी अक्षरों के समूह रूप होने के कारण अक्षरों में ही संगृहीत होते हैं। ตสฺมา อกฺขรโกสลฺลํ, สมฺปาเทยฺย หิตตฺถิโก; อุปฏฺฐหํ ครุํ สมฺมา, อุฏฺฐานาทีหิ ปญฺจหิ. इसलिए हित चाहने वाले व्यक्ति को, उत्थान (परिश्रम) आदि पाँच प्रकारों से गुरु की सम्यक् सेवा करते हुए, अक्षर-कौशल प्राप्त करना चाहिए। สญฺญาวิธาน संज्ञा-विधान ตตฺถาโท ตาว สทฺทลกฺขเณ โวหารวิญฺญาปนตฺถํ สญฺญาวิธานมารภียเต. वहाँ सबसे पहले शब्द-लक्षण में व्यवहार के ज्ञान के लिए संज्ञा-विधान आरम्भ किया जाता है। ๒. อกฺขราปาทโย เอกจตฺตาลีสํ. २. 'अ' आदि अक्षर इकतालीस हैं। อกฺขรา อปิ อาทโย เอกจตฺตาลีสํ, เต จ โข ชินวจนานุรูปา อการาทโย นิคฺคหีตนฺตา เอกจตฺตาลีสมตฺตา วณฺณา ปจฺเจกํ อกฺขรา นาม โหนฺติ. ตํ ยถา – อา อิ อี อุ อู เอ โอ, ก ข ค ฆ ง, จ ฉ ช ฌ ญ, ฏ ฐ ฑ ฒ ณ, ต ถ ท ธ น, ป ผ พ ภ ม, ย ร ลว ส ห ฬ อํ-อิติ อกฺขรา. 'अ' आदि अक्षर इकतालीस हैं, और वे जिन-वचनों के अनुरूप 'अ' कार से लेकर 'निग्गहीत' (अनुस्वार) तक इकतालीस वर्ण प्रत्येक 'अक्षर' नाम वाले होते हैं। जैसे - अ आ इ ई उ ऊ ए ओ, क ख ग घ ङ, च छ ज झ ञ, ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न, प फ ब भ म, य र ल व स ह ळ अं - ये अक्षर हैं। นกฺขรนฺตีติ อกฺขรา, อ อาทิ เยสํ เต อาทโย. อการาทีนมนุกฺกโม ปเนส ฐานาทิกฺกมสนฺนิสฺสิโต, ตถา หิ ฐานกรณปฺปยตเนหิ วณฺณา ชายนฺเต, ตตฺถ ฉ ฐานานิ กณฺฐตาลุมุทฺธทนฺตโอฏฺฐนาสิกาวเสน. जिनका क्षय नहीं होता वे 'अक्षर' हैं, 'अ' आदि में है जिनके वे 'आदि' हैं। अ-कार आदि का यह अनुक्रम स्थान आदि के क्रम पर आश्रित है, क्योंकि स्थान, करण और प्रयत्न से वर्ण उत्पन्न होते हैं, वहाँ कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ और नासिका के भेद से छह स्थान हैं। ตตฺถ – อวณฺณ กวคฺค หการา กณฺฐชา. वहाँ - अ-वर्ण (अ, आ), क-वर्ग और ह-कार कण्ठ से उत्पन्न (कण्ठ्य) हैं। อิวณฺณ จวคฺค ยการา ตาลุชา. ฏวคฺค รการ ฬการา มุทฺธชา. ตวคฺค ลการ สการา ทนฺตชา. อุวณฺณ ปวคฺคา โอฏฺฐชา. เอกาโร กณฺฐตาลุโช. โอกาโร กณฺโฐฏฺฐโช. इ-वर्ण (इ, ई), च-वर्ग और य-कार तालु से उत्पन्न (तालव्य) हैं। ट-वर्ग, र-कार और ळ-कार मूर्धा से उत्पन्न (मूर्धन्य) हैं। त-वर्ग, ल-कार और स-कार दन्त से उत्पन्न (दन्त्य) हैं। उ-वर्ण (उ, ऊ) और प-वर्ग ओष्ठ से उत्पन्न (ओष्ठ्य) हैं। ए-कार कण्ठ-तालु से उत्पन्न (कण्ठ-तालव्य) है। ओ-कार कण्ठ-ओष्ठ से उत्पन्न (कण्ठोष्ठ्य) है। วกาโร [Pg.3] ทนฺโตฏฺฐโช. व-कार दन्त-ओष्ठ से उत्पन्न (दन्तोष्ठ्य) है। นิคฺคหีตํ นาสิกฏฺฐานชํ. निग्गहीत (अनुस्वार) नासिका स्थान से उत्पन्न (नासिक्य) है। ง ญ ณ น มา สกฏฺฐานชา, นาสิกฏฺฐานชา จาติ. ङ, ञ, ण, न, म अपने-अपने स्थान से और नासिका स्थान से भी उत्पन्न होते हैं। หการํ ปญฺจเมเหว, อนฺตฏฺฐาหิ จ สํยุตํ; โอรสนฺติ วทนฺเตตฺถ, กณฺฐชํ ตทสํยุตํ. ह-कार जब पाँचवें वर्णों (ङ, ञ, ण, न, म) और अन्तःस्थ वर्णों (य, र, ल, व) के साथ संयुक्त होता है, तो उसे यहाँ 'उरस्य' (हृदय से उत्पन्न) कहते हैं, और असंयुक्त होने पर वह 'कण्ठ्य' होता है। กรณํ ชิวฺหามชฺฌํ ตาลุชานํ, ชิวฺโหปคฺคํ มุทฺธชานํ, ชิวฺหาคฺคํ ทนฺตชานํ, เสสา สกฏฺฐานกรณา. तालव्य वर्णों का करण जिह्वा-मध्य है, मूर्धन्य वर्णों का जिह्वा के पास का भाग (जिह्वा-उपग्र), दन्त्य वर्णों का जिह्वा-अग्र है, शेष वर्णों के करण उनके अपने-अपने स्थान ही हैं। ปยตนํ สํวุตาทิกรณวิเสโส. สํวุตตฺตมการสฺส, วิวฏตฺตํ เสสสรานํ สการหการานญฺจ, ผุฏฺฐํ วคฺคานํ, อีสํผุฏฺฐํ ยรลวานนฺติ. प्रयत्न संवृत आदि करणों का विशेष भेद है। 'अ' कार का संवृत होना, शेष स्वरों और 'स' कार तथा 'ह' कार का विवृत होना, वर्गों का स्पृष्ट होना, और य, र, ल, व का ईषत्-स्पृष्ट होना (प्रयत्न है)। เอวํ ฐานกรณปฺปยตนสุติกาลภินฺเนสุ อกฺขเรสุ สรา นิสฺสยา, อิตเร นิสฺสิตา. ตตฺถ – इस प्रकार स्थान, करण, प्रयत्न और श्रुति-काल के भेद वाले अक्षरों में स्वर 'निश्रय' (आश्रयदाता) हैं, और अन्य (व्यंजन) 'निश्रित' (आश्रित) हैं। वहाँ - นิสฺสยาโท สรา วุตฺตา, พฺยญฺชนา นิสฺสิตา ตโต; วคฺเคกชา พหุตฺตาโท, ตโต ฐานลหุกฺกมา. आश्रय होने के कारण पहले स्वर कहे गए हैं, उसके बाद आश्रित व्यंजन; वर्ग में एक ही स्थान से उत्पन्न होने की अधिकता के कारण वे पहले कहे गए हैं, उसके बाद स्थान की लघुता के क्रम से। วุตฺตญฺจ – और कहा गया है - ‘‘ปญฺจนฺนํ ปน ฐานานํ, ปฏิปาฏิวสาปิ จ; นิสฺสยาทิปฺปเภเทหิ, วุตฺโต เตสมนุกฺกโม’’ติ. "पाँच स्थानों की परिपाटी के अनुसार भी, और निश्रय (आश्रय) आदि के भेदों से, उनका अनुक्रम कहा गया है।" เอเกนาธิกา จตฺตาลีสํ เอกจตฺตาลีสํ, เอเตน คณนปริจฺเฉเทน – चालीस से एक अधिक इकतालीस होता है, इस गणना की सीमा के द्वारा - อธิกกฺขรวนฺตานิ, เอกตาลีสโต อิโต; น พุทฺธวจนานีติ, ทีเปตาจริยาสโภ. इन इकतालीस (४१) अक्षरों से अधिक जो अक्षर हैं, वे बुद्धवचन नहीं हैं - ऐसा आचार्यों में श्रेष्ठ (आचार्याषभ) ने स्पष्ट किया है। อปิคฺคหณํ เหฏฺฐา วุตฺตานํ อเปกฺขากรณตฺถํ. 'अपि' का ग्रहण नीचे (पूर्व में) कहे गए की अपेक्षा करने के लिए है। ๓. ตตฺโถทนฺตา [Pg.4] สรา อฏฺฐ. ३. उनमें 'ओ' पर्यन्त आठ स्वर हैं। ตตฺถ เตสุ อกฺขเรสุ อการาทีสุ โอการนฺตา อฏฺฐ อกฺขรา สรา นาม โหนฺติ. ตํ ยถา – อ อา อิ อี อุ อู เอ โอ-อิติ สรา. उनमें, उन 'अ' आदि अक्षरों में 'ओ' पर्यन्त आठ अक्षर 'स्वर' कहलाते हैं। जैसे कि - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ - ये स्वर हैं। โอ อนฺโต เยสํ เต โอทนฺตา, ทกาโร สนฺธิโช, สรนฺติ คจฺฉนฺตีติ สรา, พฺยญฺชเน สาเรนฺตีติปิ สรา. जिनके अंत में 'ओ' है, वे 'ओदन्त' हैं; 'द' कार संधि से उत्पन्न है। जो सरण करते हैं (चलते हैं), वे 'स्वर' हैं; अथवा जो व्यंजनों को उच्चारित करवाते हैं (सरित करते हैं), वे भी 'स्वर' हैं। ‘‘ตตฺถา’’ติ วตฺตเต. 'तत्र' (वहाँ/उनमें) यह पद अनुवृत्त होता है। ๔. ลหุมตฺตา ตโย รสฺสา. ४. लघु मात्रा वाले तीन 'ह्रस्व' हैं। ตตฺถ อฏฺฐสุ สเรสุ ลหุมตฺตา ตโย สรา รสฺสา นาม โหนฺติ. ตํ ยถา – อ อิ อุ-อิติ รสฺสา. उन आठ स्वरों में लघु मात्रा वाले तीन स्वर 'ह्रस्व' कहलाते हैं। जैसे कि - अ, इ, उ - ये ह्रस्व हैं। ลหุกา มตฺตา ปมาณํ เยสํ เต ลหุมตฺตา, มตฺตาสทฺโท เจตฺถ อจฺฉราสงฺฆาตอกฺขินิมีลนสงฺขาตํ กาลํ วทติ, ตาย มตฺตาย เอกมตฺตา รสฺสา, ทฺวิมตฺตา ทีฆา, อฑฺฒมตฺตา พฺยญฺชนา. ลหุคฺคหณญฺเจตฺถ ฉนฺทสิ ทิยฑฺฒมตฺตสฺสาปิ คหณตฺถํ. รสฺสกาลโยคโต รสฺสา, รสฺสกาลวนฺโต วา รสฺสา. जिनका प्रमाण लघु मात्रा है, वे 'लघुमात्र' हैं। यहाँ 'मात्रा' शब्द चुटकी बजाने या पलक झपकने के समय को कहता है। उस मात्रा के अनुसार, एक मात्रा वाले 'ह्रस्व' हैं, दो मात्रा वाले 'दीर्घ' हैं, और आधी मात्रा वाले 'व्यंजन' हैं। यहाँ 'लघु' का ग्रहण छंद में डेढ़ मात्रा वाले के भी ग्रहण के लिए है। ह्रस्व काल के योग से 'ह्रस्व' हैं, अथवा ह्रस्व काल वाले 'ह्रस्व' हैं। สรรสฺสคฺคหณานิ จ วตฺตนฺเต. 'स्वर' और 'ह्रस्व' का ग्रहण अनुवृत्त होता है। ๕. อญฺเญ ทีฆา. ५. अन्य 'दीर्घ' हैं। ตตฺถ อฏฺฐสุ สเรสุ รสฺเสหิ อญฺเญ ทฺวิมตฺตา ปญฺจ สรา ทีฆา นาม โหนฺติ. ตํ ยถา – อา อี อู เอ โอ-อิติ ทีฆา. उन आठ स्वरों में ह्रस्वों से अन्य दो मात्रा वाले पाँच स्वर 'दीर्घ' कहलाते हैं। जैसे कि - आ, ई, ऊ, ए, ओ - ये दीर्घ हैं। อญฺญคฺคหณํ ทิยฑฺฒมตฺติกานมฺปิ สงฺคหณตฺถํ. ทีฆกาเล นิยุตฺตา, ตพฺพนฺโต วา ทีฆา. กฺวจิ สํโยคปุพฺพา เอกาโรการา รสฺสา อิว วุจฺจนฺเต. ยถา – เอตฺถ, เสยฺโย, โอฏฺโฐ, โสตฺถิ. กฺวจีติ กึ? มํ เจ ตฺวํ นิขณํ วเน. ปุตฺโต ตฺยาหํ มหาราช. 'अन्य' का ग्रहण डेढ़ मात्रा वालों के भी संग्रह के लिए है। जो दीर्घ काल में नियुक्त हैं, अथवा जो दीर्घ काल वाले हैं, वे 'दीर्घ' हैं। कहीं-कहीं संयोग से पूर्व रहने वाले 'ए' और 'ओ' ह्रस्व के समान कहे जाते हैं। जैसे - एत्थ (ettha), सेय्यो (seyyo), ओट्ठो (oṭṭho), सोत्थि (sotthi)। 'कहीं-कहीं' (क्वचि) क्यों कहा? 'मं चे त्वं निखणं वने' (Maṃ ce tvaṃ nikhaṇaṃ vane)। 'पुत्तो त्याहं महाराज' (Putto tyāhaṃ mahārāja)। ๖. ทุมฺหิ [Pg.5] ครุ. ६. द्वित्व (संयोग) होने पर 'गुरु' होता है। ทฺวินฺนํ สมูโห ทุ, ตสฺมึ ทุมฺหิ. สํโยคภูเต อกฺขเร ปเร โย ปุพฺโพ รสฺสกฺขโร, โส ครุสญฺโญ โหติ. ยถา – ทตฺวา, หิตฺวา, ภุตฺวา. दो का समूह 'दु' है, उस 'दु' (द्वित्व/संयोग) में। संयोग रूप अक्षर के परे होने पर जो पूर्व का ह्रस्व अक्षर है, वह 'गुरु' संज्ञा वाला होता है। जैसे - दत्वा (datvā), हित्वा (hitvā), भुत्वा (bhutvā)। ‘‘ครู’’ติ วตฺตเต. 'गुरु' यह पद अनुवृत्त होता है। ๗. ทีโฆ จ. ७. और दीर्घ भी। ทีโฆ จ สโร ครุสญฺโญ โหติ. ยถา – นาวา, นที, วธู, ทฺเว, ตโย. ครุกโต อญฺโญ ‘‘ลหุโก’’ติ เวทิตพฺโพ. दीर्घ स्वर भी 'गुरु' संज्ञा वाला होता है। जैसे - नावा (nāvā), नदी (nadī), वधू (vadhū), द्वे (dve), तयो (tayo)। गुरु से भिन्न को 'लघु' समझना चाहिए। ๘. เสสา พฺยญฺชนา. ८. शेष 'व्यंजन' हैं। ฐเปตฺวา อฏฺฐ สเร เสสา อฑฺฒมตฺตา อกฺขรา กการาทโย นิคฺคหีตนฺตา เตตฺตึส พฺยญฺชนา นาม โหนฺติ. วุตฺเตหิ อญฺเญ เสสา. พฺยญฺชียติ เอเตหิ อตฺโถติ พฺยญฺชนา. ตํ ยถา – ก ข ค ฆ ง, จ ฉ ช ฌ ญ, ฏ ฐ ฑ ฒ ณ, ต ถ ท ธ น, ป ผ พ ภ ม, ย ร ลว ส ห ฬ อํ-อิติ พฺยญฺชนา. กการาทีสฺวกาโร อุจฺจารณตฺโถ. आठ स्वरों को छोड़कर शेष आधी मात्रा वाले अक्षर, 'क' कार से लेकर 'निग्गहीत' (अनुस्वार) पर्यन्त तैंतीस (३३) 'व्यंजन' कहलाते हैं। जो कहे गए हैं उनसे अन्य 'शेष' हैं। जिनसे अर्थ अभिव्यक्त (व्यंजित) होता है, वे 'व्यंजन' हैं। जैसे कि - क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, स, ह, ळ, अं - ये व्यंजन हैं। 'क' कार आदि में 'अ' कार उच्चारण के लिए है। ‘‘พฺยญฺชนา’’ติ วตฺตเต. 'व्यंजन' यह पद अनुवृत्त होता है। ๙. วคฺคา ปญฺจปญฺจโส มนฺตา. ९. पाँच-पाँच के समूह वाले 'म' पर्यन्त 'वर्ग' हैं। เตสํ โข พฺยญฺชนานํ กการาทโย มการนฺตา ปญฺจวีสติ พฺยญฺชนา ปญฺจปญฺจวิภาเคน วคฺคา นาม โหนฺติ. ตํ ยถา – ก ข ค ฆ ง, จ ฉ ช ฌ ญ, ฏ ฐ ฑ ฒ ณ, ต ถ ท ธ น, ป ผ พ ภ ม-อิติ วคฺคา. उन व्यंजनों में 'क' कार से लेकर 'म' कार पर्यन्त पच्चीस (२५) व्यंजन पाँच-पाँच के विभाग से 'वर्ग' कहलाते हैं। जैसे कि - क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म - ये वर्ग हैं। เต ปน ปฐมกฺขรวเสน กวคฺคจวคฺคาทิโวหารํ คตา, วคฺโคติ สมูโห, ตตฺถ ปญฺจปญฺจวิภาเคนาติ วา ปญฺจ ปญฺจ เอเตสมตฺถีติ [Pg.6] วา ปญฺจปญฺจโส, โม อนฺโต เยสํ เต มนฺตา. वे प्रथम अक्षर के वश से 'क-वर्ग', 'च-वर्ग' आदि व्यवहार को प्राप्त होते हैं। 'वर्ग' का अर्थ समूह है। वहाँ 'पाँच-पाँच के विभाग से' अथवा 'जिनमें पाँच-पाँच हैं' वे 'पञ्चपञ्चशः' हैं। जिनके अंत में 'म' है, वे 'मन्त' हैं। ๑๐. อํอิติ นิคฺคหีตํ. १०. 'अं' यह 'निग्गहीत' (अनुस्वार) है। อกาโร อุจฺจารณตฺโถ, อิติสทฺโท ปนานนฺตรวุตฺตนิทสฺสนตฺโถ, อํอิติ ยํ อการโต ปรํ วุตฺตํ พินฺทุ, ตํ นิคฺคหีตํ นาม โหติ. รสฺสสฺสรํ นิสฺสาย คยฺหติ, กรณํ นิคฺคเหตฺวา คยฺหตีติ วา นิคฺคหีตํ. 'अ' कार उच्चारण के लिए है, और 'इति' शब्द तुरंत कहे गए के निदर्शन (उदाहरण) के लिए है। 'अं' में जो 'अ' कार के बाद बिंदु कहा गया है, वह 'निग्गहीत' कहलाता है। क्योंकि यह ह्रस्व स्वर के आश्रित होकर ग्रहण किया जाता है, अथवा उच्चारण स्थान (करण) को रोककर (निग्रह कर) ग्रहण किया जाता है, इसलिए यह 'निग्गहीत' है। กรณํ นิคฺคเหตฺวาน, มุเขนาวิวเฏน ยํ; วุจฺจเต นิคฺคหีตนฺติ, วุตฺตํ พินฺทุ สรานุคํ. उच्चारण स्थान (करण) को रोककर, बिना खुले मुख से जो उच्चारित होता है, उसे 'निग्गहीत' कहा जाता है; वह स्वर के पीछे आने वाला बिंदु कहा गया है। อิธ อวุตฺตานํ ปรสมญฺญานมฺปิ ปโยชเน สติ คหณตฺถํ ปริภาสมาห. यहाँ जो नहीं कहे गए हैं, उन अन्य संज्ञाओं का भी प्रयोजन होने पर ग्रहण करने के लिए परिभाषा कहते हैं। ๑๑. ปรสมญฺญา ปโยเค. ११. प्रयोग होने पर अन्य संज्ञाएँ (भी मान्य हैं)। ยา จ ปน ปรสฺมึ สกฺกตคนฺเถ, ปเรสํ วา เวยฺยากรณานํ สมญฺญา โฆสาโฆสโลปสวณฺณสํโยคลิงฺคาทิกา, ตา ปโยเค สติ เอตฺถาปิ ยุชฺชนฺเต. और जो अन्य संस्कृत ग्रंथों में अथवा अन्य वैयाकरणों की संज्ञाएँ हैं, जैसे - घोष, अघोष, लोप, सवर्ण, संयोग, लिंग आदि, वे प्रयोग होने पर यहाँ भी प्रयुक्त होती हैं। ปรสฺมึ, ปเรสํ วา สมญฺญา ปรสมญฺญา, เวยฺยากรเณ, เวยฺยากรณมธีตานํ วา สมญฺญาตฺยตฺโถ. ปยุชฺชนํ ปโยโค, วินิโยโค. दूसरे में, या दूसरों की जो संज्ञा है वह 'परसमञ्ञा' है; व्याकरण में, व्याकरण का अध्ययन करने वालों की जो संज्ञा है, वह इसका अर्थ है। 'पयुज्जनं' का अर्थ प्रयोग या विनियोग है। ตตฺถ วคฺคานํ ปฐมทุติยา, สกาโร จ อโฆสา. วคฺคานํ ตติยจตุตฺถปญฺจมา, ย ร ลว ห ฬา จาติ เอกวีสติ โฆสา นาม. वहाँ वर्गों के प्रथम और द्वितीय (वर्ण) तथा 'स' अघोष हैं। वर्गों के तृतीय, चतुर्थ और पञ्चम (वर्ण) तथा य, र, ल, व, ह, ळ - ये इक्कीस 'घोष' कहलाते हैं। เอตฺถ จ วคฺคานํ ทุติยจตุตฺถา ธนิตาติปิ วุจฺจนฺติ, อิตเร สิถิลาติ. วินาโส โลโป. รสฺสสฺสรา สกทีเฆหิ อญฺญมญฺญํ สวณฺณา นาม, เย สรูปาติปิ วุจฺจนฺติ. สรานนฺตริตานิ [Pg.7] พฺยญฺชนานิ สํโยโค. ธาตุปฺปจฺจยวิภตฺติวชฺชิตมตฺถวํ ลิงฺคํ. วิภตฺยนฺตํ ปทํ. อิจฺเจวมาทิ. और यहाँ वर्गों के द्वितीय और चतुर्थ (वर्ण) 'धनित' (महाप्राण) भी कहे जाते हैं, अन्य 'शिथिल' (अल्पप्राण) हैं। विनाश 'लोप' है। ह्रस्व स्वर अपने दीर्घ (स्वरों) के साथ परस्पर 'सवर्ण' कहलाते हैं, जिन्हें 'सरूप' भी कहा जाता है। स्वरों से रहित (व्यवधान रहित) व्यञ्जन 'संयोग' हैं। धातु, प्रत्यय और विभक्ति से रहित अर्थवान (शब्द) 'लिङ्ग' है। विभक्त्यन्त (विभक्ति जिसके अन्त में हो) 'पद' है। इसी प्रकार आदि। อิติ สญฺญาวิธานํ. इति संज्ञा-विधान। สรสนฺธิวิธาน स्वर-सन्धि विधान อถ สรสนฺธิ วุจฺจเต. अब स्वर-सन्धि कही जाती है। โลก อคฺคปุคฺคโล, ปญฺญา อินฺทฺริยํ, ตีณิ อิมานิ, โน หิ เอตํ, ภิกฺขุนี โอวาโท, มาตุ อุปฏฺฐานํ, สเมตุ อายสฺมา, อภิภู อายตนํ, ธนา เม อตฺถิ, สพฺเพ เอว, ตโย อสฺสุ ธมฺมา, อสนฺโต เอตฺถ น ทิสฺสนฺติ อิตีธ สราทิสญฺญายํ สพฺพสนฺธิกรณฏฺฐาเน พฺยญฺชนวิโยชนตฺถํ ปริภาสมาห. लोक अग्गपुग्गलो, पञ्ञा इन्द्रियं, तीणि इमानि, नो हि एतं, भिक्खुनी ओवादो, मातु उपट्ठानं, समेतु आयस्मा, अभिभू आयतनं, धना मे अत्थि, सब्बे एव, तयो अस्सु धम्मा, असन्तो एत्थ न दिस्सन्ति - यहाँ स्वर आदि की संज्ञा होने पर, सभी सन्धि करने के स्थानों पर व्यञ्जन को अलग करने के लिए परिभाषा कहते हैं। ๑๒. ปุพฺพมโธฐิตมสฺสรํ สเรน วิโยชเย. १२. पूर्व (व्यञ्जन) को, जो नीचे स्थित है और स्वर रहित है, स्वर से अलग करना चाहिए। สเรนาติ นิสฺสกฺเก กรณวจนํ, สหโยเค วา, สนฺธิตพฺเพ สรสหิตํ ปุพฺพพฺยญฺชนํ อนติกฺกมนฺโต อโธฐิตมสฺสรญฺจ กตฺวา สรโต วิโยชเยติ สรโต พฺยญฺชนํ วิโยเชตพฺพํ. เอตฺถ จ อสฺสรคฺคหณสามตฺถิเยน ‘‘พฺยญฺชน’’นฺติ ลทฺธํ. 'सरेन' यह अपादान (निसक्क) में करण वचन है, अथवा सहयोग में है; सन्धि करने योग्य स्वर सहित पूर्व व्यञ्जन का अतिक्रमण न करते हुए, उसे नीचे स्थित और स्वर रहित करके स्वर से अलग करना चाहिए, अर्थात् स्वर से व्यञ्जन को अलग करना चाहिए। और यहाँ 'अस्सर' (स्वर रहित) ग्रहण के सामर्थ्य से 'व्यञ्जन' प्राप्त होता है। ๑๓. สรา สเร โลปํ. १३. स्वर के परे होने पर स्वरों का लोप होता है। สรา โข สพฺเพปิ สเร ปเร ฐิเต โลปํ ปปฺโปนฺติ. โลโปติ อทสฺสนํ อนุจฺจารณํ. เอตฺถ สราติ การิยีนิทฺเทโส. พหุวจนํ ปเนตฺถ เอเกกสฺมึ สเร ปเร พหูนํ โลปญาปนตฺถํ. สเรติ นิมิตฺตนิทฺเทโส, นิมิตฺตสตฺตมี จายํ, นิมิตฺโตปาทานสามตฺถิยโต วณฺณกาลพฺยวธาเน สนฺธิการิยํ น โหติ. โลปนฺติ การิยนิทฺเทโส, อิทํ ปน สุตฺตํ [Pg.8] อุปริ ปรโลปวิธานโต ปุพฺพโลปวิธานนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, เอวํ สพฺพตฺถ สตฺตมีนิทฺเทเส ปุพฺพสฺเสว วิธิ, น ปรสฺส วิธานนฺติ เวทิตพฺพํ. निश्चित ही सभी स्वर, स्वर के परे होने पर लोप को प्राप्त होते हैं। 'लोप' का अर्थ है अदर्शन (दिखाई न देना) या अनुच्चारण। यहाँ 'सरा' कार्य का निर्देश है। यहाँ बहुवचन एक-एक स्वर के परे होने पर बहुतों के लोप को बताने के लिए है। 'सरे' निमित्त का निर्देश है, और यह निमित्त सप्तमी है; निमित्त ग्रहण के सामर्थ्य से वर्ण और काल के व्यवधान होने पर सन्धि कार्य नहीं होता है। 'लोपं' कार्य का निर्देश है; यह सूत्र आगे पर-लोप का विधान होने के कारण पूर्व-लोप का विधान करने वाला समझना चाहिए; इस प्रकार सर्वत्र सप्तमी निर्देश में पूर्व का ही विधान होता है, पर का विधान नहीं, ऐसा जानना चाहिए। ‘‘อสฺสรํ, อโธฐิต’’นฺติ จ วตฺตเต, สิลิฏฺฐกถเน ปริภาสมาห. 'अस्सरं' और 'अधोठितं' की अनुवृत्ति होती है, सुसम्बद्ध कथन (सन्धि) के लिए परिभाषा कहते हैं। ๑๔. นเย ปรํ ยุตฺเต. १४. युक्त होने पर (व्यञ्जन को) पर (वर्ण) से जोड़ना चाहिए। สรรหิตํ โข พฺยญฺชนํ อโธฐิตํ ปรกฺขรํ นเย ยุตฺเต ฐาเนติ ปรนยนํ กาตพฺพํ. เอตฺถ ยุตฺตคฺคหณํ นิคฺคหีตนิเสธนตฺถํ, เตน ‘‘อกฺโกจฺฉิ มํ อวธิ ม’’นฺติอาทีสุ ปรนยนสนฺเทโห น โหติ. स्वर रहित नीचे स्थित व्यञ्जन को युक्त स्थान पर पर-अक्षर (अगले वर्ण) से जोड़ना चाहिए। यहाँ 'युत्त' ग्रहण निग्गहीत के निषेध के लिए है, जिससे 'अक्कोच्छि मं अवधि मं' आदि में पर-नयन (अगले वर्ण से जोड़ने) का सन्देह नहीं होता है। โลกคฺคปุคฺคโล, ปญฺญินฺทฺริยํ, ตีณิมานิ, โนเหตํ, ภิกฺขุโนวาโท, มาตุปฏฺฐานํ, สเมตายสฺมา, อภิภายตนํ, ธนา มตฺถิ, สพฺเพว, ตยสฺสุ ธมฺมา, อสนฺเตตฺถ น ทิสฺสนฺติ. लोकग्गपुग्गलो, पञ्ञिन्द्रियं, तीणिमानि, नोहेतं, भिक्खुनोवादो, मातुपट्ठानं, समेतायस्मा, अभिभायतनं, धना मत्थि, सब्बेव, तयस्सु धम्मा, असन्तेत्थ न दिस्सन्ति। ยสฺส อิทานิ, สญฺญา อิติ, ฉายา อิว, กถา เอว กา, อิติ อปิ, อสฺสมณี อสิ, จกฺขุ อินฺทฺริยํ, อกตญฺญู อสิ, อากาเส อิว, เต อปิ, วนฺเท อหํ, โส อหํ, จตฺตาโร อิเม, วสโล อิติ, โมคฺคลฺลาโน อาสิ พีชโก, ปาโต เอวาตีธ ปุพฺพโลเป สมฺปตฺเต ‘‘สเร’’ติ อธิกาโร, อิธ ปน ‘‘อตฺถวสา วิภตฺติวิปริณาโม’’ติ กตฺวา ‘‘สโร, สรมฺหา, โลป’’นฺติ จ วตฺตมาเน – यस्स इदानि, सञ्ञा इति, छाया इव, कथा एव का, इति अपि, अस्समणी असि, चक्खु इन्द्रियं, अकतञ्ञू असि, आकासे इव, ते अपि, वन्दे अहं, सो अहं, चत्तारो इमे, वसलो इति, मोग्गल्लानो आसि बीजको, पातो एव - यहाँ पूर्व-लोप प्राप्त होने पर 'सरे' का अधिकार है, किन्तु यहाँ 'अर्थ के वश से विभक्ति का विपरिणाम' करके 'सरो' (प्रथमा), 'सरम्हा' (पञ्चमी) और 'लोपं' की अनुवृत्ति होने पर - ๑๕. วา ปโร อสรูปา. १५. असमान रूप वाले स्वर से परे (बाद वाला) स्वर विकल्प से लोप को प्राप्त होता है। อสมานรูปมฺหา สรมฺหา ปโร สโร โลปํ ปปฺโปติ วา. สมานํ รูปํ อสฺสาติ สรูโป, น สรูโป อสรูโป, อสวณฺโณ[Pg.9]. ยสฺมา ปน มริยาทายํ, อภิวิธิมฺหิ จ วตฺตมาโน อาอุปสคฺโค วิย วาสทฺโท ทฺวิธา วตฺตเต, กตฺถจิ วิกปฺเป, กตฺถจิ ยถาววตฺถิตรูปปริคฺคเห, อิธ ปน ปจฺฉิเม, ตโต นิจฺจมนิจฺจมสนฺตญฺจ วิธิเมตฺถ วาสทฺโท ทีเปติ. ‘‘นเย ปรํ ยุตฺเต’’ติ ปรํ เนตพฺพํ. असमान रूप वाले स्वर से परे स्वर विकल्प से लोप को प्राप्त होता है। जिसका रूप समान हो वह 'सरूप' है, जो सरूप नहीं है वह 'असरूप' (असवर्ण) है। चूँकि 'वा' शब्द मर्यादा और अभिविधि में प्रयुक्त 'आ' उपसर्ग की तरह दो प्रकार से प्रयुक्त होता है, कहीं विकल्प में, कहीं यथा-व्यवस्थित रूप के ग्रहण में; यहाँ उत्तरवर्ती (बाद वाला) अर्थ है, इसलिए यहाँ 'वा' शब्द नित्य, अनित्य और अभाव रूप विधान को दर्शाता है। 'नये परं युत्ते' से पर (वर्ण) में जोड़ना चाहिए। ยสฺสทานิ ยสฺส อิทานิ, สญฺญาติ สญฺญา อิติ, ฉายาว ฉายา อิว, กถาว กา กถา เอว กา, อิตีปิ อิติ อปิ, อสฺสมณีสิ อสฺสมณี อสิ. จกฺขุนฺทฺริย มิติ นิจฺจํ. อกตญฺญูสิ อกตญฺญู อสิ, อากาเสว อากาเส อิว, เตปิ เต อปิ, วนฺเทหํ วนฺเท อหํ, โสหํ โส อหํ, จตฺตาโรเม จตฺตาโร อิเม, วสโลติ วสโล อิติ, โมคฺคลฺลาโนสิ พีชโก โมคฺคลฺลาโน อาสิ พีชโก, ปาโตว ปาโต เอว. यस्सदानि (यस्स इदानि), सञ्ञाति (सञ्ञा इति), छायाव (छाया इव), कथाव का (कथा एव का), इतीपि (इति अपि), अस्समणीसि (अस्समणी असि)। चक्खुन्द्रियं - यह नित्य है। अकतञ्ञू सि (अकतञ्ञू असि), आकासेव (आकासे इव), तेपि (ते अपि), वन्दे हं (वन्दे अहं), सोहं (सो अहं), चत्तारोमे (चत्तारो इमे), वसलोति (वसलो इति), मोग्गल्लानोसि बीजको (मोग्गल्लानो आसि बीजको), पातोव (पातो एव)। อิธ น ภวติ – ปญฺจินฺทฺริยานิ, สทฺธินฺทฺริยํ, สตฺตุตฺตโม, เอกูนวีสติ, ยสฺเสเต, สุคโตวาโท, ทิฏฺฐาสโว, ทิฏฺโฐโฆ, จกฺขายตนํ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา อิจฺจาทิ. यहाँ (यह लोप) नहीं होता है - पञ्चिन्द्रियानि, सद्धिन्द्रियं, सत्तुत्तमो, एकूनवीसति, यस्सेते, सुगतोवादो, दिट्ठासवो, दिट्ठोघो, चक्खायतनं, तं कुतेत्थ लब्भा इत्यादि। ภวติ จ ววตฺถิตวิภาสาย. और व्यवस्थित विभाषा (विकल्प) से होता है। อวณฺณโต สโรทานี-ตีเววาทึ วินา ปโร; น ลุปฺปตญฺญโต ทีโฆ, อาเสวาทิวิวชฺชิโต. अ-वर्ण (अ, आ) से परे 'इदानि', 'इति', 'इव', 'एव' आदि को छोड़कर पर-स्वर का लोप नहीं होता है; और 'आसि', 'एव' आदि को छोड़कर अन्य (स्वर) से परे दीर्घ स्वर का लोप नहीं होता है। พนฺธุสฺส อิว, อุป อิกฺขติ, อุป อิโต, อว อิจฺจ, ชิน อีริตํ, น อุเปติ, จนฺท อุทโย, ยถา อุทเก อิตีธ ปุพฺพาวณฺณสฺสรานํ [Pg.10] โลเป กเต ‘‘ปโร, อสรูเป’’ติ จ วตฺตเต, ตถา ‘‘อิวณฺโณ ยํ นวา’’ติ อิโต อิวณฺณคฺคหณญฺจ, ‘‘วโมทุทนฺตาน’’นฺติ อิโต อุคฺคหณญฺจ สีหคติยา อิธานุวตฺเตตพฺพํ. बन्धुस्स इव, उप इक्खति, उप इतो, अव इच्च, जिन ईरितं, न उपेति, चन्द उदयो, यथा उदके - यहाँ पूर्व अ-वर्ण स्वरों का लोप होने पर 'परो' और 'असरूपे' की अनुवृत्ति होती है, तथा 'इवण्णो यं नवा' यहाँ से 'इवण्ण' का ग्रहण और 'वमोदुदन्तानं' यहाँ से 'उ' का ग्रहण सिंहगति (पीछे मुड़कर देखना) से यहाँ अनुवृत्त करना चाहिए। ๑๖. กฺวจาสวณฺณํ ลุตฺเต. १६. लोप होने पर कहीं-कहीं असवर्ण (आदेश) होता है। อิวณฺณภูโต, อุการภูโต จ ปโร สโร อสรูเป ปุพฺพสฺสเร ลุตฺเต กฺวจิ อสวณฺณํ ปปฺโปติ. นตฺถิ สวณฺณา เอเตสนฺติ อสวณฺณา, เอกาโรการา, ตตฺถ ฐานาสนฺนวเสน อิวณฺณุการานเมกาโรการา โหนฺติ. पूर्व स्वर के लुप्त होने पर, असवर्ण (स्वर) के परे होने पर, इ-वर्ण और उ-वर्ण रूप पर-स्वर कहीं-कहीं असवर्ण को प्राप्त होते हैं। जिनका सवर्ण नहीं है वे 'असवर्ण' हैं, अर्थात् एकार और ओकार; वहाँ स्थान की निकटता के कारण इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर क्रमशः एकार और ओकार होते हैं। พนฺธุสฺเสว, อุเปกฺขติ, อุเปโต, อเวจฺจ, ชิเนริตํ, โนเปติ, จนฺโททโย, ยโถทเก. กฺวจีติ กึ? ตตฺริเม, ยสฺสินฺทฺริยานิ, มหิทฺธิโก, สพฺพีติโย, เตนุปสงฺกมิ, โลกุตฺตโร. ลุตฺเตติ กึ? ฉ อิเม ธมฺมา, ยถา อิทํ, กุสลสฺส อุปสมฺปทา. อสรูเปติ กึ? จตฺตาริมานิ, มาตุปฏฺฐานํ. बन्धुस्सेव (बन्धुस्स + इव), उपेक्खति (उप + इक्खति), उपेतो (उप + इतो), अवेच्च (अव + इच्च), जिनेरितं (जिन + ईरितं), नोपेति (न + उपेति), चन्दोदयो (चन्द + उदयो), यथोदके (यथा + उदके)। 'क्वचि' (कहीं-कहीं) क्यों? तत्रिमे (तत्र + इमे), यस्सिन्द्रियानि (यस्स + इन्द्रियानि), महिद्धिको (महा + इद्धिको), सब्बीतियो (सब्ब + ईतियो), तेनुपसङ्कमि (तेन + उपसङ्कमि), लोकुत्तरो (लोक + उत्तरो)। 'लुत्ते' (लोप होने पर) क्यों? छ इमे धम्मा, यथा इदं, कुसलस्स उपसम्पदा। 'असरूपे' (असमान होने पर) क्यों? चत्तारिमानि, मातुपट्ठानं। เอตฺถ จ สติปิ เหฏฺฐา วาคฺคหเณ กฺวจิกรณโต อวณฺเณ เอว ลุตฺเต อิธ วุตฺตวิธิ โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ตโต อิธ น ภวติ – ทิฏฺฐุปาทานํ, ปญฺจหุปาลิ, มุทินฺทฺริยํ, โย มิสฺสโรติ. यहाँ नीचे 'वा' शब्द के ग्रहण होने पर भी, 'क्वचि' (कहीं-कहीं) करने से 'अ' वर्ण के ही लुप्त होने पर यहाँ बताई गई विधि होती है, ऐसा समझना चाहिए। इसलिए यहाँ नहीं होता - दिट्ठुपादानं, पञ्चहुपालि, मुदिन्द्रियं, यो मिस्सरोति। ตตฺร อยํ, พุทฺธ อนุสฺสติ, ส อตฺถิกา, ปญฺญวา อสฺส, ตทา อหํ, ยานิ อิธ ภูตานิ, คจฺฉามิ อิติ, อติ อิโต, กิกี อิว, พหุ อุปการํ, มธุ อุทกํ, สุ อุปธาริตํ, โยปิ อยํ[Pg.11], อิทานิ อหํ, สเจ อยํ, อปฺปสฺสุโต อยํ, อิตร อิตเรน, สทฺธา อิธ วิตฺตํ, กมฺม อุปนิสฺสโย, ตถา อุปมํ, รตฺติ อุปรโต, วิ อุปสโม อิจฺจตฺร ปุพฺพสฺสรานํ โลเป กเต – तत्र अयं, बुद्ध अनुस्सति, सा अत्थिका, पञ्ञवा अस्स, तदा अहं, यानि इध भूतानि, गच्छामि इति, अति इतो, किकी इव, बहु उपकारं, मधु उदकं, सु उपधारितं, योपि अयं, इदानि अहं, सचे अयं, अप्पस्सुतो अयं, इतर इतरेन, सद्धा इध वित्तं, कम्म उपनिस्सयो, तथा उपमं, रत्ति उपरतो, वि उपसमो - यहाँ पूर्व स्वरों का लोप होने पर - ‘‘กฺวจี’’ติ อธิกาโร, ‘‘ปโร, ลุตฺเต’’ติ จ วตฺตเต. 'क्वचि' यह अधिकार है, और 'परो, लुत्ते' की अनुवृत्ति होती है। ๑๗. ทีฆํ. १७. दीर्घ (होता है)। สโร โข ปโร ปุพฺพสฺสเร ลุตฺเต กฺวจิ ทีฆภาวํ ปปฺโปตีติ ฐานาสนฺนวเสน รสฺสสฺสรานํ สวณฺณทีโฆ. पूर्व स्वर का लोप होने पर पर (बाद वाला) स्वर कहीं-कहीं दीर्घ भाव को प्राप्त होता है; स्थान की निकटता के कारण ह्रस्व स्वरों का सवर्ण दीर्घ होता है। ตตฺรายํ, พุทฺธานุสฺสติ, สาตฺถิกา, ปญฺญวาสฺส, ตทาหํ, ยานีธ ภูตานิ, คจฺฉามีติ, อตีโต, กิกีว, พหูปการํ, มธูทกํ, สูปธาริตํ, โยปายํ, อิทานาหํ, สจายํ, อปฺปสฺสุตายํ, อิตรีตเรน, สทฺธีธ วิตฺตํ, กมฺมูปนิสฺสโย, ตถูปมํ, รตฺตูปรโต, วูปสโม. तत्रायं, बुद्धानुस्सति, सात्थिका, पञ्ञवास्स, तदाहं, यानीध भूतानि, गच्छामीति, अतीतो, किकीव, बहूपकारं, मधूदकं, सूपधारितं, योपायं, इदानाहं, सचायं, अप्पस्सुतायं, इतरीतरेन, सद्धीध वित्तं, कम्मूपनिस्सयो, तथूपमं, रत्तूपरतो, वूपसमो। กฺวจีติ กึ? อจิรํ วต’ยํ กาโย, กิมฺปิมาย, ตีณิมานิ, ปญฺจสุปาทานกฺขนฺเธสุ, ตสฺสตฺโถ, ปญฺจงฺคิโก, มุนินฺโท, สตินฺทฺริยํ, ลหุฏฺฐานํ, คจฺฉามหํ, ตตฺริทํ, ปญฺจหุปาลิ, นตฺถญฺญํ. ลุตฺเตติ กึ? ยถา อยํ, นิมิ อิว ราชา, กิกี อิว, สุ อุปธาริตํ. 'क्वचि' क्यों? अचिरं वत'यं कायो, किम्पिमाय, तीणिमानि, पञ्चसुपादानक्खन्धेसु, तस्सत्थो, पञ्चङ्गिको, मुनिन्दो, सतिन्द्रयिँ, लहुट्ठानं, गच्छामहं, तत्रिदं, पञ्चहुपालि, नत्थञ्ञं। 'लुत्ते' क्यों? यथा अयं, निमि इव राजा, किकी इव, सु उपधारितं। โลกสฺส [Pg.12] อิติ, เทว อิติ, วิ อติ ปตนฺติ, วิ อติ นาเมนฺติ, สงฺฆาฏิ อปิ, ชีวิตเหตุ อปิ, วิชฺชุ อิว, กึสุ อิธ วิตฺตํ, สาธุ อิติ อิตีธ ปรสฺสรานํ โลเป กเต – लोकस्स इति, देव इति, वि अति पतन्ति, वि अति नामेन्ति, सङ्घाटि अपि, जीवितहेतु अपि, विज्जु इव, किंसु इध वित्तं, साधु इति - यहाँ पर स्वरों का लोप होने पर - ‘‘ลุตฺเต, ทีฆ’’นฺติ จ วตฺตเต. 'लुत्ते' और 'दीघं' की अनुवृत्ति होती है। ๑๘. ปุพฺโพ จ. १८. और पूर्व (स्वर)। ปุพฺโพ สโร ปรสฺสเร ลุตฺเต กฺวจิทีฆํ ปปฺโปติ. จคฺคหณํ ลุตฺตทีฆคฺคหณานุกฑฺฒนตฺถํ, ตํ ‘‘จานุกฑฺฒิตมุตฺตรตฺร นานุวตฺตเต’’ติ ญาปนตฺถํ. पर स्वर का लोप होने पर पूर्व स्वर कहीं-कहीं दीर्घ हो जाता है। 'च' का ग्रहण लुप्त और दीर्घ के ग्रहण को खींचने (अनुवृत्ति) के लिए है, वह यह बताने के लिए है कि 'च' से खींचा गया आगे अनुवृत्त नहीं होता। โลกสฺสาติ, เทวาติ, วีติปตนฺติ, วีตินาเมนฺติ, สงฺฆาฏีปิ, ชีวิตเหตูปิ, วิชฺชูว, กึสูธ วิตฺตํ, สาธูติ. लोकस्साति, देवाति, वीतिपतन्ति, वीतिनामेन्ति, सङ्घाटीपि, जीवितहेतूपि, विज्जूव, किंसुध वित्तं, साधूति। กฺวจีติ กึ? ยสฺสทานิ, อิติสฺส, อิทานิปิ, เตสุปิ, จกฺขุนฺทฺริยํ, กินฺนุมาว. 'क्वचि' क्यों? यस्सदानि, इतिस्स, इदानिपि, तेसुपि, चक्खुन्द्रियं, किन्नुमाव। อธิคโต โข เม อยํ ธมฺโม, ปุตฺโต เต อหํ, เต อสฺส ปหีนา, ปพฺพเต อหํ, เย อสฺส อิตีธ ปุพฺพโลเป สมฺปตฺเต – अधिगतो खो मे अयं धम्मो, पुत्तो ते अहं, ते अस्स पहीना, पब्बते अहं, ye assa - यहाँ पूर्व लोप प्राप्त होने पर - ๑๙. ยเมทนฺตสฺสาเทโส. १९. ए-कार के अन्त वाले का 'य' आदेश। เอการสฺส ปทนฺตภูตสฺส ฐาเน สเร ปเร กฺวจิ ยการาเทโส โหติ. อกาเรเมเตเยสทฺทาทิสฺเสวายํ วิธิ, ยนฺติ ยํ รูปํ, เอ เอว อนฺโต เอทนฺโต, อาเทสิฏฺฐาเน อาทิสฺสตีติ อาเทโส. ‘‘พฺยญฺชเน’’ติ อธิกิจฺจ ‘‘ทีฆ’’นฺติ ทีโฆ. पद के अन्त में स्थित ए-कार के स्थान पर स्वर परे होने पर कहीं-कहीं य-कार आदेश होता है। 'अकारेमेतये' शब्दों के आदि में ही यह विधि होती है; 'यं' जो रूप है, 'ए' ही अन्त में है जिसका वह 'एदन्त', आदेश के स्थान पर जो आता है वह 'आदेश' है। 'ब्यञ्जने' का अधिकार कर 'दीघं' से दीर्घ होता है। อธิคโต [Pg.13] โข มฺยายํ ธมฺโม, ปุตฺโต ตฺยาหํ, ตฺยาสฺส ปหีนา, ปพฺพตฺยาหํ, ยฺยาสฺส. अधिगतो खो म्यायं धम्मो, पुत्तो त्याहं, त्यास्स पहीना, पब्बत्याहं, य्यास्स। กฺวจีติ กึ? เต นาคตา, ปุตฺตา มตฺถิ. อนฺตคฺคหณํ กึ? ธมฺมจกฺกํ ปวตฺเตนฺโต, ทเมนฺโต จิตฺตํ. 'क्वचि' क्यों? ते नागता, पुत्ता मत्थि। 'अन्त' ग्रहण क्यों? धम्मचक्कं पवत्तेन्तो, दमेन्तो चित्तं। ยาวตโก อสฺส กาโย, ตาวตโก อสฺส พฺยาโม, โก อตฺโถ, อถ โข อสฺส, อหํ โข อชฺช, โย อยํ, โส อสฺส, โส เอว, ยโต อธิกรณํ, อนุ อทฺธมาสํ, อนุ เอติ, สุ อาคตํ, สุ อากาโร, ทุ อากาโร, จกฺขุ อาปาถํ, พหุ อาพาโธ, ปาตุ อกาสิ, น ตุ เอวาตีธ – यावतको अस्स कायो, तावतको अस्स ब्यामो, को अत्थो, अथ खो अस्स, अहं खो अज्ज, यो अयं, सो अस्स, सो एव, यतो अधिकरणं, अनु अद्धमासं, अनु एति, सु आगतं, सु आकारो, दु आकारो, चक्खु आपाथं, बहु आबाधो, पातु अकासि, न तु एव - यहाँ - ๒๐. วโมทุทนฺตานํ. २०. ओ और उ अन्त वालों का 'व' आदेश। โอการุการานํ อนฺตภูตานํ สเร ปเร กฺวจิ วการาเทโส โหติ. ก ข ย ตสทฺทาทิโอการสฺเสทํ คหณํ. अन्त में स्थित ओ-कार और उ-कार के स्थान पर स्वर परे होने पर कहीं-कहीं व-कार आदेश होता है। क, ख, य, त शब्दों के आदि ओ-कार का यह ग्रहण है। ยาวตกฺวสฺส กาโย, ตาวตกฺวสฺส พฺยาโม, กฺวตฺโถ, อถ ขฺวสฺส, อหํ ขฺวชฺช, ยฺวายํ, สฺวสฺส, สฺเวว, ยตฺวาธิกรณํ, อนฺวทฺธมาสํ, อนฺเวภิ, สฺวาคตํ, สฺวากาโร, ทฺวากาโร, จกฺขฺวาปาถํ, พหฺวาพาโธ, ปาตฺวากาสิ, น ตฺเวว. यावतक्वस्स कायो, तावतक्वस्स ब्यामो, क्वत्थो, अथ ख्वस्स, अहं ख्वज्ज, य्वायं, स्वस्स, स्वेव, यत्वाधिकरणं, अन्वद्धमासं, अन्वेभि, स्वागतं, स्वाकारो, द्वाकारो, चक्ख्वापाथं, बह्वाबाधो, पात्वाकासि, न त्वेव। กฺวจีติ กึ? โก อตฺโถ, อถ โข อญฺญตรา, โยหํ, โสหํ, จตฺตาโรเม, สาคตํ, สาธาวุโส, โหตูติ. อนฺตคฺคหณํ กึ? สวนียํ, วิรวนฺติ. 'क्वचि' क्यों? को अत्थो, अथ खो अञ्ञतरा, योहं, सोहं, चत्तारोमे, सागतं, साधावुसो, होतूति। 'अन्त' ग्रहण क्यों? सवनीयं, विरवन्ति। ปฏิสนฺถารวุตฺติ [Pg.14] อสฺส, สพฺพา วิตฺติ อนุภุยฺยเต, วิ อญฺชนํ, วิ อากโต, นที อาสนฺโน อิตีธ มณฺฑูกคติยา ‘‘อสรูเป’’ติ วตฺตเต. पटिसन्थारवुत्ति अस्स, सब्बा वित्ति अनुभुय्यते, वि अञ्जनं, वि आगतो, नदी आसन्नो - यहाँ मण्डूकगति से 'असरूपे' की अनुवृत्ति होती है। ๒๑. อิวณฺโณ ยํ นวา. २१. इ-वर्ण का 'य' विकल्प से। ปุพฺโพ อิวณฺโณ อสรูเป สเร ปเร ยการํ ปปฺโปติ นวา. อิ เอว วณฺโณ อิวณฺโณ, นวาสทฺโท กฺวจิสทฺทปริยาโย. पूर्व इ-वर्ण असमान स्वर परे होने पर विकल्प से य-कार को प्राप्त होता है। 'इ' ही वर्ण 'इ-वर्ण' है, 'नवा' शब्द 'क्वचि' शब्द का पर्यायवाची है। ปฏิสนฺถารวุตฺยสฺส, สพฺพา วิตฺยานุภุยฺยเต, พฺยญฺชนํ, พฺยากโต, นทฺยาสนฺโน. पटिसन्थारवुत्यस्स, सब्बा वित्यानुभुय्यते, ब्यञ्जनं, ब्याकतो, नद्यासन्नो। นวาติ กึ? ปญฺจหงฺเคหิ, ตานิ อตฺตนิ, คจฺฉามหํ, มุตฺตจาคี อนุทฺธโต. อสรูเปติ กึ? อิติหิทํ, อคฺคีว, อตฺถีติ. 'नवा' क्यों? पञ्चहङ्गेहि, तानि अत्तनि, गच्छामहं, मुत्तचागी अनुद्धतो। 'असरूपे' क्यों? इतिहिदं, अग्गीव, अत्थीति। อติ อนฺตํ, อติ โอทาตา, ปติ อโย, ปติ อาหรติ, ปติ เอติ, อิติ อสฺส, อิติ เอตํ, อิติอาทิ อิตีธ ‘‘อิวณฺโณ ยํ นวา’’ติ ยการาเทเส สมฺปตฺเต – अति अन्तम्, अति ओदाता, पति अयो, पति आहरति, पति एति, इति अस्स, इति एतं, इतिआदि - यहाँ 'इवण्णो यं नवा' से य-कार आदेश प्राप्त होने पर - ๒๒. สพฺโพ จนฺติ. २२. सब्बो चं ति। อติปติอิตีนํ ติสทฺทสฺเสทํ คหณํ. यह 'अति', 'पति' और 'इति' के 'ति' शब्द का ग्रहण है। สพฺโพ ติอิจฺเจโส สทฺโท สเร ปเร กฺวจิ จการํ ปปฺโปติ. ตีติ นิทฺเทสโต อกตยการสฺเสวายํ วิธิ, อิตรถา กฺวจิคฺคหณสฺส จ ‘‘อติสฺส จนฺตสฺสา’’ติสุตฺตสฺส จ นิรตฺถกตา สิยา. ‘‘ปรทฺเวภาโว ฐาเน’’ติ ทฺวิตฺตํ. यह 'सब्बो ति' ऐसा शब्द स्वर के परे होने पर कहीं 'च' कार को प्राप्त होता है। 'ति' इस निर्देश से यह विधि बिना 'य' कार किए हुए के लिए ही है, अन्यथा 'क्वचि' ग्रहण और 'अतिस्स चन्तस्स' इस सूत्र की निरर्थकता हो जाएगी। 'परद्वेभावो ठाने' से द्वित्व होता है। อจฺจนฺตํ[Pg.15], อจฺโจทาตา, ปจฺจโย, ปจฺจาหรติ, ปจฺเจติ, อิจฺจสฺส, อิจฺเจตํ, อิจฺจาทิ. अच्चन्तं, अच्चोदाता, पच्चयो, पच्चाहरति, पच्चेति, इच्चस्स, इच्चेतं, इत्यादि। กฺวจีติ กึ? อิติสฺส, อิติ อากงฺขมาเนน. 'क्वचि' क्यों? इतिस्स, इति आकङ्खमानेन। ‘‘เต น วาอิวณฺเณ’’ติ อิโต ‘‘น อิวณฺเณ’’ติ จ วตฺตเต. 'ते न वा इवण्णे' यहाँ से 'न इवण्णे' की अनुवृत्ति होती है। ๒๓. อติสฺส จนฺตสฺส. २३. अतिस्स चन्तस्स। อติอิจฺเจตสฺส อนฺตภูตสฺส ติสทฺทสฺส อิวณฺเณ ปเร ‘‘สพฺโพ จํ ตี’’ติ วุตฺตรูปํ น โหติ. อติสฺสาติ อติอุปสคฺคานุกรณเมตํ. เตเนเวตฺถ วิภตฺติโลปาภาโว. เอตฺถ จ อนฺตสทฺโท สทฺทวิธินิเสธปฺปกรณโต อติสทฺทนฺตภูตํ ติสทฺทเมว วทติ, น อิวณฺณนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, อิตรถา อิทํ สุตฺตเมว นิรตฺถกํ สิยา. इस 'अति' के अन्त में स्थित 'ति' शब्द को 'इ' वर्ण के परे होने पर 'सब्बो चं ति' द्वारा कहा गया रूप नहीं होता है। 'अतिस्स' यह 'अति' उपसर्ग का अनुकरण है। इसी कारण यहाँ विभक्ति का लोप नहीं हुआ है। और यहाँ 'अन्त' शब्द शब्द-विधि-निषेध के प्रकरण से 'अति' शब्द के अन्त में स्थित 'ति' शब्द को ही कहता है, 'इ' वर्ण को नहीं, ऐसा समझना चाहिए; अन्यथा यह सूत्र ही निरर्थक हो जाएगा। ‘‘อิวณฺโณ ยํ นวา’’ตีธ, อสรูปาธิการโต; อิวณฺณสฺส สรูปสฺมึ, ยาเทโส จ น สมฺภเว. 'इवण्णो यं नवा' यहाँ 'असरूप' के अधिकार से, 'इ' वर्ण के समान स्वर होने पर 'य' आदेश संभव नहीं है। จกาโร อนุตฺตสมุจฺจยตฺโถ, เตน อิติปตีนมนฺตสฺส จ น โหติ. อติ อิสิคโณ อตีสิคโณ, เอวํ อตีโต, อตีริตํ, อิตีติ, อิตีทํ, ปตีโต. 'च' कार अनुक्त समुच्चय के अर्थ में है, उससे 'इति' और 'पति' के अन्त को भी (यह रूप) नहीं होता है। अति + इसिगणो = अतीसिगणो, इसी प्रकार अतीतो, अतीरितं, इतीति, इतीदं, पतीतो। อภิ อกฺขานํ, อภิ อุคฺคโต, อภิ โอกาโส อิตีธ ยกาเร สมฺปตฺเต – अभि + अक्खानं, अभि + उग्गतो, अभि + ओकासो यहाँ 'य' कार प्राप्त होने पर — ‘‘สเร’’ติ วตฺตเต. 'सरे' की अनुवृत्ति होती है। ๒๔. อพฺโภ อภิ. २४. अब्भो अभि। อภิอิจฺเจตสฺส สพฺพสฺส สเร ปเร อพฺภาเทโส โหติ. इस सम्पूर्ण 'अभि' को स्वर के परे होने पर 'अब्भ' आदेश होता है। ‘‘อภี’’ติ ปฐมนฺตสฺส, วุตฺติยํ ฉฏฺฐิโยชนํ; อาเทสาเปกฺขโต วุตฺตํ, ‘‘อํโม’’ติอาทิเก วิย. 'अभि' यह प्रथमान्त है, वृत्ति में षष्ठी का योजन आदेश की अपेक्षा से किया गया है, जैसे 'अंमो' इत्यादि में। ปุพฺพสฺสรโลโป[Pg.16], อพฺภกฺขานํ, อพฺภุคฺคโต, อพฺโภกาโส. पूर्व स्वर का लोप (होकर) — अब्भक्खानं, अब्भुग्गतो, अब्भोकासो। อธิ อคมา, อธิ อุปคโต, อธิ โอคาเหตฺวา อิตีธ अधि + अगमा, अधि + उपगतो, अधि + ओगाहेत्वा यहाँ — ๒๕. อชฺโฌ อธิ. २५. अज्झो अधि। อธิอิจฺเจตสฺส สพฺพสฺส สเร ปเร อชฺฌาเทโส โหติ. อชฺฌคมา, อชฺฌุปคโต, อชฺโฌคาเหตฺวา. इस सम्पूर्ण 'अधि' को स्वर के परे होने पर 'अज्झ' आदेश होता है। अज्झगमा, अज्झुपगतो, अज्झोगाहेत्वा। อภิ อิจฺฉิตํ, อธิ อีริตํ อิตีธ अभि + इच्छितं, अधि + ईरितं यहाँ — ‘‘อพฺโภ อภิ, อชฺโฌ อธี’’ติ จ วตฺตเต. 'अब्भो अभि' और 'अज्झो अधि' की अनुवृत्ति होती है। ๒๖. เต น วา อิวณฺเณ. २६. ते न वा इवण्णे। เต จ โข อภิอธิอิจฺเจเต อุปสคฺคา อิวณฺเณ ปเร อพฺโภ อชฺโฌอิติ วุตฺตรูปา น โหนฺติ วา. สรโลปปรนยนานิ. อภิจฺฉิตํ, อธีริตํ. วาติ กึ? อพฺภีริตํ, อชฺฌิณมุตฺโต, อชฺฌิฏฺโฐ. वे 'अभि' और 'अधि' उपसर्ग 'इ' वर्ण के परे होने पर 'अब्भ' और 'अज्झ' रूप वाले विकल्प से नहीं होते हैं। स्वर लोप और पर-नयन (होकर) — अभिच्छितं, अधीरितं। 'वा' (विकल्प) क्यों? अब्भीरितं, अज्झिणमुत्तो, अज्झिट्ठो। เอกมิธ อหนฺตีธ एकमध अहन्तिध यहाँ — ๒๗. โท ธสฺส จ. २७. दो धस्स च। ธอิจฺเจตสฺส สเร ปเร กฺวจิ ทกาโร โหติ. เอกสทฺทโต ปรสฺส อิธสฺส ธการสฺเสวายํ, สรโลปทีฆา. เอกมิทาหํ. กฺวจีติ กึ? อิเธว. इस 'ध' को स्वर के परे होने पर कहीं 'द' कार होता है। यह 'एक' शब्द के बाद आने वाले 'इध' के 'ध' कार को ही होता है, (फिर) स्वर लोप और दीर्घ (होकर) — एकमिदाहं। 'क्वचि' क्यों? इधेव। จสทฺเทน กฺวจิ สาธุสฺส ธสฺส หกาโร, ยถา – สาหุ ทสฺสนํ. 'च' शब्द से कहीं 'साधु' के 'ध' को 'ह' कार होता है, जैसे — साहु दस्सनं। ยถา เอว ตถา เอวาตีธ यथा + एव, तथा + एव यहाँ — ‘‘นวา’’ติ วตฺตเต, ‘‘สรมฺหา’’ติ จ. 'नवा' और 'सरम्हा' की अनुवृत्ति होती है। ๒๘. เอวาทิสฺส [Pg.17] ริ ปุพฺโพ จ รสฺโส. २८. एवादि के (आदि को) 'रि' और पूर्व (स्वर) ह्रस्व होता है। ยถาตถาทฺวยปรสฺเสทํ คหณํ. ทีฆสรมฺหา ปรสฺส เอวสทฺทาทิภูตสฺส เอการสฺส ริกาโร โหติ, ปุพฺโพ จ สโร รสฺโส โหติ นวา. ยถริว, ตถริว. นวาติ กึ? ยเถว, ตเถว. 'यथा' और 'तथा' इन दोनों के बाद आने वाले 'एव' आदि शब्दों के 'ए' का 'रि' हो जाता है और पूर्व स्वर विकल्प से ह्रस्व हो जाता है। जैसे- 'यथारिव', 'तथारिव'। 'विकल्प से' क्यों? 'यथेव', 'तथेव' (भी होते हैं)। ติ อนฺตํ,ติ อทฺธํ, อคฺคิ อคาเร, สตฺตมี อตฺเถ, ปญฺจมี อนฺตํ, ทุ องฺคิกํ, ภิกฺขุ อาสเน, ปุถุ อาสเน, สยมฺภู อาสเน อิตีธ ยวาเทเสสุ สมฺปตฺเตสุ – 'ति अन्तम्', 'ति अद्धम्', 'अग्गि अगारे', 'सत्तमी अत्थे', 'पञ्चमी अन्तम्', 'दु अङ्गिकम्', 'भिक्खु आसने', 'पुथु आसने', 'सयम्भू आसने' - यहाँ 'य' और 'व' आदेश प्राप्त होने पर - ‘‘สญฺญา’’ติ วตฺตเต. 'संज्ञा' यह (पद) अनुवृत्त होता है। ๒๙. อิวณฺณุวณฺณา ฌลา. २९. इ-वर्ण (इ, ई) और उ-वर्ण (उ, ऊ) 'झ' और 'ल' संज्ञक होते हैं। อิวณฺณอุวณฺณอิจฺเจเต ยถากฺกมํ ฌลสญฺญา โหนฺติ. วณฺณคฺคหณํ สวณฺณคฺคหณตฺถํ. इ-वर्ण और उ-वर्ण ये क्रमशः 'झ' और 'ल' संज्ञा वाले होते हैं। 'वर्ण' का ग्रहण सवर्णों के ग्रहण के लिए है। ฌลสญฺญา ปสญฺญาว, น ลิงฺคนฺตํว นิสฺสิตา; อาขฺยาเต ลิงฺคมชฺเฌ จ, ทฺวิลิงฺคนฺเต จ ทสฺสนา. 'झ' और 'ल' संज्ञाएँ 'प' संज्ञा के समान ही हैं, वे केवल लिंग (शब्द) के अंत पर ही आश्रित नहीं हैं; क्योंकि वे आख्यात (क्रिया), लिंग के मध्य में और दोनों लिंगों के अंत में भी देखी जाने के कारण। ๓๐. ฌลานมิยุวา สเร วา. ३०. स्वर परे होने पर 'झ' और 'ल' के स्थान पर विकल्प से क्रमशः 'इय्' और 'उव्' आदेश होते हैं। ฌลอิจฺเจเตสํ อิยอุวอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา สเร ปเร, สรโลโป. स्वर परे होने पर इन 'झ' और 'ल' के स्थान पर विकल्प से 'इय्' और 'उव्' ये आदेश होते हैं, और (पर) स्वर का लोप हो जाता है। ติยนฺตํ, ติยทฺธํ, อคฺคิยาคาเร, สตฺตมิยตฺเถ, ปญฺจมิยนฺตํ, ทุวงฺคิกํ, ภิกฺขุวาสเน, ปุถุวาสเน, สยมฺภุวาสเน. วาติ กึ? อคฺยาคาเร, สตฺตมีอตฺเถ, ภิกฺขุอาสเน นิสีทติ. 'तियन्तम्', 'तियद्धम्', 'अग्गियागारे', 'सत्तमीयत्थे', 'पञ्चमियन्तम्', 'दुवङ्गिकम्', 'भिक्खुवासने', 'पुथुवासने', 'सयम्भूवासने'। 'विकल्प से' क्यों? 'अग्यागारे', 'सत्तमीअत्थे', 'भिक्खु आसने निसीदति'। โค อชินํ, โค เอฬกํ อิตีธ 'गो अजिनम्', 'गो एळकम्' - यहाँ - ‘‘โค, อโว, สมาเส’’ติ จ วตฺตเต. 'गो', 'अव' और 'समास में' - ये (पद) अनुवृत्त होते हैं। ๓๑. โอ [Pg.18] สเร จ. ३१. और स्वर परे होने पर 'ओ' को (अव आदेश होता है)। โคอิจฺเจตสฺส โอการสฺส สเร ปเร อวาเทโส โหติ สมาเส. ควาชินํ, คเวฬกํ. จสทฺทคฺคหเณน อุวณฺณสฺส อุวอวาเทสา. ยถา – ภุวิ, ปสโว. समास में स्वर परे होने पर 'गो' शब्द के ओकार को 'अव' आदेश होता है। जैसे- 'गवाजिनम्', 'गवेळकम्'। 'च' शब्द के ग्रहण से उ-वर्ण को 'उव' और 'अव' आदेश होते हैं। जैसे- 'भुवि', 'पसवो'। ปุถ เอวาตีธ 'पुथ एव' - यहाँ - ๓๒. โค สเร ปุถสฺสาคโม กฺวจิ. ३२. स्वर परे होने पर 'पुथ' शब्द को कहीं 'ग' का आगम होता है। ปุถอิจฺเจตสฺส นิปาตสฺส อนฺเต กฺวจิ คการาคโม โหติ สเร ปเร. อาคจฺฉตีติ อาคโม, อสนฺตุปฺปตฺติ อาคโม. เอตฺถ จ ‘‘สเร’’ติ นิมิตฺตาสนฺนวเสน ปุถสฺส อนฺเตติ ลพฺภติ. ปุถเคว, ปุถ เอว. स्वर परे होने पर 'पुथ' इस निपात के अंत में कहीं 'ग' कार का आगम होता है। जो आता है वह 'आगम' है, जो पहले विद्यमान नहीं था उसकी उत्पत्ति 'आगम' है। और यहाँ 'सरे' (स्वर परे होने पर) इस निमित्त की निकटता के कारण 'पुथ' के अंत में (आगम) प्राप्त होता है। जैसे- 'पुथगेव', 'पुथ एव'। ปา เอวาตีธ 'पा एव' - यहाँ - ‘‘สเร, โค, อาคโม, กฺวจี’’ติ จ วตฺตเต. 'सरे', 'ग', 'आगम' और 'क्वचि' - ये (पद) अनुवृत्त होते हैं। ๓๓. ปาสฺส จนฺโต รสฺโส. ३३. 'पा' के अंत को ह्रस्व होता है (और 'ग' का आगम होता है)। ปาอิจฺเจตสฺส อนฺเต สเร ปเร กฺวจิ คการาคโม โหติ, ปาสฺส อนฺโต จ สโร รสฺโส โหติ. ปเคว วุตฺยสฺส, ปา เอว. स्वर परे होने पर 'पा' इस (निपात) के अंत में कहीं 'ग' कार का आगम होता है, और 'पा' का अंतिम स्वर ह्रस्व हो जाता है। जैसे- 'पगेव' (पा एव), 'पा एव'। ‘‘วา, สเร’’ติ จ วตฺตเต. 'वा' और 'सरे' - ये (पद) अनुवृत्त होते हैं। ๓๔. ยว ม ท น ต ร ลา จาคมา. ३४. य, व, म, द, न, त, र, ल - ये आगम होते हैं। สเร ปเร ยการาทโย อฏฺฐ อาคมา โหนฺติ วา. จสทฺเทน คการาคโม จ, ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. स्वर परे होने पर य-कार आदि आठ आगम विकल्प से होते हैं। 'च' शब्द से 'ग' कार का आगम भी होता है, और यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा (निश्चित विकल्प) के लिए है। ตตฺถ [Pg.19] ยการาคโม ยถาทิโภ อิกาเรการาทีสุ. ยถา อิทํ ยถยิทํ, พฺยญฺชเนติ อธิกิจฺจ ‘‘รสฺส’’นฺติ รสฺสตฺตํ, ยถา อิทํ วา, ยถา เอว, ยถาเยว, ยเถว, เอวํ มายิทํ, มาเยวํ, ตํยิทํ, ตํเยว, นยิทํ, นยิมสฺส, นยิมานิ, นวยิเม ธมฺมา, พุทฺธานํเยว, สนฺติเยว, โพธิยาเยว, สติเยว, ปถวีเยว, ธาตุเยว, เตสุเยว, โสเยว, ปาฏิเยกฺกํ. उनमें से 'य' कार का आगम 'यथा' आदि के बाद इ-कार, ए-कार आदि होने पर होता है। जैसे- 'यथा इदं' = 'यथयिदं', 'व्यञ्जने' (सूत्र) के अधिकार में 'ह्रस्व' (नियम) से ह्रस्व होने पर 'यथयिदं' हुआ, अथवा 'यथा इदं', 'यथा एव' = 'यथायेव', 'यथेव'। इसी प्रकार 'मायिदं', 'मायेवं', 'तंयिदं', 'तंयेव', 'नयिदं', 'नयिमस्स', 'नयिमानि', 'नवयिमे धम्मा', 'बुद्धानंयेव', 'सन्तियेव', 'बोधियायेव', 'सतियेव', 'पथवीयेव', 'धातुयेव', 'तेसुयेव', 'सोयेव', 'पाटियेक्कं'। ตถา สเร วิปริยาทิโต จ. วิ อญฺชนา วิยญฺชนา, พฺยญฺชนา วา, เอวํ วิยากาสิ, พฺยากาสิ. ปริอนฺตํ ปริยนฺตํ, เอวํ ปริยาทานํ, ปริยุฏฺฐานํ, ปริเยสติ, ปริโยสานมิติ นิจฺจํ. นิ อาโยโค นิยาโยโค. อิธ น ภวติ, ปริกฺขโต, อุปปริกฺขติ. उसी प्रकार स्वर परे होने पर 'वि', 'परि' आदि के बाद भी (य-आगम होता है)। जैसे- 'वि अञ्जना' = 'वियञ्जना' या 'ब्यञ्जना'; इसी प्रकार 'वियाकासि', 'ब्याकासि'। 'परि अन्तम्' = 'परियन्तम्'; इसी प्रकार 'परियादानं', 'परियुट्ठानं', 'परियेसति', 'परियोसानं' - ये नित्य होते हैं। 'नि आयोगो' = 'नियायोगो'। यहाँ (य-आगम) नहीं होता - 'परिक्खतो', 'उपपरिक्खति'। วกาโร ติสทฺทาทิโต อวณฺณุกาเรสุ. ติ องฺคุลํ ติวงฺคุลํ, เอวํ ติวงฺคิกํ, ภูวาทโย, มิคี ภนฺตา วุทิกฺขติ, ปวุจฺจติ, ปาคุญฺญวุชุตา. 'व' कार का आगम 'ति' शब्द आदि के बाद अ-वर्ण और उ-कार होने पर होता है। जैसे- 'ति अङ्गुलं' = 'तिवङ्गुलं'; इसी प्रकार 'तिवङ्गिकं', 'भूवादयो', 'मिगी भन्ता वुदिक्खति', 'पवुच्चति', 'पागुञ्ञवुजुता'। มกาโร ลหุปฺปภุติโต สเร ฉนฺทานุรกฺขณาทิมฺหิ. ลหุ เอสฺสติ ลหุเมสฺสติ, เอวํ ครุเมสฺสติ, อิธมาหุ, เกน เต อิธ มิชฺฌติ, ภทฺโร กสามิว, อากาเส มภิปูชยิ, เอกเมกสฺส, เยน มิเธกจฺเจ, อาสติเมว. 'म' कार का आगम 'लहु' आदि के बाद स्वर परे होने पर छंद की रक्षा आदि के लिए होता है। जैसे- 'लहु एस्सति' = 'लहुमेस्सति'; इसी प्रकार 'गरुमेस्सति', 'इधमाहु', 'केन ते इध मिज्झति', 'भद्रो कसामिव', 'आकासे मभिपूजायि', 'एकमेकस्स', 'येन मिधेकच्चे', 'आसतिमेव'। ทกาโร [Pg.20] อุอุปสคฺค สกิ เกนจิ กิญฺจิ กิสฺมิญฺจิ โกจิ สมฺมา ยาว ตาว ปุน ย เต’ตตฺตสาทีหิ. อุอุปสคฺคโต นิจฺจํ, อุ อคฺโค อุทคฺโค, เอวํ อุทโย, อุทปาทิ, อุทาหฏํ, อุทิโต, อุทีริตํ, อุเทติ. 'द' कार का आगम 'उ' उपसर्ग, 'सकि', 'केनचि', 'किञ्चि', 'किस्मिञ्चि', 'कोचि', 'सम्मा', 'याव', 'ताव', 'पुन', 'य', 'त', 'एत', 'अत्त' आदि के बाद होता है। 'उ' उपसर्ग के बाद नित्य होता है, जैसे- 'उ अग्गो' = 'उदग्गो'; इसी प्रकार 'उदयो', 'उदापादि', 'उदाहटं', 'उदितो', 'उदीरितं', 'उदेति'। นิปาตโต จ, สกิ เอว สกิเทว, เอวํ สกทาคามิ, มหาวุตฺติสุตฺเตน อิการสฺส อกาโร. ตถา เกนจิเทว, กิญฺจิเทว, กิสฺมิญฺจิเทว, โกจิเทว, สมฺมา อตฺโถ สมฺมทตฺโถ, รสฺสตฺตํ. เอวํ สมฺมทกฺขาโต, สมฺมทญฺญา วิมุตฺตานํ, สมฺมเทว, ยาวทตฺถํ, ยาวเทว, ตาวเทว, ปุนเทว. और निपातों से भी, जैसे- 'सकि एव' = 'सकिदेव'; इसी प्रकार 'सकदागामि' (यहाँ महावृत्ति सूत्र से इ-कार को अ-कार हुआ है)। इसी प्रकार 'केनचिदेव', 'किञ्चिदेव', 'किस्मिञ्चिदेव', 'कोचिदेव', 'सम्मा अत्थो' = 'सम्मत्थो' (ह्रस्व होने पर)। इसी प्रकार 'सम्मदाक्खातो', 'सम्म दञ्ञा विमुत्तानं', 'सम्मदेव', 'यावदत्थं', 'यावदेव', 'तावदेव', 'पुनदेव'। นามโต, ยทตฺถํ, ตทตฺถํ, ยทนฺตรา, ตทนฺตรา, ตทงฺควิมุตฺติ, เอตทตฺถํ, อตฺตทตฺถํ, สทตฺถปสุโต สิยา. ยเตตตฺตเสหิ สมาเสเยว. संज्ञा (नाम) शब्दों से, जैसे- 'यदत्थं', 'तदत्थं', 'यदन्तरा', 'तदन्तरा', 'तदङ्गविमुत्ति', 'एतदत्थं', 'अत्तदत्थं', 'सदत्थपसुतो सिया'। 'य', 'त', 'एत', 'अत्त' और 'स' (शब्दों) के साथ केवल समास में ही (यह आगम होता है)। อาทิสทฺเทน อญฺญทตฺถํ, มนสาทญฺญา วิมุตฺตานํ, พหุเทว รตฺตึ, อหุเทว ภยํ. 'आदि' शब्द से 'अञ्ञदत्थं', 'मनसादञ्ञा विमुत्तानं', 'बहुदेव रत्तिं', 'अहुदेव भयं' (सिद्ध होते हैं)। วาติ กึ? เกนจิ อตฺถกาเมน, สมฺมา อญฺญาย, ยาวาหํ, ตาวาหํ, ปุนาปรํ, อตฺตตฺถํ. 'वा' (विकल्प) क्यों? 'केनचि अत्थकामेन', 'सम्मा अञ्ञाय', 'यावाहं', 'तावाहं', 'पुनापरं', 'अत्तत्थं'। นกาโร อายตาทิมฺหิ. อิโต อายติ อิโต นายติ, จิรํ นายติ. 'आयति' आदि के होने पर 'न' कार (आगम) होता है। 'इतो आयति' से 'इतो नायति', 'चिरं नायति'। ตกาโร ยสฺมา ตสฺมา อชฺชาทิโต อิหคฺคาทิมฺหิ. ยสฺมาติห, ตสฺมาติห, อชฺชตคฺเค. 'यस्मा', 'तस्मा', 'अज्ज' आदि के बाद 'इह', 'अग्ग' आदि के होने पर 'त' कार (आगम) होता है। 'यस्मातिह', 'तस्मातिह', 'अज्जतग्गे'। รกาโร [Pg.21] นิ ทุปาตุ ปุน ธี ปาต จตุราทิโต. นิ อนฺตรํ นิรนฺตรํ, เอวํ นิราลโย, นิรินฺธโน, นิรีหกํ, นิรุตฺตโร, นิโรชํ. ทุ อติกฺกโม ทุรติกฺกโม, ทุราคตํ, ทุรุตฺตํ. ปาตุรโหสิ, ปาตุรเหสุํ. ปุนราคจฺเฉยฺย, ปุนรุตฺตํ, ปุนเรว, ปุนเรติ. ธิรตฺถุ. ปาตราโส. 'नि', 'दु', 'पातु', 'पुन', 'धी', 'पात', 'चतुर' आदि के बाद 'र' कार (आगम) होता है। 'नि' + 'अन्तरं' = 'निरन्तरं'; इसी प्रकार 'निरालयो', 'निरिन्धनो', 'निरीहकं', 'निरुत्तरो', 'निरोजं'। 'दु' + 'अतिक्कमो' = 'दुरतिक्कमो', 'दुरागतं', 'दुरुत्तं'। 'पातु रहोसि', 'पातु रहेसुं'। 'पुनरागच्छेय्य', 'पुनरुत्तं', 'पुनरेव', 'पुनरेति'। 'धिरत्थु'। 'पातरासो'। จตุสทฺทาทิโต, จตุรงฺคิกํ, จตุรารกฺขา, จตุริทฺธิปาทปฏิลาโภ, จตุโรฆนิตฺถรณตฺถํ. ภตฺตุรตฺเถ, วุตฺติเรสา, ปถวีธาตุเรเวสา. 'चतु' शब्द आदि के बाद (र-कार होता है), जैसे- 'चतुरङ्गिकं', 'चतुरारक्खा', 'चतुरिद्धिपादपटिलाभो', 'चतुरोघनित्थरणत्थं'। 'भत्तुरत्थे', 'वुत्तिरेसा', 'पथवीधातूरेवेसा'। ตถา สรโต อิเวเวสุ ฉนฺทานุรกฺขเณ. นกฺขตฺตราชาริว ตารกานํ, วิชฺชุริวพฺภกูเฏ, อารคฺเคริว สาสโป, สาสโปริว อารคฺเค, อุสโภริว, สพฺภิเรว สมาเสถ. उसी प्रकार स्वर के बाद 'इव' और 'एव' के होने पर छन्द की रक्षा (लय) के लिए (र-कार होता है)। 'नक्खत्तराजा रिव तारकानं', 'विज्जुरिवब्भकूटे', 'आरग्गेरिव सासपो', 'सासपोरिव आरग्गे', 'उसभोरिव', 'सब्भिरेव समासेथ'। วาติ กึ? ทฺวาธิฏฺฐิตํ, ปาตฺวากาสิ, ปุนปิ. 'वा' (विकल्प) क्यों? 'द्वाधिट्ठितं', 'पात्वाकासि', 'पुनपि'। ลกาโร ฉสงฺขฺยาหิ. ลฬานมวิเสโส. ฉ อภิญฺญา ฉฬภิญฺญา, ฉฬงฺคํ, ฉฬาสีติ, ฉฬํสา, สฬายตนํ. 'छ' (छह) संख्या के बाद 'ल' कार (आगम) होता है। 'ल' और 'ळ' में कोई भेद नहीं है। 'छ' + 'अभिञ्ञा' = 'छळabhiññā', 'छळङ्गं', 'छळासीति', 'छळंसा', 'सळायतनं'। วาติ กึ? ฉ อภิญฺญา. 'वा' (विकल्प) क्यों? 'छ अभिञ्ञा'। อิติ สรสนฺธิวิธานํ นิฏฺฐิตํ. इस प्रकार स्वर-सन्धि विधान समाप्त हुआ। อิตฺถิลิงฺค स्त्रीलिंग। อถ [Pg.81] อิตฺถิลิงฺคานิ วุจฺจนฺเต. अब स्त्रीलिंग शब्द कहे जाते हैं। อการนฺโต อิตฺถิลิงฺคสทฺโท อปฺปสิทฺโธ. अकारान्त स्त्रीलिंग शब्द नहीं देखे जाते हैं। อาการนฺโต อิตฺถิลิงฺโค กญฺญาสทฺโท. ‘‘กญฺญ’’อิติ ฐิเต – आकारान्त स्त्रीलिंग 'कञ्ञा' शब्द है। 'कञ्ञ' ऐसा रहने पर - ๑๗๖. อิตฺถิยมโต อาปฺปจฺจโย. १७६. स्त्रीलिंग में 'आ' प्रत्यय होता है। อิตฺถิยํ วตฺตมานา อการนฺตโต ลิงฺคมฺหา ปโร อาปฺปจฺจโย โหติ. स्त्रीलिंग को बताने के लिए अकारान्त लिंग (प्रातिपदिक) से परे 'आ' प्रत्यय होता है। ปกตฺยตฺถโชตกา อิตฺถิ-ปฺปจฺจยา สฺยาทโย วิย; ณาทโย ปจฺจยตฺถสฺส, สกตฺถสฺสาปิ วาจกา. स्त्रीलिंग प्रत्यय 'सि' आदि (विभक्तियों) के समान मूल अर्थ के द्योतक होते हैं; 'ण' आदि प्रत्यय प्रत्ययार्थ के और स्वार्थ (अपने अर्थ) के भी वाचक होते हैं। ‘‘สรโลโป’’ติอาทินา ปุพฺพสฺสเร ลุตฺเต, ปรนยเน จ กเต ‘‘ธาตุปฺปจฺจยวิภตฺติวชฺชิตมตฺถวํ ลิงฺค’’นฺติ วุตฺตตฺตาว ปจฺจยนฺตสฺสาปิ อลิงฺคตฺตา วิภตฺตุปฺปตฺติยมสมฺปตฺตายํ ‘‘ตทฺธิตสมาสกิตกา นามํ วา’ตเวตุนาทีสุ จา’’ติ เอตฺถ วคฺคหเณน อิตฺถิปฺปจฺจยนฺตสฺสาปิ นามพฺยปเทโส. ปุเร วิย สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, ‘‘เสสโต โลปํ คสิปี’’ติ สิโลโป. สา กญฺญา. 'सरलोपो' आदि सूत्र से पूर्व स्वर का लोप होने पर और पर-संयोजन करने पर, 'धातु, प्रत्यय और विभक्ति को छोड़कर अर्थवान शब्द लिंग (प्रातिपदिक) है' ऐसा कहे जाने के कारण, प्रत्ययान्त होने पर भी लिंगत्व न होने से विभक्ति की उत्पत्ति अप्राप्त होने पर, 'तद्धितसमासकितका नामं वा...' इस सूत्र में 'वा' ग्रहण से स्त्रीलिंग प्रत्ययान्त शब्दों की भी 'नाम' संज्ञा होती है। पहले की तरह 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है, और 'सेसतो लोपं गसिपी' सूत्र से 'सि' का लोप हो जाता है। वह 'कञ्ञा' है। พหุวจเน ‘‘อาลปเน สิ คสญฺโญ’’ติ อิโต ‘‘สญฺโญ’’, ‘‘เต อิตฺถิขฺยา โป’’ติ อิโต ‘‘อิตฺถิขฺยา’’ติ จ วตฺตเต. बहुवचन में, 'आलपने सि गसञ्ञो' सूत्र से 'सञ्ञो' (संज्ञा) और 'ते इत्थिख्या पो' सूत्र से 'इत्थिख्या' (स्त्रीलिंग संज्ञक) की अनुवृत्ति आती है। ๑๗๗. อา โฆ. १७७. आ घो। ลิงฺคสฺสนฺโต อากาโร ยทา อิตฺถิขฺโย, ตทา ฆสญฺโญ โหตีติ ฆสญฺญายํ ‘‘ฆปโต จ โยนํ โลโป’’ติ [Pg.82] วิกปฺเปน โยโลโป. ตา กญฺญา กญฺญาโย. लिंग का अन्त्य 'आ' कार जब स्त्रीलिंग संज्ञक होता है, तब उसकी 'घ' संज्ञा होती है। 'घ' संज्ञा होने पर 'घपतो च योनं लोपो' सूत्र से विकल्प से 'यो' विभक्ति का लोप होता है। वे 'कञ्ञा', 'कञ्ञायो'। อาลปเน ‘‘สขโต คสฺเส วา’’ติ อิโต ‘‘คสฺสา’’ติ วตฺตเต. सम्बोधन में 'सखतो गस्से वा' सूत्र से 'गस्से' की अनुवृत्ति आती है। ๑๗๘. ฆเต จ. १७८. घते च। ฆโต ปรสฺส คสฺส เอกาโร โหติ, สรโลปาทิ. โภติ กญฺเญ, โภติโย กญฺญา กญฺญาโย. 'घ' संज्ञक से परे 'सि' (ग) विभक्ति का 'ए' कार हो जाता है, फिर स्वर-लोप आदि होते हैं। हे कञ्ञे! हे कञ्ञा, कञ्ञायो! อํมฺหิ สรโลปปกติภาวา กญฺญํ, กญฺญา กญฺญาโย. 'अं' विभक्ति होने पर स्वर-लोप और प्रकृति-भाव होकर 'कञ्ञं', 'कञ्ञा', 'कञ्ञायो' रूप बनते हैं। ตติยาทีสุ ‘‘อาย จตุตฺเถกวจนสฺส ตู’’ติ อิโต ‘‘อาโย, เอกวจนาน’’นฺติ จ วตฺตเต. तृतीया आदि विभक्तियों में 'आय चतुत्थेकवचनस्स तू' सूत्र से 'आय' और 'एकवचनानं' की अनुवृत्ति आती है। ๑๗๙. ฆโต นาทีนํ. १७९. घतो नादीनं। ฆสญฺญโต ลิงฺคสฺสาการา ปเรสํ นาทีนํ สฺมึปริยนฺตานํ เอกวจนานํ วิภตฺติคณานํ อายาเทโส โหติ. สรโลปปรนยนานิ. กญฺญาย, กญฺญาหิ กญฺญาภิ, กญฺญาย, กญฺญานํ, กญฺญาย, กญฺญาหิ กญฺญาภิ, กญฺญาย, กญฺญานํ. 'घ' संज्ञक लिंग के 'आ' कार से परे 'ना' से लेकर 'स्मिं' पर्यन्त एकवचन विभक्ति समूहों का 'आय' आदेश होता है। फिर स्वर-लोप और पर-संयोजन होते हैं। कञ्ञाय, कञ्ञाहि कञ्ञाभि, कञ्ञाय, कञ्ञानं, कञ्ञाय, कञ्ञाहि कञ्ञाभि, कञ्ञाय, कञ्ञानं। สฺมึมฺหิ – 'स्मिं' विभक्ति होने पर - ๑๘๐. ฆปโต สฺมึ ยํ วา. १८०. घ-प संज्ञक शब्दों से परे 'स्मिं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'यं' आदेश होता है। ฆปโต ปรสฺส สฺมึวจนสฺส ยํ โหติ วา, อญฺญตฺถายาเทโส. กญฺญายํ กญฺญาย, กญฺญาสุ. घ और प संज्ञक शब्दों से परे 'स्मिं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'यं' होता है, अन्यथा 'आय' आदेश होता है। जैसे- कन्यायं, कन्याय, कन्यासु। เอวมญฺเญปิ – इसी प्रकार अन्य भी - สทฺธา เมธา ปญฺญา วิชฺชา, จินฺตา มนฺตา วีณา ตณฺหา; อิจฺฉา มุจฺฉา เอชา มายา, เมตฺตา มตฺตา สิกฺขา ภิกฺขา. श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, विद्या, चिन्ता, मन्ता (मन्त्रणा), वीणा, तण्हा (तृष्णा); इच्छा, मुच्छा (मूर्च्छा), एजा (कम्पन/तृष्णा), माया, मेत्ता (मैत्री), मत्ता (मात्रा), सिक्खा (शिक्षा), भिक्खा (भिक्षा)। ชงฺฆา [Pg.83] คีวา ชิวฺหา วาจา,ฉายา อาสา คงฺคา นาวา; คาถา เสนา เลขา สาลา,มาลา เวลา ปูชา ขิฑฺฑา. जङ्घा, गीवा (ग्रीवा), जिव्हा (जिह्वा), वाचा, छाया, आसा (आशा), गङ्गा, नावा (नौका); गाथा, सेना, लेखा, साला (शाला), माला, वेला, पूजा, खिड्डा (क्रीड़ा)। ปิปาสา เวทนา สญฺญา, เจตนา ตสิณา ปชา; เทวตา วฏฺฏกา โคธา, พลากา ปริสา สภา. पिपासा, वेदना, सञ्ञा (संज्ञा), चेतना, तसिणा (तृष्णा), पजा (प्रजा); देवता, वट्टका (बटेर), गोधा (गोह), बलाका (बगुला), परिसा (परिषद), सभा। อูกาเสผาลิกา ลงฺกา, สลากา วาลิกา สิขา; วิสาขา วิสิขา สาขา, วจา วญฺฌา ชฏา ฆฏา. ऊका (जूँ), सेफालिका, लङ्का, सलाका (शलाका), वालिका (बालू), सिखा (शिखा); विसाखा (विशाखा), विसिखा (गली), साखा (शाखा), वचा, वञ्झा (बाँझ), जटा, घटा। เชฏฺฐา โสณฺฑา วิตณฺฑา จ, กรุณา วนิตา ลตา; กถา นิทฺทา สุธา ราธา, วาสนา สึสปา ปปา. जेठ्ठा (ज्येष्ठा), सोण्डा (शुण्डा/मद्यपा), वितण्डा, करुणा, वनिता, लता; कथा, निद्दा (नित्रा), सुधा, राधा, वासना, सिंसपा (शीशम), पपा (प्याऊ)। ปภา สีมา ขมา ชายา,ขตฺติยา สกฺขรา สุรา; โทลา ตุลา สิลา ลีลา,ลาเล’ลา เมขลา กลา. पभा (प्रभा), सीमा, खमा (क्षमा), जाया (पत्नी), खत्तिया (क्षत्रिया), सक्खरा (शर्करा), सुरा; दोला, तुला, सिला (शिला), लीला, एला (इलायची), मेखला, कला। วฬวา’ลมฺพุสา มูสา, มญฺชูสา สุลสา ทิสา; นาสา ชุณฺหา คุหา อีหา, ลสิกา วสุธาทโย. वळवा (घोड़ी), अलम्बुसा, मूसा (मूषा), मञ्जूसा (मञ्जूषा), सुलसा, दिसा (दिशा); नासा, जुण्हा (ज्योत्स्ना), गुहा, ईहा, लसिका, वसुधा आदि। อมฺมาทีนํ อาลปเนว รูปเภโท. อมฺมา, อมฺมา อมฺมาโย. अम्मा आदि शब्दों के सम्बोधन में ही रूप-भेद होता है। अम्मा (एकवचन), अम्मा, अम्मायो (बहुवचन)। คสฺส ‘‘ฆเต จา’’ติ เอกาเร สมฺปตฺเต – सम्बोधन एकवचन 'ग' के परे होने पर 'घते च' सूत्र से 'ए' कार प्राप्त होने पर - ๑๘๑. น อมฺมาทิโต. १८१. अम्मा आदि शब्दों से परे नहीं। อมฺมา อนฺนาอิจฺเจวมาทิโต ปรสฺส คสฺส อาลปเนกวจนสฺส น เอการตฺตํ โหติ. ‘‘อากาโร วา’’ติ รสฺสตฺตํ. अम्मा, अन्ना इत्यादि शब्दों से परे सम्बोधन एकवचन 'ग' विभक्ति को 'ए' कार नहीं होता है। 'आकारो वा' सूत्र से ह्रस्व होता है। โภติ อมฺม โภติ อมฺมา, โภติโย อมฺมา อมฺมาโย. เอวํ อนฺนา, อนฺนา อนฺนาโย, โภติ อนฺน โภติ อนฺนา, โภติโย อนฺนา อนฺนาโย. อมฺพา[Pg.84], อมฺพา อมฺพาโย, โภติ อมฺพ โภติ อมฺพา, โภติโย อมฺพา อมฺพาโย อิจฺจาทิ. भोति अम्म, भोति अम्मा (हे माँ!), भोतियो अम्मा, अम्मायो। इसी प्रकार अन्ना - अन्ना, अन्नायो, भोति अन्न, भोति अन्ना, भोतियो अन्ना, अन्नायो। अम्बा - अम्बा, अम्बायो, भोति अम्ब, भोति अम्बा, भोतियो अम्बा, अम्बायो इत्यादि। อาการนฺตํ. आकारान्त (स्त्रीलिङ्ग) समाप्त। อิการนฺโต อิตฺถิลิงฺโค รตฺติสทฺโท; ตเถว สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, สิโลโป, รตฺติ. इकारान्त स्त्रीलिङ्ग 'रत्ति' (रात्रि) शब्द; वैसे ही 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति, 'सि' का लोप, 'रत्ति'। พหุวจเน ‘‘สญฺญา, อิวณฺณุวณฺณา’’ติ จ วตฺตเต. बहुवचन में 'सञ्ञा' और 'इवण्णुवण्णा' की अनुवृत्ति होती है। ๑๘๒. เต อิตฺถิขฺยา โป. १८२. वे स्त्रीलिङ्गवाची (इ, ई, उ, ऊ) 'प' संज्ञक होते हैं। อิตฺถิยา อาขฺยา สญฺญา อิตฺถิขฺยา, ลิงฺคสฺสนฺตา เต อิวณฺณุวณฺณา ยทา อิตฺถิขฺยา, ตทา ปสญฺญา โหนฺตีติ ปสญฺญายํ ‘‘ฆปโต จา’’ติอาทินา โยโลโป, ‘‘โยสุ กต’’อิจฺจาทินา ทีโฆ. รตฺตี รตฺติโย รตฺโย วา, เห รตฺติ, เห รตฺตี เห รตฺติโย. स्त्रीलिङ्ग की आख्या (नाम) ही 'इत्थिक्ख्या' संज्ञा है। शब्द के अन्त में विद्यमान वे इ-ई-उ-ऊ जब स्त्रीलिङ्गवाची होते हैं, तब उनकी 'प' संज्ञा होती है। 'प' संज्ञा होने पर 'घपतो च' आदि सूत्र से 'यो' का लोप होता है, 'योसु कत' आदि सूत्र से दीर्घ होता है। रत्ती, रत्तियो या रत्यो; हे रत्ति, हे रत्ती, हे रत्तियो। ‘‘อํโม’’ติอาทินา นิคฺคหีตํ, รตฺตึ, รตฺตี รตฺติโย; ตติยาทีสุ ‘‘เอกวจนานํ, นาทีน’’นฺติ จ วตฺตเต. 'अंमो' आदि सूत्र से निग्गहीत (अनुस्वार) होकर - रत्तिं; रत्ती, रत्तियो। तृतीया आदि में 'एकवचनानं' और 'नादीनं' की अनुवृत्ति होती है। ๑๘๓. ปโต ยา. १८३. 'प' संज्ञक से परे 'या' आदेश होता है। ปสญฺญโต อิวณฺณุวณฺเณหิ ปเรสํ นาทีนเมกวจนานํ วิภตฺติคณานํ ยาอาเทโส โหติ. รตฺติยา, รตฺตีหิ รตฺตีภิ รตฺติหิ รตฺติภิ, รตฺติยา, รตฺตีนํ รตฺตินํ. 'प' संज्ञक इ-ई-उ-ऊ से परे 'ना' आदि एकवचन विभक्ति समूहों के स्थान पर 'या' आदेश होता है। रत्तिया, रत्तीहि, रत्तीभि, रत्तिहि, रत्तिभि; रत्तिया, रत्तीनं, रत्तिनं। ปญฺจมิยํ – पञ्चमी विभक्ति में - ๑๘๔. อมา ปโต สฺมึสฺมานํ วา. १८४. 'प' संज्ञक से परे 'स्मिं' और 'स्मा' के स्थान पर विकल्प से 'अं' और 'आ' आदेश होते हैं। ปอิจฺเจตสฺมา ปเรสํ สฺมึ สฺมาอิจฺเจเตสํ ยถากฺกมํ อํ อาอาเทสา โหนฺติ วา. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท[Pg.85], เตน อุวณฺณนฺตโต น โหนฺติ, อิวณฺณนฺตโตปิ ยถาปโยคํ. 'प' संज्ञक से परे 'स्मिं' और 'स्मा' के स्थान पर क्रमशः 'अं' और 'आ' आदेश विकल्प से होते हैं। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है, इसलिए उकारान्त शब्दों में ये आदेश नहीं होते हैं, और इकारान्त में भी प्रयोग के अनुसार होते हैं। ‘‘สเร, ยกาโร’’ติ จ วตฺตเต, สีหมณฺฑูกคตีหิ โยวจเนกวจนคฺคหณญฺจ. 'सरे' और 'यकारो' की अनुवृत्ति होती है, और सिंहमण्डूकगति से 'यो' वचन और एकवचन का ग्रहण होता है। ๑๘๕. ปสญฺญสฺส จ. १८५. और 'प' संज्ञक का (यकार होता है)। ปสญฺญสฺส อิวณฺณสฺส โยวจเนกวจนวิภตฺตีนมาเทเส สเร ปเร ยกาโร โหติ. เอตฺถ จ ยการสฺเสวาธิการโต ปสญฺญคฺคหเณน อิวณฺโณว คยฺหติ, จคฺคหณํ ‘‘รตฺโต’’ติอาทีสุ นิวตฺตนตฺถํ. รตฺยา รตฺติยา, รตฺตีหิ รตฺตีภิ รตฺติหิ รตฺติภิ, รตฺติยา, รตฺตีนํ รตฺตินํ. สฺมึวจเน อมาเทสยการาเทสา, รตฺยํ. ‘‘ฆปโต สฺมึ ยํ วา’’ติ ยํอาเทโส, รตฺติยํ. 'प' संज्ञक इकार के स्थान पर, 'यो' वचन और एकवचन विभक्तियों के आदेश रूप स्वर के परे होने पर 'य' कार होता है। यहाँ यकार के ही अधिकार होने से 'प' संज्ञा के द्वारा केवल इकार ही ग्रहण किया जाता है। 'च' का ग्रहण 'रत्तो' आदि रूपों की निवृत्ति के लिए है। रत्या, रत्तिया; रत्तीहि, रत्तीभि, रत्तिहि, रत्तिभि; रत्तिया, रत्तीनं, रत्तिनं। 'स्मिं' विभक्ति में 'अं' आदेश और 'य' कार आदेश होने पर - रत्यं। 'घपतो स्मिं यं वा' सूत्र से 'यं' आदेश होने पर - रत्तियं। อญฺญตฺถ ‘‘อํ, สฺมึ, วา’’ติ จ วตฺตเต. अन्यत्र 'अं', 'स्मिं' और 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๑๘๖. อาทิโต โอ จ. १८६. 'आदि' शब्द से 'ओ' भी होता है। อาทิอิจฺเจตสฺมา สฺมึวจนสฺส อํ โออาเทสา โหนฺติ วา. จสทฺเทน อญฺญสฺมาปิ อา อํ โออาเทสา. รตฺยา รตฺตึ รตฺโต รตฺติยา, รตฺตีสุ รตฺติสุ. 'आदि' इस शब्द से 'स्मिं' विभक्ति के स्थान पर 'अं' और 'ओ' आदेश विकल्प से होते हैं। 'च' शब्द के ग्रहण से अन्य शब्दों से भी 'आ', 'अं' और 'ओ' आदेश होते हैं। जैसे— रत्या, रत्तिं, रत्तो, रत्तिया; रत्तीसु, रत्तिसु। เอวมญฺญานิปิ – इसी प्रकार अन्य भी— ปตฺติ ยุตฺติ วุตฺติ กิตฺติ, มุตฺติ ติตฺติ ขนฺติ กนฺติ; สนฺติ ตนฺติ สิทฺธิ สุทฺธิ, อิทฺธิ วุทฺธิ พุทฺธิ โพธิ. पत्ति, युत्ति, वुत्ति, कित्ति, मुत्ति, तित्ति, खन्ति, कन्ति; सन्ति, तन्ति, सिद्धि, सुद्धि, इद्धि, वुद्धि, बुद्धि, बोधि। ภูมิ ชาติ ปีติ สูติ, นนฺทิ สนฺธิ สาณิ โกฏิ; ทิฏฺฐิ วุฑฺฒิ ตุฏฺฐิ ยฏฺฐิ, ปาฬิ อาฬิ นาฬิ เกฬิ; สติ มติ คติ จุติ, ธิติ ยุวติ วิกติ. भूमि, जाति, पीति, सूति, नन्दि, सन्धि, साणि, कोटि; दिट्ठि, वुड्ढि, तुट्ठि, यट्ठि, पाळि, आळि, नाळि, केळि; सति, मति, गति, चुति, धिति, युवति, विकति। รติ รุจิ รสฺมิ อสนิ วสนิ โอสธิ องฺคุลิ ธูลิ ทุนฺทุภิ โทณิ อฏวิ ฉวิ อาทีนิ อิการนฺตนามานิ. रति, रुचि, रस्मि, असनि, वसनि, ओसधि, अङ्गुलि, धूलि, दुन्दुभि, दोणि, अटवि, छवि आदि इकारान्त नाम (शब्द) हैं। อิการนฺตํ. इकारान्त प्रकरण समाप्त। อีการนฺโต [Pg.86] อิตฺถิลิงฺโค อิตฺถีสทฺโท; ‘‘อิตฺถ’’อิตีธ ‘‘อิตฺถิยํ, ปจฺจโย’’ติ จ วตฺตเต. ईकारान्त स्त्रीलिंग 'इत्थी' शब्द; यहाँ 'इत्थ' इस सूत्र में 'इत्थियं' और 'पच्चयो' की अनुवृत्ति होती है। ๑๘๗. นทาทิโต วา อี. १८७. नदि आदि से विकल्प से 'ई' प्रत्यय होता है। นทาทิโต วา อนทาทิโต วา อิตฺถิยํ วตฺตมานา ลิงฺคมฺหา อีปฺปจฺจโย โหติ. วาคฺคหณมนทาทิสมฺปิณฺฑนตฺถํ, เตน ปุถุควาทิโต จ อี. नदि आदि से अथवा अनदि आदि से स्त्रीलिंग में वर्तमान प्रातिपदिक से 'ई' प्रत्यय होता है। 'वा' का ग्रहण अनदि आदि के संग्रह के लिए है, जिससे 'पुथु', 'गव' आदि से भी 'ई' प्रत्यय होता है। สรโลเป ‘‘กฺวจาสวณฺณํ ลุตฺเต’’ติ อสวณฺเณ สมฺปตฺเต ปกติภาโว นามพฺยปเทโส, สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. อิตฺถี, อิตฺถี ‘‘อโฆ รสฺส’’นฺติอาทินา รสฺสตฺตํ, อิตฺถิโย. สมฺโพธเน ‘‘ฌลปา รสฺส’’นฺติ รสฺสตฺตํ. โภติ อิตฺถิ, โภติโย อิตฺถี อิตฺถิโย. स्वर का लोप होने पर 'क्वचासवण्णं लुत्ते' इस सूत्र से असवर्ण स्वर परे होने पर प्रकृतिभाव और नाम संज्ञा होकर 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। 'इत्थी' (एकवचन), 'इत्थी' (बहुवचन) - 'अघो रस्सं' आदि सूत्र से ह्रस्व होकर 'इत्थियो' बनता है। सम्बोधन में 'झलपा रस्सं' से ह्रस्व होता है। जैसे— भोति इत्थि, भोतियो इत्थी, इत्थियो। ทุติเยกวจเน ‘‘ฆปโต สฺมึ ยํ วา’’ติ อิโต ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. द्वितीया एकवचन में 'घपतो स्मिं यं वा' यहाँ से 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๑๘๘. อํ ยมีโต ปสญฺญโต. १८८. 'प' संज्ञक ईकार से परे 'अं' के स्थान पर 'यं' होता है। ปสญฺญโต อีการโต ปรสฺส อํวจนสฺส ยํ โหติ วา. อิตฺถิยํ อิตฺถึ, อิตฺถี อิตฺถิโย, อิตฺถิยา, อิตฺถีหิ อิตฺถีภิ, อิตฺถิยา, อิตฺถีนํ, อิตฺถิยา, อิตฺถีหิ อิตฺถีภิ, อิตฺถิยา, อิตฺถีนํ, อิตฺถิยํ อิตฺถิยา, อิตฺถีสุ. 'प' संज्ञक ईकार से परे 'अं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'यं' होता है। जैसे— इत्थियं, इत्थिं; इत्थी, इत्थियो; इत्थिया; इत्थीहि, इत्थीभि; इत्थिया; इत्थीनं; इत्थिया; इत्थीहि, इत्थीभि; इत्थिया; इत्थीनं; इत्थियं, इत्थिया; इत्थीसु। เอวํ นที, นที. โยโลปาภาเว ‘‘ตโต โยนโม ตู’’ติ เอตฺถ ตุสทฺเทน โยนโมกาโร จ, ‘‘ปสญฺญสฺส จา’’ติ อีการสฺส ยกาโร, ‘‘ยวตํ ตลน’’อิจฺจาทินา ทฺยสฺส ชกาโร, ทฺวิตฺตํ. นชฺโช สนฺทนฺติ, นทิโย. इसी प्रकार 'नदी', 'नदी'। 'यो' का लोप न होने पर 'ततो योनमो तू' यहाँ 'तु' शब्द से 'यो' विभक्ति के स्थान पर 'ओ' कार, और 'पसञ्ञस्स च' से ईकार के स्थान पर यकार, 'यवतं तलण' इत्यादि से 'द्य' के स्थान पर जकार और द्वित्व होता है। जैसे— नज्जो सन्दान्ति (नदियाँ बहती हैं), नदियो। เอตฺถ [Pg.87] เจวํ สิชฺฌนฺตานํ นชฺโชอาทีนํ วุตฺติยํ อานตฺตคฺคหณาทินา นิปฺผาทนํ อตฺรช สุคตาทีนํ วิย นิปฺผาทนูปายนฺตรทสฺสนตฺถนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. यहाँ इस प्रकार सिद्ध होने वाले 'नज्जो' आदि का वृत्ति में 'आनत्त' ग्रहण आदि के द्वारा निष्पादन, 'अत्रज', 'सुगत' आदि के समान निष्पादन के अन्य उपायों को दिखाने के लिए है, ऐसा समझना चाहिए। เห นทิ, เห นที เห นชฺโช เห นทิโย, นทิยํ นทึ, นที นชฺโช นทิโย. हे नदि, हे नदी, हे नज्जो, हे नदियो; नदियं, नदिं; नदी, नज्जो, नदियो। อมาทิสุตฺเต อา ปโตติ โยควิภาเคน กฺวจิ นาสานญฺจาตฺตํ, เตน น ชจฺจา วสโล โหติ, ปถพฺยา เอกรชฺเชนาติ อาทิ จ สิชฺฌติ, ปุเร วิย ยการชการาเทสทฺวิตฺตานิ. 'अमादि' सूत्र में 'आ पतो' इस योग-विभाग से कहीं-कहीं 'ना' आदि विभक्तियों के स्थान पर 'आ' होता है, उससे 'न जच्चा वसलो होति', 'पथब्या एकरज्जेन' इत्यादि सिद्ध होते हैं, पहले की तरह यकार, जकार आदेश और द्वित्व होते हैं। นชฺชา กตํ นทิยา, นทีหิ นทีภิ, นชฺชา นทิยา, นทีนํ, นชฺชา นทิยา, นทีหิ นทีภิ, นชฺชา นทิยา, นทีนํ, นชฺชํ นทิยํ นทิยา, นทีสุ. नज्जा कतं, नदिया; नदीहि, नदीभि; नज्जा, नदिया; नदीनं; नज्जा, नदिया; नदीहि, नदीभि; नज्जा, नदिया; नदीनं; नज्जं, नदियं, नदिया; नदीसु। อญฺเญปิ – अन्य भी— มหี เวตรณี วาปี, ปาฏลี กทลี ฆฏี; นารี กุมารี ตรุณี, วารุณี พฺราหฺมณี สขี. मही, वेतरणी, वापी, पाटली, कदली, घटी; नारी, कुमारी, तरुणी, वारुणी, ब्राह्मणी, सखी। คนฺธพฺพี กินฺนรี นาคี, เทวี ยกฺขี อชี มิคี; วานรี สูกรี สีหี, หํสี กากี จ กุกฺกุฏี – गन्धब्बी, किन्नरी, नागी, देवी, यक्खी, अजी, मिगी; वानरी, सूकरी, सीही, हंसी, काकी और कुक्कुटी— อิจฺจาทโย อิตฺถีสทฺทสมา. इत्यादि 'इत्थी' शब्द के समान हैं। ตเถว มาตุลสทฺทโต อีปฺปจฺจเย กเต – उसी प्रकार 'मातुल' शब्द से 'ई' प्रत्यय होने पर— ๑๘๙. มาตุลาทีนมานตฺตมีกาเร. १८९. ईकार प्रत्यय परे होने पर मातुल आदि शब्दों को 'आन' आदेश होता है। มาตุล อยฺยกวรุณอิจฺเจวมาทีนมนฺโต อานตฺตมาปชฺชเต อีกาเร ปจฺจเย ปเร, อนฺตาเปกฺขายํ ฉฏฺฐี, สรโลปาทิ. มาตุลานี, เอวํ อยฺยกานี, วรุณานี, เสสํ อิตฺถีสทฺทสมํ. मातुल, अय्यक, वरुण इत्यादि के अन्त को 'ई' प्रत्यय परे होने पर 'आन' आदेश प्राप्त होता है, यहाँ 'अन्त' की अपेक्षा में षष्ठी विभक्ति है, फिर स्वर लोप आदि कार्य होते हैं। जैसे— मातुलानी, इसी प्रकार अय्यकानी, वरुणानी, शेष रूप 'इत्थी' शब्द के समान हैं। อนทาทีสุ [Pg.88] ปุถุสทฺทโต อีปฺปจฺจโย. ‘‘โอ สเร จา’’ติ เอตฺถ จสทฺเทน อุการสฺส อวาเทโส. ปุถวี, ปุถวิโย. สสฺมา สฺมึสุ ปุถพฺยา ปุถวิยา, ปุถพฺยา ปุถวิยา, ปุถพฺยํ ปุถวิยํ ปุถวิยา อิจฺจาทิ. अनदि आदि में 'पुथु' शब्द से 'ई' प्रत्यय होता है। 'ओ सरे च' यहाँ 'च' शब्द से उकार के स्थान पर 'अव' आदेश होता है। पुथवी, पुथवियो। 'सा' से 'स्मिं' विभक्ति तक— पुथब्या, पुथविया; पुथब्या, पुथविया; पुथब्यं, पुथवियं, पुथविया इत्यादि। โคสทฺทโต ‘‘นทาทิโต วา อี’’ติ อีปฺปจฺจโย. มหาวุตฺตินา วา ‘‘คาว เส’’ติ เอตฺถ คาวอิติ โยควิภาเคน วา โอการสฺส อาวาเทโส. คาวี, คาวี คาวิโย อิจฺจาทิ อิตฺถีสทฺทสมํ. 'गो' शब्द से 'नदादितो वा ई' इस सूत्र से 'ई' प्रत्यय होता है। अथवा महावृत्ति के अनुसार 'गाव से' यहाँ 'गाव' इस योग-विभाग से ओकार के स्थान पर 'आव' आदेश होता है। गावी, गावी, गावियो इत्यादि रूप 'इत्थी' शब्द के समान हैं। ‘‘มานว’’อิตีธ ‘‘อิตฺถิยํ, วา, อี’’ติ จ วตฺตเต. 'माणव' यहाँ 'इत्थियं', 'वा' और 'ई' की अनुवृत्ति होती है। ๑๙๐. ณว ณิก เณยฺย ณนฺตุหิ. १९०. णव, णिक, णैय और णन्तु प्रत्ययों से। ณว ณิก เณยฺย ณนฺตุปฺปจฺจยนฺเตหิ อิตฺถิยํ วตฺตมาเนหิ ลิงฺเคหิ อีปฺปจฺจโย โหติ. วาธิกาโร กตฺถจิ นิวตฺตนตฺโถ, สรโลปาทิ. มานวี, เอวํ นาวิกี, เวนเตยฺยี, โคตมี. 'णव', 'णिक', 'णेय्य' और 'णन्तु' प्रत्ययों से अंत होने वाले स्त्रीलिंग शब्दों में 'ई' प्रत्यय होता है। 'वा' का अधिकार कहीं-कहीं (नियम की) निवृत्ति के लिए है, जैसे स्वर-लोप आदि। उदाहरण: मानवी, इसी प्रकार नाविकी, वेनतेय्यी, गोतमी। ‘‘คุณวนฺตุ อี’’อิตีธ ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. "गुणवन्तु ई" इस सूत्र में "वा" की अनुवृत्ति होती है। ๑๙๑. นฺตุสฺส ตมีกาเร. १९१. 'ई' कार परे होने पर 'न्तु' के स्थान पर 'त' होता है। สพฺพสฺเสว นฺตุปฺปจฺจยสฺส ตกาโร โหติ วา อีการปฺปจฺจเย ปเร, อญฺญตฺถ สรโลปาทิ. คุณวตี, คุณวตี คุณวติโย, คุณวนฺตี, คุณวนฺตี คุณวนฺติโย อิจฺจาทิ อิตฺถีสทฺทสมํ. 'ई' कार प्रत्यय परे होने पर संपूर्ण 'न्तु' प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'त' कार होता है, अन्यथा स्वर-लोप आदि होते हैं। गुणवती, गुणवती गुणवतियो, गुणवन्ती, गुणवन्ती गुणवन्तियो इत्यादि 'इत्थी' शब्द के समान हैं। เอวํ กุลวตี, สีลวตี, ยสวตี, รูปวตี, สติมตี, โคตฺตมตี. इसी प्रकार कुलवती, शीलवती, यशवती, रूपवती, सतिमती, गोत्तमती। มหนฺตสทฺทโต ‘‘นทาทิโต วา อี’’ติ อีปฺปจฺจโย, นฺตุพฺยปเทโส วิกปฺเปน ตการาเทโส. มหตี มหนฺตี. 'महन्त' शब्द से "नदादितो वा ई" सूत्र द्वारा 'ई' प्रत्यय होता है, और 'न्तु' के स्थान पर विकल्प से 'त' कार आदेश होता है। महती, महन्ती। ‘‘ภวนฺต อี’’อิตีธ ‘‘อีกาเร’’ติ วตฺตเต. "भवन्त ई" इस सूत्र में "ईकारे" की अनुवृत्ति होती है। ๑๙๒. ภวโต [Pg.89] โภโต. १९२. 'भवन्त' के स्थान पर 'भोत' होता है। สพฺพสฺเสว ภวนฺตสทฺทสฺส โภตาเทโส โหติ อีกาเร อิตฺถิคเต ปเร. สา โภตี, โภตี โภติโย, เห โภติ, เห โภตี โภติโย อิจฺจาทิ. स्त्रीलिंग में 'ई' कार परे होने पर संपूर्ण 'भवन्त' शब्द के स्थान पर 'भोत' आदेश होता है। वह भोती, भोती भोतियो, हे भोति, हे भोती भोतियो इत्यादि। ‘‘ภิกฺขุ’’ อิตีธ ‘‘อิตฺถิย’’นฺติ วตฺตเต ‘‘วา’’ติ จ. "भिक्खु" इस सूत्र में "इत्थियं" और "वा" की अनुवृत्ति होती है। ๑๙๓. ปติภิกฺขุราชีการนฺเตหิ อินี. १९३. पति, भिक्खु, राज और ई-कारान्त शब्दों से 'इनी' प्रत्यय होता है। ปติ ภิกฺขุ ราช อิจฺเจเตหิ อีการนฺเตหิ จ อิตฺถิยํ วตฺตมาเนหิ ลิงฺเคหิ อินีปฺปจฺจโย โหติ. पति, भिक्खु, राज और ई-कारान्त स्त्रीलिंग शब्दों से 'इनी' प्रत्यय होता है। ‘‘สรโลโป’มาเทส’’อิจฺจาทิสุตฺเต ตุคฺคหเณน กฺวจิ ปุพฺพโลปสฺส นิเสธนโต ‘‘วา ปโร อสรูปา’’ติ สรโลโป. ภิกฺขุนี, ภิกฺขุนี ภิกฺขุนิโย อิจฺจาทิ. "सरलोपोऽमादेस" इत्यादि सूत्र में 'तु' ग्रहण से कहीं-कहीं पूर्व-लोप का निषेध होने के कारण "वा परो असरूपा" सूत्र से स्वर-लोप होता है। भिक्खुनी, भिक्खुनी भिक्खुनियो इत्यादि। คหปติสทฺทโต อินี, ‘‘อตฺต’’มิติ วตฺตเต. 'गहपति' शब्द से 'इनी' प्रत्यय होता है, और "अत्तं" की अनुवृत्ति होती है। ๑๙๔. ปติสฺสินีมฺหิ. १९४. 'इनी' परे होने पर 'पति' शब्द के (अन्त्य स्वर) को 'अ' होता है। ปติสทฺทสฺส อนฺโต อตฺตมาปชฺชเต อินีปฺปจฺจเย ปเร. ตเถว ปรสเร ลุตฺเต ‘‘ปุพฺโพ จา’’ติ ทีโฆ, คหปตานี. 'इनी' प्रत्यय परे होने पर 'पति' शब्द का अन्त्य 'अ' भाव को प्राप्त होता है। उसी प्रकार पर-स्वर का लोप होने पर "पुब्बो च" सूत्र से दीर्घ होता है, गहपतानी। ตเถว ราชสทฺทโต อินี, สรโลปปกติภาวา, ราชินี. อีการนฺเตสุ ทณฺฑีสทฺทโต อินี, สรโลปาทิ, ทณฺฑินี, ทณฺฑินี ทณฺฑินิโย, เอวํ หตฺถินี, เมธาวินี, ตปสฺสินี, ปิยภาณินี อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'राज' शब्द से 'इनी' प्रत्यय होने पर, स्वर-लोप और प्रकृति-भाव से 'राजिनी' बनता है। ई-कारान्त शब्दों में 'दण्डी' शब्द से 'इनी' प्रत्यय, स्वर-लोप आदि होकर 'दण्डिनी', दण्डिनी दण्डिनियो, इसी प्रकार हत्थिनी, मेधाविनी, तपस्सिनी, पियभाणिनी इत्यादि। ‘‘โปกฺขรินี’’ อิตีธ ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อิการนการานํ อการณการาเทสา, โปกฺขรณี, โปกฺขรณี. ‘‘ตโต โยนโม ตู’’ติ สุตฺเต ตุคฺคหเณน โยนโมกาโร [Pg.90] จ, อีการสฺส ยกาโร, ‘‘ยวต’’มิจฺจาทิสุตฺเต การคฺคหเณน ณฺยสฺส ญกาโร, ทฺวิตฺตํ. โปกฺขรญฺโญ โปกฺขรณิโย วา อิจฺจาทิ. "पोक्खरिनी" यहाँ "तेसु वुद्धी" इत्यादि सूत्र से 'इ' कार और 'न' कार के स्थान पर 'अ' कार और 'ण' कार आदेश होते हैं, जिससे 'पोक्खरणी', 'पोक्खरणी' बनता है। "ततो योनमो तु" सूत्र में 'तु' ग्रहण से 'यो' के स्थान पर 'ओ' कार भी होता है, 'ई' कार का 'य' कार होता है, "यवत" इत्यादि सूत्र में 'क' कार ग्रहण से 'ण्य' का 'ञ' कार और द्वित्व होता है। पोक्खरञ्ञो या पोक्खरणीयो इत्यादि। วาธิกาโร อนุตฺตสมุจฺจยตฺโถ, เตน วิทู ยกฺขาทิโตปิ อินี, ปรจิตฺตวิทุนี, สรโลปรสฺสตฺตานิ, ปรจิตฺตวิทุนี ปรจิตฺตวิทุนิโย, ยกฺขินี ยกฺขินิโย, สีหินี สีหินิโย อิจฺจาทิ. 'वा' का अधिकार अनुक्त के समुच्चय के लिए है, उससे 'विदू', 'यक्ख' आदि से भी 'इनी' प्रत्यय होता है, जैसे परचित्तविदुनी, स्वर-लोप और ह्रस्व होने पर; परचित्तविदुनी परचित्तविदुनियो, यक्खिनी यक्खिनियो, सीहिनी सीहिनियो इत्यादि। อีการนฺตํ. ई-कारान्त समाप्त। อุการนฺโต อิตฺถิลิงฺโค ยาคุสทฺโท. उ-कारान्त स्त्रीलिंग 'यागु' शब्द। ตสฺส รตฺติสทฺทสฺเสว รูปนโย. อมาเทสาทิอภาโวว วิเสโส. इसके रूपों की विधि 'रत्ति' शब्द के समान ही है। 'अं' आदेश आदि का न होना ही विशेष है। ยาคุ, ยาคู ยาคุโย, เห ยาคุ, เห ยาคู ยาคุโย, ยาคุํ, ยาคู ยาคุโย, ยาคุยา, ยาคูหิ ยาคูภิ ยาคุหิ ยาคุภิ, ยาคุยา, ยาคูนํ ยาคุนํ, ยาคุยา, ยาคูหิ ยาคูภิ ยาคุหิ ยาคุภิ, ยาคุยา, ยาคูนํ ยาคุนํ, ยาคุยํ ยาคุยา, ยาคูสุ ยาคุสุ. यागु, यागू यागुयो; हे यागु, हे यागू यागुयो; यागुं, यागू यागुयो; यागुया; यागूहि यागूब्भि यागुहि यागुब्भि; यागुया; यागूनं यागुनं; यागुया; यागूहि यागूब्भि यागुहि यागुब्भि; यागुया; यागूनं यागुनं; यागुयं यागुया; यागूसु यागुसु। เอวํ ธาตุ เธนุ กาสุ ททฺทุ กจฺฉุ กณฺฑุ รชฺชุ กเรณุ ปิยงฺคุ สสฺสุอาทีนิ. इसी प्रकार धातु, धेनु, कासु, दद्दु, कच्छु, कण्डु, रज्जु, करेणु, पियङ्गु, सस्सु आदि। มาตุสทฺทสฺส เภโท. ตสฺส ปิตุสทฺทสฺเสว รูปนโย. ‘‘อารตฺต’’มิติ ภาวนิทฺเทเสน อาราเทสาภาเว ‘‘ปโต ยา’’ติ ยาเทโสว วิเสโส. 'मातु' शब्द का भेद। इसके रूपों की विधि 'पितु' शब्द के समान ही है। "आरत्तं" इस भाव निर्देश से 'आर' आदेश के अभाव में "पतो या" सूत्र से 'या' आदेश होना ही विशेष है। มาตา, มาตโร, โภติ มาต, โภติ มาตา โภติโย มาตโร, มาตรํ, มาตเร มาตโร, มาตรา มาตุยา มตฺยา, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อุการโลโป[Pg.91], รสฺสตฺตญฺจ. มาตเรหิ มาตเรภิ มาตูหิ มาตูภิ มาตุหิ มาตุภิ, มาตุ มาตุสฺส มาตุยา, มาตรานํ มาตานํ มาตูนํ มาตุนํ, มาตรา มาตุยา, มาตเรหิ มาตเรภิ มาตูหิ มาตูภิ, มาตุ มาตุสฺส มาตุยา, มาตรานํ มาตานํ มาตูนํ มาตุนํ, มาตริ, มาตเรสุ มาตูสุ มาตุสุ. माता, मातरो; भोति मात, भोति माता भोतियो मातरो; मातरं, मातरे मातरो; मातरा मातुया मत्या, "तेसु वुद्धी" इत्यादि सूत्र से 'उ' कार का लोप और ह्रस्व होना। मातरेहि मातरेब्भि मातूहू मातूब्भि मातुहि मातुब्भि; मातु मातुस्स मातुया; मातरानं मातानं मातूर्नं मातुनं; मातरा मातुया; मातरेहि मातरेब्भि मातूहू मातूब्भि; मातु मातुस्स मातुया; मातरानं मातानं मातूर्नं मातुनं; मातरि; मातरेसु मातूसु मातुसु। เอวํ ธีตา, ธีตโร, ทุหิตา, ทุหิตโร อิจฺจาทิ. इसी प्रकार धीता, धीतरो, दुहिता, दुहितरो इत्यादि। อุการนฺตํ. उ-कारान्त समाप्त। อูการนฺโต อิตฺถิลิงฺโค ชมฺพูสทฺโท. ऊ-कारान्त स्त्रीलिंग 'जम्बू' शब्द। ชมฺพู, ชมฺพู ชมฺพุโย, เห ชมฺพุ, เห ชมฺพู ชมฺพุโย, ชมฺพุํ, ชมฺพู ชมฺพุโย อิจฺจาทิ อิตฺถีสทฺทสมํ. जम्बू, जम्बू जम्बुयो; हे जम्बु, हे जम्बू जम्बुयो; जम्बुं, जम्बू जम्बुयो इत्यादि 'इत्थी' शब्द के समान हैं। เอวํ วธู จ สรภู, สรพู สุตนู จมู; วามูรู นาคนาสูรู, สมานิ ขลุ ชมฺพุยา. इसी प्रकार वधू, सरभू, सरबू, सुतनू, चमू, वामूरू, नागनासूरू (शब्द) निश्चय ही 'जम्बू' के समान होते हैं। อูการนฺตํ. ऊकारान्त (स्त्रीलिंग समाप्त)। โอการนฺโต อิตฺถิลิงฺโค โคสทฺโท. ओकारान्त स्त्रीलिंग 'गो' शब्द। ตสฺส ปุลฺลิงฺคโคสทฺทสฺเสว รูปนโย. इसका रूप पुल्लिंग 'गो' शब्द के समान ही होता है। กญฺญา รตฺติ นที อิตฺถี, มาตุลานี จ ภิกฺขุนี; ทณฺฑินี ยาคุ มาตา จ, ชมฺพู โคติตฺถิสงฺคโห. कन्या, रत्ति, नदी, इत्थी, मातुलानी, भिक्खुनी, दण्डिनी, यागु, माता, जम्बू और गो - यह स्त्रीलिंग का संग्रह है। อิตฺถิลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. स्त्रीलिंग समाप्त हुआ। นปุํสกลิงฺค नपुंसक लिंग। อถ [Pg.92] นปุํสกลิงฺคานิ วุจฺจนฺเต. अब नपुंसक लिंग शब्द कहे जाते हैं। อการนฺโต นปุํสกลิงฺโค จิตฺตสทฺโท. अकारान्त नपुंसक लिंग 'चित्त' शब्द। ปุเร วิย สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, ‘‘จิตฺต สิ’’ อิตีธ – पहले की तरह 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है, यहाँ 'चित्त + सि' इस अवस्था में - ‘‘นปุํสเกหิ, อโต นิจฺจ’’นฺติ จ วตฺตเต. 'नपुंसकेहि' और 'अतो निच्चं' (सूत्र) प्रवृत्त होते हैं। ๑๙๕. สึ. १९५. सिम् (सूत्र)। สิ, อํอิติ ทฺวิปทมิทํ. อการนฺเตหิ นปุํสกลิงฺเคหิ ปรสฺส สิวจนสฺส อํ โหติ นิจฺจํ. สรโลปปกติภาวาทิ, จิตฺตํ. 'सि' और 'अं' - यह दो पदों वाला सूत्र है। अकारान्त नपुंसक लिंग शब्दों से परे 'सि' विभक्ति के स्थान पर नित्य 'अं' होता है। स्वर-लोप और प्रकृति-भाव आदि होकर 'चित्तं' रूप बनता है। พหุวจเน ‘‘โยนํ นิ นปุํสเกหี’’ติ วตฺตเต. बहुवचन में 'योनां नि नपुंसकेहि' (सूत्र) प्रवृत्त होता है। ๑๙๖. อโต นิจฺจํ. १९६. अतो निच्चं (सूत्र)। อการนฺเตหิ นปุํสกลิงฺเคหิ โยนํ นิจฺจํ นิ โหติ. ‘‘สพฺพโยนีนมาเอ’’ติ นิสฺส วา อากาโร. อญฺญตฺถ ‘‘โยสุ กต’’อิจฺจาทินา ทีโฆ. จิตฺตา จิตฺตานิ. अकारान्त नपुंसक लिंग शब्दों से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर नित्य 'नि' होता है। 'सब्बयोनीनमाए' सूत्र से 'नि' के स्थान पर विकल्प से 'आ' होता है। अन्यत्र 'योसु कत' आदि से दीर्घ होता है। (रूप बनते हैं:) चित्ता, चित्तानि। โยนํ นิภาเว จาเอตฺเต, สิทฺเธปิ อวิเสสโต; ‘‘อโต นิจฺจ’’นฺติ อารมฺภา, อาเอตฺตํ กฺวจิเทวิธ. 'यो' के स्थान पर 'नि' भाव और 'ए' भाव सिद्ध होने पर भी, बिना किसी विशेष भेद के 'अतो निच्चं' के आरम्भ से यहाँ कहीं-कहीं 'आ' और 'ए' भाव होते हैं। อาลปเน คโลโป. เห จิตฺต, เห จิตฺตา จิตฺตานิ, ทุติยายํ นิสฺส วิกปฺเปเนกาโร. จิตฺตํ, จิตฺเต จิตฺตานิ. เสสํ ปุริสสทฺเทน สมํ. सम्बोधन में 'ग' (सि) का लोप होता है। हे चित्त, हे चित्ता, हे चित्तानि। द्वितीया में 'नि' के स्थान पर विकल्प से 'ए' कार होता है। चित्तं, चित्ते, चित्तानि। शेष रूप 'पुरिस' शब्द के समान होते हैं। เอวมญฺญานิปิ – इसी प्रकार अन्य भी (शब्द हैं) - ปุญฺญ ปาป ผล รูป สาธนํ,โสต ฆาน สุข ทุกฺข การณํ; ทาน สีล ธน ฌาน โลจนํ,มูล กูล พล ชาลมงฺคลํ. पुण्य, पाप, फल, रूप, साधन, सोत (श्रोत्र), घान (घ्राण), सुख, दुःख, कारण, दान, शील, धन, झान (ध्यान), लोचन, मूल, कूल, बल, जाल, मङ्गल। นฬิน [Pg.93] ลิงฺค มุข’งฺค ชล’มฺพุชํ,ปุลิน ธญฺญ หิรญฺญ ปทา’มตํ; ปทุม วณฺณ สุสาน วนา’ยุธํ,หทย จีวร วตฺถ กุลิ’นฺทฺริยํ. नलिन, लिङ्ग, मुख, अङ्ग, जल, अम्बुज, पुलिन, धञ्ञ (धान्य), हिरञ्ञ (हिरण्य), पद, अमत (अमृत), पदुम (पद्म), वण्ण (वर्ण), सुसान (श्मशान), वन, आयुध, हृदय, चीवर, वत्थ (वस्त्र), कुल, इन्द्रिय। นยน วทน ยาโน’ทาน โสปาน ปานํ,ภวน ภุวน โลหา’ลาต ตุณฺฑ’ณฺฑ ปีฐํ; กรณ มรณ ญาณา’รมฺมณา’รญฺญ ตาณํ,จรณ นคร ตีรจฺฉตฺต ฉิทฺโท’ทกานิ – नयन, वदन, यान, उदान, सोपान, पान, भवन, भुवन, लोह, अलात, तुण्ड, अण्ड, पीठ, करण, मरण, ञाण (ज्ञान), आरम्मण (आलम्बन), अरञ्ञ (अरण्य), ताण (त्राण), चरण, नगर, तीर, छत्त (छत्र), छिद्द (छिद्र), उदक - อิจฺจาทีนิ. इत्यादि। กมฺมสทฺทสฺส ตติเยกวจนาทีสุ รูปเภโท. 'कम्म' (कर्म) शब्द के तृतीया एकवचन आदि में रूपों में भेद होता है। กมฺมํ, กมฺมา กมฺมานิ, เห กมฺม, เห กมฺมา กมฺมานิ, กมฺมํ, กมฺเม กมฺมานิ. कम्मं, कम्मा, कम्मानि; हे कम्म, हे कम्मा, हे कम्मानि; कम्मं, कम्मे, कम्मानि। ‘‘วา, อุ, นามฺหิ, จา’’ติ จ วตฺตเต. 'वा', 'उ', 'नाम्हि' और 'च' (सूत्रों) की अनुवृत्ति होती है। ๑๙๗. อ กมฺมนฺตสฺส จ. १९७. अ कम्मन्तस्स च (सूत्र)। กมฺมสทฺทนฺตสฺส อุการ อการาเทสา โหนฺติ วา นามฺหิ วิภตฺติมฺหิ. อนฺตคฺคหเณน ถามทฺธาทีนมนฺตสฺสปิ อุตฺตํ. จสทฺทคฺคหเณน ยุว มฆวานมนฺตสฺส อา โหติ กฺวจิ นา สุอิจฺเจเตสุ. กมฺมุนา กมฺมนา กมฺเมน วา, กมฺเมหิ กมฺเมภิ. 'कम्म' शब्द के अन्त्य (अ) के स्थान पर 'ना' विभक्ति होने पर विकल्प से उकार और अकार आदेश होते हैं। 'अन्त' ग्रहण करने से 'थाम', 'अद्धा' आदि के अन्त को भी उकार होता है। 'च' शब्द के ग्रहण से 'युव' और 'मघवा' के अन्त को 'ना' और 'सु' आदि विभक्तियों में कहीं-कहीं 'आ' होता है। (रूप:) कम्मुना, कम्मना या कम्मेन; कम्मेहि, कम्मेभि। สสฺมาสุ ‘‘อุ นามฺหิ จา’’ติ เอตฺถ จสทฺเทน ปุม กมฺมถามนฺตสฺส จุกาโร วา สสฺมาสูติ อุตฺตํ. กมฺมุโน กมฺมสฺส, กมฺมานํ, กมฺมุนา กมฺมา กมฺมมฺหา กมฺมสฺมา, กมฺเมหิ กมฺเมภิ, กมฺมุโน กมฺมสฺส, กมฺมานํ. 'स' और 'स्मा' विभक्तियों में 'उ नाम्हि च' यहाँ 'च' शब्द से पुल्लिंग 'कम्म' और 'थाम' शब्दों के अन्त को 'स' और 'स्मा' विभक्तियों में विकल्प से उकार होता है। (रूप:) कम्मुनो, कम्मस्स; कम्मानं; कम्मुना, कम्मा, कम्मम्हा, कम्मस्मा; कम्मेहि, कम्मेभि; कम्मुनो, कम्मस्स; कम्मानं। สฺมึวจเน ‘‘พฺรหฺมโต ตุ สฺมึนี’’ติ เอตฺถ ตุสทฺเทน กฺวจิ นิ โหติ. กมฺมนิ กมฺเม กมฺมมฺหิ กมฺมสฺมึ, กมฺเมสุ. 'स्मिं' विभक्ति में 'ब्रह्मतो तु स्मिंनी' यहाँ 'तु' शब्द से कहीं-कहीं 'नि' होता है। (रूप:) कम्मनि, कम्मे, कम्मम्हि, कम्मस्मिं; कम्मेसु। เอวํ [Pg.94] ถามุนา ถาเมน ถามสา วา, ถามุโน ถามสฺส, ถามุนา ถามา. อทฺธุนา, อทฺธุโน อิจฺจาทิ ปุริมสมํ. इसी प्रकार 'थामुना', 'थामेन' या 'थामसा' (तृतीया), 'थामुनो', 'थामस्स' (षष्ठी), 'थामुना', 'थामा' (पञ्चमी) होते हैं। 'अद्धुना', 'अद्धुनो' इत्यादि पहले के समान हैं। คุณวนฺตุ สิ, ‘‘สวิภตฺติสฺส, นฺตุสฺส, สิมฺหี’’ติ จ วตฺตเต. 'गुणवन्तु' + 'सि' होने पर, 'सविभत्तिस्स', 'न्तुस्स', 'सिम्हि' (सूत्रों की) अनुवृत्ति होती है। ๑๙๘. อํ นปุํสเก. १९८. नपुंसक लिंग में 'अं' होता है। นปุํสเก วตฺตมานสฺส ลิงฺคสฺส สมฺพนฺธิโน นฺตุปฺปจฺจยสฺส สวิภตฺติสฺส อํ โหติ สิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. คุณวํ จิตฺตํ. नपुंसक लिंग में वर्तमान लिंग से संबंधित 'न्तु' प्रत्यय को विभक्ति सहित 'सि' विभक्ति के परे होने पर 'अं' होता है। जैसे- 'गुणवं चित्तं' (गुणवान चित्त)। โยมฺหิ ‘‘นฺตุสฺสนฺโต โยสุ จา’’ติ อตฺตํ, อิกาโร จ. คุณวนฺติ, คุณวนฺตานิ, เสสํ เญยฺยํ. 'यो' विभक्ति के परे होने पर 'न्तुस्सन्तो योसु च' सूत्र से 'अत्त' (अकार) और 'इकार' होता है। 'गुणवन्ति', 'गुणवन्तानि', शेष (रूप) जानने चाहिए। คจฺฉนฺต สิ, ‘‘สิมฺหิ คจฺฉนฺตาทีนํ นฺตสทฺโท อ’’มิติ อํ. คจฺฉํ คจฺฉนฺตํ, คจฺฉนฺตา คจฺฉนฺตานิ. 'गच्छन्त' + 'सि' होने पर, 'सिम्हि गच्छन्तादीनं न्तसद्दो अं' सूत्र से 'अं' होता है। 'गच्छं', 'गच्छन्तं', 'गच्छन्ता', 'गच्छन्तानि'। อการนฺตํ. अकारान्त (समाप्त)। อาการนฺโต นปุํสกลิงฺโค อสฺสทฺธาสทฺโท. आकारान्त नपुंसक लिंग 'अस्सद्धा' शब्द। ‘‘อสฺสทฺธา’’อิติ ฐิเต – 'अस्सद्धा' ऐसा स्थित होने पर - ‘‘สมาสสฺสา’’ติ อธิกิจฺจ ‘‘สโร รสฺโส นปุํสเก’’ติ สมาสนฺตสฺส รสฺสตฺตํ, สมาสตฺตา นามพฺยปเทโส, สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. เสสํ จิตฺตสมํ. 'समासस्स' के अधिकार में 'सरो रस्सो नपुंसके' सूत्र से समासान्त को ह्रस्व होता है, समास होने से 'नाम' संज्ञा होती है, और 'सि' आदि की उत्पत्ति होती है। शेष 'चित्त' शब्द के समान है। อสฺสทฺธํ กุลํ, อสฺสทฺธา อสฺสทฺธานิ กุลานิ อิจฺจาทิ. 'अस्सद्धं कुलं', 'अस्सद्धा', 'अस्सद्धानि कुलानि' इत्यादि। ตถา มุขนาสิกาสทฺโท. ตสฺส ทฺวนฺเทกตฺตา สพฺพตฺเถกวจนเมว. มุขนาสิกํ, เห มุขนาสิก, มุขนาสิกํ, มุขนาสิเกน อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'मुखनासिका' शब्द है। उसके द्वन्द्व एकत्व (समाहार द्वन्द्व) होने के कारण सभी जगह एकवचन ही होता है। 'मुखनासिकं', 'हे मुखनासिक', 'मुखनासिकं', 'मुखनासिकेन' इत्यादि। อาการนฺตํ. आकारान्त (समाप्त)। อิการนฺโต [Pg.95] นปุํสกลิงฺโค อฏฺฐิสทฺโท. इकारान्त नपुंसक लिंग 'अट्ठि' (हड्डी) शब्द। สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, สิโลโป, อฏฺฐิ. 'सि' आदि की उत्पत्ति, 'सि' का लोप, 'अट्ठि' रूप बनता है। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' (विकल्प से) की अनुवृत्ति होती है। ๑๙๙. โยนํ นิ นปุํสเกหิ. १९९. नपुंसक लिंगों से परे 'यो' (विभक्तियों) को 'नि' होता है। นปุํสกลิงฺเคหิ ปเรสํ สพฺเพสํ โยนํ นิ โหติ วา. नपुंसक लिंगों से परे सभी 'यो' विभक्तियों को विकल्प से 'नि' होता है। อฏฺฐีนิ, อญฺญตฺถ นิจฺจํ โยโลโป, ทีโฆ จ, อฏฺฐี, ตถา เห อฏฺฐิ, เห อฏฺฐี อฏฺฐีนิ, อฏฺฐึ, อฏฺฐี อฏฺฐีนิ, อฏฺฐินา อิจฺจาทิ อคฺคิสทฺทสมํ. 'अट्ठीनि', अन्यत्र (पक्ष में) नित्य 'यो' का लोप और दीर्घ होता है - 'अट्ठी'। उसी प्रकार 'हे अट्ठि', 'हे अट्ठी', 'अट्ठीनि', 'अट्ठिं', 'अट्ठी', 'अट्ठीनि', 'अट्ठिना' इत्यादि 'अग्गि' शब्द के समान हैं। เอวํ สตฺถิ ทธิ วาริ อกฺขิ อจฺฉิ อจฺจิ อิจฺจาทีนิ. इसी प्रकार 'सत्थि' (सक्थि/जाँघ), 'दधि', 'वारि' (जल), 'अक्खि' (आँख), 'अच्छि', 'अच्चि' इत्यादि के रूप होते हैं। อิการนฺตํ. इकारान्त (समाप्त)। อีการนฺโต นปุํสกลิงฺโค สุขการีสทฺโท. ईकारान्त नपुंसक लिंग 'सुखकारी' शब्द। ‘‘สุขภารี สิ’’ อิตีธ อนปุํสกตฺตาภาวา สิสฺมิมฺปิ ‘‘อโฆ รสฺส’’มิจฺจาทินา รสฺสตฺตํ, สิโลโป. สุขการิ ทานํ, สุขการี สุขการีนิ, เห สุขการิ, เห สุขการี เห สุขการีนิ, สุขการินํ สุขการึ, สุขการี สุขการีนิ. 'सुखकारी' + 'सि' यहाँ नपुंसकत्व होने के कारण 'सि' के परे होने पर भी 'अघो रस्सं' इत्यादि सूत्र से ह्रस्व होता है और 'सि' का लोप होता है। 'सुखकारि दानं', 'सुखकारी', 'सुखकारीनि', 'हे सुखकारि', 'हे सुखकारी', 'हे सुखकारीनि', 'सुखकारिनं', 'सुखकारिं', 'सुखकारी', 'सुखकारीनि'। เสสํ ทณฺฑีสทฺทสมํ. เอวํ สีฆยายีอาทีนิ. शेष 'दण्डी' शब्द के समान है। इसी प्रकार 'सीघयायी' इत्यादि के रूप होते हैं। อีการนฺตํ. ईकारान्त (समाप्त)। อุการนฺโต นปุํสกลิงฺโค อายุสทฺโท. ตสฺส อฏฺฐิสทฺทสฺเสว รูปนโย. उकारान्त नपुंसक लिंग 'आयु' शब्द। इसके रूपों की विधि 'अट्ठि' शब्द के समान ही है। อายุ, อายู อายูนิ, เห อายุ, เห อายู เห อายูนิ, อายุํ, อายู อายูนิ, อายุนา อายุสาติ [Pg.96] มโนคณาทิตฺตา สิทฺธํ. อายูหิ อายูภิ, อายุโน อายุสฺส, อายูนมิจฺจาทิ. 'आयु', 'आयू', 'आयूनि', 'हे आयु', 'हे आयू', 'हे आयूनि', 'आयुं', 'आयू', 'आयूनि', 'आयुना', 'आयुसा' - यह मनोगण आदि होने से सिद्ध होता है। 'आयूहि', 'आयूब्भि', 'आयुनो', 'आयुस्स', 'आयूनं' इत्यादि। เอวํ จกฺขุ วสุ ธนุ ทารุ ติปุ มธุ หิงฺคุ สิคฺคุ วตฺถุ มตฺถุ ชตุ อมฺพุ อสฺสุอาทีนิ. इसी प्रकार 'चक्खु' (चक्षु), 'वसु', 'धनु', 'दारु', 'तिपु', 'मधु', 'हिङ्गु', 'सिग्गु', 'वत्थु' (वस्तु), 'मत्थु', 'जतु', 'अम्बु', 'अस्सु' (अश्रु) इत्यादि के रूप होते हैं। อุการนฺตํ. उकारान्त (समाप्त)। อูการนฺโต นปุํสกลิงฺโค โคตฺรภูสทฺโท. ऊकारान्त नपुंसक लिंग 'गोत्रभू' शब्द। โคตฺรภู สิ, นปุํสกตฺตา รสฺสตฺตํ, สิโลโป. โคตฺรภุ จิตฺตํ, โคตฺรภู โคตฺรภูนิ, เห โคตฺรภุ, เห โคตฺรภู เห โคตฺรภูนิ, โคตฺรภุํ, โคตฺรภู โคตฺรภูนิ, โคตฺรภุนา อิจฺจาทิ ปุลฺลิงฺเค อภิภูสทฺทสมํ. 'गोत्रभू' शब्द के बाद 'सि' प्रत्यय होने पर, नपुंसक होने के कारण ह्रस्वत्व होता है और 'सि' का लोप हो जाता है। गोत्रभु चित्तं (Gotrabhu cittaṃ), गोत्रभू (gotrabhū), गोत्रभूनि (gotrabhūni); हे गोत्रभु (he gotrabhu), हे गोत्रभू (he gotrabhū), हे गोत्रभूनि (he gotrabhūni); गोत्रभुं (gotrabhuṃ), गोत्रभू (gotrabhū), गोत्रभूनि (gotrabhūni); गोत्रभुना (gotrabhunā) इत्यादि रूप पुल्लिंग में 'अभिभू' शब्द के समान होते हैं। เอวํ อภิภู สยมฺภู ธมฺมญฺญูอาทีนิ. इसी प्रकार 'अभिभू', 'स्वयंभू', 'धम्मञ्ञू' (धर्मज्ञ) आदि के रूप होते हैं। อูการนฺตํ. ऊकारान्त (समाप्त)। โอการนฺโต นปุํสกลิงฺโค จิตฺตโคสทฺโท. ओकारान्त नपुंसकलिङ्ग 'चित्तगो' शब्द। ‘‘จิตฺตา คาโว อสฺส กุลสฺสา’’ติ อตฺเถ พหุพฺพีหิสมาเส กเต ‘‘สโร รสฺโส นปุํสเก’’ติ โอการสฺส ฐานปฺปยตนาสนฺนตฺตา รสฺสตฺตมุกาโร, สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, สิโลโป. จิตฺตคุ กุลํ, จิตฺตคู จิตฺตคูนิ อิจฺจาทิ อายุสทฺทสมํ. “चित्ता गावो अस्स कुलस्स” (जिस कुल की गायें चितकबरी हैं) इस अर्थ में बहुव्रीहि समास होने पर, “सरो रस्सो नपुंसके” सूत्र से ओकार के स्थान और प्रयत्न की निकटता के कारण ह्रस्व 'उ'कार हो जाता है, फिर 'सि' आदि की उत्पत्ति और 'सि' का लोप होता है। चित्तगु कुलं (Cittagu kulaṃ), चित्तगू (cittagū), चित्तगूनि (cittagūni) इत्यादि रूप 'आयु' शब्द के समान होते हैं। โอการนฺตํ. ओकारान्त (समाप्त)। จิตฺตํ กมฺมญฺจ อสฺสทฺธ-มถฏฺฐิ สุขการิ จ; อายุ โคตฺรภู ธมฺมญฺญู, จิตฺตคูติ นปุํสเก. चित्त, कर्म, अस्सद्ध (अश्रद्ध), अथट्ठि (अस्थि), सुखकारी, आयु, गोत्रभू, धम्मञ्ञू और चित्तगू - ये नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। นปุํสกลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. नपुंसकलिङ्ग समाप्त हुआ। สพฺพนาม सर्वनाम। อถ [Pg.97] สพฺพนามานิ วุจฺจนฺเต. अब सर्वनाम कहे जाते हैं। สพฺพ, กตร, กตม, อุภย, อิตร, อญฺญ, อญฺญตร, อญฺญตม, ปุพฺพ, ปร, อปร, ทกฺขิณ, อุตฺตร, อธร, ย, ต, เอต, อิม, อมุ, กึ, เอก, อุภ, ทฺวิ, ติ, จตุ, ตุมฺห, อมฺห อิติ สตฺตวีสติ สพฺพนามานิ, ตานิ สพฺพนามตฺตา ติลิงฺคานิ. सब्ब (सब), कतर, कतम, उभय, इतर, अञ्ञ (अन्य), अञ्ञतर, अञ्ञतम, पुब्ब (पूर्व), पर, अपर, दक्खिण (दक्षिण), उत्तर, अधर, य (जो), त (वह), एत, इम (यह), अमु, किं (क्या), एक, उभ, द्वि (दो), ति (तीन), चतु (चार), तुम्हा (तुम), अम्हा (मैं/हम) - ये सत्ताईस सर्वनाम हैं; सर्वनाम होने के कारण ये तीनों लिङ्गों में होते हैं। ตตฺถ สพฺพสทฺโท นิรวเสสตฺโถ, โส ยทา ปุลฺลิงฺควิสิฏฺฐตฺถาภิธายี, ตทา รูปนโย. ปุเร วิย สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, ‘‘โส’’ติ สิสฺส โอกาโร, สรโลปปรนยนานิ. สพฺโพ ชโน. उनमें 'सब्ब' शब्द पूर्णता (निरवशेष) के अर्थ में है; जब वह पुल्लिंग विशिष्ट अर्थ का बोध कराता है, तब रूप बनाने की विधि इस प्रकार है: पहले की तरह 'सि' आदि की उत्पत्ति, “सो” सूत्र से 'सि' को ओकार, स्वर-लोप और पर-नयन (मिलाना) होता है। सब्बो जनो (Sabbo jano)। พหุวจเน ‘‘สพฺพ โย’’ อิตีธ ‘‘ปรสมญฺญา ปโยเค’’ติ สพฺพาทีนํ สพฺพนามสญฺญา. बहुवचन में “सब्ब यो” यहाँ “परसमञ्ञा पयोगे” सूत्र से 'सब्ब' आदि की 'सर्वनाम' संज्ञा होती है। ‘‘โย’’ติ วตฺตเต. “यो” की अनुवृत्ति आती है। ๒๐๐. สพฺพนามการเต ปฐโม. २००. सर्वनाम के अकार से परे प्रथमा (का 'यो')। สพฺเพสํ อิตฺถิปุมนปุํสกานํ นามานิ สพฺพนามานิ, เตสํ สพฺเพสํ สพฺพนามสญฺญานํ ลิงฺคานํ อการโต ปโร ปฐโม โย เอตฺตมาปชฺชเต. สพฺเพ ปุริสา. सभी स्त्री, पुरुष और नपुंसक के जो नाम हैं वे 'सर्वनाम' हैं; उन सभी सर्वनाम संज्ञक अंगों के अकार से परे प्रथमा विभक्ति का 'यो' प्रत्यय 'ए'त्व (ए) को प्राप्त होता है। सब्बे पुरिसा (Sabbe purisā)। อการโตติ กึ? สพฺพา อมู. “अकार से” ऐसा क्यों कहा? (ताकि यहाँ न हो:) सब्बा (Sabbā), अमू (amū)। เห สพฺพ สพฺพา, เห สพฺเพ, สพฺพํ, สพฺเพ, สพฺเพน, สพฺเพหิ สพฺเพภิ. हे सब्ब (he sabba), सब्बा (sabbā); हे सब्बे (he sabbe); सब्बं (sabbaṃ), सब्बे (sabbe); सब्बेन (sabbena), सब्बेहि (sabbehi), सब्बेभि (sabbebhi)। จตุตฺเถกวจเน อายาเทเส สมฺปตฺเต – चतुर्थी एकवचन में 'आय' आदेश प्राप्त होने पर - ‘‘อโต, อา เอ, สฺมาสฺมึนํ, อาย จตุตฺเถกวจนสฺสา’’ติ จ วตฺตเต. “अतो”, “आ ए”, “स्मास्मिंनं”, “आय चतुत्थेकवचनस्स” की अनुवृत्ति आती है। ๒๐๑. ตโย [Pg.98] เนว จ สพฺพนาเมหิ. २०१. और सर्वनामों से परे वे तीनों नहीं होते। อการนฺเตหิ สพฺพนาเมหิ ปเรสํ สฺมา สฺมึ อิจฺเจเตสํ, จตุตฺเถกวจนสฺส จ อา เอ อายอิจฺเจเต อาเทสา เนว โหนฺตีติ อายาเทสาภาโว. จคฺคหณํ กตฺถจิ ปฏิเสธนิวตฺตนตฺถํ, เตน ปุพฺพาทีหิ สฺมา สฺมึนํ อา เอ จ โหนฺติ. สพฺพสฺส. अकारान्त सर्वनामों से परे 'स्मा' और 'स्मिं' के स्थान पर, तथा चतुर्थी एकवचन के स्थान पर क्रमशः 'आ', 'ए' और 'आय' ये आदेश नहीं होते हैं, इसलिए 'आय' आदेश का अभाव होता है। 'च' का ग्रहण कहीं-कहीं प्रतिषेध (निषेध) को हटाने के लिए है, जिससे 'पुब्ब' आदि शब्दों से 'स्मा' और 'स्मिं' के स्थान पर 'आ' और 'ए' होते हैं। सब्बस्स (Sabbassa)। ‘‘อกาโร, เอ’’ติ จ วตฺตเต. “अकारो” और “ए” की अनुवृत्ति आती है। ๒๐๒. สพฺพนามานํ นํมฺหิ จ. २०२. और 'नं' परे होने पर सर्वनामों का (अकार 'ए' हो जाता है)। สพฺเพสํ สพฺพนามานํ อกาโร เอตฺตมาปชฺชเต นํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. 'नं' विभक्ति परे होने पर सभी सर्वनामों का अकार 'ए'त्व (ए) को प्राप्त होता है। ‘‘สพฺพนามโต’’ติ จ วตฺตเต. “सब्बनामतो” की अनुवृत्ति आती है। ๒๐๓. สพฺพโต นํ สํสานํ. २०३. सभी (सर्वनामों) से परे 'नं' को 'सं' और 'सानं' आदेश होते हैं। สพฺพโต สพฺพนามโต ปรสฺส นํวจนสฺส สํ สานํอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ. सभी सर्वनामों से परे 'नं' वचन (प्रत्यय) के स्थान पर 'सं' और 'सानं' ये आदेश होते हैं। สพฺเพสํ สพฺเพสานํ, สพฺพสฺมา สพฺพมฺหา, สพฺเพหิ สพฺเพภิ, สพฺพสฺส, สพฺเพสํ สพฺเพสานํ, สพฺพสฺมึ สพฺพมฺหิ, สพฺเพสุ. सब्बेसं (sabbesaṃ), सब्बेसानं (sabbesānaṃ); सब्बस्मा (sabbasmā), सब्बम्हा (sabbamhā); सब्बेहि (sabbehi), सब्बेभि (sabbebhi); सब्बस्स (sabbassa); सब्बेसं (sabbesaṃ), सब्बेसानं (sabbesānaṃ); सब्बस्मिं (sabbasmiṃ), सब्बम्हि (sabbamhi); सब्बेसु (sabbesu)। อิตฺถิยํ ‘‘อิตฺถิยมโต อาปฺปจฺจโย’’ติ อาปฺปจฺจโย. อญฺญํ กญฺญาสทฺทสมํ อญฺญตฺร ส นํ สฺมึวจเนหิ. สพฺพา ปชา, สพฺพา สพฺพาโย, เห สพฺเพ, เห สพฺพา สพฺพาโย, สพฺพํ, สพฺพา สพฺพาโย, สพฺพาย, สพฺพาหิ สพฺพาภิ. स्त्रीलिंग में “इत्थियमतो आप्पच्चयो” सूत्र से 'आ' प्रत्यय होता है। 'सं', 'नं' और 'स्मिं' वचनों को छोड़कर शेष रूप 'कञ्ञा' शब्द के समान होते हैं। सब्बा पजा (Sabbā pajā), सब्बा (sabbā), सब्बायो (sabbāyo); हे सब्बे (he sabbe), हे सब्बा (he sabbā), हे सब्बायो (he sabbāyo); सब्बं (sabbaṃ), सब्बा (sabbā), सब्बायो (sabbāyo); सब्बाय (sabbāya), सब्बाहि (sabbāhi), सब्बाभि (sabbābhi)। จตุตฺเถกวจเน ‘‘สพฺพนามโต วา’’, สพฺพโต โกติ อิโต ‘‘สพฺพโต’’ติ จ วตฺตเต. चतुर्थी एकवचन में 'सब्बनामतो वा' (सूत्र से), 'सब्बतो' यहाँ 'इतो' और 'सब्बतो' अनुवृत्त होते हैं। ๒๐๔. ฆปโต [Pg.99] สฺมึสานํ สํสา. २०४. 'घ' और 'प' संज्ञक शब्दों से परे 'स्मिं' और 'सा' (विभक्तियों) के स्थान पर क्रमशः 'सं' और 'सा' आदेश होते हैं। สพฺพโต สพฺพนามโต ฆปสญฺญโต สฺมึ สอิจฺเจเตสํ ยถากฺกมํ สํสาอาเทสา โหนฺติ วา. सभी सर्वनामों से, जो 'घ' और 'प' संज्ञक हैं, उनसे परे 'स्मिं' और 'सा' इन (विभक्तियों) के स्थान पर यथाक्रम (क्रमशः) 'सं' और 'सा' आदेश विकल्प से होते हैं। ‘‘สํสาสฺเวกวจเนสุ จา’’ติ วตฺตเต. 'संसास्वेकवचनेसु च' इसकी अनुवृत्ति होती है। ๒๐๕. โฆ รสฺสํ. २०५. 'घ' संज्ञक (दीर्घ स्वर) ह्रस्व हो जाता है। ฆสญฺโญ อากาโร รสฺสมาปชฺชเต สํสาสฺเวกวจเนสุ วิภตฺตาเทเสสุ ปเรสุ. 'घ' संज्ञक आकार (आ) ह्रस्व हो जाता है, जब 'सं' और 'सा' जैसे एकवचन विभक्ति आदेश परे हों। ‘‘สาคโม’’ติ วตฺตเต. 'सागमो' (स-आगम) की अनुवृत्ति होती है। ๒๐๖. สํสาสฺเวกวจเนสุ จ. २०६. 'सं' और 'सा' एकवचन (आदेशों) के परे होने पर भी। สํ สาอิจฺเจเตสุ เอกวจนฏฺฐานสมฺภูเตสุ วิภตฺตาเทเสสุ ปเรสุ ลิงฺคมฺหา สการาคโม โหติ. 'सं' और 'सा' इन एकवचन के स्थान पर उत्पन्न हुए विभक्ति आदेशों के परे होने पर प्रातिपदिक (लिंग) से 'स' कार का आगम होता है। สพฺพสฺสา สพฺพาย, สพฺพาสํ สพฺพาสานํ, สพฺพาย, สพฺพาหิ สพฺพาภิ, สพฺพสฺสา สพฺพาย, สพฺพาสํ สพฺพาสานํ. सब्बस्सा, सब्बाय; सब्बासं, सब्बासानं; सब्बाय; सब्बाहि, सब्बाभि; सब्बस्सा, सब्बाय; सब्बासं, सब्बासानं। สฺมึมฺหิ ‘‘สพฺพนามโต, ฆปโต’’ติ จ วตฺตเต. 'स्मिं' विभक्ति के विषय में 'सब्बनामतो' और 'घपतो' की अनुवृत्ति होती है। ๒๐๗. เนตาหิ สฺมิมายยา. २०७. 'न एताहि स्मिमायाया' (सूत्र)। เอเตหิ สพฺพนาเมหิ ฆปสญฺเญหิ ปรสฺส สฺมึวจนสฺส เนว อาย ยาเทสา โหนฺตีติ อายาภาโว. วาธิการโต กฺวจิ โหติ ทกฺขิณาย อุตฺตรายาติ อาทิ. इन 'घ' और 'प' संज्ञक सर्वनामों से परे 'स्मिं' वचन (विभक्ति) के स्थान पर 'आय' और 'या' आदेश नहीं होते हैं, इसलिए 'आय' का अभाव होता है। 'वा' (विकल्प) के अधिकार से कहीं-कहीं होता है, जैसे—दक्खिणाय, उत्तराय आदि। สํยมาเทสา, สพฺพสฺสํ สพฺพายํ, สพฺพาสุ. 'सं' और 'यं' आदेश होने पर—सब्बस्सं, सब्बायं; सब्बासु। นปุํสเก สพฺพํ จิตฺตํ, สพฺพานิ, เห สพฺพ, เห สพฺพานิ, สพฺพํ, สพฺพานิ. เสสํ ปุลฺลิงฺเค วิย เญยฺยํ. नपुंसक लिंग में—सब्बं चित्तं, सब्बानि; हे सब्ब, हे सब्बानि; सब्बं, सब्बानि। शेष पुल्लिंग के समान समझना चाहिए। เอวํ [Pg.100] กตราทีนํ อญฺญตมสทฺทปริยนฺตานํ ตีสุปิ ลิงฺเคสุ รูปนโย. इसी प्रकार 'कतर' आदि से लेकर 'अञ्ञतम' शब्द तक तीनों लिंगों में रूपों की विधि है। ตตฺถ กตรกตมสทฺทา ปุจฺฉนตฺถา. वहाँ 'कतर' और 'कतम' शब्द प्रश्न के अर्थ में हैं। อุภยสทฺโท ทฺวิอวยวสมุทายวจโน. 'उभय' शब्द दो अवयवों के समुदाय का वाचक है। อิตรสทฺโท วุตฺตปฺปฏิโยควจโน. 'इतर' शब्द कहे गए के प्रतिपक्षी (दूसरे) का वाचक है। อญฺญสทฺโท อธิกตาปรวจโน. 'अञ्ञ' शब्द अधिकृत से भिन्न (अन्य) का वाचक है। อญฺญตร อญฺญตมสทฺทา อนิยมตฺถา. 'अञ्ञतर' और 'अञ्ञतम' शब्द अनिश्चय (अनियम) के अर्थ में हैं। ‘‘โย, สพฺพนามการเต ปฐโม’’ติ จ วตฺตเต. 'यो, सब्बनामकारते पठमो' इसकी अनुवृत्ति होती है। ๒๐๘. ทฺวนฺทฏฺฐา วา. २०८. 'द्वन्द्वट्ठा वा' (सूत्र)। ทฺวนฺทสมาสฏฺฐา สพฺพนามการโต ปโร ปฐโม โย เอตฺตมาปชฺชเต วา. กตโร จ กตโม จาติ กตรกตเม, กตรกตมา วา อิจฺจาทิ. द्वन्द्व समास में स्थित सर्वनाम संज्ञक 'अ' कार से परे प्रथमा विभक्ति का 'यो' विकल्प से 'ए' भाव को प्राप्त होता है। जैसे—'कतरो च कतमो च' इति 'कतरकतमे' या 'कतरकतमा' इत्यादि। ปุพฺพาทโย ทิสาทิววตฺถานวจนา. 'पुब्ब' आदि शब्द दिशा आदि की व्यवस्था के वाचक हैं। ปุพฺโพ กาโล. พหุวจเน ‘‘ธาตุลิงฺเคหิ ปรา ปจฺจยา’’ติ เอตฺถ ปราติ นิทฺเทสโต ปุพฺพาทีหิ โยวจนสฺส วิกปฺเปเนกาโร. 'पुब्बो कालो' (पूर्व काल)। बहुवचन में 'धातुुलिङ्गेहि परा पच्चया' यहाँ 'परा' के निर्देश से 'पुब्ब' आदि से परे 'यो' वचन (विभक्ति) का विकल्प से 'ए' कार होता है। ปุพฺเพ ปุพฺพา, เห ปุพฺพ, เห ปุพฺเพ เห ปุพฺพา, ปุพฺพํ, ปุพฺเพ, ปุพฺเพน, ปุพฺเพหิ ปุพฺเพภิ, ปุพฺพสฺส, ปุพฺเพสํ ปุพฺเพสานํ. ‘‘สฺมาสฺมึนํ วา’’ติ วิกปฺเปนากาเรการา. ปุพฺพา ปุพฺพสฺมา ปุพฺพมฺหา, ปุพฺเพหิ ปุพฺเพภิ, ปุพฺพสฺส, ปุพฺเพสํ ปุพฺเพสานํ, ปุพฺเพ ปุพฺพสฺมึ ปุพฺพมฺหิ, ปุพฺเพสุ. पुब्बे, पुब्बा; हे पुब्ब, हे पुब्बे, हे पुब्बा; पुब्बं, पुब्बे; पुब्बेन, पुब्बेहि, पुब्बेभि; पुब्बस्स, पुब्बेसं, पुब्बेसानं। 'स्मास्मिंनं वा' (सूत्र) से विकल्प से 'आ' कार और 'ए' कार होते हैं—पुब्बा, पुब्बस्मा, पुब्बम्हा; पुब्बेहि, पुब्बेभि; पुब्बस्स, पुब्बेसं, पुब्बेसानं; पुब्बे, पुब्बस्मिं, पुब्बम्हि; पुब्बेसु। อิตฺถิยํ ปุพฺพา ทิสา, ปุพฺพา ปุพฺพาโย อิจฺจาทิ สพฺพาสทฺทสมํ. स्त्रीलिंग में—'पुब्बा दिसा', 'पुब्बा', 'पुब्बायो' इत्यादि 'सब्बा' शब्द के समान (रूप होते हैं)। นปุํสเก [Pg.101] ปุพฺพํ ฐานํ, ปุพฺพานิ, เห ปุพฺพ, เห ปุพฺพานิ, ปุพฺพํ, ปุพฺพานิ, เสสํ ปุลฺลิงฺคสมํ. เอวํ ปราปรทกฺขิณุตฺตราธรสทฺทา. नपुंसक लिंग में—'पुब्बं ठानं', 'पुब्बानि'; हे पुब्ब, हे पुब्बानि; पुब्बं, पुब्बानि; शेष पुल्लिंग के समान है। इसी प्रकार पर, अपर, दक्खिण, उत्तर और अधर शब्द हैं। ‘‘สพฺพนามโต, ทฺวนฺทฏฺฐา’’ติ จ วตฺตเต. 'सब्बनामतो' और 'द्वन्द्वट्ठा' की अनुवृत्ति होती है। ๒๐๙. นาญฺญํ สพฺพนามิกํ. २०९. अन्य कोई सर्वनामिक (कार्य) नहीं होता। ทฺวนฺทฏฺฐา สพฺพนามโต ปรสฺส โยวจนสฺส ฐเปตฺวา เอตฺตํ อญฺญํ สพฺพนามิกํ การิยํ น โหตีติ สํสานมาเทสาภาโว. ปุพฺพาปรานํ, ปุพฺพุตฺตรานํ อธรุตฺตรานํ, ‘‘นาญฺญํ สพฺพนามิก’’นฺติ วินาธิกาเรน โยเคน ตติยาสมาเสปิ. มาสปุพฺพาย, มาสปุพฺพานํ. द्वन्द्व समास में स्थित सर्वनाम से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर होने वाले 'ए' आदेश को छोड़कर अन्य कोई सर्वनामिक कार्य नहीं होता है, जैसे 'सं' और 'सां' आदेशों का अभाव। 'पुब्बापरानं', 'पुब्बुत्तरानं', 'अधरुत्तरानं' (में)। 'नाञ्ञं सब्बनामिकं' इस सूत्र के बिना अधिकार वाले योग से तृतीया तत्पुरुष समास में भी (सर्वनामिक कार्य नहीं होता)। जैसे: 'मासपुब्बाय', 'मासपुब्बानं'। ‘‘นาญฺญํ สพฺพนามิก’’นฺติ จ วตฺตเต. 'नाञ्ञं सब्बनामिकं' यह (पद) अनुवृत्त होता है। ๒๑๐. พหุพฺพีหิมฺหิ จ. २१०. और बहुव्रीहि समास में भी। พหุพฺพีหิมฺหิ จ สมาเส สพฺพนามิกวิธานํ นาญฺญํ โหติ. ปิยปุพฺพาย, ปิยปุพฺพานํ, ปิยปุพฺเพ. बहुव्रीहि समास में भी अन्य सर्वनामिक विधान नहीं होता है। जैसे: 'पियपुब्बाय', 'पियपुब्बानं', 'पियपुब्बे'। จสทฺทคฺคหเณน ทิสตฺถสพฺพนามานํ พหุพฺพีหิมฺหิ สพฺพนามิกวิธานํว โหติ. 'च' शब्द के ग्रहण से दिशावाचक सर्वनामों का बहुव्रीहि समास में सर्वनामिक विधान ही होता है। ทกฺขิณสฺสา จ ปุพฺพสฺสา จ ยทนฺตราฬนฺติ อตฺเถ พหุพฺพีหิ, ทกฺขิณปุพฺพสฺสํ, ทกฺขิณปุพฺพสฺสา, เอวํ อุตฺตรปุพฺพสฺสํ, อุตฺตรปุพฺพสฺสา อิจฺจาทิ. 'दक्षिण और पूर्व के जो बीच में है' इस अर्थ में बहुव्रीहि समास होने पर 'दक्खिणपुब्बस्सं', 'दक्खिणपुब्बस्सा'; इसी प्रकार 'उत्तरपुब्बस्सं', 'उत्तरपुब्बस्सा' इत्यादि रूप बनते हैं। ยเตตสทฺทาทีนมาลปเน รูปํ น สมฺภวติ. ยสทฺโท อนิยมตฺโถ. 'य', 'त', 'एत' आदि शब्दों का सम्बोधन में रूप नहीं होता है। 'य' शब्द अनिश्चयवाचक अर्थ में है। โย ปุริโส, เย ปุริสา, ยํ, เย. ยา กญฺญา, ยา ยาโย, ยํ, ยา ยาโย. ยํ จิตฺตํ, ยานิ, ยํ, ยานิ. เสสํ สพฺพตฺถ สพฺพสทฺทสมํ. यो पुरिसो (जो पुरुष), ये पुरिसा (जो पुरुष - बहुवचन), यं, ये। या कञ्ञा (जो कन्या), या यायो, यं, या यायो। यं चित्तं (जो चित्त), यानि, यं, यानि। शेष सभी स्थानों पर 'सब्ब' शब्द के समान रूप होते हैं। ต [Pg.102] เอต อิม อมุ กึอิจฺเจเต ปรมฺมุข สมีป อจฺจนฺตสมีปทูร ปุจฺฉนตฺถวจนา. 'त', 'एत', 'इम', 'अमु', 'किं' - ये क्रमशः परोक्ष (वह), समीप (यह), अत्यंत समीप (यह), दूर (वह) और प्रश्नवाचक अर्थों के वाचक हैं। ตสทฺทสฺส เภโท. ‘‘ต สิ’’ อิตีธ – 'त' शब्द के भेद। 'त + सि' यहाँ पर - ‘‘อนปุํสกสฺสายํ สิมฺหีติ, ส’’มิติ จ วตฺตเต. 'अनपुंसकस्सायं सिम्हि' और 'स' (इन पदों की) अनुवृत्ति होती है। ๒๑๑. เอตเตสํ โต. २११. एत और त के (तकार को सकार होता है)। เอต ตอิจฺเจเตสํ อนปุํสกานํ ตกาโร สการมาปชฺชเต สิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. โส ปุริโส. 'एत' और 'त' इन अनपुंसक शब्दों के 'त' कार को 'सि' विभक्ति परे होने पर 'स' कार आदेश होता है। जैसे: 'सो पुरिसो' (वह पुरुष)। สพฺพนามคฺคหณญฺจ, อิโต ตคฺคหณญฺจ วตฺตเต. 'सब्बनाम' का ग्रहण और यहाँ से 'त' का ग्रहण अनुवृत्त होता है। ๒๑๒. ตสฺส วา นตฺตํ สพฺพตฺถ. २१२. उस (त) के तकार को सभी जगह विकल्प से 'न' होता है। ตอิจฺเจตสฺส สพฺพนามสฺส ตการสฺส นตฺตํ โหติ วา สพฺพตฺถ ลิงฺเคสุ. เน เต, นํ ตํ, เน เต, เนน เตน, เนหิ เนภิ เตหิ เตภิ. 'त' इस सर्वनाम के 'त' कार को सभी लिंगों में विकल्प से 'न' कार आदेश होता है। जैसे: 'ने-ते', 'नं-तं', 'ने-ते', 'नेन-तेन', 'नेहि-नेभि-तेहि-तेभि'। ‘‘สพฺพสฺส, ตสฺส วา สพฺพตฺถา’’ติ จ วตฺตเต. 'सब्बस्स', 'तस्स वा सब्बत्थ' - यह (पद) अनुवृत्त होता है। ๒๑๓. สสฺมาสฺมึสํสาสฺวตฺตํ. २१३. स, स्मा, स्मिं, सं और सा विभक्तियों में 'अ' आदेश होता है। ตอิจฺเจตสฺส สพฺพนามสฺส สพฺพสฺเสว อตฺตํ โหติ วา ส สฺมา สฺมึ สํ สาอิจฺเจเตสุ วจเนสุ สพฺพตฺถ ลิงฺเคสุ. อสฺส นสฺส ตสฺส, เนสํ เตสํ เนสานํ เตสานํ. 'त' इस सर्वनाम के सम्पूर्ण रूप को 'स', 'स्मा', 'स्मिं', 'सं', 'सा' इन विभक्तियों के परे होने पर सभी लिंगों में विकल्प से 'अ' कार आदेश होता है। जैसे: 'अस्स-नस्स-तस्स', 'नेसं-तेसं-नेसानं-तेसानं'। ‘‘สฺมาหิสฺมึนํ มฺหาภิมฺหิ วา’’ติ อิโต ‘‘สฺมาสฺมึนํ, มฺหามฺหี’’ติ จ วตฺตเต. 'स्माहिस्मिंनं म्हाभिम्हि वा' यहाँ से 'स्मा-स्मिं-नं' और 'म्हा-म्हि' अनुवृत्त होते हैं। ๒๑๔. น ติเมหิ กตากาเรหิ. २१४. जिनमें 'अ' कार आदेश कर दिया गया है, उन 'त' और 'इम' से (परे आदेश नहीं होते)। ต อิมอิจฺเจเตหิ กตากาเรหิ ปเรสํ สฺมาสฺมึนํ มฺหา มฺหิอิจฺเจเต อาเทสา น โหนฺติ. 'त' और 'इम' इन शब्दों से, जिनमें 'अ' कार आदेश कर दिया गया है, परे 'स्मा', 'स्मिं', 'नं', 'म्हा', 'म्हि' ये आदेश नहीं होते हैं। ปกติสนฺธิวิธาน प्रकृति-सन्धि विधान อถ [Pg.22] สรานเมว สนฺธิการิเย สมฺปตฺเต ปกติภาโว วุจฺจเต. अब स्वरों के ही सन्धि कार्य प्राप्त होने पर प्रकृति-भाव कहा जाता है। ‘‘สรา, ปกตี’’ติ จ วตฺตเต. 'सरा', 'पकति' - यह (पद) अनुवृत्त होता है। ๓๕. สเร กฺวจิ. ३५. स्वर परे होने पर कहीं-कहीं। สรา โข สเร ปเร กฺวจิ ฉนฺทเภทาสุขุจฺจารณฏฺฐาเน, สนฺธิจฺฉารหิตฏฺฐาเน จ ปกติรูปานิ โหนฺติ, น โลปาเทสวิการมาปชฺชนฺเตติ อตฺโถ. स्वर परे होने पर कहीं-कहीं छन्द-भंग के भय से, सुखद उच्चारण के स्थान पर, और जहाँ सन्धि की इच्छा न हो, वहाँ स्वर प्रकृति रूप में ही रहते हैं, अर्थात् वे लोप, आदेश या विकार को प्राप्त नहीं होते हैं। ตตฺถ ปกติฏฺฐานํ นาม อาลปนนฺตา อนิติสฺมึ อจฺฉนฺทานุรกฺขเณ อสมาเส ปทนฺตทีฆา จ อิการุการา จ นามปทนฺตาตีตกฺริยาทิมฺหีติ เอวมาทิ. वहाँ प्रकृति-भाव के स्थान ये हैं: सम्बोधन के अन्त में, 'इति' शब्द परे न होने पर, छन्द की रक्षा की आवश्यकता न होने पर, असमस्त पद (समास रहित) में, पद के अन्त में स्थित दीर्घ 'इ' और 'उ' कार, और संज्ञा पद के अन्त में या अतीत काल की क्रिया के आदि में इत्यादि। อาลปนนฺเตสุ ตาว – กตมา จานนฺท อนิจฺจสญฺญา, กตมา จานนฺท อาทีนวสญฺญา, สาริปุตฺต อิเธกจฺโจ, เอหิ สิวิก อุฏฺเฐหิ, อุปาสกา อิเธกจฺโจ, โภติ อยฺเย, ภิกฺขุ อโรคํ ตว สีลํ, สิญฺจ ภิกฺขุ อิมํ นาวํ, ภิกฺขเว เอวํ วทามิ, ปญฺจิเม คหปตโย อานิสํสา อิจฺเจวมาทีสุ ปกติภาโว, ปุพฺพสฺสรโลปยวาเทสาทโย น โหนฺติ. सम्बोधन के अन्त में जैसे - 'कतम चानन्द अनिच्चसञ्ञा', 'कतम चानन्द आदीनवसञ्ञा', 'सारिपुत्त इधेकच्चो', 'एहि सिविक उट्ठेहि', 'उपासका इधेकच्चो', 'भोति अय्ये', 'भिक्खु अरोगं तव सीलं', 'सिञ्च भिक्खु इमं नावं', 'भिक्खवे एवं वदामि', 'पञ्चिमे गहपतयो आनिसंसा' - इन उदाहरणों में प्रकृति-भाव होता है, पूर्व स्वर का लोप या 'य', 'व' आदेश आदि नहीं होते हैं। กฺวจิคฺคหเณน อิติสฺมึ ฉนฺทานุรกฺขเณ สนฺธิ โหติ, ยถา – สกฺกา เทวีติ, นโม เต พุทฺธ วีรตฺถุ. 'क्वचि' ग्रहण से 'इति' शब्द में छन्द की रक्षा के लिए सन्धि होती है, जैसे - सक्का देवीति, नमो ते बुद्ध वीरत्थु। สเรติ กึ? สาธุ มหาราชาติ, เอวํ กิร ภิกฺขูติ. 'सरे' (स्वर होने पर) क्यों? साधु महाराजाति, एवं किर भिक्खूति। อสมาเส ปทนฺตทีเฆสุ – อายสฺมา อานนฺโท คาถา อชฺฌภาสิ, เทวา อาภสฺสรา ยถา, เตวิชฺชา อิทฺธิปฺปตฺตา [Pg.23] จ, ภควา อุฏฺฐายาสนา, ภควา เอตทโวจ, อภิวาเทตฺวา เอกมนฺตํ อฏฺฐาสิ, คนฺตฺวา โอโลเกนฺโต, ภูตวาที อตฺถวาที, ยํ อิตฺถี อรหา อสฺส, สามาวตี อาห, ปาปการี อุภยตฺถ ตปฺปติ, นที โอตฺถรติ, เย เต ภิกฺขู อปฺปิจฺฉา, ภิกฺขู อามนฺเตสิ, ภิกฺขูอุชฺฌายึสุ, ภิกฺขู เอวมาหํสุ, อิมสฺมึ คาเม อารกฺขกา, สพฺเพ อิเม, กตเม เอกาทส, คมฺภีเร โอทกนฺติเก, อปฺปมาโท อมตปทํ, สงฺโฆ อาคจฺฉตุ, โก อิมํ ปถวึ วิจฺเจสฺสติ, อาโลโก อุทปาทิ, เอโก เอกาย, จตฺตาโร โอฆา. असमस्त (समास रहित) पदों के अन्त में दीर्घ स्वरों के होने पर - आयुस्मा आनन्दो गाथा अज्झभासि, देवा आभस्सरा यथा, तेविज्जा इद्धिप्पत्ता च, भगवा उट्ठायासना, भगवा एतदवोच, अभिवादेत्वा एकमन्तं अट्टासि, गन्त्वा ओलोकेन्तो, भूतवादी अत्थवादी, यं इत्थी अरहा अस्स, सामावती आह, पापकारी उभयत्थ तप्पति, नदी ओत्थरति, ये ते भिक्खू अप्पिच्छा, भिक्खू आमन्तेसि, भिक्खूउज्झायिंसु, भिक्खू एवमाहंसु, इमस्मिं गामे आरक्खका, सब्बे इमे, कतमे एकादस, गम्भीरे ओदकन्तिके, अप्पमादो अमतपदं, सङ्घो आगच्छतु, को इमं पठविं विच्चेस्सति, आलोको उदापादि, एको एकाय, चत्तारो ओघा। นิปาเตสุปิ – อเร อหมฺปิ, สเจ อิมสฺส กายสฺส, โน อภิกฺกโม, อโห อจฺฉริโย, อโถ อนฺโต จ, อถ โข อายสฺมา, อโถ โอฏฺฐวจิตฺตกา, ตโต อามนฺตยี สตฺถา. निपातों में भी - अरे अहम्पि, सचे इमस्स कायस्स, नो अभिक्कमो, अहो अच्छरियो, अथो अन्तो च, अथ खो आयुस्मा, अथो ओट्ठवचित्तका, ततो आमन्तयी सत्था। กฺวจิคฺคหเณน อการ อิตีเวเวตฺถาทีสุ สนฺธิปิ. ยถา – อาคตตฺถ, อาคตมฺหา, กตมาสฺสุ จตฺตาโร, อปฺปสฺสุตายํ ปุริโส, อิตฺถีติ, จ มรีว, สพฺเพว, สฺเวว, เอเสว นโย, ปริสุทฺเธตฺถายสฺมนฺโต, เนตฺถ, ตํ กุเตตฺถ ลพฺภา, สเจส พฺราหฺมณ, ตถูปมํ, ยถาห. 'क्वचि' ग्रहण से अकार, इति, एव, एत्थ आदि में भी सन्धि होती है। जैसे - आगतत्थ, आगतम्हा, कतमास्सु चत्तारो, अप्पस्सुतायं पुरिसो, इत्थीति, च मरीव, सब्बेव, स्वेव, एसेव नयो, परिसुद्धेत्थायस्मन्तो, नेत्थ, तं कुतेत्थ लब्भा, सचेस ब्राह्मण, तथूपमं, यथाहा। อสมาเสติ กึ? ชิวฺหายตนํ, อวิชฺโชโฆ, อิตฺถินฺทฺริยํ, อภิภายตนํ, ภยตุปฏฺฐานํ. อจฺฉนฺทานุรกฺขเณติ [Pg.24] กึ? สทฺธีธ วิตฺตํ ปุริสสฺส เสฏฺฐํ, โย มิสฺสโร. 'असमासे' (समास न होने पर) क्यों? जिव्हायतनं, अविज्जोघो, इत्थिन्द्रियं, अभिभायतनं, भयतूपट्ठानं। 'अच्छन्दानुरक्खणे' (छन्द की रक्षा के बिना) क्यों? सद्धीध वित्तं पुरिसस्स सेट्ठं, यो मिस्सरो। นามปทนฺตอิการุกาเรสุ – คาถาหิ อชฺฌภาสิ, ปุปฺผานิ อาหรึสุ, สตฺถุ อทาสิ. नाम पदों के अन्त में इकार और उकार होने पर - गाथाहि अज्झभासि, पुप्फानि आहरिंसु, सत्थु अदासि। กฺวจีติ กึ? มนสากาสิ. 'क्वचि' क्यों? मनसाकासि। ๓๖. สรา ปกติ พฺยญฺชเน. ३६. व्यञ्जन परे होने पर स्वर प्रकृतिभाव (ज्यों के त्यों) रहते हैं। สรา โข พฺยญฺชเน ปเร ปกติรูปา โหนฺตีติ เยภุยฺเยน ทีฆรสฺสโลเปหิ วิการาภาโว. ยถา – อจฺจโย, ปจฺจโย, ภาสติ วา กโรติ วา, เวทนากฺขนฺโธ, ภาคฺยวา, ภทฺโร กสามิว, ทียติ, ตุณฺหีภูโต, โส ธมฺมํ เทเสติ. व्यञ्जन परे होने पर स्वर प्रकृति रूप (अपने मूल रूप) में होते हैं, जिससे प्रायः दीर्घ, ह्रस्व और लोप आदि विकारों का अभाव होता है। जैसे - अच्चयो, पच्चयो, भासति वा करोति वा, वेदनाक्खन्धो, भाग्यवा, भद्रो कसामिव, दीयति, तुम्हीभूतो, सो धम्मं देसेति। อิติ ปกติสนฺธิวิธานํ นิฏฺฐิตํ. इस प्रकार प्रकृति-सन्धि विधान समाप्त हुआ। พฺยญฺชนสนฺธิวิธาน व्यञ्जन-सन्धि विधान อถ พฺยญฺชนสนฺธิ วุจฺจเต. अब व्यञ्जन-सन्धि कही जाती है। ‘‘พฺยญฺชเน’’ติ อธิกาโร, ‘‘สรา, กฺวจี’’ติ จ วตฺตเต. 'व्यञ्जने' यह अधिकार है, और 'सरा', 'क्वचि' की अनुवृत्ति होती है। ๓๗. ทีฆํ. ३७. दीर्घ। สรา โข พฺยญฺชเน ปเร กฺวจิ ทีฆํ ปปฺโปนฺตีติ สุตฺตสุขุจฺจารณฉนฺทานุรกฺขณฏฺฐาเนสุ ทีโฆ. व्यञ्जन परे होने पर स्वर कहीं-कहीं दीर्घ हो जाते हैं; सूत्र के सुखद उच्चारण और छन्द की रक्षा के स्थानों में दीर्घ होता है। ตฺยสฺส ปหีนา ตฺยาสฺส ปหีนา, สฺวสฺส สฺวาสฺส, มธุว มญฺญติ พาโล มธุวา มญฺญตี พาโล, ตถา เอวํ คาเม มุนี [Pg.25] จเร, ขนฺตี ปรมํ ตโป ติติกฺขา, น มงฺกู ภวิสฺสามิ, สฺวากฺขาโต, ยฺวาหํ, กามโต ชายตี โสโก, กามโต ชายตี ภยํ, สกฺโก อุชู จ สุหุชู จ, อนูปฆาโต, ทูรกฺขํ, ทูรมํ, สูรกฺขํ, ทูหรตา. त्यस्स पहीना - त्यास्स पहीना, स्वस्स - स्वास्स, मधुव मञ्ञति बालो - मधुवा मञ्ञती बालो, तथा एवं गामे मुनी चरे, खन्ती परमं तपो तितिक्खा, न मङ्कू भविस्सामि, स्वाक्खातो, य्वाहं, कामतो जायती सोको, कामतो जायती भयं, सक्को उजू च सुहुजू च, अनूपघातो, दूरक्खं, दूरमं, सूरक्खं, दूहरता। กฺวจีติ กึ? ตฺยชฺช, สฺวสฺส, ปติลิยฺยติ. 'क्वचि' क्यों? त्यज्ज, स्वस्स, पतिलिय्यति। ยิฏฺฐํ วา หุตํ วา โลเก, ยทิ วา สาวเก, ปุคฺคลา ธมฺมทสา เต, โภวาที นาม โส โหติ, ยถาภาวี คุเณน โส อิตีธ – यिट्ठं वा हुतं वा लोके, यदि वा सावके, पुग्गला धम्मदसा ते, भोवादी नाम सो होति, यथाभावी गुणेन सो - यहाँ। ปุพฺพสฺมึเยวาธิกาเร – पूर्वोक्त अधिकार में ही - ๓๘. รสฺสํ. ३८. ह्रस्व। สรา โข พฺยญฺชเน ปเร กฺวจิ รสฺสํ ปปฺโปนฺตีติ ฉนฺทานุรกฺขเณ, อาคเม, สํโยเค จ รสฺสตฺตํ. व्यञ्जन परे होने पर स्वर कहीं-कहीं ह्रस्व हो जाते हैं; छन्द की रक्षा में, आगम में और संयोग में ह्रस्वत्व होता है। ฉนฺทานุรกฺขเณ ตาว ยิฏฺฐํว หุตํว โลเก, ยทิว สาวเก, ปุคฺคล ธมฺมทสา เต, โภวาทิ นาม โส โหติ, ยถาภาวิ คุเณน โส. छन्द की रक्षा में पहले - यिट्ठंव हुतंव लोके, यदिव सावके, पुग्गल धम्मदसा ते, भोवादि नाम सो होति, यथाभावि गुणेन सो। อาคเม ยถยิทํ, สมฺมทกฺขาโต. आगम में - यथयिदं, सम्मदक्खातो। สํโยเค ปรากโม ปรกฺกโม, อาสาโท อสฺสาโท, เอวํ ตณฺหกฺขโย, ฌานสฺส ลาภิมฺหิ, วสิมฺหิ, ถุลฺลจฺจโย. संयोग में - पराकमो - परक्कमो, आसादो - अस्सादो, इसी प्रकार तण्हक्खयो, झानस्स लाभिम्हि, वसिम्हि, थुल्लच्चयो। กฺวจีติ กึ? มายิทํ, มนสา ทญฺญา วิมุตฺตานํ, ยถากฺกมํ, อาขฺยาติกํ, ทียฺยติ, สูยฺยติ. 'क्वचि' क्यों? मायिदं, मनसा दञ्ञा विमुत्तानं, यथाक्कमं, आख्यातिकं, दीय्यति, सूय्यति। เอโส โข พฺยนฺตึ กาหิติ, โส คจฺฉํ น นิวตฺตติ อิจฺจตฺร – एसो खो ब्यन्तिं काहिति, सो गच्छं न निवत्तति - यहाँ। ตสฺมึเยวาธิกาเร – उसी अधिकार में - ๓๙. โลปญฺจ [Pg.26] ตตฺรากาโร. ३९. लोप और वहाँ अकार (का आगम)। สรา โข พฺยญฺชเน ปเร กฺวจิ โลปํ ปปฺโปนฺติ, ตตฺร ลุตฺเต ฐาเน อการาคโม จ โหติ. เอตตสทฺทนฺโตการสฺเสวายํ โลโป. व्यञ्जन परे होने पर स्वर कहीं-कहीं लोप को प्राप्त होते हैं, और उस लुप्त स्थान पर अकार का आगम भी होता है। यह लोप 'एत' और 'त' शब्दों के अन्त में स्थित ओकार का ही है। เอส โข พฺยนฺตึ กาหิติ, ส คจฺฉํ น นิวตฺตติ, เอวํ เอส ธมฺโม, เอส ปตฺโตสิ, ส มุนิ, ส สีลวา. यह निश्चय ही अंत करेगा, वह जाता हुआ नहीं लौटता है, ऐसा यह धर्म है, यह (तुम) प्राप्त हुए हो, वह मुनि है, वह शीलवान है। กฺวจีติ กึ? เอโส ธมฺโม, โส มุนิ, โส สีลวา. 'क्वचि' (कहीं/कभी) क्यों? (उदाहरण:) 'एसो धम्मो' (यह धर्म), 'सो मुनि' (वह मुनि), 'सो सीलवा' (वह शीलवान)। จสทฺเทน เอตสทฺทนฺตสฺส สเรปิ กฺวจิ โลโป. ยถา – เอส อตฺโถ, เอส อาโภโค, เอส อิทานิ. 'च' शब्द के ग्रहण से 'एत' शब्द के अंत का स्वर के परे होने पर भी कहीं लोप होता है। जैसे - एस अत्थो (esa attho), एस आभोगो (esa ābhogo), एस इदानि (esa idāni)। วิปริณาเมน ‘‘สรมฺหา, พฺยญฺชนสฺสา’’ติ จ วตฺตเต. विभक्ति-परिणाम के द्वारा 'सरम्हा' (स्वर से) और 'ब्यञ्जनस्स' (व्यंजन का) - ये पद अनुवृत्त होते हैं। ๔๐. ปรทฺเวภาโว ฐาเน. ४०. उचित स्थान (विषय) में पर-व्यंजन का द्वित्व होता है। สรมฺหา ปรสฺส พฺยญฺชนสฺส ทฺเวภาโว โหติ ฐาเน. ทฺวินฺนํ ภาโว ทฺวิภาโว, โส เอว ทฺเวภาโว. स्वर से परे व्यंजन का उचित स्थान में द्वित्व होता है। दो का भाव 'द्विभाव' है, वही 'द्वेभाव' (द्वित्व) है। เอตฺถ จ ฐานํ นาม รสฺสาการโต ปรํ ป ปติ ปฏิกมุกุส กุธ กี คห ชุต ญาสิ สุ สมฺภู สร สสาทีนมาทิพฺยญฺชนานํ ทฺเวภาวํ, ติก ตย ตึส วตาทีนมาทิ จ, วตุ วฏุทิสาทีนมนฺตญฺจ, อุ ทุ นิ-อุปสคฺค ต จตุ ฉ สนฺตสทฺทาเทสาทิปรญฺจ, อปทนฺตา นาการทีฆโต ยการาทิ จ, और यहाँ 'स्थान' का अर्थ है - ह्रस्व अकार के बाद प, पति, पटि, कमु, कुसु, कुध, की, गह, जुत, ञा, सि, सु, सम्भू, सर, सस आदि के आदि व्यंजन का द्वित्व; तिक, तय, तिंस, वत आदि के आदि का; वतु, वटु, दिस आदि के अंत का; उ, दु, नि उपसर्गों तथा त, चतु, छ, सन्त शब्दों के आदेश आदि के बाद का; और अपदान्त 'ना' कार दीर्घ से यकार आदि का (द्वित्व)। ยวตํ ตลนาทีน-มาเทโส จ สยาทินํ; สห ธาตฺวนฺตสฺสาเทโส, สีสกาโร ตปาทิโต. यकार आदि का त, ल, न आदि के रूप में आदेश और सय आदि का (आदेश); धातु के अंत के साथ आदेश, और तप आदि से परे सकार का (द्वित्व/आदेश)। ฉนฺทานุรกฺขเณ จ – ฆร เฌ ธํสุ ภมาทีนมาทิ จ, รสฺสาการโต วคฺคานํ จตุตฺถทุติยา จ อิจฺเจวมาทิ. और छन्द की रक्षा के लिए - घर, झे, धंसु, भम आदि के आदि व्यंजन का, तथा ह्रस्व अकार से परे वर्गों के चतुर्थ और द्वितीय वर्णों का (द्वित्व) इत्यादि। ตตฺถ [Pg.27] ป ปติ ปฏีสุ ตาว – อิธ ปมาโท อิธปฺปมาโท, เอวํ อปฺปมาโท, วิปฺปยุตฺโต, สุปฺปสนฺโน, สมฺมา ปธานํ สมฺมปฺปธานํ, รสฺสตฺตํ, อปฺปติวตฺติโย, อธิปติปฺปจฺจโย, สุปฺปติฏฺฐิโต, อปฺปฏิปุคฺคโล, วิปฺปฏิสาโร, สุปฺปฏิปนฺโน, สุปฺปฏิปตฺติ. उनमें प, पति, पटि के विषय में पहले - इध पमादो = इधप्पमादो, इसी प्रकार अप्पमादो, विप्पयुत्तो, सुप्पसन्नो, सम्मा पधानं = सम्मप्पधानं (ह्रस्वत्व होकर), अप्पतिवत्तियो, अधिपतिप्पच्चयो, सुप्पतिट्ठितो, अप्पटिपुग्गलो, विप्पटिसारो, सुप्पटिपन्नो, सुप्पटिपत्ति। กมาทิธาตูสุ – ปกฺกโม, ปฏิกฺกโม, เหตุกฺกโม, อากมติ อกฺกมติ, เอวํ ปรกฺกมติ, ยถากฺกมํ. कमु आदि धातुओं में - पक्कमो, पटिक्कमो, हेतुक्कमो, आकमति = अक्कमति, इसी प्रकार परक्कमति, यथाक्कमं। ปกฺโกสติ, ปฏิกฺโกสติ, อนุกฺโกสติ, อาโกสติ, อกฺโกสติ. पक्कोसati, पटिक्कोसति, अनुक्कोसति, आकोसति = अक्कोसति। อกฺกุทฺโธ, อติกฺโกโธ. अक्कुद्धो, अतिक्कोधो। ธนกฺกีโต, วิกฺกโย, อนุกฺกโย. धनक्कीतो, विक्कयो, अनुक्कयो। ปคฺคโห, วิคฺคโห, อนุคฺคโห, นิคฺคโห, จนฺทคฺคโห, ทิฏฺฐิคฺคาโห. पग्गहो, विग्गहो, अनुग्गहो, निग्गहो, चन्दग्गहो, दिट्ठिग्गाहो। ปชฺโชโต, วิชฺโชตติ, อุชฺโชโต. पज्जोतो, विज्जोतति, उज्जोतो। กตญฺญู, วิญฺญู, ปญฺญาณํ, วิญฺญาณํ, อนุญฺญา, มนุญฺญา, สมญฺญา. कतञ्ञू, विञ्ञू, पञ्ञाणं, विञ्ञाणं, अनुञ्ञा, मनुञ्ञा, समञ्ञा। อวสฺสโย, นิสฺสโย, สมุสฺสโย. अवस्सयो, निस्सयो, समुस्सयो। อปฺปสฺสุโต, วิสฺสุโต, พหุสฺสุโต, อาสวา อสฺสวา. अप्पस्सुतो, विस्सुतो, बहुस्सुतो, आसवा = अस्सवा। ปสฺสมฺภนฺโต, วิสฺสมฺภติ. पस्सम्भन्तो, विस्सम्भति। อฏฺฏสฺสโร, วิสฺสรติ, อนุสฺสรติ. अट्ठस्सरो, विस्सरति, अनुस्सरति। ปสฺสสนฺโต, วิสฺสสนฺโต, มหุสฺสสนฺโต, อาสาโส อสฺสาโส. पस्ससन्तो, विस्ससन्तो, महुस्ससन्तो, आसासो = अस्सासो। อวิสฺสชฺเชนฺโต, วิสฺสชฺเชนฺโต, ปริจฺจชนฺโต, อุปทฺทโว, อุปกฺกิลิฏฺโฐ, มิตฺตทฺทุ, อายพฺพโย, อุทพฺพหิ อิจฺจาทิ. अविस्सज्जेन्तो, विस्सज्जेन्तो, परिच्चजन्तो, उपद्दवो, उपक्किलिट्ठो, मित्तद्दु, आयब्बयो, उदब्बहि इत्यादि। สรมฺหาติ [Pg.28] กึ? สมฺปยุตฺโต, สมฺปติชาโต, สมฺปฏิจฺฉนฺนํ, สงฺกมนฺโต, สงฺคโห. 'सरम्हा' (स्वर से) क्यों? (उदाहरण:) सम्पयुत्तो, सम्पतिजातो, सम्पटिच्छन्नं, सङ्कमन्तो, सङ्गहो (यहाँ अनुस्वार है, स्वर नहीं)। ฐาเนติ กึ? มา จ ปมาโท, ปติคยฺหติ, วจีปโกปํ รกฺเขยฺย, เย ปมตฺตา ยถา มตา, มโนปโกปํ รกฺเขยฺย, อิธ โมทติ, เปจฺจ โมทติ. 'ठाने' (उचित स्थान में) क्यों? (जहाँ द्वित्व नहीं होता:) मा च पमादो, पतिगय्हति, वचीपकोपं रक्खेय्य, ye pamattā yathā matā, मनोपकोपं रक्खेय्य, इध मोदति, पेच्च मोदति। ติกาทีสุ – กุสลตฺติกํ, ปีติตฺติกํ, เหตุตฺติกํ, เวทนาตฺติกํ, โลกตฺตยํ, โพธิตฺตยํ, วตฺถุตฺตยํ. เอกตฺตึส, ทฺวตฺตึส, จตุตฺตึส. สีลพฺพตํ, สุพฺพโต, สปฺปีติโก, สมนฺนาคโต, ปุนปฺปุนํ อิจฺจาทิ. तिक आदि में - कुसलत्तिकं, पीतित्तिकं, हेतुत्तिकं, वेदनात्तिकं, लोकत्तयं, बोधित्तयं, वत्थुत्तयं। एकत्तिंस, द्वत्तिंस, चतुत्तिंस। सीलब्बतं, सुब्बतो, सप्पीतिको, समन्नागतो, पुनप्पुनं इत्यादि। วตุ วฏุ ทิสาทีนมนฺเต ยถา – วตฺตติ, วฏฺฏติ, ทสฺสนํ, ผสฺโส อิจฺจาทิ. वतु, वटु, दिस आदि के अंत में जैसे - वत्तति, वट्टति, दस्सनं, फस्सो इत्यादि। อุ ทุ นิ อุปสคฺคาทิปเรสุ – อุกํโส อุกฺกํโส. ทุกรํ ทุกฺกรํ, นิกงฺโข นิกฺกงฺเข. उ, दु, नि उपसर्गों आदि के परे होने पर - उकंसो = उक्कंसो। दुकरं = दुक्करं, निकङ्खो = निक्कङ्खे। เอวํ อุคฺคตํ, ทุจฺจริตํ, นิชฺชฏํ, อุญฺญาตํ, อุนฺนติ, อุตฺตโร, ทุกฺกโร, นิทฺทโร, อุนฺนโต, ทุปฺปญฺโญ, ทุพฺพโล, นิมฺมโล, อุยฺยุตฺโต, ทุลฺลโภ, นิพฺพตฺโต, อุสฺสาโห, ทุสฺสโห, นิสฺสาโร. इसी प्रकार उग्गतं, दुच्चरितं, निज्जटं, उञ्ञातं, उन्नति, उत्तरो, दुक्करो, निद्दरो, उन्नतो, दुप्पञ्ञो, दुब्बलो, निम्मलो, उय्युत्तो, दुल्लभो, निब्बत्तो, उस्साहो, दुस्सहो, निस्सारो। ตถา ตกฺกโร, ตชฺโช, ตนฺนินฺโน, ตปฺปภโว, ตมฺมโย. वैसे ही तक्करो, तज्जो, तन्निन्नो, तप्पभवो, तम्मयो। จตุกฺกํ, จตุทฺทิสํ, จตุปฺปาโท, จตุพฺพิธํ, จตุสฺสาลํ. चतुष्क, चतुर्दिश, चतुष्पाद, चतुर्विध, चतुःशाल। ฉกฺกํ, ฉนฺนวุติ, ฉปฺปทิกา, ฉพฺพสฺสานิ. षट्क, छियानवे, छह पदों वाली, छह वर्ष। สกฺกาโร, สกฺกโต, สทฺทิฏฺฐิ, สปฺปุริโส, มหพฺพโล. सत्कार, सत्कृत, सदृष्टि, सत्पुरुष, महाबल। ฐาเนติ กึ? นิกาโย, นิทานํ, นิวาโส, นิวาโต, ตโต, จตุวีสติ, ฉสฏฺฐิ. 'स्थान' (उचित स्थान पर) क्यों कहा? निकाय, निदान, निवास, निवात, ततः, चौबीस, छियासठ। ยการาทิมฺหิ [Pg.29] – นียฺยติ, สูยฺยติ, อภิภูยฺย, วิเจยฺย, วิเนยฺย, เธยฺยํ, เนยฺยํ, เสยฺโย, เชยฺโย, เวยฺยากรโณ. यकार आदि होने पर – नीयते, श्रूयते, अभिभूय, विचेय, विनेय, धेय, नेय, श्रेय, जेय, वैयाकरण। อาทิสทฺเทน เอตฺโต, เอตฺตาวตา. 'आदि' शब्द से – एत्तो, एत्तावता। อนาการคฺคหณํ กึ? มาลาย, โทลาย, สมาทาย. 'अ-आकार' का ग्रहण क्यों? मालाया, दोलाया, समादाय। ฐาเนติ กึ? อุปนียติ, สูยติ, โตยํ. 'स्थान' क्यों? उपनीयते, सूयते, तोय। ยวตมาเทเส – ชาติ อนฺโธ, วิปลิ อาโส, อนิ อาโย, ยทิ เอวํ, อปิ เอกจฺเจ, อปิ เอกทา อิจฺจตฺร, อิการสฺส ‘‘อิวณฺโณ ยํ นวา’’ติ ยกาเร กเต – य-व-त-म आदेश होने पर – जाति अन्धो, विपलि आसो, अनि आयो, यदि एवं, अपि एकच्चे, अपि एकदा; यहाँ इकार का 'इवण्णो यं नवा' सूत्र से यकार करने पर – ‘‘สพฺพสฺส โส ทามฺหิ วา’’ติ อิโต มณฺฑูกคติยา วาติ วตฺตเต. 'सब्बस्स सो दाम्हि वा' इस सूत्र से यहाँ मण्डूकगति से 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๔๑. ยวตํ ตลนทการานํ พฺยญฺชนานิ จลญชการตฺตํ. ४१. यकार के साथ होने वाले त, ल, न, द कारों का क्रमशः च, ल, ञ, ज कार होना। ยการวนฺตานํ ตลนทการานํ สํโยคพฺยญฺชนานิ ยถากฺกมํ จลญชการตฺตมาปชฺชนฺเต วา. यकार युक्त त, ल, न, द कारों के संयोग व्यंजन यथाक्रम च, ल, ञ, ज कार को विकल्प से प्राप्त होते हैं। การคฺคหณํ ยวตํ สการ ก จ ฏ ปวคฺคานํ สการกจฏปวคฺคาเทสตฺถํ, ตถา ยวตํ ต ธ ณการานํ ฉ ฌญการาเทสตฺถญฺจ, ตโต ยวตมาเทสสฺส อเนน ทฺวิภาโว. 'कार' का ग्रहण यकार के साथ सकार, क, च, ट और प वर्गों के सकार, क, च, ट और प वर्ग के आदेश के लिए है, तथा यकार के साथ त, ध, ण कारों के छ, झ, ञ कार आदेश के लिए है, उसके बाद इस (सूत्र) से य-व-त-म आदेश का द्वित्व होता है। ชจฺจนฺโธ, วิปลฺลาโส, อญฺญาโย, ยชฺเชวํ, อปฺเปกจฺเจ อปฺเปกทา. जच्चन्धो, विपल्लासो, अन्यायो, यज्जेवं, अप्पेकच्चे, अप्पेकदा। วาติ กึ? ปฏิสนฺถารวุตฺยสฺส, พาลฺยํ, อาลสฺยํ. 'वा' क्यों? प्रतिसन्थारवुत्यस्स, बाल्यम्, आलस्यम्। สรมฺหาติ กึ? อญาโย, อากาสานญฺจายตนํ. 'स्वर से परे' क्यों? अन्यायो, आकासानञ्चायतनम्। ตปาทิโต สิมฺหิ – ตปสฺสี, ยสสฺสี. तप आदि से 'सि' प्रत्यय होने पर – तपस्वी, यशस्वी। ฉนฺทานุรกฺขเณ [Pg.30] – นปฺปชฺชเห วณฺณพลํ ปุราณํ, อุชฺชุคเตสุ เสยฺโย, คจฺฉนฺติ สุคฺคตินฺติ. छन्द की रक्षा के लिए – नप्पज्जहे वण्णबलं पुराणं, उज्जुगतेसु सेय्यो, गच्छन्ति सुग्गतिन्ति। วคฺคจตุตฺถทุติเยสุ ปน ตสฺมึเยวาธิกาเร ‘‘ปรทฺเวภาโว ฐาเน’’ติ จ วตฺตเต. और वर्ग के चतुर्थ और द्वितीय वर्णों के विषय में उसी अधिकार में 'परद्वेभावो ठाने' की अनुवृत्ति होती है। วคฺคจตุตฺถทุติยานํ สทิสวเสน ทฺวิภาเว สมฺปตฺเต นิยมตฺถมาห. वर्ग के चतुर्थ और द्वितीय वर्णों के सदृश होने के कारण द्वित्व प्राप्त होने पर नियम के लिए (यह सूत्र) कहा गया है। ๔๒. วคฺเค โฆสาโฆสานํ ตติยปฐมา. ४२. वर्ग में घोष और अघोष वर्णों के स्थान पर क्रमशः तृतीय और प्रथम वर्ण होते हैं। สรมฺหา ปรภูตานํ วคฺเค โฆสาโฆสานํ พฺยญฺชนานํ ยถากฺกมํ วคฺคตติย ปฐมกฺขรา ทฺวิภาวํ คจฺฉนฺติ ฐาเนติ ฐานาสนฺนวเสน ตพฺพคฺเค ตติยปฐมาว โหนฺติ. स्वर से परे होने वाले वर्ग के घोष और अघोष व्यंजनों के स्थान पर यथाक्रम वर्ग के तृतीय और प्रथम अक्षर द्वित्व को प्राप्त होते हैं; 'स्थान' में स्थान की निकटता के कारण उसी वर्ग के तृतीय और प्रथम ही होते हैं। เอตฺถ จ สมฺปตฺเต นิยมตฺตา โฆสาโฆสคฺคหเณน จตุตฺถทุติยาว อธิปฺเปตา, อิตรถา อนิฏฺฐปฺปสงฺโคสิยา. เตน ‘‘กตญฺญู, ตนฺนโย, ตมฺมโย’’ติอาทีสุ วคฺคปญฺจมานํ สติปิ โฆสตฺเต ตติยปฺปสงฺโคน โหติ, ฐานาธิการโต วา. और यहाँ प्राप्त होने पर नियम के कारण घोष और अघोष के ग्रहण से चतुर्थ और द्वितीय ही अभिप्रेत हैं, अन्यथा अनिष्ट प्रसंग होगा। इसलिए 'कतञ्ञू, तन्नयो, तम्मयो' आदि में वर्ग के पंचम वर्णों के घोष होने पर भी तृतीय का प्रसंग नहीं होता, अथवा स्थान के अधिकार से। ฆราทีสุ ป อุ ทุ นิอาทิปรจตุตฺเถสุ ตาว – ปฆรติ ปคฺฆรติ, เอวํ อุคฺฆรติ, อุคฺฆาเฏติ, ทุคฺโฆโส, นิคฺโฆโส, เอเสว จชฺฌานผโล, ปฐมชฺฌานํ, อภิชฺฌายติ, อุชฺฌายติ, วิทฺธํเสติ, อุทฺธํสิโต, อุทฺธาโร, นิทฺธาโร, นิทฺธโน, นิทฺธุโต, วิพฺภนฺโต, อุพฺภโต, ทุพฺภิกฺขํ, นิพฺภยํ, ตพฺภาโว, จตุทฺธา, จภุพฺภิ, ฉทฺธา, สทฺธมฺโม, สพฺภูโต, มหทฺธโน, มหพฺภยํ. घर आदि शब्दों में प्र, उ, दु, नि आदि से परे चतुर्थ वर्ण होने पर – पग्घरति, इसी प्रकार उग्घरति, उग्घाटेति, दुग्घोषो, निग्घोषो, यही चज्झानफलो, पठमज्झानं, अभिज्झायति, उज्झायति, विद्धंसेति, उद्धंसितो, उद्धारो, निद्धारो, निद्धनो, निद्धुतो, विब्भन्तो, उब्भतो, दुब्भिक्खं, निब्भयं, तब्भावो, चतुद्धा, चभुब्भि, छद्धा, सद्धम्मो, सब्भूतो, महद्धनो, महब्भयं। ยวต มาเทสาทีสุ – โพชฺฌงฺคา, อาสพฺภํ, พุชฺฌิตพฺพํ, พุชฺฌติ. य-व-त-म आदेश आदि में – बोज्झङ्गा, आसब्भं, बुज्झितब्बं, बुज्झति। ฐาเนติ [Pg.31] กึ? สีลวนฺตสฺส ฌายิโน, เย ฌานปฺปสุตา ธีรา, นิธานํ, มหาธนํ. 'स्थान' क्यों? शीलवन्तस्स झायिनो, ये झानप्पसुता धीरा, निधानं, महाधनं। รสฺสาการโตปรํ วคฺคทุติเยสุ – ปญฺจ ขนฺธา ปญฺจกฺขนฺธา, เอวํรูปกฺขนฺโธ, อกฺขโม, อภิกฺขณํ, อวิกฺเขโป, ชาติกฺเขตฺตํ, ธาตุกฺโขโภ, อายุกฺขโย. เสตฉตฺตํ เสตจฺฉตฺตํ, เอวํ สพฺพจฺฉนฺนํ, วิจฺฉินฺนํ, โพธิจฺฉายา, ชมฺพุจฺฉายา, สมุจฺเฉโท. ตตฺร ฐิโต ตตฺรฏฺฐิโต, เอวํ ถลฏฺฐํ, ชลฏฺฐํ, อธิฏฺฐิตํ, นิฏฺฐิตํ, จตฺตาริฏฺฐานานิ, ครุฏฺฐานิโย, สมุฏฺฐิโต, สุปฺปฏฺฐาโน. ยสตฺเถโร, ยตฺถ, ตตฺถ, ปตฺถรติ, วิตฺถาโร, อภิตฺถุโต, วิตฺถมฺภิโต, อนุตฺถุนํ, จตุตฺโถ, กุตฺถ. ปปฺโผเฏติ, มหปฺผลํ, นิปฺผลํ, วิปฺผาโร, ปริปฺผุเสยฺย, มธุปฺผาณิตํ. ह्रस्व अकार से परे वर्ग के द्वितीय वर्णों में – पञ्चक्खन्धा, इसी प्रकार रूपक्खन्धो, अक्खमो, अभिक्खणं, अविक्खेपो, जातिक्खेत्तं, धातुक्खोभो, आयुक्खयो। सेतच्छत्तं, इसी प्रकार सब्बच्छन्नं, विच्छिन्नं, बोधिच्छाया, जम्बुच्छाया, समुच्छेदो। तत्रट्ठितो, इसी प्रकार थलट्ठं, जलट्ठं, अधिट्ठितं, निट्ठितं, चत्तारिट्ठानानि, गरुट्ठानियो, समुट्ठितो, सुप्पट्ठानो। यसत्थेरो, यत्थ, तत्थ, पत्थरति, वित्थारो, अभित्थुतो, वित्थम्भितो, अनुत्थुनं, चतुत्थो, कुत्थ। पप्फोटति, महप्फलं, निप्फलं, विप्फारो, परिप्फुसेय्य, मधुप्फाणितं। อาการโต – อาขาโต อากฺขาโต, เอวํ ตณฺหากฺขโย, อาณากฺเขตฺตํ, สญฺญากฺขนฺโธ, อาฉาทยติ, อาจฺฉาทยติ, เอวํ อาจฺฉินฺทติ, นาวาฏฺฐํ, อาตฺถรติ, อาปฺโผเฏติ. आकार से – आक्खातो, इसी प्रकार तण्हाक्खयो, आणाक्खेत्तं, सञ्ञाक्खन्धो, आच्छादयति, इसी प्रकार आच्छिन्दति, नावाट्ठं, आत्थरति, आप्फोटति। สรมฺหาติ กึ? สงฺขาโร, ตงฺขเณ, สญฺฉนฺนํ, ตณฺฐานํ, สนฺถุโต, ตมฺผลํ. 'स्वर से' क्यों? सङ्खारो, तङ्खणे, सञ्छन्नं, तण्ठानं, सन्थुतो, तम्फलं। ฐาเนติ กึ? ปูวขชฺชกํ, ตสฺส ฉวิยาทีนิ ฉินฺทิตฺวา, ยถา ฐิตํ, กถํ, กมฺมผลํ. 'स्थान' क्यों? पूवखज्जकं, तस्स छवियादीनि छिन्दित्वा, यथा ठितं, कथं, कम्मफलं। นิกมติ, นิปตฺติ, นิจโย, นิจรติ, นิตรณํ อิจฺจตฺร – ‘‘โท ธสฺส จา’’ติ เอตฺถ จคฺคหณสฺส พหุลตฺถตฺตา เตน จคฺคหเณน ยถาปโยคํ พหุธา อาเทโส สิยา. 'निकमति', 'निपत्ति', 'निचयो', 'निचरति', 'नितरणं' - यहाँ 'दो धस्स चा' इस सूत्र में 'च' ग्रहण की बहुलता के कारण उस 'च' ग्रहण से प्रयोग के अनुसार अनेक प्रकार के आदेश होते हैं। ยถา – นิ อุปสคฺคโต กมุ ปท จิ จร ตรานํ ปฐมสฺส วคฺคทุติโย อิมินา ทฺวิตฺตํ, นิกฺขมติ, นิปฺผตฺติ, นิจฺฉโย, นิจฺฉรติ, นิตฺถรณํ. जैसे - 'नि' उपसर्ग के बाद 'कमु', 'पद', 'चि', 'चर', 'तर' धातुओं के प्रथम अक्षर का वर्ग का द्वितीय अक्षर होकर इससे द्वित्व होता है - 'निक्खमति', 'निप्फत्ति', 'निच्छयो', 'निच्छरति', 'नित्थरणं' । ตถา [Pg.32] โพ วสฺส กุว ทิว สิว วชาทีนํ ทฺวิรูปสฺสาติ วการทฺวยสฺส พการทฺวยํ, ยถา – กุพฺพนฺโต, เอวํ กุพฺพาโน, กุพฺพนฺติ, สธาตฺวนฺตยาเทสสฺส ทฺวิตฺตํ. ทิวติ ทิพฺพติ, เอวํ ทิพฺพนฺโต, สิพฺพติ, สิพฺพนฺโต, ปวชติ ปพฺพชติ, ปพฺพชนฺโต, นิวานํ นิพฺพานํ, นิพฺพุโต, นิพฺพินฺทติ, อุทพฺพยํ อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'कुव', 'दिव', 'सिव', 'वज' आदि के 'व' के स्थान पर 'ब' होता है, 'द्विरूपस्स' (दो रूपों का) होने से दो 'व' के स्थान पर दो 'ब' होते हैं। जैसे - 'कुब्बन्तो', इसी प्रकार 'कुब्बानो', 'कुब्बन्ति', धातु के अन्त्य आदेश के साथ द्वित्व होता है। 'दिवति' से 'दिब्बति', इसी प्रकार 'दिब्बन्तो', 'सिब्बति', 'सिब्बन्तो', 'पवजति' से 'पब्बजति', 'पब्बजन्तो', 'निवानं' से 'निब्बानं', 'निब्बुतो', 'निब्बिन्दति', 'उदब्बयं' इत्यादि। โล รสฺส ปริ ตรุณาทีนํ กฺวจิ. ปริปนฺโน ปลิปนฺโน, เอวํ ปลิโพโธ, ปลฺลงฺกํ, ตรุโณ ตลุโน, มหาสาโล, มาลุโต, สุขุมาโล. 'परि', 'तरुण' आदि में 'र' के स्थान पर कहीं-कहीं 'ल' होता है। 'परिपन्नो' से 'पलिपन्नो', इसी प्रकार 'पलिबोधो', 'पल्लङ्कं', 'तरुणो' से 'तलुनो', 'महासालो', 'मालुतो', 'सुखुमालो' । โฏ ตสฺส ทุกฺกตาทีนํ กฺวจิ. ยถา – ทุกฺกตํ ทุกฺกฏํ, เอวํ สุกฏํ, ปหโฏ, ปตฺถโฏ, อุทฺธโฏ, วิสโฏ อิจฺจาทิ. 'दुक्कत' आदि में 'त' के स्थान पर कहीं-कहीं 'ट' होता है। जैसे - 'दुक्कतं' से 'दुक्कटं', इसी प्रकार 'सुकटं', 'पहटो', 'पत्थटो', 'उद्धटो', 'विसटो' इत्यादि। โก ตสฺส นิยตาทีนํ กฺวจิ. นิยโต นิยโก. 'नियत' आदि में 'त' के स्थान पर कहीं-कहीं 'क' होता है। 'नियतो' से 'नियको' । โย ชสฺส นิชาทิสฺส วา, นิชํปุตฺตํ นิยํปุตฺตํ. 'निज' आदि में 'ज' के स्थान पर विकल्प से 'य' होता है। 'निजं पुत्तं' से 'नियम पुत्तं' । โก คสฺส กุลูปคาทีนํ, กุลูปโค กุลูปโก. 'कुलूपग' आदि में 'ग' के स्थान पर 'क' होता है। 'कुलूपगो' से 'कुलूपको' । ตถา โณ นสฺส ป ปริอาทิโต. ปนิธานํ ปณิธานํ, เอวํ ปณิปาโต, ปณาโม, ปณีตํ, ปริณโต, ปริณาโม, นินฺนโย นิณฺณโย, เอวํ อุณฺณโต, โอณโต อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'प', 'परि' आदि के बाद 'न' के स्थान पर 'ण' होता है। 'पनिधानं' से 'पणिधानं', इसी प्रकार 'पणिपातो', 'पणामो', 'पणीतं', 'परिणतो', 'परिणामो', 'निन्नयो' से 'निण्णयो', इसी प्रकार 'उण्णतो', 'ओणतो' इत्यादि। ปติอคฺคิ, ปติหญฺญติ อิตีธ – 'पतिअग्गि', 'पतिहञ्ञति' - यहाँ - ๔๓. กฺวจิ ปฏิ ปติสฺส. ४३. 'पति' के स्थान पर कहीं-कहीं 'पटि' होता है। ปติอิจฺเจตสฺส อุปสคฺคสฺส สเร วา พฺยญฺชเน วา ปเร กฺวจิ ปฏิอาเทโส โหติ ปุพฺพสฺสรโลโป. ปฏคฺคิ, ปฏิหญฺญติ. 'पति' इस उपसर्ग के बाद स्वर या व्यंजन होने पर कहीं-कहीं 'पटि' आदेश होता है और पूर्व स्वर का लोप होता है। 'पटग्गि', 'पटिहञ्ञति' । กฺวจีติ กึ? ปจฺจตฺตํ, ปติลียติ. 'क्वचि' (कहीं-कहीं) क्यों कहा? 'पच्चत्तं', 'पतिलीयति' (यहाँ नहीं होता)। ปุถชโน ปุถภูตํ อิตีธ ‘‘อนฺโต’’ติ วตฺตเต. 'पुथजनो', 'पुथभूतं' - यहाँ 'अन्तो' की अनुवृत्ति आती है। ๔๔. ปุถสฺสุ [Pg.33] พฺยญฺชเน. ४४. व्यंजन परे होने पर 'पुथ' के (अन्त्य स्वर को) 'उ' होता है। ปุถอิจฺเจตสฺส อนฺโต สโร อุกาโร โหติ พฺยญฺชเน ปเร, ทฺวิตฺตํ. ปุถุชฺชโน, ปุถุภูตํ. 'पुथ' इस (शब्द) का अन्त्य स्वर व्यंजन परे होने पर 'उकार' हो जाता है और द्वित्व होता है। 'पुथुज्जनो', 'पुथुभूतं' । พฺยญฺชเนติ กึ? ปุถ อยํ. ‘‘ปุถสฺส อ ปุถ’’อิติ สมาเสเนว สิทฺเธ ปุน อนฺตคฺคหณาธิกาเรน กฺวจิ อปุถนฺตสฺสาปิ อุตฺตํ สเร. 'व्यञ्जने' (व्यंजन परे होने पर) क्यों कहा? 'पुथ अयं' । 'पुथस्स अ पुथ' इस समास से ही सिद्ध होने पर भी पुनः 'अन्त' ग्रहण के अधिकार से कहीं-कहीं 'पुथ' के अन्त में न होने पर भी स्वर परे होने पर 'उ' होता है। มโน อญฺญํ มนุญฺญํ, เอวํ อิมํ เอวุมํ, ปรโลโป, อิติ เอวํ อิตฺเววํ, อุการสฺส วกาโร. 'मनो अञ्ञं' से 'मनुञ्ञं', इसी प्रकार 'इमं' से 'एवुमं', पर-लोप होता है, 'इति एवं' से 'इत्वेवं', उकार का वकार होता है। อวกาโส, อวนทฺโธ, อววทติ, อวสานมิตีธ – 'अवकासो', 'अवनद्धो', 'अववदति', 'अवसानं' - यहाँ - ‘‘กฺวจิ พฺยญฺชเน’’ติ จ วตฺตเต. 'क्वचि व्यञ्जने' की भी अनुवृत्ति आती है। ๔๕. โอ อวสฺส. ४५. 'अव' के स्थान पर 'ओ' होता है। อวอิจฺเจตสฺส อุปสคฺคสฺส โอกาโร โหติ กฺวจิ พฺยญฺชเน ปเร. โอกาโส, โอนทฺโธ, โอวทติ, โอสานํ. 'अव' इस उपसर्ग के स्थान पर व्यंजन परे होने पर कहीं-कहीं 'ओकार' होता है। 'ओकासो', 'ओनद्धो', 'ओवदति', 'ओसानं' । กฺวจีติ กึ? อวสานํ, อวสุสฺสตุ. 'क्वचि' क्यों कहा? 'अवसानं', 'अवसुस्सतु' (यहाँ नहीं होता)। พฺยญฺชเนติ กึ? อวยาคมนํ, อเวกฺขติ. 'व्यञ्जने' क्यों कहा? 'अवयागमनं', 'अवेक्खति' (यहाँ स्वर परे है)। อวคเต สูริเย, อวคจฺฉติ, อวคเหตฺวา อิตีธ – 'अवगते सूरिये', 'अवगच्छति', 'अवगहेत्वा' - यहाँ - ‘‘อวสฺเส’’ติ วตฺตเต โอคฺคหณญฺจ. 'अवस्स' की अनुवृत्ति आती है और 'ओ' का ग्रहण भी। ๔๖. ตพฺพิปรีตูปปเท พฺยญฺชเน จ. ४६. उसके विपरीत उपपद होने पर और व्यंजन परे होने पर। อวสทฺทสฺส อุปปเท ติฏฺฐมานสฺส ตสฺโสการสฺส วิปรีโต จ โหติ พฺยญฺชเน ปเร. 'अव' शब्द के उपपद में स्थित होने पर, उस 'ओकार' का विपरीत (वर्ण) व्यंजन परे होने पर होता है। ตสฺส วิปรีโต ตพฺพิปรีโต, อุโปจฺจาริตํ ปทํ อุปปทํ, โอการวิปรีโตติ อุการสฺเสตํ อธิวจนํ. จสทฺโท กตฺถจิ [Pg.34] นิวตฺตนตฺโถ, ทฺวิตฺตํ. อุคฺคเต สูริเย, อุคฺคจฺฉติ, อุคฺคเหตฺวา. उसका विपरीत 'तद्विपरीत' है, समीप उच्चारित पद 'उपपद' है, 'ओकार-विपरीत' यह 'उकार' का पर्यायवाची है। 'च' शब्द कहीं-कहीं निवृत्ति के लिए है, द्वित्व होता है। 'उग्गते सूरिये', 'उग्गच्छति', 'उग्गहेत्वा' । อติปฺปโข ตาว, ปรสตํ, ปรสหสฺสํ อิตีธ – 'अतिप्पखो ताव', 'परसतं', 'परसहस्सं' - यहाँ - ‘‘อาคโม’’ติ วตฺตเต. ‘‘आगम’’ का अधिकार चलता है। ๔๗. กฺวจิ โอ พฺยญฺชเน. ४७. व्यंजन के परे होने पर कहीं 'ओ' (आगम) होता है। พฺยญฺชเน ปเร กฺวจิ โอการาคโม โหตีติ อติปฺป ปรสทฺเทหิ โอการาคโม ‘‘ยวมท’’อิจฺจาทิสุตฺเต จสทฺเทน อติปฺปโต คการาคโม จ. व्यंजन के परे होने पर कहीं 'ओ' कार का आगम होता है; जैसे 'अतिप्प' और 'पर' शब्दों से 'ओ' कार का आगम होता है। 'यवमद' इत्यादि सूत्र में 'च' शब्द के कारण 'अतिप्प' शब्द से 'ग' कार का आगम भी होता है। อติปฺปโค โข ตาว, ปโรสตํ, ปโรสหสฺสํ, เอตฺถ ‘‘สรา สเร โลป’’นฺติ ปุพฺพสฺสรโลโป. 'अतिप्पगो', 'परोसतं', 'परोसहस्सं' - यहाँ 'सरा सरे लोपं' सूत्र से पूर्व स्वर का लोप होता है। มนมยํ, อยมยํ อิตีธ ‘‘มโนคณาทีน’’นฺติ วตฺตเต. 'मनमयं', 'अयमयं' - यहाँ 'मनोगणादीनं' का अधिकार चलता है। ๔๘. เอเตสโม โลเป. ४८. विभक्ति का लोप होने पर इनके (अन्त) में 'ओ' होता है। เอเตสํ มโนคณาทีนมนฺโต โอตฺตมาปชฺชเต วิภตฺติโลเป กเต. विभक्ति का लोप होने पर इन मनोगण आदि शब्दों का अन्त्य वर्ण 'ओ' भाव को प्राप्त होता है। มโนมยํ, อโยมยํ, เอวํ มโนเสฏฺฐา, อโยปตฺโต, ตโปธโน, ตโมนุโท, สิโรรุโห, เตโชกสิณํ, รโชชลฺลํ, อโหรตฺตํ, รโหคโต. मनोमयं, अयोमयं; इसी प्रकार मनोसेट्ठा, अयोपत्तो, तपोधनो, तमोनुदो, सिरोरुहो, तेजोकसिणं, रजोजल्लं, अहोत्तं, रहोगतो। อาทิสทฺเทน อาโปธาตุ, วาโยธาตุ. 'आदि' शब्द से आपोधातु और वायोधातु (का भी ग्रहण होता है)। สีหคติยา วาธิการโต อิธ น ภวติ, มนมตฺเตน มนจฺฉฏฺฐานํ, อยกปลฺลํ, ตมวิโนทโน, มนอายตนํ. सिंहगति न्याय से 'वा' (विकल्प) के अधिकार के कारण यहाँ (ओ-भाव) नहीं होता है: मनमत्तेन, मनच्छट्ठानं, अयकपल्लं, तमविनोदनो, मनायतनं। อิติ พฺยญฺชนสนฺธิวิธานํ นิฏฺฐิตํ. इस प्रकार व्यंजन सन्धि विधान समाप्त हुआ। นิคฺคหีตสนฺธิวิธาน निग्गहीत (अनुस्वार) सन्धि विधान อถ [Pg.35] นิคฺคหีตสนฺธิ วุจฺจเต. अब निग्गहीत सन्धि कही जाती है। ตณฺหํ กโร, รณํ ชโห, สํ ฐิโต, ชุตึ ธโร, สํ มโต อิตีธ ‘‘นิคฺคหีต’’นฺติ อธิกาโร, ‘‘พฺยญฺชเน’’ติ วตฺตเต. 'तण्हं करो', 'रणं जहो', 'सं ठितो', 'जुतिं धरो', 'सं मतो' - यहाँ 'निग्गहीत' का अधिकार है और 'व्यञ्जने' (व्यंजन के परे होने पर) का अनुवर्तन होता है। ๔๙. วคฺคนฺตํ วา วคฺเค. ४९. वर्ग (के व्यंजन) परे होने पर निग्गहीत विकल्प से वर्गान्त (पंचम वर्ण) को प्राप्त होता है। วคฺคภูเต พฺยญฺชเน ปเร นิคฺคหีตํ โข วคฺคนฺตํ วา ปปฺโปตีติ นิมิตฺตานุสฺวรานํ ฐานาสนฺนวเสน ตพฺพคฺคปญฺจโม โหติ. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. เตน ‘‘ตณฺหงฺกโร, รณญฺชโห, สณฺฐิโต, ชุตินฺธโร, สมฺมโต’’ติอาทีสุ นิจฺจํ. वर्गीय व्यंजन के परे होने पर निग्गहीत विकल्प से वर्गान्त को प्राप्त होता है, अर्थात् निमित्त और अनुस्वार के उच्चारण स्थान की निकटता के कारण उस वर्ग का पाँचवाँ वर्ण हो जाता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है। इसलिए 'तण्हङ्करो, रणञ्जहो, सण्ठितो, जुतिन्धरो, सम्मतो' इत्यादि में यह नित्य होता है। ตงฺกโรติ ตํ กโรติ, ตงฺขณํ ตํขณํ, สงฺคโห สํคโห, ตงฺฆตํ ตํ ฆตํ. ธมฺมญฺจเร ธมฺมํ จเร, ตญฺฉนฺนํ ตํ ฉนฺนํ, ตญฺชาตํ ตํ ชาตํ, ตญฺญาณํ ตํ ญาณํ. ตณฺฐานํ ตํ ฐานํ, ตณฺฑหติ ภํ ฑหติ. ตนฺตโนติ ตํ ตโนติ, ตนฺถิรํ ตํ ถิรํ, ตนฺทานํ ตํ ทานํ, ตนฺธนํ ตํ ธนํ, ตนฺนิจฺจุตํ ตํ นิจฺจุตํ. ตมฺปตฺโต ตํ ปตฺโต, ตมฺผลํ ตํ ผลํ, เตสมฺโพโธ เตสํ โพโธ, สมฺภูโต สํภูโต, ตมฺมิตฺตํ ตํ มิตฺตํ. กิงฺกโต กึ กโต, ทาตุงฺคโต ทาตุํ คโตติ เอวมาทีสุ วิกปฺเปน. तङ्करोति (तं करोति), तङ्खणं (तं खणं), सङ्गहो (सं गहो), तङ्घतं (तं घतं)। धम्मञ्चरे (धम्मं चरे), तञ्छन्नं (तं छन्नं), तञ्जातं (तं जातं), तञ्ञाणं (तं ञाणं)। तण्ठानं (तं ठानं), तण्डहति (तं डहति)। तन्तनोति (तं तनोति), तन्थिरं (तं थिरं), तन्दानं (तं दानं), तन्धनं (तं धनं), तन्निच्चुतं (तं निच्चुतं)। तम्पत्तो (तं पत्तो), तम्फलं (तं फलं), तेसम्बोधो (तेसं बोधो), सम्भूतो (सं भूतो), तम्मित्तं (तं मित्तं)। किङ्कतो (किं कतो), दातुङ्गतो (दातुं गतो) - इत्यादि में विकल्प से होता है। อิธ น ภวติ, น ตํ กมฺมํ กตํ สาธุ, สรณํ คจฺฉามิ. यहाँ नहीं होता है: 'न तं कम्मं कतं साधु', 'सरणं गच्छामि' । สติ โจปริ วาคฺคหเณ วิชฺฌนฺตเร วา อิธ วาคฺคหณกรณมตฺถนฺตรวิญฺญาปนตฺถํ, เตน นิคฺคหีตสฺส สํอุปสคฺคปุมนฺตสฺส เล ลกาโร. ยถา – ปฏิสํลีโน ปฏิสลฺลีโน, เอวํ ปฏิสลฺลาโณ, สลฺลกฺขณา, สลฺเลโข, สลฺลาโป, ปุํลิงฺคํ ปุลฺลิงฺคํ. ऊपर 'वा' ग्रहण के होने पर भी यहाँ पुनः 'वा' ग्रहण करना अन्य अर्थ के ज्ञापन के लिए है, जिससे 'सं' उपसर्ग और 'पुम' शब्द के अन्त में स्थित निग्गहीत को 'ल' परे होने पर 'ल' कार हो जाता है। जैसे - पटिसंलीनो > पटिसल्लीनो, इसी प्रकार पटिसल्लाणो, सल्लक्खणा, सल्लेखो, सल्लापो, पुंलिङ्गं > पुल्लिङ्गं। ปจฺจตฺตํ เอว, ตํ เอว, ตญฺหิ ตสฺส, เอวญฺหิ โว อิตีธ ‘‘วา’’ติ อธิกาโร. 'पच्चत्तां एव', 'तं एव', 'तञ्हि तस्स', 'एवञ्हि वो' - यहाँ 'वा' का अधिकार है। ๕๐. เอเห [Pg.36] ญํ. ५०. 'ए' और 'ह' के परे होने पर (निग्गहीत को) 'ञ' होता है। เอการหกาเร ปเร นิคฺคหีตํ โข ญการํ ปปฺโปติ วา, เอกาเร ญาเทสสฺส ทฺวิภาโว. 'ए' कार और 'ह' कार के परे होने पर निग्गहीत विकल्प से 'ञ' कार को प्राप्त होता है; 'ए' कार परे होने पर 'ञ' आदेश का द्वित्व हो जाता है। ปจฺจตฺตญฺเญวปจฺจตฺตํ เอว, ตญฺเญว ตํ เอว, ตญฺหิ ตสฺส ตญฺหิ ตสฺส, เอวญฺหิ โว เอวญฺหิ โว. पच्चत्ताञ्ञेव (पच्चत्तं एव), तञ्ञेव (तं एव), तञ्हि तस्स (तं हि तस्स), एवञ्हि वो (एवं हि वो)। ววตฺถิตวิภาสตฺตา วาสทฺทสฺส เอวหินิปาตโต อญฺญตฺถ น โหติ, ยถา – เอวเมตํ, เอวํ โหติ. 'वा' शब्द के व्यवस्थित विभाषा होने के कारण 'एव' और 'हि' निपातों के अतिरिक्त अन्यत्र नहीं होता है, जैसे - एवमेतं, एवं होति। สํโยโค, สํโยชนํ, สํยโต, สํยาจิกาย, ยํ ยเทว, อานนฺตริกํ ยมาหุ อิตีธ ‘‘ญ’’มิติ วตฺตเต. 'संयोगो', 'संयोजनं', 'संयतो', 'संयाचिकाय', 'यं यदेव', 'आनन्तरिकं यमाहु' - यहाँ 'ञ' का अनुवर्तन होता है। ๕๑. ส เย จ. ५१. 'य' के साथ होने पर भी (ञ होता है)। นิคฺคหีตํ โข ยกาเร ปเร สห ยกาเรน ญการํ ปปฺโปติ วา, ญาเทสสฺส ทฺวิตฺตํ. 'य' कार के परे होने पर निग्गहीत 'य' कार के साथ मिलकर विकल्प से 'ञ' कार को प्राप्त होता है; 'ञ' आदेश का द्वित्व हो जाता है। สญฺโญโค สํโยโค, สญฺโญชนํ สํโยชนํ, สญฺญโต สํยโต, สญฺญาจิกาย สํยาจิกาย, ยญฺญเทว ยํ ยเทว, อานนฺตริกญฺญมาหุ อานนฺตริกํ ยมาหุ. सञ्ञोगो (संयोगो), सञ्ञोजनं (संयोजनं), सञ्ञतो (संयतो), सञ्ञाचिकाय (संयाचिकाय), यञ्ञदेव (यं यदेव), आनन्तरिकञ्ञमाहु (आनन्तरिकं यमाहु)। วาสทฺทสฺส ววตฺถิตวิภาสตฺตาว สํปทนฺตโต จ สพฺพนามยการปรโต จ นิคฺคหีตา อญฺญตฺถ น โหติ. ยถา – เอตํ โยชนํ, ตํ ยานํ, สรณํ ยนฺติ. 'वा' शब्द के व्यवस्थित विभाषा होने के कारण ही 'सं' के अन्त में और सर्वनाम के 'य' कार के परे होने के अतिरिक्त निग्गहीत को अन्यत्र (ञ) नहीं होता है। जैसे - एतं योजनं, तं यानं, सरणं यन्ति। เอตฺถ จ ‘‘สห เย จา’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘ส เย จา’’ติ วจนโต สุตฺตนฺเตสุ สุขุจฺจารณตฺถมกฺขรโลโปปีติ ทฏฺฐพฺพํ, เตน ปฏิสงฺขาย โยนิโส ปฏิสงฺขา โยนิโส, สยํ อภิญฺญาย สจฺฉิกตฺวา สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา, ปริเยสนาย ปริเยสนาติอาทิ สิชฺฌติ. और यहाँ 'सह ये च' कहना चाहिए था, किन्तु 'स ये च' कहने से यह समझना चाहिए कि सूत्रों में सुखद उच्चारण के लिए अक्षरों का लोप भी होता है, जिससे 'पटिसङ्खाय योनिसो' से 'पटिसङ्खा योनिसो', 'सयं अभिञ्ञाय सच्छिकत्वा' से 'सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा', 'परियेसनाय' से 'परियेसना' इत्यादि सिद्ध होते हैं। ตํ [Pg.37] อหํ พฺรูมิ, ยํ อาหุ, ธนํ เอว, กึ เอตํ, นินฺทิตุํ อรหติ, ยํ อนิจฺจํ, ตํ อนตฺตา, เอตํ อโวจ, เอตํ เอว อิจฺจตฺร – मैं उसे कहता हूँ, जिसे वे कहते हैं, धन ही, यह क्या है, निंदा के योग्य है, जो अनित्य है, वह अनात्मा है, यह कहा, यही यहाँ (इच्छित है) - ๕๒. มทา สเร. ५२. स्वर के परे होने पर 'म' और 'द' (आदेश होते हैं)। นิคฺคหีตสฺส โข สเร ปเร มการทการาเทสา โหนฺติ วา. เอตฺถ จ วาสทฺทาธิการสฺส ววตฺถิตวิภาสตฺตา ทกาโร ยเตตสทฺทโต ปรสฺเสว. स्वर के परे होने पर निग्गहीत के स्थान पर 'म' और 'द' आदेश विकल्प से होते हैं। और यहाँ 'वा' शब्द के अधिकार की व्यवस्थित विभाषा होने के कारण 'द' कार 'यत' और 'एत' शब्दों के बाद ही होता है। ตมหํ พฺรูมิ, ยมาหุ, ธนเมว, กิเมตํ, นินฺทิตุมรหติ, ยทนิจฺจํ, ตทนตฺตา, เอตทโวจ, เอตเทว. तमहम ब्रूमि, यमाहु, धनमेव, किमेतं, निन्दितुमरहति, यदनिच्चं, तदनत्ता, एतदवोच, एतदेव। วาติ กึ? ตํ อหํ, เอตํ เอว, อกฺโกจฺฉิ มํ อวธิ มํ. 'वा' (विकल्प) क्यों? तं अहं, एतं एव, अक्कोच्छि मं अवधि मं। เอตฺถ จ มทาติ โยควิภาเคน พฺยญฺชเนปิ วา มกาโร. เตน ‘‘พุทฺธม สรณม คจฺฉามี’’ติอาทิ สิชฺฌติ. और यहाँ 'मदा' इस सूत्र के योग-विभाग से व्यंजन के परे होने पर भी विकल्प से 'म' कार होता है। उससे "बुद्धम सरणम गच्छामि" आदि सिद्ध होते हैं। ตาสํ อหํ สนฺติเก, วิทูนํ อคฺคํ, ตสฺส อทาสึ อหํ อิตีธ ‘‘สเร’’ติ วตฺตเต. 'तासं अहं सन्तिके', 'विदूनं अग्गं', 'तस्स अदासिं अहं' - यहाँ 'सरे' (स्वर के परे होने पर) का अनुवर्तन होता है। ๕๓. กฺวจิ โลปํ. ५३. कहीं लोप (होता है)। นิคฺคหีตํ โข สเร ปเร โลปํ ปปฺโปติ กฺวจิ ฉนฺทานุรกฺขเณ สุขุจฺจารณฏฺฐาเน. ปุพฺพสฺสรโลโป, ปรสฺส อสํโยคนฺตสฺส ทีโฆ. स्वर के परे होने पर निग्गहीत का कहीं छंद की रक्षा के लिए या सुखद उच्चारण के स्थान पर लोप हो जाता है। पूर्व स्वर का लोप होता है और परवर्ती असंयोगान्त स्वर दीर्घ हो जाता है। ตาสาหํ สนฺติเก, วิทูนคฺคํ, ตสฺส อทาสาหํ, ตถาคตาหํ, เอวาหํ, กฺยาหํ. तासाहं सन्तिके, विदूनग्गं, तस्स अदासाहं, तथागताहं, एवाहं, क्याहं। กฺวจีติ กึ? เอวมสฺส, กิมหํ. 'क्वचि' (कहीं) क्यों? एवमस्स, किमहं। อริยสจฺจานํ ทสฺสนํ, เอตํ พุทฺธานํ สาสนํ, สํรตฺโต, สํราโค, สํรมฺโภ, อวิสํหาโร, จิรํ ปวาสึ, คนฺตุํ กาโม, คนฺตุํ มโน อิตีธ ‘‘กฺวจิ โลป’’นฺติ วตฺตเต. 'अरियसच्चानं दस्सनं', 'एतं बुद्धानं सासनं', 'संरित्तो', 'संरागो', 'संरम्भो', 'अविसंहारो', 'चिरं पवासिं', 'गन्तुं कामो', 'गन्तुं mano' - यहाँ 'क्वचि लोपं' का अनुवर्तन होता है। ๕๔. พฺยญฺชเน [Pg.38] จ. ५४. और व्यंजन के परे होने पर। นิคฺคหีตํ โข พฺยญฺชเน จ ปเร โลปํ ปปฺโปติ กฺวจิ ฉนฺทานุรกฺขณาทิมฺหิ. รการหกาเรสุ อุปสคฺคนฺตสฺส ทีโฆ. व्यंजन के परे होने पर भी निग्गहीत का कहीं छंद की रक्षा आदि के लिए लोप हो जाता है। 'र' कार और 'ह' कार के परे होने पर उपसर्ग के अंत का स्वर दीर्घ हो जाता है। อริยสจฺจาน ทสฺสนํ, เอตํ พุทฺธาน สาสนํ, สารตฺโต, สาราโค, สารมฺโภ, อวิสาหาโร, จิรปฺปวาสึ, ทฺวิตฺตํ, คนฺตุกาโม, คนฺตุมโน. अरियसच्चान दस्सनं, एतं बुद्धान सासनं, सारत्तो, सारागो, सारम्भो, अविसाहारो, चिरप्पवासिं, द्वित्तं, गन्तुकामो, गन्तुमनो। กฺวจีติ กึ? เอตํ มงฺคลมุตฺตมํ. 'क्वचि' क्यों? एतं मङ्गलमुत्तमं। กตํ อิติ, กึ อิติ, อภินนฺทุํ อิติ, อุตฺตตฺตํ อิว, จกฺกํ อิว, กลึ อิทานิ, กึ อิทานิ, ตฺวํ อสิ, อิทํ อปิ, อุตฺตรึ อปิ, ทาตุํ อปิ, สทิสํ เอว อิตีธ ‘‘นิคฺคหีตมฺหา, โลป’’นฺติ จ วตฺตเต. 'कतं इति', 'किं इति', 'अभिनन्दुं इति', 'उत्तत्तां इव', 'चक्कं इव', 'कलिं इदानि', 'किं इदानि', 'त्वं असि', 'इदं अपि', 'उत्तरिं अपि', 'दातुं अपि', 'सदिसं एव' - यहाँ 'निग्गहीतमहा' और 'लोपं' का अनुवर्तन होता है। ๕๕. ปโร วา สโร. ५५. परवर्ती स्वर विकल्प से (लुप्त होता है)। นิคฺคหีตมฺหา ปโร สโร โลปํ ปปฺโปติ วา. นิคฺคหีตสฺส วคฺคนฺตตฺตํ. निग्गहीत के बाद आने वाला स्वर विकल्प से लोप को प्राप्त होता है। निग्गहीत का वर्गान्त (वर्ग का पंचम वर्ण) हो जाता है। กตนฺติ, กินฺติ, อภินนฺทุนฺติ, อุตฺตตฺตํว, จกฺกํว, กลินฺทานิ, กินฺทานิ, ตฺวํสิ, อิทมฺปิ, อุตฺตริมฺปิ, ทาตุมฺปิ, สทิสํว. कतन्ति, किन्ति, अभिनन्दुन्ति, उत्तत्तं व, चक्कं व, कलिन्दानि, किन्दानि, त्वंसि, इदम्पि, उत्तरिम्पि, दातुम्पि, सदिसं व। วาติ กึ? กตํ อิติ, กิมิติ, ทาตุมปิ, สามํ เอว. 'वा' (विकल्प) क्यों? कतं इति, किमिति, दातुमपि, सामं एव। อยมฺปิ วาสทฺทสฺส ววตฺถิตวิภาสตฺตา อิตีวีทานิสีเปวาทิโต อญฺญตฺถ น โหติ. ยถา – อหํ เอตฺถ, เอตํ อโหสิ. यह भी 'वा' शब्द की व्यवस्थित विभाषा होने के कारण 'इति', 'इव', 'इदानि', 'असि', 'अपि', 'एव' आदि के अतिरिक्त अन्यत्र नहीं होता है। जैसे - अहं एत्थ, एतं अहोसि। เอวํ อสฺส เต อาสวา, ปุปฺผํ อสฺสา อุปฺปชฺชติ อิตีธ สเร ปเร ลุตฺเต วิปริณาเมน ‘‘ปรสฺมึ, สเร, ลุตฺเต’’ติ จ วตฺตเต. 'एवं अस्स ते आसवा', 'पुप्फं अस्सा उप्पज्जति' - यहाँ स्वर के परे होने पर लुप्त होने के कारण विपरिणाम से 'परस्मिं सरे लुत्ते' (परवर्ती स्वर के लुप्त होने पर) का अनुवर्तन होता है। ๕๖. พฺยญฺชโน [Pg.39] จ วิสญฺโญโค. ५६. और व्यंजन असंयुक्त (हो जाता है)। นิคฺคหีตมฺหา ปรสฺมึ สเร ลุตฺเต พฺยญฺชโน สญฺโญโค เจ, วิสญฺโญโคว โหตีติ สํโยเคกเทสสฺส ปุริมพฺยญฺชนสฺส โลโป. निग्गहीत के बाद परवर्ती स्वर के लुप्त होने पर यदि व्यंजन संयुक्त है, तो वह असंयुक्त ही हो जाता है, अर्थात् संयोग के एक भाग पूर्व व्यंजन का लोप हो जाता है। ทฺวินฺนํ พฺยญฺชนานเมกตฺร ฐิติ สญฺโญโค, อิธ ปน สํยุชฺชตีติ สญฺโญโค, ปุริโม วณฺโณ, วิคโต สญฺโญโค อสฺสาติ วิสญฺโญโค, ปโร. दो व्यंजनों का एक साथ स्थित होना 'संयोग' है, किन्तु यहाँ 'संयुज्जति' (जुड़ता है) इस अर्थ में संयोग पूर्व वर्ण है; जिसका संयोग विगत (चला गया) हो गया है, वह 'विसंयोग' (असंयुक्त) है, जो परवर्ती है। เอวํ ส เต อาสวา, ปุปฺผํสา อุปฺปชฺชติ. एवं स ते आसवा, पुप्फंसा उप्पज्जति। ลุตฺเตติ กึ? เอวมสฺส. 'लुत्ते' (लुप्त होने पर) क्यों? एवमस्स। จสทฺเทน ติณฺณํ พฺยญฺชนานํ สรูปสํโยโคปิ วิสญฺโญโค โหติ. ยถา – อคฺยาคารํ, วุตฺยสฺส. 'च' शब्द से तीन व्यंजनों का सरूप संयोग भी असंयुक्त हो जाता है। जैसे - अग्यागारं, वुत्यस्स। จกฺขุ อุทปาทิ, อว สิโร, ยาวจิธ ภิกฺขเว, อณุถูลานิ, ต สมฺปยุตฺตา อิภีธ ‘‘สเร, อาคโม, กฺวจิ, พฺยญฺชเน’’ติ จ วตฺตเต. 'चक्खु उदापादि', 'अव सिरो', 'यावचिध भिक्खवे', 'अणुथूलानि', 'तं सम्पयुत्ता' - यहाँ 'सरे', 'आगमो', 'क्वचि', 'ब्यञ्जने' का अनुवर्तन होता है। ๕๗. นิคฺคหิตญฺจ. ५७. और निग्गहीत (अनुस्वार)। นิคฺคหีตญฺจ อาคโม โหติ สเร วา พฺยญฺชเน วา กฺวจิ สุขุจฺจารณฏฺฐาเน. นิคฺคหีตสฺส รสฺสานุคตตฺตา รสฺสโตเยวายํ. स्वर या व्यंजन के परे होने पर कहीं-कहीं सुखद उच्चारण के लिए निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम होता है। निग्गहीत के ह्रस्व के अनुगामी होने के कारण यह ह्रस्व ही है। จกฺขุํ อุทปาทิ, อวํสิโร, ยาวญฺจิธ ภิกฺขเว, อณุํถูลานิ, ตํสมฺปยุตฺตา, เอวํ ตงฺขเณ, ตํสภาโว. चक्खुं उदापादि, अवंसिरो, यावञ्चिध भिक्खवे, अणुंथूलानि, तंसम्पयुत्ता, एवं तङ्खणे, तंसभावो। กฺวจีติ กึ? น หิ เอเตหิ, อิธ เจว. 'क्वचि' (कहीं-कहीं) क्यों कहा? 'न हि एतेहि', 'इध चेव' (यहाँ आगम नहीं होता)। เอวํ วุตฺเต, ตํ สาธุ, เอกํ สมยํ ภควา, อคฺคึว สนมํ อิตีธ โลปาเทสการิเย สมฺปตฺเต เยภุยฺเยน ตทปวาทตฺถมาห. 'एवं वुत्ते', 'तं साधु', 'एकं समयं भगवा', 'अग्गिं व सनमं' - यहाँ लोप और आदेश के कार्य प्राप्त होने पर, प्रायः उनके अपवाद के लिए यह (सूत्र) कहा गया है। ๕๘. อํ [Pg.40] พฺยญฺชเน นิคฺคหีตํ. ५८. व्यंजन के परे होने पर 'अं' निग्गहीत होता है। นิคฺคหีตํ โข พฺยญฺชเน ปเร อํอิติ โหติ. व्यंजन के परे होने पर निग्गहीत 'अं' के रूप में होता है। อกาโร อุจฺจารณตฺโถ, ‘‘สรโลโป’’ติอาทินา ปุพฺพสฺสรโลโป วา. 'अ'कार उच्चारण के लिए है, अथवा 'सरलोपो' आदि (सूत्र) से पूर्व स्वर का लोप हो जाता है। เอวํ วุตฺเต, ตํ สาธุ, เอกํ สมยํ ภควา, อคฺคึว สนฺธมํ. एवं वुत्ते, तं साधु, एकं समयं भगवा, अग्गिं व सन्धमं। อิธ อวุตฺตวิเสสานมฺปิ วุตฺตนยาติเทสตฺถมติเทสมาห. यहाँ जो विशेष बातें नहीं कही गई हैं, उनके लिए भी कहे गए नियमों के अतिदेश (विस्तार) के लिए अतिदेश (सूत्र) कहा गया है। ๕๙. อนุปทิฏฺฐานํ วุตฺตโยคโต. ५९. जो उपदिष्ट नहीं हैं, उन्हें कहे गए योग (नियम) के अनुसार (समझना चाहिए)। เย อิธ อมฺเหหิ วิเสสโต น อุปทิฏฺฐา อุปสคฺคนิปาตาทโย, เตสํ วุตฺตโยคโต วุตฺตนเยน สรสนฺธาทีสุ วุตฺตนยานุสาเรน รูปสิทฺธิ เวทิตพฺพา. जो यहाँ हमारे द्वारा विशेष रूप से उपदिष्ट नहीं किए गए हैं, जैसे उपसर्ग और निपात आदि, उनकी रूपसिद्धि कहे गए योग और स्वर-सन्धि आदि में बताए गए नियमों के अनुसार ही समझनी चाहिए। เตน ‘‘โท ธสฺส จา’’ติ สุตฺเต จสทฺเทน ปริยาทีนํ รหนาทิวณฺณสฺส วิปริยโย ยวาทีหิ, ยถา – ปริยุทาหาสิ ปยิรุทาหาสิ, อริยสฺส อยิรสฺส, พหฺวาพาโธ พวฺหาพาโธ, น อภิเนยฺย อนภิเนยฺย. इसलिए 'दो धस्स चा' सूत्र में 'च' शब्द से 'परिय' आदि के 'र' और 'ह' आदि वर्णों का 'य' आदि के साथ विपर्यय (स्थान परिवर्तन) होता है, जैसे - परियुदाहासि का पयिरुदाहासि, अरियस्स का अयिरस्स, बह्वाबोधो का बव्वाबोधो, न अभिनेय्य का अनभिनेय्य। ‘‘ตํ อิมินาปิ ชานาถา’’ติ เอตฺถ ‘‘ปโร วา สโร’’ติ สเร ลุตฺเต ‘‘ตตฺรากาโร’’ติ โยควิภาเคน อกาโร นิคฺคหีตสฺส ทกาโร, ตทมินาปิ ชานาถ อิจฺจาทิ. 'तं इमिनापि जानाथा' यहाँ 'परो वा सरो' से स्वर का लोप होने पर 'तत्राकारो' इस योग-विभाग से 'अ'कार और निग्गहीत का 'द'कार होकर 'तदमिनापि जानाथ' इत्यादि रूप बनते हैं। อิติ นิคฺคหีตสนฺธิวิธานํ นิฏฺฐิตํ. इस प्रकार निग्गहीत-सन्धि विधान समाप्त हुआ। สญฺญาวิธานํ สรสนฺธิ สนฺธิ,นิเสธนํ พฺยญฺชนสนฺธิ สนฺธิ; โย นิคฺคหีตสฺส จ สนฺธิกปฺเป,สุนิจฺฉโย โสปิ มเยตฺถ วุตฺโต. संज्ञा-विधान, स्वर-सन्धि, निषेध, व्यंजन-सन्धि और निग्गहीत-सन्धि के कल्प (अध्याय) में जो भी सुनिश्चित नियम हैं, वे सब मेरे द्वारा यहाँ कहे गए हैं। อิติ รูปสิทฺธิยํ สนฺธิกณฺโฑ इस प्रकार रूपसिद्धि में सन्धि-काण्ड ปฐโม. प्रथम (समाप्त)। ๒. นามกณฺฑ २. नाम-काण्ड (संज्ञा प्रकरण)। อถ [Pg.41] นามิกวิภตฺยาวตาโร วุจฺจเต. अब नामिक (संज्ञा) विभक्तियों का अवतार (प्रारम्भ) कहा जाता है। อตฺถาภิมุขํ นมนโต, อตฺตนิ จตฺถสฺส นามนโต นามํ, ทพฺพาภิธานํ. अर्थ की ओर झुकने (नमन) के कारण, अथवा अपने आप में अर्थ को नमित (समाहित) करने के कारण इसे 'नाम' (संज्ञा) कहते हैं, जो द्रव्य का अभिधान (वाचक) है। ตํ ปน ทุวิธํ อนฺวตฺถรุฬฺหีวเสน, ติวิธํ ปุมิตฺถินปุํสกลิงฺควเสน. ยถา – รุกฺโข, มาลา, ธนํ. वह (नाम) अन्वर्थ (सार्थक) और रूढ़ि के भेद से दो प्रकार का है, तथा पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग के भेद से तीन प्रकार का है। जैसे - रुक्खो, माला, धनं। จตุพฺพิธํ สามญฺญคุณกฺริยายทิจฺฉาวเสน, ยถา – รุกฺโข, นีโล, ปาจโก, สิริวฑฺโฒติอาทิ. सामान्य, गुण, क्रिया और यदृच्छा (संज्ञा) के भेद से वह चार प्रकार का है, जैसे - रुक्खो, नीलो, पाचको, सिरिवड्ढो आदि। อฏฺฐวิธํ อวณฺณิวณฺณุวณฺโณการนิคฺคหีตนฺตปกติเภเทน. अ-वर्ण, इ-वर्ण, उ-वर्ण, ओ-कार और निग्गहीत-अन्त वाली प्रकृति के भेद से वह आठ प्रकार का है। ปุลฺลิงฺค पुल्लिंग। ตตฺถ ปฐมํ อการนฺตมฺหา ปุลฺลิงฺคา ชาตินิมิตฺตา ปุริสสทฺทา สฺยาทิวิภตฺติโย ปรา โยชียนฺเต. उनमें सबसे पहले अ-कारान्त पुल्लिंग जाति-वाचक 'पुरिस' (पुरुष) शब्द से 'सि' आदि विभक्तियाँ बाद में जोड़ी जाती हैं। ๖๐. ชินวจนยุตฺตญฺหิ. ६०. क्योंकि यह जिन-वचन (बुद्ध-वचन) के अनुकूल है। อธิกาโรยํ. ตตฺถ ปญฺจ มาเร ชิตวาติ ชิโน, พุทฺโธ. ชินสฺส วจนํ ชินวจนํ, ตสฺส ชินวจนสฺส ยุตฺตํ ชินวจนยุตฺตํ, เตปิฏกสฺส พุทฺธวจนสฺส มาคธิกาย สภาวนิรุตฺติยา ยุตฺตํ อนุรูปเมวาติ อิทํ อธิการตฺถํ เวทิตพฺพํ. यह अधिकार (सूत्र) है। वहाँ पाँच मारों को जीतने वाला 'जिन' अर्थात् बुद्ध है। जिन का वचन 'जिन-वचन' है। उस जिन-वचन के जो युक्त (अनुकूल) है, वह 'जिन-वचन-युक्त' है। त्रिपिटक रूप बुद्ध-वचन की मागधी स्वभाव-निरुक्ति (प्राकृतिक भाषा) के जो सर्वथा अनुरूप है, ऐसा इस अधिकार का अर्थ समझना चाहिए। สา มาคธี มูลภาสา, นรา ยายาทิกปฺปิกา; พฺรหฺมาโน จ’สฺสุตาลาปา, สมฺพุทฺธา จาปิ ภาสเร. वह मागधी ही मूल भाषा है, जिसे आदि-कल्प के मनुष्य, जिन्होंने कभी कोई आलाप (भाषण) नहीं सुना ऐसे ब्रह्मा और सम्यक् सम्बुद्ध भी बोलते हैं। อธิกาโร ปน ติวิโธ สีหคติกมณฺฑูกคติกยถานุปุพฺพิกวเสน, อยํ ปน สีหคติโก ปุพฺพาปรวิโลกนโต, ยถานุปุพฺพิโกเยว วา. अधिकार तीन प्रकार का होता है - सिंह-गति, मण्डूक-गति और यथानुपूर्वी। यह (अधिकार) पूर्व और अपर (आगे-पीछे) के अवलोकन के कारण सिंह-गति है, अथवा यथानुपूर्वी ही है। สกฺกตวิสทิสํ [Pg.42] กตฺวา ชินวจนานุรูปวเสน ปกติฏฺฐปนตฺถํ ปริภาสมาห. संस्कृत के विपरीत (पालि के) स्वभाव को स्थापित करने के लिए बुद्धवचन के अनुरूप परिभाषा कही गई है। ๖๑. ลิงฺคญฺจ นิปจฺจเต. ६१. और लिंग (प्रातिपदिक) निपातित किया जाता है। ลิงฺคํปาฏิปทิกํ, ยถา ยถา ชินวจนยุตฺตญฺหิ ลิงฺคํ, ตถา ตถา อิธ ลิงฺคํ นิปจฺจเต ฐปียติ. จสทฺเทน ธาตโว จาติ ชินวจนานุรูปโต ‘‘ปุริส’’อิติ ลิงฺเค ฐปิเต ตโต ตสฺส ธาตุปฺปจฺจยวิภตฺติวชฺชิตสฺส อตฺถวโต สทฺทสฺส ‘‘ปรสมญฺญา ปโยเค’’ติ ปริภาสโต ลิงฺคสญฺญายํ – लिंग प्रातिपदिक है, जैसे-जैसे बुद्धवचन के युक्त लिंग है, वैसे-वैसे यहाँ लिंग निपातित (स्थापित) किया जाता है। 'च' शब्द से धातुएँ भी (ली जाती हैं), बुद्धवचन के अनुरूप 'पुरिस' इस लिंग के स्थापित होने पर, उस धातु, प्रत्यय और विभक्ति से रहित अर्थवान शब्द की 'परसमञ्ञा पयोगे' इस परिभाषा से लिंग संज्ञा होने पर - อิโต ปรํ วิภตฺติปฺปจฺจยาทิวิธาเน สพฺพตฺถ ลิงฺคคฺคหณมนุวตฺตเต. इसके बाद विभक्ति, प्रत्यय आदि के विधान में सर्वत्र 'लिंग' का ग्रहण अनुवृत्त होता है। ๖๒. ตโต จ วิภตฺติโย. ६२. और उसके बाद विभक्तियाँ होती हैं। ตโต ชินวจนยุตฺเตหิ ลิงฺเคหิ ปรา วิภตฺติโย โหนฺติ. จสทฺทคฺคหเณน ตเวตุนาทิปจฺจยนฺตนิปาตโตปิ. กมฺมาทิวเสน, เอกตฺตาทิวเสน จ ลิงฺคตฺถํ วิภชนฺตีติ วิภตฺติโย. उसके बाद बुद्धवचन-युक्त लिंगों से परे विभक्तियाँ होती हैं। 'च' शब्द के ग्रहण से 'तवे', 'तुन' आदि प्रत्ययान्त निपातों से भी (विभक्तियाँ होती हैं)। कर्म आदि के वश से और एकत्व आदि के वश से जो लिंग के अर्थ को विभाजित करती हैं, वे 'विभक्तियाँ' हैं। กา จ ปน ตา วิภตฺติโย? ‘‘วิภตฺติโย’’ติ อธิกาโร. और वे विभक्तियाँ कौन सी हैं? 'विभत्तियो' यह अधिकार सूत्र है। ๖๓. สิโย, อํโย, นาหิ, สนํ, สฺมาหิ, สนํ, สฺมึสุ. ६३. सि-यो, अं-यो, ना-हि, स-नं, स्मा-हि, स-नं, स्मिं-सु। สฺยาทโย ทฺวิสตฺต วิภตฺติโย นาม โหนฺติ. ตตฺถ สิ, โย อิติ ปฐมา, อํ, โย อิติ ทุติยา, นา, หิ อิติ ตติยา, ส, นํ อิติ จตุตฺถี, สฺมา, หิ อิติ ปญฺจมี, ส, นํ อิติ ฉฏฺฐี, สฺมึ, สุ อิติ สตฺตมี. सि आदि चौदह विभक्तियाँ होती हैं। उनमें 'सि, यो' प्रथमा है, 'अं, यो' द्वितीया है, 'ना, हि' तृतीया है, 'स, नं' चतुर्थी है, 'स्मा, हि' पञ्चमी है, 'स, नं' षष्ठी है, 'स्मिं, सु' सप्तमी है। อิทํ [Pg.43] ปน สญฺญาธิการปริภาสาวิธิสุตฺเตสุ สญฺญาสุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, วุตฺตญฺหิ วุตฺติยํ ‘‘วิภตฺติอิจฺจเนน กฺวตฺโถ, อมฺหสฺส มมํ สวิภตฺติสฺส เส’’ติ, อิตรถา ปุริมสุตฺเตน เอกโยโค กตฺตพฺโพติ. เอตฺถ จ ปฐมาทิโวหาโร, เอกวจนาทิโวหาโร จ อนฺวตฺถวเสน, ปรสมญฺญาวเสน วา สิทฺโธติ เวทิตพฺโพ. इसे संज्ञा, अधिकार, परिभाषा और विधि सूत्रों में 'संज्ञा सूत्र' समझना चाहिए, क्योंकि वृत्ति में कहा गया है - "'विभत्ति' इस (संज्ञा) से क्या प्रयोजन है? 'अम्हस्स ममं सविभत्तिस्स से' (इस सूत्र के लिए)", अन्यथा पिछले सूत्र के साथ एक ही योग (सूत्र) बनाना चाहिए था। और यहाँ प्रथमा आदि व्यवहार और एकवचन आदि व्यवहार अन्वर्थ (अर्थ के अनुसार) होने से या पर-संज्ञा (अन्य व्याकरणों की संज्ञा) के कारण सिद्ध समझना चाहिए। เอกสฺส วจนํ เอกวจนํ, พหูนํ วจนํ พหุวจนํ, ทฺวินฺนํ ปูรณี ทุติยาติอาทิ, อิตรถา ปุริมสุตฺเต จสทฺเทน สญฺญากรเณ อปฺปกตนิรตฺถกวิธิปฺปสงฺโค สิยา. एक का वचन 'एकवचन' है, बहुतों का वचन 'बहुवचन' है, दो की पूरणी 'द्वितीया' है इत्यादि; अन्यथा पिछले सूत्र में 'च' शब्द से संज्ञा करने पर अप्रकृत और निरर्थक विधि का प्रसंग होता। ‘‘ชินวจนยุตฺตญฺหิ, ลิงฺคญฺจ นิปจฺจเต’’ติ จ วตฺตเต. อิธ ปน ปทนิปฺผาทนมฺปิ ชินวจนสฺสาวิโรเธนาติ ญาเปตุํ ปริภาสนฺตรมาห. "बुद्धवचन के युक्त ही लिंग निपातित किया जाता है" यह अनुवृत्त होता है। यहाँ पद की निष्पत्ति भी बुद्धवचन के अविरोध (बिना विरोध) से होती है, यह बताने के लिए दूसरी परिभाषा कहते हैं। ๖๔. ตทนุปโรเธน. ६४. उसके (बुद्धवचन के) अनवरोध (बिना विरोध) से। ยถา ยถา เตสํ ชินวจนานํ อุปโรโธ น โหติ, ตถา ตถา อิธ ลิงฺคํ, จสทฺเทนาขฺยาตญฺจ นิปจฺจเต, นิปฺผาทียตีติ อตฺโถ. เตเนว อิธ จ อาขฺยาเต จ ทฺวิวจนาคฺคหณํ, สกฺกตวิสทิสโต วิภตฺติปฺปจฺจยาทิวิธานญฺจ กตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. जैसे-जैसे उन बुद्धवचनों का विरोध नहीं होता, वैसे-वैसे यहाँ लिंग और 'च' शब्द से आख्यात (क्रिया) निपातित होते हैं, अर्थात् निष्पन्न किए जाते हैं। इसीलिए यहाँ और आख्यात में द्विवचन का ग्रहण न करना और संस्कृत के विपरीत विभक्ति, प्रत्यय आदि का विधान किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। ตตฺถ อวิเสเสน สพฺพสฺยาทิวิภตฺติปฺปสงฺเค ‘‘วตฺติจฺฉานุปุพฺพิกา สทฺทปฺปวตฺตี’’ติ วตฺติจฺฉาวสา – वहाँ बिना किसी विशेष के सभी 'सि' आदि विभक्तियों के प्राप्त होने पर, "वक्ता की इच्छा के अनुसार शब्दों की प्रवृत्ति होती है" इस वक्ता की इच्छा के वश - ๖๕. ลิงฺคตฺเถ ปฐมา. ६५. लिंग के अर्थ में प्रथमा (विभक्ति होती है)। ลิงฺคตฺถาภิธานมตฺเต ปฐมาวิภตฺติ โหตีติ ปฐมา. ตตฺถาปิ อนิยเมเนกวจนพหุวจนปฺปสงฺเค ‘‘เอกมฺหี วตฺตพฺเพ เอกวจน’’นฺติ ปริภาสโต ลิงฺคตฺถสฺเสกตฺตวจนิจฺฉายํ ปฐเมกวจนํ สิ. केवल लिंग के अर्थ को कहने में प्रथमा विभक्ति होती है, इसलिए 'प्रथमा' है। वहाँ भी अनियम से एकवचन और बहुवचन के प्राप्त होने पर, "एक के कहे जाने पर एकवचन होता है" इस परिभाषा से लिंग के अर्थ की एकत्व कहने की इच्छा होने पर प्रथमा एकवचन 'सि' होता है। ‘‘อโต เนนา’’ติ อิโต ‘‘อโต’’ติ วตฺตเต, ลิงฺคคฺคหณญฺจ. 'अतो नेना' इस (सूत्र) से 'अतो' अनुवृत्त होता है, और 'लिंग' का ग्रहण भी। ๖๖. โส[Pg.44]. ६६. सो। สิ, โออิติ ทฺวิปทมิทํ. ลิงฺคสฺส อการโต ปรสฺส สิวจนสฺส โอกาโร โหติ. 'सि, ओ' यह दो पदों वाला (सूत्र) है। लिंग के अकार से परे 'सि' वचन का ओकार होता है। สุตฺเตสุ หิ ปฐมานิทฺทิฏฺฐสฺส การิยิโน ฉฏฺฐีวิปริณาเมน วิวรณํ อาเทสาเปกฺขนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. सूत्रों में प्रथमा विभक्ति द्वारा निर्दिष्ट कार्य वाले (पद) का षष्ठी विभक्ति में परिणाम करके विवरण आदेश की अपेक्षा से समझना चाहिए। เอตฺถ จ สีติ วิภตฺติ คยฺหเต วิภตฺติการิยวิธิปฺปกรณโต, ‘‘ตโต จ วิภตฺติโย’’ติ อิโต วิภตฺติคฺคหณานุวตฺตนโต วา, เอวํ สพฺพตฺถ สฺยาทีนํ การิยวิธาเน วิภตฺติเยวาติ ทฏฺฐพฺพํ. और यहाँ 'सि' यह विभक्ति, विभक्ति-कार्य के विधान के प्रकरण से ली जाती है, अथवा 'ततो च विभत्तियो' इससे 'विभत्ति' ग्रहण की अनुवृत्ति से; इस प्रकार सर्वत्र 'सि' आदि के कार्य-विधान में विभक्ति ही (ली जाती है), ऐसा समझना चाहिए। ‘‘วา ปโร อสรูปา’’ติ ปรโลเป สมฺปตฺเต ตทปวาเทน ปุพฺพโลปมาห. 'वा परो असरूपा' से पर-लोप के प्राप्त होने पर, उसके अपवाद स्वरूप पूर्व-लोप को कहते हैं। ๖๗. สรโลโป’มาเทสปฺปจฺจยาทิมฺหิ สรโลเป ตุ ปกติ. ६७. अं-आदेश और प्रत्यय आदि के परे होने पर स्वर का लोप होता है, स्वर का लोप होने पर (पर स्वर) प्रकृति भाव में रहता है। ปุพฺพสฺสรสฺส โลโป โหติ อํวจเน, อาเทสปฺปจฺจยาทิภูเต จ สเร ปเร, สรโลเป กเต ตุ ปรสรสฺส ปกติภาโว โหติ. เอตฺถ จ ‘‘สรโลเป’’ติ ปุนคฺคหณํ อิมินาว กตสรโลปนิมิตฺเตเยว ปรสฺส วิกาเร สมฺปตฺเต ปกติภาวตฺถํ. ปรสรสฺส ปกติภาววิธานสามตฺถิยโต อมาเทสปฺปจฺจยาทิภูเต สเร ปเรติปิ สิทฺธํ. 'अं' वचन और आदेश या प्रत्यय के आदि भूत स्वर के परे होने पर पूर्व स्वर का लोप होता है, स्वर लोप होने पर पर-स्वर का प्रकृति भाव होता है। और यहाँ 'सरलोपे' का पुनः ग्रहण इसी (सूत्र) द्वारा किए गए स्वर-लोप के निमित्त से ही पर (स्वर) में विकार प्राप्त होने पर प्रकृति भाव के लिए है। पर-स्वर के प्रकृति भाव विधान के सामर्थ्य से 'अं' आदेश और प्रत्यय आदि भूत स्वर के परे होने पर भी (यह) सिद्ध है। ตฺยาทิวิภตฺติโย เจตฺถ, ปจฺจยตฺเตน คยฺหเร; อาทิคฺคหณมาขฺยาต-กิตเกสฺวาคมตฺถิทํ. और यहाँ 'ति' आदि विभक्तियाँ प्रत्यय के रूप में ली जाती हैं; 'आदि' का ग्रहण आख्यात और कृदन्त में आगम के लिए है। ปจฺจยสาหจริยา, จาเทโส ปกตีปโร; ปทนฺตสฺสรโลโป น, เตน’พฺภาหาทิเก ปเร. प्रत्यय के साहचर्य से आदेश भी प्रकृति (अंग) से परे होता है; उससे 'अब्भाहत' आदि के परे होने पर पदान्त स्वर का लोप नहीं होता। ตุคฺคหณํ [Pg.45] ภิกฺขุนีอาทีสุ สรโลปนิวตฺตนตฺถํ, ‘‘นเย ปรํ ยุตฺเต’’ติ ปรํ เนตพฺพํ. ปุริโส ติฏฺฐติ. 'तु' का ग्रहण 'भिक्खुनी' आदि में स्वर-लोप को रोकने के लिए है, 'नये परं युत्ते' से (व्यंजन को) पर (स्वर) से जोड़ना चाहिए। 'पुरिसो तिट्ठति' (पुरुष खड़ा होता है)। ปุริโส จ ปุริโส จาติ ปุริส ปุริสอิติ วตฺตพฺเพ – 'पुरिसो च पुरिसो च' इस अर्थ में 'पुरिस पुरिस' ऐसा कहे जाने पर - ๖๘. สรูปานเมกเสสฺวสกึ. ६८. समान रूप वालों में एक शेष रहता है, एक बार नहीं (अनेक बार होने पर)। สรูปานํ สมานรูปานํ ปทพฺยญฺชนานํ มชฺเฌ เอโกว สิสฺสเต, อญฺเญ โลปมาปชฺชนฺเต อสกินฺติ เอกเสโส. เอตฺถ จ ‘‘สรูปาน’’นฺติ วุตฺตตฺตาว สิทฺเธ อสกิมฺปโยเค ปุนาสกึคหณํ เอกวิภตฺติวิสยานเมวาสกิมฺปโยเค เอวายนฺติ ทสฺสนตฺถํ, น จ วิจฺฉาปโยเค’ติปฺปสงฺโค. ‘‘วคฺคา ปญฺจปญฺจโส มนฺตา’’ติ เอตฺถ ‘‘ปญฺจปญฺจโส’’ติ นิทฺเทเสเนว วิจฺฉาปโยคสิทฺธิยา ญาปิตตฺตา, อถ วา สหวจนิจฺฉาย’มย’เมกเสโส. समान रूप वाले पदों और व्यंजनों के मध्य में एक ही शेष रहता है, अन्य का लोप हो जाता है, इसे 'एकशेष' कहते हैं। यहाँ 'सरूपानं' कहने से ही सिद्ध होने पर भी 'असकिं' (पुनः पुनः) का प्रयोग यह दिखाने के लिए है कि यह केवल एक ही विभक्ति के विषय में होता है, वीप्सा (दोहराव) के प्रयोग में अतिप्रसंग न हो। 'वग्गा पञ्चपञ्चसो मन्ता' यहाँ 'पञ्चपञ्चसो' इस निर्देश से ही वीप्सा के प्रयोग की सिद्धि ज्ञापित होने के कारण, अथवा यह एकशेष सहवचन की इच्छा में होता है। โยควิภาคโต เจตฺถ, เอกเสสฺวสกึ อิติ; วิรูเปกเสโส โหติ, วา ‘‘ปิตูน’’นฺติอาทิสุ. यहाँ योग-विभाग से 'एकसेसु-असकिं' इस सूत्र द्वारा 'पितूनं' आदि में विकल्प से विरूप-एकशेष भी होता है। ตตฺเถว ลิงฺคตฺถสฺส พหุตฺตวจนิจฺฉายํ ‘‘พหุมฺหิ วตฺตพฺเพ พหุวจน’’นฺติ ปฐมาพหุวจนํ โย, ปุริส โย อิตีธ ‘‘อโต, วา’’ติ จ วตฺตเต. वहीं प्रातिपदिक अर्थ (लिंगार्थ) के बहुत्व की विवक्षा होने पर 'बहुम्हि वत्तब्बे बहुवचनं' इस सूत्र से प्रथमा बहुवचन 'यो' प्रत्यय होता है। 'पुरिस यो' यहाँ 'अतो' और 'वा' की अनुवृत्ति आती है। ๖๙. สพฺพโยนีนมาเอ. ६९. सब्बयोनीनमाए (सभी 'यो' विभक्तियों के स्थान पर 'आ' और 'ए' आदेश होते हैं)। อการนฺตโต ลิงฺคมฺหา ปเรสํ สพฺเพสํ ปฐมาโยนีนํ, ทุติยาโยนีนญฺจ ยยากฺกมํ อากาเรการาเทสา โหนฺติ วาติ อากาโร, สพฺพคฺคหณํ สพฺพาเทสตฺถํ, สรโลปาทิ ปุริมสทิสเมว, ปุริสา ติฏฺฐนฺติ. अकारान्त प्रातिपदिक से परे सभी प्रथमा 'यो' और द्वितीया 'यो' विभक्तियों के स्थान पर क्रमशः 'आ' और 'ए' आदेश विकल्प से होते हैं। यहाँ 'आ' आदेश हुआ। 'सब्ब' ग्रहण सर्वादेश के लिए है। स्वर-लोप आदि पूर्व के समान ही हैं। 'पुरिसा तिट्ठन्ति' (पुरुष खड़े होते हैं)। วา อิจฺเจว รูปา รูปานิ, อคฺคโย, มุนโย. 'वा' (विकल्प) से ही 'रूपा', 'रूपानि', 'अग्गयो', 'मुनयो' रूप बनते हैं। วาสทฺโทยํ ววตฺถิตปิภาสตฺโถ, เตน เจตฺถ – यह 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है, इसलिए यहाँ— นิจฺจเมว [Pg.46] จ ปุลฺลิงฺเค, อนิจฺจญฺจ นปุํสเก; อสนฺตํ เฌ กตตฺเต ตุ, วิธึ ทีเปติ วาสุติ. पुल्लिंग में नित्य, नपुंसक लिंग में अनित्य; 'झ' और 'घ' संज्ञक होने पर अभाव—इस विधि को 'वा' शब्द दर्शाता है। ตตฺเถวาลปนวจนิจฺฉายํ ‘‘ลิงฺคตฺเถ ปฐมา’’ติ วตฺตเต. वहीं संबोधन (आलपन) की विवक्षा होने पर 'लिंगत्थे पठमा' की अनुवृत्ति आती है। ๗๐. อาลปเน จ. ७०. आलपने च (संबोधन में भी प्रथमा होती है)। อภิมุขํ กตฺวา ลปนํ อาลปนํ, สมฺโพธนํ. ตสฺมึ อาลปนตฺถาธิเก ลิงฺคตฺถาภิธานมตฺเต จ ปฐมาวิภตฺติ โหติ. ปุเร วิย เอกวจนาทิ. अभिमुख करके बोलना 'आलपन' (संबोधन) है। उस संबोधन अर्थ के अधिक होने पर और केवल प्रातिपदिक अर्थ के कथन में प्रथमा विभक्ति होती है। पहले की तरह एकवचन आदि होते हैं। ปุริส สิ อิจฺจตฺร – 'पुरिस सि' यहाँ— ๗๑. อาลปเน สิ คสญฺโญ. ७१. आलपने सि गसञ्ञो (संबोधन में 'सि' की 'ग' संज्ञा होती है)। อาลปนตฺเถ วิหิโต สิ คสญฺโญ โหตีติ คสญฺญายํ ‘‘โภ เค ตู’’ติ อิโต ‘‘เค’’ติ วตฺตเต. संबोधन अर्थ में विहित 'सि' की 'ग' संज्ञा होती है। 'ग' संज्ञा होने पर 'भो गे तू' इस सूत्र से 'गे' की अनुवृत्ति आती है। ๗๒. อการปิตาทฺยนฺตานมา. ७२. अकारपिताद्यन्तानमा (अकारान्त और पितृ-शास्तृ आदि के अन्त्य स्वर को 'आ' होता है)। ลิงฺคสฺส สมฺพนฺธี อกาโร จ ปิตุสตฺถุอิจฺเจวมาทีนมนฺโต จ อาการตฺตมาปชฺชเต เค ปเร. प्रातिपदिक से संबंधित अकार और पितृ, शास्तृ आदि के अन्त्य स्वर को 'ग' (संबोधन एकवचन) परे होने पर 'आ' भाव प्राप्त होता है। ‘‘เค, รสฺส’’มิติ จ วตฺตเต. 'गे' और 'रस्सं' की अनुवृत्ति आती है। ๗๓. อากาโร วา. ७३. आकारो वा (आकार विकल्प से ह्रस्व होता है)। ลิงฺคสฺส สมฺพนฺธี อากาโร รสฺสมาปชฺชเต เค ปเร วิกปฺเปน, อทูรฏฺฐสฺสาลปเนวายํ. प्रातिपदिक से संबंधित आकार को 'ग' परे होने पर विकल्प से ह्रस्व होता है; यह समीप स्थित के संबोधन में ही होता है। ๗๔. เสสโต โลปํ คสิปิ. ७४. सेसतो लोपं गसिपि (शेष से 'ग' और 'सि' का लोप होता है)। ‘‘สึ, โส, สฺยา จ, สขโต คสฺเส วา, ฆเต จา’’ติ เอวมาทีหิ นิทฺทิฏฺเฐหิ อญฺโญ เสโส นาม, ตโต เสสโต ลิงฺคมฺหา คสิอิจฺเจเต โลปมาปชฺชนฺเต. อปิคฺคหณํ [Pg.47] ทุติยตฺถสมฺปิณฺฑนตฺถํ, เอตฺถ จ สติปิ สิคฺคหเณ วอิติ วจนเมว ญาปกมญฺญตฺถาปิ สิคฺคหเณ อาลปนาคฺคหณสฺส. เกจิ อาลปนาภิพฺยตฺติยา ภวนฺตสทฺทํ วา เหสทฺทํ วา ปยุชฺชนฺเต. โภ ปุริส ติฏฺฐ, เห ปุริสา วา. 'सिं, सो, स्या च, सखतो गस्से वा, घते चा' इत्यादि सूत्रों द्वारा निर्दिष्ट से भिन्न 'शेष' कहलाता है। उस शेष प्रातिपदिक से 'ग' और 'सि' का लोप हो जाता है। 'अपि' का ग्रहण द्वितीय अर्थ के समुच्चय के लिए है। यहाँ 'सि' का ग्रहण होने पर भी 'वा' यह वचन ही ज्ञापक है कि अन्यत्र भी 'सि' के ग्रहण में संबोधन का ग्रहण होता है। कुछ लोग संबोधन की स्पष्टता के लिए 'भवन्त' शब्द या 'हे' शब्द का प्रयोग करते हैं। जैसे— 'भो पुरिस तिट्ठ' (हे पुरुष! ठहरो) या 'हे पुरिसा'। พหุวจเน น วิเสโส, ภวนฺโต ปุริสา ติฏฺฐถ. बहुवचन में कोई विशेष अंतर नहीं है, 'भवन्तो पुरिसा तिट्ठथ' (हे पुरुषों! तुम सब ठहरो)। ตตฺเถว กมฺมตฺถวจนิจฺฉายํ ‘‘ว,’’ติ วตฺตเต. वहीं कर्म अर्थ की विवक्षा होने पर 'व' की अनुवृत्ति आती है। ๗๕. ยํ กโรติ ตํ กมฺมํ. ७५. यं करोति तं कम्मं (जो करता है, वह कर्म है)। ยํ วา กโรติ, ยํ วา วิกโรติ, ยํ วา ปาปุณาติ, ตํ การกํ กฺริยานิมิตฺตํ กมฺมสญฺญํ โหติ. जिसे करता है, या जिसे विकृत करता है, या जिसे प्राप्त करता है, वह क्रिया का निमित्त कारक 'कर्म' संज्ञक होता है। ๗๖. กมฺมตฺเถ ทุติยา. ७६. कम्मत्थे दुतिया (कर्म अर्थ में द्वितीया विभक्ति होती है)। กมฺมตฺเถ ทุติยาวิภตฺติ โหติ. ปุเร วิย ทุติเยกวจนํ อํ, ‘‘สรโลโป’’ติอาทินา สเร ลุตฺเต ‘‘ทีฆ’’นฺติ ทีเฆ สมฺปตฺเต ปกติภาโว จ, ปุริสํ ปสฺส. कर्म अर्थ में द्वितीया विभक्ति होती है। पहले की तरह द्वितीया एकवचन 'अं' प्रत्यय होता है, 'सरलोपो' आदि से स्वर का लोप होने पर 'दीघं' सूत्र से दीर्घ प्राप्त होने पर प्रकृतिभाव हो जाता है, 'पुरिसं पस्स' (पुरुष को देखो)। พหุวจเน ‘‘สพฺพโยนีนมาเอ’’ติ โยวจนสฺเสกาโร, ปุริเส ปสฺส. बहुवचन में 'सब्बयोनीनमाए' सूत्र से 'यो' वचन के स्थान पर 'ए' कार होता है, 'पुरिसे पस्स' (पुरुषों को देखो)। ตตฺเถว กตฺตุวจนิจฺฉายํ – वहीं कर्ता की विवक्षा होने पर— ๗๗. โย กโรติ ส กตฺตา. ७७. यो करोति स कत्ता (जो करता है, वह कर्ता है)। โย อตฺตปฺปธาโน กฺริยํ กโรติ, โส กตฺตุสญฺโญ โหติ. जो स्वयं प्रधान होकर क्रिया करता है, वह कर्ता कहलाता है। ‘‘ตติยา’’ติ วตฺตเต. 'तृतीया' का अधिकार आता है। ๗๘. กตฺตริ จ. ७८. और कर्ता में भी। กตฺตริ จ การเก ตติยาวิภตฺติ โหตีติ ตติเยกวจนํ นา. कर्ता कारक में तृतीया विभक्ति होती है, इस प्रकार तृतीया का एकवचन 'ना' है। ๗๙. อโต [Pg.48] เนน. ७९. 'अ' से (परे) 'ना' को 'एन' आदेश होता है। เอนาติ อวิภตฺติกนิทฺเทโส. อการนฺตโต ลิงฺคมฺหา ปรสฺส นาวจนสฺส เอนาเทโส โหติ, สรโลปาทิ, ปุริเสน กตํ. 'एन' यह विभक्ति-रहित निर्देश है। अकारान्त लिंग से परे 'ना' वचन का 'एन' आदेश होता है, स्वर-लोप आदि के बाद, 'पुरिसेन कतं' (पुरुष द्वारा किया गया)। พหุวจนมฺหิ – बहुवचन में - ๘๐. สุหิสฺวกาโร เอ. ८०. 'सु' और 'हि' के परे होने पर अकार को 'ए' हो जाता है। สุ, หิอิจฺเจเตสุ วิภตฺติรูเปสุ ปเรสุ ลิงฺคสฺส สมฺพนฺธี อกาโร เอตฺตมาปชฺชเต. 'सु' और 'हि' इन विभक्तियों के परे होने पर लिंग के अकार को 'ए' हो जाता है। ๘๑. สฺมาหิสฺมึนํ มฺหาภิมฺหิ วา. ८१. 'स्मा', 'हि' और 'स्मिं' के स्थान पर क्रमशः 'म्हा', 'भि' और 'म्हि' आदेश विकल्प से होते हैं। สพฺพโต ลิงฺคมฺหา สฺมา หิ สฺมึอิจฺเจเตสํ ยถากฺกมํ มฺหา, ภิ, มฺหิอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา, ปุริเสหิ, ปุริเสภิ กตํ. सभी लिंगों से परे 'स्मा', 'हि' और 'स्मिं' के स्थान पर यथाक्रम 'म्हा', 'भि' और 'म्हि' आदेश विकल्प से होते हैं; जैसे- 'पुरिसेहि', 'पुरिसेभि कतं'। ตตฺเถว กรณวจนิจฺฉายํ – वहीं करण कहने की इच्छा होने पर - ๘๒. เยน วา กยิรเต ตํ กรณํ. ८२. जिसके द्वारा (क्रिया) की जाती है, वह करण है। เยน วา กยิรเต, เยน วา ปสฺสติ, เยน วา สุณาติ, ตํ การกํ กรณสญฺญํ โหติ. जिसके द्वारा किया जाता है, जिसके द्वारा देखता है, या जिसके द्वारा सुनता है, वह कारक 'करण' संज्ञक होता है। ๘๓. กรเณ ตติยา. ८३. करण में तृतीया विभक्ति होती है। กรณการเก ตติยาวิภตฺติ โหติ, เสสํ กตฺตุสมํ, อาวิฏฺเฐน ปุริเสน โส ปุญฺญํ กโรติ, ปุริเสหิ, ปุริเสภิ. करण कारक में तृतीया विभक्ति होती है, शेष कर्ता के समान है; जैसे- 'आविट्ठेन पुरिसेन सो पुञ्ञं करोति', 'पुरिसेहि', 'पुरिसेभि'। ตตฺเถว สมฺปทานวจนิจฺฉายํ – वहीं सम्प्रदान कहने की इच्छा होने पर - ๘๔. ยสฺส [Pg.49] ทาตุกาโม โรจเต ธารยเต วา ตํ สมฺปทานํ. ८४. जिसे देने की इच्छा हो, जिसे अच्छा लगे या जो धारण करे, वह सम्प्रदान है। ยสฺส วา ทาตุกาโม, ยสฺส วา โรจเต, ยสฺส วา ธารยเต, ตํ การกํ สมฺปทานสญฺญํ โหติ. जिसे देने की इच्छा हो, जिसे अच्छा लगे, या जो धारण करे, वह कारक 'सम्प्रदान' संज्ञक होता है। ๘๕. สมฺปทาเน จตุตฺถี. ८५. सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है। สมฺปทานการเก จตุตฺถีวิภตฺติ โหตีติ จตุตฺถิยา เอกวจนํ ส. सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है, इस प्रकार चतुर्थी का एकवचन 'स' है। ๘๖. สาคโม เส. ८६. 'स' विभक्ति के परे होने पर 'स' का आगम होता है। สพฺพโต ลิงฺคมฺหา สการาคโม โหติ เส วิภตฺติมฺหิ ปเร. ปุริสสฺส ธนํ ททาติ. सभी लिंगों से परे 'स' विभक्ति के परे होने पर सकार का आगम होता है; जैसे- 'पुरिसस्स धनं ददाति'। พหุวจนมฺหิ ‘‘ทีฆ’’นฺติ วตฺตเต. बहुवचन में 'दीर्घ' का अधिकार आता है। ๘๗. สุนํหิสุ จ. ८७. 'सु', 'नं' और 'हि' के परे होने पर भी। สุ นํ หิอิจฺเจเตสุ ปเรสุ ลิงฺคสฺส อนฺตภูตา สพฺเพ รสฺสสรา ทีฆมาปชฺชนฺเต, จคฺคหณมิการุการานํ กฺวจิ นิวตฺตนตฺถํ. ปุริสานํ. 'सु', 'नं' और 'हि' के परे होने पर लिंग के अंत में स्थित सभी ह्रस्व स्वर दीर्घ हो जाते हैं; 'च' का ग्रहण इकार और उकार की कहीं-कहीं निवृत्ति के लिए है; जैसे- 'पुरिसानं'। ตตฺเถวาปาทานวจนิจฺฉายํ – वहीं अपादान कहने की इच्छा होने पर - ๘๘. ยสฺมา ทเปติ ภยมาทตฺเต วา ตทปาทานํ. ८८. जिससे अलग होता है, जिससे भय होता है या जिससे ग्रहण करता है, वह अपादान है। ยสฺมา วา อวธิภูตา อเปติ, ยสฺมา วา ภยํ, ยสฺมา วา อาทตฺเต, ตํ การกํ อปาทานสญฺญํ โหติ. जिससे अवधिभूत होकर अलग होता है, जिससे भय होता है, या जिससे ग्रहण करता है, वह कारक 'अपादान' संज्ञक होता है। ๘๙. อปาทาเน [Pg.50] ปญฺจมี. ८९. अपादान में पंचमी विभक्ति होती है। อปาทานการเก ปญฺจมีวิภตฺติ โหตีติ ปญฺจมิยา เอกวจนํ สฺมา. अपादान कारक में पञ्चमी विभक्ति होती है; पञ्चमी का एकवचन 'स्मा' है। ‘‘อโต, สพฺเพสํ, อา เอ’’ติ จ วตฺตเต. 'अतो', 'सब्बेसं', 'आ ए' - इनकी अनुवृत्ति होती है। ๙๐. สฺมาสฺมึน วา. ९०. स्मा और स्मिं को विकल्प से (आदेश होते हैं)। อการนฺตโต ลิงฺคมฺหา สพฺเพสํ สฺมา สฺมึอิจฺเจเตสํ ยถากฺกมํ อากาเรการาเทสา โหนฺติ วา, อญฺญตฺถ มฺหาเทโส. ปุริสา อเปติ, ปุริสมฺหา, ปุริสสฺมา. अकारान्त प्रातिपदिक (लिंग) से परे सभी 'स्मा' और 'स्मिं' के स्थान पर क्रमशः 'आ' और 'ए' आदेश विकल्प से होते हैं, अन्यथा 'म्हा' आदेश होता है। जैसे- पुरिसा अपेति, पुरिसम्हा, पुरिसस्मा। พหุวจเน สพฺพตฺถ ตติยาสมํ, หิสฺส ภิอาเทโส โหติ. ปุริเสหิ, ปุริเสภิ อเปติ. बहुवचन में सर्वत्र तृतीया के समान रूप होते हैं, 'हि' को 'भि' आदेश होता है। जैसे- पुरिसेहि, पुरिसेभि अपेति। ตตฺเถว สามิวจนิจฺฉายํ – वहीं स्वामी (सम्बन्ध) कहने की इच्छा होने पर - ๙๑. ยสฺส วา ปริคฺคโห ตํ สามิ. ९१. जिसका परिग्रह (स्वामित्व) हो, वह 'स्वामी' कहलाता है। ยสฺส วา ปริคฺคโห, ตํ สามิสญฺญํ โหติ. जिसका परिग्रह हो, उसकी 'स्वामी' संज्ञा होती है। ๙๒. สามิสฺมึ ฉฏฺฐี. ९२. स्वामी (सम्बन्ध) में षष्ठी विभक्ति होती है। สามิสฺมึ ฉฏฺฐีวิภตฺติ โหติ. ฐเปตฺวา อายาเทสํ สพฺพตฺถ จตุตฺถีฉฏฺฐีนํ สมานํ รูปํ. ปุริสสฺส เอตํ ธนํ, ปุริสานํ. स्वामी में षष्ठी विभक्ति होती है। 'आय' आदेश को छोड़कर सर्वत्र चतुर्थी और षष्ठी के रूप समान होते हैं। जैसे- पुरिसस्स एतं धनं, पुरिसानं। ตตฺเถว โอกาสวจนิจฺฉายํ – वहीं अवकाश (आधार) कहने की इच्छा होने पर - ๙๓. โยธาโร ตโมกาสํ. ९३. जो आधार है, वह 'अवकाश' (अधिकरण) है। โย กตฺตุกมฺมานํ กฺริยาย อาธาโร, ตํ การกํ โอกาสสญฺญํ โหติ. जो कर्ता और कर्म की क्रिया का आधार है, उस कारक की 'अवकाश' (अधिकरण) संज्ञा होती है। ๙๔. โอกาเส [Pg.51] สตฺตมี. ९४. अवकाश (अधिकरण) में सप्तमी विभक्ति होती है। โอกาสการเก สตฺตมีวิภตฺติ โหตีติ สตฺตมิยา เอกวจนํ สฺมึ, ตสฺส ‘‘สฺมาสฺมึนํ วา’’ติ เอกาโร, มฺหิอาเทโส จ, ปุริเส ปติฏฺฐิตํ, ปุริสมฺหิ, ปุริสสฺมึ. अवकाश कारक में सप्तमी विभक्ति होती है; सप्तमी का एकवचन 'स्मिं' है, उसको 'स्मास्मिंनं वा' सूत्र से 'ए'कार और 'म्हि' आदेश होता है। जैसे- पुरिसे पतिट्ठितं, पुरिसम्हि, पुरिसस्मिं। พหุวจเน ‘‘สุหิสฺวกาโร เอ’’ติ เอกาโร, ปุริเสสุ. बहुवचन में 'सुहिस्वकारो ए' सूत्र से 'ए'कार होता है। जैसे- पुरिसेसु। ปุริโส, ปุริสา, โภ ปุริส โภ ปุริสา วา, ภวนฺโต ปุริสา, ปุริสํ, ปุริเส, ปุริเสน, ปุริเสหิ ปุริเสภิ, ปุริสสฺส, ปุริสานํ, ปุริสา ปุริสสฺมา ปุริสมฺหา, ปุริเสหิ ปุริเสภิ, ปุริสสฺส, ปุริสานํ, ปุริเส ปุริสสฺมึ ปุริสมฺหิ, ปุริเสสุ. पुरिसो, पुरिसा, भो पुरिस, भो पुरिसा वा, भवन्तो पुरिसा, पुरिसं, पुरिसे, पुरिसेन, पुरिसेहि पुरिसेभि, पुरिसस्स, पुरिसानं, पुरिसा पुरिसस्मा पुरिसम्हा, पुरिसेहि पुरिसेभि, पुरिसस्स, पुरिसानं, पुरिसे पुरिसस्मिं पुरिसम्हि, पुरिसेसु। ตถา สุคโต, สุคตา, โภ สุคต โภ สุคตา วา, ภวนฺโต สุคตา, สุคตํ, สุคเต, สุคเตน, สุคเตหิ สุคเตภิ, สุคตสฺส, สุคตานํ, สุคตา สุคตสฺมา สุคตมฺหา, สุคเตหิ สุคเตภิ, สุคตสฺส, สุคตานํ, สุคเต สุคตสฺมึ สุคตมฺหิ, สุคเตสุ. वैसे ही सुगतो, सुगता, भो सुगत, भो सुगता वा, भवन्तो सुगता, सुगतं, सुगते, सुगतेन, सुगतेहि सुगतेभि, सुगतस्स, सुगतानं, सुगता सुगतस्मा सुगतम्हा, सुगतेहि सुगतेभि, सुगतस्स, सुगतानं, सुगते सुगतस्मिं सुगतम्हि, सुगतेसु। เอวํ สุรา’สุร นโร’รค นาค ยกฺขา,คนฺธพฺพ กินฺนร มนุสฺส ปิสาจ เปตา; มาตงฺค ชงฺคม ตุรงฺค วราห สีหา,พฺยคฺฆ’จฺฉ กจฺฉป ตรจฺฉ มิค’สฺส โสณา. इसी प्रकार सुर, असुर, नर, उरग, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, मनुष्य, पिशाच, प्रेत, मातंग, जंगम, तुरंग, वराह, सिंह, व्याघ्र, अच्छ (भालू), कच्छप, तरच्छ (लकड़बग्घा), मृग, अश्व, श्वान आदि के रूप होते हैं। อาโลก โลก นิลยา’นิล จาค โยคา, วายาม คามนิคมา’คม ธมฺม กามา; สงฺโฆ’ฆ โฆส ปฏิฆา’สว โกธ โลภา,สารมฺภ ถมฺภ มท มาน ปมาท มกฺขา. आलोक, लोक, निलय, अनिल, त्याग, योग, व्यायाम, ग्राम, निगम, आगम, धर्म, काम, संघ, ओघ, घोष, प्रतिघ, आस्रव, क्रोध, लोभ, सारम्भ, स्तम्भ, मद, मान, प्रमाद, म्रक्ष। ปุนฺนาค [Pg.52] ปูค ปนสา’สน จมฺปก’มฺพา,หินฺตาล ตาล พกุล’ชฺชุน กึสุกา จ; มนฺทาร กุนฺท ปุจิมนฺท กรญฺช รุกฺขา,เญยฺยา มยูร สกุนณฺฑช โกญฺจ หํสา – पुन्नाग, पूग, पनस, आसन, चम्पक, आम्र, हिन्ताल, ताल, बकुल, अर्जुन, किंशुक, मन्दार, कुन्द, पुचिमन्द (नीम), करंज, वृक्ष, मयूर, शकुन, अण्डज, क्रौंच, हंस - อิจฺจาทโยปิ. इत्यादि भी (इसी प्रकार जानने चाहिए)। มโนคณาทิสฺส ตุ นาสสฺมาสฺมึสุ วิเสโส. อญฺญตฺถ ปุริสสมํ. मनोगण आदि के लिए 'ना', 'स', 'स्मा' और 'स्मिं' विभक्तियों में विशेषता है। अन्यत्र पुरुष शब्द के समान रूप होते हैं। มโน, มนา, เห มน เห มนา วา, ภวนฺโต มนา, มนํ, มเน. मनो, मना, हे मन, हे मना वा, भवन्तो मना, मनं, मने। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' (विकल्प) की अनुवृत्ति होती है। ๙๕. มโนคณาทิโต สฺมึนานมิอา. ९५. मनोगण आदि से परे 'स्मिं' और 'ना' के स्थान पर क्रमशः 'इ' और 'आ' आदेश विकल्प से होते हैं। มโนปภุติ คโณ มโนคโณ, มโนคณาทิโต สฺมึ, นาอิจฺเจเตสํ ยถากฺกมํ อิการาการาเทสา โหนฺติ วา. อาทิคฺคหเณน พิลปทาทิโตปิ. मनः आदि गण 'मनोगण' है, मनोगण से परे 'स्मिं' और 'ना' के स्थान पर क्रमशः इकार और अकार आदेश विकल्प से होते हैं। 'आदि' ग्रहण से बिलपद आदि में भी ये आदेश होते हैं। ‘‘มโนคณาทิโต’’ติ วตฺตเต. 'मनोगणादितो' की अनुवृत्ति होती है। ๙๖. ส สเร วาคโม. ९६. स्वर परे होने पर 'स' का आगम विकल्प से होता है। เอเตเหว มโนคณาทีหิ สเร ปเร สาคโม โหติ วา. มนสา, มเนน. इन्हीं मनोगण आदि शब्दों से परे स्वर होने पर 'स' का आगम विकल्प से होता है। जैसे- मनसा, मनेन। ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, เตน ‘‘มโน มนา มนํ มเน มนอายตน’’นฺติอาทีสุ น โหติ. ‘‘มานสิกํ, เจตสิก’’นฺติอาทีสุ นิจฺจํ. มเนหิ, มเนภิ. यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है, इसलिए 'मनो, मना, मनं, मने, मनायतनं' आदि में (यह कार्य) नहीं होता है। 'मानसिकं, चेतसिकं' आदि में नित्य होता है। मनेहि, मनेभि। ‘‘มโนคณาทิโต, วา’’ติ จ วตฺตเต. 'मनोगणादितो' और 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๙๗. สสฺส [Pg.53] โจ. ९७. 'स' (विभक्ति) का 'ओ' भी होता है। มโนคณาทิโต ปรสฺส สสฺส วิภตฺติสฺส โอกาโร โหติ วา. สาคโม. मनोगण के शब्दों से परे 'स' विभक्ति का विकल्प से 'ओ' कार होता है। 'स' का आगम होता है। มนโส มนสฺส, มนานํ, มนา มนสฺมา มนมฺหา, มเนหิ มเนภิ, มนโส มนสฺส, มนานํ, มนสิ มเน มนสฺมึ มนมฺหิ, มเนสุ. मनसो, मनस्स; मनानं; मना, मनस्मा, मनम्हा; मनेहि, मनेभि; मनसो, मनस्स; मनानं; मनसि, मने, मनस्मिं, मनम्हि; मनेसु। เอวํ วโจ วโย เตโช,ตโป เจโต ตโม ยโส; อโย ปโย สิโร ฉนฺโท,สโร อุโร รโห อโห – इसी प्रकार वचो, वयो, तेजो, तपो, चेतो, तमो, यसो, अयो, पयो, सिरो, छन्दो, सरो, उरो, रहो, अहो - อิจฺจาทิ มโนคโณ. इत्यादि मनोगण हैं। คุณวนฺตุสทฺทสฺส เภโท. คุณวนฺตุ สิ อิตีธ – 'गुणवन्तु' शब्द के रूप भेद। यहाँ 'गुणवन्तु + सि' इस अवस्था में - ‘‘สวิภตฺติสฺส, นฺตุสฺสา’’ติ จ อธิกาโร. 'सविभत्तिस्स' और 'न्तुस्स' का अधिकार है। ๙๘. อา สิมฺหิ. ९८. 'सि' विभक्ति होने पर 'आ' होता है। สพฺพสฺเสว นฺตุปจฺจยสฺส สวิภตฺติสฺส อาอาเทโส โหติ สิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. คุณวา. 'सि' विभक्ति के परे होने पर विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'न्तु' प्रत्यय का 'आ' आदेश होता है। गुणवा। ‘‘โยมฺหิ, ปฐเม’’สีหคติยา ‘‘วา’’ติ จ วตฺตเต. 'यो' विभक्ति में, 'प्रथमा' में, सिंहगति न्याय से 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๙๙. นฺตุสฺส นฺโต. ९९. 'न्तु' का 'न्तो' होता है। สพฺพสฺเสว นฺตุปจฺจยสฺส สวิภตฺติสฺส นฺโตอาเทโส โหติ วา โยมฺหิ ปฐเม, คุณวนฺโต ติฏฺฐนฺติ. प्रथमा 'यो' विभक्ति के परे होने पर विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'न्तु' प्रत्यय का विकल्प से 'न्तो' आदेश होता है। गुणवन्तो तिट्ठन्ति। ‘‘สุนํหิสุ, อตฺต’’นฺติ จ วตฺตเต. 'सु, नं, हि' विभक्तियों में 'अत्त' की अनुवृत्ति होती है। ๑๐๐. นฺตุสฺสนฺโต [Pg.54] โยสุ จ. १००. 'न्तु' का 'अन्त' और 'यो' विभक्तियों में भी होता है। นฺตุปจฺจยสฺส อนฺโต อุกาโร อตฺตมาปชฺชเต สุนํหิ โยอิจฺเจเตสุ, จคฺคหเณน อญฺเญสุ อํ นา สฺมาสฺมึสุ จ. คุณวนฺตา, ฉฏฺฐิยา สิทฺเธปิ อนฺตาเทเส ปุน อนฺตคฺคหณกรณโต โยนํ อิกาโร จ กฺวจิ. คุณวนฺติ. 'सु, नं, हि, यो' इन विभक्तियों के परे होने पर 'न्तु' प्रत्यय का अन्त्य 'उ' कार 'अ' भाव (अत्त) को प्राप्त होता है, 'च' ग्रहण से अन्य 'अं, ना, स्मा, स्मिं' विभक्तियों में भी। गुणवन्ता। षष्ठी में 'अन्त' आदेश सिद्ध होने पर भी पुनः 'अन्त' ग्रहण करने से 'यो' विभक्तियों का कहीं-कहीं 'इ' कार भी होता है। गुणवन्ति। ‘‘อ’’มิติ วตฺตเต. 'अं' की अनुवृत्ति होती है। ๑๐๑. อวณฺณา จ เค. १०१. 'ग' (सम्बोधन सि) परे होने पर 'अ' वर्ण भी होता है। สพฺพสฺเสว นฺตุปจฺจยสฺส สวิภตฺติสฺส อํ อวณฺณอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ เค ปเร. 'ग' (सम्बोधन) के परे होने पर विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'न्तु' प्रत्यय के 'अं' और 'अ' वर्ण ये आदेश होते हैं। โภ คุณวํ โภ คุณว โภ คุณวา, ภวนฺโต คุณวนฺโต คุณวนฺตา, คุณวนฺตํ, คุณวนฺเต. भो गुणवं, भो गुणव, भो गुणवा; भवन्तो गुणवन्तो गुणवन्ता; गुणवन्तं; गुणवन्ते। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๑๐๒. โตติตา สสฺมึนาสุ. १०२. 'स, स्मिं, ना' विभक्तियों में 'तो, ति, ता' आदेश होते हैं। สพฺพสฺเสว นฺตุปจฺจยสฺส สวิภตฺติสฺส โตติ ตาอาเทสา โหนฺติ วา สสฺมึนาอิจฺเจเตสุ ยถาสงฺขฺยํ. คุณวตา คุณวนฺเตน, คุณวนฺเตหิ คุณวนฺเตภิ. 'स, स्मिं, ना' इन विभक्तियों के परे होने पर विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'न्तु' प्रत्यय के यथासंख्यानुसार 'तो, ति, ता' आदेश विकल्प से होते हैं। गुणवता, गुणवन्तेन; गुणवन्तेहि, गुणवन्तेभि। ๑๐๓. นฺตสฺส เส วา. १०३. 'स' विभक्ति परे होने पर (विभक्ति सहित 'न्तु' का) विकल्प से 'न्तस्स' आदेश होता है। สพฺพสฺเสว นฺตุปจฺจยสฺส สวิภตฺติสฺส นฺตสฺสอิจฺจยมาเทโส โหติ วา เส วิภตฺติมฺหิ. คุณวนฺตสฺส คุณวโต. 'स' विभक्ति के परे होने पर विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'न्तु' प्रत्यय का विकल्प से 'न्तस्स' यह आदेश होता है। गुणवन्तस्स, गुणवतो। ๑๐๔. นํมฺหิ ตํ วา. १०४. 'नं' विभक्ति परे होने पर विकल्प से 'तं' आदेश होता है। สพฺพสฺเสว นฺตุปจฺจยสฺส สวิภตฺติสฺส ตํอาเทโส โหติ วา นํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. คุณวตํ คุณวนฺตานํ. 'नं' विभक्ति के परे होने पर विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'न्तु' प्रत्यय का विकल्प से 'तं' आदेश होता है। गुणवतं, गुणवन्तानं। ‘‘อมฺห [Pg.55] ตุมฺห นฺตุ’’อิจฺจาทินา สฺมาวจนสฺส นาพฺยปเทโส. 'अम्ह तुम्हा न्तु' इत्यादि (सूत्र) से 'स्मा' विभक्ति का 'ना' संज्ञा के रूप में निर्देश होता है। คุณวตา คุณวนฺตา คุณวนฺตสฺมา คุณวนฺตมฺหา, คุณวนฺเตหิ คุณวนฺเตภิ, คุณวนฺตสฺส คุณวโต, คุณวตํ คุณวนฺตานํ, คุณวติ คุณวนฺเต คุณวนฺตสฺมึ คุณวนฺตมฺหี, คุณวนฺเตสุ. गुणवता, गुणवन्ता, गुणवन्तस्मा, गुणवन्तम्हा; गुणवन्तेहि, गुणवन्तेभि; गुणवन्तस्स, गुणवतो; गुणवतं, गुणवन्तानं; गुणवति, गुणवन्ते, गुणवन्तस्मिं, गुणवन्तम्हि; गुणवन्तेसु। เอวํ คณวา กุลวา พลวา ยสวา ธนวา สุตวา ภควา หิมวา ผลวา สีลวา ปญฺญวา อิจฺจาทโย. इसी प्रकार गणवान्, कुलवान्, बलवान्, यशवान्, धनवान्, श्रुतवान्, भगवान्, हिमवान्, फलवान्, शीलवान्, प्रज्ञावान् इत्यादि। หิมวนฺตุสทฺทโต สิมฺหิ กเต – 'हिमवन्तु' शब्द से 'सि' (विभक्ति) होने पर - ‘‘อตฺตํ, นฺตุสฺส’นฺโต’’ติ จ วตฺตมาเน – 'अत्तं' और 'न्तुस्स'न्तो' (सूत्रों) की अनुवृत्ति होने पर - ๑๐๕. สิมฺหี วา. १०५. 'सि' विभक्ति में विकल्प से। นฺตุปจฺจยสฺส อนฺโต อตฺตํ โหติ วา สิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. หิมวนฺโต, หิมวา, เสสํ สมํ. 'सि' विभक्ति के परे होने पर 'न्तु' प्रत्यय के अन्त्य को विकल्प से 'अ' (अकार) होता है। हिमवन्तो, हिमवा, शेष (रूप) समान हैं। ปุน วาคฺคหณกรณํ หิมวนฺตุสทฺทโต อญฺญตฺร อตฺตนิเสธนตฺถํ, ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. เตน คุณวนฺตาทีสุ นาติปฺปสงฺโค. पुनः 'वा' ग्रहण करना 'हिमवन्तु' शब्द के अतिरिक्त अन्यत्र 'अ' (अकार) का निषेध करने के लिए है, यह 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है। इससे 'गुणवन्तु' आदि में अतिप्रसंग नहीं होता। เอวํ สติมา ธิติมา คติมา มติมา มุติมา มุตฺติมา ชุติมา สิริมา หิริมา ถุติมา รติมา ยติมา สุจิมา กลิมา พลิมา กสิมา รุจิมา พุทฺธิมา จกฺขุมา พนฺธุมา เหตุมา เสตุมา เกตุมา ราหุมา ภาณุมา ขาณุมา วิชฺชุมา อิจฺจาทโย. इसी प्रकार सतिमा (स्मृतिमान्), धितिमा (धृतिमान्), गतिमा, मतिमा, मुतिमा, मुत्तिमा (मुक्तिमान्), जुतिमा (द्युतिमान्), सिरिमा (श्रीमान्), हिरिमा (ह्रीमान्), थुतिमा (स्तुतिमान्), रतिमा, यतिमा, सुचिमा, कलिमा, बलिमा, कसिमा (कृषिमान्), रुचिमा, बुद्धिमा, चक्खुमा (चक्षुमान्), बन्धुमा, हेतुमा, सेतुमा, केतुमा, राहुमा, भानुमा, खाणुमा (स्थाणुमान्), विज्जुमा (विद्युमान्) इत्यादि। ตตฺถ สติมนฺตุ พนฺธุมนฺตุสทฺทานํ อํเสสุ รูปเภโท. ‘‘อตฺตํ, นฺตุสฺสา’’ติ จ วตฺตเต. वहाँ 'सतिमन्तु' और 'बन्धुमन्तु' शब्दों के 'अं' (विभक्ति) में रूपों का भेद है। 'अत्तं' और 'न्तुस्स' की अनुवृत्ति होती है। ๑๐๖. สพฺพสฺส วา อํเสสุ. १०६. 'अं' और 'स' (विभक्तियों) में सम्पूर्ण (न्तु प्रत्यय) को विकल्प से। สพฺพสฺเสว นฺตุปจฺจยสฺส อตฺตํ โหติ วา อํสอิจฺเจเตสุ. อิธาปิ วาสทฺทสฺส ววตฺถิตวิภาสตฺตา นาติปฺปสงฺโค[Pg.56]. สติมํ สติมนฺตํ, พนฺธุมํ พนฺธุมนฺตํ, สติมสฺส สติมโต สติมนฺตสฺส, พนฺธุมสฺส พนฺธุมโต พนฺธุมนฺตสฺส, เสสํ สมํ. 'अं' और 'स' इन विभक्तियों के परे होने पर सम्पूर्ण 'न्तु' प्रत्यय को विकल्प से 'अ' (अकार) होता है। यहाँ भी 'वा' शब्द के व्यवस्थित विभाषा होने से अतिप्रसंग नहीं होता। सतिमं-सतिमन्तं, बन्धुमं-बन्धुमन्तं, सतिमस्स-सतिमतो-सतिमन्तस्स, बन्धुमस्स-बन्धुमतो-बन्धुमन्तस्स, शेष समान हैं। คจฺฉนฺตสทฺทสฺส เภโท, คจฺฉนฺต สิ, 'गच्छन्त' शब्द का भेद (रूपान्तर), गच्छन्त + सि, ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๑๐๗. สิมฺหิ คจฺฉนฺตาทีนํ นฺตสทฺโท อํ. १०७. 'सि' विभक्ति में 'गच्छन्त' आदि के 'न्त' शब्द को 'अं' होता है। คจฺฉนฺติจฺเจวมาทีนํ อนฺตปฺปจฺจยนฺตานํ นฺตสทฺโท อํรูปํ อาปชฺชเต วา สิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. สรโลปสิโลปา, โส คจฺฉํ, คจฺฉนฺโต วา คณฺหาติ. 'गच्छन्त' इत्यादि 'अन्त' प्रत्ययान्त शब्दों के 'न्त' शब्द को 'सि' विभक्ति में विकल्प से 'अं' रूप प्राप्त होता है। स्वर-लोप और सि-लोप होने पर, 'सो गच्छं' (वह जाता हुआ) या 'गच्छन्तो' ग्रहण करता है। ‘‘คจฺฉนฺตาทีนํ, นฺตสทฺโท’’ติ จ วตฺตมาเน – 'गच्छन्तादीनं' और 'न्तसद्दो' की अनुवृत्ति होने पर - ๑๐๘. เสเสสุ นฺตุว. १०८. शेष (विभक्तियों) में 'न्तु' के समान। คจฺฉนฺตาทีนํ นฺตสทฺโท นฺตุปจฺจโยว ทฏฺฐพฺโพ เสเสสุ วิภตฺติปฺปจฺจเยสุ, อสฺมิมฺหิ การิยาติเทโสยํ. เสสํ คุณวนฺตุสมํ. शेष विभक्ति प्रत्ययों के परे होने पर 'गच्छन्त' आदि के 'न्त' शब्द को 'न्तु' प्रत्यय के समान ही समझना चाहिए, यह इस प्रकरण में कार्य का अतिदेश है। शेष 'गुणवन्तु' के समान है। เต คจฺฉนฺโต คจฺฉนฺตา, โภ คจฺฉํ โภ คจฺฉ โภ คจฺฉา, ภวนฺโต คจฺฉนฺโต คจฺฉนฺตา, [คจฺฉํ] คจฺฉนฺตํ, คจฺฉนฺเต, คจฺฉตา คจฺฉนฺเตน, คจฺฉนฺเตหิ คจฺฉนฺเตภิ, คจฺฉโต คจฺฉนฺตสฺส, คจฺฉตํ คจฺฉนฺตานํ, คจฺฉตา คจฺฉนฺตสฺมา คจฺฉนฺตมฺหา, คจฺฉนฺเตหิ คจฺฉนฺเตภิ, คจฺฉโต คจฺฉนฺตสฺส, คจฺฉตํ คจฺฉนฺตานํ, คจฺฉติ คจฺฉนฺเต คจฺฉนฺตสฺมึ คจฺฉนฺตมฺหี, คจฺฉนฺเตสุ. वे गच्छन्तो-गच्छन्ता; हे गच्छं-हे गच्छ-हे गच्छा; आप गच्छन्तो-गच्छन्ता; [गच्छं]-गच्छन्तं, गच्छन्ते; गच्छता-गच्छन्तेन; गच्छन्तेहि-गच्छन्तेभि; गच्छतो-गच्छन्तस्स; गच्छतं-गच्छन्तानं; गच्छता-गच्छन्तस्मा-गच्छन्तम्हा; गच्छन्तेहि-गच्छन्तेभि; गच्छतो-गच्छन्तस्स; गच्छतं-गच्छन्तानं; गच्छति-गच्छन्ते-गच्छन्तस्मिं-गच्छन्तम्हि; गच्छन्तेसु। เอวํ มหํ จรํ ติฏฺฐํ, ททํ ภุญฺชํ สุณํ ปจํ; ชยํ ชีรํ จวํ มียํ, สรํ กุพฺพํ ชปํ วชํ – इसी प्रकार महं (महान), चरं (चलता हुआ), तिट्ठं (ठहरता हुआ), ददं (देता हुआ), भुञ्जं (खाता हुआ), सुणं (सुनता हुआ), पचं (पकाता हुआ); जयं (जीतता हुआ), जीरं (बूढ़ा होता हुआ), चवं (च्युत होता हुआ), मीयं (मरता हुआ), सरं (स्मरण करता हुआ), कुब्बं (करता हुआ), जपं (जपता हुआ), वजं (जाता हुआ) - อิจฺจาทโย. इत्यादि। ภวนฺตสทฺทสฺส [Pg.57] ค โย นา สวจเนสุ วิเสโส. โส ภวํ. 'भवन्त' शब्द के 'ग' (सम्बोधन), 'यो' और 'ना' वचनों में विशेष नियम है। वह 'भवं' (होता है)। ‘‘ภวโต’’ติ วตฺตเต. 'भवतो' की अनुवृत्ति होती है। ๑๐๙. โอภาโว กฺวจิ โยสุ วการสฺส. १०९. 'यो' विभक्तियों में 'व' कार को कहीं-कहीं 'ओ' भाव होता है। ภวนฺตอิจฺเจตสฺส วการสฺส โอภาโว โหติ กฺวจิ โยอิจฺเจเตสุ. เต โภนฺโต ภวนฺโต ภวนฺตา. 'भवन्त' इसके 'व' कार को 'यो' विभक्तियों के परे होने पर कहीं-कहीं 'ओ' भाव होता है। वे भोन्तो-भवन्तो-भवन्ता। ‘‘ภวโต’’ติ วตฺตเต. 'भवतो' की अनुवृत्ति होती है। ๑๑๐. โภ เค ตุ. ११०. 'गे' (सम्बोधन एकवचन) परे होने पर 'भो' होता है। สพฺพสฺเสว ภวนฺตสทฺทสฺส โภ โหติ เค ปเร. ตุสทฺเทน ภนฺเต, โภนฺตาทิ จ, คโลโป, โภ ภนฺเต โภนฺต โภนฺตา, โภนฺโต ภวนฺโต ภวนฺตา, ภวนฺตํ, โภนฺเต ภวนฺเต. 'गे' परे होने पर सम्पूर्ण 'भवन्त' शब्द को 'भो' आदेश होता है। 'तु' शब्द के ग्रहण से 'भन्ते', 'भोन्त' आदि भी होते हैं, और 'ग' का लोप होता है। भो, भन्ते, भोन्त, भोन्ता; भोन्तो, भवन्तो, भवन्ता; भवन्तं; भोन्ते, भवन्ते। นาเสสุ ‘‘โอภาโว กฺวจี’’ติ โยควิภาเคน โอภาโว. 'ना' और 'स' विभक्तियों में 'ओभावो क्वचि' इस योग-विभाग से 'ओ' भाव होता है। โภตา ภวตา ภวนฺเตน, โภโต ภวโต ภวนฺตสฺส อิจฺจาทิ. भोता-भवता-भवन्तेन, भोतो-भवतो-भवन्तस्स इत्यादि। ๑๑๑. ภทนฺตสฺส ภทฺทนฺต ภนฺเต. १११. 'भदन्त' शब्द के 'भद्दन्त' और 'भन्ते' रूप होते हैं। สพฺพสฺเสว ภทนฺตสทฺทสฺส ภทฺทนฺต ภนฺเตอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ กฺวจิ เค ปเร โยสุ จ. โภ ภทฺทนฺต ภนฺเต, ภทนฺต ภทนฺตา วา อิจฺจาทิ ปุริสสทฺทสมํ. सम्पूर्ण 'भदन्त' शब्द के स्थान पर 'भद्दन्त' और 'भन्ते' ये आदेश होते हैं, कहीं 'ग' (सम्बोधन एकवचन) के परे होने पर और 'यो' (प्रथमा/द्वितीया बहुवचन) के परे होने पर। 'भो भद्दन्त', 'भन्ते', 'भदन्त' या 'भदन्ता' इत्यादि 'पुरिस' शब्द के समान होते हैं। ๑๑๒. สนฺตสทฺทสฺส โส เภ โพ จนฺเต. ११२. 'सन्त' शब्द के स्थान पर 'स' आदेश होता है 'भ' के परे होने पर और अन्त में 'ब' होता है। สพฺพสฺเสว สนฺตสทฺทสฺส สสทฺทาเทโส โหติ ภกาเร ปเร, อนฺเต จ พการาคโม โหติ. सम्पूर्ण 'सन्त' शब्द के स्थान पर 'स' शब्द का आदेश होता है 'भ' कार के परे होने पर, और अन्त में 'ब' कार का आगम होता है। จสทฺทคฺคหเณน [Pg.58] อภกาเรปิ สมาเส กฺวจิ สการาเทโส. สพฺภิ. 'च' शब्द के ग्रहण से 'भ' कार के न होने पर भी समास में कहीं 'स' कार का आदेश होता है। जैसे- 'सब्भि'। เภติ กึ? สนฺเตหิ, เสสํ คจฺฉนฺตสทฺทสมํ. 'भ' के परे होने पर ही क्यों? 'सन्तेहि', शेष 'गच्छन्त' शब्द के समान है। อตฺถิ ราช พฺรหฺม อตฺต สขสทฺทาทีนํ เภโท, ตเถว สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, ‘‘ราช สิ’’อิติ ฐิเต – 'राज', 'ब्रह्म', 'अत्त', 'सख' आदि शब्दों में भेद है, उसी प्रकार 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है, 'राज + सि' ऐसी स्थिति होने पर - ‘‘พฺรหฺมตฺตสขราชาทิโต’’ติ อธิกาโร. 'ब्रह्मत्तसखराजादितो' यह अधिकार सूत्र है। ๑๑๓. สฺยา จ. ११३. और 'सि' विभक्ति का 'आ' होता है। พฺรหฺม อตฺต สข ราชอิจฺเจวมาทิโต สิวจนสฺส อากาโร โหติ. อาทิสทฺเทน อาตุมาทิสทฺทโต จ. สรโลปาทิ. ราชา ติฏฺฐติ. 'ब्रह्म', 'अत्त', 'सख', 'राज' इत्यादि से परे 'सि' वचन का 'आकार' (आ) होता है। 'आदि' शब्द से 'आतुम' आदि शब्दों से भी। स्वर-लोप आदि होकर 'राजा तिट्ठति' (राजा खड़ा है) बनता है। ๑๑๔. โยนมาโน. ११४. 'यो' विभक्तियों का 'आनो' आदेश होता है। พฺรหฺมตฺตสขราชาทิโต โยนํ อาโนอาเทโส โหติ. ราชาโน ติฏฺฐนฺติ, โภ ราช โภ ราชา, ภวนฺโต ราชาโน. 'ब्रह्म', 'अत्त', 'सख', 'राज' आदि से परे 'यो' विभक्तियों का 'आनो' आदेश होता है। 'राजानो तिट्ठन्ति', 'भो राज', 'भो राजा', 'भवन्तो राजानो'। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' (विकल्प) की अनुवृत्ति होती है। ๑๑๕. พฺรหฺมตฺตสขราชาทิโต อมานํ. ११५. 'ब्रह्म', 'अत्त', 'सख', 'राज' आदि से परे 'अं' का 'आनं' होता है। พฺรหฺมาทีหิ ปรสฺส อํวจนสฺส อานํ โหติ วา. ราชานํ ปสฺส ราชํ วา, ราชาโน. 'ब्रह्म' आदि से परे 'अं' वचन का विकल्प से 'आनं' होता है। 'राजानं पस्स' या 'राजं', 'राजानो'। ‘‘สวิภตฺติสฺส, ราชสฺสา’’ติ จ วตฺตเต. 'सविभत्तिस्स' और 'राजस्स' की अनुवृत्ति होती है। ๑๑๖. นามฺหิ รญฺญา วา. ११६. 'ना' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से 'रञ्ञा' आदेश होता है। สพฺพสฺเสว ราชสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส รญฺญาอาเทโส โหติ วา นามฺหิ วิภตฺติมฺหิ. รญฺญา กตํ ราเชน วา. विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'राज' शब्द के स्थान पर 'ना' विभक्ति में विकल्प से 'रञ्ञा' आदेश होता है। 'रञ्ञा कतं' या 'राजेन'। ๑๑๗. ราชสฺส [Pg.59] ราชุ สุนํหิสุ จ. ११७. 'सु', 'नं' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'राज' का 'राजु' होता है। สพฺพสฺส ราชสทฺทสฺส ราชุอาเทโส โหติ สุ นํ หิอิจฺเจเตสุ วจเนสุ. จสทฺโท วิกปฺปนตฺโถ, ‘‘สุนํหิสุ จา’’ติ ทีโฆ, ราชูหิ ราชูภิ, ราเชหิ ราเชภิ วา. सम्पूर्ण 'राज' शब्द का 'सु', 'नं', 'हि' इन वचनों में 'राजु' आदेश होता है। 'च' शब्द विकल्प के अर्थ में है, 'सुनंहीसु च' से दीर्घ होकर 'राजुहि', 'राजुभि' या 'राजेहि', 'राजेभि' होता है। ‘‘สวิภตฺติสฺสา’’ติ อธิกาโร. 'सविभत्तिस्स' का अधिकार है। ๑๑๘. ราชสฺส รญฺโญราชิโน เส. ११८. 'से' (स) विभक्ति के परे होने पर 'राज' का 'रञ्ञो' और 'राजिनो' आदेश होता है। สพฺพสฺเสว ราชสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส รญฺโญ ราชิโนอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ เส วิภตฺติมฺหิ. รญฺโญ, ราชิโน เทติ. विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'राज' शब्द के स्थान पर 'से' विभक्ति में 'रञ्ञो' और 'राजिनो' ये आदेश होते हैं। 'रञ्ञो देति', 'राजिनो देति'। ‘‘ราชสฺสา’’ติ วตฺตเต. 'राजस्स' की अनुवृत्ति होती है। ๑๑๙. รญฺญํ นํ มฺหี วา. ११९. 'नं' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से 'रञ्ञं' आदेश होता है। สพฺพสฺเสว ราชสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส รญฺญํอาเทโส โหติ วา นํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. รญฺญํ ราชูนํ ราชานํ. विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'राज' शब्द के स्थान पर 'नं' विभक्ति में विकल्प से 'रञ्ञं' आदेश होता है। 'रञ्ञं', 'राजूनं', 'राजानं'। ปญฺจมิยํ – पञ्चमी विभक्ति में - ๑๒๐. อมฺหตุมฺหนฺตุราชพฺรหฺมตฺตสขสตฺถุปิตาทีหิ สฺมา นาว. १२०. 'अम्ह', 'तुम्ह', 'अन्त', 'राज', 'ब्रह्म', 'अत्त', 'सख', 'सत्थु', 'पितु' आदि से परे 'स्मा' का 'ना' के समान (अतिदेश) होता है। อมฺหตุมฺหนฺตุราชพฺรหฺมตฺตสขสตฺถุปิตุอิจฺเจวมาทีหิ สฺมาวจนํ นาว ทฏฺฐพฺพนฺติ สฺมาวจนสฺส นาภาวาติเทโส. อติเทโส ปน ฉพฺพิโธ. 'अम्ह', 'तुम्ह', 'अन्त', 'राज', 'ब्रह्म', 'अत्त', 'सख', 'सत्थु', 'पितु' इत्यादि से परे 'स्मा' वचन को 'ना' के समान समझना चाहिए, इस प्रकार 'स्मा' वचन का 'ना' भाव का अतिदेश होता है। अतिदेश छह प्रकार का होता है। วุตฺตญฺจ – और कहा गया है - ‘‘พฺยปเทโส นิมิตฺตญฺจ, ตํรูปํ ตํสภาวตา; สุตฺตญฺเจว ตถา การิ-ยาติเทโสติ ฉพฺพิโธ’’ติ. व्यपदेश, निमित्त, तद्रूप, तत्स्वभावता, सूत्र और कार्य-अतिदेश - ये छह प्रकार के अतिदेश हैं। ตตฺรายํ [Pg.60] พฺรหฺมตฺตสขาทีสุ ปาฐสามตฺถิยโต รูปาติเทโส. เสสํ ตติยาสมํ. वहाँ यह 'ब्रह्म', 'अत्त', 'सख' आदि शब्दों में पाठ-सामर्थ्य से रूप का अतिदेश (विस्तार) है। शेष तृतीय (प्रकरण) के समान है। รญฺญา อเปติ, ราชูหิ ราชูภิ, ราเชหิ ราเชภิ, รญฺโญ, ราชิโน สนฺตกํ, รญฺญํ ราชูนํ ราชานํ. राजा से दूर जाता है (राञ्ञा अपेति), राजाओं के द्वारा/से (राजूहि राजूभि, राजेहि राजेभि), राजा का (राञ्ञो, राजिनो सन्तंक), राजाओं का (राञ्ञं, राजूनां, राजानं)। ‘‘ราชสฺสา’’ติ วตฺตเต. 'राजस्स' (यह पद) अनुवृत्त होता है। ๑๒๑. สฺมึมฺหิ รญฺเญ ราชินิ. १२१. 'स्मिं' विभक्ति होने पर 'राञ्ञे' और 'राजिनि' रूप होते हैं। สพฺพสฺเสว ราชสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส รญฺเญราชินิอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ สฺมึมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. รญฺเญ, ราชินิ ปติฏฺฐิตํ, ราชูสุ ราเชสุ. 'स्मिं' विभक्ति होने पर विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'राज' शब्द के स्थान पर 'राञ्ञे' और 'राजिनि' ये आदेश होते हैं। राजा में प्रतिष्ठित (राञ्ञे, राजिनि पतिट्ठितं), राजाओं में (राजूसु, राजेसु)। พฺรหฺมสทฺทสฺส จ ค นา ส สฺมึสุ วิเสโส. พฺรหฺมา, พฺรหฺมาโน. 'ब्रह्म' शब्द के 'ग' (सम्बोधन), 'ना', 'स' और 'स्मिं' विभक्तियों में विशेष नियम हैं। ब्रह्मा (ब्रह्मा), बहुत से ब्रह्मा (ब्रह्मानो)। อาลปเน จ ‘‘เอ’’ติ วตฺตเต. और सम्बोधन में 'ए' अनुवृत्त होता है। ๑๒๒. พฺรหฺมโต คสฺส จ. १२२. 'ब्रह्म' शब्द से परे 'ग' (सम्बोधन) को भी। พฺรหฺมสทฺทโต คสฺส จ เอกาโร โหติ, จคฺคหณํ เอคฺคหณานุกฑฺฒนตฺถํ, โภ พฺรหฺเม, ภวนฺโต พฺรหฺมาโน, พฺรหฺมานํ พฺรหฺมํ, พฺรหฺมาโน. 'ब्रह्म' शब्द से परे 'ग' (सम्बोधन) को 'एकार' होता है, 'च' का ग्रहण 'ए' के ग्रहण को खींचने (अनुवृत्ति) के लिए है। हे ब्रह्म! (भो ब्रह्मे), हे ब्रह्माओ! (भवन्तो ब्रह्मानो), ब्रह्मा को (ब्रह्मानं, ब्रह्मं), ब्रह्माओं को (ब्रह्मानो)। วิปริณาเมน ‘‘พฺรหฺมสฺส, อนฺโต’’ติ จ วตฺตเต. विभक्ति-विपरिणाम के द्वारा 'ब्रह्मस्स' और 'अन्तो' (ब्रह्म शब्द का अन्त्य) अनुवृत्त होते हैं। ๑๒๓. อุตฺตํ สนาสุ. १२३. 'स' और 'ना' विभक्तियों के परे होने पर 'उ' (उकार) होता है। พฺรหฺมสทฺทสฺส อนฺโต อุตฺตมาปชฺชเต ส นาอิจฺเจเตสุ วจเนสุ. อุตฺตมิติ ภาวนิทฺเทโส กตฺถจิ อภาวทสฺสนตฺโถ. พฺรหฺมุนา, พฺรหฺเมหิ พฺรหฺเมภิ. 'स' और 'ना' इन वचनों (विभक्तियों) के परे होने पर 'ब्रह्म' शब्द का अन्त्य 'उ' भाव को प्राप्त होता है। 'उत्तमिति' यह भाव-निर्देश कहीं-कहीं इसके अभाव को दर्शाने के लिए है। ब्रह्मा के द्वारा (ब्रह्मुना), ब्रह्माओं के द्वारा (ब्रह्मेहि, ब्रह्मेभि)। สสฺมึ อุตฺเต กเต ‘‘อิวณฺณุวณฺณา ฌลา’’ติ ลสญฺญายํ – 'स' विभक्ति में 'उ' (उकार) हो जाने पर 'इवण्णुवण्णा झला' सूत्र से 'ल' संज्ञा होने पर - ๑๒๔. ฌลโต [Pg.61] สสฺส โน วา. १२४. 'झल' संज्ञक (इवर्ण और उवर्ण) से परे 'स' विभक्ति को विकल्प से 'नो' आदेश होता है। ฌลสญฺเญหิ อิวณฺณุวณฺเณหิ ปรสฺส สอิจฺเจตสฺส วจนสฺส โนอิจฺจาเทโส โหติ วา. พฺรหฺมุโน พฺรหฺมสฺส, พฺรหฺมานํ พฺรหฺมูนํ วา, อุตฺตมิติ โยควิภาเคน อญฺญตฺถาปิ อุตฺตํ. 'झल' संज्ञक इवर्ण और उवर्ण से परे 'स' इस वचन (विभक्ति) को विकल्प से 'नो' आदेश होता है। ब्रह्मा का (ब्रह्मुनो, ब्रह्मस्स), ब्रह्माओं का (ब्रह्मानं, ब्रह्मूनं वा)। 'उत्तमिति' इस योग-विभाग से अन्यत्र भी 'उ' (उकार) होता है। ปญฺจมิยํ นาภาวาติเทโส. พฺรหฺมุนา, พฺรหฺเมหิ พฺรหฺเมภิ, พฺรหฺมุโน พฺรหฺมสฺส, พฺรหฺมานํ พฺรหฺมูนํ วา. पंचमी विभक्ति में 'ना' भाव का अतिदेश होता है। ब्रह्मा से (ब्रह्मुना), ब्रह्माओं से (ब्रह्मेहि, ब्रह्मेभि), ब्रह्मा का (ब्रह्मुनो, ब्रह्मस्स), ब्रह्माओं का (ब्रह्मानं, ब्रह्मूनं वा)। ๑๒๕. พฺรหฺมโต ตุ สฺมึ นิ. १२५. 'ब्रह्म' शब्द से परे 'स्मिं' को 'नि' होता है। พฺรหฺมสทฺทโต สฺมึวจนสฺส นิ โหติ. ตุสทฺเทน กมฺมจมฺมมุทฺธาทิโต จ กฺวจิ. พฺรหฺมนิ, พฺรหฺเมสุ. 'ब्रह्म' शब्द से परे 'स्मिं' वचन को 'नि' होता है। 'तु' शब्द के ग्रहण से 'कम्म', 'चम्म', 'मुद्ध' आदि शब्दों से परे भी कहीं-कहीं (नि) होता है। ब्रह्मा में (ब्रह्मनि), ब्रह्माओं में (ब्रह्मेसु)। อตฺตสทฺทสฺส ตติยาทีสฺเวว วิเสโส. 'अत्त' (आत्मन्) शब्द की तृतीया आदि विभक्तियों में ही विशेषता है। อตฺตา, อตฺตาโน, โภ อตฺต โภ อตฺตา, ภวนฺโต อตฺตาโน, อตฺตานํ อตฺตํ, อตฺตาโน. आत्मा (अत्ता), आत्माएँ (अत्तानो), हे आत्मन्! (भो अत्त, भो अत्ता), हे आत्माओ! (भवन्तो अत्तानो), आत्मा को (अत्तानं, अत्तं), आत्माओं को (अत्तानो)। นามฺหิ ‘‘อกมฺมนฺตสฺส จา’’ติ เอตฺถ จสทฺเทน อตฺตนฺตสฺส อตฺตํ วา. อตฺตนา อตฺเตน วา. 'ना' विभक्ति होने पर 'अकम्मन्तस्स च' यहाँ 'च' शब्द से 'अत्त' शब्द के अन्त्य को विकल्प से 'अत्त' (अकारान्त) होता है। स्वयं के द्वारा (अत्तना, अत्तेन वा)। ๑๒๖. อตฺตนฺโต หิสฺมิมนตฺตํ. १२६. 'हि' विभक्ति परे होने पर 'अत्त' शब्द का अन्त्य 'अनत्त' भाव को प्राप्त होता है। อตฺตสทฺทสฺส อนฺโต อนตฺตมาปชฺชเต หิสฺมึ ปเร. อตฺตเนหิ อตฺตเนภิ. 'हि' विभक्ति परे होने पर 'अत्त' शब्द का अन्त्य 'अनत्त' भाव को प्राप्त होता है। आत्माओं के द्वारा (अत्तनेहि, अत्तनेभि)। ‘‘ตโต, อตฺตโต’’ติ จ วตฺตเต. 'ततो' और 'अत्ततो' (यह पद) अनुवृत्त होते हैं। ๑๒๗. สสฺส โน. १२७. 'स' विभक्ति को 'नो' होता है। ตโต อตฺตสทฺทโต สสฺส วิภตฺติสฺส โน โหติ. อตฺตโน, อตฺตานํ. उस 'अत्त' शब्द से परे 'स' विभक्ति को 'नो' होता है। स्वयं का (अत्तनो), स्वयं का/आत्माओं का (अत्तानं)। ๑๒๘. สฺมา [Pg.62] นา. १२८. 'स्मा' विभक्ति को 'ना' होता है। ตโต อตฺตสทฺทโต สฺมาวจนสฺส นา โหติ. อตฺตนา อเปติ. उस 'अत्त' शब्द से परे 'स्मा' वचन को 'ना' होता है। स्वयं से दूर जाता है (अत्तना अपेति)। นาภาวาติเทเสเนว สิทฺเธปิ อุตฺตรสุตฺเตน เอกโยคมกตฺวา ภินฺนโยคกรณํ อตฺถนฺตรวิญฺญาปนตฺถํ, เตน อตฺตนฺตตการสฺส รกาโร ชกาเร กฺวจิ. อตฺรโช อตฺตโช วา. อตฺตเนหิ อตฺตเนภิ, อตฺตโน, อตฺตานํ. 'ना' भाव के अतिदेश से ही सिद्ध होने पर भी, उत्तर सूत्र के साथ एक योग न करके भिन्न योग करना अन्य अर्थ के ज्ञापन के लिए है; उससे 'अत्त' शब्द के अन्त्य 'त' कार को 'ज' कार परे होने पर कहीं-कहीं 'र' कार होता है। जैसे- अत्रजो (आत्मज) या अत्तजो। आत्माओं से (अत्तनेहि, अत्तनेभि), स्वयं का (अत्तनो), आत्माओं का (अत्तानं)। ‘‘อตฺตโต’’ติ วตฺตเต. 'अत्ततो' अनुवृत्त होता है। ๑๒๙. ตโต สฺมึ นิ. १२९. उससे 'स्मिं' के स्थान पर 'नि' होता है। ตโต อตฺตสทฺทโต สฺมึวจนสฺส นิ โหติ. อตฺตนิ, อตฺเตสุ. उस 'अत्त' शब्द से 'स्मिं' विभक्ति का 'नि' होता है। जैसे- अत्तनि, अत्तेसु। สขสทฺทสฺส เภโท. สขา, สขาโน. 'सख' शब्द का रूप-भेद। सखा, सखानो। ‘‘โยน’’มิติ วตฺตเต. 'योनं' इसकी अनुवृत्ति आती है। ๑๓๐. สขโต จาโยโน. १३०. सख शब्द से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर 'आय' और 'नो' आदेश होते हैं। สขสทฺทโต โยนํ อาโย โนอาเทสา จ โหนฺติ. สขาโย. सख शब्द से 'यो' विभक्ति के स्थान पर 'आय' और 'नो' आदेश होते हैं। जैसे- सखायो। ๑๓๑. สขนฺตสฺสิ โนนานํเสสุ. १३१. 'नो', 'नां' और 'सु' विभक्तियों के परे होने पर सख शब्द के अन्त्य को इकार आदेश होता है। สขสทฺทนฺตสฺส อิการาเทโส โหติ โนนานํสอิจฺเจเตสุ ปเรสุ. สขิโน ติฏฺฐนฺติ. सख शब्द के अन्त्य को 'नो', 'नां' और 'सु' विभक्तियों के परे होने पर इकार आदेश होता है। जैसे- सखिनो तिट्ठन्ति। อาลปเน คสญฺญายํ – सम्बोधन में 'ग' संज्ञा होने पर – ๑๓๒. สขโต [Pg.63] คสฺเส วา. १३२. सख शब्द से परे 'ग' (सम्बोधन) के स्थान पर विकल्प से (अ, आ, इ, ई, ए) होते हैं। สขโต คสฺส อการ อาการ อิการ อีการเอการาเทสา โหนฺติ. วาสทฺเทน อญฺญสฺมาปิ กฺวจิ เอกาโร. ยถา – ภทฺทนฺเต อิเส อิติ. सख शब्द से परे 'ग' के स्थान पर अकार, आकार, इकार, ईकार और एकार आदेश होते हैं। 'वा' शब्द के ग्रहण से अन्य शब्दों से भी कहीं-कहीं एकार होता है। जैसे- भद्दन्ते, इसे। อ จ อา จ อิ จ อี จ เอ จาติปิ เอ, ปุพฺพสฺสรานํ กเมน โลโป. अ, आ, इ, ई और ए (आदेश होने पर), पूर्व स्वरों का क्रमशः लोप होता है। โภ สข โภ สขา โภ สขิ โภ สขี โภ สเข, ภวนฺโต สขาโน สขาโย สขิโน. हे सख, हे सखा, हे सखि, हे सखी, हे सखे; हे सखानो, सखायो, सखिनो। ‘‘สขนฺตสฺส, อาโร จา’’ติ จ วตฺตเต. 'सखन्तस्स' और 'आरो च' की अनुवृत्ति आती है। ๑๓๓. สุนมํสุ วา. १३३. 'सु', 'नं' और 'अं' विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से (आरो आदेश होता है)। สขนฺตสฺส อาโร โภติ วา สุนํ อํอิจฺเจเตสุ ปเรสุ. สขารํ สขานํ สขํ, สขาโน สขาโย สขิโน, สขินา. सख शब्द के अन्त्य को 'सु', 'नं' और 'अं' विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से 'आर' आदेश होता है। जैसे- सखारं, सखानं, सखं; सखानो, सखायो, सखिनो; सखिना। ‘‘สขนฺตสฺสา’’ติ วตฺตเต. 'सखन्तस्स' की अनुवृत्ति आती है। ๑๓๔. อาโร หิมฺหิ วา. १३४. 'हि' विभक्ति परे होने पर विकल्प से 'आर' आदेश होता है। สขนฺตสฺส อาโร โหติ วา หิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. สขาเรหิ สขาเรภิ, สเขหิ สเขภิ. सख शब्द के अन्त्य को 'हि' विभक्ति परे होने पर विकल्प से 'आर' आदेश होता है। जैसे- सखारेहि, सखारेभि; सखेहि, सखेभि। อิการาเทเส ‘‘ฌลโต สสฺส โน วา’’ติ โน. สขิโน สขิสฺส, สขารานํ สขีนํ. इकार आदेश होने पर 'झलतो सस्स नो वा' सूत्र से 'नो' आदेश होता है। जैसे- सखिनो, सखिस्स; सखारानं, सखीनं। สฺมาวจนสฺส นาภาโว. สขินา, สขาเรหิ สขาเรภิ สเขหิ สเขภิ, สขิโน สขิสฺส, สขารานํ สขีนํ. 'स्मा' विभक्ति का 'ना' आदेश होता है। जैसे- सखिना; सखारेहि, सखारेभि, सखेहि, सखेभि; सखिनो, सखिस्स; सखारानं, सखीनं। ‘‘สขโต’’ติ จ วตฺตเต. 'सखतो' की अनुवृत्ति आती है। ๑๓๕. สฺมิเม[Pg.64]. १३५. 'स्मिं' के स्थान पर 'ए' होता है। สขโต สฺมึวจนสฺส เอกาโร โหติ. นิจฺจตฺโถยมารมฺโภ. สเข, สขาเรสุ สเขสุ. सख शब्द से परे 'स्मिं' विभक्ति का एकार आदेश होता है। यह नियम नित्य है। जैसे- सखे; सखारेसु, सखेसु। อาตุมสทฺทสฺส ปฐมาทุติยาสุ อตฺตสทฺทสฺเสว รูปนโย. อาตุมา, อาตุมาโน, โภ อาตุม โภ อาตุมา, ภวนฺโต อาตุมาโน, อาตุมานํ อาตุมํ, อาตุมาโน, อาตุเมน อิจฺจาทิ ปุริสสมํ. आतुम शब्द की प्रथमा और द्वितीया विभक्तियों में अत्त शब्द के समान ही रूप प्रक्रिया है। जैसे- आतुमा, आतुमानो; हे आतुम, हे आतुमा; हे आतुमानो; आतुमानं, आतुमं; आतुमानो; आतुमेन इत्यादि 'पुरिस' शब्द के समान हैं। ปุมสทฺทสฺส เภโท. ปุม สิ, पुम शब्द का रूप-भेद। पुम + सि, ‘‘สวิภตฺติสฺสา’’ติ อธิกาโร. 'सविभत्तिस्स' का अधिकार है। ๑๓๖. ปุมนฺตสฺสา สิมฺหิ. १३६. 'सि' विभक्ति परे होने पर पुम शब्द के अन्त्य को (आकार आदेश होता है)। ปุมสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส อาการาเทโส โหติ สิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. อนฺตคฺคหเณน มฆวยุวาทีนมนฺตสฺส จ. ปุมา. विभक्ति सहित पुम शब्द के अन्त्य को 'सि' विभक्ति परे होने पर आकार आदेश होता है। 'अन्त' ग्रहण से मघवा, युवा आदि के अन्त्य को भी (आकार होता है)। जैसे- पुमा। ‘‘ปุมนฺตสฺสา’’ติ อธิกาโร. 'पुमन्तस्स' का अधिकार है। ๑๓๗. โยสฺวาโน. १३७. यो विभक्ति के परे होने पर 'आन' आदेश होता है। ปุมนฺตสฺส สวิภตฺติสฺส อาโนอาเทโส โหติ โยสุ วิภตฺตีสุ. ปุมาโน. यो विभक्तियों के परे होने पर विभक्ति सहित 'पुम' शब्द के अन्त्य को 'आनो' आदेश होता है। उदाहरण: पुमानो। ๑๓๘. อมาลปเนกวจเน. १३८. सम्बोधन एकवचन में 'अं' आदेश होता है। ปุมนฺตสฺส สวิภตฺติสฺส อํ โหติ อาลปเนกวจเน ปเร. เห ปุมํ, เห ปุมาโน, ปุมํ, ปุมาโน. सम्बोधन एकवचन परे होने पर विभक्ति सहित 'पुम' शब्द के अन्त्य को 'अं' होता है। हे पुमं, हे पुमानो, पुमं, पुमानो। ‘‘อา, วา’’ติ จ วตฺตเต. 'आ' और 'वा' (विकल्प से) की अनुवृत्ति होती है। ๑๓๙. อุ [Pg.65] นามฺหิ จ. १३९. और 'ना' विभक्ति में 'उ' होता है। ปุมนฺตสฺส อาอุอาเทสา โหนฺติ วา นามฺหิ วิภตฺติมฺหิ. จสทฺเทน ปุมกมฺมถามนฺตสฺส จุ’กาโร วา สสฺมาสุ. ปุมานา ปุมุนา ปุเมน วา. 'ना' विभक्ति में 'पुम' शब्द के अन्त्य को विकल्प से 'आ' और 'उ' आदेश होते हैं। 'च' शब्द से 'पुम' और 'कम्म' आदि के अन्त को 'स' और 'स्मा' विभक्तियों में भी 'उ' कार विकल्प से होता है। पुमाना, पुमुना या पुमेन। ‘‘อาเน’’ติ วตฺตเต. 'आने' की अनुवृत्ति होती है। ๑๔๐. หิวิภตฺติมฺหิ จ. १४०. और 'हि' विभक्ति में भी। ปุมนฺตสฺส หิวิภตฺติมฺหี จ อาเนอาเทโส โหติ. วิภตฺติคฺคหณํ สวิภตฺติคฺคหณนิวตฺตนตฺถํ. ปุมาเนหิ ปุมาเนภิ. 'हि' विभक्ति परे होने पर भी 'पुम' शब्द के अन्त्य को 'आने' आदेश होता है। यहाँ 'विभक्ति' का ग्रहण 'सविभक्ति' के ग्रहण की निवृत्ति के लिए है। पुमानेहि, पुमानेभि। จสทฺเทน ยุวมฆวาทีนมนฺตสฺส วา อานาเทโส โหติ สพฺพวิภตฺตีสุ. ‘‘อุ นามฺหิ จา’’ติ เอตฺถ จสทฺเทน ปุมนฺตสฺสุกาโร วา สสฺมาสุ วิภตฺตีสุ. ‘‘ฌลโต สสฺส โน วา’’ติ โน. ปุมุโน ปุมสฺส, ปุมานํ. 'च' शब्द से 'युव', 'मघव' आदि के अन्त को सभी विभक्तियों में विकल्प से 'आन' आदेश होता है। "उ नाम्हि च" यहाँ 'च' शब्द से 'पुम' शब्द के अन्त को 'स' और 'स्मा' विभक्तियों में विकल्प से 'उ' कार होता है। "झलतो सस्स नो वा" सूत्र से 'नो' होता है। पुमुनो, पुमस्स, पुमानं। ‘‘สฺมา, นา’’ติ วตฺตเต. 'स्मा' और 'ना' की अनुवृत्ति होती है। ๑๔๑. ฌลโต จ. १४१. और 'झ' और 'ल' से परे। ฌลอิจฺเจเตหิ สฺมาวจนสฺส นา โหติ. จคฺคหณํ กฺวจิ นิวตฺตนตฺถํ. ปุมานา ปุมุนา ปุมา ปุมสฺมา ปุมมฺหา, ปุมาเนหิ ปุมาเนภิ ปุเมหิ ปุเมภิ, ปุมุโน ปุมสฺส, ปุมานํ. 'झ' और 'ल' संज्ञक वर्णों से परे 'स्मा' विभक्ति को 'ना' होता है। 'च' का ग्रहण कहीं निवृत्ति के लिए है। पुमाना, पुमुना, पुमा, पुमस्मा, पुमम्हा; पुमानेहि, पुमानेभि, पुमेहि, पुमेभि; पुमुनो, पुमस्स; पुमानं। ๑๔๒. อาเน สฺมึมฺหิ วา. १४२. 'स्मिं' विभक्ति में विकल्प से 'आने' होता है। ปุมนฺตสฺส สวิภตฺติสฺส อาเนอาเทโส โหติ วา สฺมึมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. ปุมาเน ปุเม ปุมสฺมึ ปุมมฺหิ. 'स्मिं' विभक्ति परे होने पर विभक्ति सहित 'पुम' शब्द के अन्त्य को विकल्प से 'आने' आदेश होता है। पुमाने, पुमे, पुमस्मिं, पुमम्हि। ๑๔๓. สุสฺมิมา [Pg.66] วา. १४३. 'सु' विभक्ति में विकल्प से 'आ' होता है। ปุมนฺตสฺส สุอิจฺเจตสฺมึ ปเร อาอาเทโส โหติ วา. ปุมาสุ ปุเมสุ. 'सु' विभक्ति परे होने पर 'पुम' शब्द के अन्त्य को विकल्प से 'आ' आदेश होता है। पुमासु, पुमेसु। ยุวาทีสุ ‘‘ยุว สิ’’ อิตีธ – 'युव' आदि शब्दों में, जैसे "युव + सि" यहाँ - ‘‘ปุมนฺตสฺสา สิมฺหี’’ติ เอตฺถ อนฺตคฺคหเณน อากาโร, ‘‘หิวิภตฺติมฺหิ จา’’ติ สุตฺเต จสทฺเทน อานาเทโส จ. "पुमन्तस्सा सिम्हि" यहाँ 'अन्त' ग्रहण से 'आ' कार होता है, और "हिविभत्तिम्हि च" सूत्र में 'च' शब्द से 'आन' आदेश होता है। ยุวา ยุวาโน, ยุวานา ยุวา, เห ยุว เห ยุวา เห ยุวาน เห ยุวานา, ภวนฺโต ยุวานา, ยุวานํ ยุวํ, ยุวาเน ยุเว. युवा, युवानो; युवाना, युवा; हे युव, हे युवा, हे युवान, हे युवाना; भवन्तो युवाना; युवानं, युवं; युवाने, युवे। ‘‘อกมฺมนฺตสฺส จา’’ติ เอตฺถ จสทฺเทน ยุวมฆวาทีนมนฺตสฺส อา โหติ วา นาสุอิจฺเจเตสูติ อาตฺตํ. "अकम्मन्तस्स च" यहाँ 'च' शब्द से 'युव', 'मघव' आदि के अन्त को 'ना' और 'सु' आदि विभक्तियों में विकल्प से 'आ' होता है, यह 'आत्त्व' (आ-कार होना) है। ยุวานา ยุเวน ยุวาเนน วา, ยุวาเนหิ ยุวาเนภิ ยุเวหิ ยุเวภิ, ยุวานสฺส ยุวสฺส, ยุวานานํ ยุวานํ, ยุวานา ยุวานสฺมา ยุวานมฺหา, ยุวาเนหิ ยุวาเนภิ ยุเวหิ ยุเวภิ, ยุวานสฺส ยุวสฺส, ยุวานานํ ยุวานํ, ยุวาเน ยุวานสฺมึ ยุวานมฺหิ ยุเว ยุวมฺหิ ยุวสฺมึ, ยุวาเนสุ ยุวาสุ ยุเวสุ. युवाना, युवेन या युवानेन; युवानेहि, युवानेभि, युवेहि, युवेभि; युवानस्स, युवस्स; युवानानं, युवानं; युवाना, युवानस्मा, युवानम्हा; युवानेहि, युवानेभि, युवेहि, युवेभि; युवानस्स, युवस्स; युवानानं, युवानं; युवाने, युवानस्मिं, युवानम्हि, युवे, युवम्हि, युवस्मिं; युवानेसु, युवासु, युवेसु। เอวํ มฆวา มฆวาโน, มฆวานา อิจฺจาทิ ยุวสทฺทสมํ. इसी प्रकार मघवा, मघवानो, मघवाना इत्यादि 'युव' शब्द के समान हैं। อการนฺตํ. अकारान्त (शब्द समाप्त)। อาการนฺโต ปุลฺลิงฺโค สาสทฺโท. आकारान्त पुल्लिंग 'सा' (कुत्ता) शब्द। สา สิ, สิโลโป, สา สุนโข. सा + सि, 'सि' का लोप, 'सा' (कुत्ता)। พหุวจเน – बहुवचन में - ๑๔๔. อโฆ [Pg.67] รสฺสเมกวจนโยสฺวปิ จ. १४४. 'अघ' संज्ञक को छोड़कर, एकवचन और 'यो' विभक्तियों में भी ह्रस्व होता है। ฆสญฺญกอาการวชฺชิโต ลิงฺคสฺสนฺโต สโร รสฺสมาปชฺชเต เอกวจเนสุ โยสุ จ ปเรสูติ รสฺสตฺตํ. อปิคฺคหณํ สิมฺหิ นิวตฺตนตฺถํ. เสสํ เนยฺยํ. 'घ' संज्ञक आकार को छोड़कर, प्रातिपदिक के अन्त में स्थित स्वर को एकवचन और 'यो' विभक्तियों के परे होने पर ह्रस्व होता है। 'अपि' का ग्रहण 'सि' विभक्ति में (ह्रस्व की) निवृत्ति के लिए है। शेष (रूपों को) जान लेना चाहिए। สา ติฏฺฐนฺติ, เห ส เห สา, เห สา, สํ, เส, เสน, สาหิ สาภิ, สสฺส สาย, สานํ, สา สสฺมา สมฺหา, สาหิ สาภิ, สสฺส, สานํ, เส สสฺมึ สมฺหิ, สาสุ. वे (स्त्रीलिंग) इस प्रकार रहते हैं: हे स, हे सा, हे सा, सं, से, सेन, साहि साभि, सस्स साय, सानं, सा सस्मा सम्हा, साहि साभि, सस्स, सानं, से सस्मिं सम्हि, सासु। เอวํ ปจฺจกฺขธมฺมา คาณฺฑีวธนฺวาปภุตโย. इसी प्रकार प्रत्यक्षधर्मा, गाण्डीवधन्वा आदि के रूप होते हैं। อาการนฺตํ. आकारान्त (समाप्त)। อิการนฺโต ปุลฺลิงฺโค อคฺคิสทฺโท. สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, อคฺคิ สิ, इकारान्त पुल्लिंग 'अग्गि' शब्द। 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होने पर: अग्गि + सि। ‘‘อนฺโต, สิมฺหิ, วา’’ติ จ วตฺตเต. ‘अन्तो’, ‘सिम्हि’, और ‘वा’ की अनुवृत्ति होती है। ๑๔๕. อคฺคิสฺสินิ. १४५. अग्गिस्सिनि। อคฺคิสฺส อนฺโต อินิ โหติ วา สิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. ‘‘เสสโต โลปํ คสิปี’’ติ สิโลโป. อคฺคินิ อคฺคิ. 'सि' विभक्ति के परे होने पर 'अग्गि' के अन्त्य (इ) को विकल्प से 'इनि' आदेश होता है। 'सेसतो लोपं गसिपि' सूत्र से 'सि' का लोप हो जाता है। (रूप बनते हैं:) अग्गिनि, अग्गि। พหุวจเน ‘‘อิวณฺณุวณฺณา ฌลา’’ติ ฌลสญฺญายํ – बहुवचन में 'इवण्णुवण्णा झला' सूत्र से 'झल' संज्ञा होने पर — ‘‘ฌลโต, วา’’ติ จ วตฺตเต. ‘झलतो’ और ‘वा’ की अनुवृत्ति होती है। ๑๔๖. ฆปโต จ โยนํ โลโป. १४६. घपत और झल से परे 'यो' विभक्तियों का लोप होता है। ฆปสญฺเญหิ อิตฺถิวาจเกหิ อาการิวณฺณุวณฺเณหิ, ฌลสญฺเญหิ จ ปเรสํ โยวจนานํ โลโป โหติ วา. ววตฺถิตวิภาสายํ. घ-संज्ञक स्त्रीलिंग आकारान्त, इकारान्त, ईकारान्त, उकारान्त, ऊकारान्त शब्दों से और झल-संज्ञक शब्दों से परे 'यो' विभक्तियों का विकल्प से लोप होता है। यह व्यवस्थित विभाषा है। ๑๔๗. โยสุ [Pg.68] กตนิการโลเปสุ ทีฆํ. १४७. 'यो' विभक्तियों के लोप होने पर या अकार (अ) आदेश होने पर दीर्घ होता है। ลิงฺคสฺสนฺตภูตา สพฺเพ รสฺสสรา โยสุ กตนิการโลเปสุ ทีฆมาปชฺชนฺเต. กตา นิการโลปา เยสํ เต กตนิการโลปา. อคฺคี. शब्द के अन्त में स्थित सभी ह्रस्व स्वर 'यो' विभक्तियों के लोप होने पर या अकार आदेश होने पर दीर्घ हो जाते हैं। जिनका अकार आदेश या लोप कर दिया गया है, वे 'कतनिकारलोप' कहलाते हैं। (रूप:) अग्गी। ‘‘ปญฺจาทีนมตฺต’’นฺติ อิโต ‘‘อตฺต’’มิติ วตฺตเต. ‘पञ्चादीनमत्तं’ इस सूत्र से ‘अत्तं’ की अनुवृत्ति होती है। ๑๔๘. โยสฺวกตรสฺโส โฌ. १४८. योसुकतरस्सो झो। โยสุ ปเรสุ อกตรสฺโส โฌ อตฺตมาปชฺชเต. อคฺคโย. 'यो' विभक्तियों के परे होने पर, जहाँ ह्रस्व नहीं किया गया है, वहाँ 'झ' (इ, ई, उ, ऊ) को 'अ' (अकार) आदेश होता है। (रूप:) अग्गयो। โฌติ กึ? รตฺติโย. ‘झ’ क्यों कहा? (ताकि स्त्रीलिंग में न हो, जैसे:) रत्तियो। อาลปเนเปวํ. เห อคฺคิ, เห อคฺคี เห อคฺคโย. सम्बोधन में भी इसी प्रकार होता है। हे अग्गि, हे अग्गी, हे अग्गयो। ทุติเยกวจเน ปุพฺพสฺสรโลเป สมฺปตฺเต – द्वितीया एकवचन में पूर्व स्वर के लोप की प्राप्ति होने पर — ๑๔๙. อํ โม นิคฺคหีตํ ฌลเปหิ. १४९. अं मो निग्गहीतं झलपेहि। ฌลปอิจฺเจเตหิ ปรสฺส อํวจนสฺส, มการสฺส จ นิคฺคหีตํ อาเทโส โหติ. อคฺคึ. झल और प संज्ञक शब्दों से परे 'अं' विभक्ति और 'म' कार को निग्गहीत (अनुस्वार) आदेश होता है। (रूप:) अग्गिं। อคฺคี อคฺคโย, อคฺคินา, อคฺคีหิ อคฺคีภิ, ‘‘สุนํหิสุ จา’’ติ เอตฺถ จคฺคหเณน กตฺถจิ ทีฆาภาโว. อคฺคิหิ อคฺคิภิ. अग्गी, अग्गयो; अग्गिना; अग्गीहि, अग्गीभि। 'सुनंहीसु चा' इस सूत्र में 'च' ग्रहण से कहीं-कहीं दीर्घ नहीं होता है। (जैसे:) अग्गिहि, अग्गिभि। ‘‘ฌลโต สสฺส โน วา’’ติ โน. อคฺคิโน อคฺคิสฺส, อคฺคีนํ. ‘झलतो सस्स नो वा’ सूत्र से ‘नो’ आदेश होता है। (रूप:) अग्गिनो, अग्गिस्स; अग्गीनं। ‘‘สฺมา นา’’ติ วตฺตมาเน ‘‘ฌลโต จา’’ติ วิกปฺเปน นา. อคฺคินา อคฺคิสฺมา อคฺคิมฺหา, อคฺคีหิ อคฺคีภิ อคฺคิหิ อคฺคิภิ, อคฺคิโน อคฺคิสฺส, อคฺคีนํ อคฺคินํ, อคฺคิมฺหิ อคฺคิสฺมึ, อคฺคีสุ อคฺคิสุ. ‘स्मा ना’ की अनुवृत्ति होने पर ‘झलतो चा’ सूत्र से विकल्प से ‘ना’ आदेश होता है। (रूप:) अग्गिना, अग्गिस्मा, अग्गिम्हा; अग्गीहि, अग्गीभि, अग्गिहि, अग्गिभि; अग्गिनो, अग्गिस्स; अग्गीनं, अग्गिनं; अग्गिम्हि, अग्गिस्मिं; अग्गीसु, अग्गिसु। เอวมญฺเญปิ – इसी प्रकार अन्य शब्द भी हैं — โชติ ปาณิ คณฺฐิ มุฏฺฐิ, กุจฺฉิ วตฺถิ สาลิ วีหิ; พฺยาธิ โอธิ โพธิ สนฺธิ, ราสิ เกสิ สาติ ทีปิ. जोति (ज्योति), पाणि (हाथ), गण्ठि (गाँठ), मुट्ठि (मुट्ठी), कुच्छि (पेट), वत्थि (बस्ति), सालि (धान), वीहि (धान); ब्याधि, ओधि (सीमा), बोधि, सन्धि, रासि (राशि), केसि (केश), साति (सुख), दीपि (तेंदुआ)। อิสิ [Pg.69] มุนิ มณิ ธนิ ยติ คิริ รวิ กวิ,กปิ อสิ มสิ นิธิ วิธิ อหิ กิมิ ปติ; หริ อริ ติมิ กลิ พลิ ชลธิ คหปติ,อุรุธิติ วรมติ นิรุปธิ อธิปติ. इसि (ऋषि), मुनि, मणि, धनि (धनी), यति, गिरि (पर्वत), रवि (सूर्य), कवि, कपि (बन्दर), असि (तलवार), मसि (स्याही), निधि, विधि, अहि (साँप), किमि (कीड़ा), पति; हरि, अरि (शत्रु), तिमि (मछली), कलि, बलि, जलधि (समुद्र), गहपति (गृहपति), उरुधिति, वरमति, निरुपधि, अधिपति। อญฺชลิ สารถิ อติถิ สมาธิ อุทธิปฺปภุตโย. अञ्जलि, सारथि, अतिथि, समाधि, उदधि आदि। อิการนฺตํ. इकारान्त (समाप्त)। อีการนฺโต ปุลฺลิงฺโค ทณฺฑีสทฺโท. ईकारान्त पुल्लिंग 'दण्डी' शब्द। ‘‘ทณฺฑี สิ’’ อิตีธ – यहाँ 'दण्डी सि' में - ‘‘อโฆ รสฺสเมกวจนโยสฺวปิ จา’’ติ รสฺสตฺเต สมฺปตฺเต เอตฺเถวาปิคฺคหเณน สิสฺมึ ตทภาเว สิทฺเธ นิยมตฺถมาห. 'अघो रस्समेकवचनयोस्वपि च' इस सूत्र से ह्रस्व प्राप्त होने पर, यहाँ 'अपि' के ग्रहण से 'सि' प्रत्यय में उसके अभाव के सिद्ध होने पर नियम के लिए कहा गया है। ‘‘รสฺส’’นฺติ วตฺตมาเน – 'रस्स' की अनुवृत्ति होने पर - ๑๕๐. น สิสฺมิมนปุํสกานิ. १५०. न सिस्मिमनपुंसकानी। สิสฺมึ นปุํสกวชฺชิตานิ ลิงฺคานิ น รสฺสมาปชฺชนฺเตติ รสฺสตฺตาภาโว, สิโลโป. ทณฺฑี ติฏฺฐติ. 'सि' प्रत्यय परे होने पर नपुंसक लिंग को छोड़कर अन्य लिंग ह्रस्व नहीं होते हैं, इस प्रकार ह्रस्व का अभाव और 'सि' का लोप होता है। 'दण्डी तिट्ठति'। อนปุํสกานีติ กึ? สุขการิ ทานํ. 'अनपुंसकानी' क्यों? 'सुखकारि दानं'। เอตฺถ จ – और यहाँ - วิสทาวิสทาการ-โวหาโรภยมุตฺตกา; ปุมาทิชานเน เหตุ-ภาวโต ลิงฺคมีริตา. स्पष्ट और अस्पष्ट आकार के व्यवहार से मुक्त, पुल्लिंग आदि के ज्ञान के हेतु होने के कारण 'लिंग' कहे गए हैं। โยโลเป ทณฺฑี ติฏฺฐนฺติ. 'यो' का लोप होने पर 'दण्डी तिट्ठन्ति'। อิตรตฺร ‘‘อโฆ รสฺส’’มิจฺจาทินา รสฺสตฺเต กเต – अन्यत्र 'अघो रस्स' इत्यादि से ह्रस्व करने पर - ‘‘ฌโต, กตรสฺสา’’ติ จ วตฺตเต. 'झतो' और 'कतरस्सा' की अनुवृत्ति होती है। ๑๕๑. โยนํ [Pg.70] โน. १५१. योनं नो। สพฺเพสํ โยนํ สาลปนานํ ฌโต กตรสฺสา ปเรสํ โนอิจฺจาเทโส โหติ. ทณฺฑิโน ติฏฺฐนฺติ. सम्बोधन सहित सभी 'यो' प्रत्ययों के स्थान पर, 'झ' संज्ञक और ह्रस्व किए गए वर्णों से परे 'नो' आदेश होता है। 'दण्डिनो तिट्ठन्ति'। กตรสฺสาติ กึ? อคฺคโย. 'कतरस्सा' क्यों? 'अग्गयो'। อธิการํ วินา ‘‘โยนํ,โน’’ติ โยควิภาคโต; กฺวจิ อกตรสฺสาปิ,โน สารมติโน ยถา. अधिकार के बिना 'योनं नो' इस योग-विभाग से कहीं-कहीं बिना ह्रस्व किए भी 'नो' होता है, जैसे 'सारमतिनो'। อาลปเน ‘‘เค’’ติ วตฺตเต. सम्बोधन में 'गे' की अनुवृत्ति होती है। ๑๕๒. ฌลปา รสฺสํ. १५२. झलपा रस्सं। ฌลปอิจฺเจเต รสฺสมาปชฺชนฺเต เค ปเร. โภ ทณฺฑิ. 'झ', 'ल' और 'प' संज्ञक वर्ण 'गे' परे होने पर ह्रस्व होते हैं। 'भो दण्डि'। ‘‘อโฆ รสฺส’’นฺติอาทินาว สิทฺเธปิ รสฺสตฺเต ปุนารมฺโภ นิยมตฺโถ, เตน ‘‘โภ โค’’ติอาทีสุ น ภวติ. ทณฺฑี ทณฺฑิโน. 'अघो रस्स' इत्यादि से ह्रस्व सिद्ध होने पर भी पुनः आरम्भ नियम के लिए है, जिससे 'भो गो' इत्यादि में नहीं होता है। 'दण्डी', 'दण्डिनो'। ทุติยายํ รสฺสตฺเต กเต ‘‘อ’’มิติ วตฺตเต, ‘‘ฆปโต สฺมึ ยํ วา’’ติ อิโต มณฺฑูกคติยา ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. द्वितीया में ह्रस्व करने पर 'अं' की अनुवृत्ति होती है, 'घपतो स्मिं यं वा' यहाँ से मण्डूकगति से 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๑๕๓. นํ ฌโต กตรสฺสา. १५३. नं झतो कतरस्सा। ฌโต กตรสฺสา ปรสฺส อํวจนสฺส นํ โหติ วา. ทณฺฑินํ ทณฺฑึ, ทณฺฑี ทณฺฑิโน, ทณฺฑินา, ทณฺฑีหิ ทณฺฑีภิ, ทณฺฑิโน ทณฺฑิสฺส, ทณฺฑีนํ. 'झ' संज्ञक और ह्रस्व किए गए वर्णों से परे 'अं' वचन के स्थान पर विकल्प से 'नं' होता है। 'दण्डिनं', 'दण्डिं', 'दण्डी', 'दण्डिनो', 'दण्डिना', 'दण्डीहि', 'दण्डीभि', 'दण्डिनो', 'दण्डिस्स', 'दण्डीनं'। ‘‘ฌลโต จา’’ติ นา. ทณฺฑินา ทณฺฑิสฺมา ทณฺฑิมฺหา, ทณฺฑีหิ ทณฺฑีภิ, ทณฺฑิโน ทณฺฑิสฺส, ทณฺฑีนํ. 'झलतो च' से 'ना' होता है। 'दण्डिना', 'दण्डिस्मा', 'दण्डिम्हा', 'दण्डीहि', 'दण्डीभि', 'दण्डिनो', 'दण्डिस्स', 'दण्डीनं'। ‘‘ฌโต, กตรสฺสา’’ติ จ วตฺตเต, ปุเร วิย ‘‘วา’’ติ จ. 'झतो' और 'कतरस्सा' की अनुवृत्ति होती है, और पहले की तरह 'वा' की भी। ๑๕๔. สฺมึ [Pg.71] นิ. १५४. स्मिं नि। ฌโต กตรสฺสา ปรสฺส สฺมึวจนสฺส นิอิจฺจาเทโส โหติ วา. ทณฺฑินิ ทณฺฑิสฺมึ ทณฺฑิมฺหิ, ทณฺฑีสุ. 'झ' संज्ञक और ह्रस्व किए गए वर्णों से परे 'स्मिं' वचन के स्थान पर विकल्प से 'नि' आदेश होता है। 'दण्डिनि', 'दण्डिस्मिं', 'दण्डिम्हि', 'दण्डीसु'। เอวมญฺญานิปิ – इसी प्रकार अन्य भी - ธมฺมี สงฺฆี ญาณี หตฺถี, จกฺกี ปกฺขี ทาฐี รฏฺฐี; ฉตฺตี มาลี วมฺมี โยคี, ภาคี โภคี กามี สามี. धम्मी, संघी, ञाणी, हत्थी, चक्की, पक्खी, दाठी, रट्ठी; छत्ती, माली, वम्मी, योगी, भागी, भोगी, कामी, सामी। ธชี คณี สสี กุฏฺฐี, ชฏี ยานี สุขี สิขี; ทนฺตี มนฺตี กรี จาคี, กุสลี มุสลี พลี. धजी, गणी, ससी, कुट्ठी, जटी, यानी, सुखी, सिखी; दन्ती, मन्ती, करी, चागी, कुसली, मुसली, बली। ปาปการี สตฺตุฆาตี, มาลฺยการี ทีฆชีวี; ธมฺมจารี สีฆยายี, สีหนาที ภูมิสายี – पापकारी, सत्तुघाती, माल्यकारी, दीर्घजीवी; धम्मचारी, सीघयायी, सीहनादी, भूमिसायी - อิจฺจาทีนิ อีการนฺตนามานิ. इत्यादि ईकारान्त नाम हैं। คามณีสทฺทสฺส ตุ สตฺตมิยํ เภโท. 'गामणी' शब्द का तो सप्तमी विभक्ति में भेद होता है। คามณี, คามณี คามณิโน, โภ คามณิ, โภนฺโต คามณี โภนฺโต คามณิโน, คามณินํ คามณึ, คามณี คามณิโน. गामणी, गामणी गामणिनो, भो गामणि, भोन्तो गामणी भोन्तो गामणिनो, गामणिनं गामणिं, गामणी गामणिनो। เสสํ ทณฺฑีสมํ. นิอาเทสาภาโวว วิเสโส. เอวํ เสนานี สุธีปฺปภุตโย. शेष 'दण्डी' शब्द के समान है। 'नि' आदेश का अभाव ही विशेष है। इसी प्रकार सेनानी, सुधी आदि। อีการนฺตํ. ईकारान्त। อุการนฺโต ปุลฺลิงฺโค ภิกฺขุสทฺโท. उकारान्त पुल्लिंग 'भिक्खु' शब्द। ตเถว ภิกฺขุสทฺทโต สิ, สิโลโป. โส ภิกฺขุ. वैसे ही 'भिक्खु' शब्द से 'सि' प्रत्यय होने पर 'सि' का लोप हो जाता है। वह 'भिक्खु' (भिक्षु)। พหุวจเน ‘‘ฆปโต จ โยนํ โลโป’’ติ โยโลโป, ‘‘โยสุ กต’’อิจฺจาทินา ทีโฆ. เต ภิกฺขู. बहुवचन में 'घपतो च योनं लोपो' सूत्र से 'यो' का लोप होता है, और 'योसु कत' इत्यादि सूत्र से दीर्घ होता है। वे 'भिक्खू' (भिक्षुगण)। โลปาภาเว ‘‘วา, โยน’’นฺติ จ วตฺตเต. लोप के अभाव में 'वा' और 'योनं' की अनुवृत्ति होती है। ๑๕๕. ลโต [Pg.72] โวกาโร จ. १५५. 'ल' संज्ञक से परे 'वो' कार भी होता है। ลสญฺญโต ปเรสํ โยวจนานํ โวการาเทโส โหติ วา. การคฺคหเณน โยนํ โน จ โหติ. จสทฺทคฺคหณํ กตฺถจิ นิวตฺตนตฺถํ. อถ วา จคฺคหณํ โนคฺคหณานุวตฺตนตฺถํ, เตน ชนฺตุสพฺพญฺญูอาทิโต โยนํ โน จ โหติ. วาสทฺโท ววตฺถิตวิภาสตฺโถ. เตน – 'ल' संज्ञक से परे 'यो' वचनों के स्थान पर विकल्प से 'वो' आदेश होता है। 'कार' ग्रहण से 'यो' के स्थान पर 'नो' भी होता है। 'च' शब्द का ग्रहण कहीं निवृत्ति के लिए है। अथवा 'च' का ग्रहण 'नो' के ग्रहण की अनुवृत्ति के लिए है, जिससे 'जन्तु', 'सब्बञ्ञू' आदि से परे 'यो' के स्थान पर 'नो' भी होता है। 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। उससे — ภิกฺขุปฺปภุติโต นิจฺจํ, โว โยนํ เหตุอาทิโต; วิภาสา น จ โว โน จ, อมุปฺปภุติโต ภเว. 'भिक्खु' आदि से 'यो' के स्थान पर 'वो' नित्य होता है, 'हेतु' आदि से 'वो' होता है; 'अमु' आदि से विकल्प से न 'वो' और न 'नो' होता है। ‘‘อตฺตํ, อกตรสฺโส’’ติ จ วตฺตเต. 'अत्तं' और 'अकतरस्सो' की अनुवृत्ति होती है। ๑๕๖. เวโวสุ โล จ. १५६. 'वे' और 'वो' परे होने पर 'ल' (ह्रस्व स्वर) को 'अ' कार भी होता है। เว โวอิจฺเจเตสุ จ ปเรสุ อกตรสฺโส โล อตฺตมาปชฺชเต. ภิกฺขโว, โภ ภิกฺขุ, ภวนฺโต ภิกฺขู. 'वे' और 'वो' इनके परे होने पर जिसका ह्रस्व नहीं किया गया है ऐसा 'ल' (ह्रस्व स्वर) 'अ' भाव को प्राप्त होता है। भिक्खवो, भो भिक्खु, भवन्तो भिक्खू। โลปาภาเว – लोप के अभाव में — ๑๕๗. อกตรสฺสา ลโต ยฺวาลปนสฺส เวโว. १५७. जिसका ह्रस्व नहीं किया गया है ऐसे 'ल' (ह्रस्व स्वर) से परे सम्बोधन के 'यो' के स्थान पर 'वे' और 'वो' होते हैं। อกตรสฺสา ลโต ปรสฺส อาลปเน วิหิตสฺส โยอิจฺเจตสฺส เว โวอาเทสา โหนฺติ. อตฺตํ. ภวนฺโต ภิกฺขเว ภิกฺขโว. ‘‘อํ โม นิคฺคหีตํ ฌลเปหี’’ติ นิคฺคหีตํ. जिसका ह्रस्व नहीं किया गया है ऐसे 'ल' (ह्रस्व स्वर) से परे सम्बोधन में विहित 'यो' के स्थान पर 'वे' और 'वो' आदेश होते हैं। 'अ' भाव होता है। भवन्तो भिक्खवे, भिक्खवो। 'अं मो निग्गहीतं झलपेहि' सूत्र से निग्गहीत होता है। ภิกฺขุํ, ภิกฺขู ภิกฺขโว, ภิกฺขุนา, ภิกฺขูหิ ภิกฺขูภิ ภิกฺขุหิ ภิกฺขุภิ, ภิกฺขุโน ภิกฺขุสฺส, ภิกฺขูนํ [Pg.73] ภิกฺขุนํ, ภิกฺขุนา ภิกฺขุสฺมา ภิกฺขุมฺหา, ภิกฺขูหิ ภิกฺขูภิ ภิกฺขุหิ ภิกฺขุภิ, ภิกฺขุโน ภิกฺขุสฺส, ภิกฺขูนํ ภิกฺขุนํ, ภิกฺขุมฺหิ ภิกฺขุสฺมึ, ภิกฺขูสุ ภิกฺขุสุ. भिक्खुं, भिक्खू भिक्खवो, भिक्खुना, भिक्खूहि भिक्खूभि भिक्खुहि भिक्खुभि, भिक्खुनो भिक्खुस्स, भिक्खूनं भिक्खुनं, भिक्खुना भिक्खुस्मा भिक्खुम्हा, भिक्खूहि भिक्खूभि भिक्खुहि भिक्खुभि, भिक्खुनो भिक्खुस्स, भिक्खूनं भिक्खुनं, भिक्खुम्हि भिक्खुस्मिं, भिक्खूसु भिक्खुसु। เอวํ เสตุ เกตุ ราหุ ภานุ ปงฺคุ อุจฺฉุ เวฬุ มจฺจุ สินฺธุ พนฺธุ เนรุ เมรุ สตฺตุ การุ เหตุ ชนฺตุ รุรุ ปฏุ อิจฺจาทโย. इसी प्रकार सेतु, केतु, राहु, भानु, पङ्गु, उच्छु, वेळु, मच्चु, सिन्धु, बन्धु, नेरु, मेरु, सत्तु, कारु, हेतु, जन्तु, रुरु, पटु इत्यादि के रूप होते हैं। เหตุชนฺตุสทฺทานํ ปฐมาทุติยาสุ วิเสโส. 'हेतु' और 'जन्तु' शब्दों के प्रथमा और द्वितीया विभक्तियों में विशेष होता है। เหตุ, เหตู เหตโว เหตุโย, โภ เหตุ, โภนฺโต เหตู เหตเว เหตโว, เหตุํ, เหตู เหตโว เหตุโย. เสสํ ภิกฺขุสมํ. हेतु, हेतू हेतवो हेतुयो, भो हेतु, भोन्तो हेतू हेतवे हेतवो, हेतुं, हेतू हेतवो हेतुयो। शेष 'भिक्खु' के समान है। ชนฺตุ, ชนฺตู ชนฺตโว. การคฺคหเณน โยนํ โน จ โหติ. ชนฺตุโน ชนฺตุโย, โภ ชนฺตุ, ชนฺตู ชนฺตเว ชนฺตโว, ชนฺตุํ, ชนฺตู ชนฺตโว ชนฺตุโน ชนฺตุโย อิจฺจาทิ. जन्तु, जन्तू जन्तवो। 'कार' ग्रहण से 'यो' के स्थान पर 'नो' भी होता है। जन्तुनो जन्तुयो, भो जन्तु, जन्तू जन्तवे जन्तवो, जन्तुं, जन्तू जन्तवो जन्तुनो जन्तुयो इत्यादि। สตฺถุสทฺทสฺส เภโท. ‘‘สตฺถุ สิ’’อิตีธ – 'सत्थु' (शास्ता) शब्द का भेद। 'सत्थु + सि' यहाँ — ‘‘อนฺโต’’ติ วตฺตเต. 'अन्तो' की अनुवृत्ति होती है। ๑๕๘. สตฺถุปิตาทีนมา สิสฺมึ สิโลโป จ. १५८. 'सि' परे होने पर 'सत्थु', 'पितु' आदि के अन्त्य स्वर को 'आ' होता है और 'सि' का लोप भी होता है। สตฺถุ ปิตุ มาตุ ภาตุ ธีตุ กตฺตุอิจฺเจวมาทีนมนฺโต อาตฺตมาปชฺชเต สิสฺมึ, สิโลโป จ โหติ. สตฺถา. 'सत्थु', 'पितु', 'मातु', 'भातु', 'धीतु', 'कत्तु' इत्यादि के अन्त्य स्वर को 'सि' परे होने पर 'आ' भाव प्राप्त होता है, और 'सि' का लोप भी होता है। 'सत्था' (शास्ता)। ‘‘สตฺถุ ปิตาทีน’’นฺติ อธิกาโร. 'सत्थु पितादीनं' यह अधिकार सूत्र है। ๑๕๙. อญฺเญสฺวารตฺตํ[Pg.74]. १५९. अन्य विभक्तियों में 'आर' भाव होता है। สตฺถุ ปิตาทีนมนฺโต สิวจนโต อญฺเญสุ วจเนสุ อารตฺตมาปชฺชเต. อารตฺตมิติภาวนิทฺเทเสน กตฺถจิ อนิยมํ ทสฺเสติ. 'सत्थु', 'पितु' आदि का अन्त्य स्वर 'सि' वचन से भिन्न अन्य वचनों में 'आर' भाव को प्राप्त होता है। 'आरत्तं' इस भाव निर्देश से कहीं अनियम प्रदर्शित होता है। อารคฺคหณมนุวตฺตเต. 'आर' ग्रहण की अनुवृत्ति होती है। ๑๖๐. ตโต โยนโม ตุ. १६०. उससे (आर आदेश से) परे 'यो' विभक्ति को 'ओ' आदेश होता है। ตโต อาราเทสโต สพฺเพสํ โยนํ โอการาเทโส โหติ. उस 'आर' आदेश से परे सभी 'यो' विभक्तियों को 'ओ' आदेश होता है। ตุคฺคหเณน อญฺเญหิปิ จตุอุภนทีควาทีหิ โยนโมกาโร โหติ, สรโลปาทิ. สตฺถาโร. 'तु' ग्रहण से अन्य 'चतु', 'उभ', 'नदी', 'गाव' आदि से परे भी 'यो' को 'ओ' आदेश होता है, स्वर-लोप आदि होकर। जैसे - सत्थारो। อาลปเน ‘‘อการปิตาทฺยนฺตานมา’’ติ อาตฺตํ. ‘‘เค รสฺส’’นฺติ อธิกิจฺจ ‘‘อากาโร วา’’ติ วิกปฺเปน รสฺสตฺตํ, วโลโป. โภ สตฺถ โภ สตฺถา, ภวนฺโต สตฺถาโร, สตฺถารํ, สตฺถาเร สตฺถาโร. सम्बोधन में 'अकारपिताद्यन्तानामा' सूत्र से 'आ' आदेश होता है। 'गे रस्स' के अधिकार में 'आकारो वा' सूत्र से विकल्प से ह्रस्व होता है, और 'व' का लोप होता है। भो सत्थ, भो सत्था, भवन्तो सत्थारो, सत्थारं, सत्थारे सत्थारो। ‘‘ตโต’’ติ จ วตฺตเต. 'ततो' की भी अनुवृत्ति होती है। ๑๖๑. นา อา. १६१. 'ना' को 'आ' आदेश होता है। ตโต อาราเทสโต นาวจนสฺส อาการาเทโส โหติ. สตฺถารา, สตฺถุนาติ อารตฺตมิติภาวนิทฺเทเสน สิทฺธํ. สตฺถาเรหิ สตฺถาเรภิ. उस 'आर' आदेश से परे 'ना' विभक्ति को 'आ' आदेश होता है। सत्थारा; 'सत्थुना' यह 'आरत्तं' इस भाव-निर्देश से सिद्ध होता है। सत्थारेहि, सत्थारेभि। ‘‘วา นํมฺหี’’ติ อิโต ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा नंम्हि' इस सूत्र से 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๑๖๒. อุ [Pg.75] สสฺมึ สโลโป จ. १६२. 'स' विभक्ति के परे होने पर 'उ' आदेश और 'स' का लोप होता है। สตฺถุ ปิตุอิจฺเจวมาทีนมนฺตสฺส อุตฺตํ โหติ วา สสฺมึ, สโลโป จ โหติ. อาราเทสาปวาโทยํ. สตฺถุ, อญฺญตฺถ ภาวนิทฺเทเสนาราภาโว. สตฺถุสฺส สตฺถุโน. सत्थु, पितु इत्यादि शब्दों के अन्त्य स्वर को 'स' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से 'उ' आदेश होता है और 'स' का लोप होता है। यह 'आर' आदेश का अपवाद है। सत्थु; अन्यत्र भाव-निर्देश के कारण 'आर' का अभाव होता है। सत्थुस्स, सत्थुनो। ‘‘อารตฺต’’นฺติ วตฺตเต. 'आरत्तं' की अनुवृत्ति होती है। ๑๖๓. วา นํมฺหิ. १६३. 'नं' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से। สตฺถุ ปิตุอาทีนมนฺโต อารตฺตมาปชฺชเต วา นํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. สตฺถารานํ. सत्थु, पितु आदि के अन्त्य स्वर को 'नं' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से 'आर' आदेश होता है। सत्थारानं। อาราภาเว ‘‘วา นํมฺหี’’ติ วตฺตเต. 'आर' के अभाव में 'वा नंम्हि' की अनुवृत्ति होती है। ๑๖๔. สตฺถุนตฺตญฺจ. १६४. और 'सत्थु' को 'अ' आदेश होता है। สตฺถุสทฺทนฺตสฺส, ปิตาทีนมนฺตสฺส จ อตฺตํ โหติ วา นํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ, ปุน สตฺถุคฺคหณํ สตฺถุโน นิจฺจวิธานตฺถํ. สตฺถานํ. सत्थु शब्द के अन्त को और पितु आदि के अन्त को 'नं' विभक्ति के परे होने पर विकल्प से 'अ' आदेश होता है; पुनः 'सत्थु' का ग्रहण सत्थु के लिए नित्य विधान हेतु है। सत्थानं। ‘‘อมฺหตุมฺหนฺตุราชพฺรหฺมตฺตสขสตฺถุปิตาทีหิ สฺมา นาวา’’ติ สฺมาวจนสฺสนาภาโว. สตฺถารา, สตฺถาเรหิ สตฺถาเรภิ, สตฺถุ สตฺถุโน สตฺถุสฺส, สตฺถารานํ สตฺถานํ. 'अम्हतुम्हन्तराजब्रह्मत्तसखसत्थुपितादीहि स्मा नावा' सूत्र से 'स्मा' विभक्ति को 'ना' आदेश होता है। सत्थारा, सत्थारेहि, सत्थारेभि, सत्थु, सत्थुनो, सत्थुस्स, सत्थारानं, सत्थानं। ‘‘อารโต’’ติ วตฺตเต. 'आरतो' की अनुवृत्ति होती है। ๑๖๕. ตโต สฺมิมิ. १६५. उससे (आर आदेश से) परे 'स्मिं' को 'इ' आदेश होता है। ตโต อาราเทสโต สฺมึวจนสฺส อิการาเทโส โหติ. ปุน ตโตคฺคหเณน อญฺญสฺมาปิ สฺมึวจนสฺส อิกาโร. ยถา – ภุวิ, ทิวิ. उस 'आर' आदेश से परे 'स्मिं' विभक्ति को 'इ' आदेश होता है। पुनः 'ततो' के ग्रहण से अन्य से परे भी 'स्मिं' विभक्ति को 'इ' आदेश होता है। जैसे - भुवि, दिवि। ๑๖๖. อาโร [Pg.76] รสฺสมิกาเร. १६६. 'इ' कार के परे होने पर 'आर' को ह्रस्व होता है। อาราเทโส รสฺสมาปชฺชเต อิกาเร ปเร, สตฺถริ, สตฺถาเรสุ. 'इ' कार के परे होने पर 'आर' आदेश ह्रस्व हो जाता है। सत्थरि, सत्थारेसु। เอวํ กตฺตา, กตฺตาโร, โภ กตฺต โภ กตฺตา, ภวนฺโต กตฺตาโร, กตฺตารํ, กตฺตาเร กตฺตาโร, กตฺตารา, กตฺตาเรหิ กตฺตาเรภิ. ‘‘อุ สสฺมึ สโลโป จา’’ติ อุตฺตํ, สโลโป จ. กตฺตุ กตฺตุโน กตฺตุสฺส, กตฺตารานํ กตฺตานํ กตฺตูนํ กตฺตุนํ, กตฺตารา, กตฺตาเรหิ กตฺตาเรภิ, กตฺตุ กตฺตุโน กตฺตุสฺส, กตฺตารานํ กตฺตานํ กตฺตูนํ กตฺตุนํ, กตฺตริ, กตฺตาเรสุ, อาราภาเว กตฺตูสุ กตฺตุสุ. इसी प्रकार - कत्ता, कत्तारो, भो कत्त, भो कत्ता, भवन्तो कत्तारो, कत्तारं, कत्तारे कत्तारो, कत्तारा, कत्तारेहि कत्तारेभि। 'उ सस्मिं सलोपो च' सूत्र से 'उ' आदेश और 'स' का लोप होता है। कत्तु, कत्तुनो, कत्तुस्स, कत्तारानं, कत्तानं, कत्तूनं, कत्तुनं, कत्तारा, कत्तारेहि कत्तारेभि, कत्तु, कत्तुनो, कत्तुस्स, कत्तारानं, कत्तानं, कत्तूनं, कत्तुनं, कत्तरि, कत्तारेसु, 'आर' के अभाव में कत्तूसु, कत्तुसु। เอวํ – इसी प्रकार - ภตฺตุ วตฺตุ เนตุ โสตุ, ญาตุ เชตุ เฉตฺตุ เภตฺตุ. ทาตุ ธาตุ นตฺตุ โพทฺธุ, วิญฺญาเปตุ อาทโยปิ. भत्तु, वत्तु, नेतु, सोतु, ञातु, जेतु, छेत्तु, भेत्तु। दातु, धातु, नत्तु, बोद्धु, विञ्ञापेतु आदि भी। ‘‘อุ สสฺมึ สโลโป จา’’ติ วตฺตเต. 'उ सस्मिं सलोपो च' की अनुवृत्ति होती है। ๑๖๗. สกมนฺธาตาทีนญฺจ. १६७. सकमन्धातु आदि का भी। สกมนฺธาตุอิจฺเจวมาทีนมนฺโต จ อุตฺตมาปชฺชเต สสฺมึ, สโลโป จ, นิจฺจํ ปุนพฺพิธานา. สกมนฺธาตุ วิย อสฺส ราชิโน วิภโว, เสสํ สมํ. เอวํ มหามนฺธาตุปฺปภุตโย. सकमन्धातु इत्यादि के अन्त को भी 'स' विभक्ति के परे होने पर 'उ' आदेश और 'स' का लोप होता है; पुनः विधान करने से यह नित्य है। 'सकमन्धातु विय अस्स राजिनो विभवो', शेष समान है। इसी प्रकार महामन्धातु प्रभृति। ปิตุสทฺทสฺส เภโท. สิมฺหิ อาตฺตํ, สิโลโป, ปิตา. पितु शब्द का भेद। 'सि' विभक्ति में 'आ' आदेश और 'सि' का लोप होकर 'पिता' बनता है। โยมฺหิ ‘‘อาโร, รสฺส’’นฺติ จ วตฺตเต. 'यो' विभक्ति के होने पर 'आर' (āra) और 'ह्रस्व' (rassa) की अनुवृत्ति होती है। ๑๖๘. ปิตาทีนมสิมฺหิ[Pg.77]. १६८. 'असि' विभक्ति के होने पर 'पितृ' आदि शब्दों का (कार्य होता है)। ปิตาทีนมาราเทโส รสฺสมาปชฺชเต อสิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. สิสฺมึ อาราเทสาภาเวปิ อสิมฺหีติ อธิกวจนมตฺถนฺตรวิญฺญาปนตฺถํ, เตน โตอาทิมฺหิ ปิตาทีนมิกาโร จ. ยถา – ปิติโต, มาติโต, ภาติโต, ธีติโต, ปิติปกฺโข, มาติปกฺโขติ. 'असि' विभक्ति के होने पर 'पितृ' आदि शब्दों का 'आर' आदेश ह्रस्व हो जाता है। 'सि' विभक्ति में 'आर' आदेश के अभाव में भी 'असि' ऐसा अधिक वचन अन्य अर्थ के ज्ञापन के लिए है, जिससे 'तो' आदि प्रत्ययों के होने पर 'पितृ' आदि के (ऋकार को) 'इकार' भी होता है। जैसे - पितितो, मातितो, भातितो, धीतितो, पितिपक्खो, मातिपक्खो। ปิตโร, เสสํ กตฺตุสมํ. โภ ปิต โภ ปิตา, ภวนฺโต ปิตโร, ปิตรํ, ปิตเร ปิตโร, ปิตรา ปิตุนา, ปิตเรหิ ปิตเรภิ. ภาวนิทฺเทเสน อาราเทสาภาเว ปิตูหิ ปิตูภิ ปิตุหิ ปิตุภิ, ปิตุ ปิตุโน ปิตุสฺส, ปิตรานํ ปิตานํ ปิตูนํ, ทีฆาภาเว ปิตุนํ วา, ปิตรา, ปิตเรหิ ปิตเรภิ ปิตูหิ ปิตูภิ ปิตุหิ ปิตุภิ, ปิตุ ปิตุโน ปิตุสฺส, ปิตรานํ ปิตานํ ปิตูนํ ปิตุนํ, ปิตริ, ปิตเรสุ ปิตูสุ ปิตุสุ. पितरो (प्रथमा बहुवचन), शेष 'कत्तृ' शब्द के समान है। भो पित, भो पिता (सम्बोधन), भवन्तो पितरो। पितरं (द्वितीया एकवचन), पितरे पितरो (बहुवचन)। पितरा, पितुना (तृतीया एकवचन), पितरेहि पितरेभि। 'भाव' निर्देश से 'आर' आदेश के अभाव में पितूहि, पितूभि, पितुहि, पितुभि। पितु, पितुनो, पितुस्स (चतुर्थी एकवचन), पितरानं, पितानं, पितूनं, दीर्घ के अभाव में पितुनं वा। पितरा (पञ्चमी एकवचन), पितरेहि, पितरेभि, पितूहि, पितूभि, पितुहि, पितुभि। पितु, पितुनो, पितुस्स (षष्ठी एकवचन), पितरानं, पितानं, पितूनं, पितुनं। पितरि (सप्तमी एकवचन), पितरेसु, पितूसु, पितुसु। เอวํ ภาตา, ภาตโร อิจฺจาทิ. इसी प्रकार भाता (भ्राता), भातरो इत्यादि। อุการนฺตํ. उकारान्त (समाप्त)। อูการนฺโต ปุลฺลิงฺโค อภิภูสทฺโท. ऊकारान्त पुल्लिंग 'अभिभू' शब्द। ตเถว สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, สิโลโป. โส อภิภู, โยโลเป กเต เต อภิภู. वैसे ही 'सि' आदि की उत्पत्ति और 'सि' का लोप होता है। वह 'अभिभू' (एकवचन), 'यो' का लोप होने पर 'ते अभिभू' (बहुवचन)। ‘‘อโฆ รสฺส’’นฺติอาทินา รสฺสตฺตํ, โวกาโร. กตรสฺสตฺตา อตฺตาภาโว. อภิภุโว, โภ อภิภุ, ภวนฺโต อภิภู อภิภุโว. 'अघो रस्स' इत्यादि सूत्र से ह्रस्व होता है और 'वो' आदेश होता है। ह्रस्व करने पर 'अ' भाव (अकारान्तता) नहीं होता। अभिभुवो, भो अभिभु (सम्बोधन), भवन्तो अभिभू, अभिभुवो। กตรสฺสตฺตา เวอาเทโส น โหติ. เสสํ ภิกฺขุสทฺทสมํ, รสฺสตฺตเมว วิเสโส. อภิภุํ, อภิภู อภิภุโว[Pg.78], อภิภุนา, อภิภูหิ อภิภูภิ, อภิภุโน อภิภุสฺส, อภิภูนํ อิจฺจาทิ. ह्रस्व करने पर 'वे' आदेश नहीं होता है। शेष 'भिक्खु' शब्द के समान है, केवल ह्रस्व होना ही विशेष है। अभिभुं, अभिभू, अभिभुवो, अभिभुना, अभिभूहि, अभिभूभि, अभिभुनो, अभिभुस्स, अभिभूनं इत्यादि। เอวํ สยมฺภู, เวสฺสภู, ปราภิภู, สหภูอาทโย. สหภูสทฺทสฺส โยนํ โนอาเทโสว วิเสโส. สหภู, สหภู สหภุโว สหภุโน อิจฺจาทิ. इसी प्रकार स्वयम्भू, वेस्सभू, पराभिभू, सहभू आदि। 'सहभू' शब्द में 'यो' विभक्तियों का 'नो' आदेश ही विशेष है। सहभू, सहभू, सहभुवो, सहभुनो इत्यादि। ตถา สพฺพญฺญูสทฺทสฺส โยสฺเวว วิเสโส. โส สพฺพญฺญู เต สพฺพญฺญู, โยโลปาภาเว รสฺสตฺตํ, ‘‘ลโต โวกาโร จา’’ติ เอตฺถ การคฺคหเณน โยนํ โนอาเทโส. วาธิการสฺส ววตฺถิตวิภาสตฺตา น จ โวกาโร. สพฺพญฺญุโน, โภ สพฺพญฺญุ, โภนฺโต สพฺพญฺญู สพฺพญฺญุโน, สพฺพญฺญุํ, สพฺพญฺญู สพฺพญฺญุโน อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'सब्बञ्ञू' शब्द में 'यो' विभक्तियों में ही विशेष है। वह सब्बञ्ञू, वे सब्बञ्ञू; 'यो' के लोप के अभाव में ह्रस्व होता है, 'लतो वोकारो च' यहाँ 'कार' ग्रहण से 'यो' का 'नो' आदेश होता है। 'वा' के अधिकार की व्यवस्थित विभाषा होने से 'वो' आदेश नहीं होता। सब्बञ्ञुनो, भो सब्बञ्ञु, भोन्तो सब्बञ्ञू, सब्बञ्ञुनो, सब्बञ्ञुं, सब्बञ्ञू, सब्बञ्ञुनो इत्यादि। เอวํ มคฺคญฺญู ธมฺมญฺญู อตฺถญฺญู กาลญฺญู รตฺตญฺญู มตฺตญฺญู กตญฺญู ตถญฺญู วิญฺญู วิทู เวทคู ปารคู อิจฺจาทโย. इसी प्रकार मग्गञ्ञू, धम्मञ्ञू, अत्थञ्ञू, कालञ्ञू, रत्तञ्ञू, मत्तञ्ञू, कतञ्ञू, तथञ्ञू, विञ्ञू, विदू, वेदगू, पारगू इत्यादि। อูการนฺตํ. ऊकारान्त (समाप्त)। เอการนฺโต อปฺปสิทฺโธ. एकारान्त पुल्लिंग (नहीं पाया जाता है)। โอการนฺโต ปุลฺลิงฺโค โคสทฺโท. ओकारान्त पुल्लिंग 'गो' शब्द। ตโต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, สิโลโป, โค คจฺฉติ. उससे 'सि' आदि की उत्पत्ति, 'सि' का लोप, 'गो गच्छति' (बैल/गाय जाता/जाती है)। ‘‘คาว เส’’ติ อิโต ‘‘โค’’ติ อธิกาโร, ‘‘อาวา’’ติ จ วตฺตเต. 'गावा से' यहाँ से 'गो' का अधिकार और 'आवा' की अनुवृत्ति होती है। ๑๖๙. โยสุ จ. १६९. और 'यो' विभक्तियों के होने पर। โคอิจฺเจตสฺส โอการสฺส อาวาเทโส โหติ โยสุ. จสทฺเทน นา สฺมา สฺมึสุอิจฺเจเตสุ จ. ‘‘ตโต โยนโม ตู’’ติ เอตฺถ ตุคฺคหเณน โยนโมกาโร, สรโลปาทิ. คาโว ติฏฺฐนฺติ. 'गो' इसके ओकार को 'यो' विभक्तियों के होने पर 'आव' आदेश होता है। 'च' शब्द से 'ना', 'स्मा', 'स्मिं', 'सु' इनमें भी होता है। 'ततो योनमो तु' यहाँ 'तु' ग्रहण से 'यो' का 'ओकार' होता है, फिर स्वर-लोप आदि। गावो तिट्ठन्ति। ๑๗๐. อวํมฺหิ [Pg.79] จ. १७०. और 'अं' विभक्ति के होने पर 'अव' आदेश होता है। โคอิจฺเจตสฺส โอการสฺส อาว อวอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ อํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. เสทฺเทน โย นา ส สฺมาสฺมึสุอิจฺเจเตสุ จ อวาเทโส โหติ. คโว คจฺฉนฺติ, เห โค, เห คาโว เห คโว. 'गो' इसके ओकार को 'अं' विभक्ति के होने पर 'आव' और 'अव' ये आदेश होते हैं। 'च' शब्द से 'यो', 'ना', 'सा', 'स्मा', 'स्मिं', 'सु' इनमें भी 'अव' आदेश होता है। गवो गच्छन्ति, हे गो, हे गावो, हे गवो। ทุติยายํ ‘‘อํมฺหี’’ติ วตฺตเต. द्वितीया विभक्ति में 'अं' की अनुवृत्ति होती है। ๑๗๑. อาวสฺสุ วา. १७१. 'आव' को 'उ' विकल्प से होता है। อาวอิจฺเจตสฺส คาวาเทสสฺส อนฺตสรสฺส อุการาเทโส โหติ วา อํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. อาวสฺส อ อาว, ตสฺส อาวสทฺทนฺตสฺส. ‘‘อํโม’’ติอาทินา นิคฺคหีตํ. คาวุํ คาวํ ควํ, คาโว คโว. 'आव' इस 'गाव' आदेश के अन्त्य स्वर को 'अं' विभक्ति के होने पर विकल्प से 'उकार' आदेश होता है। 'आव' का 'अ' और 'आव', उस 'आव' शब्दान्त का। 'अंमो' इत्यादि से निग्गृहीत (अनुस्वार) होता है। गावुं, गावं, गवं, गावो, गवो। ‘‘โคณ, วา’’ติ วตฺตเต. 'गोण' और 'वा' (विकल्प) की अनुवृत्ति होती है। ๑๗๒. สุหินาสุ จ. १७२. 'सु', 'हि', 'ना' विभक्तियों में भी। สุ หิ นาอิจฺเจเตสุ สพฺพสฺส โคสทฺทสฺส โคณาเทโส โหติ วา. จสทฺเทน เสเสสุ จ. โคโณ, โคณา, เห โคณ เห โคณา, โคณํ, โคเณ, โคเณน, โคเณหิ โคเณภิ, โคณสฺส. 'सु', 'हि', 'ना' इन विभक्तियों के होने पर सम्पूर्ण 'गो' शब्द को विकल्प से 'गोण' आदेश होता है। 'च' शब्द से शेष विभक्तियों में भी। गोणो, गोणा, हे गोण, हे गोणा, गोणं, गोणे, गोणेन, गोणेहि, गोणेभि, गोणस्स। ๑๗๓. โคณ นํมฺหิ วา. १७३. 'नं' विभक्ति के होने पर विकल्प से 'गोण' आदेश होता है। สพฺพสฺส โคสทฺทสฺส โคณาเทโส โหติ วา นํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. โคณานํ, โคณา โคณสฺมา โคณมฺหา, โคเณหิ โคเณภิ, โคณสฺส, โคณานํ, โคเณ โคณสฺมึ โคณมฺหิ, โคเณสุ. सम्पूर्ण 'गो' शब्द को 'नं' विभक्ति के होने पर विकल्प से 'गोण' आदेश होता है। गोणानं, गोणा, गोणस्मा, गोणम्हा, गोणेहि, गोणेभि, गोणस्स, गोणानं, गोणे, गोणस्मिं, गोणम्हि, गोणेसु। โคณาเทสาภาเว คาเวน คเวน, โคหิ โคภิ. गोण आदेश के अभाव में गावेन, गवेन, गोहि, गोभि (रूप होते हैं)। ๑๗๔. คาว [Pg.80] เส. १७४. गावा से। ‘‘โค อาว เส’’อิติ ติปทมิทํ. โคสฺส โอ โค, โคสทฺโทการสฺส อาวาเทโส โหติ เส วิภตฺติมฺหิ. คาวสฺส ควสฺส. ‘गो आवा से’ यह तीन पदों वाला सूत्र है। गो का ओ गो है, गो शब्द के ओकार को से विभक्ति होने पर आवादेश होता है। गावस्स, गवस्स। นํมฺหิ ‘‘โค, อวา’’ติ จ วตฺตเต. नं विभक्ति में ‘गो, अवा’ की अनुवृत्ति होती है। ๑๗๕. ตโต นมํ ปติมฺหาลุตฺเต จ สมาเส. १७५. उसके बाद पति शब्द के परे होने पर और अलुक् समास में नं को अं आदेश होता है। ตโต โคสทฺทโต ปรสฺส นํวจนสฺส อํอาเทโส โหติ, โคสทฺโทการสฺส อวาเทโส จ ปติมฺหิ ปเร อลุตฺเต จ สมาเส. จสทฺเทน อสมาเสปิ อํ อวาเทสา. ควํปติสฺส เถรสฺส, ควํ. उसके बाद गो शब्द से परे नं वचन को अं आदेश होता है, और पति के परे होने पर तथा अलुक् समास में गो शब्द के ओकार को अव आदेश होता है। च शब्द से असमस्त पद में भी अं और अव आदेश होते हैं। गवम्पतिस्स थेर का, गवं। ‘‘สุหินาสุ จา’’ติ เอตฺถ จสทฺเทน นํมฺหิ คุอาเทโส. ‘‘โน จ ทฺวาทิโต นํมฺหี’’ติ สุตฺเต จสทฺเทน นการาคโม จ. คุนฺนํโคนํ วา. ‘सुहिनासु च’ यहाँ च शब्द से नं विभक्ति में गु आदेश होता है। ‘नो च द्वादितो नंम्हि’ सूत्र में च शब्द से नकार का आगम भी होता है। गुन्नं या गोनं। คาวา คาวมฺหา คาวสฺมา ควา ควมฺหา ควสฺมา, โคหิ โคภิ, คาวสฺส ควสฺส, ควํ คุนฺนํ โคนํ, คาเว คาวมฺหิ คาวสฺมึ คเว ควมฺหิ ควสฺมึ, คาเวสุ คเวสุ โคสุ. गावा, गावम्हा, गावस्मा, गवा, गवम्हा, गवस्मा, गोहि, गोभि, गावस्स, गवस्स, गवं, गुन्नं, गोनं, गावे, गावम्हि, गावस्मिं, गवे, गवम्हि, गावस्मिं, गावेसु, गवेसु, गोसु। โอการนฺตํ. ओकारान्त। ปุริโส คุณวา ราชา, สา’คฺคิ ทณฺฑี จ ภิกฺขุ จ; สตฺถา’ภิภู จ สพฺพญฺญู, โคติ ปุลฺลิงฺคสงฺคโห. पुरिसो, गुणवा, राजा, सा (स), अग्गि, दण्डी, भिक्खु, सत्था, अभिभू, सब्बञ्ञू और गो—यह पुल्लिंग का संग्रह है। ปุลฺลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. पुल्लिंग समाप्त। อสฺมา [Pg.103] นสฺมา ตสฺมา นมฺหา ตมฺหา, เนหิ เนภิ เตหิ เตภิ, อสฺส นสฺส ตสฺส, เนสํ เตสํ เนสานํ เตสานํ, อสฺมึ นสฺมึ ตสฺมึ นมฺหิ ตมฺหิ, เนสุ เตสุ. अस्मा, नस्मा, तस्मा, नम्हा, तम्हा, नेहि, नेभि, तेहि, तेभि, अस्स, नस्स, तस्स, नेसं, तेसं, नेसानं, तेसानं, अस्मिं, नस्मिं, तस्मिं, नम्हि, तम्हि, नेसु, तेसु। อิตฺถิยํ ‘‘ตา สิ’’ อิตีธ สาเทสสิโลปา. สา กญฺญา, นตฺตํ. นา ตา นาโย ตาโย, นํ ตํ, นา ตา นาโย ตาโย, นาย ตาย, นาหิ ตาหิ นาภิ ตาภิ. स्त्रीलिंग में ‘ता सि’ यहाँ स आदेश और सि का लोप होता है। सा कञ्ञा, न भाव। ना, ता, नायो, तायो, नं, तं, ना, ता, नायो, तायो, नाय, ताय, नाहि, ताहि, नाभि, ताभि। ‘‘เอติมาสมี’’ติ อิโต เอติมาคฺคหณญฺจ ‘‘ตสฺสา วา’’ติ อิโต ตคฺคหณญฺจ ปญฺจมิยนฺตวเสน วตฺตเต ‘‘วา’’ติ จ. ‘एतिमासमि’ इससे एतिमा का ग्रहण और ‘तस्सा वा’ इससे त का ग्रहण पंचमी विभक्ति के रूप में अनुवृत्त होता है और ‘वा’ भी। ๒๑๕. ตโต สสฺส สฺสาย. २१५. उसके बाद स को स्साय (आदेश होता है)। ตโต ตา เอตา อิมาโต ปรสฺส สสฺส วิภตฺติสฺส สฺสายาเทโส โหติ วา. उसके बाद ता, एता, इमा से परे स विभक्ति को विकल्प से स्साय आदेश होता है। ‘‘สํสาสฺเวกวจเนสุ จ, อิ’’อิติ จ วตฺตเต. ‘संसास्वेकवचनेसु च, इ’ इसकी भी अनुवृत्ति होती है। ๒๑๖. ตสฺสา วา. २१६. तस्सा वा। ตาอิจฺเจตสฺส อิตฺถิยํ วตฺตมานสฺส อนฺตสฺส อิกาโร โหติ วา สํ สาสฺเวกวจเนสุ วิภตฺตาเทเสสุ. ติสฺสาย ตสฺสาย อสฺสาย นสฺสาย อสฺสา นสฺสา ติสฺสา ตสฺสา นาย ตาย, นาสํ ตาสํ. स्त्रीलिंग में वर्तमान ‘ता’ इसके अन्त्य स्वर को सं, सा आदि एकवचन विभक्ति आदेशों के परे होने पर विकल्प से इकार होता है। तिस्साय, तस्साय, अस्साय, नस्साय, अस्सा, नस्सा, तिस्सा, तस्सा, नाय, ताय, नासं, तासं। ปญฺจมีฉฏฺฐีสุ ตติยาจตุตฺถีสมํ. สตฺตมิยํ อสฺสํ นสฺสํ ติสฺสํ ตสฺสํ นายํ ตายํ, นาสุ ตาสุ. पंचमी और षष्ठी में तृतीया और चतुर्थी के समान। सप्तमी में अस्सं, नस्सं, तिस्सं, तस्सं, नायं, तायं, नासु, तासु। นปุํสเก สิมฺหิสาเทสาภาวา นตฺตํ. นํ ตํ, นานิ ตานิ, นํ ตํ, นานิ ตานิ, เนน เตน อิจฺจาทิ ปุลฺลิงฺคสมํ. नपुंसक लिंग में सि विभक्ति में स आदेश के अभाव के कारण न भाव होता है। नं, तं, नानि, तानि, नं, तं, नानि, तानि, नेन, तेन इत्यादि पुल्लिंग के समान। เอต สิ, ‘‘เอตเตสํ โต’’ติ สการาเทโส. เอโส ปุริโส, เอเต, เอตํ, เอเต อิจฺจาทิ สพฺพสทฺทสมํ. एत सि, ‘एततेसं तो’ इस सूत्र से सकार आदेश होता है। एसो पुरिसो, एते, एतं, एते इत्यादि सब्ब शब्द के समान। อิตฺถิยํ [Pg.104] เอตา สิ, สาเทโส. เอสา กญฺญา, เอตา เอตาโย, เอตํ, เอตา เอตาโย, เอตาย, เอตาหิ เอตาภิ. स्त्रीलिंग में एता सि, स आदेश होता है। एसा कञ्ञा, एता, एतायो, एतं, एता, एतायो, एताय, एताहि, एताभि। ส สฺมึสุ ปน ‘‘สํสาสฺเวกวจเนสุ จา’’ติ วตฺตเต. स और स्मिं विभक्तियों में तो ‘संसास्वेकवचनेसु च’ इसकी अनुवृत्ति होती है। ๒๑๗. เอติมาสมิ. २१७. एतिमासमि। อนฺตาเปกฺขายํ ฉฏฺฐี, เอตา อิมาอิจฺเจเตสมนฺโต สโร อิกาโร โหติ สํสาสฺเวกวจเนสุ วิภตฺตาเทเสสุ. สาเทสคติกตฺตา สฺสายาเทเสปิ. จสทฺทาธิการโต อญฺเญกาสทฺทาทีนมนฺตสฺส จ. अन्त्य की अपेक्षा में यहाँ षष्ठी है; एता, इमा इनके अन्त्य स्वर को सं, सा आदि एकवचन विभक्ति आदेशों के परे होने पर इकार होता है। स आदेश की गति होने से स्साय आदेश में भी। च शब्द के अधिकार से अञ्ञ, एक आदि शब्दों के अन्त्य को भी। เอติสฺสาย เอติสฺสา เอตาย, เอตาสํ เอตาสานํ, เอตาย, เอตาหิ เอตาภิ, เอติสฺสาย เอติสฺสา เอตาย, เอตาสํ เอตาสานํ, เอติสฺสํ เอตายํ, เอตาสุ. एतिस्साय, एतिस्सा, एताय, एतासं, एतासानं, एताय, एताहि, एताभि, एतिस्साय, एतिस्सा, एताय, एतासं, एतासानं, एतिस्सं, एतायं, एतासु। จสทฺทโต อญฺญิสฺสา อญฺญาย, อญฺญิสฺสํ อญฺญายํ. เอกิสฺสา เอกาย, เอกิสฺสํ เอกายํ. อิตริสฺสา อิตราย, อิตริสฺสํ อิตรายํ อิจฺจาทิ. च शब्द से—अञ्ञिस्सा, अञ्ञाय, अञ्ञिस्सं, अञ्ञायं। एकिस्सा, एकाय, एकिस्सं, एकायं। इतरिस्सा, इतराय, इतरिस्सं, इतरायं इत्यादि। นปุํสเก เอตํ, เอตานิ, เอตํ, เอตานิ, เสสํ เญยฺยํ. नपुंसक लिंग में एतं, एतानि, एतं, एतानि, शेष को जानना चाहिए। อิมสทฺทสฺส เภโท. อิม สิ – इम शब्द का भेद। इम सि — ‘‘สพฺพสฺสิมสฺสา’’ติ วตฺตเต. 'सब्बस्सिमस्स' (सम्पूर्ण 'इम' शब्द का) यह अनुवृत्ति के रूप में आता है। ๒๑๘. อนปุํสกสฺสายํ สิมฺหิ. २१८. नपुंसक लिंग को छोड़कर (पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में) 'सि' विभक्ति परे होने पर 'अयं' आदेश होता है। อิมสทฺทสฺส สพฺพสฺเสว อนปุํสกสฺส อยํอาเทโส โหติ สิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ, สิโลโป. อยํ ปุริโส, อิเม, อิมํ, อิเม. 'इम' शब्द के सम्पूर्ण स्थान पर नपुंसक लिंग को छोड़कर 'सि' विभक्ति परे होने पर 'अयं' आदेश होता है और 'सि' का लोप हो जाता है। जैसे- अयं पुरिसो, इमे, इमं, इमे। ๒๑๙. อนิมิ [Pg.105] นามฺหิ จ. २१९. 'ना' विभक्ति परे होने पर 'अन' और 'इमि' आदेश भी होते हैं। อิมสทฺทสฺส สพฺพสฺเสว อน อิมิอาเทสา โหนฺติ นามฺหิ วิภตฺติมฺหิ. อนิตฺถิลิงฺคสฺเสเวตํ คหณํ. อเนน อิมินา. 'इम' शब्द के सम्पूर्ण स्थान पर 'ना' विभक्ति परे होने पर 'अन' और 'इमि' आदेश होते हैं। यह केवल अन-स्त्रीलिंग (पुल्लिंग और नपुंसक लिंग) के लिए ग्रहण किया गया है। जैसे- अनेन, इमिना। ‘‘สุนํหิสู’’ติ วตฺตเต. 'सुनंहीसु' यह अनुवृत्ति के रूप में आता है। ๒๒๐. สพฺพสฺสิมสฺเส วา. २२०. सम्पूर्ण 'इम' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'ए' होता है। สพฺพสฺส อิมสทฺทสฺส เอกาโร โหติ วา สุ นํ หิอิจฺเจเตสุ วจเนสุ. 'सु', 'नं', 'हि' इन विभक्तियों के परे होने पर सम्पूर्ण 'इम' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'ए'कार होता है। อาปฺปจฺจยนฺตานิทฺเทสา, สพฺพตฺถาติ อวุตฺตโต; อนิตฺถิลิงฺคสฺเสเวตฺถ, คหณญฺหิ อิมสฺสิติ. 'आ' प्रत्ययान्त का निर्देश न होने से और 'सब्बत्थ' (सब जगह) ऐसा न कहे जाने से, यहाँ 'इम' का ग्रहण केवल अन-स्त्रीलिंग (पुल्लिंग और नपुंसक लिंग) के लिए ही है। เอหิ เอภิ อิเมหิ อิเมภิ. एहि, एभि, इमेहि, इमेभि। ‘‘สพฺพสฺส, วา, สพฺพตฺถ, สสฺมาสฺมึสํสาสฺวตฺต’’นฺติ จ วตฺตเต. 'सब्बस्स, वा, सब्बत्थ, सस्मास्मिंसांसास्वत्तं' यह अनुवृत्ति के रूप में आता है। ๒๒๑. อิมสทฺทสฺส จ. २२१. और 'इम' शब्द का भी। อิมสทฺทสฺส จ สพฺพสฺเสว อตฺตํ โหติ วา ส สฺมา สฺมึสํ สาอิจฺเจเตสุ วจเนสุ สพฺพตฺถ ลิงฺเคสุ. 'स', 'स्मा', 'स्मिं', 'सं', 'सा' इन विभक्तियों के परे होने पर सभी लिंगों में सम्पूर्ण 'इम' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'अ'कार (अत्तं) होता है। อสฺส อิมสฺส, เอสํ เอสานํ อิเมสํ อิเมสานํ, อสฺมา อิมสฺมา อิมมฺหา, เอหิ เอภิ อิเมหิ อิเมภิ, อสฺส อิมสฺส, เอสํ เอสานํ อิเมสํ อิเมสานํ, อสฺมึ อิมสฺมึ อิมมฺหิ, เอสุ อิเมสุ. अस्स, इमस्स; एसं, एसानं, इमेसं, इमेसानं; अस्मा, इमस्मा, इमम्हा; एहि, एभि, इमेहि, इमेभि; अस्स, इमस्स; एसं, एसानं, इमेसं, इमेसानं; अस्मिं, इमस्मिं, इमम्हि; एसु, इमेसु। อิตฺถิยํ อิมา สิ, อยมาเทสสิโลปา. स्त्रीलिंग में 'इमा' और 'सि' विभक्ति में 'अयं' आदेश तथा 'सि' का लोप होता है। อยํ กญฺญา, อิมา อิมาโย, อิมํ, อิมา อิมาโย, อิมาย, อิมาหิ อิมาภิ. จตุตฺถิยํ อตฺตํ, อิการ- สฺสายาเทสา [Pg.106] จ, อสฺสาย อิมิสฺสาย อสฺสา อิมิสฺสา อิมาย, อิมาสํ อิมาสานํ. สตฺตมิยํ อสฺสํ อิมิสฺสํ อิมิสฺสา วา, ‘‘เตสุ วุทฺธิโลปา’’ทินา สฺมึวจนสฺส วา สาเทโส. อิมายํ, อิมาสุ. เสสํ เญยฺยํ. अयं कञ्ञा, इमा, इमायो; इमं, इमा, इमायो; इमाय, इमाहि, इमाभि। चतुर्थी में 'अ'कार और 'इ'कार के स्थान पर 'आय' आदेश होता है- अस्साय, इमिस्साय, अस्सा, इमिस्सा, इमाय; इमासं, इमासानं। सप्तमी में अस्सं, इमिस्सं, इमिस्सा विकल्प से; 'तेसु वुद्धिलोपा' आदि सूत्र से 'स्मिं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'सा' आदेश होता है। इमायं, इमासु। शेष इसी प्रकार समझना चाहिए। นปุํสเก อิม สิ, ‘‘สวิภตฺติสฺส, วา’’ติ จ วตฺตเต. नपुंसक लिंग में 'इम' और 'सि' विभक्ति में, 'सविभत्तिस्स, वा' यह अनुवृत्ति के रूप में आता है। ๒๒๒. อิมสฺสิทมํสิสุ น ปุํสเก. २२२. नपुंसक लिंग में 'अं' और 'सि' परे होने पर 'इम' के स्थान पर 'इदं' होता है। นปุํสเก วตฺตมานสฺส สพฺพสฺเสว อิมสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส อิทํ โหติ วา อํ สิสุ ปเรสุ. नपुंसक लिंग में वर्तमान सम्पूर्ण 'इम' शब्द के स्थान पर विभक्ति सहित विकल्प से 'इदं' होता है, यदि 'अं' और 'सि' परे हों। อิทํ จิตฺตํ วิโรจติ, อิมํ, อิมานิ, อิทํ ปุปฺผํ ปสฺสสิ, อิมํ, อิมานิ, อเนน อิมินา, เอหิ เอภิ อิเมหิ อิเมภิ อิจฺจาทิ ปุลฺลิงฺเค วิย เญยฺยํ. इदं चित्तं विरोचति, इमं, इमानि; इदं पुप्फं पस्ससि, इमं, इमानि; अनेन, इमिना, एहि, एभि, इमेहि, इमेभि इत्यादि पुल्लिंग के समान समझना चाहिए। อมุสทฺทสฺส เภโท. อมุ สิ – 'अमु' शब्द का भेद। 'अमु' और 'सि' – ‘‘วา, อนปุํสกสฺส, สิมฺหี’’ติ จ วตฺตเต. 'वा, अनपुंसकस्स, सिम्हि' यह अनुवृत्ति के रूप में आता है। ๒๒๓. อมุสฺส โม สํ. २२३. 'अमु' के 'म' को 'स' होता है। อนปุํสกสฺส อมุสทฺทสฺส มกาโร สการมาปชฺชเต วา สิมฺหิ ปเร. อสุ ราชา. नपुंसक लिंग को छोड़कर 'अमु' शब्द के मकार के स्थान पर 'सि' परे होने पर विकल्प से सकार होता है। जैसे- असु राजा। ‘‘สพฺพนามโต, วา’’ติ จ วตฺตเต. 'सब्बनामतो, वा' यह अनुवृत्ति के रूप में आता है। ๒๒๔. สพฺพโต โก. २२४. सब (सर्वनाम) से 'क' प्रत्यय होता है। สพฺพโต สพฺพนามโต ปโร กอิจฺจยมาคโม โหติ วา. ปุน สพฺพโตคฺคหเณน หีนาทิโตปิ โก. ‘‘อมุสฺส โม ส’’นฺติ วินาธิกาเรน โยเคน กกาเรปิ สาเทโส. सभी सर्वनामों से परे 'क' यह आगम विकल्प से होता है। पुनः 'सब्बतो' ग्रहण करने से 'हीन' आदि शब्दों से भी 'क' होता है। 'अमुस्स मो सं' इस सूत्र के बिना अधिकार के योग से 'क'कार परे होने पर भी 'स' आदेश होता है। อสุโก[Pg.107], อสุกา, อสุกํ. สาเทสาภาเว อมุโก, อมุกา, อมุกํ อิจฺจาทิ. असुको, असुका, असुकं। 'स' आदेश के अभाव में अमुको, अमुका, अमुकं इत्यादि। พหุวจเน ‘‘ลโต โวกาโร จา’’ติ สุตฺเต อนุวตฺตมานวาคฺคหเณน โวกาโร น โหติ, นิจฺจํ โยโลโป, ทีโฆ จ. बहुवचन में 'लतो वोकारो चा' सूत्र से अनुवृत्त 'वा' शब्द के ग्रहण से 'वोकार' नहीं होता है, 'यो' का नित्य लोप और दीर्घ होता है। อมู ปุริสา, อมุํ, อมู, อมุนา, อมูหิ อมูภิ อมุหิ อมุภิ, อมุสฺส. ‘‘อมุสฺสาทุ’’นฺติ วินาธิกาเรน โยเคน อทุํอาเทโส, อทุสฺส, อมูสํ อมูสานํ อมุสํ อมุสานํ, อมุสฺมา อมุมฺหา, อมูหิ อมูภิ อมุหิ อมุภิ, อมุสฺส อทุสฺส, อมูสํ อมูสานํ อมุสํ อมุสานํ, อมุสฺมึ อมุมฺหิ, อมูสุ อมุสุ. अमू पुरिसा, अमुं, अमू, अमुना, अमूहि, अमूभि, अमुहि, अमुभि, अमुस्स। 'अमुस्सादुं' इस बिना अधिकार के योग से 'अदुं' आदेश होता है; अदुस्स, अमूसं, अमूसानं, अमुसं, अमुसानं, अमुस्मा, अमुम्हा, अमूहि, अमूभि, अमुहि, अमुभि, अमुस्स, अदुस्स, अमूसं, अमूसानं, अमुसं, अमुसानं, अमुस्मिं, अमुम्हि, अमूसु, अमुसु। อิตฺถิยํ สิมฺหิ สาเทสาทิ. स्त्रीलिंग में 'सि' विभक्ति होने पर 'सा' आदेश आदि होते हैं। อสุ กญฺญา อสุกา อมุกา วา, อมู อมุโย, อมุํ, อมู อมุโย, อมุยา, อมูหิ อมูภิ, อมุสฺสา อมุยา, อมูสํ อมูสานํ, อมุยา, อมูหิ อมูภิ, อมุสฺสา อมุยา, อมูสํ อมูสานํ, อมุสฺสํ อมุยํ อมุยา, อมูสุ. वह कन्या (asu kaññā), असुका (asukā) या अमुका (amukā), अमू (amū), अमुयो (amuyo), अमुं (amuṃ), अमू (amū), अमुयो (amuyo), अमुया (amuyā), अमूहि (amūhi), अमूभि (amūbhi), अमुस्सा (amussā), अमुया (amuyā), अमूसं (amūsaṃ), अमूसानं (amūsānaṃ), अमुया (amuyā), अमूहि (amūhi), अमूभि (amūbhi), अमुस्सा (amussā), अमुया (amuyā), अमूसं (amūsaṃ), अमूसानं (amūsānaṃ), अमुस्सं (amussaṃ), अमुयं (amuyaṃ), अमुया (amuyā), अमूसु (amūsu)। นปุํสเก อมุสิ. ‘‘สวิภตฺติสฺส’’, อิมสฺสิทมิจฺจาทิโต ‘‘อํสิสุ นปุํสเก’’ติ จ วตฺตเต. नपुंसक लिंग में 'अमु' और 'सि' होने पर। 'सविभत्तिस्स' (विभक्ति सहित), 'इमस्सिदमिच्चादि' सूत्र से 'अं-सि' विभक्तियों के परे होने पर 'नपुंसक लिंग में' की अनुवृत्ति होती है। ๒๒๕. อมุสฺสาทุํ. २२५. अमुस्स-अदुं (अमु के स्थान पर अदुं)। นปุํสเก วตฺตมานสฺส สพฺพสฺเสว อมุสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส อทุํ โหติ อํสิสุ ปเรสุ. อทุํ ปุปฺผํ, อมู อมูนิ, อทุํ, อมู อมูนิ, อมุนา อิจฺจาทิ ปุลฺลิงฺคสมํ. नपुंसक लिंग में वर्तमान संपूर्ण 'अमु' शब्द को विभक्ति सहित 'अदुं' आदेश होता है, 'अं' और 'सि' विभक्तियों के परे होने पर। अदुं पुप्फं (वह पुष्प), अमू, अमूनि, अदुं, अमू, अमूनि, अमुना इत्यादि पुल्लिंग के समान हैं। กึสทฺทสฺส เภโท. ‘‘กึ สิ’’ อิตีธ – 'किं' शब्द के भेद। यहाँ 'किं' और 'सि' होने पर - ‘‘กิสฺส [Pg.108] ก เว จา’’ติ อิโต ‘‘กิสฺส, ก’’อิติ จ วตฺตเต. 'किस्स क वे चा' इस (सूत्र) से 'किस्स' और 'क' की अनुवृत्ति होती है। ๒๒๖. เสเสสุ จ. २२६. सेसेसु च (और शेष में)। กิมิจฺเจตสฺส กสทฺโท อาเทโส โหติ วปฺปจฺจยโต เสเสสุ วิภตฺติเภเทสุ. เอตฺถ จ ‘‘กิสฺส ก เว จา’’ติ สุตฺเต จสทฺเทน วปฺปจฺจยาวสิฏฺฐ ถมาทิปฺปจฺจยานํ คหิตตฺตา เสสคฺคหเณน วิภตฺติโยว คยฺหนฺเต. จคฺคหณํ กตฺถจิ นิวตฺตนตฺถํ, เตน ‘‘กิสฺส, กิสฺมิ’’นฺติอาทิ จ สิชฺฌติ. ‘‘โส’’ติ สิสฺส โอ, สรโลปาทิ. 'किं' इस (शब्द) के स्थान पर 'क' शब्द आदेश होता है, 'व' प्रत्यय से शेष विभक्ति भेदों में। और यहाँ 'किस्स क वे चा' सूत्र में 'च' शब्द के द्वारा 'व' प्रत्यय के अतिरिक्त 'थं' आदि प्रत्ययों के ग्रहण होने से, 'सेस' (शेष) ग्रहण से केवल विभक्तियाँ ही ली जाती हैं। 'च' का ग्रहण कहीं (आदेश की) निवृत्ति के लिए है, जिससे 'किस्स', 'किस्मिं' इत्यादि भी सिद्ध होते हैं। 'सो' (सूत्र) से 'सि' का 'ओ', स्वर-लोप आदि होते हैं। โก เอโส, เก, กํ, เก, เกน, เกหิ เกภิ, กสฺส กิสฺส, นิคฺคหีตโลปาทิ, เกสํ เกสานํ, กสฺมา กมฺหา, เกหิ เกภิ, กสฺส กิสฺส, เกสํ เกสานํ, กสฺมึ กิสฺมึ กมฺหิ กิมฺหิ, เกสุ. को एसो (यह कौन है?), के, कं, के, केन, केहि, केभि, कस्स, किस्स, निग्गहीत-लोप आदि, केसं, केसानं, कस्मा, कम्हा, केहि, केभि, कस्स, किस्स, केसं, केसानं, कस्मिं, किस्मिं, कम्हि, किम्हि, केसु। อิตฺถิยํ ‘‘กึ สิ’’อิตีธ ‘‘เสเสสุ จา’’ติ วิภตฺติยํ ปรายํ กาเทเส กเต ‘‘อิตฺถิยมโต อาปฺปจฺจโย’’ติ มชฺเฌ อาปฺปจฺจโย, สิโลโป. स्त्रीलिंग में 'किं' और 'सि' होने पर, 'सेसेसु च' इस (सूत्र) से विभक्ति के परे होने पर 'क' आदेश होने के बाद, 'इत्थियमतो आप्पच्चयो' से मध्य में 'आ' प्रत्यय होता है, और 'सि' का लोप होता है। กา เอสา กญฺญา, กา กาโย, กํ, กา กาโย อิจฺจาทิ สพฺพาสทฺทสมํ. का एसा कञ्ञा (यह कन्या कौन है?), का, कायो, कं, का, कायो इत्यादि 'सब्बा' शब्द के समान हैं। นปุํสเก กึ สิ, โลปวิธิสฺส พลวตรตฺตา ปฐมํ สิโลเป กเต ปุน วิภตฺติปรตฺตาภาวา, ‘‘ตทนุปโรเธนา’’ติ ปริภาสโต วา กาเทสาภาโว. กึ เอตํ, กานิ. नपुंसक लिंग में 'किं' और 'सि' होने पर, लोप-विधि के अधिक बलवान होने से पहले 'सि' का लोप हो जाने पर, पुनः विभक्ति के परे न होने के कारण, अथवा 'तदनुपरोधेन' इस परिभाषा से 'क' आदेश का अभाव होता है। किं एतं (यह क्या है?), कानि। ทุติเยกวจเน ‘‘กฺวจิ โลป’’นฺติ นิคฺคหีตโลเป กเต ‘‘อํโม นิคฺคหีตํ ฌลเปหี’’ติ นิคฺคหีตํ. กึ, กานิ อิจฺจาทิ ปุลฺลิงฺคสมํ. द्वितीया एकवचन में 'क्वचि लोपं' से निग्गहीत का लोप होने पर, 'अंमो निग्गहीतं झलपेहि' से निग्गहीत होता है। किं, कानि इत्यादि पुल्लिंग के समान हैं। เอกสทฺโท [Pg.109] สงฺขฺยาตุลฺยาสหายญฺญวจโน. ยทา สงฺขฺยาวจโน, ตทา สพฺพตฺเถกวจนนฺโตว, อญฺญตฺถ พหุวจนนฺโตปิ. เอโก, เอกา, เอกํ อิจฺจาทิ สพฺพตฺถ สพฺพสทฺทสมํ. สํสาสฺเวว วิเสโส. 'एक' शब्द संख्या, तुल्य (समान), असहाय (अकेला) और अन्य का वाचक है। जब यह संख्यावाचक होता है, तब सभी जगह केवल एकवचनांत ही होता है, अन्य अर्थों में बहुवचनांत भी होता है। एको, एका, एकं इत्यादि सभी जगह 'सब्ब' शब्द के समान हैं। केवल 'सं' और 'सा' (विभक्तियों) में ही विशेष है। อุภสทฺโท ทฺวิสทฺทปริยาโย, สทา พหุวจนนฺโตว. 'उभ' शब्द 'द्वि' शब्द का पर्यायवाची है, यह सदैव बहुवचनांत ही होता है। ‘‘อุภ โย’’ อิตีธ ‘‘ตโต โยนโม ตู’’ติ เอตฺถ ตุคฺคหเณน กฺวจิ โยนโมกาโร. อุโภ ปุริสาอุเภ วา, อุโภ ปุริเส อุเภ. สุ หิสุ ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา กฺวจิ เอการสฺโสกาโร. อุโภหิ อุโภภิ อุเภหิ อุเภภิ. 'उभ' और 'यो' होने पर, 'ततो योनमो तु' यहाँ 'तु' के ग्रहण से कहीं 'यो' का 'ओ' कार होता है। उभो पुरिसा (दोनों पुरुष) या उभे, उभो पुरिसे, उभे। 'सु' और 'हि' विभक्तियों में 'तेसु वुद्धि' इत्यादि (सूत्र) से कहीं 'ए' कार का 'ओ' कार होता है। उभोहि, उभोभि, उभेहि, उभेभि। ๒๒๗. อุภาทิโต นมินฺนํ. २२७. उभादितो नमिन्नं (उभ आदि से परे 'नं' को 'इन्नं' होता है)। อุภอิจฺเจวมาทิโต นํวจนสฺส อินฺนํ โหติ. 'उभ' इत्यादि से परे 'नं' वचन को 'इन्नं' होता है। อุภินฺนํ, อุโภหิ อุโภภิ อุเภหิ อุเภภิ, อุภินฺนํ, อุโภสุ อุเภสุ. उभिन्नं, उभोहि, उभोभि, उभेहि, उभेभि, उभिन्नं, उभोसु, उभेसु। ทฺวิอาทโย สงฺขฺยาสงฺขฺเยยฺยวจนา, พหูนํ วาจิตตฺตา สทา พหุวจนนฺตาว. 'द्वि' आदि संख्या और संख्यय (गिने जाने वाले) के वाचक हैं, बहुतों का वाचक होने के कारण ये सदैव बहुवचनांत ही होते हैं। ‘‘ทฺวิ โย’’อิตีธ ‘‘สวิภตฺติสฺส, อิตฺถิปุมนปุํสกสงฺขฺย’’นฺติ จ อธิกาโร. 'द्वि' और 'यो' होने पर, 'सविभत्तिस्स' और 'इत्थिपुमनपुंसकसंखं' का अधिकार होता है। ๒๒๘. โยสุ ทฺวินฺนํ ทฺเว จ. २२८. योसुर द्विन्नं द्वे च (यो विभक्तियों में 'द्वि' को 'द्वे' और 'द्विन्नं' होता है)। ทฺวิอิจฺเจตสฺส สงฺขฺยาสทฺทสฺส อิตฺถิปุมนปุํสเก วตฺตมานสฺส สวิภตฺติสฺส ทฺเวอิจฺจาเทโส โหติ โยสุ ปเรสุ. จสทฺเทน ทุเว จ, กฺวจิ ทุวิ จ นํมฺหิ. พหุวจนุจฺจารณํ ทฺวิสทฺทโต [Pg.110] พหุวจนเมว โหตีติ ญาปนตฺถํ. ทฺเว ธมฺมา, ทฺเว อิตฺถิโย, ทฺเว รูปานิ, ทุเว วา, เอวํ ทุติยายมฺปิ, ทฺวีหิ ทฺวีภิ. स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसक लिंग में वर्तमान 'द्वि' इस संख्या शब्द को विभक्ति सहित 'द्वे' आदेश होता है, 'यो' विभक्तियों के परे होने पर। 'च' शब्द से 'दुवे' भी होता है, और कहीं 'नं' विभक्ति में 'दुवि' भी होता है। (सूत्र में) बहुवचन का उच्चारण यह बताने के लिए है कि 'द्वि' शब्द से केवल बहुवचन ही होता है। द्वे धम्मा (दो धर्म), द्वे इत्थियो (दो स्त्रियाँ), द्वे रूपाणि (दो रूप), अथवा दुवे; इसी प्रकार द्वितीया में भी; द्वीहि, द्वीभि। นํมฺหิ ทีเฆ สมฺปตฺเต – 'नं' विभक्ति में दीर्घ प्राप्त होने पर - ๒๒๙. โน จ ทฺวาทิโต นํมฺหิ. २२९. नो च द्वादितो नंम्हि (द्वि आदि से परे 'नं' में 'न' का आगम होता है)। ทฺวิอิจฺเจวมาทิโต สงฺขฺยาโต นการาคโม โหติ นํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. จสทฺทคฺคหเณน อิตฺถิยํ ติ จ ตุสทฺทโต สฺสญฺจาคโม นํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. ทฺวินฺนํ ทุวินฺนํ วา, ทฺวีหิ ทฺวีภิ, ทฺวินฺนํ ทุวินฺนํ, ทฺวีสุ. 'द्वि' इत्यादि संख्या से 'नं' विभक्ति में 'न' कार का आगम होता है। 'च' शब्द के ग्रहण से स्त्रीलिंग में 'ति' (तीन) शब्द होने पर और 'तु' शब्द से 'स्स' का आगम 'नं' विभक्ति में होता है। द्विन्नं अथवा दुविन्नं, द्वीहि, द्वीभि, द्विन्नं, दुविन्नं, द्वीसु। ติสทฺทสฺส เภโท. ‘‘ติ โย’’อิตีธ 'ति' शब्द के भेद। यहाँ 'ति' और 'यो' होने पर - โยโลเป สมฺปตฺเต 'यो' का लोप प्राप्त होने पर - ‘‘โยสู’’ติ วตฺตเต. 'योसु' की अनुवृत्ति होती है। ๒๓๐. ติ จตุนฺนํ ติสฺโส จตสฺโส ตโยจตฺตาโรตีณิ จตฺตาริ. २३०. 'ति' और 'चतु' (संख्याओं) के (स्थान पर) 'तिस्सो', 'चतस्सो', 'तयो', 'चत्तारो', 'तीणि' और 'चत्तारि' (आदेश होते हैं)। ติ จตุนฺนํ สงฺขฺยานํ อิตฺถิปุมนปุํสเก วตฺตมานานํ สวิภตฺตีนํ ยถากฺกมํ ติสฺโส จตสฺโส ตโย จตฺตาโรตีณิ จตฺตาริอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ โยสุ ปเรสุ. ตโย ปุริสา, ตโย ปุริเส ปสฺส, ตีหิ ตีภิ. स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसक लिंग में वर्तमान 'ति' और 'चतु' संख्याओं के स्थान पर, विभक्ति सहित, 'यो' विभक्ति परे होने पर यथाक्रम 'तिस्सो', 'चतस्सो', 'तयो', 'चत्तारो', 'तीणि' और 'चत्तारि' ये आदेश होते हैं। (जैसे) 'तयो पुरिसा' (तीन पुरुष), 'तयो पुरिसे पस्स' (तीन पुरुषों को देखो), 'तीहि', 'तीभि' (तीन के द्वारा)। ‘‘น’’มิติ วตฺตเต. 'नं' (विभक्ति) की अनुवृत्ति होती है। ๒๓๑. อิณฺณมิณฺณนฺนํ ตีหิ สงฺขฺยาหิ. २३१. 'ति' संख्या से (परे 'नं' के स्थान पर) 'इण्णं' और 'इण्णन्नं' (आदेश होते हैं)। ติอิจฺเจตสฺมา สงฺขฺยาสทฺทา ปรสฺส นํวจนสฺส อิณฺณํ อิณฺณนฺนํอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ, สรโลปาทิ. ติณฺณํ ติณฺณนฺนํ, ตีหิ ตีภิ, ติณฺณํ ติณฺณนฺนํ, ตีสุ. 'ति' इस संख्या शब्द से परे 'नं' वचन (विभक्ति) के स्थान पर 'इण्णं' और 'इण्णन्नं' ये आदेश होते हैं, (फिर) स्वर-लोप आदि (कार्य होते हैं)। (जैसे) 'तिण्णं', 'तिण्णन्नं', 'तीहि', 'तीभि', 'तिण्णं', 'तिण्णन्नं', 'तीसु'। อิตฺถิยํ [Pg.111] ติสฺโส อิตฺถิโย, ติสฺโส, ตีหิ ตีภิ, นํมฺหิ สฺสญฺจาคโม, ติสฺสนฺนํ, สฺสํพฺยวธานโต อิณฺณาภาโว, เสสํ สมํ. स्त्रीलिंग में 'तिस्सो इत्थियो', 'तिस्सो', 'तीहि', 'तीभि'; 'नं' विभक्ति में 'स्स' का आगम होता है - 'तिस्सन्नं'; 'स्स' के व्यवधान के कारण 'इण्णं' का अभाव होता है, शेष (रूप पुल्लिंग के) समान हैं। นปุํสเก ตีณิ, ตีณิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสมํ. नपुंसक लिंग में 'तीणि', 'तीणि'। शेष पुल्लिंग के समान है। ตถา จตุสทฺทสฺสปิ โยสุ ‘‘ติจตุนฺน’’นฺติอาทินา ยถาวุตฺตาเทโส, ‘‘ตโต โยนโม ตู’’ติ เอตฺถ ตุสทฺเทน กฺวจิ โอกาโร จ. จตฺตาโร จตุโร วา, จตฺตาโร จตุโร, จตูหิ จตูภิ จตุพฺภิ, จตุนฺนํ, นการาคโม. จตูหิ จตูภิ จตุพฺภิ, จตุนฺนํ, จตูสุ. उसी प्रकार 'चतु' शब्द के भी 'यो' विभक्ति परे होने पर 'तिचतुन्नं' आदि (सूत्र) से यथाकथित आदेश होते हैं, और 'ततो योनमो तू' यहाँ 'तु' शब्द से कहीं 'ओकार' भी होता है। (जैसे) 'चत्तारो' या 'चतुरो', 'चत्तारो', 'चतुरो', 'चतूहि', 'चतूबहि', 'चतुब्भि', 'चतुन्नं' (यहाँ 'न' कार का आगम है)। 'चतूहि', 'चतूबहि', 'चतुब्भि', 'चतुन्नं', 'चतूसु'। อิตฺถิยํ จตสฺโส, จตสฺโส, นํมฺหิ สฺสญฺจาคโม, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา จตุรุการสฺส อกาโร. จตสฺสนฺนํ. เสสํ สมํ. स्त्रीलिंग में 'चतस्सो', 'चतस्सो'; 'नं' विभक्ति में 'स्स' का आगम होता है, 'तेसु वुद्धि' आदि (सूत्र) से 'चतु' के 'उ' कार को 'अ' कार होता है - 'चतस्सन्नं'। शेष समान है। นปุํสเก จตฺตาริ, จตฺตาริ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสมํ. नपुंसक लिंग में 'चत्तारि', 'चत्तारि'। शेष पुल्लिंग के समान है। ตถา – उसी प्रकार – นีลาทิคุณนามญฺจ, พหุพฺพีหิ จ ตทฺธิตํ; สามญฺญวุตฺยตีตาทิ-กิตนฺตํ วาจฺจลิงฺคิกํ. नीलादि गुणवाचक नाम, बहुब्रीहि समास, तद्धित प्रत्ययान्त, और सामान्य वृत्ति वाले अतीत आदि कृदन्त शब्द वाच्य के लिंग के अनुसार (तीनों लिंगों में) होते हैं। เอตฺเถทํ วุจฺจเต – यहाँ यह कहा जाता है – เอเส’โส เอตมิติ จ,ปสิทฺธิ อตฺเถสุ เยสุ โลกสฺส; ถีปุนฺนปุํสกานิติ,วุจฺจนฺเต ตานิ นามานิ. 'एसा', 'एसो' और 'एतं' - लोक में जिन अर्थों में ये प्रसिद्ध हैं, उन्हें स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसक लिंग नाम कहा जाता है। ติลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. त्रिलिंग (प्रकरण) समाप्त हुआ। อลิงฺคนาม अलिंग नाम (लिंगरहित शब्द)। อถาลิงฺเคสุ [Pg.112] นาเมสุ ตุมฺหมฺหสทฺทา วุจฺจนฺเต. अब अलिंग नामों में 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्द कहे जाते हैं। เตสํ ปนาลิงฺคตฺตา ตีสุ ลิงฺเคสุ สมานรูปํ. ‘‘ตุมฺหมฺห’’อิติ ฐิเต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. उनके अलिंग होने के कारण तीनों लिंगों में समान रूप होते हैं। 'तुम्ह' और 'अम्ह' के स्थित होने पर 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। ‘‘สวิภตฺตีนํ, ตุมฺหมฺหาก’’นฺติ อธิกาโร. 'सविभत्तीनं' और 'तुम्हम्हाकं' का अधिकार है। ๒๓๒. ตฺวมหํ สิมฺหิ จ. २३२. 'सि' विभक्ति परे होने पर 'त्वं' और 'अहं' (आदेश होते हैं)। สพฺเพสํ ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ยถากฺกมํ ตฺวํอหํอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ สิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. จสทฺเทน ตุมฺหสฺส ตุวญฺจ โหติ. ตฺวํ ปุมา, ตฺวํ อิตฺถี, ตฺวํ นปุํสกํ, ตุวํ สตฺถา วา. อหํ ปุมา, อหํ อิตฺถี, อหํ นปุํสกํ. 'सि' विभक्ति परे होने पर सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर, विभक्ति सहित, यथाक्रम 'त्वं' और 'अहं' ये आदेश होते हैं। 'च' शब्द से 'तुम्ह' का 'तुवं' भी होता है। 'त्वं पुमा' (तुम पुरुष), 'त्वं इत्थी' (तुम स्त्री), 'त्वं नपुंसकं' (तुम नपुंसक), अथवा 'तुवं सत्था' (तुम शास्ता)। 'अहं पुमा' (मैं पुरुष), 'अहं इत्थी' (मैं स्त्री), 'अहं नपुंसकं' (मैं नपुंसक)। พหุวจเน ‘‘สพฺพนามการเต ปฐโม’’ติ เอกาโร. ตุมฺเห ติฏฺฐถ, ภิยฺโย อมฺเห มเหมเส. बहुवचन में 'सब्बनामकारते पठमो' (सूत्र) से 'ए' कार होता है। 'तुम्हे तिट्ठथ' (तुम सब ठहरो), 'भिय्यो अम्हे महेमसे' (हम और अधिक पूजा करें)। ‘‘อมฺหสฺสา’’ติ วตฺตเต. 'अम्हस्स' की अनुवृत्ति होती है। ๒๓๓. มยํ โยมฺหิ ปฐเม. २३३. प्रथमा 'यो' विभक्ति परे होने पर 'मयं' (आदेश होता है)। สพฺพสฺส อมฺหสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส มยํอาเทโส โหติ โยมฺหิ ปฐเม. มยํ คจฺฉาม. प्रथमा 'यो' विभक्ति परे होने पर विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'अम्ह' शब्द के स्थान पर 'मयं' आदेश होता है। 'मयं गच्छाम' (हम सब जाते हैं)। เอตฺถ จ เอกสฺมิมฺปิ คารวพหุมาเนน พหุตฺตสมาโรปา พหุวจนํ โหติ. और यहाँ एक (व्यक्ति) के लिए भी गौरव और बहुमान के कारण बहुत्व का आरोप होने से बहुवचन होता है। ‘‘อํมฺหี’’ติ วตฺตเต. 'अं' (विभक्ति) की अनुवृत्ति होती है। ๒๓๔. ตวํ มมญฺจ นวา. २३४. 'अं' विभक्ति परे होने पर 'तवं' और 'ममं' (आदेश) विकल्प से (होते हैं)। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตวํ มมํอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ นวา ยถากฺกมํ อํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. ตวํ, มมํ ปสฺส. 'अं' विभक्ति परे होने पर सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर, विभक्ति सहित, यथाक्रम 'तवं' और 'ममं' ये आदेश विकल्प से होते हैं। 'तवं पस्स' (तुझे देखो), 'ममं पस्स' (मुझे देखो)। ๒๓๕. ตํ [Pg.113] มมํมฺหิ. २३५. 'अं' विभक्ति परे होने पर 'तं' (आदेश होता है)। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตํ มํอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ ยถากฺกมํ อํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. ตํ, มํ. 'अं' विभक्ति होने पर, विभक्ति सहित सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तं' और 'मं' आदेश होते हैं। जैसे- तं, मं। ๒๓๖. ตุมฺหสฺส ตุวํ ตฺวมํมฺหิ. २३६. 'अं' विभक्ति होने पर 'तुम्ह' शब्द के स्थान पर 'तुवं' और 'त्वं' आदेश होते हैं। สพฺพสฺส ตุมฺหสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส ตุวํตฺวํอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ อํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. ตุวํ ตฺวํ. 'अं' विभक्ति होने पर, विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'तुम्ह' शब्द के स्थान पर 'तुवं' और 'त्वं' ये आदेश होते हैं। जैसे- तुवं, त्वं। พหุวจเน ‘‘ตุมฺหมฺเหหิ, อาก’’นฺติ จ วตฺตเต. बहुवचन में 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों से परे 'आकं' की अनुवृत्ति होती है। ๒๓๗. วา ยฺวปฺปฐโม. २३७. प्रथमा विभक्ति को छोड़कर अन्य 'यो' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से (आकं होता है)। ตุมฺหมฺเหหิ ปโร อปฺปฐโม โย อากํ โหติ วา. ตุมฺหากํ ปสฺสามิ, ตุมฺเห ปสฺสามิ, อมฺหากํ ปสฺสสิ, อมฺเห ปสฺสสิ. 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों से परे, प्रथमा को छोड़कर अन्य 'यो' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'आकं' आदेश होता है। जैसे- तुम्हाकं पस्सामि, तुम्हे पस्सामि, अम्हाकं पस्ससि, अम्हे पस्ससि। ๒๓๘. นามฺหิ ตยา มยา. २३८. 'ना' विभक्ति होने पर 'तया' और 'मया' आदेश होते हैं। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตยา มยาอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ ยถากฺกมํ นามฺหิ วิภตฺติมฺหิ. 'ना' विभक्ति होने पर, विभक्ति सहित सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तया' और 'मया' ये आदेश होते हैं। ๒๓๙. ตยาตยีนํ ตกาโร ตฺวตฺตํ วา. २३९. 'तया' और 'तयि' के 'त'कार को विकल्प से 'त्व' भाव होता है। ตยา ตยิอิจฺเจเตสํ ตกาโร ตฺวตฺตมาปชฺชเต วา. ตฺวยา ตยา, มยา, ตุมฺเหหิ ตุมฺเหภิ, อมฺเหหิ อมฺเหภิ. 'तया' और 'तयि' इनके 'त'कार को विकल्प से 'त्व' भाव प्राप्त होता है। जैसे- त्वया, तया, मया, तुम्हेहि, तुम्हेभि, अम्हेहि, अम्हेभि। ‘‘สสฺมึ, วา’’ติ วตฺตเต. 'स' विभक्ति होने पर 'वा' (विकल्प) की अनुवृत्ति होती है। ๒๔๐. สสฺสํ. २४०. 'स' विभक्ति के स्थान पर 'अं' आदेश होता है। ตุมฺหมฺเหหิ สสฺส วิภตฺติสฺส อมาเทโส โหติ วา. ตุมฺหํ, อมฺหํ ทียเต. 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों से परे 'स' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'अं' आदेश होता है। जैसे- तुम्हं, अम्हं दीयते। ๒๔๑. ตว [Pg.114] มม เส. २४१. 'स' विभक्ति होने पर 'तव' और 'मम' आदेश होते हैं। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ยถากฺกมํ ตวมมอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ เส วิภตฺติมฺหิ, วิกปฺเปนายํ วิชฺฌนฺตรสฺส วิชฺชมานตฺตา. 'स' विभक्ति होने पर, विभक्ति सहित सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तव' और 'मम' ये आदेश होते हैं; अन्य विधि के विद्यमान होने के कारण यह विकल्प से होता है। ‘‘เส’’ติ วตฺตเต. 'स' विभक्ति की अनुवृत्ति होती है। ๒๔๒. ตุยฺหํ มยฺหญฺจ. २४२. और 'तुय्हं' तथा 'मय्हं' आदेश भी होते हैं। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ยถากฺกมํ ตุยฺหํมยฺหํอิจฺเจเต อาเทสา จ โหนฺติ เส วิภตฺติมฺหิ. ตว, มม ตุยฺหํ, มยฺหํ วา ทียเต. 'स' विभक्ति होने पर, विभक्ति सहित सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तुय्हं' और 'मय्हं' ये आदेश भी होते हैं। जैसे- तव, मम, तुय्हं, मय्हं वा दीयते। ๒๔๓. อมฺหสฺส มมํ สวิภตฺติสฺส เส. २४३. 'स' विभक्ति होने पर, विभक्ति सहित 'अम्ह' शब्द के स्थान पर 'ममं' आदेश होता है। สพฺพสฺเสว อมฺหสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส มมํอาเทโส โหติ เส วิภตฺติมฺหิ. มมํ ทียเต. 'स' विभक्ति होने पर, विभक्ति सहित सम्पूर्ण 'अम्ह' शब्द के स्थान पर ही 'ममं' आदेश होता है। जैसे- ममं दीयते। ‘‘สสฺส’’นฺติ อิโต สีหคติยา ‘‘อ’’มิติ วตฺตเต. 'सस्सं' (सूत्र) से सिंहगति न्याय से 'अं' की अनुवृत्ति होती है। ๒๔๔. ตุมฺหมฺเหหิ นมากํ. २४४. 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों से परे 'नं' विभक्ति के स्थान पर 'आकं' आदेश होता है। ตุมฺหมฺเหหิ ปรสฺส นํวจนสฺส อากมิจฺจาเทโส โหติ, อญฺจ. ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อมฺหสฺส กฺวจิ อสฺมาเทโส. ตุมฺหํ ตุมฺหากํ, อมฺหํ อมฺหากํ อสฺมากํ วา. 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों से परे 'नं' वचन (विभक्ति) के स्थान पर 'आकं' आदेश होता है, और 'अं' भी। 'तेसु वुद्धि' इत्यादि सूत्र से 'अम्ह' के स्थान पर कहीं 'अस्म' आदेश होता है। जैसे- तुम्हं, तुम्हाकं, अम्हं, अम्हाकं या अस्माकं। ปญฺจมิยํ ‘‘อมฺหตุมฺหนฺตุราช’’อิจฺจาทินา สฺมาวจนสฺส นาภาวาติเทโส. ตยา, มยา อเปติ, ตุมฺเหหิ, อมฺเหหิ ตุมฺเหภิ อมฺเหภิ, ตุมฺหํ อมฺหํ ตว มม, ตุยฺหํ, มยฺหํ มมํ ปริคฺคโห, ตุมฺหํ ตุมฺหากํ, อมฺหํ อมฺหากํ อสฺมากํ ธมฺมตา. पंचमी विभक्ति में 'अम्हतुम्हन्तुरज' इत्यादि सूत्र से 'स्मा' वचन के स्थान पर 'ना' भाव का अतिदेश होता है। जैसे- तया, मया अपेति, तुम्हेहि, अम्हेहि, तुम्हेभि, अम्हेभि, तुम्हं, अम्हं, तव, मम, तुय्हं, मय्हं, ममं परिग्गहो, तुम्हं, तुम्हाकं, अम्हं, अम्हाकं, अस्माकं धम्मता। ‘‘สฺมึมฺหี’’ติ วตฺตเต. 'स्मिं' विभक्ति की अनुवृत्ति होती है। ๒๔๕. ตุมฺหมฺหากํ [Pg.115] ตยิ มยิ. २४५. 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर 'तयि' और 'मयि' आदेश होते हैं। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตยิ มยิอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ ยถากฺกมํ สฺมึมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. ตการสฺส ตฺวตฺตํ. ตฺวยิ ตยิ มยิ, ตุมฺเหสุ อมฺเหสุ. 'स्मिं' विभक्ति होने पर, विभक्ति सहित सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तयि' और 'मयि' ये आदेश होते हैं। 'त'कार को 'त्व' भाव होता है। जैसे- त्वयि, तयि, मयि, तुम्हेसु, अम्हेसु। เตสํ เอว ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ ปทโต ปเรสํ กฺวจิ อาเทสนฺตรวิธาเน รูปเภโท. उन्हीं 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के किसी पद के बाद आने पर, कहीं अन्य आदेशों के विधान से रूपों में भिन्नता होती है। ‘‘นวา’’ติ อธิกาโร. 'नवा' (न वा - विकल्प से नहीं) का अधिकार है। ๒๔๖. ปทโต ทุติยาจตุตฺถีฉฏฺฐีสุ โว โน. २४६. पद के बाद द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी विभक्तियों में 'वो' और 'नो' आदेश होते हैं। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ปทสฺมา ปเรสํ โว โนอาเทสา โหนฺติ ยถากฺกมํ ทุติยาจตุตฺถีฉฏฺฐีสุ พหุวจเนสุ นวา. เอตฺถ จ ‘‘เอกวจเนสู’’ติ วกฺขมานตฺตา ‘‘พหุวจเนสู’’ติ ลทฺธํ. ปหาย โว คมิสฺสามิ, มา โน อชฺช วิกนฺตึสุ, ธมฺมํ โว ภิกฺขเว เทสิสฺสามิ, สํวิภเชถ โน รชฺเชน, ตุฏฺโฐสฺมิ โว ปกติยา, สตฺถา โน ภควา อนุปฺปตฺโต. सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों की सभी विभक्तियों के स्थान पर, किसी पद के बाद आने पर, द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी के बहुवचन में क्रमशः 'वो' और 'नो' आदेश विकल्प से होते हैं। और यहाँ 'एकवचन में' ऐसा आगे कहे जाने के कारण (यहाँ) 'बहुवचन में' यह प्राप्त होता है। (उदाहरण:) मैं तुम्हें छोड़कर जाऊँगा, वे आज हमें न काटें, भिक्षुओं! मैं तुम्हें धर्म का उपदेश दूँगा, हमारे राज्य के साथ बँटवारा करो, मैं तुम्हारे स्वभाव से संतुष्ट हूँ, हमारे शास्ता भगवान आ पहुँचे हैं। นวาติ กึ? ภยํ ตุมฺหาก โน สิยา, เอโส อมฺหากํ สตฺถา. 'नवा' (विकल्प से) क्यों? (ताकि ये रूप भी हों:) 'भयं तुम्हाकं नो सिया' (तुम्हें भय न हो), 'एसो अम्हाकं सत्था' (यह हमारे शास्ता हैं)। ‘‘ปทโต, จตุตฺถีฉฏฺฐีสู’’ติ วตฺตเต. 'पदतः' और 'चतुर्थी-षष्ठीषु' की अनुवृत्ति आती है। ๒๔๗. เตเมกวจเนสุ จ. २४७. 'ते' और 'मे' एकवचन में भी। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ปทสฺมา ปเรสํ เต เมอาเทสา โหนฺติ ยถากฺกมํ จตุตฺถีฉฏฺฐีสุ เอกวจเนสุ [Pg.116] นวา. ททามิ เต คามวรานิ ปญฺจ, ททาหิ เม คามวรํ, อิทํ เต รฏฺฐํ, อยํ เม ปุตฺโต. सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों की सभी विभक्तियों के स्थान पर, किसी पद के बाद आने पर, चतुर्थी और षष्ठी के एकवचन में क्रमशः 'ते' और 'मे' आदेश विकल्प से होते हैं। (उदाहरण:) मैं तुम्हें पाँच श्रेष्ठ गाँव देता हूँ, मुझे एक श्रेष्ठ गाँव दो, यह तुम्हारा राष्ट्र है, यह मेरा पुत्र है। นวาติ กึ? อิทํ จีวรํ ตุยฺหํ วิกปฺปนตฺถาย ทมฺมิ, สุณาถ วจนํ มม. 'नवा' क्यों? (ताकि ये रूप भी हों:) 'इदं चीवरं तुय्हं विकप्पनत्थाय दम्मि' (यह चीवर मैं तुम्हें विकल्प के लिए देता हूँ), 'सुणाथ वचनं मम' (मेरा वचन सुनो)। นวาธิการโต เจตฺถ,โว โน เต เมติ เย อิเม; ปาทาโท จ จ วา เอวา-ทิโยเค จ น โหนฺติ เต. और यहाँ 'नवा' के अधिकार से, ये जो 'वो', 'नो', 'ते', 'मे' हैं; वे पाद (छंद के चरण) के आदि में तथा 'च', 'वा', 'एव' आदि के योग में नहीं होते हैं। ยถา – जैसे - น โสจามิ น โรทามิ, ตว สุตฺวาน มาณว; ตุยฺหญฺจาปิ มหาราช, มยฺหญฺจ รฏฺฐวฑฺฒน. हे माणव! तुम्हारी (बात) सुनकर मैं न शोक करता हूँ न रोता हूँ; और हे महाराज! तुम्हारे लिए भी, और हे राष्ट्रवर्द्धन! मेरे लिए भी। เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ มมญฺเจว ตุมฺหากญฺจาติ. इस प्रकार यह दीर्घ काल तक मेरा और तुम्हारा ही संसरण और संधावन हुआ है। ปทโตติ กึ? ตว ญาติ, มม ญาติ. 'पदतः' क्यों? (ताकि पद के अभाव में ये रूप हों:) 'तव ञाति' (तुम्हारा ज्ञाति), 'मम ञाति' (मेरा ज्ञाति)। ‘‘เต เม’’ติ วตฺตเต. 'ते मे' की अनुवृत्ति आती है। ๒๔๘. น อํมฺหิ. २४८. 'अं' विभक्ति होने पर नहीं। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ปทสฺมา ปเรสํ เต เมอาเทสา น โหนฺติ อํมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. ปสฺเสยฺย ตํ วสฺสสตํ อาโรคฺยํ. โส มมพฺรวีติ. सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों की सभी विभक्तियों के स्थान पर, किसी पद के बाद आने पर, 'अं' विभक्ति होने पर 'ते' और 'मे' आदेश नहीं होते हैं। (उदाहरण:) वह तुम्हें सौ वर्ष तक आरोग्य देखे। उसने मुझसे कहा। ‘‘เตเมกวจเน’’ติ วตฺตเต. 'ते मे एकवचने' की अनुवृत्ति आती है। ๒๔๙. วา ตติเย จ. २४९. और तृतीया में विकल्प से। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ปทสฺมา ปเรสํ เต เม อาเทสา โหนฺติ วา ยถากฺกมํ ตติเยกวจเน ปเร[Pg.117]. กตํ เต ปาปํ, กตํ ตยา ปาปํ, กตํ เม ปุญฺญํ, กตํ มยา ปุญฺญํ. सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों की सभी विभक्तियों के स्थान पर, किसी पद के बाद आने पर, तृतीया एकवचन परे होने पर क्रमशः 'ते' और 'मे' आदेश विकल्प से होते हैं। (उदाहरण:) तुम्हारे द्वारा पाप किया गया (ते), तुम्हारे द्वारा पाप किया गया (तया), मेरे द्वारा पुण्य किया गया (मे), मेरे द्वारा पुण्य किया गया (मया)। ‘‘วา, ตติเย’’ติ จ วตฺตเต. 'वा' और 'तृतीये' की अनुवृत्ति आती है। ๒๕๐. พหุวจเนสุ โว โน. २५०. बहुवचन में 'वो' और 'नो' आदेश। สพฺเพสํ ตุมฺห อมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ปทสฺมา ปเรสํ โว โนอาเทสา โหนฺติ วา ยถากฺกมํ ตติยาพหุวจเน ปเร. กตํ โว กมฺมํ, กตํ โน กมฺมํ. सभी 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों की सभी विभक्तियों के स्थान पर, किसी पद के बाद आने पर, तृतीया बहुवचन परे होने पर क्रमशः 'वो' और 'नो' आदेश विकल्प से होते हैं। (उदाहरण:) तुम्हारे द्वारा कर्म किया गया (वो), हमारे द्वारा कर्म किया गया (नो)। พหุวจนนิทฺเทเสน กฺวจิ โยมฺหิ ปฐเม จ โว โน โหนฺติ. คามํ โว คจฺเฉยฺยาถ, คามํ โน คจฺเฉยฺยาม. बहुवचन के निर्देश से कहीं-कहीं प्रथमा के 'यो' विभक्ति में भी 'वो' और 'नो' होते हैं। (उदाहरण:) तुम गाँव जाओ (वो), हम गाँव जाएँ (नो)। ตถา ปญฺจาทีนมฏฺฐารสนฺตานํ, กติสทฺทสฺส จาลิงฺคตฺตา ติลิงฺเคปิ สมานรูปํ, อลิงฺคตฺตา เอว ปญฺจาทิโต อิตฺถิปฺปจฺจยาภาโว. उसी प्रकार 'पञ्च' आदि से लेकर 'अट्ठारस' तक के शब्दों और 'कति' शब्द का अलिङ्ग होने के कारण तीनों लिङ्गों में समान रूप होता है; अलिङ्ग होने के कारण ही 'पञ्च' आदि से स्त्री-प्रत्यय का अभाव होता है। ‘‘ปญฺจ โย’’อิตีธ – यहाँ 'पञ्च यो' इसमें - ‘‘โยสุ ทฺวินฺนํ ทฺเว จา’’ติ อิโต ‘‘โยสู’’ติ วตฺตเต, ‘‘อิตฺถิปุมนปุํสกสงฺขฺย’’นฺติ จ. 'योसु द्विन्नं द्वे च' यहाँ से 'योसु' की अनुवृत्ति आती है, और 'इत्थिपुमनपुंसकसंख्यां' की भी। ๒๕๑. ปญฺจาทีนมกาโร. २५१. 'पञ्च' आदि का अकार। อนฺตาเปกฺขายํ ฉฏฺฐี, ปญฺจาทีนํ อฏฺฐารสนฺตานํ สงฺขฺยานํ อิตฺถิปุมนปุํสเก วตฺตมานานมนฺตสฺส สวิภตฺติสฺส อกาโร โหติ โยสุ ปเรสุ. อา เออาเทสาปวาโทยํ, ปญฺจกฺขนฺธา, ปญฺจ คติโย, ปญฺจ อินฺทฺริยานิ. เอวํ ทุติยายญฺจ. यहाँ 'पञ्चादीनं' में अंत की अपेक्षा से षष्ठी विभक्ति है; स्त्री, पुरुष और नपुंसक लिङ्ग में वर्तमान 'पञ्च' आदि से लेकर 'अट्ठारस' तक की संख्याओं के विभक्ति सहित अंत के स्थान पर 'यो' विभक्तियों के परे होने पर अकार आदेश होता है। यह 'आ' और 'ए' आदेशों का अपवाद है। (उदाहरण:) पञ्चक्खन्धा, पञ्च गतियो, पञ्च इन्द्रियानि। इसी प्रकार द्वितीया में भी। ‘‘สุนํหิสู’’ติ วตฺตเต. 'सु-नं-हिसु' की अनुवृत्ति आती है। ๒๕๒. ปญฺจาทีนมตฺตํ. २५२. 'पञ्च' आदि का अत्व (अकार)। ปญฺจาทีนมฏฺฐารสนฺตานํ สงฺขฺยานมนฺโต อตฺตมาปชฺชเต สุ นํ หิอิจฺเจเตสุ ปเรสุ. เอตฺตทีฆาปวาโทยํ. ปญฺจหิ ปญฺจภิ[Pg.118], ปญฺจนฺนํ, ปญฺจหิ ปญฺจภิ, ปญฺจนฺนํ, ปญฺจสุ. เอวํ ฉ ส ตฺต อฏฺฐนว ทสสทฺทา. 'पञ्च' आदि से लेकर 'अट्ठारस' तक की संख्याओं का अंत 'सु', 'नं', 'हि' इनके परे होने पर अत्व (अकार) को प्राप्त होता है। यह एत्व और दीर्घ का अपवाद है। (उदाहरण:) पञ्चहि, पञ्चभि, पञ्चन्नं, पञ्चहि, पञ्चभि, पञ्चन्नं, पञ्चसु। इसी प्रकार छ, सत्त, अट्ठ, नव, दस शब्द हैं। ‘‘เอกญฺจ ทส จา’’ติ อตฺเถ ทฺวนฺทสมาเส, ‘‘เอเกน อธิกา ทสา’’ติ อตฺเถ ตปฺปุริเส วา กเต 'एक और दस' इस अर्थ में द्वन्द्व समास होने पर, अथवा 'एक से अधिक दस' इस अर्थ में तत्पुरुष समास होने पर - ‘‘สงฺขฺยาเน’’ติ วตฺตเต. ‘‘संख्याने’’ यह अनुवृत्ति आती है। ๒๕๓. ทฺเวกฏฺฐานมากาโร วา. २५३. द्वि, एक और अष्ट के स्थान पर विकल्प से आकार (आ) होता है। ทฺวิเอกอฏฺฐอิจฺเจเตสมนฺโต อากาโร โหติ วา สงฺขฺยาเน อุตฺตรปเท ปเร. ววตฺถิตวิภาสายํ. เอกาทส, ทฺวาทส, อฏฺฐารส. संख्यावाचक उत्तरपद परे होने पर द्वि, एक और अष्ट के अन्त में विकल्प से आकार होता है। यह व्यवस्थित विभाषा है। जैसे—एकादस, द्वादस, अट्ठारस। สงฺขฺยาเนติ กิมตฺถํ? เอกทนฺโต, ทฺวิทนฺโต, อฏฺฐตฺถมฺโภ. ‘संख्याने’ (संख्या में) ऐसा क्यों कहा गया? एकदन्तो, द्विदन्तो, अट्ठत्थम्भो (यहाँ आकार नहीं होता)। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. ‘‘वा’’ यह अनुवृत्ति आती है। ๒๕๔. เอกาทิโต ทสฺส ร สงฺขฺยาเน. २५४. संख्या में एक आदि के बाद ‘दस’ के ‘द’ को ‘र’ होता है। เอกาทิโต สงฺขฺยาโต ปรสฺส ทสสฺส อาทิสฺส ทสฺส รกาโร โหติ วา สงฺขฺยาเน. เสสํ สมํ. เอการส, เอกาทส. संख्या में एक आदि संख्या से परे ‘दस’ के आदि ‘द’ कार को विकल्प से ‘र’ कार होता है। शेष समान है। जैसे—एकारस, एकादस। ทฺเว จ ทส จ, ทฺวีหิ วา อธิกา ทสาติ ทฺวิทส อิตีธ – दो और दस, अथवा दो से अधिक दस—इस अर्थ में ‘द्विदस’ यहाँ— ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. ‘‘वा’’ यह अनुवृत्ति आती है। ๒๕๕. วีสติทเสสุ พา ทฺวิสฺส ตุ. २५५. वीसति और दस परे होने पर ‘द्वि’ के स्थान पर ‘बा’ होता है। วีสติ ทสอิจฺเจเตสุ ปเรสุ ทฺวิสทฺทสฺส พา โหติ วา. ตุสทฺเทน ตึสายมฺปิ. รกาโร, อาตฺตญฺจ. พารส, ทฺวาทส. वीसति और दस—इनके परे होने पर ‘द्वि’ शब्द को विकल्प से ‘बा’ होता है। ‘तु’ शब्द से ‘तिंसा’ (तीस) में भी होता है। र-कार और आकार भी होते हैं। जैसे—बारस, द्वादस। ตโย จ ทส จ, ตีหิ วา อธิกา ทสาติ เตรส. เอตฺถ ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา ติสทฺทสฺส เตอาเทโส อานวุติยา. तीन और दस, अथवा तीन से अधिक दस—इस अर्थ में ‘तेरस’। यहाँ ‘तेसु वुद्धि’ इत्यादि सूत्र से ‘ति’ शब्द को नब्बे तक ‘ते’ आदेश होता है। จตฺตาโร [Pg.119] จ ทส จ, จตูหิ วา อธิกา ทสาติ จตุทฺทส อิจฺจตฺร – चार और दस, अथवा चार से अधिक दस—इस अर्थ में ‘चतुद्दस’ यहाँ— ‘‘คณเน, ทสสฺสา’’ติ จ วตฺตเต. ‘‘गणने’’ और ‘‘दसस्स’’ यह अनुवृत्ति आती है। ๒๕๖ . จตูปปทสฺส โลโป ตุตฺตรปทาทิ จสฺส จุ โจปิ นวา. २५६. चतु उपपद का लोप होता है और उत्तरपद के आदि ‘च’ को ‘चु’ और ‘चो’ भी विकल्प से होते हैं। คณเน ทสสฺสาทิมฺหิ ฐิตสฺส จตุอิจฺเจตสฺส อุปปทสฺส ตุสทฺโท โลโป โหติ, อุตฺตรปทาทิมฺหิ ฐิตสฺส จตูปปทสฺส จการสฺส จุ โจอาเทสา โหนฺติ นวา. จุทฺทส, โจทฺทส, จตุทฺทส. गणना में ‘दस’ के आदि में स्थित ‘चतु’ इस उपपद के ‘तु’ शब्द का लोप होता है, और उत्तरपद के आदि में स्थित ‘चतु’ उपपद के च-कार को विकल्प से ‘चु’ और ‘चो’ आदेश होते हैं। जैसे—चुद्दस, चोद्दस, चतुद्दस। อปิคฺคหเณน อนุปปทสฺสาปิ คณเน ปทาทิจการสฺส โลโป, จุ โจ โหนฺติ นวา. ยถา – ตาลีสํ, จุตฺตาลีสํ, โจตฺตาลีสํ, จตฺตาลีสํ. ‘अपि’ ग्रहण से बिना उपपद के भी गणना में पदादि च-कार का लोप होता है, और ‘चु’, ‘चो’ विकल्प से होते हैं। जैसे—तालीसं, चुत्तालीसं, चोत्तालीसं, चत्तालीसं। ปญฺจ จ ทส จ, ปญฺจหิ วา อธิกา ทสาติ อตฺเถ ปญฺจทส. ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา ปญฺจสทฺทสฺส ทส วีสตีสุ กฺวจิ ปนฺนปณฺณอาเทสา. ปนฺนรส, ปณฺณรส. पाँच और दस, अथवा पाँच से अधिक दस—इस अर्थ में ‘पञ्चदस’। ‘तेसु वुद्धि’ इत्यादि सूत्र से ‘पञ्च’ शब्द को दस और वीसति परे होने पर कहीं ‘पन्न’ और ‘पण्ण’ आदेश होते हैं। जैसे—पन्नरस, पण्णरस। ฉ จ ทส จ, ฉหิ วา อธิกา ทสาติ อตฺเถ ฉทส อิตีธ – छह और दस, अथवा छह से अधिक दस—इस अर्थ में ‘छदस’ यहाँ— ‘‘ฉสฺสา’’ติ วตฺตเต. ‘‘छस्स’’ यह अनुवृत्ति आती है। ๒๕๗. ทเส โส นิจฺจญฺจ. २५७. दस परे होने पर (छह को) नित्य ‘सो’ होता है। ฉอิจฺเจตสฺส สงฺขฺยาสทฺทสฺส นิจฺจํ โส โหติ ทเส ปเร. ‘छ’ इस संख्यावाचक शब्द को दस परे होने पर नित्य ‘सो’ होता है। ‘‘สงฺขฺยานํ, วา’’ติ จ วตฺตเต. ‘‘संख्यानं’’ और ‘‘वा’’ यह अनुवृत्ति आती है। ๒๕๘. ล ทรานํ. २५८. ल-कार, द और र के स्थान पर। สงฺขฺยานํ ทการรการานํ ลการาเทโส โหติ วา. संख्यावाचक शब्दों के द-कार और र-कार के स्थान पर विकल्प से ल-कार आदेश होता है। ลฬานมวิเสโส[Pg.120]. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, เตน ‘‘โสฬส’’ อิติ นิจฺจํ, ‘‘เตฬส, เตรส, จตฺตาลีสํ, จตฺตารีส’’มิติ วิภาสา, ทส ปนฺนรสาทีสุ น จ โหติ. ल और ळ में कोई भेद नहीं है। यहाँ ‘वा’ शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है, जिससे ‘सोळस’ नित्य होता है, ‘तेळस, तेरस, चत्तालीसं, चत्तारीसं’ में विकल्प होता है, और दस, पन्नरस आदि में नहीं होता है। สตฺต จ ทส จ, สตฺตหิ วา อธิกา ทสาติ อตฺเถ สตฺตรส, สตฺตทส. सात और दस, अथवा सात से अधिक दस—इस अर्थ में ‘सत्तरस’, ‘सत्तदस’। อฏฺฐ จ ทส จ, อฏฺฐหิ วา อธิกา ทสาติ อตฺเถ อฏฺฐทส อิตีธ อาตฺเต กเต – आठ और दस, अथवा आठ से अधिक दस—इस अर्थ में ‘अट्ठदस’ यहाँ आकार होने पर— ‘‘วา, ทสฺส, ร, สงฺขฺยาเน’’ติ จ วตฺตเต. ‘‘वा, दस्स, र, संख्याने’’ यह अनुवृत्ति आती है। ๒๕๙. อฏฺฐาทิโต จ. २५९. और अष्ट आदि के बाद भी। อฏฺฐาทิโต จ ทสสทฺทสฺส ทการสฺส รกาโร โหติ วา สงฺขฺยาเน. อฏฺฐารส, อฏฺฐาทส. 'अट्ठा' के बाद 'दस' शब्द के 'द' कार का 'र' कार विकल्प से होता है संख्या के विषय में। जैसे- अट्ठारस (अठारह), अट्ठादस। อฏฺฐาทิโตติ กึ? จตุทฺทส. 'अट्ठा' आदि से ऐसा क्यों कहा? (क्योंकि) चतुद्दस (चौदह) में नहीं होता। กติสทฺโท พหุวจนนฺโตว, ‘‘กติ โย’’ อิตีธ 'कति' शब्द केवल बहुवचनान्त ही होता है, जैसे यहाँ 'कति यो' में। นิจฺจํ โยโลปาทิ, รสฺสตฺตํ, กติ ติฏฺฐนฺติ, กติ ปสฺสสิ, กติหิ กติภิ, กตินํ, กติหิ กติภิ, กตินํ, กติสุ. नित्य 'यो' का लोप आदि और ह्रस्वत्व होता है; जैसे- कति तिट्ठन्ति, कति पस्ससि, कतिहि कतिभि, कतिनं, कतिहि कतिभि, कतिनं, katisu। อลิงฺคนามํ นิฏฺฐิตํ. अलिङ्ग नाम (अव्यय) समाप्त हुआ। วิภตฺติปฺปจฺจยวิธาน विभक्ति-प्रत्यय विधान। อถ วิภตฺติปฺปจฺจยนฺตา วุจฺจนฺเต. अब विभक्ति-प्रत्ययान्त शब्द कहे जाते हैं। เตสํ ปนาลิงฺคตฺตา, นิปาตตฺตา จ ติลิงฺเค, วจนทฺวเย จ สมานํ รูปํ. उनके अलिङ्ग होने और निपात होने के कारण तीनों लिङ्गों और दोनों वचनों में समान रूप होता है। ปุริสสฺมา, ปุริเสหิ วาติ อตฺเถ – 'पुरिसस्मा' (पुरुष से) या 'पुरिसेहि' (पुरुषों से) इस अर्थ में - ๒๖๐. กฺวจิ [Pg.121] โต ปญฺจมฺยตฺเถ. २६०. पञ्चमी के अर्थ में कहीं 'तो' प्रत्यय होता है। สพฺพสฺมา สุทฺธนามโต, สพฺพนามโต จ ลิงฺคมฺหา กฺวจิ โตปจฺจโย โหติ ปญฺจมฺยตฺเถ. सभी शुद्ध नामों और सर्वनामों के लिङ्गों से पञ्चमी के अर्थ में कहीं 'तो' प्रत्यय होता है। ๒๖๑. ตฺวาทโย วิภตฺติสญฺญา. २६१. 'त्वा' आदि की विभक्ति संज्ञा होती है। โตอาทิ เยสํ ทานิปริยนฺตานํ ปจฺจยานํ เต โหนฺติ ปจฺจยา ตฺวาทโย, เต ปจฺจยา วิภตฺติสญฺญา โหนฺติ. เตน ตทนฺตานมฺปิ วิภตฺยนฺตปทตฺตํ สิทฺธํ โหติ. 'तो' आदि से लेकर 'दानि' पर्यन्त जो प्रत्यय हैं, वे 'त्वादि' प्रत्यय कहलाते हैं, और उन प्रत्ययों की विभक्ति संज्ञा होती है। उससे उन प्रत्ययों से अन्त होने वाले शब्दों की भी विभक्त्यन्त पदता सिद्ध होती है। ปุริสโต, เอวํ ราชโต วา, โจรโต วา, อคฺคิโต วา, คหปติโต วา, หตฺถิโต, เหตุโต, สพฺพญฺญุโต, กญฺญโต, ยุตฺติโต, อิตฺถิโต, ภิกฺขุนิโต, เอตฺถ จ ‘‘กฺวจาทิมชฺฌุตฺตรานํ ทีฆรสฺสาปจฺจเยสุ จา’’ติ โตปจฺจเย รสฺสตฺตํ. ยาคุโต, ชมฺพุโต, จิตฺตโต, อายุโต อิจฺจาทิ. पुरिसतो, इसी प्रकार राजतो, चोरतो, अग्गितो, गहपतितो, हत्थितो, हेतुतो, सब्बञ्ञुतो, कञ्ञतो, युत्तितो, इत्थितो, भिक्खुनितो; और यहाँ 'क्वचादिमज्झुत्तरानं दीघरस्सापच्चयेसु चा' सूत्र से 'तो' प्रत्यय होने पर ह्रस्वत्व होता है। यागुतो, जम्बुतो, चित्ततो, आयुतो इत्यादि। สพฺพนามโต สพฺพสฺมา, สพฺเพหีติ วา อตฺเถ สพฺพโต, เอวํ ยโต, ตโต, กตรโต, กตมโต, อิตรโต, อญฺญโต, เอกโต, อุภยโต, ปุพฺพโต, ปรโต, อปรโต, ทกฺขิณโต, อุตฺตรโต, อมุโต. सर्वनाम से 'सब्बस्मा' या 'सब्बेहि' के अर्थ में 'सब्बतो' होता है, इसी प्रकार यतो, ततो, कतरतो, कतमतो, इतरतो, अञ्ञतो, एकतो, उभयतो, पुब्बतो, परतो, अपरतो, दक्खिणतो, उत्तरतो, अमुतो। ‘‘กิสฺส, กุ’’อิติ จ วตฺตเต. 'किस्स' और 'कु' की अनुवृत्ति आती है। ๒๖๒. ตฺรโตเถสุ จ. २६२. 'त्र', 'तो' और 'थ' प्रत्ययों के परे होने पर भी। กิมิจฺเจตสฺส กุ โหติ ตฺรโต ถอิจฺเจเตสุ จ ปเรสุ. กสฺมา, เกหีติ วา กุโต. 'किम्' शब्द के स्थान पर 'कु' होता है 'त्र', 'तो' और 'थ' प्रत्ययों के परे होने पर। 'कस्मा' या 'केहि' के अर्थ में 'कुतो' बनता है। ‘‘โตเถสู’’ติ วตฺตเต. 'तो' और 'थ' प्रत्ययों की अनुवृत्ति आती है। ๒๖๓. สพฺพสฺเสตสฺสากาโร [Pg.122] วา. २६३. 'एत' शब्द के सम्पूर्ण स्थान पर विकल्प से 'अ' कार होता है। สพฺพสฺส เอตสทฺทสฺส อกาโร โหติ วา โตถอิจฺเจเตสุ. เอตสฺมา, เอเตหีติ วา อโต. 'एत' शब्द के सम्पूर्ण स्थान पर 'तो' और 'थ' प्रत्ययों के परे होने पर विकल्प से 'अ' कार होता है। 'एतस्मा' या 'एतेहि' के अर्थ में 'अतो' बनता है। ‘‘สพฺพสฺเสตสฺสา’’ติ จ วตฺตเต. 'सब्बस्स एतस्स' की अनुवृत्ति आती है। ๒๖๔. เอ โตเถสุ จ. २६४. 'तो' और 'थ' प्रत्ययों के परे होने पर 'ए' कार भी होता है। สพฺพสฺส เอตสทฺทสฺส เอกาโร โหติ วา โตถอิจฺเจเตสุ. ทฺวิตฺตํ, เอตฺโต. 'एत' शब्द के सम्पूर्ण स्थान पर 'तो' और 'थ' प्रत्ययों के परे होने पर विकल्प से 'ए' कार होता है। द्वित्व होने पर 'एत्तो' बनता है। ‘‘สพฺพสฺสา’’ติ วตฺตเต. 'सब्बस्स' की अनुवृत्ति आती है। ๒๖๕. อิมสฺสิ ถํทานิหโตเธสุ จ. २६५. 'इम' शब्द के स्थान पर 'थं', 'दानि', 'ह', 'तो' और 'ध' प्रत्ययों के परे होने पर (इकार होता है)। อิมสทฺทสฺส สพฺพสฺเสว อิกาโร โหติ ถํทานิหโตธอิจฺเจเตสุ จ. อิมสฺมาติ อิโต. 'इम' शब्द के सम्पूर्ण स्थान पर ही 'इ' कार होता है 'थं', 'दानि', 'ह', 'तो' और 'ध' प्रत्ययों के परे होने पर। 'इमस्मा' के अर्थ में 'इतो' बनता है। ‘‘กฺวจิ โต’’ติ โยควิภาเคน อาทิปฺปภุตีหิ โต สตฺตมิยตฺเถ. อนิจฺจาทีหิ ตติยตฺเถ จ. ยถา – อาทิมฺหีภิ อตฺเถ อาทิโต. เอวํ มชฺฌโต, เอกโต, ปุรโต, ปจฺฉโต, ปสฺสโต, ปิฏฺฐิโต, ปาทโต, สีสโต, อคฺคโต, มูลโต, ปรโต อิจฺจาทโย. 'क्वचि तो' इस योग-विभाग से 'आदि' प्रभृति शब्दों से सप्तमी के अर्थ में 'तो' प्रत्यय होता है। 'अनिच्च' आदि शब्दों से तृतीया के अर्थ में भी होता है। जैसे- 'आदिम्हि' के अर्थ में 'आदितो'। इसी प्रकार मज्झतो, एकतो, पुरतो, पच्छतो, पस्सतो, पिट्ठितो, पादतो, सीसतो, अग्गतो, मूलतो, परतो इत्यादि। ตติยตฺเถ อนิจฺเจนาติ อนิจฺจโต, อนิจฺจโต สมฺมสติ. เอวํ ทุกฺขโต, โรคโต, คณฺฑโต อิจฺจาทโย. तृतीया के अर्थ में 'अनिच्चेन' के स्थान पर 'अनिच्चतो', जैसे- 'अनिच्चतो सम्मसति' (अनित्य रूप से सम्मर्शन करता है)। इसी प्रकार दुक्खतो, रोगतो, गण्डतो इत्यादि। ‘‘อตฺเถ, กฺวจี’’ติ จ วตฺตเต. 'अत्थे' और 'क्वचि' की अनुवृत्ति आती है। ๒๖๖. ตฺรถ สตฺตมิยา สพฺพนาเมหิ. २६६. सप्तमी विभक्ति के अर्थ में सर्वनामों से 'त्र' और 'थ' प्रत्यय होते हैं। สพฺพนาเมหิ ปรา ตฺร ถอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ กฺวจิ สตฺตมฺยตฺเถ. สพฺพสฺมึ, สพฺเพสุ จาติ สพฺพตฺร สพฺพตฺถ. เอวํ [Pg.123] ยตฺร ยตฺถ, ตตฺร ตตฺถ, อิตรตฺร อิตรตฺถ, อญฺญตฺร อญฺญตฺถ, อุภยตฺร อุภยตฺถ, ปรตฺร ปรตฺถ, กุตฺร กุตฺถ, ‘‘ตฺรโตเถสุ จา’’ติ กุตฺตํ. ‘‘กิสฺส ก เว จา’’ติ สุตฺเต จสทฺเทน กาเทโส. กตฺถ, อมุตฺร อมุตฺถ. सर्वनामों से परे 'त्र' और 'थ' ये प्रत्यय कहीं-कहीं सप्तमी के अर्थ में होते हैं। 'सब्बस्मिं' (सब में) या 'सब्बेसु' (सबों में) के अर्थ में 'सब्बत्र' और 'सब्बत्थ' बनते हैं। इसी प्रकार यत्र-यत्थ, तत्र-तत्थ, इतरत्र-इतरत्थ, अञ्ञत्र-अञ्ञत्थ, उभयत्र-उभयत्थ, परत्र-परत्थ, कुत्र-कुत्थ। 'त्रतोथेसु च' सूत्र से 'कु' आदेश होता है। 'किस्स क वे च' सूत्र में 'च' शब्द के ग्रहण से 'क' आदेश होता है। कत्थ, अमुत्र, अमुत्थ। ‘‘สพฺพสฺเสตสฺสากาโร’’ติ วตฺตเต. "सब्बस्सेतस्साकारो" (एतद् के स्थान पर अकार) का अधिकार चलता है। ๒๖๗. ตฺเร นิจฺจํ. २६७. 'त्रे' प्रत्यय परे होने पर (एतद् के स्थान पर अकार) नित्य होता है। สพฺพสฺเสว เอตสทฺทสฺส อกาโร โหติ นิจฺจํ ตฺเร ปเร. อตฺร. ‘‘สพฺพสฺเสตสฺสากาโร วา’’ติ อตฺตํ, ‘‘เอ โตเถสุ จา’’ติ เอกาโร, อตฺถ, เอตฺถ. 'त्रे' परे होने पर सम्पूर्ण 'एत' शब्द के स्थान पर नित्य 'अ'कार होता है। अत्र। "सब्बस्सेतस्साकारो वा" से 'अ'त्व, "ए तोथेसु च" से 'ए'कार होकर अत्थ, एत्थ बनते हैं। ‘‘กฺวจิ, อตฺเถ, สตฺตมิยา’’ติ จ อธิกาโร, สพฺพสฺมินฺติ อตฺเถ – "क्वचि", "अत्थे" और "सत्तमिया" का अधिकार है। 'सब्बस्मिं' इस अर्थ में – ๒๖๘. สพฺพโต ธิ. २६८. 'सब्ब' शब्द से 'धि' प्रत्यय होता है। สพฺพอิจฺเจตสฺมา ธิปฺปจฺจโย โหติ กฺวจิ สตฺตมฺยตฺเถ. สพฺพธิ. 'सब्ब' इस शब्द से कहीं-कहीं सप्तमी के अर्थ में 'धि' प्रत्यय होता है। सब्बधि। ๒๖๙. กิสฺมา โว. २६९. 'किं' शब्द से 'व' प्रत्यय होता है। กิมิจฺเจตสฺมา วปฺปจฺจโย โหติ กฺวจิ สตฺตมฺยตฺเถ. 'किं' इस शब्द से कहीं-कहीं सप्तमी के अर्थ में 'व' प्रत्यय होता है। ๒๗๐. กิสฺส ก เว จ. २७०. 'व' प्रत्यय परे होने पर 'किं' के स्थान पर 'क' शब्द आदेश होता है। กิมิจฺเจตสฺส กสทฺโท อาเทโส โหติ วปฺปจฺจเยปเร. จคฺคหเณน ถหมาทิอวปฺปจฺจเยปิ. ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา กกาเร อการสฺส โลโป จ วมฺหิ. กฺว คโตสิ ตฺวํ. 'व' प्रत्यय परे होने पर 'किं' के स्थान पर 'क' शब्द आदेश होता है। 'च' के ग्रहण से 'थ', 'ह' आदि अ-व प्रत्ययों में भी (आदेश होता है)। "तेसु वुद्धी" आदि सूत्र से 'व' परे होने पर 'क' के 'अ'कार का लोप होता है। क्व गतोसि त्वं (तुम कहाँ गए हो?)। ‘‘กิสฺมา’’ติ วตฺตเต. "किस्मा" (किं से) का अधिकार चलता है। ๒๗๑. หึหํหิญฺจนํ[Pg.124]. २७१. 'हिं', 'हं' और 'हिञ्चनं' प्रत्यय होते हैं। กิมิจฺเจตสฺมา หึ หํ หิญฺจนํอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ กฺวจิ สตฺตมฺยตฺเถ. 'किं' इस शब्द से कहीं-कहीं सप्तमी के अर्थ में 'हिं', 'हं', 'हिञ्चनं' ये प्रत्यय होते हैं। ‘‘กิสฺสา’’ติ วตฺตเต. "किस्स" (किं का) का अधिकार चलता है। ๒๗๒. กุ หึหํสุ จ. २७२. 'हिं' और 'हं' परे होने पर 'किं' के स्थान पर 'कु' आदेश होता है। กิมิจฺเจตสฺส กุ โหติ หึ หํ อิจฺเจเตสุ. จคฺคหเณน หิญฺจนํทาจนมิจฺจาทีสุปิ. กิสฺมินฺติ กุหึ, กุหํ, กุหิญฺจนํ, กหํ กาเทโส. 'हिं' और 'हं' परे होने पर 'किं' के स्थान पर 'कु' होता है। 'च' के ग्रहण से 'हिञ्चनं', 'दाचनं' आदि में भी होता है। 'किस्मिं' के अर्थ में - कुहिं, कुहं, कुहिञ्चनं; 'क' आदेश होने पर कहं। ‘‘หึ ห’’นฺติ วตฺตเต. "हिं" और "हं" का अधिकार चलता है। ๒๗๓. ตมฺหา จ. २७३. और 'त' शब्द से भी। ตอิจฺเจตสฺมา จ สพฺพนามโต หึหํปจฺจยา โหนฺติ กฺวจิ สตฺตมฺยตฺเถ. ตสฺมินฺติ ตหึ, ตหํ. 'त' इस सर्वनाम शब्द से भी कहीं-कहीं सप्तमी के अर्थ में 'हिं' और 'हं' प्रत्यय होते हैं। 'तस्मिं' के अर्थ में - तहिं, तहं। ๒๗๔. อิมสฺมา หธา จ. २७४. 'इम' शब्द से 'ह' और 'ध' प्रत्यय होते हैं। อิมสทฺทโต หธปฺปจฺจยา โหนฺติ กฺวจิ สตฺตมฺยตฺเถ. ‘‘อิมสฺสิ ถ’’นฺติอาทินา อิกาโร. อิมสฺมินฺติ อิห, อิธ. 'इम' शब्द से कहीं-कहीं सप्तमी के अर्थ में 'ह' और 'ध' प्रत्यय होते हैं। "इमस्सि थं" आदि सूत्र से 'इ'कार होता है। 'इमस्मिं' के अर्थ में - इह, इध। ๒๗๕. ยโต หึ. २७५. 'य' शब्द से 'हिं' प्रत्यय होता है। ยอิจฺเจตสฺมา สพฺพนามโต หึปจฺจโย โหติ กฺวจิ สตฺตมฺยตฺเถ. ยสฺมินฺติ ยหึ. 'य' इस सर्वनाम शब्द से कहीं-कहीं सप्तमी के अर्थ में 'हिं' प्रत्यय होता है। 'यस्मिं' के अर्थ में - यहिं। ‘‘กาเล’’ติ อธิกาโรยํ. यह "काले" (समय के अर्थ में) का अधिकार है। กสฺมึ กาเลติ อตฺเถ 'कस्मिं काले' (किस समय) इस अर्थ में - ๒๗๖. กึสพฺพญฺเญกยกุหิ [Pg.125] ทา ทาจนํ. २७६. 'किं', 'सब्ब', 'अञ्ञ', 'एक', 'य' और 'कु' से 'दा' और 'दाचनं' प्रत्यय होते हैं। กึ สพฺพอญฺญเอกยอิจฺเจเตหิ สพฺพนาเมหิ ทาปจฺจโย โหติ. กุอิจฺเจตสฺมา ทาจนญฺจ กาเล กฺวจิ สตฺตมฺยตฺเถ. 'किं', 'सब्ब', 'अञ्ञ', 'एक', 'य' इन सर्वनामों से 'दा' प्रत्यय होता है। 'कु' शब्द से 'दाचनं' प्रत्यय भी काल (समय) के अर्थ में कहीं-कहीं सप्तमी विभक्ति में होता है। ‘‘กิสฺส ก เว จา’’ติ สุตฺเต จสทฺเทน กาเทโส, กทา. "किस्स क वे च" सूत्र में 'च' शब्द के ग्रहण से 'क' आदेश होता है - कदा। ๒๗๗. สพฺพสฺส โส ทามฺหิ วา. २७७. 'सब्ब' शब्द को 'दा' प्रत्यय परे होने पर विकल्प से 'स' आदेश होता है। สพฺพอิจฺเจตสฺส สทฺทสฺส สสทฺทาเทโส โหติ วา ทาปจฺจเย ปเร. สพฺพสฺมึ กาเลติ สทา, สพฺพทา. 'सब्ब' इस शब्द को 'दा' प्रत्यय परे होने पर विकल्प से 'स' आदेश होता है। 'सब्बस्मिं काले' (सब समय में) इस अर्थ में 'सदा' और 'सब्बदा' शब्द बनते हैं। เอวํ อญฺญทา, เอกทา, ยทา, กสฺมึ กาเลติ กุทาจนํ, ‘‘กุ หึหํสุ จา’’ติ สุตฺเต จสทฺเทน กุตฺตํ, ‘‘กุ’’อิติ นิปาตเนน วา. इसी प्रकार 'अञ्ञदा', 'एकदा', 'यदा'। 'कस्मिं काले' (किस समय में) इस अर्थ में 'कुदाचनं' शब्द बनता है; 'कु हिंहंसु च' इस सूत्र में 'च' शब्द के प्रयोग से 'कु' आदेश होता है, अथवा 'कु' इस निपात के प्रयोग से। ‘‘ทา’’ติ วตฺตเต. 'दा' की अनुवृत्ति आती है। ๒๗๘. ตมฺหา ทานิ จ. २७८. 'त' शब्द से 'दानि' और 'च' (से 'दा') प्रत्यय होते हैं। ตอิจฺเจตสฺมา สพฺพนามโต ทานิทาปจฺจยา โหนฺติ กาเล กฺวจิ สตฺตมฺยตฺเถ. ตสฺมึ กาเลติ ตทานิ, ตทา. 'त' इस सर्वनाम से काल अर्थ में कहीं-कहीं सप्तमी के अर्थ में 'दानि' और 'दा' प्रत्यय होते हैं। 'तस्मिं काले' (उस समय में) इस अर्थ में 'तदानि' और 'तदा' शब्द बनते हैं। ๒๗๙. อิมสฺมา รหิธุนาทานิ จ. २७९. 'इम' शब्द से 'रहि', 'धुना' और 'दानि' प्रत्यय होते हैं। อิมสทฺทโต รหิ ธุนา ทานิอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ กาเล กฺวจิ สตฺตมฺยตฺเถ. 'इम' शब्द से काल अर्थ में कहीं-कहीं सप्तमी के अर्थ में 'रहि', 'धुना' और 'दानि' ये प्रत्यय होते हैं। ‘‘สพฺพสฺส, อิมสฺสา’’ติ จ วตฺตเต. 'सब्बस्स' और 'इमस्स' की अनुवृत्ति आती है। ๒๘๐. เอต [Pg.126] รหิมฺหิ. २८०. 'रहि' प्रत्यय परे होने पर 'एत' आदेश होता है। สพฺพสฺส อิมสทฺทสฺส เอตาเทโส โหติ รหิมฺหิ ปจฺจเย ปเร. อิมสฺมึ กาเลติ เอตรหิ. 'सब्ब' और 'इम' शब्द के स्थान पर 'रहि' प्रत्यय परे होने पर 'एत' आदेश होता है। 'इमस्मिं काले' (इस समय में) इस अर्थ में 'एतरहि' शब्द बनता है। ๒๘๑. อ ธุนามฺหิ จ. २८१. 'धुना' प्रत्यय परे होने पर 'अ' आदेश होता है। สพฺพสฺเสว อิมสทฺทสฺส อกาโร โหติ ธุนาปจฺจเย ปเร. อธุนา, อิมสทฺทสฺส อิกาโร. อิมสฺมึ กาเลติ อิทานิ. 'धुना' प्रत्यय परे होने पर 'सब्ब' और 'इम' शब्द के स्थान पर 'अ' कार होता है, जिससे 'अधुना' बनता है। 'इम' शब्द के स्थान पर 'इ' कार होता है (दानि प्रत्यय परे होने पर)। 'इमस्मिं काले' इस अर्थ में 'इदानि' शब्द बनता है। วิภตฺติปฺปจฺจยวิธานํ นิฏฺฐิตํ. विभक्ति प्रत्यय विधान समाप्त हुआ। โอปสคฺคิกปท उपसर्ग पद อถาลิงฺคสงฺขฺยาวิภตฺติเภทา อุปสคฺคนิปาตา วุจฺจนฺเต. अब लिंग, संख्या और विभक्ति के भेदों से रहित उपसर्ग और निपात कहे जाते हैं। ป ปรา นิ นี อุ ทุ สํ วิ อว อนุ ปริ อธิ อภิ ปติ สุ อา อติ อปิ อป อุป อิติ ปีสติ อุปสคฺคา. प (प्र), परा, नि, नी, उ, दु, सं, वि, अव, अनु, परि, अधि, अभि, पति (प्रति), सु, आ, अति, अपि, अप, उप - ये बीस उपसर्ग हैं। ตตฺถ ปสทฺโท ปการา’ทิกมฺม ปธานิ’สฺสริย’นฺโตภาววิโยค ตปฺปร ภุสตฺถ สมฺภวติตฺติ อนาวิล ปตฺถนาทีสุ. ปอิติ อยมุปสคฺโค เอเตสุ ปการาทีสุ อตฺเถสุ วตฺตติ, ยถา – ปกาเร ปญฺญา, อาทิกมฺเม วิปฺปกตํ, ปธาเน ปณีตํ, ปธานํ ปธานตฺตํ, อิสฺสริเย ปภู อยํ เทสสฺส, อนฺโตภาเว ปกฺขิตฺตํ, วิโยเค ปวาสี, ตปฺปเร ปาจริโย, ภุสตฺเถ ปวุทฺธกาโย, สมฺภเว หิมวตา คงฺคา ปภวติ, ติตฺติยํ ปหูตมนฺนํ, อนาวิเล ปสนฺนมุทกํ, ปตฺถเน ปณิหิตํ. वहाँ 'प' (प्र) शब्द प्रकर्ष, आदिकर्म (आरम्भ), प्रधान, ऐश्वर्य, अन्तर्भाव, वियोग, तत्पर, भृशार्थ (अत्यधिक), सम्भव, तृप्ति, अनाविल (स्वच्छता), प्रार्थना आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। 'प' यह उपसर्ग इन प्रकर्षादि अर्थों में प्रवृत्त होता है, जैसे - प्रकर्ष में 'पञ्ञा' (प्रज्ञा), आदिकर्म में 'विप्पकतं', प्रधान में 'पणीतं', प्रधानता में 'पधानं', ऐश्वर्य में 'पभू अयं देसस्स', अन्तर्भाव में 'पक्खित्तं', वियोग में 'पवासी', तत्पर में 'पाचरियो', भृशार्थ में 'पवुद्धकायो', सम्भव में 'हिमवता गङ्गा पभवति', तृप्ति में 'पहूत मन्नं', अनाविल में 'पसन्न मुदकं', प्रार्थना में 'पणिहितं' आदि। ปราอิติ [Pg.127] ปริหานิ ปราชย คติวิกฺกมา’มสนาทีสุ. ยถา – ปริหานิยํ ปราภโว, ปราชเย ปราชิโต, คติยํ ปรายนํ. วิกฺกเม ปรกฺกมติ, อามสเน องฺคสฺส ปรามสนํ. 'परा' उपसर्ग परिहाणि, पराजय, गति, विक्रम, आमर्शण (स्पर्श) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। जैसे - परिहाणि में 'पराबवो', पराजय में 'पराजितो', गति में 'परायणं', विक्रम में 'परक्कमति', आमर्शण में 'अङ्गस्स परामसनं' आदि। นิอิติ นิสฺเสส นิคฺคต นีหรณ’นฺโตปเวสนา’ภาวนิเสธ นิกฺขนฺต ปาตุภาวา’วธารณ วิภชน อุปมู’ปธารณา’วสานเฉกาทีสุ. นิสฺเสเส นิรุตฺติ, นิรวเสสํ เทติ, นิคฺคเต นิกฺกิเลโส, นิยฺยาติ, นีหรเณ นิทฺธารณํ, อนฺโตปเวสเน นิขาโต, อภาเว นิมฺมกฺขิกํ, นิเสเธ นิวาเรติ, นิกฺขนฺเต นิพฺพาโน, นิพฺพานํ, ปาตุภาเว นิมฺมิตํ, อวธารเณ นิจฺฉโย, วิภชเน นิทฺเทโส, อุปมายํ นิทสฺสนํ, อุปธารเณ นิสามนํ, อวสาเน นิฏฺฐิตํ, เฉเก นิปุโณ. 'नि' उपसर्ग नि:शेष, निर्गत, निर्हरण, अन्तःप्रवेशन, अभाव, निषेध, निष्क्रान्त, प्रादुर्भाव, अवधारणा (निश्चय), विभाजन, उपमा, उपधारण, अवसान (समाप्ति), छेक (निपुणता) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। नि:शेष में 'निरुत्ति', 'निरवसेसं देति', निर्गत में 'निक्किलेसो', 'निय्याति', निर्हरण में 'निद्धारणं', अन्तःप्रवेशन में 'निखातो', अभाव में 'निम् मक्खिकं', निषेध में 'निवारति', निष्क्रान्त में 'निब्बानो', 'निब्बानं', प्रादुर्भाव में 'निम्मितं', अवधारणा में 'निच्छयो', विभाजन में 'निद्देसो', उपमा में 'निदस्सनं', उपधारण में 'निसामनं', अवसान में 'निट्ठितं', छेक में 'निपुणो' आदि। นีอิติ นีหรณา’วรณาทีสุ. นีหรเณ นีหรติ, อาวรเณ นีวรณํ. 'नी' उपसर्ग निर्हरण और आवरण आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। निर्हरण में 'नीहरति', आवरण में 'नीवरणं' आदि। อุอิติ อุคฺคตุ’ทฺธกมฺม ปธาน วิโยค สมฺภว อตฺถลาภสตฺติ สรูปกถนาทีสุ. อุคฺคเต อุคฺคจฺฉติ, อุทฺธกมฺเม อาสนา อุฏฺฐิโต, อุกฺเขโป, ปธาเน อุตฺตโม, โลกุตฺตโร, วิโยเค อุพฺพาสิโต, สมฺภเว อุพฺภูโต, อตฺถลาเภ อุปฺปนฺนํ ญาณํ, สตฺติยํ อุสฺสหติ คนฺตุํ, สรูปกถเน อุทฺทิสติ สุตฺตํ. 'उ' उपसर्ग उद्गत, ऊर्ध्वकर्म, प्रधान, वियोग, सम्भव, अर्थलाभ, शक्ति, स्वरूपकथन आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। उद्गत में 'उग्गच्छति', ऊर्ध्वकर्म में 'आसना उट्ठितो', 'उक्खेपो', प्रधान में 'उत्तमो', 'लोकुत्तरो', वियोग में 'उब्बासितो', सम्भव में 'उब्भूतो', अर्थलाभ में 'उप्पन्नं ञाणं', शक्ति में 'उस्सहाति गन्तुं', स्वरूपकथन में 'उद्दिसति सुत्तं' आदि। ทุอิติ อโสภนา’ภาวกุจฺฉิตา’สมิทฺธิ กิจฺฉ วิรูปตาทีสุ. อโสภเน ทุคฺคนฺโธ, อภาเว ทุพฺภิกฺขํ, กุจฺฉิเต ทุกฺกฏํ, อสมิทฺธิยํ ทุสฺสสฺสํ, กิจฺเฉ ทุกฺกรํ, วิรูปตายํ ทุพฺพณฺโณ, ทุมฺมุโข. 'दु' उपसर्ग अशोभन, अभाव, कुत्सित, असमृद्धि, कृच्छ्र (कठिनाई), विरूपता आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। अशोभन में 'दुग्गन्धो', अभाव में 'दुब्भिक्खं', कुत्सित में 'दुक्कटं', असमृद्धि में 'दुस्सस्सं', कृच्छ्र में 'दुक्करं', विरूपता में 'दुब्बण्णो', 'दुम्मुखो' आदि। สํอิติ สโมธาน สมฺมาสม สมนฺตภาวสงฺคต สงฺเขปภุสตฺถ สหตฺถ อปฺปตฺถ ปภวา’ภิมุขภาว สงฺคห ปิธาน ปุนปฺปุนกรณ สมิทฺธาทีสุ. สโมธาเน สนฺธิ, สมฺมาสเมสุ สมาธิ[Pg.128], สมฺปยุตฺโต, สมนฺตภาเว สํกิณฺณา สมุลฺลปนา, สงฺคเต สงฺคโม, สงฺเขเป สมาโส, ภุสตฺเถ สารตฺโต, สหตฺเถ สํวาโส, อปฺปตฺเถ สมคฺโฆ. ปภเว สมฺภโว, อภิมุขภาเว สมฺมุขํ, สงฺคเห สงฺคณฺหาติ, ปิธาเน สํวุตํ, ปุนปฺปุนกรเณ สนฺธาวติ, สมิทฺธิยํ สมฺปนฺโน. 'सं' उपसर्ग समाधान (मिलन), सम्यक्-सम, समन्तभाव (पूर्णता), सङ्गत, सङ्क्षेप, भृशार्थ, सहार्थ, अल्पार्थ, प्रभव, अभिमुखभाव, सङ्ग्रह, पिधान (ढकना), पुन:पुन:करण, समृद्धि आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। समाधान में 'सन्धि', सम्यक्-सम में 'समाधि', 'सम्पयुत्तो', समन्तभाव में 'संकिण्णा समुल्लपना', सङ्गत में 'सङ्गमो', सङ्क्षेप में 'समासो', भृशार्थ में 'सारत्तो', सहार्थ में 'संवासो', अल्पार्थ में 'समग्घो', प्रभव में 'सम्भवो', अभिमुखभाव में 'सम्मुखं', सङ्ग्रह में 'सङ्गण्हाति', पिधान में 'संवुतं', पुन:पुन:करण में 'सन्धावति', समृद्धि में 'सम्पन्नो' आदि। วิอิติ วิเสส วิวิธ วิรุทฺธ วิคต วิโยค วิรูปตาทีสุ. วิเสเส วิมุตฺติ วิสิฏฺโฐ, วิวิเธ วิมติ วิจิตฺรํ, วิรุทฺเธ วิวาโท, วิคเต วิมลํ, วิโยเค วิปฺปยุตฺโต, วิรูปตายํ วิรูโป. 'वि' उपसर्ग विशेष, विविध, विरुद्ध, विगत, वियोग, विरूपता आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। विशेष में 'विमुत्ति', 'विसिट्ठो', विविध में 'विमति', 'विचित्रं', विरुद्ध में 'विवादो', विगत में 'विमलं', वियोग में 'विप्पयुत्तो', विरूपता में 'विरूपो' आदि। อวอิติ อโธภาค วิโยค ปริภว ชานน สุทฺธิ นิจฺฉยเทส เถยฺยาทีสุ. อโธภาเค อวกฺขิตฺตจกฺขุ, วิโยเค โอมุกฺกอุปาหโน อวโกกิลํ วนํ, ปริภเว อวชานนํ อวมญฺญติ, ชานเน อวคจฺฉติ, สุทฺธิยํ โวทานํ, นิจฺฉเย อวธารณํ, เทเส อวกาโส, เถยฺเย อวหาโร. 'अव' उपसर्ग अधोभाग, वियोग, परिभव (तिरस्कार), जानन (ज्ञान), शुद्धि, निश्चय, देश (स्थान), थेय्य (चोरी) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। अधोभाग में 'अवक्खित्तचक्खु', वियोग में 'ओमुक्क उपाहनो', 'अवकोकिलं वनं', परिभव में 'अवजाननं', 'अवमञ्ञति', जानन में 'अवगच्छति', शुद्धि में 'वोदानं', निश्चय में 'अवधारणं', देश में 'अवकासो', थेय्य में 'अवहारो' आदि। อนุอิติ อนุคตา’นุปจฺฉินฺน ปจฺฉตฺถ ภุสตฺถ สาทิสฺส หีนตติยตฺถ ลกฺขณิ’ตฺถมฺภูตกฺขาน ภาค วิจฺฉาทีสุ. อนุคเต อนฺเวติ, อนุปจฺฉินฺเน อนุสโย, ปจฺฉาสทฺทตฺเถ อนุรถํ, ภุสตฺเถ อนุรตฺโต, สาทิสฺเส อนุรูปํ. หีเน อนุสาริปุตฺตํ ปญฺญวนฺโต, ตติยตฺเถ นทิมนฺววสิตา เสนา, ลกฺขเณ รุกฺขํ อนุ วิชฺโชตเต วิชฺชุ, อิตฺถมฺภูตกฺขาเน สาธุ เทวทตฺโต มาตรํ อนุ, ภาเค ยเทตฺถ มํ อนุสิยา ตํ ทียตุ, วิจฺฉายํ รุกฺขํ รุกฺขํ อนุ วิชฺโชตเต จนฺโท. 'अनु' उपसर्ग अनुगत, अनुपच्छिन्न (निरन्तर), पश्चात्-अर्थ, भृशार्थ, सादृश्य, हीन, तृतीयार्थ, लक्षण, इत्थंभूत-आख्यान, भाग, वीप्सा आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। अनुगत में 'अन्वेति', अनुपच्छिन्न में 'अनुसयो', पश्चात्-अर्थ में 'अनुरथं', भृशार्थ में 'अनुरत्तो', सादृश्य में 'अनुरूपं', हीन में 'अनुसारिपुत्तं पञ्ञवन्तो', तृतीयार्थ में 'नदिमन्ववसिता सेना', लक्षण में 'रुक्खं अनु विज्जोतते विज्जु', इत्थंभूत-आख्यान में 'साधु देवदत्तो मातरं अनु', भाग में 'यदेत्थ मं अनुसिया तं दीयतु', वीप्सा में 'रुक्खं रुक्खं अनु विज्जोतते चन्दो' आदि। ปริอิติ สมนฺตโตภาว ปริจฺเฉท วชฺชนา’ลิงฺคน นิวาสนปูชาโภชนา’วชานน โทสกฺขาน ลกฺขณาทีสุ. สมนฺตโตภาเว ปริวุโต, ปริจฺเฉเท ปริญฺเญยฺยํ, วชฺชเน ปริหรติ[Pg.129], อาลิงฺคเน ปริสฺสชติ, นิวาสเน วตฺถํ ปริธสฺสติ, ปูชายํ ปาริจริยา, โภชเน ภิกฺขุํ ปริวิสติ. อวชานเน ปริภวติ, โทสกฺขาเน ปริภาสติ, ลกฺขณาทีสุ รุกฺขํ ปริ วิชฺโชตเต วิชฺชุอิจฺจาทิ. ‘परि’ उपसर्ग चारों ओर होने (समन्ततोभाव), परिच्छेद (सीमा), वर्जन (त्याग), आलिंगन, निवास (वस्त्र पहनना), पूजा, भोजन, अवमानना (तिरस्कार), दोष-कथन और लक्षण आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। चारों ओर होने के अर्थ में— ‘परिवुतो’ (घिरा हुआ); परिच्छेद में— ‘परिञ्ञेय्यं’ (पूर्णतः जानने योग्य); वर्जन में— ‘परिहरति’ (त्याग करता है); आलिंगन में— ‘परिस्सजति’ (गले लगाता है); निवास में— ‘वत्थं परिदस्सति’ (वस्त्र पहनता है); पूजा में— ‘पारिचरिया’ (परिचर्या/सेवा); भोजन में— ‘भिक्खुं परिविसति’ (भिक्षु को भोजन परोसता है)। अवमानना में— ‘परिभवति’ (तिरस्कार करता है); दोष-कथन में— ‘परिभासति’ (निंदा करता है); लक्षण आदि में— ‘रुक्खं परि विज्जोतते विज्जु’ (बिजली वृक्ष के चारों ओर चमकती है) इत्यादि। อธิอิติ อธิกิ’สฺส’รูปริภาวา’ธิภวนชฺฌายนา’ธิฏฺฐานนิจฺฉยปาปุณนาทีสุ. อธิเก อธิสีลํ, อิสฺสเร อธิปติ, อธิ พฺรหฺมทตฺเต ปญฺจาลา, อุปริภาเว อธิโรหติ, ปถวึ อธิเสสฺสติ, อธิภวเน อธิภวติ, อชฺฌายเน พฺยากรณมธีเต, อธิฏฺฐาเน ภูมิกมฺปาทึ อธิฏฺฐาติ, นิจฺฉเย อธิโมกฺโข, ปาปุณเน โภคกฺขนฺธํ อธิคจฺฉติ. ‘अधि’ उपसर्ग आधिक्य, ऐश्वर्य (स्वामी भाव), ऊपर होने, अभिभवन (दबाना), अध्ययन, अधिष्ठान (निश्चय), निर्णय और प्राप्ति आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। आधिक्य में— ‘अधिसिलं’ (उच्च शील); ऐश्वर्य में— ‘अधिपति’ (स्वामी); ‘अधि ब्रह्मदत्ते पञ्चाला’ (ब्रह्मदत्त के शासन में पांचाल); ऊपर होने के अर्थ में— ‘अधिरोहति’ (चढ़ता है), ‘पथविं अधिसेस्सति’ (पृथ्वी पर लेटेगा); अभिभवन में— ‘अधिभवति’ (अभिभूत करता है); अध्ययन में— ‘ब्याकरणमधीते’ (व्याकरण पढ़ता है); अधिष्ठान में— ‘भूमिकम्पादिं अधिट्ठाति’ (भूकंप आदि का अधिष्ठान करता है); निश्चय में— ‘अधिमोक्खो’ (दृढ़ निश्चय); प्राप्ति में— ‘भोगक्खन्धं अधिगच्छति’ (भोग-समूह को प्राप्त करता है)। อภิอิติ อภิมุขภาว วิสิฏฺฐา’ธิ กุ’ทฺธกมฺม กุล สารุปฺปวนฺทน ลกฺขณิ’ตฺถมฺภูตกฺขาน วิจฺฉาทีสุ. อภิมุขภาเว อภิมุโข อภิกฺกมติ, วิสิฏฺเฐ อภิธมฺโม, อธิเก อภิวสฺสติ, อุทฺธกมฺเม อภิรุหติ, กุเล อภิชาโต, สารุปฺเป อภิรูโป, วนฺทเน อภิวาเทติ, ลกฺขณาทีสุ ปุริมสมํ. ‘अभि’ उपसर्ग अभिमुख होना (सामने), विशिष्टता, आधिक्य, ऊर्ध्वकर्म (ऊपर की ओर क्रिया), कुल, सारूप्य (उपयुक्तता), वंदना और लक्षण आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। अभिमुख होने में— ‘अभिमुखो अभिक्कमति’ (सामने की ओर बढ़ता है); विशिष्टता में— ‘अभिधम्मो’ (विशिष्ट धर्म); आधिक्य में— ‘अभिवस्सति’ (अत्यधिक वर्षा करता है); ऊर्ध्वकर्म में— ‘अभिरुहति’ (ऊपर चढ़ता है); कुल में— ‘अभिजातो’ (उच्च कुल में उत्पन्न); सारूप्य में— ‘अभिरूपो’ (अत्यंत रूपवान/योग्य); वंदना में— ‘अभिवादेति’ (अभिवादन करता है); लक्षण आदि में पूर्व के समान समझना चाहिए। ปติอิติ ปติคต ปฏิโลมปตินิธิ ปติทาน นิเสธนิวตฺตน สาทิสฺส ปติกรณา’ทาน ปติโพธ ปฏิจฺจ ลกฺขณิ’ตฺถมฺภูตกฺขาน ภาควิจฺฉาทีสุ. ปติคเต ปจฺจกฺขํ, ปฏิโลเม ปติโสตํ, ปตินิธิมฺหิ อาจริยโต ปติ สิสฺโส, ปติทาเน เตลตฺถิกสฺส ฆตํ ปติ ททาติ, นิเสเธ ปฏิเสธนํ, นิวตฺตเน ปฏิกฺกมติ, สาทิสฺเส ปติรูปกํ, ปติกรเณ ปติกาโร, อาทาเน ปติคฺคณฺหาติ, ปติโพเธ ปฏิเวโธ, ปฏิจฺเจ ปจฺจโย, ลกฺขณาทีสุ ปุริมสมํ. ‘पति’ (प्रति) उपसर्ग प्रतिगत (सामने), प्रतिलोम (विपरीत), प्रतिनिधि (बदले में), प्रतिदान (लौटाना), निषेध, निवर्तन (पीछे हटना), सादृश्य (समानता), प्रतिकरण (बदला/उपचार), आदान (ग्रहण), प्रतिबोध (बोध), प्रतीत्य (निर्भरता), लक्षण, भाग और वीप्सा आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। प्रतिगत में— ‘पच्चक्खं’ (प्रत्यक्ष); प्रतिलोम में— ‘पतिसोतं’ (धारा के विपरीत); प्रतिनिधि में— ‘आचरियतो पति सिस्सो’ (आचार्य के प्रतिनिधि के रूप में शिष्य); प्रतिदान में— ‘तेलत्थिकस्स घतं पति ददाति’ (तेल चाहने वाले को बदले में घी देता है); निषेध में— ‘पटिसेधनं’ (मना करना); निवर्तन में— ‘पटिक्कमति’ (पीछे हटता है); सादृश्य में— ‘पतिरूपकं’ (प्रतिरूप/समान); प्रतिकरण में— ‘पतिकारो’ (प्रतिकार/उपचार); आदान में— ‘पटिग्गण्हाति’ (स्वीकार करता है); प्रतिबोध में— ‘पटिवेधो’ (साक्षात्कार/बोध); प्रतीत्य में— ‘पच्चयो’ (प्रत्यय/कारण); लक्षण आदि में पूर्व के समान समझना चाहिए। สุอิติ โสภน สุฏฺฐุสมฺมา สมิทฺธิ สุขตฺถาทีสุ. โสภเน สุคนฺโธ, สุฏฺฐุสมฺมาทตฺเถสุ สุฏฺฐุ คโต สุคโต, สมฺมา คโตติปิ สุคโต, สมิทฺธิยํ สุภิกฺขํ, สุขตฺเถ สุกโร. ‘सु’ उपसर्ग शोभन (सुंदर), सुष्ठु (भली-भांति), सम्यक्, समृद्धि और सुख आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। शोभन में— ‘सुगन्धो’ (सुगंध); सुष्ठु और सम्यक् अर्थों में— ‘सुट्ठु गतो सुगतो’ (भली-भांति गया हुआ सुगत), ‘सम्मा गतोतिपि सुगतो’ (सम्यक् रूप से गया हुआ भी सुगत है); समृद्धि में— ‘सुभिक्खं’ (सुलभ भिक्षा/सुभिक्ष); सुख के अर्थ में— ‘सुकरो’ (सुखपूर्वक करने योग्य)। อาอิติ [Pg.130] อภิมุขภาวุ’ทฺธกมฺม มริยาทา’ภิวิธิ ปตฺติ’จฺฉาปริสฺสชน อาทิกมฺมคฺคหณ นิวาส สมีป’วฺหานาทีสุ. อภิมุขภาเว อาคจฺฉติ, อุทฺธกมฺเม อาโรหติ, มริยาทายํ อาปพฺพตา เขตฺตํ, อภิวิธิมฺหิ อากุมารํ ยโส กจฺจายนสฺส, ปตฺติยํ อาปตฺติมาปนฺโน, อิจฺฉายํ อากงฺขา, ปริสฺสชเน อาลิงฺคนํ, อาทิกมฺเม อารมฺโภ, คหเณ อาทียติ อาลมฺพติ, นิวาเส อาวสโถ, สมีเป อาสนฺนํ, อวฺหาเน อามนฺเตสิ. ‘आ’ उपसर्ग अभिमुख होना, ऊर्ध्वकर्म, मर्यादा (सीमा), अभिविधि (व्याप्ति), प्राप्ति, इच्छा, परिरंभण (आलिंगन), आदिकर्म (आरंभ), ग्रहण, निवास, समीप और आह्वान (बुलाना) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। अभिमुख होने में— ‘आगच्छति’ (आता है); ऊर्ध्वकर्म में— ‘आरोहति’ (चढ़ता है); मर्यादा में— ‘आपब्बता खेत्तं’ (पर्वत तक खेत); अभिविधि में— ‘आकुमारं यसो कच्चायनस्स’ (कुमारों तक कच्चायन का यश); प्राप्ति में— ‘आपत्त्तिमापन्नो’ (आपत्ति को प्राप्त); इच्छा में— ‘आकङ्खा’ (आकांक्षा); परिरंभण में— ‘आलिङ्गनं’ (आलिंगन); आदिकर्म में— ‘आरम्भो’ (आरंभ); ग्रहण में— ‘आदीयति’, ‘आलम्बति’ (लेता है, सहारा लेता है); निवास में— ‘आवसथो’ (आवास); समीप में— ‘आसन्नं’ (निकट); आह्वान में— ‘आमन्तेसि’ (आमंत्रित किया/संबोधित किया)। อติอิติ อภิกฺกมนา’ติกฺกนฺตา’ติสย ภุสตฺถาทีสุ. อติกฺกมเน อติโรจติ อมฺเหหิ, อตีโต, อติกฺกนฺเต อจฺจนฺตํ, อติสเย อติกุสโล, ภุสตฺเถ อติกฺโกโธ อติวุทฺธิ. ‘अति’ उपसर्ग अतिक्रमण (आगे बढ़ना), अतीत (बीता हुआ), अतिशय (श्रेष्ठता) और भृश (अत्यधिक) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। अतिक्रमण में— ‘अतिरोचति अम्हेहि’ (हमसे अधिक चमकता है), ‘अतीतो’ (बीता हुआ); अतीत में— ‘अच्चन्तं’ (अत्यंत); अतिशय में— ‘अतिकुसलो’ (अत्यंत कुशल); भृश अर्थ में— ‘अतिक्कोधो’ (अत्यधिक क्रोध), ‘अतिवुद्धि’ (अत्यधिक वृद्धि)। อปิอิติ สมฺภาวนา’เปกฺขา สมุจฺจย ครห ปญฺหาทีสุ. สมฺภาวนายํ อปิ ทิพฺเพสุ กาเมสุ, เมรุมฺปิ วินิวิชฺฌิตฺวา คจฺเฉยฺย, อเปกฺขายํ อยมฺปิ ธมฺโม อนิยโต, สมุจฺจเย อิติปิ อรหํ, อนฺตมฺปิ อนฺตคุณมฺปิ อาทาย, ครเห อปิ อมฺหากํ ปณฺฑิตก, ปญฺเห อปิ ภนฺเต ภิกฺขํ ลภิตฺถ. ‘अपि’ उपसर्ग संभावना, अपेक्षा, समुच्चय (संग्रह), गर्हा (निंदा) और प्रश्न आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। संभावना में— ‘अपि दिब्बेसु कामेसु’ (दिव्य काम-भोगों में भी), ‘मेरुम्पि विनिविज्झित्वा गच्छेय्या’ (मेरु पर्वत को भी भेदकर जा सके); अपेक्षा में— ‘अयम्पि धम्मो अनियतो’ (यह धर्म भी अनियत है); समुच्चय में— ‘इतिपि अरहं’ (इस प्रकार भी अर्हत्), ‘अन्तम्पि अन्तगुणम्पि आदाय’ (आंतों और अंतड़ियों को भी लेकर); गर्हा में— ‘अपि अम्हाकं पण्डितक’ (अरे हमारे छोटे पंडित!); प्रश्न में— ‘अपि भन्ते भिक्खं लभित्थ’ (क्या भन्ते! भिक्षा मिली?)। อปอิติ อปคต ครห วชฺชน ปูชา ปทุสฺสนาทีสุ. อปคเต อปมาโน อเปโต, ครเห อปคพฺโภ, วชฺชเน อปสาลาย อายนฺติ วาณิชา, ปูชายํ วุทฺธาปจายี, ปทุสฺสเน อปรชฺฌติ. ‘अप’ उपसर्ग अपगत (दूर होना), गर्हा (निंदा), वर्जन (त्याग), पूजा और प्रदुषण (अपराध) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। अपगत में— ‘अपमानो’ (मान-रहित), ‘अपतो’ (दूर गया हुआ); गर्हा में— ‘अपगब्भो’ (पुनर्जन्म से मुक्त/निंदित गर्भ वाला); वर्जन में— ‘अपसालाय आयन्ति वाणिजा’ (शाला को छोड़कर व्यापारी आते हैं); पूजा में— ‘वुद्धापचायी’ (वृद्धों का सम्मान करने वाला); प्रदुषण में— ‘अपराज्झति’ (अपराध करता है)। อุปอิติ อุปคมน สมีปู’ปปตฺติ สาทิสฺสา’ธิกู’ปริภาวา’นสน โทสกฺขาน สญฺญา ปุพฺพกมฺม ปูชา คยฺหาการ ภุสตฺถาทีสุ. อุปคมเน นิสินฺนํ วา อุปนิสีเทยฺย, สมีเป อุปนครํ, อุปปตฺติยํ สคฺคํ โลกํ อุปปชฺชติ, อถ วา อุปปตฺติ ยุตฺติ, ยถา [Pg.131]– อุปปตฺติโต อิกฺขตีติ อุเปกฺขา, สาทิสฺเส อุปมานํ อุปมา, อธิเก อุป ขาริยํ โทโณ, อุปริภาเว อุปสมฺปนฺโน, อนสเน อุปวาโส, โทสกฺขาเน ปรํ อุปปทติ, สญฺญายํ อุปธา อุปสคฺโค, ปุพฺพกมฺเม อุปกฺกโม อุปกาโร, ปูชายํ พุทฺธุปฏฺฐาโก, มาตุปฏฺฐานํ, คยฺหากาเร โสเจยฺยปจฺจุปฏฺฐานํ, ภุสตฺเถ อุปาทานํ, อุปายาโส, อุปนิสฺสโยติ. อิติ อเนกตฺถา หิ อุปสคฺคา. ‘उप’ उपसर्ग उपगमन (पास जाना), समीप, उपपत्ति (उत्पत्ति), सादृश्य, आधिक्य, उपरिभाव (ऊपर होना), अनशन (उपवास), दोष-कथन, संज्ञा, पूर्वकर्म, पूजा, गृह्याकार (ग्रहण करने का ढंग) और भृश (अत्यधिक) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। उपगमन में— ‘निसिन्नं वा उपनिसीदेय्य’ (बैठे हुए के पास बैठना चाहिए); समीप में— ‘उपनगरं’ (नगर के पास); उपपत्ति में— ‘सग्गं लोकं उपपज्जति’ (स्वर्ग लोक में उत्पन्न होता है), अथवा उपपत्ति का अर्थ युक्ति है, जैसे— ‘उपपत्तितो इक्खतीति उपेक्खा’ (युक्तिपूर्वक देखने से उपेक्षा); सादृश्य में— ‘उपमानं’, ‘उपमा’; आधिक्य में— ‘उप खारियं दोणो’ (खारी से एक द्रोण अधिक); उपरिभाव में— ‘उपसम्पन्नो’ (उपसंपदा प्राप्त); अनशन में— ‘उपवासो’ (उपवास); दोष-कथन में— ‘परं उपपदति’ (दूसरे को दोष लगाता है); संज्ञा में— ‘उपधा’, ‘उपसग्गो’; पूर्वकर्म में— ‘उपक्कमो’ (उपक्रम), ‘उपकारो’ (उपकार); पूजा में— ‘बुद्धुपट्ठाको’ (बुद्ध का सेवक), ‘मातुपट्ठानं’ (माता की सेवा); गृह्याकार में— ‘सोचेय्यपच्चुपट्ठानं’ (शुचिता का उपस्थित होना); भृश अर्थ में— ‘उपादानं’ (उपादान/आसक्ति), ‘उपाय़ासो’ (हताशा), ‘उपनिस्सयो’ (उपनिषय/प्रबल कारण)। इस प्रकार उपसर्ग अनेक अर्थों वाले होते हैं। วุตฺตญฺจ – और कहा भी गया है— ‘‘อุปสคฺค นิปาตา จ, ปจฺจยา จ อิเม ตโย; เนเกเนกตฺถวิสยา, อิติ เนรุตฺติกาพฺรวุ’’นฺติ. “उपसर्ग, निपात और प्रत्यय—ये तीनों अनेक अर्थों के विषय वाले होते हैं, ऐसा वैयाकरणों ने कहा है।” ตตฺถ อุปสคฺคานํ นามาขฺยาตวิเสสกตฺตา ลิงฺคสญฺญายํ อนิยเมน สฺยาทิมฺหิ สมฺปตฺเต เตสํ สงฺขฺยากมฺมาทิเภทาภาวา เตหิ ปฐเมกวจนเมว ภวติ. वहाँ उपसर्गों के नाम और आख्यात (क्रिया) के विशेषक होने के कारण, ‘लिंग’ संज्ञा होने पर अनिश्चित रूप से ‘सि’ आदि विभक्तियों के प्राप्त होने पर, उनमें संख्या और कर्म आदि का भेद न होने से, उनसे केवल प्रथमा विभक्ति का एकवचन ही होता है। ‘‘โลป’’นฺติ วตฺตมาเน ‘लोप’ (हटाना) के अधिकार में— ๒๘๒. สพฺพาสมาวุโสปสคฺคนิปาตาทีหิ จ. २८२. ‘सब्बासामवुपसग्गनिपातादीहि च’ (सूत्र)। อาวุโสสทฺทโต, อุปสคฺคนิปาเตหิ จ สพฺพาสํ ปราสํ วิภตฺตีนํ โลโป โหติ. อาทิสทฺเทน กฺวจิ สุตฺตปทาทีหิ จ. เอตฺถ จ อาวุโสติมสฺส วิสุํ คหณํ สสงฺขฺยตฺตทีปนตฺถนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘आवुसो’ शब्द से, तथा उपसर्गों और निपातों से परे सभी विभक्तियों का लोप होता है। ‘आदि’ शब्द से कहीं-कहीं सूत्र के पदों आदि का भी लोप होता है। यहाँ ‘आवुसो’ का अलग से ग्रहण यह दर्शाने के लिए है कि वह संख्या (वचन) युक्त है। อุเปจฺจตฺถํ สชฺชนฺตีติ, อุปสคฺคา หิ ปาทโย; จาที ปทาทิมชฺฌนฺเต, นิปาตา นิปตนฺติติ. चूँकि वे अर्थ के समीप जाकर जुड़ते हैं, इसलिए ‘प’ आदि उपसर्ग कहलाते हैं; और ‘च’ आदि शब्द जो पद के आदि, मध्य या अंत में गिरते (प्रयुक्त होते) हैं, वे निपात कहलाते हैं। ปหรณํ ปหาโร, เอวํ ปราภโว, นิวาโส, นีหาโร, อุหาโร, ทุหาโร, สํหาโร, วิหาโร, อวหาโร, อนุหาโร, ปริหาโร, อธิหาโร, อภิหาโร, ปติหาโร, สุหาโร, อาหาโร, อติหาโร, อปิหาโร, อปหาโร[Pg.132], อุปหาโร. ปหรติ, ปราภวติ, นิวสติ, นีหรติ, อุทฺธรติ อิจฺจาทิ โยเชตพฺพํ. प्रहार (चोट), इसी प्रकार पराभव (हार), निवास (रहना), नीहार (निकासी), उहार (उद्धार), दुहार (कठिनता से ले जाना), संहार (समेटना), विहार (विचरण), अवहार (हरण), अनुहार (अनुकरण), परिहार (बचाव), अधिहार (अर्पण), अभिहार (लाना), पतिहार (प्रतिहार), सुहार (सुखद), आहार (भोजन), अतिहार (अति-ग्रहण), अपिहार (ढकना), अपहार (छीनना), उपहार (भेंट)। इसी प्रकार प्रहरति, पराभवति, निवसति, नीहरति, उद्धरति इत्यादि क्रियाओं को जोड़ना चाहिए। ธาตฺวตฺถํ พาธเต โกจิ, โกจิ ตมนุวตฺตเต; ตเมวญฺโญ วิเสเสติ, อุปสคฺคคตี ติธา. कोई (उपसर्ग) धातु के अर्थ को बाधित करता है, कोई उसका अनुवर्तन करता है; और कोई अन्य उसे विशेषित करता है, इस प्रकार उपसर्गों की गति तीन प्रकार की होती है। โอปสคฺคิกปทํ นิฏฺฐิตํ. उपसर्गयुक्त पदों का प्रकरण समाप्त हुआ। เนปาติกปท निपात पद। สมุจฺจยวิกปฺปนปฏิเสธปูรณาทิอตฺถํ อสตฺววาจกํ เนปาติกํ ปทํ. समुच्चय (संग्रह), विकल्प, प्रतिषेध (निषेध), पूरण आदि अर्थों वाला और द्रव्य (वस्तु) का वाचक न होने वाला पद 'निपात' कहलाता है। ตตฺร จอิติ สมุจฺจยา’นฺวาจเย’ตรีตรโยคสมาหารา’วธารณาทีสุ. उनमें 'च' समुच्चय, अन्वाचय (गौण संग्रह), इतरेतरयोग, समाहार और अवधारण (निश्चय) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। วาอิติ วิกปฺปนู’ปมาน สมุจฺจย ววตฺถิตวิภาสาสุ. 'वा' विकल्प, उपमान, समुच्चय और व्यवस्थित विभाषा (निश्चित विकल्प) के अर्थों में प्रयुक्त होता है। น โน มา อ อลํ หลํ อิจฺเจเต ปฏิเสธนตฺเถ. 'न', 'नो', 'मा', 'अ', 'अलम्', 'हलम्' - ये प्रतिषेध (निषेध) के अर्थ में हैं। อลํ ปริยตฺติ ภูสเนสุ จ. 'अलम्' पर्याप्तता और भूषण (सजावट) के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। ปูรณตฺถํ ทุวิธํ อตฺถปูรณํ ปทปูรณญฺจ. पूरण का अर्थ दो प्रकार का है: अर्थ-पूरण और पद-पूरण। ตตฺถ อถ ขลุ วต วถ อโถ อสฺสุ ยคฺเฆ หิ จรหิ นํ ตํ วา จ ตุว โว ปน หเว กีว ห ตโต ยถา สุทํ โข เว หํ เอนํ เสยฺยถิทํ อิจฺเจวมาทีนิ ปทปูรณานิ. उनमें अथ, खलु, वत, वथ, अथो, अस्सु, यग्घे, हि, चरहि, नं, तं, वा, च, तुव, वो, पन, हवे, कीव, ह, ततो, यथा, सुदं, खो, वे, हं, एनं, सेय्यथिदं आदि पद-पूरक निपात हैं। ตตฺถ – อถอิติ ปญฺหา’นนฺตริยา’ธิการาทีสุ จ. उनमें 'अथ' प्रश्न, आनन्तर्य (तत्पश्चात्) और अधिकार (प्रारम्भ) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। ขลุอิติ ปฏิเสธา’วธารณ ปสิทฺธีสุ จ. 'खलु' प्रतिषेध, अवधारण और प्रसिद्धि के अर्थों में प्रयुक्त होता है। วตอิติ เอกํส เขทา’นุกมฺปสงฺกปฺเปสุ จ. 'वत' निश्चय, खेद, अनुकम्पा और संकल्प के अर्थों में प्रयुक्त होता है। อโถอิติ อนฺวาเทเส จ. 'अथो' अन्वादेश (बाद में कथन) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। หิอิติ [Pg.133] เหตุ อวธารเณสุ จ. 'हि' हेतु (कारण) और अवधारण के अर्थों में प्रयुक्त होता है। ตุอิติ วิเสส เหตุ นิวตฺตนาทีสุ จ. 'तु' विशेष, हेतु और निवर्तन (हटाने) आदि अर्थों में प्रयुक्त होता है। ปนอิติ วิเสเสปิ. 'पन' विशेष के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। หเว, เวอิจฺเจเต เอกํสตฺเถปิ. 'हवे' और 'वे' निश्चय के अर्थ में भी प्रयुक्त होते हैं। หํอิติ วิสาท สมฺภเมสุปิ. 'हं' विषाद और सम्भ्रम (घबराहट) के अर्थों में भी प्रयुक्त होता है। เสยฺยถิทนฺติ ตํ กตมนฺติ อตฺเถปิ. 'सेय्यथिदं' का प्रयोग 'वह क्या है?' (तं कतमं) के अर्थ में भी होता है। อตฺถปูรณํ ทุวิธํ วิภตฺติยุตฺตํ, อวิภตฺติยุตฺตญฺจ. अर्थ-पूरण दो प्रकार का होता है: विभक्ति-युक्त और विभक्ति-रहित। อตฺถิ สกฺกา ลพฺภา อิจฺเจเต ปฐมายํ. 'अत्थि', 'सक्का', 'लब्भा' - ये प्रथमा विभक्ति के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। อาวุโส อมฺโภ หมฺโภ เร อเร หเร เชอิจฺเจเต อามนฺตเน. 'आवुसो', 'अम्भो', 'हम्भो', 'रे', 'अरे', 'हरे', 'जे' - ये आमन्त्रण (सम्बोधन) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। ทิวา ภิยฺโย นโม อิจฺเจเต ปฐมายํ, ทุติยายญฺจ. 'दिवा', 'भिय्यो', 'नमो' - ये प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। สยํ สามํ สํ สมฺมา กินฺติ อิจฺเจเต ตติยตฺเถ, โสโต ธาปจฺจยนฺตา จ. สุตฺตโส ปทโส อนิจฺจโต ทุกฺขโต เอกธา ทฺวิธา อิจฺจาทิ. 'सयं', 'सामं', 'सं', 'सम्मा', 'किन्ति' - ये तृतीया विभक्ति के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, तथा 'सो', 'तो' और 'धा' प्रत्ययान्त शब्द भी; जैसे- सुत्तसो, पदसो, अनिच्चतो, दुक्खतो, एकधा, द्विधा आदि। ตเว ตุํปจฺจยนฺตา จตุตฺถิยา, กาตเว ทาตเว กาตุํ กาเรตุํ ทาตุํ ทาเปตุํ อิจฺจาทิ. 'तवे' और 'तुं' प्रत्ययान्त शब्द चतुर्थी विभक्ति के अर्थ में होते हैं; जैसे- कातवे, दातवे, कातुं, कारेतुं, दातुं, दापेतुं आदि। โส โตปจฺจยนฺตา ปญฺจมิยตฺเถ, ทีฆโส โอรโส ราชโต วา โจรโต วา อิจฺจาทิ. 'सो' और 'तो' प्रत्ययान्त शब्द पञ्चमी विभक्ति के अर्थ में होते हैं; जैसे- दीघसो, ओरसो, राजतो वा चोरतो वा आदि। โต สตฺตมฺยตฺเถปิ, ตฺรถาทิปจฺจยนฺตา จ. เอกโต ปุรโต ปจฺฉโต ปสฺสโต ปิฏฺฐิโต ปาทโต สีสโต อคฺคโต มูลโต ยตฺร ยตฺถ ยหึ ตตฺร ตตฺถ ตหึ ตหํ อิจฺจาทิ. 'तो' प्रत्यय सप्तमी के अर्थ में भी होता है, तथा 'त्र', 'थ' आदि प्रत्ययान्त शब्द भी; जैसे- एकतो, पुरतो, पच्छतो, पस्सतो, पिट्ठितो, पादतो, सीसतो, अग्गतो, मूलतो, यत्र, यत्थ, यहिं, तत्र, तत्थ, तहिं, तहं आदि। สมนฺตา สามนฺตา ปริโต อภิโต สมนฺตโต เอกชฺฌํ เอกมนฺตํ เหฏฺฐา อุปริ อุทฺธํ อโธ ติริยํ สมฺมุขา [Pg.134] ปรมฺมุขา อาวิ รโห ติโร อุจฺจํ นีจํ อนฺโต อนฺตรา อชฺฌตฺตํ พหิทฺธา พาหิรา พาหิรํ พหิ โอรํ ปารํ อารา อารกา ปจฺฉา ปุเร หุรํ เปจฺจ อิจฺเจเต สตฺตมิยา. समन्ता, सामन्ता, परितो, अभितो, समन्ततो, एकज्झं, एकमन्तं, हेट्ठा, उपरि, उद्धं, अधो, तिरियं, सम्मुखा, परम्मुखा, आवि, रहो, तिरो, उच्चं, नीचं, अन्तो, अन्तरा, अज्झत्तं, बहिद्धा, बाहिरा, बाहिरं, बहि, ओरं, पारं, आरा, आरका, पच्छा, पुरे, हुरं, पेच्च - ये सप्तमी विभक्ति के अर्थ में हैं। สมฺปติ อายติ อชฺช อปรชฺชุ ปรชฺช สุเว สฺเว ปรสุเว หิยฺโย ปเร สชฺชุ สายํ ปาโต กาลํ กลฺลํ ทิวา นตฺตํ นิจฺจํ สตตํ อภิณฺหํ อภิกฺขณํ มุหุํ มุหุตฺตํ ภูตปุพฺพํ ปุรา ยทา ตทา กทา อิจฺจาทโย กาลสตฺตมิยา. อิติ วิภตฺติยุตฺตานิ. सम्प्रति, आयति, अज्ज, अपरज्जु, परज्ज, सुवे, स्वे, परसुवे, हिय्यो, परे, सज्जु, सायं, पातो, कालं, कल्लम्, दिवा, नत्तं, निच्चं, सततं, अभिण्हं, अभिक्खणं, मुहुं, मुहुत्तं, भूतपुब्बं, पुरा, यदा, तदा, कदा आदि कालवाचक सप्तमी के अर्थ में हैं। इस प्रकार विभक्ति-युक्त निपात समाप्त हुए। อวิภตฺติยุตฺเตสุ จ อปฺเปว อปฺเปวนาม นุ อิจฺเจเต สํสยตฺเถ. 'अप्पेव', 'अप्पेवनाम' और 'नु' - ये संशय (संदेह) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। อทฺธา อญฺญทตฺถุ ตคฺฆ ชาตุ กามํ สสกฺกํอิจฺเจเต เอกํสตฺเถ. 'अद्धा', 'अञ्ञदत्थु', 'तग्घ', 'जातु', 'कामं' और 'ससक्कं' - ये एकांश (निश्चय) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। เอวอิติ อวธารเณ. 'एव' अवधारण (निश्चय या सीमा निर्धारण) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। กจฺจินุ’กินฺนุนนุกถํ กึสุ กึอิจฺเจเต ปุจฺฉนตฺเถ. 'कच्चिनु', 'किन्नु', 'ननु', 'कथं', 'किंसु' और 'किं' - ये पूछने (प्रश्न) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। เอวํ อิติ อิตฺถํ อิจฺเจเต นิทสฺสเน. 'एवं', 'इति' और 'इत्थं' - ये निदर्शन (उदाहरण या इस प्रकार) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। อิติ เหตุ วากฺยปริสมตฺตีสุ จ. 'इति' हेतु (कारण) और वाक्य की समाप्ति के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। ยาว ตาว ยาวตา ตาวตา กิตฺตาวตา เอตฺตาวตา กีว อิจฺเจเต ปริจฺเฉทนตฺเถ. 'याव', 'ताव', 'यावता', 'तावता', 'कित्तावता', 'एत्तावता' और 'कीव' - ये परिच्छेद (सीमा या मर्यादा) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। เอวํ สาหุ ลหุ โอปายิกํ ปติรูปํ อาม สาธุ อิติ สมฺปฏิจฺฉนตฺเถ. 'एवं', 'साहु', 'लहु', 'ओपायिकं', 'पतिरूपं', 'आम' और 'साधु' - ये सम्प्रतिच्छन (स्वीकृति) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। ยถา ตถา ยเถว ตเถว เอวํ เอวเมว เอวเมวํ เอวมฺปิ ยถาปิ เสยฺยถาปิ เสยฺยถาปินาม วิย อิว ยถริว ตถริว ยถานาม ตถานาม ยถาหิ ตถาหิ ยถาจตถาจ อิจฺเจเต ปฏิภาคตฺเถ. 'यथा', 'तथा', 'यथेव', 'तथेव', 'एवं', 'एवमेव', 'एवमेवं', 'एवम्पि', 'यथापि', 'सेय्यथापि', 'सेय्यथापिनाम', 'विय', 'इव', 'यथरिव', 'तथरिव', 'यथानाम', 'तथानाम', 'यथाहि', 'तथाहि', 'यथा च तथा च' - ये प्रतिभागत (उपमा या समानता) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। ยถาอิติ [Pg.135] โยคฺคตา วิจฺฉา ปทตฺถานติวตฺตนิทสฺสเนสุ จ. 'यथा' योग्यता, वीप्सा (पुनरावृत्ति), पदार्थानतिवृत्ति (शब्द के अर्थ का उल्लंघन न करना) और निदर्शन के अर्थ में प्रयुक्त होता है। เอวํอิติ อุปเทส ปญฺหาทีสุ จ. 'एवं' उपदेश और प्रश्न आदि के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। กิญฺจาปิอิติ อนุคฺคหตฺเถ. 'किञ्चापि' अनुग्रह (स्वीकृति या रियायत) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। อโหอิติ ครห ปสํสน ปตฺถเนสุ จ. 'अहो' गर्हा (निंदा), प्रशंसा और प्रार्थना (इच्छा) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। นามอิติ ครห ปสํสน สญฺญา ปญฺเหสุ จ. 'नाम' गर्हा (निंदा), प्रशंसा, संज्ञा (नाम) और प्रश्न के अर्थ में प्रयुक्त होता है। สาธุอิติ ปสํสน ยาจเนสุ จ. 'साधु' प्रशंसा और याचना (प्रार्थना) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। อิงฺฆ หนฺท อิจฺเจเต โจทนตฺเถ. 'इङ्घ' और 'हन्द' - ये चोदना (प्रेरणा या आग्रह) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। สาธุ สุฏฺฐุ เอวเมตนฺติ อนุโมทเน. 'साधु', 'सुट्ठु' और 'एवमेतं' - ये अनुमोदन के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। กิรอิติ อนุสฺสวณ อสฺสทฺเธยฺเยสุ. 'किर' अनुश्रवण (सुनी-सुनाई बात) और अश्रद्धेय (अविश्वसनीयता) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। นูนอิติ อนุมานา’นุสฺสรณ ปริวิตกฺกเนสุ. 'नून' अनुमान, अनुस्मरण और परिवितर्क (विचार) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। กสฺมาอิติ การณปุจฺฉเน. 'कस्मा' कारण पूछने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ยสฺมา ตสฺมา ตถาหิ เตน อิจฺเจเต การณจฺเฉทนตฺเถ. 'यस्मा', 'तस्मा', 'तथाहि' और 'तेन' - ये कारण-निश्चय (तर्क की समाप्ति) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। สห สทฺธึ สมํ อมาอิติ สมกฺริยายํ. 'सह', 'सद्धिं', 'समं' और 'अमा' - ये समक्रिया (साथ होने) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। วินา ริเตอิติ วิปฺปโยเค. 'विना' और 'रिते' - ये विप्रयोग (बिना या वियोग) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। นานา ปุถุ พหุปฺปกาเร. 'नाना' और 'पुथु' - ये बहुप्रकार (अनेक प्रकार) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। ปุถุ วิสุํ อสงฺฆาเต จ. 'पुथु' और 'विसुं' - ये असंघात (पृथकता या अलग-अलग) के अर्थ में भी प्रयुक्त होते हैं। ทุฏฺฐุ กุ ชิคุจฺฉายํ. 'दुट्ठु' और 'कु' - ये जुगुप्सा (घृणा या निंदा) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। ปุน อปฺปฐเม. 'पुन' अप्रथम (पुनरावृत्ति या फिर से) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। กถญฺจิ กิจฺฉตฺเถ จ. 'कथञ्चि' कृच्छ्र (कठिनाई) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ธา กฺขตฺตุํ สกิญฺจ สงฺขฺยาวิภาเค. 'धा', 'क्खत्तुं' और 'सकिं' - ये संख्या-विभाग के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। อีสกํ [Pg.136] อปฺปตฺเถ. 'ईसकं' अल्प (थोड़ा) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। สณิกํ มนฺทตฺเถ. 'Saṇikaṃ' (धीरे) मंद (धीमी गति) के अर्थ में है। ขิปฺปํ อรํ ลหุ อาสุํ ตุณฺณํ อจิรํ สีฆตฺเถ. 'Khippaṃ', 'araṃ', 'lahu', 'āsuṃ', 'tuṇṇaṃ', 'aciraṃ' शीघ्र (तेजी) के अर्थ में हैं। จิรํ จิรสฺสํ ทีฆกาเล. 'Ciraṃ', 'cirassaṃ' दीर्घकाल (लंबे समय) के अर्थ में हैं। เจ ยทิ สงฺกาวฏฺฐาเน. 'Ce', 'yadi' शंका (संदेह) के स्थान (अर्थ) में हैं। ธุวํ ถิราวธารเณสุ. 'Dhuvaṃ' स्थिरता और अवधारण (निश्चय) के अर्थों में है। หา วิสาเท. 'Hā' विषाद (दुःख) के अर्थ में है। ตุณฺหี อภาสเน. 'Tuṇhī' अभाषण (मौन) के अर्थ में है। สจฺฉิ ปจฺจกฺเข. 'Sacchi' प्रत्यक्ष के अर्थ में है। มุสา มิจฺฉา อลิกํ อสจฺเจ. 'Musā', 'micchā', 'alikaṃ' असत्य के अर्थ में हैं। สุวตฺถิ อาสีสตฺเถ อิจฺจาทิ. 'Suvatthi' आशीर्वाद के अर्थ में है, इत्यादि। ตุน ตฺวาน ตฺวาปจฺจยนฺตา อุสฺสุกฺกนตฺเถ ภวนฺติ. 'Tuna', 'tvāna', 'tvā' प्रत्ययांत शब्द उत्सुकता (प्रयत्न) के अर्थ में होते हैं। ยถา – ปสฺสิตุน ปสฺสิย ปสฺสิตฺวาน ปสฺสิตฺวา ทิสฺวา ทิสฺวานทสฺเสตฺวา ทาตุน ทตฺวาน ทตฺวา อุปาทาย ทาเปตฺวา วิญฺญาเปตฺวา วิเจยฺย วิเนยฺย นิหจฺจ สเมจฺจ อเปจฺจ อุเปจฺจ อารพฺภ อาคมฺม อิจฺจาทิ. जैसे - पस्सितुन, पस्सिय, पस्सित्वान, पस्सित्वा, दिस्वा, दिस्वान, दस्सेत्वा, दातुन, दत्वान, दत्वा, उपादाय, दापेत्वा, विञ्ञापेत्वा, विचेय्य, विनेय्य, निहच्च, समेच्च, अपेच्च, उपेच्च, आरब्भ, आगम्म इत्यादि। เอวํ นามาขฺยาโตปสคฺควินิมุตฺตํ ยทพฺยยลกฺขณํ, ตํ สพฺพํ นิปาตปทนฺติ เวทิตพฺพํ. इस प्रकार नाम, आख्यात और उपसर्ग से मुक्त जो अव्यय लक्षण वाला है, वह सब 'निपात पद' जानना चाहिए। วุตฺตญฺจ – और कहा गया है - ‘‘มุตฺตํ ปทตฺตยา ยสฺมา, ตสฺมา นิปตตฺยนฺตรา; เนปาติกนฺติ ตํ วุตฺตํ, ยํ อพฺยย สลกฺขณ’’นฺติ. “चूँकि यह तीन पदों (नाम, आख्यात, उपसर्ग) से मुक्त है, इसलिए यह बीच में प्रयुक्त होता है; उसे 'नैपातिक' कहा गया है, जो अव्यय के लक्षणों से युक्त है।” เนปาติกปทํ นิฏฺฐิตํ. नैपातिक पद समाप्त हुआ। ปุลฺลิงฺคํ อิตฺถิลิงฺคญฺจ, นปุํสกมถาปรํ; ติลิงฺคญฺจ อลิงฺคญฺจ, นามิกํ ปญฺจธา ฐิตํ. पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, और नपुंसक लिंग; तथा त्रिलिंग और अलिंग - इस प्रकार नामिक (पद) पाँच प्रकार का स्थित है। อิติ ปทรูปสิทฺธิยํ นามกณฺโฑ ทุติโย. इस प्रकार पदरूपसिद्धि में दूसरा 'नामकाण्ड' समाप्त हुआ। ๓. การกกณฺฑ ३. कारक काण्ड อถ [Pg.137] วิภตฺตีนมตฺถเภทา วุจฺจนฺเต. अब विभक्तियों के अर्थ-भेद कहे जाते हैं। ตตฺถ เอกมฺปิ อตฺถํ กมฺมาทิวเสน, เอกตฺตาทิวเสน จ วิภชนฺตีติ วิภตฺติโย, สฺยาทโย. ตา ปน ปฐมาทิเภเทน สตฺตวิธา. उनमें, एक ही अर्थ को कर्म आदि के वश से और एकत्व आदि के वश से जो विभाजित करती हैं, वे 'विभक्तियाँ' (सि, अयो आदि) हैं। वे प्रथमा आदि के भेद से सात प्रकार की हैं। ตตฺถ กสฺมึ อตฺเถ ปฐมา? उनमें, किस अर्थ में प्रथमा (विभक्ति) होती है? ๒๘๓. ลิงฺคตฺเถ ปฐมา. २८३. लिंग के अर्थ में प्रथमा होती है। ลิงฺคตฺถาภิธานมตฺเต ปฐมาวิภตฺติ โหติ. केवल लिंग के अर्थ के कथन में प्रथमा विभक्ति होती है। ลิงฺคสฺส อตฺโถ ลิงฺคตฺโถ. เอตฺถ จ ลีนํ องฺคนฺติ ลิงฺคํ, อปากโฏ อวยโว, ปุริโสติอาทีนญฺหิ ปกติปฺปจฺจยาทิวิภาคกปฺปนาย นิปฺผาทิตานํ สทฺทปฺปติรูปกานํ นามิกปทานํ ปฐมํ ฐเปตพฺพํ ปกติรูปํ อปากฏตฺตา, อวยวตฺตา จ ลิงฺคนฺติ วุจฺจติ. อถ วา วิสทาวิสโทภยรหิตาการโวหารสงฺขาเตน ติวิธลิงฺเคน สหิตตฺถสฺส, ตพฺพินิมุตฺตสฺสุปสคฺคาทีนมตฺถสฺส จ ลีนสฺส คมนโต, ลิงฺคนโต วา ลิงฺคนฺติ อนฺวตฺถนามวเสน วา ‘‘ธาตุปฺปจฺจยวิภตฺติวชฺชิตมตฺถวํ ลิงฺค’’นฺติ วจนโต ปรสมญฺญาวเสน วา ลิงฺคนฺติ อิธ ปาฏิปทิกาปรนามเธยฺยํ สฺยาทิวิภตฺยนฺตปทปกติรูปเมว วุจฺจตีติ ทฏฺฐพฺพํ. लिंग का अर्थ 'लिंगार्थ' है। यहाँ 'लीनं अंगं' (छिपा हुआ अंग) लिंग है, जो अप्रकट अवयव है। 'पुरिस' आदि शब्दों की प्रकृति-प्रत्यय आदि के विभाग की कल्पना से निष्पन्न शब्द-प्रतिरूपक नामिक पदों का जो पहले रखा जाने वाला प्रकृति-रूप है, वह अप्रकट होने और अवयव होने के कारण 'लिंग' कहलाता है। अथवा, विशद-अविशद दोनों से रहित आकार-व्यवहार रूप त्रिविध लिंग से युक्त अर्थ का, और उससे मुक्त उपसर्ग आदि के अर्थ का, जो लीन होने से या गमन करने से 'लिंग' कहलाता है - इस अन्वर्थ नाम के कारण, अथवा 'धातु, प्रत्यय और विभक्ति से रहित अर्थवान् लिंग है' इस वचन के अनुसार पर-संज्ञा के कारण, यहाँ 'लिंग' से प्रातिपदिक नामक सि-आदि विभक्ति के अंत वाले पद का प्रकृति-रूप ही कहा जाता है, ऐसा समझना चाहिए। ลิงฺคสฺสตฺโถ นาม ปพนฺธวิเสสากาเรน ปวตฺตมาเน รูปาทโย อุปาทาย ปญฺญาปียมาโน ตทญฺญานญฺญภาเวน อนิพฺพจนีโย สมูหสนฺตานาทิเภโท อุปาทาปญฺญตฺติสงฺขาโต ฆฏปฏาทิโวหารตฺโถ จ ปถวีธาตุผสฺสาทีนํ สภาวธมฺมานํ [Pg.138] กาลเทสาทิเภทภินฺนานํ วิชาติยวินิวตฺโต สชาติยสาธารโณ ยถาสงฺเกตมาโรปสิทฺโธ ตชฺชาปญฺญตฺติสงฺขาโต กกฺขฬตฺตผุสนาทิสามญฺญากาโร จ. लिंग का अर्थ - प्रबंध विशेष के आकार में प्रवृत्त होने वाले रूप आदि को लेकर जो प्रज्ञापित किया जाता है, वह उससे अन्य या अनन्य भाव से अनिर्वचनीय, समूह-संतान आदि के भेद वाला, उपादा-प्रज्ञप्ति संज्ञक घट-पट आदि व्यवहार का अर्थ है; और पृथ्वी धातु, स्पर्श आदि स्वभाव धर्मों का, जो काल-देश आदि के भेद से भिन्न हैं, विजातीय से व्यावृत्त और सजातीय में साधारण, संकेत के अनुसार आरोप से सिद्ध, तज्जा-प्रज्ञप्ति संज्ञक कठोरता-स्पर्शन आदि सामान्य आकार है। โส ปน กมฺมาทิสํสฏฺโฐ, สุทฺโธ จาติ ทุวิโธ. ตตฺถ กมฺมาทีสุ ทุติยาทีนํ วิธียมานตฺตา กมฺมาทิสํสคฺครหิโต ลิงฺคสงฺขฺยาปริมาณยุตฺโต, ตพฺพินิมุตฺตุปสคฺคาทิปทตฺถภูโต จ สุทฺโธ สทฺทตฺโถ อิธ ลิงฺคตฺโถ นาม. वह (लिंगार्थ) कर्म आदि से संसृष्ट और शुद्ध - इस प्रकार दो प्रकार का है। उनमें कर्म आदि में द्वितीया आदि का विधान होने से, कर्म आदि के संसर्ग से रहित, लिंग-संख्या-परिमाण से युक्त, और उससे मुक्त उपसर्ग आदि के पद-अर्थ रूप जो शुद्ध शब्द-अर्थ है, वह यहाँ 'लिंगार्थ' कहलाता है। โย ปน อาขฺยาตกิตกตทฺธิตสมาเสหิ วุตฺโต กมฺมาทิสํสฏฺโฐ อตฺโถ, โสปิ ทุติยาทีนํ ปุน อตฺตนา วตฺตพฺพสฺส อตฺถวิเสสสฺสาภาเวน อวิสยตฺตา, ลิงฺคตฺถมตฺตสฺส สมฺภวโต จ ปฐมาเยว วิสโย. और जो आख्यात, कृदंत, तद्धित और समास द्वारा कहा गया कर्म आदि से संसृष्ट अर्थ है, वह भी द्वितीया आदि के लिए पुनः अपने द्वारा कहे जाने वाले अर्थ-विशेष के अभाव के कारण अविषय होने से, और केवल लिंगार्थ के संभव होने से, प्रथमा का ही विषय है। โหติ เจตฺถ – और यहाँ यह (श्लोक) है - ปฐมาวุปสคฺคตฺเถ, เกสญฺจตฺเถ นิปาตสทฺทานํ; ลิงฺคาทิเก จ สุทฺเธ-ภิหิเต กมฺมาทิอตฺเถปิ. “उपसर्ग के अर्थ में, कुछ निपात शब्दों के अर्थ में, शुद्ध लिंग आदि के अर्थ में, और (आख्यात आदि द्वारा) कहे गए कर्म आदि के अर्थ में भी प्रथमा विभक्ति होती है।” สลิงฺเค ตาว – เอโส ปุริโส, เอเต ปุริสา, เอสา กญฺญา, เอตา กญฺญาโย, เอตํ จิตฺตํ, เอตานิ จิตฺตานิ. लिंग के अर्थ में पहले - यह पुरुष, ये पुरुष, यह कन्या, ये कन्याएँ, यह चित्त, ये चित्त। สสงฺขฺเย – เอโก ทฺเว. संख्या के अर्थ में - एक, दो। สปริมาเณ – โทโณ ขารี อาฬฺหกํ. परिमाण के अर्थ में - द्रोण, खारी, आढक। ลิงฺคาทิวินิมุตฺเต สตฺตามตฺเต – จ วา ห อหํ อตฺถิ สกฺกาลพฺภา อิจฺจาทิ. लिंग आदि से मुक्त केवल सत्ता के अर्थ में - च, वा, ह, अहम्, अत्थि, सक्का, लब्भा इत्यादि। ‘‘ลิงฺคตฺเถ ปฐมา’’ติ อธิกิจฺจ ‘‘อาลปเน จา’’ติ อาลปนตฺเถ จ ปฐมา, อภิมุขํ กตฺวา ลปนํ อาลปนํ, อามนฺตนํ อวฺหานนฺติ อตฺโถ. “लिंग के अर्थ में प्रथमा” इस अधिकार के बाद “सम्बोधन में भी” (आलपने च) सूत्र से सम्बोधन के अर्थ में भी प्रथमा विभक्ति होती है। सम्मुख करके बोलना ‘आलपन’ है, जिसका अर्थ आमंत्रण या आह्वान है। เอตฺถ จ อามนฺตนํ นาม ปเคว ลทฺธสรูปสฺส สทฺเทน อภิมุขีกรณํ, กตาภิมุโข ปน ‘‘คจฺฉา’’ติอาทินา นเยน กฺริยาย [Pg.139] โยชียติ, ตสฺมา อามนฺตนสมเย กฺริยาโยคาภาวโต อิทํ การกโวหารํ น ลภติ. यहाँ ‘आमंत्रण’ का अर्थ है पहले से ही ज्ञात स्वरूप वाले व्यक्ति को शब्द के द्वारा सम्मुख करना। सम्मुख किए गए व्यक्ति को फिर “जाओ” आदि विधि से क्रिया के साथ जोड़ा जाता है, इसलिए आमंत्रण के समय क्रिया का योग न होने के कारण इसे ‘कारक’ की संज्ञा प्राप्त नहीं होती। วุตฺตญฺจ और कहा गया है - ‘‘สทฺเทนาภิมุขีกาโร, วิชฺชมานสฺส วตฺถุโน; อามนฺตนํ วิธาตพฺเพ, นตฺถิ ‘ราชา ภเว’ติท’’นฺติ. “विद्यमान वस्तु को शब्द के द्वारा सम्मुख करना आमंत्रण है; विधान (आज्ञा) के समय ‘राजा होओ’ ऐसा (सम्बोधन) नहीं होता।” โภ ปุริส เอหิ, โภ ปุริสา วา, ภวนฺโต ปุริสา เอถ. हे पुरुष! आओ, अथवा हे पुरुषों! आप पुरुष आएँ। กสฺมึ อตฺเถ ทุติยา? द्वितीया विभक्ति किस अर्थ में होती है? ๒๘๔. กมฺมตฺเถ ทุติยา. २८४. कर्म के अर्थ में द्वितीया होती है। กมฺมตฺเถ ลิงฺคมฺหา ทุติยาวิภตฺติ โหติ. कर्म के अर्थ में प्रातिपदिक (लिंग) से द्वितीया विभक्ति होती है। อนภิหิเต เอวายํ, ‘‘กมฺมนิ ทุติยายํ ตฺโต’’ติ วจนญฺเจตฺถ ญาปกํ. यह (द्वितीया) अनभिहित (जो क्रिया द्वारा न कहा गया हो) होने पर ही होती है, और यहाँ “कमणि द्वितीयायं त्तो” यह वचन ज्ञापक है। กึ กมฺมํ? कर्म क्या है? ‘‘เยน วา กยิรเต ตํ กรณ’’นฺติ อิโต ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. “जिसके द्वारा किया जाता है वह करण है” इस सूत्र से “वा” (अथवा) की अनुवृत्ति होती है। ๒๘๕. ยํ กโรติ ตํ กมฺมํ. २८५. जो करता है (जिसे किया जाता है), वह कर्म है। ยํ วา กโรติ, ยํ วา วิกโรติ, ยํ วา ปาปุณาติ, ตํ การกํ กมฺมสญฺญํ โหติ. जिसे करता है, या जिसे विकृत (परिवर्तित) करता है, या जिसे प्राप्त करता है, वह कारक ‘कर्म’ संज्ञा वाला होता है। อิธ ลิงฺคกาลวจนมตนฺตํ. กรียตีติ กมฺมํ. ตตฺถ การกํ, สาธกํ กฺริยานิปฺผตฺติยา การณมุจฺจเต, ตํ ปน การกํ ฉพฺพิธํ กมฺมํ กตฺตา กรณํ สมฺปทานมปาทานโมกาโส จาติ. ตตฺถ สภาวโต, ปริกปฺปโต วา กมฺมาทิมฺหิ สติเยว กฺริยาภาวโต กมฺมาทีนํ ฉนฺนมฺปิ การกโวหาโร สิทฺโธว โหติ. यहाँ लिंग, काल और वचन का बंधन नहीं है। जो किया जाता है वह कर्म है। वहाँ ‘कारक’ क्रिया की निष्पत्ति के साधक या कारण को कहा जाता है। वह कारक छह प्रकार का है: कर्म, कर्ता, करण, सम्प्रदान, अपादान और अवकाश (अधिकरण)। वहाँ स्वभाव से या कल्पना से कर्मादि के होने पर ही क्रिया का अस्तित्व होने के कारण, इन छहों की ‘कारक’ संज्ञा सिद्ध ही होती है। ตํ [Pg.140] ปน กมฺมํ ติวิธํ นิพฺพตฺตนียํ วิกรณียํ ปาปณียญฺจาติ. ยถา – มาตา ปุตฺตํ วิชายติ, อาหาโร สุขํ ชนยติ. ฆฏํ กโรติ เทวทตฺโต, กฏฺฐมงฺคารํ กโรติ, สุวณฺณํ เกยูรํ, กฏกํ วา กโรติ, วีหโย ลุนาติ. เทวทตฺโต นิเวสนํ ปวิสติ, อาทิจฺจํ ปสฺสติ, ธมฺมํ สุณาติ, ปณฺฑิเต ปยิรุปาสติ. वह कर्म तीन प्रकार का है: निर्वर्त्य (उत्पन्न करने योग्य), विकार्त्य (विकृत करने योग्य) और प्राप्य (प्राप्त करने योग्य)। जैसे - माता पुत्र को जन्म देती है, आहार सुख उत्पन्न करता है। देवदत्त घड़ा बनाता है, लकड़ी को कोयला बनाता है, सोने को बाजूबंद या कंगन बनाता है, धान काटता है। देवदत्त घर में प्रवेश करता है, सूर्य को देखता है, धर्म सुनता है, पंडितों की सेवा करता है। วุตฺตญฺจ और कहा गया है - ‘‘นิพฺพตฺติวิกติปฺปตฺติ-เภเทน ติวิธํ มตํ; กตฺตุ กฺริยาภิคมฺมํ ตํ, สุขงฺคารํ นิเวสน’’นฺติ. “उत्पत्ति (निर्वृत्ति), विकार और प्राप्ति के भेद से वह (कर्म) तीन प्रकार का माना गया है; जो कर्ता की क्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है, जैसे - सुख, अंगार और निवेश (घर)।” เอตฺถ จ อิจฺฉิตานิจฺฉิตกถิตากถิตาทิเภทมนเปกฺขิตฺวา สพฺพสงฺคาหกวเสน ‘‘ยํ กโรติ ตํ กมฺม’’นฺติ วุตฺตตฺตา, อตฺถนฺตรวิกปฺปนวาธิการโต จ สพฺพตฺถ อิมินาว กมฺมสญฺญา โหติ. और यहाँ इष्ट (इच्छित), अनिष्ट (अनिच्छित), कथित और अकथित आदि भेदों की अपेक्षा न करते हुए, सर्व-संग्राहक रूप में “जो करता है वह कर्म है” ऐसा कहे जाने के कारण, और अन्य अर्थों के विकल्प के अधिकार से, सब जगह इसी से ‘कर्म’ संज्ञा होती है। ตตฺถ อนิจฺฉิตกมฺมํ ยถา – กณฺฏกํ มทฺทติ, วิสํ คิลติ, คามํ คจฺฉนฺโต รุกฺขมูลํ อุปคจฺฉติ. वहाँ अनिष्ट (अनिच्छित) कर्म जैसे - काँटे को कुचलता है, विष निगलता है, गाँव जाते हुए वृक्ष की जड़ के पास पहुँचता है। อกถิตกมฺมํ ยถา – ยญฺญทตฺตํ กมฺพลํ ยาจเต พฺราหฺมโณ. เอตฺถ หิ ‘‘กมฺพล’’มิติ กถิตกมฺมํ ทฺวิกมฺมิกาย ยาจนกฺริยาย ปตฺตุมิจฺฉิตตรตฺตา. ‘‘ยญฺญทตฺต’’มิติ อปฺปธานตฺตา อกถิตกมฺมํ. ตถา สมิทฺธํ ธนํ ภิกฺขเต, อชํ คามํ นยติ, ปราภวนฺตํ ปุริสํ, มยํ ปุจฺฉาม โคตมํ, ภควา ภิกฺขู เอตทโวจ อิจฺจาทิ. अकथित कर्म जैसे - ब्राह्मण यज्ञदत्त से कंबल माँगता है। यहाँ “कंबल” कथित (प्रधान) कर्म है क्योंकि द्विकर्मक याचना-क्रिया द्वारा उसे प्राप्त करना सर्वाधिक अभीष्ट है। “यज्ञदत्त” गौण होने के कारण अकथित कर्म है। वैसे ही - समिद्ध से धन माँगता है, बकरी को गाँव ले जाता है, पराभव (पतन) होते हुए पुरुष के विषय में हम गौतम से पूछते हैं, भगवान ने भिक्षुओं से यह कहा इत्यादि। อภิหิตกมฺเม ปน น โหติ, ยถา – กโฏ กรียเต เทวทตฺเตน, สุคเตน เทสิโต ธมฺโม, ยญฺญทตฺโต กมฺพลํ ยาจียเต พฺราหฺมเณน อิจฺจาทิ. किन्तु अभिहित (कहे गए) कर्म में द्वितीया नहीं होती, जैसे - देवदत्त द्वारा चटाई बनाई जाती है, सुगत द्वारा धर्म देशित किया गया, ब्राह्मण द्वारा यज्ञदत्त से कंबल माँगा जाता है इत्यादि। ‘‘ทุติยา’’ติ อธิกาโร. “द्वितीया” यह अधिकार है। ๒๘๖. คติ [Pg.141] พุทฺธิ ภุช ปฐ หร กร สยาทีนํ การิเต วา. २८६. गति, बुद्धि, भुज (खाना), पठ, हर, कर, शय (सोना) आदि धातुओं के णिजन्त (प्रेरणार्थक) प्रयोग में विकल्प से (द्वितीया होती है)। คมุ สปฺป คติมฺหิ, พุธ โพธเน, พุธ อวคมเน วา, ภุช ปาลนพฺยวหรเณสุ, ปฐ พฺยตฺติยํ วาจายํ, หร หรเณ, กร กรเณ, สิ สเย อิจฺเจวมาทีนํ ธาตูนํ ปโยเค การิเต สติ ปโยชฺชกกตฺตุภูเต กมฺมนิ ลิงฺคมฺหา ทุติยาวิภตฺติ โหติ วา. นิจฺจสมฺปตฺเต วิกปฺปตฺโถยํ, เตน ตสฺส ปกฺเข ตติยา โหติ. गमु, सप्प (गति अर्थ में), बुध (बोध या ज्ञान अर्थ में), भुज (पालन और उपभोग अर्थ में), पठ (स्पष्ट वाणी में), हर (हरण में), कर (करने में), सि (शयन में) इत्यादि धातुओं के प्रयोग में, प्रेरणार्थक (कारित) होने पर, प्रयोज्य कर्ता रूपी कर्म में प्रातिपदिक से विकल्प से द्वितीया विभक्ति होती है। नित्य प्राप्त होने पर यह विकल्प के लिए है, इसलिए इसके पक्ष में तृतीया विभक्ति होती है। โย โกจิ ปุริโส คามํ คจฺฉติ, ตมญฺโญ ปโยชยติ. ปุริโส ปุริสํ คามํ คมยติ, ปุริเสน วา คามํ คมยติ. เอวํ สิสฺสํ ธมฺมํ โพเธติ อาจริโย, มาตา ปุตฺตํ โภชนํ โภชยติ, สิสฺสํ ธมฺมํ ปาเฐติ อาจริโย, ปุริโส ปุริสํ ภารํ หาเรติ, ตถา ปุริโส ปุริสํ กมฺมํ การยติ, ปุริเสน วา กมฺมํ การาปยติ, ปุริโส ปุริสํ สยาปยติ. เอวํ สพฺพตฺถ การิเต กตฺตุกมฺมนิ ทุติยา. कोई पुरुष गाँव जाता है, उसे दूसरा प्रेरित करता है। पुरुष पुरुष को गाँव भेजता है (गमयति), अथवा पुरुष के द्वारा गाँव भेजता है। इसी प्रकार आचार्य शिष्य को धर्म समझाता है, माता पुत्र को भोजन कराती है, आचार्य शिष्य को धर्म पढ़ाता है, पुरुष पुरुष से बोझ उठवाता है, वैसे ही पुरुष पुरुष से काम करवाता है, अथवा पुरुष के द्वारा काम करवाता है, पुरुष पुरुष को सुलाता है। इस प्रकार सब जगह प्रेरणार्थक (कारित) में कर्ता-रूपी कर्म में द्वितीया होती है। การิเตติ กึ? ปุริโส คามํ คจฺฉติ. “कारित (प्रेरणार्थक) में” ऐसा क्यों कहा? (उदाहरण:) पुरुष गाँव जाता है। อภิหิเต น ภวติ, ปุริเสน ปุริโส คามํ คมียเต, สิสฺโส ธมฺมํ โพธียเต อิจฺจาทิ. उक्त होने पर (द्वितीया) नहीं होती है, जैसे- 'पुरिसेन पुरिसो गामं गमीयते' (पुरुष के द्वारा पुरुष गाँव ले जाया जाता है), 'सिस्सो धम्मं बोधीयते' (शिष्य को धर्म समझाया जाता है) इत्यादि। ๒๘๗. กาลทฺธานมจฺจนฺตสํโยเค. २८७. काल (समय) और अध्व (मार्ग) के अत्यंत संयोग (निरंतरता) होने पर। อจฺจนฺตํ นิรนฺตรํ สํโยโคอจฺจนฺตสํโยโค. กาลทฺธานํ ทพฺพคุณกฺริยาหิ อจฺจนฺตสํโยเค เตหิ กาลทฺธานวาจีหิ ลิงฺเคหิ ทุติยาวิภตฺติ โหติ. अत्यंत अर्थात् निरंतर संयोग 'अत्यंतसंयोग' है। काल और मार्ग का द्रव्य, गुण और क्रिया के साथ अत्यंत संयोग होने पर, उन काल और मार्ग वाचक शब्दों से द्वितीया विभक्ति होती है। กาเล ตาว – สตฺตาหํ ควปานํ, มาสํ มํโสทนํ, สรทํ รมณียา นที, สพฺพกาลํ รมณียํ นนฺทนํ, มาสํ สชฺฌายติ, ตโย มาเส อภิธมฺมํ เทเสสิ. काल के उदाहरण में - सात दिन तक गायों का दूध पीना, महीने भर मांस-भात, शरद ऋतु भर रमणीय नदी, सब समय रमणीय नन्दन वन, महीने भर स्वाध्याय करता है, तीन महीने तक अभिधम्म का उपदेश दिया। อทฺธาเน [Pg.142] – โยชนํ วนราชิ, โยชนํ ทีโฆ ปพฺพโต, โกสํ สชฺฌายติ. अध्व (मार्ग) के उदाहरण में - योजन भर वन की पंक्ति, योजन भर लम्बा पर्वत, कोस भर स्वाध्याय करता है। อจฺจนฺตสํโยเคติ กึ? มาเส มาเส ภุญฺชติ, โยชเน โยชเน วิหารํ ปติฏฺฐาเปสิ. 'अत्यंतसंयोग' क्यों कहा गया? (जहाँ निरंतरता न हो वहाँ नहीं होती, जैसे-) महीने-महीने में खाता है, योजन-योजन पर विहार स्थापित किया। ๒๘๘. กมฺมปฺปวจนียยุตฺเต. २८८. कर्मप्रवचनीय के योग में। กมฺมปฺปวจนีเยหิ นิปาโตปสคฺเคหิ ยุตฺเต โยเค สติ ลิงฺคมฺหา ทุติยาวิภตฺติ โหติ. कर्मप्रवचनीय संज्ञक निपातों और उपसर्गों के साथ योग होने पर प्रातिपदिक से द्वितीया विभक्ति होती है। กมฺมํ ปวจนียํ เยสํ เต กมฺมปฺปวจนียา, ปรสมญฺญาวเสน วา อนฺวาทโย กมฺมปฺปวจนียา. जिनके द्वारा कर्म (क्रिया) कही जाए वे 'कर्मप्रवचनीय' हैं, अथवा अन्य संज्ञा के वश से 'अनु' आदि कर्मप्रवचनीय कहलाते हैं। ตตฺถ อนุสทฺทสฺส ลกฺขเณ, สหตฺเถ, หีเน จ กมฺมปฺปวจนียสญฺญา วุตฺตา. ยถา – ปพฺพชิตมนุ ปพฺพชึสุ, นทิมนฺววสิตา พาราณสี, นทิยา สห อวพทฺธาติ อตฺโถ, อนุ สาริปุตฺตํ ปญฺญวา. वहाँ 'अनु' शब्द की लक्षण (चिह्न), सह (साथ) और हीन अर्थ में कर्मप्रवचनीय संज्ञा कही गई है। जैसे - 'पब्बजितमनु पब्बजिंसु' (प्रव्रजित के पीछे प्रव्रजित हुए), 'नदिमन्ववसिता बाराणसी' (नदी के साथ बसी हुई वाराणसी, अर्थात् नदी से सटी हुई), 'अनु सारिपुत्तं पञ्ञवा' (सारिपुत्र से कम प्रज्ञावान)। ลกฺขณาทีสุ ‘‘ลกฺขณิ’ตฺถมฺภูตกฺขานภาค วิจฺฉาสุ ปติ ปริ อนโว’’ติ ปติ ปริ อนูนํ กมฺมปฺปวจนียสญฺญา วุตฺตา. लक्षण आदि अर्थों में - "लक्षण, इत्थंभूताख्यान, भाग और वीप्सा में 'प्रति', 'परि' और 'अनु' की" कर्मप्रवचनीय संज्ञा कही गई है। ลกฺขเณ สูริยุคฺคมนํ ปติ ทิพฺพา ภกฺขา ปาตุภเวยฺยุํ, รุกฺขํ ปติ วิชฺโชตเต จนฺโท, รุกฺขํ ปริ, รุกฺขํ อนุ. लक्षण (चिह्न) अर्थ में - सूर्योदय के समय दिव्य भक्ष्य प्रकट हों, वृक्ष की ओर चन्द्रमा चमकता है, 'रुक्खं परि', 'रुक्खं अनु'। อิตฺถมฺภูตกฺขาเน สาธุ เทวทตฺโต มาตรํ ปติ, มาตรํ ปริ, มาตรํ อนุ. इत्थंभूताख्यान (किसी प्रकार की स्थिति का कथन) में - देवदत्त अपनी माता के प्रति अच्छा है, 'मातरं परि', 'मातरं अनु'। ภาเค ยเทตฺถ มํ ปติ สิยา, มํ ปริ, มํ อนุ, ตํ ทียตุ. भाग (हिस्सा) अर्थ में - जो यहाँ मेरा हिस्सा हो, 'मं परि', 'मं अनु', वह दिया जाए। วิจฺฉาโยเค [Pg.143] อตฺถมตฺถํ ปติ สทฺโท นิวิสติ, รุกฺขํ รุกฺขํ ปติ วิชฺโชตเต จนฺโท, รุกฺขํ รุกฺขํ ปริ, รุกฺขํ รุกฺขํ อนุ. वीप्सा (व्याप्ति/दोहराव) के योग में - अर्थ-अर्थ के प्रति शब्द प्रवृत्त होता है, वृक्ष-वृक्ष के प्रति चन्द्रमा चमकता है, 'रुक्खं रुक्खं परि', 'रुक्खं रुक्खं अनु'। ‘‘อภิรภาเค’’ติ อภิสฺส ภาควชฺชิเตสุ ลกฺขณาทีสุ กมฺมปฺปวจนียสญฺญา วุตฺตา. ตํ โข ปน ภวนฺตํ โคตมํ เอวํ กลฺยาโณ กิตฺติสทฺโท อพฺภุคฺคโต, สาธุ เทวทตฺโต มาตรํ อภิ. "अभिर्भागे" सूत्र से 'अभि' की भाग को छोड़कर लक्षण आदि अर्थों में कर्मप्रवचनीय संज्ञा कही गई है। जैसे - उन भगवान गौतम का ऐसा कल्याणकारी कीर्ति-शब्द फैला है, देवदत्त अपनी माता के प्रति अच्छा है। นิปาเต ธิ พฺราหฺมณสฺส หนฺตาร มิจฺเจวมาทิ. निपात के योग में - 'धि ब्राह्मणस्स हन्तारं' (ब्राह्मण के हत्यारे को धिक्कार है) इत्यादि। ๒๘๙. กฺวจิ ทุติยา ฉฏฺฐีนมตฺเถ. २८९. कहीं-कहीं षष्ठी के अर्थ में द्वितीया होती है। ฉฏฺฐีนํ อตฺเถ กฺวจิ ทุติยาวิภตฺติ โหติ. อนฺตราอภิโต ปริโต ปติ ปฏิภาติโยเค อยํ. อนฺตรา จ ราชคหํ อนฺตรา จ นาฬนฺทํ อทฺธานมคฺคปฺปฏิปนฺโน, ราชคหสฺส จ นาฬนฺทาย จ มชฺเฌติ อตฺโถ. อภิโต คามํ วสติ, ปริโต คามํ วสติ, นทึ เนรญฺชรํ ปติ, เนรญฺชราย นทิยา สมีเปติ อตฺโถ. ปฏิภนฺตุ ตํ จุนฺท โพชฺฌงฺคา, อุปมา มํ ปฏิภาติ, อุปมา มยฺหํ อุปฏฺฐหตีติ อตฺโถ. षष्ठी के अर्थ में कहीं-कहीं द्वितीया विभक्ति होती है। 'अन्तरा', 'अभितो', 'परितो', 'पति' और 'प्रतिभाति' के योग में यह होती है। 'अन्तरा च राजगहं अन्तरा च नाळन्दं' मार्ग पर चल पड़ा, इसका अर्थ है - राजगृह और नालंदा के बीच में। 'अभितो गामं वसति' (गाँव के दोनों ओर रहता है), 'परितो गामं वसति' (गाँव के चारों ओर रहता है), 'नदिं नेरञ्जरं पति' (निरंजना नदी के पास), इसका अर्थ है - निरंजना नदी के समीप। 'पटिभन्तु तं चुन्द बोज्झङ्गा' (हे चुन्द! तुम्हें बोध्यंग प्रतिभासित हों), 'उपमा मं पटिभाति' (मुझे उपमा सूझ रही है), इसका अर्थ है - मुझे उपमा उपस्थित हो रही है। ‘‘กฺวจิ ทุติยา, อตฺเถ’’ติ จ วตฺตเต. "क्वचि द्वितीया" और "अत्थे" की अनुवृत्ति होती है। ๒๙๐. ตติยาสตฺตมีนญฺจ. २९०. और तृतीया तथा सप्तमी के अर्थ में भी। ตติยาสตฺตมีนมตฺเถ จ กฺวจิ ลิงฺคมฺหา ทุติยาวิภตฺติ โหติ. तृतीया और सप्तमी के अर्थ में भी कहीं-कहीं प्रातिपदिक से द्वितीया विभक्ति होती है। ตติยตฺเถ สเจ มํ นาลปิสฺสติ, ตฺวญฺจ มํ นาภิภาสสิ, วินา สทฺธมฺมํ กุโต สุขํ, อุปายมนฺตเรน น อตฺถสิทฺธิ. तृतीया के अर्थ में - यदि मुझसे बात नहीं करेगा, और तुम मुझसे नहीं बोलोगे, सद्धर्म के बिना सुख कहाँ, उपाय के बिना अर्थ की सिद्धि नहीं होती। สตฺตมิยตฺเถ [Pg.144]– กาเล, อุปานฺวชฺฌาวสสฺส ปโยเค, อธิสิฏฺฐาวสานํ ปโยเค, ตปฺปานจาเร จ ทุติยา. सप्तमी के अर्थ में - काल (समय) में, 'उप', 'अनु', 'अधि' और 'आ' पूर्वक 'वस्' धातु के प्रयोग में, 'अधि' पूर्वक 'स्था' और 'आस्' धातु के प्रयोग में, तथा तृप्ति और आचरण के अर्थ में द्वितीया होती है। กาเล ตาว – ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา, เอกํ สมยํ ภควา. อิมํ รตฺตึ จตฺตาโร มหาราชาโน. काल के उदाहरण में - पूर्वाह्न समय में (चीवर) पहनकर, एक समय भगवान..., इस रात्रि में चारों महाराज...। อุปาทิปุพฺพสฺส วสธาตุสฺส ปโยเค – คามํ อุปวสติ, คามํ อนุวสติ, วิหารํ อธิวสติ, คามํ อาวสติ, อคารํ อชฺฌาวสติ. ตถา ปถวึ อธิเสสฺสติ, คามํ อธิติฏฺฐติ, คามํ อชฺฌาวสติ. 'उप' आदि पूर्वक 'वस्' धातु के प्रयोग में - गाँव में रहता है (उपवसति), गाँव में रहता है (अनुवसति), विहार में रहता है (अधिवसति), गाँव में रहता है (आवसति), घर में रहता है (अज्झावसति)। उसी प्रकार - पृथ्वी पर सोएगा (अधिसस्सति), गाँव में ठहरता है (अधितिट्ठति), गाँव में रहता है (अज्झावसति)। ตปฺปานจาเรสุ – นทึ ปิวติ, คามํ จรติ อิจฺจาทิ. तृप्ति और आचरण में - नदी (का जल) पीता है, गाँव में विचरण करता है इत्यादि। กสฺมึ อตฺเถ ตติยา? किस अर्थ में तृतीया होती है? ๒๙๑. กรเณ ตติยา. २९१. करण में तृतीया होती है। กรณการเก ตติยาวิภตฺติ โหติ. करण कारक में तृतीया विभक्ति होती है। กึ กรณํ? करण क्या है? ๒๙๒. เยน วา กยิรเต ตํ กรณํ. २९२. जिसके द्वारा (क्रिया) की जाती है, वह करण है। เยน วา กตฺตา อุปกรณภูเตน วตฺถุนา กฺริยํ อพฺยวธาเนน กโรติ, เยน วา วิกโรติ, เยน วา ปาปุณาติ, ตํ การกํ กรณสญฺญํ โหติ. अथवा जिसके द्वारा कर्ता उपकरणभूत वस्तु से क्रिया को बिना किसी व्यवधान के करता है, अथवा जिसके द्वारा विकार उत्पन्न करता है, अथवा जिसके द्वारा प्राप्त करता है, वह कारक 'करण' संज्ञा वाला होता है। กรียเต อเนนาติ กรณํ, เอตฺถ จ สติปิ สพฺพการกานํ กฺริยาสาธกตฺเต ‘‘เยน วา กยิรเต’’ติ วิเสเสตฺวา วจนํ กตฺตูปกรณภูเตสุ การเกสุ สาธกตมสฺเสว คหณตฺถํ. 'इसके द्वारा किया जाता है' इसलिए यह करण है। यहाँ सभी कारकों के क्रिया-साधक होने पर भी, 'जिसके द्वारा किया जाता है' ऐसा विशेष रूप से कहना कर्ता के उपकरणभूत कारकों में जो 'साधकतम्' (सबसे अधिक सहायक) है, उसी के ग्रहण के लिए है। วุตฺตญฺจ [Pg.145] और कहा गया है— ‘‘ยสฺส สพฺพวิเสเสน, กฺริยาสํสิทฺธิเหตุตา; สมฺภาวียติ ตํ วุตฺตํ, กรณํ นาม การก’’นฺติ. "जिसकी सभी प्रकार से क्रिया की सिद्धि में हेतुता (कारणता) संभावित होती है, उसे 'करण' नामक कारक कहा गया है।" ตํ ปน ทุวิธํ อชฺฌตฺติก พาหิรวเสน. वह (करण) फिर आध्यात्मिक (आन्तरिक) और बाह्य के भेद से दो प्रकार का है। ยถา – หตฺเถน กมฺมํ กโรติ, จกฺขุนา รูปํ ปสฺสติ, มนสา ธมฺมํ วิญฺญาย. ทตฺเตน วีหโย ลุนาติ, อคฺคินา กุฏึ ฌาเปติ. जैसे—हाथ से काम करता है, आँख से रूप देखता है, मन से धर्म को जानकर। हँसिये से धान काटता है, आग से कुटिया जलाता है। ‘‘ตติยา’’ติ อธิกาโร. "तृतीया" यह अधिकार है। ๒๙๓. กตฺตริ จ. २९३. और कर्ता में। กตฺตริ จ การเก ลิงฺคมฺหา ตติยาวิภตฺติ โหติ. จคฺคหเณน อิตฺถมฺภูตลกฺขเณ, กฺริยาปวคฺเค, ปุพฺพสทิสสมูนตฺถ กลห นิปุณ มิสฺสก สขิลตฺถาทิโยเค, กาลทฺธาเนสุ, ปจฺจตฺตกมฺมตฺถปญฺจมิยตฺถาทีสุ จ ตติยา. कर्ता कारक में भी प्रातिपदिक से तृतीया विभक्ति होती है। 'च' ग्रहण से 'इत्थंभूतलक्षण' में, 'क्रियापवर्ग' (फल प्राप्ति) में, 'पूर्व, सदृश, सम, ऊनार्थ (कम), कलह, निपुण, मिश्रक, श्लक्ष्ण' आदि के योग में, काल और मार्गवाची शब्दों में, और प्रथमा, द्वितीया तथा पंचमी विभक्ति के अर्थों आदि में भी तृतीया होती है। โก จ กตฺตา? और कर्ता कौन है? ๒๙๔. โย กโรติ ส กตฺตา. २९४. जो करता है, वह कर्ता है। โย กฺริยํ อตฺตปฺปธาโน หุตฺวา กโรติ, โส กตฺตุสญฺโญ โหติ. जो स्वयं प्रधान होकर क्रिया को करता है, वह 'कर्ता' संज्ञा वाला होता है। โส ติวิโธ สุทฺธกตฺตา เหตุกตฺตา กมฺมกตฺตาติ. ตตฺถ โย สยเมว กฺริยํ กโรติ, โส สุทฺธกตฺตา. โย อญฺญํ กาตุํ สมตฺถํ อกโรนฺตํ กมฺมํ นิโยเชติ, โส เหตุกตฺตา, ยถา – คนฺตุํ สมตฺโถ เทวทตฺโต, ตมญฺโญ ปโยเชติ ‘‘คมยติ เทวทตฺต’’นฺติ. वह तीन प्रकार का है—शुद्धकर्ता, हेतुकर्ता और कम्मकर्ता (कर्मकर्ता)। उनमें जो स्वयं क्रिया करता है, वह शुद्धकर्ता है। जो दूसरे समर्थ व्यक्ति को, जो कार्य नहीं कर रहा है, कार्य में नियोजित करता है, वह हेतुकर्ता है। जैसे—जाने में समर्थ देवदत्त को कोई दूसरा प्रेरित करता है—'देवदत्त को भेजता है (गमयति देवदत्तं)'। ยํ ปน ตตฺถ ตตฺถ คจฺฉติ เทวทตฺโต, ตมญฺโญ ปโยชยติ ‘‘คมยติ เทวทตฺต’’นฺติ เหตฺวตฺถนิทสฺสนํ, ตมฺปิ สามตฺถิยทสฺสนวเสน [Pg.146] วุตฺตนฺติ คเหตพฺพํ. อญฺญถา ยทิ สยเมว คจฺฉติ, กึ ตตฺถ ปโยชกพฺยาปาเรน อกโรนฺตํ พเลน การยติ, ปาสาณํ อุฏฺฐาปยตีติอาทิกญฺจ น สิชฺเฌยฺย. जो वहाँ-वहाँ देवदत्त जाता है, उसे दूसरा प्रेरित करता है 'देवदत्त को भेजता है'—यह हेतु-अर्थ का निदर्शन है, उसे भी सामर्थ्य दिखाने के वश से कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। अन्यथा यदि वह स्वयं ही जाता है, तो वहाँ प्रेरक के व्यापार की क्या आवश्यकता? जो नहीं कर रहा है उसे बलपूर्वक कराना, जैसे 'पत्थर उठवाता है' आदि सिद्ध नहीं होगा। เอตฺถ ปน यहाँ फिर— ‘‘กตฺตา’’ติ วตฺตเต. "कर्ता" की अनुवृत्ति होती है। ๒๙๓. โย กาเรติ ส เหตุ. २९३. जो करवाता है, वह 'हेतु' है। โย กตฺตารํ กาเรติ, โส เหตุสญฺโญ โหติ, กตฺตา จาติ เหตุกตฺตุสญฺญา. जो कर्ता से कार्य करवाता है, वह 'हेतु' संज्ञा वाला होता है, और कर्ता होने से 'हेतुकर्ता' संज्ञा होती है। โย ปน ปรสฺส กฺริยํ ปฏิจฺจ กมฺมภูโตปิ สุกรตฺตา สยเมว สิชฺฌนฺโต วิย โหติ, โส กมฺมกตฺตา นาม, ยถา – สยํ กรียเต กโฏ, สยเมว ปจฺจเต โอทโนติ. और जो दूसरे की क्रिया की अपेक्षा रखते हुए कर्मभूत होने पर भी, सुकर (आसान) होने के कारण स्वयं सिद्ध होने वाले के समान होता है, वह 'कम्मकर्ता' (कर्मकर्ता) कहलाता है। जैसे—'चटाई स्वयं बनाई जा रही है', 'भात अपने आप पक रहा है'। วุตฺตญฺจ और कहा गया है— ‘‘อตฺตปฺปธาโน กิริยํ, โย นิพฺพตฺเตติ การโก; อปฺปยุตฺโต ปยุตฺโต วา, ส กตฺตาติ ปวุจฺจติ. "जो कारक स्वयं प्रधान होकर क्रिया को निष्पन्न करता है, चाहे वह (दूसरे द्वारा) प्रेरित हो या न हो, वह 'कर्ता' कहा जाता है।" เหตุกตฺตาติ กถิโต,กตฺตุโน โย ปโยชโก; กมฺมกตฺตาติ สุกโร,กมฺมภูโต กถียเต’’ติ. "जो कर्ता का प्रयोजक (प्रेरक) है, वह 'हेतुकर्ता' कहा गया है; और जो कर्मभूत होने पर भी सुकर होने से (स्वयं सिद्ध होता है), वह 'कम्मकर्ता' कहा जाता है।" นนุ จ ‘‘สํโยโค ชายเต’’ติอาทีสุ กถํ ปุเร อสโต ชนนกฺริยาย กตฺตุภาโวสิยาติ? วุจฺจเต – โลกสงฺเกตสิทฺโธ หิ สทฺทปฺปโยโค, อวิชฺชมานมฺปิ หิ โลโก สทฺทาภิเธยฺยตาย วิชฺชมานํ วิย คเหตฺวา โวหรติ[Pg.147], วิกปฺปพุทฺธิคหิตากาโรเยว หิ สทฺเทนาภิธียเต, น ตุ วตฺถุสภาโว, อญฺญถา สุตมยญาเณนปิ ปจฺจกฺเขน วิย วตฺถุสภาวสจฺฉิกรณปฺปสงฺโค จ มุสาวาท กุทิฏฺฐิวาทาทีนมภาวปฺปสงฺโค จ สิยา, ตสฺมา พุทฺธิปริกปฺปิตปญฺญตฺติวเสนปิ สทฺทปฺปวตฺติ โหตีติ อสโต สํโยคาทิสฺสปิ โหเตว ชนนกฺริยาย กตฺตุการกตาติ. प्रश्न: 'संयोग उत्पन्न होता है' आदि में, पहले से अविद्यमान (असत्) का जन्म-क्रिया में कर्तृत्व कैसे हो सकता है? उत्तर: कहा जाता है—शब्द का प्रयोग लोक-संकेत से सिद्ध होता है। लोक अविद्यमान वस्तु को भी शब्द द्वारा अभिधेय होने के कारण विद्यमान की तरह ग्रहण करके व्यवहार करता है। विकल्प-बुद्धि द्वारा ग्रहण किया गया आकार ही शब्द द्वारा कहा जाता है, न कि वस्तु का वास्तविक स्वभाव। अन्यथा श्रुतमय ज्ञान से भी प्रत्यक्ष की तरह वस्तु-स्वभाव के साक्षात्कार का प्रसंग आ जाएगा, और मृषावाद (झूठ), कुदृष्टिवाद आदि के अभाव का प्रसंग आ जाएगा। इसलिए बुद्धि द्वारा कल्पित प्रज्ञप्ति के वश से भी शब्द की प्रवृत्ति होती है, अतः अविद्यमान संयोग आदि का भी जन्म-क्रिया में कर्ता-कारक होना संभव है। ยถาห जैसा कि कहा गया है— ‘‘โวหารวิสโย สทฺโท, เนกนฺตปรมตฺถิโก; พุทฺธิสงฺกปฺปิโต อตฺโถ, ตสฺสตฺโถติ ปวุจฺจติ. "शब्द व्यवहार का विषय है, वह एकांततः परमार्थिक नहीं है। बुद्धि द्वारा संकल्पित अर्थ ही उसका अर्थ कहा जाता है।" พุทฺธิยา คหิตตฺตา หิ, สํโยโค ชายเต อิติ; สํโยโค วิชฺชมาโนว, กตฺตา ภวติ ชาติยา’’ติ. "बुद्धि द्वारा ग्रहण किए जाने के कारण ही 'संयोग उत्पन्न होता है'—ऐसा (कहा जाता है)। संयोग विद्यमान की तरह ही उत्पत्ति क्रिया का कर्ता होता है।" ตตฺร ตติยา ชิเนน เทสิโต ธมฺโม, พุทฺเธน ชิโต มาโร, อหินา ทฏฺโฐ นโร, พุทฺเธน โพธิโต โลโก, สทฺเธหิ การิโต วิหาโร. वहाँ तृतीया (के उदाहरण)—जिन (बुद्ध) द्वारा धर्म देशित किया गया, बुद्ध द्वारा मार जीता गया, साँप द्वारा मनुष्य डसा गया, बुद्ध द्वारा लोक को बोधित किया गया, श्रद्धावानों द्वारा विहार बनवाया गया। อภิหิเต น ภวติ. กฏํ กโรติ เทวทตฺโต, กาเรติ วา. अभिहित (कहे गए) में नहीं होती है। (जैसे) देवदत्त चटाई बनाता है, या बनवाता है। อิตฺถมฺภูตสฺส ลกฺขเณ – สา ภินฺเนน สีเสน ปคฺฆรนฺเตน โลหิเตน ปฏิวิสฺสกานํ อุชฺฌาเปสิ, อูนปญฺจพนฺธเนน ปตฺเตน อญฺญํ นวํ ปตฺตํ เจตาเปยฺย, ติทณฺฑเกน ปริพฺพาชกมทฺทกฺขิ. 'इत्थंभूत' (इस प्रकार के लक्षण) के अर्थ में - उसने फटे हुए सिर से बहते हुए खून के साथ पड़ोसियों को परेशान किया, पाँच से कम टाँकों वाले पात्र के बदले दूसरा नया पात्र मँगवाया, उसने त्रिदण्ड से परिव्राजक को देखा। อปวคฺเค – เอกาเหเนว พาราณสึ ปายาสิ, นวหิ มาเสหิ วิหารํ นิฏฺฐาเปสิ, โยชเนน อธีตํ พฺยากรณํ, กฺริยาปวคฺโคติ กฺริยาย อาสุํ ปรินิฏฺฐาปนํ. 'अपवर्ग' (कार्य की समाप्ति) के अर्थ में - एक ही दिन में वाराणसी पहुँच गया, नौ महीनों में विहार का निर्माण पूरा किया, एक योजन (चलते हुए) व्याकरण पढ़ लिया; क्रियापवर्ग का अर्थ है क्रिया की शीघ्र समाप्ति। ปุพฺพาทิโยเค [Pg.148]– มาเสน ปุพฺโพ, ปิตรา สทิโส, มาตรา สโม, กหาปเณน อูโน, ธเนน วิกโล, อสินา กลโห, อาจาเรน นิปุโณ, วาจาย นิปุโณ, คุเฬน มิสฺสกํ, ติเลน มิสฺสกํ, วาจาย สขิโล, มณินา อตฺโถ, ธเนน อตฺโถ, ปิตรา ตุลฺโย. 'पूर्व' आदि के योग में - महीने भर पहले, पिता के सदृश, माता के समान, एक कार्षापण कम, धन से रहित, तलवार से कलह, आचरण में निपुण, वाणी में निपुण, गुड़ से मिश्रित, तिल से मिश्रित, वाणी में मधुर, मणि की आवश्यकता, धन की आवश्यकता, पिता के तुल्य। กาลทฺธาเนสุ – มาเสน ภุญฺชติ, โยชเนน คจฺฉติ. काल (समय) और अध्व (मार्ग) के अर्थ में - महीने भर खाता है, एक योजन तक जाता है। ปจฺจตฺเต – อตฺตนาว อตฺตานํ สมฺมนฺนติ. 'प्रत्यात्म' (स्वयं) के अर्थ में - वह स्वयं ही स्वयं को सम्मत करता है। กมฺมตฺเถ – ติเลหิ เขตฺเต วปติ. 'कर्म' के अर्थ में - खेत में तिल बोता है। ปญฺจมิยตฺเถ – สุมุตฺตา มยํ เตน มหาสมเณน. 'पंचमी' के अर्थ में - हम उस महाश्रमण से भली-भाँति मुक्त हैं। ๒๙๖. สหาทิโยเค จ. २९६. और 'सह' आदि के योग में। สห สทฺธึ สมํ นานา วินา อลํ กิมิจฺเจวมาทีหิ โยเค ลิงฺคมฺหา ตติยาวิภตฺติ โหติ, จสทฺเทน สหตฺเถปิ. सह, सद्धिं, समं, नाना, विना, अलं, किम् इत्यादि के योग में प्रातिपदिक से तृतीया विभक्ति होती है, और 'च' शब्द से 'सह' के अर्थ में भी। ตตฺถ สหสทฺเทน โยโค กฺริยา คุณ ทพฺพ สมวาเย สมฺภวติ. ยถา – วิตกฺเกน สห วตฺตติ, ปุตฺเตน สห ถูโล, อนฺเตวาสิกสทฺธิวิหาริเกหิ สห อาจริยุปชฺฌายานํ ลาโภ, นิสีทิ ภควา สทฺธึ ภิกฺขุสงฺเฆน, สหสฺเสน สมํ มิตา, สพฺเพหิ เม ปิเยหิ มนาเปหิ นานาภาโว วินาภาโว, สงฺโฆ วินาปิ คคฺเคน อุโปสถํ กเรยฺย, อลํ เต อิธ วาเสน, กึ เม เอเกน ติณฺเณน, ปุริเสน ถามทสฺสินา, กึ เต ชฏาหิ ทุมฺเมธ, กึ เต อชินสาฏิยา. वहाँ 'सह' शब्द का योग क्रिया, गुण और द्रव्य के समवाय (संबंध) में संभव है। जैसे - वितर्क के साथ रहता है, पुत्र के साथ स्थूल (मोटा), अन्तेवासी और सार्धविहारी के साथ आचार्य और उपाध्याय का लाभ, भगवान भिक्षु संघ के साथ बैठे, हजार के समान मापा गया, मेरे सभी प्रिय और मनभावन जनों से नानाभाव (पृथकता) और विनाशभाव है, संघ गग्ग के बिना भी उपोसथ करे, तुम्हारा यहाँ रहने से क्या लाभ (बस करो), मुझे अकेले पार हुए शक्ति देखने वाले पुरुष से क्या प्रयोजन, हे दुर्बुद्धि! तेरी जटाओं से क्या लाभ, तेरी मृगचर्म की चादर से क्या लाभ। สหตฺเถ [Pg.149]– เทวทตฺโต ราชคหํ ปาวิสิ โกกาลิเกน ปจฺฉาสมเณน, ทุกฺโข พาเลหิ สํวาโส. 'सह' के अर्थ में - देवदत्त ने कोकालिक रूपी पश्चात्-श्रमण के साथ राजगृह में प्रवेश किया, मूर्खों के साथ निवास दुखद है। ๒๙๗. เหตฺวตฺเถ จ. २९७. और 'हेतु' के अर्थ में भी। โยคคฺคหณมิหานุวตฺตเต, เหตฺวตฺเถ, เหตฺวตฺถปฺปโยเค จ ลิงฺคมฺหา ตติยาวิภตฺติ โหติ. यहाँ 'योग' ग्रहण की अनुवृत्ति होती है, हेतु के अर्थ में और हेतु अर्थ के प्रयोग में प्रातिपदिक से तृतीया विभक्ति होती है। กิสฺมิญฺจิ ผเล ทิฏฺฐสามตฺถิยํ การณํ เหตุ, โสเยว อตฺโถ, ตสฺมึ เหตฺวตฺเถ, อนฺเนน วสติ, ธมฺเมน วสติ, วิชฺชาย วสติ. किसी फल में जिसकी सामर्थ्य देखी गई हो, वह कारण 'हेतु' है, वही अर्थ है; उस हेतु के अर्थ में - अन्न के कारण रहता है, धर्म के कारण रहता है, विद्या के कारण रहता है। น ชจฺจาวสโล โหติ,น ชจฺจา โหติ พฺราหฺมโณ; กมฺมุนา วสโล โหติ,กมฺมุนา โหติ พฺราหฺมโณ. न जन्म से कोई वृषल (नीच) होता है, न जन्म से कोई ब्राह्मण होता है; कर्म से ही वृषल होता है, कर्म से ही ब्राह्मण होता है। ทาเนน โภควา, อาจาเรน กุลี. दान से भोगवान (धनी) होता है, आचरण से कुलीन होता है। เกน ปาณิ กามทโท, เกน ปาณิ มธุสฺสโว; เกน เต พฺรหฺมจริเยน, ปุญฺญํ ปาณิมฺหิ อิชฺฌติ. किस कारण से हाथ इच्छित वस्तु देने वाला है, किस कारण से हाथ से मधु बहता है? तुम्हारे किस ब्रह्मचर्य के कारण हाथ में पुण्य फलीभूत हो रहा है? เหตฺวตฺถปฺปโยเค – เกน นิมิตฺเตน, เกน ปโยชเนน, เกนฏฺเฐน, เกน เหตุนา วสติ. हेतु अर्थ के प्रयोग में - किस निमित्त से, किस प्रयोजन से, किस अर्थ से, किस हेतु से रहता है। ๒๙๘. สตฺตมฺยตฺเถ จ. २९८. और 'सप्तमी' के अर्थ में भी। สตฺตมฺยตฺเถ จ ลิงฺคมฺหา ตติยาวิภตฺติ โหติ. और सप्तमी के अर्थ में भी प्रातिपदिक से तृतीया विभक्ति होती है। กาลทฺธานทิสาเทสาทีสุ จายํ. เตน สมเยน, เตน กาเลน, กาเลน ธมฺมสฺสวณํ, โส โว มมจฺจเยน สตฺถา, มาเสน ภุญฺชติ, โยชเนน ธาวติ. ปุรตฺถิเมน ธตรฏฺโฐ, ทกฺขิเณน วิรูฬฺหโก, ปจฺฉิเมน วิรูปกฺโข, อุตฺตเรน [Pg.150] กสิวนฺโต ชโนฆมปเรน จ, เยน ภควา เตนุปสงฺกมิ อิจฺจาทิ. यह काल, अध्व (मार्ग), दिशा, देश आदि के विषय में होता है। उस समय में, उस काल में, समय पर धर्म-श्रवण, वह मेरे बाद तुम्हारा शास्ता होगा, महीने भर में खाता है, योजन भर दौड़ता है। पूर्व दिशा में धृतराष्ट्र, दक्षिण में विरूढ़क, पश्चिम में विरूपाक्ष, उत्तर में कुबेर और दूसरी ओर जनसमूह है, जहाँ भगवान थे वहाँ पहुँचा, इत्यादि। ๒๙๙. เยนงฺควิกาโร. २९९. जिस अंग से विकार (हो)। เยน พฺยาธิมตา องฺเคน องฺคิโน วิกาโร ลกฺขียเต, ตตฺถ ตติยาวิภตฺติ โหติ. เอตฺถ จ องฺคมสฺส อตฺถีติ องฺคํ, สรีรํ. อกฺขินา กาโณ, หตฺเถน กุณี, ปาเทน ขญฺโช, ปิฏฺฐิยา ขุชฺโช. जिस व्याधिग्रस्त अंग से अंगी (शरीरधारी) का विकार लक्षित होता है, वहाँ तृतीया विभक्ति होती है। यहाँ 'अंग' का अर्थ है जिसका अंग हो, अर्थात् शरीर। आँख से काना, हाथ से लूला, पैर से लंगड़ा, पीठ से कुबड़ा। ๓๐๐. วิเสสเน จ. ३००. और 'विशेषण' में भी। วิเสสียติ วิเสสิตพฺพํ อเนนาติ วิเสสนํ, โคตฺตาทิ. ตสฺมึ โคตฺตนามชาติสิปฺปวโยคุณสงฺขาเต วิเสสนตฺเถ ตติยาวิภตฺติ โหติ, จสทฺเทน ปกติอาทีหิ จ. โคตฺเตน โคตโม นาโถ. जिससे विशेषित किया जाए वह विशेषण है, जैसे गोत्र आदि। उस गोत्र, नाम, जाति, शिल्प, आयु, गुण के रूप में कहे गए विशेषण के अर्थ में तृतीया विभक्ति होती है, और 'च' शब्द से 'प्रकृति' आदि के योग में भी। गोत्र से नाथ गौतम हैं। สาริปุตฺโตติ นาเมน, วิสฺสุโต ปญฺญวา จ โส; ชาติยา ขตฺติโย พุทฺโธ, โลเก อปฺปฏิปุคฺคโล. नाम से वे सारिपुत्र हैं, वे विख्यात और प्रज्ञावान हैं; जाति से बुद्ध क्षत्रिय हैं, जो लोक में अद्वितीय पुरुष हैं। ตทหุ ปพฺพชิโต สนฺโต, ชาติยา สตฺตวสฺสิโก; โสปิ มํ อนุสาเสยฺย, สมฺปฏิจฺฉามิ มตฺถเก. उस दिन प्रव्रजित होते हुए, जन्म से सात वर्ष के; यदि वे भी मुझे अनुशासित करें, तो मैं उसे सिर झुकाकर स्वीकार करूँगा। สิปฺเปน นฬกาโร โส, เอกูนตึโส วยสา, วิชฺชาย สาธุ, ปญฺญาย สาธุ, ตปสา อุตฺตโม, สุวณฺเณน อภิรูโป. शिल्प से वह टोकरी बनाने वाला (नलकार) है, आयु से उनतीस वर्ष का, विद्या से साधु (अच्छा), प्रज्ञा से साधु, तप से उत्तम, वर्ण (रंग) से अत्यंत सुंदर। ปกติอาทีสุ – ปกติยา อภิรูโป, เยภุยฺเยน มตฺติกา, สเมน ธาวติ, วิสเมน ธาวติ, ทฺวิโทเณน ธญฺญํ กิณาติ, สหสฺเสน อสฺสเก กิณาติ อิจฺจาทิ. प्रकृति आदि के अर्थ में - स्वभाव से सुंदर, प्रायः मिट्टी, समतल पर दौड़ता है, विषम (ऊबड़-खाबड़) पर दौड़ता है, दो द्रोण से अनाज खरीदता है, हजार से घोड़ों को खरीदता है, इत्यादि। กสฺมึ อตฺเถ จตุตฺถี? किस अर्थ में चतुर्थी (विभक्ति) होती है? ๓๐๑. สมฺปทาเน [Pg.151] จตุตฺถี. ३०१. सम्प्रदान में चतुर्थी (विभक्ति होती है)। สมฺปทานการเก ลิงฺคมฺหา จตุตฺถีวิภตฺติ โหติ. सम्प्रदान कारक में प्रातिपदिक (लिंग) से चतुर्थी विभक्ति होती है। กิญฺจ สมฺปทานํ? और सम्प्रदान क्या है? ๓๐๒. ยสฺส ทาตุกาโม โรจเต ธารยเต วา ตํ สมฺปทานํ. ३०२. जिसे देने की इच्छा हो, जिसे अच्छा लगे, या जो (ऋण) धारण करे, वह सम्प्रदान है। ยสฺส วา ทาตุกาโม, ยสฺส วา โรจเต, ยสฺส วา ธารยเต, ตํ การกํ สมฺปทานสญฺญํ โหติ. สมฺมา ปทียเต อสฺสาติ สมฺปทานํ, ปฏิคฺคาหโก. अथवा जिसे देने की इच्छा हो, जिसे अच्छा लगे, या जो धारण करे, वह कारक सम्प्रदान संज्ञक होता है। 'सम्यक् रूप से जिसे दिया जाता है' वह सम्प्रदान है, अर्थात् प्रतिग्राहक (प्राप्त करने वाला)। ตํ ปน ติวิธํ ทิยฺยมานสฺสานิวารณชฺเฌสนานุมติวเสน. ยถา – พุทฺธสฺส ปุปฺผํ ยชติ, โพธิรุกฺขสฺส ชลํ ททาติ. อชฺเฌสเน – ยาจกานํ ธนํ ททาติ. อนุมติยํ – ภิกฺขูนํ ทานํ เทติ. वह (सम्प्रदान) दी जाने वाली वस्तु के अनिवारण (न रोकना), अध्येषण (प्रार्थना) और अनुमति के भेद से तीन प्रकार का है। जैसे - बुद्ध के लिए पुष्प अर्पित करता है, बोधिवृक्ष को जल देता है। अध्येषण में - याचकों को धन देता है। अनुमति में - भिक्षुओं को दान देता है। ยถาห जैसा कि कहा गया है— ‘‘อนิรากรณาราธ-นาพฺภนุญฺญวเสน หิ; สมฺปทานํ ติธา วุตฺตํ, รุกฺข ยาจก ภิกฺขโว’’ติ. “अनिवारण, आराधन (प्रार्थना) और अभ्यनुज्ञा (अनुमति) के वश से सम्प्रदान तीन प्रकार का कहा गया है—वृक्ष, याचक और भिक्षु।” ทาตุกาโมติ กึ? รญฺโญ ทณฺฑํ ททาติ. 'देने की इच्छा' क्यों कहा? (ताकि यहाँ न हो:) राजा को दण्ड देता है। โรจนาทีสุ ปน – สมณสฺส โรจเต สจฺจํ, มายสฺมนฺตานมฺปิ สงฺฆเภโท รุจฺจิตฺถ, ยสฺสายสฺมโต ขมติ, เทวทตฺตสฺส สุวณฺณจฺฉตฺตํ ธารยเต ยญฺญทตฺโต. रोचन आदि के अर्थ में—श्रमण को सत्य अच्छा लगता है, आयुष्मानों को भी संघ-भेद अच्छा लगा, जिस आयुष्मान को क्षमा (पसंद) हो, यज्ञदत्त देवदत्त का स्वर्ण-छत्र धारण करता है (अर्थात् देवदत्त का ऋणी है)। ‘‘สมฺปทานํ, วา’’ติ จ วตฺตเต. 'सम्प्रदान' और 'वा' (विकल्प से) की अनुवृत्ति होती है। ๓๐๓. สิลาฆ หนุ ฐา สป ธาร ปิห กุธ ทุหิ สฺสาสูย ราธิกฺข ปจฺจาสุณ อนุปติคิณปุพฺพกตฺตาโรจนตฺถตทตฺถ ตุมตฺถาลมตฺถ มญฺญานาทรปฺปาณินิ คตฺยตฺถกมฺมนิ อาสิสตฺถ สมฺมุติ ภิยฺยสตฺตมฺยตฺเถสุ จ. ३०३. श्लाघ्, ह्नु, स्था, शप्, धृ, स्पृह्, क्रुध्, द्रुह्, ईर्ष्य, असूय, राध्, ईक्ष्, प्रति-आ-श्रु, अनु-प्रति-गृ के पूर्व कर्ता, आरोचनार्थक, तदर्थक, तुमर्थक, अलमर्थक, अनादर अर्थ में 'मन्' धातु के प्रयोग में अप्राणी वाचक में, गत्यर्थक धातुओं के कर्म में, आशीरर्थक, सम्मति, भूयस् और सप्तमी के अर्थ में (चतुर्थी होती है)। จตุปฺปทมิทํ[Pg.152]. สิลาฆ กตฺถเน, หนุ อปนยเน, ฐา คตินิวตฺติมฺหิ, สป อกฺโกเส, ธร ธารเณ, ปิห อิจฺฉายํ อิจฺเจเตสํ ธาตูนํ ปโยเค, กุธ โกเป, ทุห ชิฆํสายํ, อิสฺส อิสฺสายํ, อุสูย โทสาวิกรเณ อิจฺเจเตสํ ตทตฺถวาจีนญฺจ ธาตูนํ ปโยเค จ ราธ หึสาสํราเธสุ, อิกฺข ทสฺสนงฺเกสูติ อิเมสํ ปโยเค จ ปติ อาปุพฺพสฺส สุ สวเณติ อิมสฺส จ อนุปติปุพฺพสฺส เคสทฺเทติ อิมสฺส จ ปุพฺพกตฺตา จ อาโรจนตฺถปฺปโยเค, ตทตฺเถ, ตุมตฺเถ, อลมตฺถปฺปโยเค จ มญฺญติปฺปโยเค อนาทเร อปฺปาณินิ จ คตฺยตฺถานํ กมฺมนิ จ อาสิสตฺถปฺปโยเค จ สมฺมุติ ภิยฺยปฺปโยเคสุ จ สตฺตมฺยตฺเถ จาติ ตํ กมฺมาทิการกํ สมฺปทานสญฺญํ โหติ, จสทฺทคฺคหเณน ปหิณติกปฺปติ ปโหติ อุปมาญฺชลิกรณ ผาสุ อตฺถเสยฺยปฺปภุติโยเค จ ปุเร วิย จตุตฺถี. यह चार पदों वाला (सूत्र) है। श्लाघ् - प्रशंसा में, ह्नु - छिपाने में, स्था - गति की निवृत्ति में, शप् - कोसने (गाली देने) में, धृ - धारण करने में, स्पृह् - इच्छा करने में, इन धातुओं के प्रयोग में; क्रुध् - क्रोध में, द्रुह् - द्रोह में, ईर्ष्य - ईर्ष्या में, असूय - दोष प्रकट करने में, इन धातुओं और इनके समान अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में; राध् - हिंसा और संराधन में, ईक्ष् - दर्शन और चिह्न में, इन धातुओं के प्रयोग में; 'प्रति' और 'आ' उपसर्ग पूर्वक 'श्रु' (सुनना) धातु के प्रयोग में; 'अनु' और 'प्रति' उपसर्ग पूर्वक 'गृ' (शब्द करना) धातु के प्रयोग में; पूर्व कर्ता और आरोचनार्थक प्रयोग में; तदर्थ में; तुमर्थ में; अलमर्थक प्रयोग में; अनादर अर्थ में 'मन्' धातु के प्रयोग में अप्राणी वाचक में; गत्यर्थक धातुओं के कर्म में; आशीरर्थक प्रयोग में; सम्मति और भूयस् के प्रयोग में; और सप्तमी के अर्थ में; वह कर्मादि कारक सम्प्रदान संज्ञक होता है। 'च' शब्द के ग्रहण से 'पहिणति', 'कप्पति', 'पहोति', उपमा, अञ्जलिकर्म, फासु, अर्थ, शय्या आदि के योग में भी पहले की तरह चतुर्थी होती है। สิลาฆาทิปฺปโยเค ตาว – พุทฺธสฺส สิลาฆเต. อุปชฺฌายสฺส สิลาฆเต, โถเมตีติ อตฺโถ. श्लाघ् आदि के प्रयोग में—बुद्ध की श्लाघा (प्रशंसा) करता है। उपाध्याय की श्लाघा करता है, अर्थात् स्तुति करता है। หนุเต มยฺหเมว, หนุเต ตุยฺหเมว, อปลปตีติ อตฺโถ. मुझसे ही छिपाता है, तुझसे ही छिपाता है, अर्थात् अपलाप (इनकार) करता है। อุปติฏฺเฐยฺย สกฺยปุตฺตานํ วฑฺฒกี, เอตฺถ จ อุปฏฺฐานํ นาม อุปคมนํ. ภิกฺขุสฺส ภุญฺชมานสฺส ปานีเยน วา วิธูปเนน วา อุปติฏฺเฐยฺย. बढ़ई शाक्यपुत्रों (भिक्षुओं) की सेवा में उपस्थित हो, यहाँ 'उपस्थान' का अर्थ 'पास जाना' है। भोजन करते हुए भिक्षु की पानी से या पंखे से सेवा करे। ตุยฺหํ สปเต, มยฺหํ สปเต, เอตฺถ จ สปนํ นาม สจฺจกรณํ. तुझे शपथ देता है, मुझे शपथ देता है, यहाँ 'शपन' का अर्थ 'सत्य करना' (शपथ लेना) है। ธารยติปฺปโยเค ธนิโกเยว สมฺปทานํ, สุวณฺณํ เต ธารยเต, อิณํ ธารยตีติ อตฺโถ. ตสฺส รญฺโญ มยํ นาคํ ธารยาม. 'धारेति' के प्रयोग में उत्तमर्ण (कर्ज देने वाला) ही सम्प्रदान है; वह तेरा स्वर्ण धारण करता है, अर्थात् ऋण धारण करता है। हम उस राजा का हाथी धारण करते हैं। ปิหปฺปโยเค [Pg.153] อิจฺฉิโตเยว, เทวาปิ ตสฺส ปิหยนฺติ ตาทิโน, เทวาปิ เตสํ ปิหยนฺติ, สมฺพุทฺธานํ สตีมตํ, ปตฺเถนฺตีติ อตฺโถ. 'स्पृह्' के प्रयोग में जो इच्छित है (वही सम्प्रदान है); देवता भी उस तादी (अर्हत्) की स्पृहा (इच्छा) करते हैं; देवता भी उन स्मृतिवान बुद्धों की स्पृहा करते हैं, अर्थात् चाहत करते हैं। โกธาทิอตฺถานํ ปโยเค ยํ ปติ โกโป, ตสฺส กุชฺฌ มหาวีร, ยทิหํ ตสฺส กุปฺเปยฺยํ. क्रोध आदि अर्थों के प्रयोग में जिसके प्रति कोप हो (वह सम्प्रदान है); हे महावीर! उस पर क्रोध करें; यदि मैं उस पर क्रोध करूँ। ทุหยติ ทิสานํ เมโฆ, โย มิตฺตานํ น ทุพฺภติ. मेघ दिशाओं के प्रति द्रोह करता है; जो मित्रों के प्रति द्रोह नहीं करता। ติตฺถิยา อิสฺสนฺติ สมณานํ. तीर्थिक श्रमणों से ईर्ष्या करते हैं। ทุชฺชนา คุณวนฺตานํ อุสูยนฺติ, กา อุสูยา วิชานตํ. दुर्जन गुणवानों के प्रति असूया (दोषारोपण) करते हैं; जानने वालों के लिए असूया क्या? ราธิกฺขปฺปโยเค ยสฺส วิปุจฺฉนํ กมฺมวิขฺยาปนตฺถํ, วาธิการโต ทุติยา จ. อาราโธ เม รญฺโญ, รญฺโญ อปรชฺฌติ, ราชานํ วา อปรชฺฌติ, กฺยาหํ อยฺยานํ อปรชฺฌามิ, กฺยาหํ อยฺเย อปรชฺฌามิ วา. राध् और ईक्ष् के प्रयोग में जिससे कर्म के स्पष्टीकरण के लिए पूछा जाए (वह सम्प्रदान है), और 'वा' के अधिकार से द्वितीया भी होती है। राजा के प्रति मेरा संराधन (अपराध) है; राजा के प्रति अपराध करता है, या राजा का अपराध करता है; क्या मैं आर्यों के प्रति अपराध करता हूँ, या क्या मैं आर्यों का अपराध करता हूँ। อายสฺมโต อุปาลิตฺเถรสฺส อุปสมฺปทาเปกฺโข อุปติสฺโส, อายสฺมนฺตํ วา. उपतिस्स आयुष्मान उपालि स्थविर से उपसम्पदा की अपेक्षा रखता है, अथवा आयुष्मान से (द्वितीया)। ปจฺจาสุณ อนุปติคิณานํ ปุพฺพกตฺตา จ สุโณติสฺส ธาตุสฺส ปจฺจาโยเค, คิณสฺส จ อนุปติโยเค ปุพฺพสฺส กมฺมุโน โย กตฺตา, โส สมฺปทานสญฺโญ โหติ. ยถา – ภควา ภิกฺขู เอตทโวจ, เอตฺถ ‘‘ภิกฺขู’’ติ อกถิตกมฺมํ, ‘‘เอต’’นฺติ กถิตกมฺมํ, ปุพฺพสฺส วจนกมฺมสฺส กตฺตา ภควา. ภิกฺขู ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ, อาสุณนฺติ พุทฺธสฺส ภิกฺขู, ตถา ภิกฺขุ ชนํ ธมฺมํ สาเวติ, ตสฺส ภิกฺขุโน ชโน อนุคิณาติ, ตสฺส ภิกฺขุโน ชโน ปติคิณาติ, สาธุการทานาทินา ตํ อุสฺสาหยตีติ อตฺโถ. 'प्रति-आ-श्रु' और 'अनु-प्रति-गृ' के प्रयोग में, 'श्रु' धातु के 'प्रति' योग में और 'गृ' धातु के 'अनु-प्रति' योग में, पूर्व कर्म का जो कर्ता है, वह सम्प्रदान संज्ञक होता है। जैसे - भगवान ने भिक्षुओं से यह कहा, यहाँ 'भिक्षु' अकथित कर्म है, 'यह' कथित कर्म है, पूर्व वचन-कर्म का कर्ता भगवान हैं। भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया (प्रतिश्रवण किया), भिक्षु बुद्ध को सुनते हैं (स्वीकार करते हैं), वैसे ही भिक्षु लोगों को धर्म सुनाता है, उस भिक्षु को लोग अनुगृणन (प्रोत्साहित) करते हैं, उस भिक्षु को लोग प्रतिगृणन करते हैं, अर्थात् साधुवाद आदि देकर उसे उत्साहित करते हैं। โย วเทติ ส กตฺตาติ, วุตฺตํ กมฺมนฺติ วุจฺจติ; โย ปฏิคฺคาหโก ตสฺส, สมฺปทานํ วิชานิยาติ. “जो बोलता है वह कर्ता है, जो कहा गया वह कर्म कहा जाता है; उसका जो प्रतिग्राहक (स्वीकार करने वाला) है, उसे सम्प्रदान जानना चाहिए।” อาโรจนตฺถปฺปโยเค [Pg.154] ยสฺส อาโรเจติ, ตํ สมฺปทานํ. อาโรจยามิ โว ภิกฺขเว, ปฏิเวทยามิ โว ภิกฺขเว, อามนฺตยามิ เต มหาราช, อามนฺต โข ตํ คจฺฉามาติ วา. เอตฺถ จ อาโรจนสทฺทสฺส กถนปฺปการตฺถตฺตา เทสนตฺถาทิปฺปโยเคปิ จตุตฺถี. ธมฺมํ โว เทเสสฺสามิ, เทเสตุ ภนฺเต ภควา ธมฺมํ ภิกฺขูนํ, ยถา โน ภควา พฺยากเรยฺย, นิรุตฺตึ เต ปวกฺขามิ อิจฺจาทิ. आरोचनार्थक (बताने के अर्थ वाली) धातुओं के प्रयोग में जिसे बताया जाता है, वह सम्प्रदान है। “भिक्षुओं! मैं तुम्हें सूचित करता हूँ”, “भिक्षुओं! मैं तुम्हें प्रतिवेदित करता हूँ”, “महाराज! मैं आपको आमंत्रित (सम्बोधित) करता हूँ”, अथवा “हाँ, मैं तुम्हें (कहकर) जाता हूँ”। यहाँ 'आरोचन' शब्द का अर्थ 'कहने का प्रकार' होने से देशना आदि के प्रयोग में भी चतुर्थी होती है। “मैं तुम्हें धर्म का उपदेश दूँगा”, “भन्ते! भगवान भिक्षुओं को धर्म का उपदेश दें”, “जैसे भगवान हमें व्याख्या करके बताएँ”, “मैं तुम्हें निरुक्ति कहूँगा” इत्यादि। ตทตฺเถ สมฺปทานสญฺญา, จตุตฺถี จ. तदर्थ (उसके प्रयोजन के लिए) में सम्प्रदान संज्ञा और चतुर्थी विभक्ति होती है। ‘‘อโต, วา’’ติ จ วตฺตเต. 'अतः' और 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๓๐๔. อาย จตุตฺเถกวจนสฺส ตุ. ३०४. चतुर्थी एकवचन के लिए 'आय' (प्रत्यय) होता है। อการนฺตโต ลิงฺคมฺหา ปรสฺส จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทโส โหติ วา, สรโลปาทิ. अकारान्त प्रातिपदिक (लिंग) से परे चतुर्थी एकवचन के स्थान पर 'आय' आदेश विकल्प से होता है, (फिर) स्वर-लोप आदि (कार्य होते हैं)। พุทฺธสฺสตฺถาย ธมฺมสฺสตฺถาย สงฺฆสฺสตฺถาย ชีวิตํ ปริจฺจชามิ, ปิณฺฑปาตํ ปฏิเสวามิ เนว ทวาย น มทาย น มณฺฑนาย น วิภูสนาย, อูนสฺส ปาริปูริยา, อตฺถาย หิตาย สุขาย สํวตฺตติ. बुद्ध के अर्थ के लिए, धम्म के अर्थ के लिए, संघ के अर्थ के लिए मैं जीवन का परित्याग करता हूँ; मैं पिण्डपात का सेवन न तो क्रीड़ा के लिए, न मद के लिए, न मण्डन (सजावट) के लिए और न ही विभूषण के लिए करता हूँ; (बल्कि) न्यूनता की परिपूर्ति के लिए; (यह) अर्थ, हित और सुख के लिए संवर्तित (प्रवृत्त) होता है। ตุมตฺเถ – โลกานุกมฺปาย, โลกมนุกมฺปิตุนฺติ อตฺโถ. ตถา ผาสุวิหาราย. 'तुम्' (तुमुन्) प्रत्यय के अर्थ में - 'लोकानुकम्पाय' (लोक पर अनुकम्पा के लिए), इसका अर्थ है 'लोक पर अनुकम्पा करने के लिए'। उसी प्रकार 'फासुविहाराय' (सुखपूर्वक विहार के लिए)। อลํสทฺทสฺส อตฺถา อรหปฏิกฺเขปา. อรหตฺเถ – อลํ เม รชฺชํ, อลํ ภิกฺขุ ปตฺตสฺส, อกฺขธุตฺโต ปุริสปุคฺคโล นาลํ ทารภรณาย, อลํ มลฺโล มลฺลสฺส, อรหติ มลฺโล มลฺลสฺส. 'अलम्' शब्द के अर्थ 'योग्यता' (अर्ह) और 'निषेध' (प्रतिषेध) हैं। योग्यता के अर्थ में - 'मेरे लिए राज्य पर्याप्त है', 'भिक्षु पात्र के योग्य है', 'जुआरी पुरुष पत्नी के भरण-पोषण के योग्य नहीं है', 'मल्ल (पहलवान) मल्ल के लिए पर्याप्त (बराबर) है', 'मल्ल मल्ल के योग्य है'। ปฏิกฺเขเป [Pg.155]– อลํ เต อิธ วาเสน, อลํ เม หิรญฺญสุวณฺเณน, กึ เม เอเกน ติณฺเณน, กึ เต ชฏาหิ ทุมฺเมธ, กึ เตตฺถ จตุมฏฺฐสฺส. निषेध के अर्थ में - 'तुम्हारा यहाँ रहने से बस (निषेध) हो', 'मुझे सुवर्ण-चाँदी की आवश्यकता नहीं (बस) है', 'मेरे अकेले पार होने से क्या लाभ?', 'हे दुर्बुद्धि! तेरी जटाओं से क्या लाभ?', 'यहाँ चार शुद्धियों (चतुमट्ठ) से क्या प्रयोजन?'। มญฺญติปฺปโยเค อนาทเร อปฺปาณินิ กมฺมนิเยว – กฏฺฐสฺส ตุวํ มญฺเญ, กฬิงฺครสฺส ตุวํ มญฺเญ, ชีวิตํ ติณายปิ น มญฺญมาโน. 'मञ्ञति' (मानना) के प्रयोग में, अनादर (तिरस्कार) अर्थ में, अप्राणी (जड़) कर्म में ही (चतुर्थी होती है) - 'मैं तुझे काष्ठ (लकड़ी) के समान मानता हूँ', 'मैं तुझे कलिङ्गर (लकड़ी के टुकड़े) के समान मानता हूँ', 'जीवन को तिनके के समान भी न मानते हुए'। อนาทเรติ กึ? สุวณฺณํ ตํ มญฺเญ. อปฺปาณินีติ กึ? คทฺรภํ ตุวํ มญฺเญ. 'अनादर में' ऐसा क्यों कहा? (उत्तर:) 'मैं उसे सुवर्ण मानता हूँ' (यहाँ अनादर नहीं है)। 'अप्राणी में' ऐसा क्यों कहा? (उत्तर:) 'मैं तुझे गधा मानता हूँ' (यहाँ प्राणी है)। คตฺยตฺถกมฺมนิ วาธิการโต ทุติยา จ. อปฺโป สคฺคาย คจฺฉติ, อปฺโป สคฺคํ คจฺฉติ, นิพฺพานาย วชนฺติยา, มูลาย ปฏิกสฺเสยฺย, มูลํ ปฏิกสฺเสยฺย. गत्यर्थक धातुओं के कर्म में 'वा' के अधिकार से द्वितीया भी होती है। 'थोड़े ही स्वर्ग को जाते हैं' (सग्गाय - चतुर्थी), 'थोड़े ही स्वर्ग को जाते हैं' (सग्गं - द्वितीया), 'निर्वाण की ओर जाते हुए', 'जड़ की ओर खींचना चाहिए' (मूलाय - चतुर्थी), 'जड़ की ओर खींचना चाहिए' (मूलं - द्वितीया)। อาสีสนตฺเถ อายุภทฺทกุสลาทิโยเคเยว, อายสฺมโต ทีฆายุ โหตุ, ‘‘โตติตา สสฺมึนาสู’’ติ นฺตุสฺส สวิภตฺติสฺส โต อาเทโส. ภทฺทํ ภวโต โหตุ, กุสลํ ภวโต โหตุ, อนามยํ ภวโต โหตุ, สุขํ ภวโต โหตุ, อตฺถํ ภวโต โหตุ, หิตํ ภวโต โหตุ, สฺวาคตํ ภวโต โหตุ, โสตฺถิ โหตุ สพฺพสตฺตานํ. आशीर्वाद के अर्थ में आयु, भद्र, कुशल आदि के योग में ही (चतुर्थी होती है) - 'आयुष्मान् दीर्घायु हों', यहाँ 'तोतिता सस्मिंनासू' सूत्र से विभक्ति सहित 'न्तु' के स्थान पर 'तो' आदेश हुआ है। 'आपका कल्याण (भद्र) हो', 'आपका कुशल हो', 'आपका आरोग्य हो', 'आपका सुख हो', 'आपका अर्थ (प्रयोजन) सिद्ध हो', 'आपका हित हो', 'आपका स्वागत हो', 'सभी प्राणियों का कल्याण (स्वस्ति) हो'। สมฺมุติปฺปโยเค – สาธุ สมฺมุติ เม ตสฺส ภควโต ทสฺสนาย. सम्मति (सहमति) के प्रयोग में - 'उन भगवान् के दर्शन के लिए मेरी भली सम्मति है'। ภิยฺยปฺปโยเค ภิยฺโยโส มตฺตาย. 'भिय्यो' (अधिक) के प्रयोग में - 'मात्रा से अधिक' (भिय्योसो मत्ताय)। สตฺตมิยตฺเถ อาวิกรณ ปาตุภวนาทิโยเค – ตุยฺหญฺจสฺส อาวิกโรมิ, ตสฺส เม สกฺโก ปาตุรโหสิ. सप्तमी के अर्थ में, 'आविष्करण' (प्रकट करना) और 'प्रादुर्भाव' (प्रकट होना) आदि के योग में - 'मैं तुम्हारे प्रति (इसे) प्रकट करता हूँ', 'मेरे समक्ष शक्र (इन्द्र) प्रकट हुए'। จสทฺทคฺคหเณน [Pg.156] ปหิณาทิกฺริยาโยเค, ผาสุอาทินามปโยเค จ – ตสฺส ปหิเณยฺย, ภิกฺขูนํ ทูตํ ปาเหสิ, กปฺปติ สมณานํ อาโยโค, เอกสฺส ทินฺนํ ทฺวินฺนํ ติณฺณํ ปโหติ, อุปมํ เต กริสฺสามิ, อญฺชลึ เต ปคฺคณฺหามิ. ตถา ตสฺส ผาสุ โหติ, โลกสฺสตฺโถ, มณินา เม อตฺโถ, เสยฺโย เม อตฺโถ อิจฺจาทิ. 'च' शब्द के ग्रहण से 'पहिण' (भेजना) आदि क्रियाओं के योग में, और 'फासु' आदि नामों के प्रयोग में भी (चतुर्थी होती है) - 'उसे भेजना चाहिए', 'भिक्षुओं के पास दूत भेजा', 'श्रमणों के लिए उद्योग कल्पित (उचित) है', 'एक को दिया हुआ दो या तीन के लिए पर्याप्त होता है', 'मैं तुम्हारे लिए उपमा दूँगा', 'मैं तुम्हारे प्रति अञ्जलि (प्रणाम) करता हूँ'। उसी प्रकार 'उसे सुख होता है', 'लोक का अर्थ (कल्याण)', 'मुझे मणि से प्रयोजन है', 'मुझे श्रेय (कल्याण) से प्रयोजन है' इत्यादि। ‘‘จตุตฺถี’’ติ วตฺตเต. 'चतुर्थी' (विभक्ति) की अनुवृत्ति आती है। ๓๐๕. นโมโยคาทีสฺวปิ จ. ३०५. 'नमो' आदि के योग में भी (चतुर्थी होती है)। นโมสทฺทโยเค, โสตฺถิสฺวาคตาทีหิ จ โยเค ลิงฺคมฺหา จตุตฺถีวิภตฺติ โหติ. นโม เต พุทฺธ วีรตฺถุ, นโม กโรหิ นาคสฺส, นมตฺถุ พุทฺธานํ, นมตฺถุ โพธิยา, โสตฺถิ ปชานํ, สฺวาคตํ เต มหาราช, อโถ เต อทุราคตํ. 'नमो' शब्द के योग में, और 'स्वस्ति', 'स्वागत' आदि के योग में प्रातिपदिक से चतुर्थी विभक्ति होती है। 'हे बुद्ध! आपको नमस्कार हो, आप वीर हों', 'नाग को नमस्कार करो', 'बुद्धों को नमस्कार हो', 'बोधि को नमस्कार हो', 'प्रजा का कल्याण हो', 'हे महाराज! आपका स्वागत है', 'और आपका स्वागत (अदुरागत) है'। ‘‘กาเล, ภวิสฺสตี’’ติ จ วตฺตเต. 'काले' (समय में) और 'भविष्यति' (भविष्य काल में) की अनुवृत्ति आती है। ๓๐๖. ภาววาจิมฺหิ จตุตฺถี. ३०६. भाववाची (क्रियावाची) शब्द में चतुर्थी होती है। ภาววาจิมฺหิ จตุตฺถีวิภตฺติ โหติ ภวิสฺสติกาเล. ภวนํ ภาโว. ปจฺจิสฺสเต, ปจนํ วา ปาโก, ปากาย วชติ, ปจิตุํ คจฺฉตีติ อตฺโถ. เอวํ โภคาย วชติ อิจฺจาทิ. भविष्य काल में भाववाची शब्द में चतुर्थी विभक्ति होती है। 'भवन' (होना/क्रिया) ही भाव है। 'पकाएगा', पकाना ही 'पाक' है, 'पाक के लिए जाता है' (पाकाय वजति), इसका अर्थ है 'पकाने के लिए जाता है'। इसी प्रकार 'भोग के लिए जाता है' इत्यादि। กสฺมึ อตฺเถ ปญฺจมี? किस अर्थ में पञ्चमी (विभक्ति) होती है? ๓๐๗. อปาทาเน ปญฺจมี. ३०७. अपादान में पञ्चमी होती है। กิมปาทานํ? अपादान क्या है? ๓๐๘. ยสฺมาทเปติ [Pg.157] ภยมาทตฺเต วา ตทปาทานํ. ३०८. जिससे कोई अलग होता है या भय प्राप्त करता है, वह 'अपादान' है। ยสฺมา วา อวธิโต อเปติ, ยสฺมา วา ภยเหตุโต ภยํ ภวติ, ยสฺมา วา อกฺขาตารา วิชฺชํ อาททาติ, ตํ การกํ อปาทานสญฺญํ โหติ. อปเนตฺวา อิโต อาททาตีติ อปาทานํ. अथवा जिस अवधि (सीमा) से कोई अलग होता है, या जिस भय के हेतु से भय होता है, या जिस व्याख्याता (गुरु) से विद्या ग्रहण करता है, वह कारक 'अपादान' संज्ञक होता है। 'यहाँ से हटाकर ग्रहण करता है' इसलिए यह अपादान है। ตํ ปน ติวิธํ วิสยเภเทน นิทฺทิฏฺฐวิสยํ, อุปาตฺตวิสยํ, อนุเมยฺยวิสยญฺจาติ. वह (अपादान) विषय-भेद से तीन प्रकार का है - निर्दिष्टविषय, उपात्तविषय और अनुमेयविषय। อปาทานสญฺญาวิสยสฺส กฺริยาวิเสสสฺส นิทฺทิฏฺฐตฺตา นิทฺทิฏฺฐวิสยํ. ยถา – คามา อเปนฺติ มุนโย, นครา นิคฺคโต ราชา. अपादान संज्ञा के विषयभूत क्रिया-विशेष के निर्दिष्ट होने से 'निर्दिष्टविषय' (अपादान) होता है। जैसे - 'मुनि गाँव से दूर जाते हैं', 'राजा नगर से निकला'। เอตฺถ จ ‘‘ปาปา จิตฺตํ นิวารเย, ปาปา นิวาเรนฺตี’’ติอาทีสุ ยทิปิ กายสํโยคปุพฺพกาปคมนํ นตฺถิ, ตถาปิ จิตฺตสํโยคปุพฺพกสฺส อปคมนสฺส สมฺภวโต อิมินา จ อปาทานสญฺญา. और यहाँ 'पाप से चित्त को रोके', 'पाप से रोकते हैं' आदि में यद्यपि शारीरिक संयोगपूर्वक अलग होना नहीं है, तथापि चित्त के संयोगपूर्वक अलग होने की सम्भावना होने से इससे 'अपादान' संज्ञा होती है। ยตฺถ ปน อปคมนกฺริยํ อุปาตฺตํ อชฺฌาหฏํ วิสยํ กตฺวา ปวตฺตติ, ตํ อุปาตฺตวิสยํ. ยถา – วลาหกา วิชฺโชตเต วิชฺชุ, กุสูลโต ปจตีติ. เอตฺถ จ ‘‘วลาหกา นิกฺขมฺม, กุสูลโต อปเนตฺวา’’ติ จ ปุพฺพกฺริยา อชฺฌาหรียติ. जहाँ अलग होने की क्रिया उपात्त (गृहीत) या अध्याहृत विषय को बनाकर प्रवृत्त होती है, वह 'उपात्तविषय' है। जैसे - 'बादल से बिजली चमकती है', 'कोठार (कुसूल) से (अनाज लेकर) पकाता है'। यहाँ 'बादल से निकलकर' और 'कोठार से निकालकर' - इन पूर्व क्रियाओं का अध्याहार किया जाता है। อนุเมยฺยวิสยํ ยถา – มาถุรา ปาฏลิปุตฺตเกหิ อภิรูปา. เอตฺถ หิ เกนจิ คุเณน อุกฺกํสียนฺตีติ อนุเมยฺโยว กฺริยาวิเสโส. อิธ ปน ทูรนฺติกาทิสุตฺเต วิภตฺตคฺคหเณน อปาทานสญฺญา. 'अनुमेयविषय' जैसे - 'मथुरावासी पाटलिपुत्रवासियों से अधिक सुन्दर हैं'। यहाँ किसी गुण के कारण 'उत्कृष्ट होना' - यह क्रिया-विशेष केवल अनुमेय (अनुमान करने योग्य) ही है। यहाँ 'दूर-अन्तिक' आदि सूत्र में विभक्ति-ग्रहण से 'अपादान' संज्ञा होती है। วุตฺตญฺจ और कहा गया है— ‘‘นิทฺทิฏฺฐวิสยํ กิญฺจิ, อุปาตฺตวิสยํ ตถา; อนุเมยฺยวิสยญฺจาติ, อปาทานํ ติธา มต’’นฺติ. ‘कुछ निर्दिष्ट-विषय, वैसे ही उपात्त-विषय और अनुमेय-विषय—इस प्रकार अपादान तीन प्रकार का माना गया है’। ตเทว [Pg.158] จลาจลวเสน ทุวิธมฺปิ โหติ. वही चल और अचल के भेद से दो प्रकार का भी होता है। จลํ ยถา – ธาวตา หตฺถิมฺหา ปติโต องฺกุสธารี. चल जैसे—दौड़ते हुए हाथी से गिरा हुआ अंकुशधारी। อจลํ ยถา – ปพฺพตา โอตรนฺติ วนจรา. अचल जैसे—पर्वत से उतरते हैं वनवासी। ภยเหตุมฺหิ – โจรา ภยํ ชายติ, ตณฺหาย ชายตี ภยํ, ปาปโต อุตฺตสติ, อกฺขาตริ – อุปชฺฌายา สิกฺขํ คณฺหาติ, อาจริยมฺหา อธีเต, อาจริยโต สุณาติ. भय के हेतु में—चोर से भय उत्पन्न होता है, तृष्णा से भय उत्पन्न होता है, पाप से डरता है; व्याख्याता (शिक्षक) के अर्थ में—उपाध्याय से शिक्षा ग्रहण करता है, आचार्य से पढ़ता है, आचार्य से सुनता है। ‘‘อปาทาน’’นฺติ อธิกาโร. ‘अपादान’ यह अधिकार (सूत्र) है। ๓๐๙. ธาตุนามานมุปสคฺคโยคาทีสฺวปิ จ. ३०९. धातुओं और नामों के उपसर्ग योग आदि में भी। ธาตโว จ นามานิ จ ธาตุนามานิ, เตสํ อวิหิตลกฺขณานํ ธาตุนามานํ ปโยเค, อุปสคฺคโยเค จ อาทิสทฺเทน นิปาตโยเค จ ตํยุตฺตํ การกํ อปาทานสญฺญํ โหติ. धातु और नाम 'धातु-नाम' हैं, उन अविहित-लक्षण वाले धातु-नामों के प्रयोग में, उपसर्ग के योग में और 'आदि' शब्द से निपात के योग में, उनसे युक्त कारक 'अपादान' संज्ञक होता है। ธาตุปฺปโยเค ตาว – ปราชิโยเค โย อสยฺโห, ปภูโยเค ปภโว, ชนิโยเค ชายมานสฺส ปกติ จ. ยถา – พุทฺธสฺมา ปราเชนฺติ อญฺญติตฺถิยา. หิมวตา ปภวนฺติ ปญฺจ มหานทิโย, อนวตตฺตมฺหา มหาสรา ปภวนฺติ, อจิรวติยา ปภวนฺติ กุนฺนทิโย. กามโต ชายตี โสโก, ยสฺมา โส ชายเต คินิ, อุรสฺมา ชาโต ปุตฺโต, กมฺมโต ชาตํ อินฺทฺริยํ. धातु के प्रयोग में पहले—पराजय के योग में जो असह्य है, प्रभव (उत्पत्ति स्थान) के योग में प्रभव, और जनन (उत्पत्ति) के योग में उत्पन्न होने वाले का मूल कारण। जैसे—बुद्ध से अन्यतीर्थिक पराजित होते हैं। हिमालय से पाँच महानदियाँ निकलती हैं, अनवतप्त महासरोवर से निकलती हैं, अचिरावती से छोटी नदियाँ निकलती हैं। काम से शोक उत्पन्न होता है, जिससे वह अग्नि उत्पन्न होती है, हृदय से उत्पन्न पुत्र, कर्म से उत्पन्न इन्द्रिय। นามปฺปโยเค อญฺญตฺถิตราทีหิ ยุตฺเต – นาญฺญตฺร ทุกฺขา สมฺโภติ, นาญฺญํ ทุกฺขา นิรุชฺฌติ, ตโต อญฺเญน กมฺเมน, ตโต อิตรํ, อุภโต สุชาโต ปุตฺโต อิจฺจาทิ. नाम के प्रयोग में 'अन्य', 'इतर' आदि से युक्त होने पर—दुःख के बिना अन्य कुछ उत्पन्न नहीं होता, दुःख के बिना अन्य कुछ निरुद्ध नहीं होता, उससे अन्य कर्म से, उससे इतर, दोनों ओर से सुजात पुत्र इत्यादि। อุปสคฺคยุตฺเตสุ [Pg.159] อปปรีหิ วชฺชนตฺเถหิ โยเค, มริยาทาภิวิธิอตฺเถ อาโยเค ปตินา ปตินิธิปติทานตฺเถน โยเค จ. ยถา – อปสาลาย อายนฺติ วาณิชา, สาลํ วชฺเชตฺวาติ อตฺโถ. ตถา ปริปพฺพตา เทโว วสฺสติ, ปพฺพตํ วชฺเชตฺวาติ อตฺโถ. มริยาทายํ – อาปพฺพตา เขตฺตํ. อภิวิธิมฺหิ – อาพฺรหฺมโลกา สทฺโท อพฺภุคฺคจฺฉติ, พฺรหฺมโลกํ อภิพฺยาเปตฺวาติ อตฺโถ. ปตินิธิมฺหิ – พุทฺธสฺมา ปติ สาริปุตฺโต ธมฺมเทสนาย อาลปติ เตมาสํ. ปติทาเน – ฆตมสฺส เตลสฺมา ปติ ททาติ, กนกมสฺส หิรญฺญสฺมา ปติ ททาติ. उपसर्ग युक्त होने पर 'अप' और 'परि' के वर्जन (त्याग) अर्थ में योग होने पर, मर्यादा और अभिविधि अर्थ में 'आ' के योग में, और 'प्रति' के साथ प्रतिनिधि और प्रतिदान अर्थ में योग होने पर। जैसे—शाला को छोड़कर (अपशाला) व्यापारी आते हैं, 'शाला को छोड़कर' यह अर्थ है। वैसे ही पर्वत को छोड़कर (परिपर्वत) देव वर्षा करता है, 'पर्वत को छोड़कर' यह अर्थ है। मर्यादा में—पर्वत तक खेत। अभिविधि में—ब्रह्मलोक तक शब्द गूँजता है, 'ब्रह्मलोक को व्याप्त करके' यह अर्थ है। प्रतिनिधि में—बुद्ध के प्रतिनिधि के रूप में सारिपुत्र तीन महीने तक धर्मदेशना करते हैं। प्रतिदान में—उसे तेल के बदले घी देता है, उसे चाँदी के बदले सोना देता है। นิปาตยุตฺเตสุ ริเต นานา วินาทีหิ โยเค – ริเต สทฺธมฺมา กุโต สุขํ ลภติ. เต ภิกฺขู นานากุลา ปพฺพชิตา. วินา สทฺธมฺมา นตฺถญฺโญ โกจิ นาโถ โลเก วิชฺชติ. อริเยหิ ปุถเควายํ ชโน, ยาว พฺรหฺมโลกา สทฺโท อพฺภุคฺคจฺฉติ. निपात युक्त होने पर 'ऋते', 'नाना', 'विना' आदि के योग में—सद्धर्म के बिना सुख कहाँ से प्राप्त होता है? वे भिक्षु विभिन्न कुलों से प्रव्रजित हुए। सद्धर्म के बिना लोक में अन्य कोई नाथ (रक्षक) नहीं है। आर्यों से यह जन पृथक ही है, ब्रह्मलोक तक शब्द गूँजता है। อปิคฺคหเณน กมฺมาปาทานการกมชฺเฌปิ ปญฺจมี กาลทฺธาเนหิ, ปกฺขสฺมา วิชฺฌติ มิคํ ลุทฺทโก, อิโต ปกฺขสฺมา มิคํ วิชฺฌตีติ วุตฺตํ โหติ. เอวํ มาสสฺมา ภุญฺชติ โภชนํ, โกสา วิชฺฌติ กุญฺชรํ. 'अपि' के ग्रहण से कर्म और अपादान कारक के मध्य में भी काल और मार्गवाची शब्दों से पंचमी होती है; जैसे—शिकारी पक्ष (पखवाड़े) से मृग को मारता है, 'यहाँ से एक पक्ष में मृग को मारता है' यह कहा गया है। इसी प्रकार महीने से भोजन करता है, कोस से हाथी को मारता है। จสทฺทคฺคหเณน ปภุตฺยาทิอตฺเถ, ตทตฺถปฺปโยเค จ – ยโตหํ ภคินิ อริยาย ชาติยา ชาโต, ยโต สรามิ อตฺตานํ, ยโต ปตฺโตสฺมิ วิญฺญุตํ, ยตฺวาธิกรณเมนํ, ยโต ปภุติ, ยโต ปฏฺฐาย, ตโต ปฏฺฐาย อิจฺจาทิ. 'च' शब्द के ग्रहण से 'प्रभृति' आदि के अर्थ में और उस अर्थ के प्रयोग में भी—'हे बहन! जब से मैं आर्य जाति में उत्पन्न हुआ हूँ', 'जब से मैं स्वयं को याद करता हूँ', 'जब से मैं समझदार हुआ हूँ', 'जिस अधिकरण से यह', 'तब से लेकर', 'वहाँ से लेकर' इत्यादि। ๓๑๐. รกฺขณตฺถานมิจฺฉิตํ[Pg.160]. ३१०. रक्षा के अर्थ वाली (धातुओं) का इष्ट (अपादान होता है)। รกฺขณตฺถานํ ธาตูนํ ปโยเค ยํ อิจฺฉิตํ, ตํ การกํ อปาทานสญฺญํ โหติ, จการาธิการโต อนิจฺฉิตญฺจ. รกฺขณญฺเจตฺถ นิวารณํ, ตายนญฺจ. กาเก รกฺขนฺติ ตณฺฑุลา, ยวา ปฏิเสเธนฺติ คาโว. रक्षा के अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में जो इष्ट है, वह कारक 'अपादान' संज्ञक होता है, और 'च' कार के अधिकार से अनिष्ट भी। यहाँ रक्षा का अर्थ निवारण और त्राण (बचाना) है। चावलों से कौओं की रक्षा करते हैं, जौ से गायों को रोकते हैं। อนิจฺฉิตํ ยถา – ปาปา จิตฺตํ นิวารเย, ปาปานิวาเรนฺติ, ราชโต วา โจรโต วา อคฺคิโต วา อุทกโต วา นานาภยโต วา นานาโรคโต วา นานาอุปทฺทวโต วา อารกฺขํ คณฺหนฺตุ. अनिष्ट जैसे—पाप से चित्त को रोके, पाप से निवारण करते हैं; राजा से, या चोर से, या अग्नि से, या जल से, या विभिन्न भयों से, या विभिन्न रोगों से, या विभिन्न उपद्रवों से रक्षा करें। ‘‘อิจฺฉิต’’มิติ วตฺตเต. ‘इष्ट’ (शब्द) की अनुवृत्ति होती है। ๓๑๑. เยน วา’ทสฺสนํ. ३११. जिससे (स्वयं का) अदर्शन (छिपाना इष्ट हो)। เยน อทสฺสนมิจฺฉิตํ อนฺตรธายนฺเตน, ตํ การกํ อปาทานสญฺญํ โหติ วา, อนฺตรธาเนวายํ. อุปชฺฌายา อนฺตรธายติ สิสฺโส, นิลียตีติ อตฺโถ. มาตาปิตูหิ อนฺตรธายติ ปุตฺโต. अन्तर्धान (छिपते) हुए जिससे अदर्शन इष्ट हो, वह कारक विकल्प से 'अपादान' संज्ञक होता है, यह अन्तर्धान के विषय में ही है। उपाध्याय से शिष्य अन्तर्धान होता है (छिपता है), 'छिपता है' यह अर्थ है। माता-पिता से पुत्र अन्तर्धान होता है। วาติ กึ? เชตวเน อนฺตรหิโต. เยนาติ กึ? ยกฺโข ตตฺเถว อนฺตรธายติ. 'वा' (विकल्प) क्यों? 'जेतवन में अन्तर्हित हुआ'। 'जिससे' क्यों? 'यक्ष वहीं अन्तर्धान हो जाता है'। ๓๑๒. ทูรนฺติกทฺธกาลนิมฺมานตฺวาโลปทิสาโยควิภตฺตารปฺปโยค สุทฺธปฺปโมจน เหตุ วิวิตฺตปฺปมาณ ปุพฺพโยค พนฺธน คุณวจน ปญฺห กถนโถกากตฺตูสุ จ. ३१२. दूर, अन्तिक (निकट), मार्ग (अध्व), काल, निर्माण, 'त्वा' प्रत्यय का लोप, दिशा-योग, विभक्त (पृथक्करण), आरति (विरति) प्रयोग, शुद्ध अर्थ का प्रयोग, प्रमोचन (मुक्ति) अर्थ का प्रयोग, हेतु, विविक्त अर्थ का प्रयोग, प्रमाण, पूर्व-योग, बन्धन अर्थ का प्रयोग, गुणवाचक, प्रश्न, कथन, थोक (अल्प) अर्थ और अकर्ता में भी। ทูรตฺเถ, อนฺติกตฺเถ, อทฺธนิมฺมาเน, กาลนิมฺมาเน, ตฺวาโลเป, ทิสาโยเค, วิภตฺเต, อารติปฺปโยเค, สุทฺธตฺถปฺปโยเค, ปโมจนตฺถปฺปโยเค, เหตฺวตฺเถ, วิวิตฺตตฺถปฺปโยเค, ปมาณตฺเถ, ปุพฺพโยเค, พนฺธนตฺถปฺปโยเค, คุณวจเน[Pg.161], ปญฺเห, กถเน, โถกตฺเถ, อกตฺตริ จ ยทวธิภูตํ, เหตุกมฺมาทิภูตญฺจ, ตํ การกํ อปาทานสญฺญํ โหติ, จสทฺเทน ยถาโยคํ ทุติยา, ตติยา, ฉฏฺฐี จ. दूर अर्थ में, निकट अर्थ में, मार्ग-परिमाण में, काल-परिमाण में, 'त्वा' के लोप में, दिशा के योग में, विभाग में, विरति के प्रयोग में, शुद्ध अर्थ के प्रयोग में, मोक्ष अर्थ के प्रयोग में, हेतु अर्थ में, विविक्त अर्थ के प्रयोग में, प्रमाण अर्थ में, पूर्व के योग में, बन्धन अर्थ के प्रयोग में, गुणवाचक में, प्रश्न में, कथन में, अल्प अर्थ में और अकर्ता में जो अवधिभूत है, और हेतु-कर्म आदि भूत है, वह कारक 'अपादान' संज्ञक होता है, और 'च' शब्द से यथासंभव द्वितीया, तृतीया और षष्ठी भी होती है। เอตฺถ จ ทูรนฺติกญฺจ ทูรนฺติกตฺถญฺจาติ ทูรนฺติกนฺติ สรูเปกเสสํ กตฺวา วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, เตน ทูรนฺติกตฺถปฺปโยเค, ตทตฺเถ จ อปาทานสญฺโญ โหติ. यहाँ 'दूर और अन्तिक' तथा 'दूर और अन्तिक के अर्थ वाले'—इस प्रकार 'दूरान्तिक' को सरूपैकशेष करके कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए; उससे दूर और अन्तिक के प्रयोग में और उस अर्थ में 'अपादान' संज्ञा होती है। ทูรตฺถปฺปโยเค ตาว – กีวทูโร อิโต นฬการคาโม, ตโต หเว ทูรตรํ วทนฺติ, คามโต นาติทูเร. อารกา เต โมฆปุริสา อิมสฺมา ธมฺมวินยา, อารกา เตหิ ภควา. ทูรตฺเถ – ทูรโตว นมสฺสนฺติ, อทฺทส ทูรโตว อาคจฺฉนฺตํ. दूर अर्थ के प्रयोग में पहले—यहाँ से नलकार ग्राम कितनी दूर है? उससे निश्चय ही बहुत दूर कहते हैं, गाँव से बहुत दूर नहीं। वे मोघ पुरुष इस धर्म-विनय से दूर हैं, भगवान उनसे दूर हैं। दूर अर्थ में—दूर से ही नमस्कार करते हैं, दूर से ही आते हुए देखा। อนฺติกตฺถปฺปโยเค – อนฺติกํ คามา, อาสนฺนํ คามา, สมีปํ คามา, คามสฺส สมีปนฺติ อตฺโถ. निकट अर्थ के प्रयोग में—गाँव के निकट, गाँव के आसन्न, गाँव के समीप, 'गाँव के समीप' यह अर्थ है। ทุติยา, ตติยา จ, ทูรํ คามํ อาคโต, ทูเรน คาเมน อาคโต, ทูรโต คามา อาคโตติ อตฺโถ. ทูรํ คาเมน วา. อนฺติกํ คามํ อาคโต, อนฺติกํ คาเมน วา, อาสนฺนํ คามํ, อาสนฺนํ คาเมน วา อิจฺจาทิ. द्वितीया और तृतीया भी (होती है), जैसे 'दूरं गामं आगतो' (दूर गाँव को आया), 'दूरेन गामेन आगतो' (दूर गाँव से आया), 'दूरतो गामा आगतो' (दूर गाँव से आया) - यह अर्थ है। अथवा 'दूरं गामेन'। 'अन्तिकं गामं आगतो' (निकट गाँव को आया), अथवा 'अन्तिकं गामेन', 'आसन्नं गामं' (समीप गाँव को), अथवा 'आसन्नं गामेन' इत्यादि। อทฺธกาลนิมฺมาเน นิมฺมานํ นาม ปริมาณํ, ตสฺมึ คมฺยมาเน – อิโต มถุราย จตูสุ โยชเนสุ สงฺกสฺสํ, ราชคหโต ปญฺจจตฺตาลีสโยชนมตฺถเก สาวตฺถิ. मार्ग (अध्व) और काल के परिमाण (निर्मान) में, 'निर्मान' का अर्थ परिमाण है, उसके बोध होने पर - 'इतो मथुराय चतुसु योजनेसु संकस्सं' (यहाँ से मथुरा चार योजन पर संकस्य है), 'राजगहतो पञ्चचत्तालीसयोजनमत्थके सावत्थि' (राजगृह से पैंतालीस योजन की दूरी पर श्रावस्ती है)। กาลนิมฺมาเน – อิโต เอกนวุติกปฺปมตฺถเก วิปสฺสี ภควา โลเก อุทปาทิ, อิโต วสฺสสหสฺสจฺจเยน พุทฺโธ โลเก อุปฺปชฺชิสฺสติ. काल के परिमाण में - 'इतो एकनवुतिकप्पमत्थके विपस्सी भगवा लोके उदापादि' (यहाँ से इक्यानवे कल्प पूर्व लोक में विपस्सी भगवान उत्पन्न हुए), 'इतो वस्ससहस्सच्चयेन बुद्धो लोके उप्पज्जिस्सति' (यहाँ से एक हजार वर्ष बीतने पर लोक में बुद्ध उत्पन्न होंगे)। ตฺวาปจฺจยนฺตสฺส โลโป นาม ตทตฺถสมฺภเวปิ อวิชฺชมานตา, ตสฺมึ ตฺวาโลเป กมฺมาธิกรเณสุ – ปาสาทา สงฺกเมยฺย, ปาสาทํ อภิรุหิตฺวา สงฺกเมยฺยาติ อตฺโถ[Pg.162]. ตถา หตฺถิกฺขนฺธา สงฺกเมยฺย, อภิธมฺมา ปุจฺฉนฺติ, อภิธมฺมํ สุตฺวา วา, อภิธมฺมา กถยนฺติ, อภิธมฺมํ ปฐิตฺวา วา, อาสนา วุฏฺฐเหยฺย, อาสเน นิสีทิตฺวา วา. 'त्वा' प्रत्ययान्त का लोप होने पर, लोप का अर्थ है उस अर्थ के संभव होने पर भी शब्द का विद्यमान न होना, उस 'त्वा' के लोप होने पर कर्म और अधिकरण में (पञ्चमी होती है) - 'पासादा संकमेय्य' (प्रासाद से संक्रमण करे), इसका अर्थ है 'पासादं अभिरुहित्वा संकमेय्य' (प्रासाद पर चढ़कर संक्रमण करे)। उसी प्रकार 'हत्थिक्खन्धा संकमेय्य' (हाथी के कंधे से संक्रमण करे), 'अभिधम्मा पुच्छन्ति' (अभिधर्म से पूछते हैं) अथवा 'अभिधम्मं सुत्वा' (अभिधर्म सुनकर), 'अभिधम्मा कथयन्ति' (अभिधर्म से कहते हैं) अथवा 'अभिधम्मं पठित्वा' (अभिधर्म पढ़कर), 'आसना वुट्ठहेय्य' (आसन से उठे) अथवा 'आसने निसीदित्वा' (आसन पर बैठकर)। ทิสตฺถวาจีหิ โยเค, ทิสตฺเถ จ – อิโต สา ปุริมา ทิสา, อิโต สา ทกฺขิณา ทิสา, อิโต สา ปจฺฉิมา ทิสา, อิโต สา อุตฺตรา ทิสา, อวีจิโต อุปริภวคฺคา, อุทฺธํ ปาทตลา, อโธ เกสมตฺถกา อิจฺจาทิ. ทิสตฺเถ – ปุรตฺถิมโต ทกฺขิณโตติอาทิ. เอตฺถ ปน สตฺตมิยตฺเถ โตปจฺจโยปิ ภวิสฺสติ. दिशावाची शब्दों के योग में और दिशा के अर्थ में - 'इतो सा पुरिमा दिसा' (यहाँ से वह पूर्व दिशा है), 'इतो सा दक्खिणा दिसा' (यहाँ से वह दक्षिण दिशा है), 'इतो सा पच्छिमा दिसा' (यहाँ से वह पश्चिम दिशा है), 'इतो सा उत्तरा दिसा' (यहाँ से वह उत्तर दिशा है), 'अवीचितो उपरिभवग्गा' (अवीचि से ऊपर भवग्र तक), 'उद्धं पादतल्ला' (पैर के तलवों से ऊपर), 'अधो केसमत्थका' (केशों के मस्तक से नीचे) इत्यादि। दिशा के अर्थ में - 'पुरत्थिमतो', 'दक्खिणतो' इत्यादि। यहाँ सप्तमी के अर्थ में 'तो' प्रत्यय भी होता है। วิภตฺตํ นาม สยํ วิภตฺตสฺเสว ตทญฺญโต คุเณน วิภชนํ, ตสฺมึ วิภตฺเต – ยโต ปณีตตโร วา วิสิฏฺฐตโร วา นตฺถิ, อตฺตทนฺโต ตโต วรํ. กิญฺจาปิ ทานโต สีลเมว วรํ, ตโต มยา สุตา อสฺสุตเมว พหุตรํ, สีลเมว สุตา เสยฺโย. ฉฏฺฐี จ, ฉนฺนวุตีนํ ปาสณฺฑานํ ปวรํ ยทิทํ สุคตวินโย. 'विभक्त' का अर्थ है स्वयं विभक्त (अलग) किए हुए का ही उससे अन्य से गुण के द्वारा विभाजन करना, उस विभक्त के अर्थ में - 'यतो पणीततरो वा विसिट्ठतरो वा नत्थि' (जिससे श्रेष्ठतर या विशिष्टतर कोई नहीं है), 'अत्तदन्तो ततो वरं' (स्वयं को दमित करने वाला उससे श्रेष्ठ है)। 'किञ्चापि दानतो सीलमेव वरं' (यद्यपि दान से शील ही श्रेष्ठ है), 'ततो मया सुता अस्सुतमेव बहुतं' (उससे मेरे द्वारा सुने हुए की अपेक्षा न सुना हुआ ही बहुत अधिक है), 'सीलमेव सुता सेय्यो' (श्रुत से शील ही श्रेष्ठ है)। षष्ठी भी होती है, जैसे 'छन्नवुतीनं पासण्डानं पवरं यदिदं सुगतविनयो' (छियानवे पाखंडों में जो यह सुगत-विनय है, वह प्रवर/श्रेष्ठ है)। อารติปฺปโยโค นาม วิรมณตฺถสทฺทปฺปโยโค. ตตฺถ – อสทฺธมฺมา อารติ, วิรติ ปาปา, ปาณาติปาตา เวรมณี, อทินฺนาทานา ปฏิวิรโต, อปฺปฏิวิรโต มุสาวาทา. 'आरति-प्रयोग' का अर्थ है विरमण (निवृत्ति) अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग। वहाँ - 'अस्सधम्मा आरति' (असद्धर्म से आरति/विरति), 'विरति पापा' (पाप से विरति), 'पाणातिपाता वेरमणी' (प्राणातिपात से विरमि), 'अदिन्नादाना पटिविरतो' (अदत्तादान से प्रतिविरत), 'अप्पटिविरतो मुसावादा' (मृषावाद से अप्रतिविरत)। สุทฺธตฺถปฺปโยเค – โลภนีเยหิ ธมฺเมหิ สุทฺโธ อสํสฏฺโฐ, มาติโต จ ปิติโต จ สุทฺโธ อนุปกฺกุฏฺโฐ อครหิโต. शुद्ध अर्थ के प्रयोग में - 'लोभनीयेहि धम्मेहि सुद्धो असंसट्ठो' (लोभनीय धर्मों से शुद्ध, असंसृष्ट), 'मातितो च पितितो च सुद्धो अनुपक्कुट्ठो अगरहितो' (माता की ओर से और पिता की ओर से शुद्ध, अनिन्दित, अगर्हित)। ปโมจนตฺถปฺปโยเค [Pg.163]– ปริมุตฺโต ทุกฺขสฺมาติ วทามิ, มุตฺโต มารพนฺธนา, น เต มุจฺจนฺติ มจฺจุนา, มุตฺโตหํ สพฺพปาเสหิ. प्रमोचन (मुक्त होने) के अर्थ के प्रयोग में - 'परिमुत्तो दुक्खस्माति वदामि' (दुःख से परिमुक्त है, ऐसा मैं कहता हूँ), 'मुत्तो मारबन्धना' (मार के बंधन से मुक्त), 'न ते मुच्चन्ति मच्चुना' (वे मृत्यु से मुक्त नहीं होते), 'मुत्तोहं सब्बपासेहि' (मैं सब पाशों से मुक्त हूँ)। เหตฺวตฺเถ, สรูเปกเสสสฺส คหิตตฺตา เหตฺวตฺถปฺปโยเค จ สพฺพนามโต – กสฺมา นุ ตุมฺหํ ทหรา น มียเร, กสฺมา อิเธว มรณํ ภวิสฺสติ, กสฺมา เหตุนา, ยสฺมา จ กมฺมานิ กโรนฺติ, ยสฺมา ติห ภิกฺขเว, ตสฺมา ติห ภิกฺขเว เอวํ สิกฺขิตพฺพํ, ตสฺมา พุทฺโธสฺมิ พฺราหฺมณ, ยสฺมา การณา, ตสฺมา การณา, กึ การณา. ทุติยา, ฉฏฺฐี จ, กึ การณํ, ตํ กิสฺส เหตุ, กิสฺส ตุมฺเห กิลมถ. हेतु के अर्थ में, सरूपैकशेष के ग्रहण होने से और हेतु अर्थ के प्रयोग में सर्वनाम से (पञ्चमी होती है) - 'कस्मा नु तुम्हं दहरा न मीयरे' (किस कारण से तुम्हारे यहाँ युवा नहीं मरते?), 'कस्मा इधेव मरणं भविस्सति' (किस कारण यहीं मरण होगा?), 'कस्मा हेतुना' (किस हेतु से), 'यस्मा च कम्मानि करोन्ति' (और जिस कारण कर्म करते हैं), 'यस्मा तिह भिक्खवे' (जिस कारण तो भिक्षुओं), 'तस्मा तिह भिक्खवे एवं सिक्खितब्बं' (इसलिए तो भिक्षुओं ऐसा सीखना चाहिए), 'तस्मा बुद्धोस्मि ब्राह्मण' (इसलिए हे ब्राह्मण! मैं बुद्ध हूँ), 'यस्मा कारणा' (जिस कारण से), 'तस्मा कारणा' (उस कारण से), 'किं कारणा' (किस कारण से)। द्वितीया और षष्ठी भी होती है, जैसे 'किं कारणं' (क्या कारण), 'तं किस्स हेतु' (वह किस हेतु से), 'किस्स तुम्हे किलमथ' (किसलिए तुम थकते हो)। เกน เหตุนา, เกน การเณน, เยน มิเธกจฺเจ สตฺตา, เตน นิมิตฺเตน, เตน วุตฺตมิจฺจาทีสุ ‘‘เหตฺวตฺเถ จา’’ติ ตติยา. 'केन हेतुना' (किस हेतु से), 'केन कारणेन' (किस कारण से), 'येन मिधेकच्चे सत्ता' (जिससे यहाँ कुछ प्राणी), 'तेन निमित्तेन' (उस निमित्त से), 'तेन वुत्तं' (उसके द्वारा कहा गया) इत्यादि में 'हेत्वत्थे च' सूत्र से तृतीया होती है। วิวิตฺตํ นาม วิเวจนํ, ตทตฺถปฺปโยเค – วิวิตฺโต ปาปกา ธมฺมา, วิวิจฺเจว กาเมหิ, วิวิจฺจ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ. 'विविक्त' का अर्थ है विवेचन (पृथक् होना), उस अर्थ के प्रयोग में - 'विवित्तो पापका धम्मा' (पापमय धर्मों से विविक्त), 'विविच्चेव कामेहि' (कामों से विविक्त होकर ही), 'विविच्च अकुसलेहि धम्मेहि' (अकुशल धर्मों से विविक्त होकर)। ปมาณตฺเถ ตติยา จ, อายามโต จ วิตฺถารโต จ โยชนํ, คมฺภีรโต จ ปุถุลโต จ โยชนํ จนฺทภาคาย ปริมาณํ, ปริกฺเขปโต นวโยชนสตปริมาโณ มชฺฌิมปเทโส. परिमाण के अर्थ में तृतीया भी होती है, जैसे 'आयामतो च वित्थारतो च योजनं' (लम्बाई और चौड़ाई में एक योजन), 'गम्भीरतो च पुथुलतो च योजनं' (गहराई और विस्तार में एक योजन) यह चन्द्रभागा का परिमाण है, 'परिक्खेपतो नवयोजनसतपरिमाणो मज्झिमपदेसो' (घेरे में नौ सौ योजन परिमाण वाला मध्यदेश)। ทีฆโส นว วิทตฺถิโย สุคตวิทตฺถิยา ปมาณิกา กาเรตพฺพา. 'दीघसो' (लम्बाई में) सुगत-वितस्ति के प्रमाण की नौ वितस्तियाँ (चीवर) बनवानी चाहिए। เอตฺถ จ ‘‘สฺมาหิสฺมึน’’มิจฺจาทิโต ‘‘สฺมา’’ติ จ ‘‘โส, วา’’ติ จ วตฺตมาเน और यहाँ 'स्माहिस्मिंन' इत्यादि से 'स्मा' और 'सो, वा' की अनुवृत्ति होने पर। ๓๑๓. ทีโฆเรหิ[Pg.164]. ३१३. 'दीघोरेहि' (सूत्र)। ทีฆ โอรอิจฺเจเตติ สฺมาวจนสฺส โสอาเทโส โหติ วา. 'दीघ' और 'ओर' शब्दों से परे 'स्मा' विभक्ति का 'सो' आदेश विकल्प से होता है। ทีฆโส, ทีฆมฺหา วา, [โอรโส, โอรมฺหา วา] ตติยา จ, โยชนํ อายาเมน, โยชนํ วิตฺถาเรน, โยชนํ อุพฺเพเธน สาสปราสิ. 'दीघसो' (लम्बाई में), अथवा 'दीघम्हा', ['ओरसो', अथवा 'ओरम्हा']। तृतीया भी होती है, जैसे 'योजनं आयामेन' (लम्बाई में एक योजन), 'योजनं वित्थारेन' (चौड़ाई में एक योजन), 'योजनं उब्बेधेन' (ऊँचाई में एक योजन) सरसों की राशि। ปฐมตฺถวาจเกน ปุพฺพสทฺเทน โยโค ปุพฺพโยโค, เอตฺถ จ ปุพฺพคฺคหณํ อทิสตฺถวุตฺติโน ปุพฺพาทิคฺคหณสฺสุปลกฺขณนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, เตน ปราทิโยเคปิ. ยถา – ปุพฺเพว เม ภิกฺขเว สมฺโพธา, อิโต ปุพฺเพนาโหสิ, ตโต ปรํ ปจฺจนฺติมา ชนปทา, ธาตุลิงฺเคหิ ปรา ปจฺจยา, ตโต อปเรน สมเยน, ตโต อุตฺตริมฺปิ อิจฺจาทิ. प्रथम अर्थ के वाचक 'पुब्ब' शब्द के साथ योग 'पुब्बयोग' है, और यहाँ 'पुब्ब' का ग्रहण आदि अर्थ वाले 'पुब्बादि' के ग्रहण का उपलक्षण समझना चाहिए, जिससे 'पर' आदि के योग में भी (पञ्चमी होती है)। जैसे - 'पुब्बेव मे भिक्खवे सम्बोधा' (हे भिक्षुओं! मुझे सम्बोधि से पूर्व ही), 'इतो पुब्बेनाहोसि' (इससे पूर्व था), 'ततो परं पच्चन्तिमा जनपदा' (उसके बाद प्रत्यन्तिक जनपद), 'धातुलिङ्गेहि परा पच्चया' (धातु और लिंग से परे प्रत्यय), 'ततो अपरेन समयेन' (उसके बाद दूसरे समय में), 'ततो उत्तरिम्पि' (उससे आगे भी) इत्यादि। พนฺธนตฺถปฺปโยเค พนฺธนเหตุมฺหิ อิเณ ปญฺจมี, ตติยา จ โหติ, สตสฺมา พทฺโธ นโร รญฺญา, สเตน วา พทฺโธ นโร. बंधन अर्थ के प्रयोग में, बंधन के हेतुभूत ऋण में पञ्चमी और तृतीया होती है, जैसे 'सतस्मा बद्धो नरो रञ्ञा' (सौ के कारण राजा द्वारा मनुष्य बाँधा गया), अथवा 'सतेन वा बद्धो नरो'। ผลสาธนเหตุภูตสฺส คุณสฺส วจนํ คุณวจนํ, ตสฺมึ คุณวจเน ปญฺจมี, ตติยา จ, อิสฺสริยา ชนํ รกฺขติ ราชา, อิสฺสริเยน วา, สีลโต นํ ปสํสนฺติ, สีเลน วา, ปญฺญาย วิมุตฺติมโน อิจฺจาทิ. फल की सिद्धि में हेतुभूत गुण का कथन 'गुणवचन' है, उस गुणवचन में पञ्चमी और तृतीया होती है, जैसे 'इस्सरिया जनं रक्खति राजा' (ऐश्वर्य के कारण राजा लोगों की रक्षा करता है), अथवा 'इस्सरियेन वा', 'सीलतो नं पसंसन्ति' (शील के कारण उसकी प्रशंसा करते हैं), अथवा 'सीलेन वा', 'पञ्ञाय विमुत्तिमनो' (प्रज्ञा से विमुक्त मन वाला) इत्यादि। ปญฺหกถเนสุ – กุโตสิ ตฺวํ, กุโต ภวํ, ปาฏลิปุตฺตโต. เอตฺถ จ กถนํ นาม วิสฺสชฺชนํ. प्रश्नों के उत्तर (कथन) में - 'कुतोसि त्वं' (तुम कहाँ से हो?), 'कुतो भवं' (आप कहाँ से हैं?), 'पाटलिपुत्ततो' (पाटलिपुत्र से)। और यहाँ 'कथन' का अर्थ विसर्जन (उत्तर देना) है। โถกตฺเถ อสตฺววจเน กรเณ ตติยา จ, โถกา มุจฺจติ, โถเกน มุจฺจติ วา, อปฺปมตฺตกา มุจฺจติ, อปฺปมตฺตเกน วา, กิจฺฉา มุจฺจติ, กิจฺเฉน วา. 'थोक' (थोड़ा) अर्थ में, द्रव्यवाचक न होने पर, करण में तृतीया भी होती है, जैसे 'थोका मुच्चति' (थोड़े से मुक्त होता है), अथवा 'थोकेन मुच्चति', 'अप्पमत्तका मुच्चति' (अल्प मात्र से मुक्त होता है), अथवा 'अप्पमत्तकेन वा', 'किच्छा मुच्चति' (कठिनाई से मुक्त होता है), अथवा 'किच्छेन वा'। อกตฺตริ [Pg.165] อการเก ญาปกเหตุมฺหิ – กมฺมสฺส กตตฺตา อุปจิตตฺตา อุสฺสนฺนตฺตา วิปุลตฺตา อุปฺปนฺนํ โหติ จกฺขุวิญฺญาณ, น ตาวิทํ นามรูปํ อเหตุกํ สพฺพตฺถ สพฺพทา สพฺเพสญฺจ เอกสทิสภาวาปตฺติโต. अकर्त्ता और अकारक ज्ञापक हेतु में (पञ्चमी होती है) - 'कम्मस्स कतत्ता उपचितत्ता उस्सन्नत्ता विपुलत्ता उप्पन्नं होति चक्खुविञ्ञाणं' (कर्म के किए जाने से, संचित होने से, उत्कृष्ट होने से और विपुल होने से चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है), 'न ताविदं नामरूपं अहेतुकं सब्बत्थ सब्बदा सब्बेसञ्च एकसदिसभावापत्तितो' (यह नाम-रूप अहेतुक नहीं है, क्योंकि सब जगह, सब समय और सभी के लिए एक समान भाव की प्राप्ति हो जाएगी)। หุตฺวา อภาวโต นิจฺจา, อุทยพฺพยปีฬนา; ทุกฺขา อวสวตฺติตฺตา, อนตฺตาติ ติลกฺขณํ. होकर अभाव होने से 'अनित्य' (अनिच्चा), उदय और व्यय से पीड़ित होने के कारण 'दुःख' (दुक्खा), और वश में न रहने के कारण 'अनात्मा' (अनत्ता) - ये तीन लक्षण हैं। ‘‘ปญฺจมี’’ติ วตฺตเต. 'पञ्चमी' की अनुवृत्ति होती है। ๓๑๔. การณตฺเถ จ. ३१४. और कारण के अर्थ में। กโรติ อตฺตโน ผลนฺติ การณํ, การกเหตุ [ชนกเหตุ], ตสฺมึ การณตฺเถ จ ปญฺจมีวิภตฺติ โหติ, วิกปฺเปนายํ, เหตฺวตฺเถ ตติยาย จ วิหิตตฺตา, อนนุโพธา อปฺปฏิเวธา จตุนฺนํ อริยสจฺจานํ ยถาภูตํ อทสฺสนา เอวมิทํ ทีฆมทฺธานํ สนฺธาวิตํ สํสริตํ, อวิชฺชาปจฺจยา สงฺขารา, สงฺขารปจฺจยา วิญฺญาณํ, อวิชฺชาย ตฺเวว อเสสวิราคนิโรธา สงฺขารนิโรโธ, สงฺขารนิโรธา วิญฺญาณนิโรโธ, วิญฺญาณนิโรธา อิจฺจาทิ. जो अपने फल को उत्पन्न करता है वह 'कारण' है, कारक-हेतु [जनक-हेतु]। उस कारण के अर्थ में पञ्चमी विभक्ति होती है। यह विकल्प से है, क्योंकि हेतु के अर्थ में तृतीया विभक्ति का भी विधान है। जैसे— 'चार आर्यसत्यों के अननुबोध (न समझने), अप्रतिवेध (साक्षात्कार न करने) और यथाभूत दर्शन न होने से यह (संसार) इस प्रकार दीर्घ काल तक संधावित और संसरित हुआ', 'अविद्या के प्रत्यय (कारण) से संस्कार होते हैं', 'संस्कार के प्रत्यय से विज्ञान होता है', 'अविद्या के ही अशेष विराग-निरोध से संस्कार-निरोध होता है', 'संस्कार-निरोध से विज्ञान-निरोध होता है', 'विज्ञान-निरोध से' इत्यादि। กสฺมึ อตฺเถ ฉฏฺฐี? षष्ठी विभक्ति किस अर्थ में होती है? ๓๑๕. สามิสฺมึ ฉฏฺฐี. ३१५. स्वामी (स्वामी-भाव) के अर्थ में षष्ठी होती है। โก จ สามี? और स्वामी कौन है? ๓๑๖. ยสฺส วา ปริคฺคโห ตํ สามี. ३१६. अथवा जिसका परिग्रह (अधिकार) है, वह स्वामी है। ปริคฺคยฺหตีติ ปริคฺคโห, โย ยสฺส ปริคฺคโห อายตฺโต สมฺพนฺธี, ตํ ปติ โส อตฺโถ สามิสญฺโญ โหติ. วาคฺคหเณน สามิตพฺพ รุชาทิโยเคปิ. 'परिगृह्यते' (जो ग्रहण किया जाता है) वह परिग्रह है। जो जिसका परिग्रह, अधीन या सम्बन्धी है, उसके प्रति वह अर्थ 'स्वामी' संज्ञा वाला होता है। 'वा' शब्द के ग्रहण से स्वामित्व, रुजा (पीड़ा) आदि के योग में भी (षष्ठी होती है)। เอตฺถ [Pg.166] จ กฺริยาภิสมฺพนฺธาภาวา น การกตา สมฺภวติ. สามิภาโว หิ กฺริยาการกภาวสฺส ผลภาเวน คหิโต, ตถา หิ ‘‘รญฺโญ ปุริโส’’ติ วุตฺเต ยสฺมา ราชา ททาติ, ปุริโส จ ปติคฺคณฺหาติ, ตสฺมา ‘‘ราชปุริโส’’ติ วิญฺญายติ. เอวํ โย ยสฺส อายตฺโต เสวกาทิภาเวน วา ภณฺฑภาเวน วา สมีป สมูหาวยววิการ การิยอวตฺถา ชาติ คุณ กฺริยาทิวเสน วา, ตสฺส สพฺพสฺสาปิ โส สมฺพนฺธาธารภูโต วิเสสนฏฺฐานี อาคมีวเสน ติวิโธปิ อตฺโถ สามี นามาติ คเหตพฺโพ. यहाँ क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध न होने के कारण 'कारकता' सम्भव नहीं है। स्वामी-भाव वास्तव में क्रिया-कारक भाव के फल-भाव के रूप में ग्रहण किया जाता है। जैसे— 'राज्ञः पुरुषः' (राजा का पुरुष) कहने पर, चूँकि राजा देता है और पुरुष ग्रहण करता है, इसलिए 'राजपुरुष' ऐसा समझा जाता है। इस प्रकार जो जिसके अधीन है—चाहे सेवक आदि भाव से, वस्तु भाव से, अथवा समीप, समूह, अवयव, विकार, कार्य, अवस्था, जाति, गुण, क्रिया आदि के वश से—उस सबका वह सम्बन्ध का आधारभूत, विशेषण के स्थान पर स्थित, आगमी (आगम, स्थान, स्वामी) के भेद से तीन प्रकार का अर्थ भी 'स्वामी' नाम से ग्रहण करना चाहिए। วุตฺตญฺจ और कहा गया है— ‘‘กฺริยาการกสญฺชาโต,อสฺเสทํ ภาวเหตุโก; สมฺพนฺโธ นาม โส อตฺโถ,ตตฺถ ฉฏฺฐี วิธียเต. “क्रिया और कारक से उत्पन्न, 'इसका यह है' इस भाव का हेतुभूत जो अर्थ 'सम्बन्ध' कहलाता है, उसमें षष्ठी विभक्ति का विधान किया जाता है। ปารตนฺตฺยญฺหิ สมฺพนฺโธ,ตตฺถ ฉฏฺฐี ภเวติโต; อุปาธิฏฺฐานา คมิโต,น วิเสสฺยาทิโต ติโต’’ติ. परतन्त्रता ही सम्बन्ध है, वहाँ षष्ठी होती है; वह उपाधि (विशेषण), स्थान और आगम से (तीन प्रकार की) होती है, न कि विशेष्य आदि से।” วิเสสนโต ตาว – รญฺโญ ปุริโสติ, เอตฺถ จ ราชา ปุริสํ อญฺญสามิโต วิเสเสติ นิวตฺเตตีติ วิเสสนํ, ปุริโส เตน วิเสสียตีติ วิเสสิตพฺโพ, เอวํ สพฺพตฺถ วิเสสิตพฺพโยเค วิเสสนโตว ฉฏฺฐี. पहले विशेषण से— 'राज्ञः पुरुषः' (राजा का पुरुष), यहाँ राजा पुरुष को अन्य स्वामियों से विशेषित (अलग) करता है, इसलिए वह 'विशेषण' है; पुरुष उसके द्वारा विशेषित किया जाता है, इसलिए वह 'विशेष्य' (विशेषितव्य) है। इस प्रकार सर्वत्र विशेष्य के योग में विशेषण से ही षष्ठी होती है। ภณฺเฑน สมฺพนฺเธ – ปหูตํ เม ธนํ สกฺก, เอตสฺส ปฏิวีโส, ภิกฺขุสฺส ปตฺตจีวรํ. वस्तु (भाण्ड) के साथ सम्बन्ध में— 'हे शक्र! मेरा बहुत धन है' (पभूतं मे धनं सक्क), 'इसका हिस्सा' (एतस्स पटिीसो), 'भिक्षु का पात्र-चीवर' (भिक्खुस्स पत्तचीवरं)। สมีปสมฺพนฺเธ – อมฺพวนสฺส อวิทูเร, นิพฺพานสฺเสว สนฺติเก. समीप सम्बन्ध में— 'आम्रवन के पास' (अम्बवनस्स अविदूरे), 'निर्वाण के ही समीप' (निब्बानस्सेव सन्तिके)। สมูหสมฺพนฺเธ [Pg.167]– สุวณฺณสฺส ราสิ, ภิกฺขูนํ สมูโห. समूह सम्बन्ध में— 'सुवर्ण की राशि' (सुवण्णस्स रासि), 'भिक्षुओं का समूह' (भिक्खूनं समूहो)। อวยวสมฺพนฺเธ – มนุสฺสสฺเสว เต สีสํ, รุกฺขสฺส สาขา. अवयव (अंग) सम्बन्ध में— 'मनुष्य का ही तुम्हारा सिर' (मनुस्सस्सेव ते सीसं), 'वृक्ष की शाखा' (रुक्खस्स साखा)। วิการสมฺพนฺเธ – สุวณฺณสฺส วิกติ, ภฏฺฐธญฺญานํ สตฺตุ. विकार सम्बन्ध में— 'सुवर्ण का विकार' (सुवण्णस्स विकति), 'भुने हुए धान्य का सत्तू' (भट्ठधञ्ञानं सत्तू)। การิยสมฺพนฺเธ – ยวสฺส องฺกุโร, เมฆสฺส สทฺโท, ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, กมฺมานํ ผลํ วิปาโก. कार्य सम्बन्ध में— 'जौ का अंकुर' (यवस्स अङ्कुरो), 'मेघ का शब्द' (मेघस्स सद्दो), 'उसके बहुत पुत्र भी हैं' (पुत्तापि तस्स बहवो), 'कर्मों का फल विपाक है' (कम्मानं फलं विपाको)। อวตฺถาสมฺพนฺเธ – ขนฺธานํ ปาตุภาโว, ขนฺธานํ ชรา, ขนฺธานํ เภโท. अवस्था सम्बन्ध में— 'स्कन्धों का प्रादुर्भाव' (खन्धानं पातुभावो), 'स्कन्धों की जरा' (खन्धानं जरा), 'स्कन्धों का भेद' (खन्धानं भेदो)। ชาติสมฺพนฺเธ – มนุสฺสสฺส ภาโว, มนุสฺสานํ ชาติ. जाति सम्बन्ध में— 'मनुष्य का भाव' (मनुस्सस्स भावो), 'मनुष्यों की जाति' (मनुस्सानं जाति)। คุณสมฺพนฺเธ – สุวณฺณสฺส วณฺโณ, วณฺโณ น ขีเยถ ตถาคตสฺส, พุทฺธสฺส คุณโฆโส, ปุปฺผานํ คนฺโธ, ผลานํ รโส, จิตฺตสฺส ผุสนา, สิปฺปิกานํ สตํ นตฺถิ, ติลานํ มุฏฺฐิ, เตสํ สมาโยโค, สนฺธิโน วิโมกฺโข, ตถาคตสฺส ปญฺญาปารมึ อารพฺภ, ปุพฺพจริยํ วา, สุขํ เต, ทุกฺขํ เต, เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ, ปญฺญาย ปฏุภาโว, รูปสฺส ลหุตา, รูปสฺส มุทุตา, รูปสฺส อุปจโย. गुण सम्बन्ध में— 'सुवर्ण का वर्ण' (सुवण्णस्स वण्णो), 'तथागत का वर्ण क्षीण नहीं होता' (वण्णो न खीयथ तथागतस्स), 'बुद्ध का गुण-घोष' (बुद्धस्स गुणघोसो), 'पुष्पों की गन्ध' (पुप्फानं गन्धो), 'फलों का रस' (फलानं रसो), 'चित्त का स्पर्शन' (चित्तस्स फुसना), 'सीपियों का सौ नहीं है' (सिप्पिकानं सतं नत्थि), 'तिलों की मुट्ठी' (तिलानं मुट्ठि), 'उनका समायोग' (तेसं समायोगो), 'सन्धि का विमोक्ष' (सन्धिनो विमोक्खो), 'तथागत की प्रज्ञा-पारमिता को आरम्भ कर' (तथागतस्स पञ्ञापारमिं आरब्भ), 'अथवा पूर्वचर्या' (पुब्बचरियं वा), 'तुम्हें सुख हो' (सुखं ते), 'तुम्हें दुःख हो' (दुक्खं ते), 'चित्त में वितर्क उत्पन्न हुआ' (चेतसो परिवितक्को उदापादि), 'प्रज्ञा का प्राकट्य' (पञ्ञाय पटुभावो), 'रूप की लघुता' (रूपस्स लहुता), 'रूप की मृदुता' (रूपस्स मुदुता), 'रूप का उपचय' (रूपस्स उपचयो)। กฺริยาสมฺพนฺเธ – ปาทสฺส อุกฺขิปนํ, ปาทสฺส อวกฺเขปนํ วา, หตฺถสฺส สมิญฺชนํ, ปาทานํ ปสารณํ, ธาตูนํ คมนํ, ธาตูนํเยว ฐานํ, นิสชฺชา, สยนํ วา. ตถา ตสฺส นามโคตฺตาทิ, ตสฺส การณํ, ตสฺส มาตาปิตโร, ตสฺส ปุรโต ปาตุรโหสิ, ตสฺส ปจฺฉโต, นครสฺส ทกฺขิณโต, วสฺสานํ ตติเย มาเส, น ตสฺส อุปมา, กุเวรสฺส พลิ อิจฺจาทิ. क्रिया सम्बन्ध में— 'पैर का उठाना' (पादस्स उक्खिपनं), 'अथवा पैर का रखना' (पादस्स अवक्खेपनं वा), 'हाथ का सिकोड़ना' (हत्थस्स समिञ्जनं), 'पैरों का फैलाना' (पादानं पसारणं), 'धातुओं का गमन' (धातूनं गमनं), 'धातुओं का ही स्थान, बैठना या सोना' (धातूनंयेव ठानं, निसज्जा, सयनं वा)। वैसे ही 'उसका नाम-गोत्र आदि' (तस्स नामगोत्तादि), 'उसका कारण' (तस्स कारणं), 'उसके माता-पिता' (तस्स मातापितरो), 'उसके सामने प्रकट हुआ' (तस्स पुरतो पातुरहोसि), 'उसके पीछे' (तस्स पच्छतो), 'नगर के दक्षिण में' (नगरस्स दक्खिणतो), 'वर्षा के तीसरे महीने में' (वस्सानं ततिये मासे), 'उसकी कोई उपमा नहीं' (ना तस्स उपमा), 'कुबेर की बलि' (कुवेरस्स बलि) इत्यादि। ฐานิโต [Pg.168]– ยเมทนฺตสฺสาเทโส, โอ อวสฺส. स्थान से— 'यम् एदन्त का आदेश है' (यमेदन्तस्सादेसो), 'अ वर्ण का ओ' (ओ अवस्स)। อาคมิโต – ปุถสฺสาคโม อิจฺจาทิ. आगम से— 'पुथ शब्द का आगम' (पुथस्सागमो) इत्यादि। สามิโยเค – เทวานมินฺโท, มิคานํ ราชา. स्वामी के योग में— 'देवों का इन्द्र' (देवामनिन्दो), 'मृगों का राजा' (मिगानं राजा)। ตพฺพ รุชาทิโยเค – มหาเสนาปตีนํ อุชฺฌาเปตพฺพํ วิกนฺทิตพฺพํ วิรวิตพฺพํ, เทวทตฺตสฺส รุชติ, ตสฺส โรโค อุปฺปชฺชติ, รชกสฺส วตฺถํ ททาติ, มุสาวาทสฺส โอตฺตปฺปํ อิจฺจาทิ. तब्ब (तव्य प्रत्यय), रुजा आदि के योग में— 'महासेनापतियों को उलाहना देना चाहिए, चिल्लाना चाहिए, विलाप करना चाहिए' (महासेनापतीनं उज्झापेतब्बं विकन्दितब्बं विरवितब्बं), 'देवदत्त को पीड़ा होती है' (देवदत्तस्स रुजति), 'उसे रोग उत्पन्न होता है' (तस्स रोगो उप्पज्जति), 'धोबी को वस्त्र देता है' (रजकस्स वत्थं ददाति), 'मृषावाद (झूठ) से भय' (मुसावादस्स ओत्तप्पं) इत्यादि। ‘‘กฺวจิ, ตติยาสตฺตมีน’’นฺติ จ วตฺตเต. 'क्वचि, ततीयासत्तमीनं' (कभी-कभी तृतीया और सप्तमी के अर्थ में) यह अनुवृत्ति आती है। ๓๑๗. ฉฏฺฐี จ. ३१७. और षष्ठी (विभक्ति होती है)। ตติยาสตฺตมีนมตฺเถ กฺวจิ ฉฏฺฐีวิภตฺติ โหติ. तृतीया और सप्तमी के अर्थ में कभी-कभी षष्ठी विभक्ति होती है। ยชสฺส กรเณ – ปุปฺผสฺส พุทฺธํ ยชติ, ปุปฺเผน วา, ฆตสฺส อคฺคึ ชุโหติ. यज् धातु के करण (साधन) में— 'पुष्प से बुद्ध का यजन (पूजा) करता है' (पुप्फस्स बुद्धं यजति), अथवा 'पुष्प से' (पुप्फेन वा); 'घी से अग्नि में हवन करता है' (घतस्स अग्गिं जुहोति)। สุหิตตฺถโยเค – ปตฺตํ โอทนสฺส ปูเรตฺวา, โอทเนนาติ อตฺโถ. อิมเมว กายํ ปูรํ นานปฺปการสฺส อสุจิโน ปจฺจเวกฺขติ, ปูรํ หิรญฺญสุวณฺณสฺส, ปูรติ พาโล ปาปสฺส. तृप्ति (सुहित) अर्थ के योग में— 'पात्र को भात से भरकर' (पत्तं ओदनस्स पूरेत्वा), यहाँ 'ओदन से' (ओदनेन) यह अर्थ है। 'इसी काया को नाना प्रकार की अशुचि से पूर्ण देखता है' (इममेव कायं पूरं नानप्पकारस्स असुचिनो पच्चवेक्खति), 'सोने-चाँदी से पूर्ण' (पूरं हिरञ्ञसुवण्णस्स), 'मूर्ख पाप से भर जाता है' (पूरति बालो पापस्स)। ตุลฺยตฺถกิมลมาทิโยเค – ปิตุสฺส ตุลฺโย, ปิตรา วา ตุลฺโย, มาตุ สทิโส, มาตรา สทิโส วา, กึ ตสฺส จ ตุฏฺฐสฺส, กึ เตน ตุฏฺเฐนาติ อตฺโถ. อลํ ตสฺส จ ตุฏฺฐสฺส. 'तुल्य' (समान), 'किं' (क्या), 'अलम्' (बस/पर्याप्त) आदि के योग में - पिता के समान या पिता से समान, माता के सदृश या माता से सदृश, उस संतुष्ट का क्या या उस संतुष्ट से क्या - यह अर्थ है। उस संतुष्ट के लिए पर्याप्त। กตฺตริ กิตปฺปจฺจยโยเค – โสภนา กจฺจายนสฺส กติ, กจฺจายเนน วา, รญฺโญ สมฺมโต, รญฺญา วา, เอวํ รญฺโญ [Pg.169] ปูชิโต, รญฺโญ สกฺกโต, รญฺโญ อปจิโต, รญฺโญ มานิโต, อมตํ เตสํ ภิกฺขเว อปริภุตฺตํ, เยสํ กายคตาสติ อปริภุตฺตา อิจฺจาทิ. कर्ता अर्थ में 'कित' प्रत्यय के योग में - कच्चायन की सुंदर रचना या कच्चायन द्वारा, राजा द्वारा सम्मत या राजा से, इसी प्रकार राजा द्वारा पूजित, राजा द्वारा सत्कृत, राजा द्वारा अपचित (सम्मानित), राजा द्वारा मानित। "भिक्षुओं, उनके द्वारा अमृत का उपभोग नहीं किया गया है, जिनके द्वारा कायगतासति का उपभोग नहीं किया गया है" इत्यादि। สตฺตมิยตฺเถ กุสลาทิโยเค – กุสลา นจฺจคีตสฺส สิกฺขิตา จาตุริตฺถิโย, กุสโล ตฺวํ รถสฺส องฺคปจฺจงฺคานํ, กุสโล มคฺคสฺส, กุสโล อมคฺคสฺส, สนฺติ หิ ภนฺเต อุฬารา ยกฺขา ภควโต ปสนฺนา, ทิวสสฺส ติกฺขตฺตุํ, ทิวเส ติกฺขตฺตุํ วา, มาสสฺส ทฺวิกฺขตฺตุํ อิจฺจาทิ. सप्तमी के अर्थ में 'कुशल' आदि के योग में - नृत्य-गीत में कुशल शिक्षित चतुर स्त्रियाँ, तुम रथ के अंग-प्रत्यंगों में कुशल हो, मार्ग में कुशल, कुमार्ग में कुशल। "भन्ते, भगवान के प्रति प्रसन्न महान यक्ष हैं", दिन में तीन बार या दिन में तीन बार, महीने में दो बार इत्यादि। ‘‘กฺวจิ, ฉฏฺฐี’’ติ จ วตฺตเต. "कहीं-कहीं, षष्ठी" - यह (अनुवृत्ति) चलती है। ๓๑๘. ทุติยาปญฺจมีนญฺจ. ३१८. द्वितीया और पञ्चमी का भी। ทุติยาปญฺจมีนมตฺเถ จ กฺวจิ ฉฏฺฐีวิภตฺติ โหติ. द्वितीया और पञ्चमी के अर्थ में भी कहीं-कहीं षष्ठी विभक्ति होती है। ทุติยตฺเถ กมฺมนิ กิตกโยเค – ตสฺส ภวนฺติ วตฺตาโร, สหสา กมฺมสฺส กตฺตาโร, อมตสฺส ทาตา, ภินฺนานํ สนฺธาตา, สหิตานํ อนุปฺปทาตา, โพเธตา ปชาย, กมฺมสฺส การโก นตฺถิ, วิปากสฺส จ เวทโก, อวิสํวาทโก โลกสฺส, ปาปานํ อกรณํ สุขํ, จตุนฺนํ มหาภูตานํ อุปาทาย ปสาโท, อจฺฉริโย อรชเกน วตฺถานํ ราโค, อจฺฉริโย อโคปาลเกน คาวีนํ โทโห. द्वितीया के अर्थ में कर्म में 'कितक' के योग में - उसके बोलने वाले होते हैं, साहसपूर्वक कर्म को करने वाले, अमृत का दाता, भिन्नों (अलग हुए लोगों) को जोड़ने वाला, साथ रहने वालों को अनुप्रदान करने वाला, प्रजा को बोध कराने वाला, कर्म का कोई कर्ता नहीं है और न ही विपाक का कोई वेदन करने वाला (अनुभव करने वाला), लोक को धोखा न देने वाला, पापों का न करना सुखद है, चार महाभूतों को उपादान कर (आश्रित) प्रसाद, बिना धोबी के वस्त्रों का रंगना आश्चर्यजनक है, बिना ग्वाले के गायों का दुहना आश्चर्यजनक है। ตถา สริจฺฉาทีนํ กมฺมนิ – มาตุ สรติ, มาตรํ สรติ, น เตสํ โกจิ สรติ, สตฺตานํ กมฺมปฺปจฺจยา, ปุตฺตสฺส อิจฺฉติ, ปุตฺตมิจฺฉติ. उसी प्रकार 'सरि' (स्मरण करना) आदि के कर्म में - माता को याद करता है, माता को याद करता है, उन्हें कोई याद नहीं करता, सत्त्वों के कर्म-प्रत्यय से, पुत्र की इच्छा करता है, पुत्र की इच्छा करता है। กโรติสฺส [Pg.170] ปติยตเน จ – ปติยตนํ อภิสงฺขาโร, อุทกสฺส ปติกุรุเต, อุทกํ ปติกุรุเต, กณฺฑสฺส ปติกุรุเต, กณฺฑํ ปติกุรุเต. 'करोति' (करना) के 'पतियतन' (प्रतिकार/संस्कार) अर्थ में भी - पतियतन का अर्थ अभिसंस्कार है, जल का संस्कार करता है, जल का संस्कार करता है, बाण का संस्कार करता है, बाण का संस्कार करता है। ปญฺจมิยตฺเถ ปริหานิภยตฺถโยเค – อสฺสวนตา ธมฺมสฺส ปริหายนฺติ, กึ นุ โข อหํ ตสฺส สุขสฺส ภายามิ, สพฺเพ ตสนฺติ ทณฺฑสฺส, สพฺเพ ภายนฺติ มจฺจุโน, ภีโต จตุนฺนํ อาสิวิสานํ อิจฺจาทิ. पञ्चमी के अर्थ में परिहाणि (हानि) और भय के अर्थ के योग में - न सुनने के कारण धर्म से परिहीण होते हैं, क्या मैं उस सुख से डरता हूँ? सभी दण्ड से त्रस्त होते हैं, सभी मृत्यु से डरते हैं, चार विषैले साँपों से डरा हुआ इत्यादि। กฺวจีติ กึ? คมฺภีรญฺจ กถํ กตฺตา, กาเลน ธมฺมึ กถํ ภาสิตา โหติ, ปเรสํ ปุญฺญานิ อนุโมทิตา, พุชฺฌิตา สจฺจานิ, กฏํ การโก, ปสโว ฆาตโก. 'क्वचि' (कहीं-कहीं) क्यों? गंभीर कथा को करने वाला, समय पर धार्मिक कथा को बोलने वाला होता है, दूसरों के पुण्यों का अनुमोदन करने वाला, सत्यों को जानने वाला, चटाई को बनाने वाला, पशुओं को मारने वाला। ตถา น นิฏฺฐาทีสุ จ – สุขกามี วิหารํ กโต, รถํ กตวนฺโต, รถํ กตาวี, กฏํ กตฺวา, กฏํ กโรนฺโต, กฏํ กราโน, กฏํ กุรุมาโน อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'निष्ठा' (क्त, क्तवतु) आदि में नहीं होता - सुख चाहने वाला विहार को गया, रथ को बनाने वाला, रथ को बनाने वाला, चटाई को बनाकर, चटाई को करते हुए, चटाई को करते हुए इत्यादि। กสฺมึ อตฺเถ สตฺตมี? किस अर्थ में सप्तमी होती है? ๓๑๙. โอกาเส สตฺตมี. ३१९. 'ओकास' (अवकाश/आधार) अर्थ में सप्तमी होती है। โอกาสการเก สตฺตมีวิภตฺติ โหติ. ओकास कारक में सप्तमी विभक्ति होती है। โก จ โอกาโส? और 'ओकास' क्या है? ๓๒๐. โยธาโร ตโมกาสํ. ३२०. जो आधार है, वह 'ओकास' है। อาธารียติ อสฺมินฺติ อาธาโร, อธิกรณํ. กตฺตุกมฺมสมเวตานํ นิสชฺชปจนาทิกฺริยานํ ปติฏฺฐานฏฺเฐน โย อาธาโร, ตํ การกํ โอกาสสญฺญํ โหติ. जिसमें (क्रिया) आधारित होती है, वह 'आधार' है, (वही) अधिकरण है। कर्ता और कर्म में रहने वाली बैठने, पकाने आदि क्रियाओं के प्रतिष्ठित होने के स्थान के रूप में जो आधार है, उस कारक की 'ओकास' संज्ञा होती है। กเฏ [Pg.171] นิสีทติ เทวทตฺโต, ถาลิยํ โอทนํ ปจติ. เอตฺถ หิ เทวทตฺตตณฺฑุลานํ กตฺตุกมฺมานํ ธารณโต ตํสมเวตํ อาสนปจนสงฺขาตํ กฺริยํ ธาเรติ นาม. देवदत्त चटाई पर बैठता है, बटलोई में भात पकाता है। यहाँ देवदत्त और चावल रूपी कर्ता और कर्म को धारण करने से, उनमें रहने वाली बैठने और पकाने रूपी क्रिया को (चटाई और बटलोई) धारण करते हैं। โส ปนายโมกาโส จตุพฺพิโธ พฺยาปิโก โอปสิเลสิโก สามีปิโก เวสยิโกติ. वह यह 'ओकास' चार प्रकार का है - व्यापक, औपश्लेषिक, सामीपिक और वैषयिक। ตตฺถ พฺยาปิโก นาม ยตฺถ สกโลปิ อาธารภูโต อตฺโถ อาเธยฺเยน ปตฺถโฏ โหติ, ยสฺมิญฺจ อาเธยฺยภูตํ กิญฺจิ พฺยาเปตฺวา ติฏฺฐติ, ตํ ยถา – ติเลสุ เตลํ อตฺถิ, ขีเลสุ ชลํ, ทธิมฺหิ สปฺปีติ. उनमें 'व्यापक' वह है जहाँ संपूर्ण आधारभूत अर्थ आधेय (रखी जाने वाली वस्तु) द्वारा व्याप्त होता है, और जिसमें आधेयभूत कुछ व्याप्त होकर रहता है, जैसे - तिलों में तेल है, दूध में जल है, दही में घी है। โอปสิเลสิโก นาม ปจฺเจกสิทฺธานํ ภาวานํ ยตฺถ อุปสิเลเสน อุปคโม โหติ, ยสฺมิญฺจ อาเธยฺโย อุปสิลิสฺสติ อลฺลียิตฺวา ติฏฺฐติ, ตํ ยถา – อาสเน นิสินฺโน สงฺโฆ, ถาลิยํ โอทนํ ปจติ, ฆเฏสุ อุทกํ อตฺถิ, ทูเร ฐิโต, สมีเป ฐิโตติ. 'औपश्लेषिक' वह है जहाँ अलग-अलग सिद्ध भावों का संयोग (उपश्लेष) से संबंध होता है, और जिसमें आधेय सटकर या लगकर रहता है, जैसे - आसन पर बैठा संघ, बटलोई में भात पकाता है, घड़ों में जल है, दूर स्थित, समीप स्थित। สามีปิโก นาม ยตฺถ สมีเป สมีปิโวหารํ กตฺวา ตทายตฺตวุตฺติตาทีปนตฺถํ อาธารภาโว วิกปฺปียติ, ตํ ยถา – คงฺคายํ โฆโส วสติ, คงฺคาย สมีเป วโช วสตีติ อตฺโถ. ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ เชตวเน, สาวตฺถิยา สมีเปติ อตฺโถ. 'सामीपिक' वह है जहाँ समीप में समीपवर्ती व्यवहार करके, उस पर आश्रित वृत्ति को दर्शाने के लिए आधार भाव की कल्पना की जाती है, जैसे - गंगा में घोष (बस्ती) बसता है, अर्थ है गंगा के समीप बस्ती बसती है। भगवान श्रावस्ती के जेतवन में विहार करते हैं, अर्थ है श्रावस्ती के समीप। เวสยิโก นาม ยตฺถ อญฺญตฺถาภาววเสน, เทสนฺตราวจฺเฉทวเสน วา อาธารภาโว ปริกปฺโป, ตํ ยถา – อากาเส สกุณา ปกฺขนฺติ, ภูมีสุ มนุสฺสา จรนฺติ, ชเลสุ มจฺฉา, ปาเทสุ ปติโต, ปาปสฺมึ รมตี มโน, ปสนฺโน พุทฺธสาสเน, ปญฺญาย สาธุ, วินเย นิปุโณ, มาตริ สาธุ, ปิตริ นิปุโณ อิจฺจาทิ. 'वैषयिक' वह है जहाँ अन्यत्र अभाव के कारण या देशान्तर के परिच्छेद (सीमांकन) के कारण आधार भाव की कल्पना की जाती है, जैसे - आकाश में पक्षी उड़ते हैं, भूमियों पर मनुष्य चलते हैं, जलों में मछलियाँ, चरणों में गिरा हुआ, मन पाप में रमता है, बुद्ध शासन में प्रसन्न, प्रज्ञा में साधु (उत्तम), विनय में निपुण, माता के प्रति साधु, पिता के प्रति निपुण इत्यादि। สพฺโพปิ [Pg.172] จายมาธาโร ปธานวเสน วา ปริกปฺปิตวเสน วา กฺริยาย ปติฏฺฐา ภวตีติ โอกาโสตฺเวว วุตฺโตติ เวทิตพฺโพ. यह संपूर्ण आधार चाहे मुख्य रूप से हो या कल्पित रूप से, क्रिया की प्रतिष्ठा (आधार) होता है, इसलिए इसे 'ओकास' ही कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। วุตฺตญฺเจตํ और यह कहा गया है - ‘‘กิริยา กตฺตุกมฺมานํ,ยตฺถ โหติ ปติฏฺฐิตา; ‘โอกาโส’ติ ปวุตฺโต โส,จตุธา พฺยาปิกาทิโต. "कर्ता और कर्म की क्रिया जहाँ प्रतिष्ठित होती है, उसे 'ओकास' कहा गया है, जो व्यापक आदि के भेद से चार प्रकार का है।" พฺยาปิโก ติลขีราทิ,กโฏ โอปสิเลสิโก; สามีปิโก ตุ คงฺคาทิ,อากาโส วิสโย มโต’’ติ. "तिल और दूध आदि व्यापक हैं, चटाई औपश्लेषिक है; गंगा आदि सामीपिक हैं, और आकाश वैषयिक माना गया है।" ‘‘ฉฏฺฐี, สตฺตมี’’ติ จ อธิกาโร. "षष्ठी, सप्तमी" - यह अधिकार (सूत्र) है। ๓๒๑. สามิสฺสราธิปติทายาทสกฺขีปติภูปสูตกุสเลหิ จ. ३२१. स्वामी, ईश्वर, अधिपति, दायाद (उत्तराधिकारी), साक्षी, प्रतिभू (जमानती), प्रसूत और कुशल शब्दों के योग में भी (षष्ठी और सप्तमी विभक्तियाँ होती हैं)। สามี อิสฺสร อธิปติ ทายาท สกฺขิปติภู ปสูต กุสลอิจฺเจเตหิ โยเค ฉฏฺฐีวิภตฺติ โหติ, สตฺตมี จ. อุภยตฺถํ วจนํ. 'स्वामी' (स्वामी), 'इस्सर' (ईश्वर/प्रभु), 'अधिपति' (अधिपति), 'दायाद' (उत्तराधिकारी), 'सक्खि' (साक्षी), 'पटिभू' (प्रतिभू/ज़मानतदार), 'पसूत' (उत्पन्न/संतान), और 'कुसल' (कुशल) - इन शब्दों के योग में षष्ठी विभक्ति होती है और सप्तमी भी। दोनों ही अर्थों में वचन (प्रयोग) होता है। ควํ สามิ, โคสุ สามิ, ควํ อิสฺสโร, โคสุ อิสฺสโร, ควํ อธิปติ, โคสุ อธิปติ, ควํ ทายาโท, โคสุ ทายาโท, ควํ สกฺขิ, โคสุ สกฺขิ, ควํ ปติภู, โคสุ ปติภู, ควํ ปสูโต, โคสุ ปสูโต, ควํ กุสโล, โคสุ กุสโล. गायों का स्वामी (गवं सामि), गायों में स्वामी (गोसु सामि); गायों का ईश्वर, गायों में ईश्वर; गायों का अधिपति, गायों में अधिपति; गायों का उत्तराधिकारी, गायों में उत्तराधिकारी; गायों का साक्षी, गायों में साक्षी; गायों का प्रतिभू, गायों में प्रतिभू; गायों से उत्पन्न, गायों में उत्पन्न; गायों में कुशल, गायों में कुशल। ๓๒๒. นิทฺธารเณ จ. ३२२. और निर्धारण (समूह में से किसी एक को अलग करने) के अर्थ में भी। นีหริตฺวา ธารณํ นิทฺธารณํ, ชาติ คุณ กฺริยา นาเมหิ สมุทายโต เอกเทสสฺส ปุถกฺกรณํ, ตสฺมึ นิทฺธารณตฺเถ คมฺยมาเน [Pg.173] ตโต สมุทายวาจิลิงฺคมฺหา ฉฏฺฐีวิภตฺติ โหติ, สตฺตมี จ. निकाल कर धारण करना 'निर्धारण' है; जाति, गुण, क्रिया और नाम के द्वारा समुदाय से एक अंश को पृथक करना (निर्धारण है)। उस निर्धारण अर्थ के प्रतीत होने पर, उस समुदायवाचक शब्द से षष्ठी विभक्ति होती है और सप्तमी भी। มนุสฺสานํ ขตฺติโย สูรตโม, มนุสฺเสสุ ขตฺติโย สูรตโม, กณฺหา คาวีนํ สมฺปนฺนขีรตมา, กณฺหา คาวีสุ สมฺปนฺนขีรตมา, อทฺธิกานํ ธาวนฺโต สีฆตโม, อทฺธิเกสุ ธาวนฺโต สีฆตโม, อายสฺมา อานนฺโท อรหตํ อญฺญตโร อโหสิ, อรหนฺเตสุ วา อิจฺจาทิ. मनुष्यों में क्षत्रिय सबसे अधिक शूरवीर है (षष्ठी और सप्तमी); काली गाय, गायों में सबसे अधिक दूध देने वाली है; यात्रियों में दौड़ने वाला सबसे तेज़ है; आयुष्मान आनंद अर्हतों में से एक थे; इत्यादि। ๓๒๓. อนาทเร จ. ३२३. और अनादर के अर्थ में भी। อนาทเร คมฺยมาเน ภาววตา ลิงฺคมฺหา ฉฏฺฐีวิภตฺติ โหติ, สตฺตมี จ. อกามกานํ มาตาปิตูนํ รุทนฺตานํ ปพฺพชิ, มาตาปิตูสุ รุทนฺเตสุ ปพฺพชิ. अनादर के प्रतीत होने पर भाववाचक शब्द से षष्ठी विभक्ति होती है और सप्तमी भी। जैसे—अनिच्छुक माता-पिता के रोते रहने पर भी वह प्रव्रजित हो गया (षष्ठी और सप्तमी)। อาโกฏยนฺโต โส เนติ,สิวิราชสฺส เปกฺขโต; มจฺจุ คจฺฉติ อาทาย,เปกฺขมาเน มหาชเน. वह (मृत्यु) प्रहार करते हुए ले जाती है, जबकि शिविराज देख रहे होते हैं; मृत्यु (प्राणी को) लेकर चली जाती है, जबकि महाजन (लोग) देख रहे होते हैं। ๓๒๔. กมฺมกรณนิมิตฺตตฺเถสุ สตฺตมี. ३२४. कर्म, करण और निमित्त के अर्थों में सप्तमी विभक्ति होती है। กมฺมกรณนิมิตฺตอิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ ลิงฺคมฺหา สตฺตมีวิภตฺติ โหติ. कर्म, करण और निमित्त—इन अर्थों में प्रातिपदिक (शब्द) से सप्तमी विभक्ति होती है। กมฺมตฺเถ – ภิกฺขูสุ อภิวาเทนฺติ, มุทฺธนิ จุมฺพิตฺวา, ปุริสสฺส พาหาสุ คเหตฺวา. कर्म के अर्थ में—भिक्षुओं का अभिवादन करते हैं, मस्तक पर चूमकर, पुरुष की बाँहों को पकड़कर। กรณตฺเถ – หตฺเถสุ ปิณฺฑาย จรนฺติ, ปตฺเตสุ ปิณฺฑาย จรนฺติ, ปเถสุ คจฺฉนฺติ, โสปิ มํ อนุสาเสยฺย, สมฺปฏิจฺฉามิ มตฺถเก. करण के अर्थ में—हाथों से भिक्षा के लिए विचरण करते हैं, पात्रों से भिक्षा के लिए विचरण करते हैं, मार्गों से जाते हैं, वह भी मुझे उपदेश दे, मैं मस्तक से स्वीकार करता हूँ। นิมิตฺตตฺเถ [Pg.174]– ทีปิ จมฺเมสุ หญฺญเต, กุญฺชโร ทนฺเตสุ หญฺญเต, อณุมตฺเตสุ วชฺเชสุ ภยทสฺสาวี, สมฺปชานมุสาวาเท ปาจิตฺติยํ, มุสาวาทนิมิตฺตํ มุสาวาทปฺปจฺจยาติ อตฺโถ. निमित्त के अर्थ में—तेंदुआ खाल के लिए मारा जाता है, हाथी दाँतों के लिए मारा जाता है, अणु मात्र (सूक्ष्म) दोषों में भी भय देखने वाला, जानबूझकर झूठ बोलने के कारण पाचित्तिय (दोष) होता है; यहाँ अर्थ है—मृषावाद (झूठ) के निमित्त से या मृषावाद के प्रत्यय (कारण) से। ‘‘สตฺตมี’’ติ อธิกาโร. 'सप्तमी' यह अधिकार सूत्र है। ๓๒๕. สมฺปทาเน จ. ३२५. और सम्प्रदान के अर्थ में भी। สมฺปทานตฺเถ จ ลิงฺคมฺหา สตฺตมีวิภตฺติ โหติ. สงฺเฆ ทินฺนํ มหปฺผลํ, สงฺเฆ โคตมิ เทหิ, สงฺเฆ เต ทินฺเน อหญฺเจว ปูชิโต ภวิสฺสามิ. सम्प्रदान के अर्थ में भी प्रातिपदिक से सप्तमी विभक्ति होती है। संघ को दिया गया दान महाफलदायी होता है, हे गौतमी! संघ को (दान) दो, तुम्हारे द्वारा संघ को (दान) दिए जाने पर मैं भी पूजित होऊँगा। ยา ปลาลมยํ มาลํ, นารี ทตฺวาน เจติเย; อลตฺถ กญฺจนมยํ, มาลํ โพชฺฌงฺคิกญฺจ สา. जिस स्त्री ने चैत्य को पुआल (घास) की माला दी, उसने स्वर्णमयी माला और बोध्यङ्गिक (माला) प्राप्त की। ๓๒๖. ปญฺจมฺยตฺเถ จ. ३२६. और पञ्चमी के अर्थ में भी। ปญฺจมฺยตฺเถ จ ลิงฺคมฺหา สตฺตมีวิภตฺติ โหติ. กทลีสุ คเช รกฺขนฺติ. पञ्चमी के अर्थ में भी प्रातिपदिक से सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे—हाथियों को केलों (के वन) से बचाते हैं। ๓๒๗. กาลภาเวสุ จ. ३२७. और काल तथा भाव के अर्थ में भी। กาโล นาม นิเมส ขณ ลย มุหุตฺต ปุพฺพณฺหาทิโก, ภาโว นาม กฺริยา, สา เจตฺถ กฺริยนฺตรูปลกฺขณาว อธิปฺเปตา, ตสฺมึ กาลตฺเถ จ ภาวลกฺขเณ ภาวตฺเถ จ ลิงฺคมฺหา สตฺตมีวิภตฺติ โหติ. काल का अर्थ है—निमेष, क्षण, लय, मुहूर्त, पूर्वाह्न आदि; भाव का अर्थ है—क्रिया, और यहाँ वह दूसरी क्रिया के लक्षण (संकेतक) के रूप में अभिप्रेत है। उस काल के अर्थ में और भाव-लक्षण रूपी भाव के अर्थ में प्रातिपदिक से सप्तमी विभक्ति होती है। กาเล – ปุพฺพณฺหสมเย คโต, สายนฺหสมเย อาคโต, อกาเล วสฺสติ ตสฺส, กาเล ตสฺส น วสฺสติ, ผุสฺสมาสมฺหา ตีสุ มาเสสุ เวสาขมาโส, อิโต สตสหสฺสมฺหิ, กปฺเป อุปฺปชฺชิ จกฺขุมา. काल के अर्थ में—पूर्वाह्न के समय गया, सायंकाल के समय आया, उसके लिए असमय में वर्षा होती है, उसके लिए समय पर वर्षा नहीं होती, पौष मास से तीन महीने बाद वैशाख मास आता है, यहाँ से एक लाख कल्प पहले चक्षुमान (बुद्ध) उत्पन्न हुए। ภาเวนภาวลกฺขเณ [Pg.175]– ภิกฺขุสงฺเฆสุ โภชียมาเนสุ คโต, ภุตฺเตสุ อาคโต, โคสุ ทุยฺหมานาสุ คโต, ทุทฺธาสุ อาคโต, ชายมาเน โข สาริปุตฺต โพธิสตฺเต อยํ ทสสหสฺสิโลกธาตุ สํกมฺปิ สมฺปกมฺปิ สมฺปเวธิ. भाव के द्वारा भाव-लक्षण के अर्थ में—भिक्षु संघ के भोजन करते समय वह गया, उनके भोजन कर लेने पर वह आया, गायों के दुहे जाते समय वह गया, उनके दुह लिए जाने पर वह आया; हे सारिपुत्र! बोधिसत्व के जन्म लेते समय यह दस हज़ार लोकधातु काँप उठी, अत्यधिक काँप उठी, प्रकम्पित हो उठी। ปาสาณา สกฺขรา เจว, กฐลา ขาณุกณฺฏกา; สพฺเพ มคฺคา วิวชฺเชนฺติ, คจฺฉนฺเต โลกนายเก. पत्थर, कंकड़, ठूँठ और काँटे—लोकनायक (बुद्ध) के चलते समय सभी मार्ग से हट जाते हैं। อิมสฺมึ สติ อิทํ โหติ อิจฺจาทิ. इसके होने पर यह होता है, इत्यादि। ๓๒๘. อุปาฌาธิกิสฺสรวจเน. ३२८. 'उप' और 'अधि' के योग में अधिकता और ऐश्वर्य (स्वामी) के अर्थ में। ทฺวิปทมิทํ. อธิกตฺเถ, อิสฺสรตฺเถ จ วตฺตมาเนหิ อุปอธิอิจฺเจเตหิ โยเค อธิกิสฺสรวจเน คมฺยมาเน ลิงฺคมฺหา สตฺตมีวิภตฺติ โหติ. यह दो पदों वाला (सूत्र) है। अधिकता और ऐश्वर्य के अर्थ में प्रयुक्त 'उप' और 'अधि' के योग में, अधिकता और ऐश्वर्य का बोध होने पर प्रातिपदिक से सप्तमी विभक्ति होती है। อธิกวจเน – อุป ขาริยํ โทโณ, ขาริยา โทโณ อธิโกติ อตฺโถ. ตถา อุป นิกฺเข กหาปณํ, อธิ เทเวสุ พุทฺโธ, สมฺมุติอุปปตฺติวิสุทฺธิเทวสงฺขาเตหิ ติวิเธหิปิ เทเวหิ สพฺพญฺญู พุทฺโธว อธิโกติ อตฺโถ. अधिकता के अर्थ में—'उप खारियं दोणो' अर्थात् खारी से द्रोण अधिक है। उसी प्रकार 'उप निक्खे कहापणं'; 'अधि देवेसु बुद्धो'—यहाँ अर्थ है कि सम्मति-देव, उपपत्ति-देव और विशुद्धि-देव नामक तीनों प्रकार के देवों से सर्वज्ञ बुद्ध ही अधिक (श्रेष्ठ) हैं। อิสฺสรวจเน – อธิ พฺรหฺมทตฺเต ปญฺจาลา, พฺรหฺมทตฺติสฺสรา ปญฺจาลาติ อตฺโถ. ऐश्वर्य (स्वामी) के अर्थ में—'अधि ब्रह्मदत्ते पञ्चाला' अर्थात् ब्रह्मदत्त पञ्चालों का स्वामी है। ๓๒๙. มณฺฑิตุสฺสุกฺเกสุ ตติยา จ. ३२९. 'मण्डित' (अलंकृत) और 'उत्सुक' शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति भी होती है। มณฺฑิตอุสฺสุกฺกอิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ คมฺยมาเนสุ ลิงฺคมฺหา ตติยาวิภตฺติ โหติ, สตฺตมี จ. มณฺฑิตสทฺโท ปเนตฺถ ปสนฺนตฺถวาจโก, อุสฺสุกฺกสทฺโท สอีหตฺโถ. ญาเณน ปสนฺโน, ญาณสฺมึ ปสนฺโน, ญาเณน อุสฺสุกฺโก, ญาณสฺมึ อุสฺสุกฺโก สปฺปุริโส. 'मण्डित' (प्रसन्न) और 'उत्सुक' इन अर्थों के गम्यमान होने पर प्रातिपदिक से तृतीया और सप्तमी विभक्ति होती है। यहाँ 'मण्डित' शब्द प्रसन्न अर्थ का वाचक है और 'उत्सुक' शब्द उत्साह अर्थ का। उदाहरण: ज्ञान से प्रसन्न (ñāṇena pasanno), ज्ञान में प्रसन्न (ñāṇasmiṃ pasanno), ज्ञान के लिए उत्सुक (ñāṇena ussukko), ज्ञान में उत्सुक (ñāṇasmiṃ ussukko) सत्पुरुष। การกํ [Pg.176] ฉพฺพิธํ สญฺญา-วสา ฉพฺพีสตีวิธํ; ปเภทา สตฺตธา กมฺมํ, กตฺตา ปญฺจวิโธ ภเว. कारक संज्ञा के अनुसार छह प्रकार के होते हैं और (विस्तार से) छब्बीस प्रकार के होते हैं; कर्म के सात भेद होते हैं और कर्ता पाँच प्रकार का होता है। กรณํ ทุวิธํ โหติ, สมฺปทานํ ติธา มตํ; อปาทานํ ปญฺจวิธํ, อาธาโร ตุ จตุพฺพิโธ. करण दो प्रकार का होता है, सम्प्रदान तीन प्रकार का माना गया है; अपादान पाँच प्रकार का और आधार (अधिकरण) चार प्रकार का होता है। วิภตฺติโย ปน ปจฺจตฺตวจนาทิวเสน อฏฺฐวิธา ภวนฺติ. ยถาห और विभक्तियाँ 'पच्चत्त' (प्रथमा) आदि वचनों के अनुसार आठ प्रकार की होती हैं। जैसा कि कहा गया है— ‘‘ปจฺจตฺตมุปโยคญฺจ, กรณํ สมฺปทานิยํ; นิสฺสกฺกํ สามิวจนํ, ภุมฺมาลปนมฏฺฐม’’นฺติ. "पच्चत्त (प्रथमा), उपयोग (द्वितीया), करण (तृतीया), सम्प्रदानीय (चतुर्थी), निस्सक्क (पञ्चमी), सामिवचन (षष्ठी), भुम्म (सप्तमी) और आठवाँ आलपन (सम्बोधन) है।" อิติ ปทรูปสิทฺธิยํ การกกณฺโฑ इस प्रकार पदरूपसिद्धि में कारक काण्ड— ตติโย. तीसरा (समाप्त हुआ)। ๔. สมาสกณฺฑ ४. समास काण्ड। อถ นามเมว อญฺญมญฺญสมฺพนฺธีนํ สมาโสติ นามนิสฺสิตตฺตา, สยญฺจ นามิกตฺตา นามานนฺตรํ สมาโส วุจฺจเต. अब, परस्पर सम्बद्ध नामों (संज्ञाओं) का ही 'समास' होता है, इसलिए नाम (संज्ञा) पर आश्रित होने के कारण और स्वयं नामिक (प्रातिपदिक) होने के कारण, नाम के बाद समास कहा जाता है। โส จ สญฺญาวเสน ฉพฺพิโธ อพฺยยีภาโว กมฺมธารโย ทิคุ ตปฺปุริโส พหุพฺพีหิ ทฺวนฺโท จาติ. और वह (समास) संज्ञा के अनुसार छह प्रकार का है: अव्ययीभाव, कर्मधारय, द्विगु, तत्पुरुष, बहुव्रीहि और द्वन्द्व। อพฺยยีภาวสมาส अव्ययीभाव समास। ตตฺร ปฐมํ อพฺยยีภาวสมาโส วุจฺจเต; โส จ นิจฺจสมาโสติ อสฺสปทวิคฺคโห. उनमें सबसे पहले अव्ययीभाव समास कहा जाता है; और वह 'नित्य समास' है, जिसका विग्रह अपने पदों (अस्वपद) से नहीं होता। ‘‘อุปนครํ’’อิตีธ – อุปสทฺทโต ปฐเมกวจนํ สิ, ตสฺส อุปสคฺคปรตฺตา ‘‘สพฺพาสมาวุโสปสคฺคนิปาตาทีหิ จา’’ติ โลโป, นครสทฺทโต ฉฏฺเฐกวจนํ ส, นครสฺส สมีปนฺติ อญฺญปเทน วิคฺคเห – "उपनगरं" यहाँ— 'उप' शब्द से प्रथमा एकवचन 'सि' आता है, उस उपसर्ग के परे होने के कारण "सब्बासमावुपसग्गनिपातादीहि च" सूत्र से उसका लोप हो जाता है; 'नगर' शब्द से षष्ठी एकवचन 'स' आता है, 'नगरस्स समीप' (नगर के समीप) इस प्रकार अन्य पदों के साथ विग्रह होने पर— ‘‘นามานํ สมาโส ยุตฺตตฺโถ’’ติ สมาสวิธาเน สพฺพตฺถ วตฺตเต. "नामानं समासो युत्तत्थो" (युक्त अर्थ वाले नामों का समास होता है) यह सूत्र समास विधान में सर्वत्र प्रवृत्त होता है। ๓๓๐. อุปสคฺคนิปาตปุพฺพโก อพฺยยีภาโว. ३३०. उपसर्ग और निपात जिसके पूर्व में हों, वह अव्ययीभाव है। อุปสคฺคปุพฺพโก, นิปาตปุพฺพโก จ นามิโก ยุตฺตตฺโถ เตเหว อตฺตปุพฺพเกหิ อุปสคฺคนิปาเตหิ สห นิจฺจํ สมสียเต, โส จ สมาโส อพฺยยีภาวสญฺโญ โหติ. อิธ อพฺยยีภาวาทิสญฺญาวิธายกสุตฺตาเนว วา สญฺญาวิธานมุเขน สมาสวิธายกานีติ ทฏฺฐพฺพานิ. उपसर्ग-पूर्वक और निपात-पूर्वक युक्त अर्थ वाला नामिक (पद) उन्हीं अपने पूर्ववर्ती उपसर्गों और निपातों के साथ नित्य रूप से समसित (समास युक्त) होता है, और वह समास 'अव्ययीभाव' संज्ञा वाला होता है। यहाँ अव्ययीभाव आदि संज्ञा विधायक सूत्रों को ही संज्ञा विधान के माध्यम से समास विधायक सूत्र समझना चाहिए। ตตฺถ อพฺยยมิติ อุปสคฺคนิปาตานํ สญฺญา, ลิงฺควจนเภเทปิ พฺยยรหิตตฺตา, อพฺยยานํ อตฺถํ วิภาวยตีติ อพฺยยีภาโว อพฺยยตฺถปุพฺพงฺคมตฺตา, อนพฺยยํ อพฺยยํ ภวตีติ วา [Pg.178] อพฺยยีภาโว. ปุพฺพปทตฺถปฺปธาโน หิ อพฺยยีภาโว, เอตฺถ จ ‘‘อุปสคฺคนิปาตปุพฺพโก’’ติ วุตฺตตฺตา อุปสคฺคนิปาตานเมว ปุพฺพนิปาโต. वहाँ 'अव्यय' यह उपसर्गों और निपातों की संज्ञा है, क्योंकि लिंग और वचन के भेद होने पर भी वे व्यय (परिवर्तन) से रहित होते हैं। अव्ययों के अर्थ को प्रकट करने के कारण अथवा अव्यय अर्थ की प्रधानता के कारण इसे 'अव्ययीभाव' कहते हैं; अथवा जो अव्यय नहीं है वह अव्यय हो जाता है, इसलिए 'अव्ययीभाव' है। अव्ययीभाव समास में पूर्व पद का अर्थ प्रधान होता है, और यहाँ "उपसग्गनिपातपुब्बको" कहे जाने के कारण उपसर्ग और निपातों का ही पूर्व-निपात (पहले प्रयोग) होता है। ๓๓๑. นามานํ สมาโส ยุตฺตตฺโถ. ३३१. नामों (पदों) का समास युक्त अर्थ (सम्बद्ध अर्थ) में होता है। เตสํ นามานํ ปยุชฺชมานปทตฺถานํ โย ยุตฺตตฺโถ, โส สมาสสญฺโญ โหติ, ตทญฺญํ วากฺยมิติ รุฬฺหํ. उन प्रयुक्त होने वाले पदों के अर्थों का जो 'युक्त अर्थ' (सम्बद्ध अर्थ) है, उसकी 'समास' संज्ञा होती है; उससे भिन्न को 'वाक्य' कहना रूढ़ है। นามานิ สฺยาทิวิภตฺยนฺตานิ, สมสฺสเตติ สมาโส, สงฺขิปิยตีติ อตฺโถ. 'नाम' सि-आदि विभक्तियों से अन्त होने वाले शब्द हैं। 'समस्सते' (संक्षेप किया जाता है) इसलिए 'समास' है, अर्थात् संक्षेप किया जाना ही इसका अर्थ है। วุตฺตญฺหิ क्योंकि कहा गया है— ‘‘สมาโส ปทสงฺเขโป, ปทปฺปจฺจยสํหิตํ; ตทฺธิตํ นาม โหเตวํ, วิญฺเญยฺยํ เตสมนฺตร’’นฺติ. "समास पदों का संक्षेप है; पदों और प्रत्ययों से युक्त तद्धित नाम होता है, इस प्रकार उनके बीच के अन्तर को समझना चाहिए।" ทุวิธญฺจสฺส สมสนํ สทฺทสมสนมตฺถสมสนญฺจ, ตทุภยมฺปิ ลุตฺตสมาเส ปริปุณฺณเมว ลพฺภติ. อลุตฺตสมาเส ปน อตฺถสมสนเมว วิภตฺติโลปาภาวโต, ตตฺถาปิ วา เอกปทตฺตูปคมนโต ทุวิธมฺปิ ลพฺภเตว. ทฺเว หิ สมาสสฺส ปโยชนานิ เอกปทตฺตเมกวิภตฺติตฺตญฺจาติ. और इसका समसन (संक्षेपीकरण) दो प्रकार का है: शब्द-समसन और अर्थ-समसन। लुप्त-समास (जहाँ विभक्ति का लोप हो) में ये दोनों ही पूर्ण रूप से प्राप्त होते हैं। किन्तु अलुप्त-समास में विभक्ति का लोप न होने के कारण केवल अर्थ-समसन ही होता है, फिर भी वहाँ एक पद बन जाने के कारण दोनों ही प्रकार (समसन) प्राप्त हो जाते हैं। समास के दो ही प्रयोजन हैं: एक पद होना और एक विभक्ति होना। ยุตฺโต อตฺโถ ยุตฺตตฺโต, อถ วา ยุตฺโต สงฺคโต, สมฺพนฺโธ วา อตฺโถ ยสฺส โสยํ ยุตฺตตฺโถ, เอเตน สงฺคตตฺเถน ยุตฺตตฺถวจเนน ภินฺนตฺถานํ เอกตฺถีภาโว สมาสลกฺขณนฺติ วุตฺตํ โหติ. เอตฺถ จ ‘‘นามาน’’นฺติ วจเนน ‘‘เทวทตฺโต ปจตี’’ติอาทีสุ อาขฺยาเตน สมาโส น โหตีติ ทสฺเสติ. สมฺพนฺธตฺเถน ปน ยุตฺตตฺถคฺคหเณน ‘‘ภโฏ รญฺโญ ปุตฺโต เทวทตฺตสฺสา’’ติอาทีสุ อญฺญมญฺญานเปกฺเขสุ, ‘‘เทวทตฺตสฺส กณฺหา ทนฺตา’’ติอาทีสุ จ อญฺญสาเปกฺเขสุ [Pg.179] อยุตฺตตฺถตาย สมาโส น โหตีติ ทีเปติ. 'युक्त अर्थ' ही 'युक्तार्थ' है, अथवा जिसका अर्थ युक्त, संगत या सम्बद्ध हो वह 'युक्तार्थ' है। इससे यह कहा गया है कि संगत अर्थ वाले 'युक्तार्थ' वचन के द्वारा भिन्न अर्थों का 'एकार्थीभाव' (एक अर्थ हो जाना) ही समास का लक्षण है। और यहाँ "नामानं" वचन से यह दर्शाया गया है कि "देवदत्तो पचति" आदि में आख्यात (क्रिया) के साथ समास नहीं होता। 'सम्बद्ध अर्थ' के रूप में 'युक्तार्थ' ग्रहण करने से "भटो रञ्ञो पुत्तो देवदत्तस्स" (देवदत्त का, राजा का पुत्र, योद्धा) आदि में जहाँ परस्पर अपेक्षा नहीं है, और "देवदत्तस्स कण्हा दन्ता" (देवदत्त के काले दाँत) आदि में जहाँ अन्य की अपेक्षा है, वहाँ 'अयुक्तार्थ' होने के कारण समास नहीं होता, यह स्पष्ट किया गया है। ‘‘อตฺถวสา วิภตฺติวิปริณาโม’’ติ วิปริณาเมน ‘‘ยุตฺตตฺถาน’’นฺติ วตฺตเต. "अर्थवशात् विभक्ति विपरिणाम" के अनुसार विपरिणाम (परिवर्तन) से "युक्तार्थानां" (युक्त अर्थ वालों का) ऐसा पद आता है। ๓๓๒. เตสํ วิภตฺติโย โลปา จ. ३३२. उनकी विभक्तियों का लोप होता है। อิธ ปทนฺตเรน วา ตทฺธิตปฺปจฺจเยหิ วา อายาทิปฺปจฺจเยหิ วา เอกตฺถีภูตา ยุตฺตตฺถา นาม, เตน ‘‘เตสํ ยุตฺตตฺถานํ สมาสานํ, ตทฺธิตายาทิปฺปจฺจยนฺตานญฺจ วิภตฺติโย โลปนียา โหนฺตี’’ติ อตฺโถ. สมาสคฺคหณาธิกาเร ปน สติ เตสํคหเณน วา ตทฺธิตายาทิปฺปจฺจยนฺต วิภตฺติโลโป. จคฺคหณํ ‘‘ปภงฺกโร’’ติอาทีสุ โลปนิวตฺตนตฺถํ. यहाँ अन्य पद के साथ, अथवा तद्धित प्रत्ययों के साथ, अथवा आय-आदि प्रत्ययों के साथ जो एकार्थीभूत हुए हैं, वे 'युक्तार्थ' नाम वाले हैं; इसलिए "उन युक्तार्थ समासों और तद्धित एवं आय-आदि प्रत्ययान्त शब्दों की विभक्तियों का लोप होना चाहिए" यह अर्थ है। समास ग्रहण के अधिकार में होने पर 'तेसं' ग्रहण से अथवा तद्धित एवं आय-आदि प्रत्ययान्त शब्दों की विभक्ति का लोप होता है। 'च' का ग्रहण "पभङ्करो" आदि में लोप को रोकने के लिए है। วิปริณาเมน ‘‘ลุตฺตาสุ, วิภตฺตีสู’’ติ วตฺตเต, ยุตฺตตฺถคฺคหณญฺจ. विपरिणाम से "लुप्त हुई विभक्तियों में" ऐसा पद आता है, और 'युक्तार्थ' का ग्रहण भी होता है। ๓๓๓. ปกติ จสฺส สรนฺตสฺส. ३३३. और स्वरान्त (स्वर से अन्त होने वाले) की प्रकृति (मूल रूप) बनी रहती है। ลุตฺตาสุ วิภตฺตีสุ สรนฺตสฺส อสฺส ยุตฺตตฺถภูตสฺส ติวิธสฺสปิ ลิงฺคสฺส ปกติภาโว โหติ. จสทฺเทน กึสมุทย อิทปฺปจฺจยตาทีสุ นิคฺคหีตนฺตสฺสปิ. นิมิตฺตาภาเว เนมิตฺตกาภาวสฺส อิธ อนิจฺฉิตตฺตา อยมติเทโส. विभक्तियों के लुप्त हो जाने पर, स्वरान्त और युक्तार्थ हुए तीनों लिंगों के शब्दों का प्रकृति-भाव (मूल रूप) बना रहता है। 'च' शब्द से 'किं-समुदय', 'इदं-प्रत्यय' आदि में निगृहीत (अनुस्वार) से अन्त होने वाले शब्दों का भी (प्रकृति-भाव होता है)। निमित्त के अभाव में नैमित्तिक का अभाव यहाँ अनपेक्षित होने के कारण यह अतिदेश (नियम का विस्तार) है। สกตฺถวิรเหนิธ สมาสสฺส จ ลิงฺคภาวาภาวา วิภตฺตุปฺปตฺติยมสมฺปตฺตายํ นามพฺยปเทสาติเทสมาห. यहाँ स्वार्थ (अपने अर्थ) के विरह में समास के लिंग के भाव और अभाव के कारण विभक्ति की उत्पत्ति की असम्पत्ति होने पर 'नाम' संज्ञा का अतिदेश कहा गया है। ๓๓๔. ตทฺธิตสมาสกิตกา นามํวา’ตเวตุนาทีสุ จ. ३३४. तद्धित, समास और कृदन्त (कितक) 'नाम' संज्ञक होते हैं, और 'तवे', 'तुन' आदि प्रत्ययों के होने पर भी। ตทฺธิตนฺตา[Pg.180], กิตนฺตา, สมาสา จ นามมิว ทฏฺฐพฺพา ตเวตุน ตฺวาน ตฺวาทิปฺปจฺจยนฺเต วชฺเชตฺวา. จคฺคหณํ กิจฺจปฺปจฺจยอาอีอินีอิตฺถิปฺปจฺจยนฺตาทิสฺสปิ นามพฺยปเทสตฺถํ. อิธ สมาสคฺคหณํ อตฺถวตํ สมุทายานํ นามพฺยปเทโส สมาสสฺเสวาติ นิยมตฺถนฺติ อปเร. तद्धितान्त, कृदन्त और समास को 'नाम' के समान देखना चाहिए, 'तवे', 'तुन', 'त्वान', 'त्वा' आदि प्रत्ययान्तों को छोड़कर। 'च' ग्रहण कृत्य प्रत्यय आदि और स्त्री प्रत्ययान्तों के लिए भी 'नाम' संज्ञा के अर्थ में है। यहाँ समास का ग्रहण अर्थवान समुदायों की 'नाम' संज्ञा केवल समास की ही हो, इस नियम के लिए है - ऐसा अन्य आचार्य कहते हैं। ‘‘อพฺยยีภาโว’’ติ วตฺตเต. 'अव्ययीभाव' (यह अधिकार) अनुवृत्त होता है। ๓๓๕. โส นปุํสกลิงฺโค. ३३५. वह नपुंसक लिंग होता है। โส อพฺยยีภาวสมาโส นปุํสกลิงฺโคว ทฏฺฐพฺโพติ นปุํสกลิงฺคตฺตํ. เอตฺถ หิ สติปิ ลิงฺคาติเทเส ‘‘อธิปญฺญ’’นฺติอาทีสุ ‘‘อธิญาณํ’’นฺติอาทิ รูปปฺปสงฺโค น โหติ สทฺทนฺตรตฺตา, ‘‘ติปญฺญ’’นฺติอาทีสุ วิยาติ ทฏฺฐพฺพํ, น จายํ อติเทโส, สุตฺเต อติเทสลิงฺคสฺส อิวสทฺทสฺส อทสฺสนโต. ปุเร วิย สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. वह अव्ययीभाव समास नपुंसक लिंग ही समझना चाहिए, इसलिए यह नपुंसक लिंगत्व है। यहाँ लिंग का अतिदेश होने पर भी 'अधिपञ्ञं' आदि में 'अधिञाणं' आदि रूपों की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि वे भिन्न शब्द हैं, जैसे 'तिपञ्ञं' आदि में समझना चाहिए। और यह अतिदेश नहीं है, क्योंकि सूत्र में अतिदेशवाचक 'इव' शब्द नहीं देखा जाता। पहले की तरह 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। ‘‘กฺวจี’’ติ วตฺตเต. 'क्वचि' (कभी-कभी) अनुवृत्त होता है। ๓๓๖. อํ วิภตฺตีนมการนฺตา อพฺยยีภาวา. ३३६. अकारान्त अव्ययीभावों से परे विभक्तियों का 'अं' होता है। ตสฺมา อการนฺตา อพฺยยีภาวา ปราสํ วิภตฺตีนํ กฺวจิ อํ โหติ, เสสํ เนยฺยํ. उस अकारान्त अव्ययीभाव से परे विभक्तियों का कहीं 'अं' होता है, शेष को (अन्य नियमों से) जानना चाहिए। ตํ อุปนครํ, นครสฺส สมีปํ ติฏฺฐตีติ อตฺโถ. ตานิ อุปนครํ, อาลปเนเปวํ, ตํ อุปนครํ ปสฺส, ตานิ อุปนครํ. वह उपनगर (नगर के समीप), नगर के समीप स्थित है - यह अर्थ है। वे उपनगर, सम्बोधन में भी ऐसा ही है, उस उपनगर को देखो, उन उपनगरों को। น ปญฺจมฺยายมมฺภาโว, กฺวจีติ อธิการโต; ตติยาสตฺตมีฉฏฺฐี-นนฺตุ โหติ วิกปฺปโต. पंचमी विभक्ति में यह 'अं' भाव नहीं होता, 'क्वचि' के अधिकार से; तृतीया, सप्तमी और षष्ठी में तो विकल्प से होता है। เตน อุปนครํ กตํ, อุปนคเรน วา, เตหิ อุปนครํ, อุปนคเรหิ วา, ตสฺส อุปนครํ เทหิ, เตสํ อุปนครํ, อุปนครา อานย, อุปนครมฺหา อุปนครสฺมา, อุปนคเรหิ, อุปนครํ สนฺตกํ, อุปนครสฺส วา, เตสํ อุปนครํ, อุปนครานํ วา[Pg.181], อุปนครํ นิเธหิ, อุปนครมฺหิ อุปนครสฺมึ, อุปนครํ อุปนคเรสุ วา. เอวํ อุปกุมฺภํ. उसके द्वारा उपनगर किया गया (उपनगरं या उपनगरेन), उनके द्वारा उपनगर (उपनगरं या उपनगरेहि), उसे उपनगर दो, उन्हें उपनगर, उपनगर से लाओ (उपनगरा, उपनगरम्हा, उपनगरस्मा), उपनगरों से, उपनगर का स्वत्व (उपनगरं या उपनगरस्स), उनका उपनगर (उपनगरं या उपनगरानं), उपनगर में रखो (उपनगरं, उपनगरम्हि, उपनगरस्मिं), उपनगरों में (उपनगरं या उपनगरेसु)। इसी प्रकार 'उपकुम्भं' (घड़े के समीप)। อภาเว – ทรถานํ อภาโว นิทฺทรถํ, นิมฺมสกํ. अभाव के अर्थ में - दरथ (पीड़ा) का अभाव 'निद्दरथं', मच्छरों का अभाव 'निम्मसकं'। ปจฺฉาอตฺเถ – รถสฺส ปจฺฉา อนุรถํ, อนุวาตํ. 'पश्चात्' (पीछे) के अर्थ में - रथ के पीछे 'अनुरथं', वायु के पीछे 'अनुवातं'। โยคฺคตายํ – ยถาสรูปํ, อนุรูปํ, รูปโยคฺคนฺติ อตฺโถ. योग्यता के अर्थ में - 'यथासरूपं', 'अनुरूपं', अर्थात् रूप के योग्य। วิจฺฉายํ – อตฺตานมตฺตานํ ปติ ปจฺจตฺตํ, อทฺธมาสํ อทฺธมาสํ อนุ อนฺวทฺธมาสํ. वीप्सा (दोहराव) के अर्थ में - अपने-अपने प्रति 'पच्चत्तं', प्रत्येक आधे महीने में 'अन्वद्धमासं'। อนุปุพฺพิยํ – เชฏฺฐานํ อนุปุพฺโพ อนุเชฏฺฐํ. आनुपूर्वी (क्रम) के अर्थ में - ज्येष्ठों के क्रम से 'अनुजेट्ठं'। ปฏิโลเม – โสตสฺส ปฏิโลมํ ปฏิโสตํ, ปฏิปถํ, ปติวาตํ, อตฺตานํ อธิกิจฺจ ปวตฺตา อชฺฌตฺตํ. प्रतिलोम (विपरीत) के अर्थ में - स्रोत के विपरीत 'पटिसोतं', मार्ग के विपरीत 'पटिपथं', वायु के विपरीत 'पतिवातं', आत्मा को अधिकृत कर प्रवृत्त 'अज्झत्तं'। ปริยาทาภิวิธีสุ อาปาณโกฏิยา อาปาณโกฏิกํ, ‘‘กฺวจิ สมาสนฺตคตานมการนฺโต’’ติ กปฺปจฺจโย, อากุมาเรหิ ยโส กจฺจายนสฺส อากุมารํ. पर्यादान (समाप्ति) और अभिविधि (व्याप्ति) के अर्थ में - प्राणों की कोटि (अन्त) तक 'आपाणकोटि' (यहाँ 'क्वचि समासान्तगतानामकारन्तो' सूत्र से 'क' प्रत्यय हुआ है), कुमारों तक कच्चायन का यश 'आकुमारं'। สมิทฺธิยํ – ภิกฺขาย สมิทฺธีติ อตฺเถ สมาเสว นปุํสกลิงฺคตฺเต จ กเต – समृद्धि के अर्थ में - 'भिक्षा की समृद्धि' इस अर्थ में समास और नपुंसक लिंग होने पर - ‘‘สมาสสฺส, อนฺโต’’ติ จ วตฺตเต. 'समासस्स' और 'अन्तो' अनुवृत्त होते हैं। ๓๓๗. สโร รสฺโส นปุํสเก. ३३७. नपुंसक लिंग में स्वर ह्रस्व होता है। นปุํสเก วตฺตมานสฺส สมาสสฺส อนฺโต สโร รสฺโส โหติ. เอตฺถ จ อพฺยยีภาวคฺคหณํ นานุวตฺเตตพฺพํ, เตน ทิคุทฺวนฺทพหุพฺพีหีสุปิ นปุํสเก วตฺตมานสฺส สมาสนฺตสฺสรสฺส รสฺสตฺตํ สิทฺธํ โหติ. ‘‘อํ วิภตฺตีน’’มิจฺจาทินา อมาเทโส, สุภิกฺขํ. คงฺคาย สมีเป วตฺตตีติ อุปคงฺคํ, มณิกาย สมีปํ อุปมณิกํ. नपुंसक लिंग में वर्तमान समास का अन्त्य स्वर ह्रस्व होता है। यहाँ 'अव्ययीभाव' का ग्रहण अनुवृत्त नहीं करना चाहिए, जिससे द्विगु, द्वन्द्व और बहुव्रीहि समासों में भी नपुंसक लिंग में वर्तमान समासान्त स्वर का ह्रस्व होना सिद्ध हो जाता है। 'अं विभत्तीनं' आदि सूत्र से 'अं' आदेश होकर 'सुभिक्खं' बनता है। गंगा के समीप है - 'उपगङ्गं', मणिका (घड़े) के समीप 'उपमणिकं'। อิตฺถีสุ [Pg.182] อมิกิจฺจาติ อตฺเถ สมาสนปุํสกรสฺสตฺตาทีสุ กเตสุ – 'स्त्रियों के विषय में' इस अर्थ में समास, नपुंसक लिंग और ह्रस्व आदि होने पर - ‘‘อพฺยยีภาวา, วิภตฺตีน’’นฺติ จ วตฺตเต. 'अव्ययीभावा' और 'विभत्तीनं' अनुवृत्त होते हैं। ๓๓๘. อญฺญสฺมา โลโป จ. ३३८. अन्य से (विभक्तियों का) लोप भी होता है। อการนฺตโต อญฺญสฺมา อพฺยยีภาวสมาสา ปราสํ วิภตฺตีนํ โลโป จ โหติ. อธิตฺติ, อิตฺถีสุ อธิกิจฺจ กถา ปวตฺตตีติ อตฺโถ. อธิตฺถิ ปสฺส, อธิตฺถิ กตํ อิจฺจาทิ, เอวํ อธิกุมาริ, วธุยา สมีปํ อุปวธุ, คุนฺนํ สมีปํ อุปคุ, โอการสฺส รสฺสตฺตํ อุกาโร. เอวํ อุปสคฺคปุพฺพโก. अकारान्त से भिन्न अव्ययीभाव समास से परे विभक्तियों का लोप भी होता है। 'अधित्थि' - स्त्रियों के विषय में कथा प्रवृत्त होती है, यह अर्थ है। 'अधित्थि' को देखो, 'अधित्थि' किया गया इत्यादि। इसी प्रकार 'अधिकुमारि', वधू के समीप 'उपवधु', गायों के समीप 'उपगु' (यहाँ ओ-कार का ह्रस्व उ-कार हुआ है)। इस प्रकार उपसर्ग-पूर्वक (अव्ययीभाव) है। นิปาตปุพฺพโก ยถา – วุฑฺฒานํ ปฏิปาฏิ, เย เย วุฑฺฒา วา ยถาวุฑฺฒํ, ปทตฺถานติกฺกเม – ยถากฺกมํ, ยถาสตฺติ, ยถาพลํ กโรติ, พลมนติกฺกมิตฺวา กโรตีติ อตฺโถ. ชีวสฺส ยตฺตโก ปริจฺเฉโท ยาวชีวํ, ยาวตายุกํ, กปฺปจฺจโย. ยตฺตเกน อตฺโถ ยาวทตฺถํ, ปพฺพตสฺส ปรภาโค ติโรปพฺพตํ, ติโรปาการํ, ติโรกุฏฺฏํ, ปาสาทสฺส อนฺโต อนฺโตปาสาทํ, อนฺโตนครํ, อนฺโตวสฺสํ, นครสฺส พหิ พหินครํ, ปาสาทสฺส อุปริ อุปริปาสาทํ, อุปริมญฺจํ, มญฺจสฺส เหฏฺฐา เหฏฺฐามญฺจํ, เหฏฺฐาปาสาทํ, ภตฺตสฺส ปุเร ปุเรภตฺตํ, เอวํ ปจฺฉาภตฺตํ. निपात-पूर्वक जैसे - वृद्धों की परिपाटी या जो-जो वृद्ध हैं 'यथावुड्ढं'। पदार्थ का अनतिक्रमण (उल्लंघन न करना) - 'यथाक्कमं', 'यथासत्ति', 'यथाबलं' करता है, अर्थात् बल का उल्लंघन न करते हुए करता है। जीवन की जितनी सीमा है 'यावजीवं', 'यावतायुकं' ('क' प्रत्यय)। जितने से प्रयोजन है 'यावदत्थं'। पर्वत का परला भाग 'तिरोपब्बतं', 'तिरोपाकारं', 'तिरोकुट्टं'। प्रासाद (महल) के भीतर 'अन्तोपासादं', 'अन्तोनगरं', 'अन्तोवस्सं'। नगर के बाहर 'बहिनगरं'। प्रासाद के ऊपर 'उपरिपासादं', 'उपरिमिञ्चं'। मंच के नीचे 'हेट्ठामञ्चं', 'हेट्ठापासादं'। भोजन से पहले 'पुरेभत्तं', इसी प्रकार 'पच्छाभत्तं'। สากลฺลตฺเถ – สห มกฺขิกาย สมกฺขิกํ ภุญฺชติ, น กิญฺจิ ปริวชฺเชตีติ อตฺโถ. ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา สหสทฺทสฺส สาเทโส. คงฺคาย โอรํ โอรคงฺคมิจฺจาทิ. साकल्य (सम्पूर्णता) के अर्थ में - मक्खी सहित 'समक्खिकं' खाता है, अर्थात् कुछ भी नहीं छोड़ता। 'तेसु वुद्धि' आदि सूत्र से 'सह' शब्द को 'स' आदेश हुआ है। गंगा के इस पार 'ओरगङ्गं' इत्यादि। อพฺยยีภาวสมาโส นิฏฺฐิโต. अव्ययीभाव समास समाप्त हुआ। กมฺมธารยสมาส कर्मधारय समास อถ [Pg.183] กมฺมธารยสมาโส วุจฺจเต. अब कर्मधारय समास कहा जाता है। โส จ นววิโธ วิเสสนปุพฺพปโท วิเสสนุตฺตรปโท วิเสสโนภยปโท อุปมานุตฺตรปโท สมฺภาวนาปุพฺพปโท อวธารณปุพฺพปโท นนิปาตปุพฺพปโท กุปุพฺพปโท ปาทิปุพฺพปโท จาติ. और वह नौ प्रकार का है: विशेषणपूर्वपद, विशेषणोत्तरपद, विशेषणोभयपद, उपमानोत्तरपद, संभावनापूर्वपद, अवधारणापूर्वपद, न-निपातपूर्वपद, कु-पूर्वपद और प्रादि-पूर्वपद। ตตฺถ วิเสสนปุพฺพปโท ตาว – ‘‘มหนฺต ปุริส’’อิตีธ อุภยตฺถ ปฐเมกวจนํ สิ, ตุลฺยาธิกรณภาวปฺปสิทฺธตฺถํ จสทฺท ตสทฺทปฺปโยโค, มหนฺโต จ โส ปุริโส จาติ วิคฺคเห – उनमें से पहले विशेषणपूर्वपद (का उदाहरण) - 'महन्त पुरिस' यहाँ दोनों में प्रथमा एकवचन 'सि' है, समानाधिकरण भाव की सिद्धि के लिए 'च' शब्द और 'त' शब्द का प्रयोग होता है, 'महन्तो च सो पुरिसो च' (वह जो महान है और पुरुष है) इस विग्रह में - อิโต ปรํ ‘‘วิภาสา รุกฺขติณ’’อิจฺจาทิโต ‘‘วิภาสา’’ติ สมาสวิธาเน สพฺพตฺถ วตฺตเต. इसके बाद 'विभासा रुक्खतिण' इत्यादि से 'विभासा' (विकल्प से) यह शब्द समास विधान में सर्वत्र अनुवृत्त होता है। ๓๓๙. ทฺวิปเท ตุลฺยาธิกรเณ กมฺมธารโย. ३३९. दो समानाधिकरण पदों में कर्मधारय (समास होता है)। ทฺเว ปทานิ นามิกานิ ตุลฺยาธิกรณานิ อญฺญมญฺเญน สห วิภาสา สมสฺยนฺเต, ตสฺมึ ทฺวิปเท ตุลฺยาธิกรเณ สติ โส สมาโส กมฺมธารยสญฺโญ จ โหติ. दो नामिक (संज्ञा) पद जो समानाधिकरण हों, वे परस्पर विकल्प से समास को प्राप्त होते हैं, उस दो पदों के समानाधिकरण होने पर वह समास 'कर्मधारय' संज्ञा वाला होता है। ทฺเว ปทานิ ทฺวิปทํ, ตุลฺยํ สมานํ อธิกรณํ อตฺโถ ยสฺส ปททฺวยสฺส ตํ ตุลฺยาธิกรณํ, ตสฺมึ ทฺวิปเท ตุลฺยาธิกรเณ. ภินฺนปฺปวตฺตินิมิตฺตานํ ทฺวินฺนํ ปทานํ วิเสสนวิเสสิตพฺพภาเวน เอกสฺมึ อตฺเถ ปวตฺติ ตุลฺยาธิกรณตา. กมฺมมิว ทฺวยํ ธารยตีติ กมฺมธารโย. ยถา หิ กมฺมํ กฺริยญฺจ ปโยชนญฺจ ทฺวยํ ธารยติ, กมฺเม สติ กฺริยาย, ปโยชนสฺส จ สมฺภวโต, ตถา อยํ สมาโส เอกสฺส อตฺถสฺส ทฺเว นามานิ ธารยติ, ตสฺมึ สมาเส สติ เอกตฺถโชตกสฺส นามทฺวยสฺส สมฺภวโต. दो पद 'द्विपद' हैं; समान है अधिकरण (अर्थ) जिस पद-युगल का, वह 'समानाधिकरण' है; उस द्विपद समानाधिकरण में। भिन्न-भिन्न प्रवृत्ति-निमित्तों वाले दो पदों की विशेषण-विशेष्य भाव से एक ही अर्थ में प्रवृत्ति 'समानाधिकरणता' है। कर्म के समान दो को धारण करता है, इसलिए 'कर्मधारय' है। जैसे कर्म क्रिया और प्रयोजन इन दोनों को धारण करता है, क्योंकि कर्म होने पर क्रिया और प्रयोजन संभव होते हैं, वैसे ही यह समास एक ही अर्थ के दो नामों को धारण करता है, क्योंकि उस समास के होने पर एक ही अर्थ को बताने वाले दो नामों का होना संभव होता है। ปุเร [Pg.184] วิย สมาสสญฺญาวิภตฺติโลปปกติภาวา, สมาเสเนว ตุลฺยาธิกรณภาวสฺส วุตฺตตฺตา ‘‘วุตฺตตฺถานมปฺปโยโค’’ติ จสทฺท ตสทฺทานมปฺปโยโค. पहले की तरह समास-संज्ञा, विभक्ति-लोप और प्रकृति-भाव होते हैं; समास के द्वारा ही समानाधिकरण भाव के कह दिए जाने के कारण 'उक्तार्थानामप्रयोगः' (कहे हुए अर्थों का प्रयोग नहीं होता) इस नियम से 'च' शब्द और 'त' शब्द का प्रयोग नहीं होता। ๓๔๐. มหตํ มหา ตุลฺยาธิกรเณ ปเท. ३४०. समानाधिकरण पद परे होने पर 'महन्त' को 'महा' (आदेश होता है)। มหนฺต สทฺทสฺส มหา โหติ ตุลฺยาธิกรเณ อุตฺตรปเท ปเร. มหตนฺติ พหุวจนคฺคหเณน กฺวจิ มหอาเทโส จ, เอตฺถ จ วิเสสนสฺส ปุพฺพนิปาโต วิเสสนภูตสฺส ปุพฺพปทสฺส มหาเทสวิธานโตว วิญฺญายติ. समानाधिकरण उत्तरपद परे होने पर 'महन्त' शब्द को 'महा' होता है। 'महतं' इस बहुवचन ग्रहण से कहीं 'मह' आदेश भी होता है, और यहाँ विशेषण का पूर्व-निपात विशेषण रूप पूर्वपद के लिए 'महा' आदेश के विधान से ही ज्ञात होता है। ‘‘กมฺมธารโย, ทิคู’’ติ จ วตฺตเต. 'कर्मधारय' और 'दिगु' की अनुवृत्ति होती है। ๓๔๑. อุเภ ตปฺปุริสา. ३४१. दोनों तत्पुरुष हैं। อุเภ กมฺมธารยทิคุสมาสา ตปฺปุริสสญฺญา โหนฺติ. कर्मधारय और द्विगु दोनों समास 'तत्पुरुष' संज्ञा वाले होते हैं। ตสฺส ปุริโส ตปฺปุริโส, ตปฺปุริสสทิสตฺตา อยมฺปิ สมาโส อนฺวตฺถสญฺญาย ตปฺปุริโสติ วุตฺโต. ยถา หิ ตปฺปุริสสทฺโท คุณมติวตฺโต, ตถา อยํ สมาโสปิ. อุตฺตรปทตฺถปฺปธาโน หิ ตปฺปุริโสติ. ตโต นามพฺยปเทโส สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. อยํ ปน ตปฺปุริโส อภิเธยฺยวจโน, ปรลิงฺโค จ. 'तस्स पुरिसो' (उसका पुरुष) 'तप्पुरिसो' है; तत्पुरुष के समान होने के कारण यह समास भी अन्वर्थ संज्ञा से 'तत्पुरुष' कहा गया है। जैसे तत्पुरुष शब्द गुणों का अतिक्रमण करता है, वैसे ही यह समास भी। क्योंकि तत्पुरुष उत्तरपद के अर्थ की प्रधानता वाला होता है। उसके बाद नाम की संज्ञा और सुप् आदि की उत्पत्ति होती है। यह तत्पुरुष अभिधेय (विशेष्य) के अनुसार वचन वाला और परलिंग (उत्तरपद के लिंग वाला) होता है। มหาปุริโส, มหาปุริสา อิจฺจาทิ ปุริสสทฺทสมํ, เอวํ มหาวีโร, มหามุนิ, มหนฺตญฺจ ตํ พลญฺจาติ มหาพลํ, มหพฺภยํ, มหอาเทโส. สนฺโต จ โส ปุริโส จาติ สปฺปุริโส, ‘‘สนฺตสทฺทสฺส โส เภ โพ จนฺเต’’ติ เอตฺถ จสทฺเทน สนฺตสทฺทสฺส สมาเส อภกาเรปิ สาเทโส, ตถา ปุพฺพปุริโส, ปรปุริโส, ปฐมปุริโส, มชฺฌิมปุริโส, อุตฺตมปุริโส, ทนฺตปุริโส, ปรมปุริโส, วีรปุริโส, เสตหตฺถี, กณฺหสปฺโป, นีลุปฺปลํ, โลหิตจนฺทนํ. महापुरिसो, महापुरिसा इत्यादि 'पुरिस' शब्द के समान हैं; इसी प्रकार महावीरो, महामुनि; 'महन्तं च तं बलं च' इस विग्रह में 'महाबलं', 'महब्भयं' (यहाँ 'मह' आदेश है)। 'सन्तो च सो पुरिसो च' इस विग्रह में 'सप्पुरिसो'; 'सन्तसद्दस्स सो भे बो चन्ते' यहाँ 'च' शब्द से 'सन्त' शब्द के समास में 'अ'कार न होने पर भी 'स' आदेश होता है; वैसे ही पुब्बपुरिसो, परपुरिसो, पठमपुरिसो, मज्झिमपुरिसो, उत्तमपुरिसो, दन्तपुरिसो, परमपुरिसो, वीरपुरिसो, सेतहत्थी, कण्हसप्पो, नीलुपलं, lohitacandanaṃ। กฺวจิ [Pg.185] วิภาสาธิการโต น ภวติ, ยถา – ปุณฺโณ มนฺตานิปุตฺโต, จิตฺโต คหปติ, สกฺโก เทวราชาติ. कहीं 'विभासा' (विकल्प) के अधिकार से (समास) नहीं होता, जैसे - पुण्णो मन्तानिपुत्तो, चित्तो गहपति, सक्को देवराजा। ปุมา จ โส โกกิโล จาติ อตฺเถ สมาเส กเต – 'पुमा च सो कोकिलो च' (वह जो नर है और कोयल है) इस अर्थ में समास होने पर - ‘‘โลป’’นฺติ วตฺตเต. 'लोप' की अनुवृत्ति होती है। ๓๔๒. ปุมสฺส ลิงฺคาทีสุ สมาเสสุ. ३४२. लिंग आदि परे होने पर समासों में 'पुम' का (लोप होता है)। ปุมอิจฺเจตสฺส อนฺโต อกาโร โลปมาปชฺชเต ลิงฺคาทีสุ ปรปเทสุ สมาเสสุ, ‘‘อํโม นิคฺคหีตํ ฌลเปหี’’ติ มการสฺส นิคฺคหีตํ. ปุงฺโกกิโล. เอวํ ปุนฺนาโค. 'पुम' इसके अन्त्य 'अ'कार का लिंग आदि उत्तरपद परे होने पर समासों में लोप हो जाता है; 'अंमो निग्गहीतं झलपेहि' सूत्र से 'म'कार को निग्गहीत (अनुस्वार) होता है। 'पुंकोकिलो'। इसी प्रकार 'पुन्नागो'। ขตฺติยา จ สา กญฺญา จาติ วิคฺคยฺห สมาเส กเต – 'खत्तिया च सा कञ्ञा च' (वह जो क्षत्रिया है और कन्या है) ऐसा विग्रह करके समास होने पर - ‘‘ตุลฺยาธิกรเณ, ปเท, อิตฺถิยํ ภาสิตปุมิตฺถี ปุมาว เจ’’ติ จ วตฺตเต. 'तुल्याधिकरणे, पदे, इत्थियं भासितपुमित्थी पुमाव चे' की अनुवृत्ति होती है। ๓๔๓. กมฺมธารยสญฺเญ จ. ३४३. और कर्मधारय संज्ञा होने पर। กมฺมธารยสญฺเญ จ สมาเส อิตฺถิยํ วตฺตมาเน ตุลฺยาธิกรเณ อุตฺตรปเท ปเร ปุพฺพภูโต อิตฺถิวาจโก สทฺโท ปุพฺเพ ภาสิตปุมา เจ, โส ปุมา อิว ทฏฺฐพฺโพติ ปุพฺพปเท อิตฺถิปฺปจฺจยสฺส นิวตฺติ โหติ. कर्मधारय संज्ञक समास में स्त्रीलिंग में वर्तमान समानाधिकरण उत्तरपद परे होने पर, पूर्व में स्थित स्त्रीवाचक शब्द यदि पहले पुल्लिंग में बोला गया हो (भासितपुंस्क), तो उसे पुल्लिंग के समान देखा जाना चाहिए, इस प्रकार पूर्वपद में स्त्री-प्रत्यय की निवृत्ति (लोप) हो जाती है। ขตฺติยกญฺญา, ขตฺติยกญฺญาโย อิจฺจาทิ. เอวํ รตฺตลตา, ทุติยภิกฺขา, พฺราหฺมณี จ สา ทาริกา จาติ พฺราหฺมณทาริกา, นาคมาณวิกา. खत्तियकञ्ञा, खत्तियकञ्ञायो इत्यादि। इसी प्रकार रत्तलता, दुतियभिक्खा; 'ब्राह्मणी च सा दारिका च' इस विग्रह में 'ब्राह्मणदारिका', 'नागमाणविका'। ปุพฺพปทสฺเสวายํ ปุมฺภาวาติเทโส, เตน ‘‘ขตฺติยกุมารี กุมารสมณี ตรุณพฺราหฺมณี’’ติอาทีสุ อุตฺตรปเทสุ อิตฺถิปฺปจฺจยสฺส น นิวตฺติ โหติ. यह पुंवद्भाव का अतिदेश केवल पूर्वपद के लिए है, इसलिए 'खत्तियकुमारी, कुमारसमणी, तरुणब्राह्मणी' इत्यादि में उत्तरपदों में स्त्री-प्रत्यय की निवृत्ति नहीं होती। อิตฺถิยมิจฺเจว [Pg.186] กึ? กุมารีรตนํ, สมณีปทุมํ. 'स्त्रीलिंग में' ऐसा क्यों कहा? कुमारीरतनं, समणीपदुमं। ภาสิตปุมาติ กึ? คงฺคานที, ตณฺหานที, ปถวีธาตุ. ‘‘นนฺทาโปกฺขรณี, นนฺทาเทวี’’ติอาทีสุ ปน สญฺญาสทฺทตฺตา น โหติ. 'भासितपुंस्क' (जो पहले पुल्लिंग में प्रयुक्त हुआ हो) ऐसा क्यों कहा? गंगानदी, तण्हानदी, पठवीधातु। 'नन्दापोक्खरणी, नन्दादेवी' इत्यादि में संज्ञा शब्द होने के कारण (पुंवद्भाव) नहीं होता। ตถา ปุรตฺถิโม จ โส กาโย จาติ ปุรตฺถิมกาโย, เอตฺถ จ กาเยกเทโส กายสทฺโท. เอวํ ปจฺฉิมกาโย, เหฏฺฐิมกาโย, อุปริมกาโย, สพฺพกาโย, ปุราณวิหาโร, นวาวาโส, กตรนิกาโย, กตมนิกาโย, เหตุปฺปจฺจโย, อพหุลํ พหุลํ กตนฺติ พหุลีกตํ, ชีวิตปฺปธานํ นวกํ ชีวิตนวกํ อิจฺจาทิ. वैसे ही 'पुरत्थिमों च सो कायो च' इस विग्रह में 'पुरत्थिमकायो', यहाँ 'काय' शब्द काय के एक भाग (अवयव) के लिए है। इसी प्रकार पच्छिमकायो, हेट्ठिमकायो, उपरििमकायो, सब्बकायो, पुराणविहारो, नवावासो, कतरनिकायो, कतमनिकायो, हेतुप्पच्चयो; 'अबहुलं बहुलं कतं' इस विग्रह में 'बहुलीकतं'; 'जीवितप्पधानं नवकं' इस विग्रह में 'जीवितनवकं' इत्यादि। วิเสสนุตฺตรปเท ชินวจนานุปโรธโต เถราจริยปณฺฑิตาทิ วิเสสนํ ปรญฺจ ภวติ. ยถา – สาริปุตฺโต จ โส เถโร จาติ สาริปุตฺตตฺเถโร. เอวํ มหาโมคฺคลฺลานตฺเถโร, มหากสฺสปตฺเถโร, พุทฺธโฆสาจริโย, ธมฺมปาลาจริโย, อาจริยคุตฺติโลติ วา, มโหสโธ จ โส ปณฺฑิโต จาติ มโหสธปณฺฑิโต. เอวํ วิธุรปณฺฑิโต, วตฺถุวิเสโส. विशेषणोत्तरपद (Visesanuttarapada) में, जिन-वचनों (बुद्ध वचनों) के विरोध के बिना, स्थविर, आचार्य, पण्डित आदि विशेषण बाद में भी आते हैं। जैसे - वह जो सारिपुत्त है और वह जो स्थविर है - सारिपुत्तत्थेरो (सारिपुत्र स्थविर)। इसी प्रकार महामोग्गल्लानत्थेरो, महाकस्सपत्थेरो, बुद्धघोसाचरियो, धम्मपालाचरियो, आचार्यगुत्तिलो अथवा, वह जो महोसध है और वह जो पण्डित है - महोसधपण्डितो। इसी प्रकार विधुरपण्डितो, वस्तुविशेष। วิเสสโนภยปโท ยถา – สีตญฺจ ตํ อุณฺหญฺจาติ สีตุณฺหํ, สินิทฺโธ จ โส อุณฺโห จาติ สินิทฺธุณฺโห, มาโส. ขญฺโช จ โส ขุชฺโช จาติ ขญฺชขุชฺโช. เอวํ อนฺธพธิโร, กตากตํ, ฉิทฺทาวฉิทฺทํ, อุจฺจาวจํ, ฉินฺนภินฺนํ, สิตฺตสมฺมฏฺฐํ, คตปจฺจาคตํ. विशेषणोभयपद जैसे - जो शीतल है और जो उष्ण है - सीतुण्हं (शीतोष्ण), स्निग्ध और जो उष्ण है - सिनिद्धुण्हो (स्निग्धोष्ण), मास (महीना)। जो लंगड़ा है और जो कुबड़ा है - खञ्जखुज्जो (खञ्जकुब्ज)। इसी प्रकार अन्धबधिरो, कृताकृतं (किया हुआ और न किया हुआ), छिद्रावछिद्रं, उच्चावचं, छिन्नभिन्नं, सिक्तसम्मट्ठं (सींचा हुआ और बुहारा हुआ), गतपच्चागतं (गया हुआ और लौटा हुआ)। อุปมานุตฺตรปเท อภิธานานุโรธโต อุปมานภูตํ วิเสสนํ ปรํ ภวติ. ยถา – สีโห วิย สีโห, มุนิ จ โส สีโห จาติ มุนิสีโห. เอวํ มุนิวสโภ, มุนิปุงฺคโว, พุทฺธนาโค, พุทฺธาทิจฺโจ, รํสิ วิย รํสิ, สทฺธมฺโม จ [Pg.187] โส รํสิ จาติ สทฺธมฺมรํสิ. เอวํ วินยสาคโร, ปุณฺฑรีกมิว ปุณฺฑรีโก, สมโณ จ โส ปุณฺฑรีโก จาติ สมณปุณฺฑรีโก, สมณปทุโม. จนฺโท วิย จนฺโท, มุขญฺจ ตํ จนฺโท จาติ มุขจนฺโท. เอวํ มุขปทุมํ อิจฺจาทิ. उपमानोत्तरपद में, अभिधान (नाम/शब्द) के अनुरोध से उपमान-भूत विशेषण बाद में होता है। जैसे - सिंह के समान सिंह, वह जो मुनि है और वह जो सिंह है - मुनिसिहो (मुनिसिंह)। इसी प्रकार मुनिवसभो (मुनिवृषभ), मुनिपुङ्गवो, बुद्धनागो, बुद्धादिच्चो (बुद्धादित्य), रश्मि के समान रश्मि, वह जो सद्धर्म है और वह जो रश्मि है - सद्धम्मरंसि (सद्धर्मरश्मि)। इसी प्रकार विनयसागरो, पुण्डरीक के समान पुण्डरीक, वह जो श्रमण है और वह जो पुण्डरीक है - समणपुण्डरीको, समणपदुमो। चन्द्र के समान चन्द्र, वह जो मुख है और वह जो चन्द्र है - मुखचन्दो। इसी प्रकार मुखपदुमं इत्यादि। สมฺภาวนาปุพฺพปโท ยถา – ธมฺโม อิติ พุทฺธิ ธมฺมพุทฺธิ. เอวํ ธมฺมสญฺญา, ธมฺมสงฺขาโต, ธมฺมสมฺมโต, ปาณสญฺญิตา, อสุภสญฺญา, อนิจฺจสญฺญา, อนตฺตสญฺญา, ธาตุสญฺญา, ธีตุสญฺญา, อตฺตสญฺญา, อตฺถิสญฺญา, อตฺตทิฏฺฐิ อิจฺจาทิ. सम्भावनापूर्वपद जैसे - 'धम्म' ऐसी बुद्धि - धम्मबुद्धि। इसी प्रकार धम्मसञ्ञा, धम्मसङ्खातो, धम्मसम्मतो, पाणसञ्ञिता (प्राण-संज्ञा), असुभसञ्ञा, अनिच्चसञ्ञा, अनत्तसञ्ञा, धातुसञ्ञा, धीतुसञ्ञा (पुत्री-संज्ञा), अत्तसञ्ञा, अत्थिसञ्ञा (अस्थि-संज्ञा), अत्तदिट्ठि इत्यादि। อวธารณปุพฺพปโท ยถา – คุโณ เอว ธนํ คุณธนํ. เอวํ สทฺธาธนํ, สีลธนํ, ปญฺญาธนํ, จกฺขุ เอว อินฺทฺริยํ จกฺขุนฺทฺริยํ. เอวํ จกฺขายตนํ, จกฺขุธาตุ, จกฺขุทฺวารํ, รูปารมฺมณมิจฺจาทิ. अवधारणापूर्वपद जैसे - गुण ही धन है - गुणधनं। इसी प्रकार सद्धाधनं (श्रद्धाधन), सीलधनं, पञ्ञाधनं, चक्षु ही इन्द्रिय है - चक्खुन्द्रियं। इसी प्रकार चक्खायतनं, चक्खुधातु, चक्खुद्वारं, रूपारम्मणं इत्यादि। นนิปาตปุพฺพปโท ยถา – น พฺราหฺมโณติ อตฺเถ กมฺมธารยสมาเส, วิภตฺติโลปาทิมฺหิ จ กเต – न-निपातपूर्वपद जैसे - 'न ब्राह्मण' इस अर्थ में कर्मधारय समास होने पर, विभक्ति-लोप आदि कर देने पर - ‘‘อุเภ ตปฺปุริสา’’ติ ตปฺปุริสสญฺญา. "उभे तत्पुरिसा" (दोनों तत्पुरुष हैं) - इस सूत्र से तत्पुरुष संज्ञा होती है। ๓๔๔. อตฺตํ นสฺส ตปฺปุริเส. ३४४. तत्पुरुष समास में 'न' के स्थान पर 'अ' हो जाता है। นสฺส นิปาตปทสฺส ตปฺปุริเส อุตฺตรปเท ปเร สพฺพสฺเสว อตฺตํ โหติ. ตปฺปุริเสกเทสตฺตา ตปฺปุริโส, อพฺราหฺมโณ. तत्पुरुष समास में उत्तरपद परे होने पर 'न' इस निपात पद के सम्पूर्ण स्थान पर 'अ' हो जाता है। तत्पुरुष का एक देश (अंश) होने के कारण यह तत्पुरुष है, जैसे - अब्राह्मणो। น นิเสโธ สโต ยุตฺโต,เทสาทินิยมํ วินา; อสโต จาผโล ตสฺมา,กถมพฺราหฺมโณติ เจ? यदि यह कहा जाए कि - "विद्यमान (सत्) का निषेध देश आदि के नियम के बिना युक्त नहीं है, और अविद्यमान (असत्) का निषेध निष्फल है, तो फिर 'अब्राह्मण' कैसे सिद्ध होता है?" นิเสธตฺถานุวาเทน, ปฏิเสธวิธิ กฺวจิ; ปรสฺส มิจฺฉาญาณตฺตา-ขฺยาปนาโยปปชฺชเต. निषेध के अर्थ के अनुवाद के द्वारा, कहीं-कहीं प्रतिषेध की विधि दूसरे के मिथ्या ज्ञान को प्रकट करने के लिए उपपन्न (संगत) होती है। ทุวิโธ จสฺสตฺโถ ปสชฺชปฺปฏิเสธปริยุทาสวเสน. और इसका अर्थ प्रसज्य-प्रतिषेध और पर्युदास के भेद से दो प्रकार का है। ตตฺถ [Pg.188] โย ‘‘อสูริยปสฺสา ราชทารา’’ติอาทีสุ วิย อุตฺตรปทตฺถสฺส สพฺพถา อภาวํ ทีเปติ, โส ปสชฺชปฺปฏิเสธวาจี นาม. โย ปน ‘‘อพฺราหฺมณ อมนุสฺสา’’ติอาทีสุ วิย อุตฺตรปทตฺถํ ปริยุทาสิตฺวา ตํสทิเส วตฺถุมฺหิ การิยํ ปฏิปาทยติ, โส ปริยุทาสวาจี นาม. उनमें से जो "असूर्यमपश्या राजदारा" (सूर्य को न देखने वाली राज-पत्नियां) आदि के समान उत्तरपद के अर्थ के सर्वथा अभाव को सूचित करता है, वह 'प्रसज्य-प्रतिषेधवाची' कहलाता है। और जो "अब्राह्मण, अमानुष" आदि के समान उत्तरपद के अर्थ को वर्जित (पर्युदास) करके उसके सदृश वस्तु में कार्य का प्रतिपादन करता है, वह 'पर्युदासवाची' कहलाता है। วุตฺตญฺจ और कहा गया है - ‘‘ปสชฺชปฺปฏิเสธสฺส, ลกฺขณํ วตฺถุนตฺถิตา; วตฺถุโต อญฺญตฺร วุตฺติ, ปริยุทาสลกฺขณ’’นฺติ. "प्रसज्य-प्रतिषेध का लक्षण वस्तु की अविद्यमानता (नास्तित्व) है; वस्तु से भिन्न अन्य में वृत्ति (होना) पर्युदास का लक्षण है।" นนฺเววํ สนฺเตปิ ‘‘อพฺราหฺมโณ’’ติอาทีสุ กถมุตฺตรปทตฺถปฺปธานตา สิยาติ? ननु (प्रश्न), ऐसा होने पर भी 'अब्राह्मण' आदि में उत्तरपद के अर्थ की प्रधानता कैसे होगी? วุจฺจเต – พฺราหฺมณาทิสทฺทานํ พฺราหฺมณาทิอตฺถสฺเสว ตํสทิสาทิอตฺถสฺสาปิ วาจกตฺตา, พฺราหฺมณาทิสทฺทา หิ เกวลาพฺราหฺมณาทิอตฺเถสฺเวว ปากฏา, ภูสทฺโท วิยสตฺตายํ, ยทา เต ปน อญฺเญน สทิสาทิวาจเกน นอิติ นิปาเตน ยุชฺชนฺติ, ตทา ตํสทิสตทญฺญตพฺพิรุทฺธตทภาเวสุปิ วตฺตนฺติ, ภูสทฺโท วิย อนฺวภิยาทิโยเค อนุภวนอภิภวนาทีสุ, ตสฺมา อุตฺตรปทตฺถโชตโกเยเวตฺถ นอิติ นิปาโตติ น โทโส, เตน อพฺราหฺมโณติ พฺราหฺมณสทิโสติ วุตฺตํ โหติ. เอวํ อมนุสฺโส, อสฺสมโณ. कहा जाता है - ब्राह्मण आदि शब्दों के ब्राह्मण आदि अर्थ के समान ही उसके सदृश आदि अर्थों का भी वाचक होने के कारण; क्योंकि ब्राह्मण आदि शब्द केवल ब्राह्मण आदि अर्थों में ही प्रसिद्ध हैं, जैसे 'भू' शब्द सत्ता के अर्थ में; परन्तु जब वे किसी अन्य सदृश आदि के वाचक 'न' आदि निपात से युक्त होते हैं, तब वे उसके सदृश, उससे भिन्न, उसके विरुद्ध और उसके अभाव के अर्थों में भी प्रवृत्त होते हैं, जैसे 'भू' शब्द 'अनु', 'अभि', 'वि', 'आ' आदि के योग में अनुभव, अभिभव आदि अर्थों में। इसलिए यहाँ 'न' निपात उत्तरपद के अर्थ का द्योतक ही है, अतः कोई दोष नहीं है; इसलिए 'अब्राह्मण' का अर्थ 'ब्राह्मण के सदृश' कहा गया है। इसी प्रकार अमानुस्सो (अमनुष्य), अस्समणो (अश्रमण)। อญฺญตฺเถ – น พฺยากตา อพฺยากตา, อสํกิลิฏฺฐา, อปริยาปนฺนา. अन्य अर्थ में - जो व्याकृत नहीं हैं - अब्याकता (अव्याकृत), असङ्किलिट्ठा (असंक्लिष्ट), अपरियापन्ना (अपर्यापन्न)। วิรุทฺธตฺเถ – น กุสลา อกุสลา, กุสลปฏิปกฺขาติ อตฺโถ. เอวํ อโลโภ, อมิตฺโต. विरुद्ध अर्थ में - जो कुशल नहीं हैं - अकुसला (अकुशल), अर्थात् कुशल के प्रतिपक्ष। इसी प्रकार अलोभो, अमित्तो (अमित्र)। ปสชฺชปฺปฏิเสเธ – น กตฺวา อกตฺวา, อกาตุน ปุญฺญํ อกโรนฺโต. प्रसज्य-प्रतिषेध में - न करके - अकत्वा, अकातून (न करके), पुण्य न करता हुआ। ‘‘นสฺส, ตปฺปุริเส’’ติ จ วตฺตเต. "नस्स, तत्पुरिसे" (तत्पुरुष में न के स्थान पर) - इसकी अनुवृत्ति होती है। ๓๔๕. สเร [Pg.189] อน. ३४५. स्वर परे होने पर 'अन' हो जाता है। นอิจฺเจตสฺส ปทสฺส ตปฺปุริเส อุตฺตรปเท อน โหติ สเร ปเร. तत्पुरुष समास में उत्तरपद में स्वर परे होने पर 'न' इस पद के स्थान पर 'अन' हो जाता है। น อสฺโส อนสฺโส, น อริโย อนริโย. เอวํ อนิสฺสโร, อนิฏฺโฐ, อนุปวาโท, น อาทาย อนาทาย, อโนโลเกตฺวา อิจฺจาทิ. न अश्व - अनस्सो (अनश्व), न आर्य - अनरियो (अनार्य)। इसी प्रकार अनिस्सरो (अनीश्वर), अनिट्ठो (अनिष्ट), अनुपवादो, न लेकर - अनादाय, न देखकर - अनोलोकेत्वा इत्यादि। กุปุพฺพปโท ยถา – กุจฺฉิตมนฺนนฺติ นิจฺจสมาสตฺตา อญฺญปเทน วิคฺคโห, กมฺมธารยสมาเส กเต – कु-पूर्वपद जैसे - 'कुत्सित अन्न' - नित्य समास होने के कारण अन्य पद से विग्रह होता है, कर्मधारय समास होने पर - ‘‘ตปฺปุริเส, สเร’’ติ จ วตฺตเต. "तत्पुरिसे, सरे" - इसकी अनुवृत्ति होती है। ๓๔๖. กทท กุสฺส. ३४६. 'कु' के स्थान पर 'कद' आदेश होता है। กุอิจฺเจตสฺส นิปาตสฺส ตปฺปุริเส อุตฺตรปเท กท โหติ สเร ปเร. กทนฺนํ. เอวํ กทสนํ. तत्पुरुष समास में उत्तरपद में स्वर परे होने पर 'कु' इस निपात के स्थान पर 'कद' हो जाता है। कदन्नं (कुत्सित अन्न)। इसी प्रकार कदसनं (कुत्सित भोजन)। สเรติ กึ? กุทารา, กุปุตฺตา, กุทาสา, กุทิฏฺฐิ. 'स्वर परे होने पर' ऐसा क्यों कहा? (व्यंजन परे होने पर नहीं होता, जैसे -) कुदारा (कुत्सित पत्नी), कुपुत्ता (कुत्सित पुत्र), कुदासा (कुत्सित दास), कुदिट्ठि (कुत्सित दृष्टि/कुदृष्टि)। ‘‘กุสฺสา’’ติ วตฺตเต. "कुस्स" (कु के स्थान पर) - इसकी अनुवृत्ति होती है। ๓๔๗. กาปฺปตฺเถสุ จ. ३४७. और 'का' (आदेश) अल्प अर्थ में होता है। กุอิจฺเจตสฺส อปฺปตฺเถ วตฺตมานสฺส กา โหติ ตปฺปุริเส อุตฺตรปเท ปเร. พหุวจนุจฺจารณโต กุจฺฉิตตฺเถ จ กฺวจิ ตปฺปุริเส. อปฺปกํ ลวณํ กาลวณํ. เอวํ กาปุปฺผํ, กุจฺฉิโต ปุริโส กาปุริโส, กุปุริโส วา. तत्पुरुष समास में उत्तरपद के परे होने पर, अल्प अर्थ में वर्तमान 'कु' इस (अव्यय) के स्थान पर 'का' होता है। बहुवचन के उच्चारण से कहीं-कहीं कुत्सित अर्थ में भी तत्पुरुष में (यह होता है)। थोड़ा नमक - कालवण। इसी प्रकार कापुष्प (अल्प पुष्प), कुत्सित पुरुष - कापुरुष या कुपुरुष। ปาทิปุพฺพปโท จ นิจฺจสมาโสว, ปธานํ วจนํ ปาวจนํ, ภุสํ วทฺธํ ปวทฺธํ, สรีรํ, สมํ, สมฺมา วา อาธานํ สมาธานํ, วิวิธา มติ วิมติ, วิวิโธ กปฺโป วิกปฺโป, วิสิฏฺโฐ วา กปฺโป [Pg.190] วิกปฺโป, อธิโก เทโว อติเทโว. เอวํ อธิเทโว, อธิสีลํ, สุนฺทโร คนฺโธ สุคนฺโธ, กุจฺฉิโต คนฺโธ ทุคฺคนฺโธ, โสภนํ กตํ สุกตํ, อโสภนํ กตํ ทุกฺกฏํ อิจฺจาทิ. 'प्र' आदि पूर्वपद वाला (समास) नित्य समास ही है। प्रधान वचन - प्रवचन; अत्यधिक बढ़ा हुआ - प्रवृद्ध; शरीर; समान या सम्यक् आधान - समाधान; विविध मति - विमति; विविध कल्प - विकल्प, अथवा विशिष्ट कल्प - विकल्प; अधिक देव - अतिदेव। इसी प्रकार अधिदेव, अधिशील, सुन्दर गन्ध - सुगन्ध, कुत्सित गन्ध - दुर्गन्ध, शोभन (अच्छा) किया हुआ - सुकृत, अशोभन (बुरा) किया हुआ - दुष्कृत इत्यादि। เย อิธ อวิหิตลกฺขณา นามนิปาโตปสคฺคา, เตสํ ‘‘นามานํ สมาโส’’ติ โยควิภาเคน สมาโส ทฏฺฐพฺโพ. ยถา – อปุนเคยฺยา คาถา, อจนฺทมุลฺโลกิกานิ มุขานิ, อสฺสทฺธโภชี, อลวณโภชีติอาทีสุ อยุตฺตตฺถตฺตา นาญฺเญน สมาโส. यहाँ जिन नाम, निपात और उपसर्गों के लक्षण नहीं कहे गए हैं, उनका 'नामानं समासो' इस योग-विभाग के द्वारा समास देखना चाहिए। जैसे - अपुनगेय गाथा, अचन्द्रमुल्लोकिक मुख, अश्रद्धभोजी, अलवणभोजी इत्यादि में अयुक्त अर्थ होने के कारण अन्य (सूत्र) से समास नहीं होता। ตถา ทิฏฺโฐ ปุพฺพนฺติ ทิฏฺฐปุพฺโพ ตถาคตํ. เอวํ สุตปุพฺโพ ธมฺมํ, คตปุพฺโพ มคฺคํ, กมฺมนิ ทิฏฺฐา ปุพฺพนฺติ ทิฏฺฐปุพฺพา เทวา เตน. เอวํ สุตปุพฺพา ธมฺมา, คตปุพฺพา ทิสา, ปหาโร, ปราภโว, วิหาโร, อาหาโร, อุปหาโร อิจฺจาทิ. उसी प्रकार, पहले देखा गया - दृष्टपूर्व (तथागत को)। इसी प्रकार धर्म को पहले सुना - श्रुतपूर्व, मार्ग पर पहले गया - गतपूर्व; कर्म में - पहले देखे गए - दृष्टपूर्व (देव उसके द्वारा)। इसी प्रकार श्रुतपूर्व धर्म, गतपूर्व दिशाएँ, प्रहार, पराभव, विहार, आहार, उपहार इत्यादि। กมฺมธารยสมาโส. कर्मधारय समास। ทิคุสมาส द्विगु समास อถ ทิคุสมาโส วุจฺจเต. अब द्विगु समास कहा जाता है। ตโย โลกา สมาหฏา จิตฺเตน สมฺปิณฺฑิตา, ติณฺณํ โลกานํ สมาหาโรติ วา อตฺเถ – तीन लोक समाहृत (एकत्रित) हुए, चित्त से संगृहीत हुए, अथवा तीन लोकों का समाहार - इस अर्थ में - ‘‘นามานํ สมาโส ยุตฺตตฺโถ’’ติ วตฺตมาเน ‘‘ทฺวิปเท’’ติอาทินา กมฺมธารยสมาโส, ตโต สมาสสญฺญายํ, วิภตฺติโลเป, ปกติภาเว จ กเต – 'नामानं समासो युत्तत्थो' इसके अनुवर्तन में 'द्विपदे' इत्यादि के द्वारा कर्मधारय समास होने पर, फिर समास संज्ञा होने पर, विभक्ति का लोप और प्रकृतिभाव होने पर - ‘‘กมฺมธารโย’’ติ วตฺตเต. 'कर्मधारय' का अनुवर्तन होता है। ๓๔๘. สงฺขฺยาปุพฺโพ [Pg.191] ทิคุ. ३४८. संख्यापूर्वो द्विगु। สงฺขฺยาปุพฺโพ กมฺมธารยสมาโส ทิคุสญฺโญ โหติ. संख्या पूर्व वाला कर्मधारय समास 'द्विगु' संज्ञक होता है। ทฺเว คาโว ทิคุ, ทิคุสทิสตฺตา อยมฺปิ สมาโส ทิคูติ วุตฺโต. อถ วา สงฺขฺยาปุพฺพตฺตนปุํสเกกตฺตสงฺขาเตหิ ทฺวีหิ ลกฺขเณหิ คโต อวคโตติ ทิคูติ วุจฺจติ, ทฺวีหิ วา ลกฺขเณหิ คจฺฉติ ปวตฺตตีติ ทิคุ. เอตฺถ จ ‘‘สงฺขฺยาปุพฺโพ’’ติ วุตฺตตฺตา สงฺขฺยาสทฺทสฺเสว ปุพฺพนิปาโต, ‘‘อุเภ ตปฺปุริสา’’ติ ตปฺปุริสสญฺญา. दो गाएँ - द्विगु; द्विगु के समान होने से यह समास भी 'द्विगु' कहा गया है। अथवा संख्या-पूर्वत्व और नपुंसक-एकत्व नामक दो लक्षणों से ज्ञात होने के कारण 'द्विगु' कहा जाता है, अथवा दो लक्षणों से प्रवृत्त होता है इसलिए 'द्विगु' है। और यहाँ 'संख्यापूर्वो' कहे जाने से संख्या शब्द का ही पूर्व-निपात होता है, और 'उभे तत्पुरिसा' से तत्पुरुष संज्ञा होती है। ‘‘นปุํสกลิงฺโค’’ติ วตฺตเต. 'नपुंसकलिङ्गो' का अनुवर्तन होता है। ๓๔๙. ทิคุสฺเสกตฺตํ. ३४९. द्विगु का एकत्व। ทิคุสฺส สมาสสฺส เอกตฺตํ โหติ, นปุํสกลิงฺคตฺตญฺจ. द्विगु समास का एकवचन और नपुंसक लिंग होता है। สมาหารทิคุสฺเสตํ คหณํ, ตตฺถ สพฺพตฺเถกวจนเมว โหติ, อญฺญตฺร ปน พหุวจนมฺปิ, นามพฺยปเทสสฺยาทฺยุปฺปตฺติ อมาเทสาทิ. यह समाहार द्विगु का ग्रहण है, वहाँ सभी अर्थों में एकवचन ही होता है, किन्तु अन्यत्र (असमाहार में) बहुवचन भी होता है; नाम-व्यपदेश की आदि-उत्पत्ति, 'अं' आदेश आदि (होते हैं)। ติโลกํ, เห ติโลก, ติโลกํ, ติโลเกน, ติโลกสฺส, ติโลกา ติโลกสฺมา ติโลกมฺหา, ติโลกสฺส, ติโลเก ติโลกมฺหิ ติโลกสฺมึ. तिलोकं (तीन लोक), हे तिलोक, तिलोकं, तिलोकेन, तिलोकस्स, तिलोका तिलोकस्मा तिलोकम्हा, तिलोकस्स, तिलोके तिलोकम्हि तिलोकस्मिं। เอวํ ตโย ทณฺฑา ติทณฺฑํ, ตีณิ มลานิ สมาหฏานิ, ติณฺณํ มลานํ สมาหาโรติ วา ติมลํ, ติลกฺขณํ, จตุสฺสจฺจํ, จตสฺโส ทิสา จตุทฺทิสํ, ‘‘สโร รสฺโส นปุํสเก’’ติ รสฺสตฺตํ, ปญฺจสิกฺขาปทํ, สฬายตนํ, สตฺตาหํ, อฏฺฐสีลํ, นวโลกุตฺตรํ, ทสสีลํ, สตโยชนํ. इसी प्रकार तीन दण्ड - त्रिदण्ड; तीन मल समाहृत हुए, अथवा तीन मलों का समाहार - त्रिमल; त्रिलक्षण; चतुःसत्य; चार दिशाएँ - चतुर्दिश, 'सरो रस्सो नपुंसके' से ह्रस्वत्व होने पर; पञ्चशिक्षापद; षड़ायतन; सप्ताह; अष्टशील; नवलोकुत्तर; दशशील; शतयोजन। ตถา – ทฺเว รตฺติโย ทฺวิรตฺตํ, ติสฺโส รตฺติโย ติรตฺตํ, ทฺเว องฺคุลิโย ทฺวงฺคุลํ, สตฺต โคทาวริโย, ตาสํ สมาหาโรติ วา สตฺตโคทาวรํ. उसी प्रकार - दो रातें - द्विरात्र; तीन रातें - त्रिरात्र; दो अँगुलियाँ - द्व्यङ्गुल; सात गोदावरी, उनका समाहार - सप्तगोदावर। เอตฺถ จ รตฺติ องฺคุลิ โคทาวรีนมนฺตสฺส – और यहाँ रात्रि, अङ्गुलि और गोदावरी के अन्त का - ๓๕๐. กฺวจิ สมาสนฺตคตานมการนฺโต. ३५०. कहीं-कहीं समासान्तगत (शब्दों) का अकारान्त (होता है)। ราชาทิคณสฺเสตํ คหณํ, เตน สมาสนฺตคตานํ ราชาทีนํ นามานํ อนฺโต กฺวจิ อกาโร โหตีติ อตฺโถ. การคฺคหเณน พหุพฺพีหาทิมฺหิ สมาสนฺเต กฺวจิ กปฺปจฺจโย โหติ, สุรภิ สุ ทุ ปูตีหิ คนฺธนฺตสฺสิกาโร จ. यह राजादि गण का ग्रहण है, उससे समासान्तगत राजा आदि नामों का अन्त कहीं अकार होता है - यह अर्थ है। 'कार' के ग्रहण से बहुव्रीहि आदि में समासान्त में कहीं 'क' प्रत्यय होता है, और सुरभि, सु, दु, पूति शब्दों के बाद 'गन्ध' शब्द के अन्त में इकार होता है। อถ วา อ จ โก จ อกา, รกาโร ปทสนฺธิกโร, เตน กฺวจิ สมาสนฺตคตานมนฺโต หุตฺวา อ ก อิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺตีติ อตฺโถ. เตน ปญฺจ คาโว สมาหฏาติ อตฺเถ สมาสาทึ กตฺวา สมาสนฺเต อปฺปจฺจเย, ‘‘โอ สเร จา’’ติ อวาเทเส จ กเต ‘‘ปญฺจคว’’นฺติอาทิ จ สิชฺฌติ. ‘‘ทฺวิรตฺต’’นฺติอาทีสุ ปน อปฺปจฺจเย กเต ปุพฺพสรสฺส ‘‘สรโลโป’’ติอาทินา โลโป. अथवा 'अ' और 'क' - 'अका'; 'र' अक्षर पद-सन्धि करने वाला है, उससे कहीं समासान्तगत शब्दों का अन्त होकर 'अ' और 'क' ये प्रत्यय होते हैं - यह अर्थ है। उससे 'पाँच गाएँ समाहृत' इस अर्थ में समास आदि करके समासान्त में 'अ' प्रत्यय होने पर, 'ओ सरे चा' से 'अव' आदेश होने पर 'पञ्चगवं' इत्यादि सिद्ध होता है। 'द्विरात्रं' इत्यादि में 'अ' प्रत्यय होने पर पूर्व स्वर का 'सरलोपो' इत्यादि से लोप होता है। อสมาหารทิคุ ยถา – เอโก จ โส ปุคฺคโล จาติ เอกปุคฺคโล. เอวํ เอกธมฺโม, เอกปุตฺโต, ตโย ภวา ติภวา, จตสฺโส ทิสา จตุทฺทิสา, ทสสหสฺสจกฺกวาฬานิ อิจฺจาทิ. असमाहार द्विगु जैसे - वह एक ही पुद्गल है - एकपुद्गल। इसी प्रकार एकधर्म, एकपुत्र, तीन भव - त्रिभव, चार दिशाएँ - चतुर्दिश, दशसहस्र चक्रवाल इत्यादि। ทิคุสมาโส. द्विगु समास। ตปฺปุริสสมาส तत्पुरुष समास อถ ตปฺปุริสสมาโส วุจฺจเต. अब तत्पुरुष समास कहा जाता है। โส ปน ทุติยาทีสุ ฉสุ วิภตฺตีสุ ภาวโต ฉพฺพิโธ. ตตฺถ ทุติยาตปฺปุริโส คตนิสฺสิตาตีตาติกฺกนฺตปฺปตฺตาปนฺนาทีหิ ภวติ. वह द्वितीया आदि छह विभक्तियों में होने के कारण छह प्रकार का है। उनमें द्वितीया तत्पुरुष गत, निश्रित, अतीत, अतिक्रान्त, प्राप्त, आपन्न आदि (शब्दों) के साथ होता है। สรณํ คโตติ วิคฺคเห – "शरणं गतो" इस विग्रह में - ‘‘ตปฺปุริโส’’ติ วตฺตเต. "तत्पुरुष" (समास) कहा जाता है। ๓๕๑. อมาทโย[Pg.193] ปรปเทภิ. ३५१. 'अं' आदि (विभक्तियाँ) पर-पदों के साथ (समास बनाती हैं)। อมาทิวิภตฺยนฺตานิ ยุตฺตตฺถานิ ปุพฺพปทานิ นาเมหิ ปรปเทภิ สห วิภาสา สมสฺยนฺเต, โส สมาโส ตปฺปุริสสญฺโญ โหติ. อยญฺจ ตปฺปุริโส อภิเธยฺยวจนลิงฺโค. 'अं' आदि विभक्तियों से अंत होने वाले, युक्त अर्थ वाले पूर्व-पद, नाम रूपी पर-पदों के साथ विकल्प से समास को प्राप्त होते हैं, वह समास 'तत्पुरुष' संज्ञा वाला होता है। और यह तत्पुरुष (समास) विशेष्य के वचन और लिंग के अनुसार होता है। คตาทิสทฺทา กิตนฺตตฺตา ติลิงฺคา, วิภตฺติโลปาทิ สพฺพํ ปุพฺพสมํ. โส สรณคโต, เต สรณคตา. สา สรณคตา, ตา สรณคตาโย. ตํ กุลํ สรณคตํ, ตานิ กุลานิ สรณคตานิ อิจฺจาทิ. 'गत' आदि शब्द कृदन्त होने के कारण तीनों लिंगों में होते हैं, विभक्ति का लोप आदि सब पहले के समान है। वह शरण में गया (सो सरणगतो), वे शरण में गए (ते सरणगता)। वह (स्त्री) शरण में गई (सा सरणगता), वे (स्त्रियाँ) शरण में गईं (ता सरणगतायो)। वह कुल शरण में गया (तं कुलं सरणगतं), वे कुल शरण में गए (तानि कुलानि सरणगतानि) इत्यादि। เอวํ อรญฺญคโต, ภูมิคโต, ธมฺมํ นิสฺสิโต ธมฺมนิสฺสิโต, อตฺถนิสฺสิโต, ภวํ อตีโต ภวาตีโต, กาลาตีโต, ปมาณํ อติกฺกนฺตํ ปมาณาติกฺกนฺตํ. โลกาติกฺกนฺตํ, สุขํ ปตฺโต สุขปฺปตฺโต, ทุกฺขปฺปตฺโต, โสตํ อาปนฺโน โสตาปนฺโน, นิโรธสมาปนฺโน, รถํ อารุฬฺโห รถารุฬฺโห, สพฺพรตฺตึ โสภโน สพฺพรตฺติโสภโน, มุหุตฺตสุขํ. इसी प्रकार: अरण्यगत (अरञ्ञगतो), भूमिगत, धर्मनिश्रित (धम्मनिस्सितो), अर्थनिश्रित, भवातीतः (भवातितो), कालातीतः, प्रमाणातिक्रान्तम्, लोकातिक्रान्तम्, सुखप्राप्तः, दुःखप्राप्तः, स्रोतापन्नः (सोतापन्नो), निरोधसमापन्नः, रथारूढ़ः (रथारूळ्हो), सर्वरत्तिशोभनः, मुहूर्तसुखम्। อุปปทสมาเส ปน วุตฺติเยว ตสฺส นิจฺจตฺตา. ยถา – กมฺมํ กโรตีติ กมฺมกาโร, กุมฺภกาโร, อตฺถํ กาเมตีติ อตฺถกาโม, ธมฺมกาโม, ธมฺมํ ธาเรตีติ ธมฺมธโร, วินยธโร, สจฺจํ วทิตุํ สีลมสฺสาติ สจฺจวาที อิจฺจาทิ. उपपद समास में तो उसकी वृत्ति नित्य ही होती है। जैसे - कर्म करता है इति 'कर्मकारः', 'कुम्भकारः', अर्थ की कामना करता है इति 'अत्थकामो', 'धम्मकामो', धर्म को धारण करता है इति 'धम्मधरो', 'विनयधरो', सत्य बोलना जिसका स्वभाव है इति 'सच्चवादी' इत्यादि। ตวนฺตุมานนฺตาทิกิตนฺเตหิ วากฺยเมว ววตฺถิตวิภาสาธิการโต. ยถา – โอทนํ ภุตฺตวา, ธมฺมํ สุณมาโน, ธมฺมํ สุณนฺโต, กฏํ กราโน, อนภิธานโต วา, อภิธานลกฺขณา หิ ตทฺธิตสมาสกิตกาติ. 'तवन्तु', 'मान', 'अन्त' आदि कृदन्तों के साथ 'व्यवस्थित विभाषा' के अधिकार से वाक्य ही रहता है। जैसे - 'ओदनं भुत्तवा', 'धम्मं सुणमानो', 'धम्मं सुणन्तो', 'कटं करानो', अथवा अनभिधान (प्रयोग न होने) के कारण; क्योंकि तद्धित, समास और कृदन्त अभिधान (लोक-प्रसिद्धि) के लक्षण वाले होते हैं। ทุติยาตปฺปุริโส. द्वितीया तत्पुरुष। ตติยา [Pg.194] กิตก ปุพฺพ สทิส สมูนตฺถ กลห นิปุณ มิสฺสสขิลาทีหิ. तृतीया (विभक्ति का) कृदन्त, पूर्व, सदृश, सम, ऊनार्थ, कलह, निपुण, मिश्र, सखिल आदि के साथ (समास होता है)। พุทฺเธน ภาสิโต พุทฺธภาสิโต, ธมฺโม. เอวํ ชินเทสิโต, สตฺถารา วณฺณิโต สตฺถุวณฺณิโต, วิญฺญูหิ ครหิโต วิญฺญุครหิโต, วิญฺญุปฺปสตฺโถ, อิสฺสรกตํ, สยํกตํ, สุเกหิ อาหฏํ สุกาหตํ, รญฺญา หโต ราชหโต, โรคปีฬิโต, อคฺคิทฑฺโฒ, สปฺปทฏฺโฐ, สลฺเลน วิทฺโธ สลฺลวิทฺโธ, อิจฺฉาย อปกโต อิจฺฉาปกโต, สีเลน สมฺปนฺโน สีลสมฺปนฺโน. เอวํ สุขสหคตํ, ญาณสมฺปยุตฺตํ, มิตฺตสํสคฺโค, ปิยวิปฺปโยโค, ชาติตฺถทฺโธ, คุณหีโน, คุณวุฑฺโฒ, จตุวคฺคกรณียํ, จตุวคฺคาทิกตฺตพฺพํ, กาเกหิ เปยฺยา กากเปยฺยา, นที. बुद्ध द्वारा भाषित इति 'बुद्धभाषितः' (धर्म)। इसी प्रकार 'जिनदेशितः', शास्ता द्वारा वर्णित 'सत्थुवण्णितो', विद्वानों द्वारा निन्दित 'विञ्ञुगरहितो', 'विञ्ञुप्पसत्थो', 'इस्सरकतं', 'सयंकतं', तोतों द्वारा लाया गया 'सुकाहतं', राजा द्वारा मारा गया 'राजहतो', 'रोगपीळितो', 'अग्गिदड्ढो', 'सप्पदट्ठो', शल्य से बिंधा हुआ 'सल्लविद्धो', इच्छा से अपकृत 'इच्छापकतं', शील से सम्पन्न 'सीलसम्पन्नो'। इसी प्रकार 'सुखसहगतं', 'ञाणसम्पयुत्तं', 'मित्तसंसग्गो', 'पियविप्पयोगो', 'जातिथद्धो', 'गुणहीनो', 'गुणवुद्धो', 'चतुवग्गकरणीयं', 'चतुवग्गादिकत्तब्बं', कौवों द्वारा पीने योग्य 'काकपेय्या' (नदी)। กฺวจิ วุตฺติเยว, อุเรน คจฺฉตีติ อุรโค, ปาเทน ปิวตีติ ปาทโป. กฺวจิ วากฺยเมว, ปรสุนา ฉินฺนวา, กาเกหิ ปาตพฺพา, ทสฺสเนน ปหาตพฺพา. कहीं केवल वृत्ति ही होती है, जैसे - छाती से चलता है इति 'उरगो', पैर से पीता है इति 'पादपो'। कहीं केवल वाक्य ही होता है, जैसे - 'परसुना छिन्नवा', 'काकेहि पातब्बा', 'दस्सनेन पहातब्बा'। ปุพฺพาทิโยเค – มาเสน ปุพฺโพ มาสปุพฺโพ. เอวํ มาตุสทิโส, ปิตุสโม, เอกูนวีสติ, สีลวิกโล, อสิกลโห, วาจานิปุโณ, ยาวกาลิกสํมิสฺสํ, วาจาสขิโล, สตฺถารา สทิโส สตฺถุกปฺโป, ปุญฺเญน อตฺถิโก ปุญฺญตฺถิโก, คุณาธิโก, คุเฬน สํสฏฺโฐ โอทโน คุโฬทโน, ขีโรทโน, อสฺเสน ยุตฺโต รโถ อสฺสรโถ, มคฺคจิตฺตํ, ชมฺพุยา ปญฺญาโต ลกฺขิโต ทีโป ชมฺพุทีโป, เอเกน อธิกา ทส เอกาทส, ชาติยา อนฺโธ ชจฺจนฺโธ, ปกติยา เมธาวี ปกติเมธาวี อิจฺจาทิ. पूर्व आदि के योग में - मास से पूर्व 'मासपुब्बो'। इसी प्रकार 'मातुसदिसो', 'पितुसमो', 'एकूनवीसति', 'सीलविकलो', 'असिकलहो', 'वाचानिपुणो', 'यावकालिकसंमिस्सं', 'वाचासखिलो', शास्ता के सदृश 'सत्थुकप्पो', पुण्य का अर्थी 'पुञ्ञत्थिको', 'गुणाधिको', गुड़ से मिश्रित भात 'गुळोदनो', 'खीरोदनो', घोड़ों से युक्त रथ 'अस्सरथो', 'मग्गचित्तं', जम्बू से पहचाना गया द्वीप 'जम्बुदीपो', एक से अधिक दस 'एकादस', जन्म से अंधा 'जच्चन्धो', प्रकृति से मेधावी 'पकृतिमेधावी' इत्यादि। ตติยาตปฺปุริโส. तृतीया तत्पुरुष। จตุตฺถี [Pg.195] ตทตฺถอตฺถหิตเทยฺยาทีหิ. चतुर्थी (विभक्ति का) तदर्थ, अर्थ, हित, देय आदि के साथ (समास होता है)। ตทตฺเถ – กถินสฺส ทุสฺสํ กถินทุสฺสํ, กถินจีวรตฺถายาติ อตฺโถ. เอวํ จีวรทุสฺสํ, จีวรมูลฺยํ, ยาคุยา อตฺถาย ตณฺฑุลา ยาคุตณฺฑุลา, ภตฺตตณฺฑุลา, สงฺฆสฺสตฺถาย ภตฺตํ สงฺฆภตฺตํ, อาคนฺตุกานมตฺถาย ภตฺตํ อาคนฺตุกภตฺตํ. เอวํ คมิกภตฺตํ, ปาสาทาย ทพฺพํ ปาสาททพฺพํ. तदर्थ में - कठिन के लिए वस्त्र 'कठिनदुस्सं', कठिन चीवर के लिए - यह अर्थ है। इसी प्रकार 'चीवरदुस्सं', 'चीवरमूल्यं', यवागू के लिए चावल 'यागुतण्डुला', 'भत्ततण्डुला', संघ के लिए भोजन 'संघभत्तं', आगंतुकों के लिए भोजन 'आगन्तुकभत्तं'। इसी प्रकार 'गमिकभत्तं', प्रासाद के लिए द्रव्य 'पासाददब्बं'। อตฺเถ ภิกฺขุสงฺฆสฺสตฺถาย วิหาโร ภิกฺขุสงฺฆตฺโถ วิหาโร, ภิกฺขุสงฺฆตฺถา ยาคุ, ภิกฺขุสงฺฆตฺถํ จีวรํ. ยสฺสตฺถาย ยทตฺโถ, ยทตฺถา, ยทตฺถํ. เอวํ ตทตฺโถ, ตทตฺถา. ตทตฺถํ. เอตทตฺโถ วายาโม, เอตทตฺถา กถา, เอตทตฺถํ โสตาวธานํ. กิมตฺถํ, อตฺตตฺถํ, ปรตฺถํ, วินโย สํวรตฺถาย, สุขํ สมาธตฺถาย, นิพฺพิทา วิราคตฺถาย, วิราโค วิมุตฺตตฺถาย. ตถา โลกสฺส หิโต โลกหิโต, พุทฺธสฺส เทยฺยํ พุทฺธเทยฺยํ, ปุปฺผํ. สงฺฆเทยฺยํ, จีวรํ. อิธ น ภวติ, สงฺฆสฺส ทาตพฺพํ, สงฺฆสฺส ทาตุํ อิจฺจาทิ. 'अर्थ' शब्द के साथ - भिक्षु संघ के लिए विहार 'भिक्खुसंघत्थो विहारो', भिक्षु संघ के लिए यवागू 'भिक्खुसंघत्था यागु', भिक्षु संघ के लिए चीवर 'भिक्खुसंघत्थं चीवरं'। जिसके लिए वह 'यदत्थो', 'यदत्था', 'यत्थं'। इसी प्रकार 'तदत्थो', 'तदत्था', 'तदत्थं'। इस अर्थ के लिए व्यायाम 'एतदत्थो वायामो', इस अर्थ के लिए कथा 'एतदत्था कथा', इस अर्थ के लिए श्रवण 'एतदत्थं सोतावधानं'। किसलिए, अपने लिए, पराये के लिए, विनय संवर के लिए है, सुख समाधि के लिए है, निर्वेद विराग के लिए है, विराग विमुक्ति के लिए है। तथा लोक का हित 'लोकहितो', बुद्ध को देने योग्य 'बुद्धदेय्यं', 'संघदेय्यं'। यहाँ नहीं होता - 'संघस्स दातब्बं', 'संघस्स दातुं' इत्यादि। จตุตฺถีตปฺปุริโส. चतुर्थी तत्पुरुष। ปญฺจมี อปคมน ภย วิรติ โมจนตฺถาทีหิ. पंचमी (विभक्ति का) अपगमन, भय, विरति, मोचन आदि अर्थों के साथ (समास होता है)। เมถุนสฺมา อเปโต เมถุนาเปโต. เอวํ ปลาปาปคโต, นครนิคฺคโต, ปิณฺฑปาตปฏิกฺกนฺโต. คามโต นิกฺขนฺตํ คามนิกฺขนฺตํ, รุกฺขคฺคา ปติโต รุกฺขคฺคปติโต, สาสนจุโต, อาปตฺติวุฏฺฐานํ, ธรณิตลุคฺคโต, สพฺพภเวหิ นิสฺสโฏ สพฺพภวนิสฺสโฏ. मैथुन से अपेत 'मेथुनापेतो'। इसी प्रकार 'पलापापगतो', 'नगरनिग्गतो', 'पिण्डपातपटिक्कन्तो'। गाँव से निकला हुआ 'गामनिक्खन्तं', वृक्ष के अग्र भाग से गिरा हुआ 'रुक्खग्गपतितो', 'सासनचुतो', 'आपत्तिवुट्ठानं', 'धरणितलुग्गतो', सब भवों से निस्सृत 'सब्बभवनिसटो'। ภยตฺถาทิโยเค ยถา – ราชโต ภยํ ราชภยํ, โจเรหิ ภยํ โจรภยํ, อมนุสฺเสหิ ภยํ อมนุสฺสภยํ, อคฺคิโต ภยํ อคฺคิภยํ. ปาปโต ภีโต ปาปภีโต[Pg.196], ปาปภีรุโก, อกตฺตพฺพโต วิรติ อกตฺตพฺพวิรติ. เอวํ กายทุจฺจริตวิรติ, วจีทุจฺจริตวิรติ, พนฺธนา มุตฺโต พนฺธนมุตฺโต, วนมุตฺโต, พนฺธนโมกฺโข, กมฺมโต สมุฏฺฐิตํ กมฺมสมุฏฺฐิตํ, อุกฺกฏฺฐุกฺกฏฺฐํ, โอมโกมกํ. भय आदि के योग में जैसे - राजा से भय 'राजभयं', चोरों से भय 'चोरभयं', अमानुषों से भय 'अमानुसभयं', अग्नि से भय 'अग्गिभयं'। पाप से डरा हुआ 'पापभीतो', 'पापभीरुको', न करने योग्य से विरति 'अकत्तब्बविरति'। इसी प्रकार 'कायदुच्चरितविरति', 'वचीदुच्चरितविरति', बंधन से मुक्त 'बन्धनमुत्तो', 'वनमुत्तो', 'बन्धनमोक्खो', कर्म से समुत्थित 'कम्मसमुट्ठितं', 'उक्कठुक्कठं' (श्रेष्ठ से श्रेष्ठ), 'ओमकोमकं' (नीच से नीच)। กฺวจิ วุตฺติเยว, กมฺมโต ชาตํ กมฺมชํ. เอวํ จิตฺตชํ, อุตุชํ, อาหารชํ. อิธ น ภวติ, ปาสาทา ปติโต. कहीं केवल वृत्ति ही होती है, जैसे - कर्म से उत्पन्न 'कम्मजं'। इसी प्रकार 'चित्तजं', 'उतुजं', 'आहारजं'। यहाँ नहीं होता - 'पासादा पतितो' (महल से गिरा)। ปญฺจมีตปฺปุริโส. पंचमी तत्पुरुष। ฉฏฺฐี รญฺโญ ปุตฺโต ราชปุตฺโต. เอวํ ราชปุริโส, อาจริยปูชโก, พุทฺธสาวโก, พุทฺธรูปํ, ชินวจนํ, สมุทฺทโฆโส, ธญฺญานํ ราสิ ธญฺญราสิ, ปุปฺผคนฺโธ, ผลรโส, กายสฺส ลหุตา กายลหุตา, มรณสฺสติ, รุกฺขมูลํ, อยสฺส ปตฺโต อโยปตฺโต, เอวํ สุวณฺณกฏาหํ, ปานียถาลกํ, สปฺปิกุมฺโภ. षष्ठी (तत्पुरुष) - राजा का पुत्र 'राजपुत्र' है। इसी प्रकार राजपुरुष, आचार्यपूजक, बुद्धश्रावक, बुद्धरूप, जिनवचन, समुद्रघोष, धान्यों की राशि 'धान्यराशि', पुष्पगन्ध, फलरस, काय की लघुता 'काय-लघुता', मरणस्मृति, वृक्षमूल, लोहे का पात्र 'अयोपात्र', इसी प्रकार सुवर्णकटाह, पानीयस्थालक, सर्पिकुम्भ। ‘‘เทวานํ ราชา’’ติ อตฺเถ สมาสาทิมฺหิ กเต ‘‘กฺวจิ สมาสนฺตคตานมการนฺโต’’ติ อกาโร, ตโต ‘‘สฺยา จา’’ติ อาตฺตํ น ภวติ. เทวราโช, เทวราชา, เทวราชํ, เทวราเช อิจฺจาทิ ปุริสสทฺทสมํ. อตฺตาภาเว โส เทวราชา, เต เทวราชาโน อิจฺจาทิ ราชสทฺทสมํ. ตถา เทวานํ สขา เทวสโข, เทวสขา, โส เทวสขา, เต เทวสขาโน อิจฺจาทิ. 'देवों का राजा' इस अर्थ में समास आदि करने पर 'क्वचि समासन्तगतानामकारन्तो' सूत्र से अकार होता है, उसके बाद 'स्या चा' सूत्र से आकार (आ-त्व) नहीं होता है। देवराजो, देवराजा, देवराजं, देवराजे इत्यादि 'पुरिस' शब्द के समान हैं। आत्म-भाव (स्वयं होने) में 'सो देवराजा', 'ते देवराजानो' इत्यादि 'राज' शब्द के समान हैं। उसी प्रकार देवों का सखा 'देवसखो', 'देवसखा', 'सो देवसखा', 'ते देवसखानो' इत्यादि। ปุมสฺส ลิงฺคํ ปุลฺลิงฺคํ. เอวํ ปุมฺภาโว, ปุมนฺตโลปาทิ. पुरुष का लिंग 'पुल्लिङ्ग' है। इसी प्रकार पुम्भाव, पुमन्तलोप आदि। หตฺถิปทํ, อิตฺถิรูปํ, ภิกฺขุนิสงฺโฆ, ชมฺพุสาขา, เอตฺถ จ ‘‘กฺวจาทิมชฺฌุตฺตราน’’นฺติอาทินา มชฺเฌ อีการูการานํ รสฺสตฺตํ. हस्तिपद, स्त्रीरूप, भिक्षुणीसंघ, जम्बुशाखा; और यहाँ 'क्वचादिमज्झुत्तरानं' आदि सूत्र से मध्य में ईकार और ऊकार का ह्रस्व होता है। วิภาสาธิการโต [Pg.197] กฺวจิ วากฺยเมว, สหสา กมฺมสฺส กตฺตาโร, ภินฺนานํ สนฺธาตา, กปฺปสฺส ตติโย ภาโค, ยา จ ปกฺขสฺส อฏฺฐมี, มนุสฺสานํ ขตฺติโย สูรตโม. विभाषा (विकल्प) के अधिकार से कहीं केवल वाक्य ही रहता है, जैसे - सहसा कर्म के कर्ता, भिन्नों को जोड़ने वाला, कल्प का तीसरा भाग, और जो पक्ष की अष्टमी है, मनुष्यों में क्षत्रिय सबसे अधिक शूरवीर है। ยุตฺตตฺโถ อิจฺเจว? ‘‘ภโฏ รญฺโญ ปุริโส เทวทตฺตสฺสา’’ติ เอตฺถ ‘‘ภฏสมฺพนฺเธ ฉฏฺฐี’’ติ อญฺญมญฺญานเปกฺขตาย อยุตฺตตฺถภาวโต สมาโส น ภวติ, ‘‘โกสลสฺส รญฺโญ ปุตฺโต’’ติอาทีสุ ปน สาเปกฺขตาย อสมตฺถตฺตา น ภวติ, สมฺพนฺธีสทฺทานํ ปน นิจฺจํ สาเปกฺขตฺเตปิ คมกตฺตา สมาโส, ยถา – เทวทตฺตสฺส คุรุกุลํ, ภควโต สาวกสงฺโฆติอาทิ. 'युक्तार्थ' (समर्थ अर्थ वाला) ही क्यों? 'भट राजा का है, पुरुष देवदत्त का है' यहाँ 'भट के सम्बन्ध में षष्ठी' होने से परस्पर अनपेक्षा के कारण युक्तार्थ न होने से समास नहीं होता है। 'कोसल के राजा का पुत्र' आदि में सापेक्षता के कारण असमर्थ होने से समास नहीं होता है। किन्तु सम्बन्धी शब्दों के नित्य सापेक्ष होने पर भी बोधक (गमक) होने से समास होता है, जैसे - देवदत्त का गुरुकुल, भगवान का श्रावकसंघ इत्यादि। ฉฏฺฐีตปฺปุริโส. षष्ठी तत्पुरुष। สตฺตมี รูเป สญฺญา รูปสญฺญา, เอวํ รูปสญฺเจตนา, สํสารทุกฺขํ, จกฺขุมฺหิ สนฺนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ จกฺขุวิญฺญาณํ, ธมฺเม รโต ธมฺมรโต, ธมฺมาภิรติ, ธมฺมรุจิ, ธมฺมคารโว, ธมฺเมสุ นิรุตฺติ ธมฺมนิรุตฺติ, ทานาธิมุตฺติ, ภวนฺตรกตํ, ทสฺสเน อสฺสาโท ทสฺสนสฺสาโท, อรญฺเญ วาโส อรญฺญวาโส, วิกาเล โภชนํ วิกาลโภชนํ, กาเล วสฺสํ กาลวสฺสํ, วเน ปุปฺผํ วนปุปฺผํ. เอวํ วนมหิโส, คามสูกโร, สมุทฺทมจฺโฉ, อาวาฏกจฺฉโป, อาวาฏมณฺฑูโก, กูปมณฺฑูโก, ติตฺถนาวา, อิตฺถีสุ ธุตฺโต อิตฺถิธุตฺโต ฉายาย สุกฺโข ฉายาสุกฺโข, องฺคารปกฺกํ, จารกพทฺโธ. सप्तमी (तत्पुरुष) - रूप में संज्ञा 'रूपसंज्ञा', इसी प्रकार रूपसंचेतना, संसारदुःख, चक्षु में संनिश्रित विज्ञान 'चक्षुविज्ञान', धर्म में रत 'धर्मरत', धर्माभिरति, धर्मरुचि, धर्मगौरव, धर्मों में निरुक्ति 'धर्मनिरुक्ति', दानाधिमुक्ति, भवान्तरकृत, दर्शन में आस्वाद 'दर्शनास्वाद', अरण्य में वास 'अरण्यवास', विकाल में भोजन 'विकालभोजन', काल में वर्षा 'कालवर्षा', वन में पुष्प 'वनपुष्प'। इसी प्रकार वनमहिष, ग्रामसूकर, समुद्रमत्स्य, आवाट-कच्छप, आवाट-मण्डूक, कूपमण्डूक, तीर्थनावा, स्त्रियों में धूर्त 'स्त्रीधूर्त', छाया में सूखा 'छायाशुष्क', अंगारों पर पका 'अंगारपक्व', कारागार में बद्ध 'चारकबद्ध'। อิธ วุตฺติเยว, ยถา – วเน จรตีติ วนจโร, กุจฺฉิมฺหิ สยตีติ กุจฺฉิสโย, ถเล ติฏฺฐตีติ ถลฏฺโฐ. เอวํ ชลฏฺโฐ, ปพฺพตฏฺโฐ, มคฺคฏฺโฐ, ปงฺเก ชาตํ ปงฺกชํ, สิเร รุหตีติ สิโรรุหํ อิจฺจาทิ. यहाँ वृत्ति (समास) ही होती है, जैसे - वन में चरता है सो 'वनचर', कोख में सोता है सो 'कुक्षिशय', स्थल पर खड़ा रहता है सो 'स्थलस्थ'। इसी प्रकार जलस्थ, पर्वतस्थ, मार्गस्थ, कीचड़ में उत्पन्न 'पंकज', सिर पर उगता है सो 'सिरोरुह' इत्यादि। อิธ [Pg.198] น ภวติ, โภชเน มตฺตญฺญุตา, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารตา, อาสเน นิสินฺโน, อาสเน นิสีทิตพฺพํ. यहाँ (समास) नहीं होता है - भोजन में मात्राज्ञता, इन्द्रियों में गुप्तद्वारता, आसन पर बैठा हुआ, आसन पर बैठना चाहिए। สตฺตมีตปฺปุริโส. सप्तमी तत्पुरुष। ‘‘ตทนุปโรเธนา’’ติ วุตฺตตฺตา ยถาภิธานํ ตปฺปุริเส กฺวจิ อจฺจนฺตาทีสุ อมาทิวิภตฺยนฺตํ ปุพฺพปทํ ปรํ สมฺภวติ. 'तदनुपरोधेन' ऐसा कहे जाने के कारण, अभिधान के अनुसार तत्पुरुष में कहीं 'अत्यन्त' आदि शब्दों में अम्-आदि विभक्ति वाला पूर्वपद बाद में हो सकता है। ยถา – อนฺตํ อติกฺกนฺตํ อจฺจนฺตํ, อจฺจนฺตานิ, เวลํ อติกฺกนฺโต อติเวโล, รสฺสตฺตํ. เอวํ มาลํ อตีโต อติมาโล, ปตฺตชีวิโก, อาปนฺนชีวิโก, อกฺขํ ปติคตํ นิสฺสิตนฺติ ปจฺจกฺขํ ทสฺสนํ, ปจฺจกฺโข อตฺตภาโว, ปจฺจกฺขา พุทฺธิ, อตฺถํ อนุคตํ อนฺวตฺถํ, โกกิลาย อวกุฏฺฐํ อวโกกิลํ วนํ, ปริจฺจตฺตนฺติ อตฺโถ. อวมยูรํ, อชฺฌยนาย ปริคิลาโน ปริยชฺฌยโน, กมฺมสฺส อลํ สมตฺโถติ อลํกมฺโม, วจนาย อลนฺติ อลํวจโน, วานโต นิกฺขนฺตํ นิพฺพานํ, กิเลเสหิ นิกฺขนฺโต นิกฺกิเลโส, นิรงฺคโณ, โกสมฺพิยา นิกฺขนฺโต นิกฺโกสมฺพี, วนโต นิยฺยาโต นิพฺพโน, อาจริยโต ปโร ปาจริโย. เอวํ ปยฺยโก, ปรหิยฺโย, คงฺคาย อุปริ อุปริคงฺคํ. เอวํ เหฏฺฐานที, อนฺโตสมาปตฺติ, หํสานํ ราชา ราชหํโส, หํสราชา วา, มาสสฺส อทฺธํ อทฺธมาสํ, มาสทฺธํ วา, อามลกสฺส อทฺธํ อทฺธามลกํ, อามลกทฺธํ วา, กหาปณสฺส อฑฺฒํ อฑฺฒกหาปณํ, อฑฺฒมาสกํ, รตฺติยา อฑฺฒํ อฑฺฒรตฺตํ, รตฺติยา ปุพฺพํ ปุพฺพรตฺตํ, รตฺติยา ปจฺฉา ปจฺฉารตฺตํ. เอตฺถ จ ‘‘กฺวจิ สมาสนฺตคตานมการนฺโต’’ติ รตฺติสทฺทนฺตสฺส อตฺตํ, อหสฺส ปุพฺพํ ปุพฺพนฺหํ. เอวํ สายนฺหํ, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อหสฺส อนฺหาเทโส. जैसे - अन्त को अतिक्रान्त 'अत्यन्त', अत्यन्तानि; वेला को अतिक्रान्त 'अतिवेल', ह्रस्वत्व होता है। इसी प्रकार माला को अतीत 'अतिमाल', प्राप्तजीविक, आपन्नजीविक; इन्द्रिय के प्रति गया हुआ या आश्रित 'प्रत्यक्ष' दर्शन, प्रत्यक्ष आत्मभाव, प्रत्यक्ष बुद्धि; अर्थ के अनुगत 'अन्वर्थ'; कोकिला द्वारा कूजित 'अवकोकिल' वन, जिसका अर्थ 'परित्यक्त' है। अवमयूर; अध्ययन के लिए ग्लानि युक्त 'पर्यध्ययन'; कर्म के लिए समर्थ 'अलंकर्म'; वचन के लिए समर्थ 'अलं-वचन'; तृष्णा से निकला हुआ 'निर्वाण'; क्लेशों से निकला हुआ 'निष्क्लेश', निरङ्गण; कौशाम्बी से निकला हुआ 'निक्कोशाम्बी'; वन से निकला हुआ 'निर्वन'; आचार्य से परे 'पाचार्य'। इसी प्रकार प्रपितामह, परसों; गंगा के ऊपर 'उपरिगंगा'। इसी प्रकार अधोनदी, अन्तःसमापत्ति; हंसों का राजा 'राजहंस' या 'हंसराज'; मास का आधा 'अर्धमास' या 'मासार्ध'; आँवले का आधा 'अर्ध-आमलक' या 'आमलकार्ध'; कार्षापण का आधा 'अर्ध-कार्षापण', अर्ध-मासक; रात्रि का आधा 'अर्धरात्र'; रात्रि का पूर्व भाग 'पूर्वरात्र'; रात्रि का पश्चात् भाग 'पश्चात्रात्र'। और यहाँ 'क्वचि समासन्तगतानामकारन्तो' सूत्र से रात्रि शब्द के अन्त में अकार होता है; दिन का पूर्व भाग 'पूर्वाह्न'। इसी प्रकार सायाह्न; 'तेसु वुद्धी' आदि सूत्र से 'अह' को 'अन्ह' आदेश होता है। อมาทิปรตปฺปุริโส. अम्-आदि पर-तत्पुरुष। กฺวจิ [Pg.199] ตปฺปุริเส ‘‘ปภงฺกรา’’ทีสุ วิภตฺติโลโป น ภวติ. कहीं तत्पुरुष में 'प्रभङ्कर' आदि में विभक्ति का लोप नहीं होता है। ยถา – ปภํ กโรตีติ อตฺเถ ‘‘อมาทโย ปรปเทภี’’ติ สมาโส, ‘‘นามานํ สมาโส ยุตฺตตฺโถ’’ติ สมาสสญฺญา, ตโต ‘‘เตสํ วิภตฺติโย โลปา จา’’ติ วิภตฺติโลเป สมฺปตฺเต ตตฺเถว จคฺคหเณน ปุพฺพปเท วิภตฺติโลปาภาโว. เสสํ สมํ. ปภงฺกโร, อมตํ ททาตีติ อมตนฺทโท, รณํ ชหาตีติ รณญฺชโห, ชุตึ ธาเรตีติ ชุตินฺธโร, ตถา สหสากตํ, ปรสฺสปทํ. อตฺตโนปทํ, ภยโต อุปฏฺฐานํ ภยตูปฏฺฐานํ, ปรโตโฆโส, ควํปติตฺเถโร, มนสิกาโร, ปุพฺเพนิวาโส, ปุพฺเพนิวาสานุสฺสติ, มชฺเฌกลฺยาณํ, อนฺเตวาสี, อนฺเตวาสิโก, ชเนสุโต, อุรสิโลโม, กณฺเฐกาโฬ, สรสิชมิจฺจาทิ. जैसे - 'पभं करोति' (प्रभा करता है) इस अर्थ में 'अमादयो परपदेभि' सूत्र से समास होता है, 'नामानं समासो युत्तत्थो' से समास संज्ञा होती है, उसके बाद 'तेसं विबत्तियो लोपा च' से विभक्ति लोप प्राप्त होने पर वहीं 'च' ग्रहण से पूर्वपद में विभक्ति लोप का अभाव होता है। शेष समान है। पभङ्करो (प्रभाकर), 'अमतं ददाति' इति 'अमतन्ददो' (अमृत देने वाला), 'रणं जहाति' इति 'रणञ्जो' (क्लेश त्यागने वाला), 'जुतिं धारेति' इति 'जुतिन्धरो' (द्युति धारण करने वाला), वैसे ही 'सहसाकतं', 'परस्सपदं'। 'अत्तनोपदं', 'भयतो उपट्ठानं' 'भयतूपट्ठानं', 'परतोघोषो', 'गवं पतित्थेरो', 'मनसिकारो', 'पुब्बेनिवासो', 'पुब्बेनिवासानुस्सति', 'मज्झेकल्याणं', 'अन्तेवासी', 'अन्तेवासिको', 'जनेसुतो', 'उरसिलोमो', 'कण्ठेकाळो', 'सरसिजं' इत्यादि। อโลปตปฺปุริโส. अलोप तत्पुरुष। ตปฺปุริสสมาโส นิฏฺฐิโต. तत्पुरुष समास समाप्त हुआ। พหุพฺพีหิสมาส बहुव्रीहि समास। อถ พหุพฺพีหิสมาโส วุจฺจเต. अब बहुव्रीहि समास कहा जाता है। โส จ นววิโธ ทฺวิปโท ตุลฺยาธิกรโณ, ทฺวิปโท ภินฺนาธิกรโณ, ติปโท นนิปาตปุพฺพปโท, สหปุพฺพปโท อุปมานปุพฺพปโท สงฺขฺโยภยปโท ทิสนฺตราฬตฺโถ พฺยติหารลกฺขโณ จาติ. और वह नौ प्रकार का है: द्विपद तुल्याधिकरण, द्विपद भिन्नाधिकरण, त्रिपद, न-निपात पूर्वपद, सह-पूर्वपद, उपमान-पूर्वपद, संख्या-उभयपद, दिशान्तराल-अर्थ और व्यतिहार-लक्षण। ตตฺถ ทฺวิปโท ตุลฺยาธิกรโณ พหุพฺพีหิ กมฺมาทีสุ ฉสุ วิภตฺยตฺเถสุ ภวติ. उनमें द्विपद तुल्याधिकरण बहुव्रीहि कर्म आदि छह विभक्ति अर्थों में होता है। ตตฺถ [Pg.200] ทุติยตฺเถ ตาว – ‘‘อาคตา สมณา อิมํ สงฺฆาราม’’นฺติ วิคฺคเห – उनमें पहले द्वितीया के अर्थ में - 'आगता समणा इमं संघारामं' (श्रमण इस संघाराम में आए हैं) इस विग्रह में - ๓๕๒. อญฺญปทตฺเถสุ พหุพฺพีหิ. ३५२. अन्य पद के अर्थों में बहुव्रीहि (होता है)। สมสฺยมานปทโต อญฺเญสํ ปฐมทุติยาทิวิภตฺยนฺตานํ ปทานมตฺเถสุ ยุตฺตตฺถานิ นามานิ วิภาสา สมสฺยนฺเต, โส สมาโส พหุพฺพีหิสญฺโญ จ โหติ. समस्त होने वाले पदों से भिन्न प्रथमा, द्वितीया आदि विभक्तियों के अंत वाले पदों के अर्थों में युक्त अर्थ वाले नाम (शब्द) विकल्प से समस्त होते हैं, और वह समास बहुव्रीहि संज्ञा वाला होता है। พหโว วีหโย ยสฺส โส พหุพฺพีหิ, พหุพฺพีหิสทิสตฺตา อยมฺปิสมาโส อนฺวตฺถสญฺญาวเสน พหุพฺพีหีติ วุตฺโต, อญฺญปทตฺถปฺปธาโน หิ พหุพฺพีหิ. 'बहवो वीहयो यस्स सो बहुव्रीहि' (बहुत धान हैं जिसके पास वह बहुव्रीहि है), बहुव्रीहि के समान होने के कारण यह समास भी अन्वर्थ संज्ञा के वश से 'बहुव्रीहि' कहा गया है, क्योंकि बहुव्रीहि अन्य पद के अर्थ की प्रधानता वाला होता है। ทุวิโธ จายํ พหุพฺพีหิ ตคฺคุณสํวิญฺญาณาตคฺคุณสํวิญฺญาณวเสน, เตสุ ยตฺถ วิเสสนภูโต อตฺโถ อญฺญปทตฺถคฺคหเณน คยฺหติ, โส ตคฺคุณสํวิญฺญาโณ, ยถา – ลมฺพกณฺณมานยาติ. और यह बहुव्रीहि तद्गुण-संविज्ञान और अतद्गुण-संविज्ञान के भेद से दो प्रकार का है; उनमें जहाँ विशेषण रूप अर्थ अन्य पद के अर्थ के ग्रहण के साथ ग्रहण किया जाता है, वह तद्गुण-संविज्ञान है, जैसे - 'लम्बकण्णमानय' (लंबे कान वाले को लाओ)। ยตฺถ ปน น คยฺหติ, โส อตคฺคุณสํวิญฺญาโณ, ยถา – พหุธนมานยาติ. जहाँ (विशेषण) ग्रहण नहीं किया जाता है, वह अतद्गुण-संविज्ञान है, जैसे - 'बहुधनमानय' (बहुत धन वाले को लाओ)। อิธ พหุพฺพีหิสทฺเท วิย วิเสสนสฺส ปุพฺพนิปาโต, เสสํ ปุพฺพสมํ. यहाँ 'बहुव्रीहि' शब्द के समान विशेषण का पूर्व निपात (पहले प्रयोग) होता है, शेष पहले के समान है। อาคตสมโณ สงฺฆาราโม. เอตฺถ จ อาคตสทฺโท, สมณสทฺโท จ อตฺตโน อตฺเถ อฏฺฐตฺวา ทุติยาวิภตฺยตฺถภูเต สงฺฆารามสงฺขาเต อญฺญปทตฺเถ วตฺตนฺติ, ตทตฺถโชตนตฺถเมว ตทนนฺตรํ ‘‘สงฺฆาราโม’’ติ ปทนฺตรํ ปยุชฺชติ, ตโต สมาเสเนว กมฺมตฺถสฺส อภิหิตตฺตา ปุน ทุติยา น โหติ. อิทํสทฺทสฺส จ อปฺปโยโค, เอวํ สพฺพตฺถ. พหุพฺพีหิ จายํ อภิเธยฺยลิงฺควจโน. 'आगतसमणो संघारामों'। और यहाँ 'आगत' शब्द और 'समण' शब्द अपने अर्थ में न रहकर द्वितीया विभक्ति के अर्थ रूप 'संघाराम' नामक अन्य पद के अर्थ में प्रवृत्त होते हैं, उसी अर्थ को प्रकट करने के लिए उसके बाद 'संघारामों' यह अन्य पद प्रयुक्त होता है, फिर समास के द्वारा ही कर्म अर्थ के कह दिए जाने के कारण पुनः द्वितीया नहीं होती है। 'इदं' शब्द का प्रयोग नहीं होता, इसी प्रकार सर्वत्र। और यह बहुव्रीहि अभिधेय (विशेष्य) के लिंग और वचन वाला होता है। ตถา อาคตสมณา สาวตฺถิ, อาคตสมณํ เชตวนํ, ปฏิปนฺนา อทฺธิกา ยํ ปถํ โสยํ ปฏิปนฺนทฺธิโก ปโถ[Pg.201], อภิรุฬฺหา วาณิชา ยํ นาวํ สา อภิรุฬฺหวาณิชา นาวา. เอวํ กมฺมตฺเถ พหุพฺพีหิ. वैसे ही 'आगतसमणा सावत्थी', 'आगतसमणं जेतवनं', 'पटिपन्ना अद्धिका यं पथं सोयं पटिपन्नद्धिको पथो' (जिस मार्ग पर यात्री चल रहे हैं वह 'प्रतिपन्नाध्विक' मार्ग है), 'अभिरूळ्हा वाणिजा यं नावं सा अभिरूळ्हवाणिजा नावा' (जिस नाव पर व्यापारी चढ़े हैं वह 'अभिरूढवाणिज' नाव है)। इस प्रकार कर्म अर्थ में बहुव्रीहि। ตติยตฺเถ พหุพฺพีหิ ยถา – ชิตานิ อินฺทฺริยานิ เยน สมเณน โสยํ ชิตินฺทฺริโย สมโณ. เอวํ ทิฏฺฐธมฺโม, ปตฺตธมฺโม, กตกิจฺโจ, ชิตา มารา อเนนาติ ชิตมาโร ภควา, ปฏิวิทฺธสพฺพธมฺโม. तृतीया के अर्थ में बहुव्रीहि जैसे - 'जितानि इन्द्रियाणि येन समणेन सोयं जितेन्द्रियो समणो' (जिस श्रमण द्वारा इन्द्रियाँ जीत ली गई हैं वह जितेन्द्रिय श्रमण है)। इसी प्रकार 'दिट्ठधम्मो', 'पत्तधम्मो', 'कतकिच्चो', 'जिता मारा अनेनाति जितमारो भगवा' (जिसके द्वारा मार जीत लिए गए हैं वह जितमार भगवान), 'पटिविद्धसब्बधम्मो'। จตุตฺถิยตฺเถ พหุพฺพีหิ ยถา – ทินฺโน สุงฺโก ยสฺส รญฺโญ โสยํ ทินฺนสุงฺโก ราชา, อุปนีตํ โภชนํ อสฺส สมณสฺสาติ อุปนีตโภชโน สมโณ, อุปหโฏ พลิ อสฺสาติ อุปหฏพลิ ยกฺโข. चतुर्थी के अर्थ में बहुव्रीहि जैसे - 'दिन्नो सुङ्को यस्स रञ्ञो सोयं दिन्नसुङ्को राजा' (जिस राजा को शुल्क दिया गया है वह दत्तशुल्क राजा है), 'उपनीतं भोजनं अस्स समणस्सति उपनीतभोजनो समणो' (जिस श्रमण को भोजन लाया गया है वह उपनीतभोजन श्रमण है), 'उपहटो बलि अस्साति उपहबलि यक्खो' (जिसके लिए बलि भेंट की गई है वह उपहृतबलि यक्ष है)। ปญฺจมิยตฺเถ พหุพฺพีหิ ยถา – นิคฺคตา ชนา อสฺมา คามา โสยํ นิคฺคตชโน คาโม, นิคฺคโต อโย อสฺมาติ นิรโย, นิคฺคตา กิเลสา เอตสฺมาติ นิกฺกิเลโส, อเปตํ วิญฺญาณํ อสฺมาติ อเปตวิญฺญาโณ มตกาโย, อปคตํ ภยเภรวํ อสฺมาติ อปคตภยเภรโว อรหา. पञ्चमी के अर्थ में बहुव्रीहि जैसे - 'निग्गता जना अस्मा गामा सोयं निग्गतजनो गामो' (जिस गाँव से लोग निकल गए हैं वह निर्गतजन गाँव है), 'निग्गतो अयो अस्माति निरयो' (जिससे सुख निकल गया है वह निरय/नरक है), 'निग्गता किलेसा एतस्माति निक्किलेसो' (जिससे क्लेश निकल गए हैं वह निष्क्लेश है), 'अपेतं विञ्ञाणं अस्माति अपेतविञ्ञाणो मतकायो' (जिससे विज्ञान निकल गया है वह अपेतविज्ञान मृत शरीर है), 'अपगतं भयभेरवं अस्माति अपगतभयभेरवो अरहा' (जिससे भय और भैरव दूर हो गए हैं वह अपगतभयभेरव अर्हत् है)। ฉฏฺฐิยตฺเถ พหุพฺพีหิ ยถา – ฉินฺนา หตฺถา ยสฺส ปุริสสฺส โสยํ ฉินฺนหตฺโถ ปุริโส. เอวํ ปริปุณฺณสงฺกปฺโป, ขีณาสโว, วีโต ราโค อสฺสาติ วีตราโค, ทฺเว ปทานิ อสฺสาติ ทฺวิปโท, ทฺวิหตฺโถ ปโฏ, เตวิชฺโช, จตุปฺปโท, ปญฺจ จกฺขูนิ อสฺสาติ ปญฺจจกฺขุ ภควา, ฉฬภิญฺโญ, รสฺสตฺตํ, นวงฺคํ สตฺถุสาสนํ, ทสพโล, อนนฺตญาโณ, ตีณิ ทส ปริมาณเมเตสนฺติ ติทสา เทวา, สมาสนฺตสฺส อตฺตํ, อิธ ปริมาณสทฺทสฺส สนฺนิธานโต [Pg.202] ทสสทฺโท สงฺขฺยาเน วตฺตเต, อยํ ปจฺจโย เอเตสนฺติ อิทปฺปจฺจยา, โก ปภโว อสฺสาติ กึปภโว อยํ กาโย, วิคตํ มลมสฺสาติ วิมโล, สุนฺทโร คนฺโธ อสฺสาติ สุคนฺธํ จนฺทนํ. เอวํ สุสีโล, สุมุโข, กุจฺฉิโต คนฺโธ อสฺสาติ ทุคฺคนฺธํ กุณปํ, ทุฏฺฐุ มโน อสฺสาติ ทุมฺมโน. เอวํ ทุสฺสีโล, ทุมฺมุโข, ตโป เอว ธนํ อสฺสาติ ตโปธโน, ขนฺติสงฺขาตํ พลํ อสฺสาติ ขนฺติพโล, อินฺโทติ นามํ เอตสฺสาติ อินฺทนาโม. षष्ठी के अर्थ में बहुव्रीहि जैसे - 'छिन्ना हत्था यस्स पुरिसस्स सोयं छिन्नहत्थो पुरिसो' (जिस पुरुष के हाथ कट गए हैं वह छिन्नहस्त पुरुष है)। इसी प्रकार 'परिपुण्णसङ्कप्पो', 'खीणासवो', 'वीतो रागो अस्साति वीतरागो', 'द्वे पदानि अस्साति द्विपदो', 'द्विहत्थो पटो', 'तेविज्जो', 'चतुप्पदो', 'पञ्च चक्खूनि अस्साति पञ्चचक्खु भगवा', 'छळभिञ्ञो', 'रस्सत्तं', 'नवङ्गं सत्थुसासनं', 'दसबलो', 'अनन्तञाणो', 'तीणि दसा परिमाणमेतेसन्ति तिदसा देवा' (तीन दस [तीस] है परिमाण जिनका वे त्रिदश देव हैं), समास के अंत में 'अ' कार होना, यहाँ 'परिमाण' शब्द के सान्निध्य से 'दस' शब्द संख्यान (गणना) में प्रवृत्त है, 'अयं पच्चयो एतेसन्ति इदप्पच्चया' (यह प्रत्यय है इनका वे इदंप्रत्यय हैं), 'को पभवो अस्साति किम्पभवो अयं कायो' (क्या है उद्भव जिसका वह किंप्रभव यह शरीर है), 'विगतं मलमस्साति विमलो', 'सुन्दरो गन्धो अस्साति सुगन्धं चन्दनं'। इसी प्रकार 'सुसीलो', 'सुमुखो', 'कुच्छितो गन्धो अस्साति दुग्गन्धं कुणपं', 'दुट्ठु मनो अस्साति दुम्मनो'। इसी प्रकार 'दुस्सीलो', 'दुम्मुखो', 'तपो एव धनं अस्साति तपोधनो', 'खन्तिसङ्खातं बलं अस्साति खन्तिबलो', 'इन्दोति नामं एतस्सति इन्दनामो'। ฉนฺทชาตาทีสุ วิเสสนวิเสสิตพฺพานํ ยถิจฺฉิตตฺตา อุภยํ ปุพฺพํ นิปตติ, ยถา – ฉนฺโท ชาโต อสฺสาติ ฉนฺทชาโต, ชาโต ฉนฺโท อสฺสาติปิ ชาตฉนฺโท. เอวํ สญฺชาตปีติโสมนสฺโส, ปีติโสมนสฺสสญฺชาโต, มาสชาโต, ชาตมาโส, ฉินฺนหตฺโถ, หตฺถจฺฉินฺโน. 'छन्दजात' आदि में विशेषण और विशेष्य की इच्छा के अनुसार दोनों का पूर्व निपात होता है, जैसे - 'छन्दो जातो अस्साति छन्दजातो', और 'जातो छन्दो अस्सातिपि जातछन्दो'। इसी प्रकार 'सञ्जातपीतिसोमनस्सो', 'पीतिसोमनस्ससञ्जातो', 'मासजातो', 'जातमासो', 'छिन्नहत्थो', 'हत्थच्छिन्नो'। ‘‘ทีฆา ชงฺฆายสฺสา’’ติ วิคฺคยฺห สมาสาทิมฺหิ กเต – 'दीघा जङ्घा यस्सा' (लंबी जंघाएँ हैं जिसकी) ऐसा विग्रह करके समास आदि करने पर - ‘‘ตุลฺยาธิกรเณ, ปเท’’ติ จ วตฺตเต. 'तुल्याधिकरणे' और 'पदे' (इन पदों की) अनुवृत्ति होती है। ๓๕๓. อิตฺถิยํ ภาสิตปุมิตฺถี ปุมาว เจ. ३५३. स्त्रीलिंग में (प्रयुक्त होने पर भी) यदि वह शब्द पहले पुल्लिंग में बोला गया हो, तो वह पुल्लिंग के समान ही होता है। อิตฺถิยํ วตฺตมาเน ตุลฺยาธิกรเณ ปเท ปเร ปุพฺเพ ภาสิตปุมา อิตฺถิวาจโก สทฺโท อตฺถิ เจ, โส ปุมา อิว ทฏฺฐพฺโพติ ปุพฺพปเท อิตฺถิปฺปจฺจยาภาโว, พหุพฺพีหิวิสโยยํ, อุปริ ‘‘กมฺมธารยสญฺเญ จา’’ติ วกฺขมานตฺตา. स्त्रीलिंग में वर्तमान समानाधिकरण पद के परे होने पर, यदि पूर्व में कहा गया पुल्लिंग शब्द स्त्रीलिंग वाचक है, तो उसे पुल्लिंग के समान ही देखा जाना चाहिए, अर्थात् पूर्व पद में स्त्रीलिंग प्रत्यय का अभाव हो जाता है। यह बहुव्रीहि का विषय है, क्योंकि आगे 'कम्मधारयसञ्ञे च' ऐसा कहा जाएगा। ๓๕๔. กฺวจาทิมชฺฌุตฺตรานํ ทีฆรสฺสาปจฺจเยสุ จ. ३५४. कहीं-कहीं आदि, मध्य और उत्तर (अन्त्य) स्वरों का दीर्घ और ह्रस्व होता है, प्रत्यय होने पर और प्रत्यय न होने पर भी। กฺวจิ ตทฺธิตสมาสนาโมปสคฺคาทีสุ ปเทสุ อาทิมชฺฌุตฺตรภูตานํ สรานํ ชินวจนานุปโรเธน ทีฆรสฺสา โหนฺติ ปจฺจเยสุ, อปจฺจเยสุ ปเรสุ, อปรภูเตสุ จ. कहीं-कहीं तद्धित, समास, नाम और उपसर्ग आदि पदों में आदि, मध्य और अन्त में स्थित स्वरों का बुद्ध-वचनों के अविरोध से दीर्घ और ह्रस्व होता है, प्रत्यय परे होने पर, प्रत्यय परे न होने पर और अन्य स्थितियों में भी। ตตฺถ [Pg.203] वहाँ— ทีฆตฺตํ ปากฏานูป- ฆาตาโท มธุวาทิสุ; รสฺสตฺตํ อชฺชเว อิตฺถิ- รูปาโท จ ก, ตาทิสูติ. 'पाकट', 'अनूप', 'घात' आदि और 'मधु' आदि शब्दों में दीर्घत्व होता है; 'अज्जव', 'इत्थिरूप' आदि में और 'क' आदि प्रत्ययों के होने पर ह्रस्वत्व होता है। พหุพฺพีหิสมาเส สติ ปุลฺลิงฺเค อุตฺตรปทนฺตสฺส รสฺสตฺตํ. ทีฆชงฺโฆ ปุริโส, ตถา ปหูตา ชิวฺหา อสฺสาติ ปหูตชิวฺโห ภควา. มหตี ปญฺญา อสฺสาติ มหาปญฺโญ. ‘‘มหตํ มหา ตุลฺยาธิกรเณ ปเท’’ติ มหาเทโส. बहुव्रीहि समास होने पर पुल्लिंग में उत्तरपद के अन्त का ह्रस्व होता है। जैसे—दीघजङ्घो पुरिसो (लम्बी जंघाओं वाला पुरुष), वैसे ही 'पहूता जिव्हा अस्साति' (जिसकी जिह्वा विस्तृत है) पहूतजिव्हो भगवा। 'महती पञ्ञा अस्साति' महापञ्ञो। 'महतं महा तुल्याधिकरणे पदे' इस सूत्र से 'महा' आदेश होता है। อิตฺถิยมิติ กึ? ขมาธโน. ภาสิตปุมาติ กึ? สทฺธาธุโร, สทฺธาปกติโก, ปญฺญาปกติโก, ปญฺญาวิสุทฺธิโก, เอตฺถ จ ‘‘กฺวจิ สมาสนฺตคตานมการนฺโต’’ติ กปฺปจฺจโย. ตุลฺยาธิกรเณ อิจฺเจว? สมณิภตฺติโก, กุมาริภตฺติโก, กุมาริภตฺติ. 'इत्थियं' (स्त्रीलिंग में) ऐसा क्यों कहा? खमाधनो। 'भासितपुमा' (पूर्व में पुल्लिंग) ऐसा क्यों कहा? सद्धाधुरो, सद्धापकतिको, पञ्ञापकतिको, पञ्ञाविसुद्धिको—यहाँ 'क्वचि समासान्तगतानमकारन्तो' सूत्र से 'क' प्रत्यय हुआ है। 'तुल्याधिकरणे' (समानाधिकरण) ही क्यों? समणिभत्तिको, कुमारिभत्तिको, कुमारिभत्ति। ปุพฺพปทสฺเสวายํ ปุมฺภาวาติเทโส, เตน อิธ น ภวติ. พหุทาสิโก ปุริโส. พหุกุมาริกํ กุลํ. यह पुल्लिंग भाव का अतिदेश केवल पूर्वपद के लिए ही है, इसलिए यहाँ नहीं होता—बहुदासिको पुरिसो, बहुकुमारिकं कुलं। ‘‘คาณฺฐิโว ธนุ อสฺสา’’ติ วิคฺคยฺห สมาสาทิมฺหิ กเต – 'गाण्ठिवो धनु अस्सा' ऐसा विग्रह करके समास आदि करने पर— ๓๕๕. ธนุมฺหา จ. ३५५. 'धनु' शब्द से भी। ติปทมิทํ. กฺวจิสมาสนฺตคตา ธนุสทฺทา อาปจฺจโย โหติ, จสทฺเทน ธมฺมาทิโต จ, ‘‘วโมทุทนฺตาน’’นฺติ วกาโร, คาณฺฐิวธนฺวา. เอวํ ปจฺจกฺขธมฺมา. यह तीन पदों वाला सूत्र है। कहीं-कहीं समासान्त 'धनु' शब्द से 'आ' प्रत्यय होता है, और 'च' शब्द से 'धम्म' आदि से भी। 'वमोदुदन्तानं' सूत्र से 'व' कार होकर 'गाण्ठिवधन्वा' बनता है। इसी प्रकार 'पच्चक्खधम्मा'। กฺวจีติ กึ? สหสฺสถามธนุ, ปจฺจกฺขธมฺโม, วิทิตธมฺโม. 'क्वचि' (कहीं-कहीं) ऐसा क्यों कहा? सहस्सथामधनु, पच्चक्खधम्मो, विदितधम्मो। นานาทุมปติตปุปฺผวาสิตสานุ อิจฺจตฺร – นานปฺปการา ทุมา นานาทุมา, นานาทุเมหิ ปติตานิ นานาทุมปติตานิ, นานาทุมปติตานิ จ ตานิ ปุปฺผานิ จาติ นานาทุมปติตปุปฺผานิ, เตหิ วาสิตา นานาทุมปติตปุปฺผวาสิตา, นานาทุมปติตปุปฺผวาสิตา สานู ยสฺส ปพฺพตสฺส โสยํ นานาทุมปติตปุปฺผวาสิตสานุ [Pg.204] ปพฺพโต. อยํ ปน กมฺมธารยตปฺปุริสคพฺโภ ตุลฺยาธิกรณพหุพฺพีหิ. 'नानादुमपतितपुप्फवासितसानु' यहाँ—नाना प्रकार के वृक्ष 'नानादुमा' हैं, नाना वृक्षों से गिरे हुए 'नानादुमपतितानि' हैं, नाना वृक्षों से गिरे हुए और वे पुष्प 'नानादुमपतितपुप्फानि' हैं, उनसे सुवासित 'नानादुमपतितपुप्फवासिता' हैं, नाना वृक्षों से गिरे हुए पुष्पों से सुवासित हैं सानु (शिखर) जिसके, वह 'नानादुमपतितपुप्फवासितसानु' पर्वत है। यह कर्मधारय और तत्पुरुष गर्भित समानाधिकरण बहुव्रीहि है। ตถา พฺยาลมฺโพ อมฺพุธโร พฺยาลมฺพมฺพุธโร, ตสฺส พินฺทูนิ พฺยาลมฺพมฺพุธรพินฺทูนิ, เตหิ จุมฺพิโต พฺยาลมฺพมฺพุธรพินฺทุจุมฺพิโต, ตาทิโส กูโฏ ยสฺส โสยํ พฺยาลมฺพมฺพุธรพินฺทุจุมฺพิตกูโฏ อิจฺจาทิ. वैसे ही 'ब्यालम्बो अम्बुधरो' से 'ब्यालम्बम्बुधरो', उसकी बूँदें 'ब्यालम्बम्बुधरबिन्दूनि', उनसे चुम्बित (स्पर्श किया हुआ) 'ब्यालम्बम्बुधरबिन्दुचुम्बितो', वैसा शिखर है जिसका वह 'ब्यालम्बम्बुधरबिन्दुचुम्बितकूटो' इत्यादि। สตฺตมิยตฺเถ พหุพฺพีหิ ยถา – สมฺปนฺนานิ สสฺสานิ ยสฺมึ ชนปเท โสยํ สมฺปนฺนสสฺโส ชนปโท, สุลโภ ปิณฺโฑ อิมสฺมินฺติ สุลภปิณฺโฑ เทโส. อากิณฺณา มนุสฺสา ยสฺสํ ราชธานิยํ สา อากิณฺณมนุสฺสา ราชธานี, พหโว ตาปสา เอตสฺมินฺติ พหุตาปโส อสฺสโม, อุปจิตํ มํสโลหิตํ อสฺมินฺติ อุปจิตมํสโลหิตํ สรีรํ, พหโว สามิโน อสฺมินฺติ พหุสฺสามิกํ นครํ. सप्तमी के अर्थ में बहुव्रीहि जैसे—जिस जनपद में फसलें सम्पन्न हैं वह 'सम्पन्नसस्सो जनपदो', जिसमें पिण्ड (भिक्षा) सुलभ है वह 'सुलभपिण्डो देसो'। जिस राजधानी में मनुष्य भरे हुए हैं वह 'आकिण्णमनुस्सा राजधानी', जिसमें बहुत तपस्वी हैं वह 'बहुतापसो अस्समो', जिसमें मांस और रक्त संचित है वह 'उपचितमंसलोहितं सरीरं', जिसमें बहुत स्वामी हैं वह 'बहुस्सामिकं नगरं'। ‘‘พหู นทิโย อสฺมิ’’นฺติ อตฺเถ สมาสาทิมฺหิ กเต – 'बहू नदियो अस्मिं' इस अर्थ में समास आदि करने पर— สมาสนฺตคฺคหณํ, กปฺปจฺจโย จ วตฺตเต. 'समासान्त' का ग्रहण और 'क' प्रत्यय अनुवृत्त होता है। ๓๕๖. นทิมฺหา จ. ३५६. 'नदी' शब्द से भी। สมาสนฺตคตา นทิมฺหา กปฺปจฺจโย โหติ, จสทฺเทน ตุอนฺตา จ. นิจฺจตฺถํ วจนํ. นทีติ เจตฺถ อิตฺถิวาจกานํ อีการูการานํ ปรสมญฺญา, ตโต ‘‘กฺวจาทิมชฺฌุตฺตราน’’นฺติอาทินา นทิสญฺญสฺส กปฺปจฺจเย รสฺสตฺตํ, พหุนทิโก ชนปโท. เอวํ พหุชมฺพุกํ วนํ. พหุนาริโกติ ฉฏฺฐีพหุพฺพีหินา สิทฺธํ. พหโว กตฺตาโร อสฺมึ, อสฺสาติ วา พหุกตฺตุโก เทโส. เอวํ พหุภตฺตุโก. समासान्त 'नदी' शब्द से 'क' प्रत्यय होता है, और 'च' शब्द से 'तु' अन्त वाले शब्दों से भी। यह वचन नित्य के लिए है। यहाँ 'नदी' स्त्रीलिंग वाचक ईकार और ऊकार की पर-संज्ञा है, उसके बाद 'क्वचादिमज्झुत्तरानं' आदि सूत्र से नदी-संज्ञक शब्द का 'क' प्रत्यय होने पर ह्रस्व हो जाता है—'बहुनदिको जनपदो'। इसी प्रकार 'बहुजम्बुकं वनं'। 'बहुनारिको' यह षष्ठी बहुव्रीहि से सिद्ध होता है। जिसमें बहुत कर्ता हैं वह 'बहुकत्तुको देसो'। इसी प्रकार 'बहुभत्तुको'। ภินฺนาธิกรโณ ยถา – เอกรตฺตึ วาโส อสฺสาติ เอกรตฺติวาโส, สมาเนน ชเนน สทฺธึ วาโส อสฺสาติ สมานวาโส [Pg.205] ปุริโส. อุภโต พฺยญฺชนมสฺส อตฺถีติ อุภโภพฺยญฺชนโก, ฉตฺตํ ปาณิมฺหิ อสฺสาติ ฉตฺตปาณิ ปุริโส. เอวํ ทณฺฑปาณิ, สตฺถปาณิ, วชิรปาณิ, ขคฺคหตฺโถ, สตฺถหตฺโถ, ทาเน อชฺฌาสโย อสฺสาติ ทานชฺฌาสโย, ทานาธิมุตฺติโก, พุทฺธภตฺติโก, สทฺธมฺมคารโว อิจฺจาทิ. व्यधिकरण (भिन्नाधिकरण) बहुव्रीहि जैसे—'एकरत्तिं वासो अस्साति' एकरत्तिवासो, 'समानेन जनेन सद्धिं वासो अस्साति' समानवासो पुरिसो। 'उभतो ब्यञ्जनमस्स अत्थीति' उभतोब्यञ्जनको, 'छत्तं पाणिम्हि अस्साति' छत्तपाणि पुरिसो। इसी प्रकार दण्डपाणि, सत्थपाणि, वजिरपाणि, खग्गहत्थो, सत्थहत्थो, 'दाने अज्झासयो अस्साति' दानज्झासयो, दानाधिमुत्तिको, बुद्धभत्तिको, सद्धम्मगारवो इत्यादि। ติปโท ยถา – ปรกฺกเมนาธิคตา สมฺปทา เยหิ เต ภวนฺติ ปรกฺกมาธิคตสมฺปทา มหาปุริสา. เอวํ ธมฺมาธิคตโภคา, โอณีโต ปตฺตโต ปาณิ เยน โสยํ โอณีตปตฺตปาณิ, สีหสฺส ปุพฺพทฺธํ วิย กาโย อสฺสาติ สีหปุพฺพทฺธกาโย, มตฺตา พหโว มาตงฺคา อสฺมินฺติ มตฺตพหุมาตงฺคํ วนํ อิจฺจาทิ. त्रिपद बहुव्रीहि जैसे—'परक्कमेनाधिगता सम्पदा yehi te' पराक्रमाधिगतसम्पदा महापुरुषाः। इसी प्रकार धम्माधिगतभोगा, 'ओणीतो पत्ततो पाणि येन' ओणीतपत्तपाणि, 'सीहस्स पुब्बद्धं विय कायो अस्साति' सीहपुब्बद्धकायो, 'मत्ता बहवो मातङ्गा अस्मिन्ति' मत्तबहुमातङ्गं वनं इत्यादि। นนิปาตปุพฺพปโท ยถา – นตฺถิ เอตสฺส สโมติ อสโม ภควา. อิธ ‘‘อตฺตํ นสฺส ตปฺปุริเส’’ติ สุตฺเต ‘‘อตฺตํ นสฺสา’’ติ โยควิภาเคน นสฺส อตฺตํ. เอวํ อปฺปฏิปุคฺคโล, อปุตฺตโก, อเหตุโก, ‘‘กฺวจิ สมาสนฺต’’อิจฺจาทินา กปฺปจฺจโย, นตฺถิ สํวาโส เอเตสนฺติ อสํวาสา, น วิชฺชเต วุฏฺฐิ เอตฺถาติ อวุฏฺฐิโก ชนปโท, อภิกฺขุโก วิหาโร, นตฺถิ เอตสฺส อุตฺตโรติ อนุตฺตโร, ‘‘สเร อน’’ติ อน, ตปฺปุริสคฺคหณมุปลกฺขณํ, อถวา ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา นสฺส อน. เอวํ นตฺถิ อนฺโต อสฺสาติ อนนฺตํ, น วิชฺชนฺติ อาสวา เอเตสนฺติ อนาสวา อิจฺจาทิ. 'न' निपात पूर्वपद वाला बहुव्रीहि जैसे—'नत्थि एतस्स समोति' असमो भगवा। यहाँ 'अत्तं नस्स तत्पुरिसे' सूत्र में 'अत्तं नस्स' इस योग-विभाग से 'न' का 'अ' हुआ है। इसी प्रकार अप्पटिपुग्गलो, अपुत्तको, अहेतुको—यहाँ 'क्वचि समासान्त' आदि से 'क' प्रत्यय हुआ है; 'नत्थि संवासो एतेसन्ति' असंवासा, 'न विज्जते वुट्ठि एत्थाति' अवुट्ठिको जनपदो, अभिक्खुको विहारो, 'नत्थि एतस्स उत्तरोति' अनुत्तरो—यहाँ 'सरे अन' से 'अन' हुआ है, तत्पुरुष का ग्रहण उपलक्षण मात्र है, अथवा 'तेसु वुद्धी' आदि से 'न' का 'अन' हुआ है। इसी प्रकार 'नत्थि अन्तो अस्साति' अनन्तं, 'न विज्जन्ति आसवा एतेसन्ति' अनासवा इत्यादि। ปฐมายตฺเถ สหปุพฺพปโท ยถา – สห เหตุนา โย วตฺตเตติ สเหตุโก, สเหตุ วา, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา [Pg.206] สหสทฺทสฺส สาเทโส, ‘‘กฺวจิ สมาสนฺต’’อิจฺจาทินา กปฺปจฺจโย จ, สห ปีติยา อิเม วตฺตนฺตีติ สปฺปีติกา. เอวํ สห ปจฺจเยหิ วตฺตนฺตีติ สปฺปจฺจยา, สกิเลโส, สอุปาทาโน, สปริวาโร, สห มูเลน อุทฺธโต สมูลุทฺธโต รุกฺโข. प्रथमा विभक्ति के अर्थ में 'सह' पूर्वपद वाला (बहुब्रीहि) जैसे - जो हेतु के साथ रहता है वह 'सहेतुक' या 'सहेतु' है। 'तेसु वुद्धि' आदि सूत्र से 'सह' शब्द के स्थान पर 'स' आदेश होता है, और 'क्वचि समासान्त' आदि से 'क' प्रत्यय होता है। जो प्रीति के साथ रहते हैं वे 'सप्पीतिक' हैं। इसी प्रकार जो प्रत्ययों के साथ रहते हैं वे 'सप्पच्चय' हैं, 'सकिलेस' (क्लेश सहित), 'सउपादान' (उपादान सहित), 'सपरिवार' (परिवार सहित), मूल के साथ उखाड़ा गया वृक्ष 'समूलुद्धत' वृक्ष है। อุปมานปุพฺพปโท ปฐมายตฺเถ ตาว – อุปมาโนปเมยฺยภาวปฺปสิทฺธตฺถํ อิวสทฺทปฺปโยโค, กายพฺยามานํ สมปฺปมาณตาย นิคฺโรโธ อิว ปริมณฺฑโล โย ราชกุมาโร โสยํนิคฺโรธปริมณฺฑโล ราชกุมาโร. ‘‘วุตฺตตฺถานมปฺปโยโค’’ติ อิวสทฺทสฺส อปฺปโยโค, สงฺโข วิย ปณฺฑโร อยนฺติ สงฺขปณฺฑโร, กาโก วิย สูโร อยนฺติ กากสูโร, จกฺขุ อิว ภูโต อยํ ปรมตฺถทสฺสนโตติ จกฺขุภูโต ภควา. เอวํ อตฺถภูโต. ธมฺมภูโต, พฺรหฺมภูโต, อนฺโธ วิย ภูโต อยนฺติ อนฺธภูโต พาโล. มุญฺชปพฺพชมิว ภูตา อยนฺติ มุญฺชปพฺพชภูตา กุทิฏฺฐิ. ตนฺตากุลกมิว ชาตา อยนฺติ ตนฺตากุลกชาตา. प्रथमा विभक्ति के अर्थ में उपमान पूर्वपद वाला (बहुब्रीहि) - उपमान और उपमेय के भाव को सिद्ध करने के लिए 'इव' शब्द का प्रयोग होता है। शरीर के विस्तार की समानता के कारण जो न्यग्रोध (बरगद) के समान परिमण्डल (सुडौल) है, वह राजकुमार 'निग्रोधपरिमण्डल' राजकुमार है। 'वुत्तत्थानमप्पयोगो' (कहे हुए अर्थ का प्रयोग नहीं होता) इस नियम से 'इव' शब्द का प्रयोग नहीं होता। शंख के समान जो सफेद है वह 'संखपण्डर' है। कौवे के समान जो शूर (वीर) है वह 'काकसूर' है। परमार्थ दर्शन के कारण जो चक्षु के समान हो गए हैं, वे भगवान 'चक्खुभूत' हैं। इसी प्रकार 'अत्थभूत', 'धम्मभूत', 'ब्रह्मभूत'। अंधे के समान जो हो गया है वह 'अन्धभूत' बाल (मूर्ख) है। मूँज और पब्बज घास के समान जो हो गई है वह 'मुञ्जपब्बजभूता' कुदृष्टि है। धागों के गुच्छे के समान जो उलझ गई है वह 'तन्ताकुलकजाता' है। ฉฏฺฐิยตฺเถ – สุวณฺณวณฺโณ วิย วณฺโณ ยสฺส โสยํ สุวณฺณวณฺโณ ภควา. อุตฺตรปทโลโป, นาคสฺส วิย อสฺส คตีติ นาคคติ. เอวํ สีหคติ, นาควิกฺกโม, สีหวิกฺกโม, สีหหนุ, เอณิสฺส วิย อสฺส ชงฺฆาติ เอณิชงฺโฆ, สีหสฺส ปุพฺพทฺธํ วิย อสฺส กาโยติ สีหปุพฺพทฺธกาโย, พฺรหฺมุโน วิย อฏฺฐงฺคสมนฺนาคโต สโร อสฺสาติ พฺรหฺมสฺสโร. षष्ठी विभक्ति के अर्थ में - सुवर्ण के वर्ण के समान जिसका वर्ण है, वे भगवान 'सुवण्णवण्ण' हैं। उत्तरपद का लोप होने पर - हाथी के समान जिसकी गति है वह 'नागगति' है। इसी प्रकार 'सीहगति', 'नागविक्कम', 'सीहविक्कम', 'सीहहनु'। मृगी (एणी) के समान जिसकी जंघा है वह 'एणिजङ्घ' है। सिंह के पूर्वार्ध (अगले भाग) के समान जिसका शरीर है वह 'सीहपुब्बद्धकाय' है। ब्रह्मा के समान आठ अंगों से युक्त जिसका स्वर है वह 'ब्रह्मस्सर' है। วาสทฺทตฺเถ [Pg.207] สงฺขฺโยภยปโท ยถา – ทฺเว วา ตโย วา ปตฺตา ทฺวตฺติปตฺตา, ‘‘ทฺเวกฏฺฐานมากาโร วา’’ติ ทฺวิสทฺทนฺตสฺส อาตฺตํ, รสฺสตฺตํ, ทฺวีหํ วา ตีหํ วา ทฺวีหตีหํ, ฉ วา ปญฺจ วา วาจา ฉปฺปญฺจวาจา. เอวํ สตฺตฏฺฐมาสา, เอกโยชนทฺวิโยชนานิ. 'वा' शब्द के अर्थ में संख्या उभयपद वाला (बहुब्रीहि) जैसे - दो या तीन पात्र 'द्वत्तिपत्ता' हैं। 'द्वेकट्ठानमाकारो वा' सूत्र से 'द्वि' शब्द के अन्त को 'आ' आदेश और फिर ह्रस्व होता है। दो दिन या तीन दिन 'द्वीहतीहं'। छह या पाँच वाणी 'छप्पञ्चवाचा'। इसी प्रकार 'सत्तट्ठमासा' (सात-आठ महीने), 'एकयोजनद्वियोजनानि' (एक-दो योजन)। ทิสนฺตราฬตฺโถ ยถา – ปุพฺพสฺสา จ ทกฺขิณสฺสา จ ทิสาย ยทนฺตราฬํ สายํ ปุพฺพทกฺขิณา วิทิสา. เอตฺถ ตุลฺยาธิกรณปทปรตฺตาภาวา น ปุมฺภาวาติเทโส, ‘‘กฺวจาทิมชฺฌุตฺตราน’’นฺติอาทินา ทิสนฺตราฬตฺเถ ปุพฺพปทสฺส รสฺสตฺตํ. เอวํ ปุพฺพุตฺตรา, อปรทกฺขิณา, ปจฺฉิมุตฺตรา. ยทา ปน ทกฺขิณา จ สา ปุพฺพา จาติ กมฺมธารยสมาโส โหติ, ตทา ปุมฺภาวาติเทโส อุตฺตรปทตฺถปฺปธานตฺตา, สพฺพนามิกวิธานมฺปิ นิจฺจํ ภวติเยว, ยถา – ทกฺขิณปุพฺพสฺสา, ทกฺขิณปุพฺพสฺสมิติ. दिशाओं के मध्य के अर्थ में जैसे - पूर्व और दक्षिण दिशा के बीच का जो अंतराल है, वह 'पुब्बदक्खिणा' विदिशा है। यहाँ समानाधिकरण पद के परे न होने के कारण पुंभाव का अतिदेश नहीं होता। 'क्वचादिमज्झुत्तरानं' आदि सूत्र से दिशाओं के अंतराल के अर्थ में पूर्वपद को ह्रस्व होता है। इसी प्रकार 'पुब्बुत्तरा', 'अपरदक्खिणा', 'पच्छिमउत्तरा'। जब 'जो दक्षिण है वही पूर्व है' ऐसा कर्मधारय समास होता है, तब उत्तरपद के अर्थ की प्रधानता के कारण पुंभाव का अतिदेश होता है, और सर्वनाम संबंधी विधान भी नित्य होता ही है, जैसे - 'दक्खिणपुब्बस्सा', 'दक्खिणपुब्बस्सं'। พฺยติหารลกฺขโณ ยถา – เกเสสุ จ เกเสสุ จ คเหตฺวา อิทํ ยุทฺธํ ปวตฺตตีติ เกสาเกสิ, ทณฺเฑหิ จ ทณฺเฑหิ จ ปหริตฺวา อิทํ ยุทฺธํ ปวตฺตตีติ ทณฺฑาทณฺฑิ, ‘‘กฺวจาทิมชฺฌุตฺตราน’’นฺติอาทินา มชฺเฌทีโฆ, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อนฺตสฺสิกาโร. व्यतिहार (परस्पर क्रिया) के लक्षण वाला जैसे - बालों और बालों को पकड़कर जो यह युद्ध होता है वह 'केसाकेसि' है। डंडों और डंडों से प्रहार करके जो यह युद्ध होता है वह 'दण्डादण्डि' है। 'क्वचादिमज्झुत्तरानं' आदि सूत्र से मध्य में दीर्घ होता है, और 'तेसु वुद्धि' आदि से अन्त में 'इ' कार होता है। ปฐมาวิภตฺยตฺถพหุพฺพีหิ. प्रथमा विभक्ति के अर्थ वाला बहुब्रीहि। พหุพฺพีหิสมาโส นิฏฺฐิโต. बहुब्रीहि समास समाप्त हुआ। ทฺวนฺทสมาส द्वन्द्व समास। อถ ทฺวนฺทสมาโส วุจฺจเต. अब द्वन्द्व समास कहा जाता है। โส จ ทุวิโธ อิตรีตรโยค สมาหารตฺถเภเทน. वह इतरेतरयोग और समाहार के अर्थ के भेद से दो प्रकार का है। ตตฺถ [Pg.208] อิตรีตรโยเค ตาว – ‘‘สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาน’’อิตีธ อุภยตฺถาปิ ปฐเมกวจนํ, สมุจฺจยโชตนตฺถํ จสทฺทปฺปโยโค จ. उनमें इतरेतरयोग में पहले - 'सारिपुत्तमोग्गल्लान' यहाँ दोनों में ही प्रथमा एकवचन है, और समुच्चय को प्रकट करने के लिए 'च' शब्द का प्रयोग है। ‘‘สาริปุตฺโต จ โมคฺคลฺลาโน จา’’ติ วิคฺคเห – 'सारिपुत्तो च मोग्गल्लानो च' इस विग्रह में - ๓๕๗. นามานํ สมุจฺจโย ทฺวนฺโท. ३५७. नामों का समुच्चय द्वन्द्व है। นานานามานเมว เอกวิภตฺติกานํ ยุตฺตตฺถานํ โย สมุจฺจโย, โส วิภาสา สมาโส ภวติ, ทฺวนฺทสญฺโญ จ. एक ही विभक्ति वाले और युक्त अर्थ वाले विभिन्न नामों का जो समुच्चय है, वह विकल्प से समास होता है और उसकी 'द्वन्द्व' संज्ञा होती है। เอตฺถ จ สมุจฺจโย นาม สมฺปิณฺฑนํ, โส ปน อตฺถวเสน เกวลสมุจฺจโย อนฺวาจโย อิตรีตรโยโค สมาหาโร จาติ จตุพฺพิโธ. यहाँ समुच्चय का अर्थ है 'संग्रह' (एकत्र करना), वह अर्थ के अनुसार चार प्रकार का होता है - केवल समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग और समाहार। ตตฺถ เกวลสมุจฺจเย, อนฺวาจเย จ สมาโส น ภวติ, กฺริยาสาเปกฺขตาย นามานํ อญฺญมญฺญํ อยุตฺตตฺถภาวโต, ยถา – จีวรํ ปิณฺฑปาตญฺจ ปจฺจยํ สยนาสนํ อทาสิ, ทานญฺจ เทหิ, สีลญฺจ รกฺขาหิ. อิตรีตรโยเค, สมาหาเร จ สมาโส ภวติ, ตตฺถ นามานํ อญฺญมญฺญํ ยุตฺตตฺถภาวโต. उनमें केवल समुच्चय और अन्वाचय में समास नहीं होता है, क्योंकि क्रिया की अपेक्षा रखने के कारण नामों का परस्पर युक्त अर्थ नहीं होता। जैसे - 'चीवरं पिण्डपातञ्च पच्चयं सयनासनं अदासि' (चीवर, पिण्डपात, प्रत्यय और शयनासन दिया), 'दानञ्च देहि, सीलञ्च रक्खाहि' (दान दो और शील की रक्षा करो)। इतरेतरयोग और समाहार में समास होता है, क्योंकि वहाँ नामों का परस्पर युक्त अर्थ होता है। ทฺเว ทฺเว ปทานิ ทฺวนฺทา, ทฺวนฺทฏฺฐา วา ทฺวนฺทา, ทฺวนฺทสทิสตฺตา อยํ สมาโสปิ อนฺวตฺถสญฺญาย ทฺวนฺโทติ วุจฺจติ, อุภยปทตฺถปฺปธาโน หิ ทฺวนฺโท. दो-दो पद द्वन्द्व हैं, अथवा द्वन्द्व (जोड़े) में स्थित द्वन्द्व हैं। द्वन्द्व के समान होने के कारण यह समास भी अन्वर्थ संज्ञा से 'द्वन्द्व' कहलाता है, क्योंकि द्वन्द्व समास दोनों पदों के अर्थ की प्रधानता वाला होता है। นนุ จ อุภยปทตฺถปฺปธานตฺเต สติ ทฺวนฺเท กถเมกตฺถีภาโว สิยาติ? วุจฺจเต – สทิสาทิอตฺเถปิ สทฺทปฺปวตฺติสมฺภเวนทฺวินฺนํ ปทานํ เอกกฺขเณเยว อตฺถทฺวยทีปกตฺตา น วิโรโธ, ตญฺจ ทฺวนฺทวิสยเมว, เตสมตฺถทฺวยทีปกตฺตา. ยถา หิ ภูสทฺโท อนุภวอภิภวาทิเก อตฺเถ อนฺวภิอาทิอุปสคฺคสหิโตว ทีเปติ, น เกวโล, เอวํ ‘‘ควสฺสก’’นฺติอาทีสุ [Pg.209] ควาทีนํ อสฺสาทิสทฺทนฺตรสหิตานเมว อตฺถทฺวยทีปนํ, น เกวลานนฺติ ตญฺจ ทฺวนฺทวิสยเมว, น สพฺพตฺถาติ ทฏฺฐพฺพํ. อถ วา ทฺวินฺนมฺปิ ยถาวุตฺตสมุจฺจยทีปกตฺตา อตฺถิ ทฺวนฺเทเปกตฺถิตาติ น โกจิ วิโรโธ, ตโต สมาสสญฺญาวิภตฺติโลปาทิ วุตฺตนยเมว, สมาเสเนว จตฺถสฺส วุตฺตตฺตา ‘‘วุตฺตตฺถานมปฺปโยโค’’ติ จสทฺทสฺส อปฺปโยโค. प्रश्न - यदि द्वन्द्व में दोनों पदों के अर्थ की प्रधानता है, तो 'एकार्थीभाव' (एक अर्थ वाला होना) कैसे होगा? उत्तर - सदृश आदि अर्थों में भी शब्द की प्रवृत्ति संभव होने से, दो पदों के एक ही क्षण में दो अर्थों को प्रकाशित करने के कारण कोई विरोध नहीं है, और वह द्वन्द्व के विषय में ही है, क्योंकि वे दो अर्थों को प्रकाशित करते हैं। जैसे 'भू' शब्द अनुभव, अभिभव आदि अर्थों को 'अनु', 'अभि' आदि उपसर्गों के साथ ही प्रकाशित करता है, अकेले नहीं; इसी प्रकार 'गवस्सकं' आदि में 'गो' आदि शब्द 'अश्व' आदि अन्य शब्दों के साथ ही दो अर्थों को प्रकाशित करते हैं, अकेले नहीं - ऐसा द्वन्द्व के विषय में ही समझना चाहिए, सर्वत्र नहीं। अथवा दोनों के ही यथाकथित समुच्चय को प्रकाशित करने के कारण द्वन्द्व में भी एकार्थीभाव है, इसलिए कोई विरोध नहीं है। उसके बाद समास संज्ञा, विभक्ति लोप आदि पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही होते हैं। समास के द्वारा ही 'च' का अर्थ कह दिए जाने के कारण 'वुत्तत्थानमप्पयोगो' नियम से 'च' शब्द का प्रयोग नहीं होता। อิธ ทฺวนฺเท อจฺจิตตรํ ปุพฺพํ นิปตติ, ปรสฺเสว ลิงฺคญฺจ. อิตรีตรโยคสฺส อวยวปฺปธานตฺตา สพฺพตฺถ พหุวจนเมว. यहाँ द्वन्द्व में जो अधिक पूजनीय है वह पहले आता है, और लिंग परपद (बाद वाले पद) के समान होता है। इतरेतरयोग में अवयवों (पदों) की प्रधानता होने के कारण सर्वत्र बहुवचन ही होता है। สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานา, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเน, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเนหิ อิจฺจาทิ, สมโณ จ พฺราหฺมโณ จ สมณพฺราหฺมณา. เอวํ พฺราหฺมณคหปติกา, ขตฺติยพฺราหฺมณา, เทวมนุสฺสา, จนฺทิมสูริยา, มาตา จ ปิตา จ มาตาปิตโร, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา ทฺวนฺเท มาตุอาทิปุพฺพปทุการสฺส อากาโร. เอวํ ปิตาปุตฺตา. सारिपुत्त-मोग्गल्लान, सारिपुत्त-मोग्गल्लान को, सारिपुत्त-मोग्गल्लान के द्वारा इत्यादि; श्रमण और ब्राह्मण - श्रमण-ब्राह्मण। इसी प्रकार ब्राह्मण-गृहपति, क्षत्रिय-ब्राह्मण, देव-मनुष्य, चन्द्र-सूर्य; माता और पिता - माता-पिता; 'तेसु वुद्धि' इत्यादि (सूत्र) से द्वन्द्व समास में 'मातृ' आदि पूर्वपद के 'उ' कार का 'आ' कार हो जाता है। इसी प्रकार पिता-पुत्र। ‘‘ชายา จ ปติ จาติ ชายาปติ’’อิตีธ – "जाया (पत्नी) और पति - जायापति" - यहाँ (इस विषय में) - ‘‘กฺวจี’’ติ วตฺตเต. "क्वचि" (कहीं-कहीं) यह अनुवृत्ति आती है। ๓๕๘. ชายาย ตุทํ ชานิ ปติมฺหิ. ३५८. पति शब्द परे होने पर जाया शब्द के स्थान पर 'तुदं' और 'जानि' आदेश होते हैं। ชายาสทฺทสฺส ตุทํ ชานิอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ ปติสทฺเท ปเร กฺวจิ. ตุทํปติ, ชานิปติ, ชยมฺปติกา. เอตฺถ นิคฺคหีตาคโม, ‘‘กฺวจา’’ทินา รสฺสตฺตญฺจ. पति शब्द परे होने पर जाया शब्द के स्थान पर 'तुदं' और 'जानि' ये आदेश कहीं-कहीं होते हैं। (जैसे) तुदम्पति, जानिपति, जयम्पतिका। यहाँ निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम हुआ है और 'क्वचा' आदि (सूत्र) से ह्रस्व हुआ है। กฺวจิ อปฺปสรํ ปุพฺพํ นิปตติ, ยถา – จนฺโท จ สูริโย จ จนฺทสูริยา, นิคมา จ ชนปทา จ นิคมชนปทา, สุรา จ อสุรา [Pg.210] จ ครุฬา จ มนุชา จ ภุชคา จ คนฺธพฺพา จ สุราสุรครุฬมนุชภุชคคนฺธพฺพา. कहीं-कहीं अल्प स्वर वाला (शब्द) पहले आता है, जैसे - चन्द्र और सूर्य - चन्द्र-सूर्य; निगम और जनपद - निगम-जनपद; सुर, असुर, गरुड़, मनुज, भुजग और गन्धर्व - सुरासुरगरुड़मनुजभुजगगन्धर्व। กฺวจิ อิวณฺณุวณฺณนฺตานํ ปุพฺพนิปาโต, ยถา – อคฺคิ จ ธูโม จ อคฺคิธูมา. เอวํ คติพุทฺธิภุชปฐหรกรสยา, ธาตโว จ ลิงฺคานิ จ ธาตุลิงฺคานิ. कहीं-कहीं इ-वर्ण और उ-वर्ण अन्त वाले शब्दों का पूर्व-निपात (पहले प्रयोग) होता है, जैसे - अग्नि और धूम - अग्नि-धूम। इसी प्रकार गति-बुद्धि-भुज-पठ-हर-कर-सय; धातु और लिङ्ग - धातु-लिङ्ग। กฺวจิ สราทิอการนฺตานํ ปุพฺพนิปาโต, ยถา – อตฺโถ จ ธมฺโม จ อตฺถธมฺมา. เอวํ อตฺถสทฺทา, สทฺทตฺถา วา. कहीं-कहीं स्वर से आरम्भ होने वाले और अ-कारान्त शब्दों का पूर्व-निपात होता है, जैसे - अर्थ और धर्म - अर्थ-धर्म। इसी प्रकार अर्थ-शब्द अथवा शब्द-अर्थ। สมาหาเร ปน – ‘‘จกฺขุ จ โสตญฺจา’’ติ อตฺเถ ‘‘นามานํ สมุจฺจโย ทฺวนฺโท’’ติ ทฺวนฺทสมาสํ กตฺวา วิภตฺติโลปาทิมฺหิ กเต – समाहार (समूह) अर्थ में तो - "चक्षु और श्रोत्र" इस अर्थ में 'नामानं समुच्चयो द्वन्दो' सूत्र से द्वन्द्व समास करके, विभक्ति लोप आदि करने पर - ‘‘นปุํสกลิงฺคํ, เอกตฺตญฺจา’’ติ วตฺตเต. "नपुंसकलिङ्ग और एकवचन" की अनुवृत्ति आती है। ๓๕๙. ตถา ทฺวนฺเท ปาณิ ตูริย โยคฺค เสนงฺค ขุทฺทชนฺตุก วิวิธ วิรุทฺธ วิสภาคตฺถาทีนญฺจ. ३५९. उसी प्रकार द्वन्द्व समास में पाणि (हाथ-पैर के अंग), तूर्य (वाद्य), योग्य (वाहन), सेनांग, क्षुद्र जन्तु, विविध विरुद्ध और विसभागत्व (असमान स्वभाव वाले) आदि अर्थों में (नपुंसकलिङ्ग और एकवचन होता है)। ยถา ทิคุสมาเส, ตถา สมาหารทฺวนฺทสมาเสปิ ปาณิ ตูริย โยคฺค เสนงฺคตฺถานํ, ขุทฺทชนฺตุกวิวิธ วิรุทฺธวิสภาคตฺถอิจฺเจวมาทีนญฺจ เอกตฺตํ โหติ, นปุํสกลิงฺคตฺตญฺจ. जैसे द्विगु समास में, वैसे ही समाहार द्वन्द्व समास में भी पाणि-अंग, तूर्य-अंग, योग्य-अंग, सेना-अंग, क्षुद्र जन्तु, विविध विरुद्ध और विसभागत्व आदि अर्थों में एकवचन और नपुंसकलिङ्ग होता है। ปาณิโน จ ตูริยานิ จ โยคฺคานิ จ เสนา จาติ ปาณิตูริย โยคฺคเสนา, ตาสมงฺคานิ ปาณิตูริยโยคฺคเสนงฺคานิ, ทฺวนฺทโต ปรตฺตา องฺคสทฺโท ปจฺเจกมภิสมฺพชฺฌเต. ขุทฺทา จ เต ชนฺตุกา เจติ ขุทฺทชนฺตุกา, วิวิเธนากาเรน วิรุทฺธา วิวิธวิรุทฺธา, นิจฺจวิโรธิโน. สมาโน ภาโค เยสํ เต สภาคา, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา สมานสฺส สอาเทโส, วิวิธา จ เต ลกฺขณโต สภาคา จ กิจฺจโตติ วิสภาคา. ปาณิตูริยโยคฺคเสนงฺคานิ จ ขุทฺทชนฺตุกา จ วิวิธวิรุทฺธา จ วิสภาคา จาติ ทฺวนฺโท, อิธ พหุตฺตา ปุพฺพนิปาตสฺส อนิยโม, เต อตฺถา เยสํ [Pg.211] เต ปาณิตูริยโยคฺคเสนงฺคขุทฺทชนฺตุกวิวิธวิรุทฺธวิสภาคตฺถา, เต อาทโย เยสํ เต ตทาทโย. हाथ-पैर, वाद्य, वाहन और सेना - ये पाणि-तूर्य-योग्य-सेना हैं; उनके अंग - पाणि-तूर्य-योग्य-सेनांग हैं; द्वन्द्व समास के बाद 'अंग' शब्द प्रत्येक के साथ जुड़ता है। वे जो क्षुद्र जन्तु हैं - क्षुद्रजन्तु; जो विविध प्रकार से विरुद्ध हैं - विविध-विरुद्ध, अर्थात् नित्य विरोधी। जिनका समान भाग (स्वभाव) है वे 'सभाग' हैं, 'तेसु वुद्धि' आदि सूत्र से 'समान' के स्थान पर 'स' आदेश होता है; जो लक्षण से विविध हैं और कार्य से सभाग हैं वे 'विसभाग' हैं। पाणि-तूर्य-योग्य-सेनांग, क्षुद्रजन्तु, विविध-विरुद्ध और विसभाग - यह द्वन्द्व समास है; यहाँ बहुलता के कारण पूर्व-निपात का नियम नहीं है; वे अर्थ जिनके हैं वे 'पाणितूर्ययोग्यसेनांगक्षुद्रजन्तुविविधविरुद्धविसभागत्व' हैं; वे जिनके आदि में हैं वे 'तदादि' हैं। อาทิคฺคหเณน อญฺโญญฺญลิงฺควิเสสิต สงฺขฺยาปริมาณตฺถ ปจนจณฺฑาลตฺถ ทิสตฺถาทีนญฺจ ทฺวนฺเท เอกตฺตํ, นปุํสกลิงฺคตฺตญฺจ, อิติ ปาณฺยงฺคตฺถภาวโต จกฺขุโสตสทฺทานํ อิมินา เอกตฺตํ, นปุํสกลิงฺคตฺตญฺจ กตฺวา สมาสตฺตา นามพฺยปเทเส กเต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ อมาเทสาทิ. 'आदि' ग्रहण से अन्योन्य-लिङ्ग-विशेषित, संख्या-परिमाण अर्थ, पचन-चाण्डाल अर्थ, दिशा अर्थ आदि के द्वन्द्व समास में भी एकवचन और नपुंसकलिङ्ग होता है; इस प्रकार पाणि-अंग अर्थ होने के कारण 'चक्षु' और 'श्रोत्र' शब्दों को इससे एकवचन और नपुंसकलिङ्ग करके, समास होने पर नाम संज्ञा होने पर 'सि' आदि की उत्पत्ति और 'अं' आदेश आदि होते हैं। จกฺขุโสตํ, เห จกฺขุโสต, จกฺขุโสตํ, จกฺขุโสเตน. เอวํ สพฺพตฺเถกวจนเมว. มุขญฺจ นาสิกา จ มุขนาสิกํ, ‘‘สโร รสฺโส นปุํสเก’’ติ อนฺตสฺส รสฺสตฺตํ, หนุ จ คีวา จ หนุคีวํ. เอวํ กณฺณนาสํ, ปาณิปาทํ, ฉวิมํสโลหิตํ. หตฺถปาทา มํสโลหิตานีติอาทีนํ ปน อิตรีตรโยเคน สิทฺธํ. เอวํ ปาณฺยงฺคตฺเถ. चक्षु-श्रोत्र (नपुं. एक.), हे चक्षु-श्रोत्र, चक्षु-श्रोत्र को, चक्षु-श्रोत्र के द्वारा। इसी प्रकार सभी अर्थों में एकवचन ही होता है। मुख और नासिका - मुख-नासिक, 'सरो रस्सो नपुंसके' सूत्र से अन्त का ह्रस्व हुआ है; हनु (ठोड़ी) और ग्रीवा - हनु-ग्रीव। इसी प्रकार कर्ण-नास, पाणि-पाद, छवि-मांस-लोहित। 'हत्थपादा' और 'मंसलोहितानि' आदि तो इतरेतर योग द्वन्द्व से सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार पाणि-अंग अर्थ में। ตูริยงฺคตฺเถ คีตญฺจ วาทิตญฺจ คีตวาทิตํ, สมฺมญฺจ ตาฬญฺจ สมฺมตาฬํ, สมฺมนฺติ กํสตาฬํ. ตาฬนฺติ หตฺถตาฬํ. สงฺเข จ ปณโว จ ฑิณฺฑิโม จ, สงฺขา จ ปณวา จ ฑํณฺฑิมา จาติ วา สงฺขปณวฑิณฺฑิมํ, ปณวาทโย ทฺเวปิ เภริวิเสโส. तूर्य-अंग अर्थ में - गीत और वादित - गीत-वादित; सम्म और ताल - सम्म-ताल; 'सम्म' का अर्थ है काँसे का ताल; 'ताल' का अर्थ है हाथ का ताल। शंख, पणव और डिण्डिम - शंख-पणव-डिण्डिम; पणव आदि दोनों भेरी (नगाड़े) के विशेष प्रकार हैं। โยคฺคงฺคตฺเถ ยถา – ผาโล จ ปาจนญฺจ ผาลปาจนํ, ยุคญฺจ นงฺคลญฺจ ยุคนงฺคลํ. योग्य-अंग (वाहन/उपकरण) अर्थ में जैसे - फाल और पाचन (चाबुक) - फाल-पाचन; युग (जुआ) और लांगल (हल) - युग-लांगल। เสนงฺคตฺเถ หตฺถิโน จ อสฺสา จ หตฺถิอสฺสํ, รถา จ ปตฺติกา จ รถปตฺติกํ, อสิ จ จมฺมญฺจ อสิจมฺมํ, จมฺมนฺติ สรวารณผลกํ. ธนุ จ กลาโป จ ธนุกลาปํ, กลาโปติ ตูณีรํ. सेना-अंग अर्थ में - हाथी और घोड़े - हत्थि-अस्स (हस्त्यश्व); रथ और पत्ति (पैदल सैनिक) - रथ-पत्तिक; असि (तलवार) और चर्म (ढाल) - असि-चर्म; 'चर्म' का अर्थ है बाणों को रोकने वाला फलक। धनुष और कलाप - धनु-कलाप; 'कलाप' का अर्थ है तरकश। ขุทฺทชนฺตุกตฺเถ ฑํสา จ มกสา จ ฑํสมกสํ. เอวํ กุนฺถกิปิลฺลิกํ, กีฏปฏงฺคํ, กีฏสรีสปํ. ตตฺถ กุนฺถา สุขุมกิปิลฺลิกา, กีฏา กปาลปิฏฺฐิกปาณา. क्षुद्र जन्तु अर्थ में - डाँस और मच्छर - डाँस-मच्छर। इसी प्रकार कुन्थ-किपिल्लिक (चींटी), कीट-पतंग, कीट-सरीसृप। वहाँ 'कुन्थ' सूक्ष्म चींटियाँ हैं, 'कीट' कपाल-पीठ वाले प्राणी हैं। วิวิธวิรุทฺธตฺเถ [Pg.212] อหิ จ นกุโล จ, อหี จ นกุลา จาติ วา อหินกุลํ. เอวํ พิฬารมูสิกํ, อนฺตสฺส รสฺสตฺตํ, กาโกลูกํ, สปฺปมณฺฑูกํ, ครุฬสปฺปํ. विविध-विरुद्ध अर्थ में - अहि (सर्प) और नकुल (नेवला) - अहि-नकुल। इसी प्रकार बिडाल-मूषिक, अन्त का ह्रस्व हुआ है; काक-उलूक, सर्प-मण्डूक, गरुड़-सर्प। วิสภาคตฺเถ สีลญฺจ ปญฺญาณญฺจ สีลปญฺญาณํ, สมโถ จ วิปสฺสนา จ สมถวิปสฺสนํ. เอวํ นามรูปํ, หิโรตฺตปฺปํ. สติสมฺปชญฺญํ, โลภโมหํ, โทสโมหํ, อหิริกาโนตฺตปฺปํ, ถินมิทฺธํ, อุทฺธจฺจกุกฺกุจฺจมิจฺจาทิ. ‘‘อํโม นิคฺคหีตํ ฌลเปหี’’ติ เอตฺถ ‘‘อํโม’’ติ นิทฺเทสทสฺสนโต กตฺถจิ นปุํสกลิงฺคตฺตํ น โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ, เตน อาธิปจฺจปริวาโร ฉนฺทปาริสุทฺธิ ปฏิสนฺธิปฺปวตฺติยนฺติอาทิ สิชฺฌติ. विसभाग (असमान स्वभाव) अर्थ में - शील और प्रज्ञा - शील-प्रज्ञा; शमथ और विपश्यना - शमथ-विपश्यना। इसी प्रकार नाम-रूप, ह्री-ओत्तप्प (लज्जा और भय), स्मृति-सम्प्रजन्य, लोभ-मोह, द्वेष-मोह, अहीरिक-अनौत्तप्प, स्त्यान-मिद्ध, औद्धत्य-कौकृत्य इत्यादि। 'अम्मो निग्गहीतं झलपेहि' यहाँ 'अम्मो' इस निर्देश के दर्शन से कहीं-कहीं नपुंसकलिङ्ग नहीं होता है, ऐसा समझना चाहिए; उससे 'आधिपत्य-परिवार', 'छन्द-पारिशुद्धि', 'प्रतिसन्धि-प्रवृत्ति' इत्यादि सिद्ध होते हैं। อญฺโญญฺญลิงฺควิเสสิตานํ ทฺวนฺเท ทาสี จ ทาโส จ ทาสิทาสํ, ‘‘กฺวจาที’’ติอาทินา มชฺเฌ รสฺสตฺตํ. เอวํ อิตฺถิปุมํ, ปตฺตจีวรํ, สาขาปลาสมิจฺจาทิ. अन्योन्य-लिङ्ग-विशेषित शब्दों के द्वन्द्व समास में - दासी और दास - दासी-दास; 'क्वचादि' आदि (सूत्र) से मध्य में ह्रस्व हुआ है। इसी प्रकार स्त्री-पुरुष, पात्र-चीवर, शाखा-पलाश इत्यादि। สงฺขฺยาปริมาณตฺถานํ ทฺวนฺเท เอกกญฺจ ทุกญฺจ เอกกทุกํ, สงฺขฺยาทฺวนฺเท อปฺปสงฺขฺยา ปุพฺพํ นิปตติ. เอวํ ทุกติกํ, ติกจตุกฺกํ, จตุกฺกปญฺจกํ, ทีโฆ จ มชฺฌิโม จ ทีฆมชฺฌิมํ. संख्या और परिमाण के अर्थ में द्वन्द्व समास में 'एकक' और 'दुक' मिलकर 'एकक-दुक' (ekakadukaṃ) बनता है। संख्या-द्वन्द्व में कम संख्या वाला शब्द पहले आता है। इसी प्रकार 'दुक-तिक' (dukatikaṃ), 'तिक-चतुष्क' (tikacatukkaṃ), 'चतुष्क-पञ्चक' (catukkapañcakaṃ)। 'दीर्घ' और 'मध्यम' मिलकर 'दीर्घ-मध्यम' (dīghamajjhimaṃ) बनता है। ปจนจณฺฑาลตฺถานํ ทฺวนฺเท โอรพฺภิกา จ สูกริกา จ โอรพฺภิกสูกริกํ. เอวํ สากุณิกมาควิกํ, สปาโก จ จณฺฑาโล จ สปากจณฺฑาลํ, ปุกฺกุสฉวฑาหกํ, เวนรถการํ. ตตฺถ เวนา ตจฺฉกา, รถการา จมฺมการา. पकाने वाले और चाण्डालों के अर्थ में द्वन्द्व समास में 'औरभ्रिका' (भेड़ पालने वाले) और 'सूकरिका' (सूअर पालने वाले) मिलकर 'औरभ्रिका-सूकरिक' (orabbhikasūkarikaṃ) बनता है। इसी प्रकार 'शाकुनिक-मागविक' (sākuṇikamāgavikaṃ), 'सपाक' और 'चाण्डाल' मिलकर 'सपाक-चाण्डाल' (sapākacaṇḍālaṃ), 'पुक्कुस-छवदाहक' (pukkusachavaḍāhakaṃ), 'वेण-रथकार' (venarathakāraṃ)। वहाँ 'वेण' का अर्थ बढ़ई (तक्षक) है और 'रथकार' का अर्थ चर्मकार है। ทิสตฺถานํ ทฺวนฺเท ปุพฺพา จ อปรา จาติ อตฺเถ ทฺวนฺทสมาสํ, วิภตฺติโลปญฺจ กตฺวา อิธาทิคฺคหเณน เอกตฺเต, นปุํสกลิงฺคตฺเต จ กเต ‘‘สโร รสฺโส นปุํสเก’’ติ รสฺสตฺตํ, ปุพฺพาปรํ[Pg.213], เห ปุพฺพาปร, ปุพฺพาปรํ, ปุพฺพาปเรน, ปุพฺพาปรสฺส อิจฺจาทิ. เอวํ ปุรตฺถิมปจฺฉิมํ, ทกฺขิณุตฺตรํ, อธรุตฺตรํ. दिशाओं के अर्थ में द्वन्द्व समास में 'पूर्वा' और 'अपरा' इस अर्थ में द्वन्द्व समास करके, विभक्ति का लोप करके, यहाँ 'आदि' ग्रहण से एकवचन और नपुंसकलिङ्ग होने पर 'सरो रस्सो नपुंसके' सूत्र से ह्रस्व होकर 'पूर्वापर' (pubbāparaṃ) बनता है। हे पूर्वापर! पूर्वापरम्, पूर्वापरेण, पूर्वापरस्य इत्यादि। इसी प्रकार 'पुरत्थिम-पश्चिम' (puratthimapacchimaṃ), 'दक्षिण-उत्तर' (dakkhiṇuttaraṃ), 'अधर-उत्तर' (adharuttaraṃ)। ‘‘นปุํสกลิงฺคํ, เอกตฺตํ, ทฺวนฺเท’’ติ จ วตฺตเต. "नपुंसकलिङ्ग, एकवचन, द्वन्द्व में" - यह अनुवृत्ति आती है। ๓๖๐. วิภาสา รุกฺข ติณ ปสุ ธน ธญฺญ ชนปทาทีนญฺจ. ३६०. वृक्ष, तृण, पशु, धन, धान्य, जनपद आदि के (द्वन्द्व समास) में विकल्प से (एकवचन और नपुंसकलिङ्ग) होता है। รุกฺข ติณ ปสุ ธน ธญฺญ ชนปทาทีนเมกตฺตํ, นปุํสกลิงฺคตฺตญฺจ วิภาสา โหติ ทฺวนฺเท สมาเส. เอกตฺตาภาเว พหุวจนํ, ปรสฺเสว ลิงฺคญฺจ. वृक्ष, तृण, पशु, धन, धान्य, जनपद आदि का द्वन्द्व समास में एकवचन और नपुंसकलिङ्ग विकल्प से होता है। एकवचन के अभाव में बहुवचन होता है और परवर्ती शब्द का ही लिङ्ग होता है। ตตฺถ รุกฺขานํ ทฺวนฺเท อสฺสตฺถา จ กปิตฺถา จาติ อตฺเถ สมาหาเร ทฺวนฺทสมาสาทิมฺหิ กเต อิมินา วิกปฺเปเนกตฺตํ, นปุํสกลิงฺคตฺตญฺจ. อสฺสตฺถกปิตฺถํ, อสฺสตฺถกปิตฺถา วา. เอวํ อมฺพปนสํ, อมฺพปนสา วา, ขทิรปลาสํ, ขทิรปลาสา วา, ธวสฺสกณฺณกํ, ธวสฺสกณฺณกา วา. वहाँ वृक्षों के द्वन्द्व में 'अश्वत्थ' और 'कपित्थ' इस अर्थ में समाहार द्वन्द्व समास आदि होने पर इस विकल्प से एकवचन और नपुंसकलिङ्ग होता है। 'अश्वत्थ-कपित्थ' (assatthakapitthaṃ) अथवा 'अश्वत्थ-कपित्था' (assatthakapitthā)। इसी प्रकार 'अम्ब-पनस' (ambapanasaṃ) अथवा 'अम्ब-पनसा' (ambapanasā), 'खदिर-पलास' (khadirapalāsaṃ) अथवा 'खदिर-पलासा' (khadirapalāsā), 'धव-अश्वकर्ण' (dhavassakaṇṇakaṃ) अथवा 'धव-अश्वकर्णा' (dhavassakaṇṇakā)। ติณานํ ทฺวนฺเท อุสีรานิ จ พีรณานิ จ อุสีรพีรณํ, อุสีรพีรณานิ วา. เอวํ มุญฺชปพฺพชํ, มุญฺชปพฺพชา วา, กาสกุสํ, กาสกุสา วา. तृणों के द्वन्द्व में 'उशीर' और 'बीरण' मिलकर 'उशीर-बीरण' (usīrabīraṇaṃ) अथवा 'उशीर-बीरणा' (usīrabīraṇāni)। इसी प्रकार 'मुञ्ज-पब्बज' (muñjapabbajaṃ) अथवा 'मुञ्ज-पब्बजा' (muñjapabbajā), 'कास-कुश' (kāsakusaṃ) अथवा 'कास-कुशा' (kāsakusā)। ปสูนํ ทฺวนฺเท อชา จ เอฬกา จ อเชฬกํ, อเชฬกา วา, หตฺถี จ คาโว จ อสฺสา จ วฬวา จ หตฺถิควสฺสวฬวํ, หตฺถิควสฺสวฬวา วา, ‘‘กฺวจา’’ติอาทินา รสฺสตฺตํ, ‘‘โอสเร จา’’ติ อวาเทโส จ, โคมหึสํ, โคมหึสา วา, เอเณยฺยวราหํ, เอเณยฺยวราหา วา, สีหพฺยคฺฆตรจฺฉํ, สีหพฺยคฺฆตรจฺฉา วา. पशुओं के द्वन्द्व में 'अजा' और 'एड़क' मिलकर 'अजेड़क' (ajeḷakaṃ) अथवा 'अजेड़का' (ajeḷakā)। 'हस्ती', 'गावो' (गायें), 'अश्व' और 'वडवा' (घोड़ियाँ) मिलकर 'हस्ति-गव-अश्व-वडव' (hatthigavassavaḷavaṃ) अथवा 'हस्ति-गव-अश्व-वडवा' (hatthigavassavaḷavā)। 'क्वचि' आदि सूत्र से ह्रस्व और 'ओसरे च' से अव-आदेश होकर 'गो-महिष' (gomahiṃsaṃ) अथवा 'गो-महिषा' (gomahiṃsā), 'एणेय-वराह' (eṇeyyavarāhaṃ) अथवा 'एणेय-वराहा' (eṇeyyavarāhā), 'सिंह-व्याघ्र-तरच्छ' (sīhabyagghataracchaṃ) अथवा 'सिंह-व्याघ्र-तरच्छा' (sīhabyagghataracchā)। ธนานํ ทฺวนฺเท หิรญฺญญฺจ สุวณฺณญฺจ หิรญฺญสุวณฺณํ, หิรญฺญสุวณฺณานิ วา. เอวํ ชาตรูปรชตํ, ชาตรูปรชตานิ วา, มณิมุตฺตสงฺขเวฬุริยํ, มณิมุตฺตสงฺขเวฬุริยา วา. धनों के द्वन्द्व में 'हिरण्य' और 'सुवर्ण' मिलकर 'हिरण्य-सुवर्ण' (hiraññasuvaṇṇaṃ) अथवा 'हिरण्य-सुवर्णानि' (hiraññasuvaṇṇāni)। इसी प्रकार 'जातरूप-रजत' (jātarūparajataṃ) अथवा 'जातरूप-रजतानि' (jātarūparajatāni), 'मणि-मुक्ता-शङ्ख-वैदूर्य' (maṇimuttasaṅkhaveḷuriyaṃ) अथवा 'मणि-मुक्ता-शङ्ख-वैदूर्या' (maṇimuttasaṅkhaveḷuriyā)। ธญฺญานํ [Pg.214] ทฺวนฺเท สาลี จ ยวา จ สาลิยวํ, สาลิยวา วา. เอวํ ติลมุคฺคมาสํ, ติลมุคฺคมาสา วา. धान्यों के द्वन्द्व में 'शालि' और 'यव' मिलकर 'शालि-यव' (sāliyavaṃ) अथवा 'शालि-यवा' (sāliyavā)। इसी प्रकार 'तिल-मुद्ग-माष' (tilamuggamāsaṃ) अथवा 'तिल-मुद्ग-माषा' (tilamuggamāsā)। ชนปทานํ ทฺวนฺเท กาสี จ โกสลา จ กาสิโกสลํ, กาสิโกสลา วา, วชฺชี จ มลฺลา จ วชฺชิมลฺลํ, วชฺชิมลฺลา วา, องฺคา จ มคธา จ องฺคมคธํ, องฺคมคธา วา. जनपदों के द्वन्द्व में 'कासी' और 'कोसल' मिलकर 'कासी-कोसल' (kāsikosalaṃ) अथवा 'कासी-कोसला' (kāsikosalaā), 'वज्जी' और 'मल्ल' मिलकर 'वज्जी-मल्ल' (vajjimallaṃ) अथवा 'वज्जी-मल्ला' (vajjimallā), 'अङ्ग' और 'मगध' मिलकर 'अङ्ग-मगध' (aṅgamagadhaṃ) अथवा 'अङ्ग-मगधा' (aṅgamagadhā)। อาทิคฺคหเณน อญฺโญญฺญปฺปฏิปกฺขธมฺมานํ, สกุณตฺถานญฺจ ทฺวนฺเท วิภาสา เอกตฺตํ โหติ, นปุํสกลิงฺคตฺตญฺจ. กุสลญฺจ อกุสลญฺจ กุสลากุสลํ, กุสลากุสลา วา, เอวํ สาวชฺชานวชฺชํ, สาวชฺชานวชฺชา วา, หีนปฺปณีตํ, หีนปฺปณีตา วา, กณฺหสุกฺกํ, กณฺหสุกฺกา วา, สุขทุกฺขํ, สุขทุกฺขานิ วา, ปฏิฆานุนยํ, ปฏิฆานุนยา วา, ฉายาตปํ, ฉายาตปา วา, อาโลกนฺธการํ, อาโลกนฺธการา วา, รตฺติ จ ทิวา จ รตฺตินฺทิวํ, รตฺตินฺทิวา วา, อหญฺจ รตฺติ จ อโหรตฺตํ, อโหรตฺตา วา, ‘‘กฺวจิ สมาสนฺต’’อิจฺจาทินา อาการิการานมตฺตํ. 'आदि' ग्रहण से परस्पर विरोधी धर्मों और पक्षियों के द्वन्द्व में विकल्प से एकवचन और नपुंसकलिङ्ग होता है। 'कुशल' और 'अकुशल' मिलकर 'कुशलाकुशल' (kusalākusalaṃ) अथवा 'कुशलाकुशला' (kusalākusalā)। इसी प्रकार 'सावद्य-अनवद्य' (sāvajjānavajjaṃ) अथवा 'सावद्य-अनवद्या' (sāvajjānavajjā), 'हीन-प्रणीत' (hīnappaṇītaṃ) अथवा 'हीन-प्रणीता' (hīnappaṇītā), 'कृष्ण-शुक्ल' (kaṇhasukkaṃ) अथवा 'कृष्ण-शुक्ला' (kaṇhasukkā), 'सुख-दुःख' (sukhadukkhaṃ) अथवा 'सुख-दुःखानि' (sukhadukkhāni), 'प्रतिघ-अनुनय' (paṭighānunayaṃ) अथवा 'प्रतिघ-अनुनया' (paṭighānunayā), 'छाया-आतप' (chāyātapaṃ) अथवा 'छाया-आतपा' (chāyātapā), 'आलोक-अन्धकार' (ālokandhakāraṃ) अथवा 'आलोक-अन्धकारा' (ālokandhakārā)। 'रात्रि' और 'दिवा' मिलकर 'रात्रिन्दिव' (rattindivaṃ) अथवा 'रात्रिन्दिवा' (rattindivā)। 'अह' और 'रात्रि' मिलकर 'अहोरात्र' (ahorattaṃ) अथवा 'अहोरात्रा' (ahorattaā)। 'क्वचि समासान्त' आदि सूत्र से आकार और इकार को अकार होता है। สกุณานํ ทฺวนฺเท หํสา จ พกา จ หํสพกํ, หํสพกา วา. เอวํ การณฺฑวจกฺกวากํ, การณฺฑวจกฺกวากา วา, มยูรโกญฺจํ, มยูรโกญฺจา วา, สุกสาลิกํ, สุกสาลิกา วา. पक्षियों के द्वन्द्व में 'हंस' और 'बक' मिलकर 'हंस-बक' (haṃsabakaṃ) अथवा 'हंस-बका' (haṃsabakā)। इसी प्रकार 'कारण्डव-चक्रवाक' (kāraṇḍavacakkavākaṃ) अथवा 'कारण्डव-चक्रवाका' (kāraṇḍavacakkavākā), 'मयूर-क्रौञ्च' (mayūrakoñcaṃ) अथवा 'मयूर-क्रौञ्चा' (mayūrakoñcā), 'शुक-सारिका' (sukasālikaṃ) अथवा 'शुक-सारिका' (sukasālikā)। สมาหารทฺวนฺโท. समाहार द्वन्द्व। เยภุยฺเยน เจตฺถ – और यहाँ प्रायः - อจฺจิตปฺปสรํ ปุพฺพํ, อิวณฺณุวณฺณกํ กฺวจิ; ทฺวนฺเท สราทฺยการนฺตํ, พหูสฺวนิยโม ภเว. द्वन्द्व समास में कम अक्षरों वाला शब्द पहले आता है, कहीं इ-वर्ण और उ-वर्ण वाला शब्द पहले आता है, कहीं स्वर से शुरू होने वाला और अकारान्त शब्द पहले आता है; बहुतों के होने पर कोई नियम नहीं होता। ทฺวนฺทสมาโส นิฏฺฐิโต. द्वन्द्व समास समाप्त हुआ। ปุพฺพุตฺตรุภยญฺญตฺถ-ปฺปธานตฺตา [Pg.215] จตุพฺพิโธ; สมาโสยํ ทิคุ กมฺม-ธารเยหิ จ ฉพฺพิโธ. पूर्वपद, उत्तरपद, उभयपद और अन्यपद की प्रधानता के कारण यह समास चार प्रकार का है; द्विगु और कर्मधारय के साथ यह छह प्रकार का है। ทุวิโธ อพฺยยีภาโว, นวธา กมฺมธารโย; ทิคุ ทุธา ตปฺปุริโส, อฏฺฐธา นวธา ภเว; พหุพฺพีหิ ทฺวิธา ทฺวนฺโท, สมาโส จตุรฏฺฐธาติ. अव्ययीभाव दो प्रकार का, कर्मधारय नौ प्रकार का, द्विगु दो प्रकार का, तत्पुरुष आठ या नौ प्रकार का, बहुव्रीहि दो प्रकार का और द्वन्द्व (दो प्रकार का) होता है; इस प्रकार समास बत्तीस (चार गुणा आठ) प्रकार का होता है। อิติ ปทรูปสิทฺธิยํ สมาสกณฺโฑ इस प्रकार पदरूपसिद्धि में समास काण्ड - จตุตฺโถ. चौथा (समाप्त)। ๕. ตทฺธิตกณฺฑ ५. तद्धित काण्ड। อปจฺจตทฺธิต अपत्य तद्धित। อถ [Pg.216] นามโต เอว วิภตฺยนฺตา อปจฺจาทิอตฺถวิเสเส ตทฺธิตุปฺปตฺตีติ นามโต ปรํ ตทฺธิตวิธานมารภียเต. अब नाम (प्रातिपदिक) से ही विभक्त्यन्त होने पर अपत्य आदि अर्थ विशेष में तद्धित प्रत्ययों की उत्पत्ति होती है, इसलिए नाम के बाद तद्धित विधान आरम्भ किया जाता है। ตตฺถ ตสฺมา ติวิธลิงฺคโต ปรํ หุตฺวา หิตา สหิตาติ ตทฺธิตา, ณาทิปจฺจยานเมตํ อธิวจนํ, เตสํ วา นามิกานํ หิตา อุปการา ตทฺธิตาติ อนฺวตฺถภูตปรสมญฺญาวเสนาปิ ณาทิปฺปจฺจยาว ตทฺธิตา นาม. वहाँ उन तीन प्रकार के लिङ्गों के बाद होकर जो हित (अनुकूल) या सहित हैं, वे 'तद्धित' हैं। यह 'णादि' प्रत्ययों का नाम है। अथवा उन नामिकों के लिए जो हित (उपकारक) हैं, वे 'तद्धित' हैं - इस अन्वर्थक संज्ञा के कारण भी 'णादि' प्रत्यय ही 'तद्धित' कहलाते हैं। ‘‘วสิฏฺฐสฺส อปจฺจ’’นฺติ วิคฺคเห – "वसिष्ठ की सन्तान (अपत्य)" - इस विग्रह में - ‘‘ลิงฺคญฺจ นิปจฺจเต’’ติ อิโต ลิงฺคคฺคหณมนุวตฺตเต. "लिङ्गञ्च निपच्चते" यहाँ से 'लिङ्ग' ग्रहण की अनुवृत्ति आती है। ๓๖๑. วา ณ’ปจฺเจ. ३६१. अपत्य अर्थ में विकल्प से 'ण' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตโต ลิงฺคมฺหา ณปฺปจฺจโย โหติ วิกปฺเปน ‘‘ตสฺส อปจฺจ’’มิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ. षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक (लिङ्ग) से "उसकी सन्तान" इस अर्थ में विकल्प से 'ण' प्रत्यय होता है। โส จ – और वह – ๓๖๒. ธาตุลิงฺเคหิ ปรา ปจฺจยา. ३६२. धातुओं और लिंगों (प्रातिपदिकों) से परे प्रत्यय होते हैं। ธาตูหิ, ลิงฺเคหิ จ ปจฺจยา ปราว โหนฺตีติ ปริภาสโต อปจฺจตฺถสมฺพนฺธิลิงฺคโต ฉฏฺฐิยนฺตาเยว ปโร โหติ. ปฏิจฺจ เอตสฺมา อตฺโถ เอตีติ ปจฺจโย, ปตียนฺติ อเนน อตฺถาติ วา ปจฺจโย, ‘‘วุตฺตตฺถานมปฺปโยโค’’ติ อปจฺจสทฺทสฺส อปฺปโยโค, ‘‘เตสํ วิภตฺติโย โลปา เจ’’ติ วิภตฺติโลโป จ. 'धातुओं और लिंगों से प्रत्यय परे ही होते हैं' - इस परिभाषा से, अपत्य (संतान) अर्थ से संबंधित लिंग (प्रातिपदिक) के षष्ठी विभक्ति वाले रूप से ही परे (प्रत्यय) होता है। 'जिससे अर्थ प्राप्त होता है' वह प्रत्यय है, अथवा 'जिसके द्वारा अर्थ जाना जाता है' वह प्रत्यय है। 'कहे हुए अर्थों का प्रयोग नहीं होता' इस नियम से 'अपत्य' शब्द का प्रयोग नहीं होता, और 'उनकी विभक्तियों का लोप हो जाता है' इस नियम से विभक्ति का लोप होता है। ๓๖๓. เตสํ [Pg.217] โณ โลปํ. ३६३. उनका 'ण' लुप्त हो जाता है। เตสํ ตทฺธิตปฺปจฺจยานํ ณานุพนฺธานํ ณกาโร โลปมาปชฺชเต. उन तद्धित प्रत्ययों के 'ण' अनुबन्ध का 'ण' कार लोप को प्राप्त होता है। ๓๖๔. วุทฺธาทิสรสฺส วาสํโยคนฺตสฺส สเณ จ. ३६४. और 'ण' वाले प्रत्यय के परे होने पर, असंयोगान्त आदि स्वर की वृद्धि विकल्प से होती है। อาทิสรสฺส วา อาทิพฺยญฺชนสฺส วา อสํโยคนฺตสฺส วุทฺธิ โหติ สณการปฺปจฺจเย ปเร. สํโยโค อนฺโต อสฺสาติ สํโยคนฺโต, ตทญฺโญ อสํโยคนฺโต. อถ วา ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, ตทา จ ปกติภูเต ลิงฺเค สรานมาทิสรสฺส อสํโยคนฺตสฺส วุทฺธิ โหติ สณกาเร ตทฺธิตปฺปจฺจเย ปเรติ อตฺโถ. 'ण' कार वाले प्रत्यय के परे होने पर, आदि स्वर की अथवा आदि व्यंजन (के स्वर) की, जो असंयोगान्त हो, वृद्धि होती है। जिसके अन्त में संयोग हो वह 'संयोगान्त' है, उससे भिन्न 'असंयोगान्त' है। अथवा, यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है, तब प्रकृतिभूत लिंग के स्वरों में से आदि स्वर की, जो असंयोगान्त हो, 'ण' कार वाले तद्धित प्रत्यय के परे होने पर वृद्धि होती है - यह अर्थ है। เตน – इसलिए – วาสิฏฺฐาทีสุ นิจฺจายํ, อนิจฺโจฬุมฺปิกาทิสุ; น วุทฺธิ นีลปีตาโท, ววตฺถิตวิภาสโต. वासिष्ठ आदि में यह (वृद्धि) नित्य है, ओळुम्पिक आदि में अनित्य (विकल्प से) है; नील-पीत आदि में वृद्धि नहीं होती, व्यवस्थित विभाषा के कारण। จสทฺทคฺคหณมวธารณตฺถํ. 'च' शब्द का ग्रहण अवधारण (निश्चय) के लिए है। ตสฺสา วุทฺธิยา อนิยมปฺปสงฺเค นิยมตฺถํ ปริภาสมาห. उस वृद्धि के अनियम का प्रसंग होने पर, नियम के लिए परिभाषा कहते हैं। ๓๖๕. อยุวณฺณานญฺจาโย วุทฺธี. ३६५. अ, इ-वर्ण और उ-वर्ण की क्रमशः आ, ए, ओ वृद्धियाँ होती हैं। เตสํ อการอิวณฺณุวณฺณานเมว ยถากฺกมํ อา เอโออิจฺเจเต วุทฺธิโย โหนฺติ. จสทฺทคฺคหณมวุทฺธิสมฺปิณฺฑนตฺถํ, อวธารณตฺถํ วา. อิ จ อุ จ ยุ, ยุ เอว วณฺณา ยุวณฺณา, อ จ ยุวณฺณา จ อยุวณฺณา. อา จ เอ จ โอ จ อาโย. ปุน วุทฺธิคฺคหณํ ‘‘เนคมชานปทา’’ติอาทีสุ อุตฺตรปทวุทฺธิภาวตฺถํ, เอตฺถ จ ‘‘อยุวณฺณาน’’นฺติ ฐานนิยมวจนํ อาโยนํ วุทฺธิภาวปฺปสงฺคนิวตฺตนตฺถํ. उन अ-कार, इ-वर्ण और उ-वर्ण की ही यथाक्रम से आ, ए, ओ - ये वृद्धियाँ होती हैं। 'च' शब्द का ग्रहण अ-वृद्धि के संग्रह के लिए अथवा अवधारण के लिए है। इ और उ 'यु' हैं, 'यु' ही वर्ण 'युवर्ण' हैं, अ और युवर्ण 'अयुवर्ण' हैं। आ, ए और ओ 'आय' हैं। पुनः 'वृद्धि' का ग्रहण 'नेगम-जानपदा' आदि में उत्तरपद की वृद्धि के लिए है, और यहाँ 'अयुवर्णों की' यह स्थान-नियम का वचन 'आय' (आ, ए, ओ) की पुनः वृद्धि के प्रसंग को रोकने के लिए है। ยถา [Pg.218] หิ กตวุทฺธีนํ, ปุน วุทฺธิ น โหติห; ตถา สภาววุทฺธีนํ, อาโยนํ ปุน วุทฺธิ น. जैसे यहाँ जिनकी वृद्धि हो चुकी है, उनकी पुनः वृद्धि नहीं होती; वैसे ही स्वभाव से ही वृद्धियुक्त 'आय' (आ, ए, ओ) की पुनः वृद्धि नहीं होती। ตโต อการสฺส อากาโร วุทฺธิ, ‘‘สรโลโปมาเทสปฺปจฺจยาทิมฺหิ สรโลเป ตุ ปกตี’’ติ สรโลปปกติภาวา, ‘‘นเย ปรํ ยุตฺเต’’ติ ปรนยนํ กตฺวา ตทฺธิตตฺตา ‘‘ตทฺธิตสมาส’’อิจฺจาทินา นามพฺยปเทเส กเต ปุเร วิย สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. उसके बाद अ-कार की आ-कार वृद्धि होती है, 'सरलोपोमादेस...' सूत्र से स्वर-लोप और प्रकृति-भाव होने पर, 'नये परं युत्ते' से पर-नयन (वर्ण-संयोजन) करके, तद्धित होने के कारण 'तद्धितसमास...' आदि सूत्र से नाम संज्ञा होने पर, पहले की तरह 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। วาสิฏฺโฐ, วสิฏฺฐสฺส ปุตฺโต วา, วาสิฏฺฐา อิจฺจาทิ ปุริสสทฺทสมํ. ตสฺส นตฺตุปนตฺตาทโยปิ ตทุปจารโต วาสิฏฺฐาเยว. เอวํ สพฺพตฺถ โคตฺตตทฺธิเต ปฐมปฺปกติโตเยว ปจฺจโย โหติ. 'वासिठ्ठो' (वसिष्ठ का पुत्र), अथवा 'वसिष्ठस्स पुत्तो', 'वासिठ्ठा' इत्यादि 'पुरिस' शब्द के समान हैं। उसके पौत्र, प्रपौत्र आदि भी उपचार से 'वासिठ्ठ' ही कहलाते हैं। इसी प्रकार सभी गोत्र-तद्धितों में प्रथम प्रकृति (मूल शब्द) से ही प्रत्यय होता है। อิตฺถิยํ ณปฺปจฺจยนฺตตฺตา ‘‘ณว ณิก เณยฺย ณ นฺตูหี’’ติ วาสิฏฺฐสทฺทโต อีปจฺจโย. สรโลปาทึ กตฺวา อิตฺถิปฺปจฺจยนฺตตฺตา ‘‘ตทฺธิตสมาส’’อิจฺจาทิสุตฺเต จคฺคหเณน นามพฺยปเทเส กเต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, วาสิฏฺฐี กญฺญา, วาสิฏฺฐี, วาสิฏฺฐิโย อิจฺจาทิ อิตฺถิสทฺทสมํ. स्त्रीलिंग में 'ण' प्रत्ययान्त होने के कारण 'णव णिक णेय्य ण न्तूही' सूत्र से 'वासिठ्ठ' शब्द से 'ई' प्रत्यय होता है। स्वर-लोप आदि करके, स्त्री-प्रत्ययान्त होने के कारण 'तद्धितसमास...' आदि सूत्र में 'च' के ग्रहण से नाम संज्ञा होने पर 'सि' आदि की उत्पत्ति होती है - 'वासिठ्ठी कञ्ञा', 'वासिठ्ठी', 'वासिठ्ठियो' इत्यादि 'इत्थी' शब्द के समान हैं। นปุํสเก วาสิฏฺฐํ อปจฺจํ, วาสิฏฺฐานิ อปจฺจานิ อิจฺจาทิ จิตฺตสทฺทสมํ. เอวํ อุปริปิ ตทฺธิตนฺตสฺส ติลิงฺคตา เวทิตพฺพา. नपुंसक लिंग में 'वासिठ्ठं अपच्चं', 'वासिठ्ठानि अपच्चानि' इत्यादि 'चित्त' शब्द के समान हैं। इसी प्रकार आगे भी तद्धितान्त शब्दों की तीनों लिंगों में स्थिति जाननी चाहिए। ภารทฺวาชสฺส ปุตฺโต ภารทฺวาโช, เวสามิตฺตสฺส ปุตฺโต เวสามิตฺโต, โคตมสฺส ปุตฺโต โคตโม. เอตฺถ จ อยุวณฺณตฺตาภาวา อาการาทีนํ น วุทฺธิ โหติ. วสุเทวสฺส อปจฺจํ วาสุเทโว, พลเทโว. ‘‘จิตฺตโก’’ติอาทีสุ ปน สํโยคนฺตตฺตา วุทฺธิ น ภวติ. भरद्वाज का पुत्र 'भारद्वाजो', विश्वामित्र का पुत्र 'वेसामित्तो', गौतम का पुत्र 'गोतमो'। यहाँ अयुवर्ण (अ, इ, उ) न होने के कारण आ-कार आदि की वृद्धि नहीं होती। वसुदेव की संतान 'वासुदेवो', 'बलदेवो'। 'चित्तको' आदि में संयोगान्त होने के कारण वृद्धि नहीं होती है। ‘‘วจฺฉสฺส อปจฺจ’’นฺติ วิคฺคเห ณมฺหิ สมฺปตฺเต ‘‘วา ณ’ปจฺเจ’’ติ อิโต วาติ ตทฺธิตวิธาเน สพฺพตฺถ วตฺตเต, เตน สพฺพตฺถ วากฺยวุตฺติโย ภวนฺติ. ‘‘อปจฺเจ’’ติ ปทํ ยาว สํสฏฺฐคฺคหณาว วตฺตเต. 'वच्छस्स अपच्चं' इस विग्रह में 'ण' प्रत्यय प्राप्त होने पर, 'वा णपच्चे' इस सूत्र से 'वा' (विकल्प) तद्धित विधान में सर्वत्र अनुवृत्त होता है, जिससे सर्वत्र वाक्य-वृत्ति (विग्रह वाक्य) होती है। 'अपच्चे' यह पद 'संसट्ठ' के ग्रहण तक अनुवृत्त होता है। ๓๖๖. ณายน [Pg.219] ณาน วจฺฉาทิโต. ३६६. वच्छ आदि से 'णायन' और 'णान' प्रत्यय होते हैं। วจฺฉ กจฺจอิจฺเจวมาทิโต ฉฏฺฐิยนฺตโต โคตฺตคณโต ณายน ณานอิจฺจเต ปจฺจยา โหนฺติ วา ‘‘ตสฺสาปจฺจ’’มิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ. สพฺพตฺถ ณการานุพนฺโธ วุทฺธตฺโถ, เสสํ ปุพฺพสมํ, สํโยคนฺตตฺตา วุทฺธิอภาโวว วิเสโส. वच्छ, कच्च इत्यादि षष्ठी-विभक्ति वाले गोत्र-गण के शब्दों से 'तस्सापच्चं' (उसकी संतान) इस अर्थ में 'णायन' और 'णान' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। सर्वत्र 'ण' कार अनुबन्ध वृद्धि के लिए है, शेष पहले के समान है, संयोगान्त होने के कारण वृद्धि का न होना ही विशेष है। วจฺฉายโน วจฺฉาโน วจฺฉสฺส ปุตฺโต วา. เอวํ กจฺจสฺส ปุตฺโต กจฺจายโน กจฺจาโน, โมคฺคลฺลสฺส ปุตฺโต โมคฺคลฺลายโน โมคฺคลฺลาโน. เอวํ อคฺคิเวสฺสายโน อคฺคิเวสฺสาโน, กณฺหายโน กณฺหาโน, สากฏายโน สากฏาโน, มุญฺจายโน มุญฺจาโน, กุญฺชายโน กุญฺชาโน อิจฺจาทิ. อากติคโณ’ยํ. 'वच्छायनो', 'वच्छानो' अथवा 'वच्छस्स पुत्तो'। इसी प्रकार कच्च का पुत्र 'कच्चायनो', 'कच्चानो'; मोग्गल्ल का पुत्र 'मोग्गल्लायनो', 'मोग्गल्लानो'। इसी प्रकार 'अग्गिवेस्सायनो', 'अग्गिवेस्सानो', 'कण्हायनो', 'कण्हानो', 'साकटायनो', 'साकटानो', 'मुञ्चायनो', 'मुञ्चानो', 'कुञ्जायनो', 'कुञ्जानो' इत्यादि। यह आकृति-गण है। ‘‘กตฺติกาย อปจฺจ’’นฺติ วิคฺคเห – 'कत्तिकाया अपच्चं' इस विग्रह में – ๓๖๗. เณยฺโย กตฺติกาทีหิ. ३६७. कत्तिका आदि से 'णेय्य' प्रत्यय होता है। อาทิสทฺโทยํ ปกาเร วตฺตเต. กตฺติกา วินตาโรหิณีอิจฺเจวมาทีหิ อิตฺถิยํ วตฺตมาเนหิ ลิงฺเคหิ เณยฺยปฺปจฺจโย โหติ วา ‘‘ตสฺสาปจฺจ’’มิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ. यहाँ 'आदि' शब्द प्रकार (तरह) के अर्थ में है। कत्तिका, विनता, रोहिणी इत्यादि स्त्रीलिंग शब्दों से 'तस्सापच्चं' इस अर्थ में 'णेय्य' प्रत्यय विकल्प से होता है। วิภตฺติโลเป ‘‘ปกติ จสฺส สรนฺตสฺสา’’ติ ปกติภาโว. กตฺติเกยฺโย, กตฺติกาย ปุตฺโต วา. เอวํ วินตาย อปจฺจํ เวนเตยฺโย, อิการสฺเสกาโร วุทฺธิ, โรหิณิยา ปุตฺโต โรหิเณยฺโย, คงฺคาย อปจฺจํ คงฺเคยฺโย, ภคินิยา ปุตฺโต ภาคิเนยฺโย, นทิยาปุตฺโต นาเทยฺโย. เอวํ อนฺเตยฺโย, อาเหยฺโย, กาเมยฺโย. สุจิยา [Pg.220] อปจฺจํ โสเจยฺโย, เอตฺถ อุการสฺโสกาโร วุทฺธิ, พาลาย อปจฺจํ พาเลยฺโย อิจฺจาทิ. विभक्ति का लोप होने पर 'पकति चस्स सरन्तस्स' सूत्र से प्रकृति-भाव होता है। 'कत्तिकेय्यो' अथवा 'कत्तिकाया पुत्तो'। इसी प्रकार विनता की संतान 'वेनतेय्यो' (इ-कार की ए-कार वृद्धि), रोहिणी का पुत्र 'रोहिणेय्यो', गंगा की संतान 'गङ्गेय्यो', भगिनी का पुत्र 'भागिनेय्यो', नदी का पुत्र 'नादेय्यो'। इसी प्रकार 'अन्तेय्यो', 'आहेय्यो', 'कामेय्यो'। सुचि की संतान 'सोचेय्यो' (यहाँ उ-कार की ओ-कार वृद्धि), बाला की संतान 'बालेय्यो' इत्यादि। ‘‘ทกฺขสฺสาปจฺจ’’นฺติ วิคฺคเห ณมฺหิ สมฺปตฺเต – 'दक्खस्स अपच्चं' इस विग्रह में 'ण' प्रत्यय प्राप्त होने पर – ๓๖๘. อโต ณิ วา. ३६८. अ-कारान्त से 'णि' प्रत्यय विकल्प से होता है। อการนฺตโต ลิงฺคมฺหา ณิปจฺจโย โหติ วา ‘‘ตสฺสาปจฺจ’’มิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ. ทกฺขิ, ทกฺขี, ทกฺขโย, โทณสฺส อปจฺจํ โทณิ. เอวํ วาสวิ, สกฺยปุตฺติ, นาฏปุตฺติ, ทาสปุตฺติ, ทาสรถิ. วารุณิ, กณฺฑิ, พาลเทวิ, ปาวกิ, ชินทตฺตสฺส อปจฺจํ เชนทตฺติ, สุทฺโธทนิ, อนุรุทฺธิ อิจฺจาทิ. अ-कारान्त लिंग (प्रातिपदिक) से 'तस्सापच्चं' इस अर्थ में 'णि' प्रत्यय विकल्प से होता है। 'दक्खि', 'दक्खी', 'दक्खयो', द्रोण की संतान 'दोणि'। इसी प्रकार 'वासवि', 'सक्यपुत्ति', 'नाटपुत्ति', 'दासपुत्ति', 'दासरथि'। 'वारुणि', 'कण्डि', 'बालदेवि', 'पावकि', जिनदत्त की संतान 'जेनदत्ति', 'सुद्धोदनि', 'अनुरुद्धि' इत्यादि। ปุน วาคฺคหเณน อปจฺจตฺเถ ณิกปฺปจฺจโย, อทิติอาทิโต ณฺยปฺปจฺจโย จ. ยถา – สกฺยปุตฺตสฺส ปุตฺโต สกฺยปุตฺติโก, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา กการสฺส ยกาโร, สกฺยปุตฺติโย. เอวํ นาฏปุตฺติโก, เชนทตฺติโก, วิมาตุยา ปุตฺโต เวมาติโก. फिर 'वा' ग्रहण से अपत्य (संतान) अर्थ में 'णिक' प्रत्यय होता है, और 'अदिति' आदि शब्दों से 'ण्य' प्रत्यय होता है। जैसे - शाक्यपुत्र का पुत्र 'सक्यपुत्तिको' (शाक्यपुत्रिक), 'तेसु वुद्धि' आदि सूत्र से 'क' कार का 'य' कार होने पर 'सक्यपुत्तियो' (शाक्यपुत्रीय) बनता है। इसी प्रकार 'नाटपुत्तिको', 'जेनदत्तिको', विमाता का पुत्र 'वेमातिको' (वैमात्रिक) बनता है। ‘‘อทิติยา ปุตฺโต’’ติ อตฺเถ ณฺยปฺปจฺจโย, วุทฺธิ จ. 'अदिति का पुत्र' इस अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय और वृद्धि होती है। ๓๖๙. อวณฺโณ เย โลปญฺจ. ३६९. 'य' प्रत्यय परे होने पर 'अ' वर्ण का लोप भी होता है। อวณฺโณ ตทฺธิตภูเต ยปฺปจฺจเย ปเร โลปมาปชฺชเต. จสทฺเทน อิวณฺโณปีติ อิการโลโป, ‘‘ยวตํ ตลนทการานํ พฺยญฺชนานิ จ ล ญ ชการตฺต’’นฺติ ตฺยการสํโยคสฺส จกาโร, ‘‘ปรทฺเวภาโว ฐาเน’’ติ ทฺวิตฺตํ, อาทิจฺโจ. เอวํ ทิติยา ปุตฺโต เทจฺโจ. तद्धित संज्ञक 'य' प्रत्यय परे होने पर 'अ' वर्ण लोप को प्राप्त होता है। 'च' शब्द से 'इ' वर्ण का भी लोप होता है, 'यवतं तलनदकारानं...' सूत्र से 'त्य' कार के संयोग का 'च' कार होता है, 'परद्वेभावो ठाने' सूत्र से द्वित्व होने पर 'आदिच्चो' (आदित्य) बनता है। इसी प्रकार दिति का पुत्र 'देच्चो' (दैत्य) बनता है। ‘‘กุณฺฑนิยา ปุตฺโต’’ติ อตฺเถ ณฺยปฺปจฺจเย กเต – 'कुण्डनी का पुत्र' इस अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय करने पर - ‘‘กฺวจาทิมชฺฌุตฺตเรสู’’ติ วตฺตเต. 'क्वचादिमज्झुत्तरेसु' (सूत्र) प्रवृत्त होता है। ๓๗๐. เตสุ [Pg.221] วุทฺธิโลปาคมวิการวิปรีตาเทสา จ. ३७०. उनमें (आदि, मध्य और उत्तर में) वृद्धि, लोप, आगम, विकार, विपरीत और आदेश होते हैं। เตสุ อาทิมชฺฌุตฺตเรสุ อวิหิตลกฺขเณสุ ชินวจนานุปโรเธน กฺวจิ วุทฺธิ โลป อาคม วิการ วิปรีตอาเทสา โหนฺตีติ สํโยคนฺตตฺเตปิ อาทิวุทฺธิ, อิการโลเป นฺยสฺสญาเทโส, โกณฺฑญฺโญ, กุรุโน ปุตฺโต โกรพฺโย, เอตฺถาปิ เตเนว อุการสฺส อวาเทโส, ภาตุโน ปุตฺโต ภาตพฺโย. उन आदि, मध्य और उत्तर पदों में जहाँ लक्षण (नियम) विहित नहीं हैं, वहाँ जिन-वचन (बुद्ध-वचन) के अविरोध में कहीं वृद्धि, लोप, आगम, विकार, विपरीत और आदेश होते हैं; अतः संयोगान्त होने पर भी आदि-वृद्धि होती है, इ-कार का लोप होने पर 'न्य' का 'ञ' आदेश होकर 'कोण्डञ्ञो' (कौण्डिन्य) बनता है, कुरु का पुत्र 'कोरब्यो' (कौरव्य), यहाँ भी उसी (सूत्र) से उ-कार का 'अव' आदेश होता है, भ्राता का पुत्र 'भातब्यो' (भ्रातव्य) बनता है। ‘‘อุปคุสฺส อปจฺจ’’นฺติ วิคฺคเห – 'उपगु का अपत्य (संतान)' इस विग्रह में - ๓๗๑. ณโวปคฺวาทีหิ. ३७१. 'णवोपग्वादीहि' (सूत्र से)। อุปคุ มนุอิจฺเจวมาทีหิ อุการนฺเตหิ โคตฺตคเณหิ ณวปฺปจฺจโย โหติ วา ‘‘ตสฺสาปจฺจ’’มิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ. อาทิสทฺทสฺส เจตฺถ ปการวาจกตฺตา อุการนฺตโตเยวายํ. โอปคโว, โอปควี, โอปควํ, มนุโน อปจฺจํ มานโว, ‘‘มานุโส’’ติ ณปฺปจฺจเย, สาคเม จ กเต รูปํ, ภคฺคุโน อปจฺจํ ภคฺคโว, ปณฺฑุโน อปจฺจํ ปณฺฑโว, อุปวินฺทุสฺส อปจฺจํ โอปวินฺทโว อิจฺจาทิ. 'उपगु', 'मनु' इत्यादि उ-कारान्त गोत्र गणों से 'तस्सापच्चं' (उसकी संतान) इस अर्थ में 'णव' प्रत्यय विकल्प से होता है। यहाँ 'आदि' शब्द प्रकार-वाचक होने से यह उ-कारान्तों के लिए ही है। 'ओपगवो', 'ओपगवी', 'ओपगवं'; मनु की संतान 'मानवो', 'मानुसो' यहाँ 'ण' प्रत्यय और 'स' आगम करने पर रूप बनता है; भग्गु की संतान 'भग्गवो', पाण्डु की संतान 'पाण्डवो', उपविन्दु की संतान 'ओपविन्दवो' इत्यादि। ‘‘วิธวาย อปจฺจ’’นฺติ อตฺเถ – 'विधवा की संतान' इस अर्थ में - ๓๗๒. เณร วิธวาทิโต. ३७२. 'णेर विधवादितो' (सूत्र से)। วิธวาทิโต เณรปฺปจฺจโย โหติ วา อปจฺจตฺเถ. วิคโต ธโว ปติ เอติสฺสาติ วิธวา, เวธเวโร, พนฺธุกิยา อภิสาริณิยา ปุตฺโต พนฺธุเกโร, สมณสฺส อุปชฺฌายสฺส ปุตฺโต ปุตฺตฏฺฐานิยตฺตาติ สามเณโร, นาฬิเกโร อิจฺจาทิ. 'विधवा' आदि शब्दों से अपत्य अर्थ में 'णेर' प्रत्यय विकल्प से होता है। जिसका 'धव' अर्थात् पति चला गया है वह 'विधवा' है, (उसकी संतान) 'वेधवेरो'; बन्धुकी (अभिसारिणी) का पुत्र 'बन्धुकेरो'; श्रमण उपाध्याय का पुत्र (पुत्र के समान होने के कारण) 'सामणेरो' (श्रामणेर); 'नाळिकेरो' (नारिकेल) इत्यादि। อปจฺจตทฺธิตํ. अपत्य तद्धित (समाप्त)। สํสฏฺฐาทิอเนกตฺถตทฺธิต संसृष्ट आदि अनेक अर्थ वाले तद्धित। ‘‘ติเลน [Pg.222] สํสฏฺฐ’’นฺติ วิคฺคเห – 'तिल से संसृष्ट (मिला हुआ)' इस विग्रह में - ๓๗๓. เยน วา สํสฏฺฐํ ตรติ จรติ วหติ ณิโก. ३७३. 'येन वा संसट्ठं तरति चरति वहति णिको' (सूत्र से)। เยน วา สํสฏฺฐํ, เยน วา ตรติ, เยน วา จรติ, เยน วา วหติ, ตโต ตติยนฺตโต ลิงฺคมฺหา เตสุ สํสฏฺฐาทีสฺวตฺเถสุ ณิกปฺปจฺจโย โหติ วา. เตลิกํ โภชนํ, ติเลน อภิสงฺขตนฺติ อตฺโถ. เตลิกี ยาคุ. คุเฬน สํสฏฺฐํ เอคาฬิกํ. เอวํ ฆาติกํ, ทาธิกํ, มาริจิกํ, โลณิกํ. जिससे संसृष्ट हो, जिससे पार करता हो, जिससे आचरण करता हो, या जिससे ढोता हो, उस तृतीयान्त प्रातिपदिक से उन संसृष्ट आदि अर्थों में 'णिक' प्रत्यय विकल्प से होता है। 'तेलिकं भोजनं' अर्थात् तिल से संस्कृत (बनाया हुआ) भोजन। 'तेलिकी यागु' (तिल वाली लपसी)। गुड़ से संसृष्ट 'एगाळिकं'। इसी प्रकार 'घातिकं', 'दाधिकं', 'मारिचिकं', 'लोणिकं'। นาวาย ตรตีติ นาวิโก, อุฬุมฺเปน ตรตีติ โอฬุมฺปิโก, วุทฺธิอภาวปกฺเข อุฬุมฺปิโก. เอวํ กุลฺลิโก, โคปุจฺฉิโก. สกเฏน จรตีติ สากฏิโก. เอวํ ปาทิโก, ทณฺฑิโก, ธมฺเมน จรติ ปวตฺตตีติ ธมฺมิโก. สีเสน วหตีติ สีสิโก, วาคฺคหเณน อีการสฺส วุทฺธิ น โหติ. เอวํ อํสิโก, ขนฺธิโก, หตฺถิโก, องฺคุลิโก. नौका से पार करता है वह 'नाविको' (नाविक), उळुम्प (बेड़े) से पार करता है वह 'ओळुम्पिको', वृद्धि के अभाव पक्ष में 'उळुम्पिको'। इसी प्रकार 'कुल्लिको', 'गोपुच्छिको'। शकट (गाड़ी) से चलता है वह 'साकटिको'। इसी प्रकार 'पादिको', 'दण्डिको', धर्म से चलता है (प्रवृत्त होता है) वह 'धम्मिको' (धार्मिक)। सिर से ढोता है वह 'सीसिको', 'वा' ग्रहण से ई-कार की वृद्धि नहीं होती। इसी प्रकार 'अंसिको', 'खन्धिको', 'हत्थिको', 'अङ्गुलिको'। ปุน วาคฺคหเณน อญฺญตฺเถสุปิ ณิกปฺปจฺจโย, ปรทารํ คจฺฉตีติ ปารทาริโก, ปถํ คจฺฉตีติ ปถิโก. फिर 'वा' ग्रहण से अन्य अर्थों में भी 'णिक' प्रत्यय होता है, जैसे - परस्त्री के पास जाता है वह 'पारदारिको', पथ (मार्ग) पर जाता है वह 'पथिको'। ‘‘วินยมธีเต, อเวจฺจาธีเต’’ติ วา วิคฺคเห – 'विनय का अध्ययन करता है' या 'जानकर अध्ययन करता है' इस विग्रह में - ‘‘ณิโก’’ติ วตฺตเต. 'णिको' (पद) की अनुवृत्ति होती है। ๓๗๔. ตมธีเต เตนกตาทิสนฺนิธานนิโยคสิปฺปภณฺฑชีวิกตฺเถสุ จ. ३७४. 'तमधीते तेनकतादिसन्निधाननियोगसिप्पभण्डजीविकत्थेसु च' (सूत्र से)। จตุปฺปทมิทํ. ตมธีเตติ อตฺเถ, เตน กตาทีสฺวตฺเถสุ จ ตมฺหิ สนฺนิธาโน, ตตฺถ นิยุตฺโต, ตมสฺส สิปฺปํ, ตมสฺส ภณฺฑํ[Pg.223], ตมสฺส ชีวิกา อิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ จ ทุติยาทิวิภตฺยนฺเตหิ ลิงฺเคหิ ณิกปฺปจฺจโย โหติ วา. เวนยิโก. เอวํ สุตฺตนฺติโก, อาภิธมฺมิโก. यह चार पदों वाला सूत्र है। 'उसका अध्ययन करता है' इस अर्थ में, और 'उसके द्वारा कृत' आदि अर्थों में, उसमें सन्निधान (उपस्थिति), वहाँ नियुक्त, वह उसका शिल्प है, वह उसका भाण्ड (सामान) है, वह उसकी जीविका है - इन अर्थों में द्वितीया आदि विभक्ति वाले प्रातिपदिकों से 'णिक' प्रत्यय विकल्प से होता है। 'वेनयिको' (वैनयिक)। इसी प्रकार 'सुत्तन्तिको', 'आभिधम्मिको'। ‘‘พฺยากรณมธีเต’’ติ อตฺเถ ณิกปฺปจฺจยาทิมฺหิ กเต – 'व्याकरण का अध्ययन करता है' इस अर्थ में 'णिक' प्रत्यय आदि करने पर - ‘‘วุทฺธาทิสรสฺส วาสํโยคนฺตสฺส สเณ จา’’ติ วตฺตมาเน – 'वुद्धादिसरस्स वासंयोगन्तस्स सणे चा' (सूत्र) की अनुवृत्ति होने पर - ๓๗๕. มายูนมาคโม ฐาเน. ३७५. 'मायूनामागमो ठाने' (सूत्र से)। อิ อุอิจฺเจเภสํ อาทิสรานํ อสํโยคนฺตานํ มา วุทฺธิ โหติ สเณ, ตตฺเรว วุทฺธิ อาคโม โหติ จ ฐาเนติ เอการวุทฺธาคโม. 'इ' और 'उ' इन असंयोगान्त आदि स्वरों की 'ण' प्रत्यय परे होने पर वृद्धि नहीं होती, बल्कि उसी स्थान पर वृद्धि-आगम होता है; अतः 'ए' कार रूपी वृद्धि-आगम होता है। ‘‘ฐาเน’’ติ วจนา เจตฺถ, ยูนมาเทสภูตโต; ยเวหิ ปุพฺเพว เอโอ-วุทฺธิโย โหนฺติ อาคมา. यहाँ 'ठाने' (स्थान में) वचन से, 'इ' और 'उ' के आदेश स्वरूप; 'य' और 'व' से पहले ही 'ए' और 'ओ' रूपी वृद्धि-आगम होते हैं। ยการสฺส ทฺวิภาโว. य-कार का द्वित्व होता है। เวยฺยากรณิโก, นฺยายมธีเตติ เนยฺยายิโก. เอวํ ตกฺกิโก, เวทิโก, เนมิตฺติโก, กาเยน กโต ปโยโค กายิโก, กาเยน กตํ กมฺมํ กายิกํ, วจสา กตํ กมฺมํ วาจสิกํ. เอวํ มานสิกํ, เอตฺถ จ ‘‘สสเร วาคโม’’ติ สุตฺเต ววตฺถิตวาสทฺเทน ปจฺจเย ปเรปิ สาคโม, เถเรหิ กตา สงฺคีติ เถริกา. เอวํ ปญฺจสติกา, สตฺตสติกา, เอตฺถ ‘‘ณวณิกา’’ทิสุตฺเต อนุวตฺติตวาคฺคหเณน อีปจฺจโย น โหติ. वैयाकरणिक (व्याकरण जानने वाला), न्याय का अध्ययन करने वाला नैयायिक। इसी प्रकार तार्किक, वैदिक, नैमित्तिक; काय (शरीर) द्वारा किया गया प्रयोग कायिक, काय द्वारा किया गया कर्म कायिक, वाणी द्वारा किया गया कर्म वाचसिक। इसी प्रकार मानसिक; और यहाँ 'ससरे वागमो' इस सूत्र में व्यवस्थित 'वा' शब्द के ग्रहण से प्रत्यय परे होने पर भी 'स' का आगम होता है, जैसे—स्थविरों (थेरों) द्वारा की गई संगीति 'थैरिका'। इसी प्रकार पञ्चशतिका, सप्तशतिका; यहाँ 'णवणिका' आदि सूत्र से अनुवृत्त 'वा' ग्रहण से 'ई' प्रत्यय नहीं होता है। สนฺนิธานตฺเถ สรีเร สนฺนิธานา เวทนา สารีริกา, สารีริกํ ทุกฺขํ. เอวํ มานสิกา, มานสิกํ. सन्निधान (उपस्थिति) अर्थ में—शरीर में सन्निहित वेदना 'शारीरिक' (सारीरिक), शारीरिक दुःख। इसी प्रकार मानसिकी, मानसिक। นิยุตฺตตฺเถ [Pg.224] ทฺวาเร นิยุตฺโต โทวาริโก, เอตฺถ ‘‘มายูนมาคโม ฐาเน’’ติ วการโต ปุพฺเพโอการาคโม. เอวํ ภณฺฑาคาริโก, นาคริโก, นวกมฺมิโก, วนกมฺมิโก, อาทิกมฺมิโก, โอทริโก, รถิโก, ปถิโก, อุปาเย นิยุตฺโต โอปายิโก, เจตสิ นิยุตฺตา เจตสิกา. नियुक्त अर्थ में—द्वार पर नियुक्त 'दौवारिक' (द्वारपाल); यहाँ 'मायूनामागमो ठाने' इस सूत्र से 'व' कार से पूर्व 'ओ' कार का आगम होता है। इसी प्रकार भाण्डागारिक, नागरिक, नवकम्मिक, वनकम्मिक, आदिकम्मिक, औदरिक, रथिक, पथिक; उपाय में नियुक्त 'औपायिक', चेतस् (चित्त) में नियुक्त 'चैतसिक'। สิปฺปตฺเถ วีณาวาทนํ วีณา, วีณา อสฺส สิปฺปํ เวณิโก. เอวํ ปาณวิโก, โมทิงฺคิโก, วํสิโก. शिल्प (कला) अर्थ में—वीणा बजाना 'वीणा' है, वीणा जिसका शिल्प है वह 'वैणिक'। इसी प्रकार पाणविक, मौदिङ्गिक, वांशिक। ภณฺฑตฺเถ คนฺโธ อสฺส ภณฺฑนฺติ คนฺธิโก. เอวํ เตลิโก, โคฬิโก, ปูวิโก, ปณฺณิโก, ตมฺพูลิโก, โลณิโก. भाण्ड (वस्तु) अर्थ में—गन्ध जिसकी वस्तु है वह 'गान्धिक'। इसी प्रकार तैलिक, गौलिक, पूविक, पण्णिक (पर्णिक), ताम्बूलिक, लोणिक (लवणिक)। ชีวิกตฺเถ อุรพฺภํ หนฺตฺวา ชีวติ, อุรพฺภมสฺส ชีวิกาติ วา โอรพฺภิโก. เอวํ มาควิโก, เอตฺถ วการาคโม. สูกริโก, สากุณิโก, มจฺฉิโก อิจฺจาทิ. जीविका अर्थ में—भेड़ (उरभ्र) को मारकर जीता है, भेड़ जिसकी जीविका है वह 'औरभ्रक' (औरभ्रिको)। इसी प्रकार मागविक (यहाँ 'व' कार का आगम है), सूकरिक, शाकुनिक, माच्छिक इत्यादि। ‘‘เตน กตาที’’ติ เอตฺถ อาทิคฺคหเณน เตน หตํ, เตน พทฺธํ, เตน กีตํ, เตน ทิพฺพติ, โส อสฺส อาวุโธ, โส อสฺส อาพาโธ, ตตฺถ ปสนฺโน, ตสฺส สนฺตกํ, ตมสฺส ปริมาณํ, ตสฺส ราสิ, ตํ อรหติ, ตมสฺส สีลํ, ตตฺถ ชาโต, ตตฺถ วสติ, ตตฺร วิทิโต, ตทตฺถาย สํวตฺตติ, ตโต อาคโต, ตโต สมฺภูโต, ตทสฺส ปโยชนนฺติ เอวมาทิอตฺเถ จ ณิกปฺปจฺจโย โหติ. ยถา – ชาเลน หโต, หนตีติ วา ชาลิโก. เอวํ พาฬิสิโก, วากริโก, สุตฺเตน พทฺโธ สุตฺติโก, วรตฺตาย พทฺโธ วารตฺติโก นาโค. 'तेन कतादि' (उसके द्वारा किया गया आदि) यहाँ 'आदि' ग्रहण से—उसके द्वारा मारा गया, उसके द्वारा बाँधा गया, उसके द्वारा खरीदा गया, उससे खेलता है, वह उसका आयुध (शस्त्र) है, वह उसकी व्याधि (रोग) है, उसमें प्रसन्न है, वह उसका अपना है, वह उसका परिमाण है, वह उसकी राशि है, वह उसके योग्य है, वह उसका स्वभाव है, वहाँ उत्पन्न हुआ, वहाँ रहता है, वहाँ ज्ञात है, उसके लिए प्रवृत्त होता है, वहाँ से आया है, वहाँ से उत्पन्न हुआ है, वह उसका प्रयोजन है—इन आदि अर्थों में भी 'णिक' प्रत्यय होता है। जैसे—जाल से मारा गया या मारता है वह 'जालिक'। इसी प्रकार बालिशिक, वाकरिक; सूत्र (धागे) से बाँधा गया 'सौत्रिक' (सुत्तिको), वरत्रा (चमड़े की रस्सी) से बाँधा गया 'वारत्तिक' नाग। วตฺเถน [Pg.225] กีตํ ภณฺฑํ วตฺถิกํ. เอวํ กุมฺภิกํ, ผาลิกํ, โสวณฺณิกํ, สาติกํ. อกฺเขน ทิพฺพตีติ อกฺขิโก. เอวํ สาลากิโก, ตินฺทุกิโก, อมฺพผลิโก. จาโป อสฺส อาวุโธติ จาปิโก. เอวํ โตมริโก, มุคฺคริโก, โมสลิโก. वस्त्र से खरीदी गई वस्तु 'वत्थिक' (वस्त्रिक)। इसी प्रकार कुम्भिक, फालिक, सौवण्णिक, सातिक। अक्ष (पासे) से खेलता है वह 'अक्खिक'। इसी प्रकार शालाकििक, तिन्दुकिक, अम्बफलिक। चाप (धनुष) जिसका आयुध है वह 'चापििक'। इसी प्रकार तोमरिक, मुग्गरिक, मोसलिक। วาโต อสฺส อาพาโธติ วาติโก. เอวํ เสมฺหิโก, ปิตฺติโก. वात (वायु) जिसका रोग है वह 'वातिक'। इसी प्रकार सैष्मिक, पित्तिक। พุทฺเธ ปสนฺโน พุทฺธิโก. เอวํ ธมฺมิโก, สงฺฆิโก. พุทฺธสฺส สนฺตโก พุทฺธิโก. เอวํ ธมฺมิโก, สงฺฆิโก วิหาโร, สงฺฆิกา ภูมิ, สงฺฆิกํ จีวรํ, ปุคฺคลิกํ. बुद्ध में प्रसन्न 'बुद्धिक'। इसी प्रकार धम्मिक, साङ्घिक। बुद्ध का अपना 'बुद्धिक'। इसी प्रकार धम्मिक, साङ्घिक विहार, साङ्घिक भूमि, साङ्घिक चीवर, पुग्गलिक (पुद्गलिक)। กุมฺโภ อสฺส ปริมาณนฺติ กุมฺภิกํ. เอวํ ขาริกํ, โทณิกํ. กุมฺภสฺส ราสิ กุมฺภิโก. กุมฺภํ อรหตีติ กุมฺภิโก. เอวํ โทณิโก, อฏฺฐมาสิโก, กหาปณิโก, อาสีติกา คาถา, นาวุติกา, สาติกํ, สาหสฺสิกํ. สนฺทิฏฺฐมรหตีติ สนฺทิฏฺฐิโก, ‘‘เอหิ ปสฺสา’’ติ อิมํ วิธึ อรหตีติ เอหิปสฺสิโก. कुम्भ (घड़ा) जिसका परिमाण है वह 'कुम्भिक'। इसी प्रकार खारिक, दोणिक। कुम्भ की राशि 'कुम्भिक'। कुम्भ के योग्य 'कुम्भिक'। इसी प्रकार दोणिक, अष्टमासिक, कहापणिक (कार्षापणिक), असीतिका (अस्सी वाली) गाथा, नवतिका (नब्बे वाली), सातिक, साहस्रक। सन्दिठ्ठ (साक्षात्) के योग्य 'सान्दिठ्ठिक', 'एहि पस्स' (आओ और देखो) इस विधि के योग्य 'एहिपस्सिक'। สีลตฺเถ ปํสุกูลธารณํ ปํสุกูลํ, ตํ สีลมสฺสาติ ปํสุกูลิโก. เอวํ เตจีวริโก, เอกาสเน โภชนสีโล เอกาสนิโก, รุกฺขมูเล วสนสีโล รุกฺขมูลิโก, ตถา อารญฺญิโก, โสสานิโก. शील (स्वभाव/व्रत) अर्थ में—पांशुकुल धारण करना 'पांशुकुल' है, वह जिसका शील है वह 'पांशुकुलिक'। इसी प्रकार तेचीवरिक (त्रिचीवरिक), एक आसन पर भोजन करने के स्वभाव वाला 'एकासनिक', वृक्ष के मूल में रहने के स्वभाव वाला 'वृक्षमूलिक', वैसे ही आरण्यक (आरञ्ञिक), सौसानिक (श्मशानिक)। ชาตตฺเถ อปาเย ชาโต อาปายิโก. เอวํ เนรยิโก, สามุทฺทิโก มจฺโฉ, วสฺเสสุ ชาโต วสฺสิโก, วสฺสิกา, วสฺสิกํ ปุปฺผํ, สารทิโก, เหมนฺติโก, วาสนฺติโก, จาตุทฺทสิโก, ราชคเห ชาโต, ราชคเห [Pg.226] วสตีติ วา ราชคหิโก ชโน, มคเธสุ ชาโต, วสตีติ วา มาคธิโก, มาคธิกา, มาคธิกํ, สาวตฺถิยํ ชาโต, วสตีติ วา สาวตฺถิโก, กาปิลวตฺถิโก, เวสาลิโก. जात (उत्पन्न) अर्थ में—अपाय में उत्पन्न 'आपायिक'। इसी प्रकार नैरयिक, समुद्र में होने वाली मछली 'सामुद्रिक', वर्षा ऋतु में उत्पन्न 'वस्सिक' (वार्षिक), वार्षिकी, वार्षिक पुष्प; शारदिक, हैमन्तिक, वासन्तिक, चातुद्दसिक (चतुर्दशी का); राजगृह में उत्पन्न या राजगृह में रहने वाला 'राजगहिक' जन; मगध में उत्पन्न या रहने वाला 'मागधिक', मागधिका, मागधिक; श्रावस्ती में उत्पन्न या रहने वाला 'सावत्थिक', कापिलवत्थिक, वैसालिक। โลเก วิทิโต โลกิโก, โลกาย สํวตฺตตีติปิ โลกิโก. ตถา มาติโต อาคตํ มาติกํ, ปิติโต อาคตํ เปตฺติกํ นามํ. लोक में विदित 'लौकिक', लोक के लिए प्रवृत्त होने वाला भी 'लौकिक'। वैसे ही माता से आया हुआ 'मातिक' (मातृक), पिता से आया हुआ 'पेत्तिक' (पैतृक) नाम। สมฺภูตตฺเถ มาติโต สมฺภูตํ มตฺติกํ. เอวํ เปตฺติกํ. อุปธิตสฺส ปโยชนํ โอปธิกํ. सम्भूत (उत्पन्न) अर्थ में—माता से उत्पन्न 'मत्तिक' (मातृक)। इसी प्रकार पैतृक। उपधि (क्लेश) जिसका प्रयोजन है वह 'औपधिक'। สกตฺเถปิ อสงฺขาโรเยว อสงฺขาริกํ. เอวํ สสงฺขาริกํ, นามเมว นามิกํ. เอวํ อาขฺยาติกํ, โอปสคฺคิกํ, เนปาติกํ, จตุมหาราเช ภตฺติ เอเตสนฺติ จาตุมหาราชิกา. เอวํ อญฺญตฺเถปิ โยเชตพฺพํ. स्वार्थ (उसी अर्थ) में भी—असंखार (असंस्कार) ही 'असंखारिक' (असंस्कारिक) है। इसी प्रकार ससंखारिक, नाम ही 'नामिक'। इसी प्रकार आख्यातिका, औपसर्गिक, नैपातिक; चार महाराज (लोकपालों) में जिनकी भक्ति है वे 'चातुमहाराजिक'। इसी प्रकार अन्य अर्थों में भी योजन करना चाहिए। ‘‘กสาเวน รตฺต’’นฺติ วิคฺคเห – 'कषाय (गेरुए रंग) से रंगा हुआ'—इस विग्रह में— ๓๗๖. ณ ราคา เตนรตฺตํ ตสฺเสทมญฺญตฺเถสุ จ. ३७६. 'ण' प्रत्यय राग (रंग) वाचक शब्द से 'उससे रंगा हुआ', 'उसका यह' और अन्य अर्थों में होता है। ราคตฺถวาจกา ลิงฺคมฺหา ‘‘เตน รตฺต’’มิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ, ‘‘ตสฺเส’’ติ ฉฏฺฐิยนฺตโต ‘‘อิท’’มิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ จ อญฺญตฺเถสุ จ ณปฺปจฺจโย โหติ วา. राग (रंग) अर्थ के वाचक प्रातिपदिक से 'उससे रंगा हुआ' इस अर्थ में, 'उसका' इस षष्ठ्यन्त से 'यह' इस अर्थ में और अन्य अर्थों में भी 'ण' प्रत्यय विकल्प से होता है। กาสาวํ วตฺถํ. เอวํ กาสายํ, กุสุมฺเภน รตฺตํ โกสุมฺภํ, หลิทฺทิยา รตฺตํ หาลิทฺทํ, ปตฺตงฺคํ, มญฺชิฏฺฐํ, กุงฺกุมํ, นีเลน รตฺตํ นีลํ. เอวํ ปีตํ. काषाव (कषाय से रंगा) वस्त्र। इसी प्रकार काषाय; कुसुम्भ से रंगा 'कौसुम्भ', हल्दी (हरिद्रा) से रंगा 'हारिद्र', पत्तङ्ग (पत्तङ्ग से रंगा), मञ्जिठ्ठ (मञ्जिष्ठा से रंगा), कुङ्कुम (कुङ्कुम से रंगा), नील से रंगा 'नील'। इसी प्रकार पीत। อิทมตฺเถ [Pg.227] มหึสสฺส อิทํ มาหึสํ มํสํ, ทธิ สปฺปิ จมฺมาทิกํ วา, สูกรสฺส อิทํ สูกรํ, กจฺจายนสฺส อิทํ กจฺจายนํ พฺยากรณํ. เอวํ โสคตํ สาสนํ. 'यह उसका' इस अर्थ में—महिष (भैंसे) का यह 'माहिष' मांस, दही, घी या चमड़ा आदि; सूकर (सूअर) का यह 'सौकर'; कच्चायन का यह 'कच्चायन' व्याकरण। इसी प्रकार सौगत शासन (बुद्ध का शासन)। ‘‘อิสิสฺส อิท’’นฺติ อตฺเถ ณปฺปจฺจเย กเต วุทฺธิมฺหิ สมฺปตฺเต – 'ऋषि का यह' इस अर्थ में 'ण' प्रत्यय होने पर और वृद्धि प्राप्त होने पर— ‘‘สเณ, ยูนมาคโม ฐาเน’’ติ จ วตฺตเต. 'सणे, यूनामागमो ठाने' (यह सूत्र) अनुवृत्त होता है। ๓๗๗. อาตฺตญฺจ. ३७७. और 'आ' भाव (आकार) भी। อิ อุอิจฺเจเตสํ อาทิสรานํ อาตฺตญฺจ โหติ สณการปฺปจฺจเย ปเร, จสทฺเทน ริการาคโม จ ฐาเนติ อิการสฺส อาตฺตํ. 'इ' और 'उ' इन आदिसरों को 'आ' भाव (आकार) होता है 'स' और 'ण' प्रत्यय परे होने पर; 'च' शब्द से 'रि' कार का आगम होता है और 'स्थान' (ठाने) शब्द से 'इ' कार को 'आ' भाव होता है। ฐานาธิการโต อาตฺตํ, อิสูสภอุชาทินํ; อิสิสฺส ตุ ริการาค-โม จาตฺตานนฺตเร ภเว. 'स्थान' के अधिकार से 'ऋषि', 'ऋषभ', 'ओज' आदि के (आदि स्वर को) 'आ' भाव होता है; 'ऋषि' शब्द में तो 'रि' कार का आगम और 'आ' भाव के बाद (यकार) होता है। อาริสฺยํ, อุสภสฺส อิทํ อาสภํ ฐานํ, อาสภี วาจา. आऋष्य (आदिस्य), ऋषभ का यह 'आषभ' स्थान, आषभी वाणी। อญฺญตฺถคฺคหเณน ปน อวิทูรภโว, ตตฺร ภโว, ตตฺร ชาโต, ตโต อาคโต, โส อสฺส นิวาโส, ตสฺส อิสฺสโร, กตฺติกาทีหิ นิยุตฺโต มาโส, สาสฺส เทวตา, ตมเวจฺจาธีเต, ตสฺส วิสโย เทโส, ตสฺมึ เทเส อตฺถิ, เตน นิพฺพตฺตํ, ตํ อรหติ, ตสฺส วิกาโร, ตมสฺส ปริมาณนฺติ อิจฺเจวมาทีสฺวตฺเถสุ จ ณปฺปจฺจโย. ยถา – วิทิสาย อวิทูเร ภโว เวทิโส คาโม, อุทุมฺพรสฺส อวิทูเร ภวํ โอทุมฺพรํ วิมานํ. 'अञ्ञत्थ' (अन्यत्र) ग्रहण से 'अविदूरभव' (निकट होने वाला), 'तत्र भव' (वहाँ होने वाला), 'तत्र जात' (वहाँ उत्पन्न), 'ततो आगत' (वहाँ से आया हुआ), 'सो अस्स निवासो' (वह उसका निवास है), 'तस्स इस्सरो' (उसका स्वामी), 'कत्तिकादीहि नियुत्तो मासो' (कार्तिक आदि से युक्त महीना), 'सास्स देवता' (वह उसका देवता है), 'तमवेच्चाधीते' (उसे जानकर पढ़ता है), 'तस्स विसयो देसो' (उसका विषय देश), 'तस्मिं देसे अत्थि' (उस देश में है), 'तेन निब्बत्तं' (उससे उत्पन्न), 'तं अरहति' (उसके योग्य है), 'तस्स विकारो' (उसका विकार), 'तमस्स परिमाणं' (वह उसका परिमाण है) - इन आदि अर्थों में 'ण' प्रत्यय होता है। जैसे - विदिशा के निकट होने वाला 'वेदिसा' गाँव, उदुम्बर के निकट होने वाला 'ओदुम्बर' विमान। ภวตฺเถ มนสิ ภวํ มานสํ สุขํ, สาคโม. สเร ภโว สารโส สกุโณ, สารสา สกุณี, สารสํ ปุปฺผํ[Pg.228], อุรสิ ภโว โอรโส ปุตฺโต, อุรสิ สํวฑฺฒิตตฺตา, มิตฺเต ภวา เมตฺตา, เมตฺตี วา, ปุเร ภวา โปรี วาจา. 'भव' (होने) के अर्थ में - मन में होने वाला 'मानसं' सुख, यहाँ 'स' का आगम होता है। सरोवर में होने वाला 'सारसो' पक्षी, 'सारसा' पक्षी (स्त्री.), 'सारसं' पुष्प। उर (हृदय/छाती) में होने वाला 'ओरसो' पुत्र, उर में संवर्धित होने के कारण। मित्र में होने वाली 'मेत्ता' (मैत्री) या 'मेत्ती'। पुर (नगर) में होने वाली 'पोरी' वाणी। ชาตาทีสุ ปาวุเส ชาโต ปาวุโส เมโฆ, ปาวุสา รตฺติ, ปาวุสํ อพฺภํ, สรเท ชาโต สารโท มาโส, สารทา รตฺติ, สารทํ ปุปฺผํ. เอวํ สิสิโร, เหมนฺโต, วสนฺโต, วิมฺโห, มถุรายํ ชาโต มาถุโร ชโน, มาถุรา คณิกา, มาถุรํ วตฺถํ. มถุราย อาคโต มาถุโร, มถุรา อสฺส นิวาโสติ มาถุโร, มถุราย อิสฺสโร มาถุโร ราชา. ‘‘สพฺพโต โก’’ติ เอตฺถ ปุน สพฺพโตคฺคหเณน ตทฺธิตโตปิ กฺวจิ สสรกการาคโม, มาถุรโก วา, ราชคเห ชาโต, ราชคหา อาคโต, ราชคโห อสฺส นิวาโสติ วา, ราชคหสฺส อิสฺสโรติ วา ราชคโห, ราชคหโก วา. เอวํ สาคโล, สาคลโก วา, ปาฏลิปุตฺโต, ปาฏลิปุตฺตโก วา, เวสาลิยํ ชาโตติอาทิอตฺเถ เวสาโล, เวสาลโก วา, กุสินาเร ชาโต โกสินาโร, โกสินารโก วา. เอวํ สาเกโต, สาเกตโก วา, โกสมฺโพ, โกสมฺพโก วา, อินฺทปตฺโต, อินฺทปตฺตโก วา, กปิลฺโล, กปิลฺลโก วา, ภารุกจฺโฉ, ภารุกจฺฉโก วา, นคเร ชาโต, นครา อาคโต, นคเร วสตีติ วา นาคโร, นาครโก วา. เอวํ ชานปโท. 'जात' (उत्पन्न) आदि अर्थों में - प्रावृष् (वर्षा ऋतु) में उत्पन्न 'पावुसो' मेघ, 'पावुसा' रात्रि, 'पावुसं' अभ्र (बादल)। शरद में उत्पन्न 'सारदो' मास, 'सारदा' रात्रि, 'सारदं' पुष्प। इसी प्रकार सिसिरो, हेमन्तो, वसन्तो, विम्हो। मथुरा में उत्पन्न 'माथुरो' जन, 'माथुरा' गणिका, 'माथुरं' वस्त्र। मथुरा से आया हुआ 'माथुरो', मथुरा उसका निवास है इसलिए 'माथुरो', मथुरा का स्वामी 'माथुरो' राजा। 'सब्बतो को' यहाँ पुनः 'सब्बत' ग्रहण से तद्धित में भी कहीं-कहीं 'स' के साथ 'क' कार का आगम होता है, जैसे 'माथुरको'। राजगृह में उत्पन्न, राजगृह से आया हुआ, राजगृह उसका निवास है अथवा राजगृह का स्वामी है - 'राजगहो' या 'राजगहको'। इसी प्रकार 'सागलो' या 'सागलको', 'पाटलिपुत्तो' या 'पाटलिपुत्तको', वैशाली में उत्पन्न आदि अर्थों में 'वेसालो' या 'वेसालको', कुसीनारा में उत्पन्न 'कोसिनारो' या 'कोसिनारको'। इसी प्रकार साकेतो-साकेतको, कोसम्बो-कोसम्बको, इन्दपत्तो-इन्दपत्तको, कपिल्लो-कपिल्लको, भारुकच्छो-भारुकच्छको, नगर में उत्पन्न, नगर से आया हुआ या नगर में बसता है - 'नागरो' या 'नागरको'। इसी प्रकार 'जानपदो'। ชนปทนาเมสุ ปน สพฺพตฺถ พหุวจนเมว ภวติ. ยถา – องฺเคสุ ชาโต, องฺเคหิ อาคโต, องฺคา อสฺส นิวาโส, องฺคานํ อิสฺสโร วา องฺโค, องฺคโก วา, มาคโธ, มาคธโก วา, โกสโล, โกสลโก วา[Pg.229], เวเทโห, เวเทหโก วา, กมฺโพโช, กมฺโพชโก วา, คนฺธาโร, คนฺธารโก วา, โสวีโร, โสวีรโก วา, สินฺธโว, สินฺธวโก วา, อสฺสโก, กาลิงฺโค, ปญฺจาโล, สกฺโก, ตถา สุรฏฺเฐ ชาโต, สุรฏฺฐสฺส อิสฺสโร วา โสรฏฺโฐ, โสรฏฺฐโก วา. เอวํ มหารฏฺโฐ, มหารฏฺฐโก วา อิจฺจาทิ. जनपदों के नामों में तो सर्वत्र बहुवचन ही होता है। जैसे - अङ्गों (अङ्ग देश) में उत्पन्न, अङ्गों से आया हुआ, अङ्ग जिनका निवास है, अङ्गों का स्वामी - 'अङ्गो' या 'अङ्गको'। 'मागधो' या 'मागधको', 'कोसलो' या 'कोसलको', 'वेदेहो' या 'वेदेहको', 'कम्बोजो' या 'कम्बोजको', 'गन्धारो' या 'गन्धारको', 'सोवीरो' या 'सोवीरको', 'सिन्धवो' या 'सिन्धवको', 'अस्सको', 'कालिङ्गो', 'पञ्चालो', 'सक्को'। उसी प्रकार सुराष्ट्र में उत्पन्न, सुराष्ट्र का स्वामी - 'सोरट्ठो' या 'सोरट्ठको'। इसी प्रकार 'महाराट्ठो' या 'महाराट्ठको' इत्यादि। นกฺขตฺตโยเค กตฺติกาย ปุณฺณจนฺทยุตฺตาย ยุตฺโต มาโส กตฺติโก, มคสิเรน จนฺทยุตฺเตน นกฺขตฺเตน ยุตฺโต มาโส มาคสิโร. เอวํ ผุสฺเสน ยุตฺโต มาโส ผุสฺโส, มฆาย ยุตฺโต มาโส มาโฆ, ผคฺคุนิยา ยุตฺโต มาโส ผคฺคุโน, จิตฺตาย ยุตฺโต มาโส จิตฺโต, วิสาขาย ยุตฺโต มาโส เวสาโข, เชฏฺฐาย ยุตฺโต มาโส เชฏฺโฐ, อุตฺตราสาฬฺหาย ยุตฺโต มาโส อาสาฬฺโห, อาสาฬฺหี วา, สวเณน ยุตฺโต มาโส สาวโณ, สาวณี. ภทฺเทน ยุตฺโต มาโส ภทฺโท, อสฺสยุเชน ยุตฺโต มาโส อสฺสยุโช, พุทฺโธ อสฺส เทวตาติ พุทฺโธ. เอวํ โสคโต, มาหินฺโท, ยาโม, โสโม. नक्षत्र योग में - पूर्ण चन्द्रमा से युक्त कृत्तिका नक्षत्र से युक्त मास 'कत्तिको' (कार्तिक), चन्द्रमा से युक्त मृगशिरा नक्षत्र से युक्त मास 'मागसिरो' (मार्गशीर्ष)। इसी प्रकार पुष्य से युक्त मास 'फुस्सो', मघा से युक्त मास 'माघो', फाल्गुनी से युक्त मास 'फग्गुनो', चित्रा से युक्त मास 'चित्तो', विशाखा से युक्त मास 'वेसाखो', ज्येष्ठा से युक्त मास 'जेट्ठो', उत्तराषाढ़ा से युक्त मास 'आसाळ्हो' या 'आसाळ्ही', श्रवण से युक्त मास 'सावणो' या 'सावणी'। भाद्रपद से युक्त मास 'भद्दो', अश्वयुज से युक्त मास 'अस्सयुजो'। बुद्ध जिसके देवता हैं वह 'बुद्धो'। इसी प्रकार सोगतो, माहिन्दो, यामो, सोमो। พฺยากรณํ อเวจฺจาธีเต เวยฺยากรโณ. เอวํ โมหุตฺโต, เนมิตฺโต, องฺควิชฺโช, วตฺถุวิชฺโช. วสาตีนํ วิสโย เทโส วาสาโต, อุทุมฺพรา อสฺมึ ปเทเส สนฺตีติ โอทุมฺพโร เทโส. व्याकरण को जानकर पढ़ता है वह 'वेय्याकरणो' (वैयाकरण)। इसी प्रकार मोहुत्तो (मुहूर्तज्ञ), नेमित्तो (नैमित्तिक), अङ्गविज्जो (अङ्गविद्यावेत्ता), वत्थुविज्जो (वास्तुविद्यावेत्ता)। वसातों (एक प्रकार के लोग) का विषय देश 'वासातो'। उदुम्बर (गूलर) जिस प्रदेश में हैं वह 'ओदुम्बरो' देश। สหสฺเสน นิพฺพตฺตา สาหสฺสี ปริขา, ปยสา นิพฺพตฺตํ ปายาสํ, สหสฺสํ อรหตีติ สาหสฺสี คาถา, อยโส [Pg.230] วิกาโร อายโส. เอวํ โสวณฺโณ, ปุริโส ปริมาณมสฺสาติ โปริสํ อุทกํ. हजार से निर्मित 'साहस्सी' परिखा (खाई), पय (दूध) से निर्मित 'पायासं' (खीर), हजार के योग्य 'साहस्सी' गाथा, अयस (लोहे) का विकार 'आयसो'। इसी प्रकार सोवण्णो (सुवर्ण का विकार)। पुरुष जिसका परिमाण है वह 'पोरिसं' उदकं (पुरुष भर गहरा पानी)। จคฺคหเณน ตตฺถ ชาโต, ตตฺถ วสติ, ตสฺส หิตํ, ตํ อรหตีติอาทีสุ เณยฺยปฺปจฺจโย. พาราณสิยํ ชาโต, วสตีติ วา พาราณเสยฺยโก, ปุเร วิย กการาคโม. เอวํ จมฺเปยฺยโก, สาคเลยฺยโก, มิถิเลยฺยโก ชโน, คงฺเคยฺโย มจฺโฉ, สิลาย ชาตํ เสเลยฺยกํ, กุเล ชาโต โกเลยฺยโก สุนโข, วเน ชาตํ วาเนยฺยํ ปุปฺผํ. เอวํ ปพฺพเตยฺโย มานุโส, ปพฺพเตยฺยา นที, ปพฺพเตยฺยํ โอสธํ, ปถสฺส หิตํ ปาเถยฺยํ, สปติสฺส หิตํ สาปเตยฺยํ ธนํ, ปทีเปยฺยํ เตลํ, มาตุ หิตํ มตฺเตยฺยํ. เอวํ เปตฺเตยฺยํ. ทกฺขิณมรหตีติ ทกฺขิเณยฺโย อิจฺจาทิ. 'च' ग्रहण से 'वहाँ उत्पन्न', 'वहाँ बसता है', 'उसके लिए हितकारी', 'उसके योग्य है' आदि अर्थों में 'णेय्य' प्रत्यय होता है। वाराणसी में उत्पन्न या बसता है वह 'बाराणसेय्यको', पहले की तरह 'क' कार का आगम होता है। इसी प्रकार चम्पेय्यको, सागलेय्यको, मिथिलेय्यको जन, गङ्गा में होने वाली 'गङ्गेय्यो' मछली, शिला में उत्पन्न 'सेलेय्यकं', कुल में उत्पन्न 'कोलेय्यको' कुत्ता, वन में उत्पन्न 'वानेय्यं' पुष्प। इसी प्रकार पब्बतेय्यो (पर्वतीय) मनुष्य, पब्बतेय्या नदी, पब्बतेय्यं ओषधि। पथ (मार्ग) के लिए हितकारी 'पाथेय्यं' (पाथेय), स्व-पति (अपने स्वामी) के लिए हितकारी 'सापतेय्यं' धन, प्रदीप के लिए 'पदीपेय्यं' तेल, माता के लिए हितकारी 'मत्तेय्यं'। इसी प्रकार 'पेत्तेय्यं'। दक्षिणा के योग्य 'दक्खिणेय्यो' इत्यादि। ๓๗๘. ชาตาทีนมิมิยา จ. ३७८. 'जात' आदि अर्थों में 'इम' और 'इय' प्रत्यय भी होते हैं। ชาตอิจฺเจวมาทีนํ สทฺทานํ อตฺเถ อิม อิยอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ วา. 'जात' इत्यादि शब्दों के अर्थ में 'इम' और 'इय' ये प्रत्यय विकल्प से होते हैं। ปจฺฉา ชาโต ปจฺฉิโม, ปจฺฉิมา ชนตา, ปจฺฉิมํ จิตฺตํ, อนฺเต ชาโต อนฺติโม, อนฺติมา, อนฺติมํ. เอวํ มชฺฌิโม, ปุริโม, อุปริโม, เหฏฺฐิโม, ปจฺจนฺติโม, โคปฺผิโม, คนฺถิโม. पीछे उत्पन्न 'पच्छिमो' (पश्चिम/पिछला), 'पच्छिमा' जनता, 'पच्छिमं' चित्त। अन्त में उत्पन्न 'अन्तिमो', 'अन्तिमा', 'अन्तिमं'। इसी प्रकार मज्झिमो, पुरिमो, उपरिमो, हेट्ठिमो, पच्चन्तिमो, गोप्पिमो, गन्थिमो। ตถา [Pg.231] อิยปฺปจฺจเย มนุสฺสชาติยา ชาโต มนุสฺสชาติโย, มนุสฺสชาติยา, มนุสฺสชาติยํ. เอวํ อสฺสชาติโย, หตฺถิชาติโย, โพธิสตฺตชาติโย, ทพฺพชาติโย, สมานชาติโย, โลกิโย อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'इय' प्रत्यय में - मनुष्य जाति में उत्पन्न 'मनुस्सजातियो', 'मनुस्सजातिया', 'मनुस्सजातियं'। इसी प्रकार अस्सजातियो (अश्वजातीय), हत्थिजातियो (हस्तिजातीय), बोधिसत्तजातियो, दब्बजातियो, समानजातियो, लोकियो (लौकिक) इत्यादि। อาทิคฺคหเณน ตตฺถ นิยุตฺโต, ตทสฺส อตฺถิ, ตตฺถ ภโวติอาทีสฺวปิ อิม อิยปฺปจฺจยา โหนฺติ, จสทฺเทน อิกปฺปจฺจโย จ. อนฺเต นิยุตฺโต อนฺติโม, อนฺติโย, อนฺติโก, ปุตฺโต อสฺส อตฺถิ, ตสฺมึ วา วิชฺชตีติ ปุตฺติโม, ปุตฺติโย, วุตฺติโก, กปฺโป อสฺส อตฺถีติ กปฺปิโย, ชฏา อสฺส อตฺถีติ ชฏิโย, หานภาโค อสฺส อตฺถีติ หานภาคิโย. เอวํ ฐิติภาคิโย, โพธิสฺส ปกฺเข ภวา โพธิปกฺขิยา, ปญฺจวคฺเค ภวา ปญฺจวคฺคิยา. เอวํ ฉพฺพคฺคิยา, อุทริยํ, อตฺตโน อิทนฺติ อตฺตนิยํ, นการาคโม. ‘आदि’ शब्द के ग्रहण से ‘वहाँ नियुक्त’, ‘वह उसका है’, ‘वहाँ होने वाला’ इत्यादि अर्थों में भी ‘इम’ और ‘इय’ प्रत्यय होते हैं, और ‘च’ शब्द से ‘इक’ प्रत्यय भी होता है। जैसे—अन्त में नियुक्त ‘अन्तिमो’, ‘अन्तियो’, ‘अन्तिको’। पुत्र उसका है, या उसमें विद्यमान है—‘पुत्तिमो’, ‘पुत्तियो’, ‘वुत्तिको’। कल्प (उपयुक्त) उसका है—‘कप्पियो’। जटा उसकी है—‘जटियो’। हानि का भाग जिसका है—‘हानभागियो’। इसी प्रकार ‘ठितिभागियो’। बोधि के पक्ष में होने वाले—‘बोधिपक्खिया’। पाँच के वर्ग में होने वाले—‘पञ्चवग्गिया’। इसी प्रकार ‘छब्बग्गिया’। उदर में होने वाला—‘उदरियं’ (पेट का)। अपना यह है—‘अत्तलियं’ (यहाँ ‘न’ का आगम हुआ है)। จสทฺทคฺคหเณน กิย ยณฺยปฺปจฺจยา จ. ชาติยา นิยุตฺโต ชาติกิโย. เอวํ อนฺธกิโย, ชจฺจนฺเธ นิยุตฺโต ชจฺจนฺธกิโย. สสฺส อยนฺติ สกิโย. เอวํ ปรกิโย. ‘च’ शब्द के ग्रहण से ‘किय’, ‘य’ और ‘ण्य’ प्रत्यय भी होते हैं। जाति में नियुक्त—‘जातिकियो’। इसी प्रकार ‘अन्धकियो’। जन्मान्ध में नियुक्त—‘जच्चन्धकियो’। स्व (अपना) यह है—‘सकियो’। इसी प्रकार ‘परकियो’ (दूसरे का)। ยปฺปจฺจโย สาธุหิตภวชาตาทิอตฺเถสุ. ยถา – กมฺมนิ สาธุ กมฺมญฺญํ. สภายํ สาธุ สพฺภํ, ‘‘ยวตํ ตลนา’’ทินา อุการาทิ. เอวํ เมธาย หิตํ เมชฺฌํ ฆฏํ. ปาทานํ หิตํ ปชฺชํ เตลํ, รถสฺส หิตา รจฺฉา, คาเม ภโว คมฺโม[Pg.232], คเว ภวํ คพฺยํ, ‘‘โอสเร จา’’ติ สุตฺเต จสทฺเทน ยปฺปจฺจเย ปเรปิ อวาเทโส. กวิมฺหิ ภวํ กพฺยํ, ทิวิ ภวา ทิพฺยา, ถนโต ชาตํ ถญฺญํ, ธนาย สํวตฺตตีติ ธญฺญํ. ‘य’ प्रत्यय साधु (कुशल), हित, भव (होने वाला), जात (उत्पन्न) आदि अर्थों में होता है। जैसे—कर्म में कुशल ‘कम्मञ्ञं’। सभा में साधु ‘सब्भं’ (यहाँ ‘यवतं तलना’ आदि सूत्र से ‘उ’ कार का ‘अ’ कार आदि हुआ है)। इसी प्रकार मेधा के लिए हितकारी ‘मेज्झं’ (बुद्धि के लिए हितकर)। पैरों के लिए हितकारी ‘पज्जं’ (तेल)। रथ के लिए हितकारी ‘रच्छा’। ग्राम में होने वाला ‘गम्मो’। गौ (गाय) में होने वाला ‘गब्यं’ (यहाँ ‘ओसरे च’ सूत्र में ‘च’ शब्द से ‘य’ प्रत्यय परे होने पर भी ‘अव’ आदेश हुआ है)। कवि में होने वाला ‘कब्यं’। स्वर्ग (दिवि) में होने वाले ‘दिब्या’। स्तन से उत्पन्न ‘थञ्ञं’ (दूध)। धन के लिए जो संवर्तित (उपयोगी) हो—‘धञ्ञं’। ณฺยปฺปจฺจโย ปริสายํ สาธุ ปาริสชฺโช, ทการาคโม, สมณานํ หิตา สามญฺญา ชนา, พฺราหฺมณานํ หิตา พฺราหฺมญฺญา, อรูเป ภวา อารุปฺปา อิจฺจาทิ. ‘ण्य’ प्रत्यय: परिषद् (सभा) में साधु ‘पारिसज्जो’ (यहाँ ‘द’ कार का आगम हुआ है)। श्रमणों के लिए हितकारी ‘सामञ्ञा’ (जन)। ब्राह्मणों के लिए हितकारी ‘ब्राह्मञ्ञा’। अरूप लोक में होने वाले ‘आरुप्पा’ इत्यादि। ‘‘ราชปุตฺตานํ สมูโห’’ติ วิคฺคเห – ‘राजपुत्रों का समूह’—इस विग्रह में— ๓๗๙. สมูหตฺเถ กณณา. ३७९. समूह के अर्थ में ‘क’, ‘ण’ और ‘ण’ प्रत्यय होते हैं। ฉฏฺฐิยนฺตโต ‘‘เตสํ สมูโห’’ติ อตฺเถ กณณอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. ราชปุตฺตโก, ราชปุตฺตกํ วา, ราชปุตฺโต. เอวํ มานุสฺสโก, มานุสฺโส, มาถุรโก, มาถุโร, โปริสโก, โปริโส, วุทฺธานํ สมูโห วุทฺธโก, วุทฺโธ. เอวํ มายูรโก, มายูโร, กาโปโต, โกกิโล, มาหึสโก, มาหึโส, โอฏฺฐโก, โอรพฺภโก, อฏฺฐนฺนํ สมูโห อฏฺฐโก, ราชานํ สมูโห ราชโก, ภิกฺขานํ สมูโห ภิกฺโข, สิกฺขานํ สมูโห สิกฺโข, ทฺวินฺนํ สมูโห ทฺวยํ, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อิการสฺส อยาเทโส. เอวํ ติณฺณํ สมูโห ตยํ อิจฺจาทิ. षष्ठ्यन्त शब्द से ‘उनका समूह’ इस अर्थ में ‘क’, ‘ण’, ‘ण’ ये प्रत्यय होते हैं। जैसे—‘राजपुत्तको’, ‘राजपुत्तकं’ अथवा ‘राजपुत्तो’। इसी प्रकार ‘मानुस्सको’, ‘मानुस्सो’। मथुरा वालों का समूह ‘माथुरको’, ‘माथुरो’। पुरुषों का समूह ‘पोरिसको’, ‘पोरिसो’। वृद्धों का समूह ‘वुद्धको’, ‘वुद्धो’। इसी प्रकार ‘मायूरको’, ‘मायूरो’। कबूतरों का समूह ‘कापोतो’। कोकिलों का समूह ‘कोकिलो’। भैंसों का समूह ‘माहिंसको’, ‘माहिंसो’। ऊँटों का समूह ‘ओट्ठको’। भेड़ों का समूह ‘ओरब्भको’। आठ का समूह ‘अट्ठको’। राजाओं का समूह ‘राजको’। भिक्षुओं का समूह ‘भिक्खो’। शिष्यों का समूह ‘सिक्खो’। दो का समूह ‘द्वयं’ (यहाँ ‘तेसु वुद्धि’ आदि सूत्र से ‘इ’ कार का ‘अय’ आदेश हुआ है)। इसी प्रकार तीन का समूह ‘तयं’ इत्यादि। ‘‘สมูหตฺเถ’’ติ วตฺตเต. ‘समूह के अर्थ में’ यह पद अनुवृत्त होता है। ๓๘๐. คามชนพนฺธุสหายาทีหิ ตา. ३८०. ग्राम, जन, बन्धु, सहाय आदि शब्दों से ‘ता’ प्रत्यय होता है। คามชนพนฺธุสหายอิจฺเจวมาทีหิ ตาปจฺจโย โหติ สมูหตฺเถ. คามานํ สมูโห คามตา. เอวํ ชนตา, พนฺธุตา, สหายตา, นาครตา. ‘‘ตา’’ติ โยควิภาเคน สกตฺเถปิ เทโวเยว เทวตา, ตาปจฺจยนฺตสฺส นิจฺจมิตฺถิลิงฺคตา. ग्राम, जन, बन्धु, सहाय इत्यादि शब्दों से समूह के अर्थ में ‘ता’ प्रत्यय होता है। ग्रामों का समूह ‘गामता’। इसी प्रकार ‘जनता’, ‘बन्धुता’, ‘सहायता’, ‘नागरता’। ‘ता’ इस योग-विभाग से स्वार्थ (उसी अर्थ) में भी प्रत्यय होता है, जैसे—देव ही ‘देवता’ है। ‘ता’ प्रत्ययान्त शब्द नित्य स्त्रीलिंग होते हैं। ๓๘๑. ตทสฺส ฐานมิโย จ. ३८१. ‘वह उसका स्थान है’ इस अर्थ में ‘इय’ प्रत्यय और ‘च’ (से अन्य भी) होता है। ‘‘ตทสฺส ฐาน’’มิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ ฉฏฺฐิยนฺตโต อิยปฺปจฺจโย โหติ. มทนสฺส ฐานํ มทนิโย, มทนิยา, มทนิยํ, พนฺธนสฺส ฐานํ พนฺธนิยํ. เอวํ มุจฺฉนิยํ. รชนิยํ, คมนิยํ, ทสฺสนิยํ, อุปาทานิยํ, ปสาทนิยํ. จสทฺเทน หิตาทิอตฺเถปิ อุปาทานานํ หิตา อุปาทานิยา อิจฺจาทิ. ‘वह उसका स्थान है’ इस अर्थ में षष्ठ्यन्त शब्द से ‘इय’ प्रत्यय होता है। मद (मदहोशी/हर्ष) का स्थान ‘मदनीयो’, ‘मदनीया’, ‘मदनीयं’। बन्धन का स्थान ‘बन्धनीयं’। इसी प्रकार ‘मुच्छनीयं’। ‘रजनीयं’, ‘गमनीयं’, ‘दस्सनीयं’, ‘उपादानीयं’, ‘पसादनीयं’। ‘च’ शब्द से हित आदि अर्थों में भी प्रत्यय होता है, जैसे—उपादानों के लिए हितकारी ‘उपादानिया’ इत्यादि। ๓๘๒. อุปมตฺถายิตตฺตํ. ३८२. उपमा के अर्थ में ‘आयितत्त’ प्रत्यय होता है। อุปมตฺเถ อุปมาวาจิลิงฺคโต อายิตตฺตปฺปจฺจโย โหติ. ธูโม วิย ทิสฺสตีติ ธูมายิตตฺตํ. เอวํ ติมิรายิตตฺตํ. उपमा के अर्थ में उपमावाचक लिंग (शब्द) से ‘आयितत्त’ प्रत्यय होता है। धुएँ के समान दिखाई देता है—‘धूमायितत्तं’। इसी प्रकार ‘तिमिरायितत्तं’ (अन्धकार के समान)। ‘‘ตทสฺส ฐาน’’นฺติ วตฺตเต. ‘वह उसका स्थान है’ यह पद अनुवृत्त होता है। ๓๘๓. ตนฺนิสฺสิตตฺเถ โล. ३८३. उस पर आश्रित होने के अर्थ में ‘ल’ प्रत्यय होता है। ‘‘ตนฺนิสฺสิต’’นฺติ อตฺเถ, ‘‘ตทสฺสฐาน’’นฺติ อตฺเถ จ ลปฺปจฺจโย โหติ. ทุฏฺฐุ นิสฺสิตํ, ทุฏฺฐุ ฐานํ วา ทุฏฺฐุลฺลํ, ทุฏฺฐุลฺลา วาจา, ลสฺส ทฺวิภาโว. เอวํ เวทลฺลํ. ‘उस पर आश्रित’ इस अर्थ में और ‘वह उसका स्थान है’ इस अर्थ में ‘ल’ प्रत्यय होता है। जो बुरी तरह आश्रित हो या बुरा स्थान हो—‘दुट्ठुल्लं’, ‘दुट्ठुल्ला वाचा’ (यहाँ ‘ल’ का द्वित्व हुआ है)। इसी प्रकार ‘वेदल्लं’। ‘‘อภิชฺฌา [Pg.234] อสฺส ปกติ, อภิชฺฌา อสฺส พหุลา’’ติ วา วิคฺคเห – ‘अभिध्या (लोभ) उसकी प्रकृति है’ अथवा ‘अभिध्या उसमें बहुत है’—इस विग्रह में— ๓๘๔. อาลุ ตพฺพหุเล. ३८४. उसकी बहुलता के अर्थ में ‘आलु’ प्रत्यय होता है। ปฐมาวิภตฺยนฺตโต อาลุปฺปจฺจโย โหติ ‘‘ตทสฺส พหุล’’มิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ. อภิชฺฌาลุ, อภิชฺฌาลู, อภิชฺฌาลโว. เอวํ สีตาลุ, ธชาลุ, ทยาลุ. ‘‘สพฺพโต โก’’ติ เอตฺถ ปุน สพฺพโตคฺคหเณน กการาคโม, อภิชฺฌาลุโก, อภิชฺฌาลุกา, อภิชฺฌาลุกํ. เอวํ สีตาลุโก, ทยาลุโก, ตถา หีโนว หีนโก. เอวํ โปตโก, กุมารโก, มาณวโก, มุทุโก, อุชุโก, อปฺปมตฺตกํ, โอรมตฺตกํ, สีลมตฺตกํ อิจฺจาทิ. प्रथमा विभक्ति अन्त वाले शब्द से ‘वह उसमें बहुत है’ इस अर्थ में ‘आलु’ प्रत्यय होता है। जैसे—‘अभिज्झालु’, ‘अभिज्झालू’, ‘अभिज्झालवो’। इसी प्रकार ‘सीतालु’, ‘धजालु’, ‘दयालु’। ‘सब्बतो को’ यहाँ पुनः ‘सब्बतो’ ग्रहण करने से ‘क’ कार का आगम होता है—‘अभिज्झालुको’, ‘अभिज्झालुका’, ‘अभिज्झालुकं’। इसी प्रकार ‘सीतालुको’, ‘दयालुको’। वैसे ही हीन ही ‘हीनको’ है। इसी प्रकार ‘पोतको’, ‘कुमारको’, ‘माणवको’, ‘मुदुको’, ‘उजुको’, ‘अप्पमत्तकं’, ‘ओरमत्तकं’, ‘सीलमतकं’ इत्यादि। ‘‘ยทนุปปนฺนา นิปาตนา สิชฺฌนฺตี’’ติ อิมินา ปฏิภาคกุจฺฉิตสญฺญานุกมฺปาทิอตฺเถสุ กปฺปจฺจโย. ปฏิภาคตฺเถ หตฺถิโน อิว หตฺถิกา. เอวํ อสฺสกา. กุจฺฉิตตฺเถ กุจฺฉิโต สมโณ สมณโก. เอวํ พฺราหฺมณโก, มุณฺฑโก, ปณฺฑิตโก, เวยฺยากรณโก. สญฺญายํ กตโก, ภฏโก. อนุกมฺปายํ ปุตฺตโก. ‘जो सिद्ध नहीं हुए वे निपातन से सिद्ध होते हैं’—इस नियम से सादृश्य, कुत्सित (निन्दित), संज्ञा और अनुकम्पा आदि अर्थों में ‘क’ प्रत्यय होता है। सादृश्य के अर्थ में—हाथी के समान ‘हत्थिका’। इसी प्रकार ‘अस्सका’ (घोड़े के समान)। कुत्सित अर्थ में—कुत्सित श्रमण ‘समणको’। इसी प्रकार ‘ब्राह्मणको’, ‘मुण्डको’, ‘पण्डितको’, ‘वेय्याकरणको’। संज्ञा के अर्थ में—‘कतको’, ‘भटको’। अनुकम्पा के अर्थ में—‘पुत्तको’ (प्यारा पुत्र)। ตถา กึยเตตโต ปริมาณตฺเถ ตฺตกวนฺตุปฺปจฺจยา. กึ ปริมาณมสฺสาติ กิตฺตกํ. เอวํ ยตฺตกํ, ตตฺตกํ, เอตฺตกํ. วนฺตุมฺหิ อาตฺตญฺจ, ยํ ปริมาณมสฺสาติ ยาวา, ยาวนฺโต[Pg.235], คุณวนฺตุสมํ. เอวํ ตาวา, ตาวนฺโต. เอตาวา, เอตาวนฺโต อิจฺจาทิ. उसी प्रकार ‘किं’, ‘य’, ‘त’, ‘एत’ शब्दों से परिमाण (मात्रा) के अर्थ में ‘त्तक’ और ‘वन्तु’ प्रत्यय होते हैं। इसका कितना परिमाण है—‘कित्तकं’। इसी प्रकार ‘यत्तकं’, ‘तत्तकं’, ‘एत्तकं’। ‘वन्तु’ प्रत्यय होने पर ‘आ’ कार आदेश भी होता है, जैसे—जिसका जितना परिमाण है ‘यावा’, ‘यावन्तो’ (गुणवन्तु के समान)। इसी प्रकार ‘तावा’, ‘तावन्तो’। ‘एतावा’, ‘एतावन्तो’ इत्यादि। ‘‘สุวณฺเณน ปกต’’นฺติ วิคฺคเห – ‘सुवर्ण (सोने) से बना हुआ’—इस विग्रह में— ๓๘๕. ตปฺปกติวจเน มโย. ३८५. उसकी प्रकृति (मूल पदार्थ) को बताने के लिए ‘मय’ प्रत्यय होता है। ตปฺปกติวจนตฺเถ มยปฺปจฺจโย โหติ, ปกรียตีติ ปกติ, เตน ปกติ ตปฺปกติ, ตปฺปกติยา วจนํ กถนํ ตปฺปกติวจนํ. สุวณฺณมโย รโถ, โสวณฺณมโย วา, สุวณฺณมยา ภาชนวิกติ, สุวณฺณมยํ ภาชนํ. เอวํ รูปิยมยํ, รชตมยํ, ชตุมยํ, ทารุมยํ, มตฺติกามยํ, อิทฺธิยา นิพฺพตฺตํ อิทฺธิมยํ. उसकी प्रकृति को कहने के अर्थ में ‘मय’ प्रत्यय होता है। जिससे बनाया जाता है वह ‘प्रकृति’ है, उस प्रकृति का कथन ‘तप्पकतिवचन’ है। सोने से बना रथ ‘सुवण्णमयो रथो’ अथवा ‘सोवण्णमयो’। सोने से बनी पात्र की विकृति ‘सुवण्णमया भाजनविकति’। सोने से बना पात्र ‘सुवण्णमयं भाजनं’। इसी प्रकार ‘रूपियमयं’ (चाँदी का), ‘रजतमयं’, ‘जतुमयं’ (लाख का), ‘दारुमयं’ (लकड़ी का), ‘मत्तिकामयं’ (मिट्टी का)। ऋद्धि से निष्पन्न ‘इद्धिमयं’। มนโต นิปฺผนฺนา มโนมยา, อยสาปกตํ อโยมยํ. เอตฺถ จ ‘‘มโนคณาทีน’’นฺติ วตฺตมาเน – मन से उत्पन्न 'मनोमय' है, लोहे से बना 'अयोमय' है। और यहाँ 'मनोगणादीनम्' (सूत्र) की अनुवृत्ति होने पर - ๓๘๖. เอเตสโม โลเป. ३८६. एतेसमो लोपे (इनका लोप होने पर 'ओ' होता है)। เอเตสํ มโนคณาทีนํ อนฺโต โอตฺตมาปชฺชเต วิภตฺติโลเป กเตติ โอกาโร. इन मनोगण आदि शब्दों का अन्त्य वर्ण विभक्ति का लोप होने पर 'ओ' भाव को प्राप्त होता है, इस प्रकार 'ओकार' होता है। คเวน ปกตํ กรีสํ, โคโต นิพฺพตฺตนฺติ วา โคมยํ. ‘‘มโย’’ติโยควิภาเคน สกตฺเถปิ ทานเมว ทานมยํ, สีลมยํ อิจฺจาทิ. गाय से बना हुआ गोबर, अथवा गाय से उत्पन्न 'गोमय' है। 'मयो' इस योग-विभाग के द्वारा स्वार्थ (उसी अर्थ) में भी (प्रत्यय होता है), जैसे दान ही 'दानमय' है, शील ही 'शीलमय' है इत्यादि। สํสฏฺฐาทิอเนกตฺถตทฺธิตํ. संसृष्ट (मिश्रित) आदि अनेक अर्थों वाला तद्धित। ภาวตทฺธิต भाव तद्धित। ‘‘อลสสฺส [Pg.236] ภาโว’’ติ วิคฺคเห – 'अलसस्य भावः' (आलसी का भाव) इस विग्रह में - ๓๘๗. ณฺยตฺตตา ภาเว ตุ. ३८७. णय, त्त और ता (प्रत्यय) भाव अर्थ में होते हैं। ฉฏฺฐิยนฺตโต ณฺยตฺตตาอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ ‘‘ตสฺส ภาโว’’ อิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ, ตุสทฺทคฺคหเณน ตฺตนเณยฺยาทิปฺปจฺจยา จ. ภวนฺติ เอตสฺมา พุทฺธิสทฺทา อิติ ภาโว, สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตํ วุจฺจติ, วุตฺตญฺจ – ‘‘ยสฺส คุณสฺส หิ ภาวา ทพฺเพ สทฺทนิเวโส ตทภิธาเนณฺยตฺตตาทโย’’ติ. ณฺยตฺตตฺตนนฺตานํ นิจฺจํ นปุํสกตฺตํ, ตาปจฺจยนฺตสฺส สภาวโต นิจฺจมิตฺถิลิงฺคตา. ณฺยปฺปจฺจโยยํ คุณวจเน พฺราหฺมณาทีหิ, ตตฺถ ‘‘อวณฺโณ เย โลปญฺจา’’ติ อวณฺณโลโป, อาทิวุทฺธิ. षष्ठी विभक्ति अन्त वाले शब्दों से 'तस्य भावः' (उसका भाव) इस अर्थ में 'णय', 'त्त' और 'ता' ये प्रत्यय होते हैं; 'तु' शब्द के ग्रहण से 'त्तन', 'णेय्य' आदि प्रत्यय भी होते हैं। जिससे बुद्धि और शब्द उत्पन्न होते हैं वह 'भाव' है, इसे शब्द की प्रवृत्ति का निमित्त कहा जाता है। कहा भी गया है - 'जिस गुण के होने से द्रव्य में शब्द का निवेश (प्रयोग) होता है, उसके कथन में णय, त्त, ता आदि प्रत्यय होते हैं।' णय, त्त और त्तन प्रत्ययान्त शब्द नित्य नपुंसक लिंग होते हैं, और ता प्रत्ययान्त शब्द स्वभाव से नित्य स्त्रीलिंग होते हैं। यह णय प्रत्यय गुणवाचक ब्राह्मण आदि शब्दों से होता है, वहाँ 'अवण्णो ये लोपञ्चा' सूत्र से 'अ' वर्ण का लोप और आदि-वृद्धि होती है। อาลสฺยํ. เอวํ อาโรคฺยํ, อุทคฺคสฺส ภาโว โอทคฺยํ, สขิโน ภาโว สขฺยํ, อณณสฺส ภาโว อาณณฺยํ, วิธวาย ภาโว เวธพฺยํ, ทุพฺพลสฺส ภาโว ทุพฺพลฺยํ, จปลสฺส ภาโว จาปลฺยํ. आलस्य। इसी प्रकार आरोग्य, उदग्र का भाव 'ओदग्य' (उल्लास), सखा का भाव 'सख्य', अनृण (ऋणमुक्त) का भाव 'आणण्य', विधवा का भाव 'वैधव्य', दुर्बल का भाव 'दौर्बल्य', चपल का भाव 'चापल्य'। วิยตฺตสฺส ภาโว เวยฺยตฺติยํ, มจฺฉรสฺส ภาโว มจฺฉริยํ. เอวํ อิสฺสริยํ, อาลสิยํ, มุณฺฑิยํ, มูฬฺหิยํ. เอตฺถ ‘‘เวยฺยตฺติย’’นฺติอาทีสุ ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา ยมฺหิ อิการาคโม. व्यक्त (निपुण) का भाव 'वैयत्त्य' (वेय्यत्तियं), मत्सर का भाव 'मात्सर्य' (मच्छरियं)। इसी प्रकार ऐश्वर्य (इस्सरियं), आलस्य (आलसियं), मुण्डत्व (मुण्डियं), मूढ़ता (मूळ्हियं)। यहाँ 'वैयत्त्य' आदि में 'तेसु वुद्धि' आदि सूत्र से 'य' परे होने पर इकार का आगम होता है। ‘‘ปณฺฑิตสฺส ภาโว ปณฺฑิตฺย’’นฺติอาทีสุ ‘‘ยวตํ ตลนทการานํ พฺยญฺชนานิ จลญชการตฺต’’นฺติ ตฺยการสํโยคาทีนํ จลญชการาเทสา[Pg.237], ทฺวิตฺตํ. ปณฺฑิจฺจํ, พหุสฺสุตสฺส ภาโว พาหุสฺสจฺจํ, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อุการสฺส อกาโร, เอวํ โปโรหิจฺจํ, อธิปติสฺส ภาโว อาธิปจฺจํ, มุฏฺฐสฺสติสฺส ภาโว มุฏฺฐสฺสจฺจํ, อิวณฺณโลโป. กุสลสฺส ภาโว โกสลฺลํ. เอวํ เวปุลฺลํ, สมานานํ ภาโว สามญฺญํ, คิลานสฺส ภาโว เคลญฺญํ, ‘‘กฺวจาทิมชฺฌุตฺตรา’’ทิสุตฺเตน สํโยเค ปเร รสฺสตฺตํ. 'पण्डितस्य भावः पाण्डित्यम्' आदि में 'यवतं तलनादकारानं...' सूत्र से 'त्य' कार संयोग आदि के स्थान पर 'च, ल, ञ, ज' आदेश और द्वित्व होता है। (जैसे) पाण्डित्य (पण्डिच्चं), बहुश्रुत का भाव 'बाहुश्रुत्य' (बाहुस्सच्चं), 'तेसु वुद्धि' आदि सूत्र से उकार का अकार होता है, इसी प्रकार पुरोहित का भाव 'पौरोहित्य' (पोरोहिच्चं), अधिपति का भाव 'आधिपत्य' (आधिपच्चं), मुष्टस्मृति (विस्मृति) का भाव 'मुष्टस्मृत्य' (मुट्ठस्सच्चं), यहाँ इ-वर्ण का लोप होता है। कुशल का भाव 'कौशल' (कोसल्लं)। इसी प्रकार 'वैपुल्य' (वेपुल्लं), समानों का भाव 'सामन्य' (सामञ्ञं), ग्लान (रोगी) का भाव 'ग्लान्य' (गेलञ्ञं), 'क्वचादिमज्झुत्तरा' आदि सूत्र से संयोग परे होने पर ह्रस्व होता है। สุหทสฺส ภาโวโสหชฺชํ. เอวํ เวสารชฺชํ, กุสีทสฺสภาโวโกสชฺชํ, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อีการสฺส อกาโร. ตถา ‘‘ปุริสสฺส ภาโว โปริส’’นฺติอาทีสุ ‘‘ยวตํ ตลนา’’ทิสุตฺเต การคฺคหเณน ยวตํ สการกจฏปวคฺคานํ สการกจฏปวคฺคาเทสา. สุมนสฺส ภาโว โสมนสฺสํ. เอวํ โทมนสฺสํ, โสวจสฺสํ, โทวจสฺสํ, เอตฺถ สการาคโม. ตถา นิปกสฺส ภาโว เนปกฺกํ, ทฺวิตฺตํ. เอวํ อาธิกฺกํ, ทุภคสฺส ภาโว โทภคฺคํ, วาณิชสฺส ภาโว วาณิชฺชํ, ราชิโน ภาโว รชฺชํ, ‘‘กฺวจา’’ทินา รสฺสตฺตํ. สรูปสฺส ภาโว สารุปฺปํ. เอวํ โอปมฺมํ, โสขุมฺมํ. सुहृद का भाव 'सौहार्द' (सोहज्जं)। इसी प्रकार 'वैशारद्य' (वेसारज्जं), कुसीद (आलसी) का भाव 'कौसीद्य' (कोसज्जं), 'तेसु वुद्धि' आदि सूत्र से ईकार का अकार होता है। तथा 'पुरुषस्य भावः पौरुषम्' आदि में 'यवतं तलना...' सूत्र में 'क' कार के ग्रहण से 'य' परे होने पर 'स, क, च, ट, प' वर्गों के स्थान पर 'स, क, च, ट, प' आदेश होते हैं। सुमन का भाव 'सौमनस्य' (सोमनस्सं)। इसी प्रकार 'दौर्मनस्य' (दोमनस्सं), 'सुवचस्य' (सोवचस्सं), 'दुर्वचस्य' (दोवचस्सं), यहाँ सकार का आगम होता है। तथा निपुण (निपक) का भाव 'नैपुण्य' (नेपक्कं), द्वित्व होता है। इसी प्रकार 'आधिक्य' (आधिक्कं), दुर्भाग्य का भाव 'दौर्भाग्य' (दोभग्गं), वणिज का भाव 'वाणिज्य' (वाणिज्जं), राजा का भाव 'राज्य' (रज्जं), 'क्वचा' आदि सूत्र से ह्रस्व होता है। सरूप का भाव 'सारूप्य' (सारुप्पं)। इसी प्रकार 'औपम्य' (ओपम्मं), 'सौक्ष्म्य' (सोखुम्मं)। ตถสฺส ภาโว ตจฺฉํ, ทุมฺเมธสฺส ภาโว ทุมฺเมชฺฌํ, สมณสฺส ภาโว สามญฺญํ. เอวํ พฺราหฺมญฺญํ, นิปุณสฺส ภาโว เนปุญฺญํ. ‘‘ตจฺฉ’’นฺติอาทีสุปิ การคฺคหเณเนว ยวตํ ถธณการานํ ฉฌญการาเทสา. तथ्य का भाव 'तथ्य' (तच्छं), दुर्मेध का भाव 'दुर्मेध्य' (दुम्मेज्झं), श्रमण का भाव 'श्रामण्य' (सामञ्ञं)। इसी प्रकार 'ब्राह्मण्य' (ब्राह्मण्ञं), निपुण का भाव 'नैपुण्य' (नेपुञ्ञं)। 'तच्छं' आदि में भी 'क' कार के ग्रहण से ही 'य' परे होने पर 'थ, ध, ण' कारों के स्थान पर 'छ, झ, ञ' कार आदेश होते हैं। ตฺตตาปจฺจเยสุ [Pg.238]– ปํสุกูลิกสฺส ภาโว ปํสุกูลิกตฺตํ, ปํสุกูลิกตา. เอวํ เตจีวริกตฺตํ, เตจีวริกตา, โอทริกตฺตํ, โอทริกตา, มนุสฺสตฺตํ, มนุสฺสตา ชาติ, นีลตฺตํ, นีลตา คุโณ, ยาจกตฺตํ, ยาจกตา กฺริยา, ทณฺฑิตฺตํ, ทณฺฑิตา ทพฺพํ, สจฺจวาทิตา, ปารมิตา, กตญฺญุตา, สพฺพญฺญุตา, ‘‘กฺวจา’’ทินา ตาปจฺจเย รสฺสตฺตํ, อปฺปิจฺฉตา, อสํสคฺคตา, ภสฺสารามตา, นิทฺทารามตา, ลหุตา อิจฺจาทิ. 'त्त' और 'ता' प्रत्ययों में - पांशुकूलिक का भाव 'पांशुकूलिकत्व' (पंसुकूलिकत्तं), 'पांशुकूलिकता'। इसी प्रकार 'त्रैचीवरिकत्व', 'त्रैचीवरिकता', 'औदरिकत्व', 'औदरिकता', 'मनुष्यत्व', 'मनुष्यता' (जाति), 'नीलत्व', 'नीलता' (गुण), 'याचकत्व', 'याचकता' (क्रिया), 'दण्डित्व', 'दण्डिता' (द्रव्य), 'सत्यवादिता', 'पारमिता', 'कृतज्ञता', 'सर्वज्ञता', 'क्वचा' आदि सूत्र से 'ता' प्रत्यय होने पर ह्रस्व होता है, (जैसे) 'अल्पेच्छता', 'असंसर्गता', 'भष्यारामता' (बातचीत में रमना), 'निद्रारामता', 'लघुता' इत्यादि। ตฺตนปจฺจเย – ปุถุชฺชนสฺส ภาโว ปุถุชฺชนตฺตนํ, เวทนตฺตนํ, ชายตฺตนํ. 'त्तन' प्रत्यय में - पृथग्जन का भाव 'पृथग्जनत्व' (पुथुज्जनत्तनं), 'वेदनत्व' (वेदनत्तनं), 'जायात्व' (जायत्तनं)। เณยฺเย – สุจิสฺส ภาโว โสเจยฺยํ. เอวํ อาธิปเภยฺยํ, กวิสฺส ภาโวกาเวยฺยํ, เถนสฺส ภาโว เถยฺยํ, มหาวุตฺตินา นการสฺส โลโป. 'णेय्य' प्रत्यय में - शुचि का भाव 'शौचेय' (सोचेय्यं)। इसी प्रकार 'आधिपत्य' (आधिपभेय्यं), कवि का भाव 'काव्य' (कावेय्यं), स्तेन (चोर) का भाव 'स्तेय' (थेय्यं), महावृत्ति के अनुसार 'न' कार का लोप होता है। ‘‘ณฺยตฺตตา’’ติ โยควิภาเคน กมฺมนิ, สกตฺเถ จ ณฺยาทโย, วีรานํ ภาโว, กมฺมํ วา วีริยํ, ปริภฏสฺส กมฺมํ ปาริภฏฺยํ, ปาริภฏฺยสฺส ภาโว ปาริภฏฺยตา. เอวํ โสวจสฺสตา, ภิสคฺคสฺส กมฺมํ เภสชฺชํ, พฺยาวฏสฺส กมฺมํ เวยฺยาวจฺจํ, สฐสฺส ภาโว, กมฺมํ วา สาเฐยฺยํ. 'णय, त्त, ता' इस योग-विभाग के द्वारा 'कर्म' और 'स्वार्थ' में भी 'णय' आदि प्रत्यय होते हैं; वीरों का भाव या कर्म 'वीर्य' (वीरियं), परिभृत (सेवक) का कर्म 'पारिभृत्य' (पारिभट्यं), 'पारिभृत्य' का भाव 'पारिभृत्यता'। इसी प्रकार 'सुवचस्यता', भिषक् (वैद्य) का कर्म 'भेषज' (भेसज्जं), व्यावृत्त (लगे हुए) का कर्म 'वैयावृत्य' (वेय्यावच्चं), शठ का भाव या कर्म 'शाठ्य' (साठेय्यं)। สกตฺเถ ปน – ยถาภูตเมว ยถาภุจฺจํ, กรุณาเยว การุญฺญํ, ปตฺตกาลเมว ปตฺตกลฺลํ, อากาสานนฺตเมว [Pg.239] อากาสานญฺจํ, กายปาคุญฺญเมว กายปาคุญฺญตา อิจฺจาทิ. और स्वार्थ (उसी अर्थ) में - यथाभूत ही 'यथाभूत' (यथाभुच्चं), करुणा ही 'कारुण्य' (कारुञ्ञं), प्राप्तकाल ही 'प्राप्तकाल' (पत्तकल्लं), आकाशानन्त्य ही 'आकाशानन्त्य' (आकासानञ्चं), काय-प्रागुण्य ही 'काय-प्रागुण्य' (कायपागुञ्ञता) इत्यादि। ‘‘วิสมสฺส ภาโว’’ติ วิคฺคเห – 'विषमस्य भावः' (विषमता) इस विग्रह में - ‘‘ตฺตตา, ภาเว’’ติ จ วตฺตเต. 'त्त, ता' और 'भाव' (इन पदों) की अनुवृत्ति होती है। ๓๘๘. ณ วิสมาทีหิ. ३८८. विषम आदि शब्दों से 'ण' प्रत्यय होता है। วิสมอิจฺเจวมาทีหิ ฉฏฺฐิยนฺเตหิ ณปฺปจฺจโย โหติ, ตฺต ตา จ ‘‘ตสฺส ภาโว’’ อิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ. อากติคโณยํ. เวสมํ, วิสมตฺตํ, วิสมตา. สุจิสฺส ภาโว โสจํ, สุจิตฺตํ, สุจิตา, ครุโน ภาโว คารโว, อาทิวุทฺธิ, ‘‘โอ สเร จา’’ติ สุตฺเต จสทฺทคฺคหเณน อุการสฺส จ อวาเทโส. ปฏุโน ภาโว ปาฏวํ, ปฏุตฺตํ, ปฏุตา. विषम आदि षष्ठी विभक्ति अन्त वाले शब्दों से 'तस्य भावः' इस अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, और 'त्त', 'ता' भी होते हैं। यह आकृतिगण है। (जैसे) वैषम्य (वेसमं), विषमत्व, विषमता। शुचि का भाव 'शौच' (सोचं), शुचित्व, शुचिता। गुरु का भाव 'गौरव' (गारवो), आदि-वृद्धि होती है, 'ओ सरे च' सूत्र में 'च' शब्द के ग्रहण से उकार का 'अव' आदेश होता है। पटु का भाव 'पाटव' (पाटवं), पटुत्व, पटुता। อุชุโน ภาโว อชฺชวํ, มุทุโน ภาโว มทฺทวํ อิจฺจตฺร ‘‘อาตฺตญฺจา’’ติ ณมฺหิ อิการุการานํ อาตฺตํ, ทฺวิภาโว, สํโยเค อาทิรสฺสตฺตญฺจ. อุชุตา, มุทุตา. เอวํ อิสิสฺส ภาโว อาริสฺยํ, อาสภํ, กุมารสฺส ภาโวโกมารํ, ยุวสฺส ภาโว โยพฺพนํ, มหาวุตฺตินา นการาคโม, ปรมานํ ภาโว, กมฺมํ วา ปารมี ทานาทิกฺริยา, ‘‘ณวณิกา’’ทิสุตฺเตน อีปจฺจโย, สมคฺคานํ ภาโว สามคฺคี. ऋजु का भाव आर्जव है, मृदु का भाव मार्दव है। यहाँ 'आत्तञ्चा' सूत्र से 'ण' प्रत्यय होने पर 'इ' और 'उ' के स्थान पर 'आ' आदेश, द्वित्व और संयोग होने पर आदि-ह्रस्व होता है। ऋजुता, मृदुता। इसी प्रकार ऋषि का भाव आर्ष, ऋषभ का भाव आर्षभ, कुमार का भाव कौमार्य, युवा का भाव यौवन, महावृत्ति के अनुसार 'न' का आगम होता है। परमों का भाव या कर्म पारमी (दान आदि क्रिया) है, 'णवणिका' आदि सूत्र से 'ई' प्रत्यय होकर, समग्रों का भाव सामग्गी है। ๓๘๙. รมณียาทิโต กณ. ३८९. रमणीय आदि शब्दों से 'कण' प्रत्यय होता है। รมณียอิจฺเจวมาทิโต กณปจฺจโย โหติ, ตฺต ตา จ ภาวตฺเถ. รมณียสฺส ภาโว รามณียกํ, รมณียตฺตํ, รมณียตา[Pg.240]. เอวํ มานุญฺญกํ, มนุญฺญตฺตํ, มนุญฺญตา, ปิยรูปกํ, ปิยรูปตฺตํ, ปิยรูปตา, กลฺยาณกํ, กลฺยาณตฺตํ, กลฺยาณตา, โจรกํ, โจริกา วา, โจรตฺตํ, โจรตา, อฑฺฒกํ, อฑฺฒตฺตํ, อฑฺฒตา อิจฺจาทิ. रमणीय आदि शब्दों से भाव अर्थ में 'कण' प्रत्यय होता है, और 'त्त' तथा 'ता' भी होते हैं। रमणीय का भाव रामणीयकम, रमणीयत्तं, रमणीयता है। इसी प्रकार मानुञ्ञकं, मनुञ्ञत्तं, मनुञ्ञता; पियरूपकं, पियरूपत्तं, पियरूपता; कल्याणकं, कल्याणत्तं, कल्याणता; चोरकं या चोरिका, चोरत्तं, चोरता; अढकं, अढत्तं, अढता इत्यादि। ภาวตทฺธิตํ. भाव तद्धित। วิเสสตทฺธิต विशेष तद्धित। ‘‘สพฺเพ อิเม ปาปา อยมิเมสํ วิเสเสน ปาโป’’ติ วิคฺคเห – "ये सभी पापी हैं, यह इनमें विशेष रूप से पापी है" - इस विग्रह में — ๓๙๐. วิเสเส ตรตมิสิกิยิฏฺฐา. ३९०. विशेष अर्थ में 'तर', 'तम', 'इसिक', 'इय', 'इट्ठ' ये प्रत्यय होते हैं। วิเสสตฺเถ ตร ตม อิสิก อิย อิฏฺฐอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. ปาปตโร, ปาปตรา, ปาปตรํ. ตโตปิ อธิโก ปาปตโม, ปาปตมา, ปาปตมํ. ปาปิสิโก, ปาปิสิกา, ปาปิสิกํ. ปาปิโย, ปาปิยา, ปาปิยํ. ปาปิฏฺโฐ, ปาปิฏฺฐา, ปาปิฏฺฐํ. อติสเยน ปาปิฏฺโฐ, ปาปิฏฺฐตโร. เอวํ ปฏุตโร, ปฏุตโม, ปฏิสิโก, ปฏิโย, ปฏิฏฺโฐ. สพฺเพสํ อติสเยน วโร วรตโร, วรตโม, วริสิโก, วริโย, วริฏฺโฐ. เอวํ ปณีตตโร, ปณีตตโม. विशेष अर्थ में तर, तम, इसिक, इय, इट्ठ ये प्रत्यय होते हैं। पापतरो, पापतरा, पापतं। उससे भी अधिक पापतमो, पापतमा, पापतं। पापिसिको, पापिसिका, पापिसिकं। पापियो, पापिया, पापियं। पापिठ्ठो, पापिठ्ठा, पापिठ्ठं। अतिशय रूप से पापिठ्ठो, पापिठ्ठतरो। इसी प्रकार पटुतरो, पटुतमो, पटिसिको, पटियो, पटिठ्ठो। सबमें अतिशय रूप से वर (श्रेष्ठ) वरतरो, वरतमो, वरिसिको, वरियो, वरिठ्ठो। इसी प्रकार पणीततरो, पणीततमो। ‘‘สพฺเพ อิเม วุฑฺฒา อยมิเมสํ วิเสเสน วุฑฺโฒ’’ติ อตฺเถ อิยอิฏฺฐปฺปจฺจยา โหนฺติ. "ये सभी वृद्ध हैं, यह इनमें विशेष रूप से वृद्ध है" इस अर्थ में 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्यय होते हैं। ๓๙๑. วุฑฺฒสฺส [Pg.241] โช อิยิฏฺเฐสุ. ३९१. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर 'वुद्ध' शब्द के स्थान पर 'जो' आदेश होता है। สพฺพสฺเสว วุฑฺฒสทฺทสฺส โช โหติ อิย อิฏฺฐอิจฺเจเตสุ ปจฺจเยสุ. เชยฺโย, เชฏฺโฐ, เอตฺถ จ ‘‘สรโลปาทิ’’สุตฺเต ตุคฺคหเณน โลปมกตฺวา ‘‘สรา สเร โลป’’นฺติ ปุพฺพสเร ลุตฺเต ‘‘กฺวจาสวณฺณํ ลุตฺเต’’ติ เอกาโร. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर सम्पूर्ण 'वुद्ध' शब्द के स्थान पर 'जो' होता है। जेय्यो, जेट्ठो; यहाँ 'सरलोपादि' सूत्र में 'तु' ग्रहण से लोप न करके 'सरा सरे लोपं' से पूर्व स्वर का लोप होने पर 'क्वचासवण्णं लुत्ते' से एकार होता है। ‘‘อิยิฏฺเฐสู’’ติ อธิกาโร, ‘‘โช’’ติ จ วตฺตเต. 'इयिट्ठेसु' यह अधिकार है, और 'जो' की अनुवृत्ति होती है। ๓๙๒. ปสตฺถสฺส โส จ. ३९२. 'पसत्थ' (प्रशस्त) शब्द के स्थान पर 'स' आदेश होता है, और 'जो' भी होता है। สพฺพสฺเสว ปสตฺถสทฺทสฺส สาเทโส โหติ, โช จ อิยิฏฺเฐสุ. อยญฺจ ปสตฺโถ อยญฺจ ปสตฺโถ สพฺเพ อิเม ปสตฺถา อยมิเมสํ วิเสเสน ปสตฺโถติ เสยฺโย, เสฏฺโฐ, เชยฺโย, เชฏฺโฐ. सम्पूर्ण 'पसत्थ' शब्द के स्थान पर 'सा' आदेश होता है, और 'इय', 'इट्ठ' के परे होने पर 'जो' भी होता है। "यह भी प्रशस्त है और यह भी प्रशस्त है, ये सभी प्रशस्त हैं, यह इनमें विशेष रूप से प्रशस्त है" - इस अर्थ में सेय्यो, सेट्ठो, जेय्यो, जेट्ठो। ๓๙๓. อนฺติกสฺส เนโท. ३९३. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर सम्पूर्ण 'अन्तिक' शब्द के स्थान पर 'नेद' आदेश होता है। สพฺพสฺเสว อนฺติกสทฺทสฺส เนทาเทโส โหติ อิยิฏฺเฐสุ. วิเสเสน อนฺติโกติ เนทิโย, เนทิฏฺโฐ. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर सम्पूर्ण 'अन्तिक' शब्द के स्थान पर 'नेदादेश' होता है। विशेष रूप से समीप (अन्तिक) है - नेदियो, नेदिठ्ठो। ๓๙๔. พาฬฺหสฺส สาโธ. ३९४. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर सम्पूर्ण 'बाळ्ह' शब्द के स्थान पर 'साध' आदेश होता है। สพฺพสฺเสว พาฬฺหสทฺทสฺส สาธาเทโส โหติ อิยิฏฺเฐสุ. วิเสเสน พาฬฺโหติ สาธิโย, สาธิฏฺโฐ. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर सम्पूर्ण 'बाळ्ह' शब्द के स्थान पर 'साधादेश' होता है। विशेष रूप से बहुत (बाळ्ह) है - साधियो, साधिठ्ठो। ๓๙๕. อปฺปสฺส กณ. ३९५. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर सम्पूर्ण 'अप्प' शब्द के स्थान पर 'कण' आदेश होता है। สพฺพสฺส อปฺปสทฺทสฺส กณ โหติ อิยิฏฺเฐสุ. วิเสเสน อปฺโปติ กณิโย, กณิฏฺโฐ. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर सम्पूर्ण 'अप्प' शब्द के स्थान पर 'कण' होता है। विशेष रूप से अल्प (अप्प) है - कणियो, कणिठ्ठो। ‘‘วิเสเสน ยุวา’’ติ อตฺเถ ‘‘กณ’’อิติ วตฺตเต. "विशेष रूप से युवा" इस अर्थ में 'कण' की अनुवृत्ति होती है। ๓๙๖. ยุวานญฺจ[Pg.242]. ३९६. और 'युव' शब्द के स्थान पर भी। สพฺพสฺส ยุวสทฺทสฺส กณ โหติ อิยิฏฺเฐสุ. ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา ณการสฺส นกาโร. กนิโย, กนิฏฺโฐ. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर सम्पूर्ण 'युव' शब्द के स्थान पर 'कण' होता है। 'तेसु वुद्धि' इत्यादि सूत्र से 'ण' कार का 'न' कार हो जाता है। कनियो, कणिठ्ठो। ๓๙๗. วนฺตุ มนฺตุ วีนญฺจ โลโป. ३९७. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर 'वन्तु', 'मन्तु' और 'वी' इन प्रत्ययों का लोप होता है। วนฺตุมนฺตุวี อิจฺเจเตสํ ปจฺจยานํ โลโป โหติ อิยิฏฺเฐสุ. สพฺเพ อิเม คุณวนฺโต อยมิเมสํ วิเสเสน คุณวาติ คุณิโย, คุณิฏฺโฐ, วิเสเสน สติมาติ สติโย, สติฏฺโฐ, วิเสเสน เมธาวีติ เมธิโย, เมธิฏฺโฐ อิจฺจาทิ. 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्ययों के परे होने पर 'वन्तु', 'मन्तु', 'वी' इन प्रत्ययों का लोप होता है। ये सभी गुणवान हैं, यह इनमें विशेष रूप से गुणवान है - गुणियो, गुणिठ्ठो; विशेष रूप से सतिमान (स्मृतिमान) है - सतियो, सतिठ्ठो; विशेष रूप से मेधावी है - मेधियो, मेधिठ्ठो इत्यादि। วิเสสตทฺธิตํ. विशेष तद्धित। อสฺสตฺถิตทฺธิต अस्सत्थि (अस्तित्व) तद्धित। ‘‘เมธา ยสฺส อตฺถิ, ตสฺมึ วา วิชฺชตี’’ติ วิคฺคเห – "मेधा जिसकी है, या जिसमें विद्यमान है" - इस विग्रह में — ๓๙๘. ตทสฺสตฺถีติ วี จ. ३९८. 'तदस्सत्थि' (वह इसका है या इसमें है) इस अर्थ में 'वी' प्रत्यय भी होता है। ปฐมาวิภตฺยนฺตา ‘‘ตทสฺส อตฺถิ, ตสฺมึ วา วิชฺชติ’’ อิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ วีปจฺจโย โหติ. เมธามายา สทฺเทหิ จายํ. เมธาวี, เมธาวิโน. อิตฺถิยํ อีการนฺตตฺตา ‘‘ปติภิกฺขุราชีการนฺเตหิ อินี’’ติ อินี, เมธาวินี, เมธาวินิโย. นปุํสเก เมธาวิ กุลํ. เอวํ มายาวี, มายาวินี, มายาวิ จิตฺตํ. प्रथमा विभक्ति अन्त वाले शब्दों से "वह इसका है, या उसमें विद्यमान है" इन अर्थों में 'वी' प्रत्यय होता है। मेधा और माया शब्दों से यह (प्रत्यय) होता है। मेधावी, मेधाविनो। स्त्रीलिंग में ईकारान्त होने से 'पतिभिक्खुराजीकारन्तेहि इनी' सूत्र से 'इनी' प्रत्यय होकर - मेधाविनी, मेधाविनियो। नपुंसक लिंग में - मेधावि कुलं। इसी प्रकार मायावी, मायाविनी, मायावि चित्तं। จคฺคหเณน โส อิ ลว อาลาทิปฺปจฺจยา จ. ยถา – สุเมธา ยสฺส อตฺถิ, ตสฺมึ วา วิชฺชตีติ สุเมธโส, รสฺสตฺตํ. เอวํ โลมโส. ปิจฺฉํ อสฺส อตฺถิ, ตสฺมึ [Pg.243] วา วิชฺชตีติ ปิจฺฉิโล. เอวํ เผนิโล, ตุณฺฑิโล, ชฏิโล. เกสา อสฺส อตฺถีติ เกสโว, วาจาโล อิจฺจาทิ. 'च' के ग्रहण से 'सो', 'इ', 'ल', 'व', 'आल' आदि प्रत्यय भी होते हैं। जैसे - 'सुमेधा' जिसके पास है, या जिसमें विद्यमान है, वह 'सुमेधसो' है, यहाँ ह्रस्वत्व हुआ है। इसी प्रकार 'लोमसो'। 'पिच्छ' जिसके पास है, या जिसमें विद्यमान है, वह 'पिच्छिलो' है। इसी प्रकार 'फेनिलो', 'तुण्डिलो', 'जटिलो'। 'केश' जिसके पास हैं, वह 'केशवो', 'वाचालो' इत्यादि। ‘‘ตโป อสฺส อตฺถิ, ตสฺมึ วา วิชฺชตี’’ติ วิคฺคเห – "तप (तपस्या) उसका है, या उसमें विद्यमान है" - इस विग्रह में - ‘‘ตทสฺสตฺถี’’ติ อธิกาโร. "तदस्सत्थि" (वह उसका है) - यह अधिकार है। ๓๙๙. ตปาทิโต สี. ३९९. तप आदि से 'सी' प्रत्यय होता है। ตปอิจฺเจวมาทิโต สีปจฺจโย โหติ ‘‘ตทสฺสตฺถิ’’ อิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ. สสฺส ทฺวิภาโว. ตปสฺสี, ตปสฺสิโน, ตปสฺสินี, ตปสฺสิ. เอวํ เตชสฺสี, ยสสฺสี, มนสฺสี, ปยสฺสี. तप इत्यादि से 'तदस्सत्थि' इस अर्थ में 'सी' प्रत्यय होता है। 'स' का द्वित्व होता है। 'तपस्सी', 'तपस्सिनो', 'तपस्सिनी', 'तपस्सि'। इसी प्रकार 'तेजस्सी', 'यसस्सी', 'मनस्सी', 'पयस्सी'। ‘‘ทณฺโฑ อสฺส อตฺถิ, ตสฺมึ วา วิชฺชตี’’ติ วิคฺคเห – "दण्ड उसका है, या उसमें विद्यमान है" - इस विग्रह में - ๔๐๐. ทณฺฑาทิโต อิกอี. ४००. दण्ड आदि से 'इक' और 'ई' प्रत्यय होते हैं। อาทิสทฺโทยํ ปการตฺโถ, ทณฺฑอิจฺเจวมาทิโต อวณฺณนฺตา อิก อี อิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ ‘‘ตทสฺสตฺถิ’’ อิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ. ทณฺฑิโก, ทณฺฑี, ทณฺฑิโน, ทณฺฑินี. เอวํ มาลิโก, มาลี, มาลินี, ฉตฺติโก, ฉตฺตี, รูปิโก, รูปี, เกสิโก, เกสี, สงฺฆี, ญาณี, หตฺถี อิจฺจาทิ. यहाँ 'आदि' शब्द प्रकार (तरह) के अर्थ में है, दण्ड इत्यादि अकारान्त शब्दों से 'तदस्सत्थि' इस अर्थ में 'इक' और 'ई' ये प्रत्यय होते हैं। 'दण्डिको', 'दण्डी', 'दण्डिनो', 'दण्डिनी'। इसी प्रकार 'मालिको', 'माली', 'मालिनी', 'छत्तिको', 'छत्ती', 'रूपिको', 'रूपी', 'केसिको', 'केसी', 'संघी', 'ज्ञानी', 'हत्थी' इत्यादि। ๔๐๑. มธฺวาทิโต โร. ४०१. मधु आदि से 'र' प्रत्यय होता है। มธุอาทิโต รปฺปจฺจโย โหติ ‘‘ตทสฺสตฺถี’’ติ อตฺเถ. มธุ อสฺส อตฺถิ, ตสฺมึ วา วิชฺชตีติ มธุโร คุโฬ, มธุรา สกฺขรา, มธุรํ ขีรํ, กุญฺชา หนู เอตสฺส สนฺตีติ กุญฺชโร, สพฺพสฺมึ [Pg.244] วตฺตพฺเพ มุขมสฺส อตฺถีติ มุขโร, สุสิ อสฺส อตฺถีติ สุสิโร. เอวํ รุจิโร, นคโร. मधु आदि से 'तदस्सत्थि' अर्थ में 'र' प्रत्यय होता है। 'मधु' जिसका है, या जिसमें विद्यमान है, वह 'मधुरो गुळो' (मीठा गुड़), 'मधुरा सक्खरा' (मीठी शक्कर), 'मधुरं खीरं' (मीठा दूध)। 'कुंज' और 'हनु' जिसके हैं, वह 'कुंजरो' (हाथी)। सब कुछ कहने योग्य होने पर 'मुख' जिसका है, वह 'मुखरो' (वाचाल)। 'सुषि' (छिद्र) जिसका है, वह 'सुषिरो'। इसी प्रकार 'रुचिरो', 'नगरो'। ‘‘คุโณ อสฺส อตฺถิ, ตสฺมึ วา วิชฺชตี’’ติ วิคฺคเห – "गुण उसका है, या उसमें विद्यमान है" - इस विग्रह में - ๔๐๒. คุณาทิโตวนฺตุ. ४०२. गुण आदि से 'वन्तु' प्रत्यय होता है। คุณอิจฺเจวมาทิโต วนฺตุปฺปจฺจโย โหติ ‘‘ตทสฺส อตฺถี’’ติ อตฺเถ. วิภตฺติโลเป, นามพฺยปเทเส จ กเต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. คุณวนฺตุ สิ, ‘‘สวิภตฺติสฺส, นฺตุสฺสา’’ติ อธิกิจฺจ ‘‘อา สิมฺหี’’ติ อาตฺตํ, คุณวา ปุริโส, เสสํ เญยฺยํ. เอวํ คณวา, กุลวา อิจฺจาทโย. อิตฺถิยํ ‘‘ณว ณิก เณยฺยณนฺตูหี’’ติ อีปจฺจโย, ‘‘วา’’ติ วตฺตมาเน ‘‘นฺตุสฺส ตมีกาเร’’ติ ตกาโร, คุณวตี, คุณวนฺตี อิจฺจาทิ. นปุํสเก ‘‘อํ นปุํสเก’’ติ สวิภตฺติสฺส นฺตุสฺส อมาเทโส, คุณวํ อิจฺจาทิ. गुण इत्यादि से 'तदस्सत्थि' अर्थ में 'वन्तु' प्रत्यय होता है। विभक्ति लोप और नाम संज्ञा होने पर 'सि' आदि की उत्पत्ति होती है। 'गुणवन्तु' + 'सि', "सविभत्तिस्स, न्तुस्सा" के अधिकार में "आ सिम्हि" सूत्र से आकार (आ) आदेश होकर 'गुणवा पुरिसो' (गुणवान पुरुष) बनता है, शेष को समझना चाहिए। इसी प्रकार 'गणवा', 'कुलवा' इत्यादि। स्त्रीलिंग में "णव णिक णैय्यणन्तूहि" सूत्र से 'ई' प्रत्यय होता है, "वा" की अनुवृत्ति में "न्तुस्स तमीकारे" सूत्र से 'त' कार होकर 'गुणवती', 'गुणवन्ती' इत्यादि बनते हैं। नपुंसक लिंग में "अं नपुंसके" सूत्र से सविभक्तिक 'न्तु' को 'अं' आदेश होकर 'गुणवं' इत्यादि बनते हैं। ‘‘สติ อสฺส อตฺถิ, ตสฺมึ วา วิชฺชตี’’ติ วิคฺคเห – "सति (स्मृति) उसकी है, या उसमें विद्यमान है" - इस विग्रह में - ‘‘ตทสฺสตฺถี’’ติ วตฺตเต. "तदस्सत्थि" (वह उसका है) की अनुवृत्ति होती है। ๔๙๓. สตฺยาทีหิ มนฺตุ. ४९३. सति आदि अकारान्त रहित प्रथमा विभक्ति वाले शब्दों से 'मन्तु' प्रत्यय होता है। สติอิจฺเจวมาทีหิ อวณฺณนฺตรหิเตหิ ปฐมาวิภตฺยนฺเตหิ ลิงฺเคหิ มนฺตุปฺปจฺจโย โหติ ‘‘ตทสฺสตฺถี’’ติ อตฺเถ. เสสํ คุณวนฺตุสมํ. สติมา, สติมตี, สติมนฺตี, สติมํ. เอวํ ธิติมา, คติมา อิจฺจาทโย. सति इत्यादि अकारान्त रहित प्रथमा विभक्ति वाले शब्दों से 'तदस्सत्थि' अर्थ में 'मन्तु' प्रत्यय होता है। शेष 'गुणवन्तु' के समान है। 'सतिमा', 'सतिमती', 'सतिमन्ती', 'सतिमं'। इसी प्रकार 'धृतिमा', 'गतिमा' इत्यादि। ตถา ‘‘อายุ อสฺส อตฺถีติ อายุ มนฺตุ’’อิจฺจตฺร – उसी प्रकार "आयु उसकी है, तो आयु मन्तु" - यहाँ - ๔๐๔. อายุสฺสุการาสมนฺตุมฺหิ[Pg.245]. ४०४. 'मन्तु' प्रत्यय होने पर 'आयु' के 'उ' कार को 'अस' आदेश होता है। อายุสฺส อุกาโร อส โหติ มนฺตุมฺหีติ อสาเทโส. อายสฺมา, เสสํ สมํ. คาโว อสฺส สนฺตีติ โคมา, โคมนฺโต, โคมตี, โคมนฺตี, โคมํ กุลํ อิจฺจาทิ. 'मन्तु' प्रत्यय होने पर 'आयु' के 'उ' कार को 'अस' आदेश होता है। 'आयुस्मा', शेष समान है। 'गावो' (गायें) जिसकी हैं, वह 'गोमा', 'गोमन्तो', 'गोमती', 'गोमन्ती', 'गोमं कुलं' इत्यादि। ‘‘สทฺธา อสฺส อตฺถี’’ติ วิคฺคเห – "श्रद्धा उसकी है" - इस विग्रह में - ๔๐๕. สทฺธาทิโต ณ. ४०५. श्रद्धा आदि से 'ण' प्रत्यय होता है। สทฺธา ปญฺญาอิจฺเจวมาทิโต ณปฺปจฺจโย โหติ ‘‘ตทสฺสตฺถิ’’อิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ. สทฺโธ ปุริโส, สทฺธา กญฺญา, สทฺธํ กุลํ. เอวํ ปญฺโญ, อมจฺฉโร, ตถา พุทฺธํ, พุทฺธิ อสฺส อตฺถีติ พุทฺโธ อิจฺจาทิ. श्रद्धा, प्रज्ञा इत्यादि से 'तदस्सत्थि' इस अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। 'सद्धो पुरिसो', 'सद्धा कञ्ञा', 'सद्धं कुलं'। इसी प्रकार 'पञ्ञो', 'अमच्छरो', वैसे ही 'बुद्धं', 'बुद्धि' जिसकी है, वह 'बुद्धो' इत्यादि। อสฺสตฺถิตทฺธิตํ. अस्सत्थि-तद्धित (अस्त्यर्थक तद्धित)। สงฺขฺยาตทฺธิต संख्या-तद्धित। ‘‘ปญฺจนฺนํ ปูรโณ’’ติ วิคฺคเห – "पाँचों को पूरा करने वाला" - इस विग्रह में - ๔๐๖. สงฺขฺยาปูรเณ โม. ४०६. संख्या के पूरण (क्रमवाचक) अर्थ में 'म' प्रत्यय होता है। ปูรยติ สงฺขฺยา อเนนาติ ปูรโณ, สงฺขฺยาย ปูรโณ สงฺขฺยาปูรโณ, ตสฺมึ สงฺขฺยาปูรณตฺเถ ฉฏฺฐิยนฺตโต มปฺปจฺจโย โหติ. ปญฺจโม, ปญฺจนฺนํ ปูรณี ปญฺจมี, ‘‘นทาทิโต วา อี’’ติ อีปจฺจโย. ‘‘อิตฺถิยมโต อาปจฺจโย’’ติ อาปจฺจโย, ปญฺจมา วีริยปารมี, ปญฺจมํ ฌานํ. เอวํ สตฺตโม, สตฺตมี, สตฺตมา, สตฺตมํ, อฏฺฐโม, อฏฺฐมี, อฏฺฐมา, อฏฺฐมํ, นวโม[Pg.246], นวมี, นวมา, นวมํ, ทสโม, ทสมี, ทสมา, ทสมํ อิจฺจาทิ. जिसके द्वारा संख्या पूरी की जाती है, वह 'पूरण' है। संख्या का पूरण 'संख्यापूरण' है, उस संख्यापूरण अर्थ में षष्ठी विभक्ति वाले शब्द से 'म' प्रत्यय होता है। 'पंचमो', पाँचों को पूरा करने वाली 'पंचमी', "नदादितो वा ई" सूत्र से 'ई' प्रत्यय होता है। "इत्थियमतो आपच्चयो" सूत्र से 'आ' प्रत्यय होकर 'पंचमा वीरियपारमी', 'पंचमं झानं'। इसी प्रकार 'सत्तमो', 'सत्तमी', 'सत्तमा', 'सत्तमं', 'अट्ठमो', 'अट्ठमी', 'अट्ठमा', 'अट्ठमं', 'नवमो', 'नवमी', 'नवमा', 'नवमं', 'दसमो', 'दसमी', 'दसमा', 'दसमं' इत्यादि। ‘‘สงฺขฺยาปูรเณ’’ติ อธิกาโร. "संख्यापूरणे" - यह अधिकार है। ๔๐๗. จตุจฺเฉหิ ถฐา. ४०७. चतु (चार) और छ (छह) से 'थ' और 'ठ' प्रत्यय होते हैं। จตุฉอิจฺเจเตหิ ถฐอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ สงฺขฺยาปูรณตฺเถ. จตุนฺนํ ปูรโณ จตุตฺโถ, ทฺวิตฺตํ, จตุตฺถี, จตุตฺถา, จตุตฺถํ, ฉนฺนํ ปูรโณ ฉฏฺโฐ, ฉฏฺฐี, ฉฏฺฐา, ฉฏฺฐํ, ฉฏฺโฐ เอว ฉฏฺฐโม. 'चतु' और 'छ' इन शब्दों से संख्या की पूर्ति के अर्थ में 'थ' और 'ठ' प्रत्यय होते हैं। चार की पूर्ति करने वाला 'चतुत्थ' (चौथा), द्वित्व होने पर 'चतुत्थी', 'चतुत्था', 'चतुत्थं'। छह की पूर्ति करने वाला 'छट्ठ' (छठा), 'छट्ठी', 'छट्ठा', 'छट्ठं'। 'छट्ठ' ही 'छट्ठम' भी होता है। ฉาหํ, ฉฬายตนํ อิจฺจตฺร – 'छाहं' (छह दिन), 'छळायतनं' (छह आयतन) यहाँ पर - ๔๐๘. ส ฉสฺส วา. ४०८. 'छ' के स्थान पर विकल्प से 'स' होता है। ฉสฺส สการาเทโส โหติ วา สงฺขฺยาเน. ฉาหมสฺส ชีวิตํ สาหํ, ฉาหํ วา, สฬายตนํ. गणना (संख्यान) में 'छ' के स्थान पर विकल्प से सकार आदेश होता है। 'छाहं' (छह दिन) का जीवन 'साहं' अथवा 'छाहं'। 'सळायतनं' (छह आयतन)। ‘‘ทฺวินฺนํ ปูรโณ’’ติ วิคฺคเห – "दो की पूर्ति करने वाला" इस विग्रह में - ๔๐๙. ทฺวิตีหิ ติโย. ४०९. 'द्वि' और 'ति' से 'तिय' प्रत्यय होता है। ทฺวิติอิจฺเจเตหิ ติยปฺปจฺจโย โหติ สงฺขฺยาปูรณตฺเถ. วิปริณาเมน ‘‘ทฺวิ ติณฺณ’’นฺติ วตฺตมาเน – 'द्वि' और 'ति' इन शब्दों से संख्या की पूर्ति के अर्थ में 'तिय' प्रत्यय होता है। विभक्ति परिणाम से "द्वि और ति" की अनुवृत्ति होने पर - ๔๑๐. ติเย ทุตาปิ จ. ४१०. 'तिय' प्रत्यय परे होने पर 'दु' और 'त' भी होते हैं। ทฺวิติอิจฺเจเตสํ ทุตอิจฺจาเทสา โหนฺติ ติยปฺปจฺจเย ปเร. ทุติโย ปุริโส, ทุติยา, ทุติยํ. เอวํ ติณฺณํ ปูรโณ ตติโย, ตติยา, ตติยํ. อปิคฺคหเณน อญฺญตฺถาปิ ทฺวิสทฺทสฺส ทุอาเทโส โหติ, จสทฺเทน ทิ จ. ทฺเว รตฺติโย ทุรตฺตํ, ทุวิธํ, ทุวงฺคํ, ทิรตฺตํ, ทิคุณํ, ทิคุ. 'तिय' प्रत्यय परे होने पर 'द्वि' और 'ति' के स्थान पर क्रमशः 'दु' और 'त' आदेश होते हैं। 'दुतियो पुरिसो' (दूसरा पुरुष), 'दुतिया', 'दुतियं'। इसी प्रकार तीन की पूर्ति करने वाला 'ततियो' (तीसरा), 'ततिया', 'ततियं'। 'अपि' ग्रहण से अन्यत्र भी 'द्वि' शब्द को 'दु' आदेश होता है, और 'च' शब्द से 'दि' भी। दो रातें 'दुरत्तं', 'दुविधं', 'दुवङ्गं', 'दिरत्तं', 'दिगुणं', 'दिगु'। ๔๑๑. เตสมฑฺฒูปปเทน อฑฺฒุฑฺฒทิวฑฺฒทิยฑฺฒฑฺฒติยา. ४११. 'अड्ढ' उपपद होने पर उनके (चतुर्थ, द्वितीय, तृतीय के) स्थान पर 'अड्ढुड्ढ', 'दिवड्ढ', 'दियड्ढ' और 'अड्ढतिय' आदेश होते हैं। เตสํ จตุตฺถทุติยตติยานํ อฑฺฒูปปทานํ อฑฺฒูปปเทน สห อฑฺฒุฑฺฒทิวฑฺฒทิยฑฺฒอฑฺฒติยาเทสา โหนฺติ. उन चतुर्थ, द्वितीय और तृतीय शब्दों के 'अड्ढ' उपपद के साथ होने पर 'अड्ढुड्ढ', 'दिवड्ढ', 'दियड्ढ' और 'अड्ढतिय' आदेश होते हैं। เอตฺถ จ – और यहाँ - อฑฺฒูปปทปาทาน-สามตฺถา อฑฺฒปุพฺพกา; เตสํสทฺเทน คยฺหนฺเต, จตุตฺถทุติยาทโย. 'अड्ढ' उपपद के ग्रहण के सामर्थ्य से 'अड्ढ' है पूर्व में जिनके, ऐसे 'चतुर्थ', 'द्वितीय' आदि शब्द 'तेसं' शब्द से ग्रहण किए जाते हैं। อฑฺเฒน จตุตฺโถ อฑฺฒุฑฺโฒ, อฑฺเฒน ทุติโย ทิวฑฺโฒ, ทิยฑฺโฒ, อฑฺเฒน ตติโย อฑฺฒติโย. आधे के साथ चौथा 'अड्ढुड्ढ' (साढ़े तीन), आधे के साथ दूसरा 'दिवड्ढ' या 'दियड्ढ' (डेढ़), आधे के साथ तीसरा 'अड्ढतिय' (ढाई)। ‘‘เอกญฺจ ทส จา’’ติ อตฺเถ ทฺวนฺทสมาเส, ‘‘เอเกน อธิกา ทสา’’ติ อตฺเถ ตปฺปุริสสมาเส วา กเต ‘‘สงฺขฺยาเน’’ติ วตฺตมาเน ‘‘ทฺเวกฏฺฐานมากาโร วา’’ติ อาตฺตํ. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. "एक और दस" इस अर्थ में द्वन्द्व समास, अथवा "एक से अधिक दस" इस अर्थ में तत्पुरुष समास करने पर, 'संख्याने' की अनुवृत्ति होने पर 'द्वेकट्ठाानमाकारो वा' सूत्र से आकार (आ-त्व) होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। เตน เจตฺถ – इसलिए यहाँ - ทฺเวกฏฺฐานํ ทเส นิจฺจํ, ทฺวิสฺสา’นวุติยา นวา; อิตเรส’มสนฺตญฺจ, อาตฺตํ ทีเปติ วาสุติ. 'दस' परे होने पर 'द्वि', 'एक' और 'अट्ठ' को नित्य आकार होता है; 'नवुति' परे होने पर 'द्वि' को विकल्प से; और अन्यों में आकार नहीं होता - यह 'वा' शब्द दर्शाता है। ‘‘เอกาทิโต ทสร สงฺขฺยาเน’’ติ รตฺตํ. 'एकादितो दसर संख्याने' सूत्र से 'र' आदेश (र-त्व) होता है। ราเทโส วณฺณมตฺตตฺตา, วณฺณมตฺตปฺปสงฺคิปิ; สิยา ทสสฺส ทสฺเสว, นิมิตฺตาสนฺนภาวโต. 'र' आदेश केवल वर्ण मात्र होने के कारण, वर्ण मात्र की प्राप्ति होने पर भी, निमित्त की निकटता के कारण 'दस' के 'द' को ही होता है। ตโต พหุวจนํ โย, ‘‘ปญฺจาทีนมกาโร’’ติ สวิภตฺติสฺส อนฺตสฺส อตฺตํ. เอการส, เอกาทส, ลิงฺคตฺตเยปิ สมานํ. उसके बाद बहुवचन 'यो' प्रत्यय आने पर, 'पञ्चादीनमकारो' सूत्र से विभक्ति सहित अन्त को अकार (अ-त्व) होता है। 'एकारस', 'एकादस' (ग्यारह), तीनों लिंगों में समान होते हैं। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๔๑๒. เอกาทิโต [Pg.248] ทสสฺสี. ४१२. 'एकादि' से परे 'दस' को 'ई' होता है। เอกาทิโต ปรสฺส ทสสฺส อนฺเต อีปจฺจโย โหติ วา ปูรณตฺเถ. 'एकादि' से परे 'दस' शब्द के अन्त में संख्या की पूर्ति के अर्थ में विकल्प से 'ई' प्रत्यय होता है। ทสสฺส ปจฺจยาโยคา, ลทฺธมนฺเตติ อตฺถโต; ตทนฺตสฺส สภาเวน, อิตฺถิยํเยว สมฺภโว. 'दस' के साथ प्रत्यय का योग होने से, अर्थतः 'अन्त' प्राप्त होता है; उस (ई) प्रत्यय के स्वभाव से, यह केवल स्त्रीलिंग में ही संभव है। เอกาทสนฺนํ ปูรณี เอกาทสี, อญฺญตฺร เอกาทสโม, เอกาทสมํ. ग्यारह की पूर्ति करने वाली 'एकादसी' (ग्यारहवीं), अन्यत्र 'एकादसमो', 'एकादसमं'। ทฺเว จ ทส จ, ทฺวีหิ วา อธิกา ทสาติ ‘‘ทฺวิ ทส’’อิจฺจตฺร ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. "दो और दस" अथवा "दो से अधिक दस" इस प्रकार 'द्वि दस' यहाँ 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ‘‘วีสติ ทเสสุ พา ทฺวิสฺส ตู’’ติ พาเทโส, ทสฺส ราเทโส. พารส, อญฺญตฺร อาตฺตํ, ทฺวาทส. ทฺวาทสนฺนํ ปูรโณ พารสโม, ทฺวาทสโม, ทฺวาทสี. 'वीसति दसेसु बा द्विस्स तू' सूत्र से 'बा' आदेश होता है, और 'द' को 'र' आदेश। 'बारस' (बारह), अन्यत्र आकार होने पर 'द्वादस'। बारह की पूर्ति करने वाला 'बारसमो', 'द्वादसमो', 'द्वादसी'। ตโย จ ทส จ, ตีหิ วา อธิกา ทสาติ เตรส, ‘‘เตสุ วุทฺธิ โลปา’’ทินา ติสฺส เตอาทโส อานวุติยา, เตรสโม, เตรสี. "तीन और दस" अथवा "तीन से अधिक दस" इस प्रकार 'तेरस' (तेरह), 'तेसु वुद्धि लोपा' आदि सूत्र से 'नवुति' तक 'ति' को 'ते' आदेश होता है, 'तेरसमो', 'तेरसी'। จตฺตาโร จ ทส จ, จตูหิ วา อธิกา ทสาติ จตุทฺทส อิจฺจตฺร ‘‘คณเน ทสสฺสา’’ติ จ วตฺตมาเน ‘‘จตูปปทสฺส โลโป ตุตฺตรปทาทิ จสฺส จุโจปิ นวา’’ติ ตุโลโป, จุโจ จ. จุทฺทส, โจทฺทส, จตุทฺทส. จุทฺทสโม, จตุทฺทสโม, จกุทฺทสี, จาตุทฺทสี วา. "चार और दस" अथवा "चार से अधिक दस" इस प्रकार 'चतुद्दस' (चौदह) यहाँ 'गणने दसस्स' की अनुवृत्ति होने पर 'चतूपपदस्स लोपो...' सूत्र से 'तु' का लोप और 'चु', 'चो' आदेश विकल्प से होते हैं। 'चुद्दस', 'चोद्दस', 'चतुद्दस'। 'चुद्दसमो', 'चतुद्दसमो', 'चकुद्दसी' अथवा 'चातुद्दसी' विकल्प से होते हैं। ปญฺจ จ ทส จ, ปญฺจหิ วา อธิกา ทสาติ ปญฺจทส, ‘‘เตสุ วุทฺธิ โลปา’’ทินา ปญฺจสทฺทสฺส ทส วีเสสุ ปนฺนปณฺณอาเทสาปิ, ‘‘อฏฺฐาทิโต จา’’ติ รตฺตํ. ปนฺนรส, ปญฺจทส. ปนฺนรสโม, ปญฺจทสโม, ปนฺนรสี, ปญฺจทสี. "पाँच और दस" अथवा "पाँच से अधिक दस" इस प्रकार 'पञ्चदस' (पन्द्रह), 'तेसु वुद्धि लोपा' आदि सूत्र से 'दस' और 'वीस' परे होने पर 'पञ्च' शब्द को 'पन्न' और 'पण्ण' आदेश भी होते हैं, और 'अट्ठादितो च' सूत्र से र-त्व होता है। 'पन्नरस', 'पञ्चदस'। 'पन्नरसमो', 'पञ्चदसमो', 'पन्नरसी', 'पञ्चदसी'। ‘‘ฉ [Pg.249] จ ทส จ, ฉหิ วา อธิกา ทสา’’ติ สมาเส กเต ‘‘ฉสฺสา’’ติ วตฺตมาเน ‘‘ทเส โส นิจฺจญฺจา’’ติ โส, ‘‘สงฺขฺยานํ, วา’’ติ จ วตฺตเต, ‘‘ล ทราน’’นฺติ ลตฺตํ, ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. ‘‘छह और दस, अथवा छह अधिक दस’’ - इस प्रकार समास करने पर ‘छस्स’ शब्द के रहने पर ‘दसे सो निच्चञ्च’ सूत्र से ‘स’ आदेश होता है, ‘संख्यानम्’ और ‘वा’ की अनुवृत्ति होती है, ‘ल दरानम्’ सूत्र से ‘ल’ होता है, यहाँ ‘वा’ शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। โฬ นิจฺจํ โสฬเส ทสฺส, จตฺตาลีเส จ เตรเส; อญฺญตฺร น จ โหตายํ, ววตฺถิตวิภาสโต. ‘सोळस’ (सोलह) में ‘द’ के स्थान पर ‘ळ’ नित्य होता है, तथा ‘चत्तालीस’ और ‘तेरस’ में भी; व्यवस्थित विभाषा के कारण अन्यत्र यह नहीं होता है। ลฬานมวิเสโส กฺวจิ, โสฬส. เตฬส, จตฺตาลีสํ, จตฺตารีสํ. โสฬสโม, โสฬสี. कहीं-कहीं ‘ल’ और ‘ळ’ में कोई भेद नहीं होता, जैसे- सोळस। तेळस, चत्तालीसम्, चत्तारीसम्। सोळसमो (सोलहवाँ), सोळसी। ‘‘วา, ทสร สงฺขฺยาเน’’ติ อธิกิจฺจ ‘‘อฏฺฐาทิโต จา’’ติ รตฺตํ. อฏฺฐารส, อฏฺฐาทส, อาตฺตํ. อฏฺฐารสนฺนํ ปูรโณ อฏฺฐารสโม, อฏฺฐาทสโม. เอวํ สตฺตรส, สตฺตทส. สตฺตรสโม, สตฺตทสโม. ‘वा, दसर संख्याने’ के अधिकार में ‘अट्ठादितो च’ सूत्र से ‘र’ होता है। अट्ठारस, अट्ठादस, यहाँ ‘आ’ भाव (आकार) है। अट्ठारस का पूरण (अठारहवाँ) अट्ठारसमो, अट्ठादसमो है। इसी प्रकार सत्तरस, सत्तदस। सत्तरसमो, सत्तदसमो। อฏฺฐาทิโตติ กิมตฺถํ? จตุทฺทส. ‘अट्ठादितो’ (आठ आदि से) क्यों कहा गया? (ताकि) चतुद्दस (चौदह) में न हो। เอเกน อูนา วีสตีติ ตปฺปุริโส, เอกูนวีสติ. เอกูนวีสตาทโย อานวุติยา เอกวจนนฺตา, อิตฺถิลิงฺคา จ ทฏฺฐพฺพา, เต จ สงฺขฺยาเน, สงฺขฺเยยฺเย จ วตฺตนฺเต, ยทา สงฺขฺยาเน วตฺตนฺเต, ตทา ภิกฺขูนเมกูนวีสติ ติฏฺฐติ, โภติ ภิกฺขูนเมกูนวีสติ ติฏฺฐตุ, ภิกฺขูนเมกูนวีสตึ ปสฺส, ภิกฺขูนเมกูนวีสติยา กตํ อิจฺจาทิ. ‘‘एक से कम बीस’’ - यह तत्पुरुष समास है, एकूनवीसति (उन्नीस)। एकूनवीसति से लेकर नवुति (नब्बे) तक के शब्द एकवचनान्त और स्त्रीलिंग समझने चाहिए, और वे संख्या (गिनती) तथा संख्यय (गिने जाने वाले पदार्थ) दोनों में प्रयुक्त होते हैं। जब वे संख्या में प्रयुक्त होते हैं, तब- ‘‘भिक्षुओं की उन्नीस (संख्या) स्थित है’’, ‘‘हे भिक्षुओं की उन्नीस (संख्या) स्थित रहे’’, ‘‘भिक्षुओं की उन्नीस (संख्या) को देखो’’, ‘‘भिक्षुओं की उन्नीस (संख्या) के द्वारा किया गया’’ इत्यादि। สงฺขฺเยยฺเย ปน เอกูนวีสติ ภิกฺขโว ติฏฺฐนฺติ, โภนฺโต เอกูนวีสติ ภิกฺขโว ติฏฺฐถ, เอกูนวีสตึ ภิกฺขู ปสฺส, เอกูนวีสติยา ภิกฺขูหิ กตํ อิจฺจาทิ. เอวํ วีสตาทีสุปิ โยเชตพฺพํ, เอกูนวีสติยา ปูรโณ เอกูนวีสติโม. संख्यय (विशेष्य) के अर्थ में- ‘‘उन्नीस भिक्षु स्थित हैं’’, ‘‘हे उन्नीस भिक्षुओं, ठहरो’’, ‘‘उन्नीस भिक्षुओं को देखो’’, ‘‘उन्नीस भिक्षुओं द्वारा किया गया’’ इत्यादि। इसी प्रकार वीसति (बीस) आदि में भी जोड़ना चाहिए। एकूनवीसति का पूरण (उन्नीसवाँ) एकूनवीसतिमो है। ทส จ ทส จาติ อตฺเถ ทฺวนฺทสมาสํ กตฺวา ‘‘ทสทสา’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘สรูปานเมกเสสฺวสกิ’’นฺติ เอกเสเส กเต [Pg.250] ทสสทฺทโต ปฐมาพหุวจนํ โย. ‘‘ทส โย’’อิตีธ – ‘‘दस और दस’’ इस अर्थ में द्वन्द्व समास करके ‘दस-दसा’ कहने योग्य होने पर ‘सरूपानामेकसेसवसकिं’ सूत्र से एकशेष करने पर ‘दस’ शब्द से प्रथमा बहुवचन ‘यो’ प्रत्यय आता है। ‘‘दस यो’’ यहाँ - ๔๑๓. คณเน ทสสฺส ทฺวิติ จตุ ปญฺจ ฉ สตฺต อฏฺฐนวกานํ วีติ จตฺตาร ปญฺญา ฉ สตฺตาส นวา โยสุ โยนญฺจี สมาสํ ฐิริ ตีตุติ. ४१३. गणना में दस के सम्बन्धी द्वि, ति, चतु, पञ्च, छ, सत्त, अट्ठ और नव के एकशेष होने पर क्रमशः वी, ति, चत्तार, पञ्ञा, छ, सत्त, आस और नव आदेश होते हैं ‘यो’ प्रत्यय परे होने पर, और ‘यो’ प्रत्यय के स्थान पर ईसं, आसं, ठि, रि, ईति और उति आदेश होते हैं। คณเน ทสสฺส สมฺพนฺธีนํ ทฺวิก ติก จตุกฺก ปญฺจก ฉกฺกสตฺตก อฏฺฐก นวกานํ กเตกเสสานํ ยถากฺกมํ วีติ จตฺตาร ปญฺญา ฉ สตฺต อส นว อิจฺจาเทสา โหนฺติ โยสุ ปเรสุ, โยนญฺจ อีสํ อาสํ ฐิ ริติ อีติ อุติอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺตีติ ทฺวิทสตฺถวาจกสฺส ทสสฺส วีอาเทโส โหติ, โยวจนสฺส อีสญฺจ, สรโลปาทิ. गणना में दस के सम्बन्धी द्विक, त्रिक, चतुष्क, पञ्चक, छक्क, सप्तक, अष्टक और नवक के एकशेष होने पर क्रमशः वी, ति, चत्तार, पञ्ञा, छ, सत्त, आस, नव ये आदेश होते हैं ‘यो’ प्रत्यय परे होने पर; और ‘यो’ प्रत्यय के स्थान पर ईसं, आसं, ठि, रि, ईति, उति ये आदेश होते हैं। इस प्रकार दो-दस (बीस) अर्थ के वाचक ‘दस’ शब्द को ‘वी’ आदेश होता है और ‘यो’ वचन को ‘ईसं’, फिर स्वर-लोप आदि कार्य होते हैं। ‘‘สงฺขฺยานํ, วา, อนฺเต’’ติ จ วตฺตเต. ‘संख्यानम्’, ‘वा’ और ‘अन्ते’ की अनुवृत्ति होती है। ๔๑๔. ติ จ. ४१४. और ‘ति’ (आगम)। ตาสํ สงฺขฺยานมนฺเต ติการาคโม โหติ วา. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. उन संख्याओं के अन्त में ‘ति’ कार का आगम विकल्प से होता है। यहाँ ‘वा’ शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। วิภาสา วีส ตึสาน-มนฺเต โหติ ติอาคโม; อญฺญตฺถ น จ โหเตว, ววตฺถิตวิภาสโต. ‘वीस’ और ‘तिंस’ के अन्त में ‘ति’ आगम विकल्प से होता है; व्यवस्थित विभाषा के कारण अन्यत्र यह नहीं होता है। ‘‘พฺยญฺชเน จา’’ติ นิคฺคหีตโลโป, ปุน ตทฺธิตตฺตา นามพฺยปเทเส สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. ภิกฺขูนํ วีสติ, วีสํ วา, วีสติ ภิกฺขู, วีสํ วา อิจฺจาทิ. วีสติโม. ตถา เอกวีสติ กุสลจิตฺตานิ, เอกวีสํ วา. เอกวีสติโม. พาวีสติ, พาวีสํ วา. พาวีสติโม. ทฺวาวีสติ, ทฺวาวีสํ วา. ทฺวาวีสติโม. เตวีสติ, เตวีสํ วา. เตวีสติโม. จตุวีสติ, จตุวีสํ วา. จตุวีสติโม. ปณฺณวีสติ, ปณฺณวีสํ วา. ปณฺณวีสติโม. ปญฺจวีสติ, ปญฺจวีสํ วา. ปญฺจวีสติโม. ฉพฺพีสติ[Pg.251], ฉพฺพีสํ วา. ฉพฺพีสติโม. สตฺตวีสติ, สตฺตวีสํ วา. สตฺตวีสติโม. อฏฺฐวีสติ, อฏฺฐวีสํ วา. อฏฺฐวีสติโม. เอกูนตึสติ, เอกูนตึสํวา. เอกูนตึสติโม. ‘ब्यञ्जने च’ सूत्र से निग्गृहीत (अनुस्वार) का लोप होता है, पुनः तद्धित होने के कारण नाम संज्ञा होने पर ‘सि’ आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। भिक्षुओं की वीसति (बीस) अथवा वीसं; वीसति भिक्षु अथवा वीसं भिक्षु इत्यादि। वीसतिमो (बीसवाँ)। उसी प्रकार एकवीसति कुशल चित्त अथवा एकवीसं। एकवीसतिमो। बावीसति अथवा बावीसं। बावीसतिमो। द्वावीसति अथवा द्वावीसं। द्वावीसतिमो। तेवीसति अथवा तेवीसं। तेवीसतिमो। चतुवीसति अथवा चतुवीसं। चतुवीसतिमो। पण्णवीसति अथवा पण्णवीसं। पण्णवीसतिमो। पञ्चवीसति अथवा पञ्चवीसं। पञ्चवीसतिमो। छब्बीसति अथवा छब्बीसं। छब्बीसतिमो। सत्तवीसति अथवा सत्तवीसं। सत्तवीसतिमो। अट्ठवीसति अथवा अट्ठवीसं। अट्ठवीसतिमो। एकूनतिंसति अथवा एकूनतिंसं। एकूनतिंसतिमो। ทส จ ทส จ ทส จาติ ‘‘ทส ทส ทสา’’ติ วตฺตพฺเพ เอกเสเส กเต ‘‘คณเน ทสสฺสา’’ติอาทินา ติอีสมาเทสา, ‘‘กฺวจา’’ทินา รสฺสตฺตํ, นิคฺคหีตาคโม จ, เสสํ วีสติสมํ. ตึสติ, ตึสํ, ตึส วสฺสานิ, นิคฺคหีตโลโป, ตึสํ, ตึสาย อิจฺจาทิ. เอกตึสติ, เอกตึสํ วา, พาตฺตึสํ, ทฺวตฺตึสํ, เตตฺตึสํ อิจฺจาทิ. ‘‘दस और दस और दस’’ इस प्रकार ‘दस दस दसा’ कहने योग्य होने पर एकशेष करने पर ‘गणने दसस्स’ आदि सूत्र से ‘ति’ और ‘ईसं’ आदेश होते हैं, ‘क्वचि’ आदि सूत्र से ह्रस्वत्व और निग्गृहीत आगम होता है, शेष वीसति के समान है। तिंसति, तिंसं; तिंस वस्सानी (तीस वर्ष), यहाँ निग्गृहीत लोप हुआ है; तिंसं, तिंसाय इत्यादि। एकतिंसति अथवा एकतिंसं, बात्तिंसं, द्वत्तिंसं, तेत्तिंसं इत्यादि। จตุทสตฺถวาจกสฺส กเตกเสสสฺส ทสสฺส จตฺตาร, โยวจนสฺส อีสํ, จตฺตาลีสํ, ‘‘ล ทราน’’นฺติ รสฺส ลตฺตํ, ตาลีสํ วา. จตฺตาลีสติโม. เอกจตฺตาลีสํ, ทฺวาจตฺตาลีสํ, ทฺวิจตฺตาลีสํ, เตจตฺตาลีสํ, ติจตฺตาลีสํ อิจฺจาทิ. चार-दस (चालीस) अर्थ के वाचक एकशेष किए हुए ‘दस’ शब्द को ‘चत्तार’ और ‘यो’ वचन को ‘ईसं’ आदेश होकर ‘चत्तालीसम्’ बनता है, ‘ल दरानम्’ सूत्र से ‘र’ को ‘ल’ होता है, अथवा ‘तालीसम्’। चत्तालीसतिमो। एकचत्तालीसम्, द्वाचत्तालीसम्, द्विचत्तालीसम्, तेचत्तालीसम्, तिचत्तालीसम् इत्यादि। ปญฺจทสตฺถวาจกสฺส ทสสฺส ปญฺญา, โยวจนสฺส อาสญฺจ. ปญฺญาสํ, ‘‘เตสุ วุทฺธิ โลปา’’ทินา ปณฺณาเทโส, ปณฺณาสํ วา. เอกปญฺญาสํ, ทฺเวปญฺญาสํ, ทฺวิปญฺญาสํ. पाँच-दस (पचास) अर्थ के वाचक ‘दस’ शब्द को ‘पञ्ञा’ और ‘यो’ वचन को ‘आसं’ आदेश होता है। पञ्ञासं; ‘तेसु वुद्धि लोपा’ आदि सूत्र से ‘पण्ण’ आदेश होकर ‘पण्णासं’ भी बनता है। एकपञ्ञासं, द्वेपञ्ञासं, द्विपञ्ञासं। ฉทสตฺถวาจกสฺส ทสสฺส ฉ, โยวจนสฺส ฐิอาเทโส, ‘‘ส ฉสฺส วา’’ติ สการาเทโส, สฏฺฐิ, ทฺวาสฏฺฐิ, ทฺเวสฏฺฐิ, ทฺวิสฏฺฐิ, เตสฏฺฐิ, ติสฏฺฐิ. छह-दस (साठ) अर्थ के वाचक ‘दस’ शब्द को ‘छ’ और ‘यो’ वचन को ‘ठि’ आदेश होता है, ‘स छस्स वा’ सूत्र से सकार आदेश होकर ‘सट्ठि’ बनता है। द्वासाट्ठि, द्वेसट्ठि, द्विसट्ठि, तेसट्ठि, तिसट्ठि। สตฺตทสตฺถวาจกสฺส ทสสฺส สตฺต, โยวจนสฺส ริ, ติ จ. สตฺตริ, สตฺตติ, ทฺวาสตฺตริ, ทฺวาสตฺตติ, ทฺวิสตฺตริ, ทิสตฺตติ, เตสตฺตติ, ติสตฺตติ อิจฺจาทิ. सात-दस (सत्तर) अर्थ के वाचक ‘दस’ शब्द को ‘सत्त’ और ‘यो’ वचन को ‘रि’ तथा ‘ति’ आदेश होते हैं। सत्तरि, सत्तति, द्वासत्तरि, द्वासत्तति, द्विसत्तरि, दिसत्तति, तेसत्तति, तिसत्तति इत्यादि। อฏฺฐทสตฺถวาจกสฺส ทสสฺส อส, โยวจนสฺส อีติอาเทโส จ. อสีติ, เอกาสีติ, ทฺเวอสีติ, เตอสีติ, จตุราสีติ, ‘‘กฺวจา’’ทินา ทีโฆ. आठ-दस (अस्सी) अर्थ के वाचक ‘दस’ शब्द को ‘अस’ और ‘यो’ वचन को ‘ईति’ आदेश होता है। असीति, एकासीति, द्वेअसीति, तेअसीति, चतुरासीति; ‘क्वचि’ आदि सूत्र से दीर्घ होता है। นวทสตฺถวาจกสฺส [Pg.252] ทสสฺส นว, โยวจนสฺส อุติ จ, นวุติ, ทฺวานวุติ, ทฺเวนวุติ, ทฺวินวุติ, เตนวุติ, ตินวุติ, จตุนวุติ, ฉนฺนวุติยา, ฉนฺนวุตีนํ ปาสณฺฑานํ. नौ-दस (नब्बे) अर्थ के वाचक ‘दस’ शब्द को ‘नव’ और ‘यो’ वचन को ‘उति’ आदेश होता है। नवुति, द्वानवुति, द्वेनवुति, द्विनवुति, तेनवुति, तिनवुति, चतुनवुति, छन्नवुतिया (छियानवे के द्वारा), छन्नवुतीनं पासण्डानं (छियानवे पाखण्डियों का)। ‘‘คณเน, ทสสฺสา’’ติ จ วตฺตเต. ‘गणने’ और ‘दसस्स’ की अनुवृत्ति होती है। ๔๑๕. ทสทสกํ สตํ ทสกานํ สตํ สหสฺสญฺจ โยมฺหิ. ४१५. दस-दशक (दस बार दस) ‘सतं’ (सौ) है, और ‘यो’ प्रत्यय परे होने पर दस शतकों (दस बार सौ) का ‘सहस्सं’ (हजार) होता है। คณเน ปริยาปนฺนสฺส ทสทสกตฺถวาจกสฺส ทสสทฺทสฺส สตํ โหติ, สตทสกตฺถวาจกสฺส ทสสฺส สหสฺสํ โหติ โยมฺหิ. อิมินา นิปาตเนน โยโลโป, ตทฺธิตตฺตา ปุน นามพฺยปเทเส สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, นิคฺคหีตสฺส โลโป, ‘‘สิ’’นฺติ อมาเทโส, โยชนานํ สตํ, สหสฺสํ. สตํ นปุํสกเมกวจนนฺตญฺจ, ตถา สหสฺสํ, วคฺคเภเท สพฺพตฺถ พหุวจนมฺปิ ภวติ. ทฺเว วีสติโย. เอวํ ตึสาทีสุปิ, ทฺเว สตานิ, พหูนิ สตานิ, ทฺเว สหสฺสานิ, พหูนิ สหสฺสานิ. गणना में सम्मिलित दस-दस के अर्थ को कहने वाले दस शब्द का 'शत' (सौ) होता है, सौ-दस के अर्थ को कहने वाले दस का 'सहस्र' (हजार) होता है। इस निपातन से 'यो' का लोप होता है, तद्धित होने के कारण पुनः नाम संज्ञा होने पर 'सि' आदि की उत्पत्ति, निग्गहीत का लोप, 'सि' के स्थान पर 'अं' आदेश होकर 'योजनानं सतं' (सौ योजन), 'सहस्सं' (हजार योजन) बनता है। 'सतं' नपुंसक लिंग और एकवचनान्त है, वैसे ही 'सहस्सं' भी; वर्ग भेद होने पर सर्वत्र बहुवचन भी होता है। जैसे- 'द्वे वीसतियो' (दो बीस)। इसी प्रकार तीस आदि में भी, 'द्वे सतानि' (दो सौ), 'बहूनि सतानि' (बहुत सौ), 'द्वे सहस्सानी' (दो हजार), 'बहूनि सहस्सानी' (बहुत हजार)। สตสฺส ทฺวิกนฺติ อตฺเถ ฉฏฺฐีตปฺปุริสํ กตฺวา ‘‘สตํ ทฺวิก’’นฺติ วตฺตพฺเพ ‘‘ทฺวิกาทีนํ ตทุตฺตรปทานญฺจ นิปจฺจนฺเต’’ติ วุตฺติยํ วจนโต อิมินา นิปาตเนน อุตฺตรปทสฺส ปุพฺพนิปาโต, กการโลโป จ โหติ. ทฺวิสตํ. เอวํ สตสฺส ติกํ ติสตํ, ตถา จตุสตํ, ปญฺจสตํ, ฉสตํ, สตฺตสตํ, อฏฺฐสตํ, นวสตํ, ทสสตํ สหสฺสํ โหติ. อถ วา ทฺเว สตานิ ทฺวิสตนฺติ ทิคุสมาโส. เอวํ ติสตํ, จตุสตํ อิจฺจาทิ. 'सतस्स द्विकं' (सौ का दो) इस अर्थ में षष्ठी तत्पुरुष समास करके 'सतं द्विकं' कहना चाहिए, किन्तु 'द्विकादीनं तदुत्तरपदानञ्च निपच्चन्ते' इस वृत्ति के वचन से इस निपातन द्वारा उत्तरपद का पूर्व निपात और 'क' कार का लोप होता है। 'द्विसतं' (दो सौ)। इसी प्रकार सौ का तीन 'तिसतं' (तीन सौ), वैसे ही 'चतुसतं' (चार सौ), 'पञ्चसतं' (पाँच सौ), 'छसतं' (छह सौ), 'सत्तसतं' (सात सौ), 'अट्ठसतं' (आठ सौ), 'नवसतं' (नौ सौ), 'दससतं' (दस सौ) 'सहस्सं' (हजार) होता है। अथवा 'द्वे सतानि' 'द्विसतं' यह द्विगु समास है। इसी प्रकार 'तिसतं', 'चतुसतं' इत्यादि। ๔๑๖. ยาว ตทุตฺตริ ทสคุณิตญฺจ. ४१६. जहाँ तक उसके आगे है, वहाँ तक दस गुना भी। ยาว ตาสํ สงฺขฺยานมุตฺตริ, ตาว ทสคุณิตญฺจ กาตพฺพํ, เอตฺถ ทกาโร สนฺธิโช. ยถา – ทสสฺส คณนสฺส ทสคุณิตํ [Pg.253] สตํ โหติ, สตสฺส ทสคุณิตํ สหสฺสํ, สหสฺสสฺส ทสคุณิตํ ทสสหสฺสํ, อิทํ นหุตนฺติปิ วุจฺจติ, ทสสหสฺสสฺส ทสคุณิตํ สตสหสฺสํ, ตํ ลกฺขนฺติปิ วุจฺจติ, สตสหสฺสสฺส ทสคุณิตํ ทสสตสหสฺสํ. जहाँ तक उन संख्याओं के आगे है, वहाँ तक दस गुना करना चाहिए, यहाँ 'द' कार सन्धि से उत्पन्न है। जैसे - दस की गणना का दस गुना 'शत' (सौ) होता है, सौ का दस गुना 'सहस्र' (हजार), हजार का दस गुना 'दससहस्र' (दस हजार), इसे 'नहुत' भी कहा जाता है, दस हजार का दस गुना 'शतसहस्र' (लाख), इसे 'लक्ख' भी कहा जाता है, लाख का दस गुना 'दसशतसहस्र' (दस लाख) होता है। ‘‘ยทนุปปนฺนา นิปาตนา สิชฺฌนฺตี’’ติ วตฺตเต. "जो सिद्ध नहीं होते, वे निपातन से सिद्ध होते हैं" - यह अनुवृत्ति आती है। ๔๑๗. สกนาเมหิ. ४१७. अपने नामों से। ยาสํ ปน สงฺขฺยานํ อนิทฺทิฏฺฐนามเธยฺยานํ ยานิ รูปานิ, ตานิ สเกหิ นาเมหิ นิปจฺจนฺเต. สตสหสฺสานํ สตํ โกฏิ, อิตฺถิลิงฺคา, เอกวจนนฺตา จ, วคฺคเภเท พหุวจนญฺจ ภวติ, โกฏิสตสหสฺสานํ สตํ ปโกฏิ, ปโกฏิสตสหสฺสานํ สตํ โกฏิปฺปโกฏิ. เอวํ นหุตํ, นินฺนหุตํ, อกฺโขภินี, พินฺทุ, อพฺพุทํ, นิรพฺพุทํ, อหหํ, อพพํ, อฏฏํ, โสคนฺธิกํ, อุปฺปลํ, กุมุทํ, ปุณฺฑรีกํ, ปทุมํ, กถานํ, มหากถานํ, อสงฺขฺเยยฺยนฺติ. जिन संख्याओं के नाम निर्दिष्ट नहीं हैं, उनके जो रूप हैं, वे अपने नामों से निपातित होते हैं। सौ लाख (शतसहस्र) की एक 'कोटि' (करोड़) होती है, यह स्त्रीलिंग और एकवचनान्त है, और वर्ग भेद होने पर बहुवचन भी होता है। सौ लाख कोटि की एक 'पकोटि', सौ लाख पकोटि की एक 'कोटिप्पकोटि' होती है। इसी प्रकार नहुत, निन्नहुत, अक्खोभिनी, बिन्दु, अब्बुद, निरब्बुद, अहह, अबब, अटट, सोगन्धिक, उप्पल, कुमुद, पुण्डरीक, पदुम, कथान, महाकथान, असंख्येय। อิจฺเจวํ ฐานโต ฐานํ, สตลกฺขคุณํ มตํ; โกฏิปฺปภุตินํ วีส-สงฺขฺยานญฺจ ยถากฺกมํ. इस प्रकार स्थान-स्थान पर, कोटि आदि बीस संख्याओं को क्रमशः सौ लाख (एक करोड़) गुना माना गया है। ‘‘ทฺเว ปริมาณานิ เอตสฺสา’’ติ วิคฺคเห – "दो परिमाण हैं इसके" - इस विग्रह में - ๔๑๘. ทฺวาทิโต โกเนกตฺเถ จ. ४१८. 'द्वि' आदि से 'क' प्रत्यय अनेक अर्थ में भी। ทฺวิอิจฺเจวมาทิโต คณนโต กปฺปจฺจโย โหติ อเนกตฺเถ. ทฺวิโก ราสิ ทฺวิกํ. เอวํ ติกํ, จตุกฺกํ, ปญฺจกํ, ฉกฺกํ, สตฺตกํ, อฏฺฐกํ, นวกํ, ทสกํ, ปณฺณาสกํ, สตกํ, สหสฺสกํ อิจฺจาทิ. 'द्वि' इत्यादि गणनावाचक शब्दों से अनेक अर्थ में 'क' प्रत्यय होता है। 'द्विको रासि' (दो का समूह) 'द्विकं'। इसी प्रकार तिकं, चतुक्कं, पञ्चकं, छक्कं, सत्तकं, अट्ठकं, नवकं, दसकं, पण्णासकं, सतकं, सहस्सकं इत्यादि। สงฺขฺยาตทฺธิตํ. संख्या तद्धित। อพฺยยตทฺธิต अव्यय तद्धित। ‘‘เอกสฺมึ [Pg.254] วาเร ภุญฺชติ, ทฺวิวาเร ภุญฺชตี’’ติ วิคฺคเห – "एक बार खाता है, दो बार खाता है" - इस विग्रह में - ๔๑๙. เอกาทิโต สกิสฺส กฺขตฺตุํ. ४१९. 'एक' आदि से 'सकिं' (एक बार) के अर्थ में 'क्खत्तुं' प्रत्यय। เอกทฺวิติอิจฺเจวมาทิโต คณนโต สกิสฺส ฐาเน วารตฺเถ กฺขตฺตุํปจฺจโย โหติ. เอกกฺขตฺตุํ, ทฺวิกฺขตฺตุํ ภุญฺชติ, ‘‘สพฺพาสมาวุโส’’ติอาทินา สิโลโป. เอวํ ติกฺขตฺตุํ, จตุกฺขตฺตุํ, ปญฺจกฺขตฺตุํ, ฉกฺขตฺตุํ, สตฺตกฺขตฺตุํ, อฏฺฐกฺขตฺตุํ, นวกฺขตฺตุํ, ทสกฺขตฺตุํ, สตกฺขตฺตุํ, สหสฺสกฺขตฺตุํ, พหุกฺขตฺตุํ, กติกฺขตฺตุํ. 'एक', 'द्वि', 'ति' इत्यादि गणनावाचक शब्दों से 'सकिं' के स्थान पर 'वार' (बार) अर्थ में 'क्खत्तुं' प्रत्यय होता है। 'एकक्खत्तुं' (एक बार), 'द्विक्खत्तुं' (दो बार) खाता है, "सब्बासमावुसो" इत्यादि सूत्र से 'सि' का लोप होता है। इसी प्रकार तिक्खत्तुं, चतुक्खत्तुं, पञ्चक्खत्तुं, छक्खत्तुं, सत्तक्खत्तुं, अट्ठक्खत्तुं, नवक्खत्तुं, दसक्खत्तुं, सतक्खत्तुं, सहस्सक्खत्तुं, बहुक्खत्तुं, कतिक्खत्तुं। ‘‘เอเกน วิภาเคนา’’ติ วิคฺคเห – "एक विभाग से" - इस विग्रह में - มณฺฑูกคติยา สงฺขฺยาคฺคหณมนุวตฺตเต. मण्डूकगति से 'संख्या' ग्रहण की अनुवृत्ति आती है। ๔๒๐. วิภาเค ธา จ. ४२०. विभाग अर्थ में 'धा' प्रत्यय भी। วิภาคตฺเถ เอกาทิสงฺขฺยาโต ธาปจฺจโย โหติ. จสทฺเทน เอกทฺวิโต ชฺฌ จ, สุตฺตาทิโต โส จ. เอกธา. ทฺวีหิ วิภาเคหิ ทฺวิธา, ทุธา วา, ทฺเวธา. ตีหิ วิภาเคหิ ติธา, เตธา วา, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อิการสฺเสกาโร. เอวํ จตุธา, ปญฺจธา, ฉธา, สตฺตธา, อฏฺฐธา, นวธา, ทสธา, สตธา, สหสฺสธา, กติธา, พหุธา. विभाग अर्थ में 'एक' आदि संख्याओं से 'धा' प्रत्यय होता है। 'च' शब्द से 'एक' और 'द्वि' से 'ज्झ' भी, और 'सुत्त' आदि से 'सो' भी होता है। 'एकधा'। दो विभागों से 'द्विधा', 'दुधा' अथवा 'द्वेधा'। तीन विभागों से 'तिधा' अथवा 'तेधा', "तेसु वुद्धी" इत्यादि सूत्र से इकार को एकार होता है। इसी प्रकार चतुधा, पञ्चधा, छधा, सत्तधा, अट्ठधा, नवधा, दसधा, सतधा, सहस्सधा, कतिधा, बहुधा। ชฺฌปฺปจฺจเย เอกธา กโรตีติ เอกชฺฌํ. เอวํ ทฺเวชฺฌํ. 'ज्झ' प्रत्यय होने पर 'एकधा करोति' (एक साथ करता है) इस अर्थ में 'एकज्झं'। इसी प्रकार 'द्वेज्झं'। โสปจฺจเย สุตฺเตน วิภาเคน สุตฺตโส. เอวํ พฺยญฺชนโส, ปทโส, อตฺถโส, พหุโส, สพฺพากาเรน สพฺพโส[Pg.255], อุปายโส, เหตุโส, ฐานโส, โยนิโส. 'सो' प्रत्यय होने पर 'सुत्तेन विभागेन' (सूत्र के विभाग से) 'सुत्तसो'। इसी प्रकार ब्यञ्जनसो, पदसो, अत्थसो, बहुसो, सबाकारेण 'सब्बसो', उपायसो, हेतुसो, ठानसो, योनिसो। ๔๒๑. สพฺพนาเมหิ ปการวจเน ตุ ถา. ४२१. सर्वनामों से प्रकार (तरह) अर्थ में 'था' प्रत्यय। สพฺพนาเมหิ ปการวจนตฺเถ ถาปจฺจโย โหติ, ตุสทฺเทน ถตฺตาปจฺจโย จ. สามญฺญสฺส เภทโก วิเสโส ปกาโร, ตสฺสาภิธาเนติ อตฺโถ, โส ปกาโร ตถา, ตํ ปการํ ตถา, เตน ปกาเรน ตถา, เยน ปกาเรน ยถา. เอวํ สพฺพถา, อญฺญถา, อิตรถา, อุภยถา, ถตฺตาปจฺจเย เตน ปกาเรน ตถตฺตา. เอวํ ยถตฺตา, อญฺญถตฺตา. सर्वनामों से प्रकार अर्थ में 'था' प्रत्यय होता है, 'तु' शब्द से 'थत्ता' प्रत्यय भी। सामान्य का भेदक विशेष 'प्रकार' है, उसका कथन अर्थ है; वह प्रकार 'तथा' (उस तरह), उस प्रकार को 'तथा', उस प्रकार से 'तथा', जिस प्रकार से 'यथा'। इसी प्रकार सब्बथा, अञ्ञथा, इतरथा, उभयथा; 'थत्ता' प्रत्यय होने पर उस प्रकार से 'तथत्ता'। इसी प्रकार यथत्ता, अञ्ञथत्ता। โก ปกาโรติ อตฺเถ – "कौन सा प्रकार?" - इस अर्थ में - ๔๒๒. กิมิเมหิ ถํ. ४२२. 'किं' और 'इम' से 'थं' प्रत्यय। กึอิมอิจฺเจเตหิ ถํปจฺจโย โหติ ปการวจนตฺเถ. ‘‘กิสฺส ก เว จา’’ติ เอตฺถ จสทฺเทน กิสฺส กาเทโส. กถํ, กํ ปการํ กถํ, เกน ปกาเรน กถํ, อยํ ปกาโร อิตฺถํ, อิมํ ปการํ อิตฺถํ. อเนน ปกาเรน อิตฺถํ, ‘‘อิมสฺสิ ถํ ทานิห โต เธสุ จา’’ติ อิมสทฺทสฺส อิกาโร, ทฺวิตฺตํ. เอตฺถ หิ กฺขตฺตุํ อาทิถํปริโยสานปฺปจฺจยนฺตานํ อพฺยยตทฺธิตตฺตา นามพฺยปเทสํ กตฺวา วิภตฺติมฺหิ กเต ‘‘สพฺพาสมาวุโส’’ติอาทินา วิภตฺติโลโป, ‘‘กฺวจิ โต ปญฺจมฺยตฺเถ’’ติอาทินา วุตฺตโตอาทิปฺปจฺจยนฺตา จ อิเธว อพฺยยตทฺธิเต สงฺคยฺหนฺติ. 'किं' और 'इम' इन शब्दों से प्रकार अर्थ में 'थं' प्रत्यय होता है। "किस्स क वे च" यहाँ 'च' शब्द से 'किं' को 'क' आदेश होता है। 'कथं' (कैसे), किस प्रकार को 'कथं', किस प्रकार से 'कथं'; यह प्रकार 'इत्थं' (इस तरह), इस प्रकार को 'इत्थं', इस प्रकार से 'इत्थं'; "इमस्सि थं दानिह तो धेसु च" इस सूत्र से 'इम' शब्द के इकार को द्वित्व होता है। यहाँ 'क्खत्तुं' आदि से लेकर 'थं' पर्यन्त प्रत्ययान्त शब्दों के अव्यय तद्धित होने के कारण नाम संज्ञा करके विभक्ति आने पर "सब्बासमावुसो" इत्यादि सूत्र से विभक्ति का लोप होता है, "क्वचि तो पञ्चम्यत्थे" इत्यादि सूत्र से कहे गए 'तो' आदि प्रत्ययान्त शब्द भी इसी अव्यय तद्धित में संगृहीत होते हैं। ๔๒๓. ยทนุปปนฺนา [Pg.256] นิปาตนา สิชฺฌนฺติ. ४२३. जो (नियमों से) सिद्ध नहीं होते, वे निपातन से सिद्ध होते हैं। เย สทฺทา ลกฺขเณน อนุปปนฺนา อนิทฺทิฏฺฐลกฺขณา อกฺขราทิโต, นาโมปสคฺคนิปาตโต วา สมาสตทฺธิตาทิโต วา, เต นิปาตนา สิชฺฌนฺติ. जो शब्द व्याकरण के लक्षणों (नियमों) से सिद्ध नहीं होते, जिनके लक्षण अक्षरों, नाम, उपसर्ग, निपात, समास या तद्धित आदि के माध्यम से निर्दिष्ट नहीं किए गए हैं, वे 'निपातन' (अपवाद स्वरूप) सिद्ध होते हैं। ตทฺธิตโต ตาว – पहले तद्धित के विषय में – อิมสฺมา ชฺช สิยา กาเล, สมานาปรโต ชฺชุ จ; อิมสทฺทสฺส’กาโร จ, สมานสฺส จ โส สิยา. 'इम' (imasma) से काल अर्थ में 'ज्ज' (jja) प्रत्यय होता है, और 'समान' तथा 'अपर' से 'ज्जु' (jju) प्रत्यय होता है; 'इम' के स्थान पर 'अ' (a-kāra) और 'समान' के स्थान पर 'स' (sa) आदेश होता है। อิมสฺมึ กาเล, อิมสฺมึ ทิวเส วา อชฺช, สมาเน กาเล สชฺชุ, อปรสฺมึทิวเส อปรชฺชุ. นิปาเตหิ ภวตฺเถ ตนปฺปจฺจโย. อชฺช ภวํ อชฺชตนํ, อชฺช ภวา อชฺชตนี, สฺเว ภวํ สฺวาตนํ. เอวํ ปุราตนํ, หิยฺโย ภวํ หิยฺยตฺตนํ, หิยฺโย ภวา หิยฺยตฺตนี อิจฺจาทิ. इस काल में या इस दिन में - 'अज्ज' (ajja), समान काल में - 'सज्जु' (sajju), दूसरे दिन में - 'अपरज्जु' (aparajju)। निपातों से 'होने' (भव) के अर्थ में 'तन' (tana) प्रत्यय होता है। आज होने वाला - 'अज्जतनं' (ajjatanaṃ), आज होने वाली - 'अज्जतनी' (ajjatanī), कल होने वाला - 'स्वातनं' (svātanaṃ)। इसी प्रकार 'पुरातनं' (purātanaṃ), कल (बीता हुआ) होने वाला - 'हिय्यत्तनं' (hiyyattanaṃ), कल होने वाली - 'हिय्यत्तनी' (hiyyattanī) इत्यादि। อพฺยยตทฺธิตํ. अव्यय तद्धित। สามญฺญวุตฺติภาวตฺถา-พฺยยโต ตทฺธิตํ ติธา; ตตฺราทิ จตุธาปจฺจา-เนกตฺถสฺสตฺถิสงฺขฺยาโต. सामान्य वृत्ति, भाव अर्थ और अव्यय के आधार पर तद्धित तीन प्रकार का है; उनमें से पहला (सामान्य तद्धित) अनेक अर्थों, अस्ति (होना) और संख्या के आधार पर चार प्रकार के प्रत्ययों वाला है। อิติ ปทรูปสิทฺธิยํ ตทฺธิตกณฺโฑ इस प्रकार पदरूपसिद्धि में तद्धित काण्ड (अध्याय) ปญฺจโม. पाँचवाँ (समाप्त हुआ)। ๖. อาขฺยาตกณฺฑ ६. आख्यात काण्ड (क्रिया प्रकरण)। ภูวาทิคณ भूवादि गण। วิภตฺติวิธาน विभक्ति विधान। อถ [Pg.257] อาขฺยาตวิภตฺติโย กฺริยาวาจีหิ ธาตูหิ ปรา วุจฺจนฺเต. अब, क्रियावाची धातुओं के बाद आख्यात विभक्तियाँ कही जाती हैं। ตตฺถ กฺริยํ อาจิกฺขตีติ อาขฺยาตํ, กฺริยาปทํ. วุตฺตญฺหิ ‘‘กาลการกปุริสปริทีปกํ กฺริยาลกฺขณมาขฺยาติก’’นฺติ. ตตฺถ กาโลติ อตีตาทโย, การกมิติ กมฺมกตฺตุภาวา, ปุริสาติ ปฐมมชฺฌิมุตฺตมา, กฺริยาติ คมนปจนาทิโก ธาตฺวตฺโถ, กฺริยาลกฺขณํ สญฺญาณํ เอตสฺสาติ กฺริยาลกฺขณํ, อติลิงฺคญฺจ. वहाँ जो क्रिया को कहता है वह 'आख्यात' है, अर्थात् क्रियापद। जैसा कि कहा गया है— "काल, कारक और पुरुष को प्रकाशित करने वाला, क्रिया के लक्षण वाला आख्यात है।" वहाँ 'काल' से तात्पर्य अतीत आदि से है, 'कारक' से कर्म, कर्ता और भाव, 'पुरुष' से प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष, 'क्रिया' से गमन, पचन आदि धातु का अर्थ, और 'क्रिया-लक्षण' का अर्थ है जिसका लक्षण (पहचान) क्रिया है, और यह लिंग से रहित (अतिलिंग) होता है। วุตฺตมฺปิ เจตํ – यह भी कहा गया है – ‘‘ยํ ติกาลํ ติปุริสํ, กฺริยาวาจิ ติการกํ; อติลิงฺคํ ทฺวิวจนํ, ตทาขฺยาตนฺติ วุจฺจตี’’ติ. "जो तीन कालों, तीन पुरुषों, तीन कारकों वाला, क्रियावाची, लिंग-रहित और दो वचनों (एकवचन और बहुवचन) वाला है, उसे 'आख्यात' कहा जाता है।" กาลาทิวเสน ธาตฺวตฺถํ วิภชนฺตีติ วิภตฺติโย, ตฺยาทโย, ตา ปน วตฺตมานา ปญฺจมี สตฺตมี ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนี อชฺชตนี ภวิสฺสนฺตี กาลาติปตฺติ จาติ อฏฺฐวิธา ภวนฺติ. काल आदि के अनुसार धातु के अर्थ को विभाजित करने वाली 'विभक्तियाँ' (ति-आदि) कहलाती हैं। वे आठ प्रकार की होती हैं: वर्तमाना, पंचमी, सप्तमी, परोक्षा, हिय्यत्तनी, अज्जतनी, भविस्सती और कालातिपत्ति। กฺริยํ ธาเรนฺตีติ ธาตโว, ภูวาทโย, ขาทิธาตุปฺปจฺจยนฺตา จ, เต ปน อตฺถวสา ทฺวิธา ภวนฺติ สกมฺมกา, อกมฺมกา จาติ. ตตฺร สกมฺมกา เย ธาตโวกมฺมาเปกฺขํ กฺริยํ วทนฺติ, ยถา – กฏํ กโรติ, คามํ คจฺฉติ, โอทนํ ปจตีติอาทโย, อกมฺมกา เย กมฺมนิรเปกฺขํ กฺริยํ วทนฺติ, ยถา – อจฺฉติ, เสติ, ติฏฺฐตีติอาทโย. जो क्रिया को धारण करते हैं वे 'धातु' हैं, जैसे भू आदि, और खादि धातु प्रत्ययांत। वे अर्थ के अनुसार दो प्रकार के होते हैं: सकर्मक और अकर्मक। उनमें से सकर्मक वे धातु हैं जो कर्म की अपेक्षा रखने वाली क्रिया को कहते हैं, जैसे— चटाई बनाता है (कटं करोति), गाँव जाता है (गामं गच्छति), भात पकाता है (ओदनं पचति) इत्यादि। अकर्मक वे हैं जो कर्म की अपेक्षा न रखने वाली क्रिया को कहते हैं, जैसे— बैठता है (अच्छति), सोता है (सेति), खड़ा होता है (तिट्ठति) इत्यादि। เต [Pg.258] ปน สตฺตวิธา ภวนฺติ วิกรณปฺปจฺจยเภเทน, กถํ? อวิกรณา ภูวาทโย. นิคฺคหีตปุพฺพกอวิกรณา รุธาทโย, ยวิกรณา ทิวาทโย, ณุณา อุณาวิกรณา สฺวาทโย, นาปฺปณฺหาวิกรณา กิยาทโย, โอยิรวิกรณา ตนาทโย, สกตฺเถ เณ ณยนฺตา จุราทโยติ. वे विकरण प्रत्ययों के भेद से सात प्रकार के होते हैं। कैसे? भू-आदि अविकरण (बिना विकरण के), रुध-आदि निग्गृहीत-पूर्वक अविकरण, दिव-आदि 'य' विकरण वाले, सु-आदि 'णु, णा, उणा' विकरण वाले, कि-आदि 'ना, प्प, ण्हा' विकरण वाले, तन-आदि 'ओ, यिर' विकरण वाले, और चुर-आदि स्वार्थ में 'णे, णय' प्रत्यय वाले। ตตฺถ ปฐมํ อวิกรเณสุ ภูวาทีสุ ธาตูสุ ปฐมภูตา อกมฺมกา ภูอิจฺเจตสฺมา ธาตุโต ตฺยาทโย ปรา โยชียนฺเต. उनमें से पहले, अविकरण भू-आदि धातुओं में प्रथम अकर्मक 'भू' इस धातु से 'ति' आदि (विभक्तियाँ) बाद में जोड़ी जाती हैं। ภูสตฺตายํ, ‘‘ภู’’อิจฺจยํ ธาตุ สตฺตายมตฺเถ วตฺตเต, กฺริยาสามญฺญภูเต ภวเน วตฺตเตติ อตฺโถ. 'भू सत्तायां' (होने के अर्थ में), 'भू' यह धातु सत्ता (अस्तित्व) के अर्थ में प्रयुक्त होती है; इसका अर्थ है सामान्य क्रिया रूप 'होने' (भवन) में प्रयुक्त होना। ‘‘ภู’’อิติ ฐิเต – 'भू' ऐसा स्थित होने पर – ๔๒๔. ภูวาทโย ธาตโว. ४२४. भू-आदि धातु हैं। ภูอิจฺเจวมาทโย เย กฺริยาวาจิโน สทฺทคณา, เต ธาตุสญฺญา โหนฺติ. ภู อาทิ เยสํ เต ภูวาทโย, อถ วา ภูวา อาที ปการา เยสํ เต ภูวาทโย. 'भू' इत्यादि जो क्रियावाची शब्द-समूह हैं, उनकी 'धातु' संज्ञा होती है। जिनके आदि में 'भू' है वे 'भूवादि' हैं, अथवा 'भू' और 'वा' जिनके आदि प्रकार हैं वे 'भूवादि' हैं। ภูวาทีสุ วกาโรยํ, เญยฺโย อาคมสนฺธิโช; ภูวาปฺปการา วา ธาตู, สกมฺมากมฺมกตฺถโต. 'भूवादि' में यह 'व' कार आगम संधि से उत्पन्न समझना चाहिए; अथवा सकर्मक और अकर्मक अर्थ के कारण धातु 'भू' और 'वा' के प्रकार वाली हैं। ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทิโต ‘‘กฺวจี’’ติ วตฺตเต. 'क्वचि धातु' इत्यादि सूत्र से 'क्वचि' (कहीं) की अनुवृत्ति आती है। ๔๒๕. ธาตุสฺสนฺโต โลโปเนกสฺสรสฺส. ४२५. अनेक स्वरों वाली धातु के अंत का लोप होता है। อเนกสฺสรสฺส ธาตุสฺส อนฺโต กฺวจิ โลโป โหติ. अनेक स्वरों वाली धातु के अंत का कहीं लोप होता है। กฺวจิคฺคหณํ ‘‘มหียติ สมโถ’’ติอาทีสุ นิวตฺตนตฺถํ, อิติ อเนกสฺสรตฺตาภาวา อิธ ธาตฺวนฺตโลโป น โหติ. 'क्वचि' का ग्रहण 'महीयति समथो' इत्यादि में (लोप को) रोकने के लिए है, क्योंकि यहाँ अनेक स्वर न होने के कारण धातु के अंत का लोप नहीं होता है। ตโต [Pg.259] ธาตฺวาธิการวิหิตาเนกปฺปจฺจยปฺปสงฺเค ‘‘วตฺติจฺฉานุปุพฺพิกา สทฺทปฺปฏิปตฺตี’’ติ กตฺวา วตฺตมานวจนิจฺฉายํ – उसके बाद, धातु के अधिकार में विहित अनेक प्रत्ययों की प्राप्ति होने पर, "वक्ता की इच्छा के अनुसार शब्दों का प्रयोग होता है" इस नियम से वर्तमान काल कहने की इच्छा होने पर – ๔๒๖. วตฺตมานา ติอนฺติ, สิถ, มิม, เตอนฺเต, เสวฺเห, เอมฺเห. ४२६. वर्तमान (काल) के प्रत्यय हैं: ति-अन्ति, सि-थ, मि-म, ते-अन्ते, से-व्हे, ए-म्हे। ตฺยาทโย ทฺวาทส วตฺตมานาสญฺญา โหนฺตีติ ตฺยาทีนํ วตฺตมานตฺถวิสยตฺตา วตฺตมานาสญฺญา. 'ति' आदि बारह प्रत्यय 'वर्तमान' संज्ञा वाले होते हैं; क्योंकि 'ति' आदि वर्तमान अर्थ के विषय में होते हैं, इसलिए उनकी 'वर्तमान' संज्ञा है। ๔๒๗. กาเล. ४२७. काल में। อยมธิกาโร. यह अधिकार (सूत्र) है। อิโต ปรํ ตฺยาทิวิภตฺติวิธาเน สพฺพตฺถ วตฺตเต. इसके बाद 'ति' आदि विभक्तियों के विधान में यह सर्वत्र प्रवृत्त होता है। ๔๒๘. วตฺตมานา ปจฺจุปฺปนฺเน. ४२८. वर्तमान काल में (वर्तमान विभक्ति होती है)। ปจฺจุปฺปนฺเน กาเล คมฺยมาเน วตฺตมานาวิภตฺติ โหติ, กาโลติ เจตฺถ กฺริยา, กรณํ กาโร, รการสฺส ลกาโร, กาโล. वर्तमान काल के प्रतीत होने पर वर्तमान विभक्ति होती है; यहाँ 'काल' का अर्थ क्रिया है, 'करण' (साधन) 'कार' है, 'र' कार का 'ल' कार होने पर 'काल' बनता है। ตสฺมา – इसलिए – กฺริยาย คมฺยมานาย, วิภตฺตีนํ วิธานโต; ธาตูเหว ภวนฺตีติ, สิทฺธํ ตฺยาทิวิภตฺติโย. क्रिया के प्रतीत होने पर, विभक्तियों के विधान से; वे धातुओं से ही होती हैं, यह 'ति' आदि विभक्तियों के विषय में सिद्ध है। อิธ ปน กาลสฺส อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนาณตฺติปริกปฺปกาลาภิปตฺติวเสน ฉธา ภินฺนตฺตา ‘‘ปจฺจุปฺปนฺเน’’ติ วิเสเสติ. ตํ ตํ การณํ ปฏิจฺจ อุปฺปนฺโน ปจฺจุปฺปนฺโน, ปฏิลทฺธสภาโว, น ตาว อตีโตติ อตฺโถ. यहाँ काल के अतीत, अनागत, वर्तमान, आज्ञा (आणत्ति), परिकल्प और कालातिपत्ति के भेद से छह प्रकार का होने के कारण 'वर्तमान' (पच्चुप्पन्ने) ऐसा विशेषण दिया गया है। उन-उन कारणों को प्राप्त कर जो उत्पन्न हुआ है वह 'वर्तमान' है, जिसने अपना स्वभाव प्राप्त कर लिया है और जो अभी तक अतीत नहीं हुआ है, यह इसका अर्थ है। ปจฺจุปฺปนฺนสมีเปปิ, ตพฺโพหารูปจารโต; วตฺตมานา อตีเตปิ, ตํกาลวจนิจฺฉยาติ. वर्तमान के समीप होने पर भी, उस व्यवहार के उपचार से; अतीत में भी वर्तमान विभक्ति होती है, यदि उस काल को कहने की इच्छा हो। ตสฺมึ ปจฺจุปฺปนฺเน วตฺตมานาวิภตฺตึ กตฺวา, ตสฺสา ฐานานิยเม ‘‘ธาตุลิงฺเคหิ ปรา ปจฺจยา’’ติ ปริภาสโต ธาตุโต [Pg.260] ปรํ วตฺตมานปฺปจฺจเย กตฺวา, เตสมนิยมปฺปสงฺเคสติ ‘‘วตฺติจฺฉานุปุพฺพิกา สทฺทปฺปฏิปตฺตี’’ติ ปรสฺสปทวจนิจฺฉายํ – उस वर्तमान काल में वर्तमान विभक्ति करके, उसके स्थान के अनियम होने पर 'धातु और लिंग से परे प्रत्यय होते हैं' इस परिभाषा से धातु के बाद वर्तमान प्रत्यय करके, उनके अनियम का प्रसंग होने पर 'शब्द की प्रवृत्ति वक्ता की इच्छा के अनुसार होती है' इस न्याय से परस्मैपद कहने की इच्छा होने पर – ๔๒๙. อถ ปุพฺพานิ วิภตฺตีนํ ฉ ปรสฺสปทานิ. ४२९. अब विभक्तियों के पूर्व के छह (पद) 'परस्मैपद' हैं। อถ ตทฺธิตานนฺตรํ วุจฺจมานานํ สพฺพาสํ วตฺตมานาทีนํ อฏฺฐวิธานํ วิภตฺตีนํ ยานิ ยานิ ปุพฺพกานิ ฉ ปทานิ, ตานิ ตานิ อตฺถโต อฏฺฐจตฺตาลีสมตฺตานิ ปรสฺสปทสญฺญานิ โหนฺตีติอาทิมฺหิ ฉนฺนํ ปรสฺสปทสญฺญา, ปรสฺสตฺถานิ ปทานิ ปรสฺสปทานิ, ตพฺพาหุลฺลโต ตพฺโพหาโร. अब तद्धित के बाद कही जाने वाली सभी वर्तमान आदि आठ प्रकार की विभक्तियों के जो-जो पूर्व के छह पद हैं, वे अर्थतः लगभग अड़तालीस 'परस्मैपद' संज्ञा वाले होते हैं; इस प्रकार आदि के छह की 'परस्मैपद' संज्ञा होती है। दूसरों के लिए प्रयुक्त होने वाले पद 'परस्मैपद' कहलाते हैं, उनकी बहुलता के कारण यह व्यवहार होता है। ‘‘ธาตูหิ เณ ณย’’อิจฺจาทิโต ‘‘ธาตูหี’’ติ วตฺตมาเน – 'धातुओं से णे, णय' इत्यादि (सूत्र) से 'धातुओं से' (धातूहि) पद की अनुवृत्ति होने पर – ๔๓๐. กตฺตริ ปรสฺสปทํ. ४३०. कर्ता अर्थ में परस्मैपद होता है। กตฺตริการเก อภิเธยฺเย สพฺพธาตูหิ ปรสฺสปทํ โหตีติ ปรสฺสปทํ กตฺวา, ตสฺสาปฺยนิยมปฺปสงฺเค วตฺติจฺฉาวสา – कर्ता कारक के अभिधेय होने पर सभी धातुओं से परस्मैपद होता है, ऐसा परस्मैपद करके, उसके भी अनियम के प्रसंग में वक्ता की इच्छा के वश – วิปริณาเมน ‘‘ปรสฺสปทานํ, อตฺตโนปทาน’’นฺติ จ วตฺตเต. विभक्ति परिणाम से 'परस्मैपदों का' और 'आत्मनेपदों का' ऐसा अनुवर्तन होता है। ๔๓๑. ทฺเว ทฺเว ปฐมมชฺฌิมุตฺตมปุริสา. ४३१. दो-दो (पद) क्रमशः प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष होते हैं। ตาสํ วิภตฺตีนํ ปรสฺสปทาน’มตฺตโนปทานญฺจ ทฺเว ทฺเว วจนานิ ยถากฺกมํ ปฐมมชฺฌิมุตฺตมปุริสสญฺญานิ โหนฺติ. ตํ ยถา? ติ อนฺติอิติ ปฐมปุริสา, สิ ถอิติ มชฺฌิมปุริสา, มิ มอิติ อุตฺตมปุริสา. อตฺตโนปเทสุปิ เต อนฺเตอิติ ปฐมปุริสา, เส วฺเหอิติ มชฺฌิมปุริสา, เอ มฺเหอิติ อุตฺตมปุริสา. เอวํ เสสาสุ สตฺตสุ วิภตฺตีสุปิ โยเชตพฺพนฺติ[Pg.261]. เอวํ อฏฺฐวิภตฺติวเสน ฉนฺนวุติวิเธ อาขฺยาตปเท ทฺวตฺตึส ทฺวตฺตึส ปฐมมชฺฌิมอุตฺตมปุริสา โหนฺตีติ วตฺตมานปรสฺสปทาทิมฺหิ ทฺวินฺนํ ปฐมปุริสสญฺญา. उन विभक्तियों के परस्मैपद और आत्मनेपद के दो-दो वचन यथाक्रम प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष संज्ञा वाले होते हैं। वह कैसे? 'ति-अन्ति' प्रथम पुरुष हैं, 'सि-थ' मध्यम पुरुष हैं, 'मि-म' उत्तम पुरुष हैं। आत्मनेपद में भी 'ते-अन्ते' प्रथम पुरुष हैं, 'से-व्हे' मध्यम पुरुष हैं, 'ए-म्हे' उत्तम पुरुष हैं। इसी प्रकार शेष सात विभक्तियों में भी योजन करना चाहिए। इस प्रकार आठ विभक्तियों के भेद से छियानवे प्रकार के आख्यात पदों में बत्तीस-बत्तीस प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष होते हैं; इस प्रकार वर्तमान परस्मैपद आदि में दो (वचनों) की प्रथम पुरुष संज्ञा होती है। ๔๓๒. นามมฺหิ ปยุชฺชมาเนปิตุลฺยาธิกรเณ ปฐโม. ४३२. समान अधिकरण वाले नाम के प्रयुक्त होने पर भी प्रथम (पुरुष) होता है। ตุมฺหามฺหสทฺทวชฺชิเต ตุลฺยาธิกรณภูเต สาธกวาจเก นามมฺหิ ปยุชฺชมาเนปิ อปฺปยุชฺชมาเนปิ ธาตูหิ ปฐมปุริโส โหตีติ ปฐมปุริสํ กตฺวา, ตสฺสาปฺยนิยมปฺปสงฺเค กฺริยาสาธกสฺส กตฺตุโน เอกตฺเต วตฺตุมิจฺฉิเต ‘‘เอกมฺหิ วตฺตพฺเพ เอกวจน’’นฺติ วตฺตมานปรสฺสปทปฐมปุริเสกวจนํ ติ. 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों को छोड़कर, समान अधिकरण वाले साधक-वाचक नाम के प्रयुक्त होने पर अथवा प्रयुक्त न होने पर भी धातुओं से प्रथम पुरुष होता है; ऐसा प्रथम पुरुष करके, उसके भी अनियम के प्रसंग में क्रिया के साधक कर्ता के एकत्व को कहने की इच्छा होने पर 'एक के कहे जाने पर एकवचन होता है' इस नियम से वर्तमान परस्मैपद प्रथम पुरुष एकवचन 'ति' होता है। ‘‘ปโร, ปจฺจโย, ธาตู’’ติ จ อธิกาโร, ‘‘ยถา กตฺตริ จา’’ติ อิโต ‘‘กตฺตรี’’ติ วิกรณปฺปจฺจยวิธาเน สพฺพตฺถ วตฺตเต. 'पर', 'प्रत्यय' और 'धातु' का अधिकार है, तथा 'यथा कर्तरि च' यहाँ से 'कर्तरि' (कर्ता में) पद विकरण प्रत्यय के विधान में सर्वत्र अनुवृत्त होता है। ๔๓๓. ภูวาทิโต อ. ४३३. भू आदि (धातुओं) से 'अ' (प्रत्यय होता है)। ภูอิจฺเจวมาทิโต ธาตุคณโต ปโร อปจฺจโย โหติ กตฺตริ วิหิเตสุ วิภตฺติปฺปจฺจเยสุ ปเรสุ. สพฺพธาตุกมฺหิเยวายมิสฺสเต. भू इत्यादि धातुगणों से परे 'अ' प्रत्यय होता है, जब कर्ता अर्थ में विहित विभक्ति प्रत्यय परे हों। यह केवल सार्वधातुक में ही देखा जाता है। ‘‘อสํโยคนฺตสฺส, วุทฺธี’’ติ จ วตฺตเต. 'असंयोगान्तस्य' और 'वृद्धि' पदों की अनुवृत्ति होती है। ๔๓๔. อญฺเญสุ จ. ४३४. और अन्यों में भी। การิตโต อญฺเญสุ ปจฺจเยสุ อสํโยคนฺตานํ ธาตูนํ วุทฺธิ โหติ. จคฺคหเณน ณุปฺปจฺจยสฺสาปิ วุทฺธิ โหติ. เอตฺถ จ ‘‘ฆฏาทีนํ วา’’ติ อิโต วาสทฺโท อนุวตฺเตตพฺโพ, โส จ ววตฺถิตวิภาสตฺโถ. เตน – कारित (प्रत्ययों) से भिन्न प्रत्ययों के परे होने पर असंयोगान्त धातुओं की वृद्धि होती है। 'च' ग्रहण से 'णु' प्रत्यय में भी वृद्धि होती है। और यहाँ 'घटादीनां वा' से 'वा' शब्द की अनुवृत्ति करनी चाहिए, और वह व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। उससे – อิวณฺณุวณฺณนฺตานญฺจ, ลหูปนฺตาน ธาตุนํ; อิวณฺณุวณฺณานเมว, วุทฺธิ โหติ ปรสฺส น. इ-वर्ण और उ-वर्ण जिनके अन्त में हैं, तथा जिनके उपधा में लघु इ-वर्ण और उ-वर्ण हैं, उन धातुओं के इ-वर्ण और उ-वर्ण की ही वृद्धि होती है, दूसरों की नहीं। ยุวณฺณานมฺปิ [Pg.262] ย ณุ ณา-นานิฏฺฐาทีสุ วุทฺธิ น; ตุทาทิสฺสาวิกรเณ, น เฉตฺวาทีสุ วา สิยา. इ-वर्ण और उ-वर्ण वालों की भी 'य', 'णु', 'णा', 'ना', 'निट्ठ' आदि प्रत्ययों के परे होने पर वृद्धि नहीं होती; तुदादि गण के विकरण में, तथा 'छेत्वा' आदि में भी वृद्धि नहीं होती अथवा विकल्प से होती है। ตสฺสาปฺยนิยมปฺปสงฺเค – ‘‘อยุวณฺณานญฺจาโย วุทฺธี’’ติ ปริภาสโต อูการสฺโสกาโร วุทฺธิ. उस (नियम) के भी अनिश्चित होने के प्रसंग में - "अयुवर्णों (इ, ई, उ, ऊ) की वृद्धि अ, ए, ओ होती है" इस परिभाषा से 'ऊ' कार का 'ओ' कार वृद्धि होती है। วิปริณาเมน ‘‘ธาตูน’’นฺติ วตฺตเต. विपरिणाम (विभक्ति परिवर्तन) के द्वारा 'धातूनां' (धातुओं का) यह पद अनुवृत्त होता है। ๔๓๕. โอ อว สเร. ४३५. स्वर परे होने पर 'ओ' का 'अव' होता है। โอการสฺส ธาตฺวนฺตสฺส สเร ปเร อวาเทโส โหติ. ‘‘สรโลโป มาเทส’’อิจฺจาทินา สรโลปาทิมฺหิ กเต ‘‘นเย ปรํ ยุตฺเต’’ติ ปรนยนํ กาตพฺพํ. धातु के अन्त में स्थित 'ओ' कार के स्थान पर स्वर परे होने पर 'अव' आदेश होता है। "सरलोपो मादेस" इत्यादि (सूत्र) से स्वर-लोप आदि करने के बाद "नये परं युत्ते" (सूत्र) से पर-नयन (वर्णों को जोड़ना) करना चाहिए। โส ปุริโส สาธุ ภวติ, สา กญฺญา สาธุ ภวติ, ตํ จิตฺตํ สาธุ ภวติ. वह पुरुष अच्छा होता है, वह कन्या अच्छी होती है, वह चित्त अच्छा होता है। เอตฺถ หิ – यहाँ वास्तव में - กตฺตุโนภิหิตตฺตาว, อาขฺยาเตน น กตฺตริ; ตติยา ปฐมา โหติ, ลิงฺคตฺถํ ปนเปกฺขิย. आख्यात (क्रिया) द्वारा कर्ता के अभिहित (कहे जाने) होने के कारण ही, कर्ता में तृतीया नहीं होती; बल्कि लिंगार्थ (प्रातिपदिक अर्थ) की अपेक्षा करके प्रथमा होती है। สติปิ กฺริยาเยกตฺเต กตฺตูนํ พหุตฺตา ‘‘พหุมฺหิ วตฺตพฺเพ พหุวจน’’นฺติ วตฺตมานปรสฺสปทปฐมปุริสพหุวจนํ อนฺติ, ปุเร วิย อปฺปจฺจยวุทฺธิอวาเทสา, สรโลปาทิ. เต ปุริสา ภวนฺติ, อปฺปยุชฺชมาเนปิ ภวติ, ภวนฺติ. क्रिया के एक होने पर भी कर्ताओं के बहुत होने के कारण "बहुत के कहे जाने पर बहुवचन होता है" इस (नियम) से वर्तमान परस्मैपद प्रथम पुरुष बहुवचन 'अन्ति' (प्रत्यय) होता है, पहले की तरह 'अ' प्रत्यय, वृद्धि, अव-आदेश और स्वर-लोप आदि होते हैं। 'ते पुरिसा भवन्ति' (वे पुरुष होते हैं), (क्रिया के) प्रयोग न होने पर भी 'भवति', 'भवन्ति' (का अर्थ समझा जाता है)। ‘‘ปยุชฺชมาเนปิ, ตุลฺยาธิกรเณ’’ติ จ วตฺตเต. "प्रयुक्त होने पर भी" और "समानाधिकरण में" - यह (पद) अनुवृत्त होता है। ๔๓๖. ตุมฺเห มชฺฌิโม. ४३६. 'तुम्ह' (युष्मद्) के रहने पर मध्यम पुरुष होता है। ตุลฺยาธิกรณภูเต ตุมฺหสทฺเท ปยุชฺชมาเนปิ อปฺปยุชฺชมาเนปิ ธาตูหิ มชฺฌิมปุริโส โหตีติ วตฺตมานปรสฺสปทมชฺฌิมปุริเสกวจนํสิ, เสสํ ปุริมสมํ. ตฺวํ ภวสิ, ตุมฺเห ภวถ, อปฺปยุชฺชมาเนปิ ภวสิ, ภวถ. समानाधिकरण होने पर 'तुम्ह' शब्द के प्रयुक्त होने या न होने पर भी धातुओं से मध्यम पुरुष होता है, इस प्रकार वर्तमान परस्मैपद मध्यम पुरुष एकवचन 'सि' (प्रत्यय) होता है, शेष पहले के समान है। 'त्वं भवसि' (तुम होते हो), 'तुम्हे भवथ' (तुम सब होते हो), प्रयोग न होने पर भी 'भवसि', 'भवथ'। ตุลฺยาธิกรเณติ [Pg.263] กิมตฺถํ? ตยา ปจฺจเต โอทโน. "समानाधिकरण में" यह किसलिए है? 'तया पच्चते ओदनो' (तुम्हारे द्वारा भात पकाया जाता है) - यहाँ (समानाधिकरण नहीं है)। ตสฺมึเยวาธิกาเร – उसी अधिकार में - ๔๓๗. อมฺเห อุตฺตโม. ४३७. 'अम्ह' (अस्मद्) के रहने पर उत्तम पुरुष होता है। ตุลฺยาธิกรณภูเต อมฺหสทฺเท ปยุชฺชมาเนปิ อปฺปยุชฺชมาเนปิ ธาตูหิ อุตฺตมปุริโส โหตีติ วตฺตมานปรสฺสปทอุตฺตมปุริเสกวจนํ มิ, อปฺปจฺจยวุทฺธิอวาเทสา. समानाधिकरण होने पर 'अम्ह' शब्द के प्रयुक्त होने या न होने पर भी धातुओं से उत्तम पुरुष होता है, इस प्रकार वर्तमान परस्मैपद उत्तम पुरुष एकवचन 'मि' (प्रत्यय) होता है, 'अ' प्रत्यय, वृद्धि और अव-आदेश होते हैं। ๔๓๘. อกาโร ทีฆํ หิมิเมสุ. ४३८. 'हि', 'मि', 'म' (प्रत्ययों) के परे होने पर अकार दीर्घ हो जाता है। อกาโร ทีฆมาปชฺชเต หิมิมอิจฺเจตาสุ วิภตฺตีสุ. อหํ ภวามิ, มยํ ภวาม. ภวามิ, ภวาม. 'हि', 'मि', 'म' इन विभक्तियों के परे होने पर अकार दीर्घता को प्राप्त होता है। 'अहं भवामि' (मैं होता हूँ), 'मयं भवाम' (हम होते हैं)। 'भवामि', 'भवाम'। ‘‘วิภตฺตีนํ, ฉา’’ติ จ วตฺตเต. "विभक्तियों का" और "छह" - यह (पद) अनुवृत्त होता है। ๔๓๙. ปราณฺยตฺตโนปทานิ. ४३९. बाद वाले (छह) आत्मनेपद होते हैं। สพฺพาสํ วตฺตมานานํ อฏฺฐวิธานํ วิภตฺตีนํ ยานิ ยานิ ปรานิ ฉ ปทานิ, ตานิ ตานิ อตฺตโนปทสญฺญานิ โหนฺตีติ เตอาทีนํ อตฺตโนปทสญฺญา. सभी आठ प्रकार की वर्तमान विभक्तियों में जो-जो बाद के छह पद हैं, उनकी 'आत्मनेपद' संज्ञा होती है, इस प्रकार 'ते' आदि की आत्मनेपद संज्ञा होती है। ‘‘ธาตูหิ, อตฺตโนปทานี’’ติ จ วตฺตเต. "धातुओं से" और "आत्मनेपद" - यह (पद) अनुवृत्त होता है। ๔๔๐. กตฺตริ จ. ४४०. और कर्ता में। กตฺตริ จ การเก อภิเธยฺเย ธาตูหิ อตฺตโนปทานิ โหนฺติ. จคฺคหณํ กตฺถจิ นิวตฺตนตฺถํ, เสสํ ปรสฺสปเท วุตฺตนเยเนว เวทิตพฺพํ. ภวเต, ภวนฺเต, ภวเส, ภววฺเห, ภเว, ภวามฺเห. कर्ता कारक के अभिधेय (कहे जाने) होने पर धातुओं से आत्मनेपद (प्रत्यय) होते हैं। 'च' का ग्रहण कहीं (नियम की) निवृत्ति के लिए है, शेष परस्मैपद में कहे गए नियम के अनुसार ही जानना चाहिए। 'भवते', 'भवन्ते', 'भवसे', 'भवव्हे', 'भवे', 'भवाम्हे'। ปจ ปาเก, ธาตุสญฺญายํ ธาตฺวนฺตโลโป, วุตฺตนเยเนว ตฺยาทฺยุปฺปตฺติ, อิวณฺณุวณฺณานมภาวา วุทฺธิอภาโวเวตฺถ วิเสโส. โส เทวทตฺโต โอทนํ ปจติ, ปจนฺติ, ปจสิ[Pg.264], ปจถ, ปจามิ, ปจาม, โส โอทนํ ปจเต, เต ปจนฺเต, ตฺวํ ปจเส, ตุมฺเห ปจวฺเห, อหํ ปเจ, มยํ ปจามฺเห. 'पच' (धातु) पाक (पकाने) के अर्थ में है, धातु संज्ञा होने पर धातु के अन्त्य (स्वर) का लोप होता है, कहे गए नियम के अनुसार ही 'ति' आदि की उत्पत्ति होती है, इ-वर्ण और उ-वर्ण के अभाव के कारण वृद्धि का न होना ही यहाँ विशेषता है। 'सो देवदत्तो ओदनं पचति' (वह देवदत्त भात पकाता है), 'पचन्ति', 'पचसि', 'पचथ', 'पचामि', 'पचाम'। 'सो ओदनं पचते', 'ते पचन्ते', 'त्वं पचसे', 'तुम्हे पचव्हे', 'अहं पचे', 'मयं पचाम्हे'। ปฐมปุริสาทีนเมกชฺฌปฺปวตฺติปฺปสงฺเค ปริภาสมาห – प्रथम पुरुष आदि के एक साथ प्रवृत्त होने के प्रसंग में परिभाषा कहते हैं - ๔๔๑. สพฺเพสเมกาภิธาเน ปโร ปุริโส. ४४१. सभी के एक साथ कहे जाने पर बाद वाला पुरुष (प्रयुक्त होता है)। สพฺเพสํ ปฐมมชฺฌิมานํ, ปฐมุตฺตมานํ, มชฺฌิมุตฺตมานํ ติณฺณํ วา ปุริสานํ เอกโตภิธาเน กาตพฺเพ ปโร ปุริโส โยเชตพฺโพ. เอกกาลานเมวาภิธาเน จายํ. โส จ ปจติ, ตฺวญฺจ ปจสีติ ปริยายปฺปสงฺเค ตุมฺเห ปจถาติ ภวติ. เอวํ โส จ ปจติ, อหญฺจ ปจามีติ มยํ ปจาม, ตถา ตฺวญฺจ ปจสิ, อหญฺจ ปจามิ, มยํ ปจาม, โส จ ปจติ, ตฺวญฺจ ปจสิ, อหญฺจ ปจามิ, มยํ ปจาม. เอวํ สพฺพตฺถ โยเชตพฺพํ. सभी प्रथम और मध्यम, प्रथम और उत्तम, मध्यम और उत्तम, अथवा तीनों पुरुषों के एक साथ कहे जाने पर बाद वाले पुरुष का प्रयोग करना चाहिए। और यह एक ही काल (वर्तमान आदि) के कथन में होता है। 'वह पकाता है और तुम पकाते हो' - इस पर्याय के प्रसंग में 'तुम्हे पचथ' (तुम सब पकाते हो) होता है। इसी प्रकार 'वह पकाता है और मैं पकाता हूँ' - 'मयं पचाम' (हम पकाते हैं), वैसे ही 'तुम पकाते हो और मैं पकाता हूँ' - 'मयं पचाम', 'वह पकाता है, तुम पकाते हो और मैं पकाता हूँ' - 'मयं पचाम'। इस प्रकार सर्वत्र जोड़ना चाहिए। เอกาภิธาเนติ กิมตฺถํ? ‘‘โส จ ปจติ, ตฺวญฺจ ปจิสฺสสิ, อหํ ปจึ’’ เอตฺถ ภินฺนกาลตฺตา ‘‘มยํ ปจิมฺหา’’ติ น ภวติ. "एक साथ कथन" यह किसलिए है? 'वह पकाता है, तुम पकाओगे, मैंने पकाया' - यहाँ भिन्न काल होने के कारण 'मयं पचिम्हा' ऐसा नहीं होता है। คมุ สปฺป คติมฺหิ, ปุเร วิย ธาตุสญฺญายํ ธาตฺวนฺตโลโป. 'गमु' (धातु) सर्पण (चलने) और गति के अर्थ में है, पहले की तरह धातु संज्ञा होने पर धातु के अन्त्य (स्वर) का लोप होता है। กตฺตริ ตฺยาทฺยุปฺปตฺติ. कर्ता में 'ति' आदि (प्रत्ययों) की उत्पत्ति होती है। ๔๔๒. คมิสฺสนฺโต จฺโฉ วา สพฺพาสุ. ४४२. गमु धातु के अन्त्य मकार को सभी विभक्तियों में विकल्प से 'च्छ' आदेश होता है। คมุอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺสนฺโต มกาโร จฺโฉ โหติ วา สพฺพาสุ วิภตฺตีสุ, สพฺพคฺคหเณน มานนฺต ย การิตปฺปจฺจเยสุ จ. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. เตนายํ – 'गमु' इस धातु के अन्त्य मकार को सभी विभक्तियों में विकल्प से 'च्छ' होता है, 'सब्ब' (सभी) ग्रहण करने से 'मान', 'अन्त', 'य' और 'कारित' प्रत्ययों के परे होने पर भी होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। उससे यह कहा गया है— วิธึ นิจฺจญฺจ วาสทฺโท, มาน’นฺเตสุ ตุ กตฺตริ; ทีเปตานิจฺจมญฺญตฺถ, ปโรกฺขายมสนฺตกํ. 'वा' शब्द 'मान' और 'अन्त' प्रत्ययों के परे होने पर कर्ता अर्थ में नित्य विधि को दर्शाता है; अन्यत्र अनित्यता (विकल्प) को दर्शाता है, और परोक्षा लकार में मकार का अभाव होता है। อปฺปจฺจยปรนยนานิ[Pg.265], โส ปุริโส คามํ คจฺฉติ, เต คจฺฉนฺติ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ครุปุพฺพรสฺสโต ปรสฺส ปฐมปุริสพหุวจนสฺส เร วา โหติ, คจฺฉเร. ตฺวํ คจฺฉสิ, ตุมฺเห คจฺฉถ. อหํ คจฺฉามิ, มยํ คจฺฉาม. 'अ' प्रत्यय के बाद के प्रयोग: वह पुरुष गाँव जाता है (सो पुरिसो गामं गच्छति), वे जाते हैं (ते गच्छन्ति)। 'क्वचि धातु...' इत्यादि सूत्र से गुरु वर्ण के बाद वाले प्रथम पुरुष बहुवचन के स्थान पर विकल्प से 'रे' होता है— 'गच्छरे'। तुम जाते हो (त्वं गच्छसि), तुम सब जाते हो (तुम्हे गच्छथ)। मैं जाता हूँ (अहं गच्छामि), हम सब जाते हैं (मयं गच्छाम)। จฺฉาเทสาภาเว ‘‘โลปญฺเจตฺตมกาโร’’ติ อปฺปจฺจยสฺส เอกาโร. คเมติ, คเมนฺติ, สรโลโป. คเมสิ, คเมถ. คเมมิ, คเมม. 'च्छ' आदेश के अभाव में 'लोपञ्चेत्तमकारो' सूत्र से 'अ' प्रत्यय को 'ए' कार हो जाता है। गमेति, गमेन्ति, (यहाँ) स्वर लोप होता है। गमेसि, गमेथ। गमेमि, गमेम। อตฺตโนปเทปิ โส คามํ คจฺฉเต, คจฺฉนฺเต, คจฺฉเร. คจฺฉเส, คจฺฉวฺเห. คจฺเฉ, คจฺฉามฺเห. आत्मनेपद में भी: वह गाँव जाता है (सो गामं गच्छते), वे जाते हैं (गच्छन्ते, गच्छरे)। तुम जाते हो (गच्छसे), तुम सब जाते हो (गच्छव्हे)। मैं जाता हूँ (गच्छे), हम सब जाते हैं (गच्छाम्हे)। ‘‘กุโต นุ ตฺวํ อาคจฺฉสิ, ราชคหโต อาคจฺฉามี’’ติอาทีสุ ปน ปจฺจุปฺปนฺนสมีเป วตฺตมานวจนํ. 'तुम कहाँ से आ रहे हो? मैं राजगृह से आ रहा हूँ' इत्यादि में वर्तमान के समीप अर्थ में वर्तमान काल का प्रयोग है। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' (विकल्प) की अनुवृत्ति होती है। ๔๔๓. คมิสฺส ฆมฺมํ. ४४३. 'गमु' धातु को 'घम्म' आदेश होता है। คมุอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส สพฺพสฺส ฆมฺมาเทโส โหติ วา. ฆมฺมติ, ฆมฺมนฺติ อิจฺจาทิ. 'गमु' इस सम्पूर्ण धातु को विकल्प से 'घम्म' आदेश होता है। घम्मति, घम्मन्ति इत्यादि। ภาวกมฺเมสุ ปน – भाव और कर्म वाच्य में तो— ๔๔๔. อตฺตโนปทานิ ภาเว จ กมฺมนิ. ४४४. भाव और कर्म में आत्मनेपद विभक्तियाँ होती हैं। ภาเว จ กมฺมนิ จ การเก อภิเธยฺเย อตฺตโนปทานิ โหนฺติ, จสทฺเทน กมฺมกตฺตริปิ. ภวนํ ภาโว, โส จ การกนฺตเรน อสํสฏฺโฐ เกวโล ภวนลวนาทิโก ธาตฺวตฺโถ. กรียตีติ กมฺมํ. อกมฺมกาปิ ธาตโว โสปสคฺคา สกมฺมกาปิ ภวนฺติ, ตสฺมา กมฺมนิ อนุปุพฺพา ภูธาตุโต วตฺตมานตฺตโนปทปฐมปุริเสกวจนํ เต. भाव और कर्म कारक के कहे जाने पर आत्मनेपद होते हैं, 'च' शब्द से कर्मकर्तृवाच्य में भी। 'भवन' (होना) भाव है, और वह अन्य कारक से असंसृष्ट केवल होना, काटना आदि धातु का अर्थ है। जो किया जाता है वह 'कर्म' है। अकर्मक धातुएँ भी उपसर्ग के साथ होने पर सकर्मक हो जाती हैं, इसलिए कर्म अर्थ में 'अनु' उपसर्ग पूर्वक 'भू' धातु से वर्तमान काल आत्मनेपद प्रथम पुरुष एकवचन 'ते' प्रत्यय होता है। ‘‘ธาตูหิ [Pg.266] เณ ณย’’อิจฺจาทิโต ‘‘ธาตูหี’’ติ วตฺตมาเน – 'धातूहि णे णय' इत्यादि सूत्र से 'धातूहि' की अनुवृत्ति होने पर— ๔๔๕. ภาวกมฺเมสุ โย. ४४५. भाव और कर्म में 'य' प्रत्यय होता है। สพฺพธาตูหิ ปโร ภาวกมฺเมสุ ยปฺปจฺจโย โหติ. อตฺตโนปทวิสเยวายมิสฺสเต, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ สุตฺเต อนุวตฺติตวาคฺคหเณน ยปฺปจฺจเย วุทฺธิ น ภวติ, อนุภูยเต สุขํ เทวทตฺเตน. सभी धातुओं से परे भाव और कर्म में 'य' प्रत्यय होता है। यह आत्मनेपद के विषय में ही इष्ट है, 'अञ्ञेसु च' सूत्र में अनुवृत्त 'वा' ग्रहण से 'य' प्रत्यय होने पर वृद्धि नहीं होती है, जैसे— देवदत्तेन सुखं अनुभूयते (देवदत्त द्वारा सुख अनुभव किया जाता है)। อาขฺยาเตน อวุตฺตตฺตา, ตติยา โหติ กตฺตริ; กมฺมสฺสาภิหิตตฺตา น, ทุติยา ปฐมาวิธ. आख्यात (क्रिया) द्वारा कर्ता के न कहे जाने के कारण कर्ता में तृतीया होती है; कर्म के कह दिए जाने के कारण यहाँ द्वितीया नहीं, बल्कि प्रथमा होती है। อนุภูยนฺเต สมฺปตฺติโย ตยา. อนุภูยเส ตฺวํ เทวทตฺเตน, อนุภูยวฺเห ตุมฺเห. อหํ อนุภูเย ตยา, มยํ อนุภูยามฺเห. तुम्हारे द्वारा सम्पत्तियाँ अनुभव की जाती हैं। देवदत्त द्वारा तुम अनुभव किए जाते हो, तुम सब अनुभव किए जाते हो। तुम्हारे द्वारा मैं अनुभव किया जाता हूँ, हम सब अनुभव किए जाते हैं। ‘‘กฺวจิ ธาตุ’’อิจฺจาทิโต ‘‘กฺวจี’’ติ วตฺตมาเน – 'क्वचि धातु' इत्यादि से 'क्वचि' की अनुवृत्ति होने पर— ๔๔๖. อตฺตโนปทานิ ปรสฺสปทตฺตํ. ४४६. आत्मनेपद प्रत्यय कहीं-कहीं परस्मैपद भाव को प्राप्त होते हैं। อตฺตโนปทานิ กฺวจิ ปรสฺสปทตฺตมาปชฺชนฺเต, อกตฺตริเยเวตํ. ยการสฺส ทฺวิตฺตํ, อนุภูยฺยติ มยา สุขํ, อนุภูยฺยเต วา, อนุภูยฺยนฺติ. อนุภูยฺยสิ, อนุภูยฺยถ. อนุภูยฺยามิ, อนุภูยฺยาม. ทฺวิตฺตาภาเว – อนุภูยติ, อนุภูยนฺติ. आत्मनेपद प्रत्यय कहीं-कहीं परस्मैपद हो जाते हैं, यह अकर्तृवाच्य में ही होता है। 'य' कार का द्वित्व होने पर— अनुभूय्यति मया सुखं, अथवा अनुभूय्यते, अनुभूय्यन्ति। अनुभूय्यसि, अनुभूय्यथ। अनुभूय्यामि, अनुभूय्याम। द्वित्व के अभाव में— अनुभूयति, अनुभूयन्ति। กฺวจีติ กึ? อนุภูยเต. 'क्वचि' क्यों कहा? (ताकि जहाँ न हो वहाँ) 'अनुभूयते' बने। ภาเว อทพฺพวุตฺติโน ภาวสฺเสกตฺตา เอกวจนเมว, ตญฺจ ปฐมปุริสสฺเสว, ภูยเต เทวทตฺเตน, เทวทตฺเตน สมฺปติ ภวนนฺติ อตฺโถ. भाव वाच्य में द्रव्य का वाचक न होने से भाव के एकत्व के कारण केवल एकवचन ही होता है, और वह भी केवल प्रथम पुरुष का ही; जैसे— भूयते देवदत्तेन, इसका अर्थ है 'देवदत्त द्वारा इस समय होना (क्रिया) हो रही है'। ปจธาตุโต [Pg.267] กมฺมนิ อตฺตโนปเท ยปฺปจฺจเย จ กเต – 'पच' धातु से कर्मवाच्य में आत्मनेपद और 'य' प्रत्यय करने पर— วิปริณาเมน ‘‘ยสฺสา’’ติ วตฺตมาเน – विभक्ति परिणाम के साथ 'यस्स' की अनुवृत्ति होने पर— ๔๔๗. ตสฺส จวคฺคยการวการตฺตํ สธาตฺวนฺตสฺส. ४४७. उस (य प्रत्यय) को धातु के अन्त्य वर्ण के साथ यथासम्भव च-वर्ग, य-कार और व-कार आदेश होते हैं। ตสฺส ภาวกมฺมวิสยสฺส ยปฺปจฺจยสฺส จวคฺคยการวการตฺตํ โหติ ธาตฺวนฺเตน สห ยถาสมฺภวํ. เอตฺถ จ ‘‘อิวณฺณาคโม วา’’ติ อิโต สีหคติยา วาสทฺโท อนุวตฺเตตพฺโพ, โส จ ววตฺถิตวิภาสตฺโถ. เตน – उस भाव और कर्म विषयक 'य' प्रत्यय को धातु के अन्त्य वर्ण के साथ यथासम्भव च-वर्ग, य-कार और व-कार आदेश होते हैं। और यहाँ 'इवण्णागमो वा' सूत्र से सिंहगति न्याय से 'वा' शब्द की अनुवृत्ति करनी चाहिए, और वह व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। उससे— จวคฺโค จ ต วคฺคานํ, ธาตฺวนฺตานํ ยวตฺตนํ; รวานญฺจ สยปฺปจฺจ-ยานํ โหติ ยถากฺกมนฺติ. धातु के अन्त्य त-वर्ग को च-वर्ग, (अन्य को) य-कार और र-व को 'य' प्रत्यय के साथ यथाक्रम आदेश होते हैं। ธาตฺวนฺตสฺส จวคฺคาทิตฺตา จกาเร กเต ‘‘ปรทฺเวภาโว ฐาเน’’ติ จการสฺส ทฺวิตฺตํ. ปจฺจเต โอทโน เทวทตฺเตน, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ครุปุพฺพรสฺสโต ปรสฺส ปฐมปุริสพหุวจนสฺส กฺวจิ เร โหติ. ปจฺจเร, ปจฺจนฺเต. ปจฺจเส, ปจฺจวฺเห. ปจฺเจ, ปจฺจามฺเห. धातु के अन्त्य को च-वर्ग आदि होने से 'च' कार होने पर 'परद्वेभावो ठाने' सूत्र से 'च' कार का द्वित्व होता है। पच्चते ओदनो देवदत्तेन, 'क्वचि धातु...' इत्यादि सूत्र से गुरु वर्ण के बाद वाले प्रथम पुरुष बहुवचन के स्थान पर कहीं 'रे' होता है। पच्चरे, पच्चन्ते। पच्चसे, पच्चव्हे। पच्चे, पच्चाम्हे। ปรสฺสปทาเทเส ปจฺจติ, ปจฺจนฺติ. ปจฺจสิ, ปจฺจถ. ปจฺจามิ, ปจฺจาม. ตถา กมฺมกตฺตริ ปจฺจเต โอทโน สยเมว, ปจฺจนฺเต. ปจฺจติ, ปจฺจนฺติ วา อิจฺจาทิ. परस्मैपद आदेश होने पर— पच्चति, पच्चन्ति। पच्चसि, पच्चथ। पच्चामि, पच्चाम। उसी प्रकार कर्मकर्तृवाच्य में— पच्चते ओदनो सयमेव, पच्चन्ते। अथवा पच्चति, पच्चन्ति इत्यादि। คมิโต กมฺมนิ อตฺตโนปเท, ยปฺปจฺจเย จ กเต – 'गमु' धातु से कर्म में आत्मनेपद और 'य' प्रत्यय करने पर – ‘‘ธาตูหิ, ตสฺมึ, เย’’ติ จ วตฺตเต. ‘धातुओं से’, ‘उसमें’, और ‘य’ (प्रत्यय) की अनुवृत्ति होती है। ๔๔๘. อิวณฺณาคโม วา. ४४८. इ-वर्ण (इ या ई) का आगम विकल्प से होता है। สพฺเพหิ ธาตูหิ ตสฺมึ ภาวกมฺมวิสเย ยปฺปจฺจเย ปเร อิวณฺณาคโม โหติ วาติ อีการาคโม. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. จฺฉาเทโส, คจฺฉียเต คาโม เทวทตฺเตน[Pg.268], คจฺฉียนฺเต. คจฺฉียเส, คจฺฉียวฺเห. คจฺฉีเย, คจฺฉียามฺเห. सभी धातुओं से उस भाव और कर्म के विषय में 'य' प्रत्यय के परे होने पर विकल्प से इ-वर्ण का आगम होता है, अर्थात् ई-कार का आगम होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। 'च्छ' आदेश होने पर—देवदत्त द्वारा गाँव जाया जाता है (गच्छीयते), वे सब जाते हैं (गच्छीयन्ते)। तुम जाते हो (गच्छीयसे), तुम सब जाते हो (गच्छीयवहे)। मैं जाता हूँ (गच्छीये), हम सब जाते हैं (गच्छीयामहे)। จฺฉาเทสาภาเว – 'च्छ' आदेश के अभाव में – ‘‘ธาตูหิ, โย, วา’’ติ จ วตฺตเต. ‘धातुओं से’, ‘य’, और ‘विकल्प से’ (वा) की अनुवृत्ति होती है। ๔๔๙. ปุพฺพรูปญฺจ. ४४९. और पूर्वरूप भी होता है। เหฏฺฐานุตฺเตหิ ปรสฺเสเวทํ, เตน กฏปวคฺคยการลสนฺเตเหว ธาตูหิ ปโร ยปฺปจฺจโย ปุพฺพรูปมาปชฺชเต วาติ มการา ปรสฺส ยการสฺส มกาโร. คมฺมเต, คมียเต, คมฺมนฺเต, คมียนฺเต. คมฺมเส, คมียเส, คมฺมวฺเห, คมียวฺเห. คมฺเม, คมีเย, คมฺมามฺเห, คมียามฺเห. यह नीचे कहे गए (सूत्रों) से परे के लिए ही है, इसलिए क-वर्ग, ट-वर्ग, प-वर्ग, य-कार, ल-कार और स-कार के अन्त वाली धातुओं से परे 'य' प्रत्यय विकल्प से पूर्वरूप को प्राप्त होता है; जैसे म-कार से परे य-कार का म-कार हो जाता है। गम्मते, गमीयते, गम्मन्ते, गमीयन्ते। गम्मसे, गमीयसे, गम्मवहे, गमीयवहे। गम्मे, गमीये, गम्ममहे, गमीयामहे। ปรสฺสปทตฺเต – คจฺฉียฺยติ, คจฺฉียฺยนฺติ. คจฺฉียติ, คจฺฉียนฺติ วา. คมฺมติ, คมฺมนฺติ. คมียติ, คมียนฺติ. อิการาคเม คมิยฺยติ, คมิยฺยนฺติ. ตถา ฆมฺมียติ, ฆมฺมียนฺติ อิจฺจาทิ. परस्मैपद होने पर – गच्छीय्यति, गच्छीय्यन्ति। अथवा गच्छीयति, गच्छीयन्ति। गम्मति, गम्मन्ति। गमीयति, गमीयन्ति। इ-कार आगम होने पर गमिय्यति, गमिय्यन्ति। उसी प्रकार घम्मीयति, घम्मीयन्ति इत्यादि। วตฺตมานาวิภตฺติ. वर्तमान विभक्ति। ๔๕๐. ปญฺจมี ตุ อนฺตุ, หิ ถ, มิ ม, ตํ อนฺตํ, สฺสุวฺโห, เอ อามเส. ४५०. पञ्चमी (विभक्ति) है: तु, अन्तु, हि, थ, मि, म (परस्मैपद); तं, अन्तम्, स्सु, व्हो, ए, आमसे (आत्मनेपद)। ตฺวาทโย ทฺวาทส ปญฺจมีสญฺญา โหนฺติ. तु आदि बारह (प्रत्यय) पञ्चमी संज्ञा वाले होते हैं। ๔๕๑. อาณตฺยาสิฏฺเฐนุตฺตกาเล ปญฺจมี. ४५१. आज्ञा (आणत्ति), आशीर्वाद (आसिट्ठ) और अनुत्तकाल (वर्तमान) में पञ्चमी होती है। อาณตฺยตฺเถ จ อาสีสตฺเถ อนุตฺตกาเล ปญฺจมีวิภตฺติ โหติ. आज्ञा के अर्थ में और आशीर्वाद के अर्थ में अनुत्तकाल में पञ्चमी विभक्ति होती है। สติปิ กาลาธิกาเร ปุน กาลคฺคหเณน วิธินิมนฺตนาชฺเฌสนานุมติปตฺถนาปตฺตกาลาทีสุ จ ปญฺจมี. อาณาปนมาณตฺติ, อาสีสนมาสิฏฺโฐ, โส จ อิฏฺฐสฺส อสมฺปตฺตสฺส [Pg.269] อตฺถสฺส ปตฺถนํ, ตสฺมึ อาณตฺยาสิฏฺเฐ. อนุ สมีเป อุตฺตกาโล อนุตฺตกาโล, ปจฺจุปฺปนฺนกาโลติ อตฺโถ, น อุตฺตกาโลติ วา อนุตฺตกาโล, ตสฺมึ อนุตฺตกาเล, กาลมนามสิตฺวา โหตีติ อตฺโถ. काल का अधिकार होने पर भी पुनः 'काल' ग्रहण करने से विधि, निमन्त्रण, अध्येषण, अनुमति, प्रार्थना और प्राप्तकाल आदि में भी पञ्चमी होती है। आज्ञा देना 'आणत्ति' है, आशीर्वाद देना 'आसिट्ठ' है, और वह इष्ट अप्राप्त अर्थ की प्रार्थना है, उस आज्ञा और आशीर्वाद में। 'अनु' अर्थात् समीप में 'उत्काल' (बीता हुआ काल) 'अनुत्तकाल' है, जिसका अर्थ वर्तमान काल है; अथवा जो 'उत्काल' नहीं है वह 'अनुत्तकाल' है, उस अनुत्तकाल में, काल का उल्लेख किए बिना होती है, यह अर्थ है। ตตฺถ อาสีสนตฺเถ ภูธาตุโต ปญฺจมีปรสฺสปทปฐมปุริเสกวจนํ ตุ, อปฺปจฺจยวุทฺธิอวาเทสา. โส สุขี ภวตุ, เต สุขิตา ภวนฺตุ. वहाँ आशीर्वाद के अर्थ में 'भू' धातु से पञ्चमी परस्मैपद प्रथम पुरुष एकवचन 'तु' प्रत्यय, 'अ' प्रत्यय, वृद्धि और 'अव्' आदेश होते हैं। वह सुखी हो (सो सुखी भवतु), वे सुखी हों (ते सुखिता भवन्तु)। วิปริณาเมน ‘‘อการโต’’ติ วตฺตเต. विपरिणाम से ‘अकार से’ की अनुवृत्ति होती है। ๔๕๒. หิโลปํ วา. ४५२. 'हि' का लोप विकल्प से होता है। อการโต ปโร หิวิภตฺติ โลปมาปชฺชเต วา. ตฺวํ สุขี ภว, ภวาหิ วา, หิมฺหิ ทีโฆ. ตุมฺเห สุขิตา ภวถ. อหํ สุขี ภวามิ, มยํ สุขิโน ภวาม. अकार से परे 'हि' विभक्ति का विकल्प से लोप होता है। तुम सुखी हो (त्वं सुखी भव), अथवा 'भवाहि', 'हि' परे होने पर दीर्घ होता है। तुम सब सुखी हो (तुम्हे सुखिता भवथ)। मैं सुखी होऊँ (अहं सुखी भवामि), हम सुखी हों (मयं सुखिनो भवाम)। อตฺตโนปเท โส สุขี ภวตํ, เต สุขิตา ภวนฺตํ. ตฺวํ สุขี ภวสฺสุ, ตุมฺเห สุขิตา ภววฺโห. อหํ สุขี ภเว, มยํ สุขิตา ภวามเส. आत्मनेपद में—वह सुखी हो (सो सुखी भवतं), वे सुखी हों (ते सुखिता भवन्तं)। तुम सुखी हो (त्वं सुखी भवस्सु), तुम सब सुखी हो (तुम्हे सुखिता भवव्हो)। मैं सुखी होऊँ (अहं सुखी भवे), हम सुखी हों (मयं सुखिता भवामसे)। กมฺมนิ อนุภูยตํ ตยา, อนุภูยนฺตํ. อนุภูยสฺสุ, อนุภูยวฺโห. อนุภูเย, อนุภูยามเส. ปรสฺสปทตฺเต อนุภูยฺยตุ, อนุภูยฺยนฺตุ. อนุภูยตุ, อนุภูยนฺตุ วา, อนุภูยฺยาหิ อิจฺจาทิ. ภาเว ภูยตํ. कर्मवाच्य में—तुम्हारे द्वारा अनुभव किया जाए (अनुभूयतं तया), उनके द्वारा अनुभव किया जाए (अनुभूयन्तं)। तुम अनुभव करो (अनुभूयस्सु), तुम सब अनुभव करो (अनुभूयव्हो)। मैं अनुभव करूँ (अनुभूये), हम अनुभव करें (अनुभूयामसे)। परस्मैपद होने पर—अनुभूय्यतु, अनुभूय्यन्तु। अथवा अनुभूयतु, अनुभूयन्तु, अनुभूय्याहि इत्यादि। भाववाच्य में—भूयतं (होना चाहिए)। อาณตฺติยํ กตฺตริ เทวทตฺโต ทานิ โอทนํ ปจตุ, ปจนฺตุ. ปจ, ปจาหิ, ปจถ. ปจามิ, ปจาม. ปจตํ, ปจนฺตํ. ปจสฺสุ, ปจวฺโห. ปเจ, ปจามเส. आज्ञा के अर्थ में कर्तृवाच्य में—देवदत्त अब भात पकाए (देवदत्तो दानि ओदनं पचतु), वे पकाएँ (पचन्तु)। तुम पकाओ (पच, पचाहि), तुम सब पकाओ (पचथ)। मैं पकाऊँ (पचामि), हम पकाएँ (पचाम)। आत्मनेपद में—पचतं, पचन्तं। पचस्सु, पचव्हो। पचे, पचामसे। กมฺมนิ ยปฺปจฺจยจวคฺคาทิ, ปจฺจตํ โอทโน เทวทตฺเตน, ปจฺจนฺตํ. ปจฺจสฺสุ, ปจฺจวฺโห. ปจฺเจ, ปจฺจามเส. ปรสฺสปทตฺเต ปจฺจตุ, ปจฺจนฺตุ. ปจฺจ, ปจฺจาหิ, ปจฺจถ. ปจฺจามิ, ปจฺจาม. कर्मवाच्य में 'य' प्रत्यय और च-वर्ग आदि होने पर—देवदत्त द्वारा भात पकाया जाए (पच्चतं ओदनो देवदत्तेन), वे पकाए जाएँ (पच्चन्तं)। तुम पकाए जाओ (पच्चस्सु), तुम सब पकाए जाओ (पच्चव्हो)। मैं पकाया जाऊँ (पच्चे), हम पकाए जाएँ (पच्चामसे)। परस्मैपद होने पर—पच्चतु, पच्चन्तु। पच्च, पच्चाहि, पच्चथ। पच्चामि, पच्चाम। ตถา [Pg.270] โส คามํ คจฺฉตุ, คจฺฉนฺตุ. คจฺฉ, คจฺฉาหิ, คจฺฉถ. คจฺฉามิ, คจฺฉาม. คเมตุ, คเมนฺตุ. คม, คมาหิ, คเมถ. คเมมิ, คเมม. คจฺฉตํ, คจฺฉนฺตํ. คจฺฉสฺสุ, คจฺฉวฺโห. คจฺเฉ, คจฺฉามเส. ฆมฺมาเทเส ฆมฺมตุ, ฆมฺมนฺตุ อิจฺจาทิ. उसी प्रकार—वह गाँव जाए (सो गामं गच्छतु), वे जाएँ (गच्छन्तु)। तुम जाओ (गच्छ, गच्छाहि), तुम सब जाओ (गच्छथ)। मैं जाऊँ (गच्छामि), हम जाएँ (गच्छाम)। गमेतु, गमन्तु। गम, गमाहि, गमेथ। गमेमि, गमेम। गच्छतं, गच्छन्तं। गच्छस्सु, गच्छव्हो। गच्छे, गच्छामसे। 'घम्म' आदेश होने पर घम्मतु, घम्मन्तु इत्यादि। กมฺมนิ คจฺฉียตํ, คจฺฉียตุ, คมียตํ, คมียตุ, คมฺมตํ, คมฺมตุ อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में—गच्छीयतं, गच्छीयतु, गमीयतं, गमीयतु, गम्मतं, गम्मतु इत्यादि। วิธิมฺหิ อิธ ปพฺพโต โหตุ, อยํ ปาสาโท สุวณฺณมโย โหตูติอาทิ. विधि के अर्थ में—यहाँ पर्वत हो (इध पब्बतो होतु), यह प्रासाद स्वर्णमय हो (अयं पासादो सुवण्णमयो होतु) इत्यादि। นิมนฺตเน อธิวาเสตุ เม ภนฺเต ภควา โภชนํ, อิธ นิสีทตุ ภวํ. निमन्त्रण के अर्थ में—भन्ते! भगवान् मेरे भोजन को स्वीकार करें (अधिवासेतु मे भन्ते भगवा भोजनं), आप यहाँ बैठें (इध निसीदतु भवं)। อชฺเฌสเน เทเสตุ ภนฺเต ภควา ธมฺมํ. अध्येषण (याचना) के अर्थ में—भन्ते! भगवान् धर्म का उपदेश दें (देसेतु भन्ते भगवा धम्मं)। อนุมติยํ ปุจฺฉตุ ภวํ ปญฺหํ, ปวิสตุ ภวํ, เอตฺถ นิสีทตุ. अनुमति के अर्थ में—आप प्रश्न पूछें (पुच्छतु भवं पञ्हं), आप प्रवेश करें (पविसतु भवं), यहाँ बैठें (एत्थ निसीदतु)। ปตฺถนา ยาจนา, ททาหิ เม คามวรานิ ปญฺจ, เอกํ เม นยนํ เทหิ. प्रार्थना अर्थात् याचना—मुझे पाँच श्रेष्ठ गाँव दें (ददाहि मे गामवरानि पञ्च), मुझे एक आँख दें (एकं मे नयनं देहि)। ปตฺตกาเล สมฺปตฺโต เต กาโล กฏกรเณ, กฏํ กโรตุ ภวํ อิจฺจาทิ. उचित समय आने पर, तुम्हारे लिए कार्य करने का समय आ गया है, आप कार्य करें इत्यादि। ปญฺจมีวิภตฺติ. पञ्चमी विभक्ति। ๔๕๓. สตฺตมี เอยฺย เอยฺยุํ, เอยฺยาสิ เอยฺยาถ, เอยฺยามิเอยฺยาม, เอถ เอรํ, เอโถ เอยฺยาวฺโห, เอยฺยํเอยฺยามฺเห. ४५३. सप्तमी (विभक्ति): एय्य, एय्युं; एय्यासि, एय्याथ; एय्यामि, एय्याम; एथ, एरं; एथो, एय्याव्हो; एय्यं, एय्याम्हे। เอยฺยาทโย ทฺวาทส สตฺตมีสญฺญา โหนฺติ. 'एय्य' आदि बारह (प्रत्यय) 'सप्तमी' संज्ञा वाले होते हैं। ‘‘อนุตฺตกาเล’’ติ วตฺตเต. 'अनुत्तकाले' (अतीत से भिन्न काल में) यह पद अनुवृत्त होता है। ๔๕๔. อนุมติปริกปฺปตฺเถสุ [Pg.271] สตฺตมี. ४५४. अनुमति और परिकल्प (संभावना) के अर्थों में सप्तमी विभक्ति होती है। อนุมตฺยตฺเถ จ ปริกปฺปตฺเถ จ อนุตฺตกาเล สตฺตมีวิภตฺติ โหติ. अनुमति के अर्थ में और परिकल्प के अर्थ में, अनुत्तकाल (वर्तमान/भविष्य) में सप्तमी विभक्ति होती है। อตฺถคฺคหเณน วิธินิมนฺตนาทีสุ จ สตฺตมี. กตฺตุมิจฺฉโต ปรสฺส อนุชานนํ อนุมติ, ปริกปฺปนํ ปริกปฺโป, ‘‘ยทิ นาม ภเวยฺยา’’ติ สลฺลกฺขณํ นิรูปนํ, เหตุกฺริยาย สมฺภเว ผลกฺริยาย สมฺภวปริกปฺโป จ. 'अत्थ' (अर्थ) ग्रहण से विधि, निमन्त्रण आदि में भी सप्तमी होती है। करने की इच्छा रखने वाले दूसरे व्यक्ति को अनुमति देना 'अनुमति' है; परिकल्पना करना 'परिकल्प' है, जैसे "यदि ऐसा हो" इस प्रकार का निरूपण, और हेतु-क्रिया के होने पर फल-क्रिया के होने की संभावना का परिकल्प। ตตฺถ ปริกปฺเป สตฺตมีปรสฺสปทปฐมปุริเสกวจนํ เอยฺย, อปฺปจฺจยวุทฺธาทิ ปุริมสมํ, ‘‘กฺวจิ ธาตุ วิภตฺตี’’ติอาทินา เอยฺย เอยฺยาสิ เอยฺยามิ เอยฺยํอิจฺเจเตสํ วิกปฺเปน เอการาเทโส. โส ทานิ กึ นุ โข ภเว, ยทิ โส ปฐมวเย ปพฺพเชยฺย, อรหา ภเวยฺย, สเจ สงฺขารา นิจฺจา ภเวยฺยุํ, น นิรุชฺเฌยฺยุํ. ยทิ ตฺวํ ภเวยฺยาสิ, ตุมฺเห ภเวยฺยาถ. กถมหํ เทโว ภเวยฺยามิ, กึ นุ โข มยํ ภเวยฺยาม. ตถา ภเวถ, ภเวรํ. ภเวโถ, ภเวยฺยาวฺโห. वहाँ परिकल्प में सप्तमी परस्मैपद प्रथम पुरुष एकवचन 'एय्य' है, 'अ' प्रत्यय, वृद्धि आदि पहले के समान हैं। 'क्वचि धातु विभक्ति' आदि सूत्र से एय्य, एय्यासि, एय्यामि, एय्यं—इनके स्थान पर विकल्प से 'ए' आदेश होता है। वह अब क्या हो? यदि वह प्रथम अवस्था में प्रव्रजित होता, तो अर्हत् होता। यदि संस्कार नित्य होते, तो वे निरुद्ध नहीं होते। यदि तुम होते, तुम सब होते। मैं देव कैसे होऊँ? क्या हम होंगे? वैसे ही—भवेथ, भवेरं। भवेथो, भवेय्याव्हो। ปตฺถเน ตุ อหํ สุขี ภเว, พุทฺโธ ภเวยฺยํ, ภเวยฺยามฺเห. प्रार्थना (इच्छा) में तो—"मैं सुखी होऊँ", "मैं बुद्ध होऊँ", "हम हों"। กมฺมนิ สุขํ ตยา อนุภูเยถ, อนุภูเยรํ. อนุภูเยโถ, อนุภูเยยฺยาวฺโห. อนุภูเย, อนุภูเยยฺยํ, อนุภูเยยฺยามฺเห. ปรสฺสปทตฺเต อนุภูเยยฺย, อนุภูเยยฺยุํ. อนุภูเยยฺยาสิ อิจฺจาทิ. ภาเว ภูเยถ. कर्मवाच्य में—"तुम्हारे द्वारा सुख का अनुभव किया जाए", "अनुभूयेरं"। "अनुभूयेथो", "अनुभूयेय्याव्हो"। "अनुभूये", "अनुभूयेय्यं", "अनुभूयेय्याम्हे"। परस्मैपद होने पर—"अनुभूयेय्य", "अनुभूयेय्युं"। "अनुभूयेय्यासि" इत्यादि। भाववाच्य में—"भूयेथ"। วิธิมฺหิ โส โอทนํ ปเจ, ปเจยฺย, ปเจยฺยุํ. ตฺวํ ปเจ, ปเจยฺยาสิ, ตุมฺเห ปเจยฺยาถ. อหํ ปเจ, ปเจยฺยามิ, มยํ ปเจยฺยาม. ปเจถ, ปเจรํ. ปเจโถ, ปเจยฺยาวฺโห. ปเจ, ปเจยฺยํ, ปเจยฺยามฺเห. विधि (आदेश) में—"वह भात पकाए", "पचेय्य", "पचेय्युं"। "तुम पकाओ", "पचेय्यासि", "तुम सब पकाओ"। "मैं पकाऊँ", "पचेय्यामि", "हम पकाएँ"। "पचेथ", "पचेरं"। "पचेथो", "पचेय्याव्हो"। "पचे", "पचेय्यं", "पचेय्याम्हे"। กมฺมนิ [Pg.272] ปจฺเจถ, ปจฺเจรํ. ปจฺเจโถ, ปจฺเจยฺยาวฺโห. ปจฺเจ, ปจฺเจยฺยํ, ปจฺเจยฺยามฺเห. ปรสฺสปทตฺเต ปจฺเจ, ปจฺเจยฺย, ปจฺเจยฺยุํ. ปจฺเจยฺยาสิ อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में—"पच्चेथ", "पच्चेरं"। "पच्चेथो", "पच्चेय्याव्हो"। "पच्चे", "पच्चेय्यं", "पच्चेय्याम्हे"। परस्मैपद होने पर—"पच्चे", "पच्चेय्य", "पच्चेय्युं"। "पच्चेय्यासि" इत्यादि। อนุมติยํ โส คามํ คจฺเฉ, คจฺเฉยฺย, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา เอยฺยุสฺส อุํ วา, คจฺฉุํ, คจฺเฉยฺยุํ. ตฺวํ คจฺเฉ, คจฺเฉยฺยาสิ, คจฺเฉยฺยาถ. คจฺเฉ, คจฺเฉยฺยามิ, คจฺเฉยฺยาม. คเม, คเมยฺย, คมุํ, คเมยฺยุํ. คเม, คเมยฺยาสิ, คเมยฺยาถ. คเม, คเมยฺยามิ, คเมยฺยาม. คจฺเฉถ, คจฺเฉรํ. คจฺเฉโถ, คจฺเฉยฺยาวฺโห. คจฺเฉ, คจฺเฉยฺยํ, คจฺเฉยฺยามฺเห. คเมถ, คเมรํ อิจฺจาทิ. अनुमति में—"वह गाँव जाए", "गच्छेय्य", 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से 'एय्युं' के स्थान पर 'उं' विकल्प से होता है—"गच्छुं", "गच्छेय्युं"। "तुम जाओ", "गच्छेय्यासि", "तुम सब जाओ"। "गच्छे", "गच्छेय्यं", "गच्छेय्याम्हे"। "गमे", "गमेय्य", "गमुं", "गमेय्युं"। "गमे", "गमेय्यासि", "गमेय्याथ"। "गमे", "गमेय्यामि", "गमेय्याम"। "गच्छेथ", "गच्छेरं"। "गच्छेथो", "गच्छेय्याव्हो"। "गच्छे", "गच्छेय्यं", "गच्छेय्याम्हे"। "गमेथ", "गमेरं" इत्यादि। กมฺมนิ คจฺฉีเยถ, คมีเยถ, คจฺฉีเยรํ, คมีเยรํ อิจฺจาทิ. ปรสฺสปทตฺเต คจฺฉีเยยฺย, คมีเยยฺย, คมฺเมยฺย, คมฺเมยฺยุํ อิจฺจาทิ. ตถา ฆมฺเม, ฆมฺเมยฺย, ฆมฺเมยฺยุํ อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में—"गच्छीयथ", "गमीयथ", "गच्छीयेरं", "गमीयेरं" इत्यादि। परस्मैपद होने पर—"गच्छीयेय्य", "गमीयेय्य", "गम्मेय्य", "गम्मेय्युं" इत्यादि। वैसे ही—"घम्मे", "घम्मेय्य", "घम्मेय्युं" इत्यादि। สตฺตมีวิภตฺติ. सप्तमी विभक्ति। ปจฺจุปฺปนฺนาณตฺติปริกปฺปกาลิกวิภตฺตินโย. वर्तमान, आज्ञा, परिकल्प और काल संबंधी विभक्ति का नियम। ๔๕๕. หิยฺยตฺตนี อาอู, โอตฺถ, อํมฺหา, ตฺถตฺถุํ, เสวฺหํ, อึมฺหเส. ४५५. हिय्यत्तनी (विभक्ति): आ, ऊ; ओ, त्थ; अं, म्हा; त्थ, त्थुं; से, व्हं; इं, म्हासे। อาอาทโย ทฺวาทส หิยฺยตฺตนีสญฺญา โหนฺติ. 'आ' आदि बारह (प्रत्यय) 'हिय्यत्तनी' संज्ञा वाले होते हैं। ‘‘อปฺปจฺจกฺเข, อตีเต’’ติ จ วตฺตเต. 'अप्पच्चक्खे' (परोक्ष) और 'अतीते' (अतीत में) यह पद अनुवृत्त होते हैं। ๔๕๖. หิยฺโยปภุติ ปจฺจกฺเข หิยฺยตฺตนี. ४५६. कल से लेकर (अतीत काल में) प्रत्यक्ष होने पर हिय्यत्तनी होती है। หิยฺโยปภุติ อตีเต กาเล ปจฺจกฺเข วา อปฺปจฺจกฺเข วา หิยฺยตฺตนีวิภตฺติ โหตีติ หิยฺยตฺตนีปรสฺสปทปฐมปุริเสกวจนํ อา. कल से लेकर अतीत काल में, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या परोक्ष, हिय्यत्तनी विभक्ति होती है; हिय्यत्तनी परस्मैपद प्रथम पुरुष एकवचन 'आ' है। ‘‘กฺวจิ ธาตุ’’อิจฺจาทิโต ‘‘กฺวจิ, ธาตูน’’นฺติ จ วตฺตเต. 'क्वचि धातु' आदि (सूत्र) से 'क्वचि' और 'धातूनं' पद अनुवृत्त होते हैं। ๔๕๗. อการาคโม [Pg.273] หิยฺยตฺตนี อชฺชตนีกาลาติปตฺตีสุ. ४५७. हिय्यत्तनी, अज्जतनी और कालातिपत्ति (विभक्तियों) में 'अ' कार का आगम होता है। กฺวจิ ธาตูนมาทิมฺหิ อการาคโม โหติ หิยฺยตฺตนีอชฺชตนีกาลาติปตฺติอิจฺเจตาสุ ตีสุ วิภตฺตีสุ. กถมยมการาคโม ธาตฺวาทิมฺหีติ เจ? हिय्यत्तनी, अज्जतनी और कालातिपत्ति—इन तीन विभक्तियों में धातुओं के आदि में कहीं 'अ' कार का आगम होता है। यदि कहें कि यह 'अ' कार का आगम धातु के आदि में कैसे होता है? สติสฺสเรปิ ธาตฺวนฺเต, ปุนการาคมสฺสิธ; นิรตฺถตฺตา ปโยคานุ โรธา ธาตฺวาทิโต อยํ. धातु के अन्त में स्वर होने पर भी, यहाँ पुनः 'अ' कार का आगम निरर्थक होने के कारण, प्रयोग के अनुरोध से यह (आगम) धातु के आदि में होता है। อปฺปจฺจยวุทฺธิอวาเทสสรโลปาทิ วุตฺตนยเมว. 'अ' प्रत्यय, वृद्धि, 'अव' आदेश, स्वर-लोप आदि पहले कहे गए नियम के अनुसार ही हैं। อภวา, อภวู. อภโว, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา โอการสฺส ออาเทโส วา, อภว, อภวตฺถ. อภวํ, อภวมฺหา. อภวตฺถ, อภวตฺถุํ. อภวเส, อภววฺหํ. อภวึ, อภวมฺหเส. अभवा, अभवू। अभवो, 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से 'ओ' कार के स्थान पर विकल्प से 'अ' आदेश होने पर—अभव, अभवत्थ। अभवं, अभवम्हा। अभवत्थ, अभवत्थुं। अभवसे, अभवव्हं। अभविं, अभवम्हासे। กมฺมนิ ยปฺปจฺจโย, ตยา สุขมนฺวภูยตฺถ, อการาคมาภาเว อนุภูยตฺถ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ตฺถสฺส ถาเทโส, อนฺวภูยถ, อนุภูยถ, อนฺวภูยตฺถุํ, อนุภูยตฺถุํ. อนฺวภูยเส, อนุภูยเส, อนฺวภูยวฺหํ, อนุภูยวฺหํ. อนฺวภูยึ, อนุภูยึ, อนฺวภูยมฺหเส, อนุภูยมฺหเส. ปรสฺสปทตฺเต อนฺวภูยา, อนุภูยา อิจฺจาทิ. ภาเว อนฺวภูยตฺถ. कर्मवाच्य में 'य' प्रत्यय होता है—"तुम्हारे द्वारा सुख का अनुभव किया गया" (अन्वभूयत्थ), 'अ' कार आगम के अभाव में 'अनुभूयत्थ', 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से 'त्थ' के स्थान पर 'थ' आदेश होने पर—अन्वभूयथ, अनुभूयथ, अन्वभूयत्थुं, अनुभूयत्थुं। अन्वभूयसे, अनुभूयसे, अन्वभूयव्हं, अनुभूयव्हं। अन्वभूयिं, अनुभूयिं, अन्वभूयम्हासे, अनुभूयम्हासे। परस्मैपद होने पर—अन्वभूया, अनुभूया इत्यादि। भाववाच्य में—अन्वभूयत्थ। ตถา โส โอทนํ อปจา, ปจา, อปจู, ปจู. อปโจ, ปโจ, อปจตฺถ, ปจตฺถ. อปจํ, ปจํ, อปจมฺหา, ปจมฺหา. อปจตฺถ, ปจตฺถ, อปจตฺถุ, ปจตฺถุํ. อปจเส, ปจเส, อปจวฺหํ, ปจวฺหํ. อปจึ, ปจึ, อปจมฺหเส, ปจมฺหเส. वैसे ही—"उसने भात पकाया" (अपचा, पचा), अपचू, पचू। अपचो, पचो, अपचत्थ, पचत्थ। अपचं, पचं, अपचम्हा, पचम्हा। अपचत्थ, पचत्थ, अपचत्थु, पचत्थुं। अपचसे, पचसे, अपचव्हं, पचव्हं। अपचिं, पचिं, अपचम्हासे, पचम्हासे। กมฺมนิ [Pg.274] อปจฺจถ, อปจฺจตฺถ, อปจฺจตฺถุํ. อปจฺจเส, อปจฺจวฺหํ. อปจฺจึ, อปจฺจมฺหเส. อปจฺจา, อปจฺจู อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में अपच्चथ, अपच्चत्थ, अपच्चत्थुं। अपच्चसे, अपच्चव्हं। अपच्चिं, अपच्चम्हसे। अपच्चा, अपच्चू इत्यादि (रूप होते हैं)। ตถา อคจฺฉา, อคจฺฉู. อคจฺโฉ, อคจฺฉ, อคจฺฉตฺถ. อคจฺฉํ, อคจฺฉมฺหา. อคจฺฉตฺถ, อคจฺฉตฺถุํ. อคจฺฉเส, อคจฺฉวฺหํ. อคจฺฉึ, อคจฺฉมฺหเส. อคมา, อคมู. อคโม, อคม, อคมตฺถ. อคมํ, อคมมฺหา. อคมตฺถ, อคมตฺถุํ. อคมเส, อคมวฺหํ. อคมึ, อคมมฺหเส. उसी प्रकार अगच्छा, अगच्छू। अगच्छो, अगच्छा, अगच्छत्थ। अगच्छं, अगच्छम्हा। अगच्छत्थ, अगच्छत्थुं। अगच्छसे, अगच्छव्हं। अगच्छिं, अगच्छम्हसे। अगमा, अगमू। अगमो, अगम, अगमत्थ। अगमं, अगमम्हा। अगमत्थ, अगमत्थुं। अगमसे, अगमव्हं। अगमिं, अगमम्हसे। กมฺมนิ อคจฺฉียตฺถ, คจฺฉียตฺถ, อคมียตฺถ, คมียตฺถ, อคจฺฉียตฺถุํ, คจฺฉียตฺถุํ, อคมียตฺถุํ, คมียตฺถุํ อิจฺจาทิ. ตถา อฆมฺมา, อฆมฺมู อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में अगच्छीयत्थ, गच्छीयत्थ, अगमीयत्थ, गमीयत्थ, अगच्छीयत्थुं, गच्छीयत्थुं, अगमीयत्थुं, गमीयत्थुं इत्यादि। उसी प्रकार अघम्मा, अघम्मू इत्यादि। หิยฺยตฺตนีวิภตฺติ. हिय्यत्तनी विभक्ति। ๔๕๘. หิยฺยตฺตนี สตฺตมี ปญฺจมี วตฺตมานา สพฺพธาตุกํ. ४५८. हिय्यत्तनी, सप्तमी, पञ्चमी और वर्तमाना (विभक्तियाँ) 'सब्बधातुक' (सार्वधातुक) कहलाती हैं। หิยฺยตฺตนาทโย จตสฺโส วิภตฺติโย สพฺพธาตุกสญฺญา โหนฺตีติ หิยฺยตฺตนาทีนํ สพฺพธาตุกสญฺญตฺตา ‘‘อิการาคโม อสพฺพธาตุกมฺหี’’ติ วุตฺโต อิการาคโม น ภวติ. हिय्यत्तनी आदि चार विभक्तियाँ 'सब्बधातुक' संज्ञा वाली होती हैं; हिय्यत्तनी आदि के सब्बधातुक संज्ञक होने के कारण, "इकारागमो असब्बधातुकम्हि" (असार्वधातुक में इकार का आगम होता है) सूत्र से कहा गया इकार का आगम नहीं होता है। สพฺพธาตุกํ. सब्बधातुक (सार्वधातुक)। ๔๕๙. ปโรกฺขา อ อุ, เอ ตฺถ, อํ มฺห, ตฺถ เร, โถ วฺโห, อึมฺเห. ४५९. परोक्खा (विभक्ति के प्रत्यय): अ उ, ए त्थ, अं म्ह (परस्मैपद); त्थ रे, थो व्हो, इं म्हे (आत्मनेपद)। ออาทโย ทฺวาทส ปโรกฺขาสญฺญา โหนฺติ. อกฺขานํ อินฺทฺริยานํ ปรํ ปโรกฺขา, ตทฺทีปกตฺตา อยํ วิภตฺติ ปโรกฺขาติ วุจฺจติ. 'अ' आदि बारह (प्रत्यय) 'परोक्खा' संज्ञा वाले होते हैं। आँखों (इन्द्रियों) से परे (अप्रत्यक्ष) होना 'परोक्खा' है; उस (परोक्ष काल) को प्रकाशित करने के कारण इस विभक्ति को 'परोक्खा' कहा जाता है। ๔๖๐. อปจฺจกฺเข [Pg.275] ปโรกฺขาตีเต. ४६०. अप्रत्यक्ष परोक्ष अतीत (भूतकाल) में। อปจฺจกฺเข วตฺตุโน อินฺทฺริยาวิสยภูเต อตีเต กาเล ปโรกฺขาวิภตฺติ โหติ. อติกฺกมฺม อิโตติ อตีโต, หุตฺวา อติกฺกนฺโตติ อตฺโถ. वक्ता की इन्द्रियों का विषय न होने वाले अप्रत्यक्ष अतीत काल में 'परोक्खा' विभक्ति होती है। 'इतः' (इस समय से) जो 'अतिक्कम्म' (बीत गया) है, वह 'अतीतो' (अतीत) है; अर्थात् होकर जो बीत गया है। เหฏฺฐา วุตฺตนเยน ปโรกฺขาปรสฺสปทปฐมปุริเสกวจนํ อ. ‘‘ภู อ’’อิตีธ – नीचे बताई गई विधि के अनुसार परोक्खा परस्मैपद प्रथम पुरुष एकवचन 'अ' है। "भू + अ" यहाँ — วิปริณาเมน ‘‘ธาตูน’’นฺติ วตฺตเต. विभक्ति-परिणाम के द्वारा "धातूनं" (धातुओं का) पद अनुवृत्त होता है। ๔๖๑. กฺวจาทิวณฺณานเมกสฺสรานํ ทฺเวภาโว. ४६१. कहीं-कहीं (धातुओं के) आदि वर्णों का, जो एक स्वर वाले हों, द्वित्व (दोगुना) होता है। ธาตูนมาทิภูตานํ วณฺณานเมกสฺสรานํ กฺวจิ ทฺเวภาโว โหติ. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ กฺวจิสทฺโท, เตน – धातुओं के आदिभूत वर्णों का, जो एक स्वर वाले हों, कहीं-कहीं द्वित्व होता है। यहाँ 'क्वचि' शब्द व्यवस्थित विभाषा (विकल्प) के लिए है, इसलिए — ข ฉ เสสุ ปโรกฺขายํ, ทฺเวภาโว สพฺพธาตุนํ; อปฺปจฺจเย ชุโหตฺยาทิ-สฺสปิ กิจฺจาทิเก กฺวจิ. 'ख', 'छ', 'स' (प्रत्ययों) के परे होने पर, परोक्खा विभक्ति में सभी धातुओं का द्वित्व होता है; 'अ' प्रत्यय के न होने पर जुहोत्यादि गण की धातुओं का भी, और कृत्य आदि प्रत्ययों के परे होने पर भी कहीं-कहीं (द्वित्व होता है)। ‘‘ภู ภู อ’’อิตีธ – "भू भू अ" यहाँ — ๔๖๒. ปุพฺโพพฺภาโส. ४६२. पूर्व (वाला भाग) 'अभ्यास' (संज्ञक होता है)। ทฺเวภูตสฺส ธาตุสฺส โย ปุพฺโพ อวยโว, โส อพฺภาสสญฺโญ โหตีติ อพฺภาสสญฺญา. द्वित्व हुई धातु का जो पूर्व अवयव (भाग) है, वह 'अभ्यास' संज्ञा वाला होता है; यह 'अभ्यास' संज्ञा है। อพฺภาสคฺคหณมนุวตฺตเต. 'अभ्यास' का ग्रहण अनुवृत्त होता है। ๔๖๓. อนฺตสฺสิวณฺณากาโร วา. ४६३. (अभ्यास के) अन्त (स्वर) को विकल्प से इकार और अकार होता है। อพฺภาสสฺส อนฺตสฺส อิวณฺโณ โหติ วา, อกาโร จ. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. เตน – अभ्यास के अन्त को विकल्प से इकार होता है, और अकार भी। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है। इसलिए — ข [Pg.276] ฉ เสสุ อวณฺณสฺส,อิกาโร สคุปุสฺส อี; วาสฺส ภูสฺส ปโรกฺขายํ,อกาโร นาปรสฺสิเมติ. 'ख', 'छ', 'स' (प्रत्ययों) के परे होने पर अकार को इकार होता है; 'गुप' धातु के साथ 'ई' होता है; 'भू' धातु के अभ्यास को परोक्खा में विकल्प से अकार होता है, किन्तु अन्य (विभक्तियों) में नहीं। อูการสฺส อกาโร. ऊकार को अकार (होता है)। ๔๖๔. ทุติยจตุตฺถานํ ปฐมตติยา. ४६४. (अभ्यास में स्थित) द्वितीय और चतुर्थ (वर्णों) के स्थान पर क्रमशः प्रथम और तृतीय (वर्ण) होते हैं। อพฺภาสคตานํ ทุติยจตุตฺถานํ วคฺคพฺยญฺชนานํ ยถากฺกมํ ปฐมตติยา โหนฺตีติ ภการสฺส พกาโร. अभ्यास में आए हुए वर्ग के द्वितीय और चतुर्थ व्यंजनों के स्थान पर क्रमशः प्रथम और तृतीय व्यंजन होते हैं; इस प्रकार 'भ'कार के स्थान पर 'ब'कार होता है। ๔๖๕. พฺรูภูนมาหภูวา ปโรกฺขายํ. ४६५. परोक्खा विभक्ति में 'ब्रू' और 'भू' धातुओं के स्थान पर क्रमशः 'आह' और 'भुव' आदेश होते हैं। พฺรูภูอิจฺเจเตสํ ธาตูนํ อาหภูวอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ ปโรกฺขาวิภตฺติยนฺติ ภูสทฺทสฺส ภูวอาเทโส, ‘‘สรโลโป มาเทสปฺปจฺจยาทิมฺหี’’ติอาทินา สรโลปาทิ, โส กิร ราชา พภูว, เต กิร พภูวุ. ตฺวํ กิร พภูเว. 'ब्रू' और 'भू' इन धातुओं के स्थान पर 'आह' और 'भुव' ये आदेश परोक्खा विभक्ति में होते हैं; इस प्रकार 'भू' शब्द को 'भुव' आदेश होता है, "सरलोपो मादेसप्पच्चयादिम्हि" इत्यादि सूत्र से स्वर-लोप आदि होकर — 'सो किर राजा बभूव' (वह राजा हुआ सुना जाता है), 'ते किर बभूवु' (वे हुए सुने जाते हैं)। 'त्वं किर बभूवे' (तुम हुए सुने जाते हो)। ‘‘ธาตูหี’’ติ วตฺตเต, สีหคติยา กฺวจิคฺคหณญฺจ. "धातूहि" (धातुओं से) पद अनुवृत्त होता है, और सिंहगति (न्याय) से "क्वचि" का ग्रहण भी होता है। ๔๖๖. อิการาคโม อสพฺพธาตุกมฺหิ. ४६६. असब्बधातुक (असार्वधातुक) प्रत्यय के परे होने पर इकार का आगम होता है। สพฺพสฺมึ อสพฺพธาตุกมฺหิ ปเร กฺวจิ ธาตูหิ ปโร อิการาคโม โหติ. सभी असर्वधातुक (प्रत्यय) परे होने पर, कहीं-कहीं धातुओं से परे 'इ' कार का आगम होता है। อสพฺพธาตุเก พฺยญฺช-นาทิมฺเห วายมาคโม; กฺวจาธิการโต พฺยญฺช-นาโทปิ กฺวจิ โน สิยา. व्यञ्जनादि असर्वधातुक (प्रत्यय) परे होने पर यह आगम विकल्प से होता है; 'क्वचि' के अधिकार से व्यञ्जनादि होने पर भी कहीं-कहीं यह नहीं होता है। เอตฺถ จ ‘‘น สพฺพธาตุกํ อสพฺพธาตุก’’มิติ กตฺวา ‘‘หิยฺยตฺตนี สตฺตมี ปญฺจมี วตฺตมานา สพฺพธาตุก’’นฺติ หิยฺยตฺตนีอาทีนํ สพฺพธาตุกสญฺญาย วุตฺตตฺตา ตทญฺญา จตสฺโส วิภตฺติโย อสพฺพธาตุกนฺติ วุจฺจติ. और यहाँ "जो सर्वधातुक नहीं है वह असर्वधातुक है" ऐसा मानकर, "हिय्यत्तनी, सप्तमी, पञ्चमी और वर्त्तमाना सर्वधातुक हैं" इस प्रकार हिय्यत्तनी आदि की सर्वधातुक संज्ञा कहे जाने के कारण, उनसे भिन्न शेष चार विभक्तियाँ 'असर्वधातुक' कहलाती हैं। ตุมฺเห [Pg.277] กิร พภูวิตฺถ. อหํ กิร พภูวํ, มยํ กิร พภูวิมฺห. อตฺตโนปเท โส พภูวิตฺถ, พภูวิเร. พภูวิตฺโถ, พภูวิวฺโห. พภูวึ, พภูวิมฺเห. तुम सब हुए (सुना जाता है)। मैं हुआ, हम सब हुए। आत्मनेपद में—वह हुआ, वे सब हुए। तुम हुए, तुम सब हुए। मैं हुआ, हम सब हुए। กมฺมนิ อตฺตโนปเท อีการาคมยปฺปจฺจยิการาคมา, อนุพภูวียิตฺถ, ยปฺปจฺจยสฺส อสพฺพธาตุกมฺหิ ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา โลเป กเต อิวณฺณาคโม น ภวติ, ตยา กิร อนุพภูวิตฺถ, อนุพภูวิเร อิจฺจาทิ. ภาเว พภูวียิตฺถ, พภูวิตฺถ วา. कर्मवाच्य आत्मनेपद में 'ई' कार आगम, 'य' प्रत्यय और 'इ' कार आगम होने पर—'अनुबभूवीयित्थ' (अनुभव किया गया)। असर्वधातुक में 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'य' प्रत्यय का लोप होने पर इ-वर्ण का आगम नहीं होता है, जैसे—तुम्हारे द्वारा अनुभव किया गया, उनके द्वारा अनुभव किया गया इत्यादि। भाववाच्य में—'बभूवीयित्थ' या 'बभूवित्थ' (हुआ)। ตถา ปปจ, ปปจู. ปปเจ, ปปจิตฺถ. ปปจํ, ปปจิมฺห. ปปจิตฺถ, ปปจิเร. ปปจิตฺโถ, ปปจิวฺโห. ปปจึ, ปปจิมฺเห. उसी प्रकार—उसने पकाया, उन्होंने पकाया। तुमने पकाया, तुम सबने पकाया। मैंने पकाया, हमने पकाया। (आत्मनेपद में) उसने पकाया, उन्होंने पकाया। तुमने पकाया, तुम सबने पकाया। मैंने पकाया, हमने पकाया। กมฺมนิ ปปจฺจิตฺถ, ปปจฺจิเร อิจฺจาทิ. ตถา อปจฺจ, อปจฺจู อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में—'पपच्चित्थ', 'पपच्चिरे' इत्यादि। उसी प्रकार—'अपच्च', 'अपच्चू' इत्यादि। คมิมฺหิ ‘‘กฺวจาทิวณฺณาน’’นฺติอาทินา ทฺเวภาโว, ‘‘ปุพฺโพพฺภาโส’’ติ อพฺภาสสญฺญา. 'गमु' धातु में 'क्वचादिवण्णानं' आदि सूत्र से द्वित्व होता है, और 'पुब्बोब्भासो' सूत्र से (पूर्व खण्ड की) अभ्यास संज्ञा होती है। ‘‘อพฺภาเส’’ติ วตฺตเต. 'अभ्यासे' (यह पद) अनुवृत्त होता है। ๔๖๗. กวคฺคสฺส จวคฺโค. ४६७. कवर्ग का चवर्ग होता है। อพฺภาเส วตฺตมานสฺส กวคฺคสฺส จวคฺโค โหตีติ วการสฺส ชกาโร, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อนพฺภาสสฺส ปฐมปุริเสกวจนมฺหิ ทีโฆ. โส คามํ ชคาม กิร, ชคม วา, ชคมุ. ชคเม, ชคมิตฺถ. ชคมํ, ชคมิมฺห. ชคมิตฺถ, ชคมิเร. ชคมิตฺโถ, ชคมิวฺโห. ชคมึ, ชคมิมฺเห. अभ्यास में विद्यमान कवर्ग का चवर्ग होता है, इस नियम से 'ग' कार का 'ज' कार हो जाता है, और 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से अनभ्यास (धातु) के प्रथम पुरुष एकवचन में दीर्घ होता है। वह गाँव गया (सुना जाता है), 'जगाम' या 'जगम', 'जगमु'। तुमने गमन किया, तुम सबने गमन किया। मैंने गमन किया, हमने गमन किया। (आत्मनेपद में) वह गया, वे सब गए। तुम गए, तुम सब गए। मैं गया, हम सब गए। กมฺมนิ ชคมียิตฺถ, ชคมิตฺถ วา อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में—'जगमियित्थ' या 'जगमित्थ' इत्यादि। ปโรกฺขาวิภตฺติ. परोक्षा विभक्ति (समाप्त)। ๔๖๘. อชฺชตนี [Pg.278] อี อุํ, โอ ตฺถ, อึ มฺหา, อา อู, เส วฺหํ, อมฺเห. ४६८. अद्यतनी—ई, उं; ओ, त्थ; इं, म्हा; आ, ऊ; से, व्हं; अम्हे। อีอาทโย ทฺวาทส อชฺชตนีสญฺญา โหนฺติ. อชฺช ภโว อชฺชตโน, ตทฺทีปกตฺตา อยํ วิภตฺติ อชฺชตนีติ วุจฺจติ. 'ई' आदि बारह (प्रत्यय) अद्यतनी संज्ञक होते हैं। आज होने वाला 'अद्यतन' है, उसे प्रकाशित करने के कारण यह विभक्ति 'अद्यतनी' कहलाती है। ‘‘อปจฺจกฺเข, อตีเต, ปจฺจกฺเข’’ติ จ วตฺตเต. 'अपरोक्ष में, अतीत में और परोक्ष में' (इन पदों की) अनुवृत्ति होती है। ๔๖๙. สมีเปชฺชตนี. ४६९. समीप अद्यतनी। สมีเป สมีปโต ปฏฺฐาย อชฺชปฺปภุติ อตีเต กาเล ปจฺจกฺเข จ อปจฺจกฺเข จ อชฺชตนีวิภตฺติ โหตีติ อชฺชตนีปรสฺสปทปฐมปุริเสกวจนํ อี. समीप में, समीप से लेकर आज से आरम्भ कर अतीत काल में, प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों में अद्यतनी विभक्ति होती है; इस प्रकार अद्यतनी परस्मैपद प्रथम पुरुष एकवचन 'ई' है। ปุเร วิย อการาคโม, วุทฺธาทิ จ, ‘‘กฺวจิ ธาตุวิภตฺตี’’ติอาทินา อีมฺหาทิวิภตฺตีนํ กฺวจิ รสฺสตฺตํ, โออาอวจนานํ อิตฺถอมาเทสา จ, สรโลปาทิ, โส อภวิ, อภวี วา, อการาคมาภาเว ภวิ. पहले की तरह 'अ' कार का आगम, वृद्धि आदि कार्य होते हैं, 'क्वचि धातुविभत्ती' आदि सूत्र से 'ई', 'म्हा' आदि विभक्तियों का कहीं-कहीं ह्रस्व होता है, और 'ओ', 'आ' वचनों के स्थान पर 'इत्थ', 'अम' आदेश होते हैं, स्वर-लोप आदि कार्य होकर—वह हुआ 'अभावि' या 'अभावी', 'अ' कार आगम के अभाव में 'भावि'। มณฺฑูกคติยา ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. मण्डूकगति से 'वा' (विकल्प) की अनुवृत्ति होती है। ๔๗๐. สพฺพโต อุํ อึ สุ. ४७०. सभी (धातुओं) से 'उं' के स्थान पर 'इंसु' होता है। สพฺเพหิ ธาตูหิ อุํวิภตฺติสฺส อึสฺวาเทโส โหติ วา. सभी धातुओं से 'उं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'इंसु' आदेश होता है। เต อภวึสุ, ภวึสุ วา, อภวุํ, ภวุํ วา. ตฺวํ อภวิ, ภวิ วา, อภโว, ภโว วา, ตุมฺเห อภวิตฺถ, ภวิตฺถ วา, อิการาคโม. อหํ อภวึ, ภวึ วา, มยํ อภวิมฺห, ภวิมฺห วา, อภวิมฺหา, ภวิมฺหา วา. โส อภวิตฺถ, ภวิตฺถ วา, อภวา, ภวา วา, อภวู, ภวู วา. อภวิเส, ภวิเส วา, อภวิวฺหํ, ภวิวฺหํ วา. อภวํ[Pg.279], ภวํ วา, อภว, ภว วา, อภวิมฺเห, ภวิมฺเห วา. वे हुए—'अभाविंसु' या 'भाविंसु', 'अभवुं' या 'भवुं'। तुम हुए—'अभावि' या 'भावि', 'अभवो' या 'भवो'। तुम सब हुए—'अभवित्थ' या 'भवित्थ', यहाँ 'इ' कार का आगम हुआ है। मैं हुआ—'अभाविं' या 'भाविं'। हम सब हुए—'अभविम्ह' या 'भविम्ह', 'अभविम्हा' या 'भविम्हा'। (आत्मनेपद में) वह हुआ—'अभवित्थ' या 'भवित्थ', 'अभवा' या 'भववा', 'अभवू' या 'भवू'। तुम हुए—'अभाविसे' या 'भाविसे'। तुम सब हुए—'अभविव्हं' या 'भविव्हं'। मैं हुआ—'अभवं' या 'भवं', 'अभव' या 'भव'। हम सब हुए—'अभविम्हे' या 'भविम्हे'। กมฺมนิ ยปฺปจฺจยโลเป วุทฺธิอวาเทสาทิ, สุขํ ตยา อนุภวิตฺถ, อนฺวภูยิตฺถ, อนุภูยิตฺถ วา อิจฺจาทิ. ปรสฺสปทตฺเต ตยา อนฺวภูยิ, อนุภูยิ, อนฺวภูยี, อนุภูยี วา, อนฺวภูยึสุ, อนุภูยึสุ, อนฺวภูยุํ, อนุภูยุํ. ตฺวํ อนฺวภูยิ, อนุภูยิ, ตุมฺเห อนฺวภูยิตฺถ, อนุภูยิตฺถ. อหํ อนฺวภูยึ, อนุภูยึ, มยํ อนฺวภูยิมฺห, อนุภูยิมฺห, อนฺวภูยิมฺหา, อนุภูยิมฺหา วา. ภาเว อภวิตฺถ, อภูยิตฺถ ตยา. कर्मवाच्य में 'य' प्रत्यय का लोप होने पर वृद्धि, 'अव' आदेश आदि होकर—तुम्हारे द्वारा सुख अनुभव किया गया 'अनुभवित्थ', 'अन्वभूयित्थ' या 'अनुभूयित्थ' इत्यादि। परस्मैपद होने पर—तुम्हारे द्वारा अनुभव किया गया 'अन्वभूयि', 'अनुभूयि', 'अन्वभूयी' या 'अनुभूयी', 'अन्वभूयिंसु', 'अनुभूयिंसु', 'अन्वभूयुं', 'अनुभूयुं'। तुमने अनुभव किया—'अन्वभूयि', 'अनुभूयि'। तुम सबने अनुभव किया—'अन्वभूयित्थ', 'अनुभूयित्थ'। मैंने अनुभव किया—'अन्वभूयिं', 'अनुभूयिं'। हमने अनुभव किया—'अन्वभूयिम्ह', 'अनुभूयिम्ह', 'अन्वभूयिम्हा' या 'अनुभूयिम्हा'। भाववाच्य में—तुम्हारे द्वारा हुआ 'अभवित्थ' या 'अभूयित्थ'। โส อปจิ, ปจิ, อปจี, ปจี วา, เต อปจึสุ, ปจึสุ, อปจุํ, ปจุํ. ตฺวํ อปจิ, ปจิ, อปโจ, ปโจ วา, ตุมฺเห อปจิตฺถ, ปจิตฺถ. อหํ อปจึ, ปจึ, มยํ อปจิมฺห, ปจิมฺห, อปจิมฺหา, ปจิมฺหา วา. โส อปจิตฺถ, ปจิตฺถ, อปจา, ปจา วา, อปจู, ปจู. อปจิเส, อปจิวฺหํ. อปจํ, ปจํ, อปจ, ปจ วา, อปจิมฺเห, ปจิมฺเห. उसने पकाया—'अपचि', 'पचि', 'अपची' या 'पची'। उन्होंने पकाया—'अपचिंसु', 'पचिंसु', 'अपचुं', 'पचुं'। तुमने पकाया—'अपचि', 'पचि', 'अपचो' या 'पचो'। तुम सबने पकाया—'अपचित्थ', 'पचित्थ'। मैंने पकाया—'अपचिं', 'पचिं'। हमने पकाया—'अपचिम्ह', 'पचिम्ह', 'अपचिम्हा' या 'पचिम्हा'। (आत्मनेपद में) उसने पकाया—'अपचित्थ', 'पचित्थ', 'अपचा' या 'पचा', 'अपचू' या 'पचू'। तुमने पकाया—'अपचिसे'। तुम सबने पकाया—'अपचिव्हं'। मैंने पकाया—'अपचं' या 'पचं', 'अपच' या 'पच'। हमने पकाया—'अपचिम्हे' या 'पचिम्हे'। กมฺมนิ อปจฺจิตฺถ, ปจฺจิตฺถ อิจฺจาทิ. ปรสฺสปทตฺเต อปจฺจิ, ปจฺจิ, อปจฺจี, ปจฺจี วา, อปจฺจึสุ, ปจฺจึสุ, อปจฺจุํ, ปจฺจุํ. อปจฺจิ, ปจฺจิ, อปจฺโจ, ปจฺโจ วา, อปจฺจิตฺถ, ปจฺจิตฺถ. อปจฺจึ, ปจฺจึ, อปจฺจิมฺห, ปจฺจิมฺห, อปจฺจิมฺหา, ปจฺจิมฺหา วา. कर्मवाच्य में—'अपच्चित्थ', 'पच्चित्थ' इत्यादि। परस्मैपद होने पर—'अपच्चि', 'पच्चि', 'अपच्ची' या 'पच्ची', 'अपच्चिंसु', 'पच्चिंसु', 'अपच्चुं', 'पच्चुं'। तुमने पकाया—'अपच्चि', 'पच्चि', 'अपच्चो' या 'पच्चो'। तुम सबने पकाया—'अपच्चित्थ', 'पच्चित्थ'। मैंने पकाया—'अपच्चिं', 'पच्चिं'। हमने पकाया—'अपच्चिम्ह', 'पच्चिम्ह', 'अपच्चिम्हा' या 'पच्चिम्हा'। โส คามํ อคจฺฉี, คจฺฉี, อคจฺฉิ, คจฺฉิ วา, เต อคจฺฉึสุ, คจฺฉึสุ, อคจฺฉุํ, คจฺฉุํ. ตฺวํ อคจฺฉิ, คจฺฉิ, อคจฺโฉ, คจฺโฉ วา, ตุมฺเห อคจฺฉิตฺถ, คจฺฉิตฺถ. อหํ อคจฺฉึ, คจฺฉึ, มยํ อคจฺฉิมฺห, คจฺฉิมฺห, อคจฺฉิมฺหา, คจฺฉิมฺหา วา. वह गाँव गया—'अगच्छी', 'गच्छी', 'अगच्छि' या 'गच्छि'। वे गए—'अगच्छिंसु', 'गच्छिंसु', 'अगच्छुं', 'गच्छुं'। तुम गए—'अगच्छि', 'गच्छि', 'अगच्छो' या 'गच्छो'। तुम सब गए—'अगच्छित्थ', 'गच्छित्थ'। मैं गया—'अगच्छिं', 'गच्छिं'। हम सब गए—'अगच्छिम्ह', 'गच्छिम्ह', 'अगच्छिम्हा' या 'गच्छिम्हा'। ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อชฺชตนิมฺหิ คมิสฺส จฺฉสฺส กฺวจิ ญฺฉาเทโส, อคญฺฉิ, คญฺฉิ, อคญฺฉี, คญฺฉี วา, เต อคญฺฉึสุ[Pg.280], คญฺฉึสุ, อคญฺฉุํ, คญฺฉุํ. ตฺวํ อคญฺฉิ, คญฺฉิ, อคญฺโฉ, คญฺโฉ วา, ตุมฺเห อคญฺฉิตฺถ, คญฺฉิตฺถ. อหํ อคญฺฉึ, คญฺฉึ, มยํ อคญฺฉิมฺห, คญฺฉิมฺห, อคญฺฉิมฺหา, คญฺฉิมฺหา วา. 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से अद्यतनी में 'गमु' धातु के 'च्छ' के स्थान पर कहीं-कहीं 'ञ्छ' आदेश होता है—'अगञ्छि', 'गञ्छि', 'अगञ्छी' या 'गञ्छी'। वे गए—'अगञ्छिंसु', 'गञ्छिंसु', 'अगञ्छुं', 'गञ्छुं'। तुम गए—'अगञ्छि', 'गञ्छि', 'अगञ्छो' या 'गञ्छो'। तुम सब गए—'अगञ्छित्थ', 'गञ्छित्थ'। मैं गया—'अगञ्छिं', 'गञ्छिं'। हम सब गए—'अगञ्छिम्ह', 'गञ्छिम्ह', 'अगञ्छिम्हा' या 'गञ्छिम्हा'। จฺฉาเทสาภาเว โส อคมิ, คมิ, อคมี, คมี วา, ‘‘กรสฺส กาสตฺตมชฺชตนิมฺหี’’ติ เอตฺถ ภาวนิทฺเทเสน, ‘‘สตฺตมชฺชตนิมฺหี’’ติ โยควิภาเคน วา สาคเม ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา พฺยญฺชนโต อาการาคโม, อคมาสิ, อุํวจนสฺส กฺวจิ อํสฺวาเทโส, อุจาคโม ตฺถมฺเหสุ กฺวจิ, อคมึสุ, คมึสุ, อคมํสุ, คมํสุ, อคมุํ, คมุํ, ตฺวํ อคมิ, คมิ, อคโม, คโม วา, อคมิตฺถ, คมิตฺถ, อคมุตฺถ, คมุตฺถ. อหํ อคมึ, คมึ, อคมิมฺห, คมิมฺห, อคมุมฺห, คมุมฺห, อคมิมฺหา, คมิมฺหา วา. ‘ccha’ आदेश के अभाव में वह ‘agami’, ‘gami’, ‘agamī’, या ‘gamī’ हुआ। ‘karassa kāsattamajjatanimhī’ यहाँ ‘bhāvaniddesa’ से, अथवा ‘sattamajjatanimhī’ इस योगविभाग से ‘s’ आगम होने पर ‘kvaci dhātū’ आदि से व्यंजन के बाद ‘ā’ कार का आगम होता है—‘agamāsi’। ‘uṃ’ वचन के स्थान पर कहीं ‘aṃsu’ आदेश होता है, ‘ttha’ और ‘mha’ में कहीं ‘u’ का आगम होता है—‘agamiṃsu’, ‘gamiṃsu’, ‘agamaṃsu’, ‘gamaṃsu’, ‘agamuṃ’, ‘gamuṃ’। तुम ‘agami’, ‘gami’, ‘agamo’, या ‘gamo’ हुए; ‘agamittha’, ‘gamittha’, ‘agamuttha’, ‘gamuttha’। मैं ‘agamiṃ’, ‘gamiṃ’ हुआ; ‘agamimha’, ‘gamimha’, ‘agamumha’, ‘gamumha’, ‘agamimhā’, या ‘gamimhā’ हुए। ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา คมิสฺส อชฺชตนิมฺหิ คาเทโส จ, โส อชฺฌคา, ปรโลโป, เต อชฺฌคุํ. ตฺวํ อชฺฌโค, ตุมฺเห อชฺฌคุตฺถ. อหํ อชฺฌคึ, มยํ อชฺฌคุมฺห. ‘Kvaci dhātū’ आदि (सूत्र) से ‘gam’ धातु को ‘ajjatanī’ में ‘gā’ आदेश भी होता है। वह ‘ajjhagā’ (गया), पर-लोप (अन्तिम स्वर का लोप), वे ‘ajjhaguṃ’ (गये)। तुम ‘ajjhago’, तुम सब ‘ajjhaguttha’। मैं ‘ajjhagiṃ’, हम ‘ajjhagumha’। อตฺตโนปเท โส อคจฺฉิตฺถ, คจฺฉิตฺถ, อคญฺฉิตฺถ, คญฺฉิตฺถ อิจฺจาทิ. จฺฉาเทสาภาเว โส อคมิตฺถ, คมิตฺถ, อคมา, คมา, เต อคมู, คมู, อชฺฌคู, อคู. ตฺวํ อคมิเส, คมิเส, อคมิวฺหํ, คมิวฺหํ. อหํ อคมํ, คมํ, อคม, คม, อชฺฌคํ วา, อคมิมฺเห, คมิมฺเห. आत्मनेपद में वह ‘agacchittha’, ‘gacchittha’, ‘agañchittha’, ‘gañchittha’ इत्यादि। ‘ccha’ आदेश के अभाव में वह ‘agamittha’, ‘gamittha’, ‘agamā’, ‘gamā’; वे ‘agamū’, ‘gamū’, ‘ajjhagū’, ‘agū’। तुम ‘agamise’, ‘gamise’; तुम सब ‘agamivhaṃ’, ‘gamivhaṃ’। मैं ‘agamaṃ’, ‘gamaṃ’, ‘agama’, ‘gama’, या ‘ajjhagaṃ’; हम ‘agamimhe’, ‘gamimhe’। กมฺเม คาโม อคจฺฉียิตฺถ เตน, คจฺฉียิตฺถ, อคญฺฉิยิตฺถ, คญฺฉิยิตฺถ, อคมียิตฺถ, คมียิตฺถ, อคมิตฺถ, คมิตฺถ อิจฺจาทิ. ปรสฺสปทตฺเต อคจฺฉียิ, คจฺฉียิ วา, อคมียิ, คมียิ [Pg.281] วา, อคจฺฉียุํ, อคมียุํ วา. ตถา อฆมฺมียิ, อฆมฺมียึสุ อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में—उसके द्वारा गाँव ‘agacchīyittha’, ‘gacchīyittha’, ‘agañchiyittha’, ‘gañchiyittha’, ‘agamīyittha’, ‘gamīyittha’, ‘agamittha’, ‘gamittha’ इत्यादि। परस्मैपद होने पर ‘agacchīyi’ या ‘gacchīyi’, ‘agamīyi’ या ‘gamīyi’, ‘agacchīyuṃ’ या ‘agamīyuṃ’। वैसे ही ‘aghammīyi’, ‘aghammīyiṃsu’ इत्यादि। ‘‘หิยฺยตฺตนี, อชฺชตนี’’ติ จ วตฺตเต. ‘Hiyyattanī’ और ‘ajjatanī’ की अनुवृत्ति होती है। ๔๗๑. มาโยเค สพฺพกาเล จ. ४७१. ‘Mā’ के योग में और सभी कालों में। ยทามาโยโค, ตทา หิยฺยตฺตนชฺชตนีวิภตฺติโย สพฺพกาเลปิ โหนฺติ, จสทฺเทน ปญฺจมี จ. มา ภวติ, มา ภวา, มา ภวิสฺสตีติ วา อตฺเถ หิยฺยตฺตนชฺชตนีปญฺจมี วิภตฺติโย, เสสํ เนยฺยํ, โส มา ภวา, มา ภวี, มา เต ภวนฺตฺวนฺตรายา. มา ปจา, มา ปจี, มา ปจตุ. มา คจฺฉา, มา คจฺฉี, มา คจฺฉตุ. มา กญฺจิ ปาปมาคมา, มา อคมิ, มา คมา, มา คมี, มา คเมตุ. ตฺวํ มา คจฺโฉ, มา คจฺฉิ, มา คจฺฉาหิ อิจฺจาทิ. जब ‘mā’ का योग होता है, तब ‘hiyyattanī’ और ‘ajjatanī’ विभक्तियाँ सभी कालों में भी होती हैं, और ‘ca’ शब्द से ‘pañcamī’ (आज्ञार्थक) भी। ‘mā bhavati’ (न हो), ‘mā bhavā’, या ‘mā bhavissatī’ (न होगा) के अर्थ में ‘hiyyattanī’, ‘ajjatanī’ और ‘pañcamī’ विभक्तियाँ होती हैं; शेष को समझना चाहिए। वह ‘mā bhavā’, ‘mā bhavī’ (न हो)। ‘mā te bhavantvantarāyā’ (तुम्हें अन्तराय न हों)। ‘mā pacā’, ‘mā pacī’, ‘mā pacatu’ (मत पकाओ)। ‘mā gacchā’, ‘mā gacchī’, ‘mā gacchatu’ (मत जाओ)। ‘mā kañci pāpamāgamā’ (कोई पाप न आए), ‘mā agami’, ‘mā gamā’, ‘mā gamī’, ‘mā gametu’। तुम ‘mā gaccho’, ‘mā gacchi’, ‘mā gacchāhi’ इत्यादि। อตีตกาลิกวิภตฺติ. अतीतकालिक विभक्ति (भूतकाल की विभक्तियाँ)। ๔๗๒. ภวิสฺสนฺตี สฺสติ สฺสนฺติ, สฺสสิ สฺสถ, สฺสามิสฺสาม, สฺสเต สฺสนฺเต, สฺสเส สฺสวฺเห, สฺสํสฺสามฺเห. ४७२. भविष्यन्ती (भविष्य काल): ssati ssanti, ssasi ssatha, ssāmissāma, ssate ssante, ssase ssavhe, ssaṃssāmhe। สฺสตฺยาทีนํ ทฺวาทสนฺนํ วจนานํ ภวิสฺสนฺตีสญฺญา โหติ. ภวิสฺสตีติ ภวิสฺสนฺโต, ตํกาลทีปกตฺตา อยํ วิภตฺติ ภวิสฺสนฺตีติ วุจฺจติ. ‘ssati’ आदि बारह वचनों (प्रत्ययों) की ‘bhavissantī’ संज्ञा होती है। ‘bhavissatī’ का अर्थ है—जो भविष्य में होगा; उस काल को बताने वाली होने के कारण इस विभक्ति को ‘bhavissantī’ कहा जाता है। ๔๗๓. อนาคเต ภวิสฺสนฺตี. ४७३. अनागत (भविष्य) काल में ‘bhavissantī’ होती है। อนาคเต กาเล ภวิสฺสนฺตีวิภตฺติ โหติ. अनागत काल में ‘bhavissantī’ विभक्ति होती है। อตีเตปิ ภวิสฺสนฺตี, ตํกาลวจนิจฺฉยา; ‘‘อเนกชาติสํสารํ, สนฺธาวิสฺส’’นฺติอาทิสุ. अतीत (भूतकाल) में भी ‘bhavissantī’ होती है, उस काल के वचन की इच्छा से; जैसे—‘anekajātisaṃsāraṃ sandhāvissaṃ’ (अनेक जन्मों के संसार में मैं दौड़ा) इत्यादि में। น [Pg.282] อาคโต อนาคโต, ปจฺจยสามคฺคิยํ สติ อายตึ อุปฺปชฺชนารโหติ อตฺโถ, อิการาคโม, วุทฺธิอวาเทสา, สรโลปาทิ จ. जो नहीं आया वह ‘anāgato’ (अनागत) है; प्रत्यय-सामग्री होने पर भविष्य में उत्पन्न होने योग्य—यह अर्थ है। ‘i’ कार का आगम, वृद्धि, ‘av’ आदेश और स्वर-लोप आदि होते हैं। ภวิสฺสติ, ภวิสฺสนฺติ. ภวิสฺสสิ, ภวิสฺสถ. ภวิสฺสามิ, ภวิสฺสาม. ภวิสฺสเต, ภวิสฺสนฺเต. ภวิสฺสเส, ภวิสฺสวฺเห. ภวิสฺสํ, ภวิสฺสามฺเห. वह होगा (bhavissati), वे होंगे (bhavissanti)। तुम होगे (bhavissasi), तुम सब होगे (bhavissatha)। मैं होऊँगा (bhavissāmi), हम होंगे (bhavissāma)। (आत्मनेपद): bhavissate, bhavissante। bhavissase, bhavissavhe। bhavissaṃ, bhavissāmhe। กมฺเม ยปฺปจฺจยโลโป, สุขํ ตยา อนุภวิสฺสเต, อนุภวิสฺสนฺเต. อนุภวิสฺสเส, อนุภวิสฺสวฺเห. อนุภวิสฺสํ, อนุภวิสฺสามฺเห. ปรสฺสปทตฺเต อนุภวิสฺสติ เทวทตฺเตน, อนุภวิสฺสนฺติ อิจฺจาทิ. ภาเว ภวิสฺสเต เตน, ยปฺปจฺจยโลปาภาเว อนุภูยิสฺสเต, อนุภูยิสฺสนฺเต อิจฺจาทิ. ภาเว ภูยิสฺสเต. कर्मवाच्य में ‘ya’ प्रत्यय का लोप होता है—तुम्हारे द्वारा सुख ‘anubhavissate’ (अनुभव किया जाएगा), ‘anubhavissante’। ‘anubhavissase’, ‘anubhavissavhe’। ‘anubhavissaṃ’, ‘anubhavissāmhe’। परस्मैपद होने पर—देवदत्त के द्वारा ‘anubhavissati’, ‘anubhavissanti’ इत्यादि। भाववाच्य में—उसके द्वारा ‘bhavissate’; ‘ya’ प्रत्यय के लोप के अभाव में ‘anubhūyissate’, ‘anubhūyissante’ इत्यादि। भाववाच्य में ‘bhūyissate’। ตถา ปจิสฺสติ, ปจิสฺสนฺติ. ปจิสฺสสิ, ปจิสฺสถ. ปจิสฺสามิ, ปจิสฺสาม. ปจิสฺสเต, ปจิสฺสนฺเต. ปจิสฺสเส, ปจิสฺสวฺเห. ปจิสฺสํ, ปจิสฺสามฺเห. वैसे ही—वह पकाएगा (pacissati), वे पकाएंगे (pacissanti)। तुम पकाओगे (pacissasi), तुम सब पकाओगे (pacissatha)। मैं पकाऊँगा (pacissāmi), हम पकाएंगे (pacissāma)। (आत्मनेपद): pacissate, pacissante। pacissase, pacissavhe। pacissaṃ, pacissāmhe। กมฺเม ปจฺจิสฺสเต โอทโน เทวทตฺเตน, ปจฺจิสฺสนฺเต อิจฺจาทิ. ปรสฺสปทตฺเต ปจฺจิสฺสติ, ปจฺจิสฺสนฺติ. ปจฺจิสฺสสิ, ปจฺจิสฺสถ. ปจฺจิสฺสามิ, ปจฺจิสฺสาม. कर्मवाच्य में—देवदत्त के द्वारा भात ‘paccissate’ (पकाया जाएगा), ‘paccissante’ इत्यादि। परस्मैपद होने पर ‘paccissati’, ‘paccissanti’। ‘paccissasi’, ‘paccissatha’। ‘paccissāmi’, ‘paccissāma’। คจฺฉิสฺสติ, คจฺฉิสฺสนฺติ. คจฺฉิสฺสสิ, คจฺฉิสฺสถ. คจฺฉิสฺสามิ, คจฺฉิสฺสาม. คจฺฉิสฺสเต, คจฺฉิสฺสนฺเต. คจฺฉิสฺสเส, คจฺฉิสฺสวฺเห. คจฺฉิสฺสํ, คจฺฉิสฺสามฺเห. โส สคฺคํ คมิสฺสติ, คมิสฺสนฺติ. คมิสฺสสิ, คมิสฺสถ. คมิสฺสามิ, คมิสฺสาม อิจฺจาทิ. वह जाएगा (gacchissati), वे जाएंगे (gacchissanti)। तुम जाओगे (gacchissasi), तुम सब जाओगे (gacchissatha)। मैं जाऊँगा (gacchissāmi), हम जाएंगे (gacchissāma)। (आत्मनेपद): gacchissate, gacchissante। gacchissase, gacchissavhe। gacchissaṃ, gacchissāmhe। वह स्वर्ग जाएगा (gamissati), वे जाएंगे (gamissanti)। तुम जाओगे (gamissasi), तुम सब जाओगे (gamissatha)। मैं जाऊँगा (gamissāmi), हम जाएंगे (gamissāma) इत्यादि। กมฺเม คจฺฉียิสฺสเต, คจฺฉียิสฺสนฺเต. คจฺฉียิสฺสติ, คจฺฉียิสฺสนฺติ วา, คมียิสฺสเต, คมียิสฺสนฺเต. คมียิสฺสติ, คมียิสฺสนฺติ วา อิจฺจาทิ. ยปฺปจฺจยโลเป คมิสฺสเต[Pg.283], คมิสฺสนฺเต. คมิสฺสติ, คมิสฺสนฺติ วา. ตถา ฆมฺมิสฺสติ, ฆมฺมิสฺสนฺติ อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में ‘gacchīyissate’, ‘gacchīyissante’। अथवा ‘gacchīyissati’, ‘gacchīyissanti’; ‘gamīyissate’, ‘gamīyissante’। अथवा ‘gamīyissati’, ‘gamīyissanti’ इत्यादि। ‘ya’ प्रत्यय के लोप होने पर ‘gamissate’, ‘gamissante’। अथवा ‘gamissati’, ‘gamissanti’। वैसे ही ‘ghammissati’, ‘ghammissanti’ इत्यादि। ภวิสฺสนฺตีวิภตฺติ. भविष्यन्ती विभक्ति। ๔๘๔. กาลาติปตฺติ สฺสา สฺสํสุ, สฺเส สฺสถ, สฺสํสฺสามฺหา, สฺสถ สฺสิสุ, สฺสเส สฺสวฺเห, สฺสึสฺสามฺหเส. ४८४. कालातिपत्ति (Conditional): ssā ssaṃsu, sse ssatha, ssaṃssāmhā, ssatha ssisu, ssase ssavhe, ssiṃssāmhase। สฺสาทีนํ ทฺวาทสนฺนํ กาลาติปตฺติสญฺญา โหติ. กาลสฺส อติปตนํ กาลาติปตฺติ, สา ปน วิรุทฺธปจฺจยูปนิปาตโต, การณเวกลฺลโต วา กฺริยาย อนภินิพฺพตฺติ, ตทฺทีปกตฺตา อยํ วิภตฺติ กาลาติปตฺตีติ วุจฺจติ. ‘ssā’ आदि बारह (प्रत्ययों) की ‘kālātipatti’ संज्ञा होती है। काल का अतिपतन (बीत जाना) ‘kālātipatti’ है; वह विपरीत कारणों के उपस्थित होने से अथवा कारणों की कमी से क्रिया की निष्पत्ति न होना है; उसे बताने वाली होने के कारण इस विभक्ति को ‘kālātipatti’ कहा जाता है। ๔๗๕. กฺริยาติปนฺเนตีเต กาลาติปตฺติ. ४७५. क्रिया के अतिपन्न (अपूर्ण) रहने पर अतीत काल में ‘kālātipatti’ होती है। กฺริยาติปนฺนมตฺเต อตีเต กาเล กาลาติปตฺติวิภตฺติ โหติ. กฺริยาย อติปตนํ กฺริยาติปนฺนํ, ตํ ปน สาธกสตฺติวิรเหน กฺริยาย อจฺจนฺตานุปฺปตฺติ. เอตฺถ จ กิญฺจาปิ น กฺริยา อตีตสทฺเทน โวหริตพฺพา, ตถาปิ ตกฺกิริยุปฺปตฺติปฺปฏิพนฺธกรกฺริยาย กาลเภเทน อตีตโวหาโร ลพฺภเตวาติ ทฏฺฐพฺพํ. क्रिया के अतिपन्न (अपूर्ण) रहने मात्र पर अतीत काल में ‘kālātipatti’ विभक्ति होती है। क्रिया का अतिपतन ‘kriyātipanna’ है, और वह साधक शक्ति के अभाव में क्रिया की अत्यन्त अनुत्पत्ति है। यहाँ यद्यपि क्रिया को ‘अतीत’ शब्द से नहीं कहा जाना चाहिए, फिर भी उस क्रिया की उत्पत्ति में बाधक क्रिया के काल-भेद से ‘अतीत’ व्यवहार प्राप्त होता है—ऐसा समझना चाहिए। กาลาติปตฺติปรสฺสปทปฐมปุริเสกวจนํ สฺสา, อการิการาคมา, วุทฺธิอวาเทสา จ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา สฺสา สฺสามฺหาวิภตฺตีนํ กฺวจิ รสฺสตฺตํ, สฺเสวจนสฺส จ อตฺตํ. कालातिपत्ति परस्मैपद प्रथम पुरुष एकवचन 'स्सा' है, अ-कार और इ-कार का आगम, तथा वृद्धि और 'अव्' आदेश होते हैं; 'क्वचि धातु' इत्यादि (सूत्र) से 'स्सा' और 'स्साम्हा' विभक्तियों का कहीं ह्रस्व होता है, और 'स्से' वचन का 'अ' होता है। โส เจ ปฐมวเย ปพฺพชฺชํ อลภิสฺส, อรหา อภวิสฺส, ภวิสฺส, อภวิสฺสา, ภวิสฺสาวา, เต เจ ตํ อลภิสฺสํสุ, อรหนฺโต อภวิสฺสํสุ, ภวิสฺสํสุ. เอวํ ตฺวํ อภวิสฺส, ภวิสฺส, อภวิสฺเส วา, ตุมฺเห อภวิสฺสถ, ภวิสฺสถ. อหํ อภวิสฺสํ, ภวิสฺสํ, มยํ [Pg.284] อภวิสฺสมฺห, ภวิสฺสมฺห, อภวิสฺสามฺหา, ภวิสฺสามฺหา วา. โส อภวิสฺสถ, อภวิสฺสิสุ. อภวิสฺสเส, อภวิสฺสวฺเห. อภวิสฺสึ, อภวิสฺสามฺหเส. यदि वह प्रथम अवस्था (युवावस्था) में प्रव्रज्या प्राप्त करता, तो वह अर्हत् होता, होता, होता, या होता; यदि वे उसे प्राप्त करते, तो वे अर्हत् होते, होते। इसी प्रकार तुम होते, होते, या होते; तुम सब होते, होते। मैं होता, होता; हम होते, होते, या होते। वह होता, वे होते। तुम होते, तुम सब होते। मैं होता, हम होते। กมฺเม อนฺวภวิสฺสถ, อนฺวภวิสฺสิสุ. อนฺวภูยิสฺสถ วา อิจฺจาทิ. ปรสฺสปทตฺเต อนฺวภวิสฺส, อนฺวภวิสฺสํสุ. อนฺวภูยิสฺส วา อิจฺจาทิ. ภาเว อภวิสฺสถ เทวทตฺเตน, อภูยิสฺสถ. कर्मवाच्य में 'अन्वभविस्सथ', 'अन्वभविस्सिसु' होते हैं। 'अन्वभूयिस्सथ' आदि भी। परस्मैपद होने पर 'अन्वभविस्स', 'अन्वभविस्संु'। 'अन्वभूयिस्स' आदि भी। भाववाच्य में 'अभविस्सथ देवदत्तेन', 'अभूयिस्सथ'। ตถา โส เจ ตํ ธนํ อลภิสฺส, โอทนํ อปจิสฺส, ปจิสฺส, อปจิสฺสา, ปจิสฺสา วา, อปจิสฺสํสุ, ปจิสฺสํสุ. อปจิสฺส, ปจิสฺส, อปจิสฺเส, ปจิสฺเส วา, อปจิสฺสถ, ปจิสฺสถ. อปจิสฺสํ, ปจิสฺสํ, อปจิสฺสมฺห, ปจิสฺสมฺห, อปจิสฺสามฺหา, ปจิสฺสามฺหา วา. อปจิสฺสถ, ปจิสฺสถ, อปจิสฺสิสุ, ปจิสฺสิสุ. อปจิสฺสเส, ปจิสฺสเส, อปจิสฺสวฺเห, ปจิสฺสวฺเห. อปจิสฺสึ, ปจิสฺสึ, อปจิสฺสามฺหเส, ปจิสฺสามฺหเส. उसी प्रकार यदि वह उस धन को प्राप्त करता, तो वह भात पकाता, पकाता, पकाता, या पकाता; वे पकाते, पकाते। तुम पकाते, पकाते, पकाते, या पकाते; तुम सब पकाते, पकाते। मैं पकाता, पकाता; हम पकाते, पकाते, पकाते, या पकाते। वह पकाता, वे पकाते। तुम पकाते, तुम सब पकाते। मैं पकाता, हम पकाते। กมฺเม อปจิสฺสถ โอทโน เทวทตฺเตน, อปจิสฺสิสุ. ยปฺปจฺจยโลปาภาเว อปจียิสฺสถ อิจฺจาทิ. ปรสฺสปทตฺเต อปจฺจิสฺส เตน, ปจฺจิสฺส, อปจฺจิสฺสา, ปจฺจิสฺสา วา, อปจฺจิสฺสํสุ, ปจฺจิสฺสํสุ อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में 'अपचिस्सथ ओदनो देवदत्तेन' (देवदत्त द्वारा भात पकाया जाता), 'अपचिस्सिसु'। 'य' प्रत्यय के लोप के अभाव में 'अपचीयिस्सथ' आदि। परस्मैपद होने पर 'अपच्चिस्स तेन', 'पच्चिस्स', 'अपच्चिस्सा', 'पच्चिस्सा' या 'अपच्चिस्संु', 'पच्चिस्संु' आदि। โส อคจฺฉิสฺส, คจฺฉิสฺส, อคจฺฉิสฺสา, คจฺฉิสฺสาวา, อคจฺฉิสฺสํสุ, คจฺฉิสฺสํสุ. ตฺวํ อคจฺฉิสฺส, คจฺฉิสฺส, อคจฺฉิสฺเส, คจฺฉิสฺเส วา, อคจฺฉิสฺสถ, คจฺฉิสฺสถ. อคจฺฉิสฺสํ, คจฺฉิสฺสํ, อคจฺฉิสฺสมฺห, คจฺฉิสฺสมฺห, อคจฺฉิสฺสามฺหา, คจฺฉิสฺสามฺหา วา. อคมิสฺส, คมิสฺส, อคมิสฺสา, คมิสฺสา วา, อคมิสฺสํสุ, คมิสฺสํสุ. อคมิสฺส, คมิสฺส, อคมิสฺเส วา, อคมิสฺสถ, คมิสฺสถ. อคมิสฺสํ[Pg.285], คมิสฺสํ, อคมิสฺสมฺห, คมิสฺสมฺห, อคมิสฺสามฺหา, คมิสฺสามฺหา วา. อคจฺฉิสฺสถ, คจฺฉิสฺสถ วา อิจฺจาทิ. वह जाता, जाता, जाता, या जाता; वे जाते, जाते। तुम जाते, जाते, जाते, या जाते; तुम सब जाते, जाते। मैं जाता, जाता; हम जाते, जाते, जाते, या जाते। वह जाता, जाता, जाता, या जाता; वे जाते, जाते। तुम जाते, जाते, जाते; तुम सब जाते, जाते। मैं जाता, जाता; हम जाते, जाते, जाते, या जाते। 'अगच्छिस्सथ', 'गच्छिस्सथ' आदि। กมฺเม อคจฺฉียิสฺสถ, อคมียิสฺสถ, อคจฺฉียิสฺส, อคมียิสฺสอิจฺจาทิ. ตถา อฆมฺมิสฺสา, อฆมฺมิสฺสํสุ อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में 'अगच्छीयिस्सथ', 'अगमीयिस्सथ', 'अगच्छीयिस्स', 'अगमीयिस्स' आदि। उसी प्रकार 'अघम्मिस्सा', 'अघम्मिस्संु' आदि। กาลาติปตฺติวิภตฺติ. कालातिपत्ति विभक्ति। ปญฺจมี สตฺตมี วตฺต-มานา สมฺปตินาคเต; ภวิสฺสนฺตี ปโรกฺขาที, จตสฺโสตีตกาลิกา. पञ्चमी (आज्ञा/प्रार्थना), सप्तमी (विधि/संभावना) और वर्तमाना वर्तमान और भविष्य काल में होती हैं; भविष्यन्ती और परोक्षा आदि चार भूतकाल की होती हैं। ฉกาลิกวิภตฺติวิธานํ. छह कालिक विभक्तियों का विधान। วิกรณวิธาน विकरण विधान। อิสุ อิจฺฉากนฺตีสุ, ปุเร วิย ธาตฺวนฺตโลโป, ตฺยาทฺยุปฺปตฺติ, อปฺปจฺจโย จ. 'इषु' धातु इच्छा और कान्ति (चाहने) के अर्थ में है, पहले की तरह धातु के अन्त्य का लोप, 'ति' आदि की उत्पत्ति और 'अ' प्रत्यय होता है। ‘‘ธาตูน’’นฺติ วตฺตมาเน – 'धातूनां' की अनुवृत्ति होने पर – ๔๗๖. อิสุยมูนมนฺโต จฺโฉ วา. ४७६. इषु और यमु धातुओं के अन्त्य को 'च्छ' विकल्प से होता है। อิสุยมุอิจฺเจเตสํ ธาตูนํ อนฺโต จฺโฉ โหติ วา. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, ‘‘อนฺโต จฺโฉ วา’’ติ โยควิภาเคน อาสสฺสปิ. โส สคฺคํ อิจฺฉติ, อิจฺฉนฺติ. อิจฺฉสิ, อิจฺฉถ. อิจฺฉามิ, อิจฺฉาม. จฺฉาเทสาภาเว อสํโยคนฺตตฺตา ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ วุทฺธิ, เอสติ, เอสนฺติ อิจฺจาทิ. 'इषु' और 'यमु' इन धातुओं के अन्त्य को विकल्प से 'च्छ' होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है, 'अन्तो च्छो वा' इस योग-विभाग से 'आस' धातु को भी होता है। वह स्वर्ग की इच्छा करता है (इच्छति), वे इच्छा करते हैं (इच्छन्ति)। तुम इच्छा करते हो (इच्छसि), तुम सब इच्छा करते हो (इच्छथ)। मैं इच्छा करता हूँ (इच्छामि), हम इच्छा करते हैं (इच्छाम)। 'च्छ' आदेश के अभाव में असंयोगान्त होने के कारण 'अञ्ञेसु च' सूत्र से वृद्धि होकर 'एसति', 'एसन्ति' आदि रूप होते हैं। กมฺเม อตฺตโนปทสฺส เยภุยฺเยน ปรสฺสปทตฺตเมว ปโยชียติ, เตน เจตฺถ อตฺตโนปเท รูปานิ สงฺขิปิสฺสาม. โส อิจฺฉียติ, เอสียติ, อิสฺสเต, อิสฺสติ, ยการสฺส [Pg.286] ปุพฺพรูปตฺตํ. ตถา อิจฺฉตุ, เอสตุ. อิจฺเฉยฺย, เอเสยฺย. ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนีสุ ปน รูปานิ สพฺพตฺถ ปโยคมนุคมฺม ปโยเชตพฺพานิ, อิจฺฉิ, เอสิ. อิจฺฉิสฺสติ, เอสิสฺสติ. อิจฺฉิสฺสา, เอสิสฺสา อิจฺฉาทิ. कर्मवाच्य में आत्मनेपद के स्थान पर प्रायः परस्मैपद ही प्रयुक्त होता है, इसलिए यहाँ आत्मनेपद के रूपों को संक्षेप में कहेंगे। वह चाहा जाता है (इच्छीयति, एसीयति, इस्सते, इस्सति), यहाँ 'य' कार का पूर्वरूप हुआ है। उसी प्रकार 'इच्छतु', 'एसतु'। 'इच्छेय्य', 'एसेय्य'। परोक्षा और हिय्यत्तनी में तो सभी जगह प्रयोग के अनुसार रूपों का प्रयोग करना चाहिए, जैसे 'इच्छि', 'एसि'। 'इच्छिस्सति', 'एसिस्सति'। 'इच्छिस्सा', 'एसिस्सा' आदि। ยมุ อุปรเม, นิปุพฺโพ, จฺฉาเทโส จ. นิยจฺฉติ, นิยจฺฉนฺติ. นิยมติ, นิยมนฺติ. สํปุพฺโพ ‘‘สเย จา’’ติ ญตฺตํ, ทฺวิตฺตญฺจ. สญฺญมติ, สญฺญมนฺติ. 'यमु' धातु उपरति (रुकने) के अर्थ में है, 'नि' उपसर्ग पूर्वक होने पर 'च्छ' आदेश होता है। 'नियच्छति', 'नियच्छन्ति'। 'नियमति', 'नियमन्ति'। 'सम्' उपसर्ग पूर्वक होने पर 'सये चा' सूत्र से 'ञ' भाव और द्वित्व होता है। 'सञ्ञमति', 'सञ्ञमन्ति'। กมฺเม นิยจฺฉียติ, นิยมียติ, นิยมฺมติ, สญฺญมียติ วา. ตถา นิยจฺฉตุ, สญฺญมตุ. นิยจฺเฉยฺย, สญฺญเมยฺย. นิยจฺฉี, สญฺญมี. นิยจฺฉิสฺสติ, สญฺญมิสฺสติ. นิยจฺฉิสฺส, สญฺญมิสฺส อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में 'नियच्छीयति', 'नियमीयति', 'नियम्यति' या 'सञ्ञमीयति' होते हैं। उसी प्रकार 'नियच्छतु', 'सञ्ञमतु'। 'नियच्छेय्य', 'सञ्ञमेय्य'। 'नियच्छी', 'सञ्ञमी'। 'नियच्छिस्सति', 'सञ्ञमिस्सति'। 'नियच्छिस्स', 'सञ्ञमिस्स' आदि। อาส อุปเวสเน, โยควิภาเคน จฺฉาเทโส, รสฺสตฺตํ. อจฺฉติ, อจฺฉนฺติ. อจฺฉสิ, อจฺฉถ. อจฺฉามิ, อจฺฉาม. อญฺญตฺร อุปปุพฺโพ อุปาสติ, อุปาสนฺติ. อจฺฉียติ, อุปาสียติ. อจฺฉตุ, อุปาสตุ. อจฺเฉยฺย, อุปาเสยฺย. อจฺฉี, อุปาสี. อจฺฉิสฺสติ, อุปาสิสฺสติ. อจฺฉิสฺส, อุปาสิสฺส อิจฺจาทิ. 'आस' धातु बैठने के अर्थ में है, योग-विभाग से 'च्छ' आदेश और ह्रस्व होता है। 'अच्छति', 'अच्छन्ति'। 'अच्छसि', 'अच्छथ'। 'अच्छामि', 'अच्छाम'। अन्यत्र 'उप' उपसर्ग पूर्वक 'उपासति', 'उपासन्ति' होता है। 'अच्छीयति', 'उपासीयति'। 'अच्छतु', 'उपासतु'। 'अच्छेय्य', 'उपासेय्य'। 'अच्छी', 'उपासी'। 'अच्छिस्सति', 'उपासिस्सति'। 'अच्छिस्स', 'उपासिस्स' आदि। ลภ ลาเภ, ลภติ, ลภนฺติ. ลภสิ, ลภถ. ลภามิ, ลภาม. ลภเต, ลภนฺเต. ลภเส, ลภวฺเห. ลเภ, ลภามฺเห. 'लभ' धातु लाभ के अर्थ में है, 'लभति', 'लभन्ति'। 'लभसि', 'लभथ'। 'लभामि', 'लभाम'। 'लभते', 'लभन्ते'। 'लभसे', 'लभवहे'। 'लभे', 'लभाम्हे'। กมฺเม ยการสฺส ปุพฺพรูปตฺเต กเต ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ปุริมภการสฺส พกาโร, ลพฺภเต, ลพฺภนฺเต. ลพฺภติ, ลพฺภนฺติ. ลพฺภตํ, ลพฺภตุ. ลพฺเภ, ลพฺเภยฺย. कर्मवाच्य में 'य' कार का पूर्वरूप होने पर 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से पूर्व 'भ' कार को 'ब' कार होकर 'लब्भते', 'लब्भन्ते' रूप बनते हैं। 'लब्भति', 'लब्भन्ति'। 'लब्भतं', 'लब्भतु'। 'लब्भे', 'लब्भेय्य'। อชฺชตนิมฺหิ ‘‘วา, อนฺตโลโป’’ติ จ วตฺตมาเน – अद्यतनी में 'वा' और 'अन्तलोपो' की अनुवृत्ति होने पर – ๔๗๗. ลภสฺมา อี อึนํ ตฺถตฺถํ. ४७७. 'लभ' धातु से परे 'ई' और 'इं' विभक्तियों को क्रमशः 'त्थ' और 'त्थं' आदेश होते हैं। ลภอิจฺเจตสฺมา ธาตุโต ปเรสํ อีอึนํ วิภตฺตีนํ ตฺถ ตฺถํอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา, ธาตฺวนฺตสฺส โลโป [Pg.287] จ. อลตฺถ, อลภิ, ลภิ, อลภึสุ, ลภึสุ. อลโภ, ลโภ, อลภิ, ลภิ, อลภิตฺถ, ลภิตฺถ. อลตฺถํ, อลภึ, ลภึ, อลภิมฺห, ลภิมฺห อิจฺจาทิ. 'लभ्' (labh) धातु से परे 'ई' और 'इुं' विभक्तियों के स्थान पर 'त्थ' और 'त्थं' आदेश विकल्प से होते हैं, और धातु के अन्त्य वर्ण का लोप होता है। अलत्थ, अलभि, लभि, अलभिंसु, लभिंसु। अलभो, लभो, अलभि, लभि, अलभित्थ, लभित्थ। अलत्थं, अलभिं, लभिं, अलभिम्ह, लभिम्ह इत्यादि। ภวิสฺสนฺติมฺหิ ‘‘กรสฺส สปฺปจฺจยสฺส กาโห’’ติ เอตฺถ สปฺปจฺจยคฺคหเณน วจ มุจ ภุชาทิโต สฺสสฺสขาเทโส, วส ฉิท ลภาทิโต ฉาเทโส จ วา โหตีติ สฺสสฺส ฉาเทโส, ‘‘พฺยญฺชนนฺตสฺส โจ ฉปฺปจฺจเยสุ จา’’ติ ธาตฺวนฺตสฺส จกาโร, ลจฺฉติ, ลจฺฉนฺติ. ลจฺฉสิ, ลจฺฉถ. ลจฺฉามิ, ลจฺฉาม. ฉาเทสาภาเว ลภิสฺสติ, ลภิสฺสนฺติ. ลภิสฺสสิ, ลภิสฺสถ. ลภิสฺสามิ, ลภิสฺสาม อิจฺจาทิ. อลภิสฺส, อลภิสฺสํสุ อิจฺจาทิ. भविष्यत् काल में 'करस्स सप्पच्चयस्स काहो' यहाँ 'सप्पच्चय' ग्रहण से 'वच', 'मुच', 'भुज' आदि से 'स्स' के स्थान पर 'ख' आदेश, और 'वस', 'छिद', 'लभ' आदि से 'छ' आदेश विकल्प से होता है, इस प्रकार 'स्स' का 'छ' आदेश होता है। 'ब्यञ्जनन्तस्स चो छप्पच्चयेसु चा' सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण का 'च' कार होता है - लच्छति, लच्छन्ति। लच्छसि, लच्छथ। लच्छामि, लच्छाम। 'छ' आदेश के अभाव में - लभिस्सति, लभिस्सन्ति। लभिस्ससि, लभिस्सथ। लभिस्सामि, लभिस्साम इत्यादि। अलभिस्स, अलभिस्संु इत्यादि। วจ วิยตฺติยํ วาจายํ, วจติ, วจนฺติ. วจสิ, วจถ. วจามิ, วจาม. 'वच' धातु स्पष्ट वाणी (बोलने) के अर्थ में है - वचति, वचन्ति। वचसि, वचथ। वचामि, वचाम। กมฺเม อตฺตโนปเท, ยปฺปจฺจเย จ กเต – कर्मवाच्य में आत्मनेपद और 'य' प्रत्यय होने पर - ๔๗๘. วจ วส วหาทีนมุกาโร วสฺส เย. ४७८. 'य' प्रत्यय परे होने पर 'वच', 'वस', 'वह' आदि धातुओं के 'व' कार को 'उ' कार होता है। วจ วส วหอิจฺเจวมาทีนํ ธาตูนํ วการสฺส อุกาโร โหติ ยปฺปจฺจเย ปเร, อาทิสทฺเทน วฑฺฒสฺส จ. ‘‘วสฺส อ ว’’อิติ สมาเสน ทุติยญฺเจตฺถ วคฺคหณํ อิจฺฉิตพฺพํ, เตน อการสฺสปิ อุกาโร โหติ, ปุริมปกฺเข ปรโลโป. ‘‘ตสฺส จวคฺค’’อิจฺจาทินา สธาตฺวนฺตสฺส ยการสฺส จกาโร, ทฺวิตฺตํ. อุจฺจเต, อุจฺจนฺเต. วุจฺจเต, วุจฺจนฺเต. วุจฺจติ, วุจฺจนฺติ วา อิจฺจาทิ. ตถา วจตุ, วุจฺจตุ. วเจยฺย, วุจฺเจยฺย. อวจา, อวจฺจา, อวจู, อวจฺจู. อวจ, อวโจ, อวจุตฺถ. อวจ, อวจํ, อวจมฺหา. อวจุตฺถ อิจฺจาทิ. 'वच', 'वस', 'वह' इत्यादि धातुओं के 'व' कार को 'य' प्रत्यय परे होने पर 'उ' कार होता है, 'आदि' शब्द से 'वड्ढ' का भी। 'वस्स अ व' इस समास से यहाँ द्वितीय 'व' का ग्रहण इष्ट है, उससे 'अ' कार को भी 'उ' कार होता है, पूर्व पक्ष में पर-लोप होता है। 'तस्स चवग्ग' इत्यादि सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण सहित 'य' कार का 'च' कार और द्वित्व होता है - उच्चते, उच्चन्ते। वुच्चते, वुच्चन्ते। वुच्चति, वुच्चन्ति वा इत्यादि। तथा वचतु, वुच्चतु। वचेय्य, वुच्चेय्य। अवचा, अवच्चा, अवचू, अवच्चू। अवच, अवचो, अवचुत्थ। अवच, अवचं, अवचम्हा। अवचुत्थ इत्यादि। ๔๗๙. วจสฺสชฺชตนิมฺหิ [Pg.288] มกาโร โอ. ४७९. अद्यतनी विभक्ति में 'वच' धातु के 'अ' कार को 'ओ' होता है। วจอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส อกาโร โอตฺตมาปชฺชเต อชฺชตนิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ. อโวจิ, อโวจุํ. อโวโจ, อโวจุตฺถ. อโวจึ, อโวจุมฺห, อุการาคโม. อโวจ, รสฺสตฺตํ, อโวจุ อิจฺจาทิ. อวุจฺจิตฺถ. 'वच' इस धातु का 'अ' कार अद्यतनी विभक्ति में 'ओ' भाव को प्राप्त होता है। अवोचि, अवोचुं। अवोचो, अवोचुत्थ। अवोचिं, अवोचुम्ह, 'उ' कार का आगम। अवोच, ह्रस्वत्व, अवोचु इत्यादि। अवुच्चित्थ। ภวิสฺสนฺติมฺหิ สปฺปจฺจยคฺคหเณน สฺสสฺส ขาเทโส, ‘‘พฺยญฺชนนฺตสฺสา’’ติ วตฺตมาเน ‘‘โก เข จา’’ติ ธาตฺวนฺตสฺส กาเทโส, วกฺขติ, วกฺขนฺติ. วกฺขสิ, วกฺขถ. วกฺขามิ, วกฺขาม อิจฺจาทิ. भविष्यत् काल में 'सप्पच्चय' ग्रहण से 'स्स' को 'ख' आदेश होता है, 'ब्यञ्जनन्तस्स' की अनुवृत्ति होने पर 'को खे चा' सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण को 'क' आदेश होता है - वक्खति, वक्खन्ति। वक्खसि, वक्खथ। वक्खामि, वक्खाम इत्यादि। วส นิวาเส, วสติ, วสนฺติ. 'वस' धातु निवास करने के अर्थ में है - वसति, वसन्ति। กมฺเม อุตฺตํ, ปุพฺพรูปตฺตญฺจ วุสฺสติ, วุสฺสนฺติ อิจฺจาทิ. วสตุ. วเสยฺย. อวสิ, วสิ. कर्मवाच्य में 'उ' कार और पूर्वरूप होने पर - वुस्सति, वुस्सन्ति इत्यादि। वसतु। वसेय्य। अवसि, वसि। ภวิสฺสนฺติยํ สฺสสฺส ฉาเทโส, ธาตฺวนฺตสฺส จกาโร จ, วจฺฉติ, วจฺฉนฺติ. วจฺฉสิ, วจฺฉถ. วจฺฉามิ, วจฺฉาม. วสิสฺสติ, วสิสฺสนฺติ. อวสิสฺส, อวสิสฺสํสุ. भविष्यत् काल में 'स्स' को 'छ' आदेश और धातु के अन्त्य वर्ण को 'च' कार होता है - वच्छति, वच्छन्ति। वच्छसि, वच्छथ। वच्छामि, वच्छाम। वसिस्सति, वसिस्सन्ति। अवसिस्स, अवसिस्संु। ตถา รุท อสฺสุวิโมจเน, โรทติ, รุจฺฉติ. โรทิสฺสติ อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'रुद' धातु आँसू बहाने (रोने) के अर्थ में है - रोदति, रुच्छति। रोदिस्सति इत्यादि। กุส อกฺโกเส, อาปุพฺโพ ทฺวิตฺตรสฺสตฺตานิ, อปฺปจฺจยวุทฺธิโย จ. อกฺโกสติ. อกฺโกสตุ. อกฺโกเสยฺย. 'कुस' धातु आक्रोश (गाली देने) के अर्थ में है, 'आ' उपसर्ग पूर्वक द्वित्व और ह्रस्वत्व, तथा 'अ' प्रत्यय और वृद्धि होती है - अक्कोसति। अक्कोसतु। अक्कोसेय्य। ‘‘อนฺตโลโป’’ติ วตฺตเต, มณฺฑูกคติยา ‘‘วา’’ติ จ. 'अन्तलोपो' की अनुवृत्ति होती है, और मण्डूकगति से 'वा' (विकल्प) की भी। ๔๘๐. กุสสฺมา ที จฺฉิ. ४८०. 'कुस' धातु से परे 'दी' (ई) को 'च्छि' आदेश होता है। กุส อิจฺเจตสฺมา ธาตุโต อีวิภตฺติสฺส จฺฉิอาเทโส โหติ, ธาตฺวนฺตสฺส โลโป จ. อกฺโกจฺฉิ มํ, อกฺโกสิ วา. อกฺโกสิสฺสติ. อกฺโกสิสฺส อิจฺจาทิ. 'कुस' इस धातु से परे 'ई' विभक्ति को 'च्छि' आदेश होता है, और धातु के अन्त्य वर्ण का लोप होता है। अक्कोच्छि मं (उसने मुझे कोसा), अथवा अक्कोसि। अक्कोसिस्सति। अक्कोसिस्स इत्यादि। วห [Pg.289] ปาปุณเน, วหติ, วหนฺติ. 'वह' धातु प्राप्त करने (ले जाने) के अर्थ में है - वहति, वहन्ति। กมฺเม อตฺตโนปเท, ยปฺปจฺจเย จ กเต – कर्मवाच्य में आत्मनेपद और 'य' प्रत्यय होने पर - ‘‘เย’’ติ วตฺตเต. 'ये' (य प्रत्यय परे होने पर) की अनुवृत्ति होती है। ๔๘๑. ห วิปริยโย โล วา. ४८१. 'ह' कार का विपर्यय (स्थान परिवर्तन) होता है और विकल्प से 'ल' कार होता है। หการสฺส วิปริยโย โหติ ยปฺปจฺจเย ปเร, ยปฺปจฺจยสฺส จ ลกาโร โหติ วา. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, เตน ‘‘คยฺหตี’’ติอาทีสุ ลตฺตํ น โหติ, นิมิตฺตภูตสฺส ยการสฺเสเวตํ ลตฺตํ, ‘‘วจวส’’อิจฺจาทินา อุตฺตํ. วุยฺหติ, วุลฺหติ, วุยฺหนฺติ. วหตุ, วุยฺหตุ. วเหยฺย, วุยฺเหยฺย. อวหี, อวุยฺหิตฺถ, อวหิตฺถ. อวหิสฺสติ, วุยฺหิสฺสติ. อวหิสฺส, อวุยฺหิสฺส อิจฺจาทิ. 'य' प्रत्यय परे होने पर 'ह' कार का विपर्यय होता है, और 'य' प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'ल' कार होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है, जिससे 'गय्हति' आदि में 'ल'त्व नहीं होता है; यह 'ल'त्व निमित्तभूत 'य' कार का ही है, 'वचवस' इत्यादि सूत्र से 'उ'त्व होता है। वुय्हति, वुल्हति, वुय्हन्ति। वहतु, वुय्हतु। वहेय्य, वुय्हेय्य। अवही, अवुय्हित्थ, अवहित्थ। अवहिस्सति, वुय्हिस्सति। अवहिस्स, अवुय्हिस्स इत्यादि। ชร วโยหานิมฺหิ. 'जर' धातु अवस्था की हानि (बुढ़ापा) के अर्थ में है। ๔๘๒. ชรมรานํ ชีรชียฺยมียฺยา วา. ४८२. 'जर' और 'मर' धातुओं के स्थान पर विकल्प से 'जीर', 'जीय्य' और 'मीय्य' आदेश होते हैं। ชรมร อิจฺเจเตสํ ธาตูนํ ชีรชียฺยมียฺยาเทสา โหนฺติ วา, สรโลปาทิ. ชีรติ, ชีรนฺติ. ชียฺยติ, ชียฺยนฺติ. ‘‘กฺวจา’’ทิสุตฺเตน เอกยการสฺส กฺวจิ โลโป โหติ. ชียติ, ชียนฺติ. 'जर' और 'मर' इन धातुओं के स्थान पर विकल्प से 'जीर', 'जीय्य' और 'मीय्य' आदेश होते हैं, स्वर-लोप आदि कार्य होते हैं। जीरति, जीरन्ति। जीय्यति, जीय्यन्ति। 'क्वचा' आदि सूत्र से कहीं एक 'य' कार का लोप होता है - जीयति, जीयन्ति। กมฺเม ชีรียติ, ชีรียนฺติ. ชียิยฺยติ, ชียิยฺยนฺติ. ชีรตุ, ชียฺยตุ. ชีเรยฺย, ชียฺเยยฺย. อชีรี, ชีรี, ชียฺยี. ชีริสฺสติ, ชียฺยิสฺสติ. อชีริสฺส, อชียฺยิสฺส. कर्मवाच्य में - जीरीयति, जीरीयन्ति। जीयिय्यति, जीयिय्यन्ति। जीरतु, जीय्यतु। जीरेय्य, जीय्येय्य। अजीरी, जीरी, जीय्यी। जीरिस्सति, जीय्यिस्सति। अजीरिस्स, अजीय्यिस्स। มร ปาณจาเค, มียฺยาเทโส, มียฺยติ, มียฺยนฺติ. มียติ, มียนฺติ วา. มรติ, มรนฺติ อิจฺจาทิ. 'मर' धातु प्राण त्यागने के अर्थ में है, 'मीय्य' आदेश होता है - मीय्यति, मीय्यन्ति। अथवा मीयति, मीयन्ति। मरति, मरन्ति इत्यादि। ทิส เปกฺขเณ. 'दिस' धातु देखने के अर्थ में है। ๔๘๓. ทิสสฺส [Pg.290] ปสฺส ทิสฺส ทกฺขา วา. ४८३. 'दिस' के स्थान पर विकल्प से 'पस्स', 'दिस्स' और 'दक्ख' आदेश होते हैं। ทิสอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส ปสฺส ทิสฺส ทกฺขอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, เตน ทิสฺสาเทโส กมฺมนิ สพฺพธาตุเก เอว. ปสฺสติ, ปสฺสนฺติ. ทกฺขติ, ทกฺขนฺติ. 'दिस' इस धातु के स्थान पर 'पस्स', 'दिस्स' और 'दक्ख' ये आदेश विकल्प से होते हैं। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है, जिससे 'दिस्स' आदेश केवल कर्मवाच्य के सार्वधातुक में ही होता है। पस्सति, पस्सन्ति। दक्खति, दक्खन्ति। กมฺมนิ ยการโลโป, ทิสฺสเต, ทิสฺสนฺเต. ทิสฺสติ, ทิสฺสนฺติ. วิปสฺสียติ, ทกฺขียติ. ปสฺสตุ, ทกฺขตุ, ทิสฺสตุ. ปสฺเสยฺย, ทกฺเขยฺย, ทิสฺเสยฺย. कर्मवाच्य में 'य' कार का लोप होता है, (जैसे) dissate, dissante। Dissati, dissanti। Vipassīyati, dakkhīyati। Passatu, dakkhatu, dissatu। Passeyya, dakkheyya, disseyya। หิยฺยตฺตนิยํ ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ธาตุอิการสฺส อตฺตํ, อทฺทสา, อทฺทส. กมฺมนิ อทิสฺส. हिय्यत्तनी (अतीत काल) में 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से धातु के इ-कार को अ-कार होता है, (जैसे) addasā, addasa। कर्मवाच्य में adissa। ตถา อปสฺสิ, ปสฺสิ, อปสฺสึสุ, ปสฺสึสุ. อปสฺสิ, ปสฺสิ, อปสฺสิตฺถ, ปสฺสิตฺถ. อปสฺสึ, ปสฺสึ, อปสฺสิมฺห, ปสฺสิมฺห. อทฺทสิ, ทสิ, อทฺทสํสุ, ทสํสุ. กมฺมนิ อทิสฺสํสุ. อทฺทกฺขิ, อทฺทกฺขึสุ. उसी प्रकार apassi, passi, apassiṃsu, passiṃsu। Apassi, passi, apassittha, passittha। Apassiṃ, passiṃ, apassimha, passimha। Addasi, dasi, addasaṃsu, dasaṃsu। कर्मवाच्य में adissaṃsu। Addakkhi, addakkhiṃsu। ปสฺสิสฺสติ, ปสฺสิสฺสนฺติ. ‘‘ภวิสฺสนฺติมฺหิ สฺสสฺส จา’’ติ โยควิภาเคน สฺสสฺส โลโป, อิการาคโม จ, ทกฺขิติ, ทกฺขินฺติ. โลปาภาเว ทกฺขิสฺสติ, ทกฺขิสฺสนฺติ. อปสฺสิสฺส, อทกฺขิสฺส อิจฺจาทิ. Passissati, passissanti। 'भविस्सन्तिम्हि स्सस्स चा' इस योग-विभाग से 'स्से' का लोप और इ-कार का आगम होता है, (जैसे) dakkhiti, dakkhinti। लोप के अभाव में dakkhissati, dakkhissanti। Apassissa, adakkhissa इत्यादि। สท วิสรณคตฺยาวสาเนสุ. 'सद' (Sada) धातु विसरण (फैलना), गति और अवसान (बैठना/समाप्त होना) के अर्थ में है। ‘‘สพฺพตฺถา’’ติ วตฺตเต, มณฺฑูกคติยา ‘‘กฺวจี’’ติ จ. 'सब्बत्थ' (सर्वत्र) की अनुवृत्ति होती है, और मण्डूकगति से 'क्वचि' की भी। ๔๘๔. สทสฺส สีทตฺตํ. ४८४. 'सद' (Sada) धातु को 'सीद' (sīda) आदेश होता है। สทอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส สีทาเทโส โหติ สพฺพตฺถ วิภตฺติปฺปจฺจเยสุ กฺวจิ. เสสํ เนยฺยํ. นิสีทติ, นิสีทนฺติ. ภาเว นิสชฺชเต, อิธ กฺวจาธิกาเรน สีทา-เทโส [Pg.291] น ภวติ. นิสีทตุ. นิสีเท. นิสีทิ. นิสีทิสฺสติ. นิสีทิสฺส อิจฺจาทิ. 'सद' इस धातु को सभी विभक्ति प्रत्ययों के परे होने पर कहीं-कहीं 'सीद' आदेश होता है। शेष को (इसी प्रकार) समझना चाहिए। Nisīdati, nisīdanti। भाववाच्य में nisajjate, यहाँ 'क्वचि' के अधिकार के कारण 'सीद' आदेश नहीं होता है। Nisīdatu। Nisīde। Nisīdi। Nisīdissati। Nisīdissa इत्यादि। ยช เทวปูชาสงฺคติกรณทาเนสุ. ยชติ, ยชนฺติ. 'यज' (Yaja) धातु देवपूजा, संगतिकरण और दान के अर्थ में है। Yajati, yajanti। กมฺมนิ ‘‘ยมฺหี’’ติ วตฺตเต. कर्मवाच्य में 'यम्हि' की अनुवृत्ति होती है। ๔๘๕. ยชสฺสาทิสฺสิ. ४८५. 'यज' के आदि (वर्ण) को 'इ' (आदेश) होता है। ยชอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส อาทิสฺส ยการสฺส อิการาเทโส โหติ ยปฺปจฺจเย ปเร, สรโลโป. อิชฺชเต มยา พุทฺโธ. ตถา ยชตุ, อิชฺชตํ. ยเช, อิชฺเชถ. ยชิ, อิชฺชิตฺถ. ยชิสฺสติ, อิชฺชิสฺสเต. ยชิสฺส, อิชฺชิสฺสถ อิจฺจาทิ. 'यज' इस धातु के आदि य-कार को 'य' प्रत्यय परे होने पर इ-कार आदेश होता है, (और) स्वर का लोप होता है। Ijjate mayā buddho (मेरे द्वारा बुद्ध पूजे जाते हैं)। उसी प्रकार yajatu, ijjataṃ। Yaje, ijjetha। Yaji, ijjittha। Yajissati, ijjissate। Yajissa, ijjissatha इत्यादि। วท วิยตฺติยํ วาจายํ, ตฺยาทฺยุปฺปตฺติ, อปฺปจฺจโย จ. 'वद' (Vada) धातु स्पष्ट वाणी (बोलने) के अर्थ में है, (इससे) ति-आदि विभक्तियों की उत्पत्ति और 'अ' प्रत्यय होता है। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' (विकल्प से) की अनुवृत्ति होती है। ๔๘๖. วทสฺส วชฺชํ. ४८६. 'वद' (Vada) को 'वज्ज' (vajja) आदेश होता है। วทอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส สพฺพสฺส วชฺชาเทโส โหติ วา สพฺพาสุ วิภตฺตีสุ. วิภตฺยาธิการตฺตา เจตฺถ สพฺพาสูติ อตฺถโต สิทฺธํ. 'वद' इस संपूर्ण धातु को सभी विभक्तियों में विकल्प से 'वज्ज' आदेश होता है। विभक्ति का अधिकार होने से यहाँ 'सभी (विभक्तियों) में' यह अर्थतः सिद्ध है। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๔๘๗. โลปญฺเจตฺตมกาโร. ४८७. और अ-कार को 'ए' (एत्त) तथा लोप होता है। ภูวาทิโต ปโร อปฺปจฺจโย เอตฺตมาปชฺชเต, โลปญฺจ วา. วิกรณการิยวิธิปฺปกรณโต เจตฺถ อกาโรติ อปฺปจฺจโย คยฺหติ. भू-आदि धातुओं से परे 'अ' प्रत्यय को 'ए' भाव (एत्त) प्राप्त होता है, और विकल्प से लोप भी। विकरण कार्य के विधान के प्रकरण से यहाँ 'अ-कार' से 'अ' प्रत्यय ग्रहण किया जाता है। ภูวาทิโต ชุโหตฺยาทิ-โต จ อปฺปจฺจโย ปโร; โลปมาปชฺชเต นาญฺโญ, ววตฺถิตวิภาสโตติ. भू-आदि और जुहोत्यादि धातुओं से परे 'अ' प्रत्यय ही लोप को प्राप्त होता है, अन्य नहीं; यह व्यवस्थित विभाषा से है। อปฺปจฺจยสฺส เอกาโร, สรโลปาทิ, วชฺเชติ, วเทติ, วทติ, อนฺติมฺหิ – 'अ' प्रत्यय को ए-कार, स्वर-लोप आदि होने पर vajjeti, vadeti, vadati; 'अन्ति' (विभक्ति) परे होने पर — ๔๘๘. กฺวจิ [Pg.292] ธาตุวิภตฺติปฺปจฺจยานํ ทีฆวิปรีตาเทสโลปาคมา จ. ४८८. कहीं-कहीं धातु, विभक्ति और प्रत्ययों के दीर्घ, उसके विपरीत (ह्रस्व), आदेश, लोप और आगम भी होते हैं। อิธ ธาตฺวาธิกาเร อาขฺยาเต, กิตเก จ อวิหิตลกฺขเณสุ ปโยเคสุ กฺวจิ ธาตูนํ, ตฺยาทิวิภตฺตีนํ, ธาตุวิหิตปฺปจฺจยานญฺจ ทีฆตพฺพิปรีตอาเทสโลปาคมอิจฺเจตานิ การิยานิ ชินวจนานุรูปโต ภวนฺติ. ตตฺถ – यहाँ धातु के अधिकार में आख्यात (क्रिया) और कृदंत में, जहाँ लक्षण (नियम) विहित नहीं हैं, उन प्रयोगों में कहीं-कहीं धातुओं, ति-आदि विभक्तियों और धातुओं से विहित प्रत्ययों के दीर्घ, उसके विपरीत (ह्रस्व), आदेश, लोप और आगम—ये कार्य जिन-वचन (बुद्ध-वचन) के अनुरूप होते हैं। उनमें — นามฺหิ รสฺโส กิยาทีนํ, สํโยเค จญฺญธาตุนํ; อายูนํ วา วิภตฺตีนํ, มฺหา, สฺสานฺตสฺส จ รสฺสตา. 'ना' प्रत्यय परे होने पर क्रिया-आदि (धातुओं) को ह्रस्व होता है, और संयोग परे होने पर अन्य धातुओं को; 'आयु' प्रत्ययों को या विभक्तियों को, और 'म्हा' तथा 'स्सा' अंत वाले (शब्दों) को विकल्प से ह्रस्वता होती है। คมิโต จฺฉสฺส ญฺโฉ วาสฺส, คมิสฺสชฺชตนิมฺหิ คา; อุจาคโม วา ตฺถมฺเหสุ, ธาตูนํ ยมฺหิ ทีฆตา. 'गम्' धातु से परे 'च्छ' को विकल्प से 'ञ्छ' होता है, अज्जतनी (लुङ् लकार) में 'गम्' को 'गा' होता है; 'त्थ' और 'म्ह' विभक्तियों में विकल्प से 'उ' का आगम होता है, और 'य' प्रत्यय परे होने पर धातुओं को दीर्घता होती है। เอยฺเยยฺยาเสยฺยาเมตฺตญฺจ, วา สฺเสสฺเสตฺตญฺจ ปาปุเณ; โอการา อตฺตมิตฺตญฺจ, อาตฺถา ปปฺโปนฺติ วา ตฺถเถ. 'एय्य', 'एय्यासि', 'एय्याम' को 'ए' भाव (एत्त) प्राप्त होता है, और विकल्प से 'स्से' को भी 'ए' भाव प्राप्त होता है; ओ-कार को अ-कार और इ-कार प्राप्त होता है, और 'त्थ' तथा 'थे' विभक्तियों में 'आत्था' विकल्प से प्राप्त होते हैं। ตถา พฺรูโตติ อนฺตีนํ, ออุ วาห จ ธาตุยา; ปโรกฺขาย วิภตฺติมฺหิ, อนพฺภาสสฺส ทีฆตา. उसी प्रकार 'ब्रूति' और 'अन्ति' को 'आह' और 'आहु' आदेश होते हैं; परोक्षा विभक्ति में अनभ्यास (जहाँ द्वित्व न हुआ हो) को दीर्घता होती है। สํโยคนฺโต อกาเรตฺถ, วิภตฺติปฺปจฺจยาทิ ตุ; โลป มาปชฺชเต นิจฺจ-เมกาโรการโต ปโรติ. यहाँ संयोग के अंत में स्थित अ-कार, तथा विभक्ति और प्रत्यय का आदि (वर्ण), ए-कार और ओ-कार से परे होने पर नित्य लोप को प्राप्त होता है। เอการโต ปรสฺส อนฺติอการสฺส โลโป, วชฺเชนฺติ, วเทนฺติ, วทนฺติ. วชฺเชสิ, วเทสิ, วทสิ, วชฺเชถ, วเทถ, วทถ. วชฺเชมิ, วชฺชามิ, วเทมิ, วทามิ, วชฺเชม, วเทม, วชฺชาม, วทาม. ए-कार से परे 'अन्ति' के अ-कार का लोप होता है, (जैसे) vajjenti, vadenti, vadanti। Vajjesi, vadesi, vadasi, vajjetha, vadetha, vadatha। Vajjemi, vajjāmi, vademi, vadāmi, vajjema, vadema, vajjāma, vadāma। กมฺมนิ วชฺชียติ, วชฺชียนฺติ. วชฺชติ, วชฺชนฺติ. วทียติ วา. วชฺเชตุ, วเทตุ, วทตุ. วชฺเช, วชฺเชยฺย, วเท, วเทยฺย, วชฺเชยฺยุํ, วเทยฺยุํ. วชฺเชยฺยาสิ, วชฺเชสิ, วเทยฺยาสิ. อวทิ, วทิ, วทึสุ. วทิสฺสติ, วทิสฺสนฺติ. อวทิสฺส อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में vajjīyati, vajjīyanti। Vajjati, vajjanti। अथवा vadīyati। Vajjetu, vadetu, vadatu। Vajje, vajjeyya, vade, vadeyya, vajjeyyuṃ, vadeyyuṃ। Vajjeyyāsi, vajjesi, vadeyyāsi। Avadi, vadi, vadiṃsu। Vadissati, vadissanti। Avadissa इत्यादि। กมุ [Pg.293] ปทวิกฺเขเป, อปฺปจฺจเย กเต ‘‘กฺวจาทิวณฺณานเมกสฺสรานํ ทฺเวภาโว’’ติ ทฺวิตฺตํ, กวคฺคสฺส จวคฺโค. 'कमु' (kamu) धातु 'पदविक्षेप' (पैर बढ़ाने/चलने) के अर्थ में है। 'अ' प्रत्यय होने पर 'क्वचादिवण्णानामेकस्सरानं द्वेभावो' सूत्र से द्वित्व होता है और कवर्ग का चवर्ग हो जाता है। อพฺภาสคฺคหณมนฺตคฺคหณํ, วาคฺคหณญฺจ วตฺตเต. 'अभ्यास' ग्रहण, 'अन्त' ग्रहण और 'वा' (विकल्प) ग्रहण की अनुवृत्ति होती है। ๔๘๙. นิคฺคหีตญฺจ. ४८९. और निग्गहीत (अनुस्वार) भी। อพฺภาสนฺเต นิคฺคหีตญฺจาคโม โหติ วา. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, เตน กมาทีนเมเวตํ. จงฺกมติ, จงฺกมนฺติ อิจฺจาทิ. กมติ, กมนฺติ อิจฺจาทิ. अभ्यास के अन्त में निग्गहीत का आगम विकल्प से होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है, इसलिए यह 'कम्' आदि धातुओं के लिए ही है। जैसे— चङ्कमति, चङ्कमन्ति इत्यादि। (विकल्प में) कमति, कमन्ति इत्यादि। จล กมฺปเน, จญฺจลติ, จลติ. 'चल' (cala) धातु 'कम्पन' के अर्थ में है। (द्वित्व होने पर) चञ्चलति, (न होने पर) चलति। จล ทลเน, ททฺทลฺลติ. 'चल' (cala) धातु 'दलन' (चमकने) के अर्थ में है। (द्वित्व होने पर) दद्दल्लति। เฌจินฺตายํ, อปฺปจฺจเย ‘‘โอ, สเร, เอ’’ติ จ อธิกิจฺจ ‘‘เต อาวายา’’ติ โยควิภาเคน อการิเตปิ เอการสฺส อายาเทโส, ฌายติ, ฌายนฺติ อิจฺจาทิ, วิเสสวิธานํ. 'झे' (jhe) धातु 'चिन्ता' के अर्थ में है। 'अ' प्रत्यय होने पर 'ओ, सरे, ए' के अधिकार में 'ते आवाया' सूत्र के योग-विभाग से अकारित (णिच् रहित) होने पर भी एकार को 'आय' आदेश होता है। जैसे— झायति, झायन्ति इत्यादि। यह विशेष विधान है। อวุทฺธิกภูวาทินโย. यह अवृद्धिक भूवादि नय (पद्धति) है। ตุท พฺยถเน, ตฺยาทฺยุปฺปตฺติ อปฺปจฺจโย, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ เอตฺถานุวตฺติต วาคฺคหเณน ตุทาทีนํ วุทฺธิอภาโวว วิเสโส, ตุทติ, ตุทนฺติ. ตุทสิ, ตุทถ. ตุทามิ, ตุทาม. 'तुद' (tuda) धातु 'व्यथा' (पीड़ा) के अर्थ में है। ति-आदि विभक्तियों की उत्पत्ति और 'अ' प्रत्यय होता है। 'अञ्ञेसु च' सूत्र में अनुवृत्त 'वा' ग्रहण के कारण तुदादि धातुओं में वृद्धि का अभाव ही विशेषता है। जैसे— तुदति, तुदन्ति। तुदसि, तुदथ। तुदामि, तुदाम। กมฺเม ‘‘ตสฺส จวคฺค’’อิจฺจาทินา สทการสฺส ยปฺปจฺจยสฺส ชกาโร ทฺวิตฺตํ, ตุชฺชเต, ตุชฺชนฺเต. ตุชฺชติ, ตุชฺชนฺติ, ตุชฺชเร วา. ตถา ตุทตุ, ตุทนฺตุ. ตุเท, ตุเทยฺย, ตุเทยฺยุํ. อตุทิ, ตุทึสุ. อตุทิ, อตุทิตฺถ. อตุทึ, อตุทิมฺห. อตุชฺชิตฺถ, อตุชฺชิ. ตุทิสฺสติ. อตุทิสฺส อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में 'तस्स चवग्ग' इत्यादि सूत्र से 'द' कार और 'य' प्रत्यय के स्थान पर 'ज' कार और द्वित्व होकर— तुज्जते, तुज्जन्ते। अथवा तुज्जति, तुज्जन्ति, तुज्जरे। उसी प्रकार (लोट् में) तुदतु, तुदन्तु। (सप्तमी में) तुदे, तुदेय्य, तुदेय्युं। (अज्जतनी में) अतुदि, तुदिंसु। अतुदि, अतुदित्थ। अतुदिं, अतुदिम्ह। (कर्म में) अतुज्जित्थ, अतुज्जि। (भविष्यन्ती में) तुदिस्सति। (कालातिपत्ति में) अतुदिस्स इत्यादि। วิส ปเวสเน ปปุพฺโพ, โส คามํ ปวิสติ, ปวิสนฺติ. ปวิสสิ, ปวิสถ. ปวิสามิ, ปวิสาม. 'विस' (visa) धातु 'प्रवेश' के अर्थ में है। 'प' उपसर्ग पूर्वक— वह गाँव में प्रवेश करता है (पविसति), वे प्रवेश करते हैं (पविसन्ति)। पविससि, पविसथ। पविसामि, पविसाम। กมฺเม [Pg.294] ปวิสิยฺยเต, ปวิสิยฺยนฺเต. ปวิสิยฺยติ, ปวิสิยฺยนฺติ. ปวิสฺสเต วา. ตถา ปวิสตุ, ปวิสนฺตุ. ปวิเสยฺย. ปาวิสิ, ปวิสิ, ปาเวกฺขิ ปถวึ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อชฺชตนิมฺหิ วิสสฺส เวกฺขาเทโส จ. ปาวิสึสุ, ปวิสึสุ. कर्मवाच्य में— पविसिय्यते, पविसिय्यन्ते। पविसिय्यति, पविसिय्यन्ति। अथवा पविसते। उसी प्रकार (लोट् में) पविसतु, पविसन्तु। (सप्तमी में) पविसैय्य। (अज्जतनी में) पाविसि, पविसि। 'पावेक्खि पथविं' (उसने पृथ्वी में प्रवेश किया)— यहाँ 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से अज्जतनी विभक्ति में 'विस' धातु को 'वेक्ख' आदेश भी होता है। पाविसिंसु, पविसिंसु। กมฺเม ปาวิสียิตฺถ, ปวิสียิตฺถ, ปาวิสียิ, ปวิสียิ. ปวิสิสฺสติ, ปวิสิสฺสนฺติ. ปวิสียิสฺสเต, ปวิสิสฺสเต. ปาวิสิสฺส. ปาวิสียิสฺส อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में— पाविसीयित्थ, पविसियित्थ, पाविसीयि, पविसियि। (भविष्यन्ती में) पविसिस्सति, पविसिस्सन्ति। (कर्म में) पविसियिस्सते, पविसिस्सते। (कालातिपत्ति में) पाविसिस्स, पाविसीयिस्स इत्यादि। นุท เขเป, นุทติ, นุทนฺติ. 'नुद' (nuda) धातु 'क्षेपण' (प्रेरणा/हटाना) के अर्थ में है। नुदति, नुदन्ति। ทิส อติสชฺชเน, อุทฺทิสติ, อุทฺทิสนฺติ. 'दिस' (disa) धातु 'अतिसर्जन' (दान/निर्देश) के अर्थ में है। उद्दिसति, उद्दिसन्ति। ลิข เลขเน, ลิขติ, ลิขนฺติ. 'लिख' (likha) धातु 'लेखन' के अर्थ में है। लिखति, लिखन्ति। ผุส สมฺผสฺเส, ผุสติ, ผุสนฺติ อิจฺจาทิ. 'फुस' (phusa) धातु 'स्पर्श' के अर्थ में है। फुसति, फुसन्ति इत्यादि। ตุทาทินโย. यह तुदादि नय (पद्धति) है। หู, ภู สตฺตายํ, ตฺยาทฺยุปฺปตฺติ ‘‘ภูวาทิโต อ’’อิติ อปฺปจฺจโย, ‘‘วา’’ติ อธิกิจฺจ ‘‘โลปญฺเจตฺตมกาโร’’ติ ภูวาทิโต ปรสฺส อปฺปจฺจยสฺส โลโป, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ วุทฺธิ. โส โหติ, เต โหนฺติ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ปรสรสฺส โลโป. โหสิ, โหถ. โหมิ, โหม. ภาเว หูยเต. 'हू' (hū) और 'भू' (bhū) धातु 'सत्ता' (होने) के अर्थ में हैं। ति-आदि विभक्तियों की उत्पत्ति और 'भूवादितो अ' सूत्र से 'अ' प्रत्यय होता है। 'वा' के अधिकार में 'लोपञ्चेत्तमकारो' सूत्र से भूवादि धातुओं से परे 'अ' प्रत्यय का लोप होता है और 'अञ्ञेसु च' सूत्र से वृद्धि होती है। वह होता है (होति), वे होते हैं (होन्ति)। 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से पर-स्वर का लोप होता है। होसि, होथ। होमि, होम। भाववाच्य में— हूयते। ตถา โหตุ, โหนฺตุ. โหหิ, อนการปรตฺตา หิโลโป น ภวติ, โหถ. โหมิ, โหม. ภาเว หูยตํ. उसी प्रकार (लोट् में) होतु, होन्तु। होहि— यहाँ अकार परे न होने के कारण 'हि' का लोप नहीं होता है, होथ। होमि, होम। भाववाच्य में— हूयतं। สตฺตมิยํ สรโลปาทิ, เหยฺย, เหยฺยุํ. เหยฺยาสิ, เหยฺยาถ. เหยฺยามิ, เหยฺยาม. เหยฺยํ วา. ภาเว หูเยถ. सप्तमी विभक्ति में स्वर-लोप आदि होकर— हेय्य, हेय्युं। हेय्यासि, हेय्याथ। हेय्यामि, हेय्याम। अथवा हेय्यं। भाववाच्य में— हूयेथ। หิยฺยตฺตนิยํ [Pg.295] อปฺปจฺจยโลเป ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา หูธาตุสฺส อูการสฺส อุวาเทโส. อหุวา, อหุวุ, อหุวู. อหุว, อหุโว, อหุวตฺถ. อหุวํ, อหุวมฺห. อหุวตฺถ, อหุวตฺถุํ. อหุวเส, อหุววฺหํ. อหุวึ, อหุวมฺหเส. ภาเว อหูยตฺถ. हिय्यत्तनी विभक्ति में 'अ' प्रत्यय का लोप होने पर 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से 'हू' धातु के ऊकार को 'उव' आदेश होता है। अहुवा, अहुवु, अहुवू। अहुव, अहुवो, अहुवत्थ। अहुवं, अहुवम्ह। (आत्मनेपद में) अहुवत्थ, अहुवत्थुं। अहुवसे, अहुवव्वं। अहुविं, अहुवम्हसे। भाववाच्य में— अहूयत्थ। อชฺชตนิมฺหิ ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา หูโต อีวิภตฺติสฺส โลโป รสฺสตฺตํ, โส อหุ, โลปาภาเว ‘‘กรสฺส กาสตฺตมชฺชตนิมฺหี’’ติ เอตฺถ ‘‘สตฺตมชฺชตนิมฺหี’’ติ โยควิภาเคน สาคโม, วุทฺธิ, อโหสิ, อเหสุํ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา โอการสฺเสกาโร. อหวุํ วา. อโหสิ, อโหสิตฺถ. อโหสึ, อหุํ, ปรสรสฺส โลโป, รสฺสตฺตญฺจ, อโหสิมฺห, อหุมฺห, รสฺสตฺตํ. ภาเว อหูยิตฺถ. अज्जतनी विभक्ति में 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से 'हू' धातु से परे 'ई' विभक्ति का लोप और ह्रस्व होकर— वह हुआ (अहु)। लोप न होने पर 'करस्स कासत्तमज्जतनिंही' सूत्र में 'सत्तमज्जतनिंही' के योग-विभाग से 'स' का आगम और वृद्धि होकर— अहोसि, अहेसुं। 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से ओकार को एकार होता है। अथवा अहवुं। अहोसि, अहोसित्थ। अहोसिं, अहुं— यहाँ पर-स्वर का लोप और ह्रस्व होता है। अहोसिम्ह, अहुम्ह— यहाँ ह्रस्व होता है। भाववाच्य में— अहूयित्थ। ‘‘หิ โลปํ วา’’ติ อิโต ‘‘โลโป, วา’’ติ จ วตฺตเต. 'हि लोपं वा' इस सूत्र से 'लोपो' और 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๔๙๐. โหติสฺสเร’โหเห ภวิสฺสนฺติมฺหิ สฺสสฺส จ. ४९०. भविष्यन्ती विभक्ति में 'हू' धातु के स्वर को 'एह' और 'ओह' आदेश होता है और 'स्स' का लोप भी (विकल्प से) होता है। หูอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส สโร เอห โอห เอตฺตมาปชฺชเต ภวิสฺสนฺติมฺหิ วิภตฺติมฺหิ, สฺสสฺส จ โลโป โหติ วา. อิการาคโม, สรโลปาทิ. 'हू' इस धातु के स्वर को भविष्यन्ती विभक्ति में 'एह', 'ओह' और 'ए' आदेश होता है, और 'स्स' का लोप विकल्प से होता है। इकार का आगम और स्वर-लोप आदि भी होते हैं। เหหิติ, เหหินฺติ. เหหิสิ, เหหิถ. เหหามิ, เหหาม. โลปาภาเว – เหหิสฺสติ, เหหิสฺสนฺติ. เหหิสฺสสิ, เหหิสฺสถ. เหหิสฺสามิ, เหหิสฺสาม. โอหาเทเส – โหหิติ, โหหินฺติ. โหหิสิ, โหหิถ. โหหามิ, โหหาม. ตถา โหหิสฺสติ, โหหิสฺสนฺติ. โหหิสฺสสิ, โหหิสฺสถ. โหหิสฺสามิ, โหหิสฺสาม. เอการาเทเส – เหติ, เหนฺติ. เหสิ, เหถ. เหมิ[Pg.296], เหม. เหสฺสติ, เหสฺสนฺติ. เหสฺสสิ, เหสฺสถ. เหสฺสามิ, เหสฺสาม. ภาเว หูยิสฺสเต. (एह आदेश में) हेहिति, हेहिन्ति। हेहिसि, हेहिथ। हेहामि, हेहाम। लोप न होने पर— हेहिस्सति, हेहिस्सन्ति। हेहिस्ससि, हेहिस्सथ। हेहिस्सामि, हेहिस्साम। (ओह आदेश में) होहिति, होहिन्ति। होहिसि, होहिथ। होहामि, होहाम। उसी प्रकार— होहिस्सति, होहिस्सन्ति। होहिस्ससि, होहिस्सथ। होहिस्सामि, होहिस्साम। (एकार आदेश में) हेति, हेन्ति। हेसि, हेथ। हेमि, हेम। हेस्सति, हेस्सन्ति। हेस्ससि, हेस्सथ। हेस्सामि, हेस्साम। भाववाच्य में— हूयिस्सते। กาลาติปตฺติยํ อหวิสฺส, อหวิสฺสํสุ. อหุยิสฺสถ อิจฺจาทิ. कालातिपत्ति विभक्ति में— अहविस्स, अहविस्संु। अहयिस्सथ इत्यादि। หู, ภู สตฺตายํ, ภู อิตีธ อนุปุพฺโพ, ตฺยาทฺยุปฺปตฺติ อปฺปจฺจยสฺส โลปวุทฺธิโย, อนุโภติ, อนุโภนฺติ. อนุโภสิ, อนุโภถ. อนุโภมิ, อนุโภม. 'हू' और 'भू' धातु 'सत्ता' के अर्थ में हैं। यहाँ 'भू' धातु 'अनु' उपसर्ग पूर्वक है। ति-आदि विभक्तियों की उत्पत्ति, 'अ' प्रत्यय का लोप और वृद्धि होकर— अनुभोति, अनुभोन्ति। अनुभोसि, अनुभोथ। अनुभोमि, अनुभोम। กมฺเม อนุภูยติ, อนุภูยนฺติ. ตถา อนุโภตุ, อนุโภนฺตุ. อนุโภหิ, อนุโภถ. อนุโภมิ, อนุโภม. อนุภูยตุ, อนุภูยนฺตุ. อนุภเว, อนุภเวยฺย. อนุภูเยยฺย. อนุโภสิ, อนุภวิ. อนุโภสฺสติ, อนุโภสฺสนฺติ. อนุโภสฺสสิ, อนุโภสฺสถ. อนุโภสฺสามิ, อนุโภสฺสาม. อนุภวิสฺสติ วา. อนุโภสฺส, อนุภวิสฺส วา อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में— अनुभूयति, अनुभूयन्ति। उसी प्रकार (लोट् में) अनुभोतु, अनुभोन्तु। अनुभोहि, अनुभोथ। अनुभोमि, अनुभोम। (कर्म में) अनुभूयतु, अनुभूयन्तु। (सप्तमी में) अनुभवे, अनुभवेय्य। (कर्म में) अनुभूयेय्य। (अज्जतनी में) अनुभोसि, अनुभवि। (भविष्यन्ती में) अनुभोसति, अनुभोसन्ति। अनुभोससि, अनुभोसथ। अनुभोसामि, अनुभोसाम। अथवा अनुभविसति। (कालातिपत्ति में) अनुभोस, अथवा अनुभविस इत्यादि। สี สเย อปฺปจฺจยโลโป, วุทฺธิ จ, เสติ, เสนฺติ. เสสิ, เสถ. เสมิ, เสม. เสเต, เสนฺเต อิจฺจาทิ. 'Sī' (सोना) धातु से 'अ' प्रत्यय का लोप और वृद्धि होती है - 'seti', 'senti'। 'sesi', 'setha'। 'semi', 'sema'। 'sete', 'sente' इत्यादि। อปฺปจฺจยโลปาภาเว – 'अ' प्रत्यय के लोप के अभाव में – ‘‘สเร’’ติ วตฺตเต, ธาตุคฺคหณญฺจ. 'सरे' (स्वर परे होने पर) यह अनुवृत्ति आती है, और 'धातु' का ग्रहण होता है। ๔๙๑. เอ อย. ४९१. 'ए' को 'अय' होता है। เอการสฺส ธาตฺวนฺตสฺส สเร ปเร อยาเทโส โหติ, สรโลปาทิ. สยติ, สยนฺติ. สยสิ, สยถ. สยามิ, สยาม. धातु के अन्त में स्थित 'ए' कार को स्वर परे होने पर 'अय' आदेश होता है, स्वर-लोप आदि। 'sayati', 'sayanti'। 'sayasi', 'sayatha'। 'sayāmi', 'sayāma'। กมฺเม [Pg.297] อติปุพฺโพ, ‘‘กฺวจิ ธาตฺวา’’ทินา ยมฺหิ รสฺสสรสฺส ธาตฺวนฺตสฺส ทีโฆ, อติสียเต, อติสียนฺเต. อติสียติ, อติสียนฺติ. ภาเว สียเต. कर्मवाच्य में 'अति' उपसर्ग पूर्वक, 'क्वचि धातु...' आदि सूत्र से 'य' परे होने पर धातु के अन्त के ह्रस्व स्वर को दीर्घ होता है - 'atisīyate', 'atisīyante'। 'atisīyati', 'atisīyanti'। भाववाच्य में 'sīyate'। ตถา เสตุ, เสนฺตุ. เสหิ, เสถ. เสมิ, เสม. สยตุ, สยนฺตุ. สย, สยาหิ, สยถ. สยามิ, สยาม. สยตํ, สยนฺตํ. สยสฺสุ, สยวฺโห. สเย, สยามเส. อติสียตํ, อติสียนฺตํ. อติสียตุ, อติสียนฺตุ. ภาเว สียตํ. उसी प्रकार 'setu', 'sentu'। 'sehi', 'setha'। 'semi', 'sema'। 'sayatu', 'sayantu'। 'saya', 'sayāhi', 'sayatha'। 'sayāmi', 'sayāma'। 'sayataṃ', 'sayantaṃ'। 'sayassu', 'sayavho'। 'saye', 'sayāmase'। 'atisīyataṃ', 'atisīyantaṃ'। 'atisīyatu', 'atisīyantu'। भाववाच्य में 'sīyataṃ'। สเย, สเยยฺย, สเยยฺยุํ. อติสีเยยฺย. ภาเว สีเยถ. 'saye', 'sayeyya', 'sayeyyuṃ'। 'atisīyeyya'। भाववाच्य में 'sīyetha'। อสยิ, สยิ, อสยึสุ, สยึสุ, อสยุํ. สาคเม อติเสสิ, อติเสสุํ. กมฺเม อจฺจสียิตฺถ, อจฺจสียิ, อติสียิ. ภาเว สียิตฺถ. 'asayi', 'sayi', 'asayiṃsu', 'sayiṃsu', 'asayuṃ'। 'स' आगम होने पर 'atisesi', 'atisesuṃ'। कर्मवाच्य में 'accasīyittha', 'accasīyi', 'atisīyi'। भाववाच्य में 'sīyittha'। สยิสฺสติ, สยิสฺสนฺติ. อิการาคมาภาเว เสสฺสติ, เสสฺสนฺติ. กมฺเม อติสียิสฺสถ, อติสียิสฺสติ. ภาเว สียิสฺสเต. 'sayissati', 'sayissanti'। 'इ' कार के आगम के अभाव में 'sessati', 'sessanti'। कर्मवाच्य में 'atisīyissatha', 'atisīyissati'। भाववाच्य में 'sīyissate'। อสยิสฺสา, อสยิสฺสํสุ. กมฺเม อจฺจสียิสฺสถ อิจฺจาทิ. 'asayissā', 'asayissaṃsu'। कर्मवाच्य में 'accasīyissatha' इत्यादि। นี ปาปุณเน, ทฺวิกมฺมโกยํ, อชํ คามํ เนติ, เนนฺติ. เนสิ, เนถ. เนมิ, เนม. โลปาภาเว นยติ, นยนฺติ อิจฺจาทิ. กมฺเม นียเต คามํ อโช เทวทตฺเตน, นียเร, นียนฺเต. นียติ, นียนฺติ. 'Nī' (प्राप्त करना/ले जाना) धातु, यह द्विकर्मक है; 'ajaṃ gāmaṃ neti' (बकरी को गाँव ले जाता है), 'nenti'। 'nesi', 'netha'। 'nemi', 'nema'। लोप के अभाव में 'nayati', 'nayanti' इत्यादि। कर्मवाच्य में 'nīyate gāmaṃ ajo devadattena', 'nīyare', 'nīyante'। 'nīyati', 'nīyanti'। ตถา เนตุ, นยตุ. นียตํ, นียนฺตํ. นเย, นเยยฺย. นีเยถ, นีเยยฺย. อนยิ, นยิ, อนยึสุ, นยึสุ. วิเนสิ, วิเนสุํ. อนียิตฺถ, นียิตฺถ. นยิสฺสติ[Pg.298], เนสฺสติ. นยิสฺสเต, นียิสฺสเต, นียิสฺสติ. อนยิสฺส, อนียิสฺส อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'netu', 'nayatu'। 'nīyataṃ', 'nīyantaṃ'। 'naye', 'nayeyya'। 'nīyetha', 'nīyeyya'। 'anayi', 'nayi', 'anayiṃsu', 'nayiṃsu'। 'vinesi', 'vinesuṃ'। 'anīyittha', 'nīyittha'। 'nayissati', 'nessati'। 'nayissate', 'nīyissate', 'nīyissati'। 'anayissa', 'anīyissa' इत्यादि। ฐา คตินิวตฺติมฺหิ, ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'Ṭhā' (गति की निवृत्ति/रुकना) अर्थ में, 'वा' (विकल्प से) की अनुवृत्ति आती है। ๔๙๒. ฐา ติฏฺโฐ. ४९२. 'Ṭhā' को 'tiṭṭha' होता है। ฐาอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส ติฏฺฐาเทโส โหติ วา. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, อปฺปจฺจยโลโป. ติฏฺฐติ, ติฏฺฐนฺติ. ฐาติ, ฐนฺติ. โลปาภาเว ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ฐาโต หการาคโม จ รสฺสตฺตํ, สํปุพฺโพ สณฺฐหติ, สณฺฐหนฺติ. เอตฺเต อธิฏฺเฐติ, อธิฏฺเฐนฺติ. 'Ṭhā' इस धातु को विकल्प से 'tiṭṭha' आदेश होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है, 'अ' प्रत्यय का लोप होता है। 'tiṭṭhati', 'tiṭṭhanti'। 'ṭhāti', 'ṭhanti'। लोप के अभाव में 'क्वचि धातु...' आदि से 'ṭhā' को 'ह' कार का आगम और ह्रस्व होता है, 'सम्' उपसर्ग पूर्वक 'saṇṭhahati', 'saṇṭhahanti'। 'ए'त्व होने पर 'adhiṭṭheti', 'adhiṭṭhenti'। กมฺเม – कर्मवाच्य में – ๔๙๓. ยมฺหิ ทาธา มา ฐา หา ปา มห มถาทีนมี. ४९३. 'य' परे होने पर 'dā', 'dhā', 'mā', 'ṭhā', 'hā', 'pā', 'maha', 'matha' आदि धातुओं को 'ई' होता है। ภาวกมฺมวิสเย ยมฺหิ ปจฺจเย ปเร ทา ธา มา ฐา หาปา มห มถ อิจฺเจวมาทีนํ ธาตูนํ อนฺโต อีการมาปชฺชเต, นิจฺจตฺโถยมารมฺโภ. อุปฏฺฐียติ, อุปฏฺฐียนฺติ. หการาคเม รสฺสตฺตํ, อีการาคโม จ, ปติฏฺฐหียติ, ปติฏฺฐหียนฺติ. ภาเว ฐียเต. भाव और कर्म के विषय में 'य' प्रत्यय परे होने पर 'dā', 'dhā', 'mā', 'ṭhā', 'hā', 'pā', 'maha', 'matha' इत्यादि धातुओं का अन्त्य 'ई' कार हो जाता है, यह नियम नित्य है। 'upaṭṭhīyati', 'upaṭṭhīyanti'। 'ह' कार आगम होने पर ह्रस्व और 'ई' कार का आगम होता है - 'patiṭṭhahīyati', 'patiṭṭhahīyanti'। भाववाच्य में 'ṭhīyate'। ตถา ติฏฺฐตุ, ติฏฺฐนฺตุ. ฐาตุ, ฐนฺตุ. สณฺฐหตุ, สณฺฐหนฺตุ. ติฏฺเฐ, ติฏฺเฐยฺย. สณฺเฐ, สณฺเฐยฺย, สณฺเฐยฺยุํ. สณฺฐเห, สณฺฐเหยฺยุํ. อฏฺฐาสิ, อฏฺฐํสุ. สณฺฐหิ, สณฺฐหึสุ. ปกิฏฺฐิสฺสติ, ปติฏฺฐิสฺสนฺติ. ฐสฺสติ, ฐสฺสนฺติ. ปติฏฺฐหิสฺสติ, ปติฏฺฐหิสฺสนฺติ. ปติฏฺฐิสฺส, ปติฏฺฐิสฺสํสุ. ปติฏฺฐหิสฺส, ปติฏฺฐหิสฺสํสุ อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'tiṭṭhatu', 'tiṭṭhantu'। 'ṭhātu', 'ṭhantu'। 'saṇṭhahatu', 'saṇṭhahantu'। 'tiṭṭhe', 'tiṭṭheyya'। 'saṇṭhe', 'saṇṭheyya', 'saṇṭheyyuṃ'। 'saṇṭhahe', 'saṇṭhaheyyuṃ'। 'aṭṭhāsi', 'aṭṭhaṃsu'। 'saṇṭhahi', 'saṇṭhahiṃsu'। 'pakiṭṭhissati', 'patiṭṭhissanti'। 'ṭhassati', 'ṭhassanti'। 'patiṭṭhahissati', 'patiṭṭhahissanti'। 'patiṭṭhissa', 'patiṭṭhissaṃsu'। 'patiṭṭhahissa', 'patiṭṭhahissaṃsu' इत्यादि। ปา ปาเน, ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'Pā' (पीना) अर्थ में, 'वा' की अनुवृत्ति आती है। ๔๙๔. ปา [Pg.299] ปิโพ. ४९४. 'Pā' को 'piba' होता है। ปาอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส ปิพาเทโส โหติ วา. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. 'Pā' इस धातु को विकल्प से 'piba' आदेश होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है। ปิพติ. ปิพตุ. ปิเพยฺย. ‘‘กฺวจิ ธาตฺวา’’ทินา พการสฺส วกาโร, ปิวติ, ปิวนฺติ. ปาติ, ปานฺติ, ปนฺติ วา. ปียเต, ปียนฺเต. ปียติ, ปียนฺติ. ปิวตุ. ปิเวยฺย. อปายิ, ปิวิ. ปิวิสฺสติ. อปิวิสฺส อิจฺจาทิ. 'pibati'। 'pibatu'। 'pibeyya'। 'क्वचि धातु...' आदि से 'ब' कार को 'व' कार होता है - 'pivati', 'pivanti'। 'pāti', 'pānti' या 'panti'। 'pīyate', 'pīyante'। 'pīyati', 'pīyanti'। 'pivatu'। 'piveyya'। 'apāyi', 'pivi'। 'pivissati'। 'apivissa' इत्यादि। อส ภุวิ, วิภตฺตุปฺปตฺติ, อปฺปจฺจยโลโป, อส อิตีธ – 'Asa' (होना) अर्थ में, विभक्ति की उत्पत्ति, 'अ' प्रत्यय का लोप, यहाँ 'Asa' में – ‘‘อสสฺมา, อนฺตโลโป’’ติ จ วตฺตเต. 'असस्मा' (अस् से) और 'अन्तलोपो' (अन्त का लोप) की अनुवृत्ति आती है। ๔๙๕. ติสฺส ตฺถิตฺตํ. ४९५. 'ti' को 'tthi' होता है। อสอิจฺเจตสฺมา ธาตุมฺหา ปรสฺส ติสฺส วิภตฺติสฺส ตฺถิตฺตํ โหติ, ธาตฺวนฺตสฺส โลโป จ. อตฺถิ. 'Asa' इस धातु से परे 'ti' विभक्ति को 'tthi' होता है और धातु के अन्त का लोप होता है। 'atthi'। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' की अनुवृत्ति आती है। ๔๙๖. สพฺพตฺถาสสฺสาทิ โลโป จ. ४९६. सब जगह 'Asa' आदि के आदि (प्रारम्भ) का लोप होता है। สพฺพตฺถ วิภตฺติปฺปจฺจเยสุ จ อสอิจฺเจตาย ธาตุยา อาทิสฺส โลโป โหติ วา, ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. สนฺติ. सभी विभक्तियों और प्रत्ययों के परे होने पर 'अस' इस धातु के आदि (अ) का लोप विकल्प से होता है, यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है। 'सन्ति'। ‘‘อสสฺมา, อนฺตโลโป’’ติ จ อธิกาโร. 'असस्मा' और 'अन्तलोपो' का अधिकार है। ๔๙๗. สิมฺหิ จ. ४९७. और 'सि' विभक्ति के परे होने पर। อสธาตุสฺส อนฺตโลโป โหติ สิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ จ. ตฺวํ อสิ. 'अस' धातु के अन्त्य का लोप होता है 'सि' विभक्ति के परे होने पर। 'त्वं असि' (तुम हो)। ๔๙๘. ถสฺส [Pg.300] ตฺถตฺตํ. ४९८. 'थ' को 'त्थ' भाव। อสอิจฺเจตาย ธาตุยา ปรสฺส ถสฺส วิภตฺติสฺส ตฺถตฺตํ โหติ, ธาตฺวนฺตสฺส โลโป จ. ตุมฺเห อตฺถ. 'अस' इस धातु से परे 'थ' विभक्ति को 'त्थ' होता है और धातु के अन्त्य का लोप होता है। 'तुम्हे अत्थ' (तुम सब हो)। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๔๙๙. อสสฺมา มิมานํ มฺหิมฺหานฺตโลโป จ. ४९९. 'अस' धातु से परे 'मि' और 'म' को क्रमशः 'म्हि' और 'म्हा' आदेश होते हैं और धातु के अन्त्य का लोप होता है। อสอิจฺเจตาย ธาตุยา ปราสํ มิ มอิจฺเจตาสํ วิภตฺตีนํ มฺหิมฺหอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา, ธาตฺวนฺตสฺส โลโป จ. อมฺหิ, อมฺห. อสฺมิ, อสฺม. ‘अस्’ इस धातु से परे ‘मि’ और ‘म’ इन विभक्तियों के स्थान पर ‘म्हि’ और ‘म्ह’ ये आदेश विकल्प से होते हैं, और धातु के अन्त्य वर्ण का लोप भी होता है। अम्हि, अम्ह। अस्मि, अस्म। ๕๐๐. ตุสฺส ตฺถุตฺตํ. ५००. ‘तु’ के स्थान पर ‘त्थु’ आदेश होता है। อสอิจฺเจตาย ธาตุยา ปรสฺส ตุสฺส วิภตฺติสฺส ตฺถุตฺตํ โหติ, ธาตฺวนฺตสฺส โลโป จ. อตฺถุ. อสสฺสาทิโลโป จ, สนฺตุ. อาหิ, อตฺถ. อสฺมิ, อสฺม. ‘अस्’ इस धातु से परे ‘तु’ विभक्ति के स्थान पर ‘त्थु’ आदेश होता है, और धातु के अन्त्य वर्ण का लोप भी होता है। अत्थु। ‘अस्’ के आदि वर्ण का लोप भी होता है, सन्तु। आहि, अत्थ। अस्मि, अस्म। สตฺตมิยํ อสสฺสาทิโลโป, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อสโต เอยฺยเอยฺยุํ วิภตฺตีนํ อิยาอิยุญฺจ โหนฺติ. สิยา, สิยุํ. सप्तमी (विभक्ति) में ‘अस्’ के आदि वर्ण का लोप होता है, और ‘क्वचि धातू’ इत्यादि सूत्र से ‘अस्’ से परे ‘एय्य’ और ‘एय्युं’ विभक्तियों के स्थान पर ‘इया’ और ‘इयुं’ आदेश होते हैं। सिया, सियुं। โลปาภาเว ‘‘กฺวจิ ธาตฺวา’’ทินา อสโต เอยฺยาทีนํ สธาตฺวนฺตานํ สฺส สฺสุ สฺส สฺสถ สฺสํ สฺสามอาเทสา โหนฺติ. लोप के अभाव में ‘क्वचि धात्वा’ इत्यादि सूत्र से ‘अस्’ से परे ‘एय्यादि’ विभक्तियों के धातु के अन्त्य वर्ण सहित ‘स्स’, ‘स्सु’, ‘स्स’, ‘स्सथ’, ‘स्सं’, ‘स्साम’ आदेश होते हैं। เอวมสฺส วจนีโย, อสฺสุ. อสฺส, อสฺสถ. อสฺสํ, อสฺสาม. इस प्रकार कहना चाहिए - अस्सु। अस्स, अस्सथ। अस्सं, अस्साम। อชฺชตนิยํ อการาคโม, ทีโฆ จ, อาสิ, อาสึสุ, อาสุํ. อาสิ, อาสิตฺถ. อาสึ, อาสิมฺห. अद्यतनी (विभक्ति) में ‘अ’ कार का आगम और दीर्घ होता है - आसि, आसिंसु, आसुं। आसि, आसित्थ। आसिं, आसिम्ह। ‘‘วา[Pg.301], อสสฺสา’’ติ จ วตฺตเต. ‘वा’ और ‘असस्स’ की अनुवृत्ति होती है। ๕๐๑. อสพฺพธาตุเก ภู. ५०१. असब्बधातुक (विभक्तियों) में ‘अस्’ के स्थान पर ‘भू’ आदेश होता है। อสสฺเสว ธาตุสฺส ภูอาเทโส โหติ วา อสพฺพธาตุเก. ภวิสฺสติ, ภวิสฺสนฺติ. อภวิสฺส, อภวิสฺสํสุ. असब्बधातुक में ‘अस्’ धातु के स्थान पर विकल्प से ‘भू’ आदेश होता है। भविस्सति, भविस्सन्ति। अभविस्स, अभविस्संु। วาติ กิมตฺถํ? อาสุํ. ‘वा’ (विकल्प) किसलिए? आसुं (के लिए)। พฺรู วิยตฺติยํ วาจายํ, ตฺยาทฺยุปฺปตฺติ, อปฺปจฺจยโลโป จ. ‘ब्रू’ धातु स्पष्ट वाणी (बोलने) के अर्थ में है, ‘ति’ आदि की उत्पत्ति और ‘अ’ प्रत्यय का लोप होता है। ‘‘กฺวจี’’ติ วตฺตเต. ‘क्वचि’ की अनुवृत्ति होती है। ๕๐๒. พฺรูโต อี ติมฺหิ. ५०२. ‘ब्रू’ से परे ‘ति’ विभक्ति होने पर ‘ई’ (आगम) होता है। พฺรูอิจฺเจตาย ธาตุยา ปโร อีการาคโม โหติ ติมฺหิ วิภตฺติมฺหิ กฺวจิ, วุทฺธิอวาเทสา, สรโลปาทิ. พฺรวีติ, พฺรูติ, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ สุตฺตานุวตฺติตวาคฺคหเณน พฺรูธาตุสฺส พฺยญฺชเน วุทฺธิ น โหติ, พหุวจเน ‘‘ฌลานมิยุวา สเร วา’’ติ อูการสฺส สเร อุวาเทโส, พฺรุวนฺติ. ‘‘กฺวจิ ธาตฺวา’’ทินา พฺรูโต ติอนฺตีนํ วา อ อุ อาเทสา พฺรูสฺส อาหาเทโส จ. ‘ब्रू’ इस धातु से परे ‘ति’ विभक्ति होने पर क्वचित् ‘ई’ कार का आगम होता है, वृद्धि और ‘अव्’ आदेश, स्वर-लोप आदि होते हैं। ब्रवीति, ब्रूति। ‘अञ्ञेसु च’ इस सूत्र से अनुवृत्त ‘वा’ ग्रहण से ‘ब्रू’ धातु की व्यञ्जन परे होने पर वृद्धि नहीं होती है। बहुवचन में ‘झलानमियुवा सरे वा’ सूत्र से स्वर परे होने पर ‘ऊ’ कार के स्थान पर ‘उव्’ आदेश होता है, ब्रुवन्ति। ‘क्वचि धात्वा’ इत्यादि सूत्र से ‘ब्रू’ से परे ‘ति’ और ‘अन्ति’ के स्थान पर विकल्प से ‘अ’ और ‘उ’ आदेश होते हैं और ‘ब्रू’ के स्थान पर ‘आह’ आदेश होता है। อาห, อาหุ. พฺรูสิ, พฺรูถ. พฺรูมิ, พฺรูม. พฺรูเต, พฺรุวนฺเต. พฺรูเส, พฺรุววฺเห. พฺรุเว, พฺรูมฺเห. พฺรูตุ, พฺรุวนฺตุ. พฺรูหิ, พฺรูถ. พฺรูมิ, พฺรูม. พฺรูตํ, พฺรุวนฺตํ. พฺรุเว, พฺรุเวยฺย, พฺรุเวยฺยุํ. พฺรุเวยฺยาสิ, พฺรุเวยฺยาถ. พฺรุเวยฺยามิ, พฺรุเวยฺยาม. พฺรุเวถ, พฺรุเวรํ. อพฺรุวา, อพฺรุวู. आह, आहु। ब्रूसि, ब्रूथ। ब्रूमि, ब्रूम। ब्रूते, ब्रुवन्ते। ब्रूसे, ब्रुवव्हे। ब्रुवे, ब्रूम्हे। ब्रूतु, ब्रुवन्तु। ब्रूहि, ब्रूथ। ब्रूमि, ब्रूम। ब्रूतं, ब्रुवन्तं। ब्रुवे, ब्रुवेय्य, ब्रुवेय्युं। ब्रुवेय्यासि, ब्रुवेय्याथ। ब्रुवेय्यामि, ब्रुवेय्याम। ब्रुवेथ, ब्रुवेरं। अब्रुवा, अब्रुवू। ปโรกฺขายํ [Pg.302] ‘‘พฺรูภูนมาหภูวา ปโรกฺขาย’’นฺติ พฺรูธาตุสฺส อาหอาเทโส, สรโลปาทิ, สุปิเน กิร มาห, เตนาหุ โปราณา, อาหํสุ วา อิจฺจาทิ. परोक्खा (विभक्ति) में ‘ब्रूभूनमाहभूवा परोक्खायं’ सूत्र से ‘ब्रू’ धातु के स्थान पर ‘आह’ आदेश होता है, स्वर-लोप आदि होते हैं। सुपिते किर माह, तेनाहु पोराणा, आहंसु वा इत्यादि। อชฺชตนิยํ อพฺรวิ, อพฺรุวิ, อพฺรวุํ. พฺรวิสฺสติ. อพฺรวิสฺส อิจฺจาทิ. अद्यतनी में अब्रवि, अब्रुवि, अब्रवुं। भविस्सति। अब्रविस्स इत्यादि। หน หึสาคตีสุ, ติมฺหิ กฺวจิ อปฺปจฺจยโลโป, หนฺติ, หนติ, หนนฺติ. หนสิ, หนถ. หนามิ, หนาม. ‘हन’ धातु हिंसा और गति के अर्थ में है, ‘ति’ परे होने पर क्वचित् ‘अ’ प्रत्यय का लोप होता है - हन्ति, हनति, हनन्ति। हनसि, हनथ। हनामि, हनाम। กมฺเม ‘‘ตสฺส จวคฺค’’อิจฺจาทินา ญตฺตํ, ทฺวิตฺตญฺจ, หญฺญเต, หญฺญนฺเต, หญฺญเร. หญฺญติ, หญฺญนฺติ. หนตุ, หนนฺตุ. หเนยฺย. कर्मवाच्य में ‘तस्स चवग्ग’ इत्यादि सूत्र से ‘ञ’ कार और द्वित्व होता है - हञ्ञते, हञ्ञन्ते, हञ्ञरे। हञ्ञति, हञ्ञन्ति। हनतु, हनन्तु। हनेय्य। ‘‘หนสฺสา’’ติ วตฺตเต. ‘हनस्स’ की अनुवृत्ति होती है। ๕๐๓. วโธ วา สพฺพตฺถ. ५०३. सब जगह (सभी लकारों में) विकल्प से ‘वध’ आदेश होता है। หนอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส วธาเทโส โหติ วา สพฺพตฺถ วิภตฺติปฺปจฺจเยสุ, ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. วเธติ. วธียติ. วเธตุ. วธียตุ. วเธยฺย. อวธิ, อวธึสุ. อหนิ, อหนึสุ. วธิสฺสติ, หนิสฺสติ. ขาเทเส ปฏิหงฺขามิ, ปฏิหนิสฺสามิ. อวธิสฺส, อหนิสฺส อิจฺจาทิ. 'हन' (han) इस धातु के स्थान पर सभी विभक्ति प्रत्ययों के परे होने पर विकल्प से 'वध' (vadha) आदेश होता है, यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। वधेति (vadheti)। वधीयति (vadhīyati)। वधेतु (vadhetu)। वधीयतु (vadhīyatu)। वधेय्य (vadheyya)। अवधि (avadhi), अवधिंसु (avadhiṃsu)। अहनि (ahani), अहनिंसु (ahaniṃsu)। वधिस्सति (vadhissati), हनिस्सति (hanissati)। 'खा' आदेश होने पर पटिहङ्खामि (paṭihaṅkhāmi), पटिहनिस्सामि (paṭihanissāmi)। अवधिस्स (avadhissa), अहनिस्स (ahanissa) इत्यादि। หูวาทินโย. 'हू' आदि की विधि (नय)। หุ ทานาทนหพฺยปฺปทาเนสุ, ตฺยาทฺยุปฺปตฺติ, อปฺปจฺจโย จ, ‘‘กฺวจาทิวณฺณานเมกสฺสรานํ ทฺเวภาโว’’ติ ทฺวิตฺตํ, ‘‘ปุพฺโพพฺภาโส’’ติ อพฺภาสสญฺญา. 'हु' (hu) धातु दान, अदन (भक्षण) और हव्य प्रदान के अर्थ में है, 'ति' आदि की उत्पत्ति और 'अ' प्रत्यय होता है, 'क्वचादिवण्णानमेकस्सरानं द्वेभावो' इस सूत्र से द्वित्व होता है, 'पुब्बोब्भासो' से अभ्यास संज्ञा होती है। ‘‘อพฺภาเส’’ติ วตฺตเต. 'अब्भासे' (abbhāse) इसकी अनुवृत्ति आती है। ๕๐๔. หสฺส [Pg.303] โช. ५०४. 'ह' का 'ज' होता है। หการสฺส อพฺภาเส วตฺตมานสฺส โช โหติ. ‘‘โลปญฺเจตฺต มกาโร’’ติ อปฺปจฺจยโลโป, วุทฺธิ. ชุโหติ. अभ्यास में वर्तमान 'ह' कार का 'ज' होता है। 'लोपञ्चेत्त मकारो' इस सूत्र से 'अ' प्रत्यय का लोप और वृद्धि होती है। जुहोति (juhoti)। โลปาภาเว ‘‘ฌลานํ, สเร’’ติ จ วตฺตมาเน – लोप के अभाव में 'झलानं' और 'सरे' की अनुवृत्ति होने पर— ๕๐๕. ยวการา จ. ५०५. और 'य' तथा 'व' कार। ฌลสญฺญานํ อิวณฺณุวณฺณานํ ยการวการาเทสา โหนฺติ สเร ปเรติ อปทนฺตสฺส อุการสฺส วกาโร. 'झल' संज्ञक इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर स्वर परे होने पर य-कार और व-कार आदेश होते हैं, इस प्रकार अपदान्त उ-कार का व-कार होता है। ชุหฺวติ, ชุโหติ, ชุหฺวนฺติ, ชุโหนฺติ. ชุหฺวสิ, ชุโหสิ, ชุหฺวถ, ชุโหถ. ชุหฺวามิ, ชุโหมิ, ชุหฺวาม, ชุโหม. जुह्वति (juhvati), जुहोति (juhoti), जुह्वन्ति (juhvanti), जुहोन्ति (juhonti)। जुह्वसि (juhvasi), जुहोसि (juhosi), जुह्वथ (juhvatha), जुहोथ (juhotha)। जुह्वामि (juhvāmi), जुहोमि (juhomi), जुह्वाम (juhvāma), जुहोम (juhoma)। กมฺเม ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ทีโฆ, หูยเต, หูยนฺเต. หูยติ, หูยนฺติ. कर्मवाच्य में 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से दीर्घ होता है— हूयते (hūyate), हूयन्ते (hūyante)। हूयति (hūyati), हूयन्ति (hūyanti)। ตถา ชุโหตุ, ชุโหนฺตุ, ชุหฺวนฺตุ วา. ชุเห, ชุเหยฺย, ชุเหยฺยุํ. อชุหวิ, อชุหวุํ. อชุโหสิ, อชุโหสุํ. อหูยิตฺถ อคฺคิ. ชุหิสฺสติ, ชุหิสฺสนฺติ. ชุโหสฺสติ, ชุโหสฺสนฺติ วา. อชุหิสฺส, อชุหิสฺสํสุ อิจฺจาทิ. उसी प्रकार जुहोतु (juhotu), जुहोन्तु (juhontu), या जुह्वन्तु (juhvantu)। जुहे (juhe), जुहेय्य (juheyya), जुहेय्युं (juheyyuṃ)। अजुहवि (ajuhavi), अजुहवुं (ajuhavuṃ)। अजुहोसि (ajuhosi), अजुहोसुं (ajuhosuṃ)। अहूयित्थ अग्गि (ahūyittha aggi)। जुहिस्सति (juhissati), जुहिस्सन्ति (juhissanti)। जुहोस्सति (juhossati), या जुहोस्सन्ति (juhossanti)। अजुहिस्स (ajuhissa), अजुहिस्सं सु (ajuhissaṃsu) इत्यादि। หา จาเค, ปุเร วิย ทฺเวภาวชาเทส อปฺปจฺจยโลปา. 'हा' (hā) त्याग के अर्थ में है, पहले की तरह द्वित्व, 'ज' आदेश और 'अ' प्रत्यय का लोप होता है। ‘‘อพฺภาเส’’ติ วตฺตเต. 'अब्भासे' (abbhāse) इसकी अनुवृत्ति आती है। ๕๐๖. รสฺโส. ५०६. ह्रस्व। อพฺภาเส วตฺตมานสฺส สรสฺส รสฺโส โหติ. अभ्यास में वर्तमान स्वर का ह्रस्व होता है। ชหาติ, ชหนฺติ. ชหาสิ, ชหาถ. ชหามิ, ชหาม. जहाति (jahāti), जहन्ति (jahanti)। जहासि (jahāsi), जहाथ (jahātha)। जहामि (jahāmi), जहाम (jahāma)। กมฺเม [Pg.304] ‘‘ยมฺหิ ทาธามาฐาหาปามหมถาทีนมี’’ติ ธาตฺวนฺตสฺส อีกาโร. หียเต, หียนฺเต, หียเร. หียติ, หียนฺติ. कर्मवाच्य में 'यम्हि दाधामाठाहापा महमथादीनमी' इस सूत्र से धातु के अन्त का ई-कार होता है। हीयते (hīyate), हीयन्ते (hīyante), हीयरे (hīyere)। हीयति (hīyati), हीयन्ति (hīyanti)। ตถา ชหาตุ, ชหนฺตุ. ชเห, ชเหยฺย, ชเหยฺยุํ. หีเยถ, หีเยยฺย. อชหาสิ, อชหึสุ, อชหาสุํ. ปชหิ, ปชหึสุ, ปชหํสุ, ปชหุํ. กมฺเม ปชหียิตฺถ, ปชหียิ. ปชหิสฺสติ, ปชหิสฺสนฺติ. หียิสฺสติ, หียิสฺสนฺติ. ปชหิสฺส, ปชหิสฺสํสุ อิจฺจาทิ. उसी प्रकार जहातु (jahātu), जहन्तु (jahantu)। जहे (jahe), जहेय्य (jaheyya), जहेय्युं (juheyyuṃ)। हीयेथ (hīyetha), हीयेय्य (hīyeyya)। अजहासि (ajahāsi), अजहिंसु (ajahiṃsu), अजहासुं (ajahāsuṃ)। पजहि (pajahi), पजहिंसु (pajahiṃsu), पजहंसु (pajahaṃsu), पजहुं (pajahuṃ)। कर्मवाच्य में पजहीयित्थ (pajahīyittha), पजहीयि (pajahīyi)। पजहिस्सति (pajahissati), पजहिस्सन्ति (pajahissanti)। हीयिस्सति (hīyissati), हीयिस्सन्ति (hīyissanti)। पजहिस्स (pajahissa), पजहिस्सं सु (pajahissaṃsu) इत्यादि। ทา ทาเน, ตฺยาทฺยุปฺปตฺติ, ทฺเวภาวรสฺสตฺตานิ, อปฺปจฺจยสฺส โลโป, ททาติ, ททนฺติ. ททาสิ, ททาถ. ททามิ, ททาม. 'दा' (dā) दान के अर्थ में है, 'ति' आदि की उत्पत्ति, द्वित्व और ह्रस्वत्व होते हैं, 'अ' प्रत्यय का लोप होता है— ददाति (dadāti), ददन्ति (dadanti)। ददासि (dadāsi), ददाथ (dadātha)। ददामि (dadāmi), ददाम (dadāma)। ทฺวิตฺตาภาเว มณฺฑูกคติยา ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. द्वित्व के अभाव में मण्डूकगति से 'वा' की अनुवृत्ति आती है। ๕๐๗. ทาธาตุสฺส ทชฺชํ. ५०७. 'दा' धातु का 'दज्ज' होता है। ทาอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส สพฺพสฺส ทชฺชาเทโส โหติ วา, ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, อปฺปจฺจยโลโป. ทชฺชติ, ทชฺชนฺติ. ทชฺชสิ, ทชฺชถ. ทชฺชามิ, ทชฺชาม. ทชฺชาเทสาภาเว ‘‘โลปญฺเจตฺตมกาโร’’ติ อปฺปจฺจยสฺส เอกาโร, ทานํ เทติ, เทนฺติ. เทสิ, เทถ. 'दा' इस धातु के सम्पूर्ण स्थान पर विकल्प से 'दज्ज' आदेश होता है, यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है, 'अ' प्रत्यय का लोप होता है। दज्जति (dajjati), दज्जन्ति (dajjanti)। दज्जसि (dajjasi), दज्जथ (dajjatha)। दज्जामि (dajjāmi), दज्जाम (dajjāma)। दज्ज आदेश के अभाव में 'लोपञ्चेत्त मकारो' इस सूत्र से 'अ' प्रत्यय का ए-कार होता है— दानं देति (deti), देन्ति (denti)। देसि (desi), देथ (detha)। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' (vā) इसकी अनुवृत्ति आती है। ๕๐๘. ทาทนฺตสฺสํ มิเมสุ. ५०८. 'मि' और 'म' के परे होने पर 'दा' के अन्त का 'अं' होता है। ทาอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส อนฺตสฺส อํ โหติ วา มิมอิจฺเจเตสุ ปเรสุ, นิคฺคหีตสฺส วคฺคนฺตตฺตํ. ทมฺมิ, ทมฺม. เทมิ, เทม. 'दा' इस धातु के अन्त का विकल्प से 'अं' होता है 'मि' और 'म' के परे होने पर, निग्गहीत का वर्गान्त (म-कार) होता है। दम्मि (dammi), दम्म (damma)। देमि (demi), देम (dema)। กมฺเม ‘‘ยมฺหิ ทาธา’’อิจฺจาทินา อีกาโร, ทียเต, ทียนฺเต. ทียติ, ทียนฺติ. ทียฺยเต, ทียฺยนฺเต. ทียฺยติ, ทียฺยนฺติ วา อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में 'यम्हि दाधा' इत्यादि सूत्र से ई-कार होता है— दीयते (dīyate), दीयन्ते (dīyante)। दीयति (dīyati), दीयन्ति (dīyanti)। दीय्यते (dīyyate), दीय्यन्ते (dīyyante)। दीय्यति (dīyyati), दीय्यन्ति (dīyyanti) वा इत्यादि। ททาตุ[Pg.305], ททนฺตุ. ททาหิ, ททาถ. ททามิ, ททาม. ททตํ, ททนฺตํ. ททสฺสุ, ททวฺโห. ทเท, ททามเส. ทชฺชตุ, ทชฺชนฺตุ อิจฺจาทิ. เทตุ, เทนฺตุ. เทหิ, เทถ. เทมิ, เทม. กมฺเม ทียตํ, ทียนฺตํ. ทียตุ, ทียนฺตุ. ददातु (dadātu), ददन्तु (dadantu)। ददाहि (dadāhi), ददाथ (dadātha)। ददामि (dadāmi), ददाम (dadāma)। ददतं (dadataṃ), ददन्तं (dadantaṃ)। ददस्सु (dadassu), ददवहो (dadavho)। ददे (dade), ददामसे (dadāmase)। दज्जतु (dajjatu), दज्जन्तु (dajjantu) इत्यादि। देतु (detu), देन्तु (dentu)। देहि (dehi), देथ (detha)। देमि (demi), देम (dema)। कर्मवाच्य में दीयतं (dīyataṃ), दीयन्तं (dīyantaṃ)। दीयतु (dīyatu), दीयन्तु (dīyantu)। สตฺตมิยํ ทเท, ทเทยฺย, ทเทยฺยุํ. ทเทยฺยาสิ, ทเทยฺยาถ. ทเทยฺยามิ, ทเทยฺยาม. ทเทถ, ทเทรํ. ทเทโถ, ทเทยฺยาวฺโห. ทเทยฺยํ, ทเทยฺยามฺเห. ทชฺเช, ทชฺเชยฺย. सप्तमी (विधिलिङ्) में— ददे (dade), ददेय्य (dadeyya), ददेय्युं (dadeyyuṃ)। ददेय्यासि (dadeyyāsi), ददेय्याथ (dadeyyātha)। ददेय्यामि (dadeyyāmi), ददेय्यामा (dadeyyāma)। ददेथ (dadetha), ददेरं (daderaṃ)। ददेथो (dadetho), ददेय्यावहो (dadeyyāvho)। ददेय्यं (dadeyyaṃ), ददेय्यामहे (dadeyyāmhe)। दज्जे (dajje), दज्जेय्य (dajjeyya)। ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา เอยฺยสฺสาตฺตญฺจ, ทชฺชา, ทชฺชุํ, ทชฺเชยฺยุํ. ทชฺเชยฺยาสิ, ทชฺเชยฺยาถ. ทชฺชํ, เอยฺยามิสฺส อมาเทโส จ, ทชฺเชยฺยามิ, ทชฺเชยฺยาม. ทฺวิตฺตาภาเว เทยฺย, เทยฺยุํ. เทยฺยาสิ, เทยฺยาถ. ทีเยถ, ทีเยยฺย. 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'एय्य' का 'आ' भी होता है— दज्जा (dajjā), दज्जुं (dajjuṃ), दज्जेय्युं (dajjeyyuṃ)। दज्जेय्यासि (dajjeyyāsi), दज्जेय्याथ (dajjeyyātha)। दज्जं (dajjaṃ), 'एय्यामि' का 'अं' आदेश भी होता है— दज्जेय्यामि (dajjeyyāmi), दज्जेय्यामा (dajjeyyāma)। द्वित्व के अभाव में देय्य (deyya), देय्युं (deyyuṃ)। देय्यासि (deyyāsi), देय्याथ (deyyātha)। दीयेथ (dīyetha), दीयेय्य (dīyeyya)। หิยฺยตฺตนิยํ อททา, อททู. อทโท, อททตฺถ. อททํ, อททมฺห. อททตฺถ, อททมฺหเส. กมฺเม อทียิตฺถ. हिय्यत्तनी (Imperfect) में: adadā, adadū (उसने दिया, उन्होंने दिया)। Adado, adadattha (तुमने दिया, तुम सबने दिया)। Adadaṃ, adadamha (मैंने दिया, हमने दिया)। Adadattha, adadamhase (आत्मनेपद)। कर्मवाच्य (Passive) में: adīyittha। อชฺชตนิมฺหิ อททิ, อททึสุ, อททุํ. อทชฺชิ, อทชฺชึสุ. อทาสิ, อทํสุ. อทาสิ, อโท, อทิตฺถ. อทาสึ, อทาสิมฺห, อทมฺห. อทาทานํ ปุรินฺทโท. กมฺเม อทียิตฺถ, อทียฺยิ. अज्जतनी (Aorist) में: adadi, adadiṃsu, adaduṃ। Adajji, adajjiṃsu। Adāsi, adaṃsu। Adāsi, ado, adittha। Adāsiṃ, adāsimha, adamha। 'Adādānaṃ purindado' (इन्द्र का विशेषण)। कर्मवाच्य में: adīyittha, adīyyi। ภวิสฺสนฺติยํ อิการาคโม, สรโลปาทิ, ททิสฺสติ, ททิสฺสนฺติ. ทชฺชิสฺสติ, ทชฺชิสฺสนฺติ. รสฺสตฺตํ, ทสฺสติ, ทสฺสนฺติ. ทสฺสสิ, ทสฺสถ. ทสฺสามิ, ทสฺสาม. ทสฺสเต. ทียิสฺสเต, ทียิสฺสติ. भविष्यन्ती (Future) में: 'इ' कार का आगम, स्वर लोप आदि होकर: dadissati, dadissanti। Dajjissati, dajjissanti। ह्रस्व होने पर: dassati, dassanti। Dassasi, dassatha। Dassāmi, dassāma। Dassate (आत्मनेपद)। कर्मवाच्य में: dīyissate, dīyissati। กาลาติปตฺติยํ อททิสฺส, อทชฺชิสฺส, อทชฺชิสฺสา, อทสฺส, อทสฺสา, อทสฺสํสุ. อทียิสฺสถ, อทียิสฺส อิจฺจาทิ. कालातिपत्ति (Conditional) में: adadissa, adajjissa, adajjissā, adassa, adassā, adassaṃsu। Adīyissatha, adīyissa इत्यादि। ธา [Pg.306] ธารเณ, ปุเร วิย วิภตฺตุปฺปตฺติ, ทฺวิตฺตรสฺสตฺตานิ, อปฺปจฺจยโลโป จ, ‘‘ทุติยจตุตฺถานํ ปฐมตติยา’’ติ ธการสฺส ทกาโร, ทธาติ, ทธนฺติ. อปิปุพฺโพ ตสฺส ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อการโลโป, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ธการสฺส หกาโร, รสฺสตฺตญฺจ, ทฺวารํ ปิทหติ, ปิทหนฺติ. ทฺเวภาวาภาเว นิธึ นิเธติ, นิเธนฺติ. 'धा' (dhā) धारण करने के अर्थ में; पहले की तरह विभक्ति की उत्पत्ति, द्वित्व और ह्रस्व होना, और 'अ' प्रत्यय का लोप होता है। 'द्वितीयचतुत्थानं पठमततिया' सूत्र से 'ध' कार का 'द' कार होकर: dadhāti, dadhanti। 'अपि' उपसर्ग पूर्वक होने पर 'तेसु वुद्धि' आदि सूत्र से 'अ' कार का लोप, 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से 'ध' कार का 'ह' कार और ह्रस्व होकर: dvāraṃ pidahati (द्वार बंद करता है), pidahanti। द्वित्व न होने पर: nidhiṃ nidheti (निधि रखता है), nidhenti। กมฺเม ธียเต, ธียติ, ปิธียเต, ปิธียติ. कर्मवाच्य में: dhīyate, dhīyati, pidhīyate, pidhīyati। ตถา ทธาตุ, ปิทหตุ, นิเธตุ, นิเธนฺตุ. ทเธ, ทเธยฺย, ปิทเห, ปิทเหยฺย, นิเธ, นิเธยฺย. ทธาสิ, ปิทหิ. ธสฺสติ, ปิทหิสฺสติ, ปริทเหสฺสติ. อธสฺส, ปิทหิสฺส อิจฺจาทิ. उसी प्रकार: dadhātu, pidahatu, nidhetu, nidhentu (पञ्चमी)। Dadhe, dadheyya, pidahe, pidaheyya, nidhe, nidheyya (सत्तमी)। Dadhāsi, pidahi (अज्जतनी)। Dhassati, pidahissati, paridahessati (भविष्यन्ती)। Adhassa, pidahissa इत्यादि (कालातिपत्ति)। ชุโหตฺยาทินโย. यह जुहोत्यादि गण की विधि है। อวุทฺธิกา ตุทาที จ, หูวาทิ จ ตถาปโร; ชุโหตฺยาทิ จตุทฺเธวํ, เญยฺยา ภูวาทโย อิธ. यहाँ भूवादि गण के चार भेद जानने चाहिए: अवृद्धिक तुदादि, हूवादि, और जुहोत्यादि। ภูวาทิคโณ. भूवादि गण। รุธาทิคณ रुधादि गण। รุธ อาวรเณ, ปุเร วิย ธาตุสญฺญาทิมฺหิ กเต วิภตฺตุปฺปตฺติ. 'रुध' (rudh) आवरण (रोकने) के अर्थ में; पहले की तरह धातु संज्ञा आदि करने के बाद विभक्ति की उत्पत्ति होती है। ‘‘อ’’อิติ วตฺตเต. 'अ' (प्रत्यय) की अनुवृत्ति होती है। ๕๐๙. รุธาทิโต นิคฺคหีตปุพฺพญฺจ. ५०९. रुधादि धातुओं से (अ प्रत्यय) और उससे पहले निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम होता है। จตุปฺปทมิทํ. รุธอิจฺเจวมาทิโต ธาตุคณโต อปฺปจฺจโย โหติ กตฺตริ วิภตฺติปฺปจฺจเยสุ, นิคฺคหีตญฺจ ตโต ปุพฺพํ [Pg.307] หุตฺวา อาคโม โหติ, ตญฺจ นิคฺคหีตํ ปกติยา สรานุคตตฺตา ธาตุสฺสรโต ปรํ โหติ. จสทฺเทน อิอีเอโอปจฺจยา จ, นิคฺคหีตสฺส วคฺคนฺตตฺตํ. อิธ สํโยคนฺตตฺตา น วุทฺธิ โหติ, ตทาคมสฺส ตคฺคหเณน คหณโต. यह चार पदों वाला (सूत्र) है। रुध आदि धातु गण से कर्तावाच्य की विभक्तियों के परे होने पर 'अ' प्रत्यय होता है, और उससे पहले निग्गहीत का आगम होता है। वह निग्गहीत स्वभाव से स्वर के पीछे आने के कारण धातु के स्वर के बाद होता है। 'च' शब्द से इ, ई, ए, ओ प्रत्यय भी होते हैं, और निग्गहीत का वर्गान्त (पंचम वर्ण) हो जाता है। यहाँ संयोगान्त होने के कारण वृद्धि नहीं होती है, क्योंकि उस आगम का ग्रहण उसी के साथ होता है। โส มคฺคํ รุนฺธติ, รุนฺธนฺติ. รุนฺธสิ, รุนฺธถ. รุนฺธามิ, รุนฺธาม. รุนฺธเต, รุนฺธนฺเต อิจฺจาทิ, อิการาทิปฺปจฺจเยสุ ปน รุนฺธิติ, รุนฺธีติ, รุนฺเธติ, รุนฺโธตีติปิ โหติ. वह मार्ग रोकता है—rundhati, rundhanti। Rundhasi, rundhatha। Rundhāmi, rundhāma। Rundhate, rundhante इत्यादि। इ-कार आदि प्रत्ययों के होने पर rundhiti, rundhīti, rundheti, rundhotī भी होता है। กมฺเม นิปุพฺโพ ยปฺปจฺจยสฺส ‘‘ตสฺส จวคฺค’’อิจฺจาทินา สธาตฺวนฺตสฺส ฌกาเร กเต ‘‘วคฺเค โฆสา’’ติอาทินา ทฺวิตฺตํ, มคฺโค นิรุชฺฌเต เตน, นิรุชฺฌนฺเต. ปรสฺสปทตฺเต นิรุชฺฌติ, นิรุชฺฌนฺติ. นิรุชฺฌสิ, นิรุชฺฌถ. นิรุชฺฌามิ, นิรุชฺฌาม. कर्मवाच्य में 'नि' उपसर्ग पूर्वक 'य' प्रत्यय होने पर 'तस्स चवग्ग' आदि सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण के साथ 'झ' कार होने पर 'वग्गे घोसा' आदि सूत्र से द्वित्व होता है—उसके द्वारा मार्ग रोका जाता है—nirujjhate, nirujjhante। परस्मैपद होने पर: nirujjhati, nirujjhanti। Nirujjhasi, nirujjhatha। Nirujjhāmi, nirujjhāma। รุนฺธตุ, รุนฺธนฺตุ. รุนฺธาหิ, รุนฺธถ. รุนฺธามิ, รุนฺธาม. รุนฺธตํ, รุนฺธนฺตํ. รุนฺธสฺสุ, รุนฺธวฺโห. รุนฺเธ, รุนฺธามเส. นิรุชฺฌตํ, นิรุชฺฌนฺตํ. นิรุชฺฌตุ, นิรุชฺฌนฺตุ. รุนฺเธ, รุนฺเธยฺย, รุนฺเธยฺยุํ. รุนฺเธถ, รุนฺเธรํ. นิรุชฺเฌถ, นิรุชฺเฌยฺย อิจฺจาทิ. รุนฺธิ, รุนฺธึสุ. อรุนฺธิ, นิรุชฺฌิตฺถ. นิรุชฺฌิ, นิรุชฺฌึสุ. รุนฺธิสฺสติ, รุนฺธิสฺสนฺติ. นิรุชฺฌิสฺสเต, นิรุชฺฌิสฺสนฺเต. นิรุชฺฌิสฺสติ, นิรุชฺฌิสฺสนฺติ. อรุนฺธิสฺส, อรุนฺธิสฺสํสุ. นิรุชฺฌิสฺสถ, นิรุชฺฌิสฺส อิจฺจาทิ. Rundhatu, rundhantu (पञ्चमी)। Rundhāhi, rundhatha। Rundhāmi, rundhāma। Rundhataṃ, rundhantaṃ (आत्मनेपद)। Rundhassu, rundhavho। Rundhe, rundhāmase। Nirujjhataṃ, nirujjhantaṃ (कर्मवाच्य)। Nirujjhatu, nirujjhantu। Rundhe, rundheyya, rundheyyuṃ (सत्तमी)। Rundhetha, rundheraṃ। Nirujjhetha, nirujjheyya इत्यादि। Rundhi, rundhiṃsu (अज्जतनी)। Arundhi, nirujjhittha। Nirujjhi, nirujjhiṃsu। Rundhissati, rundhissanti (भविष्यन्ती)। Nirujjhissate, nirujjhissante। Nirujjhissati, nirujjhissanti। Arundhissa, arundhissaṃsu (कालातिपत्ति)। Nirujjhissatha, nirujjhissa इत्यादि। ฉิทิ ทฺวิธากรเณ, ฉินฺทติ, ฉินฺทนฺติ. กมฺเม ฉิชฺชเต, ฉิชฺชนฺเต. ฉิชฺชติ, ฉิชฺชนฺติ. ตถา ฉินฺทตุ, ฉินฺทนฺตุ. ฉิชฺชตุ, ฉิชฺชนฺตุ. ฉินฺเท, ฉินฺเทยฺย. ฉิชฺเชยฺย. อฉินฺทิ, ฉินฺทิ, ฉินฺทึสุ. อฉิชฺชิตฺถ, ฉิชฺชิ. ฉินฺทิสฺสติ, ฉินฺทิสฺสนฺติ. สฺสสฺส ฉาเทเส – เฉจฺฉติ, เฉจฺฉนฺติ. เฉจฺฉิติ วา. กมฺเม ฉิชฺชิสฺสเต, ฉิชฺชิสฺสนฺเต. ฉิชฺชิสฺสติ, ฉิชฺชิสฺสนฺติ. อฉินฺทิสฺส. อฉิชฺชิสฺส อิจฺจาทิ. 'छिदि' (chidi) दो भाग करने (काटने) के अर्थ में; chindati, chindanti। कर्मवाच्य में: chijjate, chijjante। Chijjati, chijjanti। उसी प्रकार: chindatu, chindantu (पञ्चमी)। Chijjatu, chijjantu। Chinde, chindeyya (सत्तमी)। Chijjeyya। Achindi, chindi, chindiṃsu (अज्जतनी)। Achijjittha, chijji। Chindissati, chindissanti (भविष्यन्ती)। 'स्स' के स्थान पर 'छ' आदेश होने पर—checchati, checchanti। अथवा checchiti। कर्मवाच्य में: chijjissate, chijjissante। Chijjissati, chijjissanti। Achindissa (कालातिपत्ति)। Achijjissa इत्यादि। ภิทิ [Pg.308] วิทารเณ, ภินฺทติ, ภินฺทนฺติ อิจฺจาทิ. 'भिदि' (bhidi) विदारण (फाड़ने/तोड़ने) के अर्थ में; bhindati, bhindanti इत्यादि। ยุช โยเค, ยุญฺชติ, ยุญฺชนฺติ. ยุชฺชเต, ยุชฺชนฺเต. ยุชฺชติ, ยุชฺชนฺติ. ยุญฺชตุ. ยุชฺชตํ. ยุญฺเช. ยุชฺเชถ. อยุญฺชิ, อยุญฺชึสุ. อยุชฺชิตฺถ, อยุชฺชิ. ยุญฺชิสฺสติ, ยุญฺชิสฺสนฺติ. ยุชฺชิสฺสเต, ยุชฺชิสฺสนฺเต. ยุชฺชิสฺสติ, ยุชฺชิสฺสนฺติ. อยุญฺชิสฺส. อยุชฺชิสฺสถ, อยุชฺชิสฺส อิจฺจาทิ. 'युज' (yuja) योग (जोड़ने) के अर्थ में; yuñjati, yuñjanti। Yujjate, yujjante (कर्मवाच्य)। Yujjati, yujjanti। Yuñjatu (पञ्चमी)। Yujjataṃ। Yuñje (सत्तमी)। Yujjetha। Ayuñji, ayuñjiṃsu (अज्जतनी)। Ayujjittha, ayujji। Yuñjissati, yuñjissanti (भविष्यन्ती)। Yujjissate, yujjissante। Yujjissati, yujjissanti। Ayuñjissa (कालातिपत्ति)। Ayujjissatha, ayujjissa इत्यादि। ภุช ปาลนพฺยวหรเณสุ, ภุญฺชติ, ภุญฺชนฺติ อิจฺจาทิ. 'भुज' (bhuja) पालन और व्यवहार (खाने) के अर्थ में; bhuñjati, bhuñjanti इत्यादि। ภวิสฺสนฺติยํ ‘‘กรสฺส สปฺปจฺจยสฺส กาโห’’ติ สุตฺเต สปฺปจฺจยคฺคหเณน ภุชโต สฺสสฺส ขาเทโส, ‘‘โก เข จา’’ติ ธาตฺวนฺตสฺส กกาโร, วุทฺธิ, โภกฺขติ, โภกฺขนฺติ. โภกฺขสิ, โภกฺขถ. โภกฺขามิ, โภกฺขาม. ขาเทสาภาเว ภุญฺชิสฺสติ, ภุญฺชิสฺสนฺติ อิจฺจาทิ. भविष्यन्ती में 'करस्स सप्पच्चयस्स काहो' सूत्र में 'सप्पच्चय' (प्रत्यय सहित) ग्रहण करने से 'भुज' धातु से 'स्स' का 'ख' आदेश होता है, 'को खे च' सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण का 'क' कार, और वृद्धि होकर: bhokkhati, bhokkhanti। Bhokkasi, bhokkhatha। Bhokkhāmi, bhokkhāma। 'ख' आदेश न होने पर: bhuñjissati, bhuñjissanti इत्यादि। มุจ โมจเน, มุญฺจติ, มุญฺจนฺติ. มุจฺจเต, มุจฺจนฺเต. มุญฺจตุ, มุญฺจนฺตุ. มุจฺจตํ, มุจฺจนฺตํ. มุญฺเจ, มุญฺเจยฺย, มุญฺเจยฺยุํ. มุจฺเจถ, มุจฺเจรํ. อมุญฺจิ, อมุญฺจึสุ. อมุจฺจิตฺถ. โมกฺขติ, โมกฺขนฺติ. มุญฺจิสฺสติ, มุญฺจิสฺสนฺติ. มุจฺจิสฺสเต, มุจฺจิสฺสนฺเต. อมุญฺจิสฺส, อมุจฺจิสฺสถ อิจฺจาทิ. 'मुच' (muca) मोचन (छोड़ने) के अर्थ में; muñcati, muñcanti। Muccate, muccante (कर्मवाच्य)। Muñcatu, muñcantu (पञ्चमी)। Muccataṃ, muccantaṃ। Muñce, muñceyya, muñceyyuṃ (सत्तमी)। Muccetha, mucceraṃ। Amuñci, amuñciṃsu (अज्जतनी)। Amuccittha। Mokkhati, mokkhanti (भविष्यन्ती)। Muñcissati, muñcissanti। Muccissate, muccissante। Amuñcissa (कालातिपत्ति), amuccissatha इत्यादि। รุธาทิคโณ. रुधादि गण। ทิวาทิคณ दिवादि गण। ทิวุ กีฬาวิชิคีสาพฺยวหารชุติถุติกนฺติคตีสุ. ปุเร วิย ธาตฺวนฺตโลปวิภตฺตุปฺปตฺติโย. 'दिवु' (divu) क्रीड़ा (खेलना), विजिगीषा (जीतने की इच्छा), व्यवहार, द्युति (चमकना), स्तुति, कान्ति और गति के अर्थ में है। पहले की तरह धातु के अन्त्य वर्ण का लोप और विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। ๕๑๐. ทิวาทิโต [Pg.309] โย. ५१०. दिवादि गण की धातुओं से 'य' प्रत्यय होता है। ทิวาทิโต ธาตุคณโต ยปฺปจฺจโย โหติ กตฺตริ วิหิเตสุ วิภตฺติปฺปจฺจเยสุ. दिवादि धातुगण से कर्ता अर्थ में विहित विभक्ति प्रत्ययों के परे होने पर ‘य’ प्रत्यय होता है। ‘‘ยคฺคหณํ, จวคฺค ยการ วการตฺตํ สธาตฺวนฺตสฺส, ปุพฺพรูป’’นฺติ จ วตฺตเต. ‘यग्गहणं’, ‘चवग्ग यकार वकारत्तं सधात्वन्तस्स’ और ‘पुब्बरूपं’ की अनुवृत्ति होती है। ๕๑๑. ตถา กตฺตริ จ. ५११. उसी प्रकार कर्ता (वाच्य) में भी। ยถา ภาวกมฺเมสุ ยปฺปจฺจยสฺสาเทโส โหติ, ตถา กตฺตริปิ ยปฺปจฺจยสฺส สธาตฺวนฺตสฺส จวคฺค ยการวการาเทโส, ปุพฺพรูปญฺจ กาตพฺพานีติ ธาตฺวนฺตสฺส วการตฺตา สห เตน ยการสฺส วกาเร กเต ทฺวิภาโว, ‘‘โท ธสฺส จา’’ติ เอตฺถ จคฺคหเณน ‘‘โพ วสฺสา’’ติ วุตฺตตฺตา วการทฺวยสฺส พการทฺวยํ, ทิพฺพติ, ทิพฺพนฺติ. ทิพฺพสิ, ทิพฺพถ. ทิพฺพามิ, ทิพฺพาม. जैसे भाव और कर्मवाच्य में ‘य’ प्रत्यय के आदेश होते हैं, वैसे ही कर्तावाच्य में भी ‘य’ प्रत्यय के धातु के अन्त्य वर्ण सहित चवर्ग, यकार और वकार आदेश तथा पूर्वरूप करने चाहिए। धातु के अन्त्य वर्ण के वकार होने से उस (यकार) के साथ वकार होने पर द्वित्व होता है, ‘दो धस्स च’ यहाँ ‘च’ ग्रहण से ‘बो वस्स’ कहे जाने के कारण दो वकारों के स्थान पर दो बकार होते हैं - दिब्बति, दिब्बन्ति। दिब्बसि, दिब्बथ। दिब्बामि, दिब्बामा। กมฺเม ทิพฺพเต, ทิพฺพนฺเต. ทิพฺพติ, ทิพฺพนฺติ. ทิพฺพตุ. ทิพฺพตํ. ทิพฺเพ. ทิพฺเพถ. อทิพฺพิ. อทิพฺพิตฺถ. ทิพฺพิสฺสติ. ทิพฺพิสฺสเต. อทิพฺพิสฺส อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में दिब्बते, दिब्बन्ते। दिब्बति, दिब्बन्ति। दिब्बतु। दिब्बतं। दिब्बे। दिब्बेथ। अदिब्बि। अदिब्बिट्ठ। दिब्बिस्सति। दिब्बिस्सते। अदिब्बिस्स इत्यादि। สิวุ ตนฺตสนฺตาเน, สิพฺพติ, สิพฺพนฺติ. สิพฺพตุ. สิพฺเพยฺย. อสิพฺพิ, สิพฺพิ. สิพฺพิสฺสติ. อสิพฺพิสฺส อิจฺจาทิ. ‘सिवु’ धातु तन्तु-सन्तान (सिलाई) के अर्थ में है - सिब्बति, सिब्बन्ति। सिब्बतु। सिब्बेय्य। असिब्बि, सिब्बि। सिब्बिस्सति। असिब्बिस्स इत्यादि। ปท คติมฺหิ, อุปุพฺโพ ทฺวิตฺตํ, ‘‘ตถา กตฺตริ จา’’ติ สธาตฺวนฺตสฺส ยการสฺส ชกาโร, ทฺวิตฺตญฺจ. ‘पद’ धातु गति के अर्थ में है, ‘उ’ उपसर्ग पूर्वक द्वित्व होता है, ‘तथा कत्तरि च’ इस सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण सहित यकार के स्थान पर जकार और द्वित्व होता है। อุปฺปชฺชติ, อุปฺปชฺชนฺติ. อุปฺปชฺชเต, อุปฺปชฺชนฺเต, อุปฺปชฺชเร. उप्पज्जति, उप्पज्जन्ति। उप्पज्जते, उप्पज्जन्ते, उप्पज्जरे। กมฺเม ปฏิปชฺชเต, ปฏิปชฺชนฺเต. ปฏิปชฺชติ, ปฏิปชฺชนฺติ. ภาเว อุปฺปชฺชเต ตยา. कर्मवाच्य में 'paṭipajjate', 'paṭipajjante' रूप होते हैं। कर्तृवाच्य में 'paṭipajjati', 'paṭipajjanti' रूप होते हैं। भाववाच्य में 'uppajjate tayā' (तुम्हारे द्वारा उत्पन्न हुआ जाता है) रूप होता है। ตถา [Pg.310] อุปฺปชฺชตุ. อุปฺปชฺเชยฺย. อุทปชฺชา. อุทปชฺชถ. อุทปาทิ, อุปฺปชฺชี. อุปฺปชฺชิตฺถ. อุปฺปชฺชิสฺสติ. อุปฺปชฺชิสฺส, อุปฺปชฺชิสฺสา อิจฺจาทิ. उसी प्रकार 'uppajjatu' (उत्पन्न हो)। 'Uppajjeyya' (उत्पन्न होना चाहिए)। 'Udapajjā', 'Udapajjatha', 'Udapādi', 'uppajjī', 'Uppajjittha' (उत्पन्न हुआ)। 'Uppajjissati' (उत्पन्न होगा)। 'Uppajjissa', 'uppajjissā' इत्यादि। พุธ อวคมเน, ยปฺปจฺจยปรตฺตา น วุทฺธิ, ฌการาเทโสว วิเสโส, ธมฺมํ พุชฺฌติ, พุชฺฌนฺติ. พุชฺฌเต, พุชฺฌนฺเต, พุชฺฌเร วา. 'Budha' धातु ज्ञान के अर्थ में है, 'ya' प्रत्यय परे होने के कारण वृद्धि नहीं होती, 'jha' कार का आदेश ही विशेष है; 'dhammaṃ bujjhati' (धर्म को जानता है), 'bujjhanti'। 'Bujjhate', 'bujjhante' अथवा 'bujjhare' रूप भी होते हैं। กมฺเม พุชฺฌเต มยา ธมฺโม, พุชฺฌนฺเต. พุชฺฌติ, พุชฺฌนฺติ. พุชฺฌตุ. พุชฺเฌยฺย. อพุชฺฌิ. อพุชฺฌิตฺถ. พุชฺฌิสฺสติ. อพุชฺฌิสฺส. कर्मवाच्य में 'bujjhate mayā dhammo' (मेरे द्वारा धर्म जाना जाता है), 'bujjhante' रूप होते हैं। (कर्तृवाच्य में) 'bujjhati', 'bujjhanti'। 'Bujjhatu'। 'Bujjheyya'। 'Abujjhi'। 'Abujjhittha'। 'Bujjhissati'। 'Abujjhissa'। ยุธ สมฺปหาเร, ยุชฺฌติ, ยุชฺฌนฺติ. 'Yudha' धातु प्रहार (युद्ध) के अर्थ में है; 'yujjhati' (युद्ध करता है), 'yujjhanti'। กุธ โกเป, กุชฺฌติ, กุชฺฌนฺติ. 'Kudha' धातु क्रोध के अर्थ में है; 'kujjhati' (क्रोध करता है), 'kujjhanti'। วิธ ตาฬเน, วิชฺฌติ, วิชฺฌนฺติ อิจฺจาทิ. 'Vidha' धातु ताड़न (भेदने) के अर्थ में है; 'vijjhati' (भेदता है), 'vijjhanti' इत्यादि। นห พนฺธเน, ‘‘ห วิปริยโย’’ติ โยควิภาเคน วิปริยโย. สนฺนยฺหติ, สนฺนยฺหนฺติ อิจฺจาทิ. 'Naha' धातु बाँधने के अर्थ में है, 'ha vipariyayo' इस योग-विभाग से (ह और न का) विपर्यय होता है। 'Sannayhati' (कवच पहनता है), 'sannayhanti' इत्यादि। มน ญาเณ, ญาเทโสว วิเสโส, มญฺญติ, มญฺญนฺติ อิจฺจาทิ. 'Mana' धातु ज्ञान के अर्थ में है, 'ñā' आदेश ही विशेष है; 'maññati' (मानता है), 'maññanti' इत्यादि। ทา อาทาเน, สํอาปุพฺโพ ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ยมฺหิ ธาตฺวนฺตสฺส อิกาโร, สีลํ สมาทิยติ, สมาทิยนฺติ อิจฺจาทิ. 'Dā' धातु ग्रहण करने के अर्थ में है, 'saṃ' और 'ā' उपसर्ग पूर्वक 'kvaci dhātū' इत्यादि सूत्र से 'ya' प्रत्यय होने पर धातु के अन्त्य वर्ण को इकार होता है; 'sīlaṃ samādiyati' (शील ग्रहण करता है), 'samādiyanti' इत्यादि। ตุส ปีติมฺหิ, ยปฺปจฺจยสฺส ปุพฺพรูปตฺตํ, ตุสฺสติ, ตุสฺสนฺติ อิจฺจาทิ. 'Tusa' धातु प्रीति (संतुष्टि) के अर्थ में है, 'ya' प्रत्यय का पूर्वरूप होने पर 'tussati' (संतुष्ट होता है), 'tussanti' इत्यादि। ตถา สมุ อุปสเม, สมฺมติ, สมฺมนฺติ. उसी प्रकार 'samu' धातु उपशम (शान्त होने) के अर्थ में है; 'sammati' (शान्त होता है), 'sammanti'। กุป โกเป, กุปฺปติ, กุปฺปนฺติ. 'Kupa' धातु क्रोध के अर्थ में है; 'kuppati' (क्रुद्ध होता है), 'kuppanti'। ชนชนเน, ‘‘ชนาทีนมา ติมฺหิ จา’’ติ เอตฺถ ‘‘ชนาทีนมา’’ติ โยควิภาเคน ยมฺหิ ธาตฺวนฺตสฺส อากาโร. ชายติ, ชายนฺติ. ชายเต, ชายนฺเต. 'Jana' धातु उत्पन्न होने के अर्थ में है, 'janādīnamā timhi cā' यहाँ 'janādīnamā' इस योग-विभाग से 'ya' प्रत्यय होने पर धातु के अन्त्य वर्ण को आकार होता है। 'Jāyati' (उत्पन्न होता है), 'jāyanti'। 'Jāyate', 'jāyante'। กมฺเม [Pg.311] ชนียติ, ชนียนฺติ. ชายตุ. ชาเยยฺย. อชายิ, อชนิ. ชายิสฺสติ, ชนิสฺสติ. อชายิสฺส, อชนิสฺส อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में 'janīyati', 'janīyanti' रूप होते हैं। 'Jāyatu'। 'Jāyeyya'। 'Ajāyi', 'ajani'। 'Jāyissati', 'janissati'। 'Ajāyissa', 'ajanissa' इत्यादि। ทิวาทิคโณ. दिवादि गण। สฺวาทิคณ स्वादि गण। สุ สวเณ, ปุเร วิย วิภตฺตุปฺปตฺติ. 'Su' धातु सुनने के अर्थ में है, पहले की तरह विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। ๕๑๒. สฺวาทิโต ณุณาอุณา จ. ५१२. स्वादि गण की धातुओं से 'ṇu', 'ṇā' और 'uṇā' प्रत्यय होते हैं। สุอิจฺเจวมาทิโต ธาตุคณโต ณุ ณาอุณาอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ กตฺตริ วิหิเตสุ วิภตฺติปฺปจฺจเยสุ. ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ เอตฺถ จคฺคหเณน ณุปฺปจฺจยสฺส วุทฺธิ. ตตฺเถวานุวตฺติตวาคฺคหเณน สฺวาทีนํ ณุณาทีสุ น วุทฺธิ. 'Su' इत्यादि धातु गणों से कर्तृवाच्य में विहित विभक्ति प्रत्ययों के परे होने पर 'ṇu', 'ṇā' और 'uṇā' ये प्रत्यय होते हैं। 'Aññesu cā' यहाँ 'ca' के ग्रहण से 'ṇu' प्रत्यय की वृद्धि होती है। वहीं अनुवृत्त 'vā' के ग्रहण से स्वादि गण की धातुओं में 'ṇu', 'ṇā' आदि प्रत्ययों के होने पर वृद्धि नहीं होती। ธมฺมํ สุโณติ, สรโลปาทิ, สุณนฺติ. สุโณสิ, สุโณถ. สุโณมิ, สุโณม. ณาปจฺจเย สุณาติ, สุณนฺติ. สุณาสิ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา รสฺสตฺตํ, สุณสิ, สุณาถ, สุณถ. สุณามิ, สุณาม. 'Dhammaṃ suṇoti' (धर्म सुनता है), स्वर-लोप आदि होकर 'suṇanti'। 'Suṇosi', 'suṇotha'। 'Suṇomi', 'suṇoma'। 'Ṇā' प्रत्यय होने पर 'suṇāti', 'suṇanti'। 'Suṇāsi', 'kvaci dhātū' इत्यादि से ह्रस्व होने पर 'suṇasi', 'suṇātha', 'suṇatha'। 'Suṇāmi', 'suṇāma'। กมฺเม ยปฺปจฺจเย ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ทีโฆ, สูยเต, สูยนฺเต. สูยติ, สูยนฺติ. ทฺวิตฺเต รสฺสตฺตํ, สุยฺยติ, สุยฺยนฺติ. สูยฺยติ, สูยฺยนฺติ วา. कर्मवाच्य में 'ya' प्रत्यय होने पर 'kvaci dhātū' इत्यादि से दीर्घ होकर 'sūyate', 'sūyante'। 'Sūyati', 'sūyanti'। द्वित्व होने पर ह्रस्व होकर 'suyyati', 'suyyanti' अथवा 'sūyyati', 'sūyyanti'। สุโณตุ, สุณนฺตุ. สุโณหิ, สุโณถ. สุโณมิ, สุโณม. สุณาตุ, สุณนฺตุ. สุณ, สุณาหิ, สุณาถ. สุณามิ, สุณาม. สุณตํ, สุณนฺตํ[Pg.312]. สุณสฺสุ, สุณวฺโห. สุเณ, สุณามเส. กมฺเม สูยตํ, สูยนฺตํ. สูยตุ, สูยนฺตุ. वह सुनता है, वे सुनते हैं। तुम सुनो, तुम सब सुनो। मैं सुनता हूँ, हम सुनते हैं। वह सुने, वे सुनें। तुम सुनो, तुम सब सुनो। मैं सुनूँ, हम सुनें। वह सुना जाए, वे सुने जाएँ। तुम सुनो, तुम सब सुनो। मैं सुनूँ, हम सब सुनें। कर्मवाच्य में—वह सुना जाए, वे सुने जाएँ। वह सुने, वे सुनें। สุเณ, สุเณยฺย, สุเณยฺยุํ. สุเณยฺยาสิ, สุเณยฺยาถ. สุเณยฺยามิ, สุเณยฺยาม. สุเณถ, สุเณรํ. สุเณโถ, สุเณยฺยาวฺโห. สุเณยฺยํ, สุเณยฺยามฺเห. สูเยถ, สูเยยฺย. वह सुने, वह सुने, वे सुनें। तुम सुनो, तुम सब सुनो। मैं सुनूँ, हम सुनें। वे सुनें, वे सुनें। तुम सुनो, तुम सब सुनो। मैं सुनूँ, हम सब सुनें। वह सुना जाए, वह सुने। อสุณิ, สุณิ, อสุณึสุ, สุณึสุ. อสุณิ, อสุณิตฺถ. อสุณึ, สุณึ, อสุณิมฺห, สุณิมฺห. อสุณิตฺถ, สุณิตฺถ. ณาปจฺจยโลโป, วุทฺธิ, สสฺส ทฺวิภาโว, สาคโม, อสฺโสสิ, อสฺโสสึสุ, ปจฺจสฺโสสุํ. อสฺโสสิ, อสฺโสสิตฺถ. อสฺโสสึ, อสฺโสสิมฺห, อสฺโสสิมฺหา วา, อสฺโสสิตฺถ. อสูยิตฺถ, อสฺสูยิ. उसने सुना, उसने सुना, उन्होंने सुना, उन्होंने सुना। उसने सुना, तुम सबने सुना। मैंने सुना, मैंने सुना, हमने सुना, हमने सुना। तुम सबने सुना, तुम सबने सुना। 'णा' प्रत्यय का लोप, वृद्धि, 'स' का द्वित्व, 'स' का आगम होने पर—उसने सुना (अस्सोसि), उन्होंने सुना (अस्सोसिंसु), उन्होंने सुना (पच्चस्सोसुं)। उसने सुना, तुम सबने सुना। मैंने सुना, हमने सुना, अथवा हमने सुना, तुम सबने सुना। वह सुना गया, उसने सुना। สรโลปาทิ, สุณิสฺสติ, สุณิสฺสนฺติ. สุณิสฺสสิ, สุณิสฺสถ. สุณิสฺสามิ, สุณิสฺสาม. สุณิสฺสเต, สุณิสฺสนฺเต. สุณิสฺสเส, สุณิสฺสวฺเห. สุณิสฺสํ, สุณิสฺสามฺเห. ณาปจฺจยโลโป, วุทฺธิ, โสสฺสติ, โสสฺสนฺติ. โสสฺสสิ, โสสฺสถ. โสสฺสามิ, โสสฺสาม. โสสฺสเต. สูยิสฺสเต, สูยิสฺสติ. อสุณิสฺส. อสูยิสฺส อิจฺจาทิ. स्वर-लोप आदि होने पर—वह सुनेगा, वे सुनेंगे। तुम सुनोगे, तुम सब सुनोगे। मैं सुनूँगा, हम सुनेंगे। वह सुना जाएगा, वे सुने जाएँगे। तुम सुने जाओगे, तुम सब सुने जाओगे। मैं सुना जाऊँगा, हम सुने जाएँगे। 'णा' प्रत्यय का लोप और वृद्धि होने पर—सोस्सति, सोस्सन्ति। तुम सुनोगे, तुम सब सुनोगे। मैं सुनूँगा, हम सुनेंगे। वह सुना जाएगा। वह सुना जाएगा, वह सुनेगा। यदि वह सुनता। यदि वह सुना जाता इत्यादि। หิ คติมฺหิ, ปปุพฺโพ ณาปจฺจโย, ปหิณาติ, ปหิณติ วา, ปหิณนฺติ. ปหิณาตุ, ปหิณนฺตุ. ปหิเณยฺย. ปหิณิ, ทูตํ ปาเหสิ. ปหิณิสฺสติ. ปหิณิสฺส อิจฺจาทิ. 'हि' गति (जाने) के अर्थ में है, 'प' उपसर्ग और 'णा' प्रत्यय लगने पर—पहिणाति (वह भेजता है), अथवा पहिणति, पहिणन्ति। वह भेजे, वे भेजें। वह भेजे (विधिलिंग)। उसने भेजा, दूत भेजा। वह भेजेगा। यदि वह भेजता इत्यादि। วุ สํวรเณ, อาวุณาติ, อาวุณนฺติ อิจฺจาทิ. 'वु' संवरण (ढकने/घेरने) के अर्थ में है—आवुणाति (वह पिरोता है/घेरता है), आवुणन्ति इत्यादि। มิ ปกฺเขเป, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ณสฺส นตฺตํ, มิโนติ, มินนฺติ อิจฺจาทิ. 'मि' प्रक्षेप (डालने) के अर्थ में है, 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'ण' को 'न' होने पर—मिनोति (वह डालता है/मापता है), मिनन्ति इत्यादि। อป [Pg.313] ปาปุณเน, ปปุพฺโพ สรโลเป ‘‘ทีฆ’’นฺติ ทีโฆ, อุณาปจฺจโย, สมฺปตฺตึ ปาปุณาติ, ปาปุณนฺติ. ปาปุณาสิ, ปาปุณาถ. ปาปุณามิ, ปาปุณาม. 'अप' प्रापण (प्राप्त करने) के अर्थ में है, 'प' उपसर्ग होने पर स्वर-लोप और 'दीघं' सूत्र से दीर्घ होने पर, 'उणा' प्रत्यय लगकर—सम्पत्ति प्राप्त करता है (पापुणाति), वे प्राप्त करते हैं। तुम प्राप्त करते हो, तुम सब प्राप्त करते हो। मैं प्राप्त करता हूँ, हम प्राप्त करते हैं। กมฺเม ปาปียติ, ปาปียนฺติ. ตถา ปาปุณาตุ. ปาปียตุ. ปาปุเณ, ปาปุเณยฺย. ปาปีเยยฺย. ปาปุณิ, ปาปุณึสุ. ปาปียิ. ปาปุณิสฺสติ. ปาปียิสฺสติ. ปาปุณิสฺส. ปาปียิสฺส อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में—प्राप्त किया जाता है (पापीयति), प्राप्त किए जाते हैं। वैसे ही—वह प्राप्त करे। वह प्राप्त किया जाए। वह प्राप्त करे (विधिलिंग)। वह प्राप्त किया जाए। उसने प्राप्त किया, उन्होंने प्राप्त किया। वह प्राप्त किया गया। वह प्राप्त करेगा। वह प्राप्त किया जाएगा। यदि वह प्राप्त करता। यदि वह प्राप्त किया जाता इत्यादि। สก สตฺติมฺหิ, ทฺวิภาโว, สกฺกุณาติ, สกฺกุณนฺติ. ภาเว ‘‘ปุพฺพรูปญฺจา’’ติ ปุพฺพรูปตฺตํ, สกฺกเต ตยา, สกฺกติ วา, สกฺกุณาตุ. สกฺกุเณยฺย. ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา สกนฺตสฺส ขาเทโส อชฺชตนาทิมฺหิ, อสกฺขิ, สกฺขิ, อสกฺขึสุ, สกฺขึสุ. สกฺขิสฺสติ, สกฺขิสฺสนฺติ. อสกฺขิสฺส, อสกฺขิสฺสํสุ อิจฺจาทิ. 'सक' शक्ति (सामर्थ्य) के अर्थ में है, द्वित्व होने पर—सक्कुणाति (वह समर्थ है), सक्कुणन्ति। भाववाच्य में 'पुब्बरूपञ्च' सूत्र से पूर्वरूप होने पर—तुझसे हो सकता है (सक्कते तया), अथवा सक्कति। वह समर्थ हो। वह समर्थ हो सके। 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'सक' के अन्त को 'ख' आदेश होने पर अद्यतनी (भूतकाल) आदि में—वह समर्थ हुआ (असक्खि), सक्खि, वे समर्थ हुए। वह समर्थ होगा, वे समर्थ होंगे। यदि वह समर्थ होता, यदि वे समर्थ होते इत्यादि। สฺวาทิคโณ. स्वादि गण समाप्त। กิยาทิคณ क्रियादि गण। กี ทพฺพวินิมเย, วิปุพฺโพ ทฺวิตฺตํ, ปุเร วิย วิภตฺตุปฺปตฺติ. 'की' द्रव्य-विनिमय (खरीदने-बेचने) के अर्थ में है, 'वि' उपसर्ग होने पर द्वित्व होता है, पहले की तरह विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। ๕๑๓. กิยาทิโต นา. ५१३. क्रियादि गण की धातुओं से 'ना' प्रत्यय होता है। กีอิจฺเจว มาทิโต ธาตุคณโต นาปจฺจโย โหติ กตฺตริ. นาปรตฺตา น วุทฺธิ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา กิยาทีนํ นามฺหิ รสฺสตฺตํ, กีโต นาปจฺจยนการสฺส ณตฺตญฺจ. 'की' आदि धातुओं के समूह से कर्ता अर्थ में 'ना' प्रत्यय होता है। 'ना' प्रत्यय परे होने पर वृद्धि नहीं होती, 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'ना' परे होने पर क्रियादि धातुओं को ह्रस्व होता है, और 'की' से परे 'ना' प्रत्यय के 'न' को 'ण' होता है। ภณฺฑํ วิกฺกิณาติ, วิกฺกิณนฺติ. วิกฺกียติ, วิกฺกียนฺติ. วิกฺกิณาตุ, วิกฺกิณนฺตุ. วิกฺกียตุ, วิกฺกียนฺตุ. วิกฺกิเณ, วิกฺกิเณยฺย[Pg.314]. วิกฺกีเยยฺย, วิกฺกีเยยฺยุํ. อวิกฺกิณิ, วิกฺกิณิ. วิกฺกียิตฺถ, วิกฺกียิ. วิกฺกิณิสฺสติ, วิกฺกิณิสฺสนฺติ. วิกฺกียิสฺสติ, วิกฺกียิสฺสนฺติ. อวิกฺกิณิสฺส, อวิกฺกิณิสฺสํสุ. วิกฺกียิสฺส, วิกฺกียิสฺสํสุ อิจฺจาทิ. वह वस्तु बेचता है (विक्किणाति), वे बेचते हैं। बेची जाती है (विक्कीयति), बेची जाती हैं। वह बेचे, वे बेचें। वह बेची जाए, वे बेची जाएँ। वह बेचे (विधिलिंग)। वह बेची जाए, वे बेची जाएँ। उसने बेचा, उसने बेचा। वह बेची गई, वह बेची गई। वह बेचेगा, वे बेचेंगे। वह बेची जाएगी, वे बेची जाएँगी। यदि वह बेचता, यदि वे बेचते। यदि वह बेची जाती, यदि वे बेची जातीं इत्यादि। ชิ ชเย, กิเลเส ชินาติ, ชินนฺติ. ชียติ, ชียนฺติ. เอวํ ชินาตุ. ชียตุ. ชิเนยฺย. ชีเยยฺย. อชินิ, ชินิ, อชินึสุ, ชินึสุ. อเชสิ, อเชสุํ. อชินิตฺถ. อชียิตฺถ, อชียิ. ชินิสฺสติ, ชินิสฺสนฺติ. วิเชสฺสติ, วิเชสฺสนฺติ. ชียิสฺสติ, ชียิสฺสนฺติ. อชินิสฺส. อชียิสฺส อิจฺจาทิ. 'जि' जय (जीतने) के अर्थ में है, क्लेशों को जीतता है (जिनाति), वे जीतते हैं। जीता जाता है (जीयति), वे जीते जाते हैं। इसी प्रकार—वह जीते। वह जीता जाए। वह जीते (विधिलिंग)। वह जीता जाए। उसने जीता, जीता, उन्होंने जीता, उन्होंने जीता। उसने जीता (अजेसि), उन्होंने जीता। उसने जीता। वह जीता गया, वह जीता गया। वह जीतेगा, वे जीतेंगे। वह विशेष रूप से जीतेगा, वे जीतेंगे। वह जीता जाएगा, वे जीते जाएँगे। यदि वह जीतता। यदि वह जीता जाता इत्यादि। ตถา จิ จเย, จินาติ, จินนฺติ อิจฺจาทิ. वैसे ही 'चि' चयन (इकट्ठा करने) के अर्थ में है—चिनाति (वह चुनता है), चिनन्ति इत्यादि। ญา อวโพธเน นาปจฺจโย. 'ञा' अवबोधन (जानने) के अर्थ में 'ना' प्रत्यय होता है। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' (विकल्प से) का अधिकार आता है। ๕๑๔. ญาสฺส ชา ชํ นา. ५१४. 'ञा' को 'जा', 'जं' और 'ना' आदेश होते हैं। ญาอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส ชา ชํ นาอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา. 'ञा' इस धातु को 'जा', 'जं' और 'ना' ये आदेश विकल्प से होते हैं। ชาเทโส นามฺหิ ชํ ญามฺหิ, นาภาโว ติมฺหิ เอวิธ; ววตฺถิตวิภาสตฺถ-วาสทฺทสฺสานุวตฺตนา; ธมฺมํ วิชานาติ, วินายติ วา, วิชานนฺติ. 'ना' प्रत्यय परे होने पर 'जा' आदेश, 'ञा' प्रत्यय परे होने पर 'जं' आदेश, और 'ति' प्रत्यय परे होने पर यहाँ 'ना' का अभाव होता है; यह 'वा' शब्द की अनुवृत्ति व्यवस्थित विभाषा के लिए है। वह धर्म को जानता है (विजानाति), अथवा विनायति, वे जानते हैं। กมฺเม วิญฺญายติ, วิญฺญายนฺติ. อิวณฺณาคเม ปุพฺพโลโป, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา เอกาโร, ทฺวิตฺตญฺจ, เญยฺยติ, เญยฺยนฺติ. วิชานาตุ, วิชานนฺตุ, รสฺสตฺตํ. วิชาน, วิชานาหิ, วิชานาถ. วิชานามิ, วิชานาม. วิชานตํ, วิชานนฺตํ. วิชานสฺสุ. วิญฺญายตุ, วิญฺญายนฺตุ. कर्मवाच्य में—जाना जाता है (विञ्ञायति), जाने जाते हैं। 'इ' वर्ण का आगम होने पर पूर्व का लोप, 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'ए' कार और द्वित्व होने पर—ञेय्यति, ञेय्यन्ति। वह जाने, वे जानें, ह्रस्व होने पर। तुम जानो, तुम जानो, तुम सब जानो। मैं जानूँ, हम जानें। वह जाना जाए, वे जाने जाएँ। तुम जानो। वह जाना जाए, वे जाने जाएँ। ๕๑๕. เอยฺยสฺส [Pg.315] ญาโต อิยา ญา วา. ५१५. 'ञा' धातु से परे 'एय्य' विभक्ति को विकल्प से 'इया' और 'ञा' आदेश होते हैं। เอยฺยสฺส วิภตฺติสฺส ญาอิจฺเจตาย ธาตุยา ปรสฺส อิยา ญาอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา, สรโลปาทิ. วิชานิยา. 'ञा' इस धातु से परे 'एय्य' विभक्ति को विकल्प से 'इया' और 'ञा' ये आदेश होते हैं, स्वर-लोप आदि होने पर—विजानिया (वह जाने)। ญาเทเส ญาสฺส ชํอาเทโส. 'ञा' आदेश होने पर 'ञा' को 'जं' आदेश होता है। ‘‘ญาโต, วา’’ติ จ วตฺตเต. 'ञातो' और 'वा' की अनुवृत्ति आती है। ๕๑๖. นาสฺส โลโป ยการตฺตํ. ५१६. 'ना' का लोप और 'य' कार होना। ญาอิจฺเจตาย ธาตุยา ปรสฺส นาปจฺจยสฺส โลโป โหติ วา, ยการตฺตญฺจ, ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. เตน – 'ञा' इस धातु से परे 'ना' प्रत्यय का विकल्प से लोप होता है और 'य' कार होता है, यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है। उससे— ญามฺหิ นิจฺจญฺจ นาโลโป,วิภาสาชฺชตนาทิสุ; อญฺญตฺถ น จ โหตายํ,นาโต ติมฺหิ ยการตา. 'Ñā' धातु में 'nā' प्रत्यय का लोप नित्य होता है, अद्यतनी (लुङ् लकार) आदि में विकल्प से होता है; अन्यत्र यह लोप नहीं होता, और 'ti' प्रत्यय होने पर 'nā' के आकार को यकार नहीं होता। นิคฺคหีตสฺส วคฺคนฺตตฺตํ, วิชญฺญา, วิชาเนยฺย, วิชาเนยฺยุํ. วิชาเนยฺยาสิ, วิชาเนยฺยาถ. วิชาเนยฺยามิ, วิชาเนยฺยาม, วิชาเนมุ วา. วิชาเนถ. วิญฺญาเยยฺย, วิญฺญาเยยฺยุํ. निगृहीत (अनुस्वार) को वर्गान्त (ञकार) आदेश होने पर; 'vijaññā', 'vijāneyya' (जानना चाहिए), 'vijāneyyuṃ'। 'Vijāneyyāsi', 'vijāneyyātha'। 'Vijāneyyāmi', 'vijāneyyāma' अथवा 'vijānemu'। 'Vijānetha'। 'Viññāyeyya', 'viññāyeyyuṃ'। สมชานิ, สญฺชานิ, สญฺชานึสุ. นาโลเป อญฺญาสิ, อญฺญาสุํ. วิชานิตฺถ. วิญฺญายิตฺถ. ปญฺญายิ, ปญฺญายึสุ. วิชานิสฺสติ, วิชานิสฺสนฺติ. ญสฺสติ, ญสฺสนฺติ. วิญฺญายิสฺสเต, วิญฺญายิสฺสนฺเต. ปญฺญายิสฺสติ, ปญฺญายิสฺสนฺติ. ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา สฺสสฺส [Pg.316] หิ จ, ปญฺญายิหิติ, ปญฺญายิหินฺติ. อชานิสฺส. อชานิสฺสถ. อญฺญายิสฺสถ, อญฺญายิสฺส อิจฺจาทิ. 'Samajāni', 'sañjāni', 'sañjāniṃsu'। 'Nā' का लोप होने पर 'aññāsi', 'aññāsuṃ'। 'Vijānittha'। 'Viññāyittha'। 'Paññāyi', 'paññāyiṃsu'। 'Vijānissati', 'vijānissanti'। 'Ñassati', 'ñassanti'। 'Viññāyissate', 'viññāyissante'। 'Paññāyissati', 'paññāyissanti'। 'Kvaci dhātū' इत्यादि से 'ssa' को 'hi' भी होता है, 'paññāyihiti', 'paññāyihinti'। 'Ajānissa'। 'Ajānissatha'। 'Aññāyissatha', 'aññāyissa' इत्यादि। มา มาเน, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา มานฺตสฺส อิกาโร, มินาติ, มินนฺติ. กมฺเม มียติ, มียนฺติ อิจฺจาทิ. 'Mā' धातु मापने के अर्थ में है, 'kvaci dhātū' इत्यादि से धातु के अन्त्य वर्ण को इकार होता है; 'mināti' (मापता है), 'minanti'। कर्मवाच्य में 'mīyati', 'mīyanti' इत्यादि। ลู เฉทเน, นามฺหิ รสฺสตฺตํ, ลุนาติ, ลุนนฺติ. ลูยติ, ลูยนฺติ อิจฺจาทิ. 'Lū' धातु छेदन (काटने) के अर्थ में है, 'nā' प्रत्यय होने पर ह्रस्व होकर 'lunāti' (काटता है), 'lunanti' रूप बनते हैं। 'Lūyati', 'lūyanti' इत्यादि। ธู กมฺปเน, ธุนาติ, ธุนนฺติ. ธูยติ, ธูยนฺติ อิจฺจาทิ. 'Dhū' धातु कम्पन (हिलाने) के अर्थ में है, 'dhunāti' (हिलाता है), 'dhunanti' रूप बनते हैं। 'Dhūyati', 'dhūyanti' इत्यादि। คห อุปาทาเน, นามฺหิ สมฺปตฺเต – 'Gaha' धातु ग्रहण करने के अर्थ में है, 'nā' प्रत्यय प्राप्त होने पर - ๕๑๗. คหาทิโตปฺปณฺหา. ५१७. 'Gaha' आदि धातुओं से 'ppa' और 'ṇhā' प्रत्यय होते हैं। คหอิจฺเจวมาทิโต ธาตุโต ปฺป ณฺหาอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ กตฺตริ. อาทิสทฺโทยํ ปกาโร. 'गह' (gaha) आदि धातुओं से 'प्प' (ppa) और 'ण्हा' (ṇhā) प्रत्यय कर्ता अर्थ में होते हैं। यहाँ 'आदि' शब्द प्रकार (तरह) के अर्थ में है। ‘‘คหสฺสา’’ติ วตฺตเต. 'गहस्स' (gahassa) की अनुवृत्ति होती है। ๕๑๘. หโลโป ณฺหามฺหิ. ५१८. 'ण्हा' (ṇhā) प्रत्यय परे होने पर 'ह' का लोप होता है। คหอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส หการสฺส โลโป โหติ ณฺหามฺหิ ปจฺจเย ปเร. สีลํ คณฺหาติ, รสฺสตฺเต คณฺหติ วา, คณฺหนฺติ. คณฺหาสิ, คณฺหาถ. คณฺหามิ, คณฺหาม. 'गह' इस धातु के 'ह' कार का लोप होता है 'ण्हा' प्रत्यय परे होने पर। वह शील ग्रहण करता है (gaṇhāti), ह्रस्व होने पर 'gaṇhati' अथवा 'gaṇhanti'। तुम ग्रहण करते हो (gaṇhāsi), तुम सब ग्रहण करते हो (gaṇhātha)। मैं ग्रहण करता हूँ (gaṇhāmi), हम सब ग्रहण करते हैं (gaṇhāma)। กมฺเม ‘‘เย’’ติ วตฺตมาเน ‘‘หวิปริยโย โล วา’’ติ หการสฺส ยกาเรน วิปริยโย โหติ. คยฺหติ, คยฺหนฺติ. कर्मवाच्य में 'य' (ye) के वर्तमान होने पर 'हविपरिययो लो वा' सूत्र से 'ह' कार का 'य' कार के साथ विपर्यय (स्थान परिवर्तन) होता है। 'gayhati', 'gayhanti'। คณฺหาตุ, คณฺหนฺตุ. คณฺห, คณฺหาหิ, คณฺหาถ. คณฺหามิ, คณฺหาม. คณฺหตํ, คณฺหนฺตํ. คยฺหตํ, คยฺหนฺตํ. คยฺหตุ, คยฺหนฺตุ. คณฺเห, คณฺเหยฺย, คณฺเหยฺยุํ. คยฺเหยฺย, คยฺเหยฺยุํ. อคฺคณฺหิ, คณฺหิ, อคฺคณฺหึสุ, คณฺหึสุ. (आज्ञार्थक/लोट्) gaṇhātu, gaṇhantu। gaṇha, gaṇhāhi, gaṇhātha। gaṇhāmi, gaṇhāma। (आत्मनेपद) gaṇhataṃ, gaṇhantaṃ। (कर्मवाच्य) gayhataṃ, gayhantaṃ। gayhatu, gayhantu। (विध्यर्थक/सत्तमी) gaṇhe, gaṇheyya, gaṇheyyuṃ। gayheyya, gayheyyuṃ। (अतीत/अज्जतनी) aggaṇhi, gaṇhi, aggaṇhiṃsu, gaṇhiṃsu। ยทา [Pg.317] ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อสพฺพธาตุเก วิกรณปจฺจยสฺส โลโป, อิการาคมสฺส เอกาโร จ, ตทา สาคโม. जब 'क्वचि धातु' आदि (सूत्र) से असर्वधातुक (प्रत्यय) में विकरण प्रत्यय का लोप होता है, और 'इ' कार आगम का 'ए' कार हो जाता है, तब 'स' का आगम होता है। อคฺคเหสิ, อคฺคเหสุํ. อคฺคหิ, อคฺคหึสุ, อคฺคหุํ. อคฺคยฺหิตฺถ, อคฺคยฺหิ. คณฺหิสฺสติ, คณฺหิสฺสนฺติ. คเหสฺสติ, คเหสฺสนฺติ. คหียิสฺสเต, คหียิสฺสนฺเต. คยฺหิสฺสติ, คยฺหิสฺสนฺติ. อคฺคณฺหิสฺส, อคฺคหิสฺส. อคฺคณฺหิสฺสถ, อคฺคหิสฺสถ. อคฺคยฺหิสฺสถ, อคฺคยฺหิสฺส อิจฺจาทิ. aggahesi, aggahesuṃ। aggahi, aggahiṃsu, aggahuṃ। aggayhittha, aggayhi। (भविष्य/भविस्सती) gaṇhissati, gaṇhissanti। gahessati, gahessanti। gahīyissate, gahīyissante। gayhissati, gayhissanti। (कालातिपत्ति) aggaṇhissa, aggahissa। aggaṇhissatha, aggahissatha। aggayhissatha, aggayhissa इत्यादि। ปฺปปฺปจฺจเย – 'प्प' (ppa) प्रत्यय होने पर - ๕๑๙. คหสฺส เฆ ปฺเป. ५१९. 'प्प' (ppa) प्रत्यय परे होने पर 'गह' (gaha) को 'घे' (ghe) आदेश होता है। คหอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส สพฺพสฺส เฆอาเทโส โหติ ปฺปปฺปจฺจเย ปเร. เฆปฺปติ อิจฺจาทิ. 'गह' इस संपूर्ण धातु के स्थान पर 'घे' आदेश होता है 'प्प' प्रत्यय परे होने पर। 'gheppati' इत्यादि। กิยาทิคโณ. क्र्यादि गण (समाप्त)। ตนาทิคณ तनादि गण। ตนุ วิตฺถาเร, ปุเร วิย ธาตฺวนฺตโลปวิภตฺตุปฺปตฺติโย. 'तनु' (tanu) विस्तार के अर्थ में है, पहले की तरह ही धातु के अन्त्य का लोप और विभक्ति की उत्पत्ति होती है। ๕๒๐. ตนาทิโต โอยิรา. ५२०. 'तनु' आदि धातु गण से 'ओ' (o) और 'यिर' (yira) प्रत्यय कर्ता अर्थ में होते हैं। ตนุอิจฺเจวมาทิโต ธาตุคณโต โอยิรอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ กตฺตริ. กรโตวายํ ยิรปฺปจฺจโย. 'तनु' आदि धातु गण से 'ओ' और 'यिरा' ये प्रत्यय कर्ता अर्थ में होते हैं। 'कर' (kara) धातु से यह 'यिर' प्रत्यय होता है। ธมฺมํ ตโนติ, ตโนนฺติ. ตโนสิ, ตโนถ. ตโนมิ, ตโนม. वह धर्म का विस्तार करता है (tanoti), वे विस्तार करते हैं (tanonti)। तुम विस्तार करते हो (tanosi), तुम सब विस्तार करते हो (tanotha)। मैं विस्तार करता हूँ (tanomi), हम सब विस्तार करते हैं (tanoma)। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' (विकल्प से) की अनुवृत्ति होती है। ๕๒๑. อุตฺตโมกาโร[Pg.318]. ५२१. उत्तम (पुरुष) में 'ओ' कार होता है। ตนาทิโต โอการปฺปจฺจโย อุตฺตมาปชฺชเต วา. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. เอตฺถ จ วิกรณการิยวิธิปฺปกรณโต ‘‘โอกาโร’’ติ โอวิกรณํ คยฺหติ. ตนุเต, พหุวจเน ‘‘ยวการา จา’’ติ วตฺตํ, ตนฺวนฺเต. ตนุเส, ตนุวฺเห. ตนฺเว, ตนุมฺเห. तनादि से 'ओ' कार प्रत्यय विकल्प से उत्तम (भाव) को प्राप्त होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। और यहाँ विकरण कार्य के विधान के प्रकरण से 'ओकार' से 'ओ' विकरण लिया जाता है। tanute, बहुवचन में 'यवकारा च' से 'tanvante'। tanuse, tanuvhe। tanve, tanumhe। กมฺเม ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ตนุธาตฺวนฺตสฺส ยมฺหิ อากาโร, ปตายเต, ปตายนฺเต. ปตายติ, ปตายนฺติ. อาการาภาเว ปตญฺญติ, ปตญฺญนฺติ. ตโนตุ, ตโนนฺตุ. ตเนยฺย, ตเนยฺยุํ. อตนิ, อตนึสุ. อตายิตฺถ, ปตายิ. ตนิสฺสติ, ตนิสฺสนฺติ. ปตายิสฺสติ, ปตายิสฺสนฺติ. อตนิสฺส. ปตายิสฺส อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में 'क्वचि धातु' आदि (सूत्र) से 'तनु' धातु के अन्त्य को 'य' परे होने पर 'आ' कार होता है - patāyate, patāyante। patāyati, patāyanti। 'आ' कार के अभाव में pataññati, pataññanti। tanotu, tanontu। taneyya, taneyyuṃ। atani, ataniṃsu। atāyittha, patāyi। tanissati, tanissanti। patāyissati, patāyissanti। atanissa, patāyissa इत्यादि। กร กรเณ, ปุญฺญํ กโรติ. 'कर' (kara) करने के अर्थ में है, वह पुण्य करता है (karoti)। พหุวจเน ‘‘วา’’ติ วตฺตมาเน, ‘‘อุตฺตโมกาโร’’ติ อุตฺเต กเต – बहुवचन में 'वा' की अनुवृत्ति होने पर, 'उत्तमोंकारो' सूत्र से 'उ' आदेश होने पर - ‘‘วา, อุตฺต’’นฺติ จ วตฺตเต. 'वा' और 'उत्त' की अनुवृत्ति होती है। ๕๒๒. กรสฺสากาโร จ. ५२२. और 'कर' धातु के अकार को (भी)। กรอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส อกาโร อุตฺตมาปชฺชเต วา. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, ‘‘ยวการา จา’’ติ อปทนฺตสฺส ปรอุการสฺส วกาโร, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ธาตุรการสฺส วการสฺมึ โลโป, วการสฺส ทฺวิตฺเต ตสฺส ‘‘พฺโพ วฺวสฺสา’’ติ พการทฺวยํ, กุพฺพนฺติ, กโรนฺติ. กโรสิ, กโรถ. กโรมิ, กโรม. ตถา กุรุเต, กุพฺพนฺเต. กุรุเส, กุรุวฺเห. กุพฺเพ, กุรุมฺเห. ยิรปฺปจฺจเย รการโลโป, กยิรติ, กยิรนฺติ อิจฺจาทิ. 'कर' इस धातु के अकार को विकल्प से 'उ' आदेश होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है। 'यवकारा चा' सूत्र से अपदान्त पर-उकार को 'व'कार होता है, 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से धातु के अकार का 'व'कार के परे होने पर लोप होता है, 'व'कार के द्वित्व होने पर 'ब्बो व्वस्स' सूत्र से दो 'ब'कार होते हैं - कुब्बन्ति, करोन्ति। करोसि, करोथ। करोमि, करोमा। वैसे ही कुरुते, कुब्बन्ते। कुरुसे, कुरुव्वे। कुब्बे, कुरुम्हे। यिर प्रत्यय होने पर रकार का लोप होता है - कयिरति, कयिरन्ति इत्यादि। กมฺเม [Pg.319] ยปฺปจฺจเย ‘‘อิวณฺณาคโม วา’’ติ อีการาคโม, ยการสฺส ทฺวิตฺตํ, กรียฺยเต กโฏ เตน, กรียฺยติ, กรียฺยนฺติ. กรียติ, กรียนฺติ วา. อีการาภาเว ‘‘ตสฺส จวคฺค’’อิจฺจาทินา สธาตฺวนฺตสฺส ยการตฺตํ, ทฺวิตฺตญฺจ. กยฺยติ, กยฺยนฺติ. อิการาคเม ‘‘กฺวจิ ธาตุ’’อิจฺจาทิสุตฺเต จคฺคหเณน รยานํ วิปริยโย, กยิรติ กโฏ เตน, กยิรนฺติ อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में य प्रत्यय होने पर 'इवण्णागमो वा' सूत्र से ईकार का आगम होता है, यकार का द्वित्व होता है - 'करीय्यते कटो तेन' (उसके द्वारा चटाई बनाई जाती है), करीय्यति, करीय्यन्ति। अथवा करीयति, करीयन्ति। ईकार के अभाव में 'तस्स चवग्ग' इत्यादि सूत्र से धातु के अन्त्य सहित यकार को यकारत्व और द्वित्व होता है - कय्यति, कय्यन्ति। इकार का आगम होने पर 'क्वचि धातु' इत्यादि सूत्र में 'च' ग्रहण से र और य का विपर्यय (स्थान परिवर्तन) होता है - कयिरति कटो तेन, कयिरन्ति इत्यादि। ตถา กุสลํ กโรตุ, กุรุตุ วา, กุพฺพนฺตุ, กโรนฺตุ. กโรหิ, กโรถ. กโรมิ, กโรม. กุรุตํ, กุพฺพนฺตํ. กุรุสฺสุ, กุรสฺสุ วา, กุรุวฺโห. กุพฺเพ, กุพฺพามเส. वैसे ही कुसलं करोतु, कुरुतु वा, कुब्बन्तु, करोन्तु। करोहि, करोथ। करोमि, करोमा। कुरुतं, कुब्बन्तं। कुरुस्सु, कुरस्सु वा, कुरुव्वो। कुब्बे, कुब्बामसे। กมฺเม กรียตุ, กรียนฺตุ, กยฺยตํ, กยิรตํ, กยิรตุ. कर्मवाच्य में करीयतु, करीयन्तु, कय्यतं, कयिरतं, कयिरतु। สตฺตมิยํ กเร, กเรยฺย, กเรยฺยุํ. กเรยฺยาสิ, กเรยฺยาถ. กเรยฺยามิ, กเรยฺยาม. อุตฺเต กุพฺเพ, กุพฺเพยฺย. सप्तमी (विधिलिङ्) में करे, करेय्य, करेय्युं। करेय्यासि, करेय्याथ। करेय्यामि, करेय्यामा। उत्व होने पर कुब्बे, कुब्बेय्य। ยิรปฺปจฺจเย – यिर प्रत्यय होने पर - ยิรโต อาตฺตเมยฺยสฺส, เอถาทิสฺเสยฺยุมาทิสุ; เอยฺยสทฺทสฺส โลโป จ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา. एथ आदि और एय्युं आदि के परे होने पर यिर प्रत्यय के एय्य को आत्व होता है; और 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से एय्य शब्द का लोप होता है। สรโลปาทิ, กยิรา, กยิรุํ. กยิราสิ, กยิราถ. กยิรามิ, กยิราม. อตฺตโนปเท กยิราถ ธีโร, กุพฺเพถ, กเรถ วา, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา กุสฺส กฺรุ จ, กฺรุพฺเพถ, กฺรุพฺเพรํ. กฺรุพฺเพโถ, กฺรุพฺเพยฺยาวฺโห. กฺรุพฺเพยฺยํ, กฺรุพฺเพยฺยามฺเห. กมฺเม กรีเยยฺย, กรีเยยฺยุํ. स्वर-लोप आदि होकर - कयिरा, कयिरुं। कयिरासि, कयिराथ। कयिरामि, कयिरामा। आत्मनेपद में कयिराथ धीरो, कुब्बेथ, करेथ वा। 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से 'क' को 'क्रु' आदेश भी होता है - क्रुब्बेथ, क्रुब्बेरं। क्रुब्बेथो, क्रुब्बेय्याव्वो। क्रुब्बेय्यं, क्रुब्बेय्याम्हे। कर्मवाच्य में करीयेय्य, करीयेय्युं। หิยฺยตฺตนิยํ [Pg.320] ‘‘กรสฺส กา’’ติ โยควิภาเคน กา โหติ, สรโลปาทิ. हिय्यत्तनी (अनद्यतन भूतकाल) में 'करस्स का' इस योग-विभाग से 'का' होता है, फिर स्वर-लोप आदि। อกา, อกรา, อกรู. อกโร, อกตฺถ, อกโรตฺถ. อกํ, อกรํ, อกมฺห, อกรมฺห. อกตฺถ. อกรึ, อกรมฺหเส. अका, अकरा, अकरू। अकरो, अकत्थ, अकरोत्थ। अकं, अकरं, अकम्हा, अकरम्हा। अकत्थ। अकरिं, अकरम्हसे। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๕๒๓. กรสฺส กาสตฺตมชฺชตนิมฺหิ. ५२३. अज्जतनी (सामान्य भूतकाल) में 'कर' धातु को 'कास' आदेश होता है। กร อิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส สพฺพสฺเสว กาสตฺตํ โหติ วา อชฺชตนิมฺหิ วิภตฺติมฺหิ ปเร. ‘‘กาสตฺต’’มิติ ภาวนิทฺเทเสน อญฺญสฺมาปิ ธาตุโต สาคโม. อถ วา ยทา กรสฺส กา โหติ, สตฺตญฺจาคโม อชฺชตนิมฺหิ วาติ อตฺโถ, ตทา ‘‘สตฺตมชฺชตนิมฺหี’’ติ โยควิภาเคน อญฺญสฺมาปิ ธาตุโต สาคโมปิ สิชฺฌติ, ‘‘โยควิภาคโต อิฏฺฐปฺปสิทฺธี’’ติ เยภุยฺเยน ทีฆโตว โหติ, ‘‘กรสฺส กา’’ติ โยควิภาเคน กาภาโว จ หิยฺยตฺตนิยํ สิทฺโธ โหติ. 'कर' इस धातु के सम्पूर्ण स्थान पर विकल्प से 'कास' आदेश होता है, अज्जतनी विभक्ति परे होने पर। 'कासत्तं' इस भाव-निर्देश से अन्य धातुओं से भी 'स' का आगम होता है। अथवा, जब 'कर' को 'का' होता है, तब अज्जतनी में विकल्प से 'स' का आगम होता है - यह अर्थ है। तब 'सत्तमज्जतनिम्हि' इस योग-विभाग से अन्य धातुओं से भी 'स' का आगम सिद्ध होता है। 'योग-विभाग से इष्ट की सिद्धि होती है' इस नियम से प्रायः दीर्घ ही होता है। 'करस्स का' इस योग-विभाग से 'का' का अभाव हिय्यत्तनी में सिद्ध होता है। อกาสิ, อกาสุํ. อกาสิ, อกาสิตฺถ. อกาสึ, อกาสิมฺห. อกาสิตฺถ. กาสตฺตาภาเว อกริ, กริ, อกรึสุ, กรึสุ, อกํสุ, อกรุํ. อกริ, อกริตฺถ. อกรึ, กรึ, อกริมฺห, กริมฺห. อกริตฺถ. อกรียิตฺถ, อกรียิ วา. अकासि, अकासुं। अकासि, अकासित्थ। अकासिं, अकासिम्हा। अकासित्थ। कास आदेश के अभाव में - अकरि, करि, अकरिंसु, करिंसु, अकंसु, अकरुं। अकरि, अकरित्थ। अकरिं, करिं, अकरिम्हा, करिम्हा। अकरित्थ। अकरीयित्थ, अकरीयि वा। ‘‘วา, โลโป, ภวิสฺสนฺติมฺหิ สฺสสฺส จา’’ติ จ วตฺตเต. 'वा', 'लोप' और 'भविस्सन्ती में स्स का' की अनुवृत्ति होती है। ๕๒๔. กรสฺส สปฺปจฺจยสฺส กาโห. ५२४. प्रत्यय सहित 'कर' धातु को 'काह' आदेश होता है। กรอิจฺเจตสฺส [Pg.321] ธาตุสฺส สปฺปจฺจยสฺส กาหาเทโส โหติ วา ภวิสฺสนฺติมฺหิ, สฺสสฺส จ โลโป โหติ. อธิกภูตสปฺปจฺจยคฺคหเณน วจมุจภุชาทิโต สฺสสฺส ขาเทโส, วส ฉิทิ ลภาทิโต ฉาเทโส จ โหติ. 'कर' इस धातु को प्रत्यय सहित विकल्प से 'काह' आदेश होता है भविष्यत् काल में, और 'स्स' का लोप होता है। सप्प्रत्यय के अधिक ग्रहण से वच, मुच, भुज आदि धातुओं से 'स्स' को 'ख' आदेश, और वस, छिदि, लभ आदि से 'छ' आदेश होता है। กาหติ, กาหนฺติ. กาหสิ, กาหถ. กาหามิ, กาหาม. อิการาคเม กาหิติ, กาหินฺติ อิจฺจาทิ. กาหาภาเว กริสฺสติ, กริสฺสนฺติ. กริสฺสสิ, กริสฺสถ. กริสฺสามิ, กริสฺสาม. กริสฺสเต, กริสฺสนฺเต. กริสฺสเส, กริสฺสวฺเห. กริสฺสํ, กริสฺสามฺเห. กรียิสฺสติ, กรียิสฺสนฺติ. อกริสฺส. อกรียิสฺสา อิจฺจาทิ. काहति, काहन्ति। काहसि, काहथ। काहामि, काहामा। इकार का आगम होने पर काहिति, काहिन्ति इत्यादि। काह आदेश के अभाव में - करिस्सति, करिस्सन्ति। करिस्ससि, करिस्सथ। करिस्सामि, करिस्साम। करिस्सते, करिस्सन्ते। करिस्ससे, करिस्सव्वे। करिस्सं, करिस्साम्हे। करीयिस्सति, करीयिस्सन्ति। अकरिस्स। अकरीयिस्स इत्यादि। ยทา สํปุพฺโพ, ตทา ‘‘ปุรสมุปปรีหิ กโรติสฺส ข ขรา วา’’ติ โยควิภาเคน ตฺยาทิวิภตฺตีสุปิ สํปุพฺพกโรติสฺส ขราเทโส. जब 'सं' उपसर्ग पूर्वक हो, तब 'पुर-समुप-परीहि करोतिस्स ख खरा वा' इस योग-विभाग से ति-आदि विभक्तियों में भी 'सं' उपसर्ग पूर्वक 'करोति' को 'खर' आदेश होता है। อภิสงฺขโรติ, อภิสงฺขโรนฺติ. อภิสงฺขรียติ, อภิสงฺขรียนฺติ. อภิสงฺขโรตุ. อภิสงฺขเรยฺย. อภิสงฺขริ, ขาเทเส อภิสงฺขาสิ วา. อภิสงฺขริสฺสติ. อภิสงฺขริสฺส อิจฺจาทิ. अभिसङ्खरोति, अभिसङ्खरोन्ति। अभिसङ्करीयति, अभिसङ्करीयन्ति। अभिसङ्खरोतु। अभिसङ्खरेय्य। अभिसङ्खरि, ख आदेश होने पर अभिसङ्खासि वा। अभिसङ्खरिस्सति। अभिसङ्खरिस्स इत्यादि। สก สตฺติมฺหิ, โอปจฺจโย, สกฺโกติ, สกฺโกนฺติ. สกฺโกสิ, สกฺโกถ. สกฺโกมิ, สกฺโกม อิจฺจาทิ. 'सक' शक्ति अर्थ में, 'ओ' प्रत्यय - सक्कोति, सक्कोन्ति। सक्कोसि, सक्कोथ। सक्कोमि, सक्कोमा इत्यादि। อป ปาปุณเน, ปปุพฺโพ, ปปฺโปติ, ปปฺโปนฺติ. ปปฺโปสิ, ปปฺโปถ. ปปฺโปมิ, ปปฺโปม. ปปฺโปตุ, ปปฺโปนฺตุ อิจฺจาทิ. 'अप' प्राप्ति अर्थ में, 'प' उपसर्ग पूर्वक - पप्पोति, पप्पोंति। पप्पोसि, पप्पोत्थ। पप्पोमि, पप्पोम। पप्पोतु, पप्पोंतु इत्यादि। ตนาทิคโณ. तनादि गण। จุราทิคณ चुरादि गण। ธุร [Pg.322] เถยฺเย, ปุเร วิย ธาตฺวนฺตโลโป, วิภตฺตุปฺปตฺติ. 'धुर' चोरी अर्थ में, पहले की तरह धातु के अन्त्य का लोप और विभक्ति की उत्पत्ति। ‘‘ตถา กตฺตริ จา’’ติ อิโต ‘‘กตฺตรี’’ติ จ สีหวิโลกเนน ภาวกมฺมคฺคหณานิ จ วตฺตนฺเต, มณฺฑูกคติยา การิตคฺคหณญฺจ. 'तथा कत्तरि चा' यहाँ से 'कत्तरि' की और सिंहविलोकन न्याय से 'भाव-कर्म' के ग्रहण की अनुवृत्ति होती है, और मण्डूकगति से 'कारित' का ग्रहण होता है। ๕๒๕. จุราทิโต เณณยา. ५२५. चुरादि गण से 'णे' और 'णय' प्रत्यय होते हैं। จุรอิจฺเจวมาทิโต ธาตุคณโต เณ ณยอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ กตฺตริ, ภาเว จ กมฺมนิ, วิภตฺติปฺปจฺจเยสุ. ‘‘การิตํ วิย ณานุพนฺโธ’’ติ เณ ณยานํ การิตพฺยปเทโส. चुरादि आदि धातुगणों से 'णे' और 'णय' ये प्रत्यय कर्ता, भाव और कर्म में, विभक्ति प्रत्ययों के होने पर होते हैं। 'कारित के समान ण-अनुबन्ध होने के कारण' णे और णय की 'कारित' संज्ञा होती है। ๕๒๖. การิตานํ โณ โลปํ. ५२६. कारित प्रत्ययों के 'ण' का लोप होता है। การิตปฺปจฺจยานํ ณกาโร โลปมาปชฺชเต. कारित प्रत्ययों के 'ण' कार का लोप हो जाता है। ๕๒๗. อสํโยคนฺตสฺส วุทฺธิ การิเต. ५२७. कारित प्रत्यय परे होने पर असंयोगान्त धातु की वृद्धि होती है। อสํโยคนฺตสฺส ธาตุสฺส การิเต ปเร วุทฺธิ โหตีติ อุการสฺโสกาโร วุทฺธิ. असंयोगान्त धातु के कारित प्रत्यय परे होने पर वृद्धि होती है, इस प्रकार 'उ' कार की 'ओ' कार वृद्धि होती है। ธนํ โจเรติ, โจเรนฺติ. โจเรสิ, โจเรถ. โจเรมิ, โจเรม. ณยปฺปจฺจเย – โจรยติ, โจรยนฺติ. โจรยสิ, โจรยถ. โจรยามิ, โจรยาม. โจรยเต, โจรยนฺเต. โจรยเส, โจรยวฺเห. โจรเย, โจรยามฺเห. धनं चोरेति (वह धन चुराता है), चोरेन्ति। चोरेसि, चोरेथ। चोरेमि, चोरेम। 'णय' प्रत्यय होने पर - चोरयति, चोरयन्ति। चोरयसि, चोरयथ। चोरयामि, चोरयाम। चोरयते, चोरयन्ते। चोरयसे, चोरयवहे। चोरये, चोरयामहे। กมฺเม ยปฺปจฺจเย อีการาคโม, สรโลปาทิ จ, โจรียเต เทวทตฺเตน, โจรียติ, โจรียนฺติ อิจฺจาทิ. कर्मवाच्य में 'य' प्रत्यय होने पर 'ई' कार का आगम और स्वर-लोप आदि होकर - देवदत्तेन चोरीयते (देवदत्त द्वारा चुराया जाता है), चोरीयति, चोरीयन्ति इत्यादि। โจเรตุ[Pg.323], โจเรนฺตุ. โจเรหิ. โจรยตุ, โจรยนฺตุ. โจรย, โจรยาหิ. चोरेतु, चोरेन्तु। चोरेहि। चोरयतु, चोरयन्तु। चोरय, चोरयाहि। โจเรยฺย, โจเรยฺยุํ. โจรเย, โจรเยยฺยุํ. อโจเรสิ, โจเรสิ, อโจเรสุํ, โจเรสุํ. อโจรยิ, โจรยิ, อโจรยึสุ, โจรยึสุ, อโจรยุํ, โจรยุํ. อโจเรสิ, อโจเรสิตฺถ. ตฺวํ อโจรยิ, อโจรยิตฺถ. อโจเรสึ, อโจเรสิมฺห. อโจรยึ, อโจรยิมฺห. อโจรยิตฺถ. อโจรียิตฺถ, อโจรียิ. चोरेय्य, चोरेय्युं। चोरये, चोरयेय्युं। अचोरेसि, चोरेसि, अचोरेसुं, चोरेसुं। अचोरयि, चोरयि, अचोरयिंसु, चोरयिंसु, अचोरयुं, चोरयुं। अचोरेसि, अचोरेसित्थ। त्वं अचोरयि, अचोरयित्थ। अचोरेसिं, अचोरेसिम्ह। अचोरयिं, अचोरयिम्ह। अचोरयित्थ। अचोरीयित्थ, अचोरीयि। โจริสฺสติ, โจริสฺสนฺติ. โจรยิสฺสติ, โจรยิสฺสนฺติ. โจรียิสฺสเต, โจรียิสฺสนฺเต. โจรียิสฺสติ, โจรียิสฺสนฺติ. อโจริสฺส, อโจรยิสฺส. อโจรียิสฺสถ, อโจรียิสฺส อิจฺจาทิ. चोरिस्सति, चोरिस्सन्ति। चोरयिस्सति, चोरयिस्सन्ति। चोरीयिस्सते, चोरीयिस्सन्ते। चोरीयिस्सति, चोरीयिस्सन्ति। अचोरिस्स, अचोरयिस्स। अचोरीयिस्सथ, अचोरीयिस्स इत्यादि। ตถา จินฺต จินฺตายํ, สํโยคนฺตตฺตา วุทฺธิอภาโวว วิเสโส. उसी प्रकार 'चिन्त' धातु चिन्तन (सोचने) के अर्थ में है, यहाँ संयोगान्त होने के कारण वृद्धि का अभाव ही विशेष है। จินฺเตติ, จินฺตยติ, จินฺเตนฺติ, จินฺตยนฺติ. จินฺเตตุ, จินฺตยตุ. จินฺเตยฺย, จินฺตเยยฺย. อจินฺเตสิ, จินฺเตสิ, อจินฺตยิ, จินฺตยิ. จินฺเตสฺสติ, จินฺตยิสฺสติ. อจินฺติสฺส, อจินฺตยิสฺส อิจฺจาทิ. चिन्तेति, चिन्तयति, चिन्तेन्ति, चिन्तयन्ति। चिन्तेतु, चिन्तयतु। चिन्तेय्य, चिन्तयय्य। अचिन्तेसि, चिन्तेसि, अचिन्तयि, चिन्तयि। चिन्तेस्सति, चिन्तयिस्सति। अचिन्तिस्स, अचिन्तयिस्स इत्यादि। มนฺต คุตฺตภาสเน, มนฺเตติ, มนฺตยติ อิจฺจาทิ ปุริมสมํ. मन्ता धातु गुप्त भाषण (परामर्श) के अर्थ में है, मन्तेति, मन्तयति इत्यादि पूर्व के समान हैं। ปาล รกฺขเณ, ธมฺมํ ปาเลติ, ปาลยติ. ปาลียติ. ปาเลตุ, ปาลยตุ อิจฺจาทิ. पाल धातु रक्षण (रक्षा करने) के अर्थ में है, धम्मं पालेति (धर्म की रक्षा करता है), पालयति। पालीयति। पालेतु, पालयतु इत्यादि। ฆฏ ฆฏเน, ฆาเฏติ, ฆาฏยติ, ฆเฏติ, ฆฏยติ, ฆฏาทิตฺตา วิกปฺเปน วุทฺธิ. घट धातु चेष्टा (घटन) के अर्थ में है, घाटति, घाटयति, घटेति, घटयति; 'घटादि' होने के कारण विकल्प से वृद्धि होती है। วิท ญาเณ, เวเทติ, เวทยติ. विद धातु ज्ञान के अर्थ में है, वेदेति, वेदयति। คณ [Pg.324] สงฺขฺยาเน, ‘‘ฆฏาทีนํ วา’’ติ น วุทฺธิ, คเณติ, คณยติ อิจฺจาทิ, สพฺพตฺถ สุโพธํ. गण धातु संख्यान (गिनने) के अर्थ में है, 'घटादीनं वा' सूत्र से वृद्धि नहीं होती, गणेति, गणयति इत्यादि, सब जगह सुबोध है। จุราทิคโณ. चुरादिगण समाप्त। ภูวาที จ รุธาที จ, ทิวาที สฺวาทโย คณา; กิยาที จ ตนาที จ, จุราที จิธ สตฺตธา. भूवादि, रुधादि, दिवादि, स्वादि, कियादि, तनादि और चुरादि - इस प्रकार यहाँ (पालि व्याकरण में) सात प्रकार के धातुगण हैं। วิกรณวิธานํ สมตฺตํ. विकरण विधान समाप्त हुआ। ธาตุปฺปจฺจยนฺตนย धातु-प्रत्ययान्त पद्धति। อถ ธาตุปฺปจฺจยนฺตา วุจฺจนฺเต. अब धातु-प्रत्ययान्त कहे जाते हैं। ตตฺถ ธาตฺวตฺเถ นิทฺทิฏฺฐา ขาทิการิตนฺตา ปจฺจยา ธาตุปฺปจฺจยา นาม. उनमें धातु के अर्थ में निर्दिष्ट 'ख' आदि से लेकर 'कारित' पर्यन्त प्रत्यय 'धातु-प्रत्यय' कहलाते हैं। ติช นิสาน พนฺธนขมาสุ, ธาตุสญฺญาทิ. तिज धातु तीक्ष्ण करने, बाँधने और क्षमा करने के अर्थ में है, इसकी धातु संज्ञा आदि होती है। ‘‘ธาตุลิงฺเคหิ ปรา ปจฺจยา’’ติ อิโต ธาตุคฺคหณํ อนุวตฺตเต, ‘‘ปรา, ปจฺจยา’’ติ จ อธิกาโร. "धातु-लिंगेहि परा पच्चया" इस सूत्र से 'धातु' का ग्रहण अनुवृत्त होता है, और 'परा' तथा 'पच्चया' का अधिकार है। ๕๒๘. ติช คุป กิต มาเนหิ ข ฉ สา วา. ५२८. तिज, गुप, कित और मान इन धातुओं से 'ख', 'छ' और 'स' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। ติช คุป กิต มาน อิจฺเจเตหิ ธาตูหิ ข ฉ ส อิจฺเจเต ปจฺจยา ปรา โหนฺติ วา. तिज, गुप, कित, मान इन धातुओं से 'ख', 'छ', 'स' ये प्रत्यय विकल्प से परे होते हैं। ติชโต ขนฺติยํ โขว, นินฺทายํ คุปโต ตุ โฉ; กิตา โฉ โสว มานมฺหา, ววตฺถิตวิภาสโต. व्यवस्थित विभाषा के कारण 'तिज' से क्षमा अर्थ में 'ख' ही, 'गुप' से निन्दा अर्थ में 'छ' ही, 'कित' से 'छ' और 'मान' से 'स' ही प्रत्यय होता है। ‘‘กฺวจาทิวณฺณานเมกสฺสรานํ ทฺเวภาโว’’ติ ธาตฺวาทิสฺส ทฺวิภาโว. "क्वचादिवण्णानमेकस्सरानं द्वेभावो" सूत्र से धातु के आदि वर्ण का द्वित्व होता है। ‘‘พฺยญฺชนนฺตสฺสา’’ติ วตฺตมาเน – "व्यञ्जनन्तस्स" (व्यंजन अन्त वाले के) ऐसा अनुवृत्त होने पर - ๕๒๙. โก เข จ. ५२९. को खे च। ธาตฺวนฺตสฺส [Pg.325] พฺยญฺชนสฺส กการาเทโส โหติ ขปฺปจฺจเย ปเร. 'ख' प्रत्यय परे होने पर धातु के अन्त्य व्यंजन का 'क'कार आदेश होता है। ติติกฺข อิติ ฐิเต – 'तितिक्ख' ऐसा स्थित होने पर - ธาตุวิหิตานํ ตฺยาทิวิภตฺตีนํ อธาตุโต อปฺปวตฺติยมาห. धातु से विहित 'ति' आदि विभक्तियों की अधातु से अप्रवृत्ति (न होना) कहते हैं। ๕๓๐. ธาตุปฺปจฺจเยหิ วิภตฺติโย. ५३०. धातु-प्रत्ययों से विभक्तियाँ होती हैं। ธาตฺวตฺเถ นิทฺทิฏฺเฐหิ ขาทิการิตนฺเตหิ ปจฺจเยหิ ตฺยาทโย วิภตฺติโย โหนฺตีติ ปุเร วิย วตฺตมานาทโย โยเชตพฺพา. धातु के अर्थ में निर्दिष्ट 'ख' आदि और 'कारित' (णिच् आदि) प्रत्ययान्त शब्दों से 'ति' आदि विभक्तियाँ होती हैं, इस प्रकार पहले की तरह वर्तमान आदि काल की विभक्तियाँ जोड़नी चाहिए। อติวากฺยํ ติติกฺขติ, ติติกฺขนฺติ. กมฺเม ติติกฺขียติ. ตถา ติติกฺขตุ, ติติกฺขนฺตุ. ติติกฺเขยฺย, ติติกฺเขยฺยุํ. อติติกฺขิ, อติติกฺขึสุ. ติติกฺขิสฺสติ. อติติกฺขิสฺส อิจฺจาทิ. अतिवाक्य (कठोर वचन) को सहता है (तितिक्खति), सहते हैं (तितिक्खन्ति)। कर्मवाच्य में 'तितिक्खीयति'। उसी प्रकार 'तितिक्खतु', 'तितिक्खन्तु'। 'तितिक्खेय्य', 'तितिक्खेय्युं'। 'अतितिक्खि', 'अतितिक्खिंसु'। 'तितिक्खिस्सति'। 'अतितिक्खिस्स' इत्यादि। ขปฺปจฺจยาภาเว อปฺปจฺจยสฺส เอกาโร, เตเชติ, เตชติ วา, เตชนฺติ อิจฺจาทิ. 'ख' प्रत्यय के अभाव में 'अ' प्रत्यय का 'ए'कार (होकर) 'तेजेति' या 'तेजति', 'तेजन्ति' इत्यादि। คุป โคปเน, ฉปฺปจฺจเย ทฺวิภาโว, ‘‘ปุพฺโพพฺภาโส’’ติ อพฺภาสสญฺญา, ‘‘อพฺภาสสฺสา’’ติ วตฺตมาเน ‘‘อนฺตสฺสิวณฺณากาโร วา’’ติ อพฺภาสนฺตสฺสิกาโร, ‘‘กวคฺคสฺส จวคฺโค’’ติ อพฺภาสคการสฺส ชกาโร จ. 'गुप' (रक्षा करने के अर्थ में), 'छ' प्रत्यय होने पर द्वित्व, 'पुब्बोब्भासो' से अभ्यास संज्ञा, 'अब्भासस्स' के अधिकार में 'अन्तस्सिवण्णाकारो वा' से अभ्यास के अन्त्य को 'इ'कार, और 'कवग्गस्स चवग्गो' से अभ्यास के 'ग'कार को 'ज'कार होता है। ๕๓๑. พฺยญฺชนนฺตสฺส โจ ฉปฺปจฺจเยสุ จ. ५३१. 'छ' प्रत्ययों के परे होने पर व्यंजन-अन्त (धातु) को 'च' (आदेश) होता है। ธาตฺวนฺถสฺส พฺยญฺชนสฺส จการาเทโส โหติ ฉปฺปจฺจเยสุ ปเรสุ. ตโต วิภตฺติโย, กายํ ชิคุจฺฉติ, ชิคุจฺฉนฺติ. เสสํ ปุริมสมํ. ฉาภาเว โคเปติ, โคเปนฺติ อิจฺจาทิ. 'छ' प्रत्ययों के परे होने पर धातु के अन्त्य व्यंजन का 'च'कार आदेश होता है। उसके बाद विभक्तियाँ (लगती हैं), जैसे- शरीर से घृणा करता है (जिगुच्छति), घृणा करते हैं (जिगुच्छन्ति)। शेष पहले के समान है। 'छ' के अभाव में 'गोपेति', 'गोपेन्ति' इत्यादि। กิต โรคาปนยเน, ฉปฺปจฺจโย, ทฺวิตฺตญฺจ. 'कित' (रोग दूर करने के अर्थ में), 'छ' प्रत्यय और द्वित्व होता है। อพฺภาสคฺคหณมนุวตฺตเต[Pg.326]. 'अभ्यास' ग्रहण की अनुवृत्ति होती है। ๕๓๒. มานกิตานํ วตตฺตํ วา. ५३२. 'मान' और 'कित' धातुओं (के अभ्यास) को विकल्प से 'व' और 'त' होता है। อพฺภาสคตานํ มาน กิตอิจฺเจเตสํ ธาตูนํ วการตการตฺตํ โหติ วา ยถากฺกมนฺติ ตกาโร, ธาตฺวนฺตสฺส จกาโร, เสสํ สมํ. โรคํ ติกิจฺฉติ, ติกิจฺฉนฺติ อิจฺจาทิ. ตการาภาเว ‘‘กวคฺคสฺส จวคฺโค’’ติ จกาโร, วิจิกิจฺฉติ, วิจิกิจฺฉนฺติ อิจฺจาทิ. अभ्यास में स्थित 'मान' और 'कित' इन धातुओं को यथाक्रम 'व'कार और 'त'कार होता है, इस प्रकार 'त'कार हुआ, धातु के अन्त्य को 'च'कार हुआ, शेष समान है। रोग की चिकित्सा करता है (तिकिच्छति), चिकित्सा करते हैं (तिकिच्छन्ति) इत्यादि। 'त'कार के अभाव में 'कवग्गस्स चवग्गो' से 'च'कार होकर 'विचि-किच्छति', 'विचि-किच्छन्ति' इत्यादि। มาน วีมํสปูชาสุ, สปฺปจฺจยทฺวิภาวอีการวการา. 'मान' (मीमांसा और पूजा के अर्थ में), 'स' प्रत्यय, द्वित्व, 'ई'कार और 'व'कार (होते हैं)। ๕๓๓. ตโต ปามานานํ วา มํ เสสุ. ५३३. उसके बाद 'पा' और 'मान' को 'स' (प्रत्यय) परे होने पर विकल्प से 'व' और 'मं' (आदेश होते हैं)। ตโต อพฺภาสโต ปราสํ ปามานานํ ธาตูนํ วามํอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ ยถากฺกมํ สปฺปจฺจเย ปเร. เสสูติ พหุวจนนิทฺเทโส ปโยเคปิ วจนวิปลฺลาสญาปนตฺถํ. อตฺถํ วีมํสติ, วีมํสนฺติ อิจฺจาทิ. उसके बाद अभ्यास से परे 'पा' और 'मान' धातुओं को 'स' प्रत्यय परे होने पर यथाक्रम 'व' और 'मं' ये आदेश होते हैं। 'सेसु' यह बहुवचन निर्देश प्रयोग में भी वचन-विपर्यास को सूचित करने के लिए है। अर्थ की मीमांसा करता है (वीमंसति), मीमांसा करते हैं (वीमंसन्ति) इत्यादि। อญฺญตฺถ ‘‘โลปญฺเจตฺตมกาโร’’ติ อปฺปจฺจยสฺเสกาโร, มาเนติ, มาเนนฺติ. अन्यत्र 'लोपञ्चेत्तमकारो' से 'अ' प्रत्यय को 'ए'कार होकर 'मानेति', 'मानेन्ति' (बनते हैं)। ภุช ปาลนพฺยวหรเณสุ, โภตฺตุมิจฺฉตีติ อตฺเถ – 'भुज' (पालन और व्यवहार के अर्थ में), 'खाने की इच्छा करता है' इस अर्थ में - ‘‘ข ฉ สา, วา’’ติ จ วตฺตเต. 'ख, छ, स' और 'वा' (विकल्प) की अनुवृत्ति होती है। ๕๓๔. ภุช ฆส หร สุ ปาทีหิ ตุมิจฺฉตฺเถสุ. ५३४. 'भुज', 'घस', 'हर', 'सु', 'पा' आदि से 'तुमुन्' (इच्छा) के अर्थ में। ภุช ฆส หร สุ ปา อิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ตุมิจฺฉตฺเถสุ จ ข ฉ สอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ วา. ตุมิจฺฉานํ, ตุมนฺตยุตฺตอิจฺฉาย วา อตฺถา ตุมิจฺฉตฺถา, เตน ตุมนฺตรหิเตสุ ‘‘โภชนมิจฺฉตี’’ติอาทีสุ น โหนฺติ, ‘‘วุตฺตตฺถานมปฺปโยโค’’ติ วากฺยสฺส อปฺปโยโค, ธาตฺวาทิสฺส ทฺเวภาเว กเต [Pg.327] ‘‘ทุติยจตุตฺถานํ ปฐมตติยา’’ติ อพฺภาสภการสฺส พกาโร, ธาตฺวนฺตสฺส ‘‘โก เข จา’’ติ กกาโร, พุภุกฺขติ, พุภุกฺขนฺติ อิจฺจาทิ. 'भुज', 'घस', 'हर', 'सु', 'पा' इत्यादि धातुओं से 'तुमुन्' (इच्छा) के अर्थ में 'ख', 'छ', 'स' ये प्रत्यय विकल्प से होते हैं। 'तुमुन्' प्रत्यय युक्त इच्छा के अर्थ 'तुमिच्छत्थ' हैं, इसलिए 'तुमुन्' रहित 'भोजनमिच्छति' आदि में (ये प्रत्यय) नहीं होते। 'उक्त अर्थों का प्रयोग नहीं होता' इस नियम से वाक्य का प्रयोग नहीं होता। धातु के आदि को द्वित्व करने पर 'दुतियचतुत्थानं पठमततिया' से अभ्यास के 'भ'कार को 'ब'कार, धातु के अन्त्य को 'को खे चा' से 'क'कार होकर 'बुभुक्खति', 'बुभुक्खन्ति' इत्यादि। วาติ กิมตฺถํ? โภตฺตุมิจฺฉติ, อิจฺฉตฺเถสูติ กิมตฺถํ? โภตฺตุํ คจฺฉติ. 'वा' (विकल्प) किसलिए? 'भोत्तुमिच्छति' (खाने की इच्छा करता है)। 'इच्छत्थेसु' (इच्छा के अर्थ में) किसलिए? 'भोत्तुं गच्छति' (खाने के लिए जाता है)। ฆส อทเน, ฆสิตุมิจฺฉตีติ อตฺเถ ฉปฺปจฺจโย, ทฺวิตฺตํ, ตติย จวคฺค อิการ จการาเทสา, ชิฆจฺฉติ, ชิฆจฺฉนฺติ. 'घस' (भक्षण के अर्थ में), 'खाने की इच्छा करता है' इस अर्थ में 'छ' प्रत्यय, द्वित्व, तृतीय (वर्ग का), चवर्ग, इकार और चकार आदेश होकर 'जिघच्छति', 'जिघच्छन्ति' (बनते हैं)। หร หรเณ, หริตุมิจฺฉตีติ อตฺเถ สปฺปจฺจโย. 'हर' (हरण करने के अर्थ में), 'हरण करने की इच्छा करता है' इस अर्थ में 'स' प्रत्यय होता है। ๕๓๕. หรสฺส คี เส. ५३५. 'स' (प्रत्यय) परे होने पर 'हर' (धातु) को 'गी' आदेश होता है। หรอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส สพฺพสฺส คี โหติ เส ปจฺจเย ปเร. ‘‘คีเส’’ติ โยควิภาเคน ชิสฺสปิ, ฐานูปจาเรนาเทสสฺสาปิ ธาตุโวหารตฺตา ทฺวิตฺตํ, ภิกฺขํ ชิคีสติ, ชิคีสนฺติ. 'हर' इस सम्पूर्ण धातु को 'स' प्रत्यय परे होने पर 'गी' होता है। 'गीसे' इस योग-विभाग से 'जि' भी होता है, स्थान-उपचार से आदेश को भी धातु व्यवहार होने के कारण द्वित्व होकर 'भिक्खं जिगीसति', 'जिगीसन्ति' (बनते हैं)। สุ สวเณ, โสตุมิจฺฉติ สุสฺสูสติ, สุสฺสูสนฺติ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ทีโฆ. 'सु' (श्रवण के अर्थ में), सुनने की इच्छा करता है - 'सुस्सूसति', 'सुस्सूसन्ति', 'क्वचि धातू' आदि से दीर्घ होता है। ปา ปาเน, ปาตุมิจฺฉตีติ อตฺเถ สปฺปจฺจยทฺวิตฺตรสฺสตฺตอิการาเทสา, ‘‘ตโต ปามานานํ วามํ เสสู’’ติ วาเทโส, ปิวาสติ, ปิวาสนฺติ อิจฺจาทิ. 'पा' (पीने के अर्थ में), 'पीने की इच्छा करता है' इस अर्थ में 'स' प्रत्यय, द्वित्व, ह्रस्वत्व और इकार आदेश होते हैं, 'ततो पामानानं वामंसेसु' से 'व' आदेश होकर 'पिवासति', 'पिवासन्ति' इत्यादि। ชิ ชเย, วิเชตุมิจฺฉติ วิชิคีสติ อิจฺจาทิ. जि (धातु) जीतने के अर्थ में है, 'जीतने की इच्छा करता है' इस अर्थ में 'विजिगीसति' आदि रूप होते हैं। สงฺโฆ ปพฺพตมิว อตฺตานมาจรติ, ปพฺพโต อิว อาจรตีติ วา อตฺเถ – संघ पर्वत के समान स्वयं का आचरण करता है, अथवा पर्वत के समान आचरण करता है - इस अर्थ में – ๕๓๖. อาย นามโต กตฺตุปมานาทาจาเร. ५३६. आचरण के अर्थ में कर्ता के उपमानभूत नाम (संज्ञा) से 'आय' प्रत्यय होता है। อาจรณกฺริยาย กตฺตุโน อุปมานภูตมฺหา นามโต อายปฺปจฺจโย โหติ อาจารตฺเถ. อุปมียติ เอเตนาติ [Pg.328] อุปมานํ, กตฺตุโน อุปมานํ กตฺตุปมานํ, ‘‘วุตฺตตฺถานมปฺปโยโค’’ติ อิวสทฺทนิวตฺติ, ธาตุปฺปจฺจยนฺตตฺตา ‘‘เตสํ วิภตฺติโย โลปา จา’’ติ สุตฺเต เตสํคหเณน วิภตฺติโลโป, ‘‘ปกติ จสฺส สรนฺตสฺสา’’ติ ปกติภาโว, สรโลปาทิ, ‘‘ธาตุปฺปจฺจเยหิ วิภตฺติโย’’ติ วิภตฺตุปฺปตฺติ, ปพฺพตายติ สงฺโฆ, เอวํ สมุทฺทมิว อตฺตานมาจรติ สมุทฺทายติ, จิจฺจิฏมิว อตฺตานมาจรติ จิจฺจิฏายติ สทฺโท. เอวํ ธูมายติ. आचरण क्रिया के कर्ता के उपमानभूत नाम से आचरण के अर्थ में 'आय' प्रत्यय होता है। जिसके द्वारा उपमा दी जाए वह 'उपमान' है, कर्ता का उपमान 'कर्तूपमान' है। "वुत्तत्थानमप्पयोगो" इस नियम से 'इव' शब्द की निवृत्ति हो जाती है। धातु-प्रत्ययान्त होने के कारण "तेसं विमत्तियो लोपा चा" सूत्र में 'तेसं' ग्रहण से विभक्ति का लोप होता है, "पकति चस्स सरन्तस्सा" से प्रकृतिभाव, स्वर-लोप आदि होकर "धातुप्पच्चयेहि विमत्तियो" से विभक्ति की उत्पत्ति होती है। जैसे- 'पब्बतयति संघो' (संघ पर्वत के समान आचरण करता है), इसी प्रकार 'समुद्दायति' (समुद्र के समान आचरण करता है), 'चिच्चिटायति सद्दो' (शब्द चिच्चिट के समान आचरण करता है)। इसी प्रकार 'धूमायति'। ‘‘นามโต, อาจาเร’’ติ จ วตฺตเต. "नामतो" और "आचारे" की अनुवृत्ति होती है। ๕๓๗. อียูปมานา จ. ५३७. और उपमानभूत (नाम) से 'ईय' प्रत्यय होता है। อุปมานภูตา นามโต อียปฺปจฺจโย โหติ อาจารตฺเถ. ปุน อุปมานคฺคหณํ กตฺตุคฺคหณนิวตฺตนตฺถํ, เตน กมฺมโตปิ สิชฺฌติ, เสสํ สมํ. อฉตฺตํ ฉตฺตมิวาจรติ ฉตฺตียติ, อปุตฺตํ ปุตฺตมิวาจรติ ปุตฺตียติ สิสฺสมาจริโย. उपमानभूत नाम से आचरण के अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है। पुनः 'उपमान' का ग्रहण 'कर्ता' के ग्रहण की निवृत्ति के लिए है, जिससे कर्म से भी (प्रत्यय) सिद्ध होता है, शेष समान है। 'छत्तीियति' (जो छत्र नहीं है उसे छत्र के समान आचरण/व्यवहार करता है), 'पुत्तीियति सिस्सम आचरियो' (आचार्य शिष्य के साथ पुत्र के समान आचरण करता है)। อุปมานาติ กึ? ธมฺมมาจรติ, อาจาเรติ กึ? อฉตฺตํ ฉตฺตมิว รกฺขติ. 'उपमान' क्यों कहा? 'धम्ममाचरति' (धर्म का आचरण करता है)। 'आचारे' क्यों कहा? 'अछत्तं छत्तं इव रक्खति' (जो छत्र नहीं है उसे छत्र के समान रक्षा करता है)। ‘‘อีโย’’ติ วตฺตเต. "ईयो" की अनुवृत्ति होती है। ๕๓๘. นามมฺหาตฺติจฺฉตฺเถ. ५३८. नाम (संज्ञा) से अपने लिए इच्छा करने के अर्थ में ('ईय' प्रत्यय होता है)। นามมฺหา อตฺตโน อิจฺฉตฺเถ อียปฺปจฺจโย โหติ. อตฺตโน ปตฺตมิจฺฉติ ปตฺตียติ, เอวํ วตฺถียติ, ปริกฺขารียติ, จีวรียติ, ปฏียติ, ธนียติ, ปุตฺตียติ. नाम से अपनी इच्छा के अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है। 'पत्तीियति' (अपने लिए पात्र की इच्छा करता है), इसी प्रकार 'वत्थीियति', 'परिक्खारीियति', 'चीवरीियति', 'पटीियति', 'धनीियति', 'पुत्तीियति'। อตฺติจฺฉตฺเถติ กิมตฺถํ? อญฺญสฺส ปตฺตมิจฺฉติ. 'अत्तिच्छत्थे' (अपनी इच्छा के अर्थ में) क्यों कहा? 'अञ्ञस्स पत्तं इच्छति' (दूसरे के लिए पात्र की इच्छा करता है)। ทฬฺหํ กโรติ วีริยนฺติ อตฺเถ – 'वीर्य को दृढ़ करता है' इस अर्थ में – การิตคฺคหณมนุวตฺตเต. 'कारित' ग्रहण की अनुवृत्ति होती है। ๕๓๙. ธาตุรูเป [Pg.329] นามสฺมา ณโยจ. ५३९. धातु के रूप में नाम से 'णय' प्रत्यय भी होता है। ธาตุยา รูเป นิปฺผาเทตพฺเพ, ‘‘ตํ กโรติ, เตน อติกฺกมติ’’อิจฺจาทิเก ปยุชฺชิตพฺเพ วา สติ นามมฺหา ณยปฺปจฺจโย โหติ, การิตสญฺญา จ. ณโลเป, วิภตฺติโลปสรโลปาทีสุ กเตสุ วิภตฺตุปฺปตฺติ, ทฬฺหยติ วีริยํ, เอวํ ปมาณยติ, อมิสฺสยติ, ตถา หตฺถินา อติกฺกมติ อติหตฺถยติ, วีณาย อุปคายติ อุปวีณยติ, วิสุทฺธา โหติ รตฺติ วิสุทฺธยติ, กุสลํ ปุจฺฉติ กุสลยติ อิจฺจาทิ. धातु के रूप में निष्पन्न करने के लिए, "वह करता है, उससे अतिक्रमण करता है" इत्यादि प्रयोग होने पर नाम से 'णय' प्रत्यय होता है और उसकी 'कारित' संज्ञा होती है। 'ण' का लोप, विभक्ति लोप, स्वर लोप आदि होने पर विभक्ति की उत्पत्ति होती है। जैसे- 'दळ्हयति वीरियं' (वीर्य को दृढ़ करता है), इसी प्रकार 'पमाणयति', 'अमिस्सयति', तथा 'अतिहत्थयति' (हाथी से अतिक्रमण करता है), 'उपवीणयति' (वीणा के साथ गाता है), 'विसुद्धयति' (रात्रि विशुद्ध होती है), 'कुसलयति' (कुशल पूछता है) इत्यादि। ๕๔๐. ธาตูหิ เณ ณย ณาเป ณาปยา การิตานิ เหตฺวตฺเถ. ५४०. सभी धातुओं से हेतु (प्रेरणा) के अर्थ में 'णे', 'णय', 'णापे', 'णापय' प्रत्यय होते हैं और वे 'कारित' संज्ञक होते हैं। สพฺเพหิ ธาตูหิ เหตฺวตฺเถ อภิเธยฺเย เณ ณยณาเป ณาปย อิจฺเจเต ปจฺจยา ปรา โหนฺติ, เต การิตสญฺญา จ โหนฺติ. เหตุเยว อตฺโถ เหตฺวตฺโถ, โส จ ‘‘โย กาเรติ ส เหตู’’ติ ลทฺธเหตุสญฺโญ สุทฺธกตฺตุโน ปโยชโก เหตุกตฺตา, อตฺถโต เปสนชฺเฌสนาทิโก ปโยชกพฺยาปาโร อิธ เหตุ นาม. सभी धातुओं से 'हेतु' अर्थ के अभिधेय होने पर 'णे', 'णय', 'णापे', 'णापय' ये प्रत्यय बाद में होते हैं, और उनकी 'कारित' संज्ञा होती है। हेतु ही अर्थ 'हेत्वर्थ' है, और वह "यो कारेति स हेतु" इस लक्षण से 'हेतु' संज्ञा प्राप्त प्रयोजक कर्ता है। अर्थ की दृष्टि से प्रेषण (आज्ञा देना), अध्येषण (प्रार्थना करना) आदि प्रयोजक का व्यापार ही यहाँ 'हेतु' कहलाता है। เอตฺถ จ – और यहाँ – เณ ณยาว อุวณฺณนฺตา, อาโต ทฺเว ปจฺฉิมา สิยุํ; เสสโต จตุโร ทฺเว วา, วาสทฺทสฺสานุวตฺติโต. उकारान्त और ऊकारान्त धातुओं से 'णे' और 'णय' ही होते हैं, आकारान्त से पिछले दो ('णापे', 'णापय') होने चाहिए; शेष धातुओं से चारों अथवा दो होते हैं, 'वा' शब्द की अनुवृत्ति के कारण। อกมฺมา ธาตโว โหนฺติ, การิเต ตุ สกมฺมกา; สกมฺมกา ทฺวิกมฺมาสฺสุ, ทฺวิกมฺมา ตุ ติกมฺมกา. अकर्मक धातुएँ कारित (प्रेरणार्थक) होने पर सकर्मक हो जाती हैं; सकर्मक धातुएँ द्विकर्मक हो जाती हैं, और द्विकर्मक धातुएँ त्रिकर्मक हो जाती हैं। ตสฺมา กตฺตริ กมฺเม จ, การิตาขฺยาตสมฺภโว; น ภาเว สุทฺธกตฺตา จ, การิเต กมฺมสญฺญิโต. इसलिए कर्ता और कर्म में कारित आख्यात (क्रिया) का संभव है; भाव में नहीं। और कारित होने पर (मूल क्रिया का) कर्ता कर्म संज्ञक हो जाता है। นิยาทีนํ [Pg.330] ปธานญฺจ, อปฺปธานํ ทุหาทินํ; การิเต สุทฺธกตฺตา จ, กมฺมมาขฺยาตโคจรนฺติ. 'नी' आदि धातुओं का प्रधान कर्म और 'दुह' आदि का अप्रधान कर्म; कारित होने पर कर्ता, आख्यात (क्रिया) के विषय में कर्म होता है। ตตฺถ โย โกจิ ภวติ, ตมญฺโญ ‘‘ภวาหิ ภวาหิ’’ อิจฺเจวํ พฺรวีติ, อถ วา ภวนฺตํ ภวิตุํ สมตฺถํ ปโยชยติ, ภวิตุํ ปโยเชตีติ วา อตฺเถ อิมินา เณณยปฺปจฺจยา, การิตสญฺญา จ, ‘‘วุตฺตตฺถานมปฺปโยโค’’ติ วากฺยสฺส อปฺปโยโค, ‘‘การิตานํ โณ โลป’’นฺติ ณโลโป, ‘‘อสํโยคนฺตสฺส วุทฺธิ การิเต’’ติ อูการสฺโสกาโร วุทฺธิ. वहाँ जो कोई होता है, उसे दूसरा "होओ, होओ" इस प्रकार कहता है, अथवा होते हुए को होने में समर्थ को प्रेरित करता है, "होने के लिए प्रेरित करता है" इस अर्थ में इससे 'णे' और 'णय' प्रत्यय होते हैं, और उनकी 'कारित' संज्ञा होती है। "वुत्तत्थानमप्पयोगो" से वाक्य का प्रयोग नहीं होता, "कारितानं णो लोपं" से 'ण' का लोप होता है, "असंयोगन्तस्स वुद्धि कारिते" से उकार को ओकार वृद्धि होती है। ‘‘โอ, เอ’’ติ จ วตฺตเต, ธาตุคฺคหณญฺจ. "ओ, ए" और "धातु" ग्रहण की अनुवृत्ति होती है। ๕๔๑. เต อาวายา การิเต. ५४१. वे (ओ और ए) कारित प्रत्यय परे होने पर 'आव' और 'आय' आदेश को प्राप्त होते हैं। เต ธาตฺวนฺตภูตา โอกาเรการา อาวอายาเทเส ปาปุณนฺติ การิเต ปเร. ‘‘เต อาวายา’’ติ โยควิภาเคน เฌอาทีนํ อการิเตปิ โหนฺตีติ โอการสฺส อาวาเทโส, สรโลปาทิ, ‘‘ธาตุปฺปจฺจเยหิ วิภตฺติโย’’ติ ตฺยาทโย. वे धातु के अन्त में स्थित ओकार और एकार कारित प्रत्यय परे होने पर 'आव' और 'आय' आदेश को प्राप्त होते हैं। "ते आवाया" इस योग-विभाग से 'झे' आदि धातुओं के अकारित होने पर भी (यह आदेश) होते हैं, अतः ओकार को 'आव' आदेश, स्वर-लोप आदि होकर "धातुप्पच्चयेहि विमत्तियो" से 'ति' आदि प्रत्यय होते हैं। โส สมาธึ ภาเวติ, ภาวยติ, ภาเวนฺติ, ภาวยนฺติ. ภาเวสิ, ภาวยสิ, ภาเวถ, ภาวยถ. ภาเวมิ, ภาวยามิ, ภาเวม, ภาวยาม. ภาวยเต, ภาวยนฺเต. वह समाधि की भावना करता है - भावेति, भावयति; वे भावना करते हैं - भावेंति, भावयंति। तुम भावना करते हो - भावेसि, भावयसि; तुम सब भावना करते हो - भावेथ, भावयथ। मैं भावना करता हूँ - भावेमि, भावयामि; हम भावना करते हैं - भावेम, भावयाम। भावयते, भावयंते। กมฺเม อตฺตโนปทยปฺปจฺจยอีการาคมา, สรโลปาทิ จ, เตน ภาวียเต สมาธิ, ภาวียนฺเต. ภาวียติ, ภาวียนฺติ. कर्मवाच्य में आत्मनेपद प्रत्यय और ईकार का आगम, स्वर-लोप आदि होते हैं, उससे 'भावीियते समाधि' (समाधि की भावना की जाती है), 'भावीियंते'। 'भावीियति', 'भावीियंति'। ตถา ภาเวตุ, ภาวยตุ, ภาเวนฺตุ, ภาวยนฺตุ. ภาเวหิ, ภาวย, ภาวยาหิ, ภาเวถ, ภาวยถ[Pg.331]. ภาเวมิ, ภาวยามิ, ภาเวม, ภาวยาม. ภาวยตํ, ภาวยนฺตํ. इसी प्रकार (लोट् लकार में) - भावेतु, भावयतु, भावेंतु, भावयंतु। भावेहि, भावय, भावयाहि, भावेथ, भावयथ। भावेमि, भावयामि, भावेम, भावयाम। भावयतं, भावयंतं। กมฺเม ภาวียตํ, ภาวียตุ, ภาวียนฺตุ. कर्मवाच्य में - भावियतं, भावियतु, भावियन्तु। ภาเวยฺย, ภาวเย, ภาวเยยฺย, ภาเวยฺยุํ, ภาวเยยฺยุํ. ภาเวยฺยาสิ, ภาวเยยฺยาสิ, ภาเวยฺยาถ, ภาวเยยฺยาถ. ภาเวยฺยามิ, ภาวเยยฺยามิ, ภาเวยฺยาม, ภาวเยยฺยาม. ภาเวถ, ภาวเยถ, ภาเวรํ, ภาวเยรํ. भावेय्य, भावये, भावयेय्य, भावेय्युं, भावयेय्युं। भावेय्यासि, भावयेय्यासि, भावेय्याथ, भावयेय्याथ। भावेय्यामि, भावयेय्यामि, भावेय्याम, भावयेय्याम। भावेथ, भावयेथ, भावेरं, भावयेरं। กมฺเม ภาวีเยยฺย, ภาวีเยยฺยุํ. कर्मवाच्य में - भावियेय्य, भावियेय्युं। อชฺชตนิยํ ‘‘สตฺตมชฺชตนิมฺหี’’ติ โยควิภาเคน การิตนฺตาปิ ทีฆโต สการาคโม. अद्यतनी (लुङ् लकार) में 'सत्तमज्जतनिमि' इस योग-विभाग से कारित-प्रत्ययान्त (प्रेरणार्थक) दीर्घ के बाद भी 'स' कार का आगम होता है। อภาเวสิ, ภาเวสิ, อภาวยิ, ภาวยิ, อภาเวสุํ, ภาเวสุํ, อภาวยึสุ, ภาวยึสุ, อภาวยุํ, ภาวยุํ. อภาเวสิ, อภาวยสิ, อภาวิตฺถ, อภาวยิตฺถ. อภาเวสึ, ภาเวสึ, อภาวยึ, ภาวยึ, อภาวิมฺห, อภาวยิมฺห. अभावेसि, भावेसि, अभावयि, भावयि, अभावेसुं, भावेसुं, अभावयिंसु, भावयिंसु, अभावयुं, भावयुं। अभावेसि, अभावयसि, अभावित्थ, अभावयित्थ। अभावेसिं, भावेसिं, अभावयिं, भावयिं, अभाविम्ह, अभावयिम्ह। กมฺเม อภาวียิตฺถ, อภาวียิ. कर्मवाच्य में - अभावियित्थ, अभावियि। ภาเวสฺสติ, ภาวยิสฺสติ, ภาเวสฺสนฺติ, ภาวยิสฺสนฺติ. ภาเวสฺสสิ, ภาวยิสฺสสิ, ภาวิสฺสถ, ภาวยิสฺสถ. ภาเวสฺสามิ, ภาวยิสฺสามิ, ภาเวสฺสาม, ภาวยิสฺสาม. भावेस्सति, भावयिस्सति, भावेस्सन्ति, भावयिस्सन्ति। भावेस्ससि, भावयिस्ससि, भाविस्सथ, भावयिस्सथ। भावेस्सामि, भावयिस्सामि, भावेस्साम, भावयिस्साम। กมฺเม ภาวียิสฺสเต, ภาวียิสฺสนฺเต. ภาวียิสฺสติ, ภาวียิสฺสนฺติ. कर्मवाच्य में - भावियिस्सते, भावियिस्सन्ते। भावियिस्सति, भावियिस्सन्ति। อภาวิสฺส, อภาวยิสฺส, อภาวิสฺสํสุ, อภาวยิสฺสํสุ. กมฺเม อภาวียิสฺสถ, อภาวียิสฺส อิจฺจาทิ. अभाविस्स, अभावयिस्स, अभाविस्सुं, अभावयिस्सुं। कर्मवाच्य में - अभावियिस्सथ, अभावियिस्स इत्यादि। ตถา [Pg.332] โย โกจิ ปจติ, ตมญฺโญ ‘‘ปจาหิ ปจาหิ’’ อิจฺเจวํ พฺรวีติ, อถ วา ปจนฺตํ ปโยเชติ, ปจิตุํ วา ปโยเชตีติ อตฺเถ วุตฺตนเยน เณ ณยาทโย, อการสฺสากาโร วุทฺธิ, เสสํ เนยฺยํ. उसी प्रकार जो कोई पकाता है, उसे दूसरा 'पकाओ, पकाओ' ऐसा कहता है, अथवा पकाते हुए को प्रेरित करता है, या पकाने के लिए प्रेरित करता है - इस अर्थ में कहे गए नियम के अनुसार 'णे', 'णय' आदि प्रत्यय होते हैं, अकार की आकार वृद्धि होती है, शेष समझने योग्य है। โส เทวทตฺตํ โอทนํ ปาเจติ, ปาเจนฺติ. ปาเจสิ, ปาเจถ. ปาเจมิ, ปาเจม. ปาจยติ, ปาจยนฺติ. ปาจยสิ, ปาจยถ. ปาจยามิ, ปาจยาม. ณาเปณาปเยสุ ปน โส ปุริโส ตํ ปุริสํ โอทนํ ปาจาเปติ, ปาจาเปนฺติ. ปาจาปยติ, ปาจาปยนฺติ. वह देवदत्त से भात पकवाता है (पाचेति), वे पकवाते हैं (पाचेन्ति)। पाचेसि, पाचेथ। पाचेमि, पाचेम। पाचयति, पाचयन्ति। पाचयसि, पाचयथ। पाचय्यामि, पाचय्याम। 'णापे' और 'णापय' प्रत्ययों में - वह पुरुष उस पुरुष से भात पकवाता है (पाचापेति), वे पकवाते हैं (पाचापेन्ति)। पाचापयति, पाचापयन्ति। กมฺเม โส โอทนํ ปาจียติ เตน, ปาจยียติ, ปาจาปียติ, ปาจาปยียติ. कर्मवाच्य में - उसके द्वारा वह भात पकवाया जाता है (पाचीयति), पाचयीयति, पाचापीयति, पाचापयीयति। ตถา ปาเจตุ, ปาจยตุ, ปาจาเปตุ, ปาจาปยตุ. ปาจียตํ, ปาจียตุ, ปาจยียตํ, ปาจยียตุ, ปาจาปียตํ, ปาจาปียตุ, ปาจาปยียตํ, ปาจาปยียตุ. ปาเจยฺย, ปาจเยยฺย, ปาจาเปยฺย, ปาจาปเยยฺย. ปาจีเยยฺย, ปาจีเยยฺยุํ. อปาเจสิ, อปาจยิ, อปาจาเปสิ, อปาจาปยิ. ปาเจสฺสติ, ปาจยิสฺสติ, ปาจาเปสฺสติ, ปาจาปยิสฺสติ. อปาจิสฺส, อปาจยิสฺส, อปาจาปิสฺส, อปาจาปยิสฺส อิจฺจาทิ. उसी प्रकार पाचेतु, पाचयतु, पाचापेतु, पाचापयतु। पाचीयतं, पाचीयतु, पाचयीयतं, पाचयीयतु, पाचापीयतं, पाचापीयतु, पाचापयीयतं, पाचापयीयतु। पाचेय्य, पाचय्येय्य, पाचापेय्य, पाचापयेय्य। पाचीयेय्य, पाचीयेय्युं। अपाचेसि, अपाचयि, अपाचापेसि, अपाचापयि। पाचेस्सति, पाचयिस्सति, पाचापेस्सति, पाचापयिस्सति। अपाचिस्स, अपाचयिस्स, अपाचापिस्स, अपाचापयिस्स इत्यादि। คจฺฉนฺตํ, คนฺตุํ วา ปโยเชตีติ อตฺเถ เณ ณยาทโย, วุทฺธิยํ สมฺปตฺตายํ – जाते हुए को, या जाने के लिए प्रेरित करता है - इस अर्थ में 'णे', 'णय' आदि प्रत्यय होने पर, वृद्धि प्राप्त होने पर - ‘‘อสํโยคนฺตสฺส วุทฺธิ การิเต’’ติ วตฺตเต. 'असंयोगन्तस्स वुद्धि कारिते' (कारित प्रत्यय परे होने पर असंयोगान्त धातु की वृद्धि होती है) यह सूत्र प्रवृत्त होता है। ๕๔๒. ฆฏาทีนํ วา. ५४२. 'घटादीनं वा' (घटादि धातुओं की विकल्प से वृद्धि होती है)। ฆฏาทีนํ ธาตูนํ อสํโยคนฺตานํ วุทฺธิ โหติ วา การิเตติ เอตฺถ วาคฺคหเณน วุทฺธิ น โหติ, ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. कारित प्रत्यय परे होने पर असंयोगान्त घटादि धातुओं की वृद्धि विकल्प से होती है; यहाँ 'वा' ग्रहण से वृद्धि नहीं होती है, यह 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है। โส [Pg.333] ตํ ปุริสํ คามํ คเมติ, คมยติ, คจฺฉาเปติ, คจฺฉาปยติ. โส คามํ คมียติ เตน, คมยียติ, คจฺฉาปียติ, คจฺฉาปยียติ อิจฺจาทิ. สพฺพตฺถ โยเชตพฺพํ. เอวํ อุปริปิ. वह उस पुरुष को गाँव भेजता है (गमेति, गमयति, गच्छापेति, गच्छापयति)। उसके द्वारा गाँव भेजा जाता है (गमीयति, गमयीयति, गच्छापीयति, गच्छापयीयति) इत्यादि। सर्वत्र इसी प्रकार जोड़ना चाहिए। आगे भी इसी तरह। ฆฏ อีหายํ, ฆฏนฺตํ ปโยชยติ, ฆเฏติ, ฆฏาทีนํ วาติ น วุทฺธิ, ฆฏยติ, ฆฏาเปติ, ฆฏาปยติ. 'घट' चेष्टा के अर्थ में; चेष्टा करते हुए को प्रेरित करता है - घटेति; 'घटादीनं वा' इस सूत्र से वृद्धि नहीं होती - घटयति, घटापेति, घटापयति। ‘‘การิเต’’ติ วตฺตเต. 'कारिते' (कारित प्रत्यय परे होने पर) यह अनुवृत्ति आती है। ๕๔๓. คุห ทุสานํ ทีฆํ. ५४३. 'गुह दुसानं दीघं' (गुह और दुस धातुओं का दीर्घ होता है)। คุหทุสอิจฺเจเตสํ ธาตูนํ สโร ทีฆมาปชฺชเต การิเต ปเร, วุทฺธาปวาโทยํ. कारित प्रत्यय परे होने पर 'गुह' और 'दुस' इन धातुओं का स्वर दीर्घ हो जाता है; यह वृद्धि का अपवाद है। คุห สํวรเณ, คุหิตุํ ปโยชยติ คูหยติ, คูหยนฺติ. ทุส อปฺปีติมฺหิ, ทุสฺสนฺตํ ปโยชยติ ทูสยติ, ทูสยนฺติ อิจฺจาทิ. 'गुह' संवरण (छिपाने) के अर्थ में; छिपाने के लिए प्रेरित करता है - गूहयति, गूहयन्ति। 'दुस' अप्रीति (द्वेष) के अर्थ में; द्वेष करते हुए को प्रेरित करता है - दूसयति, दूसयन्ति इत्यादि। ตถา อิจฺฉนฺตํ ปโยชยติ อิจฺฉาเปติ, อิจฺฉาปยติ, เอเสติ, เอสยติ. นิยจฺฉนฺตํ ปโยชยติ นิยาเมติ, นิยามยติ. อาสนฺตํ ปโยชยติ อาเสติ, อาสยติ, อจฺฉาเปติ, อจฺฉาปยติ. ลภนฺตํ ปโยชยติ ลาเภติ, ลาภยติ. วจนฺตํ ปโยชยติ วาเจติ, วาจยติ, วาจาเปติ, วาจาปยติ. เอวํ วาเสติ, วาสยติ, วาสาเปติ, วาสาปยติ. วาเหติ, วาหยติ, วาหาเปติ, วาหาปยติ. ชีเรติ, ชีรยติ, ชีราเปติ, ชีราปยติ. มาเรติ, มารยติ, มาราเปติ, มาราปยติ. ทสฺเสติ, ทสฺสยติ อิจฺจาทิ. उसी प्रकार इच्छा करते हुए को प्रेरित करता है - इच्छापेति, इच्छापयति, एसेति, एसयति। नियन्त्रण करते हुए को प्रेरित करता है - नियामेति, नियामयति। बैठे हुए को प्रेरित करता है - आसेति, आसयति, अच्छापेति, अच्छापयति। प्राप्त करते हुए को प्रेरित करता है - लाभेति, लाभयति। बोलते हुए को प्रेरित करता है - वाचेति, वाचयति, वाचापेति, वाचापयति। इसी प्रकार वासेति, वासयति, वासापेति, वासापयति। वाहेति, वाहयति, वाहापेति, वाहापयति। जीरेति, जीरयति, जीरापेति, जीरापयति। मारेति, मारयति, मारापेति, मारापयति। दस्सेति, दस्सयति इत्यादि। ตถา ตุทนฺตํ ปโยชยติ โตเทติ, โตทยติ, โตทาเปติ, โตทาปยติ. ปวิสนฺตํ ปโยชยติ, ปวิสิตุํ วา ปเวเสติ, ปเวสยติ, ปเวสาเปติ[Pg.334], ปเวสาปยติ. อุทฺทิสนฺตํ ปโยชยติ อุทฺทิสาเปติ, อุทฺทิสาปยติ. ปโหนฺตํ ปโยชยติ ปหาเวติ, ปหาวยติ. สยนฺตํ ปโยชยติ สาเยติ, สายยติ, สายาเปติ, สายาปยติ. เอตฺถ เอการสฺส อายาเทโส, สยาเปติ, สยาปยติ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ณาเปณาปเยสุ อายาเทสสฺส รสฺสตฺตํ. นยนฺตํ ปโยชยติ นยาเปติ, นยาปยติ. ปติฏฺฐนฺตํ ปโยชยติ ปติฏฺฐาเปติ, ปติฏฺฐาปยติ, ปติฏฺฐเปติ วา. उसी प्रकार व्यथित करते हुए को प्रेरित करता है - तोदेति, तोदयति, तोदापेति, तोदापयति। प्रवेश करते हुए को, या प्रवेश करने के लिए प्रेरित करता है - पवेसेति, पवेसयति, पवेसापेति, पवेसापयति। उद्दिष्ट करते हुए को प्रेरित करता है - उद्दिसापेति, उद्दिसापयति। समर्थ होते हुए को प्रेरित करता है - पहावेति, पहावयति। सोते हुए को प्रेरित करता है - सायेति, साययति, सायापेति, सायापयति। यहाँ एकार को 'आय' आदेश होता है; सयापेति, सयापयति में 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'णापे' और 'णापय' प्रत्ययों में 'आय' आदेश का ह्रस्व हो जाता है। ले जाते हुए को प्रेरित करता है - नयापेति, नयापयति। प्रतिष्ठित होते हुए को प्रेरित करता है - पतिट्ठापेति, पतिट्ठापयति, अथवा पतिट्ठापेति। หนนฺตํ ปโยชยตีติ อตฺเถ เณณยาทโย. मारते हुए को प्रेरित करता है - इस अर्थ में 'णे', 'णय' आदि प्रत्यय होते हैं। ‘‘ณมฺหี’’ติ วตฺตเต. 'णम्हि' (णकार संज्ञक प्रत्यय परे होने पर) यह अनुवृत्ति आती है। ๕๔๔. หนสฺส ฆาโต. ५४४. 'हनस्स घातो' (हन धातु को घात आदेश होता है)। หนอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส ฆาตาเทโส โหติ ณการวติ การิตปฺปจฺจเย ปเร. ฆาเตติ, ฆาตยติ, ฆาตาเปติ, ฆาตาปยติ, ‘‘วโธ วา สพฺพตฺถา’’ติ วธาเทเส วเธติ, วธาเปติ. 'हन' इस धातु को णकार वाले कारित प्रत्यय के परे होने पर 'घात' आदेश होता है - घातेति, घातयति, घातापेति, घातापयति; 'वधो वा सब्बत्थ' इस सूत्र से वध आदेश होने पर - वधेति, वधापेति। ชุโหนฺตํ ปโยชยติ ชุหาเวติ, ชุหาวยติ. ชหนฺตํ ปโยชยติ ชหาเปติ, ชหาปยติ, หาเปติ, หาปยติ. ททนฺตํ ปโยชยติ ทาเปติ, ทาปยติ. ปิทหนฺตํ ปโยชยติ ปิธาเปติ, ปิธาปยติ, ปิทหาเปติ, ปิทหาปยติ. हवन करते हुए को प्रेरित करता है - जुहावेति, जुहावयति। छोड़ते हुए को प्रेरित करता है - जहापेति, जहापयति, हापेति, हापयति। देते हुए को प्रेरित करता है - दापेति, दापयति। ढकते हुए को प्रेरित करता है - पिधापेति, पिधापयति, पिदहापेति, पिदहापयति। รุนฺธนฺตํ ปโยชยติ โรเธติ, โรธยติ, โรธาเปติ, โรธาปยติ. ฉินฺทนฺตํ ปโยชยติ เฉเทติ, เฉทยติ, เฉทาเปติ, เฉทาปยติ. ยุญฺชนฺตํ ปโยชยติ [Pg.335] โยเชติ, โยชยติ, โยชาเปติ, โยชาปยติ. ภุญฺชนฺตํ ปโยชยติ โภเชติ, โภชยติ, โภชาเปติ, โภชาปยติ. มุญฺจนฺตํ ปโยชยติ โมเจติ, โมจยติ, โมจาเปติ, โมจาปยติ. रोकने वाले को प्रेरित करता है - रोधेति, रोधयति, रोधापेति, रोधापयति। काटने वाले को प्रेरित करता है - छेदेति, छेदयति, छेदापेति, छेदापयति। जोड़ने वाले को प्रेरित करता है - योजेति, योजयति, योजापेति, योजापयति। भोजन करने वाले को प्रेरित करता है - भोजेति, भोजयति, भोजापेति, भोजापयति। मुक्त करने वाले को प्रेरित करता है - मोचेति, मोचयति, मोचापेति, मोचापयति। ทิพฺพนฺตํ ปโยชยติ เทเวติ, เทวยติ. อุปฺปชฺชนฺตํ ปโยชยติ อุปฺปาเทติ, อุปฺปาทยติ. พุชฺฌนฺตํ ปโยชยติ โพเธติ, โพธยติ. ‘‘ทาธานฺตโต โย กฺวจี’’ติ ยการาคโม, พุชฺฌาเปติ, พุชฺฌาปยติ. ตุสฺสนฺตํ ปโยชยติ โตเสติ, โตสยติ, โตสาเปติ, โตสาปยติ. สมฺมนฺตํ ปโยชยติ สเมติ, สมยติ, ฆฏาทิตฺตา น วุทฺธิ. กุปฺปนฺตํ ปโยชยติ โกเปติ, โกปยติ. ชายนฺตํ ปโยชยติ ชเนติ, ชนยติ, ฆฏาทิตฺตา น วุทฺธิ. क्रीड़ा करने वाले को प्रेरित करता है - देवेति, देवयति। उत्पन्न होने वाले को प्रेरित करता है - उप्पादेति, उप्पादयति। समझने वाले को प्रेरित करता है - बोधेति, बोधयति। 'दाधान्ततो यो क्वचि' सूत्र से 'य' कार का आगम होकर - बुज्झापेति, बुज्झापयति। संतुष्ट होने वाले को प्रेरित करता है - तोसेति, तोसयति, तोसापेति, तोसापयति। शांत होने वाले को प्रेरित करता है - समेति, समयति, 'घटादि' होने के कारण वृद्धि नहीं होती। क्रोध करने वाले को प्रेरित करता है - कोपेति, कोपयति। जन्म लेने वाले को प्रेरित करता है - जनेति, जनयति, 'घटादि' होने के कारण वृद्धि नहीं होती। สุณนฺตํ ปโยชยติ ธมฺมํ สาเวติ, สาวยติ. ปาปุณนฺตํ ปโยชยติ ปาเปติ, ปาปยติ. सुनने वाले को प्रेरित करता है - धर्म सुनाता है (सावेति, सावयति)। प्राप्त करने वाले को प्रेरित करता है - प्रापेति, प्रापयति। วิกฺกิณนฺตํ ปโยชยติ วิกฺกายาเปติ, วิกฺกายาปยติ. ชินนฺตํ ปโยชยติ ชยาเปติ, ชยาปยติ. ชานนฺตํ ปโยชยติ ญาเปติ, ญาปยติ. คณฺหนฺตํ ปโยชยติ คาเหติ, คาหยติ, คาหาเปติ, คาหาปยติ, คณฺหาเปติ, คณฺหาปยติ. बेचने वाले को प्रेरित करता है - विक्कायापेति, विक्कायापयति। जीतने वाले को प्रेरित करता है - जयापेति, जयापयति। जानने वाले को प्रेरित करता है - ज्ञापेति, ज्ञापयति। ग्रहण करने वाले को प्रेरित करता है - गाहेति, गाहयति, गाहापेति, गाहापयति, गण्हापेति, गण्हापयति। วิตนนฺตํ ปโยชยติ วิตาเนติ, วิตานยติ. โย โกจิ กโรติ, ตมญฺโญ ‘‘กโรหิ กโรหิ’’อิจฺเจวํ พฺรวีติ, กโรนฺตํ ปโยชยติ, กาตุํ วา กาเรติ, การยติ, การาเปติ, การาปยติ อิจฺจาทิ. विस्तार करने वाले को प्रेरित करता है - वितानेति, वितानयति। जो कोई करता है, उसे दूसरा 'करो, करो' ऐसा कहता है, करने वाले को प्रेरित करता है, अथवा करने के लिए - कारेति, कारयति, कारापेति, कारापयति इत्यादि। โจเรนฺตํ ปโยชยติ โจราเปติ, โจราปยติ. จินฺเตนฺตํ ปโยชยติ จินฺตาเปติ, จินฺตาปยติ[Pg.336], ปูเชนฺตํ ปโยชยติ ปูชาเปติ, ปูชาปยติ อิจฺจาทิ. สพฺพตฺถ สุโพธํ. चोरी करने वाले को प्रेरित करता है - चोरापेति, चोरापयति। चिंतन करने वाले को प्रेरित करता है - चिंतापेति, चिंतापयति। पूजा करने वाले को प्रेरित करता है - पूजापेति, पूजापयति इत्यादि। सब जगह सुबोध है। ธาตุปฺปจฺจยโต จาปิ, การิตปฺปจฺจยา สิยุํ; สการิเตหิ ยุณฺวูนํ, ทสฺสนญฺเจตฺถ ญาปกํ. धातु प्रत्ययों से भी कारित प्रत्यय होते हैं; यहाँ सकारितों (कारित प्रत्यय युक्त धातुओं) से 'यु' और 'ण्वु' का दर्शन ज्ञापक है। เตน ติติกฺขนฺตํ ปโยชยติ ติติกฺเขติ, ติติกฺขาเปติ. ติกิจฺฉนฺตํ ปโยชยติ ติกิจฺเฉติ, ติกิจฺฉยติ, ติกิจฺฉาเปติ, ติกิจฺฉาปยติ. เอวํ พุภุกฺเขติ, พุภุกฺขยติ, พุภุกฺขาเปติ, พุภุกฺขาปยติ, ปพฺพตายนฺตํ ปโยชยติ ปพฺพตายยติ. ปุตฺตียยติ อิจฺจาทิปิ สิทฺธํ ภวติ. उससे, तितिक्षा (सहन) करने वाले को प्रेरित करता है - तितिक्खेति, तितिक्खापेति। चिकित्सा करने वाले को प्रेरित करता है - तिकिच्छेति, तिकिच्छयति, तिकिच्छापेति, तिकिच्छापयति। इसी प्रकार बुभुक्खेति, बुभुक्खयति, बुभुक्खापेति, बुभुक्खापयति। पर्वत के समान आचरण करने वाले को प्रेरित करता है - पब्बताययति। पुत्तीययति इत्यादि भी सिद्ध होते हैं। ธาตุปฺปจฺจยนฺตนโย. धातु-प्रत्ययान्त नय (विधि)। สาสนตฺถํ สมุทฺทิฏฺฐํ, อาขฺยาตํ สกพุทฺธิยา; พาหุสจฺจพเลนีทํ, จินฺตยนฺตุ วิจกฺขณา. शासन (बुद्ध वचन) के अर्थ के लिए अपनी बुद्धि से आख्यात (क्रिया) का निर्देश किया गया है; विद्वान लोग बहुश्रुतता के बल से इस पर विचार करें। ภวติ ติฏฺฐติ เสติ, อโหสิ เอวมาทโย; อกมฺมกาติ วิญฺเญยฺยา, กมฺมลกฺขณวิญฺญุนา. 'भवति' (होता है), 'तिट्ठति' (खड़ा होता है), 'सेति' (सोता है), 'अहोसि' (हुआ) इत्यादि को कर्म के लक्षणों के ज्ञाताओं द्वारा अकर्मक समझना चाहिए। อกมฺมกาปิ เหตฺวตฺถ-ปฺปจฺจยนฺตา สกมฺมกา; ตํ ยถา ภิกฺขุ ภาเวติ, มคฺคํ ราคาทิทูสกนฺติ. अकर्मक धातुएँ भी हेतु-अर्थ वाले प्रत्यय (प्रेरणार्थक) लगने पर सकर्मक हो जाती हैं; जैसे - 'भिक्षु राग आदि को दूषित करने वाले मार्ग की भावना करता है'। อิติ ปทรูปสิทฺธิยํ อาขฺยาตกณฺโฑ इस प्रकार पदरूपसिद्धि में आख्यात काण्ड। ฉฏฺโฐ. छठा। ๗. กิพฺพิธานกณฺฑ ७. कृदन्त विधान काण्ड (कृदन्त प्रकरण)। เตกาลิก त्रैकालिक (तीनों कालों से संबंधित)। กิจฺจปฺปจฺจยนฺตนย कृत्य प्रत्ययान्त नय (विधि)। อถ ธาตูหิเยว ภาวกมฺมกตฺตุกรณาทิสาธนสหิตํ กิพฺพิธานมารภียเต. अब धातुओं से ही भाव, कर्म, कर्ता, करण आदि साधनों सहित कृदन्त विधान आरम्भ किया जाता है। ตตฺถ กิจฺจกิตกวเสน ทุวิธา หิ ปจฺจยา, เตสุ กิจฺจสญฺญาย ปฐมํ วุตฺตตฺตา, กิจฺจานมปฺปกตฺตา จ กิจฺจปฺปจฺจยา ตาว วุจฺจนฺเต. वहाँ कृत्य और कितक (कृत्) के भेद से प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं, उनमें कृत्य संज्ञा का पहले कथन होने के कारण और कृत्यों की संख्या कम होने के कारण, पहले कृत्य प्रत्यय कहे जाते हैं। ภู สตฺตายํ, ‘‘ภูยเต, อภวิตฺถ, ภวิสฺสเต วา เทวทตฺเตนา’’ติ วิคฺคเห – 'भू' सत्ता (होने) के अर्थ में, 'देवदत्त के द्वारा हुआ जाता है, हुआ, या होगा' - इस विग्रह में - ‘‘ธาตุยา กมฺมาทิมฺหิ โณ’’ติ อิโต ‘‘ธาตุยา’’ติ สพฺพตฺถ ปจฺจยาทิวิธาเน วตฺตเต, ‘‘ปรา, ปจฺจยา’’ติ จ อธิกาโร. 'धातुया कम्मादिम्हि णो' इस सूत्र से 'धातुया' (धातु से) यह पद सब जगह प्रत्यय आदि के विधान में अनुवृत्त होता है, और 'परा' (बाद में) तथा 'पच्चया' (प्रत्यय) का अधिकार है। ๕๔๕. ภาวกมฺเมสุ ตพฺพานียา. ५४५. भाव और कर्म में 'तब्ब' और 'अनीय' प्रत्यय होते हैं। ภาวกมฺมอิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ สพฺพธาตูหิ ตพฺพ อนียอิจฺเจเต ปจฺจยา ปรา โหนฺติ. โยควิภาเคน อญฺญตฺถาปิ. भाव और कर्म इन अर्थों में सभी धातुओं से 'तब्ब' और 'अनीय' ये प्रत्यय बाद में होते हैं। योग-विभाग के द्वारा अन्य अर्थों में भी होते हैं। ตตฺถ – वहाँ - อกมฺมเกหิ ธาตูหิ, ภาเว กิจฺจา ภวนฺติ เต; สกมฺมเกหิ กมฺมตฺเถ, อรหสกฺกตฺถทีปกา. अकर्मक धातुओं से वे कृत्य प्रत्यय भाव अर्थ में होते हैं; सकर्मक धातुओं से कर्म अर्थ में, जो 'अर्ह' (योग्य) और 'शक्य' (संभव) अर्थों को प्रकट करते हैं। เต จ – और वे - ๕๔๖. ณาทโย [Pg.338] เตกาลิกา. ५४६. 'ण' आदि प्रत्यय त्रैकालिक होते हैं। ติกาเล นิยุตฺตา เตกาลิกา, เย อิธ ตติเย ธาตฺวาธิกาเร วิหิตา อนิทฺทิฏฺฐกาลา ณาทโย ปจฺจยา, เต เตกาลิกา โหนฺตีติ ปริภาสโต กาลตฺตเยปิ โหนฺติ. तीनों कालों में नियुक्त त्रैकालिक कहलाते हैं; जो यहाँ तीसरे धातु-अधिकार में विहित अनिर्दिष्ट काल वाले 'ण' आदि प्रत्यय हैं, वे 'त्रैकालिक होते हैं' इस परिभाषा से तीनों कालों में होते हैं। สีหคติยา ‘‘กฺวจี’’ติ วตฺตเต. सिंहगति (न्याय) से 'क्वचि' पद की अनुवृत्ति होती है। ๕๔๗. ยถาคมมิกาโร. ५४७. आगम के अनुसार 'इ' कार होता है। ยถาคมํ ยถาปโยคํ ชินวจนานุปโรเธน ธาตูหิ ปโร อิการาคโม โหติ กฺวจิ พฺยญฺชนาทิเกสุ กิจฺจกิตกปฺปจฺจเยสุ, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ วุทฺธิ, ‘‘โอ อว สเร’’ติ อวาเทโส, ‘‘นเย ปรํ ยุตฺเต’’ติ ปรํ เนตพฺพํ. आगम के अनुसार, प्रयोग के अनुसार, जिनवचन (बुद्ध के वचनों) के विरोध के बिना, धातुओं के बाद कहीं-कहीं व्यञ्जन आदि कृत्य और कितक प्रत्ययों के होने पर 'इ' कार का आगम होता है। 'अञ्ञेसु च' सूत्र से वृद्धि होती है, 'ओ अव सरे' सूत्र से 'अव' आदेश होता है, और 'नये परं युत्ते' सूत्र से वर्णों को मिलाना चाहिए। ๕๔๘. เต กิจฺจา. ५४८. वे 'कृत्य' (प्रत्यय) हैं। เย อิธ วุตฺตา ตพฺพานียณฺย เตยฺย ริจฺจปฺปจฺจยา, เต กิจฺจสญฺญา โหนฺตีติ เวทิตพฺพา. ตโต ‘‘อญฺเญ กิติ’’ติ วจนโต กิจฺจปฺปจฺจยานมกิตกตฺตา นามพฺยปเทเส อสมฺปตฺเต ‘‘ตทฺธิตสมาสกิตกา นามํวาตเวตุนาทีสุ จา’’ติ เอตฺถ จคฺคหเณน นามพฺยปเทโส, ตโต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. ภาเว ภาวสฺเสกตฺตา เอกวจนเมว, ‘‘สิ’’นฺติ อมาเทโส. ภวิตพฺพํ ภวตา ปญฺเญน, ภวนียํ. यहाँ जो 'तब्ब', 'अनीय', 'ण्य', 'तेय्य' और 'रिच्च' प्रत्यय कहे गए हैं, उन्हें 'कृत्य' संज्ञा वाला जानना चाहिए। उसके बाद 'अञ्ञे किति' इस वचन से कृत्य प्रत्ययों के अ-कितक होने के कारण 'नाम' संज्ञा प्राप्त न होने पर, 'तद्धितसमासकितका नामंवातवेतुनादीसु च' इस सूत्र में 'च' के ग्रहण से 'नाम' संज्ञा होती है, फिर 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। भाववाच्य में भाव के एकत्व के कारण केवल एकवचन ही होता है, 'सि' को 'अं' आदेश होता है। जैसे— 'भवितब्बं भवता पञ्ञेन' (आपके द्वारा प्रज्ञावान होना चाहिए), 'भवनीयं'। อิธ พฺยญฺชนาทิตฺตาภาวา อนุวตฺติตกฺวจิคฺคหเณน อิการาคมาภาโว. ภาเว กิจฺจปฺปจฺจยนฺตา นปุํสกา. กมฺเม ติลิงฺคา. यहाँ व्यञ्जन आदि न होने के कारण अनुवृत्त 'क्वचि' के ग्रहण से 'इ' कार के आगम का अभाव होता है। भाववाच्य में कृत्य प्रत्ययान्त शब्द नपुंसक लिंग में होते हैं। कर्मवाच्य में तीनों लिंगों में होते हैं। กมฺมนิ อภิปุพฺโพ, อภิภูยเต, อภิภูยิตฺถ, อภิภูยิสฺสเตติ อภิภวิตพฺโพ โกโธ ปณฺฑิเตน, อภิภวิตพฺพา [Pg.339] ตณฺหา, อภิภวิตพฺพํ ทุกฺขํ, เอวํ อภิภวนีโย, อภิภวนียา, อภิภวนียํ, ปุริส กญฺญา จิตฺตสทฺทนเยน เนตพฺพํ, เอวํ สพฺพตฺถ. कर्मवाच्य में 'अभि' उपसर्ग पूर्वक (भू धातु)— 'अभिभूयते', 'अभिभूयित्थ', 'अभिभूयिस्सते' के अर्थ में— 'अभिभवितब्बो कोधो पण्डितेन' (पण्डित के द्वारा क्रोध को जीतना चाहिए), 'अभिभवितब्बा तण्हा', 'अभिभवितब्बं दुक्खं'। इसी प्रकार 'अभिभवनीयो', 'अभिभवनीया', 'अभिभवनीयं'— इन्हें 'पुरिस', 'कञ्ञा' और 'चित्त' शब्दों के समान (तीनों लिंगों में) ले जाना चाहिए, इसी प्रकार सर्वत्र। เอตฺถ หิ – क्योंकि यहाँ— ตพฺพาทีเหว กมฺมสฺส, วุตฺตตฺตาว ปุนตฺตนา; วตฺตพฺพสฺส อภาวา น, ทุติยา ปฐมา ตโต. 'तब्ब' आदि प्रत्ययों के द्वारा ही कर्म के कह दिए जाने के कारण, पुनः उसे कहने की आवश्यकता न होने से द्वितीया विभक्ति नहीं होती, बल्कि प्रथमा विभक्ति होती है। อาส อุปเวสเน, อาสียิตฺถ, อาสียเต, อาสียิสฺสเตติ อาสิตพฺพํ ตยา, อาสนียํ. กมฺเม อุปาสิตพฺโพ ครุ, อุปาสนีโย. 'आस' धातु बैठने के अर्थ में— 'आसीयित्थ', 'आसीयते', 'आसीयिस्सते' के अर्थ में— 'आसितब्बं तया' (तुम्हारे द्वारा बैठना चाहिए), 'आसनीयं'। कर्मवाच्य में— 'उपासितब्बो गरु' (गुरु की उपासना करनी चाहिए), 'उपासनीयो'। สี สเย, อสียิตฺถ, สียเต, สียิสฺสเตติ สยิตพฺพํ ภวตา, สยนียํ, ‘‘เอ อยา’’ติ อยาเทโส, อติสยิตพฺโพ ปโร, อติสยนีโย. 'सी' धातु सोने के अर्थ में— 'असीयित्थ', 'सीयते', 'सीयिस्सते' के अर्थ में— 'सयितब्बं भवता' (आपके द्वारा सोना चाहिए), 'सयनीयं'। 'ए अया' सूत्र से 'अय' आदेश होता है। 'अतिसयितब्बो परो', 'अतिसयनीयो'। ปท คติมฺหิ, อุปฺปชฺชิตฺถ, อุปฺปชฺชเต, อุปฺปชฺชิสฺสเตติ อุปฺปชฺชิตพฺพํ เตน, อุปฺปชฺชนียํ, เอตฺถ จ ‘‘กตฺตรี’’ติ อธิการํ วินา ‘‘ทิวาทิโต โย’’ติ วินาธิการโยควิภาเคน ยปฺปจฺจโย, ‘‘ตสฺส จวคฺคยการ’’อิจฺจาทินา จวคฺโค, ‘‘ปรทฺเวภาโว ฐาเน’’ติ ทฺวิภาโว, ปฏิปชฺชิตพฺโพ มคฺโค, ปฏิปชฺชนีโย. 'पद' धातु गति के अर्थ में— 'उप्पज्जित्थ', 'उप्पज्जते', 'उप्पज्जिस्सते' के अर्थ में— 'उप्पज्जितब्बं तेन' (उसके द्वारा उत्पन्न होना चाहिए), 'उप्पज्जनीयं'। यहाँ 'कत्तरि' के अधिकार के बिना 'दिवादितो यो' इस सूत्र के योग-विभाग से 'य' प्रत्यय होता है। 'तस्स चवग्गयकार' इत्यादि से च-वर्ग आदेश होता है, 'परद्वेभावो ठाने' से द्वित्व होता है। 'पटिपज्जितब्बो मग्गो' (मार्ग पर चलना चाहिए), 'पटिपज्जनीयो'। พุธ อวคมเน, อพุชฺฌิตฺถ, พุชฺฌเต, พุชฺฌิสฺสเตติ พุชฺฌิตพฺโพ ธมฺโม, พุชฺฌนีโย. 'बुध' धातु जानने के अर्थ में— 'अबुज्झित्थ', 'बुज्झते', 'बुज्झिस्सते' के अर्थ में— 'बुज्झितब्बो धम्मो' (धर्म को जानना चाहिए), 'बुज्झनीयो'। สุ สวเณ, อสูยิตฺถ, สูยเต, สูยิสฺสเตติ โสตพฺโพ ธมฺโม, อิธ ยถาคมคฺคหเณน อิการาคมาภาโว, สุณิตพฺโพ, ‘‘สฺวาทิโต ณุ ณา อุณา จา’’ติ วินาธิการโยควิภาเคน ณาปจฺจโย, สวณีโย. 'सु' धातु सुनने के अर्थ में— 'असूयित्थ', 'सूयते', 'सूयिस्सते' के अर्थ में— 'सोतब्बो धम्मो' (धर्म सुनना चाहिए)। यहाँ 'यथागम' के ग्रहण से 'इ' कार के आगम का अभाव होता है। 'सुणितब्बो'— यहाँ 'स्वाधितो णु णा उणा चा' इस सूत्र के योग-विभाग से 'णा' प्रत्यय होता है। 'सवणीयो'। กร กรเณ, กรียิตฺถ, กรียติ, กรียิสฺสตีติ อตฺเถ ตพฺพา’นียา. 'कर' धातु करने के अर्थ में— 'करीयित्थ', 'करीयति', 'करीयिस्सति' के अर्थ में 'तब्ब' और 'अनीय' प्रत्यय होते हैं। ‘‘อนฺตสฺส, กรสฺส, จ, ตตฺต’’นฺติ จ วตฺตเต. 'अन्तस्स', 'करस्स', 'च', 'तत्तं'— इनकी अनुवृत्ति होती है। ๕๔๙. ตุํ [Pg.340] ตุ น ตพฺเพสุ วา. ५४९. 'तुं', 'तु', 'न', 'तब्बेसु वा' (सूत्र)। กรอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส อนฺตภูตสฺส รการสฺส ตการตฺตํ โหติ วา ตุํ ตุ น ตพฺพอิจฺเจเตสุ ปจฺจเยสุ ปเรสุ. กตฺตพฺโพ ภวตา ธมฺโม, กตฺตพฺพา ปูชา, กตฺตพฺพํ กุสลํ, ตตฺตาภาเว ‘‘กโรติสฺสา’’ติ วตฺตมาเน ‘‘ตเวตุนาทีสุ กา’’ติ เอตฺถ อาทิสทฺเทน ตพฺเพปิ กาเทโส, กาตพฺพํ หิตํ. 'कर' इस धातु के अन्त्य 'र' कार को 'त' कार आदेश होता है, विकल्प से, 'तुं', 'तु', 'न', 'तब्ब' इन प्रत्ययों के परे होने पर। 'कत्तब्बो भवता धम्मो' (आपके द्वारा धर्म किया जाना चाहिए), 'कत्तब्बा पूजा', 'कत्तब्बं कुसलं'। 'त' कार आदेश के अभाव में 'करोतिस्सा' की अनुवृत्ति होने पर 'तवेतुनादीसु का' यहाँ 'आदि' शब्द से 'तब्ब' प्रत्यय में भी 'का' आदेश होता है— 'कातब्बं हितं'। ๕๕๐. รหาทิโต ณ. ५५०. 'रहादितो ण' (सूत्र)। รการ หหาราทฺยนฺเตหิ ธาตูหิ ปรสฺส อนานียาทินการสฺส ณกาโร โหติ. อาทิสทฺเทน รมุ อปญาตาทิโตปิ. 'र' कार और 'ह' कार आदि जिनके अन्त में हों, उन धातुओं से परे 'अनीय' आदि के 'न' कार को 'ण' कार होता है। 'आदि' शब्द से 'रमु' और 'अपञ्ञात' आदि से भी। รหาทิโต ปรสฺเสตฺถ, นการสฺส อสมฺภวา; อนานียาทินสฺเสว, สามถฺยายํ ณการตา. यहाँ 'र', 'ह' आदि से परे (प्रत्यय के आदि में) 'न' कार का सम्भव न होने के कारण, सामर्थ्य से 'अनीय' आदि के ही 'न' कार को 'ण' कार होता है। กรณีโย ธมฺโม, กรณารโหติ อตฺโถ, กรณียา, กรณียํ. 'करणीयो धम्मो' (धर्म करने योग्य है—यह अर्थ है), 'करणीया', 'करणीयं'। ภร ภรเณ, ภรียตีติ ภริตพฺโพ, ภรณีโย. 'भर' धातु भरण (पोषण) के अर्थ में— 'भरीयति' के अर्थ में 'भरितब्बो', 'भरणीयो'। คห อุปาทาเน, อคยฺหิตฺถ, คยฺหติ, คยฺหิสฺสตีติ คเหตพฺโพ, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อิการสฺเสกาโร, สงฺคณฺหิตพฺโพ, ‘‘คหาทิโต ปฺปณฺหา’’ติ วินาธิการโยควิภาเคน ณฺหาปจฺจโย, หโลปสรโลปาทิ, สงฺคณฺหณีโย, คหณีโย. 'गह' धातु ग्रहण करने के अर्थ में— 'अगय्हित्थ', 'गय्हति', 'गय्हिस्सति' के अर्थ में 'गहेतब्बो', 'तेसु वुद्धी' इत्यादि से 'इ' कार को 'ए' कार होता है। 'सङ्गिण्हितब्बो'— यहाँ 'गहादितो प्पण्हा' इस सूत्र के योग-विभाग से 'ण्हा' प्रत्यय होता है, ह-लोप, अ-लोप आदि होकर 'सङ्गिण्हणीयो', 'गहणीयो'। อาทิคฺคหเณน รมุ กีฬายํ, รมียิตฺถ, รมียติ, รมียิสฺสตีติ รมิตพฺโพ, รมณีโย วิหาโร. 'आदि' के ग्रहण से 'रमु' धातु क्रीड़ा के अर्थ में— 'रमीयित्थ', 'रमीयति', 'रमीयिस्सति' के अर्थ में 'रमितब्बो', 'रमणीयो विहारो'। อป [Pg.341] ปาปุณเน, อุณาปจฺจโย, ปาปียตีติ ปาปุณิตพฺโพ, ‘‘คุปาทีนญฺจา’’ติ ธาตฺวนฺตสฺส โลโป, ทฺวิตฺตญฺจ, ปตฺตพฺโพ, ปตฺเตยฺโย, ปาปุณณีโย, ปาปณีโย. 'अप' (आप्) धातु प्राप्त करने के अर्थ में, 'उणा' प्रत्यय— 'पापीयति' के अर्थ में 'पापुणितब्बो'। 'गुपादीनञ्च' सूत्र से धातु के अन्त का लोप और द्वित्व होकर 'पत्तब्बो', 'पत्तेय्यो', 'पापुणणीयो', 'पापणीयो'। ‘‘อนฺตสฺส, วา’’ติ จ วตฺตเต. 'अन्तस्स' और 'वा'— इनकी अनुवृत्ति होती है। ๕๕๑. คม ขน หนาทีนํ ตุํตพฺพาทีสุ น. ५५१. 'गम खन हनादीनं तुंतब्बादीसु न' (सूत्र)। คม ขน หนอิจฺเจวมาทีนํ มการ นการนฺตานํ ธาตูนมนฺตสฺส นกาโร โหติ วา ตุํ ตพฺพ ตเว ตุน ตฺวานตฺวาอิจฺเจวมาทีสุ ตการาทิปฺปจฺจเยสุ ปเรสุ. อคจฺฉียิตฺถ, คจฺฉียติ, คจฺฉียิสฺสตีติ คนฺตพฺโพ มคฺโค, คมิตพฺพํ, คมนียํ. 'गम', 'खन', 'हन' इत्यादि म-कार और न-कार अन्त वाली धातुओं के अन्त्य वर्ण को 'न' कार होता है, विकल्प से, 'तुं', 'तब्ब', 'तवे', 'तुन', 'त्वान', 'त्वा' इत्यादि त-कार आदि प्रत्ययों के परे होने पर। 'अगच्छीयित्थ', 'गच्छीयति', 'गच्छीयिस्सति' के अर्थ में 'गन्तब्बो मग्गो' (मार्ग पर जाना चाहिए), 'गमितब्बं', 'गमनीयं'। ขนุ อวทารเณ, อขญฺญิตฺถ, ขญฺญติ, ขญฺญิสฺสตีติ ขนฺตพฺพํ อาวาฏํ, ขนิตพฺพํ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ขนนฺตสฺส ณตฺตญฺจ, ขณิตพฺพํ, ขณณียํ, ขนนียํ วา. 'खनु' धातु खोदने के अर्थ में— 'अखञ्ञित्थ', 'खञ्ञति', 'खञ्ञिस्सति' के अर्थ में 'खन्तब्बं आवाटं' (गड्ढा खोदना चाहिए), 'खनितब्बं'। 'क्वचि धातू' इत्यादि से 'खन' के अन्त्य को 'ण' कार होकर 'खणितब्बं', 'खणणीयं' या 'खननीयं'। หน หึสา คตีสุ, อหญฺญิตฺถ, หญฺญเต, หญฺญิสฺสเตติ หนฺตพฺพํ, หนิตพฺพํ, หนนียํ. 'हन' धातु हिंसा और गति के अर्थ में— 'अहञ्ञित्थ', 'हञ्ञते', 'हञ्ञिस्सते' के अर्थ में 'हन्तब्बं', 'हनितब्बं', 'हननीयं'। มน ญาเณ, อมญฺญิตฺถ, มญฺญเต, มญฺญิสฺสเตติ มนฺตพฺโพ, มนิตพฺโพ, ยปฺปจฺจเย จวคฺคาทิ, มญฺญิตพฺพํ, มญฺญนียํ. 'मन' धातु ज्ञान के अर्थ में— 'अमञ्ञित्थ', 'मञ्ञते', 'मञ्ञिस्सते' के अर्थ में 'मन्तब्बो', 'मनितब्बो'। 'य' प्रत्यय होने पर च-वर्ग आदि होकर 'मञ्ञितब्बं', 'मञ्ञनीयं'। ปูช ปูชายํ, อปูชียิตฺถ, ปูชียติ, ปูชียิสฺสตีติ อตฺเถ ตพฺพานียา. ‘‘จุราทิโต เณ ณยา’’ติ อกตฺตริปิ เณณยา, อิการาคมานีเยสุ ‘‘สรโลโป’’ติอาทินา การิตสรสฺส โลโป, ปูเชตพฺโพ, ปูชยิตพฺโพ, ปูชนีโย ภควา. 'पूज' पूजा के अर्थ में है। 'अपूजीयित्थ', 'पूजीयति', 'पूजीयस्सति' इन अर्थों में 'तब्ब' और 'अनीय' प्रत्यय होते हैं। 'चुरादितो णे णया' सूत्र से अकर्त्ता (कर्म और भाव) में भी 'णे' और 'णय' प्रत्यय होते हैं। इकारागम और 'अनीय' प्रत्यय होने पर 'सरलोपो' आदि सूत्र से कारित (णिच्) स्वर का लोप हो जाता है; जैसे— 'पूजेतब्बो', 'पूजयितब्बो', 'पूजनीयो भगवा' (भगवान पूजनीय हैं)। ‘‘ตพฺพานียา’’ติ โยควิภาเคน กตฺตุกรเณสุปิ, ยา ปาปุณเน, นิยฺยาตีติ นิยฺยานีโก มคฺโค. คจฺฉนฺตีติ คมนียา [Pg.342] โภคา. นห โสเจ, นหายติ เอเตนาติ นหานียํ จุณฺณํ. 'तब्बानीया' इस सूत्र के योग-विभाग से कर्त्ता और करण अर्थों में भी ये प्रत्यय होते हैं। 'या' (प्राप्त करने के अर्थ में) धातु से 'निय्यातीति निय्यानीको मग्गो' (जो निकलता है वह निर्याणिक मार्ग है)। 'गच्छन्तीति गमनीया भोगा' (जो चले जाते हैं वे गमनीय भोग हैं)। 'नह' (शौच/स्नान के अर्थ में) धातु से 'नहायति एतेनाति नहानीयं चुण्णं' (जिससे स्नान किया जाता है वह नहानीय चूर्ण है)। ‘‘ภาวกมฺเมสู’’ติ อธิกาโร. 'भावकम्मेसु' (भाव और कर्म अर्थों में) यह अधिकार सूत्र है। ๕๕๒. ณฺโย จ. ५५२. 'ण्य' (प्रत्यय) भी होता है। ภาวกมฺเมสุ สพฺพธาตูหิ ณฺยปฺปจฺจโย โหติ, จคฺคหเณน ‘‘ญาเตยฺย’’นฺติอาทีสุ เตยฺยปฺปจฺจโย จ. भाव और कर्म अर्थों में सभी धातुओं से 'ण्य' प्रत्यय होता है। 'च' शब्द के ग्रहण से 'ञातैय्यं' आदि में 'तैय्य' प्रत्यय भी होता है। ๕๕๓. การิตํ วิย ณานุพนฺโธ. ५५३. 'ण' अनुबन्ध कारित (णिच्) के समान होता है। อนุพนฺโธ อปฺปโยคี, ณการานุพนฺโธ ปจฺจโย การิตํ วิย ทฏฺฐพฺโพติ การิตพฺยปเทโส, ‘‘การิตานํ โณ โลป’’นฺติ ณโลโป, ‘‘อสํโยคนฺตสฺส วุทฺธิ การิเต’’ติ วุทฺธิ, อิการาคโม, กตฺตพฺพํ การิยํ. अनुबन्ध प्रयोग में नहीं आता। 'ण'कार अनुबन्ध वाला प्रत्यय कारित के समान देखा जाना चाहिए, इसलिए इसे 'कारित-व्यपदेश' (संज्ञा) कहते हैं। 'कारितानं णो लोपं' सूत्र से 'ण' का लोप होता है। 'असंयोगन्तस्स वुद्धि कारिते' सूत्र से वृद्धि होती है। इकारागम होने पर 'कत्तब्बं', 'कारियं' (करने योग्य) रूप बनते हैं। หร หรเณ, อหรียิตฺถ, หรียติ, หรียิสฺสตีติ วา หริตพฺพํ หาริยํ. 'हर' हरण (ले जाने) के अर्थ में है। 'अहरीयित्थ', 'हरीयति', 'हरीयस्सति' अथवा 'हरितब्बं', 'हारियं' (हरने योग्य)। ภร ภรเณ, ภริตพฺพํ ภาริยํ. 'भर' भरण (पोषण) के अर्थ में है। 'भरितब्बं', 'भारियं' (भरण करने योग्य)। ลภ ลาเภ, ลภิตพฺพํ ลพฺภํ, ‘‘ยวตํ ตลน’’อิจฺจาทิสุตฺเต การคฺคหเณน ยวโต ภการสฺส ภกาโร, ทฺวิตฺตํ. 'लभ' लाभ के अर्थ में है। 'लभितब्बं', 'लब्भं'। 'यवतं तलना' आदि सूत्र में 'कार' के ग्रहण से 'य' के परे होने पर 'भ'कार का 'भ'कार होकर द्वित्व हो जाता है। สาส อนุสิฏฺฐิมฺหิ, สาสิตพฺโพ สิสฺโส, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อาการสฺสิกาโร. 'सास' अनुशिष्टि (उपदेश) के अर्थ में है। 'सासितब्बो', 'सिस्सो' (शिष्य)। 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'आ'कार को 'इ'कार होता है। วจ วิยตฺติยํ วาจายํ, ณฺยปฺปจฺจยาทิมฺหิ กเต ‘‘อนฺตานํ, ณานุพนฺเธ’’ติ จ วตฺตเต. 'वच' व्यक्त वाणी (बोलने) के अर्थ में है। 'ण्य' प्रत्यय आदि होने पर 'अन्तानं, णानुबन्धे' सूत्र प्रवृत्त होता है। ๕๕๔. กคา [Pg.343] จชานํ. ५५४. 'च' और 'ज' के स्थान पर 'क' और 'ग' होते हैं। จชอิจฺเจเตสํ ธาตฺวนฺตานํ กการ คการาเทสา โหนฺติ ณการานุพนฺเธ ปจฺจเย ปเรติ จสฺส กาเทโส. วจนียํ วากฺยํ. 'च' और 'ज' आदि धातु के अन्तिम वर्णों के स्थान पर 'क'कार और 'ग'कार आदेश होते हैं, जब 'ण'कार अनुबन्ध वाला प्रत्यय परे हो। यहाँ 'च' का 'क' आदेश हुआ। 'वचनीयं', 'वाक्यं'। ภช เสวายํ, ภชนียํ ภาคฺยํ, ชสฺส คาเทโส. 'भज' सेवा के अर्थ में है। 'भजनीयं', 'भाग्यं'। यहाँ 'ज' का 'ग' आदेश हुआ है। จิ จเย, อจียิตฺถ, จียติ, จียิสฺสตีติ เจตพฺพํ เจยฺยํ, อิการสฺเสกาโร วุทฺธิ, ยการสฺส ทฺวิตฺตํ, วินิปุพฺโพ ‘‘โท ธสฺส จา’’ติ สุตฺเต จคฺคหเณน จการสฺส ฉกาโร, วินิจฺเฉยฺยํ, วินิจฺฉิตพฺพํ, วินิจฺฉนียํ. ‘‘กิยาทิโต นา’’ติ วินาธิการโยควิภาเคน ตพฺพานีย ตุํ ตุนา ทีสุ จ นาปจฺจโย, วินิจฺฉินิตพฺพํ, วินิจฺฉินนียํ. 'चि' चयन (इकट्ठा करने) के अर्थ में है। 'अचीयित्थ', 'चीयति', 'चीयस्सति' इन अर्थों में 'चेतब्बं', 'चेय्यं' रूप बनते हैं। यहाँ 'इ'कार की 'ए'कार वृद्धि हुई और 'य'कार का द्वित्व हुआ। 'वि' और 'नि' उपसर्ग पूर्वक 'दो धस्स चा' सूत्र में 'च' के ग्रहण से 'च'कार का 'छ'कार होकर 'विनिच्छेय्यं', 'विनिच्छितब्बं', 'विनिच्छनीयं' रूप बनते हैं। 'कियादितो ना' सूत्र के 'विना' अधिकार के योग-विभाग से 'तब्ब', 'अनीय', 'तुं', 'तुना' आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'ना' प्रत्यय भी होता है, जिससे 'विनिच्छिनितब्बं', 'विनिच्छिननीयं' रूप बनते हैं। นี ปาปุณเน, อนียิตฺถ, นียติ, นียิสฺสตีติ เนยฺโย, เนยฺยา, เนยฺยํ. เนตพฺพํ. 'नी' प्राप्त करने (ले जाने) के अर्थ में है। 'अनीयित्थ', 'नीयति', 'नीयस्सति' इन अर्थों में 'नेय्यो', 'नेय्या', 'नेय्यं' और 'नेतब्बं' रूप बनते हैं। ณฺยคฺคหณํ ฉฏฺฐียนฺตวเสนานุวตฺตเต, มณฺฑูกคติยา อนฺตคฺคหณญฺจ ตติยนฺตวเสน. 'ण्य' का ग्रहण षष्ठी विभक्ति के अनुसार अनुवृत्त होता है, और 'मण्डूकगति' (मेंढक की चाल) से 'अन्त' का ग्रहण तृतीया विभक्ति के अनुसार होता है। ๕๕๕. ภูโตพฺพ. ५५५. 'भूतुब्ब'। ภู อิจฺเจตสฺมา ปรสฺส ณฺยปฺปจฺจยสฺส สห ธาตฺวนฺเตน อพฺพาเทโส โหติ. ภวิตพฺโพ ภพฺโพ, ภพฺพา, ภพฺพํ. 'भू' इस धातु से परे 'ण्य' प्रत्यय का धातु के अन्तिम वर्ण के साथ 'अब्ब' आदेश होता है। 'भवितब्बं', 'भब्बो', 'भब्बा', 'भब्बं'। ‘‘ณฺยสฺส, อนฺเตนา’’ติ จ วตฺตเต. 'ण्यस्स' और 'अन्तेन' की अनुवृत्ति होती है। ๕๕๖. วท มท คมุ ยุช ครหาการาทีหิ ชฺชมฺมคฺคยฺเหยฺยาคาโร วา. ५५६. 'वद', 'मद', 'गमु', 'युज', 'गरह' और 'आ'कारान्त आदि धातुओं से परे 'ज्ज', 'म्म', 'ग्ग', 'य्ह', 'ए', 'य्य' आदेश और 'गार' आदेश विकल्प से होते हैं। วท มท คมุ ยุช ครหอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ, อาการนฺเตหิ จ ปรสฺส ณฺยปฺปจฺจยสฺส ธาตฺวนฺเตน สห ยถากฺกมํ [Pg.344] ชฺช มฺม คฺค ยฺห เอ ยฺยอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา, ครสฺส จ คาราเทโส, ครหสฺส ครสฺเสวายํ คาโร. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท. 'वद', 'मद', 'गमु', 'युज', 'गरह' आदि धातुओं और 'आ'कारान्त धातुओं से परे 'ण्य' प्रत्यय का धातु के अन्तिम वर्ण के साथ यथाक्रम 'ज्ज', 'म्म', 'ग्ग', 'य्ह', 'ए', 'य्य' ये आदेश विकल्प से होते हैं। 'गर' के स्थान पर 'गार' आदेश होता है; यह 'गार' आदेश 'गरह' के 'गर' भाग के स्थान पर ही होता है। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है। วท วิยตฺติยํ วาจายํ, อวชฺชิตฺถ, วชฺชติ, วชฺชิสฺสตีติ วา วชฺชํ วทนียํ, รสฺสตฺตํ. วชฺชํ โทโส. 'वद' व्यक्त वाणी के अर्थ में है। 'अवज्जित्थ', 'वज्जति', 'वज्जस्सति' इन अर्थों में 'वज्जं' या 'वदनीयं' रूप बनते हैं। यहाँ ह्रस्व हुआ है। 'वज्जं' का अर्थ 'दोष' है। มท อุมฺมาเท, อมชฺชิตฺถ, มชฺชเต, มชฺชิสฺสติ เอเตนาติ มชฺชํ มทนียํ. มทคฺคหเณน กรเณปิ ณฺยปฺปจฺจโย. คมุ สปฺป คติมฺหิ, คนฺตพฺพํ คมฺมํ. 'मद' उन्माद के अर्थ में है। 'अमज्जित्थ', 'मज्जते', 'मज्जस्सति' जिससे, वह 'मज्जं' (मदिरा) या 'मदनीयं' है। 'मद' के ग्रहण से करण अर्थ में भी 'ण्य' प्रत्यय होता है। 'गमु' सर्पण (जाने) के अर्थ में है; 'गन्तब्बं', 'गम्मं'। ยุช โยเค, อยุชฺชิตฺถ, ยุชฺชเต, ยุชฺชิสฺสตีติ โยคฺคํ, นิโยชฺโช วา. 'युज' योग के अर्थ में है। 'अयुज्जित्थ', 'युज्जते', 'युज्जस्सति' इस अर्थ में 'योग्गं' या 'नियोज्जो' रूप बनते हैं। ครห นินฺทายํ, อครยฺหิตฺถ, ครหียติ, ครหียิสฺสตีติ อตฺเถ ณฺยปฺปจฺจโย, ตสฺสิมินา ธาตฺวนฺเตน สห ยฺหาเทโส, ครสฺส คาราเทโส จ, คารยฺโห, คารยฺหา, คารยฺหํ, ครหณียํ. 'गरह' निन्दा के अर्थ में है। 'अगरय्हित्थ', 'गरहीयति', 'गरहीयस्सति' इन अर्थों में 'ण्य' प्रत्यय होता है। उसका इस धातु के अन्तिम वर्ण के साथ 'य्ह' आदेश होता है और 'गर' को 'गार' आदेश होकर 'गारय्हो', 'गारय्हा', 'गारय्हं' और 'गरहणीयं' रूप बनते हैं। อาทิสทฺเทน อญฺเญปิ ทมชหนฺตา คยฺหนฺเต. คท วิยตฺติยํ วาจายํ, คชฺชเต, คทนียํ วา คชฺชํ. ปท คติมฺหิ, ปชฺชนียํ ปชฺชํ คาถา. ขาท ภกฺขเณ, ขชฺชเตติ ขชฺชํ ขาทนียํ. ทมุ ทมเน, อทมฺมิตฺถ, ทมฺมเต, ทมียิสฺสตีติ ทมฺโม ทมนีโย. ภุช ปาลนพฺยวหรเณสุ, อภุชฺชิตฺถ, ภุชฺชติ, ภุชฺชิสฺสตีติ โภคฺคํ, โภชฺชํ วา, การคฺคหเณน ยสฺส ชกาโร. คเหตพฺพํ คยฺหมิจฺจาทิ. 'आदि' शब्द से अन्य 'द' और 'म' अन्त वाली धातुएँ भी ली जाती हैं। 'गद' व्यक्त वाणी के अर्थ में है; 'गज्जते', 'गदनीयं' या 'गज्जं'। 'पद' गति के अर्थ में है; 'पज्जनीयं', 'पज्जं' (गाथा)। 'खाद' भक्षण के अर्थ में है; 'खाज्जते' इति 'खाज्जं', 'खादनीयं'। 'दमु' दमन के अर्थ में है; 'अदम्मित्थ', 'दम्मते', 'दमीयस्सति' इति 'दम्मो', 'दमनीयो'। 'भुज' पालन और व्यवहार के अर्थ में है; 'अभुज्जित्थ', 'भुज्जति', 'भुज्जस्सति' इति 'भोग्गं' या 'भोज्जं'। 'कार' के ग्रहण से 'य' के स्थान पर 'ज'कार हुआ है। 'गहेतब्बं', 'गय्हं' इत्यादि। อาการนฺตโต ปน ทา ทาเน, อทียิตฺถ, ทียติ, ทียิสฺสตีติ อตฺเถ ณฺยปฺปจฺจโย, ตสฺสิมินา ธาตฺวนฺเตน อากาเรน สห เอยฺยาเทโส, เทยฺยํ, ทาตพฺพํ. อนีเย ‘‘สรโลโป’’ติอาทินา ปุพฺพสรสฺส โลเป สมฺปตฺเต ตตฺเถว [Pg.345] ตุคฺคหเณน นิเสเธตฺวา ‘‘สรา สเร โลป’’นฺติ อากาเร ลุตฺเต ปรสรสฺส ทีโฆ, ทานียํ. आकारान्त धातुओं में 'दा' दान के अर्थ में है। 'अदीयित्थ', 'दीयति', 'दीयस्सति' इन अर्थों में 'ण्य' प्रत्यय होता है। उसका इस धातु के अन्तिम 'आ'कार के साथ 'ऐय्य' आदेश होकर 'देय्यं', 'दातब्बं' रूप बनते हैं। 'अनीय' प्रत्यय में 'सरलोपो' आदि सूत्र से पूर्व स्वर के लोप की प्राप्ति होने पर, वहीं 'तु' के ग्रहण से निषेध कर 'सरा सरे लोपं' सूत्र से 'आ'कार का लोप होने पर पर-स्वर का दीर्घ हो जाता है, जिससे 'दानीयं' रूप बनता है। ปา ปาเน, อปียิตฺถ, ปียติ, ปียิสฺสตีติ เปยฺยํ, ปาตพฺพํ, ปานียํ. หา จาเค, อหียิตฺถ, หียติ, หียิสฺสตีติ เหยฺยํ, หาตพฺพํ, หานียํ. มา มาเน, อมียิตฺถ, มียติ, มียิสฺสตีติ เมยฺยํ, มาตพฺพํ, มินิตพฺพํ, เมตพฺพํ วา. ญา อวโพธเน, อญฺญายิตฺถ, ญายติ, ญายิสฺสตีติ เญยฺยํ, ญาตพฺพํ, ญาเตยฺยํ. ‘‘ญาสฺส ชา ชํ นา’’ติ ชาเทเส ‘‘กิยาทิโต นา’’ติ วินาธิการโยควิภาเคน นาปจฺจโย, อิการาคโม จ, ชานิตพฺพํ, วิชานนียํ. ขฺยาปกถเน, สงฺขฺยาตพฺพํ, สงฺขฺเยยฺยํ อิจฺจาทิ. 'पा' पान (पीने) के अर्थ में है; 'अपीयित्थ', 'पीयति', 'पीयस्सति' इति 'पेय्यं', 'पातब्बं', 'पानीयं'। 'हा' त्याग के अर्थ में है; 'अहीयित्थ', 'हीयति', 'हीयस्सति' इति 'हेय्यं', 'हातब्बं', 'हानीयं'। 'मा' मान (मापने) के अर्थ में है; 'अमीयित्थ', 'मीयति', 'मीयस्सति' इति 'मेय्यं', 'मातब्बं', 'मिनितब्बं' या 'मेतब्बं'। 'ञा' अवबोधन (जानने) के अर्थ में है; 'अञ्ञायित्थ', 'ञ्ञायति', 'ञ्ञायस्सति' इति 'ञेय्यं', 'ञातब्बं', 'ञातैय्यं'। 'ञास्स जा जं ना' सूत्र से 'जा' आदेश होने पर 'कियादितो ना' सूत्र के 'विना' अधिकार के योग-विभाग से 'ना' प्रत्यय और इकारागम होकर 'जानितब्बं', 'विजाननीयं' रूप बनते हैं। 'ख्या' कथन (कहने) के अर्थ में है; 'सङ्ख्यातब्बं', 'सङ्ख्येय्यं' इत्यादि। ๕๕๗. กรมฺหา ริจฺจ. ५५७. 'कर' धातु से 'रिच्च' प्रत्यय होता है। กรธาตุโต ริจฺจปฺปจฺจโย โหติ ภาวกมฺเมสุ. 'कर' धातु से भाव और कर्म अर्थ में 'रिच्च' प्रत्यय होता है। ๕๕๘. รมฺหิ รนฺโต ราทิ โน. ५५८. 'र' (रिच्च प्रत्यय) परे होने पर धातु के अन्त 'र' आदि का 'नो' (लोप) होता है। รการานุพนฺเธ ปจฺจเย ปเร สพฺโพ ธาตฺวนฺโต ราทิ ปจฺจยรการมริยาโท โน โหติ, โลปมาปชฺชเตติ อตฺโถ. รนฺโตติ เอตฺถ รกาโร สนฺธิโช, กตฺตพฺพํ กิจฺจํ. ‘‘ริจฺจา’’ติ โยควิภาเคน ภราทิโตปิ ริจฺจปฺปจฺจโย, ยถา, ภรียตีติ ภจฺโจ, สรโลโป. อิ คติมฺหิ, ปติ เอตพฺโพ ปฏิจฺโจ. 'र' कार अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर, धातु का सम्पूर्ण अन्त्य भाग 'र' आदि प्रत्यय के 'र' कार की सीमा तक 'नो' होता है, अर्थात् लोप को प्राप्त होता है। 'रन्तो' यहाँ 'र' कार सन्धि से उत्पन्न है। 'कत्तब्बं' 'किच्चं' (उदाहरण हैं)। 'रिच्चा' इस योग-विभाग से 'भर' आदि धातुओं से भी 'रिच्च' प्रत्यय होता है, जैसे- 'भरीयतीति भच्चो', यहाँ स्वर का लोप हुआ है। 'इ' धातु गति अर्थ में, 'पति एतब्बो पटिच्चो'। ๕๕๙. เปสาติสคฺคปตฺตกาเลสุ กิจฺจา. ५५९. प्रेष (आज्ञा), अतिसर्ग (अनुमति) और प्राप्तकाल (उचित समय) के अर्थों में 'किच्च' प्रत्यय होते हैं। เปส อติสคฺค ปตฺตกาลอิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ กิจฺจปฺปจฺจยา โหนฺติ. เปสนํ นาม ‘‘กตฺตพฺพมิทํ ภวตา’’ติ อาณาปนํ, อชฺเฌสนญฺจ. อติสคฺโคนาม ‘‘กิมิทํ มยา กตฺตพฺพ’’นฺติ ปุฏฺฐสฺส วา [Pg.346] ‘‘ปาโณ น หนฺตพฺโพ’’ติอาทินา ปฏิปตฺติทสฺสนมุเขน วา กตฺตพฺพสฺส อนุญฺญา. ปตฺตกาโล นาม สมฺปตฺตสมโย โย อตฺตโน กิจฺจกรณสมยมนุปปริกฺขิตฺวา น กโรติ, ตสฺส สมยาโรจนํ, น ตตฺถ อชฺเฌสนมตฺถีติ. เต จ ‘‘ภาวกมฺเมสุ กิจฺจตฺตกฺขตฺถา’’ติ วุตฺตตฺตา ภาวกมฺเมสฺเวว ภวนฺติ. प्रेष, अतिसर्ग और प्राप्तकाल इन अर्थों में 'किच्च' प्रत्यय होते हैं। 'प्रेषण' का अर्थ है 'आपके द्वारा यह किया जाना चाहिए' ऐसी आज्ञा देना और प्रार्थना करना। 'अतिसर्ग' का अर्थ है 'मेरे द्वारा यह क्या किया जाना चाहिए' ऐसा पूछे जाने पर, अथवा 'प्राणी की हत्या नहीं करनी चाहिए' इत्यादि के द्वारा आचरण दिखाने के माध्यम से कर्तव्य की अनुमति देना। 'प्राप्तकाल' का अर्थ है कार्य के लिए उचित समय; जो अपने कार्य करने के समय का विचार न करके कार्य नहीं करता है, उसे समय की सूचना देना; वहाँ प्रार्थना नहीं होती है। और वे (प्रत्यय) 'भाव और कर्म में किच्च और तक्खत्थ होते हैं' ऐसा कहे जाने के कारण भाव और कर्म में ही होते हैं। เปสเน ตาว – กรียตุ ภวตา กมฺมนฺติ อตฺเถ อิมินา ตพฺพานียา, เสสํ วุตฺตนยเมว, กตฺตพฺพํ กมฺมํ ภวตา, กรณียํ กิจฺจํ ภวตา. प्रेषण में पहले - 'आपके द्वारा कर्म किया जाए' इस अर्थ में इससे 'तब्ब' और 'अनीय' प्रत्यय होते हैं, शेष प्रक्रिया पूर्वोक्त ही है; 'कत्तब्बं कम्मं भवता' (आपके द्वारा कर्म किया जाना चाहिए), 'करणीयं किच्चं भवता' (आपके द्वारा कार्य किया जाना चाहिए)। อติสคฺเค ภุชฺชตุ ภวตาติ อตฺเถ ตพฺพาทิ, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ วุทฺธิ. अतिसर्ग में 'आपके द्वारा भोजन किया जाए' इस अर्थ में 'तब्ब' आदि प्रत्यय होते हैं, 'अञ्ञेसु च' सूत्र से वृद्धि होती है। ‘‘ตสฺสา’’ติ วตฺตเต. 'तस्स' इसकी अनुवृत्ति होती है। ๕๖๐. ภุชาทีนมนฺโต โน ทฺวิ จ. ५६०. 'भुज' आदि धातुओं के अन्त्य वर्ण का लोप (नो) होता है और (प्रत्यय के तकार का) द्वित्व होता है। ภุชอิจฺเจวมาทีนํ ชการาทิอนฺตานํ ธาตูนมนฺโต โน โหติ, ปรสฺส กิจฺจกิตกปฺปจฺจยตการสฺส จ ทฺเวภาโว โหติ. โภตฺตพฺพํ โภชนํ ภวตา, โภชนียํ โภชฺชํ ภวตา. 'भुज' इत्यादि जकार आदि अन्त वाली धातुओं के अन्त्य वर्ण का लोप (नो) होता है, और परवर्ती किच्च और कितक प्रत्ययों के 'त' कार का द्वित्व होता है। 'भोत्तब्बं भोजनं भवता' (आपके द्वारा भोजन खाया जाना चाहिए), 'भोजनीयं भोज्जं भवता'। อิการาคมยุตฺตตกาเร ปน – ‘‘นมกรานมนฺตานํ นิยุตฺตตมฺหี’’ติ เอตฺถ ‘‘อนฺตานํ นิยุตฺตตมฺหี’’ติ โยควิภาเคน ธาตฺวนฺตโลปาทินิเสโธ, ‘‘รุธาทิโต นิคฺคหีตปุพฺพ’’นฺติ วินาธิการโยควิภาเคน, ‘‘นิคฺคหีตญฺจา’’ติ วา นิคฺคหีตาคโม, ภุญฺชิตพฺพํ ตยา, ยุญฺชิตพฺพํ. इकार आगम युक्त 'त' कार में तो - 'नमकरानमन्तानं नियुत्ततम्हि' यहाँ 'अन्तानं नियुत्ततम्हि' इस योग-विभाग से धातु के अन्त्य लोप आदि का निषेध होता है, 'रुधादितो निग्गहीतपुब्बं' इस विनाधिकार योग-विभाग से, अथवा 'निग्गहीतं च' से अनुस्वार का आगम होता है; 'भुञ्जितब्बं तया' (तुम्हारे द्वारा खाया जाना चाहिए), 'युञ्जितब्बं'। สมยาโรจเน ปน – อิ อชฺฌยเน อธิปุพฺโพ, อธียตํ ภวตาติ อตฺเถ ตพฺพานียาทิ, อิการาคมวุทฺธิอยาเทสอชฺฌาเทสา จ, ณฺยปฺปจฺจเย ตุ วุทฺธิ, ยการสฺส ทฺวิตฺตญฺจ, อชฺฌยิตพฺพํ, อชฺเฌยฺยํ ภวตา, อชฺฌยนียํ ภวตา, อวสฺสํ [Pg.347] กตฺตพฺพนฺติ วากฺเย ปน ‘‘กิจฺจา’’ติ อธิกิจฺจ ‘‘อวสฺสกาธมิเณสุ ณี จา’’ติ อวสฺสกาธมิณตฺเถ จ ตพฺพาทโย, กตฺตพฺพํ เม ภวตา เคหํ, กรณียํ, การิยํ. เอวํ ทาตพฺพํ เม ภวตา สตํ, ทานียํ, เทยฺยํ. समय की सूचना (प्राप्तकाल) में - 'इ' धातु अध्ययन अर्थ में 'अधि' उपसर्ग पूर्वक, 'आपके द्वारा अध्ययन किया जाए' इस अर्थ में 'तब्ब', 'अनीय' आदि प्रत्यय, इकार आगम, वृद्धि, अयादेश और अज्झादेश होते हैं। 'ण्य' प्रत्यय में तो वृद्धि और 'य' कार का द्वित्व होता है; 'अज्झयितब्बं', 'अज्झेय्यं भवता', 'अज्झयनीयं भवता'। 'अवश्य करना चाहिए' इस वाक्य में तो 'किच्चा' के अधिकार में 'अवस्सकाधमिणेसु णी च' सूत्र से अनिवार्यता और ऋण अर्थ में 'तब्ब' आदि प्रत्यय होते हैं; 'कत्तब्बं मे भवता गेहं' (मेरे लिए आपके द्वारा घर बनाया जाना चाहिए), 'करणीयं', 'कारियं'। इसी प्रकार 'दातब्बं मे भवता सतं' (मेरे लिए आपके द्वारा सौ दिया जाना चाहिए), 'दानीयं', 'देय्यं'। ธร ธารเณ, จุราทิตฺตา เณณยา, วุทฺธิ, อิการาคโม จ, ธาเรตพฺพํ, ธารยิตพฺพํ อิจฺจาทิ. 'धर' धातु धारण अर्थ में, चुरादि गण होने से 'णे', 'णय' प्रत्यय, वृद्धि और इकार आगम होकर 'धारेतब्बं', 'धारयितब्बं' इत्यादि रूप बनते हैं। ‘‘นุทาทีหิ ยุณฺวูนมนานนากานนกา สการิเตหิ จา’’ติ สการิเตหิปิ ยุณฺวูนมาเทสวิธานโตเยว ธาตุปฺปจฺจยนฺตโตปิ กิจฺจกิตกปฺปจฺจยา ภวนฺตีติ ทฏฺฐพฺโพ. เตน ติติกฺขาปียตีติ ติติกฺขาเปตพฺโพ. เอวํ ติกิจฺฉาเปตพฺโพ ติกิจฺฉาปนีโย. อภาวียิตฺถ, ภาวียติ, ภาวียิสฺสตีติ ภาเวตพฺโพ มคฺโค. ภาวยิตพฺโพ, ภาวนีโย, ภาวนียํ, ภาวนียา, อการียิตฺถ, การียติ, การียิสฺสตีติ กาเรตพฺพํ, การยิตพฺพํ, การาเปตพฺพํ, การาปยิตพฺพํ, การาปนียมิจฺจาทิ จ สิทฺธํ ภวติ. 'नुदादीहि युण्वूनमनाननाकाननका सकारितेहि च' इस सूत्र से णिजन्त धातुओं से भी 'यु' और 'ण्वु' के आदेश विधान से ही धातु और प्रत्यय के अन्त से भी किच्च और कितक प्रत्यय होते हैं, ऐसा समझना चाहिए। उससे 'तितिक्खापीयतीति तितिक्खापेतब्बो'। इसी प्रकार 'तिकिच्छापेतब्बो', 'तिकिच्छापनीयो'। 'अभावीयित्थ', 'भावीयति', 'भावीयिस्सतीति भावेतब्बो मग्गो'। 'भावयितब्बो', 'भावनीयो', 'भावनीयं', 'भावनीया'। 'अकारीयित्थ', 'कारीयति', 'कारीयिस्सतीति कारेतब्बं', 'कारयितब्बं', 'कारापेतब्बं', 'कारापयितब्बं', 'कारापनीयं' इत्यादि सिद्ध होते हैं। กตฺตพฺพํ กรณียญฺจ, การิยํ กิจฺจมิจฺจปิ; กาเรตพฺพํ ตถา การา-เปตพฺพํ กิจฺจสงฺคโห. कत्तब्ब, करणीय, कारिय, किच्च, कारेतब्ब और कारापेतब्ब - यह 'किच्च' प्रत्ययों का संग्रह है। กิจฺจปฺปจฺจยนฺตนโย. किच्च प्रत्ययान्त विधि। เตกาลิก त्रैकालिक (तीनों कालों से संबंधित)। กิตกปฺปจฺจยนฺตนย कितक प्रत्ययान्त विधि। อิทานิ กิตกปฺปจฺจยา วุจฺจนฺเต. अब कितक प्रत्यय कहे जाते हैं। กร กรเณ, ปุเร วิย ธาตุสญฺญาทิ. 'कर' धातु करण (करने) के अर्थ में है, पहले की तरह धातु संज्ञा आदि होती है। กุมฺภอิจฺจุปปทํ, ตโต ทุติยา. 'कुम्भ' यह उपपद है, उससे द्वितीया विभक्ति होती है। ‘‘กุมฺภํ กโรติ, อกาสิ, กริสฺสตี’’ติ วา วิคฺคเห – 'कुम्भं करोति' (घड़ा बनाता है), 'अकासि' (बनाया), या 'करिस्सति' (बनाएगा) - इस विग्रह में - ‘‘ปรา, ปจฺจยา’’ติ จ วตฺตเต. 'परा' और 'पच्चया' की अनुवृत्ति होती है। ๕๖๑. ธาตุยา [Pg.348] กมฺมาทิมฺหิ โณ. ५६१. कर्म आदि उपपद होने पर धातु से 'ण' प्रत्यय होता है। กมฺมสฺมึ อาทิมฺหิ สติ ธาตุยา ปโร ณปฺปจฺจโย โหติ. कर्म के उपपद होने पर धातु से परे 'ण' प्रत्यय होता है। โส จ – और वह - ๕๖๒. อญฺเญ กิต. ५६२. अन्य (प्रत्यय) 'कित' संज्ञक होते हैं। ตติเย ธาตฺวาธิกาเร วิหิตา กิจฺเจหิ อญฺเญ ปจฺจยา กิติจฺเจว สญฺญา โหนฺตีติ กิตสญฺญา กตา. तीसरे धातु अधिकार में विहित 'किच्च' प्रत्ययों से भिन्न प्रत्ययों की 'कित' संज्ञा होती है, इस प्रकार 'कित' संज्ञा की गई है। ๕๖๓. กตฺตริ กิต. ५६३. कर्ता अर्थ में 'कित' प्रत्यय होते हैं। กตฺตริ การเก กิตปจฺจโย โหตีติ นิยมโต กตฺตริ ภวติ, โส จ ‘‘ณาทโย เตกาลิกา’’ติ วุตฺตตฺตา กาลตฺตเย จ โหติ. ปุเร วิย การิตพฺยปเทสณโลปวุทฺธิโย, ปจฺจยนฺตสฺสาลิงฺคตฺตา สฺยาทิมฺหิ อสมฺปตฺเต ‘‘ตทฺธิตสมาสกิตกา นามํวาตเวตุนาทีสุ จา’’ติ กิตกนฺตตฺตา นามํว กเต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, ตโต กุมฺภํ กโรตีติ อตฺเถ ‘‘อมาทโย ปรปเทภี’’ติ ทุติยาตปฺปุริสสมาโส, ‘‘นามาน’’นฺติอาทินา สมาสสญฺญา, ‘‘เตสํ วิภตฺติโย โลปา จา’’ติ วิภตฺติโลโป, ‘‘ปกติ จสฺส สรนฺตสฺสา’’ติ ปกติภาโว, ปุน สมาสตฺตา นามมิว กเต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. कर्ता कारक में 'कित' (कृत्) प्रत्यय होता है, इस नियम से यह कर्ता अर्थ में होता है। और "णादयो तेकालिका" (ण आदि प्रत्यय तीनों कालों में होते हैं) इस कथन के कारण यह तीनों कालों में होता है। पहले की तरह कारित संज्ञा, 'ण' का लोप और वृद्धि होती है। प्रत्ययान्त के अलिङ्ग होने के कारण 'सि' आदि विभक्तियों की अप्राप्ति होने पर "तद्धितसमासकितका नामंवातवेतुनादीसु च" इस सूत्र से 'कित' प्रत्ययान्त होने के कारण 'नाम' की तरह संज्ञा होने पर 'सि' आदि की उत्पत्ति होती है। उसके बाद 'कुम्भं करोति' (घड़ा बनाता है) इस अर्थ में "अमादयो परपदेभी" सूत्र से द्वितीया तत्पुरुष समास होता है, "नामानं" आदि से समास संज्ञा होती है, "तेसं विभत्तियो लोपा च" से विभक्ति का लोप होता है, "पकति चस्स सरन्तस्स" से प्रकृति भाव होता है, और पुनः समास होने के कारण 'नाम' की तरह 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। โส กุมฺภกาโร, เต กุมฺภการา อิจฺจาทิ. อิตฺถิยํ กุมฺภการี, กุมฺภการิโย อิจฺจาทิ, ตถา กมฺมํ กโรตีติ กมฺมกาโร. เอวํ มาลากาโร, กฏฺฐกาโร, รถกาโร, สุวณฺณกาโร, สุตฺตกาโร, วุตฺติกาโร, ฏีกากาโร. वह 'कुम्भकारो' (कुम्हार), वे 'कुम्भकारा' इत्यादि। स्त्रीलिंग में 'कुम्भकारी', 'कुम्भकारियो' इत्यादि। उसी प्रकार 'कम्मं करोति' (काम करता है) इस अर्थ में 'कम्मकारो'। इसी प्रकार 'मालाकारो', 'कट्ठकारो' (लकड़हारा), 'रथकारो', 'सुवण्णकारो' (सुनार), 'सुत्तकारो', 'वुत्तिकारो', 'टीकाकारो' शब्द बनते हैं। คห อุปาทาเน, ปตฺตํ อคณฺหิ, คณฺหาติ, คณฺหิสฺสตีติ วา ปตฺตคฺคาโห. เอวํ รสฺมิคฺคาโห, รชฺชุคฺคาโห. 'गह' धातु ग्रहण (लेने) के अर्थ में; 'पत्तं अगण्हि' (पात्र लिया), 'गण्हाति' (लेता है), या 'गण्हिस्सति' (लेगा) इस अर्थ में 'पत्तग्गाहो' (पात्र पकड़ने वाला) शब्द बनता है। इसी प्रकार 'रस्मिग्गाहो', 'रज्जुग्गाहो' शब्द हैं। เว [Pg.349] ตนฺตสนฺตาเน, ตนฺตํ อวายิ, วายติ, วายิสฺสตีติ วา ตนฺตวาโย, ‘‘เต อาวายา การิเต’’ติ อายาเทโส, วากฺเย ปเนตฺถ ‘‘เต อาวายา’’ติ โยควิภาเคน อายาเทโส. เอวํ ตุนฺนวาโย. 'वे' धातु तन्तु-सन्तान (बुनने) के अर्थ में; 'तन्तं अवायि' (तन्तु बुना), 'वायति' (बुनता है), या 'वायिस्सति' (बुनेगा) इस अर्थ में 'तन्तवायो' (जुलाहा) शब्द बनता है। "ते आवाया कारिते" सूत्र से 'आय' आदेश होता है। यहाँ वाक्य में "ते आवाया" इस योग-विभाग से 'आय' आदेश होता है। इसी प्रकार 'तुन्नवायो' (दर्जी) शब्द बनता है। มา ปริมาเณ, ธญฺญํ อมินิ, มินาติ, มินิสฺสตีติ วา อตฺเถ ณปฺปจฺจเย กเต – 'मा' धातु परिमाण (नापने) के अर्थ में; 'धञ्ञं अमिनि' (धान नापा), 'मिनाति' (नापता है), या 'मिनिस्सति' (नापेगा) इस अर्थ में 'ण' प्रत्यय होने पर - ‘‘ณมฺหี’’ติ วตฺตเต. "णम्हि" (यह सूत्र) प्रवृत्त होता है। ๕๖๔. อาการนฺตานมาโย. ५६४. आकारान्त धातुओं को 'आय' आदेश होता है। อาการนฺตานํ ธาตูนํ อนฺตสฺส อายาเทโส โหติ ณการานุพนฺเธ ปจฺจเย ปเร, สรโลปาทิ. ธญฺญมาโย. เอวํ ทานํ ททาตีติ ทานทาโย. आकारान्त धातुओं के अन्त को 'आय' आदेश होता है जब 'ण' अनुबन्ध वाला प्रत्यय परे हो, फिर स्वर-लोप आदि होते हैं। 'धञ्ञमायो'। इसी प्रकार 'दानं ददाति' इस अर्थ में 'दानदायो' शब्द बनता है। กมุ กนฺติมฺหิ, ธมฺมํ อกามยิ, กามยติ, กามยิสฺสตีติ วา ธมฺมกาโม ปุริโส, ธมฺมกามา กญฺญา, ธมฺมกามํ จิตฺตํ. เอวํ อตฺถกาโม, หิตกาโม, สุขกาโม, ธมฺมํ ปาเลตีติ ธมฺมปาโล อิจฺจาทิ. 'कमु' धातु कान्ति (इच्छा) के अर्थ में; 'धम्मं अकामयि' (धर्म की इच्छा की), 'कामयति' (इच्छा करता है), या 'कामयिस्सति' (इच्छा करेगा) इस अर्थ में 'धम्मकामो पुरिसो' (धर्म-कामी पुरुष), 'धम्मकामा कञ्ञा', 'धम्मकामं चित्तं'। इसी प्रकार 'अत्थकामो', 'हितकामो', 'सुखकामो'। 'धम्मं पालेति' इस अर्थ में 'धम्मपालो' इत्यादि शब्द बनते हैं। ทมุ ทมเน, ‘‘อรึ อทมิ, ทเมติ, ทมิสฺสตี’’ติ วิคฺคเห ‘‘ธาตุยา’’ติ อธิกาโร, ‘‘กมฺมาทิมฺหี’’ติ จ วตฺตเต. 'दमु' धातु दमन के अर्थ में; 'अरिं अदमि, दमेति, दमिस्सति' (शत्रु का दमन किया, करता है, करेगा) इस विग्रह में "धातुया" का अधिकार है और "कम्मादिम्हि" की अनुवृत्ति होती है। ๕๖๕. สญฺญายมนุ. ५६५. "सञ्ञायमनु" (संज्ञा होने पर 'अनु' का आगम)। กมฺมูปปเท อาทิมฺหิ สติ สญฺญายํ คมฺยมานายํ ธาตุยา อปฺปจฺจโย โหติ, อุปปทนฺเต นุการาคโม จ. เอตฺถ จ ‘‘นุ นิคฺคหีตํ ปทนฺเต’’ติ สุตฺเต ‘‘ปทนฺเต’’ติ วจนโต อุปปทนฺเตเยว นุการาคโม โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อุการโลโป. อยํ ปน นฺวาคโม สมาสํ [Pg.350] กตฺวา อุปปทวิภตฺติโลเป กเตเยว โหตีติ เวทิตพฺพํ. कर्म उपपद आदि में होने पर और संज्ञा का बोध होने पर धातु से 'अ' प्रत्यय होता है और उपपद के अन्त में 'नु' का आगम होता है। यहाँ "नु निग्गहीतं पदन्ते" इस सूत्र में "पदन्ते" कहने से उपपद के अन्त में ही 'नु' का आगम होता है, ऐसा समझना चाहिए। "तेसु वुद्धी" आदि से 'उ' कार का लोप होता है। यह 'नु' आगम समास करने और उपपद की विभक्ति का लोप करने के बाद ही होता है, ऐसा जानना चाहिए। ๕๖๖. นุ นิคฺคหีตํ ปทนฺเต. ५६६. "नु निग्गहीतं पदन्ते" (पद के अन्त में 'नु' निग्गहीत/अनुस्वार हो जाता है)। อุปปทภูตนามปทนฺเต วตฺตมาโน นุการาคโม นิคฺคหีตมาปชฺชเต, นิคฺคหีตสฺส วคฺคนฺตตฺตํ, เสสํ สมํ, วุทฺธาภาโวว วิเสโส, อรินฺทโม ราชา. उपपद रूप नाम-पद के अन्त में रहने वाला 'नु' आगम निग्गहीत (अनुस्वार) को प्राप्त होता है, निग्गहीत का वर्गान्त (पञ्चम वर्ण) होता है, शेष प्रक्रिया समान है, केवल वृद्धि का न होना ही विशेष है। 'अरिन्दमो राजा' (शत्रुओं का दमन करने वाला राजा)। ตถา ตร ตรเณ, เวสฺสํ ตรตีติ เวสฺสนฺตโร, ตณฺหํ กโรติ หึสตีติ ตณฺหงฺกโร ภควา. เอวํ เมธงฺกโร, สรณงฺกโร, ทีปงฺกโร. उसी प्रकार 'तर' धातु तरण (पार करने) के अर्थ में; 'वेस्सं तरति' इस अर्थ में 'वेस्सन्तरो'। 'तण्हं करोति हिंसति' इस अर्थ में 'तण्हङ्करो' भगवान। इसी प्रकार 'मेधङ्करो', 'सरणङ्करो', 'दीपङ्करो' शब्द बनते हैं। ‘‘อาทิมฺหิ, อ’’อิติ จ วตฺตเต. "आदिम्हि, अ" (इनकी) अनुवृत्ति होती है। ๕๖๗. ปุเร ททา จ อึ. ५६७. "पुरे ददा च इं" (पुरे शब्द के होने पर 'ददा' धातु से 'अ' प्रत्यय और 'इं' आगम)। ปุรสทฺเท อาทิมฺหิ สติ ‘‘ทท ทาเน’’อิจฺเจตาย ธาตุยา อปฺปจฺจโย โหติ, ปุรสทฺเท อการสฺส อิญฺจ โหติ. เอตฺถ จ ‘‘ตทนุปโรเธนา’’ติ ปริภาสโต ปุรสทฺทนฺตสฺเสว อึ โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ณาทีนํ เตกาลิกตฺเตปิ อุปปทตฺถวิเสเสน อตีเตเยวายมปฺปจฺจโย โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ปุเร ทานํ อททีติ ปุรินฺทโท สกฺโก. อิธาปิ วิภตฺติโลเป กเตเยว อึอาเทโส. 'पुर' शब्द आदि (उपपद) में होने पर "दद दाने" इस धातु से 'अ' प्रत्यय होता है और 'पुर' शब्द के अकार को 'इं' होता है। यहाँ "तदनुपरोधेन" इस परिभाषा से 'पुर' शब्द के अन्त को ही 'इं' होता है, ऐसा समझना चाहिए। 'ण' आदि प्रत्ययों के त्रैकालिक होने पर भी उपपद के विशेष अर्थ के कारण यह 'अ' प्रत्यय केवल अतीत (भूतकाल) में ही होता है, ऐसा समझना चाहिए। 'पुरे दानं अददि' (पहले दान दिया) इस अर्थ में 'पुरिन्ददो सक्को' (इन्द्र)। यहाँ भी विभक्ति लोप होने के बाद ही 'इं' आदेश होता है। ‘‘กมฺมาทิมฺหิ, อ’’อิติ จ วตฺตเต. "कम्मादिम्हि, अ" (इनकी) अनुवृत्ति होती है। ๕๖๘. สพฺพโต ณฺวุ ตฺวาวี วา. ५६८. "सब्बतो ण्वु त्वावी वा" (सभी धातुओं से 'ण्वु', 'तु', 'आवी' और 'अ' प्रत्यय विकल्प से होते हैं)। สพฺพโต ธาตุโต กมฺมาทิมฺหิ วา อกมฺมาทิมฺหิ วา สติ อ ณฺวุ ตุ อาวี อิจฺเจเต จตฺตาโร ปจฺจยา โหนฺติ. วาคฺคหณํ ‘‘อกมฺมาทิมฺหิ วา’’ติ วิกปฺปนตฺถํ. सभी धातुओं से कर्म आदि के उपपद होने पर या न होने पर 'अ', 'ण्वु', 'तु', 'आवी' ये चार प्रत्यय होते हैं। 'वा' का ग्रहण "अकम्मादिम्हि वा" (बिना कर्म उपपद के भी) इस विकल्प के लिए है। อปฺปจฺจเย [Pg.351] ตาว – ธร ธารเณ, ธมฺมํ อธริ, ธรติ, ธริสฺสตีติ วา ธมฺมธโร. เอวํ วินยธโร. ตถา ตํ กโรตีติ ตกฺกโร, ทฺวิตฺตํ. เอวํ หิตกโร, ทิวสกโร, ทินกโร, ทิวากโร, นิสากโร, ธนุํ คณฺหาตีติ ธนุคฺคโห. เอวํ กฏคฺคโห, สพฺพกามํ ททาตีติ สพฺพกามทโท, สพฺพทโท. पहले 'अ' प्रत्यय में - 'धर' धातु धारण करने के अर्थ में; 'धम्मं अधरि, धरति, धरिस्सति' इस अर्थ में 'धम्मधरो'। इसी प्रकार 'विनयधरो'। उसी प्रकार 'तं करोति' इस अर्थ में 'तक्करो' (वह करने वाला), यहाँ द्वित्व हुआ है। इसी प्रकार 'हितकरो', 'दिवसकरो', 'दिनकरो', 'दिवाकरो', 'निसाकरो'। 'धनुं गण्हाति' इस अर्थ में 'धनुग्गहो'। इसी प्रकार 'कटग्गहो'। 'सब्बकामं ददाति' इस अर्थ में 'सब्बकामददो', 'सब्बददो' शब्द बनते हैं। อาโต ปน – อนฺนํ อทาสิ, ททาติ, ททิสฺสตีติ อนฺนโท. เอวํ ธนโท, สจฺจํ สนฺทหตีติ สจฺจสนฺโธ. ปา ปาเน, มชฺชํ ปิวตีติ มชฺชโป. ตา ปาลเน, ควํ สทฺทํ ตายตีติ โคตฺตํ. เอวํ กตฺตริ. आकारान्त धातुओं से - 'अन्नं अदासि, ददाति, ददिस्सति' इस अर्थ में 'अन्नदो'। इसी प्रकार 'धनदो'। 'सच्चं सन्दहाति' इस अर्थ में 'सच्चसन्धो'। 'पा' धातु पाने (पीने) के अर्थ में; 'मज्जं पिवति' इस अर्थ में 'मज्जपो'। 'ता' धातु पालने के अर्थ में; 'गवं सद्दं तायति' (गायों के शब्द की रक्षा करता है) इस अर्थ में 'गोत्तं'। इसी प्रकार कर्ता अर्थ में रूप बनते हैं। อกมฺมาทิมฺหิ ปน ‘‘ยสฺมา ทเปตี’’ติ สุตฺเต ภยคฺคหเณน เสสสาธเนปิ อปฺปจฺจโย. कर्म आदि के अभाव में भी "यस्मा दापेति" इस सूत्र में 'भय' के ग्रहण से शेष साधनों (कारकों) में भी 'अ' प्रत्यय होता है। นี ปาปุณเน วิปุพฺโพ, วิเนสิ, วิเนติ, วิเนสฺสติ เอเตน, เอตฺถาติ วา วินโย, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ วุทฺธิ, อยาเทโส จ, นยนํ นโย. สิ เสวายํ นิปุพฺโพ, นิสฺสียิตฺถ, นิสฺสียติ, นิสฺสียิสฺสตีติ วา นิสฺสโย. สิ สเย, อนุสยิ, อนุเสติ, อนุเสสฺสตีติ วา อนุสโย. 'नी' धातु प्रापण (ले जाने) के अर्थ में 'वि' उपसर्ग पूर्वक; 'विनेसि, विनेति, विनेस्सति' इसके द्वारा या इसमें, इस अर्थ में 'विनयो' शब्द बनता है। "अञ्ञेसु च" सूत्र से वृद्धि और 'अय' आदेश होता है। 'नयनं नयो'। 'सि' धातु सेवा के अर्थ में 'नि' उपसर्ग पूर्वक; 'निस्सीयित्थ, निस्सीयति, निस्सीयिस्सति' इस अर्थ में 'निस्सयो'। 'सि' धातु शयन के अर्थ में; 'अनुसयि, अनुसेति, अनुसेस्सति' इस अर्थ में 'अनुसयो' शब्द बनता है। อิ คติมฺหิ ปติปุพฺโพ, ปฏิจฺจ เอกสฺมา ผลเมตีติ ปจฺจโย, สมุทโย. จิ จเย, วินิจฺฉียเต อเนน, วินิจฺฉยนํ วา วินิจฺฉโย, อุจฺจยนํ อุจฺจโย, สญฺจโย, ธมฺมํ วิจินาตีติ ธมฺมวิจโย. ขี ขเย, ขยนํ ขโย. ชิ ชเย, วิชยนํ วิชโย, ชโย. กี ทพฺพวินิมเย, วิกฺกยนํ วิกฺกโย, กโย. ลี สิเลสเน, อลฺลียติ เอตฺถาติ อาลโย, ลโย. เอวํ อิวณฺณนฺตโต. 'इ' धातु गति के अर्थ में 'प्रति' उपसर्ग पूर्वक; 'पटिच्च एकस्मा फलमेति' (एक से दूसरे फल को प्राप्त होता है) इस अर्थ में 'पच्चयो', 'समुदयो'। 'चि' धातु चयन (इकट्ठा करने) के अर्थ में; 'विनिच्छीयते अनेन' (इसके द्वारा निश्चय किया जाता है), 'विनिच्छयनं' या 'विनिच्छयो'। 'उच्चयनं उच्चयो', 'सञ्चयो'। 'धम्मं विचिनाति' इस अर्थ में 'धम्मविचयो'। 'खी' धातु क्षय के अर्थ में; 'खयनं खयो'। 'जि' धातु जय के अर्थ में; 'विजयनं विजयो', 'जयो'। 'की' धातु द्रव्य-विनिमय (खरीद-बिक्री) के अर्थ में; 'विक्कयनं विक्कयो', 'कयो'। 'ली' धातु श्लेषण (चिपकने/लीन होने) के अर्थ में; 'अल्लीयति एत्थ' (इसमें लीन होता है) इस अर्थ में 'आलयो', 'लयो'। इसी प्रकार इ-वर्णान्त धातुओं से रूप बनते हैं। อาสุณนฺตีติ [Pg.352] อสฺสวา, อวาเทโส, ปฏิสฺสวนํ ปฏิสฺสโว. สุ คติมฺหิ, อาภวคฺคา สวนฺตีติ อาสวา. รุ สทฺเท, รวตีติ รโว. ภวตีติ ภโว. ปภวติ เอตสฺมาติ ปภโว. ลู เฉทเน, ลวนํ ลโว. เอวํ อุวณฺณนฺตโต. जो सुनते हैं वे 'अस्सव' (आश्रव) हैं, यहाँ 'अव' आदेश होता है; प्रतिश्रवण (सुनना/स्वीकार करना) 'पटिस्सव' है। 'सु' गति अर्थ में है, भव के अग्र भाग तक जो बहते हैं वे 'आसव' (आस्रव) हैं। 'रु' शब्द अर्थ में है, जो शब्द करता है वह 'रव' है। जो होता है वह 'भव' है। जिससे उत्पन्न होता है वह 'पभव' (प्रभव) है। 'लू' छेदन अर्थ में है, लवन (काटना) 'लव' है। इसी प्रकार उ-वर्णान्त धातुओं से होता है। นิคฺคณฺหาติ, นิคฺคหณํ วา นิคฺคโห, ปคฺคโห, สงฺคณฺหาติ เตน, สงฺคหณํ วา สงฺคโห. วร วรเณ, สํวรณํ สํวโร. ทร อาทเร, อาทรณํ อาทโร. อาคจฺฉติ, อาคมนนฺติ วา อาคโม, อาคมียนฺติ เอตฺถ, เอเตน วา อตฺถาติ อาคโม ปริยตฺติ. สปฺปตีติ สปฺโป. ทิพฺพตีติ เทโว. กมุ ปทวิกฺเขเป, ปกฺกมนํ, ปกฺกมตีติ วา ปกฺกโม. เอวํ วิกฺกโม. निग्रह करता है या निग्रहण 'निग्गह' (निग्रह) है; 'पग्गह' (प्रग्रह); जिससे संग्रह करता है या संग्रहण 'सङ्गह' (संग्रह) है। 'वर' वरण अर्थ में है, संवरण 'संवर' है। 'दर' आदर अर्थ में है, आदर करना 'आदर' है। आता है या आगमन 'आगम' है; जिसमें या जिसके द्वारा अर्थ प्राप्त किया जाता है वह 'आगम' (पर्यत्ति/शास्त्र) है। जो सर्पण करता है वह 'सप्प' (सर्प) है। जो दीप्तिमान होता है वह 'देव' है। 'कमु' पद-विक्षेप (पैर बढ़ाना) अर्थ में है, प्रक्रमण या जो प्रक्रमण करता है वह 'पक्कम' (प्रक्रम) है। इसी प्रकार 'विक्कम' (विक्रम) है। จร จรเณ, วเน จรตีติ วนจโร, กาโม อวจรติ เอตฺถาติ กามาวจโร โลโก, กามาวจรา สญฺญา, กามาวจรํ จิตฺตํ. คาโว จรนฺติ เอตฺถาติ โคจโร, ฉฏฺฐีตปฺปุริโส. 'चर' चरण (विचरने) के अर्थ में है, जो वन में विचरता है वह 'वनचर' है; जिसमें काम (इच्छा) विचरण करता है वह 'कामावचर' लोक है, कामावचर संज्ञा है, कामावचर चित्त है। जहाँ गाएँ (इन्द्रियाँ या पशु) चरती हैं वह 'गोचर' है, यह षष्ठी तत्पुरुष समास है। ปาเทน ปิวตีติ ปาทโป. เอวํ กจฺฉโป, ตติยาตปฺปุริโส. जो पैर (जड़) से पीता है वह 'पादप' (वृक्ष) है। इसी प्रकार 'कच्छप' है, यह तृतीया तत्पुरुष समास है। รุห ชนเน, สิรสฺมึ รุหตีติ สิโรรุโห, คุหายํ สยตีติ คุหาสยํ จิตฺตํ. เอวํ กุจฺฉิสยา วาตา. ฐา คตินิวตฺติมฺหิ, ปพฺพเต อฏฺฐาสิ, ติฏฺฐติ, ฐสฺสตีติ วา ปพฺพตฏฺโฐ ปุริโส, ปพฺพตฏฺฐา นที, ปพฺพตฏฺฐํ โอสธํ. เอวํ ถลฏฺฐํ, ชลฏฺฐํ, สตฺตมีตปฺปุริโส. 'रुह' जनन (उत्पन्न होने) के अर्थ में है, जो सिर पर उगता है वह 'सिरोरुह' (बाल) है; जो गुहा (हृदय-गुहा) में शयन करता है वह 'गुहासय' चित्त है। इसी प्रकार 'कुच्छिसया' (कुक्षि-शयन करने वाली) वायु। 'ठा' गति-निवृत्ति (रुकने) के अर्थ में है, जो पर्वत पर स्थित था, स्थित है या स्थित होगा वह 'पब्बतट्ठ' (पर्वतस्थ) पुरुष है, पर्वतस्थ नदी है, पर्वतस्थ औषधि है। इसी प्रकार 'थलट्ठ' (थलस्थ), 'जलट्ठ' (जलस्थ) हैं, ये सप्तमी तत्पुरुष समास हैं। ๕๖๙. คหสฺสุปธสฺเส วา. ५६९. 'गह' धातु की उपधा को 'ए' होता है, विकल्प से। คหอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส อุปธสฺส เอตฺตํ โหติ วา, อุปธาติ อนฺตกฺขรโต ปุพฺพกฺขรสฺส ปรสมญฺญา, คยฺหตีติ เคหํ, คหํ วา. 'गह' इस धातु की उपधा को विकल्प से 'ए' होता है; 'उपधा' अन्तिम अक्षर से पूर्व वाले अक्षर की संज्ञा है। जो ग्रहण किया जाता है वह 'गेह' (घर) है, अथवा 'गह' है। ณฺวุปฺปจฺจเย [Pg.353] รถํ กโรตีติ อตฺเถ ณฺวุปฺปจฺจโย, โส จ ‘‘อญฺเญ กิต’’ติ กิตสญฺญตฺตา ‘‘กตฺตริ กิต’’ติ กตฺตริเยว ภวติ, ตโต การิตพฺยปเทส ณโลปวุทฺธิโย. 'ण्वु' प्रत्यय होने पर, 'रथ बनाता है' इस अर्थ में 'ण्वु' प्रत्यय होता है, और वह 'अञ्ञे कित' सूत्र से 'कित' संज्ञक होने के कारण 'कत्तरि कित' सूत्र से कर्ता अर्थ में ही होता है, उसके बाद कारित-व्यपदेश (णिच् के समान कार्य), 'ण' का लोप और वृद्धि होती है। ๕๗๐. อนกา ยุณฺวูนํ. ५७०. 'यु' और 'ण्वु' के स्थान पर 'अन' और 'अक' होते हैं। ยุณฺวุอิจฺเจเตสํ ปจฺจยานํ อน อกอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺตีติ อกาเทโส. เสสํ กุมฺภการสทฺทสมํ, รถการโก. ตถา อนฺนํ ททาตีติ อนฺนทายโก, ‘‘อาการนฺตานมาโย’’ติ อายาเทโส, ‘‘อิตฺถิยมโต อาปจฺจโย’’ติ อาปจฺจโย, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา อการสฺส อิกาโร, อนฺนทายิกา กญฺญา, อนฺนทายกํ กุลํ. โลกํ เนตีติ โลกนายโก, วิเนติ สตฺเตติ วินายโก, ‘‘เต อาวายา การิเต’’ติ อายาเทโส. 'यु' और 'ण्वु' इन प्रत्ययों के स्थान पर क्रमशः 'अन' और 'अक' ये आदेश होते हैं, यहाँ 'अक' आदेश हुआ। शेष 'कुम्भकार' शब्द के समान है, जैसे 'रथकारको'। उसी प्रकार 'अन्न देता है' वह 'अन्नदायको' है, 'आकारान्तानामायो' सूत्र से 'आय' आदेश होता है, 'इत्थियमतो आपच्चयो' सूत्र से 'आ' प्रत्यय होता है, 'तेसु वुद्धि' आदि सूत्र से अकार को इकार होकर 'अन्नदायिका' कन्या, 'अन्नदायकं' कुल बनता है। जो लोक को ले जाता है वह 'लोकनायको' है, जो सत्त्वों (प्राणियों) को विनीत करता है वह 'विनायको' है, 'ते आवाया कारिते' सूत्र से 'आय' आदेश होता है। อกมฺมูปปเท กโรตีติ การโก, การิกา, การกํ. ททาตีติ ทายโก, ทายิกา, ทายกํ. เนตีติ นายโก, นายิกา, นายกํ. ภควโต โอวาทานุสาสนึ อสุณิ, สุณาติ, สุณิสฺสตีติ วา สาวโก, สาวิกา, อาวาเทโส. ลุนาตีติ ลาวโก. ปุ ปวเน, ปุนาตีติ ปาวโก, ภวตีติ ภาวโก, อุปาสตีติ อุปาสโก, อุปาสิกา. คณฺหาตีติ คาหโก. बिना कर्म उपपद के, जो करता है वह 'कारको', 'कारिका', 'कारकं' है। जो देता है वह 'दायको', 'दायिका', 'दायकं' है। जो ले जाता है वह 'नायकं', 'नायिका', 'नायकं' है। जिसने भगवान के ओवाद (उपदेश) और अनुशासनी को सुना, सुनता है या सुनेगा वह 'सावको' (श्रावक), 'साविका' (श्राविका) है, यहाँ 'अव' आदेश होता है। जो काटता है वह 'लावको' है। 'पु' पवन (पवित्र करने) के अर्थ में है, जो पवित्र करता है वह 'पावको' (अग्नि) है, जो होता है वह 'भावको' है, जो उपासना करता है वह 'उपासको', 'उपासिका' है। जो ग्रहण करता है वह 'गाहको' (ग्राहक) है। ปจตีติ ปาจโก. อยชิ, ยชติ, ยชิสฺสตีติ วา ยาชโก. เอตฺถ หิ ‘‘กคา จชาน’’นฺติ จชานํ กคตฺเต สมฺปตฺเต – जो पकाता है वह 'पाचको' है। जिसने यज्ञ किया, यज्ञ करता है या यज्ञ करेगा वह 'याजको' है। यहाँ 'कगा चजानं' सूत्र से 'च' और 'ज' को 'क' और 'ग' प्राप्त होने पर— ๕๗๑. น [Pg.354] กคตฺตํ จชา ณฺวุมฺหิ. ५७१. 'ण्वु' प्रत्यय परे होने पर 'च' और 'ज' को 'क' और 'ग' भाव नहीं होता। ธาตฺวนฺตภูตา จการชการา กการ คการตฺตํ นาปชฺชนฺเต ณฺวุปฺปจฺจเย ปเรติ ปฏิสิทฺธตฺตา น ภวติ. धातु के अन्त में स्थित चकार और जकार, 'ण्वु' प्रत्यय परे होने पर ककार और गकार भाव को प्राप्त नहीं होते, ऐसा निषेध होने से (ककार-गकार) नहीं होते। ชน ชนเน, ชเนตีติ ชนโก, ชนิกา, ‘‘ฆฏาทีนํ วา’’ติ เอตฺถ วาคฺคหเณน วุทฺธิ น โหติ. เอวํ ขนตีติ ขนโก, สเมตีติ สมโก, คเมตีติ คมโก, ทเมตีติ ทมโก, อหนิ, หนฺติ, หนิสฺสตีติ วา วธโก, ‘‘วโธ วา สพฺพตฺถา’’ติ หนสฺส วธาเทโส, หนฺตีติ ยาตโก, ‘‘หนสฺส ฆาโต’’ติ ณฺวุมฺหิ ฆาตาเทโส, คาโว หนตีติ โคฆาตโก, รุนฺธตีติ รุนฺธโก, นิคฺคหีตาคโม, สํโยคนฺตตฺตา น วุทฺธิ โหติ. เอวํ ภุญฺชตีติ ภุญฺชโก, กิณาตีติ กายโก, ปาเลตีติ ปาลโก, ปูเชตีติ ปูชโก. 'जन' जनन अर्थ में है, जो उत्पन्न करता है वह 'जनको', 'जनिका' है; 'घटादीनं वा' यहाँ 'वा' ग्रहण से वृद्धि नहीं होती। इसी प्रकार जो खोदता है वह 'खनको' है, जो शान्त करता है वह 'समको' है, जो गमन कराता है वह 'गमको' है, जो दमन करता है वह 'दमको' है; जिसने मारा, मारता है या मारेगा वह 'वधको' है, 'वधो वा सब्बत्था' सूत्र से 'हन' को 'वध' आदेश होता है; जो मारता है वह 'यातको' है, 'हनस्स घातो' सूत्र से 'ण्वु' में 'घात' आदेश होता है, जो गायों को मारता है वह 'गोघातको' है; जो रोकता है वह 'रुन्धको' है, यहाँ निग्गृहीत (अनुस्वार) का आगम होता है, संयोगान्त होने के कारण वृद्धि नहीं होती। इसी प्रकार जो भोग करता है वह 'भुञ्जको' है, जो खरीदता है वह 'कायको' है, जो पालन करता है वह 'पालको' है, जो पूजा करता है वह 'पūजको' है। ๕๗๒. นุทาทีหิ ยุณฺวูนมนานนากานนกา สการิเตหิ จ. ५७२. 'नुद' आदि धातुओं से और सकारित (प्रेरणार्थक) धातुओं से परे 'यु' और 'ण्वु' प्रत्ययों के स्थान पर क्रमशः 'अन', 'आनन', 'अक' और 'आननक' आदेश होते हैं। นุทาทีหิ ธาตูหิ, สการิเตหิ จ ธาตูหิ ปเรสํ ยุณฺวุปฺปจฺจยานํ ยถากฺกมํ อน อานน อก อานนกอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ. 'नुद' आदि धातुओं से और सकारित धातुओं से परे 'यु' और 'ण्वु' प्रत्ययों के स्थान पर यथाक्रम 'अन', 'आनन', 'अक' और 'आननक' ये आदेश होते हैं। เอตฺถ หิ – यहाँ निश्चय ही— สการิเตหิ ยุณฺวูนํ, การิยสฺส วิธานโต; กิจฺจกิตฺถมฺภโว ธาตุ-ปฺปจฺจเยหิปิ เวทิโย. सकारित (प्रेरणार्थक) धातुओं से 'यु' और 'ण्वु' के कार्यों के विधान से, कृत्य और इत्थंभाव (इस प्रकार का भाव) धातु-प्रत्ययों से भी जानना चाहिए। นุท เขเป ปปุพฺโพ, ปนุทิ, ปนุทติ, ปนุทิสฺสตีติ วา อตฺเถ ณฺวุปฺปจฺจโย, ตสฺสิมินา อกาเทโส, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา นุทิสฺส ทีโฆ, ปนูทโก. 'नुद' क्षेपण (फेंकने/हटाने) के अर्थ में है, 'प' उपसर्ग पूर्वक, जिसने हटाया, हटाता है या हटाएगा इस अर्थ में 'ण्वु' प्रत्यय होता है, उसे इस (सूत्र) से 'अक' आदेश होता है, 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'नुद' के (उकार) को दीर्घ होकर 'पनूदको' बनता है। สูท [Pg.355] ปคฺฆรเณ, สูทตีติ สูทโก. ญา อวโพธเน, อญฺญาสิ, ชานาติ, ชานิสฺสตีติ วา อตฺเถ ณฺวุปฺปจฺจโย, ตสฺสาเนน อานนกาเทโส, ‘‘ญาสฺส ชาชํนา’’ติ ชาเทโส, สรโลปาทิ, ชานนโก. 'सूद' प्रक्षरण (टपकने/बहने) के अर्थ में है, जो टपकता है (या रसोई बनाता है) वह 'सूदको' है। 'ञा' अवबोधन (जानने) के अर्थ में है, जिसने जाना, जानता है या जानेगा इस अर्थ में 'ण्वु' प्रत्यय होता है, उसे इससे 'आननक' आदेश होता है, 'ञास्स जाजंना' सूत्र से 'जा' आदेश, स्वर-लोप आदि होकर 'जाननको' बनता है। สการิเตหิ ปน อาณ เปสเน, อาณาเปสิ, อาณาเปติ, อาณาเปสฺสตีติ วา อตฺเถ ‘‘สพฺพโต ณฺวุตฺวาวี วา’’ติ ณฺวุปฺปจฺจโย, ตสฺสิมินา อกาเทโส, สรโลปาทิ, อาณาปโก, สญฺญาเปตีติ สญฺญาปโก, สญฺชานนโก, เอตฺถ อานนกาเทโส, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา การิตโลโป. ตถา ทาเปตีติ ทาปโก, ‘‘อนกา ยุณฺวูน’’นฺติ อกาเทโส, ปติฏฺฐาเปตีติ ปติฏฺฐาปโก, นิพฺพานํ สมฺปาเปตีติ นิพฺพานสมฺปาปโก, การาเปตีติ การาปโก, การาปิกา อิจฺจาทิ. सकारित (प्रेरणार्थक) धातुओं से, 'आण' प्रेषण (आज्ञा देने) के अर्थ में है, जिसने आज्ञा दी, आज्ञा देता है या आज्ञा देगा इस अर्थ में 'सब्बतो ण्वुत्वावी वा' सूत्र से 'ण्वु' प्रत्यय होता है, उसे इस (सूत्र) से 'अक' आदेश, स्वर-लोप आदि होकर 'आणापको' बनता है; जो संज्ञापित (सूचित) करता है वह 'सञ्ञापको' है; 'सञ्जाननको' यहाँ 'आननक' आदेश होता है और 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से कारित (णिच्) का लोप होता है। उसी प्रकार जो दिलवाता है वह 'दापको' है, 'अनका युण्वूनं' सूत्र से 'अक' आदेश होता है; जो प्रतिष्ठित कराता है वह 'पतिट्ठापको' है; जो निर्वाण को प्राप्त कराता है वह 'निब्बानसम्पापको' है; जो करवाता है वह 'कारापको', 'कारापिका' इत्यादि। ตุปฺปจฺจเย อกาสิ, กโรติ, กริสฺสตีติ วา อตฺเถ ‘‘สพฺพโต ณฺวุตฺวาวี วา’’ติ ตุปฺปจฺจโย, โส จ กิตสญฺญตฺตา ณฺวุปฺปจฺจโย วิย สพฺพตฺถ กตฺตริเยว ภวติ. 'तु' प्रत्यय होने पर, जिसने किया, करता है या करेगा इस अर्थ में 'सब्बतो ण्वुत्वावी वा' सूत्र से 'तु' प्रत्यय होता है, और वह 'कित' संज्ञक होने के कारण 'ण्वु' प्रत्यय के समान सब जगह कर्ता अर्थ में ही होता है। ‘‘อนฺตสฺสา’’ติ วตฺตเต. 'अन्तस्स' (अन्त का) यह अनुवृत्ति आती है। ๕๗๓. กรสฺส จ ตตฺตํ ตุสฺมึ. ५७३. 'तु' प्रत्यय परे होने पर 'कर' (धातु) को 'त' भाव (तकार आदेश) होता है। กรอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส อนฺตสฺส รการสฺส ตการตฺตํ โหติ ตุปฺปจฺจเย ปเร. จสทฺเทน ภราทีนญฺจ, ตโต นามมิว กเต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, ‘‘สตฺถุปิตาทีนมา สิสฺมึ สิโลโป จา’’ติ อาตฺตํ, สิโลโป, ตสฺส กตฺตา ตกฺกตฺตา, ฉฏฺฐีสมาโส. ตถา ภรตีติ ภตฺตา. 'Kara' धातु के अन्त्य 'र' कार को 'तु' प्रत्यय परे होने पर 'त' कार हो जाता है। 'च' शब्द से 'भर' आदि धातुओं का भी (यही कार्य होता है), उसके बाद नाम की तरह होने पर 'सि' आदि की उत्पत्ति होती है, 'सत्थुपितादीनमा सिस्मिं सिलोपो चा' सूत्र से 'आ' भाव और 'सि' का लोप होता है, उसका कर्ता 'तक्कत्ता' है, षष्ठी समास है। उसी प्रकार 'भरति' इति 'भत्ता' (भर्ता)। หร หรเณ, หรตีติ หตฺตา, ภินฺทตีติ เภตฺตา, เภทิตา วา, ฉินฺทตีติ เฉตฺตา, ททาตีติ ทาตา, โภชนสฺส ทาภา โภชนทาตา, สนฺทหตีติ สนฺธาตา, อวจิ, วจติ[Pg.356], วกฺขตีติ วา วตฺตา, ‘‘ภุชาทีนมนฺโต โน ทฺวิ จา’’ติ ธาตฺวนฺตโลโป, ทฺวิตฺตญฺจ, ภุญฺชตีติ โภตฺตา, อพุชฺฌิ, พุชฺฌติ, พุชฺฌิสฺสตีติ วา พุชฺฌิตา, ยการิการาคมา, ชานาตีติ ญาตา, ชินาตีติ เชตา, สุณาตีติ โสตา, คณฺหาตีติ คเหตา, ภวตีติ ภวิตา, สรตีติ สริตา, คจฺฉตีติ คนฺตา. ‘‘คม ขน หนาทีนํ ตุํ ตพฺพาทีสุ น’’อิติ ธาตฺวนฺตสฺส นตฺตํ. เอวํ ขนตีติ ขนฺตา, หนตีติ หนฺตา, มญฺญตีติ มนฺตา, ปาเลตีติ ปาเลตา, ปาลยิตา. 'हर' हरण करने के अर्थ में, 'हरति' इति 'हत्ता' (हर्ता), 'भिन्दति' इति 'भेत्ता' या 'भेदित' (भेदिता), 'छिन्दति' इति 'छेत्ता', 'ददाति' इति 'दाता', भोजन का दान करने वाला 'भोजनदाता', 'सन्दहति' इति 'सन्धाता', 'अवचि', 'वचति', 'वक्खति' इति 'वत्ता' (वक्ता), 'भुजादीनमन्तो नो द्वि चा' सूत्र से धातु के अन्त्य का लोप और द्वित्व होने पर 'भुञ्जति' इति 'भोत्ता' (भोक्ता), 'अबुज्झि', 'बुज्झति', 'बुज्झिस्सति' इति 'बुज्झिता', 'य' कार और 'इ' कार के आगम से, 'जानाति' इति 'ञाता' (ज्ञाता), 'जिनाति' इति 'जेता', 'सुणाति' इति 'सोता' (श्रोता), 'गण्हाति' इति 'गहेता' (ग्रहीता), 'भवति' इति 'भविता', 'सरति' इति 'सरिता', 'गच्छति' इति 'गन्ता'। 'गम खन हनादीनं तुं तब्बादीसु न' सूत्र से धातु के अन्त्य को 'न' कार होता है। इसी प्रकार 'खनति' इति 'खन्ता', 'हनति' इति 'हन्ता', 'मञ्ञति' इति 'मन्ता', 'पालेति' इति 'पालेता', 'पालयिता'। การิเต ภาเวตีติ ภาเวตา, ภาวยิตา. เอวํ สาเรตา, สารยิตา, ทาเปตา, ทาปยิตา, หาเปตา, หาปยิตา, นิโรเธตา, นิโรธยิตา, โพเธตา, โพธยิตา, ญาเปตา, ญาปยิตา, สาเวตา, สาวยิตา, คาเหภา, คาหยิตา, กาเรตา, การยิตา, การาเปตา, การาปยิตา อิจฺจาทิ. कारित (प्रेरणार्थक) में 'भावेति' इति 'भावेता', 'भावयिता'। इसी प्रकार 'सारेता', 'सारयिता', 'दापेता', 'दापयिता', 'हापेता', 'हाpayिता', 'निरोधेता', 'निरोधयिता', 'बोधेता', 'बोधयिता', 'ञापेता', 'ञापयिता', 'सावेता', 'सावयिता', 'गाहेता', 'गाहैयिता', 'कारेता', 'कारयिता', 'कारापेता', 'कारापयिता' इत्यादि। อาวีปจฺจเย ทิส เปกฺขเน, ภยํ อปสฺสิ, ปสฺสติ, ปสฺสิสฺสตีติ วา อตฺเถ อาวีปจฺจโย, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ทิสสฺส ทสฺสาเทโส, ภยทสฺสาวี, ภยทสฺสาวิโน อิจฺจาทิ ทณฺฑีว เนยฺยํ. อิตฺถิยํ ภยทสฺสาวินี. นปุํสเก ภยทสฺสาวิ จิตฺตํ. 'आवी' प्रत्यय में 'दिस' प्रेक्षण (देखने) के अर्थ में, 'भयं अपस्सि', 'पस्सति', 'पस्सिस्सति' इस अर्थ में 'आवी' प्रत्यय होता है, 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'दिस' को 'दस्स' आदेश होता है, 'भयदस्सावी', 'भयदस्साविनो' इत्यादि 'दण्डी' की तरह समझना चाहिए। स्त्रीलिंग में 'भयदस्साविनी'। नपुंसक लिंग में 'भयदस्सावि चित्तं'। สาส อนุสิฏฺฐิมฺหิ, สเทวกํ โลกํ ทิฏฺฐธมฺมิกาทิวเสน สาสตีติ อตฺเถ – 'सास' अनुशासन (शिक्षा) के अर्थ में, देवों सहित लोक को दृष्टधार्मिक आदि के वश से 'सासति' इस अर्थ में - ๕๗๔. สาสาทีหิ รตฺถุ. ५७४. 'सासादीहि रत्थु' (सास आदि धातुओं से 'रत्थु' प्रत्यय होता है)। สาสอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ รตฺถุปฺปจฺจโย โหติ. 'सास' इत्यादि धातुओं से 'रत्थु' प्रत्यय होता है। ‘‘รมฺหิ รนฺโต ราทิ โน’’ติ ราทิโลโป, สรโลปาทิ, นามพฺยปเทโส, สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, อาตฺตํ, สิโลโป. สตฺถา, สตฺถาโร. 'रम्हि रन्तो रादि नो' सूत्र से 'र' आदि का लोप, स्वर लोप आदि, नाम की संज्ञा, 'सि' आदि की उत्पत्ति, 'आ' भाव, 'सि' का लोप। 'सत्था' (शास्ता), 'सत्थारो' (शास्तारः)। ปา รกฺขเณ, ปุตฺตํ ปาตีติ อตฺเถ – 'पा' रक्षण के अर्थ में, 'पुत्तं पाति' (पुत्र की रक्षा करता है) इस अर्थ में - ๕๗๕. ปาทิโต [Pg.357] ริตุ. ५७५. 'पादितो रितु' ('पा' आदि से 'रितु' प्रत्यय होता है)। ปาอิจฺเจวมาทิโต ธาตุคฺคณโต ริตุปฺปจฺจโย โหติ, ราทิโลโป สรโลปาทิ. ปิตา. ธร ธารเณ, มาตาปิตูหิ ธรียตีติ ธีตา, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อิการสฺส ทีโฆ. 'पा' इत्यादि धातुगण से 'रितु' प्रत्यय होता है, 'र' आदि का लोप, स्वर लोप आदि। 'पिता'। 'धर' धारण करने के अर्थ में, माता-पिता द्वारा धारण की जाती है इति 'धीता' (पुत्री), 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'इ' कार को दीर्घ होता है। มาน ปูชายํ, ธมฺเมน ปุตฺตํ มาเนตีติ อตฺเถ – 'मान' पूजा के अर्थ में, धर्म से पुत्र का मान (सम्मान) करती है इस अर्थ में - ๕๗๖. มานาทีหิ ราตุ. ५७६. 'मानादीहि रातु' ('मान' आदि से 'रातु' प्रत्यय होता है)। มาน ภาสอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ราตุปฺปจฺจโย โหติ, ราทิโลโป, มาตา. ภาส วิยตฺติยํ วาจายํ, ปุพฺเพ ภาสตีติ ภาตา อิจฺจาทิ. 'मान', 'भास' इत्यादि धातुओं से 'रातु' प्रत्यय होता है, 'र' आदि का लोप, 'माता'। 'भास' स्पष्ट वाणी के अर्थ में, पहले बोलता है इति 'भाता' (भ्राता) इत्यादि। วิส ปเวสเน ปปุพฺโพ, ปาวิสิ, ปวิสติ, ปวิสิสฺสตีติ วา อตฺเถ – 'विस' प्रवेश करने के अर्थ में 'प' उपसर्ग पूर्वक, 'पाविसि', 'पविसति', 'पविसिस्सति' इस अर्थ में - ๕๗๗. วิส รุช ปทาทิโต ณ. ५७७. 'विस रुज पदादितो ण' ('विस', 'रुज', 'पद' आदि से 'ण' प्रत्यय होता है)। วิส รุช ปทอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ปโร ณปฺปจฺจโย โหตีติ ณปฺปจฺจโย. โส จ กิตสญฺญตฺตา กตฺตริ ภวติ, การิตพฺยปเทสณโลป วุทฺธิโย, ปเวโส. 'विस', 'रुज', 'पद' इत्यादि धातुओं से परे 'ण' प्रत्यय होता है। और वह 'कित' संज्ञक होने से कर्ता अर्थ में होता है, कारित संज्ञा, 'ण' का लोप और वृद्धि होने पर 'पवेसो' (प्रवेश)। ตถา รุช โรเค, อรุชิ, รุชติ, รุชิสฺสตีติ วา โรโค, ‘‘กคาจชาน’’นฺติ ชการสฺส คกาโร, อุปฺปชฺชตีติ อุปฺปาโท. ผุส ผุสเน, อผุสิ, ผุสติ, ผุสิสฺสติ, ผุสนฺติ วา เตน สมฺปยุตฺตาติ ผสฺโส, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ผุสสฺส ผสฺโส, สํโยคนฺตตฺตา น วุทฺธิ. ภวตีติ ภาโว. อุจ สมวาเย, อุจตีติ โอโก, จการสฺส กกาโร. อย คติมฺหิ, อยิ, อยติ, อยิสฺสติ, อยติ วา อิโตติ อาโย. พุธ อวคมเน, สมฺมา พุชฺฌตีติ สมฺโพโธ, อาหรตีติ [Pg.358] อาหาโร, อุปหนตีติ อุปฆาโต, ‘‘หนสฺส ฆาโต’’ติ ฆาตาเทโส. उसी प्रकार 'रुज' रोग के अर्थ में, 'अरुजि', 'रुजति', 'रुजिस्सति' इस अर्थ में 'रोगो', 'कगाचजानं' सूत्र से 'ज' कार को 'ग' कार होता है, 'उप्पज्जति' इति 'उप्पादो'। 'फुस' स्पर्श करने के अर्थ में, 'अफुसि', 'फुसति', 'फुसिस्सति', 'फुसन्ति' या उससे सम्प्रयुक्त है इति 'फस्सो' (स्पर्श), 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'फुस' को 'फस्स' होता है, संयोगान्त होने के कारण वृद्धि नहीं होती। 'भवति' इति 'भावो'। 'उच' समवाय के अर्थ में, 'उचति' इति 'ओको' (आश्रय), 'च' कार को 'क' कार होता है। 'अय' गति के अर्थ में, 'अयि', 'अयति', 'अयिस्सति', या यहाँ से जाता है इति 'आयो'। 'बुध' अवगमन के अर्थ में, सम्यक् प्रकार से जानता है इति 'सम्बोधो', 'आहरति' इति 'आहारो', 'उपहनति' इति 'उपघातो', 'हनस्स घातो' सूत्र से 'घात' आदेश होता है। รนฺช ราเค, รนฺชตีติ อตฺเถ ณปฺปจฺจโย. 'रञ्ज' राग के अर्थ में, 'रञ्जति' इस अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। ๕๗๘. นิคฺคหีต สํโยคาทิ โน. ५७८. 'निग्गहीत संयोगदि नो' (संयोग के आदि में निग्गहीत होता है)। สํโยคสฺมึ อาทิภูโต นกาโร นิคฺคหีตมาปชฺชเต. นิคฺคหีตสฺส วคฺคนฺตตฺตํ, ชการสฺส คตฺตํ, รงฺโค. संयोग में आदिभूत 'न' कार निग्गहीत को प्राप्त होता है। निग्गहीत को वर्गान्त, 'ज' कार को 'ग' भाव होने पर 'रङ्गो' (रंग)। ๕๗๙. ณมฺหิ รนฺชสฺส โช ภาวกรเณสุ. ५७९. 'णम्हि रञ्जस्स जो भावकरणेसु' (भाव और करण अर्थों में 'ण' प्रत्यय होने पर 'रञ्ज' के 'ञ्ज' को 'ज' होता है)। รนฺชอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส อนฺตภูตสฺส นฺชสฺส ชการาเทโส โหติ ภาวกรณอิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ วิหิเต ณการวติปฺปจฺจเย ปเร. 'रञ्ज' इस धातु के अन्त्यभूत 'ञ्ज' को 'ज' कार आदेश होता है, भाव और करण इन अर्थों में विहित 'ण' कार वाले प्रत्यय के परे होने पर। เอตฺถ หิ – यहाँ ही - ณมฺหิ รนฺชสฺส กรเณ, ชาเทสสฺส วิธานโต; อกตฺตริปิ วิญฺเญยฺโย, การเก ณสฺส สมฺภโวติ. 'ण' प्रत्यय होने पर करण अर्थ में 'रञ्ज' को 'ज' आदेश के विधान से; अकर्ता कारकों में भी 'ण' प्रत्यय का सम्भव समझना चाहिए। รนฺชนฺติ อเนนาติ ราโค, รญฺชียติ อเนนาติ วา ราโค, สยํ รญฺชตีติปิ ราโค. ‘‘ณมฺหิ รนฺชสฺส โช’’ติ โยควิภาเคน ชกาโร. ปชฺชเต อเนนาติ ปาโท, ปตุชฺชเต อเนนาติ ปโตโท, ชรียติ อเนนาติ ชาโร. เอวํ ทาโร. ตถา กมฺมาทีสุ, ภุชฺชตีติ โภโค. เอวํ ภาโค, ภาโร, ลพฺภตีติ ลาโภ, โวหรียตีติ โวหาโร, ทียตีติ ทาโย, วิหญฺญติ เอตสฺมาติ วิฆาโต, วิหรนฺติ เอตฺถาติ วิหาโร, อารมนฺติ เอตสฺมินฺติ อาราโม. เอวํ ปปาโต อิจฺจาทิ. इससे रंजित होते हैं इति 'रागो', या इसके द्वारा रंजित किया जाता है इति 'रागो', स्वयं रंजित होता है यह भी 'रागो' है। 'णम्हि रञ्जस्स जो' इस योग-विभाग से 'ज' कार होता है। इसके द्वारा प्राप्त किया जाता है इति 'पादो', इसके द्वारा प्रेरित किया जाता है इति 'पतोदो', इसके द्वारा जीर्ण किया जाता है इति 'जारो'। इसी प्रकार 'दारो'। उसी प्रकार कर्म आदि में, 'भुज्जति' इति 'भोगो'। इसी प्रकार 'भागो', 'भारो', 'लब्भति' इति 'लाभो', 'वहरीयति' इति 'वोहारो', 'दीयति' इति 'दायो', 'विहञ्ञति' इससे इति 'विघातो', 'विहारन्ति' इसमें इति 'विहारो', 'आरमन्ति' इसमें इति 'आरामो'। इसी प्रकार 'पपातो' इत्यादि। ‘‘ณ’’อิติ วตฺตเต. 'ण' इसकी अनुवृत्ति होती है। ๕๘๐. ภาเว จ. ५८०. 'भावे च' (भाव अर्थ में भी)। ภาวตฺเถ ภาวาภิเธยฺเย ธาตูหิ ณปฺปจฺจโย โหติ. ภูยเต, ภวนํ วา ภาโว, ปจฺจเต, ปจนํ วา ปาโก, ‘‘กคา จชาน’’นฺติ กาเทโส. भाव अर्थ में, भाव के अभिधेय होने पर धातुओं से 'ण' प्रत्यय होता है। 'भूयते', या 'भवनं' इति 'भावो', 'पच्चते', या 'पचनं' इति 'पाको', 'कगा चजानं' सूत्र से 'क' आदेश होता है। สิจ ปคฺฆรเณ, เสจนํ เสโก. สุจ โสเก, โสจนํ โสโก. จช หานิมฺหิ, อจชฺชิตฺถ, จชฺชเต, จชฺชิสฺสเต, จชนํ วา จาโค. ยช เทวปูชาสงฺคติกรณทาเนสุ, อิชฺชิตฺถ, อิชฺชเต, อิชฺชิสฺสเต, ยชนํ วา ยาโค, ยุญฺชนํ โยโค. ภช เสวายํ, อภชฺชิตฺถ, ภชฺชเต, ภชฺชิสฺสเต, ภชนํ วา ภาโค, อรชฺชิตฺถ, รชฺชเต, รชฺชิสฺสเต, รชนํ วา ราโค, ชสฺส คกาโร. 'सिच' क्षरण के अर्थ में, 'सेचनं' इति 'सेको'। 'सुच' शोक के अर्थ में, 'सोचनं' इति 'सोको'। 'चज' हानि के अर्थ में, 'अचज्जित्थ', 'चज्जते', 'चज्जिस्सते', या 'चजनं' इति 'चागो'। 'यज' देवपूजा, संगतिकरण और दान के अर्थों में, 'इज्जित्थ', 'इज्जते', 'इज्जिस्सते', या 'यजनं' इति 'यागो', 'युञ्जनं' इति 'योगो'। 'भज' सेवा के अर्थ में, 'अभज्जित्थ', 'भज्जते', 'भज्जिस्सते', या 'भजनं' इति 'भागो', 'अरज्जित्थ', 'रज्जते', 'रज्जिस्सते', या 'रजनं' इति 'रागो', 'ज' का 'ग' कार होता है। ทห ภสฺมีกรเณ, ปริฑยฺหิตฺถ, ปริฑยฺหติ, ปริฑยฺหิสฺสติ, ปริฑยฺหนํ วาติ อตฺเถ ณปฺปจฺจโย. 'दह' (daha) भस्मीकरण (जलाने) के अर्थ में है, 'pariḍayhittha', 'pariḍayhati', 'pariḍayhissati', 'pariḍayhanaṃ' अथवा इस अर्थ में 'ण' (ṇa) प्रत्यय होता है। ‘‘ณมฺหิ, วา’’ติ จ วตฺตเต. 'ण' (ṇa) प्रत्यय में, और 'वा' (विकल्प) की अनुवृत्ति होती है। ๕๘๑. ทหสฺส โท ลํ. ५८१. 'दह' (daha) के 'द' को 'ल' (la) होता है। ทหอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส ทกาโร ลตฺตมาปชฺชเต ณปฺปจฺจเย ปเร วา. ปริฬาโห, ปริทาโห. ภนฺช อวมทฺทเน, ภญฺชนํ ภงฺโค. สนฺช สงฺเค, สญฺชนํ สงฺโค, นสฺส นิคฺคหีตํ. 'दह' इस धातु के 'द' कार को विकल्प से 'ल' त्व प्राप्त होता है 'ण' प्रत्यय परे होने पर। pariḷāho, paridāho। 'भञ्ज' (bhañja) कुचलने (मर्दन) के अर्थ में है - bhañjanaṃ, bhaṅgo। 'सञ्ज' (sañja) आसक्ति (संग) के अर्थ में है - sañjanaṃ, saṅgo, यहाँ 'न' को निग्गहीत (अनुस्वार) होता है। ปจฺจเยหิ สงฺคมฺม กรียติ, สงฺขรียติ เตน วาติ อตฺเถ วิสรุชปทาทินา, สงฺขรณนฺติ อตฺเถ ‘‘ภาเว จา’’ติ วา ณปฺปจฺจโย. प्रत्ययों के साथ मिलकर किया जाता है, अथवा उसके द्वारा संस्कारित (saṅkharīyati) किया जाता है, इस अर्थ में 'विसरुजपद' आदि (सूत्र) से, अथवा 'संखरण' (saṅkharaṇa) इस भाव अर्थ में 'भावे च' से 'ण' प्रत्यय होता है। ‘‘ณมฺหี’’ติ วตฺตเต. 'ण' (ṇa) प्रत्यय की अनुवृत्ति होती है। ๕๘๒. ปุรสมุปปรีหิ [Pg.360] กโรติสฺส ขขรา วา ตปฺปจฺจเยสุ จ. ५८२. 'पुर', 'सं', 'उप', 'परि' इन (उपसर्गों) से परे 'करोति' (कर धातु) को विकल्प से 'ख' और 'खर' आदेश होते हैं उन प्रत्ययों और 'ण' प्रत्यय के परे होने पर। ปุร สํ อุป ปริอิจฺเจเตหิ ปรสฺส กโรติสฺส ธาตุสฺส ข ขรอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา ตปฺปจฺจเย, ณปฺปจฺจเย จ ปเร. ‘‘ตปฺปจฺจเยสู’’ติ พหุวจนนิทฺเทเสน ตุํ ตฺวาทีสุปิ. ธาตฺวาเทสสฺสาปิ ฐาโนปจาเรน ธาตุโวหารโต ‘‘อสํโยคนฺตสฺส วุทฺธิ การิเต’’ติ วุทฺธิ, สงฺขาโร. เอวํ ปริกฺขาโร, ปุเรกฺขาโร. 'पुर', 'सं', 'उप', 'परि' इन (उपसर्गों) से परे 'करोति' धातु को 'ख' और 'खर' ये आदेश विकल्प से होते हैं 'त' प्रत्यय और 'ण' प्रत्यय परे होने पर। 'तप्पच्चयेसु' इस बहुवचन निर्देश से 'तुं', 'त्वा' आदि प्रत्ययों में भी (यह होता है)। धातु के आदेश को भी स्थानोपचार से धातु व्यवहार होने के कारण 'असंयोगन्तस्स वुद्धि कारिते' (सूत्र) से वृद्धि होकर 'saṅkhāro' बनता है। इसी प्रकार 'parikkhāro', 'purekkhāro' (बनते हैं)। วาติ กึ? อุปกาโร. "वा" (विकल्प) किसलिए है? उपकार (सहायता) के लिए। ลุภ คิทฺธิมฺหิ, ลุพฺภนฺติ เตน, สยํ วา ลุพฺภติ, ลุพฺภนมตฺตเมว วา ตนฺติ โลโภ. ทุส อปฺปีติมฺหิ, ทุสฺสนฺติ เตน, สยํ วา ทุสฺสติ, ทุสฺสนมตฺตเมว วา ตนฺติ โทโส. มุห เวจิตฺเต, มุยฺหนฺติ เตน, สยํ วา มุยฺหติ, มุยฺหนมตฺตเมว วา ตนฺติ โมโห อิจฺจาทิ กตฺตุกรณภาเวสุ ยถารหํ โยเชตพฺพํ. 'लुभ' (lubha) लोभ (आसक्ति) के अर्थ में है, इससे वे लोभ करते हैं, या स्वयं लोभ करता है, या केवल लोभ करना ही है, वह 'लोभ' है। 'दुस' (dusa) अप्रीति (द्वेष) के अर्थ में है, इससे वे द्वेष करते हैं, या स्वयं द्वेष करता है, या केवल द्वेष करना ही है, वह 'दोष' (द्वेष) है। 'मुह' (muha) विक्षिप्तता (मोह) के अर्थ में है, इससे वे मोहित होते हैं, या स्वयं मोहित होता है, या केवल मोहित होना ही है, वह 'मोह' है। इस प्रकार कर्ता, करण और भाव अर्थों में यथायोग्य योजन करना चाहिए। คห อุปาทาเน, คยฺหตีติ อตฺเถ วิสรุชปทาทินา กมฺมนิ ณปฺปจฺจโย. 'गह' (gaha) ग्रहण करने के अर्थ में है, 'ग्रहण किया जाता है' इस अर्थ में 'विसरुज' आदि सूत्रों से कर्म में 'ण' प्रत्यय होता है। ๕๘๓. คหสฺส ฆร เณ วา. ५८३. अथवा 'गह' धातु को 'घर' आदेश होता है 'ण' प्रत्यय होने पर। คหอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส ฆราเทโส โหติ วา ณปฺปจฺจเย ปเร, สรโลปาทิ, ฆรํ, ฆรานิ. 'गह' इस धातु को 'ण' प्रत्यय परे होने पर विकल्प से 'घर' आदेश होता है, स्वर लोप आदि होकर 'घरं' (घर), 'घराणि' (घर - बहुवचन) बनते हैं। วาติ กึ? คณฺหาติ, คหณํ วา คาโห. "वा" (विकल्प) किसलिए है? (ताकि) 'गण्हाति' (पकड़ता है), 'गहणं' (ग्रहण) या 'गाहो' (पकड़) भी सिद्ध हो सकें। สมฺภวตีติ อตฺเถ – 'सम्भवति' (उत्पन्न होता है) इस अर्थ में - ๕๘๔. กฺวิ [Pg.361] จ. ५८४. 'क्वि' (kvi) प्रत्यय भी होता है। สพฺพธาตูหิ กฺวิปจฺจโย โหติ, โส จ กิตสญฺญตฺตา กตฺตริ ภวติ. सभी धातुओं से 'क्वि' प्रत्यय होता है, और वह 'कित्' संज्ञक होने के कारण कर्ता अर्थ में होता है। ๕๘๕. กฺวิโลโป จ. ५८५. और 'क्वि' का लोप भी होता है। กฺวิโน สพฺพสฺส โลโป โหติ. กิตนฺตตฺตา นามมิว กตฺวา สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, สิโลโป, สมฺภู. เอวํ วิภวตีติ วิภู, อภิภู, สยมฺภู. 'क्वि' का पूर्णतः लोप हो जाता है। कृदन्त होने के कारण नाम (संज्ञा) के समान मानकर 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है, 'सि' का लोप होकर 'सम्भु' (सम्भू) बनता है। इसी प्रकार 'विभवति' से 'विभु' (विभू), 'अभिभू', 'स्वयम्भू' (सयम्भू) बनते हैं। ตถา ธู กมฺปเน, สนฺธุนาตีติ สนฺธู. ภา ทิตฺติมฺหิ, วิภาตีติ วิภา, ปภาตีติ ปภา, สห, สงฺคมฺม วา ภนฺติ, ภาสนฺติ วา เอตฺถาติ สภา, สหสฺส สาเทโส, นิคฺคหีตโลโป จ. उसी प्रकार 'धू' कम्पन के अर्थ में है, 'सन्धुनाति' (हिलाता है) से 'सन्धू'। 'भा' दीप्ति (प्रकाश) के अर्थ में है, 'विभाति' से 'विभा', 'पभाति' से 'पभा'। साथ मिलकर (सह) या मिलकर (सङ्gamma) जहाँ चमकते हैं या प्रकाशित होते हैं, वह 'सभा' है; यहाँ 'सह' को 'स' आदेश और निग्गहीत (अनुस्वार) का लोप होता है। ภุเชน คจฺฉตีติ อตฺเถ กฺวิปฺปจฺจโย. 'भुज' (टेढ़ा/हाथ) से जाता है, इस अर्थ में 'क्वि' प्रत्यय होता है। ๕๘๖. ธาตฺวนฺตสฺส โลโป กฺวิมฺหิ. ५८६. 'क्वि' प्रत्यय परे होने पर धातु के अन्तिम वर्ण का लोप होता है। ธาตฺวนฺตสฺส พฺยญฺชนสฺส โลโป โหติ กฺวิปฺปจฺจเย ปเร. กฺวิโลโป, ภุชโค. เอวํ อุรสา คจฺฉตีติ อุรโค, ตุรํ สีฆํ ตุริตตุริโต คจฺฉตีติ ตุรโค, เข คจฺฉตีติ ขโค, วิหายเส คจฺฉตีติ วิหโค, วิหาเทโส, น คจฺฉตีติ อโค, นโค. 'क्वि' प्रत्यय परे होने पर धातु के अन्तिम व्यंजन का लोप होता है। 'क्वि' का लोप होकर 'भुजग' (सांप) बनता है। इसी प्रकार 'उरसा गच्छति' (छाती के बल चलता है) से 'उरग' (सांप), 'तुरं' (शीघ्र) 'तुरित-तुरित' (जल्दी-जल्दी) जाता है से 'तुरग' (घोड़ा), 'खे गच्छति' (आकाश में जाता है) से 'खग' (पक्षी), 'विहायसे गच्छति' (आकाश में जाता है) से 'विहग' (पक्षी) - यहाँ 'विहा' आदेश होता है, 'न गच्छति' (जो नहीं चलता) से 'अग' या 'नग' (पर्वत)। ขนุ อวธารเณ สํปุพฺโพ, สงฺขนิ, สงฺขนติ, สงฺขนิสฺสตีติ วา สงฺโข. รมุ กีฬายํ, กุญฺเช รมตีติ กุญฺชโร. ชน ชนเน, กมฺมโต ชาโตติ อตฺเถ กฺวิปฺปจฺจโย, ธาตฺวนฺตสฺส โลปาทิ ปุริมสมํ, ปญฺจมีตปฺปุริโสว วิเสโส. กมฺมโช วิปาโก, กมฺมชา ปฏิสนฺธิ, กมฺมชํ รูปํ[Pg.362]. เอวํ จิตฺตชํ, อุตุชํ, อาหารชํ, อตฺตโช ปุตฺโต. วาริมฺหิ ชาโต วาริโช. เอวํ ถลโช, ปงฺกชํ, ชลชํ, อณฺฑชํ, สิรชํ, สตฺตมีสมาโส. ทฺวิกฺขตฺตุํ ชาโต ทฺวิโช, ปจฺฉา ชาโต อนุโช อิจฺจาทิ. 'खनु' खोदने (अवधारण) के अर्थ में 'सं' उपसर्ग पूर्वक 'संखनि', 'संखनति', 'संखनस्सति' या 'संखो' (शंख) बनता है। 'रमु' क्रीड़ा के अर्थ में, 'कुञ्जे रमति' (कुञ्ज में रमता है) से 'कुञ्जर' (हाथी)। 'जन' जनन (उत्पन्न होने) के अर्थ में, 'कर्म से उत्पन्न' इस अर्थ में 'क्वि' प्रत्यय होता है, धातु के अन्तिम वर्ण का लोप आदि पहले के समान है, केवल पंचमी तत्पुरुष का विशेष है। 'कम्मजो विपाको' (कर्मज विपाक), 'कम्मजा पटिसन्धि' (कर्मज प्रतिसन्धि), 'कम्मजं रूपं' (कर्मज रूप)। इसी प्रकार 'चित्तज', 'उतुज' (ऋतुज), 'आहारज', 'अत्तजो पुत्तो' (आत्मज पुत्र)। 'वारिम्हि जातो' (जल में उत्पन्न) से 'वारिज' (कमल)। इसी प्रकार 'थलज' (स्थलज), 'पङ्कज', 'जलज', 'अण्डज', 'सिरज' (शिरज - बाल), यहाँ सप्तमी समास है। 'द्विक्खत्तुं जातो' (दो बार जन्मा) से 'द्विज', 'पच्छा जातो' (बाद में जन्मा) से 'अनुज' इत्यादि। วิท ญาเณ, โลกํ อเวทีติ อตฺเถ กฺวิปฺปจฺจโย. 'विद' ज्ञान के अर्थ में, 'लोक को जाना' इस अर्थ में 'क्वि' प्रत्यय होता है। ‘‘กฺวิมฺหี’’ติ วตฺตเต. ''क्विम्हि'' (क्वि प्रत्यय में) का अनुवर्तन होता है। ๕๘๗. วิทนฺเต อู. ५८७. 'विद' के अन्त में 'ऊ' होता है। วิทธาตุโน อนฺเต อูการาคโม โหติ กฺวิมฺหิ, กฺวิโลโป. โลกวิทู. 'विद' धातु के अन्त में 'क्वि' प्रत्यय होने पर 'ऊ' कार का आगम होता है, 'क्वि' का लोप होता है। 'लोकविदू' (लोकविद्)। ทิส เปกฺขเณ, อิมมิว นํ อปสฺสิ, ปสฺสติ, ปสฺสิสฺสตีติ, อยมิว ทิสฺสตีติ วา อตฺเถ กฺวิปฺปจฺจโย. 'दिस' देखने के अर्थ में, 'इसकी तरह इसे देखा', 'देखता है', 'देखेगा' या 'इसकी तरह दिखाई देता है' इस अर्थ में 'क्वि' प्रत्यय होता है। ‘‘ธาตฺวนฺตสฺส โลโป กฺวิมฺหี’’ติ ธาตฺวนฺตโลเป สมฺปตฺเต – ''क्वि'' प्रत्यय में धातु के अन्तिम वर्ण का लोप प्राप्त होने पर - ๕๘๘. อิยตมกิเอสานมนฺตสฺสโร ทีฆํ กฺวจิ ทิสสฺส คุณํ โท รํ สกฺขี จ. ५८८. 'इम', 'य', 'त', 'अम्ह', 'किं', 'एत', 'समान' - इनके अन्त्य स्वर को कहीं दीर्घ होता है और 'दिस' धातु के स्थान पर गुण (ए), 'द', 'र' और 'सक्खी' (क्ख, ई) आदेश होते हैं। อิม ย ต อมฺห กึ เอต สมานอิจฺเจเตสํ สพฺพนามานํ อุปมานุปปทภาเวน ทิสสฺส ธาตุสฺส คุณภูตานํ อนฺโต สโร ทีฆมาปชฺชเต, ทิสอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส อนฺตสฺส ส กฺข อีอิจฺเจเต อาเทสา จ โหนฺติ. ทิสสฺส ทกาโร รการมาปชฺชเตติ กฺวิมฺหิ ธาตฺวนฺตสฺส สสทฺทาเทสํ กตฺวา กฺวิโลปาทิมฺหิ จ กเต อิอิติ นิปาตเนน อิมสทฺทสฺสิกาเร, ตสฺสิมินา ทีเฆ จ กเต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. 'इम', 'य', 'त', 'अम्ह', 'किं', 'एत', 'समान' - इन सर्वनामों के उपमान-उपपद होने पर 'दिस' धातु के गुणभूत होने पर अन्त्य स्वर दीर्घ हो जाता है, और 'दिस' इस धातु के अन्त्य के स्थान पर 'स', 'क्ख', 'ई' ये आदेश होते हैं। 'दिस' के 'द' कार को 'र' कार होता है - इस प्रकार धातु के अन्त्य को 'स' शब्द का आदेश करके और 'क्वि' प्रत्यय का लोप आदि करने पर 'इ' इस निपातन से 'इम' शब्द के इकार को, और इस सूत्र से उसे दीर्घ करने पर 'स्यादि' विभक्ति की उत्पत्ति होती है। อีทิโส [Pg.363] ปุริโส, อีทิสา กญฺญา, อีทิสี วา, อีทิสํ จิตฺตํ. ตถา ยมิว นํ ปสฺสติ, โย วิย ทิสฺสตีติ วา ยาทิโส, ยาทิสา, ยาทิสี, ยาทิสํ. ตมิว นํ ปสฺสติ, โส วิย ทิสฺสตีติ วา ตาทิโส, ตาทิสา, ตาทิสี, ตาทิสํ. มมิว นํ ปสฺสติ, อหํ วิย โส ทิสฺสตีติ วา มาทิโส, มาทิสา, มาทิสี, มาทิสํ, มอิติ นิปาตเนน อมฺหสทฺทสฺส มสทฺทาเทโส. กิมิว นํ ปสฺสติ, โก วิย ทิสฺสตีติ วา กีทิโส, กีทิสา, กีทิสี, กีทิสํ. เอตมิว นํ ปสฺสติ, เอโส วิย ทิสฺสตีติ วา เอทิโส, เอตาทิโส วา, เอทิสา, เอทิสี, เอทิสํ, เออิติ นิปาตเนน เอตสทฺทสฺส เอกาโร. สมานํ กตฺวา นํ ปสฺสติ, สมาโน วิย ทิสฺสตีติ สาทิโส, สทิโส, สอิติ นิปาตเนน สมานสฺส สาเทโส, ตทนฺตสฺส วา ทีโฆ, สาทิสา, สาทิสี, สทิสา, สทิสี, สาทิสํ, สทิสํ. 'ईदिसो पुरिसो' (ऐसा पुरुष), 'ईदिसा कञ्ञा' (ऐसी कन्या), 'ईदिसी' वा, 'ईदिसं चित्तं' (ऐसा चित्त)। उसी प्रकार 'यमिवा नं पस्सति' (जिसे इसके समान देखता है) या 'यो विय दिस्सति' (जो इसके समान दिखता है) - 'यादिसो', 'यादिसा', 'यादिसी', 'यादिसं'। 'तमिवा नं पस्सति' (उसे इसके समान देखता है) या 'सो विय दिस्सति' (वह इसके समान दिखता है) - 'तादिसो', 'तादिसा', 'तादिसी', 'तादिसं'। 'ममिवा नं पस्सति' (मुझे इसके समान देखता है) या 'अहं विय सो दिस्सति' (मैं जैसा वह दिखता है) - 'मादिसो', 'मादिसा', 'मादिसी', 'मादिसं', यहाँ 'म' निपातन से 'अम्ह' शब्द को 'म' आदेश हुआ है। 'किमिवा नं पस्सति' (किसके समान इसे देखता है) या 'को विय दिस्सति' (कौन जैसा दिखता है) - 'कीदिसो', 'कीदिसा', 'कीदिसी', 'कीदिसं'। 'एतमिवा नं पस्सति' (इसके समान इसे देखता है) या 'एसो विय दिस्सति' (यह जैसा दिखता है) - 'एदिसो', 'एतादिसो' वा, 'एदिसा', 'एदिसी', 'एदिसं', यहाँ 'ए' निपातन से 'एत' शब्द को 'ए' कार हुआ है। 'समानं कत्वा नं पस्सति' (समान करके इसे देखता है) या 'समानो विय दिस्सति' (समान जैसा दिखता है) - 'सादिसो', 'सदिसो', यहाँ 'स' निपातन से 'समान' को 'स' आदेश हुआ है, अथवा उसके अन्त को दीर्घ होकर 'सादिसो', 'सादिसा', 'सादिसी', 'सदिसा', 'सदिसी', 'सादिसं', 'सदिसं'। ทการสฺส รการาเทเส ปน อีริโส, ยาริโส, ตาริโส, มาริโส, กีริโส, เอริโส, สาริโส, สริโส. กฺขาเทเส อีทิกฺโข, ยาทิกฺโข, ตาทิกฺโข, มาทิกฺโข, กีทิกฺโข, เอทิกฺโข, สาทิกฺโข, สทิกฺโข. รการาเทเส สาริกฺโข, สริกฺโข, อีการาเทเส อีที, ยาที, ตาที, มาที, กีที, เอที, สาที. 'द' कार को 'र' कार आदेश होने पर - 'ईरिसो', 'यारिसो', 'तारिसो', 'मारिसो', 'कीरिसो', 'एरिसो', 'सारिसो', 'सरिसो'। 'क्ख' आदेश होने पर - 'ईदिक्खो', 'यादिक्खो', 'तादिक्खो', 'मादिक्खो', 'कीदिक्खो', 'एदिक्खो', 'सादिक्खो', 'सदिक्खो'। 'र' कार आदेश होने पर - 'सारिक्खो', 'सरिक्खो'। 'ई' कार आदेश होने पर - 'ईदी', 'यादी', 'तादी', 'मादी', 'कीदी', 'एदी', 'सादी'। จสทฺเทน ตุมฺหาทิอุปปเทปิ ตุมฺเห วิย ทิสฺสตีติ ตุมฺหาทิโส, ตุมฺหาทิสี, ขนฺธา วิย ทิสฺสนฺตีติ ขนฺธาทิสา อิจฺจาทิ. 'च' शब्द से 'तुम्ह' आदि उपपद होने पर भी - 'तुम्हे विय दिस्सति' (तुम्हारे जैसा दिखता है) - 'तुम्हादिसो', 'तुम्हादिसी'। 'खन्धा विय दिस्सन्ति' (स्कन्धों के समान दिखते हैं) - 'खन्धादिसा' इत्यादि। ธร ธารเณ, อปาเยสฺวปตมาเน อธิคตมคฺคาทิเก สตฺเต ธาเรติ, ธรนฺติ เตนาติ วา, สลกฺขณํ ธาเรติ วา, ปจฺจเยหิ ธรียติ วาติ อตฺเถ – 'धर' धारण करने के अर्थ में; अपायों में न गिरते हुए, अधिगत मार्ग आदि के द्वारा सत्त्वों को धारण करता है, अथवा जिसके द्वारा धारण करते हैं, अथवा अपने लक्षण को धारण करता है, अथवा प्रत्ययों के द्वारा धारण किया जाता है - इस अर्थ में - ๕๘๙. ธราทีหิ [Pg.364] รมฺโม. ५८९. 'धरादीहि रम्मो' (धरादि धातुओं से 'रम्म' प्रत्यय होता है)। ธรอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ รมฺมปฺปจฺจโย โหติ. 'धर' इत्यादि धातुओं से 'रम्म' प्रत्यय होता है। โส จ – और वह - กมฺมคฺคหณโภ ภาว- กมฺเมสูเตตฺถ เวทิโย; อกตฺตริปิ โหตีติ, การเก รมฺมปฺปจฺจโย. 'कम्मग्गहणभो भाव-कम्मेसूतेत्थ वेदियो; अकत्तरिपि होतीति, कारके रम्मप्पच्चयो' (यहाँ कर्म ग्रहण से भाव और कर्म अर्थ में जानना चाहिए; कर्ता के अतिरिक्त अन्य कारकों में भी 'रम्म' प्रत्यय होता है)। ราทิโลโป, ธมฺโม, เอวํ กรียตีติ กมฺมํ. วร วรเณ, วมฺมํ. 'र' आदि का लोप होकर - 'धम्मो' (धर्म)। इसी प्रकार 'करीयतीति कम्मं' (जो किया जाता है वह कर्म है)। 'वर' वरण (चुनने) के अर्थ में - 'वम्मं' (वर्म/कवच)। สํส ปสํสเน ปปุพฺโพ, ปิยอิจฺจุปปทํ, ปิยํ ปสํสิตุํ สีลํ ยสฺสาติ วา ปิยํ ปสํสนสีโล, ปิยํ ปสํสนธมฺโม, ปิยํ ปสํสเน สาธุการีติ วา อตฺเถ – 'संस' प्रशंसा करने के अर्थ में 'प' उपसर्ग पूर्वक, 'पिय' उपपद होने पर; 'पियं पसंसितुं सीलं यस्साति' (प्रिय की प्रशंसा करना जिसका स्वभाव है) अथवा 'पियं पसंसनसीलो', 'पियं पसंसनधम्मो', 'पियं पसंसने साधुकारी' (प्रिय की प्रशंसा करने में कुशल) - इस अर्थ में - ๕๙๐. ตสฺสีลาทีสุ ณีตฺวาวี จ. ५९०. 'तस्सीलादीसु णीत्वावी च' (तच्छील आदि अर्थों में 'णी', 'तु' और 'आवी' प्रत्यय होते हैं)। สีลํ ปกติ, ตสฺสีล ตทฺธมฺม ตสฺสาธุการีสฺวตฺเถสุ คมฺยมาเนสุ สพฺพธาตูหิ ณี ตุ อาวีอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺตีติ กตฺตริ ณีปจฺจโย, สํโยคนฺตตฺตาน วุทฺธิ. เสสํ เนยฺยํ. 'सील' का अर्थ प्रकृति (स्वभाव) है; तच्छील, तद्धर्म, तत्साधुकारी - इन अर्थों के प्रतीत होने पर सभी धातुओं से 'णी', 'तु', 'आवी' ये प्रत्यय होते हैं। यहाँ कर्ता अर्थ में 'णी' प्रत्यय है, संयोगान्त होने के कारण वृद्धि नहीं होती। शेष समझने योग्य है। ปิยปสํสี ราชา. อถ วา ปิยํ ปสํสิ, ปสํสติ, ปสํสิสฺสติ วา สีเลน วา ธมฺเมน วา สาธุ วาติ ปิยปสํสี, ปิยปสํสินี, ปิยปสํสิ กุลํ. พฺรหฺมํ จริตุํ สีลํ ยสฺสาติ วา พฺรหฺมํ จรติ สีเลน, ธมฺเมน, สาธุ วาติ พฺรหฺมจารี, พฺรหฺมจารินี, พฺรหฺมจาริ. เอวํ สจฺจวาที, ธมฺมวาที, สีฆยายี, ปาปการี, มาลาการี อิจฺจาทิ. 'पियपसंसी राजा'। अथवा 'पियं पसंसि' (प्रिय की प्रशंसा की), 'पसंसति' (प्रशंसा करता है), 'पसंसिस्सति' (प्रशंसा करेगा) - स्वभाव से, धर्म से या अच्छी तरह से - 'पियपसंसी', 'पियपसंसिनी', 'पियपसंसि कुलं'। 'ब्रह्मं चरितुं सीलं यस्साति' (ब्रह्मचर्य का आचरण करना जिसका स्वभाव है) अथवा स्वभाव से, धर्म से या अच्छी तरह से ब्रह्मचर्य का आचरण करता है - 'ब्रह्मचारी', 'ब्रह्मचारिनी', 'ब्रह्मचारि'। इसी प्रकार 'सच्चवादी' (सत्यवादी), 'धम्मवादी' (धर्मवादी), 'सीघयायी' (शीघ्र जाने वाला), 'पापकारी', 'मालाकारी' इत्यादि। จสทฺเทน อตฺตมาเนปิ ณี, ปณฺฑิตํ อตฺตานํ มญฺญตีติ ปณฺฑิตมานี พาโล, พหุสฺสุตมานี อิจฺจาทิ. 'च' शब्द से 'अत्तमान' (स्वयं को मानने) के अर्थ में भी 'णी' प्रत्यय होता है - 'पण्डितं अत्तानं मञ्ञतीति' (अपने आप को पण्डित मानने वाला) - 'पण्डितमानी बालो', 'बहुस्सुतमानी' इत्यादि। วตุ [Pg.365] วตฺตเน ปปุพฺโพ, ปสยฺห ปวตฺติตุํ สีลํ ยสฺสาติ อตฺเถ อิมินา ตุปฺปจฺจโย, ปสยฺหปวตฺตา. อถ วา วจ วิยตฺติยํ วาจายํ, ปสยฺห ปวตฺติตุํ สีลมสฺสาติ ปสยฺหปวตฺตา, ปสยฺหปวตฺตาโร, ภุชาทิตฺตา ธาตฺวนฺตโลปทฺวิตฺตานิ, เสสํ กตฺตุสมํ. 'वतु' वर्तन (होने) के अर्थ में 'प' उपसर्ग पूर्वक; 'पसय्ह पवत्तितुं सीलं यस्साति' (बलपूर्वक प्रवृत्त होना जिसका स्वभाव है) - इस अर्थ में इस सूत्र से 'तु' प्रत्यय होकर 'पसय्हपवत्ता' बनता है। अथवा 'वच' स्पष्ट वाणी के अर्थ में; 'पसय्ह पवत्तितुं सीलमस्साति' - 'पसय्हपवत्ता', 'पसय्हपवत्तारो', 'भुजादि' गण के होने से धातु के अन्त्य का लोप और द्वित्व होता है, शेष कर्ता के समान है। ภยํ ปสฺสิตุํ สีลํ ยสฺสาติ วา ภยํ ทสฺสนสีโล, ภยํ ทสฺสนธมฺโม, ภยํ ทสฺสเน สาธุการีติ วา ภยทสฺสาวี, ภยทสฺสาวินี, ภยทสฺสาวิ จิตฺตํ. เอวํ อาทีนวทสฺสาวี. 'भयं पस्सितुं सीलं यस्साति' (भय देखना जिसका स्वभाव है) अथवा 'भय दस्सनसीलो', 'भय दस्सनधम्मो', 'भय दस्सने साधुकारी' - 'भयदस्सावी', 'भयदस्साविनी', 'भयदस्सावि चित्तं'। इसी प्रकार 'आदीनवदस्सावी' (दोष देखने वाला)। ‘‘ตสฺสีลาทีสู’’ติ อธิกาโร. 'तस्सीलादीसू' - यह अधिकार (सूत्र) है। ๕๙๑. สทฺท กุ ธ จ ล ม ณฺฑ ตฺถ รุจาทีหิ ยุ. ५९१. 'सद्द कु ध च ल मण्ड त्थ रुचादीहि यु' (सद्द, कु, ध, च, ल, मण्ड, त्थ और रुचादि धातुओं से 'यु' प्रत्यय होता है)। สทฺท กุ ธ จ ล มณฺฑตฺเถหิ ธาตูหิ, รุจาทีหิ จ ยุปฺปจฺจโย โหติ ตสฺสีลาทีสฺวตฺเถสุ. 'सद्द', 'कु', 'ध', 'च', 'ल', 'मण्ड' अर्थ वाली धातुओं से और 'रुच' आदि धातुओं से 'तच्छील' आदि अर्थों में 'यु' प्रत्यय होता है। ฆุส สทฺเท, โฆสิตุํ สีลํ อสฺสาติ วา โฆสนสีโลติ วา อโฆสยิ, โฆสยติ, โฆสยิสฺสติ สีเลน, ธมฺเมน, สาธุ วาติ อตฺเถ อิมินา ยุปฺปจฺจโย, ตสฺส ‘‘อนกา ยุณฺวูน’’นฺติ อนาเทโส, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ วุทฺธิ, โส โฆสโน, สา โฆสนา. ภาส วิยตฺติยํ วาจายํ, ภาสิตุํ สีลมสฺสาติ วา ภาสนสีโล, ภาสนธมฺโม, ภาสเน สาธุการีติ วา ภาสโน. 'घुस' शब्द करने के अर्थ में; 'घोसितुं सीलं अस्साति' (घोषणा करना जिसका स्वभाव है) अथवा 'घोसनसीलो' अथवा स्वभाव से, धर्म से या अच्छी तरह से घोषणा की, घोषणा करता है, घोषणा करेगा - इस अर्थ में इस सूत्र से 'यु' प्रत्यय होता है, उसे 'अनका युण्वूनं' सूत्र से 'अन' आदेश होता है, 'अञ्ञेसु चा' से वृद्धि होकर - वह 'घोसनो', वह 'घोसना'। 'भास' स्पष्ट वाणी के अर्थ में; 'भासितुं सीलमस्साति' (बोलना जिसका स्वभाव है) अथवा 'भासनसीलो', 'भासनधम्मो', 'भासने साधुकारी' - 'भासनो'। กุธ โกเป, กุชฺฌิตุํ สีลมสฺสาติ วา กุชฺฌนสีโลติ วา โกธโน, โกธนา, โกธนํ. 'कुध' क्रोध करने के अर्थ में; 'कुज्झितुं सीलमस्साति' (क्रोध करना जिसका स्वभाव है) अथवा 'कुज्झनसीलो' - 'कोधनो', 'कोधना', 'कोधनं'। รุส โรเส, โรสิตุํ สีลมสฺสาติ วา โรสนสีโลติ วา โรสโน. 'रुस' रोष (क्रोध) करने के अर्थ में; 'रोसितुं सीलमस्साति' (रोष करना जिसका स्वभाव है) अथवा 'रोसनसीलो' - 'रोसनो'। จล กมฺปเน, จลิตุํ สีลํ ยสฺสาติ วา จลติ สีเลนาติ วา จลโน. กปิจลเน, กมฺปิตุํ สีลํ ยสฺสาติ วา [Pg.366] อกมฺปิ, กมฺปติ, กมฺปิสฺสติ สีเลนาติ วา กมฺปโน, อิการานุพนฺธิธาตุสรโต ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา, ‘‘นิคฺคหีตญฺจา’’ติ วา นิคฺคหีตาคโม. ผทิ กิญฺจิจลเน, ผนฺทิตุํ สีลํ ยสฺสาติ วา ผนฺทติ สีเลนาติ วา ผนฺทโน. 'चल' काँपने के अर्थ में; 'चलितुं सीलं यस्साति' (चलना जिसका स्वभाव है) अथवा स्वभाव से चलता है - 'चलनो'। 'कपि' काँपने के अर्थ में; 'कम्पितुं सीलं यस्साति' अथवा स्वभाव से काँपा, काँपता है, काँपेगा - 'कम्पनो', इकार अनुबन्ध वाली धातु के स्वर के बाद 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से अथवा 'निग्गहीतं च' से निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम होता है। 'फदि' थोड़ा काँपने के अर्थ में; 'फन्दितुं सीलं यस्साति' अथवा स्वभाव से काँपता है - 'फन्दनो'। มฑิ ภูสายํ, มณฺฑยิตุํ สีลํ ยสฺสาติ วา มณฺฑยติ สีเลนาติ วา มณฺฑโน. ภูส อลงฺกาเร, ภูสนสีโลติ วา อภูสยิ, ภูสยติ, ภูยยิสฺสติ สีเลนาติ วา ภูสโน, ภูสนา, ภูสนํ. 'मडि' धातु अलङ्कार (सजावट) के अर्थ में है; जिसका स्वभाव सजाना है या जो स्वभाव से सजाता है, वह 'मण्डन' है। 'भूस' धातु अलङ्कार के अर्थ में है; जिसका स्वभाव सजाना है या जिसने सजाया, सजाता है, सजाएगा स्वभाव से, वह 'भूषण', 'भूषणा', 'भूषणम्' है। รุจ ทิตฺติมฺหิ, อรุจฺจิ, รุจฺจติ, รุจฺจิสฺสติ สีเลนาติ วา โรจโน. ชุต ทิตฺติมฺหิ, อโชติ, โชตติ, โชติสฺสติ สีเลนาติ วา โชตโน. วฑฺฒ วฑฺฒเน, วฑฺฒิตุํ สีลมสฺสาติ วฑฺฒโน อิจฺจาทิ. 'रुच' धातु दीप्ति (चमक) के अर्थ में है; जिसने स्वभाव से दीप्ति की, जो दीप्ति करता है, जो दीप्ति करेगा, वह 'रोचन' है। 'जुट' धातु दीप्ति के अर्थ में है; जिसने स्वभाव से दीप्ति की, जो दीप्ति करता है, जो दीप्ति करेगा, वह 'जोतन' है। 'वड्ढ' धातु वर्धन (बढ़ने) के अर्थ में है; जिसका स्वभाव बढ़ना है, वह 'वड्ढन' है, इत्यादि। ๕๙๒. ปาราทิคมิมฺหา รู. ५९२. 'पार' आदि उपपद होने पर 'गमि' धातु से 'रू' प्रत्यय होता है। ปาราทิอุปปเทหิ ปรสฺมา คมิอิจฺเจตสฺมา ธาตุมฺหา ปโร รูปจฺจโย โหติ ตสฺสีลาทีสฺวตฺเถสุ กตฺตริเยว. ปาโร อาทิ เยสํ เต ปาราทโย, ปาราทีหิ คมิ ปาราทิคมิ. ราทิโลโป, ภวปารํ คนฺตุํ สีลํ ยสฺสาติ วา ภวปารํ คมนสีโล, ภวปารํ คมนธมฺโม, ภวปารํ คมเน สาธุการีติ วา ภวปารคู, ภวปารคุโน. อนฺตํ คมนสีโล อนฺตคู. เอวํ เวทคู, อทฺธคู. 'पार' आदि उपपदों के बाद 'गमि' इस धातु से परे 'रू' प्रत्यय होता है, उन 'तच्छील' आदि अर्थों में कर्ता कारक में ही। 'पार' है आदि में जिनके वे 'पारादि' हैं, 'पारादि' के साथ 'गमि' धातु 'पारादिगमि' है। 'र' आदि का लोप होता है; भव के पार जाने का जिसका स्वभाव है, अथवा भव के पार जाने वाला, भव के पार जाने के धर्म वाला, अथवा भव के पार जाने में कुशल, वह 'भवपारगू' (भवपारगु) है। अन्त तक जाने के स्वभाव वाला 'अन्तगू' है। इसी प्रकार 'वेदगू', 'अद्धगू' हैं। ‘‘รู’’ติ วตฺตเต. 'रू' की अनुवृत्ति होती है। ๕๙๓. ภิกฺขาทิโต จ. ५९३. 'भिक्ख' आदि धातुओं से भी (रू प्रत्यय होता है)। ภิกฺขอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ รูปจฺจโย โหติ ตสฺสีลาทีสฺวตฺเถสุ. ภิกฺข ยาจเน, ภิกฺขิตุํ สีลํ ยสฺสาติ วา อภิกฺขิ, ภิกฺขติ, ภิกฺขิสฺสติ สีเลนาติ วา ภิกฺขนธมฺโมติ [Pg.367] วา ภิกฺขเน สาธุการีติ วา ภิกฺขุ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา รสฺสตฺตํ. อิกฺข ทสฺสนงฺเกสุ, สํสาเร ภยํ อิกฺขตีติปิ ภิกฺขุ, วิชานิตุํ สีลํ ยสฺส, วิชานนสีโลติ วา วิญฺญู, สพฺพํ ชานาตีติ สพฺพญฺญู. เอวํ มตฺตญฺญู, ธมฺมญฺญู, อตฺถญฺญู, กาลญฺญู, กตญฺญู อิจฺจาทโย. 'भिक्ख' इत्यादि धातुओं से 'तच्छील' आदि अर्थों में 'रू' प्रत्यय होता है। 'भिक्ख' धातु याचना के अर्थ में है; भिक्षा माँगना जिसका स्वभाव है, अथवा जिसने भिक्षा माँगी, माँगता है, माँगेगा स्वभाव से, अथवा भिक्षा माँगने के धर्म वाला, अथवा भिक्षा माँगने में कुशल, वह 'भिक्खु' है; 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से ह्रस्व होता है। 'इक्ख' धातु दर्शन और अंकन के अर्थ में है; संसार में भय को जो देखता है, वह भी 'भिक्खु' है। विशेष रूप से जानना जिसका स्वभाव है, अथवा जानने के स्वभाव वाला 'विञ्ञू' है। सब कुछ जानने वाला 'सब्बञ्ञू' है। इसी प्रकार 'मत्तञ्ञू', 'धम्मञ्ञू', 'अत्थञ्ञू', 'कालञ्ञू', 'कतञ्ञू' इत्यादि। ๕๙๔. หนตฺยาทีนํ ณุโก. ५९४. 'हन' आदि धातुओं से 'णुक' प्रत्यय होता है। หนตฺยาทีนํ ธาตูนมนฺเต ณุกปฺปจฺจโย โหติ ตสฺสีลาทีสฺวตฺเถสุ กตฺตริ, อนฺตาเปกฺขายํ ฉฏฺฐี, ณกาโร วุทฺธตฺโถ. อาหนนสีโล อาฆาตุโก, ฆาตาเทโส, สรโลปาทิ, กรณสีโล การุโก สิปฺปิ. ภี ภเย, ภายนสีโล ภีรุโก, รการาคโม. อว รกฺขเณ, อาวุโก ปิตา. 'हन' आदि धातुओं के अन्त में 'तच्छील' आदि अर्थों में कर्ता कारक में 'णुक' प्रत्यय होता है; 'अन्त' की अपेक्षा में षष्ठी विभक्ति है, 'ण' कार वृद्धि के लिए है। आघात करने के स्वभाव वाला 'आघातुको' है, 'घात' आदेश, स्वर-लोप आदि होते हैं। करने के स्वभाव वाला 'कारुको' (शिल्पी) है। 'भी' धातु भय के अर्थ में है; डरने के स्वभाव वाला 'भीरुको' है, 'र' कार का आगम होता है। 'अव' धातु रक्षण के अर्थ में है; 'आवुको' पिता है। ๕๙๕. สํหนญฺญาย วา โร โฆ. ५९५. 'सम्' उपसर्ग पूर्वक 'हन' धातु और 'ञा' धातु से परे 'र' प्रत्यय होता है और 'हन' को 'घ' आदेश होता है। สํปุพฺพาย หนอิจฺเจตาย ธาตุยา, อญฺญาย จ ธาตุยา ปโร รปฺปจฺจโย โหติ, หนสฺส โฆ จ. วาคฺคหณํ สมฺปิณฺฑนตฺถํ, วิกปฺปนตฺถํ วา, เตน สงฺฆาโตติปิ สิทฺธํ โหติ. 'सम्' उपसर्ग पूर्वक 'हन' इस धातु से और 'ञा' धातु से परे 'र' प्रत्यय होता है, और 'हन' को 'घ' आदेश होता है। 'वा' का ग्रहण संग्रह के लिए अथवा विकल्प के लिए है, उससे 'सङ्घात' भी सिद्ध होता है। หนสฺเสวายํ โฆ โหติ, อภิธานานุรูปโต; อสํปุพฺพา จ โร เตน, ปฏิโฆติปิ สิชฺฌติ. यह 'घ' आदेश 'हन' धातु को ही होता है, अभिधान (नाम) के अनुरूप; और उससे 'सम्' उपसर्ग के बिना भी 'र' प्रत्यय होता है, जिससे 'पटिघ' भी सिद्ध होता है। หน หึสาคตีสุ สํ ปุพฺโพ, สํหนติ สมคฺคํ กมฺมํ สมุปคจฺฉติ, สมฺมเทว กิเลสทรเถ หนตีติ วา สงฺโฆ, ราทิโลโป[Pg.368], สมนฺตโต นครสฺส พาหิเย ขญฺญตีติ ปริขา, อิตฺถิยํ อาปจฺจโย, อนฺตํ กโรตีติ อนฺตโก มจฺจุ. 'हन' धातु हिंसा और गति के अर्थ में है, 'सम्' उपसर्ग पूर्वक; जो सम्यक् रूप से हनन करता है, समग्र कर्म को प्राप्त होता है, अथवा जो सम्यक् रूप से क्लेशों के संताप को नष्ट करता है, वह 'सङ्घ' है; 'र' आदि का लोप होता है। नगर के बाहर चारों ओर जो खोदी जाती है, वह 'परिखा' है, स्त्रीलिंग में 'आ' प्रत्यय होता है। जो अन्त करता है, वह 'अन्तको' (मृत्यु) है। ‘‘ภาวกมฺเมสู’’ติ วตฺตเต. 'भाव और कर्म में' इसकी अनुवृत्ति होती है। ๕๙๖. นนฺทาทีหิ ยุ. ५९६. 'नन्द' आदि धातुओं से 'यु' प्रत्यय होता है। นนฺทอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ปโร ยุปฺปจฺจโย โหติ ภาวกมฺเมสุ. ‘‘อนกา ยุณฺวูน’’นฺติ ยุปฺปจฺจยสฺส อนาเทโส, นนฺท สมิทฺธิมฺหิ, นนฺท นนฺทเน วา. ภาเว – นนฺทียเต นนฺทนํ. กมฺเม – อนนฺทียิตฺถ, นนฺทียติ, นนฺทียิสฺสติ, นนฺทิตพฺพนฺติ วา นนฺทนํ วนํ, คยฺหติ, คหณียํ วา คหณํ, คณฺหนํ วา, จริตพฺพํ จรณํ, ภูยเต ภวนํ, หูยเต หวนํ. รุนฺธิตพฺพํ รุนฺธนํ, โรธนํ วา, ภุญฺชิตพฺพํ ภุญฺชนํ, โภชนํ วา. พุชฺฌิตพฺพํ พุชฺฌนํ, โพธนํ วา. สูยติ, สุติ วา สวณํ, ปาปียตีติ ปาปุณนํ, ปาปนํ วา, ปาลียตีติ ปาลนํ อิจฺจาทิ. 'नन्द' इत्यादि धातुओं से परे भाव और कर्म अर्थों में 'यु' प्रत्यय होता है। 'अनका युण्वूनं' सूत्र से 'यु' प्रत्यय को 'अन' आदेश होता है। 'नन्द' धातु समृद्धि के अर्थ में है, अथवा 'नन्द' प्रसन्नता के अर्थ में है। भाव में - 'नन्दनं'। कर्म में - जो प्रसन्न किया गया, प्रसन्न किया जाता है, प्रसन्न किया जाएगा, अथवा जो प्रसन्न करने योग्य है, वह 'नन्दनं' वन है। जो ग्रहण किया जाता है या ग्रहण करने योग्य है, वह 'गहणं' या 'गण्हनं' है। जो आचरण करने योग्य है, वह 'चरणं' है। जो होता है, वह 'भवनं' है। जो हवन किया जाता है, वह 'हवनं' है। जो रोका जाना चाहिए, वह 'रुन्धनं' या 'रोधनं' है। जो खाया जाना चाहिए, वह 'भुञ्जनं' या 'भोजनं' है। जो समझा जाना चाहिए, वह 'बुज्झनं' या 'बोधनं' है। जो सुना जाता है, वह 'सवणं' है। जो प्राप्त किया जाता है, वह 'पापुणनं' या 'पापनं' है। जो पालन किया जाता है, वह 'पालनं' है, इत्यादि। ‘‘ยู’’ติ วตฺตเต. 'यु' की अनुवृत्ति होती है। ๕๙๗. กตฺตุกรณปเทเสสุ จ. ५९७. कर्ता, करण और प्रदेश (अधिकरण) अर्थों में भी (यु प्रत्यय होता है)। กตฺตุกรณปเทสอิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ จ สพฺพธาตูหิ ยุปฺปจฺจโย โหติ. เอตฺถ จ ปเทโสติ อธิกรณการกํ วุจฺจติ. กตฺตริ ตาว – รชํ หรตีติ รโชหรณํ โตยํ. อารมณํ วิชานาตีติ วิญฺญาณํ, วิชานนํ วา, อานนชาเทสา. ฆา คนฺโธปาทาเน, ฆายตีติ ฆานํ, เฌ จินฺตายํ, ฌายตีติ ฌานํ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อาตฺตํ. कर्ता, करण और प्रदेश इन अर्थों में भी सभी धातुओं से 'यु' प्रत्यय होता है। यहाँ 'प्रदेश' से अधिकरण कारक कहा जाता है। पहले कर्ता में - जो रज को हरता है, वह 'रजोहरणं' जल है। जो आलम्बन को विशेष रूप से जानता है, वह 'विञ्ञाणं' या 'विजाननं' है, 'आन' और 'नज' आदेश होते हैं। 'घा' धातु गन्ध ग्रहण करने के अर्थ में है; जो सूँघता है, वह 'घानं' है। 'झे' धातु चिन्तन के अर्थ में है; जो ध्यान करता है, वह 'झानं' है, 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से 'आ' कार होता है। กรเณ [Pg.369] – กร กรเณ, กโรติ เตนาติ กรณํ, ยถาสรูปํ สทฺทา พฺยากรียนฺติ เอเตนาติ พฺยากรณํ. ปูร ปูรเณ, ปูรยติ เตนาติ ปูรณํ. ทียติ อเนนาติ ทานํ, ปมียติ อเนนาติ ปมานํ, วุจฺจติ อเนนาติ วจนํ, ปนุทติ, ปนุชฺชเต อเนนาติ วา ปนูทโน. สูท ปคฺฆรเณ, สูทติ, สุชฺชเต อเนนาติ วา สูทโน, สุณาติ, สูยติ เอเตนาติ วา สวณํ. ลู เฉทเน, ลุนาติ, ลูยติ อเนนาติ วา ลวนํ, ลวณํ, โลณํ วา. นยติ, นียติ เอเตนาติ วา นยนํ. ปู ปวเน, ปุนาติ, ปูยเต อเนนาติ วา ปวโน, สเมติ, สมียติ วา ปาปํ อเนนาติ สมโณ, สมณํ วา. ตถา ภาเวติ, ภาวียติ เอกายาติ วา ภาวนา. เอวํ ปาจนํ, ปาจาปนํ อิจฺจาทิ. करण में - 'कर' धातु करने के अर्थ में है; जिससे करता है, वह 'करणं' है। जिसके द्वारा शब्द यथास्वरूप व्याकृत किए जाते हैं, वह 'ब्याकरणं' है। 'पूर' धातु भरने के अर्थ में है; जिससे भरता है, वह 'पूरणं' है। जिसके द्वारा दिया जाता है, वह 'दानं' है। जिसके द्वारा मापा जाता है, वह 'पमानं' है। जिसके द्वारा कहा जाता है, वह 'वचनं' है। जिसके द्वारा दूर किया जाता है, वह 'पनूदनो' है। 'सूद' धातु क्षरण के अर्थ में है; जिससे क्षरित होता है, वह 'सूदनो' है। जिसके द्वारा सुनता है या सुना जाता है, वह 'सवणं' है। 'लू' धातु छेदन के अर्थ में है; जिसके द्वारा काटता है या काटा जाता है, वह 'लवनं', 'लवणं' या 'लोणं' है। जिसके द्वारा ले जाता है या ले जाया जाता है, वह 'नयनं' है। 'पू' धातु पवित्र करने के अर्थ में है; जिसके द्वारा पवित्र करता है या पवित्र होता है, वह 'पवनो' है। जिसके द्वारा पाप शान्त होता है या शान्त किया जाता है, वह 'समणो' या 'समणं' है। उसी प्रकार जिसके द्वारा भावना करता है या भावित किया जाता है, वह 'भावना' है। इसी प्रकार 'पाचनं', 'पाचापनं' इत्यादि। อธิกรเณ – ฐา คตินิวตฺติมฺหิ, ติฏฺฐติ ตสฺมินฺติ ฐานํ. เอวํ สยนํ, เสนํ วา, อาสนํ, อธิกรียติ เอตฺถาติ อธิกรณํ. अधिकरण में - 'ठा' धातु गति की निवृत्ति के अर्थ में है; जिसमें ठहरता है, वह 'ठानं' है। इसी प्रकार 'सयनं' या 'सेनं', 'आसनं', जिसमें अधिकरण किया जाता है, वह 'अधिकरणं' है। จสทฺเทน สมฺปทานาปาทาเนสุปิ – สมฺมา ปกาเรน ททาติ อสฺสาติ สมฺปทานํ, อเปจฺจ เอตสฺมา อาททาตีติ อปาทานํ. 'च' शब्द से सम्प्रदान और अपादान अर्थों में भी - जिसे सम्यक् प्रकार से देता है, वह 'सम्पदानं' है। जिससे अलग होकर ग्रहण करता है, वह 'अपादानं' है। ๕๙๘. สญฺญายํ ทาธาโต อิ. ५९८. संज्ञा के अर्थ में 'दा' धातु से 'इ' प्रत्यय होता है। สญฺญายํ คมฺยมานายํ ทาธาอิจฺเจเตหิ ธาตูหิ อิปฺปจฺจโย โหติ, ภาวกมฺมาทิอธิกาเรวายํ, สรโลปาทิ. ทา ทาเน อาปุพฺโพ, อาทียตีติอาทิ. เอวํ อุปาทิ. ธา ธารเณ[Pg.370], อุทกํ ทธาตีติ อุทธิ, เตสุ วุทฺธิโลปาทินา สญฺญายํ อุทกสฺส อุทาเทโส. ชลํ ธียเต อสฺมินฺติ ชลธิ, วาลานิ ทธาติ ตสฺมินฺติ วาลธิ, สนฺธียติ, สนฺทธาตีติ วา สนฺธิ, นิธียตีติ นิธิ. เอวํ วิธียติ, วิทธาติ, วิธานํ วา วิธิ, สมฺมา, สมํ วา จิตฺตํ อาทธาตีติ สมาธิ. संज्ञा (नाम) के अर्थ में 'दा' और 'धा' धातुओं से 'इ' प्रत्यय होता है। यह भाव और कर्म आदि के अधिकार में होता है, इसमें स्वर-लोप आदि कार्य होते हैं। 'दा' दान के अर्थ में, 'आ' उपसर्ग पूर्वक, 'आदीयति' (लिया जाता है) आदि। इसी प्रकार 'उपादि'। 'धा' धारण के अर्थ में, 'उदकं दधाति' (जल को धारण करता है) इति 'उदधि', इनमें वृद्धि-लोप आदि के द्वारा संज्ञा के अर्थ में 'उदक' को 'उदा' आदेश होता है। 'जलं धीयते अस्मिन्' (जिसमें जल रखा जाता है) इति 'जलधि', 'वालानि दधाति तस्मिन्' (जिसमें बाल/पुच्छ धारण किए जाते हैं) इति 'वालधि', 'सन्धीयति' या 'सन्दधाति' इति 'सन्धि', 'निधीयते' इति 'नधि'। इसी प्रकार 'विधीयते', 'विदधाति' या 'विधानं' इति 'विधि', 'सम्मा' या 'समं' चित्त को 'आदधाति' (स्थापित करता है) इति 'समाधि'। ๕๙๙. อิตฺถิยมติยโว วา. ५९९. स्त्रीलिंग में 'अ', 'ति' और 'यु' (प्रत्यय) विकल्प से होते हैं। อิตฺถิยํ อภิเธยฺยายํ สพฺพธาตูหิ อการติยุอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ วา ภาวกมฺมาทีสุ. อปฺปจฺจเย ตาว ชร วโยหานิมฺหิ, ชีรติ, ชีรณนฺติ วา ชรา, ‘‘อิตฺถิยมโต อาปจฺจโย’’ติ อาปจฺจโย, ปฏิสมฺภิชฺชตีติ ปฏิสมฺภิทา. ปฏิปชฺชติ เอตายาติ ปฏิปทา. เอวํ สมฺปทา, อาปทา. อุปาทียตีติ อุปาทา. สญฺชานาตีติ สญฺญา, ปชานาตีติ ปญฺญา. อุเปกฺขตีติ อุเปกฺขา. จินฺตนํ จินฺตา. ปติฏฺฐานํ ปติฏฺฐา. สิกฺข วิชฺโชปาทาเน, สิกฺขนํ, สิกฺขียตีติ วา สิกฺขา. เอวํ ภิกฺขา. เฌ จินฺตายํ, ปรสมฺปตฺตึ อภิมุขํ ฌายตีติ อภิชฺฌา, หิเตสิตํ อุปฏฺฐเปตฺวา ฌายตีติ อุปชฺฌา, อุปชฺฌาโย, สมฺมา ฌายติ เอตฺถาติ สชฺฌา. स्त्रीलिंग के अभिधेय होने पर सभी धातुओं से 'अ', 'ति' और 'यु' प्रत्यय भाव और कर्म आदि अर्थों में विकल्प से होते हैं। 'अ' प्रत्यय होने पर: 'जरा' (आयु की हानि), 'जीयति' या 'जीरणं' इति 'जरा', "इत्थियमतो आपच्चयो" सूत्र से 'आ' प्रत्यय होता है। 'पटिसम्भिज्जति' इति 'पटिसम्भिदा'। 'पटिपज्जति एताय' (जिसके द्वारा प्रतिपन्न हुआ जाता है) इति 'पटिपदा'। इसी प्रकार 'सम्पदा', 'आपदा'। 'उपादीयति' इति 'उपादा'। 'सञ्जानाति' इति 'सञ्ञा' (संज्ञा), 'पजानाति' इति 'पञ्ञा' (प्रज्ञा)। 'उपेक्खति' इति 'उपेक्खा' (उपेक्षा)। 'चिन्तनं' इति 'चिन्ता'। 'पतिट्ठानं' इति 'पतिट्ठा' (प्रतिष्ठा)। 'सिक्ख' विद्या ग्रहण करने के अर्थ में, 'सिक्खनं' या 'सिक्खीयति' इति 'सिक्खा' (शिक्षा)। इसी प्रकार 'भिक्खा' (भिक्षा)। 'झे' चिन्तन के अर्थ में, 'परसम्पत्तिं अभिमुखं झायति' (दूसरे की संपत्ति की ओर ध्यान देना) इति 'अभिज्झा' (अभिध्या), 'हितेसितं उपट्ठपेत्वा झायति' (हित की इच्छा रखकर ध्यान करना) इति 'उपज्झा', 'उपज्झायो' (उपाध्याय), 'सम्मा झायति एत्थ' (यहाँ सम्यक् ध्यान किया जाता है) इति 'सज्झा' (स्वाध्याय)। อิสุ [Pg.371] อิจฺฉายํ, เอสนนฺติ อตฺเถ อปฺปจฺจโย, ‘‘อิสุ ยมูนมนฺโต จฺโฉ วา’’ติ จฺฉาเทโส, อิจฺฉา. ปุจฺฉ ปุจฺฉเน, ปุจฺฉนํ ปุจฺฉา, ติกิจฺฉนํ ติกิจฺฉา, ฆสิตุมิจฺฉา ชิฆจฺฉา, ติติกฺขา, พุภุกฺขา, ปาตุมิจฺฉา ปิปาสา, มณฺฑูกคติยา วาธิการโต วาเทสาภาโว. พฺยาปิตุมิจฺฉา วิจฺฉา อิจฺจาทิ. 'इसु' इच्छा के अर्थ में, 'एसनं' (खोज/इच्छा) अर्थ में 'अ' प्रत्यय होता है, "इसु यमूनमन्तो च्छो वा" सूत्र से 'च्छ' आदेश होकर 'इच्छा' बनता है। 'पुच्छ' पूछने के अर्थ में, 'पुच्छनं' इति 'पुच्छा'। 'तिकिच्छनं' इति 'तिकिच्छा' (चिकित्सा)। 'घसितुमिच्छा' (खाने की इच्छा) इति 'जिघच्छा' (जिघत्सा)। 'तितिक्खा' (तितिक्षा), 'बुभुक्खा' (बुभुक्षा)। 'पातुमिच्छा' (पीने की इच्छा) इति 'पिपासा'। मण्डूकगति (मेंढक की चाल/अनुवृत्ति) के अधिकार से 'व' आदेश का अभाव होता है। 'ब्यापितुमिच्छा' (व्याप्त होने की इच्छा) इति 'विच्छा' इत्यादि। ติปฺปจฺจเย สมฺภวนํ สมฺภูติ. วาธิการโต ติปฺปจฺจยมฺหิ น วุทฺธิ, สวณํ สุติ, นยนํ, นียติ เอตายาติ วา นีติ. มน ญาเณ, มญฺญตีติ มติ. 'ति' प्रत्यय होने पर: 'सम्भावनं' इति 'सम्भुति'। 'वा' (विकल्प) के अधिकार से 'ति' प्रत्यय में वृद्धि नहीं होती, 'सवणं' इति 'सुति' (श्रुति), 'नयनं' या 'नीयति एताय' (जिसके द्वारा ले जाया जाता है) इति 'नीति'। 'मन' ज्ञान के अर्थ में, 'मञ्ञति' इति 'मति'। ‘‘เต, โน, ติมฺหี’’ติ จ วตฺตเต. "ते, नो, तिम्हि" की अनुवृत्ति होती है। ๖๐๐. คมขนหนรมาทีนมนฺโต. ६००. गम, खन, हन, रम आदि (धातुओं) का अन्त्य (व्यंजन)। คม ขน หน รมอิจฺเจวมาทีนํ มการนการนฺตานํ ธาตูนํ อนฺโต พฺยญฺชโน โน โหติ ตปฺปจฺจเย, ติมฺหิ จาติ ธาตฺวนฺตโลโป. คมนํ, คนฺตพฺพาติ วา คติ, อุปหนนํ อุปหติ, รมนฺติ ตาย, รมณํ วา รติ. ตนุ วิตฺถาเร, ตนนํ ตติ. ยมุ อุปรเม, นิยมนํ นิยติ. ‘‘รมโต, รมตี’’ติอาทีสุ ปน อการพฺยวหิตตฺตา น ธาตฺวนฺตโลโป, ภุญฺชนํ ภุตฺติ, ยุญฺชนํ ยุตฺติ, ‘‘ภุชาทีนมนฺโต โน ทฺวิ จา’’ติ ธาตฺวนฺตโลโป, ทฺวิตฺตญฺจ. สมาปชฺชนํ, สมาปชฺชเตติ วา สมาปตฺติ, สมฺปตฺติ, ‘‘คุปาทีนญฺจา’’ติ ธาตฺวนฺตโลปทฺวิตฺตานิ. ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา หาทิโต ติสฺส นิ โหติ. หานิ, ชานิ อิจฺจาทิ. गम, खन, हन, रम आदि मकारान्त और नकारान्त धातुओं का अन्त्य व्यंजन 'त' प्रत्यय होने पर 'न' हो जाता है, और 'ति' प्रत्यय होने पर धातु के अन्त्य का लोप हो जाता है। 'गमनं' या 'गन्तब्बा' इति 'गति'। 'उपहननं' इति 'उपहति'। 'रमन्ति ताय' या 'रमणं' इति 'रति'। 'तनु' विस्तार के अर्थ में, 'तननं' इति 'तति'। 'यमु' उपराम (रुकने) के अर्थ में, 'नियमनं' इति 'नियति'। "रमतो, रमति" आदि में अकार के व्यवधान के कारण धातु के अन्त्य का लोप नहीं होता। 'भुञ्जनं' इति 'भुत्ति' (भुक्ति), 'युञ्जनं' इति 'युत्ति' (युक्ति), "भुजादीनमन्तो नो द्वि च" सूत्र से धातु के अन्त्य का लोप और द्वित्व होता है। 'समापज्जनं' या 'समापज्जते' इति 'समापत्ति', 'सम्पत्ति', "गुपादीनञ्च" सूत्र से धातु के अन्त्य का लोप और द्वित्व होते हैं। "क्वचि धातु" आदि सूत्र से 'हा' आदि के बाद 'ति' को 'नि' होता है। 'हानि', 'जानि' इत्यादि। ยุปฺปจฺจเย จิต สญฺเจตเน, เจตยตีติ อตฺเถ ยุปฺปจฺจโย, อนาเทสวุทฺธี, อาปจฺจโย, เจตนา. วิท อนุภวเน[Pg.372], เวทยตีติ เวทนา. ทิสี อุจฺจารเณ, เทสียตีติ เทสนา, ภาวียตีติ ภาวนา อิจฺจาทิ. 'यु' प्रत्यय होने पर: 'चित' संचेतन के अर्थ में, 'चेतयति' इस अर्थ में 'यु' प्रत्यय होता है, 'अन' आदेश, वृद्धि और 'आ' प्रत्यय होकर 'चेतना' बनता है। 'विद' अनुभव करने के अर्थ में, 'वेदयति' इति 'वेदना'। 'दिसि' उच्चारण के अर्थ में, 'देसीयति' इति 'देसना' (देशना), 'भावीयति' इति 'भावना' इत्यादि। ‘‘อิตฺถิยํ, วา’’ติ จ วตฺตเต. "इत्थियं, वा" (स्त्रीलिंग में, विकल्प से) की अनुवृत्ति होती है। ๖๐๑. กรโต ริริย. ६०१. 'कर' धातु से 'रिरिय' (प्रत्यय होता है)। กรธาตุโต อิตฺถิยมนิตฺถิยํ วา อภิเธยฺยายํ ริริยปฺปจฺจโย โหติ, ราทิโลโป. กตฺตพฺพา กิริยา. กรณียํ กิริยํ. 'कर' धातु से स्त्रीलिंग या अ-स्त्रीलिंग के अभिधेय होने पर 'रिरिय' प्रत्यय होता है, 'र' आदि का लोप होता है। 'कत्तब्बा' इति 'किरिया' (क्रिया)। 'करणीयं' इति 'किरियं' (कृत्य)। ‘‘กตฺตรี’’ติ วตฺตเต. "कत्तरि" (कर्ता में) की अनुवृत्ति होती है। ๖๐๒. ชิโต อิน สพฺพตฺถ. ६०२. 'जि' धातु से 'इन' प्रत्यय सब जगह (सब कालों में) होता है। ชิอิจฺเจตาย ธาตุยา ปโร อินปฺปจฺจโย โหติ สพฺพกาเล กตฺตริ. ชิ ชเย, ปาปเก อกุสเล ธมฺเม อชินิ, ชินาติ, ชินิสฺสตีติ วา ชิโน. 'जि' इस धातु से परे कर्ता अर्थ में सब कालों में 'इन' प्रत्यय होता है। 'जि' जय (जीतने) के अर्थ में, 'पापके अकुसले धम्मे अजिनि' (पापमय अकुशल धर्मों को जीता), 'जिनाति' (जीतता है), या 'जिनिस्सति' (जीतेगा) इति 'जिनो' (जिन)। ‘‘อินา’’ติ วตฺตเต. "इन" की अनुवृत्ति होती है। ๖๐๓. สุปโต จ. ६०३. और 'सुप' धातु से भी (इन प्रत्यय होता है)। สุปอิจฺเจตาย ธาตุยา จ ปโร อินปฺปจฺจโย โหติ. สุป สเย, สุปติ, สุปนนฺติ วา สุปิโน, สุปินํ. 'सुप' इस धातु से परे भी 'इन' प्रत्यय होता है। 'सुप' शयन (सोने) के अर्थ में, 'सुपति' या 'सुपनं' इति 'सुपिनो' (स्वप्न), 'सुपिनं' (स्वप्न)। สี สเย, ‘‘อีสํ’’อิติ อุปปทํ, อีสํ สียติ ภวตาติ อตฺเถ – 'सी' शयन के अर्थ में, 'ईसं' यह उपपद होने पर, 'ईसं सीयति भवता' (आपके द्वारा थोड़ा सोया जाता है) इस अर्थ में – ๖๐๔. อีสํทุสูหิ ข. ६०४. 'ईसं' और 'दुसु' उपपदों के रहते धातुओं से 'ख' प्रत्यय होता है। อีสํทุสุอิจฺเจเตหิ อุปปเทหิ ปเรหิ ธาตูหิ ขปฺปจฺจโย โหติ. 'ईसं' और 'दुसु' इन उपपदों के बाद धातुओं से 'ख' प्रत्यय होता है। โส จ – और वह (प्रत्यय) – ๖๐๕. ภาวกมฺเมสุ [Pg.373] กิจฺจกฺตกฺขตฺถา. ६०५. भाव और कर्म अर्थों में 'किच्च' (कृत्य), 'क्त' और 'क्ख' अर्थ वाले प्रत्यय होते हैं। ภาวกมฺมอิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ กิจฺจกฺตกฺขตฺถอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺตีติ นิยมโต ภาวกมฺเมสฺเวว โหติ. ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติ กฺขการานุพนฺธสฺส โลโป, วุทฺธิ, อยาเทสทฺวิตฺตานิ, อีสสฺสโย ภวตา, ทุกฺเขน สียติ ทุสฺสโย, สุเขน สียติ สุสฺสโย. भाव और कर्म इन अर्थों में 'किच्च', 'क्त' और 'क्ख' अर्थ वाले प्रत्यय होते हैं, इस नियम से ये भाव और कर्म में ही होते हैं। "क्वचि धातु" सूत्र से 'क्ख' कार के अनुबन्ध का लोप, वृद्धि, अयादेश और द्वित्व होते हैं; 'ईसस्सयो भवता' (आपके द्वारा थोड़ा सोया जाना), 'दुक्खेन सीयति' इति 'दुस्सयो' (कठिनाई से सोना), 'सुखेन सीयति' इति 'सुस्सयो' (सुख से सोना)। กมฺเม – อีสํ กรียตีติ อีสกฺกรํ กมฺมํ ภวตา. เอวํ ทุกฺเขน กรียตีติ ทุกฺกรํ หิตํ ภวตา, สุกรํ ปาปํ พาเลน, ทุกฺเขน ภรียตีติ ทุพฺภโร มหิจฺโฉ. สุเขน ภรียตีติ สุภโร อปฺปิจฺโฉ. ทุกฺเขน รกฺขิตพฺพนฺติ ทุรกฺขํ จิตฺตํ. ทุกฺเขน ปสฺสิตพฺโพติ ทุทฺทโส ธมฺโม. สุเขน ปสฺสิตพฺพนฺติ สุทสฺสํ ปรวชฺชํ. ทุกฺเขน อนุพุชฺฌิตพฺโพติ ทุรนุโพโธ ธมฺโม. สุเขน พุชฺฌิตพฺพนฺติ สุโพธมิจฺจาทิ. कर्म में – 'ईसं करीयति' इति 'ईसक्करं' (थोड़ा किया गया) कार्य आपके द्वारा। इसी प्रकार 'दुक्खेन करीयति' इति 'दुक्करं' (दुष्कर) हित आपके द्वारा, 'सुकरं' पाप मूर्ख के द्वारा, 'दुक्खेन भरीयति' इति 'दुब्भरो' (दुर्भर) बहुत इच्छा वाला। 'सुखेन भरीयति' इति 'सुभरो' (सुभर) अल्प इच्छा वाला। 'दुक्खेन रक्खितब्बं' इति 'दुरक्खं' (दुरक्ष) चित्त। 'दुक्खेन पस्सितब्बो' इति 'दुद्दसो' (दुर्दर्श) धर्म। 'सुखेन पस्सितब्बं' इति 'सुदस्सं' (सुदृश्य) दूसरे का दोष। 'दुक्खेन अनुबुज्झितब्बो' इति 'दुरनुबोधो' (दुरनुबोध) धर्म। 'सुखेन बुज्झितब्बं' इति 'सुबोधं' इत्यादि। พุธ อวคมเน, สพฺเพ สงฺขตาสงฺขตสมฺมุติเภเท ธมฺเม อพุชฺฌิ, พุชฺฌติ, พุชฺฌิสฺสตีติ วา อตฺเถ – 'बुध' अवगमन (जानने) के अर्थ में, सभी संस्कृत, असंस्कृत और सम्मति-भेद वाले धर्मों को 'अबुज्झि' (जाना), 'बुज्झति' (जानता है), या 'बुज्झिस्सति' (जानेगा) इस अर्थ में – ‘‘ต’’อิติ วตฺตเต. "त" की अनुवृत्ति होती है। ๖๐๖. พุธคมาทิตฺเถ กตฺตริ. ६०६. बुध, गम आदि धातुओं से कर्ता अर्थ में (त प्रत्यय होता है)। พุธคมุอิจฺเจคมาทีหิ ธาตูหิ ตทตฺเถ คมฺยมาเน กตฺตริ ตปฺปจฺจโย โหติ สพฺพกาเล. बुध, गम आदि धातुओं से उस अर्थ के प्रतीत होने पर कर्ता में सब कालों में 'त' प्रत्यय होता है। ‘‘ตสฺสา’’ติ วตฺตเต. "तस्स" की अनुवृत्ति होती है। ๖๐๗. ธฒภเหหิ ธ ฒา จ. ६०७. 'ध', 'ढ' और 'भ' (अन्त वाली धातुओं) से (परे प्रत्यय के 'त' के स्थान पर) 'ध' और 'ढ' होते हैं। ธฒนฺต ภหนฺเตหิ ธาตูหิ ปรสฺส ปจฺจยตการสฺส ยถากฺกมํ ธการฒการาเทสา โหนฺตีติ ธภโต ตการสฺส [Pg.374] ธกาโร, ‘‘หจตุตฺถาน’’นฺติ เอตฺถ หการคฺคหณโต หการโตปิ กฺวจิ ธตฺตํ, อพฺยวธาเน จายํ, เตน ‘‘รุนฺธติ, อาราธิโต, วฑฺฒิโต, ลภิตฺวา, คหิโต’’ติอาทีสุ ปจฺจยาคมพฺยวหิตตฺตา น ภวติ. 'ध', 'ढ' और 'भ' अन्त वाली धातुओं से परे प्रत्यय के 'त' कार के स्थान पर यथाक्रम 'ध' कार और 'ढ' कार आदेश होते हैं; 'ध' और 'भ' से 'त' कार का 'ध' कार होता है। "हचतुत्थानं..." यहाँ 'ह' कार के ग्रहण से 'ह' कार से भी कहीं 'ध' भाव होता है, और यह व्यवधान रहित होने पर होता है, जिससे "रुन्धति, आराधितो, वड्ढितो, लभित्वा, गहितो" आदि में प्रत्यय के आगम (इट्) से व्यवहित होने के कारण नहीं होता है। ๖๐๘. หจตุตฺถานมนฺตานํ โท เธ. ६०८. 'ह' कार और वर्गों के चतुर्थ वर्ण (झ, ढ, ध, भ) जिनके अन्त में हों, उनके स्थान पर 'द' कार आदेश होता है, 'ध' कार परे होने पर। หการวคฺคจตุตฺถานํ ธาตฺวนฺตภูตานํ ทการาเทโส โหติ ธกาเร ปเร. พุทฺโธ ภควา. สรณํ อคจฺฉิ, คจฺฉติ, คจฺฉิสฺสตีติ วา สรณงฺคโต อุปาสโก, ‘‘คมขนหนรมาทีนมนฺโต’’ติ ธาตฺวนฺตโลโป. เอวํ ชานาตีติ ญาโต. อิ คติมฺหิ, อุเปตีติ อุเปโต. จินฺต จินฺตายํ, จินฺเตตีติ จิตฺตํ, ‘‘คุปาทีนญฺจา’’ติ ธาตฺวนฺตโลปทฺวิตฺตานิ. สนฺช สงฺเค, รูปาทีสุ อสชฺชิ, สชฺชติ, สชฺชิสฺสตีติ วา สตฺโต, ‘‘ภุชาทีนมนฺโต โน ทฺวิ จา’’ติ ธาตฺวนฺตโลโป, ทฺวิตฺตญฺจ. धातु के अन्त में स्थित 'ह' कार और वर्ग के चतुर्थ वर्णों के स्थान पर 'द' कार आदेश होता है 'ध' कार परे होने पर। बुद्धो भगवा। शरण गया, जाता है, या जायेगा - वह 'सरणङ्गतो' (शरणगत) उपासक है, "गमुखनहनरमादीनमन्तो" सूत्र से धातु के अन्त का लोप होता है। इसी प्रकार जो जानता है वह 'ञातो' (ज्ञात) है। 'इ' गति अर्थ में, 'उपेति' से 'उपेतो' (उपेत)। 'चिन्त' चिन्तन अर्थ में, 'चिन्तेति' से 'चित्तं' (चित्त), "गुपादीनञ्च" सूत्र से धातु के अन्त का लोप और द्वित्व होते हैं। 'सञ्ज' आसक्ति अर्थ में, रूपादि में आसक्त हुआ, आसक्त होता है, या आसक्त होगा - वह 'सत्तो' (सत्त/सक्त) है, "भुजादीनमन्तो नो द्वि च" सूत्र से धातु के अन्त का लोप और द्वित्व होता है। ‘‘สญฺญาย’’มิติ วตฺตเต. "सञ्ञायं" (संज्ञा में) यह अनुवृत्ति आती है। ๖๐๙. ติกิจฺจาสิฏฺเฐ. ६०९. 'ति' और 'कि' (प्रत्यय) आशीर्वाद (आसिठ्ठ) के अर्थ में होते हैं। สญฺญายมภิเธยฺยายํ อาสิฏฺเฐ คมฺยมาเน ธาตูหิ ติปฺปจฺจโย โหติ, กิตปจฺจโย จ. ชิโน เอนํ พุชฺฌตูติ ชินพุทฺธิ, ธการทการาเทสา, ธนมสฺส ภวตูติ ธนภูติ. संज्ञा के अभिधेय होने पर और आशीर्वाद के प्रतीत होने पर धातुओं से 'ति' प्रत्यय और 'कित' प्रत्यय होते हैं। "जिन इसे जानें" - इस अर्थ में 'जिनबुद्धि' (यहाँ धकार और दकार आदेश होते हैं), "इसे धन प्राप्त हो" - इस अर्थ में 'धनभूति'। กิตปจฺจเย ภวตูติ ภูโต, ธมฺโม เอนํ ททาตูติ ธมฺมทินฺโน, ‘‘ภิทาทิโต อินฺน อนฺน อีณา วา’’ติ ตปฺปจฺจยสฺส อินฺนาเทโส. วฑฺฒตูติ วฑฺฒมาโน, ‘‘ภูวาทิโต อ’’อิติ มานนฺเตสุ อปฺปจฺจโย, นนฺทตูติ นนฺทโก, ชีวตูติ ชีวโก อิจฺจาทิ. 'कित' प्रत्यय में: "होवे" इस अर्थ में 'भूतो', "धम्म इसे दे" इस अर्थ में 'धम्मदिन्नो', "भिदादितो इन्न अन्न ईणा वा" सूत्र से 'त' प्रत्यय के स्थान पर 'इन्न' आदेश होता है। "बढ़े" इस अर्थ में 'वड्ढमानो', "भुवादितो अ" इस सूत्र से 'मान' अन्त वाले शब्दों में 'अ' प्रत्यय होता है। "नन्दित हो" इस अर्थ में 'नन्दको', "जीवित रहे" इस अर्थ में 'जीवको' इत्यादि। ๖๑๐. อาคมา [Pg.375] ตุโก. ६१०. 'आ' उपसर्ग पूर्वक 'गम' धातु से 'तुक' प्रत्यय होता है। อาปุพฺพา คมิโต ตุกปฺปจฺจโย โหติ, กิตกตฺตา กตฺตริ. อาคจฺฉตีติ อาคนฺตุโก. 'आ' उपसर्ग पूर्वक 'गम' धातु से 'तुक' प्रत्यय होता है, कृत् होने के कारण कर्ता अर्थ में। "जो आता है" वह 'आगन्तुको' (आगन्तुक) है। ‘‘คมา’’ติ วตฺตเต. "गमा" (गम धातु से) यह अनुवृत्ति आती है। ๖๑๑. ภพฺเพ อิก. ६११. 'भव्य' (योग्य) अर्थ में 'इक' प्रत्यय होता है। คมิโต อิกปฺปจฺจโย โหติ ภพฺพตฺเถ. คนฺตุํ ภพฺโพติ คมิโก ภิกฺขุ. 'गम' धातु से 'भव्य' अर्थ में 'इक' प्रत्यय होता है। "जाने के योग्य" वह 'गमिको भिक्खु' (गमिक भिक्षु) है। เตกาลิกปฺปจฺจยนฺตนโย. त्रैकालिक प्रत्ययों की विधि। อตีตปฺปจฺจยนฺตนย अतीत (भूतकाल) प्रत्ययों की विधि। ๖๑๒. อตีเต ต ตวนฺตุ ตาวี. ६१२. अतीत काल में 'त', 'तवन्तु' और 'तावी' ये प्रत्यय होते हैं। อตีเต กาเล สพฺเพหิ ธาตูหิ ต ตวนฺตุ ตาวี อิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. เอเต เอว ปรสมญฺญาย นิฏฺฐสญฺญกาปิ, เต จ กิตสญฺญตฺตา กตฺตริ ภวนฺติ. อภวีติ ภูโต, ภูตา, ภูตํ, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ เอตฺถานุวตฺติตวาคฺคหเณน ต ตวนฺตุตาวีสุ วุทฺธิ น โหติ. หุ ทานาทนหพฺยปฺปทาเนสุ, อหวีติ หุโต อคฺคึ. अतीत काल में सभी धातुओं से 'त', 'तवन्तु', 'तावी' ये प्रत्यय होते हैं। ये ही दूसरी संज्ञा के अनुसार 'निष्ठा' संज्ञक भी हैं, और वे 'कित' (कृत्) संज्ञक होने के कारण कर्ता अर्थ में होते हैं। "वह हुआ" इस अर्थ में 'भूतो', 'भूता', 'भूतं'। "अञ्ञेसु च" यहाँ से 'वा' के अनुवर्तन के कारण 'त', 'तवन्तु', 'तावी' प्रत्ययों के परे होने पर वृद्धि नहीं होती है। 'हु' दान और हवन के अर्थ में, "अग्नि में हवन किया" इस अर्थ में 'हुतो अग्गिं'। ตวนฺตุปฺปจฺจเย – ‘‘อา สิมฺหี’’ติ อากาโร, อคฺคึ หุตวา, หุตวนฺโต อิจฺจาทิ คุณวนฺตุสมํ. ตาวีมฺหิ – อคฺคึ หุตาวี, อคฺคึ หุตาวิโน อิจฺจาทิ ทณฺฑีสมํ. อิตฺถิยํ อินีปจฺจโย – หุตาวินี, นปุํสเก – รสฺสตฺตํ หุตาวิ. 'तवन्तु' प्रत्यय में - "आ सिम्हि" सूत्र से आकार होता है, जैसे 'हुतवा', 'हुतवन्तो' इत्यादि 'गुणवन्तु' के समान। 'तावी' प्रत्यय में - 'हुतावी', 'हुताविनो' इत्यादि 'दण्डी' के समान। स्त्रीलिंग में 'इनी' प्रत्यय होकर 'हुताविनी', नपुंसक लिंग में ह्रस्व होकर 'हुतावि'। วส นิวาเส, วสฺสํ อวสีติ อตฺเถ ตปฺปจฺจโย, สการนฺตตฺตา ‘‘สาทิสนฺต’’อิจฺจาทินา ฐาเทเส สมฺปตฺเต – 'वस' निवास अर्थ में, "वर्ष भर रहा" इस अर्थ में 'त' प्रत्यय होने पर, सकारान्त होने के कारण "सादिमन्त..." इत्यादि सूत्र से 'ठ' आदेश प्राप्त होने पर - ‘‘ตสฺสา’’ติ อธิกาโร, ‘‘สาที’’ติ จ. "तस्स" और "सादि" का अधिकार है। ๖๑๓. วสโต [Pg.376] อุตฺถ. ६१३. 'वस' धातु से परे 'त' कार के स्थान पर (धातु के अन्त्य व्यंजन के साथ) 'उत्थ' आदेश होता है। วสอิจฺเจตสฺมา ธาตุมฺหา ปรสฺส ตการสฺส สหาทิพฺยญฺชเนน อุตฺถาเทโส โหติ, สรโลปาทิ. วสฺสํ วุตฺโถ, วุตฺถา สา, ‘‘สรโลโป’’ติอาทิสุตฺเต ตุคฺคหณโต ปุพฺพโลปาภาเว ‘‘อธิวตฺถา เทวตา, วตฺถพฺพ’’นฺติอาทีสุ ปรโลโป. 'वस' इस धातु से परे 'त' कार का (धातु के) आदि व्यंजन के साथ 'उत्थ' आदेश होता है, स्वर लोप आदि होकर। "वर्ष भर रहा" - 'वुत्थो', "वह रही" - 'वुत्था'। "सरलोपो..." आदि सूत्र में 'तु' के ग्रहण से पूर्व लोप के अभाव में "अधिवत्था देवता, वत्थब्बं" आदि में पर (बाद वाले) का लोप होता है। ‘‘วสสฺสา’’ติ วิปริณาเมน วตฺตเต. "वसस्स" (वस का) यह विभक्ति परिणाम के साथ अनुवृत्त होता है। ๖๑๔. วสฺส วา วุ. ६१४. 'वस' के स्थान पर विकल्प से 'वु' होता है। วสอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส วการสฺส ตกาเร ปเร อุกาโร โหติ, ตตฺถ วการาคโม จ วา โหติ. นิฏฺฐตกาเร เอวายํ. อถ วา ‘‘วู’’ติ เอตฺถ วกาโร สนฺธิโช, ตนฺตญาเยน ทุติยญฺเจตฺถ วาคฺคหณมิจฺฉิตพฺพํ, เตน อการสฺสปิ อุกาโร สิทฺโธ ภวติ, อุสิโต พฺรหฺมจริยํ, วุสิโต, ตถา วุสิตวา, วุสิตาวี, อิการาคเมน พฺยวหิตตฺตา อุตฺถาเทโส น ภวติ. 'वस' इस धातु के 'व' कार के स्थान पर 'त' कार परे होने पर 'उ' कार होता है, और वहाँ विकल्प से 'व' कार का आगम होता है। यह केवल निष्ठा के 'त' कार के परे होने पर ही होता है। अथवा "वू" यहाँ 'व' कार सन्धि से उत्पन्न है, तन्त्र न्याय से यहाँ दूसरे 'वा' का ग्रहण इष्ट है, जिससे 'अ' कार का भी 'उ' कार सिद्ध होता है - 'उसितो ब्रह्मचरियं', 'वुसितो', वैसे ही 'वुसितवा', 'वुसितावी'। 'इ' कार के आगम से व्यवहित होने के कारण 'उत्थ' आदेश नहीं होता है। ภุช ปาลนพฺยวหรเณสุ, โอทนํ อภุญฺชีติ อตฺเถ ตตวนฺตุตาวี, ‘‘ภุชาทีนมนฺโต โน ทฺวิ จา’’ติ ธาตฺวนฺตโลโป, ตการสฺส ทฺวิตฺตญฺจ, ภุตฺโต, ภุตฺตวา, ภุตฺตาวี. ตถา รนฺช ราเค, อรญฺชีติ รตฺโต, รตฺตา, รตฺตํ. ยุช โยเค, อยุญฺชีติ ยุตฺโต, ยุตฺตา, ยุตฺตํ. วิจ วิเวจเน วิปุพฺโพ, วิวิจฺจีติ วิวิตฺโต, วิวิตฺตา, วิวิตฺตํ. มุจ โมจเน, อมุจฺจีติ พนฺธนา มุตฺโต. ตถา ติปฺปจฺจเยปิ อิมินา ธาตฺวนฺตโลปทฺวิตฺตานิ, อาสชฺชนํ อาสตฺติ, วิมุจฺจนํ, วิมุจฺจติ เอตายาติ วา วิมุตฺติ. 'भुज' पालन और व्यवहार (खाने) के अर्थ में, "भात खाया" इस अर्थ में 'त', 'तवन्तु', 'तावी' प्रत्यय होने पर, "भुजादीनमन्तो नो द्वि च" सूत्र से धातु के अन्त का लोप और 'त' कार का द्वित्व होता है - 'भुत्तो', 'भुत्तवा', 'भुत्तावी'। वैसे ही 'रञ्ज' राग अर्थ में, 'रत्तो', 'रत्ता', 'रत्तं'। 'युज' योग अर्थ में, 'युत्तो', 'युत्ता', 'युत्तं'। 'विच' विवेचन अर्थ में 'वि' उपसर्ग पूर्वक, 'विवित्तो', 'विवित्ता', 'विवित्तं'। 'मुच' मोचन अर्थ में, "बन्धन से मुक्त हुआ" - 'मुत्तो'। वैसे ही 'ति' प्रत्यय में भी इसी (सूत्र) से धातु के अन्त का लोप और द्वित्व होते हैं - 'आसत्ति', 'विमुत्ति'। กุธ [Pg.377] โกเป, อกุชฺฌีติ อตฺเถ ตปฺปจฺจโย, ตสฺส ‘‘ธฒภเหหิ ธฒา จา’’ติ ธตฺตํ, ‘‘หจตุตฺถานมนฺตานํ โทเธ’’ติ ธการสฺส ทกาโร, กุทฺโธ. ยุธ สมฺปหาเร, อยุชฺฌีติ ยุทฺโธ, ยุทฺธํ. สิธ สํสิทฺธิมฺหิ, อสิชฺฌีติ สิทฺโธ. อาปุพฺโพ รภ ราภสฺเส, อารภีติ อารทฺโธ คนฺตุํ. นห พนฺธเน สํปุพฺโพ, สนฺนยฺหีติ สนฺนทฺโธ, ‘‘ธฒภเหหิ ธฒา จา’’ติ นหาทิโต ตการสฺส ธกาโร. 'कुध' क्रोध अर्थ में, "क्रोध किया" इस अर्थ में 'त' प्रत्यय होने पर, उसे "धढभहेहि धढा च" सूत्र से 'ध' भाव, और "हचतुत्थानमन्तानं दोधे" सूत्र से (धातु के) धकार को दकार होकर 'कुद्धो' बनता है। 'युध' प्रहार अर्थ में, 'युद्धो', 'युद्धं'। 'सिध' संसिद्धि अर्थ में, 'सिद्धो'। 'रभ' वेग अर्थ में 'आ' उपसर्ग पूर्वक, "जाने के लिए आरम्भ किया" - 'आरद्धो'। 'नह' बन्धन अर्थ में 'सं' उपसर्ग पूर्वक, 'सन्नद्धो', "धढभहेहि धढा च" सूत्र से 'नह' आदि से परे 'त' कार का 'ध' कार होता है। วฑฺฒ วฑฺฒเน, อวฑฺฒีติ อตฺเถ ตปฺปจฺจโย, ตสฺส ฒตฺตํ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ธาตฺวาการสฺสุตฺตํ, ฑโลโป จ. 'वड्ढ' बढ़ने के अर्थ में, "बढ़ा" इस अर्थ में 'त' प्रत्यय होने पर, उसे 'ढ' भाव, "क्वचि धातू..." इत्यादि से धातु के अकार को उकार और 'ढ' का लोप होता है। ‘‘หจตุตฺถานมนฺตาน’’นฺติ วตฺตเต. "हचतुत्थानमन्तानं" यह अनुवृत्ति आती है। ๖๑๕. โฑ ฒกาเร. ६१५. 'ढ' कार परे होने पर 'ड' कार आदेश होता है। หจตุตฺถานํ ธาตฺวนฺตานํ ฑการาเทโส โหติ ฒกาเร ปเร. วุฑฺโฒ, วุฑฺฒา, ‘‘โพ วสฺสา’’ติ พตฺเต พุฑฺโฒ. ติปฺปจฺจเย – พุชฺฌนํ, พุชฺฌติ วา เอตายาติ พุทฺธิ. เอวํ สิทฺธิ, วฑฺฒิ. ตพฺพปฺปจฺจเย – โพทฺธพฺพมิจฺจาทิ. 'ह' और चतुर्थ वर्ण (घ, झ, ढ, ध, भ) जिनके अन्त में हों, उन धातुओं के अन्त के स्थान पर 'ड' आदेश होता है 'ढ' परे होने पर। (जैसे) वुड्ढो, वुड्ढा। 'बो वस्सा' सूत्र से 'ब' होने पर 'बुड्ढो'। 'ति' प्रत्यय होने पर - बुज्झन (बुझना), जिससे बुझता है वह 'बुद्धि'। इसी प्रकार सिद्धि, वड्ढि। 'तब्ब' प्रत्यय होने पर - बोद्धब्ब इत्यादि। ‘‘อนฺโต, โน’’ติ จ อธิกาโร. 'अन्तो' और 'नो' का अधिकार है। ๖๑๖. ตราทีหิ อิณฺโณ. ६१६. 'तर' आदि धातुओं से 'इण्ण' (आदेश) होता है। ตรอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ปรสฺส ตปฺปจฺจยสฺส อิณฺณาเทโส โหติ, ธาตฺวนฺโต จ โน โหติ, สรโลปาทิ. ตร ตรเณ, สํสารณฺณวํ อตรีติ ติณฺโณ ตาเรยฺยํ. เอวํ อุตฺติณฺโณ, ติณฺณํ วา. ปูร ปูรเณ, สํปูรีติ สํปุณฺโณ, ‘‘สรโลโป’’ติอาทิสุตฺเต ตุคฺคหณโต ปุพฺพโลปาภาเว อุวณฺณโต ปรสฺส ‘‘วา ปโร อสรูปา’’ติ โลโป, สํโยเค รสฺสตฺตํ. ตุร เวเค, อตุรีติ ตุณฺณํ[Pg.378], ตุริตํ วา. ชร วโยหานิมฺหิ, ปริชีรีติ ปริชิณฺโณ. กิร วิกิรเณ, อากิรีติ อากิณฺโณ อิจฺจาทิ. 'तर' इत्यादि धातुओं से परे 'त' प्रत्यय के स्थान पर 'इण्ण' आदेश होता है, और धातु का अन्त्य वर्ण लुप्त (नो) हो जाता है, स्वर-लोप आदि कार्य होते हैं। 'तर' (तरने के अर्थ में), संसार रूपी समुद्र को पार किया - 'तिण्णो' (तैर गया)। इसी प्रकार 'उत्तिण्णो' या 'तिण्णं'। 'पूर' (भरने के अर्थ में), पूर्ण हुआ - 'संपुण्णो', 'सरलोपो' आदि सूत्र में 'तु' ग्रहण से पूर्व लोप न होने पर 'उ' वर्ण से परे 'वा परो असरूपा' से लोप और संयोग होने पर ह्रस्वत्व होता है। 'तुर' (वेग के अर्थ में), शीघ्रता की - 'तुण्णं' या 'तुरितं'। 'जर' (अवस्था की हानि के अर्थ में), जीर्ण हुआ - 'परिजिण्णो'। 'किर' (बिखेरने के अर्थ में), बिखेरा - 'आकिण्णो' इत्यादि। ๖๑๗. สุส ปจ สกโต กฺขกฺกา จ. ६१७. 'सुस', 'पच' और 'सक' धातुओं से परे (त प्रत्यय के स्थान पर) 'क्ख' और 'क्क' आदेश होते हैं। สุส ปจ สกอิจฺเจเตหิ ธาตูหิ ปรสฺส ตปฺปจฺจยสฺส กฺขกฺกาเทสา โหนฺติ, อนฺโต จ พฺยญฺชโน โน โหติ. จสทฺเทน มุจาทิโต กฺกาเทโส. สุส โสสเน, อสุสฺสีติ สุกฺโข รุกฺโข. อปจฺจีติ ปกฺกํ ผลํ. สก สามตฺเถ, อสกฺขีติ สกฺโก อสฺส, โอมุจฺจีติ โอมุกฺกา อุปาหนา. ‘‘ปจิตุํ, ปจิตพฺพ’’นฺติอาทีสุ ปน น ภวติ, อิกาเรน พฺยวหิตตฺตา. เอวํ สพฺพตฺถ พฺยวธาเน น ภวติ. 'सुस', 'पच' और 'सक' इन धातुओं से परे 'त' प्रत्यय के स्थान पर 'क्ख' और 'क्क' आदेश होते हैं, और अन्त्य व्यंजन लुप्त (नो) हो जाता है। 'च' शब्द से 'मुच' आदि धातुओं से 'क्क' आदेश होता है। 'सुस' (सुखाने के अर्थ में), सूख गया - 'सुक्खो' वृक्ष। 'पच' (पकने के अर्थ में), पका हुआ फल - 'पक्कं' फल। 'सक' (सामर्थ्य के अर्थ में), समर्थ हुआ - 'सक्को' अश्व। 'मुच' (छोड़ने के अर्थ में), उतारे हुए जूते - 'ओमुक्का' उपाहना। 'पचितुं', 'पचितब्बं' आदि में इकार के व्यवधान के कारण यह नहीं होता है। इसी प्रकार सर्वत्र व्यवधान होने पर नहीं होता है। สีหคติยา ติคฺคหณมนุวตฺตเต. सिंहगति (न्याय) से 'ति' का ग्रहण अनुवृत्त होता है। ๖๑๘. ปกฺกมาทีหิ นฺโต จ. ६१८. 'पक्कम' आदि धातुओं से 'न्त' और (च से 'न्ति') आदेश होते हैं। ปกฺกมอิจฺเจวมาทีหิ มการนฺเตหิ ธาตูหิ ปรสฺส ตปฺปจฺจยสฺส นฺตาเทโส โหติ, ธาตฺวนฺโต จ โน โหติ. จสทฺเทน ติปฺปจฺจยสฺส นฺติ จ โหติ. กมุ ปทวิกฺเขเป, ปกฺกมีติ ปกฺกนฺโต. เอวํ สงฺกนฺโต, นิกฺขนฺโต, ‘‘โท ธสฺส จา’’ติ สุตฺเต จคฺคหเณน กสฺส ขตฺตํ. ภมุ อนวฏฺฐาเน, วิพฺภมีติ วิพฺภนฺโต, ภนฺโต. ขมุ สหเน, อกฺขมีติ ขนฺโต. สมุ อุปสเม, อสมีติ สนฺโต. ทมุ ทมเน, อทมีติ ทนฺโต. 'पक्कम' इत्यादि मकारान्त धातुओं से परे 'त' प्रत्यय के स्थान पर 'न्त' आदेश होता है, और धातु का अन्त्य वर्ण लुप्त (नो) हो जाता है। 'च' शब्द से 'ति' प्रत्यय के स्थान पर 'न्ति' भी होता है। 'कमु' (पैर बढ़ाने के अर्थ में), प्रस्थान किया - 'पक्कन्तो'। इसी प्रकार 'संकन्तो', 'निक्खन्तो', 'दो धस्स चा' सूत्र में 'च' ग्रहण से 'क' को 'ख' होता है। 'भमु' (अस्थिरता के अर्थ में), भ्रमित हुआ - 'विब्भन्तो', 'भन्तो'। 'खमु' (सहन करने के अर्थ में), क्षमा किया - 'खन्तो'। 'समु' (उपशम के अर्थ में), शान्त हुआ - 'सन्तो'। 'दमु' (दमन के अर्थ में), दमित हुआ - 'दन्तो'। ติมฺหิ – สงฺกมนํ สงฺกนฺติ. เอวํ โอกฺกนฺติ, วิพฺภนฺติ, ขนฺติ, สนฺติ ทนฺติ อิจฺจาทิ. 'ति' प्रत्यय होने पर - संक्रमण 'संकन्ति'। इसी प्रकार ओक्कन्ति, विब्भन्ति, खन्ति, सन्ति, दन्ति इत्यादि। ๖๑๙. ชนาทีนมา [Pg.379] ติมฺหิ จ. ६१९. 'जन' आदि धातुओं के (अन्त्य व्यंजन) को 'आ' होता है, 'त' प्रत्यय और 'ति' प्रत्यय होने पर। ชนอิจฺเจวมาทีนํ ธาตูนมนฺตสฺส พฺยญฺชนสฺส อาตฺตํ โหติ ตปฺปจฺจเย, ติมฺหิ จ. โยควิภาเคน อญฺญตฺถาปิ. ชน ชนเน, อชนีติ ชาโต, วิชายีติ ปุตฺตํ วิชาตา, ชนนํ ชาติ. ตปฺปจฺจเย สติปิ ตกาเร ปุน ติคฺคหณกรณํ ปจฺจยนฺตรตกาเร อาตฺตนิวตฺตนตฺถํ, ยถา – ชนฺตุ. ‘‘ชนิตฺวา, ชนิตุ’’นฺติอาทีสุ ปน อิกาเรน พฺยวหิตตฺตา น ภวติ. 'जन' इत्यादि धातुओं के अन्त्य व्यंजन के स्थान पर 'आ' होता है 'त' प्रत्यय और 'ति' प्रत्यय होने पर। योग-विभाग से अन्यत्र भी होता है। 'जन' (उत्पन्न होने के अर्थ में), उत्पन्न हुआ - 'जातो', पुत्र को जन्म दिया - 'विजाता', जनन - 'जाति'। 'त' प्रत्यय में 'त' कार होने पर भी पुनः 'ति' का ग्रहण अन्य प्रत्ययों के 'त' कार में 'आ' भाव को रोकने के लिए है, जैसे - 'जन्तु'। 'जनित्वा', 'जनितुं' आदि में इकार के व्यवधान के कारण नहीं होता है। ‘‘อา, ติมฺหิ, จา’’ติ จ วตฺตเต. 'आ', 'तिम्हि' और 'चा' की अनुवृत्ति होती है। ๖๒๐. ฐาปานมิอี จ. ६२०. 'ठा' और 'पा' धातुओं के (अन्त्य स्वर) को क्रमशः 'इ' और 'ई' आदेश होते हैं। ฐา ปาอิจฺเจเตสํ ธาตูนํ อนฺตสฺส อาการสฺส ยถากฺกมํ อิการอีการาเทสา โหนฺติ ตปฺปจฺจเย, ติมฺหิ จ. จสทฺเทน อญฺญตฺราปิ กฺวจิ. ฐา คตินิวตฺติมฺหิ, อฏฺฐาสีติ ฐิโต, อุปฏฺฐิโต ครุํ, ฐิตวา, อธิฏฺฐิตฺวา, ฐานํ ฐิติ. ปา ปาเน, อปายีติ ปีตา, ยาคุํ ปีตวา, ปานํ ปีติ, ปีตฺวา. 'ठा' और 'पा' इन धातुओं के अन्त्य आकार के स्थान पर यथाक्रम इकार और ईकार आदेश होते हैं 'त' प्रत्यय और 'ति' प्रत्यय होने पर। 'च' शब्द से कहीं अन्यत्र भी। 'ठा' (गति की निवृत्ति के अर्थ में), स्थित हुआ - 'ठितो', गुरु की सेवा में उपस्थित - 'उपठितो', 'ठितवा', 'अधिठित्वा', स्थान - 'ठिति'। 'पा' (पीने के अर्थ में), पिया - 'पीता', यवागू पिया - 'पीतवा', पान - 'पीति', 'पीत्वा'। ๖๒๑. หนฺเตหิ โห หสฺส โล วา อทหนหานํ. ६२१. हकारान्त धातुओं से परे 'त' और 'ति' के स्थान पर 'ह' आदेश होता है, और धातु के अन्त्य 'ह' के स्थान पर 'ल' (ळ) होता है, 'दहन' और 'हा' को छोड़कर। หการนฺเตหิ ธาตูหิ ปรสฺส ตปฺปจฺจยสฺส, ติสฺส จ หการาเทโส โหติ, หสฺส จ ธาตฺวนฺตสฺส ลกาโร โหติ วา ทหนเห วชฺเชตฺวา, ฒตฺตาปวาโทยํ. รุห ชนเน, อรุหีติ อารุฬฺโห รุกฺขํ. ลฬานมวิเสโส, อารุลฺโห วา, รุหนํ รุฬฺหี. คาหุ วิโลฬเน, อคาหีติ คาฬฺโห, อชฺโฌคาฬฺโห มหณฺณวํ. พห วุทฺธิมฺหิ, อพหีติ พาฬฺโห, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ทีโฆ. มุห เวจิตฺเต, อมุยฺหีติ มูฬฺโห. คุห สํวรเณ, อคุหีติ คูฬฺหํ. วห ปาปุณเน[Pg.380], อุปวหีติ อุปวุฬฺโห, ‘‘วจ วส วหาทีนมุกาโร วสฺสา’’ติ โยควิภาเคน อุตฺตํ. हकारान्त धातुओं से परे 'त' प्रत्यय और 'ति' प्रत्यय के स्थान पर 'ह' आदेश होता है, और धातु के अन्त्य 'ह' के स्थान पर 'ल' (ळ) होता है, 'दहन' और 'हा' को छोड़कर; यह 'ढ' भाव का अपवाद है। 'रुह' (उत्पन्न होने के अर्थ में), वृक्ष पर चढ़ा - 'आरुळ्हो'। 'ल' और 'ळ' में कोई भेद नहीं है, अतः 'आरुल्हो' भी, चढ़ना - 'रुळ्ही'। 'गाहु' (मथने के अर्थ में), गहरा - 'गाळ्हो', महासागर में प्रविष्ट - 'अज्झोगाळ्हो'। 'बह' (वृद्धि के अर्थ में), बहुत - 'बाळ्हो', 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से दीर्घ हुआ। 'मुह' (चित्त की व्याकुलता के अर्थ में), मोहित - 'मूळ्हो'। 'गुह' (छिपाने के अर्थ में), गुप्त - 'गूळ्हं'। 'वह' (प्राप्त करने के अर्थ में), उपवह - 'उपवुळ्हो', 'वच वस वहादीनमुकारो वस्सा' इस योग-विभाग से 'उ' हुआ। อทหนหานนฺติ กิมตฺถํ? ทฑฺโฒ, สนฺนทฺโธ. วาติ กึ? ทุทฺโธ, สินิทฺโธ. ‘‘คหิตํ, มหิต’’นฺติอาทีสุ ปน อิการาคเมน พฺยวหิตตฺตา น ภวติ. 'अदहनहानं' किसलिए? (ताकि) 'दड्ढो', 'सन्नद्धो' में यह नियम न लगे। 'वा' किसलिए? (ताकि) 'दुद्धो', 'सिनिद्धो' भी बनें। 'गहितं', 'महितं' आदि में इकार के आगम से व्यवधान होने के कारण यह नहीं होता है। ธาตุปฺปจฺจยนฺตโตปิ ‘‘อตีเต ต ตวนฺตุตาวี’’ติ ตปฺปจฺจโย, อพุภุกฺขีติ พุภุกฺขิโต. เอวํ ชิฆจฺฉิโต, ปิปาสิโต อิจฺจาทิ. धातु-प्रत्ययान्त से भी 'अतीते त तवन्तुतावी' सूत्र से 'त' प्रत्यय होता है, जैसे - खाने की इच्छा की - 'बुभुक्खितो'। इसी प्रकार जिघच्छितो, पिपासितो इत्यादि। เอวํ กตฺตริ นิฏฺฐนโย. इस प्रकार कर्ता अर्थ में निष्ठा की विधि है। ‘‘อตีเต’’ติ วตฺตเต. 'अतीते' की अनुवृत्ति होती है। ๖๒๒. ภาวกมฺเมสุ ต. ६२२. भाव और कर्म अर्थ में 'त' प्रत्यय होता है। อตีเต กาเล คมฺยมาเน สพฺพธาตูหิ ตปฺปจฺจโย โหติ ภาวกมฺมอิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ. अतीत काल की प्रतीति होने पर सभी धातुओं से भाव और कर्म इन अर्थों में 'त' प्रत्यय होता है। ภาเว ตาว – पहले भाव अर्थ में - เค สทฺเท, คายนํ, อคายิตฺถาติ วา อตฺเถ ตปฺปจฺจโย. 'गे' (शब्द करने के अर्थ में), गायन, 'अगायित्थ' (गाया गया) इस अर्थ में 'त' प्रत्यय होता है। ๖๒๓. สพฺพตฺถ เค คี. ६२३. सर्वत्र 'गे' धातु को 'गी' आदेश होता है। เคอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส คีอาเทโส โหติ สพฺพตฺถ, ตปฺปจฺจยติปจฺจเยสฺเววายํ. ตสฺส คีตํ, คายนํ, คายิตพฺพาติ วา คีติ. 'गे' इस धातु को सर्वत्र 'गी' आदेश होता है, यह 'त' प्रत्यय और 'ति' प्रत्यय होने पर ही होता है। उसका 'गीतं' (गाया हुआ), गायन, 'गायितब्बा' या 'गीति'। ภาเว – ตปฺปจฺจยนฺตา นปุํสกา. กมฺมนิ – ติลิงฺคา. भाव अर्थ में - 'त' प्रत्ययान्त शब्द नपुंसक लिंग में होते हैं। कर्म अर्थ में - तीनों लिंगों में होते हैं। นต คตฺตวินาเม, นจฺจนํ, อนจฺจิตฺถาติ วา อตฺเถ ตปฺปจฺจโย. 'नत' (शरीर झुकाने के अर्थ में), नर्तन, 'अनच्चित्थ' (नाचा गया) इस अर्थ में 'त' प्रत्यय होता है। ๖๒๔. ปจฺจยา ทนิฏฺฐา นิปาตนา สิชฺฌนฺติ. ६२४. अनिष्ट प्रत्यय निपातन से सिद्ध होते हैं। เย อิธ สปฺปจฺจยา สทฺทา ปจฺจเยหิ น นิฏฺฐํ คตา, เต นิปาตนโต สิชฺฌนฺตีติ ธาตฺวนฺเตน สห ตปฺปจฺจยสฺส จฺจ ฏฺฏาเทสา. นจฺจํ, นฏฺฏํ. หส หสเน, หสนํ หสิตํ, อิการาคโม. คมนํ คตํ. เอวํ ฐิตํ, สยิตํ, วาธิการสฺส ววตฺถิตวิภาสตฺตา วุทฺธิ. รุท อสฺสุวิโมจเน, อรุชฺฌิตฺถาติ โรทิตํ, รุณฺณํ วา อิจฺจาทิ. यहाँ जो प्रत्यययुक्त शब्द प्रत्ययों के द्वारा सिद्ध नहीं हुए हैं, वे निपातन से सिद्ध होते हैं - ऐसा (कहकर) धातु के अन्तिम वर्ण के साथ 'त' प्रत्यय के स्थान पर 'च्च' और 'ट्ठ' आदेश होते हैं। नच्चं, नट्टं। हस (हँसने में) - हसनं, हसितं, इ-कार का आगम। गमनं, गतं। इसी प्रकार ठितं, सयितं; 'वा' अधिकार की व्यवस्थित विभाषा होने के कारण वृद्धि होती है। रुद (अश्रु विमोचन में) - अरुज्झित्थ इति रोदितं, रुण्णं वा इत्यादि। กมฺมนิ – कर्मवाच्य में – อภิภูยิตฺถาติ อภิภูโต โกโธ ภวตา, อภิภูตา, อภิภูตํ. ภาส พฺยตฺติยํ วาจายํ, อภาสิตฺถ เตนาติ ภาสิโต ธมฺโม, ภาสิตา คาถา, ภาสิตํ สุตฺตํ. ทิสี อุจฺจารเณ, จุราทิตฺตา เณ. อเทสียิตฺถาติ เทสิโต ธมฺโม ภควตา, อิการาคเม การิตสรโลโป. ชิ ชเย, อชียิตฺถาติ ชิโต มาโร. นี ปาปุณเน, อนียึสูติ นีตา คามมชา, สุโต ตยา ธมฺโม, ญาโต. 'अभिभूपित्थ' इस अर्थ में 'अभिभूतो कोधो भवता' (आपके द्वारा क्रोध अभिभूत किया गया), अभिभूता, अभिभूतं। भास (स्पष्ट वाणी में) - 'अभासित्थ तेन' इस अर्थ में 'भासितो धम्मो', 'भासिता गाथा', 'भासितं सुत्तं'। दिसी (उच्चारण में), चुरादि गण होने से 'णे' प्रत्यय। 'अदेसीयित्थ' इस अर्थ में 'देसितो धम्मो भगवता' (भगवान द्वारा धर्म देशित किया गया), इ-कार आगम होने पर कारित (णिच्) स्वर का लोप होता है। जि (जय में) - 'अजीयित्थ' इस अर्थ में 'जितो मारो'। नी (प्राप्त करने में) - 'अनीयिंसु' इस अर्थ में 'नीता गाममजा', 'सुतो तया धम्मो', 'ञातो'। สาส อนุสิฏฺฐิมฺหิ, อนุสาสียิตฺถาติ อตฺเถ ตปฺปจฺจโย. सास (अनुशासन/सिखाने में) - 'अनुसासीयित्थ' इस अर्थ में 'त' प्रत्यय होता है। ๖๒๕. สาสทิสโต ตสฺส ริฏฺโฐ จ. ६२५. 'सास' और 'दिस' धातुओं से परे 'त' प्रत्यय के स्थान पर 'रिट्ठ' आदेश होता है और 'च' शब्द से 'ति' के स्थान पर 'रिट्ठि' भी होता है। สาสทิสอิจฺเจเตหิ ธาตูหิ ปรสฺส ตปฺปจฺจยสฺส ริฏฺฐาเทโส โหติ, จสทฺเทน ติสฺส ริฏฺฐิ จ, ทิสโต กิจฺจตการตุํตฺวาทีนญฺจ รฏฺฐ รฏฺฐุํ รฏฺฐาเทสา จ โหนฺติ, ราทิโลโป, อนุสิฏฺโฐ โส มยา, อนุสิฏฺฐา สา, อนุสิฏฺฐํ. ทิส เปกฺขเณ, อทิสฺสิตฺถาติ ทิฏฺฐํ เม รูปํ. 'सास' और 'दिस' इन धातुओं से परे 'त' प्रत्यय के स्थान पर 'रिट्ठ' आदेश होता है, 'च' शब्द से 'ति' के स्थान पर 'रिट्ठि' भी होता है, और 'दिस' धातु से परे कृत्य, त-कार, तुं, त्वा आदि के स्थान पर 'रट्ठ', 'रट्ठुं' और 'रट्ठ' आदेश होते हैं, 'र' आदि का लोप होता है। जैसे - 'अनुसिट्ठो सो मया', 'अनुसिट्ठा सा', 'अनुसिट्ठं'। दिस (देखने में) - 'अदिस्सित्थ' इस अर्थ में 'दिट्ठं मे रूपं' (मेरे द्वारा रूप देखा गया)। ติมฺหิ – อนุสาสนํ อนุสิฏฺฐิ, ทสฺสนํ ทิฏฺฐิ. 'ति' प्रत्यय होने पर – अनुसासनं (अनुशासन) - अनुसिट्ठि, दस्सनं (दर्शन) - दिट्ठि। กิจฺจาทีสุ [Pg.382] – ทสฺสนียํ ทฏฺฐพฺพํ, ทฏฺเฐยฺยํ, ปสฺสิตุนฺติ ทฏฺฐุํ คจฺฉติ, ปสฺสิตฺวาติ เนกฺขมํ ทฏฺฐุํ, ทฏฺฐา, อิการาคเมน อนฺตริกสฺส น ภวติ, ยถา – อนุสาสิตํ, อนุสาสิตพฺพํ, อนุสาสิตุํ, อนุสาสิตฺวา, ทสฺสิตํ อิจฺจาทิ. कृत्य आदि प्रत्ययों में – दस्सनीयं, दट्ठब्बं, दट्ठेय्यं; 'पस्सितुं' के अर्थ में 'दट्ठुं गच्छति' (देखने के लिए जाता है); 'पस्सित्वा' के अर्थ में 'नेक्खमं दट्ठुं', 'दट्ठा'। इ-कार आगम से व्यवधान होने पर (यह आदेश) नहीं होता है, जैसे – अनुसासितं, अनुसासितब्बं, अनुसासितुं, अनुसासित्वा, दस्सितं इत्यादि। ตุส ปีติมฺหิ, อตุสฺสีติ อตฺเถ กตฺตริ ตปฺปจฺจโย. तुस (प्रीति/संतोष में) - 'अतुस्सी' इस अर्थ में कर्ता में 'त' प्रत्यय होता है। ‘‘ตสฺสา’’ติ อธิกาโร. 'तस्स' (त प्रत्यय का) यह अधिकार है। ๖๒๖. สาทิ, สนฺตปุจฺฉภนฺชหนฺสาทีหิ ฏฺโฐ. ६२६. स-आदि (सकारान्त), सन्त, पुच्छ, भञ्ज, हंस आदि से परे 'ट्ठ' आदेश होता है। อาทินา สห วตฺตตีติ สาทิ. สการนฺเตหิ, ปุจฺฉ ภนฺชหนฺสอิจฺเจวมาทีหิ จ ธาตูหิ ปรสฺส อนนฺตริกสฺส ตการสฺส สหาทิพฺยญฺชเนน ธาตฺวนฺเตนฏฺฐาเทโส โหติ. หนฺสสฺส สติปิ สนฺตตฺเต ปุนคฺคภณํ กฺวจิ ฏฺฐาเทสสฺส อนิจฺจตาทีปนตฺถํ, เตน ‘‘วิทฺธสฺโต อุตฺรสฺโต’’ติอาทีสุ น โหติ. ตุฏฺโฐ, สนฺตุสิโต. ภส ภสฺสเน, อภสฺสีติ ภฏฺโฐ, ภสฺสิโต. นส อทสฺสเน, นสฺสีติ นฏฺโฐ. ทํส ทํสเน, อทํสียิตฺถาติ ทฏฺโฐ สปฺเปน, ฑํสิโต วา, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ทสฺส ฑตฺตํ. ผุส ผสฺสเน, อผุสียิตฺถาติ ผุฏฺโฐ โรเคน, ผุสฺสิโต วา. อิสุ อิจฺฉายํ, เอสียิตฺถาติ อิฏฺโฐ, อิจฺฉิโต, เอสิโต. มส อามสเน, อามสียิตฺถาติ อามโฐ. วสเสจเน, อวสฺสีติ วุฏฺโฐ เทโว, ปวิสียิตฺถาติ ปวิฏฺโฐ, อุทฺทิสียิตฺถาติ อุทฺทิฏฺโฐ. ปุจฺฉ ปุจฺฉเน, อปุจฺฉียิตฺถาติ ปุฏฺโฐ ปญฺหํ, ปุจฺฉิโต. ภนฺช อวมทฺทเน, อภญฺชียิตฺถาติ ภฏฺฐํ ธญฺญํ. หนฺส ปีติมฺหิ, อหํสีติ หฏฺโฐ, ปหฏฺโฐ, ปหํสิโต. 'आदि' के साथ जो रहता है वह 'सादि' है। सकारान्त धातुओं से, तथा पुच्छ, भञ्ज, हंस आदि धातुओं से परे अव्यवहित 'त' कार के स्थान पर धातु के अन्तिम व्यंजन के साथ 'ट्ठ' आदेश होता है। 'हंस' धातु के सकारान्त होने पर भी पुनः ग्रहण करना कहीं 'ट्ठ' आदेश की अनित्यता दर्शाने के लिए है, जिससे 'विद्धस्तो', 'उत्रस्तो' आदि में (यह आदेश) नहीं होता है। तुट्ठो, संतुसितो। भस (गिरने में) - 'अभस्सी' इस अर्थ में 'भट्ठो', 'भस्सितो'। नस (अदर्शन में) - 'नस्सी' इस अर्थ में 'नट्ठो'। दंस (डसने में) - 'अदंसीयित्थ' इस अर्थ में 'दट्ठो सप्पेन' अथवा 'डंसितो', 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'द' को 'ड' हुआ। फुस (स्पर्श करने में) - 'अफुसीयित्थ' इस अर्थ में 'फुट्ठो रोंगेन' अथवा 'फुस्सितो'। इसु (इच्छा में) - 'एसीयित्थ' इस अर्थ में 'इट्ठो', 'इच्छितो', 'एसितो'। मस (स्पर्श करने में) - 'आमसीयित्थ' इस अर्थ में 'आमठो'। वस (सींचने में) - 'अवस्सी' इस अर्थ में 'वुट्ठो देवो', 'पविसीयित्थ' इस अर्थ में 'पविट्ठो', 'उद्दीसीयित्थ' इस अर्थ में 'उद्दिट्ठो'। पुच्छ (पूछने में) - 'अपुच्छीयित्थ' इस अर्थ में 'पुट्ठो पञ्हं', 'पुच्छितो'। भञ्ज (मर्दन करने में) - 'अभञ्जीयित्थ' इस अर्थ में 'भट्ठं धञ्ञं'। हंस (प्रीति में) - 'अहंसी' इस अर्थ में 'हट्ठो', 'पहट्ठो', 'पहंसितो'। อาทิสทฺเทน [Pg.383] ยช เทวปูชาสงฺคติกรณทาเนสุ, อิชฺชิตฺถาติ อตฺเถ ตปฺปจฺจโย, ตสฺส ฏฺฐาเทโส. 'आदि' शब्द से यज (देवपूजा, संगतिकरण और दान में) - 'इज्जित्थ' इस अर्थ में 'त' प्रत्यय होता है, और उसके स्थान पर 'ट्ठ' आदेश होता है। ๖๒๗. ยชสฺส สรสฺสิ ฏฺเฐ. ६२७. 'ट्ठ' परे होने पर 'यज' धातु के स्वर को इ-कार आदेश होता है। ยชอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส สรสฺส อิการาเทโส โหติ ฏฺเฐ ปเร. ยิฏฺโฐ มยา ชิโน. สช วิสฺสคฺเค สํปุพฺโพ, สํสชฺชิตฺถาติ สํสฏฺโฐ เตน, วิสฺสฏฺโฐ. มช สุทฺธิมฺหิ, อมชฺชีติ มฏฺโฐ อิจฺจาทิ. 'यज' इस धातु के स्वर को 'ट्ठ' परे होने पर इ-कार आदेश होता है। जैसे - 'यिट्ठो मया जिनो'। सज (त्यागने में) 'सं' उपसर्ग पूर्वक - 'संसज्जित्थ' इस अर्थ में 'संसट्ठो तेन', 'विस्सट्ठो'। मज (शुद्धि में) - 'अमज्जी' इस अर्थ में 'मट्ठो' इत्यादि। กิจฺจตการาทีสุ ตุสฺสิตพฺพํ โตฏฺฐพฺพํ, ผุสิตพฺพํ โผฏฺฐพฺพํ, ปุจฺฉิตุํ ปุฏฺฐุํ, ยชิตุํ ยิฏฺฐุํ, อภิหริตุํ อภิหฏฺฐุํ, โตสนํ ตุฏฺฐิ, เอสนํ เอฏฺฐิ, วสฺสนํ วุฏฺฐิ, วิสฺสชฺชนํ วิสฺสฏฺฐิ อิจฺจาทิ. कृत्य, त-कार आदि प्रत्ययों में – तुस्सितब्बं, तोट्ठब्बं; फुस्सितब्बं, फोट्ठब्बं; पुच्छितुं, पुट्ठुं; यजितुं, यिट्ठुं; अभिहरितुं, अभिहट्ठुं; तोसनं - तुट्ठि, एसनं - एट्ठि, वस्सनं - वुट्ठि, विस्सज्जनं - विस्सट्ठि इत्यादि। ‘‘ตสฺส, สาที’’ติ จ วตฺตเต. 'तस्स' और 'सादी' की अनुवृत्ति होती है। ๖๒๘. ภนฺชโต คฺโค จ. ६२८. 'भञ्ज' धातु से परे (त प्रत्यय के स्थान पर) 'ग्गो' आदेश भी होता है। ภนฺชโต ธาตุมฺหา ตปฺปจฺจยสฺส สหาทิพฺยญฺชเนน คฺโค อาเทโส โหติ. ภคฺโค ราโค อเนน. วสนิวาเส, ปริวสียิตฺถาติ ปริวุฏฺโฐ ปริวาโส, วุสิตํ พฺรหฺมจริยํ, อุฏฺฐ อุอาเทสา. วส อจฺฉาทเน, นิวสียิตฺถาติ นิวตฺถํ วตฺถํ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา สฺตการสํโยคสฺส ตฺถตฺตํ, เอวํ นิวตฺถพฺพํ. สํส ปสํสเน, ปสํสียิตฺถาติ ปสตฺโถ ปสํสิโต, ปสํสนํ ปสตฺถิ. พธ พนฺธเน, อพชฺฌิตฺถาติ พทฺโธ รญฺญา, อลภียิตฺถาติ ลทฺธํ เม ธนํ, ธตฺตทตฺตานิ. รภ ราภสฺเส, อารภียิตฺถาติ อารทฺธํ วีริยํ. ทห ภสฺมีกรเณ[Pg.384], อทยฺหิตฺตาติ ทฑฺฒํ วนํ, อภุชฺชิตฺถาติ ภุตฺโต โอทโน, ภุชาทิตฺตา ธาตฺวนฺตโลโป, ทฺวิตฺตญฺจ. จช หานิมฺหิ, ปริจฺจชียิตฺถาติ ปริจฺจตฺตํ ธนํ, อมุจฺจิตฺถาติ มุตฺโต สโร. 'भञ्ज' धातु से परे 'त' प्रत्यय के स्थान पर आदि व्यंजन के साथ 'ग्गो' आदेश होता है। 'भग्गो रागो अनेन'। वस (निवास में) - 'परिवसीयित्थ' इस अर्थ में 'परिवुट्ठो परिवासो', 'वुसितं ब्रह्मचरियं', यहाँ 'उट्ठ' और 'उ' आदेश हुए। वस (आच्छादन में) - 'निवसीयित्थ' इस अर्थ में 'निवत्थं वत्थं', 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'स्त' कार के संयोग को 'त्थ' हुआ, इसी प्रकार 'निवत्थब्बं'। संस (प्रशंसा में) - 'पसंसीयित्थ' इस अर्थ में 'पसत्थो', 'पसंसितो'; 'पसंसनं' - 'पसत्थि'। बध (बाँधने में) - 'अबज्झित्थ' इस अर्थ में 'बद्धो रञ्ञा'; 'अलभीयित्थ' इस अर्थ में 'लद्धं मे धनं', धत्त और दत्त आदेश। रभ (आरम्भ में) - 'आरभीयित्थ' इस अर्थ में 'आरद्धं वीरियं'। दह (भस्मीकरण में) - 'अदय्हित्थ' इस अर्थ में 'दड्ढं वनं'; 'अभुज्जित्थ' इस अर्थ में 'भुत्तो ओदनो', भुजादि गण होने से धातु के अन्त्य का लोप और द्वित्व हुआ। चज (हानि में) - 'परिच्चजीयित्थ' इस अर्थ में 'परिच्चत्तं धनं'; 'अमुच्चित्थ' इस अर्थ में 'मुत्तो सरो'। วจ วิยตฺติยํ วาจายํ, อวจียิตฺถาติ อตฺเถ ตปฺปจฺจโย. वच (स्पष्ट वाणी में) - 'अवसीयित्थ' इस अर्थ में 'त' प्रत्यय होता है। ‘‘อนฺโต, โน, ทฺวิ, จา’’ติ จ อธิกาโร. 'अन्तो', 'नो', 'द्वि' और 'च' का अधिकार है। ๖๒๙. วจ วา วุ. ६२९. 'वच' के स्थान पर 'वा' और 'वु' (आदेश होते हैं)। จตุปฺปทมิทํ. วจอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส วการสฺส อุการาเทโส โหติ วา, ธาตฺวนฺโต จ จกาโร โน โหติ, ตปฺปจฺจยสฺส จ ทฺวิภาโว โหติ. วาคฺคหณมวธารณตฺถํ, ธาตฺวาทิมฺหิ วการาคโม. วุตฺตมิทํ ภควตา, อุตฺตํ วา. यह चार पदों वाला सूत्र है। 'वच' इस धातु के व-कार के स्थान पर विकल्प से उ-कार आदेश होता है, धातु का अन्तिम च-कार 'न' हो जाता है, और 'त' प्रत्यय का द्वित्व होता है। 'वा' का ग्रहण अवधारण के लिए है, धातु के आदि में व-कार का आगम होता है। 'वुत्तमिटं भगवता' अथवा 'उत्तं' (कहा गया)। ๖๓๐. คุปาทีนญฺจ. ६३०. और गुप आदि धातुओं का भी। คุปอิจฺเจวมาทีนํ ธาตูนมนฺโต จ พฺยญฺชโน โน โหติ, ปรสฺส ตการสฺส จ ทฺวิภาโว โหติ. คุป โคปเน, สุโคปียิตฺถาติ สุคุตฺโต, สุโคปิโต, อิกาเรน พฺยวหิตตฺตา น ธาตฺวนฺตโลโป, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ สุตฺเต วาธิการสฺส ววตฺถิตวิภาสตฺตา นิฏฺฐตกาเรปิ กฺวจิ วุทฺธิ. โคปนํ คุตฺติ. ‘गुप्’ आदि धातुओं के अन्त्य व्यंजन का लोप हो जाता है और परवर्ती ‘त’ कार का द्वित्व हो जाता है। ‘गुप गोपने’ (रक्षा करना), ‘सुगोपीयित्था’ इति ‘सुगुत्तो’ (अच्छी तरह रक्षित), ‘सुगोपितो’ (इकार के व्यवधान के कारण धातु के अन्त्य का लोप नहीं हुआ), ‘अञ्ञेसु चा’ इस सूत्र में ‘वा’ के अधिकार की व्यवस्थित विभाषा होने से ‘निष्ठा’ के ‘त’ कार के परे होने पर भी कहीं-कहीं वृद्धि होती है। ‘गोपनं गुत्ति’ (रक्षा करना ही गुप्ति है)। ลิป ลิมฺปเน, อลิมฺปียิตฺถาติ ลิตฺโต สุคนฺเธน. ตป สนฺตาเป, สนฺตปียิตฺถาติ สนฺตตฺโต เตเชน. ทีป ทิตฺติมฺหิ, อาทีปียิตฺถาติอาทิตฺโต อคฺคินา, รสฺสตฺตํ, ทีปนํ ทิตฺติ. อป ปาปุณเน, ปาปียิตฺถาติ ปตฺโต คาโม, ปาปุณีติ ปตฺโต สุขํ, ปาปุณนํ ปตฺติ, ปตฺตพฺพํ. มท อุมฺมาเท, ปมชฺชีติ ปมตฺโต. สุป สยเน, อสุปีติ สุตฺโต อิจฺจาทิ. ‘लिप लिम्पने’ (लेपना), ‘अलिम्पीयित्था’ इति ‘लित्तो’ (सुगंध से लिप्त)। ‘तप सन्तापे’ (तपाना), ‘सन्तपीयित्था’ इति ‘सन्तत्तो’ (तेज से संतप्त)। ‘दीप दित्तिम्हि’ (दीप्ति/चमक), ‘आदीपीयित्था’ इति ‘आदित्तो’ (अग्नि से प्रदीप्त), यहाँ ह्रस्व हुआ है, ‘दीपनं दित्ति’। ‘अप पापुणने’ (प्राप्त करना), ‘पापीयित्था’ इति ‘पत्तो’ (गाँव पहुँचा हुआ), ‘पापुणी’ इति ‘पत्तो’ (सुख प्राप्त किया), ‘पापुणनं पत्ति’ (प्राप्ति), ‘पत्तब्बं’ (प्राप्तव्य)। ‘मद उम्मादे’ (मत्त होना), ‘पमज्जी’ इति ‘पमत्तो’ (प्रमत्त)। ‘सुप सयने’ (सोना), ‘असुपी’ इति ‘सुत्तो’ (सोया हुआ) इत्यादि। จร [Pg.385] จรเณ, อจรียิตฺถาติ จิณฺโณ ธมฺโม, อิณฺณาเทโส, จริโต วา. เอวํ ปุณฺโณ, ปูริโต. ‘चर चरणे’ (आचरण करना), ‘अचरीयित्था’ इति ‘चिण्णो’ (आचरित धर्म), यहाँ ‘इण्ण’ आदेश हुआ है, अथवा ‘चरितो’। इसी प्रकार ‘पुण्णो’ (पूर्ण), ‘पूरितो’ (पूरित)। นุท เขเป, ปนุชฺชิตฺถาติ ปณุนฺโน, นสฺส ณตฺตํ, ปนุทิโต. ทา ทาเน, อาทียิตฺถาติอาทินฺโน, อตฺโต วา, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ทาสทฺทสฺส ตกาโร, รสฺสตฺตํ. ‘नुद खेपे’ (प्रेरित करना/फेंकना), ‘पनुज्जित्था’ इति ‘पणुन्नो’ (प्रेरित/दूर किया गया), ‘न’ का ‘ण’ हुआ है, ‘पनुदितो’। ‘दा दाने’ (देना), ‘आदीयित्था’ इति ‘आदिन्नो’ (लिया हुआ), अथवा ‘अत्तो’, ‘क्वचि धातू’ आदि सूत्र से ‘दा’ शब्द के स्थान पर ‘त’ कार और ह्रस्व हुआ है। ๖๓๑. ภิทาทิโต อินฺนอนฺนอีณา วา. ६३१. ‘भिद्’ आदि से परे (त-प्रत्यय के स्थान पर) ‘इन्न’, ‘अन्न’ और ‘ईण’ विकल्प से होते हैं। ภิทอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ปรสฺส ตปฺปจฺจยสฺส อินฺน อนฺนอีณอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา, อนฺโต จ โน โหติ. ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, สรโลปาทิ. ‘भिद्’ आदि धातुओं से परे ‘त’ प्रत्यय के स्थान पर ‘इन्न’, ‘अन्न’ और ‘ईण’ ये आदेश विकल्प से होते हैं, और धातु के अन्त्य (व्यंजन) का लोप हो जाता है। यहाँ ‘वा’ शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है, स्वर-लोप आदि भी होते हैं। ภิทิ วิทารเณ, อภิชฺชิตฺถาติ ภินฺโน ฆโฏ ภวตา, ภิชฺชีติ วา ภินฺโน เทวทตฺโต. ฉิทิ ทฺวิธากรเณ, อฉิชฺชิตฺถาติ ฉินฺโน รุกฺโข, อจฺฉินฺนํ จีวรํ, อุจฺฉิชฺชีติ อุจฺฉินฺโน. อทียิตฺถาภิ ทินฺโน สุงฺโก. สท วิสรณคตฺยาวสาเนสุ, นิสีทีติ นิสินฺโน. ขิท อุตฺตาสเน, ขิท ทีนภาเว วา, อขิชฺชีติ ขินฺโน. ‘भिदि विदारणे’ (फाड़ना/तोड़ना), ‘अभिज्जित्था’ इति ‘भिन्नों’ (आपके द्वारा टूटा हुआ घड़ा), अथवा ‘भिज्जी’ इति ‘भिन्नों’ (देवदत्त जो टूट गया/अलग हो गया)। ‘छिदि द्विधाकरणे’ (दो भाग करना), ‘अछिज्जित्था’ इति ‘छिन्नो’ (कटा हुआ वृक्ष), ‘अच्छिन्नं चीवरं’ (न कटा हुआ चीवर), ‘उच्छिज्जी’ इति ‘उच्छिन्नो’ (उच्छिन्न)। ‘अदीयित्था’ इति ‘दिन्नो’ (दिया हुआ शुल्क)। ‘सद विसरणगत्यावसानेसु’ (बैठना/अवसाद), ‘निसीदी’ इति ‘निसिन्नो’ (बैठा हुआ)। ‘खिद उत्तासने’ (उद्विग्न होना) अथवा ‘खिद दीनभावे’ (दीन होना), ‘अखिज्जी’ इति ‘खिन्नो’ (खिन्न)। อนฺนาเทเส ฉท อปวารเณ, อจฺฉาทียิตฺถาติ ฉนฺโน, ปฏิจฺฉนฺนํ เคหํ, ปสีทีติ ปสนฺโน. ปท คติมฺหิ, อุปฺปชฺชีติ อุปฺปนฺโน, ฌานํ สมาปนฺโน. รุทิ อสฺสุวิโมจเน, รุณฺโณ, ปรโลโป. ‘अन्न’ आदेश के उदाहरण में: ‘छद अपवारणे’ (ढकना), ‘अच्छानीयित्था’ इति ‘छन्नो’ (ढका हुआ), ‘पडिच्छन्नं गेहं’ (ढका हुआ घर), ‘पसीदी’ इति ‘पसन्नो’ (प्रसन्न)। ‘पद गतिम्हि’ (जाना/प्राप्त करना), ‘उप्पज्जी’ इति ‘उप्पन्नो’ (उत्पन्न), ‘झानं समापन्नो’ (ध्यान को प्राप्त)। ‘रुदि अस्सुविमोचने’ (रोना), ‘रुण्णो’ (रोया हुआ), यहाँ पर (त) का लोप हुआ है। ขี ขเย อีณาเทโส, อขียีติ ขีโณ โทโส, ขีณา ชาติ, ขีณํ ธนํ. หา จาเค, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา หาทิโต อีณาเทเส ณการสฺส นตฺตํ, ปหียิตฺถาติ ปหีโน กิเลโส, ปริหายีติ ปริหีโน. อาส อุปเวสเน[Pg.386], อจฺฉีติ อาสีโน. ลี สิเลสเน, ลียีติ ลีโน, นิลีโน. ชิ ชเย, ชิยีติ ชีโน วิตฺตมนุโสจติ, ชิโต วา. ที ขเย, ทีโน. ปี ตปฺปเน, ปีโน. ลู เฉทเน, ลูยิตฺถาติ ลูโน อิจฺจาทิ. ‘खी खये’ (क्षय होना) में ‘ईण’ आदेश होता है, ‘अखीयी’ इति ‘खीणो’ (क्षीण दोष), ‘खीणा जाति’ (क्षीण जन्म), ‘खीणं धनं’ (क्षीण धन)। ‘हा चागे’ (त्यागना), ‘क्वचि धातू’ आदि सूत्र से ‘हा’ के बाद ‘ईण’ आदेश होने पर ‘ण’ कार का ‘न’ कार हो जाता है, ‘पहीयित्था’ इति ‘पहीनो’ (प्रहीण क्लेश), ‘परिहायी’ इति ‘परिहीनो’ (परिहीन)। ‘आस उपवेसने’ (बैठना), ‘अच्छी’ इति ‘आसीनो’ (बैठा हुआ)। ‘ली सिलेसने’ (चिपकना/लीन होना), ‘लीयि’ इति ‘लीनो’ (लीन), ‘निलीनो’ (निलीन)। ‘जि जये’ (जीतना), ‘जियी’ इति ‘जीनो’ (जीर्ण/हारा हुआ) ‘वित्तमनुसोचति’ (धन के लिए शोक करता है), अथवा ‘जितो’। ‘दी खये’ (क्षय होना), ‘दीनो’। ‘पी तप्पने’ (तृप्त करना), ‘पीनो’। ‘लू छेदने’ (काटना), ‘लूयित्था’ इति ‘लूनो’ (कटा हुआ) इत्यादि। วมุ อุคฺคิรเณ, วมียิตฺถาติ วนฺตํ, วมิตํ, ‘‘ปกฺกมาทีหิ นฺโต’’ติ นฺตาเทโส. อคจฺฉียิตฺถาติ คโต คาโม ตยา, คามํ คโต วา, ‘‘คมขนหนรมาทีนมนฺโต’’ติ ธาตฺวนฺตโลโป. อขญฺญิตฺถาติ ขโต กูโป, อุปหญฺญิตฺถาติ อุปหตํ จิตฺตํ, อรมีติ รโต, อภิรโต. มน ญาเณ, อมญฺญิตฺถาติ มโต, สมฺมโต. ตนุ วิตฺถาเร, อตนิตฺถาติ ตตํ, วิตตํ. ยมุ อุปรเม, นิยจฺฉีติ นิยโต. ‘वमु उग्गिरणे’ (वमन करना), ‘वमीयित्था’ इति ‘वन्तं’ (वमन किया हुआ), ‘वमितं’, ‘पक्कमादीहि न्तो’ सूत्र से ‘न्त’ आदेश हुआ है। ‘अगच्छीयित्था’ इति ‘गतो’ (तुम्हारे द्वारा गया हुआ गाँव), अथवा ‘गामं गतो’ (गाँव गया हुआ), ‘गमकनहनरमादीनमन्तो’ सूत्र से धातु के अन्त्य का लोप हुआ है। ‘अखञ्ञित्था’ इति ‘खतो’ (खुदा हुआ कुआँ), ‘उपहञ्ञित्था’ इति ‘उपहतं’ (उपहत चित्त), ‘अरमी’ इति ‘रतो’ (रक्त/लीन), ‘अभिरतो’। ‘मन नाणे’ (जानना), ‘अमञ्ञित्था’ इति ‘मतो’ (ज्ञात), ‘सम्मतो’ (सम्मत)। ‘तनु वित्थारे’ (फैलाना), ‘अतणित्था’ इति ‘ततं’ (विस्तृत), ‘विततं’। ‘यमु उपरामे’ (रुकना/संयम), ‘नियच्छी’ इति ‘नियतो’ (नियत)। ‘‘โน, ตมฺหิ, ติมฺหี’’ติ จ วตฺตเต. ‘नो’, ‘तम्हि’ और ‘तिम्हि’ की अनुवृत्ति होती है। ๖๓๒. รกาโร จ. ६३२. और ‘र’ कार भी। รกาโร จ ธาตูนมนฺตภูโต โน โหติ ตปฺปจฺจเย, ติปฺปจฺจเย จ ปเร. ปกรียิตฺถาติ ปกโต กโฏ ภวตา, กตา เม รกฺขา, กตํ เม ปุญฺญํ. ‘‘โท ธสฺส จา’’ติ เอตฺต จสทฺเทน โฏ ตสฺส, ยถา – สุกฏํ, ทุกฺกฏํ, ปุเร อกรียิตฺถาติ ปุรกฺขโต, ‘‘ปุรสมุปปรีหิ กโรติสฺส ขขรา วา ตปฺปจฺจเยสุ จา’’ติ ขกาโร, ปจฺจเยหิ สงฺคมฺม กรียิตฺถาติ สงฺขโต, อภิสงฺขโต, อุปกรียิตฺถาติ อุปกฺขโต, อุปกฺขโฏ, ปริกรียิตฺถาติ ปริกฺขโต. ‘त’ प्रत्यय और ‘ति’ प्रत्यय के परे होने पर धातुओं के अन्त्य में स्थित ‘र’ कार का लोप हो जाता है। ‘पकरीयित्था’ इति ‘पक्तो’ (आपके द्वारा की गई चटाई), ‘कता मे रक्खा’ (मेरे द्वारा की गई रक्षा), ‘कतं मे पुञ्ञं’ (मेरे द्वारा किया गया पुण्य)। ‘दो धस्स चा’ यहाँ ‘च’ शब्द से ‘त’ का ‘ट’ हो जाता है, जैसे— ‘सुकटं’, ‘दुक्कटं’। ‘पुरे अकरीयित्था’ इति ‘पुरक्खतो’ (पुरस्कृत), ‘पुरसमुपपरीहि करोतिस्स खखरा वा तप्पच्चयेसु चा’ सूत्र से ‘ख’ कार हुआ है। ‘पच्चयेहि सङ्gamma करीयित्था’ इति ‘सङ्खतो’ (संस्कृत/संस्कारित), ‘अभिसङ्खतो’। ‘उपकरीयित्था’ इति ‘उपक्खतो’, ‘उपक्खटो’। ‘परिकरीयित्था’ इति ‘परिक्खतो’। ติปฺปจฺจเย ปกรณ ปกติ. สร คติจินฺตายํ, อสรีติ สโต, วิสรีติ วิสโฏ, สรณํ, สรติ เอตายาติ วา สติ, นีหรียิตฺถาติ นีหโฏ. ธร ธารเณ, อุทฺธรียิตฺถาติ [Pg.387] อุทฺธโฏ, อภรียิตฺถาติ ภโต, ภรณํ, ภรติ เอตายาติ วา ภติ. ‘ति’ प्रत्यय होने पर ‘पकरण’ (प्रकरण) और ‘पकति’ (प्रकृति) बनते हैं। ‘सर गतिचिन्तायं’ (गति और चिन्तन), ‘असरी’ इति ‘सतो’ (स्मृत), ‘विसरी’ इति ‘विसटो’ (विस्तृत), ‘सरणं’ (शरण), ‘सरति एतायाति’ वा ‘सति’ (स्मृति)। ‘नीहरीयित्था’ इति ‘नीहटो’ (निकाला हुआ)। ‘धर धारणे’ (धारण करना), ‘उद्धरीयित्था’ इति ‘उद्धटो’ (उद्धृत), ‘अभरीयित्था’ इति ‘भतो’ (भृत/पोषित), ‘भरणं’ (भरण), ‘भरति एतायाति’ वा ‘भति’ (भृति/मजदूरी)। อิการาคมยุตฺเตสุ ‘‘คมิโต’’ติอาทีสุ ธาตฺวนฺตโลเป สมฺปตฺเต – ‘इ’ कार के आगम से युक्त ‘गमितो’ आदि में धातु के अन्त्य के लोप की प्राप्ति होने पर— ‘‘โลโป’’ติ วตฺตเต. ‘लोपो’ (लोप) की अनुवृत्ति होती है। ๖๓๓. นมกรานมนฺตานํ นิยุตฺตตมฺหิ. ६३३. ‘न’, ‘म’, ‘क’, ‘र’ अन्त्य वाले (धातुओं) का, ‘त’ के परे होने पर। นการ มการ กการ รการานํ ธาตฺวนฺตานํ โลโป น โหติ อิการาคมยุตฺเต ตกาเร ปเรติ โลปาภาโว. อคจฺฉี, คมียิตฺถาติ วา คมิโต, รมิตฺถาติ รมิโต. เอวํ วมิโต, นมิโต. สกิ สงฺกายํ, สงฺกิโต, สริโต, ภริโต. ตถา ขนิตพฺพํ, หนิตพฺพํ, คมิตพฺพํ, รมิตพฺพํ อิจฺจาทิ. ‘इ’ कार के आगम से युक्त ‘त’ कार के परे होने पर ‘न’ कार, ‘म’ कार, ‘क’ कार और ‘र’ कार रूपी धातु के अन्त्य का लोप नहीं होता है, अतः लोप का अभाव रहता है। ‘अगच्छी’, ‘गमीयित्था’ वा ‘गमितो’ (गया हुआ), ‘रमित्था’ इति ‘रमितो’ (रमा हुआ)। इसी प्रकार ‘वमितो’, ‘नमितो’। ‘सकि सङ्कायं’ (शंका करना), ‘सङ्कितो’ (शंकित), ‘सरितो’, ‘भरितो’। इसी प्रकार ‘खनितब्बं’ (खनितव्य), ‘हनितब्बं’ (हनितव्य), ‘गमितब्बं’ (गमितव्य), ‘रमितब्बं’ (रमितव्य) इत्यादि। นิธียิตฺถาติ นิหิโต, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ธิสฺส หิ ตปฺปจฺจเย. เอวํ วิหิโต. ‘निधीयित्था’ इति ‘निहितो’ (रखा हुआ), ‘क्वचि धातू’ आदि सूत्र से ‘त’ प्रत्यय के परे होने पर ‘धा’ के स्थान पर ‘हि’ आदेश होता है। इसी प्रकार ‘विहितो’। การิเต อภาวียิตฺถาติ อตฺเถ ‘‘ภาวกมฺเมสุ ต’’อิติ ตปฺปจฺจโย, ‘‘ยถาคมมิกาโร’’ติ อิการาคโม, สรโลปาทิ, ภาวิโต มคฺโค เตน, ภาวยิโต, อปาจียิตฺถาติ ปาจิโต โอทนํ ยญฺญทตฺโต เทวทตฺเตน, ปาจยิโต, ปาจาปิโต, ปาจาปยิโต, กมฺมํ การียิตฺถาติ การิโต, การยิโต, การาปิโต, การาปยิโต อิจฺจาทิ. कारित (णिजन्त) में ‘अभावीयित्था’ इस अर्थ में ‘भावकम्मेसु त’ इस सूत्र से ‘त’ प्रत्यय होता है, ‘यथागमिमिक्कारो’ से ‘इ’ कार का आगम, स्वर-लोप आदि होकर— उसके द्वारा मार्ग ‘भावितो’ (भावित किया गया), ‘भावयितो’। ‘अपाचीयित्था’ इति ‘पाचितो’ ओदनं यज्ञदत्त द्वारा देवदत्त से, ‘पाचयितो’, ‘पाचापितो’, ‘पाचापयितो’। कर्म ‘कारीयित्था’ इति ‘कारितो’, ‘कारयितो’, ‘कारापितो’, ‘कारापयितो’ इत्यादि। ‘‘ภาวกมฺเมสุ ต’’อิติ เอตฺถ ‘‘ต’’อิติ โยควิภาเคน อจลน คติ โภชนตฺถาทีหิ อธิกรเณปิ ตปฺปจฺจโย, ยถา – อาส อุปเวสเน, อธิกรเณ อจฺฉึสุ เอตฺถ เตติ อิทํ เตสํ อาสิตํ ฐานํ. ภาเว อิธ เตหิ อาสิตํ. กมฺมนิ อยํ เตหิ อชฺฌาสิโต คาโม. กตฺตริ [Pg.388] อิธ เต อาสิตา. ตถา อฏฺฐํสุ เอตฺถาติ อิทํ เตสํ ฐิตํ ฐานํ, อิธ เตหิ ฐิตํ, อยํ เตหิ อธิฏฺฐิโต โอกาโส, อิธ เต ฐิตา. นิสีทึสุ เอตฺถาติ อิทํ เตสํ นิสินฺนํ ฐานํ, อยํ เตสํ นิสินฺนกาโล, เต อิธ นิสินฺนา. นิปชฺชึสุ เอตฺถาติ อิทํ เตสํ นิปนฺนํ ฐานํ, อิธ เต นิปนฺนา. ‘‘Bhāvakammesu ta’’ (भावकर्मों में 'त' प्रत्यय) यहाँ ‘‘ta’’ इस योगविभाग के द्वारा अचल (स्थिर), गति, भोजन आदि अर्थों में अधिकरण में भी 'त' प्रत्यय होता है, जैसे – 'आस' (बैठना) उपवेशन अर्थ में, अधिकरण में 'अच्छिंसु एत्थ' (यहाँ वे बैठे) इस अर्थ में 'तेसं आसितं ठानं' (यह उनके बैठने का स्थान है)। भाव में 'इध तेहि आसितं' (यहाँ उनके द्वारा बैठा गया)। कर्म में 'अयं तेहि अज्झासितो गामो' (यह उनके द्वारा अध्यासित गाँव है)। कर्ता में 'इध ते आसिता' (यहाँ वे बैठे हैं)। उसी प्रकार 'अट्ठंसु एत्थाति' (यहाँ वे खड़े हुए) इस अर्थ में 'इदं तेसं ठितं ठानं' (यह उनके खड़े होने का स्थान है), 'इध तेहि ठितं' (यहाँ उनके द्वारा खड़ा हुआ गया), 'अयं तेहि अधिट्ठितो ओकासो' (यह उनके द्वारा अधिष्ठित स्थान है), 'इध ते ठिता' (यहाँ वे खड़े हैं)। 'निसीदिसु एत्थाति' (यहाँ वे बैठे) इस अर्थ में 'इदं तेसं निसिन्नं ठानं' (यह उनके बैठने का स्थान है), 'अयं तेसं निसिन्नकालो' (यह उनके बैठने का समय है), 'ते इध निसिन्ना' (वे यहाँ बैठे हैं)। 'निपज्जिसु एत्थाति' (यहाँ वे लेटे) इस अर्थ में 'इदं तेसं निपन्नं ठानं' (यह उनके लेटने का स्थान है), 'इध ते निपन्ना' (यहाँ वे लेटे हैं)। ยา คติปาปุณเน. อยาสุํ เต เอตฺถาติ อยํ เตสํ ยาโต มคฺโค, อิธ เตหิ ยาตํ, อยํ เตหิ ยาโต, มคฺโค, อิธ เต ยาตา. ตถา อิทํ เตสํ คตฏฺฐานํ, อยํ เตสํ คตกาโล, อิธ เตหิ คตํ, อยํ เตหิ คโต คาโม, อิธ เต คตา. 'या' धातु गति और प्राप्ति के अर्थ में है। 'अयासुं ते एत्थाति' (वे यहाँ से गए) इस अर्थ में 'अयं तेसं यातो मग्गो' (यह उनके द्वारा गया हुआ मार्ग है), 'इध तेहि यातं' (यहाँ उनके द्वारा जाया गया), 'अयं तेहि यातो मग्गो' (यह उनके द्वारा गया हुआ मार्ग है), 'इध ते याता' (यहाँ वे गए हैं)। उसी प्रकार 'इदं तेसं गतट्ठानं' (यह उनके जाने का स्थान है), 'अयं तेसं गतकालो' (यह उनके जाने का समय है), 'इध तेहि गतं' (यहाँ उनके द्वारा जाया गया), 'अयं तेहि गतो गामो' (यह उनके द्वारा गया हुआ गाँव है), 'इध ते गता' (यहाँ वे गए हैं)। ภุญฺชึสุ เอตสฺมินฺติ อิทํ เตสํ ภุตฺตฏฺฐานํ, อยํ เตสํ ภุตฺตกาโล, อิธ เตหิ ภุตฺโต โอทโน, อิธ เต ภุตฺตา. ปิวึสุ เต เอตฺถาติ อิทํ เตสํ ปีตํ ฐานํ, อิธ เตหิ ปีตา ยาคุ, อิธ เต ปีตา. ทิสฺสนฺติ เอตฺถาติ อิทํ เตสํ ทิฏฺฐฏฺฐานํ อิจฺจาทิ. 'भुञ्जिसु एतस्मिन्ति' (इसमें उन्होंने खाया) इस अर्थ में 'इदं तेसं भुत्तट्ठानं' (यह उनके खाने का स्थान है), 'अयं तेसं भुत्तकालो' (यह उनके खाने का समय है), 'इध तेहि भुत्तो ओदनो' (यहाँ उनके द्वारा भात खाया गया), 'इध ते भुत्ता' (यहाँ वे खा चुके हैं)। 'पिविसु ते एत्थाति' (उन्होंने यहाँ पिया) इस अर्थ में 'इदं तेसं पीतं ठानं' (यह उनके पीने का स्थान है), 'इध तेहि पीता यागु' (यहाँ उनके द्वारा यवागू पी गई), 'इध ते पीता' (यहाँ वे पी चुके हैं)। 'दिस्सन्ति एत्थाति' (यहाँ वे देखे जाते हैं) इस अर्थ में 'इदं तेसं दिट्ठट्ठानं' (यह उनके देखे जाने का स्थान है) इत्यादि। ‘‘กตฺตริ กิติ’’ติ อิโต มณฺฑูกคติยา ‘‘กตฺตรี’’ติ วตฺตเต. ‘‘Kattari kiti’’ (कर्ता में 'कित्' प्रत्यय) यहाँ से मण्डूकगति (मेंढक की छलांग की तरह) से ‘‘kattarī’’ (कर्ता में) यह पद अनुवृत्त होता है। ๖๓๔. กมฺมนิ ทุติยายํ กฺโต. ६३४. कर्म में द्वितीया होने पर 'क्त' प्रत्यय होता है। กมฺมตฺเถ ทุติยายํ วิภตฺติยํ วิชฺชมานายํ ธาตูหิ กตฺตริ กฺตปฺปจฺจโย โหติ. อิทเมว วจนํ ญาปกํ อภิหิเต กมฺมาทิมฺหิ ทุติยาทีนมภาวสฺส. ทานํ อทาสีติ อตฺเถ กฺตปฺปจฺจโย, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ปจฺจยกการสฺส โลโป, ตสฺส อินฺนาเทโส, ทานํ ทินฺโน เทวทตฺโต. รกฺข ปาลเน, สีลํ อรกฺขีติ สีลํ รกฺขิโต, ภตฺตํ อภุญฺชีติ ภตฺตํ ภุตฺโต, ครุํ อุปาสีติ ครุมุปาสิโต อิจฺจาทิ. कर्म अर्थ में द्वितीया विभक्ति के विद्यमान होने पर धातुओं से कर्ता में 'क्त' प्रत्यय होता है। यही वचन इस बात का ज्ञापक है कि अभिहित (कहे गए) कर्म आदि में द्वितीया आदि विभक्तियाँ नहीं होतीं। 'दानं अदासी' (दान दिया) इस अर्थ में 'क्त' प्रत्यय होता है, ‘‘kvaci dhātū’’ इत्यादि सूत्र से प्रत्यय के 'क' कार का लोप होता है, और उसे 'इन्न' आदेश होता है - 'दानं दिन्नो देवदत्तो' (दान देने वाला देवदत्त)। 'रक्ख' धातु पालन अर्थ में, 'सीलं अरक्खी' (शील की रक्षा की) इस अर्थ में 'सीलं रक्खितो' (शील की रक्षा करने वाला), 'भत्तं अभुञ्जी' (भात खाया) इस अर्थ में 'भत्तं भुत्तो' (भात खाने वाला), 'गरुं उपासी' (गुरु की उपासना की) इस अर्थ में 'गरुमुपासितो' (गुरु की उपासना करने वाला) इत्यादि। ๖๓๕. ภฺยาทีหิ มติพุธิปูชาทีหิ จ กฺโต. ६३५. भी (भय) आदि धातुओं से तथा मति, बुधि, पूजा आदि अर्थ वाली धातुओं से 'क्त' प्रत्यय होता है। ภีอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ, มติ พุธิ ปูชาทีหิ จ กฺตปฺปจฺจโย โหติ. โส จ ‘‘ภาวกมฺเมสุ กิจฺจตฺตกฺขตฺถา’’ติ วุตฺตตฺตา ภาวกมฺเมสฺเวว ภวติ. 'भी' इत्यादि धातुओं से तथा मति, बुधि, पूजा आदि अर्थ वाली धातुओं से 'क्त' प्रत्यय होता है। और वह ‘‘bhāvakammesu kiccattakkhatthā’’ (भाव और कर्म में कृत्य, क्त और खलर्थ प्रत्यय होते हैं) ऐसा कहे जाने के कारण भाव और कर्म में ही होता है। ภี ภเย, อภายิตฺถาติ ภีตํ ภวตา. สุป สเย, อสุปียิตฺถาติ สุตฺตํ ภวตา. เอวํ สยิตํ ภวตา. อส โภชเน, อสิตํ ภวตา, ปจิโต โอทโน ภวตา. 'भी' धातु भय के अर्थ में, 'अभायित्थाति' (डरा गया) इस अर्थ में 'भीतं भवता' (आपके द्वारा डरा गया)। 'सुप' धातु शयन के अर्थ में, 'असुपीयित्थाति' (सोया गया) इस अर्थ में 'सुत्तं भवता' (आपके द्वारा सोया गया)। इसी प्रकार 'सयितं भवता' (आपके द्वारा सोया गया)। 'अस' धातु भोजन के अर्थ में, 'असितं भवता' (आपके द्वारा खाया गया), 'पचितो ओदनो भवता' (आपके द्वारा भात पकाया गया)। อิธ มตฺยาทโย อิจฺฉตฺถา, พุธิอาทโย ญาณตฺถา. यहाँ 'मति' आदि इच्छा के अर्थ में हैं और 'बुधि' आदि ज्ञान के अर्थ में हैं। มน ญาเณ สํปุพฺโพ, ‘‘พุธคมาทิตฺเถ กตฺตรี’’ติ ตปฺปจฺจเย สมฺปตฺเต อิมินา กมฺมนิ กฺตปฺปจฺจโย, ‘‘คม ขนา’’ติอาทินา ธาตฺวนฺตโลโป, รญฺญา สมฺมโต. กปฺป ตกฺกเน, สงฺกปฺปิโต. ธร ธารเณ, จุราทิตฺตา เณ, วุทฺธิ, อิการาคโม, สรโลปาทิ, อวธาริโต. 'मन' धातु ज्ञान के अर्थ में 'सं' उपसर्ग पूर्वक है, ‘‘budhagamāditthe kattarī’’ (बुध, गम आदि से कर्ता में 'त' प्रत्यय) इस सूत्र से कर्ता में 'त' प्रत्यय प्राप्त होने पर, इस (प्रस्तुत) सूत्र से कर्म में 'क्त' प्रत्यय होता है, ‘‘gama khanā’’ इत्यादि सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण का लोप होकर 'रञ्ञा सम्मतो' (राजा द्वारा सम्मत/मान्य) रूप बनता है। 'कप्प' धातु तर्क (सोचने) के अर्थ में, 'सङ्कप्पितो' (संकल्पित)। 'धर' धातु धारण करने के अर्थ में, चुरादि गण होने से 'णे' प्रत्यय, वृद्धि, 'इ' कार का आगम, स्वर लोप आदि होकर 'अवधारितो' (अवधारित) रूप बनता है। พุธ อวคมเน, อวพุชฺฌิตฺถาติ พุทฺโธ ภควา มเหสกฺเขหิ เทวมนุสฺเสหิ. อิ อชฺฌยเน, อธียิตฺถาติ อธีโต. 'बुध' धातु अवगमन (जानने) के अर्थ में, 'अवबुज्झित्थाति' (जाना गया) इस अर्थ में 'बुद्धो भगवा महेसक्खेहि देवमनुस्सेहि' (महान प्रभावशाली देवों और मनुष्यों द्वारा भगवान बुद्ध जाने गए)। 'इ' धातु अध्ययन के अर्थ में, 'अधीयित्थाति' (पढ़ा गया) इस अर्थ में 'अधीतो' (पढ़ा हुआ)। อิ คติมฺหิ, อภิสมิโต. วิท ญาเณ, อเวทียิตฺถาติ วิทิโต. ญา อวโพธเน, อญฺญายิตฺถาติ ญาโต. วิธ เวธเน, ปฏิวิชฺฌิตฺถาติ ปฏิวิทฺโธ ธมฺโม. ตกฺก วิตกฺเก, ตกฺกิโต. 'इ' धातु गति के अर्थ में, 'अभिसमितो' (प्राप्त किया हुआ)। 'विद' धातु ज्ञान के अर्थ में, 'अवेदीयित्थाति' (जाना गया) इस अर्थ में 'विदितो' (ज्ञात)। 'ञा' धातु अवबोधन (जानने) के अर्थ में, 'अञ्ञायित्थाति' (जाना गया) इस अर्थ में 'ञातो' (ज्ञात)। 'विध' धातु वेधन (भेदने/साक्षात्कार) के अर्थ में, 'पटिविज्झित्थाति' (साक्षात्कार किया गया) इस अर्थ में 'पटिविद्धो धम्मो' (साक्षात्कृत धर्म)। 'तक्क' धातु वितर्क के अर्थ में, 'तक्कितो' (तर्क किया हुआ)। ปูชนตฺเถสุ – पूजा के अर्थों में – ปูช ปูชายํ, อปูชียิตฺถาติ ปูชิโต ภควา. จาย สนฺตานปูชเนสุ อปปุพฺโพ, อปจายิโต. มาน ปูชายํ, มานิโต. จิ จเย, อปจิโต. วนฺท อภิวนฺทเน, วนฺทิโต. กร กรเณ, สกฺกโต. สกฺการ ปูชายํ, สกฺการิโต อิจฺจาทิ. 'पूज' धातु पूजा के अर्थ में, 'अपूजीयित्थाति' (पूजे गए) इस अर्थ में 'पूजितो भगवा' (भगवान पूजित हैं)। 'चाय' धातु सन्तान (विस्तार) और पूजा के अर्थ में 'अप' उपसर्ग पूर्वक, 'अपचायितो' (आदर किया गया)। 'मान' धातु पूजा के अर्थ में, 'मानितो' (मानित)। 'चि' धातु चयन के अर्थ में, 'अपचितो' (पूजित)। 'वन्द' धातु अभिवन्दन के अर्थ में, 'वन्दितो' (वन्दित)। 'कर' धातु करने के अर्थ में, 'सक्कतो' (सत्कृत)। 'सक्कार' पूजा के अर्थ में, 'सक्कारितो' (सत्कृत) इत्यादि। หุโต [Pg.390] หุตาวี หุตวา, วุฏฺโฐ วุสิต ชิณฺณโก; ปกฺกํ ปกฺกนฺตโก ชาโต, ฐิโต รุฬฺโห พุภุกฺขิโต. हुतो (हवन किया हुआ), हुतावी, हुतवा, वुट्ठो (रहा हुआ), वुसित, जिण्णको (बूढ़ा/जीर्ण); पक्कं (पका हुआ), पक्कन्तको, जातो (उत्पन्न), ठितो (खड़ा), रुळ्हो (चढ़ा हुआ), बुभुक्खितो (भूखा)। คีตํ นจฺจํ ชิโต ทิฏฺโฐ, ตุฏฺโฐ ยิฏฺโฐ จ ภคฺควา; วุตฺตญฺจ คุตฺโต อจฺฉินฺโน, ปหีโน คมิโต คโต. गीतं (गाया हुआ), नच्चं (नृत्य), जितो (जीता हुआ), दिट्ठो (देखा हुआ), तुट्ठो (सन्तुष्ट) और यिट्ठो (यज्ञ किया हुआ) तथा भग्गवा (भाग्यवान); वुत्तञ्च (कहा हुआ), गुत्तो (रक्षित), अच्छिन्नो (न छीना हुआ), पहीनो (त्यागा हुआ), गमितो, गतो (गया हुआ)। กโตภิสงฺขโต ภุตฺตํ, ฐานํ ครุมุปาสิโต; ภีตญฺจ สมฺมโต พุทฺโธ, ปูชิโตตีตกาลิกา. कतो (किया हुआ), अभिसङ्खतो (संस्कारित), भुत्तं (खाया हुआ), ठानं (स्थान), गरुमुपासितो (गुरु की उपासना करने वाला); भीतञ्च (डरा हुआ), सम्मतो (सम्मत), बुद्धो (जाना हुआ), पूजितो (पूजित) - ये सब अतीत काल के रूप हैं। อตีตปฺปจฺจยนฺตนโย. अतीत प्रत्ययों की विधि समाप्त हुई। ตเวตุนาทิปฺปจฺจยนฺตนย तवे, तुं आदि प्रत्ययों की विधि। ‘‘ปุญฺญานิ กาตุมิจฺฉิ, อิจฺฉติ, อิจฺฉิสฺสติ วา’’ติ วิคฺคเห – ‘‘पुञ्ञानि कातुमिच्छि, इच्छति, इच्छिस्सति वा’’ (पुण्य करना चाहा, चाहता है, या चाहेगा) इस विग्रह में – ๖๓๖. อิจฺฉตฺเถสุ สมาน กตฺตุ เกสุ ต เว ตุํ วา. ६३६. इच्छा अर्थ वाली धातुओं के होने पर, समान कर्ता होने पर 'तवे' या 'तुं' प्रत्यय होते हैं। อิจฺฉา อตฺโถ เยสํ เต อิจฺฉตฺถา, เตสุ อิจฺฉตฺเถสุ ธาตูสุ สมานกตฺตุเกสุ สนฺเตสุ สพฺพธาตูหิ ตเวตุํอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ วา, ‘‘ตเวตุํ วา’’ติ โยควิภาเคน ตทตฺถกฺริยายญฺจ, เต จ กิตกตฺตา กตฺตริ โหนฺติ. इच्छा ही अर्थ है जिनका वे 'इच्छत्थ' हैं, उन इच्छा अर्थ वाली धातुओं के उपपद होने पर, समान कर्ता होने पर सभी धातुओं से 'तवे' और 'तुं' ये प्रत्यय विकल्प से होते हैं। ‘‘tavetuṃ vā’’ इस योगविभाग से उस अर्थ वाली क्रिया (प्रयोजन क्रिया) में भी ये प्रत्यय होते हैं, और वे कृत् होने के कारण कर्ता अर्थ में होते हैं। ‘‘กโรติสฺส, วา’’ติ จ วตฺตเต. ‘‘Karotissa, vā’’ (करोति धातु को विकल्प से) यह पद अनुवृत्त होता है। ๖๓๗. ตเวตุนาทีสุ กา. ६३७. तवे, तुं आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'का' आदेश होता है। ตเวตุนอิจฺเจวมาทีสุ ปจฺจเยสุ ปเรสุ กโรติสฺส ธาตุสฺส กาเทโส โหติ วา, อาทิสทฺเทน ตุํตฺวาน ตฺวา ตพฺเพสุ จ. 'तवे', 'तुं' इत्यादि प्रत्ययों के परे होने पर 'करोति' धातु को 'का' आदेश विकल्प से होता है, 'आदि' शब्द से 'तुं', 'त्वान', 'त्वा' और 'तब्ब' प्रत्ययों में भी यह आदेश होता है। ‘‘ตทฺธิตสมาสกิตกา นามํวาตเวตุนาทีสุ จา’’ติ เอตฺถ ‘‘อตเว ตุนาทีสู’’ติ นามพฺยปเทสสฺส นิเสธนโต ตทนฺตานํ นิปาตตฺตํ สิทฺธํ ภวติ, ตโต นิปาตตฺตา ตเวตุนมนฺตโต ‘‘สพฺพาสมาวุโส’’ติอาทินา วิภตฺติโลโป. โส ปุญฺญานิ กาตเว อิจฺฉติ, กาตุมิจฺฉติ. ‘‘Taddhitasamāsakitakā nāmaṃvātavetunādīsu cā’’ यहाँ ‘‘atave tunādīsū’’ इस अंश से नाम संज्ञा का निषेध होने से उन (तवे, तुं आदि) प्रत्ययान्तों की निपात संज्ञा सिद्ध होती है, फिर निपात होने के कारण 'तवे' और 'तुं' प्रत्ययान्तों से ‘‘sabbāsamāvuso’’ इत्यादि सूत्र से विभक्ति का लोप हो जाता है। वह 'पुञ्ञानि कातवे इच्छति' (पुण्य करना चाहता है), 'कातुमिच्छति' (करना चाहता है)। กาเทสาภาเว [Pg.391] ‘‘ตุํตุนตพฺเพสุ วา’’ติ รการสฺส ตตฺตํ. กตฺตุํ กาเมตีติ กตฺตุกาโม, อภิสงฺขริตุมากงฺขติ. ตถา สทฺธมฺมํ โสตเว, โสตุํ, สุณิตุํ วา ปตฺเถติ. เอวํ อนุภวิตุํ, ปจิตุํ, คนฺตุํ, คมิตุํ, ขนฺตุํ, ขนิตุํ, หนฺตุํ, หนิตุํ, มนฺตุํ, มนิตุํ, หริตุํ, อนุสฺสริตุมิจฺฉติ, เอตฺถ อิการยุตฺตตมฺหิ ‘‘นมกราน’’มิจฺจาทินา ปฏิสิทฺธตฺตา น ธาตฺวนฺตโลโป. 'का' आदेश के अभाव में ‘‘tuṃtunatabbesu vā’’ सूत्र से 'र' कार को 'त' कार होता है। 'कत्तुं कामेतीति कत्तुकामो' (करने की इच्छा रखने वाला)। 'अभिसङ्खरितुमाकङ्खति' (संस्कारित करना चाहता है)। उसी प्रकार 'सद्धम्मं सोतवे' (सद्धर्म सुनने के लिए), 'सोतुं', या 'सुणितुं पत्थेति' (सुनने की प्रार्थना करता है)। इसी प्रकार 'अनुभवितुं', 'पचितुं', 'गन्तुं', 'गमितुं', 'खन्तुं', 'खनितुं', 'हन्तुं', 'हनितुं', 'मन्तुं', 'मनितुं', 'हरितुं', 'अनुस्सरितुमिच्छति' (अनुस्मरण करना चाहता है), यहाँ 'इ' कार युक्त 'त' होने पर ‘‘namakarāna’’ इत्यादि सूत्र से निषेध होने के कारण धातु के अन्त्य वर्ण का लोप नहीं होता। ตถา ตุทพฺยถเน, ตุทิตุํ, ปวิสิตุํ, อุทฺทิสิภุํ, โหตุํ, สยิภุํ, เนตุํ, ชุโหตุํ, ปชหิตุํ, ปหาตุํ, ทาตุํ. โรทฺธุํ, รุนฺธิตุํ, ตุํตุนาทีสุปิ โยควิภาเคน กตฺตริ วิกรณปฺปจฺจยา, สรโลปาทิ จ. โภตฺตุํ, ภุญฺชิตุํ, เฉตฺตุํ, ฉินฺทิตุํ. สิพฺพิตุํ, โพทฺธุํ, พุชฺฌิตุํ. ชายิตุํ, ชนิตุํ. ปตฺตุํ, ปาปุณิตุํ. เชตุํ, ชินิตุํ, เกตุํ, กิณิตุํ, วินิจฺเฉตุํ, วินิจฺฉินิตุํ, ญาตุํ, ชานิตุํ, คเหตุํ, คณฺหิตุํ. โจเรตุํ, โจรยิตุํ, ปาเลตุํ, ปาลยิตุํ. इसी प्रकार 'तुद' (व्यथा पहुँचाने) में - तुदितुं (व्यथा पहुँचाने के लिए), पविसितुं (प्रवेश करने के लिए), उद्दिसिभुं (उद्देश्य करने के लिए), होतुं (होने के लिए), सयिभुं (सोने के लिए), नेतुं (ले जाने के लिए), जुहोतुं (हवन करने के लिए), पजहितुं (त्यागने के लिए), पहातुं (त्यागने के लिए), दातुं (देने के लिए)। रोद्धुं, रुन्धितुं (रोकने के लिए), 'तुं' और 'तुना' आदि प्रत्ययों में भी योग-विभाग के द्वारा कर्ता में विकरण प्रत्यय और स्वर-लोप आदि होते हैं। भोत्तुं, भुञ्जितुं (खाने के लिए), छेत्तुं, छिन्दितुं (काटने के लिए)। सिब्ब्वितुं (सीने के लिए), बोद्धुं, बुज्झितुं (जानने के लिए)। जायितुं, जनितुं (उत्पन्न होने के लिए)। पत्तुं, पापुणितुं (प्राप्त करने के लिए)। जेतुं, जिनितुं (जीतने के लिए), केतुं, किणितुं (खरीदने के लिए), विनिच्छेतुं, विनिच्छिनितुं (निश्चय करने के लिए), ञातुं, जानितुं (जानने के लिए), गहेतुं, गण्हितुं (पकड़ने के लिए)। चोरेतुं, चोरयितुं (चुराने के लिए), पालेतुं, पालयितुं (पालन करने के लिए)। การิเต ภาเวตุํ, ภาวยิตุํ, กาเรตุํ, การยิตุํ, การาเปตุํ, การาปยิตุมิจฺฉติ อิจฺจาทิ. कारित (प्रेरणार्थक) में - भावेतुं, भावयितुं (भावित करने के लिए), कारेतुं, कारयितुं, कारापेतुं, कारापयितुमिच्छति (कराना चाहता है) इत्यादि। ‘‘ตเวตุํ วา’’ติ โยควิภาเคน กฺริยตฺถกฺริยายญฺจ คมฺมมานายํ ตุํปจฺจโย. ยถา – สุพุทฺธุํ วกฺขามิ, โภตฺตุํ วชติ, โภชนาย วชตีติ อตฺโถ. เอวํ ทฏฺฐุํ คจฺฉติ, คนฺตุมารภติ, คนฺตุํ ปโยชยติ, ทสฺเสตุมาห อิจฺจาทิ. 'तवेतुं वा' इस सूत्र के योग-विभाग से क्रियार्थक क्रिया (प्रयोजन के लिए की जाने वाली क्रिया) के प्रतीत होने पर 'तुं' प्रत्यय होता है। जैसे - सुबुद्धुं वक्खामि (अच्छी तरह समझाने के लिए कहूँगा), भोत्तुं वजति (खाने के लिए जाता है), जिसका अर्थ है 'भोजनाय वजति'। इसी प्रकार दट्टुं गच्छति (देखने के लिए जाता है), गन्तुमारभति (जाने के लिए आरम्भ करता है), गन्तुं पयोजयति (जाने के लिए प्रेरित करता है), दस्सेतुमाह (दिखाने के लिए कहा) इत्यादि। ‘‘ตุ’’มิติ วตฺตเต. 'तुं' की अनुवृत्ति होती है। ๖๓๘. อรหสกฺกาทีสุ จ. ६३८. 'अरह', 'सक्क' आदि के योग में भी। อรหสกฺกภพฺพานุจฺฉวิกานุรูปอิจฺเจวมาทีสฺวตฺเถสุ ปยุชฺชมาเนสุ สพฺพธาตูหิ ตุํปจฺจโย โหติ, จสทฺเทน กาลสมยเวลาทีสุปิ. นินฺท ครหายํ, โก ตํ นินฺทิตุมรหติ[Pg.392], ราชา อรหสิ ภวิตุํ, อรโห ภวํ วตฺตุํ. สกฺกา เชตุํ ธเนน วา, สกฺกา ลทฺธุํ, กาตุํ สกฺขิสฺสติ. ภพฺโพ นิยามํ โอกฺกมิตุํ, อภพฺโพ กาตุํ. อนุจฺฉวิโก ภวํ ทานํ ปฏิคฺคเหตุํ. อิทํ กาตุํ อนุรูปํ. ทานํ ทาตุํ ยุตฺตํ, ทาตุํ วตฺตุญฺจ ลภติ, เอวํ วฏฺฏติ ภาสิตุํ, ฉินฺทิตุํ น จ กปฺปติ อิจฺจาทิ. ตถา กาโล ภุญฺชิตุํ, สมโย ภุญฺชิตุํ, เวลา ภุญฺชิตุํ. अरह (योग्य), सक्क (सक्षम), भब्ब (भव्य/योग्य), अनुच्छविक (अनुरूप), अनुरूप इत्यादि अर्थों के प्रयोग होने पर सभी धातुओं से 'तुं' प्रत्यय होता है, और 'च' शब्द से काल, समय, वेला आदि के योग में भी। निन्दा और गर्हा के अर्थ में - 'को तं निन्दितुमरहति' (उसकी निन्दा करने के योग्य कौन है?), 'राजा अरहसि भवितुं' (आप राजा होने के योग्य हैं), 'अरहो भवं वत्तुं' (आप बोलने के योग्य हैं)। 'सक्का जेतुं धनेन वा' (धन से जीता जा सकता है), 'सक्का लद्धुं' (प्राप्त किया जा सकता है), 'कातुं सक्खिस्सति' (करने में समर्थ होगा)। 'भब्बो नियामं ओक्कमितुं' (नियम में प्रवेश करने के योग्य), 'अभब्बो कातुं' (करने के अयोग्य)। 'अनुच्छविको भवं दानं पटिग्गहेतुं' (आप दान ग्रहण करने के अनुरूप हैं)। 'इदं कातुं अनुरूपं' (यह करने के अनुरूप है)। 'दानं दातुं युत्तं' (दान देना उचित है), 'दातुं वत्तुञ्च लभति' (देने और बोलने का अवसर प्राप्त करता है), इसी प्रकार 'वट्टति भासितुं' (बोलना उचित है), 'छिन्दितुं न च कप्पति' (काटना उचित नहीं है) इत्यादि। इसी प्रकार 'कालो भुञ्जितुं' (खाने का काल है), 'समयो भुञ्जितुं' (खाने का समय है), 'वेला भुञ्जितुं' (खाने की वेला है)। ‘‘ตุ’’มิติ วตฺตเต. 'तुं' की अनुवृत्ति होती है। ๖๓๙. ปตฺตวจเน อลมตฺเถสุ จ. ६३९. 'पत्तवचन' (प्राप्ति के कथन) और 'अलम्' के अर्थों में भी। อลมตฺเถสุ ปตฺตวจเน สติ สพฺพธาตูหิ ตุํปจฺจโย โหติ, อลํสทฺทสฺส อตฺถา อลมตฺถา ภูสนปริยตฺตินิวารณา, เตสุ อลมตฺเถสุ. ปตฺตสฺส วจนํ ปตฺตวจนํ, อลเมว ทานานิ ทาตุํ, อลเมว ปุญฺญานิ กาตุํ, สมฺปตฺตเมว ปริยตฺตเมวาติ อตฺโถ. 'अलम्' के अर्थों में और 'पत्तवचन' होने पर सभी धातुओं से 'तुं' प्रत्यय होता है। 'अलम्' शब्द के अर्थ 'अलमत्थ' हैं - भूषण (सजावट), पर्याप्ति (पर्याप्तता) और निवारण (रोकना); उन 'अलमत्थ' अर्थों में। प्राप्त का कथन 'पत्तवचन' है। 'अलमेव दानानि दातुं' (दान देने के लिए पर्याप्त ही है), 'अलमेव पुञ्ञानि कातुं' (पुण्य करने के लिए पर्याप्त ही है), जिसका अर्थ है 'सम्पत्तमेव' (प्राप्त ही है) या 'परियत्तमेव' (पर्याप्त ही है)। กตฺวา กมฺมํ อคจฺฉิ, คจฺฉติ, คจฺฉิสฺสตีติ วา อตฺเถ – 'कर्म करके गया', 'जाता है', या 'जायेगा' - इस अर्थ में - ๖๔๐. ปุพฺพกาเลกกตฺตุกานํ ตุน ตฺวาน ตฺวา วา. ६४०. पूर्वकाल और एक ही कर्ता होने पर 'तुन', 'त्वान' या 'त्वा' प्रत्यय होते हैं। ปุพฺพกาโลติ ปุพฺพกฺริยา, เอโก กตฺตา เยสํ เต เอกกตฺตุกา, เตสํ เอกกตฺตุกานํ สมานกตฺตุกานํ ธาตูนมนฺตเร ปุพฺพกาเล วตฺตมานธาตุมฺหา ตุน ตฺวาน ตฺวาอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ วา. 'पूर्वकाल' का अर्थ है पूर्व क्रिया। जिनका कर्ता एक ही हो, वे 'एककर्तृक' हैं। उन एककर्तृक (समान कर्ता वाले) धातुओं के मध्य, पूर्वकाल में वर्तमान धातु से 'तुन', 'त्वान' और 'त्वा' ये प्रत्यय विकल्प से होते हैं। วาสทฺทสฺส ววตฺถิตวิภาสตฺตา ตุนปฺปจฺจโย กตฺถจิเยว ภวติ. เต จ กิตสญฺญตฺตา, ‘‘เอกกตฺตุกาน’’นฺติ วุตฺตตฺตา จ กตฺตริเยว ภวนฺติ. ตุเน ‘‘ตเวตุนาทีสุ กา’’ติ กาเทโส, นิปาตตฺตา สิโลโป. โส กาตุน กมฺมํ คจฺฉติ, อกาตุน ปุญฺญํ กิลมิสฺสนฺติ สตฺตา. 'वा' शब्द की व्यवस्थित विभाषा होने के कारण 'तुन' प्रत्यय कहीं-कहीं ही होता है। वे 'कित' संज्ञक होने के कारण और 'एककर्तृक' कहे जाने के कारण कर्ता अर्थ में ही होते हैं। 'तुन' में 'तवेतुनादीसु का' सूत्र से 'का' आदेश होता है, और निपात होने के कारण 'सि' का लोप हो जाता है। 'सो कातुन कम्मं गच्छति' (वह कर्म करके जाता है), 'अकातुन पुञ्ञं किलमिसन्ति सत्ता' (पुण्य न करके प्राणी दुखी होंगे)। ตฺวานตฺวาสุ [Pg.393] ‘‘รกาโร จา’’ติ ธาตฺวนฺตโลโป, กมฺมํ กตฺวาน ภทฺรกํ, ทานาทีนิ ปุญฺญานิ กตฺวา สคฺคํ คจฺฉติ, อภิสงฺขริตฺวา, กริตฺวา. ตถา สิพฺพิตฺวา, ชายิตฺวา, ชนิตฺวา, ธมฺมํ สุตฺวา, สุตฺวาน ธมฺมํ โมทติ, สุณิตฺวา, ปตฺวา, ปาปุณิตฺวา. กิณิตฺวา, เชตฺวา, ชินิตฺวา, ชิตฺวา. โจเรตฺวา, โจรยิตฺวา, ปูเชตฺวา, ปูชยิตฺวา. ตถา เมตฺตํ ภาเวตฺวา, ภาวยิตฺวา, วิหารํ กาเรตฺวา, การยิตฺวา, การาเปตฺวา, การาปยิตฺวา สคฺคํ คมิสฺสนฺติ อิจฺจาทิ. 'त्वान' और 'त्वा' प्रत्ययों में 'रकारो च' सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण का लोप होता है। 'कम्मं कत्वान भद्रकं' (श्रेष्ठ कर्म करके), 'दानादीनि पुञ्ञानि कत्वा सग्गं गच्छति' (दानादि पुण्य करके स्वर्ग जाता है), 'अभिसङ्खरित्वा', 'करित्वा'। इसी प्रकार 'सिब्ब्वित्वा' (सीकर), 'जायित्वा', 'जनित्वा' (उत्पन्न होकर), 'धम्मं सुत्वा', 'सुत्वान धम्मं मोदति' (धर्म सुनकर प्रसन्न होता है), 'सुणित्वा', 'पत्वा', 'पापुणित्वा' (प्राप्त करके)। 'किणित्वा' (खरीदकर), 'जेत्वा', 'जिनित्वा', 'जित्वा' (जीतकर)। 'चोरेत्वा', 'चोरयित्वा' (चुराकर), 'पूजेत्वा', 'पूजयित्वा' (पूजा करके)। इसी प्रकार 'मेत्तं भावेत्वा', 'भावयित्वा' (मैत्री की भावना करके), 'विहारं कारेत्वा', 'कारयित्वा', 'कारापेत्वा', 'कारापयित्वा सग्गं गमिस्सन्ति' (विहार बनवाकर स्वर्ग जायेंगे) इत्यादि। ปุพฺพกาเลติ กิมตฺถํ? ปฐติ, ปจติ. เอกกตฺตุกานนฺติ กึ? ภุตฺเต เทวทตฺเต ยญฺญทตฺโต วชติ. 'पूर्वकाल' क्यों कहा गया? (ताकि) 'पठति, पचति' (पढ़ता है, पकाता है - यहाँ न हो)। 'एककर्तृक' क्यों कहा गया? (ताकि) 'भुत्ते देवदत्ते यञ्ञदत्तो वजति' (देवदत्त के भोजन कर लेने पर यज्ञदत्त जाता है - यहाँ न हो)। ‘‘อปตฺวาน นทึ ปพฺพโต, อติกฺกมฺม ปพฺพตํ นที’’ติอาทีสุ ปน สพฺพตฺถ ‘‘ภวตี’’ติ สมฺพนฺธโต เอกกตฺตุกตา, ปุพฺพกาลตา จ คมฺยเต. 'अपत्वान नदिं पब्बतो' (नदी तक न पहुँचकर पर्वत है), 'अतिक्कम्म पब्बतं नदी' (पर्वत को पार करके नदी है) इत्यादि में तो सर्वत्र 'भवति' (है) के सम्बन्ध से एककर्तृकता और पूर्वकालता समझी जाती है। ‘‘วา’’ติ วตฺตเต. 'वा' की अनुवृत्ति होती है। ๖๔๑. สพฺเพหิ ตุนาทีนํ โย. ६४१. सभी (धातुओं) से 'तुन' आदि प्रत्ययों के स्थान पर 'य' आदेश होता है। สพฺเพหิ โสปสคฺคานุปสคฺเคหิ ธาตูหิ ปเรสํ ตุนาทีนํ ปจฺจยานํ ยสทฺทาเทโส โหติ วา. วนฺท อภิวนฺทเน อภิปุพฺโพ, ตฺวาปจฺจยสฺส โย, อิการาคโม จ, อภิวนฺทิย ภาสิสฺสํ, อภิวนฺทิตฺวา, วนฺทิย, วนฺทิตฺวา. ตถา อภิภุยฺย, ทฺวิตฺตรสฺสตฺตานิ, อภิภวิตฺวา, อภิโภตฺวา. उपसर्ग सहित और उपसर्ग रहित सभी धातुओं से परे 'तुन' आदि प्रत्ययों के स्थान पर 'य' शब्द का आदेश विकल्प से होता है। 'वन्द' (अभिवादन में) 'अभि' उपसर्ग पूर्वक, 'त्वा' प्रत्यय के स्थान पर 'य' और 'इ' कार का आगम होने पर - 'अभिवन्दिय भासिस्सं' (अभिवादन करके कहूँगा), 'अभिवन्दित्वा', 'वन्दिय', 'वन्दित्वा'। इसी प्रकार 'अभिभुय्य' (अभिभूत करके), यहाँ द्वित्व और ह्रस्व हुए हैं, 'अभिभवित्वा', 'अभिभोत्वा'। สิ เสวายํ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อิการสฺส อาตฺตํ, นิสฺสาย, นิสฺสิตฺวา. 'सि' (सेवा में), 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से 'इ' कार को 'आ' होकर - 'निस्साय' (आश्रय लेकर), 'निस्सित्वा'। ภช เสวายํ, ‘‘ตถา กตฺตริ จา’’ติ ปุพฺพรูปตฺตํ, วิภชฺช, วิภชิย, วิภชิตฺวา. 'भज' (सेवा में), 'तथा कत्तरि च' सूत्र से पूर्वरूप होकर - 'विभज्ज' (विभाजित करके), 'विभजिय', 'विभजित्वा'। ทิส [Pg.394] อติสชฺชเน, อุทฺทิสฺส, อุทฺทิสิย, อุทฺทิสิตฺวา. ปวิสฺส, ปวิสิย, ปวิสิตฺวา. 'दिस' (विसर्जन/निर्देश में) - 'उद्दिस' (उद्देश्य करके), 'उद्दिसिय', 'उद्दिसित्वा'। 'पविस्स' (प्रवेश करके), 'पविसिय', 'पविसित्वा'। นี ปาปุณเน, อุปนีย, อุปเนตฺวา. อติเสยฺย, อติสยิตฺวา. โอหาย, โอหิตฺวา, ชหิตฺวา, หิตฺวา. อาทาย, อาทิยิตฺวา, ‘‘ทิวาทิโต โย’’ติ ยปฺปจฺจโย, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ธาตฺวนฺตสฺสิกาโร จ, ทตฺวา, ทตฺวาน. ปิธาย, ปิทหิตฺวา. ภุญฺชิย, ภุญฺชิตฺวา, โภตฺวา. วิเจยฺย, วิจินิตฺวา. วิญฺญาย, วิชานิตฺวา, ญตฺวา. 'नी' (प्राप्त करने में) - 'उपनीय' (पास ले जाकर), 'उपनेत्वा'। 'अतिसेय्य' (अतिशयन करके), 'अतिसयित्वा'। 'ओहाय' (छोड़कर), 'ओहित्वा', 'जहित्वा', 'हित्वा'। 'आदाय' (लेकर), 'आदियित्वा', 'दिवादितो यो' सूत्र से 'य' प्रत्यय और 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से धातु के अन्त्य को 'इ' कार होकर, 'दत्वा', 'दत्वान' (देकर)। 'पिधाय' (ढककर), 'पिदहित्वा'। 'भुञ्जिय' (खाकर), 'भुञ्जित्वा', 'भोत्वा'। 'विचेय्य' (चुनकर), 'विचित्त्वा'। 'विञ्ञाय' (जानकर), 'विजानित्वा', 'ञत्वा'। ‘‘ยถาคมํ, ตุนาทีสู’’ติ จ วตฺตเต. 'यथागमं' और 'तुनादीसु' की अनुवृत्ति होती है। ๖๔๒. ทธนฺตโต โย กฺวจิ. ६४२. 'द' और 'ध' अन्त वाली धातुओं से परे 'तुन' आदि प्रत्ययों में कहीं-कहीं 'य' का आगम होता है। ทการธการนฺเตหิ ธาตูหิ ยถาคมํ ยการาคโม โหติ กฺวจิ ตุนาทีสุ ปจฺจเยสุ. ยวโต ทการสฺส ชกาโร, สมาปชฺชิตฺวา, อุปฺปชฺชิตฺวา, ภิชฺชิตฺวา, ฉิชฺชิตฺวา คโต. พุธ อวคมเน, ‘‘ตถา กตฺตริ จา’’ติ สขาตฺวนฺตสฺส ยการสฺส จวคฺโค, พุชฺฌิย, พุชฺฌิตฺวา. วิรชฺฌิย, วิรชฺฌิตฺวา. รุนฺธิย, รุนฺธิตฺวา. दकार और धकार अन्त वाली धातुओं से 'तुन' आदि प्रत्ययों के होने पर यथागम 'य' कार का आगम कहीं-कहीं होता है। 'य' के कारण दकार का जकार हो जाता है - 'समापज्जित्वा' (समापन्न होकर), 'उप्पज्जित्वा' (उत्पन्न होकर), 'भिज्जित्वा' (टूटकर), 'छिज्जित्वा' (कटकर) गया। 'बुध' (जानने में), 'तथा कत्तरि च' सूत्र से धातु के अन्त्य सहित 'य' कार को च-वर्ग (ज्झ) होकर - 'बुज्झिय' (जानकर), 'बुज्झित्वा'। 'विरज्झिय' (विरक्त होकर), 'विरज्झित्वा'। 'रुन्धिय' (रोककर), 'रुन्धित्वा'। ‘‘ตุนาทีน’’นฺติ อธิกาโร, ‘‘วา’’ติ จ. 'तुनादीनं' का अधिकार है और 'वा' की भी (अनुवृत्ति है)। ๖๔๓. จนนฺเตหิ รจฺจํ. ६४३. ‘च’ और ‘न’ अंत वाली धातुओं से ‘रच्च’ आदेश होता है। จการนการนฺเตหิ ธาตูหิ ปเรสํ ตุนาทีนํ ปจฺจยานํ รจฺจาเทโส โหติ วา, ‘‘รจฺจ’’นฺติ โยควิภาเคน อญฺญสฺมาปิ, ววตฺถิตวิภาสตฺโถยํ วาสทฺโท, ราทิโลโป. วิจ วิเวจเน วิปุพฺโพ, วิวิจฺจ, วิวิจฺจิตฺวา, ‘‘โย กฺวจี’’ติ โยควิภาเคน ยการาคโม. ‘च’ कार और ‘न’ कार अंत वाली धातुओं से परे ‘तुन’ आदि प्रत्ययों के स्थान पर ‘रच्च’ आदेश विकल्प से होता है। ‘रच्च’ इस योग-विभाग से अन्य धातुओं से भी होता है। यहाँ ‘वा’ शब्द व्यवस्थित विभाषा के लिए है। ‘र’ आदि का लोप होता है। ‘वि’ उपसर्ग पूर्वक ‘विच’ (विवेचन अर्थ में) धातु से ‘विविच्च’, ‘विविच्चित्वा’ बनता है। ‘यो क्वचि’ इस योग-विभाग से ‘य’ कार का आगम होता है। ปว ปาเก, ปจฺจ, ปจฺจิย, ปจฺจิตฺวา. วิมุจฺจ, วิมุจฺจิตฺวา. ‘पच’ (पाक अर्थ में) धातु से ‘पच्च’, ‘पच्चिय’, ‘पच्चित्वा’ बनता है। ‘विमुच्च’, ‘विमुच्चित्वा’ (वि-मुच धातु से)। หน [Pg.395] หึสาคตีสุ, อาหจฺจ, อุปหจฺจ, อาหนฺตฺวา, อุปหนฺตฺวา. ‘हन’ (हिंसा और गति अर्थ में) धातु से ‘आहच्च’, ‘उपहच्च’, ‘आहन्त्वा’, ‘उपहन्त्वा’ बनता है। วาติ กึ? อวมญฺญ, อวมญฺญิตฺวา, มนฺตฺวา, นฺยสฺสญกาโร. ‘वा’ (विकल्प) क्यों? ‘अवमञ्ञ’, ‘अवमञ्ञित्वा’, ‘मन्त्वा’। यहाँ ‘न्य’ का ‘ञ’ कार हुआ है। อิ คติมฺหิ, โยควิภาเคน รจฺจาเทโส, ปฏิจฺจ, อเวจฺจ, อุเปจฺจ อุเปตฺวา. กร กรเณ, สกฺกจฺจ, อธิกิจฺจ, อิการาคโม, กริย. ‘इ’ (गति अर्थ में) धातु से योग-विभाग द्वारा ‘रच्च’ आदेश होता है - ‘पटिच्च’, ‘अवेच्च’, ‘उपेच्च’, ‘उपेत्वा’। ‘कर’ (करण अर्थ में) धातु से ‘सक्कच्च’, ‘अधिकिच्च’। ‘इ’ कार का आगम होने पर ‘करिय’ बनता है। ทิส เปกฺขเณ – ‘दिस’ (देखने के अर्थ में) - ๖๔๔. ทิสา สฺวานสฺวานฺตโลโป จ. ६४४. ‘दिस’ धातु से ‘स्वान’, ‘स्वा’ आदेश और अंत का लोप भी होता है। ทิสอิจฺเจตาย ธาตุยา ปเรสํ ตุนาทีนํ ปจฺจยานํ สฺวาน สฺวาอิจฺจาเทสา โหนฺติ วา, ธาตฺวนฺตสฺส โลโป จ. ทิสฺวานสฺส เอตทโหสิ, จกฺขุนา รูปํ ทิสฺวา. ‘दिस’ इस धातु से परे ‘तुन’ आदि प्रत्ययों के स्थान पर ‘स्वान’ और ‘स्वा’ आदेश विकल्प से होते हैं, और धातु के अंत का लोप भी होता है। जैसे - ‘दिस्वानस्स एतदहोसि’ (उसे यह हुआ), ‘चक्खुना रूपं दिस्वा’ (आँख से रूप को देखकर)। วาติ กึ? เนกฺขมฺมํ ทฏฺฐุํ, ทฏฺฐา. ปสฺสิย, ปสฺสิตุน, ปสฺสิตฺวา. ‘वा’ (विकल्प) क्यों? ‘नेक्खम्मं दट्ठुं’, ‘दट्ठा’। ‘पस्सिय’, ‘पस्सितुन’, ‘पस्सित्वा’। อนฺตคฺคหณํ อนฺตโลปคฺคหณญฺจานุวตฺตเต. ‘अन्त’ ग्रहण और ‘अन्तलोप’ ग्रहण की अनुवृत्ति होती है। ๖๔๕. ม ห ท เภหิ มฺม ยฺห ชฺช พฺภ ทฺธา จ. ६४५. ‘म’, ‘ह’, ‘द’, ‘भ’ अंत वाली धातुओं से ‘म्म’, ‘य्ह’, ‘ज्ज’, ‘ब्भ’ और ‘द्धा’ आदेश होते हैं। ม ห ท ภอิจฺเจวมนฺเตหิ ธาตูหิ ปเรสํ ตุนาทีนํ ปจฺจยานํ ยถากฺกมํ มฺม ยฺห ชฺช พฺภ ทฺธาอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ วา, ธาตฺวนฺตโลโป จ. มการนฺเตหิ ตาว อาคมฺม, อาคนฺตฺวา. กมุ ปทวิกฺเขเป, โอกฺกมฺม, โอกฺกมิตฺวา, นิกฺขมฺม, นิกฺขมิตฺวา, อภิรมฺม, อภิรมิตฺวา. ‘म’, ‘ह’, ‘द’, ‘भ’ इन अंत वाली धातुओं से परे ‘तुन’ आदि प्रत्ययों के स्थान पर यथाक्रम ‘म्म’, ‘य्ह’, ‘ज्ज’, ‘ब्भ’, ‘द्धा’ ये आदेश विकल्प से होते हैं, और धातु के अंत का लोप भी होता है। पहले म-कार अंत वाली धातुओं से - ‘आगम्म’, ‘आगन्त्वा’। ‘कमु’ (पदविक्षेप अर्थ में) धातु से ‘ओक्कम्म’, ‘ओक्कमित्वा’, ‘निक्खम्म’, ‘निक्खमित्वा’, ‘अभिरम्म’, ‘अभिरमित्वा’। หการนฺเตหิ ปคฺคยฺห, ปคฺคณฺหิตฺวา, ปคฺคเหตฺวา. มุห เวจิตฺเต, สมฺมุยฺห, สมฺมุยฺหิตฺวา, ยการาคโม, อารุยฺห, อารุหิตฺวา, โอคยฺห, โอคเหตฺวา. ह-कार अंत वाली धातुओं से - ‘पग्गय्ह’, ‘पग्गण्हित्वा’, ‘पग्गहेत्वा’। ‘मुह’ (विचित्तता अर्थ में) धातु से ‘सम्मूय्ह’, ‘सम्मूय्हित्वा’। ‘य’ कार का आगम होने पर ‘आरुय्ह’, ‘आरुहित्वा’, ‘ओगय्ह’, ‘ओगहेत्वा’। ทการนฺเตหิ [Pg.396] อุปฺปชฺช, อุปฺปชฺชิตฺวา, ปมชฺช, ปมชฺชิตฺวา, อุปสมฺปชฺช, อุปสมฺปชฺชิตฺวา. ฉิทิ ทฺวิธากรเณ, อจฺฉิชฺช, ฉิชฺช, ฉิชฺชิตฺวา, ฉินฺทิย, ฉินฺทิตฺวา, เฉตฺวา. द-कार अंत वाली धातुओं से - ‘उप्पज्ज’, ‘उप्पज्जित्वा’, ‘पमज्ज’, ‘पमज्जित्वा’, ‘उपसम्पज्ज’, ‘उपसम्पज्जित्वा’। ‘छिदि’ (दो भाग करने के अर्थ में) धातु से ‘अच्छिज्ज’, ‘छिज्ज’, ‘छिज्जित्वा’, ‘छिन्दिय’, ‘छिन्दित्वा’, ‘छेत्वा’। ภการนฺเตหิ รภ ราภสฺเส, อารพฺภ กเถสิ, อารทฺธา, อารภิตฺวา. ลภ ลาเภ, อุปลพฺภ, อุปลทฺธา, สทฺธํ ปฏิลภิตฺวา ปุญฺญานิ กโรนฺติ อิจฺจาทิ. भ-कार अंत वाली धातुओं से - ‘रभ’ (आरम्भ अर्थ में) धातु से ‘आरब्भ कथेसि’, ‘आरद्धा’, ‘आरभित्वा’। ‘लभ’ (लाभ अर्थ में) धातु से ‘उपलब्भ’, ‘उपलद्धा’, ‘सद्धं पटिलभित्वा पुञ्ञानि करोन्ति’ इत्यादि। ตเวตุนาทิปฺปจฺจยนฺตนโย. ‘तवे’, ‘तुन’ आदि प्रत्ययान्त का नियम समाप्त हुआ। วตฺตมานกาลิกมานนฺตปฺปจฺจยนฺตนย वर्तमानकालिक ‘मान’ और ‘अन्त’ प्रत्ययान्त का नियम। ๖๔๖. วตฺตมาเน มานนฺตา. ६४६. वर्तमान काल में ‘मान’ और ‘अन्त’ प्रत्यय होते हैं। อารทฺโธ อปริสมตฺโต อตฺโถ วตฺตมาโน, ตสฺมึ วตฺตมาเน กาเล คมฺมมาเน สพฺพธาตูหิ มานอนฺตอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. เต จ กิตสญฺญตฺตา ‘‘กตฺตริ กิต’’ติ กตฺตริ ภวนฺติ. आरब्ध (शुरू किया हुआ) किन्तु अपरिसमाप्त (अपूर्ण) अर्थ ‘वर्तमान’ कहलाता है। उस वर्तमान काल के प्रतीत होने पर सभी धातुओं से ‘मान’ और ‘अन्त’ ये प्रत्यय होते हैं। वे ‘कित’ (कृत्) संज्ञक होने के कारण ‘कत्तरि कित’ सूत्र से कर्ता अर्थ में होते हैं। อนฺตมานปฺปจฺจยานญฺเจตฺถ ‘‘ปรสมญฺญาปโยเค’’ติ ปรสมญฺญาวเสน ปรสฺสปทตฺตโนปทสญฺญตฺตา ตฺยาทีสุ วิย อนฺตมาเนสุ จ วิกรณปฺปจฺจยา ภวนฺติ. यहाँ ‘अन्त’ और ‘मान’ प्रत्ययों के विषय में ‘परसमञ्ञापयोगे’ सूत्र से पर-संज्ञा के वश में परस्मैपद और आत्मनेपद संज्ञा होने के कारण, ‘ति’ आदि के समान ‘अन्त’ और ‘मान’ प्रत्ययों में भी विकरण प्रत्यय होते हैं। เตเนว มานปฺปจฺจโย ‘‘อตฺตโนปทานิ ภาเว จ กมฺมนี’’ติ ภาวกมฺเมสุปิ โหติ, ตสฺส จ ‘‘อตฺตโนปทานิ ปรสฺสปทตฺต’’นฺติ กฺวจิ อนฺตปฺปจฺจยาเทโส จ. इसी कारण ‘मान’ प्रत्यय ‘अत्तनओपदानि भावे च कम्मनि’ सूत्र से भाव और कर्म अर्थ में भी होता है, और उसका ‘अत्तनओपदानि परस्सपदत्तं’ सूत्र से कहीं-कहीं ‘अन्त’ प्रत्यय आदेश भी होता है। คมุ, สปฺป คติมฺหิ, คจฺฉตีติ อตฺเถ อนฺตปฺปจฺจโย, ‘‘ภูวาทิโต อ’’อิติ อปฺปจฺจโย, ‘‘คมิสฺสนฺโต จฺโฉ วา สพฺพาสู’’ติ ธาตฺวนฺตสฺส จฺฉาเทโส, สรโลปาทิ, นามพฺยปเทเส สฺยาทฺยุปฺปตฺติ. คจฺฉนฺต สิ อิตีธ ‘‘วา’’ติ วตฺตมาเน ‘‘สิมฺหิ คจฺฉนฺตาทีนํ นฺตสทฺโท อํ’’ อิติ นฺตสฺส อมาเทโส. ‘गमु’, ‘सप्प’ (गति अर्थ में) धातु से ‘गच्छति’ इस अर्थ में ‘अन्त’ प्रत्यय, ‘भूवादितो अ’ से ‘अ’ प्रत्यय, ‘गमिसन्तो च्छो वा सब्बासू’ से धातु के अंत को ‘च्छ’ आदेश, स्वर-लोप आदि होकर नाम संज्ञा होने पर ‘सि’ आदि की उत्पत्ति होती है। ‘गच्छन्त + सि’ यहाँ ‘वा’ की अनुवृत्ति होने पर ‘सिम्हि गच्छन्तादीनं न्तसद्दो अं’ सूत्र से ‘न्त’ को ‘अं’ आदेश होता है। วาสทฺทสฺส [Pg.397] ววตฺถิภวิภาสตฺตา เอกาโรการปรสฺส น ภวติ, สรโลปาทิ, โส ปุริโส คจฺฉํ, คจฺฉนฺโต คณฺหาติ, เสสํ คุณวนฺตุสมํ. ‘वा’ शब्द के व्यवस्थित विभाषा होने के कारण ‘ए’ कार और ‘ओ’ कार के परे होने पर यह नहीं होता है। स्वर-लोप आदि होकर ‘सो पुरिसो गच्छं’, ‘गच्छन्तो गण्हाति’ बनता है। शेष ‘गुणवन्तु’ शब्द के समान है। อิตฺถิยํ ‘‘นทาทิโต วา อี’’ติ อีปจฺจโย, ‘‘เสเสสุ นฺตุวา’’ติ นฺตุพฺยปเทเส ‘‘วา’’ติ อธิกิจฺจ ‘‘นฺตุสฺส ตมีกาเร’’ติ ตกาเร สรโลปสิโลปา, สา กญฺญา คจฺฉตี, คจฺฉนฺตี อิจฺจาทิ อิตฺถิสมํ. स्त्रीलिंग में ‘नदादितो वा ई’ सूत्र से ‘ई’ प्रत्यय होता है। ‘सेसेसु न्तुवा’ सूत्र से ‘न्तु’ संज्ञा होने पर ‘वा’ के अधिकार में ‘न्तुस्स तमीकारे’ सूत्र से ‘त’ कार होने पर स्वर-लोप और ‘सि’ का लोप होता है। ‘सा कञ्ञा गच्छती’, ‘गच्छन्ती’ इत्यादि ‘इत्थी’ शब्द के समान हैं। นปุํสเก ปุเร วิย นฺตสฺส อมาเทโส, ตํ จิตฺตํ คจฺฉํ, คจฺฉนฺตํ, คจฺฉนฺตานิ อิจฺจาทิ ปุลฺลิงฺคสมํ. नपुंसक लिंग में पहले के समान ‘न्त’ को ‘अं’ आदेश होता है - ‘तं चित्तं गच्छं’, ‘गच्छन्तं’, ‘गच्छन्तानि’ इत्यादि पुल्लिंग के समान हैं। ตถา คจฺฉตีติ อตฺเถ มานปฺปจฺจโย, จฺฉาเทสาทิ จ, โส คจฺฉมาโน คณฺหาติ, เต คจฺฉมานา อิจฺจาทิ ปุริสสทฺทสมํ. สา คจฺฉมานา, ตา คจฺฉมานาโย อิจฺจาทิ กญฺญาสทฺทสมํ. ตํ คจฺฉมานํ, ตานิ คจฺฉมานานิ อิจฺจาทิ จิตฺตสทฺทสมํ. उसी प्रकार ‘गच्छति’ इस अर्थ में ‘मान’ प्रत्यय, ‘च्छ’ आदेश आदि होने पर ‘सो गच्छमानो गण्हाति’, ‘ते गच्छमाना’ इत्यादि ‘पुरिस’ शब्द के समान हैं। ‘सा गच्छमाना’, ‘ता गच्छमानायो’ इत्यादि ‘कञ्ञा’ शब्द के समान हैं। ‘तं गच्छमानं’, ‘तानि गच्छमानानि’ इत्यादि ‘चित्त’ शब्द के समान हैं। คจฺฉียตีติ อตฺเถ ‘‘อตฺตโนปทานิ ภาเว จ กมฺมนี’’ติ กมฺมนิ มานปฺปจฺจโย, ‘‘ภาวกมฺเมสุ โย’’ติ ยปฺปจฺจโย, ‘‘อิวณฺณาคโม วา’’ติ อิการาคโม, จฺฉาเทโส, โส เตน คจฺฉิยมาโน, สา คจฺฉิยมานา, ตํ คจฺฉิยมานํ. ‘गच्छीयति’ इस अर्थ में ‘अत्तनओपदानि भावे च कम्मनि’ सूत्र से कर्म अर्थ में ‘मान’ प्रत्यय, ‘भावकम्मेसु यो’ से ‘य’ प्रत्यय, ‘इवण्णागमो वा’ से ‘इ’ कार का आगम और ‘च्छ’ आदेश होने पर ‘सो तेन गच्छियमानो’, ‘सा गच्छियमाना’, ‘तं गच्छियमानं’ बनता है। จฺฉาเทสาภาเว ‘‘ปุพฺพรูปญฺจา’’ติ ยการสฺส มกาโร, ธมฺโม อธิคมฺมมาโน หิตาย ภวติ, อธิคมฺมมานา, อธิคมฺมมานํ. ‘च्छ’ आदेश के अभाव में ‘पुब्बरूपञ्च’ सूत्र से ‘य’ कार का ‘म’ कार (द्वित्व) होने पर ‘धम्मो अधिगम्ममानो हिताय भवति’, ‘अधिगम्ममाना’, ‘अधिगम्ममानं’ बनता है। ตถา มห ปูชายํ, มหตีติ มหํ, มหนฺโต, มหตี, มหนฺตี, มหํ, มหนฺตํ, มหมาโน, มหมานา, มหมานํ. กมฺมนิ ‘‘ยมฺหิ ทาธามาฐาหาปา มห มถาทีนมี’’อิติ ธาตฺวนฺตสฺส อการสฺส อีกาโร, มหียมาโน, มหียมานา, มหียมานํ. उसी प्रकार ‘मह’ (पूजा अर्थ में) धातु से ‘महति’ इस अर्थ में ‘महं’, ‘महन्तो’, ‘महती’, ‘महन्ती’, ‘महं’, ‘महन्तं’, ‘महमानो’, ‘महमाना’, ‘महमानं’ बनता है। कर्म अर्थ में ‘यम्हि दाधामाठाहापा मह मथादीनमी’ सूत्र से धातु के अंत ‘अ’ कार को ‘ई’ कार होने पर ‘महीयमानो’, ‘महीयमाना’, ‘महीयमानं’ बनता है। เอวํ [Pg.398] จรตีติ จรํ, จรตี, จรนฺตี, จรนฺตํ, จรมาโน, จริยมาโน, ปจตีติ ปจํ, ปจตี, ปจนฺตี, ปจนฺตํ, ปจมาโน, ปจฺจมาโน, ‘‘ตสฺส จวคฺค’’อิจฺจาทินา จวคฺคตฺตํ, ทฺวิตฺตญฺจ. इस प्रकार 'चरति' (चलता है) से चरं, चरती, चरन्ती, चरन्तं, चरमानो, चरियामानो बनते हैं। 'पचति' (पकाता है) से पचं, पचती, पचन्ती, पचन्तं, पचमानो, पच्चमानो बनते हैं। 'तस्स चवग्ग' इत्यादि सूत्रों से च-वर्ग (तालव्यीकरण) और द्वित्व होता है। ภู สตฺตายํ, ภวตีติ อตฺเถ อนฺตปฺปจฺจโย, อปฺปจฺจยวุทฺธิอวาเทสาทิ, โส ภวํ, ภวนฺโต. อิตฺถิยํ อีปจฺจโย, ‘‘ภวโต โภโต’’ติ โภตาเทโส, โภตี, โภตี, โภติโย. นปุํสเก ภวํ, ภวนฺตํ, ภวนฺตานิ, อภิภวมาโน. ภาเว ภูยมานํ. กมฺมนิ อภิภูยมาโน. 'भू' सत्ता (होने) के अर्थ में है। 'भवति' इस अर्थ में 'अन्त' प्रत्यय, 'अ' प्रत्यय, वृद्धि और 'अव' आदेश आदि होते हैं, वह 'भवं', 'भवन्तो' बनता है। स्त्रीलिंग में 'ई' प्रत्यय होता है, 'भवतो भोतो' सूत्र से 'भोत' आदेश होकर 'भोती', 'भोती', 'भोतियो' बनते हैं। नपुंसक लिंग में 'भवं', 'भवन्तं', 'भवन्तानि' और 'अभिभवमानो' होते हैं। भाववाच्य में 'भूयमानं' और कर्मवाच्य में 'अभिभूयमानो' होता है। ชร วโยหานิมฺหิ, ‘‘ชร มราน’’นฺติอาทินา ชีร ชียฺยาเทสา, ชีรตีติ ชีรํ, ชีรนฺตี, ชีรนฺตํ, ชีรมาโน, ชีรียมาโน, ชียํ, ชียนฺตี, ชียนฺตํ, ชียมาโน, ชียฺยมาโน. 'जर' आयु की हानि (वृद्धावस्था) के अर्थ में है। 'जर मरानं' इत्यादि सूत्रों से 'जीर' और 'जीय्य' आदेश होते हैं। 'जीरति' से जीरं, जीरन्ती, जीरन्तं, जीरमानो, जीरियामानो, जीयं, जीयन्ती, जीयन्तं, जीयमानो, जीय्यमानो बनते हैं। มร ปาณจาเค, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา เอกสฺส ยการสฺส โลโป, มรตีติ มียํ, มียนฺตี, มียนฺตํ, มียมาโน, มียฺยมาโน, มรํ, มรนฺตี, มรนฺตํ, มรมาโน, มรียมาโน. ลภํ, ลภนฺตี, ลภนฺตํ, ลภมาโน, ลพฺภมาโน. วหํ, วหนฺตี, วหนฺตํ, วหมาโน, วุยฺหมาโน. ‘‘อิสุยมูนมนฺโต จฺโฉ วา’’ติ จฺฉาเทโส, อิจฺฉตีติ อิจฺฉํ, อิจฺฉนฺตี, อิจฺฉนฺตํ, อิจฺฉมาโน, อิจฺฉียมาโน, อิสฺสมาโน. 'मर' प्राण त्यागने के अर्थ में है। 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से एक यकार का लोप होता है। 'मरति' से मीयं, मीयन्ती, मीयन्तं, मीयमानो, मीय्यमानो, मरं, मरन्ती, मरन्तं, मरमानो, मरियामानो बनते हैं। 'लभं', 'लभन्ती', 'लभन्तं', 'लभमानो', 'लब्भमानो'। 'वहं', 'वहन्ती', 'वहन्तं', 'वहमानो', 'वुय्हमानो'। 'इसुयमूनमन्तो च्छो वा' सूत्र से 'च्छ' आदेश होता है, 'इच्छति' से इच्छं, इच्छन्ती, इच्छन्तं, इच्छमानो, इच्छियामानो, इस्समानो बनते हैं। ‘‘ทิสสฺส ปสฺสทิสฺสทกฺขา วา’’ติ ปสฺส ทิสฺส ทกฺขาเทสา, ปสฺสตีติ ปสฺสํ, ปสฺสนฺตี, ปสฺสนฺตํ, ปสฺสมาโน, วิปสฺสียมาโน, ทิสฺสมาโน, ทิสฺสนฺโต, มานสฺส อนฺตาเทโส, ทิสฺสํ, ทิสฺสนฺตี, ทิสฺสนฺตํ, ทกฺขํ, ทกฺขนฺตี, ทกฺขนฺตํ, ทกฺขมาโน ทกฺขิยมาโน อิจฺจาทิ. 'दिसस्स पस्सदिस्सदक्खा वा' सूत्र से पस्स, दिस्स और दक्ख आदेश होते हैं। 'पस्सति' से पस्सं, पस्सन्ती, पस्सन्तं, पस्समानो, विपस्सियामानो, दिस्समानो, दिस्सन्तो (मान के स्थान पर अन्त आदेश), दिस्सं, दिस्सन्ती, दिस्सन्तं, दक्खं, दक्खन्ती, दक्खन्तं, दक्खमानो, दक्खियमानो इत्यादि बनते हैं। ตุท พฺยถเน, ตุทตีติ ตุทํ, ตุทนฺตี, ตุทนฺตํ, ตุทมาโน, ตุชฺชมาโน. ปวิสตีติ ปวิสํ, ปวิสนฺตี, ปวิสนฺตํ, ปวิสมาโน, ปวิสียมาโน อิจฺจาทิ. 'तुद' व्यथा (पीड़ा) देने के अर्थ में है। 'तुदति' से तुदं, तुदन्ती, तुदन्तं, तुदमानो, तुज्जमानो बनते हैं। 'पविसति' से पविसं, पविसन्ती, पविसन्तं, पविसमानो, पविसियामानो इत्यादि बनते हैं। หู, [Pg.399] ภู สตฺตายํ, อปฺปจฺจยโลโป, ปโหตีติ ปโหนฺโต, ปโหนฺตี, ปโหนฺตํ, ปหูยมานํ เตน. เสตีติ เสนฺโต, เสนฺตี, เสนฺตํ, เสมาโน, สยํ, สยนฺตี, สยนฺตํ, สยมาโน, สยาโน วา, มานสฺส อานาเทโส, อติสียมาโน. 'हू' और 'भू' सत्ता (होने) के अर्थ में हैं। 'अ' प्रत्यय का लोप होता है। 'पहोति' से पहोन्तो, पहोन्ती, पहोन्तं और उसके द्वारा 'पहूयमानं' बनता है। 'सेति' (सोता है) से सेन्तो, सेन्ती, सेन्तं, सेमानो, सयं, सयन्ती, सयन्तं, सयमानो या सयानो (मान के स्थान पर आन आदेश), अतिसीयमानो बनते हैं। อส สพฺภาเว, ‘‘สพฺพตฺถาสสฺสาทิโลโป จา’’ติ อการสฺส โลโป, อตฺถีติ สํ, สนฺโต, สตี, สนฺตี, สนฺตํ, สมาโน, สมานา, สมานํ. 'अस' सद्भाव (होने) के अर्थ में है। 'सब्बत्थासस्सादिलोपो चा' सूत्र से अकार का लोप होता है। 'अत्थि' से सं, सन्तो, सती, सन्ती, सन्तं, समानो, समाना, समानं बनते हैं। ฐา คตินิวตฺติมฺหิ, ‘‘วา’’ติ วตฺตมาเน ‘‘ฐา ติฏฺโฐ’’ติ ติฏฺฐาเทโส, ติฏฺฐํ, ติฏฺฐนฺตี, ติฏฺฐนฺตํ, ติฏฺฐมาโน. ติฏฺฐาภาเว ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ฐาโต หการาคโม, รสฺสตฺตญฺจ, อุปฏฺฐหํ, อุปฏฺฐหนฺตี, อุปฏฺฐหนฺตํ, อุปฏฺฐหมาโน. ฐียมานํ เตน, อุปฏฺฐียมาโน, อุปฏฺฐหียมาโน. 'ठा' गति की निवृत्ति (रुकने) के अर्थ में है। 'वा' सूत्र से वर्तमान काल में 'ठा तिट्ठो' सूत्र द्वारा 'तिट्ठ' आदेश होता है—तिट्ठं, तिट्ठन्ती, तिट्ठन्तं, तिट्ठमानो। 'तिट्ठ' आदेश न होने पर 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से 'ठा' के बाद हकार का आगम और ह्रस्व होता है—उपट्ठहं, उपट्ठहन्ती, उपट्ठहन्तं, उपट्ठहमानो। उसके द्वारा 'ठीयमानं', 'उपट्ठीयमानो', 'उपट्ठहीयमानो' बनते हैं। ปา ปาเน, ‘‘ปา ปิโพ’’ติ ปิพาเทโส, ปิพตีติ ปิพํ, ปิพนฺตี, ปิพนฺตํ, ปิพมาโน, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา พการสฺส วตฺตํ, ปิวํ, ปิวนฺตี, ปิวนฺตํ, ปิวมาโน, ปียมาโน, ปียมานา, ปียมานํ อิจฺจาทิ. 'पा' पीने के अर्थ में है। 'पा पिबो' सूत्र से 'पिब' आदेश होता है। 'पिबति' से पिबं, पिबन्ती, पिबन्तं, पिबमानो बनते हैं। 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से बकार का वकार हो जाता है—पिवं, पिवन्ती, पिवन्तं, पिवमानो, पीयमानो, पीयमाना, पीयमानं इत्यादि। หุ ทานาทนหพฺยปฺปทาเนสุ, อปฺปจฺจเย ปุเร วิย ทฺวิภาวาทิ, ชุโหตีติ ชุหํ, ชุหนฺตี, ชุหนฺตํ, ชุหมาโน, หูยมาโน. เอวํ ชหํ, ชหนฺตี, ชหนฺตํ, ชหมาโน, ชหียมาโน. ททาตีติ ททํ, ททนฺตี, ททนฺตํ, ททมาโน, ทฺวิตฺตาภาเว ทานํ เทนฺโต, เทนฺตี, เทนฺตํ, ทียมาโน. 'हु' दान, आदान और हव्य प्रदान करने के अर्थ में है। 'अ' प्रत्यय होने पर पहले की तरह द्वित्व आदि होते हैं। 'जुहोति' से जुहं, जुहन्ती, जुहन्तं, जुहमानो, हूयमानो बनते हैं। इसी प्रकार जहं, जहन्ती, जहन्तं, जहमानो, जहीयमानो बनते हैं। 'ददाति' से ददं, ददन्ती, ददन्तं, ददमानो और द्वित्व न होने पर दान के अर्थ में देन्तो, देन्ती, देन्तं, दीयमानो बनते हैं। รุธิ อาวรเณ, ‘‘รุธาทิโต นิคฺคหีตปุพฺพญฺจา’’ติ อปฺปจฺจยนิคฺคหีตาคมา, รุนฺธตีติ รุนฺธํ, รุนฺธนฺตี, รุนฺธนฺตํ, รุนฺธมาโน, รุชฺฌมาโน. ภุญฺชตีติ ภุญฺชํ, ภุญฺชนฺตี, ภุญฺชนฺตํ, ภุญฺชมาโน, ภุชฺชมาโน อิจฺจาทิ. 'रुधि' आवरण (रोकने) के अर्थ में है। 'रुधादितो निग्गहीतपुब्बञ्चा' सूत्र से 'अ' प्रत्यय और निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम होता है। 'रुन्धति' से रुन्धं, रुन्धन्ती, रुन्धन्तं, रुन्धमानो, रुज्झमानो बनते हैं। 'भुञ्जति' से भुञ्जं, भुञ्जन्ती, भुञ्जन्तं, भुञ्जमानो, भुज्जमानो इत्यादि बनते हैं। ทิวุ [Pg.400] กีฬายํ, ‘‘ทิวาทิโต โย’’ติ ยปฺปจฺจโย, ‘‘ตถา กตฺตริ จา’’ติ ปุพฺพรูปตฺตํ, พตฺตญฺจ, ทิพฺพตีติ ทิพฺพํ, ทิพฺพนฺตี, ทิพฺพนฺตํ, ทิพฺพมาโน. เอวํ พุชฺฌตีติ พุชฺฌํ, พุชฺฌนฺโต, พุชฺฌมาโน, จวคฺคาเทโส. ชนี ปาตุภาเว, ‘‘ชนาทีนมา’’ติ โยควิภาเคน อาตฺตํ, ชายตีติ ชายํ, ชายมาโน, ชญฺญมาโน. 'दिवु' क्रीड़ा (खेलने) के अर्थ में है। 'दिवादितो यो' सूत्र से 'य' प्रत्यय होता है। 'तथा कत्तरि चा' सूत्र से पूर्वरूप और बकार होता है। 'दिब्बति' से दिब्बं, दिब्बन्ती, दिब्बन्तं, दिब्बमानो बनते हैं। इसी प्रकार 'बुज्झति' से बुज्झं, बुज्झन्तो, बुज्झमानो और च-वर्ग आदेश होता है। 'जनी' प्रादुर्भाव (उत्पन्न होने) के अर्थ में है। 'जनादीनमा' सूत्र के योग-विभाग से आकार (आत्त) होता है। 'जायति' से जायं, जायमानो, जञ्ञमानो बनते हैं। สุ สวเณ, ‘‘สฺวาทิโต’’ติอาทินา ณุ ณา อุณา จ, สุณาตีติ สุณํ, สุณนฺโต, สุณมาโน, สูยมาโน, สุยฺยมาโน. ปาปุณาตีติ ปาปุณํ, ปาปุณมาโน, ปาปียมาโน. 'सु' श्रवण (सुनने) के अर्थ में है। 'स्वाधितो' इत्यादि सूत्र से 'णु', 'णा' और 'उणा' प्रत्यय होते हैं। 'सुणाति' से सुणं, सुणन्तो, सुणमानो, सूयमानो, सुय्यमानो बनते हैं। 'पापुणाति' से पापुणं, पापुणमानो, पापीयमानो बनते हैं। ‘‘กิยาทิโต นา’’ติ นา, รสฺสตฺตํ, กิณาตีติ กิณํ, กีณมาโน, กียมาโน. วินิจฺฉินาตีติ วินิจฺฉินํ, วินิจฺฉินมาโน, วินิจฺฉียมาโน, จินํ, จียมาโน. ชานาตีติ ชานํ, ชานมาโน, ชาเทโส, ญายมาโน. คณฺหาตีติ คณฺหํ, คณฺหมาโน, คยฺหมาโน. 'कियादितो ना' सूत्र से 'ना' प्रत्यय और ह्रस्व होता है। 'किणाति' से किणं, कीणमानो, कीयमानो बनते हैं। 'विनिच्छिनाति' से विनिच्छिनं, विनिच्छिनमानो, विनिच्छीयमानो, चिनं, चीयमानो बनते हैं। 'जानाति' से जानं, जानमानो, 'जा' आदेश और न्यायमानो बनते हैं। 'गण्हाति' से गण्हं, गण्हमानो, गय्हमानो बनते हैं। กร กรเณ, กโรตีติ อตฺเถ ‘‘วตฺตมาเน มานนฺตา’’ติ อนฺตปฺปจฺจโย, ‘‘ตนาทิโต โอยิรา’’ติ โอ, ‘‘ตสฺส วา’’ติ อธิกิจฺจ ‘‘อุตฺตโมกาโร’’ติ อุตฺตํ, ‘‘กรสฺสากาโร จา’’ติ อการสฺสุกาโร. ‘‘ยวการา จา’’ติ สเร อุการสฺส วตฺตํ, ทฺวิตฺตํ, ‘‘โพ วสฺสา’’ติ พการทฺวยญฺจ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา รโลโป, โส กุพฺพํ, กุพฺพนฺโต, กุพฺพตี, กุพฺพนฺตี, กุพฺพนฺตํ. อุตฺตาภาเว – กมฺมํ กโรนฺโต, กโรนฺตี, กโรนฺตํ. มาเน – อุตฺตทฺวยํ, กุรุมาโน, กุรุมานา, กุรุมานํ, กุพฺพาโน วา. กมฺมนิ กยิรมาโน, กรียมาโน วา อิจฺจาทิ. 'कर' करने के अर्थ में है। 'करोति' इस अर्थ में 'वत्तमाने मानन्ता' सूत्र से 'अन्त' प्रत्यय, 'तनादितो ओयिरा' से 'ओ', 'तस्स वा' के अधिकार में 'उत्तमओकारो' से 'उत्त' (उ-कार), और 'करस्साकारो चा' से अकार का उकार होता है। 'यवकारा चा' सूत्र से स्वर परे होने पर उकार का वकार, द्वित्व और 'बो वस्सा' से दो बकार होते हैं। 'क्वचि धातू' इत्यादि सूत्र से र-कार का लोप होता है, जिससे कुब्बं, कुब्बन्तो, कुब्बती, कुब्बन्ती, कुब्बन्तं बनते हैं। उ-कार न होने पर—कम्मं करोन्तो, करोन्ती, करोन्तं। 'मान' प्रत्यय में—दो बार उ-कार होकर कुरुमानो, कुरुमाना, कुरुमानं या कुब्बानो बनते हैं। कर्मवाच्य में कयिरमानो या करीयमानो इत्यादि बनते हैं। จุร เถยฺเย, ‘‘จุราทิโต’’ติอาทินา เณ ณยา, โจเรตีติ โจเรนฺโต, โจเรนฺตี, โจเรนฺตํ, โจรยํ, โจรยตี, โจรยนฺตํ, โจรยมาโน, โจรียมาโน. ปาเลตีติ ปาเลนฺโต, ปาเลนฺตี, ปาเลนฺตํ, ปาลยํ, ปาลยนฺตี, ปาลยนฺตํ, ปาลยมาโน, ปาลียมาโน อิจฺจาทิ. 'चुर' चोरी के अर्थ में, 'चुरादितो' आदि सूत्रों से 'णे' और 'णय' प्रत्यय होते हैं; 'चोरेति' (चोरी करता है) से 'चोरेन्तो', 'चोरेन्ती', 'चोरेन्तं', 'चोरयं', 'चोरयती', 'चोरयन्तं', 'चोरयमानो', 'चोरीयमानो'। 'पालेति' (पालन करता है) से 'पालेन्तो', 'पालेन्ती', 'पालेन्तं', 'पालयं', 'पालयन्ती', 'पालयन्तं', 'पालयमानो', 'पालीयमानो' इत्यादि। การิเต [Pg.401] ภาเวตีติ ภาเวนฺโต, ภาเวนฺตี, ภาเวนฺตํ, ภาวยํ, ภาวยนฺตี, ภาวยนฺตํ, ภาวยมาโน, ภาวียมาโน. กาเรตีติ กาโรนฺโต, กาเรนฺตี, กาเรนฺตํ, การยํ, การยนฺตี, การยนฺตํ, การยมาโน, การียมาโน, การาเปนฺโต, การาเปนฺตี, การาเปนฺตํ, การาปยํ, การาปยนฺตี, การาปยนฺตํ, การาปยมาโน, การาปียมาโน อิจฺจาทิ. कारित (प्रेरणार्थक) में 'भावेति' से 'भावेन्तो', 'भावेन्ती', 'भावेन्तं', 'भावयं', 'भावयन्ती', 'भावयन्तं', 'भावयमानो', 'भावीयमानो'। 'कारेति' (करवाता है) से 'कारोन्तो', 'कारेन्ती', 'कारेन्तं', 'कारयं', 'कारयन्ती', 'कारयन्तं', 'कारयमानो', 'कारीयमानो', 'कारापेन्तो', 'कारापेन्ती', 'कारापेन्तं', 'कारापयं', 'कारापयन्ती', 'कारापयन्तं', 'कारापयमानो', 'कारापीयमानो' इत्यादि। วตฺตมานกาลิกมานนฺตปฺปจฺจยนฺตนโย. वर्तमानकालिक 'मान' और 'अन्त' प्रत्ययों का नियम। อนาคตกาลิกปฺปจฺจยนฺตนย भविष्यत्कालिक प्रत्ययों का नियम। ‘‘กาเล’’ติ อธิกาโร. ''काले'' (काल में) का अधिकार है। ๖๔๗. ภวิสฺสติ คมาทีหิ ณี ฆิณ. ६४७. भविष्यत् काल में 'गम' आदि धातुओं से 'णी' और 'घिण' प्रत्यय होते हैं। ภวิสฺสติ กาเล คมฺมมาเน คมาทีหิ ธาตูหิ ณี ฆิณอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. ณการา วุทฺธตฺถา. อายติ คมนํ สีลมสฺสาติ อตฺเถ ณี, วุทฺธิณโลปา. คามี, คามิโน, อาคามี กาโล. ฆิณปจฺจเย – ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ฆโลโป, คามํ คามิ, คามี, คามโย. भविष्यत् काल के प्रतीत होने पर 'गम' आदि धातुओं से 'णी' और 'घिण' ये प्रत्यय होते हैं। 'ण' कार वृद्धि के लिए है। 'भविष्य में जाना जिसका स्वभाव है' इस अर्थ में 'णी' प्रत्यय, वृद्धि और 'ण' का लोप होता है। 'गामी', 'गामिनो', 'आगामी कालो' (आगामी काल)। 'घिण' प्रत्यय होने पर - 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'घ' का लोप होकर 'गामं गामि', 'गामी', 'गामयों' बनते हैं। ภช เสวายํ, อายติ ภชิตุํ สีลมสฺสาติ ภาชี, ภาชิ, ‘‘น กคตฺตํ จชา’’ติ โยควิภาเคน นิเสธนโต ‘‘สจชานํ กคา ณานุพนฺเธ’’ติ คตฺตํ น ภวติ. 'भज' सेवा के अर्थ में, 'भविष्य में सेवा करना जिसका स्वभाव है' इस अर्थ में 'भाजी', 'भाजि'। 'न कगत्तं चजा' इस योग-विभाग द्वारा निषेध होने से 'सचजानं कगा णानुबन्धे' सूत्र से 'ग' कार (क-वर्ग) नहीं होता है। สุ คติมฺหิ, การิเต วุทฺธิอาวาเทสา จ, อายติ ปสฺสวิตุํ สีลมสฺสาติ ปสฺสาวี, ปสฺสาวิ. อายติ ปฏฺฐานํ สีลมสฺสาติ ปฏฺฐายี, ปฏฺฐายิ, ‘‘อาการนฺตานมาโย’’ติ อายาเทโส. ‘सु’ (धातु) गति के अर्थ में है, णिच् (प्रेरणार्थक) होने पर वृद्धि और ‘आव्’ आदेश होते हैं। भविष्य में प्रसव (उत्पन्न) करना जिसका स्वभाव है, वह ‘पस्सावी’ (passāvī) या ‘पस्सावि’ (passāvi) है। भविष्य में प्रस्थान करना जिसका स्वभाव है, वह ‘पट्ठायी’ (paṭṭhāyī) या ‘पट्ठायि’ (paṭṭhāyi) है, यहाँ ‘आकारान्तानामायो’ सूत्र से ‘आय’ आदेश हुआ है। ‘‘ภวิสฺสตี’’ติ อธิกาโร. ‘भविस्सति’ (भविष्य काल में) यह अधिकार सूत्र है। ๖๔๘. กิริยายํ [Pg.402] ณฺวุตโว. ६४८. क्रिया के अर्थ में ‘ण्वु’ और ‘तु’ प्रत्यय होते हैं। กิริยายํ กิริยตฺถายํ คมฺมมานายํ ธาตูหิ ณฺวุตุอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ ภวิสฺสติ กาเล. ณฺวุมฺหิ – ณโลปวุทฺธิอกาเทสา, กริสฺสํ วชตีติ การโก วชติ. क्रिया के लिए क्रिया (निमित्तार्थक क्रिया) के प्रतीत होने पर धातुओं से भविष्य काल में ‘ण्वु’ और ‘तु’ ये प्रत्यय होते हैं। ‘ण्वु’ प्रत्यय होने पर— ‘ण’ का लोप, वृद्धि और ‘अक’ आदेश होते हैं; जैसे— ‘करिस्सं वजति’ (करने के लिए जाता है) इस अर्थ में ‘कारको वजति’ (कर्ता जाता है) बनता है। ตุมฺหิ – ‘‘กรสฺส จ ตตฺตํ ตุสฺมิ’’นฺติ ตกาโร, เสสํ กตฺตุสมํ, กตฺตา วชติ, กตฺตุํ วชตีติ อตฺโถ. เอวํ ปจิสฺสํ วชตีติ ปาจโก วชติ, ปจิตา วชติ. ภุญฺชิสฺสํ วชตีติ ภุญฺชโก วชติ, โภตฺตา วชติ อิจฺจาทิ. ‘तु’ प्रत्यय होने पर— ‘करस्स च तत्तं तुस्मिं’ सूत्र से ‘त’कार होता है, शेष ‘कत्तु’ (कर्ता) के समान होता है; ‘कत्ता वजति’ (कर्ता जाता है), इसका अर्थ ‘कत्तुं वजति’ (करने के लिए जाता है) है। इसी प्रकार ‘पचिस्सं वजति’ (पकाने के लिए जाता है) इस अर्थ में ‘पाचको वजति’ या ‘पचिता वजति’ होता है। ‘भुञ्जिस्सं वजति’ (खाने के लिए जाता है) इस अर्थ में ‘भुञ्जको वजति’ या ‘भोत्ता वजति’ आदि होते हैं। ๖๔๙. กมฺมนิ โณ. ६४९. कर्म उपपद होने पर ‘ण’ प्रत्यय होता है। กมฺมสฺมึ อุปปเท ธาตูหิ ณปฺปจฺจโย โหติ ภวิสฺสติ กาเล ณโลปวุทฺธี. นครํ กริสฺสตีติ นครกาโร วชติ. ลู เฉทเน, สาลึ ลวิสฺสตีติ สาลิลาโว วชติ. วป พีชสนฺตาเน, ธญฺญํ วปิสฺสตีติ ธญฺญวาโป วชติ. โภคํ ททิสฺสตีติ โภคทาโย วชติ, สินฺธุํ ปิวิสฺสตีติ สินฺธุปาโย วชติ อิจฺจาทิ. कर्म के उपपद होने पर धातुओं से भविष्य काल में ‘ण’ प्रत्यय होता है, ‘ण’ का लोप और वृद्धि होती है। ‘नगरं करिस्सति’ (नगर बनाएगा) इस अर्थ में ‘नगरकारो वजति’ (नगर बनाने वाला जाता है)। ‘लू’ (छेदने के अर्थ में), ‘सालिं लविस्सति’ (शालि काटेगा) इस अर्थ में ‘शालिलावो वजति’। ‘वप’ (बीज बोने के अर्थ में), ‘धञ्ञं वपिस्सति’ (धान्य बोएगा) इस अर्थ में ‘धञ्ञवापो वजति’। ‘भोगं ददिस्सति’ (भोग देगा) इस अर्थ में ‘भोगदायो वजति’, ‘सिन्धुं पिविस्सति’ (सिंधु पिएगा) इस अर्थ में ‘सिन्धुपायो वजति’ आदि। ‘‘กมฺมนี’’ติ วตฺตเต. ‘कम्मनि’ (कर्म में) इसकी अनुवृत्ति होती है। ๖๕๐. เสเส สฺสํ นฺตุ มานานา. ६५०. शेष (असमाप्त अर्थ) में ‘स्सं’, ‘न्तु’, ‘मान’ और ‘आन’ प्रत्यय होते हैं। กมฺมสฺมึ อุปปเท เสเส อปริสมตฺตตฺเถ ธาตูหิ สฺสํนฺตุ มาน อานอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ ภวิสฺสติ กาเล คมฺมมาเน, เต จ กิตกตฺตา กตฺตริ ภวนฺติ. กมฺมํ กริสฺสตีติ อตฺเถ สฺสํปจฺจโย, อิการาคโม, สิโลโป, กมฺมํ กริสฺสํ วชติ, สาเปกฺขตฺตา น สมาโส. นฺตุปจฺจเย ‘‘ตนาทิโต โอยิรา’’ติ โอ, ‘‘สิมฺหิ วา’’ติ นฺตฺว’นฺตสฺส อตฺตํ, กมฺมํ กริสฺสตีติ กมฺมํ กโรนฺโต วชติ อิจฺจาทิ คุณวนฺตุสมํ. कर्म के उपपद होने पर शेष असमाप्त अर्थ में धातुओं से भविष्य काल के प्रतीत होने पर ‘स्सं’, ‘न्तु’, ‘मान’ और ‘आन’ ये प्रत्यय होते हैं, और वे कृत् होने के कारण कर्ता अर्थ में होते हैं। ‘कम्मं करिस्सति’ (काम करेगा) इस अर्थ में ‘स्सं’ प्रत्यय, ‘इ’कार का आगम और ‘सि’ का लोप होकर ‘कम्मं करिस्सं वजति’ बनता है, सापेक्ष होने के कारण यहाँ समास नहीं होता। ‘न्तु’ प्रत्यय होने पर ‘तनादितो ओयिरा’ सूत्र से ‘ओ’, ‘सिम्हि वा’ सूत्र से ‘न्तु’ के अन्त को ‘अ’त्व होता है; ‘कम्मं करिस्सति’ इस अर्थ में ‘कम्मं करन्तो वजति’ आदि ‘गुणवन्तु’ के समान होते हैं। อถ [Pg.403] วา ‘‘ภวิสฺสติ คมาทีหิ ณี ฆิณ’’ติ เอตฺถ ‘‘ภวิสฺสตี’’ติ วจนโต ‘‘สฺสนฺตุ’’อิติ เอโกว ปจฺจโย ทฏฺฐพฺโพ, ตโต ‘‘สิมฺหิ วา’’ติ อตฺตํ, ‘‘นฺตสทฺโท อ’’มิติโยควิภาเคน อมาเทโส, สิโลโป, กริสฺสํ กริสฺสนฺโต, กริสฺสนฺตา, กริสฺสนฺตํ, กริสฺสนฺเต, กริสฺสตา กริสฺสนฺเตน, กริสฺสนฺเตหิ, กริสฺสโต กริสฺสนฺตสฺส, กริสฺสตํ กริสฺสนฺตานํ, กริสฺสตา, กริสฺสนฺเตหิ, กริสฺสโต กริสฺสนฺตสฺส, กริสฺสตํ กริสฺสนฺตานํ, กริสฺสติ กริสฺสนฺเต, กริสฺสนฺเตสูติอาทิ คุณวนฺตุสทิสํ เนยฺยํ. अथवा ‘भविस्सति गमादीहि णी घिण’ यहाँ ‘भविस्सति’ वचन से ‘स्सन्तु’ यह एक ही प्रत्यय देखना चाहिए, उसके बाद ‘सिम्हि वा’ से ‘अ’त्व, ‘न्तु-शब्दो अं’ इस योग-विभाग से ‘अं’ आदेश और ‘सि’ का लोप होकर— ‘करिस्सं’, ‘करिस्सन्तो’, ‘करिस्सन्ता’, ‘करिस्सन्तं’, ‘करिस्सन्ते’, ‘करिस्सता/करिस्सन्तेन’, ‘करिस्सन्तेहि’, ‘करिस्सतो/करिस्सन्तस्स’, ‘करिस्सतं/करिस्सन्तानं’, ‘करिस्सता’, ‘करिस्सन्तेहि’, ‘करिस्सतो/करिस्सन्तस्स’, ‘करिस्सतं/करिस्सन्तानं’, ‘करिस्सति/करिस्सन्ते’, ‘करिस्सन्तेसु’ आदि ‘गुणवन्तु’ के समान समझना चाहिए। มานมฺหิ – โอการาการานํ อุตฺตํ, กมฺมํ กริสฺสตีติ กมฺมํ กุรุมาโน, กมฺมํ กราโน วชติ. เอวํ โภชนํ ภุญฺชิสฺสํ วชติ, โภชนํ ภุญฺชนฺโต, ภุญฺชมาโน, ภุญฺชาโน วชติ. ‘मान’ प्रत्यय होने पर— ‘ओ’कार और ‘अ’कार को ‘उ’त्व होता है; ‘कम्मं करिस्सति’ इस अर्थ में ‘कम्मं कुरुमानो’ या ‘कम्मं करानो वजति’ होता है। इसी प्रकार ‘भोजनं भुञ्जिस्सं वजति’, ‘भोजनं भुञ्जन्तो’, ‘भुञ्जमानो’, ‘भुञ्जानो वजति’ होता है। สพฺพตฺถ กตฺตริ นฺตุมาเนสุ สกสกวิกรณปฺปจฺจโย กาตพฺโพ. कर्ता अर्थ में ‘न्तु’ और ‘मान’ प्रत्ययों के होने पर सर्वत्र अपने-अपने विकरण प्रत्यय लगाने चाहिए। ขาทนํ ขาทิสฺสตีติ ขาทนํ ขาทิสฺสํ วชติ, ขาทนํ ขาทนฺโต, ขาทนํ ขาทมาโน, ขาทนํ ขาทาโน วชติ. มคฺคํ จริสฺสตีติ มคฺคํ จริสฺสํ, มคฺคํ จรนฺโต, มคฺคํ จรมาโน, มคฺคํ จราโน วชติ. ภิกฺข อายาจเน, ภิกฺขํ ภิกฺขิสฺสตีติ ภิกฺขํ ภิกฺขิสฺสํ จรติ, ภิกฺขํ ภิกฺขนฺโต, ภิกฺขํ ภิกฺขมาโน, ภิกฺขํ ภิกฺขาโน จรติ อิจฺจาทิ. ‘खादनं खादिस्सति’ (खाद्य खाएगा) इस अर्थ में ‘खादनं खादिस्सं वजति’, ‘खादनं खादन्तो’, ‘खादनं खादमानो’, ‘खादनं खादानो वजति’ होता है। ‘मग्गं चरिस्सति’ (मार्ग पर चलेगा) इस अर्थ में ‘मग्गं चरिस्सं’, ‘मग्गं चरन्तो’, ‘मग्गं चरमानो’, ‘मग्गं चरानो वजति’ होता है। ‘भिक्ख’ (याचना के अर्थ में), ‘भिक्खं भिक्खिस्सति’ (भिक्षा माँगेगा) इस अर्थ में ‘भिक्खं भिक्खिस्सं चरति’, ‘भिक्खं भिक्खन्तो’, ‘भिक्खं भिक्खमानो’, ‘भिक्खं भिक्खानो चरति’ आदि। อนาคตกาลิกปฺปจฺจยนฺตนโย. भविष्यकालिक प्रत्ययों की विधि समाप्त हुई। อุณาทิปฺปจฺจยนฺตนย उणादि प्रत्ययों की विधि। อถ อุณาทโย วุจฺจนฺเต. अब उणादि प्रत्यय कहे जाते हैं। ‘‘ธาตุยา’’ติ อธิกาโร. ‘धातुया’ (धातु से) यह अधिकार सूत्र है। ๖๕๑. [Pg.404] กาเล วตฺตมานาตีเต ณฺวาทโย. ६५१. वर्तमान और अतीत काल में ‘ण्वु’ आदि प्रत्यय होते हैं। อตีเต กาเล, วตฺตมาเน จ คมฺมมาเน ธาตูหิ ณุปฺปจฺจโย โหติ. อาทิสทฺเทน ยุ กฺต มิอิจฺจาทโย จ โหนฺติ. अतीत काल और वर्तमान काल के प्रतीत होने पर धातुओं से ‘णु’ प्रत्यय होता है। ‘आदि’ शब्द से ‘यु’, ‘क्त’, ‘मि’ आदि भी होते हैं। กร กรเณ, อกาสิ, กโรตีติ วา อตฺเถ ณุปฺปจฺจโย, ณโลโป, วุทฺธิ, การุ สิปฺปี, การู การโว. วา คติคนฺธเนสุ, อวายิ, วายตีติ วา วายุ, อายาเทโส. สท อสฺสาทเน, อสฺสาทียตีติ สาทุ. ราธ, สาธ สํสิทฺธิมฺหิ, สาธียติ อเนน หิตนฺติ สาธุ. พนฺธ พนฺธเน, อตฺตนิ ปรํ พนฺธตีติ พนฺธุ. จกฺข วิยตฺติยํ วาจายํ, จกฺขตีติ จกฺขุ. อิ คติมฺหิ, เอนฺติ คจฺฉนฺติ ปวตฺตนฺติ สตฺตา เอเตนาติ อายุ. ทร วิทารเณ, ทรียตีติ ทารุ กฏฺฐํ. สนุ ทาเน. สโนตีติ สานุ ปพฺพเตกเทโส. ชนียตีติ ชานุ ชงฺฆาสนฺธิ. จรียตีติ จารุ ทสฺสนีโย. รห จาเค, รหียตีติ ราหุ อสุรินฺโท. ตร ตรเณ, ตาลุ, โล รสฺส. 'कृ' (kara) धातु 'करण' (करने) के अर्थ में है, 'अकासि' (उसने किया) या 'करोति' (वह करता है) इस अर्थ में 'णु' प्रत्यय, 'ण' का लोप, और वृद्धि होकर 'कारु' (शिल्पी) बनता है, बहुवचन में 'कारू' या 'कारवो'। 'वा' धातु 'गति' और 'गन्ध' के अर्थ में है, 'अवायि' या 'वायति' (बहता है) इस अर्थ में 'वायु' बनता है, यहाँ 'आय' आदेश होता है। 'सद' धातु 'आस्वादन' के अर्थ में है, जिसका आस्वादन किया जाए वह 'सादु' (स्वादिष्ट) है। 'राध' और 'साध' धातु 'संसिद्धि' (सिद्धि) के अर्थ में हैं, जिससे हित सिद्ध होता है वह 'साधु' है। 'बन्ध' धातु 'बन्धन' के अर्थ में है, जो स्वयं को दूसरों से बाँधता है वह 'बन्धु' है। 'चक्ख' धातु 'स्पष्ट वाणी' के अर्थ में है, जो देखता/बोलता है वह 'चक्खु' (चक्षु) है। 'इ' धातु 'गति' के अर्थ में है, जिससे प्राणी जाते हैं या प्रवृत्त होते हैं वह 'आयु' है। 'दर' धातु 'विदारण' (फाड़ने) के अर्थ में है, जो विदीर्ण किया जाता है वह 'दारु' (लकड़ी) है। 'सनु' धातु 'दान' के अर्थ में है, जो दान देता है या ऊँचा है वह 'सानु' (पर्वत का एक भाग) है। जिससे जन्म होता है वह 'जानु' (घुटने का जोड़) है। जो चलने योग्य या देखने योग्य है वह 'चारु' (सुन्दर) है। 'रह' धातु 'त्याग' के अर्थ में है, जो त्यागा जाता है वह 'राहु' (असुरराज) है। 'तर' धातु 'तरण' (पार करने) के अर्थ में है, जिससे पार किया जाए वह 'तालु' है, यहाँ 'र' को 'ल' आदेश होता है। มราทีนํ ปเนตฺถ ณุมฺหิ ‘‘ฆฏาทีนํ วา’’ติ เอตฺถ วาสทฺเทน น วุทฺธิ, มรุ, ตรุ, ตนุ, ธนุ, หนุ, มนุ, อสุ, วสุ, วฏุ, ครุ อิจฺจาทิ. यहाँ 'मर' आदि धातुओं में 'णु' प्रत्यय होने पर 'घटादीनं वा' सूत्र के 'वा' शब्द से वृद्धि नहीं होती है, जैसे— मरु, तरु, तनु, धनु, हनु, मनु, असु, वसु, वटु, गरु इत्यादि। จทิ หิลาทเน, ยุปฺปจฺจโย, ‘‘นุทาทีหิ ยุณฺวูนมนานนากานนกา สการิเตหิ จา’’ติ อนาเทโส, นิคฺคหีตาคโม จ, จนฺทนํ. ภวติ เอตฺถาติ ภุวนํ, ‘‘ฌลานมิยุวาสเร วา’’ติ อุวาเทโส. กิร วิกฺเขเป, กิรโณ. วิจกฺขโณ, กมฺปนํ กโรตีติ กรุณา, อการสฺสุตฺตํ. 'चदि' धातु 'ह्लादन' (प्रसन्नता) के अर्थ में है, 'यु' प्रत्यय, 'नुदादीहि युण्वूनमनाननाकाननका सकारितेहि चा' सूत्र से 'अन' आदेश और निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम होकर 'चन्दनं' बनता है। जहाँ (प्राणी) होते हैं वह 'भुवनं' है, यहाँ 'झलानमियुवासरे वा' सूत्र से 'उव' आदेश होता है। 'किर' धातु 'विक्षेप' (फैलाने) के अर्थ में है, जिससे 'किरणो' बनता है। 'विचक्खणो' (विद्वान), जो कम्पन (करुणा) करता है वह 'करुणा' है, यहाँ 'अ' कार का 'उ' कार हो जाता है। กฺตปฺปจฺจเย [Pg.405] – กโลโป, อภวิ, ภวตีติ วา ภูตํ ยกฺขาทิ, ภูตานิ. วายตีติ วาโต, ตายตีติ ตาโต. มิมฺหิ – ภวนฺติ เอตฺถาติ ภูมิ, เนตีติ เนมิ อิจฺจาทิ. 'क्त' प्रत्यय होने पर— 'क' का लोप होता है, 'अभावि' या 'भवति' इस अर्थ में 'भूतं' (यक्ष आदि) या 'भूतानि' (प्राणी) बनता है। 'वायति' (बहती है) इस अर्थ में 'वातो' (वायु), 'तायति' (रक्षा करता है) इस अर्थ में 'तातो' (पिता) बनता है। 'मि' प्रत्यय होने पर— जहाँ (प्राणी) होते हैं वह 'भूमि', जो ले जाता है वह 'नेमि' इत्यादि। ๖๕๒. ขฺยาทีหิ มน ม จ โต วา. ६५२. 'ख्या' आदि धातुओं से 'मन' प्रत्यय होता है और 'म' को 'त' विकल्प से होता है। ขี ภี สุ รุ หุ วา ธู หิ ลูปี อทอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ มนปจฺจโย โหติ, มสฺส จ โต โหติ วา. खी, भी, सु, रु, हु, वा, धू, हि, लू, पी, अद इत्यादि धातुओं से 'मन' प्रत्यय होता है, और 'म' के स्थान पर विकल्प से 'त' होता है। อทธาตุปรสฺเสว, มการสฺส ตการตา; ตทญฺญโต น โหตายํ, ววตฺถิตวิภาสโต. केवल 'अद' धातु के बाद आने वाले 'म' कार को 'त' कार होता है; व्यवस्थित विभाषा के कारण अन्य धातुओं के बाद यह नहीं होता है। ขี ขเย, ขียนฺติ เอตฺถ อุปทฺทวุปสคฺคาทโยติ อตฺเถ มนปจฺจโย, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา นโลโป, ‘‘อญฺเญสุ จา’’ติ วุทฺธิ, เขโม. ตถา ภี ภเย, ภายนฺติ เอตสฺมาติ ภีโม, วาธิการโต น วุทฺธิ. สุ อภิสเว, สวตีติ โสโม. รุ คติมฺหิ, โรโม. หุ ทานาทนหพฺยปฺปทาเนสุ, หูยตีติ โหโม. วา คติคนฺธเนสุ, วาโม. ธู กมฺปเน, ธุนาตีติ ธูโม. หิ คติมฺหิ, หิโนตีติ เหโม. ลู เฉทเน, ลูยตีติ โลโม. ปี ตปฺปเน, ปีณนํ เปโม. อท ภกฺขเณ, อทตีติ อตฺเถ มน, มสฺส จ วา ตกาโร, ‘‘โต ทสฺสา’’ติ ตกาโร, อตฺตา, อาตุมา, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อทสฺส ทีโฆ, อุการาคโม จ. ยา ปาปเณ, ยาโม. 'खी' धातु 'क्षय' के अर्थ में है, जहाँ उपद्रव और उपसर्ग आदि क्षीण होते हैं, इस अर्थ में 'मन' प्रत्यय, 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'न' का लोप, 'अञ्ञेसु चा' से वृद्धि होकर 'खेमो' (क्षेम) बनता है। उसी प्रकार 'भी' धातु 'भय' के अर्थ में है, जिससे डरते हैं वह 'भीमो' है, 'वा' के अधिकार से यहाँ वृद्धि नहीं होती। 'सु' धातु 'अभिषव' (निचोड़ने/उत्पन्न करने) के अर्थ में है, जो बहता है वह 'सोमो' है। 'रु' धातु 'गति' के अर्थ में है, जिससे 'रोमो' बनता है। 'हु' धातु 'दान, ग्रहण और हवन' के अर्थ में है, जो हवन किया जाता है वह 'होमो' है। 'वा' धातु 'गति' और 'गन्ध' के अर्थ में है, जिससे 'वामो' बनता है। 'धू' धातु 'कम्पन' के अर्थ में है, जो काँपता है (धुआँ) वह 'धूमो' है। 'हि' धातु 'गति' के अर्थ में है, जो जाता है वह 'हेमो' (स्वर्ण) है। 'लू' धातु 'छेदन' के अर्थ में है, जो काटा जाता है वह 'लोमो' (रोम) है। 'पी' धातु 'तर्पण' (तृप्त करने) के अर्थ में है, जो तृप्त करता है वह 'पेमो' (प्रेम) है। 'अद' धातु 'भक्षण' के अर्थ में है, जो खाता है इस अर्थ में 'मन' प्रत्यय, 'म' को विकल्प से 'त' कार, 'तो दस्सा' सूत्र से 'त' कार होकर 'अत्ता' (आत्मा) और 'आतुमा' बनता है, 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'अद' के 'अ' को दीर्घ और 'उ' कार का आगम होता है। 'या' धातु 'प्रापण' (पहुँचने) के अर्थ में है, जिससे 'यामो' बनता है। ‘‘วา’’ติ วตฺตมาเน – 'वा' (विकल्प से) की अनुवृत्ति होने पर— ๖๕๓. สมาทิหิ ถมา. ६५३. 'सम' आदि धातुओं से 'थ' और 'म' प्रत्यय होते हैं। สมทมทร รห ลป วส ยุ ทุ หิ สิ ทา สา ฐา ภส พหอุสุอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ถ มอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ วา. सम, दम, दर, रह, लप, वस, यु, दु, हि, सि, दा, सा, ठा, भस, बह, उसु इत्यादि धातुओं से 'थ' और 'म' ये प्रत्यय विकल्प से होते हैं। สม [Pg.406] อุปสเม, กฺวจิคฺคหณาธิการา น ธาตฺวนฺตโลโป, กิเลเส สเมตีติ สมโถ สมาธิ. เอวํ ทมนํ ทมโถ. ทร ทาเห, ทรณํ ทรโถ ปริทาโห. รห อุปาทาเน, รหียตีติ รโถ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา หโลโป. สป อกฺโกเส, สปนํ สปโถ. วส นิวาเส, อาวสนฺติ เอตสฺมินฺติ อาวสโถ. ยุ มิสฺสเน, ยูโถ, ทีโฆ. ทุ คติวุทฺธิมฺหิ, ทวติ วฑฺฒตีติ ทุโม. หิโนตีติ หิโม อุสฺสาโว. สิ พนฺธเน, สียตีติ สีมา, ทีโฆ. ทา อวขณฺฑเน, ทาโม. สา สามตฺเถ, สาโม. ฐา คตินิวตฺติมฺหิ, ถาโม, ฐสฺส ถตฺตํ. ภส ภสฺมีกรเณ, ภสฺมา, พฺรหฺมาทิตฺตา ‘‘สฺยา จา’’ติ อาตฺตํ. พห วุทฺธิมฺหิ, พฺรหฺมา, นิปาตนโต พฺโร พสฺส. อุสุ ทาเห, อุสฺมา อิจฺจาทิ. 'सम' धातु 'उपशम' (शान्त होने) के अर्थ में है, 'क्वचि' ग्रहण के अधिकार से धातु के अन्त्य वर्ण का लोप नहीं होता, जो क्लेशों को शान्त करता है वह 'समथो' (शमथ) या 'समाधि' है। इसी प्रकार दमन करना 'दमथो' है। 'दर' धातु 'दाह' के अर्थ में है, जलना 'दरथो' (पर दाह) है। 'रह' धातु 'उपादान' (ग्रहण) के अर्थ में है, जो ग्रहण किया जाता है वह 'रथो' है, 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'ह' का लोप होता है। 'सप' धातु 'आक्रोश' (गाली देने) के अर्थ में है, शाप देना 'सपथो' (शपथ) है। 'वस' धातु 'निवास' के अर्थ में है, जिसमें निवास करते हैं वह 'आवसथो' है। 'यु' धातु 'मिश्रण' के अर्थ में है, जिससे 'यूथो' (झुण्ड) बनता है, यहाँ दीर्घ होता है। 'दु' धातु 'गति' और 'वृद्धि' के अर्थ में है, जो दौड़ता या बढ़ता है वह 'दुमो' (वृक्ष) है। 'हि' धातु से 'हिमो' (ओस/बर्फ) बनता है। 'सि' धातु 'बन्धन' के अर्थ में है, जिससे बाँधा जाता है वह 'सीमा' है, यहाँ दीर्घ होता है। 'दा' धातु 'अवखण्डन' (टुकड़े करने) के अर्थ में है, जिससे 'दामो' (रस्सी) बनता है। 'सा' धातु 'सामर्थ्य' के अर्थ में है, जिससे 'सामो' बनता है। 'ठा' धातु 'गति निवृत्ति' (रुकने) के अर्थ में है, जिससे 'थामो' (शक्ति) बनता है, 'ठ' को 'थ' होता है। 'भस' धातु 'भस्मीकरण' के अर्थ में है, जिससे 'भस्मा' बनता है, 'ब्रह्मादि' गण में होने से 'स्या चा' सूत्र से 'आ' कार होता है। 'बह' धातु 'वृद्धि' के अर्थ में है, जिससे 'ब्रह्मा' बनता है, निपातन से 'ब' को 'ब्र' आदेश होता है। 'उसु' धातु 'दाह' के अर्थ में है, जिससे 'उस्मा' (ऊष्मा) इत्यादि बनते हैं। ๖๕๔. มสุสฺส สุสฺส จฺฉ ร จฺเฉรา. ६५४. 'मसु' धातु के 'सु' के स्थान पर 'च्छर' और 'च्छेर' आदेश होते हैं। มสุอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส สุสฺส จฺฉรจฺเฉรอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ. มสุ มจฺเฉเร, กฺวิปฺปจฺจโย, จฺฉรจฺเฉราเทสา, มจฺฉโร, มจฺเฉโร. 'मसु' इस धातु के 'सु' के स्थान पर 'च्छर' और 'च्छेर' ये आदेश होते हैं। 'मसु' धातु 'मात्सर्य' (ईर्ष्या) के अर्थ में है, 'क्वि' प्रत्यय, 'च्छर' और 'च्छेर' आदेश होकर 'मच्छरो' और 'मच्छेरो' (मत्सर) बनते हैं। ‘‘จฺฉร จฺเฉรา’’ติ วตฺตเต. 'च्छर' और 'च्छेर' की अनुवृत्ति होती है। ๖๕๕. อาปุพฺพจรสฺส จ. ६५५. 'आ' उपसर्ग पूर्वक 'चर' धातु के स्थान पर भी 'च्छर' और 'च्छेर' आदेश होते हैं, और 'च' शब्द से 'च्छरिय' आदेश भी होता है। อาปุพฺพสฺส จรอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส จฺฉรจฺเฉราเทสา โหนฺติ, จสทฺเทน จฺฉริยาเทโส จ. ภุโส จรณนฺติ อตฺเถ กฺวิปฺปจฺจโย, จฺฉริยาทิอาเทโส, รสฺสตฺตญฺจ. อจฺฉริยํ[Pg.407], อจฺฉรํ, อจฺเฉรํ. อจฺฉรํ ปหริตุํ ยุตฺตนฺติปิ อจฺฉริยํ. 'आ' उपसर्ग पूर्वक 'चर' इस धातु के स्थान पर 'च्छर' और 'च्छेर' आदेश होते हैं, और 'च' शब्द से 'च्छरिय' आदेश भी होता है। 'अत्यधिक आचरण' इस अर्थ में 'क्वि' प्रत्यय, 'च्छरिय' आदि आदेश और ह्रस्व होकर 'अच्छरियं', 'अच्छरं', 'अच्छेरं' (आश्चर्य) बनते हैं। 'अंगुली बजाने (अच्छरा) के योग्य' को भी 'अच्छरियं' कहते हैं। ๖๕๖. อล กล สเลหิ ลยา. ६५६. अल, कल और सल धातुओं से 'ल' और 'य' प्रत्यय होते हैं। อล กล สล อิจฺเจเตหิ ธาตูหิ ล ยอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. อล ปริสมตฺติมฺหิ, อลฺลํ, อลฺยํ. กล สงฺขฺยาเน, กลฺลํ, กลฺยํ. สล, หุล, ปท คติมฺหิ, สลฺลํ, สลฺยํ. अल, कल और सल धातुओं से 'ल' और 'य' ये प्रत्यय होते हैं। 'अल' धातु 'परिसमाप्ति' के अर्थ में है, जिससे 'अल्लं' और 'अल्यं' बनते हैं। 'कल' धातु 'संख्यान' (गिनने) के अर्थ में है, जिससे 'कल्लं' और 'कल्यं' बनते हैं। 'सल', 'हुल' और 'पद' धातु 'गति' के अर्थ में हैं, जिनसे 'सल्लं' और 'सल्यं' बनते हैं। ‘‘กล สเลหี’’ติ วตฺตเต. 'कल' और 'सल' की अनुवृत्ति होती है। ๖๕๗. ยาณ ลาณา. ६५७. 'याण' और 'लाण' प्रत्यय होते हैं। เตหิ กล สลอิจฺเจเตหิ ธาตูหิ ยาณ ลาณปฺปจฺจยา โหนฺติ. กลฺยาณํ, ปฏิสลฺยาณํ, กลฺลาโณ, ปฏิสลฺลาโณ. ยทา ปน ลี สิเลสเนติ ธาตุ, ตทา ‘‘ปฏิสลฺลยนํ, ปฏิสลฺลาณ’’นฺติ ยุปฺปจฺจเยน สิทฺธํ, อุปสคฺคนฺตสฺส นิคฺคหีตสฺส ลตฺตํ, รหาทิปรตฺตา นสฺส ณตฺตํ, เอการสฺส ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อตฺตญฺจ. उन 'कल' और 'सल' धातुओं से 'याण' और 'लाण' प्रत्यय होते हैं। जैसे— कल्याणं, पटिसल्याणं, कल्लाणो, पटिसल्लाणो। जब 'ली' (श्लेषण/चिपकना) धातु होती है, तब 'पटिसल्लयनं' और 'पटिसल्लाणं' शब्द 'यु' प्रत्यय से सिद्ध होते हैं, यहाँ उपसर्ग के अन्त में स्थित निग्गहीत को 'ल' होता है, 'र' और 'ह' आदि के बाद होने से 'न' को 'ण' होता है, और 'ए' कार को 'क्वचि धातू' आदि सूत्र से 'अ' कार होता है। ๖๕๘. มถิสฺส ถสฺส โล จ. ६५८. 'मथ' धातु के 'थ' के स्थान पर 'ल' आदेश होता है और 'च' शब्द से 'ल' प्रत्यय भी होता है। มถอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส ถสฺส ลาเทโส โหติ, จสทฺเทน ลปฺปจฺจโย, มถ วิโลฬเน, มลฺโล, โส เอว มลฺลโก, ยถา หีนโก. 'मथ' इस धातु के 'थ' के स्थान पर 'ल' आदेश होता है, और 'च' शब्द से 'ल' प्रत्यय होता है। 'मथ' धातु 'विलोडन' (मथने) के अर्थ में है, जिससे 'मल्लो' (मल्ल) बनता है, वही 'मल्लको' भी है, जैसे 'हीनको'। ‘‘กิจฺจา’’ติ วตฺตเต. 'किच्च' (कृत्य प्रत्यय) की अनुवृत्ति होती है। ๖๕๙. อวสฺสกาธมิเณสุ ณี จ. ६५९. 'आवश्यक' और 'अधमर्ण' (ऋणी) के अर्थ में 'णी' प्रत्यय भी होता है। อวสฺสก อธมิณอิจฺเจเตสฺวตฺเถสุ, ณีปจฺจโย โหติ, กิจฺจา จาติ ณีปจฺจโย, ณโลป วุทฺธิสิโลปา, อวสฺสํ [Pg.408] เม กมฺมํ กาตุํ ยุตฺโตสีติ การีสิ เม กมฺมํ อวสฺสํ, การิโน เม กมฺมํ อวสฺสํ, หารีสิ เม ภารํ อวสฺสํ. ‘अवश्यक’ (अनिवार्यता) और ‘अधमर्ण’ (ऋणी) इन अर्थों में ‘णी’ प्रत्यय होता है। ‘किच्चा’ सूत्र से भी ‘णी’ प्रत्यय होता है, जिसमें ‘ण’ का लोप, वृद्धि और ‘सि’ का लोप होता है। “तुम्हें मेरा कार्य अवश्य करना चाहिए” इस अर्थ में ‘कारीसि मे कम्मं अवस्सं’ (तुम मेरा कार्य अवश्य करने वाले हो), ‘कारिनो मे कम्मं अवस्सं’, ‘हारीसि मे भारं अवस्सं’ (तुम मेरा भार अवश्य ढोने वाले हो)। อธมิเณ – สตํ เม อิณํ ทาตุํ ยุตฺโตสีติ ทายีสิ เม สตํ อิณํ, ธารีสิ เม สหสฺสํ อิณํ อิจฺจาทิ, กิจฺจปฺปจฺจยา ปน เหฏฺฐาเยว ทสฺสิตา. अधमर्ण (ऋणी) के अर्थ में - “तुम्हें मेरा सौ (मुद्रा) ऋण देना चाहिए” इस अर्थ में ‘दायीसि मे सतं इणं’ (तुम मेरे सौ ऋण के दायी हो), ‘धारीसि मे सहस्सं इणं’ (तुम मेरे हजार ऋण के धारी हो) इत्यादि। ‘किच्च’ प्रत्यय तो पहले ही दिखाए जा चुके हैं। ๖๖๐. วชาทีหิ ปพฺพชฺชาทโย นิปจฺจนฺเต. ६६०. ‘वज’ आदि धातुओं से ‘पब्बज्जा’ (प्रव्रज्या) आदि शब्द निपातित होते हैं। อากติคโณยํ. วชอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ปจฺจยาเทสโลปาคมนิเสธลิงฺคาทิวิธินา ยถาภิธานํ ปพฺพชฺชาทโย สทฺทา นิปจฺจนฺเต. यह आकृतिगण है। ‘वज’ आदि धातुओं से प्रत्यय, आदेश, लोप, आगम, निषेध और लिंग आदि के विधान द्वारा कथनानुसार ‘पब्बज्जा’ आदि शब्द निपातित होते हैं। วช คติมฺหิ ปปุพฺโพ, ปฐมเมว วชิตพฺพนฺติ อตฺเถ ‘‘ภาวกมฺเมสู’’ติ อธิกิจฺจ ‘‘ณฺโยจา’’ติ ณฺยปฺปจฺจโย, ณโลปาทิ. ‘‘ปวฺวชฺย’’นฺติ รูเป สมฺปตฺเต อิมินา ชฺฌสฺส ชฺชาเทโส, วการทฺวยสฺส พการทฺวยํ, วุทฺธินิเสโธ, อิตฺถิลิงฺคตฺตญฺจ นิปจฺจนฺเต, ปพฺพชฺชา. ‘वज’ धातु गति के अर्थ में है, ‘प’ उपसर्ग पूर्वक। “पहले ही जाना चाहिए” इस अर्थ में ‘भावकर्मेसु’ के अधिकार में ‘ण्य’ प्रत्यय होता है, ‘ण’ का लोप आदि होता है। ‘पव्वज्य’ रूप प्राप्त होने पर, इससे ‘ज्झ’ को ‘ज्जा’ आदेश, दो ‘व’ को दो ‘ब’, वृद्धि का निषेध और स्त्रीलिंग होना निपातित होता है, जिससे ‘पब्बज्जा’ बनता है। ตถา อิญฺช กมฺปเน, อิญฺชนํ อิชฺชา. ยช เทวปูชายํ, ยชนํ อิชฺชา, ‘‘ยชสฺสาทิสฺสี’’ติ อิตฺตํ. อญฺช พฺยตฺติคตีสุ สํปุพฺโพ, สมญฺชนํ สมชฺชา, ญฺฌสฺส ชฺชาเทโส. สท วิสรณคตฺยาวสาเนสุ, นิสีทนํ นิสชฺชา. วิท ญาเณ, วิชานนํ, วิทตีติ วา วิชฺชา. สช วิสฺสคฺเค, วิสฺสชฺชนํ วิสฺสชฺชา. ปท คติมฺหิ, นิปชฺชนํ นิปชฺชา. उसी प्रकार ‘इञ्ज’ कम्पन के अर्थ में, ‘इञ्जन’ से ‘इज्जा’। ‘यज’ देवपूजा के अर्थ में, ‘यजन’ से ‘इज्जा’, ‘यजस्सादिस्सी’ से इ-कार होता है। ‘अञ्ज’ अभिव्यक्ति और गति के अर्थ में ‘सं’ उपसर्ग पूर्वक, ‘समञ्जन’ से ‘समज्जा’, ‘ञ्झ’ को ‘ज्जा’ आदेश होता है। ‘सद’ विसरण, गति और अवसादन के अर्थ में, ‘निसीदन’ से ‘निसज्जा’। ‘विद’ ज्ञान के अर्थ में, ‘विजानन’ या ‘विदति’ से ‘विज्जा’। ‘सज’ विसर्ग (त्याग) के अर्थ में, ‘विस्सज्जन’ से ‘विस्सज्जा’। ‘पद’ गति के अर्थ में, ‘निपज्जन’ से ‘निपज्जा’। หน หึสาคตีสุ, หนฺตพฺพนฺติ อตฺเถ ณฺยมฺหิ กเต ‘‘วโธ วา สพฺพตฺถา’’ติ หนสฺส วธาเทโส, ฌสฺสิมินา ชฺฌาเทโส จ, โส วชฺโฌ, สา วชฺฌา. สี สเย, สยนํ, สยนฺติ เอตฺถาติ วา เสยฺยา, วุทฺธิ, ยการสฺส ทฺวิตฺตญฺจ[Pg.409]. ธา ธารเณ สํปุพฺโพ, สมฺมา จิตฺตํ นิเธติ เอตาย, สยํ วา สทฺทหตีติ อตฺเถ ‘‘อิตฺถิยมติยโว วา’’ติ อปฺปจฺจโย, ‘‘สนฺธา’’ติ รูเป สมฺปตฺเต อิมินา นการสฺส ทกาโร, สทฺธา. จร จรเณ, จรณนฺติ อตฺเถ ณฺยปฺปจฺจเย, อิการาคเม จ กเต อิมินา วุทฺธินิเสโธ, จริยา. ‘हन’ हिंसा और गति के अर्थ में है, “मारना चाहिए” इस अर्थ में ‘ण्य’ प्रत्यय होने पर ‘वधो वा सब्बत्था’ से ‘हन’ को ‘वध’ आदेश और इससे ‘झ’ को ‘ज्झ’ आदेश होता है, वह ‘वज्झो’ (वध्य), वह ‘वज्झा’। ‘सी’ शयन के अर्थ में, ‘शयन’ या “जिसमें सोते हैं” इस अर्थ में ‘सेय्या’, वृद्धि और ‘य’ का द्वित्व होता है। ‘धा’ धारण के अर्थ में ‘सं’ उपसर्ग पूर्वक, “जिसके द्वारा चित्त को सम्यक् रूप से स्थापित किया जाता है” या “स्वयं श्रद्धा करता है” इस अर्थ में ‘इत्थियमतियवो वा’ से ‘अ’ प्रत्यय होने पर, ‘सन्धा’ रूप प्राप्त होने पर इससे ‘न’ को ‘द’ होकर ‘सद्धा’ (श्रद्धा) बनता है। ‘चर’ चरण के अर्थ में, ‘चरण’ अर्थ में ‘ण्य’ प्रत्यय और ‘इ’ आगम होने पर इससे वृद्धि का निषेध होकर ‘चरिया’ बनता है। รุช โรเค, รุชนนฺติ อตฺเถ อิมินา ฉปฺปจฺจโย, ‘‘พฺยญฺชนนฺตสฺส โจ ฉปฺปจฺจเยสุ จา’’ติ ธาตฺวนฺตสฺส จกาโร, รุจฺฉา, รุชาติ อปฺปจฺจเยน สิทฺธํ. ตถา กุจ สงฺโกจเน, ฉปฺปจฺจโย, โกจนํ กุจฺฉา. ลภ ลาเภ, ฉมฺหิ จาเทโส, ลจฺฉา. รท วิเลขเน, รจฺฉา. มุห เวจิตฺเต, มุยฺหนํ มุจฺฉา, มุจฺฉนํ วา มุจฺฉา. วส นิวาเส, วจฺฉา. กจ ทิตฺติมฺหิ, กจฺฉา. กถ กถเน สํปุพฺโพ, สทฺธึ กถนนฺติ อตฺเถ ณฺยปฺปจฺจโย, อิมินา ถฺยสฺส จฺฉาเทโส, สํสทฺทสฺส สาเทโส จ, สากจฺฉา. ตุท พฺยถเน, ตุจฺฉา. ปท คติมฺหิ, พฺยาปชฺชนนฺติ อตฺเถ ณฺยมฺหิ กเต ‘‘พฺยาปาทฺยา’’ติ รูเป สมฺปตฺเต อิมินา นิปาตเนน ทฺยสฺส ชฺชาเทโส, รสฺสตฺตญฺจ, พฺยาปชฺชา. ‘रुज’ रोग के अर्थ में, ‘रुजन’ अर्थ में इससे ‘छ’ प्रत्यय होता है, ‘व्यञ्जनन्तस्स चो छप्पच्चयेसु चा’ से धातु के अन्त को ‘च’ कार होकर ‘रुच्छा’ बनता है, ‘रुजा’ तो ‘अ’ प्रत्यय से सिद्ध है। उसी प्रकार ‘कुच’ संकोचन के अर्थ में, ‘छ’ प्रत्यय होकर ‘कोचन’ से ‘कुच्छा’। ‘लभ’ लाभ के अर्थ में, ‘छ’ होने पर ‘च’ आदेश होकर ‘लच्छा’। ‘रद’ विलेखन के अर्थ में ‘रच्छा’। ‘मुह’ वैचित्त्य (मोह) के अर्थ में, ‘मुय्हन’ से ‘मुच्छा’ या ‘मुच्छन’ से ‘मुच्छा’। ‘वस’ निवास के अर्थ में ‘वच्छा’। ‘कच’ दीप्ति के अर्थ में ‘कच्छा’। ‘कथ’ कथन के अर्थ में ‘सं’ उपसर्ग पूर्वक, “साथ में कथन” इस अर्थ में ‘ण्य’ प्रत्यय होने पर इससे ‘थ्य’ को ‘च्छा’ आदेश और ‘सं’ शब्द को ‘सा’ आदेश होकर ‘साकच्छा’ बनता है। ‘तुद’ व्यथा के अर्थ में ‘तुच्छा’। ‘पद’ गति के अर्थ में, ‘व्यापज्जन’ अर्थ में ‘ण्य’ प्रत्यय होने पर ‘व्यापाद्या’ रूप प्राप्त होने पर इस निपातन से ‘द्य’ को ‘ज्जा’ आदेश और ह्रस्व होकर ‘व्यापज्जा’ बनता है। มร ปาณจาเค, มรติ มรณนฺติ จ อตฺเถ อิมินา ตฺยตฺยุปฺปจฺจยา, ธาตฺวนฺตโลโปจ, ตโต ‘‘ยวต’’มิจฺจาทินา จกาโร, มจฺโจ, มจฺจุ. สต สาตจฺเจ, อิมินา ยปฺปจฺจโย, ตฺยสฺส จกาโร, สจฺจํ. ตถา นต คตฺตวินาเม, นจฺจํ. นิติ นิจฺเจ, นิจฺจํ. มา มาเน, มายา. ชน ชนเน, ชายา, กน ทิตฺติกนฺตีสุ, นฺยสฺส ญตฺตํ, ทฺวิตฺตญฺจ, กญฺญา. ธน ธญฺเญ, ธญฺญํ. ปุนาตีติ ปุญฺญํ, นการาคโม อิจฺจาทิ. ‘मर’ प्राणत्याग के अर्थ में, ‘मरति’ और ‘मरण’ अर्थ में इससे ‘त्य’ और ‘त्यु’ प्रत्यय होते हैं और धातु के अन्त का लोप होता है, फिर ‘यवत’ आदि से ‘च’ कार होकर ‘मच्चो’ (मर्त्य) और ‘मच्चु’ (मृत्यु) बनते हैं। ‘सत’ सातत्य (निरन्तरता) में, इससे ‘य’ प्रत्यय होकर ‘त्य’ को ‘च’ कार होकर ‘सच्चं’ (सत्य) बनता है। उसी प्रकार ‘नत’ शरीर के झुकने (गात्रविनाम) में ‘नच्चं’ (नृत्य)। ‘निति’ नित्य के अर्थ में ‘निच्चं’। ‘मा’ मान (मापन) के अर्थ में ‘माया’। ‘जन’ जनन के अर्थ में ‘जाया’। ‘कन’ दीप्ति और कान्ति के अर्थ में, ‘न्य’ को ‘ञ’ भाव और द्वित्व होकर ‘कञ्ञा’ (कन्या)। ‘धन’ धान्य के अर्थ में ‘धञ्ञं’। “पवित्र करता है” इसलिए ‘पुञ्ञं’ (पुण्य), ‘न’ कार का आगम इत्यादि। ๖๖๑. เว [Pg.410] ปุ สี ทวว มุ กุ ทา ภูหฺวาทีหิ ถุตฺติม ณิมา นิพฺพตฺเต. ६६१. ‘वे’, ‘पु’, ‘सी’, ‘दव’, ‘वमु’, ‘कु’, ‘दा’, ‘भू’ आदि और ‘हु’ आदि धातुओं से ‘थु’, ‘त्तिम’ और ‘णिम’ प्रत्यय ‘निर्वृत्त’ (उत्पन्न) अर्थ में होते हैं। เวปุสีทววมุอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ, กุ ทา ภูอาทิโต, หฺวาทิโต จ ยถากฺกมํ ถุตฺติมณิมอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ นิพฺพตฺตตฺเถ. เวปุ กมฺปเน, ถุปฺปจฺจโย, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อการาคโม, อถ วา ‘‘อถู’’ติ วตฺตพฺเพ สรโลปํ กตฺวา ‘‘ถู’’ติ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, เวเปน นิพฺพตฺโต เวปถุ. สี สเย, สยเนน นิพฺพตฺโต สยถุ. ทว ทวเน, ทเวน นิพฺพตฺโต ทวถุ. วมุ อุคฺคิรเณ, วเมน นิพฺพตฺโต วมถุ. ‘वेपु’, ‘सी’, ‘दव’, ‘वमु’ आदि धातुओं से, ‘कु’, ‘दा’, ‘भू’ आदि से और ‘हु’ आदि से यथाक्रम ‘थु’, ‘त्तिम’ और ‘णिम’ ये प्रत्यय ‘निर्वृत्त’ अर्थ में होते हैं। ‘वेपु’ कम्पन के अर्थ में, ‘थु’ प्रत्यय, ‘क्वचि धातू’ आदि से ‘अ’ कार का आगम, अथवा ‘अथु’ कहना चाहिए था पर स्वर लोप करके ‘थु’ कहा गया है ऐसा समझना चाहिए; ‘वेप’ (कम्पन) से उत्पन्न ‘वेपथु’। ‘सी’ शयन के अर्थ में, शयन से उत्पन्न ‘सयथु’। ‘दव’ दवन (दौड़ने) के अर्थ में, दवन से उत्पन्न ‘दवथु’। ‘वमु’ उगलने (उद्गिरन) के अर्थ में, वमन से उत्पन्न ‘वमथु’। กุตฺติ กรณํ, เตน นิพฺพตฺตํ กุตฺติมํ, ‘‘กุ’’อิติ นิปาตนโต กรสฺส กุตฺตํ. ทา ทาเน, ทาติ ทานํ, เตน นิพฺพตฺตํ ทตฺติมํ, รสฺสตฺตํ. ภูติ ภวนํ, เตน นิพฺพตฺตํ โภตฺติมํ. อวหุติ อวหนํ, เตน นิพฺพตฺตํ โอหาวิมํ, ณโลปวุทฺธิอาวาเทสา. ‘कुत्ति’ करना है, उससे निर्मित ‘कुत्तिमं’ (कृत्रिम), ‘कु’ इस निपातन से ‘कर’ को ‘कुत्त’ भाव होता है। ‘दा’ दान के अर्थ में, ‘दा’ ही दान है, उससे निर्मित ‘दत्तिमं’, ह्रस्व भाव होता है। ‘भूति’ भवन (होना) है, उससे निर्मित ‘भोत्तिमं’। ‘अवाहुति’ अवाहन है, उससे निर्मित ‘ओहाविमं’, ‘ण’ का लोप, वृद्धि और ‘आव’ आदेश होते हैं। ๖๖๒. อกฺโกเส นมฺหานิ. ६६२. ‘आक्कोस’ (आक्रोश/गाली) के अर्थ में ‘न’ उपपद होने पर ‘आनि’ प्रत्यय होता है। อกฺโกเส คมฺมมาเน นมฺหิ นิปาเต อุปปเท สติ ธาตุโต อานิปฺปจฺจโย โหติ. น คมิตพฺโพ เต ชมฺม เทโสติ อตฺเถ อานิปฺปจฺจโย, กิตกตฺตา นามมิว กตฺวา สิมฺหิ กเต น คมานีติ อตฺเถ กมฺมธารยสมาโส, นสฺส อตฺตํ, ปุน สมาสตฺตา นามมิว กเต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, อคมานิ เต ชมฺม เทโส. น กตฺตพฺพํ เต ชมฺม กมฺมนฺติ อกรานิ เต ชมฺม กมฺมํ. आक्रोश (निन्दा) के प्रतीत होने पर ‘न’ निपात उपपद होने पर धातु से ‘आनि’ प्रत्यय होता है। “हे नीच! तुम्हें उस देश में नहीं जाना चाहिए” इस अर्थ में ‘आनि’ प्रत्यय होता है, कृदन्त होने के कारण नाम (संज्ञा) की तरह मानकर ‘सि’ प्रत्यय करने पर ‘न गमानी’ इस अर्थ में कर्मधारय समास होता है, ‘न’ को ‘अ’ भाव होता है, पुनः समास होने के कारण नाम की तरह मानकर ‘सि’ आदि की उत्पत्ति होने पर ‘अगमानी ते जम्म देसो’ बनता है। “हे नीच! तुम्हें यह कार्य नहीं करना चाहिए” इस अर्थ में ‘अकरानी ते जम्म कम्मं’ बनता है। นมฺหีติ กึ? วิปตฺติ เต. อกฺโกเสติ กึ? อคติ เต. ‘न’ उपपद होने पर ही क्यों? (उत्तर:) ‘विपत्ति ते’ (यहाँ ‘न’ नहीं है)। आक्रोश में ही क्यों? (उत्तर:) ‘अगति ते’ (यहाँ आक्रोश नहीं है)। ๖๖๓. สุนสฺสุนสฺโสณวานุวานุนุนขุณานา[Pg.411]. ६६३. ‘सुन’ इस प्रातिपदिक के सम्बन्धी ‘उन’ शब्द के स्थान पर ‘ओण’, ‘वान’, ‘उवान’, ‘उन’, ‘उनख’, ‘उण’, ‘आ’, ‘आन’ ये आदेश होते हैं। สุนอิจฺเจตสฺส ปาฏิปทิกสฺส สมฺพนฺธิโน อุนสทฺทสฺส โอณ วาน อุวาน อุน อุนข อุณ อา อานอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ. สุนสฺสุนสฺส โอณาทิอาเทเส, ปรนยเน จ กเต สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, โสโณ, โสณา, สฺวาโน, สฺวานา, สุวาโน, สุวานา, สุโน, สุนา, สุนโข, สุนขา, สุโณ, สุณา, สา สาโน, สานา อิจฺจาทิ. ‘सुन’ इस प्रातिपदिक के सम्बन्धी ‘उन’ शब्द के स्थान पर ‘ओण’, ‘वान’, ‘उवान’, ‘उन’, ‘उनख’, ‘उण’, ‘आ’, ‘आन’ ये आदेश होते हैं। ‘सुन’ के ‘उन’ को ‘ओण’ आदि आदेश होने पर और पर-नयन (सन्धि आदि) करने पर ‘सि’ आदि की उत्पत्ति होती है, जैसे - सोणो, सोणा, स्वानो, स्वाना, सुवानो, सुवाना, सुनो, सुना, सुनखो, सुनखा, सुणो, सुणा, सा, सानो, साना इत्यादि। ๖๖๔. ตรุณสฺส สุสุ จ. ६६४. ‘तरुण’ के स्थान पर ‘सुसु’ भी होता है। ตรุณอิจฺเจตสฺส สทฺทสฺส สุสุอิจฺจาเทโส โหติ. จสทฺโท อนิยมตฺโถ, สุสุ, ตรุโณ วา. ‘तरुण’ इस शब्द को ‘सुसु’ आदेश होता है। ‘च’ शब्द अनियम के अर्थ में है; ‘सुसु’ (शिशु) अथवा ‘तरुणो’। ๖๖๕. ยุวสฺสุวสฺสุวุวานุนูนา. ६६५. ‘युव’ इस प्रातिपदिक के ‘उव’, ‘सुव’, ‘उवान’, ‘उन’, ‘ऊन’ ये आदेश होते हैं। ยุวอิจฺเจตสฺส ปาฏิปทิกสฺส อุวสทฺทสฺส อุวอุวานอุนอูนอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ. ยุวา ติฏฺฐติ, ยุวาโน ติฏฺฐติ, ยุโน ติฏฺฐติ, ยูโน ติฏฺฐติ. ‘युव’ इस प्रातिपदिक के ‘उव’ शब्द को ‘उव’, ‘उवान’, ‘उन’, ‘ऊन’ ये आदेश होते हैं। ‘युवा तिट्ठति’, ‘युवानो तिट्ठति’, ‘युनो तिट्ठति’, ‘यूनो तिट्ठति’। ๖๖๖. ฉทาทีหิ ตตฺรณ. ६६६. ‘छद’ आदि धातुओं से ‘तत्र’ और ‘ण’ प्रत्यय होते हैं। ฉทอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ตตฺรณอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. ฉท อปวารเณ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ธาตฺวนฺตสฺส ตกาโร. อาตปํ ฉาเทตีติ ฉตฺตํ, ฉตฺรํ, พฺยญฺชนตฺตเย สรูปานเมกสฺส โลโป. ‘छद’ (ढकने के अर्थ में), ‘क्वचि धातू’ आदि सूत्र से धातु के अन्त को ‘त’कार होता है। ‘आतपं छादेति’ (धूप को ढकता है) इस अर्थ में ‘छत्तं’ (छत्र), ‘छत्रं’; तीन व्यंजनों के होने पर समान रूप वाले एक का लोप हो जाता है। จินฺต จินฺตายํ, จินฺเตตีติ จิตฺตํ, นการสฺส สํโยคาทิตฺตา นิคฺคหีตํ, ตสฺส ‘‘พฺยญฺชเน จา’’ติ โลโป, จิตฺรํ, ‘‘ฆฏาทีนํ วา’’ติ น วุทฺธิ. ‘चिन्त’ (चिन्तन के अर्थ में), ‘चिन्तेति’ इस अर्थ में ‘चित्तं’; ‘न’कार को संयोग आदि होने के कारण निग्गहीत (अनुस्वार) होता है, उसका ‘व्यञ्जने चा’ सूत्र से लोप हो जाता है; ‘चित्रं’; ‘घटादीनं वा’ सूत्र से वृद्धि नहीं होती। สุ [Pg.412] อภิสเว, ‘‘ปรทฺเวภาโว ฐาเน’’ติ ตสฺส ทฺวิตฺตํ, อตฺเถ อภิสเวตีติ สุตฺตํ, สุตฺรํ. ‘सु’ (अभिषव/निचोड़ने के अर्थ में), ‘परद्वेभावो ठाने’ सूत्र से उसका द्वित्व होता है; अर्थ का अभिषव (संग्रह) करता है इसलिए ‘सुत्तं’ (सूत्र), ‘सूत्रं’। สูท ปคฺฆรเณ, อตฺเถ สูเทตีติ สุตฺตํ, รสฺสตฺตํ, ภุชาทิตฺตา ทโลโป, ทฺวิตฺตญฺจ. สุ สวเน, สุณาตีติ โสตํ, โสตฺรํ, วุทฺธิ. ‘सूद’ (क्षरण/टपकने के अर्थ में), अर्थ का क्षरण करता है इसलिए ‘सुत्तं’, यहाँ ह्रस्वत्व हुआ है, ‘भुजादि’ गण होने से ‘द’ का लोप और द्वित्व हुआ है। ‘सु’ (श्रवण के अर्थ में), ‘सुणाति’ (सुनता है) इस अर्थ में ‘सोतं’ (स्रोत), ‘सोत्रं’, यहाँ वृद्धि हुई है। นิ ปาปเณ, เนตีติ เนตฺตํ, เนตฺรํ. วิท มงฺคลฺเล, โต ทสฺส, ปวิตฺตํ, ปวิตฺรํ. ปู ปวเน, ปุนาตีติ ปวิตฺตํ, ปวิตฺรํ, อิการาคโม, วุทฺธิอวาเทสา จ. ‘नी’ (प्रापण/ले जाने के अर्थ में), ‘नेति’ (ले जाता है) इस अर्थ में ‘नेत्तं’ (नेत्र), ‘नेत्रं’। ‘विद’ (मंगल के अर्थ में), ‘द’ को ‘त’ होकर ‘पवित्तं’, ‘पवित्रं’। ‘पू’ (पवन/शुद्ध करने के अर्थ में), ‘पुनाति’ (शुद्ध करता है) इस अर्थ में ‘पवित्तं’, ‘पवित्रं’, यहाँ ‘इ’कार का आगम, वृद्धि और ‘अव्’ आदेश हुए हैं। ปต คติมฺหิ, ปตตีติ ปตฺตํ, ปตฺรํ, ปตโต ตายตีติ ปตฺโต, ปตฺโร. ตนุ วิตฺถาเร, ตญฺญตีติ ตนฺตํ, ตนฺตฺรํ. ยต ยตเน, ยตฺตํ, ยตฺรํ. ยา ปาปเณ, ยาปนา ยตฺรา. ยมุ อุปรเม, ยนฺตํ, ยนฺตฺรํ. อท ภกฺขเณ, อทตีติ อตฺตํ, อตฺรํ. ยุช โยเค, ยุชฺชตีติ โยตฺตํ, โยตฺรํ, ภุชาทิตฺตา ธาตฺวนฺตโลปทฺวิตฺตานิ. ‘पत’ (गति के अर्थ में), ‘पतति’ (गिरता है) इस अर्थ में ‘पत्तं’ (पत्ता), ‘पत्रं’; गिरते हुए की रक्षा करता है इसलिए ‘पत्तो’ (पात्र), ‘पत्रो’। ‘तनु’ (विस्तार के अर्थ में), ‘तञ्ञति’ (विस्तार किया जाता है) इस अर्थ में ‘तन्तं’ (तन्त्र), ‘तन्त्रं’। ‘यत’ (यत्न के अर्थ में), ‘यत्तं’, ‘यत्रं’। ‘या’ (प्रापण के अर्थ में), ‘यापना’ से ‘यत्रा’। ‘यमु’ (उपरम/रोकने के अर्थ में), ‘यन्तं’ (यन्त्र), ‘यन्त्रं’। ‘अद’ (भक्षण के अर्थ में), ‘अदति’ (खाता है) इस अर्थ में ‘अत्तं’, ‘अत्रं’। ‘युज’ (योग के अर्थ में), ‘युज्जति’ (जुड़ता है) इस अर्थ में ‘योत्तं’ (योत्र/रस्सी), ‘योत्रं’; ‘भुजादि’ गण होने से धातु के अन्त का लोप और द्वित्व हुए हैं। วตุ วตฺตเน, วตฺตํ, วตฺรํ. มิท สิเนหเน, มิชฺชตีติ มิตฺตํ, มิตฺรํ. มา ปริมาเณ, มตฺตา ปริมาณํ, ทฺวิตฺตรสฺสตฺตานิ. เอวํ ปุนาตีติ ปุตฺโต, ปุตฺโร. กล สงฺขฺยาเน, กลตฺตํ, กลตฺรํ ภริยา. วร สํวรเณ, วรตฺตํ, วรตฺรํ จมฺมมยโยตฺตํ. เวปุ กมฺปเน, เวปตีติ เวตฺตํ, เวตฺรํ. 'वतु' (vatu) वर्तने (होने/घूमने) के अर्थ में, 'वत्तं' (vattaṃ), 'वत्रं' (vatraṃ)। 'मिद' (mida) स्नेह के अर्थ में, जो स्नेह करता है वह 'मित्तं' (mittaṃ), 'मित्रं' (mitraṃ) है। 'मा' (mā) परिमाण (माप) के अर्थ में, 'मत्ता' (mattā) परिमाण है, यहाँ द्वित्व और ह्रस्वत्व होता है। इसी प्रकार जो पवित्र करता है वह 'पुत्तो' (putro), 'पुत्रो' (putro) है। 'कल' (kala) संख्यान (गिनने) के अर्थ में, 'कलत्तं' (kalattaṃ), 'कलत्रं' (kalatraṃ) अर्थात् भार्या (पत्नी)। 'वर' (vara) संवरण (ढकने/रोकने) के अर्थ में, 'वरत्तं' (varattaṃ), 'वरत्रं' (varatraṃ) अर्थात् चर्ममयी रस्सी (जोत)। 'वेपु' (vepu) कम्पन के अर्थ में, जो कांपता है वह 'वेत्तं' (vettaṃ), 'वेत्रं' (vetraṃ) है। คุป สํวรเณ, โคตฺตํ, โคตฺรํ, ‘‘คุปาทีนญฺจา’’ติ ธาตฺวนฺตโลโป, ทฺวิตฺตญฺจ, คตฺตํ วา, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา อุการสฺส อกาโร. ทา อวขณฺฑเน, ทาตฺตํ, ทาตฺรํ. หุ หวเน, อคฺคิหุตฺตํ. วห ปาปเณ, วหิตฺตํ, วหิตฺรํ. จร จรเณ, จริตฺตํ, จริตฺรํ. มุจ โมจเน, มุตฺตํ ปสฺสาโว. ภาส ทิตฺติมฺหิ, ภสฺตฺรา อิจฺจาทิ. 'गुप' (gupa) संवरण (रक्षा) के अर्थ में, 'गोत्तं' (gottaṃ), 'गोत्रं' (gotraṃ); 'गुपादीनञ्च' सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण का लोप और द्वित्व होता है, अथवा 'गत्तं' (gattaṃ) बनता है, 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से 'उ' कार का 'अ' कार हो जाता है। 'दा' (dā) अवखण्डन (काटने) के अर्थ में, 'दात्तं' (dāttaṃ), 'दात्रं' (dātraṃ)। 'हु' (hu) हवन के अर्थ में, 'अग्गिहुत्तं' (aggihuttaṃ)। 'वह' (vaha) प्रापण (ले जाने) के अर्थ में, 'वहित्तं' (vahittaṃ), 'वहित्रं' (vahitraṃ)। 'चर' (cara) चरण (आचरण) के अर्थ में, 'चरित्तं' (carittaṃ), 'चरित्रं' (caritraṃ)। 'मुच' (muca) मोचन (छोड़ने) के अर्थ में, 'मुत्तं' (muttaṃ) अर्थात् मूत्र (पेशाब)। 'भास' (bhāsa) दीप्ति (चमक) के अर्थ में, 'भस्त्रा' (bhastrā) इत्यादि। ๖๖๗. วทาทีหิ [Pg.413] ณิตฺโต คเณ. ६६७. 'वद' आदि धातुओं से 'गण' (समूह) के अर्थ में 'णित्त' प्रत्यय होता है। วท จร วรอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ณิตฺตปฺปจฺจโย โหติ คเณ คมฺมมาเน. วท วิยตฺติยํ วาจายํ, วทิตานํ คโณ วาทิตฺตํ. จร จรเณ, จริตานํ คโณ จาริตฺตํ. วร วรเณ, วริตานํ คโณ วาริตฺตํ. อถ วา จรนฺติ ตสฺมึ ปริปูรการิตายาติ จาริตฺตํ. วาริตํ ตายนฺติ เอตฺถ, เอเตนาติ วา วาริตฺตํ. 'वद', 'चर', 'वर' इत्यादि धातुओं से 'गण' (समूह) का बोध होने पर 'णित्त' प्रत्यय होता है। 'वद' (vada) स्पष्ट वाणी के अर्थ में, बोले गए (वादित) शब्दों का समूह 'वादित्तं' (vādittaṃ) है। 'चर' (cara) आचरण के अर्थ में, आचरणों (चरित) का समूह 'चारित्तं' (cārittaṃ) है। 'वर' (vara) वरण (चुनने/रोकने) के अर्थ में, वरण किए गए (वरित) का समूह 'वारित्तं' (vārittaṃ) है। अथवा, जिसमें परिपूर्णता के लिए आचरण करते हैं, वह 'चारित्तं' (cārittaṃ) है। जिसमें या जिसके द्वारा निवारण (वारित) की रक्षा की जाती है, वह 'वारित्तं' (vārittaṃ) है। ๖๖๘. มิทาทีหิ ตฺติติโย. ६६८. 'मिद' आदि धातुओं से 'त्ति' और 'ति' प्रत्यय होते हैं। มิท ปท รนฺช ตนุ ธาอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ยถาภิธานํ ตฺติ ติอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. มิชฺชติ สินิยฺหตีติ เมตฺติ, ธาตฺวนฺตโลโป. ปชฺชตีติ ปตฺติ. รนฺช ราเค, รนฺชติ เอตฺถาติ รตฺติ. วิตฺถารียตีติ ตนฺติ. ธาเรตีติ ธาติ. ปา รกฺขเณ, ปาติ. วส นิวาเส, วสติ. 'मिद', 'पद', 'रञ्ज', 'तनु', 'धा' इत्यादि धातुओं से अभिधान (कथन) के अनुसार 'त्ति' और 'ति' ये प्रत्यय होते हैं। 'मिज्जति' (स्नेह करता है) इस अर्थ में 'मेत्ति' (metti), यहाँ धातु के अन्त्य वर्ण का लोप होता है। 'पज्जति' (जाता है) इस अर्थ में 'पत्ति' (patti)। 'रञ्ज' (ranja) राग के अर्थ में, जिसमें अनुरक्त होते हैं वह 'रत्ति' (ratti)। जो विस्तारित किया जाता है वह 'तन्ति' (tanti)। जो धारण करती है वह 'धाति' (dhāti)। 'पा' (pā) रक्षण के अर्थ में, 'पाति' (pāti)। 'वस' (vasa) निवास के अर्थ में, 'वसति' (vasati)। ๖๖๙. อุสุรนฺชทํสานํ ทํสสฺส ทฑฺโฒ ฒ ฐา จ. ६६९. 'उसु', 'रञ्ज' और 'दंस' धातुओं के सम्बन्ध में, 'दंस' के स्थान पर 'दड्ढ' आदेश होता है, और शेष धातुओं ('उसु' और 'रञ्ज') से 'ढ' और 'ठ' प्रत्यय होते हैं। อุสุ รนฺช ทํสอิจฺเจเตสํ ธาตูนํ อนฺตเร ทํสสฺส ทฑฺฒาเทโส โหติ, เสเสหิ ธาตูหิ ฒ ฐอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. อุสุ ทาเห, รนฺช ราเค, ฒ ฐปฺปจฺจยา, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ธาตฺวนฺตโลโป, ทฺวิตฺตํ, อุฑฺโฒ, รฏฺฐํ. ทํส ทํสเน, กฺวิปฺปจฺจโย, กฺวิโลโป, ทํสสฺส ทฑฺฒาเทโส จ, ทฑฺฒํ. 'उसु', 'रञ्ज' और 'दंस' इन धातुओं के मध्य 'दंस' के स्थान पर 'दड्ढ' आदेश होता है, और शेष धातुओं से 'ढ' और 'ठ' ये प्रत्यय होते हैं। 'उसु' (usu) दाह (जलने) के अर्थ में, 'रञ्ज' (ranja) राग के अर्थ में, इनसे 'ढ' और 'ठ' प्रत्यय होने पर, 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण का लोप और द्वित्व होकर 'उड्ढो' (uḍḍho) और 'रट्ठं' (raṭṭhaṃ) बनते हैं। 'दंस' (daṃsa) दंशन (काटने) के अर्थ में, 'क्वि' प्रत्यय, 'क्वि' का लोप और 'दंस' के स्थान पर 'दड्ढ' आदेश होकर 'दड्ढं' (daḍḍhaṃ) बनता है। ๖๗๐. สูวุสานมูวุสานมโต โถ จ. ६७०. 'सू', 'वु' और 'अस' इन धातुओं के 'ऊ', 'उ' और 'अस' के स्थान पर 'अत' आदेश होता है और अन्त में 'थ' प्रत्यय होता है। สู วุ อสอิจฺเจเตสํ ธาตูนํ อู อุ อสานํ อตอิจฺจาเทโส โหติ, อนฺเต ถปฺปจฺจโย จ. 'सू', 'वु' और 'अस' इन धातुओं के 'ऊ', 'उ' और 'अस' के स्थान पर 'अत' आदेश होता है और अन्त में 'थ' प्रत्यय होता है। สู [Pg.414] หึสายํ, สตฺถํ. วุ สํวรเณ, วตฺถํ. อส ภุวิ, อตฺโถ. ยทา ปน สสุ หึสายํ, วส อจฺฉาทเน, อร คติมฺหีติ จ ธาตุ, ตทา ‘‘สมาทีหิ ถ มา’’ติ ถปฺปจฺจโย, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ธาตฺวนฺตโลโป, ‘‘วคฺเค โฆสา’’ติอาทินา ทฺวิตฺตํ, สสตีติ สตฺถํ, วสียตีติ วตฺถํ, อรียตีติ อตฺโถ. 'सू' (sū) हिंसा के अर्थ में, 'सत्थं' (satthaṃ)। 'वु' (vu) संवरण के अर्थ में, 'वत्थं' (vatthaṃ)। 'अस' (asa) होने (सत्ता) के अर्थ में, 'अत्थो' (attho)। परन्तु जब 'ससु' हिंसा के अर्थ में, 'वस' आच्छादन (ढकने) के अर्थ में और 'अर' गति के अर्थ में धातुएँ हों, तब 'समादीहि थ मा' सूत्र से 'थ' प्रत्यय होता है, 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण का लोप होता है, 'वग्गे घोसा' आदि सूत्र से द्वित्व होता है; 'ससति' (हिंसा करता है) इस अर्थ में 'सत्थं', 'वसीयति' (पहना जाता है) इस अर्थ में 'वत्थं', 'अरीयति' (जाया जाता है) इस अर्थ में 'अत्थो' बनता है। ๖๗๑. รนฺชุทาทีหิ ธทิทฺทกิรา กฺวจิ ช ท โลโป จ. ६७१. 'रञ्ज', 'उदि' इत्यादि धातुओं से 'ध', 'द', 'इद्द', 'क', 'इर' ये प्रत्यय होते हैं और कहीं-कहीं धातु के अन्त्य 'ज' और 'द' का लोप भी होता है। รนฺช อุทิอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ธ ท อิทฺท ก อิรอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ กฺวจิ, ธาตฺวนฺตานํ ชทานํ โลโป จ โหติ. 'रञ्ज', 'उदि' इत्यादि धातुओं से 'ध', 'द', 'इद्द', 'क', 'इर' ये प्रत्यय होते हैं और कहीं-कहीं धातु के अन्त्य 'ज' और 'द' का लोप भी होता है। รนฺช ราเค, ธปฺปจฺจโย, ชโลโป จ, รนฺธํ. อุทิ ปสวนกฺเลทเนสุ สํปุพฺโพ, ทปฺปจฺจโย, สมุทฺโท, อุทฺโท. ขุท ปิปาสายํ, ขุทฺโท. ฉิทิ ทฺวิธากรเณ, ฉิทฺโท. รุทิ หึสายํ, รุทฺโท, ลุทฺโท, โล รสฺส. ภทิ กลฺยาเณ, ภทฺโท. นิทิ กุจฺฉายํ, นิทฺทา. มุท หาเส, มุทฺทา. ทล ทุคฺคติมฺหิ, อิทฺทปฺปจฺจโย, ทลิทฺโท. 'रञ्ज' (ranja) राग के अर्थ में, 'ध' प्रत्यय और 'ज' का लोप होकर 'रन्धं' (randhaṃ) बनता है। 'उदि' (udi) प्रसव और क्लेदन (गीला करने) के अर्थ में, 'सं' उपसर्ग पूर्वक 'द' प्रत्यय होने पर 'समुद्दो' (samuddo) और 'उद्दो' (uddo) बनता है। 'खुद' (khuda) पिपासा (प्यास) के अर्थ में, 'खुद्दो' (khuddo)। 'छिदि' (chidi) द्विधाकरण (दो भाग करने) के अर्थ में, 'छिद्दो' (chiddo)। 'रुदि' (rudi) हिंसा के अर्थ में, 'रुद्दो' (ruddo), 'लुद्दो' (luddo) - यहाँ 'र' का 'ल' हो जाता है। 'भदि' (bhadi) कल्याण के अर्थ में, 'भद्दो' (bhaddo)। 'निदि' (nidi) कुत्सा (निंदा) के अर्थ में, 'निद्दा' (niddā)। 'मुद' (muda) हास (हर्ष) के अर्थ में, 'मुद्दा' (muddā)। 'दल' (dala) दुर्गति के अर्थ में, 'इद्द' प्रत्यय होकर 'दलिद्दो' (daliddo) बनता है। สุส โสสเน, สุจ โสเก วา, กปฺปจฺจโย, ธาตฺวนฺตสฺส กกาโร, สุกฺกํ. วจ วิยตฺติยํ วาจายํ, วก อาทาเน วา, วกฺกํ. สก สตฺติมฺหิ, สกฺโก. อุสุ ทาเห, อุกฺกา. 'सुस' (susa) शोषण के अर्थ में, अथवा 'सुच' (suca) शोक के अर्थ में, 'क' प्रत्यय और धातु के अन्त्य वर्ण का 'क' कार होकर 'सुक्कं' (sukkaṃ) बनता है। 'वच' (vaca) स्पष्ट वाणी के अर्थ में, अथवा 'वक' (vaka) आदान (लेने) के अर्थ में, 'वक्कं' (vakkaṃ)। 'सक' (saka) शक्ति के अर्थ में, 'सक्को' (sakko)। 'उसु' (usu) दाह के अर्थ में, 'उक्का' (ukkā)। วช คติมฺหิ, อิรปฺปจฺจโย, อปฺปฏิหตํ วชตีติ วชิรํ. มท อุมฺมาเท, มทิรา. เอวํ มนฺทิรํ, รุธิรํ, รุหิรํ, รุจิรํ. พธ พนฺธเน, พธิโร, พธิรา, พธิรํ, ติมิโร, ติมิรํ, สิโร. สร หึสายํ, สริรํ. ‘‘กลิลํ, สลิล’’นฺติอาทีสุ โล รสฺส. กุฏิโล, โกกิโล อิจฺจาทโย. 'वज' (गति अर्थ में) धातु से 'इर' प्रत्यय होने पर, जो अप्रतिहत (बिना रुके) जाता है, वह 'वजिर' (वज्र) है। 'मद' (उन्माद अर्थ में) से 'मदिरा'। इसी प्रकार 'मन्दिर', 'रुधिर', 'रुहिर', 'रुचिर'। 'बध' (बन्धन अर्थ में) से 'बधिरो', 'बधिरा', 'बधिरं', 'तिमिरो', 'तिमिरं', 'सिरो'। 'सर' (हिंसा अर्थ में) से 'सरिरं' (शरीर)। 'कलिलं', 'सलिलं' आदि में 'र' के स्थान पर 'ल' होता है। 'कुटिलो', 'कोकिलो' इत्यादि। ๖๗๒. ปฏิโต [Pg.415] หิสฺส เหรณ หีรณ. ६७२. 'पटि' के बाद 'हि' धातु के स्थान पर 'हेरण' और 'हीरण' आदेश होते हैं। ปฏิโต ปรสฺส หิอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส เหรณ หีรณอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ. หิ คติมฺหิ ปฏิปุพฺโพ, ปฏิปกฺเข มทฺทิตฺวา คจฺฉตีติ อตฺเถ ‘‘กฺวิ จา’’ติ กฺวิปฺปจฺจโย, กฺวิโลโป, อิมินา เหรณ หีรณอาเทสา, ณโลโป, ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา ปฏิสทฺทาทิสฺส วุทฺธิ, ปาฏิเหรํ, ปาฏิหีรํ, ยทา ปน หร หรเณติ ธาตุ, ตทา ปฏิปกฺเข หรตีติ ‘‘ปาฏิหาริย’’มิติ ณฺเยนปิ สิทฺธํ. 'पटि' से परे 'हि' इस धातु के स्थान पर 'हेरण' और 'हीरण' ये आदेश होते हैं। 'हि' (गति अर्थ में) 'पटि' उपसर्ग पूर्वक, 'प्रतिपक्ष को कुचलकर जाता है' इस अर्थ में 'क्वि' प्रत्यय, 'क्वि' का लोप, इससे 'हेरण' और 'हीरण' आदेश, 'ण' का लोप, 'तेसु वुद्धि' आदि सूत्र से 'पटि' शब्द के आदि स्वर की वृद्धि होकर 'पाटिहेरं', 'पाटिहीरं' सिद्ध होते हैं। जब 'हर' (हरण अर्थ में) धातु हो, तब 'प्रतिपक्ष का हरण करता है' इस अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय से भी 'पाटिहारियं' सिद्ध होता है। ๖๗๓. กฑฺยาทีหิ โก. ६७३. 'कडि' आदि से 'क' प्रत्यय होता है। กฑิอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ กปฺปจฺจโย โหติ. 'कडि' इत्यादि धातुओं से 'क' प्रत्यय होता है। กฑิ เฉทเน, กปฺปจฺจเย กเต ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา, ‘‘นิคฺคหีตญฺจา’’ติ วา อิการานุพนฺธสฺส ธาตุสฺส นิคฺคหีตาคโม, กโลโป จ, นิคฺคหีตสฺส วคฺคนฺตตฺตํ, กณฺโฑ อุสุ, ปริมาณญฺจ. เอวํ ฆฏิ ฆฏฺฏเน, ฆณฺโฏ, ฆณฺฏา วา. วฏิ อาวตฺตเน, วฏิ ธารณพนฺธนสงฺฆาเตสุ วา, วณฺโฏ. กรฑิ ภาชนตฺเถ, กรณฺโฑ. มฑิ มณฺฑนตฺเถ, มณฺโฑ. สฑิ คุมฺพตฺเถ, สณฺโฑ. ภฑิ ภณฺฑตฺเถ, ภณฺฑํ. ปฑิ ลิงฺคเวกลฺลตฺเถ, ปณฺโฑ, โส เอว ปณฺฑโก. ทฑิ อาณายํ, ทณฺโฑ. รฑิ หึ สายํ, รณฺโฑ. ตฑิ จลนตฺเถ, วิตณฺโฑ. จฑิ จณฺฑตฺเถ, จณฺโฑ. คฑิ สนฺนิจฺจเย, คณฺโฑ. อฑิ อณฺฑตฺเถ, อณฺโฑ. ลฑิ ชิคุจฺฉายํ, ลณฺฑํ. เมฑิ กุฏิลตฺเถ, เมณฺโฑ, เมณฺฑโก วา. เอรฑิ หึสายํ, เอรณฺโฑ. ขฑิ เฉทนตฺเถ, ขณฺโฑ. มทิ หาเส, มนฺโท. อิทิ ปรมิสฺสริเย, อินฺโท. จทิ อิจฺฉากนฺตีสุ, จนฺโท. ขุร เฉทเน, ขุโร อิจฺจาทิ. 'कडि' (छेदन अर्थ में), 'क' प्रत्यय करने पर 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से, अथवा 'निग्गहीतं च' सूत्र से इकार अनुबन्ध वाली धातु को अनुस्वार का आगम और 'ल' का लोप होता है, अनुस्वार का वर्गान्त (ण) होने पर 'कण्डो' (बाण और परिमाण)। इसी प्रकार 'घटि' (घट्टन अर्थ में) से 'घण्टो' या 'घण्टा'। 'वटि' (आवर्तन अर्थ में) अथवा 'वटि' (धारण, बन्धन और संघात अर्थ में) से 'वण्टो'। 'करडि' (भाजन अर्थ में) से 'करण्डो'। 'मडि' (मण्डन अर्थ में) से 'मण्डो'। 'सडि' (गुम्ब अर्थ में) से 'सण्डो'। 'भडि' (भाण्ड अर्थ में) से 'भण्डं'। 'पडि' (लिंगवैकल्य अर्थ में) से 'पण्डो', वही 'पण्डको' है। 'दडि' (आज्ञा अर्थ में) से 'दण्डो'। 'रडि' (हिंसा अर्थ में) से 'रण्डो'। 'तडि' (चलन अर्थ में) से 'वितण्डो'। 'चडि' (चण्ड अर्थ में) से 'चण्डो'। 'गडि' (सन्निश्चय अर्थ में) से 'गण्डो'। 'अडि' (अण्ड अर्थ में) से 'अण्डो'। 'लडि' (जुगुप्सा अर्थ में) से 'लण्डं'। 'मेडि' (कुटिल अर्थ में) से 'मेण्डो' या 'मेण्डको'। 'एरडि' (हिंसा अर्थ में) से 'एरण्डो'। 'खडि' (छेदन अर्थ में) से 'खण्डो'। 'मदि' (हास अर्थ में) से 'मन्दो'। 'इदि' (परमैश्वर्य अर्थ में) से 'इन्दो'। 'चदि' (इच्छा और कान्ति अर्थ में) से 'चन्दो'। 'खुर' (छेदन अर्थ में) से 'खुरो' इत्यादि। ‘‘โก’’ติ วตฺตเต. 'क' (प्रत्यय) की अनुवृत्ति होती है। ๖๗๔. ขาทามคมานํ [Pg.416] ขนฺธนฺธคนฺธา. ६७४. 'खाद', 'अम' और 'गमु' के स्थान पर 'खन्ध', 'अन्ध' और 'गन्ध' आदेश होते हैं। ขาท อม คมุอิจฺเจเตสํ ธาตูนํ ขนฺธ อนฺธ คนฺธอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ, กปฺปจฺจโย จ โหติ. ขาท ภกฺขเน, ชาติชรามรณาทีหิ สํสารทุกฺเขหิ ขชฺชตีติ ขนฺโธ. อม โรเค, อนฺโธ. คมุ, สปฺป คติมฺหิ, คนฺโธ. กฺวจิคฺคหเณน กโลปาภาเว ขนฺธโก, อนฺธโก, คนฺธโก. อถ วา ราสฏฺเฐน ขนฺโธ. คนฺธ สูจเน, อตฺตโน นิสฺสยสฺส คนฺธนโต สูจนโต คนฺโธ. 'खाद', 'अम' और 'गमु' इन धातुओं के स्थान पर 'खन्ध', 'अन्ध' और 'गन्ध' ये आदेश होते हैं और 'क' प्रत्यय भी होता है। 'खाद' (भक्षण अर्थ में), जाति-जरा-मरण आदि संसार के दुखों द्वारा खाया जाता है, इसलिए 'खन्धो' (स्कन्ध) है। 'अम' (रोग अर्थ में) से 'अन्धो'। 'गमु' और 'सप्प' (गति अर्थ में) से 'गन्धो'। 'क्वचि' ग्रहण से 'क' के लोप के अभाव में 'खन्धको', 'अन्धको', 'गन्धको' बनते हैं। अथवा राशि (ढेर) के अर्थ में 'खन्धो' है। 'गन्ध' (सूचन अर्थ में), अपने आश्रय की गन्ध (सूचना) देने के कारण 'गन्धो' है। ๖๗๕. ปฏาทีหฺยลํ. ६७५. 'पट' आदि से 'अल' प्रत्यय होता है। ปฏอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ, ปาฏิปทิเกหิ จ อลปฺปจฺจโย โหติ. อฏ, ปฏ คติมฺหิ, ปเฏ อลํ สมตฺถนฺติ อตฺเถ อิมินา อลปฺปจฺจโย, ‘‘สิ’’นฺติ อมาเทโส, ปฏลํ, ปฏลานิ. ตถา กล กลเล, กลลํ. กุส เฉทนภูต ทาน สญฺจเยสุ, กุสลํ, ยทา ปน สล ลู ลาอิติ ธาตุ, ตทา กุจฺฉิตานํ สลนโต, กุสานํ ลวนโต, กุโส วิย ลวนโต วา กุเสน ลาตพฺพตฺตา กุสลนฺติ อปฺปจฺจเยน กปฺปจฺจเยน วา รูปสิทฺธิ เวทิตพฺพา. 'पट' इत्यादि धातुओं और प्रातिपदिकों से 'अल' प्रत्यय होता है। 'अट' और 'पट' (गति अर्थ में), 'पट' में जो समर्थ (अलम्) है, इस अर्थ में इससे 'अल' प्रत्यय, 'सि' को 'अं' आदेश होकर 'पटलं', 'पटलानि' बनते हैं। वैसे ही 'कल' से 'कललं'। 'कुस' (छेदन, भूत, दान और संचय अर्थ में) से 'कुसलं'। जब 'सल' (लू, ला अर्थ में) धातु हो, तब कुत्सितों के संलन (काटने) से, अथवा 'कुश' घास को काटने के समान होने से, अथवा 'कुश' (बुद्धि) द्वारा ग्रहण करने योग्य होने से 'कुसलं' - इस प्रकार 'अ' प्रत्यय या 'क' प्रत्यय से रूपसिद्धि जाननी चाहिए। กท มเท, กทลํ. ภคนฺท เสจเน, ภคนฺทลํ. เมข กฏิวิจิตฺเต, เมขลํ, เมขลา วา. วกฺก รุกฺขตเจ, วกฺกลํ. ตกฺก รุกฺขสิเลเส, ตกฺกลํ. ปลฺล นินฺนฏฺฐาเน, ปลฺลลํ. สทฺท หริเต, สทฺทลํ, ปรโลโป. มูล ปติฏฺฐายํ, มุลาลํ, รสฺสตฺตํ. พิล นิสฺสเย, พิลาลํ. วิท สตฺตายํ, วิทาลํ. จฑิ จณฺฑิกฺเก, จณฺฑาโล, ทีฆตฺตํ. วา คติคนฺธเนสุ, วาลํ. วส อจฺฉาทเน, วสโล. ปจิ วิตฺถาเร, ปจโล, ปญฺจาโล[Pg.417], ปญฺจนฺนํ ราชูนํ อลนฺติปิ ปญฺจาโล. มจ โจเร, มจโล. มุส เถยฺเย, มุสโล. 'कद' (मद अर्थ में) से 'कदलं'। 'भगन्द' (सेचन अर्थ में) से 'भगन्दलं'। 'मेख' (कटि-विचित्र अर्थ में) से 'मेखलं' या 'मेखला'। 'वक्क' (वृक्ष की छाल अर्थ में) से 'वक्कलं'। 'तक्क' (वृक्ष-श्लेष अर्थ में) से 'तक्कलं'। 'पल्ल' (निम्न स्थान अर्थ में) से 'पल्लं'। 'सद्द' (हरित अर्थ में) से 'सद्दलं', पर-लोप। 'मूल' (प्रतिष्ठा अर्थ में) से 'मुलालं', ह्रस्वत्व। 'बिल' (निश्रय अर्थ में) से 'बिलालं'। 'विद' (सत्ता अर्थ में) से 'विदालं'। 'चडि' (चण्डिक्क अर्थ में) से 'चण्डालो', दीर्घत्व। 'वा' (गति और गन्धन अर्थ में) से 'वालं'। 'वस' (आच्छादन अर्थ में) से 'वसलो'। 'पचि' (विस्तार अर्थ में) से 'पचलो', 'पञ्चालो'; पाँच राजाओं के लिए पर्याप्त होने से भी 'पञ्चालो'। 'मच' (चोर अर्थ में) से 'मचलो'। 'मुस' (स्तेय अर्थ में) से 'मुसलो'। โคตฺถุ วํเส, โคตฺถุโล. ปุถุ วิตฺถาเร, ปุถุโล. พหุ สงฺขฺยาเน, พหุลํ, ปรโลโป. ยทา ปน ลา อาทาเน อิติ ธาตุ, ตทา โคตฺถุํ ลาตีติ โคตฺถุโล. เอวํ ปุถุโล, พหุลํ. 'गोत्थु' (वंश अर्थ में) से 'गोत्थुलो'। 'पुथु' (विस्तार अर्थ में) से 'पुथुलो'। 'बहु' (संख्यान अर्थ में) से 'बहुलं', पर-लोप। जब 'ला' (आदान अर्थ में) धातु हो, तब 'गोत्थु' को ग्रहण करता है, इसलिए 'गोत्थुलो'। इसी प्रकार 'पुथुलो', 'बहुलं'। มงฺค มงฺคลฺเย, มงฺคลํ. พห วุทฺธิมฺหิ, พหลํ. กมฺพ สญฺจลเน, กมฺพลํ. สพิ มณฺฑเล, สมฺพลํ, นิคฺคหีตาคโม, สพโล วา. อคฺค คติโกฏิลฺเล, อคฺคลํ. มฑิ ภูสายํ, มณฺฑลํ. กุฑิ ทาเห, กุณฺฑลํ อิจฺจาทิ. 'मङ्ग' (मङ्गल अर्थ में) से 'मङ्गलं'। 'बह' (वृद्धि अर्थ में) से 'बहलं'। 'कम्ब' (संचलन अर्थ में) से 'कम्बलं'। 'सवि' (मण्डल अर्थ में) से 'सम्बलं', अनुस्वार का आगम, अथवा 'सबलो'। 'अग्ग' (गतिकौटिल्य अर्थ में) से 'अग्गलं'। 'मडि' (भूषा अर्थ में) से 'मण्डलं'। 'कुडि' (दाह अर्थ में) से 'कुण्डलं' इत्यादि। ๖๗๖. ปุถสฺส ปุถุปถาโม วา. ६७६. 'पुथ' के स्थान पर 'पुथु', 'पथ' और 'अम' (प्रत्यय) विकल्प से होते हैं। ปุถอิจฺเจตสฺส ธาตุสฺส ปุถุ ปถอิจฺเจเต อาเทสา โหนฺติ, อมปฺปจฺจโย จ โหติ วา, กฺวจตฺโถยํ วาสทฺโท. ปุถ วิตฺถาเร, ปตฺถฏาติ อตฺเถ กฺวิปฺปจฺจโย, อิมินา ปุถสฺส ปุถุปถาเทสา, กฺวิโลโป. อิตฺถิยํ อีปจฺจโย, ‘‘โอ สเร จา’’ติ สุตฺเต จสทฺเทน อวาเทโส, ปุถวี, ปถวี, ปธวี, ถสฺส วตฺตํ, อมปฺปจฺจเย ปถาเทโส, ปถโม. 'पुथ' इस धातु के स्थान पर 'पुथु' और 'पथ' ये आदेश होते हैं, और 'अम' प्रत्यय भी विकल्प से होता है, यहाँ 'वा' शब्द 'क्वचि' (कहीं-कहीं) के अर्थ में है। 'पुथ' (विस्तार अर्थ में), 'विस्तृत है' इस अर्थ में 'क्वि' प्रत्यय, इससे 'पुथ' को 'पुथु' और 'पथ' आदेश, 'क्वि' का लोप। स्त्रीलिंग में 'ई' प्रत्यय, 'ओ सरे च' सूत्र में 'च' शब्द से 'अव' आदेश होकर 'पुथवी', 'पथवी', 'पधवी', 'अम' प्रत्यय होने पर 'पथ' आदेश होकर 'पथमो' सिद्ध होता है। ๖๗๗. สสฺวาทีหิ ตุทโว. ६७७. 'ससु' आदि से 'तु' और 'दु' प्रत्यय होते हैं। สสุอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ตุ ทุอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. สสุ หึสาคตีสุ, ตุปฺปจฺจโย, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา ธาตฺวนฺตสฺส ตกาโร, สตฺตุ. ชน ชนเน, ชตฺตุ. ทท ทาเน, ททฺทุ กุฏฺฐวิเสโส. อท ภกฺขเณ, อทฺทุ. มทอุมฺมาเท, มทฺทุ อิจฺจาทิ. 'ससु' इत्यादि धातुओं से 'तु' और 'दु' ये प्रत्यय होते हैं। 'ससु' (हिंसा और गति अर्थ में), 'तु' प्रत्यय, 'क्वचि धातु' आदि सूत्र से धातु के अन्त्य वर्ण को तकार होकर 'सत्तु' (शत्रु)। 'जन' (जनन अर्थ में) से 'जत्तु'। 'दद' (दान अर्थ में) से 'दद्दु' (एक प्रकार का कुष्ठ)। 'अद' (भक्षण अर्थ में) से 'अद्दु'। 'मद' (उन्माद अर्थ में) से 'मद्दु' इत्यादि। ๖๗๘. ฌาทีหิ [Pg.418] อีวโร. ६७८. 'झा' (चि) आदि से 'ईवर' प्रत्यय होता है। จิปาธาอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ อีวรปฺปจฺจโย โหติ. จิ จเย, จียตีติ จีวรํ. ปา ปาเน, ปาตีติ ปีวโร ปีโน. ธา ธารเณ, ธีวโร เกวฏฺโฏ. 'चि', 'पा', 'धा' इत्यादि धातुओं से 'ईवर' प्रत्यय होता है। 'चि' (चयन अर्थ में), जो संचित किया जाता है वह 'चीवरं' है। 'पा' (पान अर्थ में), जो पीता है वह 'पीवरो' (पुष्ट)। 'धा' (धारण अर्थ में) से 'धीवरो' (केवट)। ๖๗๙. มุนาทีหิ จิ. ६७९. 'मुन' आदि से 'चि' प्रत्यय होता है। มุนาทีหิ ธาตูหิ อิปฺปจฺจโย โหติ, จสทฺเทน ปาฏิปทิเกหิ จ. มุน ญาเณ, มุนาตีติ มุนิ, วาธิการา น วุทฺธิ. ยต ยตเน, ยตตีติ ยติ. อคฺค คติโกฏิลฺเล, อคฺคิ. ปต คติมฺหิ, ปติ. สุจ โสจกมฺมนิ, สุจิ. รุจ ทิตฺติมฺหิ, รุจิ. อิส ปริเยสเน, สีลาทิคุเณ เอสตีติ อิสิ. กุ สทฺเท, กวิ, วุทฺธิ, อวาเทโส จ. รุ สทฺเท, รวิ, ทธิ, กุฏิ. อสุ เขปเน, อสิ. ราช ทิตฺติมฺหิ, ราชิ. คปุ, สปฺป คติมฺหิ, สปฺปิ. อจฺจ ปูชายํ, อจฺจิ. ชุต ทิตฺติมฺหิ, โชติ, นนฺทิ, ทีปิ, กิมิ, อการสฺส อิตฺตํ. ตมุ กงฺขายํ, ติมิ. พุธ โพธเน, พุชฺฌตีติ โพธิ. กส วิเลขเน, กสิ. กปิ จลเน, กปิ, กลิ, พลิ, มสิ, ธนิ, หริ, อริ, คิริ อิจฺจาทโย. मनादि धातुओं से 'इ' प्रत्यय होता है, और 'च' शब्द के ग्रहण से प्रातिपदिकों से भी। 'मुन' ज्ञान के अर्थ में, जो जानता है वह 'मुनि' है, 'वा' के अधिकार से वृद्धि नहीं होती। 'यत' यत्न करने के अर्थ में, जो यत्न करता है वह 'यति' है। 'अग्ग' गति और कुटिलता के अर्थ में, 'अग्गि' (अग्नि)। 'पत' गति के अर्थ में, 'पति'। 'सुच' शोक के अर्थ में, 'सुचि'। 'रुच' दीप्ति के अर्थ में, 'रुचि'। 'इस' अन्वेषण के अर्थ में, जो शील आदि गुणों को खोजता है वह 'इसि' (ऋषि) है। 'कु' शब्द करने के अर्थ में, 'कवि', वृद्धि और 'अव्' आदेश होता है। 'रु' शब्द करने के अर्थ में, ' ravi', 'दधि', 'कुटि'। 'असु' क्षेपण के अर्थ में, 'असि' (तलवार)। 'राज' दीप्ति के अर्थ में, 'राजि'। 'गपु', 'सप्प' गति के अर्थ में, 'सप्पि' (घी)। 'अच्च' पूजा के अर्थ में, 'अच्चि' (ज्वाला)। 'जुट' दीप्ति के अर्थ में, 'जोति' (ज्योति), 'नन्दि', 'दीपि', 'किमि', अकार को इत्व (इ होना)। 'तमु' आकांक्षा के अर्थ में, 'तिमि'। 'बुध' बोध के अर्थ में, जो जानता है वह 'बोधि'। 'कस' विलेखन (जोतने) के अर्थ में, 'कसि'। 'कपि' चलन के अर्थ में, 'कपि', 'कलि', 'बलि', 'मसि', 'धनि', 'हरि', 'अरि', 'गिरि' इत्यादि। ปาฏิปทิกโต ปน มหาลิ, ภทฺทาลิ, มณิ, อรณิ, ตรณิ, ธรณิ, สรณิ, ธมณิ, อวนิ, อสนิ, วสนิ อิจฺจาทิ. प्रातिपदिक से तो 'महालि', 'भद्दालि', 'मणि', 'अरणि', 'तरणि', 'धरिणि', 'सरणि', 'धमणि', 'अवनि', 'असनि', 'वसनि' इत्यादि। ๖๘๐. วิทาทีหฺยูโร. ६८०. विदादि धातुओं से 'ऊर' प्रत्यय होता है। วิทอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ อูรปฺปจฺจโย โหติ. วิท ลาเภ, วนฺทิตุํ อลํ อนาสนฺนตฺตาติ อตฺเถ อูรปฺปจฺจโย. วิทูโร, วิชฺชูโร วา, วิทูเร ชาโต เวทูโร มณิ. วล, วลฺล [Pg.419] สาธารณพนฺธเนสุ, วลฺลูโร. มส อามสเน, มสูโร. สิท สิงฺคาเร, สินฺทูโร, นิคฺคหีตาคโม. ทุ คติมฺหิ, ทูโร. กุ สทฺเท, กูโร. กปุ หึสาตกฺกลคนฺเธสุ, กปฺปูโร, ทฺวิตฺตํ. มย คติมฺหิ, มยูโร, มหิยํ รวตีติ วา มยูโรติ. 'विद' इत्यादि धातुओं से 'ऊर' प्रत्यय होता है। 'विद' लाभ के अर्थ में, 'वन्दितुं अलं अनासन्नत्ता' (निकट न होने के कारण वन्दना के योग्य) इस अर्थ में 'ऊर' प्रत्यय होकर 'विदूरो' या 'विज्जूरों' बनता है; विदूर में उत्पन्न 'वेदूरो' मणि। 'वल', 'वल्ल' साधारण बन्धन के अर्थ में, 'वल्लूरों'। 'मस' आमर्शन (स्पर्श) के अर्थ में, 'मसूरों'। 'सिद' शृंगार के अर्थ में, 'सिन्दूरों', निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम। 'दु' गति के अर्थ में, 'दूरो'। 'कु' शब्द करने के अर्थ में, 'कूरो'। 'कपु' हिंसा, तर्क और गन्ध के अर्थ में, 'कप्पूरों' (कर्पूर), द्वित्व। 'मय' गति के अर्थ में, 'मयूरों', अथवा जो पृथ्वी पर शब्द करता है वह 'मयूरों' है। ‘‘วณฺณาคโม วณฺณวิปริยโย จ,ทฺเว จาปเร วณฺณวิการนาสา; ธาตุสฺส จตฺถาติสเยน โยโค,ตทุจฺจเต ปญฺจวิธํ นิรุตฺต’’นฺติ – "वर्ण का आगम, वर्ण का विपर्यय, और दो अन्य वर्ण-विकार और वर्ण-नाश; धातु का अर्थ के अतिशय के साथ योग, इसे पाँच प्रकार का निरुक्त कहा जाता है।" วุตฺตนิรุตฺติลกฺขณานุสาเรน ‘‘เตสุ วุทฺธี’’ติอาทินา, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา จ รูปสิทฺธิ เวทิตพฺพา. कहे गए निरुक्त के लक्षणों के अनुसार 'तेसु वुद्धि' इत्यादि और 'क्वचि धातु' इत्यादि सूत्रों से रूपसिद्धि जाननी चाहिए। อุทิ ปสวนกฺเลทเนสุ, อุนฺทิตุมลํ สมตฺโถติ อุนฺทูโร. ขชฺช ภกฺขเณ, ขาทิตุํ อลนฺติ ขชฺชูโร. กุร อกฺโกเส, อกฺโกสิตุมลนฺติ กุรูโร. สุ หึสายํ, สูโร. 'उदि' प्रसव और क्लेदन के अर्थ में, 'उन्दितुं अलं' (गीला करने में समर्थ) वह 'उन्दूरो' (चूहा)। 'खज्ज' भक्षण के अर्थ में, 'खादितुं अलं' वह 'खज्जूरों'। 'कुर' आक्रोश के अर्थ में, 'अक्कोसितुं अलं' वह 'कुरूरों' (क्रूर)। 'सु' हिंसा के अर्थ में, 'सूरो'। ๖๘๑. หนาทีหิ ณุนุตโว. ६८१. हनादि धातुओं से 'णु', 'नु' और 'तु' प्रत्यय होते हैं। หนอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ ณุ นุ ตุอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. ณุปฺปจฺจเย หน หึสาคตีสุ, หนตีติ หณุ. ชน ชนเน, ชายตีติ ชาณุ, ธาตฺวนฺตโลโป, ทีโฆ. ภา ทิตฺติมฺหิ, ภาตีติ ภาณุ. ริ สนฺตาเน, รยตีติ เรณุ รโช. ขนุ อวทารเณ, ขนฺติ, ขญฺญตีติ วา ขาณุ. อม คตฺยาทีสุ, อมตีติ อณุ, ธาตฺวนฺตโลโป. 'हन' इत्यादि धातुओं से 'णु', 'नु', 'तु' ये प्रत्यय होते हैं। 'णु' प्रत्यय में: 'हन' हिंसा और गति के अर्थ में, जो मारता है वह 'हणु' (ठोड़ी)। 'जन' जनन के अर्थ में, जो उत्पन्न होता है वह 'जाणु' (घुटना), धातु के अन्त का लोप और दीर्घ। 'भा' दीप्ति के अर्थ में, जो चमकता है वह 'भाणु' (सूर्य)। 'रि' सन्तान के अर्थ में, जो फैलता है वह 'रेणु' (धूल)। 'खनु' अवदारण के अर्थ में, 'खन्ति' (क्षान्ति), अथवा जो खोदा जाता है वह 'खाणु' (ठूँठ)। 'अम' गति आदि के अर्थ में, जो चलता है वह 'अणु', धातु के अन्त का लोप। นุปฺปจฺจเย – เว ตนฺตสนฺตาเน, วายตีติ เวนุ, เวณุ วา. เธ ปาเน, ธายติ วจฺฉํ ปาเยตีติ เธนุ, ภาตีติ ภานุ. 'नु' प्रत्यय में - 'वे' तन्तु के विस्तार के अर्थ में, जो बुनता है वह 'वेनु' या 'वेणु' (बाँस)। 'धे' पान के अर्थ में, जो बछड़े को दूध पिलाती है वह 'धेनु', जो चमकता है वह 'भानु'। ตุปฺปจฺจเย [Pg.420] – ธา ธารเณ, กฺริยํ, ลกฺขณํ วา ธาเรตีติ ธาตุ. สิ พนฺธเน, สียติ พนฺธียตีติ เสตุ. กี ธนวิโยเค, กิ อุนฺนติมฺหิ, อุทฺธํ คจฺฉตีติ เกตุ. หิ คติมฺหิ, หิโนตีติ เหตุ. ชน ชนเน, ชายตีติ ชนฺตุ. ตนุ วิตฺถาเร, ตโนตีติ ตนฺตุ. วส นิวาเส, วสติ เอตฺถ ผลํ ตทายตฺตวุตฺติตายาติ วตฺถุ, ‘‘กฺวจิ ธาตู’’ติอาทินา สตการสํโยคสฺส ตฺถาเทโส. 'तु' प्रत्यय में - 'धा' धारण करने के अर्थ में, जो क्रिया या लक्षण को धारण करता है वह 'धातु'। 'सि' बन्धन के अर्थ में, जो बाँधा जाता है वह 'सेतु'। 'की' धन के वियोग के अर्थ में, 'कि' उन्नति के अर्थ में, जो ऊपर जाता है वह 'केतु'। 'हि' गति के अर्थ में, जो जाता है वह 'हेतु'। 'जन' जनन के अर्थ में, जो उत्पन्न होता है वह 'जन्तु'। 'तनु' विस्तार के अर्थ में, जो फैलता है वह 'तन्तु'। 'वस' निवास के अर्थ में, जहाँ फल निवास करता है वह 'वत्थु' (वस्तु), 'क्वचि धातु' इत्यादि सूत्र से 'स' और 'त' के संयोग को 'त्थ' आदेश। ๖๘๒. กุฏาทีหิโฐ. ६८२. कुटादि धातुओं से 'ठ' प्रत्यय होता है। กุฏาทีหิ ธาตูหิ ฐปฺปจฺจโย โหติ. กุฏ เฉทเน, กุฏติ ฉินฺทตีติ กุฏฺโฐ พฺยาธิ. กุส เฉทนปูรณคนฺเธสุ, กุสตีติ โกฏฺโฐ อุทรํ, ธาตฺวนฺตโลปทฺวิตฺตานิ. กฏมทฺทเน, กฏติ มทฺทตีติ กฏฺฐํ. กณ นิมีลเน, กณฺโฐ. कुटादि धातुओं से 'ठ' प्रत्यय होता है। 'कुट' छेदन के अर्थ में, जो काटता है वह 'कुट्ठो' (कुष्ठ) व्याधि। 'कुस' छेदन, पूरण और गन्ध के अर्थ में, 'कोट्ठो' (कोष्ठ) उदर, धातु के अन्त का लोप और द्वित्व। 'कट' मर्दन के अर्थ में, जो मर्दन करता है वह 'कट्ठं' (काष्ठ)। 'कण' निमीलन के अर्थ में, 'कण्ठो'। ๖๘๓. มนุปูรสุณาทีหิ อุสฺสนุสิสา. ६८३. मनु, पूर, सुण आदि धातुओं से 'उस्स', 'नुस' और 'इस' प्रत्यय होते हैं। มนุ ปูร สุณอิจฺเจวมาทีหิ ธาตูหิ, ปาฏิปทิเกหิ จ อุสฺสนุสอิสอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. 'मनु', 'पूर', 'सुण' इत्यादि धातुओं से और प्रातिपदिकों से 'उस्स', 'नुस', 'इस' ये प्रत्यय होते हैं। มนุ โพธเน, อุสฺส นุสา, มนเต ชานาตีติ มนุสฺโส, มานุโส วา, ธาตฺวนฺตสฺส อาตฺตํ. 'मनु' बोध के अर्थ में, 'उस्स' और 'नुस' प्रत्यय, जो जानता है वह 'मनुस्सो' (मनुष्य) या 'मानुसो', धातु के अन्त को 'आ' होना। ปูร ทานปูรเณสุ, ปูรตีติ ปุริโส, รสฺสตฺตํ, โปโส, รการิการานํ โลโป, วุทฺธิ จ, ปุเร อุจฺเจ ฐาเน เสตีติ ปุริโส. 'पूर' दान और पूरण के अर्थ में, जो पूर्ण करता है वह 'पुरिसो' (पुरुष), ह्रस्व होना, 'पोसो' (पोष), 'र' और 'इ' का लोप और वृद्धि, अथवा जो 'पुर' (ऊँचे स्थान) में शयन करता है वह 'पुरिसो'। สุณ หึสากุลสนฺธาเนสุ, สุณติ กุลํ สนฺทหตีติ สุณิสา. กุ กุจฺฉิเต, กวียตีติ กรีสํ มลํ, กุสฺส [Pg.421] กรตฺตํ, ทีโฆ จ. สุ หึสายํ, อนฺธการวิธมเนน สตฺตานํ ภยํ หึสตีติ สูริโย, รการาคโม, สการสฺส ยตฺตญฺจ. มห ปูชายํ, มหตีติ มหิโส, มหิยํ เสตีติปิ มหิโส. สิ พนฺธเน, สียติ พนฺธียตีติ สีสํ อิจฺจาทิ. 'सुण' हिंसा और कुल के सन्धान के अर्थ में, जो कुल को जोड़ती है वह 'सुणिसा' (पुत्रवधू)। 'कु' कुत्सित के अर्थ में, जो किया जाता है वह 'करीसं' (मल), 'कु' को 'कर' होना और दीर्घ। 'सु' हिंसा के अर्थ में, अन्धकार के विनाश द्वारा जो प्राणियों के भय को नष्ट करता है वह 'सूरियो' (सूर्य), 'र' कार का आगम और 'स' कार को 'य' होना। 'मह' पूजा के अर्थ में, जो पूजनीय है वह 'महिसो' (भैंसा), अथवा जो 'महि' (पृथ्वी) पर सोता है वह भी 'महिसो'। 'सि' बन्धन के अर्थ में, जो बाँधा जाता है वह 'सीसं' (सिर) इत्यादि। ๖๘๔. อกฺขเรหิ การ. ६८४. अक्षरों से 'कार' प्रत्यय होता है। อกฺขเรหิ อกฺขรวาจเกหิ วณฺเณหิ การปฺปจฺจโย โหติ. ตทฺธิตาทิสุตฺเต จคฺคหเณน นามพฺยปเทเส สฺยาทฺยุปฺปตฺติ, อกาโร, อการํ, อกาเรน อิจฺจาทิ, อากาโร, โอกาโร, กกาโร, ยกาโร, หกาโร, ฬกาโร. เอวการาทีสุ ปน กรียติ อุจฺจารียตีติ กาโร สทฺโท, เอว จ โส กาโร จาติ เอวกาโร. เอวํ ธิกาโร, หุํกาโร, สาธุกาโร. अक्षरों अर्थात् अक्षरवाचक वर्णों से 'कार' प्रत्यय होता है। 'तद्धितादि' सूत्र में 'च' के ग्रहण से नाम की संज्ञा होने पर 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है - 'अकारो', 'अकारं', 'अकारेण' इत्यादि, 'आकारो', 'ओकारो', 'ककारो', 'यकारो', 'हकारो', 'ḷakāro'। 'एवकार' आदि में तो 'करीयति' (उच्चारण किया जाता है) इस अर्थ में 'कारो' शब्द है, 'एव' ही वह 'कार' है इसलिए 'एवकारो'। इसी प्रकार 'धिकारो', 'हुंकारो', 'साधुकारो'। อิกาโร ธาตุนิทฺเทเส, วิกรณนฺธิโตติ จ; ภวนฺเตตฺถ คมิสฺสาทิ, หนตฺยาทีติ ญาปกา. धातु के निर्देश में, विकरण और सन्धि में 'इ' कार होता है; यहाँ 'गमिस' आदि और 'हनति' आदि ज्ञापक होते हैं। อุณาทิปฺปจฺจยนฺตนโย. उणादि प्रत्ययान्त का नियम समाप्त। ตพฺพาที ณาทโย นิฏฺฐา, ตเว ตุนาทโย ตถา; มานนฺตาทิ อุณาทีติ, ฉทฺธา กิตกสงฺคโห. 'तब्ब' आदि, 'णा' आदि, 'निष्ठा', 'तवे-तुन' आदि, 'मान-अन्त' आदि और 'उणादि' - इस प्रकार कृदन्त का संग्रह छह प्रकार का है। อิติ ปทรูปสิทฺธิยํ กิพฺพิธานกณฺโฑ इस प्रकार पदरूपसिद्धि में कृद्विधान काण्ड। สตฺตโม. सातवाँ। นิคมน उपसंहार। สนฺธิ นามํ การกญฺจ, สมาโส ตทฺธิตํ ตถา; อาขฺยาตํ กิตกํ กณฺฑา, สตฺติเม รูปสิทฺธิยํ. सन्धि, नाम, कारक, समास, तद्धित, आख्यात और कृदन्त - ये सात काण्ड 'रूपसिद्धि' में हैं। เตธา สนฺธึ จตุทฺธา ปทมปิ จตุธา ปญฺจธา นามิกญฺจ,พฺยาสา ฉกฺการกํ ฉสฺสมสนมปิ ฉพฺเภทโต ตทฺธิตญฺจ; อาขฺยาตํ อฏฺฐธา ฉพฺพิธมปิ กิตกํ ปจฺจยานํ ปเภทา,ทีเปนฺตี รูปสิทฺธี จิรมิธ ชนตาพุทฺธิวุฑฺฒึ กโรตุ. तीन प्रकार की संधि, चार प्रकार के पद, चार और पाँच प्रकार के नामिक, विस्तार से छह प्रकार के कारक, छह प्रकार के समास और छह प्रकार के तद्धित; आठ प्रकार के आख्यात और प्रत्ययों के भेदों के अनुसार छह प्रकार के कृदन्त को प्रकाशित करने वाली यह 'रूपसिद्धि' यहाँ चिरकाल तक जन-मानस की बुद्धि की वृद्धि करे। วิขฺยาตานนฺทเถรวฺหยวรคุรุนํ ตมฺพปณฺณิทฺธชานํ,สิสฺโส ทีปงฺกราขฺยทฺทมิฬวสุมตี ทีปลทฺธปฺปกาโส; พาลาทิจฺจาทิวาสทฺวิตยมธิวสํ สาสนํ โชตยี โย,โสยํ พุทฺธปฺปิยวฺโห ยติ อิมมุชุกํ รูปสิทฺธึ อกาสิ. ताम्रपर्णी के ध्वज स्वरूप, विख्यात आनन्द थेर नामक श्रेष्ठ गुरु के शिष्य, द्रविड़ देश और द्वीप में प्रसिद्धि प्राप्त दीपांकर नामक यति, जिन्होंने बालादित्य आदि दो विहारों में रहते हुए शासन को प्रकाशित किया, उन्हीं बुद्धप्रिय नामक यति ने इस सरल 'रूपसिद्धि' की रचना की। อิติ ปทรูปสิทฺธิปกรณํ นิฏฺฐิตํ. इस प्रकार पदरूपसिद्धि प्रकरण समाप्त हुआ। | |||
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| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
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| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |