| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
1 นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส त्या भगवंत, अर्हत, सम्यक्संबुद्धाला माझा नमस्कार असो. สทฺทนีติปฺปกรณํ सद्दनीति-प्रकरण ธาตุมาลา धातुमाला ๑๕. สรวคฺคปญฺจกนฺติก สุทฺธสฺสรธาตุ १५. सरवग्गपंचकन्तिक शुद्धस्वरधातु อิโต [Pg.1] ปรํ ตุ สรโต, กการนฺตาทิเภทโต; ธาตุโย ธาตุนิปฺผนฺน-รูปานิ วิวิธานิ จ. यापुढे स्वरांच्या क्रमाने आणि 'क' कारादी (क-कार अंत असलेल्या) भेदांनुसार, विविध धातू आणि धातूंपासून निष्पन्न होणारी विविध रूपे (सांगितली जातील). สาฏฺฐกเถ ปิฏกมฺหิ, ชินปาเฐ ยถาพลํ; นยํ อุปปริกฺขิตฺวา, สมาเสน กเถสฺส’หํ. अट्ठकथांसह त्रिपिटकात आणि जिनपाठात (बुद्धांच्या वचनांत) असलेल्या पद्धतीचे यथाशक्ती परीक्षण करून, मी संक्षेपाने (ते) सांगणार आहे. อิ คติยํ. เยสํ ธาตูนํ คติอตฺโถ, พุทฺธิปิ เตสํ อตฺโถ. ปวตฺติปาปุณานิปิ. ตตฺร คมนํ ทุวิธํ กายคมนํ ญาณคมนญฺจ. เตสุ กายคมนํ นาม อิริยาปถคมนํ, ญาณคมนํ นาม ญาณุปฺปตฺติ, ตสฺมา ปโยคานุรูเปน ‘‘คจฺฉตี’’ติ ปทสฺส ‘‘ชานาตี’’ติปิ อตฺโถ ภวติ, ‘‘ปวตฺตตี’’ติปิ อตฺโถ ภวติ, ‘‘ปาปุณาตี’’ติปิ อตฺโถ ภวติ, อิริยาปถคมเนน คจฺฉตีติปิ อตฺโถ ภวติ, ญาณคมเนน คจฺฉตีติปิ อตฺโถ ภวติ. ตถา หิ ‘‘สีฆํ คจฺฉตี’’ติอาทีสุ อิริยาปถคมนํ ‘‘คมน’’นฺติ วุจฺจติ. สุนฺทรํ นิพฺพานํ คโต. ‘‘คติมา’’ติอาทีสุ [Pg.2] ปน ญาณคมนํ. เอวํ สพฺเพสมฺปิ คตฺยตฺถานํ ธาตูนํ ยถาปโยคํ อตฺโถ คเหตพฺโพ. 'इ' (धातू) गमन (गती) अर्थात आहे. ज्या धातूंचा अर्थ गती (गमन) आहे, त्यांचा अर्थ बुद्धी (ज्ञान) देखील आहे, तसेच प्रवृत्ती (अस्तित्व/चालू राहणे) आणि प्राप्ती (मिळवणे) देखील आहे. त्यामध्ये गमन दोन प्रकारचे आहे: कायिक गमन (शारीरिक गमन) आणि ज्ञानगमन. त्यापैकी कायिक गमन म्हणजे इरियापथगमन (शारीरिक हालचालींचे गमन) आणि ज्ञानगमन म्हणजे ज्ञानाची उत्पत्ती. म्हणूनच, प्रयोगाच्या (वापराच्या) अनुरूप 'गच्छति' (जातो) या पदाचा अर्थ 'जानाति' (जाणतो) असाही होतो, 'पवत्तति' (प्रवृत्त होतो/चालतो) असाही होतो, आणि 'पापुणाति' (प्राप्त करतो) असाही होतो. इरियापथगमनाने 'गच्छति' (जातो) असाही अर्थ होतो आणि ज्ञानगमनाने 'गच्छति' (जाणतो/जातो) असाही अर्थ होतो. तसेच 'सीघं गच्छति' (वेगाने जातो) इत्यादींमध्ये इरियापथगमनाला 'गमन' म्हटले जाते. 'सुन्दरं निब्बानं गतो' (सुंदर निर्वाणाला गेला). परंतु 'गतिमंत' (गतीमान) इत्यादींमध्ये ज्ञानगमन अभिप्रेत आहे. अशा प्रकारे, गत्यर्थक (गती अर्थ असलेल्या) सर्वच धातूंचा अर्थ त्यांच्या प्रयोगाच्या गरजेनुसार ग्रहण केला पाहिजे. ตสฺสิมานิ รูปานิ ภวนฺติ – อิติ, เอติ, อุเทติ. การิเต ‘‘อุทายตี’’ติ รูปํ ภวติ. อุฏฺฐาเปตีติ หิ อตฺโถ, ทุกาโร อาคโม. อุเปติ, สมุเปติ, เวติ, อเปติ, อเวติ, อนฺเวติ, สเมติ, อภิสเมติ, สมโย, อภิสมโย, อีทิ, อุทิ, เอโกทิ, ปณฺฑิโต, อิโต, อุทิโต, อุเปโต, สมุเปโต, อนฺวิโต, อเปโต, สเมโต, เอตพฺโพ, ปจฺเจตพฺโพ, ปฏิยมาโน, ปฏิจฺโจ, เอนฺโต, อธิปฺเปโต, อธิปฺปาโย, ปจฺจโย, อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. ‘‘อิตา, อิต’’นฺติอาทินา ยถารหํ อิตฺถินปุํสกวเสนปิ. ปจฺเจตุํ, อุเปตุํ, สมุเปตุํ, อนฺเวตุํ, สเมตุํ, อภิสเมตุํ, อิจฺจ, ปฏิจฺจ, สเมจฺจ, อภิสเมจฺจ, อเปจฺจ, อุเปจฺจ, ปฏิมุขํ อิตฺวา, อิตฺวาน, อุเปตฺวา, อุเปตฺวาน, อุเปตุน, อญฺญานิปิ พุทฺธวจนานุรูปโต โยเชตพฺพานิ. त्याचे ही रूपे होतात – इति, एति, उदेति. कारित (प्रयोजक) मध्ये 'उदायात' (उदायति) असे रूप होते. 'उट्ठापेति' (उठवतो/जागृत करतो) हाच याचा अर्थ आहे, आणि 'दु' कार हा आगम आहे. उपेति, समुपेति, वेति, अपेति, अवेति, अन्वेति, समेति, अभिसमेति, समयो, अभिसमयो, ईदि, उदि, एकोदि, पण्डितो, इतो, उदितो, उपेतो, समुपेतो, अन्वितो, अपेतो, समेतो, एतब्बो, पच्चेतब्बो, पटियमनो, पटिच्चो, एन्तो, अधिप्रेतो, अधिप्यायो, पच्चयो, आणि इतरही योजावेत. 'इता, इतं' इत्यादींद्वारे योग्यतेनुसार स्त्रीलिंग आणि नपुंसकलिंगाच्या रूपाने देखील. पच्चेतुं, उपेतुं, समुपेतुं, अन्वेतुं, समेतुं, अभिसमेतुं, इच्च, पटिच्च, समेच्च, अभिसमेच्च, अपेच्च, उपेच्च, पटिमुखं इत्वा, इत्वान, उपेत्वा, उपेत्वान, उपेतुन, आणि इतरही बुद्धवचनांच्या अनुरूप योजावेत. อิติอิติ กฺริยาสทฺโท, สุตฺตนฺเตสุ น ทิสฺสติ; อิทเมตฺถ น วตฺตพฺพํ, ทสฺสนาเยว เม รุโต. "'इति' हा क्रियावाचक शब्द सूत्रांमध्ये (सुत्तन्तांमध्ये) दिसत नाही" – असे येथे म्हणू नये, कारण माझ्या पाहण्यात (किंवा ऐकण्यात) तो आलेला आहे. ‘‘อิตายํ โกธรูเปน’’, อิติ ปาฬิ หิ ทิสฺสติ; องฺคุตฺตรนิกายมฺหิ, มุนินาหจฺจ ภาสิตา; कारण "इतायं कोधरूपेन" अशी पाळी (पाठांतर) अंगुत्तरनिकायमध्ये दिसते, जी मुनींनी (बुद्धांनी) स्वतः भाषिली आहे. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา องฺคุตฺตรนิกาเย โกธํ นินฺทนฺเตน – कारण भगवंतांनी अंगुत्तरनिकायमध्ये क्रोधाची निंदा करताना असे म्हटले आहे – ‘‘อิตายํ โกธรูเปน, มจฺจุเวโส คุหาสโย; ตํ ทเมน สมุจฺฉินฺเท, ปญฺญาวีริเยน ทิฏฺฐิยา’’ติ. "हा क्रोधरूपी मृत्यूचा वेष धारण करून गुहेत (हृदयात) राहणारा आहे; त्याला दमाने (आत्मसंयमाने), प्रज्ञेने, वीर्याने (प्रयत्नाने) आणि सम्यक् दृष्टीने समूळ नष्ट करावे." ตตฺร อิตายนฺติ อิติ อยนฺติ เฉโท. อิติอิติ จ คจฺฉติ ปวตฺตตีติ อตฺโถ. อยํ ปเนตฺถ สุตฺตปทตฺโถ – โย [Pg.3] โทโส โลเก ‘‘โกโธ’’ติ โลกิยมหาชเนน วุจฺจติ, นายํ อตฺถโต โกโธติ วตฺตพฺโพ. กินฺติ ปน วตฺตพฺโพ, เอโส หิ สรีรสงฺขาตคุหาสโย มจฺจุราชา เอว โกธวเสน ปมทฺทนฺโต สตฺตสนฺตาเน คจฺฉตีติ วตฺตพฺโพ. ตํ เอวรูปํ ‘‘มจฺจุราชา’’ติ วตฺตพฺพํ พหุโน ชนสฺส อนตฺถกรํ โกธํ หิตกาโม ทเมน ปญฺญาย วีริเยน ทิฏฺฐิยา จ ฉินฺเทยฺยาติ. तेथे 'इतायं' म्हणजे 'इति अयं' असा विग्रह (छेद) आहे. आणि 'इति' म्हणजे 'गच्छति' (जातो) किंवा 'पवत्तति' (प्रवृत्त होतो) असा अर्थ आहे. येथे या सुत्तपदाचा अर्थ असा आहे – ज्या दोषाला जगात लौकिक महाजनांद्वारे 'क्रोध' म्हटले जाते, तो अर्थाच्या दृष्टीने केवळ क्रोधच म्हटला जाऊ नये. तर मग काय म्हटले पाहिजे? तो शरीराच्या रूपात असलेल्या गुहेत राहणारा मृत्यूराजच आहे, जो क्रोधाच्या रूपाने प्राण्यांच्या संतानाला (प्रवाहाला) चिरडत पुढे जातो, असे म्हटले पाहिजे. अशा प्रकारच्या, 'मृत्यूराज' म्हणता येण्याजोग्या आणि बहुसंख्य लोकांचे अनहित करणाऱ्या क्रोधाला, स्वतःचे हित इच्छिणाऱ्याने दमाने (संयमाने), प्रज्ञेने, वीर्याने आणि दृष्टीने (सम्यक् दृष्टीने) नष्ट करावे. เอตีติ อิมสฺส ปน อาคจฺฉตีติ อตฺโถ. ‘‘เอตี’’ติ เอตฺถ หิ อาอุปสคฺโค สนฺธิกิจฺเจน ปฏิจฺฉนฺนตฺตา น ปากโฏ วลาหกาวตฺถริโต ปุณฺณจนฺโท วิย. ตถา หิ เอตฺถ อา อิติ เอตีติ สนฺธิวิคฺคโห ภวติ, อาการสฺส จ อิกาเรน ปเรน สทฺธึเยว เอการาเทโส. ตสฺมา ‘‘อยํ โส สารถี เอติ. เอตุ เวสฺสนฺตโร ราชา’’ติอาทีสุ ‘‘อาคจฺฉติ, อาคจฺฉตู’’ติอาทินา อตฺโถ กเถตพฺโพ. พฺยากรณสตฺเถปิ หิ อา อิติ เอตีติ สนฺธิวิคฺคโห ทิสฺสติ, ตสฺมา อยมฺปิ นีติ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพา. อถ วา อิตีติ รสฺสวเสน วุตฺตํ ปทํ คมนํ โพเธติ, เอตีติ วุทฺธิวเสน วุตฺตํ ปน ยถาปโยคํ อาคมนาทีนิ. มตฺตาวเสนปิ หิ ปทานิ สวิเสสตฺถานิ ภวนฺติ. ตํ ยถา? สาสเน ปพฺพชิโต, รฏฺฐา ปพฺพาชิโตติ. สญฺโญคาสญฺโญควเสนปิ, ตํ ยถา? คามา นิคฺคจฺฉติ. ยสํ โปโส นิคจฺฉติ, ตสฺมา อยมฺปิ นีติ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพา. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – 'एति' याचा अर्थ 'आगच्छति' (येतो) असा आहे. 'एति' यामध्ये 'आ' हा उपसर्ग संधीच्या नियमामुळे झाकलेला असल्याने स्पष्ट दिसत नाही, जसा ढगांनी झाकलेला पूर्ण चंद्र दिसत नाही. कारण येथे 'आ + इति = एति' असा संधी-विग्रह होतो, आणि 'आ' काराचा पुढील 'इ' कारासोबत मिळून 'ए' कार असा एकादेश होतो. म्हणूनच, "अयं सो सारथी एति" (हा तो सारथी येत आहे), "एतु वेस्संतरो राजा" (राजा वेस्सांतर येवो) इत्यादींमध्ये 'आगच्छति' (येतो), 'आगच्छतु' (येवो) इत्यादी प्रकारे अर्थ सांगावा. व्याकरणशास्त्रामध्ये देखील 'आ + इति = एति' असा संधी-विग्रह दिसतो, म्हणून हा नियम देखील चांगल्या प्रकारे मनात ठेवला पाहिजे. किंवा, 'इति' हे र्हस्व स्वराने म्हटलेले पद 'गमन' (जाणे) दर्शवते, तर 'एति' हे वृद्धी (दीर्घ) स्वराने म्हटलेले पद प्रयोगाच्या गरजेनुसार 'आगमन' (येणे) इत्यादी दर्शवते. कारण मात्रांच्या फरकामुळे देखील पदांना विशेष अर्थ प्राप्त होतो. ते कसे? जसे – शासनात 'पब्बजितो' (प्रव्रजित झालेला), आणि राष्ट्रातून 'पब्बाजितो' (हद्दपार केलेला). तसेच संयोग आणि असंयोगाच्या फरकामुळे देखील; ते कसे? जसे – 'गामा निग्गच्छति' (गावातून बाहेर पडतो) आणि 'यसं पोसो निगच्छति' (मनुष्य कीर्तीला प्राप्त होतो). म्हणून हा नियम देखील चांगल्या प्रकारे मनात ठेवला पाहिजे. याविषयी असे म्हटले आहे – อิ คติยนฺติ กถิตา, ธาตุ วุทฺธึ คตา ยทา; ตทา อาคมนตฺถสฺส, วาจิกา ปายโต วสา. 'इ' हा धातू गमन (गती) अर्थात सांगितले आहे, जेव्हा तो वृद्धीला प्राप्त होतो (म्हणजे 'ए' होतो), तेव्हा तो बहुधा 'आगमन' (येणे) या अर्थाचा वाचक बनतो. อิริยาปถตฺถโต เห-สา นิจฺจาคมวาจิกา; ‘‘อยํ โส สารถี เอติ’’, อิจฺจาเทตฺถ นิทสฺสนํ. शारीरिक हालचालींच्या (इरियापथ) अर्थामध्ये हा धातू नेहमी 'आगमन' (येणे) दर्शवणारा असतो; "अयं सो सारथी एति" (हा तो सारथी येत आहे) इत्यादी याचे उदाहरण आहे. อนิริยาปถตฺเถน[Pg.4], วตฺตเน คมเนปิ จ; อาคมเน จ โหตีติ, ธีมา ลกฺเขยฺย ตํ ยถา. शारीरिक हालचालींशिवाय इतर (अनिरियापथ) अर्थामध्ये, हा धातू प्रवृत्ती (चालू राहणे), गमन (जाणे) आणि आगमन (येणे) या अर्थांतही होतो; बुद्धिमान माणसाने ते योग्य प्रकारे ओळखावे. ‘‘ปฏิจฺจ ผลเมตี’’ติ, เอวมาทีสุ วตฺตเน; วุทฺธิปฺปตฺตา อิการวฺหา, เอสา ธาตุ ปวตฺตติ. "पटिच्च फलमेति" (प्रत्यय/कारण अवलंबून फळ उत्पन्न होते) इत्यादींमध्ये प्रवृत्ती (उत्पन्न होणे/चालू राहणे) या अर्थात, वृद्धीला प्राप्त झालेला हा 'इ' कार नावाचा धातू प्रयुक्त होतो. ‘‘อตฺถเมนฺตมฺหิ สูริเย, วาฬา’’ อิจฺจาทีสุ ปน; คเต, ‘‘เอตีติ อิตี’’ติ-อาทิสฺวาคมเน สิยา. परंतु "अत्थमेन्तमहि सूरिये, वाळा" (सूर्य मावळतीला गेला असता, हिंस्र श्वापद...) इत्यादींमध्ये 'गेला' (गत) या अर्थात, आणि "एतीति इतीति" इत्यादींमध्ये 'आगमन' (येणे) या अर्थात तो असावा. ตถา หิ อีตีติ อนตฺถาย เอติ อาคจฺฉตีติ อีติ, อุปทฺทโว, อิติ อาคมนตฺโถ คเหตพฺโพ. อาห จ สุตฺตนิปาตฏฺฐกถายํ ‘‘เอตีติ อีติ, อาคนฺตุกานํ อกุสลภาคีนํ พฺยสนเหตูนํ เอตํ อธิวจน’’นฺติ. कारण 'ईति' म्हणजे अनहितासाठी जी येते (एति/आगच्छति) ती 'ईति' (आपत्ती/उपद्रव) होय; अशा प्रकारे येथे 'आगमन' हाच अर्थ ग्रहण केला पाहिजे. सुत्तनिपात-अट्ठकथेमध्ये देखील म्हटले आहे – "एति म्हणजे ईति; बाहेरून येणाऱ्या, अकुशल भागाच्या आणि विनाशाच्या कारणांचे हे नाव (अधिवचन) आहे." อิทานิ ยถารหํ นิปาตาขฺยาตนามิกปริยาปนฺนานํ อิติอิโต สทฺทานมตฺถุทฺธาโร วุจฺจเต – ตตฺถ อิติสทฺโท เหตุปริสมาปนาทิปทตฺถ วิปริยาย ปการาวธารณ นิทสฺสนาทิอเนกตฺถปฺปเภโท. ตถา เหส ‘‘รุปฺปตีติ โข ภิกฺขเว ตสฺมา รูปนฺติ วุจฺจตี’’ติอาทีสุ เหตุอตฺเถ ทิสฺสติ. ‘‘ตสฺมาติห เม ภิกฺขเว ธมฺมทายาทา ภวถ, มา อามิสทายาทา. อตฺถิ เม ตุมฺเหสุ อนุกมฺปา, กินฺติ เม สาวกา ธมฺมทายาทา ภเวยฺยุํ, โน อามิสทายาทา’’ติอาทีสุ ปริสมาปเน. ‘‘อิติ วา อิติ เอวรูปา วิสูกทสฺสนา ปฏิวิรโต’’ติอาทีสุ อาทิอตฺโถ. ‘‘มาคณฺฑิโยติ ตสฺส พฺราหฺมณสฺส สงฺขา สมญฺญา ปญฺญตฺติ โวหาโร นามํ นามกมฺมํ นามเธยฺยํ นิรุตฺติ พฺยญฺชนมภิลาโป’’ติอาทีสุ ปทตฺถวิปริยาเย. ‘‘อิติ โข ภิกฺขเว สปฺปฏิภโย พาโล, อปฺปฏิภโย ปณฺฑิโต. สอุปทฺทโว พาโล, อนุปทฺทโว [Pg.5] ปณฺฑิโต. สอุปสคฺโค พาโล, อนุปสคฺโค ปณฺฑิโต’’ติอาทีสุ ปกาโร. ‘‘อตฺถิ อิทปฺปจฺจยา ชรามรณนฺติ อิติ ปุฏฺเฐน สตา อาทนฺท อตฺถีติสฺส วจนียํ. กึ ปจฺจยา ชรามรณนฺติ อิติ เจ วเทยฺย, ชาติปจฺจยา ชรามรณนฺติ อิจฺจสฺส วจนีย’’นฺติอาทีสุ อวธารเณ. ‘‘อตฺถีติ โข กจฺจาน อยเมโก อนฺโต, นตฺถีติ โข กจฺจาน อยํ ทุติโย อนฺโต’’ติอาทีสุ นิทสฺสเน. นิปาตวเสเนว เต ปโยคา คเหตพฺพา. ‘‘อิตายํ โกธรูเปนา’’ติ เอตฺถ ปน อาขฺยาตวเสน คมเน อิติสทฺโท ทิสฺสติ. อยเมวตฺโถ อิธาธิปฺเปโต, นิปาตตฺโถ ปน น อิจฺฉิตพฺโพ, วิญฺญูนํ อตฺถคฺคหเณ โกสลฺลุปาทนตฺถํ เกวลํ อตฺถุทฺธารวเสน อาคโตติ ทฏฺฐพฺพํ. อิตโร ปน – आता योग्यतेनुसार निपात, आख्यात (क्रियापद) आणि नाम यांच्या अंतर्गत येणाऱ्या ‘इति’ आणि ‘इतो’ या शब्दांचा अर्थ-उद्धार (अर्थ स्पष्टीकरण) केला जात आहे – त्यापैकी ‘इति’ हा शब्द हेतू (कारण), परिसमापन (समाप्ती), इत्यादी, पदार्थाचा विपर्यास (बदल), प्रकार, अवधारण (निश्चय), निदर्शन (उदाहरण) इत्यादी अनेक अर्थांचे भेद दर्शवणारा आहे. जसे की, “रुप्पतीति खो भिक्खवे तस्मा रूपन्ति वुच्चती” (हे भिक्षूंनो, जे रूप पावले जाते म्हणून त्याला रूप म्हणतात) इत्यादींमध्ये तो हेतू (कारण) अर्थामध्ये दिसतो. “तस्मातिह मे भिक्खवे धम्मदायादा भवथ, मा आमिसदायादा. अत्थि मे तुम्हेसु अनुकम्पा, किन्ति मे सावका धम्मदायादा भवेय्युं, नो आमिसदायादा” (म्हणूनच, हे भिक्षूंनो, तुम्ही माझे धम्मदायाद व्हा, आमिषदायाद होऊ नका. माझी तुमच्यावर अनुकंपा आहे, की माझे श्रावक धम्मदायाद व्हावेत, आमिषदायाद नाही) इत्यादींमध्ये परिसमापन (समाप्ती) अर्थात आहे. “इति वा इति एवरूपा विसूकदस्सना पटिविरतो” (अशा प्रकारे किंवा अशा प्रकारे या प्रकारच्या तमाशा पाहण्यापासून विरत असलेला) इत्यादींमध्ये ‘इत्यादी’ (आदि) अर्थ आहे. “मागण्डियोति तस्स ब्राह्मणस्स सङ्खा समञ्ञा पञ्ञत्ति वोहारो नामं नामकम्मं नामधेय्यं निरुत्ति ब्यञ्जनमभिलापो” (मागंडिय हे त्या ब्राह्मणाचे नाव, संज्ञा, प्रज्ञप्ती, व्यवहार, नामकर्म, नामधेय, निरुक्ती, व्यंजन आणि अभिलाप आहे) इत्यादींमध्ये पदार्थाच्या विपर्यासात (पर्यायी अर्थात) आहे. “इति खो भिक्खवे सप्पटिभयो बालो, अप्पटिभयो पण्डितो. सौपद्दवो बालो, अनुपद्दवो पण्डितो. सौपसग्गो बालो, अनुपसग्गो पण्डितो” (अशा प्रकारे, हे भिक्षूंनो, बाल (मूर्ख) हा भययुक्त असतो, पंडित भयरहित असतो. बाल उपद्रवयुक्त असतो, पंडित उपद्रवरहित असतो. बाल उपसर्गयुक्त असतो, पंडित उपसर्गरहित असतो) इत्यादींमध्ये प्रकार अर्थात आहे. “अत्थि इदप्पच्चया जरामरणन्ति इति पुट्ठेन सता आदन्द अत्थीतिस्स वचनीयं. किं पच्चया जरामरणन्ति इति चे वदेय्य, जातिपच्चया जरामरणन्ति इच्चस्स वचनीयं” (या प्रत्ययामुळे (कारणामुळे) जरामरण आहे काय? असे विचारले असता, ‘आहे’ असे उत्तर द्यावे. जरामरण कशामुळे होते? असे विचारल्यास, ‘जातीमुळे (जन्मामुळे) जरामरण होते’ असे उत्तर द्यावे) इत्यादींमध्ये अवधारण (निश्चय) अर्थात आहे. “अत्थीति खो कच्चान अयमेको अन्तो, नत्थीति खो कच्चान अयं दुतियो अन्तो” (हे कच्चान, ‘आहे’ हा एक अंत आहे, ‘नाही’ हा दुसरा अंत आहे) इत्यादींमध्ये निदर्शन (उदाहरण) अर्थात आहे. हे प्रयोग निपाताच्या अर्थानेच ग्रहण केले पाहिजेत. परंतु “इतायं कोधरूपेना” येथे आख्याताच्या (क्रियापदाच्या) अर्थाने ‘गमन’ (जाणे) या अर्थात ‘इति’ शब्द दिसतो. हाच अर्थ येथे अभिप्रेत आहे, निपाताचा अर्थ येथे इच्छित नाही. विद्वानांना अर्थग्रहणात कौशल्य प्राप्त व्हावे म्हणून केवळ अर्थ-उद्धाराच्या दृष्टीने हा येथे आला आहे, असे समजावे. दुसरा (इतो शब्द) तर – คตฺยตฺเถ จิมสทฺทตฺเถ, อิโตสทฺโท ปวตฺตติ; อนฺวิโต’’ติ หิ คตฺยตฺเถ, ปจฺจตฺตวจนํ ภเว. ‘इतो’ हा शब्द गमन (जाणे) अर्थात आणि ‘इम’ (हा) शब्दाच्या अर्थात वापरला जातो; ‘अन्वितो’ (अनुसरण केलेला) हा गमन अर्थात प्रथमा विभक्तीचे (पच्चत्तवचन) रूप आहे. อิมสทฺทสฺส อตฺถมฺหิ, นิสฺสกฺกวจนํ ภเว; ‘‘อิโต สา ทกฺขิณา ทิสา’’, อิติอาทีสุ ปาฬิสุ. ‘इम’ शब्दाच्या अर्थात हा पंचमी विभक्तीचे (निस्सक्कवचन) रूप होतो; जसे की पाळीमध्ये “इतो सा दक्खिणा दिसा” (येथून ती दक्षिण दिशा आहे) इत्यादींमध्ये. คตฺยตฺโถ อิจฺฉิโต เอตฺถ, อิตรตฺโถ น อิจฺฉิโต; อตฺถุทฺธารวสา วุตฺโต, โกสลฺลตฺถาย วิญฺญุนํ. येथे गमन अर्थच अभिप्रेत आहे, इतर (दुसरा) अर्थ अभिप्रेत नाही; विद्वानांच्या कौशल्यासाठी केवळ अर्थ-उद्धाराच्या दृष्टीने हा सांगितला आहे. อิธ ปน สมยสทฺทสฺส อตฺถุทฺธารํ สนิพฺพจนํ วตฺตพฺพมฺปิ อวตฺวา อุปริ อยธาตุวิสเยเยว วกฺขาม อิ เอ อยธาตุวเสน ติธาตุมยตฺตา สมยสทฺทสฺส. ตตฺร อิตีติ อิการานนฺตรตฺยนฺตปทสฺส จ ‘‘เอติ, อุเทตี’’ติอาทีนญฺจ เอการานนฺตรตฺยนฺตปทานํ อญฺเญสญฺจ เอวรูปานํ ปทมาลา ยถารหํ เยภุยฺเยน อตฺตโนปทานิ วชฺเชตฺวา โยเชตพฺพา. อีทิเสสุ หิ ฐาเนสุ ทุกฺกรา กฺริยาปทมาลา. ยสฺมา ปน อิมสฺมึ ปกรเณ สุกรา จ ทุกฺกรา จ ตฺยนฺตปทมาลา ชานิตพฺพา[Pg.6], ตสฺมา ภูวาทิคณาทีสุ อฏฺฐสุ คเณสุ วิหิเตหิ ฉนฺนวุติยา วจเนหิ สพฺพสาธารณํ อสพฺพสาธารณญฺจ ปทมาลานยํ พฺรูม – परंतु येथे ‘समय’ शब्दाचा अर्थ-उद्धार निरुक्तीसह सांगणे आवश्यक असूनही ते न सांगता, पुढे ‘अय’ धातूच्या संदर्भातच सांगू, कारण ‘इ’ आणि ‘ए’ या ‘अय’ धातूच्या रूपांमुळे ‘समय’ शब्द हा त्रिधातुमय (तीन धातूंनी बनलेला) आहे. तेथे ‘इति’ या इ-कारान्त ‘ति’-प्रत्ययान्त पदाची आणि “एति, उदेति” इत्यादी ए-कारान्त ‘ति’-प्रत्ययान्त पदांची व इतर अशाच प्रकारच्या पदांची पदमाला (रूपांची मालिका) योग्यतेनुसार बहुतांश करून आत्मनेपद वगळून जोडली पाहिजे. कारण अशा ठिकाणी क्रियापदांची मालिका कठीण असते. परंतु या ग्रंथामध्ये सोपी आणि कठीण अशी ‘ति’-प्रत्ययान्त पदांची मालिका जाणून घेणे आवश्यक असल्याने, आम्ही भूवादी इत्यादी आठ गणांमध्ये विहित केलेल्या ९६ वचनांद्वारे सर्वसाधारण आणि असाधारण अशा पदमालेचा नियम सांगतो – อการานนฺตรตฺยนฺต-ปทานํ ปนฺติโย พุโธ; ภวติ รุนฺธตาทีนํ, โยเช สพฺพตฺถ สพฺพถา. विद्वानाने अ-कारान्त ‘ति’-प्रत्ययान्त पदांच्या ओळी (रूपे), जसे की ‘भवति’, ‘रुन्धति’ इत्यादी, सर्व ठिकाणी सर्व प्रकारे जोडाव्यात. อิติ เอตี’’ติ เจเตสํ, ปทานํ ปน ปนฺติโย; สุทฺธสฺสรปุพฺพกานํ, โยเช วิญฺญู ยถารหํ. परंतु ‘इति’ आणि ‘एति’ या शुद्ध स्वराने सुरू होणाऱ्या पदांच्या ओळी विद्वानाने योग्यतेनुसार जोडाव्यात. อาการานนฺตรตฺยนฺต-ปทานญฺจาปิ ปนฺติโย; ‘‘ยาติ สุณาติ อสฺนา-ติ’’ อิจฺจาทีนํ ยถารหํ. आणि आ-कारान्त ‘ति’-प्रत्ययान्त पदांच्या ओळी देखील, जसे की “याति, सुणाति, अस्नाति” इत्यादी, योग्यतेनुसार जोडाव्यात. อิวณฺณานนฺตรตฺยนฺต-ปทานมปิ ปาฬิโย; โยเช ‘‘รุนฺธิติ รุนฺธีติ’’-อิจฺจาทีนํ ยถารหํ. इ-वर्णान्त (इ किंवा ई कारान्त) ‘ति’-प्रत्ययान्त पदांच्या ओळी देखील, जसे की “रुन्धिति, रुन्धीति” इत्यादी, योग्यतेनुसार जोडाव्यात. อุการานนฺตรตฺยนฺต-สุติอิติ ปทสฺส จ; เปรณตฺเถ ปวตฺตสฺส, โยเช มาลํ ยถารหํ. उ-कारान्त ‘ति’-प्रत्ययान्त ‘सुति’ या पदाची आणि प्रेरणार्थ (प्रयोजक) अर्थात वापरल्या जाणाऱ्या पदांची मालिका योग्यतेनुसार जोडावी. เอการานนฺตรตฺยนฺต-ปทานมฺปิ ยถารหํ; ‘‘เชติ รุนฺเธติ กาเรติ, การาเปตี’’ติอาทีนํ. ए-कारान्त ‘ति’-प्रत्ययान्त पदांची देखील, जसे की “जेति, रुन्धेति, कारेति, कारापेति” इत्यादी, योग्यतेनुसार योजना करावी. โอการานนฺตรตฺยนฺต-ปทานมฺปิ ปทกฺกเม; ‘‘กโรติ โภติ โหตี’’ติ-อาทีนํ ยุตฺติโตวเท; ओ-कारान्त ‘ति’-प्रत्ययान्त पदांच्या पदक्रमात देखील, जसे की “करोति, भोति, होति” इत्यादी, योग्यतेनुसार सांगावे. อิจฺเจวํ สตฺตธา วุตฺโต, ปทมาลานโย มยา; อิโต มุตฺโต นโย นาม, นตฺถิ โกจิ กฺริยาปเท. अशा प्रकारे माझ्याद्वारे सात प्रकारचा पदमालेचा नियम सांगितला गेला आहे; क्रियापदांमध्ये याहून वेगळा दुसरा कोणताही नियम नाही. ‘‘อาทตฺเต กุรุเต เปเต’’, อิจฺจาทิ นยทสฺสนา; ยถารหํ ยุตฺติโตติ, วจนํ เอตฺถ ภาสิตํ. “आदत्ते, कुरुते, पेते” इत्यादी नियमांच्या दर्शनावरून, येथे ‘योग्यतेनुसार योग्य आहे’ असे वचन सांगितले आहे. อิทานิ อิการานนฺตรตฺยนฺตปทสฺส กโม วุจฺจเต – อิติ, อินฺติ. อิสิ, อิถ. อิมิ, อิม. อปริปุณฺโณ วตฺตมานานโย. อิตุ, อินฺตุ. อิหิ, อิถ. อิมิ, อิม. อปริปุณฺโณ ปญฺจมีนโย. เอตฺถ จ อิเมสํ ทฺวินฺนํ สาสนานุรูปภาวสฺส อิมานิ สาธกปทานิ [Pg.7] ‘‘เวติ, อเปติ, อนฺเวตี’’ติ. ตตฺถ วิ อิติ เวติ. วิคจฺฉตีติ อตฺโถ, อิติสทฺโท เหตฺถ คมนํ โพเธติ. ตถา อป อิติ อเปติ. อปคจฺฉตีติ อตฺโถ. อนุ อิติ อนฺเวติ. อนุคจฺฉตีติ อตฺโถ. ครู ปน อนุ เอติ อนฺเวตีติ วทนฺติ. ตํ – आता इ-कारान्त ‘ति’-प्रत्ययान्त पदाचा क्रम सांगितला जात आहे – इति, इन्ति। इसि, इथ। इमि, इम। हा अपूर्ण वर्तमानकाळ (वत्तमाना) नियम आहे. इतु, इन्तु। इहि, इथ। इमि, इम। हा अपूर्ण पंचमी (आज्ञार्थ) नियम आहे. आणि येथे या दोघांच्या शासनाला (बुद्धवचनाला) अनुरूप असण्याचे सिद्ध करणारे शब्द म्हणजे “वेति, अपेति, अन्वेति” हे आहेत. त्यापैकी ‘वि + इति = वेति’ म्हणजे ‘विगच्छति’ (दूर जातो) असा अर्थ आहे, आणि येथे ‘इति’ शब्द गमन (जाणे) दर्शवतो. तसेच ‘अप + इति = अपेति’ म्हणजे ‘अपगच्छति’ (निघून जातो) असा अर्थ आहे. ‘अनु + इति = अन्वेति’ म्हणजे ‘अनुगच्छति’ (मागोमाग जातो) असा अर्थ आहे. परंतु आचार्य (गुरू) ‘अनु + एति = अन्वेति’ असे म्हणतात. ते – ‘‘ยถา อารญฺญกํ นาคํ, ทนฺตึ อนฺเวติ หตฺถินี; เชสฺสนฺตํ คิริทุคฺเคสุ, สเมสุ วิสเมสุ จ; เอวํ ตํ อนุคจฺฉามิ, ปุตฺเต อาทาย ปจฺฉโต’’ติ. “ज्याप्रमाणे अरण्यातील हत्तीच्या (नाग) मागे, जो पर्वताच्या कठीण दुर्गम भागात, सम आणि विषम मार्गांवर फिरत असतो, हत्तीण (हत्थिनी) त्याचे अनुसरण करते; त्याचप्रमाणे मी माझ्या पुत्रांना मागे घेऊन तुमच्या मागे येत आहे.” อิมาย ปาฬิยา น สเมติ ‘‘เชสฺสนฺตํ อนฺเวตี’’ติ วจนโต ‘‘อนุคจฺฉามี’’ติ วจนโต จ. ตถา หิ เอติสทฺโท ยตฺถ เจ อิริยาปถวาจโก, ตตฺถ อาคมนํเยว โชเตติ, น คมนํ, ตสฺมา อาคมนตฺถสฺส อยุตฺติโต คมนตฺถสฺส จ ยุตฺติโต วิ อิติอาทินา เฉโท เญยฺโย. เอเตสญฺจ อิติสทฺทวเสน กตเฉทานํ อตฺถิภาวํ ยุตฺติภาวญฺจ ‘‘อิตายํ โกธรูเปนา’’ติ ปาฬิเยว สาเธติ, ตสฺมาเยว ‘‘อนุ อิติ, อนุ อินฺติ, อนุ อิสี’’ติอาทินา ‘‘อนฺเวตี’’ติอาทีนํ เฉเท ลพฺภมานนเยน วุตฺตปฺปกาโร วตฺตมานาปญฺจมีนโย ปรสฺสปทวเสน ทสฺสิโต. สตฺตมีรูปาทีนิ สพฺพถา อปฺปสิทฺธานิ. या पाळी वचनाशी ते जुळत नाही, कारण “जेस्संतं अन्वेति” या वचनामुळे आणि “अनुगच्छामि” या वचनामुळे. कारण ‘एति’ शब्द जेथे इरियापथ (हालचाल) वाचक असतो, तेथे तो ‘आगमन’ (येणे) च दर्शवतो, ‘गमन’ (जाणे) नाही. म्हणून आगमनाचा अर्थ अयोग्य असल्याने आणि गमनाचा अर्थ योग्य असल्याने ‘वि + इति’ इत्यादी प्रकारे विग्रह (छेद) समजावा. आणि ‘इति’ शब्दाच्या आधारे केलेल्या या विग्रहांचे अस्तित्व आणि योग्यता “इतायं कोधरूपेना” ही पाळीच सिद्ध करते. म्हणूनच “अनु इति, अनु इन्ति, अनु इसि” इत्यादी प्रकारे “अन्वेति” इत्यादींच्या विग्रहामध्ये प्राप्त होणाऱ्या नियमानुसार, वर सांगितलेला वर्तमानकाळ आणि पंचमीचा नियम परस्मैपदाच्या रूपाने दर्शवला आहे. सप्तमीची रूपे इत्यादी सर्वथा अनुपलब्ध आहेत (आढळत नाहीत). อิมานิ ปน ภวิสฺสนฺติยา รูปานิ, สิตฺตา เต ลหุเมสฺสติ. อิสฺสติ, อิสฺสนฺติ. อิสฺสสิ, อิสฺสถ. อิสฺสามิ, อิสฺสาม. อิสฺสเต, อิสฺสนฺเต. อิสฺสเส, อิสฺสวฺเห. อิสฺสํ, อิสฺสามฺเห. อสพฺพธาตุกตฺเตปิ สุทฺธสฺสรตฺตา ธาตุสฺส อิการาคโม น ลพฺภติ. ปริปุณฺโณ ภวิสฺสนฺตีนโย. परंतु ही भविष्यकाळाची (भविस्सती) रूपे आहेत, जसे की “सित्ता ते लहुमेस्सति” (सिंचन केल्यावर ते तुला हलके होईल). इस्सति, इस्सन्ति। इस्ससि, इस्सथ। इस्सामि, इस्साम। इस्सते, इस्सन्ते। इस्ससे, इस्सव्हे। इस्सं, इस्साम्हे। असर्वधातुकत्व असूनही धातू शुद्ध स्वर असल्यामुळे ‘इ’ काराचा आगम होत नाही. भविष्यकाळाचा नियम पूर्ण झाला। อถ กาลาติปตฺติยา รูปานิ ภวนฺติ, อิสฺสา, อิสฺสํสุ. อิสฺเส, อิสฺสถ. อิสฺสํ, อิสฺสมฺหา. อิสฺสถ, อิสฺสิสุ. อิสฺสเส, อิสฺสวฺเห. อิสฺสํ, อิสฺสามฺหเส. กาลาติปตฺติภาเว [Pg.8] จ อสพฺพธาตุกตฺเต จ สนฺเตปิ สุทฺธสฺสรตฺตา ธาตุสฺส อการิการาคโม น ลพฺภติ อเนกนฺติกตฺตา วา อนุปปนฺนตฺตา จ อการาคโม น โหติ. ทฺวินฺนญฺเหตฺถ สุทฺธสฺสรานํ อนนฺตริกานํ เอกโตสนฺนิปาโต อนุปปตฺติ. ปริปุณฺโณ กาลาติปตฺตินโย. त्यानंतर काळातिपत्तीचे (conditional tense) रूपे होतात - इस्सा, इस्संसु. इस्से, इस्सथ. इस्सं, इस्सल्हा. इस्सथ, इस्सिस्सु. इस्ससे, इस्सव्हे. इस्सं, इस्साम्हसे. काळातिपत्ती भाव आणि असब्बधातुकत्व (असार्वधातुकत्व) असतानाही, धातूचा शुद्ध स्वर असल्यामुळे 'अ' किंवा 'इ' काराचा आगम प्राप्त होत नाही, किंवा अनैकांतिकत्वामुळे आणि अनुपपन्नत्वामुळे 'अ' काराचा आगम होत नाही. कारण येथे दोन लागोपाठ येणाऱ्या शुद्ध स्वरांचा एकत्र संयोग होणे अनुपपन्न (अयोग्य) आहे. काळातिपत्तीचा नय (नियम) परिपूर्ण झाला. อิมสฺมึ ปน ฐาเน สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเน โสตูนํ ปโยคตฺเถสุ ปรมโกสลฺลชนนตฺถํ ‘‘นนุ เต สุตํ พฺราหฺมณ ภญฺญมาเน, เทวา น อิสฺสนฺติ ปุริสปรกฺกมสฺสา’’ติ ปาฬิโต นยํ คเหตฺวา วุตฺตปฺปกาเรหิ ภวิสฺสนฺติยา รูเปหิ สพฺพโส สมานานิ อสมานตฺถานิ วตฺตมานิกรูปานิ จ อีสกํ อญฺญมญฺญํ สมานานิ ภวิสฺสนฺตีกาลาติปตฺตีนํ รูปานิ จ ปกาสยิสฺสาม – วตฺตมานาวเสน ตาว ‘‘อิสฺสติ, อิสฺสนฺติ. อิสฺสสิ, อิสฺสถา’’ติ สพฺพํ โยเชตพฺพํ. อตฺโถ ปน ‘‘อิสฺสํ กโรตี’’ติอาทินา วตฺตพฺโพ. ตสฺมึเยว อตฺเถ ภวิสฺสนฺตีวเสน ‘‘อิสฺสิสฺสติ, อิสฺสิสฺสนฺติ. อิสฺสิสฺสสิ, อิสฺสิสฺสถา’’ติ ปริปุณฺณํ โยเชตพฺพํ. อตฺโถ ปน ‘‘อิสฺสํ กริสฺสตี’’ติอาทินา วตฺตพฺโพ. กาลาติปตฺติวเสน ปน ‘‘อิสฺสิสฺสา, อิสฺสิสฺสํสุ. อิสฺสิสฺเส, อิสฺสิสฺสถา’’ติ ปริปุณฺณํ โยเชตพฺพํ, อตฺโถ ปน ‘‘อิสฺสํ อกริสฺสา’’ติอาทินา วตฺตพฺโพ. ธาตฺวนฺตรวเสน สํสนฺทนานโยยํ. परंतु या ठिकाणी, अट्ठकथासहित त्रिपिटक बुद्धवचनामध्ये श्रोत्यांच्या प्रयोगाच्या अर्थांमध्ये परम कौशल्य उत्पन्न करण्यासाठी, 'हे ब्राह्मणा, तू ऐकले नाहीस का की, पुरुषाच्या पराक्रमाचा देव हेवा (ईर्ष्या) करत नाहीत?' या पाळीतील नियमाला ग्रहण करून, सांगितलेल्या प्रकारे भविष्यकाळाच्या रूपांशी सर्वथा समान असणारी पण भिन्न अर्थ असणारी वर्तमानकाळाची रूपे आणि परस्परांशी थोडी समान असणारी भविष्यकाळ व काळातिपत्तीची रूपे आम्ही स्पष्ट करू - प्रथम वर्तमानकाळाच्या नियमाने 'इस्सति, इस्सन्ति. इस्ससि, इस्सथ' असे सर्व जोडावे. परंतु याचा अर्थ 'ईर्ष्या करतो' इत्यादी प्रकारे सांगावा. त्याच अर्थामध्ये भविष्यकाळाच्या नियमाने 'इस्सिस्सति, इस्सिस्सन्ति. इस्सिस्ससि, इस्सिस्सथ' असे परिपूर्ण जोडावे. परंतु याचा अर्थ 'ईर्ष्या करेल' इत्यादी प्रकारे सांगावा. काळातिपत्तीच्या नियमाने 'इस्सिस्सा, इस्सिस्संसु. इस्सिस्से, इस्सिस्सथ' असे परिपूर्ण जोडावे, आणि याचा अर्थ 'ईर्ष्या केली असती' इत्यादी प्रकारे सांगावा. इतर धातूंच्या नियमांनुसार हा तुलनात्मक नियम आहे. อิทานิ เอการานนฺตรตฺยนฺตปทสฺส กโม วุจฺจเต – आता 'ए' कार शेवटी असणाऱ्या तिङन्त पदांचा क्रम सांगितला जातो - เอติ, เอนฺติ. เอสิ, เอถ. เอมิ, เอม. एति, एन्ति. एसि, एथ. एमि, एम. เอตุ, เอนฺตุ. เอหิ, เอถ. เอมิ, เอม. एतु, एन्तु. एहि, एथ. एमि, एम. น จ อปฺปตฺวา ทุกฺขนฺตํ, วิสฺสาสํ เอยฺย ปณฺฑิโต; นิเวสนานิ มาเปตฺวา, เวเทหสฺส ยสสฺสิโน; ยทา เต ปหิณิสฺสามิ, ตทา เอยฺยาสิ ขตฺติย. दुःखाचा अंत गाठल्याशिवाय पंडिताने विश्वास ठेवू नये; यशस्वी विदेहाची निवासस्थाने निर्माण करून, हे क्षत्रिया, जेव्हा मी तुला निरोप पाठवीन, तेव्हा तू यावेस. เอยฺย[Pg.9], เอยฺยุํ. เอยฺยาสิ, เอยฺยาถ. เอยฺยามิ, เอยฺยาม. เอถ, เอรํ. เอโถ, เอยฺยาวฺโห. เอยฺยํ, เอยฺยามฺเห. एय्य, एय्युं. एय्यासि, एय्याथ. एय्यामि, एय्याम. एथ, एरं. एथो, एय्याव्हो. एय्यं, एय्याम्हे. โส ปุริโส เอยฺย, เต เอยฺยุํ. ตฺวํ เอยฺยาสิ, ตุมฺเห เอยฺยาถ. อหํ เอยฺยามิ, มยํ เอยฺยาม. โส ปุริโส เอถ, เต เอรํ. ตฺวํ เอโถ, ตุมฺเห เอยฺยาวฺโห. อหํ เอยฺยํ, มยํ เอยฺยามฺเห. तो मनुष्य जावा, ते जावेत. तू जावेस, तुम्ही जावे. मी जावे, आम्ही जावे. तो मनुष्य जावा, ते जावेत. तू जावेस, तुम्ही जावे. मी जावे, आम्ही जावे. ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีรูปานิ สพฺพโส อปฺปสิทฺธานิ. परोक्षा (भूतकाळ), हिय्यत्तनी (अद्यतन भूतकाळ) आणि अज्जतनी (सामान्य भूतकाळ) यांची रूपे सर्व प्रकारे समजून घ्यावीत. เอสฺสติ, เอสฺสนฺติ. เอสฺสสิ, เอสฺสถ. เอสฺสามิ, เอสฺสาม. เอสฺสเต, เอสฺสนฺเต. เอสฺสเส, เอสฺสวฺเห. เอสฺสํ, เอสฺสามฺเห. एस्सति, एस्सन्ति. एस्ससि, एस्सथ. एस्सामि, एस्साम. एस्सते, एस्सन्ते. एस्ससे, एस्सव्हे. एस्सं, एस्साम्हे. สมฺโมทมานา คจฺฉนฺติ, ชาลมาทาย ปกฺขิโน; ยทา เต วิวทิสฺสนฺติ, ตทา เอหินฺติ เม วสํ. पक्षी जाळे घेऊन आनंदाने एकत्र उडून जातात; परंतु जेव्हा ते आपसात भांडू लागतील, तेव्हा ते माझ्या ताब्यात येतील. ‘‘อภิโทสคโต อิทานิ เอหี’’ติ วจนทสฺสนโต อปรานิปิ ภวิสฺสนฺตีรูปานิ คเหตพฺพานิ. “संध्याकाळ झाली आहे, आता तू ये” या वचनावरून भविष्यकाळाची इतर रूपेही ग्रहण करावीत. เอหิติ, เอหินฺติ. เอหิสิ, เอหิถ. เอหิมิ, เอหิม. เอหิเต, เอหินฺเต. เอหิเส, เอหิวฺเห. เอหิสฺสํ, เอหิสฺสามฺเห. एहिति, एहिन्ति. एहिसि, एहिथा. एहिमि, एहिमा. एहिते, एहिन्ते. एहिसे, एहिव्हे. एहिस्सं, एहिस्साम्हे. เอสฺสา, เอสฺสํสุ. เอสฺเส, เอสฺสถ. เอสฺสํ เอสฺสามฺหา. เอสฺสถ, เอสฺสิสุ. เอสฺสเส, เอสฺสวฺเห. เอสฺสึ, เอสฺสามฺหเส. एस्सा, एस्संसु. एस्से, एस्सथ. एस्सं, एस्साम्हा. एस्सथ, एस्सिस्सु. एस्ससे, एस्सव्हे. एस्सिं, एस्साम्हसे. อถาปโรปิ เอการานนฺตรตฺยนฺตปทกฺกโม ภวติ; อุเทติ, อุเทนฺติ; อุเทสิ, อุเทถ; อุเทมิ, อุเทม. त्यानंतर 'ए' कार शेवटी असणाऱ्या तिङन्त पदांचा दुसरा क्रम असा होतो - उदेति, उदेन्ति; उदेसि, उदेथ; उदेमि, उदेमा. อุเทตุ, อุเทนฺตุ. อุเทหิ, อุเทถ. อุเทมิ, อุเทม, อุทามเส. उदेतु, उदेन्तु. उदेहि, उदेथ. उदेमि, उदेमा, उदामसे. อุเทยฺย, อุเทยฺยุํ. เสสํ เนยฺยํ. อุทิสฺสติ, อุทิสฺสนฺติ. เสสํ เนยฺยํ. อุทิสฺสา, อุทิสฺสํสุ. เสสํ เนยฺยํ. उदेय्य, उदेय्युं. उर्वरित रूपे याचप्रमाणे समजून घ्यावीत. उदिस्सति, उदिस्सन्ति. उर्वरित रूपे याचप्रमाणे समजून घ्यावीत. उदिस्सा, उदिस्संसु. उर्वरित रूपे याचप्रमाणे समजून घ्यावीत. อิมานิ สุทฺธสฺสรธาตุรูปานิ. ही शुद्ध स्वर असणाऱ्या धातूंची रूपे आहेत. กการนฺตธาตุ क-कारान्त धातू กุ [Pg.10] สทฺเท เก จ. โกติ, กวติ, กายติ, เอวํ กตฺตุปทานิ ภวนฺติ. กุยฺยติ, กิยฺยติ, เอวํ กมฺมปทานิ. กานนํ, กพฺพํ, ชาตกํ, เอวํ นามิกปทานิ. กุตฺวา, กุตฺวาน, กวิตฺวา, กวิตฺวาน, กาวิตฺวา, กาวิตฺวาน, กายิตุํ, เอวํ อพฺยยปทานิ. 'कु' हा शब्द आणि ध्वनी या अर्थाचा धातू आहे. कोति, कवति, कायति - अशी कर्तृवाचक पदे होतात. कुय्यति, किय्यति - अशी कर्मवाचक पदे होतात. काननं, कब्बं, जातकं - अशी नामवाचक पदे होतात. कुत्वा, कुत्वान, कवित्वा, कवित्वान, कावित्वा, कावित्वान, कायितुं - अशी अव्यय पदे होतात. ตตฺร กานนนฺติ ฐิตมชฺฌนฺหิกสมเย กวติ สทฺทํ กโรตีติ กานนํ, วนํ. ตถา หิ – त्यामध्ये 'कानन' म्हणजे - दुपारच्या वेळी जेथे पक्षी आवाज (कूजन) करतात, ते कानन म्हणजेच वन होय. जसे की - ‘‘ฐิเต มชฺฌนฺหิเก กาเล, สนฺนิสีเวสุ ปกฺขิสุ; สณเตว พฺรหารญฺญํ, สา รติ ปฏิภาติ ม’’นฺติ “दुपारची वेळ झाली असता, पक्षी शांत बसले असताना, हे महाअरण्य जणू गुंजत आहे; हे दृश्य माझ्या मनाला आनंदित करते.” วุตฺตํ. อถ วา โกกิลมยูราทโย กวนฺติ สทฺทายนฺติ กูชนฺติ เอตฺถาติ กานนํ. มโนหรตาย อวสฺสํ กุยฺยติ ปณฺฑิเตหีติ กพฺพํ. กาวิยํ. กาเวยฺยํ. อญฺญตฺร ปน กวีนํ อิทนฺติ กพฺพนฺติ ตทฺธิตวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ. เกจิ ตุ กาพฺยนฺติ สทฺทรูปํ อิจฺฉนฺติ, น ตํ ปาวจเน ปมาณํ สกฺกฏภาสาภาวโต. สกฺกฏภาสาโตปิ หิ อาจริยา นยํ คณฺหนฺติ. ชาตํ ภูตํ อตีตํ ภควโต จริยํ, ตํ กียติ กถียติ เอเตนาติ ชาตกํ. ชาตกปาฬิ หิ อิธ ‘‘ชาตก’’นฺติ วุตฺตา. อญฺญตฺร ปน ชาตํ เอว ชาตกนฺติ คเหตพฺพํ. ตถา หิ ชาตกสทฺโท เทสนายมฺปิ วตฺตติ ‘‘อิติวุตฺตกํ ชาตกํ อพฺภุตธมฺม’’นฺติอาทีสุ. ชาติยมฺปิ วตฺตติ ‘‘ชาตกํ สโมธาเนสี’’ติอาทีสุ. असे म्हटले आहे. किंवा कोकिळा, मोर इत्यादी पक्षी जेथे आवाज करतात, कूजन करतात, ते 'कानन' होय. मनोहर असल्यामुळे पंडितांकडून ज्याची प्रशंसा केली जाते, ते 'कब्बं' (काव्य) होय. यालाच कावियं किंवा कावेय्यं असेही म्हणतात. इतर ठिकाणी कवींचे ते 'कब्बं' (काव्य) असा तद्धित प्रत्ययानुसार अर्थ घ्यावा. काही लोक 'काव्य' (काब्ब्य) असे शब्दरूप मानतात, परंतु ते बुद्धवचनात प्रमाण मानले जात नाही, कारण ती संस्कृत भाषा नाही. आचार्य देखील संस्कृत भाषेतूनच हा नियम घेतात. भगवंतांचे जे भूतकाळातील चरित्र घडले, ज्याचे याद्वारे कथन केले जाते, ते 'जातक' होय. येथे 'जातकपाळी'लाच 'जातक' म्हटले आहे. इतर ठिकाणी 'जात' म्हणजेच 'जातक' असे समजावे. म्हणूनच 'जातक' हा शब्द उपदेशाच्या अर्थातही वापरला जातो, जसे की 'इतिवृत्तक, जातक, अद्भुतधम्म' इत्यादींमध्ये. तसेच हा शब्द जन्माच्या अर्थातही वापरला जातो, जसे की 'जातकाचे संधान केले' इत्यादींमध्ये. ปกฺก นีจคติยํ. นีจคมนํ นาม หีนคมนํ หีนปฺปวตฺติ วา. นีจสทฺโท หิ หีนวาจโก ‘‘นีเจ กุเล ปจฺจาชาโต’’ติ เอตฺถ วิย. ปกฺกติ กฺริยาปทเมตฺถ ทิสฺสติ, น นามิกปทํ. ยตฺถ ยตฺถ นามิกปทํ น ทิสฺสติ, ตตฺถ ตตฺถ นามิกปทํ อุปปริกฺขิตฺวา [Pg.11] คเหตพฺพํ. กฺริยาปทเมว หิ ทุทฺทสํ, กฺริยาปเท วิชฺชมาเน นามิกปทํ นตฺถีติ น วตฺตพฺพํ, ตสฺมา อนฺตมโส ‘‘ปกฺกนํ, ตกนํ’’ อิจฺเจวมาทีนิ ภาววาจกานิ นามิกปทานิ สพฺพาสุ ธาตูสุ ยถารหํ ลพฺภนฺตีติ ทฏฺฐพฺพํ. 'पक्क' हा धातू खालच्या दिशेने जाणे (नीचगती) या अर्थात आहे. नीचगमन म्हणजे हीन गमन किंवा हीन प्रवृत्ती होय. 'नीच' हा शब्द हीन या अर्थाचा वाचक आहे, जसे की 'नीच कुळात जन्मलेला' या वाक्यात. येथे 'पक्कति' हे क्रियापद दिसते, नामवाचक पद दिसत नाही. जेथे जेथे नामवाचक पद दिसत नाही, तेथे तेथे नामवाचक पदाचा शोध घेऊन ते ग्रहण करावे. क्रियापद ओळखणे कठीण असते; क्रियापद असताना नामवाचक पद नाही असे म्हणता येत नाही. म्हणून शेवटी 'पक्कनं, तकनं' इत्यादी भाववाचक नामे सर्व धातूंमध्ये योग्यतेनुसार मिळतात, असे समजावे. ตก หสเน. หสนํ หาโส. ตกติ. 'तक' हा धातू हसणे या अर्थात आहे. हसणे म्हणजे हास्य. 'तकटि' (तो हसतो). ตกิ กิจฺฉชีวเน. กิจฺฉชีวนํ กสิรชีวนํ. ตงฺกติ. อาตงฺกติ. อาตงฺโก. อาตงฺโกติ กิจฺฉชีวิตกโร โรโค, ตถา หิ อฏฺฐกถาจริยา ‘‘อปฺปาพาธํ อปฺปาตงฺก’’นฺติ อิมสฺมึ ปาฬิปฺปเทเส อิติ อตฺถํ สํวณฺเณสุํ ‘‘อาพาโธติ วิสภาคเวทนา วุจฺจติ, ยา เอกเทเส อุปฺปชฺชิตฺวา สกลสรีรํ อยปฏฺเฏน พนฺธิตฺวา วิย คณฺหาติ. อาตงฺโกติ กิจฺฉชีวิตกโร โรโค. อถ วา ยาเปตพฺพโรโค อาตงฺโก, อิตโร อาพาโธ. ขุทฺทโก วา โรโค อาตงฺโก, พลวา อาพาโธ. เกจิ ปน ‘อชฺฌตฺตสมุฏฺฐาโน อาพาโธ, พหิทฺธาสมุฏฺฐาโน อาตงฺโก’ติ วทนฺตี’’ติ. 'तकि' (धातू) कष्टदायक जीवनाच्या (किच्छजीवन) अर्थात आहे. कष्टदायक जीवन म्हणजेच कठीण जीवन (कसिरजीवन). तङ्कति, आतङ्कति, आतङ्को. 'आतङ्क' (आतंक) म्हणजे कष्टदायक जीवन निर्माण करणारा रोग. म्हणूनच अट्ठकथाचार्यांनी "अप्पाबाधं अप्पातङ्कं" (अल्प आजार व अल्प त्रास) या पाळी-प्रदेशात (पाठात) असा अर्थ स्पष्ट केला आहे – "आबाध (आजार) म्हणजे विषम वेदना (विसभागवेदना) म्हटली जाते, जी शरीराच्या एका भागात उत्पन्न होऊन संपूर्ण शरीराला जणू लोखंडी पट्ट्याने बांधल्यासारखे जखडून टाकते. आतंक म्हणजे कष्टदायक जीवन निर्माण करणारा रोग. किंवा, जो रोग सहन करत जगता येतो तो 'आतंक' आणि दुसरा तो 'आबाध'. किंवा लहान रोग म्हणजे 'आतंक' आणि तीव्र रोग म्हणजे 'आबाध'. परंतु काही लोक म्हणतात की, 'अज्झत्त-समुट्ठाण (अंतर्गत कारणांमुळे उत्पन्न होणारा) तो आबाध आणि बाह्य-समुत्थान (बाहेरून उत्पन्न होणारा) तो आतंक' होय." อาตงฺโก อามโย โรโค,พฺยาธา’พาโธ คโท รุชา; อกลฺลญฺเจว เคลญฺญํ,นามํ โรคาภิธานกํ. आतंक, आमय, रोग, व्याधी, आबाध, gद, रुजा, अकल्ल आणि गेलञ्ञ (आजारीपण) – ही सर्व रोगाचीच नावे (समानार्थी शब्द) आहेत. สุก คติยํ. โสกติ, สุโก, สุกี. ตตฺร สุโกติ สุโว. โสกติ มนาเปน คมเนน คจฺฉตีติ สุโก. ตสฺส ภริยา สุกี. 'सुक' (धातू) गमन (गती) अर्थात आहे. सोकति, सुको, सुकी. तेथे 'सुको' म्हणजे पोपट (सुव). जो मनपसंत (मनोहर) गतीने जातो तो 'सुको' (पोपट) होय. त्याची मादी (पत्नी) ती 'सुकी' होय. พุกฺก ภสฺสเน. อิธ ภสฺสนํ นาม สุนขภสฺสนํ อธิปฺเปตํ ‘‘สุนโข ภสฺสิตฺวา’’ติ เอตฺถ วิย, น ‘‘อาวาโส โคจรํ [Pg.12] ภสฺส’’นฺติอาทีสุ วิย. วจนสงฺขาตํ ภสฺสนํ, พุกฺกติ สา. बुक्क (धातू) भुंकण्याच्या अर्थात आहे. येथे 'भस्सन' (bhassana) म्हणजे कुत्र्याचे भुंकणे अभिप्रेत आहे, जसे 'सुनखो भस्सित्वा' (कुत्रा भुंकून) यामध्ये आहे; 'आवासो गोचरं भस्स' (आवास किंवा गोचर नष्ट होणे) इत्यादींसारखे नाही. वाणीशी संबंधित जे भुंकणे आहे, त्याला 'बुक्कति' असे म्हणतात. ธก ปฏิฆาเต คติยญฺจ. ปฏิฆาโต ปฏิหนนํ. ธกติ. धक (धातू) प्रतिघात (आघात/विरोध) आणि गती (गमन) या अर्थात आहे. प्रतिघात म्हणजे प्रतिहनन (आघात करणे). 'धकति' (असे रूप बनते). จก ติตฺติปฏิฆาเตสุ. ติตฺติ ตปฺปนํ, ปฏิฆาตํ ปฏิหนนํว. จกติ. चक (धातू) तृप्ती आणि प्रतिघात या अर्थांमध्ये आहे. तृप्ती म्हणजे तृप्त होणे (तप्पण) आणि प्रतिघात म्हणजे प्रतिहननच (आघात करणेच) होय. 'चकति' (असे रूप बनते). อก กุฏิลคติยํ. อกติ. เอตา กุอาทิกา อกปริยนฺตา ธาตุโย ปรสฺส ภาสาติ สทฺทสตฺถวิทู วทนฺติ. เตสํ มเต เอตา ‘‘ติ อนฺติ, ตุ อนฺตุ’’ อิจฺจาทีนํเยว วิสโย. ปาฬิยํ ปน นิยโม นตฺถิ, ตสฺมา น ตํ อิธ ปมาณํ. अक (धातू) कुटिल गती (वाकडी चाल) या अर्थात आहे. 'अकति' (असे रूप बनते). व्याकरणकार म्हणतात की, 'कु' पासून सुरू होणारे आणि 'अक' पर्यंतचे हे धातू परस्मैपद (परस्सपद) आहेत. त्यांच्या मते, हे केवळ 'ति, अन्ति, तु, अन्तु' इत्यादी प्रत्ययांचेच विषय आहेत. परंतु पाळिमध्ये असा नियम नाही, म्हणून ते येथे प्रमाण मानले जात नाही. อิ อชฺฌยเน. อชฺฌยนํ อุจฺจารณํ สิกฺขนํ วา, อยติ, อธียติ, อชฺฌยติ, อธีเต, อชฺเฌนํ, อชฺฌายโก. ทิพฺพํ อธียเส มายํ. อธียนฺติ มหาราช, ทิพฺพมายิธ ปณฺฑิตา. อชฺเฌนมริยา ปถวึ ชนินฺทา. ตตฺถ อชฺฌายโกติ อชฺฌยตีติ อชฺฌายโก, มนฺเต ปริวตฺเตตีติ อตฺโถ. इ (धातू) अध्ययनाच्या अर्थात आहे. अध्ययन म्हणजे उच्चारण किंवा शिकणे होय. 'अयति', 'अधीयति', 'अज्झयति', 'अधीते', 'अज्झेनं', 'अज्झायको' (अशी रूपे बनतात). 'दिब्बं अधीयसे मायं' (तू दिव्य मायेचे अध्ययन करतोस). 'अधीयन्ति महाराज, दिब्बमायिध पण्डिता' (हे महाराज, येथे पंडित लोक दिव्य मायेचे अध्ययन करतात). 'अज्झेनमरिया पथविं जनिन्दा' (अध्ययनाने आर्य पृथ्वीवर राजे होतात). तेथे 'अज्झायको' म्हणजे जो अध्ययन करतो तो 'अज्झायको', म्हणजेच जो मंत्रांचे आवर्तन करतो असा अर्थ आहे. อุ สทฺเท. อวติ, อวนฺติ. อวสิ. เอตฺถ ‘‘โย อาตุมานํ สยเมว ปาวา’’ติ ปาฬิ ปปุพฺพสฺส อุธาตุสฺส ปโยโคติ ทฏฺฐพฺโพ. ปปุพฺพสฺส วทธาตุสฺส ทการโลปปฺปโยโคติปิ วตฺตุํ ยุชฺชติ. उ (धातू) शब्दाच्या (ध्वनीच्या) अर्थात आहे. 'अवति', 'अवन्ति', 'अवसि' (अशी रूपे बनतात). येथे 'यो आतुमानं सयमेव पावा' ही पाळि 'प' (प्र) उपसर्गपूर्वक 'उ' धातूचा प्रयोग आहे असे समजावे. किंवा 'प' उपसर्गपूर्वक 'वद्' धातूच्या 'द' काराचा लोप होऊन झालेला प्रयोग आहे असे म्हणणेही योग्य ठरेल. วงฺก โกฏิลฺเล. วงฺกติ. วงฺกํ. วงฺกสทฺโท หิ วกฺกสทฺเทน สมานตฺโถ, วกฺกสทฺโท จ วงฺกสทฺเทน. ตถา หิ – वङ्क (धातू) कुटिलतेच्या (वाकडेपणाच्या) अर्थात आहे. 'वङ्कति', 'वङ्कं' (अशी रूपे बनतात). कारण 'वङ्क' शब्द हा 'वक्क' शब्दाशी समान अर्थाचा आहे, आणि 'वक्क' शब्द हा 'वङ्क' शब्दाशी समान अर्थाचा आहे. तसेच - ‘‘ยํ นิสฺสิตา ชคติรุหํ, สฺวายํ อคฺคึ ปมุญฺจติ; ทิสา ภชถ วกฺกงฺคา, ชาตํ สรณโต ภย’’นฺติ. 'ज्या वृक्षाचा आश्रय घेतला होता, तोच आता अग्नी बाहेर टाकत आहे; हे वक्र-अंग असलेल्या (पक्ष्यांनो), दिशांकडे निघून जा, कारण आश्रयापासूनच भय निर्माण झाले आहे.' ปาฬิ [Pg.13] ทิสฺสติ. อยํ ปน วกฺกสทฺโท สกฺกฏภาสํ ปตฺวา กการรการสญฺโญคกฺขริโก ภวติ, ธาตุภาโว ปนสฺส โปราเณหิ น วุตฺโต, ตสฺมา กฺริยาปทํ น ทิฏฺฐํ. อิมสฺส ปน วงฺกสทฺทสฺส ‘‘วงฺก โกฏิลฺเล’’ติ ธาตุภาโว วุตฺโต, ‘‘วงฺกตี’’ติ กฺริยาปทญฺจ, ปาฬิยํ ตุ ‘‘วงฺกตี’’ติ กฺริยาปทํ น ทิฏฺฐํ, ตถา ภาววาจโก วงฺกสทฺโทปิ. วาจฺจลิงฺโค ปน อเนเกสุ ฐาเนสุ ทิฏฺโฐ. ตตฺต วงฺกตีติ กฺริยาปทํ ปาฬิยํ อวิชฺชมานมฺปิ คเหตพฺพเมว นาถตีติ กฺริยาปทมิว. ภาววาจกสฺส ปน วงฺกสทฺทสฺส อตฺถิตา นตฺถิตา จ ปาฬิอาทีสุ ปุนปฺปุนํ อุปปริกฺขิตพฺพา. เกเจตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘ยทิ ภาววาจโก วงฺกสทฺโท นตฺถิ, กถํ ‘อฏฺฐวงฺกํ มณิรตนํ อุฬาร’นฺติ เอตฺถ สมาโส’’ติ. เอตฺถ ปน อฏฺฐสุ ฐาเนสุ วงฺกํ อฏฺฐวงฺกํ, น อฏฺฐวงฺกานิ ยสฺสาติ. ทพฺพวาจโก หิ วงฺกสทฺโท, น ภาววาจโกติ ทฏฺฐพฺพํ. अशी पाळि (गाथा) दिसून येते. परंतु हा 'वक्क' शब्द संस्कृत भाषेत जाऊन 'क' आणि 'र' यांच्या संयोगाने युक्त अक्षर (वक्र) बनतो. प्राचीन आचार्यांनी याचा धातूभाव (धातू असणे) सांगितलेला नाही, म्हणून याचे क्रियापद आढळत नाही. परंतु या 'वङ्क' शब्दाचा 'वङ्क कोिटल्ले' असा धातूभाव आणि 'वङ्कति' असे क्रियापद सांगितले आहे. परंतु पाळिमध्ये 'वङ्कति' हे क्रियापद आढळत नाही, तसेच भाववाचक 'वङ्क' शब्दही आढळत नाही. विशेषण (वाच्चलिंग) म्हणून मात्र तो अनेक ठिकाणी आढळतो. तेथे 'वङ्कति' हे क्रियापद पाळिमध्ये नसले तरी, 'नाथति' या क्रियापदाप्रमाणे ते स्वीकारलेच पाहिजे. भाववाचक 'वङ्क' शब्दाचे अस्तित्व किंवा नास्तित्व पाळि इत्यादींमध्ये वारंवार तपासून पाहिले पाहिजे. येथे काही जण म्हणू शकतात की, 'जर भाववाचक वङ्क शब्द नाही, तर अट्ठवङ्कं मणिरतनं उळारं (आठ कोनांचे श्रेष्ठ मणिरत्न) यामध्ये समास कसा झाला?' येथे आठ ठिकाणी वक्र असणे म्हणजे 'अट्ठवङ्कं' होय, ज्याचे आठ वक्र आहेत असे नाही. कारण 'वङ्क' शब्द हा द्रव्यवाचक आहे, भाववाचक नाही, असे समजावे. วงฺกํ วกฺกญฺจ กุฏิลํ, ชิมฺหญฺจ ริมฺหมนุชุ; วงฺกสทฺทาทโย เอเต, วาจฺจลิงฺคา ติลิงฺคิกา. वङ्क, वक्क, kuटिल, जिम्ह, रिम्ह आणि अनूजु (वाकडे) - हे 'वङ्क' इत्यादी शब्द विशेषण (वाच्चलिंग) असून तिन्ही लिंगांत चालणारे आहेत. อถ วา วงฺกสทฺโทยํ, ‘‘วงฺกฆสฺตา’’ติอาทิสุ; พฬิเส คิริเภเท จ, วตฺตเต ส ปุมา ตทา. किंवा हा 'वङ्क' शब्द 'वङ्कघस्ता' इत्यादींमध्ये गळ (मासे पकडण्याचा गळ) आणि पर्वताचा भेद (दरी) या अर्थांत वापरला जातो, तेव्हा तो पुल्लिंगी असतो. อยญฺหิ ‘‘เต’เม ชนา วงฺกฆสฺตา สยนฺติ. ยถาปิ มจฺโฉ พฬิสํ, วงฺกํ มํเสน ฉาทิตํ. วงฺกฆสฺโตว อมฺพุโช’’ติอาทีสุ พฬิเส วตฺตติ. कारण 'ते'मे जना वङ्कघस्ता सयन्ति' (हे लोक गळाने गिळल्यासारखे पडले आहेत), 'यथापि मच्छो बळिसं, वङ्कं मंसेन छादितं' (ज्याप्रमाणे मासा मांसाने झाकलेल्या वाकड्या गळाला गिळतो), 'वङ्कघस्तोव अम्बुजो' (गळाने गिळलेल्या माशाप्रमाणे) इत्यादींमध्ये हा शब्द 'गळ' (बळिस) या अर्थात वापरला जातो. เอตฺถ สิยา ‘‘นนุ จ โภ ‘ยถาปิ มจฺโฉ พฬิสํ, วงฺกํ มํเสน ฉาทิต’นฺติ เอตฺถ วงฺกสทฺโท คุณวาจโก วิเสสนสโท, เยน พฬิโส วิเสสิโต, เตน วงฺกํ กุฏิลํ พฬิสนฺติ อตฺโถ วิญฺญายตี’’ติ? ตนฺน, วงฺกสทฺเท อวุตฺเตปิ พฬิสสภาวสฺส วงฺกตฺตา กุฏิลตฺโถ ปากโฏติ นตฺถิ วิเสสนสทฺเทน [Pg.14] ปโยชนํ. อิทํ ปน ‘‘พฬิสํ วงฺก’’นฺติ วจนํ ‘‘หตฺถิ นาโค. สโรรุหํ ปทุมํ. หตฺถี จ กุญฺชโร นาโค’’ติอาทิวจนมิว ปริยายวจนํ, ตสฺมา ‘‘วงฺก’’นฺติ ปทสฺส ‘‘กุฏิล’’นฺติ อตฺโถ น คเหตพฺโพ. อถ วา ยถา ‘‘ยถา อารญฺญกํ นาคํ, ทนฺตึ อนฺเวติ หตฺถินี’’ติ เอตฺถ นาคสทฺทสฺส ทนฺตีสทฺทสฺส จ อญฺญมญฺญปริยา ยวจนตฺเตปิ ทนฺตินฺติ มโนรมทนฺตยุตฺตนฺติ อตฺโถ สํวณฺณิโต, ตถา ‘‘พฬิสํ วงฺก’’นฺติ อิเมสมฺปิ อญฺญมญฺญํ ปริยายวจนตฺเตปิ วงฺกนฺติ กุฏิลนฺติ อตฺโถ วตฺตพฺโพ. เอวญฺหิ สติ อตฺโถ สาลราชา วิย สุผุลฺลิโต โหติ, เทสนา จ วิลาสปฺปตฺตา, น ปน ‘‘วงฺกํ พฬิส’’นฺติ สทฺทานํ คุณคุณีวเสน สมานาธิกรณภาโว อิจฺฉิตพฺโพ ‘‘พุทฺโธ ภควา เวรญฺชายํ วิหรตี’’ติอาทีสุ ‘‘พุทฺโธ ภควา’’ติ อิเมสํ วิย สมานาธิกรณภาวสฺส อนิจฺฉิตพฺพตฺตา. น หิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ สมานาธิกรณภาโว โปราเณหิ อนุมโต. येथे अशी शंका येऊ शकते की, 'अहो, 'यथापि मच्छो बळिसं, वङ्कं मंसेन छादितं' यामध्ये 'वङ्क' शब्द हा गुणवाचक विशेषण शब्द आहे, ज्याने 'बळिस' (गळ) विशेषित केला आहे, त्यामुळे 'वङ्क' म्हणजे 'कुटिल (वाकडा) गळ' असा अर्थ समजला जातो का?' तसे नाही, कारण 'वङ्क' शब्द न वापरताही गळाचा स्वभावच वाकडा असल्याने कुटिल अर्थ स्पष्टच आहे, त्यामुळे विशेषण शब्दाची काही गरज नाही. परंतु हे 'बळिसं वङ्कं' असे म्हणणे 'हत्थी नागो' (हत्ती नाग), 'सरोरुहं पदुमं' (कमळ), 'हत्थी च कुञ्जरो नागो' इत्यादी शब्दांप्रमाणे समानार्थी (पर्यायवाचक) शब्द आहे. म्हणून 'वङ्क' या पदाचा अर्थ 'कुटिल' असा घेऊ नये. किंवा जसे 'यथा आरञ्ञकं नागं, दन्तिं अन्वेति हत्थिनी' (जशी हत्तीण अरण्यातील हत्तीच्या मागे जाते) येथे 'नाग' शब्द आणि 'दन्ती' शब्द हे एकमेकांचे समानार्थी असूनही 'दन्ती' म्हणजे 'मनोहर सुळे असलेला' असा अर्थ स्पष्ट केला आहे, तसेच 'बळिसं वङ्कं' हे एकमेकांचे समानार्थी शब्द असूनही 'वङ्क' म्हणजे 'कुटिल' (वाकडा) असा अर्थ सांगावा. असे केल्याने अर्थ हा बहरलेल्या शालवृक्षासारखा सुशोभित होतो आणि उपदेश (देशना) अधिक सुंदर वाटतो. परंतु 'वङ्क' आणि 'बळिस' या शब्दांचा गुण-गुणी भावाने सामानाधिकरण भाव मानू नये, जसे 'बुद्धो भगवा वेरञ्जायं विहरति' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'बुद्धो भगवा' या शब्दांचा सामानाधिकरण भाव मानणे अनपेक्षित आहे. कारण अशा ठिकाणी प्राचीन आचार्यांनी सामानाधिकरण भाव मान्य केलेला नाही. ‘‘ยตฺถ เอตาทิโส สตฺถา, โลเก อปฺปฏิปุคฺคโล; ตถาคโต พลปฺปตฺโต, สมฺพุทฺโธ ปรินิพฺพุโต’’ติ, 'जिथे असे शास्ते, जे जगात अद्वितीय (अप्रतिपुद्गल) आहेत; तथागत, बलप्राप्त, सम्यक्संबुद्ध परिनिर्वाण पावले आहेत.' ‘‘พุทฺธํ พุทฺธํ นิขิลวิสยํ สุทฺธิยา ยาว สุทฺธิ’’นฺติ จ อาทีสุ ปน อนุมโต. เอตฺถ หิ ‘‘เอตาทิโส’’ติ จ ‘‘อปฺปฏิปุคฺคโล’’ติ จ ‘‘ตถาคโต’’ติ จ ‘‘พลปฺปตฺโต’’ติ จ ‘‘สมฺพุทฺโธ’’ติ จ ‘‘ปรินิพฺพุโต’’ติ จ อิมานิ ‘‘สตฺถา’’ติ อเนน ปเทน สมานาธิกรณานิ. ตถา ‘‘พุทฺธํ พุทฺธ’’นฺติ ทฺวินฺนํ ปทานํ ปจฺฉิมํ ปุริเมน สมานาธิกรณํ ภวติ. 'बुद्धं बुद्धं निखिलविसयं सुद्धिया याव सुद्धिं' इत्यादींमध्ये मात्र तो (सामानाधिकरण भाव) मान्य आहे. कारण येथे 'एतादिसो' (असे), 'अप्पटिपुग्गलो' (अद्वितीय), 'तथागतो' (तथागत), 'बलप्पत्तो' (बलप्राप्त), 'सम्बुद्धो' (संबुद्ध) आणि 'परिनिब्बुतो' (परिनिर्वृत) ही पदे 'सत्था' (शास्ता) या पदाशी सामानाधिकरण आहेत. तसेच 'बुद्धं बुद्धं' या दोन पदांमध्ये नंतरचे पद आधीच्या पदाशी सामानाधिकरण होते. อิติ ‘‘ยถาปิ มจฺโฉ พฬิสํ, วงฺกํ มํเสน ฉาทิต’’นฺติ เอตฺถ วงฺกสทฺโท พฬิสสฺสาภิธานนฺตรํ, น คุณวาจโก. เอวํ วงฺกสทฺโท พฬิเส วตฺตติ. ‘‘กงฺกํ คจฺฉาม ปพฺพตํ. ทูเร วงฺกตปพฺพโต’’ติอาทีสุ [Pg.15] ปน คิริวิเสเส วตฺตติ. เอตฺถ จ ‘‘วงฺกปพฺพโต’’ติ วตฺตพฺเพ สุขุจฺจารณตฺถํ นิรุตฺตินเยน มชฺเฌ อนิมิตฺตํ ตการาคมํ กตฺวา ‘‘วงฺกตปพฺพโต’’ติ วุตฺตํ. อถ วา วงฺโกเยว วงฺกตา, ยถา เทโว เอว เทวตา. ยถา จ ทิสา เอว ทิสตาติ, เอวํ ตาปจฺจยวเสน วงฺกตา จ สา ปพฺพโต จาติ ‘‘วงฺกตปพฺพโต’’ติ วุตฺตํ, มชฺเฌ รสฺสวเสน เจตํ ทฏฺฐพฺพํ. อถ วา วงฺกมสฺส สณฺฐานมตฺถีติ วงฺกโตติ มนฺตุอตฺเถ ตปจฺจโย, ยถา ปพฺพมสฺส อตฺถีติ ปพฺพโตติ. เอวํ วงฺกโต จ โส ปพฺพโต จาติ วงฺกตปพฺพโต. ‘‘วงฺกปพฺพโต’’ อิจฺเจว วา ปณฺณตฺติ, ปาทกฺขรปาริปูริยา ปน ‘‘ทูเร วงฺกตปพฺพโต’’ติ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. अशा प्रकारे, 'ज्याप्रमाणे मासा मांसाने झाकलेल्या वाकड्या गळाला (बाळिस)...' येथे 'वंक' (vaṅka) हा शब्द गळाचे (बाळिस) दुसरे नाव आहे, तो गुणवाचक नाही. अशा प्रकारे 'वंक' शब्द गळाच्या (बाळिस) अर्थात वापरला जातो. 'आम्ही कंक पर्वताकडे जात आहोत. दूर वंकत पर्वत आहे' इत्यादींमध्ये तो एका विशिष्ट पर्वताच्या अर्थात वापरला जातो. आणि येथे 'वंकपर्वत' असे म्हणायचे असताना, सुलभ उच्चारणासाठी निरुक्त पद्धतीनुसार मध्ये विनाकारण 'त' काराचा आगम करून 'वंकतपर्वत' असे म्हटले आहे. अथवा 'वंक' म्हणजेच 'वंकता', जसे 'देव' म्हणजेच 'देवता' आणि जसे 'दिसा' (दिशा) म्हणजेच 'दिसाता' (दिशाता), अशा प्रकारे 'ता' प्रत्ययाच्या प्रभावाने 'वंकता' आणि तो 'पर्वत' मिळून 'वंकतपर्वत' असे म्हटले आहे, आणि मध्ये र्हस्व स्वराच्या प्रभावाने हे समजले पाहिजे. अथवा ज्याचा आकार वक्र (वाकडा) आहे तो 'वंकत' - येथे 'मतुप्' अर्थात 'त' प्रत्यय आहे, जसे ज्याला पर्व (सांधे) आहेत तो 'पर्वत'. अशा प्रकारे जो 'वंकत' आहे आणि तो 'पर्वत' आहे तो 'वंकतपर्वत' होय. 'वंकपर्वत' अशीच ही संज्ञा (पण्णत्ति) आहे, परंतु गाथेचा चरण पूर्ण करण्यासाठी 'दूरे वंकतपब्बतो' असे म्हटले आहे, असे समजले पाहिजे. โลก ทสฺสเน. โลกติ. โลโก. อาโลโกติ อญฺญานิปิ รูปานิ คเหตพฺพานิ. จุราทิคณํ ปน ปตฺวา อิมิสฺสา ‘‘โลเกติ, โลกยติ, โอโลเกติ, โอโลกยตี’’ติอาทินา รูปานิ ภวนฺติ. โลโกติ ตโย โลกา สงฺขารโลโก สตฺตโลโก โอกาสโลโกติ. ตตฺถ ‘‘เอโก โลโก, สพฺเพ สตฺตา อาหารฏฺฐิติกา’’ติ อาคโต สงฺขาโร เอว โลโก สงฺขารโลโก. สตฺตา เอว โลโก สตฺตโลโก. จกฺกวาฬสงฺขาโต โอกาโส เอว โลโก โอกาสโลโก, โย ‘‘ภาชนโลโก’’ติปิ วุจฺจติ. เตสุ สงฺขาโร ลุชฺชตีติ โลโกติ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา ‘‘ลุชฺชติ ปลุชฺชตีติ โข ภิกฺขุ ตสฺมา โลโกติ วุจฺจตี’’ติ. โลกิยติ เอตฺถ ปุญฺญปาปํ ตพฺพิปาโก จาติ สตฺโต โลโก. โลกิยติ วิจิตฺตาการโต ทิสฺสตีติ จกฺกวาฬสงฺขาโต โอกาโส โลโก. ยสฺมา ปน โลกสทฺโท สมูเหปิ ทิสฺสติ, ตสฺมา โลกิยติ สมุทายวเสน [Pg.16] ปญฺญาปิยตีติ โลโก, สมูโหติ อยมฺปิ อตฺโถ คเหตพฺโพ. อถ วา โลโกติ ตโย โลกา กิเลสโลโก ภวโลโก อินฺทฺริยโลโกติ. เตสํ สรูปํ จุราทิคเณ กเถสฺสาม พหุวิธตญฺจ. พหิทฺธา ปน กวีหิ ‘‘โลโก ตุ ภุวเน ชเน’’ติ เอตฺตกเมว วุตฺตํ. लोक् (loka) धातू पाहणे (दर्शन) या अर्थात आहे. लोकति (पाहतो). लोक (loko). आलोक (प्रकाश) इत्यादी इतर रूपेही ग्रहण करावीत. चुरादिगणात आल्यावर या धातूची 'लोकेति, लोकयति, ओलोकेति, ओलोकयति' इत्यादी रूपे होतात. लोक म्हणजे तीन लोक आहेत: संस्कारलोक (संखारलोक), सत्त्वलोक (सत्तलोक) आणि अवकाशलोक (ओकासलोक). त्यात 'एक लोक आहे, सर्व प्राणी आहारावर टिकून आहेत' या वचनात आलेला संस्कार (संखार) हाच लोक म्हणजे 'संस्कारलोक' होय. प्राणी (सत्त) हाच लोक म्हणजे 'सत्त्वलोक' होय. चक्रवाळ नावाचा अवकाश हाच लोक म्हणजे 'अवकाशलोक' होय, ज्याला 'भाजनलोक' (पात्रलोक) असेही म्हणतात. त्यांच्यामध्ये, संस्कार नष्ट होतो (लज्जति) म्हणून त्याला 'लोक' म्हणतात. कारण भगवंतांनी असे म्हटले आहे की, 'हे भिक्खू, जे नष्ट होते, विरघळते (लुज्जति पलुज्जति), म्हणूनच त्याला लोक असे म्हटले जाते.' येथे ज्याच्याद्वारे पुण्य-पाप आणि त्याचा विपाक पाहिला जातो, तो प्राणी म्हणजे 'सत्त्वलोक' होय. जो विविध रूपांनी पाहिला जातो किंवा दिसतो, तो चक्रवाळ नावाचा अवकाश म्हणजे 'अवकाशलोक' होय. परंतु, ज्याअर्थी 'लोक' शब्द समूहाच्या अर्थातही आढळतो, त्याअर्थी जो समुदाय रूपाने जाणला जातो तो 'लोक' (समूह) हा देखील अर्थ ग्रहण केला पाहिजे. अथवा लोक म्हणजे तीन लोक आहेत: क्लेशलोक (किलेसलोक), भवलोक आणि इंद्रियलोक. त्यांचे स्वरूप आणि विविध प्रकार आम्ही चुरादिगणात सांगू. परंतु बाहेरील कवींनी 'लोक म्हणजे भुवन (विश्व) आणि जन (लोक)' एवढेच म्हटले आहे. สิโลก สงฺฆาเต. สงฺฆาโต ปิณฺฑนํ. สิโลกติ, สิโลโก, สิโลกมนุกสฺสามิ. อกฺขรปทนิยมิโต วจนสงฺฆาโต สิโลโก. โส ปชฺชนฺติ วุจฺจติ, ตถา หิ ‘‘สิโลโก ยสสฺสิ ปชฺเช’’ติ กวโย วทนฺติ. सिलोक् (siloka) धातू एकत्र करणे (संघात/पिंडण) या अर्थात आहे. संघात म्हणजे पिंडण (एकत्र करणे). सिलोकति, सिलोक, 'सिलोकमनुकस्सामि' (मी श्लोकाचे अनुकरण करीन). अक्षर आणि पदांनी नियमबद्ध असलेला शब्दांचा समूह म्हणजे 'सिलोक' (श्लोक) होय. त्याला 'पज्ज' (पद्य) असेही म्हणतात, म्हणूनच कवी म्हणतात की 'सिलोक म्हणजे यशस्वी पद्य होय'. เทก เธก สทฺทุสฺสาเหสุ. สทฺโท รโว, อุสฺสาโห วายาโม. เทกติ. เธกติ. देक् (deka) आणि धेक् (dheka) हे धातू आवाज (शब्द) आणि उत्साह (प्रयत्न) या अर्थात आहेत. शब्द म्हणजे आवाज (रव), आणि उत्साह म्हणजे प्रयत्न (वायाम). देकति. धेकति. เรก สกิ สงฺกายํ. เรกติ. สงฺกติ, ตสฺมึ เม สงฺกเต มโน. สงฺกา. रेक् (reka) आणि सक् (saki) हे धातू शंका (संका) घेण्याच्या अर्थात आहेत. रेकति. संकति (शंका घेतो), 'त्याच्याविषयी माझे मन शंका घेते' (तस्मिं मे संकते मनो). संका (शंका). อกิ ลกฺขเณ. องฺกติ, องฺโก, สสงฺโก. अक् (aki) धातू चिन्हांकित करणे (लक्षण) या अर्थात आहे. अंकति (चिन्हांकित करतो), अंक (चिन्ह/मांडी), ससंक (शशंक - चंद्राचे नाव). มกิ มณฺฑเน. มณฺฑนํ ภูสนํ, มงฺกติ. मक् (maki) धातू सुशोभित करणे (मंडन) या अर्थात आहे. मंडन म्हणजे विभूषण. मंकति (सुशोभित करतो). กต โลลิเย. โลลภาโว โลลิยํ ยถา ทกฺขิยํ. กกติ, กาโก, กากี. เอตฺถ ‘‘กาโก, ธงฺโก, วายโส, พลิ, โภชิ, อริฏฺโฐ’’ติ อิมานิ กากาภิธานานิ. कत् (kata) धातू चंचलतेच्या (लोलिय) अर्थात आहे. लोलभाव म्हणजे लोलिय (चंचलता), जसे 'दक्खिय' (दक्षता). ककति, काक (कावळा), काकी (कावळीण). येथे 'काक, धंक, वायस, बलिभोजी, अरिट्ठ' ही कावळ्याची नावे आहेत. กุก วก อาทาเน. กุกติ, วกติ, โกโก, วโก. เอตฺถ โกโกติ อรญฺญสุนโข. วโกติ ขุทฺทกวนทีปิโก, พฺยคฺโฆติปิ วทนฺติ. कुक् (kuka) आणि वक् (vaka) हे धातू ग्रहण करणे (आदान) या अर्थात आहेत. कुकति, वकति, कोक, वक. येथे 'कोक' म्हणजे जंगली कुत्रा (अरण्यशुनक). आणि 'वक' म्हणजे लहान वन-चित्ता (खुद्दकवनदीपिक), काही जण याला वाघ (ब्यग्ध) असेही म्हणतात. วก ทิตฺติยํ ปฏิฆาเต จ. ทิตฺติ โสภา, วกติ. वक् (vaka) धातू चमकणे (दीप्ति) आणि प्रतिकार करणे (प्रतिघात) या अर्थात आहे. दीप्ति म्हणजे शोभा. वकति. กกิ [Pg.17] วกิ สกฺก ติก ฏิก เสก คตฺยตฺถา. กงฺกติ, วงฺกติ, สกฺกติ, นิสกฺกติ, ปริสกฺกติ, โอสกฺกติ, วธาย ปริสกฺกนํ. พิฬารนิสกฺกมตฺตมฺปิ. เตกติ, เฏกติ, ฏีกา เสกติ. เอตฺถ ฏีกาติ ฏิกิยติ ชานิยติ สํวณฺณนาย อตฺโถ เอตายาติ ฏีกา. เอตา อิธาตุอาทิกา เสกปริยนฺตา ธาตุโย ‘‘อตฺตโนภาสา’’ติ สทฺทสตฺถวิทู วทนฺติ. เตสํ มเต เอตา ‘‘เต อนฺเต, ตํ อนฺตํ’’อิจฺจาทีนํเยว วิสโย, ปาวจเน ปน นิยโม นตฺถิ. कक् (kaki), वक् (vaki), सक्क (sakka), तिक (tika), टिक (ṭika), सेक् (seka) हे धातू गतीच्या अर्थात आहेत. कंकति, वंकति, सक्कति, निसक्कति, परिसक्कति, ओसक्कति, 'वधाय परिसक्कनं' (वधासाठी फिरणे). 'बिळारनिसक्कमत्तम्पि' (मांजराच्या सरकण्याइतके देखील). तेकति, टेकति, टीका, सेकति. येथे 'टीका' म्हणजे - जिच्याद्वारे स्पष्टीकरणाचा (संवण्णना) अर्थ जाणला जातो (टिकियति जानियति) ती 'टीका' होय. व्याकरणतज्ज्ञ (सद्दसत्थविदू) म्हणतात की, या 'इ' धातूपासून सुरू होऊन 'सेक' पर्यंत संपणाऱ्या धातू 'आत्मनेपदी' (अत्तनोभासा) आहेत. त्यांच्या मते, या धातू केवळ 'ते, अन्ते, तं, अन्तम्' इत्यादी प्रत्ययांचेच विषय आहेत, परंतु बुद्धवचनात (पावचन) असा कोणताही नियम नाही. หิกฺก อพฺยตฺตสทฺเท. อพฺยตฺตสทฺโท อวิภาวิตตฺถสทฺโท นิรตฺถกสทฺโท จ. หิกฺกติ, หิกฺกเต. อิมํ ‘‘อุภยโตภาสา’’ติ วทนฺติ. อิทํ ตุ ปาวจเนน สํสนฺทติ. ปรสฺสตฺตโนภาสานญฺหิ ธาตูนํ ‘‘ภวติ, ภวเต, พาธเต, พาธตี’’ติอาทินา เยภุยฺเยน ทฺวิธา ทฺวิธา รูปานิ สาสเน ทิสฺสนฺติ. हिक्क् (hikka) धातू अस्पष्ट आवाजाच्या (अव्यक्तशब्द) अर्थात आहे. अव्यक्तशब्द म्हणजे जिचा अर्थ स्पष्ट होत नाही असा शब्द किंवा निरर्थक शब्द. हिक्कति, हिक्कते. याला 'उभयपदी' (उभयतोभासा) म्हणतात. हे मात्र बुद्धवचनाशी (पावचन) सुसंगत आहे. कारण परस्मैपद आणि आत्मनेपद (परस्स-अत्तनोभास) असणाऱ्या धातूंची 'भवति, bhavate, बाधते, बाधति' इत्यादी प्रकारे बहुतांश करून दोन्ही प्रकारची रूपे शासनात (बुद्धशासनात) आढळतात. อิมานิ กการนฺตธาตุรูปานิ. ही 'क'कारान्त धातूंची रूपे आहेत. ขการนฺตธาตุ 'ख'कारान्त धातू. ขา ปกถเน ขฺยา จ. ปกถนํ อาจิกฺขนํ เทสนํ วา. ขาติ, สงฺขาติ. อาปุพฺพตฺเต วิสทิสภาเวน ขาตฺยกฺขรสฺส ทฺวิตฺตํ, อาการสฺส จ สญฺโญคปุพฺพตฺตา รสฺสตฺตํ, อกฺขาติ. อกฺขาสิ ปุริสุตฺตโม. อกฺเขยฺยํ เต อหํ อยฺเย. ธมฺโม สงฺขายติ. อกฺขายติ. อตฺร ปน กการโลโป. สฺวาขาโต ภควตา ธมฺโม. สงฺขาโต. อกฺขาโต. อกฺขาตาโร ตถาคตา. สงฺขาตา สพฺพธมฺมานํ วิธุโร. สงฺขา, ปฏิสงฺขา. กฺริยํ อากฺยาติ กเถตีติ อาขฺยาตํ. เกจิ [Pg.18] ปน ‘‘สฺวาขาโต’’ติ จ ‘‘สฺวากฺขฺยาโต’’ติ จ ‘‘สฺวาขฺยาโต’’ติ จ ปทมิจฺฉนฺติ. ตตฺถ ปจฺฉิมานิ สกฺกฏภาสาโต นยํ คเหตฺวา วุตฺตานิ, อิตรํ ยถาฐิตรูปนิปฺผตฺติวเสน, อโต ยถาทสฺสิตปทานิเยว ปสตฺถตรานิ. ตตฺถ สงฺขาสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร นียเต – สงฺขาสทฺโท ญาณโกฏฺฐาสปญฺญตฺติคณนาสุ ทิสฺสติ. ‘‘สงฺขาเยกํ ปฏิเสวตี’’ติอาทีสุ หิ ญาเณ ทิสฺสติ. ‘‘ปปญฺจสญฺญาสงฺขา สมุทาจรนฺตี’’ติอาทีสุ โกฏฺฐาเส. ‘‘เตสํ เตสํ ธมฺมานํ สงฺขา สมญฺญา’’ติอาทีสุ ปญฺญตฺติยํ. ‘‘น สุกรํ สงฺขาตุ’’นฺติอาทีสุ คณนายํ. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – खा (khā) आणि ख्या (khyā) हे धातू प्रकथन (स्पष्ट सांगणे) या अर्थात आहेत. प्रकथन म्हणजे सांगणे (आचिक्खण) किंवा उपदेश करणे (देसना). खाति, संखाति. 'आ' उपसर्ग लागल्यावर विसदृश भावामुळे 'खा' या अक्षराचे द्वित्व होते, आणि संयोगाच्या पूर्वी असल्यामुळे 'आ' कार र्हस्व होतो, ज्यामुळे 'अक्खाति' (अक्खाति) रूप बनते. 'अक्खासि पुरिसुत्तमो' (पुरुषोत्तमाने सांगितले). 'अक्खेय्यं ते अहं अय्ये' (हे आर्ये, मी तुला सांगेन). धम्मो संखायति. अक्खायति. येथे मात्र 'क' काराचा लोप होतो. 'स्वाक्खातो भगवता धम्मो' (भगवंतांनी धर्म सुविख्यात/सुस्पष्ट सांगितला आहे). संखातो. अक्खातो. 'अक्खातारो तथागता' (तथागत हे केवळ मार्ग सांगणारे आहेत). 'संखाता सब्बधम्मानं विधुरो' (सर्व धर्मांचे योग्य प्रकारे आकलन करणारा विद्वान). संखा (संख्या/प्रज्ञा), पटिसंखा (प्रतिसंख्या/विचारपूर्वक). जे क्रियेचे कथन करते (आक्याति कथेति) ते 'आख्यात' (क्रियापद) होय. काही जण 'स्वाखातो', 'स्वाक्ख्यातो' आणि 'स्वाख्यातो' अशी पदे इच्छितात. त्यात नंतरची दोन पदे संस्कृत भाषेचा (सक्कठभासा) नियम घेऊन सांगितली आहेत, तर पहिले पद मूळ पाली भाषेच्या रूपसिद्धीनुसार आहे; म्हणून वर दर्शविलेली पदेच अधिक प्रशस्त आहेत. येथे 'संखा' (saṅkhā) शब्दाचा अर्थ स्पष्ट केला जात आहे - 'संखा' शब्द ज्ञान, विभाग (कोठ्ठास), प्रज्ञप्ती (पण्णत्ति) आणि गणना या अर्थांमध्ये आढळतो. 'संखायेकं पटिसेवति' (विचारपूर्वक एकाचे सेवन करतो) इत्यादींमध्ये तो 'ज्ञान' या अर्थात आढळतो. 'पपञ्चसञ्ञासंखा समुदाचरन्ति' (प्रपंच-संज्ञांचे विभाग उद्भवतात) इत्यादींमध्ये तो 'विभाग' (कोठ्ठास) या अर्थात आढळतो. 'तेसं तेसं धम्मानं संखा समञ्ञा' (त्या त्या धर्मांची संज्ञा व नाव) इत्यादींमध्ये तो 'प्रज्ञप्ती' (पण्णत्ति) या अर्थात आढळतो. 'न सुकरं संखातुं' (मोजणे सोपे नाही) इत्यादींमध्ये तो 'गणना' या अर्थात आढळतो. याविषयी असे म्हटले आहे - ‘‘ญาณปญฺญตฺติโกฏฺฐาส-คณนาสุ ปทิสฺสติ; สงฺขาสทฺโทติ ทีเปยฺย, ธมฺมทีปสฺส สาสเน’’ติ. 'संखा' हा शब्द ज्ञान, प्रज्ञप्ती, विभाग आणि गणना या अर्थांमध्ये आढळतो; धर्मदीप असलेल्या भगवंतांच्या शासनात असा याचा अर्थ स्पष्ट करावा. ขิ ขเย. ขิยนธมฺมํ ขียติ. สาสนานุรูเปน สเร อิการสฺส อิยฺยาเทโส, ขิยฺยติ. ‘‘ขโย, ขํ’’ อิจฺจปิ รูปานิ เญยฺยานิ. ตตฺถ ขโยติ ขิยนํ ขโย. อถ วา ขิยนฺติ กิเลสา เอตฺถาติ ขโย, มคฺคนิพฺพานานิ. ขยสงฺขาเตน มคฺเคน ปาปุณิยตฺตา ผลมฺปิ ขโย. ขนฺติ ตุจฺฉํ สุญฺญํ วิวิตฺตํ ริตฺตํ, ขนฺติ วา อากาโส. 'खि' धातु क्षय (नाश) होण्याच्या अर्थात आहे. क्षय होण्याच्या स्वभावाचे जे आहे ते क्षीण होते (खीयति). व्याकरणाच्या नियमांनुसार स्वराच्या जागी 'इ' काराचा 'इय्य' आदेश होऊन 'खिय्यति' असे रूप बनते. 'खय', 'खं' इत्यादी रूपे जाणावीत. तेथे 'खय' म्हणजे क्षीण होणे (नाश). किंवा ज्याच्यामध्ये क्लेश क्षीण होतात तो 'खय' म्हणजे मार्ग आणि निर्वाण होय. क्षय संज्ञक मार्गाने प्राप्त होत असल्यामुळे 'फल' देखील 'खय' आहे. 'ख' म्हणजे तुच्छ, शून्य, विविक्त, रिक्त किंवा 'ख' म्हणजे आकाश होय. ขิ นิวาเส. ขียติ, ขิยฺยติ วา. สาสนานุรูเปน อิการสฺส อีย อิยฺยาเทโส ทฏฺฐพฺโพ. อยํ ทิวาทิคเณปิ ปกฺขิปิตพฺโพ. ขํ ขยํ. อภิรมณียํ ราชกฺขยํ. ตตฺถ ขียตีติ นิวสติ. ขนฺติ จกฺขาทิอินฺทฺริยํ จกฺขุวิญฺญาณาทีนํ นิวาสฏฺเฐน. ขยนฺติ นิเวสนํ. ราชกฺขยนฺติ รญฺโญ นิเวสนํ. อตฺรายํ ปาฬิ – 'खि' धातु निवास करण्याच्या अर्थात आहे. 'खीयति' किंवा 'खिय्यति' असे रूप बनते. व्याकरणाच्या नियमांनुसार 'इ' काराचा 'ईय' आणि 'इय्य' आदेश समजावा. हा दिवादिगणात देखील समाविष्ट केला पाहिजे. 'खं' म्हणजे 'खय' (निवासस्थान). 'अभिरमणीय राजक्खय' (रमणीय राजवाडा). तेथे 'खीयति' म्हणजे निवास करतो. चक्षुविज्ञानादींचे निवासस्थान असल्यामुळे चक्षु इत्यादी इंद्रियांना 'ख' म्हणतात. 'खय' म्हणजे निवासस्थान. 'राजक्खय' म्हणजे राजाचे निवासस्थान. येथे ही पाळी (गाथा) आहे – ‘‘สเจ [Pg.19] จ อชฺช ธาเรสิ, กุมารํ จารุทสฺสนํ; กุเสน ชาตขตฺติยํ, สวณฺณมณิเมขลํ; ปูชิตา ญาติสงฺเฆหิ, น คจฺฉสิ ยมกฺขย’’นฺติ. “आणि जर आज तू या सुंदर दिसणाऱ्या कुमाराला धारण करशील, जो कुशापासून जन्मलेला क्षत्रिय आहे, ज्याने सुवर्ण आणि मण्यांची मेखला धारण केली आहे, तर नातेवाईकांच्या समूहाकडून पूजली जाऊन तू यमलोकाला (यमाच्या निवासाला) जाणार नाहीस.” ตตฺถ ยมกฺขยนฺติ ยมนิเวสนํ. तेथे 'यमक्खय' म्हणजे यमाचे निवासस्थान. ขุ สทฺเท. โขติ ขวติ. 'खु' धातु शब्दाच्या (आवाजाच्या) अर्थात आहे. 'खु' पासून 'खवति' असे रूप बनते. เข ขาทนสตฺตาสุ. ขายติ. อุนฺทูรา ขายนฺติ. วิกฺขายิตกํ. โคขายิตกํ. อสฺสิรี วิย ขายติ. ทิสาปิ เม น ปกฺขายนฺติ. เอตฺถาทิมฺหิ กายตีติ ขาทติ. อถ วา อุปฏฺฐาติ ปญฺญายติ. 'खे' धातु खाणे आणि अस्तित्व (किंवा दिसणे) या अर्थात आहे. 'खायति' असे रूप बनते. 'उंदूरा खायन्ति' (उंदीर खातात). 'विक्खायितकं' (प्राण्यांनी खाल्लेले शव). 'गोखायितकं' (गाईने खाल्लेले). 'अस्सिरी विय खायति' (शोभाहीन असल्यासारखे दिसते). 'दिसापि मे न पक्खायन्ति' (मला दिशा देखील स्पष्ट दिसत नाहीत). येथे सुरुवातीच्या उदाहरणांमध्ये 'खायति' म्हणजे खातो. किंवा उपस्थित होते, स्पष्ट दिसते (प्रकट होते). สุข ทุกฺข ตกฺริยายํ. ตกฺริยาติ สุขทุกฺขานํ เวทนานํ กฺริยา, สุขนํ ทุกฺขนนฺติ วุตฺตํ โหติ. อกมฺมกา อิเม ธาตโว. สุขติ, ทุกฺขติ. สุขํ, ทุกฺขํ. สุขิโต, ทุกฺขิโต. สุขํ สาตํ ปีณนํ, ทุกฺขํ วิฆาตํ อฆํ กิเลโส. ตตฺถ สุขนฺติ สุขยตีติ สุขํ. ยสฺสุปฺปชฺชติ, ตํ สุขิตํ กโรตีติ อตฺโถ. ทุกฺขนฺติ ทุกฺขยตีติ ทุกฺขํ. ยสฺสุปฺปชฺชติ, ตํ ทุกฺขิตํ กโรตีติ อตฺโถ. อิมานิ นิพฺพจนานิ การิตวเสน วุตฺตานีติ ทฏฺฐพฺพํ อฏฺฐกถายํ สุขทุกฺขสทฺทตฺถํ วทนฺเตหิ ครูหิ สุขยติ ทุกฺขยติสทฺทานํ กมฺมตฺถมาทาย วิวรณสฺส กตตฺตา. ตถา หิ ‘‘สุเขติ สุขยติ, สุขาเปติ สุขาปยติ, ทุกฺเขติ ทุกฺขยติ, ทุกฺขาเปติ ทุกฺขาปยตี’’ติ อิมานิ เตสํ การิตปทรูปานิ, อตฺตานํ สุเขติ ปีเณตีติ จ, สุขยติ สุขํ, ทุกฺขยตีติ ทุกฺขนฺติ จ, 'सुख' आणि 'दुःख' हे धातु 'तक्रिया' (त्यांच्या क्रियेच्या) अर्थात आहेत. 'तक्रिया' म्हणजे सुख आणि दुःख या वेदनांची क्रिया, म्हणजेच सुखी करणे आणि दुःखी करणे असे म्हटले आहे. हे धातु अकर्मक आहेत. 'सुखति', 'दुःखति' अशी रूपे बनतात. 'सुखं', 'दुःखं', 'सुखितो', 'दुःखितो'. सुख म्हणजे आनंद, तृप्ती; दुःख म्हणजे आघात, पीडा, क्लेश. तेथे 'सुख' म्हणजे जे सुखी करते ते सुख. ज्याला ते उत्पन्न होते, त्याला सुखी करते असा अर्थ आहे. 'दुःख' म्हणजे जे दुःखी करते ते दुःख. ज्याला ते उत्पन्न होते, त्याला दुःखी करते असा अर्थ आहे. ही व्युत्पत्ती कारित (प्रयोजक) रूपाच्या आधारे सांगितली आहे असे समजावे, कारण अट्ठकथेत सुख आणि दुःख या शब्दांचा अर्थ सांगणाऱ्या आचार्यांनी 'सुखयति' आणि 'दुःखयति' या शब्दांच्या कर्मार्थाला घेऊन स्पष्टीकरण केले आहे. तसेच “सुखेति, सुखयति, सुखापेति, सुखापयति, दुक्खेति, दुक्खयति, दुक्खापेति, duक्खापयति” ही त्यांची कारित (प्रयोजक) पदे आहेत, स्वतःला सुखी करतो, तृप्त करतो म्हणून 'सुखयति' ते सुख, आणि दुःखी करतो म्हणून 'दुक्खयति' ते दुःख, ‘‘สเจ [Pg.20] จ กิมฺหิจิ กาเล,มรณํ เม ปุเร สิยา; ปุตฺเต จ เม ปปุตฺเต จ,สุขาเปยฺย มโหสโธ’’ติ จ “आणि जर कधी काळी, माझा मृत्यू आधी झाला, तर महौषधाने माझ्या पुत्रांना आणि नातवंडांना सुखी करावे.” ปาฬิอาทิทสฺสนโต. สทฺทสตฺเถ ปน ธาตุปาฐสงฺเขเป จ อิเม ธาตโว จุราทิคเณเยว วุตฺตา. ‘‘สุขยติ ทุกฺขยตี’’ติ จ อการิตานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ อิจฺฉิตานิ. มยํ ตุ เตสํ ตพฺพจนํ สุทฺธกตฺตริ จ ตานิ ปทรูปานิ น อิจฺฉาม ปาฬิอาทีหิ วิรุทฺธตฺตา, ตสฺมาเยว เต อิมสฺมึ ภูวาทิคเณ วุตฺตา. อยญฺหิ สุทฺธกตฺตุวิสเย อสฺมากํ รุจิ ‘‘สุขตีติ สุขิโต, ทุกฺขตีติ ทุกฺขิโต’’ติ. पाळी इत्यादींमध्ये पाहिल्यामुळे. व्याकरणशास्त्रात आणि धातुपाठाच्या संक्षेपात हे धातु चुरादिगणातच सांगितले आहेत. आणि 'सुखयति', 'दुःखयति' ही अ-कारित (सामान्य) कर्तृवाचक पदे मानली गेली आहेत. परंतु आम्ही त्यांचे ते वचन आणि ती पदरूपे स्वीकारत नाही, कारण ते पाळी इत्यादींशी विरुद्ध आहे. म्हणूनच ते या भूवादिगणात सांगितले आहेत. कारण शुद्ध कर्त्याच्या विषयात आमची संमती अशी आहे की – 'सुखति' म्हणून 'सुखितो' आणि 'दुःखति' म्हणून 'दुःखितो'. นนุ จ โภ ‘‘สุขติ ทุกฺขตี’’ติ กฺริยาปทานิ พุทฺธวจเน น ทิสฺสนฺตีติ? สจฺจํ, เอวํ สนฺเตปิ อฏฺฐกถานยวเสน คเหตพฺพตฺตา ทิสฺสนฺติเยว นาม. น หิ สพฺพถา สพฺเพสํ ธาตูนํ รูปานิ สาสเน โลเก วา ลพฺภนฺติ, เอกจฺจานิ ปน ลพฺภนฺติ, เอกจฺจานิ น ลพฺภนฺติ. เอวํ สนฺเตปิ นยวเสน ลพฺภนฺติเยว. ‘‘กปฺปยวฺโห ปติสฺสตา’’ติ หิ ทิฏฺเฐ ‘‘จรวฺโห ภุญฺชวฺโห’’ติอาทีนิปิ นยวเสน ทิฏฺฐานิเยว นาม. “अहो! 'सुखति' आणि 'दुःखति' ही क्रियापदे बुद्धवचनात दिसत नाहीत ना?” हे खरे आहे, तरीही अट्ठकथेच्या पद्धतीनुसार ग्रहण करायचे असल्यामुळे ती दिसतातच. कारण सर्व प्रकारे सर्व धातूंची रूपे शासनात (बुद्धवचनात) किंवा लोकात आढळत नाहीत; काही आढळतात, तर काही आढळत नाहीत. असे असले तरी नियमानुसार ती प्राप्त होतातच. कारण 'कप्पयव्हो पतिस्सता' हे रूप पाहिले असता, 'चरव्हो', 'भुञ्जव्हो' इत्यादी रूपे देखील नियमानुसार पाहिलेलीच मानली जातात. ตตฺร ปนายํ นโย. วิสุทฺธิมคฺคาทีสุ หิ ‘‘เอกทฺวิโยชนมตฺตมฺปิ อทฺธานํ คตสฺส วาโย กุปฺปติ, คตฺตานิ ทุกฺขนฺตี’’ติ เอวํ ภูวาทิคณิกํ อกมฺมกํ สุทฺธกตฺตุวาจกํ ‘‘ทุกฺขนฺตี’’ติ กฺริยาปทํ ทิสฺสติ. ตสฺมึ ทิฏฺฐิเยว ‘‘สุขติ, สุขนฺติ. สุขสิ, สุขถ. สุขามิ, สุขามา’’ติอาทีนิ จ ‘‘ทุกฺขติ, ทุกฺขนฺติ. ทุกฺขสิ, ทุกฺขถา’’ติอาทีนิจ ทิฏฺฐานิ นาม โหนฺติ ทิฏฺเฐน อทิฏฺฐสฺส ตาทิสสฺส อนวชฺชสฺส นยสฺส คเหตพฺพตฺตา, ตสฺมา ‘‘สุขตีติ สุขิโต, ทุกฺขตีติ ทุกฺขิโต’’ติ ภูวาทินโย เอว คเหตพฺโพ, น ปน จุราทินโย. อปรมฺเปตฺถ นิพฺพจนํ, สุขํ สญฺชาตํ [Pg.21] เอตสฺสาติ สุขิโต, สญฺชาตสุโขติ อตฺโถ. เอส นโย ทุกฺขิโตติ เอตฺถาปิ. อถ วา สุเขน อิโต ปวตฺโตติ สุขิโต. เอส นโย ‘‘ทุกฺขิโต’’ติ เอตฺถาปิ. ทุลฺลภายํ นีติ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพา. तेथे हा नियम आहे. कारण विसुद्धिमग्ग इत्यादींमध्ये “एक-दोन योजन अंतर चालून गेल्यावर वायू कुपित होतो आणि शरीराचे अवयव दुखतात (दुक्खन्ति)” असे भूवादिगणीय, अकर्मक क्रियावाचक 'दुक्खन्ति' हे क्रियापद दिसते. ते पाहिले असता 'सुखति, सुखन्ति, सुखसि, सुखथ, सुखामि, सुखाम' इत्यादी आणि 'दुक्खति, duक्खन्ति, duक्खसि, duक्खथ' इत्यादी रूपे देखील पाहिलेलीच मानली जातात, कारण पाहिलेल्या रूपावरून न पाहिलेल्या अशा निर्दोष नियमाचे ग्रहण केले पाहिजे. म्हणून 'सुखति' पासून 'सुखितो' आणि 'दुःखति' पासून 'दुःखितो' हा भूवादिगणाचाच नियम स्वीकारला पाहिजे, चुरादिगणाचा नाही. येथे दुसरी व्युत्पत्ती अशी आहे – ज्याला सुख उत्पन्न झाले आहे तो 'सुखितो' (सुख प्राप्त झालेला). हाच नियम 'दुःखितो' या शब्दालाही लागू होतो. किंवा सुखाने युक्त होऊन जो प्रवृत्त झाला आहे तो 'सुखितो'. हाच नियम 'दुःखितो' या शब्दालाही लागू होतो. हा दुर्मिळ नियम चांगल्या प्रकारे मनात धारण केला पाहिजे. โมกฺข มุจฺจเน. อกมฺมโกยํ ธาตุ. โมกฺขติ. โมกฺโข. ปาติโมกฺโข. การิเต ‘‘โมกฺเขติ, โมกฺขยติ, โมกฺขาเปติ, โมกฺขาปยตี’’ติ รูปานิ. เกจิ ปนิมํ ‘‘โมกฺข โมจเน’’ติ ปฐิตฺวา จุราทิคเณ ปกฺขิปนฺติ. เตสํ มเต ‘‘โมกฺเขติ, โมกฺขยตี’’ติ สุทฺธกตฺตุปทานิ ภวนฺติ. เอตานิ ปาฬิยา อฏฺฐกถาย จ วิรุชฺฌนฺติ. ตถา หิ ‘‘โมกฺขนฺติ มารพนฺธนา. น เม สมเณ โมกฺขสิ. มหายญฺญํ ยชิสฺสาม, เอวํ โมกฺขาม ปาปกา’’ติ ปาฬิยา วิรุชฺฌนฺติ. ‘‘โย นํ ปาติ รกฺขติ, ตํ โมกฺเขติ โมเจติ อาปายิกาทีหิ ทุกฺเขหีติ ปาติโมกฺโข’’ติ อฏฺฐกถาย จ วิรุชฺฌนฺติ, ตสฺมา ปาฬิยํ ‘‘โมกฺเขสิ โมกฺเขมา’’ติ จ อวตฺวา ‘‘โมกฺขสิ, โมกฺขามา’’ติ สุทฺธกตฺตุวาจกํ วุตฺตํ, ตญฺจ โข อปาทานวิสยํ กตฺวา. อฏฺฐกถายํ ปน ‘‘โมกฺเขติ, โมเจตี’’ติ เหตุกตฺตุวาจกํ วุตฺตํ, ตมฺปิ อปาทานวิสยํเยว กตฺวา. เอวํ อิมสฺส ธาตุโน สุทฺธกตฺตุวิสเย อกมฺมกภาโว วิทิโต, เหตุกตฺตุวิสเย เอกกมฺมกภาโว วิทิโต มุจ ปจ ฉิทาทโย วิย. โมกฺขธาตุ ทฺวิคณิโกติ เจ? น, อเนเกสุ สาฏฺฐกเถสุ ปาฬิปฺปเทเสสุ ‘‘โมกฺเขติ, โมกฺขยตี’’ติ สุทฺธกตฺตุรูปานํ อทสฺสนโตติ ทฏฺฐพฺพํ. 'मोक्ख' धातु मुक्त होण्याच्या (सुटण्याच्या) अर्थात आहे. हा धातु अकर्मक आहे. 'मोक्खति' असे रूप बनते. 'मोक्खो', 'पातिमोक्खो'. कारित (प्रयोजक) रूपात “मोक्खेति, मोक्खयति, मोक्खापेति, मोक्खापयति” अशी रूपे बनतात. काही लोग याला 'मोक्ख मोचने' (मुक्त करणे) असे वाचून चुरादिगणात समाविष्ट करतात. त्यांच्या मते 'मोक्खेति', 'मोक्खयति' ही शुद्ध कर्तृवाचक पदे होतात. ही रूपे पाळी आणि अट्ठकथेशी विरुद्ध आहेत. कारण “मोक्खन्ति मारबन्धना (मारबंधनातून मुक्त होतात), न मे समणे मोक्खसि (हे श्रमणा, तू माझ्यापासून सुटू शकणार नाहीस), महायञ्ञं यजिस्साम, एवं मोक्खाम पापका (आम्ही महायज्ञ करू, अशा प्रकारे पापापासून मुक्त होऊ)” या पाळी वचनांशी ती विरुद्ध आहेत. तसेच “जो याचे पालन करतो, रक्षण करतो, त्याला अपायकारक इत्यादी दुःखांपासून मुक्त करतो (मोक्खेति मोचेति) म्हणून तो पातिमोक्ख होय” या अट्ठकथेच्या वचनाशी देखील विरुद्ध आहेत. म्हणून पाळीमध्ये 'मोक्खेसि, मोक्खेम' असे न म्हणता 'मोक्खसि, मोक्खाम' असे क्रियावाचक रूप सांगितले आहे, आणि ते अपादान विषयाला धरून आहे. अट्ठकथेत मात्र 'मोक्खेति, मोचेति' असे कारित (प्रयोजक) वाचक रूप सांगितले आहे, ते देखील अपादान विषयाला धरूनच आहे. अशा प्रकारे या धातूचा शुद्ध कर्त्याच्या विषयात अकर्मक भाव आणि हेतुकर्त्याच्या (प्रयोजक) विषयात एककर्मक भाव समजला जातो, जसे 'मुच', 'पच', 'छिद्' इत्यादी धातूंचा असतो. 'मोक्ख' धातु द्विगणिक (दोन गणांचा) आहे का? नाही, कारण अट्ठकथेसह अनेक पाळी प्रदेशांमध्ये 'मोक्खेति, मोक्खयति' ही शुद्ध कर्तृवाचक रूपे आढळत नाहीत, असे समजावे. กกฺข หสเน. กกฺขติ. 'कक्ख' धातु हसण्याच्या अर्थात आहे. 'कक्खति' असे रूप बनते. โอข ราข ลาข ทาข ธาข โสสนาลมตฺเถสุ. โอขติ. ราขติ. ลาขติ. ทาขติ. ธาขติ. 'ओख', 'राख', 'लाख', 'दाख', 'धाख' हे धातु शोषण (वाळवणे) आणि अलम् (पुरेसे असणे/शोभणे) या अर्थात आहेत. 'ओखति', 'राखति', 'लाखति', 'दाखति', 'धाखति' अशी रूपे बनतात. สาข [Pg.22] พฺยาปเน. สาขติ. สาขา. 'साख' (धातू) व्यापणे (पसरणे) या अर्थात आहे. 'साखति' (रूप बनते). 'साखा' (फांदी). อุข นข มข รข ลข รขิ ลขิ อิขิ ริขิ คตฺยตฺถา. อุขติ. นขติ. มขติ. รขติ. ลขติ. รงฺขติ. ลงฺขติ. อิงฺขติ. ริงฺขติ. 'उख', 'नख', 'मख', 'रख', 'लख', 'रखि', 'लखि', 'इखि', 'रिखि' (हे धातू) गतीच्या (गमनाच्या) अर्थात आहेत. 'उखति', 'नखति', 'मखति', 'रखति', 'लखति', 'रङ्खति', 'लङ्खति', 'इङ्खति', 'रिङ्खति' (अशी रूपे बनतात). รกฺข ปาลเน. รกฺขติ. รกฺขา, รกฺขณํ, สีลํ รกฺขิโต เทวทตฺโต, สีลํ รกฺขิตํ เทวทตฺเตน, สีลํ รกฺขโก เทวทตฺโต. 'रक्ख' (धातू) पालनाच्या (रक्षण करण्याच्या) अर्थात आहे. 'रक्खति' (रक्षण करतो). 'रक्खा' (रक्षण), 'रक्खणं' (रक्षण करणे), 'सीलं रक्खितो देवदत्तो' (देवदत्ताने शीलाचे रक्षण केले), 'सीलं रक्खितं देवदत्तेन' (देवदत्ताद्वारे शीलाचे रक्षण केले गेले), 'सीलं रक्खको देवदत्तो' (देवदत्त शीलाचे रक्षण करणारा आहे). อกฺข พฺยตฺติสงฺขาเตสุ. อกฺขติ, อกฺขิ, อกฺขํ. 'अक्ख' (धातू) प्रकटीकरण (स्पष्ट करणे) आणि गणना करणे या अर्थात आहे. 'अक्खति' (क्रियापद), 'अक्खि' (डोळा), 'अक्खं' (अक्ष/फासा). นิกฺข จุมฺพเน. นิกฺขติ, นิกฺขํ. 'निक्ख' (धातू) चुंबन घेण्याच्या (स्पर्श करण्याच्या) अर्थात आहे. 'निक्खति' (क्रियापद), 'निक्खं' (सोन्याचे नाणे/अलंकार). นกฺข คติยํ. นกฺขติ. นกฺขตฺตํ. เอตฺถ นกฺขตฺตนฺติ เอตฺโต อิโต จาติ วิสมคติยา อคนฺตฺวา อตฺตโน วีถิยาว คมเนน นกฺขนํ คมนํ ตายติ รกฺขตีติ นกฺขตฺตํ. โปราณา ปน ‘‘นกฺขรนฺติ น นสฺสนฺตีติ นกฺขตฺตานี’’ติ กถยึสุ. ‘‘นกฺขตฺตํ, โชติ, นิริกฺขํ, ภํ’’ อิจฺเจเต ปริยายา. 'नक्ख' (धातू) गतीच्या अर्थात आहे. 'नक्खति' (क्रियापद). 'नक्खत्तं' (नक्षत्र). येथे 'नक्खत्त' म्हणजे इकडे-तिकडे विषम गतीने न जाता, स्वतःच्याच मार्गाने (कक्षेत) जाण्याद्वारे आपल्या गतीचे रक्षण करते म्हणून ते 'नक्खत्त' (नक्षत्र) होय. प्राचीन आचार्यांनी मात्र असे म्हटले आहे की, "जे नष्ट होत नाहीत (नक्खरन्ति न नस्सन्तीति), ते नक्षत्र (नक्खत्तानि) होत." 'नक्खत्तं', 'जोति', 'निरिक्खं', 'भं' हे याचे समानार्थी शब्द आहेत. เวกฺข เวกฺขเน. เวกฺขติ. 'वेक्ख' (धातू) पाहण्याच्या (निरीक्षण करण्याच्या) अर्थात आहे. 'वेक्खति' (पाहतो). มกฺข สงฺขเต. มกฺขติ. 'मक्ख' (धातू) संस्कारित करणे (किंवा लेपन करणे) या अर्थात आहे. 'मक्खति' (लेपन करतो). ตกฺข ตปเน. ตปนํ สํวรณํ. ตกฺขติ. 'तक्ख' (धातू) तपनाच्या अर्थात आहे. तपन म्हणजे संवरण (संयम/रक्षण). 'तक्खति' (क्रियापद). สุกฺข อนาทเร. สุกฺขติ. 'सुक्ख' (धातू) अनादराच्या (किंवा सुकण्याच्या) अर्थात आहे. 'सुक्खति' (सुकतो). กขิ วขิ มขิ กงฺขายํ. สตฺถริ กงฺขติ. วงฺขติ, มงฺขติ. ‘‘กงฺขา กงฺขายนา กงฺขายิตตฺตํ วิมติ วิจิกิจฺฉา ทฺเวฬฺหกํ ทฺเวธาปโถ สํสโย อเนกํสคาโห อาสปฺปนา ปริสปฺปนา อปริโยคาหนา ถมฺภิตตฺตํ จิตฺตสฺส มโนวิเลโข’’ อิจฺเจเต กงฺขาปริยายา. เอเตสุ ปน – 'कखि', 'वखि', 'मखि' (हे धातू) शंकेच्या (कांक्षेच्या) अर्थात आहेत. 'सत्थरि कङ्खति' (शास्त्याविषयी/बुद्धांविषयी शंका घेतो). 'वङ्खति', 'मङ्खति' (अशी रूपे बनतात). "कङ्खा (शंका), कङ्खायना (शंका घेणे), कङ्खायितत्तं (शंकाग्रस्तता), विमति (द्विधा मनःस्थिती), विचिकिच्छा (संदेह), द्वेळ्हकं (दुटप्पीपणा), द्वेधापथो (दुहेरी मार्ग), संसयो (संशय), अनेकंसगाहो (अनिश्चित मत), आसप्पना (तगमग), परिसप्पना (भिरभिरणे), अपरियोगाहना (खोलवर न जाणे), थम्भितत्तं चित्तस्स (चित्ताची जडता), मनोविलेखो (मनाचा गोंधळ)" हे 'कङ्खा' (शंका) या शब्दाचे समानार्थी शब्द आहेत. यांपैकी – วตฺตนฺติ [Pg.23] โลกโวหาเร, ‘‘กงฺขา วิมติ สํสโย; วิจิกิจฺฉา’’ติ เอตานิ, นามานิเยว ปายโต. लोकव्यवहारात प्रामुख्याने "कङ्खा, विमति, संसयो (संशय) आणि विचिकिच्छा" हेच शब्द बहुतांश करून वापरले जातात. กขิ อิจฺจายํ. ธนํ กงฺขติ, อภิกงฺขติ, นาภิกงฺขามิ มรณํ. อภิกงฺขิตํ ธนํ. 'कखि' (धातू) इच्छेच्या अर्थात आहे. 'धनं कङ्खति' (धनाची इच्छा करतो), 'अभिकङ्खति' (तीव्र इच्छा करतो), 'नाभिकङ्खामि मरणं' (मी मरणाची इच्छा करत नाही). 'अभिकङ्खितं धनं' (इच्छिलेले धन). ทขิ ธขิ โฆรวาสิเต กงฺขายญฺจ. ทงฺขติ. ธงฺขติ. 'दखि' आणि 'धखि' (हे धातू) भयानक ओरडणे (घोरवासित) आणि शंका (किंवा इच्छा) या अर्थात आहेत. 'दङ्खति', 'धङ्खति' (अशी रूपे बनतात). อุกฺข เสจเน. อุกฺขติ. 'उक्ख' (धातू) सिंचन करण्याच्या (शिंपडण्याच्या) अर्थात आहे. 'उक्खति' (सिंचन करतो). กข หสเน. กขติ. 'कख' (धातू) हसण्याच्या अर्थात आहे. 'कखति' (हसतो). ชกฺข ภกฺขเณ จ. หสนานุกฑฺฒนตฺถํ จกาโร. ชกฺขติ. 'जक्ख' (धातू) भक्षण करण्याच्या (खाण्याच्या) आणि (हसण्याच्या) अर्थात आहे. 'च' हा शब्द हसण्याच्या अर्थाचा समावेश करण्यासाठी आहे. 'जक्खति' (भक्षण करतो/हसतो). ลิข เลขเน. ลิขติ, สลฺเลขติ. อติสลฺเลขเตวายํ สมโณ. เลขา, เลขนํ, เลขโก, ลิขิตํ, สลฺเลขปฏิปตฺติ, เอตา ทขิอาทิกา ลิขปริยนฺตา ‘‘ปรสฺสภาสา’’ติ สทฺทสตฺถวิทู วทนฺติ. 'लिख' (धातू) लिहिण्याच्या (लेखन करण्याच्या) अर्थात आहे. 'लिखति' (लिहितो), 'सल्लेखति' (क्लेश दूर करतो/कोरणे). 'अतिसल्लेखतेवायं समणो' (हा श्रमण अत्यंत कडक संलेखन/क्लेश-उन्मूलन करत आहे). 'लेखा' (रेघ/लेखन), 'लेखनं' (लेखन), 'लेखको' (लेखक), 'लिखिंत' (लिहिलेले), 'सल्लेखपटिपत्ति' (क्लेश-उन्मूलनाची प्रतिपत्ती/साधना). व्याकरणकार (सद्दसत्थविदू) म्हणतात की, 'दखि' पासून सुरू होऊन 'लिख' पर्यंत संपणारे हे धातू 'परस्सभासा' (परस्मैपद) आहेत. ธุกฺข ธิกฺข สนฺทีปนกิเลสนชีวเนสุ. ธุกฺขติ. ธิกฺขติ. สทฺทสตฺถวิทู ปน ‘‘ธุกฺขเต ธิกฺขเต’’ติ อตฺตโนภาสํ วทนฺติ. ตถา อิโต ปรานิ รูปานิปิ. 'धुक्ख' आणि 'धिक्ख' (हे धातू) प्रदीप्त करणे (संदीपन), क्लेश देणे (किलेसन) आणि जगणे (जीवन) या अर्थात आहेत. 'धुक्खति', 'धिक्खति' (अशी रूपे बनतात). परंतु, व्याकरणकार (सद्दसत्थविदू) 'धुक्खते', 'धिक्खते' अशी 'अत्तनोभास' (आत्मनेपद) रूपे सांगतात. याचप्रमाणे यापुढील रूपे देखील समजावीत. รุกฺข วกฺข วรเณ. วรณํ สํวรณํ. รุกฺขติ. วกฺขติ. รุกฺโข, วกฺโข. เอตฺถ จ วกฺโขติ รุกฺโขเยว. ตถา หิ ‘‘สาทูนิ รมณียานิ, สนฺติ วกฺขา อรญฺญชา’’ติ ชาตกปาโฐ ทิสฺสติ. อิมานิ ปน รุกฺขสฺส นามานิ – 'रुक्ख' आणि 'वक्ख' (हे धातू) वरणाच्या अर्थात आहेत. वरण म्हणजे संवरण (झाकणे/रक्षण करणे). 'रुक्खति', 'वक्खति' (अशी रूपे बनतात). 'रुक्खो' (वृक्ष), 'वक्खो' (वृक्ष). येथे 'वक्खो' म्हणजे 'रुक्खो' (वृक्ष) हाच होय. कारण जातक कथेमध्ये "सादूनि रमणीयानि, सन्ति वक्खा अरञ्ञजा" (अरण्यात उगवलेले वृक्ष गोड आणि रमणीय आहेत) असा पाठ आढळतो. वृक्षाची (रुक्खाची) नावे खालीलप्रमाणे आहेत – ‘‘รุกฺโข มหีรุโห วกฺโข, ปาทโป ชคตีรุโห; อโค นโค กุโช สาขี, สาโล จ วิฏปี ตรุ; ทุโม ผลี ตุ ผลวา, คจฺโฉ ตุ ขุทฺทปาทโป’’ติ. "रुक्खो (वृक्ष), महीरुहो, वक्खो, पादपो, jagatīruho (जगतीरुहो), अगो, नगो, कुजो, साखी, सालो, विटपी, तरु, दुमो, फली, फलवा आणि गच्छो म्हणजे लहान झाड (खुद्दपादपो)." เกเจตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘นนุ จ สาลสทฺเทน สาลรุกฺโขเยว วุตฺโต, นาญฺโญ ‘สาลา ผนฺทนมาลุวา’ติ ปโยคทสฺสนโต, อถ กิมตฺถํ สาลสทฺเทน โย โกจิ รุกฺโข [Pg.24] วุตฺโต’’ติ? น สาลรุกฺโขเยว สาลสทฺเทน วุตฺโต, อถ โข สาลรุกฺเขปิ วนปฺปติเชฏฺฐรุกฺเขปิ ยสฺมึ กสฺมิญฺจิ รุกฺเขปิ ‘‘สาโล’’ติ โวหารสฺส ทสฺสนโต อญฺเญปิ รุกฺขา วุตฺตา. ตถา หิ สาลรุกฺโขปิ ‘‘สาโล’’ติ วุจฺจติ. ยถาห ‘‘เสยฺยถาปิ ภิกฺขเว คามสฺส วา นิคมสฺส วา อวิทูเร มหนฺตํ สาลวนํ, ตญฺจสฺส เอลณฺเฑหิ สญฺฉนฺนํ. อนฺตเรน ยมกสาลาน’’นฺติ. วนปฺปติเชฏฺฐรุกฺโขปิ. ยถาห – यावर काही जण असे म्हणू शकतात की, " 'साल' या शब्दाने केवळ साल वृक्षच (सालरुक्ख) अभिप्रेत आहे, दुसरा कोणताही नाही, कारण 'साला फन्दनमालुवा' असा प्रयोग आढळतो. मग 'साल' या शब्दाने कोणताही वृक्ष का अभिप्रेत धरला गेला आहे?" केवळ साल वृक्षच 'साल' या शब्दाने अभिप्रेत नाही, तर साल वृक्षासाठी, वनातील मुख्य वृक्षासाठी (वनप्पतिजेट्ठरुक्ख) आणि कोणत्याही सामान्य वृक्षासाठी देखील 'सालो' असा व्यवहार (प्रयोग) आढळत असल्यामुळे इतर वृक्षही अभिप्रेत आहेत. कारण साल वृक्षालाही 'सालो' म्हटले जाते. जसे की म्हटले आहे – "हे भिक्खूंनो, समजा एखाद्या गावाच्या किंवा नगराच्या जवळ एक मोठे सालवन (सालांचे जंगल) असेल आणि ते एरंडाच्या झाडांनी वेढलेले असेल... यमकसालांच्या (जोडप्या साल वृक्षांच्या) दरम्यान..." वनातील मुख्य वृक्षालाही (असे म्हटले जाते). जसे की म्हटले आहे – ‘‘ตเวว เทว วิชิเต, ตเววุยฺยานภูมิยา; อุชุวํสา มหาสาลา, นีโลภาสา มโนรมา’’ติ. "हे देवा (राजन)! तुमच्याच विजितात (राज्यात), तुमच्याच उद्यानभूमीत, सरळ वंशाचे (सरळ वाढणारे), निळसर आभा असलेले आणि मनोरम असे महासाल (मोठे वृक्ष) आहेत." โย โกจิ รุกฺโขปิ. ยถาห ‘‘อถ โข ตํ ภิกฺขเว มาลุวพีชํ อญฺญตรสฺมึ สาลมูเล นิปเตยฺยา’’ติ. อตฺริทํ วุจฺจติ – कोणताही सामान्य वृक्ष देखील (साल म्हटला जातो). जसे की म्हटले आहे – "त्यानंतर, हे भिक्खूंनो, ते मालुवा (वेल) बी एका विशिष्ट साल वृक्षाच्या मुळाशी (सालमूले) पडेल." यावर हे म्हटले आहे – ‘‘สาลรุกฺเข เชฏฺฐรุกฺเข,ยสฺมึ กสฺมิญฺจิ ปาทเป; สาโล อิติ รโว สาลา,สนฺธาคาเร ถิยํ สิยา’’ติ. "साल वृक्षाच्या अर्थात, मुख्य वृक्षाच्या अर्थात किंवा कोणत्याही वृक्षाच्या अर्थात 'सालो' असा (पुल्लिंगी) शब्द वापरला जातो; आणि 'साला' हा स्त्रीलिंगी शब्द सभागृहाच्या (सन्धागारे) अर्थात वापरला जातो." สิกฺข วิชฺโชปาทาเน. สิกฺขติ. สิกฺขา, สิกฺขนํ, สิกฺขิตํ สิปฺปํ, สิกฺขโก, สิกฺขิโต, เสกฺโข, อเสกฺโข. กการโลเป ‘‘เสโข อเสโข’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. ตตฺถ สิกฺขิโตติ สญฺชาตสิกฺโข, อสิกฺขีติ วา สิกฺขิโต, ตถา หิ กตฺตุปฺปโยโค ทิสฺสติ ‘‘อหํ โข ปน สุสิกฺขิโต อนวโย สเก อาจริยเก กุมฺภการกมฺเม’’ติ. 'सिक्ख' (धातू) विद्या ग्रहण करण्याच्या (शिकण्याच्या) अर्थात आहे. 'सिक्खति' (शिकतो/प्रशिक्षण घेतो). 'सिक्खा' (शिक्षण/शीलादींचे शिक्षण), 'सिक्खनं' (शिकणे), 'सिक्खितं सिप्पं' (शिकलेली कला), 'सिक्खको' (शिकणारा/शिक्षक), 'सिक्खितो' (शिक्षित/प्रशिक्षित), 'सेक्खो' (शैक्ष - जो अजून शिकत आहे), 'असेक्खो' (अशैक्ष - ज्याचे शिक्षण पूर्ण झाले आहे). 'क' काराचा लोप झाल्यावर 'सेखो' आणि 'असेखो' अशी रूपे बनतात. त्यामध्ये 'सिक्खितो' म्हणजे ज्याच्यामध्ये शिक्षण उत्पन्न झाले आहे (सञ्जातसिक्खो) किंवा ज्याने शिक्षण घेतले आहे तो 'सिक्खितो' होय. कारण कर्त्याचा प्रयोग असा आढळतो – "मी माझ्या गुरूंच्या कुंभारकामात चांगला प्रशिक्षित (सुसिक्खितो) आणि निष्णात आहे." ภิกฺข ยาจเน. ภิกฺขติ. ภิกฺขุ, ภิกฺขา, ภิกฺขนํ, ภิกฺขโก, ภิกฺขิตํ โภชนํ. เอตฺถ ปน ‘‘ภิกฺขุ ยติ สมโณ มุนิ ปพฺพชิโต [Pg.25] อนคาโร ตปสฺสี ตโปธโน’’ อิจฺเจตานิ ปริยายวจนานิ. เอเตสุ สาสเน ‘‘ภิกฺขู’’ติ อุปสมฺปนฺโน วุจฺจติ. กทาจิ ปน ‘‘ภิกฺขุสตํ โภเชสิ, ภิกฺขุสหสฺสํ โภเชสี’’ติอาทีสุ สามเณเรปิอุปาทาย ‘‘ภิกฺขู’’ติ โวหาโร ปวตฺตติ, ตาปสาปิ จ สมณสทฺทาทีหิ วุจฺจนฺติ, ‘‘อหู อตีตมทฺธาเน, สมโณ ขนฺติทีปโน’’ติอาทิ เอตฺถ นิทสฺสนํ. 'भिक्ख' (धातू) याचना करण्याच्या (भिक्षा मागण्याच्या) अर्थात आहे. 'भिक्खति' (भिक्षा मागतो). 'भिक्खु' (भिक्खू), 'भिक्खा' (भिक्षा), 'भिक्खनं' (भिक्षा मागणे), 'भिक्खको' (भिक्षा मागणारा), 'भिक्खितं भोजनं' (भिक्षेत मिळालेले भोजन). येथे "भिक्खु, yati (यति), समणो (श्रमण), मुनि, पब्बजितो (प्रव्रजित), अनगारो (गृहहीन), तपस्सी, तपोधनो" हे समानार्थी शब्द आहेत. यांपैकी बुद्धशासनात 'भिक्खू' हा शब्द उपसंपन्न (दीक्षित) व्यक्तीसाठी वापरला जातो. परंतु कधीकधी "भिक्खुसतं भोजेसि" (शंभर भिक्खूंना भोजन दिले), "भिक्खुसहस्सं भोजेसि" (हजार भिक्खूंना भोजन दिले) इत्यादी वाक्यांमध्ये श्रामणेरांचाही (सामणेर) समावेश करून 'भिक्खू' असा व्यवहार केला जातो. तपस्वी लोकांनाही 'समण' (श्रमण) इत्यादी शब्दांनी संबोधले जाते, जसे की "भूतकाळात खन्तिदीपन नावाचे श्रमण (समणो) होते..." हे याचे उदाहरण आहे. ทกฺข วุทฺธิยํ สีฆตฺเต จ. ทกฺขติ, ทกฺขิณา, ทกฺโข. ทกฺขนฺติ วทฺธนฺติ สตฺตา เอตาย ยถาธิปฺเปตาหิ สมฺปตฺตีหิ อิทฺธา วุทฺธา อุกฺกํสคตา โหนฺตีติ ทกฺขิณา, ทาตพฺพวตฺถุ. ทกฺขติ กุสลกมฺเม อญฺญสฺมิญฺจ กิจฺจากิจฺเจ อทนฺธตาย สีฆํ คจฺฉตีติ ทกฺโข, เฉโก, โย ‘‘กุสโล’’ติปิ วุจฺจติ. 'दक्ख' (धातू) वृद्धी (वाढ) आणि शीघ्रता (चपळता) या अर्थात आहे. 'दक्खति' (क्रियापद), 'दक्खिणा' (दान), 'दक्खो' (कुशल/दक्ष). ज्याच्याद्वारे प्राणी वाढतात (वृद्धीस पावतात), म्हणजेच इच्छित संपत्तीने समृद्ध, वृद्ध आणि उन्नत होतात, त्याला 'दक्खिणा' (दान देण्याची वस्तू) म्हणतात. जो कुशल कर्मांमध्ये आणि इतर कर्तव्यांमध्ये आळस न करता वेगाने (शीघ्रतेने) प्रवृत्त होतो, त्याला 'दक्खो' (दक्ष/कुशल), चतुर (छेको) म्हणतात, ज्याला 'कुसलो' (कुशल) असेही म्हटले जाते. ทิกฺข มุณฺฑิโอปนยนนิยมพฺพตาเทเสสุ. ทิกฺขธาตุ มุณฺฑิเย, อุปนยเน, นิยเม, วเต, อาเทเส จ ปวตฺตติ. ทิกฺขติ. ทิกฺขิโต มุณฺโฑ. เอตฺถ สิยา – นนุ จ โภ สรภงฺคชาตเก ‘‘คนฺโธ อิสีนํ จิรทิกฺขิตานํ, กายา จุโต คจฺฉติ มาลุเตนา’’ติ เอตสฺมึ ปเทเส อฏฺฐกถาจริเยหิ ‘‘จิรทิกฺขิตานนฺติ จิรปพฺพชิตาน’’นฺติ วุตฺตํ. น หิ ตตฺถ ‘‘จิรมุณฺฑาน’’นฺติ วุตฺตํ. เอวํ สนฺเต กสฺมา อิธ ‘‘ทิกฺขธาตุ มุณฺฑิเย วุตฺตา’’ติ? สจฺจํ, ตตฺถ ปน ทิกฺขิตสทฺทสฺส ปพฺพชิเต วตฺตนโต ‘‘จิรปพฺพชิตาน’’นฺติ วุตฺตํ, น ธาตุอตฺถสฺส วิภาวนตฺถํ. อิท ปน ธาตุอตฺถวิภาวนตฺถํ มุณฺฑิเย วุตฺตา. ตาปสา หิ มุณฺฑิยตฺถวาจเกน ทิกฺขิตสทฺเทน วตฺตุํ ยุตฺตา. ตถา หิ อฏฺฐกถาจริเยหิ จกฺกวตฺติสุตฺตตฺถวณฺณนายํ ‘‘เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา กาสายานิ วตฺถานิ อจฺฉาเทตฺวา’’ติ อิมิสฺสา ปาฬิยา อตฺถวิวรเณ ‘‘ตาปสปพฺพชฺชํ ปพฺพชนฺตาปิ หิ ปฐมํ เกสมสฺสุํ โอหาเรนฺติ, ตโต ปฏฺฐาย ปรูฬฺหเกเส [Pg.26] พนฺธิตฺวา วิวรนฺติ, เตน วุตฺตํ เกสมสฺสุํ โอหาเรตฺวา’’ติ เอวํ อตฺโถ สํวณฺณิโต. 'दिक्ख' (dikkha) धातू मुंडण (मुंडिय), उपनयन, नियम, व्रत आणि आदेश या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'दिक्ख' धातू मुंडण, उपनयन, नियम, व्रत आणि आदेश या अर्थांत प्रवृत्त होतो. 'दिक्खति' (दीक्षा घेतो). 'दिक्खितो मुण्डो' (दीक्षित मुंडित). येथे शंका उपस्थित होऊ शकते – "अहो, सरभंग जातकात 'गन्धो इसीनां चिरदिक्खितानं, काया चुतो गच्छति मालुतेना' (दीर्घकाळ दीक्षित असलेल्या ऋषींच्या शरीरातून सुटलेला गंध वाऱ्याने वाहून जातो) या संदर्भात अट्ठकथाचार्यांनी 'चिरदिक्खितानं' म्हणजे 'चिरपब्बजितानं' (दीर्घकाळ प्रव्रजित झालेले) असे म्हटले आहे. तिथे 'चिरमुण्डानं' (दीर्घकाळ मुंडण केलेले) असे म्हटलेले नाही. असे असताना, येथे 'दिक्ख' धातू मुंडण अर्थात का सांगितला आहे? हे सत्य आहे, परंतु तिथे 'दिक्खित' शब्दाचा अर्थ प्रव्रजित असा होत असल्याने 'चिरपब्बजितानं' असे म्हटले आहे, धातूचा मूळ अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी नाही. परंतु येथे धातूचा अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी तो मुंडण अर्थात सांगितला आहे. कारण तापसांना मुंडण अर्थ दर्शवणाऱ्या 'दिक्खित' शब्दाने संबोधित करणे योग्य आहे. तसेच, अट्ठकथाचार्यांनी चक्कवत्तिसुत्त अर्थवर्णनात 'केसमस्सुं ओहारेत्वा कासायानि वत्थानि अच्छादेत्वा' (केश-श्मश्रू काढून आणि काषाय वस्त्रे परिधान करून) या पाळीच्या अर्थविवरणात 'तापसप्रव्रज्या ग्रहण करणारे सुद्धा आधी केश-श्मश्रू काढतात, त्यानंतर वाढलेले केस बांधून ठेवतात, म्हणून केश-श्मश्रू काढून असे म्हटले आहे' अशा प्रकारे अर्थ स्पष्ट केला आहे. อิกฺข ทสฺสนงฺเกสุ. อิกฺขติ, อุเปกฺขติ, อเปกฺขติ. อุเปกฺขา, อเปกฺขา, ปจฺจเวกฺขณา. กการโลเป ‘‘อุเปขา, อเปขา, อุปสมฺปทาเปโข’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. 'इक्ख' (ikkha) धातू दर्शन (पाहणे) आणि अंकन (चिन्हांकित करणे) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'इक्खति' (पाहतो), 'उपेक्खति' (उपेक्षा करतो/तटस्थ राहतो), 'अपेक्खति' (अपेक्षा करतो). 'उपेक्खा' (उपेक्षा), 'अपेक्खा' (अपेक्षा), 'पच्चवेक्खणा' (प्रत्यवेक्षण/पुनरावलोकन). 'क' काराचा लोप झाल्यास "उपेखा, अपेखा, उपसम्पदापेखो" अशी रूपे बनतात. ทุกฺข หึสาคตีสุ. ทกฺขติ. ทกฺขโก. 'दुक्ख' (dukkha) धातू हिंसा आणि गती या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'दक्खति' (पाहतो/जातो). 'दक्खको' (पाहणारा/जाणारा). จิกฺข จกฺข วิยตฺติยํ วาจายํ. จิกฺขติ, อาจิกฺขติ, อพฺภาจิกฺขติ. อาจิกฺขโก. จกฺขติ, จกฺขุ. เอตฺถ จกฺขูติ จกฺขตีติ จกฺขุ, สมวิสมํ อภิพฺยตฺตํ วทนฺตํ วิย โหตีติ อตฺโถ. อถ วา ‘‘สูปํ จกฺขติ, มธุํ จกฺขตี’’ติอาทีสุ วิย ยสฺมา อสฺสาทตฺโถปิ จกฺขุสทฺโท ภวติ, ตสฺมา ‘‘จกฺขติ วิญฺญาณาธิฏฺฐิตํ รูปํ อสฺสาเทนฺตํ วิย โหตี’’ติ อสฺสาทตฺโถปิ คเหตพฺโพ. ‘‘จกฺขุํ โข มาคณฺฑิยํ รูปารามํ รูปรตํ รูปสมฺมุทิต’’นฺติ หิ วุตฺตํ. สติปิ โสตาทีนํ สทฺทารามตาทิภาเว นิรูฬฺหตฺตา นยเน เอว จกฺขุสทฺโท ปวตฺตติ ปงฺกชาทิสทฺทา วิย ปทุมาทีสุ. 'चिक्ख' (cikkha) आणि 'चक्ख' (cakkha) धातू स्पष्ट वाणी (व्यक्त करणे) या अर्थात वापरले जातात. 'चिक्खति' (सांगतो), 'आचिक्खति' (स्पष्ट करतो/उपदेश करतो), 'अब्भाचिक्खति' (खोटा आरोप करतो). 'आचिक्खको' (सांगणारा/उपदेशक). 'चक्खति' (आस्वाद घेतो/पाहतो), 'चक्खु' (नेत्र/डोळा). येथे 'चक्खु' म्हणजे 'चक्खति' (जे पाहते किंवा आस्वाद घेते ते चक्खु), याचा अर्थ असा की ते सम आणि विषम (चांगले आणि वाईट) स्पष्टपणे सांगत असल्यासारखे असते. अथवा "सूपं चक्खति, मधुं चक्खति" (सूपाचा आस्वाद घेतो, मधाचा आस्वाद घेतो) इत्यादींप्रमाणे ज्या अर्थी 'चक्खु' शब्द आस्वाद घेण्याच्या अर्थातही येतो, त्या अर्थी "चक्खु विज्ञानावर अधिष्ठित होऊन रूपाचा आस्वाद घेत असल्यासारखे होते" असा आस्वादाचा अर्थही घेतला पाहिजे. "चक्खुं खो मागण्डिय रूपारामं रूपरतं रूपसम्मुदितं" (हे मागंदिया, चक्खु रूपाचा आस्वाद घेणारे, रूपात रमणारे आणि रूपातच आनंदित होणारे आहे) असे म्हटले आहे. कान इत्यादी इंद्रिये शब्दादी विषयांमध्ये रमणारी असली, तरी रूढीमुळे 'चक्खु' हा शब्द केवळ डोळ्यासाठीच वापरला जातो, ज्याप्रमाणे 'पंकज' इत्यादी शब्द केवळ कमळासाठीच वापरले जातात. จกฺข’กฺขิ นยนํ, โลจนํ ทิฏฺฐิ ทสฺสนํ; เปกฺขนํ อจฺฉิ ปมฺหํ ตุ, ‘‘ปขุม’’นฺติ ปวุจฺจติ. चक्ख, अक्खि, नयन, लोचन, दिट्ठि, दस्सन, पेक्खण आणि अच्छि हे डोळ्याचे (नेत्राचे) समानार्थी शब्द आहेत; आणि 'पम्ह' याला "पखुम" (पापणी) असे म्हटले जाते. เอตา รุกฺขาทิกา จกฺขปริยนฺตา ‘‘อตฺตโนภาสา’’ติ สทฺทสตฺถวิทู วทนฺติ. 'रुक्ख' (rukkha) पासून सुरू होऊन 'चक्ख' (cakkha) पर्यंत संपणारे हे धातू "अत्तनोभासा" (आत्मनेपदी) आहेत, असे व्याकरणकार (शब्दशास्त्रज्ञ) म्हणतात. ขการนฺตธาตุรูปานิ. 'ख' कारान्त धातूंची रूपे समाप्त. คการนฺตธาตุ 'ग' कारान्त धातू. คุ กรีสุสฺสคฺเค. กรีสุสฺสคฺโค วจฺจกรณํ. ควติ. เค สทฺเท. คายติ. คีตํ. 'गु' (gu) धातू मलोत्सर्ग (विष्ठा त्याग करणे) या अर्थात वापरला जातो. मलोत्सर्ग म्हणजे शौच करणे. 'गवति' (मल विसर्जन करतो). 'गे' (ge) धातू ध्वनी (गाणे) या अर्थात वापरला जातो. 'गायति' (गातो). 'गीतं' (गाणे/गीत). วคฺค [Pg.27] คติยํ. วคฺคติ. วคฺโค, วคฺคิตํ. เอตฺถ สมุทายวเสน วคฺคนํ ปวตฺตนํ วคฺโค. วคฺคิตนฺติ คมนํ. ตถา หิ นาคเปตวตฺถุอฏฺฐกถายํ ‘‘โย โส มชฺเฌ อสฺสตรีรเถน จตุพฺภิ ยุตฺเตน สุวคฺคิเตน. อมฺหากํ ปุตฺโต อหุ มชฺฌิโม โส, อมจฺฉรี ทานปตี วิโรจตี’’ติ อิมิสฺสา ปาฬิยา อตฺถํ วทนฺเตหิ ‘‘สุวคฺคิเตนาติ สุนฺทรคมเนนา’’ติ. กิญฺจิ ภิยฺโย กฺริยาปทมฺปิ จ ทิฏฺฐํ ‘‘ธุนนฺติ วคฺคนฺติ ปวตฺตนฺติ จมฺพเร’’ติ. 'वग्ग' (vagga) धातू गती (चालणे/धावणे) या अर्थात वापरला जातो. 'वग्गति' (धावतो/चालतो). 'वग्गो' (समूह/वर्ग), 'वग्गितं' (चालणे/गती). येथे समूहाच्या रूपाने प्रवृत्त होणे म्हणजे 'वग्गो' (वर्ग). 'वग्गितं' म्हणजे गमन (चालणे). तसेच, नागपेतवत्थु-अट्ठकथेत "यो सो मज्झे अस्सतरीरथेन चतुब्भि युत्तेन सुवग्गितेन. अम्हाकं पुत्तो अहु मज्झिमो सो, अमच्छरी दानपती विरोचति" (जो चार उत्तम चालणाऱ्या खेचरांच्या रथाच्या मध्यभागी बसला आहे...) या पाळीचा अर्थ सांगताना "सुवग्गितेन म्हणजे सुंदर गमनाने (उत्तम चालीने)" असे म्हटले आहे. काही ठिकाणी क्रियापद म्हणूनही याचा अधिक वापर आढळतो, जसे की "धुनन्ति वग्गन्ति पवत्तन्ति चम्बरे" (ते आकाशात थरथरतात, वेगाने धावतात आणि फिरतात). รคิ ลคิ อคิ วคิ มคิ อิคิ ริคิ ลิคิ ตคิ สคิ คมเน จ. จกาโร คติเปกฺขโก. รงฺคติ. รงฺโค. ลงฺคติ. ลงฺโค, ลงฺคี. องฺคติ, องฺเคติ. องฺโค, สมงฺคี, สมงฺคิตา, องฺคํ, องฺคณํ. วงฺคติ. วงฺโค. มงฺคติ. มงฺโค, อุปงฺโค, มงฺคลํ. อิงฺคติ. อิงฺคิตํ. ริงฺคติ. ริงฺคนํ. ลิงฺคติ. ลิงฺคนํ. อุลฺลิงฺคติ, อุลฺลิงฺคนํ. ตงฺคติ. ตงฺคนํ. สงฺคติ. สงฺคนํ. ตตฺถ องฺคนฺติ เยสํ เกสญฺจิ วตฺถูนํ อวยโว, สรีรมฺปิ การณมฺปิ จ วุจฺจติ. องฺคณนฺติ กตฺถจิ กิเลสา วุจฺจนฺติ ‘‘ราโค องฺคณ’’นฺติอาทีสุ. ราคาทโย หิ องฺคนฺติ เอเตหิ ตํสมงฺคิปุคฺคลา นิหีนภาวํ คจฺฉนฺตีติ ‘‘องฺคณานี’’ติ วุจฺจนฺติ. กตฺถจิ มลํ วา ปงฺโก วา ‘‘ตสฺเสว รชสฺส วา องฺคณสฺส วา ปหานาย วายมตี’’ติอาทีสุ. อญฺชติ มกฺเขตีติ หิ องฺคณํ, มลาทิ. กตฺถจิ ตถารูโป วิวฏปฺปเทโส ‘‘เจติยงฺคณํ, โพธิยงฺคณ’’นฺติอาทีสุ. อญฺชติ ตตฺถ ฐิตํ อติสุนฺทรตาย อภิพฺยญฺเชตีติ หิ องฺคณํ, วิวโฏ ภูมิปฺปเทโส. อิจฺเจวํ – 'रगि' (ragi), 'लगि' (lagi), 'अगि' (agi), 'वगि' (vagi), 'मगि' (magi), 'इगि' (igi), 'रिगि' (rigi), 'लिगि' (ligi), 'तगि' (tagi), 'सगि' (sagi) हे धातू गमन (जाणे) या अर्थात वापरले जातात. 'च' कार गतीचा निर्देश करतो. 'रङ्गति' (रंगतो/जातो), 'रङ्गो' (रंग/मंच). 'लङ्गति' (ओलांडतो/जातो), 'लङ्गो', 'लङ्गी'. 'अङ्गति', 'अङ्गेति' (जातो/चिन्हांकित करतो). 'अङ्गो', 'समङ्गी' (युक्त असलेला), 'समङ्गिता' (युक्तता), 'अङ्गं' (अवयव/अंग), 'अङ्गणं' (अंगण/मळ). 'वङ्गति' (वाकडा जातो), 'वङ्गो' (वाकडा). 'मङ्गति' (जातो), 'मङ्गो', 'उपङ्गो' (उपांग), 'मङ्गलं' (मंगल). 'इङ्गति' (हलतो), 'इङ्गितं' (इशारा/चेष्टा). 'रिङ्गति' (रांगतो), 'रिङ्गणं' (रांगणे). 'लिङ्गति' (आलिंगन देतो/चिन्हांकित करतो), 'लिङ्गणं' (लिंग/चिन्ह). 'उल्लिङ्गति' (उल्लेख करतो), 'उल्लिङ्गणं'. 'तङ्गति' (जातो), 'तङ्गणं'. 'सङ्गति' (सोबत जातो/मिळतो), 'सङ्गणं'. त्यापैकी 'अङ्ग' म्हणजे कोणत्याही वस्तूचा अवयव, शरीर किंवा कारण असे म्हटले जाते. 'अङ्गण' हा शब्द काही ठिकाणी क्लेशांसाठी वापरला जातो, जसे की "रागो अङ्गणं" (राग हा मळ/अंगण आहे) इत्यादींमध्ये. राग इत्यादी क्लेशांमुळे त्या क्लेशांनी युक्त असलेले पुद्गल (व्यक्ती) हीन दशेला प्राप्त होतात, म्हणून त्यांना "अङ्गणानी" (मळ) म्हटले जाते. काही ठिकाणी याचा अर्थ धूळ किंवा चिखल असा होतो, जसे की "तस्सेव रजस्स वा अङ्गणस्स वा पहानाय वायमति" (त्याच धुळीचा किंवा मळाचा नाश करण्यासाठी प्रयत्न करतो) इत्यादींमध्ये. 'अञ्जति' (माखणे/लिंपणे) यावरून 'अङ्गण' म्हणजे मळ इत्यादी असा अर्थ होतो. काही ठिकाणी याचा अर्थ मोकळी जागा असा होतो, जसे की "चेतियङ्गणं" (चैत्य-अंगण), "बोधियङ्गणं" (बोधी-अंगण) इत्यादींमध्ये. तिथे असलेली अतिशय सुंदर गोष्ट जी प्रकट करते ती 'अङ्गण' म्हणजे मोकळी जमीन होय. अशा प्रकारे – ราคาทีสุ กิเลเสสุ, ปงฺเก กายมลมฺหิ จ; วิวเฏ ภูมิภาเค จ, ‘‘องฺคณ’’นฺติ รโว คโต. राग इत्यादी क्लेश, चिखल, शरीराचा मळ आणि मोकळी जमीन या अर्थांमध्ये "अङ्गण" (अंगण/मळ) हा शब्द प्रसिद्ध आहे. ยุคิ [Pg.28] ชุคิ วชฺชเน. ยุงฺคติ. ชุงฺคติ. 'युगि' (yugi) आणि 'जुगि' (jugi) हे धातू वर्जना (त्याग करणे) या अर्थात वापरले जातात. 'युङ्गति' (त्याग करतो), 'जुङ्गति' (निंदा करतो/त्याग करतो). รคิ สงฺกายํ. รงฺคติ. 'रगि' (ragi) धातू शंका (संशय) या अर्थात वापरला जातो. 'रङ्गति' (शंका घेतो). ลค สงฺเคจ. จ กาโร อนนฺตรวุตฺตาเปกฺขโก. ลคติ. จ ชโต น โหติ ลคนํ. พฬิเส ลคฺโค. 'लग' (laga) धातू आसक्ती (चिकटणे) आणि शंका या अर्थात वापरला जातो. 'च' कार आधी सांगितलेल्या अर्थाचा (शंकेचा) निर्देश करतो. 'लगति' (चिकटतो/अडकतो). 'च' कारामुळे 'लगन' (अडकणे) हे संशयाशिवाय होत नाही. 'बळिसे लग्गो' (गळाला अडकलेला मासा). ถคํ สํวรเณ. ถคติ. 'थग' (thaga) धातू झाकणे (संवरण करणे) या अर्थात वापरला जातो. 'थगति' (झाकतो/बंद करतो). อคฺค กุฏิลคติยํ. อคฺคตีติ อคฺคิ, กุฏิลํ คจฺฉตีติ อตฺโถ. 'अग्ग' (agga) धातू वक्र गती (वाकडी चाल) या अर्थात वापरला जातो. 'अग्गति' (वाकडा जातो) यावरून 'अग्गि' (अग्नी) हा शब्द बनतो, कारण अग्नीची गती वक्र (वाकडी) असते. อคฺคิ ธูมสิโข โชติ, ชาตเวโท สิขี คินิ; อคฺคินิ ภาณุมา เตโช, ปาวโก ติวโก’นโล. अग्गि, धूमसिख, जोति, जातवेद, सिखी, गिनी, अग्गिनी, bhāṇumā, तेजो, पावक, तिवक आणि अनल हे अग्नीचे समानार्थी शब्द आहेत. หุตาสโน ธูมเกตุ, เวสฺสานโร จ อจฺจิมา; ฆตาสโน วายุสโข, ทหโน กณฺหวตฺตนิ. हुतासन, धूमकेतु, वेस्सानर, अच्चिमा, घतासन, वायुसख, दहन आणि कण्हवत्तनी हे देखील अग्नीचे समानार्थी शब्द आहेत. เอตา คุอาทิกา อคฺคปริยนฺตา ‘‘ปรสฺสภาสา’’ติ สทฺทสตฺถวิทู วทนฺติ. 'गु' (gu) पासून सुरू होऊन 'अग्ग' (agga) पर्यंत संपणारे हे धातू "परस्सभासा" (परस्मैपदी) आहेत, असे व्याकरणकार म्हणतात. คา คติยํ. คาติ. 'गा' (gā) धातू गमन (जाणे) या अर्थात वापरला जातो. 'गाति' (जातो). คุ สทฺเท. ควติ. 'गु' (gu) धातू ध्वनी (शब्द करणे) या अर्थात वापरला जातो. 'गवति' (शब्द करतो). คุ อุคฺคเม. อุคฺคโม อุคฺคมนํ ปากฏตา. ควติ. สทฺทสตฺถวิทู ปนิมาสํ ‘‘คาเต ควเต’’ติ อตฺตโนภาสตฺตํ วทนฺติ. 'गु' (gu) धातू उद्गमन (वर येणे/प्रकट होणे) या अर्थात वापरला जातो. उद्गमन म्हणजे वर येणे किंवा प्रकट होणे. 'गवति' (प्रकट होतो). व्याकरणकार या धातूंची "गाते, गवते" अशी 'अत्तनोभासा' (आत्मनेपदी) रूपे देखील सांगतात. คการนฺตธาตุรูปานิ. 'ग' कारान्त धातूंची रूपे समाप्त. ฆการนฺตธาตุ 'घ' कारान्त धातू. ฆา คนฺโธปาทาเน. ฆาติ. ฆานํ. คนฺธํ ฆตฺวา. อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘คนฺธํ ฆตฺวา สติ มุฏฺฐา’’ติ. เอติสฺสา ปน ทิวาทิคณํ ปตฺตาย ‘‘ฆายติ ฆายิตฺวา’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. 'घा' (ghā) धातू गंध ग्रहण करणे (वास घेणे) या अर्थात वापरला जातो. 'घाति' (वास घेतो). 'घानं' (नाक/घ्राणेंद्रिय). 'गन्धं घत्वा' (गंधाचा वास घेऊन). येथे ही पाळी आहे – "गन्धं घत्वा सति मुट्ठा" (गंधाचा वास घेऊन स्मृती नष्ट झाली). परंतु, जेव्हा हा धातू दिवादिगणात जातो, तेव्हा "घायति घायित्वा" अशी रूपे बनतात. ฆุ [Pg.29] อภิคมเน. อภิคมนํ อธิคมนํ. โฆติ. 'घु' (ghu) धातू अभिगमन (जवळ जाणे/प्राप्त करणे) या अर्थात वापरला जातो. अभिगमन म्हणजे अधिगमन (प्राप्ती). 'घोति' (प्राप्त करतो/जवळ जातो). ชคฺฆ หสเน. ชคฺฆติ, สญฺชคฺฆติ. สญฺชคฺฆิตฺโถ มยา สห. ชคฺฆิตุมฺปิ น โสภติ. ชคฺฆิตฺวา. 'जग्घ' (jaggha) धातू हसणे या अर्थात वापरला जातो. 'जग्घति' (हसतो), 'सञ्जग्घति' (मोठ्याने हसतो/मस्करी करतो). "सञ्जग्घित्थो मया सह" (तू माझ्यासोबत हसलास). "जग्घितुम्पि न सोभति" (हसणे देखील शोभत नाही). 'जग्घित्वा' (हसून). ตคฺฆ ปาลเน. ตคฺฆติ. 'तग्घ' (taggha) धातू पालन करणे या अर्थात वापरला जातो. 'तग्घति' (पालन करतो). สิฆิ อาฆาเน. อาฆานํ ฆาเนน คนฺธานุภวนํ. สิงฺฆติ, อุปสิงฺฆติ. อุปสิงฺฆิตฺวา. อารา สิงฺฆามิ วาริชํ. เอตา ‘‘ปรสฺสภาสา’’ติ สทฺทสตฺถวิทู วทนฺติ. 'सिघि' (sighi) धातू आघ्राण (वास घेणे) या अर्थात वापरला जातो. आघ्राण म्हणजे नाकाने गंधाचा अनुभव घेणे. 'सिङ्घति' (वास घेतो), 'उपसिङ्घति' (जवळून वास घेतो). 'उपसिङ्घित्वा' (जवळून वास घेऊन). "आरा सिङ्घामि वारिजं" (मी दुरूनच कमळाचा वास घेतो). हे धातू "परस्सभासा" (परस्मैपदी) आहेत, असे व्याकरणकार म्हणतात. ฆุ สทฺเท. โฆติ, ฆวติ. 'घु' (ghu) धातू ध्वनी (शब्द करणे) या अर्थात वापरला जातो. 'घोति', 'घवति' (शब्द करतो). รฆิ ลฆิ คตฺยกฺเขเป. คตฺยกฺเขโป คติยา อกฺเขโป. รงฺฆติ, ลงฺฆติ, อุลฺลงฺฆติ. ลงฺฆิตา, อุลฺลงฺฆิกาปีติ, ลงฺฆิตฺวา. ‘रघि’ (raghi) आणि ‘लघि’ (laghi) हे धातू गत्यक्षेप (गतीचा आक्षेप किंवा उडी मारणे) या अर्थात आहेत. गत्यक्षेप म्हणजे गतीचा आक्षेप (वेगवान गती किंवा उल्लंघन). रंघति (धावतो/उडी मारतो), लंघति (ओलांडतो), उल्लंघति (उल्लंघन करतो). ‘लंघिता’ (ओलांडणारा), ‘उल्लंघिका’ (उल्लंघन करणारी) असेही रूप होते, आणि ‘लंघित्वा’ (ओलांडून). มฆิ เกตเว จ. จกาโร ปุพฺพตฺถาเปกฺโข. มงฺฆติ. ‘मघि’ (maghi) धातू कपट (लबाडी) आणि (मागील अर्थाच्या) अपेक्षेने आहे. ‘च’ कार हा मागील अर्थाची अपेक्षा ठेवणारा आहे. मंघति (कपट करतो किंवा गती करतो). ราฆ ลาฆ สามตฺถิเย. ราฆติ. ลาฆติ. ‘राघ’ (rāgha) आणि ‘लाघ’ (lāgha) हे धातू सामर्थ्य (क्षमता) या अर्थात आहेत. राघति, लाघति. ทาฆ อายาเส จ. อายาโส กิลมนํ. จกาโร สามตฺถิยาเปกฺขโก. ทาฆติ. นิทาโฆ. ‘दाघ’ (dāgha) धातू आयास (थकवा/कष्ट) आणि (सामर्थ्य) या अर्थात आहे. आयास म्हणजे थकणे (क्लेश). ‘च’ कार हा सामर्थ्य अर्थाची अपेक्षा ठेवणारा आहे. दाघति. निदाघो (उन्हाळा). สิลาฆ กตฺถเน. กตฺถนํ ปสํสนํ. สิลาฆติ. สิลาฆา. พุทฺธสฺส สิลาฆเต. สิลาฆิตฺวา. ‘‘อตฺตโนภาสา’’ติ สทฺทสตฺถวิทู วทนฺติ. ‘सिलाघ’ (silāgha) धातू कत्थन (प्रशंसा) या अर्थात आहे. कत्थन म्हणजे प्रशंसा (स्तुती). सिलाघति. सिलाघा. बुद्धस्स सिलाघते (बुद्धांची प्रशंसा करतो). सिलाघित्वा (प्रशंसा करून). व्याकरणकार (शब्दशास्त्रज्ञ) याला ‘अत्तनोभासा’ (आत्मनेपद) असे म्हणतात. ฆ การนฺตธาตุรูปานิ. ‘घ’ कारान्त धातूंची रूपे. อิติ ภูวาทาคเณ กวคฺคนฺตธาตุรูปานิ अशा प्रकारे भूवादी गणातील ‘क-वर्गान्त’ धातूंची रूपे สมตฺตานิ. समाप्त झाली. จการนฺตธาตุ ‘च’ कारान्त धातू. อิทานิ [Pg.30] จวคฺคนฺตธาตุรูปานิ วุจฺจนฺเต – आता ‘च-वर्गान्त’ धातूंची रूपे सांगितली जात आहेत – สุจ โสเก. โสจติ. โสโก, โสจนา, โสจํ, โสจนฺโต, โสจนฺตี, โสจนฺตํ กุลํ, โสจิตฺวา. ‘सुच’ (suca) धातू शोक या अर्थात आहे. सोचति. सोको (शोक), सोचना (शोक करणे), सोचं, सोचन्तो (शोक करणारा), सोचन्ती (शोक करणारी), सोचन्तं कुलं (शोक करणारे कुटुंब), सोचित्वा (शोक करून). กุจ สทฺเท ตาเร. ตารสทฺโท อจฺจุจฺจสทฺโท. โกจติ. อุจฺจสทฺทํ กโรตีติ อตฺโถ. ‘कुच’ (kuca) धातू तार स्वरातील आवाजात (मोठ्याने ओरडणे) या अर्थात आहे. तार शब्द म्हणजे अत्यंत उच्च (मोठा) आवाज. कोचति. याचा अर्थ ‘मोठा आवाज करतो’ असा आहे. กุญฺจ โกฏิลฺล’ปฺปีภาเวสุ. กุญฺจติ. กุญฺจิกา, กุญฺจิตเกโส. กุญฺจิตฺวา. ‘कुञ्च’ (kuñca) धातू कौटिल्य (वाकडेपणा) आणि अल्पीभाव (आकुंचन किंवा कमी होणे) या अर्थात आहे. कुञ्चति. कुञ्चिका (किल्ली), कुञ्चितकेसो (कुरळे केस असलेला), कुञ्चितत्वा (वाकवून/आकुंचन करून). ลุญฺจ อปนยเน. ลุญฺจติ. ลุญฺจโก, ลุญฺจิตุํ, ลุญฺจิตฺวา. ‘लुञ्च’ (luñca) धातू अपनयन (उपटणे/काढून टाकणे) या अर्थात आहे. luñcati. लुञ्चको (उपटणारा), लुञ्चितुं (उपटण्यासाठी), लुञ्चित्वा (उपटून). อญฺจุ คติปูชนาสุ. มคฺคํ อญฺจติ. พุทฺธํ อญฺจติ. อุทฺธํ อนุคฺคนฺตฺวา ติริยํ อญฺจิโตติ ติรจฺฉาโน. กฏุกญฺจุกตา. ‘अञ्चु’ (añcu) धातू गती आणि पूजन (आदर करणे) या अर्थात आहे. मग्गं अञ्चति (मार्गावर चालतो). बुद्धं अञ्चति (बुद्धांचा आदर करतो). वर न जाता आडवे (तिरपे) चालतो म्हणून तो ‘तिरच्छानो’ (प्राणी) होय. कटुकञ्चुकता (कंजूषपणा). วญฺจุ จญฺจุ ตญฺจุ คติยํ. วญฺจติ. จญฺจติ. ตญฺจติ. มญฺจติ. สนฺติ ปาทา อวญฺจนา. อวญฺจนาติ วญฺจิตุํ คนฺตุํ อสมตฺถา. ‘वञ्चु’ (vañcu), ‘चञ्चु’ (cañcu) आणि ‘तञ्चु’ (tañcu) हे धातू गती या अर्थात आहेत. वञ्चति, चञ्चति, तञ्चति, मञ्चति. ‘सन्ति पादा अवञ्चना’ (पाय आहेत पण ते चालत नाहीत). अवाञ्चना म्हणजे चालण्यास (जाण्यास) असमर्थ असलेले. คุจุ คเณจุ เถยฺยกรเณ. เถนนํ เถยฺยํ, โจริกา. ตสฺส กฺริยา เถยฺยกรณํ. โคจติ. คเณจติ. ‘गुचु’ (gucu) आणि ‘गणेचु’ (gaṇecu) हे धातू थेय्यकरण (चोरी करणे) या अर्थात आहेत. थेनन म्हणजे थेय्य, म्हणजेच चोरी. त्याची क्रिया म्हणजे थेय्यकरण होय. गोचति, गणेचति. อจฺจ ปูชายํ อจฺจติ. พฺรหฺมาสุรสุรจฺจิโต. ‘अच्च’ (acca) धातू पूजेच्या अर्थात आहे. अच्चति. ब्रह्मासुरसुरच्चितो (ब्रह्मा, असुर आणि देवांनी पूजिलेला). ตจฺจ หึสายํ. ตจฺจติ. ‘तच्च’ (tacca) धातू हिंसेच्या अर्थात आहे. तच्चति. จจฺจ ชจฺจ ปริภาสนวชฺชเนสุ. จจฺจติ. ชจฺจติ. ‘चच्च’ (cacca) आणि ‘जच्च’ (jacca) हे धातू परिभाषण (निंदा) आणि वर्जन (त्याग करणे) या अर्थात आहेत. चच्चति, जच्चति. กุจ สํปจฺจนโกฏิลฺลปฏิกฺกมวิเลขเนสุ. กุจติ, สงฺกุจติ. สงฺโกโจ. ‘कुच’ (kuca) धातू संपच्चन (विरोध), कौटिल्य (वाकडेपणा), प्रतिक्रम (मागे हटणे) आणि विलेखन (खरवडणे) या अर्थात आहे. कुचति, संकुचति. संकोचो (संकोच/आकुंचन). ตจ สํวรเณ. สํวรณํ รกฺขณํ. ตจติ. ตโจ. ‘तच’ (taca) धातू संवरण (झाकणे/रक्षण करणे) या अर्थात आहे. संवरण म्हणजे रक्षण करणे. तचति. तचो (त्वचा/साल). ทิจ [Pg.31] ถุติยํ. ทิจติ. ‘दिच’ (dica) धातू थुती (स्तुती) या अर्थात आहे. दिचति. กุจ สงฺโกจเน. โกจติ, สงฺโกจติ. สงฺโกโจ. ‘कुच’ (kuca) धातू संकोचन (आकुंचन) या अर्थात आहे. कोचति, संकुचति. संकोचो. พฺยาจ พฺยาชิกรเณ. พฺยาชิกรณํ พฺยาชิกฺริยา. พฺยาจติ. ‘ब्याच’ (byāca) धातू व्याजीकरण (कपट किंवा बहाणा करणे) या अर्थात आहे. व्याजीकरण म्हणजे व्याजीक्रिया (कपटपूर्ण व्यवहार). ब्याचति. วจ วิยตฺติยํ วาจายํ. วิยตฺตสฺส เอสา วิยตฺติ, ติสฺสํ วิยตฺติยํ วาจายํ, วิยตฺตายํ วาจายนฺติ อธิปฺปาโย. วิยตฺตสฺส หิ วทโต ปุคฺคลสฺส วเสน วาจา วิยตฺตา นาม วุจฺจติ. ยถา ปน กุจฺฉิสทฺทติรจฺฉานคตาทิสทฺโท ‘‘อพฺยตฺตสทฺโท’’ติ วุจฺจติ, น เอวํ วจนสงฺขาโต สทฺโท ‘‘อพฺยตฺตสทฺโท’’ติ วุจฺจติ วิญฺญาตตฺถตฺตา. ‘‘วตฺติ, วจติ, วจนฺติ. วจสิ’’ อิจฺจาทีนิ สุทฺธกตฺตุปทานิ. ‘‘วาเจติ, วาเจนฺติ’’ อิจฺจาทีนิ เหตุกตฺตุปทานิ. ‘‘อตฺถาภิสมยา ธีโร, ปณฺฑิโตติ ปวุจฺจติ. วุจฺจนฺติ. สนฺโต สปฺปุริสา โลเก, เทวธมฺมาติ วุจฺจเร’’ อิจฺจาทีนิ กมฺมปทานิ. ครู ปน วการสฺส อุการาเทสวเสน ‘‘อุตฺตํ อุจฺจเต อุจฺจนฺเต’’ติอาทีนิ อิจฺฉนฺติ, ตานิ สาสเน อปฺปสิทฺธานิ, สกฺกฏภาสานุโลมานิ. สาสนสฺมิญฺหิ รการาคมวิสเย นิปุพฺพสฺเสว วจสฺส วสฺส อุการาเทโส สิทฺโธ ‘‘นิรุตฺติ, นิรุตฺตํ, เนรุตฺต’’นฺติ. วจนํ, วาจา, วโจ, วจี, วุตฺตํ, ปวุตฺตํ, วุจฺจมานํ, อธิวจนํ, วตฺตพฺพํ, วจนียํ, อิมานิ นามิกปทานิ. วตฺตุํ, วตฺตเว, วตฺวา, วตฺวาน, อิมานิ ตุมนฺตาทีนิ ‘‘ปรสฺสภาสา’’ติ สทฺทสตฺถวิทู วทนฺติ. ‘वच’ (vaca) धातू स्पष्ट वाणी या अर्थात आहे. स्पष्ट बोलणाऱ्याची जी स्पष्टता ती ‘वियत्ति’ होय, त्या स्पष्ट वाणीच्या अर्थात हा धातू आहे, असा अभिप्राय आहे. कारण स्पष्ट बोलणाऱ्या व्यक्तीच्या प्रभावाने वाणीला ‘व्यक्त वाणी’ म्हटले जाते. परंतु ज्याप्रमाणे कुत्सित शब्द किंवा प्राण्यांचे आवाज इत्यादींना ‘अव्यक्त शब्द’ म्हटले जाते, त्याप्रमाणे बोलण्याने युक्त असलेल्या शब्दाला ‘अव्यक्त शब्द’ म्हटले जात नाही, कारण त्याचा अर्थ समजतो. ‘वत्ति, वचति, वचन्ति, वचसि’ इत्यादी शुद्ध कर्तृपदे (कर्तरी रूपे) आहेत. ‘वाचेति, वाचेन्ति’ इत्यादी हेतुकर्तृपदे (प्रयोजक रूपे) आहेत. ‘अत्थाभिसमया धीरो, पण्डितोति पवुच्चति’ (अर्थाचा बोध झाल्यामुळे धीर पुरुषाला पंडित म्हटले जाते), ‘वुच्चन्ति’, ‘सन्तो सप्पुरिसा लोके, देवधम्माति वुच्चरे’ (जगातील शांत सत्पुरुषांना देवधम्म म्हटले जाते) इत्यादी कर्मपदे (कर्मणी रूपे) आहेत. परंतु आचार्य (गुरू) ‘व’ काराच्या जागी ‘उ’ कार आदेश करून ‘उत्तं, उच्चते, उच्चन्ते’ इत्यादी रूपे मानतात; ती शासनात (बुद्धवचनात) अमान्य असून संस्कृत भाषेला अनुसरून आहेत. कारण शासनात (बुद्धवचनात) ‘र’ कार आगम विषयामध्ये ‘नि’ उपसर्ग लागलेल्या ‘वच’ धातूच्या ‘व’ काराचा ‘उ’ कार आदेश सिद्ध होतो, जसे की ‘निरुत्ति, निरुत्तं, नेरुत्तं’. वचनं, वाचा, वचो, वची, वुत्तं, पवुत्तं, वुच्चमानं, अधिवचनं, वत्तब्बं, वचनीयं - ही नामिक पदे आहेत. वत्तुं, वत्तवे, वत्वा, वत्वान - ही तुमन्त (कृदन्त) इत्यादी रूपे ‘परस्मैपद’ (परस्सभासा) आहेत, असे व्याकरणकार म्हणतात. ตตฺถ วตฺตีติ วทติ. อาขฺยาตปทญฺเหตํ. อตฺถสํวณฺณเกหิปิ ‘‘วตฺติ เอตายาติ วาจา’’ติ นิพฺพจนมุทาหฏํ. สทฺทสตฺเถ จ ตาทิสํ อาขฺยาตปทํ ทิฏฺฐํ. เอตฺถ ปเนเก วทนฺติ ‘‘วจติ, วจนฺตีติอาทีนิ กฺริยาปทรูปานิ พุทฺธวจเน อฏฺฐกถาฏีกาสุ สตฺเถสุ จ อนาคตตฺตา ฉฑฺเฑตพฺพานี’’ติ. ตนฺน, ยสฺมา สาสเน ‘‘อวจ, อวจึสู’’ติ สุทฺธกตฺตุปทานิ จ ‘‘วาเจติ, วาเจนฺตี’’ติอาทีนิ เหตุกตฺตุปทานิ จ ทิสฺสนฺติ, ตสฺมา [Pg.32] พุทฺธวจนาทีสุ อนาคตานิปิ ‘‘วจติ, วจนฺตี’’ติอาทีนิ รูปานิ คเหตพฺพานิ. วเจยฺย, วุจฺจตุ, วุจฺเจยฺย. เสสํ สพฺพํ สพฺพตฺถ วิตฺถารโต คเหตพฺพํ. त्यामध्ये ‘वत्ति’ म्हणजे बोलतो. हे आख्यातपद (क्रियापद) आहे. अर्थवर्णन करणाऱ्यांनी (टीकाकारांनी) देखील ‘वत्ति एतायाति वाचा’ (ज्याद्वारे बोलले जाते ती वाचा) अशी निरुक्ती दिली आहे. आणि शब्दशास्त्रात (व्याकरणात) असे आख्यातपद पाहिले गेले आहे. येथे काही जण म्हणतात की, ‘वचति, वचन्ति’ इत्यादी क्रियापदांची रूपे बुद्धवचनात, अट्ठकथांमध्ये, टीकांमध्ये आणि शास्त्रांमध्ये आलेली नसल्यामुळे ती सोडून दिली पाहिजेत. ते योग्य नाही, कारण शासनात (बुद्धवचनात) ‘अवच, अवचिंसु’ इत्यादी शुद्ध कर्तृपदे आणि ‘वाचेति, वाचेन्ति’ इत्यादी हेतुकर्तृपदे दिसतात, म्हणून बुद्धवचनात आलेली नसली तरी ‘वचति, वचन्ति’ इत्यादी रूपे स्वीकारली पाहिजेत. वचेय्य, वुच्चतु, वुच्चेय्य. उर्वरित सर्व सर्व ठिकाणी विस्ताराने समजून घ्यावे. ปโรกฺขารูปานิ วทาม – วจ, วจุ. วเจ, วจิตฺถ. วจํ, วจิมฺห. วจิตฺถ, วจิเร. วจิตฺโถ, วจิวฺโห. วจึ, วจิมฺเห. आता परोक्षा (परोक्ष भूतकाळ) रूपे सांगतो – वच, वचु. वचे, वचित्थ. वचं, वचिम्ह. वचित्थ, वचिरे. वचित्थो, वचिव्हो. वचिं, वचिम्हे. หิยฺยตฺตนีรูปานิ วทาม – อวจา, อวจู. อวโจ, อวจุตฺถ. อโวจํ, อวจุมฺห. อวจุตฺถ, อวจุตฺถุํ. อวจเส, อวจุวฺหํ. อวจึ, อวจมฺหเส. आता हिय्यतनी (अनद्यतन भूतकाळ) रूपे सांगतो – अवचा, अवचू. अवचो, अवचुत्थ. अवोचं, अवचुम्ह. अवचुत्थ, अवचुत्थुं. अवचसे, अवचुव्हं. अवचिं, अवचम्हसे. อชฺชตนีรูปานิ วทาม – อวจิ, อโวจุํ, อวจึสุ. อโวโจ, อโวจุตฺถ. อโวจึ, อโวจุมฺห. อโวจา, อโวจุ. อวจเส, อโวจิวํ. อโวจํ, อโวจิมฺเห. आता अज्जतनी (सामान्य भूतकाळ) रूपे सांगतो – अवचि, अवोचुं, अवचिंसु. अवोचो, अवोचुत्थ. अवोचिं, अवोचुम्ह. अवोचा, अवोचु. अवचसे, अवोचिवं. अवोचं, अवोचिम्हे. ภวิสฺสนฺตีรูปานิ วทาม – วกฺขติ, วกฺขนฺติ. วกฺขสิ, วกฺขถ. วกฺขามิ, วกฺขาม. วกฺขเต, วกฺขนฺเต. วกฺขเส, วกฺขวฺเห. วกฺขสฺสํ วกฺขมฺเห. आता भविस्सती (भविष्यकाळ) रूपे सांगतो – वक्खति, वक्खन्ति. वक्खसि, वक्खथ. वक्खामि, वक्खाम. वक्खते, वक्खन्ते. वक्खसे, वक्खव्हे. वक्खस्सं, वक्खम्हे. อิเมสํ ปน ปทานํ ‘‘กเถสฺสติ, กเถสฺสนฺตี’’ติอาทินา อตฺโถ วตฺตพฺโพ. วกฺข โรเสติ ธาตุสฺส จ ‘‘วกฺขติ, วกฺขนฺติ. วกฺขสี’’ติอาทีนิ วตฺวา อวสาเน อุตฺตมปุริเสกวจนฏฺฐาเน ‘‘วกฺเขมี’’ติ วตฺตพฺพํ. อตฺโถ ปนิเมสํ ‘‘โรสติ, โรสนฺตี’’ติอาทินา วตฺตพฺโพ. อยํ วจวกฺขธาตูนํ ภวิสฺสนฺตีวตฺตมานาวเสน รูปสํสนฺทนานโย. อปรานิปิ วจธาตุสฺส ภวิสฺสนฺตี สหิตานิ รูปานิ ภวนฺติ – วกฺขิสฺสติ, วกฺขิสฺสนฺติ. วกฺขิสฺสสิ, วกฺขิสฺสถ. วกฺขิสฺสามิ, วกฺขิสฺสาม. วกฺขิสฺสเต, วกฺขิสฺสนฺเต. วกฺขิสฺสเส, วกฺขิสฺสวฺเห. วกฺขิสฺสํ, วกฺขิสฺสามฺเห. परंतु या पदांचा अर्थ ‘कथेस्सति, कथेस्सन्ति’ (सांगेल, सांगतील) इत्यादी प्रकारे सांगावा. ‘वक्ख’ (vakkha) हा रोष (रागवणे) अर्थाचा धातू असून, त्याची ‘वक्खति, वक्खन्ति, वक्खसि’ इत्यादी रूपे सांगून शेवटी उत्तम पुरुष एकवचनाच्या ठिकाणी ‘वक्खेमि’ असे म्हणावे. आणि यांचा अर्थ ‘रोसति, रोसन्ति’ (रागवतो, रागवतात) इत्यादी प्रकारे सांगावा. हा ‘वच’ आणि ‘वक्ख’ धातूंच्या भविष्यकाळ आणि वर्तमानकाळाच्या रूपांची तुलना करण्याचा नियम आहे. ‘वच’ धातूची भविष्यकाळाची इतरही रूपे होतात – वक्खिस्सति, वक्खिस्सन्ति. वक्खिस्ससि, वक्खिस्सथ. वक्खिस्सामि, वक्खिस्sam. वक्खिस्सते, वक्खिस्सन्ते. वक्खिस्ससे, वक्खिस्सव्हे. वक्खिस्सं, वक्खिस्साम्हे. อตฺรายํ ปาฬิ – या संदर्भात ही पाळी (मूळ पाठ) आहे – ‘‘อภีตกปฺเป จริตํ, ฐปยิตฺวา ภวาภเว; อิมมฺหิ กปฺเป จริตํ, ปวกฺขิสฺสํ สุโณหิ เม’’ติ. “अभीत कल्पामधील आचरण, आणि वेगवेगळ्या भवांमध्ये केलेले आचरण सोडून; या कल्पामधील आचरण मी सांगेन, ते माझ्याकडून ऐका.” คทฺรตปญฺเหปิ [Pg.33] ‘‘ราชา ตุมฺเหหิ สทฺธึ ปฏิสนฺถารํ กตฺวา คหปติ ปติรูปํ อาสนํ ญตฺวา นิสีทถาติ วกฺขิสฺสตี’’ติ เอวมาทิอฏฺฐกถาปาโฐ ทิสฺสติ, ตสฺมาเยว เอทิสี ปทมาลา รจิตา. วกฺข โรเสติ ธาตุสฺสปิ ภวิสฺสนฺตีสหิตานิ รูปานิ ‘‘วกฺขิสฺสติ, วกฺขิสฺสนฺตี’’ติอาทีนิ ภวนฺติ. อตฺโถ ปนิเมสํ ‘‘โรสิสฺสติ, โรสิสฺสนฺตี’’ติอาทินา วตฺตพฺโพ. อยํ วจวกฺขธาตูนํ ภวิสฺสนฺตีวเสเนว รูปสํสนฺทนานโย. गद्रतप्रश्नात (गद्रतपञ्ह) देखील "राजा तुमच्याशी कुशल विचारपूस करून, हे गृहपती, योग्य आसन जाणून बसा, असे म्हणेल (वक्खिस्सति)" असा अट्ठकथापाठ आढळतो, म्हणूनच अशी पदमाला रचली गेली आहे. "वक्ख रोसेति" (रागवणे) या धातूची देखील भविष्यकाळातील रूपे "वक्खिस्सति, वक्खिस्सन्ति" इत्यादी होतात. परंतु यांचा अर्थ "रोसिस्सति, रोसिस्सन्ति" (रागवेल, रागवतील) इत्यादी असा सांगावा. हा "वच" आणि "वक्ख" धातूंच्या केवळ भविष्यकाळाच्या संदर्भातील रूपांची तुलना करण्याचा नियम आहे. อวจิสฺสา, วจิสฺสา, อวจิสฺสํสุ, วจิสฺสํสุ. เสสํ สพฺพํ เนยฺยํ. อิธ ปน วุตฺตสทฺทสฺส อตฺถุทฺธารํ วตฺตพฺพมฺปิ อวตฺวา อุปริเยว กเถสฺสาม อิโต อติวิย วตฺตพฺพฏฺฐานตฺตา. अवचिस्सा, वचिस्सा, अवचिस्संसु, वचिस्संसु. उर्वरित सर्व (रूपे) समजून घ्यावीत. येथे मात्र सांगितलेल्या शब्दाचा अर्थोद्धार सांगण्याजोगा असला तरी तो न सांगता, पुढेच सांगू, कारण येथून पुढे तो अत्यंत सांगण्याजोगा विषय आहे. จุ จวเน. จวติ. การิเต ‘‘จาเวตี’’ติ รูปํ. เทวกายา จุโต. จุตํ ปทุมํ. จวิตุํ, จวิตฺวา. "चु" (चु) हा धातू च्युत होणे (नष्ट होणे/मरणे) या अर्थात आहे. चवति (तो च्युत होतो). कारित (प्रयोजक) मध्ये "चावेति" असे रूप बनते. देवकाया चुतो (देवलोकातून च्युत झालेला). चुतं पदुमं (गळून पडलेले कमळ). चवितुं (च्युत होण्यासाठी), चवित्वा (च्युत होऊन). โลจ ทสฺสเน. โลจติ. โลจนํ. "लोच" (लोच) हा धातू पाहणे या अर्थात आहे. लोचति (तो पाहतो). लोचनं (डोळा). เสจ เสจเน. เสจติ. "सेच" (सेच) हा धातू सिंचन करणे (शिंपडणे) या अर्थात आहे. सेचति (तो सिंचन करतो). สจ วิยตฺติยํ วาจายํ. สจติ. "सच" (सच) हा धातू स्पष्ट वाणीत बोलणे या अर्थात आहे. सचति (तो स्पष्ट बोलतो). กจ พนฺธเน. กจติ. "कच" (कच) हा धातू बांधणे या अर्थात आहे. कचति (तो बांधतो). มจ มุจิ กกฺกเน. กกฺกนํ สรีเร อุพฺพฏฺฏนํ. มจติ. มุญฺจติ. มจิ ธารณุจฺฉายปูชเนสุ. ธารณํ อุจฺฉาโย ปูชนนฺติ ตโย อตฺถา. ตตฺถ อุจฺฉาโย มลหรณํ. มญฺจติ. มญฺโจ, มญฺจนํ. มญฺจติ ปุคฺคลํ ธาเรตีติ มญฺโจ. "मच" आणि "मुच" हे धातू घासणे/मळणे (कक्कन) या अर्थात आहेत. कक्कन म्हणजे शरीराला उटणे लावणे (चोळणे). मचति, मुञ्चति. "मचि" हा धातू धारण करणे, उच्छाय (मळ दूर करणे) आणि पूजा करणे या तीन अर्थांत आहे. तेथे उच्छाय म्हणजे मळ दूर करणे. मञ्चति. मञ्चो (पलंग), मञ्चनं. जो व्यक्तीला धारण करतो (मञ्चति पुग्गलं धारेतीति) तो मञ्चो (पलंग) होय. ปจ พฺยตฺติกรเณ. ปจติ. ปาโก, ปริปาโก, วิปาโก, ปกฺกํ ผลํ. "पच" (पच) हा धातू स्पष्ट करणे (किंवा परिपक्व करणे) या अर्थात आहे. पचति (तो शिजवतो/पचवतो). पाको (पाक/स्वयंपाक), परिपाको (परिपक्वता), विपाको (कर्मविपाक/फळ), पक्कं फलं (पिकलेले फळ). ถุจ ปสาเท. โถจติ. "थुच" (थुच) हा धातू प्रसन्न करणे किंवा स्तुती करणे या अर्थात आहे. थोचति. วจ วจิ ทิตฺติยํ. วจติ. วญฺจติ. "वच" आणि "वचि" हे धातू चमकणे (दीप्ती) या अर्थात आहेत. वचति, वञ्चति. รุจ [Pg.34] ทิตฺติยํ โรจเน จ. ทิตฺติ โสภา. โรจนํ รุจิ. โรจติ. เวโรจโน. สมณสฺส โรจเต สจฺจํ. ตสฺส เต สคฺคกามสฺส, เอกตฺตมุปโรจิตํ. อยญฺจ ทิวาทิคเณ รุจิอตฺถํ คเหตฺวา ‘‘รุจฺจตี’’ติ รูปํ ชเนติ. เตน ‘‘คมนํ มยฺห รุจฺจตี’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. จุราทิคเณ ปน รุจิอตฺถํ คเหตฺวา ‘‘โรเจติ โรจยตี’’ติ รูปานิ ชเนติ. เตน ‘‘กึ นุ ชาตึ น โรเจสี’’ติอาทิกา ปาฬิโย ทิสฺสนฺติ. เตคณิโกยํ ธาตุ. "रुच" (रुच) हा धातू चमकणे (दीप्ती) आणि आवडणे (रोचन) या अर्थात आहे. दीप्ती म्हणजे शोभा. रोचन म्हणजे रुची (आवड). रोचति (तो चमकतो/आवडतो). वेरोचनो (सूर्य). "समणस्स रोचते सच्चं" (श्रमणाला सत्य आवडते). "तस्स ते सग्गकामस्स, एकत्तमुपरोचितं" (स्वर्गाची इच्छा करणाऱ्या तुझ्यासाठी, एकांत पसंत केला गेला आहे). आणि हा धातू दिवादिगणात रुची (आवडणे) हा अर्थ घेऊन "रुच्चति" असे रूप निर्माण करतो. त्यामुळे "गमनं मय्ह रुच्चति" (मला जाणे आवडते) अशी पाळी (पाठात) आढळते. चुरादिगणात मात्र रुची अर्थ घेऊन "रोचेति, रोचयति" अशी रूपे निर्माण करतो. त्यामुळे "किं नु जातिं न रोचेसि" (तू जन्माला का पसंत करत नाहीस?) इत्यादी पाळीवचने आढळतात. हा तीन गणांमध्ये चालणारा (तैगणिक) धातू आहे. ปจ สํปาเก. ปจติ, ปจนฺติ. สทฺทสตฺถวิทู ปน ‘‘อตฺตโนภาสา’’ติ วทนฺติ. "पच" (पच) हा धातू पूर्णपणे शिजवणे (संपाक) या अर्थात आहे. पचति, पचन्ति. व्याकरणतज्ज्ञ मात्र याला "आत्मनोभाषा" (आत्मनेपद) असे म्हणतात. อญฺจ พฺยยคติยํ. พฺยยคติ วินาสคติ. อญฺจติ. "अञ्च" (अञ्च) हा धातू व्ययगती (विनाशगती) या अर्थात आहे. व्ययगती म्हणजे विनाशगती (नाशाकडे जाणे). अञ्चति. ยาจ ยาจนายํ. พฺราหฺมโณ นาคํ มณึ ยาจติ. นาโค มณึ ยาจิโต พฺราหฺมเณน. เต ตํ อสฺเส อยาจิสุํ. โส ตํ รถมยาจถ. เทวทตฺตํ อายาจติ. เอวํ สุทฺธกตฺตริ รูปานิ ภวนฺติ. พฺราหฺมโณ พฺราหฺมเณน นาคํ มณึ ยาเจติ, ยาจยติ, ยาจาเปติ, ยาจาปยติ. เอวํ เหตุกตฺตริ. ราชา พฺราหฺมเณน ธนํ ยาจิยติ, ยาจยิยติ, ยาจาปิยติ, ยาจาปยิยติ. เอวํ กมฺมนิ. ยาจํ, ยาจนฺโต, ยาจนฺตี, ยาจนฺตํ กุลํ. ยาจมาโน, ยาจมานา, ยาจมานํ กุลํ. ยาจโก, ยาจนา, ยาจิตพฺพํ, ยาจิตุํ, ยาจิตฺวาน, ยาจิตุน, ยาจิย, ยาจิยาน. เอวํ นามิกปทานิ ตุมนฺตาทีนิ จ ภวนฺติ. "याच" (याच) हा धातू याचना करणे (मागणे) या अर्थात आहे. "ब्राह्मणो नागं मणिं याचति" (ब्राह्मण नागाकडे मण्याची याचना करतो). "नागो मणिं याचितो ब्राह्मणेन" (नागाकडे ब्राह्मणाद्वारे मण्याची याचना केली गेली). "ते तं अस्से अयाचिसुं" (त्यांनी त्याला घोड्यांची याचना केली). "सो तं रथमयाचथ" (त्याने त्या रथाची याचना केली). "देवदत्तं आयाचति" (तो देवदत्ताकडे याचना करतो). अशी कर्तरी रूपे होतात. "ब्राह्मणो ब्राह्मणेन नागं मणिं याचेति, याचयति, याचापेति, याचापयति" (ब्राह्मण दुसऱ्या ब्राह्मणाद्वारे नागाकडे मण्याची याचना करवतो). अशी कारित (प्रयोजक) रूपे होतात. "राजा ब्राह्मणेन धनं याचियति, याचयियति, याचापियति, याचापयियति" (राजाकडून ब्राह्मणाद्वारे धनाची याचना केली जाते). अशी कर्मणी रूपे होतात. याचं, याचन्तो, याचन्ती, याचन्तं कुलं. याचमानो, याचमाना, याचमानं कुलं. याचको, याचना, याचितब्बं, याचितुं, याचित्वान, याचितुन, याचिय, याचियान. अशी नामिक पदे आणि तुमन्त (कृदन्त) इत्यादी रूपे होतात. ปจ ปาเก. โอทนํ ปจติ. ‘‘อุภยโตภาสา’’ติ สทฺทสตฺถวิทู วทนฺติ. ยถา ปน สาสเน ‘‘ปณฺฑิโตติ ปวุจฺจตี’’ติ [Pg.35] วจธาตุสฺส กมฺมนิ รูปํ ปสิทฺธํ, น ตถา ปจธาตุสฺส. เอวํ สนฺเตปิ ครู ‘‘ตยา ปจฺจเต โอทโน’’ติ ตสฺส กมฺมนิ รูปํ วทนฺติ. สาสเน ปน อวิเสสโต ‘‘ปจฺจเต’’ติ วา ‘‘ปจฺจตี’’ติ วา วุตฺตสฺสปิ ปทสฺส อกมฺมโกเยว ทิวาทิคณิโก ปโยโค อิจฺฉิตพฺโพ ‘‘เทวทตฺโต นิรเย ปจฺจติ. ยาว ปาปํ น ปจฺจตี’’ติอาทิทสฺสนโต. เกเจตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘สยเมว ปียเต ปานียนฺติอาทิ วิย ภูวาทิคณปกฺขิโก กมฺมกตฺตุปฺปโยโค เอส, ตสฺมา ‘สยเมวา’ติ ปทํ อชฺฌาหริตฺวา ‘สยเมว เทวทตฺโต ปจฺจตี’ติอาทินา อตฺโถ วตฺตพฺโพ’’ติ ตนฺน, ‘‘สยเมว ปียเต ปานีย’’นฺติ เอตฺถ หิ ปานียํ มนุสฺสา ปิวนฺติ, น ปานียํ ปานียํ ปิวติ. มนุสฺเสเหว ตํ ปียเต, น สยํ. เอวํ ปรสฺส ปานกฺริยํ ปฏิจฺจ กมฺมภูตมฺปิ ตํ สุกรปานกฺริยาวเสน สุกรตฺตา อตฺตนาว สิชฺฌนฺตํ วิย โหตีติ ‘‘สยเมว ปียเต ปานีย’’นฺติ รูฬฺหิยา ปโยโค กโต. "पच" (पच) हा धातू शिजवणे या अर्थात आहे. "ओदनं पचति" (तो भात शिजवतो). व्याकरणतज्ज्ञ याला "उभयतोभाषा" (उभयपद) असे म्हणतात. परंतु, ज्याप्रमाणे बुद्धशासनात "पण्डितोति पवुच्चति" (पंडित असे म्हटले जाते) असे "वच" धातूचे कर्मणी रूप प्रसिद्ध आहे, तसे "पच" धातूचे नाही. असे असूनही आचार्य "तया पच्चते ओदनो" (तुझ्याकडून भात शिजवला जातो) असे त्याचे कर्मणी रूप सांगतात. बुद्धशासनात मात्र सामान्यतः "पच्चते" किंवा "पच्चति" असे म्हटलेले पद देखील कर्मकर्तरी अर्थानेच दिवादिगणातील प्रयोग म्हणून स्वीकारले पाहिजे, कारण "देवदत्तो niraye पच्चति" (देवदत्त नरकात शिजतो/यातना भोगतो), "याव पापं न पच्चति" (जोपर्यंत पाप पिकत नाही/फळ देत नाही) इत्यादी प्रयोग आढळतात. येथे काही जण कदाचित् म्हणतील की, "सयमेव पीयते पानीयं" (पाणी स्वतःच प्यायले जाते) इत्यादीप्रमाणे हा भूवादिगणाच्या पक्षातील कर्मकर्तरी प्रयोग आहे, म्हणून "सयमेव" (स्वतःच) या पदाचा अध्याहार करून "स्वतःच देवदत्त शिजतो" इत्यादी अर्थ सांगावा. पण ते योग्य नाही. कारण "सयमेव पीयते पानीयं" येथे पाणी लोक पितात, पाणी स्वतः पाण्याला पीत नाही. लोकांद्वारेच ते प्यायले जाते, स्वतःहून नाही. अशा प्रकारे दुसऱ्याच्या पिण्याच्या क्रियेवर अवलंबून असूनही कर्म असलेले ते पाणी, पिण्याच्या सुलभ क्रियेमुळे सुलभतेने स्वतःच सिद्ध होत असल्यासारखे वाटते, म्हणून "सयमेव पीयते पानीयं" असा रूढीने प्रयोग केला जातो. ‘‘สยเมว กโฏ กริยเต’’ติ เอตฺถาปิ กฏํ มนุสฺสา กโรนฺติ, น กฏํ กโฏ กโรติ. มนุสฺเสเหว กโฏ กริยเต, น สยํ. เอวํ ปรสฺส กรณกฺริยํ ปฏิจฺจ กมฺมภูโตปิ โส สุกรณ กฺริยาวเสน สุกรตฺตา อตฺตนาว สิชฺฌนฺโต วิย โหตีติ ‘‘สยเมว กโฏ กริยเต’’ติ รูฬฺหิยา ปโยโค กโต. "सयमेव कटो करियते" (चटई स्वतःच बनवली जाते) येथे देखील चटई लोक बनवतात, चटई स्वतः चटईला बनवत नाही. लोकांद्वारेच चटई बनवली जाते, स्वतःहून नाही. अशा प्रकारे दुसऱ्याच्या बनवण्याच्या क्रियेवर अवलंबून असूनही कर्म असलेली ती चटई, बनवण्याच्या सुलभ क्रियेमुळे सुलभतेने स्वतःच सिद्ध होत असल्यासारखी वाटते, म्हणून "सयमेव कटो करियते" असा रूढीने प्रयोग केला जातो. เอตฺถ ยถา สยํสทฺโท ปานียํ ปานีเยเนว ปียเต, น อมฺเหหิ. กโฏ กเฏเนว กริยเต, น อมฺเหหีติ สกมฺมกวิสยตฺตา ปโยคานํ อญฺญสฺส กฺริยาปฏิเสธนสงฺขาตํ อตฺถวิเสสํ วทติ, น ตถา ‘‘เทวทตฺโต นิรเย ปจฺจติ, กมฺมํ ปจฺจตี’’ติอาทีสุ ตุมฺเหหิ อชฺฌาหริโต สยํสทฺโท อตฺถวิเสสํ วทติ อกมฺมกวิสยตฺตา เอเตสํ ปโยคานํ. เอวํ [Pg.36] ‘‘เทวทตฺโต’’ติอาทิกสฺส ปจฺจตฺตวจนสฺส อกมฺมกกตฺตุวาจกตฺตา กมฺมรหิตสุทฺธกตฺตุวาจกตฺตา จ ‘‘ปจฺจตี’’ติ อิทํ ทิวาทิคณิกรูปนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ปจธาตุ สทฺทสตฺเถ ทิวาทิคณ วุตฺโต นตฺถีติ เจ? นตฺถิ วา อตฺถิ วา, กิเมตฺถ สทฺทสตฺถํ กริสฺสติ, ปาฬิ เอว ปมาณํ, ตสฺมา มยํ โลกโวหารกุสลสฺส ภควโต ปาฬินยญฺเญว คเหตฺวา อิมํ ปจธาตุํ ทิวาทิคเณปิ ปกฺขิปิสฺสาม. ตถา หิ ธมฺมปาลาจริย อนุรุทฺธาจริยาทีหิ อภิสงฺขตา ทิวาทิคณิกปฺปโยคา ทิสฺสนฺติ –- येथे ज्याप्रमाणे "सयम्" (स्वतः) हा शब्द "पाणी पाण्यानेच प्यायले जाते, आमच्याद्वारे नाही", "चटई चटईनेच बनवली जाते, आमच्याद्वारे नाही" अशा कर्मकर्तरी विषयाच्या प्रयोगांमुळे दुसऱ्याच्या क्रियेचा निषेध करणारा विशेष अर्थ सांगतो; त्याप्रमाणे "देवदत्तो निरये पच्चति, कम्मं पच्चति" इत्यादींमध्ये तुमच्याद्वारे अध्याहृत केलेला "सयम्" शब्द विशेष अर्थ सांगत नाही, कारण हे प्रयोग केवळ कर्तरी विषयाचे आहेत. अशा प्रकारे "देवदत्तो" इत्यादी प्रथमा विभक्तीचे (पच्चत्तवचन) पद हे कर्मरहित शुद्ध कर्त्याचे वाचक असल्यामुळे "पच्चति" हे दिवादिगणातील रूप आहे असे समजावे. जर व्याकरणशास्त्रात "पच" धातू दिवादिगणात सांगितलेला नाही असे म्हटले, तर? तो असो वा नसो, येथे व्याकरणशास्त्र काय करणार? पाळी (पाळि) हेच प्रमाण आहे. म्हणूनच, आम्ही लोकव्यवहारात कुशल असलेल्या भगवंतांच्या पाळी पद्धतीचाच स्वीकार करून या "पच" धातूला दिवादिगणात देखील समाविष्ट करू. कारण धम्मपालाचार्य, अनुरुद्धाचार्य इत्यादींनी रचलेले दिवादिगणातील प्रयोग आढळतात— ญาณยุตฺตวรํ ตตฺถ, ทตฺวา สนฺธึ ติเหตุกํ; ปจฺฉา ปจฺจติ ปากานํ, ปวตฺเต อฏฺฐเก ทุเว. तेथे ज्ञानयुक्त श्रेष्ठ, तिहेतुक संधी देऊन; नंतर प्रवृत्तीमध्ये आठ (महाविपाकांपैकी) दोन विपाकांसाठी विपाकाला प्राप्त होतो (पच्चति). อสงฺขารํ สสงฺขาร-วิปากานิ จ ปจฺจติ असंखारिक आणि ससंखारिक विपाकांमध्ये देखील तो विपाकाला प्राप्त होतो (पच्चति). อิจฺเจวมาทโย. เอตฺถ ปน เตสํ อิทเมว ปาฬิยา น สเมติ. เย จุราทิคณมฺหิ สกมฺมกภาเวน ภูวาทิคเณ จ อกมฺมกภาเวน ปวตฺตสฺส ภูธาตุสฺเสว ภูวาทิคเณ ปวตฺตสฺส สกมกสฺสปิ สโต ทิวาทิคณํ ปตฺวา อกมฺมกภูตสฺส ปจธาตุสฺส สกมฺมกตฺตมิจฺฉนฺติ. เอตญฺหิ สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเน กุโต ลพฺภา, ตสฺมา ภควโต ปาวจเน โสตูนํ สํสยสมุคฺฆาฏตฺถํ เอตฺถ อิมํ นีตึ ปฏฺฐเปม – इत्यादी. परंतु येथे त्यांचे हेच पाळीशी (पाळि व्याकरणाशी) जुळत नाही. जे चुरादिगणात सकर्मक रूपाने आणि भूवादिगणात अकर्मक रूपाने प्रवृत्त होणाऱ्या 'भू' धातूच्या प्रमाणेच, भूवादिगणात प्रवृत्त होणाऱ्या सकर्मक असलेल्याही 'पच' धातूचे दिवादिगणात आल्यावर अकर्मक झालेल्याचे सकर्मकत्व इच्छितात. हे अट्ठकथासहित त्रिपिटक बुद्धवचनात कोठून मिळणार? म्हणून भगवंतांच्या प्रवचनात (शासनात) श्रोत्यांच्या संशयाचे निर्मूलन करण्यासाठी आम्ही येथे हा नियम प्रस्थापित करतो – วินาปิ อุปสคฺเคน, คณนานตฺตโยคโต; สกมฺมากมฺมกา โหนฺติ, ธาตู ปจภิทาทโย. उपसर्गाशिवाय देखील, गणांच्या भिन्नतेच्या योगाने; पच, भिद इत्यादी धातू सकर्मक आणि अकर्मक होतात. ปุริโส โอทนํ ปจติ. ส ภูตปจนึ ปจิ. โอทโน ปจฺจติ. กมฺมํ ปจฺจติ. วีหิสีสํ ปจฺจติ. รุกฺขผลานิ ปจฺจนฺติ. นาโค ปาการํ ภินฺทติ. ตฬากปาฬิ ภิชฺชติ. ภิชฺชนธมฺมํ ภิชฺชติ. เอตฺถ จ สยํสทฺทํ อชฺฌาหริตฺวา ‘‘สยเมว โอทโน ปจฺจตี’’ติอาทินา วุตฺเตปิ ‘‘ปุริโส สยเมว ปาณํ หนติ. ภควา สยเมว [Pg.37] เญยฺยธมฺมํ อพุชฺฌี’’ติ ปโยเคสุ ปรสฺส อาณตฺติสมฺภูตหนนกฺริยาปฏิเสธมิว ปโรปเทสสมฺภูตพุชฺฌนกฺริยาปฏิเสธนมิว จ อญฺญสฺส กฺริยาปฏิเสธนวเสน วุตฺตตฺตา โย สยํสทฺทวเสน กมฺมกตฺตุภาวปริกปฺโป, ตํ น ปมาณํ. สยํสทฺโท หิ สุทฺธกตฺตุอตฺเถปิ ทิสฺสติ, น เกวลํ ‘‘สยเมว ปียเต ปานีย’’นฺติอาทีสุ กมฺมตฺเถเยว, ตสฺมา สาสนานุรูเปน อตฺโถ คเหตพฺโพ นยญฺญูหิ. ‘पुरुष भात शिजवतो’ (पुरिसो ओदनं पचति). ‘त्याने भूतपचनी शिजवली’ (स भूतपचनिं पचि). ‘भात शिजतो’ (ओदनो पच्चति). ‘कर्म शिजते/पक्व होते’ (कम्मं पच्चति). ‘भाताचे कणीस पिकते’ (वीहिसीसं पच्चति). ‘झाडाची फळे पिकतात’ (रुक्खफलानि पच्चन्ति). ‘हत्ती भिंत फोडतो’ (नागो पाकारं भिन्दति). ‘तलावाची भिंत फुटते’ (तळाकपाळि भिज्जति). ‘नाशवंत वस्तू नष्ट होते’ (भिज्जनधम्मं भिज्जति). आणि येथे ‘स्वयं’ (स्वतः) शब्दाचा अध्याहार करून “स्वतःच भात शिजतो” (सयमेव ओदनो पच्चति) इत्यादी म्हटले तरी, “पुरुष स्वतःच प्राणाचा घात करतो” (पुरिसो सयमेव पाणं हनति), “भगवंत स्वतःच ज्ञेय धर्म जाणते झाले” (भगवा सयमेव नेय्यधम्मं अबुज्झि) या प्रयोगांमध्ये दुसऱ्याच्या आज्ञेने होणाऱ्या हनन क्रियेच्या निषेधाप्रमाणे आणि दुसऱ्याच्या उपदेशाने होणाऱ्या बोध क्रियेच्या निषेधाप्रमाणे, अन्य क्रियेच्या निषेधार्थ म्हटल्यामुळे जो ‘स्वयं’ शब्दाच्या आधारे कर्मकर्तृभावाचा कल्पनाविलास केला जातो, तो प्रमाण मानला जाऊ शकत नाही. कारण ‘स्वयं’ शब्द कर्तृअर्थातही दिसतो, केवळ “पाणी स्वतःच प्यायले जाते” (सयमेव पीयते पानीयं) इत्यादी कर्मअर्थातच नाही. म्हणून नय जाणणाऱ्यांनी (व्याकरणतज्ज्ञांनी) शासनाला (बुद्धवचनाला) अनुसरूनच अर्थ ग्रहण केला पाहिजे. วินาปิ อุปสคฺเคน, วินาปิ จ คณนฺตรํ; สกมฺมากมฺมกา โหนฺติ, อตฺถโต ทิวุอาทโย. उपसर्गाशिवाय आणि दुसऱ्या गणात न जाताही, अर्थाच्या दृष्टीने 'दिवु' इत्यादी धातू सकर्मक आणि अकर्मक होतात. กามคุเณหิ ทิพฺพติ. ปจฺจามิตฺเต ทิพฺพติ. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. ‘कामगुणांनी क्रीडा करतो’ (कामगुणेहि दिब्बति). ‘शत्रूंवर विजय मिळवतो’ (पच्चामित्ते दिब्बति). इतर प्रयोगही असेच योजावेत. คณนฺตรญฺโจปสคฺคํ, วินาปิ อตฺถนานตํ; ปโยคโต สกมฺมา จ, อกมฺมา จ คมาทโย. दुसरा गण आणि उपसर्ग यांच्याशिवाय, अर्थाच्या भिन्नतेविनाही; प्रयोगावरून 'गमु' इत्यादी धातू सकर्मक आणि अकर्मक होतात. ปุริโส มคฺคํ คจฺฉติ. คมฺภีเรสุปิ อตฺเถสุ ญาณํ คจฺฉติ. ธมฺมํ จรติ. ตตฺถ ตตฺถ จรติ. ‘पुरुष मार्गावरून जातो’ (पुरिसो मग्गं गच्छति). ‘गंभीर अर्थांमध्येही ज्ञान जाते (प्रवेश करते)’ (गम्भीरेसुपि अत्थेसु ञाणं गच्छति). ‘धर्माचे आचरण करतो’ (धम्मं चरति). ‘तेथे तेथे फिरतो’ (तत्थ तत्थ चरति). คณนฺตรญฺโจปสคฺคํ, ปโยคญฺจตฺถนานตํ; วินาปิ ติวิธา โหนฺติ, ทิสาที รูปเภทโต. दुसरा गण, उपसर्ग, प्रयोग आणि अर्थाची भिन्नता यांच्याशिवायही; 'दिस' इत्यादी धातू रूपभेदाने तीन प्रकारचे होतात. ปาสาทํ ปสฺสติ, ปาสาทํ ทกฺขติ ปาสาโท ทิสฺสติ. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. ‘प्रासाद (वाडा) पाहतो’ (पासादं पस्सति), ‘प्रासाद पाहील’ (पासादं दक्खति), ‘प्रासाद दिसतो’ (पासादो दिस्सति). इतर प्रयोगही असेच योजावेत. สภาวโต สกมฺมา ตุ, รุทธาตาทโย มตา; สภาวโต อกมฺมา จ, นนฺทธาตาทโย มตา. स्वभावानेच सकर्मक असलेले 'रुद' इत्यादी धातू मानले गेले आहेत; आणि स्वभावानेच अकर्मक असलेले 'नन्द' इत्यादी धातू मानले गेले आहेत. มตํ วา อมฺม โรทนฺติ, อิธ นนฺทติ เปจฺจ นนฺทติ. ‘किंवा हे आई! मृतासाठी रडतात’ (मतं वा अम्म रोदन्ति), ‘येथे आनंदित होतो, परलोकात आनंदित होतो’ (इध नन्दति पेच्च नन्दति). อุปสคฺควเสเนเก, สกมฺมาปิ อกมฺมกา; สมฺภวนฺติ ตเถกจฺเจ, อกมฺมาปิ สกมฺมกา. उपसर्गाच्या प्रभावाने काही सकर्मक धातू देखील अकर्मक होतात; तसेच काही अकर्मक धातू देखील सकर्मक होतात. เอกจฺเจ [Pg.38] ตุปสคฺเคหิ, สกมฺมา จ สกมฺมกา; อกมฺมกา อกมฺมา จ, เอสตฺโถเปตฺถ ทีปิโต; काही धातू उपसर्गांमुळे सकर्मक असूनही सकर्मकच राहतात, आणि अकर्मक असूनही अकर्मकच राहतात, हा अर्थही येथे स्पष्ट केला आहे. ปุริโส คามา นิคฺคจฺฉติ, ธนํ อธิคจฺฉติ, ปุริโส ปาณํ อภิภวติ, หิมวตา ปภวนฺติ มหานทิโย. อญฺญานิปิ ปโยคานิ โยเชตพฺพานิ. ‘पुरुष गावातून बाहेर पडतो’ (पुरिसो गामा निग्गच्छति), ‘धन प्राप्त करतो’ (धनं अधिगच्छति), ‘पुरुष प्राण्याला पराभूत करतो’ (पुरिसो पाणं अभिभवति), ‘हिमालयातून महानद्या उगम पावतात’ (हिमवता पभवन्ति महानदियो). इतर प्रयोगही असेच योजावेत. ตตฺถ ยทิ สาสเน ปจธาตุสฺส กมฺมนิ รูปํ สิยา, ‘‘ปุริเสน กมฺมํ กริยตี’’ติ ปโยโค วิย ‘‘ปุริเสน โอทโน ปจิยตี’’ติ ปโยโค อิจฺฉิตพฺโพ. เย ปน ครู ‘‘ตยา ปจฺจเต โอทโน’’ติอาทีนิ อิจฺฉนฺติ, เต สทฺทสตฺถนยํ นิสฺสาย วทนฺติ มญฺเญ. เอวํ สนฺเตปิ อุปปริกฺขิตฺวา ยุตฺตานิ เจ, คเหตพฺพานิ. การิเต ‘‘ปุริโส ปุริเสน ปุริสํ วา โอทนํ ปาเจติ, ปาจยติ, ปาจาเปติ, ปาจาปยติ. ปุริเสน ปุริโส โอทนํ ปาจิยติ, ปาจยิยติ, ปาจาปิยติ, ปาจาปยิยตี’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. ‘‘ยถา ทณฺเฑน โคปาโล, คาวํ ปาเจติ โคจร’’นฺติอาทีสุ อญฺโญปิ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. तेथे जर शासनात (बुद्धवचनात) 'पच' धातूचे कर्मणी रूप असेल, तर “पुरुषाकडून कर्म केले जाते” (पुरिसेन कम्मं करियति) या प्रयोगाप्रमाणे “पुरुषाकडून भात शिजवला जातो” (पुरिसेन ओदनों पचियति) हा प्रयोग स्वीकारला पाहिजे. परंतु जे आचार्य “तुझ्याकडून भात शिजवला जातो” (तया पच्चते ओदनो) इत्यादी प्रयोग स्वीकारतात, ते व्याकरणशास्त्राच्या नियमांचा आश्रय घेऊन बोलतात असे मला वाटते. असे असले तरी, परीक्षण करून जर ते योग्य वाटले, तर ते ग्रहण करावे. प्रयोजक (कारित) रूपात “पुरुष दुसऱ्या पुरुषाकडून किंवा पुरुषाला भात शिजवतो” (पुरिसो पुरिसेन पुरिसं वा ओदनं पाचेति, पाचयति, पाचापेति, पाचापयति) आणि “पुरुषाकडून पुरुषाद्वारे भात शिजवला जातो” (पुरिसेन पुरिसो ओदनं पाचियति, पाचयियति, पाचापियति, पाचापयियति) अशी रूपे होतात. “ज्याप्रमाणे गोपाळ काठीने गाईला गोचराकडे (चरण्याच्या जागेकडे) हाकतो” (यथा दण्डेन गोपालो, गावं पाचेति गोचरं) इत्यादींमध्ये दुसराही अर्थ पाहिला पाहिजे. ปจํ, ปจนฺโต, ปจนฺตี, ปจมาโน, ปจมานา. ปาตพฺพํ, ปจิตํ, ปจิตพฺพํ, ปจนียํ, ปจิตุํ, ปจิตฺวา. เอตฺถ จ ‘‘อิมสฺส มํสญฺจ ปาตพฺพ’’นฺติ ปโยโค อุทาหรณํ. ‘‘ปจติ, ปจนฺติ. ปจสี’’ติอาทิ ปทกฺกโม สุโพโธ. ‘पचं’ (शिजवणारा), ‘पचन्तो’ (शिजवणारा), ‘पचन्ती’ (शिजवणारी), ‘पचमानो’ (शिजवणारा), ‘पचमाना’ (शिजवणारी). ‘पातब्बं’ (पिण्यायोग्य/रक्षण करण्यायोग्य), ‘पचितं’ (शिजविलेले), ‘पचितब्बं’ (शिजवण्यायोग्य), ‘पचनीयं’ (शिजवण्यायोग्य), ‘पचितुं’ (शिजवण्यासाठी), ‘पचित्वा’ (शिजवून). आणि येथे “याचे मांस खाण्यायोग्य (किंवा रक्षण करण्यायोग्य) आहे” (इमस्स मंसञ्च पातब्बं) हा प्रयोग उदाहरण आहे. “पचति, पचन्ति, पचसि” इत्यादी पदक्रम सुबोध (समजण्यास सोपा) आहे. สิจ ฆรเณ. เสจติ, เสโก, ‘‘อุภโตภาสา’’ติ วทนฺติ. सिच (सिञ्च्) धातू सिंचन (शिंपडणे) या अर्थात. ‘सेचेति’ (सिंचन करतो), ‘सेको’ (सिंचन). याला ‘उभतोभासा’ (दोन्ही भाषांमध्ये/पदांमध्ये चालणारा) असे म्हणतात. อิมานิ จการนฺตธาตุรูปานิ. ही 'च'कारान्त धातूंची रूपे आहेत. ฉการนฺตธาตุ छकारान्त धातू ปรสฺสภาสาทิภาวํ, สพฺเพสํ ธาตุนํ อิโต; ปรํ น พฺยากริสฺสํ โส, สาสเน อีริโต น หิ. सर्व धातूंचा परस्मैपद इत्यादी भाव यापुढे मी स्पष्ट करणार नाही, कारण शासनात (बुद्धवचनात) तसे सांगितले गेलेले नाही. ฉุ [Pg.39] เฉทเน. โฉติ. โฉตฺวาน โมฬึ วรคนฺธวาสิตํ. อจฺโฉจฺฉุํวต โภ รุกฺขํ. छु धातू छेदण्याच्या (कापण्याच्या) अर्थात. ‘छोति’ (कापतो). ‘उत्कृष्ट सुवासाने सुवासित केलेली जटा कापून’ (छोत्वान मोळिं वरगन्धवासितं). ‘अरे! त्यांनी खरोखरच झाड कापले’ (अच्छोच्छुंवत भो रुक्खं). มิเลฉ อวิยตฺตายํ วาจายํ. มิเลจฺฉติ, มิลกฺขุ. ปจฺจนฺติเมสุ ชนปเทสุ ปจฺจาชาโต โหติ มิลกฺขูสุ อวิญฺญาตาเรสุ. मिलेछ (म्लेच्छ) धातू अस्पष्ट बोलण्याच्या अर्थात. ‘मिलेच्छति’ (अस्पष्ट बोलतो), ‘मिलक्खु’ (म्लेच्छ/अस्पष्ट बोलणारा). ‘तो सीमावर्ती प्रदेशांतील म्लेंच्छांमध्ये जन्मला आहे, जे (धर्म) जाणत नाहीत’ (पच्चन्तिमेसु जनपदेसु पच्चाजातो होति मिलक्खूसु अविञ्ञातारेसु). วฉิ อิจฺฉายํ. วญฺฉติ. วญฺฉิตํ ธนํ. वछि धातू इच्छेच्या अर्थात. ‘वञ्छति’ (इच्छा करतो). ‘इच्छिलेले धन’ (वञ्छितं धनं). อฉิ อายาเม. อญฺจติ. ทีฆํ วา อญฺฉนฺโต ทีฆํ อญฺฉามีติ ปชานาติ. अछि धातू लांबवण्याच्या (ओढण्याच्या) अर्थात. ‘अञ्चति’ (ओढतो). ‘दीर्घ श्वास ओढताना (घेताना), मी दीर्घ श्वास ओढत आहे असे जाणतो’ (दीघं वा अञ्चन्तो दीघं अञ्चामीति पजानाति). หุจฺฉ โกฏิลฺเล. หุจฺฉติ. हुच्छ धातू कुटिलतेच्या (वाकडेपणाच्या) अर्थात. ‘हुच्छति’ (कुटिल होतो/वाकडा होतो). มุจฺฉ โมหมุจฺฉาสุ. มุจฺฉติ. มุจฺฉิโต วิสเวเคน, วิสญฺญี สมปชฺชถ. มุจฺฉา, มุจฺฉิตฺวา. मुच्छ धातू मोह आणि मूर्च्छेच्या (बेशुद्धीच्या) अर्थात. ‘मुच्छति’ (मूर्च्छित होतो). ‘विषाच्या वेगाने मूर्च्छित होऊन, तो बेशुद्ध झाला’ (मुच्छितो विसवेगेन, विसञ्ञी समपज्जथ). ‘मुच्छा’ (मूर्च्छा), ‘मुच्छित्वा’ (मूर्च्छित होऊन). ผุฉ วิสรเณ โผฉติ. फुछ धातू पसरण्याच्या (विस्तारण्याच्या) अर्थात. ‘फोछति’ (पसरतो). ยุฉ ปมาเท. ยุจฺฉติ. युच्छ धातू प्रमादाच्या (आळसाच्या/दुर्लक्षाच्या) अर्थात. ‘युच्छति’ (प्रमाद करतो). อุฉิ อุญฺเฉ. อุญฺโฉ ปริเยสนํ. อุญฺฉติ. อุญฺฉาจริยาย อีหถ. उछि धातू उञ्छ (धान्य गोळा करणे/भिक्षा मागणे) या अर्थात. ‘उञ्छो’ म्हणजे शोधणे/भिक्षा मिळवणे. ‘उञ्छति’ (धान्य गोळा करतो/भिक्षा मागतो). ‘उञ्छचर्येसाठी (भिक्षेसाठी) प्रयत्न करा’ (उञ्छाचरियाय ईहथ). อุฉ ปิปาสายํ. อุฉติ. उछ धातू तहानेच्या (तृष्णेच्या) अर्थात. ‘उछति’ (तहानलेला होतो). ปุจฺฉ ปญฺเห ปุจฺฉติ. ปุจฺฉิตา, ปุจฺฉโก, ปุฏฺโฐ, ปุจฺฉิโต, ปุจฺฉา. ภิกฺขุ วินยธรํ ปญฺหํ ปุจฺฉติ. ปุจฺฉิ, ปุจฺฉิตุํ. ปุจฺฉิตฺวา. เอตฺถ จ ปญฺจวิธา ปุจฺฉา อทิฏฺฐโชตนาปุจฺฉา ทิฏฺฐสํสนฺทนาปุจฺฉา วิมติจฺเฉทนาปุจฺฉา อนุมติปุจฺฉา กเถตุกมฺยตาปุจฺฉาติ. ตาสํ นานตฺตํ อฏฺฐสาลินิยาทิโต คเหตพฺพํ. पुच्छ धातू प्रश्न विचारण्याच्या अर्थात. ‘पुच्छति’ (विचारतो). ‘पुच्छिता’ (विचारणारा), ‘पुच्छको’ (विचारणारा), ‘पुट्ठो’ (विचारलेला), ‘पुच्छितो’ (विचारलेला), ‘पुच्छा’ (प्रश्न). ‘भिक्खू विनयधराला प्रश्न विचारतो’ (भिक्खु विनयधरं पञ्हं पुच्छति). ‘पुच्छि’ (विचारले), ‘पुच्छितुं’ (विचारण्यासाठी), ‘पुच्छित्वा’ (विचारून). आणि येथे पाच प्रकारचे प्रश्न आहेत: अदिट्ठजोतनापुच्छा (न पाहिलेले स्पष्ट करण्यासाठी विचारलेला प्रश्न), दिट्ठसंसन्दनापुच्छा (पाहिलेल्याची पडताळणी करण्यासाठी विचारलेला प्रश्न), विमतिच्छेदनापुच्छा (संशयाचे निरसन करण्यासाठी विचारलेला प्रश्न), अनुमतिपुच्छा (संमती मिळवण्यासाठी विचारलेला प्रश्न) आणि कथेतुकाम्यतापुच्छा (सांगण्याच्या इच्छेने विचारलेला प्रश्न). त्यांची भिन्नता अट्ठसालिनी इत्यादी ग्रंथांमधून ग्रहण करावी. วิจฺฉ คติยํ. วิจฺฉติ. วิจฺฉิกา. विच्छ धातू गतीच्या (जाण्याच्या) अर्थात. ‘विच्छति’ (जातो). ‘विच्छिका’ (विंचू - गती करणारी). วจฺฉุ [Pg.40] เฉทเน. วุจฺฉติ. วุตฺตา, วุตฺตวา, วุตฺตสิโร. วการคตสฺส อการสฺส อุตฺตํ. वच्छु धातू छेदण्याच्या (कापण्याच्या) अर्थात. ‘वुच्छति’ (कापला जातो). ‘वुत्ता’ (कापलेले/मुंडण केलेले), ‘वुत्तवा’ (ज्याने कापले आहे तो), ‘वुत्तसिरो’ (ज्याचे डोके मुंडण केले आहे तो). येथे 'व' कारामधील 'अ' काराचा 'उ' कार झाला आहे. วุตฺตสทฺโท เกโสหรเณปิ ทิสฺสติ ‘‘กาปฏิโก มาณโว ทหโร วุตฺตสิโร’’ติอาทีสุ. เอตฺถ จ สิรสทฺเทน สิโรรุหา วุตฺตา ยถา มญฺจสทฺเทน มญฺจฏฺฐา, จกฺขุสทฺเทน จ จกฺขุนิสฺสิตํ วิญฺญาณํ. โรปิเตปิ ‘‘ยถา สารทิกํ พีชํ, เขตฺเต วุตฺตํ วิรูหตี’’ติอาทีสุ. กถิเตปิ ‘‘วุตฺตมิทํ ภควตา, วุตฺตมรหตา’’ติอาทิสุ. อตฺริทํ วุจฺจติ – ‘वुत्त’ शब्द केस कापण्याच्या (मुंडण करण्याच्या) अर्थातही दिसतो, जसे की “कापटिक तरुण माणवक मुंडित डोक्याचा आहे” (कापटिको माणवो दहरो वुत्तसिरो) इत्यादींमध्ये. आणि येथे ‘शिर’ शब्दाने डोक्यावरील केस (शिरोरुह) अभिप्रेत आहेत, ज्याप्रमाणे ‘मंच’ शब्दाने मंचावर बसलेले लोक (मंचस्था) आणि ‘चक्षु’ शब्दाने चक्षूवर आश्रित असलेले विज्ञान अभिप्रेत असते. पेरण्याच्या अर्थातही हा शब्द वापरला जातो, जसे की “ज्याप्रमाणे शरद ऋतूतील बीज शेतात पेरले असता उगवते” (यथा सारदिकं बीजं, खेत्ते वुत्तं विरूहति) इत्यादींमध्ये. आणि बोलण्याच्या अर्थातही, जसे की “हे भगवंतांनी म्हटले आहे, अरहंतांनी म्हटले आहे” (वुत्तमिदं भगवता, वुत्तमरहता) इत्यादींमध्ये. याविषयी असे म्हटले जाते – วจฺฉุวปวจวสา, วุตฺตสทฺโท ปวตฺตติ; เกโสหาเร โรปิเต จ, กถิเต จ ยถากฺกมนฺติ. ‘वच्छु’, ‘वपु’ आणि ‘वच’ या धातूंपासून अनुक्रमे केस कापण्याच्या (मुंडण करण्याच्या), पेरण्याच्या आणि बोलण्याच्या अर्थात ‘वुत्त’ शब्द प्रवृत्त होतो. อปโร นโย – วุตฺตสทฺโท ‘‘โน จ โข ปฏิวุตฺต’’นฺติอาทีสุ วาปสมีกรเณ ทิสฺสติ. ‘‘ปนฺนโลโม ปรทตฺตวุตฺโต’’ติอาทีสุ ชีวิตวุตฺติยํ. ‘‘ปณฺฑุปลาโส พนฺธนา ปวุตฺโต’’ติอาทีสุ อปคเม. ‘‘คีตํ ปวุตฺตํ สมีหิต’’นฺติอาทีสุ ปาวจนวเสน ปวตฺติเต. โลเก ปน ‘‘วุตฺโต ปารายโน’’ติอาทีสุ อชฺเฌเน ทิสฺสติ, อตฺริทํ วุจฺจติ दुसरा प्रकार (असा आहे) – 'वृत्त' (vutta) हा शब्द "नो च खो पटिवुत्तं" (पण प्रत्युत्तर दिले नाही) इत्यादींमध्ये पेरणीनंतर जमीन सपाट करण्याच्या (वापसमीकरण) अर्थात दिसतो. "पन्नलोमो परदत्तवुत्तो" (रोम शांत झालेला, दुसऱ्याने दिलेल्यावर जगणारा) इत्यादींमध्ये जीवनवृत्तीच्या अर्थात. "पण्डुपलासो बन्धना पवुत्तो" (पिवळे पान बंधनातून मुक्त झाले) इत्यादींमध्ये दूर होण्याच्या (अपगम) अर्थात. "गीतं पवुत्तं समीहितं" (गायलेले, प्रवचन केलेले, इच्छित) इत्यादींमध्ये प्रवचनाच्या रूपाने प्रवृत्त करण्याच्या अर्थात. लोकव्यवहारात (लौकिक भाषेत) "वुत्तो पारायनो" इत्यादींमध्ये अध्ययनाच्या (शिकण्याच्या) अर्थात दिसतो, येथे हे म्हटले जाते – ‘‘วาปสมีกรเณ จ, อโถ ชีวิตวุตฺติยํ; อปคเม ปาวจน-วเสน จ ปวตฺติเต; อชฺเฌเน เจวเมเตสุ, วุตฺตสทฺโท ปทิสฺสตี’’ติ. "पेरणीनंतर जमीन सपाट करण्यात (वापसमीकरण), तसेच जीवनवृत्तीमध्ये; दूर होण्यात (मुक्त होण्यात) आणि प्रवचनाच्या रूपाने प्रवृत्त करण्यात; आणि अध्ययनात, या सर्व अर्थांमध्ये 'वृत्त' (vutta) हा शब्द दिसून येतो." อปโรปิ นโย – วุตฺตสทฺโท สอุปสคฺโคจ อนุปสคฺโค จ วปเน วาปสมีกรเณ เกโสหาเร ชีวิตวุตฺติยํ ปมุตฺตภาเว [Pg.41] ปาวจนวเสน ปวตฺติเต อชฺเฌเน กถเนติ เอวมาทีสุ ทิสฺสติ. ตถา เหส – आणखी एक प्रकार (असा आहे) – 'वृत्त' (vutta) हा शब्द उपसर्गासह आणि उपसर्गाशिवाय देखील पेरणी करणे, पेरणीनंतर जमीन सपाट करणे, केस कापून टाकणे, जीवनवृत्ती, मुक्त भाव, प्रवचनाच्या रूपाने प्रवृत्त करणे, अध्ययन आणि कथन (बोलणे) इत्यादी अर्थांमध्ये दिसतो. तसेच तो (खालीलप्रमाणे आहे) – ‘‘คาโว ตสฺส ปชายนฺติ, เขตฺเต วุตฺตํ วิรูหติ; วุตฺตานํ ผลมสฺนาติ, โย มิตฺตานํ น ทุพฺภตี’’ติ "जो मित्रांशी द्रोह करत नाही, त्याच्या गाई प्रसवतात (वाढतात), शेतात पेरलेले उगवते आणि तो पेरलेल्याचे फळ खातो." อาทีสุ วปเน อาคโต. ‘‘โน จ โข ปฏิวุตฺต’’นฺติอาทีสุ อฏฺฐทนฺตกาทีหิ วาปสมีกรเณ. ‘‘กาปฏิโก มาณโว ทหโร วุตฺตสิโร’’ติอาทีสุ เกโสหรเณ. ‘‘ปนฺนโลโม ปรทตฺตวุตฺโต มิคภูเตน เจตสา วิหรตี’’ติอาทีสุ ชีวิตวุตฺติยํ. ‘‘เสยฺยถาปิ นาม ปณฺฑุปลาโส พนฺธนา ปวุตฺโต อภพฺโพ หริตตฺถายา’’ติอาทีสุ พนฺธนโต ปมุตฺตภาเว. ‘‘เยสมิทํ เอตรหิ โปราณํ มนฺตปทํ คีตํ ปวุตฺตํ สมีหิต’’นฺติอาทีสุ ปาวจนภาเวน ปวตฺติเต. โลเก ปน ‘‘วุตฺโต คโณ, วุตฺโต ปารายโน’’ติอาทีสุ อชฺเฌเน. ‘‘วุตฺตํ โข ปเนตํ ภควตา, ธมฺมทายาทา เม ภิกฺขเว ภวถ, มา อามิสทายาทา’’ติอาทีสุ กถเน. อตฺริทํ วุจฺจติ – इत्यादींमध्ये (हा शब्द) पेरणीच्या (वपन) अर्थात आला आहे. "नो च खो पटिवुत्तं" इत्यादींमध्ये अष्टदंतक (आठ दातांचे अवजार) इत्यादींद्वारे पेरणीनंतर जमीन सपाट करण्याच्या (वापसमीकरण) अर्थात. "कापटिको माणवो दहरो वुत्तसिरो" (कपटी तरुण माणवक मुंडित डोक्याचा आहे) इत्यादींमध्ये केस कापण्याच्या (केशोहरण) अर्थात. "पन्नलोमो परदत्तवुत्तो मिगभूतेन चेतसा विहरति" (रोम शांत झालेला, दुसऱ्याने दिलेल्यावर जगणारा, हरिणासारख्या चित्ताने विहार करतो) इत्यादींमध्ये जीवनवृत्तीच्या अर्थात. "सेय्यथापि नाम पण्डुपलासो बन्धना पवुत्तो अभब्बो हरितत्थाय" (ज्याप्रमाणे पिवळे पडलेले पान बंधनातून तुटल्यावर पुन्हा हिरवे होण्यास असमर्थ असते) इत्यादींमध्ये बंधनातून मुक्त होण्याच्या अर्थात. "येसमिदं एतरहि पोराणं मन्तपदं गीतं पवुत्तं समीहितं" (ज्यांचे हे प्राचीन मंत्रपद सध्या गायलेले, प्रवचन केलेले, इच्छित आहे) इत्यादींमध्ये प्रवचन रूपाने प्रवृत्त करण्याच्या अर्थात. लोकव्यवहारात "वुत्तो गणो, वुत्तो पारायनो" इत्यादींमध्ये अध्ययनाच्या अर्थात. "वृत्तं खो पनेतं भगवता, धम्मदायादा मे भिक्खवे भवथ, मा आमिसदायादा" ("भिक्खूंनो, तुम्ही माझे धम्मदायाद व्हा, आमिषदायाद होऊ नका, असे भगवंतांनी म्हटले आहे") इत्यादींमध्ये कथनाच्या (बोलण्याच्या) अर्थात. येथे हे म्हटले जाते – วป วตุ วจฺฉุวจ-ธาตูนํ วสโต มโต; โสปสคฺโค โนปสคฺโค, วุตฺตสทฺโท ยถารหํ. "वप, वतु, वच्छु आणि वच या धातूंच्या प्रभावाने, उपसर्गासह किंवा उपसर्गाशिवाय, 'वृत्त' (vutta) हा शब्द यथायोग्य मानला गेला आहे." วปเน จ วาปสมี-กรเณ มุณฺฑตาย จ; ชีววุตฺยํ ปมุตฺตตฺเถ, วสา ปาวจนสฺส ตุ; ปวตฺติเต จ อชฺเฌเน, กถเน จาติ ลกฺขเย; "पेरणीमध्ये, पेरणीनंतर जमीन सपाट करण्यात, मुंडण करण्यात (केस कापण्यात), जीवनवृत्तीमध्ये, मुक्त होण्याच्या अर्थात, प्रवचनाच्या प्रभावाने प्रवृत्त करण्यात, अध्ययनात आणि कथनात (हा शब्द) लक्षित करावा (समजावा)." ตจฺฉ ตนุกรเณ. ตจฺฉติ. ตจฺฉโก ทารุํ. 'तच्छ' (taccha) धातू बारीक करणे (तासणे) या अर्थात आहे. 'तच्छति' (तो तासतो). 'तच्छको दारुं' (सुतार लाकूड तासतो). ฉการนฺตธาตุรูปานิ. 'छ' कारान्त धातूंची रूपे. ชการนฺตธาตุ 'ज' कारान्त धातू. ชิชเย. เชติ. ชยติ, ปราชยติ. ธมฺมํ จรนฺโต สามิกํ ปราเชติ. ธมฺมํ จรนฺโต ปรชฺชติ. ราชานํ ชยาเปสุํ. ชยาเปตฺวา. เอตฺถ ชยาเปสุนฺติ ‘‘ชยตุ ภว’’นฺติ อาสีสวจนํ วทึสูติ อตฺโถ. ชยนํ, ชิตํ, ชโย, วิชิตํ, ชิโน, เชตา, เชโต, ชิโต มาโร, มารํ ชิโต, ชิตวา, ชิตาวี, วิชิตาวี, มารชิ, โลกชิ, โอธิชิโน, อโนธิชิโน, ชิโต. วิชิโต, เชตุํ, วิเชตุํ, ชิตฺวา, วิชิตฺวา. อิมสฺส ปน ธาตุสฺส กิยาทิคณํ ปตฺตสฺส ‘‘ชินาติ ชินิตฺวา’’ตฺยาทีนิ รูปานิ ภวนฺติ. 'जि' (ji) धातू जिंकणे (जय) या अर्थात आहे. 'जेति', 'जयति', 'पराजयति' (जिंकतो, पराभूत करतो). "धम्मं चरन्तो सामिकं पराजेति" (धर्माचे आचरण करणारा स्वामीला पराभूत करतो). "धम्मं चरन्तो परज्जति" (धर्माचे आचरण करणारा पराभूत होतो). "राजानं जयापेसुं" (त्यांनी राजाचा जयजयकार केला). "जयापेत्वा" (जयजयकार करून). येथे 'जयापेसुं' म्हणजे "आपला विजय असो" (जयतु भवं) असे आशिर्वचन बोलले, असा अर्थ आहे. जयनं (जिंकणे), जितं (जिंकलेले), जयो (विजय), विजितं (विशेष जिंकलेले), जिनो (विजेता), जेता (विजेता), जेतो, जितो मारो (मार जिंकला गेला), मारं जितो (माराला जिंकणारा), जितवा (जिंकणारा), जितावी (विजेता), विजितावी, मारजि (मारविजेता), लोकजि (लोकविजेता), ओधिजिनो (मर्यादित विजेता), अनोधिजिनो (अमर्यादित विजेता), जितो, विजितो, जेतुं (जिंकण्यासाठी), विजेतुं, जित्वा (जिंकून), विजित्वा. परंतु या धातूला 'क्रियादिगण' प्राप्त झाल्यावर "जिनाति, जिनित्वा" इत्यादी रूपे होतात. ชิ อภิภวเน. เชติ. ชิโน. ปุพฺเพ วิย รูปานิ. เอตฺถ จ ‘‘ตุมฺเหหิ อานนฺท สปฺปุริเสหิ วิชิตํ, ปจฺฉิมา ชนตาสาลิมํโสทนํ อติมญฺญิสฺสตี’’ติ ปาฬิ อภิภวนตฺถสาธกา. เอตฺถ หิ วิชิตนฺติ อธิภูตนฺติ อตฺโถ. 'जि' (ji) धातू पराभूत करणे (अभिभव) या अर्थात आहे. 'जेति', 'जिनो'. पूर्वीप्रमाणेच रूपे होतात. आणि येथे "तुम्हा सत्पुरुषांनी, हे आनंदा, विजय मिळवला आहे, भावी पिढी तांदूळ आणि मांसाच्या भोजनाला तुच्छ मानेल" ही पाळी (वाक्य) पराभूत करण्याच्या अर्थाची साधक आहे. कारण येथे 'विजितं' म्हणजे 'अधिभूतं' (पराभूत केलेले/वश केलेले) असा अर्थ आहे. ชุ คติยํ. เอตฺถ สีฆคติ อธิปฺเปตา. ชวติ. ชวนํ, ชโว, ชวํ, ชวนฺโต, ชวนจิตฺตํ, ชวนปญฺโญ, ชวนหํโส. มโนชวํ คจฺฉติ เยนกามํ. 'जु' (ju) धातू गती या अर्थात आहे. येथे 'शीघ्रगती' (वेगवान गती) अभिप्रेत आहे. 'जवति' (तो वेगाने धावतो). जवनं (वेगवान धावणे), जवो (वेग), जवं, जवन्तो (धावणारा), जवनचित्तं (जवनचित्त), जवनपञ्ञो (तीव्र बुद्धीचा), जवनहंसो (वेगवान हंस). "मनोजवं गच्छति येनकामं" (मनाच्या वेगाने इच्छेनुसार जातो). เชขเย. ชียติ. เอการสฺส อียาเทโส. สาสนานุรูเปน ‘‘กึ มํ ธเนน ชีเยถา’’ติ หิ ปาฬิ ทิสฺสติ. สทฺทสตฺถวิทู ปน ‘‘ชายตี’’ติ รูปํ วทนฺติ. 'जे' (je) धातू क्षय होणे (नाश होणे) या अर्थात आहे. 'जीयति' (क्षय होतो). 'ए' काराचा 'ईय्' (īy) असा आदेश होतो. शासनाच्या (बुद्धवचनाच्या) अनुरूप "मला धनाने काय क्षय होणार?" (किं मं धनेन जीयेथा) अशी पाळी दिसते. परंतु व्याकरणकार 'जायति' असे रूप सांगतात. สชฺช คติยํ. สชฺชติ. 'सज्ज' (sajja) धातू गती या अर्थात आहे. 'सज्जति'. กุชุ ขุชุ เถยฺยกรเณ. โกชติ. โขชติ. 'कुजु' (kuju) आणि 'खुजु' (khuju) धातू चोरी करणे या अर्थात आहेत. 'कोजति', 'खोजति'. วช คติยํ. ธช ธชิ จ. วชติ. อพฺพชติ. มนุสฺสตฺตญฺจ อพฺพเช. วโช, วชนํ, ปวชนํ, ปพฺพชฺชา, ปพฺพชิโต, ปพฺพาชิโต. 'वज' (vaja) धातू गती या अर्थात आहे. 'धज' (dhaja) आणि 'धजि' (dhaji) देखील (गतीच्या अर्थात आहेत). 'वजति', 'अब्बजति'. "मनुस्सत्तञ्च अब्बजे" (आणि मनुष्यत्वाला प्राप्त व्हावे). वजो (गोठा/मार्ग), वजनं (जाणे), पवजनं (प्रस्थान), पब्बज्जा (प्रव्रज्या), पब्बजितो (प्रव्रजित), पब्बाजितो (प्रव्रजित केलेला/हद्दपार केलेला). สกา รฏฺฐา ปพฺพาชิโต, อญฺญํ ชนปทํ คโต; มหนฺตํ โกฏฺฐํ กยิราถ, ทุรุตฺตานํ นิเธตเว. "स्वतःच्या राष्ट्रातून हद्दपार केलेल्या आणि दुसऱ्या जनपदात गेलेल्या मनुष्याने, वाईट शब्दांचा (दुर्भाषिते) संग्रह करण्यासाठी (सहन करण्यासाठी) मोठा कोठार बनवावा." ธชติ. ธโช. ธญฺชติ. ธญฺชนํ. เอตฺถ ธโชติ เกตุ. ธญฺชนนฺติ คมนํ. 'धजति', 'धजो'. 'धञ्जति', 'धञ्जनं'. येथे 'धजो' म्हणजे ध्वज (निशाण) आणि 'धञ्जनं' म्हणजे गमन (जाणे). อช เขปเน จ. คติอเปกฺขโกเยว จกาโร. อชติ. อโช. เอตฺถ อโชติ เอฬโก. อิมานิ ปนสฺส ปริยายวจนานิ ‘‘อโช เอฬโก อุรพฺโภ อวิ เมณฺโฑ’’ติ. ตตฺถ อุรพฺโภติ เอฬโก, โย ‘‘อโช’’ติปิ วุจฺจติ. อวีติ รตฺตโลโม เอฬโก. เมณฺโฑติ กุฏิลสิงฺโค เอฬโก. ตถา หิ ชนกชาตเก อชรถโต เมณฺฑรถา วิสุํ วุตฺตา. อปิจ อเชฬกนฺติ อชโต เอฬกสฺส วิสุํ วจนโต เอฬกสทฺเทน เมณฺโฑปิ คเหตพฺโพ, มโหสธชาตกฏฺฐกถายญฺหิ เมณฺเฑฬกานํ นิพฺพิเสสตา วุตฺตาติ. 'अज' (aja) धातू फेकणे (क्षेपण) आणि गतीच्या अर्थात आहे. 'च' कार हा गतीच्या अपेक्षेनेच आहे. 'अजति', 'अजो'. येथे 'अजो' म्हणजे एडका (बकरा). आणि हे त्याचे समानार्थी शब्द आहेत – "अजो, एळको, उरब्भो, अवि, मेण्डो". त्यामध्ये 'उरब्भो' म्हणजे एडका, ज्याला 'अजो' देखील म्हटले जाते. 'अवि' म्हणजे तांबड्या केसांचा एडका. 'मेण्डो' म्हणजे वक्र (वाकड्या) शिंगांचा एडका. तसेच जनकजातकात शेळ्यांच्या रथापेक्षा मेंढ्यांचे रथ वेगळे सांगितले आहेत. शिवाय, 'अजेळकं' (शेळ्या-मेंढ्या) यामध्ये शेळीपेक्षा एडका वेगळा सांगितल्यामुळे 'एळक' शब्दाने मेंढा देखील ग्रहण करावा, कारण महौषधजातक अट्ठकथेत मेंढा आणि एडका यांच्यात कोणताही भेद नाही असे म्हटले आहे. อชฺช สชฺช อชฺชเน. อชฺชนํ อชฺชนกฺริยา. อชฺชติ. สชฺชติ. 'अज्ज' (ajja) आणि 'सज्ज' (sajja) धातू मिळवणे (अर्जन करणे) या अर्थात आहेत. 'अज्जनं' म्हणजे मिळवण्याची क्रिया. 'अज्जति', 'सज्जति'. กชฺช พฺยถเน. พฺยถนํ หึสา. กชฺชติ. 'कज्ज' (kajja) धातू पीडा देणे (व्यथन) या अर्थात आहे. 'व्यथन' म्हणजे हिंसा. 'कज्जति'. ขชฺช มชฺชเน จ. มชฺชนํ สุทฺธิ. พฺยถนาเปกฺโข จกาโร. ขชฺชติ. ขชฺชูโร. 'खज्ज' (khajja) धातू शुद्ध करणे (मज्जन) आणि पीडा देण्याच्या अर्थात आहे. 'मज्जन' म्हणजे शुद्धी. 'च' कार हा पीडा देण्याच्या अपेक्षेने आहे. 'खज्जति', 'खज्जुरो' (खजूर). ขช มนฺเถ. มนฺโถ วิโลฬนํ. ขชติ. 'खज' (khaja) धातू घुसळणे (मंथन) या अर्थात आहे. 'मंथन' म्हणजे ढवळणे (विलोळन). 'खजति'. ขชิ คติเวกลฺเล. กิสฺส ภนฺเต อยฺโย ขญฺชตีติ. อุโภ ขญฺชา. ขญฺชนํ, ขญฺชิตุํ, ขญฺชิตฺวา. 'खजि' (khaji) धातू गतीचे वैकल्य (लंगडणे) या अर्थात आहे. "भन्ते! आर्य का लंगडत आहेत?" (किस्स भन्ते अय्यो खञ्जति). "उभो खञ्जा" (दोघेही लंगडे आहेत). खञ्जनं (लंगडणे), खञ्जितुं (लंगडण्यासाठी), खञ्जित्वा (लंगडून). ขช กมฺปเน. ขชติ. เอชา. เอตฺถ จ เอชาติ ลาภาทึ ปฏิจฺจ เอชติ กมฺปตีติ เอชา, พลวตณฺหาเยตํ นามํ. 'खज' (khaja) धातू कंप पावणे (कापणे) या अर्थात आहे. 'खजति'. 'एजा'. आणि येथे 'एजा' म्हणजे लाभ इत्यादींच्या कारणाने जी कंप पावते (कापते) ती 'एजा' होय, हे तीव्र तृष्णेचे नाव आहे. พุช วชิรนิพฺเพเส. วชิรนิคฺโฆเสติ เกจิ วิทู วทนฺติ. โพชติ. 'बुज' (buja) धातू वज्राचा उपभोग घेणे (वज्रनिर्वेष) या अर्थात आहे. काही विद्वान 'वज्रनिर्घोष' (वज्राचा आवाज) असा अर्थ सांगतात. 'बोजति'. ขิช [Pg.44] กุชิ คุชิ อพฺยตฺตสทฺเท. ขิชติ. กุญฺชติ. คุญฺชติ. 'खिज' (khija), 'कुजि' (kuji) आणि 'गुजि' (guji) हे धातू अस्पष्ट आवाज (अव्यक्त शब्द) या अर्थात आहेत. 'खिजति', 'कुञ्जति', 'गुञ्जति'. ลช ลาช ตชฺช ภสฺสเน. ลชติ. ลาชติ. ตชฺชติ. 'लज' (laja), 'लाज' (lāja) आणि 'तज्ज' (tajja) धातू निंदा करणे (भर्त्सना) या अर्थात आहेत. 'लजति', 'लाजति', 'तज्जति'. ลชิ ทิตฺติยญฺจ. ภสฺสนาเปกฺโข จกาโร. ลญฺชติ. ตติโย นยลญฺชโก. ลญฺเชติ ปกาเสติ สุตฺตตฺถนฺติ ลญฺชโก. 'लजि' (laji) धातू प्रकाशणे (दीप्ती) आणि निंदा करण्याच्या अर्थात आहे. 'च' कार हा निंदा करण्याच्या अपेक्षेने आहे. 'लञ्जति'. तिसरा प्रकार 'नयलञ्जक' आहे. जो सूत्राचा अर्थ प्रकाशित करतो (स्पष्ट करतो) तो 'लञ्जक' होय. ชช ชชิ ยุทฺเธ. ยุชฺฌนํ ยุทฺธํ. ชชติ. ชญฺชติ. 'जज' (jaja) आणि 'जजि' (jaji) धातू युद्ध करणे या अर्थात आहेत. 'युद्ध' म्हणजे युद्ध करण्याची क्रिया. 'जजति', 'जञ्जति'. ตุช หึสายํ. โตชติ. 'तुज' (tuja) धातू हिंसा करणे या अर्थात आहे. 'तोजति'. ตุชิ พลเน จ. พลนํ พลนกฺริยา. หึสาเปกฺขโก จกาโร. ตุญฺชติ. 'तुजि' (tuji) धातू बल देणे (बलन) आणि हिंसेच्या अर्थात आहे. 'बलन' म्हणजे बल देण्याची क्रिया. 'च' कार हा हिंसेच्या अपेक्षेने आहे. 'तुञ्जति'. คช กุชิ มุชิ คชฺช สทฺทตฺถา. คชติ. กุญฺชติ. มุญฺชติ. คโช คชฺชติ, เมโฆ คชฺชติ. ยตฺถ ทาโส อามชาโต, ฐิโต ถุลฺลานิ คชฺชติ. มณิ คชฺชติ. ญาณคชฺชนํ คชฺชติ. คชฺชิตุํ สมตฺโถ. คชฺชิตา. คชฺชิตฺวา. ตตฺถ คโชติ หตฺถี. หตฺถิสฺส หิ อเนกานิ นามานิ – 'गज' (gaja), 'कुजि' (kuji), 'मुजि' (muji) आणि 'गज्ज' (gajja) हे धातू आवाज करणे (शब्द) या अर्थात आहेत. 'गजति', 'कुञ्जति', 'मुञ्जति'. 'गजो गज्जति' (हत्ती गर्जना करतो), 'मेघो गज्जति' (मेघ गर्जना करतो). "जिथे घरात जन्मलेला दास उभा राहून मोठ्या बाता मारतो (गर्जना करतो)." 'मणी गर्जना करतो'. 'ज्ञानाची गर्जना करतो'. गर्जना करण्यास समर्थ, गर्जना करणारा, गर्जना करून. त्यामध्ये 'गजो' म्हणजे हत्ती. कारण हत्तीची अनेक नावे आहेत – หตฺถี นาโค คโช ทนฺตี, กุญฺชโร วารโณ กรี; มาตงฺโค ทฺวิรโท สฏฺฐิ-หายโน’เนกโป อิโภ. "हत्ती, नाग, गज, दंती, कुंजर, वारण, करी, मातंग, द्विरद, षष्टिहायन (साठ वर्षांचा), अनेकप आणि इभ." ถมฺโภ รมฺโม ทฺวิโป เจว, หตฺถินี ตุ กเรณุกา; หตฺถิโปโต หตฺถิจฺฉาโป, ภิงฺโก จ กลโภ ภเว. थम्भो (खांब), रम्मो (रमणीय), द्विपो (हत्ती) तसेच हत्तिनी म्हणजे करेणुका; हत्तीचे पिल्लू म्हणजे हत्थिपोतो, हत्थिच्छापो, भिङ्को आणि कलभो होय. จช จาเค. จชติ. ปริจฺจชติ. จาโค. ปริจฺจาโค. จชนํ. จชํ, จชนฺโต. จชมาโน. ‘चज’ (caja) धातू त्याग करण्याच्या अर्थात आहे. तो त्याग करतो (cajati). तो पूर्णपणे त्याग करतो (pariccajati). त्याग (cāgo). पूर्ण त्याग (pariccāgo). त्याग करणे (cajanaṃ). त्याग करणारा (cajaṃ, cajanto, cajamāno). สนฺช สงฺเค. สงฺโค ลคนํ. สญฺจติ. สตฺโต. สชนํ, สตฺติ. อาสตฺติ. สชิตุํ. สชิตฺวา. ‘सञ्ज’ (sañja) धातू आसक्ती किंवा चिकटून राहण्याच्या अर्थात आहे. ‘सङ्ग’ म्हणजे चिकटणे (laganaṃ). तो आसक्त होतो (sañcati). आसक्त झालेला प्राणी (satto). आसक्ती (sajanaṃ, satti). तीव्र आसक्ती (āsatti). आसक्त होण्यासाठी (sajituṃ). आसक्त होऊन (sajitvā). อีช คติยํ. อีชติ. ‘ईज’ (īja) धातू गतीच्या (जाण्याच्या) अर्थात आहे. तो जातो किंवा गतिमान होतो (ījati). ภชิ ภชฺชเน. ภชฺชนํ ตาปกรณํ. ติลานิ ภชฺชติ. ปุริเสน ภชฺชมานานิ ติลานิ. ‘भज’ (bhaji) धातू भाजण्याच्या अर्थात आहे. भाजणे म्हणजे उष्णता देणे (tāpakaraṇaṃ). तो तीळ भाजतो (tilāni bhajjati). माणसाद्वारे भाजले जाणारे तीळ (purisena bhajjamānāni tilāni). เอช [Pg.45] เภช ภาช ทิตฺติยํ. ทิตฺติ โสภา. เอชติ. เภชติ. ภาชติ. ‘एज’ (eja), ‘भेज’ (bheja) आणि ‘भाज’ (bhāja) हे धातू चमकण्याच्या (दीप्ती) अर्थात आहेत. दीप्ती म्हणजे शोभा किंवा सौंदर्य (ditti sobhā). तो चमकतो (ejati, bhejati, bhājati). ติช นิสาเน, ขมายญฺจ. นิสานํ ติกฺขตากรณํ. ขมา ขนฺติ. เตชติ. ติติกฺขติ. เตชโน. เตโช. ตตฺถ เตชโนติ กณฺโฑ สโร อุสุ. เตโชติ สูริโย. อถ วา เตโชติ เตชนํ อุสฺมา อุณฺหตฺตํ ตาโป. เตโชติ วา อานุภาโว ปภาโว. ‘तिज’ (tija) धातू तीक्ष्ण करणे (nisāna) आणि क्षमा (khamā) या अर्थात आहे. तीक्ष्ण करणे म्हणजे धार लावणे (tikkhatākaraṇaṃ). क्षमा म्हणजे शांती किंवा सहनशीलता (khanti). तो तीक्ष्ण करतो (tejati). तो सहन करतो (titikkhati). बाण (tejano). तेज (tejo). तेथे ‘तेजन’ म्हणजे बाण किंवा तीर (kaṇḍo saro usu). ‘तेज’ म्हणजे सूर्य (sūriyo). किंवा ‘तेज’ म्हणजे उष्णता, गरमपणा किंवा ताप (usmā uṇhattaṃ tāpo). किंवा ‘तेज’ म्हणजे प्रभाव किंवा सामर्थ्य (ānubhāvo pabhāvo). สญฺช ปริสฺสคฺเค, อาลิงฺคนํ ปริสฺสคฺโค. สญฺชติ. ‘सञ्ज’ (sañja) धातू आलिंगन देण्याच्या (parissagga) अर्थात आहे. आलिंगन देणे म्हणजे मिठी मारणे (āliṅganaṃ parissaggo). तो आलिंगन देतो (sañjati). ขชิ ทาเน, คติยญฺจ. ขญฺชติ. ขญฺชนํ. ‘खज’ (khaji) धातू दान देणे आणि गती (जाणे) या अर्थात आहे. तो लंगडतो किंवा जातो (khañjati). लंगडणे किंवा गती (khañjanaṃ). ราช ทิตฺติยํ ภาช จ. ราชติ. ภาชติ. ราชา. ราชินี. วนราชิ. ราชิตฺวา. วิราชิตฺวา. อตฺร วิญฺญูนมตฺถวิวรเณ โกสลฺลชนนตฺถํ สิโลกํ รจยาม – ‘राज’ (rāja) आणि ‘भाज’ (bhāja) हे धातू चमकण्याच्या (दीप्ती) अर्थात आहेत. तो चमकतो (rājati, bhājati). राजा (rājā). राणी (rājinī). वनराजी (vanarāji). चमकून (rājitvā). विशेष रूपाने चमकून (virājitvā). येथे विद्वानांच्या अर्थ-स्पष्टीकरणासाठी आणि कौशल्य वाढवण्यासाठी आम्ही एक श्लोक रचत आहोत – ม’หา’ราช มหาราช, มหาราช มเมว’หิ; เน’ตสฺส อิติ วตฺวาน, ทฺเว ชนา กลหํ กรุํ. “हे महाराजा! हा माझा साप आहे, हा साप माझाच आहे, याचा नाही,” असे बोलून दोन माणसांनी भांडण केले. เอตฺถ จ ปฐมปาทสฺส ทุติยปเท ‘‘เม อหิ มหี’’ติ เฉโท ‘‘ปุตฺตา เม อตฺถิ ปุตฺตา มตฺถี’’ติ วิย. ‘‘มหิ อราช มหาราชา’’ติ จ เฉโท ‘‘โยปิ อยํ โยปาย’’นฺติ วิย. เอตฺถ อราชสทฺโท ‘‘อติกรมกราจริยา’’ติ เอตฺถ อกรีติ อตฺถวาจโก อกรสทฺโท วิย อาขฺยาตปโรกฺขาวิภตฺติโก ทฏฺฐพฺโพ. อราช วิโรจีติ อตฺโถ. อยํ ปน คาถาย ปิณฺฑตฺโถ ‘‘มหาราช เม อหิ อราช, มม เอว อหิ อราช, น เอตสฺส อิติ วตฺวา ทฺเว อหิตุณฺฑิกชนา กลหํ กรึสู’’ติ. आणि येथे पहिल्या चरणाच्या दुसऱ्या पदात “मे अहि मही” (me ahi mahī) असा संधिच्छेद होतो, जसे “पुत्ता मे अत्थि” चे “पुत्ता मत्थि” होते. आणि “महि अराज महाराज” (mahi arāja mahārājā) असा संधिच्छेद होतो, जसे “यो पि अयं” चे “योपायं” होते. येथे ‘अराज’ (arāja) हा शब्द “अतिकरमकर्राचरिया” मधील ‘अकरी’ या अर्थाचा वाचक असलेल्या ‘अकर’ शब्दाप्रमाणे आख्यात परोक्ष विभक्तीचा समजावा. ‘अराज’ म्हणजे चमकला किंवा शोभला (virocī) असा अर्थ आहे. या गाथेचा एकत्रित अर्थ असा आहे: “हे महाराजा, माझा साप शोभला (किंवा खेळला), माझाच साप शोभला, याचा नाही, असे म्हणून दोन गारुड्यांनी भांडण केले.” รนฺช ราเค. ภิกฺขุ จีวรํ รชติ. สตฺโต รูปาทีสุ รญฺชติ. รชนํ. รชโก. ราโค. วิราโค. หลิทฺทิราโค. ราชา. ราชินี. อิมสฺส จ ทิวาทิคณํ ปตฺตสฺส ‘‘รชฺชติ วิรชฺชตี’’ติ รูปานิ [Pg.46] ภวนฺติ. ตตฺถ รชนนฺติ รชนวตฺถุ. รชโกติ รชกาโร วตฺถโธวนโก. ราโคติ รชฺชนฺติ สตฺตา เตน, สยํ วา รญฺชติ, รญฺชนมตฺตเมว วา เอตนฺติ ราโค, ตณฺหา. อิมานิ ปน ตทภิธานานิ – ‘रञ्ज’ (ranja) धातू रंगाच्या किंवा आसक्तीच्या (राग) अर्थात आहे. भिक्खू चीवर रंगवतो (bhikkhu cīvaraṃ rajati). प्राणी रूप इत्यादींमध्ये आसक्त होतो (satto rūpādīsu rañjati). रंगवणे किंवा रंग (rajanaṃ). धोबी (rajako). राग किंवा आसक्ती (rāgo). विराग किंवा अनासक्ती (virāgo). हळदीचा रंग (haliddirāgo). राजा (rājā). राणी (rājinī). आणि या धातूला दिवादिगणात समाविष्ट केल्यावर “रज्जति, विरज्जति” अशी रूपे बनतात. तेथे ‘रजन’ म्हणजे रंगवण्याचे साधन (rajanavatthu). ‘रजक’ म्हणजे धोबी, कपडे धुणारा (rajakāro vatthadhovanako). ‘राग’ म्हणजे ज्याच्याद्वारे प्राणी आसक्त होतात, किंवा स्वतः आसक्त होतो, या केवळ आसक्त होणे म्हणजे ‘राग’ म्हणजेच तृष्णा (taṇhā) होय. आता त्याची समानार्थी नावे खालीलप्रमाणे आहेत – ราโค โลโภ ตสิณา จ, ตณฺหา เอชา วิสตฺติกา; สตฺติ อาสตฺติ มุจฺฉา จ, ลุพฺภิตตฺตญฺจ ลุพฺภนา. राग (आसक्ती), लोभ, तसिणा (तहान), तृष्णा, एजा (कंप किंवा चंचलता), विसत्तिका (विषारी आसक्ती), सत्ति (आसक्ती), आसत्ति, मुच्छा (मोह), लुब्भितत्त (लोभीपणा) आणि लुब्भना (लोभ). กาโม นิกามนา อิจฺฉา, นิกนฺติ จ นิยนฺติ จ; วนญฺจ วนโถ เจว, อเปกฺขา ภวเนตฺติ จ. काम (इच्छा), निकामना, इच्छा, निकन्ति, नियन्ति, वन (जंगल किंवा आसक्ती), वनथ (आसक्तीचे जंगल), अपेक्षा आणि भवनेत्ति (भव-तृष्णा). อนุโรโธ จ สาราโค, สงฺโค ปงฺโก จ สิพฺพินี; นนฺทีราโค อนุนโย, เคโธ สญฺชนนี ตถา; ชนิกา ปณิธิ เจว, อชฺโฌสานนฺติเนกธา. अनुरोध, साराग, सङ्ग (आसक्ती), पङ्क (चिखल), सिब्बिनी (शिवण किंवा तृष्णा), नन्दीराग (आनंदयुक्त आसक्ती), अनुनय, गेध (लोभ), तसेच सञ्जननी (उत्पन्न करणारी), जनिका (माता किंवा तृष्णा), पणिधि (प्रणिधान किंवा इच्छा) आणि अज्झोसान (अति-आसक्ती) अशा अनेक प्रकारे (तृष्णेचे वर्णन केले आहे). วิราโคติ มคฺโค นิพฺพานญฺจ. ราชาติ ปถวิสฺสโร. เอตฺถ ธาตุทฺวยวเสน นิพฺพจนานิ นิยฺยนฺเต. นานาสมฺปตฺตีหิ ราชติ ทิพฺพติ วิโรจตีติ ราชา. ทานญฺจ ปิยวจนญฺจ อตฺถจริยา จ สมานตฺตตา จาติ อิเมหิ จตูหิ สงฺคหวตฺถูหิ อตฺตนิ มหาชนํ รญฺเชตีติปิ ราชา. ราชินีติ ราชภริยา. เตสํ อภิธานานิ วุจฺจนฺเต สหาภิธานนฺตเรหิ – ‘विराग’ म्हणजे मार्ग (अष्टांगिक मार्ग) आणि निर्वाण (nibbāna). ‘राजा’ म्हणजे पृथ्वीचा स्वामी (pathavissaro). येथे दोन धातूंच्या आधारे व्युत्पत्ती सांगितली जाते. विविध संपत्तींनी जो चमकतो, क्रीडा करतो किंवा शोभतो तो ‘राजा’ (rājā). तसेच दान, प्रियवचन, अर्थचर्या आणि समानार्थता या चार संग्रहवस्तूंनी (saṅgahavatthu) जो लोकांचे मन स्वतःकडे आकर्षित करतो (रंगवतो), तो देखील ‘राजा’ होय. ‘राजिनी’ म्हणजे राजाची पत्नी. त्यांची इतर समानार्थी नावे खालीलप्रमाणे सांगितली जातात – ราชา ภูปติ เทโว จ, มนุชินฺโท ทิสมฺปติ; ปตฺถิโว ชคติปาโล, ภูภุโช ปถวิสฺสโร. राजा, भूपति, देव, मनुजिन्द (मनुष्येंद्र), दिसम्पति (दिशांचा पती), पत्थिव (पार्थिव), जगतिपाल, भूभुज आणि पथविस्सर (पृथ्वीचा ईश्वर). รฏฺฐาธิโป ภูมิปาโล, มนุสฺสินฺโท ชนาธิโป; นรินฺโท ขตฺติโย เจว, เขตฺตสฺสามิ ปภาวโก. रट्ठाधिप (राष्ट्राधिपती), भूमिपाल, मनुस्सिन्द (मनुष्येंद्र), जनाधिप, नरिन्द (नरेंद्र), खत्तिय (क्षत्रिय), खेत्तसामी (शेताचा किंवा भूमीचा स्वामी) आणि प्रभावक. มุทฺธาภิสิตฺโต ราชาติ, กถิโต อิตโร ปน; ราชญฺโญ ขตฺติโย จาติ, วุตฺโต ขตฺติยชาติโก. ज्याचा मस्तकाभिषेक झाला आहे त्याला ‘राजा’ म्हटले जाते, तर इतरांना ‘राजञ्ञ’ (राजन्य) किंवा ‘खत्तिय’ (क्षत्रिय) म्हटले जाते, जे क्षत्रिय जातीचे असतात. มุทฺธาภิสิตฺโต อนุราชา, อุปราชาติ ภาสิโต; จตุทฺทีปี ราชราชา, จกฺกวตฺตีติ ภาสิโต. मस्तकाभिषेक झालेल्या राजाच्या हाताखालील राजाला ‘अनुराजा’ किंवा ‘उपराजा’ म्हटले जाते. चारही द्वीपांवर राज्य करणाऱ्या राजाधिराजाला ‘चक्कवत्ती’ (चक्रवर्ती) म्हटले जाते. ราชินี [Pg.47] อุปรี เทวี, มเหสี ภูภุชงฺคนา; ขตฺติยา ราชปทุมี, ขตฺติยานี จ ขตฺติยี; อิตฺถาคารนฺตุ โอโรโธ, อุปรีติปิ วุจฺจติ. राजिनी (राणी), उपरी, देवी, महेसी (मुख्य राणी), भूभुजङ्गना (राजाची पत्नी), खत्तिया, राजपदुमी, खत्तियानी आणि खत्तियी; अंतःपुराला ‘ओरोध’ (अवरोध) किंवा ‘उपरी’ असेही म्हटले जाते. ภช เสวายํ. ภชติ. ภชนา. สมฺภชนา. ภตฺติ. สมฺภตฺติ. ภตฺตา. ‘भज’ (bhaja) धातू सेवा करण्याच्या अर्थात आहे. तो सेवा करतो (bhajati). सेवा किंवा भजन (bhajanā). चांगली सेवा (sambhajanā). भक्ती (bhatti). दृढ भक्ती (sambhatti). भक्त किंवा पती (bhattā). ยช เทวปูชสงฺคตกรณทานธมฺเมสุ. เทวปูชคฺคหเณน พุทฺธาทิปูชา คหิตา. สงฺคตกรณํ สโมธานกรณํ. ตถา หิ อธิมุตฺตตฺเถรวตฺถุมฺหิ ‘‘ยทตฺถิ สงฺคตํ กิญฺจิ, ภโว วา ยตฺถ ลพฺภตี’’ติ คาถายํ สงฺคตสทฺเทน สโมธานํ วุตฺตํ. ทานํ ปริจฺจาโค. ธมฺโม ฌานสีลาทิ. เอเตสฺวตฺเถสุ ยชธาตุ วตฺตติ. ปุปฺเผหิ พุทฺธํ ยชติ. เทวตํ ยชติ. เทวมนุสฺเสหิ ภควา ยชิยติ. อิชฺชติ. ยิฏฺฐํ. ยญฺโญ. ยาโค. ธมฺมยาโค. ยชมาโน สเก ปุเร. ยิฏฺฐุํ, ยชิตุํ. ปุถุยญฺญํ ยชิตฺวาน. โสฬสปริกฺขารํ มหายญฺญํ กตฺตุกาโม. ‘यज’ (yaja) धातू देवपूजा, संगतीकरण (एकत्र करणे), दान आणि धर्म या अर्थांमध्ये वापरला जातो. ‘देवपूजा’ या शब्दाने बुद्ध इत्यादींची पूजा अभिप्रेत आहे. ‘संगतीकरण’ म्हणजे एकत्र करणे (samodhānakaraṇaṃ). जसे की, अधिमूत्त थेर यांच्या कथेत “यदत्थि सङ्गतं kiñci, भवो वा यत्थ लब्भति” या गाथेत ‘सङ्गत’ शब्दाने एकत्र येणे (samodhāna) सांगितले आहे. ‘दान’ म्हणजे त्याग (pariccāgo). ‘धर्म’ म्हणजे ध्यान, शील इत्यादी. या अर्थांमध्ये ‘यज’ धातू चालतो. तो फुलांनी बुद्धांची पूजा करतो (pupphehi buddhaṃ yajati). तो देवतेची पूजा करतो (devataṃ yajati). देव आणि मनुष्यांद्वारे भगवंतांची पूजा केली जाते (devamanussehi bhagavā yajiyati). पूजा केली जाते (ijjati). पूजलेले (yiṭṭhaṃ). यज्ञ (yañño). याग (yāgo). धम्मयाग (dhammayāgo). आपल्या नगरात यज्ञ करणारा (yajamāno sake pure). यज्ञ करण्यासाठी (yiṭṭhuṃ, yajituṃ). मोठा यज्ञ करून (puthuyaññaṃ yajitvāna). सोळा प्रकारच्या साहित्यांनी युक्त महायज्ञ करण्याची इच्छा असणारा (soḷasaparikkhāraṃ mahāyaññaṃ kattukāmo). มชฺช สํสุทฺธิยํ. มชฺชติ. พาหิรํ ปริมชฺชติ. ภูมึ สมฺมชฺชติ. มชฺชนํ. สมฺมชฺชนี. ‘मज्ज’ (majja) धातू शुद्धीकरणाच्या अर्थात आहे. तो स्वच्छ करतो (majjati). तो बाहेरील भाग स्वच्छ करतो (bāhiraṃ parimajjati). तो जमीन झाडतो किंवा स्वच्छ करतो (bhūmiṃ sammajjati). स्वच्छ करणे (majjanaṃ). झाडू (sammajjanī). นิญฺชิ สุทฺธิยํ. นิญฺชติ. ปนิญฺชติ. นิญฺชิตุํ. ปนิญฺชิตุํ. นิญฺชิตฺวา. ปนิญฺชิตฺวา. อยํ ปน ปาฬิ ‘‘ตโต ตฺวํ โมคฺคลฺลาน อุฏฺฐายาสนา อุทเกน อกฺขีนิ ปนิญฺชิตฺวา ทิสา อนุโลเกยฺยาสี’’ติ. ‘निञ्ज’ (niñji) धातू शुद्धीच्या अर्थात आहे. तो धुतो (niñjati). तो चांगल्या प्रकारे धुतो (paniñjati). धुण्यासाठी (niñjituṃ). चांगल्या प्रकारे धुण्यासाठी (paniñjituṃ). धुवून (niñjitvā). चांगल्या प्रकारे धुवून (paniñjitvā). ही पाळी (वचन) अशी आहे: “त्यानंतर तू, हे मोग्गल्लान, आसनावरून उठून पाण्याने डोळे धुवून दिशांचे अवलोकन करावेस.” นิชิ อพฺยตฺตสทฺเท. นิญฺชติ. ‘निज’ (niji) धातू अस्पष्ट आवाजाच्या अर्थात आहे. तो अस्पष्ट आवाज करतो (niñjati). ภช ปาเก. ติลานิ ภชฺชติ. ภชฺชมานา ติลานิ จ. ‘भज’ (bhaja) धातू शिजवण्याच्या (किंवा भाजण्याच्या) अर्थात आहे. तो तीळ भाजतो (tilāni bhajjati). आणि भाजले जाणारे तीळ (bhajjamānā tilāni ca). อุชุ อชฺชเว. อชฺชวํ อุชุภาโว. โอชติ. อุชุ. ‘उजु’ (uju) धातू सरळपणाच्या (आर्जव) अर्थात आहे. आर्जव म्हणजे सरळपणा (ujubhāvo). तो सरळ होतो किंवा तेजस्वी होतो (ojati). सरळ (uju). สช [Pg.48] วิสฺสคฺคปริสฺสชฺชนพฺภุกฺกิรเณสุ. สชติ. โลกฺยํ สชนฺตํ อุทกํ. ‘सज’ (saja) धातू सोडणे (vissagga), आलिंगन देणे (parissajjana) आणि शिंपडणे (abbhukkiraṇa) या अर्थांमध्ये आहे. तो सोडतो किंवा शिंपडतो (sajati). जगामध्ये शिंपडले जाणारे पाणी (lokyaṃ sajantaṃ udakaṃ). รุช ภงฺเค. รุชติ. รุชา. โรโค. เอตฺถ รุชาติ พฺยาธิ รุชนฏฺเฐน. โรโคติ รุชติ ภญฺชติ องฺคปจฺจงฺคานีติ โรโค, พฺยาธิเยว, โย ‘‘อาตงฺโก’’ติปิ ‘‘อาพาโธ’’ติปิ วุจฺจติ. ‘रुज’ (ruja) धातू नष्ट होण्याच्या किंवा मोडण्याच्या (भंग) अर्थात आहे. तो वेदना देतो किंवा नष्ट करतो (rujati). वेदना किंवा रुजा (rujā). रोग (rogo). येथे ‘रुजा’ म्हणजे वेदना देण्याच्या अर्थाने व्याधी (byādhi). ‘रोग’ म्हणजे जो शरीराचे अवयव नष्ट करतो किंवा मोडतो तो रोग, म्हणजेच व्याधी होय, ज्याला ‘आतङ्क’ (ātaṅko) किंवा ‘आबाध’ (ābādho) असेही म्हटले जाते. ภุช โกฏิลฺเล. อาวิปุพฺโพ อญฺญตฺเถสุ จ. อุรโค ภุชติ. อาภุชติ. ภิกฺขุ ปลฺลงฺกํ อาภุชติ, อูรุพทฺธาสนํ พนฺธตีติ อตฺโถ. มหาสมุทฺโท อาภุชติ, อาวฏฺฏตีติ อตฺโถ. เกจิ ปน ‘‘โอสกฺกตี’’ติ อตฺถํ วทนฺติ. ‘‘วณฺณทาน’’นฺติ อาภุชติ, มนสิ กโรตีติ อตฺโถ. มูลานิ วิภุชตีติ มูลวิภุโช, รโถ. เอตฺถ จ วิภุชตีติ ฉินฺทติ. โภโค. โภคี. อาโภโค. อาภุชิตฺวา. เอตฺถ จ โภโคติ ภุชยติ กุฏิลํ กริยตีติ โภโค, อหิสรีรํ. โภคีติ สปฺโป. 'भुज' (bhuja) हा धातू 'कुटिलता' (वाकडेपणा) या अर्थात आहे. 'आ' उपसर्ग लागून इतर अर्थांमध्येही होतो. 'उरगो भुजति' (सर्प वाकडा चालतो). 'आभुजति'. 'भिक्खु पल्लङ्कं आभुजति' (भिक्खू मांडी घालतात), याचा अर्थ 'ऊरुबद्धासन' (पद्मासन) घालतात असा आहे. 'महासमुद्दो आभुजति' (महासमुद्र फिरतो/आवर्त होतो), असा अर्थ आहे. काही लोक तर 'ओसक्कति' (मागे सरकणे) असा अर्थ सांगतात. 'वण्णदानं' (वर्णदान) या अर्थी 'आभुजति' म्हणजे 'मनसि करोति' (मनात आणणे/विचार करणे) असा अर्थ आहे. 'मूलाणि विभुजति' (मुळांना छेदतो) म्हणून 'मूलविभुज' म्हणजे रथ. येथे 'विभुजति' म्हणजे छेदणे/कापणे. 'भोगो' (भोग), 'भोगी' (भोगी), 'आभोगो' (आभोग), 'आभुजित्वा' (आभुजित्वा - वाकवून/मांडी घालून). येथे 'भोग' म्हणजे 'भुजयति कुटिलं करियति' (वाकडे केले जाते) म्हणून 'भोग' म्हणजे सर्पाचे शरीर. 'भोगी' म्हणजे सर्प. รชิ วิชฺฌเน. นาโค ทนฺเตหิ ภูมึ รญฺชติ. อารญฺชติ. เอตฺถ จ ‘‘ตถาคตรญฺชิตํ อิติปี’’ติ เนตฺติปาฬิ นิทสฺสนํ. ตสฺสตฺโถ ‘‘อิทํ สิกฺขตฺตยสงฺคหิตํ สาสนพฺรหฺมจริยํ ตถาคตคนฺธหตฺถิโน มหาวชิรญาณสพฺพญฺญุตญฺญาณทนฺเตหิ รญฺชิตํ อารญฺชิตํ, เตภูมกธมฺมานํ อารญฺชนฏฺฐานนฺติปิ วุจฺจตี’’ติ. รญฺชิตนฺติ หิ รญฺชติ วิชฺฌติ เอตฺถาติ รุญฺชิตํ, รญฺชนฏฺฐานํ. ‘‘อิทํ เนสํ ปทกฺกนฺต’’นฺติอาทิมฺหิ วิย เอตสฺส สทฺทสฺส สิทฺธิ เวทิตพฺพา อธิกรณตฺถสมฺภวโต. 'रजि' (raji) हा धातू 'विद्ध करणे' (टोचणे/भेदणे) या अर्थात आहे. 'नागो दन्तेहि भूमिं रञ्जति' (हत्ती दातांनी जमीन विद्ध करतो/खणतो). 'आरञ्जति'. येथे 'तथागतरञ्जितं इतिपि' (तथागतांद्वारे विद्ध केलेले/अंकित केलेले) हे नेत्तिपाळीचे उदाहरण आहे. त्याचा अर्थ असा आहे: 'हे त्रिशिक्षांनी (शील, समाधी, प्रज्ञा) संग्रहित केलेले शासन-ब्रह्मचर्य, तथागतरूपी गंधहत्तीच्या महावज्रज्ञान आणि सर्वज्ञताज्ञानरूपी दातांनी विद्ध (अंकित) केलेले आहे, म्हणून याला तेभूमिक (तीन भूमींमधील) धर्मांचे आरंजनस्थान (विद्ध करण्याचे स्थान) असेही म्हटले जाते.' 'रञ्जित' म्हणजे ज्यामध्ये विद्ध केले जाते ते 'रुञ्जित' किंवा 'रंजनस्थान' (विद्ध करण्याचे स्थान) होय. 'इदं नेसं पदक्कन्तं' (हे त्यांचे पाऊल उमटले आहे) इत्यादी उदाहरणांप्रमाणे या शब्दाची सिद्धी अधिकरण अर्थाच्या संभवामुळे जाणावी. วิชี ภยจลเนสุ. อีการนฺโตยํ ธาตุ, เตนสฺส สนิคฺคหีตาคมานิ รูปานิ น สนฺติ. เวชติ. เวโค. ธมฺมสํเวโค. สํวิโค เวเคน ปลายิ. นทีเวโค. อูมิเวโค[Pg.49], วาตเวโค. เอตฺถ ธมฺมสํเวโคติ สโหตฺตปฺปํ ญาณํ. ‘‘เวโค, ชโว, รโย’’ติ อิเม เอกตฺถา. ทิวาทิคณํ ปน ปตฺตสฺส ‘‘วิชฺชติ สํวิชฺชติ อุพฺพิชฺชตี’’ติ รูปานิ ภวนฺติ ทฺวิคณิกตฺตา. 'विजी' (vijī) हा धातू 'भय' (भीती) आणि 'चलन' (कंपन/वेग) या अर्थांमध्ये आहे. हा ई-कारान्त धातू आहे, त्यामुळे याची अनुस्वार-आगम असलेली रूपे होत नाहीत. 'वेवति' (किंवा वेजति - थरथरणे/घाबरणे), 'वेगो' (वेग), 'धम्मसंवेगो' (धर्मसंवेग). 'संविगो वेगेन पलायि' (संविग्न होऊन वेगाने पळाला). ' नदीवेगो' (नदीचा वेग), 'ऊमिवेगो' (लाटांचा वेग), 'वातवेगो' (वाऱ्याचा वेग). येथे 'धम्मसंवेग' म्हणजे ओत्तप्प (पापाची भीती) युक्त ज्ञान होय. 'वेगो', 'जवो', 'रयो' हे एकाच अर्थाचे शब्द आहेत. दिवादिगणात गेल्यावर द्विगणिकत्वामुळे 'विज्जति', 'संविज्जति', 'उब्विज्जति' अशी रूपे होतात. ลชฺช ลชฺชเน. ลชฺชติ. ลชฺชา. ลชฺชาติ หิรี. ยา ‘‘วิริฬนา’’ติปิ วุจฺจติ. 'लज्ज' (lajja) हा धातू 'लज्जा वाटणे' (लाजणे) या अर्थात आहे. 'लज्जति' (लाजतो/लाजते). 'लज्जा' (लाज). 'लज्जा' म्हणजे 'हिरी' (पापाची लाज), जिला 'विरिळना' (संकोच/लाज) असेही म्हटले जाते. วฬชิ ปริโภเค. วฬญฺชติ. 'वळजि' (vaḷaji) हा धातू 'परिभोग' (वापरणे/उपभोग घेणे) या अर्थात आहे. 'वळञ्जति' (वापरतो/उपभोग घेतो). กุชฺช อโธมุขีกรเณ. กุชฺชติ. นิกุชฺชติ. อุกฺกุชฺชติ. ปฏิกุชฺชติ. นิกุชฺชิตํ วา อุกฺกุชฺเชยฺย. อญฺญิสฺสา ปาติยา ปฏิกุชฺชติ. อวกุชฺโช นิปชฺชหํ. ตตฺถ กุชฺชติ นิกุชฺชตีติ อิมานิ ‘‘จรติ วิจรตี’’ติ ปทานิ วิย สมานตฺถานิ, อโธมุขํ กโรตีติ หิ อตฺโถ. อุกฺกุชฺชตีติ อุปริมุขํ กโรติ. ปฏิกุชฺชตีติ มุเข มุขํ ฐเปติ. 'कुज्ज' (kujja) हा धातू 'अधोमुख करणे' (पालथे घालणे/खाली तोंड करणे) या अर्थात आहे. 'कुज्जति', 'निकुज्जति', 'उक्कुज्जति', 'पटिकुज्जति'. 'निकुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य' (पालथे घातलेले उताणे करावे). 'अञ्ञिस्सा पातिया पटिकुज्जति' (दुसऱ्या पात्रावर पालथे घालतो). 'अवकुज्जो निपज्जहं' (पालथा निजलेला). तेथे 'कुज्जति' आणि 'निकुज्जति' ही पदे 'चरति' आणि 'विचरति' या पदांप्रमाणे समान अर्थाची आहेत, कारण 'अधोमुख करणे' (पालथे घालणे) हाच त्यांचा अर्थ आहे. 'उक्कुज्जति' म्हणजे वर तोंड करणे (उताणे करणे). 'पटिकुज्जति' म्हणजे तोंडावर तोंड ठेवणे (झाकणे). มุชฺช โอสีทเน. มุชฺชติ. นิมุชฺชติ. นิมุคฺโค. อุมฺมุคฺโค. 'मुज्ज' (mujja) हा धातू 'ओसीदन' (बुडणे/खाली जाणे) या अर्थात आहे. 'मुज्जति' (बुडतो). 'निमुज्जति' (डुबकी मारतो). 'निमुग्गो' (बुडालेला/मग्न). 'उम्मुग्गो' (वर आलेला). โอปุชิ วิลิมฺปเน. โคมเยน ปถวึ โอปุญฺชติ. 'ओपुजि' (opuji) हा धातू 'विलेपन' (सारवणे/लेपणे) या अर्थात आहे. 'गोमयेन पथविं ओपुञ्जति' (शेणाने जमीन सारवतो). ชการนฺตธาตุรูปานิ. 'ज' कारान्त धातूंची रूपे समाप्त झाली. ฌการนฺตธาตุ 'झ' कारान्त धातू. เฌ จินฺตายํ. ฌายติ, นิชฺฌายติ, อุปนิชฺฌายติ, อุชฺฌายติ, สชฺฌายติ. ฌานํ, นิชฺฌานํ, อุปนิชฺฌานํ, อุชฺฌายนํ, สชฺฌายนํ. นิชฺฌตฺติ. อุปชฺฌา, อุปชฺฌาโย. ฌายี, อชฺฌายโก. 'झे' (jhe) हा धातू 'चिंता' (चिंतन/ध्यान करणे) या अर्थात आहे. 'झायति' (ध्यान करतो), 'निज्झायति' (निरीक्षण करतो/चिंतन करतो), 'उपनिज्झायति' (जवळून चिंतन करतो), 'उज्झायति' (दोष शोधतो/नाराजी व्यक्त करतो), 'सज्झायति' (सज्झाय करतो/पाठ करतो). 'झानं' (ध्यान), 'निज्झानं' (चिंतन/निश्चय), 'उपनिज्झानं' (जवळून चिंतन), 'उज्झायनं' (दोष शोधणे/नाराजी), 'सज्झायनं' (सज्झाय/सराव). 'निज्झत्ति' (समजूत/निश्चय). 'उपज्झा' (उपाध्याय), 'उपज्झायो' (उपाध्याय). 'झायी' (ध्यानी), 'अज्झायको' (अध्यायक/वेदाभ्यासी). ตตฺถ ฌายนนฺติ ทุวิธํ ฌายนํ โสภนมโสภนญฺจ. เตสุ โสภนํ ‘‘ฌายี ตปติ พฺราหฺมโณ. ฌายามิ [Pg.50] อกุโตภโย’’ติอาทีสุ ทฏฺฐพฺพํ. อโสภนํ ปน ‘‘ตตฺถ ตตฺถ ฌายนฺโต นิสีทิ. อโธมุโข ปชฺฌายนฺโต นิสีที’’ติอาทีสุ ทฏฺฐพฺพํ. ฌายีติ อารมฺมณูปนิชฺฌาเนน วา ลกฺขณูปนิชฺฌาเนน วา ฌายนสีโล จินฺตนสีโล. ฌายี ฌานวาติ อตฺโถ. อชฺฌายโกติ อิทํ ‘‘น ทานิเม ฌายนฺติ, น ทานิเม ฌายนฺตีติ โข วาเสฏฺฐ อชฺฌายกา อชฺฌายกาตฺเวว ตติยํ อกฺขรํ อุปนิพฺพตฺต’’นฺติ เอวํ ปฐมกปฺปิกกาเล ฌานวิรหิตานํ พฺราหฺมณานํ ครหวจนํ อุปฺปนฺนํ, อิทานิ ปน ตํ อชฺฌายตีติ อชฺฌายโก, มนฺเต ปริวตฺเตตีติ อิมินา อตฺเถน ปสํสาวจนํ กตฺวา โวหรนฺตีติ. อยํ ปนตฺโถ ‘‘อธิปุพฺพสฺส อิ อชฺฌยเน’’ติ ธาตุสฺส วเสน คเหตพฺโพ. เอวํ อธิปุพฺพสฺส อิธาตุสฺส วเสน อิมสฺส ธาตุสฺส อตฺถปริวตฺตนํ ภวติ. ยํ สนฺธาย ‘‘อชฺฌายโก มนฺตธโร’’ติ วุตฺตํ. तेथे 'झायन' (ध्यान/चिंतन) हे दोन प्रकारचे आहे - शोभन (चांगले) आणि अशोभन (वाईट). त्यापैकी शोभन ध्यान 'झायी तपति ब्राह्मणो' (ध्यानी ब्राह्मण तेजस्वी दिसतो), 'झायामि अकुतोभयो' (मी निर्भयपणे ध्यान करतो) इत्यादींमध्ये पाहावे. अशोभन ध्यान 'तत्थ तत्थ झायन्तो निसीदि' (तो तिथे तिथे चिंता करत बसला), 'अधोमुखो पज्झायन्तो निसीदि' (खाली तोंड करून चिंता करत बसला) इत्यादींमध्ये पाहावे. 'झायी' म्हणजे आलंबन-उपनिध्यान किंवा लक्षण-उपनिध्यानाने ध्यान करण्याचा स्वभाव असलेला, चिंतनशील. 'झायी' म्हणजे 'ध्यानवान' असा अर्थ आहे. 'अज्झायक' (अध्यायक) हा शब्द 'हे वासेठ्ठ! आता हे ध्यान करत नाहीत, आता हे ध्यान करत नाहीत, म्हणून अज्झायक (अध्यायक - ध्यान न करणारे) हे तिसरे अक्षर (नाव) उत्पन्न झाले' अशा प्रकारे प्रथम कल्पकाळातील ध्यानरहित ब्राह्मणांच्या निंदेचे वचन म्हणून उत्पन्न झाला होता; परंतु आता 'तो अध्ययन करतो म्हणून अज्झायक' किंवा 'मंत्रांचे पठण करतो' या अर्थाने प्रशंसनीय वचन मानून व्यवहार केला जातो. हा अर्थ 'अधि' उपसर्गपूर्वक 'इ' (अध्ययन करणे) या धातूच्या आधारे घेतला पाहिजे. अशा प्रकारे 'अधि' उपसर्गपूर्वक 'इ' धातूच्या प्रभावाने या धातूच्या अर्थात परिवर्तन होते. ज्याला उद्देशून 'ajjhāyako mantadharo' (अध्यायक मंत्र धारण करणारा असतो) असे म्हटले आहे. เฌ ทิตฺติยํ. ทีโป ฌายติ, ทารูนิ ฌายนฺติ. เอตฺถ ฌายตีติ ชลติ. ฌายนชลนสทฺทา หิ เอกตฺถา. 'झे' (jhe) हा धातू 'दीप्ती' (जळणे/प्रकाशणे) या अर्थात आहे. 'दीपो झायति' (दिवा जळतो), 'दारूनि झायन्ति' (लाकडे जळतात). येथे 'झायति' म्हणजे 'जलति' (जळणे). 'झायन' आणि 'जलन' हे शब्द एकाच अर्थाचे आहेत. ชชฺฌ ปริภาสนตชฺชเนสุ. ชชฺฌติ. 'जज्झ' (jajjha) हा धातू 'परिभाषण' (निंदा करणे/गालीप्रदान) आणि 'तर्जन' (धमकावणे) या अर्थांमध्ये आहे. 'जज्झति' (निंदा करतो/धमकावतो). อุชฺฌ อุสฺสคฺเค. อุสฺสคฺโค ฉฑฺฑนํ. อุชฺฌติ. อุชฺฌิตํ. 'उज्झ' (ujjha) हा धातू 'उत्सर्ग' (त्याग करणे/टाकून देणे) या अर्थात आहे. 'उत्सर्ग' म्हणजे टाकून देणे. 'उज्झति' (त्यागतो/टाकून देतो). 'उज्झितं' (त्यागलेले/टाकलेले). ฌการนฺตธาตุรูปานิ. 'झ' कारान्त धातूंची रूपे समाप्त झाली. ญการนฺตธาตุ 'ञ' कारान्त धातू. ญา อวโพธเน. ‘‘ญาติ, ญนฺติ, ญาสิ. ญาตุ, ญนฺตุ. เญยฺย, เญยฺยุ’’นฺติอาทีนิ ยถาปาวจนํ คเหตพฺพานิ. ญาติ, ญาตโก, อญฺโญ, ญตฺตํ, ญตฺติ, ปญฺญตฺติ, วิญฺญตฺติ, สญฺญตฺติ, สญฺญา, สญฺญาณํ, ปญฺญา, ปญฺญาณํ, ญาณํ, วิญฺญาณํ. 'ञा' (ñā) हा धातू 'अवबोधन' (जाणणे/ज्ञान होणे) या अर्थात आहे. 'ञाति', 'ञन्ति', 'ञासि', 'ञातु', 'ञन्तु', 'ञेय्य', 'ञेय्युं' इत्यादी रूपे बुद्धवचनानुसार ग्रहण करावीत. 'ञाति' (ज्ञाती/नातेवाईक), 'ञातको' (नातेवाईक), 'अञ्ञो' (अज्ञ/दुसरा), 'ञत्तं' (ज्ञान/ज्ञात भाव), 'ञत्ति' (ज्ञप्ति/घोषणा), 'पञ्ञत्ति' (प्रज्ञप्ती/नियम), 'विञ्ञत्ति' (विज्ञप्ती/इशारा), 'सञ्ञत्ति' (संज्ञप्ती/समजूत), 'सञ्ञा' (संज्ञा), 'सञ्ञाणं' (संज्ञान/चिन्ह), 'पञ्ञा' (प्रज्ञा), 'पञ्ञाणं' (प्रज्ञान), 'ञाणं' (ज्ञान), 'विञ्ञाणं' (विज्ञान). ตตฺถ [Pg.51] ญาตีติ ชานาติ. ปุน ญาตีติ พนฺธุ. โส หิ ‘‘อยํ อมฺหาก’’นฺติ ญาตพฺพฏฺเฐน ญาตีติ. เอวํ ญาตโก. อญฺโญติ ทิฏฺฐธมฺมิกาทโย อตฺเถ น ญาติ น ชานาตีติ อญฺโญ, อวิทฺวา พาโลติ อตฺโถ. ญตฺตนฺติ ชานนภาโว. ‘‘ยาวเทว อนตฺถาย, ญตฺตํ พาลสฺส ชายตี’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. สญฺญาณนฺติ จิหนํ. การิเต ‘‘ญาเปติ สญฺญาเปติ วิญฺญาปยตี’’ติอาทีนิ ภวนฺติ. ยสฺมา ปน ‘‘อญฺญาติ ปฏิวิชฺฌติ. อตฺตตฺถํ วา ปรตฺถํ วา ญสฺสติ. อนญฺญาตญฺญสฺสามีตินฺทฺริยํ. เอกจฺเจ นพฺภญฺญํสุ, เอกจฺเจ อพฺภญฺญํสู’’ติ ปาฬิโย ทิสฺสนฺติ, ตสฺมา ญาตีติอาทีนิ อาขฺยาติกปทานิ ทิฏฺฐานิเยว โหนฺติ นยวเสน. ตถา หิ อญฺญาตีติ เอตฺถ อาอิติ อุปสคฺโค, โส ปรสฺสกฺขรสฺส สญฺโญคุจฺจารณิจฺฉาย รสฺสํ กตฺวา นิทฺทิฏฺโฐ. ญาตีติ สาสเน อาขฺยาติกปทํ ทิฏฺฐํ, ตสฺมาเยว ‘‘ญาติ, ญนฺติ. ญาสี’’ติอาทินา ปทมาลากรเณ นตฺเถว โทโส. तेथे 'ञाति' म्हणजे जाणतो. पुन्हा 'ञाति' म्हणजे बंधू (नातेवाईक). कारण 'अयं अम्हाकं' (हा आमचा आहे) अशा प्रकारे जाणण्यायोग्य असल्यामुळे तो 'ज्ञाती' (नातेवाईक) होय. याचप्रमाणे 'ञातको' (नातेवाईक). 'अञ्ञो' (अज्ञ/दुसरा) म्हणजे जो ऐहिक इत्यादी अर्थांना जाणत नाही तो 'अज्ञ', म्हणजेच अज्ञानी किंवा बाल (मूर्ख) असा अर्थ आहे. 'ञत्तं' म्हणजे जाणण्याचा भाव (ज्ञान). 'यावदेव अनत्थाय, ञत्तं बालस्स जायति' (मूर्खाचे ज्ञान केवळ त्याच्या अनर्थासाठीच उत्पन्न होते) हे पाळीचे उदाहरण आहे. 'सञ्ञाणं' म्हणजे चिन्ह. प्रयोजक (कारित) रूपात 'ञापेति' (जाणवून देतो), 'सञ्ञापेति' (समजावतो), 'विञ्ञापयति' (विज्ञप्त करतो) इत्यादी रूपे होतात. परंतु ज्याअर्थी 'अञ्ञाति पटिविज्झति' (जाणतो, प्रतिवेध करतो), 'अत्तत्थं वा परत्थं वा ञस्सति' (स्वतःचा किंवा दुसऱ्याचा अर्थ जाणेल), 'अनञ्ञातञ्ञस्सामीतिन्द्रियं' (अनज्ञात-ज्ञास्यामीन्द्रिय), 'एकच्चे नब्भञ्ञंसु, एकच्चे अब्भञ्ञंसु' (काहींनी जाणले नाही, काहींनी जाणले) इत्यादी पाळी वचने आढळतात, त्याअर्थी 'ञाति' इत्यादी क्रियापदे नियमानुसार सिद्धच आहेत. कारण 'अञ्ञाति' यामध्ये 'आ' हा उपसर्ग आहे, जो पुढील अक्षराच्या संयोगाच्या उच्चारणाच्या इच्छेने र्हस्व करून दर्शविला आहे. शासनात (बुद्धवचनात) 'ञाति' हे क्रियापद आढळते, म्हणूनच 'ञाति, ञन्ति, ञासि' इत्यादी रूपांनी पदमाला (धातू रूपे) तयार करण्यात कोणताही दोष नाही. ญา มารณโตสนนิสาเนสุ. มารณํ ชีวิตินฺทฺริยุปจฺเฉทกรณํ. โตสนํ ตุฏฺฐิ. นิสานํ ติกฺขตา. ญตฺติ. มนุญฺญํ. ปญฺญตฺติ. 'ञा' (ñā) हा धातू 'मारण' (मारणे), 'तोषण' (संतुष्ट करणे) आणि 'निसान' (तीक्ष्ण करणे) या अर्थांमध्ये आहे. 'मारण' म्हणजे जीवितेंद्रियाचा उच्छेद करणे. 'तोषण' म्हणजे तुष्टी (संतोष). 'निसान' म्हणजे तीक्ष्णता. 'ञत्ति' (ज्ञप्ति), 'मनुञ्ञं' (मनोज्ञ/सुंदर), 'पञ्ञत्ति' (प्रज्ञप्ती). เอตฺถ ญตฺตีติ มาเรตีติ วา โตเสตีติ วา นิเสตีติ วา อตฺโถ. อยญฺจ ญตฺติสทฺโท ‘‘วตฺติ เอตายาติ วาจา’’ติ เอตฺถ วตฺติสทฺโท วิย อาขฺยาติกปทนฺติ ทฏฺฐพฺโพ. ตถา อาทตฺเตติ เอตฺถ วิภตฺติภูตสฺส เตสทฺทสฺส วิย วิภตฺติภูตสฺส ติสทฺทสฺส สญฺโญคภาโว จ ธาตุอนฺตสฺสรสฺส รสฺสตฺตญฺจ. มนุญฺญนฺติ มนํ อาภุโส เญติ โตเสตีติ มนุญฺญํ. อยมตฺโถ มนสทฺทูปปทสฺส อาปุพฺพสฺสิมสฺส ญาธาตุสฺส วเสน ทฏฺฐพฺโพ. ปญฺญตฺตีติ นานปฺปการโต ปวตฺตินิวารเณน อกุสลานํ ธมฺมานํ ญตฺติ [Pg.52] มารณํ ปญฺญตฺติ. อถ วา ธมฺมํ สุณนฺตานํ ธมฺมเทสนาย จิตฺเต อเนกวิเธน โสมนสฺสุปฺปาทนํ. อติขิณพุทฺธีนํ อเนกวิเธน ญาณติขิณกรณญฺจ ปญฺญตฺติ นาม, ตถา โสตูนํ จิตฺตโตสเนน จิตฺตนิสาเนน จ ปญฺญาปนํ ปญฺญตฺตีติ ทฏฺฐพฺพํ. येथे 'ज्ञप्ति' (ñatti) म्हणजे मारणे, किंवा संतुष्ट करणे, किंवा तीक्ष्ण करणे असा अर्थ आहे. आणि हा 'ज्ञप्ति' शब्द "वत्ति एतायाति वाचा" (ज्याद्वारे बोलले जाते ती वाणी) यातील 'वत्ति' शब्दाप्रमाणे आख्यातपद (क्रियापद) समजावा. तसेच 'आदत्ते' यामध्ये जसा विभक्तीरूप 'ते' शब्दाचा संयोगभाव आणि धातूच्या अंतिम स्वराचा र्हस्वभाव होतो, तसाच येथे विभक्तीरूप 'ति' शब्दाचा संयोगभाव आणि धातूच्या अंतिम स्वराचा र्हस्वभाव होतो. 'मनुज्ञ' (manuñña) म्हणजे मनाला अत्यंत संतुष्ट करणारे ते मनुज्ञ. हा अर्थ 'मन' शब्द उपपद असताना 'आ' पूर्व असलेल्या 'ज्ञा' धातूच्या योगाने समजावा. 'प्रज्ञप्ति' (paññatti) म्हणजे विविध प्रकारे प्रवृत्ती रोखून अकुशल धर्मांचा नाश (मरण) करणे ती प्रज्ञप्ति होय. अथवा, धर्म ऐकणाऱ्यांच्या मनात धर्मदेशनेद्वारे अनेक प्रकारे सोमनस्य (आनंद) उत्पन्न करणे. अतिशय तीक्ष्ण बुद्धी असलेल्यांच्या ज्ञानाला अनेक प्रकारे तीक्ष्ण करणे म्हणजे 'प्रज्ञप्ति' होय, तसेच श्रोत्यांच्या चित्ताला संतुष्ट करून आणि चित्ताला तीक्ष्ण करून प्रज्ञापित करणे (जाणवून देणे) ही 'प्रज्ञप्ति' समजावी. อิติ ภูวาทิคเณ จวคฺคนฺตธาตุรูปานิ अशा प्रकारे भूवादिगणातील च-वर्गान्त धातुरूपे สมตฺตานิ. समाप्त झाली. ฏการนฺตธาตุ ट-कारान्त धातू อิทานิ ฏวคฺคนฺตธาตุรูปานิ วุจฺจนฺเต – आता ट-वर्गान्त धातुरूपे सांगितली जातात – โสฏุ คพฺเพ. คพฺพํ ทพฺพนํ. โสฏติ. सोठु (soṭu) - गर्वाने वागणे. गर्व म्हणजे दंभ करणे. सोठति (soṭati). โยฏุ สมฺพนฺเธ. โยฏติ. योठु (yoṭu) - संबंध जोडणे. योठति (yoṭati). เมฏุ มิเลฏุ อุมฺมาเท. เมฏติ. มิเลฏติ. मेठु (meṭu), मिळेठु (mileṭu) - उन्माद (वेडेपणा). मेठति (meṭati). मिळेठति (mileṭati). กฏ วสฺสาวรเณสุ. กฏติ. कट (kaṭa) - वर्षा (पाऊस) किंवा आवरण (झाकणे). कटति (kaṭati). สฏ ปริภาสเน. สฏติ. सट (saṭa) - निंदा करणे. सटति (saṭati). ลฏ พาลฺเย จ. ปุพฺพาเปกฺขาย จกาโร. ลฏติ. ลาโฏ. लट (laṭa) - बालपणात आणि. 'च' कार हा पूर्व अपेक्षेने आहे. लटति (laṭati). लाटो (lāṭo). สฏ รุชาวิสรณคตฺยาวสาเนสุ. รุชา ปีฬา. วิสรณํ วิปฺผรณํ. คตฺยาวสานํ คติยา อวสานํ โอสานํ อภาวกรณํ, นิสีทนนฺติ วุตฺตํ โหติ. สฏติ. สาโฏ วุจฺจติ สาฏโก. सट (saṭa) - रोग (रुजा), विसरण (पसरणे) आणि गतीच्या अंतात. रुजा म्हणजे पीडा. विसरण म्हणजे विस्फुरण (पसरणे). गतीचा अंत म्हणजे गतीचा अवसान, अंत, अभाव करणे, म्हणजेच बसणे असे म्हटले आहे. सटति (saṭati). साटो (sāṭo) याला साटको (sāṭako) असे म्हणतात. วฏ เวธเน. วฏติ. วโฏ. วาโฏ. वट (vaṭa) - वेधणे. वटति (vaṭati). वटो (vaṭo). वाटो (vāṭo). ขิฏ อุตฺตาสเน. เขฏติ, อาเขฏโก, เขโฏ, อุกฺเขฏิโต, สมุกฺเขฏิโต. खिट (khiṭa) - भयभीत करणे. खेटति (kheṭati), आखेटको (ākheṭako), खेटो (kheṭo), उक्खेटितो (ukkheṭito), समुक्खेटितो (samukkheṭito). สิฏ อนาทเร. เสฏติ. सिट (siṭa) - अनादर करणे. सेटति (seṭati). ชฏ [Pg.53] ฆฏ สงฺฆาเต. ชฏติ. ชฏา, ชฏิโล, ชฏี. อนฺโตชฏา พหิชฏา, ชฏาย ชฏิตา ปชา. การิเต ‘‘โส อิมํ วิชฏเย ชฏํ. อรหตฺตมคฺคกฺขเณ วิชเฏติ นามา’’ติ ปโยโค. जट (jaṭa), घट (ghaṭa) - एकत्र येणे (संघात). जटति (jaṭati). जटा (jaṭā), जटिलो (jaṭilo), जटी (jaṭī). 'अंतर्जटा बाह्यजटा, जटेने गुंफलेली ही प्रजा'. प्रयोजक (कारित) रूपात - "तो या जटेला सोडवतो" (सो इमं विजटये जटं). अर्हत्त्वमार्गाच्या क्षणी "विजटेति" (जटा सोडवतो) असा प्रयोग होतो. ภฏ ภตฺติยํ. ภฏติ. ภโฏ. เวตนํ ภฏโก ยถา. भट (bhaṭa) - भरण-पोषण करणे (भक्ती/सेवा). भटति (bhaṭati). भटो (bhaṭo). जसे वेतन घेणारा भटको (bhaṭako). ตฏ อุสฺสเย. อุสฺสโย อาโรโห อุพฺเพโธ. ตฏติ. ตโฏ, คิริตโฏ, นทีตโฏ, ตฏี, ตฏํ. तट (taṭa) - उंची (उच्छ्रय). उच्छ्रय म्हणजे चढण किंवा उंची. तटति (taṭati). तटो (taṭo), गिरितटो (giritaṭo), नदीतटो (nadītaṭo), तटी (taṭī), तटं (taṭaṃ). ขฏ กํเส. ขฏติ. ขโฏ. खट (khaṭa) - कांस्य (काशाचे भांडे). खटति (khaṭati). खटो (khaṭo). นฏ นติยํ. นฏติ. นโฏ, นาฏกํ. नट (naṭa) - नमन करणे (नृत्य करणे). नटति (naṭati). नटो (naṭo), नाटकं (nāṭakaṃ). ปิฏ สทฺทสงฺฆาเฏสุ. เปฏติ. เปฏโก, ปิฏกํ. ปิฏกสทฺโท ‘‘มา ปิฏกสมฺปทาเนนา’’ติอาทีสุ ปริยตฺติยํ ทิสฺสติ. ‘‘อถ ปุริโส อาคจฺเฉยฺย กุทาลปิฏกํ อาทายา’’ติอาทีสุ ยสฺมึ กิสฺมิญฺจิ ภาชเน. पिट (piṭa) - शब्द आणि संघात (एकत्र करणे). पेटति (peṭati). पेटको (peṭako), पिटकं (piṭakaṃ). 'पिटक' शब्द "मा पिटकसम्पदानेन" इत्यादींमध्ये पर्यत्ती (बुद्धवचन) या अर्थी दिसतो. "अथ पुरिसो आगच्छेय्य कुदालपिटकं आदाय" इत्यादींमध्ये कोणत्याही पात्राच्या (टोपलीच्या) अर्थी दिसतो. หฏ ทิตฺติยํ. หฏติ. หาฏกํ, หฏกํ. ยํ ชาตรูปํ หฏกนฺติ วุจฺจติ. हट (haṭa) - दीप्ती (चमकणे). हटति (haṭati). हाटकं (hāṭakaṃ), हटकं (haṭakaṃ). जे सुवर्ण असते त्याला 'हाटक' किंवा 'हटक' असे म्हटले जाते. สฏ อวยเว. สฏติ. सट (saṭa) - अवयव (भाग करणे). सटति (saṭati). ลุฏ วิโลฐเน. โลฏติ. लुट (luṭa) - लोळणे (विलोठन). लोठति (loṭati). จิฏ เปสเน. เจฏติ. เจฏโก. चिट (ciṭa) - पाठवणे (प्रेषण). चेटति (ceṭati). चेटको (ceṭako). วิฏ สทฺเท. เวฏติ. เวฏโก. विट (viṭa) - शब्द करणे. वेटति (veṭati). वेटको (veṭako). อฏ ปฏ อิฏ กิฏ กฏ คติยํ. อฏติ. ปฏติ. เอฏติ. เกฏติ. กฏติ. ปโฏ อิจฺเจว นามิกปทํ ทิฏฺฐํ. ปฏติ ชิณฺณภาวํ [Pg.54] คจฺฉตีติ ปโฏ. ปโฏติ วตฺถํ. วตฺถสฺส หิ อเนกานิ นามานิ – अट (aṭa), पट (paṭa), इट (iṭa), किट (kiṭa), कट (kaṭa) - गती (जाणे). अटति (aṭati). पटति (paṭati). एटति (eṭati). केटति (keṭati). कटति (kaṭati). 'पटो' (paṭo) हे नामपद पाहिले जाते. 'पटति जिण्णभावं गच्छतीति पटो' (जे जीर्ण होते ते पट). पट म्हणजे वस्त्र. वस्त्राची अनेक नावे आहेत – ปโฏ โจโฬ สาฏโก จ, วาโส วสนมํสุกํ; ทุสฺสมจฺฉาทนํ วตฺถํ, เจลํ วสนิ อมฺพรํ. पट (paṭo), चोळ (coḷo), साटक (sāṭako), वास (vāso), वसन (vasanaṃ), अंशुक (aṃsukaṃ), दुस्स (dussaṃ), आच्छादन (acchādanaṃ), वत्थ (vatthaṃ), चेल (celaṃ), वसनि (vasani), अम्बर (ambaraṃ) [ही वस्त्राची नावे आहेत]. มุฏ ปมทฺทเน. โมฏติ. मुट (muṭa) - चिरडणे (प्रमर्दन). मोठति (moṭati). จุฏ อปฺปีภาเว. โจฏติ. चुट (cuṭa) - कमी होणे (अल्पीभाव). चोटति (coṭati). วฏิ วิภาชเน. วฏติ. วณฺโฏ. वटि (vaṭi) - विभाजन करणे. वटति (vaṭati). वण्टो (vaṇṭo - देठ). รุฏิ ลุฏิ เถยฺเย. รุณฺฏติ. ลุณฺฏติ. รุณฺฏโก. ลุณฺฏโก. रुठि (ruṭi), लुठि (luṭi) - चोरी करणे (स्तेय). रुण्ठति (ruṇṭati). लुण्ठति (luṇṭati). रुण्ठको (ruṇṭako). लुण्ठको (luṇṭako). ผุฏ วิสรเณ โผฏติ. โผโฏ. फुट (phuṭa) - पसरणे (विसरण). फोटति (phoṭati). फोटो (phoṭo). เจฏ เจฏายํ. เจฏติ. เจฏโก. चेट (ceṭa) - चेष्टा करणे (क्रियाशील असणे). चेटति (ceṭati). चेटको (ceṭako). ฆุฏ ปริวตฺตเน. โฆฏติ. घुट (ghuṭa) - फिरणे (परिवर्तन). घोटति (ghoṭati). รุฏ ลุฏ ปฏิฆาเต. โรฏติ. โลฏติ. रुठ (ruṭa), लुठ (luṭa) - प्रतिघात (विरोध करणे). रोठति (roṭati). लोठति (loṭati). ฆฏ เจตายํ. ฆฏติ. ฆโฏ. ฆโฏ วุจฺจติ กุมฺโภ. อิมานิ ตทภิธานานิ – घट (ghaṭa) - चेष्टा करणे (प्रयत्न करणे). घटति (ghaṭati). घटो (ghaṭo). घटाला 'कुंभ' (घडा) असे म्हणतात. त्याची नावे खालीलप्रमाणे आहेत – ฆโฏ กุมฺโภ ฆฏี กุมฺภี, ตุณฺฑิกิโร ตุ อุกฺขลี; มหนฺตภาชนํ จาฏิ, อติขุทฺทํ กุฏฺฏํ ภเว; घटो (ghaṭo), कुम्भो (kumbho), घटी (ghaṭī), कुम्भी (kumbhī), तुण्डिकिरो (tuṇḍikiro), उक्खली (ukkhalī); मोठे भांडे म्हणजे चाटी (cāṭi), आणि अतिशय लहान भांडे म्हणजे कुट्टं (kuṭṭaṃ) होय. จฏ ภฏ ปริภาสเน เทฏ จ. จฏติ. ภฏติ. เทฏติ. चट (caṭa), भट (bhaṭa) - निंदा करणे (भाषण करणे) आणि देट (deṭa) सुद्धा. चटति (caṭati). भटति (bhaṭati). देटति (deṭati). กุฏ โกฏิลฺเล. กุฏติ. ปฏิกุฏติ. कुट (kuṭa) - कुटिलता (वाकडेपणा). कुटति (kuṭati). पटिकुटति (paṭikuṭati). ปุฏ สํกิเลสเน. ปุฏติ. पुट (puṭa) - संक्लेश (मळणे/दूषित करणे). पुटति (puṭati). จุฏ ฉุฏ กุฏ เฉทเน. จุฏติ. ฉุฏติ. กุฏติ. चुट (cuṭa), छुट (chuṭa), कुट (kuṭa) - छेदणे (कापणे). चुटति (cuṭati). छुटति (chuṭati). कुटति (kuṭati). ผุฏ วิกสเน. ผุฏติ. फुट (phuṭa) - विकसित होणे (फुलणे). फुटति (phuṭati). มุฏ อคฺคิสทฺทปกฺเขปมทฺทเนสุ. มุฏติ. मुट (muṭa) - अग्नीचा आवाज, फेकणे आणि चिरडणे या अर्थांमध्ये. मुटति (muṭati). ตุฏ กลหกมฺมนิ. ตุฏติ. तुट (tuṭa) - भांडण करणे (कलहकर्म). तुटति (tuṭati). ฆุฏ ปฏิฆาเต. ฆุฏติ. โฆฏโก. घुट (ghuṭa) - प्रतिघात (विरोध). घुटति (ghuṭati). घोटको (ghoṭako). ฏการนฺตธาตุรูปานิ. ट-कारान्त धातुरूपे समाप्त झाली. ฐการนฺตธาตุ ठ-कारान्त धातू ฐา [Pg.55] คตินิวตฺติยํ. คตินิวตฺติ อุปฺปชฺชมานสฺส คมนสฺสุปจฺเฉโท. ฐาติ, ฐนฺติ. ติฏฺฐติ. ปติฏฺฐาติ. อธิฏฺฐาติ. อธิฏฺเฐติ. สณฺฐาติ. สณฺฐหติ. อธิฏฺฐหติ. อุปฏฺฐหติ. ฐาตุ. ติฏฺฐตุ. ติฏฺเฐยฺย. อฏฺฐ, อฏฺฐุ. อฏฺฐา, อฏฺฐู, อฏฺฐาสิ, อฏฺฐํสุ. ยาวสฺส กาโย ฐสฺสติ. ติฏฺฐิสฺสติ. อุปสฺสุติ ติฏฺฐิสฺสถ. อฏฺฐิสฺสา, อฏฺฐิสฺสํสุ. อติฏฺฐิสฺสา, อติฏฺฐิสฺสํสุ. ฐาตุํ, อุปฏฺฐาตุํ. อุปฏฺฐหิตุํ. อธิฏฺฐาตุํ. อธิฏฺฐหิตุํ. ฐตฺวา, อธิฏฺฐิตฺวา. อุปฏฺฐหิตฺวา, อธิฏฺฐหิตฺวา. ฐานํ, ฐิติ, สณฺฐิติ, อวฏฺฐิติ. สณฺฐานํ, ปฏฺฐานํ. อุปฏฺฐาโก, ฐิโต. ปพฺพตฏฺโฐ ภูมฏฺโฐ. อุปฏฺฐหํ อิจฺจาทีนิ. ठा (ṭhā) - गती थांबवणे (गतीची निवृत्ती). गतीची निवृत्ती म्हणजे उत्पन्न होणाऱ्या गमनाचा (जाण्याचा) उच्छेद (थांबणे). ठाति (ṭhāti), ठन्ति (ṭhanti). तिट्ठति (tiṭṭhati). पतिट्ठति (patiṭṭhāti). अधिट्ठाहति (adhiṭṭhāti). अधिट्ठेति (adhiṭṭheti). सण्ठाति (saṇṭhāti). सण्ठहति (saṇṭhahati). अधिट्ठहति (adhiṭṭhahati). उपट्ठहति (upaṭṭhahati). ठातु (ṭhātu). तिट्ठतु (tiṭṭhatu). तिट्ठेय्य (tiṭṭheyya). अट्ठ (aṭṭha), अट्ठु (aṭṭhu). अट्ठि (aṭṭhā), अट्ठू (aṭṭhū), अट्ठासि (aṭṭhāsi), अट्ठंसु (aṭṭhaṃsu). 'यावस्स कायो ठस्सति' (जोपर्यंत शरीर राहील). तिट्ठिस्सति (tiṭṭhissati). 'उपस्सुति तिट्ठिस्सथ' (तुम्ही ऐकत उभे राहाल). अट्ठिस्सा (aṭṭhissā), अट्ठिस्संग्सु (aṭṭhissaṃsu). अतिट्ठिस्सा (atiṭṭhissā), अतिट्ठिस्संग्सु (atiṭṭhissaṃsu). ठातुं (ṭhātuṃ), उपट्ठातुं (upaṭṭhātuṃ). उपट्ठहितुं (upaṭṭhahituṃ). अधिट्ठातुं (adhiṭṭhātuṃ). अधिट्ठहितुं (adhiṭṭhahituṃ). ठत्वा (ṭhatvā), अधिट्ठित्वा (adhiṭṭhitvā). उपट्ठहित्वा (upaṭṭhahitvā), अधिट्ठहित्वा (adhiṭṭhahitvā). ठानं (ṭhānaṃ), ठिति (ṭhiti), सण्ठिति (saṇṭhiti), अवट्ठिति (avaṭṭhiti). सण्ठानं (saṇṭhānaṃ), पट्ठानं (paṭṭhānaṃ). उपट्ठाको (upaṭṭhāko), ठितो (ṭhito). पब्बतट्ठो (pabbataṭṭho - पर्वतावर राहणारा), भूमट्ठो (bhūmaṭṭho - भूमीवर राहणारा). उपट्ठहं (upaṭṭhahaṃ) इत्यादी रूपे होतात. ตตฺถ ฐานสทฺโท อิสฺสริยฐิติขณการเณสุ ทิสฺสติ. ‘‘กึ ปนายสฺมา เทวานมินฺโท กมฺมํ กตฺวา อิมํ ฐานํ ปตฺโต’’ติอาทีสุ หิ อิสฺสริเย ทิสฺสติ. ‘‘ฐานกุสโล โหติ อกฺขณเวธี’’ติอาทีสุ ฐิติยํ. ‘‘ฐานโสเปตํ ตถาคตํ ปฏิภาตี’’ติอาทีสุ ขเณ. ‘‘ฐานญฺจ ฐานโส ญตฺวา อฏฺฐานญฺจ อฏฺฐานโส’’ติอาทีสุ การเณ. การณญฺหิ ยสฺมา ตตฺถ ผลํ ติฏฺฐติ ตทายตฺตวุตฺติภาเวน, ตสฺมา ฐานนฺติ วุจฺจติ. त्यामध्ये 'स्थान' (ṭhāna) शब्द ऐश्वर्य (अधिकार), स्थिती, क्षण आणि कारण या अर्थांमध्ये दिसतो. "किं पनायस्मा देवानामिन्दो कम्मं कत्वा इमं ठानं पत्तो" (आयुष्यमान देवांचा राजा इंद्र कोणते कर्म करून या स्थानाला प्राप्त झाला?) इत्यादींमध्ये तो ऐश्वर्य (अधिकार) या अर्थी दिसतो. "ठानकुसलो होति अक्खणवेधी" (तो स्थानात कुशल आणि अचूक वेध घेणारा असतो) इत्यादींमध्ये स्थिती या अर्थी. "ठानसोपेतं तथागतं पटिभाति" (तथागतांना योग्य क्षणी स्फुरते) इत्यादींमध्ये क्षण या अर्थी. "ठानञ्च ठानसो ञत्वा अट्ठानञ्च अट्ठानसो" (कारण योग्य कारणाने आणि अकारण अकारणाने जाणून) इत्यादींमध्ये कारण या अर्थी. कारण म्हणजे ज्याच्यावर फळ अवलंबून असते, म्हणून त्याला 'स्थान' असे म्हटले जाते. อิสฺสริเย ฐิติยญฺจ, ขณสฺมิมฺปิ จ การเณ; จตูสฺวตฺเถสุ เอเตสุ, ฐานสทฺโท ปวตฺตตีติ. ऐश्वर्य (आधिपत्य), स्थिती (स्थैर्य), क्षण आणि कारण या चार अर्थांमध्ये 'ठान' (स्थान) हा शब्द वापरला जातो. เฐ สทฺทสงฺกาเตสุ. ฐียติ. 'ठे' धातू शब्द किंवा आवाजाच्या अर्थात. 'ठीयति' (तो आवाज करतो). เฐ เวฐเน. ฐายติ. 'ठे' धातू वेढण्याच्या (वेष्टन) अर्थात. 'ठायति' (तो वेढतो). ปฐ [Pg.56] วิยตฺติยํ วาจายํ. ธมฺมํ ปฐติ. ปาโฐ, นกฺขตฺตปาฐโก, โส โหรปาฐกํ ปุจฺฉิ. สพฺพปาฐี ภวิสฺสติ. ปฐิตุํ, ปฐิตเว, ปฐิตฺวา, ปฐิตฺวาน, ปฐิตุน, ปฐิย, ปฐิยาน. 'पठ' धातू स्पष्ट वाणीच्या अर्थात. 'धम्मं पठति' (तो धम्माचे पठण करतो). 'पाठो' (पाठ), 'नक्खत्तपाठको' (नक्षत्र वाचक/ज्योतिषी), 'सो होरापाठकं पुच्छि' (त्याने ज्योतिषाला विचारले). 'सब्बपाठी भविस्सति' (तो सर्व पाठांचा ज्ञाता होईल). 'पठितुं', 'पठितवे', 'पठित्वा', 'पठित्वान', 'पठितुन', 'पठिय', 'पठियान' (ही पठ् धातूची कृदन्त रूपे आहेत). เอวํวิธํ ตุํปจฺจยนฺตาทิวิภาคํ สพฺพตฺถ ยถารหํ วตฺตุกามาปิ คนฺถ วิตฺถารภเยน น วทาม. อวุตฺโตปิ อีทิโส วิภาโค นยานุสาเรน ยถาสมฺภวํ สพฺพตฺถ โยเชตพฺโพ. ยตฺถ ปน ปาฬินิทสฺสนาทิวิเสโส อิจฺฉิตพฺโพ โหติ, ตตฺเถเวตํ ทสฺเสสฺสาม. अशा प्रकारचा 'तुं' प्रत्ययादींचा विभाग सर्व ठिकाणी योग्यतेनुसार सांगण्याची इच्छा असूनही, ग्रंथाच्या विस्ताराच्या भयाने आम्ही तो सांगत नाही. न सांगितलेला देखील असा विभाग नियमानुसार शक्यतेनुसार सर्व ठिकाणी योजावा. परंतु, जेथे पाळी उदाहरणादी विशेष आवश्यक असतील, तेथेच आम्ही ते दाखवू. วฐ ถูลิเย. วฐติ. วฐโร. วฐโรติ ถูลฆนสรีรสฺมึ วตฺตพฺพวจนํ. ตถา หิ วินยฏฺฐกถายํ ‘‘วฐโรติ ถูโล, ถูโล จ ฆนสรีโร จายํ ภิกฺขูติ วุตฺตํ โหตี’’ติ วุตฺตํ. 'वठ' धातू स्थूलतेच्या (जाडेपणाच्या) अर्थात. 'वठति'. 'वठरो'. 'वठरो' हा शब्द स्थूल आणि घट्ट शरीरासाठी वापरला जाणारा शब्द आहे. तसेच विनय अट्ठकथेत म्हटले आहे - 'वठरो म्हणजे स्थूल, आणि हा भिक्खू स्थूल व घट्ट शरीराचा आहे, असे म्हटले आहे'. มฐ นิวาเส. มฐติ. มโฐ. 'मठ' धातू निवासाच्या (राहण्याच्या) अर्थात. 'मठति'. 'मठो' (मठ/निवास). กฐ กิจฺฉชีวเน. กฐติ. กโฐ. 'कठ' धातू कठीण उपजीविकेच्या (कष्टमय जीवनाच्या) अर्थात. 'कठति'. 'कठो'. รฐ ปริภาสเน. รฐติ. 'रठ' धातू निंदा किंवा भाषणाच्या अर्थात. 'रठति'. สาฐ พลกฺกาเร. พลกฺกาโร นาม อตฺตโน พเลน ยถาชฺฌาสยํ ทพฺพลสฺส อภิภวนํ. สาฐติ. สาโฐ. 'साठ' धातू बळजबरीच्या (बलात्काराच्या) अर्थात. बळजबरी म्हणजे स्वतःच्या बळाने आपल्या इच्छेनुसार दुर्बलाचा पराभव करणे. 'साठति'. 'साठो'. อุฐ รุฐ ลุฐ อุปฆาเต. โอฐติ. โรฐติ. โลฐติ. 'उठ', 'रुठ', 'लुठ' हे धातू उपघाताच्या (इजा किंवा नाशाच्या) अर्थात. 'ओठति', 'रोठति', 'लोठति'. ปิฐ หึสาสํกิเลเสสุ. เปฐติ. ปิฐโร. 'पिठ' धातू हिंसा आणि संक्लेशाच्या (मलीनतेच्या) अर्थात. 'पेठति'. 'पिठरो' (भांडे/घडा). สฐ เกตเว จ. ปุพฺพตฺเถสุ จกาโร. สฐติ. สโฐ สโฐติ เกราฏิโก วุจฺจติ. 'सठ' धातू कपटाच्या (धूर्ततेच्या) अर्थात आणि 'च' कारामुळे मागील अर्थांमध्येही. 'सठति'. 'सठो' - सठ म्हणजे कपटी किंवा धूर्त माणसाला म्हटले जाते. สุฐ คติปฏิฆาเต. คมนปฏิหนนํ คติปฏิฆาโต. โสฐติ. 'सुठ' धातू गतीच्या रोधाच्या (गती अडवण्याच्या) अर्थात. जाणे अडवणे म्हणजे गतीचा रोध होय. 'सोठति'. กุฐิ ลุฐิ อาลสฺสิเย จ. จกาโร ปุพฺพตฺเถ จ. กุณฺฐติ. กุณฺโฐ. ลุณฺฐติ. ลุณฺโฐ. 'कुठि', 'लुठि' हे धातू आळसाच्या अर्थात आणि 'च' कारामुळे मागील अर्थातही. 'कुण्ठति', 'कुण्ठो', 'लुण्ठति', 'लुण्ठो'. สุฐิ [Pg.57] โสสเน. สุณฺฐติ. 'सुठि' धातू सुकवण्याच्या (शोषण) अर्थात. 'सुण्ठति'. รุฐิ ลุฐิ อฐิ คติยํ. รุณฺฐติ. ลุณฺฐติ. อณฺฐติ. 'रुठि', 'लुठि', 'अठि' हे धातू गतीच्या (गमनाच्या) अर्थात. 'रुण्ठति', 'लुण्ठति', 'अण्ठति'. เวฐ เวฐเน. เวฐติ, นิพฺเพฐติ. เวฐนํ, นิพฺเพฐนํ. 'वेठ' धातू वेढण्याच्या (वेष्टन) अर्थात. 'वेठति' (तो वेढतो), 'निब्बेठति' (तो उलगडतो). 'वेठनं' (वेढणे), 'निब्बेठनं' (उलगडणे). วฐิ เอกจริยายํ. วณฺฐติ. 'वठि' धातू एकटे राहण्याच्या (एकचर्या) अर्थात. 'वण्ठति'. มฐ กุฐิ โสเก. มฐติ. กุณฺฐติ. 'मठ', 'कुठि' हे धातू शोकाच्या (दुःखाच्या) अर्थात. 'मठति', 'कुण्ठति'. เอฐ เหฐ วิพาธายํ. เอฐติ. เหฐติ. วิเหฐติ. วิเหฐนํ. 'एठ', 'हेठ' हे धातू पीडा देण्याच्या (बाधा पोहचवण्याच्या) अर्थात. 'एठति', 'हेठति', 'विहेठति' (तो त्रास देतो), 'विहेठनं' (त्रास देणे/पीडा). ลุฐ ปฏิฆาเต. โลฐติ. 'लुठ' धातू प्रतिघाताच्या (अडथळा किंवा क्रोधाच्या) अर्थात. 'लोठति'. ปฐ วิขฺยาเน. ปฐติ. 'पठ' धातू व्याख्यान करण्याच्या (स्पष्ट सांगण्याच्या) अर्थात. 'पठति'. ลุฐ สํกิเลเส. โลฐติ. 'लुठ' धातू संक्लेशाच्या (मलीनतेच्या) अर्थात. 'लोठति'. ฐการนฺตธาตุรูปานิ. ठकारान्त धातूंची रूपे. ฑการนฺตธาตุ डकारान्त धातू. ฑิ วิหายสคติยํ คมนมตฺเต จ. เฑติ, ฑยติ. เฑมาโน. อุจฺเจ สกุณ เฑมาน. เย มํ ปุเร ปจฺจุฑฺเฑนฺติ. 'डि' धातू आकाशात उडण्याच्या (विहायसगती) आणि केवळ गमनाच्या (जाण्याच्या) अर्थात. 'डेति', 'डयति'. 'डेमानो' (उडणारा). 'उच्चे सकुण डेमान' (हे उंच उडणाऱ्या पक्षा!). 'ये मं पुरे पच्चुड्डेन्ति' (जे पूर्वी माझ्या समोर उडून आले). ฑิ ขิปนุฑฺฑเนสุ. เฑติ. อุฑฺเฑติ. 'डि' धातू फेकण्याच्या आणि वर उडण्याच्या अर्थात. 'डेति', 'उड्डेति'. อิโต พหิทฺธา ปาสณฺฑา, ทิฏฺฐีสุ ปสีทนฺติ เต; น เตสํ ธมฺมํ โรเจมิ, น เต ธมฺมสฺส โกวิทา. या (शासना)बाहेरचे पाखंडी (परधर्मीय) आपापल्या दृष्टींमध्ये (मतांमध्ये) प्रसन्न होतात; मला त्यांचा धम्म आवडत नाही आणि ते धम्मामध्ये कुशलही नाहीत. เอตฺถ จ ปาสณฺฑาติ ปาสํ เฑนฺตีติ ปาสณฺฑา, สตฺตานํ จิตฺเตสุ ทิฏฺฐิปาสํ ขิปนฺตีติ อตฺโถ. อถ วา ตณฺหาปาสํ ทิฏฺฐิปาสญฺจ เฑนฺติ อุฑฺเฑนฺตีติ ปาสณฺฑา. आणि येथे 'पाखंडी' (पासण्ड) म्हणजे जे पाश (फास) फेकतात ते पाखंडी, म्हणजेच प्राण्यांच्या चित्तामध्ये दृष्टीचा पाश (मतांचा फास) फेकतात असा अर्थ आहे. अथवा, जे तण्हापाश (तृष्णेचा फास) आणि दिठ्ठिपाश (दृष्टीचा फास) फेकतात किंवा वर उचलतात, ते पाखंडी होत. มุฑิ [Pg.58] กณฺฑเน. มุณฺฑติ. กุมารํ มุณฺฑึสุ. มุณฺโฑ. मुडि (धातू) मुंडण करणे (केस कापणे) या अर्थात. मुण्डति (तो मुंडण करतो). कुमारं मुण्डिंसु (त्यांनी मुलाचे मुंडण केले). मुण्डो (मुंडण केलेला/बोडका). จุฑฺฑ หาวกรเณ. จุฑฺฑติ. चुड्ड (धातू) हावभाव करणे या अर्थात. चुड्डति. อฑฺฑ อภิโยเค. อฑฺฑติ. अड्ड (धातू) अभियोग (प्रयत्न किंवा आरोप) या अर्थात. अड्डति. คฑิ วทเนกเทเส. คณฺฑติ. คณฺโฑ. गडि (धातू) चेहऱ्याचा एक भाग (गाल किंवा गळू) या अर्थात. गण्डति. गण्डो (गाल किंवा गळू). หุฑิ ปิฑิ สงฺฆาเต. หุณฺฑติ. ปิณฺฑติ. ปิณฺโฑ. हुडि आणि पिडि (धातू) संघात (एकत्र करणे किंवा गोळा करणे) या अर्थात. हुण्डति. पिण्डति. पिण्डो (पिंड/गोळा). หิฑิ คติยํ. หิณฺฑติ, อาหิณฺฑติ. हिडि (धातू) गती (भटकणे किंवा फिरणे) या अर्थात. हिण्डति, आहिण्डति. กุฑิ ทาเห. กุณฺฑติ. กุณฺโฑ. कुडि (धातू) दाह (जळणे) या अर्थात. कुण्डति. कुण्डो (कुंड/भांडे). วฑิ มฑิ เวฐเน. วณฺฑติ. มณฺฑติ. มณฺฑลํ. वडि आणि मडि (धातू) वेढणे (गुंडाळणे) या अर्थात. वण्डति. मण्डति. मण्डलं (मंडळ/वर्तुळ). ภฑิ ปริภาสเน. ภณฺฑติ. ภณฺฑนํ. ภณฺโฑ. भडि (धातू) शिवीगाळ करणे किंवा भांडणे या अर्थात. भण्डति. भण्डनं (भांडण). भण्डो (भांड/भांडण करणारा). มฑิ มชฺชเน. มณฺฑติ. มณฺฑนํ. मडि (धातू) सुशोभित करणे (किंवा स्नान/स्वच्छ करणे) या अर्थात. मण्डति. मण्डनं (सुशोभन/अलंकार). ตุฑิ โตฬเน. ตุณฺฑติ. ตุณฺโฑ. ตุณฺเฑนาทาย คจฺเฉยฺย. तुडि (धातू) तोलणे (किंवा चोचीने उचलणे) या अर्थात. तुण्डति. तुण्डो (चोच). तुण्डेनादाय गच्छेय्य (चोचीने पकडून निघून जावा). ภุฑิ ภรเณ. ภุณฺฑติ. भुडि (धातू) भरण (पोषण करणे किंवा भरणे) या अर्थात. भुण्डति. จฑิ โกเป. จณฺฑติ. จณฺโฑ. จณฺฑาโล, จณฺฑิกฺกํ. चडि (धातू) कोप (राग) या अर्थात. चण्डति. चण्डो (क्रोधित/उग्र). चण्डालो (चांडाल), चण्डिक्कं (उग्रता/क्रोध). สฑิ รุชายํ. สณฺฑติ. สณฺโฑ. सडि (धातू) रुजा (वेदना किंवा रोग) या अर्थात. सण्डति. सण्डो (समूह/वृषभ). ตฑิ ตาฬเน. ตณฺฑติ. วิตณฺฑา. तडि (धातू) ताडन (मारणे) या अर्थात. तण्डति. वितण्डा (वितंडवाद). ปฑิ คติยํ. ปณฺฑติ. ปณฺฑา, ปณฺฑิโต. เอตฺถ ปณฺฑาติ ปญฺญา. สา หิ สุขุเมสุปิ อตฺเถสุ ปณฺฑติ คจฺฉติ ทุกฺขาทีนํ ปีฬนาทิกมฺปิ อาการํ ชานาตีติ ‘‘ปณฺฑา’’ติ วุจฺจติ. ปณฺฑิโตติ ปณฺฑาย อิโต คโต ปวตฺโตติ ปณฺฑิโต. อถ วา สญฺชาตา ปณฺฑา เอตสฺสาติ ปณฺฑิโต. ปณฺฑติ ญาณคติยา คจฺฉตีติปิ ปณฺฑิโต. ตถา หิ อฏฺฐกถายํ [Pg.59] วุตฺตํ ‘‘ปณฺฑนฺตีติ ปณฺฑิตา. สนฺทิฏฺฐิกสมฺปรายิกตฺเถสุ ญาณคติยา คจฺฉนฺตีติ อตฺโถ’’ติ. पडि (धातू) गती (जाणे किंवा जाणणे) या अर्थात. पणण्डति. पण्डा, पण्डितो. येथे 'पण्डा' म्हणजे प्रज्ञा (बुद्धी). कारण ती सूक्ष्म अर्थांमध्येही गती करते (प्रवेश करते) आणि दुःखादींच्या पीडादायक स्वरूपाला जाणते, म्हणून तिला 'पण्डा' म्हटले जाते. 'पण्डित' म्हणजे जो या प्रज्ञेच्या साहाय्याने पुढे गेला आहे किंवा प्रवृत्त झाला आहे तो 'पण्डित'. अथवा, ज्याच्यामध्ये प्रज्ञा उत्पन्न झाली आहे तो 'पण्डित'. जो ज्ञानरूपी गतीने जातो तोही 'पण्डित'. म्हणूनच अट्ठकथेत (टीकेत) म्हटले आहे - 'जे गती करतात (जाणतात) ते पण्डित. इहलोकातील आणि परलोकातील अर्थांमध्ये ज्ञानरूपी गतीने जाणारे, असा याचा अर्थ आहे'. คฑิ มเท. คณฺฑติ. गडि (धातू) मद (गर्व किंवा नशा) या अर्थात. गण्डति. ขฑิ มนฺเถ. ขณฺฑติ. ขณฺฑิโต, ขณฺโฑ. खडि (धातू) मंथन (वळणे किंवा तुकडे करणे) या अर्थात. खण्डति. खण्डितो (तुकडे केलेला), खण्डो (तुकडा). ลฑิ ชิวฺหามถเน. ลณฺฑติ. ลณฺโฑ. लडि (धातू) जिभेचे मंथन करणे (जीभ हलवणे किंवा बोलणे) या अर्थात. लण्डति. लण्डो (लेंड/विष्ठा). ฑการนฺตธาตุรูปานิ. डकारान्त धातूंची रूपे. ฑการนฺตธาตุ डकारान्त धातू. วฑฺฒ วฑฺฒเน. วฑฺฒติ. สิริวฑฺฒโก, ธนวฑฺฒโก, วฑฺฒิโต, พุฑฺโฒ. เอตฺถ จ วการสฺส พกาโร, อการสฺส จุกาโร. वड्ढ (धातू) वाढवणे (वृद्धी करणे) या अर्थात. वड्ढति. सिरिवड्ढको (श्रीवर्धन करणारा), धनवड्ढको (धन वाढवणारा), वड्ढितो (वाढलेला), बुड्ढो (वृद्ध). आणि येथे 'व' काराचा 'ब' कार आणि 'अ' काराचा 'उ' कार होतो. กฑฺฒ อากฑฺฒเน. กฑฺฒติ, อากฑฺฒติ, นิกฑฺฒติ. อกามา ปริกฑฺฒนฺติ, อุลูกญฺเญว วายสา. कड्ढ (धातू) ओढणे (आकर्षण करणे) या अर्थात. कड्ढति, आकड्ढति, निकड्ढति. 'अकामा परिकड्ढन्ति, उलूकञ्ञेव वायसा' (इच्छा नसतानाही ते त्याला ओढतात, जसे कावळे घुबडाला ओढतात). อิมานิ ฒการนฺตธาตุรูปานิ. ही ढकारान्त धातूंची रूपे आहेत. ณการนฺตธาตุ णकारान्त धातू. อณ รณ วณ ภณ มณ กณ สทฺเท. อณติ. อณโก พฺราหฺมโณ. รณติ. รณํ. วณติ. วาณโก. ภณติ. ภาณโก. มณติ. มณิโก. กณติ. กาโณ. ตตฺถ พฺราหฺมโณติ พฺรหฺมํ อณตีติ พฺราหฺมโณ, มนฺเต สชฺฌายตีติ อตฺโถ. อกฺขรจินฺตกา ปน ‘‘พฺรหฺมุโน อปจฺจํ พฺราหฺมโณ’’ติ วทนฺติ. อริยา ปน พาหิตปาปตฺตา พฺราหฺมโณติ. अण, रण, वण, भण, मण, कण (धातू) शब्द (आवाज करणे) या अर्थात. अणति. अणको, ब्राह्मणो. रणति. रणं. वणति. वाणको. भणति (तो बोलतो). भाणको (पाठक/प्रवचनकार). मणति. मणिको. कणति. काणो (एका डोळ्याने आंधळा). त्यामध्ये 'ब्राह्मण' म्हणजे जो ब्रह्माचे (मंत्रांचे) उच्चारण करतो तो 'ब्राह्मण', म्हणजेच मंत्रांचा स्वाध्याय करतो असा अर्थ आहे. व्याकरणकार (अक्षरचिंतक) मात्र 'ब्रह्मदेवाचे अपत्य म्हणजे ब्राह्मण' असे म्हणतात. परंतु आर्य पापांचा त्याग केल्यामुळे (बाहितपापत्वामुळे) त्याला 'ब्राह्मण' म्हणतात. พฺราหฺมโณ [Pg.60] โสตฺติโย วิปฺโป, โภวาที พฺรหฺมพนฺธุ จ; พฺรหฺมสูนุ ทฺวิโช พฺรหฺมา, กมลาสนสูนุ จ; ब्राह्मणो, सोत्तियो (श्रोत्रिय), vippo (विप्र), भोवादी, ब्रह्मबन्धु, ब्रह्मसूनु, द्विजो, ब्रह्मा आणि कमलासनसूनु (हे ब्राह्मणाचे समानार्थी शब्द आहेत). รณสทฺโท ‘‘สรณา ธมฺมา อรณา ธมฺมา’’ติอาทีสุ กิเลเสสุ วตฺตติ. กิเลสา หิ รณนฺติ กนฺทนฺติ เอเตหีติ รณาติ วุจฺจนฺติ. 'रण' हा शब्द 'सरणा धम्मा अरणा धम्मा' इत्यादी वाक्यांमध्ये क्लेशांच्या (विकारांच्या) अर्थात वापरला जातो. कारण क्लेश हे ओरडतात (आक्रोश करतात) किंवा ज्यांच्यामुळे प्राणी आक्रोश करतात, म्हणून त्यांना 'रण' म्हटले जाते. ‘‘ธนุคฺคโห อสทิโส, ราชปุตฺโต มหพฺพโล; สพฺพามิตฺเต รณํ กตฺวา, สํยมํ อชฺฌุปาคมี’’ติ 'अतुलनीय धनुर्धारी, महाबली राजकुमार, सर्व शत्रूंशी युद्ध करून (रणं कत्वा) संयमाला प्राप्त झाला' - เอตฺถ ยุทฺเธ วตฺตติ. รณํ กตฺวาติ หิ ยุทฺธํ กตฺวาติ อตฺโถ. ‘‘ติณญฺจ กฏฺฐญฺจ รณํ กโรนฺตา, ธาวึสุ เต อฏฺฐทิสา สมนฺตโต’’ติ เอตฺถ จุณฺณวิจุณฺณกรเณ วตฺตติ. รณํ กโรนฺตาติ หิ จุณฺณวิจุณฺณํ กโรนฺตาติ อตฺโถ. เอวํ อตฺถวิวรณมฺปิ สทฺทสงฺขาตมตฺถํ อนฺโตเยว กตฺวา อธิปฺปายตฺถวเสน กตํ, น ธาตุนานตฺถวเสนาติ ทฏฺฐพฺพํ. อถ วา ธาตูนมตฺถาติสยโยโคปิ ภวติ, เตน เอวํ อตฺถวิวรณํ กตนฺติปิ ทฏฺฐพฺพํ. येथे हा शब्द युद्धाच्या अर्थात वापरला आहे. 'रणं कत्वा' म्हणजे 'युद्ध करून' असा अर्थ आहे. 'गवत आणि लाकूड यांचे चूर्ण करत (रणं करोन्ता) ते सर्व बाजूंनी आठही दिशांना धावले' या वाक्यात हा शब्द चूर्ण करण्याच्या (तुकडे करण्याच्या) अर्थात वापरला आहे. 'रणं करोन्ता' म्हणजे 'चूर्ण करत' असा अर्थ आहे. अशा प्रकारे, हा अर्थ-स्पष्टीकरण देखील शब्दाच्या मूळ अर्थाला अंतर्भूत ठेवून अभिप्रेत अर्थानुसार केले आहे, केवळ धातूच्या विविध अर्थांमुळे नाही, असे समजले पाहिजे. अथवा, धातूंच्या अर्थांचा अतिशय योग (अतिव्याप्ती) देखील होतो, त्यामुळे असे अर्थ-स्पष्टीकरण केले जाते, असेही समजले पाहिजे. ภณ ภณเน. ปริตฺตํ ภณติ, วจนํ ภณติ. ทีฆภาณโก, ปิยภาณี, ภาณวาโร. เอตฺถ ภาณวาโรติ – भण (धातू) भणन (बोलणे किंवा पाठ करणे) या अर्थात. परित्तं भणति (परित्त पाठ करतो), वचनं भणति (वचन बोलतो). दीघभाणको (दीघनिकायचा पाठ करणारा), पियभाणी (प्रिय बोलणारा), भाणवारो (पाठ-विभाग). येथे 'भाणवार' म्हणजे - ‘‘อฏฺฐกฺขรา เอกปทํ, เอกา คาถา จตุปฺปทํ; คาถา เจกามโต คนฺโถ, คนฺโถ พาตฺตึสตกฺขโร; 'आठ अक्षरांचे एक पद होते, चार पदांची एक गाथा होते. एक गाथा म्हणजे एक ग्रंथ-एकक मानला जातो, आणि एका ग्रंथात बत्तीस अक्षरे असतात; พาตฺตึสกฺขรคนฺถานํ, ปญฺญาสํ ทฺวิสตํ ปน; ภาณวาโร มโต เอโก, สฺวฏฺฐกฺขรสหสฺสโก’’ติ. बत्तीस अक्षरांच्या अशा अडीचशे (२५०) ग्रंथांचा मिळून एक 'भाणवार' मानला जातो, ज्यामध्ये आठ हजार अक्षरे असतात' - เอวํ อฏฺฐกฺขรสหสฺสปริมาโณ ปาโฐ วุจฺจติ. अशा प्रकारे, आठ हजार अक्षरांच्या परिमाणाचा (प्रमाणाचा) जो पाठ असतो, त्याला 'भाणवार' म्हटले जाते. โอณํ อปนยเน. โอณติ. ओण (धातू) दूर करणे (किंवा खाली वाकणे) या अर्थात. ओणति. โสณ วณฺณคตีสุ. โสณติ, โสโณ. सोण (धातू) वर्ण (रंग) आणि गती या अर्थात. सोणति. सोणो (तांबडा रंग किंवा कुत्रा). โสณ [Pg.61] สิโลณ สงฺฆาเต. โสณติ. สิโลณติ. सोण आणि सिलोण (धातू) संघात (एकत्र करणे) या अर्थात. सोणति. सिलोणति. ฆิณิ ฆุณิ ฆณิ คหเณ. ฆิณฺณติ. ฆุณฺณติ. ฆณฺณติ. घिणि, घुणि आणि घणि (धातू) ग्रहण (पकडणे किंवा स्वीकारणे) या अर्थात. घिण्णति. घुण्णति. घण्णति. ฆุณ ฆุณฺณ คมเน. โฆณติ. ฆุณฺณติ. घुण आणि घुण्ण (धातू) गमन (जाणे) या अर्थात. घोणति. घुण्णति. ปณ พฺยวหาเร, ถุติยญฺจ. ปณติ วาณิโช, โวหารํ กโรติ อิจฺจตฺโถ. สทฺโธ พุทฺธํ ปณติ, โถมยติ อิจฺจตฺโถ, อาปณํ, สาปโณ คาโม. पण (धातू) व्यवहार (व्यापार) आणि स्तुती या अर्थात. पणति वाणिजो (व्यापारी व्यापार करतो) असा याचा अर्थ आहे. सद्धो बुद्धं पणति (श्रद्धाळू बुद्ध भगवंतांची स्तुती करतो) म्हणजेच गुणगान करतो असा याचा अर्थ आहे. आपणं (बाजार/दुकान), सापणो गामो (दुकान असलेला गाव). คณ รณ คติยํ. คณติ. รณติ. 'गण', 'रण' हे धातू गतीच्या (गमनाच्या) अर्थात. 'गणति', 'रणति'. จณ สณ ทาเน. จณติ. สณติ. 'चण', 'सण' हे धातू दानाच्या (देण्याच्या) अर्थात. 'चणति', 'सणति'. ผณ คติยํ. ผณติ. ผณํ. 'फण' धातू गतीच्या अर्थात. 'फणति'. 'फणं' (फणा). เวณุ ญาณจินฺตานิสามเนสุ. เวณติ. 'वेणु' (किंवा वेण) धातू ज्ञान, विचार आणि अवधानाच्या (ऐकण्याच्या) अर्थात. 'वेणति'. ปีณ ปีณเน. ปีณนํ ปริปุณฺณตา. ปีณติ. ปีโณ ทิวา น ภุญฺชติ, ปีโณรกฺขํสพาหุ. 'पीण' धातू तृप्त करण्याच्या (पुष्ट करण्याच्या) अर्थात. 'पीणन' म्हणजे परिपूर्णता. 'पीणति'. 'पीणो दिवा न भुञ्जति' (पुष्ट मनुष्य दिवसा जेवत नाही), 'पीणोरक्खंसबाहु' (राक्षसासारखे पुष्ट बाहू असलेला). มิณ หึสายํ. มิณติ. 'मिण' धातू हिंसेच्या अर्थात. 'मिणति'. ทุณ คติยญฺจ. หึสาเปกฺขโก จกาโร. ทุณติ. 'दुण' धातू गतीच्या आणि 'च' कारामुळे हिंसेच्याही अर्थात. 'दुणति'. สณ อพฺยตฺตสทฺเท. สณติ. สณเตว พฺรหฺมารญฺญํ. สณเตวาติ นทติ วิย. 'सण' धातू अस्पष्ट आवाजाच्या अर्थात. 'सणति'. 'सणतेव ब्रह्मारञ्ञं' (ब्रह्म-अरण्य गुंजत आहे). 'सणतेव' म्हणजे गर्जना करण्यासारखे (नाद करण्यासारखे). ตุณ โกฏิลฺเล. โตณติ. 'तुण' धातू कुटिलतेच्या (वाकडेपणाच्या) अर्थात. 'तोणति'. ปุณ นิปุเณ. ปุณติ, นิปุณติ. นิปุณธมฺโม. เอตฺถ จ นิปุณสณฺหสุขุมสทฺทา เววจนสทฺทา กุสลเฉกทกฺขสทฺทา วิยาติ ทฏฺฐพฺพํ. 'पुण' धातू निपुणतेच्या (कुशलतेच्या) अर्थात. 'पुणति', 'निपुणति'. 'निपुणधम्मो' (निपुण धम्म). आणि येथे 'निपुण', 'सण्ह' (मृदू) आणि 'सुखुम' (सूक्ष्म) हे शब्द 'कुसल' (कुशल), 'छेक' (चतुर) आणि 'दक्ख' (दक्ष) या शब्दांप्रमाणेच समानार्थी शब्द आहेत असे समजावे. มุณ ปฏิญฺญาเณ. มุณติ. 'मुण' धातू प्रतिज्ञा किंवा प्रतिज्ञानाच्या (स्वीकृतीच्या) अर्थात. 'मुणति'. กุณ สทฺโทปกรเณ. โกณติ. 'कुण' धातू आवाजाच्या किंवा नादाच्या साधनांच्या अर्थात. 'कोणति'. จุณ [Pg.62] เฉทเน. โจณติ. 'चुण' धातू छेदनाच्या (कापण्याच्या) अर्थात. 'चोणति'. มณ จาเค. เวรํ มณตีติ เวรมณิ. 'मण' धातू त्यागाच्या अर्थात. 'वेरं मणतीति वेरमणी' (वैराचा त्याग करणे म्हणजे वेरमणी/विरती होय). ผุณ วิกิรเณ วิธุนเน จ. ผุณติ. องฺคารกาสุํ อปเร ผุณนฺติ. 'फुण' धातू विखुरण्याच्या (विकिरण) आणि झटकण्याच्या (विधूनन) अर्थात. 'फुणति'. 'अङ्गारकासुं अपरे फुणन्ति' (इतर लोक निखाऱ्यांच्या खड्ड्याला विखुरतात). อิมานิ ณการนฺตธาตุรูปานิ. ही णकारान्त धातूंची रूपे आहेत. อิติ ภูวาทิคเณ ฏวคฺคนฺตธาตุรูปานิ अशा प्रकारे भूवादी गणातील ट-वर्गीय (ट, ठ, ड, ढ, ण) धातूंची रूपे สมตฺตานิ. समाप्त झाली. ตการนฺตธาตุ तकारान्त धातू. อถ ตวคฺคนฺตธาตุรูปานิ วุจฺจนฺเต – आता त-वर्गीय (त, थ, द, ध, न) धातूंची रूपे सांगितली जात आहेत - เต ปาลเน. ปาลนํ รกฺขณํ. ตายติ. ตาณํ, โคตฺตํ, นกฺขตฺตํ. อฆสฺส ตาตา. กิจฺเฉนาธิคตา โภคา, เต ตาโต วิธมิ ธมํ. ตตฺถ โคตฺตนฺติ คํ ตายตีติ โคตฺตํ. ‘‘โคตโม กสฺสโป’’ติ หิ อาทินา ปวตฺตมานํ คํ วจนํ พุทฺธิญฺจ ตายติ เอกํสิกวิสยตาย รกฺขตีติ โคตฺตํ. ยถา หิ พุทฺธิ อารมฺมณภูเตน อตฺเถน วินา น วตฺตติ, ตถา อภิธานํ อภิเธยฺยภูเตน, ตสฺมา โส โคตฺตสงฺขาโต อตฺโถ ตานิ ตายติ รกฺขตีติ วุจฺจติ. โก ปน โสติ? อญฺญกุลปรมฺปราสาธารณํ ตสฺส กุลสฺส อาทิปุริสสมฺมุทิตํ ตํกุลปริยาปนฺนสาธารณํ สามญฺญรูปํ. 'ते' (te) धातु पालनामध्ये (रक्षणात) आहे. पालन म्हणजे रक्षण. 'तायति' (रक्षण करतो). 'ताणं' (शरण/रक्षण), 'गोत्तं' (गोत्र), 'नक्खत्तं' (नक्षत्र). 'अघस्स ताता' (पापापासून रक्षण करणारे). 'किच्छेनाधिगता भोगा, ते तातो विधमि धमं' (कष्टाने प्राप्त केलेले भोग, त्या पित्याने फुंकून नष्ट केले). त्यामध्ये 'गोत्तं' (गोत्र) म्हणजे 'गं' (वाणी/बुद्धी) चे जे रक्षण करते ते 'गोत्र' होय. "गोतमो कस्सपो" इत्यादी रूपाने प्रवृत्त होणारी 'गं' म्हणजे वाणी आणि बुद्धीचे जे एकांतिक विषयभावाने रक्षण करते, ते 'गोत्र' होय. कारण जशी बुद्धी ही आलंबनभूत अर्थाशिवाय प्रवृत्त होत नाही, तसेच अभिधान (नाव) हे अभिधेय (अर्था) शिवाय प्रवृत्त होत नाही, म्हणून तो गोत्रसंज्ञक अर्थ त्यांचे रक्षण करतो असे म्हटले जाते. तो (गोत्र) म्हणजे काय? इतर कुलपरंपरेला साधारण असणारे, त्या कुलाच्या आदिपुरुषापासून उत्पन्न झालेले आणि त्या कुलात समाविष्ट असणारे साधारण सामान्य रूप होय. นกฺขตฺตนฺติ วิสมคติยา อคนฺตฺวา อตฺตโน วีถิยาว คมเนน นกฺขนํ คมนํ ตายติ รกฺขตีติ นกฺขตฺตํ, ตํ ปน อสฺสยุชาทิวเสน สตฺตวีสติวิธํ โหติ. ตถา หิ อสฺสยุโช [Pg.63] ภรณี กตฺติกา โรหณี มิคสิโร อทฺทา ปุนพฺพสุ ผุสฺโส อสฺสลิโส มาโฆ ปุพฺพผคฺคุณี อุตฺตรผคฺคุณี หตฺโถ จิตฺตํ สฺวาติ วิสาขา อนุราธา เชฏฺฐา มูลํ ปุพฺพาสฬฺหํ อุตฺตราสฬฺหํ สาวณํ ธนสิฏฺฐา สตภิสตฺตํ ปุพฺพภทฺทปทํ อุตฺตรภทฺทปทํ เรวตี จาติ สตฺตวีสติ นกฺขตฺตานิ. ตานิ ปน อตฺตโน คมนฏฺฐานํ อีสกมฺปิ น วิชหนฺติ กิญฺจิ สีฆํ กิญฺจิ ทนฺธํ, กทาจิ สีฆํ, กทาจิ ทนฺธํ, เอตฺโต อิโต จาติ เอวํ วิสมคติยา อคนฺตฺวา ยนฺตจกฺเก ปฏิปาฏิยา โยชิตานิ วิย สมปฺปมาณคติยา อตฺตโน วีถิยาว คจฺฉนฺตานิ มณฺฑลากาเรน สิเนรุํ ปริวตฺตนฺติ. เอวํ อิมานิ นกฺขนํ คมนํ ตายนฺติ รกฺขนฺตีติ นกฺขตฺตานีติ วุจฺจนฺติ. โปราณา ปน ขรธาตุวเสน ‘‘นกฺขรนฺติ น นสฺสนฺตีติ นกฺขตฺตานี’’ติ อาโวจุํ, ‘‘นกฺขตฺตํ โชติ ริกฺขํ ตํ’’ อิจฺเจตานิ นกฺขตฺตตารกานํ นามานิ. ‘‘อุฬุ ตารา ตารกา’’ติ อิมานิ ปน สพฺพาสมฺปิ ตารกานํ สาธารณนามานิ. โอสธีติ ปน ตารกาวิเสสสฺส นามํ. 'नक्खत्तं' (नक्षत्र) म्हणजे विषम गतीने न जाता आपल्याच मार्गाने (वीथीने) जाण्याद्वारे 'नक्खन' (गमन/चालणे) चे जे रक्षण करते ते 'नक्षत्र' होय. ते अश्विनी इत्यादींच्या भेदाने सत्तावीस प्रकारचे असते. जसे की - अस्सयुज (अश्विनी), भरणी, कत्तिका (कृत्तिका), रोहिणी, मिगसिर (मृगशीर्ष), अद्दा (आर्द्रा), पुनब्बसु (पुनर्वसू), फुस्स (पुष्य), अस्सलीस (आश्लेषा), माघ (मघा), पुब्बफग्गुणी (पूर्वाफाल्गुनी), उत्तरफग्गुणी (उत्तराफाल्गुनी), हत्थ (हस्त), चित्त (चित्रा), स्वाती, विशाखा, अनुराधा, जेट्ठा (ज्येष्ठा), मूल (मूळ), पुब्बासळ्ह (पूर्वाषाढा), उत्तरासळ्ह (उत्तराषाढा), सावण (श्रावण), धनिठ्ठा (धनिष्ठा), सतभिसत्त (शतभिषा), पुब्बभद्दपद (पूर्वाभाद्रपदा), उत्तरभद्दपद (उत्तराभाद्रपदा) आणि रेवती - ही सत्तावीस नक्षत्रे आहेत. ती आपल्या गमनाच्या स्थानाला थोडेही सोडत नाहीत; काही जलद, काही मंद, कधी जलद, कधी मंद, इकडून तिकडे अशा विषम गतीने न जाता, यंत्रचक्रात क्रमाने जोडल्याप्रमाणे समान गतीने आपल्याच मार्गाने जात वर्तुळाकारात सुमेरू पर्वताची प्रदक्षिणा करतात. अशा प्रकारे ही 'नक्खन' म्हणजे गमनाचे रक्षण करतात म्हणून त्यांना 'नक्षत्रे' (नक्खत्तानि) असे म्हणतात. प्राचीन आचार्यांनी मात्र 'खर' धातूवरून "नक्खरन्ति न नस्सन्तीति नक्खत्तानि" (जे क्षीण होत नाहीत, नष्ट होत नाहीत ते नक्षत्र) असे म्हटले आहे. "नक्खत्तं, जोति, रिक्खं, तं" ही नक्षत्रांच्या ताऱ्यांची नावे आहेत. "उळु, तारा, तारका" ही सर्वच ताऱ्यांची सामान्य नावे आहेत. 'ओसधी' हे एका विशिष्ट ताऱ्याचे नाव आहे. จิติ สญฺญาเณ. สญฺญาณํ จิหนํ ลกฺขณกรณํ. เจตติ. จิหนํ กโรตีติ อตฺโถ. อีการนฺตวเสน วุตฺตตฺตา อสฺมา ธาตุโต สกิ สงฺกายนฺติ ธาตุโต วิย นิคฺคหีตาคโม น โหติ. เอส นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ. 'चिति' (citi) धातु संज्ञान (चिन्ह किंवा लक्षण करणे) या अर्थात आहे. संज्ञान म्हणजे चिन्ह किंवा लक्षण करणे. 'चेतति' (cetati) म्हणजे चिन्ह करतो असा अर्थ आहे. ईकारान्त रूपाने सांगितल्यामुळे या धातूपासून 'सकि' आणि 'सङ्कायति' धातूंप्रमाणे निग्गहीत (अनुस्वार) चा आगम होत नाही. इतरही अशाच ठिकाणी हाच नियम लागू होतो. ปต คติยํ. ปตติ. ปปตติ ปปาตํ, ปปเตยฺยหํ. ปาปตฺตํ นิรยํ ภุสํ. อหํสทฺเทน โยเชตพฺพํ, ปาปตฺตํ ปปติโตสฺมีติ อตฺโถ. ปาปตฺถ นิรยํ ภุสํ, โสกุมาโรติ โยเชตพฺพํ, ปาปตฺถ ปปติโตติ อตฺโถ. ปโรกฺขาปทญฺหิเอตํ ทฺวยํ. ‘‘ปาวทํ ปาวทา’’ติอาทีสุ วิย อุปสคฺคปทสฺส ทีฆภาโว, ตโต อํสทฺทสฺส ตฺตํอาเทโส, อสทฺทสฺส จ ตฺถาเทโส ภวติ. อจินฺเตยฺโย หิ ปาฬินโย. 'पत' (pata) धातु गती या अर्थात आहे. 'पतति' (पडतो/जातो). 'पपतति' (पडतो), 'पपातं' (कडा/घळ), 'पपतेय्यहं' (मी पडावे). 'पापत्तं nirayaṃ bhusaṃ' (मी अत्यंत तीव्र नरकात पडलो). येथे 'अहं' (मी) शब्दाशी संबंध जोडला पाहिजे, 'पापत्तं' म्हणजे 'मी पडलो आहे' असा अर्थ आहे. 'पापत्थ nirayaṃ bhusaṃ' (तुम्ही अत्यंत तीव्र नरकात पडलात), येथे 'सुकुमार' (सॉकुमारो) शब्दाशी संबंध जोडला पाहिजे, 'पापत्थ' म्हणजे 'तुम्ही पडलात' असा अर्थ आहे. कारण हे दोन्ही परोक्ष (भूतकाळाचे) पद आहेत. "पावदं पावदा" इत्यादींप्रमाणे उपसर्ग पदाचा दीर्घभाव होतो, त्यानंतर 'अं' शब्दाचा 'त्तं' आदेश आणि 'अ' शब्दाचा 'त्थ' आदेश होतो. कारण पाळी भाषेचा नियम अचिंत्य आहे. อต [Pg.64] สาตจฺจคมเน. สาตจฺจคมนํ นิรนฺตรคมนํ. อตติ. ยสฺมา ปน อตธาตุ สาตจฺจคมนตฺถวาจิกา, ตสฺมา ภวาภวํ ธาวนฺโต ชาติชราพฺยาธิมรณาทิเภทํ อเนกวิหิตํ สํสารทุกฺขํ อตติ สตตํ คจฺฉติ ปาปุณาติ อธิคจฺฉตีติ อตฺตาติปิ นิพฺพจนมิจฺฉิตพฺพํ. อตฺถนฺตรวเสน ปน ‘‘อาหิโต อหํมาโน เอตฺถาติ อตฺตา, อตฺตภาโว’’ติ จ ‘‘สุขทุกฺขํ อทติ อนุภวตีติ อตฺตา’’ติ จ ‘‘อตฺตมโนติ ปีติโสมนสฺเสน คหิตมโน’’ติ จ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ, ยตฺถ ยตฺถ ยถา ยถา อตฺโถ ลพฺภติ, ตตฺถ ตตฺถ ตถา ตถา อตฺถสฺส คเหตพฺพโตติ. 'अत' (ata) धातु सातत्यपूर्ण गती (निरंतर गमन) या अर्थात आहे. 'अतति' (निरंतर जातो). ज्याअर्थी 'अत' धातु सातत्यपूर्ण गतीच्या अर्थाचा वाचक आहे, त्याअर्थी भव-अभावात (पुनर्जन्मात) धावणारा, जन्म, जरा, व्याधी, मरण इत्यादी भेदांनी युक्त अशा अनेक प्रकारच्या संसारदुःखाला 'अतति' म्हणजे सतत प्राप्त करतो, मिळवतो, म्हणून त्याला 'अत्ता' (आत्मा/स्व) असेही निरुक्तीच्या नियमाने मानले पाहिजे. इतर अर्थांच्या भेदाने मात्र - "ज्यामध्ये अहंभाव (मी-पणा) स्थापित केला जातो तो 'अत्ता' (आत्मा/आत्मभाव)" आणि "जो सुख-दुःखाचा 'अदति' म्हणजे अनुभव घेतो तो 'अत्ता'" आणि "अत्तमनो म्हणजे प्रीती व सोमनस्याने (आनंदाने) युक्त मन असलेला" असा अर्थ समजला पाहिजे. जेथे जेथे जसा जसा अर्थ प्राप्त होतो, तेथे तेथे तसा तसा अर्थ ग्रहण केला पाहिजे. จุต อาเสจเน ขรเณ จ. โจตติ. 'चुत' (cuta) धातु सिंचन करणे (आसेचन) आणि गळणे (झरणे/क्षरण) या अर्थात आहे. 'चोतति' (cotati - गळतो/सिंचन करतो). อติ พนฺธเน. อนฺตติ. อนฺตํ. อนฺติยติพนฺธิยติ อนฺตคุเณนาติ อนฺตํ. อิธ อนฺต สทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร วุจฺจเต ‘‘อนฺตํ อนฺตคุณํ อุทริย’’นฺติ เอตฺถ ทฺวตฺตึสาการนฺโตคธํ กุณปนฺตํ อนฺตํ นาม. ‘‘กายพนฺธนสฺส อนฺโต ชีรติ. หริตนฺตํ วา’’ติ เอตฺถ อนฺติมมริยาทนฺโต อนฺโต นาม. ‘‘อนฺตมิทํ ภิกฺขเว ชีวิกาน’’นฺติ เอตฺถ ลามกนฺโต. ‘‘สกฺกาโย เอโก อนฺโต’’ติ เอตฺถ โกฏฺฐาสนฺโต. ‘‘เอเสวนฺโต ทุกฺขสฺส สปฺปจฺจยสงฺขยา’’ติ เอตฺถ โกฏนฺโต. อิจฺเจวํ – 'अति' (ati) धातु बांधणे या अर्थात आहे. 'अन्तति' (बांधतो). 'अन्तं' (आतडे/अंत). जे अंतगुणाने (आतड्याच्या वेढ्याने) बांधले जाते ते 'अन्तं' (आतडे) होय. येथे 'अन्त' शब्दाच्या अर्थाचा विस्तार सांगितला जात आहे - "अन्तं अन्तगुणं उदरियं" (आतडे, आतड्याचे वेढे, जठर) यामध्ये बत्तीस प्रकारच्या शरीराच्या अवयवांमध्ये समाविष्ट असलेले कुणप-अन्त (घाणेरडे आतडे) हे 'अन्त' नावाचे आहे. "कायबंधनाचा अन्त (शेवट) जीर्ण होतो. किंवा हिरवा अन्त" येथे अंतिम मर्यादा असलेला 'अन्त' (शेवट) नावाचा आहे. "अन्तमिदं भिक्खवे जीविकानं" (हे भिक्खूंनो, उपजीविकांमध्ये हे निकृष्ट आहे) येथे 'अन्त' म्हणजे लामक (निकृष्ट/कनिष्ठ) अर्थ आहे. "सक्कायो एको अन्तो" (सत्काय हा एक भाग आहे) येथे 'अन्त' म्हणजे कोठ्ठहास (भाग/पक्ष) अर्थ आहे. "एसेवन्तो दुक्खस्स सप्पच्चयसङ्खया" (हाच प्रत्ययांच्या क्षयाने दुःखाचा अंत आहे) येथे 'अन्त' म्हणजे कोटी (शेवटची सीमा/कोटी) अर्थ आहे. अशा प्रकारे - กุณปนฺตํ [Pg.65] อนฺติมญฺจ, มริยาโท จ ลามกํ; โกฏฺฐาโส โกฏิ’เม อตฺโถ, อนฺตสทฺเทน ภาสิตา. कुणप-अन्त (घाणेरडे आतडे), अंतिम (शेवट), मर्यादा, लामक (निकृष्ट), कोठ्ठहास (भाग) आणि कोटी (सीमा) - हे अर्थ 'अन्त' शब्दाने सांगितले आहेत. กิต นิวาเส โรคาปนยเน จ. เกตติ. สาเกตํ น ครํ, นิเกโต, นิเกตํ ปาวิสิ. อาโมทมาโน คจฺฉติ สนฺนิเกตํ. ติกิจฺฉติ, จิกิจฺฉติ, จิกิจฺฉา, จิกิจฺฉโก. ตตฺถ สาเกตนฺติ สายํ คหิตวสนฏฺฐานตฺตา สาเกตํ, ยํสทฺทโลโป. 'कित' (kita) धातु निवास करणे आणि रोग दूर करणे (रोगापनयन) या अर्थात आहे. 'केतति' (ketati). 'साकेतं' नगर, 'निकेतो' (निवास), 'निकेतं पाविसि' (घरात प्रवेश केला). 'आमोदमानो गच्छति सन्निकेतं' (आनंदित होऊन घराकडे जातो). 'तिकिच्छति' (उपचार करतो), 'चिकिच्छति' (उपचार करतो), 'चिकिच्छा' (वैद्यकीय उपचार/चिकित्सा), 'चिकिच्छको' (वैद्य/चिकित्सक). त्यामध्ये 'साकेत' म्हणजे संध्याकाळी राहण्याचे स्थान ग्रहण केल्यामुळे 'साकेत' असे म्हटले जाते, येथे 'यं' शब्दाचा लोप झाला आहे. ยต ปติยตเน. ปติยตนํ วายามกรณํ. ยตติ. ยติ, ยตวา, ปยตนํ, อายตนํ, โลกายตํ. เอตฺถ อายตนนฺติ อายตนโต อายตนํ, จกฺขุรูปาทีนิ. เอตานิ หิ ตํทฺวารารมฺมณจิตฺตเจตสิกา ธมฺมา เสน เสน อนุภวนาทิกิจฺเจน อายตนฺติ อุฏฺฐหนฺติ ฆฏนฺติ วายมนฺติ เอเตสูติ ‘‘อายตนานี’’ติ วุจฺจนฺติ. เอตฺถ ปน นีตนุธาตูนํ วเสนปิ อายตนสทฺทตฺโถ วตฺตพฺโพ สิยา, โส อุตฺตริ อาวิภวิสฺสติ. 'यत' (yata) धातु प्रयत्न करणे (पतियतन) या अर्थात आहे. पतियतन म्हणजे व्यायाम (प्रयत्न) करणे. 'यतति' (प्रयत्न करतो). 'यति' (संयमी/साधू), 'यतवा' (प्रयत्नशील), 'पयतनं' (प्रयत्न), 'आयतनं' (आयतन), 'लोकायतं' (लोकायत). येथे 'आयतन' म्हणजे आयतन (विस्तार/स्थान) पासून आयतन, जसे चक्षु-रूप इत्यादी. कारण हे त्या त्या द्वाराच्या आणि आलंबनाच्या चित्त आणि चैतसिक धर्म आपापल्या अनुभव इत्यादी कार्याने 'आयतन' म्हणजे उत्पन्न होतात, घटतात किंवा प्रयत्न करतात, म्हणून त्यांना 'आयतन' (आयतनानी) असे म्हणतात. येथे 'नी' आणि 'तनु' धातूंच्या आधारे देखील 'आयतन' शब्दाचा अर्थ सांगितला जाऊ शकतो, तो पुढे स्पष्ट होईल. อายตนสทฺโท นิวาสฏฺฐาเน อากเร สโมสรณฏฺฐาเน สญฺชาติเทเส การเณ จ. ตถา หิ ‘‘โลเก อิสฺสรายตนํ วาสุเทวายตน’’นฺติอาทีสุ นิวาสฏฺฐาเน อายตนสทฺโท วตฺตติ. ‘‘สุวณฺณายตนํ รชตายตน’’นฺติอาทีสุ อากเร. สาสเน ปน ‘‘มโนรเม อายตเน, เสวนฺติ นํ วิหงฺคมา’’ติอาทีสุ สโมสรณฏฺฐาเน. ‘‘ทกฺขิณาปโถ คุนฺนํ อายตน’’นฺติอาทีสุ สญฺชาติเทเส. ‘‘ตตฺร ตตฺเรว สกฺขิภพฺพตํ ปาปุณาติ สติ สติอายตเน’’ติอาทีสุ การเณ วตฺตตีติ [Pg.66] เวทิตพฺโพ. โส จ นานาปวตฺตินิมิตฺตวเสน คเหตพฺโพ. 'आयतन' शब्द निवासस्थान, खाण (आकर), समवसरण स्थान (एकत्र येण्याचे स्थान), उत्पत्तीचे स्थान (संजात देश) आणि कारण या अर्थांमध्ये वापरला जातो. जसे की, "लोके इस्सरायतनं वासुदेवायतनं" इत्यादींमध्ये निवासस्थान या अर्थात 'आयतन' शब्द वापरला जातो. "सुवण्णायतनं रजतायतनं" इत्यादींमध्ये खाण (आकर) या अर्थात. बुद्धशासनात मात्र "मनोरमे आयतने, सेवन्ति नं विहङ्गमा" इत्यादींमध्ये समवसरण स्थान (एकत्र येण्याचे स्थान) या अर्थात. "दक्खिणापथो गुन्नं आयतनं" इत्यादींमध्ये उत्पत्तीचे स्थान या अर्थात. "तत्र तत्रेव सक्खिभब्बतं पापुणाति सति सतिआयतने" इत्यादींमध्ये कारण या अर्थात वापरला जातो, असे जाणावे. आणि तो विविध प्रवृत्तीच्या निमित्ताने ग्रहण केला पाहिजे. นิวาเส อากาเร เจว, ชาติเทเส จ การเณ; สโมสรณฏฺฐาเน จ, อายตนรโว คโต. निवासस्थान, खाण (आकार), उत्पत्तीचे स्थान (जाती देश), कारण आणि समवसरण स्थान (एकत्र येण्याचे स्थान) या अर्थांमध्ये 'आयतन' हा शब्द प्रसिद्ध आहे. โลกายตํ นาม ‘‘สพฺพํ อุจฺฉิฏฺฐํ, สพฺพํ นุจฺฉิฏฺฐํ. เสโต กาโก, กาโฬ พโก อิมินา จ อิมินา จ การเณนา’’ติ เอวมาทินิรตฺถกการณปฏิสํยุตฺตํ ติตฺถิยสตฺถํ, ยํ โลเก ‘‘วิตณฺฑสตฺถ’’นฺติ วุจฺจติ, ยญฺจ สนฺธาย โพธิสตฺโต อสมธุโร วิธุรปณฺฑิโต ‘‘น เสเว โลกายติกํ, เนตํ ปญฺญาย วฑฺฒน’’นฺติ อาห. อายตึ หิตํ เตน โลโก น ยตติ น อีหตีติ โลกายตํ, กินฺตํ? วิตณฺฑสตฺถํ. ตญฺหิ คนฺถํ นิสฺสาย สตฺตา ปุญฺญกฺริยาย จิตฺตมฺปิ น อุปฺปาเทนฺติ. อญฺญตฺถาปิ หิ เอวํ วุตฺตํ ‘‘โลกายตสิปฺปนฺติ ‘กาโก เสโต, อฏฺฐีนํ เสตตฺตา, พลากา รตฺตา, โลหิตสฺส รตฺตตฺตา’ติ เอวมาทินยปฺปวตฺตํ ปรโลกนิพฺพานานํ ปฏิเสธกํ วิตณฺฑสตฺถสิปฺป’’นฺติ. लोकायत म्हणजे 'सर्व उच्छिष्ट आहे, सर्व अनुच्छिष्ट आहे. कावळा पांढरा आहे, बगळा काळा आहे, या आणि या कारणामुळे' अशा प्रकारच्या निरर्थक कारणांशी संबंधित असलेले तीर्थिक शास्त्र (पाखंडी शास्त्र) होय, ज्याला जगात 'वितंडशास्त्र' म्हटले जाते. आणि ज्याचा संदर्भ घेऊन अद्वितीय अशा विधुरपंडित बोधिसत्त्वांनी म्हटले होते: 'लोकायताचे सेवन करू नये, कारण हे प्रज्ञेची वृद्धी करणारे नाही.' ज्याच्याद्वारे लोक भविष्यातील हितासाठी प्रयत्न करत नाहीत किंवा इच्छा करत नाहीत, ते लोकायत होय. ते काय आहे? वितंडशास्त्र. कारण त्या ग्रंथाचा आश्रय घेऊन प्राणी पुण्यकर्मासाठी चित्तही उत्पन्न करत नाहीत. इतर ठिकाणीही असे म्हटले आहे: 'लोकायताचे शिल्प म्हणजे—कावळा पांढरा असतो कारण हाडे पांढरी असतात, बगळा लाल असतो कारण रक्त लाल असते—अशा प्रकारे चालणारे, परलोक आणि निर्वाणाचा निषेध करणारे वितंडशास्त्र-शिल्प होय.' ยุต ชุต ภาสเน. ภาสนํ อุทีรณํ. โยตติ. โชตติ. युत (युत्) आणि जुत (जुत्) हे धातू भाषणाच्या (उच्चारणाच्या) अर्थात आहेत. भाषण म्हणजे उच्चारण. योतति, जोतति. ชุตทิตฺติยํ. โชตติ, วิชฺโชตติ. ชุติ, โชติ. การิเต ‘‘โชเตติ, โชตยิตฺวาน สทฺธมฺม’’นฺติ ปโยคา. เอตฺถ จ ชุตีติ อาโลโก สิริ วา. โชตีติ ปตาโป. อถ วา โชตีติ จนฺทาทีนิ. วุตฺตมฺปิ เจต สิริมาวิมาน วตฺถุอฏฺฐกถายํ ‘‘โชตีติ จนฺทิมสูริยนกฺขตฺตตารกานํ สาธารณนาม’’นฺติ. อถ วา ‘‘โชติ โชติปรายโณ’’ติ วจนโต โย โกจิ โชตติ ขตฺติยกุลาทีสุ ชาตตฺตา จ รูปโสภายุตฺตตฺตา จ, โส ‘‘โชตี’’ติ วุจฺจติ. जुत (जुत्) हा दीप्ती (चमकणे) या अर्थात आहे. जोतति (तो चमकतो), विज्जोतति (तो विशेष चमकतो). जुति, जोति (दीप्ती/प्रकाश). प्रयोजक रूपात (कारित) 'जोतेति' (तो प्रकाशित करतो), 'जोतयित्वान सद्धम्मं' (सद्धम्माला प्रकाशित करून) असे प्रयोग आहेत. येथे 'जुति' म्हणजे प्रकाश किंवा शोभा (श्री). 'जोति' म्हणजे प्रताप. किंवा 'जोति' म्हणजे चंद्र इत्यादी. सिरिमाविमानवत्थुच्या अट्ठकथेतही असे म्हटले आहे: 'जोति हे चंद्र, सूर्य, नक्षत्र आणि ताऱ्यांचे साधे (साधारण) नाव आहे.' किंवा 'जोति जोतिपरायणो' (जो प्रकाशाकडून प्रकाशाकडे जाणारा आहे) या वचनावरून, जो कोणी क्षत्रियकुळ इत्यादींमध्ये जन्मल्यामुळे आणि रूपसौंदर्याने युक्त असल्यामुळे चमकतो, त्याला 'जोति' म्हटले जाते. สิต [Pg.67] วณฺโณ. สิตธาตุ เสตวณฺเณ วตฺตติ. กิญฺจาเปตฺถ วณฺณสามญฺญํ วุตฺตํ, ตถาปิ อิธ นีลปีตาทีสุ เสตวณฺโณเยว คเหตพฺโพ ปโยคทสฺสนวเสน. เสตติ. เสตํ วตฺถํ. วาจฺจลิงฺคตฺตา ปน เสตสทฺโท ติลิงฺโค คเหตพฺโพ. सित म्हणजे वर्ण (रंग). सित धातू श्वेत (पांढऱ्या) वर्णाच्या अर्थात वापरला जातो. जरी येथे सामान्य वर्णाचा उल्लेख केला असला, तरी प्रयोगाच्या दर्शनानुसार येथे निळ्या, पिवळ्या इत्यादींऐवजी केवळ श्वेत (पांढरा) वर्णच ग्रहण केला पाहिजे. सेतति (तो पांढरा होतो). सेतं वत्थं (पांढरे वस्त्र). विशेष्यलिंगी (वाच्यलिंगी) असल्यामुळे 'सेत' हा शब्द तिन्ही लिंगांत ग्रहण करावा. เสตํ สิตํ สุจิ สุกฺกํ, ปณฺฑรํ ธวลมฺปิ จ; อกณฺหํ โครโมทาตํ, เสตนามานิ โหนฺติ หิ. सेतं, सितं, सुचि, सुक्कं, पंडरं, धवलं, अकण्हं, गोरं आणि ओदातं—ही सर्व पांढऱ्या रंगाची (श्वेत रंगाची) नावे आहेत. วตุ วตฺตเน. วตฺตติ, ปวตฺตติ, สํวตฺตติ, อนุวตฺตติ, ปริวตฺตติ. ปวตฺตํ. वतु (वत्) हा धातू वर्तनाच्या (अस्तित्वात असणे/फिरणे) अर्थात आहे. वत्तति (तो वर्ततो/चालतो), पवत्तति (तो प्रवृत्त होतो), संवत्तति (तो संवर्तित होतो), अनुवत्तति (तो अनुवर्तन करतो), परिवत्तति (तो परिवर्तन करतो). पवत्तं (प्रवृत्त/प्रवृत्ती). กิโลต อทฺทภาเว. อทฺทภาโว ตินฺตภาโว. กิโลตติ, ปกิโลตติ, เตเมตีติ อตฺโถ. การิเต ปกิโลเตติ, ปกิโลตยติ. อุณฺโหทกสฺมึ ปกิโลตยิตฺวา, เตเมตฺวาติ อตฺโถ. किलोत (किलोत्) हा धातू आर्द्रभावाच्या (ओले होण्याच्या) अर्थात आहे. आर्द्रभाव म्हणजे ओले असणे. किलोतति, पकिलोतति—याचा अर्थ 'तो ओला करतो/भिजवतो' असा आहे. प्रयोजक रूपात 'पकिलोतेति', 'पकिलोतयति' असे होते. 'उण्होदकस्मिं पकिलोतयित्वा' म्हणजे गरम पाण्यात भिजवून (ओले करून) असा अर्थ आहे. วต ยาจเน. วตติ. वत (वत्) हा धातू याचना करण्याच्या (मागण्याच्या) अर्थात आहे. वतति (तो याचना करतो). กิต ญาเณ. เกตติ. เกตนํ, เกตโก, สงฺเกโต. कित (कित्) हा धातू ज्ञानाच्या अर्थात आहे. केतति (तो जाणतो). केतनं (ध्वज/घर), केतको (केतकी), संकेतो (संकेत). กติ สุตฺตชนเน. สุตฺตํ กนฺตติ. कति (कत्) हा धातू सूत तयार करण्याच्या (कातण्याच्या) अर्थात आहे. सुत्तं कन्तति (तो सूत काततो). กติ เฉทเน. มํสํ กนฺตติ, วิกนฺตติ, อโยกนฺโต. สลฺลกนฺโต มหาวีโร. มา โน อชฺช วิกนฺตึสุ, รญฺโญ สูทา มหานเส. कति (कत्) हा धातू छेदनाच्या (कापण्याच्या) अर्थात आहे. मंसं कन्तति (तो मांस कापतो), विकन्तति (तो विशेष कापतो), अयोकन्तो (लोहचुंबक/लोखंड कापणारा). सल्लकन्तो महावीरो (शल्यचिकित्सक महावीर). 'मा नो अज्ज विकन्तिंसु, रञ्ञो सूदा महानसे' (राजाच्या स्वयंपाकघरातील आचाऱ्यांनी आज आम्हास कापू नये). จตี หึสาคนฺเธสุ. อีการนฺตตฺตา อิมสฺมา นิคฺคหีตาคโม น โหติ. จตติ. चती (चत्) हा धातू हिंसा आणि गंध (वास घेणे/सूचकता) या अर्थांत आहे. ई-कारान्त असल्यामुळे या धातूमध्ये निग्गहीत (अनुस्वार) आगम होत नाही. चतति (तो हिंसा करतो/वास घेतो). ตการนฺตธาตุรูปานิ. त-कारान्त धातूंची रूपे. ถการนฺตธาตุ थ-कारान्त धातू. ถา [Pg.68] คตินิวตฺติยํ. ถาติ. อวตฺถา, ววตฺถานํ, ววตฺถิตํ, วนโถ. ‘‘เฉตฺวา วนํ วนถญฺจา’’ติ เอตฺถ หิ มหนฺตา รุกฺขา วนํ นาม, ขุทฺทกา ปน ตสฺมึ วเน ฐิตตฺตา วนโถ นาม วุจฺจนฺติ. था (ठा) हा धातू गतीच्या निवृत्तीच्या (थांबण्याच्या) अर्थात आहे. ठाति (तो थांबतो). अवस्था, ववत्थानं (व्यवस्थापन/निश्चय), ववत्थितं (व्यवस्थित/निश्चित), वनथो (जंगल/तृष्णा). 'छेत्वा वनं वनथञ्च' (वन आणि वनथ कापून) येथे मोठे वृक्ष म्हणजे 'वन' होय, आणि त्या वनात असलेले लहान वृक्ष (किंवा झुडपे) 'वनथ' म्हटले जातात. ถุ ถุติยํ. ถวติ, อภิตฺถวติ. ถวนา, อภิตฺถวนา, ถุติ, อภิตฺถุติ. थु (थु) हा धातू स्तुतीच्या अर्थात आहे. thवति (तो स्तुती करतो), अभित्थवति (तो पूर्णपणे स्तुती करतो). थवना (स्तुती), अभित्थवना (विशेष स्तुती), थुति (स्तुती), अभित्थुति (विशेष स्तुती). ยทิ หิ รูปินี สิยา, ปญฺญา เม วสุมตี น สเมยฺย; อโนมทสฺสิสฺส ภควโต, ผลเมตํ ญาณถวนาย. जर माझी प्रज्ञा रूपवान (मूर्तिमंत) असती, तर ही पृथ्वी देखील तिच्या समान होऊ शकली नसती; हे अनोमदस्सी भगवंतांच्या ज्ञान-स्तुतीचे फळ आहे. เตหิ ถุติปฺปสตฺโถ โส, เยนิทํ ถวิตํ ญาณํ, พุทฺธเสฏฺโฐ จ โถมิโต. ตตฺร ถวนาติ ปสํสนา. ปสํสาย หิ อเนกานิ นามานิ. त्यांच्याद्वारे तो स्तुतीने प्रशंसित आहे, ज्याने हे ज्ञान स्तुत केले आहे आणि बुद्धश्रेष्ठांची प्रशंसा केली आहे. तेथे 'थवना' म्हणजे प्रशंसा होय. कारण प्रशंसेची अनेक नावे आहेत. ถวนา จ ปสํสา จ, สิลาฆา วณฺณนา ถุติ; ปนุติ โถมนา วณฺโณ, กตฺถนา คุณกิตฺตนํ; थवना, पसंसा (प्रशंसा), सिलाघा, वण्णना, थुति, पनुति, थोमना, वण्णो, कत्थना आणि गुणकित्तनं (ही प्रशंसेची नावे आहेत). เถ สทฺทสงฺฆาเตสุ. ถียติ, ปติตฺถียติ. ถี. อตฺริมา ปาฬิโย – อภิสชฺชติ กุปฺปติ พฺยาปชฺชติ ปติตฺถียติ, โกปญฺจ โทสญฺจ อปฺปจฺจยญฺจ ปาตุกโรติ. ถิโย นํ ปริภาสึสูติ. ตตฺร ‘‘ถียติ ปติตฺถียตี’’ติมานิ เอการสฺสียาเทสวเสน สมฺภูตานิ. ถียติ สงฺฆาตํ คจฺฉติ คพฺโภ เอติสฺสาติ ถี. อาจริยา ปน อิตฺถีสทฺทสฺเสว เอวํ นิพฺพจนํ วทนฺติ, น ถีสทฺทสฺส. थे (थे) हा धातू शब्द आणि संघात (एकत्र येणे) या अर्थांत आहे. थीयति (तो एकत्र येतो/स्तब्ध होतो), पतिट्ठीयति (तो प्रति-स्तब्ध होतो). थी. येथे या पाळी (वचने) आहेत—'अभिसज्जति कुप्पति ब्यापज्जति पतिट्ठीयति, कोपञ्च दोसञ्च अप्पच्चयञ्च पातुकरोति' (तो आसक्त होतो, क्रुद्ध होतो, बिघडतो, स्तब्ध होतो, आणि राग, द्वेष व असंतोष प्रकट करतो). 'थियो नं परिभासिंसु' (स्त्रियांनी त्याची निर्भत्सना केली). तेथे 'थीयति पतिट्ठीयति' ही रूपे 'ए' काराच्या जागी 'ई' आदेश झाल्यामुळे निर्माण झाली आहेत. 'थीयति संघातं गच्छति गब्भो एतिस्साति थी' (जिच्यामध्ये गर्भ एकत्र येतो किंवा स्थिर होतो, ती 'थी' होय). परंतु आचार्य 'इत्थी' शब्दाचीच अशी व्युत्पत्ती सांगतात, 'थी' शब्दाची नाही. คพฺโภ ถียติ เอติสฺสา, อิติ ถี อิติ โน รุจิ; คพฺโภ ถียติ เอติสฺสา, อิติ อิตฺถีติ อาจริยา. 'जिच्यामध्ये गर्भ स्थिर होतो (एकत्र येतो) ती थी' हे आम्हाला मान्य नाही; 'जिच्यामध्ये गर्भ स्थिर होतो ती इत्थी' असे आचार्य म्हणतात. เตสํ สุทุกฺกโรวาเท, ‘‘อิตฺถี’’ติ ปทสมฺภโว; อยํ วินิจฺฉโย ปตฺโต, นิจฺฉยํ โภ สุณาถ เม. त्यांच्या अत्यंत कठीण उपदेशात 'इत्थी' या पदाची उत्पत्ती कशी झाली, याविषयीचा हा निर्णय प्राप्त झाला आहे. हे महाशयांनो, माझा हा निश्चय ऐका. ถีสทฺเทน [Pg.69] สมานตฺโถ, อิตฺถีสทฺโท ยโต ตโต; ถีสทฺเท ลพฺภมานตฺถํ, อิตฺถีสทฺทมฺหิ โรปิย. ज्या अर्थी 'इत्थी' शब्द 'थी' शब्दाशी समान अर्थाचा आहे, त्या अर्थी 'थी' शब्दात मिळणारा अर्थ 'इत्थी' शब्दात आरोपित करून— อปฺปานํ พหุตา ญาเย, คหิเต สติ ยุชฺชติ; ตถา หิ ‘‘ทฺเว ทุเว, ตณฺหา, ตสิณา’’ติ นิทสฺสนํ. अल्पाचे बहुत्वात परिवर्तन होण्याच्या नियमाने ग्रहण केले असता ते योग्य ठरते; जसे की 'द्वे' चे 'दुवे' आणि 'तण्हा' चे 'तसिणा' हे उदाहरण आहे. อถ วา ปน ‘‘อิตฺถี’’ติ-อิทํ วณฺณาคมาทิโต; นิรุตฺติลกฺขเณนาปิ, สิชฺฌตีติ ปกาสเย. किंवा 'इत्थी' हा शब्द वर्णागम (अक्षराचा आगम) इत्यादींद्वारे निरुक्त-लक्षणाने देखील सिद्ध होतो, असे स्पष्ट करावे. อิจฺฉตีติ นเร อิตฺถี, อิจฺฉาเปตีติ วา ปน; อิทํ นิพฺพจนญฺจาปิ เญยฺยํ นิพฺพจนตฺถินา. जी पुरुषांची इच्छा करते ती 'इत्थी', किंवा जी पुरुषांना इच्छा करायला लावते ती 'इत्थी'; व्युत्पत्तीची इच्छा करणाऱ्याने हे देखील निर्वचन जाणावे. อตฺริมานิ อิตฺถีนมภิธานานิ – येथे स्त्रियांची ही नावे (समानार्थी शब्द) आहेत— อิตฺถี ถี วนิตา นารี, อพลา ภีรุ สุนฺทรี; กนฺตา สีมนินี มาตุ-คาโม ปิยา จ กามินี. इत्थी, थी, वनिता, नारी, अबला, भीरु, सुन्दरी, कन्ता, सीमनिनी, मातुगामो, पिया आणि कामिनी (ही स्त्रियांची नावे आहेत). รมณี ปมทา ทยิตา, ลลนา มหิลา’งฺคนา; ตาสํเยว จ นามานิ, อวตฺถาโต อิมานิปิ. रमणी, प्रमदा, दयिता, ललना, महिला आणि अंगना; ही सर्व तिचीच नावे आहेत, आणि ही देखील तिच्या अवस्थेनुसार (वयानुसार) होतात. โครี จ ทาริกา กญฺญา, กุมารี จ กุมาริกา; ยุวตี ตรุณี มาณ-วิกา เถรี มหลฺลิกา. गोरी, दारिका, कञ्ञा, कुमारी, कुमारिका, युवती, तरुणी, माणविका, थेरी आणि महल्लिका. ตถา หิ อฏฺฐวสฺสิกา โครีติปิ ทาริกาติปิ วุจฺจติ. ทสวสฺสิกา กญฺญาติ วุจฺจติ. อนิพฺพิทฺธา วา โยพฺพนิตฺถี กญฺญาติ วุจฺจติ. ทฺวาทสวสฺสิกา กุมารีติปิ วุจฺจติ กุมาริกาติปิ. อโถ ชรํ อปฺปตฺตา ยุวตีติปิ ตรุณีติปิ มาณวิกาติปิ วุจฺจติ. ชรํ ปตฺตา ปน เถรีติปิ มหลฺลิกาติปิ วุจฺจติ. ปุริเสสุปิ อยํ นโย ยถารหํ เวทิตพฺโพ. तसेच, आठ वर्षांच्या मुलीला ‘गोरी’ किंवा ‘दारिका’ असे म्हटले जाते. दहा वर्षांच्या मुलीला ‘कञ्ञा’ म्हटले जाते. किंवा जिचे कान टोचलेले नाहीत अशा तरुण स्त्रीला ‘कञ्ञा’ म्हटले जाते. बारा वर्षांच्या मुलीला ‘कुमारी’ किंवा ‘कुमारिका’ असे म्हटले जाते. तसेच, वृद्धत्वाप्रत न पोहोचलेल्या स्त्रीला ‘युवती’, ‘तरुणी’ किंवा ‘माणविका’ म्हटले जाते. वृद्धत्वाला पोहोचलेल्या स्त्रीला ‘थेरी’ किंवा ‘महल्लिका’ म्हटले जाते. पुरुषांच्या बाबतीतही हाच नियम योग्यतेनुसार समजून घ्यावा. กิญฺจาเปตฺถ เอวํ นิยโม วุตฺโต, ตถาปิ กตฺถจิ อนิยมวเสนปิ โวหาโร ปวตฺตติ. ตถา หิ ‘‘ราชา กุมารมาทาย, ราชปุตฺตี จ ทาริก’’นฺติ จ ‘‘อจฺฉา กณฺหาชินํ กญฺญ’’นฺติ จ อิมาสํ ทฺวินฺนํ ปาฬีนํ วเสน ยา อิตฺถี ทาริกาสทฺเทน วตฺตพฺพา, สา กญฺญาสทฺเทนปิ วตฺตพฺพา ชาตา. ยาปิ [Pg.70] จ กญฺญาสทฺเทน วตฺตพฺพา, สาปิ ทาริกาสทฺเทน วตฺตพฺพา ชาตา. ตถา ‘‘ราชา กุมารมาทาย, ราชปุตฺตี จ ทาริก’’นฺติ จ ‘‘กุมาริเย อุปเสนิเย, นิจฺจํ นิคฬมณฺฑิเต’’ติ จ อิมาสํ ปน ปาฬีนํ วเสน ยา อิตฺถี ทาริกาสเทน วตฺตพฺพา, สา กุมาริกาสทฺเทนปิ วตฺตพฺพา ชาตา. ยา จ ปน กุมารีสทฺเทน วตฺตพฺพา, สาปิ ทาริกาสทฺเทน วตฺตพฺพา ชาตา. อปิเจตฺถ ‘‘ราชกญฺญา รุจา นามา’’ติ จ ‘‘ตโต มทฺทิมฺปิ นฺหาเปสุํ, สิวิกญฺญา สมาคตา’’ติ จ อิมาสํ ทฺวินฺนํ ปาฬีนํ ทสฺสนโต ยา อนิพฺพิทฺธา วา โหตุ นิพฺพิทฺธา วา, ยาว ชรํ น ปาปุณาติ, ตาว สา กญฺญาเยว นามาติปิ เวทิตพฺพํ. जरी येथे असा नियम सांगितला असला, तरी काही ठिकाणी अनियंत्रितपणे व्यवहार चालतो. जसे की, ‘राजा कुमारमादाय, राजपुत्ती च दारिकं’ आणि ‘अच्छा कण्हाजिनं कञ्ञं’ या दोन पाळी वचनांच्या आधारे, ज्या स्त्रीला ‘दारिका’ या शब्दाने संबोधले पाहिजे, तिला ‘कञ्ञा’ या शब्दानेही संबोधले गेले आहे. आणि जिला ‘कञ्ञा’ या शब्दाने संबोधले पाहिजे, तिला ‘दारिका’ या शब्दानेही संबोधले गेले आहे. तसेच, ‘राजा कुमारमादाय, राजपुत्ती च दारिकं’ आणि ‘कुमारीये उपसेनीये, निच्चं निगळमण्डिते’ या पाळी वचनांच्या आधारे, ज्या स्त्रीला ‘दारिका’ या शब्दाने संबोधले पाहिजे, तिला ‘कुमारिका’ या शब्दानेही संबोधले गेले आहे. आणि जिला ‘कुमारी’ या शब्दाने संबोधले पाहिजे, तिला ‘दारिका’ या शब्दानेही संबोधले गेले आहे. शिवाय, ‘राजकञ्ञा रुचा नामा’ आणि ‘ततो मद्दिम्पि न्हापेसुं, सिविकञ्ञा समागता’ या दोन पाळी वचनांच्या दर्शनावरून, ती कान टोचलेली असो वा नसो, जोपर्यंत ती वृद्धत्वाला पोहोचत नाही, तोपर्यंत तिला ‘कञ्ञा’ असेच म्हटले जाते, हे समजून घ्यावे. เกเจตฺถ วเทยฺยุํ – ยํ ตุมฺเหหิ ‘‘อฏฺฐวสฺสิกา โครีติปิ ทาริกาติปิ วุจฺจตี’’ติ วุตฺตํ, เอตสฺมึ ปน วจเน ‘‘ยทาหํ ทารโก โหมิ, ชาติยา อฏฺฐวสฺสิโก’’ติ วจนโต อฏฺฐวสฺโส ทารโก โหตุ, ‘‘ตตฺถทฺทสกุมารํ โส, รมมานํ สเก ปุเร’’ติ ปาฬิยํ ปน ปุตฺตทาเรหิ สํวทฺโธ เวสฺสนฺตรมหาราชา กถํ ‘‘กุมาโร’’ติ วตฺตุํ ยุชฺชิสฺสติ ทฺวาทสวสฺสาติกฺกนฺตตฺตา? ยุชฺชเตว ภควโต อิจฺฉาวเสน. ภควา หิ ธมฺมิสฺสรตฺตา โวหารกุสลตาย จ ยํ ยํ เวเนยฺยชนานุรูปํ เทสนํ เทเสตุํ อิจฺฉติ, ตํ ตํ เทเสติ เอว, ตสฺมา ภควตา ตสฺส มาตาปิตูนํ อตฺถิตํ สนฺธาย กุมารปริหาเรน วทฺธิตตฺตญฺจ เอวํ เทสนา กตา. ตถา หิ อายสฺมา กุมารกสฺสโป กุมารปริหาเรน วทฺธิตตฺตา มหลฺลโกปิ สมาโน กุมารกสฺสโปตฺเวว โวหริยติ. ‘‘น วายํ กุมารโก มตฺตมญฺญาสี’’ติ เอตฺถ ปน สิรสฺมึ ปลิเตสุ ชาเตสุปิ อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ อายสฺมา มหากสฺสโป ตสฺมึ เถเร อธิมตฺตวิสฺสาโส [Pg.71] หุตฺวา โกมารวาเทน โอวทนฺโต กุมารโกติ อโวจาติ คเหตพฺพํ. อุทานฏฺฐกถายํ ปน ‘‘สตฺตา ชาตทิวสโต ปฏฺฐาย ยาว ปญฺจทสวสฺสํ, ตาว กุมารกา, พาลาติ จ วุจฺจนฺติ, ตโต ปรํ วีสติวสฺสานิ ยุวาโน’’ติ วุตฺตํ. येथे काही जण म्हणू शकतील – तुम्ही जे म्हटले की ‘आठ वर्षांच्या मुलीला गोरी किंवा दारिका म्हटले जाते’, या विधानानुसार ‘जेव्हा मी जन्माने आठ वर्षांचा बालक (दारक) होतो’ या वचनावरून आठ वर्षांचा मुलगा ‘दारक’ असो; परंतु ‘तेथे त्याने आपल्या नगरात क्रीडा करणाऱ्या कुमाराला पाहिले’ या पाळी वचनात, मुले आणि पत्नीसह वाढलेल्या वेस्सन्तर महाराजांना, बारा वर्षांचे वय ओलांडले असल्यामुळे ‘कुमार’ म्हणणे कसे योग्य ठरेल? भगवंतांच्या इच्छेनुसार ते योग्यच ठरते. कारण भगवान हे धम्माचे स्वामी आणि व्यवहारकुशल असल्यामुळे, विनेय (उपदेश देण्यास योग्य) जनांच्या अनुरूप जो जो उपदेश देण्याची इच्छा करतात, तो तो उपदेश देतातच. म्हणूनच भगवंतांनी त्यांच्या मातापित्यांचे अस्तित्व आणि कुमाराप्रमाणे त्यांचे संगोपन झाले असल्याचा विचार करून असा उपदेश केला आहे. तसेच, आयुष्यमान कुमारकस्सप हे वृद्ध झाले असतानाही, कुमाराप्रमाणे संगोपन झाल्यामुळे त्यांना ‘कुमारकस्सप’ असेच म्हटले जात असे. ‘हा कुमार मर्यादा जाणत नाही’ या वाक्यात, डोक्यावर पांढरे केस आले असतानाही, आयुष्यमान महाकस्सप यांनी त्या थेरांवर (आयुष्यमान आनंदांवर) अत्यंत विश्वास असल्यामुळे, त्यांना तरुण समजून उपदेश करताना ‘कुमारक’ असे म्हटले, असे समजून घ्यावे. उदान-अट्ठकथेत मात्र असे म्हटले आहे की – ‘प्राणी जन्माच्या दिवसापासून पंधरा वर्षांपर्यंत कुमार आणि बाल म्हटले जातात, त्यानंतर वीस वर्षांपर्यंत ते तरुण (युवान) म्हटले जातात.’ มนฺถ มตฺถ วิโลฬเน. มนฺถติ. มนฺถญฺจ มธุปิณฺฑิกญฺจ อาทาย. อภิมตฺถติ ทุมฺเมธํ วชิรํวมฺหมยํ มณึ. สิเนรุํ มตฺถํ กตฺวา. ‘मन्थ्’ आणि ‘मत्थ्’ धातू ढवळणे (विलोडन) या अर्थात आहेत. ‘मन्थति’ (तो ढवळतो/मंथन करतो). ‘मंथ (मंथन केलेले अन्न) आणि मधुपिंड घेऊन’ (मन्थञ्च मधुपिण्डिकञ्च आदाय). ‘वज्र मूर्खाचा नाश करते, जसे पाषाणमय मणीचा’ (अभिमन्थति दुम्मेधं वजिरं व अम्ममयं मणिं). ‘सिनेरूला (मेरू पर्वताला) रवी (मंथनदंड) करून’ (सिनेरुं मत्थं कत्वा). กุถิ ปุถิ ลุถิ หึสาสํกิเลเสสุ. กุนฺถติ. กุนฺโถ, กุนฺถกิปิลฺลิกํ. ทิสฺวาน ปติตํ สามํ, ปุตฺตกํ ปํสุกุนฺถิตํ. ปุนฺถติ. ลุนฺถติ. ‘कुथ्’, ‘पुथ्’ आणि ‘लुथ्’ हे धातू हिंसा आणि संक्लेश (मलीन होणे किंवा सडणे) या अर्थात आहेत. ‘कुन्थति’. ‘कुन्थो’ (लहान कीटक), ‘कुन्थकिपिल्लिकं’ (मुंग्या आणि लहान कीटक). ‘धूळ आणि कीटकांनी माखलेल्या, खाली पडलेल्या प्रिय पुत्र सामा याला पाहून’ (दिस्वाना पतितं सामं, पुत्तकं पंसुकुन्थितं). ‘पुन्थति’. ‘लुन्थति’. นาถ ยาจโนปตาปิสฺสริยาสีสาสุ. นาถธาตุ ยาจเน อุปตาเป อิสฺสริเย อาสีสเน จาติ จตูสฺวตฺเถสุ วตฺตติ. เตนาหุ โปราณา ‘‘นาถตีติ นาโถ, เวเนยฺยานํ หิตสุขํ อาสีสติ ปตฺเถติ, ปรสนฺตานคตํ วา กิเลสพฺยสนํ อุปตาเปติ, ‘‘สาธุ ภิกฺขเว ภิกฺขุ กาเลน กาลํ อตฺตสมฺปตฺตึ ปจฺจเวกฺเขยฺยา’ติอาทินา ตํ ตํ หิตปฏิปตฺตึ ยาจตีติ อตฺโถ, ปรเมน จิตฺติสฺสริเยน สมนฺนาคโต สพฺพสตฺเต วา คุเณหิ อีสติ อภิภวตีติ ปรมิสฺสโร ภควา ‘นาโถ’ติ วุจฺจตีติ นาถตีติ นาโถ’’ติ. สทฺทสตฺถวิทู ปน เตสุ จตูสุ อตฺเถสุ นาถ นาธ อิติ ธาตุทฺวยํ ปฐนฺติ. อตฺตโนภาสตฺตา ปน ตสฺส ‘‘นาถเต นาธเต’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. ‘नाथ्’ धातू याचना (मागणे), उपताप (ताप देणे/नष्ट करणे), ऐश्वर्य (प्रभुत्व) आणि आशिष (इच्छा करणे) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. ‘नाथ्’ धातू याचना, उपताप, ऐश्वर्य आणि आशिष या चार अर्थांमध्ये वर्ततो. म्हणूनच प्राचीन आचार्य म्हणतात – ‘जो इच्छा करतो तो नाथ (नाथतीति नाथो), म्हणजेच तो विनेय (उपदेश देण्यास योग्य) लोकांच्या हित आणि सुखाची इच्छा करतो, प्रार्थना करतो; किंवा इतरांच्या संतानातील (चित्तप्रवाहातील) क्लेशरूपी संकटांना नष्ट करतो (ताप देतो); किंवा “भिक्खूंनो, भिक्खूने वेळोवेळी स्वतःच्या आत्मसंपत्तीचे सिंहावलोकन करावे” इत्यादी उपदेशांद्वारे त्या त्या हितकारक आचरणाची याचना करतो; किंवा परम चित्त-ऐश्वर्याने संपन्न असल्यामुळे सर्व प्राण्यांवर किंवा आपल्या गुणांनी शासन करतो (अभिभूत करतो), म्हणून परमेश्वर (परम ऐश्वर्यवान) भगवान यांना “नाथ” म्हटले जाते, अशा प्रकारे जो याचना करतो/इच्छा करतो/शासन करतो तो नाथ होय.’ व्याकरणकार मात्र या चार अर्थांमध्ये ‘नाथ’ आणि ‘नाध’ असे दोन धातू वाचतात. आत्मनेपद असल्यामुळे त्याची ‘नाथते’ आणि ‘नाधते’ अशी रूपे होतात. เอตฺถ สิยา ‘‘ยทิ ยาจนตฺเถน นาถตีติ นาโถ, เอวํ สนฺเต โย โกจิ ยาจโก ทลิทฺโท, โส เอว นาโถ [Pg.72] สิยา. โย ปน อยาจโก สมิทฺโธ, โส น นาถติ น ยาจตีติ อนาโถ สิยา’’ติ? น, นาถสทฺโท หิ ยาจนตฺถาทีสุ ปวตฺตมาโน โลกสงฺเกตวเสน อุตฺตมปุริเสสุ นิรูฬฺโห, ภควา จ อุตฺตเมสุ สาติสยํ อุตฺตโม, เตน ตํ ตํ หิตปฏิปตฺตึ ยาจตีติ นาถสทฺทสฺสตฺโถ วุตฺโต. อนาถสทฺโท ปน อิตฺตรชเนสุ นิรูฬฺโห, โส จ โข ‘‘น นาโถติ อนาโถ. นตฺถิ นาโถ เอตสฺสาติ วา อนาโถ’’ติ ทพฺพปฏิเสธวเสน, น ปน ‘‘น นาถติ น ยาจตีติ อนาโถ’’ติ ธาตุอตฺถปฏิเสธวเสน. โย หิ อญฺญสฺส สรณํ คติ ปติฏฺฐา โหติ, โส นาโถ, โย จ อญฺญสฺส สรณํ คติ ปติฏฺฐา น โหติ, นาปิ อตฺตโน อญฺโญ สรณํ คติ ปติฏฺฐา โหติ, โส อนาโถติ วุจฺจติ สงฺเกตวเสน. ตถา หิ ‘‘สงฺเกตวจนํ สจฺจํ, โลกสมฺมุติการณ’’นฺติ วุตฺตํ. อิมสฺส ปนตฺถสฺส อาวิภาวตฺถํ อิมสฺมึ ฐาเน ‘‘โลกนาโถ ตุวํ เอโก, สรณํ สพฺพปาณิน’’นฺติ จ ‘‘อนาถานํ ภวํ นาโถ’’ติ จ – येथे अशी शंका येऊ शकते – ‘जर याचना करण्याच्या अर्थाने जो याचना करतो तो नाथ असेल, तर मग कोणताही गरीब याचक (भिकारी) हाच नाथ ठरेल. आणि जो याचना न करणारा समृद्ध व्यक्ती आहे, तो याचना करत नाही म्हणून अनाथ ठरेल काय?’ असे नाही, कारण ‘नाथ’ हा शब्द याचना इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जात असला, तरी लोकसंकेतानुसार (रूढीनुसार) तो उत्तम पुरुषांसाठीच रूढ झाला आहे; आणि भगवान हे उत्तमांमध्येही सर्वश्रेष्ठ उत्तम आहेत, म्हणून त्या त्या हितकारक आचरणाची याचना करतात या अर्थाने ‘नाथ’ शब्दाचा अर्थ सांगितला आहे. ‘अनाथ’ हा शब्द मात्र सामान्य लोकांमध्ये रूढ आहे, आणि तो ‘जो नाथ (रक्षक) नाही तो अनाथ’ किंवा ‘ज्याला कोणी नाथ (रक्षक) नाही तो अनाथ’ अशा द्रव्य-प्रतिषेधाच्या (वस्तूच्या अभावाच्या) अर्थाने रूढ आहे; ‘जो याचना करत नाही तो अनाथ’ अशा धातूच्या अर्थाच्या प्रतिषेधाने नाही. कारण जो दुसऱ्याचा आश्रय, गती आणि प्रतिष्ठा (आधार) असतो, तो ‘नाथ’ होय; आणि जो दुसऱ्याचा आश्रय, गती आणि प्रतिष्ठा नसतो, तसेच ज्याला स्वतःसाठी दुसरा कोणी आश्रय, गती आणि प्रतिष्ठा नसतो, त्याला संकेतानुसार ‘अनाथ’ म्हटले जाते. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘संकेतवचन हे सत्य आहे, जे लोकसंमतीचे कारण आहे.’ हाच अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी या ठिकाणी ‘तुम्ही एकटेच लोकनाथ आहात, सर्व प्राण्यांचे शरण आहात’ आणि ‘अनाथांचे आपण नाथ आहात’ आणि – ‘‘เอวาหํ จินฺตยิตฺวาน, เนกโกฏิสตํ ธนํ; นาถานาถานํ ทตฺวาน, หิมวนฺตมุปาคมิ’’นฺติ จ ‘असा विचार करून, मी शेकडो कोटींचे धन सनाथ आणि अनाथांना देऊन हिमालयात निघून गेलो’ – असे म्हटले आहे. ปาฬิโย นิทสฺสนานิ ภวนฺติ. ยสฺมา ปน สาสเน จ โลเก จ ยาจโก ‘‘นาโถ’’ติ น วุจฺจติ, อยาจโก จ ‘‘อนาโถ’’ติ. โลกสฺส ปน สรณํ ‘‘นาโถ’’ติ วุจฺจติ. ยสฺส สรณํ น วิชฺชติ, โส ‘‘อนาโถ’’ติ วุจฺจติ, ตถา สมิทฺโธ ‘‘นาโถ’’ติ วุจฺจติ, อสมิทฺโธ ‘‘อนาโถ’’ติ. ตสฺมา ปญฺญวตา สพฺเพสุ ฐาเนสุ ธาตุอตฺถมตฺเตน โลกสมญฺญํ อนติธาวิตฺวา ยถานุรูปํ อตฺโถ คเหตพฺโพ. อยญฺจ นีติ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพา. पाळी (मूळ पाळीचे संदर्भ) ही उदाहरणे आहेत. कारण शासनात (बुद्धशासनात) आणि लोकात याचक (मागणी करणारा) याला "नाथ" म्हटले जात नाही, आणि अयाचक (न मागणारा) याला "अनाथ" म्हटले जात नाही. परंतु जगाचा जो आश्रय (शरण) आहे, त्याला "नाथ" म्हटले जाते. ज्याला आश्रय नाही, त्याला "अनाथ" म्हटले जाते. तसेच समृद्ध व्यक्तीला "नाथ" म्हटले जाते आणि असमृद्ध (गरीब) व्यक्तीला "अनाथ" म्हटले जाते. म्हणून प्रज्ञावंताने सर्व ठिकाणी केवळ धातूच्या अर्थावरच न राहता, लोकव्यवहाराचे उल्लंघन न करता योग्य अर्थ ग्रहण केला पाहिजे. आणि हा नियम चांगल्या प्रकारे मनात ठेवला पाहिजे. วิถุ [Pg.73] ยาจเน. เวถติ. 'विथु' (vithu) हा धातू याचना करणे (मागणे) या अर्थात आहे. 'वेथति' (vethati - तो याचना करतो) असे रूप बनते. สถ เสฐิลฺเล. สถติ. สถโล หิ ปริพฺพาโช, ภิยฺโย อากิรเต รชํ. สิฐิโลติปิ ปาฬิ ทิสฺสติ. ตทา ฐิกาโร มุทฺธโช คเหตพฺโพ. 'सथ' (satha) हा धातू शिथिलतेच्या (सैलपणाच्या) अर्थात आहे. 'सथति' (sathati - तो शिथिल होतो) असे रूप बनते. "सथलो हि परिब्बाजो, भिय्यो आकिरते रजं" (शिथिल झालेला परिव्राजक अधिक प्रमाणात धूळ/मळ अंगावर ओढून घेतो). पाळीमध्ये 'सिथिलो' (siṭhilo) असाही पाठ आढळतो. तेव्हा 'ठ' हा मूर्धन्य वर्ण ग्रहण करावा. กถิ โกฏิลฺเล. กนฺถติ. 'कथि' (kathi) हा धातू कुटिलतेच्या (वाकडेपणाच्या) अर्थात आहे. 'कन्थति' (kanthati) असे रूप बनते. กตฺถ สิลาฆายํ. กตฺถติ, วิกตฺถติ. กตฺถนา, วิกตฺถนา. ตตฺถ กตฺถตีติ ปสํสติ. วิกตฺถตีติ วิรูปํ กตฺถติ อภูตวตฺถุทีปนโต. เอตฺถ จ ‘‘พหุมฺปิ โส วิกตฺเถยฺย, อญฺญํ ชนปทํ คโต’’ติ จ ‘‘อิเธกจฺโจ กตฺถี โหติ วิกตฺถี, โส กตฺถติ ‘อหมสฺมิ สีลสมฺปนฺโนติ วา วตฺตสมฺปนฺโนติ วา วิกตฺถตี’ติ’’ จ อาทโย ปโยคา. 'कत्थ' (kattha) हा धातू प्रशंसा करण्याच्या अर्थात आहे. 'कत्थति' (katthati), 'विकत्थति' (vikatthati) अशी रूपे बनतात. 'कत्थना' (katthanā), 'विकत्थना' (vikatthanā) हे नाम बनते. तेथे 'कत्थति' म्हणजे प्रशंसा करतो. 'विकत्थति' म्हणजे असत्य गोष्टींचे प्रदर्शन करून विकृतपणे स्वतःची स्तुती करतो. आणि येथे "बहुम्पि सो विकत्थेय्य, अञ्ञं जनपदं गतो" (दुसऱ्या देशात गेल्यावर तो खूप बढाया मारू शकतो) आणि "इधेकच्चो कत्थी होति विकत्थी, सो कत्थति 'अहमस्मि सीलसम्पन्नोति वा वत्तसम्पन्नोति वा विकत्थती'ति" (येथे कोणी बढाया मारणारा, स्वतःची स्तुती करणारा असतो, तो बढाया मारतो की 'मी शीलसंपन्न आहे किंवा व्रतसंपन्न आहे' अशी स्वतःची स्तुती करतो) इत्यादी प्रयोग आहेत. พฺยถ ทุกฺขภยจลเนสุ. พฺยถติ. ภนฺตา พฺยถิตมานสา. ตโต กุมาราพฺยถิตา, สุตฺวา ลุทฺทสฺส ภาสิตํ. อิตฺเถตํ ทฺวยํ จลญฺเจว พฺยถญฺจ. 'ब्यथ' (byatha) हा धातू दुःख, भय आणि कंप पावणे (चालणे/थरथरणे) या अर्थांत आहे. 'ब्यथति' (byathati) असे रूप बनते. "भन्ता ब्यथितमानसा" (भ्रमित आणि व्यथित मनाचे). "ततो कुमाराब्यथिता, सुत्वा लुद्दस्स भासितं" (त्यानंतर व्याधाचे बोलणे ऐकून ते राजकुमार व्यथित झाले नाहीत). येथे हे दोन्ही म्हणजे 'चल' (कंप पावणे) आणि 'व्यथा' (दुःख) दर्शवितात. สุถ กุถ กถ หึสายํ. โสถติ. โกถติ. กถติ. 'सुथ' (sutha), 'कुथ' (kutha) आणि 'कथ' (katha) हे धातू हिंसेच्या अर्थात आहेत. 'सोथति' (sothati), 'कोथति' (kothati), 'कथति' (kathati) अशी रूपे बनतात. ปถ คติยํ. ปถติ. ปโถ. ปโถติ มคฺโค. โส ทุวิโธ มหาชเนน ปทสา ปฏิปชฺชิตพฺโพ ปกติมคฺโค จ ปณฺฑิเตหินิพฺพานตฺถิเกหิ ปฏิปชฺชิตพฺโพ ปฏิปทาสงฺขาโต อริยมคฺโค จาติ. ตตฺถ ปกติมคฺโค อุปฺปนฺนกิจฺจากิจฺเจหิ ชเนหิ ปถิยติ คจฺฉิยตีติ ปโถ, ปฏิปทา ปน อมตมหาปุรํ คนฺตุกาเมหิ กุลปุตฺเตหิ สทฺธาปาเถยฺยํ คเหตฺวา ปถิยติ ปฏิปชฺชิยตีติ ปโถ. อถ วา ปาเถติ การกํ ปุคฺคลํ คเมติ นิพฺพานํ สมฺปาเปตีติ วา ปโถ[Pg.74], ปฏิปทาเยว. มคฺคาภิธานํ จุราทิคเณ มคฺคธาตุกถนฏฺฐาเน กเถสฺสาม. 'पथ' (patha) हा धातू गतीच्या (जाण्याच्या) अर्थात आहे. 'पथति' (pathati) असे रूप बनते. 'पथो' (patho) म्हणजे मार्ग. तो दोन प्रकारचा आहे - सामान्य लोकांनी पायी चालण्याचा 'प्राकृत मार्ग' (साधा रस्ता) आणि निर्वाणाची इच्छा करणाऱ्या पंडितांनी आचरावयाचा प्रतिपदेच्या स्वरूपातील 'आर्यमार्ग'. तेथे प्राकृत मार्ग म्हणजे विविध कामांसाठी लोकांद्वारे चालला जातो (पथियति) म्हणून तो 'पथ' होय. तर प्रतिपदा म्हणजे अमृतमय महापुरात (निर्वाणनगरात) जाण्याची इच्छा असणाऱ्या कुलपुत्रांनी श्रद्धारूपी पाथेय (शिदोरी) घेऊन ज्याचे आचरण केले जाते (पथियति), म्हणून तो 'पथ' होय. अथवा जो साधक पुद्गलाला निर्वाणाप्रत पोहोचवतो तो 'पथ' म्हणजेच प्रतिपदा होय. 'मार्ग' या शब्दाचे स्पष्टीकरण चुरादिगणात 'मग्ग' धातूच्या विवेचनाच्या वेळी करू. กถ นิปฺปาเก. กถติ. 'कथ' (katha) हा धातू शिजवणे किंवा पिकवणे (निप्पाक) या अर्थात आहे. 'कथति' (kathati) असे रूप बनते. มถ วิโลถเน. มถติ. 'मथ' (matha) हा धातू घुसळणे किंवा विलोडन करणे या अर्थात आहे. 'मथति' (mathati) असे रूप बनते. โปถ ปริยายนภาเว. โปถติ. โปถโก. โปเถตีติ อยํ จุราทิคเณปิ วตฺตติ. เตน ‘‘สมนฺตา อนุปริเยยฺยุํ, นิปฺโปเถนฺตา จตุทฺทิสา’’ติ ปโยโค ทิสฺสติ. 'पोथ' (potha) हा धातू आलटून-पालटून मारणे किंवा प्रहार करणे या अर्थात आहे. 'पोथति' (pothati) असे रूप बनते. 'पोथको' (pothako) हे नाम बनते. 'पोथेति' (potheti) हा धातू चुरादिगणातही चालतो. त्यामुळे "समन्ता अनुपरियेय्युं, निप्पोथेन्ता चतुद्दिसा" (चारही बाजूंनी वेढून, चारी दिशांना प्रहार करत) असा प्रयोग आढळतो. โคตฺถ วํเส. โคตฺถติ. โคตฺถุโล, โคตฺถุ. 'गोत्थ' (gottha) हा धातू वंशाच्या अर्थात आहे. 'गोत्थति' (gotthati) असे रूप बनते. 'गोत्थुलो' (gotthulo), 'गोत्थु' (gotthu) ही नामे बनतात. ปุถุ วิตฺถาเร. โปถติ. ปุถวี. 'पुथु' (puthu) हा धातू विस्ताराच्या अर्थात आहे. 'पोथति' (pothati) असे रूप बनते. 'पुथवी' (puthavī - पृथ्वी) हे नाम बनते. ถการนฺตธาตุรูปานิ. 'थ' कारान्त धातूंची रूपे समाप्त झाली. ทการนฺตธาตุ 'द' कारान्त धातू. ทา ทาเน. อาปุพฺโพ คหเณ. สทฺโธ ทานํ ททาติ เทติ, สีลํ อาททาติ อาเทติ. อิมานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ ตทฺทีปกตฺตา. สทฺโธ อสฺสทฺธํ ทานํ ทาเปติ, สีลํ อาทเปติ, สมาทเปติ. เย ธมฺมเมวาทปยนฺติ สนฺโต. อิมานิ การิตปทานิ เหตุกตฺตุปทานีติ จ วุจฺจนฺติ ตทฺทีปกตฺตา. สทฺเธน ทานํ ทียติ, สีลํ อาทียติ, สมาทียติ, อิมานิ กมฺมปทานิ ตทฺทีปกตฺตา. อยญฺจ ทา ทาเนติ ธาตุ สาสนานุรูปสุติวเสน ทิวาทิคณํ ปตฺวา สุปนกฺริยํ วทนฺโต ‘‘ทายติ นิทฺทายติ นิทฺทา’’ติ สนามปทานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ ชนยติ. ทานมวขณฺฑนญฺจ วทนฺโต ‘‘ทิยติ ทานํ ทาตฺต’’นฺติ สนามปทานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ ชนยติ. สุทฺธึวทนฺโต ‘‘ทายติ เวทายติ โวทาน’’นฺติ สนามปทานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ ชนยติ, อิมสฺมึ ปน ภูวาทิคเณ ทานํ วทนฺโต อาปุพฺพวเสน คหณญฺจ [Pg.75] วทนฺโต ‘‘ททาติ เทติ อาททาติ อาเทติ ทานํ อาทาน’’นฺติ สนามปทานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ ชนยติ. ตถา กุจฺฉิตคมนํ วทนฺโต ‘‘ทาติ สุทฺทาติ สุทฺโท สุทฺที’’ติ สนามปทานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ ชนยตีติ อยํ วิเสโส ทฏฺฐพฺโพ. ยถา เจตฺถ, เอวมญฺญตฺราปิ ยถาสมฺภวํ วิเสโส อุปปริกฺขิตพฺโพ นยญฺญูหิ. 'दा' (dā) हा धातू दान देण्याच्या अर्थात आहे. 'आ' उपसर्ग लागल्यास तो ग्रहण करण्याच्या अर्थात होतो. जसे - "सद्धो दानं ददाति देति" (श्रद्धावान मनुष्य दान देतो), "सीलं आददाति आदेति" (शील ग्रहण करतो). हे त्याचे दर्शक असल्यामुळे ही शुद्ध कर्तृपदे आहेत. "सद्धो अस्सद्धं दानं दापेति, सीलं आदापेति, समादापेति" (श्रद्धावान मनुष्य अश्रद्धावानाला दान देववतो, शील ग्रहण करावयास लावतो, समादृत करावयास लावतो). "ये धम्ममेवादापयन्ति सन्तो" (जे संत धर्माचेच ग्रहण करावयास लावतात). हे त्याचे दर्शक असल्यामुळे यांना कारितपदे किंवा हेतुकर्तृपदे असे म्हटले जाते. "सद्धेन दानं दीयति, सीलं आदीयति, समादीयति" (श्रद्धावानाद्वारे दान दिले जाते, शील ग्रहण केले जाते, समादृत केले जाते), हे त्याचे दर्शक असल्यामुळे ही कर्मपदे आहेत. आणि हा 'दा' (दान देणे) धातू शासनाच्या (बुद्धवचनाच्या) सूत्रांच्या अनुषंगाने दिवादिगणात जाऊन झोपण्याची क्रिया दर्शवताना "दायति, niद्दायति, निद्दा" (तो झोपतो, निद्रा घेतो, निद्रा) अशी नामांसह शुद्ध कर्तृपदे निर्माण करतो. दान आणि खंडन (तुकडे करणे) दर्शवताना "दियति, दानं, दात्तं" अशी नामांसह शुद्ध कर्तृपदे निर्माण करतो. शुद्धी दर्शवताना "दायति, वेदायति, वोदानं" (तो शुद्ध करतो, शुद्ध होतो, शुद्धी) अशी नामांसह शुद्ध कर्तृपदे निर्माण करतो. परंतु या भ्वादिगणात दान दर्शवताना आणि 'आ' उपसर्गाच्या योगाने ग्रहण करणे दर्शवताना "ददाति, देति, आददाति, आदेति, दानं, आदानं" अशी नामांसह शुद्ध कर्तृपदे निर्माण करतो. तसेच कुत्सित गमन दर्शवताना "दाति, सुद्दाति, सुद्दो, सुद्दी" अशी नामांसह शुद्ध कर्तृपदे निर्माण करतो, हा विशेष जाणावा. ज्याप्रमाणे येथे हा विशेष आहे, त्याचप्रमाणे इतर ठिकाणीही नियम जाणणाऱ्यांनी शक्यतेनुसार विशेष तपासून पाहावा. อิทานิสฺส นามปทานิ ตุมนฺตาทีนิ พฺรูม. ‘‘ทานํ, เทยฺยํ, ทาตพฺพํ, พฺรหฺมเทยฺยํ, ทินฺนํ, ทายโก, ทายิกา, ทกฺขิณา’’ อิจฺจาทีนิ, ‘‘ทาตุํ, ปทาตุํ, ทาตเว, ปทาตเว, ทตฺวา, ทตฺวาน, ททาตุน, ททิตฺวา, ททิตฺวาน, ททิย, ทชฺชา, ททิยาน, อาทาตุํ, อาทาย, อาทิย’’ อิจฺจาทีนิ จ โยเชตพฺพานิ. आता आपण याचे 'तुमुन्' प्रत्ययान्त इत्यादी नामपदे सांगू. "दानं, देय्यं, दातब्बं, ब्रह्मदेय्यं, दिन्नं, दायको, दायिका, दक्खिणा" इत्यादी नामे, आणि "दातुं, पदातुं, दातवे, पदातवे, दत्वा, दत्वान, ददातुन, ददित्वा, ददित्वान, ददिय, दज्जा, ददियान, आदातुं, आदाय, आदिय" इत्यादी कृदन्त रूपे जोडावीत. ตตฺถ ทานนฺติ ทาตพฺพํ, ททนฺติ เอเตนาติ อตฺเถ น เทยฺยธมฺโม ทานเจตนา จ วุจฺจติ. กสฺมา ปน ตตฺถ ทินฺนสทฺโทเยว กถิยติ, น ทตฺตสทฺโทติ? อกถเน การณมตฺถิ. ‘‘ทานํ ทินฺน’’นฺติอาทีสุ หิ ทินฺนสทฺทฏฺฐาเน ทตฺตสทฺโท น ทิสฺสติ, ตสฺมา น กถิยติ. तेथे 'दान' म्हणजे जे दिले पाहिजे ते, किंवा 'ज्याद्वारे देतात' या अर्थाने देयधर्म (दानाच्या वस्तू) आणि दानचेतना यांना 'दान' म्हटले जाते. परंतु तेथे केवळ 'दिन्न' (दिलेले) हाच शब्द का सांगितला जातो, 'दत्त' हा शब्द का नाही? न सांगण्यामागे कारण आहे. कारण "दानं दिन्नं" (दान दिले) इत्यादींमध्ये 'दिन्न' शब्दाच्या जागी 'दत्त' शब्द आढळत नाही, म्हणून तो सांगितला जात नाही. คุณภูโต ทตฺตสทฺโท, น ทิฏฺโฐ ชินภาสิเต; ‘‘มนสา ทานํ มยา ทินฺนํ’’, อิติ ทินฺนปทํ วิย. जिनांच्या (बुद्धांच्या) वचनात 'दत्त' हा शब्द स्वतंत्र विशेषण (गुणभूत) म्हणून आढळत नाही; जसे "मनसा दानं मया दिन्नं" (मी मनाने दान दिले) या वाक्यात 'दिन्न' हे पद आढळते, तसे 'दत्त' पद आढळत नाही. ‘‘เทวทตฺโต ยญฺญทตฺโต, ทตฺโต’’ อิติ จ อาทิโก; ปณฺณตฺติวจเน ทิฏฺโฐ, สมาสพฺยาสโต ปน. "देवदत्त, यज्ञदत्त, दत्त" इत्यादी शब्द केवळ संज्ञेच्या (नावाच्या) रूपात (पण्णत्तिवचन) आढळतात, जे समास किंवा विग्रहाच्या स्वरूपात असतात. ตสฺมา ‘‘เทวทตฺโต’’ติอาทีสุ ‘‘เทเวน ทินฺโน’’ติ สมาสํ กตฺวา ปณฺณตฺติวจนตฺตา ทินฺนสทฺทสฺส ทตฺตาเทโส กาตพฺโพ สาสนานุรูเปน. อุปริ หิ ‘‘ทินฺนสฺส ทตฺโต กฺวจิ ปณฺณตฺติย’’นฺติ ลกฺขณํ ปสฺสิสฺสถ. อยเมว หิ สาสเน นีติ อวิลงฺฆนียา. อิทํ ปเนตฺถ ววตฺถานํ – म्हणून "देवदत्त" इत्यादी शब्दांमध्ये "देवेन दिन्नो" (देवाकडून दिले गेलेले) असा समास करून, संज्ञावाचक शब्द असल्यामुळे शासनाच्या (बुद्धवचनाच्या) नियमांनुसार 'दिन्न' शब्दाच्या जागी 'दत्त' असा आदेश करावा. कारण पुढे आपण "दिन्नस्स दत्तो क्वचि पण्णत्तियं" (संज्ञेमध्ये काही ठिकाणी 'दिन्न' च्या जागी 'दत्त' होतो) हा नियम पाहाल. शासनात हाच नियम अनुल्लंघनीय आहे. याविषयीची व्यवस्था खालीलप्रमाणे आहे - สกฺกเฏ ทตฺตสทฺโทว, ทินฺนสทฺโท น ทิสฺสติ; พฺยาสมฺหิ ทินฺนสทฺโทว, ทตฺตสทฺโท น ปาฬิยํ. संस्कृतमध्ये केवळ 'दत्त' हाच शब्द आढळतो, 'दिन्न' शब्द आढळत नाही; तर पाळीमध्ये विग्रहाच्या वेळी केवळ 'दिन्न' हाच शब्द आढळतो, 'दत्त' शब्द आढळत नाही. ‘‘มนสา [Pg.76] ทานํ มยา ทินฺนํ, ทานํ ทินฺโน’’ติอาทิสุ; ‘‘ธมฺมทินฺนา มหามายา’’, อิจฺจาทีสุ จ ปาฬิสุ. "मनसा दानं मया दिन्नं, दानं दिन्नो" इत्यादी वाक्यांमध्ये आणि "धम्मदिन्ना, महामाया" इत्यादी पाळी वचनांमध्ये ('दिन्न' शब्दच आढळतो). อิติ พฺยาสสมาสานํ, วสา ทฺเวธา ปวตฺตติ; ทินฺนสทฺโทติ ทีเปยฺย, น โส สกฺกฏภาสิเต. अशा प्रकारे विग्रह आणि समास यांच्या प्रभावाने 'दिन्न' हा शब्द दोन प्रकारे प्रवृत्त होतो, हे स्पष्ट करावे; परंतु संस्कृत भाषेत तो (दिन्न शब्द) आढळत नाही. คุณภูโต ทตฺตสทฺโท, อสมาสมฺหิ เกวโล; น ทิสฺสติ มุนิมเต, ทินฺนสทฺโทว เกวโล. मुनींच्या (बुद्धांच्या) मतात (वचनात) समासरहित असलेला केवळ स्वतंत्र 'दत्त' हा शब्द विशेषण म्हणून आढळत नाही, तर केवळ 'दिन्न' हाच शब्द आढळतो. เตเนว ทินฺนสทฺทสฺส, ทตฺตาเทโส กโต มยา; ‘‘ทตฺตํ สิรปฺปทาน’’นฺติ, กวโย ปน อพฺรวุํ. त्यामुळेच मी 'दिन्न' शब्दाच्या जागी 'दत्त' असा आदेश केला आहे; परंतु कवींनी "दत्तं सिरप्पदानं" (मस्तक दान दिले) असे म्हटले आहे. เอทิโส ปาฬิยํ นตฺถิ, นโย ตสฺมา น โส วโร; ‘‘ทตฺโต’’ติ ภูริทตฺตสฺส, สญฺญา ปณฺณตฺติยํ คตา. असा प्रयोग पाळीमध्ये आढळत नाही, म्हणून तो नियम श्रेष्ठ नाही; 'दत्त' हा शब्द 'भूरिदत्त' या नावाच्या संज्ञेमध्ये (पण्णत्ति) रूढ झाला आहे. ‘‘พฺรหฺมทตฺโต พุทฺธทตฺโต, ทตฺโต’’ อิติ หิ สาสเน; ปณฺณตฺติยํ ทตฺตสทฺโท, อสมาสสมาสิโก. शासनात (बुद्धशासनात) 'ब्रह्मदत्त', 'बुद्धदत्त' आणि 'दत्त' असे प्रयोग आढळतात. प्रज्ञप्तीमध्ये (संज्ञेमध्ये) 'दत्त' हा शब्द असमस्त (समास नसलेला) आणि समस्त (समास असलेला) अशा दोन्ही प्रकारे वापरला जातो. ‘‘ปรทตฺตโภชน’’นฺติ, เอวมาทีสุ ปาฬิสุ; สมาเส คุณภูโตยํ, ทตฺตสทฺโท ปติฏฺฐิโต. तसेच, 'परदत्तभोजन' (दुसऱ्याने दिलेले भोजन) इत्यादी पाळी वचनांमध्ये, समासामध्ये हा 'दत्त' शब्द गौण (विशेषण) म्हणून प्रस्थापित झाला आहे. ‘‘มนสา ทานํ มยา ทินฺนํ, ทานํ ทินฺโน’’ติอาทิสุ; คุณภูโต ทินฺนสทฺโท, อสมาสมฺหิ ทิสฺสติ. 'मनसा दानं मया दिन्नं' (माझ्याद्वारे मनाने दान दिले गेले), 'दानं दिन्नो' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'दिन्न' हा शब्द असमस्त (समास नसलेल्या) रूपात गौण (विशेषण) म्हणून दिसून येतो. ‘‘ทินฺนาทายี ธมฺมทินฺนา’’, อิจฺเจวมาทีสุ ปน; สมาเส คุณปณฺณตฺติ-ภาเวเนส ปทิสฺสติ. परंतु, 'दिन्नादायी' (दिलेले ग्रहण करणारा), 'धम्मदिन्ना' इत्यादी शब्दांमध्ये समासात हा शब्द गौण प्रज्ञप्ती (गुणप्रज्ञप्ती) रूपात दिसून येतो. โกจิ [Pg.77] ปน สทฺทสตฺถวิทู ครุ เอวํ สทฺทรจนมกาสิ – परंतु, व्याकरण जाणणाऱ्या एका आचार्यांनी (गुरूंनी) अशा प्रकारे शब्दांची रचना केली आहे – ‘‘ยสฺสงฺกุเรหิ ชิมุตมฺพุชโลทิเตหิ,วาเตริเตหิ ปติเตหิ สุเณหิ เตหิ. 'ज्याच्या अंकुरांनी, जे मेघांप्रमाणे आणि कमलांप्रमाणे शोभणारे आहेत, वाऱ्याने हलविलेले, गळून पडलेले आणि अत्यंत सुंदर आहेत. เชนนฺตจีวรมโสภถ พฺรหฺมทตฺตํ,วนฺทามิ ตํ จลทลํ วรโพธิรุกฺข’’นฺติ. ज्यांच्याद्वारे जिनांचे (बुद्धांचे) अंतर्वस्त्र (चीवर) ब्रह्मदत्त (ब्रह्मदेवाने दिलेले किंवा अत्यंत श्रेष्ठ) म्हणून शोभून दिसले, त्या हलणाऱ्या पानांच्या श्रेष्ठ बोधिवृक्षाला मी वंदन करतो.' เอตฺถ จ พฺรหฺมทตฺตนฺติ อิทํ สกฺกฏภาสาโต นยํ คเหตฺวา วุตฺตํ, น ปาฬิโต. ปาฬินยญฺหิปตฺวา ‘‘พฺรหฺมทตฺติย’’นฺติ วา ‘‘พฺรหฺมทินฺน’’นฺติ วา ‘‘เทวทตฺติย’’นฺติ วา ‘‘เทวทินฺน’’นฺติ วา รูเปน ภวิตพฺพํ. ตถา หิ ‘‘โพธิสตฺโต จ มทฺที จ สมฺโมทมานา สกฺกทตฺติเย อสฺสเม วสึสู’’ติ ปาฬินยานุรูโป อฏฺฐกถาปาโฐ ทิสฺสติ. ตสฺมา เอตฺเถวํ วทาม – येथे 'ब्रह्मदत्त' हा शब्द संस्कृत भाषेचा नियम घेऊन वापरला गेला आहे, पाळी भाषेचा नाही. कारण पाळीच्या नियमानुसार 'ब्रह्मदत्तिय' किंवा 'ब्रह्मदिन्न' किंवा 'देवदत्तिय' किंवा 'देवदिन्न' असे रूप असायला हवे. तसेच, 'बोधिसत्त आणि मद्दी आनंदाने शक्राने दिलेल्या (सक्कदत्तिय) आश्रमात राहिले' असा पाळी नियमाला अनुसरून असलेला अट्ठकथा-पाठ दिसून येतो. म्हणून आम्ही येथे असे म्हणतो – ‘‘ทตฺตสทฺทสฺส ฐานมฺหิ, ‘‘ทตฺติย’’นฺติ รโว คโต; เทวทตฺติยปตฺโต จ, อสฺสโม สกฺกทตฺติโย’’ติ. 'दत्त' शब्दाच्या जागी 'दत्तिय' असा शब्दप्रयोग रूढ आहे; जसे की 'देवदत्तियपत्त' (देवदत्ताने दिलेले पात्र) आणि 'सक्कदत्तिय अस्सम' (शक्राने दिलेला आश्रम).' อยํ นีติ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพา. อตฺร ปน ปริปุณฺณาปริปุณฺณวเสน ยถารหํ ปทกฺกโม ภวติ. हा नियम चांगल्या प्रकारे मनात ठेवला पाहिजे. येथे पूर्ण आणि अपूर्णतेच्या आधारे योग्य तो पदक्रम (शब्दांचा क्रम) होतो. ททาติ, ททนฺติ. ททาสิ, ททาถ. ททามิ, ททาม. ททาตุ, ททนฺตุ. ททาหิ, ททาถ. ททามิ, ททาม, ททามเส. ทเทยฺย, ทเท, ทชฺชา. ทชฺชา สปฺปุริโส ทานํ. ทเทยฺยุํ, ทชฺชุํ. ปิตา มาตา จ เต ทชฺชุํ. ทเทยฺยาสิ, ทชฺชาสิ, ทชฺเชสิ อิจฺจปิ. ทชฺชาสิ อภยํ มม. มาตรํ เกน โทเสน, ทชฺชาสิ ทกรกฺขิโน. สีลวนฺเตสุ ทชฺเชสิ, ทานํ มทฺทิ ยถารหํ. ทเทยฺยาถ, ทชฺชาถ. ทเทยฺยามิ, ทชฺชามิ, ทเทยฺยาม, ทชฺชาม. ทเทถ, ทเทรํ. ทเทโถ, ทเทยฺยาวฺโห, ทชฺชาวฺโห. ทเทยฺยํ, ทชฺชํ. เนว ทชฺชํ มโหสธํ. ทเทยฺยามฺเห, ทชฺชามฺเห. อยมสฺมากํ ขนฺติ. ครูนํ ปน ขนฺติ อญฺญถา ภวติ. ตถา หิ – ददाति, ददन्ति। ददासि, ददाथ। ददामि, ददाम। ददातु, ददन्तु। ददाहि, ददाथ। ददामि, ददाम, ददामसे। ददेय्य, ददे, दज्जा। 'दज्जा सप्पुरिसो दानं' (सत्पुरुषाने दान द्यावे)। ददेय्युं, दज्जुं। 'पिता माता च ते दज्जुं' (तुझे माता आणि पिता तुला देवोत)। ददेय्यासि, दज्जासि, दज्जेसि इत्यादी। 'दज्जासि अभयं मम' (तू मला अभय दे). 'मातरं केन दोसेन, दज्जासि दकरक्खिनो' (कोणत्या दोषासाठी तू आईला जलराक्षसाला देत आहेस?). 'सीलवन्तेसु दज्जेसि, दानं मद्दी यथारहं' (मद्दीने शीलवानांना योग्यतेनुसार दान दिले). ददेय्याथ, दज्जाथ। ददेय्यामि, दज्जामि, ददेय्यामा, दज्जाम। ददेथ, ददेरं। ददेथो, ददेय्याव्हो, दज्जाव्हो। ददेय्यं, दज्जं। 'नेव दज्जं महोसधं' (मी महौषधाला कधीही देणार नाही)। ददेय्याम्हे, दज्जाम्हे। हे आमचे मत (खन्ति) आहे. परंतु आचार्यांचे (गुरूंचे) मत वेगळे आहे. कारण की – ครู ‘‘ทชฺชติ ทชฺชนฺติ’’, อิติอาทินเยน ตุ; อฏฺฐนฺนมฺปิ วิภตฺตีนํ, วเสนาหุ ปทกฺกมํ. आचार्य (गुरू) मात्र 'दज्जति, दज्जन्ति' इत्यादी पद्धतीने आठही विभक्तींच्या आधारे पदक्रम सांगतात. ปาฬึ อุปปริกฺขิตฺวา, ตญฺเจ ยุชฺชติ คณฺหถ; น หิ สพฺพปฺปกาเรน, ปาฬิโย ปฏิภนฺติ โน. पाळी (वचनांचे) नीट परीक्षण करून, जर ते योग्य वाटले तरच त्याचा स्वीकार करावा; कारण सर्व प्रकारे पाळीचे ज्ञान आम्हाला स्पष्ट होत नाही. ตตฺถ [Pg.78] อสฺมากํ ขนฺติยา ‘‘ทชฺชา ทชฺช’’นฺติอาทีนิ ยฺยการสหิเตเยว สตฺตมิยา ปทรูเป สิชฺฌนฺติ. ‘‘ทชฺชา สปฺปุริโส ทาน’’นฺติ เอตฺถ หิ ‘‘ทชฺชา อิทํ ‘‘ทเทยฺยา’’ติ ปทรูปํ ปติฏฺฐเปตฺวา ยฺยกาเร ปเร สรโลปํ กตฺวา ตโต ติณฺณํ พฺยญฺชนานํ สํโยคญฺจ ตีสุสญฺโญคพฺยญฺชเนสุ ทฺวินฺนํ สรูปานเมกสฺส โลปญฺจ ทฺยการสญฺโญคสฺส จ ชการทฺวยํ กตฺวา ตโต ทีฆวเสนุจฺจาริตพฺพตฺตา อนิมิตฺตํ ทีฆภาวํ กตฺวา นิปฺผชฺชติ. เอวํ สาสนสฺสานุรูโป วณฺณสนฺธิ ภวติ. ทุวิโธ หิ สนฺธิ ปทสนฺธิ วณฺณสนฺธีติ. เตสุ ยตฺถ ปทจฺเฉโท ลพฺภติ, โส ปทสนฺธิ. ยถา? ตตฺรายํ. ยตฺถ ปน น ลพฺภติ, โส วณฺณสนฺธิ. ยถา? อตฺรโช. ยถา จ สุคโต, ยถา จ ปทฺธานิ. เอวํ ทุวิเธสุ สนฺธีสุ ‘‘ทชฺชา’’ติ อยํ วณฺณสนฺธิ เอว. त्यामध्ये आमच्या मते 'दज्जा, दज्ज' इत्यादी रूपे 'य्य' कारासह सप्तमी विभक्तीमध्येच (विध्यर्थात) सिद्ध होतात. 'दज्जा सप्पुरिसो दानं' येथे 'दज्जा' हे रूप 'ददेय्या' या पदावरून सिद्ध होते. 'य्य' कार पुढे असताना स्वराचा लोप (सरलोप) करून, त्यानंतर तीन व्यंजनांचा संयोग होतो, आणि तीन संयुक्त व्यंजनांपैकी दोन समान व्यंजनांपैकी एकाचा लोप होतो, आणि 'द्य' या संयुक्त व्यंजनाच्या जागी द्वित्व 'ज्ज' होऊन, दीर्घ उच्चारणामुळे अकारण दीर्घत्व येऊन हे रूप सिद्ध होते. अशा प्रकारे शासनाला (बुद्धशासनाला) अनुकूल असा वर्णसंधी होतो. संधी दोन प्रकारचा असतो – पदसंधी आणि वर्णसंधी. त्यापैकी जेथे पदच्छेद (शब्दांचे विभाजन) करता येतो, तो पदसंधी होय. जसे की – 'तत्रायं' (तत्र + अयं). परंतु जेथे पदच्छेद करता येत नाही, तो वर्णसंधी होय. जसे की – 'अत्रजो'. आणि जसे 'सुगतो', जसे 'पद्धानि'. अशा दोन प्रकारच्या संधींमध्ये 'दज्जा' हा केवळ वर्णसंधीच आहे. อปโรปิ รูปนโย ภวติ ตฺวาปจฺจยนฺตวเสน – 'त्वा' प्रत्ययाच्या (त्वा-पच्चय) आधारे आणखी एक रूपसिद्धीचा नियम खालीलप्रमाणे आहे – ‘‘อยํ โส อินฺทโก ยกฺโข, ทชฺชา ทานํ ปริตฺตกํ; อติโรจติ อมฺเหหิ, จนฺโท ตารคเณ ยถา’’ติ 'हा तो इन्दक यक्ष आहे, ज्याने थोडेसे दान देऊन (दज्जा), तो आमच्यापेक्षा अधिक शोभून दिसतो, जसा ताऱ्यांच्या समुदायात चंद्र शोभतो.' ทสฺสนโต. เอตฺถ หิ ทชฺชาติ ทตฺวาติ อตฺโถ. อิทํ ปน ทตฺวาสทฺเทน สมานตฺถํ ‘‘ททิยฺย’’ อิติ ปทรูปํ ปติฏฺฐเปตฺวา ยฺยกาเร ปเร สรโลปํ กตฺวา สญฺโญเคสุ สรูปโลปญฺจ ตโต ทฺยการสญฺโญคสฺส ชฺชการทฺวยํ ทีฆตฺตญฺจ กตฺวา นิปฺผชฺชติ. असे दिसून येते. येथे 'दज्जा' म्हणजे 'दत्वा' (दान देऊन) असा अर्थ आहे. 'दत्वा' या शब्दाशी समान अर्थ असलेला हा शब्द 'ददिय्य' हे रूप प्रस्थापित करून, 'य्य' कार पुढे असताना स्वराचा लोप करून, संयुक्त व्यंजनांमधील समान वर्णाचा लोप करून, 'द्य' या संयुक्त व्यंजनाच्या जागी द्वित्व 'ज्ज' आणि दीर्घत्व करून सिद्ध होतो. อถาปโรปิ รูปนโย ภวติ กมฺมนิ ยปจฺจยวเสน. ตถา หิ ‘‘เปตานํ ทกฺขิณํ ทชฺชา’’ติ จ ‘‘ทกฺขิณา ทชฺชา’’ติ จ ทฺเว ปาฐา ทิสฺสนฺติ. ตตฺถ ปจฺฉิมสฺส ทชฺชาติ ทาตพฺพาติ อตฺโถ กมฺมนิ ยปจฺจยวเสน. อิธ ปน ทาธาตุโต ยปจฺจยํ กตฺวา ธาตุสฺส ทฺวิตฺตญฺจ ปุพฺพสฺส รสฺสตฺตญฺจ ตโต ยกาเร ปเร [Pg.79] สรโลปํ สญฺโญคภาวญฺจ ชฺชการทฺวยญฺจ อิตฺถิลิงฺคตฺตา อาปจฺจยาทิญฺจ กตฺวา ‘‘ทชฺชา’’ติ นิปฺผชฺชติ. เอวํ ‘‘ทชฺชา ทเทยฺยา’’ติ จ ‘‘ทชฺชา ททิยฺย ทตฺวา’’ติ จ ‘‘ทชฺชา ทาตพฺพา’’ติ จ เอตานิ ปจฺเจกํ ปริยายวจนานิ ภวนฺติ. ‘‘ทชฺชุํ. ทชฺชาสิ, ทชฺชาถ. ทชฺชามิ, ทชฺชาม. ทชฺชาวฺโห, ทชฺช’’นฺติ เอตานิปิ ‘‘ทเทยฺยุํ ทเทยฺยาสี’’ติอาทินา ปทรูปานิ ปติฏฺฐเปตฺวา ยฺยกาเร ปเร สรโลปํ สญฺโญเคสุ สรูปโลปํ ทฺยการสมญฺโญคสฺส ชฺชการทฺวยญฺจ กตฺวา นิปฺผชฺชนฺติ. เอเตสุ ทชฺชาสีติ ยํ รูปํ ตสฺสาวยวสฺส อาการสฺส เอการํ กตฺวา อปรมฺปิ ‘‘ทชฺเชสี’’ติ รูปํ ภวตีติ ทฏฺฐพฺพํ. เอส นโย อญฺญตฺราปิ ยถาสมฺภวํ โยเชตพฺโพ. आता कर्मणी 'य' प्रत्ययाच्या (कम्मनि य-पच्चय) आधारे आणखी एक रूपसिद्धीचा नियम आहे. जसे की, 'पेतानं दक्खिणं दज्जा' आणि 'दक्खिणा दज्जा' असे दोन पाठ दिसून येतात. त्यापैकी नंतरच्या 'दज्जा' चा अर्थ कर्मणी 'य' प्रत्ययाच्या नियमानुसार 'दातब्बा' (दिली पाहिजे) असा आहे. येथे 'दा' धातूला 'य' प्रत्यय लावून, धातूचे द्वित्व करून, पूर्व स्वराला र्हस्व करून, त्यानंतर 'य' कार पुढे असताना स्वराचा लोप, संयोगभाव आणि द्वित्व 'ज्ज' करून, तसेच स्त्रीलिंगी असल्यामुळे 'आ' प्रत्यय इत्यादी लावून 'दज्जा' हे रूप सिद्ध होते. अशा प्रकारे 'दज्जा = ददेय्या', 'दज्जा = ददिय्य = दत्वा' आणि 'दज्जा = दातब्बा' हे प्रत्येक पर्यायी शब्द आहेत. 'दज्जुं, दज्जासि, दज्जाथ, दज्जामि, दज्जाम, दज्जाव्हो, दज्जं' ही रूपे देखील 'ददेय्युं, ददेय्यासि' इत्यादी रूपे प्रस्थापित करून, 'य्य' कार पुढे असताना स्वराचा लोप, संयुक्त व्यंजनांमधील समान वर्णाचा लोप आणि 'द्य' या संयुक्त व्यंजनाच्या जागी द्वित्व 'ज्ज' करून सिद्ध होतात. यापैकी 'दज्जासि' या रूपामध्ये त्याच्या अवयवातील 'आ' काराचा 'ए' कार करून 'दज्जेसि' हे दुसरे रूप देखील बनते, असे समजले पाहिजे. हा नियम इतर ठिकाणीही यथासंभव लागू केला पाहिजे. อจินฺเตยฺยานุภาวสฺส หิ สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส ปาฬินโย อจินฺเตยฺโยเยว โหติ, คมฺภีโร ทุกฺโขคาฬฺโห, น เยน เกนจิ ลกฺขเณน สาเธตพฺโพ, ยถาตนฺติ วิรจิเตเหว ลกฺขเณหิ สาเธตพฺโพ. ตถา หิ ‘‘ขตฺติยา ติตฺถิยา เจติยานี’’ติอาทีสุ ยกาเร ปเร สรโลโป ภวติ, เตน ‘‘อเถตฺเถกสตํ ขตฺยา. เอวมฺปิ ติตฺถฺยา ปุถุโส วทนฺติ. อารามรุกฺขเจตฺยานี’’ติ ปโยคา ทิสฺสนฺติ. ตถา ‘‘สากจฺฉติ ตจฺฉ’’นฺติ เอตฺถาปิ ‘‘สห กถยตี’’ติวา ‘‘สํกถยตี’’ติ วา ‘‘ตถฺย’’นฺติ จ ปทรูปํ ปติฏฺฐเปตฺวา สหสทฺทสฺส หการโลปํ, สํสทฺเท จ นิคฺคหีตโลปํ กตฺวา สการคตสฺส สรสฺส ทีฆํ กตฺวา ยกาเร ปเร สรโลปํ กตฺวา ตโต ถฺยการสญฺโญคสฺส จฺฉยุคํ กตฺวา วิสภาคสญฺโญเค เอโก เอกสฺส สภาคตฺตมาปชฺชติ. เตน ‘‘สากจฺฉติ ตจฺฉ’’นฺติ รูปานิ สิชฺฌนฺติ. ตถา หิ ‘‘อญฺญมญฺญํ สากจฺฉึสุ. กาเลน ธมฺมสากจฺฉา. ภูตํ ตจฺฉํ. ยถาตถิยํ วิทิตฺวาปิ ธมฺมํ, สมฺมา โส โลเก ปริพฺพเชยฺยา’’ติ [Pg.80] สวิกปานิ ปโยคานิ ทิสฺสนฺติ. ‘‘นชฺชา’’ติอาทีสุปิ ‘‘นทิยา’’ติอาทีนิ ปทรูปานิ ปติฏฺฐเปตฺวา วณฺณสนฺธิวเสน ยกาเร ปเร โลปวิธิ ลพฺภติเยว. วิวิโธ หิ สาสนานุกูโล รูปนิปฺผาทนุปาโย, อุปริ จ เอเตสํ สาธนตฺถํ ‘‘สรโลโป ยมนราทีสู’’ติอาทีนิ ลกฺขณานิ ภวิสฺสนฺติ. ตตฺถ – अचिंत्य प्रभाव असलेल्या सम्यक्संबुद्धांची पाळिनयी (व्याकरण पद्धत) अचिंत्यच असते, ती गंभीर आणि अवगाहन करण्यास कठीण असते. ती कोणत्याही सामान्य लक्षणाने (व्याकरण नियमाने) सिद्ध करता येत नाही, तर परंपरेने रचलेल्या लक्षणांनीच सिद्ध केली पाहिजे. तसेच, "खत्तिया तित्थिया चेतियानी" इत्यादींमध्ये 'य' कार पुढे असताना स्वराचा लोप होतो, त्यामुळे "अथेत्थेकसतं खत्या. एवम्पि तित्थ्या पुथुसो वदन्ति. आरामरुक्खचेत्यानी" असे प्रयोग दिसतात. तसेच "साकच्छति तच्छं" यामध्ये देखील "सह कथयति" किंवा "सं कथयति" किंवा "तथ्यं" असे पदरूप प्रस्थापित करून, 'सह' शब्दातील 'ह' काराचा लोप करून, आणि 'सं' शब्दातील निग्गहीताचा (अनुस्वाराचा) लोप करून, 'स' कारामधील स्वराला दीर्घ करून, 'य' कार पुढे असताना स्वराचा लोप करून, त्यानंतर 'थ्य' कार संयोगाचा 'च्छ' कार करून, विसभाग संयोगात एकाचा दुसऱ्याशी सभागभाव (समानता) प्राप्त होतो. त्याने "साकच्छति तच्छं" ही रूपे सिद्ध होतात. तसेच "अञ्ञमञ्ञं साकच्छिंसु. कालेन धम्मसाकच्छा. भूतं तच्छं. यथातथियं विदित्वापि धम्मं, सम्मा सो लोके परिब्बजेय्या" हे विविध प्रयोग दिसतात. "नज्जा" इत्यादींमध्ये देखील "नदिया" इत्यादी पदरूपे प्रस्थापित करून वर्णसंधीनुसार 'य' कार पुढे असताना लोपविधी प्राप्त होतोच. बुद्धशासनाला अनुकूल असे रूप सिद्ध करण्याचे विविध उपाय आहेत, आणि पुढे यांच्या सिद्धीसाठी "सरलोपो यमनरादीसू" इत्यादी लक्षणे (नियम) येतील. त्यामध्ये - ‘‘ทชฺชา ทชฺชุ’’นฺติอาทีนิ, สตฺตมีนํ วเสน เม; วุตฺตานิ โยคิราชสฺส, สาสนตฺถํ มเหสิโน. "दज्जा, दज्जु" इत्यादी रूपे, मी महर्षी योगिराजांच्या (बुद्धांच्या) शासनाच्या (उपदेशाच्या) कल्याणासाठी सप्तमी विभक्तीच्या (विधी-लिङ् लकार) अर्थाने सांगितली आहेत. อตฺริทํ วตฺตพฺพํ, กิญฺจาปิ อฏฺฐกถาจริเยหิ ‘‘มาตรํ เตน โทเสน, ทชฺชาหํ ทกรกฺขิโน’’ติ เอตฺถ ทชฺชนฺติ ปทสฺส ‘‘ทมฺมี’’ติ วตฺตมานาวเสน วิวรณํ กตํ, ตถาปิ สตฺตมีปโยโคเยว. อาจริยา หิ ‘‘สตฺตมีปโยโค อย’’นฺติ ชานนฺตาปิ ‘‘กทาจิ อญฺเญ ปริกปฺปตฺถมฺปิ คณฺเหยฺยุ’’นฺติ อาสงฺกาย เอวํ วิวรณมกํสุ. ตถา กิญฺจาปิ เตหิ ‘‘อนาปราธกมฺมนฺตํ, น ทชฺชํ ทกรกฺขิโน’’ติ เอตฺถ น ทชฺชนฺติ ปทสฺส ‘‘นาหํ ทกรกฺขสฺส ทสฺสามี’’ติ ภวิสฺสนฺตีวเสน วิวรณํ กตํ, ตถาปิ สตฺตมีปโยโคเยว, อนาคตํ ปน ปฏิจฺจ วตฺตพฺพตฺถตฺตา เอวํ วิวรณํ กตํ. ‘‘เนว ทชฺชํ มโหสธ’’นฺติ เอตฺถ ปน ‘‘น ตฺเวว ทเทยฺย’’นฺติ สตฺตมีปโยควเสเนว วิวรณํ กตนฺติ. เอวํ ทชฺชํปทสฺส วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. येथे हे सांगणे आवश्यक आहे की, जरी अट्ठकथाचार्यांनी "मातरं तेन दोसेन, दज्जाहं दकरक्खिनो" यामध्ये 'दज्जा' या पदाचे "दम्मी" (मी देतो) अशा वर्तमानकाळाच्या अर्थाने विवरण केले आहे, तरीही हा सप्तमीचाच प्रयोग आहे. कारण आचार्य "हा सप्तमीचा प्रयोग आहे" हे जाणत असूनही, "कदाचित इतर लोक याचा अर्थ संशयार्थक (परिकल्पार्थ) घेतील" या शंकेने त्यांनी असे विवरण केले. तसेच, जरी त्यांनी "अनापराधकम्मन्तं, न दज्जं दकरक्खिनो" यामध्ये 'न दज्जं' या पदाचे "नाहं दकरक्खस्स दस्सामि" (मी जलरक्षकाला देणार नाही) अशा भविष्यकाळाच्या अर्थाने विवरण केले आहे, तरीही हा सप्तमीचाच प्रयोग आहे; परंतु भविष्याला अनुसरून सांगायचा अर्थ असल्यामुळे त्यांनी असे विवरण केले. "नेव दज्जं महोसधं" यामध्ये मात्र "न त्वेव ददेय्य" (देऊ नये) अशा सप्तमी प्रयोगाच्या अर्थानेच विवरण केले आहे. अशा प्रकारे 'दज्जं' या पदाचा निर्णय समजून घ्यावा. อิทานิ ปโรกฺขาทิวเสน ปทกฺกโม กถิยติ. ‘‘ทท, ททู. ททู’’ติ จ อิทํ ‘‘นารโท อิติ นาเมน, กสฺสโป อิติ มํ วิทู’’ติอาทีสุ วิทูสทฺเทน สมํ. ทเท, ททิตฺถ, ททํ, ททิมฺห. ททิตฺถ, ททิเร. ททิตฺโถ, ททิวฺโห. आता परोक्षा (परोक्ष भूतकाळ) इत्यादींच्या क्रमाने पदांचा क्रम सांगितला जात आहे. "दद, ददू. ददू" हे "नारदो इति नामेन, कस्सपो इति मं विदू" इत्यादींमधील 'विदू' शब्दासारखेच आहे. ददे, ददित्थ, ददं, ददिम्ह. ददित्थ, ददिरे. ददित्ठो, ददिव्हो. เอตฺถ จ ททิตฺโถติ อิทํ ‘‘สญฺชคฺฆิตฺโถ มยา สห. มา กิสิตฺโถ มยา วินา. มา นํ กลเล อกฺกมิตฺโถ’’ติอาทีสุ ‘‘สญฺชคฺฆิตฺโถ’’ติอาทีหิ [Pg.81] สมํ. อิมินา นเยน สพฺพตฺถ ลพฺภมานวเสน สทิสตา อุปปริกฺขิตพฺพา. ททํ, ททิมฺเห. ปโรกฺขาสหิภรูปานิ. आणि येथे 'ददित्ठो' हे "सञ्जग्घित्ठो मया सह. मा किसित्ठो मया विना. मा नं कलले अक्कमित्ठो" इत्यादींमधील "सञ्जग्घित्ठो" इत्यादींसारखेच आहे. या पद्धतीने सर्व ठिकाणी उपलब्ध होणाऱ्या रूपांनुसार समानतेचे परीक्षण करावे. ददं, ददिम्हे. ही परोक्षा विभक्तीची रूपे आहेत. อททา, อททู. อทเท, อททตฺถ. อททํ, อททมฺห. อททตฺถ, อททตฺถุํ. อททเส, อททวฺหํ. อททึ อททมฺหเส. อิติ อนการปุพฺพมฺปิ รูปํ คเหตพฺพํ ‘‘เยสํ โน น ททมฺหเส’’ติ ทสฺสนโต. หิยฺยตฺตนีสหิตรูปานิ. अददा, अददू. अददे, अददत्थ. अददं, अददम्ह. अददत्थ, अददत्थुं. अददसे, अददव्हं. अददिं, अददम्हसे. अशा प्रकारे 'अ' कार पूर्व नसलेले रूप देखील "येसं नो न ददम्हसे" या प्रयोगाच्या दर्शनावरून ग्रहण करावे. ही हिय्यत्तनी (ह्यस्तन भूतकाळ) युक्त रूपे आहेत. อททิ, อททุํ, อททึสุ. อทโท, อททิตฺถ. อททึ, อททิมฺหา. อททา, อททู. อททเส, อททิวฺหํ. อททํ, อททิมฺเห. อชฺชตนีสหิตรูปานิ. अददि, अददुं, अददिंसु. अददो, अददित्थ. अददिं, अददिम्हा. अददा, अददू. अददसे, अददिव्हं. अददं, अददिम्हे. ही अज्जतनी (अद्यतन भूतकाळ) युक्त रूपे आहेत. ‘‘ททิสฺสติ, ททิสฺสนฺติ’’ อิจฺจาทิ สพฺพํ เนยฺยํ. ภวิสฺสนฺตีสหิตรูปานิ. "ददिस्सति, ददिस्सन्ति" इत्यादी सर्व रूपे जाणून घ्यावीत. ही भविस्सती (भविष्यकाळ) युक्त रूपे आहेत. ‘‘อททิสา, ททิสฺสา, อททิสฺสํสุ, ททิสฺสํสุ’’ อิจฺจาทิ จ สพฺพํ เนยฺยํ. กาลาติปตฺติสหิตรูปานิ. "अददिसा, ददिस्सा, अददिस्संसु, ददिस्संसु" इत्यादी सर्व रूपे जाणून घ्यावीत. ही कालातिपत्ती (क्रियातिपत्ती) युक्त रूपे आहेत. อปรานิปิ วตฺตมานาทิสหิตรูปานิ ภวนฺติ. เทติ, เทนฺติ. เทสิ, เทถ. เทมิ, ทมฺมิ, เทม, ทมฺม. เทตุ, เทนฺตุ. เทหิ, เทถ. เทมิ, ทมฺมิ, เทม, ทมฺม. อตฺตโนปทานิ อปฺปสิทฺธานิ. สตฺตมีนโย จ ปโรกฺขานโย จ อปฺปสิทฺโธ. หิยุตฺตนีนโย ปน อชฺชตนีนโย จ โกจิ โกจิ ปสิทฺโธ ปาฬิยํ อาคตตฺตา, สกฺกา จ ‘‘อทา, อทู, อโท, อท’’นฺติอาทินา โยเชตุํ. ตถา หิ นโย ทิสฺสติ. อทา ทานํ ปุรินฺทโท. วรญฺเจเม อโท สกฺก. พฺราหฺมณานํ อทํ คชํ. อทาสิเม. อทํสุ เต มโมกาสํ. อทาสึ พฺราหฺมเณ ตทาติ. ‘‘ทสฺสติ, ทสฺสนฺติ’’ อิจฺจาทิ สพฺพํ เนยฺยํ. ‘‘อทสฺสา, ทสฺสา, อทสฺสํสุ, ทสฺสํสุ, ทสฺสึสุ’’ อิจฺจาทิ จ สพฺพํ เนยฺยํ. इतरही वर्तमानकाळ इत्यादींनी युक्त रूपे होतात. देति, देन्ति. देसि, देथ. देमि, दम्मि, देम, दम्म. देतु, देन्तु. देहि, देथ. देमि, दम्मि, देम, दम्म. आत्मनेपदाची रूपे देखील योजावीत. सप्तमीचा नियम आणि परोक्षाचा नियम देखील योजावा. परंतु हिय्यत्तनीचा नियम आणि अज्जतनीचा नियम पाळिमध्ये काही काही ठिकाणी प्रसिद्ध रूपाने आल्यामुळे "अदा, अदू, अदो, अदं" इत्यादी प्रकारे योजना करता येते. कारण तसा नियम दिसतो. "अदा दानं पुरिन्ददो. वरञ्चेमे अदो सक्क. ब्राह्मणानं अदं गजं. अदासिमे. अदंसु ते ममोकासं. अदासिं ब्राह्मणे तदा" असे. "दस्सति, दस्सन्ति" इत्यादी सर्व रूपे जाणून घ्यावीत. "अदस्सा, दस्सा, अदस्संसु, दस्संसु, दस्सिंसु" इत्यादी सर्व रूपे जाणून घ्यावीत. ตถา [Pg.82] อาททาติ, อาททนฺติ. อาททาสิ, อาททาถ. อาททามิ, อาททาม. กจฺจายนมเต ‘‘อาทตฺเต’’ติ อตฺตโนปทํ วุตฺตํ. เอวํ ‘‘อาททาตุ, อาทเทยฺย’’ อิจฺจาทิ สพฺพํ เนยฺยํ. อาเทตุ อาเทยฺย อิจฺจาทิ ยถารหํ โยเชตพฺพํ. เอวเมว จ ‘‘ทาเปติ, อาทาเปตี’’ติอาทีนิปิ ยถารหํ โยเชตพฺพานิ. तसेच आददाति, आददन्ति. आददासि, आददाथ. आददामि, आददाम. कच्चायनाच्या मते "आदत्ते" हे आत्मनेपद सांगितले आहे. याप्रमाणे "आददातु, आददेय्य" इत्यादी सर्व रूपे जाणून घ्यावीत. आदेतु, आदेय्य इत्यादींची योग्यतेनुसार योजना करावी. याचप्रमाणे "दापेति, आदापेति" इत्यादींची देखील योग्यतेनुसार योजना करावी. ทากุจฺฉิเต คมเน. ทาติ. สุทฺทาติ. สุทฺโท, สุทฺที. ตตฺถ สุทฺโทติ สุทฺทาตีติ สุทฺโท, ปรโปถนาทิลุทฺทาจารกมฺมุนา ทารุกมฺมาทิขุทฺทาจารกมฺมุนา จ ลหุํ ลหุํ กุจฺฉิตํ คจฺฉตีติ อตฺโถ. ตถา หิ สุ อิติ สีฆตฺเถ นิปาโต, ทา อิติ ครหตฺโถ ธาตุ กุจฺฉิตคติวาจกตฺตา. สุทฺทสฺส ภริยา สุทฺที. 'दा' धातू निंदित गमनाच्या (जाण्याच्या) अर्थात आहे. दाति. सुद्दाति. सुद्दो, सुद्दी. त्यामध्ये 'सुद्दो' म्हणजे जो 'सुद्दाति' तो 'सुद्दो' (शूद्र) होय; दुसऱ्याला पीडा देणे इत्यादी क्रूर आचरणाच्या कर्माने आणि लाकडाचे काम इत्यादी क्षुद्र आचरणाच्या कर्माने जो वेगाने निंदित गतीला प्राप्त होतो, असा अर्थ आहे. कारण 'सु' हा वेगाच्या अर्थातील निपात आहे, आणि 'दा' हा निंदेच्या अर्थातील धातू निंदित गतीचा वाचक असल्यामुळे आहे. सुद्द्याची (शूद्राची) पत्नी ती 'सुद्दी' (शूद्रा) होय. ทุ คติยํ. ทวติ. ทุโม. เอตฺถ จ ทวติ คจฺฉติ มูลกฺขนฺธสาขาวิฏปปตฺตปลฺลวปุปฺผผเลหิ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ ปาปุณาตีติ ทุโม. 'दु' धातू गतीच्या अर्थात आहे. दवति. दुमो. आणि येथे 'दवति' म्हणजे जो गमन करतो, मूळ, खोड, फांद्या, उपफांद्या, पाने, पालवी, फुले आणि फळांनी वृद्धी, वाढ आणि विशालतेला प्राप्त होतो, तो 'दुमो' (वृक्ष) होय. เทโสธเน. โสธนํ ปริโยทาปนํ. ทายติ. ทายนํ. ยถา คายติ, คายนํ. ทายิตุํ, ทายิตฺวา, ธาตาวยวสฺเสการสฺส อายาเทโส. ‘‘ทาตุํ, ทตฺวา’’ อิจฺจปิ รูปานิ. 'दे' धातू शोधनाच्या (स्वच्छ करण्याच्या) अर्थात आहे. शोधन म्हणजे पूर्णपणे स्वच्छ करणे. दायति. दायनं. जसे गायति, गायनं. दायितुं, दायित्वा, धातूच्या अवयव असलेल्या 'ए' काराचा 'आय्' आदेश होतो. "दातुं, दत्वा" इत्यादी रूपे होतात. ตตฺร ทาตุนฺติ โสเธตุํ. ทตฺวาติ โสเธตฺวาติ อตฺโถ คเหตพฺโพ. ตถา หิ ‘‘พาโล อพฺยตฺโต นปฺปฏิพโล อนุยุญฺชิยมาโน อนุโยคํ ทาตุ’’นฺติ เอตฺถ ทาตุนฺติ ปทสฺส โสเธตุนฺติ อตฺโถ. เกจิ ‘‘ทานตฺถ’’นฺติ อตฺถํ วทนฺติ, ตํ น ยุตฺตํ. น หิ โย ปเรหิ อนุยุญฺชิยติ, โส อนุโยคํ เทติ นามาติ. ตสฺมา ‘‘อาจริยสฺส อนุโยคํ ทตฺวา พาราณสึ ปจฺจาคจฺฉี’’ติอาทีสุปิ อนุโยคํ ทตฺวาติ อนุโยคํ โสเธตฺวาติ อตฺโถเยว คเหตพฺโพ. ตถา [Pg.83] หิ ปุพฺพาจริเยหิ ‘‘อนุโยคทาปนตฺถ’’นฺติ เอตสฺมึ ปเทเส เอโสเยวตฺโถ วิภาวิโต. กถํ? อนุโยคทาปนตฺถนฺติ อนุโยคํ โสธาเปตุํ. วิมทฺทกฺขมญฺหิ สีหนาทํ นทนฺโต อตฺถโต อนุโยคํ โสเธติ นาม, อนุยุญฺชนฺโต จ นํ โสธาเปติ นามาติ. อิทมฺปิ จ เตหิ วุตฺตํ. ทาตุนฺติ โสเธตุํ. เกจิ ‘‘ทานตฺถ’’นฺติ อตฺถํ วทนฺติ, ตํ น ยุตฺตํ. น หิ โย สีหนาทํ นทติ, โส เอว ตตฺถ อนุโยคํ เทตีติ. สมนฺตปฏฺฐานมหาปกรณ สํวณฺณนายมฺปิ ปุพฺพาจริเยหิ ‘‘ทานํ ทตฺวาติ ตํ เจตนํ ปริโยทาเปตฺวา’’ติ โสธนตฺโถ วุตฺโต. ทุลฺลภา อยํ นีติ สาธุกํ จิตฺเต ฐเปตพฺพา. तेथे 'दातुं' (dātuṃ) म्हणजे 'शोधेतुं' (sodhetuṃ - शुद्ध करणे/स्पष्ट करणे). 'दत्वा' (datvā) म्हणजे 'शोधेत्वा' (sodhetvā - शुद्ध करून) असा अर्थ घ्यावा. कारण, 'बालो अब्यत्तो नप्पटिबलो अनुयुञ्जियमानो अनुयोगं दातुं' (मूर्ख, अडाणी, असमर्थ मनुष्य विचारला असता उत्तर देण्यास/स्पष्ट करण्यास असमर्थ असतो) येथे 'दातुं' या पदाचा अर्थ 'शोधेतुं' (स्पष्ट करणे) असा आहे. काही लोक याचा अर्थ 'दान देणे' (dānatthaṃ) असा सांगतात, पण ते योग्य नाही. कारण ज्याला इतरांकडून विचारले जाते, तो 'अनुयोग' (प्रश्न/अभ्यास) देतो असे नाही. म्हणून, 'आचरियस्स अनुयोगं दत्वा बाराणसिं पच्चागच्छि' (आचार्यांकडे अभ्यास स्पष्ट करून/परीक्षा देऊन वाराणसीला परत आला) इत्यादी ठिकाणी देखील 'अनुयोगं दत्वा' म्हणजे 'अनुयोगं सोधेत्वा' (अभ्यास स्पष्ट करून/शुद्ध करून) असाच अर्थ घ्यावा. तसेच पूर्वाचार्यांनी 'अनुयोगदापनत्थं' या पदात हाच अर्थ स्पष्ट केला आहे. कसा? 'अनुयोगदापनत्थं' म्हणजे 'अनुयोगं सोधापेतुं' (अभ्यास स्पष्ट करून घेणे/शुद्ध करून घेणे). कारण, आक्षेपांना सहन करणारी सिंहगर्जना करणारा मनुष्य अर्थाच्या दृष्टीने 'अनुयोग' स्पष्ट करतो आणि विचारणारा तो स्पष्ट करून घेतो. हे देखील त्यांनी सांगितले आहे: 'दातुं' म्हणजे 'शोधेतुं'. काही लोक 'दान देणे' असा अर्थ सांगतात, ते योग्य नाही. कारण जो सिंहगर्जना करतो, तोच तेथे अनुयोग (प्रश्न) देतो असे नाही. 'समन्तपट्ठानमहापकरण संवण्णना' (महापट्टण अट्ठकथा) मध्ये देखील पूर्वाचार्यांनी 'दानं दत्वा' म्हणजे 'तं चेतनं परियोदापेत्वा' (त्या चेतनेला अत्यंत शुद्ध करून) असा शुद्धीकरणाचा अर्थ सांगितला आहे. हा नियम दुर्मिळ आहे, तो मनात चांगल्या प्रकारे ठसवावा. เท ปาลเน. ทียติ. ทานํ, อุทฺทานํ ทายิตุํ, ทายิตฺวา. ตตฺถ ทานนฺติ ทุคฺคติโต ทายติ รกฺขตีติ ทานํ, ทานเจตนา. อุทฺทานนฺติ วุตฺตสฺส อตฺถสฺส วกฺขมานสฺส วา วิปฺปกิณฺณภาเวน นสฺสิตุํ อทตฺวา อุทฺธํ ทานํ รกฺขณํ อุทฺทานํ, สงฺคหวจนนฺติ อตฺโถ. อถ วา อุทฺทานนฺติ ปจฺฉุทฺทานาทิกํ อุทฺทานํ. 'दे' (de) धातू रक्षण करणे (पालने) या अर्थात आहे. 'दीयति' (dīyati). 'दानं' (dānaṃ), 'उद्दानं' (uddānaṃ), 'दायितुं' (dāyituṃ), 'दायित्वा' (dāyitvā). तेथे 'दान' म्हणजे दुर्गतीपासून रक्षण करते (दायति रक्खति) म्हणून 'दान', म्हणजेच दानचेतना. 'उद्दान' म्हणजे सांगितलेल्या किंवा सांगण्यात येणाऱ्या अर्थाला विखुरलेल्या अवस्थेमुळे नष्ट होऊ न देता वर धरून ठेवणे, रक्षण करणे म्हणजे 'उद्दान', म्हणजेच संग्रहवचन (संक्षिप्त संग्रह) असा अर्थ आहे. किंवा 'उद्दान' म्हणजे पश्चाद्-उद्दान (pacchuddāna) इत्यादी उद्दान (अनुक्रमणिका/संग्रह). ขาท ภกฺขเน. ขาทติ. ขาทิกา, ขาทนํ, อญฺญมญฺญขาทิกา. ปุพฺพผลขาทิกา, ขชฺชํ, ขาทนียํ, ขนฺธา. 'खाद' (khāda) धातू भक्षण करणे (भक्खने) या अर्थात आहे. 'खादति' (khādati). 'खादिका' (khādikā), 'खादनं' (khādanaṃ), 'अञ्ञमञ्ञखादिका' (एकमेकांना खाणे). 'पुब्बफलखादिका' (पहिले फळ खाणे), 'खज्जं' (खाद्य), 'खादनीयं' (खाण्यायोग्य), 'खन्धा' (स्कंध). ตตฺถ ขชฺชนฺติ ปูโว. ขาทนียนฺติ ปูวผลาผลาทิ. ‘‘ขาทนียํ วา โภชนียํ วา’’ติ วิสุํ โภชนียสฺส วจนโต ขาทนํ นาม ขชฺชสฺส วา ขาทนียสฺส วา ภกฺขนํ. อปิจ หึสาปิ ‘‘ขาทน’’นฺติ วุจฺจติ. ชาติชราพฺยาธิทุกฺขาทีหิ ขชฺชนฺตีติ ขนฺธา, รูปเวทนาสญฺญาสงฺขารวิญฺญาณานิ. ‘‘จีวรานิ นสฺสนฺติปิ ฑยฺหนฺติปิ อุนฺทูเรหิปิ ขชฺชนฺตี’’ติ เอตฺถ วิย ขชฺชนฺติ สทฺโท กมฺมตฺโถ. तेथे 'खज्जं' (khajjaṃ) म्हणजे पिष्टमय पदार्थ (पुवो - केक/रोटी). 'खादनीयं' (khādanīyaṃ) म्हणजे फळे, कंदमुळे इत्यादी. 'खादनीयं वा भोजनीयं वा' (खादनीय किंवा भोजनीय) यामध्ये 'भोजनीय' शब्दाचा वेगळा उल्लेख असल्यामुळे, 'खादन' म्हणजे खाद्य किंवा खादनीय पदार्थांचे भक्षण करणे होय. शिवाय, हिंसेला देखील 'खादन' म्हटले जाते. जन्म, जरा, व्याधी, दुःख इत्यादींद्वारे जे खाल्ले जातात (पीडित केले जातात) ते 'स्कंध' (खन्धा) होत, म्हणजेच रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार आणि विज्ञान. 'चीवरे नष्ट होतात, जळतात आणि उंदरांद्वारे देखील खाल्ली जातात' (चीवराणि नस्सन्तिपि डय्हन्तिपि उन्दूरेहिपि खज्जन्ति) या वाक्याप्रमाणे येथे 'खज्जन्ति' (खाल्ले जातात) हा शब्द कर्मभाव (कर्मवाच्य) अर्थात आहे. พท [Pg.84] เถริเย. ถิรภาโว เถริยํ, ยถา ทกฺขิยํ. พทติ. พทรี, พทรํ. อตฺริทํ วุจฺจติ – 'बद' (bada) धातू स्थैर्य (थेरिय - theriya) या अर्थात आहे. स्थिर भाव म्हणजे स्थैर्य (थेरिय), जसे 'दक्खिय' (दक्षता). 'बदति' (badati). 'बदरी' (badarī), 'बदरं' (badaraṃ - बोर). याविषयी हे म्हटले आहे – กกฺกนฺธุ พทรี โกลี, โกลํ กุลวมิจฺจปิ; เตนิลํ พทรญฺจาติ, นามํ รุกฺขสฺส โกลิยาติ. 'कक्कन्धु' (kakkandhu), 'बदरी' (badarī), 'कोली' (kolī), 'कोलं' (kolaṃ), 'कुलवम्' (kulavam) आणि 'तेनिलं' (tenilaṃ) व 'बदरं' (badaraṃ) ही कोली (बोरीच्या) वृक्षाची नावे आहेत. ขท ธิติหึสาสุ จ. เถริยาเปกฺขาย จกาโร. ขทติ. ขทิโร. 'खद' (khada) धातू धैर्य (धृति) आणि हिंसा या अर्थात देखील आहे. 'च' (ca) हा शब्द 'थेरिय' (स्थैर्य) या अर्थाच्या अपेक्षेने आहे. 'खदति' (khadati). 'खदिरो' (khadiro - खैर). คท วิยตฺติยํ วาจายํ. คทติ. อาคทนํ, ตโถ อาคโท เอตสฺสาติ ตถาคโต. สุฏฺฐุ คทตีติ สุคโท. 'गद' (gada) धातू स्पष्ट वाणी (वियत्तियं वाचायं) या अर्थात आहे. 'गदति' (gadati). 'आगदनं' (āgadanaṃ - बोलणे), ज्यांचे बोलणे (आगद) तथ्य (तथ) आहे ते 'तथागत' (tathāgato). जे उत्तम प्रकारे बोलतात ते 'सुगद' (sugado). รท วิเลขเน. รทติ. รทโน, รโท, ทาฐารโท. อตฺร รทโนติ ทนฺโต. 'रद' (rada) धातू खोदणे/लेखन करणे (विलेखने) या अर्थात आहे. 'रदति' (radati). 'रदनो' (radano), 'रदो' (rado), 'दाठारदो' (dāṭhārado - सुळे असलेला). येथे 'रदन' म्हणजे दात. นท อพฺยตฺตสทฺเท. สีโห นทติ, ปณทติ. นาโท, นที. ปพฺพเตสุ วนาทีสุ นทตีติ นที. นท อิ อิติ ธาตุทฺวยวเสน ปน ‘‘นทนฺตี คจฺฉตีติ นที’’ติปิ นิพฺพจนํ วทนฺติ. 'नद' (nada) धातू अस्पष्ट आवाजाच्या (अब्ब्यत्तसद्दे) अर्थात आहे. 'सीहो नदति' (सिंह गर्जना करतो), 'पणदति' (panadati). 'नादो' (nādo - नाद/आवाज), 'नदी' (nadī). जी पर्वतांमध्ये, वनांमध्ये आवाज करत वाहते ती 'नदी'. 'नद' आणि 'इ' या दोन धातूंच्या संयोगाने 'नदन्ती गच्छतीति नदी' (आवाज करत जाणारी ती नदी) अशी देखील व्युत्पत्ती सांगतात. เกเจตฺถ วเทยฺยุํ ยา ปเนสา ‘‘นท อพฺยตฺตสทฺเท’ติ ธาตุ ตุมฺเหหิ วุตฺตา, สา กึนิจฺจมพฺยตฺตสทฺเทเยว วตฺตติ, อุทาหุ กตฺถจิ วิยตฺติยมฺปิ วาจายํ วตฺตตี’’ติ? นิจฺจมพฺยตฺตสทฺเทเยว วตฺตตีติ. ยชฺเชวํ ‘‘สีโห นทตี’’ติอาทีสุ ติรจฺฉานคตาทิสทฺทภาเวน อวิภาวิตตฺถตาย นทสทฺโท อพฺยตฺตสทฺโท โหตุ, ‘‘สีโห วิย อยํ ปุริโส นทตี’’ติอาทีสุ ปน มนุสฺสภาสาปิ อพฺยตฺตสทฺโท สิยาติ? ตนฺน วิยตฺตาปิ สมานา มนุสฺสภาสา สีโห วิยาติ เอวํ สมุเปกฺขาวเสน สีหปทตฺถสฺสาเปกฺขนโต นทสทฺเทน นิทฺทิสิยติ[Pg.85], น ปุริสาเปกฺขนวเสน. ยถา หิ วลาหกูปมาวเสน กถิตํ, ‘‘กถญฺจ ปุคฺคโล คชฺชิตา จ วสฺสิตา จ โหตี’’ติ ปาฬิยํ คชฺชนํ วสฺสนญฺจ ปุคฺคเล อลพฺภมานมฺปิ วลาหกสฺส คชฺชนวสฺสนสทิสตาย ภาสนกรณกฺริยายูปลพฺภนโต วตฺตพฺพเมว โหติ, เอวเมว นิพฺภยภาเวน สีหนาทสทิสิยา วาจาย นิจฺฉรณโต สีโห วิย นทตีติ อวิภาวิตตฺถวนฺเตน นทสทฺเทน มนุสฺสภาสาปิ นิทฺทิสิตพฺพา โหติ. येथे काही लोक विचारू शकतात की, 'तुम्ही सांगितलेला 'नद अव्यत्तशब्दे' (अस्पष्ट आवाजात) हा धातू नेहमी अस्पष्ट आवाजासाठीच वापरला जातो की कधी स्पष्ट वाणीसाठी देखील वापरला जातो?' उत्तर: तो नेहमी अस्पष्ट आवाजासाठीच वापरला जातो. जर असे असेल, तर 'सीहो नदति' (सिंह गर्जना करतो) इत्यादी वाक्यांमध्ये प्राण्यांच्या आवाजाच्या स्वरूपात अर्थ स्पष्ट न झाल्यामुळे 'नद' शब्द अस्पष्ट आवाज मानला जाऊ शकतो, परंतु 'हा मनुष्य सिंहासारखा गर्जना करतो (नदति)' इत्यादी वाक्यांमध्ये मानवी भाषा देखील अस्पष्ट आवाज ठरेल का? तसे नाही. मानवी भाषा स्पष्ट असली तरी, 'सिंहासारखा' अशा उपमेच्या दृष्टीने सिंह या पदाच्या अर्थाच्या अपेक्षेने 'नद' शब्दाने ती दर्शवली जाते, मनुष्याच्या अपेक्षेने नाही. जसे ढगाच्या उपमेने (वलाहक उपमा) पाळीमध्ये म्हटले आहे की, 'मनुष्य गर्जना करणारा आणि वर्षाव करणारा कसा होतो?' येथे गर्जना आणि वर्षाव मनुष्यामध्ये प्रत्यक्ष नसले तरी, ढगाच्या गर्जना व वर्षावासारख्या त्याच्या बोलण्याच्या क्रियेमुळे ते बोलणे योग्यच ठरते. त्याचप्रमाणे, निर्भयपणे सिंहगर्जनेसारखी वाणी बाहेर पडत असल्यामुळे 'सिंहासारखा गर्जना करतो' अशा प्रकारे अस्पष्ट अर्थ असणाऱ्या 'नद' शब्दाने मानवी भाषा देखील दर्शवली जाते. เอตฺถ จ อมฺพผลูปมาทโยปิ อาหริตฺวา ทสฺเสตพฺพา. น หิ ปกฺกามกตาทีนิ ปุคฺคเลสุ วิชฺชนฺติ, อถ โข อมฺพผลาทีสุ เอว วิชฺชนฺติ, เอวํ สนฺเตปิ ภควตา อญฺเญนากาเรน สทิสตฺตํ วิภาเวตุํ อมฺพผลูปมาทโย วุตฺตา, เอวเมว นทสทฺโท อพฺยตฺตสทฺทภาเวน ติรจฺฉานคตสทฺทาทีสุ เอว วตฺตพฺโพปิ อตฺถนฺตรวิภาวนตฺถํ ‘‘สีโห วิย นทตี’’ติอาทีสุ มนุสฺสภาสายมฺปิ รูฬฺหิยา วุตฺโต, น สภาวโต. ตถา หิ สภาวโต นทสทฺเทนปิ วสฺสิตสทฺทาทีหิปิ มนุสฺสภาสา นิทฺทิสิตพฺพา น โหตีติ. ยทิ เอวํ – आणि येथे आंब्याच्या फळाची उपमा (अम्बफलूपमा) इत्यादी उदाहरणे देऊन स्पष्ट केले पाहिजे. कारण पिकलेले किंवा कच्चे असणे इत्यादी गुण मनुष्यांमध्ये नसतात, तर ते आंब्याच्या फळांमध्येच असतात. असे असूनही भगवंतांनी दुसऱ्या प्रकारे समानता स्पष्ट करण्यासाठी आंब्याच्या फळाची उपमा इत्यादी सांगितले आहे. त्याचप्रमाणे, 'नद' शब्द अस्पष्ट आवाजाच्या स्वरूपात प्राण्यांच्या आवाजासाठीच वापरला पाहिजे, तरीही दुसरा अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी 'सिंहासारखा गर्जना करतो' इत्यादी वाक्यांमध्ये मानवी भाषेसाठी देखील तो रूढीने वापरला गेला आहे, स्वभावाने नाही. कारण स्वभावाने 'नद' शब्दाने किंवा 'वस्सित' (प्राण्यांचा ओरडणे) इत्यादी शब्दांनी मानवी भाषा दर्शवली जात नाही. जर असे असेल तर – ‘‘สุวิชานํ สิงฺคาลานํ, สกุณานญฺจ วสฺสิตํ; มนุสฺสวสฺสิตํ ราช, ทุพฺพิชานตรํ ตโต’’ติ “हे राजा! कोल्ह्यांचे आणि पक्ष्यांचे ओरडणे (वस्सितं) ओळखणे सोपे आहे; परंतु मनुष्याचे ओरडणे (बोलणे/वर्तन) त्यापेक्षाही अधिक कठीण आहे.” เอตฺถ กสฺมา วสฺสิตสทฺเทน มนุสฺสภาสา นิทฺทิสิยตีติ? สจฺจํ มนุสฺสภาสาปิ วสฺสิตสทฺเทน นิทฺทิฏฺฐา ทิสฺสติ, เอวํ สนฺเตปิ สา ‘‘สุวิชานํ สิงฺคาลานํ, สกุณานญฺจ วสฺสิต’’นฺติ วสฺสิตสทฺทวเสน ปโยคสฺส วจนโต ตทนุรูปํ นิทฺทิสิตุํ อรหตีติ มนฺตฺวา วสฺสิตสทฺทสทิสี นิทฺทิฏฺฐา. น หิ ‘‘มนุสฺโส วสฺสตี’’ติอาทินา วิสุํ ปโยคา ทิสฺสนฺติ, ‘‘สกุโณ วสฺสติ, กูชตี’’ติอาทินา ปน ปโยคา ทิสฺสนฺติ, ตสฺมา ‘‘สงฺคามํ โอตริตฺวาน, สีหนาทํ นทิ กุโส’’ติอาทีสุ วิย ยถารหํ [Pg.86] อตฺโถ คเหตพฺโพ. เอวํ นทธาตุ สภาวโต อพฺยตฺตสทฺเทเยว โหติ, น วิยตฺติยํ วาจายนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. येथे 'वस्सित' (vassita) शब्दाने मानवी भाषा का दर्शवली आहे? हे खरे आहे की मानवी भाषा देखील 'वस्सित' शब्दाने दर्शवलेली दिसते, तरीही 'सुविजानं सिङ्गालानं, सकुळानञ्च वस्सितं' या वाक्यात 'वस्सित' शब्दाच्या प्रयोगामुळे, त्याला अनुरूप दर्शवणे योग्य आहे असे मानून 'वस्सित' शब्दासारखी ती दर्शवली आहे. कारण 'मनुष्य ओरडतो (वस्सति)' असे स्वतंत्र प्रयोग आढळत नाहीत, तर 'पक्षी ओरडतो (वस्सति), कूजन करतो (कूजति)' असे प्रयोग आढळतात. म्हणून, 'संग्रामात उतरून कुसाने सिंहगर्जना केली' (सङ्गामं ओतरित्वान, सीहनादं नदि कुसो) इत्यादी वाक्यांप्रमाणे योग्य तो अर्थ घ्यावा. अशा प्रकारे, 'नद' धातू स्वभावाने अस्पष्ट आवाजासाठीच असतो, स्पष्ट वाणीसाठी नाही, असे जाणावे. อทฺท คติยํ ยาจเน จ. อทฺทติ. 'अद्द' (adda) धातू गती आणि याचना (मागणे) या अर्थात आहे. 'अद्दति' (addati). นทฺท คทฺท สทฺเท. นทฺทติ. คทฺทติ. 'नद्द' (nadda) आणि 'गद्द' (gadda) धातू आवाजाच्या (सद्दे) अर्थात आहेत. 'नद्दति' (naddati), 'गद्दति' (gaddati). ตทฺท หึสายํ. ตทฺทติ. 'तद्द' (tadda) धातू हिंसेच्या (हिंसायं) अर्थात आहे. 'तद्दति' (taddati). กทฺท กุจฺฉิเต สทฺเท. กทฺทติ. กทฺทโม. 'कद्द' (kadda) धातू निंद्य/वाईट आवाजाच्या (कुच्छिते सद्दे) अर्थात आहे. 'कद्दति' (kaddati). 'कद्दमो' (kaddamo - चिखल). ขทฺท ทํสเน. ทํสนมิห ทนฺตสุกตกตฺติกา กฺริยา อภิธียเต. สภาวตฺตา ธาตุยา สาธนปฺปโยคสมวายี. ขทฺทติ. 'खद्द' (धातू) दंसन (चावणे/खाणे) या अर्थात आहे. येथे 'दंसन' म्हणजे दातांनी चांगल्या प्रकारे केलेली क्रिया (चावण्याची क्रिया) म्हटली जाते. धातूच्या स्वभावामुळे साधनांच्या (दातांच्या) प्रयोगाचा समवाय (संबंध) होतो. 'खद्दति' (तो चावतो/खातो). อทิ พนฺธเน. อนฺทติ. อนฺทุ. อนฺทุสทฺโทปเนตฺถ อิตฺถิลิงฺโค คเหตพฺโพ ปาฬิยํ อิตฺถิลิงฺคปฺปโยคทสฺสนโต ‘‘เสยฺยถาปิ วาเสฏฺฐ อยํ อจิรวตี นที ปูรา อุทกสฺส สมติตฺติกา กากเปยฺยา, อถ ปุริโส อาคจฺเฉยฺย ปารตฺถิโก ปารคเวสี ปารคามี ปารํ ตริตุกาโม, โส โอริมตีเร ทฬฺหาย อนฺทุยา ปจฺฉาพาหํ คาฬฺหพนฺธนพนฺโธ’’ติ. ตตฺร อนฺทูติ ยํ กิญฺจิ พนฺธนํ วา. ‘‘ยถา อนฺทุฆเร ปุริโส’’ติ หิ วุตฺตํ. พนฺธนวิเสโส วา, ‘‘อนฺทุพนฺธนาทีนิ ฉินฺทิตฺวา ปลายึสู’’ติ หิ วุตฺตํ. อปิจ อนฺทนฏฺเฐน พนฺธนฏฺเฐน อนฺทุ วิยาติปิ อนฺทุ, ปญฺจ กามคุณา. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา ‘‘อิเม โข วาเสฏฺฐ ปญฺจ กามคุณา อริยสฺส วินเย อนฺทูติปิ พนฺธนนฺติปิ วุจฺจนฺตี’’ติ. นิคฺคหีตาคมวเสนายํ ธาตุ วุตฺตา. กตฺถจิ ปน วิคตนิคฺคหีตาคโมปิ โหติ, ตํ ยถา? ‘‘อวิชฺชา ภิกฺขเว ปุพฺพงฺคมา อกุสลานํ ธมฺมานํ สมาปตฺติยา อนฺวเทว อหิริก’’นฺติ ปาฬิ. เอตฺถ อนุอนฺทติ อนุพนฺธตีติ อนฺวทิ. อนฺวทิ เอว อนฺวเทวาติ กิตวิคฺคโห สนฺธิวิคฺคโห จ [Pg.87] เวทิตพฺโพ. ตถา หิ อฏฺฐกถายํ ‘‘อนฺวเทวาติ อนุพนฺธมานเมวา’’ติ วุตฺตํ, ตํ อวิชฺชมหิริกํ อนุพนฺธมานเมว โหตีติ อตฺโถ. 'अदि' (धातू) बंधन (बांधणे) या अर्थात आहे. 'अन्दति' (तो बांधतो). 'अन्दु' (साखळी/बेडी). येथे 'अन्दु' हा शब्द स्त्रीलिंगी मानला पाहिजे, कारण पाळीमध्ये त्याचा स्त्रीलिंगी प्रयोग दिसून येतो: "जसे की, वासेठ्ठ, ही अचिरवती नदी पाण्याने काठोकाठ भरलेली आहे की कावळ्यालाही सहज पाणी पिता यावे, आणि एखादा पलीकडे जाऊ इच्छिणारा, पलीकडचा किनारा शोधणारा, पलीकडे जाण्याची इच्छा असणारा माणूस आला, आणि तो या तीरावर मजबूत साखळीने (अन्दुया) पाठीमागे हात बांधून घट्ट बांधला गेला असेल..." तेथे 'अन्दू' म्हणजे कोणतेही बंधन किंवा बेडी होय. कारण "जसा तुरुंगात (अन्दुघरे) माणूस" असे म्हटले आहे. किंवा विशिष्ट प्रकारचे बंधन, कारण "साखळ्या व बंधने तोडून ते पळून गेले" असे म्हटले आहे. शिवाय, बांधण्याच्या अर्थाने 'अन्दु' सारखे जे आहे ते 'अन्दु' म्हणजेच पाच कामगुण (पंच कामगुणा) होत. भगवानांनी म्हटलेच आहे: "वासेठ्ठ, हे पाच कामगुण आर्यांच्या विनयात 'अन्दु' (बेडी) आणि 'बंधन' असेही म्हटले जातात." हा धातू निग्गहीत (अनुस्वार) आगम होऊन सांगितला आहे. परंतु काही ठिकाणी निग्गहीत आगम नसलेलाही असतो, तो कसा? "भिक्खूहो, अकुशल धर्मांच्या प्राप्तीसाठी अविद्या ही अग्रगामी आहे, आणि तिच्या पाठोपाठ (अन्वदेव) अहिरिक (निर्लज्जपणा) येतो" ही पाळी आहे. येथे 'अनुअन्दति' म्हणजे 'अनुबन्धति' (पाठोपाठ बांधणे) यावरून 'अन्वदि' बनतो. 'अन्वदि' म्हणजेच 'अन्वदेव' असा कृत्-विग्रह आणि संधि-विग्रह समजला पाहिजे. म्हणूनच अट्ठकथेत म्हटले आहे: "अन्वदेव म्हणजे पाठोपाठ येणारेच (अनुबन्धमानमेव)", याचा अर्थ असा की ती अविद्या अहिरिकाच्या पाठोपाठ येणारीच असते. อิทิ ปรมิสฺสริเย อินฺทติ. อินฺทนํ, อินฺโท. 'इदि' (धातू) परम ऐश्वर्य (सर्वोच्च प्रभुत्व) या अर्थात आहे. 'इन्दति' (तो प्रभुत्व गाजवतो). 'इन्दनं' (प्रभुत्व गाजवणे), 'इन्दो' (इंद्र/स्वामी). เอตฺถ อินฺโทติ อธิปติภูโต โย โกจิ. โส หิ อินฺทติ ปเรสุ อิสฺสริยํ ปาปุณาตีติ อินฺโทติ วุจฺจติ. อปิจ อินฺโทติ สกฺโก. สกฺกสฺส หิ อเนกานิ นามานิ – येथे 'इन्दो' म्हणजे अधिपती (स्वामी) झालेला कोणताही प्राणी. कारण तो इतरांवर प्रभुत्व गाजवतो, ऐश्वर्य प्राप्त करतो, म्हणून त्याला 'इन्दो' म्हटले जाते. शिवाय, 'इन्दो' म्हणजे सक्क (शक्र/इंद्र) होय. सक्काची अनेक नावे आहेत – สกฺโก ปุรินฺทโท อินฺโท, วตฺรภู ปากสาสโน; สหสฺสเนตฺโต มฆวา, เทวราชา สุชมฺปติ. सक्क (शक्र), पुरिन्दद, इन्द (इंद्र), वत्रभू, पाकसासन; सहस्सनेत्त (सहस्रनेत्र), मघवा, देवराजा, सुजम्पति (सुजाचा पती). สหสฺสกฺโข ทสสต-โลจโน วชิราวุโธ; หูตปติ มหินฺโท จ, โกสิโย เทวกุญฺชโร. सहस्सक्ख (सहस्राक्ष), दससत-लोचन (हजार डोळे असलेला), वजिरावुध (वज्रायुध धारण करणारा); हूतपति, महिन्द (महेंद्र), कोसिय (कौशिक) आणि देवकुञ्जर (देवांमध्ये श्रेष्ठ). สุราธิโป สุรนาโถ, วาสโว ติทิวาธิภู; ชมฺพาริ เจว วชิร-หตฺโถ อสุรสาสโน; คนฺธราชา เทวินฺโท, สุรินฺโท อสุราภิภูติ. सुराधिप, सुरनाथ, वासव, तिदिवाधिभू (त्रयस्त्रिंश स्वर्गाचा स्वामी); जम्बारि, वजिरहत्थ (हातात वज्र असलेला), असुरसासन (असुरांवर शासन करणारा); गन्धराजा, देविन्द (देवांचा इंद्र), सुरिन्द आणि असुराभिभू (असुरांना पराभूत करणारा). เอวํ อเนกานิ นามานิ. เอโกปิ หิ อตฺโถ อเนกสทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตตาย อเนกนาโม. เตนาห ภควา – अशी अनेक नावे आहेत. कारण एकच अर्थ (वस्तू) शब्दांच्या प्रवृत्तीच्या अनेक कारणांमुळे (सद्दप्पवत्तिनिमित्त) अनेक नावांनी ओळखला जातो. म्हणूनच भगवानांनी म्हटले आहे – สกฺโก มหาลิ เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน มโฆ นาม มาณโว อโหสิ, ตสฺมา ‘‘มฆวา’’ติ วุจฺจติ. สกฺโก มหาลิ เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน ปุเร ทานํ อทาสิ, ตสฺมา ‘‘ปุรินฺทโท’’ติ วุจฺจติ. สกฺโก มหาลิ เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน สกฺกจฺจํ ทานํ อทาสิ, ตสฺมา ‘‘สกฺโก’’ติ วุจฺจติ. สกฺโก มหาลิ เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน อาวาสํ อทาสิ, ตสฺมา ‘‘วาสโว’’ติ วุจฺจติ. สกฺโก มหาลิ เทวานมินฺโท สหสฺสํ อตฺถานํ มุหุตฺเตน [Pg.88] จินฺเตติ, ตสฺมา ‘‘สหสฺสกฺโข’’ติ วุจฺจติ. สกฺกสฺส มหาลิ เทวานมินฺทสฺส สุชา นาม อสุรกญฺญา ปชาปติ, ตสฺมา ‘‘สุชมฺปตี’’ติ วุจฺจติ. สกฺโก มหาลิ เทวานมินฺโท เทวานํ ตาวตึสานํ อิสฺสริยาธิปจฺจํ รชฺชํ กาเรติ, ตสฺมา ‘‘เทวานมินฺโท’’ติ วุจฺจตีติ. "महाली, देवांचा राजा सक्क पूर्वजन्मी मनुष्य असताना 'मघ' नावाचा तरुण होता, म्हणून त्याला 'मघवा' म्हटले जाते. महाली, देवांचा राजा सक्क पूर्वजन्मी मनुष्य असताना त्याने नगरात (किंवा आधी) दान दिले होते, म्हणून त्याला 'पुरिन्दद' म्हटले जाते. महाली, देवांचा राजा सक्क पूर्वजन्मी मनुष्य असताना त्याने आदरपूर्वक (सक्कच्चं) दान दिले होते, म्हणून त्याला 'सक्क' म्हटले जाते. महाली, देवांचा राजा सक्क पूर्वजन्मी मनुष्य असताना त्याने निवासस्थान (आवास) दिले होते, म्हणून त्याला 'वासव' म्हटले जाते. महाली, देवांचा राजा सक्क एका क्षणात हजार गोष्टींचा विचार करतो, म्हणून त्याला 'सहस्सक्ख' (सहस्राक्ष) म्हटले जाते. महाली, देवांचा राजा सक्क याची पत्नी (पजापति) 'सुजा' नावाची असुरकन्या आहे, म्हणून त्याला 'सुजम्पति' म्हटले जाते. महाली, देवांचा राजा सक्क तावतिंस (त्रयस्त्रिंश) देवांवर आधिपत्य व राज्य करतो, म्हणून त्याला 'देवानामिन्य' (देवांचा राजा) म्हटले जाते." เอวเมกสฺสาปิ อตฺถสฺส อเนกานิ สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตานิ ทิสฺสนฺติ. अशा प्रकारे, एकाच अर्थासाठी (वस्तूसाठी) शब्दांच्या प्रवृत्तीची अनेक कारणे (सद्दप्पवत्तिनिमित्त) दिसून येतात. ตถา หิ เยน ปวตฺตินิมิตฺเตน ตาวตึสาธิปติมฺหิ อินฺทสทฺโท ปวตฺโต, น เตน ตตฺถ สกฺกาทิสทฺทา ปวตฺตา, อถ โข อญฺเญน. ตถา เยน สมฺมาทิฏฺฐิยํ ปญฺญาสทฺโท ปวตฺโต, น เตน ตตฺถ วิชฺชาทิสทฺทา. เยน สมฺปยุตฺตธมฺมานํ ปุพฺพงฺคมภาเวน อุปฺปนฺนธมฺมสฺมึ จิตฺตสทฺโท ปวตฺโต, น เตน ตตฺถ วิญฺญาณาทิสทฺทา. น หิ วินา เกนจิ ปวตฺตินิมิตฺเตน สทฺโท ปวตฺตตีติ. เอโกปิ อตฺโถ สมฺมุตฺยตฺโถ จ ปรมตฺโถ จ อเนกสทฺทปฺปวฺตฺตินิมิตฺตตาย อเนกนาโมติ ทฏฺฐพฺพํ. तसेच, ज्या प्रवृत्तीच्या कारणामुळे तावतिंसच्या अधिपतीसाठी 'इन्द' शब्द प्रवृत्त झाला आहे, त्या कारणाने तेथे 'सक्क' इत्यादी शब्द प्रवृत्त झाले नाहीत, तर दुसऱ्या कारणाने झाले आहेत. तसेच, ज्या कारणाने सम्यक् दृष्टीमध्ये (सम्मादिट्ठि) 'पञ्ञा' (प्रज्ञा) शब्द प्रवृत्त झाला आहे, त्या कारणाने तेथे 'विज्जा' (विद्या) इत्यादी शब्द प्रवृत्त झाले नाहीत. ज्या कारणाने संप्रयुक्त धर्मांच्या (सहयोगी मानसिक घटकांच्या) अग्रगामी असण्याने उत्पन्न झालेल्या धर्मामध्ये 'चित्त' शब्द प्रवृत्त झाला आहे, त्या कारणाने तेथे 'विञ्ञाण' (विज्ञान) इत्यादी शब्द प्रवृत्त झाले नाहीत. कारण कोणत्याही प्रवृत्तीच्या कारणाशिवाय शब्द प्रवृत्त होत नाही. म्हणून, एकच अर्थ—मग तो संवृति-अर्थ (सम्मतियत्थ - व्यावहारिक सत्य) असो वा परमार्थ-अर्थ (परमत्थ) असो—शब्दांच्या प्रवृत्तीच्या अनेक कारणांमुळे अनेक नावांनी युक्त असतो, असे समजले पाहिजे. เอตฺถ สิยา ‘‘นามานีติ วทถ, กึ นามํ นามา’’ติ. วุจฺจเต – อีทิเส ฐาเน อตฺเถสุ สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตํ ‘‘นาม’’นฺติ คหิตํ, ยํ ‘‘ลิงฺค’’นฺติปิ วุจฺจติ. ตถา หิ ‘‘นาม’’นฺติ จ ‘‘ลิงฺค’’นฺติ จ สทฺโทปิ วุจฺจติ, ‘‘อญฺญํ โสภนํ นามํ ปริเยสิสฺสามิ. ลิงฺคญฺจ นิปฺปชฺชเต’’ติอาทีสุ วิย. อสภาวธมฺมภูตํ นามปญฺญตฺติสงฺขาตํ อตฺเถสุ สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตมฺปิ วุจฺจติ ‘‘นามโคตฺตํ น ชีรติ. สตลิงฺโค’’ติอาทีสุ วิย. อิติ นามสทฺเทนปิ ลิงฺคสทฺเทนปิ สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตสฺส กถนํ ทฏฺฐพฺพํ. สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตญฺจ นาม โลกสงฺเกตสิทฺโธ ตํตํวจนตฺถนิยโต สามญฺญาการวิเสโสติ คเหตพฺพํ. โส เอวํภูโตเยว สามญฺญาการวิเสโส นาม ปญฺญตฺตีติ ปุพฺพาจริยา วทนฺติ[Pg.89]. โส หิ ตสฺมึ ตสฺมึ อตฺเถ สทฺทํ นาเมติ ตสฺส ตสฺส อตฺถสฺส นามสญฺญํ กโรตีติ นามํ, ปกาเรหิ ญาปนโต ปญฺญตฺติ จ. สวิญฺญตฺติวิการสฺส ปน สทฺทสฺส สมฺมุติปรมตฺถสจฺจานํ ปกาเรหิ ญาปนโต ปญฺญตฺติภาเว วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. สทฺทสฺเสว หิ เอกนฺเตน ปญฺญตฺติภาโว อิจฺฉิตพฺโพ ‘‘นิรุตฺติปฏิสมฺภิทา ปริตฺตารมฺมณา’’ติ จ ‘‘นิรุตฺติปฏิสมฺภิทา ปจฺจุปฺปนฺนารมฺมณา’’ติ จ ‘‘นิรุตฺติปฏิสมฺภิทา พหิทฺธารมฺมณา’’ติ จ ปาฬิทสฺสนโต. อิธ ปน สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตาธิการตฺตา นามวเสน อตฺโถ ปกาสิโต. เอวํ อเนกวิธสฺส สามญฺญาการวิเสโสติ ปุพฺพาจริเยหิ คหิตสฺส นามปญฺญตฺติสงฺขาตสฺส สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺตสฺส วเสน เอโกปิ เญยฺยตฺโถ อเนกลิงฺโคติ คเหตพฺโพ. เตนาห อายสฺมา สุเหมนฺโต ปภินฺนปฏิสมฺภิโท – येथे अशी शंका येऊ शकते: "तुम्ही 'नावे' असे म्हणता, पण 'नाम' म्हणजे काय?" उत्तर दिले जाते – अशा ठिकाणी अर्थांमधील शब्दांच्या प्रवृत्तीच्या कारणाला (सद्दप्पवत्तिनिमित्त) 'नाम' मानले गेले आहे, ज्याला 'लिंग' (चिन्ह) असेही म्हणतात. कारण 'नाम' आणि 'लिंग' हे शब्द स्वतः शब्दासाठीही वापरले जातात, जसे की "मी दुसरे एखादे सुंदर नाव (नाम) शोधेन. आणि लिंग (चिन्ह) सिद्ध होते" इत्यादींमध्ये. स्वभाव-धर्म नसलेले (अस्वभावधर्मभूत) आणि नाम-प्रज्ञप्ती (नामपञ्ञत्ति) म्हणून ओळखले जाणारे अर्थांमधील शब्दांच्या प्रवृत्तीचे कारणही 'नाम' किंवा 'लिंग' म्हटले जाते, जसे की "नाम आणि गोत्र (नामगोत्त) कधी नष्ट होत नाही. शंभर लिंगे (सतिलिंगो) असलेला" इत्यादींमध्ये. अशा प्रकारे, 'नाम' शब्दाने आणि 'लिंग' शब्दानेही शब्दांच्या प्रवृत्तीच्या कारणाचे कथन समजले पाहिजे. आणि शब्दांच्या प्रवृत्तीचे कारण असलेले 'नाम' हे लोकसंकेताने सिद्ध झालेले, त्या त्या शब्दाच्या अर्थाशी संबंधित असलेले विशिष्ट सामान्य लक्षण (सामञ्ञाकारविसेस) मानले पाहिजे. प्राचीन आचार्य (पुब्बाचरिय) म्हणतात की, अशा प्रकारचा विशिष्ट सामान्य लक्षण म्हणजेच 'नाम-प्रज्ञप्ती' होय. कारण ते त्या त्या अर्थामध्ये शब्दाला झुकवते (नामेति) आणि त्या त्या अर्थाची नाम-संज्ञा तयार करते, म्हणून ते 'नाम' आहे; आणि विविध प्रकारे ज्ञान करून देणारे असल्यामुळे ते 'प्रज्ञप्ती' (पञ्ञत्ति) आहे. परंतु, विज्ञाप्तीचा विकार असलेल्या शब्दाच्या बाबतीत, तो संवृति (व्यावहारिक) आणि परमार्थ सत्याचे विविध प्रकारे ज्ञान करून देतो, म्हणून तो प्रज्ञप्ती-रूप आहे याबद्दल काही सांगण्याची गरजच नाही. कारण शब्दाचाच प्रज्ञप्ती-भाव निश्चितपणे स्वीकारला पाहिजे, जसे की पाळी पाठात दिसून येते: "निरुक्ति-पटिसम्भिदा (भाषेचे विश्लेषण ज्ञान) परीत्त-आरम्मण (मर्यादित विषय) असलेली असते", "निरुक्ति-पटिसम्भिदा वर्तमान-आरम्मण असलेली असते" आणि "निरुक्ति-पटिसम्भिदा बहिद्धा-आरम्मण (बाह्य विषय) असलेली असते". परंतु येथे शब्दांच्या प्रवृत्तीच्या कारणाचा अधिकार असल्यामुळे 'नाम' या रूपाने अर्थ स्पष्ट केला आहे. अशा प्रकारे, प्राचीन आचार्यांनी स्वीकारलेल्या विविध प्रकारच्या विशिष्ट सामान्य लक्षणांच्या म्हणजेच नाम-प्रज्ञप्ती संज्ञेच्या शब्दांच्या प्रवृत्तीच्या कारणावरून, एकच ज्ञेय अर्थ (ज्ञेय वस्तू) अनेक लिंगांनी (चिन्हांनी) युक्त मानला पाहिजे. म्हणूनच प्रभिन्नपटिसम्भिदा (भेदक ज्ञान) प्राप्त आयुष्यमान सुहेमन्त यांनी म्हटले आहे – ‘‘สตลิงฺคสฺส อตฺถสฺส, สตลกฺขณธาริโน; เอกงฺคทสฺสี ทุมฺเมโธ, สตทสฺสีว ปณฺฑิโต’’ติ. "शंभर लिंगे (चिन्हे) असलेल्या आणि शंभर लक्षणे धारण करणाऱ्या अर्थाचा (वस्तूचा) मूर्ख माणूस केवळ एकच भाग पाहतो (एक अंग पाहणारा मूर्ख ठरतो), तर पंडित माणूस शंभर (सर्व) अंगांनी पाहणारा असतो." เอวํ สพฺพาภิธาเนสุปิ อิมินา นเยน ยถารหํ อตฺโถ วิภาเวตพฺโพ นยญฺญูหิ. अशा प्रकारे, सर्वच अभिधानांमध्ये (नावांमध्ये) पद्धती जाणणाऱ्यांनी (नयज्ञ लोकांनी) याच पद्धतीने योग्य प्रकारे अर्थ स्पष्ट केला पाहिजे. วิทิ อวยเว. วินฺทติ. ยทิ อภิธานมตฺถิ, ‘‘วินฺโท’’ติ ทิสฺสติ. ยถา กณฺฑติ. กณฺโฑ. विदि अवयव (अवयव करणे/भाग करणे) या अर्थात. विन्दति (मिळवतो/जाणतो). जर संज्ञा असेल, तर 'विन्दो' असे दिसते. जसे कण्डति (खाजवतो/वेगळे करतो). कण्डो (काण्ड/भाग). ขิทิ อวยเวติ จนฺทวิทุโน วทนฺติ. เตสํ มเต ‘‘ขินฺทตี’’ติ รูปํ. खिदि अवयव (भाग करणे) या अर्थात, असे चन्द्राचे अनुयायी (चान्द्र व्याकरणकार) म्हणतात. त्यांच्या मते 'खिन्दति' असे रूप होते. นิทิ กุจฺฉายํ. กุจฺฉาสทฺโท ครหตฺโถ. นินฺทติ. นินฺทา. निदि कुत्सा (निंदा/धिक्कार) या अर्थात. 'कुत्सा' हा शब्द निंदा किंवा निर्भर्त्सना या अर्थाचा वाचक आहे. निन्दति (निंदा करतो). निन्दा (निंदा). โปราณเมตํ อตุล, เนตํ อชฺชตนามิว; นินฺทนฺติ ตุณฺหิมาสีนํ, นินฺทนฺติ พหุภาณินํ; มิตภาณิมฺปิ นินฺทนฺติ, นตฺถิ โลเก อนินฺทิโต. हे अतुला! हा सनातन नियम आहे, हा केवळ आजचाच नाही; शांत बसलेल्याचीही निंदा करतात, खूप बोलणाऱ्याचीही निंदा करतात आणि मोजकेच बोलणाऱ्याचीही निंदा करतात. या जगात असा कोणीही नाही ज्याची निंदा केली जात नाही. อวณฺโณ [Pg.90] อคุโณ นินฺทา, ครหา อยโสปิ จ; อสิโลโก อกิตฺติ จ, อสิลาฆา จ อตฺถุติ. अवण्ण (अपकीर्ती), अगुण (दोष), निंदा, गरहा (निर्भर्त्सना), अयस (अपयश), असिलोक (बदनामी), अकित्ती (अपकीर्ती), असिलाघा (अस्तुती) आणि अत्थुति (अस्तुती) हे समानार्थी शब्द आहेत. นนฺท สมิทฺธิยํ. อกมฺมิกา ธาตุ. นนฺทติ ปุตฺเตหิ ปุตฺติมา. นนฺทาย นุน มรเณน. นนฺทสิ สิริวาหน. นนฺทนํ วนํ. อภิสทฺทโยเค ปนายํ สกมฺมโกปิ. อภินนฺทนฺติ อาคตํ นาภินนฺทนฺติ มรณํ. नन्द समृद्धी (आनंद/समृद्धी) या अर्थात. हा अकर्मक धातू आहे. 'नन्दति पुत्तेहि पुत्तिमा' (पुत्रवान मनुष्य पुत्रांमुळे आनंदित होतो). 'नन्दाया नुन मरणेन' (नक्कीच नंदाच्या मृत्यूने...). 'नन्दसि सिरिवाहना' (हे सिरिवाहन! तू आनंदित होतोस). 'नन्दनं वनं' (नंदन वन). परंतु 'अभि' उपसर्ग जोडल्यास हा सकर्मकही होतो. 'अभिनन्दन्ति आगतं' (आलेल्याचे स्वागत/अभिनंदन करतात), 'नाभिनन्दन्ति मरणं' (मृत्यूचे स्वागत करत नाहीत). สิรีว รูปินึ ทิสฺวา, นนฺทิตํ อาสิ ตํ กุลํ; เตน นนฺทาติ เม นามํ, สุนฺทรํ ปวรํ อหุ. मूर्तिमंत लक्ष्मीप्रमाणे (श्री) तिला पाहून ते कुटुंब आनंदित झाले; म्हणूनच माझे 'नंदा' हे नाव सुंदर आणि श्रेष्ठ झाले. รมฺมํ เวฬุวนํ เยน, น ทิฏฺฐํ สุคตาลยํ; น เตน นนฺทนํ ทิฏฺฐํ, อิติ มญฺเญ มเหสยํ. ज्यांनी सुगतांचे (बुद्धांचे) निवासस्थान असलेले रमणीय वेळुवन पाहिले नाही, त्यांनी नंदनवन पाहिले नाही, असे मी मानतो, हे महर्षी! เยน เวฬุวนํ ทิฏฺฐํ, นรนนฺทนนนฺทนํ; สุทิฏฺฐํ นนฺทนํ เตน, อมรินฺทสุนนฺทนํ. ज्यांनी मनुष्यांना आनंद देणारे वेळुवन पाहिले आहे, त्यांनी देवराज इंद्राला आनंद देणारे नंदनवन उत्तम प्रकारे पाहिले आहे. จทิ หิลาทเน ทิตฺติยญฺจ. หิลาทนํ สุขนํ. ทิตฺติ โสภา. จนฺทติ. จนฺทโน, จนฺโท. चदि हिलादन (आनंदित करणे) आणि दित्ती (प्रकाशणे/शोभणे) या अर्थात. 'हिलादन' म्हणजे सुख देणे. 'दित्ती' म्हणजे शोभा. चन्दति (आनंदित करतो/प्रकाशतो). चन्दनो (चंदन), चन्दो (चंद्र). เอตฺถ จ จนฺทนสฺสปิ อเนกานิ นามานิ – จนฺทนํ, คนฺธสาโร, มลยโช, สุวณฺณจนฺทนํ, หริจนฺทนํ, รตฺตจนฺทนํ, โคสีตจนฺทนํ. จนฺทยติ หิลาทยติ สีตคุณสมงฺคิตาย สตฺตานํ ปลิฬาหํ วูปสเมนฺตํ สุขํ อุปฺปาเทตีติ จนฺทนํ. จนฺโทติ โสโม, โสปิ จนฺทยติ หิลาทยติ สีตคุณสมฺปตฺติยา อตฺตโน ปภาย สตฺตานํ ปริฬาหํ วูปสเมนฺโต สุขํ อุปฺปาเทตีติ จนฺโทติ วุจฺจติ. อถ วา จนฺทติ ทิพฺพติ สิริยา วิโรจตีติ จนฺโท. อาคมฏฺฐกถาสุ ปน ‘‘ฉนฺทํ ชเนตีติ จนฺโท’’ติ วุตฺตํ. ตสฺสาปิ อเนกานิ นามานิ – आणि येथे चंदनाचीही अनेक नावे आहेत – चंदन, गंधसार, मलयज, सुवण्णचंदन (सुवर्णचंदन), हरिचंदन, रत्तचंदन (रक्तचंदन), गोसीतचंदन (गोशीतचंदन). जे आपल्या शीतल गुणाने प्राण्यांचा दाह शांत करून त्यांना आनंदित करते (चन्दयति/हिलादयति) आणि सुख उत्पन्न करते, ते 'चंदन' होय. 'चन्दो' म्हणजे सोम (चंद्र); तो देखील आपल्या शीतल गुणाने आणि स्वतःच्या प्रकाशाने प्राण्यांचा दाह शांत करून त्यांना आनंदित करतो आणि सुख उत्पन्न करतो, म्हणून त्याला 'चन्दो' (चंद्र) म्हटले जाते. किंवा, जो आपल्या सौंदर्याने प्रकाशतो (चन्दति/दिब्बति) आणि शोभून दिसतो, तो 'चन्दो' होय. आगम-अट्ठकथांमध्ये (टीकांमध्ये) मात्र 'जो छंद (इच्छा) उत्पन्न करतो तो चंद्र' (छन्दं जनेतीति चन्दो) असे म्हटले आहे. त्याचीही अनेक नावे आहेत – จนฺโท [Pg.91] นกฺขตฺตราชา จ, อินฺทุ โสโม นิสากโร; จนฺทิมา มา นิสานาโถ, โอสธี โส นิสาปติ. चन्दो (चंद्र), नक्खत्तराजा (नक्षत्रराज), इन्दु, सोमो (सोम), निसाकरो (निशाकर), चन्दिमा (चंद्रमा), मा, niसानाथो (निशानाथ), ओसधी (औषधीपती), सो, निसापति (निशापती). อุฬุราชา สสงฺโก จ, หิมรํสิ สสีปิ จ; ทฺวิชราชา สสธโร, ตาราปติ หิมํสุ จ. उळूराजा (नक्षत्रराज), ससङ्को (शशांक), हिमरंसि (हिम रश्मी), ससी (शशी), द्विजराजा, ससधरो (शशधर), तारापति (तारापती) आणि हिमंसु (हिमांशू). กุมุทพนฺธโว เจว, มิคงฺโก จ กลานิธิ; สุธํ สุธิ ธูปิ ยูป-รสฺมิ เจว ขมากโร; นกฺขตฺเตโส จ รชนี-กโร สุพฺภํสุ เอว จ. कुमुदबन्धवो (कुमुदबंधू), मिगङ्को (मृगांक), कलानिधि (कलानिधी), सुधं, सुधि, धूपी, यूप-रस्मि, खमाकरो (क्षमाकर), नक्खत्तेसो (नक्षत्रेश), रजनी-करो (रजनीकर) आणि सुब्भंसु (शुभ्रांशू). ตทิ เจตายํ. ตนฺทติ. ตนฺที. तदि आळस (तन्द्री/ग्लानी) या अर्थात. तन्दति (आळस करतो). तन्दी (आळस/तन्द्री). กทิ กลทิ อวฺหาเน โรทเน จ. กนฺทติ, ปกฺกนฺทติ. ปกฺกนฺทุํ, กนฺทนฺโต, กลนฺทโก. कदि आणि कलदि आव्हान (हाक मारणे) आणि रोदन (रडणे) या अर्थात. कन्दति (रडतो/ओरडतो), पक्कन्दति (आक्रोश करतो). पक्कन्दुं (त्यांनी आक्रोश केला), कन्दन्तो (रडणारा), कलन्दको (खार/ओरडणारा). กลิทิ ปริเทวเน. กลินฺทติ. कलिदि परिदेवन (विलाप करणे) या अर्थात. कलिन्दति (विलाप करतो). โขท ปฏิฆาเต. โขทติ. खोद प्रतिघात (आघात करणे/अडथळा आणणे) या अर्थात. खोदति (आघात करतो/अडवतो). ขนฺท คติโสสเนสุ. ขนฺทติ. ขนฺโท. ขนฺโท นาม เอโก เทโว, โย ‘‘กุมาโร สตฺติธโร’’ติ จ วุจฺจติ. खन्द गती (जाणे) आणि सोसन (सुकवणे/नाश करणे) या अर्थात. khन्दति (जातो/सुकवतो). खन्दो (स्कंद). 'खन्दो' नावाचा एक देव आहे, ज्याला 'कुमारो सत्तिधरो' (शक्ती/भाला धारण करणारा कुमार) असेही म्हटले जाते. ขุทิ อาปวเน. ขุนฺทติ. खुदि आपवन (कंपन करणे/पवित्र करणे) या अर्थात. खुन्दति (कंपित करतो/पवित्र करतो). สิทิ สีติเย. สีติยํ สีติภาโว. สินฺทติ. โสสินฺโท, โสตตฺโต. सिदि शीतलता (थंड होणे) या अर्थात. 'शीतलता' म्हणजे थंड होण्याची अवस्था (शीतीभाव). सिन्दति (थंड होतो). सोसिन्दो (अतिशय थंड), सोतत्तो (अतिशय तप्त). วนฺท อภิวาทนถุตีสุ. วนฺทติ, อภิวนฺทติ. อภิวนฺทนา, วนฺทนํ, วนฺทโก. वन्द अभिवादन (नमस्कार करणे) आणि थुति (स्तुती करणे) या अर्थात. वन्दति (वंदन करतो), अभिवन्दति (अभिवादन करतो). अभिवन्दना (अभिवादन), वन्दनं (वंदन), वन्दको (वंदन करणारा). เอตฺถ ปน วนฺทตีติ ปทสฺส นมสฺสติ โถเมติ วาติ อตฺโถ. ตถา หิ สุตฺตนฺตฏีกากาโร ‘‘วนฺเทติ วนฺทามิ โถเมมิ วา’’ติ อาห. येथे 'वन्दति' या शब्दाचा अर्थ 'नमस्सति' (नमस्कार करतो) किंवा 'थोमेति' (स्तुती करतो) असा आहे. म्हणूनच सुत्तन्त-टीकाकारांनी 'वन्देति म्हणजे मी वंदन करतो किंवा स्तुती करतो' (वन्देति वन्दामि थोमेमि वा) असे म्हटले आहे. ภทิ กลฺลาเณ โสขิเย จ. กลฺลาณํ กลฺยาณํ, โสขิยํ สุขิโน ภาโว, สุขมิจฺเจวตฺโถ. ภนฺทติ. ภนฺทโก, ภทฺโท, ภทฺโร. भदि कल्याण (मंगल) आणि सोखिय (सुख) या अर्थात. 'कल्लाण' म्हणजे कल्याण, 'सोखिय' म्हणजे सुखी असण्याची अवस्था, म्हणजेच सुख. भन्दति (कल्याण करतो/सुखी होतो). भन्दको, भद्दो (भद्र/मंगल), भद्रो (भद्र). มทิ [Pg.92] ถุติโมทมทสุปนคตีสุ. มนฺทติ. มนฺโท. मदि थुति (स्तुती), मोद (आनंद), मद (मत्तता), सुपन (झोपणे) आणि गती (जाणे) या अर्थात. मन्दति (स्तुती करतो/आनंदित होतो/झोपतो/जातो). मन्दो (मंद/मूर्ख/बालक). เอตฺถ ปน มนฺโทติ อญฺญาณีปิ พาลทารโกปิ วุจฺจติ. ตตฺถ อญฺญาณี มนฺทติ อญฺญาณภาเวน อปฺปสํสิตพฺพมฺปิ ปุคฺคลํ โถเมตีติ มนฺโท. มนฺทติ อโมทิตพฺพฏฺฐาเนปิ โมทตีติ มนฺโท. มนฺทติ ทานสีลาทิปุญฺญกฺริยาสุ ปมชฺชตีติ มนฺโท. มนฺทติ อตฺตโน จ ปเรสญฺจ หิตาหิตํ อจินฺเตนฺโต ขาทนียโภชนียาทีหิ อตฺตโน กายํ สญฺชาตเมทํ กุรุมาโน สุปตีติ มนฺโท. มนฺทติ อยุตฺตํ ปเรสํ กฺริยํ ทิฏฺฐานุคติอาปชฺชเนน คจฺฉติ คณฺหาตีติ มนฺโท. อถ วา มนฺทติ ปุนปฺปุนํ ปฏิสนฺธิคฺคหณวเสน คพฺภํ คจฺฉตีติ มนฺโท. วุตฺตญฺหิ ภควตา ‘‘ปุนปฺปุนํ คพฺภมุเปติ มนฺโท’’ติ. พาลทารโก ปน มนฺทติ ยุตฺตายุตฺตมชานนฺโต อุตฺตานเสยฺยํปริวตฺตนเสยฺยํ วา สุปตีติ มนฺโท. ตถา หิ – येथे 'मन्दो' (मंद) हा अज्ञानी माणसाला आणि लहान बालकालाही म्हटले जाते. त्यापैकी, अज्ञानी मनुष्य आपल्या अज्ञानामुळे स्तुतीस अपात्र असलेल्या व्यक्तीचीही स्तुती करतो (मन्दति), म्हणून तो 'मन्दो' होय. जो आनंद न मानण्याच्या ठिकाणीही आनंद मानतो (मन्दति), तो 'मन्दो' होय. जो दान, शील इत्यादी पुण्यकर्मांमध्ये प्रमाद (आळस) करतो (मन्दति), तो 'मन्दो' होय. जो स्वतःच्या आणि इतरांच्या हिता-अहिताचा विचार न करता, खाण्या-पिण्याच्या पदार्थांनी स्वतःचे शरीर चरबीयुक्त करून झोपून राहतो (मन्दति), तो 'मन्दो' होय. जो इतरांच्या अयोग्य कृत्यांचे अंधानुकरण करून त्यांचे अनुसरण करतो (मन्दति), तो 'मन्दो' होय. किंवा, जो वारंवार प्रतिसंधी (पुनर्जन्म) घेण्याच्या स्वरूपात गर्भात जातो (मन्दति), तो 'मन्दो' होय. कारण भगवंतांनी म्हटले आहे – 'मूर्ख मनुष्य (मन्दो) वारंवार गर्भात प्रवेश करतो' (पुनप्पुनं गब्भमुपेति मन्दो). लहान बालक मात्र योग्य-अयोग्य न जाणता, उताणे निजून किंवा कुशीवर वळून झोपतो (मन्दति), म्हणून तो 'मन्दो' होय. जसे की – ‘‘โนนีตสุขุมาลํ มํ, ชาตปลฺลวโกมลํ; มนฺทํ อุตฺตานสยนํ, ปิสาจภยตชฺชิตา. लोण्यासारखा सुकुमार, नुकत्याच उगवलेल्या पालवीसारखा कोमल, उताणा निजलेला असा मी बालक (मन्दं), पिशाचाच्या भयाने भयभीत होऊन... ปาทมูเล มเหสิสฺส, สาเยสุํ ทีนมานสา; อิทํ ททาม เต นาถ, สรณํ โหหิ นายกา’’ติ महर्षींच्या (बुद्धांच्या) चरणकमळांशी दीन मनाने निजले आणि म्हणाले, 'हे नाथा! आम्ही हे आपल्याला अर्पण करतो, हे नायका! आपण आमचे शरण व्हा.' วุตฺตํ, อิติ อุตฺตานสยนโต ปฏฺฐาย ยาว มนฺททสกํ, ตาว ‘‘มนฺโท’’ติ ‘‘ทารโก’’ติ ทฏฺฐพฺโพ. อปฺปตฺถวาจโกปิ ปน มนฺทสทฺโท โหติ, โส ปาฏิปทิกตฺตา อิธ นาธิปฺเปโต, อถ วา มนฺทติ อปฺปภาเวน คจฺฉติ ปวตฺตตีติ นิปฺผนฺนปาฏิปทิกวเสนปิ คเหตพฺโพ. असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे, उताणे निजण्यापासून ते 'मंद-दशक' (बालपणीचे पहिले दहा वर्षे) पर्यंतच्या काळातील व्यक्तीला 'मन्दो' किंवा 'दारको' (बालक) समजावे. 'मन्द' हा शब्द 'अल्प' (कमी) या अर्थाचा वाचकही असतो, परंतु तो प्रातिपदिक (मूळ शब्द) म्हणून येथे अभिप्रेत नाही; किंवा 'जो अल्प प्रभावाने चालतो किंवा प्रवृत्त होतो' (मन्दति) या व्युत्पत्तीनुसार सिद्ध झालेल्या प्रातिपदिकानुसार तो ग्रहण करावा. มุท หาเส. หสนํ หาโส ตุฏฺฐิ. โมทติ, ปโมทติ. สมฺโมทติ. สมฺโมทโก. สมฺโมทมานา คจฺฉนฺติ มุทิตา. มุทา. मुद हास (हसणे/आनंद) या अर्थात. 'हसन' म्हणजे हास्य किंवा तुष्टी (संतोष). मोदति (आनंदित होतो), पमोदति (अतिशय आनंदित होतो). सम्मोदति (परस्पर आनंद व्यक्त करतो/संभाषण करतो). सम्मोदको (आनंद देणारा/संभाषण करणारा). 'सम्मोदमाना गच्छन्ति' (ते परस्परांशी आनंदपूर्वक बोलत जातात). मुदिता (सहानुभूतीपूर्वक आनंद). मुदा (आनंद). หท [Pg.93] กรีโสสฺสคฺเค. กรีโสสฺสคฺโค นาม กรีสสฺส โอสฺสชฺชนํ วิสฺสชฺชนํ. หทติ. อุหทติ. หทโน. हद करीसोस्सग्ग (मलविसर्जन करणे) या अर्थात. 'करीसोस्सग्ग' म्हणजे मलाचे उत्सर्जन किंवा विसर्जन करणे. हदति (मलविसर्जन करतो). उहदति (वर मलविसर्जन करतो). हदनो (मलविसर्जन). เอตฺถ จ ‘‘เยสํ โน สนฺถเต ทารกา อุหทนฺติปิ อุมฺมิหนฺติปี’’ติ อยํ ปาฬิ นิทสฺสนํ, ตตฺร อุหทนฺติปีติ วจฺจมฺปิ กโรนฺติ. อุมฺมิหนฺติปีติ ปสฺสาวมฺปิ กโรนฺติ. ปจฺฉิมปทสฺสตฺโถ มิห เสจเนติ ธาตุวเสน ทฏฺฐพฺโพ. อยํ ปน จุราทิคเณปิ วตฺตติ ทฺวิคณิกตฺตา. อิมสฺมิญฺหิ ฐาเน ‘‘มุตฺเตติ โอหเทติ จา’’ติ จริยาปิฏกปาฬิปฺปเทโส นิทสฺสนํ. ตตฺถ มุตฺเตตีติ ปสฺสาวํ กโรติ. โอหเทตีติ กรีสํ วิสฺสชฺเชติ. आणि येथे 'येसं नो सन्थते दारका उहदन्तिपि उम्मिहन्तिपि' (ज्यांच्या अंथरुणावर मुले मलविसर्जनही करतात आणि मूत्रविसर्जनही करतात) हे पाळी (पाळि) उदाहरण आहे. तेथे 'उहदन्तिपि' म्हणजे मलविसर्जनही करतात. 'उम्मिहन्तिपि' म्हणजे मूत्रविसर्जनही करतात. शेवटच्या शब्दाचा अर्थ 'मिह सेचने' (सिंचन करणे/लघवी करणे) या धातूवरून समजून घ्यावा. हा धातू दोन गणांमध्ये (द्विगणिक) येत असल्यामुळे चुरादि गणातही चालतो. या संदर्भात 'मुत्तेति ओहदेति चा' (लघवी करतो आणि शौचास करतो) हा चरियापिटकातील पाळी पाठ उदाहरण आहे. तेथे 'मुत्तेति' म्हणजे मूत्रविसर्जन करतो आणि 'ओहदेति' म्हणजे मलविसर्जन करतो. อุท โมเท กีฬายญฺจ. อุทติ. อุทานํ. อุทคฺโค. उद मोद (आनंद) आणि कीळा (क्रीडा/खेळ) या अर्थात. उदति (आनंदित होतो/खेळतो). उदानं (उदान/उत्स्फूर्त उद्गार). उदग्गो (उदग्र/आनंदित/उत्फुल्ल). ตตฺถ อุทานนฺติ เกนฏฺเฐน อุทานํ? อุทานนฏฺเฐน. กิมิทํ อุทานนํ นาม? ปีภิเวคสมุฏฺฐาปิโต อุทาหาโร. ยถา หิ ยํ เตลาทิ มินิตพฺพวตฺถุ มานํคเหตุํ น สกฺโกติ, วิสฺสนฺทิตฺวา คจฺฉติ, ตํ ‘‘อวเสโก’’ติ วุจฺจติ. ยญฺจ ชลํ ตฬากํ คเหตุํ น สกฺโกติ, อชฺโฌตฺถริตฺวา คจฺฉติ, ตํ ‘‘โอโฆ’’ติ วุจฺจติ, เอวเมว ยํ ปีติเวคสมุฏฺฐาปิตํ วิตกฺกวิปฺผารํ หทยํ สนฺธาเรตุํ น สกฺโกติ, โส อธิโก หุตฺวา อนฺโต อสณฺฐหิตฺวา วจีทฺวาเรน นิกฺขมนฺโต ปฏิคฺคาหกนิรเปกฺโข อุทาหารวิเสโส ‘‘อุทาน’’นฺติ วุจฺจติ. อุทคฺโคติ สญฺชาตโสมนสฺโส. तेथे 'उदान' म्हणजे कोणत्या अर्थाने उदान? उदानन (उद्गार काढणे) या अर्थाने. हे 'उदानन' म्हणजे काय? प्रीतीच्या वेगाने निर्माण झालेला उद्गार. ज्याप्रमाणे तेल इत्यादी मोजण्याचे पदार्थ मोजपात्र सामावून घेऊ शकत नाही आणि ते ओसंडून वाहते, त्याला 'अवसेक' (ओसंडणे) म्हटले जाते. आणि जे पाणी तलाव सामावून घेऊ शकत नाही, ते ओसंडून वाहून जाते, त्याला 'ओघ' (पूर) म्हटले जाते; त्याचप्रमाणे प्रीतीच्या वेगाने उत्पन्न झालेला विचारांचा विस्तार जेव्हा हृदय धारण करू शकत नाही, तेव्हा तो अधिक होऊन आत न मावता, वाणीच्या द्वाराने बाहेर पडणारा आणि ऐकणाऱ्याची अपेक्षा न ठेवणारा विशिष्ट उद्गार म्हणजे 'उदान' म्हटला जातो. 'उदग्ग' म्हणजे उत्पन्न झालेला आनंद (सोमनस्य) असलेला. กุท ขุท คุท กีฬายเมว. โกทติ. โขทติ. โคทติ. कुद्, खुद्, गुद् हे धातू क्रीडा (खेळणे) याच अर्थात आहेत. कोदति. खोदति. गोदति. สูท ปคฺฆรเณ. สูทติ. สุตฺตํ. สูโท. รญฺโญ สูทา มหานเส. सूद् हा धातू पाझरणे (गळणे) या अर्थात आहे. सूदति. सुत्तं. सूदो. 'रञ्ञो सूदा महानसे' (राजाचे स्वयंपाकी स्वयंपाकघरात आहेत). เอตฺถ [Pg.94] จ สุตฺตนฺติ สูทติ เธนุ วิย ขีรํ อตฺเถ ปคฺฆราเปตีติ สุตฺตํ, เตปิฏกํ พุทฺธวจนํ. สกมฺมิกธาตุตฺตา ปน ‘‘ปคฺฆราเปตี’’ติ การิตวเสน อตฺโถ กเถตุํ ลพฺภติ. ตถา หิ ‘‘กโรตี’’ติ ปทสฺส ‘‘นิปฺผาเทตี’’ติ อตฺโถ กเถตุํ ลพฺภติ. สูโทติ ภตฺตกาโร. โย ‘‘อาฬาริโก, โอทนิโก, สูปกาโร, รสโก’’ติ จ วุจฺจติ. สูทติ ‘‘เอวญฺเจวญฺจ กเต ขาทนียํ วา โภชนียํ วา สุคนฺธํ มนาปํ สุรสญฺจ ภวิสฺสตี’’ติ รนฺธนกฺริยาย สุกุสลตาย รสํ ปคฺฆราเปติ อภินิพฺพตฺเตตีติ สูโท. आणि येथे 'सुत्त' म्हणजे - ज्याप्रमाणे गाय दूध पाझरते, त्याप्रमाणे जे अर्थाला पाझरवते (प्रकट करते) ते 'सुत्त' (सूत्र) होय, म्हणजेच त्रिपिटक बुद्धवचन. हा सकर्मक धातू असल्यामुळे 'पाझरवते' (paggharāpeti) असा प्रयोजक (कारित) अर्थ सांगता येतो. कारण 'करोति' या पदाचा 'निष्पन्न करतो' असा अर्थ सांगता येतो. 'सूद' म्हणजे आचारी (स्वयंपाकी). ज्याला 'आळारिक, ओदनिक, सूपकार, रसक' असेही म्हटले जाते. 'असे आणि असे केले असता खाण्याचे किंवा भोज्य अन्न सुगंधी, मनपसंत आणि स्वादिष्ट होईल' अशा प्रकारे स्वयंपाकाच्या क्रियेतील कौशल्यामुळे जो रस पाझरवून आणतो (उत्पन्न करतो), तो 'सूद' (आचारी) होय. รหท อพฺยตฺตสทฺเท. รหทติ. รหโท. रहद् हा धातू अव्यक्त आवाजात (अस्पष्ट ध्वनी) आहे. रहदति. रहदो (तलाव). หิลาทิ สุเข จ. จกาโร ปุพฺพตฺถาเปกฺขโก. หิลาทติ. หิลาทนํ, หิลาโท, เมตฺตาสหายกตสตฺตมหาหิลาโท. हिलाद् इत्यादी धातू सुखाच्या अर्थात आणि (मागील अर्थाच्या अपेक्षेने) आहेत. 'च' कार हा पूर्व अर्थाची अपेक्षा ठेवणारा आहे. हिलादति. हिलादनं, हिलादो, 'मेत्तासहाइकतसत्तमहाहिलादो' (मैत्रीने साहाय्य केलेल्या प्राण्याचा मोठा आनंद). สทฺท กุจฺฉิเต สทฺเท. สทฺทติ. सद्द् हा धातू निंदित आवाजात (कुत्सित ध्वनी) आहे. सद्दति. มิท สฺเนเห. สฺเนโห นาม วสาสงฺขาโต สฺเนโห ปีติสฺเนโหติ ทุวิโธ. อิธ ปน วสาสงฺขาโต สฺเนโห อธิปฺเปโต, เมทติ เมโท. मिद् हा धातू स्नेहाच्या (स्निग्धता/प्रेम) अर्थात आहे. स्नेह हा 'वसा' (चरबी) नावाचा स्नेह आणि 'प्रीती' (प्रेम) नावाचा स्नेह असा दोन प्रकारचा आहे. परंतु येथे 'वसा' नावाचा स्नेह अभिप्रेत आहे. मेदति, मेदो (चरबी). เอตฺถ จ เมทตีติ เมทสหิโต ภวติ อยํ ปุริโสติ อตฺโถ. เมโท นาม ถูลสฺส สกลสรีรํ ผริตฺวา กิสสฺส ชงฺฆมํสาทีนิ นิสฺสาย ฐิโต ปตฺถินฺนสิเนโห, โส วณฺเณน หลิทฺทิวณฺโณ โหติ. การิเต ‘‘เมเทติ เมทยตี’’ติ รูปานิ. ตถา หิ ‘‘เต อิมํ กายํ พลํ คาเหนฺติ นาม พฺรูเหนฺติ นาม เมเทนฺติ นามา’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. ตตฺถ เมเทนฺตีติ สญฺชาตเมทํ กโรนฺตีติ อตฺโถ. อิมิสฺสา ปน ธาตุยา ทิวาทิคณํ ปตฺตาย ปีติสิเนหตฺเถ ‘‘เมชฺชตี’’ติ สุทฺธกตฺตุรูปํ ภวติ. จุราทิคณํ ปน [Pg.95] ปตฺตาย ‘‘เมเทติ เมทยตี’’ติ สุทฺธกตฺตุรูปานิ ภวนฺตีติ ทฏฺฐพฺพํ. आणि येथे 'मेदति' म्हणजे 'हा मनुष्य मेदाने (चरबीने) युक्त होतो' असा अर्थ आहे. 'मेद' म्हणजे स्थूल व्यक्तीच्या संपूर्ण शरीरात पसरून आणि कृश (बारीक) व्यक्तीच्या जंघांच्या (पिढऱ्यांच्या) मांसाचा आश्रय घेऊन असलेला घट्ट स्नेह (चरबी), तो रंगाने हळदीच्या रंगाचा (पिवळा) असतो. प्रयोजक (कारित) रूपात 'मेदेति, मेदयति' अशी रूपे होतात. कारण 'ते इमं कायं बलं गाहेन्ति नाम ब्रूहेन्ति नाम मेदेन्ति नाम' (ते या शरीराला बलवान करतात, वाढवतात आणि मेदयुक्त करतात) असे पाळीत आढळते. तेथे 'मेदेन्ति' म्हणजे मेदयुक्त करतात असा अर्थ आहे. परंतु या धातूला दिवादिगण प्राप्त झाल्यावर प्रीति-स्नेह अर्थात 'मेज्जति' असे क्रियापद रूप होते. आणि चुरादिगण प्राप्त झाल्यावर 'मेदेति, मेदयति' अशी क्रियापद रूपे होतात, असे समजावे. สิท โมจเน. สิทติ. เสโท. सिद् हा धातू मोचन (मुक्त करणे/घाम गाळणे) या अर्थात आहे. सिदति. सेदो (घाम). สนฺท ปสวเน. ปสวนํ สนฺทนํ อวิจฺเฉทปฺปวตฺติ. สนฺทติ อุทกํ. มหนฺโต ปุญฺญาภิสนฺโท. सन्द् हा धातू प्रसव (वाहणे/उत्पन्न होणे) या अर्थात आहे. प्रसव म्हणजे वाहणे, अखंड प्रवृत्ती. 'सन्दति उदकं' (पाणी वाहते). 'महन्तो पुञ्ञाभिसन्दो' (मोठा पुण्याचा प्रवाह). เอตฺถ จ ปุญฺญาภิสนฺโทติ ปุญฺญปฺปวาโห, ปุญฺญนทีติปิ วตฺตุํ ยุชฺชติ. आणि येथे 'पुण्याभिसंद' म्हणजे पुण्याचा प्रवाह, याला 'पुण्यनदी' असेही म्हणणे योग्य आहे. มทฺท มทฺทเน. มทฺทภิ, ปมทฺทติ. มารเสนปฺปมทฺทโน. กณฺฏกํ มทฺทติ. मद्द् हा धातू मर्दन (चिरडणे/दडपून टाकणे) या अर्थात आहे. मद्दति, पमद्दति. 'मारसेनप्पमद्दनो' (मारसेनेचे मर्दन करणारा). 'कण्टकं मद्दति' (काट्याला चिरडतो). กทิ เวลมฺเพ. วิลมฺพภาโว เวลมฺโพ. กนฺทติ. कद् इ हा धातू विलंब (रडणे/विलंब करणे) या अर्थात आहे. विलंब भाव म्हणजे वेळ लावणे. कन्दति. กท อวฺหาเน โรทเน จ. กทติ. कद् हा धातू आव्हान (बोलवणे) आणि रोदन (रडणे) या अर्थात आहे. कदति. ขทิ อุชฺฌเน. ฉนฺทติ. खद् इ हा धातू उज्झन (त्याग करणे) या अर्थात आहे. खन्दति (किंवा छन्दति). สท สาทเน. สทติ. อสฺสาโท. सद् हा धातू सादन (आस्वाद घेणे/थकणे) या अर्थात आहे. सदति. अस्सादो (आस्वाद). สีท วิสรณคตฺยาวสาเนสุ. วิสรณํ วิปฺผรณํ. คตฺยาวสานํ คมนสฺส อวสานํ โอสานํ อภาวกรณํ, นิสีทนนฺติ อตฺโถ. สีทติ, ลาพูนิ สีทนฺติ. สํสีทติ, โอสีทติ, ปสีทติ, วิปฺปสีทติ. ปสาโท. ปสนฺโน. วิปฺปสนฺโน. ปสาทโก. ปสาทิโต. ปาสาโท. โอสีทาปโก. กุสีโต. อาสีโน. นิสินฺโน. นิสินฺนโก. สนฺนิสีเวสุ ปกฺขิสุ. นิสีทนํ, นิสินฺนํ. นิสชฺชา. โคนิสาโท, อุปนิสา. สีเทติ. สีทยติ. สีทาเปติ. สีทาปยติ. ปสาเทติ. นิสีทิตุํ. นิสีทาเปตุํ, นิสาเทตุํ, นิสีทาเปติ, นิสีทาเปตฺวา. อุจฺฉงฺเค มํ นิสาเทตฺวา, ปิตา อตฺถานุสาสติ. นิสีทิตฺวาติปิ ปาโฐ. นิสีทิตฺวา. นิสีทิตฺวาน. นิสีทิตุน[Pg.96]. นิสีทิย. นิสีทิยาน. สํสีทิตฺวา. อวสีทิตฺวา. โอสีทิตฺวา. सीद् हा धातू विसरण (पसरणे), गती आणि अवसान (थांबणे/नाश होणे) या अर्थांमध्ये आहे. विसरण म्हणजे विस्तार (विप्फरण). गत्यवसान म्हणजे गमनाचा अंत, अवसान, अभाव करणे, म्हणजेच 'निसीदन' (बसणे) असा अर्थ आहे. सीदति, 'लाबूनि सीदन्ति' (भोपळे बुडतात). संसीदति, ओसीदति, पसीदति, विप्पसीदति. पसादो. पसन्नो. विप्पसन्नो. पसादको. पसादितो. पासादो. ओसीदापको. कुसीतो. आसीनो. निसिन्नो. निसिन्नको. 'सन्निसीवेसु पक्खीसु' (पक्षी शांत बसले असता). निसीदनं, निसिन्नं. निसज्जा. गोनिसादो, उपनिसा. सीदेति. सीदयति. सीदापेति. सीदापयति. पसादेति. निसीदितुं. निसीदापेतुं, निसादेतुं, निसीदापेति, निसीदापेत्वा. 'उच्छङ्गे मं निसादेत्वा, पिता अत्थानुसासति' (मला मांडीवर बसवून पिता हितोपदेश करतो). 'निसीदित्वा' असाही पाठ आहे. निसीदित्वा. निसीदित्वान. निसीदितुन. निसीदिय. निसीदियान. संसीदित्वा. अवसीदित्वा. ओसीदित्वा. ตตฺถ กุสีโตติ วีริเยนาธิคนฺตพฺพสฺส อตฺถสฺส อลาภโต กุจฺฉิเตนากาเรน สีทตีติ กุสีโต. อถ วา สยมฺปิ กุจฺฉิเตนากาเรน สีทติ อญฺเญปิ สีทาเปติ ตํ นิสฺสาย อญฺเญสํ สีทนสฺส สมฺภวโตติ กุสีโต. ตถา หิ วุตฺตํ – तेथे 'कुसीत' (आळशी) म्हणजे - वीर्याने (प्रयत्नाने) प्राप्त करावयाच्या अर्थाचा लाभ न झाल्यामुळे जो निंद्य रीतीने खचून जातो (सीदति), तो 'कुसीत' होय. अथवा जो स्वतःही निंद्य रीतीने खचतो आणि इतरांनाही खचवतो, त्याच्या आश्रयाने इतरांचेही खचणे (अधोगती) संभवत असल्यामुळे तो 'कुसीत' होय. कारण असे म्हटले आहे - ‘‘ปริตฺตํ กฏฺฐมารูยฺห, ยถา สีเท มหณฺณเว; เอวํ กุสีตมาคมฺม, สาธชีวีปิ สีทตี’’ติ; 'ज्याप्रमाणे लहान लाकडाचा आश्रय घेऊन मनुष्य महासागरात बुडतो, त्याचप्रमाणे आळशी माणसाचा आश्रय घेऊन चांगल्या प्रकारे जगणारा मनुष्यही बुडतो (नाश पावतो).' กุสีโตติ เจตฺถ ทสฺส ตตฺตํ ‘‘สุคโต’’ติ เอตฺถ วิย ‘‘สตสฺมีติ โหตี’’ติ เอตฺถ วิย จ. ตถา หิ สีทตีติ สตํ, อนิจฺจสฺเสตํ อธิวจนํ. อิมินา อุจฺเฉททิฏฺฐิ วุตฺตา. สตอิติ เจตฺถ อวิภตฺติโก นิทฺเทโส. สนฺนิสีเวสูติ ปริสฺสมวิโนทนตฺถํ สพฺพโส นิสีทนฺเตสุ, วิสฺสมมาเนสูติ อตฺโถ, ทการสฺส วการํ กตฺวา นิทฺเทโส. นิสีทนนฺติ นิสีทนกฺริยา. มญฺจปีฐาทิกํ วา อาสนํ. ตญฺหิ นิสีทนฺติ เอตฺถาติ นิสีทนนฺติ วุจฺจติ. นิสินฺนนฺติ นิสีทนกฺริยา เอว. เอตฺถ ปน ‘‘คเต ฐิเต นิสินฺเน สุตฺเต ชาคริเต ภาสิเต ตุณฺหีภาเว สมฺปชานการี โหติ. มาตุคาเมน สทฺธึ รโห มญฺเญ ตยา นิสินฺนนฺติ กุกฺกุจฺจํ อุปทหตีติอาทีสุ จสฺส ปโยโค เวทิตพฺโพ. เอตฺถ หิ คมนํ คภํ, ฐานํ ฐิตํ, นิสีทนํ นิสนฺนํ, สุปนํ สุตฺตํ, ชาครณํ ชาคริตํ, ภาสนํ ภาสิตนฺติ วุจฺจติ. นิสชฺชาติ นิสีทนา. โคนิสาโทติ โคนิสชฺชนา. อุปนิสาติ อุปนิสีทติ ผลํ เอตฺถาติ อุปนิสา, การณํ. นิสาเทตุนฺติ นิสีทาเปตุํ. นิสาเทตฺวาติ นิสีทาเปตฺวา. आणि येथे 'कुसीत' यामध्ये 'द' काराचा 'त' कार झाला आहे, ज्याप्रमाणे 'सुगत' यामध्ये किंवा 'सतस्मीति होति' यामध्ये होतो. कारण 'सीदति' (नाश पावतो) ते 'सतं' होय, हे अनित्याचेच नाव आहे. याद्वारे उच्छेददृष्टी सांगितली आहे. 'सत' हा येथे विभक्तीरहित निर्देश आहे. 'सन्निसीवेसु' म्हणजे थकवा दूर करण्यासाठी पूर्णपणे बसलेले असता, म्हणजेच विश्रांती घेत असता असा अर्थ आहे; येथे 'द' काराचा 'व' कार करून निर्देश केला आहे. 'निसीदन' म्हणजे बसण्याची क्रिया. किंवा मंचक, पीठ (पाट) इत्यादी आसन. कारण 'येथे बसतात' म्हणून त्याला 'निसीदन' म्हटले जाते. 'निसिन्न' म्हणजे बसण्याची क्रियाच होय. परंतु येथे 'चालताना, उभे असताना, बसलेले असताना, निजलेले असताना, जागे असताना, बोलताना, मौन असताना सजग राहतो. स्त्रीसोबत एकांतात तुझ्याकडून बसले गेले असावे, अशी शंका उत्पन्न करतो' इत्यादींमध्ये याचा प्रयोग समजून घ्यावा. कारण येथे जाणे म्हणजे 'गत', उभे राहणे म्हणजे 'ठित', बसणे म्हणजे 'nisiṇṇa' (निसिन्न), निजणे म्हणजे 'सुत्त', जागी असणे म्हणजे 'जागरित', बोलणे म्हणजे 'भासित' असे म्हटले जाते. 'निसज्जा' म्हणजे बसणे. 'गोनिसादो' म्हणजे गाईंचे बसणे. 'उपनिसा' म्हणजे ज्याच्यावर फळ प्राप्त होते (आश्रय घेतात) ती 'उपनिसा', म्हणजेच कारण. 'निसादेतुं' म्हणजे बसवण्यासाठी. 'निसादेत्वा' म्हणजे बसवून. ภาเว [Pg.97] นปุํสโก เญยฺโย, นิสินฺนนฺติ รโว ปน; วาจฺจลิงฺโค ติลิงฺโค โส, คตาทีสุปฺยยํ นโย. भावार्थात नपुंसकलिंगी समजावे, परंतु 'निसिन्न' हा शब्द विशेष्यलिंगी (तिन्ही लिंगांत चालणारा) आहे; 'गत' इत्यादी शब्दांच्या बाबतीतही हाच नियम आहे. จท ยาจเน. ยาจนํ อชฺเฌสนํ. จทติ. चद् हा धातू याचना (मागणे/विनंती करणे) या अर्थात आहे. याचना म्हणजे प्रार्थना (अज्झेसना). चदति. มิท เมท เมธาหึสาสุ. มิทติ. เมทติ. मिद्, मेद् हे धातू मेधा (बुद्धी) आणि हिंसा या अर्थांमध्ये आहेत. मिदति. मेदति. นิท เนท กุจฺฉาสนฺนิกริเสสุ. กุจฺฉา ครหา. สนฺนิกริสํ โวหารวิเสโส. นิทติ. เนทติ. निद्, नेद् हे धातू कुत्सा (निंदा) आणि संनिकर्ष (जवळ आणणे/विशिष्ट व्यवहार) या अर्थांमध्ये आहेत. कुत्सा म्हणजे निंदा. संनिकर्ष म्हणजे विशिष्ट व्यवहार. निदति. नेदति. พุนฺทิ นิสาเน. นิสานํ เตชนํ ติกฺขตา. พุนฺทติ. โพนฺทิ. बुन्द् इ हा धातू निसान (तीक्ष्ण करणे/तेजस्वी करणे) या अर्थात आहे. निसान म्हणजे तीक्ष्णता. बुन्दति. बोन्दि (शरीर). เอตฺถ จ โพนฺทีติ สรีรํ. ตญฺหิ พุนฺทานิ ติกฺขานิ ปิสุณผรุสวาจาทีนิ วา ปญฺญาวีริยาทีนิ วา เอตฺถ สนฺตีติ โพนฺทีติ วุจฺจติ, สญฺโญคปรตฺเตปิ อุการสฺโสการาเทโส, ปาปกลฺยาณชนวเสเนส อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. โพนฺทิสทฺทสฺส สรีรวาจกตา ปน – आणि येथे 'बोन्दी' म्हणजे शरीर होय. कारण येथे तीक्ष्ण 'बुन्द' म्हणजे चहाडी, कठोर वचन इत्यादी किंवा प्रज्ञा, वीर्य इत्यादी असतात, म्हणून याला 'बोन्दी' असे म्हटले जाते. संयोग पर असताना देखील 'उ' काराचा 'ओ' कार आदेश होतो. पाप आणि कल्याणकारी (पुण्यवान) लोकांच्या संदर्भाने हा अर्थ समजला पाहिजे. 'बोन्दी' शब्दाची शरीरवाचकता तर — ‘‘นาหํ ปุน น จ ปุน, น จาปิ อปุนปฺปุนํ; หตฺถิโพนฺทึ ปเวกฺขามิ, ตถา หิ ภยตชฺชิโต’’ติอาทีสุ "मी पुन्हा नाही, आणि पुन्हा नाही, आणि वारंवार देखील नाही, हत्तीच्या शरीरात प्रवेश करीन, कारण मी भयाने भयभीत झालो आहे" इत्यादींमध्ये (पाहिली पाहिजे). ทฏฺฐพฺพา. อิมานิสฺส นามานิ – पाहिली पाहिजे. याची ही नावे आहेत — กาโย เทหํ สรีรญฺจ, วปุ พิมฺพญฺจ วิคฺคหํ; โพนฺทิ คตฺตํ ตนุ เจว, อตฺตภาโว ตถูปธิ; สมุสฺสโยติ เจตานิ, เทหนามานิ โหนฺติ หิ. काय, देह, शरीर, वपु, बिंब, विग्रह, बोन्दी, गात्र, तनू, अत्तभाव, तसेच उपधी आणि समुच्छय ही देहाची (शरीराची) नावे आहेत. วท วิยตฺติยํ วาจายํ. วทติ, วชฺชติ. วเทติ, โอวทติ, โอวเทติ, ปฏิวทติ. อภิวทติ, อนุวทติ, อุปวทติ, อปวทติ. นิวทติ. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. ตตฺถ ‘‘วชฺชนฺตุ โภนฺโต อมฺม’’นฺติ ปาฬิทสฺสนโต วชฺชตีติ ปทํ วุตฺตํ. เกจิ ปน ครู ‘‘วชฺเชตี’’ติ รูปํ อิจฺฉนฺติ, ตํ อุปปริกฺขิตฺวา ยุตฺตญฺเจ คเหตพฺพํ, ‘‘อุปาสโก ภิกฺขุํ วเทติ. เตน โยเคน ชนกายํ, โอวเทติ มหามุนี’’ติ จ ทสฺสนโต วเทติ โอวเทตีติ จ วุตฺตํ. สพฺพาเนตานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ. 'वद्' धातू स्पष्ट वाणीच्या अर्थात आहे. वदति, वज्जति. वदेति, ओवदति, ओवदेति, पटिवदति. अभिवदति, अनुवदति, उपवदति, अपवदति, निवदति. इतर रूपे देखील योजावीत. त्यामध्ये "वज्जन्तु भोन्तो अम्म" (हे पूज्य आई, बोला/वाजवा) या पाळी प्रयोगावरून 'वज्जति' हे पद म्हटले आहे. परंतु काही आचार्य 'वज्जेति' असे रूप इच्छितात, त्याची परीक्षा करून योग्य असल्यास ते स्वीकारावे. "उपासक भिक्खूला बोलतो. त्या योगाने महामुनी जनसमुदायाला उपदेश करतात" अशा प्रयोगावरून 'वदेति' आणि 'ओवदेति' असे म्हटले आहे. ही सर्व कर्तृवाच्य (शुद्धकर्तृपद) रूपे आहेत. โอวาเทติ[Pg.98], วาทยติ, วาทาเปติ, วาทาปยติ. วชฺเชนฺโต, วชฺชยนฺโต, อิมานิ เหตุกตฺตุปทานิ. ओवादेति, वादयति, वादापेति, वादापयति. वज्जेन्तो, वज्जयन्तो, ही प्रयोजक कर्तृपदे (हेतुकर्तृपदे) आहेत. กมฺเม ‘‘วทิยติ, โอวทิยติ, วชฺชิยติ. วทิยมาโน, วชฺชมาโน, โอวทิยมาโน, โอวชฺชมาโน น กโรติ สาสนํ’’ อิจฺจาทีนิ ภวนฺติ. ‘‘วาโท, โอวาโท, ปฏิวาโท, ปวาโท, อภิวาทนํ, อนุวาโท, อุปวาโท, อปวาโท, วิวาโท, นิวาทนํ, วชฺชํ, วทนํ’’ อิจฺเจวมาทีนิ นามิกปทานิ โยเชตพฺพานิ. कर्मणी प्रयोगात "वदियति, ओवदियति, वज्जियति. वदियमानो, वज्जमानो, ओवदियमानो, ओवज्जमानो न करोति सासनं" (उपदेश केला जात असताना देखील शासनाचे पालन करत नाही) इत्यादी रूपे होतात. "वादो, ओवादो, पटिवादो, पवादो, अभिवादनं, अनुवादो, उपवादो, अपवादो, विवादो, निवादनं, वज्जं, वदनं" इत्यादी नामपदे योजावीत. ‘‘วทิตุํ, วทิตฺวา, วิวทิตฺวา’’ อิจฺเจวมาทีนิ จ ตุมนฺตาทีนิ ปทานิ. "वदितुं, वदित्वा, विवदित्वा" इत्यादी 'तुमुन्' आणि 'त्वा' प्रत्ययान्त पदे आहेत. ตตฺถ วาโทติ กถา. วทิตพฺพํ วตฺตพฺพนฺติ วชฺชํ, กึ ตํ? วจนํ. เอเตน สจฺจวชฺเชน, สมงฺคินี สามิเกน โหมีติ เอตฺถ หิ วจนํ ‘‘วชฺช’’นฺติ วุจฺจติ. วทนฺติ เอเตนาติ วทนํ, มุขํ. มุขสฺส หิ อิมานิ นามานิ – त्यामध्ये 'वाद' म्हणजे कथा (भाषण/चर्चा). जे बोलले पाहिजे, सांगितले पाहिजे ते 'वज्ज' होय. ते काय आहे? वचन (शब्द). "या सत्य वचनाने मी पतीशी युक्त होईन" येथे वचनाला 'वज्ज' असे म्हटले आहे. ज्याच्याद्वारे बोलतात ते 'वदन' म्हणजे मुख (तोंड). मुखाची ही नावे आहेत — วทนํ ลปนํ ตุณฺฑํ, มุข มสฺสญฺจ อานนํ; สูกราทิมุขํ ตุณฺฑ-มิติ เญยฺยํ วิเสสโต. वदन, लपन, तुंड, मुख, आस्य आणि आनन; डुकराचे इत्यादींचे मुख विशेषतः 'तुंड' म्हणून जाणावे. ตตฺร วทตีติ ปิตา ปุตฺตํ วทติ. อปิจ วทตีติ เภรี วทติ, นาทํ มุญฺจตีติ อตฺโถ. เอส นโย วชฺชตีติ เอตฺถาปิ. त्यामध्ये 'वदति' म्हणजे पिता पुत्राला बोलतो. तसेच 'वदति' म्हणजे भेरी (नगारा) वाजते, नाद (ध्वनी) सोडते असा अर्थ आहे. हाच नियम 'वज्जति' यामध्ये देखील लागू होतो. ตตฺรายํ ปทมาลา, วทติ, วทนฺติ. วทสิ, วทถ. วทามิ, วทาม. วทเต, วทนฺเต. วทเส, วทวฺเห. วเท, วทมฺเห. त्यामध्ये ही पदमाला (रूपमाला) आहे: वदति, वदन्ति; वदसि, वदथ; वदामि, वदाम; वदते, वदन्ते; वदसे, वदव्हे; वदे, वदम्हे. วทตุ, วทนฺตุ. วทาหิ, วท, วทถ. วทามิ, วทาม. วทตํ, วทนฺตํ. วทสฺสุ, วทวฺโห. วเท, วทามเส. वदतु, वदन्तु; वदाहि, वद, वदथ; वदामि, वदाम; वदतं, वदन्तं; वदस्सु, वदव्हो; वदे, वदामसे. วชฺชติ, วชฺชนฺติ. วชฺชสิ, วชฺชถ. วชฺชามิ, วชฺชาม. วชฺชเต, วชฺชนฺเต. วชฺชเส, วชฺชวฺเห. วชฺเช, วชฺชมฺเห. वज्जति, वज्जन्ति; वज्जसि, वज्जथ; वज्जामि, वज्जाम; वज्जते, vajjante; वज्जसे, वज्जव्हे; वज्जे, वज्जम्हे. วชฺชตุ[Pg.99], วชฺชนฺตุ. วชฺชาหิ, วชฺช, วชฺชถ. วชฺชามิ, วชฺชาม. วชฺชตํ, วชฺชนฺตํ. วชฺชสฺสุ, วชฺชวฺโห. วชฺเช, วชฺชามฺหเส. อิมา ทฺเว ปทมาลา วทธาตุสฺส วชฺชาเทสวเสน วุตฺตาติ ทฏฺฐพฺพํ. อตฺรายํ สุขุมตฺถวินิจฺฉโย, ‘‘มานุสฺสกา จ ทิพฺพา จ, ตูริยา วชฺชนฺติ ตาวเท’’ติ ปาฬิ. เอตฺถ วชฺชนฺตีติ อิทํ สุทฺธกตฺตุปทํ ตทฺทีปกตฺตา. กึ วิย? वज्जतु, वज्जन्तु; वज्जाहि, वज्ज, वज्जथ; वज्जामि, वज्जाम; वज्जतं, वज्जन्तं; वज्जस्सु, वज्जव्हो; वज्जे, वज्जाम्हसे. या दोन पदमाला 'वद्' धातूच्या 'वज्ज' आदेशाच्या नियमाने सांगितल्या आहेत असे जाणावे. येथे हा सूक्ष्म अर्थ-निर्णय आहे: "मानवी आणि दिव्य वाद्ये त्याच वेळी वाजतात" ही पाळी आहे. येथे 'वज्जन्ति' हे शुद्धकर्तृपद आहे, कारण ते त्याला प्रकाशित करते. कशासारखे? ‘‘อุทีรยนฺตุ สงฺขปณวา, วทนฺตุ เอกโปกฺขรา; นทนฺตุ เภอี สนฺนทฺธา, วคฺคู วทนฺตุ ทุนฺทุภี’’ติ "शंख आणि पणव वाजवावेत, एकपोक्खर वाजवावेत, सज्ज झालेल्या भेरींनी नाद करावा, आणि मधुर दुंदुभी वाजवाव्यात." เอตฺถ ‘‘อุทีรยนฺตุ วทนฺตุ’’อาทีนิ วิย. ตถา หิ อฏฺฐกถายํ ‘‘วชฺชนฺตีติ วชฺชึสูติ อตีตวจเน วตฺตมานวจนํ เวทิตพฺพ’’นฺติ สุทฺธกตฺตุวเสน วิวรณํ กตํ, ตสฺมา อีทิเสสุ ฐาเนสุ วทธาตุสฺส วชฺชาเทโส ทฏฺฐพฺโพ. येथे "उदीरयन्तु वदन्तु" इत्यादींसारखे. तसेच अट्ठकथेत "वज्जन्ति म्हणजे वज्जियुं (वाजले) अशा भूतकाळाच्या अर्थात वर्तमानकाळाचे वचन जाणावे" असे शुद्धकर्तृपदाचे विवरण केले आहे, म्हणून अशा ठिकाणी 'वद्' धातूचा 'वज्ज' आदेश जाणावा. ‘‘สงฺขา จ ปณวา เจว, อโถปิ ทิณฺฑิมา พหู; อนฺตลิกฺขมฺหิ วชฺชนฺติ, ทิสฺวานจฺเฉรกํ นเภ’’ติ "शंख, पणव आणि अनेक डिंडिम, आकाशातील आश्चर्य पाहून अंतरीक्षात वाजतात (वाजविली जातात)." เอตฺถ ปน วชฺชนฺตีติ เหตุกตฺตุปทํ ตทฺทีปกตฺตา. ตญฺจ โข วณฺณสนฺธิวิสยตฺตา วาทยนฺตีติ การิตปทรูเปน สิทฺธํ. ตถา หิ ‘‘วาทยนฺตี’’ติ ปทรูปํ ปติฏฺฐเปตฺวา ยกาเร ปเร สรโลโป กโต, ทฺยการสญฺโญคสฺส ชฺชการทฺวยํ ปุพฺพกฺขรสฺส รสฺสตฺตญฺจ ภวติ. เตนาห อฏฺฐกถายํ ‘‘วชฺชนฺตีติ วาทยนฺตี’’ติ เหตุกตฺตุวเสน วิวรณํ. ตถา หิ ‘‘เทวตา นเภ อจฺเฉรกํ ภควโต ยมกปาฏิหาริยํ ทิสฺวา อนฺตลิกฺเข เอตานิ สงฺขปณวาทีนิ ตูริยานิ วาทยนฺตี’’ติ เหตุกตฺตุวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ ภวติ, ตสฺมา อีทิเสสุ ฐาเนสุ วทสฺส วชฺชาเทโส น ภวติ. येथे मात्र 'वज्जन्ति' हे प्रयोजक कर्तृपद (हेतुकर्तृपद) आहे, कारण ते त्याला प्रकाशित करते. आणि ते वर्णसंधीच्या विषयामुळे 'वादयन्ति' या प्रयोजक (कारित) पदाच्या रूपाने सिद्ध होते. तसेच 'वादयन्ति' हे पदरूप प्रस्थापित करून, 'य' कार पर असताना स्वराचा लोप केला जातो, 'द्य' कार संयोगाचा द्वित्व 'ज्ज' कार होतो आणि पूर्व अक्षराला र्हस्वत्व प्राप्त होते. म्हणूनच अट्ठकथेत "वज्जन्ति म्हणजे वादयन्ति (वाजवितात)" असे प्रयोजक विवरण केले आहे. तसेच "देवता आकाशात भगवंतांचे यमकप्रातिहार्य पाहून अंतरीक्षात हे शंख, पणव इत्यादी वाद्ये वाजवितात" असा प्रयोजक अर्थ ग्रहण करावा लागतो, म्हणून अशा ठिकाणी 'वद्' धातूचा 'वज्ज' आदेश होत नाही. เกเจตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘อนฺตลิกฺขมฺหิ วชฺชนฺติ, ทิสฺวานจฺเฉรกํ นเภ’’ติ เอตฺถาปิ ‘‘วชฺชนฺตี’’ติ ปทํ สุทฺธกตฺตุปทเมว, น เหตุกตฺตุปทํ [Pg.100] ‘‘วชฺชนฺตีติ วาทยนฺตี’’ติ วิวรเณ กเตปิ, ตถา หิ ‘‘เย เกจิเม ทิฏฺฐิปริพฺพสานา, ‘‘อิทเมว สจฺจ’นฺติ วิวาทยนฺตี’’ติ จ ‘‘เอวมฺปิ วิคฺคยฺห วิวาทยนฺตี’’ติ จ เอวมาทีสุ วทนฺติปเทน สมานตฺถํ ‘‘วาทยนฺตี’’ติ ปทญฺจ สาสเน ทิฏฺฐ’’นฺติ? ตนฺน, ‘‘ทิสฺวา’’ติ ทสฺสนกฺริยาวจนโต. น หิ สงฺขปณวาทีนํ ปาฏิหาริยาทิทสฺสนํ อุปปชฺชติ ทสฺสนจิตฺตสฺส อภาวโตติ. สจฺจํ, ตถาปิ – येथे काही जण म्हणू शकतात की, "आकाशातील आश्चर्य पाहून अंतरीक्षात वाजतात" येथे देखील 'वज्जन्ति' हे पद शुद्धकर्तृपदच आहे, प्रयोजक कर्तृपद नाही, जरी "वज्जन्ति म्हणजे वादयन्ति" असे विवरण केले असले तरी. कारण "जे कोणी या मतामध्ये राहणारे आहेत, 'हेच सत्य आहे' असा विवाद करतात" आणि "अशा प्रकारे देखील कलह करून विवाद करतात" इत्यादींमध्ये 'वदन्ति' पदाच्या समान अर्थाने 'वादयन्ति' हे पद बुद्धवचनात पाहिले गेले आहे? ते योग्य नाही, कारण "दिस्वा" (पाहून) हा दर्शन-क्रियावाचक शब्द आहे. कारण शंख, पणव इत्यादी अचेतन वाद्यांना प्रातिहार्य इत्यादींचे दर्शन घडणे शक्य नाही, कारण त्यांच्यात दर्शनचित्त (पाहण्याची चेतना) नसते. हे सत्य आहे, तरी देखील — ‘‘ราทนฺเต ทารเก ทิสฺวา, อุพฺพิทฺธา วิปุลา ทุมา; สยเมโวนมิตฺวาน, อุปคจฺฉนฺติ ทารเก’’ติ "रडणाऱ्या बालकांना पाहून, उंच आणि मोठे वृक्ष स्वतःच वाकून बालकांजवळ जातात." เอตฺถ วิย อุปจริตตฺตา อุปปชฺชเตว ทสฺสนวจนํ. ตสฺมา ‘‘วชฺชนฺตีติ วาทยนฺตี’’ติ วิวรณํ สุทฺธกตฺตุวเสน กตนฺติ? ตนฺน, เหฏฺฐา – येथे ज्याप्रमाणे उपचाराने (लाक्षणिक अर्थाने) दर्शनवचन योग्य ठरते, त्याप्रमाणेच तेथेही घडते. म्हणून "वज्जन्ति म्हणजे वादयन्ति" हे विवरण शुद्धकर्तृपदाचे विवरण केले आहे काय? ते योग्य नाही, कारण खालीलप्रमाणे — ‘‘สงฺคีติโย จ วตฺตนฺติ, อมฺพเร อนิลญฺชเส; จมฺมนทฺธานิ วาเทนฺติ, ทิสฺวานจฺเฉรกํ นเภ’’ติ "आणि वायूच्या मार्गावर (आकाशात) संगीत चालते, आकाशातील आश्चर्य पाहून चर्मबद्ध वाद्ये वाजवितात." อิมินฺนา คาถาย ‘‘วาเทนฺตีติ วาทยนฺติ เทวตา’’ติ สปาฐเสสสฺส อตฺถวิวรณสฺส เหตุกตฺตุวเสน กตตฺตา. อถาปิ วเทยฺยุํ ‘‘สงฺขา จ ปณวา เจว, อโถปิ ทิณฺฑิมา พหู’ติ ปจฺจตฺตวจนวเสน วุตฺตตฺตา วชฺชนฺตีติ ปทํ กมฺมวาจกปท’’นฺติ เจ? ตมฺปิ น, กมฺมวเสน วิวรณสฺส อกตตฺตา, กตฺตุวเสน ปน กตตฺตาติ นิฏฺฐเมตฺถ คนฺตพฺพํ. या गाथेमध्ये 'वादेन्ति म्हणजे देव वाजवतात' (vādentīti vādayanti devatā) अशा उर्वरित पाठासह अर्थाचे स्पष्टीकरण प्रयोजक (हेतुकर्तृक) रूपाने केले गेले असल्यामुळे. तसेच जर असे म्हटले की, 'शंख आणि पणव, तसेच अनेक दिंडिम' (saṅkhā ca paṇavā ceva, athopi diṇḍimā bahū) असे प्रथमा विभक्तीच्या (पच्चत्तवचन) रूपाने म्हटले असल्यामुळे 'वज्जन्ति' (vajjanti) हे पद कर्मवाचक पद आहे, तर? ते देखील योग्य नाही, कारण कर्मानुसार स्पष्टीकरण केलेले नसून, कर्तृवाचक (किच्च) रूपाने केले गेले आहे, असा येथे निष्कर्ष काढावा. อยเมตฺถ วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. ทฺวิคณิโก วทธาตุ ภูวาทิคณิโก จ จุราทิคณิโก จ. โส หิ ภูวาทิคเณ วตฺตนฺโต ‘‘วทติ วชฺชตี’’ติ สุทฺธกตฺตุรูปานิ ชเนตฺวา ‘‘วาเทติ, วาทยติ, วาทาเปติ, วาทาปยตี’’ติ จตฺตาริ เหตุกตฺตุรูปานิ ชเนติ, จุราทิคเณ ปน ‘‘วาเทติ, วาทยตี’’ติ [Pg.101] สุทฺธกตฺตุรูปานิ ชเนตฺวา ‘‘วาทาเปติ, วาทาปยตี’’ติ จ ทฺเว เหตุกตฺตุรูปานิ ชเนติ, ตสฺมา สาสเน ‘‘วาเทนฺติ วาทยนฺตี’’ติ สุทฺธกตฺตุปทานิ ทิสฺสนฺติ. ‘‘วเทยฺย, วเทยฺยุํ’’ อิจฺจาทิ สพฺพํ เนยฺยํ. ‘‘วชฺเชยฺย, วชฺเชยฺยุํ’’ อิจฺจาทิ จ สพฺพํ เนยฺยํ วชฺชาเทสวเสน. येथे हा निर्णय समजून घ्यावा. 'वद्' (vad) धातू हा दोन गणांमधील आहे - भूवादिगणीय आणि चुरादिगणीय. तो भूवादिगणामध्ये असताना 'वदति, वज्जति' अशी कर्तृरूपे निर्माण करून 'वादेति, वादयति, वादापेति, वादापयति' अशी चार प्रयोजक (हेतुकर्तृक) रूपे निर्माण करतो; तर चुरादिगणामध्ये 'वादेति, वादयति' अशी कर्तृरूपे निर्माण करून 'वादापेति, वादापयति' अशी दोन प्रयोजक रूपे निर्माण करतो. त्यामुळे शासनात (बुद्धवचनात) 'वादेन्ति, वादयन्ति' ही शुद्ध कर्तृपदे दिसतात. 'वदेय्य, वदेय्युं' इत्यादी सर्व रूपे समजून घ्यावीत. तसेच 'वज्जेय्य, वज्जेय्युं' इत्यादी सर्व रूपे 'वज्ज' आदेशाच्या नियमाने समजून घ्यावीत. อถ วา วเทยฺย, วเทยฺยุํ, วชฺชุํ. ปิตา มาตา จ เต ทชฺชุนฺติ ปทมิว. เอตฺถ จ ‘‘วชฺชุํ วา เต น วา วชฺชุํ, นตฺถิ นาสาย รูหนา’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. วเทยฺยุํ วาน วเทยฺยุํวาติ อตฺโถ. วเทยฺยาสิ, วชฺชาสิ, วชฺเชสิ อิจฺจปิ. วุตฺโต วชฺชาสิ วนฺทนํ. วชฺเชสิ โข ตฺวํ วามูรํ. วเทยฺยาถ, วชฺชาถ. อมฺมํ อโรคํ วชฺชาถ. วเทยฺยามิ, วชฺชามิ, วเทยฺยาม, วชฺชาม. วเทถ, วเทรํ. วเทโถ, วเทยฺยาวฺโห, วชฺชาวฺโห. วเทยฺยํ, วชฺชํ, วเทยฺยามฺเห, วชฺชามฺเห. ปุพฺเพ วิย อิธาปิ ยกาเร ปเร สรโลโป ทฏฺฐพฺโพ. อญฺญานิปิ อุปปริกฺขิตฺวา คเหตพฺพานิ. किंवा 'वदेय्य, वदेय्युं, वज्जुं' अशी रूपे होतात. जसे 'पिता माता च ते दज्जुं' या पदाप्रमाणे. आणि येथे 'वज्जुं वा ते न वा वज्जुं, नत्थि नासाय रूहना' (त्यांनी बोलावे किंवा बोलू नये, नाकाची वाढ होत नाही) हे पाळीचे उदाहरण आहे. याचा अर्थ 'त्यांनी बोलावे किंवा बोलू नये' असा आहे. 'वदेय्यासि, वज्जासि, वज्जेसि' इत्यादी. जसे 'वुत्तो वज्जासि वन्दनं', 'वज्जेसि खो त्वं वामूरं'. 'वदेय्याथ, वज्जाथ' जसे 'अम्मं अरोगं वज्जाथ'. 'वदेय्यामि, वज्जामि, वदेय्याम, वज्जाम'. 'वदेथ, वदेरं'. 'वदेथो, वदेय्याव्हो, वज्जाव्हो'. 'वदेय्यं, वज्जं, वदेय्याम्हे, वज्जाम्हे'. पूर्वीप्रमाणे येथेही 'य' कार नंतर असताना स्वराचा लोप होतो असे पाहावे. इतर रूपे देखील नीट तपासून ग्रहण करावीत. อิทานิ ปโรกฺขาทิรูปานิ กถยาม. วท, ปาวท, ยถา พภุว. ทการโลเป ‘‘ปาว’’ อิติปิ รูปํ ภวติ, ‘‘ปฏิปํ วเทหิ ภทฺทนฺเต’’ติ เอตฺถ ‘‘ปฏิป’’นฺติ ปทํ วิย. ตถา หิ ‘‘โย อาตุมานํ สยเมว ปาว’’ อิติ ปาฬิ ทิสฺสติ. เอตฺถ ปสทฺโท อุปสคฺโค ทีฆํ กตฺวา วุตฺโต ‘‘ปาวทติ ปาวจน’’นฺติอาทีสุ วิย, ปาวาติ จ อิทํ อตีตวจนํ, อฏฺฐกถายํ ปน อตีตวจนํ อิทนฺติ ชานนฺโตปิ ครุ วตฺตมานวจนวเสน ‘‘ปาวาติ วทตี’’ติ วิวรณมกาสิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ กาลวิปลฺลาสวเสน อตฺถสฺส วตฺตพฺพตฺตา. आता आपण परोक्षा (भूतकाळ) इत्यादींची रूपे सांगू. 'वद, पावद', जसे 'बभूव' होते. 'द' काराचा लोप झाल्यावर 'पाव' असेही रूप बनते, जसे 'पटिपं वदेहि भद्दन्ते' येथे 'पटिपं' हे पद आहे. तसेच 'यो आतुमानं सयमेव पाव' अशी पाळी (मूळ पाठ) दिसते. येथे 'प' (प्र) हा उपसर्ग 'पावदति, पावचनं' इत्यादींप्रमाणे दीर्घ करून वापरला आहे. 'पाव' हे भूतकाळाचे रूप आहे, परंतु अट्ठकथेमध्ये हे भूतकाळाचे रूप आहे हे माहीत असूनही, आचार्यांनी वर्तमानकाळाच्या रूपाने 'पाव म्हणजे बोलतो (वदति)' असे स्पष्टीकरण केले आहे, कारण अशा ठिकाणी काळाच्या व्यत्यासामुळे (कालविपर्यास) अर्थ सांगावा लागतो. อายสฺมาปิ จ สาริปุตฺโต นิทฺเทเส ‘‘โย อาตุมานํ สยเมว ปาวา’’ติ ปทํ นิกฺขิปิตฺวา อาตุมา วุจฺจติ อตฺตา, สยเมว ปาวาติ สยเมว อตฺตานํ ปาวทติ, ‘‘อหมสฺมิ [Pg.102] สีลสมฺปนฺโน’’ติ วา ‘‘วตสมฺปนฺโน’’ติ วาติ วตฺตมานวจเนน อตฺถํ นิทฺทิสิ. อถ วา ปาวาติ อิทํ น เกวลํ วทธาตุวเสเนว นิปฺผนฺนํ, อถ โข อุธาตุวเสนปิ. ตถา หิ อิทํ ปปุพฺพสฺส อุสทฺเท อิติ ธาตุสฺส ปโยเค อุการสฺส โอการาเทสํ กตฺวา ตโต ปโรกฺขาภูเต อกาเร ปเร โอการสฺส อาวาเทสํ ตโต จ สนฺธิกิจฺจํ กตฺวา สิชฺฌติ, ตสฺมา อุธาตุสฺส วทธาตุยา สมานตฺถตฺตา ตนฺนิปฺผนฺนรูปสฺส จ วทธาตุยา นิปฺผนฺนรูเปน สมานรูปตฺตา ‘‘สยเมว อตฺตานํ ปาวทตี’’ติ วทธาตุวเสน นิทฺทิสีติ ทฏฺฐพฺพํ. आयुष्यमान सारिपुत्तांनी देखील निद्देसामध्ये 'यो आतुमानं सयमेव पावा' हे पद ठेवून, 'आतुमा' म्हणजे 'आत्मा' (स्वतः) असे म्हटले आहे; 'सयमेव पावा' म्हणजे 'स्वतःच स्वतःची प्रशंसा करतो (पावदति)', जसे 'मी शीलसंपन्न आहे' किंवा 'व्रतसंपन्न आहे' अशा वर्तमानकाळाच्या शब्दांनी अर्थ स्पष्ट केला आहे. किंवा 'पावा' हे केवळ 'वद्' धातूपासूनच सिद्ध झालेले नाही, तर 'उ' (u) धातूपासूनही सिद्ध झाले आहे. तसेच, 'प' उपसर्गपूर्वक 'उ' (शब्दे) या धातूच्या प्रयोगात 'उ' काराचा 'ओ' कार आदेश करून, त्यानंतर परोक्षा भूतकाळातील 'अ' कार नंतर असताना 'ओ' काराचा 'आव' आदेश करून आणि त्यानंतर संधीचे कार्य करून हे सिद्ध होते. त्यामुळे 'उ' धातूचा अर्थ 'वद्' धातूसारखाच असल्यामुळे आणि त्यापासून सिद्ध झालेले रूप 'वद्' धातूच्या रूपासारखेच असल्यामुळे, 'स्वतःच स्वतःची प्रशंसा करतो (पावदति)' असे 'वद्' धातूच्या रूपाने स्पष्ट केले आहे, असे समजावे. อิทานิ วิจฺฉินฺนา ปทมาลา ฆฏียติ. วท, วทุํ. วเท, วทิตฺถ, วทํ, วทิมฺห. วทิตฺถ, วทิเร. วทิตฺโถ, วทิวฺโห. วทึ, วทิมฺเห. ปาวท, ปาว อิจฺจปิ. ปาวทุ. ปาวเท, ปาวทิตฺถ. ปาวทํ, ปาวทิมฺห. ปาวทิตฺถ, ปาวทิเร. ปาวทิตฺโถ, ปาวทิวฺโห. ปาวทึ, ปาวทิมฺเห. ตถา ‘‘วชฺช, วชฺชุ’’ อิจฺจาทีนิ ปโรกฺขารูปานิ. आता विखुरलेली पदमाला (रूपावली) जोडली जात आहे. 'वद, वदुं. वदे, वदित्थ, वदं, वदिम्ह. वदित्थ, वदिरे. वदित्थो, वदिव्हो. वदिं, वदिम्हे'. 'पावद, पाव' इत्यादी. 'पावदु. पावदे, पावदित्थ. पावदं, पावदिम्ह. पावदित्थ, पावदिरे. पावदित्थो, पावदिव्हो. पावदिं, पावदिम्हे'. तसेच 'वज्ज, वज्जु' इत्यादी परोक्षा (भूतकाळाची) रूपे आहेत. ‘‘อวทา, อวทู. อวชฺชา, อวชฺชู’’ อิจฺจาทีนิ หิยฺยตฺตนีรูปานิ. 'अवदा, avadū. अवज्जा, avajjū' इत्यादी हिय्यत्तनी (ह्यस्तन भूतकाळाची) रूपे आहेत. ‘‘อวทิ, วทิ, อวทุํ, วทุํ, อวทึสุ, วทึสุ. อวชฺชิ, วชฺชิ’’ อิจฺจาทีนิ อชฺชตนีรูปานิ. 'अवदि, वदि, अवदुं, वदुं, अवदिंसु, वदिंसु. अवज्जि, वज्जि' इत्यादी अज्जतनी (अद्यतन भूतकाळाची) रूपे आहेत. ‘‘วทิสฺสติ, วทิสฺสนฺติ. วชฺชิสฺสติ, วชฺชิสฺสนฺติ’’ อิจฺจาทีนิ ภวิสฺสนฺตีรูปานิ. 'वदिस्सति, वदिस्सन्ति. वज्जिस्सति, वज्जिस्सन्ति' इत्यादी भविस्सती (भविष्यकाळाची) रूपे आहेत. ‘‘อวทิสฺสา, วทิสฺสา, อวชฺชิสฺสา, วชฺชิสฺสา’’ อิจฺจาทีนิ กาลาติปตฺติรูปานิ. เสสานิ สพฺพานิปิ ยถาสมฺภวํ วิตฺถาเรตพฺพานิ. ยา ปเนตฺถ วทธาตุ วิยตฺติยํ วาจายํ วุตฺตา, สา กตฺถจิ ‘‘วทนฺตํ เอกโปกฺขรา. เภริวาทโก’’ติอาทีสุ อพฺยตฺตสทฺเทปิ วตฺตติ อุปจริตวเสนาติ ทฏฺฐพฺพํ. 'अवदिस्सा, वदिस्सा, अवज्जिस्सा, वज्जिस्सा' इत्यादी कालातिपत्ती (क्रियातिपत्ती) रूपे आहेत. उर्वरित सर्व रूपे आवश्यकतेनुसार सविस्तर जाणावीत. येथे जो 'वद्' धातू स्पष्ट वाणीच्या अर्थाने सांगितला आहे, तो काही ठिकाणी 'वदन्तं एकपोक्खरा', 'भेरिवादको' इत्यादींमध्ये उपचाराने (लाक्षणिक अर्थाने) अव्यक्त आवाजाच्या अर्थाने देखील वापरला जातो, असे समजावे. วิท [Pg.103] ญาเณ. ญาณํ ชานนํ. วิทติ. เวโท. วิทู. การิเต ‘‘เวเทติ. เวทยติ. สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทติ. เวทยนฺติ จ เต ตุฏฺฐึ, เทวา มานุสกา อุโภ’’ติ ปโยคา. ตตฺถ ปเวเทตีติ โพเธติ ญาเปติ ปกาเสติ. เวโทติ วิทติ สุขุมมฺปิ การณํ อาชานาตีติ เวโท, ปญฺญาเยตํ นามํ. ‘‘เวเทหมุนี’’ติ เอตฺถ หิ ญาณํ เวโทติ วุจฺจติ. เวโทติ วา เวทคนฺถสฺสปิ นามํ วิทนฺติ ชานนฺติ เอเตน อุจฺจาริตมตฺเตน ตทาธารํ ปุคฺคลํ ‘‘พฺราหฺมโณ อย’’นฺติ, วิทนฺติ วา เอเตน พฺราหฺมณา อตฺตนา กตฺตพฺพกิจฺจนฺติ เวโท. โส ปน อิรุเวทยชุเวทสามเวทวเสน ติวิโธ. อาถพฺพณเวทํ ปน ปณีตชฺฌาสยา น สิกฺขนฺติ ปรูปฆาตสหิตตฺตา. ตสฺมา ปาฬิยํ ‘‘ติณฺณํ เวทานํ ปารคู’’ติ วุตฺตํ. เอเตเยว ‘‘ฉนฺโท, มนฺโต, สุตี’’ติ จ วุจฺจนฺติ. 'विद्' (vid) धातू ज्ञान (जाणणे) या अर्थी आहे. ज्ञान म्हणजे जाणणे. 'विदति' (तो जाणतो). 'वेदो' (वेद). 'विदू' (विद्वान). प्रयोजक (कारित) रूपात 'वेदेति, वेदयति' असे प्रयोग होतात. जसे: 'सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदेति' (स्वतः अभिज्ञा प्राप्त करून, साक्षात करून प्रवेदित करतो/जाणवून देतो) आणि 'वेदयन्ति च ते तुट्ठिं, देवा मानुसका उभो' (देव आणि मानव दोघेही आनंद व्यक्त करतात). तेथे 'पवेदेति' म्हणजे बोध करतो, जाणवून देतो, प्रकाशित करतो. 'वेद' म्हणजे जो सूक्ष्म कारण देखील जाणतो तो 'वेद' होय, हे प्रज्ञेचे नाव आहे. 'विदेहमुनी' येथे ज्ञानाला 'वेद' म्हटले आहे. किंवा 'वेद' हे वेदग्रंथाचे देखील नाव आहे, ज्याच्या केवळ उच्चारणाने त्या आधारावर 'हा ब्राह्मण आहे' असे लोक जाणतात, किंवा ज्याच्याद्वारे ब्राह्मण स्वतःचे कर्तव्यकर्म जाणतात, तो 'वेद' होय. तो ऋग्वेद, यजुर्वेद आणि सामवेद या रूपाने तीन प्रकारचा आहे. परंतु अथर्ववेदाचे अध्ययन श्रेष्ठ विचारसरणीचे लोक करत नाहीत, कारण तो इतरांना इजा पोहचवण्याशी (अभिचार कर्म) संबंधित आहे. म्हणून पाळीमध्ये 'तिण्णं वेदानं पारगू' (तीन वेदांमध्ये पारंगत) असे म्हटले आहे. यांनाच 'छन्द, मन्त (मंत्र), सुति (श्रुती)' असेही म्हणतात. ปญฺญายํ ตุฏฺฐิยํ เวเท, เวทสทฺโท ปวตฺตติ; ปาวเกปิ จ โส ทิฏฺโฐ, ชาตสทฺทปุเรจโร; प्रज्ञा, तुष्टी (आनंद) आणि वेद (ज्ञान/ग्रंथ) या अर्थांमध्ये 'वेद' शब्द प्रवृत्त होतो; तसेच अग्नीच्या अर्थात देखील तो 'जात' शब्दाच्या आधी लागून (जातवेद) वापरलेला दिसतो; ปจฺฉานุเค ชาตสทฺเท, สติ ตุฏฺฐชเนปิ จ; ‘‘เวทคู สพฺพธมฺเม’’ติ เอตฺถาปิ วิทิเตสุ จ. आणि 'जात' शब्द नंतर आल्यावर (वेदजात) आनंदित झालेल्या लोकांच्या अर्थात वापरला जातो; तसेच 'वेदगू सब्बधम्मे' (सर्व धर्मांना जाणणारा) येथे 'वेद' शब्द 'जाणलेल्या' (विदित) गोष्टींच्या अर्थात वापरला आहे. วิทูติ ปณฺฑิตมนุสฺโส. โส หิ ยถาสภาวโต กมฺมญฺจ ผลญฺจ กุสลาทิเภเท จ ธมฺเม วิทตีติ ‘‘วิทู’’ติ วุจฺจติ. 'विदू' म्हणजे पंडित (विद्वान) मनुष्य. कारण तो स्वभावतः कर्म आणि त्याचे फळ, तसेच कुशल इत्यादी भेदांनी युक्त असणाऱ्या धर्मांना (गोष्टींना) जाणतो, म्हणून त्याला 'विदू' असे म्हणतात. รุท อสฺสุวิโมจเน, สกมฺมิกวเสนิมิสฺสา อตฺโถ คเหตพฺโพ. โรทติ, รุทติ อิจฺจปิ. รุณฺณํ. รุทิตํ. โรทนํ. โรทนฺโต. โรทมาโน. โรทนฺตี. โรทมานา. รุทมุขา. รุทํ. รุทนฺโต. 'रुद्' (rud) धातू अश्रू ढाळणे (रडणे) या अर्थी आहे, येथे अकर्मक रूपाने याचा अर्थ घ्यावा. 'रोदति, रुदति' इत्यादी. 'रुण्णं' (रडलेला), 'रुदितं' (रडणे), 'रोदनं' (रडणे), 'रोदन्तो' (रडणारा), 'रोदमानो' (रडणारा), 'रोदन्ती' (रडणारी), 'रोदमाना' (रडणारी), 'रुदमुखा' (रडवेला चेहरा असलेला), 'रुदं' (रडत असताना), 'रुदन्तो' (रडणारा). ตตฺถ [Pg.104] โรทตีติ กึ โรทติ? มตํ ปุตฺตํ วา ภาตรํ วา โรทติ. ตตฺรายํ ปาฬิ ‘‘นาหํ ภนฺเต เอตํ โรทามิ, ยํ มํ ภนฺเต ภควา เอวมาห’’. อยํ ปเนตฺถ อตฺโถ – ‘‘ยํ มํ ภนฺเต ภควา เอวมาห, อหํ เอตํ ภควโต พฺยากรณํ น ปโรทามิ น ปริเทวามิ น อนุตฺถุนามี’ติ เอวํ สกมฺมิกวเสนตฺโถ เวทิตพฺโพ, น อสฺสุมุญฺจนมตฺเตน. तेथे 'रोदति' (रडतो) म्हणजे काय रडतो? मृत पुत्रासाठी किंवा भावासाठी रडतो. तेथे हा पाळी पाठ आहे – "भंते, भगवान मला जे असे म्हणाले, त्याबद्दल मी रडत नाही." येथे हा अर्थ आहे – "भंते, भगवान मला जे असे म्हणाले, मी भगवंतांच्या त्या व्याकरणावर (स्पष्टीकरणावर) शोक करत नाही, विलाप करत नाही, अनुताप करत नाही." अशा प्रकारे सकर्मक अर्थ समजून घ्यावा, केवळ अश्रू ढाळणे एवढाच नाही. ‘มตํ วา อมฺม โรทนฺติ, โย วา ชีวํ น ทิสฺสติ; ชีวนฺตํ อมฺม ปสฺสนฺติ, กสฺมา มํ อมฺม โรทสี’ติ "आई, जे मृत झाले आहेत किंवा जे जिवंत दिसत नाहीत, त्यांच्यासाठी लोक रडतात; आई, तू तर मला जिवंत पाहत आहेस, मग माझ्यासाठी का रडत आहेस?" อยญฺเจตฺถ ปโยโค’’ติ อิทมฏฺฐกถาวจนํ. อิทํ ปน ฏีกาวจนํ – ‘‘ยถา สกมฺมกา ธาตุสทฺทา อตฺถวิเสสวเสน อกมฺมกา โหนฺติ ‘วิพุทฺโธ ปุริโส วิพุทฺโธ กมลสณฺโฑ’ติ, เอวํ อตฺถวิเสสวเสน อกมฺมกาปิ สกมฺมกา โหนฺตีติ ทสฺเสตุํ ‘น ปริเทวามิ น อนุตฺถุนามี’ติ อาห. อนุตฺถุนสทฺโท สกมฺมกวเสน ปยุชฺชติ ‘ปุราณานิ อนุตฺถุน’นฺติอาทีสุ. อยญฺเจตฺถ ปโยโคติ อิมินา คาถาย อนุตฺถุนนํ รุทนํ อธิปฺเปตนฺติ ทสฺเสตี’’ติ. "आणि हा येथे प्रयोग आहे" हे अट्ठकथा वचन आहे. हे तर टीका वचन आहे – "जसे अकर्मक धातू शब्द अर्थविशेषाने सकर्मक होतात, जसे 'विबुद्धो पुरिसो' (जागृत पुरुष), 'विबुद्धो कमलसण्डो' (विकसित कमळसमूह), त्याचप्रमाणे अर्थविशेषाने अकर्मक देखील सकर्मक होतात हे दर्शवण्यासाठी 'न परिदेवामि न अनुत्थुनामि' असे म्हटले आहे. 'अनुत्थुन' शब्द सकर्मक रूपाने वापरला जातो, जसे 'पुराणानि अनुत्थुनं' (पूर्वीच्या गोष्टींचा अनुताप करणे) इत्यादींमध्ये. 'आणि हा येथे प्रयोग आहे' याने या गाथेमध्ये अनुत्थुनन (अनुताप करणे) हे रडणे अभिप्रेत आहे, हे दर्शवले जाते." ทลิทฺท ทุคฺคติยํ. ทุกฺขสฺส คติ ปติฏฺฐาติ ทุคฺคตีติ อยํ อตฺโถ ‘‘อปายํ ทุคฺคตึวินิปาตํ นิรยํ อุปปชฺชตี’’ติอาทีสุ ยุชฺชติ, อิธ ปน อิทํ อตฺถํ อคฺคเหตฺวา อญฺโญ อตฺโถ คเหตพฺโพ. กถํ ทุคฺคตีติ? ทุกฺเขน กิจฺเฉน คติ คมนํ อนฺนปานาทิลาโภ ทุคฺคตีติ. ทลิทฺทติ. ทลิทฺโท, ทลิทฺที, ทาลิทฺทิยํ. ตตฺถ ทลิทฺทตีติ สพฺพํ อิจฺฉิติจฺฉิตํ ปรํ ยาจิตฺวา เอว ทุกฺเขน อธิคจฺฉติ, น อยาจิตฺวาติ อตฺโถ. ทุลิทฺโทติ ทุคฺคตมนุสฺโส. ทลิทฺทีติ ทุคฺคตา นารี. ทลิทฺทสฺส ภาโว ทาลิทฺทิยํ. เอตฺถ จ สพฺพเมว ‘‘ทลิทฺทตี’’ติ โลกิกปฺปโยคทสฺสนโต ‘‘ทลิทฺทตี’’ติ กฺริยาปทํ วิภาวิตํ. สาสเน ปน [Pg.105] ตํ กฺริยาปทํ น อาคตํ, ‘‘ทลิทฺโท ทลิทฺที’’ติ นามปทานิเยว อาคตานิ. อนาคตมฺปิ ตํ ‘‘นาถตี’’ติ ปทมิว สาสนานุโลมตฺตา คเหตพฺพเมว. ครู ปน กจฺจายนมตวเสน ทล ทุคฺคติมฺหีติ ทุคฺคติวาจกทลธาตุโต อิทฺทปจฺจยํ กตฺวา ‘‘ทลิทฺโท’’ติ นามปทํ ทสฺเสสุํ. दलिद्द (धातू) दुर्गत्यामध्ये (दुर्गती अर्थात). "दुःखाची गती किंवा प्रतिष्ठा म्हणजे दुर्गती" हा अर्थ "अपाय, दुर्गती, विनिपात, निरय (नरक) मध्ये उत्पन्न होतो" इत्यादींमध्ये योग्य ठरतो, परंतु येथे हा अर्थ न घेता दुसरा अर्थ घेतला पाहिजे. दुर्गती म्हणजे काय? दुःखाने, कष्टाने गती (गमन) किंवा अन्न-पानादींचा लाभ होणे म्हणजे दुर्गती होय. 'दलिद्दति' (तो दरिद्री होतो). दलिद्द् (दरिद्री पुरुष), दलिद्दी (दरिद्री स्त्री), दालिद्दियं (दारिद्र्य). तेथे 'दलिद्दति' म्हणजे सर्व काही इच्छित वस्तू दुसऱ्याकडे याचना करूनच दुःखाने प्राप्त करतो, न मागता नाही, असा अर्थ आहे. दलिद्द् म्हणजे दुर्गतीला प्राप्त झालेला मनुष्य (दरिद्री मनुष्य). दलिद्दी म्हणजे दुर्गतीला प्राप्त झालेली स्त्री (दरिद्री स्त्री). दरिद्र्याचा भाव म्हणजे 'दालिद्दियं' (दारिद्र्य). आणि येथे सर्व काही 'दलिद्दति' या लौकिक प्रयोगाच्या दर्शनावरून 'दलिद्दति' हे क्रियापद स्पष्ट केले आहे. परंतु शासनात (बुद्धवचनात) ते क्रियापद आलेले नाही, केवळ 'दलिद्द्', 'दलिद्दी' ही नामपदेच आली आहेत. आलेले नसले तरी, 'नाथति' या पदाप्रमाणे शासनाला अनुकूल असल्यामुळे ते ग्रहण करावेच. परंतु आचार्यांनी कच्चायन मतानुसार 'दल दुग्गतिम्हि' या दुर्गतीवाचक 'दल' धातूपासून 'इद्द' प्रत्यय लावून 'दलिद्द्' हे नामपद दर्शवले आहे. ตุท พฺยถเน. ตุทติ, วิตุทติ. กมฺมนิ ‘‘ตุชฺชติ, วิตุชฺชมาโน, เวทนาภิภุนฺโน’’ติ รูปานิ. तुद (धातू) व्यथेमध्ये (पीडा देणे/दुःख देणे अर्थात). तुदति (तो पीडा देतो), वितुदति (तो विशेष पीडा देतो). कर्मणी प्रयोगात 'तुज्जति' (पीडित केला जातो), 'वितुज्जमानो' (पीडित केला जात असलेला), 'वेदनाभिभुन्नो' (वेदनेने ग्रासलेला) अशी रूपे होतात. ตุทนฺติ วาจาหิ ชนา อสญฺญตา,สเรหิ สงฺคามคตํว กุญฺชรํ; สุตฺวาน วากฺยํ ผรุสํ อุทีริตํ,อธิวาสเย ภิกฺขุ อทุฏฺฐจิตฺโต; "असंयत लोक वाचेने (शब्दांनी) तशाच प्रकारे टोचतात (पीडा देतात), जसे युद्धभूमीवर गेलेल्या हत्तीला बाणांनी टोचले जाते; उच्चारलेले कठोर वचन ऐकूनही, भिक्खूने द्वेषरहित चित्ताने ते सहन करावे." นุท เปรเณ. เปรณํ จุณฺณิกรณํ ปิสนํ, นุทติ, ปนุทติ. ปนุทนํ. नुद (धातू) प्रेरणेमध्ये (दूर करणे/प्रेरित करणे अर्थात). प्रेरणा म्हणजे चूर्ण करणे, दळणे (किंवा दूर ढकलणे). नुदति (तो दूर करतो), पनुदति (तो पूर्णपणे दूर करतो). पनुदनं (दूर करणे). วิทิ ลาเภ. วินฺทติ. อุฏฺฐาตา วินฺทเต ธนํ. โควินฺโท. विदि (धातू) लाभामध्ये (मिळवणे अर्थात). विन्दति (तो प्राप्त करतो). "उद्योगी (प्रयत्नशील) मनुष्य धन प्राप्त करतो." गोविन्दो (गोविंद). ขทิ ปริฆาเต. ปริฆาตํ สมนฺตโต หนนํ. ขนฺทติ. खदि (धातू) परिघातामध्ये (नाश करणे/प्रहार करणे अर्थात). परिघात म्हणजे चहूबाजूंनी मारणे किंवा नाश करणे. खन्दति (तो नाश करतो/तुकडे करतो). ทการนฺตธาตุรูปานิ. 'द' कारान्त धातूंची रूपे. ธการนฺตธาตุ 'ध' कारान्त धातू. ธา ธารเณ. ทธาติ, วิทธาติ. ยํ ปณฺฑิโต นิปุณํ สํวิเธติ. นิธึ นิเธติ. นิธิ นาม นิธียติ. ตาว สุนิหิโต สนฺโต. ยโต นิธึ ปริหริ. นิทหติ. กุหึ เทว นิทหามิ. ปริทหติ. โย วตฺตํ ปริทหิสฺสติ. ธสฺสติ. ปริธสฺสติ. พาโลติ ปรํ ปทหติ. สกฺยา โข อมฺพฏฺฐ ราชานํ [Pg.106] อุกฺกากํ ปิตามหํ ทหนฺติ. สทฺทหติ ตถาคตสฺส โพธึ. สทฺธา, สทฺทหนา, สทฺธาตพฺพํ, สทฺทหิตพฺพํ, สทฺธายิโก, ปจฺจยิโก. สทฺเธยฺยวจสา อุปาสิกา. สทฺทหิตุํ, สทฺทหิตฺวา. วิเสสาธานํ. โสตาวธานํ. โสตํ โอทหติ. โอหิตโสโต. โสตํ โอทหิตฺวา. มจฺจุเธยฺยํ, มารเธยฺยํ, นามเธยฺยํ, ธาตุ, ธาตา, วิธาตา. วิธิ. อภิธานํ, อภิเธยฺยํ, นิธานวตี วาจา, อาธานคาหี, สนฺธิ. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. धा (धातू) धारण करण्यामध्ये (धारण करणे/ठेवणे अर्थात). दधाति (तो धारण करतो), विदधाति (तो विधान करतो/व्यवस्था करतो). "ज्याला पंडित निपुणतेने व्यवस्थित करतो." निधी (ठेव) ठेवतो. निधी म्हणजे जो ठेवला जातो. "तोपर्यंत चांगल्या प्रकारे ठेवलेला असताना." "ज्यामुळे निधीचे रक्षण केले." निदहति (तो ठेवतो/पुरतो). "हे देवा, मी कोठे ठेवू (पुरू)?" परिदहति (तो परिधान करतो). "जो वस्त्र परिधान करेल." धस्सति (तो धारण करेल/ठेवेल). परिधस्सति (तो परिधान करेल). "मूर्ख मनुष्य दुसऱ्याला पराभूत करतो (किंवा प्रयत्न करतो)." "हे अंबट्ठ, शाक्य खरोखरच राजा उक्काक या आपल्या पूर्वजाला मानतात (किंवा स्थापित करतात)." "तथागतांच्या बोधीवर श्रद्धा ठेवतो." श्रद्धा, श्रद्धान (श्रद्धा ठेवणे), श्रद्धा ठेवण्यायोग्य, श्रद्धा ठेवण्यासारखे, श्रद्धाळू, विश्वासू. विश्वासार्ह वचन असलेली उपासिका. श्रद्धा ठेवण्यासाठी, श्रद्धा ठेवून. विशेषाधान (विशेष रीतीने ठेवणे). श्रोतावधान (कान देणे/लक्षपूर्वक ऐकणे). कान देतो (लक्षपूर्वक ऐकतो). एकाग्रचित्त होऊन ऐकणारा (कान दिलेला). कान देऊन (लक्षपूर्वक ऐकून). मृत्युधेय (मृत्यूचे साम्राज्य), मारधेय (माराचे साम्राज्य), नामधेय (नाव), धातू, धाता (धारण करणारा), विधाता (व्यवस्था करणारा). विधी. अभिधान (नाव/शब्दकोश), अभिधेय (वाच्य/अर्थ), निधानवती वाचा (अर्थपूर्ण किंवा सुरक्षित वाणी), आधानग्राही (हट्टी/पकडून ठेवणारा), संधी. इतरही (रूपे) योजावीत. วิปุพฺโพ ธา กโรตฺยตฺเถ, อภิปุพฺโพ ตุ ภาสเน; นฺยาสํปุพฺโพ ยถาโยคํ, นฺยาสาโรปนสนฺธิสุ. 'वि' उपसर्गपूर्वक 'धा' धातू 'करणे' या अर्थात होतो, तर 'अभि' उपसर्गपूर्वक 'धा' धातू 'बोलणे' या अर्थात होतो; आणि 'नि' (न्यास) उपसर्गपूर्वक 'धा' धातू योग्यतेनुसार ठेवणे, आरोपण करणे आणि संधी या अर्थांमध्ये होतो. อิมสฺมา ปน ธาธาตุโต ปุพฺพสฺส อปิ อิจฺจุปสคฺคสฺส อกาโร กฺวจิ นิจฺจํ โลปํ ปปฺโปติ, กฺวจิ นิจฺจํ โลปํ น ปปฺโปติ. อตฺร โลโป วุจฺจเต, ทฺวารํ ปิทหติ, ทฺวารํ ปิทหนฺโต, ปิทหิตุํ, ปิทหิตฺวา, เอวํ อการโลโป ภวติ. ทฺวารํ อปิทหิตฺวา, เอวํ อการโลโป น ภวติ. เอตฺถ หิ อกาโร อปิอุปสคฺคสฺส อวยโว น โหติ. กินฺติ เจ? ปฏิเสธตฺถวาจโก นิปาโตเยว, อุปสคฺคาวยโว ปน อทสฺสนํ คโต, อยํ นิจฺจาโลโป. เอวํ ธาธาตุโต ปุพฺพสฺส อปิ อิจฺจุปสคฺคสฺส อกาโร กฺวจิ นิจฺจํ โลปํ ปปฺโปติ, กฺวจิ นิจฺจํ โลปํ น ปปฺโปติ. อิทํ อจฺฉริยํ อิทํ อพฺภุตํ. ยตฺร หิ นาม ภควโต ปาวจเน เอวรูปโปปิ นโย สนฺทิสฺสติ วิญฺญูนํ หทยวิมฺหาปนกโร, โย เอกสฺมึเยว ธาตุมฺหิ เอกสฺมึเยว อุปสคฺเค เอกสฺมึเยวตฺเถ กฺวจิ โลปาโลปวเสน วิภชิตุํ ลพฺภติ. อิทานิ มยํ โสตูนํ ปรมโกสลฺลชนนตฺถํ ตทุภยมฺปิ อาการํ เอกชฺฌํ กโรนฺตา ตทาการวตึ ชินวรปาฬึ อานยาม – या 'धा' धातूच्या पूर्वी असलेल्या 'अपि' या उपसर्गातील 'अ' काराचा कधी नित्य लोप होतो, तर कधी नित्य लोप होत नाही. येथे लोप सांगितला जातो, जसे – 'द्वारं पिदहति' (दरवाजा बंद करतो), 'द्वारं पिदहन्तो' (दरवाजा बंद करत असताना), 'पिदहितुं' (बंद करण्यासाठी), 'पिदहित्वा' (बंद करून), अशा प्रकारे 'अ' काराचा लोप होतो. 'द्वारं अपिदहित्वा' (दरवाजा बंद न करता), अशा प्रकारे 'अ' काराचा लोप होत नाही. कारण येथे 'अ' कार हा 'अपि' उपसर्गाचा अवयव नाही. मग काय आहे? तो निषेधार्थक निपातच आहे, आणि उपसर्गाचा अवयव तर अदृश्य झाला आहे, हा नित्य लोप आहे. अशा प्रकारे 'धा' धातूच्या पूर्वी असलेल्या 'अपि' या उपसर्गातील 'अ' काराचा कधी नित्य लोप होतो, तर कधी नित्य लोप होत नाही. हे आश्चर्यकारक आहे, हे अद्भुत आहे! कारण भगवंतांच्या प्रवचनात (बुद्धवचनात) विद्वानांच्या हृदयाला विस्मित करणारी अशी पद्धतही दिसून येते, जिथे एकाच धातूमध्ये, एकाच उपसर्गात आणि एकाच अर्थात कधी लोप होणे आणि कधी लोप न होणे यानुसार विभागणी करता येते. आता आम्ही श्रोत्यांच्या परम कौशल्यासाठी त्या दोन्ही रूपांना एकत्र करून, त्या रूपांनी युक्त अशी श्रेष्ठ जिनांची (बुद्धांची) पाळी (गाथा) सादर करतो – ‘‘คงฺคํ [Pg.107] เม ปิทหิสฺสนฺติ, น ตํ สกฺโกมิ พฺราหฺมณ; อปิเธตุํ มหาสินฺธุํ, ตํ กถํ โส ภวิสฺสติ; น เต สกฺโกมิ อกฺขาตุํ, อตฺถํ ธมฺมญฺจ ปุจฺฉิโต. "हे ब्राह्मणा, ते माझ्यासाठी गंगा बंद करतील (अडवतील), पण मी महासागराला बंद करण्यास समर्थ नाही, मग त्याचे काय होईल? विचारले असता, मी तुला अर्थ आणि धर्म सांगण्यास समर्थ नाही." จิตฺตตฺถสาธนึ เอตํ, คาถํ สมฺภวชาตเก; ปญฺญาสมฺภวมิจฺฉนฺโต, กเร จิตฺเต สุเมธโส’’ติ. "चित्ताचा अर्थ साधणारी ही गाथा संभव जातकामध्ये आहे; प्रज्ञेचा विकास इच्छिणाऱ्या बुद्धिमान मनुष्याने आपल्या चित्तात याचे चिंतन करावे." ธุ คติเถริเยสุ. คติ คมนํ, เถริยํ ถิรภาโว. ธวติ. ธุวํ. धु (धातू) गती आणि स्थैर्य या अर्थांमध्ये. गती म्हणजे गमन (चालणे), स्थैर्य म्हणजे स्थिर भाव. धवति (तो धावतो). धुवं (ध्रुव/निश्चित). เอตฺถ จ ธุวนฺติ ถิรํ. ‘‘นิจฺโจ ธุโว สสฺสโต อวิปริณามธมฺโม’’ติอาทีสุ วิย, ตสฺมา ธุวนฺติ ถิรํ กิญฺจิ ธมฺมชาตํ. อถ วา ธุวนฺติ อิทํ คติเถริยตฺถวเสน นิพฺพานสฺเสว อธิวจนํ ภวิตุมรหติ. ตญฺหิ ชาติชราพฺยาธิมรณโสกาทิโต มุจฺจิตุกาเมหิ ธวิตพฺพํ คนฺตพฺพนฺติ ธุวํ, อุปฺปาทวยาภาเวน วา นิจฺจสภาวตฺตา ธวติ ถิรํ สสฺสตํ ภวตีติ ธุวํ. ยญฺหิ สนฺธาย ภควตา ‘‘ธุวญฺจ โว ภิกฺขเว เทเสสฺสามิ ธุวคามินิญฺจ ปฏิปท’’นฺติ วุตฺตํ. ธุวสทฺโท ‘‘วจนํ ธุวสสฺสต’’นฺติ เอตฺถ ถิเร วตฺตติ. ‘‘ธุวญฺจ ภิกฺขเว เทเสสฺสามี’’ติ เอตฺถ นิพฺพาเน. ‘‘ธุวํ พุทฺโธ ภวิสฺสสี’’ติ เอตฺถ ปน เอกํเส นิปาตปทภาเวน วตฺตตีติ ทฏฺฐพฺพํ. येथे 'धुव' (ध्रुव) म्हणजे स्थिर. 'निच्चो धुवो सस्सतो अविपरिणामधम्मो' (नित्य, ध्रुव, शाश्वत, अपरिवर्तनशील स्वभाव असलेला) इत्यादी वाक्यांप्रमाणे, म्हणून 'धुव' म्हणजे कोणतीही स्थिर गोष्ट किंवा धर्म होय. अथवा 'धुव' हा शब्द गमन (जाणे) किंवा स्थैर्य या अर्थाने 'निब्बान' (निर्वाण) याचेच एक नाव (अधिवचन) असू शकतो. कारण, जन्म, जरा, व्याधी, मरण, शोक इत्यादींपासून मुक्त होऊ इच्छिणाऱ्यांनी ज्याच्याकडे धावले पाहिजे किंवा गेले पाहिजे, ते 'धुव' (ध्रुव/निश्चित स्थान) आहे; किंवा उत्पाद (उत्पत्ती) आणि व्यय (विनाश) नसल्यामुळे नित्य स्वभाव असल्यामुळे जे स्थिर व शाश्वत राहते, ते 'धुव' होय. ज्याच्या संदर्भात भगवंतांनी म्हटले आहे: 'भिक्खूहो, मी तुम्हांला ध्रुव (नित्य/निर्वाण) आणि ध्रुवाकडे नेणारा मार्ग (धुवगामिनी पटिपदा) उपदेशीन.' 'धुव' हा शब्द 'वचनं धुवसस्सतं' (वचन ध्रुव आणि शाश्वत आहे) येथे 'स्थिर' या अर्थात वापरला आहे. 'धुवञ्च भिक्खवे देसेस्सामि' येथे तो 'निब्बान' (निर्वाण) या अर्थात आहे. तर 'धुवं बुद्धो भविस्ससि' (तू निश्चितच बुद्ध होशील) येथे तो 'निश्चितच' (एकंसे) या अर्थात निपात (अव्यय) म्हणून वापरला गेला आहे, असे समजावे. ธู วิธูนเน. อูการสฺส อูวตฺตํ. ธูวติ. ธูวิตา, ธูวิตพฺพํ. รสฺสตฺเต ‘‘ธุโต, ธุตวา’’ อิจฺจปิ รูปานิ ภวนฺติ. 'धू' धातू कंपित करणे किंवा झटकणे (विधूनन) या अर्थात आहे. 'ऊ' काराचा 'ऊव' होतो. 'धुवति' (तो झटकतो/कंपित करतो). 'धुविता', 'धुवितब्बं'. र्हस्व झाल्यावर 'धुतो', 'धुतवा' इत्यादी रूपे बनतात. เธ ปาเน. ธยติ, ธียติ. เธน. 'धे' धातू पिणे (पान) या अर्थात आहे. 'धयति', 'धीयति'. 'धेन' (असे रूप बनते). เอตฺถ จ เธนูติ ธยติ ปิวติ อิโต ขีรํ โปตโกติ เธนุ, ‘‘โคเธนุ, อสฺสเธนุ, มิคเธนู’’ติ เธนุสทฺโท สามญฺญวเสน สโปติกาสุ ติรจฺฉานคติตฺถีสุ วตฺตติ, เอวํ สนฺเตปิ เยภุยฺเยน คาวิยํ วตฺตติ. ตถา หิ ‘‘สตฺต เธนุสเต ทตฺวา’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. येथे 'धेनु' म्हणजे - जिच्यापासून पिल्लू दूध पिते (धयति/पिती) ती 'धेनु' होय. 'गोधेनु' (गाय), 'अस्सधेनु' (घोडी), 'मिगधेनु' (हरिणी) इत्यादी शब्दांमध्ये 'धेनु' हा शब्द सामान्यतः पिल्लू असलेल्या कोणत्याही तिर्यक योनीतील (प्राण्यांमधील) मादीसाठी वापरला जातो. असे असले तरी, या शब्दाचा वापर बहुतांश करून गाईसाठीच होतो. म्हणूनच पाळीमध्ये 'सत्त धेनुसते दत्वा' (सातशे धेनु देऊन) असा प्रयोग आढळतो. สิธุ [Pg.108] คติยํ เสธติ, นิเสธติ, ปฏิเสธติ. สิทฺโธ, ปสิทฺโธ, นิสิทฺโธ, ปฏิสิทฺโธ, ปฏิเสธิโต, ปฏิเสธโก, ปฏิเสโธ, ปฏิเสธิตุํ, ปฏิเสธิตฺวา. อิธ อจินฺเตยฺยพลตฺตา อุปสคฺคานํ ตํโยเค สิธุธาตุสฺส นานปฺปการา อตฺถา สมฺภวนฺติ, อญฺเญสมฺปิ เอวเมว. 'सिधु' धातू गमन (गती) या अर्थात आहे. 'सेधति' (तो जातो/रोखतो), 'निसेधति', 'पटिसेधति'. 'सिद्धो', 'पसिद्धो', 'निसिद्धो', 'पटिसिद्धो', 'पटिसेधितो', 'पटिसेधको', 'पटिसेधो', 'पटिसेधितुं', 'पटिसेधित्वा'. येथे उपसर्गांच्या अचिंत्य शक्तीमुळे त्यांच्या योगाने 'सिधु' धातूचे विविध अर्थ संभवतात, आणि इतर धातूंच्या बाबतीतही असेच होते. สิธุ สตฺเถ มงฺคลฺเย จ. สตฺถํ สาสนํ, มงฺคลฺยํ ปาปวินาสนํ วุทฺธิการณํ วา. เสธติ. สิทฺโธ, ปสิทฺโธ, ปสิทฺธิ. 'सिधु' धातू शास्त्र (अनुशासन) आणि मांगल्य या अर्थात आहे. 'सत्थं' म्हणजे शासन (बुद्धवचन/उपदेश), 'मांगल्य' म्हणजे पापाचा विनाश किंवा वृद्धीचे कारण होय. 'सेधति'. 'सिद्धो', 'पसिद्धो', 'पसिद्धि' (अशी रूपे बनतात). ทธ ธารเณ. ชนสฺส ตุฏฺฐึ ทธเตติ ทธิ. ธการสฺส หการตฺเต ‘‘ทหตี’’ติ รูปํ. อยํ อิตฺถี อิมํ อิตฺถึ อยฺยิกํ ทหติ. อิเม ปุริสา อิมํ ปุริสํ ปิตามหํ ทหนฺติ. จิตฺตํ สมาทหาตพฺพํ. สมาทหํ จิตฺตํ. 'दध' धातू धारण करणे या अर्थात आहे. लोकांचे समाधान धारण करते म्हणून ते 'दधि' (दही). 'ध' काराचा 'ह' कार झाल्यावर 'दहति' असे रूप बनते. 'अयं इत्थी इमं इत्थिं अय्यिकं दहति' (ही स्त्री या स्त्रीला आजी मानते/धारण करते). 'इमे पुरिसा इमं पुरिसं पितामहं दहन्ति' (हे पुरुष या पुरुषाला आजोबा मानतात). 'चित्तं समादहातब्बं' (चित्त समाहित केले पाहिजे). 'समादहं चित्तं' (समाहित होत असलेले चित्त). เอธ วุทฺธิยํ ลาเภ จ. เอธติ. เอโธ, สุเขธิโต. คมฺภีเร คาธเมธติ. 'एध' धातू वृद्धी (वाढ) आणि लाभ या अर्थात आहे. 'एधति'. 'एधो', 'सुखेधितो'. 'गम्भीरे गाधमेधति' (गंभीर पाण्यात तळ शोधतो/मिळवतो). เอตฺถ จ เอโธติ เอธติ. วฑฺฒติ เอเตน ปาวโกติ เอโธ. อินฺทนํ, อุปาทานํ. สุเขธิโตติ สุเขน เอธิโต, สุขสํวฑฺฒิโตติ อตฺโถ. คาธเมธตีติ คาธํ ปติฏฺฐิตํ เอธติ ลภติ. येथे 'एधो' म्हणजे जो वाढतो (एधति). ज्याच्याद्वारे अग्नी वाढतो (वड्ढति) ते 'एधो' म्हणजे इंधन किंवा उपादान होय. 'सुखेधितो' म्हणजे सुखाने वाढलेला (सुखसंवड्ढितो) असा अर्थ आहे. 'गाधमेधति' म्हणजे तळ किंवा प्रतिष्ठा प्राप्त करतो (एधति/लभति). พทฺธ สํหริเส. สํหริโส วินิพทฺธกฺริยา. พทฺธติ, วินิพทฺธติ. วินิพทฺธา. 'बद्ध' धातू संहर्ष (परस्पर संबंध किंवा बांधणे) या अर्थात आहे. संहर्ष म्हणजे परस्परांशी बांधण्याची क्रिया. 'बद्धति', 'विनिबद्धति'. 'विनिबद्धा' (अशी रूपे बनतात). คาธ ปติฏฺฐานิสฺสยคนฺเธสุ. คาธติ. คาธํ กตฺตา. คมฺภีรโต อคาธํ. 'गाध' धातू प्रतिष्ठा (तळ मिळणे), आश्रय आणि गंध या अर्थात आहे. 'गाधति'. 'गाधं कत्ता' (तळ शोधणारा). 'गम्भीरतो अगाधं' (खोल असल्यामुळे अथांग/तळ नसलेले). พาธ วิโลฬเน พาธติ, วิพาธติ. อาพาโธ. อาพาธติ จิตฺตํ วิโลเฬตีติ อาพาโธ. 'बाध' धातू विलोडन (पीडा देणे/अस्वस्थ करणे) या अर्थात आहे. 'बाधति', 'विबाधति'. 'आबाधो' (आजार/व्याधी). जो चित्ताला पीडित करतो किंवा अस्वस्थ करतो, तो 'आबाधो' होय. นาธ [Pg.109] ยาจนาทีสุ. นาธติ. นาธนํ. 'नाध' धातू याचना (मागणी) इत्यादी अर्थांत आहे. 'नाधति'. 'नाधनं' (अशी रूपे बनतात). พนฺธ พนฺธเน พนฺธติ. พนฺธนโก, พนฺโธ, พนฺธาปิโต, ปฏิพนฺโธ, พนฺธนํ, พนฺโธ, สมฺพนฺธนํ, สมฺพนฺโธ, ปพนฺโธ, พนฺธุ. 'बन्ध' धातू बांधणे (बंधन) या अर्थात आहे. 'बन्धति'. 'बन्धनको', 'बन्धो', 'बन्धापितो', 'पटिबन्धो', 'बन्धनां', 'बन्धो', 'सम्बन्धनां', 'सम्बन्धो', 'पबन्धो', 'बन्धु' (अशी रूपे बनतात). ตตฺถ พนฺธนนฺติ พนฺธนฺติ สตฺเต เอเตนาติ พนฺธนํ, สงฺขลิกาทิ. ‘‘อยํ อมฺหากํ วํโส’’ติ สมฺพนฺธิตพฺพฏฺเฐน พนฺธุ, เถรคาถาสํวณฺณนายํ ปน ‘‘เปมพนฺธเนน พนฺธู’’ติ วุตฺตํ. त्यात 'बंधन' म्हणजे - ज्याच्याद्वारे प्राण्यांना बांधले जाते ते 'बंधन' होय, जसे की साखळी इत्यादी. 'हा आमचा वंश आहे' अशा प्रकारे संबंध जोडण्याच्या अर्थाने 'बंधु' हा शब्द वापरला जातो, परंतु थेरगाथा अट्ठकथेत (थेरगाथा संवण्णना) 'प्रेमबंधनाने बांधलेला तो बंधू' असे म्हटले आहे. ทธิ อสีฆจาเร. อสีฆจาโร อสีฆปฺปวตฺติ. ทนฺธติ. ทนฺโธ, ทนฺธปญฺโญ. โย ทนฺธกาเล ตรติ, ตรณีเย จ ทนฺธติ. 'दधि' धातू मंद गती (अशीघचार - हळूहळू चालणे किंवा प्रवृत्ती) या अर्थात आहे. 'दन्धति' (तो रेंगाळतो/हळू करतो). 'दन्धो' (मंद), 'दन्धपञ्ञो' (मंदबुद्धी). 'यो दन्धकाले तरति, तरणीये च दन्धति' (जो रेंगाळण्याच्या वेळी घाई करतो आणि घाई करण्याच्या वेळी रेंगाळतो). วทฺธ วทฺธเน. วทฺธติ. วทฺธิ, วุทฺธิ, วทฺโธ, วุทฺโธ, ชาติวุทฺโธ, คุณวุทฺโธ, วโยวุทฺโธ. 'वड्ढ' धातू वाढणे (वर्धन) या अर्थात आहे. 'वड्ढति'. 'वड्ढि', 'वुद्धि', 'वड्ढो', 'वुद्धो' (वृद्ध/मोठा), 'जातिवुद्धो' (जातीने मोठा), 'गुणवुद्धो' (गुणाने मोठा), 'वयोवुद्धो' (वयाने मोठा). เย วุทฺธมปจายนฺติ, นรา ธมฺมสฺส โกวิทา; ทิฏฺเฐว ธมฺเม ปาสํสา, สมฺปราเย จ สุคฺคตึ. जे मनुष्य धर्माचे जाणकार (कोविद) आहेत आणि वृद्धांचा (वयोवृद्धांचा/गुणाने मोठ्यांचा) आदर करतात; ते याच जन्मात (दिट्ठेव धम्मे) प्रशंसेस पात्र ठरतात आणि परलोकात (सम्पराये) सुगती प्राप्त करतात. สธุ สทฺทกุจฺฉิยํ. สธติ. 'साधु' धातू शब्द करणे किंवा गर्भाशयात असणे (शब्दकुच्छी) या अर्थात आहे. 'साधतिं'. ปิฬธิ อลงฺกาเร. ปิฬนฺธติ. ปิฬนฺธนํ. 'पिळधि' धातू अलंकार (दागिने घालणे/सजवणे) या अर्थात आहे. 'पिळन्धति'. 'पिळन्धनं' (अलंकार/दागिना). ปิฬนฺธนมลงฺกาโร, มณฺฑนญฺจ วิภูสนํ; ปสาธนญฺจาภรณํ, ปริยายา อิเม มตา. 'पिळन्धनं' (दागिना), 'अलंकारो' (अलंकार), 'मण्डनं' (सजावट), 'विभूसनं' (विभूषण), 'पसाधनं' (प्रसाधन) आणि 'आभरणं' (आभरण) हे सर्व एकाच अर्थाचे (पर्यायवाची) शब्द मानले जातात. เมธ หึสายํ สงฺคเม จ. เมธติ. เมธา, เมธาวี. อตฺร เมธาติ อสนิ วิย สิลุจฺจเย กิเลเส เมธติ หึสตีติ เมธา. เมธติ วา สิริยา สีลาทีหิ จ สปฺปุริสธมฺเมหิ สห คจฺฉติ น เอกิกา หุตฺวา ติฏฺฐตีติ เมธา, ปญฺญาเยตํ นามํ. ตถา หิ – 'मेध' धातू हिंसा आणि संगम (एकत्र येणे) या अर्थात आहे. 'मेधति'. 'मेधा', 'मेधावी'. येथे 'मेधा' म्हणजे - जशी वीज पर्वतावर आदळते, त्याप्रमाणे जी क्लेशांचा नाश (हिंसा) करते, ती 'मेधा' होय. अथवा जी शोभा (सिरी), शील इत्यादी सत्पुरुष धर्मांसोबत जाते (संगम करते), कधीही एकटी राहत नाही, ती 'मेधा' होय. हे 'प्रज्ञा' (पञ्ञा) चेच एक नाव आहे. कारण असे म्हटले आहे की - ‘‘ปญฺญา [Pg.110] หิ เสฏฺฐา กุสลา วทนฺติ,นกฺขตฺตราชาริว ตารกานํ; สีลํ สิรี จาปิ สตญฺจ ธมฺโม,อนฺวายิกา ปญฺญวโต ภวนฺตี’’ติ “कुशल (ज्ञानी) लोक प्रज्ञेलाच सर्वश्रेष्ठ मानतात, ज्याप्रमाणे ताऱ्यांमध्ये चंद्र (नक्षत्रराज) श्रेष्ठ असतो; शील, शोभा (श्री) आणि सत्पुरुषांचे धर्म हे सर्व प्रज्ञावंताचे अनुगामी (मागोमाग जाणारे) असतात.” วุตฺตํ. เมธาวีติ ธมฺโมชปญฺญาย จ สมนฺนาคโต ปุคฺคโล. असे म्हटले आहे. 'मेधावी' म्हणजे धर्मरसाच्या प्रज्ञेने (धम्मोजपञ्ञा) युक्त असलेली व्यक्ती होय. สธุ มธุ อุนฺเท. สธติ. มธติ. มธุ. 'साधु' आणि 'मधु' हे धातू ओले करणे किंवा क्लेदयुक्त करणे (उन्द) या अर्थात आहेत. 'साधति', 'मधति'. 'मधु' (मध/गोड). พุธ โพธเน. โพธติ. พุทฺโธ. อภิสมฺพุทฺธาโน. สมฺพุทฺธํ. อสมฺพุทฺธํ. โพธิ. ทิวาทิคเณปิ อยํ ทิสฺสติ. ตตฺรหิ ‘‘พุชฺฌตี’’ติ รูปํ, อิธ ปน ‘‘โพธตี’’ติ รูปํ. ‘‘โย นินฺทํ อปโพธตี’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. การิเต ปน ‘‘โพเธติ’’ อิจฺจาทีนิ. 'बुध' धातू जाणणे किंवा जागृत होणे (बोधन) या अर्थात आहे. 'बोधति'. 'बुद्धो' (बुद्ध), 'अभिसम्बुद्धानो', 'सम्बुद्धं', 'असम्बुद्धं', 'बोधि'. हा धातू दिवादिगणातही आढळतो. तेथे 'बुज्झति' असे रूप बनते, परंतु येथे 'बोधति' असे रूप बनते. पाळीमध्ये 'यो निन्दं अपबोधति' (जो निंदेला दूर करतो) असा प्रयोग आढळतो. प्रयोजक (कारित) रूपात 'बोधेति' इत्यादी रूपे बनतात. ยุธ สมฺปหาเร. โยธติ. โยโธ. โยเธถ มารํ ปญฺญาวุเธน. ยุทฺธํ. จรณายุโธ, จรณาวุโธ วา. อาวุธํ. ทิวาทิคณิกสฺส ปนสฺส ‘‘ยุชฺฌตี’’ติ รูปํ. 'युध' धातू प्रहार करणे किंवा युद्ध करणे (संप्रहार) या अर्थात आहे. 'योधति'. 'योधो' (योद्धा). 'योधेथ मारं पञ्ञावुधेन' (प्रज्ञारूपी शस्त्राने माराशी युद्ध करावे). 'युद्धं'. 'चरणायुधो' किंवा 'चरणावुधो' (पाय हेच ज्याचे शस्त्र आहे असा, उदा. कोंबडा). 'आवुधं' (शस्त्र). दिवादिगणातील या धातूचे रूप 'युज्झति' असे बनते. ทีธิ ทิตฺติเวธเนสุ. ทีธติ. ทีธิติ. เอตฺถ จ ทีธิตีติ รสฺมิ. อเนกานิ หิ รสฺมินามานิ. 'दीधि' धातू दीप्ती (प्रकाशणे) आणि वेधन (भेदणे) या अर्थात आहे. 'दीधति'. 'दीधिति'. येथे 'दीधिति' म्हणजे किरण (रश्मी). किरणांची अनेक नावे आहेत. รสฺมิ อาภา ปภา รํสิ, ทิตฺติ ภา รุจิ ทีธิติ; มรีจิ ชุติ ภาณฺว’สุ, มยูโข กิรโณ กโร; นาคธาโม จ อาโลโก, อิจฺเจเต รสฺมิวาจกา. 'रस्मि' (रश्मी), 'आभा', 'पभा' (प्रभा), 'रंसि' (रश्मी), 'दित्ति' (दीप्ती), 'भा', 'रुचि', 'दीधिति', 'मरीचि', 'जुति' (द्युती), 'भाण्वसु' (भाणू/अंशू), 'मयूखो', 'किरणो', 'करो', 'नागधामो' आणि 'आलोको' हे सर्व किरणाचे वाचक (समानार्थी) शब्द आहेत. จการนฺตรูปานิ. चकारान्त रूपे. นการนฺตธาตุ नकारान्त धातू. นี นเย. เนติ, นยติ, วิเนติ. วิเนยฺย หทเย ทรํ. อาเนติ. อานยติ. เนตา. วิเนตา. นายโก. เนยฺโย[Pg.111]. เวเนยฺโย. เวนยิโก. วินีโต ปุริโส. นียมาเน ปิสาเจน, กินฺนุ ตาต อุทิกฺขติ. นียนฺโต. เนตฺตํ. เนตฺติ. ภวเนตฺติ สมูหตา. เนตฺติโก. อุทกญฺหิ นยนฺติ เนตฺติกา. เนตฺตา. เนตฺเต อุชุํ คเต สติ. นโย. วินโย. อายตนํ. เนตุํ. วิเนตุํ. เนตฺวา. วิเนตฺวา อิจฺจาทีนิ. 'नी' धातू नेणे किंवा मार्गदर्शन करणे (नयन) या अर्थात आहे. 'नेति', 'नयति', 'विनेति'. 'विनेय्य हृदये दरं' (हृदयातील भीती दूर करून). 'आनेति', 'आनयति'. 'नेता', 'विनेता'. 'नायको'. 'नेय्यो' (नेण्यायोग्य/मार्गदर्शन करण्यायोग्य). 'वेनेय्यो' (विनीत होण्यास योग्य). 'वेनयिको' (विनय जाणणारा). 'विनीतो पुरिसो' (विनीत पुरुष). 'नीयमाने पिसाचेन, किन्नु तात उदिक्खति' (पिशाचाद्वारे नेले जात असताना, हे तात, तू काय पाहत आहेस?). 'नीयन्तो'. 'नेत्तं' (नेत्र/डोळा). 'नेत्ती' (तृष्णा/मार्गदर्शक). 'भवनित्ती समूहिता' (भवतृष्णा समूळ नष्ट झाली). 'नेत्तिको' (पाणी नेणारा/पाटाचे पाणी वळवणारा). 'उदकञ्हि नयन्ति नेत्तिका' (पाणी वळवणारे पाणी नेतात). 'नेत्ता' (मार्गदर्शक/डोळा). 'नेत्ते उजुं गते सति' (डोळे सरळ गेले असता). 'नयो' (नय/पद्धत). 'विनयो' (विनय). 'आयतनं' (आयतन). 'नेतुं', 'विनेतुं'. 'नेत्वा', 'विनेत्वा' इत्यादी रूपे बनतात. ตตฺถ เนตฺตนฺติ สมวิสมํ ทสฺเสนฺตํ อตฺตภาวํ เนตีติ เนตฺตํ, จกฺขุ. เนตฺตีติ เนนฺติ เอตาย สตฺเตติ เนตฺติ, รชฺชุ. ภวเนตฺตีติ ภวรชฺชุ, ตณฺหาเยตํ นามํ. ตาย หิ สตฺตา โคณา วิย คีวาย พนฺธิตฺวา ตํ ตํ ภวํ นิยฺยนฺติ, ตสฺมา ภวเนตฺตีติ วุจฺจติ. เนตฺติกาติ กสฺสกา. เนตฺตาติ ควเชฏฺฐโก ยูถปติ. นโยติ นยนํ คมนํ นโย, ปาฬิคติ. อถ วา ตตฺถ ตตฺถ เนตพฺโพติ นโย, สทิสภาเวน เนตพฺพากาโร. นียตีติ นโย, ตถตฺตนยาทิ. นียติ เอเตนาติ นโย, อนฺตทฺวยวิวชฺชนนยาทิ. तेथे 'नेत्त' (नेत्र) म्हणजे सम आणि विषम दाखविणाऱ्या आत्मभावाला (शरीराला) जे नेते (मार्गदर्शन करते) ते 'नेत्त' म्हणजेच चक्षु (डोळा). 'नेत्ती' म्हणजे जिच्याद्वारे प्राण्यांना नेले जाते ती 'नेत्ती' म्हणजेच दोरी (रज्जू). 'भवनेट्टी' म्हणजे भवरज्जू (संसाराची दोरी), हे तृष्णेचे नाव आहे. कारण तिच्याद्वारे प्राणी, बैलांना गळ्याला बांधल्याप्रमाणे बांधून, त्या त्या भवामध्ये नेले जातात, म्हणून तिला 'भवनेट्टी' असे म्हणतात. 'नेत्तिका' म्हणजे शेतकरी (पाटाने पाणी नेणारे). 'नेत्ता' म्हणजे बैलांचा प्रमुख किंवा कळपाचा नायक (यूथपती). 'नय' म्हणजे नेणे, गमन करणे, हा 'नय' म्हणजेच पाळीगती (पाठाची गती). अथवा त्या त्या ठिकाणी जे नेण्यायोग्य आहे तो 'नय' होय, म्हणजेच सदृश भावाने नेण्याचा प्रकार. ज्याद्वारे नेले जाते तो 'नय' होय, जसे की तथत्तानय इत्यादी. ज्या साधनाद्वारे नेले जाते तो 'नय' होय, जसे की दोन्ही टोकांचे वर्जन करणारा नय (अंतद्वयविवज्जननय) इत्यादी. ตถา หิ ฉพฺพิโธ นโย ตถตฺตนโย ปตฺตินโย เทสนานโย อนฺตทฺวยวิวชฺชนนโย อจินฺเตยฺยนโย อธิปฺปายนโยติ. เตสุ ตถตฺตนโย อนฺตทฺวยวิวชฺชนนเยน นียติ, ปตฺตินโย อจินฺเตยฺยนเยน, เทสนานโย อธิปฺปายนเยน นียติ. เอตฺถาทิมฺหิ ติวิโธ นโย กมฺมสาธเนน นียตีติ ‘‘นโย’’ติ วุจฺจติ, ปจฺฉิโม ปน ติวิโธ นโย กรณสาธเนน นียติ เอเตน ตถตฺตาทินยตฺตยมิติ ‘‘นโย’’ติ วุจฺจติ. อิมสฺมึ อตฺเถ ปปญฺจิยมาเน คนฺถวิตฺถาโร สิยาติ วิตฺถาโร น ทสฺสิโต. तसेच नय सहा प्रकारचा आहे: तथत्तानय, पत्तिनय, देसनानय, अंतद्वयविवज्जननय, अचिन्तेय्यनय आणि अधिप्पायनय. त्यांच्यामध्ये तथत्तानय हा अंतद्वयविवज्जननयाने नेला जातो, पत्तिनय हा अचिन्तेय्यनयाने, आणि देसनानय हा अधिप्पायनयाने नेला जातो. येथे सुरुवातीचे तीन नय कर्मसाधनाने नेले जातात म्हणून त्यांना 'नय' म्हटले जाते, तर नंतरचे तीन नय करणसाधनाने नेले जातात, ज्याद्वारे तथत्ता इत्यादी तीन नय नेले जातात, म्हणून त्यांना 'नय' म्हटले जाते. या अर्थाचा विस्तार केल्यास ग्रंथाचा विस्तार होईल, म्हणून येथे विस्तार दाखविलेला नाही. อปโรปิ [Pg.112] จตุพฺพิโธ นโย เอกตฺตนโย นานตฺตนโย อพฺยาปารนโย เอวํธมฺมตานโยติ. दुसराही चार प्रकारचा नय आहे: एकत्तानय, नानत्तानय, अब्यापारनय आणि एवंधम्मतानय. วิเนติ สตฺเต เอตฺถ, เอเตนาติ วา วินโย. กายวาจานํ วินยนโตปิ วินโย. อายตนนฺติ อนมตคฺเค สํสาเร ปวตฺตํ อตีว อายตํ สํสารทุกฺขํ ยาว น นิวตฺตติ, ตาว นยเตว ปวตฺตเตวาติ อายตนํ. यात प्राण्यांचे नियमन केले जाते किंवा याच्याद्वारे केले जाते म्हणून तो 'विनय' होय. काय आणि वाचेचे नियमन (विनयन) करण्यावरूनही तो 'विनय' होय. 'आयतन' म्हणजे अनादी (अनमतग्ग) संसारात चालणारे अत्यंत दीर्घ (आयत) संसारदुःख जोपर्यंत निवृत्त होत नाही, तोपर्यंत ते चालतच राहते (नयते) किंवा प्रवृत्तच राहते, म्हणून ते 'आयतन' होय. อยํ ปเนตฺถ อตฺถุทฺธาโร. ‘‘อายตนนฺติ อสฺสานํ กมฺโพโช อายตนํ, คุนฺนํ ทกฺขิณาปโถ อายตน’’นฺติ เอตฺถ สญฺชาติฏฺฐานํ อายอนํ นาม. ‘‘มโนรเม อายตเน, เสวนฺติ นํ วิหงฺคมา. येथे हा अर्थाचा उद्धार (स्पष्टीकरण) आहे: 'आयतन म्हणजे घोड्यांचे कंबोज हे आयतन आहे, गाईंचे दक्षिणापथ हे आयतन आहे' येथे उत्पत्तीचे स्थान (संजातिट्ठान) म्हणजे 'आयतन' होय. 'मनोरम आयतनात (स्थानात) पक्षी त्याचा आश्रय घेतात. ฉายํ ฉายตฺถิโน ยนฺติ, ผลตฺถํ ผลโภชิโน’’ติ เอตฺถ สโมสรณฏฺฐานํ. ‘‘ปญฺจิมานิ ภิกฺขเว วิมุตฺตายตนานี’’ติ เอตฺถ การณํ. อญฺเญปิ ปน ปโยคา ยต ปติยตเนติ เอตฺถ ปกาสิตา. सावलीच्या इच्छेने सावलीकडे जातात, फळांच्या आहारासाठी फळ खाणारे जातात' येथे एकत्र येण्याचे स्थान (समोसरणट्ठाण) म्हणजे आयतन होय. 'भिक्खूहो, ही पाच विमुक्तीची आयतने (विमुत्तायतने) आहेत' येथे कारण म्हणजे आयतन होय. इतरही प्रयोग 'यत पतियतन' यामध्ये प्रकाशित केले आहेत. นี ปาปเน. เนติ, นยติ. นยนํ. 'नी' धातू प्रापण (नेणे) या अर्थात आहे. नेति, नयति. नयन. นุ ถุติยํ. โนติ, นวติ. นุโต. 'नु' धातू स्तुती या अर्थात आहे. नोति, नवति. नुतो. ถน ปน ธน สทฺเท. ถนติ. ปนติ. ธนติ. 'थन', 'पन', 'धन' हे धातू शब्द (ध्वनी) या अर्थात आहेत. थनति. पनति. धनति. กน ทิตฺติกนฺตีสุ. กนติ. กญฺญา. กนกํ. 'कन' धातू दीप्ती (चमक) आणि कांती (शोभा) या अर्थात आहे. कनति. कञ्ञा (कन्या). कनकं (कनक/सोने). เอตฺถ จ โยพฺพนิภาเว ฐิตตฺตา รูปวิลาเสน กนติ ทิปฺปติ วิโรจตีติ กญฺญา. อถ วา กนิยติ กามิยภิ อภิปตฺถิยติ ปุริเสหีติปิ กญฺญา, โยพฺพนิตฺถี. กนกนฺติ กนติ, กนียตีติ วา กนกํ, สุวณฺณํ. สุวณฺณสฺส หิ อเนกานิ นามานิ. आणि येथे यौवनावस्थेत असल्यामुळे रूपविलासाने जी चमकते, या यौवनावस्थेत दीप्यमान होते, शोभून दिसते ती 'कञ्ञा' (कन्या) होय. अथवा पुरुषांद्वारे जिची इच्छा केली जाते, प्रार्थना केली जाते ती 'कञ्ञा' म्हणजेच युवती (यौवनस्त्री) होय. 'कनक' म्हणजे जे चमकते किंवा ज्याची इच्छा केली जाते ते 'कनक' म्हणजेच सुवर्ण (सोने). सुवर्णाची अनेक नावे आहेत. สุวณฺณํ กนกํ เหมํ, กญฺจนํ หฏกมฺปิ จ; ชาตรูปํ ตปนียํ, วณฺณํ ตพฺเภทกา ปน; ชมฺพุนทํ สิงฺคิกญฺจ, จามิกรนฺติ ภาสิตา. सुवण्ण (सुवर्ण), कनक, हेम, कञ्चन (कांचन) आणि हाटक; जातरूप, तपनीय, वर्ण आणि त्याचे भेद असणारे; जाम्बूनद, सिंगी आणि चामीकर अशी (सोन्याची नावे) म्हटली गेली आहेत. วน [Pg.113] สน สมฺภตฺติยํ. วนติ. วนํ. สนติ. 'वन', 'सन' हे धातू संभक्ती (सेवा/आश्रय/इच्छा) या अर्थात आहेत. वनति. वनं (वन/जंगल). सनति. ตตฺถ วนนฺติ. ตํ สมฺภชนฺติ มยูรโกกิลาทโย สตฺตาติ วนํ, อรญฺญํ. วนติ สมฺภชติ สํกิเลสปุคฺคลนฺติ วนํ, ตณฺหา. तेथे 'वन' म्हणजे: ज्याचा मोर, कोकिळा इत्यादी प्राणी आश्रय घेतात (संभजन करतात) ते 'वन' म्हणजेच अरण्य (जंगल). जे संक्लेशयुक्त पुद्गलाचा (व्यक्तीचा) आश्रय घेते (संभजन करते) ते 'वन' म्हणजेच तृष्णा (तण्हा). มน อพฺภาเส. มนติ. มโน. 'मन' धातू अभ्यास (पुनरावृत्ती/मनन) या अर्थात आहे. मनति. मनो (मन). มาน วีมํสายํ, วีมํสติ. วีมํสา. 'मान' धातू मीमांसा (विचार/परीक्षण) या अर्थात आहे, वीमंसति. वीमंसा (मीमांसा). ชน สุน สทฺเท. ชนติ. สุนติ. 'जन', 'सुन' हे धातू शब्द (ध्वनी) या अर्थात आहेत. जनति. सुनति. เอตฺถ จ ‘‘กสฺมา เต เอโก ภุโช ชนติ, เอโก เต น ชนตี ภุโช’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ตตฺถ ชนตีติ สุนติ สทฺทํ กโรติ. येथे 'तुझा एक हात का वाजतो (ध्वनी करतो) आणि तुझा दुसरा हात का वाजत नाही?' हे पाळीचे उदाहरण आहे. तेथे 'जनति' म्हणजे ऐकतो किंवा शब्द (ध्वनी) करतो. ขนุ อวทารเณ ขนติ. สุขํ. ทุกฺขํ. ขโต อาวาโฏ. 'खनु' धातू अवदारण (खणणे) या अर्थात आहे, खनति. सुखं (सुख). दुक्खं (दुःख). खतो (खणलेला) आवाटो (खड्डा). ตตฺถ สุขนฺติ สุฏฺฐุ ทุกฺขํ ขนตีติ สุขํ. ทุฏฺฐุ ขนติ กายิกเจตสิกสุขนฺติ ทุกฺขํ. อญฺญมญฺญปฏิปกฺขา หิ เอเต ธมฺมา. ทฺวิธา จิตฺตํ ขนตีติ วา ทุกฺขํ. จุราทิคณวเสน ปน ‘‘สุขยตีติ สุขํ, ทุกฺขยตีติ ทุกฺข’’นฺติ นิพฺพจนานิ คเหตพฺพานิ. สมาสปอวเสน ‘‘สุกรํ ขมสฺสาติ สุขํ, ทุกฺกรํ ขมสฺสาติ ทุกฺข’’นฺติ นิพฺพจนานิปิ วิวิธา หิ สทฺทานํ พฺยุปฺปตฺติ ปวตฺติ นิมิตฺตญฺจ. तेथे 'सुख' म्हणजे जे दुःखाला चांगल्या प्रकारे खणून काढते (नष्ट करते) ते 'सुख'. जे कायिक आणि चैतसिक सुखाला वाईट प्रकारे खणून काढते (नष्ट करते) ते 'दुःख'. कारण हे धर्म एकमेकांचे विरोधी आहेत. अथवा जे चित्ताला दोन प्रकारे खणते (पीडित करते) ते 'दुःख'. चुरादिगणाच्या नियमानुसार 'जे सुखी करते ते सुख, जे दुःखी करते ते दुःख' अशी व्युत्पत्ती घ्यावी. समासाच्या नियमानुसार 'ज्याचे सहन करणे सोपे आहे ते सुख, ज्याचे सहन करणे कठीण आहे ते दुःख' अशा व्युत्पत्ती देखील घ्याव्यात, कारण शब्दांची व्युत्पत्ती, प्रवृत्ती आणि निमित्त विविध प्रकारचे असते. ทาน อวขณฺฑเน. ทานติ. อปทานํ. 'दान' धातू अवखंडन (तुकडे करणे) या अर्थात आहे. दानति. अपदानं (अपदान/चरित्र). สาน เตชเน. เตชนํ นิสานํ. สานติ. 'सान' धातू तेजन (तीक्ष्ण करणे/धार लावणे) या अर्थात आहे. तेजन म्हणजे धार लावणे (निसान). सानति. หน หึสาคตีสุ. เอตฺถ ปน หึสาวจเนน ผรุสาย วาจาย ปีฬนญฺจ ทณฺฑาทีหิ ปหรณญฺจ คหิตํ, ตสฺมา หน หึสาปหรณคตีสูติ อตฺโถ คเหตพฺโพ. ตถา หิ ‘‘ราชาโน โจรํ คเหตฺวา หเนยฺยุํ วา พนฺเธยฺยุํ วา’’ติ. ปาฐสฺส อตฺถํ สํวณฺเณนฺเตหิ ‘‘หเนยฺยุนฺติ โปเถยฺยุญฺเจว ฉินฺเทยฺยุญฺจา’’ติ [Pg.114] วุตฺตํ. เอตฺถ จ เฉทนํ นาม หตฺถปาทาทิเฉทนํ วา สีสจฺเฉทวเสน มารณํ วา. หนสฺส วธาเทโส ฆาตาเทโส จ ภวติ, หนฺติ หนติ, หนนฺติ. หนสิ, หนถ. เสสํ สพฺพํ เนยฺยํ. 'हन' धातू हिंसा आणि गती या अर्थांमध्ये आहे. येथे 'हिंसा' या शब्दाने कठोर वाणीने पीडा देणे आणि दंडादींनी प्रहार करणे हे घेतले आहे, म्हणून 'हन' धातूचा अर्थ हिंसा, प्रहार आणि गती असा घ्यावा. तसेच 'राजे चोराला पकडून मारतील (हनेय्युं) किंवा बांधतील' या पाठाचा अर्थ स्पष्ट करताना 'हनेय्युं म्हणजे मारहाण करतील आणि अंगच्छेद करतील' असे म्हटले आहे. येथे 'छेदन' म्हणजे हात-पाय इत्यादी कापणे किंवा शिरच्छेदाद्वारे मारणे होय. 'हन' धातूचा 'वध' आणि 'घात' असा आदेश होतो; हन्ति, hनति, हनन्ति. हनसि, हनथ. उर्वरित सर्व समजून घ्यावे. หึสาทโย จตฺตาโร อตฺถา ลพฺภนฺติ. ‘‘หนฺติ หตฺเถหิ ปาเทหี’’ติ เอตฺถ ปน หนฺตีติ ปหรตีติ อตฺโถ. ‘‘กุทฺโธ หิ ปิตรํ หนฺติ. วิกฺโกสมานา ติพฺพาหิ, หนฺติ เนสํ วรํ วร’’นฺติ. เอตฺถ หนฺตีติ มาเรนฺตีติ อตฺโถ. ‘‘วธติ, วเธติ, ฆาเตติ’’ อิจฺจปิ รูปานิ ภวนฺติ. ตตฺถ ‘‘วธติ น โรทติ, อาปตฺติ ทุกฺกฏสฺส. อตฺตานํ วธิตฺวา วธิตฺวา โรทตี’’ติอาทีสุ วโธ ปหรณํ. ปาณํ วเธติ. ปาณวโธ. ‘‘เอส วโธ ขณฺฑหาลสฺส. สตฺเต ฆาเตตี’’ติ จ อาทีสุ วโธ มารณํ. हिंसा इत्यादी चार अर्थ प्राप्त होतात. 'हात आणि पायांनी मारतो (हन्ति)' येथे 'हन्ति' चा अर्थ प्रहार करतो असा आहे. 'क्रोधित झालेला पित्याला मारतो (हन्ति). आक्रोश करणाऱ्या तीव्र वेदनांनी त्यांच्यातील श्रेष्ठांना मारतो (हन्ति)' येथे 'हन्ति' चा अर्थ मारून टाकणे (वध करणे) असा आहे. 'वधति, वधेति, घातेति' इत्यादी रूपे होतात. त्यामध्ये 'मारहाण करतो पण रडत नाही, तर दुक्कट आपत्ती होते. स्वतःला मारहाण करून करून रडतो' इत्यादींमध्ये 'वध' म्हणजे प्रहार करणे होय. प्राणाचा वध करतो तो 'प्राणवध'. 'हा खंडहालाचा वध आहे. प्राण्यांना मारतो (घातेति)' इत्यादींमध्ये 'वध' म्हणजे मारून टाकणे (मरण) होय. ‘‘อุปาหนํ, วธู’’ติ จ เอตฺถ หนวธสทฺทตฺโถคมนํ. ‘‘ปุริสํ หนติ. สีตํ อุณฺหํ ปฏิหนติ’’ อิจฺจาทีนิ กตฺตุปทานิ. เทวทตฺโต ยญฺญทตฺเตน หญฺญติ. ตโต วาตาตเป โฆเร, สญฺชาเต ปฏิหญฺญติ. ปจฺจตฺตวจนสฺเสการตฺตํ, ยถา ‘‘วนปฺปคุมฺเพ’’ติ. วิหาเรนาติ ปทํ สมฺพนฺธิตพฺพํ, อิจฺจาทีนิ กมฺมปทานิ. หนฺตา. หโต. วธโก. วธู. อาฆาโต. อุปฆาโต. ฆาตโก. ปฏิโฆ. สงฺโฆ. พฺยคฺโฆ. สกุณคฺฆิ. หนฺตุํ, หนิตุํ, หนฺตฺวา, หนิตฺวา. วชฺเฌตฺวา, วธิตฺวา อิจฺจาทีนิ สนามิกานิ ตุมนฺตาทิปทานิ. 'उपाहन' (पादत्राण) आणि 'वधू' येथे 'हन' आणि 'वध' शब्दांचा अर्थ गमन (जाणे) असा आहे. 'पुरुषाला मारतो. थंडी आणि उष्णतेचा प्रतिकार करतो (पटिहन्ति)' इत्यादी कर्तृपदे आहेत. देवदत्त यज्ञदत्ताकडून मारला जातो. त्यानंतर तीव्र वारा आणि उन्हाचा प्रादुर्भाव झाल्यावर तो बाधित होतो (पटिहञ्ञति). प्रथमा विभक्तीचे एकारत्व होते, जसे 'vanappagumbe' (वनप्पगुम्बे) मध्ये. 'विहारेन' या पदाशी संबंध जोडला पाहिजे, इत्यादी कर्मपदे आहेत. हन्ता (मारणारा), हतो (मारलेला), वधको (वधक), वधू, आघातो, उपघातो, घातको, पटिघो (प्रतिघ), संघो (संघ), ब्यग्घो (व्याघ्र), सकुणग्घि (शिकारी पक्षी). हन्तुं, हनितुं, हन्त्वा, हनित्वा, वज्झेत्वा, वधित्वा इत्यादी नामयुक्त तुमन्त (हेत्वर्थक कृदन्त) इत्यादी पदे आहेत. ตตฺถ อุปาหนนฺติ ตํ ตํ ฐานํ อุปหนนฺติ อุปคจฺฉนฺติ ตโต จ อาหนนฺติ อาคจฺฉนฺติ เอเตนาติ อุปาหนํ. วธูติ กิเลสวเสน สุนขมฺปิ อุปคมนสีลาติ วธู, สพฺพาสํ อิตฺถีนํ [Pg.115] สาธารณเมตํ. อถ วา วธูติ สุณิสา. ตถา หิ ‘‘เตน หิ วธุ ยทา อุตุนี อโหสิ, ปุปฺผํ เต อุปฺปนฺนํ, อถ เม อาโรเจยฺยาสี’’ติ เอตฺถ วธูติ สุณิสา วุจฺจติ. สา ปน ‘‘อยํ โน ปุตฺตสฺส ภริยา’’ติ สสฺสุสสุเรหิ อธิคนฺตพฺพา ชานิตพฺพาติ วธูติ วุจฺจติ. คตฺยตฺถานํ กตฺถจิ พุทฺธิยตฺถกถนโต อยมตฺโถ ลพฺภเตว. ‘‘สุณฺหา, สุณิสา, วธู’’ อิจฺเจเต ปริยายา. สงฺโฆติ ภิกฺขุสมูโห. สมคฺคํ กมฺมํ สมุปคจฺฉตีติ สงฺโฆ, สุฏฺฐุ วา กิเลเส หนฺติ เตน เตน มคฺคาสินา มาเรตีติปิ สงฺโฆ, ปุถุชฺชนาริยวเสน วุตฺตาเนตานิ. วิวิเธ สตฺเต อาหนติ ภุโส ฆาเตตีติ พฺยคฺโฆ. โส เอว ‘‘วิยคฺโฆ, วคฺโฆ’’ติ จ วุจฺจติ. อปรมฺปิ ปุณฺฑรีโกติ ตสฺส นามํ. ทุพฺพเล สกุเณ หนฺตีติ สกุณคฺฆิ, เสโน, อยํ ปน หนธาตุ ทิวาทิคเณ ‘‘ปฏิหญฺญตี’’ติ อกมฺมกํ กตฺตุปทํ ชเนติ. ตถา หิ ‘‘พุทฺธสฺส ภควโต โวหาโร โลกิเย โสเต ปฏิหญฺญตี’’ติอาทิกา ปาฬิโย ทิสฺสนฺติ. तेथे ‘उपाहन’ (जोडा/पादत्राण) म्हणजे ज्याच्याद्वारे त्या त्या ठिकाणी जातात (उपहनन्ति - उपगच्छन्ति) आणि तेथून परत येतात (आहनन्ति - आगच्छन्ति), ते ‘उपाहन’ होय. ‘वधू’ म्हणजे क्लेशांच्या वशतेमुळे कुत्र्याकडेही जाण्याचा स्वभाव असणारी ती ‘वधू’ होय, हे सर्व स्त्रियांसाठी सामान्य आहे. अथवा ‘वधू’ म्हणजे सून (पुत्रवधू). तसेच, ‘म्हणूनच हे वधू! जेव्हा तू ऋतुमती झालीस, तुला पुष्प (मासिक पाळी) आले, तेव्हा मला सांग’ येथे ‘वधू’ शब्दाने सून म्हटली आहे. ती ‘ही आमच्या पुत्राची पत्नी आहे’ अशी सासू-सासऱ्यांनी जाणावी (अधिगन्तब्बा - जानितब्बा) म्हणून तिला ‘वधू’ म्हटले जाते. गत्यर्थक धातूंचा काही ठिकाणी ज्ञानार्थ (बुद्धी) असा अर्थ सांगितल्यामुळे हा अर्थ प्राप्त होतोच. ‘सुण्हा, सुणिसा, वधू’ हे पर्यायी शब्द आहेत. ‘संघ’ म्हणजे भिक्खूंचा समूह. जो समग्र (एकत्रित) कर्माला प्राप्त होतो तो ‘संघ’ होय, किंवा जो क्लेशांचा चांगल्या प्रकारे नाश करतो, त्या त्या मार्ग-खड्गाने (मग्गसिना) मारतो तोही ‘संघ’ होय; हे पृथग्जन आणि आर्य यांच्या भेदाने सांगितले आहे. जो विविध प्राण्यांना मारतो, अत्यंत हिंसा करतो तो ‘ब्याग्ध’ (व्याघ्र/वाघ). त्यालाच ‘वियग्ध’ आणि ‘वग्ध’ असेही म्हणतात. दुसरे ‘पुंडरीक’ हे त्याचे नाव आहे. जो दुर्बळ पक्ष्यांना मारतो तो ‘सकुणग्घि’ (शिकारी पक्षी/ससाणा), ‘सेन’ (बाज पक्षी). हा ‘हन्’ धातू दिवादिगणात ‘पटिहञ्ञति’ असे अकर्मक कर्तृपद निर्माण करतो. तसेच ‘बुद्ध भगवंतांचे बोलणे लौकिक कानांवर आदळते (पटिहञ्ञति)’ इत्यादी पाळी वचने आढळतात. อน ปาณเน. ปาณนํ สสนํ. อนติ. อานํ, ปานํ. ‘‘ตตฺถ อานนฺติ อสฺสาโส. ปานนฺติ ปสฺสาโส. เอเตสุ อสฺสาโสติ พหิ นิกฺขมนวาโต. ปสฺสาโสติ อนฺโต ปวิสนวาโต’’ติ วินยฏฺฐกถายํ วุตฺตํ, สุตฺตนฺตฏฺฐกถาสุ ปน อุปฺปฏิปาฏิยา อาคตํ. ตตฺถ ยสฺมา สพฺเพสมฺปิ คพฺภเสยฺยกานํ มาตุกุจฺฉิโต นิกฺขมนกาเล ปฐมํ อพฺภนฺตรวาโต พหิ นิกฺขมติ, ปจฺฉา พาหิรวาโต สุขุมํ รชํ คเหตฺวา อพฺภนฺตรํ ปวิสนฺโต ตาลุํ อาหจฺจ นิพฺพายติ, ตสฺมา วินยฏฺฐกถายํ ‘‘อสฺสาโสติ พหิ นิกฺขมนวาโต, ปสฺสาโสติ อนฺโต ปวิสนวาโต’’ติ วุตฺตํ. เอเตสุ [Pg.116] ทฺวีสุ นเยสุ วินยนเยน อนฺโต อุฏฺฐิตสสนํ อสฺสาโส, พหิ อุฏฺฐิตสสนํ ปสฺสาโส. สุตฺตนฺตนเยน ปน พหิ อุฏฺฐหิตฺวาปิ อนฺโต สสนโต อสฺสาโส. อนฺโต อุฏฺฐหิตฺวาปิ พหิ สสนโต ปสฺสาโส. อยเมว จ นโย ‘‘อสฺสาสาทิมชฺฌปริโยสานํ สติยา อนุคจฺฉโต อชฺฌตฺตํ วิกฺเขปคเตน จิตฺเตน กาโยปิ จิตฺตมฺปิ สารทฺธา จ โหนฺติ อิญฺชิตา จ ผนฺทิตา จา’’ติ, ‘‘ปสฺสาสาทิมชฺฌปริโยสานํ สติยา อนุคจฺฉโต พหิทฺธา วิกฺเขปคเตน จิตฺเตน กาโยปิ จิตฺตมฺปิ สารทฺธา จ โหนฺติ อิญฺชิตา จ ผนฺทิตา จา’’ติ อิมาย ปาฬิยา สเมตีติ เวทิตพฺพํ. ‘अन्’ धातू श्वासोच्छ्वासाच्या (पाणन) अर्थात आहे. ‘पाणन’ म्हणजे श्वास घेणे. ‘अनति’ (तो श्वास घेतो). ‘आन’ आणि ‘पान’. ‘त्यात आन म्हणजे अस्सास (उच्छ्वास) आणि पान म्हणजे पस्सास (श्वास). यांपैकी अस्सास म्हणजे बाहेर पडणारा वायू आणि पस्सास म्हणजे आत प्रवेश करणारा वायू’ असे विनय-अट्ठकथेत म्हटले आहे; परंतु सुत्तंत-अट्ठकथांमध्ये याच्या उलट आले आहे. तेथे, कारण सर्वच गर्भवासी जीवांच्या मातांच्या उदरातून बाहेर पडण्याच्या वेळी प्रथम आतील वायू बाहेर पडतो, आणि नंतर बाहेरील वायू सूक्ष्म धुलिकण घेऊन आत प्रवेश करतो व टाळूला स्पर्श करून शांत होतो, म्हणून विनय-अट्ठकथेत ‘अस्सास म्हणजे बाहेर पडणारा वायू आणि पस्सास म्हणजे आत प्रवेश करणारा वायू’ असे म्हटले आहे. या दोन्ही पद्धतींमध्ये, विनय पद्धतीनुसार आतून निर्माण होणारा श्वास म्हणजे ‘अस्सास’ आणि बाहेरून निर्माण होणारा श्वास म्हणजे ‘पस्सास’ होय. परंतु सुत्तंत पद्धतीनुसार, बाहेरून निर्माण होऊन आत श्वास घेण्याला ‘अस्सास’ म्हणतात आणि आतून निर्माण होऊन बाहेर श्वास सोडण्याला ‘पस्सास’ म्हणतात. हाच नियम ‘अस्सासच्या आदि, मध्य आणि अंताचे स्मृतीने अनुगमन करणाऱ्या, अध्यात्मिक विक्षेप पावलेल्या चित्तामुळे काया आणि चित्त दोन्ही उत्तेजित, कंपित आणि चंचल होतात’ आणि ‘पस्सासच्या आदि, मध्य आणि अंताचे स्मृतीने अनुगमन करणाऱ्या, बाह्य विक्षेप पावलेल्या चित्तामुळे काया आणि चित्त दोन्ही उत्तेजित, कंपित आणि चंचल होतात’ या पाळी वचनाशी सुसंगत आहे, असे जाणावे. ธน ธญฺเญ. ธนนํ ธญฺญํ, สิริปุญฺญปญฺญานํ สมฺปทาติ อตฺโถ. ธาตุอตฺโถ หิ เยภุยฺเยน ภาววเสน กถิยติ ฐเปตฺวา วกฺกรุกฺขตเจติ เอวมาทิปฺปเภทํ. ยถา ภาวตฺเถ วตฺตมาเนน ยปจฺจเยน สทฺธึ นการสฺส ยฺยการํ กตฺวา เถนนํ เถยฺยนฺติ วุจฺจติ, เอวมิธ ยปจฺจเยน สทฺธึ นการสฺส ญฺญการํ กตฺวา ธนนํ ธญฺญนฺติ วุจฺจติ. ธนิโน วา ภาโว ธญฺญํ, ตสฺมึ ธญฺเญ. ธนฺติ, ธนติ. ธนิตํ. ธญฺญํ. ยสฺมา ปน ธญฺญสทฺเทน สิริปุญฺญปญฺญาสมฺปทา คหิตา, ตสฺมา ‘‘ธญฺญปุญฺญลกฺขณสมฺปนฺนํ ปุตฺตํ วิชายี’’ติอาทีสุ ธญฺญสทฺเทน สิริปญฺญาว คเหตพฺพา ปุญฺญสฺส วิสุํ วจนโต. ‘धन्’ धातू धान्याच्या (धञ्ञ) अर्थात आहे. ‘धनन’ म्हणजे धान्य, याचा अर्थ ‘श्री (समृद्धी), पुण्य आणि प्रज्ञा यांची संपदा’ असा आहे. धातूचा अर्थ बहुधा भाववाचक रूपाने सांगितला जातो, ‘वक्क’, ‘रुक्ख’, ‘तच’ इत्यादी भेद वगळता. ज्याप्रमाणे भावार्थात वर्तमान असलेल्या ‘य’ प्रत्ययासोबत ‘न’ काराचा ‘य्य’ कार करून ‘थेनन’ चे ‘थेय्य’ (चोरी) असे म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे येथे ‘य’ प्रत्ययासोबत ‘न’ काराचा ‘ञ्ञ’ कार करून ‘धनन’ चे ‘धञ्ञ’ (धान्य/भाग्यवान) असे म्हटले जाते. किंवा धनवानाचा भाव म्हणजे ‘धञ्ञ’, त्या धान्यामध्ये. ‘धन्ति’, ‘धनति’. ‘धनितं’. ‘धञ्ञं’. परंतु ज्या अर्थी ‘धञ्ञ’ शब्दाने श्री, पुण्य आणि प्रज्ञा यांची संपदा घेतली जाते, त्या अर्थी ‘धान्य-पुण्य-लक्षण-संपन्न पुत्राला जन्म दिला’ इत्यादी वाक्यांमध्ये ‘धञ्ञ’ शब्दाने केवळ ‘श्री-प्रज्ञा’च ग्रहण करावी, कारण ‘पुण्य’ हा शब्द स्वतंत्रपणे आला आहे. ‘‘นทโต ปริสายนฺเต, วาทิตพฺพปหาริโน; เย เต ทกฺขนฺติ วทนํ, ธญฺญา เต นรปุงฺคว. “हे नरपुंगवा (मनुष्यांमध्ये श्रेष्ठ)! परिषदेच्या मध्यभागी गर्जना करणाऱ्या आणि वाजवण्यास योग्य अशा वाद्यांवर प्रहार करणाऱ्या (वाजवणाऱ्या) आपले जे मुख पाहतील, ते खरोखरच भाग्यवान (धञ्ञा) आहेत. ทีฆงฺคุลี ตมฺพนเข, สุเภ อายตปณฺหิเก; เย ปาเท ปณมิสฺสนฺติ, เตปิ ธญฺญา คุณนฺธร. हे गुणधरा! लांब बोटे, तांबडे नख आणि सुंदर व लांब टाचा असलेल्या आपल्या ज्या चरणांना जे वंदन करतील, तेही भाग्यवान (धञ्ञा) आहेत. มธุรานิ ปหฏฺฐานิ, โทสคฺฆานิ หิตานิ จ; เยเตวากฺยานิ โสสฺสนฺติ, เตปิ ธญฺญานรุตฺตมา’’ติ आणि जे आपले मधुर, आनंददायी, दोषांचा नाश करणारे आणि हितकारक असे वचन ऐकतील, ते नरोत्तमा! तेही भाग्यवान (धञ्ञा) आहेत.” เอวมาทีสุ [Pg.117] ปน ธญฺญสทฺเทน ปุญฺญสมฺปทา คเหตพฺพา, ปุญฺญสมฺปทาย วา สทฺธึ สิริปญฺญาสมฺปทาปิ คเหตพฺพา. อิทเมตฺถ นิพฺพจนํ ‘‘ธญฺญํ สิริปุญฺญปญฺญาสมฺปทา เอเตสํ อตฺถีติ ธญฺญา’’ติ. ‘‘ธญฺญํ มงฺคลสมฺมต’’นฺติ เอตฺถ ตุ ‘‘อุตฺตมรตนํ อิท’’นฺติ ธนายิตพฺพํ สทฺธายิตพฺพนฺติ ธญฺญํ, สิริสมฺปนฺนํ ปุญฺญสมฺปนฺนํ ปญฺญาสมฺปนฺนนฺติปิ อตฺโถ ยุชฺชติ. ‘‘ธญฺญํ ธนํ รชตํ ชาตรูป’’นฺติ จ อาทีสุ ‘‘นตฺถิ ธญฺญสมํ ธน’’นฺติ วจนโต ธนายิตพฺพนฺติ ธญฺญํ, กึ ตํ? ปุพฺพณฺณํ. อปิจ โอสธิวิเสโสปิ ธญฺญนฺติ วุจฺจติ. ธนสทฺทสฺส จ ปน สมาสวเสน ‘‘อธโน, นิทฺธโน’’ติ จ นตฺถิ ธนํ เอตสฺสาติ อตฺเถน ทลิทฺทปุคฺคโล วุจฺจติ. ‘‘นิธนํ ยาตี’’ติเอตฺถ ตุ กมฺปนตฺถวาจกสฺส ธูธาตุสฺส วเสน วินาโส นิธนนฺติ วุจฺจตีติ. अशा इत्यादी ठिकाणी ‘धञ्ञ’ शब्दाने पुण्यसंपदा ग्रहण करावी, किंवा पुण्यसंपदेसोबत श्री-प्रज्ञा-संपदाही ग्रहण करावी. याचे येथे निर्वचन (व्युत्पत्ती) असे आहे - ‘ज्यांच्याकडे धान्य (श्री, पुण्य आणि प्रज्ञा यांची संपदा) आहे, ते धान्यवान (धञ्ञा) होत’. ‘धान्य हे मंगळ मानले गेले आहे’ येथे मात्र ‘हे उत्तम रत्न आहे’ म्हणून ज्याची इच्छा करावी, ज्याच्यावर श्रद्धा ठेवावी ते ‘धञ्ञ’ होय; तसेच श्रीसंपन्न, पुण्यसंपन्न आणि प्रज्ञासंपन्न असाही अर्थ योग्य ठरतो. ‘धान्य, धन, चांदी, सोने’ इत्यादींमध्ये ‘धान्यासारखे दुसरे धन नाही’ या वचनानुसार ज्याची इच्छा केली जाते ते ‘धञ्ञ’ होय. ते काय? पूर्वान्न (धान्य). शिवाय, विशिष्ट औषधी वनस्पतीलाही ‘धञ्ञ’ (धान्य) म्हटले जाते. आणि ‘धन’ शब्दाच्या समासामुळे ‘अधन’, ‘निर्धन’ म्हणजे ‘ज्याला धन नाही तो’ या अर्थाने दरिद्री मनुष्य म्हटला जातो. ‘निधनं याति’ (नाश पावतो) येथे मात्र कंपन अर्थाचा वाचक असलेल्या ‘धू’ धातूच्या प्रभावामुळे ‘निधन’ म्हणजे विनाश असे म्हटले जाते. มุน คติยํ. มุนติ. ‘मुन्’ धातू गतीच्या अर्थात आहे. ‘मुनति’ (तो जातो/जाणतो). จิเน มญฺญนายํ. อลุตฺตนฺโตยํ ธาตุ, ยถา คิเล, ยถา จ มิเล. จินายติ, โอจินายติ. ‘‘สพฺโพ ตํ ชโน โอจินายตู’’ติ อิทเมตฺถ ปาฬิ นิทสฺสนํ. โอจินายตติ อวมญฺญตูติ. ‘चिने’ धातू मानण्याच्या (विचार करण्याच्या) अर्थात आहे. हा अलुप्त-अंत असलेला धातू आहे, जसे ‘गिले’ आणि ‘मिले’. ‘चिनायति’, ‘ओचिनायति’. ‘सर्व लोकांनी त्याचा अनादर करावा (ओचिनायतु)’ हे येथे पाळीचे उदाहरण आहे. ‘ओचिनायति’ म्हणजे अनादर करणे (अवमञ्ञतु). อิติ ภูวาทิคเณ ตวคฺคนฺตธาตุรูปานิ अशा प्रकारे भूवादिगणातील ‘त-वर्ग’ अंत असणारे धातुरूप สมตฺตานิ. समाप्त झाले. ปการนฺตธาตุ ‘प-कार’ अंत असणारे धातू อิทานิ ปวคฺคนฺตธาตุรูปานิ วุจฺจนฺเต – आता ‘प-वर्ग’ अंत असणारे धातुरूप सांगितले जात आहेत – ปา ปาเน. ปานํ ปิวนํ. ‘‘ปาติ, ปานฺติ. ปาตุ, ปานฺตุ’’ อิจฺจาทิ ยถารหํ โยเชตพฺพํ. ‘पा’ धातू पिण्याच्या (पान) अर्थात आहे. ‘पान’ म्हणजे पिणे. ‘पाति, पान्ति। पातु, पान्तु’ इत्यादी रूपे योग्यतेनुसार योजावीत. ขิปฺปํ คีวํ ปสาเรหิ, น เต ทสฺสามิ ชีวิตํ; อยญฺหิเต มยา รูฬฺโห, สโร ปาสฺสติ โลหิตนฺติ. “त्वरेने तुझी मान पुढे कर, मी तुला जीवन देणार नाही; कारण माझ्याद्वारे सोडलेला हा बाण तुझे रक्त पिईल.” อตฺร [Pg.118] หิ ปาสฺสตีติ ปิวิสฺสติ. ‘‘ปาสฺสติ, ปาสฺสนฺติ. ปาสฺสสิ, ปาสฺสถ. ปาสฺสามิ, ปาสฺสาม’’ อิจฺจาทินา, ‘‘อปสฺสา, อปสฺสํสุ’’ อิจฺจาทินา จ นเยน เสสํ สพฺพํ โยเชตพฺพํ นยญฺญูหิ. โก หิ สมตฺโถ สพฺพานิ พุทฺธวจนสาคเร วิจิตฺรานิ วิปฺปกิณฺณรูปนฺตรรตนานิ อุทฺธริตฺวา ทสฺเสตุํ, ตสฺมา สพฺพาสุปิ ธาตูสุ สงฺเขเปน คหณูปายมตฺตเมว ทสฺสิตํ. ปิวติ, ปิวนฺติ. ปิวํ, ปิวนฺโต, ปิวมาโน, ปิวํ ภาคิรโสทกํ. การิเต กุมารํ ขีรํ ปาเยติ. มุหุตฺตํ ตณฺหาสมนํ, ขีรํ ตฺวํ ปายิโต มยา. กมฺเม ปียติ, ปีตํ. ตุมาทีสุ ‘‘ปาตุํ, ปิวิตุํ, ปิตฺวา, ปิวิตฺวา, ปาเยตฺวา’’ อิจฺจาทีนิ โยเชตพฺพานิ. อญฺเญสุปิ ฐาเนสุ ปาฬินยานุรูเปน สทฺทรูปานิ เอวเมว โยเชตพฺพานิ. येथे 'पास्सति' (pāssati) म्हणजे 'पिईल' (pivissati). 'पास्सति, पास्सन्ति। पास्ससि, पास्सथ। पास्सामि, पास्साम' इत्यादी रूपांनी, आणि 'अपस्सा, अपस्संसु' इत्यादी रूपांच्या पद्धतीने इतर सर्व रूपे व्याकरणतज्ज्ञांनी जुळवून घ्यावीत. बुद्धवचनरूपी महासागरात विखुरलेली विविध प्रकारची रूपरूपी रत्ने बाहेर काढून दाखवण्यास कोण समर्थ आहे? म्हणूनच सर्व धातूंमध्ये संक्षेपाने केवळ ग्रहण करण्याची पद्धत (नियम) दाखवली आहे. 'पिवति, पिवन्ति' (पितो, पितात). 'पिवं, पिवन्तो, पिवमानो' (पिणारा), 'पिवं भागिरसोदकं' (भागीरथीचे पाणी पिणारा). प्रयोजक (कारित) मध्ये 'कुमारं खीरं पायेति' (मुलाला दूध पाजतो). 'मुहुत्तं तण्हासमनां, खीरं त्वं पायितो मया' (काही काळ तहान शमवण्यासाठी, मी तुला दूध पाजले आहे). कर्मणी प्रयोगात 'पीयति' (पिले जाते), 'पीतं' (पिलेले). 'तुम्' इत्यादी प्रत्ययांमध्ये 'पातुं, पिवितुं, पित्वा, पिवित्वा, पायेत्वा' इत्यादी रूपे जोडावीत. इतर ठिकाणीही पाळि पद्धतीनुसार शब्दांची रूपे याचप्रमाणे जुळवावीत. ปา รกฺขเณ. ปาติ. นิปาติ. ปิตา, โคโป. 'पा' (pā) धातू रक्षण करण्याच्या अर्थात. 'पाति' (रक्षण करतो). 'निपाति'. 'पिता' (वडील), 'गोपो' (गोपाळ/रक्षक). ปา ปูรเณ. ปาติ, วิปฺปาติ. วิปฺโป. 'पा' (pā) धातू पूर्ण करण्याच्या (भरण्याच्या) अर्थात. 'पाति', 'विप्पाति'. 'विप्पो' (ब्राह्मण/पूर्ण करणारा). วิปฺโปติ พฺราหฺมโณ. โส หิ วิปฺเปติ ปูเรติ วิสิฏฺเฐน เวทุจฺจารณาทินา อตฺตโน พฺราหฺมณกมฺเมน โลกสฺส อชฺฌาสยํ อตฺตโน จ หทเย เวทานีติ วิปฺโปติ วุจฺจติ. ‘‘ชาโต วิปฺปกุเล อห’’นฺติ เอตฺถ หิ พฺราหฺมโณ ‘‘วิปฺโป’’ติ วุจฺจติ. ตสฺส กุลํ วิปฺปกุลนฺติ. ब्राह्मणाला 'विप्पो' म्हणतात. कारण तो विशिष्ट वेदोच्चारण इत्यादी आपल्या ब्राह्मणकर्माने लोकांचे मन आणि स्वतःच्या हृदयात वेदांना भरतो (पूर्ण करतो), म्हणून त्याला 'विप्पो' म्हटले जाते. 'जातो विप्पकुले अहं' (मी विप्रकुलात जन्मलो) येथे ब्राह्मणाला 'विप्पो' म्हटले आहे. त्याचे कुल म्हणजे 'विप्पकुल' (विप्रकुल) होय. ปู ปวเน. ปวติ. ปุตฺโต, ปุญฺญํ. เอตฺถ ปุตฺโตติ อตฺตโน กุลํ ปวติ โสเธตีติ ปุตฺโต. กิยาทิคณํ ปน ปตฺวา ‘‘ปุนาตี’’ติ วตฺตพฺพํ. 'पू' (pū) धातू पवित्र करण्याच्या (शुद्ध करण्याच्या) अर्थात. 'पवति' (पवित्र करतो). 'पुत्तो' (पुत्र), 'पुञ्ञं' (पुण्य). येथे 'पुत्तो' म्हणजे जो आपल्या कुलाला पवित्र करतो (शुद्ध करतो) तो पुत्र. क्रियादिगणात गेल्यावर 'पुनाति' असे म्हणावे. ปุตฺโต’ตฺรโช สุโต สูนุ,ตนุโช ตนโย’รโส; ปุตฺตนตฺตาทโย จาถ,อปจฺจนฺติ ปวุจฺจเร. पुत्र, अत्रज (आत्मज), सुत, सूनू, तनुज, तनय, ओरस (औरस); तसेच पुत्र-नातू इत्यादींना 'अपच्च' (अपत्य) असे म्हटले जाते. อิตฺถิลิงฺคมฺหิ [Pg.119] วตฺตพฺเพ, ปุตฺตีติ อตฺรชาติ จ; วตฺตพฺพํ เสสฏฺฐาเนสุ, ยถารหมุทีรเย; ปาฬิยญฺหิ อตฺรชาติ, อิตฺถี ปุตฺตี กถิยติ; स्त्रीलिंगात सांगायचे असल्यास 'पुत्ती' आणि 'अत्रजा' असे म्हणावे. इतर ठिकाणी योग्यतेनुसार प्रयोग करावा. कारण पाळिमध्ये 'अत्रजा' आणि 'पुत्ती' हे शब्द स्त्रीवाचक (मुलगी) म्हणून सांगितले जातात. เอตฺถ ปน – येथे पुन्हा - ‘‘ตโต ทฺเว สตฺตรตฺตสฺส, เวเทหสฺสตฺรชา ปิยา; ราชกญฺญา รุจา นาม, ธาติมาตรมพฺรวี’’ติ 'त्यानंतर चौदा दिवसांनी (दोन आठवड्यांनी), विदेहाची प्रिय कन्या (अत्रजा), रुचा नावाची राजकन्या आपल्या धायमातेला म्हणाली' - อยํ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ‘‘ปุตฺตี, ธีตา, ทุหิตา, อตฺตชา’’ติ อิจฺเจเต ปริยายา. เอวํ อตฺรชาติ อิตฺถิวาจกสฺส อิตฺถิลิงฺคสฺส ทสฺสนโต สุตสทฺทาทีสุปิ อิตฺถิลิงฺคนโย ลพฺภมานาลพฺภมานวเสน อุปปริกฺขิตพฺโพ. ตถา หิ โลเก ‘‘เวสฺโส, สุทฺโท, นโร, กึปุริโส’’ อิจฺจาทีนํ ยุคฬภาเวน ‘‘เวสฺสี, สุทฺที, นารี, กึปุริสี’’ติอาทีนิ อิตฺถิวาจกานิ ลิงฺคานิ ทิสฺสนฺติ. ‘‘ปุริโส ปุมา’’ อิจฺจาทีนํ ปน ยุคฬภาเวน อิตฺถิวาจกานิ อิตฺถิลิงฺคานิ น ทิสฺสนฺติ. ปุญฺญนฺติ เอตฺถ ปน อตฺตโน การกํ ปวติ โสเธตีติ ปุญฺญํ. กิยาทิคณํ ปน ปตฺวา ปุนาตีติ ปุญฺญนฺติ วตฺตพฺพํ. हे पाळिचे उदाहरण आहे. 'पुत्ती, धीता, दुहिता, अत्तजा' हे तिचे समानार्थी शब्द आहेत. अशा प्रकारे 'अत्रजा' या स्त्रीवाचक स्त्रीलिंगी शब्दाच्या दर्शनावरून 'सुत' इत्यादी शब्दांमध्येही स्त्रीलिंगी रूप मिळण्याच्या किंवा न मिळण्याच्या शक्यतेनुसार तपास केला पाहिजे. जसे की जगात 'वेस्सो' (वैश्य), 'सुद्दो' (शूद्र), 'नरो' (नर), 'किम्पुरिसो' (किंपुरुष) इत्यादींच्या जोडीने 'वेस्सी', 'सुद्दी', 'नारी', 'किम्पुरिसी' इत्यादी स्त्रीवाचक लिंगे दिसतात. परंतु 'पुरिसो', 'पुमा' इत्यादींच्या जोडीने स्त्रीवाचक स्त्रीलिंगी रूपे दिसत नाहीत. 'पुञ्ञं' (पुण्य) या शब्दात, जो स्वतःच्या कर्त्याला पवित्र करतो (शुद्ध करतो) ते पुण्य होय. क्रियादिगणात गेल्यावर 'पुनाति' वरून 'पुञ्ञं' असे म्हणावे. อญฺโญ อตฺโถปิ วตฺตพฺโพ, นิรุตฺติลกฺขณสฺสิโต; ตสฺมา นิพฺพจนํ เญยฺยํ, ชนปูชาทิโต อิธ. निरुक्तीच्या (व्युत्पत्तीच्या) लक्षणावर आधारित दुसरा अर्थही सांगितला पाहिजे; म्हणून येथे लोकांच्या पूजेवरून (आदरावरून) याची व्युत्पत्ती समजून घ्यावी. ปรํ ปุชฺชภวํ ชเนตีติ ปุญฺญํ. สทา ปูชิตํ วา ชเนตีติ ปุญฺญํ. ชนํ อตฺตการํ ปุนาตีติ ปุญฺญํ. อเสสํ อปุญฺญํ ปุนาตีติ ปุญฺญํ. जे इतरांमध्ये पूजनीय भाव निर्माण करते ते पुण्य होय. किंवा जे नेहमी पूजनीय स्थिती निर्माण करते ते पुण्य होय. जे स्वतः कर्म करणाऱ्या माणसाला पवित्र करते ते पुण्य होय. जे संपूर्ण अपुण्याला (पापाला) नष्ट/शुद्ध करते ते पुण्य होय. กลฺยาณํ กุสลํ ปุญฺญํ, สุภมิจฺเจว นิทฺทิเส; กมฺมสฺส กุสลสฺสาธิ-วจนํ วจเน ปฏุ. कल्याण, कुशल, पुण्य, शुभ असे निर्देश करावेत; कुशल कर्माचे हे समानार्थी शब्द बोलण्यात चतुर असलेल्यांनी वापरावेत. เป คติยํ. เปติ, เปนฺติ. เปสิ, เปถ. อิธ ภิกฺขเว เอกจฺโจ อสฺสขฬุงฺโก เปหีติ วุตฺโต วิทฺโธ สมาโน โจทิโต สารถินา ปจฺฉโต ปฏิสกฺกติ, ปิฏฺฐิโต รถํ ปฏิวตฺเตติ. อุมฺมคฺคํ คณฺหาติ, อุพฺพฏุมํ รถํ กโรติ. 'पे' (pe) धातू गतीच्या (जाण्याच्या) अर्थात. 'पेति, पेन्ति'। 'पेसि, पेथ'। 'भिक्खूहो, येथे एखादा अविनीत घोडा (अस्सखळुंको) 'जा' (पेहीति) असे म्हटल्यावर, चाबकाने मारलेला आणि सारथीने प्रेरित केलेला असता, मागे हटतो, पाठीमागून रथ उलटवतो, चुकीचा मार्ग धरतो आणि रथाला चुकीच्या मार्गावर नेतो.' เป [Pg.120] วุทฺธิยํ ปยติ. ปาโย, อปาโย. เอตฺถ อปาโยติ นตฺถิ ปาโย วุทฺธิ เอตฺถาติ อปาโย. อยธาตุวเสนปิ อตฺโถ เนตพฺโพ, อยโต วุทฺธิโต, สุขโต วา อเปโตติ อปาโย, นิรยติรจฺฉานโยนิเปตฺติวิสยอสุรกายา. 'पे' (pe) धातू वृद्धीच्या (वाढीच्या) अर्थात 'पयति' (वाढतो). 'पायो' (वृद्धी), 'अपायो' (अपाय). येथे 'अपाय' म्हणजे जेथे वृद्धी (कल्याण) नाही तो अपाय होय. 'अय' धातूच्या अर्थानुसारही अर्थ लावला पाहिजे; 'अय' म्हणजे वृद्धी किंवा सुखापासून जो दूर गेला आहे तो अपाय होय, जसे की - निरय (नरक), तिरच्छानयोनी (प्राणीयोनी), पेत्तिविसय (प्रेतलोक) आणि असुरकाय (असुरलोक). เป โสสเน. ปายติ, ปยติ วา. นิปโก. เอตฺถ นิปโก นิปยติ วิโสเสติ ปฏิปกฺขํ, ตโต วา อตฺตานํ นิปาติ รกฺขตีติ นิปโก, สมฺปชาโน. 'पे' (pe) धातू शोषून घेण्याच्या (वाळवण्याच्या/नष्ट करण्याच्या) अर्थात. 'पायति' किंवा 'पयति'. 'निपको' (बुद्धिमान/जागरूक). येथे 'निपको' म्हणजे जो प्रतिपक्षाला (क्लेशांना) शोषून घेतो (नष्ट करतो), किंवा त्यापासून स्वतःचे रक्षण करतो तो 'निपको' (जागरूक/संप्रजन्ययुक्त) होय. คุป รกฺขเณ. โคปติ. โคปโก. 'गुप' (gupa) धातू रक्षण करण्याच्या अर्थात. 'गोपति' (रक्षण करतो). 'गोपको' (रक्षक). นครํ ยถา ปจฺจนฺตํ, คุตฺตํ สานฺตรพาหิรํ. ज्याप्रमाणे सीमेवरील नगर आतून आणि बाहेरून सुरक्षित ठेवलेले असते, เอวํ โคเปถ อตฺตานํ, ขโณ เว มา อุปจฺจคา. त्याचप्रमाणे स्वतःचे रक्षण करावे, क्षण (संधी) वाया जाऊ देऊ नये. โคเปถาติ โคเปยฺย รกฺเขยฺย. 'गोपेथ' (gopetha) म्हणजे रक्षण करावे ('गोपेय्य', 'रक्खेय्य'). วป สนฺตาเน. วปติ. 'वप' (vapa) धातू संतती किंवा पसरवण्याच्या अर्थात. 'वपति' (पेरतो/पसरवतो). สป สมวาเย. สปติ. 'सप' (sapa) धातू समूहाच्या (एकत्र येण्याच्या) अर्थात. 'सपति' (एकत्र येतो/मिळतो). จุป มนฺทคติยํ. โจปติ. 'चुप' (cupa) धातू मंद गतीच्या अर्थात. 'चोपति' (हळूहळू हलतो/चालतो). ตุป หึสายํ. โตปติ. ตุปฺปติ. 'तुप' (tupa) धातू हिंसेच्या (इजा करण्याच्या) अर्थात. 'तोपति', 'तुप्पति'. คุป โคปนชิคุจฺฉเนสุ. โคปติ, ชิคุจฺฉติ. ชิคุจฺฉํ, ชิคุจฺฉมาโน. เชคุจฺฉี. ชิคุจฺฉิตฺวา อิจฺจาทีนิ. 'गुप' (gupa) धातू रक्षण आणि घृणा (जुगुप्सा) करण्याच्या अर्थात. 'गोपति' (रक्षण करतो), 'जिगुच्छति' (घृणा करतो). 'जिगुच्छं', 'जिगुच्छमानो' (घृणा करणारा). 'जेगुच्छी' (घृणा करणारा). 'जिगुच्छित्वा' (घृणा करून) इत्यादी. กปุ หึสาตกฺกลคนฺเธสุ. กปฺปติ. กปฺปูโร. 'कपु' (kapu) धातू हिंसा, तर्क आणि सुगंधाच्या अर्थात. 'कप्पति'. 'कप्पूरो' (कापूर). กปุ สามตฺถิเย. อิทํ อมฺหากํ กปฺปติ. เนตํ อมฺเหสุ กปฺปติ. 'कपु' (kapu) धातू सामर्थ्य (योग्य असणे) या अर्थात. 'इदं अम्हाकं कप्पति' (हे आमच्यासाठी योग्य/विहित आहे). 'नेतं अम्हेसु कप्पति' (हे आमच्यामध्ये योग्य नाही). กป กรุณายํ. กปติ. กปโณ, กาปญฺญํ. ตตฺถ กปตีติ กรุณายติ, กาปญฺญนฺติ กปณภาโว. 'कप' (kapa) धातू करुणेच्या अर्थात. 'कपति' (करुणा करतो). 'कपणो' (दीन/गरीब), 'कापञ्ञं' (दीनता). तेथे 'कपति' म्हणजे करुणा करतो, 'कापञ्ञं' म्हणजे दीनता (गरीब अवस्था). สป [Pg.121] อกฺโกเส. สปติ. สปโถ, อภิสปโถ, อภิสปิโต, สปนโก. 'सप' (sapa) धातू शिवीगाळ (आक्रोश) करण्याच्या अर्थात. 'सपति' (शाप देतो/शिवीगाळ करतो). 'सपथो' (शपथ), 'अभिसपथो', 'अभिसपितो', 'सपनको'. วป พีชนิกฺเขเป. พีชํ วปติ. วาปโก. วาปิตํ ธญฺญํ. วุตฺตํ พีชํ ปุริเสน. พีชํ วปฺปติ. วปฺปมงฺคลํ. 'वप' (vapa) धातू बी पेरण्याच्या अर्थात. 'बीजं वपति' (बी पेरतो). 'वापको' (पेरणारा). 'वापितं धञ्ञं' (पेरलेले धान्य). 'वुत्तं बीजं पुरिसेन' (माणसाने बी पेरले). 'बीजं वप्पति' (बी पेरले जाते). 'वप्पमंगलं' (वप्पमंगल/पेरणीचा उत्सव). สุป สยเน. สุปติ. สุขํ สุปนฺติ มุนโย, เย อิตฺถีสุ น พชฺฌเร. สุตฺโต ปุริโส, สุปนํ, สุตฺตํ. 'सुप' (supa) धातू झोपण्याच्या (शयन) अर्थात. 'सुपति' (झोपतो). 'सुखं सुपन्ति मुनयो, ye इत्थीसु न बज्झरे' (मुनी सुखाने झोपतात, जे स्त्रियांमध्ये बद्ध होत नाहीत). 'सुत्तो पुरिसो' (झोपलेला माणूस), 'सुपनं' (झोपणे), 'सुत्तं' (झोपलेले). ขิป เปรเณ. เปรณํ จุณฺณิกรณํ ปิสนํ. เขปติ. เขปโก. 'खिप' (khipa) धातू प्रेरणेच्या (चूर्ण करणे/दळणे) अर्थात. 'खेपति'. 'खेपको' (फेकणारा/प्रेरित करणारा). ขิป อพฺยตฺตสทฺเท. ขิปติ. ขิปิตสทฺโท. ยทา จ ธมฺมํ เทเสนฺโต, ขิปิ โลกคฺคนายโก. 'खिप' (khipa) धातू अस्पष्ट आवाजाच्या (शिंकण्याच्या) अर्थात. 'खिपति' (शिंकतो). 'खिपितसद्दो' (शिंकण्याचा आवाज). 'यदा च धम्मं देसेन्तो, खिपि लोग्गनायको' (आणि जेव्हा धम्मदेशना करताना लोकनायक बुद्धांनी शिंक दिली). ขิป ฉฑฺฑโน. ขิปติ, อุกฺขิปติ, วิกฺขิปติ, อวขิปติ, สํขิปติ. ขิตฺตํ, อุกฺขิตฺตํ, ปกฺขิตฺตํ, วิกฺขิตฺตํ อิจฺจาทีนิ. 'खिप' (khipa) धातू टाकून देण्याच्या (फेकण्याच्या) अर्थात. 'खिपति' (फेकतो), 'उक्खिपति' (वर फेकतो), 'विक्खिपति' (विखुरतो), 'अवखिपति' (खाली फेकतो), 'संखिपति' (संक्षिप्त करतो). 'खित्तं' (फेकलेले), 'उक्खित्तं' (वर फेकलेले), 'पक्खित्तं' (आत टाकलेले), 'विक्खित्तं' (विखुरलेले) इत्यादी. โอป นิฏฺฐุภเน. นิฏฺฐุภนํ เขฬปาตนํ. โอปติ. โอสธํ สงฺขริตฺวา มุเข เขฬํ โอปิ. 'ओप' (opa) धातू थुंकण्याच्या (लाळ टाकण्याच्या) अर्थात. 'ओपति'. 'ओसधं सङ्खरित्वा मुखे खेळं ओपि' (औषध तयार करून तोंडात थुंकी टाकली). ลิปิ อุปเลเป. เลปติ. ลิตฺตํ ปรเมน เตชสา. 'लिप' (lipi) धातू लेपन करण्याच्या अर्थात. 'लेपति' (लेप लावतो). 'लित्तं परमेन तेजसा' (परम तेजाने लिप्त झालेले). ขิปิ คติยํ. ขิมฺปติ. 'खिपि' (khipi) धातू गतीच्या अर्थात. 'खिम्पति'. ฑิป เขเป. เฑปติ. 'डिप' (ḍipa) धातू फेकण्याच्या अर्थात. 'डेपति'. นิทปิ นิทมฺปเน. นิทมฺปนํ นาม สสฺสรุกฺขาทีสุ วีหิสีสํ วา วรกสีสํ วา อจฺฉินฺทิตฺวา ขุทฺทกสาขํ วา อภญฺชิตฺวา ยถาฐิตเมว หตฺเถน คเหตฺวา อากฑฺฒิตฺวา พีชมตฺตสฺเสว วา ปณฺณมตฺตสฺเสว วา คหณํ. ปุริโส วีหิสีสํ นิทมฺปติ, รุกฺขปตฺตํ นิทมฺปติ. นิทมฺปโก, นิทมฺปิตํ, นิทมฺปิตุํ, นิทมฺปิตฺวา. 'निदप' (nidapi) धातू उपटण्याच्या/काढण्याच्या (निदंपन) अर्थात. 'निदंपन' म्हणजे धान्य, झाडे इत्यादींमधील भाताचे कणीस किंवा वरकाचे कणीस न तोडता, किंवा लहान फांदी न मोडता, जसे आहे तसेच हाताने पकडून, ओढून केवळ बी किंवा केवळ पाने काढणे होय. 'पुरिसो वीहिसीसं निदम्पति' (माणूस भाताचे कणीस उपटतो/काढतो), 'रुक्खपत्तं निदम्पति' (झाडाचे पान काढतो). 'निदम्पको', 'निदम्पितं', 'निदम्पितुं', 'निदम्पित्वा'. ตป [Pg.122] ทิตฺติยํ. ทิตฺติ วิโรจนํ. ทิวา ตปติอาทิจฺโจ. 'तप' (tapa) धातू प्रकाशाच्या (तळपण्याच्या) अर्थात. 'दित्ती' म्हणजे प्रकाशणे (तळपणे). 'दिवा तपति आदिच्चो' (दिवसा सूर्य तळपतो). ตป อุพฺเพเค. อุพฺเพโค อุตฺราโส ภีรุตา. ตปติ, อุตฺตปติ. โอตฺตปฺปํ, โอตฺตปฺปิยํ ธนํ. 'तप' (tapa) धातू उद्वेगाच्या (भयाच्या) अर्थात. 'उद्वेग' म्हणजे भीती, घबराट. 'तपति', 'उत्तपति'. 'ओत्तप्पं' (पापभीरुता/नैतिक भीती), 'ओत्तप्पियं धनं' (पापभीरुतारूपी धन). ตป ธูป สนฺตาเป. ตปติ. ตโปธนํ, อาตาโป. อาตาปี. อาตปํ. ธูปติ, สนฺธูปโน, กมฺเม ตาปิยติ. ธูปิยติ. ภาเว ตาปนํ, ตาโป, ปริตาโป, สนฺตาโป. ธูปนํ. 'तप्' (tapa) आणि 'धूप्' (dhūpa) हे धातू संताप (तापणे, उष्णता किंवा क्लेश) या अर्थात आहेत. 'तपति' (तो तापतो/तप करतो). 'तपोधनं' (तपोधन), 'आतापो' (आताप/उष्णता), 'आतापी' (आतापी/उद्योगी), 'आतपं' (आतप/ऊन). 'धूपति' (धूर निघतो/धूप घालतो), 'संधूपनो' (संधूपन). कर्मणी प्रयोगात 'तापीयति' (तापवले जाते) आणि 'धुपीयति' (धूपित केले जाते) अशी रूपे होतात. भाववाचकात 'तापनं' (तापन), 'तापो' (ताप), 'परितापो' (परिताप), 'संतापो' (संताप) आणि 'धूपनं' (धूपन) अशी रूपे होतात. ปการนฺตธาตุรูปานิ. 'प' कारान्त धातूंची रूपे. ผการนฺตธาตุ 'फ' कारान्त धातू. ปุปฺผ วิกสเน. อกมฺมโก จายํ สกมฺมโก จ. ปุปฺผติ. ปุปฺผํ, ปุปฺผนํ, ปุปฺผิโต, ปุปฺผิตุํ, ปุปฺผิตฺวา. ปุปฺผนฺติ ปุปฺผิโน ทุมา. ถลชา ทกชา ปุปฺผา, สพฺเพ ปุปฺผนฺติ ตาวเท. มญฺชูสโก นาม รุกฺโข ยตฺตกานิ อุทเก วา ถเล วา ปุปฺผานิ, สพฺพานิ ปุปฺผติ. 'पुप्फ' (puppha) धातू विकसने (फुलणे/उमलणे) या अर्थात आहे. हा धातू अकर्मक आणि सकर्मक दोन्ही आहे. 'पुप्फति' (फुलतो). 'पुप्फं' (फूल), 'पुप्फनं' (फुलणे), 'पुप्फितो' (फुललेला), 'पुप्फितुं' (फुलण्यासाठी), 'पुप्फित्वा' (फुलून). "पुप्फन्ति पुप्फिनो दुमा" (फुलणारे वृक्ष फुलतात). "थलजा दकजा पुप्फा, सब्बे पुप्फन्ति तावदे" (जमिनीवर उत्पन्न होणारी आणि पाण्यात उत्पन्न होणारी सर्व फुले त्याच वेळी फुलतात). "मंजूसक नावाचा वृक्ष, पाण्यात किंवा जमिनीवर जितकी फुले असतात, ती सर्व फुलवतो (किंवा ती सर्व फुलतात)." ตุผ หึสายํ. โตผติ. 'तुफ्' (tupha) धातू हिंसेच्या अर्थात आहे. 'तोफति' (तो हिंसा करतो). ทผ ทผิ วปฺผ คติยํ. ทผติ. ทมฺผติ. วปฺผติ. 'दफ्' (dapha), 'दफि' (daphi) आणि 'वप्फ्' (vappha) हे धातू गतीच्या (गमनाच्या) अर्थात आहेत. 'दफति', 'दम्फति', 'वप्फति'. ทิผ กถนยุทฺธนินฺทาหึสาทาเนสุ. เทผติ. เทโผ. 'दिफ्' (dipha) धातू कथन (बोलणे), युद्ध, निंदा, हिंसा आणि दान या अर्थांमध्ये आहे. 'देफति', 'देफो'. ตผ ติตฺติยํ. ติตฺติ ตปฺปนํ, ตผติ. 'तफ्' (tapha) धातू तृप्तीच्या (तृप्त होण्याच्या) अर्थात आहे. तृप्ती म्हणजे तर्पण (तृप्त होणे). 'तफति' (तो तृप्त होतो). ทุผ อุปกฺกิเลเส. อุปกฺกิลิสฺสนํ อุปกฺกิเลโส. โทผติ. 'दुफ्' (dupha) धातू उपक्लेशाच्या (मळकट किंवा क्लेशित होण्याच्या) अर्थात आहे. उपक्लिष्ट होणे म्हणजे उपक्लेश. 'दोफति'. คุผ คนฺเถ. คนฺโถ คนฺถิกรณํ. โคผติ. 'गुफ्' (gupha) धातू ग्रंथाच्या (गुंफण्याच्या/बांधण्याच्या) अर्थात आहे. ग्रंथ म्हणजे ग्रंथीकरण (गुंफणे). 'गोफति'. ผการนฺตธาตุรูปานิ. 'फ' कारान्त धातूंची रूपे. พการนฺตธาตุ 'ब' कारान्त धातू. ภพฺพ [Pg.123] หึสายํ. ภพฺพติ. ภพฺโพ. 'भब्ब्' (bhabba) धातू हिंसेच्या अर्थात आहे. 'भब्बति', 'भब्बो'. ปพฺพ วพฺพ มพฺพ กพฺพ ขพฺพ คพฺพ สพฺพ จพฺพ คติยํ. ปพฺพติ. วพฺพติ. มพฺพติ. กพฺพติ. ขพฺพติ. คพฺพติ. สพฺพติ. จพฺพติ. 'पब्ब्' (pabba), 'वब्ब्' (vabba), 'मब्ब्' (mabba), 'कब्ब्' (kabba), 'खब्ब्' (khabba), 'गब्ब्' (gabba), 'सब्ब्' (sabba) आणि 'चब्ब्' (cabba) हे धातू गतीच्या (गमनाच्या) अर्थात आहेत. 'पब्बति', 'वब्बति', 'मब्बति', 'कब्बति', 'खब्बति', 'गब्बति', 'सब्बति', 'चब्बति'. อพฺพ สพฺพ หึสายญฺจ. คตฺยาเปกฺขาย จกาโร. อพฺพติ. สพฺพติ. 'अब्ब्' (abba) आणि 'सब्ब्' (sabba) हे धातू हिंसेच्या अर्थात देखील आहेत. 'च' कार हा गतीच्या अपेक्षेने (गती आणि हिंसा दोन्ही अर्थांसाठी) आहे. 'अब्बति', 'सब्बति'. กุพิ อจฺฉาทเน. กุพฺพติ. 'कुबि' (kubi) धातू आच्छादनाच्या (झाकण्याच्या) अर्थात आहे. 'कुब्बति'. ลุพิ ตุพิ อทฺทเน. ลุมฺพติ. ตุมฺพติ. ลุมฺพินีวนํ. อุทกตุมฺโพ. อโถปิ ทฺเว จ ตุมฺพานิ. 'लुबि' (lubi) आणि 'तुबि' (tubi) हे धातू अर्दनाच्या (पीडा देणे/हिंसा करणे) अर्थात आहेत. 'लुम्बति', 'तुम्बति'. 'लुम्बिनीवनं' (लुंबिनी वन), 'उदकतुम्बो' (पाण्याचा तांब्या/घडा), "अथोपि द्वे च तुम्बानि" (आणि दोन पात्रे/तुंबे देखील). จุพิ วทนสํโยเค. ปุตฺตํ มุทฺธนิ จุมฺพติ. มุเข จุมฺพติ. เอตฺถ สิยา ‘‘ยทิ วทนสํโยเค จุพิธาตุ วตฺตติ, กถํ อมฺพุธรพินฺทุจุมฺพิตกูโฏติ เอตฺถ อวทเน อวิญฺญาณเก ปพฺพตกูเฏ อมฺพุธรพินฺทูนํ จุมฺพนํ วุตฺต’’นฺติ? สจฺจํ, ตํ ปน จุมฺพนาการสทิเสนากาเรน สมฺภวํ เจตสิ ฐเปตฺวา วุตฺตํ, ยถา อทสฺสนสมฺภเวปิ ทสฺสนสทิเสนากาเรน สมฺภูตตฺตา ‘‘โรทนฺเต ทารเก ทิสฺวา, อุพฺพิทฺธา วิปุลา ทุมา’’ติ อจกฺขุกานมฺปิ รุกฺขานํ ทสฺสนํ วุตฺตํ, เอวมิธาปิ จุมฺพนาการสทิเสนากาเรน สมฺภูตตฺตา อวทนานมฺปิ อมฺพุธรพินฺทูนํ จุมฺพนํ วุตฺตํ. สภาวโต ปน อวิญฺญาณกานํ ทสฺสนจุมฺพนาทีนิ จ นตฺถิ, สวิญฺญาณกานํเยว ตานิ โหนฺตีติ. อยํ นโย กมุ ปทวิกฺเขเปติอาทีสุปิ เนตพฺโพ. 'चुबि' (cubi) धातू वदनसंयोगाच्या (मुखाचा स्पर्श/चुंबन घेणे) अर्थात आहे. 'पुत्तं मुद्धनि चुम्बति' (पुत्राच्या मस्तकाचे चुंबन घेतो). 'मुखे चुम्बति' (मुखाचे चुंबन घेतो). येथे अशी शंका येऊ शकते की, "जर 'चुबि' धातू वदनसंयोगाच्या अर्थात वापरला जातो, तर 'अम्बुधरबिन्दुचुम्बितकूटो' (मेघांच्या थेंबांनी चुंबन घेतलेले पर्वतशिखर) यामध्ये मुख नसलेल्या आणि अचेतन (अविज्ञाणक) पर्वतशिखरावर मेघांच्या थेंबांचे चुंबन कसे म्हटले गेले आहे?" हे सत्य आहे, परंतु ते चुंबनाच्या आकारासारख्या (स्पर्शासारख्या) आकाराची मनात कल्पना करून म्हटले गेले आहे. जसे की, पाहणे शक्य नसतानाही पाहण्यासारख्या क्रियेच्या अस्तित्वामुळे "रोदन्ते दारके दिस्वा, उब्बिद्धा विपुला दुमा" (रडणाऱ्या मुलांना पाहून, उंच आणि विशाल वृक्ष...) असे डोळे नसलेल्या वृक्षांचेही पाहणे म्हटले गेले आहे, तसेच येथेही चुंबनासारख्या क्रियेच्या अस्तित्वामुळे मुख नसलेल्या मेघांच्या थेंबांचेही चुंबन घेणे म्हटले गेले आहे. परंतु स्वभावतः अचेतन (अविज्ञाणक) वस्तूंचे पाहणे, चुंबन घेणे इत्यादी क्रिया नसतात, त्या केवळ सचेतन (सविज्ञाणक) प्राण्यांच्याच असतात. हाच नियम 'कमु पदविक्खेपे' (पाऊल टाकणे) इत्यादी धातूंमध्येही लागू केला पाहिजे. อุพฺพิ ตุพฺพิ ถุพฺพิ ทุพฺพิ ธุพฺพิ หึสตฺถา. อุพฺพติ. ตุพฺพติ. ถุพฺพติ. ทุพฺพติ. ทุพฺพา. ธุพฺพติ. เอตฺถ ทุพฺพาติ ทพฺพติณํ, ยํ ‘‘ติริยา นาม ติณชาตี’’ติ ปาฬิยํ อาคตํ. เอตฺถ จ ทุพฺพาติ อิตฺถิลิงฺคํ, ทพฺพนฺติ นปุํสกลิงฺคนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. 'उब्बि' (ubbi), 'तुब्बि' (tubbi), 'थुब्बि' (thubbi), 'दुब्बि' (dubbi) आणि 'धुब्बि' (dhubbi) हे धातू हिंसेच्या अर्थात आहेत. 'उब्बति', 'तुब्बति', 'थुब्बति', 'दुब्बति', 'दुब्बा', 'धुब्बति'. येथे 'दुब्बा' म्हणजे दूर्वा (दूर्वा गवत), जे पाळीमध्ये "तिरिया नावाचे गवत" म्हणून आले आहे. आणि येथे 'दुब्बा' हा स्त्रीलिंगी शब्द आहे आणि 'दब्बं' हा नपुंसकलिंगी शब्द आहे, असे समजावे. มุพฺพิ [Pg.124] พนฺธเน. มุพฺพติ. 'मुब्बि' (mubbi) धातू बंधनाच्या (बांधण्याच्या) अर्थात आहे. 'मुब्बति'. กุพฺพิ อุคฺคเม. กุพฺพติ. 'कुब्बि' (kubbi) धातू उद्गमाच्या (वर येण्याच्या/उत्पन्न होण्याच्या) अर्थात आहे. 'कुब्बति'. ปุพฺพ ปพฺพ สพฺพ ปูรเณ. ปุพฺพติ. ปพฺพติ. สพฺพติ. เอตฺต สิยา ‘‘นนุ โภ ปุพฺพสพฺพสทฺทา สพฺพนามานิ, กสฺมา ปเนเต ธาตุจินฺตายํ คหิตา’’ติ? วุจฺจเต – สพฺพนาเมสุ จ ตุมนฺตาทิวิรหิเตสุ จ นิปาเตสุ อุปสคฺเคสุ จ ธาตุจินฺตา นาม นตฺถิ, อิมานิ ปน สพฺพนามานิ น โหนฺติ. เกวลํ สุติสามญฺเญน สพฺพนามานิ วิย อุปฏฺฐหนฺติ, เตน เต ตพฺภาวมุตฺตตฺตา ธาตุจินฺตายํ ปุพฺพาจริเยหิ คหิตา ‘‘ปุพฺพติ สพฺพตี’’ติ ปโยคทสฺสนโตติ. ยทิ เอวํ กสฺมา พุทฺธวจเน เอตานิ รูปานิ น สนฺตีติ? อนาคมนภาเวน น สนฺติ, น อวิชฺชมานภาเวน. กิญฺจาปิ พุทฺธวจเนสุ เอตานิ รูปานิ น สนฺติ, ตถาปิ โปราเณหิ อนุมตา ปุราณภาสาติ คเหตพฺพานิ, ยถา ‘‘นาถตีติ นาโถ’’ติ เอตฺถ ‘‘นาถตี’’ติ รูปํ พุทฺธวจเน อวิชฺชมานมฺปิ คเหตพฺพํ โหติ, เอวํ อิมานิปิ. ตสฺมา โวหาเรสุ วิญฺญูนํ โกสลฺลตฺถาย สาสเน อวิชฺชมานาปิ สาสนานุรูปา โลกิกปฺปโยคา คเหตพฺพาติ ‘‘ปุพฺพติ สพฺพตี’’ติ รูปานิ คหิตานิ. เอส นโย อญฺเญสุปิ ฐาเนสุ เวทิตพฺโพ. 'पुब्ब्' (pubba), 'पब्ब्' (pabba) आणि 'सब्ब्' (sabba) हे धातू पूरणाच्या (पूर्ण करण्याच्या) अर्थात आहेत. 'पुब्बति', 'पब्बति', 'सब्बति'. येथे अशी शंका येऊ शकते की, "अहो, 'पुब्ब' आणि 'सब्ब' हे शब्द तर सर्वनामे आहेत, मग त्यांचा धातूंच्या विचारात का समावेश केला गेला आहे?" उत्तर दिले जाते की – सर्वनामांमध्ये, 'तुमुन्' इत्यादी प्रत्यय नसलेल्या अव्ययांमध्ये (निपातांमध्ये) आणि उपसर्गांमध्ये धातूचा विचार नसतो, परंतु हे शब्द येथे सर्वनामे नाहीत. केवळ ऐकण्याच्या साधर्म्यामुळे ते सर्वनामांसारखे भासतात, म्हणून त्या सर्वनामभावापासून मुक्त असल्यामुळे पूर्वाचार्यांनी 'पुब्बति', 'सब्बति' अशा प्रयोगांच्या दर्शनासाठी धातूंच्या विचारात त्यांचा स्वीकार केला आहे. जर असे आहे, तर बुद्धवचनात ही रूपे का आढळत नाहीत? ती बुद्धवचनात न आल्यामुळे (अनुपस्थितीमुळे) नाहीत, अस्तित्वात नसल्यामुळे (अविद्यमानतेमुळे) नाहीत. जरी बुद्धवचनात ही रूपे नसली, तरी ती प्राचीन आचार्यांनी संमत केलेली प्राचीन भाषा म्हणून स्वीकारली पाहिजेत. जसे की, "नाथतीति नाथो" (जो याचना करतो तो नाथ) यामध्ये 'नाथति' हे रूप बुद्धवचनात नसले तरी स्वीकारले जाते, तसेच ही रूपेही स्वीकारली पाहिजेत. म्हणून व्यवहारात विद्वानांच्या कौशल्यासाठी, शासनात (बुद्धशासनात) नसलेले परंतु शासनाला अनुकूल असलेले लौकिक प्रयोग स्वीकारले पाहिजेत, म्हणूनच 'पुब्बति', 'सब्बति' ही रूपे घेतली आहेत. हाच नियम इतर ठिकाणीही समजून घ्यावा. จมฺพ อทเน. จมฺพติ. 'चम्ब्' (camba) धातू अदनाच्या (खाण्याच्या) अर्थात आहे. 'चम्बति'. กพฺพ ขพฺพ คพฺพ ทพฺเพ. ทพฺโพ อหงฺกาโร. กพฺพติ. ขพฺพติ. คพฺพติ. 'कब्ब्' (kabba), 'खब्ब्' (khabba) आणि 'गब्ब्' (gabba) हे धातू दब्बाच्या (अहंकार/गर्वाच्या) अर्थात आहेत. 'दब्बो' म्हणजे अहंकार. 'कब्बति', 'खब्बति', 'गब्बति'. อพิ ทพิ สทฺเท. อมฺพติ. อมฺพา, อมฺพุ. ทมฺพติ. 'अबि' (abi) आणि 'दबि' (dabi) हे धातू शब्दाच्या (आवाज करण्याच्या) अर्थात आहेत. 'अम्बति'. 'अम्बा' (माता), 'अम्बु' (पाणी). 'दम्बति'. ลพิ อวสํสเน. อวสํสนํ อวลมฺพนํ. ลมฺพติ, วิลมฺพติ, พฺยาลมฺพติ. นีเจ โจ’ลมฺพเต สูริโย. อาลมฺพติ[Pg.125]. อาลมฺพนํ, ตทาลมฺพนํ, ตทาลมฺพณํ, ตทาลมฺพํ วา. ลาพุ. อลาพุ วา, อกาโร หิ ตพฺภาเว. 'लबि' (labi) धातू अवशंसनाच्या (खाली लटकण्याच्या/अवलंबन करण्याच्या) अर्थात आहे. अवशंसन म्हणजे अवलंबन. 'लम्बति', 'विलम्बति', 'ब्यालम्बति'. "नीचे चोलम्बते सूरियो" (सूर्य खाली लटकतो/मावळतो). 'आलम्बति'. 'आलम्बनं' (आलंबन/विषय), 'तदालम्बनं', 'तदालम्बणं' किंवा 'तदालम्बं'. 'लाबू' किंवा 'अलाबु' (भोपळा), येथे 'अ' कार हा त्याच्याच भावात (तद्भावात) आहे. พการนฺตธาตุรูปานิ. 'ब' कारान्त धातूंची रूपे. ภการนฺตธาตุ 'भ' कारान्त धातू. ภา ทิตฺติยํ. จนฺโท ภาติ, ปญฺหา มํ ปฏิภาติ. รตฺติ วิภาติ. ภาณุ, ปฏิภานํ. วิภาตา รตฺติ. 'भा' (bhā) धातू दीप्तीच्या (प्रकाशण्याच्या) अर्थात आहे. 'चन्दो भाति' (चंद्र प्रकाशतो), 'पञ्हा मं पटिभाति' (प्रश्न मला सुचतो/प्रतिभासित होतो). 'रत्ति विभाति' (रात्र प्रकाशते/संपते). 'भाणू' (सूर्य), 'पटिभानं' (प्रतिभा). 'विभाता रत्ति' (प्रकाशलेली रात्र/पहाट). ภี ภเย. ภายติ. ภยํ, ภยานโก, ภีโม, ภีมเสโน, ภีรุ, ภีรุโก, ภีรุกชาติโก. การิเต ‘‘ภาเยติ, ภายยติ, ภายาเปติ, ภายาปยตี’’ติ รูปานิ. 'भी' (bhī) धातू भया च्या (भीती वाटण्याच्या) अर्थात आहे. 'भायति' (तो भितो). 'भयं' (भय), 'भयानको' (भयानक), 'भीमो' (भीम), 'भीमसेनो' (भीमसेन), 'भीरु' (भीरू/भित्रा), 'भीरुको' (भित्रा), 'भीरुकजातिको' (स्वभावाने भित्रा). प्रयोजक रूपात 'भायेति', 'भाययति', 'भायापेति', 'भायापयति' अशी रूपे होतात. สภุ สมฺภุ หึสายํ. สภติ. สมฺภติ. 'सभु' (sabhu) आणि 'सम्भु' (sambhu) हे धातू हिंसेच्या अर्थात आहेत. 'सभति', 'सम्भति'. สุมฺภ ภาสเน จ. จกาโร หึสาเปกฺขโก. สุมฺภติ. สุมฺโภ. กุสุมฺโภ. 'सुम्भ' (sumbha) धातू भाषणाच्या (बोलण्याच्या/प्रकाशण्याच्या) अर्थात देखील आहे. 'च' कार हा हिंसेच्या अपेक्षेने (भाषण आणि हिंसा दोन्ही अर्थांसाठी) आहे. 'सुम्भति', 'सुम्भो', 'कुसुम्भो'. เอตฺถ สุมฺโภติ อาวาโฏ. ‘‘สุมฺภํ นิกฺขนาหี’’ติ อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. กุสุมฺโภติ ขุทฺทกอาวาโฏ, ‘‘ปพฺพตกนฺทรปทรสาขาปริปูรา กุสุมฺเภ ปริปูเรนฺตี’’ติ อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. येथे 'सुम्भो' म्हणजे खड्डा (आवाट). "सुम्भं निक्खनाहि" (खड्डा खण) हे येथे उदाहरण आहे. 'कुसुम्भो' म्हणजे लहान खड्डा, "पब्बतकन्दरपदरसाखापरिपूरा कुसुम्भे परिपूरेन्ति" (पर्वतांच्या गुहा, दऱ्या आणि ओढे वाहून लहान खड्डे भरून काढतात) हे येथे उदाहरण आहे. อพฺภ วพฺภ มพฺภ คติยํ. อพฺภติ. อพฺโภ. วพฺภติ. มพฺภติ. 'अब्भ' (abbha), 'वब्भ' (vabbha) आणि 'मब्भ' (mabbha) हे धातू गतीच्या (गमनाच्या) अर्थात आहेत. 'अब्भति'. 'अब्भो' (ढग). 'वब्भति', 'मब्भति'. เอตฺถ อพฺโภติ เมโฆ. โส หิ อพฺภติ อเนกสตปฏโล หุตฺวา คจฺฉตีติ ‘‘อพฺโภ’’ติ วุจฺจติ. ‘‘วิชฺชุมาลี สตกฺกกู’’ติ วุตฺตํ. สตกฺกกูติ จ อเนกสตปฏโล. เอตฺถ จ อพฺภสทฺโท ติลิงฺคิโก ทฏฺฐพฺโพ. ตถา [Pg.126] หิ อยํ ‘‘อพฺภุฏฺฐิโตว ส ยาติ, ส คจฺฉํ น นิวตฺตตี’’ติ เอตฺถ ปุลฺลิงฺโค. ‘‘อพฺภา, มหิกา, ธูโม, รโช, ราหู’’ติ เอตฺถ อิตฺถิลิงฺโค. ‘‘อพฺภานิ จนฺทมณฺฑลํ ฉาเทนฺตี’’ติ เอตฺถ นปุํสกลิงฺโค. येथे 'अब्भो' म्हणजे मेघ (ढग). कारण तो अनेक शेकडो थरांचा (पटलांचा) होऊन जातो (अब्भति), म्हणून त्याला 'अब्भो' असे म्हणतात. "विज्जुमाली सतक्ककू" (विजांची माळ असलेला आणि शेकडो शिखरे/थर असलेला) असे म्हटले आहे. 'सतक्ककू' म्हणजे अनेक शेकडो थरांचा. आणि येथे 'अब्भ' शब्द तिन्ही लिंगांत (त्रिलिंगी) समजावा. जसे की, "अब्भुट्ठितोव स याति, स गच्छं न निवत्तति" (ढग वर उठून जातो, तो जाताना मागे फिरत नाही) यामध्ये तो पुल्लिंगी आहे. "अब्भा, महिका, धूमो, रजो, राहू" (ढग, धुके, धूर, धूळ, राहू) यामध्ये तो स्त्रीलिंगी ('अब्भा') आहे. "अब्भानि चन्दमण्डलं छादेन्ति" (ढग चंद्रमंडळाला झाकून टाकतात) यामध्ये तो नपुंसकलिंगी ('अब्भानि') आहे. อิมานิ ปน เมฆสฺส นามานิ – आणि ही मेघाची (ढगाची) नावे आहेत – เมโฆ วลาหโก ลงฺฆิ, ชีมูโต อมฺพุโท ฆโน; ธาราธโร อมฺพุธโร, ปชฺชุนฺโน หิมคพฺภโก. मेघो, वलाहको, लङ्घी, जीमूतो, अम्बुदो, घनो; धाराधरो, अम्बुधरो, पज्जुन्नो, हिमगब्भको. ยภ เมถุเน. มิถุนสฺส ชนทฺวยสฺส อิทํ กมฺมํ เมถูนํ, ตสฺมึ เมถุเน ยภธาตุ วตฺตติ. ยภติ. ยาภสฺสํ. 'यभ' (yabha) धातू मैथुन (लैंगिक संबंध) या अर्थात वापरला जातो. दोन व्यक्तींच्या (मिथुन) या क्रियेला 'मैथुन' म्हणतात, त्या मैथुन अर्थात 'यभ' धातू चालतो. 'यभति' (तो मैथुन करतो), 'याभस्सं' (मैथुन क्रिया). เอตฺถ จ ‘‘เมถุน’’นฺติ เอสา สพฺภิวาจา, ลชฺชาสมฺปนฺเนหิ ปุคฺคเลหิ วตฺตพฺพภาสาภาวโต. ตถา หิ ‘‘เมถุโน ธมฺโม น ปฏิเสวิตพฺโพ’’ติ จ ‘‘น เม ราชา สขา โหติ, น ราชา โหติ เมถุโน’’ติ จ โสภเน วาจาวิสเย อยํ ภาสา อาคตา. ‘‘ยภตี’’ติอาทิกา ปน ภาสา ‘‘สิขรณี’’ติอาทิกา ภาสา วิย อสมฺภิวาจา. น หิ หิโรตฺตปฺปสมฺปนฺโน โลกิยชโนปิ อีทิสึ วาจํ ภาสติ. เอวํ สนฺเตปิ อธิมตฺตุกฺกํสคตหิโรตฺตปฺโปปิ ภควา มหากรุณาย สญฺโจทิตหทโย โลกานุกมฺปาย ปริสมชฺเฌ อภาสิ. อโห ตถาคตสฺส มหากรุณาติ. आणि येथे 'मैथुन' हा सभ्य शब्द (सब्भिवाचा) आहे, कारण लज्जाशील व्यक्तींद्वारे बोलली जाणारी ही भाषा आहे. तसेच 'मैथुनो धम्मो न पटिसेवितब्बो' (मैथुन धर्माचे सेवन करू नये) आणि 'न मे राजा सखा होति, न राजा होति मेथुनो' (राजा माझा मित्र नाही आणि राजा माझा जोडीदार नाही) अशा प्रकारे सुंदर वचनव्यवहारात ही भाषा आली आहे. परंतु 'यभति' इत्यादी भाषा 'सिखरिणी' इत्यादी भाषेप्रमाणे असभ्य भाषा (असब्भिवाचा) आहे. कारण लज्जा आणि भय (हिरोत्तप्प) यांनी युक्त असलेला सामान्य संसारी माणूसही अशी भाषा बोलत नाही. असे असूनही, अत्यंत उत्कृष्ट लज्जा आणि भय (हिरोत्तप्प) असणारे भगवान, महाकरुणेने प्रेरित होऊन जगावरील अनुकंपेपोटी परिषदेच्या (सभेच्या) मध्यभागी असे बोलले. अहो! तथागतांची महाकरुणा! อิมานิ ปน เมถุนธมฺมสฺส นามานิ – ही मैथुनधर्माची (मैथुन क्रियेची) नावे आहेत – สํเวสนํ นิทฺธุวนํ, เมถุนํ สูรตํ รตํ; พฺยถโย คามธมฺโม จ, ยาภสฺสํ โมหนํ รติ. संवेसन, निद्धुवन, मैथुन, सुरत, रत, ब्यथय, गामधम्म (ग्रामधर्म), याभस्स, मोहन आणि रती. อสทฺธมฺโม จ วสล-ธมฺโม มีฬฺหสุขมฺปิ จ; ทฺวยํทฺวยสมาปตฺติ, ทฺวนฺโท คมฺโม’ทกนฺติโก. असद्धम्म (असद्धर्म), वसलधम्म (वृषलधर्म), मीळ्हसुख (मळसुख), द्वयंद्वयसमापत्ती, द्वंद्व, गम्म (ग्राम्य) आणि उदकांतिक. สิภ วิภ กตฺถเน. สิภติ. วิภติ. 'सिभ' (sibha) आणि 'विभ' (vibha) हे धातू बढाई मारणे (कत्थन) या अर्थात वापरले जातात. सिभति, विभति. เทภ [Pg.127] อภิ ทภิ สทฺเท. เทภติ. อมฺภติ. อมฺโภ. ทมฺภติ. 'देभ' (debha), 'अभि' (abhi) आणि 'दभि' (dabhi) हे धातू आवाजाच्या (सद्द) अर्थात वापरले जातात. देभति, अंभति, अंभो, दंभति. เอตฺถ จ อมฺโภ วุจฺจติ อุทกํ. ตญฺหิ นิชฺชีวมฺปิ สมานํ โอฆกาลาทีสุ วิสฺสนฺทมานํ อมฺภติ สทฺทํ กโรตีติ อมฺโภติ วุจฺจติ. आणि येथे 'अंभो' म्हणजे पाणी (उदक) म्हटले जाते. कारण ते निर्जीव असूनही पूर इत्यादी काळात वाहताना 'अंभति' असा आवाज करते, म्हणून त्याला 'अंभो' म्हटले जाते. อิมานิสฺส นามานิ – ही याची (पाण्याची) नावे आहेत – ปานียํ อุทกํ โตยํ, ชลํ ปาโต จ อมฺพุ จ; ทกํ กํ สลิลํ วาริ, อาโป อมฺโภ ปปมฺปิ จ. पानीय, उदक, तोय, जल, पात, अम्बु, दक, कं, सलिल, वारि, आपो, अंभो आणि प्रपा. นีรญฺจ เกปุกํ ปานิ, อมตํ เอลเมว จ,อาโปนามานิ เอตานิ, อาคตานิ ตโต ตโต. नीर, केपुक, पानि, अमत (अमृत) आणि एल. ही पाण्याची (आपो) नावे ठिकठिकाणच्या प्रयोगांतून आली आहेत. เอตฺถ จ ‘‘วาลคฺเคสุ จ เกปุเก. ปิวิตญฺจ เตสํ ภุสํ โหติ ปานี’’ติอาทโย ปโยคา ทสฺเสตพฺพา. आणि येथे 'वालग्गेसु च केपुके' आणि 'पिवितञ्च तेसं भुसं होति पानी' इत्यादी प्रयोग दाखवले पाहिजेत. ถภิ ขภิ ปฏิพทฺเธ ถมฺภติ, วิตฺถมฺภติ. ขมฺภติ, วิกฺขมฺภติ. ถมฺโภ. ถทฺโธ, อุปตฺถมฺโภ. อุปตฺถมฺภินี. วิกฺขมฺโภ. วิกฺขมฺภิตกิเลโส. 'थभि' (thabhi) आणि 'खभि' (khabhi) हे धातू अडथळा किंवा बंध (पटिबद्ध) या अर्थात वापरले जातात. थंभति, वित्थंभति. खंभति, विक्खंभति. थंभो (खांब/स्तंभ), थद्धो (स्तब्ध/कठोर), उपत्थंभो (आधार/उपस्तंभ), उपत्थंभिनी, विक्खंभो (विक्षंभ/दडपशाही), विक्खंभितकिलेसो (दडपून टाकलेले क्लेश). ชภ ชภิ คตฺตวินาเม. ชภติ. ชมฺภติ, วิชมฺภติ. วิชมฺภนํ, วิชมฺภิตา. วิชมฺภนฺโต, วิชมฺภมาโน, วิชมฺภิโต. 'जभ' (jabha) आणि 'जभि' (jabhi) हे धातू आळस देणे किंवा अंग ताणणे (गत्तविनाम) या अर्थात वापरले जातात. जभति, जंभति, विजंभति. विजंभनं (जांभई देणे/अंग ताणणे), विजंभिता, विजंभंतो, विजंभमानो, विजंभितो. สพฺภ กถเน. สพฺภติ. 'सब्भ' (sabbha) धातू बोलणे (कथन) या अर्थात वापरला जातो. सब्भति. วพฺภ โภชเน. วพฺภติ. 'वब्भ' (vabbha) धातू भोजन करणे (खाणे) या अर्थात वापरला जातो. वब्भति. คพฺภ ธารเณ. คพฺภติ. คพฺโภ. 'गब्भ' (gabbha) धातू धारण करणे या अर्थात वापरला जातो. गब्भति, गब्भो (गर्भ/गर्भाशय/खोली). เอตฺถ คพฺโภติ มาตุกุจฺฉิปิ วุจฺจติ กุจฺฉิคตปุตฺโตปิ. ตถา หิ ‘‘ยเมกรตฺตึ ปฐมํ, คพฺเภ วสติ มาณโว’’ติ เอตฺถ มาตุกุจฺฉิ ‘‘คพฺโภ’’ติ วุจฺจติ. ‘‘คพฺโภ เม เทว ปติฏฺฐิโต. คพฺโภ จ ปติโต ฉมา’’ติ จ เอตฺถ ปน กุจฺฉิคตปุตฺโต. อปิจ คพฺโภติ อาวาสวิเสโส. ‘‘คพฺภํ [Pg.128] ปวิฏฺโฐ’’ติอาทีสุ หิ โอวรโก ‘‘คพฺโภ’’ติ วุจฺจติ. येथे 'गब्भ' (गर्भ) म्हणजे मातेचे गर्भाशय (मातुकुच्छि) देखील म्हटले जाते आणि गर्भातील मूल (कुच्छिगतपुत्त) देखील. जसे की, 'यमेकरत्तिं पठमं, गब्भे वसति माणवो' (माणवक पहिल्या एका रात्रीसाठी गर्भात राहतो) येथे मातेच्या गर्भाशयाला 'गब्भ' म्हटले आहे. 'गब्भो मे देव पतिट्ठितो' (हे देवा, माझा गर्भ प्रस्थापित झाला आहे) आणि 'गब्भो च पतितो छमा' (आणि गर्भ जमिनीवर पडला) येथे गर्भातील मूल अभिप्रेत आहे. शिवाय, 'गब्भ' म्हणजे एक विशिष्ट निवासस्थान (खोली) देखील आहे. 'गब्भं पविट्ठो' (खोलीत प्रवेश केला) इत्यादींमध्ये आतील खोलीला (ओवरक) 'गब्भ' म्हटले जाते. รภ ราภสฺเส. อาปุพฺโพ รภ หึสากรณวายมเนสุ. ราภสฺสํ ราภสภาโว. ตํสมงฺคิโน ปน ปาฬิยํ ‘‘จณฺฑา รุทฺธา รภสา’’ติ เอวํ อาคตา. 'रभ' (rabha) धातू वेगाने किंवा हिंसेने काम करणे (राभस्य) या अर्थात वापरला जातो. 'आ' उपसर्ग लागून (आरभ) हा धातू हिंसा करणे आणि प्रयत्न करणे या अर्थात वापरला जातो. 'राभस्सं' म्हणजे उग्रता किंवा वेगवान भाव (राभसभाव). त्या गुणाने युक्त असलेल्या व्यक्तींसाठी पाळीमध्ये 'चण्डा रुद्धा रभसा' (उग्र, क्रूर आणि वेगवान) असे आले आहे. ตตฺถ รภสาติ กรณุตฺตริยา. รภติ, อารภติ, สมารภติ, อารมฺภติ. รภโส. อารมฺโภ. สมารมฺโภ, อารภนฺโต. สมารภนฺโต. อารทฺธํ เม วีริยํ. สารมฺภํ. อนารมฺภํ. สารมฺโภ เต น วิชฺชติ. ปการณารมฺโภ. วีริยารมฺโภ. อารภิตุํ. อารภิตฺวา. อารพฺภ. तेथे 'रभसा' म्हणजे कार्यात अतिशय तत्पर असणारे (करणुत्तरीया). रभति, आरभति, समारभति, आरंभति. रभसो. आरंभो. समारंभो, आरभंतो. समारभंतो. आरद्धं मे वीरियं (माझा वीर्य/प्रयत्न सुरू झाला आहे). सारंभं (सक्रोध/सहिंस). अनारंभं. सारंभो ते न विज्जति (तुझ्यात क्रोध/हिंसा आढळत नाही). पकारणारंभो (प्रकरणाचा आरंभ). वीरियारंभो (वीर्यारंभ/प्रयत्नाचा आरंभ). आरभितुं, आरभित्वा, आरब्भ. เอตฺถ วีริยารมฺโภติ วีริยสงฺขาโต อารมฺโภ. อารมฺภสทฺโท กมฺเม อาปตฺติยํ กฺริยาย วีริเย หึสาย วิโกปเนติ อเนเกสุ อตฺเถสุ อาคโต. येथे 'वीरियारंभो' म्हणजे वीर्य (प्रयत्न) नावाचा आरंभ होय. 'आरंभ' शब्द कर्म, आपत्ती (नियमभंग), क्रिया, वीर्य (प्रयत्न), हिंसा आणि विकोपन (नाश/अडथळा) अशा अनेक अर्थांमध्ये आला आहे. ‘‘ยํ กิญฺจิ ทุกฺขํ สมฺโภภิ, สพฺพํ อารมฺภปจฺจยา; อารมฺภานํ นิโรเธน, นตฺถิ ทุกฺขสฺส สมฺภโว’’ติ 'जे काही दुःख उत्पन्न होते, ते सर्व आरंभाच्या (कर्माच्या) प्रत्ययाने (कारणाने) होते; आरंभाच्या निरोधाने दुःखाची उत्पत्ती होत नाही.' เอตฺถ หิ กมฺมํ อารมฺโภติ อาคตํ. ‘‘อารมฺภติ จ วิปฺปฏิสารี จ โหตี’’ติ เอตฺถ อาปตฺติ. ‘‘มหายญฺญา มหารมฺภา, น เต โหนฺติ มหปฺผลฺลา’’ติ เอตฺถ ยูปุสฺสาปนาทิกฺริยา. ‘‘อารมฺภถ นิกฺกมถ, ยุญฺชถ พุทฺธสาสเน’’ติ เอตฺถ วีริยํ. ‘‘สมณํ โคตมํ อุทฺทิสฺส ปาณํ อารมฺภนฺตี’’ติ เอตฺถ หึสา. ‘‘พีชคามภูตคามสมารมฺภา ปฏิวิรโต โหตี’’ติ เอตฺถ เฉทนภญฺชนาทิกํ วิโกปนํ. อิจฺเจวํ – येथे 'आरंभ' म्हणजे कर्म असा अर्थ आला आहे. 'आरंभति च विप्पटिसारी च होति' (तो गुन्हा करतो आणि पश्चात्ताप करतो) येथे 'आपत्ती' (नियमभंग) असा अर्थ आहे. 'महायञ्ञा महारंभा, न ते होन्ति महप्फला' (मोठे यज्ञ आणि मोठे आरंभ, ते महाफळ देणारे नसतात) येथे यूप (यज्ञस्तंभ) उभारणे इत्यादी क्रिया अभिप्रेत आहेत. 'आरंभथ निक्कमथ, युञ्जथ बुद्धसासने' (आरंभ करा, बाहेर पडा, बुद्धशासनात युक्त व्हा) येथे 'वीर्य' (प्रयत्न) असा अर्थ आहे. 'समणं गोतमं उद्दिस्स पाणं आरंभन्ति' (श्रमण गोतमांच्या उद्देशाने प्राण्यांची हिंसा करतात) येथे 'हिंसा' असा अर्थ आहे. 'बीजगामभूतगामसमारंभा पटिविरतो होति' (बीजसमूह आणि वनस्पतीसमूहाच्या विनाशापासून तो अलिप्त राहतो) येथे तोडणे, मोडणे इत्यादी 'विकोपन' (नुकसान करणे) अभिप्रेत आहे. अशा प्रकारे – กมฺเม [Pg.129] อาปตฺติยญฺเจว, วีริเย หึสากฺริยาสุ จ; วิโกปเน จ อารมฺภ-สทฺโท โหตีติ นิทฺทิเส; कर्म, आपत्ती, वीर्य, हिंसा, क्रिया आणि विकोपन (नाश) या अर्थांमध्ये 'आरंभ' शब्द वापरला जातो, असे निर्देश करावेत. ลภ ลาเภ. ลภติ, ลพฺภติ. ลาโภ, ลทฺธํ, อลตฺถ, อลตฺถุํ. 'लभ' (labha) धातू मिळणे किंवा लाभ होणे (लाभ) या अर्थात वापरला जातो. लभति, लब्भति. लाभो, लद्धं, अलत्थ, अलत्थुं. สุภ ทิตฺติยํ. โสภติ. โสภา, โสภนํ, โสภิโต. 'सुभ' (subha) धातू शोभून दिसणे किंवा चमकणे (दित्ती) या अर्थात वापरला जातो. सोभति. सोभा, सोभनं, सोभितो. ขุภ สญฺจลเน. โขภติ, สงฺโขภติ. หตฺถินาเค ปทินฺนมฺหิ, ขุพฺภิตฺถ นครํ ตทา. โขภา, สงฺโขโภ. 'खुभ' (khubha) धातू हलणे किंवा क्षुब्ध होणे (संचलन) या अर्थात वापरला जातो. खोभति, संखोभति. 'हत्थिनागे पदिन्नम्हि, खुब्भित्थ नगरं तदा' (जेव्हा हत्ती दान दिला गेला, तेव्हा नगर क्षुब्ध झाले). खोभा, संखोभो. นภ ตุภ หึสายํ. นภติ. ตุภติ. 'नभ' (nabha) आणि 'तुभ' (tubha) हे धातू हिंसा करणे या अर्थात वापरले जातात. नभति, तुभति. สมฺภ วิสฺสาเส. สมฺภติ. สมฺภตฺติ, สมฺภตฺโต. 'संभ' (sambha) धातू विश्वास ठेवणे (विस्सास) या अर्थात वापरला जातो. संभति. संभत्ति, संभत्तो. ลุภ วิโมหเน. โลภติ, ปโลภติ. ถุลฺลกุมารีปโลภนํ. การิเต ปน ‘‘โลเภติ, ปโลเภติ, ปโลเภตฺวา’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. ทิวาทิคณํ ปน ปตฺวา คิทฺธิยตฺเถ ‘‘ลุพฺภตี’’ติ รูปํ ภวติ. 'लुभ' (lubha) धातू मोहात पाडणे किंवा प्रलोभित करणे (विमोहन) या अर्थात वापरला जातो. लोभति, पलोभति. 'थुल्लकुमारीपलोभनं' (तरुण मुलीला प्रलोभित करणे). प्रयोजक (कारित) रूपात 'लोभेति, पलोभेति, पलोभेत्वा' अशी रूपे होतात. दिवादिगणात गेल्यावर लोभ धरण्याच्या (गिद्धि) अर्थात 'लुब्भति' असे रूप होते. ทภิ คนฺถเน. ทมฺภติ. ทมฺภนํ. 'दभि' (dabhi) धातू गुंफणे किंवा बांधणे (गंथन) या अर्थात वापरला जातो. दंभति. दंभनं. รุภิ นิวารเณ. รุมฺภติ, สนฺนิรุมฺภติ. สนฺนิรุมฺโภ, สนฺนิรุมฺภิตฺวา. 'रुभि' (rubhi) धातू रोखणे किंवा अडवणे (निवारण) या अर्थात वापरला जातो. रुंभति, संनिरुंभति. संनिरुंभो, संनिरुंभित्वा. อุภ อุพฺภ อุมฺภ ปูรเณ. อุภติ. อุพฺภติ. อุมฺภติ. อุภนา. อุพฺภนา. อุมฺภนา. โอโภ. เกฏุภํ. อุพฺภํ. กุมฺโภ. กุมฺภี. การิเต ‘‘โอเภติ. อุพฺเภติ. อุมฺเภตี’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. 'उभ' (ubha), 'उब्भ' (ubbha) आणि 'उम्भ' (umbha) हे धातू भरून काढणे (पूरण) या अर्थात वापरले जातात. उभति, उब्भति, उम्भति. उभना, उब्भना, उम्भना. ओभो, केटुभं, उब्भं, कुंभो, कुंभी. प्रयोजक (कारित) रूपात 'ओभेति, उब्भेति, उम्भेति' अशी रूपे होतात. ตตฺถ เกฏุภนฺติ กฺริยากปฺปวิกปฺโป กวีนํ อุปการิยสตฺถํ. อิทํ ปเนตฺถ นิพฺพจนํ กิเฏติ คเมติ กฺริยาทิวิภาคํ, ตํ วา อนวเสสปริยาทานโต เกเฏนฺโต คเมนฺโต โอเภติ ปูเรตีติ เกฏุตํ กิฏอุภธาตุวเสน. อุพฺภติ อุพฺเภติ [Pg.130] ปูเรตีติ อุพฺภํ, ปูรณนฺติ อตฺโถ. จริยาปิฏเกปิ หิ อีทิสี สทฺทคติ ทิสฺสติ, ตํ ยถา? ‘‘มหาทานํ ปวตฺเตสิ, อจฺจุพฺภํ สาครูปม’’นฺติ. ตตฺถ จ อจฺจุพฺภนฺติ อติวิย ยาจกานํ อชฺฌาสยํ ปูรณํ. อกฺขุมฺภนฺติปิ ปาโฐ. กุมฺโภติ กํ วุจฺจติ อุทกํ, เตน อุพฺเภตพฺโพติ กุมฺโภ, โส เอว อิตฺถิลิงฺควเสน กุมฺภี. เอตฺถ จ ‘‘กุมฺภี โธวติ โอนโต’’ติ ปโยโค. तेथे 'केटुभं' म्हणजे कवींना उपयुक्त असणारे क्रियाकल्प-विकल्पाचे शास्त्र (काव्यशास्त्र/विधीशास्त्र) होय. याची व्युत्पत्ती अशी आहे – 'किटति' म्हणजे क्रिया इत्यादींचे वर्गीकरण स्पष्ट करतो, किंवा ते पूर्णपणे व्यापून (ओभेति/पूरेति) स्पष्ट करतो म्हणून 'किट' आणि 'उभ' धातूंच्या योगाने 'केटुतं' बनते. 'उब्भति' किंवा 'उब्भेति' म्हणजे भरणे, म्हणून 'उब्भं' म्हणजे भरणे (पूरण) असा अर्थ आहे. चरियापिटकातही अशी शब्दरचना आढळते, जसे की – 'महादानं पवत्तेसि, अच्चुब्भं सागरूपमं' (त्याने समुद्रासारखे अत्यंत तृप्त करणारे/भरून काढणारे महादान दिले). तेथे 'अच्चुब्भं' म्हणजे याचकांच्या इच्छेची अत्यंत तृप्ती करणे (पूर्ण करणे) होय. 'अक्खुंभन्ति' असाही पाठ आढळतो. 'कुंभो' (घडा) – 'कं' म्हणजे पाणी म्हटले जाते, ज्याच्याद्वारे ते भरले जाते तो 'कुंभो', आणि तोच स्त्रीलिंगी रूपात 'कुंभी' होतो. येथे 'कुंभी धोवति ओनतो' (वाकून घडा धुते) असा प्रयोग आहे. กุมฺภสทฺโท ฆเฏ หตฺถิ-สิโรปิณฺเฑ ทสมฺพเณ; ปวตฺตตีติ วิญฺเญยฺโย, วิญฺญุนา นยทสฺสินา. कुंभ हा शब्द घट (मातीचा घडा), हत्तीच्या मस्तकाचा उंचवटा (हत्ती-शिरोपिंड) आणि दहा छिद्रे (किंवा दहा व्रण) या अर्थांमध्ये वापरला जातो; हे नय (पद्धती) जाणणाऱ्या विद्वानाने समजून घ्यावे. ภการนฺตธาตุรูปานิ. भ-कारान्त धातूंची रूपे. มการนฺตธาตุ म-कारान्त धातू. มา มาเน สทฺเท จ. มาติ. มาตา. เอตฺถ มาตาติ ชนิกา วา จูฬมาตา วา มหามาตา วา. मा (mā) हा धातू मोजणे (मान) आणि आवाज (शब्द) या अर्थांत आहे. 'माति' (māti), 'माता' (mātā). येथे 'माता' म्हणजे जन्मदात्री (जनिका) किंवा लहान आई (चुळमाता - मावशी/काकी) किंवा मोठी आई (महामाता) होय. มู พนฺธเน. มวติ. กิยาทิคณสฺส ปนสฺส ‘‘มุนาตี’’ติ รูปํ. मू (mū) हा धातू बांधणे (बंधन) या अर्थात आहे. 'मवति' (mavati). क्रियादिगणाचा (कियादिगण) असल्यास याचे रूप 'मुनाति' (munāti) असे होते. เม ปฏิทานอาทาเนสุ. เมติ, มยติ. เมธา. मे (me) हा धातू देवाणघेवाण (प्रतिदान आणि आदान) या अर्थांत आहे. 'मेति' (meti), 'मयति' (mayati). 'मेधा' (medhā). เอตฺถ เมธาติ ปญฺญา. สา หิ สุขุมมฺปิ อตฺถํ ธมฺมญฺจ ขิปฺปเมว เมติ จ ธาเรติ จาติ เมธาติ วุจฺจติ. เอตฺถ ปน เมตีติ คณฺหาติ. ตถา หิ อฏฺฐสาลินิยํ วุตฺตํ ‘‘อสนิ วิย สิลุจฺจเย กิเลเส เมธติ หึสตีติ เมธา, ขิปฺปํ คหณธารณฏฺเฐน วา เมธา’’ติ. สงฺคมตฺถวาจกสฺส ปน เมธธาตุสฺส วเสน เมธติ สีลสมาธิอาทีหิ สทฺธมฺเมหิ สิริยา จ สงฺคจฺฉตีติ เมธาติ อตฺโถ คเหตพฺโพ. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – येथे 'मेधा' म्हणजे प्रज्ञा (paññā). ती सूक्ष्म अर्थ आणि धम्म देखील अत्यंत वेगाने ग्रहण करते (मेति) आणि धारण करते (धारेति), म्हणून तिला 'मेधा' म्हटले जाते. येथे 'मेति' म्हणजे ग्रहण करणे (गण्हाति). तसे अट्ठसालिनीमध्ये म्हटले आहे: 'ज्याप्रमाणे पर्वतावर पडणारी वीज, त्याप्रमाणे जी क्लेशांचा नाश करते (मेधति/हिंसति) ती 'मेधा' होय, किंवा वेगाने ग्रहण व धारण करण्याच्या अर्थाने ती 'मेधा' होय.' संघटन (संगम) अर्थाचा वाचक असलेल्या 'मेध' धातूच्या संदर्भाने, जी शील, समाधी इत्यादी सद्धम्मांशी आणि समृद्धीशी (सिरि) जोडली जाते, ती 'मेधा' असा अर्थ घ्यावा. याविषयी असे म्हटले आहे – ‘‘ทฺวิธาตุเยกธาตุยา[Pg.131], ทฺวิรตฺถวติยาปิ จ; เมธาสทฺทสฺส นิปฺผตฺตึ, ชญฺญา สุคตสาสเน’’ติ. 'सुगत शासनात (बुद्धांच्या शिकवणीत) दोन धातूंपासून किंवा एका धातूपासून, आणि दोन अर्थांनी देखील 'मेधा' शब्दाची उत्पत्ती जाणावी.' โอมา สามตฺถิเย. สามตฺถิยํ สมตฺถภาโว. อลุตฺตนฺโตยํ ธาตุ, โอมาติ, โอมนฺติ. ओमा (omā) हा धातू सामर्थ्य (सामत्थिय) या अर्थात आहे. सामर्थ्य म्हणजे समर्थ असणे (समत्थभावो). हा धातू लोप न पावणारा (अलुत्तन्त) आहे, 'ओमाति' (omāti), 'ओमान्ति' (omanti). อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘โอมาติ ภนฺเต ภควา อิทฺธิยา มโนมเยน กาเยน พฺรหฺมโลกํ อุปสงฺกมิตุ’’นฺติ. ตตฺถ โอมาตีติ ปโหติ สกฺโกติ. यावर ही पाळी (पाठांतर) आहे: 'भन्ते, भगवान आपल्या ऋद्धीने (iddhiyā) मनोमय कायेने ब्रह्मलोकात जाण्यास समर्थ (ओमाति) आहेत काय?' तेथे 'ओमाति' म्हणजे समर्थ असणे (पहोति), शक्य असणे (सक्कोति). ติมุ อทฺทภาเว. อทฺทภาโว ตินฺตภาโว. เตมติ. ตินฺโต, เตมิโย. เตมิตุกามา เตมึสุ. तिमु (timu) हा धातू ओलेपणा (अद्दभाव) या अर्थात आहे. अद्दभाव म्हणजे ओलेणे (तिन्तभाव). 'तेमति' (temati). 'तिन्तो' (tinto), 'तेमियो' (temiyo). 'तेमितुकामा' (temitukāmā), 'तेमिसु' (temiṃsu). เอตฺถ เตมิโยติ เอวํนามโก กาสิรญฺโญ ปุตฺโต โพธิสตฺโต. โส หิ รญฺโญ เจว มหาชนสฺส จ หทยํ เตเมนฺโต อทฺทภาวํ ปาเปนฺโต สีตลภาวํ ชเนนฺโต ชาโตติ ‘‘เตมิโย’’ติ วุจฺจติ. येथे 'तेमियो' (temiyo) हे नाव काशीच्या राजाचा पुत्र असलेल्या बोधिसत्त्वाचे आहे. कारण ते राजाच्या आणि महाजनतेच्या (लोकांच्या) हृदयाला आर्द्र (तेमेन्तो - मऊ/आनंदित) करत, त्यांना ओलेपणा (सौम्यता) प्राप्त करून देत आणि शीतलता निर्माण करत जन्माला आले, म्हणून त्यांना 'तेमियो' असे म्हटले जाते. นิตมิ กิลมเน. นิตมฺมติ. หทยํ ทยฺหเต นิตมฺมามิ. नि-तमि (ni-tami) हा धातू थकणे किंवा ग्लानी येणे (किलमन) या अर्थात आहे. 'नितम्मति' (nitammati). 'हृदय जळत आहे, मी ग्लानी पावत आहे (नितम्मामि).' จมุ ฉมุ ชปุ ฌมุ อุมุ ชิมุ อทเน. จมติ. จมู. จมูติ เสนา. ฉมติ. ชมติ. ฌมติ. อุมติ. เชมติ. चमु (camu), छमु (chamu), जपु (japu), झमु (jhamu), उमु (umu), जिमु (jimu) हे धातू खाणे (अदन) या अर्थात आहेत. 'चमति' (camati). 'चमू' (camū). 'चमू' म्हणजे सेना. 'छमति' (chamati). 'जमति' (jamati). 'झमति' (jhamati). 'उमति' (umati). 'जेमति' (jemati). กมุ ปทวิกฺเขเป. ปทวิกฺเขโป ปทสา คมนํ. อิทํ ปน โวหารสีสมตฺตํ วจนํ, ตสฺมา ‘‘นาสฺส กาเย อคฺคิ วา วิสํ วา สตฺถํ วา กมตี’’ติอาทีสุ อปทวิกฺเขปตฺโถปิ คเหตพฺโพ. กมติ. จงฺกมติ, อติกฺกมติ. อภิกฺกมติ. ปฏิกฺกมติ. ปกฺกมติ. ปรกฺกมติ. วิกฺกมติ. นิกฺกมติ. สงฺกมติ. สงฺกมนํ. สงฺกนฺติ. กมนํ. จงฺกมนํ. อติกฺกโม. อภิกฺกโม. ปฏิกฺกโม. ปกฺกโม. วิกฺกโม. นิกฺกโม. อติกฺกนฺโต ปุริโส. อภิกฺกนฺตา รตฺติ. นิกฺขมติ. อภินิกฺขมติ. การิเต [Pg.132] นิกฺขาเมติ. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. ยสฺมา ปนายํ ธาตุ จุราทิคณํ ปตฺวา อิจฺฉากนฺติ ยตฺเถสุ วตฺตติ, ตสฺมา เตปิ อตฺเถ อุปสคฺควิเสสิเต กตฺวา อิธ อภิกฺกนฺตสทฺทสฺส อตฺถุทฺธารํ วตฺตพฺพมฺปิ อวตฺวา อุปริ จุราทิคเณเยว กเถสฺสาม. कमु (kamu) हा धातू पाऊल टाकणे (पदविक्खेप) या अर्थात आहे. पदविक्खेप म्हणजे पायाने चालणे. परंतु हे केवळ व्यवहारातील मुख्य वचन आहे, म्हणून 'त्याच्या शरीरावर अग्नी, विष किंवा शस्त्र प्रभाव पाडत नाही (कमति)' इत्यादी वाक्यांमध्ये पाऊल टाकण्याव्यतिरिक्त इतर अर्थ देखील घ्यावा. 'कमति' (kamati). 'चङ्कमति' (caṅkamati - ये-जा करणे), 'अतिक्कमति' (atikkamati - ओलांडणे). 'अभिक्कमति' (abhikkamati - पुढे जाणे). 'पटिक्कमति' (paṭikkamati - मागे फिरणे). 'पक्कमति' (pakkamati - निघून जाणे). 'परक्कमति' (parakkamati - पराक्रम करणे/प्रयत्न करणे). 'विक्कमति' (vikkamati - पाऊल टाकणे/पराक्रम करणे). 'निक्कमति' (nikkamati - बाहेर पडणे). 'सङ्कमति' (saṅkamati - संक्रमण करणे). 'सङ्कमनं' (saṅkamanaṃ - संक्रमण/पूल). 'सङ्कन्ति' (saṅkanti - संक्रमण). 'कमनं' (kamanaṃ - चालणे). 'चङ्कमनं' (caṅkamanaṃ - चंक्रमण/फिरण्याची जागा). 'अतिक्कमो' (atikkamo - उल्लंघन). 'अभिक्कमो' (abhikkamo - पुढे जाणे). 'पटिक्कमो' (paṭikkamo - माघार). 'पक्कमो' (pakkamo - प्रस्थान). 'विक्कमो' (vikkamo - पराक्रम). 'निक्कमो' (nikkamo - निष्क्रमण). 'अतिक्कन्तो पुरिसो' (अतिक्रांत झालेला मनुष्य). 'अभिक्कन्ता रत्ति' (रात्र संपत आलेली किंवा सुंदर रात्र). 'निक्खमति' (nikkhamati - बाहेर पडणे). 'अभिनिक्खमति' (abhinikkhamati - महाभिनिष्क्रमण करणे). प्रयोजक रूपात (कारित) 'निक्खामेति' (nikkhāmeti) असे होते. इतर रूपे देखील अशीच जोडावीत. परंतु, जेव्हा हा धातू चुरादिगणात जातो, तेव्हा तो इच्छा आणि कांती (चकाकी/सौंदर्य) या अर्थांत वापरला जातो, म्हणून उपसर्गांच्या वैशिष्ट्यामुळे ते अर्थ येथे 'अभिक्कान्त' शब्दाच्या अर्थ-स्पष्टीकरणासह सांगणे आवश्यक असले तरी, ते येथे न सांगता पुढे चुरादिगणातच सांगू. ยมุ อุปรเม. อุปรโม วิรมนํ. ยมภิ. ยโม. ‘‘ปเร จ น วิชานนฺติ, มยเมตฺถ ยมามเส’’ติ อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. ตตฺถ ยมามเสติ อุปรมาม, นสฺสาม, มรามาติ อตฺโถ. यमु (yamu) हा धातू थांबणे (उपरम) या अर्थात आहे. उपरम म्हणजे विरती किंवा थांबणे (विरमन). 'यमभि' (yamabhi). 'यमो' (yamo). 'इतर लोक हे जाणत नाहीत की, आपण येथे नष्ट होणार आहोत (यमामसे)' हे याचे उदाहरण आहे. तेथे 'यमामसे' (yamāmase) म्हणजे आपण थांबतो (उपरमाम), नष्ट होतो (नस्साम), किंवा मरतो (मराम) असा अर्थ आहे. นม พหุตฺเต สทฺเท. พหุตฺโต สทฺโท นาม อุคฺคตสทฺโท. นมติ. नम (nama) हा धातू मोठ्या आवाजात (बहुत्ते सद्दे) या अर्थात आहे. बहुत्त शब्द म्हणजे मोठा किंवा वर उठलेला आवाज (उग्गतसद्do). 'नमति' (namati). อม ทม หมฺม มิม ฉม คติมฺหิ. อมติ. ทมติ. หมฺมติ. มิมติ. ฉมติ. ฉมา. अम (ama), दम (dama), हम्म (hamma), मिम (mima), छम (chama) हे धातू गती (गति) या अर्थात आहेत. 'अमति' (amati). 'दमति' (damati). 'हम्मति' (hammati). 'मिमति' (mimati). 'छमति' (chamati). 'छमा' (chamā). ฉมาติ ปถวี. ฉมาสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค ทฏฺฐพฺโพ, ‘‘น ฉมายํ นิสีทิตฺวา อาสเน นิสินฺนสฺส อคิลานสฺส ธมฺมํ เทเสสฺสามีติ สิกฺขา กรณียา’’ติ จ ‘‘ฉมายํ ปริวตฺตามิ วาริจโรว ฆมฺเม’’ติ จ ปโยคทสฺสนโต. โส จ โข สตฺตหิ อฏฺฐหิ วา วิภตฺตีหิ ทฺวีสุ จ วจเนสุ โยเชตพฺโพ. ฉมนฺติ คจฺฉนฺติ เอตฺถาติ ฉมา. 'छमा' (chamā) म्हणजे पृथ्वी (पथवी). 'छमा' शब्द स्त्रीलिंगी समजावा, कारण 'मी जमिनीवर बसून, आसनावर बसलेल्या निरोगी व्यक्तीला धम्म देशना करणार नाही, असा नियम पाळला पाहिजे' आणि 'मी उन्हात माशासारखा जमिनीवर लोळत आहे' अशा प्रयोगांवरून हे दिसून येते. आणि तो सात किंवा आठ विभक्तींमध्ये आणि दोन्ही वचनांमध्ये योजला जावा. ज्याच्यावर लोक चालतात (छमन्ति/गच्छन्ति) ती 'छमा' होय. ธม สทฺทคฺคิสํ โยเคสุ. ธมธาตุ สทฺเท จ มุขวาเตน สทฺธึ อคฺคิสํโยเค จ วตฺตติ. ตตฺถ ปฐมตฺเถ ‘‘สงฺขํ ธมติ. สงฺขธมโก. เภรึ ธมติ. เภริธมโก. ธเม ธเม นาติธเม’’ติ ปโยโค. ทุติยตฺเถ ‘‘อคฺคึ ธมติ. สมุฏฺฐาเปติ อตฺตานํ, อณุํ อคฺคึว สนฺธม’’นฺติ ปโยโค. धम (dhama) हा धातू आवाज आणि अग्नीचा संयोग (सद्दग्गिसंयोग) या अर्थांत आहे. 'धम' धातू आवाजाच्या अर्थात आणि मुखाच्या हवेने अग्नी पेटवण्याच्या (अग्नीशी संयोग करण्याच्या) अर्थात वापरला जातो. तेथे पहिल्या अर्थात: 'शंख वाजवतो (सङ्खं धमति). शंख वाजवणारा (सङ्खधमको). भेरी वाजवतो (भेरिं धमति). भेरी वाजवणारा (भेरिधमको). वाजव, वाजव, पण जास्त वाजवू नकोस (धमे धमे नातिधमे)' असा प्रयोग होतो. दुसऱ्या अर्थात: 'अग्नी फुंकतो/पेटवतो (अग्गिं धमति). स्वतःला जागृत करतो, लहान अग्नी फुंकून पेटवल्याप्रमाणे (समुट्ठापेति अत्तानं, अणं अग्गिं व संधमं)' असा प्रयोग होतो. ภาม โกเธ. ภามติ. भाम (bhāma) हा धातू क्रोधाच्या (कोध) अर्थात आहे. 'भामति' (bhāmati). นมุ [Pg.133] นมเน. นมติ. นโม. นตํ, นมนํ. นติ. นมํ. นมมาโน. นมนฺโต. นมิโต. นามํ. นามิตํ. นมิตุํ. นตฺวา, นตฺวาน. นมิตฺวา, นมิตฺวาน, นมิตุน. การิเต ‘‘นาเมติ, นามยติ. นาเมตฺวา. นามยิตฺวา’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. ตตฺร หิ ‘‘นมติ นมิตฺวา’’ติ เอวํปการานิ ปทานิ นมนตฺเถ วนฺทนายญฺจ ทฏฺฐพฺพานิ, ‘‘นโม นตฺวา’’ติ เอวํปการานิ ปน วนฺทนายเมว. อตฺรายมุปลกฺขณมตฺตา ปโยครจนา – नमु (namu) हा धातू नम्र होणे किंवा वाकणे (नमन) या अर्थात आहे. 'नमति' (namati). 'नमो' (namo). 'नतं' (nataṃ), 'नमनं' (namanaṃ). 'नति' (nati). 'नमं' (namaṃ). 'नममानो' (namamāno). 'नमन्तो' (namanto). 'नमितो' (namito). 'नामं' (nāmaṃ). 'नामितं' (nāmitaṃ). 'नमितुं' (namituṃ). 'नत्वा' (natvā), 'नत्वान' (natvāna). 'नमित्वा' (namitvā), 'नमित्वान' (namitvāna), 'नमितुन' (namituna). प्रयोजक रूपात (कारित) 'नामेति' (nāmeti), 'नामयति' (nāmayati), 'नामेत्वा' (nāmetvā), 'नामयित्वा' (nāmayitvā) अशी रूपे होतात. तेथे 'नमति', 'नमित्वा' यांसारखे शब्द वाकणे आणि वंदन करणे या दोन्ही अर्थांत पाहिले पाहिजेत, तर 'नमो', 'नत्वा' यांसारखे शब्द केवळ वंदनाच्याच अर्थात वापरले जातात. यावर उदाहरणादाखल ही वाक्यरचना आहे – รุกฺโข ผลี ผลภารครุตาย นมิตฺวาน ภิชฺชติ; วุทฺโธ ชราชชฺชรตาย นมติ นมิตฺวา คจฺฉติ; สทฺโธ พุทฺธํ นมติ นมิตฺวา คจฺฉติ; นโม พุทฺธสฺส สตฺถารํ นตฺวาน อคมาสีติ; फळांनी लगडलेले झाड फळांच्या वजनाने वाकून (नमित्वान) मोडते; वृद्ध मनुष्य म्हातारपणामुळे वाकतो (नमति) आणि वाकून (नमित्वा) चालतो; श्रद्धावान मनुष्य बुद्धांना वंदन करतो (नमति) आणि वंदन करून (नमित्वा) जातो; बुद्धांना नमस्कार असो (नमो बुद्धस्स), शास्त्याला वंदन करून (नत्वान) तो गेला; เอตฺถ นโมติ ปทํ นิปาเตสุปิ ลพฺภติ. เตน หิ ปจฺจตฺโตปโยควจนานิ อภินฺนรูปานิ ทิสฺสนฺติ ‘‘เทวราช นโม ตฺยตฺถุ. นโม กตฺวา มเหสิโน’’ติ. อุปสคฺเคหิปิ อยํ โยเชตพฺพา ‘‘ปณมติ, ปณาโม, อุณฺณมติ, อุณฺณติ’’ อิจฺจาทินา. येथे 'नमो' हा शब्द अव्ययांमध्ये (निपात) देखील आढळतो. त्यामुळे प्रथमा आणि द्वितीया विभक्तीची रूपे एकसारखीच दिसतात: 'हे देवराज, तुला नमस्कार असो (नमो त्यत्थु). महर्षींना नमस्कार करून (नमो कत्वा महेसिनो)'. उपसर्गांसह देखील हा धातू जोडला जाऊ शकतो, जसे की 'पणमति' (paṇamati), 'पणामो' (paṇāmo), 'उण्णमति' (uṇṇamati), 'उण्णति' (uṇṇati) इत्यादी. ขมุ สหเน. ขมติ. ขนฺติ. ขโม, ขมนํ, เอวํ ภาเว. กตฺตริ ปน ‘‘ขนฺตา. ขมิตา. ขโม โหติ สีตสฺสปิ อุณฺหสฺสปี’’ติ ปโยคา. खमु (khamu) हा धातू सहन करणे (सहन) या अर्थात आहे. 'खमति' (khamati). 'खन्ति' (khanti - क्षमा). भाववाचक नामात 'खमो' (khamo), 'खमनं' (khamanaṃ) अशी रूपे होतात. परंतु कर्तरी प्रयोगात (कत्तरि) 'खन्ता' (khantā), 'खमिता' (khamitā), 'तो थंडी आणि उष्णता देखील सहन करणारा (खमो) असतो' असे प्रयोग होतात. สม อทสฺสเน. สมติ, วูปสมติ อคฺคิ. सम (sama) हा धातू अदृश्य होणे किंवा शांत होणे (अदस्सन) या अर्थात आहे. 'समति' (samati), अग्नी शांत होतो (वूपसमति अग्गि). ยม ปริเวสเน. ยมติ. ยโม. ยมราชา. यम (yama) हा धातू वाढणे किंवा वाढून देणे (परिवेसण) या अर्थात आहे. 'यमति' (yamati). 'यमो' (yamo). 'यमराजा' (yamarājā). สม สทฺเท. สมติ. सम (sama) हा धातू आवाजाच्या (सद्द) अर्थात आहे. 'समति' (samati). สม ถม เวลมฺเพ. สมติ. ถมติ. सम (sama), थम (thama) हे धातू विलंब करणे (वेलम्ब) या अर्थात आहेत. 'समति' (samati). 'थमति' (thamati). วายม อีหายํ. วายมติ. วายาโม. वायम (vāyama) हा धातू प्रयत्न करणे (ईहा) या अर्थात आहे. 'वायमति' (vāyamati). 'वायामो' (vāyāmo - व्यायाम/प्रयत्न). คมุ [Pg.134] คติยํ. คจฺฉติ. คมโก. คโต. คติ. คมนํ. การิเต ‘‘คเมติ, คมยติ, คจฺฉาเปตี’’ติอาทีนิ ภวนฺติ. गमु (gamu) हा धातू जाणे (गति) या अर्थात आहे. 'गच्छति' (gacchati). 'गमको' (gamako). 'गतो' (gato). 'गति' (gati). 'गमनं' (gamanaṃ). प्रयोजक रूपात (कारित) 'गमेति' (gameti), 'गमयति' (gamayati), 'गच्छापेति' (gacchāpeti) इत्यादी रूपे होतात. รมุ กีฬายํ. รมติ. วิรมติ. ปฏิวิรมติ. อุปรมติ. อารติ. วิรติ. ปฏิวิรติ. อุปรติ. เวรมณิ. วิรมณํ. รติ. รมณํ. รโต. อารโต วิรโต ปฏิวิรโต. อุปรโต, อุปรโม. อาราโม. रमु (ramu) हा धातू क्रीडा करणे किंवा रममाण होणे (कीळा) या अर्थात आहे. 'रमति' (ramati). 'विरमति' (viramati - विरक्त होणे/थांबणे). 'पटिविरमति' (paṭiviramati - पूर्णपणे विरक्त होणे). 'उपरमति' (uparamati - थांबणे). 'आरति' (ārati - विरती). 'विरति' (virati - विरती). 'पटिविरति' (paṭivirati - प्रतिविरती). 'उपरति' (uparati - उपरती). 'वेरमणी' (veramaṇi - विरती/नियम). 'विरमणं' (viramaṇaṃ - विरती). 'रति' (rati - प्रीती/आवड). 'रमणं' (ramaṇaṃ - रमणे). 'रतो' (rato - रमलेला). 'आरतो' (ārato), 'विरतो' (virato), 'पटिविरतो' (paṭivirato). 'उपरतो' (uparato), 'उपरमो' (uparamo). 'आरामो' (ārāmo - विहार/बाग). วมุ อุคฺคิรเณ. วมติ. วมถุ. วมฺมิโก. वमु (vamu) हा धातू ओकणे किंवा बाहेर टाकणे (उग्गिरणा) या अर्थात आहे. 'वमति' (vamati). 'वमथु' (vamathu - उलटी). 'वम्मिको' (vammiko - वारूळ). ธีรตฺถุ ตํ วิสํ วนฺตํ, ยมหํ ชีวิตการณา; วนฺตํ ปจฺจาวมิสฺสามิ, มตํ เม ชีวิตา วรํ. त्या ओकलेल्या विषाला धिक्कार असो, जे मी केवळ जगण्याच्या कारणासाठी पुन्हा प्राशन करीन (खाईन); अशा जगण्यापेक्षा मला मरणच अधिक श्रेयस्कर आहे. ตตฺถ วมฺมิโกติ วมตีติ, วนฺตโกติ, วนฺตุสฺสโยติ, วนฺตสิเนหสมฺพนฺโธติ วมฺมิโก. โส หิ อหินกุลอุนฺทูรฆรโคฬิกาทโย นานปฺปกาเร ปาณเก วมตีติ วมฺมิโก. อุปจิกาหิ วนฺตโกติ วมฺมิโก. อุปจิกาหิ วมิตฺวา มุขตุณฺฑเกน อุกฺขิตฺตปํสุจุณฺเณน กฏิปฺปมาเณนปิ โปริสปฺปมาเณนปิ อุสฺสิโตติ วมฺมิโก. อุปจิกาหิ วนฺตเขฬสิเนเหน อาพทฺธตาย สตฺตสตฺตาหํ เทเว วสฺสนฺเตปิ น วิปฺปกิรยติ, นิทาเฆปิ ตโต ปํสุมุฏฺฐึ คเหตฺวา ตสฺมึ มุฏฺฐินา ปีฬิยมาเน สิเนโหว นิกฺขมติ, เอวํ วนฺตสิเนหสมฺพนฺโธติ วมฺมิโก. तेथे 'वम्मिको' (वारूळ) म्हणजे जे ओकते (वमतीति), जे ओकलेले आहे (वन्तकोति), जे ओकलेला ढीग आहे (वन्तुस्सयोति), जे ओकलेल्या स्नेहाने (चिकट द्रवाने) संबद्ध आहे (वन्तसिनेहसम्बन्धोति) ते वारूळ होय. कारण ते साप, मुंगूस, उंदीर, पाल इत्यादी विविध प्रकारच्या प्राण्यांना बाहेर ओकते (बाहेर काढते), म्हणून ते 'वम्मिको' आहे. वाळवीने ओकलेले असल्यामुळे ते 'वम्मिको' आहे. वाळवीने ओकून आपल्या मुखतुंडाने (तोंडाने) बाहेर टाकलेल्या मातीच्या कणांनी कंबरेच्या किंवा माणसाच्या उंचीएवढे उंच केलेले असल्यामुळे ते 'वम्मिको' आहे. वाळवीच्या ओकलेल्या लाळेच्या स्नेहाने (चिकटपणाने) ते अशा प्रकारे बांधलेले असते की, सात आठवडे पाऊस पडला तरी ते विखुरले जात नाही, आणि उन्हाळ्यातही त्यातून मूठभर माती घेऊन ती मुठीत दाबल्यास त्यातून स्नेह (ओलावा) बाहेर पडतो, अशा प्रकारे ओकलेल्या स्नेहाने संबद्ध असल्यामुळे ते 'वम्मिको' (वारूळ) म्हटले जाते. เอตฺถ ปน ‘‘ภควา, หิมวา’’ติอาทีนิ ปทานิ น เกวลํ วนฺตุปจฺจยวเสเนว นิปฺผาเทตพฺพานิ, อถ โข วมุธาตุวเสนปิ นิปฺผาเทตพฺพานิ, เตนาห วิสุทฺธิมคฺคการโก ‘‘ยสฺมา ปน ตีสุ ภเวสุ ตณฺหาสงฺขาตํ คมนมเนน วนฺตํ, ตสฺมา ‘‘ภเวสุ วนฺตคมโน’ติ วตฺตพฺเพ ภวสทฺทโต ภการํ, คมนสทฺทโต คการํ, วนฺตสทฺทโต วการญฺจ ทีฆํ กตฺวา อาทาย ภควาติ วุจฺจติ, ยถา โลเก ‘เมหนสฺส [Pg.135] ขสฺส มาลา’ติ วตฺตพฺเพ เมขลา’’ติ วทตา นิรุตฺตินเยน สทฺทสิทฺธิ ทสฺสิตา. येथे 'भगवा', 'हिमवा' इत्यादी शब्द केवळ 'वन्तु' प्रत्ययाच्या आधारेच सिद्ध केले जाऊ नयेत, तर 'वमु' धातूच्या (ओकणे/त्याग करणे) आधारेही सिद्ध केले जावेत. म्हणूनच विशुद्धिमार्गाच्या कर्त्यांनी म्हटले आहे: 'ज्याअर्थी त्यांनी तीन भवांमध्ये (अस्तित्वाच्या तीन लोकांमध्ये) तृष्णारूपी गमनाचा (संसारगमनाचा) त्याग केला आहे (ओकून टाकला आहे), म्हणून 'भवेसु वन्तगमनो' (भवांमध्ये गमन ओकलेला/त्यागलेला) असे म्हणावयाचे असताना, 'भव' शब्दातील 'भ'कार, 'गमन' शब्दातील 'ग'कार आणि 'वन्त' शब्दातील 'व'कार घेऊन, त्याला दीर्घ करून 'भगवा' असे म्हटले जाते. जसे लोकव्यवहारात 'मेहनस्स खस्स माला' असे म्हणावयाचे असताना 'मेखला' असे म्हटले जाते.' अशा प्रकारे निरुक्तीच्या नियमाने शब्दाची सिद्धी दाखविली आहे. เอตฺถ, สิยา ‘‘วิสมมิทํ นิทสฺสนํ, เยน ‘เมหนสฺส ขสฺส มาลา’ติ เอตฺถ เมการขการลาการานํ กมโต คหณํ ทิสฺสติ, ‘‘ภเวสุ วนฺตคมโน’ติ เอตฺถ ปน ภการวการคการานํ กมโต คหณํ น ทิสฺสตี’’ติ? สจฺจํ, อิธ ปน ‘‘อคฺคาหิโต, วิชฺชาจรณสมฺปนฺโน’’ติอาทีสุ วิย คุณสทฺทสฺส ปรนิปาตวเสน ‘‘ภเวสุ คมนวนฺโต’’ติ วตฺตพฺเพปิ เอวมวตฺวา สทฺทสตฺเถ เยภุยฺเยน คุณสทฺทานํ ปุพฺพนิปาตภฺวสฺส อิจฺฉิตตฺตา สทฺทสตฺถวิทูนํ เกสญฺจ วิญฺญูนํ มนํ โตเสตุํ ‘‘ภควา’’ติ ปเท อกฺขรกฺกมํ อนเปกฺขิตฺวา อตฺถมตฺตนิทสฺสนวเสน ‘‘อาหิตคฺคิ, สมฺปนฺนวิชฺชาจรโณ’’ติอาทีนิ วิย ปุพฺพนิปาตวเสน ‘‘ภเวสุ วนฺตคมโน’’ติ วุตฺตํ. อีทิสสฺมิญฺหิ ฐาเน ‘‘อาหิตคฺคี’’ติ วา ‘‘อคฺคาหิโต’’ติ วา ‘‘ฉินฺนหตฺโถ’’ติ วา ‘‘หตฺถจฺฉินฺโน’’ติ วา ปเทสุ ยถา ตถา ฐิเตสุปิ อตฺถสฺส อยุตฺติ นาม นตฺถิ อญฺญมญฺญํ สมานตฺถตฺตา เตสํ สทฺทานํ. येथे अशी शंका घेतली जाऊ शकते की, 'हे उदाहरण विसंगत आहे, कारण 'मेहनस्स खस्स माला' यामध्ये मे-कार, ख-कार आणि ला-कार यांचे क्रमाने ग्रहण दिसते, परंतु 'भवेसु वन्तगमनो' यामध्ये भ-कार, व-कार आणि ग-कार यांचे क्रमाने ग्रहण दिसत नाही?' हे सत्य आहे, परंतु येथे 'अग्गाहितो', 'विज्जाचरणसम्पन्नो' इत्यादी शब्दांप्रमाणे गुणवाचक शब्दाच्या परनिपातामुळे (नंतर येण्यामुळे) 'भवेसु गमनवन्तो' असे म्हणावयाचे असतानाही तसे न म्हणता, व्याकरणशास्त्रामध्ये बहुधा गुणवाचक शब्दांचा पूर्वनिपात (आधी येणे) इच्छित असल्यामुळे, व्याकरणतज्ज्ञ आणि काही विद्वानांच्या मनाचे समाधान करण्यासाठी 'भगवा' या पदामध्ये अक्षरांच्या क्रमाची अपेक्षा न करता, केवळ अर्थाचे दिग्दर्शन करण्यासाठी 'आहितग्गि', 'सम्पन्नविज्जाचरणो' इत्यादी शब्दांप्रमाणे पूर्वनिपाताच्या नियमाने 'भवेसु वन्तगमनो' असे म्हटले आहे. कारण अशा ठिकाणी 'आहितग्गी' किंवा 'अग्गाहितो' अथवा 'छिन्नहत्थो' किंवा 'हत्थच्छिन्नो' या शब्दांमध्ये ते कसेही ठेवले तरी अर्थाची विसंगती होत नाही, कारण त्या शब्दांचा अर्थ एकमेकांशी समानच असतो. เวทชาโตติอาทีสุ ปน ฐาเนสุ อตฺเถวาติ ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ วิสุทฺธิมคฺเค ‘‘ภควา’’ติ ปทสฺส วมุธาตุวเสนปิ นิปฺผตฺติ ทสฺสิตา, ตฏฺฏีกายมฺปิ จ ทสฺสิตา ‘‘ภเค วมีติ ภควา. ภาเค วมีติ ภควา’’ติ. นิพฺพจนํ ปน เอวํ เวทิตพฺพํ – ภคสงฺขาตํ สิรึ อิสฺสริยํ ยสญฺจ วมิ อุคฺคิริ เขฬปิณฺฑํ วิย อนเปกฺโข ฉฑฺฑยีติ ภควา. อถ วา ภานิ นาม นกฺขตฺตานิ, เตหิ สมํ คจฺฉนฺติ ปวตฺตนฺตีติ ภคา, สิเนรุยุคนฺธรอุตฺตรกุรุหิมวนฺตาทิภาชนโลกา, วิเสสสนฺนิสฺสยโสภากปฺปฏฺฐิยภาวโต. เตปิ ภควา วมิ ตนฺนิวาสิสตฺตาวาสสมติกฺกมนโต ตปฺปฏิพทฺธฉนฺทราคปฺปหาเนน ปชหีติ ภควา. 'वेदजातो' इत्यादी ठिकाणीही असाच अर्थ समजला पाहिजे. अशा प्रकारे विशुद्धिमार्गामध्ये 'भगवा' या शब्दाची सिद्धी 'वमु' धातूच्या आधारेही दाखविली आहे, आणि त्याच्या टीकेमध्येही 'भगे वमीति भगवा। भागे वमीति भगवा' (ज्याने भग ओकले तो भगवा; ज्याने भाग ओकले तो भगवा) अशी दाखविली आहे. त्याची व्युत्पत्ती अशी समजली पाहिजे – 'भग' नावाचे ऐश्वर्य, यश आणि कीर्ती यांना ज्यांनी लाळेच्या गोळ्याप्रमाणे निरपेक्षपणे ओकून टाकले (त्याग केला), म्हणून ते 'भगवा' होत. अथवा, 'भा' म्हणजे नक्षत्रे, त्यांच्यासोबत जे फिरतात ते 'भगा' म्हणजे सिनेरु, युगंधर, उत्तरकुरु, हिमवंत इत्यादी भाजनलोक (भौतिक जग) होत, कारण ते विशेष सौंदर्याचे आश्रयस्थान आहेत. भगवंतांनी त्यांचाही त्याग केला (ओकून टाकले), तेथील रहिवाशांच्या निवासस्थानांचे अतिक्रमण करून आणि त्यांच्याशी संबंधित छंद-राग (आसक्ती) नष्ट करून त्यांचा त्याग केला, म्हणून ते 'भगवा' होत. จกฺกวตฺติสิรึ [Pg.136] ยสฺมา, ยสํ อิสฺสริยํ สุขํ; ปหาสิ โลกจิตฺตญฺจ, สุคโต ภควา ตโต. ज्याअर्थी त्यांनी चक्रवर्तीचे ऐश्वर्य, यश, सत्ता, सुख आणि लौकिक चित्त यांचा त्याग केला, म्हणूनच ते सुगत 'भगवा' म्हटले जातात. ตถา ขนฺธายตนธาตาทิเภเท ธมฺมโกฏฺฐาเส สพฺพํ ปปญฺจ สพฺพํ โยคํ สพฺพํ คนฺถํ สพฺพํ สํโยชนํ สมุจฺฉินฺทิตฺวา อมตํ ธาตุํ สมธิคจฺฉนฺโต วมิ อุคฺคิริ อนเปกฺโข ฉฑฺฑยิ น ปจฺจาวมีติ ภควา. อถ วา สพฺเพปิ กุสลากุสเล สาวชฺชานวชฺเช หีนปฺปณีเต กณฺหสุกฺกสปฺปฏิภาเค ธมฺเม อริยมคฺคญาณมุเขน วมิ อุคฺคิริ อนเปกฺโข ปริจฺจชิ ปชหีติ ภควา. त्याचप्रमाणे स्कंध, आयतन, धातू इत्यादी भेदांनी युक्त असलेल्या धर्मसमूहातील सर्व प्रपंच, सर्व योग, सर्व ग्रंथ (गाठी) आणि सर्व संयोजने पूर्णपणे छिन्नभिन्न करून, अमृत धातूचा (निर्वाणाचा) लाभ घेताना ज्यांनी त्या सर्वांना ओकून टाकले, बाहेर काढले, निरपेक्षपणे सोडून दिले आणि पुन्हा कधीही ग्रहण केले नाही, म्हणून ते 'भगवा' होत. अथवा, सर्व कुशल-अकुशल, सदोष-निर्दोष, हीन-प्रणीत, कृष्ण-शुक्ल (काळे-पांढरे) विरोधी धर्मांना ज्यांनी आर्यमार्ग-ज्ञानाच्या मुखाने ओकून टाकले, बाहेर काढले, निरपेक्षपणे त्यागले आणि सोडून दिले, म्हणून ते 'भगवा' होत. ขนฺธายตนธาตาที, ธมฺมเภทา มเหสินา; กณฺหสุกฺกา ยโต วนฺตา, ตโตปิ พควา มโต. ज्याअर्थी महामुनींनी (महर्षींनी) स्कंध, आयतन, धातू इत्यादी धर्मभेद आणि कृष्ण-शुक्ल धर्म ओकून टाकले आहेत, त्याअर्थीही ते 'भगवा' मानले जातात. ชาตกฏฺฐกถายํ ปน หิมวาติ ปทสฺส วมุธาตุวเสนปิ นิปฺผตฺติ ทสฺสิตา. ตถา หิ สมฺภวชาตกฏฺฐกถายํ ‘‘หิมวาติ หิมปาตสมเย หิมยุตฺโตติ หิมวา. คิมฺหกาเล หิมํ วมตีติ หิมวา’’ติ วุตฺตํ. เอวํ ชาตกฏฺฐกถายํ ‘‘หิมวา’’ติ ปทสฺส วมุธาตุวเสนปิ นิปฺผตฺติ ทสฺสิตา, อยํ นโย อีทิเสสุ ฐาเนสุปิ เนตพฺโพ. ‘‘คุณวาคณวา’’ติอาทีสุ ปน น เนตพฺโพ. ยทิ นเยยฺย, ‘‘คุณวา คณวา’’ติ ปทานํ ‘‘นิคฺคุโณ ปริหีนคุโณ’’ติ เอวมาทิอตฺโถ ภเวยฺย, ตสฺมา อยํ นโย สพฺพตฺถปิ น เนตพฺโพ. เอตฺถ สิยา ‘‘ยทิ ‘‘ภควา’ติอาทิปทานํ วมุธาตุวเสน นิปฺผตฺติ โหติ, กถํ ‘‘ภควนฺโต, ภควนฺต’’นฺติอาทีนิ สิชฺฌนฺตี’’ติ? ยถา ‘‘ภควา’’ติ ปทํ นิรุตฺตินเยน สิชฺฌติ, ตถา ตานิปิ เตเนว สิชฺฌนฺติ. อจินฺเตยฺโย หิ นิรุตฺตินโย เกวลํ อตฺถยุตฺติปฏิพนฺธมตฺโตว, อตฺถยุตฺติยํ สติ นิปฺผาเทตุมสกฺกุเณยฺยานิปิ รูปานิ อเนเนว สิชฺฌนฺติ. เอตฺถ จ [Pg.137] ยํ นิรุตฺติลกฺขณํ อาหริตฺวา ทสฺเสตพฺพํ สิยา, ตํ อุปริ รูปนิปฺผาทนาธิกาเร อุทาหรเณหิ สทฺธึ ปกาเสสฺสาม. जातक-अट्ठकथेमध्ये 'हिमवा' या शब्दाची सिद्धी 'वमु' धातूच्या आधारेही दाखविली आहे. जसे की, संभवजातक-अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे: 'हिमवा म्हणजे – हिमवृष्टीच्या वेळी हिमाने युक्त असतो म्हणून हिमवा. उन्हाळ्यात हिम (बर्फ) ओकतो (वितळवून बाहेर टाकतो) म्हणून हिमवा.' अशा प्रकारे जातक-अट्ठकथेमध्ये 'हिमवा' शब्दाची सिद्धी 'वमु' धातूच्या आधारे दाखविली आहे, हा नियम अशा प्रकारच्या इतर ठिकाणीही लागू केला पाहिजे. परंतु 'गुणवा', 'गणवा' इत्यादी शब्दांमध्ये हा नियम लागू करू नये. जर लागू केला, तर 'गुणवा', 'गणवा' या शब्दांचा अर्थ 'निर्गुणी', 'गुणहीन' असा होईल, म्हणून हा नियम सर्वत्र लागू करू नये. येथे अशी शंका येऊ शकते की, 'जर 'भगवा' इत्यादी शब्दांची सिद्धी 'वमु' धातूच्या आधारे होते, तर 'भगवन्तो', 'भगवन्तं' इत्यादी रूपे कशी सिद्ध होतात?' ज्याप्रमाणे 'भगवा' हा शब्द निरुक्तीच्या नियमाने सिद्ध होतो, त्याचप्रमाणे ती रूपेही त्याच नियमाने सिद्ध होतात. कारण निरुक्तीचा नियम अचिंत्य आहे, तो केवळ अर्थाच्या सुसंगतीशी संबंधित आहे; अर्थाची सुसंगती असेल तर एरवी सिद्ध न होऊ शकणारी रूपेही या नियमाने सिद्ध होतात. आणि येथे जो निरुक्तीचा नियम उद्धृत करून दाखवायचा आहे, तो आम्ही पुढे रूपसिद्धीच्या अधिकारामध्ये उदाहरणांसह स्पष्ट करू. อิธ สารมเต มุนิราชมเต,ปรมํ ปฏุตํ สุชโน ปิหยํ; วิปุลตฺถธรํ ธนินีติมิมํ,สตตํ ภชตํ มติสุทฺธกรํ. येथे, मुनिराजांच्या (बुद्धांच्या) या सारभूत मतामध्ये (शासनात), परम कौशल्याची इच्छा करणाऱ्या सज्जन माणसाने, वस्तृतः विपुल अर्थ धारण करणाऱ्या आणि बुद्धीला शुद्ध करणाऱ्या या 'धनिनीती'चे (व्याकरणशास्त्राचे) सतत सेवन (अभ्यास) करावे. อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญุนํ अशा प्रकारे, अट्ठकथांसह नऊ अंगांनी युक्त असलेल्या त्रिपिटकातील वचनमार्गांमध्ये विद्वानांच्या... โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ ...कौशल्यासाठी रचलेल्या 'सद्दनीति' ग्रंथातील... สรวคฺคปญฺจกนฺติโก นาม ธาตุวิภาโค ...'सरवग्गपञ्चकन्तिको' (पाच स्वरवर्गांच्या शेवटी असलेला) नावाचा धातू-विभाग... ปนฺนรสโม ปริจฺเฉโท. ...पंधरावा परिच्छेद समाप्त झाला. ๑๖. ภูวาทิคณิกปริจฺเฉท १६. भूवादिगणीक परिच्छेद (भूवादि गणाचा परिच्छेद). อิโต ปรํ อวคฺคนฺตา, มิสฺสกา เจว ธาตุโย; วกฺขามิ ธาตุเภทาทิ-กุสลสฺส มตานุคา. यानंतर, धातूंच्या भेदांमध्ये कुशल असलेल्या विद्वानांच्या मतानुसार, मी अवर्गान्त (वर्गाच्या शेवटी नसलेले) आणि मिश्रक (मिश्र) धातूंचे वर्णन करीन. ยการนฺตธาตุ य-कारान्त धातू (य अक्षराने शेवट होणारे धातू). ยา คติปาปุเณสุ. ยาติ, ยนฺติ. ยาตุ, ยนฺตุ. เยยฺย, เยยฺยุํ, อนุปริเยยฺยุํ. ยถาสมฺภวํ ปทมาลา โยเชตพฺพา. ยนฺโต ปุริโส. ยนฺตี อิตฺถี. ยนฺตํ กุลํ. ยานํ, อุปยานํ, อุยฺยานํ อิจฺจาทีนิ. ทิวาทิคณิกสฺส ปนสฺส ‘‘ยายติ, ยายนฺตี’’ติอาทีนิ รูปานิ ภวนฺติ. या (धातू) गती (जाणे) आणि प्राप्ती (मिळवणे) या अर्थांत आहे. याति, यन्ति. यातु, यन्तु. येय्य, येय्युं, अनुपरियेय्युं. यथासंभव पदमाला (रूपावली) योजावी. यन्तो पुरिसो (जाणारा पुरुष). यन्ती इत्थी (जाणारी स्त्री). यन्तं कुलं (जाणारे कूळ). यानं, उपयानं, उय्यानं इत्यादी. दिवादिगणीय धातूचे तर 'यायति, यायन्ति' इत्यादी रूपे होतात. ตตฺร ยานนฺติอาทีสุ ยนฺติ เอเตนาติ ยานํ, รถสกฏาทิ. อุปยนฺติ เอเตน อิสฺสรสฺส วา ปิยมนาปสฺส วา สนฺติกํ คจฺฉนฺตีติ อุปยานํ, ปณฺณาการํ. ‘‘อุปยานานิ เม ทชฺชุํ, ราชปุตฺต ตยิ คเต’’ติ เอตฺถ หิ ปณฺณาการานิ ‘‘อุปยานานี’’ติ [Pg.138] วุจฺจนฺติ. สมฺปนฺนทสฺสนียปุปฺผผลาทิตาย อุทฺธํ โอโลเกนฺตา ยนฺติ คจฺฉนฺติ เอตฺถาติ อุยฺยานํ. त्यात 'यान' इत्यादी शब्दांमध्ये - ज्याच्याद्वारे जातात ते 'यान' (वाहन), जसे की रथ, गाडी इत्यादी. ज्याच्याद्वारे (लोक) स्वामीच्या किंवा प्रिय व मनपसंत व्यक्तीच्या जवळ जातात ते 'उपयान' म्हणजे भेटवस्तू. 'हे राजपुत्रा, तू गेल्यावर ते मला भेटवस्तू (उपयानानि) देतील' येथे भेटवस्तूंना 'उपयानानि' म्हटले आहे. समृद्ध आणि दर्शनीय फुले, फळे इत्यादींमुळे वर पाहत लोक जेथे जातात ते 'उय्यान' (उद्यान) होय. พฺยา อุมฺมีสเน. พฺยาติ, พฺยนฺติ. พฺยาสิ, พฺยาถ. พฺยามิ, พฺยาม. ยถาสมฺภวํ ปทมาลา โยเชตพฺพา. ตตฺร ปนายํ ปาฬิ ‘‘ยาว พฺยาติ นิมฺมีสติ, ตตฺราปิ รสติพฺพโย’’ติ. ตตฺถ ยาว พฺยาตีติ ยาว อุมฺมีสติ, ปุราณภาสา เอสา, อยญฺหิ ยสฺมึ กาเล โพธิสตฺโต จูฬโพธิปริพฺพาชโก อโหสิ, ตสฺมึ กาเล มนุสฺสานํ โวหาโร. ब्या (धातू) डोळे उघडणे (उन्मीलन) या अर्थात आहे. ब्याति, ब्यन्ति. ब्यासि, ब्याथ. ब्यामी, ब्याम. यथासंभव पदमाला योजावी. त्यात ही पालि (वचन) आहे - 'याव ब्याति निम्मीसति, तत्रापि रसतिब्बयो' (जोपर्यंत डोळे उघडतो आणि मिटतो, तोपर्यंत तिथे रसाचा तीव्र अनुभव असतो). तेथे 'याव ब्याति' म्हणजे 'जोपर्यंत डोळे उघडतो'. ही जुनी भाषा आहे, कारण ज्या काळात बोधिसत्व चूळबोधी परिव्राजक होते, त्या काळातील हा मानवी व्यवहार (भाषा) आहे. ยุ มิสฺสเน คติยญฺจ. โยติ, ยวติ. อายุ, โยนิ. यु (धातू) मिश्रण करणे आणि गती या अर्थांत आहे. योति, यवति. आयु, योनि. ตตฺถ ‘‘อายู’’ติ อาสทฺโท อุปสคฺโค. อายวนฺติ มิสฺสีภวนฺติ สตฺตา เอเตนาติ อายุ. อถ วา อายวนฺติ อาคจฺฉนฺติ ปวตฺตนฺติ ตสฺมึ สติ อรูปธมฺมาติ อายุ. ตถา หิ อฏฺฐสาลินิยํ วุตฺตํ ‘‘อายวนฏฺเฐน อายุ. ตสฺมิญฺหิ สติ อรูปธมฺมา อายวนฺติ อาคจฺฉนฺติ ปวตฺตนฺติ, ตสฺมา อายูติ วุจฺจตี’’ติ. ‘‘อายุ, ชีวิตํ, ปาโณ’’ อิจฺเจเต ปริยายา โลกโวหารวเสน. อภิธมฺมวเสน ปน ‘‘ฐิติ ยปนา ยาปนา ชีวิตินฺทฺริยํ’’ อิจฺเจเตปิ เตเหว สทฺธึ ปริยายา. โยนีติ อณฺฑชาทีนํ อณฺฑชาทีหิ สทฺธึ ยาย มิสฺสีภาโว โหติ, สา โยนิ. อิทํ ปเนตฺถ นิพฺพจนํ ‘‘ยวนฺติ เอตฺถ สตฺตา เอกชาติสมนฺวเยน อญฺญมญฺญํ มิสฺสกา โหนฺตีติ โยนิ’’ อิติ. เอตฺถ จ โยนิสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร นียเต. โยนีติ ขนฺธโกฏฺฐาสสฺสปิ การณสฺสปิ ปสฺสาวมคฺคสฺสปิ นามํ. ‘‘จตสฺโส นาคโยนิโย. จตสฺโส สุปณฺณโยนิโย’’ติ เอตฺถ หิ ขนฺธโกฏฺฐาโส โยนิ นาม. ‘‘โยนิ [Pg.139] เหสา ภูมิช ผลสฺส อธิคมายา’’ติ เอตฺถ การณํ. ‘‘น จาหํ พฺราหฺมณํ พฺรูมิ, โยนิชํ มตฺติสมฺภว’’นฺติ เอตฺถ ปสฺสาวมคฺโค. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – त्यात 'आयु' या शब्दात 'आ' हा उपसर्ग आहे. ज्याच्याद्वारे प्राणी मिश्रित (एकत्र) होतात ते 'आयु'. किंवा, जे अस्तित्वात असताना अरूप धर्म (चित्त-चैतसिक) येतात आणि प्रवृत्त होतात ते 'आयु'. तसेच अट्ठसालिनीमध्ये म्हटले आहे - 'आयवन (प्रवृत्ती/मिश्रण) या अर्थाने आयु आहे. कारण ते अस्तित्वात असताना अरूप धर्म येतात आणि प्रवृत्त होतात, म्हणून त्याला आयु म्हटले जाते.' 'आयु, जीवित, प्राण' हे लोकव्यवहारानुसार समानार्थी शब्द आहेत. अभिधम्मानुसार तर 'ठिति (स्थिती), यपना (यापन), यापना, जीवितिन्द्रिय' हे देखील त्यांच्यासोबतच समानार्थी शब्द आहेत. 'योनि' म्हणजे अंडज इत्यादी प्राण्यांचे अंडज इत्यादींसोबत ज्याच्याद्वारे मिश्रण होते ती योनी. येथे हा निर्वचन (व्युत्पत्ती) आहे - 'ज्यामध्ये प्राणी एकाच जातीच्या संबंधाने परस्परांशी मिश्रित होतात ती योनी होय.' आणि येथे 'योनि' शब्दाचा अर्थ-उद्धार (विविध अर्थ) केला जात आहे. 'योनि' हे स्कंध-कोष्ठाचे (स्कंध-समूहाचे), कारणाचे आणि प्रसूती-मार्गाचे (योनीचे) देखील नाव आहे. 'चतस्सो नागयोनियो, चतस्सो supaṇṇayoniyo' (चार नागयोनी, चार सुपर्णयोनी) येथे स्कंध-कोष्ठाला 'योनि' म्हटले आहे. 'योनि हेसा भूमिज फलस्स अधिगमाय' (हे भूमिज, फळ प्राप्तीचे हे कारण आहे) येथे 'योनि' म्हणजे कारण. 'न चाहं ब्राह्मणं ब्रूमि, योनिजं मत्तिसंभवं' (मी केवळ योनीतून जन्मलेल्या किंवा मातेपासून उत्पन्न झालेल्याला ब्राह्मण म्हणत नाही) येथे 'योनि' म्हणजे प्रसूती-मार्ग (योनी). याविषयी हे म्हटले आहे - ขนฺธานญฺจาปิ โกฏฺฐาเส, มุตฺตมคฺเค จ การเณ; อิเมสุ ตีสุ อตฺเถสุ, โยนิสทฺโท ปวตฺตติ. स्कंधांचा कोष्ठ (समूह), मूत्रमार्ग (प्रसूती-मार्ग) आणि कारण - या तीन अर्थांमध्ये 'योनि' शब्द प्रवृत्त होतो. พฺเย สํวรเณ. พฺยายติ. ब्ये (धातू) संवरण (झाकणे/रक्षण करणे) या अर्थात आहे. ब्यायति. พฺเย ปวตฺติยํ. พฺเยติ สหพฺโย. ब्ये (धातू) प्रवृत्ती (चालणे/अस्तित्वात असणे) या अर्थात आहे. ब्येति, सहब्यो. เอตฺถ สหพฺโยติ สห พฺเยติ สห ปวตฺตตีติ สหพฺโย, สหาโย, เอกภวูปโค วา. ตถา หิ ‘‘ตาวตึสานํ เทวานํ สหพฺยตํ อุปปนฺโน’’ติอาทีสุ เอกภวูปโค ‘‘สหพฺโย’’ติ วุจฺจติ. येथे 'सहब्यो' म्हणजे जो सोबत चालतो किंवा सोबत प्रवृत्त होतो तो 'सहब्यो' (सहचारी), मित्र किंवा एकाच भवात उत्पन्न झालेला. तसेच 'तावतंस देवांच्या सहवासात (सहब्यतं) उत्पन्न झाला' इत्यादी वाक्यांमध्ये एकाच भवात उत्पन्न झालेल्याला 'सहब्यो' म्हटले आहे. หย คติยํ. หยติ. หโย. หโยติ อสฺโส. โส หิ หยติ สีฆํ คจฺฉตีติ หโยติ วุจฺจติ. อิมานิ ปนสฺส นามานิ – हय (धातू) गती या अर्थात आहे. हयति. हयो. 'हयो' म्हणजे घोडा. कारण तो वेगाने जातो (हयति), म्हणून त्याला 'हयो' म्हटले जाते. ही त्याची नावे आहेत - อสฺโส ตุรงฺโค ตุรโค, วาชี วาโห หโยปิ จ; ตพฺเภทา สินฺธโว เจว, โคโช อสฺสตโรปิ จ. अस्सो (अश्व), तुरङ्गो (तुरंग), तुरगो (तुरग), वाजी, वाहो (वाह) आणि हयो (हय); त्याचे भेद म्हणजे सिन्धवो (सिंधू देशातील घोडा), गोजो आणि अस्सतरो (खेचर) हे आहेत. การณาการณญฺญู ตุ, อาชานีโย หยุตฺตโม; โฆฏโก ตุ ขฬุงฺกสฺโส, วฬโวติ จ วุจฺจติ; อสฺสโปโต กิโสโรติ, ขฬุงฺโกติปิ วุจฺจติ; योग्य आणि अयोग्य जाणणारा उत्तम घोडा 'आजानीय' (आजानेय) होय. दुष्ट किंवा आळशी घोड्याला 'घोटको' किंवा 'खळुङ्कस्सो' म्हटले जाते, आणि घोडीला 'वळवा' म्हटले जाते. घोड्याच्या पिल्लाला 'किसोरो' (किशोर) आणि 'खळुङ्को' देखील म्हटले जाते. หริย คติเคลญฺเญสุ. หริยติ. हरिय (धातू) गती आणि आजारपण (ग्लानी) या अर्थांत आहे. हरियति. อย วย ปย มย ตย จย รย คติยํ. อยติ. วยติ. ปยติ. มยติ. ตยติ. จยติ. รยติ. อโย, สมโย, วโย, ปโย, รโย. มยตยจยธาตูนํ นามิกปทานิ อุปปริกฺขิตพฺพานิ. अय, वय, पय, मय, तय, चय, रय (धातू) गती या अर्थात आहेत. अयति. वयति. पयति. मयति. तयति. चयति. रयति. अयो, समयो, वयो, पयो, रयो. मय, तय, चय धातूंच्या नामरूपांची परीक्षा करावी. ตตฺถ [Pg.140] อโยติ กาฬโลหํ, อยติ นานากมฺมารกิจฺเจสุ อุปโยคํ คจฺฉตีติ อโย. วโยติ ปฐมวยาทิอายุโกฏฺฐาโส, วยติ ปริหานึ คจฺฉตีติ วโย. ปโยติ ขีรสฺสปิ อุทกสฺสปิ นามํ, ปยติ ชเนน ปาตพฺพภาวํ คจฺฉตีติ ปโย. รโยติ เวโค, โย ‘‘ชโว’’ติปิ วุจฺจติ, ตสฺมา รยนํ ชวนํ รโย. เอตฺถ สมยสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร วุจฺจเต อห นิพฺพจเนน. สมยสทฺโท – त्यात 'अयो' म्हणजे काळे लोखंड (लोह); जे लोहाराच्या विविध कामांमध्ये उपयोगात आणले जाते ते 'अयो'. 'वयो' म्हणजे प्रथम वय इत्यादी आयुष्याचे भाग; जे क्षयाकडे जाते ते 'वयो' (वय). 'पयो' हे दूध आणि पाणी या दोन्हीचे नाव आहे; जे लोकांद्वारे पिण्यायोग्य स्थितीला प्राप्त होते ते 'पयो'. 'रयो' म्हणजे वेग, ज्याला 'जवो' (जवा) देखील म्हटले जाते, म्हणून वेगाने जाणे म्हणजे 'रयो'. येथे 'समयो' शब्दाचा अर्थ-उद्धार (विविध अर्थ) उदाहरणांद्वारे सांगितला जात आहे. 'समय' शब्द - สมวาเย ขเณ กาเล, สมเย เหตุทิฏฺฐิสุ; ปฏิลาเภ ปหาเน จ, ปฏิเวเธ จ ทิสฺสติ. समवाय (समूह/एकत्र येणे), क्षण, काळ, समय (सिद्धांत), हेतू, दृष्टी (मत), प्रतिलाभ (प्राप्ती), प्रहाण (त्याग) आणि प्रतिवेध (साक्षात्कार) या अर्थांमध्ये 'समय' शब्द दिसून येतो. ตถา หิ ‘‘อปฺเปว นาม สฺเวปิ อุปสงฺกเมยฺยาม กาลญฺจ สมยญฺจ อุปาทายา’’ติ เอวมาทีสุ สมวาโย อตฺโถ. ‘‘เอโกว โข ภิกฺขเว ขโณ จ สมโย จ พฺรหฺมจริยวาสายา’’ติอาทีสุ ขโณ. ‘‘อุณฺหสมโย ปริฬาหสมโย’’ติอาทีสุ กาโล. ‘‘มหาสมโย ปวนสฺมิ’’นฺติอาทีสุ สมูโห. ‘‘สมโยปิ โข เต ภทฺทาลิ อปฺปฏิวิทฺโธ อโหสี’’ติอาทีสุ เหตุ. ‘‘เตน สมเยน อุคฺคาหมาโน ปริพฺพาชโก สมณมุณฺฑิกาปุตฺโต สมยปฺปวาทเก ตินฺทุกาจีเร เอกสาลเก มลฺลิกาย อาราเม ปฏิวสตี’’ติอาทีสุ ทิฏฺฐิ. तसेच 'कदाचित आपण उद्याही काळ आणि समय (अनुकूल परिस्थिती) पाहून जाऊ' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'समवाय' (एकत्र येणे/अनुकूलता) हा अर्थ आहे. 'भिक्खूंनो, ब्रह्मचर्य वासासाठी एकच क्षण आणि समय आहे' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'क्षण' हा अर्थ आहे. 'उन्हाचा समय, दाहकतेचा समय' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'काळ' हा अर्थ आहे. 'वनात महासमय (मोठा समूह) आहे' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'समूह' हा अर्थ आहे. 'हे भद्द्ली, तुझ्याकडून तो समय (हेतू/कारण) देखील प्रतिवेध (समजला) गेला नाही' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'हेतू' हा अर्थ आहे. 'त्या समयाला उग्गाहमान परिव्राजक, जो समणमुंडिकापुत्राचा मुलगा होता, समयप्रवादक (सिद्धांतांविषयी चर्चा करणाऱ्या) तिन्दुकाचीर नावाच्या मल्लिकाच्या एका शालेय आरामात राहत होता' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'दृष्टी' (मत/सिद्धांत) हा अर्थ आहे. ‘‘ทิฏฺเฐ ธมฺเม จ โย อตฺโถ, โย จตฺโถ สมฺปรายิโก; อตฺถาภิสมยา ธีโร, ปณฺฑิโตติ ปวุจฺจตี’’ติ 'या जन्मात जो अर्थ (कल्याण) आहे, आणि जो परलोकात अर्थ आहे; त्या अर्थाच्या अभिसमयामुळे (प्राप्तीमुळे) धीर पुरुषाला पंडित म्हटले जाते' - อาทีสุ [Pg.141] ปฏิลาโภ. ‘‘สมฺมา มานาภิสมยา อนฺตมกาสิ ทุกฺขสฺสา’’ติอาทีสุ ปหานํ. ‘‘ทุกฺขสฺส ปีฬนฏฺโฐ สงฺขตฏฺโฐ สนฺตาปฏฺโฐ อภิสมยฏฺโฐ’’ติอาทีสุ ปฏิเวโธ. เอตฺถ จ อุปสคฺคานํ โชตกมตฺตตฺตา ตสฺส ตสฺส อตฺถสฺส วาจโก สมยสทฺโท เอวาติ สมยสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาเรปิ สอุปสคฺโค อภิสมยสทฺโท วุตฺโต. इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रतिलाभ' (प्राप्ती) हा अर्थ आहे. 'मानाचा सम्यक अभिसमय (त्याग) केल्यामुळे दुःखाचा अंत केला' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रहाण' (त्याग) हा अर्थ आहे. 'दुःखाचा पीडन अर्थ, संस्कृत अर्थ, संताप अर्थ, अभिसमय अर्थ' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रतिवेध' (साक्षात्कार) हा अर्थ आहे. आणि येथे उपसर्गांचे केवळ द्योतकत्व असल्यामुळे त्या त्या अर्थाचा वाचक 'समय' शब्दच आहे, म्हणून 'समय' शब्दाच्या अर्थ-उद्धारात उपसर्गयुक्त 'अभिसमय' शब्द देखील सांगितला आहे. ตตฺถ สหการีการณตาย สนฺนิชฺฌํ สเมติ สมเวตีติ สมโย, สมวาโย. สเมติ สมาคจฺฉติ มคฺคพฺรหฺมจริยํ เอตฺถ ตทาธารปุคฺคโลติ สมโย, ขโณ. สเมนฺติ เอตฺถ, เอเตน วา สงฺคจฺฉนฺติ ธมฺมา สหชาตธมฺเมหิ อุปฺปาทาทีหิ วาติ สมโย, กาโล. ธมฺมปฺปวตฺติมตฺตตาย อตฺถโต อภูโตปิ หิ กาโล ธมฺมปฺปวตฺติยา อธิกรณํ กรณํ วิย จ ปริกปฺปนามตฺตสิทฺเธน รูเปน โวหริยตีติ. สมํ, สห วา อวยวานํ อยนํ ปวตฺติ อวฏฺฐานนฺติ สมโย, สมูโห, ยถา ‘‘สมุทาโย’’ติ. อวยวสหาวฏฺฐานเมว หิ สมูโห. ปจฺจยนฺตรสมาคเม เอติ ผลํ เอตสฺมา อุปฺปชฺชติ ปวตฺตติ จาติ สมโย, เหตุ, ยถา ‘‘สมุทโย’’ติ. สเมติ สํโยชนภาวโต สมฺพนฺธา เอติ อตฺตโน วิสเย ปวตฺตติ, ทฬฺหคฺคหณภาวโต วา สํยุตฺตา อยนฺติ ปวตฺตนฺติ สตฺตา ยถาภินิเวสํ เอเตนาติ สมโย, ทิฏฺฐิ. ทิฏฺฐิสํโยชเนน หิ สตฺตา อติวิย พชฺฌนฺติ. สมิติ สงฺคติ สโมธานนฺติ สมโย, ปฏิลาโภ. สมสฺส นิโรธสฺส ยานํ, สมฺมา วา ยานํ อปคโม อปฺปวตฺตีติ สมโย, ปหานํ. ญาเณน อภิมุขํ สมฺมา เอตพฺโพ อธิคนฺตพฺโพติ สมโย, ธมฺมานํ อวิปรีโต สภาโว, อภิมุขภาเวน สมฺมา เอติ คจฺฉติ พุชฺฌตีติ สมโย. ยถาภูตสภาวาวโพโธ. เอวํ ตสฺมึ ตสฺมึ อตฺเถ สมยสทฺทสฺส ปวตฺติ เวทิตพฺพา. तेथे सहकारी कारणांच्या एकत्र येण्याने जे सिद्ध होते, समेट घडून येतो, तो 'समय' म्हणजे 'समवाय' (एकत्र येणे) होय. जेथे मार्ग-ब्रह्मचर्य आणि त्याचा आधार असलेला पुद्गल (व्यक्ती) एकत्र येतात, तो 'समय' म्हणजे 'क्षण' (अनुकूल वेळ) होय. जेथे किंवा ज्याच्याद्वारे धर्म (मानसिक व भौतिक घटक) हे सहजात धर्मांशी (उत्पत्ती इत्यादींशी) एकत्र येतात, तो 'समय' म्हणजे 'काळ' होय. कारण केवळ धर्मांच्या प्रवृत्तीमुळे वास्तविक पाहता काळ अस्तित्वात नसला, तरी धर्मांच्या प्रवृत्तीचे अधिकरण (स्थान) किंवा कारण असल्यासारखे केवळ कल्पनेने सिद्ध झालेल्या रूपाने व्यवहारात आणले जाते. अवयवांचे समान किंवा एकत्र गमन (प्रवृत्ती किंवा राहणे) म्हणजे 'समय' म्हणजेच 'समूह' होय, जसे की 'समुदाय'. अवयवांचे एकत्र राहणे म्हणजेच समूह होय. इतर प्रत्ययांच्या (कारणांच्या) मिलाफातून जे फळ प्राप्त होते, ज्याच्यापासून उत्पन्न होते आणि प्रवृत्त होते, तो 'समय' म्हणजे 'हेतू' (कारण) होय, जसे की 'समुदय'. संयोजनाच्या (बंधनाच्या) भावामुळे किंवा संबंधामुळे जे स्वतःच्या विषयात प्रवृत्त होते, किंवा दृढ पकडीमुळे संयुक्त होऊन प्राणी ज्याच्याद्वारे आपापल्या अभिनिवेशानुसार (आग्रहानुसार) प्रवृत्त होतात, तो 'समय' म्हणजे 'दृष्टी' (चुकीचा दृष्टिकोन) होय. कारण दृष्टीच्या संयोजनाने प्राणी अत्यंत घट्ट बांधले जातात. 'समिती' म्हणजे संगती किंवा एकत्र येणे, तो 'समय' म्हणजे 'प्रतिलाभ' (प्राप्ती) होय. शमाकडे (निरोधाकडे) जाणे, किंवा सम्यक गमन, अपगम (दूर जाणे) किंवा अप्रवृत्ती म्हणजे 'समय' म्हणजेच 'प्रहाण' (त्याग) होय. ज्ञानाने ज्याच्या सन्मुख सम्यकपणे जावे, जे प्राप्त करावे, तो 'समय' म्हणजे धर्मांचा अविपरीत (यथार्थ) स्वभाव होय; सन्मुख भावाने सम्यकपणे जाणणे किंवा समजणे म्हणजे 'समय' होय, म्हणजेच यथाभूत स्वभावाचा बोध. अशा प्रकारे त्या त्या अर्थामध्ये 'समय' शब्दाचा प्रयोग समजून घ्यावा. นนุ [Pg.142] จ อตฺถมตฺตํ ปติ สทฺทา อภินิวิสนฺตีติ น เอเกน สทฺเทน อเนเก อตฺถา อภิธียนฺตีติ? สจฺจเมตํ สทฺทวิเสเส อเปกฺขิเต. สทฺทวิเสเส หิ อเปกฺขมาเน เอเกน สทฺเทน อเนกตฺถาภิธานํ น สมฺภวติ. น หิ โย กาลตฺโถ สมยสทฺโท, โสเยว สมูหาทิอตฺถํ วทติ. เอตฺถ ปน เตสํ เตสํ อตฺถานํ สมย สทฺทวจนียตา สามญฺญมุปาทาย อเนกตฺถตา สมยสทฺทสฺส วุตฺตา. เอวํ สพฺพตฺถ อตฺถุทฺธาเร อธิปฺปาโย เวทิตพฺโพ. पण शब्द हे केवळ अर्थाच्याच प्रति प्रवृत्त होतात, तर मग एका शब्दाने अनेक अर्थ कसे सांगितले जाऊ शकतात? हे खरे आहे, जेव्हा विशिष्ट शब्दाची अपेक्षा असते. कारण विशिष्ट शब्दाची अपेक्षा असताना एका शब्दाने अनेक अर्थ सांगणे शक्य नसते. जो 'समय' शब्द काळाच्या अर्थाचा वाचक आहे, तोच समूहादी अर्थ सांगू शकत नाही. परंतु येथे त्या त्या अर्थांना 'समय' शब्दाने सांगण्याची सामान्यता (समानता) लक्षात घेऊन 'समय' शब्दाची अनेक अर्थकता सांगितली आहे. अशा प्रकारे सर्व ठिकाणी अर्थाचा उलगडा करण्याचा अभिप्राय समजून घ्यावा. อิโต ยาโต อยโต จ, นิปฺผตฺตึ สมุทีรเย; วิญฺญู สมยสทฺทสฺส, สมวายาทิวาจิโน. विद्वानांनी 'इ' धातू, 'या' धातू आणि 'अय्' धातू यांच्यापासून समवाय इत्यादी अर्थांचा वाचक असलेल्या 'समय' शब्दाची निष्पत्ती सांगावी. อิโต ยาโต อยโต จ, สมานตฺเถหิ ธาตุหิ; เอวํ สมานรูปานิ, ภวนฺตีติ จ อีรเย. 'इ', 'या' आणि 'अय्' या समान अर्थ असलेल्या धातूंपासून अशा प्रकारे समान रूपे (शब्दरूपे) तयार होतात, असेही सांगावे. นย รกฺขเณ จ. จกาโร คติเปกฺขโก. นยติ. นโย. นโยติ นยนํ คมนนฺติ นโย, ปาฬิคติ. นยนฺติ วา รกฺขนฺติ อตฺถํ เอเตนาติ นโย, ตถตฺตนยาทิ. 'नय्' (नय) धातू रक्षण आणि गमन या अर्थात आहे. 'च' कार गतीची अपेक्षा करतो. 'नयति' (नेतो). 'नय'. 'नय' म्हणजे नेणे किंवा गमन करणे, ही पाळीची गती (पद्धत) आहे. किंवा ज्याच्याद्वारे अर्थाचे नयन (मार्गदर्शन) करतात किंवा रक्षण करतात, तो 'नय' होय, जसे की तथत्ता-नय (तथतेचा मार्ग) इत्यादी. ทย ทานคติหึสาทานรกฺขาสุ. ทยติ. ทยา. 'दय्' (दय) धातू दान, गती, हिंसा, ग्रहण आणि रक्षण या अर्थांमध्ये आहे. 'दयति' (दया करतो/देतो/जातो). 'दया'. ทยาติ เมตฺตาปิ วุจฺจติ กรุณาปิ. ‘‘ทยาปนฺโน’’ติ เอตฺถ หิ เมตฺตา ‘‘ทยา’’ติ, เมตฺตจิตฺตตํ อาปนฺโนติ หิ อตฺโถ. ‘‘อทยาปนฺโน’’ติ เอตฺถ ปน กรุณา ‘‘ทยา’’ติ วุจฺจติ. นิกฺกรุณตํ อาปนฺโนติ หิ อตฺโถ. เอวํ ทยาสทฺทสฺส เมตฺตากรุณาสุ ปวตฺติ เวทิตพฺพา. ตถา หิ อภิธมฺมฏีกายํ วุตฺตํ ‘‘ทยาสทฺโท ยตฺถ ยตฺถ ปวตฺตติ, ตตฺถ ตตฺถ อธิปฺปายวเสน โยเชตพฺโพ. ทยาสทฺโท หิ อนุรกฺขณตฺถํ อนฺโตนีตํ กตฺวา ปวตฺตมาโน เมตฺตาย จ กรุณาย จ ปวตฺตตี’’ติ. 'दया' म्हणजे मैत्री देखील म्हटले जाते आणि करुणा देखील. कारण 'दयाpanno' (दयेने युक्त) येथे मैत्रीला 'दया' म्हटले आहे, कारण त्याचा अर्थ 'मैत्रीपूर्ण चित्ताने युक्त' असा आहे. परंतु 'अदयापन्नो' (दयेने रहित) येथे करुणेला 'दया' म्हटले आहे, कारण त्याचा अर्थ 'करुणारहित झालेला' असा आहे. अशा प्रकारे 'दया' शब्दाचा प्रयोग मैत्री आणि करुणा या दोन्ही अर्थांमध्ये समजून घ्यावा. म्हणूनच अभिधम्मटीकेमध्ये म्हटले आहे - 'दया शब्द जिथे जिथे प्रवृत्त होतो, तिथे तिथे अभिप्रायानुसार त्याचा अर्थ लावावा. कारण दया शब्द रक्षणाचा अर्थ अंतर्भूत करून प्रवृत्त होत असताना मैत्री आणि करुणा या दोन्ही अर्थांमध्ये प्रवृत्त होतो.' วจนตฺโถ ปเนตฺถ เอวํ เวทิตพฺโพ – ทยติ ททาติ สตฺตานํ อภยํ เอตายาติ ทยา. ทยติ คจฺฉติ วิภาคํ อกตฺวา [Pg.143] ปาปกลฺยาณชเนสุ สมํ วตฺตติ, สีเตน สมํ ผรนฺตํ รโชมลญฺจ ปวาเหนฺตํ อุทกมิวาติปิ ทยา, เมตฺตา. ทยติ วา หึสติ การุณิกํ ยาว ยถาธิปฺเปตํ ปรสฺส หิตนิปฺผตฺตึ น ปาปุณาติ, ตาวาติ ทยา. ทยติ อนุคฺคณฺหาติ ปาปชนมฺปิ สชฺชโน เอตายาติปิ ทยา. ทยติ อตฺตโน สุขมฺปิ ปหาย เขทํ คณฺหาติ สชฺชโน เอตายาติ ทยา. ทยนฺติ คณฺหนฺติ เอตาย มหาโพธิสตฺตา พุทฺธภาวาย อภินีหารกรณกาเล หตฺถคตมฺปิ อรหตฺตผลํ ฉฑฺเฑตฺวา สํสารสาครโต สตฺเต สมุทฺธริตุกามา อนสฺสาสกรํ อติภยานกํ มหนฺตํ สํสารทุกฺขํ, ปจฺฉิมภเว จ สห อมตธาตุปฏิลาเภน อเนกคุณสมลงฺกตํ สพฺพญฺญุตญฺญาณญฺจาติปิ ทยา, กรุณา. กรุณามูลกา หิ สพฺเพ พุทฺธคุณา. येथे शब्दाचा अर्थ असा समजून घ्यावा - जिच्याद्वारे प्राण्यांना अभय दिले जाते (दयति ददाति), ती 'दया' होय. जी भेदभाव न करता प्रवृत्त होते, पापी आणि कल्याणकारी लोकांमध्ये समानतेने वागते, जसे की थंडपणाने सर्वांना व्यापणारे आणि धुळीचा मळ वाहून नेणारे पाणी असते, ती 'दया' म्हणजे 'मैत्री' होय. किंवा जोपर्यंत दुसऱ्याच्या हिताची सिद्धी होत नाही, तोपर्यंत जी कारुणिक व्यक्तीला व्याकुळ करते (हिंसा करते), ती 'दया' होय. जिच्याद्वारे सज्जन पुरुष पापी लोकांवरही अनुग्रह करतो, ती 'दया' होय. जिच्याद्वारे सज्जन पुरुष स्वतःच्या सुखाचाही त्याग करून दुःख पत्करतो, ती 'दया' होय. जिच्याद्वारे महाबोधिसत्व बुद्धत्वासाठी अभिनिहार (संकल्प) करताना, हातात आलेले अर्हत्त्वफळही सोडून देऊन, प्राण्यांना संसारसागरातून उद्धार करण्याच्या इच्छेने, अत्यंत भयानक आणि अश्वासक अशा महान संसारदुःखाला स्वीकारतात, आणि अंतिम जन्मात अमृतधातूच्या (निर्वाणाच्या) प्राप्तीसह अनेक गुणांनी सुशोभित अशा सर्वज्ञता-ज्ञानाला स्वीकारतात, ती 'दया' म्हणजे 'करुणा' होय. कारण बुद्धांचे सर्व गुण हे करुणामूलकच असतात. อปโร นโย – ทยนฺติ อนุรกฺขนฺติ สตฺเต เอตาย, สยํ วา อนุทยติ, อนุทยมตฺตเมว วา เอตนฺติ ทยา, เมตฺตา เจว กรุณา จ. กิญฺจิ ปโยคเมตฺถ กถยาม ‘‘เสยฺยถาปิ คหปติ คิชฺโฌ วา กงฺโก วา กุลโล วา มํสเปสึ อาทาย ทเยยฺย. ปุตฺเตสุ มทฺที ทเยสิ, สสฺสุยา สสุรมฺหิ จ. ทยิตพฺโพ รเถสภ’’. ตตฺถ ทเยยฺยาติ อุปฺปติตฺวา คจฺเฉยฺย, คตฺยตฺถวเสเนตํ ทฏฺฐพฺพํ. ทเยสีติ เมตฺตจิตฺตํ กเรยฺยาสิ. ทยิตพฺโพติ ปิยายิตพฺโพ. อุภยมฺเปตํ วิวรณํ รกฺขณตฺถํ อนฺโตคธํ กตฺวา อธิปฺปายตฺถวเสน กตนฺติ เวทิตพฺพํ. दुसरा नय (पद्धत) - जिच्याद्वारे प्राण्यांचे रक्षण करतात, किंवा जी स्वतः अनुकंपा करते, किंवा जी केवळ अनुकंपारूपच आहे, ती 'दया' म्हणजे मैत्री आणि करुणा दोन्ही होय. येथे काही प्रयोग (उदाहरणे) सांगू या - 'हे गृहपती, जसे एखादा गिधाड, कंक (एक पक्षी) किंवा घार मांसाचा तुकडा घेऊन उडून जाईल (दयेय्य)'. 'मद्दीने पुत्रांवर, सासूवर आणि सासऱ्यावर दया केली (दयेसि)'. 'हे रथेसभ (रथांमध्ये श्रेष्ठ), दया करावी (दयितब्बो)'. तेथे 'दयेय्य' म्हणजे उडून जावे, हे गतीच्या अर्थाने समजून घ्यावे. 'दयेसि' म्हणजे मैत्रीचे चित्त करावे. 'दयितब्बो' म्हणजे प्रिय मानावे (प्रेम करावे). हे दोन्ही स्पष्टीकरण रक्षणाचा अर्थ अंतर्भूत करून अभिप्रायाच्या अर्थानुसार केले आहे, असे समजून घ्यावे. อูยี ตนฺตสนฺตาเน. อูยติ. อูโต, อูตวา. 'ऊयी' (ऊय्) धातू विणणे किंवा तंतूंच्या विस्ताराच्या अर्थात आहे. 'ऊयति' (विणतो). 'ऊतो' (विणलेला), 'ऊतवा' (विणणारा). ปูยี วิสรเณ ทุคฺคนฺเธ จ. ปูยติ. ปูโต, ปูตวา. ปูติมจฺฉํ กุสคฺเคน, โย นโร อุปนยฺหติ. 'पूयी' (पूय्) धातू दुर्गंधी पसरवणे आणि कुजणे या अर्थात आहे. 'पूयति' (कुजतो/दुर्गंधी सुटते). 'पूतो' (कुजलेला), 'पूतवा' (कुजलेला असलेला). 'जो मनुष्य कुशाच्या (गवताच्या) टोकाने सडलेला मासा बांधतो...' กนุยี [Pg.144] สทฺเท. กนุยติ. กนุโต, กนุตวา. 'कनुयी' (कनुय्) धातू शब्दाच्या (आवाजाच्या) अर्थात आहे. 'कनुयति' (आवाज करतो). 'कनुतो' (आवाज केलेला), 'कनुतवा' (आवाज करणारा). ขมาย วิธูนเน. ขมายติ. ขมาโต, ขมาตวา. 'खमा' धातू कंप पावणे किंवा झटकणे या अर्थात आहे. 'खमायति' (झटकतो/कंप पावतो). 'खमातो' (झटकलेला), 'खमातवा' (झटकणारा). ผายิ ปายิ วุทฺธิยํ. ผายติ. ผีโต, ผตวา. 'फायी' आणि 'पायी' धातू वृद्धीच्या (वाढीच्या) अर्थात आहेत. 'फायति' (वाढतो). 'फीतो' (समृद्ध/वाढलेला), 'फतवा' (वाढलेला असलेला). ตตฺถ ตตวนฺตุปจฺจยา, ยการโลโป, ธาตฺวนฺตสฺส สรสฺส อิการาเทโส จ ทฏฺฐพฺโพ. เอส นโย ‘‘ปูโต ปูตวา’’ติอาทีสุปิ ยถาสมฺภวํ ทฏฺฐพฺโพ. ปายติ. ปาโย. อปาโย. เอตฺถ จ นตฺถิ ปาโย วุทฺธิ เอตฺถาติ อปาโย. อถ วา ปน อยโต สุขโต อเปโตติ อปาโยติปิ นิพฺพจนียํ. อปาโยติ จ นิรโย ติรจฺฉานโยนิ เปตฺติวิสโย อสุรกาโยติ จตฺตาโร อปายา. तेथे 'त' आणि 'तवन्तु' प्रत्यय लागल्याने, 'य' काराचा लोप आणि धातूच्या शेवटी असलेल्या स्वराचा 'इ' कार आदेश समजून घ्यावा. हाच नियम 'पूतो पूतवा' इत्यादींमध्येही यथासंभव समजून घ्यावा. 'पायति' (वाढतो). 'पायो' (वृद्धी/वाढ). 'अपाय'. आणि येथे ज्याच्यामध्ये 'पाय' म्हणजे वृद्धी नाही, तो 'अपाय' होय. किंवा 'अय' म्हणजे सुखापासून जो दूर गेला आहे, तो 'अपाय' होय, अशी व्युत्पत्ती आहे. 'अपाय' म्हणजे निरय (नरक), tiracchānayoni (प्राणीयोनी), pettivisayo (प्रेतलोक) आणि asurakāyo (असुरलोक) हे चार अपाय होत. ตายุ สนฺตานปาลเนสุ. ตายติ. ตายนํ. ทิวาทิคเณ ปน ตา ปาลเนติ ธาตุํ ปสฺสถ, ตสฺส ‘‘ตายติ ตาณ’’นฺติ รูปานิ. อุภเยสํ กฺริยาปทํ สมํ. อการยการปจฺจยมตฺเตเนว นานตฺตํ, นามิกปทานิ ปน วิสทิสานิ ‘‘ตายนํ, ตาณ’’นฺติ. 'तायु' (ताय्) धातू विस्तार आणि रक्षण या अर्थांमध्ये आहे. 'तायति' (रक्षण करतो/विस्तार करतो). 'तायनं' (रक्षण/विस्तार). परंतु दिवादिगणामध्ये 'ता' धातू रक्षणाच्या अर्थात पाहावा, त्याची 'तायति', 'ताणं' अशी रूपे होतात. दोन्हीचे क्रियापद समान आहे. केवळ 'अ' कार आणि 'य' कार प्रत्ययामुळेच भिन्नता आहे, परंतु नामपदे (प्रातिपदिके) 'तायनं' आणि 'ताणं' अशी भिन्न आहेत. จายุ ปูชานิสามเนสุ. ปูชา ปูชนา. นิสามนํ โอโลกนํ สวนญฺจ วุจฺจติ. ‘‘อิงฺฆ มทฺทิ นิสาเมหิ. นิสามยถ สาธโว’’ติ จ อาทีสุ หิ โอโลกนสวนานิ นิสามนสทฺเทน วุตฺตานิ. อปิจ ญาเณน อุปปริกฺขณมฺปิ นิสามนเมวาติ คเหตพฺพํ. จายติ, อปจายติ. อนคาเร ปพฺพชิเต, อปเจ พฺรหฺมจาริเย. เย วุทฺธมปจายนฺติ. อปจิตึ ทสฺเสติ. นิจฺจํ วุทฺธาปจายิโน. 'चायु' (धातू) हा पूजा आणि अवलोकन/श्रवण (निसामन) या अर्थांत वापरला जातो. पूजा म्हणजे पूजना (आदर करणे). 'निसामन' म्हणजे अवलोकन (पाहणे) आणि श्रवण (ऐकणे) असे म्हटले जाते. 'इङ्घ मद्दी निसामेही' (हे मद्दी, ऐक/अवलोकन कर) आणि 'निसामयथ साधवो' (हे सज्जनहो, ऐका) इत्यादींमध्ये अवलोकन आणि श्रवण या अर्थांनी 'निसामन' शब्द वापरला गेला आहे. तसेच ज्ञानाने परीक्षण करणे यालाही 'निसामन'च समजावे. 'चायति' (तो आदर करतो), 'अपचायति' (तो सन्मान करतो). 'अनगारे पब्बजिते, अपचे ब्रह्मचारिये' (घर नसलेल्या प्रव्रजितांचा आणि ब्रह्मचाऱ्यांचा आदर करावा). 'ये वुड्ढमपचायन्ति' (जे वृद्धांचा आदर करतात). 'अपचितिं दस्सेति' (तो आदर दर्शवतो). 'निच्चं वुड्ढापचायिनो' (नेहमी वृद्धांचा आदर करणारे). ยการนฺตธาตุรูปานิ. य-कारान्त धातूंची रूपे. รการนฺตธาตุ र-कारान्त धातू. รา [Pg.145] อาทาเน. ราติ. 'रा' (धातू) ग्रहण करणे (आदान) या अर्थी. 'राति' (तो ग्रहण करतो). ริ สนฺตาเน. เรติ. เรณุ. เรณูติ รโช. 'रि' (धातू) विस्तार/संतती (संतान) या अर्थी. 'रेति'. 'रेणु'. 'रेणु' म्हणजे धूळ (रज). รุ คติยํ โรสเน จ. รวติ, วิรวติ. 'रु' (धातू) गती आणि राग (रोसन) या अर्थी. 'रवति' (तो आवाज करतो), 'विरवति' (तो ओरडतो). รุ สทฺเท. โรติ, รวติ. รโว, อุปรโว. รุตมนุญฺญํ รุจิยา จ ปิฏฺฐิ. รุตนฺติ รวนํ รุตํ, สทฺโท. 'रु' (धातू) शब्द (आवाज) या अर्थी. 'रोति', 'रवति'. 'रवो' (आवाज), 'उपरवो'. 'रुतमनुञ्ञं रुचिया च पिट्ठि'. 'रुत' म्हणजे ओरडणे, आवाज (सद्द). เร สทฺเท. รายติ. รา. รตฺติ. เอตฺถ จ ราติ สทฺโท. รตฺตีติ นิสาสงฺขาโต สตฺตานํ สทฺทสฺส วูปสมกาโล. รา ติยฺยติ อุจฺฉิชฺชติ เอตฺถาติ รตฺติ. 'रे' (धातू) शब्द या अर्थी. 'रायति'. 'रा'. 'रत्ति' (रात्र). आणि येथे 'राति' हा शब्द आहे. 'रत्ति' (रात्र) म्हणजे निशा म्हणून ओळखला जाणारा, प्राण्यांच्या आवाजाचा शांत होण्याचा काळ. 'रा' (शब्द) जेथे नष्ट होतो (उच्छिद्यते) ती 'रत्ति' (रात्र) होय. พฺรู วิยตฺติยํ วาจายํ. อปิ หนฺตฺวา หโต พฺรูติ. 'ब्रू' (धातू) स्पष्ट वाणी (व्यक्ती) या अर्थी. 'अपि हन्त्वा हतो ब्रूति' (मारूनही मारला गेला असे म्हणतो). พฺรวีติ, พฺรุนฺติ. พฺรูสิ, พฺรูถ. พฺรูมิ, พฺรูม. พฺรูเต, พฺรุวนฺเต. พฺรูเส, พฺรุวฺเห. พฺรุเว, พฺรุมฺเห. 'ब्रवीति', 'ब्रुन्ति'. 'ब्रूसि', 'ब्रूथ'. 'ब्रूमि', 'ब्रूम'. 'ब्रूते', 'ब्रुवन्ते'. 'ब्रूसे', 'ब्रुव्हे'. 'ब्रुवे', 'ब्रुम्हे'. พฺรูตุ, พฺรุวิตุ, พฺรุวนฺตุ. พฺรูหิ, พฺรูถ. พฺรูมิ, พฺรูม. พฺรูตํ, พฺรุวนฺตํ. 'ब्रूतु', 'ब्रुवितु', 'ब्रुवन्तु'. 'ब्रूhi', 'ब्रूथ'. 'ब्रूमि', 'ब्रूम'. 'ब्रूतं', 'ब्रुवन्तं'. เอตฺถ จ อมฺพฏฺฐสุตฺเต ‘‘ปุน ภวํ โคตโม พฺรุวิตู’’ติ ปาฬิทสฺสนโต ‘‘พฺรุวิตู’’ติ วุตฺตํ. เอวํ สพฺพตฺถาปิ อุปปริกฺขิตฺวา นโย คเหตพฺโพ. आणि येथे अम्बट्ठसुत्तात 'पुन भवं गोतमो ब्रुवितू' (पुन्हा आदरणीय गौतम म्हणोत) या पाळी पाठावरून 'ब्रुवितू' असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे सर्व ठिकाणी परीक्षण करून नियम समजून घ्यावा. พฺรุเวยฺย, พฺรุเว, พฺรุเวยฺยุํ. พฺรุเวยฺยาสิ, พฺรุเวยฺยาถ. พฺรุเวยฺยามิ, พฺรุเวยฺยาม. พฺรุเวถ, พฺรุเวรํ. พฺรุเวโถ, พฺรุเวยฺยาวฺโห. พฺรุเวยฺยํ. พฺรุเวยฺยามฺเห. 'ब्रुवेय्य', 'ब्रुवे', 'ब्रुवेय्युं'. 'ब्रुवेय्यासि', 'ब्रुवेय्याथ'. 'ब्रुवेय्यामि', 'ब्रुवेय्याम'. 'ब्रुवेथ', 'ब्रुवेरं'. 'ब्रुवेथो', 'ब्रुवेय्याव्हो'. 'ब्रुवेय्यं'. 'ब्रुवेय्याम्हे'. ปพฺรูติ. อนุพฺรูติ. ปพฺรูตุ, อนุพฺรูตุ. ปพฺรุเวยฺย, อนุพฺรุเวยฺย. เอวํ สพฺพตฺถ ปอนุอุปสคฺเคหิปิ ยถาสมฺภวํ ปทมาลา โยเชตพฺพา. 'पब्रूति'. 'अनुब्रूति'. 'पब्रूतु', 'अनुब्रूतु'. 'पब्रुवेय्य', 'अनुब्रुवेय्य'. अशा प्रकारे सर्व ठिकाणी 'प', 'अनु' इत्यादी उपसर्गांसह योग्यतेनुसार पदमाला (रूपावली) जोडावी. อาห, อาหุ. พฺรเว, พฺรวิตฺถ, พฺรวิเร. พฺรวิตฺโถ, พฺรวิวฺโห. พฺรวึ, พฺรวิมฺเห. ปโรกฺขาวเสน วุตฺตานิ. 'आह', 'आहु'. 'ब्रवे', 'ब्रवित्थ', 'ब्रविरे'. 'ब्रवित्थो', 'ब्रविव्हो'. 'ब्रविं', 'ब्रविम्हे'. ही परोक्ष (भूतकाळ) विभक्तीच्या अर्थाने म्हटलेली रूपे आहेत. อพฺรวา[Pg.146], อพฺรวู. อพฺรโว, อพฺรวตฺถ. อพฺรวํ, อพฺรวมฺหา. อพฺรวตฺถ, อพฺรวตฺถุํ. อพฺรวเส, อพฺรวฺหํ. อพฺรวึ, อพฺรวิมฺหเส. หิยฺยตฺตนีวเสน วุตฺตานิ. 'अब्रवा', 'अब्रवू'. 'अब्रवो', 'अब्रवत्थ'. 'अब्रवं', 'अब्रवम्हा'. 'अब्रवत्थ', 'अब्रवत्थुं'. 'अब्रवसे', 'अब्रव्हं'. 'अब्रविं', 'अब्रविम्हसे'. ही हिय्यत्तनी (कालचा भूतकाळ) विभक्तीच्या अर्थाने म्हटलेली रूपे आहेत. อพฺรวิ, อพฺรวุํ. อพฺรโว, อพฺรวิตฺถ. อพฺรวึ, อพฺรวิมฺหา. อพฺรวา, อพฺรวู. อพฺรวเส, อพฺรวิวฺหํ. อพฺรวํ, อพฺรวิมฺเห. อชฺชตนีวเสน วุตฺตานิ. 'अब्रवि', 'अब्रवुं'. 'अब्रवो', 'अब्रवित्थ'. 'अब्रविं', 'अब्रविम्हा'. 'अब्रवा', 'अब्रवू'. 'अब्रवसे', 'अब्रविव्हं'. 'अब्रवं', 'अब्रविम्हे'. ही अज्जतनी (आजचा/सामान्य भूतकाळ) विभक्तीच्या अर्थाने म्हटलेली रूपे आहेत. พฺรุวิสฺสติ, พฺรุวิสฺสนฺติ. อพฺรวิสฺสา, อพฺรวิสฺสํสุ. เสสํ สพฺพํ เนตพฺพํ. กมฺมปทํ อปฺปสิทฺธํ. สเจ ปน สิยา, ‘‘พฺรูยตี’’ติ สิยา ‘‘ลุยติ, ลูยตี’’ติ ปทานิ วิย. 'ब्रुविस्सति', 'ब्रुविस्सन्ति'. 'अब्रविस्सा', 'अब्रविस्संसु'. उर्वरित सर्व रूपे अशीच बनवावीत. कर्मपद दिसत नाही. परंतु जर कर्मपद असेल, तर 'लुयति, लूयति' या पदांप्रमाणे 'ब्रूयति' असे रूप होईल. ชีร พฺรูหเน. พฺรูหนํ วฑฺฒนํ. ชีรติ. ชีรํ. ชีรมาโน. ชีรณํ. อปฺปสฺสุตายํ ปุริโส, พลิพทฺโทว ชีรติ. 'जीर' (धातू) वृद्धी (ब्रूहण) या अर्थी. ब्रूहण म्हणजे वाढणे (वड्ढन). 'जीरति' (तो वृद्ध होतो/झिजतो). 'जीरं'. 'जीरमानो'. 'जीरणं'. 'अप्पस्सुतायं पुरिसो, बलिबद्दोव जीरति' (हा अल्पश्रुत मनुष्य बैलाप्रमाणेच वृद्ध होतो/झिजतो). ปูร ปูรเณ. ปูรติ. ปูรโตว มโหทธิ. สพฺเพ ปูเรนฺตุ สงฺกปฺปา. ปูริตุํ, ปูริตฺวา, ปูรํ, ปูริตํ. ปุณฺณํ, ปริปุณฺณํ. สมฺปุณฺณํ, ปูรณํ. ปูรโณ กสฺสโป. การิเต ‘‘ปารมิโย ปูเรติ, ปูรยติ, ปูราเปติ, ปูราปยติ. ปูเรตฺวา, ปูรยิตฺวา, ปูราเปตฺวา, ปูราปยิตฺวา, ปริปูเรตฺวา’’ อิจฺจาทีนิ ภวนฺติ. 'पूर' (धातू) पूर्ण करणे (पूरण) या अर्थी. 'पूरति' (तो भरतो). 'पूरतोव महोदधि' (महासागर भरतोच). 'सब्बे पूरेन्तु सङ्कप्पा' (सर्व संकल्प पूर्ण होवोत). 'पूरितुं', 'पूरित्वा', 'पूरं', 'पूरितं'. 'पुण्णं' (पूर्ण), 'परिपुण्णं'. 'सम्पुण्णं', 'पूरणं'. 'पूरणो कस्सपो' (पूरण कस्सप). प्रयोजक (कारित) रूपात 'पारमियो पूरेति' (पारमिता पूर्ण करतो), 'पूरयति', 'पूरापेति', 'पूरापयति'. 'पूरेत्वा', 'पूरयित्वा', 'पूरापेत्वा', 'पूरापयित्वा', 'परिपूरेत्वा' इत्यादी रूपे होतात. โฆร คติปฏิฆาเต. คติปฏิฆาตํ คติปฏิหนนํ. โฆรติ. 'घोर' (धातू) गतीचा अडथळा (गतिप्रतिघात) या अर्थी. गतिप्रतिघात म्हणजे गती रोखणे. 'घोरति'. โธร คติจาตุริเย. คติจาตุริยํ คติเฉกภาโว. โธเรติ. 'धोर' (धातू) गतीमधील चतुरता (गतिचातुर्य) या अर्थी. गतिचातुर्य म्हणजे गतीमधील चतुरपणा. 'धोरेति'. สร คติยํ. สรติ, วิสรติ, อุสฺสรติ. อุสฺสารณา. สโร. สํสาโร อิจฺจาทีนิ. ตตฺถ สโรติ รหโท. สํสาโรติ วฏฺฏํ, โย ‘‘ภโว’’ติปิ วุจฺจติ. 'सर' (धातू) गती या अर्थी. 'सरति' (तो सरकतो/जातो), 'विसरति', 'उस्सरति'. 'उस्सारणा'. 'सरो'. 'संसारो' इत्यादी. तेथे 'सरो' म्हणजे तलाव (रहद). 'संसारो' म्हणजे चक्र (वट्ट), ज्याला 'भव' असेही म्हटले जाते. จร จรเณ. จรติ, วิจรติ, อนุจรติ, สญฺจรติ. 'चर' (धातू) आचरण करणे (चरण) या अर्थी. 'चरति' (तो आचरण करतो/चालतो), 'विचरति', 'अनुचरति', 'सञ्चरति'. จร [Pg.147] คติภกฺขเนสุ. จรติ, วิจรติ, อนุจรติ, สญฺจรติ, ปฏิจรติ. จริยา. จริตา. จาโร. วิจาโร. อนุวิจาโร. อุปวิจาโร. จรณํ. จารโก. โอจรโก. พฺรหฺมจริยํ อิจฺจาทีนิ. 'चर' (धातू) गमन आणि भक्षण या अर्थी. 'चरति', 'विचरति', 'अनुचरति', 'सञ्चरति', 'पटिचरति'. 'चरिया' (चर्या), 'चरिता'. 'चारो'. 'विचारो'. 'अनुविचारो'. 'उपविचारो'. 'चरणं'. 'चारको'. 'ओचरको'. 'ब्रह्मचरियं' (ब्रह्मचर्य) इत्यादी. ตตฺถ จรตีติ คจฺฉติ, ภกฺขติ วา. ตถา หิ จรนฺติ ปทสฺส คจฺฉนฺโต ขาทนฺโต จาติ อตฺถํ วทนฺติ ครู. ปฏิจรตีติ ปฏิจฺฉาเทติ. จารโกติ ตํปเวสิตานํ สตฺตานํ สุขํ จรติ ภกฺขตีติ จารโก, โรโธ. โอจรโกติ อโธจารี. พฺรหฺมจริยนฺติ ทานมฺปิ เวยฺยาวจฺจมฺปิ สิกฺขาปทมฺปิ พฺรหฺมวิหาโรปิ ธมฺมเทสนาปิ เมถุนวิรติปิ สทารสนฺโตโสปิ อุโปสโถปิ อริยมคฺโคปิ สกลํ สาสนมฺปิ อชฺฌาสโยปิ วุจฺจติ. तेथे 'चरति' म्हणजे जातो किंवा भक्षण करतो. म्हणूनच 'चरन्ति' या पदाचा अर्थ 'जाणारा आणि खाणारा' असा गुरुजन सांगतात. 'पटिचरति' म्हणजे झाकणे/लपवणे. 'चारको' म्हणजे त्यात प्रवेश केलेल्या प्राण्यांचे सुख हरण करतो किंवा भक्षण करतो तो 'चारक' (तुरुंग/अडथळा). 'ओचरको' म्हणजे गुप्तहेर (अधोचारी). 'ब्रह्मचर्य' या शब्दाने दान, वैयावृत्य (सेवा), शिक्षापद (शील), ब्रह्मविहार, धम्मदेशना, मैथुनविरती, सदा-संतोष (स्वपत्नीसंतोष), उपोसथ, आर्यमार्ग, संपूर्ण शासन (बुद्धवचन) आणि आशय (अभिप्राय) देखील अभिप्रेत आहे. กินฺเต วตํ กึ ปน พฺรหฺมจริยํ,กิสฺส สุจิณฺณสฺส อยํ วิปาโก; อิทฺธิชุติพลวีริยูปปตฺติ,อิทญฺจ เต นาค มหาวิมานํ. तुमचे व्रत कोणते होते? आणि कोणते ब्रह्मचर्य होते? कोणत्या चांगल्या आचरणाचा हा विपाक (फळ) आहे? ज्यामुळे तुम्हाला ही ऋद्धी, द्युती (तेज), बल, वीर्य आणि हे विशाल विमान प्राप्त झाले आहे, हे नागा? อหญฺจ ภริยา จ มนุสฺสโลเก,สทฺธา อุโภ ทานปตี อหุมฺหา; โอปานภูตํ เม ฆรํ ตทาสิ,สนฺตปฺปิตา สมณพฺราหฺมณา จ. मी आणि माझी पत्नी मनुष्यलोकात असताना, आम्हा दोघांमध्ये श्रद्धा होती आणि आम्ही दानशूर होतो. माझे घर विहिरीसारखे (सर्वांसाठी खुले) होते, आणि तेथे श्रमण व ब्राह्मण तृप्त केले जात असत. ตํ เม วตํ ตํ ปน พฺรหฺมจริยํ,ตสฺส สุจิณฺณสฺส อยํ วิปาโก; อิทฺธิชุติพลวีริยูปปตฺติ,อิทญฺจ เม ธีร มหาวิมาน’’นฺติ तेच माझे व्रत होते आणि तेच माझे ब्रह्मचर्य होते. त्याच सुचरित कर्माचा हा विपाक आहे, ज्यामुळे मला ही ऋद्धी, द्युती, बल, वीर्य आणि हे विशाल विमान प्राप्त झाले आहे, हे धीर पुरुषा! อิมสฺมิญฺหิ ปุณฺณกชาตเก ทานํ ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺตํ. या पुण्णक जातकामध्ये दानाला 'ब्रह्मचर्य' असे म्हटले आहे. ‘‘เกน [Pg.148] ปาณิ กามทโท, เกน ปาณิ มธุสฺสโว; เกน เต พฺรหฺมจริเยน, ปุญฺญํ ปาณิมฺหิ อิชฺฌติ. कोणत्या कर्माने तुमचा हात इच्छा पूर्ण करणारा झाला आहे? कोणत्या कर्माने तुमच्या हातातून मध स्रवतो? कोणत्या ब्रह्मचर्याने तुमच्या हातात हे पुण्य फलद्रूप झाले आहे? เตน ปาณิ กามทโท, เตน ปาณิ มธุสฺสโว; เตน เม พฺรหฺมจริเยน, ปุญฺญํ ปาณิมฺหิ อิชฺฌตี’’ติ त्या कर्माने माझा हात इच्छा पूर्ण करणारा झाला आहे, त्या कर्माने माझ्या हातातून मध स्रवतो. त्या माझ्या ब्रह्मचर्याने माझ्या हातात हे पुण्य फलद्रूप झाले आहे. อิมสฺมึ องฺกุรเปตวตฺถุมฺหิ เวยฺยาวจฺจํ ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺตํ. ‘‘อิทํ โข ตํ ภิกฺขเว ติตฺติริยํ นาม พฺรหฺมจริยํ อโหสี’’ติ อิมสฺมึ ติตฺติรชาตเก สิกฺขาปทํ ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺตํ. ‘‘ตํ โข ปน ปญฺจสิข พฺรหฺมจริยํ เนว นิพฺพิทาย น วิราคาย…เป… ยาวเทว พฺรหฺมโลกูปปตฺติยา’’ติ อิมสฺมึ มหาโควินฺทสุตฺเต พฺรหฺมวิหารา ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺตา. ‘‘เอกสฺมึ พฺรหฺมจริยสฺมึ, สหสฺสํ มจฺจุหายิโน’’ติ เอตฺถ ธมฺมเทสนา ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺตา. ‘‘ปเร อพฺรหฺมจารี ภวิสฺสนฺติ, มยเมตฺถ พฺรหฺมจาริโน ภวิสฺสามา’’ติ สลฺเลขสุตฺเต เมถุนวิรติ ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺตา. या अङ्कुरपेतवत्थूमध्ये वैयावृत्य (सेवा) याला 'ब्रह्मचर्य' म्हटले आहे. 'भिक्खूहो, हेच ते तित्तिरिय नावाचे ब्रह्मचर्य होते' या तित्तिर जातकामध्ये शिक्षापदाला 'ब्रह्मचर्य' म्हटले आहे. 'हे पंचशिखा, ते ब्रह्मचर्य निर्वेदासाठी नाही, विरागासाठी नाही... केवळ ब्रह्मलोक प्राप्तीसाठीच आहे' या महागोविंद सुत्तात ब्रह्मविहारांना 'ब्रह्मचर्य' म्हटले आहे. 'एका ब्रह्मचर्यामध्ये हजारो मृत्यूला मागे टाकणारे असतात' येथे धम्मदेशनेला 'ब्रह्मचर्य' म्हटले आहे. 'इतर लोक अब्रह्मचारी होतील, पण आम्ही येथे ब्रह्मचारी राहू' या सल्लेख सुत्तात मैथुनविरतीला 'ब्रह्मचर्य' म्हटले आहे. มยญฺจ ภริยา นาติกฺกมาม,อมฺเห จ ภริยา นาติกฺกมนฺติ; อญฺญตฺร ตาห พฺรหฺมจริยํ จราม; ตสฺมา หิ อมฺหํ ทหรา น มียเร’’ติ आम्ही आमच्या पत्नीचे उल्लंघन करत नाही आणि आमच्या पत्न्या आमचे उल्लंघन करत नाहीत. त्याशिवाय आम्ही ब्रह्मचर्य पाळतो; म्हणूनच आमचे तरुण (मुले) अकाली मरत नाहीत. มหาธมฺมปาลชาตเก สทารสนฺโตโส ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺโต. महाधम्मपालजातकात स्वतःच्या पत्नीविषयी संतुष्ट असण्याला (सदारसंतोष) "ब्रह्मचर्य" म्हटले आहे. หีเนน พฺรหฺมจริเยน, ขตฺติเย อุปปชฺชติ; มชฺฌิเมน จ เทเวสุ, อุตฺตเมน วิสุชฺฌตี’’ติ "हीन ब्रह्मचर्याने क्षत्रियकुळात जन्म मिळतो, मध्यम ब्रह्मचर्याने देवांमध्ये जन्म मिळतो आणि उत्तम ब्रह्मचर्याने मनुष्य विशुद्ध होतो." เอวํ นิมิชาตเก อวีติกฺกมวเสน กโต อุโปสโถ ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺโต. ‘‘อิทํ โข ปน ปญฺจสิข พฺรหฺมจริยํ เอกนฺตนิพฺพิทาย วิราคาย…เป… อยเมว อริโย อฏฺฐงฺคิโก มคฺโค’’ติ [Pg.149] มหาโควินฺทสุตฺตสฺมิํเยว อริยมคฺโค ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺโต. ‘‘ตยิทํ พฺรหฺมจริยํ อิทฺธญฺเจว ผีตญฺจ วิตฺถาริกํ พาหุชญฺญํ ปุถุภูตํ ยาวเทว มนุสฺเสหิ สุปฺปกาสิต’’นฺติ ปาสาทิกสุตฺเต สิกฺขตฺตยสงฺคหํ สกลํ สาสนํ ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺตํ. अशा प्रकारे, निमिजातकात (नियम किंवा शीलांचे) उल्लंघन न करण्याच्या स्वरूपात पाळलेल्या उपोसथाला "ब्रह्मचर्य" म्हटले आहे. "हे पंचशिखा! हे ब्रह्मचर्य एकांत निर्वेदासाठी (वैराग्यासाठी), विरागासाठी... पे... हाच आर्य अष्टांगिक मार्ग आहे" असे महागोविंदसुत्तात आर्यमार्गालाच "ब्रह्मचर्य" म्हटले आहे. "हे ब्रह्मचर्य समृद्ध, संपन्न, विस्तृत, बहुजनप्रिय, सर्वत्र पसरलेले आणि मनुष्यांमध्ये चांगल्या प्रकारे प्रकाशित झालेले आहे" असे पासादिकसुत्तात त्रिशिक्षांच्या संग्रहरूप संपूर्ण शासनाला (बुद्धांच्या शिकवणीला) "ब्रह्मचर्य" म्हटले आहे. ‘‘อปิ อตรมานานํ, ผลาสาว สมิชฺฌติ; วิปกฺกพฺรหฺมจริโยสฺมิ, เอวํ ชานาหิ คามณี’’ติ "घाई न करणाऱ्यांची देखील फळाची आशा पूर्ण होते; माझे ब्रह्मचर्य परिपक्व झाले आहे, हे ग्रामणी! तू असे जाण." เอตฺถ อชฺฌาสโย ‘‘พฺรหฺมจริย’’นฺติ วุตฺโต. อิจฺเจวํ – येथे अध्याशयाला (उच्च हेतूला/संकल्पाला) "ब्रह्मचर्य" म्हटले आहे. अशा प्रकारे – ทานํ เวยฺยาวฏิยญฺจ, สิกฺขา พฺรหฺมวิหารกา; ธมฺมกฺขานํ เมถุนตา-วิรติ จ อุโปสโถ. दान, वैयावृत्य (सेवा), शिक्षा (शील-प्रशिक्षण), ब्रह्मविहार, धम्मोपदेश (धम्मकथन), मैथुनापासून विरती आणि उपोसथ. สทาเรสุ จ สนฺโตโส, อริยมคฺโค จ สาสนํ; อชฺฌาสโย จิเม พฺรหฺม-จริยสทฺเทน วุจฺจเร. स्वतःच्या पत्नीविषयी संतोष, आर्यमार्ग, बुद्धशासन आणि अध्याशय (उच्च हेतू) – हे सर्व 'ब्रह्मचर्य' या शब्दाने सांगितले जातात. หุร โกฏิลฺเล. หุรติ. 'हुर' (धातू) कुटिलतेच्या (वाकडेपणाच्या) अर्थात आहे. 'हुरति' (तो कुटिल होतो/वाकतो). สร สทฺโทปตาเปสุ. สรติ. สโร, สรณํ. 'सर' (धातू) शब्द (आवाज) आणि उपताप (पीडा देणे/तप्त करणे) या अर्थांमध्ये आहे. 'सरति'. 'सरो' (बाण/स्वर), 'सरणम्' (शरण). เอตฺถ จ สโรติ สทฺโทปิ วุจฺจติ อุสุปิ. สรณนฺติ สรติ อุปตาเปติ หึสติ สรณคตานํ เตเนว สรณคมเนน ภยํ สนฺตาปํ ทุกฺขํ ทุคฺคตึ ปริกิเลสญฺจาติ สรณํ, พุทฺธาทิรตนตฺตยํ. อถ วา สทฺธา ปสนฺนา มนุสฺสา ‘‘อมฺหากํ สรณมิท’’นฺติ สรนฺติ จินฺเตนฺติ, ตํ ตตฺถ จ วาจํ นิจฺฉรนฺติ คจฺฉนฺติ จาติปิ สรณํ. आणि येथे 'सरो' म्हणजे शब्द (आवाज) देखील म्हटले जाते आणि बाण (उसु) देखील. 'शरण' (सरणम्) म्हणजे जे शरण आलेल्यांच्या भय, संताप, दुःख, दुर्गती आणि क्लेशांना त्या शरण जाण्यानेच नष्ट करते, पीडित करते किंवा हिंसेत बदलते, ते 'शरण' होय; म्हणजेच बुद्ध इत्यादी त्रिरत्न. किंवा, श्रद्धावान व प्रसन्न झालेले मनुष्य "हे आमचे शरण आहे" असे स्मरण करतात, चिंतन करतात, आणि त्याविषयी वाणी उच्चारतात व तिथे जातात, म्हणूनही ते 'शरण' आहे. สร จินฺตายํ. สรติ, สุสรติ อิจฺจปิ ปโยโค. อปฺปกฺขรานญฺหิ พหุภาโว อญฺญถาภาโว จ โหติ, ยถา ‘‘ทฺเว, ทุเว, ตณฺหา ตสิณา, ปมฺหํ, ปขุม’’นฺติ. อนุสฺสรติ, ปฏิสฺสรติ. สรนฺติ เอตาย สตฺตา, สยํ วา สรติ, สรณมตฺตเมว วา เอตนฺติ สติ. อนุสฺสติ, ปฏิสฺสติ. สรตีติ สโต. ปุนปฺปุนํ สรตีติ ปฏิสฺสโต. 'सर' (धातू) चिंतनाच्या (स्मरणाच्या) अर्थात आहे. 'सरति', 'सुसरति' असा प्रयोग होतो. कमी अक्षरे असलेल्या शब्दांचे बहुविध रूप आणि परिवर्तन होते, जसे की "द्वे, दुवे; तण्हा, तसिणा; पम्हं, पखुमं". 'अनुस्सरति' (अनुस्मरण करतो), 'पटिस्सरति' (प्रतिस्मरण करतो). ज्याच्याद्वारे प्राणी स्मरण करतात, किंवा जे स्वतः स्मरण करते, किंवा जे केवळ स्मरणमात्र आहे, ती 'सति' (स्मृती) होय. 'अनुस्सति' (अनुस्मृती), 'पटिस्सति' (प्रतिस्मृती). जो स्मरण करतो तो 'सतो' (स्मृतिमान). जो वारंवार स्मरण करतो तो 'पटिस्सतो' (प्रतिस्मृतिमान). ทฺวร [Pg.150] สํวรเณ. สํวรณํ รกฺขณา. ทฺวรติ. ทฺวารํ. ทฺวิสทฺทูปปทอรธาตุวเสนปิ อิทํ รูปํ สิชฺฌติ. ตตฺริมานิ นิพฺพจนานิ – ทฺวรนฺติ สํวรนฺติ รกฺขนฺติ เอเตนาติ ทฺวารํ, อถ วา ทฺเว กวาฏา อรนฺติ คจฺฉนฺติ ปวตฺตนฺติ เอตฺถาติปิ ทฺวารนฺติ. เคหทฺวารมฺปิ กายทฺวาราทีนิปิ อุปาโยปิ ทฺวารนฺติ วุจฺจติ. ปาฬิยํ ตุ ‘‘ทฺวารํ ทฺวารา’’ติ จ อิตฺถินปุํสกวเสน ทฺวารสทฺโท วุตฺโต. ตถา หิ ‘‘ทฺวารมฺปิ สุรกฺขิตํ โหตี’’ติ จ ‘‘ทฺวาราเปสา’’ติ จ ตสฺส ทฺวิลิงฺคตา วุตฺตา. 'दवर' (धातू) संवरणाच्या (बंद करण्याच्या) अर्थात आहे. संवरण म्हणजे रक्षण करणे. 'दवरति'. 'द्वारं' (द्वार/दरवाजा). 'द्वि' या शब्दाच्या उपपदासह 'अर' धातूच्या योगाने देखील हे रूप सिद्ध होते. त्याविषयी ही व्युत्पत्ती आहे – ज्याच्याद्वारे बंद करतात किंवा रक्षण करतात ते 'द्वार'; अथवा जेथे दोन कवाडे (दारे) फिरतात, जातात किंवा कार्य करतात ते 'द्वार'. घराचे द्वार, कायद्वार (शरीरद्वार) इत्यादी आणि उपायाला देखील 'द्वार' म्हटले जाते. पाळीमध्ये 'द्वार' शब्द स्त्रीलिंग आणि नपुंसकलिंग या दोन्ही रूपांत "द्वारं" आणि "द्वारा" असा वापरला जातो. जसे की "द्वारम्पि सुरक्खितं होति" आणि "द्वारापेसा" यावरून त्याचे द्विलिंगत्व स्पष्ट होते. คร ฆร เสจเน. ครติ. ฆรติ. ฆรํ. 'गर' आणि 'घर' (धातू) सिंचनाच्या (शिंपडण्याच्या) अर्थात आहेत. 'गरति'. 'घरति'. 'घरं' (घर). ธูร หุจฺฉเน. หุจฺฉน โกฏิลฺลํ. ธูรติ. 'धूर' (धातू) हुच्छनाच्या (कुटिलतेच्या/वाकडेपणाच्या) अर्थात आहे. हुच्छन म्हणजे कुटिलता. 'धूरति'. ตร ปฺลวนสรเณสุ. ตรติ. ตรณํ. ติตฺถํ. ติณฺโณ. อุตฺติณฺโณ. โอติณฺโณ อิจฺจาทีนิ. ตตฺถ ตรณํ วุจฺจติ นาวา, ตรติ อุทกปิฏฺเฐ ปฺลวติ, ตรนฺติ อุตฺตรนฺติ วา นทึ เอเตนาติ อตฺเถน. 'तर' (धातू) प्लवन (पोहणे/तरंगणे) आणि सरण (पार करणे/जाणे) या अर्थांमध्ये आहे. 'तरति'. 'तरणं'. 'तित्थं' (तीर्थ/घाट). 'तिण्णो' (पार झालेला). 'उत्तिण्णो' (पार गेलेला). 'ओतिण्णो' (उतरलेला) इत्यादी. तेथे 'तरण' म्हणजे नौका (नाव) म्हटले जाते, कारण ती पाण्याच्या पृष्ठभागावर तरंगते (प्लवति), या अर्थाने किंवा ज्याच्याद्वारे नदी पार करतात (तरन्ति किंवा उत्तरन्ति) या अर्थाने. นาวา ปฺลโว ตรํ โปโต, ตรณํ อุตฺตรํ ตถา; ชลยานนฺติ เอตานิ, นาวานามานิ โหนฺติ ตุ. "नावा (नौका), प्लव, तर, पोत, तरण, उत्तर आणि जलयान – ही सर्व नौकेचीच नावे आहेत." ตร สมฺภเม. สมฺภโม อนวฏฺฐานํ. ตรติ. ตริโต. ตุรงฺโค. 'तर' (धातू) संभ्रमाच्या (घाईच्या/चंचलतेच्या) अर्थात आहे. संभ्रम म्हणजे अनवस्थान (अस्थिरता). 'तरति'. 'तरितो'. 'तुरङ्गो' (घोडा). เอตฺถ จ ‘‘โส มาสเขตฺตํ ตริโต อวาสริ’’นฺติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ตตฺถ ตริโตติ ตุริโต สมฺภมนฺโต. อวาสรินฺติ อุปคจฺฉึ อุปวิสึ วา. आणि येथे "सो मासखेत्तं तरितो अवासरि" (तो उडदाच्या शेतात घाईघाईने शिरला) हे पाळीचे उदाहरण आहे. तेथे 'तरितो' म्हणजे घाई केलेला (तुरितो), संभ्रमित झालेला (सम्भमन्तो). 'अवासरि' म्हणजे जवळ गेला (उपगच्छि) किंवा प्रवेश केला/बसला (उपविसि). ชร โรเค. เอตฺถ ชรโรโคเยว ‘‘โรโค’’ติ อธิปฺเปโต ปโยควเสน. ชรสทฺทสฺส หิ ชรโรเค ปวตฺตนิยมนตฺถํ ‘‘โรเค’’ติ วุตฺตํ. เตน อญฺโญ โรโค อิธ โรคสทฺเทน น วุจฺจติ. ชรติ. ชโร. สชฺชโร. ปชฺชรโรโค. ชเรน ปีฬิตา มนุสฺสา. ยตฺถ ตุ อยํ วโยหานิวาจโก[Pg.151], ตตฺถ ปโยเค ‘‘ชีรติ, ชรา’’ติ จสฺส รูปานิ ภวนฺติ. 'जर' (धातू) रोगाच्या अर्थात आहे. येथे प्रयोगाच्या अनुसार 'जरा-रोग' (वृद्धत्वाचा आजार) हाच 'रोग' या शब्दाने अभिप्रेत आहे. 'जर' शब्दाची जरा-रोगामध्येच प्रवृत्ती मर्यादित करण्यासाठी "रोगे" असे म्हटले आहे. त्यामुळे इतर रोगांना येथे 'रोग' शब्दाने म्हटले जात नाही. 'जरति'. 'जरो' (ताप/ज्वर). 'सज्जरो'. 'पज्जररोगो' (दाहज्वर). ज्वराने (किंवा वृद्धत्वाने) पीडित झालेले मनुष्य. परंतु जेथे हा शब्द वयोवृद्धतेचा (वय कमी होण्याचा) वाचक असतो, तेथे प्रयोगात "जीरति" आणि "जरा" अशी त्याची रूपे होतात. ทร ภเย. ทรติ. ทรี. ‘‘พีลาสยา ทรีสยา’’ติ นิทสฺสนํ. ตตฺถ ทรีติ ภายิตพฺพฏฺเฐน ทรี. 'दर' (धातू) भयाचा (भीतीच्या) अर्थात आहे. 'दरति'. 'दरी' (गुहा). "बीलासया दरीसया" (बिळात राहणारे, दरीत राहणारे) हे उदाहरण आहे. तेथे 'दरी' म्हणजे भीती वाटण्याच्या ठिकाणाच्या अर्थाने 'दरी' म्हटले आहे. ทร อาทรานาทเรสุ. ทรติ, อาทรติ, อนาทรติ. อาทโร, อนาทโร. 'दर' (धातू) आदर आणि अनादर या अर्थांमध्ये आहे. 'दरति', 'आदरति', 'अनादरति'. 'आदरो' (आदर), 'अनादरो' (अनादर). เอตฺถ จ ทรตีติ ทรํ กโรตีติ จ อนาทรํ กโรตีติ จ อตฺโถ. ยถา หิ อารกาสทฺโท ทูราสนฺนวาจโก, ตถายมฺปิ ทรธาตุ อาทรานาทรวาจโก ทฏฺฐพฺโพ. ทรสทฺโท จ กายทรเถ จิตฺตทรเถ กิเลสทรเถ จ วตฺตติ. อยญฺหิ – आणि येथे 'दरति' म्हणजे 'आदर करतो' आणि 'अनादर करतो' असा अर्थ आहे. ज्याप्रमाणे 'आरक' शब्द दूर आणि जवळ या दोन्ही अर्थांचा वाचक आहे, त्याचप्रमाणे हा 'दर' धातू देखील आदर आणि अनादर या दोन्ही अर्थांचा वाचक समजला पाहिजे. तसेच 'दर' शब्द काय-दर (शारीरिक क्लेश), चित्त-दर (मानसिक क्लेश) आणि क्लेश-दर (विकारांचे क्लेश) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. जसे की – อาทิตฺตํ วต มํ สนฺตํ, ฆตสิตฺตํว ปาวกํ; วารินา วิย โอสิญฺจิ, สพฺพํ นิพฺพาปเย ทร’’นฺติ "तूप ओतलेल्या अग्नीप्रमाणे जळणाऱ्या मला, पाण्याने शिंपडावे त्याप्रमाणे शिंपडून माझे सर्व क्लेश (दर) शांत केले." เอตฺถ กายทรเถ จิตฺตทรเถ จ วตฺตติ. ‘‘วีตทฺทโร วีตโสโก วีตสลฺโล, สยํ อภิญฺญาย อภาสิ พุทฺโธ’’ติ เอตฺถ ปน กิเลสทรเถ วตฺตติ. วีตทฺทโรติ หิ อคฺคมคฺเคน สพฺพกิเลสานํ สมุจฺฉินฺนตฺตา วิคตกิเลสทรโถติ อตฺโถ. येथे हा शब्द शारीरिक क्लेश आणि मानसिक क्लेश या अर्थांमध्ये वापरला आहे. "क्लेशरहित (वीतद्दर), शोकरहित, शल्यरहित होऊन बुद्धांनी स्वतः अभिज्ञा प्राप्त करून धम्म उपदेशिला" येथे मात्र हा शब्द क्लेश-दराच्या (विकारांच्या क्लेशाच्या) अर्थात वापरला आहे. 'वीतद्दर' म्हणजे अग्र मार्गाने (अर्हत मार्गाने) सर्व क्लेशांचा समूळ उच्छेद केल्यामुळे ज्यांचे क्लेश नष्ट झाले आहेत असा अर्थ आहे. นร นยเน. นรติ. นโร, นารี. 'नर' (धातू) नयनाच्या (मार्ग दाखवण्याच्या/नेण्याच्या) अर्थात आहे. 'नरति'. 'नरो' (नर/पुरुष), 'नारी' (स्त्री). เอตฺถ นโรติ ปุริโส. โส หิ นรติ เนตีติ นโร. ยถา ปฐมปกติภูโต สตฺโต ทตราย ปกติยา เสฏฺฐฏฺเฐน ปุริ อุจฺจาฏฺฐาเน เสติ ปวตฺตตีติ ปุริโสติ วุจฺจติ, เอวํ นยนฏฺเฐน นโรติ วุจฺจติ. ปุตฺตภาตุภูโตปิ หิ ปุคฺคโล มาตุเชฏฺฐภคินีนํ เนตุฏฺฐาเน ติฏฺฐติ, ปเคว อิตโร อิตราสํ. นารีติ นเรน โยคโต, นรสฺสายนฺติ วา นารี. อปรมฺเปตฺถ นรสทฺทสฺส นิพฺพจนํ, นริยติ สเกน [Pg.152] กมฺเมน นิยฺยตีติ นโร, สตฺโต มนุสฺโส วา. ‘‘กมฺเมน นิยฺยเตโอ โลโก’’ติ หิ วุตฺตํ. ตตฺถ นรสทฺทสฺส ตาว ปุริสวจเน ‘‘นรา จ อถ นาริโย’’ติ นิทสฺสนํ. สตฺตมนุสฺสวจเน ปน ‘‘พุทฺโธ อยํ เอทิสโก นรุตฺตโม. อาโมทิตา นรมรู’’ติ จ นิทสฺสนํ, ตสฺมา ‘‘นโรติ ปุริโส, นโรติ สตฺโต, นโรติ มนุสฺโส’’ติ ตตฺถ ตตฺถ ยถาสมฺภวํ อตฺโถ สํวณฺเณตพฺโพ. येथे 'नरो' म्हणजे पुरुष. तो मार्ग दाखवतो (नेतो) म्हणून 'नरो' (नर) म्हटला जातो. ज्याप्रमाणे प्रथम प्रकृती असलेला प्राणी अधिक दृढ प्रकृतीमुळे श्रेष्ठत्वाच्या अर्थाने उच्च स्थानावर (पुरी) राहतो म्हणून त्याला 'पुरिसो' (पुरुष) म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे मार्ग दाखवण्याच्या (नेण्याच्या) अर्थाने त्याला 'नरो' म्हटले जाते. कारण मुलगा किंवा भाऊ असलेला व्यक्ती देखील आई आणि मोठ्या बहिणीसाठी मार्गदर्शकाच्या (नेत्याच्या) स्थानी असतो, मग इतरांचा इतर स्त्रियांशी काय संबंध! 'नारी' म्हणजे नराशी (पुरुषाशी) युक्त असल्यामुळे किंवा नराची (पुरुषाची) असल्यामुळे ती 'नारी'. येथे 'नर' शब्दाची दुसरी व्युत्पत्ती अशी आहे – जो स्वतःच्या कर्माने नेला जातो (नरीयति/प्रेरित केला जातो) तो 'नरो' (प्राणी किंवा मनुष्य) होय. कारण "जग कर्माने नेले जाते" (कम्मेन निय्यति लोको) असे म्हटले आहे. तेथे 'नर' शब्दाचा पुरुष या अर्थातील प्रयोगासाठी "नरा च अथ नारियो" (पुरुष आणि स्त्रिया) हे उदाहरण आहे. प्राणी किंवा मनुष्य या अर्थातील प्रयोगासाठी "बुद्धो अयं एदिसको नरुत्तमो। आमोदिता नरमरू" (असे हे बुद्ध नरोत्तम आहेत. मनुष्य आणि देव हर्षित झाले) हे उदाहरण आहे. म्हणून "नरो म्हणजे पुरुष, नरो म्हणजे प्राणी, नरो म्हणजे मनुष्य" असा त्या त्या ठिकाणी योग्यतेनुसार अर्थ स्पष्ट केला पाहिजे. หร หรเณ. หรณํ ปวตฺตนํ. หรติ. สาวตฺถิยํ วิหรติ. วิหาสิ. วิหํสุ. วิหริสฺสติ. อปฺปมตฺโต วิหิสฺสติ. โวหรติ. สํโวหรติ. สพฺโพ หรติ วา. รูปิยสํโวหาโร, รูปิยสพฺโพหาโร วา. ปาฏิหาริยํ. ปีติปาโมชฺชหาโร. วิหาโร. โวหาโร. อภิหาโร. จิตฺตํ อภินีหรติ. สาสเน วิหรํ, วิหรนฺโต, วิหรมาโน. วิหาตพฺพํ, วิหริตุํ. วิหริตฺวา. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. 'हर' (हृ) धातू हरण (घेऊन जाणे/प्रवृत्त करणे) या अर्थात. हरण म्हणजे प्रवृत्त करणे (चालवणे). 'हरति' (तो हरण करतो/नेतो). 'सावत्थियं विहरति' (श्रावस्तीमध्ये विहार करतात). 'विहासि' (विहार केला). 'विहंसु' (त्यांनी विहार केला). 'विहरिस्सति' (विहार करतील). 'अप्पमत्तो विहिस्सति' (अप्रमत्त होऊन विहार करतील). 'वोहरति' (व्यवहार करतो). 'संवोहरति' (संव्यवहार करतो). किंवा 'सब्बो हरति' (सर्व हरण करतो). 'रूपियसंवोहारो' किंवा 'रूपियसब्बोहारो' (रुपयाचा/नाण्यांचा संव्यवहार). 'पाटिहारियं' (प्रातिहार्य). 'पीतिपामोज्जहारो' (प्रीती आणि प्रामोद्याचे वहन करणारा). 'विहारो' (विहार). 'वोहारो' (व्यवहार). 'अभिहारो' (अभिहार/भेट). 'चित्तं अभिनीहरति' (चित्त बाहेर काढतो/एकाग्र करतो). 'सासने विहरं, विहरन्तो, विहरमानो' (शासनात विहार करणारा). 'विहातब्बं, विहरितुं' (विहार करावा, विहार करण्यासाठी). 'विहरित्वा' (विहार करून). इतर रूपांचीही अशीच योजना करावी. ตตฺถ ปาฏิหาริยนฺติ สมาหิเต จิตฺเต วิคตูปกฺกิเลเส กตกิจฺเจน ปจฺฉา หริตพฺพํ ปวตฺเตตพฺพนฺติ ปาฏิหาริยํ. ปฏีติ หิ อยํ สทฺโท ‘‘ปจฺฉา’’ติ เอตสฺส อตฺถํ โพเธติ ‘‘ตสฺมึ ปฏิปวิฏฺฐมฺหิ, อญฺโญ อาคญฺฉิ พฺราหฺมโณ’’ติอาทีสุ วิย. วิหาโรติ ฐานนิสชฺชาทินา วิหรนฺติ เอตฺถาติ วิหาโร, ภิกฺขูนํ อาวาโส. วิหรณํ วา วิหาโร, วิหรณกฺริยา. โวหาโรติ พฺยวหาโรปิ ปณฺณตฺติปิ วจนมฺปิ เจตนาปิ. ตตฺถ त्यात 'पाटिहारियं' (प्रातिहार्य) म्हणजे समाहित (एकाग्र) चित्त असताना, उपक्किलेस (मळभ/क्लेश) दूर झाल्यावर, कर्तव्य पूर्ण करून नंतर जे हरण करावे किंवा प्रवृत्त करावे ते 'प्रातिहार्य' होय. कारण 'पटि' हा शब्द 'पच्छा' (नंतर) या अर्थाचा बोध करतो, जसे की 'तस्मिं पटिपविट्ठम्हि, अञ्ञो आगञ्छि ब्राह्मणो' (त्याच्या नंतर प्रवेश केल्यावर दुसरा ब्राह्मण आला) इत्यादींमध्ये. 'विहार' म्हणजे ज्या ठिकाणी उभे राहणे, बसणे इत्यादींद्वारे विहार करतात तो 'विहार' होय, म्हणजेच भिक्खूंचा निवासस्थान. किंवा विहार करणे म्हणजे 'विहार' (विहार करण्याची क्रिया) होय. 'वोहार' (व्यवहार) म्हणजे व्यवहारही, प्रज्ञप्तीही (संज्ञा), वचनही आणि चेतनाही होय. त्यात - โย หิ โกจิ มนุสฺเสสุ, โวหารํ อุปชีวติ; เอวํ วาเสฏฺฐ ชานาติ, วาณิโช โส นพฺราหฺมโณ’’ติ. “मनुष्यांमध्ये जो कोणी व्यापारावर (व्यवहारावर) उपजीविका करतो, हे वासेठ्ठ! त्याला तू 'व्यापारी' (वाणिज) म्हणून ओळख, तो ब्राह्मण नव्हे.” อยํ [Pg.153] พฺยวหารโวหาโร นาม. ‘‘สงฺขา สมญฺญา ปญฺญตฺติ โวหาโร’’ติ อยํ ปณฺณตฺติโวหาโร นาม. ตถา ตถา โวหรนฺติ ปรามสนฺตีติ อยํ วจนโวหาโร นาม. ‘‘อฏฺฐ อริยโวหารา, อฏฺฐ อนริยโวหารา’’ติ อยํ เจตนาโวหาโร นาม. อิจฺเจวํ – याला 'व्यवहार-व्यवहार' (व्यापारविषयक व्यवहार) असे म्हणतात. 'संज्ञा, समज्ञा, प्रज्ञप्ती, व्यवहार' याला 'प्रज्ञप्ती-व्यवहार' (संज्ञात्मक व्यवहार) असे म्हणतात. ज्या ज्या प्रकारे बोलतात किंवा निर्देश करतात, त्याला 'वचन-व्यवहार' (भाषिक व्यवहार) असे म्हणतात. 'आठ आर्य व्यवहार, आठ अनार्य व्यवहार' याला 'चेतना-व्यवहार' (मानसिक व्यवहार) असे म्हणतात. अशा प्रकारे - พฺยวหาเร วจเน จ, ปณฺณตฺติเจตนาสุ จ; โวหารสทฺโท จตูสุ, อิเมสฺวตฺเถสุ ทิสฺสติ. व्यापार (व्यवहार), वचन, प्रज्ञप्ती आणि चेतना या चार अर्थांमध्ये 'वोहार' (व्यवहार) हा शब्द दिसून येतो. หร อปนยเน. อปนยนํ นีหรณํ. โทสํ หรติ. นีหรติ. นีหาโร, ปริหรติ. ปริหาโร. รโชหรณํ. สพฺพโทสหโร ธมฺโม. ภควโต จ สาสนสฺส จ ปฏิปกฺเข ติตฺถิเย หรตีติ ปาฏิหาริยํ. มตฺตาวณฺณเภเทเนตฺถ ‘‘ปาฏิเหรํ ปาฏิหีรํ ปาฏิหาริย’’นฺติ ตีณิ ปทรูปานิ, ภวนฺติ. 'हर' धातू अपनयन (दूर करणे) या अर्थात. अपनयन म्हणजे बाहेर काढणे (नष्ट करणे). 'दोसं हरति' (दोष दूर करतो). 'नीहरति' (बाहेर काढतो). 'नीहारो' (बाहेर काढणे), 'परिहरति' (परिहार करतो/टाळतो). 'परिहारो' (परिहार/बचाव). 'रजोहरणं' (धूळ साफ करणारे वस्त्र/रजोहरण). 'सब्बदोसहो धम्मो' (सर्व दोष दूर करणारा धर्म). भगवान आणि त्यांच्या शासनाच्या विरोधी असलेल्या तीर्थिकांना (परधर्मीयांना) पराभूत करतो (दूर करतो) म्हणून ते 'पाटिहारियं' (प्रातिहार्य) होय. मात्रा आणि वर्णांच्या भेदाने येथे 'पाटिहेरं', 'पाटिहीरं' आणि 'पाटिहारियं' अशी तीन पदे (रूपे) होतात. หร อาทาเน. อทินฺนํ หรติ. หริสฺสติ. หาหิติ อิจฺจป. ‘‘ขราชินํ ปร สุญฺจ, ขาริกาชญฺจ หาหิตี’’ติ อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. อาหรติ, อวหรติ, สํหรติ, อปหรติ, อุปหรติ, ปหรติ, สมฺปหรติ, สมาหรติ. มโนหโร ปาสาโท. ปรสฺสหรณํ. อาหาโร, อวหาโร, สํหาโร, อุปหาโร, สมฺปหาโร, สมาหาโร. หริยฺยติ, อาหริยฺยติ. อาหริยฺยนฺติ. อาหฏํ, หริตุํ, อาหริตุํ, อาหริตฺวา, อาหริตฺวาน. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. 'हर' धातू आदान (स्वीकारणे/घेणे) या अर्थात. 'अदिन्नं हरति' (न दिलेले घेतो/चोरी करतो). 'हरिस्सति' (घेईल). 'हाहिति' हे देखील रूप होते. 'खराजिनं पर सुञ्च, खारिकाजञ्च हाहिति' (गाढवाचे चामडे मागे सोडून तो खांद्यावरील कावड वाहून नेईल) हे याचे उदाहरण आहे. 'आहरति' (आणतो), 'अवहरति' (अपहरण करतो), 'संहरति' (एकत्र करतो), 'अपहरति' (अपहरण करतो), 'उपहरति' (भेट देतो), 'पहरति' (प्रहार करतो), 'सम्पहरति' (प्रहार करतो), 'समाहरति' (एकत्र करतो). 'मनोहोरो पासादो' (मनोहर महाल). 'परस्सहरणं' (दुसऱ्याचे हरण करणे). 'आहारो' (आहार), 'अवहारो' (अपहार), 'संहारो' (संहार/संक्षेप), 'उपहारो' (भेट), 'सम्पहारो' (प्रहार/युद्ध), 'समाहारो' (समुदाय/एकत्रीकरण). 'हरिय्यति' (हरण केले जाते), 'आहरिय्यति' (आणले जाते). 'आहरिय्यन्ति' (आणले जातात). 'आहटं' (आणलेले), 'हरितुं' (हरण करण्यासाठी), 'आहरितुं' (आणण्यासाठी), 'आहरित्वा', 'आहरित्वान' (आणून). इतर रूपांचीही अशीच योजना करावी. ธร ธรเณ. ธรณํ วิชฺชมานตา. ธรติ. ธรเต สตฺถุสาสนํ. 'धर' धातू धरण (धारण करणे/अस्तित्वात असणे) या अर्थात. धरण म्हणजे विद्यमानता (अस्तित्व असणे). 'धरति' (अस्तित्वात आहे/धारण करतो). 'धरते सत्थुसासनं' (शास्त्यांचे शासन टिकून आहे). ธร อวิทฺธํสเน. นิพฺพานํ นิจฺจํ ธรติ. 'धर' धातू अविद्धंसन (नाश न होणे/शाश्वत राहणे) या अर्थात. 'निब्बानं निच्चं धरति' (निर्वाण नेहमी शाश्वत राहते). ขร ขเย. ขรติ. ขรณํ. นกฺขรนฺติ น ขิยฺยนฺตีติ อกฺขรานิ. นกฺขรนฺติ น นสฺสนฺตีติ นกฺขตฺตานีติ โปราณา. 'खर' धातू क्षय (नाश होणे) या अर्थात. 'खरति' (नाश पावतो). 'खरणं' (नाश होणे). जे क्षय पावत नाहीत (नक्खरन्ति) आणि नष्ट होत नाहीत (न खिय्यन्ति), ते 'अक्खराणि' (अक्षरे) होत. जे क्षय पावत नाहीत आणि नष्ट होत नाहीत, ती 'नक्खत्तानि' (नक्षत्रे) होत, असे प्राचीन आचार्य म्हणतात. ชาครนิทฺทกฺขเย [Pg.154] ชาครติ. ชาคโร, ชาครณํ, ชาครํ. ทีฆา ชาครโต รตฺติ. ชาครมาโน. อยญฺจ ธาตุ ตนาทิคณํ ปตฺวา ‘‘ชาคโรติ, ปฏิชาคโรตี’’ติ รูปานิ ชเนติ. 'जागर' धातू निद्राक्षय (जागे राहणे) या अर्थात. 'जागरति' (जागा राहतो). 'जागरो', 'जागरणं', 'जागरं' (जागृती/जागे राहणे). 'दीघा जागरतो रत्ति' (जागणाऱ्यासाठी रात्र दीर्घ असते). 'जागरमानो' (जागा राहणारा). आणि हा धातू तनादिगणात जाऊन 'जागरोति', 'पटिजागरोति' अशी रूपे तयार करतो. อีร วจเน คติกมฺปเนสุ จ. อีรติ. อีริตํ. เอริตํ. สมีรโณ. ชิเนริโต ธมฺโม. กุปฺปนฺติ วาตสฺสปิ เอริตสฺส. 'ईर' धातू वचन (बोलणे), गती आणि कंपन (हलणे) या अर्थांमध्ये. 'ईरति' (बोलतो/हलतो). 'ईरितं' (बोललेले/हलायलेले). 'एरितं' (प्रेरित केलेले/हलवलेले). 'समीरणो' (वारा). 'जिनेरितो धम्मो' (जिनांनी - बुद्धांनी - उपदेशिलेला धर्म). 'कुप्पन्ति वातस्सपि एरितस्स' (वाऱ्याने हलविल्यावरही ते क्षुब्ध होतात). ตตฺถ สมีรโณติ วาโต. โส หิ สมีรติ วายติ, สมีเรติ จ รุกฺขสาขาปณฺณาทีนิ สุฏฺฐุ กมฺเปตีติ ‘‘สมีรโณ’’ติ วุจฺจติ. त्यात 'समीरण' म्हणजे वारा. कारण तो वाहतो (समीरति) आणि झाडांच्या फांद्या, पाने इत्यादींना चांगल्या प्रकारे कंपित करतो (समीरेति), म्हणून त्याला 'समीरण' असे म्हणतात. หเร ลชฺชายํ. อลุตฺตนฺโตยเมการนฺโต ธาตุ, คิเล ปีติกฺขเยติ ธาตุ วิย. หรายติ. หรายนํ. อฏฺฏียามิ หรายามิ. 'हरे' धातू लज्जा (लाज वाटणे) या अर्थात. हा 'ए'कारान्त धातू लुप्त न होणारा आहे, जसे की 'गिले पीतिक्खये' (गिळणे आणि पिण्याचा क्षय होणे) या अर्थातील धातू आहे. 'हरायति' (लाज वाटणे). 'हरायनं' (लाज वाटण्याची क्रिया). 'अट्टीयामि हरायामि' (मी पीडित होतो आणि लज्जित होतो). เอตฺถ หรายตีติ ลชฺชติ, หิรึ กโรตีติ อตฺโถ. येथे 'हरायति' म्हणजे लाजतो, 'हिरी' (लाज) बाळगतो असा अर्थ आहे. ปร ปาลนปูรเณสุ. ‘‘ปรติ, ปรโม’’ติมสฺส รูปานิ, นร นยเนติ ธาตุสฺส ‘‘นรติ นโร’’ติ รูปานิ วิย. 'पर' धातू पालन आणि पूरण (पूर्ण करणे) या अर्थांमध्ये. 'परति', 'परमो' ही याची रूपे आहेत, जसे 'नर नयने' (नेणे) या धातूची 'नरति', 'नरो' अशी रूपे होतात. ตตฺถ ปรตีติ ปาเลติ, ปูรติ วา. สุทฺธกตฺตุวเสนิทํ ปทํ วุตฺตํ. เหตุกตฺตุวเสน หิ ‘‘ปาเรติ ปารยตี’’ติอาทีนิ รูปานิ ภวนฺติ. ปรโมติ ปาลโก ปูรโก วา. เอตฺถ จ ‘‘ปารมี’’ติ ปทํ เอตสฺสตฺถสฺส สาธกํ. ตถา หิ ปารมีติ ปรติ, ปาเรติ จาติ ปรโม, ทานาทีนํ คุณานํ ปาลโก ปูรโก จ มหาโพธิสตฺโต. ปรมสฺส อิทํ, ปรมสฺส วา ภาโว, กมฺมํ วา ปารมี, ทานาทิกฺริยา. ครูหิ ปน ‘‘ปูเรตีติ ปรโม, ทานาทีนํ คุณานํ ปูรโก ปาลโก จา’’ติ วุตฺตํ, ตํ วีมํสิตพํ. त्यात 'परति' म्हणजे पालन करतो किंवा पूर्ण करतो. हे पद शुद्ध कर्तृवाचक अर्थाने सांगितले आहे. प्रयोजक (हेतु) अर्थात 'पारेति', 'पारयति' इत्यादी रूपे होतात. 'परम' म्हणजे पालक किंवा पूरक. आणि येथे 'पारमी' (पारमिता) हे पद या अर्थाचे साधक आहे. कारण 'पारमी' म्हणजे जो पालन करतो (परति) आणि पूर्ण करतो (पारेति) तो 'परम' होय, म्हणजेच दानादी गुणांचे पालन करणारा आणि पूर्ण करणारा महाबोधिसत्व. परमाचे हे, किंवा परमाचा भाव किंवा कर्म म्हणजे 'पारमी' (पारमिता), जसे की दानादी क्रिया. परंतु आचार्यांनी 'जो पूर्ण करतो तो परम, दानादी गुणांचा पूरक आणि पालक' असे म्हटले आहे, त्याचा विचार केला पाहिजे. วร วรเณ. วรติ. วารโณ, วรุโณ. 'वर' धातू वरण (निवडणे/रोखणे) या अर्थात. 'वरति' (निवडतो/रोखतो). 'वारणो' (हत्ती/रोखणारा), 'वरुणो' (वरुण देव). คิร [Pg.155] นิคฺคิรโณ. นิคฺคิรณํ ปคฺฆรณํ. คิรติ, คิริ. 'गिर' धातू निग्गिरणा (गिळणे/बाहेर टाकणे) या अर्थात. निग्गिरणा म्हणजे पाझरणे (बाहेर पडणे). 'गिरति' (गिळतो/बाहेर टाकतो), 'गिरी' (पर्वत). เอตฺถ คิรีติ ปพฺพตา, โย ‘เสโล’’ติอาทีหิ อเนเกหิ นาเมหิ กถิยติ. โส หิ สนฺธิสงฺขาเตหิ ปพฺเพหิ จิตตฺตา ปพฺพมสฺส อตฺถีติ ปพฺพโต. หิมวมนาทิวเสน ชลสฺส สารภูตานํ เภสชฺชาทิวตฺถูนญฺจ คิรณโต คิรีติ วุจฺจติ. येथे 'गिरी' म्हणजे पर्वत, ज्याला 'सेल' (शैल) इत्यादी अनेक नावांनी संबोधले जाते. कारण तो सांधे (संधी) म्हटल्या जाणाऱ्या पर्वानी (पायऱ्यांनी/भागांनी) युक्त असल्यामुळे त्याला 'पब्बत' (पर्वत) म्हणतात. हिमवान इत्यादींच्या माध्यमातून पाणी आणि सारभूत औषधी इत्यादी वस्तू बाहेर टाकल्यामुळे त्याला 'गिरी' असे म्हणतात. อิมานิ ปนสฺส นามานิ – आणि ही त्याची नावे आहेत - ปพฺพโต อจโล เสโล, นโค คิริ มหีธโร; อทฺทิ สิลุจฺจโย จาติ, คิริปณฺณตฺติโย อิมา. पब्बत (पर्वत), अचल, सेल (शैल), नग, गिरी, महीधर, अद्दि (अद्रि) आणि सिलुच्चय (शिलोच्चय) - या गिरीच्या (पर्वताच्या) संज्ञा आहेत. สุร อิสฺสริยทิตฺตีสุ. สุรติ. สุโร, อสุโร. 'सुर' धातू ऐश्वर्य आणि दीप्ती (तेज) या अर्थांमध्ये. 'सुरति' (ऐश्वर्य भोगतो/चमकतो). 'सुरो' (देव), 'असुरो' (असुर). ตตฺร สโรติ สุรติ อีสติ เทวิสฺสริยํ ปาปุณาติ วิโรจติ จาติ สุโร. สุนฺทรา รา วาจา อสฺสาติ วา สุโร, เทโว. เทวาภิธานานิ ทิวาทิคเณ ปกาเสสฺสาม. อสุโรติ เทโว วิย น สุรติ น อีสติ น วิโรจติ จาติ อสุโร. สุรานํ วา ปฏิปกฺโข มิตฺตปฏิปกฺขา อมิตฺตา วิยาติ อสุโร, ทานโว, โย ‘‘ปุพฺพเทโว’’ติปิ วุจฺจติ. ตถา หิ กุมฺภชาตเก วุตฺตํ – त्यात 'सुर' म्हणजे जो ऐश्वर्य भोगतो (सुरति), शासन करतो (ईसति), देवांचे ऐश्वर्य प्राप्त करतो आणि चमकतो (विरोचति) तो 'सुर' (देव) होय. किंवा ज्याची वाणी सुंदर (सुन्दरा रा) आहे तो 'सुर' म्हणजे देव. देवांची नावे आम्ही दिवादिगणात स्पष्ट करू. 'असुर' म्हणजे जो देवाप्रमाणे ऐश्वर्य भोगत नाही, शासन करत नाही आणि चमकत नाही तो 'असुर' होय. किंवा सुरांचा (देवांचा) जो शत्रू (प्रतिपक्ष) आहे, जसे मित्राचा शत्रू अमित्र असतो, तसा तो 'असुर' किंवा दानव होय, ज्याला 'पुब्बदेव' (पूर्वदेव) असेही म्हणतात. जसे की कुंभजातकात म्हटले आहे - ‘‘ยํ เว ปิวิตฺวา ปุพฺพเทวา ปมตฺตา,ติทิวา จุตา สสฺสติยา สมายา; ตํ ตาทิสํ มชฺชมิมํ นิรตฺถํ,ชานํ มหาราช กถํ ปิเวยฺยา’’ติ. “जे पिऊन पूर्वदेव (असुर) प्रमत्त (बेसावध) झाले आणि त्रिदश (स्वर्गातून) कायमचे च्युत झाले; हे महाराज! असे ते निरर्थक मद्य जाणूनबुजून कोणी कसे प्यावे?” สคาถาวคฺคสํวณฺณนายํ ปน ‘‘น สุรํ ปิวิมฺห, น สุรํ ปิวิมฺหา’ติ อาหํสุ, ตโต ปฏฺฐาย อสุรา นาม ชาตา’’ติ วุตฺตํ. परंतु सगाथावग्ग-अट्ठकथेत (सगाथावग्गसंवण्णना) म्हटले आहे की, 'आम्ही सुरा (मद्य) पिणार नाही, आम्ही सुरा पिणार नाही' असे ते म्हणाले, तेव्हापासून त्यांना 'असुर' असे नाव पडले. อิมานิ [Pg.156] ตทภิธานานิ – ही त्यांची (असुरांची) नावे आहेत - อสุโร ปุพฺพเทโว จ, ทานโว เทวตาริ ตุ; นามานิ อสุรานนฺติ, อิมานิ นิทฺทิเส วิทู. असुर, पुब्बदेव (पूर्वदेव), दानव आणि देवतारि (देवांचे शत्रू) - विद्वानांनी ही असुरांची नावे सांगावीत. ปาโก อิติ ตุ ยํ นามํ, เอกสฺส อสุรสฺส ตุ; ปณฺณตฺตีติปิ เอกจฺเจ, ครโว ปน อพฺรวุํ. परंतु 'पाको' (पाक) हे जे नाव आहे, ते एका असुराचे नाव आहे; काही आचार्यांच्या मते ही एक संज्ञा आहे, असे गुरूंनी सांगितले आहे. กุร สทฺเท อกฺโกเส จ. กุรติ. กุรโร, กุรรี. กุมฺโม, กุมฺมี. 'कुर' धातू शब्द (आवाज करणे) आणि आक्रोश (शिवीगाळ करणे) या अर्थांमध्ये. 'कुरति' (आवाज करतो). 'कुररो', 'कुररी' (कुरर पक्षी - नर आणि मादी). 'कुम्मो', 'कुम्मी' (कासव - नर आणि मादी). ขุร เฉทเน วิเลขเน จ. ขุรติ. ขุโร. 'खुर' धातू छेदन (कापणे) आणि विलेखन (खरवडणे/लिहिणे) या अर्थांमध्ये. 'खुरति' (कापतो). 'खुरो' (खुर/वस्तरा). มุร สํเวฐเน. มุรติ. มุโร, โมโร. 'मुर' (धातू) वेढणे (गुंडाळणे) या अर्थात. मुरति (वेढतो). मुरो, मोरो. ฆุร อภิมตฺต สทฺเทสุ. ฆุรติ. โฆโร. 'घुर' (धातू) गर्जना करणे किंवा विशिष्ट आवाज करणे या अर्थात. घुरति (गर्जना करतो). घोरो. ปุร อคฺคคมเน. อคฺคคมนํ นาม ปธานคมนํ, ปฐมเมว คมนํ วา. ปุรติ. ปุรํ, ปุรี. อวาปุรติ. อวาปุเรตํ อมตสฺส ทฺวารํ. อวาปุรณํ อาทาย คจฺฉติ. 'पुर' (धातू) पुढे जाणे (अग्रगमन) या अर्थात. अग्रगमन म्हणजे मुख्य गमन (प्रधानगमन) किंवा सर्वात पहिले जाणे. पुरति (पुढे जातो). पुरं, पुरी (नगर). अवापुरति (उघडतो). 'अवापुरेतं अमतस्स द्वारं' (अमृताचे - निर्वाणाचे दार उघडावे). अवापुरणं (किल्ली) घेऊन जातो. ตตฺถ ปุรนฺติ ราชธานี. ตถา หิ ‘‘นครํ ปุรํ ปุรี ราชธานี’’ติ เอเต ปริยายา. ‘‘เอโส อาฬาริโก โปโส, กุมารี ปุรมนฺตเร’’ติอาทีสุ ปน เคหํ ‘‘ปุร’’นฺติ วุจฺจติ. ปธานตาย ปุรโต ปุรโต คมเนน คนฺตพฺพนฺติ ปุรํ, ราชธานี เจว เคหญฺจ. อวาปุรณนฺติ อวาปุรนฺติ วิวรนฺติ ทฺวารํ เอเตนาติ อวาปุรณํ, ยํ ‘‘กุญฺจิกา’’ติปิ ‘‘ตาโฬ’’ติปิ วุจฺจติ. อวาปุรตีติอาทีสุ อว อาอิจฺจุโภ อุปสคฺคาติ ทฏฺฐพฺพา. तेथे 'पुरं' म्हणजे राजधानी. कारण, "नगरं, पुरं, पुरी, राजधानी" हे समानार्थी शब्द आहेत. परंतु, "एसो आळारिको पोसो, कुमारी पुरमन्तरे" इत्यादींमध्ये घराला 'पुर' म्हटले आहे. प्रधानतेमुळे पुढे पुढे जाऊन पोहोचण्याचे ठिकाण म्हणजे 'पुर' (राजधानी आणि घर दोन्ही). 'अवापुरण' म्हणजे ज्याच्याद्वारे दार उघडतात (विवरन्ति) ते 'अवापुरण' (किल्ली), ज्याला 'कुंचिका' किंवा 'ताळो' (किल्ली/कुलूप) असेही म्हणतात. 'अवापुरति' इत्यादी शब्दांमध्ये 'अव' आणि 'आ' हे दोन्ही उपसर्ग आहेत, असे समजावे. ผร ผรเณ. ผรณํ นาม พฺยาปนํ คมนํ วา. สมํ ผรติ สีเตน. อาหารตฺถํ ผรติ. ผรณํ. 'फर' (धातू) पसरणे (स्फुरण/व्यापणे) या अर्थात. 'फरण' म्हणजे व्यापणे किंवा गमन करणे. थंडीने समान रीतीने व्यापतो (समं फरति सीतेन). आहारासाठी पसरतो. फरणं (व्यापणे). คร อุคฺคเม. ครติ. ครุ. 'गर' (धातू) वर उठणे (उद्गम) या अर्थात. गरति (वर उठतो). गरु (गुरु/आदरणीय). ครูติ [Pg.157] มาตาปิตาทโย คารวยุตฺตปุคฺคลา. เต หิ ครนฺติ อุคฺคจฺฉนฺติ อุคฺคตา ปากฏา โหนฺตีติ ครูติ วุจฺจนฺติ. อปิจ ปาสาณจฺฉตฺตํ วิย ภาริยฏฺเฐน ครูติ วุจฺจนฺติ. ครุสทฺโท ‘‘อิทมาสนํ อตฺร ภวํ นิสีทตุ, ภวญฺหิ เม อญฺญตโร ครูน’’นฺติ เอตฺถ มาตาปิตูสุ ทิสฺสติ. ‘‘สนรามรโลกครุ’’นฺติ เอตฺถ สพฺพโลกาจริเย สพฺพญฺญุมฺหิ. อปิจ ครุสทฺโท อญฺเญสฺวตฺเถสุปิ ทิสฺสติ. สพฺพเมตํ เอกโต กตฺวา อตฺริทํ วุจฺจติ – 'गरू' म्हणजे माता-पिता इत्यादी आदरणीय व्यक्ती (गौरवयुक्त पुद्गल). कारण ते वर उठतात (गरन्ति), उन्नत होतात आणि प्रसिद्ध (उग्गता पाकटा) होतात, म्हणून त्यांना 'गरू' म्हटले जाते. शिवाय, दगडाच्या छत्रीप्रमाणे भारदस्त (वजनदार) असल्यामुळे त्यांना 'गरू' म्हणतात. 'गरु' हा शब्द "इदमासनं अत्र भवं निसीदतु, भवञ्हि मे अञ्ञतरो गरूनं" (या आसनावर आपण बसावे, कारण आपण माझ्या आदरणीयांपैकी एक आहात) येथे माता-पित्यांच्या संदर्भात दिसतो. "सनरामरलोकगरु" (देव आणि मनुष्यांसह संपूर्ण जगाचे गुरु) येथे संपूर्ण जगाचे आचार्य असलेल्या सर्वज्ञ (बुद्धां) साठी हा शब्द वापरला आहे. शिवाय, 'गरु' शब्द इतर अर्थांमध्येही आढळतो. हे सर्व एकत्र करून येथे असे म्हटले आहे – มาตาปิตาจริเยสุ, ทุชฺชเร อลหุมฺหิ จ; มหนฺเต จุคฺคเต เจว, นิเฉกาทิกเรสุ จ; ตถา วณฺณวิเสเสสุ, ครุสทฺโท ปวตฺตติ. माता-पिता आणि आचार्य यांच्यामध्ये, पचण्यास कठीण (दुज्जर) आणि जड (अलहु) मध्ये; महान आणि उन्नत (उग्गत) मध्ये, तसेच कुशल (निछेक) इत्यादींमध्ये; त्याचप्रमाणे विशिष्ट स्वरांमध्ये (दीर्घ स्वरांमध्ये) 'गरु' शब्द वापरला जातो. เกจิ ปนาจริยา ‘‘ครุ ครู’’ติ จ ทฺวิธา คเหตฺวา ภาริยวาจกตฺเต ครุสทฺโท ฐิโต. อาจริยวาจกตฺเต ปน คุรุสทฺโทติ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ. ปาฬิวิสเย หิ สพฺเพสมฺปิ ยถาวุตฺตานํ อตฺถานํ วาจกตฺเต ครุสทฺโทเยว อิจฺฉิตพฺโพ, อการสฺส อาการภาเว ‘‘คารว’’นฺติ สวุทฺธิกสฺส ตทฺธิตนฺตปทสฺส ทสฺสนโต. สกฺกฏภาสาวิสเย ปน คุรุสทฺโทเยว อิจฺฉิตพฺโพ, อุการสฺส วุทฺธิภาเว อญฺญถา ตทฺธิตนฺตปทสฺส ทสฺสนโต. परंतु काही आचार्य 'गरु' आणि 'गरू' असे दोन प्रकार मानून, जड (भारदस्त) या अर्थासाठी 'गरु' शब्द आणि आचार्य (शिक्षक) या अर्थासाठी 'गुरु' शब्द आहे असे म्हणतात; ते स्वीकारू नये. कारण पालि भाषेच्या क्षेत्रात वर उल्लेखिलेल्या सर्व अर्थांसाठी 'गरु' हाच शब्द स्वीकारला पाहिजे, कारण 'अ' चा 'आ' होऊन वृद्धीसह 'गारव' (आदर) हे तद्धित रूप पाहायला मिळते. संस्कृत भाषेच्या क्षेत्रात मात्र 'गुरु' हाच शब्द स्वीकारला पाहिजे, कारण तेथे 'उ' ची वृद्धी होऊन (गौरव) तद्धित रूप वेगळ्या प्रकारे पाहायला मिळते. มร ปาณจาเค. มรติ. มตฺตุํ. มริตฺวา. เหตุกตฺตริ ‘‘ปุริโส ปุริสํ มาเรติ, มารยติ. ปุริโส ปุริเสน ปุริสํ มาราเปติ, มาราปยติ. ปุริโส ปุริสํ มาเรตุํ มาเรตฺวา’’ อิจฺจาทีนิ รูปานิ. มจฺโจ. มรุ. มรณํ, มจฺจุ. มฏฺฏุ. มาโร. 'मर' (धातू) प्राण त्यागणे (मरणे) या अर्थात. मरति (मरतो). मत्तं (मरण्यासाठी). मरित्वा (मरून). प्रयोजक कर्तरी प्रयोगात (हेतुकर्तरि) – "पुरिसो पुरिसं मारेति, मारयति" (माणूस माणसाला मारतो). "पुरिसो पुरिसेन पुरिसं मारापेति, मारापयति" (माणूस माणसाकरवी माणसाला मारवतो). "पुरिसो पुरिसं मारेतुं मारेत्वा" (माणूस माणसाला मारण्यासाठी, मारून) इत्यादी रूपे होतात. मच्चो (मर्त्य/मनुष्य). मरु (देव). मरणं, मच्चु (मृत्यू). मट्टु (मृत्यू). मारो (मार). ตตฺถ มตฺตุนฺติ มริตุํ. ตถา หิ อลีนสตฺตุชาตเก ‘‘โย มตฺตุมิจฺเฉ ปิตุโน ปโมกฺขา’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. มจฺโจติ มริตพฺพสภาวตาย ‘‘มจฺโจ’’ติ ลทฺธนาโม สตฺโต[Pg.158]. มรูติ ทีฆายุโกปิ สมาโน มรณสีโลติ มรุ, เทโว. มรณนฺติ จุติ. तेथे 'मत्तुं' म्हणजे 'मरितुं' (मरण्यासाठी). कारण अलीनसत्तु जातकामध्ये "यो मत्तुमिच्छे पितुनो पमोक्खा" (जो वडिलांच्या सुटकेसाठी मरण्याची इच्छा करतो) असा पालि पाठ आढळतो. 'मच्चो' (मर्त्य) म्हणजे मरणशील स्वभावाचा असल्यामुळे 'मच्चो' हे नाव मिळालेला प्राणी. 'मरु' म्हणजे दीर्घायुषी असूनही मरणशील असलेला देव. 'मरणं' म्हणजे च्युती (मृत्यू/देहपात). มรณํ อนฺตโก มจฺจุ, หินฺทํ กาโล จ มฏฺฏุ จ; นิกฺเขโป จุติ เจตานิ, นามานิ มรณสฺส เว. मरण, अंतक, मच्चु, हिंद, काल, मट्टु, निक्खेप (देह ठेवणे) आणि च्युती ही खरोखर मरणाची नावे आहेत. มาโรติ สตฺตานํ กุสลํ มาเรตีติ มาโร, กามเทโว. 'मारो' (मार) म्हणजे जो प्राण्यांच्या कुशल धर्माचा नाश करतो (मारतो) तो 'मार', म्हणजेच कामदेव. อิมานิสฺส นามานิ – ही त्याची नावे आहेत – มาโร นมุจิ กณฺโห จ, วสวตฺติ ปชาปติ; ปมตฺตพนฺธุ มทฺทโน, ปาปิมา ทพฺพโกปิ จ; กนฺทปฺโป จ รติปติ, กาโม จ กุสุมายุโธ. मार, नमुची, कण्ण (कृष्ण/काळा), वसवत्ती, प्रजापती, पमत्तबंधू (प्रमत्तबंधू), मद्दल (मर्दन करणारा), पापिमा (पापी), दब्बक, कंदर्प, रतीपती, काम आणि कुसुमायुध. อญฺเญ อญฺญานิปิ นามานิ วทนฺติ, ตานิ สาสนานุโลมานิ น โหนฺตีติ อิธ น ทสฺสิตานิ. อฏฺฐกถาสุ ปน ‘‘มาโร, นมุจิ, กณฺโห, ปมตฺตพนฺธู’’ติ จตฺตาโรว นามานิ อาคตานิ. इतर लोक इतरही नावे सांगतात, परंतु ती शासनाला (बुद्ध शासनाला) अनुकूल नसल्यामुळे येथे दर्शविलेली नाहीत. अट्ठकथांमध्ये (टीकांमध्ये) मात्र "मार, नमुची, कण्ण, पमत्तबंधू" ही चारच नावे आली आहेत. เอตฺถ จ มาโรติ เทวปุตฺตมาเรน สทฺธึ ปญฺจ มารา กิเลสมาโร ขนฺธมาโร อภิสงฺขารมาโร มจฺจุมาโร เทวปุตฺตมาโรติ. आणि येथे 'मार' म्हणजे देवपुत्त-मारासह पाच मार आहेत: किलेसमारा (क्लेशमार), खंधमारा (स्कंधमार), अभिसंखारमारा (अभिसंस्कारमार), मच्चुमारा (मृत्यूमार) आणि देवपुत्तमारा (देवपुत्रमार). ธร อวตฺถาเน. ธรติ. 'धर' (धातू) राहणे (अवस्थापन/धारण करणे) या अर्थात. धरति (धारण करतो/राहतो). ภร โปสเน. ภรติ. ภริโต, ภตฺตา. 'भर' (धातू) पोषण करणे या अर्थात. भरति (पोषण करतो). भरितो, भत्ता (भर्ता/पती). ถร สนฺถรเณ. ถรติ, สนฺถรติ. สนฺถรณํ. 'थर' (धातू) पसरणे (संस्तरण) या अर्थात. थरति, संथरति (पसरतो). संथरणं (पसरणे/आच्छादन). ทร วิทารเณ. ภูมึ ทรติ. กุทาโล. 'दर' (धातू) फाडणे (विदारण करणे/खणणे) या अर्थात. भूमिं दरति (जमीन खणतो). कुदालो (कुदळ). ทร ทาเห. กาโย ทรติ. ทโร, ทรโถ. 'दर' (धातू) जळजळणे (दाह/ताप) या अर्थात. कायो दरति (शरीर जळजळते/तपते). दरो, दरथो (भय/क्लेश). ติร อโธคติยํ. ติรติ. ติรจฺฉาโน, ติรจฺฉา วา. 'तिर' (धातू) अधोगती किंवा आडवे जाणे या अर्थात. तिरति (आडवा जातो). तिरच्छानो किंवा तिरच्छा (तिर्यक प्राणी/पशू). อร คติยํ. อรติ. อตฺถํ, อตฺโถ, อุตุ. 'अर' (धातू) गमन करणे या अर्थात. अरति (जातो). अत्थं (अस्त/निर्वाण), अत्थो (अर्थ/हित), उतु (ऋतू). เอตฺถ [Pg.159] อตฺถํ วุจฺจติ นิพฺพานํ. ตํ ตํ สตฺตกิจฺจํ อรติ วตฺเตตีติ อุตุ. येथे 'अत्थं' म्हणजे निर्वाण म्हटले आहे. प्राण्यांच्या त्या त्या कर्तव्याला जे गतिमान करते (प्रवृत्त करते), ते 'उतु' (ऋतू). รการนฺตธาตุรูปานิ. 'र' कारान्त धातूंची रूपे. ลการนฺตธาตุ 'ल' कारान्त धातू. ลา อาทาเน. ลาติ. ลานํ, ครุโฬ, สีหโฬ, ราหุโล, กุสลํ, พาโล, มหลฺลโก, มหลฺลิกา. 'ला' (धातू) ग्रहण करणे (घेणे) या अर्थात. लाति (घेतो). लानं (ग्रहण करणे), गरुळो (गरुड), सीहळो (सिंहल), राहुलो (राहुल), कुसलं (कुशल), बालो (बाल/मूर्ख), महल्लको (वृद्ध पुरुष), महल्लिका (वृद्ध स्त्री). ตตฺร ครุโฬติ ครุํ ลาติ อาททาติ คณฺหาตีติ ครุโฬ, โย ‘‘สุปณฺโณ, ทิชาธิโป, นาคาริ, กโรฏี’’ติ จ วุจฺจติ. สีหโฬติ สีหํ ลาติ อาททาติ คณฺหาตีติ สีหโฬ, ปุพฺพปุริโส. ตพฺพํเส ชาตา เอตรหิ สพฺเพปิ สีหฬา นาม ชาตา. तेथे 'गरुळो' (गरुड) म्हणजे जो जड भार उचलतो (लाति/आददाति/गण्हाति), ज्याला "सुपण्ण" (सुपर्ण), "दिजाधिपो" (पक्ष्यांचा राजा), "नागारी" (नागांचा शत्रू), "करोटी" असेही म्हणतात. 'सीहळो' म्हणजे सिंहाला पकडणारा (सिंह घेणारा), पूर्वज पुरुष. त्यांच्या वंशात जन्मलेले सध्याचे सर्व लोक 'सीहळ' (सिंहली) या नावाने ओळखले जातात. ราหุโลติอาทีสุ ปน ราหุ วิย ลาติ คณฺหาตีติ ราหุโล, โก โส? สิกฺขากาโม อายสฺมา ราหุลภทฺโท พุทฺธปุตฺโต. ตสฺส หิ ชาตทิวเส สุทฺโธทนมหาราชา ‘‘ปุตฺตสฺส เม ตุฏฺฐึ นิเวเทถา’’ติ อุยฺยาเน กีฬนฺตสฺส โพธิสตฺตสฺส สาสนํ ปหิณิ. โพธิสตฺโต ตํ สุตฺวา ‘‘ราหุ ชาโต พนฺธนํ ชาต’’นฺติ อาห. ปุตฺตสฺส หิ ชายนํ ราหุคฺคโห วิย โหติ. ตณฺหากิลิสฺสนตาปาทนโต พาฬฺเหน จ สงฺขลิกาทิพนฺธเนน พนฺธํ วิย โหติ มุจฺจิตุํ อปฺปทานโตติ ‘‘ราหุ ชาโต พนฺธนํ ชาต’’นฺติ อาห. ราชา ‘‘กึ เม ปุตฺโต อวจา’’ติ ปุจฺฉิตฺวา ตํ วจนํ สุตฺวา ‘‘อิโต ปฏฺฐาย เม นตฺตา ‘ราหุโล’ ตฺเวว โหตู’’ติ อาห, ตโต ปฏฺฐาย กุมาโร ราหุโล นาม ชาโต. परंतु 'राहुलो' इत्यादी शब्दांमध्ये, जो राहू प्रमाणे ग्रहण करतो (पकडतो) तो 'राहुलो'. तो कोण? शिक्षणाची आवड असणारे, आयुष्यमान राहुलभद्र बुद्धपुत्र. त्यांच्या जन्माच्या दिवशी शुद्धोदन महाराजांनी बागेत क्रीडा करत असलेल्या बोधिसत्तांना "माझ्या पुत्राला आनंदाची बातमी सांगा" असा संदेश पाठवला. बोधिसत्तांनी ते ऐकून, "राहू जन्मला, बंधन जन्मले" असे म्हटले. पुत्राचा जन्म हा राहूच्या ग्रहणासारखा (राहुग्गह) असतो. तृष्णेमुळे क्लेश आणि ताप उत्पन्न होत असल्यामुळे आणि सुटकेची संधी न देणाऱ्या साखळदंडासारख्या घट्ट बंधनासारखा असल्यामुळे त्यांनी "राहू जन्मला, बंधन जन्मले" असे म्हटले. राजाने "माझा पुत्र काय म्हणाला?" असे विचारून ते शब्द ऐकले आणि "आजपासून माझ्या नातवाचे नाव 'राहुलो' असेच असावे" असे म्हटले, तेव्हापासून त्या कुमाराचे नाव 'राहुलो' (राहुल) असे पडले. มหาปทานสุตฺตฏีกายญฺหิ [Pg.160] ‘‘ราหุ ชาโต’’ติ เอตฺถ ‘‘ราหูติ ราหุคฺคโห’’ติ วุตฺตํ, ตํ ปน ‘‘ราหุโล’’ติ วจนสฺสตฺถํ ปากฏํ กาตุํ อธิปฺปายตฺถวเสน วุตฺตํ. น หิ เกวโล ‘‘ราหู’’ติ สทฺโท ‘‘ราหุคฺคโห’’ติ อตฺถํ วทติ, อถ โข ชาตสทฺทสมฺพนฺธํ ลภิตฺวา วทติ. ตถา หิ ‘‘ราหุ ชาโต’’ติ โพธิสตฺเตน วุตฺตวจนสฺส ‘‘ราหุคฺคโห ชาโต’’ติ อตฺถฺौ ภวติ, ตสฺมา สุทฺโธทนมหาราชา ‘‘มม นตฺตา ราหุ วิย ลาตีติ ราหุโลติ วตฺตพฺโพ’’ติ จินฺเตตฺวา ‘‘ราหุโลตฺเวว โหตู’’ติ อาหาติ ทฏฺฐพฺพํ. महापदानसुत्त टीकेमध्ये "राहू जातो" या संदर्भात "राहू म्हणजे राहुग्गह (राहूचे ग्रहण)" असे म्हटले आहे, परंतु ते 'राहुलो' या शब्दाचा अर्थ स्पष्ट करण्याच्या हेतूने म्हटले आहे. केवळ 'राहू' हा शब्द 'राहुग्गह' असा अर्थ दर्शवत नाही, तर 'जातो' (जन्मलेला/झालेला) या शब्दाशी संबंध आल्यावरच तो हा अर्थ दर्शवतो. म्हणूनच, बोधिसत्तांनी म्हटलेल्या "राहू जातो" या वाक्याचा अर्थ "राहूचे ग्रहण झाले" असा होतो, म्हणून शुद्धोदन महाराजांनी "माझा नातू राहू प्रमाणे ग्रहण करतो, म्हणून त्याला 'राहुलो' म्हटले पाहिजे" असा विचार करून "त्याचे नाव 'राहुलो' असेच असावे" असे म्हटले, असे समजावे. เกจิ ปน ‘‘ราหุโล ชาโต พนฺธนํ ชาต’’นฺติ ปฐนฺติ, กตฺถจิ โปตฺถเก จ ลิขนฺติ, ตํ น สุนฺทรํ, อตฺถสฺส อยุตฺติโต ฏีกาย จ สทฺธึวิโรจโต. น หิ ‘‘ราหุโล’’ติ กุมารสฺส นามํ ปฐมํ อุปฺปนฺนํ, ปจฺฉาเยว ปน อุปฺปนฺนํ อยฺยเกน ทินฺนตฺตา, ตสฺมา ตทา โพธิสตฺเตน ‘‘ราหุโล ชาโต’’ติ วตฺตุํ น ยุชฺชติ. ยถา หิ อนภิสิตฺเต อราชินิ ปุคฺคเล ‘‘มหาราชา’’ติ โวหาโร นปฺปวตฺตติ. ฏีกายญฺจ ‘‘ราหูติ ราหุคฺคโห’’ติ วุตฺตํ. อถาปิ เตสํ สิยา ‘‘ราหุโล ชาโต พนฺธนํ ชาต’’นฺติ ปทสฺส วิชฺชมานตฺตา เอว ฏีกายํ ‘‘ราหุคฺคโห’’ติ ภาววเสน ลาสทฺเทน สมานตฺโถ อาทานตฺโถ คหสทฺโท วุตฺโตติ เอวมฺปิ นุปปชฺชติ, ‘‘ราหุลานํ ชาตํ พนฺธนํ ชาต’’นฺติ ปาฐสฺส วตฺตพฺพตฺตา. ราหุโลติ หิ อิทํ ปทํ ‘‘สีหโฬ’’ติ ปทํ วิย ทพฺพวาจกํ, น กทาจิปิ ภาววาจกํ, ตสฺมา ‘‘ราหุโล ชาโต พนฺธนํ ชาต’’นฺติ เอตํ เอกจฺเจหิ ทุโรปิตํ ปาฐํ อคฺคเหตฺวา ‘‘ราหุ ชาโต พนฺธนํ ชาต’’นฺติ อยเมว ปาโฐ คเหตพฺโพ, สารโต จ ปจฺเจตพฺโพ สุปริสุทฺเธสุ อเนเกสุ โปตฺถเกสุ ทิฏฺฐตฺตา, โปราเณหิ จ คมฺภีรสุขุมญาเณหิ อาจริยปจาริเยหิ ปฐิตตฺตา. काही लोक तर 'राहुलो जातो बंधनं जातं' असा पाठ वाचतात आणि काही पुस्तकांमध्ये तसे लिहितात, परंतु ते योग्य नाही; कारण ते अर्थाशी सुसंगत नाही आणि टीकेशी विसंगत आहे. कारण 'राहूल' हे कुमाराचे नाव आधीच उत्पन्न झाले नव्हते, तर नंतर आजोबांनी दिल्यामुळे ते प्राप्त झाले होते, म्हणून त्या वेळी बोधिसत्त्वांनी 'राहूल जन्मला' असे म्हणणे योग्य ठरत नाही. ज्याप्रमाणे राज्याभिषेक न झालेल्या, राजा नसलेल्या व्यक्तीला 'महाराज' असे संबोधले जात नाही. आणि टीकेमध्ये 'राहूति राहुग्गहो' (राहू म्हणजे राहूचे ग्रहण) असे म्हटले आहे. जरी त्यांचे असे मत असेल की 'राहुलो जातो बंधनं जातं' या पदाच्या अस्तित्वामुळेच टीकेमध्ये 'राहुग्गहो' असा भाववाचक अर्थाने 'ला' शब्दाशी समान अर्थ असलेला, ग्रहण करणे या अर्थाचा 'गह' शब्द वापरला आहे, तरीही हे जुळत नाही, कारण अशा वेळी 'राहुलानं जातं बंधनं जातं' असा पाठ असायला हवा होता. कारण 'राहूल' हा शब्द 'सीहळ' (सिंहल) या शब्दाप्रमाणे द्रव्यवाचक आहे, तो कधीही भाववाचक नाही. म्हणून 'राहुलो जातो बंधनं जातं' हा काही लोकांनी चुकीच्या पद्धतीने प्रस्थापित केलेला पाठ न स्वीकारता, 'राहु जातो बंधनं जातं' हाच पाठ स्वीकारला पाहिजे आणि तोच खरा मानला पाहिजे; कारण अनेक अत्यंत शुद्ध हस्तलिखितांमध्ये तोच आढळतो आणि गंभीर व सूक्ष्म ज्ञान असणाऱ्या प्राचीन आचार्यांच्या परंपरेने तोच वाचला आहे. อยํ [Pg.161] ปเนตฺถ สาธิปฺปายา อตฺถปฺปกาสนา – ราหุ ชาโตติ โพธิสตฺโต ปุตฺตสฺส ชาตสาสนํ สุตฺวา สํเวคปฺปตฺโต ‘‘อิทานิ มม ราหุ ชาโต’’ติ วทติ, มุจฺจิตุํ อปฺปทานวเสน มม คหณตฺถํ ราหุ อุปฺปนฺโนติ หิ อตฺโถ. พนฺธนํ ชาตนฺติ อิมินา ‘‘มม พนฺธนํ ชาต’’นฺติ วทติ. ตถา หิ ฏีกายํ วุตฺตํ ‘‘ราหูติ ราหุคฺคโห’’ติ. ตตฺถ ราหุคฺคโหติ คณฺหาตีติ คโห, ราหุ เอว คโห ราหุคฺคโห, มม คาหโก ราหุ ชาโตติ อตฺโถ. อถ วา คหณํ คโห, ราหุโน คโห ราหุคฺคโห, ราหุคฺคหณํ มม ชาตนฺติ อตฺโถ. ปุตฺโต หิ ราหุสทิโส. ปิตา จนฺทสทิโส ปุตฺตราหุนา คหิตตฺตา. येथे अभिप्रेत असलेला अर्थ स्पष्ट करणे असे आहे – 'राहू जन्मला' म्हणजे बोधिसत्त्वांनी पुत्राच्या जन्माची बातमी ऐकून संवेग प्राप्त झाल्यावर 'आता माझा राहू जन्मला' असे म्हटले. मुक्त न होण्याच्या कारणाने मला पकडण्यासाठी राहू उत्पन्न झाला आहे, असा याचा अर्थ आहे. 'बंधन निर्माण झाले' याने ते 'माझे बंधन निर्माण झाले' असे म्हणतात. तसेच टीकेमध्ये म्हटले आहे – 'राहूति राहुग्गहो' (राहू म्हणजे राहूचे ग्रहण). तेथे 'राहुग्गहो' म्हणजे जो पकडतो तो 'गह' (ग्रह), राहू हाच ग्रह म्हणजे 'राहुग्गहो', म्हणजेच 'मला पकडणारा राहू जन्मला' असा अर्थ आहे. किंवा 'गह' म्हणजे ग्रहण करणे, राहूचे ग्रहण म्हणजे 'राहुग्गहो', म्हणजेच 'माझे राहूने ग्रहण केले' असा अर्थ आहे. कारण पुत्र हा राहूसारखा आहे आणि पिता हा पुत्ररूपी राहूने ग्रसल्या गेल्यामुळे चंद्रासारखा आहे. เอกจฺเจ ปน ‘‘ราหุโลตฺเวว โหตู’’ติ อิมํ ปเทสํ ทิสฺวา ‘‘ราหุ ชาโต’’ติ วุตฺเต อิมินา น สเมติ, ‘‘ราหุโล ชาโต’’ติ วุตฺเตเยว ปน สเมตีติ มญฺญมานา เอวํ ปาฐํ ปฐนฺติ ลิขนฺติ จ, ตสฺมา โส อนุปปริกฺขิตฺวา ปฐิโต ทุโรปิโต ปาโฐ น คเหตพฺโพ, ยถาวุตฺโต โปราณโก โปราณาจริเยหิ อภิมโต ปาโฐเยว อายสฺมนฺเตหิ คเหตพฺโพ อตฺถสฺส ยุตฺติโต, ฏีกาย จ สทฺธึ อวิโรธโตติ. परंतु काही लोक 'राहुलोत्वेव होतू' (राहूलच असो) हा पाठ पाहून, 'राहू जन्मला' असे म्हटल्यास याच्याशी मेळ बसत नाही, तर 'राहूल जन्मला' असे म्हटल्यासच मेळ बसतो, असे मानून तसा पाठ वाचतात आणि लिहितात. म्हणून, कसलीही परीक्षा न करता वाचलेला तो चुकीचा प्रस्थापित केलेला पाठ स्वीकारू नये. अर्थाच्या सुसंगततेमुळे आणि टीकेशी विरोध नसल्यामुळे, आयुष्मंतांनी प्राचीन आचार्यांना संमत असलेला वर उल्लेखिलेला प्राचीन पाठच स्वीकारला पाहिजे. ตตฺถ กุสลนฺติ กุจฺฉิตานํ ปาปธมฺมานํ สานโต ตนุกรณโต ญาณํ กุสํ นาม, เตน กุเสน ลาตพฺพํ ปวตฺเตตพฺพนฺติ กุสลํ. พาโลติ ทิฏฺฐธมฺมิกสมฺปรายิกสงฺขาเต ทฺเว อนตฺเถ เทวทตฺตโกกาลิกาทโย วิย ลาติ อาททาตีติ พาโล. อิมานิ ปน ตํนามานิ – त्यात 'कुसल' (कुशल) म्हणजे – निंदनीय पापधर्मांचा नाश केल्यामुळे किंवा त्यांना क्षीण केल्यामुळे ज्ञानाला 'कुस' म्हणतात, त्या 'कुसा'ने (ज्ञानाने) जे ग्रहण केले पाहिजे किंवा आचरले पाहिजे ते 'कुसल' होय. 'बाल' (मूर्ख) म्हणजे – देवदत्त आणि कोकालिक इत्यादींप्रमाणे या जन्मातील आणि परलोकातील अशा दोन्ही अनर्थांना जो ग्रहण करतो किंवा स्वीकारतो तो 'बाल' होय. त्याची नावे खालीलप्रमाणे आहेत – พาโล อวิทฺวา อญฺโญ จ, อญฺญาณี อวิจกฺขโณ; อปณฺฑิโต อกุสโล, ทุมฺเมโธ กุมติ ชโฬ. बाल (मूर्ख), अविद्वा (अज्ञानी), अञ्ञू (अजाण), अञ्ञाणी (अज्ञानी), अविचक्खणो (अविचक्षण/विवेकहीन), अपंडितो (अपंडित), अकुसलो (अकुशल), दुम्मेधो (दुर्बुद्धी), कुमती (कुमती) आणि जळो (जड/मतिमंद). เอฬมูโค [Pg.162] จ นิปฺปญฺโญ, ทุมฺเมธี อวิทู มโค; อวิญฺญู อนฺธพาโล จ, ทุปฺปญฺโญ จ อวิทฺทสุ. एळमूगो (मुका-बहिरा/मूर्ख), निप्पञ्ञो (प्रज्ञाहीन), दुम्मेधी (दुर्बुद्धी), अविदू (अज्ञानी), मगो (पशूसमान), अविञ्ञू (अविज्ञ), अंधबालो (अंधमूर्ख), दुप्पञ्ञो (दुष्प्रज्ञ) आणि अविद्दसू (अविद्वान). มหลฺลโกติ มหตฺตํ ลาติ คณฺหาตีติ มหลฺลโก, ชิณฺณปุริโส. อิมานิสฺส นามานิ – ‘महल्लक’ म्हणजे – जो मोठेपण (वृद्धत्व) ग्रहण करतो तो ‘महल्लक’ म्हणजेच वृद्ध मनुष्य. त्याची नावे खालीलप्रमाणे आहेत – ชิณฺโณ มหลฺลโก วุทฺโธ, พุทฺโธ วุฑฺโฒ จ กตฺตโร; เถโร จาติ อิเม สทฺทา, ชิณฺณปญฺญตฺติโย สิยุํ. जिण्णो (जीर्ण), महल्लको (वृद्ध), वुद्धो (वृद्ध), बुद्धो (बुद्ध - येथे वृद्ध या अर्थाने), वुड्ढो (वृद्ध), कत्तरो (जर्जर/अशक्त) आणि थेरो (स्थवीर) हे शब्द वृद्ध व्यक्तीचे वाचक आहेत. ตถา หิ – तसेच – ‘‘ทุเร อปสฺสํ เถโรว, จกฺขุํ ยาจิตุมาคโต’’; เอวมาทีสุ ทฏฺฐพฺโพ, เถรสทฺโท มหลฺลเก. “दूरचे न दिसणाऱ्या वृद्धाप्रमाणे, तो डोळे मागण्यासाठी आला”; इत्यादी ठिकाणी ‘थेर’ हा शब्द वृद्ध या अर्थाने पाहावा. อิมานิ ปน นามานิ อิตฺถิยา อิตฺถิลิงฺควเสน วตฺตพฺพานิ – आता हीच नावे स्त्रीसाठी स्त्रीलिंगी रूपाने खालीलप्रमाणे म्हणावीत – ชิณฺณา มหลฺลิกา วุทฺธี, พุทฺธี วุฑฺฒี จ กตฺตรา; เถรี จาติ อิเม สทฺทา, นามํ ชิณฺณาย อิตฺถิยา; जिण्णा (जीर्ण), महल्लिका (वृद्धा), वुद्धी (वृद्धा), बुद्धी (वृद्धा), वुड्ढी (वृद्धा), कत्तरा (जर्जर) आणि थेरी (स्थविरा) हे शब्द वृद्ध स्त्रीची नावे आहेत. ทล ผล วิสรเณ. ทลติ. ผลติ. ทลิโต รุกฺโข. ผลิโต ภูมิภาโค. ‘दल’ आणि ‘फल’ हे धातू विदीर्ण होणे किंवा विकसित होणे या अर्थात आहेत. दलति (विदीर्ण होते/विकसित होते). फलति (फलद्रूप होते/विकसित होते). दलितो रुक्खो (विदीर्ण झालेला वृक्ष). फलितो भूमिभागो (विकसित झालेला किंवा फळांनी बहरलेला भूभाग). อล ภูสเน. อลติ. อลงฺกาโร, อลงฺกโต, อลงฺกตํ. ‘‘สาลงฺกานนโยเคปิ, สาลงฺกานนวชฺชิตา’’ติ อิมิสฺสญฺหิ กวีนํ กพฺพรจนายํ อลงฺกสทฺโท ภูสนวิเสสํ วทติ. เกจิ ปเนตฺถ อล ภูสนปริยาปนวารเนสูติ ธาตุํ ปฐนฺติ, ‘‘อลตี’’ติ จ รูปํ อิจฺฉนฺติ. มยํ ปน อลธาตุสฺส ปริยตฺตินิวารณตฺถวาจกตฺตํ น อิจฺฉาม ปโยคาทสฺสนโต. นิปาตภูโต ปน อลํสทฺโท ปริยตฺตินิวารณตฺถวาจโก ทิสฺสติ ‘‘อลเมตํ สพฺพํ. อลํ เม เตน รชฺเชนา’’ติอาทีสุ. ‘अल’ धातू भूषणाच्या (अलंकार करण्याच्या) अर्थात आहे. अलति. अलंकारो (अलंकार), अलंकतो (अलंकृत - पुरुष), अलंकतं (अलंकृत - नपुंसकलिंगी). “सालंकाणनयोगेपि, सालंकाणनवज्जिता” या कवींच्या काव्यरचनेत ‘अलंकार’ हा शब्द विशिष्ट भूषणाचा वाचक आहे. येथे काही लोक ‘अल’ धातू भूषण, पर्याप्ति (समाप्ती) आणि निवारण या अर्थांमध्ये वाचतात आणि ‘अलति’ असे रूप मानतात. परंतु, प्रयोगात (वापरात) आढळत नसल्यामुळे आम्ही ‘अल’ धातूला पर्याप्ति आणि निवारण या अर्थांचा वाचक मानत नाही. परंतु, निपात असलेला ‘अलं’ हा शब्द पर्याप्ति आणि निवारण या अर्थांचा वाचक असलेला आढळतो, जसे की – “अलमेतं सब्बं” (हे सर्व पुरेसे आहे), “अलं मे तेन रज्जेन” (मला त्या राज्याची काही गरज नाही/पुरे झाले ते राज्य) इत्यादींमध्ये. มีล นิเมลเน. มีลติ, นิมีลติ, อุมฺมีลติ. นิมีลนํ. ‘मील’ धातू डोळे मिटण्याच्या (निमीलन) अर्थात आहे. मीलति (डोळे मिटतो), निमीलति (डोळे मिटतो), उम्मीलति (डोळे उघडतो). निमीलनं (डोळे मिटणे). พิล ปติตฺถมฺเภ. พิลติ. ‘बिल’ धातू आधार देणे किंवा रोखणे (प्रतिष्टंभ) या अर्थात आहे. बिलति. นีล [Pg.163] วณฺเณ. นีลวตฺถํ. ‘नील’ धातू रंगाच्या (विशेषतः निळ्या रंगाच्या) अर्थात आहे. नीलवत्थं (निळे वस्त्र). สีล สมาธิมฺหิ. สีลติ. สีลํ, สีลนํ. ‘सील’ धातू समाधी किंवा एकाग्रतेच्या (तसेच चारित्र्य/शील राखण्याच्या) अर्थात आहे. सीलति. सीलं (शील), सीलनं (शील राखणे/आचरण करणे). เอตฺถ สีลนฺติ สีลนฏฺเฐน สีลํ. วุตฺตญฺเหตํ วิสุทฺธิมคฺเค ‘‘สีลนฺติ เกนฏฺเฐน สีลํ? สีลนฏฺเฐน สีลํ, กิมิทํ สีลนํ นาม? สมาธานํ วา กายกมฺมาทีนํ สุสีลฺยวเสน อวิปฺปกิณฺณตาติ อตฺโถ. อุปธารณํ วา กุสลานํ ธมฺมานํ ปติฏฺฐานวเสน อาธารภาโวติ อตฺโถ. เอตเทว หิ เอตฺถ อตฺถทฺวยํ สทฺทลกฺขณวิทู อนุชานนฺติ. อญฺเญ ปน ‘สิรฏฺโฐ สีลฏฺโฐ, สีตลฏฺโฐ สีลฏฺโฐ’ติ เอวมาทินา นเยเนตฺถ อตฺถํ วณฺเณนฺตี’’ติ. ตตฺถ ‘‘อตฺถทฺวยํ สทฺทลกฺขณ วิทู อนุชานนฺตี’’ติ อิทํ ‘‘สีล สมาธิมฺหิ สีล อุปธารเณ’’ติ ทฺวิคณิกสฺส สีลธาตุสฺส อตฺเถ สนฺธาย วุตฺตํ. อิมสฺส หิ จุราทิคณํ ปตฺตสฺส อุปธารเณ ‘‘สีเลติ, สีลยตี’’ติ รูปานิ ภวนฺติ, อุปธาเรตีติปิ เตสํ อตฺโถ. อิธ ปน ภูวาทิคณิกตฺตา สมาธานตฺเถ ‘‘สีลตี’’ติ รูปํ ภวติ, สมาธิยตีติ ตสฺส อตฺโถ. ปุนปิ เอตฺถ โสตูนํ สุขคฺคหณตฺถํ นิพฺพจนานิ วุจฺจนฺเต. สีลติ สมาธิยติ กายกมฺมาทีนํ สุสีลฺยวเสน น วิปฺปกิรตีติ สีลํ. อถ วา สีลนฺติ สมาทหนฺติ จิตฺตํ เอเตนาติ สีลํ. อิมานิ ภูวาทิคณิกวเสน นิพฺพจนานิ. จุราทิคณิกวเสน ปน สีเลติ กุสเล ธมฺเม อุปธาเรติ ปติฏฺฐาภาเวน ภุโส ธาเรตีติ สีลํ. สีเลนฺติ วา เอเตน กุสเล ธมฺเม อุปธาเรนฺติ ภุโส ธาเรนฺติ สาธโวติ สีลนฺติ นิพฺพจนานิ. येथे 'शील' म्हणजे शीलनाच्या (आचरणाच्या) अर्थाने शील होय. विसुद्धिमग्गमध्ये असे म्हटले आहे की - 'शील कोणत्या अर्थाने शील आहे? शीलनाच्या अर्थाने शील आहे. हे शीलन म्हणजे काय? कायकर्म इत्यादींचे सुशीलतापूर्वक असंमिश्र (अविप्रकीर्ण) राहणे म्हणजेच 'समाधान' (एकाग्रता) असा अर्थ आहे. किंवा कुशल धर्मांचे प्रतिष्ठेच्या (पाया) रूपाने आधारभूत असणे म्हणजेच 'उपधारण' असा अर्थ आहे. व्याकरणकार येथे याच दोन अर्थांना मान्यता देतात. इतर काही जण मात्र 'शिरोऽर्थ (श्रेष्ठ अर्थ) हाच शीलार्थ आहे, शीतलार्थ (शांतता) हाच शीलार्थ आहे' अशा प्रकारे येथे अर्थाचे वर्णन करतात.' त्यात 'व्याकरणकार दोन अर्थांना मान्यता देतात' हे 'शील समाधीमध्ये, शील उपधारणामध्ये' या दोन गणांतील 'शील' धातूच्या अर्थाला अनुसरून म्हटले आहे. कारण जेव्हा हा धातू चुरादिगणात येतो, तेव्हा उपधारण अर्थामध्ये 'सीलेति' (sīleti), 'सीलयति' (sīlayati) अशी रूपे होतात, आणि त्यांचा अर्थ 'उपधारण करतो' (धारण करतो) असाही होतो. परंतु येथे भूवादिगणातील असल्यामुळे समाधान अर्थामध्ये 'सीलति' (sīlati) असे रूप होते, आणि त्याचा अर्थ 'समाहित होतो' असा आहे. पुन्हा येथे श्रोत्यांच्या सुलभ आकलनासाठी व्युत्पत्ती सांगितली जात आहे: 'सीलति' म्हणजे समाहित होतो, कायकर्म इत्यादींच्या सुशीलतापूर्वक विखुरत नाही ते 'शील' होय. अथवा, ज्याच्याद्वारे चित्त समाहित (एकाग्र) केले जाते ते 'शील' होय. या भूवादिगणाच्या अनुसार व्युत्पत्ती आहेत. चुरादिगणाच्या अनुसार मात्र, जे कुशल धर्मांचे 'शीलन' करते, म्हणजेच उपधारण करते, आधारभूत होऊन दृढपणे धारण करते ते 'शील' होय. किंवा ज्याच्याद्वारे सत्पुरुष कुशल धर्मांचे उपधारण करतात, दृढपणे धारण करतात ते 'शील' होय, अशा व्युत्पत्ती आहेत. กิล พนฺเธ. กิลติ. กิลํ. किल (kila) धातू बांधण्याच्या अर्थात. किलति (kilati). कील (kīlaṃ - पाचर/खूंटी). กูล อาวรเณ. กุลติ. กูลํ. วเห รุกฺเข ปกูลเช. กูลํ พนฺธติ. นทีกูเล วสามหํ. กูลติ อาวรติ อุทกํ พหิ นิกฺขมิตุํ น เทตีติ กูลํ. कूल (kūla) धातू आवरण (रोखणे/वेढणे) या अर्थात. कुलति (kulati). कूल (kūlaṃ - काठ/किनारा). प्रवाहातील किंवा काठावर उगवलेल्या वृक्षांमध्ये. काठ बांधतो. आम्ही नदीकाठी राहतो. 'कूलति' म्हणजे रोखतो, पाणी बाहेर जाण्यापासून रोखतो म्हणून ते 'कूल' (काठ) होय. สูล [Pg.164] รุชายํ. สูลติ. สูลํ. กณฺณสูลํ น ชเนติ. सूल (sūla) धातू वेदना (रुजा) या अर्थात. सूलति (sūlati). शूल (sūlaṃ - वेदना/शूळ). कानदुखी (कर्णशूळ) उत्पन्न करत नाही. ตูล นิกฺกรีเส. นิกฺกรีสํ นาม กรีสมตฺเตนปิ อมิเนตพฺพโต ลหุภาโวเยว. ตูลติ. ตูลํ ภฏฺฐํว มาลุโต. तूल (tūla) धातू हलकेपणा (निकरीष) या अर्थात. 'निकरीष' म्हणजे अगदी थोड्या वजनानेही मोजता न येण्याजोगा हलकेपणाच होय. तूलति (tūlati). वाऱ्याने उडविलेल्या कापसाप्रमाणे (तूलं). ปุล สงฺฆาเต. ปุลติ. ปญฺจปุลิ. पुल (pula) धातू समूहाच्या (संघात) अर्थात. पुलति (pulati). पंचपुली (पाच पेंढ्यांचा समूह). มูล ปติฏฺฐายํ มูลติ. มูลํ. มูลสทฺโท ‘‘มูลานิ อุทฺธเรยฺย อนฺตมโส อุสฺสีรนาฬิมตฺตานิปี’’ติอาทีสุ มูลมูเล ทิสฺสติ. ‘‘โลโภ อกุสลมูล’’นฺติอาทีสุ อสาธารณเหตุมฺหิ. ‘‘ยาวมชฺฌนฺหิเก กาเล ฉายา ผรติ, นิวาเต ปณฺณานิ ปตนฺติ, เอตฺตาวตา รุกฺขมูล’’นฺติอาทีสุ สมีเป. อตฺริทํ วุจฺจติ – मूल (mūla) धातू प्रतिष्ठेच्या (पाया/मूळ) अर्थात. मूलति (mūlati). मूळ (mūlaṃ). 'मूल' शब्द 'मुळासकट उपटून टाकावे, अगदी वाळ्याच्या मुळांइतकेही' इत्यादी वाक्यांमध्ये मुख्य मुळाच्या अर्थात दिसतो. 'लोभ हे अकुशल मूळ आहे' इत्यादी वाक्यांमध्ये असाधारण कारणाच्या (हेतूच्या) अर्थात. 'दुपारच्या वेळेपर्यंत सावली पसरते, वारा नसताना पाने पडतात, एवढ्या अंतराला वृक्षमुळ (वृक्षाच्या जवळ) म्हणतात' इत्यादी वाक्यांमध्ये समीप (जवळ) या अर्थात. याविषयी असे म्हटले आहे - มูลมูเล มูลสทฺโท, ปทิสฺสติ ตเถว จ; อสาธารณเหตุมฺหิ, สมีปมฺหิ จ วตฺตติ. 'मूल' शब्द मुख्य मुळाच्या अर्थात, तसेच असाधारण कारणाच्या अर्थात आणि समीप (जवळ) या अर्थातही वापरला जातो. ผล นิพฺพตฺติยํ. รุกฺโข ผลติ. รุกฺขผลานิ ภุญฺชนฺตา. มหปฺผลํ มหานิสํสํ. โสตาปตฺติผลํ. ตตฺถ ผลนฺติ มหานิพฺพตฺติกํ. फल (phala) धातू उत्पत्तीच्या (निष्पत्ती) अर्थात. वृक्ष फलद्रूप होतो (फळ देतो). वृक्षाची फळे खाणारे. महाफल, महान आनिशंस (फायदा). स्रोतापत्ती फल. तेथे 'फल' म्हणजे महान उत्पत्ती देणारे. ผล เภเท. ผลติ. มุทฺธา เต ผลตุ สตฺตธา. ปาทา ผลึสุ. ตตฺถ ผลตูติ ภชฺชิตุ. फल (phala) धातू भेदण्याच्या (तुकडे होणे/फाटणे) अर्थात. फलति (phalati). तुझे मस्तक सात तुकड्यांत फाटो. पाय फाटले (भेगा पडल्या). तेथे 'फलतु' म्हणजे भंग पावो (तुकडे होवो). ผล อพฺยตฺตสทฺเท. อสนี ผลติ. ทฺเวเม ภิกฺขเว อสนิยา ผลนฺติยา น สนฺตสนฺติ. ผลนฺติยาติ สทฺทํ กโรนฺติยา. फल (phala) धातू स्पष्ट आवाजाच्या (अव्यक्त शब्द) अर्थात. वीज कडकडते (असनी फलति). 'भिक्खूहो, वीज कडकडत असताना हे दोघे घाबरत नाहीत.' 'फलंतिया' म्हणजे आवाज करत असताना. จุลฺล หาวกรเณ. หาวกรณํ วิลาสกรณํ. จุลฺลติ. चुल्ल (culla) धातू हावभाव (विलास करणे) करण्याच्या अर्थात. हावकरण म्हणजे विलास करणे. चुल्लति (cullati). ผุลฺล [Pg.165] วิกสนเภเทสุ. ผุลฺลติ. ผุลฺลํ. ผุลฺลิโต กึสุโก. สุผุลฺลิตมรวินฺทวนํ. फुल्ल (phulla) धातू उमलणे (विकसन) आणि भेदणे या अर्थांत. फुल्लति (phullati). फुल्ल (phullaṃ - उमललेले). उमललेला पळस (किंशुक). उत्तम प्रकारे उमललेले कमळवन (अरविंदवन). อสีติหตฺถมุพฺเพโธ, ทีปงฺกโร มหามุนิ; โสภติ ทีปรุกฺโขว, สาลราชาว ผุลฺลิโต. ऐंशी हात उंचीचे, महामुनी दीपंकर बुद्ध, दीपवृक्षाप्रमाणे किंवा उमललेल्या शालवृक्षाप्रमाणे शोभून दिसतात. ขณฺฑผุลฺลปฏิสงฺขรณํ. खंडित आणि पडझड झालेल्या भागांची दुरुस्ती (खंडफुल्ल प्रतिसंकरण). จิลฺล เสฐิลฺเล. สิฐิลภาโว เสฐิลฺลํ. จิลฺลติ. चिल्ल (cilla) धातू शिथिलतेच्या (सैलपणा) अर्थात. शिथिल भाव म्हणजे शिथिलता. चिल्लति (cillati). เวลุ เจลุ เกลุ เขลุ เปลุ เพลุ เสลุ สล ติล คติยํ. เวลติ. เจลติ. เกลติ. เขลติ. เปลติ. เพลติ. เสลติ. สลติ. ติลติ. เจลํ, เพลโก. เอตฺถ เจลนฺติ วตฺถํ. เปลโกติ สโส. वेल (vela), चेल (cela), केल (kela), खेल (khela), पेल (pela), बेल (bela), सेल (sela), सल (sala), तिल (tila) हे धातू गतीच्या अर्थात. वेलति (velati). चेलति (celati). केलति (kelati). खेलति (khelati). पेलति (pelati). बेलति (belati). सेलति (selati). सलति (salati). तिलति (tilati). चेल (celaṃ), बेलक (belako). येथे 'चेल' म्हणजे वस्त्र. 'पेलक' म्हणजे ससा. ขล จลเน. ขลติ. ขโล. ขโลติ ทุชฺชโน อสาธุ อสปฺปุริโส ปาปชโน. खल (khala) धातू कंप पावण्याच्या (चलन) अर्थात. खलति (khalati). खल (khalo). 'खल' म्हणजे दुर्जन, असाधू, असत्पुरुष, पापी माणूस. ขล สญฺจินเน. ขลติ. ขลํ. ขลนฺติ วีหิฏฺฐปโนกาสภูตํ ภูมิมณฺฑลํ. ตญฺหิ ขลนฺติ สญฺจินนฺติ ราสึ กโรนฺติ เอตฺถ ธญฺญานีติ ขลนฺติ วุจฺจติ. ‘‘ขลํ สาลํ ปสุํ เขตฺตํ, คนฺตา จสฺส อภิกฺขณ’’นฺติ ปโยโค. खल (khala) धातू गोळा करण्याच्या (संचयन) अर्थात. खलति (khalati). खळ (khalaṃ - खळे). 'खळ' म्हणजे भात (धान्य) ठेवण्याची जागा असलेले भूमंडळ. कारण तेथे धान्याचे संचयन करतात, रास करतात, म्हणून त्याला 'खळ' म्हणतात. 'खळे, शाळा, पशू, शेत येथे वारंवार जाणारा असावा' असा प्रयोग आहे. คิล อชฺโฌหรเณ. คิลติ. คิลมกฺขํ ปุริโส น พุชฺฌติ. गिल (gila) धातू गिळण्याच्या (अध्यवहरण) अर्थात. | गिलति (gilati). गिळलेला फासा माणसाला समजत नाही. คล อทเน. คลติ. คโล. คลนฺติ อทนฺติ อชฺโฌหรนฺติ เอเตนาติ คโล. คโลติ คีวา วุจฺจติ. गल (gala) धातू खाण्याच्या (अदन) अर्थात. गलति (galati). गळा (galo). ज्याच्याद्वारे खातात, गिळतात तो 'गल' (गळा) होय. 'गल' म्हणजे मान (ग्रीवा) असेही म्हटले जाते. สล สลฺล อาสุคติยํ. อาสุคติ สีฆคมนํ. สลติ. สลฺลติ. สลฺลํ. เอตฺถ จ ‘‘สลฺลํ อุสุ สโร สลฺโล กณฺโฑ เตชโน’’ติ ปริยายา เอเต. सल (sala), सल्ल (salla) हे धातू जलद गतीच्या (आशुगती) अर्थात. आशुगती म्हणजे जलद गमन. सलति (salati). सल्लति (sallati). शल्य (sallaṃ - बाण). आणि येथे 'सल्ल, उषु, शर, शल्य, कांड, तेजन' हे त्याचे समानार्थी शब्द आहेत. โขล คติปฏิฆาเต. โขลติ. खोल (khola) धातू गती रोखण्याच्या (गतिप्रतिघात) अर्थात. खोलति (kholati). คิเล [Pg.166] ปีติกฺขเย. คิลายติ. คิลาโน, เคลญฺญํ. คิลาโนติ อกลฺลโก. วินเยปิ หิ วุตฺตํ ‘‘นาหํ อกลฺลโก’’ติ. อฏฺฐกถายญฺจ ‘‘นาหํ อกลฺลโกติ นาหํ คิลาโน’’ติ วุตฺตํ. गिल (gila) धातू शक्ती क्षीण होण्याच्या (प्रीतीक्षय) अर्थात. गिलायति (gilāyati). गिलान (gilāno - आजारी), गेलञ्ञ (gelaññaṃ - आजारपण). 'गिलान' म्हणजे अस्वस्थ (अकल्लको). विनयातही म्हटले आहे - 'मी अस्वस्थ नाही.' आणि अट्ठकथेत म्हटले आहे - 'मी अस्वस्थ नाही म्हणजे मी आजारी नाही.' มิเล คตฺตวินาเม. มิลายติ. มิลายโน, มิลายนฺโต, มิลายมาโน. मिल (mila) धातू शरीराच्या अवयवांच्या वाकण्याच्या (गात्रविनाम/कोमेजणे) अर्थात. मिलायति (milāyati). कोमेजणे, कोमेजणारा, कोमेजणारा. เกเล มมายเน. มมายนํ ตณฺหาทิฏฺฐิวเสน ‘‘มม อิท’’นฺติ คหณํ. เกลายติ. ตฺวํ กํ เกลายติ. केल (kela) धातू ममत्वाच्या (ममायन) अर्थात. 'ममायन' म्हणजे तृष्णा आणि दृष्टीच्या प्रभावाने 'हे माझे आहे' असे ग्रहण करणे. केलायति (kelāyati). तू कोणावर ममत्व करतोस? สล จลเน สํวรเณ จ, วล วลฺล จลเน จ. สํวรณาเปกฺขายํ จกาโร. สลติ. กุสลํ. วลติ. วลฺลติ. วลฺลูโร. सल (sala) धातू कंप पावणे (चलन) आणि संवरण (रोखणे) या अर्थांत, आणि वल (vala), वल्ल (valla) हे धातू कंप पावण्याच्या अर्थात. संवरणाची अपेक्षा असल्यामुळे 'च' कार वापरला आहे. सलति (salati). कुशल (kusalaṃ). वलति (valati). वल्लति (vallati). वल्लूर (vallūro - सुकवलेले मांस). ตตฺถ กุสลนฺติ กุจฺฉิเต ปาปธมฺเม สลยติ จลยติ กมฺเปติ วิทฺธํเสตีติ กุสลํ. กุจฺฉิตํ อปายทฺวารํ สลนฺติ สํวรนฺติ ปิทหนฺติ สาธโว เอเตนาติ กุสลํ. วลฺลนฺติ สํวรนฺติ รกฺขนฺติ อิโต กากเสนาทโย สตฺเต อขาทนตฺถายาติ วลฺลูโร. त्यात 'कुशल' म्हणजे - जे निंद्य अशा पापदर्मांना कंपित करते, नष्ट करते ते 'कुशल' होय. किंवा ज्याच्याद्वारे सत्पुरुष निंद्य अशा अपायद्वारांना (नरकद्वारांना) रोखतात, बंद करतात ते 'कुशल' होय. कावळे इत्यादी पक्षी खाऊ नयेत म्हणून ज्याचे रक्षण (संवरण) करतात ते 'वल्लूर' (सुकवलेले मांस) होय. มล มลฺล ธารเณ. มลติ. มลํ. มลฺลติ. มลฺโล. मल (mala), मल्ल (malla) हे धातू धारण करण्याच्या अर्थात. मलति (malati). मल (malaṃ - मळ). मल्लति (mallati). मल्ल (mallo - पैलवान). ภล ภลฺล ปริภาสนหึสาทาเนสุ. ภลติ. ภลฺลติ. भल (bhala), भल्ल (bhalla) हे धातू निंदा करणे (परिभाषण), हिंसा करणे आणि देणे या अर्थांत. भलति (bhalati). भल्लति (bhallati). กล สงฺขฺยาเน. กลติ. กลา, กาโล. कल (kala) धातू मोजण्याच्या (संख्यान) अर्थात. कलति (kalati). कला (kalā), काळ (kālo). เอตฺถ กลาติ โสฬสภาคาทิภาโค. กาโลติ ‘‘เอตฺตโก อตฺกฺกนฺโต’’ติอาทินา กลิตพฺโพ สงฺขาตพฺโพติ กาโล, ปุพฺพณฺหาทิสมโย. येथे 'कला' म्हणजे सोळावा भाग इत्यादी भाग. 'काळ' म्हणजे 'एवढा वेळ निघून गेला' इत्यादी प्रकारे मोजला जाणारा, म्हणून तो 'काळ' (वेळ) होय, जसे की पूर्वाह्न (सकाळ) इत्यादी वेळ. กลฺล อสทฺเท. อสทฺโท. นิสฺสทฺโท. กลฺลติ. कल्ल (kalla) धातू अस्पष्ट आवाजाच्या (अशब्द/निशब्द) अर्थात. अशब्द म्हणजे निशब्द. कल्लति (kallati). ชล ทิตฺติยํ. ชลติ. ชลํ, ชลนฺโต, ปชฺชลนฺโต, ชลมาโน. जल (jala) धातू चमकण्याच्या (दीप्ती) अर्थात. जलति (jalati). जल (jalaṃ - पाणी), जळणारा (जलंतो), प्रज्वलित होणारा (पज्जलंतो), जळणारा (जलमानो). โก [Pg.167] เอติ สิริยา ชลํ. ชลํว ยสสา อฏฺฐา, เทวทตฺโตติ เม สุตํ. สทฺธมฺมปชฺโชโต ชลิโต. शोभेने (श्रीमंत होऊन) कोण पाण्याकडे जातो? देवदत्त यशाने पाण्याच्या प्रवाहाप्रमाणे उभा राहिला, असे मी ऐकले आहे. सद्धर्माचा दिवा प्रज्वलित झाला. หุล จลเน. หุลติ. หโล. หโลติ ผาโล, โส หิ โหเลติ ภูมึ ภินฺทนฺโต มตฺติกขณฺฑํ จาเลตีติ ‘‘หโล’’ติ วุจฺจติ อุการสฺส อการํ กตฺวา. 'हुल' (धातू) हलणे या अर्थात. हुलति. हलो. 'हलो' म्हणजे नांगर (फाळ), कारण तो जमीन फोडून मातीचे ढेकूळ हलवतो (होलेति), म्हणून 'उ' काराचा 'अ' कार करून त्याला 'हलो' असे म्हटले जाते. จล กมฺปเน. จลติ. จลิโต, อจโล. มหนฺโต ภูมิจาโล. จลนํ, จาโล. 'चल' (धातू) कंपन करणे या अर्थात. चलति. चलितो (हललेला), अचलो (स्थिर). मोठा भूकंप (महंतो भूमिचालो). चलनं (हलणे), चालो (कंपन). ชล ธญฺเญ. ชลติ. ชลํ. 'जल' (धातू) धान्याच्या अर्थात. जलति. जलं (पाणी). ฏล ฏุล เวลมฺเพ. ฏลติ. ฏุลติ. 'टल', 'टुल' (धातू) विलंब करणे या अर्थात. टलति. टुलति. ถล ฐาเน. ถลติ. ถโล. ถโลติ นิรุทกปฺปเทโส. ปพฺพชฺชานิพฺพาเนสุปิ ตํสทิสตฺตา ตพฺโพหาโร. ยถา หิ โลเก อุทโกเฆน อโนตฺถรณฏฺฐานํ ‘‘ถโล’’ติ วุจฺจติ, เอวํ กิเลโสเฆน อโนตฺถรณียตฺตา ปพฺพชฺชา นิพฺพานญฺจ ‘‘ถโล’’ติ วุจฺจติ, ‘‘ติณฺโณ ปารงฺคโต ถเล ติฏฺฐติ พฺราหฺมโณ’’ติ หิ วุตฺตํ. 'थल' (धातू) स्थानाच्या अर्थात. थलति. थलो. 'थलो' म्हणजे पाण्याचा अभाव असलेला प्रदेश (कोरडी जमीन). प्रव्रज्या (पब्बज्जा) आणि निर्वाण (निब्बान) यांच्यातही तशाच समानतेमुळे हाच शब्द वापरला जातो. कारण ज्याप्रमाणे जगात पाण्याच्या प्रवाहाने (पुराने) न बुडणाऱ्या ठिकाणाला 'थलो' (कोरडी जमीन) म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे क्लेशांच्या प्रवाहाने न बुडणारे असल्यामुळे प्रव्रज्या आणि निर्वाणाला 'थलो' म्हटले जाते. कारण असे म्हटले आहे की, "पार गेलेला, पार पावलेला ब्राह्मण कोरड्या जमिनीवर (थले) उभा राहतो." ผาล วิเลขเน. ผาลติ ภูมึ วิเลขติ ภินฺทตีติ ผาโล. 'फाल' (धातू) जमीन खोदणे या अर्थात. जो जमीन खोदतो, फाडतो किंवा भेदतो तो 'फालो' (नांगराचा फाळ) होय. นล คนฺเถ. นลติ. 'नल' (धातू) बांधणे या अर्थात. नलति. พล ปาณเน. อิห ปาณนํ ชีวนํ สสนญฺจ. พลติ. พลํ, พาโล. 'बल' (धातू) प्राण धारण करणे (जगणे) या अर्थात. येथे 'पाणन' म्हणजे जीवन आणि श्वासोच्छ्वास होय. बलति. बलं (बल), बालो (बाल/मूर्ख). เอตฺถ พลนฺติ ชีวิตํ กปฺเปนฺติ เอเตนาติ พลํ, กายพลโภคพลาทิกํ พลํ. อถ วา พลนฺติ สมฺมาชีวนํ ชีวนฺติ เอเตนาติ พลํ, สทฺธาทิกํ พลํ. อาคมฏฺฐกถายํ ปน ‘‘อสฺสทฺธิเย น กมฺปตีติ สทฺธาพล’’นฺติอาทิ วุตฺตํ, ตํ ทฬฺหฏฺเฐน พลนฺติ วตฺตพฺพานํ สทฺธาทีนํ อกมฺปนภาวทสฺสนตฺถํ วุตฺตนฺติ [Pg.168] ทฏฺฐพฺพํ. อถ วา ธาตูนํ อตฺถาติสยโยคโต อสฺสทฺธิยาทีนํ อภิภวเนน สทฺธาทิพลานํ อภิภวนตฺโถปิ คเหตพฺโพ ‘‘อพลา นํ พลิยนฺตี’’ติ เอตฺถ วิย. พาโลติ พลติ อสฺสสติ เจว ปสฺสสติ จาติ พาโล, อสฺสสิตปสฺสสิตมตฺเตน ชีวติ, น เสฏฺเฐน ปญฺญาชีวิเตนาติ วุตฺตํ โหติ. ตถา หิ อฏฺฐกถายํ วุตฺตํ ‘‘พลนฺตีติ พาลา, อสฺสสิตปสฺสสิตมตฺเตน ชีวนฺติ, น ปญฺญาชีวิเตนาติ อตฺโถ’’ติ. ปญฺญาชีวิโนเยว หิ ชีวิตํ เสฏฺฐํ นาม. เตนาห ภควา ‘‘ปญฺญาชีวึ ชีวิตมาหุ เสฏฺฐ’’นฺติ. येथे ज्याच्याद्वारे जीवन व्यतीत करतात ते 'बलं' (बल) होय, जसे की कायबल (शारीरिक शक्ती), भोगबल इत्यादी. किंवा ज्याच्याद्वारे सम्यक जीवन जगतात ते 'बलं' होय, जसे की श्रद्धा इत्यादी बल (श्रद्धाबल). आगम-अट्ठकथेमध्ये (टीकेमध्ये) "अश्रद्धेमुळे जे कंपित होत नाही ते श्रद्धाबल होय" इत्यादी जे म्हटले आहे, ते दृढतेच्या अर्थाने 'बल' म्हटल्या जाणाऱ्या श्रद्धा इत्यादींच्या अकंपनभावाचे (अविचलतेचे) दर्शन घडवण्यासाठी म्हटले आहे असे समजावे. किंवा धातूंच्या अतिशय अर्थाच्या योगाने अश्रद्धा इत्यादींचा पराभव करून श्रद्धा इत्यादी बलांच्या पराभव करण्याच्या अर्थानेही ते ग्रहण करावे, जसे की "अबल लोक त्याला बळजबरी करतात" (अवला नं बलियन्ति) यामध्ये आहे. 'बालो' (मूर्ख/अज्ञानी) म्हणजे जो केवळ श्वास घेतो आणि सोडतो तो 'बालो' होय; तो केवळ श्वासोच्छ्वासाच्या बळावर जगतो, श्रेष्ठ अशा प्रज्ञाजीवनाने (ज्ञानाच्या जीवनाने) नाही, असा याचा अर्थ आहे. कारण अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे: "जे केवळ श्वास घेतात ते 'बाला' (मूर्ख) होत, ते केवळ श्वासोच्छ्वासाने जगतात, प्रज्ञाजीवनाने नाही, असा अर्थ आहे." कारण प्रज्ञावंताचेच जीवन खरोखर श्रेष्ठ मानले जाते. म्हणूनच भगवंतांनी म्हटले आहे: "प्रज्ञावंताचे जीवन हेच श्रेष्ठ जीवन आहे असे म्हणतात." ปุล มหตฺเต. ปุลติ. วิปุลํ. 'पुल' (धातू) मोठेपणा या अर्थात. पुलति. विपुलं (विपुल). กุล สงฺขาเน พนฺธุมฺหิ จ. โกลติ. กุลํ, โกโล. 'कुल' (धातू) मोजणे आणि नातेवाईक या अर्थात. कोलति. कुलं (कुळ), कोलो. สล คมเน. สลติ. 'सल' (धातू) जाणे या अर्थात. सलति. กิล ปีติย กีฬเนสุ. ปีตสฺส ภาโว ปีติยํ ยถา ทกฺขิยํ. กีฬนํ กีฬาเยว. กิลติ. 'किल' (धातू) प्रीती आणि क्रीडा या अर्थात. प्रसन्नतेचा भाव म्हणजे 'पीतियं' (प्रीती), जसे 'दक्खियं' (दक्षता). 'कीळनं' म्हणजे क्रीडाच. किलति. อิล กมฺปเน. อิลติ. เอลํ, เอลา. เอตฺถ เอลํ วุจฺจติ โทโส. เกนฏฺเฐน? กมฺปนฏฺเฐน. โทโสติ เจตฺถ อคุโณ เวทิตพฺโพ, น ปฏิโฆ. ‘‘เนลงฺโค เสตปจฺฉาโท’’ติ อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. 'इल' (धातू) कंपन करणे या अर्थात. इलति. एलं, एला. येथे 'एलं' म्हणजे दोष म्हटला जातो. कोणत्या अर्थाने? कंपनाच्या अर्थाने. आणि येथे 'दोष' म्हणजे अवगुण समजावा, द्वेष (पटिघ) नव्हे. "नेळंगो सेतपच्छादो" (दोषरहित, पांढरे वस्त्र पांघरलेला) हे याचे उदाहरण आहे. อปิจ เอลํ วุจฺจติ อุทกํ. ตถา หิ ‘‘เอลมฺพุชํ กณฺฏกึ วาริชํ ยถา’’ติ อิมิสฺสา ปาฬิยา อตฺถํ นิทฺทิสนฺโต อายสฺมา สาริปุตฺโต ‘‘เอลํ วุจฺจติ อุทก’’นฺติ อาห. เอลาติ ลาลา วุจฺจติ ‘‘เอลมูโค’’ติ เอตฺถ วิย. อปิจ เอลาติ เขโฬ วุจฺจติ ‘‘สุตฺวา เนลปตึ วาจํ, วาฬา ปนฺถา อปกฺกมุ’’นฺติ เอตฺถ วิย. เอตฺถ เนลปตึ วาจนฺติ เขฬพินฺทุนิปาตวิรหิตํ [Pg.169] วจนนฺติ อตฺโถ. ลาลาเขฬวาจกสฺส ตุ เอลาสทฺทสฺส อญฺญํ ปวตฺตินิมิตฺตํ ปริเยสิตพฺพํ. อเนกปฺปวตฺตินิมิตฺตา หิ สทฺทา. กึ วา อญฺเญน ปวตฺตินิมิตฺเตน, อิล กมฺปเนติ เอวํ วุตฺตํ กมฺปนํ เอว ลาลาเขฬวาจกสฺส เอลาสทฺทสฺส ปวตฺตินิมิตฺตํ, ตสฺมา อิลนฺติ ชิคุจฺฉิตพฺพภาเวน กมฺเปนฺติ หทยจลนํ ปาปุณนฺติ ชนา เอตฺถาติ เอลาติ อตฺโถ คเหตพฺโพ. สมานปวตฺตินิมิตฺตาเยว หิ สทฺทา โลกสงฺเกตวเสน นานาปทตฺถวาจกาปิ ภวนฺติ. ตํ ยถา? หิโนติ คจฺฉตีติ เหตุ, สปฺปติ คจฺฉตีติ สปฺโป, คจฺฉตีติ โคติ. ตถา อสมานปฺปวตฺตินิมิตฺตาเยว สมานปทตฺถวาจกาปิ ภวนฺติ. ตํ ยถา? รญฺจตีติ ราชา, ภูมึ ปาเลตีติ ภูมิปาโล, นเร อินฺทตีติ นรินฺโทติ. เอส นโย สพฺพตฺถาปิ วิภาเวตพฺโพ. तसेच 'एलं' म्हणजे पाणी देखील म्हटले जाते. कारण "ज्याप्रमाणे पाण्यातून उत्पन्न झालेले कमळ (एलम्बुजं) काटेरी असते..." या पाळी वचनाचा अर्थ स्पष्ट करताना आयुष्यमान सारिपुत्तांनी "एलं म्हणजे पाणी म्हटले जाते" असे सांगितले आहे. 'एला' म्हणजे लाळ असेही म्हटले जाते, जसे की 'एलमूगो' (लाळ गळणारा मुका) यामध्ये आहे. तसेच 'एला' म्हणजे थुंकी देखील म्हटले जाते, जसे की "नेळपतिं वाचं (थुंकीरहित वाणी) ऐकून हिंस्र प्राणी मार्गावरून दूर झाले" यामध्ये आहे. येथे 'नेळपतिं वाचं' म्हणजे थुंकीचे थेंब न उडता बोललेले वचन असा अर्थ आहे. लाळ आणि थुंकी वाचक असलेल्या 'एला' शब्दाचे इतर प्रवृत्ती-निमित्त (व्युत्पत्तीचे कारण) शोधले पाहिजे. कारण शब्दांचे अनेक प्रवृत्ती-निमित्त असतात. किंवा इतर प्रवृत्ती-निमित्ताची काय गरज? 'इल कंपने' (कंपन करणे) यावरून सांगितलेले कंपन हेच लाळ आणि थुंकी वाचक 'एला' शब्दाचे प्रवृत्ती-निमित्त आहे. म्हणून 'इलन्ति' म्हणजे ज्याच्यामुळे लोक घृणास्पद भावनेने कंपित होतात (हृदय हलते), ती 'एला' (लाळ/थुंकी) असा अर्थ घ्यावा. कारण समान प्रवृत्ती-निमित्त असलेले शब्द देखील लोकसंकेतानुसार वेगवेगळ्या पदार्थांचे वाचक असतात. ते कसे? जसे की, 'हिनोति' (जातो) म्हणून 'हेतु', 'सप्पति' (सरपटत जातो) म्हणून 'सप्पो' (सर्प), 'गच्छति' (जाते) म्हणून 'गो' (गाय). त्याचप्रमाणे, असमान प्रवृत्ती-निमित्त असलेले शब्द देखील समान पदार्थांचे वाचक असतात. ते कसे? जसे की, 'रञ्चति' (रंजन करतो) म्हणून 'राजा', 'भूमिं पालेति' (भूमीचे पालन करतो) म्हणून 'भूमिपालो', 'नरे इन्देति' (नरांमध्ये श्रेष्ठ) म्हणून 'नरिन्दो'. हाच नियम सर्वत्र समजून घ्यावा. อิล คติยํ. อิลติ. 'इल' (धातू) गतीच्या अर्थात. इलति. หิล หาวกรเณ. เหลติ. 'हिल' (धातू) हावभाव करण्याच्या अर्थात. हेलति. สิล อุญฺเฉ. สิลติ. 'सिल' (धातू) उंछवृत्ती (धान्य गोळा करणे) या अर्थात. सिलति. ติล สิเนหเน. ติลติ. ติลํ, เตลํ, ติโล. 'तिल' (धातू) स्नेह (तेलकटपणा) या अर्थात. तिलति. तिलं (तीळ), तेलं (तेल), तिलो (तीळ वनस्पती). จิล วสเน. จิลติ. 'चिल' (धातू) वस्त्र परिधान करणे या अर्थात. चिलति. วล วิลาสเน. วลติ. 'वल' (धातू) विलास या अर्थात. वलति. ปิล คหเณ. ปิลติ. 'पिल' (धातू) ग्रहण करणे या अर्थात. pिलति. มิล สิเนหเน. มิลติ. 'मिल' (धातू) स्नेह या अर्थात. मिलति. ผุล สญฺจเล ผรเณ จ. ผุลติ. 'फुल' (धातू) हलणे आणि पसरणे या अर्थात. फुलति. ลการนฺตธาตุรูปานิ. 'ल' कारान्त धातूंची रूपे. วการนฺตธาตุ 'व' कारान्त धातू. วา [Pg.170] คติคนฺธเนสุ. วาติ. วาโต. 'वा' (धातू) गती आणि गंध या अर्थात. वाति (वाहतो). वातो (वारा). วี ปชนกนฺติ อสนขาทน คตีสุ. ปชนํ จลนํ. กนฺติ อภิรุจิ. อสนํ ภตฺตปริโภโค. ขาทนํ ปูวาทิภกฺขนํ. คติ คมนํ. เวติ. 'वी' (धातू) प्रजन (कंपन), कांती (अभिरुची), असन (भोजन), खादन (खाणे) आणि गती (जाणे) या अर्थात. 'पजनं' म्हणजे कंपन (हलणे), 'कन्ति' म्हणजे अभिरुची (आवड), 'असनं' म्हणजे भाताचा उपभोग (भोजन), 'खादनं' म्हणजे पुऱ्या इत्यादी खाणे, 'गति' म्हणजे गमन (जाणे). वेति. เว ตนฺตสนฺตาเน. วายติ. ตนฺตวาโย. 'वे' (धातू) धागा विणणे (तंतूंचा विस्तार करणे) या अर्थात. वायति (विणतो). तंतवायो (विणकर). เว โสสเน. วายติ. 'वे' (धातू) सुकवणे या अर्थात. वायति. ธิวุ ขิวุ นิทสฺสเน. เธวติ. เขวติ. 'धिवु', 'खिवु' (धातू) निर्देश करणे या अर्थात. धेवति. खेवति. ถิวุ ทิตฺติยํ. เถวติ. มธุมธุกา เถวนฺติ. 'थिवु' (धातू) दीप्ती (चमकणे) या अर्थात. थेवति. मधुमधुका थेवन्ति (मध आणि मधाचे थेंब चमकतात). ชีว ปาณธารเณ. ชีวติ. ชีวิตํ, ชีโว, ชีวิกา. อตฺถิ โน ชีวิกา เทว, สา จ ยาทิสกีทิสา. ชีวิตํ กปฺเปติ. 'जीव' (धातू) प्राण धारण करणे (जगणे) या अर्थात. जीवति (जगतो). जीवितं (जीवन), जीवो (जीव), जीविका (उपजीविका). "हे देवा, आमची उपजीविका आहे, आणि ती जशी काही आहे तशी आहे." जीवितं कप्पेति (जीवन व्यतीत करतो). ปิว มิว ติว นิว ถูลิเย. ปิวติ. ปิวโร. มิวติ. ติวติ. นิวติ. 'पिव', 'मिव', 'तिव', 'निव' (धातू) स्थूलता या अर्थात. पिवति. पिवरो. मिवति. तिवति. निवति. เอตฺถ จ ปิวโรติ กจฺฉโป, โย โกจิ วา ถูลสรีโร. ตถา หิ ‘‘ปิวโร กจฺฉเป ถูเล’’ติ ปุพฺพาจริเยหิ วุตฺตํ. आणि येथे 'पिवरो' म्हणजे कासव किंवा जो कोणी स्थूल शरीराचा आहे तो होय. कारण पूर्वाचार्यांनी म्हटले आहे: "पिवरो हा शब्द कासव आणि स्थूल या अर्थात वापरला जातो." อว ปาลเน. อวติ. พุทฺโธ มม อวตํ. 'अव' (धातू) रक्षण करणे या अर्थात. अवति (रक्षण करतो). बुद्धो माझे रक्षण करोत. ภว คติยํ. สวติ. 'भव' (धातू) गतीच्या अर्थात. सवति. กว วณฺเณ. กวติ. 'कव' (धातू) वर्णन करणे या अर्थात. कवति. ขิวุ มเท. ขิวติ. 'खिवु' (धातू) मद (मत्त होणे) या अर्थात. खिवति. โธวุ โธวเน. โธวติ. 'धोवु' (धातू) धुणे या अर्थात. धोवति (धुतो). เทวุ [Pg.171] เทว เทวเน. เทวติ อาเทวติ, ปริเทวติ, อาเทโว, ปริเทโว, อาเทวนา, ปริเทวนา, อาเทวิตตฺตํ, ปริเทวิตตฺตํ. 'देवु' (devu) धातू 'देवने' (विलाप करणे/शोक करणे) या अर्थात आहे. देवति, आदेवति, परिदेवति, आदेवो, परिदेवो, आदेवना, परिदेवना, आदेवितत्तं, परिदेवितत्तं. เสวุ เกวุ เขวุ เควุ คิเลวุ เมวุ มิเลวุ เสจเน. เสวติ. เกวติ. เขวติ. เควติ. คิเลวติ. เมวติ มิเลวติ. 'सेवु', 'केवु', 'खेवु', 'गेवु', 'गिलेवु', 'मेवु', 'मिलेवु' हे धातू 'सेचने' (सिंचन करणे/शिंपडणे) या अर्थात आहेत. सेवति, केवति, खेवति, गेवति, गिलेवति, मेवति, मिलेवति. เทวุ ปฺลุตคติยํ. ปฺลุตคติ ปริปฺลุตคมนํ. เทวติ. 'देवु' (devu) धातू 'प्लुतगती' (उड्या मारत जाणे) या अर्थात आहे. प्लुतगती म्हणजे चहुबाजूने उड्या मारत जाणे. देवति. ธาตุ คติสุทฺธิยํ. ธาวติ, วิธาวติ. อาธาวติ, ปริธาวติ. ธาวโก. 'धातु' (dhātu) धातू 'गती' आणि 'शुद्धी' या अर्थात आहे. धावति, विधावति, आधावति, परिधावति, धावको. จิวุ อาทานสํวเรสุ. จิวติ. 'चिवु' (civu) धातू 'आदान' (ग्रहण करणे) आणि 'संवर' (संयम राखणे) या अर्थात आहे. चिवति. เจวิ เจตนาตุลฺเย. เจวติ. 'चेवि' (cevi) धातू 'चेतना' (विचार करणे) आणि 'तुलना' (तुलना करणे) या अर्थात आहे. चेवति. วการนฺตธาตุรูปานิ. 'व' कारान्त धातूंची रूपे. สการนฺตธาตุ 'स' कारान्त धातू. สา ปาเก. สาติ. 'सा' (sā) धातू 'पाके' (पक्व होणे) या अर्थात आहे. साति. สิ เสวายํ. เสวติ. เสวนา, เสวโก, เสวิโต, สิโว, สิวํ. 'सि' (si) धातू 'सेवा' (सेवा करणे) या अर्थात आहे. सेवति. सेवना, सेवको, सेवितो, सिवो, सिवं. นิหียติ ปุริโส นิหีนเสวี,น จ หาเยถ กทาจิ ตุลฺยเสวี; เสฏฺฐมุปคมํ อุเทติ ขิปฺปํ,ตสฺมา อตฺตโน อุตฺตริตรํ ภเชถ; "हीन लोकांची सेवा करणारा मनुष्य अधोगतीला जातो, समान लोकांची सेवा करणारा कधीही नष्ट होत नाही; श्रेष्ठ लोकांच्या जवळ जाणारा लवकरच प्रगती करतो, म्हणून स्वतःपेक्षा श्रेष्ठ असलेल्यांची संगत करावी." สิ คติพุทฺธีสุ. เสติ, อติเสติ. อติสิตุํ, อติสิตฺวา, เสตุ. 'सि' (si) धातू 'गती' आणि 'बुद्धी' (ज्ञान) या अर्थात आहे. सेति, अतिसेति. अतिसितुं, अतिसित्वा, सेतु. สี [Pg.172] สเย. สโย สุปนํ. เสติ. สยติ. เสนํ. สยนํ. 'सी' (sī) धातू 'शयन' (झोपणे) या अर्थात आहे. 'सयो' म्हणजे झोपणे. सेति, सयति. सेनं, सयनं. สุ คติยํ. สวติ. ปสวติ. ปสุโต, สุโต. 'सु' (su) धातू 'गती' या अर्थात आहे. सवति, पसवति. पसुतो, सुतो. เอตฺถ สุโตติ ทูโต, ‘‘วิตฺติญฺหิ มํ วินฺทติ สุต ทิสฺวา’’ติ ‘‘เทวสุโต จ มาตลี’’ติ จ อิมานิ ตตฺถ ปโยคานิ. येथे 'सुतो' म्हणजे दूत, "वित्तं हि मं विन्दति सुत दिस्वा" (दूताला पाहून मला आनंद मिळतो) आणि "देवसुतो च मातली" (आणि देवाचा दूत मातली) हे त्याचे तेथील प्रयोग आहेत. สุ สวเน. สวนํ สนฺทนํ. สวติ. อาสโว. 'सु' (su) धातू 'सवने' (वाहणे) या अर्थात आहे. 'सवनं' म्हणजे वाहणे. सवति. आसवो. สู ปสเว. ปสโว ชนนํ. สวติ, ปสวติ. สุตฺตํ. 'सू' (sū) धातू 'प्रसव' (जन्म देणे) या अर्थात आहे. 'पसवो' म्हणजे जन्म देणे. सवति, पसवति. सुत्तं. เอตฺถ ปน สุตฺตนฺติ อตฺเถ สวติ ชเนตีติ สุตฺตํ, เตปิฏกํ พุทฺธวจนํ, ตทญฺญมฺปิ วา หตฺถิสุตฺตาทิ สุตฺตํ. येथे 'सुत्तं' (सूत्र) म्हणजे जे अर्थाला प्रसवते (उत्पन्न करते) ते 'सुत्तं' होय, जसे की त्रिपिटकातील बुद्धवचन, किंवा त्याव्यतिरिक्त हत्ती-सूत्र इत्यादी सूत्रे. สู ปาณคพฺภวิโมจเนสุ. สูติ. ปสูติ. ปสูโต. 'सू' (sū) धातू 'प्राणी आणि गर्भाची सुटका करणे' (प्रसूती) या अर्थात आहे. सूति, पसूति, पसूतो. สุ เปรเณ. สุติ. 'सु' (su) धातू 'प्रेरणा देणे' या अर्थात आहे. सुति. เส ขเย. สียติ. เอการสฺสียาเทโส. 'से' (se) धातू 'क्षय' (नाश होणे) या अर्थात आहे. सीयति. येथे 'ए' काराचा 'सीय' असा आदेश होतो. เส ปาเก. เสติ. 'से' (se) धातू 'पाके' (पक्व होणे) या अर्थात आहे. सेति. เส คติยํ. เสติ. เสตุ. 'से' (se) धातू 'गती' या अर्थात आहे. सेति. सेतु. หึส หึสายํ. หึสติ. หึสโก, หึสนา, หึสา. 'हिंस' (hiṃsa) धातू 'हिंसा' (इजा करणे) या अर्थात आहे. हिंसति. हिंसको, हिंसना, हिंसा. อิสฺส อิสฺสายํ. อิสฺสติ. ปุริสปรกฺกมสฺส เทวา น อิสฺสนฺติ. อิสฺสา, อิสฺสายนา. 'इस्स' (issa) धातू 'ईर्ष्या' (मत्सर करणे) या अर्थात आहे. इस्सति. पुरुषाच्या पराक्रमाचा देव मत्सर करत नाहीत. इस्सा, इस्सायना. นมสฺส วนฺทนานติยํ. วนฺทนานติ นาม วนฺทนาสงฺขาตํ นมนํ, สกมฺมโกเยวายํ ธาตุ, น นมุธาตุ วิย สกมฺมโก เจว อกมฺมโก จ. นมสฺสติ. 'नमस्स' (namassa) धातू 'वंदना' आणि 'नती' (नम्र होणे) या अर्थात आहे. वंदना-नती म्हणजे वंदनेने युक्त असलेले नमन. हा धातू केवळ सकर्मकच आहे, 'नमु' धातूसारखा सकर्मक आणि अकर्मक दोन्ही नाही. नमस्सति. ฆุส สทฺเท. ฆุสติ, โฆสติ. ปฏิโฆโส, นิคฺโฆโส, วจีโฆโส. 'घुस' (ghusa) धातू 'शब्द' (आवाज करणे) या अर्थात आहे. घुसति, घोसति. पटिघोसो, निग्घोसो, वचीघोसो. จุส [Pg.173] ปาเน. จุสติ. 'चुस' (cusa) धातू 'पाने' (चोखणे) या अर्थात आहे. चुसति. ปุส พุทฺธิยํ. ปุสติ. โปโส. สมฺปีเฬ มม โปสนํ. โปสนนฺติ วฑฺฒนํ. 'पुस' (pusa) धातू 'बुद्धी' (पोषण करणे/वाढवणे) या अर्थात आहे. पुसति. पोसो. "संपीळे मम पोसनं". 'पोसनं' म्हणजे वाढवणे. มุส เถยฺเย. เถนนํ เถยฺยํ โจริกา. มุสติ. ทุทฺทิกฺโข จกฺขุมุสโน. มุสโล. 'मुस' (musa) धातू 'थेय्य' (चोरी करणे) या अर्थात आहे. 'थेननं' आणि 'थेय्यं' म्हणजे चोरी. musati. दुद्दिक्खो चक्खुमुसनो. मुसलो. ปุส ปสเว. ปุสติ. 'पुस' (pusa) धातू 'प्रसव' (जन्म देणे) या अर्थात आहे. पुसति. วาสิ ภูส อลงฺกาเร. วาสติ. ภูสติ, วิภูสติ. ภูสนํ, วิภูสนํ. 'वासि' आणि 'भूस' हे धातू 'अलंकार' (सजवणे) या अर्थात आहेत. वासति. भूसति, विभूसति. भूसनं, विभूसनं. อุส รุชายํ. อุสติ. 'उस' (usa) धातू 'रुजा' (वेदना) या अर्थात आहे. usati. อิส อุจฺเฉ. เอสติ. อิสิ. 'इस' (isa) धातू 'उच्छ' (शोधणे) या अर्थात आहे. एसति. इसि. เอตฺถ ปน สีลาทโย คุเณ เอสนฺตีติ อิสโย, พุทฺธาทโย อริยา ตาปสปพฺพชฺชาย จ ปพฺพชิตา นรา. ‘‘อิสิ ตาปโส ชฏิโล ชฏี ชฏาธโร’’ติ เอเต ตาปสปริยายา. येथे जे शील इत्यादी गुणांचा शोध घेतात ते 'इसयो' (ऋषी) होत, जसे की बुद्ध इत्यादी आर्य आणि तापस प्रव्रज्येने प्रव्रजित झालेले मनुष्य. 'इसि, तापसो, जटिलो, जटी, जटाधरो' हे तापसाचे समानार्थी शब्द आहेत. กส วิเลขเน. กสติ, กสฺสติ. กสฺสโก, อากาโส. 'कस' (kasa) धातू 'विलेखन' (नांगरणे) या अर्थात आहे. कसति, कस्सति. कस्सको, आकासो. เอตฺถ กสฺสโกติ กสิการโก. อากาโสติ นภํ. ตญฺหิ น กสฺสตีติ อากาโส. กสิตุํ วิเลขิตุํ น สกฺกาติ อตฺโถ. อิมานิ ตทภิธานานิ – येथे 'कस्सको' म्हणजे शेती करणारा. 'आकासो' म्हणजे नभ (आकाश). कारण ते नांगरले जात नाही म्हणून ते 'आकासो' होय. नांगरता किंवा खरवडता येत नाही असा याचा अर्थ आहे. त्याची नावे खालीलप्रमाणे आहेत – อากาโส อมฺพรํ อพฺภํ, อนฺตลิกฺข’มฆํ นภํ; เวหาโส คคนํ เทโว, ข’มาทิจฺจปโถปิ จ. आकासो, अम्बरं, अब्भं, अन्तलिक्खं, अघं, नभं, वेहासो, गगनं, देवो, खं, आणि आदिच्चपथो. ตาราปโถ จ นกฺขตฺต-ปโถ รวิปโถปิ จ; เวหายสํ วายุปโถ, อปโถ อนิลญฺชสํ. तारापथो, नक्खत्तपथो, रविपथो, वेहायसं, वायुपथो, अपथो, आणि अनिलंजसं. กส [Pg.174] สิส ชส ฌส วส มส ทิส ชุส ยุส หึสตฺถา. กสติ. สิสติ. ชสติ. ฌสติ. วสติ. มสติ. มสโก. โอมสติ, โอมสวาโท. ทิสติ. ชุสติ. ยูสติ. 'कस', 'सिस', 'जस', 'झस', 'वस', 'मस', 'दिस', 'जुस', 'युस' हे धातू 'हिंसा' या अर्थात आहेत. कसति, सिसति, जसति, झसति, वसति, मसति. मसको. ओमसति, ओमसवादो. दिसति, जुसति, यूसति. ตตฺถ โอมสตีติ วิชฺฌติ. โอมสวาโทติ ปเรสํ สูจิยา วิย วิชฺฌนวาโท. มสโกติ มกโส. तेथे 'ओमसति' म्हणजे टोचणे. 'ओमसवादो' म्हणजे इतरांना सुईने टोचल्याप्रमाणे बोलणे. 'मसको' म्हणजे डास. ภสฺส ภสฺสเน. ภสฺสนฺติ กถนํ วุจฺจติ ‘‘อาวาโส โคจโร ภสฺสํ. ภสฺสการก’’นฺติอาทีสุ วิย. ภสฺสติ. ภฏฺฐํ. ภฏฺฐนฺติ ภาสิตํ, วจนนฺติ อตฺโถ. เอตฺถ ปน – 'भस्स' धातू बोलण्याच्या अर्थात आहे. 'भस्स' म्हणजे बोलणे (कथन) म्हटले जाते, जसे की 'आवासो गोचरो भस्सं, भस्सकारको' इत्यादींमध्ये. 'भस्सति' (तो बोलतो). 'भट्ठं'. 'भट्ठं' म्हणजे बोललेले किंवा वचन असा अर्थ आहे. आणि येथे तर - ‘‘สุภาสิตา อตฺถวตี, คาถาโย เต มหามุนิ; นิชฺฌตฺโตมฺหิ สุภฏฺเฐน, ตฺวญฺจ เม สรณํ ภวา’’ติ “हे महामुनी! आपल्या गाथा सुभाषित (सुंदर रीतीने बोललेल्या) आणि अर्थपूर्ण आहेत. मी आपल्या सुभाषित वचनाने संतुष्ट झालो आहे, आणि आपण माझे शरण व्हावे.” ปาฬิ นิทสฺสนํ. ตตฺถ นิชฺฌตฺโตติ นิชฺฌาปิโต ธมฺโมชปญฺญาย ปญฺญตฺติคโต อมฺหิ. สุภฏฺเฐนาติ สุภาสิเตน. हे पाळीचे उदाहरण आहे. तेथे 'निज्झत्तो' म्हणजे धर्माच्या ओजाच्या प्रज्ञेने समजवलेला, प्रज्ञप्तीला प्राप्त झालेला मी आहे. 'सुभट्ठेन' म्हणजे सुभाषिताने (सुंदर वचनाने). ชิสุ นิสุ วิสุ มิสุ วสฺส เสจเน. เชสติ. เนสติ. เวสติ. เมสติ. เทโว วสฺสติ. 'जिसु', 'निसु', 'विसु', 'मिसु' आणि 'वस्स' हे धातू सिंचन करण्याच्या अर्थात आहेत. 'जेसति', 'नेसति', 'वेसति', 'मेसति'. 'देवो वस्सति' (पाऊस पडतो). มริสุ สหเน จ. จกาโร เสจนาเปกฺขโก. มริสติ. 'मरिसु' धातू सहन करण्याच्या आणि (सिंचन करण्याच्या) अर्थात आहे. 'च' कार सिंचनाच्या अपेक्षेने आहे. 'मरिसति'. ปุส โปสเน. โปสติ. โปโส. กมฺมจิตฺตอุตุอาหิอาเรหิ โปสิยตีติ โปโส. ‘‘อญฺเญปิ เทโว โปเสตี’’ติ ทสฺสนโต ปน จุราทิคเณปิ อิมํ ธาตุํ วกฺขาม. 'पुस' धातू पोषण करण्याच्या अर्थात आहे. 'पोसति'. 'पोसो'. कर्म, चित्त, ऋतु आणि आहार यांच्याद्वारे ज्याचे पोषण केले जाते, तो 'पोसो' होय. 'देव इतरांचेही पोषण करतो' (अञ्ञेपि देवो पोसेति) अशा दर्शनामुळे चुरादि गणातही आम्ही या धातूचा उल्लेख करू. ปิสุ สิลิสุ ปุสุ ปลุสุ อุสุ อุปทาเห. เปสติ. สิเลสติ. สิเลโส. โปสติ. ปโลสติ. โอสติ. อุสุ. 'पिसु', 'सिलिसु', 'पुसु', 'पलुसु' आणि 'उसु' हे धातू दाह होण्याच्या (जळण्याच्या) अर्थात आहेत. 'पेसति', 'सिलेसति', 'सिलेसो', 'पोसति', 'पलोसति', 'ओसति', 'उसु'. ฆสุ สํหริเส. สํหริโส สงฺฆฏฺฏนํ. ฆสฺสติ. 'घसु' धातू संघर्षाच्या (घासण्याच्या) अर्थात आहे. 'संहरिसो' म्हणजे संघट्टन (परस्पर घर्षण). 'घस्सति'. หสุ อาลิงฺเค. อาลิงฺโค อุปคูหนํ. หสฺสติ. 'हसु' धातू आलिंगन देण्याच्या अर्थात आहे. 'आलिंगो' म्हणजे आलिंगन देणे (मिठी मारणे). 'हस्सति'. หส [Pg.175] หสเน. หสติ. อสฺสา หสนฺติ, อาชานียา หสนฺติ, ปหสติ, อุหสติ. การิเต ‘‘หาเสติ’’อิจฺจาทิ, อุหสิยมาโน, หาโส, ปหาโส, หสนํ, ปหสนํ, หสิตํ. หการโลเปน มนฺทหสนํ ‘‘สิต’’นฺติ วุจฺจติ ‘‘สิตํ ปาตฺวากาสี’’ติอาทีสุ. 'हस' धातू हसण्याच्या अर्थात आहे. 'हसति'. 'अस्सा हसन्ति' (घोडे खिंकाळतात), 'आजानीया हसन्ति' (उत्कृष्ट घोडे खिंकाळतात), 'पहसति', 'उहसति'. प्रयोजक रूपात 'हासेति' इत्यादी रूपे होतात, जसे की 'उहसियमानो', 'हासो', 'पहासो', 'हसनं', 'पहसनं', 'हसितं'. 'ह' काराचा लोप होऊन मंदहास्याला 'सितं' असे म्हटले जाते, जसे की 'सितं पात्वाकासि' (त्यांनी मंदहास्य प्रकट केले) इत्यादींमध्ये. ตตฺถ อุหสตีติ อวหสติ. อุทสิยมาโนติ อวหสิยมาโน. ตตฺรายํ ปาฬิ ‘‘อิธ ภิกฺขุํ อรญฺญคตํ วา รุกฺขมูลคตํ วา สุญฺญาคารคตํ วา มาตุคาโม อุปสงฺกมิตฺวา อุหสติ’’ อิติ จ ‘‘โส มาตุคาเมน อุหสิยมาโน’’ อิติ จ. หาโสติ หสนํ วา โสมนสฺสํ วา ‘‘หาโส เม อุปปชฺชถา’’ติอาทีสุ วิย. तेथे 'उहसति' म्हणजे उपहास करणे. 'उहसियमानो' (पाठात उदसियमानो) म्हणजे उपहास केला जाणारा. त्याविषयी ही पाळी आहे: 'येथे अरण्यात गेलेल्या, किंवा वृक्षाच्या मुळाशी गेलेल्या, किंवा शून्य घरात गेलेल्या भिक्खूजवळ स्त्री येऊन त्याचा उपहास करते' आणि 'तो स्त्रीकडून उपहास केला जात असताना' असे. 'हासो' म्हणजे हसणे किंवा सौमनस्य (आनंद), जसे की 'हासो मे उपपज्जथा' (माझ्या मनात आनंद निर्माण झाला) इत्यादींमध्ये. ตุส หส หิส รส สทฺเท. ตุสติ, หสติ, หิสติ, รสติ, รสิตํ. อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘เภริโย สพฺพา วชฺชนฺตุ, วีณา สพฺพา รสนฺตุ ตา’’ อิติ. 'तुस', 'हस', 'हिस' आणि 'रस' हे धातू आवाजाच्या (शब्दाच्या) अर्थात आहेत. 'तुसति', 'हसति', 'हिसति', 'रसति', 'रसितं'. याविषयी ही पाळी आहे: 'सर्व भेरी वाजवाव्यात आणि त्या सर्व विणांनी नाद करावा' अशी. รส อสฺสาทเน. รสติ. รโส. 'रस' धातू आस्वाद घेण्याच्या (चव घेण्याच्या) अर्थात आहे. 'रसति'. 'रसो'. รส อสฺสาทสิเนเหสุ. รสติ. รโส. 'रस' धातू आस्वाद आणि स्नेह (प्रेम) यांच्या अर्थात आहे. 'रसति'. 'रसो'. รส หานิยํ. รสติ. รสนํ, รโส. 'रस' धातू हानीच्या (ऱ्हासाच्या) अर्थात आहे. 'रसति'. 'रसनं', 'रसो'. อตฺรายํ ปาฬิ – याविषयी ही पाळी आहे - ‘‘นเหว ฐิต นา’สีนํ, น สยานํ น ปทฺธคุํ; ยาว พฺยาติ นิมีสติ, ตตฺราปิ รสติพฺพโย’’ติ. “उभे राहिलेल्याला नाही, बसलेल्याला नाही, झोपलेल्याला नाही आणि चालणाऱ्यालाही नाही; डोळ्यांची पापणी लवते तेवढ्या वेळातही हे वय क्षीण होत जाते.” ตตฺถ รสติพฺพโยติ โส โส วโย รสติ ปริหายติ, น วฑฺฒตีติ อตฺโถ. तेथे 'रसतिय्बयो' म्हणजे ते ते वय क्षीण होते (ऱ्हास पावते), वाढत नाही असा अर्थ आहे. ลส สิเลสนกีฬเนสุ. ลสติ. ลาโส. ลสี จ เต นิปฺปลิตา. ลสิ วุจฺจติ มตฺถลุงฺคํ. นิปฺปลิตาติ นิกฺขนฺตา. 'लस' धातू चिकटणे आणि क्रीडा करणे यांच्या अर्थात आहे. 'लसति'. 'लासो'. 'लसी च ते निप्पलिता' (आणि तुझी लसी बाहेर पडली). 'लसी' म्हणजे मेंदू (मस्तुलुंग) म्हटले जाते. 'निप्पलिता' म्हणजे बाहेर पडलेली. นิส [Pg.176] สมาธิมฺหิ. สมาธิ สมาธานํ จิตฺเตกคฺคตา. เนสติ. 'निस' धातू समाधीच्या अर्थात आहे. समाधी म्हणजे समाधान, चित्ताची एकाग्रता होय. 'नेसति'. มิส มส สทฺเท โรเส จ. เมสติ. มสติ. เมโส. มสโก. 'मिस' आणि 'मस' हे धातू आवाजाच्या आणि क्रोधाच्या अर्थात आहेत. 'मेसति', 'मसति'. 'मेसो', 'मसको'. ปิสิ เปสุ คติยํ. ปิสติ. เปสติ. 'पिसि' आणि 'पेसु' हे धातू गतीच्या अर्थात आहेत. 'पिसति', 'पेसति'. สสุ หึสายํ. สสติ. สตฺถํ. สตฺถํ วุจฺจติ อสิ. 'ससु' धातू हिंसेच्या अर्थात आहे. 'ससति'. 'सत्थं'. 'सत्थं' म्हणजे तलवार म्हटले जाते. สํส ถุติยญฺจ. จกาโร หึสาเปกฺขาย. สํสติ, ปสํสติ. ปสํสา, ปสํสนา. ปสตฺโถ ภควา. ปสํสมาโน, ปสํสิโต, ปสํสโก, ปสํสิตพฺโพ, ปสํสนีโย, ปาสํโส, ปสํสิตฺวา อิจฺจาทีนิ. 'संस' धातू स्तुती करण्याच्या आणि (हिंसेच्या) अर्थात आहे. 'च' कार हिंसेच्या अपेक्षेने आहे. 'संसति', 'पसंसति'. 'पसंसा', 'पसंसना'. 'पसत्थो भगवा' (प्रशंसित भगवान). 'पसंसमानो', 'पसंसितो', 'पसंसको', 'पसंसितब्बो', 'पसंसनीयो', 'पासंसो', 'पसंसितत्वा' इत्यादी. ทิส เปกฺขเน. เอติสฺสา ปน นานารูปานิ ภวนฺติ – ‘‘ทิสฺสติ ปทิสฺสติ’’ อิจฺจาทิ อกมฺมกํ. ‘‘ปสฺสติ ทกฺขติ’’อิจฺจาทิ สกมฺมกํ. 'दिस' धातू पाहण्याच्या अर्थात आहे. याचे विविध रूपे होतात - 'दिस्सति, पदिस्सति' इत्यादी अकर्मक रूपे आहेत. 'पस्सति, दक्खति' इत्यादी सकर्मक रूपे आहेत. ทิสฺสตุ, ปสฺสตุ, ทกฺขตุ. ทิสฺเสยฺย, ปสฺเสยฺย, ทกฺเขยฺย. ทิสฺเส, ปสฺเส, ทกฺเข. ทิสฺส, ปสฺส, ทกฺข. อทิสฺสา, อปสฺสา. อทฺทา สีทนฺตเร นเค. อทฺทกฺขา, อทฺทกฺขุํ, อทสฺสุํ. อทสฺสิ, อปสฺสิ, อทกฺขิ. दिस्सतु, पस्सतु, दक्खतु. दिस्सेय्य, पस्सेय्य, दक्खेय्य. दिस्से, पस्से, दक्खे. दिस्स, पस्स, दक्ख. अदिस्सा, अपस्सा. 'अद्दा सीदन्तरे नगे' (त्याने सीदंतर पर्वतांमध्ये पाहिले). अद्दक्खा, अद्दक्खुं, अदस्सुं. अदस्सि, अपस्सि, अदक्खि. ทสฺสิสฺสติ, ปสฺสิสฺสติ, ทกฺขิสฺสติ. อทสฺสิสฺสา, อปสฺสิสฺสา, ทกฺขิสฺสา. เอวํ วตฺตมานปญฺจมิยาทิวเสน วิตฺถาเรตพฺพานิ. การิเต ‘‘ทสฺเสติ ทสฺสยตี’’ติ รูปานิ. กมฺเม ‘‘ปสฺสิยติ’’ อิจฺจาทีนิ. दस्सिस्सति, पस्सिस्सति, दक्खिस्सति. अदस्सिस्सा, अपस्सिस्सा, दक्खिस्सा. अशा प्रकारे वर्तमानकाळ, पंचमी इत्यादींच्या नियमांनुसार विस्तार करावा. प्रयोजक रूपात 'दस्सेति', 'दस्सयति' अशी रूपे होतात. कर्मणी प्रयोगात 'पस्सियति' इत्यादी रूपे होतात. ทิสา. ปสฺโส. ปสฺสํ. ปสฺสิตา. ทสฺเสตา. ทสฺสนํ. วิปสฺสนา, ญาณทสฺสนนฺติ นามิกปทานิ. ตทตฺเถ ปน ตุมตฺเถ จ ‘‘ทกฺขิตาเย’’ติ รูปํ. ‘‘อาคตามฺห อิมํ ธมฺมสมยํ, ทกฺขิตาเย อปราชิตสงฺฆ’’นฺติ หิ ปาฬิ. อิมสฺมึ ปน ปาฬิปฺปเทเส ‘‘ทกฺขิตาเย’’ติ อิทํ ตทตฺเถ ตุมตฺเถ วา จตุตฺถิยา รูปํ. ตถา [Pg.177] หิ ทกฺขิตาเยติ อิมสฺส ทสฺสนตฺถายาติ วา ปสฺสิตุนฺติ วา อตฺโถ โยเชตพฺโพ. ทิสาติอาทีสุ ปน ปุรตฺถิมาทิเภทาปิ ทิสาติ วุจฺจติ. ยถาห – 'दिसा', 'पस्सो', 'पस्सं', 'पस्सिता', 'दस्सेता', 'दस्सनं', 'विपस्सना', 'ञाणदस्सनं' ही नामरूपे (नामिक पदे) आहेत. आणि तदर्थी किंवा 'तुमुन्' प्रत्ययाच्या अर्थी 'दक्खिताये' असे रूप होते. कारण 'आगताम्ह इमं धम्मसमयं, दक्खिताये अपराजितसंघं' (आम्ही या धर्मसभेला अपराजित संघाचे दर्शन घेण्यासाठी आलो आहोत) अशी पाळी आहे. या पाळीच्या भागात 'दक्खिताये' हे तदर्थी किंवा तुमुन्-अर्थी चतुर्थीचे रूप आहे. कारण 'दक्खिताये' याचा अर्थ 'दर्शनासाठी' किंवा 'पाहण्यासाठी' असा लावला पाहिजे. 'दिसा' इत्यादींमध्ये पूर्व इत्यादी दिशांच्या भेदालाही 'दिसा' (दिशा) म्हटले जाते. जसे म्हटले आहे - ‘‘ทิสา จตสฺโส วิทิสา จตสฺโส,อุทฺธํ อโธ ทส ทิสตา อิมาโย; กตมํ ทิสํ ติฏฺฐติ นาคราชา,ยมทฺทสา สุปิเน ฉพฺพิสาณ’’นฺติ. “चार मुख्य दिशा आणि चार उपदिशा, वर आणि खाली मिळून या दहा दिशा आहेत; तो नागराज कोणत्या दिशेला उभा आहे, ज्याला तू स्वप्नात सहा सुळ्यांचा पाहिले होते?” มาตาปิตาทโยปิ. ยถาห – माता-पिता इत्यादींनाही (दिशा म्हटले जाते). जसे म्हटले आहे - ‘‘มาตาปิตา ทิสา ปุพฺพา, อาจริยา ทกฺขิณา ทิสา; ปุตฺตทารา ทิสา ปจฺฉา, มิตฺตามจฺจา จ อุตฺตรา; “माता-पिता ही पूर्व दिशा आहेत, आचार्य ही दक्षिण दिशा आहेत; पुत्र आणि पत्नी ही पश्चिम दिशा आहेत, मित्र आणि अमात्य ही उत्तर दिशा आहेत; ทาสกมฺมกรา เหฏฺฐา, อุทฺธํ สมณพฺราหฺมณา; เอตา ทิสา นมสฺเสยฺย, อลมตฺโต กุเล คิหี’’ติ; दास आणि कामगार ही खालची दिशा आहेत, श्रमण आणि ब्राह्मण ही वरची दिशा आहेत; कुळातील समर्थ गृहस्थाने या दिशांना नमस्कार करावा.” ปจฺจยทายกาปิ. ยถาห – ‘‘อคาริโน อนฺนทปานวตฺถทา, อวฺหายิกา นมฺปิ ทิสํ วทนฺตี’’ติ. प्रत्ययदायक (दान देणारे) यांनाही (दिशा म्हटले जाते). जसे म्हटले आहे - 'अन्न, पान आणि वस्त्र देणारे गृहस्थ, जे बोलावणारे आहेत, त्यांनाही दिशा म्हणतात.' นิพฺพานมฺปิ. ยถาห – निर्वाणालाही (दिशा म्हटले जाते). जसे म्हटले आहे - ‘‘เอตาทิสา ปรมา เสตเกตุ,ยํ ปตฺวา นิทฺทุกฺขา สุขิโน ภวนฺตี’’ติ; “हे श्वेतकेतू! ही अशी परम दिशा आहे, ज्याला प्राप्त करून लोक दुःखमुक्त आणि सुखी होतात.” เอวํ ทิสาสทฺเทน วุจฺจมานํ อตฺถรูปํ ญตฺวา อิทานิสฺส นิพฺพจนเมวํ ทฏฺฐพฺพํ. ทิสฺสติ จนฺทาวฏฺฏนาทิวเสน ‘‘อยํ ปุริมา อยํ ปจฺฉิมา’’ติอาทินา นานปฺปการโต ปญฺญายตีติ ทิสา, ปุรตฺถิมทิสาทโย. ตถา ‘‘อิเม อมฺหากํ ครุฏฺฐาน’นฺติอาทินา ปสฺสิตพฺพาติ ทิสา, มาตาปิตาทโย. ทิสฺสนฺติ สกาย ปุญฺญกฺริยาย อิเม ทายกาติ ปญฺญายนฺตีติ ทิสา, ปจฺจยทายกา. ทิสฺสติ อุปฺปาทวยาภาเวน นิจฺจธมฺมตฺตา สพฺพกาลมฺปิ วิชฺชตีติ ทิสา, นิพฺพานํ. ปสฺโสติ การณาการณํ [Pg.178] ปสฺสตีติ ปสฺโส. เอวํ ปสฺสตีติ ปสฺสํ. อตฺรายํ ปาฬิ – अशा प्रकारे 'दिसा' शब्दाने व्यक्त होणारा अर्थ जाणून, आता त्याची व्युत्पत्ती या प्रकारे पाहिली पाहिजे. चंद्र-सूर्याचे फिरणे इत्यादींच्या आधारे 'ही पूर्व, ही पश्चिम' इत्यादी विविध प्रकारे जी दिसते (जाणली जाते) ती 'दिसा' (दिशा), जसे की पूर्व दिशा इत्यादी. तसेच 'हे आमचे पूज्य स्थान आहेत' इत्यादी भावनेने ज्यांच्याकडे पाहिले पाहिजे ते 'दिसा', जसे की माता-पिता इत्यादी. आपल्या पुण्यक्रियेमुळे हे दायक (दाते) म्हणून दिसतात (जाणले जातात) ते 'दिसा', जसे की प्रत्ययदायक. उत्पाद आणि व्यय नसल्यामुळे, नित्य धर्म असल्याने जे सर्वकाळ विद्यमान दिसते ते 'दिसा', म्हणजे निर्वाण. 'पस्सो' म्हणजे जो कारण आणि अकारण पाहतो तो 'पस्सो'. अशा प्रकारे जो पाहतो तो 'पस्सं'. याविषयी ही पाळी आहे - ‘‘ปสฺสติ ปสฺโส ปสฺสนฺตํ, อปสฺสนฺตมฺปิ ปสฺสติ; อปสฺสนฺโต อปสฺสนฺตํ, ปสฺสนฺตมฺปิ น ปสฺสตี’’ติ. “पाहणारा (ज्ञानी) पाहणाऱ्याला पाहतो, आणि न पाहणाऱ्यालाही पाहतो; न पाहणारा (अज्ञानी) न पाहणाऱ्याला पाहत नाही, आणि पाहणाऱ्यालाही पाहत नाही.” ปสฺสตีติ ปสฺสิตา. ทสฺเสตีติ ทสฺสิตา. ทสฺสนนฺติ ทสฺสนกฺริยา. อปิจ ทสฺสนนฺติ จกฺขุวิญฺญาณํ. ตญฺหิ รูปารมฺมณํ ปสฺสตีติ ทสฺสนนฺติ วุจฺจติ. ตถา ‘‘ทสฺสเนน ปหาตพฺพา ธมฺมา’’ติ วจนโต ทสฺสนํ นาม โสตาปตฺติมคฺโค. กสฺมา โสตาปตฺติมคฺโค ทสฺสนํ? ปฐมํ นิพฺพานทสฺสนโต. นนุ โคตฺรภู ปฐมตรํ ปสฺสตีติ? โน น ปสฺสติ, ทิสฺวา กตฺตพฺพกิจฺจํ ปน น กโรติ สํโยชนานํ อปฺปหานโต, ตสฺมา ‘‘ปสฺสตี’’ติ น วตฺตพฺโพ. ยตฺถ กตฺถจิ ราชานํ ทิสฺวาปิ ปณฺณาการํ ทตฺวา กิจฺจนิปฺผตฺติยา อทิฏฺฐตฺตา อชฺชาปิ ราชานํ น ปสฺสามีติ วทนฺโต คามวาสี นิทสฺสนํ. जो पाहतो तो 'पस्सिता' (पाहणारा). जो दाखवतो तो 'दस्सिता' (दाखवणारा). 'दस्सन' म्हणजे पाहण्याची क्रिया. तसेच 'दस्सन' म्हणजे चक्षुविज्ञान (डोळ्यांचे विज्ञान) होय. कारण ते रूपाच्या आरम्मणाला (विषयाला) पाहते, म्हणून त्याला 'दस्सन' असे म्हणतात. तसेच 'दस्सनेन पहातब्बा धम्मा' (दर्शनाने नष्ट करण्यायोग्य धर्म) या वचनावरून 'दस्सन' म्हणजे 'सोतापत्तिमग्ग' (स्रोतापत्ती मार्ग) होय. सोतापत्तिमग्ग याला 'दस्सन' का म्हणतात? कारण तो पहिल्यांदा निर्वाणाचे दर्शन घडवतो. पण 'गोत्रभू' (गोत्रभू ज्ञान) आधी पाहत नाही का? असे नाही की तो पाहत नाही, परंतु पाहूनही तो (संयोजनांचा नाश न केल्यामुळे) कर्तव्य कर्म करत नाही, म्हणून त्याला 'पाहतो' असे म्हटले जात नाही. जसे की, एखाद्या गावकऱ्याने राजाला पाहिले तरी, त्याला भेटवस्तू देऊन आपले काम पूर्ण न झाल्यामुळे 'मी अजूनही राजाला पाहिले नाही' असे म्हणणे, हे याचे उदाहरण आहे. วิปสฺสนาติ อนิจฺจาทิวเสน ขนฺธานํ วิปสฺสนกํ ญาณํ. ญาณทสฺสนนฺติ ทิพฺพจกฺขุปิ วิปสฺสนาปิ มคฺโคปิ ผลมฺปิ ปจฺจเวกฺขณญาณมฺปิ สพฺพญฺญุตญฺญาณมฺปิ วุจฺจติ. ‘‘อปฺปมตฺโต สมาโน ญาณทสฺสนํ อาราเธตี’’ติ เอตฺถ หิ ทิพฺพจกฺขุ ญาณทสฺสนํ นาม. ‘‘ญาณทสฺสนาย จิตฺตํ อภินีหรติ อภินินฺนาเมตี’’ติ เอตฺถ วิปสฺสนาญาณํ. ‘‘อภพฺพา เต ญาณทสฺสนาย อนุตฺตราย สมฺโพธายา’’ติ เอตฺถ มคฺโค, ‘‘อยมญฺโญ อุตฺตริมนุสฺสธมฺโม อลมริยญาณทสฺสนวิเสโส อธิคโต ผาสุวิหาโร’’ติ เอตฺถ ผลญาณํ. ‘‘ญาณญฺจ ปน เม ทสฺสนํ อุทปาทิ, อกุปฺปา เม เจโตวิมุตฺติ, อยมนฺติมา ชาติ, นตฺถิ ทานิ ปุนพฺภโว’’ติ เอตฺถ ปจฺจเวกฺขณญาณํ. ‘‘ญาณญฺจ [Pg.179] ปน เม ทสฺสนํ อุทปาทิ สตฺตาหกาลงฺกโต อาฬาโร กาลาโม’’ติ เอตฺถ สพฺพญฺญุตญฺญาณํ. เอตฺเถตํ ภวติ – 'विपस्सना' म्हणजे अनित्यता इत्यादींच्या आधारे स्कंधांचे विपश्यना करणारे ज्ञान. 'ञाणदस्सन' (ज्ञानदर्शन) म्हणजे दिव्यचक्षू, विपश्यना, मार्ग, फल, प्रत्यवेक्षण ज्ञान आणि सर्वज्ञता ज्ञान यांनाही म्हटले जाते. 'अप्पमत्तो समानो ञाणदस्सनं आराधति' (अप्रमत्त राहून ज्ञानदर्शन प्राप्त करतो) येथे दिव्यचक्षूला 'ञाणदस्सन' म्हटले आहे. 'ञाणदस्सनाय चित्तं अभिनीहरati अभिनिन्नामेति' (ज्ञानदर्शनासाठी चित्त एकाग्र करतो, वळवतो) येथे 'विपस्सनाञाण' (विपश्यना ज्ञान) अभिप्रेत आहे. 'अभब्बा ते ञाणदस्सनाय अनुत्तराय संबोधाय' (ते अनुत्तर संबोधीच्या ज्ञानदर्शनासाठी असमर्थ आहेत) येथे 'मग्ग' (मार्ग), 'अय मञ्ञो उत्तरिमनुस्सधम्मो अलमरियञाणदस्सनविसेसो अधिगतो फासुविहारो' (हा दुसरा उत्तरमनुष्यधर्म, श्रेष्ठ आर्यज्ञानदर्शनविशेष प्राप्त झाला आहे, जो सुखाचा विहार आहे) येथे 'फलञाण' (फलज्ञान) अभिप्रेत आहे. 'ञाणञ्च पन मे दस्सनं उदपादि, अकुप्पा मे चेतोविमुत्ति, अयमन्तिमा जाति, नत्थि दानि पुनब्भवो' (माझ्यामध्ये ज्ञान आणि दर्शन उत्पन्न झाले, माझी चेतोविमुक्ती अचल आहे, हा अंतिम जन्म आहे, आता पुनर्जन्म नाही) येथे 'पच्चवेक्खणञाण' (प्रत्यवेक्षण ज्ञान) अभिप्रेत आहे. 'ञाणञ्च पन मे दस्सनं उदपादि सत्ताहकालङ्कतो आळारो कालामो' (माझ्यामध्ये ज्ञान आणि दर्शन उत्पन्न झाले की, आळार कालामाचा सात दिवसांपूर्वी मृत्यू झाला आहे) येथे 'सब्बञ्ञुतञाण' (सर्वज्ञता ज्ञान) अभिप्रेत आहे. या संदर्भात हे म्हटले आहे - ‘‘ทิพฺพจกฺขุปิ มคฺโคปิ, ผลญฺจาปิ วิปสฺสนา; ปจฺจเวกฺขณญาณมฺปิ, ญาณํ สพฺพญฺญุตาปิ จ; ญาณทสฺสนสทฺเทน, อิเม อตฺถา ปวุจฺจเร’’ติ. “दिव्यचक्षू, मार्ग, फल, विपश्यना, प्रत्यवेक्षण ज्ञान आणि सर्वज्ञता ज्ञान; या सर्व अर्थांना 'ञाणदस्सन' या शब्दाने सांगितले जाते.” ทํส ทํสเน. ทํสติ, วิทํสติ. ทนฺโต. การิเต อาโลกํ วิทํเสติ. 'दंस' धातू पाहण्याच्या अर्थात. 'दंसति' (तो पाहतो), 'विदंसति' (तो दाखवतो). 'दन्तो' (दंत/नियंत्रित). प्रयोजक रूपात (णिजन्त) 'आलोकं विदंसेति' (प्रकाश दाखवतो). เอส พุทฺธิยํ. เอสติ. 'एस' धातू बुद्धीच्या (जाणण्याच्या) अर्थात. 'एसति' (तो जाणतो/शोधतो). สํส กถเน. สํสติ. โย เม สํเส มหานาคํ. 'संस' धातू सांगण्याच्या (कथनाच्या) अर्थात. 'संसति' (तो सांगतो). 'यो मे संसे महानागं' (जो मला महानागाविषयी सांगेल). กิลิส พาธเน. กิลิสติ. กิเลโส. 'किलिस' धातू पीडा देण्याच्या (बाधण्याच्या) अर्थात. 'किलिसति' (तो पीडित होतो). 'किलेसो' (क्लेश). เอตฺถ พาธนฏฺเฐน ราคาทโยปิ ‘‘กิเลสา’’ติ วุจฺจนฺติ ทุกฺขมฺปิ. เอเตสุ ทุกฺขวเสน – येथे पीडा देण्याच्या अर्थाने राग (आसक्ती) इत्यादींना आणि दुःखालाही 'किलेसा' (क्लेश) म्हटले जाते. यांपैकी दुःखाच्या अर्थाने - ‘‘อิทญฺจ ปจฺจยํ ลทฺธา, ปุพฺเพ กิเลสมตฺตโน; อานนฺทิยํ วิจรึสุ, รมณีเย คิริพฺพเช’’ติ “आणि हे कारण मिळवून, पूर्वी स्वतःच्या क्लेशांमुळे (दुःखामुळे), ते रमणीय गिरिव्रजामध्ये आनंदाने विहरत होते.” ปโยโค เวทิตพฺโพ. ทิวาทิคณํ ปน ปตฺตสฺส ‘‘กิลิสฺสตี’’ติ รูปํ. असा प्रयोग जाणावा. दिवादिगणात आल्यावर 'किलिस्सति' असे रूप बनते. วส สิเนหเน. วสติ. วสา. 'वस' धातू स्नेह (चकाकी/तेलकटपणा) या अर्थात. 'वसति' (तो स्नेहयुक्त होतो). 'वसा' (चरबी/मेद). เอตฺถ จ วสา นาม วิลีนสิเนโห. สา วณฺณโต นาฬิเกรเตลวณฺณา. อาจาเม อาสิตฺตเตลวณฺณาติปิ วตฺตุํ วฏฺฏติ. आणि येथे 'वसा' म्हणजे वितळलेली चरबी (मेद). ती रंगाने नारळाच्या तेलासारखी असते. भाताच्या पेजेवर टाकलेल्या तेलाच्या रंगासारखी असते, असेही म्हणणे योग्य ठरेल. อีส หึสาคติทสฺสเนสุ. อีสติ. อีโส. 'ईस' धातू हिंसा, गती आणि दर्शन या अर्थांत. 'ईसति' (तो हिंसा करतो/जातो/पाहतो). 'ईसो' (स्वामी/ईश). ภาสพฺยตฺตายํ วาจายํ. ภาสติ. ภาสา, ภาสิตํ, ภาตา. ปริภาสติ. ปริภาสา, ปริภาสโก. 'भास' धातू स्पष्ट वाणीच्या अर्थात. 'भासति' (तो बोलतो). 'भासा' (भाषा), 'भासितं' (भाषित/वचन), 'भाता' (भाऊ). 'परिभासति' (तो निंदा करतो/धमकावतो). 'परिभासा' (निंदा/धमकी), 'परिभासको' (निंदा करणारा). ตตฺร [Pg.180] ภาสนฺติ อตฺถํ เอตายาติ ภาสา, มาคธภาสาทิ. ภาสิตนฺติ วจนํ. วจนตฺโถ หิ ภาสิตสทฺโท นิจฺจํ นปุํสกลิงฺโค ทฏฺฐพฺโพ. ยถา ‘‘สุตฺวา ลุทฺทสฺส ภาสิต’’นฺติ. วาจฺจลิงฺโค ปน ภาสิตสทฺโท ติลิงฺโค ทฏฺฐพฺโพ. ยถา ‘‘ภาสิโต ธมฺโม, ภาสิตํ จตุสจฺจํ, ภาสิตา วาจา’’ติ. ปุพฺเพ ภาสตีติ ภาตา, เชฏฺฐภาตาติ วุตฺตํ โหติ. โส หิ ปุพฺเพ ชาตตฺตา เอวํ วตฺตุํลภติ. กิญฺจาปิ ภาตุสทฺโท ‘‘ภาติกสตํ, สตฺตภาตโร. ภาตรํ เกน โทเสน, ทุชฺชาสิ ทกรกฺขิโน’’ติอาทีสุ เชฏฺฐกนิฏฺฐภาตูสุ วตฺตติ, ตถาปิ เยภุยฺเยน เชฏฺฐเก นิรูฏฺโฐ, ‘‘ภาตา’’ติ หิ วุตฺเต เชฏฺฐภาตาติ วิญฺญายติ, ตสฺมา กตฺถจิ ฐาเน ‘‘กนิฏฺฐภาตา’’ติ วิเสเสตฺวา วุตฺตํ. त्यामध्ये, जिच्याद्वारे अर्थ स्पष्ट केला जातो ती 'भासा' (भाषा), जसे की मागधभाषा इत्यादी. 'भासितं' म्हणजे वचन. वचनाच्या अर्थातील 'भासित' शब्द नेहमी नपुंसकलिंगी समजावा. जसे की, 'सुत्वा लुद्दस्स भासितं' (पारध्याचे बोलणे ऐकून). विशेषण म्हणून वापरलेला 'भासित' शब्द तिन्ही लिंगांत समजावा. जसे की, 'भासितो धम्मो' (सांगितलेला धर्म), 'भासितं चतुसच्चं' (सांगितलेले चार आर्यसत्य), 'भासिता वाचा' (सांगितलेली वाणी). जो आधी बोलतो तो 'भाता' (भाऊ), म्हणजे 'जेठ्ठभाता' (मोठा भाऊ) असे म्हटले जाते. कारण तो आधी जन्मल्यामुळे असे म्हणण्यास पात्र ठरतो. जरी 'भातु' शब्द 'भातिकसतं' (शंभर भाऊ), 'सत्तभातारो' (सात भाऊ), 'भातरं केन दोसेन, दुज्जासि दकरक्खिनो' (हे जलराक्षसा, कोणत्या दोषाने भावाला...) इत्यादींमध्ये मोठ्या आणि लहान भावांसाठी वापरला जात असला, तरीही तो प्रामुख्याने मोठ्या भावासाठी रूढ आहे. कारण 'भाता' असे म्हटले असता 'मोठा भाऊ' असाच अर्थ समजला जातो, म्हणूनच काही ठिकाणी 'कनिठ्ठभाता' (लहान भाऊ) असा विशेष उल्लेख केला जातो. นนุ จ โภ กตฺถจิ ‘‘เชฏฺฐภาตา’’ติ วิเสเสตฺวา วุตฺตนฺติ? สจฺจํ, ตํ ปน ภาตาสทฺทสฺส กนิฏฺเฐปิ วตฺตนโต ปากฏีกรณตฺถํ ‘‘เชฏฺฐภาตา’’ติ วุตฺตํ. ยถา หิ หริเณสุ วตฺตมานสฺส มิคสทฺทสฺส กทาจิ อวเสสจตุปฺปเทสุปิ วตฺตนโต ‘‘หริณมิโค’’ติ วิเสเสตฺวา วาจํ ภาสนฺติ, เอวํ สมฺปทมิทํ เวทิตพฺพํ. ยถา จ โคหตฺถิมหึสอจฺฉสูกรสสพิฬาราทีสุ สามญฺญวเสน มิคสทฺเท วตฺตมาเนปิ ‘‘มิคจมฺมํ มิคมํส’’นฺติ อาคตฏฺฐาเน ‘‘หริณสฺสา’’ติ วิเสสนสทฺทํ วินาปิ ‘‘หริณมิคจมฺมํ หริณมิคมํส’’นฺติ วิเสสตฺถาธิคโม โหติ, เอตฺถ น โคหตฺถิอาทีนํ จมฺมํ วา มํสํ วา วิญฺญายติ. ตถา ‘‘มิคมํสํ ขาทนฺตี’’ติ วจนสฺส โคหตฺถิอาทีนํ มํสํ ขาทนฺตีติ อตฺโถ น สมฺภวติ, เอวเมว กตฺถจิ วินาปิ เชฏฺฐกอิติ วิเสสนสทฺทํ ‘‘ภาตา’’ติ วุตฺเตเยว ‘‘เชฏฺฐกภาตา’’ติ อตฺโถ วิญฺญายตีติ. นนุ จ โภ ‘‘มิคจมฺมํ, มิคมํส’’นฺติ เอตฺถ จมฺมมํสสทฺเทเหว [Pg.181] วิเสสตฺถาธิคโม โหตีติ? น โหติ, มิคสทฺทสฺส อิว จมฺมมํสสทฺทานํ สามญฺญวเสน วตฺตนโต, เอวญฺจ สติ เกน วิเสสตฺถาธิคโม โหตีติ เจ? โลกสงฺเกตวเสน, ตถา หิ มิคสทฺเท จ จมฺมสทฺทาทีสุ จ สามญฺญวเสน วตฺตมาเนสุปิ โลกสงฺเกเตน ปริจฺฉินฺนตฺตา โคหตฺถิอาทีนํ จมฺมาทีนิ น ญายนฺติ โลเกน, อถ โข หริณจมฺมาทีนิเยว ญายนฺติ. ‘‘สงฺเกตวจนํ สจฺจํ, โลกสมฺมุติ การณ’’นฺติ หิ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. पण मग काही ठिकाणी 'जेठ्ठभाता' (मोठा भाऊ) असा विशेष उल्लेख का केला आहे? हे खरे आहे, परंतु 'भाता' हा शब्द लहान भावासाठीही वापरला जात असल्यामुळे, तो स्पष्ट करण्यासाठी 'जेठ्ठभाता' असे म्हटले आहे. जसे की, हरणांसाठी वापरला जाणारा 'मिग' (मृग/प्राणी) शब्द कधीकधी इतर चौपाया प्राण्यांसाठीही वापरला जात असल्यामुळे 'हरिणमिगो' (हरिण-मृग) असा विशेष उल्लेख करून बोलतात, तसेच हे देखील समजून घ्यावे. आणि जसे गाय, हत्ती, म्हैस, अस्वल, डुक्कर, ससा, मांजर इत्यादींसाठी सामान्यपणे 'मिग' शब्द वापरला जात असला, तरी 'मिगचम्मं मिगमंसं' (मृगचर्म, मृगमांस) अशा आलेल्या ठिकाणी 'हरिणस्स' (हरणाचे) या विशेषणाशिवाय देखील 'हरिणमिगचम्मं हरिणमिगमंसं' असा विशेष अर्थ प्राप्त होतो; येथे गाय, हत्ती इत्यादींचे चामडे किंवा मांस अभिप्रेत नसते. तसेच 'मिगमंसं खादन्ति' (मृगमांस खातात) या वाक्याचा अर्थ गाय, हत्ती इत्यादींचे मांस खातात असा होत नाही. त्याचप्रमाणे, काही ठिकाणी 'जेठ्ठक' (मोठा) या विशेषणाशिवाय केवळ 'भाता' म्हटले तरी 'जेठ्ठकभाता' (मोठा भाऊ) असाच अर्थ समजला जातो. पण मग 'मिगचम्मं, मिगमंसं' येथे 'चर्म' आणि 'मांस' या शब्दांमुळेच विशेष अर्थ प्राप्त होतो का? नाही, कारण 'मिग' शब्दाप्रमाणेच 'चर्म' आणि 'मांस' हे शब्दही सामान्य अर्थाने वापरले जातात. मग असे असेल तर विशेष अर्थ कशामुळे प्राप्त होतो? लोकसंकेतामुळे (लोकरूढीमुळे). कारण 'मिग' शब्द आणि 'चर्म' इत्यादी शब्द सामान्य अर्थाने वापरले जात असले, तरी लोकसंकेताने ते मर्यादित केल्यामुळे लोकांकडून गाय, हत्ती इत्यादींचे चामडे समजले जात नाही, तर केवळ हरणाचे चामडे इत्यादीच समजले जाते. कारण 'संकेतवचनं सच्चं, लोकसम्मुति कारणं' (संकेतवचन हे सत्य आहे आणि लोकसंकेत हे त्याचे कारण आहे) असे म्हटले आहे, हे लक्षात घ्यावे. คิเลสุ อนฺวิจฺฉายํ. ปุนปฺปุนํ อิจฺฉา อนฺวิจฺฉา. คิเลสติ. 'गिलेसु' धातू वारंवार इच्छा करण्याच्या (अनुइच्छा) अर्थात. वारंवार इच्छा करणे म्हणजे 'अन्विच्छा'. 'गिलेसति' (तो वारंवार इच्छा करतो). เยสุ ปยตเน. เยสติ. 'येसु' धातू प्रयत्नाच्या अर्थात. 'येसति' (तो प्रयत्न करतो). เชสุ เนสุ เอสุ เหสุ คติยํ. เชสติ. เนสติ. เอสติ. เหสติ. ธาตฺวนฺตสฺส ปน สญฺโญควเสน ‘‘เชสฺสติ, เนสฺสตี’’ติอาทีนิปิ คเหตพฺพานิ. เชสฺสมาโน. เชสฺสํ, เชสฺสนฺโต. เอตฺถ จ – 'जेसु', 'नेसु', 'एसु', 'हेसु' धातू गतीच्या (जाण्याच्या) अर्थात. 'जेसति', 'नेसति', 'एसति', 'हेसति'. धातूच्या शेवटी संयोगामुळे 'जेस्सति', 'नेस्सति' इत्यादी रूपेही घेतली पाहिजेत. 'जेस्समानो', 'जेस्सं', 'जेस्सन्तो'. आणि येथे - ‘‘ยถา อารญฺญกํ นาคํ, ทนฺตึ อนฺเวติ หตฺถินี; เชสฺสนฺตํ คิริทุคฺเคสุ, สเมสุ วิสเมสุ จา’’ติ “ज्याप्रमाणे हत्तीण अरण्यातील वश केलेल्या हत्तीच्या मागे जाते; जो डोंगराळ दुर्गम भागात, सम आणि विषम मार्गांवरून जात असतो.” ปาฬิ นิทสฺสนํ. हे पाळी भाषेतील उदाहरण आहे. เทสุ เหสุ อพฺยตฺตสทฺเท. เทสติ. เหสติ. 'देसु', 'हेसु' धातू अस्पष्ट आवाजाच्या (अव्यक्त शब्दाच्या) अर्थात. 'देसति', 'हेसति' (तो अस्पष्ट आवाज करतो). กาส สทฺทกุจฺฉายํ. กาสติ, อุกฺกาสติ. กาโส. กาสํ สาสํ ทรํ พลฺยํ, ขีณเมโธ นิคจฺฉติ. 'कास' धातू खोकण्याच्या किंवा आवाजाच्या अर्थात. 'कासति' (तो खोकतो), 'उक्कासति' (तो खाकरणारा/खोकणारा). 'कासो' (खोकला). 'कासं सासं दरं बल्यं, खीणमेधो निगच्छति' (ज्याची बुद्धी क्षीण झाली आहे, तो खोकला, श्वास लागणे, भीती आणि दुर्बलता प्राप्त करतो). กาสุ ภาสุ ทิตฺติยํ. ทิตฺตีติ ปากฏตา, วิราชนตา วา. กาสติ, ปกาสติ. ปกาสติ เตโช. ทูเร สนฺโต ปกาเสนฺติ. ภาสติ. ปภาสติ มิทํ พฺยมฺหํ. ปกาโส. กาสุ โอภาโส. 'कासु' आणि 'भासु' हे धातू दीप्ती (चमकणे/प्रकाशणे) या अर्थात आहेत. 'दीप्ती' म्हणजे प्रकटता किंवा शोभा (विराजमानता). 'कासति' (तो चमकतो), 'पकासति' (तो प्रकाशित होतो). 'पकासति तेजो' (तेज प्रकाशित होते). 'दूरे सन्तो पकासेन्ति' (सत्पुरुष दूरवरूनही प्रकाशित होतात). 'भासति' (तो चमकतो). 'पभासति मिदं ब्यम्हं' (हे विमान प्रकाशित होत आहे). 'पकासो' (प्रकाश). 'कासु' म्हणजे 'ओभासो' (अवभास/प्रकाश). ตตฺร [Pg.182] ปกาสตีติ ปกาโส, ปากโฏ โหตีติ อตฺโถ. ตุจฺฉภาเวน ปุญฺชภาเวน วา กาสติ ปกาสติ ปากฏา โหตีติ กาสุ. ‘‘กาสุ’’ อิติ อาวาโฏปิ วุจฺจติ ราสิปิ. तेथे 'पकासति' (प्रकाशित होतो) म्हणजे 'पकासो' (प्रकाश), प्रकट होतो असा अर्थ आहे. शून्यभावाने (तुच्छभावाने) किंवा पुंजभावाने (राशीच्या रूपाने) जे चमकते, प्रकाशित होते, प्रकट होते, त्याला 'कासु' म्हणतात. 'कासु' या शब्दाने खड्डा (आवाट) देखील म्हटला जातो आणि रास (पुंज) देखील म्हटली जाते. ‘‘กึนุ สนฺตรมาโนว, กาสุํ ขนสิ สารถิ; ปุฏฺโฐ เม สมฺม อกฺขาหิ, กึกาสุยา กริสฺสสี’’ติ "हे सारथी, तू एवढ्या घाईघाईने खड्डा (कासुं) का खणत आहेस? माझ्या विचारण्यावरून, हे मित्रा, मला नीट सांग, तू या खड्ड्याचे काय करणार आहेस?" เอตฺถ หิ อาวาโฏ กาสุ นาม. ‘‘องฺคารกาสุํ อปเร ผุณนฺติ, นรา รุทนฺตา ปริทฑฺฒคตฺตา’’ติ เอตฺถ ราสิ. การิเต – ปกาเสตีติ ปกาสโก. โอภาเสตีติ โอภาสโก. กมฺเม ปกาสิยตีติ ปกาสิโต. เอวํ ภาสิโต. ภาเว – กาสนา. สงฺกาสนา. ปกาสนา. ตุมนฺตาทิตฺเต ‘‘ปกาสิตุํ, ปกาเสตุํ, โอภาสิตุํ, โอภาเสตุํ. ปกาสิตฺวา, ปกาเสตฺวา, โอภาสิตฺวา, โอภาเสตฺวา’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. ตทฺธิเต ภาสุ เอตสฺส อตฺถีติ ภาสุโร, ปภสฺสโร โย โกจิ. ภาสุโรติ วา เกสรสีโห. อิมสฺมึ อตฺเถ ภาสุสทฺโท ‘‘ราช ทิตฺติย’’นฺติ เอตฺถ ราชสทฺโท วิย วิราชนวาจโก สิยา, ตสฺมา รูปสิริยา วิราชนสมฺปนฺนตาย ภาสุ วิราชนตา เอตสฺส อตฺถีติ ภาสุโรติ นิพฺพจนํ เญยฺยํ. येथे खड्ड्याला (आवाट) 'कासु' असे म्हटले आहे. "इतर लोक निखाऱ्यांच्या राशीवर (अङ्गारकासुं) पडतात, ते मनुष्य रडत असतात आणि त्यांचे शरीर होरपळलेले असते" - येथे 'कासु' म्हणजे रास (पुंज) आहे. प्रयोजक (कारित) मध्ये - 'पकासेति' (तो प्रकाशित करतो) म्हणून 'पकासको' (प्रकाशक). 'ओभासेति' (तो अवभासित करतो) म्हणून 'ओभासको' (अवभासक). कर्मणी प्रयोगात - 'पकासियति' (प्रकाशित केले जाते) म्हणून 'पकासितो' (प्रकाशित). याचप्रमाणे 'भासितो'. भाववाचकात - 'कासना' (प्रकटीकरण), 'सङ्कासना' (संकीर्तन/प्रकटीकरण), 'पकासना' (प्रकाशन). तुमुन् प्रत्यय इत्यादी लागल्यावर 'पकासितुं', 'पकासेतुं', 'ओभासितुं', 'ओभासेतुं' आणि क्त्वा प्रत्यय लागल्यावर 'पकासित्वा', 'पकासेत्वा', 'ओभासित्वा', 'ओभासेत्वा' अशी रूपे होतात. तद्धित प्रत्ययात - 'भासु' (दीप्ती) ज्याच्याजवळ आहे तो 'भासुरो' (तेजस्वी), किंवा जो कोणी 'पभस्सरो' (अतिशय चमकदार) आहे. किंवा 'भासुरो' म्हणजे आयाळ असलेला सिंह (केसरसिंह). या अर्थामध्ये 'भासु' हा शब्द, "राज दित्तियं" या सूत्रातील 'राज' शब्दाप्रमाणे शोभा (विराजन) वाचक असावा, म्हणून रूपसौंदर्याच्या शोभेने संपन्न असल्यामुळे 'भासु' (शोभा/विराजन) ज्याच्याजवळ आहे तो 'भासुरो' अशी व्युत्पत्ती जाणावी. นาสุ ราสุ สทฺเท. นาสติ. ราสติ. นาสา, นาสิกา. 'नासु' आणि 'रासु' हे धातू आवाजाच्या (शब्दाच्या) अर्थात आहेत. 'नासति' (तो आवाज करतो), 'रासति' (तो ओरडतो). 'नासा' (नाक/सोंड), 'नासिका' (नाक). ตตฺร นาสาติ หตฺถิโสณฺฑาปิ นาสาติ วุจฺจติ ‘‘สเจ มํ นาคนาสูรู, โอโลเกยฺย ปภาวตี’’ติอาทีสุ วิย. มนุสฺสาทีนํ นาสิกาปิ นาสาติ วุจฺจติ ‘‘โย เต หตฺเถ จ ปาเท จ, กณฺณนาสญฺจ เฉทยี’’ติอาทีสุ วิย. นาสนฺติ อพฺยตฺตสทฺทํ กโรนฺติ เอตายาติ นาสา. นาสา เอว นาสิกา. ยตฺถ นิพฺพจนํ น วทาม, ตตฺถ ตํ สุวิญฺเญยฺยตฺตา อปฺปสิทฺธตฺตา [Pg.183] วา น วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, อวุตฺตมฺปิ ปโยควิจกฺขเณหิ อุปปริกฺขิตฺวา โยเชตพฺพํ. อตฺริทํ วุจฺจติ – तेथे 'नासा' म्हणजे हत्तीची सोंड देखील म्हटली जाते, जसे की "जर हत्तीच्या सोंडेसारख्या मांड्या असणारी प्रभावती माझ्याकडे पाहेल..." इत्यादींमध्ये. मनुष्यांचे नाक देखील 'नासा' म्हटले जाते, जसे की "ज्याने तुझे हात, पाय आणि कान-नाक (कण्णनासं) कापले..." इत्यादींमध्ये. ज्याच्याद्वारे 'नासन्ति' म्हणजे अस्पष्ट आवाज करतात, ती 'नासा' (नाक). 'नासा' म्हणजेच 'नासिका'. जिथे आम्ही व्युत्पत्ती सांगत नाही, तिथे ती सहज समजण्यासारखी असल्यामुळे किंवा इतर कारणांमुळे सांगितलेली नाही असे समजावे; न सांगितलेले देखील प्रयोगात कुशल असणाऱ्यांनी नीट विचार करून योजावे. याविषयी असे म्हटले आहे - นาสา โสณฺฑา กโร หตฺโถ,หตฺถิทพฺเพ สมา มตา; นาสา จ นาสิกา จ ทฺเว,นราทีสุ สมา มตา’’ติ. "हत्तीच्या बाबतीत 'नासा', 'सोण्डा', 'करो' आणि 'हत्थो' हे शब्द समान अर्थाचे मानले गेले आहेत; आणि मनुष्यांच्या बाबतीत 'नासा' आणि 'नासिका' हे दोन्ही शब्द समान अर्थाचे मानले गेले आहेत." นส โกฏิลฺเล. นสติ. 'नस' हा धातू कुटिलतेच्या (वाकडेपणाच्या) अर्थात आहे. 'नसति' (तो वाकडा होतो). ภิสิ ภเย. ภึสติ. ภึสนโก. ตทาสิ ยํ ภึสนกํ. เภสฺมากาโย. 'भिसि' हा धातू भया च्या अर्थात आहे. 'भिंसति' (तो घाबरतो/भय निर्माण करतो). 'भिंसनको' (भयानक). 'तदासि यं भिंसनकं' (तेव्हा जे भयानक होते). 'भेस्माकायो' (भयानक शरीर असलेला). อาสิสิ อิจฺฉายํ. อาปุพฺโพ สิสิ อิจฺฉายํ วตฺตติ. อาสิสติ. อาสิสเตว ปุริโส. อาสิสนา. อาสิสตฺตํ. อาสิสนฺโต, อาสิสมาโน, อาสมาโน. ‘‘สุคฺคติมาสมานา’’ติ ปาฬิ เอตฺถ นิทสฺสนํ. 'आसिसि' हा धातू इच्छेच्या अर्थात आहे. 'आ' उपसर्गपूर्वक 'सिसि' धातू इच्छेच्या अर्थात वापरला जातो. 'आसिसति' (तो इच्छा करतो). 'आसिसतेव पुरिसो' (मनुष्य इच्छाच करतो). 'आसिसना' (इच्छा/आकांक्षा), 'आसिसत्तं' (इच्छुक असणे). 'आसिसन्तो', 'आसिसमानो', 'आसमानो' (इच्छा करणारा). "सुग्गतिमासमाना" (सुगतीची इच्छा करणारे) ही पालि येथील उदाहरण आहे. คสุ อทเน. คสติ. 'गसु' हा धातू खाण्याच्या (भक्षणाच्या) अर्थात आहे. 'गसति' (तो गिळतो/खातो). ฆุสี กนฺติกรเณ. อีการนฺโตยํ, เตน อิโต น นิคฺคหีตาคโม. ฆุสติ. 'घुसी' हा धातू कांती (शोभा/तेज) निर्माण करण्याच्या अर्थात आहे. हा ई-कारान्त धातू आहे, त्यामुळे याला अनुस्वार (निग्गहीत) आगम होत नाही. 'घुसति' (तो शोभून दिसतो). ปํสุ ภํสุ อวสํสเน. ปํสติ. ภํสติ. 'पंसु' आणि 'भंसु' हे धातू खाली पडण्याच्या (पतन होण्याच्या) अर्थात आहेत. 'पंसति' (तो खाली पडतो), 'भंसति' (तो घसरतो/पडतो). ธํสุ คติยํ. ธํสติ. รโช นุทฺธํสติ อุทฺธํ. 'धंसु' हा धातू गतीच्या अर्थात आहे. 'धंसति' (तो नष्ट होतो/जातो). 'रजो नुद्धंसति उद्धं' (धूळ वर उडत नाही). ปส วิตฺถาเร. ปสติ. ปสุ. 'पस' हा धातू विस्ताराच्या अर्थात आहे. 'पसति' (तो विस्तार करतो). 'पसु' (पशू - जो विस्तार करतो किंवा पसरतो). กุส อวฺหาเน โรทเน จ. โกสติ, ปกฺโกสติ. ปกฺโกสโก, ปกฺโกสิโต, ปกฺโกสนํ. 'कुस' हा धातू बोलावणे (आवाहन) आणि रडणे या अर्थात आहे. 'कोसति' (तो ओरडतो), 'पक्कोसति' (तो बोलावतो). 'पक्कोसको' (बोलावणारा), 'पक्कोसितो' (बोलावलेला), 'पक्कोसनं' (बोलावणे). กสฺส คติยํ. กสฺสติ, ปริกสฺสติ. ปฏิกสฺสติ. มูลาย ปฏิกสฺเสยฺย. ปฏิกสฺเสยฺยาติ อากฑฺเฒยฺย, มูลาปตฺติยํเยว ปติฏฺฐาเปยฺยาติ อตฺโถ. 'कस्स' हा धातू गतीच्या अर्थात आहे. 'कस्सति' (तो ओढतो/जातो), 'परिकस्सति' (तो चहूबाजूंनी ओढतो). 'पटिकस्सति' (तो मागे ओढतो). 'मूलाय पटिकस्सेय्य' (मूळ आपत्तीकडे मागे ओढावे). 'पटिकस्सेय्य' म्हणजे मागे ओढावे, मूळ आपत्तीमध्येच पुन्हा प्रस्थापित करावे असा अर्थ आहे. อส [Pg.184] ทิตฺยาทาเนสุ จ. จกาโร คติเปกฺขโก. อสติ. 'अस' हा धातू दीप्ती (चमकणे) आणि ग्रहण करणे (आदान) या अर्थात आहे. 'च' कार गतीची अपेक्षा ठेवणारा आहे. 'असति' (तो चमकतो/ग्रहण करतो/जातो). ทิส อาทานสํวรเณสุ. ทิสฺสติ ปุริโส. 'दिस' हा धातू ग्रहण करणे आणि झाकणे (संवरण) या अर्थात आहे. 'दिस्सति पुरिसो' (मनुष्य दिसतो/दिसून येतो). ทาสุ ทาเน. ทาสติ. 'दासु' हा धातू दानाच्या (देण्याच्या) अर्थात आहे. 'दासति' (तो देतो). โรส ภเย. โรสติ. โรสโก. 'रोस' हा धातू भया च्या अर्थात आहे. 'रोसति' (तो रागावतो/भयभीत करतो). 'रोसको' (क्रोधित करणारा/भयभीत करणारा). เภสุ จลเน. เภสติ. 'भेसु' हा धातू कंपनाच्या (हलण्याच्या) अर्थात आहे. 'भेसति' (तो कंप पावतो). ปส พาธนผสฺสเนสุ. ปสติ. ปาโส, นาคปาโส, หตฺถปาโส. 'पस' हा धातू बांधणे (बाधन) आणि स्पर्श करणे या अर्थात आहे. 'पसति' (तो बांधतो/स्पर्श करतो). 'पासो' (फास/पाश), 'नागपासो' (नागपाश), 'हत्थपासो' (हातभर अंतर/हस्तपाश). ลส กนฺติยํ. ลสติ, อภิลสติ, วิลสติ. ลาโส, วิลาโส, วิลสนํ. 'लस' हा धातू कांती (शोभा/इच्छा) या अर्थात आहे. 'लसति' (तो चमकतो/शोभतो), 'अभिलसति' (तो इच्छा करतो), 'विलसति' (तो विलास करतो). 'लासो' (नृत्य/विलास), 'विलासो' (विलास), 'विलसनं' (चमकणे/विलास करणे). จส ภกฺขเณ. จสติ. 'चस' हा धातू भक्षणाच्या (खाण्याच्या) अर्थात आहे. 'चसति' (तो खातो). กส หึสายํ. กสติ. 'कस' हा धातू हिंसेच्या अर्थात आहे. 'कसति' (तो हिंसा करतो/त्रास देतो). ติส ติตฺติยํ. ติตฺติ ตปฺปนํ ปริปุณฺณตา สุหิตตา. ติสติ. ติตฺติ. 'तिस' हा धातू तृप्तीच्या अर्थात आहे. 'तित्ती' म्हणजे तृप्ती, परिपूर्णता, सुहितता (पूर्ण समाधान). 'तिसति' (तो तृप्त होतो). 'तित्ती' (तृप्ती). วส นิวาเส. วสติ, วสิยติ, วจฺฉติ. วตฺถุ, วตฺถํ, ปริวาโส, นิวาโส, อาวาโส, อุปวาโส, อุโปสโถ, วิปฺปวาโส, จิรปฺปวาสี, จิรปฺปวุตฺโถ, วสิตฺวา, วตฺตุํ, วสิตุํ อิจฺจาทีนิ. 'वस' हा धातू निवासाच्या (राहण्याच्या) अर्थात आहे. 'वसति' (तो राहतो), 'वसियति' (राहिले जाते), 'वच्छति' (तो राहील). 'वत्थु' (वस्तू/वास्तू), 'वत्थं' (वस्त्र), 'परिवासो' (परिवस/प्रायश्चित्त काळ), 'निवासो' (निवास), 'आवासो' (आवास), 'उपवासो' (उपवास), 'उपोसथो' (उपोशथ), 'विप्पवासो' (प्रवास/दूर राहणे), 'चिरप्पवासी' (दीर्घकाळ प्रवासात असलेला), 'चिरप्पवुत्थो' (दीर्घकाळ राहिलेला), 'वसित्वा' (राहून), 'वत्तुं' (राहण्यासाठी), 'वसितुं' (राहण्यासाठी) इत्यादी रूपे होतात. อตฺร อุปวาโสติ อนฺเนน วชฺชิโต วาโส อุปวาโส. อุโปสโถติ อุปวสนฺติ เอตฺถาติ อุโปสโถ, อุปวสนฺติ สีเลน วา อนสเนน วา อุเปตา หุตฺวา วสนฺตีติ อตฺโถ. อยํ ปเนตฺถ อตฺถุทฺธาโร – ‘‘อายามาวุโส กปฺปิน อุโปสถํ คมิสฺสามา’’ติอาทีสุ ปาติโมกฺขุทฺเทโส [Pg.185] อุโปสโถ. ‘‘เอวํ อฏฺฐงฺคสมนฺนาคโต โข วิสาเข อุโปสโถ อุปวุตฺโถ’’ติอาทีสุ สีลํ. ‘‘สุทฺธสฺส เว สทา ผคฺคุ, สุทฺธสฺสุโปสโถ สทา’’ติอาทีสุ อุปวาโส. ‘‘อุโปสโถ นาม นาคราชา’’ติอาทีสุ ปญฺญตฺติ. ‘‘น ภิกฺขเว ตทหุโปสเถ สภิกฺขุกา อาวาสา’’ติอาทีสุ อุปวสิตพฺพทิวโสติ. येथे 'उपवासो' म्हणजे अन्नाचा त्याग करून राहणे हा उपवास होय. 'उपोसथो' म्हणजे ज्या दिवशी उपवास करतात तो उपोसथ; म्हणजेच शील किंवा उपवासाने युक्त होऊन राहतात असा अर्थ आहे. येथे हा अर्थ-संग्रह आहे - "या, आयुष्यमान कप्पिन, आपण उपोसथाला जाऊ या" इत्यादींमध्ये पातिमोक्खाचे पठण हा 'उपोसथ' आहे. "हे विशाखे, अशा प्रकारे आठ अंगांनी युक्त असलेला उपोसथ पाळला जातो" इत्यादींमध्ये शील हा 'उपोसथ' आहे. "शुद्ध माणसासाठी नेहमीच फाल्गुनी (पवित्र दिवस) असतो, शुद्ध माणसासाठी नेहमीच उपोसथ असतो" इत्यादींमध्ये उपवास हा 'उपोसथ' आहे. "उपोसथ नावाचा नागराज" इत्यादींमध्ये संज्ञा (नाव) हा 'उपोसथ' आहे. "हे भिक्खूंनो, त्या उपोसथाच्या दिवशी भिक्खूंनी युक्त नसलेले आवास..." इत्यादींमध्ये उपोसथ पाळण्याचा दिवस हा 'उपोसथ' आहे. วส กนฺติยํ. วจฺฉติ. ชินวจฺฉโย. 'वस' हा धातू कांती (शोभा/इच्छा) या अर्थात आहे. 'वच्छति' (तो इच्छा करतो/शोभतो). 'जिनवच्छयो' (जिनांची इच्छा/जिनांचे तेज). สส สุสเน. สสติ. สโส. 'सस' हा धातू झोपण्याच्या (शयन करण्याच्या) अर्थात आहे. 'ससति' (तो झोपतो). 'ससो' (ससा - जो झोपतो). สส ปาณเน. สสติ. สโตว อสฺสสติ, สโตว ปสฺสสติ. สโส, สสนํ. อสฺสาโส ปสฺสาโส อสฺสสนฺโต ปสฺสสนฺโต. 'सस' हा धातू प्राणापानाच्या (श्वासोच्छ्वासाच्या) अर्थात आहे. 'ससति' (तो श्वास घेतो). 'सतोव अस्ससति, सतोव पस्ससति' (स्मृतिमान राहूनच तो श्वास घेतो, स्मृतिमान राहूनच तो श्वास सोडतो). 'ससो' (श्वास), 'ससनं' (श्वास घेणे). 'अस्सासो' (श्वास घेणे/आश्वास), 'पस्सासो' (श्वास सोडणे/प्रश्वास), 'अस्ससन्तो' (श्वास घेणारा), 'पस्ससन्तो' (श्वास सोडणारा). อส ภุวิ. อตฺถิ. อส. 'अस' हा धातू असण्याच्या (अस्तित्वाच्या) अर्थात आहे. 'अत्थि' (आहे). 'अस' (असावे). เอตฺถ อตฺถีติ อาขฺยาตปทํ. น อตฺถิ ขีรา พฺราหฺมณี. อตฺถิตา, อตฺถิภาโว, ‘‘ยํ กิญฺจิ รตนํ อตฺถี’’ติอาทีสุ วิย นิปาตปทํ. ตสฺมา อตฺถีติ ปทํ อาขฺยาตนิปาตวเสน ทุวิธนฺติ เวทิตพฺพํ. อสอิติ อวิภตฺติกํ นามิกปทํ. เอตฺถ จ ‘‘อสสฺมีติ โหตี’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ตตฺถ อตฺถีติ อส, นิจฺจสฺเสตํ อธิวจนํ. อิมินา สสฺสตทิฏฺฐิ วุตฺตา. येथे 'अत्थि' हे क्रियापद (आख्यातपद) आहे. "ब्राह्मणीकडे दूध नाही (न अत्थि)" इत्यादींमध्ये. 'अत्थिता' (अस्तित्व), 'अत्थिभावो' (अस्तित्वभाव), "जे काही रत्न आहे (अत्थि)" इत्यादींमध्ये हे अव्यय (निपातपद) आहे. म्हणून 'अत्थि' हे पद क्रियापद आणि अव्यय अशा दोन प्रकारे आहे असे जाणावे. 'अस' हे विभक्ती नसलेले नामपद आहे. आणि येथे "अस्स्मीति होति" (मी आहे असे होते) ही पालि याचे उदाहरण आहे. तेथे 'अत्थि' म्हणजे 'अस' (अस्तित्व), हे नित्याचे (शाश्वताचे) नाव आहे. याद्वारे शाश्वतदृष्टी (सस्सतदिट्ठि) सांगितली आहे. ตตฺรายํ ปทมาลา – ‘‘อตฺถิ, สนฺติ. อสิ, อตฺถ. อสฺมิ, อสฺม, อมฺหิ, อมฺห’’ อิจฺเจตานิ ปสิทฺธานิ. ‘‘อตฺถุ, สนฺตุ. อาหิ, อตฺถ. อสฺมิ, อสฺม อมฺหิ, อมฺห’’ อิจฺเจตานิ จ, ‘‘สิยา, อสฺส, สิยุํ, อสฺสุ, สิยํสุ. อสฺส, อสฺสถ. สิยํ, อสฺส, อสฺสาม’’ อิจฺเจตานิ จ ปสิทฺธานิ. तेथे ही पदमाला (रूपांची मालिका) आहे - "अत्थि, सन्ति (आहे, आहेत). असि, अत्थ (तू आहेस, तुम्ही आहात). अस्मि, अस्म, अम्हि, अम्ह (मी आहे, आम्ही आहोत)" ही रूपे प्रसिद्ध आहेत. "अत्थु, सन्तु (असो, असोत). आहि, अत्थ (तू अस, तुम्ही असा). अस्मि, अस्म, अम्हि, अम्ह (मी असो, आम्ही असू)" ही रूपे आणि "सिया, अस्स, सियं, अस्सु, सियंसु. अस्स, अस्सथ. सियं, अस्स, अस्साम" ही रूपे प्रसिद्ध आहेत. เอตฺถ ปน ‘‘เตสญฺจ โข ภิกฺขเว สมคฺคานํ สมฺโมทมานานํ…เป… สิยํสุ ทฺเว ภิกฺขู อภิธมฺเม นานาวาทา’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ[Pg.186]. ตตฺถ สิยํสูติ ภเวยฺยุํ. อภิธมฺเมติ วิสิฏฺเฐ ธมฺเม. येथे "हे भिक्खूंनो, ते एकोप्याने आणि आनंदाने राहत असताना... (पे)... अभिधम्मामध्ये दोन भिक्खू भिन्न मत असणारे असू शकतील (सियंसु)" ही पालि याचे उदाहरण आहे. तेथे 'सियंसु' म्हणजे 'भवेय्युं' (असू शकतील). 'अभिधम्मे' म्हणजे विशिष्ट धम्मामध्ये (उत्कृष्ट धम्मामध्ये). อิทานิ สิยาสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร ปเภโท จ วุจฺจเต. สิยาติ เอกํเส จ วิกปฺปเน จ ‘‘ปถวีธาตุ สิยา อชฺฌตฺติกา, สิยา พาหิรา’’ติ เอกํเส. ‘‘สิยา อญฺญตรสฺส ภิกฺขุโน อาปตฺติวีติกฺกโม’’ติ วิกปฺปเน. आता 'सिया' शब्दाचा अर्थ-संग्रह आणि त्याचे भेद सांगितले जात आहेत. 'सिया' हा शब्द निश्चिततेच्या (एकांश) आणि विकल्पाच्या (संशय/पर्याय) अर्थात वापरला जातो. "पृथ्वीधातू ही अंतर्गत असू शकते (सिया), किंवा बाह्य असू शकते" - येथे निश्चिततेच्या अर्थात आहे. "कदाचित (सिया) एखाद्या भिक्खूकडून आपत्तीचे उल्लंघन होऊ शकते" - येथे विकल्पाच्या अर्थात आहे. สิยาติ เอกมารขฺยาตปทํ, เอกมพฺยยปทํ. อาขฺยาตตฺเต เอกวจนนฺตํ, อพฺยยตฺเต ยถาปาวจนํ. ‘‘ปุตฺตา มตฺถิ ธนา มตฺถี’’ติ เอตฺถ อตฺถีติ อพฺยยปทมิว เอกวจนนฺตมฺปิ พหุวจนนฺตมฺปิ ภวติ. ตสฺสาขฺยาตตฺเต ปโยโควิทิโตว. อพฺยยตฺเต ปน ‘‘สุขํ น สุขสหคตํ, สิยา ปีติสหคต’’นฺติ ‘‘อิเม ธมฺมา สิยา ปริตฺตารมฺมณา’’ติ จ เอกวจนพหุวจนปฺปโยคา เวทิตพฺพา. เอตฺถ ธาตุยา กิจฺจํ นตฺถิ. ปโรกฺขายํ ‘‘อิติห อส อิติห อสา’’ติ ทสฺสนโต อส อิติ ปทํ คเหตพฺพํ. หิยฺยตฺตนีรูปานิ อปฺปสิทฺธานิ. อชฺชตนิยา ปน ‘‘อาสิ, อาสึสุ, อาสุํ. อาสิ, อาสิตฺถ. อาสึ, อาสิมฺหา’’ อิจฺเจตานิ ปสิทฺธานิ. ภวิสฺสนฺติยา ‘‘ภวิสฺสติ, ภวิสฺสนฺติ’’ อิจฺจาทีนิ. กาลาติปตฺติยา ‘‘อภวิสฺสา, อภวิสฺสํสุ’’ อิจฺจาทีนิ ภวนฺติ. 'सिया' (siyā) हे एक आख्यातपद (क्रियापद) आणि एक अव्ययपद आहे. आख्यात रूपात ते एकवचनान्त असते, तर अव्यय रूपात ते वचनाच्या नियमांच्या पलीकडे (यथापावचन) असते. "पुत्ता मत्थि धना मत्थि" (पुत्र माझे आहेत, धन माझे आहे) येथे 'अत्थि' या अव्ययपदाप्रमाणे ते एकवचनान्त आणि बहुवचनान्त दोन्ही होते. त्याचे आख्यात रूप प्रयोगावरून ओळखले जाते. अव्यय रूपात मात्र "सुखं न सुखसहगतं, सिया पीतिसहगतं" (सुख हे सुखसहगत नाही, कदाचित ते प्रीतिसहगत असू शकते) आणि "इमे धम्मा सिया परित्तारम्मणा" (हे धर्म कदाचित परीत्तारम्मण असू शकतात) असे एकवचन आणि बहुवचनाचे प्रयोग जाणावेत. येथे धातूचे कार्य नाही. परोक्ष भूतकाळात "इतिह अस इतिह अस" या प्रयोगावरून 'अस' हे पद घ्यावे. ह्यस्तन भूतकाळाची (हिय्यत्तनी) रूपे दिली आहेत. अद्यतन भूतकाळात (अज्जतनी) मात्र "आसि, आसिंसु, आसुं. आसि, आसित्थ. आसिं, आसिम्हा" ही रूपे प्रसिद्ध आहेत. भविष्यकाळात "भविस्सति, भविस्सन्ति" इत्यादी रूपे होतात. कालातिपत्तीमध्ये "अभविस्सा, अभविस्सं सु" इत्यादी रूपे होतात. สาส อนุสิฏฺฐิยํ. สาสติ, อนุสาสติ. กมฺมนฺตํ โว สาสติ, สาสนํ, อนุสาสนํ, อนุสาสนี, อนุสิฏฺฐิ, สตฺถา, สตฺถํ, อนุสาสโก, อนุสาสิกา. 'सास' (sāsa) धातू अनुशिष्टीत (उपदेश/शासनात) वापरला जातो. सासति (तो उपदेश करतो), अनुसासति (तो अनुशास करतो). 'कम्मन्तं वो सासति' (तो तुमच्या कर्माचे नियमन करतो), सासनं (शासन/उपदेश), अनुसासनं (अनुशासन), अनुसासनी (अनुशासणी), अनुसिट्ठि (अनुशिष्टी), सत्था (शास्ता/गुरु), सत्थं (शास्त्र), अनुसासको (अनुशासक), अनुसासिका (अनुशासिका). ตตฺร สาสนนฺติ อธิสีลาทิสิกฺขตฺตยสงฺคหิตสาสนํ, ปริยตฺติปฏิปตฺติปฏิเวธสงฺขาตํ วา สาสนํ. ตญฺหิ สาสติ เอเตน, เอตฺถ วาติ ‘‘สาสน’’นฺติ ปวุจฺจติ. อปิจ สาสนนฺติ ‘‘รญฺโญ [Pg.187] สาสนํ เปเสตี’’ติอาทีสุ วิย ปาเปตพฺพวจนํ. ตถา สาสนนฺติ โอวาโท, โย ‘‘อนุสาสนี’’ติ จ, ‘‘อนุสิฏฺฐี’’ติ จ วุจฺจติ. สตฺถาติ ติวิธยานมุเขน สเทวกํ โลกํ สาสตีติ สตฺถา, ทิฏฺฐธมฺมิกสมฺปรายิกปรมตฺเถหิ ยถารหํ สตฺเต อนุสาสตีติ อตฺโถ. สตฺถนฺติ สทฺเท จ อตฺเถ จ สาสติ อาจิกฺขติ เอเตนาติ สตฺถํ. กึตํ? พฺยากรณํ. त्यात 'सासनं' (शासन) म्हणजे अधिशील इत्यादी तीन शिक्षांनी (त्रिशिक्षा) युक्त असलेले शासन, किंवा परियत्ति (अभ्यास), पटिपत्ति (आचरण) आणि पटिवेध (साक्षात्कार) या रूपाने ओळखले जाणारे शासन होय. ज्याच्याद्वारे किंवा ज्यामध्ये उपदेश केला जातो, त्याला 'सासनं' असे म्हटले जाते. शिवाय, 'सासनं' म्हणजे "राजाचा संदेश पाठवतो" इत्यादी वाक्यांप्रमाणे पोहोचवायचा संदेश (निरोप) असाही अर्थ होतो. तसेच 'सासनं' म्हणजे ओवाद (उपदेश), ज्याला 'अनुसासनी' आणि 'अनुसिट्ठि' असेही म्हणतात. 'सत्था' (शास्ता) म्हणजे त्रिविध यानांच्या (मार्गांच्या) माध्यमातून देवलोकासह संपूर्ण जगाला उपदेश करणारे ते 'शास्ता' होत; ते इहलोक, परलोक आणि परमार्थ या दृष्टीने प्राण्यांना योग्य तो उपदेश करतात, असा अर्थ आहे. 'सत्थं' (शास्त्र) म्हणजे ज्याच्याद्वारे शब्द आणि अर्थ यांचे नियमन केले जाते किंवा सांगितले जाते ते शास्त्र होय. ते काय आहे? व्याकरण. อีส อิสฺสริเย. อิสฺสริยํ อิสฺสรภาโว. อีสติ. วงฺคีโส, ชนปเทโส, มนุเชโส. 'ईस' (īsa) धातू ऐश्वर्यात (प्रभुत्वात) वापरला जातो. इस्सरियं म्हणजे ईश्वरभाव (प्रभुत्व). ईसति (तो प्रभुत्व गाजवतो). वङ्गीसो (वंगीश), जनपदेसो (जनपदेश), मनुजेसो (मनुजेश). ตตฺร วงฺคีโสติ วาจาย อีโส อิสฺสโรติ วงฺคีโส. โก โส? อายสฺมา วงฺคีโส อรหา. อาห จ สยเมว – त्यात 'वङ्गीसो' म्हणजे जो वाचेचा ईश (स्वामी) किंवा प्रभू आहे तो वंगीश होय. तो कोण आहे? आयुष्यमान वंगीश अरहंत. त्यांनी स्वतःच म्हटले आहे – ‘‘วงฺเค ชาโตติ วงฺคีโส, วจเน อิสฺสโรติ จ; ‘วงฺคีโส’ อิติ เม นามํ, อภวี โลกสมฺมต’’นฺติ; "वंग देशात जन्मल्यामुळे 'वंगीश' आणि वचनाचा स्वामी असल्यामुळे 'वंगीश'; 'वंगीश' हे माझे नाव जगात संमत (प्रसिद्ध) झाले." อาส อุปเวสเน. อุปเวสนํ นิสีทนํ ‘‘อาสเน อุปวิฏฺโฐ สงฺโฆ’’ติ เอตฺถ วิย. อาสติ. อจฺฉติ. อาสีโน. อาสนํ. อุปาสติ. อุปาสโก. 'आस' (āsa) धातू उपवेशनात (बसण्यात) वापरला जातो. उपवेशन म्हणजे बसणे, जसे की "आसनावर संघ बसला आहे" यामध्ये. आसति (तो बसतो). अच्छति (तो बसतो). आसीनो (बसलेला). आसनं (आसन). उपासति (तो उपासना करतो/जवळ बसतो). उपासको (उपासक). ตตฺถ อาสนนฺติ อาสติ นิสีทติ เอตฺถาติ อาสนํ, ยํ กิญฺจิ นิสีทนโยคฺคํ มญฺจปีฐาทิ. त्यात 'आसनं' म्हणजे ज्याच्यावर बसले जाते ते आसन, जसे की मंचक (खाट), पीठ (पाट) इत्यादी बसण्यास योग्य असलेली कोणतीही वस्तू. กสี คติโสสเนสุ. อีการนฺโตยํ ธาตุ, เตนิโต น นิคฺคหีตาคโม. กสติ. 'कसी' (kasī) धातू गती आणि शोषणात (सुकवण्यात) वापरला जातो. हा ईकारान्त धातू आहे, त्यामुळे यापासून निग्गहीत (अनुस्वार) चा आगम होत नाही. कसति (तो नांगरतो/कर्षण करतो). นิสี จุมฺพเน. นิสติ. 'निसी' (nisī) धातू चुंबनात वापरला जातो. निसति (तो चुंबन घेतो). ทิสี อปฺปีติยํ. ธมฺมํ เทสฺสติ. ทิโส. ทิฏฺโฐ. เทสฺสี. เทสฺโส. เทสฺสิโย. 'दिसी' (disī) धातू अप्रीतीत (द्वेषात) वापरला जातो. धम्मं देस्सति (तो धर्माचा द्वेष करतो). दिसो (शत्रू), दिट्ठो (शत्रू), देस्सी (द्वेष करणारा), देस्सो (द्वेषपात्र), देस्सियो (द्वेषपात्र). ตตฺร ทิโสติ จ ทิฏฺโฐติ จ ปจฺจามิตฺตสฺสาธิวจนเมตํ. โส หิ ปเร เทสฺสติ นปฺปิยายติ, ปเรหิ วา เทสฺสิยติ ปิโย [Pg.188] น กริยตีติ ‘‘ทิโส’’ติ จ ‘‘ทิฏฺโฐ’’ติ จ วุจฺจติ. อถ วา ทิโสติ โจโร วาปจฺจามิตฺโต วา. ทิฏฺโฐติ ปจฺจามิตฺโตเยว. อตฺริเม ปโยคา – त्यात 'दिसो' आणि 'दिट्ठो' हे वैऱ्याचे (शत्रूचे) समानार्थी शब्द आहेत. कारण तो इतरांचा द्वेष करतो, त्यांच्यावर प्रेम करत नाही, किंवा इतरांद्वारे त्याचा द्वेष केला जातो, त्याला प्रिय मानले जात नाही, म्हणून त्याला "दिसो" आणि "दिट्ठो" असे म्हटले जाते. अथवा 'दिसो' म्हणजे चोर किंवा शत्रू. 'दिट्ठो' म्हणजे केवळ शत्रूच. या संदर्भात हे प्रयोग आहेत – ‘‘ทิโส ทิสํ ยํ ตํ กยิรา, เวรี วา ปน เวรินํ; มิจฺฉาปณิหิตํ จิตฺตํ, ปาปิโย นํ ตโต กเร’’ติ จ. "शत्रू शत्रूचे जे काही अहित करील, किंवा वैरी वैऱ्याचे जे काही अहित करील; चुकीच्या मार्गावर लावलेले मन माणसाचे त्याहूनही अधिक वाईट (नुकसान) करते." ‘‘ทิสา หิ เม ธมฺมกถํ สุณนฺตู’’ติ จ, ‘‘ทิสา หิ เม เต มนุสฺเส ภชนฺตุ เย ธมฺมเมวาทปยนฺติ สนฺโต’’ติ จ, "माझे शत्रू माझी धम्मकथा ऐकोत" आणि "माझे शत्रू त्या माणसांची संगत करोत जे संत पुरुष केवळ धम्माचाच उपदेश करतात." ‘‘ยสฺเสเต จตุโร ธมฺมา, วานรินฺท ยถา ตว; สจฺจํ ธมฺโม ธิติ จาโค, ทิฏฺฐํ โส อติวตฺตตี’’ติ จ. "हे वानरेंद्रा! ज्याच्याकडे तुझ्यासारखे हे चार धर्म (गुण) आहेत – सत्य, धम्म (कर्तव्य), धृती (धैर्य) आणि त्याग, तो शत्रूला पार करून जातो (त्याच्यावर मात करतो)." เทสฺสีติ เทสฺสนสีโล อปฺปิยายนสีโลติ เทสฺสี. ‘‘ธมฺมกาโม ภวํ โหติ, ธมฺมเทสฺสี ปราภโว’’ติ อิทเมตฺถ ปโยคนิทสฺสนํ. เทสฺโสติ อปฺปิโย, ตถา เทสฺสิโยติ. เอตฺถ จ – 'देस्सी' म्हणजे द्वेष करण्याचा स्वभाव असलेला, अप्रीती बाळगणारा तो देस्सी. "धम्माची इच्छा करणारा प्रगती करतो, धम्माचा द्वेष करणारा अधोगतीला (पराभवाला) जातो" हे येथे प्रयोगाचे उदाहरण आहे. 'देस्सो' म्हणजे अप्रिय, तसेच 'देस्सियो' म्हणजेही अप्रिय. आणि येथे – ‘‘น เม เทสฺสา อุโภ ปุตฺตา, มทฺทีเทวี น เทสฺสิยา; สพฺพญฺญุตํ ปิยํ มยฺหํ, ตสฺมา ปิเย อทาสห’’นฺติ จ, "मला माझे दोन्ही पुत्र अप्रिय नाहीत, मद्दीदेवीही अप्रिय नाही; मला सर्वज्ञता (बुद्धत्व) प्रिय आहे, म्हणूनच मी माझ्या प्रियांना दान दिले." ‘‘น เม สา พฺราหฺมณี เทสฺสา, นปิ เม พลํ น วิชฺชตี’’ติ จ, "ती ब्राह्मणी मला अप्रिय नाही, आणि माझ्याकडे बळ नाही असेही नाही." ‘‘มาตา ปิตา น เม เทสฺสา, นปิ เทสฺสํ มหายสํ; สพฺพญฺญุตํ ปิยํ มยฺหํ, ตสฺมา วตมธิฏฺฐหิ’’นฺติ จ "मला माता-पिता अप्रिय नाहीत, आणि हे महान यशही अप्रिय नाही; मला सर्वज्ञता प्रिय आहे, म्हणूनच मी या व्रताचे अधिष्ठान केले." ปโยคา. สพฺพตฺถ เมติ จ มยฺหนฺติ จ สามิวจนํ ทฏฺฐพฺพํ. हे प्रयोग आहेत. सर्व ठिकाणी 'मे' आणि 'मय्हं' हे षष्ठी विभक्तीचे (संबंधवाचक) शब्द समजावेत. อิมานิ ปน ปจฺจามิตฺตสฺส นามานิ – आता ही वैऱ्याची (शत्रूची) नावे आहेत – ‘‘ปจฺจมิตฺโต ริปุ ทิฏฺโฐ, ทิโส เวรี จ สตฺว’ริ; อมิตฺโต จ สปตฺโต จ, เอวํ ปณฺณตฺติการิสู’’ติ. "पच्चमित्तो (प्रत्यमित्र), रिपु, दिट्ठो, दिसो, वेरी, सत्तू, अरी, अमित्तो आणि सपत्तो; संज्ञा निर्माण करणाऱ्या ग्रंथांमध्ये ही शत्रूची नावे दिली आहेत." เอสุ คติยํ. เอสติ. 'एसु' (esu) धातू गतीत वापरला जातो. एसति (तो शोधतो/जातो). ภสฺส [Pg.189] ภสฺสนทิตฺตีสุ. ภสฺสนํ วจนํ. ทิตฺติ โสภา. ภสฺสติ. ภสฺสํ, ปภสฺสรํ. 'भस्स' (bhassa) धातू भाषणात (बोलण्यात) आणि दीप्तीत (शोभेत) वापरला जातो. भाषण म्हणजे वचन (बोलणे). दीप्ती म्हणजे शोभा. भस्सति (तो बोलतो/शोभतो). भस्सं (भाषण), पभस्सरं (प्रभास्वर/अतिशय तेजस्वी). ธิส สทฺเท. ธิสติ. 'धिस' (dhisa) धातू शब्दात (आवाजात) वापरला जातो. धिसति (तो शब्द करतो). ทิส อติสชฺชเน. ทิสติ, อุปทิสติ, สนฺทิสติ, นิทฺทิสติ, ปจฺจาทิสติ, ปฏิสนฺทิสติ, อุทฺทิสติ. เทโส, อุทฺเทโส อิจฺจาทีนิ. 'दिस' (disa) धातू अतिसर्जनात (दानात/निर्देशात) वापरला जातो. दिसति (तो निर्देश करतो), उपदिसति (तो उपदेश करतो), संदिसति (तो संदेश देतो), निद्दिसति (तो निर्देश करतो), पच्चादिसति (तो नाकारतो), पटिसन्दिसति (तो प्रति-निर्देश करतो), उद्दिसति (तो उद्देश करतो). देसो (देश/प्रदेश), उद्देसो (उद्देश/पाठ) इत्यादी. ปิสุ อวยเว. ปิสติ. 'पिस' (pisu) धातू अवयवात (तुकडे करण्यात/पिष्ट करण्यात) वापरला जातो. पिसति (तो वाटतो/पिष्ट करतो). อิสิ คติยํ. อิสติ. 'इसि' (isi) धातू गतीत वापरला जातो. इसति (तो जातो). ผุส สมฺผสฺเส. ผุสติ. ผสฺโส, ผุสนา, สมฺผุสนา, สมฺผุสิตตฺตํ. เอวรูโป กายสมฺผสฺโส อโหสิ. โผฏฺฐพฺพํ, ผุสิตํ. เทโว จ เอกเมกํ ผุสายติ. ผุฏฺฐุํ, ผุสิตุํ, ผุสิตฺวา, ผุสิตฺวาน, ผุสิย, ผุสิยาน. ผุสฺส ผุสฺส พฺยนฺตึ กโรติ. 'फुस' (phusa) धातू संस्पर्शात (स्पर्शात) वापरला जातो. फुसति (तो स्पर्श करतो). फस्सो (स्पर्श), फुसना (स्पर्श करणे), संफुसना (सम्यक् स्पर्श करणे), संफुसितत्तं (स्पर्श झालेली अवस्था). "अशा प्रकारचा कायसंस्पर्श (शारीरिक स्पर्श) झाला." फोट्ठब्बं (स्पर्शविषय), फुसितं (स्पर्श केलेले). "देव (पाऊस) एकेक थेंब स्पर्श करतो (पडतो)." फुट्टुं, फुसितुं (स्पर्श करण्यासाठी), फुसित्वा, फुसित्वाना, phusiya, phusiyāna (स्पर्श करून). "स्पर्श करून करून तो नष्ट करतो." ตตฺร ผสฺโสติ อารมฺมณํ ผุสนฺติ เอเตน, สยํ วา ผุสติ, ผุสนมตฺตเมว วา เอตนฺติ ผสฺโส, อารมฺมเณ ผุสนลกฺขโณ ธมฺโม. त्यात 'फस्सो' (स्पर्श) म्हणजे ज्याच्याद्वारे आलंबनाला (विषयाला) स्पर्श केला जातो, किंवा जे स्वतः स्पर्श करते, किंवा जे केवळ स्पर्श करणे मात्र आहे तो 'स्पर्श' होय; आलंबनाला स्पर्श करणे हे लक्षण असलेला हा एक धर्म (मानसिक घटक) आहे. รุส ริส หึสายํ. โรสติ. ริสติ. ปุริโส. 'रुस' (rusa) आणि 'रिस' (risa) धातू हिंसेत वापरले जातात. रोसति (तो रागवतो/हिंसा करतो). रिसति (तो इजा करतो). पुरिसो (पुरुष). เอตฺถ จ ‘‘ปุํ วุจฺจติ นิรโย, ตํ ริสตีติ ปุริโส’’ติ อาจริยา วทนฺติ. आणि येथे आचार्य म्हणतात की, "'पुं' म्हणजे नरक, जो त्यात जातो (किंवा ज्याची तिथे हिंसा होते) तो 'पुरिसो' (पुरुष) होय." ริส คติยํ. เรสติ. 'रिस' (risa) धातू गतीत वापरला जातो. रेसति (तो आवाज करतो/जातो). วิส ปเวสเน. วิสติ, ปวิสติ. ปเวโส, ปเวสนํ, นิเวสนํ, ปวิสํ. เอตฺถ นิเวสนํ วุจฺจติ เคหํ. 'वीस' (visa) धातू प्रवेशात वापरला जातो. विसति, पविसति (तो प्रवेश करतो). पवेसो (प्रवेश), पवेसनं (प्रवेश करणे), निवेसनं (निवास/घर), पविसं (प्रवेश करणारा). येथे 'निवेसनं' म्हणजे घर असे म्हटले जाते. มส อามสเน. มสติ, อามสติ, ปรามสติ. ปรามาโส, ปรามสนํ. 'मस' (masa) धातू आमर्शनात (स्पर्शात/पकडण्यात) वापरला जातो. मसति, आमसति (तो स्पर्श करतो), परामसति (तो चुकीच्या पद्धतीने ग्रहण करतो). परामानो (परामर्श/आसक्ती), परामसनं (स्पर्श करणे/पकडणे). เอตฺถ [Pg.190] ปรามาโสติ ปรโต อามสตีติ ปรามาโส, อนิจฺจาทิธมฺเม นิจฺจาทิวเสน คณฺหาตีติ อตฺโถ. ‘‘ปรามาโส มิจฺฉาทิฏฺฐิ กุมฺมคฺโค มิจฺฉาปโถ’’ติอาทีนิ พหูนิ เววจนปทานิ อภิธมฺมโต คเหตพฺพานิ. येथे 'पaramāso' (परामर्श) म्हणजे जो विपरीतपणे ग्रहण करतो तो परामर्श होय; अनित्य इत्यादी धर्मांना नित्य इत्यादी रूपाने ग्रहण करणे असा याचा अर्थ आहे. "परामर्श म्हणजे मिथ्यादृष्टी, कुमार्ग, मिथ्यापथ" इत्यादी अनेक समानार्थी शब्द अभिधम्मातून घ्यावेत. อิสุ อิจฺฉายํ. อิจฺฉติ, สมฺปฏิจฺฉติ. สมฺปฏิจฺฉนํ, อิจฺฉา, อภิจฺฉา, อิจฺฉํ, อิจฺฉมาโน. 'इसु' (isu) धातू इच्छेत वापरला जातो. इच्छति (तो इच्छा करतो), संपटिच्छति (तो स्वीकार करतो). संपटिच्छनं (स्वीकार करणे), इच्छा (इच्छा), अभिच्छा (तीव्र इच्छा), इच्छं (इच्छा करणारा), इच्छमानो (इच्छा बाळगणारा). เวสุ ทาเน. เวจฺฉติ, ปเวจฺฉติ, ปเวจฺเฉติ. ปเวจฺฉํ, ปเวจฺฉนฺโต. 'वेसु' (vesu) धातू दानात वापरला जातो. वेच्छति, पवेच्छति, पवेच्छेति (तो दान देतो). पवेच्छं (दान देणारा), पवेच्छन्तो (दान देत असताना). นิส พทฺธายํ. พทฺธาติ วินิพทฺโธ, อหงฺการสฺเสตํ อธิวจนํ. นิสติ. 'निस' (nisa) धातू बंधनात (बद्धतेत) वापरला जातो. 'बद्धा' म्हणजे विनिबद्ध (गुंतलेला), हा अहंकाराचाच एक समानार्थी शब्द आहे. निसति (तो बांधतो/बद्ध होतो). ชุสิ ปีติเสวเนสุ. โชสติ. 'जुसि' (jusi) धातू प्रीती (आनंद) आणि सेवन करणे या अर्थात वापरला जातो. जोसति. อิส ปริเยสเน. เอสติ. อิสิ, อิฏฺฐํ, อนิฏฺฐํ, เอสํ, เอสมาโน. ‘इस्’ (धातू) शोधण्याच्या अर्थात आहे. ‘एसति’ (शोधतो). ‘इसि’ (ऋषी), ‘इट्ठं’ (इष्ट), ‘अनिट्ठं’ (अनिष्ट), ‘एसं’ (शोधणारा), ‘एसमानो’ (शोधत असलेला). สํกเส อจฺฉเน. อจฺฉนํ นิสีทนํ. สงฺกสายติ. ‘संकस्’ (धातू) बसण्याच्या अर्थात आहे. ‘अच्छनं’ म्हणजे बसणे (निसीदनं). ‘संकसायति’. สการนฺตธาตุรูปานิ. ‘स’ कारान्त धातूंची रूपे. หการนฺตธาตุ ‘ह’ कारान्त धातू. หา จาเค. ชหติ, วิชหติ. วิชหนํ, ชหิตุํ, ชหาตเว, ชหิตฺวา, ชหาย. ‘हा’ (धातू) त्यागाच्या अर्थात आहे. ‘जहति’, ‘विजहति’ (त्यागतो). ‘विजहनं’ (त्याग करणे), ‘जहितुं’ (त्याग करण्यासाठी), ‘जहातवे’ (त्याग करण्यासाठी), ‘जहित्वा’ (त्याग करून), ‘जहाय’ (त्याग करून). มฺหี อีสํหสเน. มฺหยเต, อุมฺหยเต วิมฺหยเต. ‘म्ही’ (धातू) मंद हास्य करण्याच्या अर्थात आहे. ‘म्हयते’, ‘उम्हयते’, ‘विम्हयते’. ตตฺถ มฺหยเตติ สิตํ กโรติ. อุมฺหยเตติ ปหฏฺฐาการํ ทสฺเสติ. วิมฺหยเตติ วิมฺหยนํ กโรติ. ตตฺรายํ ปาฬิ ‘‘น นํ อุมฺหยเต ทิสฺวา. เปกฺขิเตน มฺหิเตน จ. มฺหิตปุพฺพํว [Pg.191] ภาสติ. ยทา อุมฺหยมานา มํ, ราชปุตฺตี อุทิกฺขติ. อุมฺหาเปยฺย ปภาวตี. ปมฺหาเปยฺย ปภาวตี’’ติ. तेथे ‘म्हयते’ म्हणजे मंद हास्य करतो. ‘उम्हयते’ म्हणजे प्रसन्नतेचा भाव दर्शवतो. ‘विम्हयते’ म्हणजे आश्चर्य व्यक्त करतो. त्याविषयी ही पाळी (पाठांतर) आहे: “तिला पाहून तो हसत नाही, केवळ दृष्टीने आणि मंद हास्याने. तो पूर्वी हसल्यासारखाच बोलतो. जेव्हा ती राजपुत्री माझ्याकडे प्रसन्नतेने पाहत असे, तेव्हा प्रभावती मला हसवायची (उम्हापेय्य), प्रभावती मला अत्यंत आनंदित करायची (पम्हापेय्य).” ตตฺถ อุมฺหยมานาติ ปหฏฺฐาการํ ทสฺเสตฺวา หสมานา. อุมฺหาเปยฺยาติ สิตวเสน ปหํเสยฺย. ปมฺหาเปยฺยาติ มหาหสิตวเสน ปริหาเสยฺย. तेथे ‘उम्हयमाना’ म्हणजे प्रसन्नतेचा भाव दर्शवून हसणारी. ‘उम्हापेय्य’ म्हणजे मंद हास्याने आनंदित करणारी. ‘पम्हापेय्य’ म्हणजे मोठ्या हास्याने परिहास करणारी. หุ ทาเน. หวติ. หุติ. ‘हु’ (धातू) दानाच्या अर्थात आहे. ‘हवति’. ‘हुति’. หุ ปสชฺชกรเณ. ปสชฺชกรณํ ปกาเรน สชฺชนกฺริยา. หวติ. หุโต, หุตวา, หุตาวี, อาหุติ. ‘हु’ (धातू) सज्ज करण्याच्या अर्थात आहे. ‘पसज्जकरण’ म्हणजे विशेष प्रकारे सज्ज करण्याची क्रिया. ‘हवति’. ‘हुतो’, ‘हुतवा’, ‘हुतावी’, ‘आहुति’. หู สตฺตายํ. โหติ, โหนฺติ. โหสิ, โหถ. โหมิ, โหม. ปโหติ, ปโหนฺติ. ปหูตํ, ปหูตา, กุโต ปหูตา กลหา วิวาทา. โหนฺโต, โหนฺตา, โหนฺตํ, ปโหนฺโต. ปจฺฉาสมเณน โหตพฺพํ. โหตุํ โหตุเย, ปโหตุํ, หุตฺวาน. วตฺตมานาวิภตฺติรูปาทีนิ. เอตฺถ ปสิทฺธรูปาเนว คหิตานิ. ‘हू’ (धातू) अस्तित्वाच्या अर्थात आहे. ‘होति’, ‘होन्ति’. ‘होसि’, ‘होथ’. ‘होमि’, ‘होम’. ‘पहोति’, ‘पहोन्ति’. ‘पहूतं’, ‘पहूता’ (उदा. ‘कुतो पहूता कलहा विवादा’ - कलह आणि विवाद कोठून उत्पन्न होतात?). ‘होन्तो’, ‘होन्ता’, ‘होन्तं’, ‘पहोन्तो’. ‘पच्छासमणेन होतब्बं’ (मागे चालणाऱ्या श्रमणाने असावे). ‘होतुं’, ‘होतुये’, ‘पहोतुं’, ‘हुत्वान’. ही वर्तमानकाळाच्या विभक्तीची रूपे इत्यादी आहेत. येथे केवळ प्रसिद्ध रूपेच घेतली आहेत. โหตุ, โหนฺตุ. โหสิ, โหถ. โหมิ, โหม. ปญฺจมีวิภตฺติรูปานิ. เอตฺถาปิ ปสิทฺธรูปาเนว คหิตานิ. ‘होतु’, ‘होन्तु’. ‘होसि’, ‘होथ’. ‘होमि’, ‘होम’. ही पंचमी विभक्तीची (आज्ञार्थ) रूपे आहेत. येथेही केवळ प्रसिद्ध रूपेच घेतली आहेत. หุเวยฺย, หุเวยฺยุํ. หุเวยฺยาสิ, หุเวยฺยาถ. หุเวยฺยามิ, หุเวยฺยาม. หุเวถ, หุเวรํ. หุเวโถ, หุเวยฺยาวฺโห. หุเวยฺยํ, หุเวยฺยามฺเห. สตฺตมิยา รูปานิ. เอตฺถ ปน ‘‘อุปโก อาชีวโก ‘หุเวยฺย ปาวุโส’ติ วตฺวา สีสํ โอกมฺเปตฺวา อุมฺมคฺคํ คเหตฺวา ปกฺกมี’’ติ ปาฬิยํ หุเวยฺยาติ ปทสฺส ทสฺสนโต นยวเสน ‘หุเวยฺย, หุเวยฺยุ’’นฺติอาทีนิ วุตฺตานิ. หุเปยฺยาติปิ ปาโฐ ทิสฺสติ, ยถา ปจฺจเปกฺขณา. ตพฺพเสน ‘‘หุเปยฺย, หุเปยฺยุํ[Pg.192]. หุเปยฺยาสี’’ติอาทินา วการสฺส ปการาเทสภูตานิ รูปานิปิ คเหตพฺพานิ. ‘हुवेय्य’, ‘हुवेय्युं’. ‘हुवेय्यासि’, ‘हुवेय्याथ’. ‘हुवेय्यामि’, ‘हुवेय्यामा’. ‘हुवेथ’, ‘हुवेरं’. ‘हुवेथो’, ‘हुवेय्याव्हो’. ‘हुवेय्यं’, ‘हुवेय्याम्हे’. ही सप्तमी विभक्तीची (विध्यर्थ) रूपे आहेत. येथे पाळीमध्ये “उपको आजीवको ‘हुवेय्य पावुसो’ti वत्वा सीसं ओकम्पेत्वा उम्मग्गं गहेत्वा पक्कमी” (उपका आजीवकाने ‘असे असू शकते, आवुसो’ असे म्हणून, डोके हलवून, दुसरा मार्ग धरून निघून गेला) या प्रयोगावरून ‘हुवेय्य, huveyyuं’ इत्यादी रूपे सांगितली आहेत. ‘हुपेय्य’ असाही पाठ आढळतो, जसे ‘पच्चवेक्खणा’ मध्ये. त्यानुसार ‘व’ काराचा ‘प’ कार आदेश होऊन ‘हुपेय्य’, ‘हुपेय्युं’, ‘हुपेय्यासि’ इत्यादी रूपेही ग्रहण करावीत. อปโร นโย – เหยฺย, เหยฺยุํ. เหยฺยาสิ, เหยฺยาถ. เหยฺยามิ, เหยฺยาม. เหถ, เหรํ. เหโถ, เหยฺยาวฺโห. เหยฺยํ, เหยฺยามฺเห. อิมานิ อฏฺฐกถานเยน คหิตรูปานิ. เอตฺถ ปน ‘‘น จ อุปฺปาโท โหติ. สเจ เหยฺย, อุปฺปาทสฺสาปิ อุปฺปาโท ปาปุเณยฺยา’’ติ อิทมฺปิ นิทสฺสนํ ทฏฺฐพฺพํ. दुसरा प्रकार – ‘हेय्य’, ‘हेय्युं’. ‘हेय्यासि’, ‘हेय्याथ’. ‘हेय्यामि’, ‘हेय्यामा’. ‘हेथ’, ‘हेरं’. ‘हेथो’, ‘हेय्याव्हो’. ‘हेय्यं’, ‘हेय्याम्हे’. ही अट्टकथा पद्धतीनुसार घेतलेली रूपे आहेत. येथे “न च उप्पादो होति. सचे हेय्य, उप्पादस्सापि उप्पादो पापुणेय्या” (आणि उत्पत्ती होत नाही. जर ती असती, तर उत्पत्तीचीही उत्पत्ती झाली असती) हे उदाहरणही पाहावे. หุว, หุวุ. หุเว, หุวิตฺถ. หุวํ, หุวิมฺห. หุวิตฺถ, โหถ อิจฺจปิ สญฺโญคตการโลเปน อโหสีติ อตฺโถ. ตถาหิ ‘‘กสิรา ชีวิกา โหถา’’ติ ปทสฺสตฺถํ วณฺเณนฺเตหิ ‘‘ทุกฺขา โน ชีวิกา อโหสี’’ติ อตฺโถ วุตฺโต. หุวิเร. หุวิตฺโถ, หุวิวฺโห. หุวึ, หุวิมฺเห. ปโรกฺขาย รูปานิ. ‘हुव’, ‘हुवु’. ‘हुवे’, ‘हुवित्थ’. ‘हुवं’, ‘हुविम्ह’. ‘हुवित्थ’, ‘होथ’ इत्यादींमध्ये संयोग त-काराचा लोप होऊन ‘अहोसि’ (झाला) असा अर्थ होतो. जसे की “कसिरा जीविका होथा” या पदाचा अर्थ स्पष्ट करताना “दुक्खा नो जीविका अहोसि” (आमचे जीवन कठीण/दुःखद झाले) असा अर्थ सांगितला आहे. ‘हुविरे’. ‘हुवित्थो’, ‘हुविव्हो’. ‘हुविं’, ‘हुविम्हे’. ही परोक्ष भूतकाळाची (परोक्खा) रूपे आहेत. อหุวา, อหุวู. อหุโว, อหุวตฺถ. อหุวํ, อหุวมฺห. อหุวตฺถ, อหุวตฺถุํ. อหุวเส, อหุววฺหํ. อหุวึ, อหุวมฺหเส. หิยฺยตฺตนีรูปานิ. ‘अहुवा’, ‘अहुवू’. ‘अहुवो’, ‘अहुवत्थ’. ‘अहुवं’, ‘अहुवम्ह’. ‘अहुवत्थ’, ‘अहुवत्थुं’. ‘अहुवसे’, ‘अहुवव्हं’. ‘अहुविं’, ‘अहुवम्हसे’. ही हिय्यत्तनी (भूतकाळाची) रूपे आहेत. เอตฺถ อหุวมฺหเสติ มยํ ภวมฺหเสติ อตฺโถ. ‘‘อกรมฺหส เต กิจฺจํ, ยํ พลํ อหุวมฺหเส’’ติ ปาฬิยํ ปน ‘‘อหุว อมฺหเส’’ อิติ วา ปทจฺเฉโท กาตพฺโพ ‘‘อหุ อมฺหเส’’ติ วา. ปจฺฉิมนเย วการาคโม ‘‘อหุวา’’ติ จ ‘‘อหู’’ติ จ ทฺวินฺนมฺปิ อโหสีติ อตฺโถ. อมฺหนฺติ อมฺหากํ. เสติ นิปาตมตฺตํ. อิทํ วุตฺตํ โหติ – อมฺหากํ ยํ พลํ อโหสิ, มยํ เตน พเลน ตว กิจฺจํ อกรมฺหาติ. येथे ‘अहुवम्हसे’ म्हणजे ‘आम्ही झालो’ असा अर्थ आहे. परंतु “अकरम्हस ते किच्चं, यं बलं अहुवम्हसे” या पाळीमध्ये “अहुव अम्हसे” किंवा “अहु अम्हसे” असा पदच्छेद करावा. नंतरच्या पद्धतीनुसार ‘व’ काराचा आगम होऊन ‘अहुवा’ आणि ‘अहू’ या दोन्हीचा अर्थ ‘अहोसि’ (झाला) असा होतो. ‘अम्हं’ म्हणजे ‘आमचे’. ‘से’ हा केवळ निपात आहे. याचा अर्थ असा आहे – आमचे जे बळ होते, आम्ही त्या बळाने तुझे कार्य केले. อโหสิ, อหุํ, อเหสุํ. อหุโว, อหุวิตฺถ. อโหสิตฺถอิจฺจปิ. อโหสึ, อหุวาสึ อิจฺจปิ, อโหสิมฺหา, อหุมฺหา[Pg.193]. อหุวา, อหุวุ, อหุวเส, อหุวิวฺหํ. อหุวํ, อหุํ อิจฺจปิ. อหุวิมฺเห. อชฺชตนิยา รูปานิ. ‘अहोसि’, ‘अहुं’, ‘अहेसुं’. ‘अहुवो’, ‘अहुवत्थ’. ‘अहोसित्थ’ असेही. ‘अहोसिं’, ‘अहुवासिं’ इत्यादी, ‘अहोसिम्हा’, ‘अहुम्हा’. ‘अहुवा’, ‘अहुवु’, ‘अहुवसे’, ‘अहुविव्हं’. ‘अहुवं’, ‘अहुं’ इत्यादी. ‘अहुविम्हे’. ही अज्जतनी (भूतकाळाची) रूपे आहेत. เอตฺถ ‘‘อหํ เกวฏฺฏคามสฺมึ, อหุํ เกวฏฺฏทารโก’’ติ ทสฺสนโต ‘‘อหุ’’นฺติ วุตฺตํ, อโหสินฺติ อตฺโถ. ‘‘อหํ ภทนฺเต อหุวาสึ ปุพฺเพ สุเมธนามสฺส ชินสฺส สาวโก’’ติ ทสฺสนโต ‘‘อหุวาสิ’’นฺติ อิจฺเจวตฺโถ. ตถา หิ อเนกวณฺณวิมานวตฺถุอฏฺฐกถายํ อิมิสฺสา ปาฬิยา อตฺถํ วณฺเณนฺเตหิ อหุวาสินฺติ อโหสินฺติ อตฺโถ ปกาสิโต. येथे “अहं केवट्टगामस्मिं, अहुं केवट्टदारको” (मी केवर्तगामात कोळ्याचा मुलगा होतो) या प्रयोगावरून ‘अहुं’ असे म्हटले आहे, ज्याचा अर्थ ‘अहोसिं’ (होतो) असा आहे. “अहं भदन्ते अहुवासिं पुब्बे सुमेधनामस्स जिनस्स सावको” (भदन्त, मी पूर्वी सुमेध नावाच्या जिनांच्या [बुद्धांच्या] श्रावक होतो) या प्रयोगावरून ‘अहुवासिं’ असाच अर्थ आहे. तसेच अनेकवर्णविमानवस्तूच्या अट्टकथेत या पाळीचा अर्थ स्पष्ट करताना ‘अहुवासिं’ म्हणजे ‘अहोसिं’ (होतो) असा अर्थ प्रकट केला आहे. ‘‘เหสฺสติ, เหหิสฺสติ, เหหิติ, โหหิตี’’ติ อิมานิ จตฺตาริ ภวิสฺสนฺติยา มาติกาปทานิ เวทิตพฺพานิ. ‘हेस्सति’, ‘हेहिस्सति’, ‘हेहिति’, ‘होहिति’ ही चार भविष्यकाळाची (भविस्सन्ती) मूळ पदे समजावीत. อิทานิ ตานิ วิภชิสฺสามิ – เหสฺสาติ, เหสฺสนฺติ. เหสฺสสิ, เหสฺสถ. เหสฺสามิ, เหสฺสาม. เหสฺสเต, เหสฺสนฺเต. เหสฺสเส, เหสฺสวฺเห. เหสฺสํ, เหสฺสามฺเห. อิมานิ ‘‘อนาคตมฺหิ อทฺธาเน, เหสฺสาม สมฺมุขา อิม’’นฺติ ทสฺสนโต วุตฺตานิ. आता मी त्यांचे वर्गीकरण करतो – ‘हेस्सति’, ‘हेस्सन्ति’. ‘हेस्ससि’, ‘हेस्सथ’. ‘हेस्सामि’, ‘हेस्साम’. ‘हेस्सते’, ‘हेस्सन्ते’. ‘हेस्ससे’, ‘हेस्सव्हे’. ‘हेस्सं’, ‘हेस्साम्हे’. ही रूपे “अनागतम्हि अद्धाने, हेस्साम सम्मुखा इमं” (भविष्यात आम्ही याच्या समोर असू) या प्रयोगावरून सांगितली आहेत. เหหิสฺสติ, เหหิสฺสนฺติ. เหหิสฺสสิ. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. ‘हेहिस्सति’, ‘हेहिस्सन्ति’. ‘हेहिस्ससि’. उर्वरित रूपे सविस्तर जाणावीत. โหหิสฺสติ, โหหิสฺสนฺติ. โหหิสฺสสิ. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. ‘होहिस्सति’, ‘होहिस्सन्ति’. ‘होहिस्ससि’. उर्वरित रूपे सविस्तर जाणावीत. เหหิติ, เหหินฺติ. เหหิสิ. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. ‘हेहिति’, ‘हेहिन्ति’. ‘हेहिसि’. उर्वरित रूपे सविस्तर जाणावीत. โหหิติ, โหหินฺติ. โหหิสิ. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. ภวิสฺสนฺติยา รูปานิ. ‘होहिति’, ‘होहिन्ति’. ‘होहिसि’. उर्वरित रूपे सविस्तर जाणावीत. ही भविष्यकाळाची रूपे आहेत. อหุวิสฺสา, อหุวิสฺสํสุ. อหุวิสฺสเส, อหุวิสฺสถ. อหุวิสฺสํ, อหุวิสฺสมฺหา. อหุวิสฺสถ, อหุวิสฺสิสุ. อหุวิสฺสเส[Pg.194], อหุวิสฺสวฺเห. อหุวิสฺสึ, อหุวิสฺสามฺหเส. กาลาติปตฺติรูปานิ. ‘अहुविस्सा’, ‘अहुविस्संसु’. ‘अहुविस्ससे’, ‘अहुविस्सथ’. ‘अहुविस्सं’, ‘अहुविस्सम्हा’. ‘अहुविस्सथ’, ‘अहुविस्सिसु’. ‘अहुविस्ससे’, ‘अहुविस्सव्हे’. ‘अहुविस्सिं’, ‘अहुविस्साम्हसे’. ही कालातिपत्ती (अतिभूतकाळाची/संकेतार्थाची) रूपे आहेत. วฺเห อวฺหายเน พทฺธายํ สทฺเท จ. อวฺหายนํ ปกฺโกสนํ. พทฺธาติ อหงฺกาโร, ฆฏฺฏนํ วา สารมฺภกรณํ วา. สทฺโท รโว. วฺเหติ, วฺหายติ, อวฺเหติ, อวฺหายติ, อวฺหาสิ อิจฺจปิ. กจฺจายโน มาณวโกสฺมิ ราช, อนูนนาโม อิติ มวฺหยนฺติ. อาสทฺโท อุปสคฺโคว, โส สญฺโญคปรตฺตา รสฺโส ชาโต. อวฺหิโต. อนวฺหิโต ตโต อาคา. อวฺหา, อวฺหายนา. วารณวฺหยนา รุกฺขา. กามวฺเห วิสเย. กุมาโร จนฺทสวฺหโย. ‘व्हे’ (धातू) बोलावणे (अव्हायन), अहंकार/संघर्ष (बद्धा) आणि आवाज (सद्द) या अर्थात आहे. ‘अव्हायन’ म्हणजे बोलावणे (पक्कोसन). ‘बद्धा’ म्हणजे अहंकार किंवा संघर्ष किंवा स्पर्धा करणे. ‘सद्द’ म्हणजे आवाज (रव). ‘व्हेति’, ‘व्हायाति’, ‘अव्हेति’, ‘अव्हायाति’, ‘अव्हासि’ इत्यादी. “कच्चायनो माणवकोस्मि राज, अनूननामो इति मव्हयन्ति” (हे राजा, मी कच्चायन नावाचा तरुण आहे, मला या नावाने बोलावतात). ‘आ’ शब्द हा उपसर्गच आहे, तो संयोगाच्या नंतर असल्यामुळे र्हस्व झाला आहे. ‘अव्हितो’. ‘अनव्हितो ततो आगा’ (न बोलावता तेथून आला). ‘अव्हा’, ‘अव्हायना’. ‘वारणव्हयना रुक्खा’ (वारण नावाचे वृक्ष). ‘कामव्हे विसये’ (काम नावाच्या विषयात). ‘कुमारो चन्दसव्हयो’ (चंद्र नावाचा कुमार). ‘‘สตฺตตนฺตึ สุมธุรํ,รามเณยฺยํ อวาจยึ; โส มํ รงฺคมฺหิ อวฺเหติ,สรณํ เม โหหิ โกสิยา’’ติ. “सत्तर तारांची अत्यंत मधुर आणि रमणीय वीणा मी वाजवली; तो मला रंगमंचावर आव्हान देतो (अव्हेति), हे कोसीय, तू माझे शरण हो.” เอตฺถ อวฺเหตีติ สารมฺภวเสน อตฺตโน วิสยํ ทสฺเสตุํ สงฺฆฏฺฏตีติ อตฺโถ. ‘‘สมาคเต เอกสตํ สมคฺเค, อวฺเหตฺถ ยกฺโข อวิกมฺปมาโน’’ติ เอตฺถาปิ สารมฺภวเสน ฆฏฺฏนํ อวฺหายนํ นาม. येथे ‘अव्हेति’ म्हणजे स्पर्धेच्या भावनेने स्वतःचा विषय दर्शवण्यासाठी संघर्ष करतो असा अर्थ आहे. “समागते एकसतं समग्गे, अव्हेत्थ यक्खो अविकम्पमानो” (एकत्र आलेल्या एकशे एक जणांमध्ये, तो यक्ष न डगमगता आव्हान देत होता) येथेही स्पर्धेच्या भावनेने संघर्ष करणे यालाच ‘अव्हायन’ म्हटले आहे. ‘‘ตตฺถ นจฺจนฺติ คายนฺติ, อวฺหายนฺติ วราวรํ; อจฺฉรา วิย เทเวสุ, นาริโย สมลงฺกตา’’ติ “तेथे सुशोभित झालेल्या स्त्रिया, देवांमध्ये अप्सरांप्रमाणे, नाचतात, गातात आणि एकमेकींना बोलावतात.” เอตฺถ ปน อวฺหายนฺติ วราวรนฺติ วรโต วรํ นจฺจญฺจ คีตญฺจ กโรนฺติโย สารมฺภํ กโรนฺตีติ อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. येथे 'अव्हायन्ति वरावरं' (avhāyanti varāvaraṃ) याचा अर्थ असा समजावा की, एकापेक्षा एक सरस नृत्य आणि गायन करत त्या स्पर्धा (किंवा उत्साह) निर्माण करतात. ปญฺห ปุจฺฉายํ. ภิกฺขุ ครุํ ปญฺหํ ปญฺหติ. ปญฺโห. อยํ ปน ปาฬิ ‘‘ปริปุจฺฉติ ปริปญฺหติ อิทํ ภนฺเต กถํ อิมสฺส โก อตฺโถ’’ติ. ปญฺหสทฺโท ปุลฺลิงฺควเสน คเหตพฺโพ. ‘‘ปญฺโห มํ [Pg.195] ปฏิภาติ, ตํ สุณา’’ติ เยภุยฺเยน ปุลฺลิงฺคปฺปโยคทสฺสนโต. กตฺถจิ ปน อิตฺถิลิงฺโคปิ ภวติ นปุํสกลิงฺโคปิ. ตถา หิ ‘‘ปญฺหา เมสา กุสเลหิ จินฺติตา. โกณฺฑญฺญ ปญฺหานิ วิยากโรหี’’ติ ตทฺทีปิกา ปาฬิโย ทิสฺสนฺติ, ลิงฺควิปลฺลาโส วา ตตฺถ ทฏฺฐพฺโพ. 'पञ्ह' (pañha) हा धातू विचारण्याच्या अर्थात आहे. भिक्खू गंभीर प्रश्न विचारतात. 'पञ्हो' (प्रश्न). ही पाळी (मूळ पाठ) अशी आहे: 'भन्ते, हे कसे? याचा काय अर्थ आहे?' असे विचारतात, उलटून विचारतात. 'पञ्ह' हा शब्द पुल्लिंगी मानला पाहिजे, कारण 'पञ्हो मं पटिभाति, तं सुणा' (मला प्रश्न सुचत आहे, तो ऐका) यावरून बहुतांश पुल्लिंगी प्रयोग दिसून येतात. परंतु काही ठिकाणी तो स्त्रीलिंगी किंवा नपुंसकलिंगी देखील होतो. जसे की, 'पञ्हा मेसा कुसलेहि चिन्तिता' (हा प्रश्न कुशल लोकांनी विचार केला आहे) आणि 'कोण्डञ्ञ पञ्हानि वियाकरोहि' (हे कोंडण्य, प्रश्नांचे स्पष्टीकरण करा) असे स्पष्ट करणारे पाळी पाठ आढळतात, किंवा तेथे लिंगविपर्यास (लिंगाचा बदल) समजावा. ปญฺห อิจฺฉายํ. ปญฺหติ. ปญฺโห. เอตฺถ จ ปญฺโหติ ญาตุํ อิจฺฉิโต อตฺโถ. อิทํ ปเนตฺถ นิพฺพจนํ ปญฺหิยติ ญาตุํ อิจฺฉิยติ โสติ ปญฺโหติ. ตถา หิ วุตฺตํ ‘‘วิสฺสชฺชิตมฺหิ ปญฺเห’’ติ อิมิสฺสา เนตฺติปาฬิยา อตฺถํ สํวณฺเณนฺเตน ‘‘ปญฺเหติ ญาตุํ อิจฺฉิเต อตฺเถ’’ติ. 'पञ्ह' (pañha) हा धातू इच्छेच्या अर्थात आहे. पञ्हति, पञ्हो. आणि येथे 'पञ्हो' म्हणजे जाणण्याची इच्छा असलेला अर्थ. याची व्युत्पत्ती अशी आहे: 'पञ्हियति' म्हणजे ज्याची जाणण्याची इच्छा केली जाते, तो 'पञ्हो' (प्रश्न). तसेच 'विस्सज्जितम्हि पञ्हे' (प्रश्नाचे उत्तर दिले असता) या नेत्तिपाळीच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण करताना म्हटले आहे: 'पञ्ह' म्हणजे जाणण्याची इच्छा असलेला अर्थ. มิห เสจเน. มิหติ, อุมฺมิหติ. เมโฆ, เมหนํ. 'मिह' (miha) हा धातू सिंचन करण्याच्या (किंवा मूत्रविसर्जन करण्याच्या) अर्थात आहे. मिहति, उम्मिहति. मेघो (ढग), मेहनं. ตตฺถ อุมฺมิหตีติ ปสฺสาวํ กโรติ. เมโฆติ มิหติ สิญฺจติ โลกํ วสฺสธาราหีติ เมโฆ, ปชฺชุนฺโน. เมหนนฺติ อิตฺถีนํ คุยฺหฏฺฐานํ. तेथे 'उम्मिहति' म्हणजे लघवी करणे. 'मेघो' म्हणजे जो पावसाच्या धारांनी जगाचे सिंचन करतो तो मेघ (ढग), पर्जन्य. 'मेहनं' म्हणजे स्त्रियांचे गुह्यस्थान. ทห ภสฺมีกรเณ ธารเณ จ. อาคารานิ อคฺคิ ทหติ. อยํ ปุริโส อิมํ อิตฺถึ อยฺยิกํ ทหติ, มม อยฺยิกาติ ธาเรตีติ อตฺโถ. อิมสฺส ปุริสสฺส อยํ อิตฺถี อยฺยิกา โหตีติ อธิปฺปาโย. อตฺร ปนายํ ปาฬิ ‘‘สกฺยา โข อมฺพฏฺฐ ราชานํ อุกฺกากํ ปิตามหํ ทหนฺตี’’ติ. อคฺคินา ทฑฺฒํ เคหํ, ทยฺหติ, ทยฺหมานํ. ทสฺส ฑาเทเส ‘‘ฑหตี’’ติ รูปํ. ‘‘ฑหนฺตํ พาลมนฺเวติ, ภสฺมาฉนฺโนว ปาวโก’’ติอาทโย ปโยคา เอตฺถ นิทสฺสนานิ ภวนฺติ. 'दह' (daha) हा धातू भस्म करण्याच्या (जाळण्याच्या) आणि धारण करण्याच्या अर्थात आहे. अग्नी घरांना जाळतो. 'हा पुरुष या स्त्रीला आजी मानतो', म्हणजे 'माझी आजी' म्हणून धारण करतो, असा अर्थ आहे. या पुरुषाची ही स्त्री आजी आहे, असा अभिप्राय आहे. येथे ही पाळी (मूळ पाठ) आहे: 'हे अंबठ्ठ, शाक्य राजे उक्काक राजाला आपले आजोबा मानतात (दहन्ति).' अग्नीने जळलेले घर, जळते, जळणारे. 'द' च्या जागी 'ड' आदेश होऊन 'डहति' (ḍahati) असे रूप बनते. 'राखेने झाकलेल्या अग्नीप्रमाणे, जळणारा (अग्नी) मूर्खाच्या पाठीमागे लागतो' इत्यादी प्रयोग येथे उदाहरणे आहेत. จห ปริสกฺกเน. จหติ. 'चह' (caha) हा धातू फिरण्याच्या (किंवा प्रयत्न करण्याच्या) अर्थात आहे. चहति. รห จาเค. รหติ. รโห, รหิโต. 'रह' (raha) हा धातू त्यागाच्या अर्थात आहे. रहति. रहो (एकांत/गुप्त), रहितो (रहित). รหิ คติยํ. รหติ. รโห, รหํ. 'रहि' (rahi) हा धातू गतीच्या अर्थात आहे. रहति. रहो, रहं. ทหิ [Pg.196] พหิ วุทฺธิยํ. ทหติ. พหติ. 'दहि' (dahi) आणि 'बहि' (bahi) हे धातू वृद्धीच्या (वाढण्याच्या) अर्थात आहेत. दहति, बहति. พหิ สทฺเธ จ. จกาโร วุทฺธาเปกฺโข. พหติ. 'बहि' (bahi) हा धातू श्रद्धेच्या अर्थातही आहे. 'च' कार हा वृद्धीच्या अपेक्षेने आहे. बहति. ตุหิ ทุหิ อทฺทเน. ตุหติ. ทุหติ. 'तुहि' (tuhi) आणि 'दुहि' (duhi) हे धातू पीडा देण्याच्या (किंवा प्रवासाच्या) अर्थात आहेत. तुहति, दुहति. อรห มห ปูชายํ. อรหติ. อรหํ, อรหา. มหติ. 'अरह' (araha) आणि 'मह' (maha) हे धातू पूजेच्या (आदर करण्याच्या) अर्थात आहेत. अरहति. अरहं, अरहा (अर्हत). महति. มหนํ, มโห. วิหารมโห. เจติยมโห. महनं, महो (उत्सव/पूजा). विहारमहो (विहार उत्सव), चेतियमहो (चैत्य उत्सव). ตตฺร นิกฺกิเลสตฺตา เอกนฺตทกฺขิเณยฺยภาเวน อตฺตโน กตปูชาสกฺการาทีนํ มหปฺผลภาวกรเณน อรหณีโย ปูชนีโยติ อรหา, ขีณาสโว. तेथे निष्क्लेश (क्लेशरहित) असल्यामुळे, अत्यंत दक्षिणेय (दान देण्यास योग्य) भावाने, स्वतःला केलेल्या पूजा-सत्कारादींना महाफलदायी बनवणारे असल्यामुळे, जे आदरणीय आणि पूजनीय आहेत, ते 'अरहा' (अर्हत), म्हणजेच क्षीणासव (ज्यांचे आसव नष्ट झाले आहेत असे) होत. อีห เจตายํ. อีหติ. อีหา. อีหา วุจฺจติ วีริยํ. 'ईह' (īha) हा धातू चेष्टा किंवा प्रयत्नाच्या अर्थात आहे. ईहति. ईहा. ईहा म्हणजे वीर्य (प्रयत्न) म्हटले जाते. วห มห พุทฺธิยํ. วหติ, มหติ. 'वह' (vaha) आणि 'मह' (maha) हे धातू बुद्धीच्या (जाणण्याच्या) अर्थात आहेत. वहति, महति. อหิ ปิลหิ คติยํ. อหติ. ปิลหติ, อหิ. 'अहि' (ahi) आणि 'पिलहि' (pilahi) हे धातू गतीच्या अर्थात आहेत. अहति. पिलहति, अहि. เอตฺถ จ อหีติ นิปฺปาโทปิ สมาโน อหติ คจฺฉติ คนฺตุํ สกฺโกตีติ อหิ. आणि येथे 'अहि' हा शब्द निष्पन्न झाला तरी, जो 'अहति' म्हणजे जातो, जाण्यास समर्थ असतो, तो 'अहि' (सर्प) होय. ครห กลห กุจฺฉเน. ครหติ. ครหา, กลหติ, กลโห. 'गरह' (garaha) आणि 'कलह' (kalaha) हे धातू निंदेच्या अर्थात आहेत. गरहति. गरहा (निंदा), कलहति, कलहो (भांडण). วรห วลห ปธานิเย ปริภาสนหึสาทาเนสุ จ. วรหติ. วลหติ. วราโห. 'वरह' (varaha) आणि 'वलह' (valaha) हे धातू श्रेष्ठत्व, निंदा, हिंसा आणि ग्रहण करण्याच्या अर्थात आहेत. वरहति. वलहति. वराहो. เอตฺถ จ วราโหติ สูกโรปิ หตฺถีปิ วุจฺจติ. ตถา หิ ‘‘เอเนยฺยา จ วราหา จ. มหาวราโหว นิวาปปุฏฺโฐ’’ติอาทีสุ สูกโร ‘‘วราโห’’ติ นาเมน วุจฺจติ. ‘‘มหาวราหสฺส นทีสุ ชคฺคโต, ภิสํ ฆสมานสฺสา’’ติอาทีสุ ปน หตฺถี ‘‘วราโห’’ติ นาเมน วุจฺจติ. มหาวราหสฺสาติ หิ มหาหตฺถิโนติ อตฺโถ. आणि येथे 'वराहो' म्हणजे डुकरालाही (सूकर) आणि हत्तीलाही म्हटले जाते. जसे की, 'एनेय्या च वराहा च' (हरणे आणि डुकरे) आणि 'महावराहोव निवापपुट्ठो' (चांगले खायला घालून पुष्ट केलेल्या मोठ्या डुकराप्रमाणे) इत्यादींमध्ये डुकराला 'वराहो' या नावाने संबोधले आहे. परंतु 'महावराहास्य नदीसु जग्गतो, भिसं घसमानस्स' (नद्यांमध्ये फिरणाऱ्या आणि कमळाचे कंद खाणाऱ्या महावराहाचा...) इत्यादींमध्ये हत्तीला 'वराहो' या नावाने संबोधले आहे. कारण 'महावराहाचा' याचा अर्थ 'मोठ्या हत्तीचा' असा आहे. เวหุ เชหุ วาหุ ปยตเน. เวหติ, เชหติ. วาหติ. วาหโน. 'वेहु' (vehu), 'जेहु' (jehu) आणि 'वाहु' (vāhu) हे धातू प्रयत्नाच्या अर्थात आहेत. वेहति, जेहति. वाहति. वाहनो. วาหโน [Pg.197] วุจฺจติ อสฺโส. โส หิ วาหนฺติ สงฺคามาทีสุ กิจฺเจ อุปฺปนฺเน ปยตนฺติ วีริยํ กโรนฺติ, เอเตนาติ วาหโนติ วุจฺจติ. 'वाहनो' म्हणजे घोडा म्हटला जातो. कारण तो वाहून नेतो, युद्धादी कार्ये उद्भवली असता प्रयत्न करतो, पराक्रम करतो, म्हणून त्याला 'वाहन' असे म्हणतात. ทาหุ นิทฺทกฺขเย. ทาหติ. 'दाहु' (dāhu) हा धातू निद्रेचा क्षय करण्याच्या (जागे होण्याच्या) अर्थात आहे. दाहति. อูห วิตกฺเก. อูหติ, อายูหติ, วิยูหติ, พฺยูหติ อโปหติ. อูหนํ, อายูหนํ, พฺยูโห, อโปโห. 'ऊह' (ūha) हा धातू वितर्काच्या (विचाराच्या) अर्थात आहे. ऊहति, आयूहति, वियूहति, ब्यूहति, अपोहति. ऊहनं, आयूहनं, ब्यूहो, अपोहो. ตตฺถ อูหตีติ วิตกฺเกติ, อายูหตีติ วายมติ, วิยูหตีติ ปํสุํ อุทฺธรติ. เอวํ พฺยูหตีติ เอตฺถาปิ. อโปหตีติ ฉฑฺเฑติ, อถ วา วิเวเจติ. तेथे 'ऊहति' म्हणजे वितर्क (विचार) करतो, 'आयूहति' म्हणजे प्रयत्न करतो, 'वियूहति' म्हणजे माती उपसतो. याचप्रमाणे 'ब्यूहति' यातही समजावे. 'अपोहति' म्हणजे टाकून देतो किंवा विवेक (पृथक्करण) करतो. คาหุ วิโลฬเน. คาหติ. คาโห, จนฺทคฺคาโห, สูริยคฺคาโห, นกฺขตฺตคฺคาโห. 'गाहु' (gāhu) हा धातू घुसळण्याच्या (किंवा ढवळण्याच्या) अर्थात आहे. गाहति. गाहो, चन्दग्गाहो (चंद्रग्रहण), सूरियग्गाहो (सूर्यग्रहण), नक्खत्तग्गाहो (नक्षत्रग्रहण). คห คหเณ. คหติ, ปคฺคหติ. อาหุตึปคฺคหิสฺสามิ. ปคฺคโห, ปคฺคาโห. 'गह' (gaha) हा धातू ग्रहण करण्याच्या अर्थात आहे. गहति, पग्गहति. 'आहुतिं पग्गहिस्सामि' (मी आहुती ग्रहण करीन/अर्पण करीन). पग्गहो, पग्गाहो. ปคฺคโหติ ปตฺโต. ปคฺคาโหติ วีริยํ. 'पग्गहो' म्हणजे पात्र (भिक्षापात्र). 'पग्गाहो' म्हणजे वीर्य (प्रयत्न). สห ปริสหเน. ปริสหนํ ขนฺติ. สหติ. สโห, อสโห, อสยฺโห. 'सह' (saha) हा धातू सहन करण्याच्या अर्थात आहे. सहन करणे म्हणजे क्षंती (क्षमा/सहनशीलता). सहति. सहो, असहो, असय्हो (असह्य). รุห จมฺมนิ ปาตุภาเว. รุหติ. รุกฺโข. 'रुह' (ruha) हा धातू प्रगट होण्याच्या (किंवा वाढण्याच्या) अर्थात आहे. रुहति. रुक्खो (वृक्ष). มาตุ มาเน. มาหติ. 'मातु' (mātu) हा धातू मोजण्याच्या (किंवा मानाच्या) अर्थात आहे. माहति. คุหู สํวรเณ. คุหติ นิคฺคุหติ. คุโห, คุยฺหโก. 'गुहू' (guhū) हा धातू झाकण्याच्या (गुप्त ठेवण्याच्या) अर्थात आहे. गुहति, निग्गुहति. गुहो (गुहा), गुय्हको. วห ปาปุเณ. วหติ. วาริวโห. 'वह' (vaha) हा धातू पोहोचवण्याच्या (किंवा वाहून नेण्याच्या) अर्थात आहे. वहति. वारिवहो (जलप्रवाह). ทุห ปปูรเณ. ทุหติ, โทหติ. ทุยฺหมานา คาวี. 'दुह' (duha) हा धातू पूर्ण भरण्याच्या (किंवा दूध काढण्याच्या) अर्थात आहे. दुहति, दोहति. दुय्हमाना गावी (दूध काढली जाणारी गाय). ทิห อุปจเย. เทหติ. เทโห. เทโหติ สรีรํ. 'दिह' (diha) हा धातू उपचय (वाढ किंवा संचय) करण्याच्या अर्थात आहे. देहति. देहो. देहो म्हणजे शरीर. ลิห [Pg.198] อสฺสาทเน. เลหติ, ปเลหติ. เลหนียํ. อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘สุนขา หิมสฺส ปลิหึสุ ปาเท’’ติ. อยํ ปนตฺโถ – สุนขา อิมสฺส กุมารสฺส ปาทตเล อตฺตโน ชิวฺหาย ปลิหึสูติ. 'लिह' (liha) हा धातू आस्वाद घेण्याच्या (चाटण्याच्या) अर्थात आहे. लेहति, पलेहति. लेहनीयं (चाटण्यायोग्य). येथे ही पाळी (मूळ पाठ) आहे: 'सुनखा हिंस्स पलिहिंसु पादे' (कुत्र्यांनी याच्या पायांना चाटले). याचा अर्थ असा आहे - कुत्र्यांनी या कुमाराच्या तळपायांना आपल्या जिभेने चाटले. โอห จาเค. โอหติ. สพฺพมนตฺถํ อโปหติ. อโปโห. 'ओह' (oha) हा धातू त्यागाच्या अर्थात आहे. ओहति. 'सब्बमनत्थं अपोहति' (सर्व अनर्थ दूर करतो). अपोहो. พฺรหฺม อุคฺคเม. พฺรหติ. พฺรหา. ‘ब्रह्’ धातू उगवणे (वाढणे) या अर्थात आहे. ब्रहति. ब्रहा. ทห ถห หึสตฺถา. ทหติ. ถหติ. ‘दह्’ आणि ‘थह्’ धातू हिंसेच्या अर्थात आहेत. दहति. थहति. พฺรูห วฑฺฒเน. อุปรูปริ พฺรูหตีติ พฺรหฺมา. การิเต ‘‘วิเวกมนุพฺรูเหตุํ วฏฺฏตี’’ติ ปโยโค. ‘ब्रूह्’ धातू वाढण्याच्या अर्थात आहे. जो उत्तरोत्तर वाढतो तो ‘ब्रह्मा’. प्रयोजक रूपात (कारिते) “विवेकमनुब्रूहेतुं वट्टति” (विवेकाची वृद्धी करणे योग्य आहे) असा प्रयोग होतो. พฺรหฺมาติ เตหิ เตหิ คุณวิเสเสหิ พฺรูหิโตติ พฺรหฺมา. พฺรหฺมาติ มหาพฺรหฺมาปิ วุจฺจติ ตถาคโตปิ พฺราหฺมโณปิ มาตาปิตโรปิ เสฏฺฐมฺปิ. ‘‘สหสฺโส พฺรหฺมา ทฺวิสหสฺโส พฺรหฺมา’’ติอาทีสุ หิ มหาพฺรหฺมา ‘‘พฺรหฺมา’’ติ วุจฺจติ. ‘‘พฺรหฺมาติ โข ภิกฺขเว ตถาคตสฺเสตํ อธิวจน’’นฺติ เอตฺถ ตถาคโต. ‘ब्रह्मा’ म्हणजे त्या त्या विशिष्ट गुणांनी जो वृद्धिंगत झाला आहे तो ब्रह्मा होय. ‘ब्रह्मा’ असे महाब्रह्मा, तथागत, ब्राह्मण, माता-पिता आणि श्रेष्ठ यांनाही म्हटले जाते. “सहस्सो ब्रह्मा द्विसहस्सो ब्रह्मा” इत्यादींमध्ये महाब्रह्माला ‘ब्रह्मा’ म्हटले आहे. “ब्रह्माति खो भिक्खवे तथागतस्सेतं अधिवचनं” (हे भिक्खूंनो, ‘ब्रह्मा’ हे तथागतांचेच नाव आहे) येथे तथागतांना (ब्रह्मा म्हटले आहे). ‘‘ตโมนุโท พุทฺโธ สมนฺตจกฺขุ,โลกนฺตคู สพฺพภวาติวตฺโต; อนาสโว สพฺพทุกฺขปฺปหีโน,สจฺจวฺหโย พฺรหฺเม อุปาสิโต เม’’ติ “अंधकार दूर करणारे, समंतचक्षू (सर्वदर्शी) बुद्ध, लोकांतगू (लोकाच्या अंतापर्यंत गेलेले), सर्व भावांचे (अस्तित्वांचे) अतिक्रमण केलेले, अनासव (आसवरहित), सर्व दुःखांचा त्याग केलेले, सत्य नावाचे ब्रह्मा (श्रेष्ठ) माझ्याकडून पूजिले गेले आहेत.” เอตฺถ พฺราหฺมโณ. ‘‘พฺรหฺมาติ มาตาปิตโร, ปุพฺพาจริยาติ วุจฺจเร’’ติ เอตฺถ มาตาปิตโร. ‘‘พฺรหฺมจกฺกํ ปวตฺเตตี’’ติ เอตฺถ เสฏฺฐํ. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – येथे ब्राह्मण (श्रेष्ठ पुरुष). “ब्रह्माति मातापितरो, पुब्बाचरियाति वुच्चरे” (माता-पिता हे ब्रह्मा आहेत, त्यांना पूर्व आचार्य म्हटले जाते) येथे माता-पिता. “ब्रह्मचक्कं पवत्तेति” (ब्रह्मचक्र प्रवर्तित करतात) येथे श्रेष्ठ. याविषयी असे म्हटले आहे – ‘‘มหาพฺรหฺมนิ [Pg.199] วิปฺเป จ, อโถ มาตาปิตูสุ จ; ตถาคเต จ เสฏฺเฐ จ, พฺรหฺมสทฺโท ปวตฺตตี’’ติ. “महाब्रह्मा, विप्र (ब्राह्मण), तसेच माता-पिता, तथागत आणि श्रेष्ठ यांच्यासाठी ‘ब्रह्म’ हा शब्द वापरला जातो.” อปโร นโย – พฺรหฺมาติ ติวิธา พฺรหฺมาโน สมฺมุติพฺรหฺมาโน อุปปตฺติพฺรหฺมาโน วิสุทฺธิพฺรหฺมาโนติ. दुसरा प्रकार असा – ब्रह्मा तीन प्रकारचे असतात: संमुति-ब्रह्मा (लोकमान्य ब्रह्मा), उपपत्ति-ब्रह्मा (उत्पत्तीने झालेले ब्रह्मा) आणि विशुद्धि-ब्रह्मा (विशुद्धीने झालेले ब्रह्मा). ‘‘สมฺปนฺนํ สาลิเกทารํ, สุวา ภุญฺชนฺติ โกสิย; ปฏิเวเทมิ เต พฺรหฺเม, น เน วาเรตุมุสฺสเห,ปริพฺพช มหาพฺรหฺเม, ปจนฺตญฺเญปิ ปาณิโน’’ติ จ “हे कोसिय! शालीचे (तांदळाचे) शेत पिकले आहे, पोपट ते खात आहेत; हे ब्रह्मा! मी तुला कळवतो, मी त्यांना रोखू शकत नाही. हे महाब्रह्मा! निघून जा, इतर प्राणीही शिजवून खात आहेत.” เอวมาทีสุ หิ พฺรหฺมสทฺเทน สมฺมุติพฺรหฺมาโน วุตฺตา. अशा इत्यादी वाक्यांमध्ये ‘ब्रह्म’ शब्दाने संमुति-ब्रह्मा (लोकमान्य ब्रह्मा) सांगितले गेले आहेत. ‘‘อปารุตา เตสํ อมตสฺส ทฺวารา,เย โสตวนฺโต ปมุญฺจนฺตุ สทฺธํ; วิหึสสญฺญี ปคุณํ น ภาสึ,ธมฺมํ ปณีตํ มนุเชสุ พฺรหฺเม, “त्यांच्यासाठी अमृताचे (निर्वाणाचे) दरवाजे उघडे आहेत, ज्यांना कान आहेत त्यांनी आपली श्रद्धा प्रकट करावी. हे ब्रह्मा! त्रासाच्या भीतीने मी मानवांमध्ये या उत्तम आणि सुस्पष्ट धम्माचा उपदेश केला नव्हता.” อถ โข พฺรหฺมา สหมฺปตี’’ติ จ เอวมาทีสุ พฺรหฺมสทฺเทน อุปปตฺติพฺรหฺมา. ‘‘พฺรหฺมจกฺกํ ปวตฺเตตี’’ติอาทิวจนโต พฺรหฺมนฺติ อริยธมฺโม วุจฺจติ. ตโต นิพฺพตฺตา อวิเสเสน สพฺเพปิ อริยา วิสุทฺธิพฺรหฺมาโน นาม ปรมตฺถพฺรหฺมตาย. วิเสสโต ปน ‘‘พฺรหฺมาติ โข ภิกฺขเว ตถาคตสฺเสตํ อธิวจน’’นฺติ วจนโต สมฺมาสมฺพุทฺโธ อุตฺตมพฺรหฺมา นาม สเทวเก โลเก พฺรหฺมภูเตหิ คุเณหิ อุกฺกํสปารมิปฺปตฺติโต. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – “त्यानंतर ब्रह्मा सहम्पती...” इत्यादी वाक्यांमध्ये ‘ब्रह्म’ शब्दाने उपपत्ति-ब्रह्मा अभिप्रेत आहे. “ब्रह्मचक्कं पवत्तेति” (ब्रह्मचक्र प्रवर्तित करतात) इत्यादी वचनांवरून ‘ब्रह्म’ म्हणजे आर्यधम्म म्हटला जातो. त्यापासून उत्पन्न झालेले सर्वच आर्य (अरिहंत) विनाभेद परमार्थ-ब्रह्मत्वामुळे ‘विशुद्धि-ब्रह्मा’ या नावाने ओळखले जातात. परंतु विशेषतः “ब्रह्माति खो भिक्खवे तथागतस्सेतं अधिवचनं” या वचनानुसार, सम्यक्संबुद्ध हे देवलोकासहित संपूर्ण जगात ब्रह्मरूप गुणांच्या उत्कृष्ट पारमितेप्रत पोहोचल्यामुळे ‘उत्तम-ब्रह्मा’ म्हणून ओळखले जातात. याविषयी असे म्हटले आहे – ‘‘สมฺมุติยุปปตฺตีนํ, วิสุทฺธีนํ วเสน จ; พฺรหฺมาโน ติวิธา โหนฺติ, อุตฺตเมน จตุพฺพิธา’’ติ. “संमुति (लोकमान्य), उपपत्ति (उत्पत्तीने झालेले) आणि विशुद्धि (विशुद्धीने झालेले) यांच्या भेदाने ब्रह्मा तीन प्रकारचे असतात; आणि उत्तम-ब्रह्मा मिळून ते चार प्रकारचे होतात.” ธิมฺห [Pg.200] นิฏฺฐุภเน. ธิมฺเหติ. ‘‘ปฏิวามคตํ สลฺลํ, ปสฺส ธิมฺหามิ โลหิต’’นฺติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ‘धिम्ह्’ धातू थुंकण्याच्या (बाहेर टाकण्याच्या) अर्थात आहे. धिम्हेति. “उलट्या दिशेने गेलेला बाण पहा, मी रक्त थुंकत आहे (धिम्हामि लोहितं)” हे पालि उदाहरण आहे. ตตฺถ ธิมฺหามีติ นิฏฺฐุภามีติ อตฺโถ. तेथे ‘धिम्हामि’ म्हणजे ‘निट्ठुभामि’ (मी थुंकतो) असा अर्थ आहे. หการนฺตธาตุรูปานิ. ह-कारान्त धातूंची रूपे. ฬการนฺตธาตุ Ḷ अ-कारान्त धातू พิฬ อกฺโกเส. เพฬติ. พิฬาโร. ‘बिळ्’ धातू शिवीगाळ करणे (आक्रोश) या अर्थात आहे. बेळति. बिळारो (मांजर). กีฬ วิหาเร. กีฬติ. กีฬา. ‘कीळ्’ धातू क्रीडा करणे (विहार) या अर्थात आहे. कीळति. कीळा (क्रीडा). อฬ อุคฺคเม. อฬติ. วาโฬ. ‘अळ्’ धातू उगवणे (वाढणे) या अर्थात आहे. अळति. वाळो (हिंस्र श्वापद किंवा सर्प). ลฬ วิลาเส. ลฬติ. ลฬิโต อสฺโส. ‘लळ्’ धातू विलास करणे या अर्थात आहे. लळति. लळितो अस्सो (विलास करणारा घोडा). กฬ มเท กกฺกสฺเส จ. กกฺกสฺสํ กสฺสสิยํ ผรุสภาโว. กฬติ. ‘कळ्’ धातू मद (मत्तता) आणि कर्कशता (कठोरता) या अर्थात आहे. कर्कशता म्हणजे कठोर भाव (परुसभाव). कळति. ตุฬ โตฬเน. โตฬติ. ‘तुळ्’ धातू तोलणे (वजन करणे) या अर्थात आहे. तोळति. หุฬ โหฬ คติยํ. หุฬติ. โหฬติ. ‘हुळ्’ आणि ‘होळ्’ धातू गतीच्या (जाण्याच्या) अर्थात आहेत. हुळति. होळति. โรฬ อนาทเร. โรฬติ. ‘रोळ्’ धातू अनादर करणे या अर्थात आहे. रोळति. โลฬ อุมฺมาเท. โลยติ. ‘लोळ्’ धातू उन्माद (वेडेपणा) या अर्थात आहे. लोयति. เหฬ โหฬ อนาทเร. เหฬติ. โหฬติ. ‘हेळ्’ आणि ‘होळ्’ धातू अनादर करणे या अर्थात आहेत. हेळति. होळति. วาฬ อาลเป. วาฬติ. ‘वाळ्’ धातू बोलणे (आलाप करणे) या अर्थात आहे. वाळति. ทาฬ ธาฬ วิสรเณ. ทาฬติ. ธาฬติ. ‘दाळ्’ आणि ‘धाळ्’ धातू पसरणे (विखुरणे) या अर्थात आहेत. दाळति. dhāळति. หฬ สิลาฆายํ. หฬติ. ‘हळ्’ धातू प्रशंसा करणे या अर्थात आहे. हळति. หีฬ อนาทเร. หีฬติ. หีฬา, หีฬิโก, หีฬิโต. ‘हीळ्’ धातू अनादर करणे या अर्थात आहे. हीळति. हीळा, हीळिको, हीळितो. กฬ [Pg.201] เสจเน. กฬติ. กฬนํ. ‘कळ्’ धातू सिंचन करणे या अर्थात आहे. कळति. कळनं. เหฬ เวฐเน. เหฬติ. ‘हेळ्’ धातू वेढणे (वेष्टन करणे) या अर्थात आहे. हेळति. อีฬ ถุติยํ. อีฬติ. ‘ईळ्’ धातू स्तुती करणे या अर्थात आहे. ईळति. ชุฬ คติยํ. ชุฬติ, โชฬติ. ‘जुळ्’ धातू गतीच्या (जाण्याच्या) अर्थात आहे. जुळति, जोळति. ปุฬ มุฬ สุขเน. ปุฬติ. มุฬติ. ‘पुळ्’ आणि ‘मुळ्’ धातू सुखाच्या (आनंदाच्या) अर्थात आहेत. पुळति. मुळति. คุฬ รกฺขายํ. คุฬติ. คุโฬ. ‘गुळ्’ धातू रक्षण करणे या अर्थात आहे. गुळति. गुळो. ชุฬ พนฺธเน. ชุฬติ. ‘जुळ्’ धातू बांधणे या अर्थात आहे. जुळति. กุฬ ฆสเน. กุฬติ. ‘कुळ्’ धातू घासणे (किंवा खाणे) या अर्थात आहे. कुळति. ขุฬ พาลฺเย จ. จกาโร ฆสนาเปกฺขโก. ขุฬติ. ‘खुळ्’ धातू बालपण आणि घासणे (खाणे) या अर्थात आहे. ‘च’ कार घासण्याच्या (खाण्याच्या) अपेक्षेने आहे. खुळति. สุฬ พุฬ สํวรเณ. สุฬติ. พุฬติ. सुळ, बुळ संवरणात (संवरण करणे/झाकणे). सुळति. बुळति. ปุฬ สงฺฆาเต. ปุฬติ. ปุฬินํ. पुळ संघात (एकत्र करणे/समूह करणे) या अर्थात. पुळति. पुळिनं (वाळूचा किनारा/वाळूचा ढीग). สฬ อพฺยตฺตสทฺเท. สฬติ. สาฬิโก, สาฬิกา. सळ अव्यक्त शब्दात (अस्पष्ट आवाज करणे). सळति. साळिको, साळिका (साळुंकी पक्षी). ‘‘อุสโภว มหี นทติ,มิคราชาว กูชติ; สุสุมาโรว สฬติ,กึ วิปาโก ภวิสฺสตี’’ติ นิทสฺสนํ; “बैलाप्रमाणे पृथ्वीवर गर्जना करतो, मृगराज (सिंहा) प्रमाणे ओरडतो; सुंसाराप्रमाणे (मगरीप्रमाणे) सळसळ करतो (पाण्यात आवाज करतो), याचा काय विपाक (परिणाम) होईल?” हे उदाहरण आहे. อิมานิ ฬการนฺตธาตุรูปานิ. ही 'ळ' कारान्त धातूंची रूपे आहेत. อิติ ภูวาทิคเณ อวคฺคนฺตธาตุรูปานิ สมตฺตานิ. เอตฺตาวตา สพฺพาปิ ภูวาทิคเณ ธาตุโย ปกาสิตา. अशा प्रकारे भूवादि गणातील अवर्गान्त (वर्गाबाहेरील व्यंजनांनी शेवट होणारे) धातूंची रूपे समाप्त झाली. एवढ्याने भूवादि गणातील सर्वच धातू प्रकाशित (स्पष्ट) झाले आहेत. อิทานิ ภูวาทิคณิกธาตูนํเยว กาจิ อสมานสุติกา, กาจิ อสมานนฺติกา. ตาสุ กาจิ สมานตฺถวเสน สโมธาเนตฺวา ปุพฺพาจริเยหิ วุตฺตา, ตาเยว ธาตุโย เอกเทเสน รูปวิภาวนาทีหิ สทฺธึ ปกาสยิสฺสาม. ตํ ยถา? आता भूवादि गणातीलच काही धातू असमान ध्वनीचे (उच्चाराचे) आहेत, तर काही असमान शेवटाचे (अन्ताचे) आहेत. त्यांपैकी काही धातू समान अर्थाच्या आधारे एकत्रित करून पूर्वाचार्यांनी सांगितले आहेत, तेच धातू आम्ही अंशतः रूपविभावन (रूपांचे स्पष्टीकरण) इत्यादींसह प्रकाशित करू. ते कसे? หู [Pg.202] ภู สตฺตายํ โหติ, ภวติ. ปโหติ, ปภวติ. หุเวยฺย ปาวุโส. สเจ อุปฺปาโท เหยฺย. อเชสิ ยกฺโข นรวีรเสฏฺฐํ, ตตฺถปฺปนาโท ตุมุโล พหูว. อมฺพา’ยํ อหุวา ปุเร. อหุ ราชา วิเทหานํ. ปหูตํ เม ธนํ สกฺก. ปหูตมริโย ปกโรติ ปุญฺญํ. ปหูตวิตฺโต ปุริโส. ปหูตชิวฺโห ภควา. ปิยปฺปภูตา กลหา วิวาทา. ปจฺฉาสมเณน โหตพฺพํ. ภวิตพฺพํ. โหตุํ, เหตุเย, ภวิตุํ. หุตฺวา, หุตฺวาน. ภวิตฺวา, ภวิตฺวาน. सत्तेच्या (अस्तित्वाच्या) अर्थात 'हू' आणि 'भू' धातूंचे 'होति' (hoti) आणि 'भवति' (bhavati) असे होते. 'पहोति' (pahoti), 'पभवति' (pabhavati). 'हुवेय्य आवुसो' (हे मित्रा, असे असावे). 'सचे उप्पादो हेय्य' (जर उत्पत्ती झाली असती). 'अजेसि यक्खो नरवीरसेट्ठं, तत्थप्पनादो तुमुलो बहूव' (यक्षाने नरवीरांमध्ये श्रेष्ठ असलेल्याला जिंकले, तेथे मोठा कोलाहल झाला). 'अम्बाऽयं अहुवा पुरे' (ही पूर्वी माता होती). 'अहु राजा विदेहानं' (विदेहांचा राजा होता). 'पहूतं मे धनं सक्क' (हे शक्रा, माझ्याजवळ भरपूर धन आहे). 'पहूतमरियो पकरोति पुञ्ञं' (आर्य भरपूर पुण्य करतो). 'पहूतवित्तो पुरिसो' (भरपूर संपत्ती असलेला मनुष्य). 'पहूतजिव्हो भगवा' (भगवान विस्तीर्ण जिभेचे आहेत). 'पियप्पभूता कलहा विवादा' (प्रिय गोष्टींपासून कलह आणि विवाद निर्माण होतात). 'पच्छासमणेन होतब्बं' (पश्चात-श्रमण/अनुगामी श्रमण व्हावे). 'भवितब्बं' (व्हावे/असावे). 'होतुं', 'हेतुये', 'भवितुं' (होण्यासाठी). 'हुत्वा', 'हुत्वान' (होऊन). 'भवित्वा', 'भवित्वान' (होऊन). เอตฺถ ปน ‘‘อตฺถิ เหหิติ โส มคฺโค, น โส สกฺกา น เหตุเย’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ตตฺถ นเหตุเยติ อภวิตุํ. หูธาตุโต ตุํปจฺจยสฺส ตเวปจฺจยสฺส วา ตุเย อาเทโส, อูการสฺส จ เอการาเทโส กโตติ ทฏฺฐพฺพํ. อถ วา เหตุภาวาย น น สกฺกาติปิ อตฺโถ. อยํ ปนตฺโถ อิธ นาธิปฺเปโต, ปุริโมเยวตฺโถ อธิปฺเปโต โหติสฺส ธาตุโน ปโยคภาวาย อุทาหริตปทสฺสตฺถภาวโต. ตตฺถ ปโหตีติ อิทํ วตฺถํ วิปุลภาเวน จีวรํ กาตุํ ปโหติ, โน นปฺปโหติ. ปโหตีติ วา ปุริโส อรโย เชตุํ สกฺโกติ. อถ วา ปโหตีติ โหติ. ปภวตีติ สนฺทติ. ปหูตนฺติ วิปุลํ, มหนฺตนฺติ อตฺโถ. ปหูตวิตฺโตติ วิปุลวิตฺโต มหทฺธโน. ปหูตชิวฺโหติ สุปุถุลสุทีฆสุมุทุกชิวฺโห, ปิยปฺปภูตาติ ปิยโต นิพฺพตฺตา. येथे “अत्थि हेहिति सो मग्गो, न सो सक्का न हेतुये” (तो मार्ग असेल, तो न होणे शक्य नाही) हे पाळी उदाहरण आहे. तेथे 'नहेतुये' म्हणजे 'अभवितुं' (न होणे). 'हू' धातूपासून 'तुं' प्रत्यय किंवा 'तवे' प्रत्ययाच्या जागी 'तुये' असा आदेश होतो आणि 'ऊ' काराचा 'ए' कार असा आदेश होतो, असे समजावे. किंवा, 'हेतुभावासाठी अशक्य नाही' असाही अर्थ होतो. परंतु हा अर्थ येथे अभिप्रेत नाही, पूर्वीचाच अर्थ अभिप्रेत आहे, कारण 'हु' धातूच्या प्रयोगासाठी उदाहरणात दिलेल्या शब्दाचा तोच अर्थ होतो. तेथे 'पहोति' म्हणजे: हे वस्त्र विपुल असल्यामुळे चीवर बनवण्यासाठी पुरेसे आहे (पहोति), अपुरे नाही (नो नप्पहोति). किंवा 'पहोति' म्हणजे मनुष्य शत्रूंना जिंकण्यास समर्थ होतो. किंवा 'पहोति' म्हणजे 'होति' (होतो). 'पभवति' म्हणजे वाहते (सन्दति) किंवा उत्पन्न होते. 'पहूतं' म्हणजे विपुल, मोठे असा अर्थ आहे. 'पहूतवित्तो' म्हणजे विपुल संपत्ती असलेला, महाधनी. 'पहूताजिव्हो' म्हणजे अत्यंत विस्तीर्ण, अत्यंत लांब आणि अत्यंत मऊ जीभ असलेले (भगवान). 'पियप्पभूता' म्हणजे प्रियापासून (आवडत्या गोष्टीपासून) उत्पन्न झालेले. คมุ สปฺป คติยํ. คจฺฉติ, คมติ, ฆมฺมติ, อาคจฺฉติ, อุคฺคจฺฉติ, อติคจฺฉติ, ปฏิคจฺฉติ, อวคจฺฉติ, อธิคจฺฉติ, อนุคจฺฉติ, อุปคจฺฉติ, อปคจฺฉติ, วิคจฺฉติ, นิคจฺฉติ, นิคฺคจฺฉติ. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. ‘‘สมุคฺคจฺฉตี’’ติอาทินา อุปสคฺคทฺวยวเสนปิ [Pg.203] ยถาสมฺภวํ โยเชตพฺพานิ. สปฺปติ, สํสปฺปติ, ปริสปฺปติ. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. गतीच्या (जाण्याच्या) अर्थात 'गमु' आणि 'सप्प' हे धातू आहेत. गच्छति, गमति, घम्मति (जातो), आगच्छति (येतो), उग्गच्छति (वर जातो/उदय पावतो), अतिगच्छति (ओलांडून जातो), पटिगच्छति (परत जातो), अवगच्छति (समजतो), अधिगच्छति (प्राप्त करतो/जाणतो), अनुगच्छति (मागोमाग जातो), उपगच्छति (जवळ जातो), अपगच्छति (दूर जातो), विगच्छति (नष्ट होतो/दूर जातो), निगच्छति (प्राप्त करतो), निग्गच्छति (बाहेर पडतो). इतरही जोडले जावेत. 'समुग्गच्छति' इत्यादींप्रमाणे दोन उपसर्गांच्या योगाने देखील यथासंभव जोडले जावेत. सप्पति (सरपटतो/जातो), संसप्पति (सरपटत जातो), परिसप्पति (भोवती सरपटतो). इतरही जोडले जावेत. ตตฺถ คมตีติ คจฺฉติ. การิเต ‘‘เทวทตฺตํ คเมติ คมยตี’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. ‘‘อปายํ คเมตีติ อปายคมนีย’’นฺติ อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. จุราทิคณํ ปตฺตสฺส อาปุพฺพสฺส อิมสฺส ‘‘อาคเมติ, อาคมยติ, อาคเมนฺโต, อาคมยมาโน’’ติ สุทฺธกตฺตุรูปานิ ภวนฺติ. तेथे 'गमति' म्हणजे 'गच्छति' (जातो). प्रयोजक (कारित) रूपात “देवदत्तं गमेति, गमयति” (देवदत्ताला पाठवतो) अशी रूपे होतात. “अपायं गमेतीति अपायगमनीयं” (जो अपायाप्रत नेतो तो अपायगमनीय) हे येथे उदाहरण आहे. चुरादि गणात गेलेल्या आणि 'आ' उपसर्ग पूर्व असलेल्या या धातूची “आगमेति, आगमयति, आगमेन्तो, आगमयामानो” अशी क्रियापदरूपे होतात. ตตฺถ อาคเมตีติ มุหุตฺตํ อธิวาเสตีติ อตฺโถ. ฆมฺมตีติ คจฺฉติ. อาคจฺฉตีติ อายาติ. อุคฺคจฺฉตีติ อุยฺยาติ อุทฺธํ คจฺฉติ. อติคจฺฉตีติ อติกฺกมิตฺวา คจฺฉติ. ปฏิคจฺฉตีติ ปุน คจฺฉติ. อวคจฺฉตีติ ชานาติ. อธิคจฺฉตีติ ลภติ ชานาติ วา. อนุคจฺฉตีติ ปจฺฉโต คจฺฉติ. อุปคจฺฉตีติ สมีปํ คจฺฉติ. อปคจฺฉตีติ อเปติ. วิคจฺฉตีติ วิคมติ. นิคจฺฉตีติ ลภติ. ‘‘ยสํ โปโส นิคจฺฉตี’’ติ อิทํ นิทสฺสนํ. นิคฺคจฺฉตีติ นิกฺขมติ. สปฺปตีติ คจฺฉติ. สํสปฺปตีติ สํสรนฺโต คจฺฉติ. ปริสปฺปตีติ สมนฺตโต คจฺฉติ. तेथे 'आगमेति' म्हणजे क्षणभर वाट पाहतो (मुहुत्तं अधिवासेति) असा अर्थ आहे. 'घम्मति' म्हणजे जातो (गच्छति). 'आगच्छति' म्हणजे येतो (आयाति). 'उग्गच्छति' म्हणजे वर जातो/उदय पावतो (उय्याति उद्धं गच्छति). 'अतिगच्छति' म्हणजे ओलांडून जातो (अतिक्कमित्वा गच्छति). 'पटिगच्छति' म्हणजे पुन्हा जातो (पुन गच्छति). 'अवगच्छति' म्हणजे जाणतो (जानाति). 'अधिगच्छति' म्हणजे प्राप्त करतो किंवा जाणतो (लभति जानाति वा). 'अनुगच्छति' म्हणजे मागोमाग जातो (पच्छतो गच्छति). 'उपगच्छति' म्हणजे जवळ जातो (समीपं गच्छति). 'अपगच्छति' म्हणजे दूर जातो (अपेति). 'विगच्छति' म्हणजे नष्ट होतो/दूर जातो (विगमति). 'निगच्छति' म्हणजे प्राप्त करतो (लभति). “यसं पोसो निगच्छति” (मनुष्य कीर्ती प्राप्त करतो) हे याचे उदाहरण आहे. 'निग्गच्छति' म्हणजे बाहेर पडतो (निक्खमति). 'सप्पति' म्हणजे जातो (गच्छति). 'संसप्पति' म्हणजे सरपटत/भटकत जातो (संसरन्तो गच्छति). 'परिसप्पति' म्हणजे चहूबाजूंनी सरपटतो/जातो (समन्ततो गच्छति). อิทานิ ปน วิญฺญูนํ สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเน ปรมโกสลฺลชนนตฺถํ สปฺปโยคํ ปทมาลํ กถยาม. เสยฺยถิทํ? โส คจฺฉติ, เต คจฺฉนฺติ, คจฺฉเร. ตฺวํ คจฺฉสิ, ตุมฺเห คจฺฉถ. อหํ คจฺฉามิ, มยํ คจฺฉาม. โส คจฺฉเต, เต คจฺฉนฺเต. ตฺวํ คจฺฉเส, ตุมฺเห คจฺฉวฺเห. อหํ คจฺเฉ, มยํ คจฺฉามฺเห. วตฺตมานาย รูปานิ. आता विद्वानांना (सुज्ञांना) अट्ठकथांसह असलेल्या तिपिटक बुद्धवचनात परम कौशल्य प्राप्त व्हावे म्हणून, प्रयोगासहित पदमाला (रूपावली) सांगतो. ती अशी: सो गच्छति (तो जातो), ते गच्छन्ति, गच्छरे (ते जातात). त्वं गच्छसि (तू जातोस), तुम्हे गच्छथ (तुम्ही जाता). अहं गच्छामि (मी जातो), मयं गच्छाम (आम्ही जातो). सो गच्छते, ते गच्छन्ते. त्वं गच्छसे, तुम्हे गच्छव्हे. अहं गच्छे, मयं गच्छाम्हे. ही वर्तमानकाळाची (वत्तमानाची) रूपे आहेत. โส คจฺฉตุ, เต คจฺฉนฺตุ. ตฺวํ คจฺฉาหิ, คจฺฉ, คจฺฉสฺสุ, ตุมฺเห คจฺฉถ. อหํ คจฺฉามิ, มยํ คจฺฉาม. โส คจฺฉตํ, เต คจฺฉนฺตํ. ตฺวํ คจฺฉสฺสุ, ตุมฺเห คจฺฉวฺโห. อหํ คจฺเฉ, มยํ คจฺฉามเส. ปญฺจมิยา รูปานิ. सो गच्छतु (तो जावो), ते गच्छन्तु (ते जावोत). त्वं गच्छाहि, गच्छ, गच्छस्सु (तू जा), तुम्हे गच्छथ (तुम्ही जा). अहं गच्छामि (मी जाऊ), मयं गच्छाम (आम्ही जाऊ). सो गच्छतं, ते गच्छन्तं. त्वं गच्छस्सु, तुम्हे गच्छव्हो. अहं गच्छे, मयं गच्छामसे. ही पंचमीची (आज्ञार्थ/Pañcamī ची) रूपे आहेत. โส [Pg.204] คจฺเฉยฺย, คจฺเฉ, เต คจฺเฉยฺยุํ. ตฺวํ คจฺเฉยฺยาสิ, ตุมฺเห คจฺเฉยฺยาถ. อหํ คจฺเฉยฺยามิ, มยํ คจฺเฉยฺยาม, คจฺเฉมุ. โส คจฺเฉถ, เต คจฺเฉรํ. ตฺวํ คจฺเฉโถ, ตุมฺเห คจฺเฉยฺยาวฺโห. อหํ คจฺเฉยฺยํ, มยํ คจฺเฉยฺยามฺเห. สตฺตมิยา รูปานิ. सो गच्छेय्य, गच्छे (त्याने जावे), ते गच्छेय्युं (त्यांनी जावे). त्वं गच्छेय्यासि (तू जावेस), तुम्हे गच्छेय्याथ (तुम्ही जावे). अहं गच्छेय्यामि (मी जावे), मयं गच्छेय्याम, गच्छेमु (आम्ही जावे). सो गच्छेथ, ते गच्छेरं. त्वं गच्छेथो, तुम्हे गच्छेय्याव्हो. अहं गच्छेय्यं, मयं गच्छेय्याम्हे. ही सप्तमीची (विध्यर्थ/Sattamī ची) रूपे आहेत. โส คจฺฉ, เต คจฺฉุ. ตฺวํ คจฺเฉ, ตุมฺเห คจฺฉิตฺถ, คญฺฉิตฺถ. อหํ คจฺฉํ, มยํ คจฺฉิมฺห, คญฺฉิมฺห. โส คจฺฉิตฺถ, คญฺฉิตฺถ, เต คจฺฉิเร. ตฺวํ คจฺฉิตฺโถ, ตุมฺเห คจฺฉิวฺโห. อหํ คจฺฉึ, คญฺฉึ, มยํ คจฺฉิมฺเห. ปโรกฺขาย รูปานิ. सो गच्छ, ते गच्छु. त्वं गच्छे, तुम्हे गच्छित्थ, गञ्चित्थ. अहं गच्छं, मयं गच्छिम्ह, गञ्चिम्ह. सो गच्छित्थ, गञ्चित्थ, ते गच्छिरे. त्वं गच्छित्तो, तुम्हे गच्छिव्हो. अहं गच्छिं, गञ्चिं, मयं गच्छिम्हे. ही परोक्षाची (परोक्खा - परोक्ष भूतकाळाची) रूपे आहेत. โส อคจฺฉา, เต อคจฺฉู. ตฺวํ อคจฺเฉ, ตุมฺเห อคจฺฉถ. อหํ อคจฺฉํ, มยํ อคจฺฉมฺหา. โส อคจฺฉถ, เต อคจฺฉตฺถุํ. ตฺวํ อคจฺฉเส, ตุมฺเห อคจฺฉิวฺหํ. อหํ อคจฺฉํ, มยํ อคจฺฉิมฺเห. อชฺชตนิยา รูปานิ. सो अगच्छा, ते अगच्छू. त्वं अगच्छे, तुम्हे अगच्छथ. अहं अगच्छं, मयं अगच्छम्हा. सो अगच्छथ, ते अगच्छत्थुं. त्वं अगच्छसे, तुम्हे अगच्छिव्हं. अहं अगच्छं, मयं अगच्छिम्हे. ही अद्यतनीची (अज्जतनी - सामान्य भूतकाळाची) रूपे आहेत. โส คจฺฉิสฺสติ, เต คจฺฉิสฺสนฺติ. ตฺวํ คจฺฉิสฺสสิ, ตุมฺเห คจฺฉิสฺสถ. อหํ คจฺฉิสฺสามิ, มยํ คจฺฉิสฺสาม. โส คจฺฉิสฺสเต, เต คจฺฉิสฺสนฺเต. ตฺวํ คจฺฉิสฺสเส, ตุมฺเห คจฺฉิสฺสวฺเห. อหํ คจฺฉิสฺสํ, มยํ คจฺฉิสฺสามฺเห. ภวิสฺสนฺติยา รูปานิ. सो गच्छिस्सति (तो जाईल), ते गच्छिस्सन्ति (ते जातील). त्वं गच्छिस्ससि (तू जाशील), तुम्हे गच्छिस्सथ (तुम्ही जाल). अहं गच्छिस्सामि (मी जाईन), मयं गच्छिस्साम (आम्ही जाऊ). सो गच्छिस्सते, ते गच्छिस्सन्ते. त्वं गच्छिस्ससे, तुम्हे गच्छिस्सव्हे. अहं गच्छिस्सं, मयं गच्छिस्साम्हे. ही भविष्यत्काळाची (भविस्सतीची) रूपे आहेत. โส อคจฺฉิสฺสา, เต อคจฺฉิสฺสํสุ. ตฺวํ อคจฺฉิสฺเส, ตุมฺเห อคจฺฉิสฺสถ. อหํ อคจฺฉิสฺสํ, มยํ อคจฺฉิสฺสามฺหา. โส อคจฺฉิสฺสถ, เต อคจฺฉิสฺสิสุ. ตฺวํ อคจฺฉิสฺสเส, ตุมฺเห อคจฺฉิสฺสวฺเห. อหํ อคจฺฉิสฺสํ, มยํ อคจฺฉิสฺสามฺหเส. กาลาติปตฺติยา รูปานิ. सो अगच्छिस्सा, ते अगच्छिस्सं सु. त्वं अगच्छिस्से, तुम्हे अगच्छिस्सथ. अहं अगच्छिस्सं, मयं अगच्छिस्साम्हा. सो अगच्छिस्सथ, ते अगच्छिस्सिसु. त्वं अगच्छिस्ससे, तुम्हे अगच्छिस्सव्हे. अहं अगच्छिस्सं, मयं अगच्छिस्सामसे. ही कालातिपत्तीची (काळाचा अतिपात दर्शवणाऱ्या रूपांची) रूपे आहेत. ตตฺถ อชฺชตนิยา กาลาติปตฺติยา จ อการาคมํ สพฺเพสุ ปุริเสสุ สพฺเพสุ วจเนสุ ลพฺภมานมฺปิ สาสเน อนิยตํ หุตฺวา ลพฺภตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ตถา หิ ‘‘อคจฺฉิ, คจฺฉิ, อคจฺฉิสฺสา, คจฺฉิสฺสา’’ติอาทินา ทฺเว ทฺเว รูปานิ ทิสฺสนฺติ. คมติ, คมนฺติ. คมตุ, คมนฺตุ. คเมยฺย. คเมยฺยุํ. เสสํ สพฺพํ วิตฺถาเรตพฺพํ. त्यामध्ये अद्यतनी (भूतकाळ) आणि कालातिपत्ती (संकेतार्थ) मध्ये 'अ'-काराचा आगम सर्व पुरुषांमध्ये आणि सर्व वचनांमध्ये प्राप्त होत असला तरी, बुद्धशासनात (व्याकरणात) तो अनियत (अनिवार्य नसलेला/वैकल्पिक) होऊन प्राप्त होतो, असे समजावे. तसेच, "अगच्छि, गच्छि, अगच्छिस्सा, गच्छिस्सा" इत्यादी दोन-दोन रूपे दिसून येतात. गमति, गमन्ति। गमतु, गमन्तु। गमेय्य, गमेय्युं। उर्वरित सर्व सविस्तर जाणावे. อิทานิ [Pg.205] ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีสุ วิเสโส วุจฺจเต – โส ปุริโส มคฺคํ ค, สา อิตฺถี ฆร’มาค. เต มคฺคํ คุ, ตา ฆร’มาคุ. เอการสฺส อการาเทสํ ตฺวํ มคฺคํ ค, ตฺวํ ฆร’’มาค. ตุมฺเห มคฺคํ คุตฺถ, ตุมฺเห ฆร’มาคุตฺถ. อหํ มคฺคํ คํ, อหํ ฆร’มาคํ. อหํ ตํ ปุริสํ อนฺวคํ, มยํ มคฺคํ คุมฺห, มยํ ฆรํ อาคุมฺห, มยํ ตํ ปุริสํ อนฺวคุมฺห. อยํ ตาว ปโรกฺขาย วิเสโส. आता परोक्षा, हिय्यत्तनी आणि अद्यतनी यांमधील विशेष नियम सांगितले जात आहेत – तो पुरुष मार्गाने गेला (सो पुरिसो मग्गं ग), ती स्त्री घरी आली (सा इत्थी घरं आग). ते मार्गाने गेले (ते मग्गं गु), त्या घरी आल्या (ता घरं आगु). 'ए' काराच्या जागी 'अ' कार आदेश होऊन – तू मार्गाने गेलास (त्वं मग्गं ग), तू घरी आलास (त्वं घरं आग). तुम्ही मार्गाने गेलात (तुम्हे मग्गं गुत्थ), तुम्ही घरी आलात (तुम्हे घरं आगुत्थ). मी मार्गाने गेलो (अहं मग्गं गं), मी घरी आलो (अहं घरं आगं). मी त्या पुरुषाच्या मागे गेलो (अहं तं पुरिसं अन्वगं), आम्ही मार्गाने गेलो (मयं मग्गं गुम्ह), आम्ही घरी आलो (मयं घरं आगुम्ह), आम्ही त्या पुरुषाच्या मागे गेलो (मयं तं पुरिसं अन्वगुम्ह). हा तर परोक्षेचा विशेष नियम आहे. ‘‘โส มคฺคํ อคมา, เต มคฺคํ อคมู’’ อิจฺจาทิ หิยฺยตฺตนิยา รูปํ. ‘‘โส อคมิ, เต อคมุํ, เต คุํ’’ อิจฺจาทิ อชฺชตนิยา รูปํ. "सो मग्गं अगमा (तो मार्गाने गेला), ते मग्गं अगमू (ते मार्गाने गेले)" इत्यादी हिय्यत्तनीची रूपे आहेत. "सो अगमि (तो गेला), ते अगमुं (ते गेले), ते गुं (ते गेले)" इत्यादी अद्यतनीची रूपे आहेत. อิทานิ เตสํ ปทรูปานิ ปากฏีกรณตฺถํ กิญฺจิ สุตฺตํ กถยาม – ‘‘โสปาคา สมิตึ วนํ. อเถตฺถ ปญฺจโม อาคา. อาคุํ เทวา ยสสฺสิโน. มาหํ กาโกว ทุมฺเมโธ, กามานํ วสมนฺวคํ. อคมา ราชคหํ พุทฺโธ. วงฺกํ อคมุ ปพฺพตํ. พฺราหฺมณา อุปคจฺฉุ ม’’นฺติ เอวมาทีนิ ภวนฺติ. आता त्या पदरूपांना स्पष्ट करण्यासाठी काही सूत्रांचे (वचनांचे) कथन करतो – "सो उपागा समितिंग वनं" (तो वनातील सभेमध्ये आला), "अथ एत्थ पञ्चमो आगा" (त्यानंतर येथे पाचवा आला), "आगुं देवा यसस्सिनो" (यशस्वी देव आले), "माहं काकोव दुम्मेधो, कामानं वसमन्वगं" (मी दुर्बुद्धी कावळ्याप्रमाणे कामाच्या आहारी गेलो), "अगमा राजगहं बुद्धो" (बुद्ध राजगृहाला गेले), "वङ्कं अगमु पब्बतं" (ते वंक पर्वतावर गेले), "ब्राह्मणा उपगच्छु मं" (ब्राह्मण माझ्याकडे आले) इत्यादी उदाहरणे आहेत. ค คุ ค คุตฺถ คํ คุมฺห, อคุ อคมุ อคมุํ; อคมา’คมิ คจฺฉนฺติ, อาทิเภทํ มเน กเร. ग, गु, ग, गुत्थ, गं, गुम्ह, अगु, अगमु, अगमुं; अगमा, अगमि, गच्छन्ति इत्यादी भेद मनात ठेवावेत. อิทานิ นามิกปทานิ วุจฺจนฺเต – คโต, คนฺตา, คจฺฉํ, คจฺฉนฺตี, คจฺฉนฺตํ กุลํ, สหคตํ, คติ, คมนํ, คโม, อาคโม, อวคโม, คนฺตพฺพํ, คมนียํ, คมฺมํ, คมฺมมานํ, คมิยมานํ, โค, มาตุคาโม, หิงฺคุ, ชคุ, อินฺทคู, เมธโค อิจฺจาทีนิ, การิเต – คจฺฉาเปติ, คจฺฉาปยติ, คจฺเฉติ, คจฺฉยติ, คมฺเมติ. กมฺเม – คมฺมติ, คมิยติ, อธิคมฺมติ, อธิคมิยติ. ตุมนฺตาทิตฺเต ‘‘คนฺตุํ, คมิตุํ, คนฺตฺวา, คนฺตฺวาน, คมิตฺวา, คมิตฺวาน, คมิย, คมิยาน, คมฺม, อาคมฺม, อาคนฺตฺวา, อธิคมฺม, อธิคนฺตฺวา’’ อิจฺจาทีนิ[Pg.206]. สปฺปธาตุสฺส ปน ‘‘สปฺโป, สปฺปินี, ปีฐสปฺปี, สปฺปิ’’ อิจฺจาทีนิ รูปานิ ภวนฺติ. आता नामिक पदे सांगितली जात आहेत – गतो, गन्ता, गच्छं, गच्छन्ती, गच्छन्तं कुलं, सहगतं, गति, गमनं, गमो, आगमो, अवगमो, गन्तब्बं, गमनीयं, गम्मं, गम्ममानं, गमियमानं, गो, मातुगामो, हिङ्गु, जगु, इन्दगू, मेधगो इत्यादी. कारित (प्रयोजक) मध्ये – गच्छापेति, गच्छापयति, गच्छेति, गच्छayati, गम्मेति. कर्मणि मध्ये – गम्मति, गमियति, अधिगम्मति, अधिगमियति. तुमुन्-प्रत्ययान्त इत्यादींमध्ये – "गन्तुं, गमितुं, गन्त्वा, गन्त्वान, गमित्वा, गमित्वान, गमिय, गमियान, गम्म, आगम्म, आगन्त्वा, अधिगम्म, अधिगन्त्वा" इत्यादी. 'सप्प' धातूची तर "सप्पो, सप्पिनी, पीठसप्पी, सप्पि" इत्यादी रूपे होतात. ตตฺถ สหคตสทฺโท ตพฺภาเว โวกิณฺเณ นิสฺสเย อารมฺมเณ สํสฏฺเฐติ อิเมสุ อตฺเถสุ ทิสฺสติ. ตตฺถ ‘‘ยายํ ตณฺหา โปโนพฺภวิกา นนฺทิราคสหคตา’’ติ ตพฺภาเว เวทิตพฺโพ, นนฺทิราคภูตาติ อตฺโถ. ‘‘ยายํ ภิกฺขเว วีมํสา โกสชฺชสหคตา โกสชฺชสมฺปยุตฺตา’’ติ โวกิณฺเณ เวทิตพฺโพ, อนฺตรนฺตรา อุปฺปชฺชมาเนน โกสชฺเชน โวกิณฺณาติ อยเมตฺถ อตฺโถ. ‘‘อฏฺฐิกสญฺญาสหคตํ สติสมฺโพชฺฌงฺคํ ภาเวตี’’ติ นิสฺสเย เวทิตพฺโพ, อฏฺฐิกสญฺญํ นิสฺสาย อฏฺฐิกสญฺญํ ภาเวตฺวา ปฏิลทฺธนฺติ อตฺโถ. ‘‘ลาภี โหติ รูปสหคตานํ วา สมาปตฺตีนํ อรูปสหคตานํ วา’’ติ อารมฺมเณ, รูปารูปารมฺมณานนฺติ อตฺโถ. ‘‘อิทํ สุขํ อิมาย ปีติยา สหคตํ สหชาตํ สมฺปยุตฺต’’นฺติ สํสฏฺเฐ, อิมิสฺสา ปีติยา สํสฏฺฐนฺติ อตฺโถ. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – त्यामध्ये 'सहगत' हा शब्द तद्भाव (त्या भावाने युक्त), वोकिण्ण (मिश्रित), निस्सय (आश्रय), आरम्मण (आलंबन) आणि संसट्ठ (संसृष्ट) या पाच अर्थांमध्ये दिसून येतो. त्यामध्ये "यायं तण्हा पोनोब्भविका नन्दिरागसहगता" (जी ही पुनरुत्पत्ती करणारी तृष्णा, नंदी आणि रागाने युक्त आहे) येथे 'तद्भाव' अर्थ समजावा, म्हणजेच 'नंदी आणि रागरूप झालेली' असा अर्थ आहे. "यायं भिक्खवे वीमंसा कोसज्जसहगता कोसज्जसम्पयुत्ता" (हे भिक्खूहो, जी ही मीमांसा आळसाने युक्त आणि आळसाने संप्रयुक्त आहे) येथे 'वोकिण्ण' (मिश्रित) अर्थ समजावा, म्हणजेच 'मध्ये-मध्ये उत्पन्न होणाऱ्या आळसाने मिश्रित' असा येथे अर्थ आहे. "अट्ठिकसञ्ञासहगतं सतिसम्बोज्झङ्गं भावेति" (अस्थिसंज्ञेने युक्त स्मृतिसंबोध्यंगाची भावना करतो) येथे 'निस्सय' (आश्रय) अर्थ समजावा, म्हणजेच 'अस्थिसंज्ञेचा आश्रय घेऊन, अस्थिसंज्ञेची भावना करून प्राप्त केलेले' असा अर्थ आहे. "लाभी होति रूपसहगतानं वा समापत्तीनं अरूपसहगतानं वा" (रूपयुक्त किंवा अरूपयुक्त समापत्तींचा लाभ घेणारा होतो) येथे 'आरम्मण' (आलंबन) अर्थ समजावा, म्हणजेच 'रूप आणि अरूप आलंबन असणाऱ्या' असा अर्थ आहे. "इदं सुखं इमाय पीतिया सहगतं सहजातं सम्पयुत्तं" (हे सुख या प्रीतीशी सहगत, सहजात आणि संप्रयुक्त आहे) येथे 'संसट्ठ' (संसृष्ट) अर्थ समजावा, म्हणजेच 'या प्रीतीशी संसृष्ट' असा अर्थ आहे. या संदर्भात असे म्हटले आहे – ตพฺภาเว เจว โวกิณฺเณ, นิสฺสยารมฺมเณสุ จ; สํสฏฺเฐ จ สหคต-สทฺโท ทิสฺสติ ปญฺจสุ; तद्भाव, वोकिण्ण (मिश्रित), निस्सय (आश्रय), आरम्मण (आलंबन) आणि संसट्ठ (संसृष्ट) या पाच अर्थांमध्ये 'सहगत' शब्द दिसून येतो. คตีติ คติคติ นิพฺพตฺติคภิ อชฺฌาสยคติ วิภวคติ นิปฺผตฺติคติ ญาณคตีติ พหุวิธา คติ นาม. 'गती' म्हणजे गतिगती, निब्बत्तिगती (उत्पत्ती गती), अज्झासयगती (अध्याशय गती), विभवगती, निप्फत्तिगती (निष्पत्ती गती) आणि जाणगती (ज्ञानगती) अशी बहुविध गती होय. ตตฺถ ‘‘ตํ คตึ เปจฺจ คจฺฉามี’’ติ จ ‘‘ยสฺส คตึ น ชานนฺติ, เทวา คนฺธพฺพมานุสา’’ติ จ อยํ คติคตินาม. ‘‘อิเมสํ [Pg.207] โข อหํ ภิกฺขูนํ สีลวนฺตานํ เนว ชานามิ คตึวา อคตึวา’’ติ อยํ นิพฺพตฺติคติ นาม. ‘‘เอวํ โข เต อหํ พฺรหฺเม คติญฺจ ชานามิ ชุติญฺจ ชานามี’’ติ อยํ อชฺฌาสยคติ นาม. ‘‘วิภโว คติ ธมฺมานํ, นิพฺพานํ อรหโต คตี’’ติ อยํ วิภวคติ นาม. ‘‘ทฺเว คติโย ภวนฺติ อนญฺญา’’ติ อยํ นิปฺผตฺติคติ นาม. ‘‘ตํ ตตฺถ คติมา ธิภิมา’’ติ จ ‘‘สุนฺทรํ นิพฺพานํ คโต’’ติ จ อยํ ญาณคติ นาม. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – त्यामध्ये "तं गतिं पेच्च गच्छामि" (मृत्यूनंतर मी त्या गतीला प्राप्त होईन) आणि "यस्स गतिं न जानन्ति, देवा गन्धब्बमानुसा" (ज्याची गती देव, गंधर्व आणि मनुष्य जाणत नाहीत) ही 'गतिगती' होय. "इमेसं खो अहं भिक्खूनं सीलवन्तानं नेव जानामि गतिंवा अगतिंवा" (या शीलवान भिक्खूंची गती किंवा अगती मी जाणत नाही) ही 'निब्बत्तिगती' (उत्पत्ती गती) होय. "एवं खो ते अहं ब्रह्मे गतिञ्च जानामि जुतिञ्च जानामि" (हे ब्रह्मा, अशा प्रकारे मी तुझी गती आणि तुझी द्युती जाणतो) ही 'अज्झासयगती' (अध्याशय गती) होय. "विभवो गति धम्मानं, निब्बानं अरहतो गती" (धर्मांचा विनाश ही गती आहे, आणि निर्वाण ही अरहंताची गती आहे) ही 'विभवगती' होय. "द्वे गतियो भवन्ति अनञ्ञा" (दोन गती निश्चित असतात) ही 'निप्फत्तिगती' (निष्पत्ती गती) होय. "तं तत्थ गतिमा धिभिमा" आणि "सुन्दरं निब्बानं गतो" (तो सुंदर निर्वाणाला गेला) ही 'जाणगती' (ज्ञानगती) होय. या संदर्भात असे म्हटले आहे – คติคตฺยญฺจ นิพฺพตฺยํ, วิภวชฺฌาสเยสุ จ; นิปฺผตฺติยญฺจ ญาเณ จ, คติสทฺโท ปวตฺตติ. गतिगती, निब्बत्ति (उत्पत्ती), विभव, अज्झासय (अध्याशय), निप्फत्ति (निष्पत्ती) आणि ज्ञान या अर्थांमध्ये 'गती' शब्द प्रवृत्त होतो. คจฺฉตีติ โค. มาตุยา สมภาวํ มิสฺสีภาวญฺจ คจฺฉติ ปาปุณาตีติ มาตุคาโม. โรคํ หึสนฺตํ คจฺฉตีติ หิงฺคุ. जो जातो तो 'गो'. जो मातेच्या समभावाला आणि संसर्गाला प्राप्त होतो, तो 'मातुगामो' (स्त्रीवर्ग). जो रोगाचा नाश करत जातो, तो 'हिङ्गु' (हिंग). อิมานิ ตสฺส นามานิ ही त्याची नावे आहेत: หิงฺคุ หิงฺคุชตุจฺเจว, ตถา หิงฺคุสิปาฏิกา; หิงฺคุชาตีติ กถิตา, วินยฏฺฐกถาย หิ. विनयअट्ठकथेमध्ये 'हिङ्गु', 'हिङ्गुजतु', तसेच 'हिङ्गुसिपाटिका' आणि 'हिङ्गुजाती' अशी नावे सांगितली आहेत. ชคูติ จุติโต ชาตึ คจฺฉตีติ ชคุ. อินฺทฺริเยน คจฺฉตีติ อินฺทคู. อถ วา อินฺทภูเตน กมฺมุนา คจฺฉตีติ อินฺทคุ. ‘‘หินฺทคู’’ติปิ ปาฬิ. ตตฺถ หินฺทนฺติ มรณํ. ตํ คจฺฉตีติ หินฺทคู. สพฺพเมตํ สตฺตาธิวจนํ, ลิงฺคโต ปุลฺลิงฺคํ. เมธโคติ อตฺตโน นิสฺสยญฺจ ปรญฺจ เมธมาโน หึสมาโน คจฺฉติ ปวตฺตตีติ เมธโค, กลโห. ‘‘ตโต สมฺมนฺติ เมธคา’’ติ เอตฺถ หิ กลโห เมธคสทฺเทน ภควตา วุตฺโต. คมิตฺวาติ เอตฺถ – 'जगु' म्हणजे जो च्युतीपासून (मरणापासून) जन्माकडे जातो तो 'जगु'. जो इंद्रियाने जातो तो 'इन्दगू'. किंवा जो इंद्रभूत (प्रधान) कर्माने जातो तो 'इन्दगु'. पाळीमध्ये 'हिन्दगू' असाही पाठ आहे. त्यामध्ये 'हिन्द' म्हणजे मरण; त्या मरणाकडे जो जातो तो 'हिन्दगू'. हे सर्व प्राण्यांचे वाचक शब्द आहेत आणि लिंगाच्या दृष्टीने पुल्लिंगी आहेत. 'मेधगो' म्हणजे जो स्वतःच्या आश्रयाला आणि दुसऱ्याला इजा (हिंसा) करत चालतो तो 'मेधगो', म्हणजेच कलह (भांडण). "ततो सम्मन्ति मेधगा" (त्यानंतर कलह शांत होतात) येथे भगवंतांनी 'मेधग' शब्दाने कलहाचाच उल्लेख केला आहे. 'गमित्वा' या संदर्भात – ‘‘อิสิวฺหยํ คมิตฺวาน, วินิตฺวา ปญฺจวคฺคิเย; ตโต วิเนสิ ภควา, คนฺตฺวา คนฺตฺวา ตหึ ตหิ’’นฺติ "ऋषिपतन (इसिपतन) येथे जाऊन आणि पंचवर्गीय भिक्खूंना विनीत (दीक्षित) करून, त्यानंतर भगवंतांनी तिथे तिथे जाऊन (इतर लोकांना) विनीत केले." อยํ [Pg.208] ปาฬิ นิทสฺสนํ. สปฺโปติ สปฺปตีติ สปฺโป, สํสปฺปนฺโต คจฺฉตีติ อตฺโถ. เตนาห อายสฺมา สาริปุตฺโต ‘‘โย กาเม ปริวชฺเชติ, สปฺปสฺเสว ปทาสิโร’’ติ อิมิสฺสา ปาฬิยา นิทฺเทเส ‘‘สปฺโป วุจฺจติ อหิ. เกนฏฺเฐน สปฺโป? สํสปฺปนฺโต คจฺฉตีติ สปฺโป. ภุชนฺโต คจฺฉตีติ ภุชโค. อุเรน คจฺฉตีติ อุรโค. ปนฺนสิโร คจฺฉตีติ ปนฺนโค. สรีเรน สปฺปตีติ สรีสโป. พิเล สยตีติ พิลาสโย. ทาฐา ตสฺส อาวุโธติ ทาฐาวุโธ. วิสํ ตสฺสโฆรนฺติ โฆรวิโส. ชิวฺหา ตสฺส ทุวิธาติ ทุชิวฺโห. ทฺวีหิ ชิวฺหาหิ รสํ สายตีติ ทฺวิรสญฺญู’’ติ. สปฺปินีติ อุรคี. ปีฐสปฺปีติ ปีเฐน สปฺปติ คจฺฉตีติ ปีฐสปฺปี, ปงฺคุโฬ. สปฺปีติ โย น ปริภุญฺชติ, ตสฺส พลายุวฑฺฒนตฺถํ สปฺปติ คจฺฉติ ปวตฺตตีติ สปฺปิ, ฆตํ. हे पाळीचे (मूळ पाठाचे) उदाहरण आहे. 'सप्पति' (सरपटतो) म्हणून तो 'सप्पो' (सर्प/साप), म्हणजेच सरपटत जाणारा असा अर्थ आहे. म्हणूनच आयुष्यमान सारिपुत्त म्हणाले आहेत— 'जो कामांचा (इच्छांचा) त्याग करतो, जसे सापाच्या डोक्याला पाय देणे टाळतो' या पाळीच्या निर्देशात (स्पष्टीकरणात) म्हटले आहे: 'सप्पो' म्हणजे 'अहि' (साप). कोणत्या अर्थाने 'सप्पो'? सरपटत जातो म्हणून 'सप्पो'. वाकडा-तिकडा (भुजंग) जातो म्हणून 'भुजगो'. छातीने (उराने) चालतो म्हणून 'उरगो'. डोके खाली करून चालतो म्हणून 'पन्नगो'. शरीराने सरपटतो म्हणून 'सरीसपो'. बिळात राहतो (शयन करतो) म्हणून 'बिलासयो'. दाढा हेच ज्याचे शस्त्र आहे तो 'दाठावुधो'. ज्याचे विष भयंकर आहे तो 'घोरविसो'. ज्याची जीभ दुभंगलेली (दोन प्रकारची) आहे तो 'दुजिव्हो'. दोन जिभांनी चव घेतो म्हणून 'द्विरसञ्ञू' (द्विरसज्ञ). 'सप्पिनी' म्हणजे मादी साप (नागीण). 'पीठसप्पी' म्हणजे पाटा किंवा पीठाच्या (आधाराने) सरपटत जाणारा, म्हणजेच 'पंगु' (अपंग). 'सप्पी' म्हणजे जो (सहजासहजी) उपभोगत नाही, परंतु त्याच्या बल आणि आयुष्याच्या वृद्धीसाठी जो प्रवृत्त होतो (जातो) तो 'सप्पी' म्हणजेच तूप (घृत). สกฺก เฏก ลงฺฆ คตฺยตฺตา. สกฺกติ, นิสกฺกติ, ปริสกฺกติ. นิสกฺโก, ปริสกฺกนํ. เฏกติ. ฏีกา. ลงฺฆติ, อุลฺลงฺฆติ, โอลงฺฆติ, ลงฺฆโก, อุลฺลงฺฆิกา ปีติ. 'सक्क', 'टेक', 'लङ्घ' हे धातू गतीच्या अर्थात आहेत. सक्कति (जातो/सरकतो), निसक्कति (बाहेर पडतो), परिसक्कति (सभोवताली फिरतो). निसक्को (बाहेर पडणे), परिसक्कनं (सभोवताली फिरणे). टेकति (जातो/टीका करतो). टीका. लङ्घति (उडी मारतो/ओलांडतो), उल्लङ्घति (उल्लंघन करतो), ओलङ्घति (खाली उडी मारतो), लङ्घको (उडी मारणारा), उल्लङ्घिका पीति (उल्लंघन करणारी प्रीती/अतिशय आनंद). เก เร เค สทฺเท. กายติ. รายติ. คายติ. ชาตกํ. รา. คีตํ. กายิตุํ. รายิตุํ, คายิตุํ. กายิตฺวา. รายิตฺวา. คายิตฺวา. 'के', 'रे', 'गे' हे धातू आवाजाच्या (शब्दाच्या) अर्थात आहेत. कायति (ध्वनी करतो/बोलतो). रायति (ओरडतो/ध्वनी करतो). गायति (गातो). जातकं (जातक). रा (आवाज). गीतं (गीत). कायितुं (बोलण्यासाठी). रायितुं, गायितुं (ओरडण्यासाठी, गाण्यासाठी). कायित्वा (बोलून). रायित्वा (ओरडून). गायित्वा (गाऊन). ตตฺถ ชาตกนฺติ ชาตํ ภูตํ อตีตํ อตฺตโน จริตํ กายติ กเถติ ภควา เอเตนาติ ชาตกํ. ชาตกปาฬิ หิ อิธ ชาตกนฺติ วุตฺตํ. อญฺญตฺร ปน ชาตํ เอวํ ชาตกนฺติ คเหตพฺพา. ตถา หิ ชาตกสทฺโท ปริยตฺติยมฺปิ วตฺตติ ‘‘อิติวุตฺตกํ ชาตกํ อพฺภุตธมฺม’’นฺติอาทีสุ, ชาติยมฺปิ วตฺตติ ‘‘ชาตกํ สโมธาเนสี’’ติอาทีสุ. รา วุจฺจติ สทฺโท. คีตนฺติ คายนํ. तेथे 'जातक' म्हणजे— ज्याद्वारे भगवान स्वतःचे झालेले, घडून गेलेले, भूतकाळातील चरित्र 'कायति' म्हणजे सांगतात (कथन करतात), ते 'जातक' होय. येथे 'जातकपाळी'लाच 'जातक' म्हटले आहे. इतर ठिकाणी मात्र 'जातं' (झालेले) म्हणजेच 'जातक' असे समजावे. तसेच 'जातक' हा शब्द परियत्तीमध्ये (बुद्धवचनात) देखील वापरला जातो, जसे की 'इतिवृत्तक, जातक, अब्भुतधम्म' इत्यादींमध्ये; आणि जन्माच्या अर्थातही वापरला जातो, जसे की 'जातकं समोधानेसि' (जातकाचा मेळ घातला) इत्यादींमध्ये. 'रा' म्हणजे शब्द (आवाज) म्हटला जातो. 'गीतं' म्हणजे गायन. เข [Pg.209] เช เส ขเย. ขายติ. ชายติ. สายติ. ขยํ คจฺฉตีติ อตฺโถ. 'खे', 'जे', 'से' हे धातू क्षय (नाश) होण्याच्या अर्थात आहेत. खायति. जायति. सायति. (या सर्वांचा) 'क्षयाला जाणे' (नाश पावणे) असा अर्थ आहे. เอตฺถ ปน สิยา ‘‘นนุ จ โภ ขายตีติ ปทสฺส ขาทตีติ วา ปญฺญายตีติ วา อตฺโถ ภวติ, ตถา ชายตีติ ปทสฺส นิพฺพตฺตตีติ อตฺโถ, สายตีติ ปทสฺส รสํ อสฺสาเทตีติ อตฺโถ, เอวํ สนฺเต โภ กสฺมา อิธ เอวํ อตฺโถ ตุมฺเหหิ กถิยตี’’ติ? สจฺจํ, ธาตูนนฺตุ อเนกตฺถตฺตา เอวํ อตฺโถ กเถตุํ ลพฺภติ. ตถา หิ ‘‘อปฺปสฺสุตายํ ปุริโส, พลิพทฺโทว ชีรตี’’ติ เอตฺถ ชีรตีติ อยํ สทฺโท ชรํ ปาปุณาตีติ อตฺถํ อวตฺวา วฑฺฒตีติ อตฺถเมว วทติ, เอวํ สมฺปทมิทํ ทฏฺฐพฺพํ. परंतु येथे अशी शंका येऊ शकते की, 'अहो, 'खायति' या पदाचा अर्थ 'खातो' किंवा 'दिसतो/प्रकट होतो' असा होतो; तसेच 'जायति' या पदाचा अर्थ 'उत्पन्न होतो' असा होतो; आणि 'सायति' या पदाचा अर्थ 'चव घेतो' असा होतो; असे असताना, अहो, तुम्ही येथे असा (क्षय होण्याचा) अर्थ का सांगत आहात?' हे सत्य आहे, परंतु धातूंचे अनेक अर्थ असल्यामुळे असा अर्थ सांगता येतो. जसे की, 'अप्पस्सुतायं पुरिसो, बलिबद्दोव जीरति' (हा अल्पश्रुत मनुष्य बैलाप्रमाणे जीर्ण होतो/वाढतो) येथे 'जीरति' हा शब्द 'वृद्धत्व प्राप्त करतो' हा अर्थ न सांगता 'वाढतो' (केवळ शरीराने वाढतो) हाच अर्थ सांगतो, त्याचप्रमाणे हे देखील समजले पाहिजे. คุ ฆุ กุ อุ สทฺเท. ควติ. ฆวติ. กวติ. อวติ. 'गु', 'घु', 'कु', 'उ' हे धातू आवाजाच्या (शब्दाच्या) अर्थात आहेत. गवति. घवति. कवति. अवति. ขุ รุ กุ สทฺเท. โขติ. โรติ. โกติ. 'खु', 'रु', 'कु' हे धातू आवाजाच्या (शब्दाच्या) अर्थात आहेत. खोति. रोति. कोति. จุ ชุ ปุ ปฺลุ คา เส คติยํ. จวติ. ชวติ. ปวติ. ปฺลวติ. คาติ. เสติ. จวนํ, จุติ. ชวนํ, ชโว. ปวนํ, ปฺลวนํ. คานํ. เสตุ. โปโต. ปฺลโว. 'चु', 'जु', 'पु', 'प्लु', 'गा', 'से' हे धातू गतीच्या (जाण्याच्या) अर्थात आहेत. चवति (च्युत होतो/मरण पावतो). जवति (वेगाने जातो). पवति (वाहतो/जातो). प्लवति (पोहतो/तरंगतो). गाति (जातो). सेति (झोपतो/जातो). चवनं, चुति (च्युती/मृत्यू). जवनं, जवो (वेग/वेगवान गती). पवनं, प्लवनं (पोहणे/तरंगणे). गानं (गमन/जाणे). सेतु (पूल). पोतो (नाव/जहाज). प्लवो (नाव/तरफा). เอตฺถ คานนฺติ คมนํ. โปโตติ ปวติ คจฺฉติ อุทเก เอเตนาติ โปโต, นาวา. ตถา ปฺลวติ น สีทตีติ ปฺลโว, นาวา เอว. ‘‘ภินฺนปฺลโว สาครสฺเสว มชฺเฌ’’ติ หิ ชาตกปาฬิ ทิสฺสติ. ‘‘นาวา, โปโต, ปฺลโว, ชลยานํ, ตรณ’’นฺติ นาวาภิธานานิ. येथे 'गानं' म्हणजे गमन (जाणे). 'पोतो' म्हणजे ज्याच्याद्वारे पाण्यात 'पवति' म्हणजे गमन केले जाते (प्रवास केला जातो) ती 'पोतो' म्हणजेच नौका (नाव). तसेच जो 'प्लवति' म्हणजे बुडत नाही तो 'प्लवो' म्हणजेच नौकाच होय. कारण जातकपाळीमध्ये 'भिन्नप्लवो सागरस्सेव मज्झे' (समुद्राच्या मध्यभागी फुटलेल्या नौकेप्रमाणे) असे आढळते. 'नावा, पोतो, प्लवो, जलयानं, तरणं' ही नौकेची (नावेची) नावे (समानार्थी शब्द) आहेत. เธ เถ สทฺทสงฺฆาเตสุ. ธายติ. ถายติ. ภาเว – ธิยติ, ถิยติ. อิตฺถี. ถี. 'धे', 'थे' हे धातू आवाज आणि समूहाच्या अर्थात आहेत. धायति. थायति. भावार्थात – धियति, थियति. इत्थी (स्त्री). थी (स्त्री). เท เต ปาลเน. ทายติ. ทยา. ตาณํ. 'दे', 'ते' हे धातू रक्षणाच्या अर्थात आहेत. दायति. दया. ताणं (त्राण/रक्षण). รา ลา อาทาเน. ราติ. ลาติ. 'रा', 'ला' हे धातू ग्रहण करण्याच्या (घेण्याच्या) अर्थात आहेत. राति. लाति. อติ อทิ พนฺธเน. อนฺตติ. อนฺทติ. อนฺตํ. อนฺทุ. 'अति', 'अदि' हे धातू बांधण्याच्या अर्थात आहेत. अन्तति. अन्दति. अन्त (आतडे/मर्यादा). अन्दु (साखळी/बेडी). ชุตสุภ [Pg.210] รุจ ทิตฺติยํ. โชตติ. โสภติ. โรจติ, วิโรจติ. 'जुत', 'सुभ', 'रुच' हे धातू दीप्तीच्या (प्रकाशाच्या/शोभेच्या) अर्थात आहेत. जोतति (प्रकाशतो). सोभति (शोभतो). रोचति, विरोचति (आवडतो, विशेष शोभतो). อก อค กุฏิลายํ คติยํ. อกติ. อคติ. 'अक', 'अग' हे धातू वक्र (वाकड्या) गतीच्या अर्थात आहेत. अकति. अगति. นาถ นาธ ยาจโนปตาปิสฺสริยาสีสาสุ. นาถติ. นาธติ. 'नाथ', 'नाध' हे धातू याचना (मागणी), उपताप (त्रास देणे), ऐश्वर्य (प्रभुत्व) आणि आशिष (इच्छा) या अर्थांमध्ये आहेत. नाथति. नाधति. สล หุล จล กมฺปเน. สลติ. หุลติ. จลติ. กุสลํ. 'सल', 'हुल', 'चल' हे धातू कंपनाच्या (थरथरण्याच्या/हलण्याच्या) अर्थात आहेत. salati. hulati. calati. कुसलं (कुशल). เอตฺถ จ กุจฺฉิเต ปาปเก ธมฺเม สลยตีติ กุสลํ, เหตุกตฺตุวเสนิทํ นิพฺพจนํ ทฏฺฐพฺพํ. ตถา หิ อฏฺฐสาลินิยํ ‘‘กุจฺฉิเต ปาปเก ธมฺเม สลยนฺติ จลยนฺติ กมฺเปนฺติ วิทฺธํเสนฺตีติ กุสลา’’ติ เหตุกตฺตุวเสน อตฺโถ กถิโต. อิทํ สลธาตุวเสน กุสลสทฺทสฺส นิพฺพจนํ. อญฺเญสมฺปิ ธาตูนํ วเสน กุสลสทฺทสฺส นิพฺพจนํ ภวติ. ตถา หิ อฏฺฐสาลินิยํ อญฺญานิปิ นิพฺพจนานิ ทสฺสิตานิ. กถํ? ‘‘กุจฺฉิเตน วา อากาเรน สยนฺตีติ กุสา, เต อกุสลธมฺมสงฺขาเต กุเส ลุนนฺติ ฉินฺทนฺตีติ กุสลา. กุจฺฉิตานํ วา สานโต ตนุกรณโต ญาณํ กุสํ นาม, เตน กุเสน ลาตพฺพาติ กุสลา, คเหตพฺพา ปวตฺเตตพฺพาติ อตฺโถ. ยถา วา กุสา อุภยภาคคตํ หตฺถปฺปเทสํ ลุนนฺติ, เอวมิเมปิ อุปฺปนฺนานุปฺปนฺนภาเวน อุภยภาคคตํ กิเลสปกฺขํ ลุนนฺติ, ตสฺมา กุสา วิย ลุนนฺตีติปิ กุสลา’’ติ. เอวํ อญฺญานิปิ นิพฺพจนานิ ทสฺสิตานิ. ตตฺร ‘‘ธมฺมา’’ อิติ ปทาเปกฺขํ กตฺวา ตทนุรูปลิงฺควจนวเสน ‘‘กุสลา’’ติ นิทฺเทโส กโต, อิธ ปน สามญฺญนิทฺเทสวเสน ‘‘กุสล’’นฺติ นปุํสเกกวจนนิทฺเทโส อมฺเหหิ กโต. ปุญฺญวาจโก หิ กุสลสทฺโท อาโรคฺยวาจโก จ เอกนฺเตน นปุํสกลิงฺโค, อิตรตฺถวาจโก ปน ติลิงฺคิโก, ยถา กุสโล ผสฺโส, กุสลา เวทนา. กุสลํ จิตฺตนฺติ. กุสลสทฺโท [Pg.211] อิมสฺมึ ภูวาทิคเณ ลาธาตุสลธาตุวเสน นิปฺผตฺตึ คโตติ เวทิตพฺโพ. อิติ ภูวาทิคเณ สโมธานคตธาตุโย สมตฺตา. आणि येथे, जे निंद्य, पापी धर्मांना 'सलयति' म्हणजे कंपित करतात (नष्ट करतात) ते 'कुसलं' (कुशल) होय; हे प्रयोजक कर्तृत्वाच्या (हेतुकर्तृत्वाच्या) दृष्टीने व्युत्पत्तीचे लक्षण समजले पाहिजे. तसेच 'अट्ठसालिनी'मध्ये म्हटले आहे— 'जे निंद्य, पापी धर्मांना कंपित करतात, हलवतात, थरथरवून सोडतात, नष्ट करतात ते कुशल होत' असा प्रयोजक अर्थ सांगितला आहे. ही 'सल' धातूच्या आधारे 'कुशल' शब्दाची व्युत्पत्ती आहे. इतर धातूंच्या आधारेही 'कुशल' शब्दाची व्युत्पत्ती होते. तसेच 'अट्ठसालिनी'मध्ये इतरही व्युत्पत्ती दाखवल्या आहेत. कशा प्रकारे? 'जे निंद्य किंवा वाईट रीतीने शयन करतात (पडून राहतात) ते 'कुस' (अकुशल धर्म) होत; त्या अकुशल धर्म नावाच्या कुसांना जे 'लुनन्ति' म्हणजे कापतात, नष्ट करतात ते 'कुसला' (कुशल) होत. किंवा निंद्य गोष्टींचे 'सान' म्हणजे क्षीण (कमी) करण्यामुळे ज्ञानाला 'कुस' म्हणतात; त्या कुसाने (ज्ञानाने) जे ग्रहण केले पाहिजे ते 'कुसला' (कुशल), म्हणजेच ग्रहण करण्यायोग्य किंवा प्रवृत्त करण्यायोग्य असा अर्थ आहे. किंवा ज्याप्रमाणे 'कुस' (दर्भ/कुश नावाचे गवत) दोन्ही बाजूंनी हाताला कापते, त्याचप्रमाणे हे (कुशल धर्म) देखील उत्पन्न झालेल्या आणि उत्पन्न न झालेल्या दोन्ही प्रकारच्या क्लेशपक्षाला कापतात, म्हणून कुशाप्रमाणे कापतात म्हणूनही 'कुसला' (कुशल) होत.' अशा प्रकारे इतरही व्युत्पत्ती दाखवल्या आहेत. तेथे 'धम्मा' (धर्म) या पदाची अपेक्षा ठेवून, त्यानुसार लिंग व वचनाच्या आधारे 'कुसला' (पुल्लिंगी बहुवचन) असा निर्देश केला आहे, परंतु येथे सामान्य निर्देशानुसार आम्ही 'कुसलं' असा नपुंसकलिंगी एकवचनी निर्देश केला आहे. कारण पुण्यवाचक आणि आरोग्यवाचक असलेला 'कुसल' शब्द निश्चितपणे नपुंसकलिंगी असतो, परंतु इतर अर्थांचा वाचक असलेला शब्द तिन्ही लिंगांत चालतो; जसे की— 'कुसलो फस्सो' (कुशल स्पर्श), 'कुसला वेदना' (कुशल वेदना), 'कुसलं चित्तं' (कुशल चित्त). 'कुसल' शब्द या भूवादी गणात 'ला' धातू आणि 'सल' धातूच्या आधारे निष्पन्न झाला आहे, असे समजावे. अशा प्रकारे भूवादी गणातील एकत्रित केलेले धातू समाप्त झाले. อิจฺเจวํ – अशा प्रकारे – วิตฺถารโต จ สงฺเขปา, ภูวาทีนํ คโณ มยา; โย วิภตฺโต สอุทฺเทโส, สนิทฺเทโส ยถารหํ. माझ्याद्वारे भूवादी गणाचे सविस्तर आणि संक्षेपाने, उद्देशासह (सूत्रांसह) आणि निर्देशानुसार (उदाहरणांसह) योग्य प्रकारे वर्गीकरण केले गेले आहे. อุปสคฺคนิปาเตหิ, นานาอตฺถยุเตหิ จ; โยเชตฺวาน ปทาเนตฺถ, ทสฺสิตานิ วิสุํ วิสุํ. विविध अर्थांनी युक्त असलेल्या उपसर्ग आणि निपातांशी जोडून, येथील पदे वेगवेगळी करून दाखवली आहेत. ปาฬินิทสฺสนาทีหิ, ทสฺสิตานิ สเหว ตุ; ตฺยาทฺยนฺตานิ จ รูปานิ, สฺยานฺยนฺตานิ จ สพฺพโส. पाळीच्या (मूळ पाठाच्या) उदाहरणांसह, 'ति-आदी' (क्रियापद) प्रत्ययांनी युक्त रूपे आणि 'सि-आदी' (नाम) प्रत्ययांनी युक्त रूपे सर्व प्रकारे दाखवली आहेत. ปทานํ สทิสตฺตญฺจ, ตถา วิสทิสตฺตนํ; โจทนาปริหาเรหิ, สหิโต จตฺถนิจฺฉโย. पदांचे साधर्म्य (सारखेपणा) आणि वैधर्म्य (वेगळेपणा), तसेच आक्षेप आणि त्यांचे परिहार (शंका-समाधान) यांसह अर्थाचा निश्चय केला आहे. อตฺถุทฺธาโร’ภิธานญฺจ, ลิงฺคตฺตยวิมิสฺสนํ; อภิเธยฺยกลิงฺเคสุ, สวิเสสปทานิ จ. अर्थाचा उद्धार (स्पष्टीकरण), संज्ञा (नावे), तिन्ही लिंगांचे मिश्रण आणि विशेष्य व लिंगांमधील विशेष पदे (दाखवली आहेत). นานาปทพหุปฺปท-สโมธานญฺจ ทสฺสิตํ; รูฬฺหีสทฺทาทโย เจว, สุวิภตฺตา อนากุลา. विविध पदे आणि अनेक पदांचे एकत्रीकरण (समास) दाखवले आहे, तसेच रूढ शब्द इत्यादींचे स्पष्ट आणि गोंधळरहित वर्गीकरण केले आहे. สพฺพนามํ สพฺพนาม-สทิสานิ ปทานิ จ; นานาปเทหิ โยเชตุํ, ทสฺสิตานิ ยถารหํ. सर्वनाम आणि सर्वनामासारखे शब्द, विविध शब्दांशी जोडण्यासाठी, योग्यतेनुसार (यथायोग्य) दाखवले गेले आहेत. ตุมนฺตานิ จ รูปานิ, ตฺวาทฺยนฺตานิ จ วิญฺญูนํ; ปิฏเก ปาฏวตฺถาย, สพฺพเมตํ ปกาสิตํ. आणि 'तुम्' प्रत्ययान्त (तुमुन्-प्रत्ययान्त) रूपे आणि 'त्वा' प्रत्ययान्त रूपे, विद्वानांच्या पिटकातील प्राविण्यासाठी, हे सर्व प्रकाशित केले गेले आहे. เย สทฺทนีติมฺหิ อิมํ วิภาคํ,ชานนฺติ สมฺมา มุนิสาสเน เต; อตฺเถสุ สพฺเพสุปิ วีตกงฺขา,อจฺฉมฺภิโน สีหสมา ภวนฺติ. जे या 'सद्दनीति' मधील या विभागाला मुनींच्या (बुद्धांच्या) शासनात चांगल्या प्रकारे जाणतात, ते सर्व अर्थांविषयी शंकारहित होऊन, सिंहाप्रमाणे निर्भय बनतात. วิภูตภุตคฺคสยมฺภุจกฺเก[Pg.212],สุภูตภูรึ วทตา นรานํ; โย สทฺทนีติมฺหิ ภุวาทิกณฺโฑ,วุตฺโต มยา ตํ ภชถตฺถกาโม. ज्यांने प्राण्यांमध्ये श्रेष्ठ अशा स्वयंभूच्या चक्रात (धम्मचक्रात) मनुष्यांना विपुल सत्याचा उपदेश केला आहे, त्या 'सद्दनीति' मधील माझ्याद्वारे सांगितलेल्या 'भुवादि-कांडा'चे कल्याण इच्छिणाऱ्यांनी सेवन (अभ्यास) करावे. อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ अशा प्रकारे, अट्ठकथांसह नऊ अंगांनी युक्त अशा त्रिपिटकातील वचनमार्गांमध्ये विद्वानांच्या... โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ ...कौशल्यासाठी (प्राविण्यासाठी) रचलेल्या 'सद्दनीति' ग्रंथात... ปนฺนรสหิ ปริจฺเฉเทหิ มณฺฑิโต ภูวาทิคโณ นาม ...पंधरा परिच्छेदांनी (अध्यायांनी) सुशोभित असलेला 'भुवादिगण' नावाचा... โสฬสโม ปริจฺเฉโท. सोळावा परिच्छेद. ๑๗. รุธาทิฉกฺก १७. रुधादि-षट्क (रुधादि सहा धातूंचा समूह). รุธาทิคณิก रुधादिगणीय (रुधादि गणाशी संबंधित). อิโต ปรํ ปวกฺขามิ, รุธาทิกคณาทโย; สาสนสฺโสปการาย, คเณ ตุ ฉพฺพิเธ กถํ. यानंतर, शासनाच्या (बुद्धशासनाच्या) उपकारासाठी, मी रुधादि गणादींविषयी सांगेन की सहा प्रकारच्या गणांचे स्वरूप कसे आहे. รุธิ อาวรเณ. รุธิธาตุ อาวรเณ วตฺตติ. เอตฺถ อาวรณํ นาม ปิทหนํ วา ปริรุนฺธนํ วา ปลิพุทฺธนํ วา หริตุํ วา อปฺปทานํ, สพฺพเมตํ วฏฺฏติ. รุนฺธติ, รุนฺธิติ, รุนฺธีติ, รุนฺเธติ, อวรุนฺเธติ. กมฺมนิ – มคฺโค ปุริเสน รุนฺธิยติ. โรโธ, โอโรโธ, วิโรโธ, ปฏิวิโรโธ, วิรุทฺโธ, ปฏิวิรุทฺโธ, ปริรุทฺโธ. รุนฺธิตุํ, ปริรุนฺธิตุํ. รุนฺธิตฺวา. ปริรุนฺธิตฺวา. 'रुध्' (धातू) आवरण (रोखणे/झाकणे) या अर्थात आहे. 'रुध्' धातू आवरण अर्थात वापरला जातो. येथे 'आवरण' म्हणजे झाकणे, किंवा रोखणे, किंवा अडथळा आणणे, किंवा घेऊन जाण्यास न देणे, हे सर्व अर्थ लागू होतात. रुन्धति, रुन्धिति, रुन्धीति, रुन्धेति, अवरुन्धेति. कर्मणी प्रयोगात – 'मग्गो पुरिसेन रुन्धियति' (माणसाकडून रस्ता अडवला जातो). रोध, ओरोध, विरोध, पटिविरोध, विरुद्ध, पटिविरुद्ध, परिरुद्ध. रुन्धितुं, परिरुन्धितुं. रुन्धित्वा, परिरुन्धित्वा. ตตฺร โรโธติ จารโก. โส หิ รุนฺธติ ปเวสิตานํ กุรูรกมฺมนฺตานํ สตฺตานํ คมนํ อาวรตีติ โรโธติ วุจฺจติ. โอโรโธติ ราชุพฺพรี, สา ปน ยถากามจารํ จริตุํ อปฺปทาเนน โอรุนฺธิยติ อวรุนฺธิยตีติ โอโรโธ. วิโรโธติ อนนุกูลตา. ปฏิวิโรโธติ ปุนปฺปุนํ อนนุกูลตา. วิรุทฺโธติ วิโรธํ อาปนฺโน. ปฏิวิรุทฺโธติ ปฏิสตฺตุภาเวน [Pg.213] วิโรธํ อาปนฺโน. ปริรุทฺโธติ คหณตฺถาย สมฺปริวาริโต. วุตฺตญฺหิ ‘‘ยถา อรีหิ ปริรุทฺโธ, วิชฺชนฺเต คมเน ปเถ’’ติ. อวรุทฺโธติ ปพฺพาชิโต. त्यापैकी 'रोध' म्हणजे कारागृह (तुरुंग). कारण ते आत टाकलेल्या क्रूर कर्म करणाऱ्या प्राण्यांचे जाणे रोखते (त्यांच्या गमनावर आवरण घालते), म्हणून त्याला 'रोध' असे म्हणतात. 'ओरोध' म्हणजे अंतःपूर (राण्यांचे निवासस्थान); ती (राणी) आपल्या इच्छेनुसार फिरण्यास प्रतिबंध केल्यामुळे अडवून ठेवली जाते, म्हणून 'ओरोध'. 'विरोध' म्हणजे अनुकूल नसणे (प्रतिकूलता). 'पटिविरोध' म्हणजे वारंवार अनुकूल नसणे. 'विरुद्ध' म्हणजे विरोधाला प्राप्त झालेला. 'पटिविरुद्ध' म्हणजे शत्रूभावाने विरोधाला प्राप्त झालेला. 'परिरुद्ध' म्हणजे पकडण्यासाठी चहूबाजूंनी वेढलेला. कारण असे म्हटले आहे – 'ज्याप्रमाणे शत्रूंनी वेढलेला, जाण्याचा मार्ग असतानाही...'. 'अवरुद्ध' म्हणजे हद्दपार केलेला (निर्वासित केलेला). มุจ โมจเน. มิคํ พนฺธนา มุญฺจติ. มุญฺจนํ, โมจนํ. ทุกฺขปฺปโมจนํ, โมโจ. 'मुच्' (धातू) मोचन (मुक्त करणे) या अर्थात आहे. 'मिगं बन्धना मुञ्चति' (तो हरणाला बंधनातून मुक्त करतो). मुञ्चन, मोचन, दुक्खप्पमोचन (दुःखातून मुक्ती), मोच. โมโจติ เจตฺถ อฏฺฐิกกทลีรุกฺโข. มุญฺจิตุํ. มุญฺจิตฺวา. การิเต ‘‘โมเจติ, โมเจตุํ, โมเจตฺวา’’ติอาทีนิ. आणि येथे 'मोच' म्हणजे बिया असलेले केळीचे झाड. मुञ्चितुं, मुञ्चित्वा. प्रयोजक (कारित) रूपात – 'मोचेति, मोचेतुं, मोचेत्वा' इत्यादी. ริจ วิเรจเน. ริญฺจติ. ริญฺจนํ, วิเรจนํ, วิเรโก, วิเรจโก. ริญฺจิตุํ. ริญฺจิตฺวา. 'रिच्' (धातू) विरेचन (साफ करणे/रिकामे करणे) या अर्थात आहे. रिञ्चति. रिञ्चन, विरेचन, विरेक, विरेचक. रिञ्चितुं, रिञ्चित्वा. สิจ ปคฺฆรเณ. อุทเกน ภูมึ สิญฺจติ. ปุตฺตํ รชฺเช อภิสิญฺจิ. อภิเสโก. มุทฺธาภิสิตฺโต ขตฺติโย. สิญฺจ ภิกฺขุ อิมํ นาวํ, สิตฺตา เต ลหุเมสฺสติ. สิตฺตฏฺฐานํ. สิญฺจิตุํ. สิญฺจิตฺวา. 'सिच्' (धातू) प्रघरण (सिंचन करणे/शिंपडणे) या अर्थात आहे. 'उदकेन भूमिं siञ्चति' (तो पाण्याने जमीन सिंचन करतो/शिंपडतो). 'पुत्तं रज्जे अभिसिञ्चि' (त्याने पुत्राचा राज्यावर अभिषेक केला). अभिषेक. 'मुद्धाभिसित्त' (मूर्धाभिषिक्त) क्षत्रिय. 'हे भिक्खू, या नौकेतील पाणी उपस (सिंचन कर), रिकामी झाल्यावर ती तुझ्यासाठी हलकी होईल.' सिंचन केलेले स्थान (सित्तट्ठान). सिञ्चितुं, सिञ्चित्वा. ยุช โยเค. ยุญฺชติ, อนุยุญฺชติ. กมฺมนิ ‘‘ยุญฺชิยตี’’ติ รูปานิ. เกจิ ‘‘ยุญฺชเต’’ติ อิจฺฉนฺติ. ยุญฺชนํ, สํโยโค, อนุโยโค, ภาวนานุยุตฺโต, สญฺโญโค, สญฺโญชนํ, อตฺถโยชนา. ทีฆํ สนฺตสฺส โยชนํ. ยุญฺชิตุํ, อนุยุญฺชิตุํ. อนุยุญฺชิตฺวา. โยเชติ. ตตฺถ สํโยชนนฺติ พนฺธนํ กามราคาทิ. โยชนนฺติ – 'युज्' (धातू) योग (जोडणे/युक्त होणे) या अर्थात आहे. युञ्जति, अनुयुञ्जति. कर्मणी प्रयोगात 'युञ्जियति' अशी रूपे होतात. काही जण 'युञ्जते' असे मानतात. युञ्जन, संयोग, अनुयोग, भावनानुयुत्त (भावनेत/ध्यानात मग्न असलेला), सञ्ञोग, सञ्ञोजन (संयोजन/बंधन), अत्थयोजना (अर्थ लावणे). 'थकलेल्या माणसाला योजन (अंतर) लांब वाटते.' युञ्जितुं, अनुयुञ्जितुं, अनुयुञ्जित्वा, योजेति. तेथे 'सञ्ञोजन' म्हणजे कामराग इत्यादींचे बंधन. 'योजन' म्हणजे – วิทตฺถิ ทฺวาทสงฺคุลฺโย, ตทฺวยํ รตนํ มตํ; สตฺตรตนิกา ยฏฺฐิ, อุสภํ วีสยฏฺฐิกํ; คาวุตํ อุสภาสีติ, โยชนํ จตุคาวุตํ. बारा अंगुळे म्हणजे एक वितस्त (विण); त्याच्या दुप्पट म्हणजे एक रतना (हात) मानले जाते; सात रतना (हात) म्हणजे एक यठ्ठि (काठी); वीस यठ्ठि म्हणजे एक उसभ; ऐंशी उसभ म्हणजे एक गावुत आणि चार गावुत म्हणजे एक योजन होय. ภุช ปาลนพฺยวหรเณสุ. ปาลนํ รกฺขณํ. พฺยวหรณํ อชฺโฌหรณํ. ภุญฺชติ, ปริภุญฺชติ, สํภุญฺชติ. ทาสปริโภเคน ปริภุญฺชิ. การิเต ‘‘โภเชติ โภชยตี’’ติอาทีนิ รูปานิ. โภชนํ, สมฺโภโค, มหิภุโช, คามโภชโก[Pg.214], อุปโภโค, ปริโภโค. ภุตฺโต โอทโน ภวตา. สเจ ภุตฺโต ภเวยฺยาหํ. โอทนํ ภุตฺโต ภุตฺตวา ภุตฺตาวี. ตุมนฺตาทิตฺเต ‘‘ภุญฺชิตุํ, ปริภุญฺชิตุํ, โภเชตุํ, โภชยิตุํ, ภุญฺชิตฺวา, ภุญฺชิตฺวาน, ภุญฺชิย, ภุญฺชิยาน, โภเชตฺวา, โภเชตฺวาน, โภชยิตฺวา, โภชยิตฺวาน’’ อิจฺจาทีนิ ปริสทฺทาทีหิ วิเสสิตพฺพานิ. 'भुज्' (धातू) पालन (रक्षण करणे) आणि व्यवहार (उपभोग घेणे/खाणे) या अर्थांमध्ये आहे. 'पालन' म्हणजे रक्षण करणे. 'व्यवहार' म्हणजे गिळणे/खाणे. भुञ्जति, परिभुञ्जति, सम्भुञ्जति. 'दासपरिभोगेन परिभुञ्जि' (त्याने दासाच्या उपभोगाप्रमाणे उपभोग घेतला). प्रयोजक (कारित) रूपात – 'भोजेति, भोजयति' इत्यादी रूपे होतात. भोजन, सम्भोग, महिभुज (राजा), गामभोजक (ग्रामप्रमुख), उपभोग, परिभोग. 'भुत्तो ओदनो भवता' (आपल्याद्वारे भात खाल्ला गेला). 'सचे भुत्तो भवेय्याहं' (जर मी जेवलो असतो). भात खाल्लेला – 'ओदनं भुत्तो', 'भुत्तवा', 'भुत्तावी'. 'तुमुन्' इत्यादी प्रत्ययांमध्ये – 'भुञ्जितुं, परिभुञ्जितुं, भोजेतुं, भोजयितुं, भुञ्जित्वा, भुञ्जित्वान, भुञ्जिय, भुञ्जियान, भोजेत्वा, भोजेत्वान, भोजयित्वा, भोजयित्वान' इत्यादी रूपे 'परि' इत्यादी उपसर्गांद्वारे विशेषित केली जावीत. ตตฺร ภุญฺชตีติ ภตฺตํ ภุญฺชติ, โภชนียํ ภุญฺชติ. ตถา หิ ‘‘ขาทนียํ วา โภชนียํ วา ขาทติ วา ภุญฺชติ วา’’ติอาทิ วุตฺตํ. อปิจ กทาจิ ขาทนีเยปิ ‘‘ภุญฺชตี’’ติ โวหาโร ทิสฺสติ. ‘‘ผลานิ ขุทฺทกปฺปานิ, ภุญฺช ราช วราวร’’นฺติ หิ วุตฺตํ. ปริภุญฺชตีติ จีวรํ ปริภุญฺชติ, ปิณฺฑปาตํ ปริภุญฺชติ, คิลานปจฺจยเภสชฺชปริกฺขารํ ปริภุญฺชติ, ปฏิเสวตีติ วุตฺตํ โหติ. เตเนว จ ปฏิเสวตีติ ปริภุญฺชตีติ อตฺโถ สํวณฺณิยติ. อปิจ ‘‘กาเม ภุญฺชตี’’ติ จ ‘‘ปญฺจกามคุเณ ปริภุญฺชตี’’ติ จ ทสฺสนโต ปน ภุญฺชนปริภุญฺชนสทฺทา ปฏิเสวนตฺเถน กตฺถจิ สมานตฺถาปิ โหนฺตีติ อวคนฺตพฺพา. สํภุญฺชตีติ สมฺโภคํ กโรติ, เอกโต วาสํ กโรตีติ อตฺโถ. เอตฺถ สิยา ‘‘นนุ จ โภ อตฺร ภุชธาตุ ปาลนพฺยวหรเณสุ วุตฺโต, โส กถํ เอตฺตเกสุปิ อตฺเถสุ วตฺตตี’’ติ? วตฺตเตว, อเนกตฺถา หิ ธาตโว, เต อุปสคฺคสหาเย ลภิตฺวาปิ อเนกตฺถตราว โหนฺติ. อิโต ปฏฺฐาย ตุมนฺตาทีนิ รูปานิ น วกฺขาม. ยตฺถ ปน วิเสโส ทิสฺสติ, ตตฺถ วกฺขาม. त्यापैकी 'भुञ्जति' म्हणजे भात खातो, भोजन (मऊ अन्न) खातो. कारण असे म्हटले आहे – 'खाद्य किंवा भोज्य खातो किंवा उपभोगतो' इत्यादी. शिवाय, कधीकधी खाण्याच्या पदार्थांच्या (खाद्याच्या) बाबतीतही 'भुञ्जति' असा प्रयोग दिसतो. कारण असे म्हटले आहे – 'हे राजा, लहान-मोठी फळे खा (भुञ्ज).' 'परिभुञ्जति' म्हणजे चीवराचा उपभोग घेतो, पिंडपाताचा उपभोग घेतो, आजारी माणसाच्या औषध-साहित्याचा उपभोग घेतो; म्हणजेच तो त्याचे सेवन करतो (पटिसेवति). म्हणूनच 'परिभुञ्जति' चा अर्थ 'सेवन करतो' (पटिसेवति) असा स्पष्ट केला जातो. शिवाय, 'कामांचा उपभोग घेतो' (कामे भुञ्जति) आणि 'पंचकामगुणांचा उपभोग घेतो' (पञ्चकामगुणे परिभुञ्जति) असे पाहिल्यावरून हे समजले पाहिजे की, 'भुञ्जन' आणि 'परिभुञ्जन' हे शब्द सेवन करण्याच्या अर्थात काही ठिकाणी समान अर्थाचेही असतात. 'सम्भुञ्जति' म्हणजे एकत्र उपभोग घेतो किंवा एकत्र राहतो, असा अर्थ आहे. येथे शंका येऊ शकते की – 'अहो, येथे भुज् धातू तर पालन आणि व्यवहार (खाणे) या अर्थांमध्ये सांगितला आहे, मग तो एवढ्या सर्व अर्थांमध्ये कसा काय वापरला जातो?' तो वापरला जातोच, कारण धातू अनेक अर्थांचे असतात; आणि उपसर्गांचे सहाय्य मिळाल्यावर तर ते आणखीनच अनेक अर्थांचे होतात. येथून पुढे आम्ही 'तुमुन्' इत्यादी रूपे सांगणार नाही. परंतु जेथे काही विशेष दिसेल, तेथे सांगू. กติ เฉทเน. กนฺตติ, วิกนฺตติ. สลฺลกตฺโต. 'कत्' (धातू) छेदन (कापणे) या अर्थात आहे. कन्तति, विकन्तति. 'सल्लकत्तो' (शल्यचिकित्सक/सर्जन). ภิทิ วิทารเณ. ภินฺทติ. อนาคตตฺเถ วตฺตพฺเพ ‘‘เภชฺชิสฺสติ, ภินฺทิสฺสตี’’ติ ทฺวิธา ภวนฺติ รูปานิ. ปาปเก อกุสเล ธมฺเม ภินฺทตีติ ภิกฺขุ. เตนาห – 'भिद्' (धातू) विदारण (फाडणे/फोडणे) या अर्थात आहे. भिन्दति. भविष्यकाळ सांगायचा असल्यास 'भेज्जिस्सति' आणि 'भिन्दिस्सति' अशी दोन प्रकारची रूपे होतात. जो पापयुक्त अकुशल धर्मांचा भेद करतो (नाश करतो), तो 'भिक्खू' होय. म्हणूनच म्हटले आहे – ‘‘น [Pg.215] เตน ภิกฺขุ โส โหติ, ยาวตา ภิกฺขเต ปเร; วิสํ ธมฺมํ สมาทาย, ภิกฺขุ โหติ น ตาวตา. 'केवळ दुसऱ्यांकडे भिक्षा मागतो म्हणून कोणी भिक्खू होत नाही; विषारी (अधार्मिक) धर्माचे आचरण करून माणूस भिक्खू बनत नाही.' โยธ ปุญฺญญฺจ ปาปญฺจ, พาหิตฺวา พฺรหฺมจริยํ; สงฺขาย โลเก จรติ, สเว ‘ภิกฺขู’ติ วุจฺจตี’’ติ. 'जो येथे पुण्य आणि पाप या दोन्हीच्या पलीकडे जाऊन, ब्रह्मचर्याचे पालन करतो आणि विचारपूर्वक जगात वावरतो, त्यालाच खरोखर भिक्खू म्हटले जाते.' อิทญฺจ ขีณาสวํ สนฺธาย วุตฺตํ, เสกฺขปุถุชฺชนสมณาปิ ยถาสมฺภวํ ‘‘ภิกฺขู’’ติ วตฺตพฺพตํ ปาปุณนฺติเยว. สงฺฆํ ภินฺทตีติ สงฺฆเภทโก. เทวทตฺเตน สงฺโฆ ภินฺโน,. ภินฺทิยตีติ ภินฺโนติ หิ นิพฺพจนํ. น เต กฏฺฐานิ ภินฺนานิ. ภินฺทตีติ เภตฺตา. आणि हे खीणासवांना (अर्हतांना) उद्देशून म्हटले आहे, परंतु सेक्ख (शैक्ष) आणि पुथुज्जन (पृथग्जन) श्रमण देखील यथासंभव 'भिक्खू' म्हणवून घेण्यास पात्र ठरतातच. जो संघाचा भेद करतो तो 'संघभेदक' होय. देवदत्ताने संघ भेदला (संघात फूट पाडली). 'भिन्दियति' (जे भेदले जाते) ते 'भिन्न' होय, अशी याची व्युत्पत्ती आहे. 'त्यांनी लाकडे फोडली नाहीत.' जो भेद करतो तो 'भेत्ता' (भेदणारा) होय. ฉิทิ ทฺเวธากรเณ. ฉินฺทตีติ เฉทโก, เอวํ เฉตฺตา. เกเส เฉตฺตุํ วฏฺฏติ. ฉินฺทิยตีติ ฉินฺโน. ฉินฺโนปิ รุกฺโข ปุนเทว รูหติ. อิทํ ปน ภิทิฉิทิทฺวยํ ทิวาทิคณํ ปตฺวา ‘‘ภิชฺชติ ฉิชฺชตี’’ติ สุทฺธกตฺตุวาจกํ รูปทฺวยํ ชเนติ, ตสฺมา ‘‘ภิชฺชตีติ ภินฺโน’’ติอาทินา สุทฺธกตฺตุวเสนปิ นิพฺพจนํ กาตพฺพํ. 'छिदि' धातू द्विधाकरण (दोन भाग करणे/कापणे) या अर्थात आहे. जो कापतो तो 'छेदक' किंवा 'छेत्ता' होय. केस कापणे योग्य आहे. जे कापले जाते ते 'छिन्न' होय. कापलेले झाड देखील पुन्हा उगवते. परंतु हे 'भिदि' आणि 'छिदि' हे दोन्ही धातू दिवादिगणात जाऊन 'भिज्जति, छिज्जति' अशी क्रियावाचक दोन रूपे तयार करतात, म्हणून 'भिज्जति म्हणून भिन्न' इत्यादी प्रकारे शुद्ध कर्तृवाचक अर्थाने देखील व्युत्पत्ती केली पाहिजे. ตทิ หึสานาทเรสุ. ตนฺทติ. ตนฺที, ตทฺทุ. ตทฺทติ กจฺฉุ. 'तदि' धातू हिंसा आणि अनादर या अर्थांमध्ये आहे. तन्दति. तन्दी (आळस), तद्दु (खाज/त्वचारोग). तद्दति कच्छु (खाज सुटते). อุทิ ปสวกิเลทเนสุ. ปสวนํ สนฺทนํ. กิเลทนํ ตินฺทตา. อุนฺทติ. อุนฺทูโร, สมุทฺโท. 'उदि' धातू प्रसव (वाहणे/उत्पन्न करणे) आणि क्लेदन (ओले करणे) या अर्थांमध्ये आहे. प्रसव म्हणजे वाहणे (संदन). क्लेदन म्हणजे ओले होणे (तिन्दता). उन्दति (ओले करतो). उन्दूरो (उंदीर), समुद्दो (समुद्र). วิท ลาเภ. วินฺทติ. โควินฺโท, วิตฺติ. เอตฺถ วิตฺตีติ อนุภวนํ, เวทนา วา. 'विद' धातू लाभ या अर्थात आहे. विन्दति (प्राप्त करतो). गोविन्दो (गोविंद), वित्ती (वृत्ती/अनुभूती). येथे 'वित्ती' म्हणजे अनुभव घेणे किंवा वेदना होय. วิท ตุฏฺฐิยํ. วินฺทติ, นิพฺพินฺทติ. นิพฺพินฺทนํ. วิรชฺชติ. นิพฺพินฺโท กามรติยา. วิตฺติ, วิตฺตํ, เวโท. ลภติ อตฺถเวทํ ธมฺมเวทํ. 'विद' धातू तुष्टी (संतोष) या अर्थात आहे. विन्दति (संतोष पावतो), निब्बिन्दति (कंटाळतो/वैराग्य पावतो). निब्बिन्दनं (वैराग्य). विरज्जति (विरक्त होतो). कामरतीपासून निब्बिन्द (वैराग्य). वित्ती, वित्तं (वित्त/धन), वेदो (वेद/ज्ञान). अर्थवेद आणि धम्मवेद प्राप्त करतो. เอตฺถ วิตฺตีติ โสมนสฺสํ. ‘‘วิตฺติ หิ มํ วินฺทติ สุต ทิสฺวา’’ติ หิ วุตฺตํ. วิตฺตนฺติ วิตฺติชนนตฺตา วิตฺตสงฺขาตํ ธนํ. เวโทติ [Pg.216] คนฺโถปิ ญาณมฺปิ โสมนสฺสมฺปิ วุจฺจติ. ‘‘ติณฺณํ เวทานํ ปารคู’’ติอาทีสุ หิ คนฺโถ ‘‘เวโท’’ติ วุจฺจติ. ‘‘พฺราหฺมณํ เวทคุมภิชญฺญา อกิญฺจนํ กามภเว อสตฺต’’นฺติอาทีสุ ญาณํ. ‘‘เย เวทชาตา วิจรนฺติ โลเก’’ติอาทีสุ โสมนสฺสํ. येथे 'वित्ती' म्हणजे सोमनस्य (आनंद). कारण 'पुत्राला पाहून मला आनंद (वित्ती) प्राप्त होतो' असे म्हटले आहे. 'वित्त' म्हणजे आनंद उत्पन्न करणारे असल्यामुळे वित्ताने मोजले जाणारे धन. 'वेद' म्हणजे ग्रंथ, ज्ञान आणि सोमनस्य (आनंद) देखील म्हटले जाते. 'तीन वेदांचा पारगामी' इत्यादींमध्ये ग्रंथ या अर्थाने 'वेद' म्हटले आहे. 'अकिंचन आणि कामभवात असक्त नसलेल्या ब्राह्मणाला वेदगू (ज्ञानवान) जाणावे' इत्यादींमध्ये ज्ञान या अर्थाने. 'जे जगात वेदजात (आनंदित होऊन) वावरतात' इत्यादींमध्ये सोमनस्य (आनंद) या अर्थाने. เวทคนฺเถ จ ญาเณ จ, โสมนสฺเส จ วตฺตติ; เวทสทฺโท อิมํ นานา-ธาตุโต สมุทีรเย. 'वेद' शब्द ग्रंथ, ज्ञान आणि सोमनस्य (आनंद) या अर्थांमध्ये वापरला जातो; हा 'वेद' शब्द वेगवेगळ्या धातूंपासून उत्पन्न होतो असे म्हणावे. ลิป ลิมฺปเน. ลิมฺปติ, ลิมฺปโก. อวเลโป. อวเลโปติ อหงฺกาโร. 'लिप' धातू लिंपन (लेप लावणे) या अर्थात आहे. लिम्पति (लेप लावतो), लिम्पको (लेप लावणारा). अवलेपो (अवलेप). अवलेप म्हणजे अहंकार. ลุป อจฺเฉทเน. ลุมฺปติ. วิลุมฺปโก, วิลุตฺโต วิโลโป. 'लुप' धातू उच्छेदन (लुटणे/कापून टाकणे) या अर्थात आहे. लुम्पति (लुटतो). विलुम्पको (लुटणारा), विलुत्तो (लुटलेला), विलोपो (विलोपन/लूट). วิลุมฺปเตว ปุริโส, ยาวสฺส อุปกปฺปติ; ยทา จญฺเญ วิลุมฺปนฺติ, โส วิลุตฺโต วิลุมฺปตีติ. माणूस तोपर्यंतच लुटतो, जोपर्यंत त्याला ते अनुकूल असते; परंतु जेव्हा इतर त्याला लुटतात, तेव्हा तो स्वतः लुटला गेलेला (विलुत्तो) असूनही लुटतो. ปิส จุณฺณเน. ปึสติ. ปิสโก. ปิสุณา วาจา. อาคมฏฺฐกถายํ ปน ‘‘อตฺตโน ปิยภาวํ ปรสฺส จ สุญฺญภาวํ ยาย วาจาย ภาสติ, สา ปิสุณา วาจา’’ติ วุตฺตํ, ตํ นิรุตฺติลกฺขเณน วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. 'पिस' धातू चूर्ण करणे (दळणे/बारीक करणे) या अर्थात आहे. पिंसति (दळतो/बारीक करतो). पिसको (पिशाच/दळणारा). पिसुणा वाचा (चुगली/कडू वाणी). आगम-अट्ठकथेत (टीकेत) म्हटले आहे की, 'ज्या वाणीने स्वतःची प्रियता आणि दुसऱ्याची शून्यता (तुच्छता) भासविली जाते, ती पिसुणा वाचा (चुगली) होय', हे निरुक्तीच्या लक्षणाने म्हटले आहे असे समजावे. หิสิ วิหึสายํ. หึสติ, วิหึสติ. หึสโก. 'हिसि' धातू विहिंसा (हिंसा करणे) या अर्थात आहे. हिंसति, विहिंसति (हिंसा करतो). हिंसको (हिंसक). อหึสโกติ เม นามํ, หึสกสฺส ปุเร สโต; อชฺชาหํ สจฺจนาโมมฺหิ, น นํ หึสามิ กิญฺจนํ. 'पूर्वी हिंसक असतानाही माझे नाव अहिंसक होते; आज मी खऱ्या नावाचा झालो आहे, मी कोणाचीही अजिबात हिंसा करत नाही.' หึสิตพฺพํ กึสตีติ สีโห. อาทิอนฺตกฺขรวิปลฺลาสวเสน สทฺทสิทฺธิ, ยถา ‘‘กนฺตนฏฺเฐน ตกฺก’’นฺติ. วิเหสโก, วิเหสนํ. जो हिंसेला पात्र असणाऱ्यांना मारतो (किंसति) तो 'सीहो' (सिंह) होय. पहिल्या आणि शेवटच्या अक्षरांच्या विपर्यासाने (बदलाने) या शब्दाची सिद्धी होते, जसे 'कंतन' अर्थाने 'तक्क' (ताक) शब्द सिद्ध होतो. विहेसको (त्रास देणारा), विहेसनं (त्रास देणे). สุมฺภ [Pg.217] ปหาเร. โย โน คาโวว สุมฺภติ. ปริสุมฺภติ. สุมฺโภติ. อตฺริเม ปาฬิโต ปโยคา – 'सुम्भ' धातू प्रहार करणे या अर्थात आहे. 'जो आमच्या बैलाप्रमाणे प्रहार करतो'. परिसुम्भति (चहूबाजूंनी प्रहार करतो). सुम्भोति. येथे पाळीतील हे प्रयोग आहेत – ‘‘สํสุมฺภมานา อตฺตานํ, กาลมาคมยามเส’’ติ จ, 'स्वतःवर प्रहार करत (दुःख सहन करत) आम्ही काळाची वाट पाहत आहोत' आणि, ‘‘เกสคฺคหณมุกฺเขปา, ภูมฺยา จ ปริสุมฺภนา; ทตฺวา จ โน ปกฺกมติ, พหุทุกฺขํ อนปฺปก’’นฺติ จ, 'केस पकडून उचलणे आणि जमिनीवर आपटणे (परिसुम्भन); आणि आम्हाला पुष्कळ व मोठे दुःख देऊन तो निघून जातो' आणि, ‘‘ภูมึ สุมฺภามิ เวคสา’’ติ จ. 'मी वेगाने जमिनीवर प्रहार करतो (आपटतो)' आणि. อญฺญตฺถ ปน อญฺญาปิ วุตฺตา. ตา อิธ อนุปปตฺติโต น วุตฺตา. เกเจตฺถ มญฺเญยฺยุํ, ยถา ภูวาทิคเณ ‘‘สกิ สงฺกายํ ขชิ คติเวกลฺเล’’ติอาทีนํ ธาตูนํ ปฏิลทฺธวคฺคนฺตภาวสฺส นิคฺคหีตาคมสฺส วเสน ‘‘สงฺกติ ขญฺชตี’’ติ รูปานิ ภวนฺติ, ตถา อิมสฺมึ รุธาทิคเณ ‘‘มุจ โมจเน กติ เฉทเน’’ติอาทีนํ ธาตูนํ ปฏิลทฺธวคฺคนฺตภาวสฺส นิคฺคหีตาคมสฺส วเสน ‘‘มุญฺจติ กนฺตตี’’ติอาทีนิ รูปานิ ภวนฺติ. เอวํ สนฺเต โก อิเมสํ เตสญฺจ วิเสโสติ? เอตฺถ วุจฺจเต – เย ภูวาทิคณสฺมึ อเนกสฺสรา อสํโยคนฺตา อิการนฺตวเสน นิทฺทิฏฺฐา, เต อาขฺยาตตฺตญฺจ นามิกตฺตญฺจ ปตฺวา สุทฺธกตฺตุเหตุกตฺตุวิสเยสุ เอกนฺตโต นิคฺคหีตาคเมน นิปฺผนฺนรูปา ภวนฺติ, น กตฺถจิปิ เตสํ วินา นิคฺคหีตาคเมน รูปปฺปวตฺติ ทิสฺสติ. ตํ ยถา? สงฺกติ, สงฺกา, ขญฺชติ, ขญฺโช อิจฺจาทิ. อยํ อเนกสฺสรานํ อิการนฺตวเสน นิทฺทิฏฺฐานํ ภูวาทิคณิกานํ วิเสโส. इतर ठिकाणी इतरही (व्युत्पत्ती) सांगितल्या आहेत. त्या येथे अप्रस्तुत असल्यामुळे सांगितल्या नाहीत. येथे काही जण असे मानू शकतात की, ज्याप्रमाणे भूवादिगणात 'सकि संकायं, खजि गतिवेकल्ले' इत्यादी धातूंच्या वर्गातील शेवटच्या वर्णाचा लाभ झाल्यामुळे आणि निग्गहीत (अनुस्वार) आगम झाल्यामुळे 'संकति, खञ्जति' अशी रूपे होतात, त्याचप्रमाणे या रुधादिगणात 'मुच मोचने, कति छेदने' इत्यादी धातूंच्या वर्गातील शेवटच्या वर्णाचा लाभ झाल्यामुळे आणि निग्गहीत आगम झाल्यामुळे 'मुञ्चति, कन्तति' इत्यादी रूपे होतात. असे असताना या दोन्हीमध्ये काय फरक आहे? यावर सांगितले जाते – जे भूवादिगणात अनेक स्वर असणारे, असंयोगान्त आणि इकारान्त रूपाने निर्दिष्ट केले आहेत, ते आख्यात (क्रियापद) आणि नाम रूप प्राप्त करून शुद्ध कर्ता व हेतुकर्ता यांच्या विषयात निश्चितपणे निग्गहीत आगमाने निष्पन्न रूपे होतात. निग्गहीत आगमाशिवाय त्यांची रूपप्रवृत्ती कुठेही दिसत नाही. ती कशी? संकति, संका, खञ्जति, खञ्जो इत्यादी. हा अनेक स्वर असणाऱ्या आणि इकारान्त रूपाने निर्दिष्ट केलेल्या भूवादिगणीय धातूंचा विशेष फरक आहे. เย จ รุธาทิคณสฺมึ อเนกสฺสรา อสํโยคนฺตฺวา อการนฺตวเสน วา อุการนฺตวเสน วา นิทฺทิฏฺฐา, เต อาขฺยาตตฺตํ ปตฺวา สุทฺธกตฺตุวิสเยเยว เอกนฺตโต นิคฺคหีตาคเมน นิปฺผนฺนรูปา ภวนฺติ, น เหตุกตฺตุวิสเย. นามิกตฺตํ ปน สหนิคฺคหีตาคเมน วินา จ นิคฺคหีตาคเมน นิปฺผนฺนรูปา ภวนฺติ. ยตฺถ [Pg.218] วินา นิคฺคหีตาคเมน นิปฺผนฺนรูปา, ตตฺถ สสํโยครูปาเยว ภวนฺติ. ตํ ยถา? มุญฺจติ, มุญฺจาเปติ, โมเจติ, โมจาเปติ. ฉินฺทาเปติ. เฉเทติ, เฉทาเปติ. ฉินฺทนํ, เฉโท. มุญฺจนํ, โมจนํ. กนฺตติ, กนฺตนํ, สลฺลกตฺโต. ปิฏฺฐิมํสานิ อตฺตโน, สามํ อุกฺกจฺจ ขาทสิ อิจฺจาทีนิ. ตตฺถ อุกฺกจฺจาติ อุกฺกนฺติตฺวา, ฉินฺทิตฺวาติ อตฺโถ. आणि जे रुधादिगणामध्ये अनेक स्वर असलेले, असंयोगान्त (संयोग नसलेले) अकारान्त किंवा उकारान्त रूपाने निर्दिष्ट केले आहेत, ते आख्यात (क्रियापद) भाव प्राप्त करून केवळ शुद्धकर्तृविषयातच निश्चितपणे निग्गहीत (अनुस्वार) आगमाने सिद्ध रूप होतात, हेतुकर्तृविषयात नाही. नामिक भाव प्राप्त झाल्यावर मात्र निग्गहीत आगमासह आणि निग्गहीत आगमाशिवाय सिद्ध रूप होतात. जेथे निग्गहीत आगमाशिवाय सिद्ध रूप होतात, तेथे ते संयोगयुक्त रूपाचेच असतात. ते कसे? जसे की - मुञ्चति (मुक्त करतो), मुञ्चापेति (मुक्त करवतो), मोचेति (मुक्त करतो), मोचापेति (मुक्त करवतो). छिन्दापेति (तोडवतो). छेदेति (तोडतो), छेदापेति (तोडवतो). छिन्दनं (तोडणे), छेदो (छेद/तोडणे). मुञ्चनं (मुक्त करणे), मोचनं (मुक्त करणे). कन्तति (कापतो), कन्तनं (कापणे), सल्लकत्तो (शल्यचिकित्सक). 'पिट्ठिमंसानि अत्तनो, सामं उक्कच्च खादसि' (स्वतःच्या पाठीचे मांस स्वतः कापून खातोस) इत्यादी. तेथे 'उक्कच्च' म्हणजे 'उक्कन्तित्वा' (कापून, तोडून) असा अर्थ आहे. นนุ จ โภ เอวํ สนฺเต อาขฺยาตนามิกภาวํ ปตฺวา สุทฺธกตฺตุเหตุกตฺตุวิสเยสุ เอกนฺตโต ปฏิลทฺธนิคฺคหีตาคเมหิ สกิ ขชิ อาทีหิเยว รุธาทิคณิเกหิ ภวิตพฺพํ, น ปน มุจฉิทิอาทีหีติ? ตนฺน, มุจฉิทิอาทีหิเยว รุธาทิคณิเกหิ ภวิตพฺพํ รุจธาตุยา สมานคติกตฺตา, ตถา หิ ยถา ‘‘รุนฺธิสฺส, รุนฺธยติ, รุนฺธาเปติ, รุนฺธนํ, โรโธ, วิโรโธ’’ติอาทีสุ นิคฺคหีตาคมานิคฺคหีตาคมวเสน ทฺวิปฺปการานิ รูปานิ ทิสฺสนฺติ, ตถา มุจฉิทิอาทีนมฺปีติ. अहो! जर असे असेल, तर आख्यात आणि नामिक भाव प्राप्त करून शुद्धकर्तृ व हेतुकर्तृ विषयात निश्चितपणे निग्गहीत आगम प्राप्त झालेल्या 'सकि', 'खजि' इत्यादी रुधादिगणीय धातूंचेच रूप असावे, 'मुच', 'छिदि' इत्यादींचे नाही का? तसे नाही, 'मुच', 'छिदि' इत्यादी रुधादिगणीय धातूंचेच रूप असावे, कारण त्यांची गती (प्रवृत्ती) 'रुच' धातूसारखीच आहे. तसेच, जसे 'रुन्धिस्स, रुन्धयति, रुन्धापेति, रुन्धनं, रोधो, विरोधो' इत्यादींमध्ये निग्गहीत आगम आणि अनिग्गहीत आगमाच्या भेदाने दोन प्रकारची रूपे दिसतात, तसेच 'मुच', 'छिदि' इत्यादींचीही दिसतात. นนุ กจฺจายเน นิคฺคหีตาคมสฺส นิจฺจวิธานตฺถํ ‘‘รุธาทิโต นิคฺคหีตปุพฺพญฺจา’’ติ ลกฺขณํ วุตฺตนฺติ? สจฺจํ, ตํ ปน กฺริยาปทตฺตํ สนฺธาย วุตฺตํ. ยทิ จ นามิกปทตฺตมฺปิ สนฺธาย วุตฺตํ ภเวยฺย, ‘‘วิโรโธ’’ติอาทีนํ ทสฺสนโต วาสทฺทํ ปกฺขิปิตฺวา วตฺตพฺพํ สิยา, น จ วาสทฺทํ ปกฺขิปิตฺวา วุตฺตํ, เตน ญายติ กฺริยาปทตฺตํเยว สนฺธาย วุตฺตนฺติ. कच्चायनात निग्गहीत आगमाच्या नित्य विधानासाठी 'रुधादितो निग्गहीतपुब्बञ्च' हे लक्षण (सूत्र) सांगितले आहे ना? सत्य आहे, परंतु ते क्रियापदभावाला अनुसरून सांगितले आहे. जर नामिकपदभावालाही अनुसरून सांगितले असते, तर 'विरोधो' इत्यादींच्या दर्शनामुळे 'वा' (विकल्प) शब्द टाकून सांगावे लागले असते, आणि 'वा' शब्द टाकून सांगितले नाही, यावरून हे समजते की ते केवळ क्रियापदभावालाच अनुसरून सांगितले आहे. นนุ จ โภ เอวํ สนฺเต สกิขชิอาทีนํ นิจฺจํ สนิคฺคหีตาคมกฺริยาปทตฺตํเยว สนฺธาย ‘‘รุธาทิโต นิคฺคหีตปุพฺพญฺจา’’ติ อิทํ วุตฺตนฺติ สกฺกา มนฺตุนฺติ? น สกฺกา, สกิขชิอาทีนํ รุธธาตุยา อสมานคติกตฺตา นามิกตฺเต ทฺวิปฺปการสฺส อสมฺภวโต. ตถา หิ เยสํ ยา นามิกตฺเต นิคฺคหีตาคมานิคฺคหีตาคมวเสน ทฺวิปฺปการวนฺตตา, สา [Pg.219] เอว เตสํ รุธาทิคณภาวสฺส ลกฺขณํ. ตญฺจ สกิขชิอาทีนํ นตฺถิ. ‘‘สงฺกา ขญฺโช’’ติอาทินา หิ นามตฺเต เอโกเยว ปกาโร ทิสฺสติ สนิคฺคหีตาคโม, ‘‘กมุ ปทวิกฺเขเป’’อิจฺจาทีนํ ปน ‘‘กโม, กมนํ, จงฺกโม, จงฺกมน’’นฺติอาทินา นามิกตฺเต ทฺวิปฺปการวนฺตตาสมฺภเวปิ นิคฺคหีตาคมสฺส อพฺภาสวิสเย ปวตฺตตฺตา สา ทฺวิปฺปการวนฺตตา รุธาทิคณภาวสฺส ลกฺขณํ น โหติ, ตสฺมา อพฺภาสวิสเย ปวตฺตํ นิคฺคหีตาคมํ วชฺเชตฺวา ยา ทฺวิปฺปการวนฺตตา, สาเยว รุธาทิคณิกภาวสฺส ลกฺขณนฺติ สนฺนิฏฺฐานํ กาตพฺพํ. อยํ นโย อตีว สุขุโม สมฺมา มนสิ กาตพฺโพ. अहो! जर असे असेल, तर 'सङ्ख' (saṅkha), 'खञ्ज' (khañja) इत्यादींच्या बाबतीत नेहमी सनिग्गहीत-आगम (अनुस्वारयुक्त आगम) क्रियापद असणे लक्षात घेऊनच 'रुधादितो निग्गहीतपुब्बञ्च' (रुधादि धातूंमध्ये पूर्वी निग्गहीत/अनुस्वार होतो) असे म्हटले गेले आहे, असा विचार करणे शक्य आहे काय? नाही, हे शक्य नाही; कारण 'सङ्ख', 'खञ्ज' इत्यादींचा 'रुध' धातूशी समान मार्ग (समान स्वभाव) नसल्यामुळे नामरूपात दोन प्रकार असणे असंभव आहे. कारण ज्यांच्या बाबतीत नामरूपात निग्गहीत-आगम आणि अनिग्गहीत-आगम या भेदाने दोन प्रकार असणे, हेच त्यांचे 'रुधादिगण' असण्याचे लक्षण आहे. आणि ते 'सङ्ख', 'खञ्ज' इत्यादींच्या बाबतीत नाही. कारण 'सङ्का' (शंका), 'खञ्जो' (लंगडा) इत्यादी नामांच्या बाबतीत केवळ एकच प्रकार (सनिग्गहीत-आगम असलेला) दिसून येतो. परंतु 'कमु पदविक्खेपे' (पाऊल टाकणे या अर्थी 'कमु' धातू) इत्यादींच्या बाबतीत 'कमो', 'कमनं', 'चङ्कमो', 'चङ्कमनं' इत्यादी रूपांद्वारे नामरूपात दोन प्रकार असणे शक्य असले, तरी निग्गहीत-आगमाचा अभ्यास-विषयात (द्वित्व विषयात) प्रवृत्त झाल्यामुळे, ती द्विरूपता 'रुधादिगण' असण्याचे लक्षण ठरत नाही. म्हणून, अभ्यास-विषयात प्रवृत्त झालेल्या निग्गहीत-आगमाला वगळून जी द्विरूपता उरते, तीच 'रुधादिगण' असण्याचे लक्षण आहे, असा निष्कर्ष काढला पाहिजे. हा नियम अत्यंत सूक्ष्म आहे, तो चांगल्या प्रकारे मनात धारण केला पाहिजे. รุธาที เอตฺตกา ทิฏฺฐา, ธาตโว เม ยถาพลํ; สุตฺเตสฺวญฺเญปิ เปกฺขิตฺวา, คณฺหวฺโห อตฺถยุตฺติโตติ. माझ्या क्षमतेनुसार 'रुधादि' इत्यादी धातू एवढेच पाहिले गेले आहेत; सूत्रांमध्ये इतरही धातू पाहून अर्थाशी सुसंगत असे ग्रहण करावे. ทุธาทิคโณยํ. हा दुधादिगण होय. ทิวาทิคณิก दिवादिगण. ทิวุ กีฬาวิชิคิสาพฺยวหารชุติถุติกนฺติคติสตฺตีสุ. เอตฺถ จ กีฬาติ ลฬนา, วิหาโร วา. ลฬนาติ จ ลฬิตานุภวนวเสน รมณํ. วิหาโร อิริยาปถปริวตฺตนาทินา วตฺตนํ. วิชิคิสาติ วิชยิจฺฉา. พฺยวหาโรติ โวหาโร. ชุตีติ โสภา. ถุตีติ โถมนา. กนฺตีติ กมนียตา. คตีติ คมนํ. สตฺตีติ สามตฺถิยํ. อิเมสุ อตฺเถสุ ทิวุธาตุ วตฺตติ. ทิพฺพติ. เทโว. เทวี. เทวตา. 'दिवु' (divu) धातू क्रीडा (खेळणे), विजिगीषा (जिंकण्याची इच्छा), व्यवहार (व्यापार/व्यवहार), द्युती (शोभा/प्रकाश), थुती (स्तुती), कांती (कमनीयता/सौंदर्य), गती (गमन) आणि शक्ती (सामर्थ्य) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. येथे 'क्रीडा' म्हणजे लळना (विलास) किंवा विहार होय. 'लळना' म्हणजे विलासाचा अनुभव घेत रममाण होणे. 'विहार' म्हणजे इरियापथ (चालणे, उभे राहणे इत्यादी शारीरिक अवस्था) बदलून वावरणे. 'विजिगीषा' म्हणजे विजयाची इच्छा. 'व्यवहार' म्हणजे वोहार (लोकव्यवहार). 'द्युती' म्हणजे शोभा. 'थुती' म्हणजे थोमना (स्तुती). 'कांती' म्हणजे कमनीयता. 'गती' म्हणजे गमन (जाणे). 'शक्ती' म्हणजे सामर्थ्य. या अर्थांमध्ये 'दिवु' धातू प्रवृत्त होतो. उदा. दिब्बति (तो खेळतो/चमकतो). देवो (देव). देवी. देवता. เอตฺถ เทโวติ ติวิธา เทวา สมฺมุติเทวา อุปปตฺติเทวา วิสุทฺธิเทวาติ. เตสุ มหาสมฺมตกาลโต ปฏฺฐาย โลเกน ‘‘เทวา’’ติ สมฺมตตฺตา ราชราชกุมาราทโย สมฺมุติเทวา [Pg.220] นาม. เทวโลเก อุปปนฺนา อุปปตฺติเทวา นาม. ขีณาสวา วิสุทฺธิเทวา นาม. วุตฺตมฺปิ เจตํ ‘‘สมฺมุติเทวา นาม ราชาโน เทวิโย กุมารา. อุปปตฺติเทวา นาม ภุมฺมเทเว อุปาทาย ตทุตฺตริเทวา. วิสุทฺธิเทวา นาม พุทฺธปจฺเจกพุทฺธขีณาสวา’’ติ. येथे 'देव' म्हणजे तीन प्रकारचे देव आहेत: संमुतिदेव (संमतीने मानलेले देव), उपपत्तिदेव (उत्पत्तीने झालेले देव) आणि विशुद्धिदेव (विशुद्ध देव). त्यांपैकी, महासंमत काळापासून लोकांनी 'देव' म्हणून स्वीकारल्यामुळे राजे, राजकुमार इत्यादींना 'संमुतिदेव' म्हणतात. देवललोकात उत्पन्न झालेल्यांना 'उपपत्तिदेव' म्हणतात. क्षीणासव (ज्यांचे आसव नष्ट झाले आहेत असे अर्हत) हे 'विशुद्धिदेव' होत. म्हणूनच असे म्हटले आहे - 'संमुतिदेव म्हणजे राजे, राण्या आणि राजकुमार. उपपत्तिदेव म्हणजे भूमदेवांना धरून त्यांच्यावरील सर्व देव. विशुद्धिदेव म्हणजे बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध आणि क्षीणासव (अर्हत) होत.' อิทํ ปเนตฺถ นิพฺพจนํ – ทิพฺพนฺติ กามคุณฌานาภิญฺญาจิตฺติสฺสริยาทีหิ กีฬนฺติ, เตสุ วา วิหรนฺตีติ เทวา. ทิพฺพนฺติ ยถาภิลาสิตํ วิสยํ อปฺปฏิฆาเตน คจฺฉนฺตีติ เทวา. ทิพฺพนฺติ ยถิจฺฉิตนิปฺผาทเน สกฺโกนฺตีติ เทวา. อถ วา ตํตํพฺยสนนิตฺถรณตฺถิเกหิ สรณํ ปรายณนฺติ เทวนียา อภิตฺถวนียาติ เทวา. โสภาวิเสสโยเคน กมนียาติ วา เทวา. या शब्दाची व्युत्पत्ती अशी आहे – 'दिब्बन्ति' म्हणजे जे कामगुण, ध्यान, अभिज्ञा, चित्त आणि ऐश्वर्य इत्यादींद्वारे क्रीडा करतात किंवा त्यांमध्ये विहार करतात, ते 'देवा' (देव) होत. 'दिब्बन्ति' म्हणजे जे इच्छित विषयाकडे कोणत्याही अडथळ्याशिवाय जातात, ते 'देवा' होत. 'दिब्बन्ति' म्हणजे जे इच्छेनुसार कार्य पूर्ण करण्यास समर्थ असतात, ते 'देवा' होत. अथवा, विविध संकटांतून पार पडू इच्छिणाऱ्यांसाठी जे शरण आणि परायण आहेत, म्हणून जे पूजनीय (देवनीय) आणि स्तुतीस पात्र (अभित्थवनीय) आहेत, ते 'देवा' होत. किंवा, विशेष शोभेने युक्त असल्यामुळे जे कमनीय (आकर्षक) आहेत, ते 'देवा' होत. เอตฺถ จ ถุติกนฺติ อตฺถา กมฺมสาธนวเสน ทฏฺฐพฺพา, กีฬาทโย ฉ อตฺถา กตฺตุสาธนวเสน. เกจิ ปน ‘‘ทิวุ กีฬาวิชิคิสาพฺยวหารชุติถุติคตีสู’’ติ ปฐนฺติ. เกจิ ‘‘คตี’’ติ ปทํ วิหาย ‘‘ชุติถุตีสู’’ติ ปฐนฺติ. เกจิ ‘‘ถุตี’’ติ ปทํ วิหาย ‘‘ชุติคตีสู’’ติ ปฐนฺติ, เกจิ ปน ทิวุธาตุํ ‘‘สตฺติถุติก’’นฺติอตฺเถปิ อิจฺฉนฺติ. เตนาห อภิธมฺมสฺส อนุฏีกากาโร ‘‘เทวสทฺโท ยถา กีฬาวิชิคิสาโวหารชุติคติอตฺโถ, เอวํ สตฺติอภิตฺถวกมนตฺโถปิ โหติ ธาตุสทฺทานํ อเนกตฺถภาวโต’’ติอาทิ. येथे 'थुति' (स्तुती) आणि 'कन्ति' (कांती) हे अर्थ कर्मसाधन रूपाने पाहावेत, आणि क्रीडा इत्यादी सहा अर्थ कर्तृसाधन रूपाने पाहावेत. काही व्याकरणकार 'दिवु कीळाविजिगीसाव्यवहारजुतिथुतिगतीसु' असा पाठ वाचतात. काही जण 'गती' हा शब्द वगळून 'जुतिथुतीसु' असा पाठ वाचतात. काही जण 'थुती' हा शब्द वगळून 'जुतिगतीसु' असा पाठ वाचतात, तर काही जण 'दिवु' धातूचा 'शक्ती' आणि 'थुति-कन्ति' या अर्थांमध्येही स्वीकार करतात. म्हणूनच अभिधम्माच्या अनुटीकाकारांनी म्हटले आहे – 'जसा देव शब्दाचा अर्थ क्रीडा, विजिगीषा, वोहार (व्यवहार), द्युती आणि गती असा होतो, तसाच धातूंच्या अनेक अर्थांमुळे शक्ती, अभित्थव (स्तुती) आणि कमन (इच्छा/कांती) असाही होतो' इत्यादी. อิทํ ปน ยถาวุตฺเตสุ สมฺมุติเทวาทีสุ ปจฺเจกํ นิพฺพจนํ – ทิพฺพนฺติ กีฬนฺติ อตฺตโน วิสเย อิสฺสริยํ กโรนฺตีติ เทวา, ราชาโน. ทิพฺพนฺติ กีฬนฺติ ปญฺจหิ กามคุเณหิ, ปฏิปกฺเข วา วิเชตุํ อิจฺฉนฺติ, โวหรนฺติ จ โลกสฺส ยุตฺตายุตฺตํ, โชตนฺติ ปรมาย สรีรชุติยา, โถมิยนฺติ ตพฺภาวตฺถิเกหิ, กามิยนฺติ ทฏฺฐุํ โสตุญฺจ [Pg.221] โสภาวิเสสโยเคน, คจฺฉนฺติ จ ยถิจฺฉิตฏฺฐานํ อปฺปฏิหตคมเนน, สกฺโกนฺติ จ อานุภาวสมฺปตฺติยา ตํตํกิจฺจํ นิปฺผาเทตุนฺติ เทวา, จาตุมหาราชิกาทโย. กีฬนฺติ ปรมาย ฌานกีฬาย, วิเชตุํ อิจฺฉนฺติ ปฏิปกฺขํ, ปรมสุขุมญาณวิเสสวิสยํ อตฺถญฺจ โวหรนฺติ, โชตนฺติ สพฺพกิเลสโทสกลุสาภาวา ปรมวิสุทฺธาย ญาณชุติยา, โถมิยนฺติ จ วิญฺญาตสภาเวหิ ปรมนิมฺมลคุณวิเสสโยคโต, กามิยนฺติ จ อนุตฺตรปุญฺญกฺเขตฺตตาย ทฏฺฐุํ โสตุํ ปูชิตุญฺจ, คจฺฉนฺติ จ อมตมหานิพฺพานํ อปจฺจาคมนียาย คติยา, สกฺโกนฺติ จ จิตฺตาจารํ ญตฺวา เต เต สตฺเต หิเต นิโยเชตุํ อมตมหานิพฺพานสุเข จ ปติฏฺฐาเปตุนฺติ เทวา, วิสุทฺธิเทวา. आता वर उल्लेखिलेल्या संमुतिदेव इत्यादींचे स्वतंत्रपणे स्पष्टीकरण (व्युत्पत्ती) खालीलप्रमाणे आहे – जे आपल्या क्षेत्रात क्रीडा करतात आणि ऐश्वर्य गाजवतात, ते 'देवा' म्हणजे राजे होत. जे पाच कामगुणांमध्ये क्रीडा करतात, शत्रूंवर विजय मिळवण्याची इच्छा ठेवतात, लोकांच्या योग्य-अयोग्य गोष्टींचा व्यवहार करतात, शरीराच्या उत्कृष्ट तेजाने चमकतात, देवत्व इच्छिणाऱ्यांकडून स्तुती मिळवतात, विशेष शोभेमुळे पाहण्याची व ऐकण्याची इच्छा निर्माण करतात, कोणत्याही अडथळ्याशिवाय इच्छित स्थळी जातात आणि आपल्या प्रभावाच्या समृद्धीने ती ती कार्ये पूर्ण करण्यास समर्थ असतात, ते 'देवा' म्हणजे चातुमहाराजिका इत्यादी देव होत. जे उत्कृष्ट ध्यानरूपी क्रीडेमध्ये रमतात, क्लेशादी शत्रूंवर विजय मिळवण्याची इच्छा ठेवतात, अत्यंत सूक्ष्म अशा विशेष ज्ञानविषयक अर्थाचा व्यवहार (प्रकटीकरण) करतात, सर्व क्लेश, दोष आणि मळ नसल्यामुळे अत्यंत विशुद्ध अशा ज्ञानतेजाने चमकतात, स्वभाव जाणणाऱ्यांकडून अत्यंत निर्मळ अशा विशेष गुणांमुळे स्तुती मिळवतात, अनुत्तर पुण्यक्षेत्र असल्यामुळे पाहण्याची, ऐकण्याची व पूजा करण्याची इच्छा निर्माण करतात, कधीही परत न येणाऱ्या गतीने अमृत महानिर्वाणाप्रत जातात आणि प्राण्यांच्या चित्ताची प्रवृत्ती जाणून त्यांना हिताच्या कार्यात जोडण्यास व अमृत महानिर्वाण सुखात प्रतिष्ठित करण्यास समर्थ असतात, ते 'देवा' म्हणजे विशुद्धिदेव होत. เทวสทฺท ‘‘วิทฺเธ วิคตวลาหเก เทเว’’ติอาทีสุ อชฏากาเส อาคโต. ‘‘เทโว จ โถกํ โถกํ ผุสายตี’’ติอาทีสุ เมเฆ. ‘‘อยญฺหิ เทว กุมาโร’’ติอาทีสุ ขตฺติเย. ‘‘อหํ เทว สกลชมฺพุทีเป อญฺญสฺส รญฺโญ สนฺติเก กิญฺจิ ภยํ น ปสฺสามี’’ติอาทีสุ อิสฺสรปุคฺคเล. ‘‘ปญฺจหิ กามคุเณหิ สมปฺปิโต สมงฺคีภูโต ปริจาเรติ เทโว มญฺเญ’’ติอาทีสุ อุปปตฺติเทเว. ‘‘เทวาติเทวํ นรทมฺมสารถิ’’นฺติอาทีสุ วิสุทฺธิเทเว อาคโต. 'देव' शब्द 'विद्धे विगत्तवलाहके देवे' (ढग विरघळलेल्या स्वच्छ आकाशात) इत्यादी वाक्यांमध्ये 'आकाश' या अर्थाने आला आहे. 'देवो च थोकं थोकं फुसायति' (मेघ थोडा-थोडा बरसत आहे) इत्यादी वाक्यांमध्ये 'मेघ' (ढग/पाऊस) या अर्थाने आला आहे. 'अयञ्हि देव कुमारो' (हे देवा! हा कुमार...) इत्यादी वाक्यांमध्ये 'क्षत्रिय' (राजे) या अर्थाने आला आहे. 'अहं देव सकलजम्बुदीपे अञ्ञस्स रञ्ञो सन्तिके kiञ्चि भयं न पस्सामि' (हे देवा! मी संपूर्ण जंबूद्गीपात इतर कोणत्याही राजाकडून काहीही भीती पाहत नाही) इत्यादी वाक्यांमध्ये 'ऐश्वर्यशाली व्यक्ती' (स्वामी/राजे) या अर्थाने आला आहे. 'पञ्चहि कामगुणेहि समप्पितो समङ्गीभूतो परिचारेति देवो मञ्ञे' (पाच कामगुणांनी युक्त होऊन क्रीडा करतो, जणू काही देवच) इत्यादी वाक्यांमध्ये 'उपपत्तिदेव' या अर्थाने आला आहे. 'देवातिदेवं नरदम्मसारथिं' (देवांचेही देव, मानवांचे दमन करणारे सारथी) इत्यादी वाक्यांमध्ये 'विशुद्धिदेव' (बुद्ध) या अर्थाने आला आहे. เทวีติ ราชภริยาปิ เทวธีตาปิ ‘‘เทวี’’ติ วุจฺจติ. เทวสฺส ภริยาติ หิ เทวี, สาปิ อตฺถโต ‘‘ทิพฺพตีติ เทวี’’ติ วตฺตพฺพา, ยถา ‘‘ภิกฺขตีติ ภิกฺขุนี’’ติ. ตถา หิ วุตฺตํ วิมานวตฺถุอฏฺฐกถายํ ‘‘ทิพฺพติ อตฺตโน ปุญฺญิทฺธิยา กีฬตีติ เทวี’’ติ. 'देवी' म्हणजे राजाची पत्नी आणि देवकन्या यांनाही 'देवी' म्हटले जाते. देवाच्या पत्नीला 'देवी' म्हणतात, तिचा अर्थही 'जी क्रीडा करते ती देवी' (दिब्बतीति देवी) असाच सांगितला पाहिजे, जसे 'जी भिक्षा मागते ती भिक्षुणी' (भिक्खतीति भिक्खुनी). म्हणूनच विमानवस्तूच्या अट्ठकथेत म्हटले आहे – 'जी आपल्या पुण्य-ऋद्धीने क्रीडा करते, ती देवी होय' (दिब्बति अत्तनो पुञ्ञिद्धिया कीळतीति देवी). เทวตาติ [Pg.222] เทวปุตฺโตปิ พฺรหฺมาปิ เทวธีตาปิ. ‘‘อถ โข อญฺญตรา เทวตา อภิกฺกนฺตาย รุตฺติยา อภิกฺกนฺตวณฺณา’’ติอาทีสุ หิ เทวปุตฺโต ‘‘เทวตา’’ติ วุตฺโต ‘‘เทโวเยว เทวตา’’ติ กตฺวา, ตถา ‘‘ตา เทวตา สตฺตสตา อุฬารา, พฺรหฺมา วิมานา อภินิกฺขมิตฺวา’’ติอาทีสุ พฺรหฺมาโน. 'देवता' म्हणजे देवपुत्र, ब्रह्मा आणि देवकन्या देखील होय. 'अथ खो अञ्ञतरा देवता अभिक्kन्ताय रुत्तिया अभिक्kन्तवण्णा' (त्यानंतर रात्रीच्या प्रहरात एक अतिशय तेजस्वी देवता...) इत्यादी वाक्यांमध्ये देवपुत्रालाच 'देवता' म्हटले आहे, कारण 'जो देव आहे तोच देवता' असे मानले जाते. तसेच 'ता देवता सत्तसता उळारा, ब्रह्मा विमाना अभिनिक्खमित्वा' (त्या सातशे भव्य देवता, ब्रह्मलोकातून बाहेर पडून...) इत्यादी वाक्यांमध्ये ब्रह्मांना 'देवता' म्हटले आहे. ‘‘อภิกฺกนฺเตน วณฺเณน, ยา ตฺวํ ติฏฺฐสิ เทวเต; โอภาเสนฺตี ทิสา สพฺพา, โอสธี วิย ตารกา’’ติ- 'हे देवते! ओषधी (शुक्र) ताऱ्याप्रमाणे सर्व दिशा प्रकाशित करत, तू अत्यंत तेजस्वी रूपाने उभी आहेस' - อาทีสุ เทวธีตา. सुरुवातीला 'देवधीता' (देवपुत्री) असा शब्द आहे. อิมานิ อุปปตฺติเทวานํ นามานิ – ही उपपत्तिदेवांची (उत्पत्ती झालेल्या देवांची) नावे आहेत – เทโว สุโร จ วิพุโธ, นิชฺชโร อมโร มรุ; สุธาสี ติทโส สคฺค-วาสี อนิมิโสปิ จ; ทิโวโก’มตปายี จ, สคฺคฏฺโฐ เทวตานิ จ. देव, सुर, विबुध, निज्जर (निर्जर), अमर, मरु, सुधासी (सुधा खाणारा), तिदस (त्रिदश), सग्गवासी (स्वर्गवासी), अनिमिस (अनिमिष - डोळे न मिटणारा), दिवोक (दिवौकस), अमतपायी (अमृत पिणारा), सग्गट्ठ (स्वर्गस्थ) आणि देवता. ขิ ขเย. ขิยติ. ขโย. ขิยนํ. ราคกฺขโย. 'खि' (धातू) क्षय (नाश) होण्याच्या अर्थात. 'खीयति' (नाश पावतो). 'खयो' (क्षय/नाश). 'खीयणं' (नाश होणे). 'रागक्खयो' (रागाचा/आसक्तीचा क्षय). ขิ นิวาเส โกธหึสาสุ จ. ขิยติ. น คจฺฉสิ ยมกฺขยํ. นาคทาเนน ขิยนฺติ. 'खि' (धातू) निवास (राहणे), क्रोध आणि हिंसा या अर्थांमध्येही आहे. 'खीयति' (राहतो). 'न गच्छसि यमक्खयं' (तू यमाच्या निवासाला जात नाहीस). 'नागदानेन खीयन्ति' (हत्तींच्या दानामुळे ते क्रुद्ध होतात किंवा हिंसा करतात). ตตฺถ ขิยตีติ นิวสติ. ยมกฺขยนฺติ ยมนิเวสนํ. ขิยนฺตีติ กุชฺฌนฺติ หึสนฺติ วา. तेथे, 'खीयति' म्हणजे राहतो (निवास करतो). 'यमक्खयं' म्हणजे यमाचे निवासस्थान. 'खीयन्ति' म्हणजे रागवतात किंवा हिंसा करतात. ฆา คนฺโธปาทาเน. ฆายตีติ ฆานํ. ฆาเนน คนฺธํ ฆายิตุํ ฆายิตฺวา. 'घा' (धातू) गंध ग्रहण करण्याच्या (वास घेण्याच्या) अर्थात. 'घायति' (वास घेतो) म्हणून 'घानं' (नाक). नाकाने गंधाचा वास घेण्यासाठी, वास घेऊन. รุจ โรจเน. โรจนํ รุจิ. ภตฺตํ เม รุจฺจติ. ภตฺตมฺปิตสฺส น รุจฺจติ. ปพฺพชฺชา มม รุจฺจติ. รุจฺจิตุํ, รุจฺจิตฺวา. เกจิ ปน อิมสฺมึ ทิวาทิคเณ ‘‘รุจ ทิตฺติมฺหี’’ติ ปฐนฺติ. ตํ น ยุตฺตํ กตฺถจิปิ ทิตฺติสงฺขาตโสภนตฺถวาจกสฺส [Pg.223] รุจธาตุโน ‘‘รุจฺจตี’’ติ รูปาภาวโต. ตสฺมา เอวํ สลฺลกฺเขตพฺพํ, ทิตฺติรุจีนํ วาจโก รุจธาตุ ภุวาทิคณิโก. ตสฺส หิ ‘‘โรจติ, วิโรจติ. เอกตฺตมุปโรจิต’’นฺติ รูปานิเยว ภวนฺติ, น ‘‘รุจฺจตี’’ติ รูปํ. รุจิยาเยว วาจโก ปน ทิวาทิคณิโกปิ โหติ จุราทิคณิโกปิ. ตสฺส หิ ทิวาทิคณิกกาเล ‘‘คมนํ มยฺหํ รุจฺจตี’’ติ รูปํ. จุราทิคณิกกาเล ‘‘กึ นุ ชาตึ น โรเจสี’’ติ รูปํ. อาปุพฺโพ เจ อาจิกฺขเน วตฺตติ, ‘‘อาโรเจติ, อาโรจยตี’’ติ รูปานิ ทิสฺสนฺติ. 'रुच' (धातू) आवडण्याच्या (रोचन) अर्थात. आवडणे म्हणजे 'रुचि'. 'भत्तं मे रुच्चति' (मला अन्न आवडते). 'भत्तम्पि तस्स न रुच्चति' (त्याला अन्नही आवडत नाही). 'पब्बज्जा मम रुच्चति' (मला प्रव्रज्या आवडते). आवडण्यासाठी, आवडल्यामुळे. परंतु काही लोक या दिवादि गणात 'रुच दित्तिम्हि' (रुच धातू प्रकाशाच्या अर्थात) असा पाठ वाचतात. ते योग्य नाही, कारण कुठेही प्रकाश किंवा शोभा या अर्थाचा वाचक असलेल्या 'रुच' धातूचे 'रुच्चति' असे रूप आढळत नाही. म्हणून हे लक्षात घेतले पाहिजे की, प्रकाश आणि आवड दर्शवणारा 'रुच' धातू हा भ्वादि गणातील आहे. कारण त्याची 'रोचति, विरोचति, एकत्तमुपरोचितं' अशीच रूपे होतात, 'रुच्चति' असे रूप होत नाही. केवळ आवडीचा वाचक असलेला धातू दिवादि गणातील आणि चुरादि गणातीलही असतो. दिवादि गणाच्या वेळी त्याचे 'गमनं मय्हं रुच्चति' (माझे जाणे मला आवडते) असे रूप होते. चुरादि गणाच्या वेळी 'किं नु जातिं न रोचेसि' (तू जन्माची आवड का धरत नाहीस?) असे रूप होते. जर 'आ' उपसर्ग आधी असेल तर तो सांगण्याच्या अर्थात वापरला जातो, आणि 'आरोचेति, आरोचयति' अशी रूपे दिसतात. มุจ โมกฺเข. ทุกฺขโต มุจฺจติ. สทฺธาย อธิมุจฺจติ. มุตฺติ, วิมุตฺติ, อธิมุตฺติ, มุจฺจมาโน. 'मुच' (धातू) मोक्षाच्या (मुक्त होण्याच्या) अर्थात. 'दुक्खतो मुच्चति' (दुःखातून मुक्त होतो). 'सद्धाय अधिमुच्चति' (श्रद्धेने अधिमुक्त/दृढनिश्चयी होतो). 'मुत्ति' (मुक्ती), 'विमुत्ति' (विमुक्ती), 'अधिमुत्ति' (अधिमुक्ती/दृढ श्रद्धा), 'मुच्चमानो' (मुक्त होत असलेला). อุจ สมวาเย. อุจฺจติ. โอโก, อูกา, อุกฺกา. 'उच' (धातू) समवायाच्या (एकत्र येण्याच्या/संबंधाच्या) अर्थात. 'उच्चति' (म्हटले जाते/एकत्र येते). 'ओको' (पाणी किंवा निवासस्थान), 'ऊका' (उवा), 'उक्का' (मशाल). โอโกติ อุทกมฺปิ อาวาโสปิ. ‘‘โอกปุณฺเณหิ จีวเรหี’’ติ จ, ‘‘วาริโชว ถเล ขิตฺโต, โอกโมกตมุพฺภโต’’ติ เจตฺถ ปโยโค. อูกาติ สีเส นิพฺพตฺตกิมิวิเสโส. 'ओको' म्हणजे पाणी आणि निवासस्थान देखील. 'ओकपुण्णेहि चीवरेहि' (पाण्याने भरलेल्या चीवरांसह) आणि 'वारिजोव thale खित्तो, ओकमोकतमुब्भतो' (जसे जमिनीवर फेकलेला मासा त्याच्या पाण्याच्या निवासस्थानातून बाहेर काढला जातो) हे येथे याचे प्रयोग आहेत. อุกฺกาติ ทีปิกาทโย วุจฺจนฺติ. ‘‘อุกฺกาสุ ธาริยมานาสู’’ติ หิ อาคตฏฺฐาเน ทีปิกา ‘‘อุกฺกา’’ติ วุจฺจติ. ‘‘อุกฺกํ พนฺเธยฺย, อุกฺกํ พนฺธิตฺวา, อุกฺกามุขํ อาลิมฺเปยฺยา’’ติ อาคตฏฺฐาเน องฺคารกปลฺลํ. ‘‘กมฺมารานํ ยถา อุกฺกา, อนฺโต ฌายติ โน พหี’’ติ อาคตฏฺฐาเน กมฺมารุทฺธนํ. ‘‘เอวํ วิปาโก อุกฺกาปาโต ภวิสฺสตี’’ติ อาคตฏฺฐาเน วาตเวโค ‘‘อุกฺกา’’ติ วุจฺจติ. ‘‘สณฺฑาเสน ชาตรูปํ [Pg.224] คเหตฺวา อุกฺกามุเข ปกฺขิเปยฺยา’’ติ อาคตฏฺฐาเน สุวณฺณการานํ มูสา ‘‘อุกฺกา’’ติ เวทิตพฺพา. อิจฺเจวํ – 'उक्का' म्हणजे मशाल इत्यादी म्हटले जाते. कारण 'उक्कासु धारियमानासु' (मशाली धरल्या जात असताना) या आलेल्या ठिकाणी मशालीला 'उक्का' म्हटले आहे. 'उक्कं बन्धेय्य, उक्कं बन्धित्वा, उक्कामुखं आलिम्पेय्य' (मशाल बांधावी, मशाल बांधून, मशालीचे तोंड पेटवावे) या आलेल्या ठिकाणी 'कोळशाचे भांडे' (अंगारकपल्ल) असा अर्थ आहे. 'कम्मारानं यथा उक्का, अन्तो झायति नो बही' (लोहाराच्या भट्टीप्रमाणे, ती आत जळते, बाहेर नाही) या आलेल्या ठिकाणी 'लोहाराची भट्टी' (कम्मारुद्धन) असा अर्थ आहे. 'एवं विपाको उक्कापातो भविस्सति' (अशा प्रकारे विपाक उल्कापात होईल) या आलेल्या ठिकाणी वायूचा वेग (वातवेग) याला 'उक्का' म्हटले आहे. 'सण्डासेन जातरूपं गहेत्वा उक्कामुखे पक्खिपेय्य' (चिमट्याने सोने पकडून मुशीच्या तोंडात टाकावे) या आलेल्या ठिकाणी सोनारांची 'मूस' (मूष) म्हणजे 'उक्का' असे समजले पाहिजे. अशा प्रकारे – ทีปิกาวาตเวเคสุ, กมฺมารานญฺจ อุทฺธเน; มูสายมฺปิ จ องฺคาร-กปลฺเล จาติ ปญฺจสุ; วิสเยสุ ปเนเตสุ, อุกฺกาสทฺโท ปวตฺตติ; मशाल, वायूचा वेग, लोहाराची भट्टी, मूस (मूष) आणि कोळशाचे भांडे या पाच विषयांमध्ये (अर्थांमध्ये) 'उक्का' हा शब्द वापरला जातो. เฉ เฉทเน. ฉิยติ, ฉิยนฺติ. อวจฺฉิตํ, อวจฺฉาตํ. เฉตฺวาน โมฬึ วรคนฺธวาสิตํ. 'छे' (धातू) छेद घेण्याच्या (कापण्याच्या) अर्थात. 'छीयति' (कापले जाते), 'छीयन्ति' (कापले जातात). 'अवच्छितं', 'अवच्छातं' (कापलेले). 'छेत्वान मोळिं वरगन्धवासितं' (उत्कृष्ट सुगंधाने सुवासित असलेली जटा कापून). สช สงฺเค. สงฺโค ลคนํ. สชฺชติ. สชฺชนํ, สชฺชิโต, สตฺโต. 'सज' (धातू) आसक्तीच्या (सङ्ग) अर्थात. आसक्ती म्हणजे चिकटणे (लगन). 'सज्जति' (आसक्त होतो/चिकटतो). 'सज्जनं' (आसक्त होणे), 'सज्जितो' (आसक्त झालेला), 'सत्तो' (प्राणी/आसक्त). ยุช สมาธิมฺหิ. สมาธานํ สมาธิ, กายกมฺมาทีนํ สมฺมาปโยควเสน อวิปฺปกิณฺณตาติ อตฺโถ. ยุชฺชติ. โยโค, โยคี. 'युज' (धातू) समाधीच्या अर्थात. समाधी म्हणजे चित्ताची एकाग्रता (समाधान), म्हणजेच कायिक कर्म इत्यादींच्या योग्य प्रयोगामुळे विखुरलेले नसणे असा अर्थ आहे. 'युज्जति' (योग्य ठरतो/जोडला जातो). 'योगो' (योग/प्रयत्न), 'योगी' (प्रयत्न करणारा/योगी). เอตฺถ โยโคติ วีริยํ. ตญฺหิ – येथे 'योगो' म्हणजे वीर्य (प्रयत्न) होय. कारण ते – ‘‘วายเมเถว ปุริโส, น นิพฺพินฺเทยฺย ปณฺฑิโต; ปสฺสามิ โว’ห’มตฺตานํ, ยถา อิจฺฉึ ตถา อหุ’’นฺติ 'माणसाने प्रयत्नच केला पाहिजे, पंडिताने खचून जाऊ नये; मी स्वतःला पाहतो, जशी मी इच्छा केली होती, तसेच झाले.' วจนโต อวสฺสํ กาตุํ ยุชฺชติ อุปปชฺชตีติ โยโคติ วุจฺจติ. या वचनावरून, जे अवश्य करणे योग्य आहे आणि जुळणारे आहे, त्याला 'योगो' असे म्हटले जाते. รนฺช ราเค. รชฺชติ. วิรชฺชติ. รชฺชมาโน, รชฺชํ, รชฺชนฺโต, ราโค, วิราโค, รชฺชนํ, วิรชฺชนํ, รชนียํ. อุปสคฺควเสน อญฺโญ อตฺโถ ภวติ. สมฺหา รฏฺฐา นิรชฺชติ, อตฺตโน รฏฺฐา นิคฺคจฺฉตีติ อตฺโถ. 'रंज' (धातू) रागाच्या (आसक्ती/रंगण्याच्या) अर्थात. 'रज्जति' (आसक्त होतो). 'विरज्जति' (विराग पावतो). 'रज्जमानो' (आसक्त होत असलेला), 'रज्जं' (राज्य/आसक्ती), 'रज्जन्तो' (आसक्त होणारा), 'रागो' (राग/आसक्ती), 'विरागो' (विराग/अनासक्ती), 'रज्जनं' (आसक्त होणे), 'विरज्जनं' (विराग होणे), 'रजनीयं' (आकर्षक/आसक्ती निर्माण करणारे). उपसर्गाच्या प्रभावाने दुसरा अर्थ होतो. 'सम्हा रट्ठा निरज्जति' म्हणजे आपल्या स्वतःच्या राज्यातून बाहेर पडतो (निघून जातो) असा अर्थ आहे. ตตฺถ วิราโคติ วิรชฺชนฺติ เอตฺถ สํกิเลสธมฺมาติ วิราโค, นิพฺพานํ มคฺโค จ. तेथे, 'विरागो' म्हणजे ज्यामध्ये संक्लेश धर्म (मलीन करणारे धर्म) नष्ट होतात तो 'विराग' होय, म्हणजेच निर्वाण आणि मार्ग. วิชี ภยจลเนสุ. วิชฺชติ, สํวิชฺชติ. สํเวโค, สํเวชนียํ. อุพฺพิชฺชติ. อุพฺเพโค, อุพฺพิคฺคหทโย. 'विजी' (धातू) भय आणि कंप पावण्याच्या (थरथरण्याच्या) अर्थात. 'विज्जति', 'संविज्जति' (थरथरतो/घाबरतो). 'संवेगो' (संवेग/धार्मिक संवेग), 'संवेजनीयं' (संवेग निर्माण करणारे). 'उब्बिज्जति' (उद्विग्न होतो/घाबरतो). 'उब्बेगो' (उद्वेग/भय), 'उब्बिग्गहदयो' (उद्विग्न/घाबरलेले हृदय असलेला). ลุช [Pg.225] วินาเส. ลุชฺชตีติ โลโก. โลโป, ลุตฺติ, ลุชฺชนํ, ลุตฺโต. 'लुज' (धातू) विनाशाच्या (नाशाच्या) अर्थात. 'लुज्जति' (नाश पावतो/भंगतो) म्हणून त्याला 'लोको' (लोक/जग) म्हणतात. 'लोपो' (लोप), 'लुत्ति' (लोप होणे), 'लुज्जनं' (भंगणे/नाश पावणे), 'लुत्तो' (लोप पावलेला). ฐา คตินิวตฺติยํ. ฐายติ. ฐายี, ฐิติ, ฐานํ, ฐิโต, ตตฺรฏฺโฐ, ติฏฺฐํ, กปฺปฏฺฐายี, อาสภฏฺฐานฏฺฐายี. 'ठा' (धातू) गती थांबण्याच्या (स्थिर होण्याच्या) अर्थात. 'ठायति' (थांबतो/उभा राहतो). 'ठायी' (स्थिर राहणारा), 'ठिति' (स्थिती), 'ठानं' (स्थान), 'ठितो' (उभा असलेला), 'तत्रट्ठो' (तेथे असलेला), 'तिट्ठं' (उभा राहणारा), 'कप्पट्ठायी' (कल्पभर टिकणारा), 'आसभट्ठानट्ठायी' (श्रेष्ठ स्थानावर राहणारा). ‘‘สุขํ สยามิ ฐายามิ, สุขํ กปฺเปมิ ชีวิตํ; อหตฺถปาโส มารสฺส, อโห สตฺถานุกมฺปโก’’ติ 'मी सुखाने झोपतो, सुखाने उभा राहतो (राहतो), सुखाने माझे जीवन घालवतो; माराच्या जाळ्याबाहेर असलेला, अहा! शास्ता (बुद्ध) किती दयाळू आहेत!' ปาฬิ นิทสฺสนํ. ลาปํ โคจรฏฺฐายินนฺติ จ. ตตฺถ ฐายามีติ ติฏฺฐามิ. हे पाळी भाषेतील उदाहरण आहे. आणि 'लापं गोचरट्ठायिनं' (आपल्या चरण्याच्या जागेत राहणारा लावा पक्षी) हे देखील. तेथे 'ठायामि' म्हणजे 'तिट्ठामि' (मी उभा राहतो/राहतो). ฑิคติยํ. ฑิยติ. เฑมาโน. ฑิโน วา. ‘‘อุจฺเจ สกุณ เฑมาน, ปตฺตยาน วิหงฺคม. วชฺเชสิ โข ตฺวํ วามูรุ’’นฺติ นิทสฺสนํ. 'डि' (धातू) गतीच्या (उडण्याच्या) अर्थात. 'डीयति' (उडतो). 'डेमानो' (उडत असलेला). किंवा 'डीनो' (उडलेला). 'उच्चे सकु ण डेमान, पत्तयान विहङ्गम। वज्जेसि खो त्वं वामूरु' (हे उंच उडणाऱ्या पक्षा, पंखांनी उडणाऱ्या विहंगमा! तू जात आहेस...) हे याचे उदाहरण आहे. เอตฺถ ฑิยตีติ เฑมาโนติ นิพฺพจนํ คเหตพฺพํ. येथे 'डीयति' म्हणजे 'डेमानो' (उडणारा) अशी व्युत्पत्ती घेतली पाहिजे. ตา ปาลเน. ตายติ. อฆสฺส ตาตา. โส นูน กปโณ ตาโต, จิรํ รุชฺชติ อสฺสเม. ตาณํ, ปริตฺตํ, โคตฺตํ. ตฺวํ โขสิ อุปาสก กตกลฺยาโณ กตภีรุตฺตาโณ. 'ता' (धातू) पालनाच्या (रक्षण करण्याच्या) अर्थात. 'तायति' (रक्षण करतो). 'अघस्स ताता' (पापापासून/दुःखापासून रक्षण करणारे). 'सो नून कपणो तातो, चिरं रुज्जति अस्समे' (तो बिचारा वडील/रक्षक नक्कीच आश्रमात दीर्घकाळ आजारी आहे). 'ताणं' (त्राण/रक्षण), 'परित्तं' (परित्त/संरक्षण), 'गोत्तं' (गोत्र/रक्षण). 'त्वं खोसि उपासक कतकल्याणो कतभीरुत्ताणो' (हे उपासका, तू कल्याण केले आहेस आणि भयापासून रक्षण केले आहेस). ตตฺร ปริตฺตนฺติ มหาเตชวนฺตตาย สมนฺตโต สตฺตานํ ภยํ อุปทฺทวํ อุปสคฺคญฺจ ตายติ รกฺขตีติ ปริตฺตํ, คํ ตายตีติ โคตฺตํ. तेथे, 'परित्त' म्हणजे महातेजस्वी असल्यामुळे जे सर्व बाजूंनी प्राण्यांचे भय, उपद्रव आणि संकटांपासून रक्षण करते (तायति/रक्खति) ते 'परित्त' होय. गायीचे किंवा पृथ्वीचे (गं) रक्षण करते ते 'गोत्तं' (गोत्र). นต คตฺตวินาเม. คตฺตวินาโม คตฺตวิกฺเขโป. นจฺจติ. นจฺจํ. นิคณฺโฐ นาฏปุตฺโต. 'नत' (धातू) शरीराचे अवयव वाकवण्याच्या (गात्रविनाम) अर्थात. शरीराचे अवयव वाकवणे म्हणजेच अवयवांची हालचाल करणे (गात्रविक्षेप). 'नच्चति' (नाचतो). 'नच्चं' (नृत्य). 'निगण्ठो नाटपुत्तो' (निगंठ नातपुत्त/नर्तकाचा मुलगा). ทา โสธเน. ทายติ. ทานํ. อนุโยคทาปนตฺถํ. อนุโยคํ ทตฺวา. ทานํ ทตฺวา. 'दा' (धातू) शोधनाच्या (स्वच्छ करण्याच्या/कापण्याच्या) अर्थात. 'दायति' (स्वच्छ करतो/कापतो). 'दानं' (दान). 'अनुयोगदापनत्थं' (अभ्यास/प्रयत्न करवून घेण्यासाठी). 'अनुयोगं दत्वा' (अभ्यास देऊन). 'दानं दत्वा' (दान देऊन). ทา [Pg.226] สุปเน. ทายติ. นิทฺทายติ. นิทฺทายนํ, นิทฺทายมาโน, นิทฺทายนฺโต. 'दा' (धातू) झोपण्याच्या (सुपन) अर्थात. 'दायति' (झोपतो). 'निद्दायति' (झोपतो). 'निद्दायणं' (झोपणे), 'निद्दायमानो' (झोपलेला), 'निद्दायन्तो' (झोपत असलेला). ทาทาเน. ปุริโส ทานํ ทายติ. อาปุพฺโพ คหเณ. อทินฺนํ อาทิยติ. สีลํ สมาทิยติ. กมฺเม – ปุริเสน ทานํ ทียติ, อทินฺนํ อาทิยติ. การิเต – อาทเปติ, สมาทเปติ, อาทปยติ, สมาทปยติ, เย ธมฺมเมวาทปยนฺติ สนฺโต. 'दा' (धातू) देण्याच्या (दान) अर्थात. 'पुरिसो दानं दायति' (माणूस दान देतो). 'आ' उपसर्ग आधी असल्यास ग्रहण करण्याच्या (घेण्याच्या) अर्थात होतो. 'अदिन्नं आदियति' (न दिलेले घेतो). 'सीलं समादियति' (शीलाचे समादान करतो/शील ग्रहण करतो). कर्मणी प्रयोगात (कम्मे) – 'पुरिसेन दानं दीयति' (माणसाद्वारे दान दिले जाते), 'अदिन्नं आदियति' (न दिलेले घेतले जाते). प्रयोजक प्रयोगात (कारिते) – 'आदापेति', 'समादापेति', 'आदापयति', 'समादापयति' (घेण्यास लावतो, समादान करण्यास लावतो), 'ye धम्ममेवादापयन्ति सन्तो' (जे संत केवळ धम्माचेच समादान करवून घेतात). ทา อวขณฺฑเน. ทิยติ, ทิยนฺติ. ปริตฺตํ. 'दा' (धातू) तुकडे करण्याच्या (अवखंडन) अर्थात. 'दीयति' (तुकडे केले जातात), 'दीयन्ति' (तुकडे केले जातात). 'परित्तं' (अल्प/मर्यादित). เอตฺถ จ ปริตฺตนฺติ สมนฺตโต ขณฺฑิตตฺตา ปริตฺตํ. อปฺปมตฺตกญฺหิ โคมยปิณฺฑํ ปริตฺตนฺติ วุจฺจติ. ตสฺมา ปริตฺตนฺติ อปฺปกสฺส นามํ กามาวจรสฺส จ ธมฺมสฺส อปฺเปสกฺขตฺตา. आणि येथे 'परित्त' म्हणजे सर्व बाजूंनी खंडित (तुकडे) केल्यामुळे ते 'परित्त' होय. कारण शेणाचा लहान गोळा 'परित्त' म्हटला जातो. म्हणून 'परित्त' हे अल्प (कमी) गोष्टीचे नाव आहे आणि कामावचर धम्माचे नाव आहे कारण त्याचा प्रभाव मर्यादित असतो. ทา สุทฺธิยํ. ทายติ. โวทายติ. โวทานํ. อกมฺมโกยํ ธาตุ. ตถา หิ ‘‘โวทายติ สุชฺฌติ เอเตนาติ โวทานํ, สมถวิปสฺสนา’’ติ เนตฺติสํวณฺณนายํ วุตฺตํ. 'दा' (धातू) शुद्धीच्या (पवित्रतेच्या) अर्थात. 'दायति' (शुद्ध करतो). 'वोदायति' (शुद्ध होतो). 'वोदानं' (शुद्धीकरण). हा धातू अकर्मक आहे. म्हणूनच नेत्ति-अट्ठकथेत (नेत्तिसंवरण्णना) म्हटले आहे की – 'वोदायति सुज्झति एतेनाति वोदानं, समथविपस्सना' (ज्याद्वारे शुद्ध होतो ते 'वोदान' होय, म्हणजेच शमथ आणि विपश्यना). ที ขเย. ทียเต. ทีโน, อาทีนโว. 'दी' (धातू) क्षय (नाश) होण्याच्या अर्थात. 'दीयते' (क्षय पावतो). 'दीनो' (दीन/दुबळा), 'आदीनवो' (आदीनव/दोष/धोका). ตตฺร ทีโนติ ปริกฺขีณญาติธนาทิภาเวน ทุกฺขิโต. อาทีนโวติอาทีนํ ทุกฺขํ วาติ อธิคจฺฉติ เอเตนาติอาทีนโว, โทโส. तेथे 'दीन' म्हणजे नातेवाईक, धन इत्यादी नष्ट झाल्यामुळे दुःखी झालेला. 'आदीनव' म्हणजे ज्याच्याद्वारे दीनता किंवा दुःख प्राप्त होते तो 'आदीनव' (दोष) होय. ทุ ปริตาเป. ทุยเต. ทุโน, ทูโต. 'दु' (धातू) संतापाच्या (दुःखाच्या) अर्थात आहे. 'दुयते' (तो दुःखी होतो). 'दुनो', 'दूतो' (हे त्याचे रूप आहेत). ภิทิ ภิชฺชเน. ภิชฺชนธมฺมํ ภิชฺชติ. ภิชฺชตีติ ภินฺโน. ภิชฺชนํ เภโท. 'भिदि' (धातू) भेदण्याच्या (तुटण्याच्या) अर्थात आहे. भेदण्याच्या स्वभावाचे जे आहे ते तुटते (भिज्जति). जे तुटते ते 'भिन्न' होय. तुटणे म्हणजे 'भेद' होय. ฉิทิ ฉิชฺชเน. สุตฺตํ ฉิชฺชติ. ฉิชฺชตีติ ฉินฺโน. เอวํ ฉิทฺทํ. ฉิชฺชนํ เฉโท. 'छिदि' (धातू) कापण्याच्या (तुटण्याच्या) अर्थात आहे. सुताचा धागा तुटतो (छिज्जति). जे तुटते ते 'छिन्न' होय. याचप्रमाणे 'छिद्र' हा शब्द बनतो. कापले जाणे म्हणजे 'छेद' होय. ขิทิ [Pg.227] ทีนิเย. ทีนภาโว ทีนิยํ, ยถา ทกฺขิยํ. ขิชฺชติ, ขินฺโน, อขินฺนมติ, เขโท, เขทงฺคโต โลกหิตาย นาโถ. 'खिदि' (धातू) दीनतेच्या अर्थात आहे. दीन भाव म्हणजे 'दीन्य', जसे 'दाक्षिण्य'. 'खिज्जति' (तो खिन्न होतो), 'खिन्न', 'अखिन्नमती' (खिन्न न होणारी बुद्धी असलेला), 'खेद', आणि 'खेदाङ्गतो लोकहिताय नाथो' (जगाच्या कल्याणासाठी नाथांनी (बुद्धांनी) शारीरिक कष्ट पत्करले). เอตฺถ เขทงฺคโตติ กายิกทุกฺขสงฺขาตํ ปริสฺสมํ ปตฺโต, ทุกฺขมนุภวีติ อตฺโถ. येथे 'खेदाङ्गतो' म्हणजे शारीरिक दुःखरूप परिश्रमाला प्राप्त झालेला, म्हणजेच दुःख अनुभवणारा, असा अर्थ आहे. ปท คติยํ. ปชฺชติ. มคฺคํ ปฏิปชฺชติ. ปฏิปตฺตึ ปฏิปชฺชติ. อทฺธานมคฺคปฺปฏิปนฺโน โหติ, ผลสมาปตฺตึ สมาปชฺชติ. อาปตฺตึ อาปชฺชติ. อกมฺมกมฺปิ ภวติ, เตสํ อธมฺโม อาปชฺชติ, ปชฺโช, พฺยคฺฆปชฺโช, สมฺปทาโย. 'पद' (धातू) गतीच्या (गमनाच्या) अर्थात आहे. 'पज्जति' (तो प्राप्त करतो/जातो). 'मग्गं पटिपज्जति' (मार्गावर चालतो). 'पटिपत्तिं पटिपज्जति' (प्रतिपत्तीचे म्हणजेच आचरणाचे पालन करतो). 'अद्धानमग्गप्पटिपन्नो होति' (दीर्घ मार्गावर चालणारा होतो), 'फलसमापत्तिं समापज्जति' (फलसमापत्तीला प्राप्त होतो). 'आपत्तिं आपज्जति' (आपत्तीला म्हणजेच नियमाच्या उल्लंघनाला प्राप्त होतो). हा धातू अकर्मक देखील होतो, जसे 'तेसं अधम्मो आपज्जति' (त्यांच्यामध्ये अधर्म उत्पन्न होतो). 'पज्ज' (मार्ग), 'ब्याग्धपज्ज', 'संपदाय' (हे शब्द यापासून बनतात). เอตฺถ จ ปชฺโชติ มคฺโค. พฺยคฺฆปชฺเช สทฺทุลปเถ ชาโตติ พฺยคฺฆปชฺโช, เอวํนามโก กุลปุตฺโต. สมฺปทิยติ ญาปิยติ ธมฺโม เอเตนาติ สมฺปทาโย, อกฺขาตา. आणि येथे 'पज्ज' म्हणजे मार्ग होय. व्याघ्रपथावर (वाघांच्या मार्गावर) जन्मलेला म्हणून 'ब्याग्धपज्ज' (व्याघ्रपज्ज), या नावाचा कुलपुत्र. ज्याच्याद्वारे धम्म प्रतिपादित केला जातो किंवा जाणवला जातो तो 'संपदाय' (संप्रदाय) म्हणजेच उपदेशक (अक्खाता) होय. วิท สตฺตายํ. สตฺตา วิชฺชมานากาโร. วิชฺชติ, สํวิชฺชติ. ชาตเวโท, วิชฺชา, อวิชฺชา, วิทิโต. 'विद' (धातू) सत्तेच्या (अस्तित्वाच्या) अर्थात आहे. सत्ता म्हणजे अस्तित्वात असणे होय. 'विज्जति' (अस्तित्वात आहे), 'संविज्जति' (विद्यमान आहे). 'जातवेदो' (अग्नी), 'विज्जा' (विद्या), 'अविज्जा' (अविद्या), 'विदितो' (विदित/ज्ञात) हे शब्द यापासून बनतात. ตตฺถ ชาตเวโทติ อคฺคิ. โส หิ ชาโตว เวทยติ ธูมชาลุฏฺฐาเนน ปญฺญายติ, ตสฺมา ชาตเวโทติ วุจฺจติ. วิชฺชาติ ธมฺมานํ สภาวํ วิทิตํ กโรตีติ วิชฺชา, ญาณํ. อวิชฺชาติ ขนฺธานํ ราสฏฺฐํ, อายตนานํ อายตนฏฺฐํ, ธาตูนํ สุญฺญฏฺฐํ, สจฺจานํ ตถฏฺฐํ, อินฺทฺริยานํ อธิปติยฏฺฐํ อวิทิตํ กโรตีติ อวิชฺชา. ทุกฺขาทีนํ ปีฬนาทิวเสน วุตฺตํ จตุพฺพิธํ อตฺถํ อวิทิตํ กโรตีติ อวิชฺชา, โมโห. तेथे 'जातवेदो' म्हणजे अग्नी. कारण तो उत्पन्न होताच धुराच्या शिखा उठवून स्वतःचे अस्तित्व प्रकट करतो, म्हणून त्याला 'जातवेदो' म्हटले जाते. 'विज्जा' (विद्या) म्हणजे जी धम्मांचा (गोष्टींचा) स्वभाव प्रकट (विदित) करते ती 'विज्जा' म्हणजेच ज्ञान होय. 'अविज्जा' (अविद्या) म्हणजे जी स्कंधांचा समूह-अर्थ, आयतनांचा आयतन-अर्थ, धातूंचा शून्य-अर्थ, सत्यांचा यथार्थ-अर्थ आणि इंद्रियांचा अधिपती-अर्थ अज्ञात (अविदित) ठेवते ती 'अविज्जा' होय. जी दुःखादींच्या पीडा देण्याच्या स्वभावावरून सांगितलेला चार प्रकारचा अर्थ अज्ञात ठेवते ती 'अविज्जा' म्हणजेच मोह होय. มท อุมฺมาเท. อุมฺมาโท นาม มุยฺห นํ วา สติวิปฺปวาโส วา จิตฺตวิกฺเขโป วา. มชฺชติ, ปมชฺชติ. มตฺโต, สุรามทมตฺโต. มตฺโต อหํ มหาราช. ปุตฺตมํสานิ ขาทยึ. มตฺตหตฺถี, ปมตฺโต, อุมฺมตฺโต. 'मद' (धातू) उन्मादाच्या अर्थात आहे. उन्माद म्हणजे संभ्रमित होणे किंवा स्मृतीचा नाश होणे किंवा चित्ताचा विक्षेप होणे होय. 'मज्जति' (तो मद्यधुंद होतो), 'पमज्जति' (तो प्रमाद करतो). 'मत्त' (धुंद), 'सुरामदमत्त' (मद्याच्या नशेने धुंद झालेला). 'हे महाराज, मी मत्त (वेडा) झालो होतो, म्हणून मी माझ्या पुत्राचे मांस खाल्ले.' 'मत्तहत्ती' (मदोनमत्त हत्ती), 'पमत्त' (प्रमत्त/असावध), 'उम्मत्त' (उन्मत्त/वेडा) हे शब्द यापासून बनतात. อปฺปมาโท [Pg.228] อมตํ ปทํ, ปมาโท มจฺจุโน ปทํ; อปฺปมตฺตา น มิยฺยนฺติ, เย ปมตฺตา ยถา มตา. अप्रमाद (जागरूकता) हे अमृताचे (निर्वाणाचे) स्थान आहे, प्रमाद (असावधपणा) हे मृत्यूचे स्थान आहे; जे अप्रमत्त (जागरूक) असतात ते मरत नाहीत, आणि जे प्रमत्त (असावध) असतात ते मृतसमानच आहेत. มิท สิเนหเน. เมชฺชติ. เมตฺตา, เมตฺติ, มิตฺตํ, มิตฺโต. 'मिद' (धातू) स्नेहाच्या (प्रेमाच्या) अर्थात आहे. 'मेज्जति' (तो स्नेह करतो). 'मेत्ता' (मैत्री), 'मेत्ती' (मैत्री), 'मित्तं' (मित्र), 'मित्तो' (मित्र) हे शब्द यापासून बनतात. อนฺตรธา อทสฺสเน. อนฺตรปุพฺโพ ธาธาตุ วิชฺชมานสฺส วตฺถุโน อทสฺสเน วตฺตติ. อนฺตรธายติ. อนฺตรธานํ, อนฺตรธายนฺโต. สา เทวตา อนฺตรหิตา. อนฺตราปิธายติ. 'अंतर्-धा' (धातू) अदृश्य होण्याच्या अर्थात आहे. 'अंतर्' पूर्वपद असलेला 'धा' धातू विद्यमान वस्तूच्या अदृश्य होण्याच्या अर्थात वापरला जातो. 'अंतराधायति' (तो अदृश्य होतो). 'अंतर्धान' (अदृश्य होणे), 'अंतराधायंतो' (अदृश्य होणारा). 'ती देवता अंतर्धान पावली' (अदृश्य झाली). 'अंतरापिधायति' (तो झाकला जातो/अदृश्य होतो) हे शब्द यापासून बनतात. พุธ อวคมเน. อวคมนํ ชานนํ. พุชฺฌติ, พุทฺโธ, พุทฺธิ, พุทฺธํ, โพโธ, โพธิ. พุชฺฌิตา สจฺจานิ. สกลํ พุทฺโธ, พุทฺธวา, วิโพเธติ, โพเธตา, พุทฺโธ, วิพุทฺโธ อิจฺจาทีนิ. 'बुध' (धातू) अवगमनाच्या (जाणून घेण्याच्या) अर्थात आहे. अवगमन म्हणजे जाणून घेणे होय. 'बुज्झति' (तो जाणतो), 'बुद्धो' (बुद्ध), 'बुद्धी' (बुद्धि), 'बुद्धं' (ज्ञात), 'बोधो' (बोध), 'बोधी' (बोधि). 'बुज्झिता सच्चानि' (सत्यांना जाणणारा). सर्व काही जाणणारा म्हणून 'बुद्ध', 'बुद्धवा' (बुद्धवान्), 'विबोधेति' (तो जागृत करतो), 'बोधेता' (जागृत करणारा), 'बुद्ध', 'विबुद्ध' इत्यादी शब्द यापासून बनतात. ตตฺร พุทฺโธติ พุชฺฌิตา สจฺจานีติ พุทฺโธ, โพเธตา ปชายาติ พุทฺโธ. อถ วา ปารมิตาปริภาวิตาย ปญฺญาย สพฺพมฺปิ เญยฺยํ อพุชฺฌีติ พุทฺโธ. เกจิ ปน กมฺเมนปิ พุทฺธสทฺทสฺส สิทฺธํ อิจฺฉนฺตา เอวํ นิพฺพจนํ กโรนฺติ ‘‘สมฺมาสมฺพุทฺโธ วต โส ภควาติ อธิคตคุณวิเสเสหิ ขีณาสเวหิ พุชฺฌิตพฺโพติ พุทฺโธ’’ติ. วิตฺถาโร ปน นิทฺเทเส วุตฺตนเยน คเหตพฺโพ. พุทฺธีติ พุชฺฌตีติ พุทฺธิ. เอวํ พุทฺธํ โพโธ โพธิ จ. อถ วา พุชฺฌนํ พุทฺธิ. เอวํ โพโธ โพธิ จ, สพฺพเมตํ ปญฺญายาธิวจนํ. तेथे 'बुद्ध' म्हणजे सत्यांना जाणणारा म्हणून 'बुद्ध', आणि प्रजेला (लोकांना) जागृत करणारा म्हणून 'बुद्ध'. किंवा पारमितांनी परिपक्व झालेल्या प्रज्ञेने सर्व ज्ञेय (जाणून घेण्याजोगे) जाणले म्हणून 'बुद्ध'. परंतु काही लोक कर्मभावात देखील 'बुद्ध' शब्दाची सिद्धी मानून अशी व्युत्पत्ती करतात की, 'ते भगवान खरोखर सम्यक्संबुद्ध आहेत, कारण प्राप्त केलेल्या विशेष गुणांनी युक्त अशा क्षीणासवांद्वारे (अर्हतांद्वारे) ते जाणले जाण्यास योग्य आहेत म्हणून 'बुद्ध' होत.' याचा सविस्तर अर्थ 'निद्देस' मध्ये सांगितलेल्या पद्धतीने ग्रहण करावा. 'बुद्धी' म्हणजे ज्याच्याद्वारे जाणले जाते ती 'बुद्धी'. याचप्रमाणे 'बुद्धं', 'बोध' आणि 'बोधी' हे शब्द आहेत. किंवा जाणून घेणे म्हणजे 'बुद्धी'. याचप्रमाणे 'बोध' आणि 'बोधी' देखील आहेत; हे सर्व प्रज्ञेचेच समानार्थी शब्द आहेत. อิทานิ โพธิสทฺทสฺส อตฺถุทฺธารํ วทาม. โพธีติ หิ รุกฺโขปิ มคฺโคปิ สพฺพญฺญุตญฺญาณมฺปิ นิพฺพานมฺปิ เอวํปณฺณตฺติโก ปุคฺคโลปิ วุจฺจติ, ตถา หิ ‘‘โพธิรุกฺขมูเล ปฐมาภิสมฺพุทฺโธ’’ติ จ, ‘‘อนฺตรา จ โพธึ อนฺตรา จ คย’’นฺติ จ อาคตฏฺฐาเน รุกฺโข โพธีติ วุจฺจติ. ‘‘จตูสุ มคฺเคสุ ญาณ’’นฺติ [Pg.229] อาคตฏฺฐาเน มคฺโค. ‘‘ปปฺโปติ โพธึ วรภูริ สุเมธโส’’ติ อาคตฏฺฐาเน สพฺพญฺญุตญฺญาณํ. ‘‘ปตฺวาน โพธึ อมตํ อสงฺขต’’นฺติ อาคตฏฺฐาเน นิพฺพานํ. ‘‘โพธิ ภนฺเต ราชกุมาโร ภควโต ปาเท สิรสา วนฺทตี’’ติ ‘‘อริยสาวโก โพธีติ วุจฺจตี’’ติ จ อาคตฏฺฐาเน เอวํปณฺณตฺติโก ปุคฺคโล. आता आपण 'बोधी' शब्दाच्या अर्थाचे विश्लेषण करूया. कारण 'बोधी' या शब्दाने वृक्ष, मार्ग, सर्वज्ञता-ज्ञान, निर्वाण आणि अशा संज्ञेचा पुद्गल (व्यक्ती) देखील दर्शवला जातो. जसे की, 'बोधीवृक्षाच्या मुळाशी प्रथम अभिसंबुद्ध झाले' आणि 'बोधी आणि गया यांच्या दरम्यान' अशा आलेल्या ठिकाणी वृक्षाला 'बोधी' म्हटले आहे. 'चार मार्गांचे ज्ञान' अशा आलेल्या ठिकाणी 'बोधी' म्हणजे मार्ग होय. 'उत्कृष्ट बुद्धी असलेला (सुमेधस) बोधीला प्राप्त करतो' अशा आलेल्या ठिकाणी 'बोधी' म्हणजे सर्वज्ञता-ज्ञान होय. 'अमृत आणि असंस्कृत अशा बोधीला प्राप्त करून' अशा आलेल्या ठिकाणी 'बोधी' म्हणजे निर्वाण होय. 'भंते, बोधी नावाचा राजकुमार भगवंतांच्या चरणी डोके ठेवून वंदन करतो' आणि 'आर्यश्रावकाला बोधी म्हटले जाते' अशा आलेल्या ठिकाणी अशा संज्ञेचा पुद्गल (व्यक्ती) अभिप्रेत आहे. อตฺริทํ วุจฺจติ – याविषयी असे म्हटले जाते – รุกฺเข มคฺเค จ นิพฺพาเน, ญาเณ สพฺพญฺญุตาย จ; ตถา ปณฺณตฺติยญฺเจว, โพธิสทฺโท ปวตฺตติ. वृक्ष, मार्ग, निर्वाण, सर्वज्ञता-ज्ञान आणि तसेच संज्ञेच्या (प्रज्ञप्तीच्या) बाबतीत देखील 'बोधी' शब्द प्रवृत्त होतो (वापरला जातो). พุชฺฌตีติ พุชฺฌิตา, โพเธตีติ โพเธตา. जो जाणतो तो 'बुज्झिता' (जाणणारा), जो जागृत करतो तो 'बोधेता' (जागृत करणारा) होय. เอตฺถ จ โกจิ ปโยโค ตุมนฺตาทีนิ จ รูปานิ วุจฺจนฺเต – ‘‘คุยฺหมตฺถมสมฺพุทฺธํ, สมฺโพธยติ โย นโร. ปรํ สมฺพุทฺธุมรหติ. พุชฺฌิตุํ, พุทฺธุํ, พุชฺฌิตฺวา, พุชฺฌิตฺวาน, พุชฺฌิตุน, พุทฺธิย, พุทฺธิยาน, พุทฺธา, พุทฺธาน’’ อิติ ภวนฺติ. आणि येथे काही प्रयोग आणि 'तुमुन्' इत्यादी प्रत्ययांची रूपे सांगितली जातात – 'जो मनुष्य गुप्त आणि न समजलेल्या गोष्टीचा बोध करून देतो, तो दुसऱ्याला समजून घेण्यास (संबुद्ध होण्यास) पात्र ठरतो.' 'बुज्झितुं', 'बुद्धुं', 'बुज्झित्वा', 'बुज्झित्वान', 'बुज्झितुन', 'बुद्धिय', 'बुद्धियान', 'बुद्धा', 'बुद्धान' अशी रूपे होतात. ตตฺร อสมฺพุทฺธนฺติ ปเรหิ อญฺญาตํ, ‘‘อสมฺโพธ’’นฺติปิ ปาโฐ, ปเรสํ โพเธตุํ อยุตฺตนฺติ อตฺโถ. สมฺพุทฺธุนฺติ สํพุชฺฌิตุํ. พุทฺธาติ พุชฺฌิตฺวา, เอวํ พุทฺธานาติ เอตฺถาปิ. तेथे 'असबुद्धं' म्हणजे इतरांनी न जाणलेले. 'असबोधं' असाही पाठ आढळतो, ज्याचा अर्थ 'इतरांना बोध करून देण्यास अयोग्य' असा आहे. 'संबुद्धुं' म्हणजे सम्यक प्रकारे जाणून घेण्यासाठी (संबुज्झितुं). 'बुद्धा' म्हणजे जाणून घेऊन (बुज्झित्वा), याचप्रमाणे 'बुद्धान' या शब्दाचा अर्थ देखील तोच आहे. เกจิ ปน ‘‘นามรูปปริจฺเฉเท ‘โพธิมคฺเคน พุธฺวา’ติ จ, ‘‘พุธฺวา โพธิตเล ยมาห สุคโต’ติ จ ธการวการสญฺโญควโต ปทสฺส ทสฺสนโต ตฺวาปจฺจยนฺตภาวโต จ ธการวการสํโยควเสน ‘‘พุธฺวา’’ติ ปทสิทฺธิ อิจฺฉิตพฺพา’’ติ วทนฺติ, ตํ ตาทิสสฺส ปทรูปสฺส พุทฺธวจเน อทสฺสนโต จ, พุทฺธวจนสฺส อนนุกูลตาย จ, ปริสุทฺเธ จ โปราณโปตฺถเก [Pg.230] วการสํโยควิคตสฺส ‘‘โพธิมคฺเคน พุทฺธา’’ติจ, ‘‘พุทฺธา โพธิตเล’’ติ จ ปทสฺส ทสฺสนโต น คเหตพฺพํ. ตถา หิ น ตาทิโส ปาโฐ พุทฺธวจนสฺส อนุกูโล โหตีติ. น หิ พุทฺธวจเน วสฺสสตมฺปิ วสฺสสหสฺสมฺปิ ปริเยสนฺตา ตาทิสํ วการธการสญฺโญคปทํ ปสฺสิสฺสนฺติ. เอวํ ‘‘พุธฺวา’’ติ ปทรูปสฺส พุทฺธวจนสฺส อนนุกูลตา ทฏฺฐพฺพา. ตญฺหิ สกฺกฏคนฺเถ กตปริจยภาเวน วญฺจิเตหิ วิทูหิ อิจฺฉิตํ, น สทฺธมฺมนีติวิทูหิ. เอตฺถ อิมานิ นิทสฺสนปทานิ เวทิตพฺพานิ – परंतु काही लोक असे म्हणतात की, 'नामरूपपरिच्छेदात 'बोधिमग्गेन बुध्वा' आणि 'बुध्वा बोधितले यमाह सुगतो' अशा प्रकारे 'ध' आणि 'व' यांच्या संयोगाने युक्त शब्द दिसत असल्यामुळे आणि 'त्वा' प्रत्ययाचा अंत असल्यामुळे, 'ध' आणि 'व' च्या संयोगाने 'बुध्वा' अशी पदसिद्धी मानली पाहिजे.' परंतु तशा प्रकारच्या पदाचे रूप बुद्धवचनात दिसत नसल्यामुळे, ते बुद्धवचनाशी सुसंगत नसल्यामुळे, आणि शुद्ध अशा प्राचीन हस्तलिखितांमध्ये 'व' च्या संयोगाशिवाय 'बोधिमग्गेन बुद्धा' आणि 'बुद्धा बोधितले' असे शब्द दिसत असल्यामुळे, ते स्वीकारू नये. कारण तसा पाठ बुद्धवचनाशी सुसंगत नाही. बुद्धवचनात शंभर वर्षे किंवा हजार वर्षे शोधले तरी तसा 'व' आणि 'ध' च्या संयोगाचा शब्द कोणालाही आढळणार नाही. अशा प्रकारे 'बुध्वा' या पदाची बुद्धवचनाशी असणारी असंगतता समजून घेतली पाहिजे. कारण ते रूप संस्कृत ग्रंथांच्या परिचयामुळे प्रभावित झालेल्या विद्वानांनी मानलेले आहे, सद्धम्मनीतीच्या जाणकारांनी नाही. येथे ही उदाहरणे समजून घ्यावीत – โก มํ วิทฺธา นิลียติ. ลทฺธา มจฺโจ ยทิจฺฉติ. ลทฺธาน ปุพฺพาปริยํ วิเสสํ, อทสฺสนํ มจฺจุราชสฺส คจฺเฉ. मला मारून (बाण मारून) कोण लपतो आहे? मर्त्य (मनुष्य) जे इच्छितो ते प्राप्त करतो. पूर्व आणि उत्तर (आधीचे आणि नंतरचे) वैशिष्ट्य प्राप्त करून, त्याने मृत्यूराजाच्या अदृश्यतेप्रत (जिथे मृत्यूराजा पाहू शकत नाही तिथे) जावे. อุมฺมาทนฺติมหํ ทิฏฺฐา, อามุกฺกมณิกุณฺฑลํ; น สุปามิ ทิวารตฺตึ, สหสฺสํว ปราชิโต’’ติ; मण्यांचे कुंडल धारण केलेल्या उम्मादन्तीला पाहून, हजार (कार्षापण) हरलेल्या माणसाप्रमाणे मी दिवस-रात्र झोपू शकत नाही. ตตฺถ วิทฺธาติ วิชฺฌิตฺวา. ลทฺธาติ ลภิตฺวา. ลทฺธานาติ ลภิตฺวาน. ทิฏฺฐาติ ทิสฺวา. อิติ ‘‘วิทฺธา ลทฺธา ลทฺธาน ทิฏฺฐา’’ติ ปทานิ ตฺวาปจฺจเยน สทฺธึ คตานิปิ สญฺโญควเสน วการปฏิพทฺธานิ น โหนฺติ, ตสฺมา ‘‘พุทฺธา พุทฺธาน’’ อิจฺเจตานิปิ ‘‘ลทฺธา ลทฺธาน’’ อิจฺจาทีนิ วิย ปริหีนวการสญฺโญคานิ เอว คเหตพฺพานิ. เย ‘‘พุธฺวา’’ติ รูปํ อิจฺฉนฺติ ปฐนฺติ จ, มญฺเญ เต ตฺวาปจฺจโย วญฺเจติ, เตน เต วญฺจนํ ปาปุณนฺติ, ตสฺมา ตาทิสํ รูปํ อคฺคเหตฺวา โย สทฺทนีติยํ สทฺทวินิจฺฉโย วุตฺโต, โสเยว อายสฺมนฺเตหิ สารโต ปจฺเจตพฺโพ. तेथे 'विद्धा' (viddhā) म्हणजे 'विज्झित्वा' (विंधून/मारून). 'लद्धा' (laddhā) म्हणजे 'लभित्वा' (प्राप्त करून). 'लद्धान' (laddhāna) म्हणजे 'लभित्वान'. 'दिट्ठा' (diṭṭhā) म्हणजे 'दिस्वा' (पाहून). अशा प्रकारे 'विद्धा, लद्धा, Lद्धान, दिट्ठा' हे शब्द 'त्वा' प्रत्ययासोबत आलेले असले तरी, संयोगामुळे ते 'व' काराशी बद्ध होत नाहीत. म्हणूनच 'बुद्धा, बुद्धान' हे शब्द देखील 'लद्धा, लद्धान' इत्यादींप्रमाणे 'व' कार विरहित संयोगाचेच मानले पाहिजेत. जे 'बुध्वा' (budhvā) असे रूप इच्छितात आणि वाचतात, मला वाटते की 'त्वा' प्रत्यय त्यांना फसवितो आणि त्यामुळे ते फसवणूक पत्करतात. म्हणून तसले रूप न स्वीकारता, सद्दनीतीमध्ये जो शब्द-निश्चय सांगितला आहे, तोच आयुष्यमानांनी (पूज्य भिक्खूंनी) सारभूत म्हणून स्वीकारला पाहिजे. พุธ โพธเน. สกมฺมกากมฺมโกยํ ธาตุ. ตถา หิ โพธนสทฺทุจฺจารเณน ชานนํ วิกสนํ นิทฺทกฺขโย จ คหิโต, ตสฺมา ‘‘พุธ ญาเณ, พุธ วิกสเน, พุธ นิทฺทกฺขเย’’ติ วุตฺตํ โหติ. พุชฺฌติ ภควา, ธมฺเม พุชฺฌติ, ปพุชฺฌติ, ปทุมํ พุชฺฌติ. ปุริโส พุทฺโธ, ปพุทฺโธ, โพธติ, ปโพธติ อิจฺจาทีนิ. 'बुध' (budha) हा धातू बोध (जाणणे/जागृत होणे) या अर्थी आहे. हा धातू सकर्मक आणि अकर्मक दोन्ही आहे. कारण 'बोधन' या शब्दाच्या उच्चारणाने ज्ञान, विकसन (उमलणे) आणि निद्रेचा क्षय (जागृती) हे ग्रहण केले जाते; म्हणूनच 'बुध ज्ञाने (ज्ञानासाठी), बुध विकसने (उमलण्यासाठी), बुध निद्दक्खये (निद्राक्षयासाठी)' असे म्हटले जाते. भगवान जाणतात (बुज्झति), धर्माला जाणतात, प्रबुद्ध होतात (पबुज्झति), कमळ उमलते (बुज्झति). मनुष्य बुद्ध (बुद्धो - जागृत), प्रबुद्ध (पबुद्धो), जाणतो (बोधति), प्रबोधित होतो (पबोधति) इत्यादी. สํธา [Pg.231] สนฺธิมฺหิ. สํปุพฺโพ ธาธาตุ สนฺธิมฺหิ วตฺตติ. เนวสฺส มทฺที ภากุฏิ, น สนฺธิยติ น โรทติ. น สนฺธิยตีติ อิทํ อญฺเญหิ ปกรเณหิ อสาธารณํ ทิวาทิรูปํ. 'सं-धा' (saṃ-dhā) हा धातू संधिसंबंधी (जोडणे/जुळणे) या अर्थी आहे. 'सं' उपसर्गपूर्वक 'धा' धातू संधिसंबंधी वापरला जातो. 'मद्दी (मद्री) कपाळावर आठी घालत नाही, जुळवून घेत नाही (किंवा शांत होत नाही) आणि रडतही नाही.' 'न संधियति' (na sandhiyati) हे इतर ग्रंथांपेक्षा वेगळे असे दिवादिगणाचे असाधारण रूप आहे. ธนุ ยาจเน. มาตา หิ ตว อิรนฺธติ, วิธรสฺส หทยํ ธนิยฺยติ. อิทมฺปิ อสาธารณํ ทิวาทิรูปํ. 'धनु' (dhanu) हा धातू याचना करणे (मागणी करणे) या अर्थी आहे. 'कारण तुझी आई इरंधती, विधुराचे हृदय याचिते (मागते).' हे देखील दिवादिगणाचे एक असाधारण रूप आहे. ธี อนาทเร. ธียเต. ธีโน. 'धी' (dhī) हा धातू अनादर (तिरस्कार) या अर्थी आहे. धीयते (dhīyate), धीनो (dhīno). ยุธ สมฺปหาเร. ยุชฺฌติ. โยโธ, ยุทฺธํ, จรณายุโธ, ยการสฺส วการภาเว ‘‘อาวุธ’’นฺติ รูปํ. ตตฺร จรณายุโธติ กุกฺกุโฏ. 'युध' (yudha) हा धातू प्रहार करणे (युद्ध करणे) या अर्थी आहे. युज्झति (yujjhati). योधो (yodho - योद्धा), युद्धं (yuddhaṃ - युद्ध), चरणायुधो (caraṇāyudho - पायांचे शस्त्र असलेला), 'य' काराचा 'व' कार झाल्यावर 'आवुध' (āvudha - शस्त्र) असे रूप बनते. तेथे 'चरणायुध' म्हणजे कोंबडा. กุธ โกเป. กุชฺฌติ. โกโธ, กุชฺฌนา, กุชฺฌิตตฺตํ. กุทฺโธ อตฺถํ น ชานาติ, กุทฺโธ ธมฺมํ น ปสฺสติ. 'कुध' (kudha) हा धातू कोप (राग) या अर्थी आहे. कुज्झति (kujjhati). कोधो (kodho - क्रोध), कुज्झना (kujjhanā - रागवणे), कुज्झितत्तं (kujjhitattaṃ - क्रोधावस्था). 'क्रोधी मनुष्य अर्थ (हित) जाणत नाही, क्रोधी मनुष्य धम्माला पाहत नाही.' สุธ โสเจยฺเย. โสเจยฺยํ สุจิภาโว. สุชฺฌติ. สุทฺธิ, วิสุทฺธิ, สุชฺฌนํ, สุทฺโธ, วิสุทฺโธ, ปริสุทฺโธ. การิเต ‘‘โสเธติ, โสธโก’’ อิจฺจาทีนิ. 'सुध' (sudha) हा धातू शुचितेच्या (पवित्रतेच्या) अर्थी आहे. शुचिता म्हणजे शुद्धभाव. सुज्झति (sujjhati). सुद्धि (suddhi - शुद्धी), विसुद्धि (visuddhi - विशुद्धी), सुज्झन (sujjhanaṃ - शुद्ध होणे), सुद्धो (suddho - शुद्ध), विसुद्धो (visuddho - विशुद्ध), परिसुद्धो (parisuddho - परिशुद्ध). प्रयोजक (कारित) रूपात 'सोधेति' (sodheti - शुद्ध करतो), 'सोधको' (sodhako - शुद्ध करणारा) इत्यादी रूपे होतात. สิธุ สํราธเน. สิชฺฌติ. สิทฺธิ. 'सिधु' (sidhu) हा धातू संराधन (सिद्धी/यश मिळवणे) या अर्थी आहे. सिज्झति (sijjhati). सिद्धि (siddhi). รธ หึสายํ. รชฺฌติ, วิรชฺฌติ, อปรชฺฌติ. อปราโธ. 'राध' (radha) हा धातू हिंसेच्या (इजा करण्याच्या) अर्थी आहे. रज्झति (rajjhati), विरज्झति (virajjhati), अपरज्झति (aparajjhati). अपराधो (aparādho - अपराध). ราธ สาธ สํสิทฺธิยํ. ราธยติ, สาธยติ. อาราธนํ, สาธนํ. สปรหิตํ สาเธตีติ สาธุ, สปฺปุริโส. อจฺจนฺตํ สาเธตพฺพนฺติ สาธุ, ลทฺธกํ สุนฺทรํ ทานสีลาทิ. 'राध' (rādha) आणि 'साध' (sādha) हे धातू संसिद्धी (पूर्ण यश/सिद्धी) या अर्थी आहेत. राधयति (rādhayati), साधयति (sādhayati). आराधनं (ārādhanaṃ), साधनं (sādhanaṃ). जो स्वतःचे आणि इतरांचे हित साधतो तो 'साधू' (sādhu - सज्जन), सत्पुरुष (sappuriso). जे अत्यंत साधले पाहिजे (आचरले पाहिजे) ते 'साधू' (उत्कृष्ट), जसे की दान, शील इत्यादी सुंदर गोष्टी. วิธ วิชฺฌเน. วิชฺฌติ. ปฏิวิชฺฌติ. ขณ วิทฺธ, วิธุ, วิชฺฌนโก, วิทฺโธ, ปฏิวิทฺโธ, วิชฺฌนํ, เวโธ, ปฏิเวโธ, วิชฺฌิตฺวา, วิทฺธา, วิทฺธาน. โก มํ วิทฺธา นิลียติ. 'विध' (vidha) हा धातू विंधणे (बाण मारणे/भेदणे) या अर्थी आहे. विज्झति (vijjhati). पटिविज्झति (paṭivijjhati - भेदून जाणणे/साक्षात्कार करणे). खण विद्ध, विधु, विज्झनको, विद्धो, पटिविद्धो, विज्झनं, वेधो, पटिवेधो, विज्झित्वा, विद्धा, विद्धान. 'मला मारून कोण लपतो आहे?' อิธ วุทฺธิยํ. อิชฺฌติ, สมิชฺฌติ. อิทฺธิ, อิชฺฌนํ, สมิชฺฌนํ, อิทฺโธ. ตตฺถ อิทฺธีติ อิชฺฌนํ อิทฺธิ. อิชฺฌนฺติ วา สตฺตา เอตาย อิทฺธา วุทฺธา อุกฺกํสคตา โหนฺตีติ อิทฺธิ. 'इध' (idha) हा धातू वृद्धी (वाढ/समृद्धी) या अर्थी आहे. इज्झति (ijjhati), समिज्झति (samijjhati). इद्धि (iddhi - ऋद्धी/यश), इज्झन (ijjhanaṃ), समिज्झन (samijjhanaṃ), इद्धो (iddho). तेथे 'इद्धि' म्हणजे यश किंवा सिद्धी. किंवा ज्याच्याद्वारे प्राणी समृद्ध होतात, वाढतात आणि उत्कर्षाला पोहोचतात, ती 'इद्धि' होय. คิธุ [Pg.232] อภิกงฺขายํ. คิชฺฌติ, คิชฺโฌ. คทฺโธ. คทฺธพาธิปุพฺโพ. กามคิทฺโธ น ชานาสิ. เคโธ. 'गिधु' (gidhu) हा धातू अभिकांक्षा (तीव्र इच्छा/लोभ) या अर्थी आहे. गिज्झति (gijjhati), गिज्झो (gijjho - गिधाड). गद्धो (gaddho). गद्धबाधिपुब्बो. 'कामासक्त (कामलोभी) माणसा, तू जाणत नाहीस.' गेधो (gedho - लोभ). รุธิ อาวรเณ. รุชฺฌติ, วิรุชฺฌติ, ปฏิวิรุชฺฌติ. วิโรธโก, วิรุทฺโธ. โรโธ, วิโรโธ, ปฏิวิโรโธ, อนุวิโรโธ. 'रुधि' (rudhi) हा धातू आवरण (अडथळा आणणे/रोखणे) या अर्थी आहे. रुज्झति (rujjhati), विरुज्झति (virujjhati), पटिविरज्झति (paṭivirujjhati). विरोधको (virodhako), विरुद्धो (viruddho). रोधो (rodho), विरोधो (virodho), पटिविरोधो (paṭivirodho), अनुविरोधो (anuvirodho). อนุวิธา อนุกรเณ. อนุวิปุพฺโพ ธาธาตุ อนุกฺริยายํ วตฺตติ. ปุริโส อญฺญสฺส ปุริสสฺส กฺริยํ อนุวิธียติ ตตฺรายํ ปาฬิ – 'अनु-विधा' (anu-vidhā) हा धातू अनुकरण (नक्कल करणे) या अर्थी आहे. 'अनु-वि' उपसर्गपूर्वक 'धा' धातू अनुकरणात वापरला जातो. एक मनुष्य दुसऱ्या मनुष्याच्या क्रियेचे अनुकरण करतो, त्याविषयी हा पाळि पाठ आहे – ทูสิโต คิริทตฺเตน, หโย สามสฺส ปณฺฑโว; โปราณํ ปกตึ หิตฺวา, ตสฺเสวานุวิธียตี’’ติ. गिरिदत्ताने बिघडवलेला, साम राजाचा पांढरा घोडा (पांडव), आपला जुना स्वभाव सोडून त्याचेच अनुकरण करतो आहे. อิทมฺปิ อสาธารณํ ทิวาทิรูปํ. हे देखील दिवादिगणाचे एक असाधारण रूप आहे. อนุรุธ กาเม. กาโม อิจฺฉา. อนุปุพฺโพ รุธธาตุ อิจฺฉายํ วตฺตติ. อนุรุทฺโธ, อนุโรโธ. อนุสฺมาติ กึ วิโรโธ. 'अनु-रुध' (anu-rudha) हा धातू काम (इच्छा) या अर्थी आहे. काम म्हणजे इच्छा. 'अनु' उपसर्गपूर्वक 'रुध' धातू इच्छेच्या अर्थी वापरला जातो. अनुरुद्धो (anuruddho), अनुरोधो (anurodho). 'अनुस्मा' म्हणजे काय विरोध आहे? ตตฺถ อนุรุทฺโธติ อนุรุชฺฌติ ปณีตํ ปณีตํ วตฺถุํ กาเมตีติ อนุรุทฺโธ. อนุโรโธติ อนุกูลตา. อยํ ปาฬิ ‘‘โส อุปฺปนฺนํ ลาภํ อนุรุชฺฌติ, อลาเภ ปฏิวิรุชฺฌตี’’ติ. तेथे 'अनुरुद्ध' (anuruddho) म्हणजे जो अनुकूल होतो, जो उत्तम-उत्तम वस्तूंची इच्छा करतो तो अनुरुद्ध. 'अनुरोध' (anurodho) म्हणजे अनुकूलता. हा पाळि पाठ असा आहे – 'तो मिळालेल्या लाभाने अनुकूल (आनंदी) होतो आणि लाभ न मिळाल्यास प्रतिकूल (नाराज) होतो.' พฺยธ ตาฬเน. พฺยชฺฌติ. พฺยาโธ. พฺยาโธติ ลุทฺโธ. ตํ ตํ มิคํ พฺยชฺฌติ ตาเฬติ หึสตีติ พฺยาโธ. 'ब्यध' (byadha) हा धातू ताडन करणे (मारणे/प्रहार करणे) या अर्थी आहे. ब्यज्झति (byajjhati). ब्याधो (byādho - शिकारी). ब्याध म्हणजे शिकारी (लुद्धक). जो त्या त्या हरणाला मारतो, प्रहार करतो, हिंसा करतो तो 'ब्याध' (शिकारी) होय. คุธ ปริเวฐเน. คุชฺฌติ. โคธา. 'गुध' (gudha) हा धातू वेढणे (गुंडाळणे) या अर्थी आहे. गुज्झति (gujjhati). गोधा (godhā - घोरपड). มน ญาเณ. มญฺญติ, อวมญฺญติ, อติมญฺญติ. เสยฺยาทิวเสน มญฺญตีติ มาโน. ‘‘มญฺญนา, มญฺญิตตฺตํ, มาโน, อหงฺกาโร, อุนฺนติ, เกตุ, ปคฺคโห, อวเลโป’’ติ ปริยายา. 'मन' (mana) हा धातू ज्ञान (जाणणे/विचार करणे) या अर्थी आहे. मञ्ञति (maññati - मानतो/विचार करतो), अवमञ्ञति (avamaññati - अपमान करतो), अतिमञ्ञति (atimaññati - अतिमान करतो). 'मी श्रेष्ठ आहे' इत्यादी विचाराने मानणे म्हणजे 'मान' (māno - अहंकार) होय. 'मञ्ञना (कल्पना/अहंकार), मञ्ञितत्तं (अहंकारी वृत्ती), मानो (मान), अहङ्कारो (अहंकार), उन्नति (उन्नती/गर्व), केतु (ध्वज/अभिमान), पग्गहो (उद्धटपणा), अवलेपो (लेप/गर्व)' हे त्याचे समानार्थी शब्द आहेत. ชน [Pg.233] ชนเน. สกมฺมโกยํ ธาตุ. ‘‘ชญฺญตี’’ติมสฺส รูปํ, กโรตีติ อตฺโถ. การิเต – ชเนสิ ผุสฺสตี มมํ. ชนยติ, สุขํ ชเนติ, ชนยตีติ ชนโก, ปิตา, โย โกจิ วา นิพฺพตฺเตตา. ปุถุ กิเลเส ชเนตีติ ปุถุชฺชโน. ตตฺถ ‘‘ชเนติ ชนยตี’’ติ รูปานิ จุราทิคณํ ปตฺวา สุทฺธกตฺตุรูปานิ ภวนฺติ. กโรตีติ หิ เตสํ อตฺโถ. เหตุกตฺตุวเสนปิ ตทตฺโถ วตฺตพฺโพ ‘‘นิพฺพตฺเตตี’’ติ. 'जन' (jana) हा धातू उत्पन्न करणे (जन्म देणे) या अर्थी आहे. हा सकर्मक धातू आहे. 'जञ्ञति' (jaññati) हे त्याचे रूप असून त्याचा अर्थ 'करतो' असा आहे. प्रयोजक (कारित) रूपात – 'जनेसि फुस्सती ममं'. जनयति (janayati), सुखं जनेति (सुख उत्पन्न करतो), जो उत्पन्न करतो तो 'जनको' (जनक - पिता) किंवा जो कोणी उत्पन्न करणारा आहे. जो अनेक क्लेशांना उत्पन्न करतो तो 'पुथुज्जन' (पृथग्जन - सामान्य माणूस). तेथे 'जनेति, जनयति' ही रूपे चुरादिगणात जाऊन प्रयोजक रूपे बनतात. कारण त्यांचा अर्थ 'करतो' असा आहे. हेतुकर्तृत्वाच्या दृष्टीनेही त्याचा अर्थ 'उत्पन्न करतो' असाच सांगितला पाहिजे. ชนี ปาตุภาเว. อีการนฺโตยํ อกมฺมโก ธาตุ, วิปุพฺโพ เจ, สกมฺมโก. ปุตฺโต ชายติ, ชาโต. ปุถุ กิเลสา ชายนฺติ เอตฺถาติ ปุถุชฺชโน. ชนนํ ชาติ, ‘‘สญฺชาติ, นิพฺพตฺติ, อภินิพฺพตฺติ, ขนฺธานํ ปาตุภาโว’’ติ ปริยายา. อิตฺถี ปุตฺตํ วิชายติ, อิตฺถี ปุตฺตํ วิชาตา. โส ปุริโส วิชาตมาตุยาปิ อมนาโป. อุปวิชญฺญา อิตฺถี. การิเต ‘‘ชาเปติ, ชาปยติ. อตฺถชาปิกา ปญฺญา’’ติ รูปานิ. 'जनी' (janī) हा ई-कारान्त अकर्मक धातू प्रादुर्भाव (प्रकट होणे/जन्म घेणे) या अर्थी आहे, आणि जर 'वि' उपसर्ग लागला तर तो सकर्मक होतो. मुलगा जन्म घेतो (जायति), जन्मलेला (जातो). ज्याच्यामध्ये अनेक क्लेश जन्म घेतात तो 'पुथुज्जन' (पृथग्जन). जन्म घेणे म्हणजे 'जाती' (जन्म); 'सञ्जाती (उत्पत्ती), निब्बत्ती (उत्पन्न होणे), अभिनिब्बत्ती (पुनर्जन्म), खन्धानं पातुभावो (स्कंधांचा प्रादुर्भाव)' हे त्याचे समानार्थी शब्द आहेत. स्त्री पुत्राला जन्म देते (विजायति), स्त्रीने पुत्राला जन्म दिला (विजाता). तो मनुष्य जन्म देणाऱ्या मातेलाही अप्रिय असतो. प्रसूती जवळ आलेली स्त्री (उपविजञ्ञा). प्रयोजक रूपात 'जापेति, जापयति. अत्थजापिका पञ्ञा' (हित उत्पन्न करणारी प्रज्ञा) अशी रूपे होतात. หน หึสายํ. อิธ หึสาวจเนน ฆฏฺฏนํ คเหตพฺพํ. สทฺโท โสตมฺหิ หญฺญติ. ปฏิหญฺญติ. พุทฺธสฺส ภควโต โวหาโร โลกิเล โสเต ปฏิหญฺญติ. อิมานิ กตฺตุปทานิ. ภูวาทิคณํ ปน ปตฺวา ‘‘โลเหน เว หญฺญติ ชาตรูปํ, น ชาตรูเปน หนนฺติ โลห’’นฺติ ปาฬิยํ ‘‘หญฺญตี’’ติ ปทํ กมฺมปทํ, ชาตรูปํ โลเหน กมฺมาเรหิ หญฺญตีติ อตฺโถ. ‘‘หนนฺตี’’ติ ปทํ กตฺตุปทํ, โลหํ ชาตรูเปน กมฺมารา หนนฺตีติ หิ อตฺโถ. เอตฺถ หนนํ ปหรณนฺติ คเหตพฺพํ. 'हन' (hana) हा धातू हिंसेच्या अर्थी आहे. येथे 'हिंसा' या शब्दाने आघात (स्पर्श/धडकणे) असा अर्थ घ्यावा. शब्द कानावर आदळतो (हञ्ञति). प्रतिहत होतो (पटिहञ्ञति - आदळून परततो). बुद्ध भगवंतांचे प्रवचन (वचन) लौकिक कानांवर आदळते. ही कर्तृवाचक पदे आहेत. परंतु भूवादिगणात गेल्यावर, पाळि साहित्यातील 'लोहेन वे हञ्ञति जातरूपं, न जातरूपेन हनन्ति लोहं' (लोखंडाने सोन्यावर प्रहार केला जातो, सोन्याने लोखंडावर प्रहार करत नाहीत) या गाथेत 'हञ्ञति' (haññati) हे कर्मवाचक पद आहे, ज्याचा अर्थ 'सोन्यावर लोखंडाने सुवर्णाकारांद्वारे (लोहारांद्वारे) प्रहार केला जातो' असा आहे. 'हनन्ति' (hananti) हे कर्तृवाचक पद आहे, कारण 'सुवर्णकार सोन्याने लोखंडावर प्रहार करतात' असा त्याचा अर्थ आहे. येथे 'हनन' म्हणजे प्रहार करणे असा अर्थ घ्यावा. รูป รุปฺปเน. รุปฺปนํ กุปฺปนํ ฆฏฺฏนํ ปีฬนํ. รุปฺปติ. รูปํ, รุปฺปนํ. อิมสฺส ปน ‘‘รูป รูปกฺริยาย’’นฺติ จุราทิคเณ ฐิตสฺส ‘‘รูเปติ รูปยตี’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. 'रूप' धातू 'रुप्पन' (विकार पावणे) या अर्थात आहे. 'रुप्पन' म्हणजे क्षोभ पावणे, आघात होणे, पीडित होणे. 'रुप्पति' (विकार पावतो). 'रूपं', 'रुप्पनं'. परंतु, 'चुरादि' गणात असलेल्या 'रूप रूपक्रियायम्' (रूप क्रिया करणे या अर्थी) या धातूची 'रूपेति', 'रूपयति' अशी रूपे होतात. ตตฺถ [Pg.234] รูปนฺติ เกนฏฺเฐน รูปํ? รุปฺปนฏฺเฐน รูปํ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา ‘‘กิญฺจ ภิกฺขเว รูปํ? รุปฺปตีติ โข ภิกฺขเว ตสฺมา ‘รูป’นฺติ วุจฺจติ. เกน รุปฺปติ? สีเตนปิ รุปฺปติ, อุณฺเหนปิ รุปฺปติ, ชิฆจฺฉายปิ รุปฺปติ, ปิปาสายปิ รุปฺปติ, ฑํสมกสวาตาตปสรีสปสมฺผสฺเสนปิ รุปฺปติ, รุปฺปตีติ โข ภิกฺขเว ตสฺมา ‘รุป’นฺติ วุจฺจตี’’ติ. त्यात 'रूप' हे कोणत्या अर्थाने 'रूप' आहे? 'रुप्पन' (विकार पावणे/बाधित होणे) या अर्थाने रूप आहे. भगवंतांनी असे म्हटलेच आहे - "आणि भिक्खूहो, रूप म्हणजे काय? भिक्खूहो, ते विकार पावते (बाधित होते), म्हणून त्याला 'रूप' असे म्हटले जाते. कशाने विकार पावते? थंडीनेही विकार पावते, उष्णतेनेही विकार पावते, भुकेनेही विकार पावते, तहानेनेही विकार पावते, डास, माश्या, वारा, ऊन आणि सरपटणाऱ्या प्राण्यांच्या स्पर्शानेही विकार पावते. भिक्खूहो, ते विकार पावते (बाधित होते), म्हणून त्याला 'रूप' असे म्हटले जाते." ตตฺถ รุปฺปตีติ กุปฺปติ ฆฏฺฏิยติ ปีฬิยติ, ภิชฺชตีติ อตฺโถ. ภิชฺชตีติ วิการํ อาปชฺชติ, วิการาปตฺติ จ สีตาทิสนฺนิปาเต วิสทิสรูปปฺปวตฺติเยว. เอตฺถ จ กุปฺปตีติ เอเตน กตฺตุอตฺเถ รูปปทสิทฺธึ ทสฺเสติ, ฆฏฺฏิยติ ปีฬิยตีติ เอเตหิ กมฺมตฺเถ. โกปาทิกฺริยาเยว หิ รุปฺปนกฺริยาติ, โส ปน กตฺตุภูโต กมฺมภูโต จ อตฺโถ ภิชฺชมาโน นาม โหตีติ อิมสฺส อตฺถสฺส ทสฺสนตฺถํ ‘‘ภิชฺชตีติ อตฺโถ’’ติ วุตฺตํ. येथे 'रुप्पति' (विकार पावतो) म्हणजे क्षोभ पावतो (कुप्पति), आघात पावतो (घट्टियति), पीडित होतो (पीळियति); 'नष्ट होतो/बदलतो' (भिज्जति) असा अर्थ आहे. 'भिज्जति' म्हणजे विकार पावतो, आणि थंडी इत्यादींच्या संपर्कात विजातीय रूपाची उत्पत्ती होणे म्हणजेच विकार पावणे होय. आणि येथे 'कुप्पति' याने कर्त्याच्या अर्थात 'रूप' पदाची सिद्धी दर्शविली आहे, 'घट्टियति' व 'पीळियति' याने कर्माच्या अर्थात. कारण क्षोभ इत्यादी क्रिया हीच 'रुप्पन' (विकार) क्रिया आहे, आणि तो कर्ता बनलेला किंवा कर्म बनलेला अर्थ नष्ट होणारा (बदलणारा) असतो, हा अर्थ दर्शविण्यासाठी "भिज्जति इति अत्थो" (नष्ट होतो असा अर्थ आहे) असे म्हटले आहे. อถ วา รุปฺปตีติ รูปนฺติ กมฺมกตฺตุตฺเถ รูปปทสิทฺธิ วุตฺตา. วิกาโร หิ รุปฺปนนฺติ วุจฺจติ, เตเนว ภิชฺชตีติ อตฺโถติ กมฺมกตฺตุตฺเถน ภิชฺชตีติ สทฺเทน อตฺถํ ทสฺเสติ. ตตฺถ ยทา กมฺมตฺเถ ‘‘รุปฺปตี’’ติ ปทํ, ตทา ‘‘สีเตนา’’ติอาทิ กตฺตุอตฺเถ กรณวจนํ. ยทา ปน ‘‘รุปฺปตี’’ติ ปทํ กตฺตุอตฺเถ กมฺมกตฺตุอตฺเถ วา, ตทา เหตุมฺหิ กรณวจนํ ทฏฺฐพฺพํ. किंवा 'रुप्पति इति रूपं' (जे विकार पावते ते रूप) याद्वारे कर्मकर्त्याच्या अर्थात 'रूप' पदाची सिद्धी सांगितली आहे. कारण विकारालाच 'रुप्पन' असे म्हणतात, म्हणूनच 'भिज्जति इति अत्थो' (नष्ट होतो असा अर्थ आहे) याने कर्मकर्त्याच्या अर्थातील 'भिज्जति' या शब्दाने अर्थ दर्शविला आहे. त्यामध्ये जेव्हा 'रुप्पति' हे पद कर्माच्या अर्थात असते, तेव्हा 'सीतेन' (थंडीने) इत्यादी कर्त्याच्या अर्थात तृतीया विभक्ती (करणवचन) असते. परंतु जेव्हा 'रुप्पति' हे पद कर्त्याच्या किंवा कर्मकर्त्याच्या अर्थात असते, तेव्हा तृतीया विभक्ती ही हेतूच्या (कारणाच्या) अर्थात समजली पाहिजे. รูปสทฺโท ขนฺธ ภว นิมิตฺต ปจฺจย สรีร วณฺณสณฺฐานาทีสุ อตฺเถสุ วตฺตติ. อยญฺหิ ‘‘ยํ กิญฺจิ รูปํ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺน’’นฺติ เอตฺถ รูปกฺขนฺเธ วตฺตติ. ‘‘รูปูปปตฺติยา มคฺคํ ภาเวตี’’ติ เอตฺถ รูปภเว. ‘‘อชฺฌตฺตํ อรูปสญฺญี พหิทฺธารูปานิ ปสฺสตี’’ติ [Pg.235] เอตฺถ กสิณนิมิตฺเต. ‘‘สรูปา ภิกฺขเว อุปฺปชฺชนฺติ ปาปกา อกุสลา ธมฺมา, โน อรูปา’’ติ เอตฺถ ปจฺจเย. ‘‘อากาโส ปริวาริโต รูปนฺตฺเวว สงฺขํ คจฺฉตี’’ติ เอตฺถ สรีเร. ‘‘จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณ’’นฺติ เอตฺถ วณฺเณ. ‘‘รูปปฺปมาโณ รูปปฺปสนฺโน’’ติ เอตฺถ สณฺฐาเน. อิจฺเจวํ – 'रूप' हा शब्द स्कंध, भव, निमित्त, प्रत्यय (कारण), शरीर, वर्ण (रंग/दृश्य) आणि संस्थान (आकार) इत्यादी अर्थांमध्ये वापरला जातो. जसे की, "जे काही रूप भूत, भविष्य किंवा वर्तमान काळातील आहे" येथे तो 'रूपस्कंधा'च्या अर्थात वापरला आहे. "रूपभवात उत्पन्न होण्यासाठी मार्गाची भावना करतो" येथे 'रूपभवा'च्या अर्थात. "अध्यात्मिकदृष्ट्या अरूपसंज्ञी असलेला बाहेर रूपांना पाहतो" येथे 'कसिण-निमित्ता'च्या अर्थात. "भिक्खूहो, सप्रत्यय (कारणासह) पापकारक अकुशल धर्म उत्पन्न होतात, अप्रत्यय (कारणाशिवाय) नाही" येथे 'प्रत्यय' (कारण) या अर्थात. "परिवेष्टित (वेढलेला) आकाश 'रूप' म्हणूनच ओळखला जातो" येथे 'शरीर' या अर्थात. "डोळा आणि रूपांना अनुसरून चक्षुविज्ञान उत्पन्न होते" येथे 'वर्ण' (रंग/दृश्य रूप) या अर्थात. "रूपाचे प्रमाण मानणारा, रूपावर प्रसन्न होणारा" येथे 'संस्थान' (आकार) या अर्थात. अशा प्रकारे – ขนฺเธ ภเว นิมิตฺเต จ, สรีเร ปจฺจเยปิ จ; วณฺเณ สณฺฐานอาทิมฺหิ, รูปสทฺโท ปวตฺตติ. स्कंध, भव, निमित्त, शरीर, प्रत्यय (कारण), वर्ण (रंग) आणि संस्थान (आकार) इत्यादी अर्थांमध्ये 'रूप' शब्द वापरला जातो. กุป โกเป. กุปฺปติ. กุปฺปนฺติ วาตสฺสปิ เอริตสฺส. โกโป, ปโกโป. วจีปโกปํ รกฺเขยฺย. 'कुप्' धातू 'कोप' (क्रोध/क्षोभ) या अर्थात आहे. 'कुप्पति' (क्रोधित होतो/क्षोभ पावतो). 'कुप्पन्ति वातस्सपि एरितस्स' (वाहणाऱ्या वाऱ्यानेही ते क्षोभ पावतात). 'कोपो', 'पकोपो' (क्रोध, प्रकोप). 'वचीपकोपं रक्खेय्य' (वाणीच्या प्रकोपापासून स्वतःचे रक्षण करावे). ตป สนฺตาเป. ตปฺปติ, สนฺตปฺปติ. สนฺตาโป. 'तप्' धातू 'संताप' (उष्णता/तप्त होणे) या अर्थात आहे. 'तप्पति', 'संतप्पति' (तप्त होतो, संताप पावतो). 'संतापो' (संताप/उष्णता). ตป ปีณเน. ตปฺปติ. ตปฺปนํ. 'तप्' धातू 'पीणन' (तृप्त करणे/प्रसन्न करणे) या अर्थात आहे. 'तप्पति' (तृप्त होतो). 'तप्पणं' (तृप्ती). ทป หาเส. ทปฺปติ. 'दप्' धातू 'हास' (हसणे/आनंद/गर्व) या अर्थात आहे. 'दप्पति' (हसतो/गर्व करतो). ทีป ทิตฺติยํ. ทิปฺปติ. ทีโป. 'दीप्' धातू 'दित्ति' (दीप्ती/प्रकाशणे) या अर्थात आहे. 'दिप्पति' (प्रकाशतो). 'दीपो' (दिवा/दीप). ลุป อทสฺสเน. ลุปฺปนํ, โลโป, ลุตฺติ. 'लुप्' धातू 'अदस्सन' (अदर्शन/लोप पावणे) या अर्थात आहे. 'लुप्पनं', 'लोपो', 'लुत्ति' (लोप पावणे, लोप, लुप्त होणे). ขิป เปรเณ. ขิปฺปติ. ขิปฺปํ. 'खिप्' धातू 'पेरण' (फेकणे/प्रेरित करणे) या अर्थात आहे. 'खिप्पति' (फेकले जाते). 'खिप्पं' (शीघ्र/लवकर). ลุภ คิทฺธิยํ. ลุพฺภติ. อตฺตโนเยว ชณฺณุกํ โอลุพฺภ ติฏฺฐติ. ลุพฺภนํ, โลโภ, ลุพฺภิตฺวา, ลุพฺภิตฺวาน, ลุพฺภิย, ลุพฺภิยาน, โอลุพฺภิตฺวา, โอลุพฺภิตฺวาน, โอลุพฺภิย, โอลุพฺภิยาน, ลุพฺภิตุํ, โอลุพฺภิตุํ. 'लुभ्' धातू 'गिद्धि' (लोभ/आसक्ती) या अर्थात आहे. 'लुब्भति' (लोभ धरतो/आसक्त होतो). 'अत्तनोयेव जण्णुकं ओलुब्भ तिट्ठति' (स्वतःच्याच गुडघ्यावर विसंबून/टेकून उभा राहतो). 'लुब्भनं', 'लोभो', 'लुब्भित्वा', 'लुब्भित्वान', 'लुब्भिय', 'लुब्भियान', 'ओलुब्भित्वा', 'ओलुब्भित्वान', 'ओलुब्भिय', 'ओलुब्भियान', 'लुब्भितुं', 'ओलुब्भितुं'. ตตฺถ โลโภติ ลุพฺภนฺติ เตน สตฺตา, สยํ วา ลุพฺภติ, ลุพฺภนมตฺตเมว วา ตนฺติ โลโภ. เอตฺถ ปน ‘‘โลโภ ลุพฺภนา [Pg.236] ลุพฺภิตตฺตํ ราโค ตณฺหา ตสิณา มุจฺฉา เอชา วนํ วนโถ’’ อิจฺจาทีนิ โลภสฺส พหุนามานิ เวทิตพฺพานิ. त्यामध्ये 'लोभ' म्हणजे ज्याच्याद्वारे प्राणी लोभ धरतात, किंवा तो स्वतः लोभ धरतो, किंवा केवळ लोभ धरण्याची क्रिया म्हणजे 'लोभ' होय. आणि येथे 'लोभ', 'लुब्भना' (लोभ करणे), 'लुब्भितत्तं' (लोभीपणा), 'राग' (आसक्ती), 'तण्हा' (तृष्णा), 'तसिणा' (तहान/लालसा), 'मुच्छा' (मूर्च्छा/मोह), 'एजा' (कंप/इच्छा), 'वनं' (वन/इच्छा), 'वनथो' (जंगल/इच्छा) इत्यादी लोभाची अनेक नावे आहेत असे समजावे. ขุภ สญฺจลเน. ขุพฺภติ, สํขุพฺภติ. ขุพฺภิตฺถนครํ. สงฺโขโภ. การิเต – โขเภติ, โขภยติ. 'खुभ्' धातू 'संचलने' (क्षोभ पावणे/हलणे) या अर्थात आहे. 'खुब्भति', 'संखुब्भति' (क्षोभ पावतो, अत्यंत क्षोभ पावतो). 'खुब्भित्थनगरं' (नगर क्षोभित झाले/खळबळले). 'संखोभो' (संक्षोभ/खळबळ). प्रयोजक (कारित) रूपात – 'खोभेति', 'खोभयति'. สมุ อุปสเม. จิตฺตํ สมฺมติ, อุปสมฺมติ, วูปสมฺมติ, สมโณ, สนฺติ, สนฺโต. 'समु' धातू 'उपशम' (शांत होणे) या अर्थात आहे. 'चित्तं सम्मति', 'उपसम्मति', 'वूपसम्मति' (चित्त शांत होते, उपशमित होते, पूर्णपणे शांत होते). 'समणो' (श्रमण), 'सन्ति' (शांती), 'सन्तो' (शांत). เอตฺถ สมโณติ สมฺมติ สนฺตจิตฺโต ภวตีติ สมโณ. การิตวเสน ปน กิเลเส สเมติ อุปสเมตีติ สมโณติ นิพฺพจนํ ทฏฺฐพฺพํ. ตถา หิ ‘‘ยํ สเมตีติ อิทํ อริยํ. สมยตีติธ สตฺตาน’’นฺติ ทฺเว การิตรูปานิ. येथे 'श्रमण' (समण) म्हणजे जो शांत होतो, शांत चित्ताचा होतो, तो 'श्रमण' होय. परंतु प्रयोजक (कारित) अर्थाने जो क्लेशांना शांत करतो, उपशमित करतो, तो 'श्रमण' अशी याची व्युत्पत्ती समजली पाहिजे. कारण "जो शांत करतो म्हणून हा आर्य आहे, येथे प्राण्यांच्या (क्लेशांना) शांत करतो" अशी दोन प्रयोजक रूपे आहेत. สมุ เขเท นิโรเธ จ. เขโท. กิลมนํ. นิโรโธ อภาวคมนํ. อทฺธานมคฺคปฺปฏิปนฺนสฺส กาโย สมฺมติ. อคฺคิ สมฺมติ. สนฺโต. 'समु' धातू 'खेद' (थकवा) आणि 'निरोध' (नष्ट होणे/शांत होणे) या अर्थातही आहे. 'खेदा'चा अर्थ थकणे (किलमनं) असा आहे. 'निरोध' म्हणजे अभाव होणे (अभावगमन). "लांबच्या मार्गाने प्रवास करणाऱ्याचा काय (शरीर) थकतो (सम्मति)." "अग्नी शांत होतो (सम्मति)." 'सन्तो' (थकलेला/शांत झालेला). สนฺตสทฺโท ‘‘ทีฆํ สนฺตสฺส โยชน’’นฺติอาทีสุ กิลนฺตภาเว อาคโต. ‘‘อยญฺจ วิตกฺโก อยญฺจ วิจาโร สนฺตา โหนฺติ สมิตา’’ติอาทีสุ นิรุทฺธภาเว. ‘‘อธิคโต โข มฺยายํ ธมฺโม คมฺภีโร ทุทฺทโส ทุรนุโพโธ สนฺโต ปณีโต’’ติอาทีสุ สนฺตญาณโคจรตายํ. ‘‘อุปสนฺตสฺส สทา สตีมโต’’ติอาทีสุ กิเลสวูปสเม. ‘‘สนฺโต หเว สพฺภิ ปเวทยนฺตี’’ติอาทีสุ สาธูสุ. ‘‘ปญฺจิเม ภิกฺขเว มหาโจรา สนฺโต สํวิชฺชมานา’’ติอาทีสุ อตฺถิภาเว. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – 'संत' (सन्त) शब्द "थकलेल्या माणसाला योजन लांब वाटते" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'थकलेल्या' (क्लांत) भावात आला आहे. "हा वितर्क आणि हा विचार शांत (निरुद्ध) व उपशमित होतात" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'निरुद्ध' (नष्ट/शांत) भावात. "मी प्राप्त केलेला हा धम्म गंभीर, दुर्दर्श, दुरनुबोध, शांत आणि प्रणीत आहे" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'शांत ज्ञानाचा विषय' या अर्थात. "नेहमी स्मृतिमान असणाऱ्या उपशांताचा" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'क्लेशांच्या उपशमा'च्या अर्थात. "सत्पुरुष (संत) खरोखरच सज्जनांना प्रकट करतात" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'सज्जन' (साधू) या अर्थात. "भिक्खूहो, हे पाच महाचोर अस्तित्वात आहेत" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'अस्तित्व' (असणे) या अर्थात आला आहे. याविषयी असे म्हटले आहे – ‘‘กิลนฺตตฺเต [Pg.237] นิรุทฺธตฺเต, สนฺตธีโคจรตฺตเน; กิเลสูปสเม เจว, อตฺถิภาเว จ สาธุสุ; อิเมสุ ฉสุ ฐาเนสุ, สนฺตสทฺโท ปนาคโต’’ติ. "थकलेपण, निरुद्धता (शांत होणे), शांत बुद्धीचा विषय असणे, क्लेशांचा उपशम, अस्तित्व आणि सज्जन; या सहा स्थानांमध्ये 'संत' शब्द आला आहे." ทมุ ทมเน. ทมฺมติ. ทนฺโต, ทโม, ทมนํ. การิเต ‘‘จิตฺตํ ทเมติ, ทมยตี’’ติ รูปานิ. 'दमु' धातू 'दमन' (दमन करणे/संयम राखणे) या अर्थात आहे. 'दम्मति' (दमित होतो/संयमित होतो). 'दन्तो', 'दमो', 'दमनं' (दमित/संयमित, दम/संयम, दमन). प्रयोजक (कारित) रूपात "चित्तं दमेति, दमयति" (चित्ताचे दमन करतो) अशी रूपे होतात. ตตฺถ ทโมติ อินฺทฺริยสํวราทีนํ เอตํ นามํ. ‘‘สจฺเจน ทนฺโต ทมสา อุเปโต. เวทนฺตคู วุสิตพฺรหฺมจริโย’’ติ เอตฺถ หิ อินฺทฺริยสํวโร ‘‘ทโม’’ติ วุตฺโต. ‘‘ยทิ สจฺจา ทมา จาคา, ขนฺตฺยา ภิยฺโยธ วิชฺชตี’’ติ เอตฺถ ปญฺญา ‘‘ทโม’’ติ วุตฺตา. ‘‘ทาเนน ทเมน สํยเมน สจฺจวชฺเชนา’’ติ เอตฺถ อุโปสถกมฺมํ ‘‘ทโม’’ติ วุตฺตํ. ‘‘ทมุปสเมนา’’ติ เอตฺถ ขนฺติ ‘‘ทโม’’ติ วุตฺตา. อิจฺเจวํ – त्यामध्ये 'दम' हे इंद्रियसंयम इत्यादींचे नाव आहे. "सत्याने दमित आणि दमाने (संयमाने) युक्त, वेदांतगू (ज्ञानाचा पारगामी) आणि ब्रह्मचर्य पूर्ण केलेला" येथे इंद्रियसंयमाला 'दम' म्हटले आहे. "जर सत्य, दम (संयम), त्याग आणि क्षमा यापेक्षा अधिक काही असेल" येथे प्रज्ञेला 'दम' म्हटले आहे. "दानाने, दमाने, संयमाने आणि सत्यवचनाने" येथे उपोसथ कर्माला 'दम' म्हटले आहे. "दम आणि उपशमाने" येथे क्षमेला 'दम' म्हटले आहे. अशा प्रकारे – ‘‘อินฺทฺริยสํวโร ปญฺญา, ขนฺติ จาปิ อุโปสโถ; อิเม อตฺถา ปวุจฺจนฺติ, ทมสทฺเทน สาสเน’’ติ. "इंद्रियसंयम, प्रज्ञा, क्षमा आणि उपोसथ; हे अर्थ शासनात (बुद्ध शासनात) 'दम' शब्दाने सांगितले जातात." ยา คติปาปุเณสุ. ยายติ, ยายนฺติ. ปริยาโย. ยายมาโน มหาราชา, อทฺทา สีทนฺตเร นเค. ยายนฺโต. ยายนฺตมนุยายติ. ยาตานุยายี. ยายิตุํ, ยายิตฺวา อิจฺจาทีนิ. 'या' धातू 'गति' (जाणे) आणि 'पापुण' (प्राप्त करणे) या अर्थात आहे. 'यायति', 'यायन्ति' (जातो, जातात). 'परियायो' (पर्याय/पद्धत). 'यायमानो महाराजा, अद्दा सीदन्तरे नगे' (जाताना महाराजांनी सीदंतर पर्वताला पाहिले). 'यायन्तो' (जाणारा). 'यायन्तमनुयायति' (जाणाऱ्याच्या मागे जातो). 'यातानुयायी' (गेलेल्यांच्या मागे जाणारा). 'यायितुं', 'यायित्वा' इत्यादी. เอตฺถ ปริยายสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร วุจฺจเต, ปริยายสทฺโท วารเทสนาการเณสุ สมนฺตโต คนฺตพฺพฏฺฐาเน จ สทิเส จ วตฺตติ. ‘‘กสฺส นุ โข อานนฺท อชฺช ปริยาโย ภิกฺขุนิโย โอวทิตุ’’นฺติอาทีสุ หิ วาเร วตฺตติ. ‘‘มธุปิณฺฑิกปริยาโยตินํ ธาเรหี’’ติอาทีสุ เทสนายํ. ‘‘อิมินาปิ โข เต ราชญฺญ ปริยาเยน เอวํ โหตู’’ติอาทีสุ [Pg.238] การเณ. ‘‘ปริยายปโถ’’ติอาทีสุ สมนฺตโต คนฺตพฺพฏฺฐาเน. ‘‘โกปสทฺโท โขภปริยาโย’’ติอาทีสุ สทิเส วตฺตติ. อิจฺเจวํ – येथे 'परियाय' (pariyāya) शब्दाचा अर्थ स्पष्ट केला जात आहे. 'परियाय' हा शब्द वार (वेळ/क्रम), देसना (उपदेश), कारण, सर्व बाजूंनी जाण्याचे ठिकाण (मार्ग) आणि सदृश (समान) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'कस्स नु खो आनन्द अज्ज परियायो भिक्खुनियो ओवदितुं' (हे आनंदा, आज भिक्खुनींना उपदेश देण्याची कोणाची वेळ/पाळी आहे?) इत्यादी वाक्यांमध्ये तो 'वार' (वेळ/क्रम) या अर्थाने वापरला जातो. 'मधुपिण्डिकपरियायोति नं धारेहि' (याला मधुपिंडिक उपदेश म्हणून लक्षात ठेव) इत्यादी वाक्यांमध्ये तो 'देसना' (उपदेश) या अर्थाने वापरला जातो. 'इमिनापि खो ते राजञ्ञ परियायेन एवं होतु' (हे राजा, याही कारणाने तुझ्यासाठी असेच असो) इत्यादी वाक्यांमध्ये तो 'कारण' या अर्थाने वापरला जातो. 'परियायपथो' इत्यादी वाक्यांमध्ये तो 'सर्व बाजूंनी जाण्याचे ठिकाण' (मार्ग) या अर्थाने वापरला जातो. 'को पसद्दो खोभपरियायो' (कोप शब्द हा क्षोभाचा समानार्थी आहे) इत्यादी वाक्यांमध्ये तो 'सदृश' (समान) या अर्थाने वापरला जातो. अशा प्रकारे - ปริยายรโว วาร-เทสนาการเณสุ จ; สมนฺตโตว คนฺตพฺพ-ฏฺฐาเน จ สทิเส สิยา. 'परियाय' हा शब्द वार (क्रम), देसना (उपदेश), कारण, सर्व बाजूंनी जाण्याचे ठिकाण (मार्ग) आणि सदृश (समान) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. ริ วสเน. ริยติ. रि (ri) - वास करणे (राहणे) या अर्थात. रियति (riyati). วิลี วิลีนภาเว. สปฺปิ วิลียติ. การิเต วิลาปยติ. विली (vilī) - विरघळणे (विलीन होणे) या अर्थात. सप्पि विलीयति (तूप विरघळते). प्रयोजक (Kārite) मध्ये - विलापयति (vilāpayati - विरघळवतो). วา คติคนฺธเนสุ. วายติ. วาโย, วาโต. वा (vā) - गती (वाहणे) आणि गंध पसरवणे या अर्थात. वायति (vāyati - वाहतो/सुगंध पसरवतो). वायो (vāyo), वातो (vāto - वारा). สิวุ ตนฺตสนฺตาเน. สิพฺพติ, สํสิพฺพติ. สิพฺพํ, สิพฺพนฺโต. การิเต – สิพฺเพติ, สิพฺพยติ, สิพฺพาเปติ, สิพฺพาปยติ. सिवु (sivu) - धागा जोडणे (शिवणे) या अर्थात. सिब्बति (sibbati), संसिब्बति (saṃsibbati). सिब्बं (sibbaṃ), सिब्बन्तो (sibbanto). प्रयोजक (Kārite) मध्ये - सिब्बेति (sibbeti), सिब्बयति (sibbayati), सिब्बापेति (sibbāpeti), सिब्बापयति (sibbāpayati). สิวุ คติโสสเนสุ. สิพฺพติ. सिवु (sivu) - गती आणि कोरडे करणे (शोषण) या अर्थात. सिब्बति (sibbati). ธิวุ ขิวุ นิทสฺสเน. ธิพฺพติ. ขิพฺพติ. धिवु (dhivu), खिवु (khivu) - निर्देश करणे (दाखवणे) या अर्थात. धिब्बति (dhibbati), खिब्बति (khibbati). สา ตนุกรเณ. สิยติ, สิยนฺติ. सा (sā) - बारीक करणे (कमी करणे) या अर्थात. सियति (siyati), सियन्ति (siyanti). สา อนฺตกมฺมนิ. สิยติ อนวเสสโต มานํ สิยติ สมุจฺฉินฺทตีติ อคฺคมคฺโค มานสนฺติ หิ วุตฺตํ. सा (sā) - अंत करणे (समाप्त करणे) या अर्थात. सियति (siyati) म्हणजे पूर्णपणे नष्ट करणे; मान (अहंकार) नष्ट करतो, समूळ उपटून टाकतो म्हणून अग्र मार्ग (अर्हत मार्ग) हा 'मानसंत' (मानाचा अंत करणारा) म्हटला गेला आहे. สา อสฺสาทเน. รสํ สายติ. สายิตํ, สายนํ. सा (sā) - आस्वाद घेणे (चाखणे) या अर्थात. रसं सायति (रसाचा आस्वाद घेतो). सायितं (sāyitaṃ), सायनं (sāyanaṃ). สิ ปาณิปฺปสเว. สูยติ, ปสูยติ. ปสูตา คาวี. सि (si) - प्राण्यांना जन्म देणे (प्रसव) या अर्थात. सूयति (sūyati), पसूयति (pasūyati). पसूता गावी (प्रसूत झालेली गाय). กุสุ หรณทิตฺตีสุ. กุสยติ. कुसु (kusu) - हरण करणे (घेऊन जाणे) आणि चमकणे (दीप्ती) या अर्थात. कुसयति (kusayati). สิลิส อาลิงฺคเน. สิลิสฺสติ. สิเลโส. सिलिस (silisa) - आलिंगन देणे (मिठी मारणे) या अर्थात. सिलिस्सति (silissati). सिलेसो (sileso - श्लेष/आलिंगन). กิลิส อุปตาเป. กิลิสฺสติ, สํกิลิสฺสติ. กิเลโส, สํกิเลโส. อิการโลเป กฺลิสฺสติ กฺเลโส [Pg.239] อิจฺจาทีนิ. อปิจ มลีนตาปิ กิลิสสทฺเทน วุจฺจติ, กิลิฏฺฐวตฺถํ ปริทหติ. ‘‘จิตฺเตน สํกิลิฏฺเฐน, สํกิลิสฺสนฺติ มาณวา’’ติอาทีสุ ธาตูนํ อเนกตฺถตาย. किलिस (kilisa) - पीडा देणे (तप्त करणे/मलीन होणे) या अर्थात. किलिस्सति (kilissati), संकिलिस्सति (saṃkilissati). किलेसो (kileso - क्लेश), संकिलेसो (saṃkileso). 'इ' कारचा लोप झाल्यावर 'क्लिस्सति' (klissati), 'क्लेसो' (kleso) इत्यादी रूपे होतात. तसेच मलीनता देखील 'किलिस' शब्दाने दर्शविली जाते, जसे की 'किलिट्ठवत्थं परिदहति' (मलीन वस्त्र परिधान करतो). 'चित्तेन संकिलिट्ठेन, संकिलिस्सन्ति माणवा' (चित्त मलीन झाल्यामुळे प्राणी मलीन होतात) इत्यादी वाक्यांमध्ये धातूंच्या अनेक अर्थांमुळे हा प्रयोग होतो. มส อปฺปีภาเว ขมายญฺจ. มสฺสติ. मस (masa) - अल्प होणे आणि क्षमा करणे या अर्थात. मस्सति (massati). ลีส อปฺปีภาเว. ลิสฺสติ. เลโส. ‘‘ลิส เลสเน’’ติปิ ปฐนฺติ อาจริยา. लीस (līsa) - अल्प होणे या अर्थात. लिस्सति (lissati). लेसो (leso). आचार्य 'लिस लेसने' (lisa lesane - लिस हा लेश/अल्प करणे या अर्थात) असाही पाठ वाचतात. ตส ปิปาสายํ. ตสฺสติ, ปริตสฺสติ. ปริตสฺสนา, ตสิณา, ตสิโต. तस (tasa) - तहान लागणे (तृष्णा/व्याकुळ होणे) या अर्थात. तस्सति (tassati), परितस्सति (paritassati). परितस्सना (paritassanā), तसिणा (tasiṇā - तृष्णा), तसितो (tasito). ทุส โทสเน. ทุสฺสติ. โทโส, โทสนํ, โทสิโต. दुस (dusa) - दूषित होणे (द्वेष करणे) या अर्थात. दुस्सति (dussati). दोसो (doso), दोसनं (dosanaṃ), दोसितो (dosito). ทุส อปฺปีติยํ. ทุสฺสติ, ปทุสฺสติ. โทโส, ปโทโส, ทุฏฺโฐ, ปทุฏฺโฐ, ทูสโก, ทูสิโต, ทูสนา. दुस (dusa) - अप्रिय वाटणे (द्वेष करणे) या अर्थात. दुस्सति (dussati), पदुस्सति (padussati). दोसो (doso), पदोसो (padoso), दुट्ठो (duṭṭho), पदुट्ठो (paduṭṭho), दूसको (dūsako), दूसितो (dūsito), दूसना (dūsanā). อสุ เขเป. เขโป ขิปนํ. อสฺสติ. นิรสฺสติอาทิยติ จ ธมฺมํ. อิสฺสาโส. असु (asu) - फेकणे (क्षेप) या अर्थात. क्षेप म्हणजे फेकणे. अस्सति (assati). निरस्सति (nirassati - फेकून देतो/त्याग करतो) आणि धम्माचा स्वीकार करतो. इस्सासो (issāso - धनुर्धारी). เอตฺถ จ นิรสฺสตีติ ฉฑฺเฑติ สตฺถารํ ตถา ธมฺมกฺขานาทีนิ. อิสฺสาโสติ อุสุํ อสฺสติ ขิปตีติ อิสฺสาโส, ธนุคฺคโห. येथे 'निरस्सति' म्हणजे शास्त्याला (बुद्धांना) तसेच धम्म-उपदेशाला सोडून देणे (फेकून देणे). 'इस्सासो' म्हणजे जो बाण (उसुं) फेकतो (अस्सति) तो 'इस्सासो' म्हणजेच धनुर्धारी (धनुग्गहो). ยสุ ปยตเน. ยสฺสติ. นิยสกมฺมํ. यसु (yasu) - प्रयत्न करणे या अर्थात. यस्सति (yassati). नियसकम्मं (niyasakammaṃ - नियसकर्म). เอตฺถ จ เยน วินยกมฺเมน ‘‘นิสฺสาย เต วตฺถพฺพ’’นฺติ นิยสฺสิยติ ภชาปิยตีติ นิยโส พาลํ, ตํ นิยสกมฺมํ นาม. ‘‘กโรหิ เม ยกฺข นิยสกมฺม’’นฺติ เอตฺถ ปน นิคฺคหกมฺมํ นิยสกมฺมํ นาม. येथे ज्या विनयकर्माने 'तुला (दुसऱ्याच्या) आश्रयाने राहावे लागेल' असे सांगून अज्ञानी भिक्खूला परावलंबी केले जाते (निसर्ग दिला जातो), त्याला 'नियसकर्म' म्हणतात. 'करोहि मे यक्ख नियसकम्मं' (हे यक्षा, माझ्यासाठी नियसकर्म कर) येथे मात्र 'नियसकर्म' म्हणजे निग्रहकर्म (शिक्षा/दमन) असा अर्थ आहे. ภสฺส ภสฺสเน. ภสฺสติ. ภสฺสํ, ภสฺสการโก. भस्स (bhassa) - बोलणे (भाषण करणे) या अर्थात. भस्सति (bhassati). भस्सं (bhassaṃ - संभाषण), भस्सकारको (bhassakārako - बोलणारा). วส สทฺเท. สกุโณ วสฺสติ. อธโม มิคชาตานํ, สิงฺคาโล ตาต วสฺสติ. มณฺฑูโก วสฺสติ. वस (vasa) - आवाज करणे या अर्थात. सकुळो वस्सति (पक्षी ओरडतो). 'अधमो मिगजातानं, सिंगालो तात वस्सति' (हे तात, पशूंमध्ये अधम असलेला कोल्हा ओरडतो). मण्डूको वस्सति (बेडूक डराव-डराव करतो). นส [Pg.240] อทสฺสเน. นสฺสนธมฺมํ นสฺสติ. ปนสฺสติ. วินสฺสติ. นสฺส วสลิ, จร ปิเร วินสฺส. นฏฺโฐ, วินฏฺโฐ. การิเต – นาเสติ, นาสยติ. नस (nasa) - अदृश्य होणे (नष्ट होणे) या अर्थात. नस्सनधम्मं nस्सति (नाशवंत नष्ट होते). पनस्सति (panassati), विनस्सति (vinassati). 'नस्स वसलि, चर पिरे विनस्स' (हे दासी, नष्ट हो/चालती हो, अरे दुष्टा, नष्ट हो). नट्ठो (naṭṭho), विनट्ठो (vinaṭṭho). प्रयोजक (Kārite) मध्ये - नासेति (nāseti), नासयति (nāsayati). สุส โสสเน. ปณฺณํ สุสฺสติ. การิเต – วาโต ปณฺณํ โสเสติ, โสสยติ. กมฺเม – วาเตน ปณฺณํ โสสิยติ. ภาเว กฺริยาปทมปฺปสิทฺธํ. โสโส, สุกฺขํ กฏฺฐํ. สุสฺสํ, สุสฺสนฺโต. สุสฺสมาโน ทหโท. सुस (susa) - सुकणे (शोषण) या अर्थात. पण्णं सुस्सति (पान सुकते). प्रयोजक (Kārite) मध्ये - वातो पण्णं सोसेति, सोसयति (वारा पान सुकवतो). कर्मभाव (Kamme) मध्ये - वातेन पण्णं सोसियति (वाऱ्याने पान सुकवले जाते). भाववाच्य मध्ये क्रियापद अप्रसिद्ध आहे. सोसो (soso - शोष), सुक्खं कट्ठं (सुके लाकूड). सुस्सं (sussaṃ), सुस्सन्तो (sussanto). सुस्समानो दहदो (आटत असलेला तलाव). ตุส ตุฏฺฐิยํ. ตุสฺสติ, สนฺตุสฺสติ. สนฺตุฏฺฐิ, สนฺโตโส, โตสนํ, ตุฏฺฐพฺพํ, ตุสฺสิตพฺพํ, ตุสิตา. การิเต ‘‘โตเสติ’’ อิจฺจาทีนิ. तुस (tusa) - संतुष्ट होणे (आनंदी होणे) या अर्थात. तुस्सति (tussati), सन्तुस्सति (santussati). सन्तुट्ठि (santuṭṭhi), सन्तोसो (santoso), तोसनं (tosanaṃ), तुट्ठब्बं (tuṭṭhabbaṃ), तुस्सितब्बं (tussitabbaṃ), तुसिता (tusitā - तुषित देवलोक). प्रयोजक (Kārite) मध्ये 'तोसेति' (toseti) इत्यादी रूपे होतात. หา ปริหานิยํ. หายติ, ปริหายติ. หายนฺติ ตตฺถ วฬวา. ภาเว ‘‘ภยํ วา ฉมฺภิตตฺตํ วา โลมหํโส วา, โส ปหียิสฺสตี’’ติ จ ‘‘ราโค ปหียตี’’ติ จ รูปํ. กมฺเม กฺริยาปทมปฺปสิทฺธํ. ‘‘ราโค ปหียตี’’ติ อิทํ ปน ‘‘หา จาเค’’ติ วุตฺตสฺส ภูวาทิคณิกธาตุสฺส รูปํ ‘‘ราคํ ปชหตี’’ติ กตฺตุปทสฺส ทสฺสนโต. हा (hā) - कमी होणे (ऱ्हास होणे) या अर्थात. हायति (hāyati), परिहायति (parihāyati). 'हायन्ति तत्थ वळवा' (तेथे घोडी क्षीण होतात). भाववाच्य मध्ये 'भयं वा छम्भितत्तं वा लोमहंसो वा, सो पहीयिस्सति' (भय, थरकाप किंवा अंगावर काटा येणे, ते नष्ट होईल) आणि 'रागो पहीयति' (राग नष्ट होतो) अशी रूपे होतात. कर्मवाच्य मध्ये क्रियापद अप्रसिद्ध आहे. 'रागो पहीयति' हे रूप मात्र 'हा चागे' (त्याग करणे) या अर्थातील भूवादिगणीय धातूचे रूप आहे, कारण 'रागं पजहति' (रागाचा त्याग करतो) या कर्तृपदाच्या दर्शनामुळे. นห พนฺธเน. นยฺหติ. อุปนยฺหติ. สนฺนยฺหติ. สนฺนาโห. สนฺนทฺโธ. नह (naha) - बांधणे या अर्थात. नय्हति (nayhati). उपनय्हति (upanayhati - वैर बांधणे). सन्नय्हति (sannayhati - सज्ज होणे/कवच घालणे). सन्नाहो (sannāho - चिलखत/तयारी), सन्नद्धो (sannaddho - सज्ज झालेला). มุห เวจิตฺเต. มุยฺหติ, สมฺมุยฺหติ, ปมุยฺหติ. โมโห, ปโมโห. มูฬฺโห. โมมูโห ปุริโส. โมมูหํ จิตฺตํ. การิเต – โมเหติ. ปโมหโก. เอตฺถ จ โมมูโหติ อวิสทตาย โมมูโห, มหามูฬฺโหติ อตฺโถ. मुह (muha) - मोहित होणे (चित्तभ्रम होणे) या अर्थात. मुय्हति (muyhati), सम्मुय्हति (sammuyhati), पमुय्हति (pamuyhati). मोहो (moho), पमोहो (pamoho). मूळ्हो (mūḷho - मोहित/मूर्ख). मोमूहो पुरिसो (अतिशय मोहित/मूर्ख मनुष्य). मोमूहं चित्तं (अतिशय मोहित चित्त). प्रयोजक (Kārite) मध्ये - मोहेति (moheti). पमोहको (pamohako). येथे 'मोमूह' म्हणजे स्पष्टता नसल्यामुळे अत्यंत मोहित झालेला, म्हणजेच 'महामूळ्ह' (अतिशय मूर्ख) असा अर्थ आहे. สห สุห สตฺติยํ. สยฺหติ. สุยฺหติ. सह (saha), सुह (suha) - सहन करणे (शक्ती असणे) या अर्थात. सय्हति (sayhati), सुय्हति (suyhati). นฺหา [Pg.241] โสเจยฺเย. นฺหายติ, อปฺปกฺขรานํ พหุภาเว นหายติ. นหายิตฺวา, นฺหายิตฺวา. นหานํ, นฺหานํ. สีสํ นฺหาโต. เอตฺถ จ สีสํ นฺหาโตติ สีสํ โธวิตฺวา นฺหาโตติ อตฺโถ คเหตพฺโพ โปราเณหิ อนุมตตฺตา. न्हा (nhā) - शुद्ध करणे (स्नान करणे) या अर्थात. न्हायति (nhāyati), अल्प अक्षरांच्या जागी बहुभावामुळे 'नहायति' (nahāyati) असे होते. नहायित्वा (nahāyitvā), न्हायित्वा (nhāyitvā). नहानं (nahānaṃ), न्हानं (nhānaṃ - स्नान). सीसं न्हातो (डोक्यावरून स्नान केलेला). येथे 'सीसं न्हातो' म्हणजे डोके धुवून स्नान केलेला असा अर्थ प्राचीन आचार्यांच्या संमतीमुळे घेतला पाहिजे. สินิห ปีติยํ. สินิยฺหติ. สิเนหโก, สิเนหิโต, สินิทฺโธ. ปุตฺเต สิเนโห อชายถ. อิการโลเปน สฺเนโห. ตถา หิ ‘‘นิสฺเนหมภิกงฺขามี’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. सिनिह (siniha) - प्रेम करणे (स्नेह) या अर्थात. सिनिय्हति (siniyhati). सिनेहको (sinehako), सिनेहितो (sinehito), सिनिद्धो (siniddho - स्निग्ध/प्रेमाळ). 'पुत्ते सिनेहो अजायथ' (पुत्रावर प्रेम निर्माण झाले). 'इ' कारचा लोप होऊन 'स्नेहो' (sneho) असे रूप होते. म्हणूनच 'निस्नेहमभिकङ्खामि' (मी स्नेहरहित होण्याची आकांक्षा करतो) असा पालि पाठ आढळतो. วิริฬ ลชฺชายํ โจทเน จ. วิริฬิโต. ลชฺชาวเสน อตฺโถ ปสิทฺโธ, น โจทนาวเสน. ตถา หิ ‘‘วิริฬิโตติ ลชฺชิโต’’ติ อตฺถสํวณฺณกา ครู วทนฺติ ‘‘ลชฺชนาการปฺปตฺโต’’ติ จ. विरिळ (viriḷa) - लाजणे आणि प्रेरित करणे (चोदना) या अर्थात. विरिळितो (viriḷito). लाजेच्या संदर्भात हा अर्थ प्रसिद्ध आहे, प्रेरणेच्या संदर्भात नाही. म्हणूनच अर्थ स्पष्ट करणारे पूज्य आचार्य म्हणतात की, 'विरिळितो म्हणजे लज्जित झालेला' आणि 'लाजण्याची अवस्था प्राप्त झालेला'. ทิวาที เอตฺตกา ทิฏฺฐา, ธาตโว เม ยถาพลํ; สุตฺเตสฺวญฺเญปิ เปกฺขิตฺวา, คณฺหวฺโห อตฺถยุตฺติโตติ. दिवादि गणाचे एवढे धातू मी माझ्या बुद्धीनुसार पाहिले आहेत; सूत्रांमध्ये इतर धातूही पाहून योग्य अर्थानुसार त्यांचा स्वीकार करावा. ทิวาทิคโณยํ. हा दिवादि गण आहे. สฺวาทิคณิก स्वादि गणीय สุ สวเน. ‘‘สุโณติ, สุณาติ. สุณึสุ. ปฏิสฺสุณิ, ปฏิสฺสุณึสุ. อสฺโสสิ, อสฺโสสุํ. ปจฺจสฺโสสิ, ปจฺจสฺโสสุํ’’ อิจฺจาทีนิ, ‘‘สุณิสฺสติ, โสสฺสติ’’ อิจฺจาทีนิ จ ภวนฺติ. อพฺภาสวิสเย ‘‘สุสฺสูสติ, สุสฺสูสา’’ อิจฺจาทีนิ. อนพฺภาสวิสเย – สาวโก, โสโต, สุณํ, สุณนฺโต, สุณมาโน, สุยฺยมาโน, สวนํ, สุตํ. อสุยิตฺถาติ วา สุตํ. สุตวา, โสตํ, โสโณ, สุณิตุํ, โสตุํ. สุณิตฺวา, สุณิย, สุณิยาน, สุตฺวา, สุตฺวาน. การิเต – สาเวติ, สาวยติ. กมฺเม – สทฺโท สุยฺยติ, สูยติ จ. ภาเว ปทรูปมปฺปสิทฺธํ. सु (su) - ऐकणे (श्रवण) या अर्थात. 'सुणोति' (suṇoti), 'सुणाति' (suṇāti). 'सुणिंसु' (suṇiṃsu). 'पटिस्सुणि' (paṭissuṇi), 'पटिस्सुणिंसु' (paṭissuṇiṃsu). 'अस्सोसि' (assosi), 'अस्सोसुं' (assosuṃ). 'पच्चस्सोसि' (paccassosi), 'पच्चस्सोसुं' (paccassosuṃ) इत्यादी, आणि 'सुणिस्सति' (suṇissati), 'सोस्सति' (sossati) इत्यादी रूपे होतात. द्वित्व (Abbhāsa) च्या विषयात 'सुस्सूसति' (sussūsati - ऐकण्याची इच्छा करतो), 'सुस्सूसा' (sussūsā - शुश्रूषा/सेवा) इत्यादी रूपे होतात. अ-द्वित्व विषयात - सावको (sāvako - श्रावक), सोतो (soto - श्रोता), सुणं (suṇaṃ), सुणन्तो (suṇanto), सुणमानो (suṇamāno), सुय्यमानो (suyyamāno), सवनं (savanaṃ - श्रवण), सुतं (sutaṃ - ऐकलेले). 'असुयित्था' या अर्थाने देखील 'सुतं' होते. सुतवा (sutavā - बहुश्रुत), सोतं (sotaṃ - कान), सोणो (soṇo), सुणितुं (suṇituṃ), सोतुं (sotuṃ). सुणित्वा (suṇitvā), सुणिय (suṇiya), सुणियान (suṇiyāna), सुत्वा (sutvā), सुत्वान (sutvāna). प्रयोजक (Kārite) मध्ये - सावेति (sāveti), सावयति (sāvayati). कर्मवाच्य (Kamme) मध्ये - 'सद्दो सुय्यति' (saddo suyyati - शब्द ऐकू येतो), 'सूयति' (sūyati) च. भाववाच्य मध्ये क्रियापदाचे रूप अप्रसिद्ध आहे. ตตฺถ [Pg.242] สาวโกติ อนฺเตวาสิโก, โส ทุวิโธ อาคตปฺผโล อนาคตปฺผโล จ, ตตฺถ อาคตปฺผโล สวนนฺเต อริยาย ชาติยา ชาโตติ ‘‘สาวโก’’ติ วุจฺจติ, อิตโร ครูนํ โอวาทํ สุณาตีติ ‘‘สาวโก’’ติ. สาวโก, อนฺเตวาสิโก, สิสฺโสติ ปริยายา. त्यामध्ये 'श्रावक' म्हणजे अंतेवासिक (जवळ राहणारा शिष्य) होय. तो दोन प्रकारचा असतो: आगतफल (फल प्राप्त झालेला) आणि अनागतफल (फल प्राप्त न झालेला). त्यामध्ये, ऐकल्यानंतर आर्य कुळात जन्मलेला असल्यामुळे आगतफलाला 'श्रावक' म्हटले जाते; तर दुसरा (अनागतफल) गुरूंचा उपदेश ऐकतो म्हणून त्याला 'श्रावक' म्हटले जाते. श्रावक, अंतेवासिक आणि शिष्य हे समानार्थी शब्द आहेत. เอตฺถ สุตสทฺทสฺส อตฺถุทฺธารํ วทาม สทฺธึ โสตสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาเรน. สุตสทฺโท สอุปสคฺโค อนุปสคฺโค จ อนุปปเทน, สุตสทฺโท จ – येथे आम्ही 'सोत' (sota) शब्दाच्या अर्थ स्पष्टीकरणासोबतच 'सुत' (suta) शब्दाचा अर्थ स्पष्ट करतो. 'सुत' शब्द उपसर्गासह, उपसर्गाशिवाय आणि उपपदाशिवाय देखील असतो – คมเน วิสฺสุเต ตินฺเต, นิโยโค’ปจิเตปิ จ; สทฺเท จ โสตทฺวารานุ-สารญาเตสุ ทิสฺสติ. गमन (जाणे), प्रसिद्ध (विख्यात), ओले झालेले, नियोग (नियोजित करणे) आणि उपचित (संचित करणे); तसेच शब्द आणि श्रोत्रद्वाराच्या (कानाच्या) माध्यमातून जाणलेले (ऐकलेले) या अर्थांमध्ये 'सुत' शब्द दिसून येतो. ตถา หิ ‘‘เสนาย ปสุโต’’ติอาทีสุ คจฺฉนฺโตติ อตฺโถ. ‘‘สุตธมฺมสฺส ปสฺสโต’’ติอาทีสุ วิสฺสุตธมฺมสฺสาติ อตฺโถ. ‘‘อวสฺสุตา อวสฺสุตสฺส ปุริสปุคฺคลสฺสา’’ติอาทีสุ ตินฺตสฺสาติ อตฺโถ. ‘‘เย ฌานปฺปสุตา ธีรา’’ติอาทีสุ อนุยุตฺตาติ อตฺโถ. ‘‘ตุมฺเหหิ ปุญฺญํ ปสุตํ อนปฺปก’’นฺติอาทีสุ อุปจิตนฺติ อตฺโถ. ‘‘ทิฏฺฐํ สุตํ มุตํ วิญฺญาต’’นฺติอาทีสุ สทฺโทติ อตฺโถ. ‘‘พหุสฺสุโต โหติ สุตธโร สุตสนฺนิจโย’’ติอาทีสุ โสตทฺวารานุสารวิญฺญาตธมฺมธโรติ อตฺโถ. तसेच, जसे की 'सेनाय पसुतो' (सैन्याकडे जाणारा) इत्यादींमध्ये 'जाणारा' असा अर्थ आहे. 'सुतधम्मस्स पस्सतो' इत्यादींमध्ये 'प्रसिद्ध धम्माचा' असा अर्थ आहे. 'अवस्सुता अवस्सुतस्स पुरिसपुग्गलस्स' इत्यादींमध्ये 'ओल्या झालेल्या' (आसक्त झालेल्या) असा अर्थ आहे. 'ये झानप्पसुता धीरा' इत्यादींमध्ये 'मग्न' (अनुयुक्त) असा अर्थ आहे. 'तुम्हेहि puññaṃ पसुतं अनप्पकं' इत्यादींमध्ये 'उपचित' (संचित केलेले) असा अर्थ आहे. 'दिट्ठं सुतं मुतं विञ्ञातं' इत्यादींमध्ये 'शब्द' (ऐकलेला) असा अर्थ आहे. 'बहुस्सुतो होति सुतधरो सुतसन्निचयो' इत्यादींमध्ये 'श्रोत्रद्वाराच्या माध्यमातून जाणलेल्या धम्माला धारण करणारा' असा अर्थ आहे. โสตสทฺโทปิ อเนกตฺถปฺปเภโท. ตถา เหส – 'सोत' (sota) शब्द देखील अनेक अर्थांचे भेद असणारा आहे. तो याप्रमाणे आहे – มํสวิญฺญาณญาเณสุ, ตณฺหาทีสุ จ ทิสฺสติ; ธารายํ อริยมคฺเค, จิตฺตสนฺตติยมฺปิ จ. मांस-श्रोत्र (भौतिक कान), श्रोत्र-विज्ञान, ज्ञान-श्रोत्र, तृष्णा इत्यादींमध्ये; तसेच पाण्याचा प्रवाह, आर्य मार्ग आणि चित्तसंततीमध्येही तो (सोत शब्द) दिसून येतो. ‘‘โสตายตนํ[Pg.243], โสตธาตุ, โสตินฺทฺริย’’นฺติอาทีสุ โสตสทฺโท มํสโสเต ทิสฺสติ, ‘‘โสเตน สทฺทํ สุตฺวา’’ติอาทีสุ โสตวิญฺญาเณ. ‘‘ทิพฺพาย โสตธาตุยา’’ติอาทีสุ ญาณโสเต. ‘‘ยานิ โสตานิ โลกสฺมินฺติ, ยานิ เอตานิ โสตานิ มยา กิตฺติตานิ ปกิตฺติตานิ อาจิกฺขิตานิ เทสิตานิ ปญฺญปิตานิ ปฏฺฐปิตานิ วิวริตานิ วิภตฺตานิ อุตฺตานีกตานิ ปกาสิตานิ. เสยฺยถิทํ? ตณฺหาโสโต ทิฏฺฐิโสโต กิเลสโสโต ทุจฺจริตโสโต อวิชฺชาโสโต’’ติอาทีสุ ปญฺจสุ ธมฺเมสุ. ‘‘อทฺทสา โข ภควา มหนฺตํ ทารุกฺขนฺธํ คงฺคาย นทิยา โสเตน วุยฺหมาน’’นฺติอาทีสุ อุทกธารายํ. ‘‘อริยสฺเสตํ อาวุโส อฏฺฐงฺคิกสฺส มคฺคสฺส อธิวจนํ, ยทิทํ โสโต’’ติอาทีสุ อริยมคฺเค. ‘‘ปุริสสฺส จ วิญฺญาณโสตํ ปชานาติ อุภยโต อพฺโพจฺฉินฺนํ อิธโลเก ปติฏฺฐิตญฺจ ปรโลเก ปติฏฺฐิตญฺจา’’ติอาทีสุ จิตฺตสนฺตติยนฺติ. 'सोतायतनं, सोतधातु, सोतिन्द्रियं' इत्यादींमध्ये 'सोत' शब्द मांस-श्रोत्रासाठी (भौतिक कानासाठी) वापरला गेला आहे; 'सोतेन सद्दं सुत्वा' (कानाने शब्द ऐकून) इत्यादींमध्ये 'श्रोत्र-विज्ञाना'साठी; 'दिब्बाय सोतधातुया' (दिव्य श्रोत्रधातूने) इत्यादींमध्ये 'ज्ञान-श्रोत्रा'साठी; 'जगामध्ये जे प्रवाह (सोत) आहेत, जे प्रवाह माझ्याद्वारे कीर्तित, प्रकीर्तित, आख्यात, देशित, प्रज्ञापित, प्रस्थापित, विवृत, विभक्त, उत्तानीकृत आणि प्रकाशित केले गेले आहेत. ते कोणते? तृष्णा-प्रवाह, दृष्टी-प्रवाह, क्लेश-प्रवाह, दुश्चरित-प्रवाह आणि अविद्या-प्रवाह' इत्यादींमध्ये पाच धर्मांसाठी; 'भगवंतांनी गंगेच्या नदीच्या प्रवाहाने वाहून जाणारा एक मोठा लाकडाचा ओंडका पाहिला' इत्यादींमध्ये 'पाण्याच्या प्रवाहा'साठी; 'हे आवुसो! 'सोत' (प्रवाह) हे या आर्य अष्टांगिक मार्गाचेच नाव आहे' इत्यादींमध्ये 'आर्य मार्गा'साठी; आणि 'तो त्या व्यक्तीचा विज्ञान-प्रवाह दोन्ही बाजूंनी अखंड असलेला, या लोकात प्रतिष्ठित असलेला आणि परलोकात प्रतिष्ठित असलेला जाणतो' इत्यादींमध्ये 'चित्तसंतती'साठी (विज्ञानाच्या प्रवाहासाठी) वापरला आहे. โสโณติ สุนโข. โส หิ สามิกสฺส วจนํ สุณาตีติ โสโณติ วุจฺจติ. 'सोण' (soṇa) म्हणजे कुत्रा होय. कारण तो मालकाचे बोलणे (वचन) ऐकतो, म्हणून त्याला 'सोण' म्हटले जाते. อิมานิ ตทภิธานานิ – ही त्याची नावे (समानार्थी शब्द) आहेत – สุนโข สารเมยฺโย จ, สุโณ สูโน จ กุกฺกุโร; โสโณ สฺวาโน สุวาโน จ, สาฬุโร มิคทํสโน. सुनख, सारमेय, सुण, सून, कुक्कुर, सोण, स्वान, suvan, साळुर आणि मृगदंशन. สา สุนิธาติ’เม สทฺทา, ปุมาเนสุ ปวตฺตเร; สุนขี กุกฺกุรี สี’ติ, อิเม อิตฺถีสุ วตฺตเร. 'सा', 'सुनिधी' इत्यादी शब्द पुल्लिंगात वापरले जातात; तर 'सुनखी', 'कुक्कुरी' आणि 'सी' हे शब्द स्त्रीलिंगात वापरले जातात. สุนขา สารเมยฺยาติ, อาทิ พหุวโจ ปน; ปวตฺตติ ปุมิตฺถีสุ, อญฺญตฺราปิ อยํ นโย; परंतु 'सुनखा', 'सारमेय्या' इत्यादी अनेकवचनी रूपे पुल्लिंग आणि स्त्रीलिंग दोन्हीमध्ये वापरली जातात; इतर ठिकाणीही हाच नियम लागू होतो. กุกฺกุโรติ [Pg.244] อยํ ตตฺถ, พาลกาเล รเวน เว; มหลฺลเกปิ สุนเข, รูฬฺหิยา สมฺปวตฺตติ. त्यामध्ये 'कुक्कुर' हा शब्द बालपणीच्या आवाजामुळे पडला असला, तरी रूढीने तो मोठ्या कुत्र्यासाठी देखील वापरला जातो. ตถา หิ อฏฺฐกถาจริยา กุกฺกุรชาตเก ‘‘เย กุกฺกุรา ราชกุลมฺหิ วฑฺฒา, โกเลยฺยกา วณฺณพลูปปนฺนา’’ติอิมสฺมึปเทเส เอวมตฺถํ วณฺณยึสุ ‘‘เย กุกฺกุราติ เย สุนขา. ยถา หิ ตรุโณปิ ปสฺสาโว ปูติมุตฺตนฺติ ตทหุชาโตปิ สิงฺคาโล ‘‘ชรสิงฺคาโล’ติ, โกมลาปิ คฬาจีลตา ‘ปูติลตา’ติ, สุวณฺณวณฺโณปิ กาโย ‘ปูติกาโย’ติ วุจฺจติ, เอวเมว วสฺสสติโกปิ สุนโข ‘กุกฺกุโร’ติ วุจฺจติ, ตสฺมา มหลฺลกา กายูปปนฺนาปิ เต ‘กุกฺกุรา’ตฺเวว วุตฺตา’’ติ. तसेच, अट्ठकथाचार्यांनी 'कुक्कुर जातका'मध्ये 'ye kukkurā rājakulamhi vaḍḍhā, koleyyakā vaṇṇabalūpapannā' या गाथेच्या भागावर असा अर्थ स्पष्ट केला आहे: 'ye kukkurā' म्हणजे जे कुत्रे. ज्याप्रमाणे ताजे मूत्र देखील 'पूतीमूत्र' म्हटले जाते, त्याच दिवशी जन्मलेला कोल्हा देखील 'जरसिंघाल' (वृद्ध कोल्हा) म्हटला जातो, कोमल असलेली गुळवेल देखील 'पूतीलता' म्हटली जाते, सुवर्णवर्णाचा शरीर देखील 'पूतीकाय' म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे शंभर वर्षांचा कुत्रा देखील 'कुक्कुर' म्हटला जातो. म्हणून, शरीराने मोठे असूनही त्यांना 'कुक्कुर' असेच म्हटले गेले आहे. กิ หึสายํ. กิโณติ, กิณาติ, กิณนฺติ. 'कि' (ki) धातू हिंसेच्या अर्थात आहे. (त्याची रूपे) किणोति, किणाति, किणन्ति अशी होतात. สก สามตฺถิเย. สมตฺถภาโว สามตฺถิยํ, ยถา ทกฺขิยํ. สกฺกุณาติ, สกฺกุณนฺติ. อสกฺขิ. สกฺขิสฺสติ. สกฺโก. สกฺกี. 'सक' (saka) धातू सामर्थ्याच्या अर्थात आहे. समर्थ असण्याचा भाव म्हणजे सामर्थ्य, जसे 'दक्खिय' (दक्षता). (त्याची रूपे) सक्कुणाति, सक्कुणन्ति, असक्खि, सक्खिस्सति, सक्को, सक्की अशी होतात. เอตฺถ สกฺโกติ เทวราชา. โส หิ ปรหิตํ สกหิตญฺจ กาตุํ สกฺกุณาตีติ สกฺโก. อปิจ สกฺยกุลชาโต โย โกจิปิ. ตถา หิ ‘‘อถ โข มหานาโม สกฺโก’’ติอาทิ วุตฺตํ. ‘‘ภควนฺตญฺจ ปิงฺคิโย มํ สกฺก สมุทฺธราหีติ อาลปิ. สกฺยา วต โภ กุมารา ปรมสกฺยา วต โภ กุมารา’’ติ วจนมุปาทาย สพฺเพปิ สกฺยกุเล ชาตา ‘‘สกฺยา’’ติ จ ‘‘สากิยา’’ติ จ ‘‘สกฺกา’’ติ จ วุจฺจนฺติ. เอตฺถ สฺวาทิตฺเตปิ อเนกสฺสรธาตุโต เอโกว อุณาปจฺจโย โหติ, น ณุ ณาปจฺจยาติ ทฏฺฐพฺพํ. येथे 'सक्क' (sakka) म्हणजे देवराज (शक्र) होय. कारण तो परहित आणि स्वहित करण्यास समर्थ आहे, म्हणून त्याला 'सक्क' म्हणतात. शिवाय, शाक्य कुळात जन्मलेला कोणताही व्यक्ती. तसेच 'अथ खो महानामो सक्को' इत्यादी म्हटले आहे. आणि पिंगियाने भगवंतांना 'हे शाक्य (सक्क)! माझा उद्धार करा' अशी हाक मारली. 'अरे, हे कुमार खरोखरच शाक्य आहेत, हे कुमार परम शाक्य आहेत' या वचनाचा आधार घेऊन, शाक्य कुळात जन्मलेल्या सर्वांनाच 'सक्य', 'साकिय' आणि 'सक्क' म्हटले जाते. येथे स्वादि गणात असूनही, अनेक स्वर असणाऱ्या धातूपासून एकच 'उणा' प्रत्यय होतो, 'णु' किंवा 'णा' प्रत्यय होत नाही, असे समजावे. ขี [Pg.245] ขเย. ขีโณติ. ขีณาติ. ขีณา ชาติ. ขีโณ. อโยคา ภูริสงฺขโย. 'खी' (khī) धातू क्षय होण्याच्या अर्थात आहे. (त्याची रूपे) खिणोति, खिणाति अशी होतात. 'खिणा जाती' (जन्म नष्ट झाला), 'खिणो' (नष्ट झालेला). 'अयोगा भूरीसंखयो' (प्रयत्नाशिवाय बुद्धीचा क्षय होतो). เค สทฺเท. คิโณติ, คิณาติ. 'गे' (ge) धातू शब्दाच्या अर्थात आहे. (त्याची रूपे) गिणोति, गिणाति अशी होतात. จิ จเย. ณการสฺส นการตฺตํ. ปาการํ จิโนติ. จิตํ กุสลํ. เจโต ปุคฺคโล. 'चि' (ci) धातू संचय करण्याच्या अर्थात आहे. येथे 'ण' काराचा 'न' कार होतो. 'पाकारं चिनोति' (भिंत बांधतो), 'चितं कुसलं' (संचित केलेले कुशल), 'चेतो पुग्गलो' (जाणणारा व्यक्ती). รุ อุปตาเป. รุโณติ, รุณาติ. 'रु' (ru) धातू उपतापाच्या (पीडेच्या) अर्थात आहे. (त्याची रूपे) रुणोति, रुणाति अशी होतात. ราธ สาธ สํสิทฺธิยํ. ราธุณาติ. สาธุณาติ. ราธนํ. อาราธนํ. สาธนํ. 'राध' (rādha) आणि 'साध' (sādha) धातू संसिद्धीच्या (पूर्णत्वाच्या) अर्थात आहेत. (त्यांची रूपे) राधुणाति, साघुणाति अशी होतात. राधनं, आराधनं, साधनं (हे त्यांचे शब्द आहेत). ปี ปีติยํ. ปีโณติ, ปีณาติ. ปีติ, ปิโย. 'पी' (pī) धातू प्रीतीच्या (आनंदाच्या) अर्थात आहे. (त्याची रूपे) पीणोति, पीणाति अशी होतात. पीति (प्रीती), पियो (प्रिय) हे शब्द यापासून बनतात. อป ปาปุเณ สมฺภุ จ. ปาปุโณติ, ปาปุณาติ. ปตฺโต. สพฺพญฺญุตํ สตฺถา ปตฺโต. สมฺปตฺโต ยมสาธนํ. สมฺภุณาติ, น กิญฺจิ อตฺถํ อภิสมฺภุณาติ. สมฺภุณนฺโต, อภิสมฺภุณมาโน. 'अप' (apa) धातू प्राप्त करण्याच्या अर्थात आहे आणि 'संभू' (sambhu) देखील याच अर्थात आहे. (त्याची रूपे) पापुणोति, पापुणाति अशी होतात. 'पत्तो' (प्राप्त झालेला), जसे 'सब्बञ्ञुतं सत्था पत्तो' (शास्त्यांनी सर्वज्ञता प्राप्त केली), 'सम्पत्तो यमसाधनं' (यमलोकाला प्राप्त झालेला). 'संभुणाति', जसे 'न किञ्चि अत्थं अभिसम्भुणाति' (काहीही अर्थ प्राप्त करत नाही). संभुणंतो, अभिसंभुणमानो (प्राप्त करणारा). ตตฺถ ปตฺโตติ ปสทฺโท อุปสคฺโค ‘‘ปปฺโปตี’’ติ เอตฺถ ปสทฺโท วิย. ตถา หิ ‘‘ปตฺโต’’ติ เอตฺถ ปาปุณีติ อตฺเถ ปปุพฺพสฺส อปธาตุสฺส ปกาเร ลุตฺเต ตปจฺจยสฺส ทฺวิภาโว ภวติ. ตตฺถ น อภิสมฺภุณาตีติ น สมฺปาปุณาติ, น สาเธตีติ วุตฺตํ โหติ. त्यामध्ये 'पत्तो' (patto) या शब्दात 'प' हा उपसर्ग आहे, जसे 'पप्पोति' (pappoti) मध्ये 'प' उपसर्ग आहे. तसेच 'पत्तो' यामध्ये 'प्राप्त केले' या अर्थात 'प' पूर्व असलेल्या 'अप' धातूच्या 'प' काराचा लोप होऊन 'त' प्रत्ययाचे द्वित्व होते. त्यामध्ये 'न अभिसम्भुणाति' म्हणजे 'प्राप्त करत नाही' किंवा 'साध्य करत नाही' असे म्हटले आहे. ขิป เขเป. ขิปุณาติ. ขิปฺปํ. ขิปฺปนฺติ มจฺฉปญฺชโร. 'खिप' (khipa) धातू फेकण्याच्या अर्थात आहे. (त्याचे रूप) खिपुणाति असे होते. 'खिप्पं' (शीघ्र), आणि 'खिप्पं' म्हणजे माशांचे जाळे देखील होय. อาป พฺยาปเน. อาปุณาติ. อาโป. 'आप' (āpa) धातू व्यापण्याच्या अर्थात आहे. (त्याचे रूप) आपुणाति असे होते. 'आपो' (पाणी/आपोधातू) हा शब्द यापासून बनतो. มิ ปกฺเขปเน. มิโนติ. มิตฺโต. 'मि' (mi) धातू प्रक्षेपणाच्या (स्थापना करण्याच्या) अर्थात आहे. (त्याचे रूप) मिनोति असे होते. 'मित्त' (मित्र) हा शब्द यापासून बनतो. เอตฺถ จ สพฺพคุยฺเหสุ นิมิยติ ปกฺขิปิยตีติ มิตฺโต. ‘‘มิตฺโต หเว สตฺตปเทน โหตี’’ติ วจนํ ปน โวหารวเสน วุตฺตํ, น อตฺถวเสน. วุจฺเจยฺย เจ, โย โกจิ อวิสฺสาสิโก [Pg.246] อตฺตโน ปฏิวิรุทฺโธปิ จ มิตฺโต นาม ภเวยฺย, น เจวํ ทฏฺฐพฺพํ. เอวญฺจ ปน ทฏฺฐพฺพํ ‘‘สตฺตปทวีติหารมตฺเตนปิ สห คจฺฉนฺโต สห คจฺฉนฺตสฺส ปิยวาจานิจฺฉารเณน อญฺญมญฺญํ อาลาปสลฺลาปกรณมตฺเตน มิตฺโต นาม โหตีติ วตฺตพฺพํ. กึการณา? ทฬฺหวิสฺสาโส มิตฺโต นาม น ภเวยฺยาติ มิตฺตสฺส คุณปสํสาวเสน เอวํ วุตฺต’’นฺติ. आणि येथे सर्व गुप्त गोष्टींमध्ये ज्याच्यावर विश्वास टाकला जातो (किंवा ज्याच्यामध्ये गुप्त गोष्टी ठेवल्या जातात) तो 'मित्र' होय. परंतु 'मित्र खरोखर सात पावले एकत्र चालल्याने होतो' हे वचन व्यवहाराच्या दृष्टीने म्हटले आहे, वास्तविक अर्थाच्या दृष्टीने नाही. जर असे मानले, तर कोणताही अविश्वासू आणि स्वतःचा विरोधी असलेला व्यक्ती देखील मित्र ठरेल, पण असे समजू नये. तर याकडे असे पाहिले पाहिजे की, 'केवळ सात पावले एकत्र चालताना, सोबत चालणाऱ्या व्यक्तीशी प्रिय बोलण्याने आणि परस्परांशी संवाद साधण्याने तो मित्र होतो' असे म्हटले पाहिजे. कारण काय? दृढ विश्वास असलेलाच मित्र होऊ शकतो, म्हणून मित्राच्या गुणांची प्रशंसा करण्यासाठी असे म्हटले गेले आहे. วุ สํวรเณ. วุโณติ, วุณาติ, สํวุโณติ, สํวุณาติ. ปณฺฑิโต สีลสํวุโต. 'वु' (धातू) संवरण (संयम राखणे/झाकणे) या अर्थात. वुणोति, वुणाति, संवुणोति, संवुणाति. 'पण्डितो सीलसंवुतो' (शीलसंयत असलेला पंडित). สุ อภิสเว. อภิสโว นาม ปีฬนํ มนฺถนํ สนฺธานํ สินฺหานํ วา. สุโณติ, สุณาติ. 'सु' (धातू) अभिषव (पिळणे, घुसळणे, सांधणे किंवा वाहणे) या अर्थात. अभिषव म्हणजे पिळणे, घुसळणे, सांधणे किंवा वाहणे होय. सुणोति, सुणाति. สิ พนฺธเน. สิโนติ. 'सि' (धातू) बंधन (बांधणे) या अर्थात. सिनोति. สิ นิสาเน. สิโณติ, สิณาติ. นิสิตสตฺถํ. 'सि' (धातू) निसान (तीक्ष्ण करणे/धार लावणे) या अर्थात. सिणोति, siणाति. 'निसितसत्थं' (तीक्ष्ण केलेले शस्त्र). น หิ นูนายํ สา ขุชฺชา, ลภติ ชิวฺหาย เฉทนํ; สุนิสิเตน สตฺเถน, เอวํ ทุพฺภาสิตํ ภณํ; "नक्कीच ही कुबडी स्त्री अशा प्रकारे दुर्भाषण बोलल्यामुळे, चांगल्या प्रकारे तीक्ष्ण केलेल्या शस्त्राने आपल्या जिभेचे कापले जाणे प्राप्त करेल." เอตฺถ ภณนฺติ ภณนฺตี. येथे 'भणन्ति' किंवा 'भणन्ती' असे म्हणतात. วุส ปาคพฺพิเย. ปาคพฺพิยํ นาม กายวาจามเนหิ ปคพฺพภาโว. วุสุณาติ. 'वुस' (धातू) प्रगल्भता (धिटाई/उद्धटपणा) या अर्थात. प्रगल्भता (पागब्भिय) म्हणजे काय, वाचा आणि मनाने उद्धट असणे होय. वुसुणाति. อสุ พฺยาปเน. อสุณาติ. อสฺสุ. 'असु' (धातू) व्यापन (पसरणे/व्यापून टाकणे) या अर्थात. असुणाति. अस्सु. หิ คติพุทฺธีสุ อุปตาเป จ. หิโนติ. 'हि' (धातू) गती, बुद्धी (ज्ञान) आणि उपताप (पीडा देणे) या अर्थात. हिनोति. เอตฺถ ปน อสมานนฺตตฺเตปิ สมานตฺถานํ สโมธานํ วุจฺจติ. परंतु येथे, भिन्न अंत (शेवट) असूनही समान अर्थ असलेल्यांचे संधान (एकत्रीकरण) सांगितले जाते. ติก ติค สฆ ทิกฺข กิวิ จิริ ชิริ ทาส ทุ หึสายํ. ติกุณาติ. ติคุณาติ. สฆุณาติ. ทิกฺขุณาติ. กิวุณาติ[Pg.247]. จิรุณาติ. ชิรุณาติ. ทาสุณาติ. ทุโณติ, ทุณาตีติ รูปานิ หึสาวาจกานิ ภวนฺติ. 'तिक', 'तिग', 'सघ', 'दिक्ख', 'किवि', 'चिरि', 'जिरि', 'दास', 'दु' (हे धातू) हिंसा (पीडा देणे/इजा करणे) या अर्थात आहेत. तिकुणाति, तिगुणाति, सघुणाति, दिक्खुणाति, किवुणाति, चिरुणाति, जिरुणाति, दासुणाति, दुणोति, दुणाति ही रूपे हिंसावाचक आहेत. สุวาที เอตฺตกา ทิฏฺฐา, ธาตโว เม ยถาพลํ; สุตฺเตสฺวญฺเญปิ เปกฺขิตฺวา, คณวฺโห อตฺถยุตฺติโต. "माझ्या शक्तीनुसार स्वादि गणाचे एवढे धातू पाहिले गेले आहेत; सूत्रांमध्ये (सुत्तांमध्ये) इतर धातूही पाहून अर्थाच्या योग्यतेनुसार त्यांचे वर्गीकरण करावे." สฺวาทิคโณยํ. हा स्वादिगण आहे. กิยาทิคณิก कियादिगण. กี ทพฺพวินิมเย. ทพฺพวินิมโย กยวิกฺกยวเสน ภณฺฑสฺส ปริวตฺตนํ. กิณาติ, กิณนฺติ. วิกฺกิณาติ, วิกฺกิณนฺติ. เกตุํ, กิณิตุํ. วิกฺเกตุํ, วิกฺกิณิตุํ. กิณิตฺวา, วิกฺกิณิตฺวา. กีตํ ภณฺฑํ. กโย, วิกฺกโย. วิกฺกิเณยฺย หเนยฺย วา. 'की' (धातू) द्रव्यविनिमय (वस्तूंची देवाणघेवाण) या अर्थात. द्रव्यविनिमय म्हणजे खरेदी-विक्रीच्या माध्यमातून वस्तूंची अदलाबदल करणे होय. किणाति, किणन्ति (खरेदी करतो, खरेदी करतात). विक्किणाति, विक्किणन्ति (विक्री करतो, विक्री करतात). केतुं, किणितुं (खरेदी करण्यासाठी). विक्केतुं, विक्किणितुं (विक्री करण्यासाठी). किणित्वा, विक्किणित्वा (खरेदी करून, विक्री करून). कीतं भण्डं (खरेदी केलेले सामान/वस्तू). कयो, विक्कयो (खरेदी, विक्री). विक्किणेय्य हनेय्य वा (विकून टाकावे किंवा नष्ट करावे/मारून टाकावे). ขิ คติยํ. ขิณาติ. อติขิโณ สโร. ขํ, ขานิ. นการสฺส ณการตฺตํ. 'खि' (धातू) गती या अर्थात. खिणाति. 'अतिखिणो सरो' (अतिशय वेगाने गेलेला बाण). खं, खानि. 'न' काराचा 'ण' कार होणे. ตตฺถ ขิณาตีติ คจฺฉติ. อติขิโนติ อติคโต. อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘เสนฺติ จาปาติขิณาว, ปุราณานิ อนุตฺถุน’’นฺติ. ตตฺถ จาปาติขิณา’ติ จาปโต อติขิณา อติคตา. อฏฺฐกถายํ ปน ‘‘จาปาติขิณาติ จาปโต อติขิณา จาปา วินิมุตฺตาติ อตฺโถ’’ติ ปทตฺถวิวรณํ กตํ, ตมฺปิ คตตฺถญฺเญว สนฺธาย อธิปฺปายตฺถวเสน กตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. ตตฺร ขนฺติ สคฺโค. โส หิ กตปุญฺเญหิ คนฺตพฺพตฺตา ‘‘ข’’นฺติ วุจฺจติ. ขานีติ สคฺคา. तेथे 'खिणाति' म्हणजे जातो. 'अतिखिणो' म्हणजे निघून गेलेला (अतिगत). येथे ही पाळि (पाठांतर) आहे - "सेन्ति चापातिखिणाव, पुराणानि अनुत्थुनन्ति" (ते धनुष्यातून सुटलेल्या बाणाप्रमाणे पडून राहतात आणि जुन्या गोष्टींबद्दल शोक करतात). तेथे 'चापातिखिणा' म्हणजे धनुष्यातून निघून गेलेले (अतिगत). परंतु अट्ठकथेत (टीकेत) "चापातिखिणा म्हणजे धनुष्यातून सुटलेले, धनुष्यातून मुक्त झालेले असा अर्थ आहे" असे शब्दांचे स्पष्टीकरण केले आहे, ते देखील गतीच्या अर्थालाच लक्षात घेऊन अभिप्रेत अर्थाने केले आहे असे समजावे. तेथे 'ख' म्हणजे स्वर्ग. कारण तो पुण्यवान लोकांनी जाण्यायोग्य असल्यामुळे त्याला 'ख' म्हटले जाते. 'खानि' म्हणजे स्वर्ग (अनेकवचन). จิ จเย. ปุญฺญํ จินาติ. ปาการํ จินาติ. ปารมิโย วิจินาติ, วิจินติ จ. ปุปฺผํ โอจินาติ, โอจินติ วา. ปจินาติ. ปจินิตฺวา. จิตํ กุสลํ. จโย สญฺจโย. จิโต ปากาโร. จินาตีติ เจโต, อิฏฺฐกวฑฺฒกี. โย สตฺโต ปุญฺญสญฺจโย[Pg.248]. ‘‘สญฺจโย ราสิ สมูโห ปิณฺโฑ คโณ สงฺโฆ กทมฺโพ วคฺโค กโร ฆฏา’’อิจฺเจวมาทโย ปริยายา. 'चि' (धातू) चय (एकत्र करणे/संचय करणे/बांधणे) या अर्थात. पुञ्ञं चिनाति (पुण्य संचित करतो). पाकारं चिनाति (भिंत बांधतो). पारमियो विचिनाति, विचिनति च (पारमितांचा संचय करतो किंवा शोध घेतो). पुप्फं ओचिनाति, ओचिनति वा (फुले गोळा करतो/तोडतो). पचिनाति (एकत्र करतो). पचिनित्वा (एकत्र करून). चितं कुसलं (संचित केलेले कुशल). चयो, सञ्चयो (संचय, ढीग). चितो पाकारो (बांधलेली भिंत). 'चिनाति' म्हणून 'चेतो' म्हणजे विटांचा गवंडी (बांधकाम करणारा). जो प्राणी पुण्याचा संचय करतो. "सञ्चयो, रासि, समूहो, पिण्डो, गणो, सङ्घो, कदम्बो, वग्गो, करो, घटा" इत्यादी त्याचे समानार्थी शब्द आहेत. ชิ ชเย. ชินาติ, วิชินาติ, ชินิยติ. เชตา, ชิโน. ชิโต มาโร. มารํ ชิโต. ชิตวา, ชิตาวี, ชิตพฺโพ, เชยฺโย, ชยนํ, ชิตํ, วิชิตํ, ชโย, ปราชยนํ, ปราชโย. ยสฺส ชิตํ นาวชียติ. ชิตมสฺส โนยาติ โกจิ โลเก. ชโย หิ พุทฺธสฺส สิรีมโต อยํ, มารสฺส จ ปาปิมโต ปราชโย. 'जि' (धातू) जय (जिंकणे) या अर्थात. जिनाति, विजिनाति, जिनियति (जिंकतो, विशेष रूपाने जिंकतो, जिंकला जातो). जेता, जिनो (जिंकणारा, जिन). जितो मारो (मार जिंकला गेला). मारं जितो (माराला जिंकले). जितवा, जितावी, जितब्बो, जेय्यो, जयनं, जितं, विजितं, जयो, पराजयनं, पराजयो. 'यस्स जितं नावजीयति' (ज्याचा विजय पराजयात बदलता येत नाही). 'जितमस्स नोयाति कोचि लोके' (या जगात कोणीही त्याच्या विजयाला पराभूत करू शकत नाही). 'जयो हि बुद्धस्स सिरीमतो अयं, मारस्स च पापिमतो पराजयो' (हा खरोखरच श्रीमान बुद्धांचा विजय आहे आणि पापी माराचा पराजय आहे). ตตฺถ เชตาติ ชินาตีติ เชตา, โย โกจิ ปุคฺคโล. อชินีติ ชิโน, สพฺพญฺญู ธมฺมราชา. กึ โส อชินิ? ปาปเก อกุสเล ธมฺเม มาราทิอรโย จ. อิติ ปาปเก อกุสเล ธมฺเม มาราทโย จ อรโย อชินีติ ชิโน. วุตฺตมฺปิ เจตํ – तेथे 'जेता' म्हणजे जो जिंकतो तो कोणताही पुद्गल (व्यक्ति). 'अजिनी' (ज्याने जिंकले) तो 'जिन' म्हणजे सर्वज्ञ धम्मराज होय. त्यांनी काय जिंकले? पापी अकुशल धम्म आणि मारासारखे शत्रू. अशा प्रकारे पापी अकुशल धम्म आणि मारासारख्या शत्रूंना जिंकले म्हणून ते 'जिन' होत. हे असेही म्हटले गेले आहे - ‘‘มาทิสา เว ชินา โหนฺติ, เย ปตฺตา อาสวกฺขยํ; ชิตา เม ปาปกา ธมฺมา, ตสฺมาหํ อุปก ชิโน’’ติ, "माझ्यासारखेच ते जिन (विजेते) असतात, ज्यांनी आसवांचा क्षय (आसवक्खय) प्राप्त केला आहे; मी पापी धम्मांना जिंकले आहे, म्हणून हे उपक! मी जिन आहे." ‘‘ตถาคโต ภิกฺขเว อภิภู อนภิภูโต’’ติ จ. आणि "भिक्खूहो! तथागत हे सर्वांना पराभूत करणारे (अभिभू) असून स्वतः कोणाकडूनही पराभूत न झालेले (अनभिभूत) आहेत." ชินสทฺโท หิ เกวโล สพฺพญฺญุมฺหิ ปวตฺตติ, โสปปโท ปน ปจฺเจกพุทฺธาทีสุ ตมฺหิ จ ยถารหํ ปวตฺตติ. ‘‘ปจฺเจกชิโน, โอธิชิโน, อโนธิชิโน, วิปากชิโน, อวิปากชิโน’’ติ อิมาเนตฺถ นิทสฺสนปทานิ. कारण केवळ 'जिन' हा शब्द सर्वज्ञांच्या (बुद्धांच्या) बाबतीत वापरला जातो, परंतु उपपदासह (विशेषणासह) तो प्रत्येकबुद्ध इत्यादींच्या बाबतीत आणि त्यांच्यासाठी योग्यतेनुसार वापरला जातो. "पच्चेकजिनो, ओधिजिनो, अनोधिजिनो, विपाकजिनो, अविपाकजिनो" ही येथील उदाहरणे आहेत. ชิ ชานิยํ. ชินาติ, น ชินาติ น ชาปเย, ชิโน รถสฺสํ มณิกุณฺฑเล จ, ปุตฺเต จ ทาเร จ ตเถว ชิโน. ชิโน ธนญฺจ ทาเส จ. 'जि' (धातू) जानी (हानी/नुकसान होणे) या अर्थात. जिनाति (हानी करतो/गमावतो). 'न जिनाति न जापये' (गमावत नाही आणि गमावण्यास कारणीभूत ठरत नाही). 'जिनो रथस्सं मणिकुण्डले च, पुत्ते च दारे च तथेव जिनो. जिनो धनञ्च दासे च' (रथ आणि घोडा, मणिकुंडल गमावलेला, तसेच मुले आणि पत्नी गमावलेला. धन आणि दास गमावलेला). ญา [Pg.249] อวโพธเน. ชานาติ, ญายติ, นายติ. อนิมิตฺตา น นายเร. ชญฺญา โส ยทิ หาปเย. มา มํ ชญฺญูติ อิจฺฉติ. ‘‘อิเม อมฺหาก’’นฺติ ญาตพฺพฏฺเฐน ญาติ, ญาตโก. ญาติมิตฺตา สุหชฺชา จ. ญาตโก โน นิสินฺโนติ. ญาตพฺพํ เญยฺยํ, สงฺขารวิการลกฺขณนิพฺพานปญฺญตฺติธมฺมา. อีทิเสสุ ฐาเนสุ เญยฺยสทฺโท เอกนฺเตน นปุํสโก, วาจฺจลิงฺคตฺเต สพฺพลิงฺคิโก, ยถา? เญยฺโย ผสฺโส. เญยฺยา เวทนา. เญยฺยํ จิตฺตํ. เญยฺโย ปุริโส, เญยฺยา อิตฺถี, เญยฺยํ ธนนฺติ จ. 'ञा' (धातू) अवबोधन (जाणणे/ज्ञान होणे) या अर्थात. जानाति, ञायति, नायति. 'अनिमित्ता न नायरे' (निमित्त नसलेले जाणले जात नाहीत). 'जञ्ञा सो यदि हापये' (जर तो हानी करत असेल तर जाणावे). 'मा मं जञ्ञूति इच्छति' (मला कोणी जाणू नये अशी इच्छा करतो). "हे आमचे आहेत" या जाणण्याच्या अर्थाने 'ञाति' (नातेवाईक), 'ञातको' म्हटले जाते. 'ञातिमित्ता सुहज्जा च' (नातेवाईक, मित्र आणि सुहृद). 'ञातको नो निसिन्नोति' (आमचा नातेवाईक बसला आहे). जाणण्यायोग्य ते 'ञेय्य' (ज्ञेय) होय, जसे की - संखारा (संस्कार), विकार, लक्षण, निब्बान (निर्वाण) आणि पण्ञत्ति (प्रज्ञप्ती) धम्म. अशा ठिकाणी 'ञेय्य' शब्द निश्चितपणे नपुंसकलिंगी असतो, परंतु विशेषण (वाच्यलिंग) म्हणून तो सर्व लिंगांत वापरला जातो, जसे की - ञेय्यो फस्सो (ज्ञेय स्पर्श - पुल्लिंग), ञेय्या वेदना (ज्ञेय वेदना - स्त्रीलिंग), ञेय्यं चित्तं (ज्ञेय चित्त - नपुंसकलिंग). ञेय्यो पुरिसो (ज्ञेय पुरुष), ञेय्या इत्थी (ज्ञेय स्त्री), ञेय्यं धनं (ज्ञेय धन) इत्यादी. ถุ อภิตฺถเว. ถุนาติ. อภิตฺถุนาติ. ถุติ, อภิตฺถุติ. ถวนา, อภิตฺถวนา, ถุโต, อภิตฺถุโต. 'थु' (धातू) अभित्थव (स्तुती करणे) या अर्थात. थुनाति, अभित्थुनाति (स्तुती करतो, विशेष स्तुती करतो). थुति, अभित्थुति (स्तुती, विशेष स्तुती). थवना, अभित्थवना, thuto, अभित्थुतो (स्तुती करणे, विशेष स्तुती करणे, स्तुती केलेला, विशेष स्तुती केलेला). ถุ นิตฺถุนเน. ถุนาติ. 'थु' (धातू) नित्थुनन (कण्हणे/शोक करणे) या अर्थात. थुनाति (कण्हतो/शोक करतो). อุฏฺเฐหิ เรวเต สุปาปธมฺเม,อปารุตทฺวาเร อทานสีเล; เนสฺสาม ตํ ยตฺถ ถุนนฺติ ทุคฺคตา,สมปฺปิตา เนรยิกา ทุกฺเขน; ปุราณานิ อนุตฺถุน’’นฺติ จ ปโยโค. "उठ रेवती! अत्यंत पापी स्वभावाच्या, उघड्या दारांच्या (नरकाच्या दारांच्या), दान न देणाऱ्या शीलहीन स्त्री! आम्ही तुला तिथे घेऊन जाऊ जिथे दुःखाने ग्रासलेले, नरकात पडलेले दुर्गती प्राप्त लोक शोक करतात (कण्हतात);" आणि "पुराणानि अनुत्थुनन्ति" (जुन्या गोष्टींबद्दल शोक करतात) असा प्रयोग आहे. ทุ หึสายํ. ทุนาติ. มิตฺตทฺทุ. ทุโม. 'दु' (धातू) हिंसा (पीडा देणे/इजा करणे) या अर्थात. दुनाति. मित्तद्दु (मित्राचा द्रोह करणारा/मित्राला पीडा देणारा). दुमो (वृक्ष). เอตฺถ มิตฺตทฺทูติ มิตฺตํ ทุนาติ หึสติ ทุพฺภตีติ มิตฺตทฺทุ. อตฺร ‘‘เวทา น ตาณาย ภวนฺติ ตสฺส, มิตฺตทฺทุโน ภูนหุโน นรสฺสา’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ทุโมติ ทุนิยติ เคหสมฺภาราทิอตฺถาย หึสิยติ ฉินฺทิยติ, ปณฺณปุปฺผาทิอตฺถิเกหิ วา ปณฺณปุปฺผาทิหรเณน ปีฬิยตีติ ทุโม. येथे 'मित्तद्दु' म्हणजे जो मित्राला पीडा देतो, त्याची हिंसा करतो किंवा त्याचा द्रोह करतो तो 'मित्तद्दु' (मित्रद्रोही) होय. येथे "वेदा न ताणाय भवन्ति तस्स, मित्तद्दुणो भूनहुणो नरस्स" (मित्राचा द्रोह करणाऱ्या आणि भ्रूणहत्या करणाऱ्या माणसाचे वेद रक्षण करू शकत नाहीत) हे पाळि उदाहरण आहे. 'दुमो' (वृक्ष) म्हणजे घराचे साहित्य इत्यादींसाठी ज्याची हिंसा केली जाते, ज्याला तोडले जाते, किंवा पाने आणि फुले इच्छिणाऱ्यांकडून पाने-फुले तोडून ज्याला पीडा दिली जाते तो 'दुमो' होय. ธู กมฺปเน. ธุนาติ. ธูโม, โธนา, โธโน, ธุโต. ธุนนฺโต วากจีรานิ, คจฺฉามิ อมฺพเร ตทา. 'धू' (धातू) कंपन (हलवणे/कापणे) या अर्थात. धुनाति (हलवतो/झटकतो). धूमो, धोना, धोनो, धुतो. "धुणन्तो वाकचीरानि, गच्छामि अम्बरे तदा" (तेव्हा वल्कले झटकत मी आकाशात जातो). ตตฺถ [Pg.250] ธูโมติ ธุนาติ กมฺปตีติ ธูโม. ธูมสทฺโท โกเธ ตณฺหาย วิตกฺเก ปญฺจสุ กามคุเณสุ ธมฺมเทสนายํ ปกติธูเมติ อิเมสุ อตฺเถสุ วตฺตติ. ‘‘โกโธ ธูโม ภสฺมานิ โมสวชฺช’’นฺติ เอตฺถ หิ โกเธ วตฺตติ. ‘‘อิจฺฉา ธูมายิโต สทา’’ติ เอตฺถ ตณฺหายํ. ‘‘เตน โข ปน สมเยน อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควโต อวิทูเร ธูมายนฺโต นิสินฺโน โหตี’’ติ เอตฺถ วิตกฺเก. तेथे 'धूमो' (धूर) म्हणजे जो हलतो/कंप पावतो तो 'धूमो' होय. 'धूम' शब्द क्रोध, तण्हा (तृष्णा), वितक्क (विचार), पाच कामगुण, धम्मदेसना (धम्मोपदेश) आणि नैसर्गिक धूर या अर्थांमध्ये वापरला जातो. "कोधो धूमो भस्मानि मोसवज्जं" (क्रोध हा धूर आहे, असत्य ही राख आहे) येथे तो क्रोधाच्या अर्थात वापरला आहे. "इच्छा धूमायितो सदा" (इच्छा नेहमी धूर सोडत असते) येथे तो तृष्णेच्या अर्थात आहे. "तेन खो पन समयेन अञ्ञतरो भिक्खु भगवतो अविदूरे धूमायन्तो निसिन्नो होति" (त्या वेळी एक भिक्खू भगवंतांच्या जवळच विचारमग्न/धूर सोडत बसला होता) येथे तो वितक्काच्या (विचाराच्या) अर्थात आहे. ‘‘ปงฺโก จ กามา ปลิโป จ กามา,ภยญฺจ เมตํ ติมุลํ ปวุตฺตํ; รโช จ ธูโม จ มยา ปกาสิโต,หิตฺวา ตุวํ ปพฺพช พฺรหฺมทตฺตา’’ติ "काम (इंद्रियसुख) हा चिखल आहे, काम हा दलदल आहे, आणि हे मोठे भय सांगितले गेले आहे; धूळ आणि धूर माझ्याद्वारे प्रकट केले गेले आहेत, हे ब्रह्मदत्ता! तू त्यांचा त्याग करून प्रव्रजित हो." เอตฺถ ปญฺจสุ กามคุเณสุ. ‘‘ธูมํ กตฺตา โหตี’’ติ เอตฺถ ธมฺมเทสนายํ. ‘‘ธโช รถสฺส ปญฺญาโน, ธูโม ปญฺญานมคฺคิโน’’ติ เอตฺถ ปกติธูเม. อิจฺเจวํ – येथे पाच कामगुणांच्या अर्थात आहे. "धूमं कत्ता होति" (तो धूर निर्माण करणारा होतो) येथे धम्मदेसनेच्या (धम्मोपदेशाच्या) अर्थात आहे. "धजो रथस्स पञ्ञानो, धूमो पञ्ञानमग्गिनो" (ध्वज ही रथाची ओळख आहे, धूर ही अग्नीची ओळख आहे) येथे नैसर्गिक धुराच्या अर्थात आहे. अशा प्रकारे - โกธตณฺหาวิตกฺเกสุ, ปญฺจกามคุเณสุ จ; เทสนายญฺจ ปกติ-ธูเม ธูโม ปวตฺตติ. क्रोध, तण्हा (तृष्णा) आणि वितक्क यांच्यामध्ये, तसेच पाच कामगुणांमध्ये, देशनेमध्ये आणि नैसर्गिक धूमामध्ये धूर प्रवृत्त होतो (उत्पन्न होतो). โธนาติ ปญฺญา. วุตฺตญฺเหตํ นิทฺเทเส ‘‘โธนา วุจฺจติ ปญฺญา, ยา ปญฺญา ปชานนา สมฺมาทิฏฺฐิ, กึการณา โธนาติ วุจฺจติ ปญฺญา? ยํ ตาย ปญฺญาย กายทุจฺจริตํ ธุตญฺจ โธตญฺจ สนฺโธตญฺจ นิทฺโธตญฺจ, วจีทุจฺจริตํ มโนทุจฺจริตํ ธุตญฺจ โธตญฺจ สนฺโธตญฺจ นิทฺโธตญฺจ. ตํการณา โธนา วุจฺจติ ปญฺญา. อถ วา สมฺมาทิฏฺฐิ มิจฺฉาทิฏฺฐึ ธุตา จ โธตา จ สนฺโธตา จ นิทฺโธตา จ, ตํการณา โธนา วุจฺจติ ปญฺญา’’ติ. ‘‘โธนสฺส หิ นตฺถิ กุหิญฺจิ โลเก, ปกปฺปิตา ทิฏฺฐิ ภวาภเวสู’’ติ อยเมตฺถ ปาฬิ นิทสฺสนํ[Pg.251]. อตฺร โธนา อสฺส อตฺถีติ โธโน, ตสฺส โธนสฺสาติ นิพฺพจนํ. ธาตูนมเนกตฺถตาย ธูธาตุ กมฺปนตฺเถปิ โธวนตฺเถปิ วตฺตติ. 'धोना' म्हणजे प्रज्ञा. कारण निर्देशामध्ये (निद्देस) असे म्हटले आहे की— 'प्रज्ञेला धोना म्हटले जाते; जी प्रज्ञा, प्रजानन (विशेष ज्ञान) आणि सम्मादिट्ठि (सम्यक् दृष्टी) आहे. कोणत्या कारणाने प्रज्ञेला धोना म्हटले जाते? कारण त्या प्रज्ञेद्वारे कायदुच्चरित (शारीरिक दुष्कृत्य) धुतले गेले आहे, स्वच्छ केले गेले आहे, पूर्णपणे धुतले गेले आहे आणि धुवून काढले गेले आहे; तसेच वचीदुच्चरित (वाचिक दुष्कृत्य) आणि मनोदुच्चरित (मानसिक दुष्कृत्य) धुतले गेले आहे, स्वच्छ केले गेले आहे, पूर्णपणे धुतले गेले आहे आणि धुवून काढले गेले आहे. त्या कारणाने प्रज्ञेला धोना म्हटले जाते. अथवा, सम्मादिट्ठिने मिच्छादिट्ठिला (मिथ्या दृष्टीला) धुतले आहे, स्वच्छ केले आहे, पूर्णपणे धुतले आहे आणि धुवून काढले आहे, त्या कारणाने प्रज्ञेला धोना म्हटले जाते.' 'या जगात कुठेही धोन (शुद्ध पुरुष) साठी भव आणि अभवामध्ये कल्पित केलेली कोणतीही दृष्टी नसते'— हे येथे पाळीचे उदाहरण आहे. येथे 'ज्याला धोना (प्रज्ञा) आहे तो धोन' अशी 'धोनस्स' ची व्युत्पत्ती (निरुक्ती) आहे. धातूंच्या अनेक अर्थांमुळे 'धू' धातू कंपनाच्या अर्थात आणि धुण्याच्या अर्थातही वापरला जातो. มุน ญาเณ. มุนาติ. โมนํ, มุนิ. อิมสฺมึ ฐาเน ธาตุยา อาขฺยาตตฺเต เอกนฺเตน อนฺตโลโป ภวติ. โสภิตตฺเถรคาถายํ ปน อนาคตวจเน อุการสฺส วุทฺธิวเสน ‘‘อหํ โมเนน โมนิสฺส’’นฺติ รูปนฺตรญฺจ ทิสฺสติ. ตตฺถ โมนิสฺสนฺติ ชานิสฺสํ. นามตฺเต อนฺตโลโป น โหติ. ตตฺถ โมนนฺติ กิญฺจาปิ ‘‘น โมเนน มุนิ โหตี’’ติ เอตฺถ ตุณฺหีภาโว ‘‘โมน’’นฺติ วุจฺจติ, ตถาปิ อิธ ‘‘ญาเณ’’ติ วจนโต น โส อธิปฺเปโต, ญาณเมวาธิปฺเปตํ, ตสฺมา โมเนยฺยปฏิปทาสงฺขาตํ มคฺคญาณโมนมฺปิ คเหตพฺพํ. มุนีติ มุนาติ ชานาติ หิตาหิตํ ปริจฺฉินฺทตีติ มุนิ. อถ วา ขนฺธาทิโลเก ตุลํ อาโรเปตฺวา มินนฺโต วิย ‘‘อิเม อชฺฌตฺติกา ขนฺธา, อิเม พาหิรา’’ติอาทินา นเยน อิเม อุโภ อตฺเถ มุนาตีติ มุนิ. เตนาห ภควา – 'मुन' धातू ज्ञानाच्या अर्थात आहे. 'मुनाति' (जाणतो). 'मोनं' (ज्ञान/मौन), 'मुनि'. या ठिकाणी धातूचे आख्यात रूप (क्रियापद) होताना निश्चितपणे अंत्यलोप होतो. परंतु सोभित थेर गाथेमध्ये भविष्यकाळात 'उ' काराच्या वृद्धीमुळे 'अहं मोनेन मोनिस्सं' (मी ज्ञानाने जाणीन) असे रूपान्तरही दिसते. तेथे 'मोनिस्सं' म्हणजे 'जाणीन'. नाम रूपात अंत्यलोप होत नाही. तेथे 'मोन' म्हणजे जरी 'न मोनेन मुनि होति' (केवळ मौनाने कोणी मुनी होत नाही) या गाथेत मौन राहण्याला (तुष्णीभाव) 'मोन' म्हटले गेले असले, तरीही येथे 'ज्ञानाच्या' अर्थात असल्यामुळे तो (तुष्णीभाव) अभिप्रेत नाही, तर ज्ञानच अभिप्रेत आहे; म्हणून मोनेय्य-पटिपदा (मुनीची प्रतिपदा) म्हणून ओळखले जाणारे मग्गञाण (मार्गज्ञान) रूपी 'मोन' देखील ग्रहण केले पाहिजे. 'मुनि' म्हणजे जो जाणतो, हित आणि अहित यांचा निवाडा करतो, तो मुनी होय. अथवा, खंध (स्कंध) इत्यादी लोकांमध्ये तराजूत तोलल्याप्रमाणे 'हे आध्यात्मिक स्कंध आहेत, हे बाह्य आहेत' इत्यादी पद्धतीने या दोन्ही अर्थांना जो जाणतो, तो मुनी होय. म्हणूनच भगवान म्हणाले— ‘‘น โมเนน มุนิ โหติ, มูฬฺหรูโป อวิทฺทสุ; โย จ ตุลํว ปคฺคยฺห, วรมาทาย ปณฺฑิโต. केवळ मौन पाळल्याने कोणी मुनी होत नाही, जर तो मूढ आणि अज्ञानी असेल. परंतु जो पंडित तराजू हातात धरल्याप्रमाणे चांगल्या गोष्टींचे ग्रहण करतो, ปาปานิ ปริวชฺเชติ, ส มุนิ เตน โส มุนิ; โย มุนาติ อุโภ โลเก, มุนิ เตน ปวุจฺจตี’’ติ. आणि पापांचा त्याग करतो, तो मुनी आहे; त्या कारणाने तो मुनी होय. जो दोन्ही लोकांचे मापन करतो (जाणतो), त्या कारणाने त्याला 'मुनी' म्हटले जाते. อปราเปตฺถ ภวติ อตฺถวิภาวนา. มุนีติ โมนํ วุจฺจติ ญาณํ, กายโมเนยฺยาทีสุ วา อญฺญตรํ, เตน สมนฺนาคตตฺตา ปุคฺคโล ‘‘มุนี’’ติ วุจฺจติ. โส ปเนส อคาริยมุนิ อนคาริยมุนิ เสกฺขมุนิ อเสกฺขมุนิ ปจฺเจกมุนิ มุนิมุนีติ อเนกวิโธ[Pg.252]. ตตฺถ อคาริยมุนีติ คิหิปิ อาคตผโล วิญฺญาตสาสโน. อนคาริยมุนีติ ตถารูโปว ปพฺพชิโต. เสกฺขมุนีติ สตฺต เสกฺขา. อเสกฺขมุนีติ ขีณาสโว. ปจฺเจกมุนีติ ปจฺเจกพุทฺโธ. มุนิมุนีติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ. ตถา หิ อายสฺมาปิ สาริปุตฺโต อาห ‘‘มุนีติ วุจฺจติ ตถาคโต อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ’’ติ. येथे आणखी एक अर्थ-स्पष्टीकरण आहे. 'मुनी' म्हणजे 'मोन' ज्याला ज्ञान म्हटले जाते, किंवा कायमोनेय्य (शारीरिक मुनीत्व) इत्यादींपैकी एक; त्याने युक्त असल्यामुळे व्यक्तीला (पुद्गलाला) 'मुनी' म्हटले जाते. तो मुनी अनेक प्रकारचा असतो: अगारियमुनी (गृहस्थ मुनी), अनगारियमुनी (गृहत्यागी मुनी), सेक्खमुनी (शैक्ष मुनी), असेक्खमुनी (अशैक्ष मुनी), पच्चेकमुनी (प्रत्येकबुद्ध मुनी) आणि मुनिमुनी (मुनींचा मुनी). त्यापैकी, 'अगारियमुनी' म्हणजे असा गृहस्थ ज्याने फल प्राप्त केले आहे आणि जो शासनाला (बुद्धांच्या शिकवणीला) जाणतो. 'अनगारियमुनी' म्हणजे तशाच प्रकारचा प्रव्रजित (दीक्षित भिक्खू). 'सेक्खमुनी' म्हणजे सात प्रकारचे शैक्ष (आर्य मार्गस्थ). 'असेक्खमुनी' म्हणजे खीणासव (अरहंत). 'पच्चेकमुनी' म्हणजे पच्चेकबुद्ध (प्रत्येकबुद्ध). 'मुनिमुनी' म्हणजे सम्मासम्बुद्ध (सम्यक् सम्बुद्ध). म्हणूनच आयुष्यमान सारिपुत्त देखील म्हणाले— 'मुनी म्हणजे तथागत, अरहंत, सम्मासम्बुद्ध यांना म्हटले जाते.' ปู ปวเน. ปวนํ โสธนํ. ปุนาติ. ปุญฺญํ, ปุตฺโต, ทนฺตโปณํ. 'पू' धातू पवनाच्या (पवित्र करण्याच्या) अर्थात आहे. पवन म्हणजे शोधन (स्वच्छ करणे). 'पुनाति' (पवित्र करतो/स्वच्छ करतो). 'पुञ्ञ' (पुण्य), 'पुत्त' (पुत्र), 'दन्तपोण' (दंतकाष्ठ/दातून). เอตฺถ จ ปุญฺญนฺติ อตฺตโน การกํ ปุนาติ โสเธตีติ ปุญฺญํ. อถ วา ยตฺถ สยํ อุปฺปนฺนํ ตํสนฺตานํ ปุนาติ วิโสเธตีติ ปุญฺญํ. กินฺตํ? สุจริตํ กุสลกมฺมํ. สกมฺมิกตฺตา ธาตุสฺส การิตวเสน อตฺถวิวรณํ ลพฺภติ. ปุตฺโตติ อตฺตโน กุลํ ปุนาติ โสเธตีติ ปุตฺโต. เอวญฺจ สติ หีนชจฺจานํ จณฺฑาลาทีนํ ปุตฺโต นาม น ภเวยฺยาติ น วตฺตพฺพํ สทฺทานมตฺถกถนสฺส นานปฺปกาเรน ปวตฺติโต, ตสฺมา อตฺตโน ปิตุ หทยํ ปูเรตีติ ปุตฺโตติ เอวมาทินาปิ นิพฺพจนํ คเหตพฺพเมว. นานาธาตุวเสนปิ หิ ปทานิ สิทฺธึ สมุปคจฺฉนฺติ. आणि येथे 'पुण्य' म्हणजे जे आपल्या कर्त्याला पवित्र करते, स्वच्छ करते ते पुण्य होय. अथवा, जिथे स्वतः उत्पन्न होते, त्या चित्त-संततीला जे पवित्र करते, विशेष रूपाने स्वच्छ करते ते पुण्य होय. ते काय आहे? सुचरित (सदाचार) आणि कुशल कर्म. धातूच्या सकर्मकतेमुळे प्रयोजक रूपाने अर्थाचे स्पष्टीकरण मिळते. 'पुत्र' म्हणजे जो आपल्या कुळाला पवित्र करतो, स्वच्छ करतो तो पुत्र होय. आणि असे असताना, हीन जातीच्या चंडालादी लोकांना 'पुत्र' नसावा असे म्हणता येत नाही, कारण शब्दांच्या अर्थाचे स्पष्टीकरण विविध प्रकारे प्रवृत्त होते; म्हणून 'जो आपल्या पित्याचे हृदय आनंदित करतो (भरून काढतो) तो पुत्र' अशीही व्युत्पत्ती ग्रहण केली पाहिजे. कारण विविध धातूंच्या आधारे देखील पदांची सिद्धी होत असते. ปุตฺโต จ นาม อตฺรโช เขตฺรโช อนฺเตวาสิโก ทินฺนโกติ จตุพฺพิโธ. ตตฺถ อตฺตานํ ปฏิจฺจ ชาโต อตฺรโช นาม. สยนปีเฐ ปลฺลงฺเก อุเรติ เอวมาทีสุ นิพฺพตฺโต เขตฺรโช นาม. สนฺติเก สิปฺปุคฺคณฺหนโก อนฺเตวาสิโก นาม. โปสาปนตฺถาย ทินฺโน ทินฺนโก นาม ทนฺตโปณนฺติ ทนฺเต ปุนนฺติ วิโสเธนฺติ เอเตนาติ ทนฺตโปณํ, ทนฺตกฏฺฐํ. आणि पुत्र हा अत्रज (स्वतःपासून जन्मलेला), क्षेत्रज, अंतेवासिक (शिष्य) आणि दिन्नक (दत्तक) अशा चार प्रकारचा असतो. त्यापैकी, स्वतःच्या आधारे जन्मलेला तो 'अत्रज' होय. शयनपीठ, पलंग, छाती इत्यादींवरून उत्पन्न झालेला तो 'क्षेत्रज' होय. जवळ राहून शिल्प (विद्या) शिकणारा तो 'अंतेवासिक' होय. पालनासाठी दिलेला तो 'दिन्नक' होय. 'दन्तपोण' म्हणजे ज्याच्याद्वारे दात स्वच्छ केले जातात, पवित्र केले जातात ते दन्तपोण, म्हणजेच दंतकाष्ठ (दातून). ปี ตปฺปนกนฺตีสุ. ปิณาตีติ ปีติ. เอตฺถ จ ปีตีติ ปีณนํ ปีติ, ตปฺปนํ กนฺตีติ จ วุตฺตํ โหติ. อิทํ ภาววเสน นิพฺพจนํ. อิทํ [Pg.253] ปน เหตุกตฺตุวเสน ปิณยตีติ ปีติ, ตปฺเปตีติ อตฺโถ. 'पी' धातू तर्पण (तृप्ती) आणि कांती (प्रियता) या अर्थात आहे. 'पिणाति' (तृप्त करतो) म्हणून ती 'पीति' (प्रीती/आनंद) होय. आणि येथे 'पीति' म्हणजे तृप्त करणे, समाधान देणे आणि प्रिय वाटणे असे म्हटले आहे. हे भाववाचक अर्थाने व्युत्पत्ती आहे. परंतु हे प्रयोजक अर्थाने 'पिणयति' म्हणजे 'पीति', ज्याचा अर्थ 'तृप्त करतो' असा आहे. สา ปเนสา ขุทฺทกาปีติ ขณิกาปีติ โอกฺกนฺติกาปีติ อุพฺเพคาปีติ ผรณาปีตีติ ปญฺจวิธา โหติ. ตตฺถ ขุทฺทกาปีติ สรีเร โลมหํสนมตฺตเมว กาตุํ สกฺโกติ. ขณิกาปีติ ขเณ ขเณ วิชฺชุปฺปาทสทิสา โหติ. โอกฺกนฺติกาปีติ สมุทฺทตีรํ วีจิ วิย กายํ โอกฺกมิตฺวา โอกฺกมิตฺวา ภิชฺชติ. อุพฺเพคาปีติ พลวตี โหติ กายํ อุทฺธคฺคํ กตฺวา อากาเส ลงฺฆาปนปฺปมาณา โหติ. ผรณาปีติยา ปน อุปฺปนฺนาย สกลสรีรํ ธมิตฺวา ปูริตวตฺถิ วิย มหตา อุทโกเฆน ปกฺขนฺทปพฺพตกุจฺฉิ วิย จ อนุปริผุฏํ โหติ, เอวํ ปญฺจวิธา ปีติ, สา สมฺปิยายนลกฺขณตฺตา ‘‘ปิณาตี’’ติ ปีตีติ สุทฺธกตฺตุวเสนปิ วตฺตุํ ยุชฺชติ. เอตฺถ ‘‘ปิยายติ, ปิตา, ปิโย, เปโม’’ติอาทีนิ ปีธาตุยา เอว รูปานิ. ตตฺถ ‘‘ปุตฺตํ ปิยายตีติ ปิตา’’ติ วทนฺติ. ปิยายิตพฺโพติ ปิโย. เปมนํ เปโม. ती पीति पाच प्रकारची असते: खुद्दका पीति (लहान पीति), khणिका पीति (क्षणिक पीति), ओक्कन्तिका पीति (लहरींसारखी पीति), उब्बेगा पीति (उद्वेग पीति) आणि फरणा पीति (व्यापक पीति). त्यापैकी, 'खुद्दका पीति' शरीरावर केवळ रोमांच उभे करण्यास समर्थ असते. 'खणिका पीति' क्षणाक्षणाला विजेच्या चमकासारखी असते. 'ओक्कन्तिका पीति' समुद्राच्या लाटांप्रमाणे शरीरावर वारंवार आदळून विरघळते. 'उब्बेगा पीति' अत्यंत बलवान असते, ती शरीराला वर उचलून आकाशात झेप घेण्यास प्रवृत्त करते. आणि 'फरणा पीति' उत्पन्न झाली असता, संपूर्ण शरीराला व्यापून टाकते, जसे हवेने भरलेली पिशवी किंवा पाण्याच्या मोठ्या प्रवाहाने भरलेली पर्वताची गुहा पूर्णपणे व्यापली जाते. अशी ही पाच प्रकारची पीति आहे. ती प्रिय वाटण्याच्या लक्षणाची असल्यामुळे 'पिणाति' (तृप्त करते) म्हणून 'पीति' असे शुद्ध कर्त्याच्या अर्थाने देखील म्हणणे योग्य आहे. येथे 'पियायति' (प्रेम करतो), 'पिता' (वडील), 'पियो' (प्रिय), 'पेमो' (प्रेम) इत्यादी 'पी' धातूचीच रूपे आहेत. त्यापैकी, 'जो पुत्रावर प्रेम करतो तो पिता' असे म्हणतात. जो प्रेम करण्यास योग्य आहे तो 'पियो' (प्रिय). प्रेम करणे म्हणजे 'पेमो' (प्रेम). มา ปริมาเณ. มินาติ. มานํ, ปริมาณํ, มตฺตํ, มตฺตา, มโน, วิมานํ, มินิตพฺพํ, เมตพฺพํ, ฉายา เมตพฺพา. อีทิเสสุ ฐาเนสุ อนียปจฺจโย น ลพฺภติ. 'मा' धातू परिमाणाच्या (मोजण्याच्या) अर्थात आहे. 'मिनाति' (मोजतो). 'मानं' (मोजमाप), 'परिमाणं', 'मत्तं' (मोजलेले), 'मत्ता' (प्रमाण), 'मनो' (मन), 'विमानं', 'मिनितब्बं' (मोजण्यायोग्य), 'मेtब्बं' (मोजण्यायोग्य), 'छाया मेतब्बा' (छाया मोजण्यायोग्य आहे). अशा ठिकाणी 'अनीय' प्रत्यय मिळत नाही. เอตฺถ มโนติ เอกาย นาฬิยา เอกาย จ ตุลาย มินมาโน วิย อารมฺมณํ มินาติ ปริจฺฉินฺทตีติ มโน. วิเสสโต มินิยเต ปริจฺฉินฺทิยเตติ วิมานํ, เทวานํ ปุญฺญพเลน นิพฺพตฺตพฺยมฺหํ เทวนิเกตํ. ยํ วิมานํ อุปโสภิตํ, ปภาสติมิทํ พฺยมฺหนฺติ จ อาทินา โถมิยติ. आणि येथे 'मन' म्हणजे जणू काही एका मापाने किंवा एका तराजूने मोजल्याप्रमाणे जे आरम्मणाला (विषयाला) मोजते, निश्चित करते ते मन होय. जे विशेष रूपाने मोजले जाते, निश्चित केले जाते ते 'विमान' होय, जे देवांच्या पुण्यबलाने उत्पन्न झालेले देवांचे निवासस्थान (देवगृह) आहे. 'जे विमान सुशोभित आहे, हे गृह प्रकाशमान आहे' इत्यादी शब्दांनी ज्याची स्तुती केली जाते. มี หึสายํ. มินาติ. มีโน, กุมีนํ. 'मी' धातू हिंसेच्या अर्थात आहे. 'मिनाति' (हिंसा करतो/नष्ट करतो). 'मीनो' (मासा), 'कुमीनं' (मासे पकडण्याचे जाळे). เอตฺถ [Pg.254] มีโนติ มจฺโฉ. มจฺฉสฺส หิ ‘‘มีโน มจฺโฉ อมฺพุโช วาริโช วาริจโร’’ติ อเนกานิ นามานิ. วิเสสนามานิ ปน ‘‘อมโร ขลิโส จนฺทกุโล กนฺทผลิ อินฺทผลิ อินฺทวโล กุลิโส วามิ กุงฺกุตโล กณฺฑิโก สกุโล มงฺคุโร สิงฺคี สตวงฺโก โรหิโต ปาฐีโน กาโณ สวงฺโก ปาวุโส’’ อิจฺเจวมาทีนิ, ‘‘ติมิ ติมิงฺคโล’’ อิจฺเจวมาทีนิ จ ภวนฺติ. กุมีนนฺติ กุจฺฉิเตนากาเรน มจฺเฉ มินนฺติ หึสนฺติ เอเตนาติ กุมีนํ, มจฺฉพนฺธนปญฺชโร. โส ปน ปาฬิยํ กุมีนสทฺเทน วุจฺจติ. ตถา หิ – येथे 'मीनो' म्हणजे मासा. माशाची 'मीनो, मच्छो, अम्बुजो, वारिजो, वारिचरो' अशी अनेक नावे आहेत. विशेष नावे तर 'अमरो, खलिसो, चन्दकुलो, कन्द्फली, इन्द्फली, इन्दवलो, कुलिसो, वामी, कुङ्कुतलो, कण्डिको, सकुलो, मङ्गुरो, सिङ्गी, सतवङ्को, रोहितो, पाठीनो, काणो, सवङ्को, पावुसो' इत्यादी आणि 'तिमि, तिमिङ्गलो' इत्यादी आहेत. 'कुमीन' म्हणजे ज्याच्याद्वारे वाईट पद्धतीने माशांना मारतात (हिंसा करतात) ते 'कुमीन' (मासे पकडण्याचा पिंजरा) होय. तो पाळीमध्ये 'कुमीन' या शब्दाने म्हटला जातो. जसे की - ‘‘วาริชสฺเสว เม สโต, พนฺธสฺส กุมินามุเข; อกฺโกสติ ปหรติ, ปิเย ปุตฺเต อปสฺสโต’’ติ "कुमीनाच्या (पिंजऱ्याच्या) मुखात अडकलेल्या माशाप्रमाणेच, प्रिय पुत्रांना न पाहता, तो आक्रोश करतो आणि प्रहार करतो." ปาฬิ ทิสฺสติ. अशी पाळी दिसून येते. มู พนฺธเน. มุนาติ. มุนิ. 'मू' (mū) धातू बांधण्याच्या अर्थात आहे. मुनाति (munāti). मुनि (muni). เอตฺถ มุนีติ อตฺตโน จิตฺตํ มุนาติ มวติ พนฺธติ ราคโทสาทิวสํ คนฺตุํ น เทตีติ มุนิ. येथे 'मुनी' म्हणजे जो आपल्या चित्ताला बांधतो, नियंत्रित करतो आणि राग-द्वेष इत्यादींच्या आहारी जाऊ देत नाही, तो 'मुनी' होय. ริ คติเทสเนสุ. ริกาติ. เรณุ. นการสฺส ณตฺตํ. 'रि' (ri) धातू गती आणि उपदेशाच्या अर्थात आहे. रिकाति (rikāti). रेणु (reṇu). 'न' काराचा 'ण' कार होतो. ลี สิเลเส. ลินาติ, นิลินาติ. ลีนํ, สลฺลีนํ, ปฏิสลฺลานํ. 'ली' (lī) धातू चिकटण्याच्या (संश्लेषण) अर्थात आहे. लिनाति (lināti), निलिनाति (nilināti). लीनं (līnaṃ), सल्लीनं (sallīnaṃ), पटिसल्लानं (paṭisallānaṃ - एकांतवास). วี ตนฺตสนฺตาเน. วตฺถํ วินาติ. อิมินา สุตฺเตน จีวรํ วินาหิ. กมฺเม – อิทํ โข อาวุโส จีวรํ มํ อุทฺทิสฺส วิยฺยติ. วีตํ. สุวีตํ. อปฺปกํ โหติ เวตพฺพํ. การิเต ‘‘วายาเปติ, ตนฺตวาเยหิ จีวรํ วายาเปสฺสามา’ติ จีวรํ วายาเปสุํ’’ อิจฺเจวมาทีนิ ภวนฺติ. 'वी' (vī) धातू विणण्याच्या (तंतू विस्तारण्याच्या) अर्थात आहे. वत्थं विनाति (वस्त्र विणतो). 'इमिना सुत्तेन चीवरं विनाहि' (या सुताने चीवर विण). कर्मणी प्रयोगात - "इदं खो आवुसो चीवरं मं उद्दिस्स विय्यति" (हे आवुसो, हे चीवर माझ्यासाठी विणले जात आहे). वीतं (विणलेले). सुवीतं (चांगले विणलेले). 'अप्पकं होति वेतब्बं' (विणायचे थोडेच आहे). प्रयोजक रूपात - "वायापेति" (विणायला लावतो), "तंतूवायांकडून (विणकरांकडून) चीवर विणवून घेऊ या, असे म्हणून त्यांनी चीवर विणवून घेतले" इत्यादी रूपे होतात. วี หึสายํ. วินาติ. เวณุ. เวณูติ วํโส. 'वी' (vī) धातू हिंसेच्या अर्थात आहे. विनाति (vināti). वेणु (veṇu). वेणू म्हणजे बांबू (वंश). ลู [Pg.255] เฉทเน. ลุนาติ. โลณํ, กุสลํ, พาโล, ลูโต. 'लू' (lū) धातू कापण्याच्या (छेदन) अर्थात आहे. लुनाति (lunāti). लोणं (loṇaṃ), कुसलं (kusalaṃ), बालो (bālo), लूतो (lūto). เอตฺถ จ โลณนฺติ ลุนาติ วีตรสภาวํ วินาเสติ สรสภาวํ กโรตีติ โลณํ, ลวณํ. กุโส วิย หตฺถปฺปเทสํ อกุสลธมฺเม ลุนาตีติ กุสลํ, อนวชฺชอิฏฺฐวิปากลกฺขโณ ธมฺโม. ทิฏฺฐธมฺมิกสมฺปรายิเก ทฺเว อตฺเถ ลุนาตีติ พาโล, อวิทฺวา. ลูโตติ มกฺกฏโก วุจฺจติ. ตสฺส หิ สุตฺตํ ‘‘ลูตสุตฺต’’นฺติ วทนฺติ. ยูสํ ปาตุํ ปฏงฺคมกฺขิกาทีนํ ชีวิตํ ลุนาตีติ ลูโต. येथे 'लोण' म्हणजे जे नीरसपणा नष्ट करते आणि चवदार बनवते ते 'लोण' (लवण/मीठ) होय. जसा कुश (दर्भ) हाताला कापतो, तसे जे अकुशल धर्मांना कापते ते 'कुशल' होय; जे दोषरहित (अनवद्य) आणि इष्ट विपाक देणारे लक्षण असलेला धर्म आहे. जो ऐहिक आणि पारलौकिक या दोन्ही हितांचा नाश करतो (कापतो) तो 'बाल' (अज्ञानी) होय. 'लूत' म्हणजे कोळी (मकडी) म्हटले जाते. कारण त्याच्या धाग्याला 'लूत-सुत्त' म्हणतात. रस पिण्यासाठी जो पतंग, माश्या इत्यादींचे जीवन नष्ट करतो (कापतो) तो 'लूत' होय. สิ พนฺธเน. สินาติ. สีมา, สีสํ. 'सि' (si) धातू बांधण्याच्या अर्थात आहे. सिनाति (sināti). सीमा (sīmā), सीसं (sīsaṃ - डोके). เอตฺถ สีมาติ สินียเต สมคฺเคน สงฺเฆน กมฺมวาจาย พนฺธิยเตติ สีมา. สา ทุวิธา พทฺธสีมา อพทฺธสีมาติ. ตาสุ อพทฺธสีมา มริยาทกรณวเสน ‘‘สีมา’’ติ เวทิตพฺพา. สินาติ พนฺธติ เกเส โมฬิกรณวเสน เอตฺถาติ สีสํ. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. येथे 'सीमा' म्हणजे जी समग्र संघाने कर्मवाचेद्वारे बांधली जाते ती 'सीमा' होय. ती दोन प्रकारची आहे - बद्धसीमा आणि अबद्धसीमा. त्यापैकी अबद्धसीमा ही मर्यादा ठरवण्याच्या दृष्टीने 'सीमा' म्हणून जाणावी. ज्याच्यावर केसांचा अंबाडा बांधला जातो ते 'सीस' (डोके) होय. इतर उदाहरणेही अशीच योजावीत. สา ปาเก. สินาติ. 'सा' (sā) धातू शिजवण्याच्या (पाक) अर्थात आहे. सिनाति (sināti). สุ หึสายํ. สุณาติ. ปรสุ. ปรํ สุณนฺติ หึสนฺติ เอเตนาติ ปรสุ. 'सु' (su) धातू हिंसेच्या अर्थात आहे. सुणाति (suṇāti). परसु (parasu - कुऱ्हाड). ज्याच्याद्वारे शत्रूला (दुसऱ्याला) मारतात (हिंसा करतात) ती 'परसू' होय. อส โภชเน. วุตฺตานํ ผลมสฺนาติ. อสนํ. 'अस' (asa) धातू भोजनाच्या अर्थात आहे. 'वुत्तानं फलमस्नाति' (पेरलेल्याचे फळ खातो). असनं (asanaṃ). เอตฺถ อสนนฺติ อาหาโร. โส หิ อสิยติ ภุญฺชิยตีติ ‘‘อสน’’นฺติ วุจฺจติ. ‘‘อสฺนาถ ขาทถ ปิวถา’’ติ อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. येथे 'असन' म्हणजे आहार. कारण तो खाल्ला जातो, भोगला जातो म्हणून त्याला 'असन' म्हणतात. "अस्नाथ खादथ पिवथ" (खा, भक्षण करा, प्या) हे याचे येथे उदाहरण आहे. กิลิส วิพาธเน. กิลิสฺนาติ. กิเลโส. 'किलिस' (kilisa) धातू पीडा देण्याच्या (विबाधन) अर्थात आहे. किलिसनाति (kilisnāti). किलेसो (kileso - क्लेश). เอตฺถ จ กิเลโสติ ราคาทโยปิ ทุกฺขมฺปิ วุจฺจติ. आणि येथे 'किलेस' (क्लेश) म्हणजे राग इत्यादी आणि दुःख देखील म्हटले जाते. อุทฺธส อุญฺเฉ. อุญฺโฉ ปริเยสนํ. อุทฺธสฺนาติ. 'उद्धस' (uddhasa) धातू उंछ (धान्य गोळा करणे/शोधणे) अर्थात आहे. उंछो म्हणजे शोधणे (परियेसनं). उद्धसनाति (uddhasnāti). อิส [Pg.256] อภิกฺขเณ. อิสฺนาติ. 'इस' (isa) धातू वारंवार करण्याच्या (अभिक्षण) अर्थात आहे. इस्नाति (isnāti). วิส วิปฺปโยเค. วิสฺนาติ. วิสํ. 'विस' (visa) धातू वियोगाच्या (विप्रयोग) अर्थात आहे. विस्नाति (visnāti). विसं (visaṃ - विष). ปุส สิเนหสวนปูรเณสุ. ปุสฺนาติ. 'पुस' (pusa) धातू स्नेह (प्रेम), पाझरणे आणि पूर्ण करणे या अर्थात आहे. पुस्नाति (pusnāti). ปุส โปสเน. ปุสฺนาติ. 'पुस' (pusa) धातू पोषणाच्या अर्थात आहे. पुस्नाति (pusnāti). มุส เถยฺเย. มุสฺนาติ. มุสโล. 'मुस' (musa) धातू चोरीच्या (स्तेय) अर्थात आहे. मुस्नाति (musnāti). मुसलो (musalo - मुसळ). กิยาที เอตฺตกา ทิฏฺฐา, ธาตโว เม ยถาพลํ; สุตฺเตสฺวญฺเญปิ เปกฺขิตฺวา, คณฺหวฺโห อตฺถยุตฺติโต. माझ्या क्षमतेनुसार क्रियादी गणाचे एवढे धातू पाहिले गेले आहेत; सूत्रांमध्ये इतर धातू देखील पाहून, अर्थाच्या योग्यतेनुसार ते ग्रहण करावेत. สาสนา โลกโต เจเต,ทสฺสิตา เตสุ โลกโต; สาสนสฺโสปการาย,วุตฺตา ตทนุรูปกา. हे धातू बुद्धशासनातून आणि लोकव्यवहारातून दाखवले गेले आहेत; त्यापैकी लोकव्यवहारातील धातू शासनाच्या उपकारासाठी त्याच्याशी सुसंगत असे सांगितले गेले आहेत. กิยาทิคโณยํ. हा क्रियादी गण होय. คหาทิคณิก गहादी गण. อิทานิ คหาทิคโณ วุจฺจเต. เอตฺเถเก เอวํ มญฺญนฺติ. आता गहादी गण सांगितला जात आहे. येथे काही जण असे मानतात. คหาทีนํ คโณ นาม, ปจฺเจกํ นุปลพฺภติ; อถเมโก คหธาตุ, คหาทีนํ คโณ สิยา. गहादी नावाचा गण स्वतंत्रपणे आढळत नाही; केवळ एक 'गह' धातूच गहादी गण असू शकतो. ยโต ปฺปณฺหา ปรา เหยฺยุํ, ธาตุโต ชินสาสเน; เตปิ อญฺเญ น วิชฺชนฺติ, อญฺญตฺร คหธาตุยา. कारण बुद्धशासनात ज्या धातूंपासून 'प्प' आणि 'ण्हा' प्रत्यय लागतात, ते इतर धातू 'गह' धातूशिवाय आढळत नाहीत. อิติ จินฺตาย เอกจฺเจ, คหธาตุํ กิยาทินํ; ปกฺขิปึสุ คเณ เอวํ, น วทึสุ คหาทิกํ. असा विचार करून काही जणांनी 'गह' धातूला क्रियादी गणातच समाविष्ट केले आणि अशा प्रकारे गहादी गणाचा स्वतंत्र उल्लेख केला नाही. น เตสํ คหณํ ธีโร, คณฺเหยฺย สุวิจกฺขโณ; ยโต กจฺจายเน วุตฺโต, คหาทีนํ คโณ วิสุํ. बुद्धिमान आणि चतुर व्यक्तीने त्यांचे हे मत स्वीकारू नये; कारण कच्चायनामध्ये गहादी गण स्वतंत्रपणे सांगितला आहे. ‘‘คหาทิโต ปฺปณฺหา’’ อิติ, ลกฺขณํ วทตา หิ โส; กจฺจายเนน ครุนา, ทสฺสิโต นนุ สาสเน. "गहादितो प्पण्हा" असे लक्षण सांगताना, आदरणीय कच्चायनांनी व्याकरणात तो स्वतंत्रपणे दर्शवला आहे की नाही? (नक्कीच दर्शवला आहे). สเจ [Pg.257] วิสุํ คหาทีนํ, คโณ นาม น ลพฺภติ; คหาทิทีปเก สุตฺเต, หิตฺวาน พาหิรํ อิทํ. जर गहादी नावाचा स्वतंत्र गण आढळत नसेल, तर गहादी दर्शवणाऱ्या सूत्रात हे बाह्य रूप सोडून; ‘‘คหโต ปฺปณฺหา’’ อิจฺเจว, วตฺตพฺพํ อถ วา ปน; ‘‘กิยาทิโต นาปฺปณฺหา’’ติ, กาตพฺพํ เอกลกฺขณํ. "गहतो प्पण्हा" असेच म्हणावे लागले असते, किंवा मग "क्रियादितो नाप्पण्हा" असे एकच लक्षण करावे लागले असते. ยสฺมา ตถา น วุตฺตญฺจ, น กตญฺเจกลกฺขณํ; ตสฺมา อยํ วิสุํเยว, คโณ อิจฺเจว ญายติ. ज्याअर्थी तसे म्हटले गेले नाही आणि तसे एकच लक्षणही केले गेले नाही, त्याअर्थी हा स्वतंत्रच गण आहे, असे समजले जाते. ‘‘สรา สเร โลป’’มิติ-อาทีนิ ลกฺขณานิว; คมฺภีรํ ลกฺขณํ เอตํ, ทุชฺชานํ ตกฺกคาหินา. "सरा सरे लोपं" इत्यादी लक्षणांप्रमाणे हे लक्षण अत्यंत गंभीर आहे, जे केवळ तर्काचा आधार घेणाऱ्यांना समजणे कठीण आहे. อุสาทโยปิ สนฺธาย, อาทิคฺคโห กโต ตหึ; ตถา หิ ‘‘อุณฺหาเปตี’’ติ, อาทิรูปานิ ทิสฺสเร. 'उस' इत्यादी धातूंना लक्षात घेऊन तेथे 'आदि' ग्रहण केले गेले आहे; कारण "उण्हापेति" इत्यादी रूपे दिसून येतात. อิทานิ ปากฏํ กตฺวา, อาทิสทฺทผลํ อหํ; สปฺปโยคํ คหาทีนํ, คณํ วกฺขามิ เม สุณ. आता स्पष्ट करून, 'आदि' शब्दाचे फळ (अर्थ) आणि प्रयोगासहित 'गह' इत्यादी धातूंचा समूह मी सांगतो, तो माझ्याकडून ऐका. คห อุปาทาเน. อุปาทานํ คหณํ, น กิเลสุปาทานํ. อุปสทฺโท เหตฺถ น กิญฺจิ อตฺถวิเสสํ วทติ. อถ วา กาเยน จิตฺเตน วา อุปคนฺตฺวา อาทานํ คหณํ อุปาทานนฺติ สมีปตฺโถ อุปสทฺโท. กตฺถจิ หิ อุปสทฺโท อาทานสทฺทสหิโต ทฬฺหคฺคหเณ วตฺตติ ‘‘กามุปาทาน’’นฺติอาทีสุ. อิธ ปน ทฬฺหคฺคหณํ วา โหตุ สิถิลคฺคหณํ วา, ยํ กิญฺจิ คหณํ อุปาทานเมว, ตสฺมา คหธาตุ คหเณ วตฺตตีติ อตฺโถ คเหตพฺโพ. เฆปฺปติ, คณฺหาติ วา. ปริคฺคณฺหาติ, ปฏิคฺคณฺหาติ, อธิคณฺหาติ, ปคฺคณฺหาติ, นิคฺคณฺหาติ. ปธานคณฺหนโก. คณฺหิตุํ, อุคฺคณฺหิตุํ. คณฺหิตฺวา, อุคฺคณฺหิตฺวา. อญฺญถาปิ รูปานิ ภวนฺติ. อหํ ชาลึ คเหสฺสามิ. คเหตุํ. คเหตฺวา. อุคฺคาหโก, สงฺคาหโก, อชฺโฌคาฬฺโห. การิเต ‘‘คณฺหาเปติ, คณฺหาปยติ, อญฺญตรํ สติปฏฺฐานํ อุคฺคณฺหาเปนฺติ, สทฺธึ อมจฺจสหสฺเสน คณฺหาเปตฺวา. อุปชฺฌํ คาหาเปตพฺโพ. อุปชฺฌํ คาหาเปตฺวา[Pg.258]. คาเหติ, คาหยติ, คาหาเปสฺสติ. คาหาปยนฺติ สพฺภาวํ. คาหโก, คาเหตฺวา’’ อิจฺจาทีนิ. กมฺมนิ – คยฺหติ, สงฺคยฺหติ, คณฺหิยติ วา. ตถา หิ ‘‘คณฺหิยนฺติ อุคฺคณฺหิยนฺตี’’ติ นิทฺเทสปาฬิ ทิสฺสติ. ‘‘เคหํ, คาโห, ปริคฺคโห, สงฺคาหโก, สงฺคเหตา’’ อิจฺจาทีนิ โยเชตพฺพานิ. 'गह' (gaha) हा धातू उपादान (ग्रहण करणे) या अर्थात आहे. उपादान म्हणजे ग्रहण करणे, क्लेश-उपादान नव्हे. येथे 'उप' हा उपसर्ग कोणताही विशेष अर्थ दर्शवत नाही. किंवा शरीराने अथवा चित्ताने जवळ जाऊन जे ग्रहण करणे (आदान) होते, त्याला 'उपादान' म्हणतात, येथे 'उप' हा उपसर्ग समीपतेच्या अर्थात आहे. काही ठिकाणी 'उप' हा उपसर्ग 'आदान' शब्दासोबत दृढ ग्रहणाच्या (घट्ट पकडण्याच्या) अर्थात वापरला जातो, जसे की 'कामुपादान' (कामोपादान) इत्यादींमध्ये. परंतु येथे दृढ ग्रहण असो वा शिथिल ग्रहण, कोणतेही ग्रहण हे उपादानच आहे, म्हणून 'गह' धातू ग्रहण करण्याच्या अर्थात वापरला जातो, असा अर्थ घ्यावा. 'घेप्पति' (घेतो), किंवा 'गण्हाति' (पकडतो). 'परिगण्हाति' (सर्व बाजूंनी ग्रहण करतो), 'पटिगण्हाति' (स्वीकारतो), 'अधिगण्हाति' (अधिग्रहण करतो), 'पगण्हाति' (प्रयत्नपूर्वक पकडतो), 'निगण्हाति' (निग्रह करतो). 'पधानगण्हनको' (मुख्य ग्रहण करणारा). 'गण्हितुं' (ग्रहण करण्यासाठी), 'उग्गण्हितुं' (शिकण्यासाठी/ग्रहण करण्यासाठी). 'गण्हित्वा' (ग्रहण करून), 'उग्गण्हित्वा' (शिकून/ग्रहण करून). इतर रूपेही होतात: 'अहं जालिं गहेस्सामि' (मी जाळे पकडेन). 'गहेतुं' (पकडण्यासाठी). 'गहेत्वा' (पकडून). 'उग्गाहको' (शिकणारा/ग्रहण करणारा), 'सङ्गाहको' (संग्रह करणारा), 'अज्झोगाळ्हो' (प्रवेश केलेला). प्रयोजक (कारित) रूपात: 'गण्हापेति, गण्हापयति' (पकडवायला लावतो), 'अञ्ञतरं सतिपट्ठानं उग्गण्हापेन्ति' (दुसरे एखादे स्मृतिप्रस्थान शिकवायला लावतात), 'सद्धिं अमच्चसहस्सेन गण्हापेत्वा' (हजार अमात्यांसह पकडायला लावून). 'उपज्झं गाहापेतब्बो' (उपाध्यायाला ग्रहण करायला लावावे). 'उपज्झं गाहापेत्वा' (उपाध्यायाला ग्रहण करायला लावून). 'गाहेति, गाहयति, गाहापेस्सति'. 'गाहापयन्ति सब्भावं'. 'गाहको, गाहेत्वा' इत्यादी. कर्मणी प्रयोगात (कम्यनि) - 'गय्हति' (घेतले जाते), 'सङ्गय्हति' (संग्रहित केले जाते) किंवा 'गण्हियति' (घेतले जाते). तसेच 'गण्हियन्ति उग्गण्हियन्ति' अशी निर्देशपाळी (व्याकरण निर्देश) दिसते. 'गेहं' (घर), 'गाहो' (ग्रह), 'परिग्गहो' (परिग्रह), 'सङ्गाहको' (संग्राहक), 'सङ्गहेता' (संग्रह करणारा) इत्यादी रूपे जोडावीत. ตตฺร อการานนฺตรตฺยนฺตปทานํ ‘‘เฆปฺปติ, เฆปฺปนฺติ. เฆปฺปสี’’ติ จ ‘‘คณฺหติ, คณฺหนฺติ. คณฺหสี’’ติ จ อาทินา นเยน สพฺพาสุ วิภตฺตีสุ สพฺพถา ปทมาลา โยเชตพฺพา. อากาเรการานนฺตรตฺยนฺตปทานํ ‘‘คณฺหาติ คณฺหาเปตี’’ติอาทินา ยถาสมฺภวํ ปทมาลา โยเชตพฺพา วชฺเชตพฺพฏฺฐานํ วชฺเชตฺวา. त्यात, 'अ' कारानंतर येणाऱ्या 'ति' प्रत्ययाने संपणाऱ्या पदांची 'घेप्पति, gheppanti, gheppasi' आणि 'गण्हति, gaṇhanti, gaṇhasi' इत्यादी पद्धतीने सर्व विभक्तींमध्ये सर्व प्रकारे पदमाला (रूपे) जोडावी. 'आ' कार आणि 'इ' कारानंतर येणाऱ्या 'ति' प्रत्ययाने संपणाऱ्या पदांची 'गण्हाति, गण्हापेति' इत्यादी रूपांनुसार, वर्ज्य असणारी ठिकाणे वर्ज्य करून, शक्यतेनुसार पदमाला जोडावी. อิมานิ ปน ปสิทฺธานิ กานิจิ อชฺชตนีรูปานิ ‘‘อคฺคหี มตฺติกาปตฺตํ. อคฺคหุํ, อคฺคหึสุ, อคฺคเหสุ’’นฺติ. ภวิสฺสนฺตีอาทีสุ คเหสฺสติ, คเหสฺสนฺติ. เสสํ ปริปุณฺณํ กาตพฺพํ. อคฺคหิสฺสา, อคฺคหิสฺสํสุ. เสสํ ปริปุณฺณํ กาตพฺพํ. तसेच, ही काही प्रसिद्ध अद्यतनी (भूतकाळाची) रूपे आहेत: 'अग्गही मत्तिकापत्तं' (त्याने मातीचे पात्र घेतले). 'अग्गहुं, अग्गहिंसु, अग्गहेसुं'. भविष्यकाळ इत्यादींमध्ये 'गहेस्सति, गहेस्सन्ति'. उर्वरित रूपे पूर्ण करावीत. 'अग्गहिस्सा, अग्गहिस्संसु'. उर्वरित रूपे पूर्ण करावीत. อุส ทาเห. ทาโห อุณฺหํ. อุสติ ทหตีติ อุณฺหํ. อุณฺหสทฺโท ‘‘อุณฺหํ ภตฺตํ ภุญฺชตี’’ติอาทีสุ ทพฺพมเปกฺขติ, ‘‘สีตํ อุณฺหํ ปฏิหนตี’’ติอาทีสุ ปน คุณํ อุณฺหภาวสฺส อิจฺฉิตตฺตา. อุณฺหภาโว หิ สีตภาโว จ คุโณ. 'उस' (usa) हा धातू दाह (उष्णता/जळणे) या अर्थात आहे. दाह म्हणजे उष्णता. जे जळते किंवा उष्ण करते ते 'उष्ण' (uṇhaṃ). 'उष्णं भत्तं भुञ्जति' (तो गरम भात खातो) इत्यादी वाक्यांमध्ये 'उष्ण' हा शब्द द्रव्याची (वस्तूची) अपेक्षा करतो, परंतु 'सीतं उण्हं पटिहनति' (थंडी उष्णतेला नष्ट करते) इत्यादी वाक्यांमध्ये तो गुणाची अपेक्षा करतो, कारण तेथे उष्णभावाची इच्छा असते. कारण उष्णभाव आणि शीतभाव हे गुण आहेत. ตส วิปาสายํ. ตณฺหา. เกนฏฺเฐน ตณฺหา? ตสฺสติ ปริตสฺสตีติ อตฺเถน. 'तस' (tasa) हा धातू तहान (पिपासा) या अर्थात आहे. 'तण्हा' (तृष्णा). कोणत्या अर्थाने 'तण्हा' म्हणतात? 'तस्सति परितस्सति' (तहान लागते किंवा व्याकुळ होतो) या अर्थाने. ชุสิ ปีติเสวเนสุ. ชุณฺโห สมโย. กาเฬ วา ยทิ วา ชุณฺเห, ยทา วายติ มาลุโต. 'जुसि' (jusi) हा धातू प्रीती आणि सेवन या अर्थांमध्ये आहे. 'जुण्हो समयो' (चांदण्याचा काळ/शुक्लपक्ष). 'काळे वा यदि वा जुण्हे, यदा वायति मालुतो' (काळोखात असो वा चांदण्यात, जेव्हा वारा वाहतो). ตตฺถ ชุณฺโหติ โชเสติ โลกสฺส ปีตึโสมนสฺสญฺจ อุปฺปาเทตีติ ชุณฺโห. तेथे 'जुण्हो' म्हणजे जो लोकांमध्ये प्रीती आणि सोमनस्य (आनंद) उत्पन्न करतो, म्हणून तो 'जुण्हो' (चांदणे/शुक्लपक्ष). ชุต [Pg.259] ทิตฺติยํ. ชุณฺหา รตฺติ. โชตติ สยํ นิปฺปภาปิ สมานา จนฺทตารกปฺปภาเสนปิ ทิพฺพติ วิโรจติ สปฺปภา โหตีติ ชุณฺหา. 'जुत' (juta) हा धातू दीप्ती (चमकणे) या अर्थात आहे. 'जुण्हा रत्ति' (चांदणी रात्र). जी स्वतः प्रभाहीन असूनही चंद्र आणि ताऱ्यांच्या प्रकाशाने चमकते, विशेष शोभून दिसते आणि सप्रभ (तेजस्वी) होते, ती 'जुण्हा' (चांदणी रात्र). สา ตนุกรเณ. สณฺหวาจา. สิยติ ตนุกริยติ, น ผรุสภาเวน กกฺกสา กริยตีติ สณฺหา. 'सा' (sā) हा धातू बारीक करणे (तनुकरण) या अर्थात आहे. 'सण्हवाचा' (मृदू वाणी). जी बारीक केली जाते, कठोर भावाने कर्कश केली जात नाही, ती 'सण्हा' (मृदू/सूक्ष्म). โส อนฺตกมฺมนิ. สณฺหํ, ญาณํ. สิยติ สยํ สุขุมภาเวน อติสุขุมมฺปิ อตฺถํ อนฺตํ กโรติ นิปฺผตฺตึ ปาเปตีติ สณฺหํ. 'सो' (so) हा धातू अंतकर्म (समाप्ती/निश्चिती) या अर्थात आहे. 'सण्हं' (सूक्ष्म), 'ञाणं' (ज्ञान). जे स्वतः सूक्ष्म भावाने अतिशय सूक्ष्म अर्थाचाही अंत करते (निश्चिती करते) किंवा त्याला पूर्णत्वास नेते, ते 'सण्हं' (सूक्ष्म ज्ञान). ติช นิสาเน. นิสานํ ติกฺขตา. ติณฺโห ปรสุ. ติติกฺขตีติ ติณฺโห. 'तिज' (tija) हा धातू तीक्ष्ण करणे (निसान) या अर्थात आहे. निसान म्हणजे तीक्ष्णता. 'तिण्हो परसु' (तीक्ष्ण कुऱ्हाड). जो सहन करतो (किंवा तीक्ष्ण असतो) तो 'तिण्हो' (तीक्ष्ण). สิ เสวายํ. อตฺตโน หิตมาสีสนฺเตหิ เสวิยเตติ สิปฺปํ, ยํ กิญฺจิ ชีวิตเหตุ สิกฺขิตพฺพํ สิปฺปายตนํ. อปิจ สิปฺปนฺติ อฏฺฐารส มหาสิปฺปานิ – สุติ สูรมติ พฺยากรณํ ฉนฺโทวิจิติ นิรุตฺติ โชติสตฺถํ สิกฺขา โมกฺขญาณํ กฺริยาวิธิ ธนุพฺเพโท หตฺถิสิกฺขา กามตนฺตํ อสฺสลกฺขณํ ปุราณํ อิติหาโส นีติ ตกฺโก เวชฺชกญฺจาติ. 'सि' (si) हा धातू सेवा या अर्थात आहे. स्वतःचे हित इच्छिणाऱ्यांकडून ज्याचे सेवन केले जाते ते 'सिप्पं' (शिल्प/कला), जे काही उपजीविकेसाठी शिकण्यासारखे शिल्पस्थान (कौशल्य) आहे. तसेच 'शिल्प' म्हणजे अठरा महाशिल्पे (कला) आहेत - श्रुती (वेद/ऐकणे), शूरमती (युद्धकला/बुद्धिमत्ता), व्याकरण, छंदोविचिती (छंदशास्त्र), निरुक्ती, ज्योतिषशास्त्र, शिक्षा (उच्चारणशास्त्र), मोक्षज्ञान, क्रियाविधी (कर्मकांड/विधी), धनुर्वेद (धनुर्विद्या), हत्ती-शिक्षण (गजविद्या), कामतंत्र, अश्वलक्षण (घोडे ओळखण्याची विद्या), पुराण, इतिहास, नीती, तर्क आणि वैद्यकशास्त्र. กุ กุจฺฉายํ. กุจฺฉา ครหา. กณฺหา ธมฺมา. กณฺโห ปุริโส. 'कु' (ku) हा धातू कुत्सा (निंदा) या अर्थात आहे. कुत्सा म्हणजे निंदा. 'कण्हा धम्मा' (कृष्ण/काळे धर्म - अकुशल धर्म). 'कण्हो पुरिसो' (काळा माणूस). ตตฺถ กณฺหาติ อปภสฺสรภาวกรณตฺตา ปณฺฑิเตหิ กุจฺฉิตพฺพา ครหิตพฺพาติ กณฺหา, อกุสลธมฺมา. กาฬวณฺณตฺตา สุวณฺณวณฺณาทิกํ อุปนิธาย กุจฺฉิตพฺโพ นินฺทิตพฺโพติ กณฺโห, กาฬวณฺโณ. วุตฺตมฺปิ เจตํ – तेथे 'कण्हा' म्हणजे प्रभाहीन (तेजहीन) भाव निर्माण करत असल्यामुळे पंडितांकडून निंदा करण्यास योग्य, म्हणून 'कण्हा' (कृष्ण/काळे) म्हणजेच अकुशल धर्म. काळ्या रंगाचा असल्यामुळे, सुवर्ण रंगाशी तुलना करता निंदा करण्यास योग्य, म्हणून 'कण्हो' म्हणजे काळ्या रंगाचा. हे असेही म्हटले आहे - ‘‘กณฺโห วตายํ ปุริโส, กณฺหํ ภุญฺชติ โภชนํ; กณฺเห ภูมิปฺปเทสสฺมึ, น มยฺหํ มนโส ปิโย’’ติ จ, 'हा माणूस खरोखरच काळा आहे, तो काळे भोजन करतो; काळ्या भूमीच्या प्रदेशात राहणारा हा मला मनापासून आवडत नाही' आणि, ‘‘น [Pg.260] กณฺโห ตจสา โหติ,อนฺโตสาโร หิ พฺราหฺมโณ; ยสฺมึ ปาปานิ กมฺมานิ,ส เว กณฺโห สุชมฺปตี’’ติ จ. 'केवळ त्वचेने कोणी काळा (कृष्ण) होत नाही, कारण अंतःकरणाने श्रेष्ठ असलेलाच खरा ब्राह्मण (श्रेष्ठ पुरुष) असतो; ज्याच्यामध्ये पापकर्मे असतात, तोच खरोखर काळा (अपवित्र) असतो, हे सुजंपती (इंद्रा)!' आणि, อิจฺเจวํ – अशा प्रकारे - คหาทิเก ธาตุคเณ, สนฺธาย ตสิอาทโย; อาทิคฺคโห กโต ปฺปณฺหา, คหาทีสุ ยถารหํ. 'गह' इत्यादी धातूंच्या समूहात, 'तस' इत्यादी धातूंचा विचार करून, 'गह' इत्यादींमध्ये योग्यतेनुसार 'ण्हा' प्रत्ययाचा 'आदि' (सुरुवात) म्हणून स्वीकार केला गेला आहे. คหโต ธาตุโต หิ ปฺโป,อาขฺยาตตฺเตวทิสฺสติ; อาขฺยาตตฺเต จ นามตฺเต, ณฺหาสทฺโท อุสโต ตถา. कारण 'गह' धातूपासून 'प्प' प्रत्यय केवळ आख्यात (क्रियापद) रूपातच दिसतो; आणि 'ण्हा' शब्द आख्यात रूपात तसेच नाम रूपातही दिसतो, तसेच 'उस' धातूपासूनही. อุสคเหหิ อญฺญสฺมา, นามตฺเตว ทุเว มตา; เอวํ วิเสสโต เญยฺโย, คหาทิคณนิจฺฉโย. 'उस' आणि 'गह' या धातूंव्यतिरिक्त इतरांपासून नाम रूपातच हे दोन प्रत्यय मानले गेले आहेत; अशा प्रकारे 'गहादि' गणाचा निश्चय विशेष रूपाने जाणून घ्यावा. เอตฺถ ปน กิญฺจาปิ สาสเน ‘‘ตณฺหายตี’’ติ กฺริยาปทมฺปิ ทิสฺสติ, ตถาปิ ตสฺส ‘‘ปพฺพตายติ, เมตฺตายตี’’ติอาทีนิ วิย นามสฺมา วิหิตสฺส อายปจฺจยสฺส วเสน สิทฺธตฺตา กฺริยาปทตฺเตปิ ณฺหาปจฺจโย มุขฺยโต ลพฺภตีติ น สกฺกา วตฺตุํ. ‘‘ตณฺหายตี’’ติ หิ อิทํ ณฺหาปจฺจยวตา ตสธาตุโต นิปฺผนฺนตณฺหาสทฺทสฺมา ปรสฺส อายปจฺจยสฺส วเสน นิปฺผนฺนํ. ตถา กิญฺจาปิ รูปิยสํโวหารสิกฺขาปทวณฺณนายํ ‘‘วาสิผลํ ตาเปตฺวา อุทกํ วา ขีรํ วา อุณฺหาเปตี’’ติ อิมสฺมึ ปเทเส ‘‘อุณฺหาเปตี’’ติ เหตุกตฺตุวาจกํ กฺริยาปทํ ทิสฺสติ, ตถาปิ ตสฺส ณฺหาปจฺจยวตา อุสธาตุโต นิปฺผนฺนอุณฺหาสทฺทโต วิหิตสฺส การิตสญฺญสฺส ณาเปปจฺจยสฺส วเสน นิปฺผนฺนตฺตา กฺริยาปทตฺเตปิ ณฺหาปจฺจโย มุขฺยโต ลพฺภตีติ น สกฺกา วตฺตุํ. ‘‘อุณฺหาเปตี’’ติ อิทํ วุตฺตปฺปการอุณฺหาสทฺทโต ณาเปปจฺจยวเสน นิปฺผนฺนํ, เอตสฺมึ ทิฏฺเฐ ‘‘อุณฺหาปยตี’’ติ ปทมฺปิ ทิฏฺฐเมว โหติ. परंतु येथे जरी शासनात (बुद्धवचनात) 'तण्हायति' (तृष्णा करतो) असे क्रियापदही दिसत असले, तरी 'पब्बतायति, मेत्तायति' इत्यादींप्रमाणे नामापासून विहित केलेल्या 'आय' प्रत्ययामुळे ते सिद्ध होत असल्याने, क्रियापद रूपातही 'ण्हा' प्रत्यय मुख्यत्वे मिळतो असे म्हणता येत नाही. कारण 'तण्हायति' हे 'ण्हा' प्रत्यययुक्त 'तस' धातूपासून निष्पन्न झालेल्या 'तण्हा' शब्दाच्या पुढे 'आय' प्रत्यय लागल्यामुळे निष्पन्न झाले आहे. तसेच, जरी रुपियसंविहार सिक्खापदाच्या (रुपयांच्या व्यवहारासंबंधीच्या शिकवणुकीच्या) वर्णनात 'वासिफलं तापेत्वा उदकं वा खीरं वा उण्हापेति' (कुऱ्हाडीचे पाते तापवून पाणी किंवा दूध गरम करतो) या वाक्यात 'उण्हापेति' (गरम करतो) हे प्रयोजक (causative) क्रियापद दिसत असले, तरी 'ण्हा' प्रत्यययुक्त 'उस' धातूपासून निष्पन्न झालेल्या 'उण्ह' शब्दापासून विहित केलेल्या कारितसंज्ञक 'णापे' प्रत्ययामुळे ते निष्पन्न झाले असल्याने, क्रियापद रूपातही 'ण्हा' प्रत्यय मुख्यत्वे मिळतो असे म्हणता येत नाही. 'उण्हापेति' हे वर सांगितलेल्या प्रकारच्या 'उण्ह' शब्दापासून 'णापे' प्रत्ययाच्या योगाने निष्पन्न झाले आहे, हे पाहिले असता 'उण्हापयति' हे पदही पाहिलेलेच (सिद्धच) होते. กิญฺจ [Pg.261] ภิยฺโย วินยฏฺฐกถายํ ‘‘อุณฺหาเปตี’’ติ การิตปทสฺส ทิฏฺฐตฺตาเยว ‘‘อุณฺหตี’’ติ กตฺตุปทมฺปิ นยโต ทิฏฺฐเมว โหติ กตฺตุการิตปทานํ เอกธาตุมฺหิ อุปลพฺภมานตฺตา, ยถา? คณฺหติ, คณฺหาเปติ, คจฺฉติ, คจฺฉาเปตีติ, ตสฺมา ‘‘อุส ทาเห’’ติ ธาตุสฺส ‘‘อุณฺหตี’’ติ รูปํ อุปลพฺภตีติ มนฺตฺวา ‘‘อุณฺหตีติ อุณฺห’’นฺติ นิพฺพจนํ กาตพฺพํ. อิติ ปฺปปจฺจโย คหโต จ อญฺญโต จ เอกธา ลพฺภติ, ณฺหาปจฺจโย ปน คหโต อุสโต จ ทฺวิธา อญฺญโต เอกธา ลพฺภตีติ ทฏฺฐพฺพํ. กิญฺจาเปตฺถ เอวํ นิยโม วุตฺโต, ตถาปิ สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเน อญฺญานิปิ เอเกกสฺส ธาตุสฺส นามิกปทานิ ทฺเว ทฺเว กฺริยาปทานิ วิจินิตพฺพานิ. เยน ปน พุทฺธวจนานุรูเปน นเยน คหาทิคเณ อาทิสทฺเทน ตสธาตาทโย อมฺเหหิ คหิตา, อิมสฺมา นยา อญฺโญ นโย ปสตฺถตโร นตฺถิ, อยเมว ปสตฺถตโร, ตสฺมา อยํ นีติ สาสนฏฺฐิติยา อายสฺมนฺเตหิ สาธุกํ ธาเรตพฺพา วาเจตพฺพา จ. आणखी काय, विनय-अट्ठकथेमध्ये 'उण्हापेति' (uṇhāpeti) हे कारित रूप (प्रयोजक रूप) दिसत असल्यामुळेच, 'उण्हति' (uṇhati) हे कर्तृपदही न्यायाने सिद्धच होते, कारण कर्तृ आणि कारित रूपे एकाच धातूमध्ये आढळतात. जसे की? गण्हति-गण्हापेति, गच्छति-गच्छापेति. म्हणून 'उस दाहे' (दाह अर्थातील उस् धातू) या धातूचे 'उण्हति' हे रूप आढळते असे मानून 'उण्हतीति उण्हं' अशी व्युत्पत्ती करावी. अशा प्रकारे 'प्प' प्रत्यय 'गह' धातूपासून आणि इतरांपासून एक प्रकारे मिळतो, तर 'ण्हा' प्रत्यय 'गह' आणि 'उस' धातूपासून दोन प्रकारे आणि इतरांपासून एक प्रकारे मिळतो, असे समजावे. जरी येथे असा नियम सांगितला असला, तरी अट्ठकथासहित त्रिपिटक बुद्धवचनात इतरही प्रत्येक धातूची नामपदे आणि दोन-दोन क्रियापदे शोधली पाहिजेत. ज्या बुद्धवचनाला अनुसरून असलेल्या पद्धतीने आम्ही 'गहादि' गणात 'आदि' शब्दाने 'तस' इत्यादी धातू घेतले आहेत, या पद्धतीपेक्षा दुसरी कोणतीही पद्धत अधिक श्रेष्ठ नाही, हीच पद्धत अत्यंत श्रेष्ठ आहे. म्हणून, शासनाच्या (धम्माच्या) चिरस्थायीसाठी आयुष्यमानांनी ही पद्धत चांगल्या प्रकारे धारण करावी आणि शिकवावी. คหาที เอตฺตกา ทิฏฺฐา, ธาตโว เม ยถาพลํ; สุตฺเตสฺวญฺเญปิ เปกฺขิตฺวา, คณฺหวฺโห อตฺถยุตฺติโต. माझ्या यथाशक्तीनुसार 'गहादि' इत्यादी धातू एवढे पाहिले गेले आहेत; सूत्तांमध्ये इतरही धातू पाहून अर्थाच्या योग्यतेनुसार ते ग्रहण करावेत. คหาทิคโณยํ. हा 'गहादि' गण समाप्त झाला. ตนาทิคณิก तनादि गण ตนุ วิตฺถาเร. ตโนติ. อายตนํ, ตนุ. กมฺมนิ ‘‘ตนิยฺยติ, ตนิยฺยนฺติ. วิตนิยฺยตี’’ติ รูปานิ. อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘ยถา หิ อาสภํ จมฺมํ, ปถพฺยา วิตนิยฺยตี’’ติ. ครู ปน ‘‘ปตายเต, ปตญฺญตี’’ติ รูปานิ วทนฺติ. ตนิตุํ, ตนิตฺวาน. ตุมนฺตาทิรูปานิ. 'तनु' धातू विस्तार करणे या अर्थात. 'तनोति' (विस्तार करतो). 'आयतनं', 'तनु'. कर्मणी प्रयोगात 'तनिय्यति, तनिय्यन्ति, वितनिय्यति' अशी रूपे होतात. येथे ही पाळी (वचन) आहे - 'यथा हि आसभं चम्मं, पथब्या वितनिय्यति' (जसे बैलाचे चामडे पृथ्वीवर पसरवले जाते). परंतु आचार्य 'पतायते, पतञ्ञति' अशी रूपे सांगतात. 'तनितुं', 'तनित्वान' ही तुमुन्-प्रत्ययान्त इत्यादी रूपे आहेत. ตตฺถ [Pg.262] อายตนนฺติ อายภูเต ธมฺเม ตโนติ วิตฺถาเรตีติ อายตนํ. ตนูติ สรีรํ. ตญฺหิ กลลโต ปฏฺฐาย กมฺมาทีหิ ยถาสมฺภวํ ตนิยฺยติ วิตฺถาริยติ มหตฺตํ ปาปิยตีติ ‘‘ตนู’’ติ วุจฺจติ. ‘‘ตนุ วปุ สรีรํ ปุํ กาโย เทโห’’ติอาทโย สรีรวาจกา สทฺทา. สรีรํ ขนฺธปญฺจกํ. ยญฺหิ มหาชโน สรีรนฺติ วทติ, ตํ ปรมตฺถโต ขนฺธปญฺจกมตฺตเมว, น ตโต อตฺตา วา อตฺตนิยํ วา อุปลพฺภติ. ‘‘กามราคพฺยาปาทานํ ตนุตฺตกรํ สกทาคามิมคฺคจิตฺต’’นฺติอาทีสุ ปน ตนุสทฺโท อปฺปตฺถวาจโก, อปฺปตฺถวาจกสฺส จ ตสฺส กฺริยาปทํ น ปสฺสาม, ตสฺมา นิปาตปเทน เตน ภวิตพฺพํ. ตนุสทฺโท นิปาตปทนฺติ วุตฺตฏฺฐานมฺปิ น ปสฺสาม, นิจฺฉเยน ปน อนิปฺผนฺนปาฏิปทิโกติ คเหตพฺโพ. त्यात 'आयतन' म्हणजे जे उत्पत्तीच्या कारणीभूत असलेल्या (आयभूत) धर्मांचा विस्तार करते (तनोति) ते आयतन होय. 'तनु' म्हणजे शरीर. कारण ते 'कलल' (गर्भाची पहिली अवस्था) पासून सुरू होऊन कर्मादींद्वारे यथासंभव विस्तारले जाते, वाढवले जाते आणि मोठे केले जाते, म्हणून त्याला 'तनु' म्हटले जाते. 'तनु, वपु, सरीरं, puṃ, कायो, देहो' इत्यादी शरीराचे वाचक शब्द आहेत. शरीर म्हणजे पंचस्कंध होय. ज्याला सामान्य लोक 'शरीर' म्हणतात, ते परमार्थतः केवळ पंचस्कंधच आहे, त्याव्यतिरिक्त तिथे 'आत्मा' किंवा 'आत्मीय' काहीही आढळत नाही. परंतु 'कामरागव्यापादांनां तनुत्तकरं सकदागामिमग्गचित्तं' इत्यादींमध्ये 'तनु' हा शब्द 'अल्प' (कमी) या अर्थाचा वाचक आहे, आणि त्या अल्पवाचक शब्दाचे क्रियापद आपल्याला दिसत नाही, म्हणून तो निपात शब्द असावा. 'तनु' शब्द निपात शब्द आहे असे सांगितलेले स्थानही आपल्याला आढळत नाही, परंतु निश्चितपणे तो अनिष्पन्न प्रातिपदिक (मूळ शब्द) म्हणून ग्रहण करावा. ตโนติ, ตโนนฺติ. ตโนสิ, ตโนถ. ตโนมิ, ตโนม. ตนุเต, ตนุนฺเต. ตนุเส, ตนุเส, ตนุวฺเห. ตเน, ตนุมฺเห. เสสํ ยถาสมฺภวํ วิตฺถาเรตพฺพํ. तनोति, तनॉन्ति. तनोसि, तनोथ. तनोमि, तनोम. तनुते, तनुन्ते. तनुसे, तनुसे (तनुव्हे). तने, तनुम्हे. उर्वरित रूपे यथासंभव विस्ताराने जाणावीत. ตโนตุ, ตโนนฺตุ. ตเนยฺย, ตเน, ตเนยฺยุํ. วิตน, วิตนุ. อตนา, อตนุ. อมฺมาย ปตนุ เกสา. อตนิ, อตนึสุ. ตนิสฺสติ, ตนิสฺสนฺติ. อตนิสฺสา, อตนิสฺสํสุ. กมฺมนิ ‘‘ตนิยฺยติ, ตนิยฺยนฺติ. ตนิยฺยสี’’ติอาทินา วิตฺถาเรตพฺพํ. तनोतु, तनॉन्तु. तनेय्य, तने, तनेय्युं. वितन, वितनु. अतना, अतनु. 'अम्माय पतनु केसा' (आईचे केस विरळ झाले). अतनि, अतनिंसु. तनिस्सति, तनिस्सन्ति. अतनिस्सा, अतनिस्संग्सु. कर्मणी प्रयोगात 'तनिय्यति, तनिय्यन्ति, तनिय्यसि' इत्यादी प्रकारे विस्तार करावा. สก สตฺติยํ. สตฺติ สมตฺถภาโว. สกฺโกติ สกฺโก. วิญฺญาเปตุํ อสกฺขิ. สกฺขิสฺสสิ. สกฺขติ. ตฺวมฺปิ อมฺม ปพฺพชิตุํ สกฺขิสฺสสิ. สกฺกเต ชราย ปฏิกมฺมํ กาตุนฺติ ปาฬิ. 'सक' धातू शक्ती (सामर्थ्य) या अर्थात. शक्ती म्हणजे सामर्थ्यभाव. 'सक्कोति' (समर्थ होतो), 'सक्को' (शक्य/समर्थ). 'विञ्ञापेतुं असक्खि' (समजावून सांगण्यास असमर्थ झाला). 'सक्खिस्ससि' (तू समर्थ होशील). 'सक्खति' (तो समर्थ होईल). 'त्वम्पि अम्म पब्बजितुं सक्खिस्ससि' (हे आई, तू देखील प्रव्रजित होण्यास समर्थ होशील). 'सक्कते जराय पटिकम्मं कातुं' (वृद्धत्वाचा प्रतिकार करणे शक्य आहे) अशी पाळी (वचन) आहे. ตตฺถ [Pg.263] สกฺโกติ เทวราชา. โส หิ อตฺถานํ สหสฺสมฺปิ มุหุตฺเตน จินฺตนสมตฺถตาย สปรหิตํ กาตุํ สกฺโกตีติ ‘‘สกฺโก’’ติ วุจฺจติ. อญฺญตฺร ปน ธาตูนํ อวิสเย ตทฺธิตวเสน สกฺกจฺจํ ทานํ อทาสีติ สกฺโกติ เอวมฺปิ อตฺถํ คเหตฺวา สกฺกสทฺโท นิรุตฺตินเยน สาเธตพฺโพ. วุตฺตญฺหิ ภควตา ‘‘สกฺโก มหาลิ เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน สกฺกจฺจํ ทานํ อทาสิ, ตสฺมา ‘สกฺโก’ติ วุจฺจตี’’ติ. สกฺโกนฺโต. สกฺโกนฺตี. สกฺโกนฺตํ กุลํ. त्यात 'सक्को' म्हणजे देवराज (शक्र). कारण तो एका क्षणात हजारो गोष्टींचा विचार करण्यास समर्थ असल्यामुळे स्वतःचे आणि इतरांचे कल्याण करण्यास समर्थ होतो, म्हणून त्याला 'सक्को' (शक्र) म्हटले जाते. इतर ठिकाणी, धातूंच्या विषयाव्यतिरिक्त, तद्धित प्रत्ययाच्या नियमाने 'सक्कच्चं दानं अदासि' (आदरपूर्वक दान दिले) म्हणून 'सक्को' असाही अर्थ घेऊन 'सक्क' शब्दाची निरुक्तीच्या नियमाने सिद्धी करावी. कारण भगवंतांनी म्हटले आहे - 'महाली, देवांचा राजा इंद्र पूर्वी मनुष्य असताना त्याने आदरपूर्वक (सक्कच्चं) दान दिले होते, म्हणून त्याला 'सक्को' (शक्र) म्हटले जाते.' सक्कोन्तो, सक्कोन्ती, सक्कोन्तं कुलं. ขุณุ ขิณุ หึสายํ. ขุโณติ. ขิโณติ. 'खुणु' आणि 'खिणु' धातू हिंसा करणे या अर्थात. 'खुणोति', 'खिणोति'. อิณุ คติยํ. อิโณติ. อิณํ อิณายิโก. 'इणु' धातू गती (जाणे) या अर्थात. 'इणोति'. 'इणं' (ऋण/कर्ज), 'इणायिको' (ऋणको/कर्जदार). ติณุ อทเน. ติโณติ. ติณํ. เอตฺถ ติณนฺติ ยวสํ. ตญฺหิ ติณิยเต ติณภกฺเขหิ โคณาทีหิ อทิยเต ขาทิยเตติ ติณํ. 'तिणु' धातू खाणे या अर्थात. 'तिणोति'. 'तिणं' (गवत). येथे 'तिण' म्हणजे चारा (गवत). कारण ते 'तिणियते' म्हणजे गवत खाणाऱ्या बैलादी प्राण्यांद्वारे खाल्ले जाते, म्हणून त्याला 'तिण' (गवत) म्हणतात. ฆิณุ ทิตฺติยํ. ฆิโณติ. 'घिणु' धातू दीप्ती (प्रकाशणे/चमकणे) या अर्थात. 'घिणोति'. หนุ อปนยเน. อปนยนํ อนาลาปกรณํ นิพฺพจนตากรณํ. หโนติ. หนุเต. 'हनु' धातू दूर करणे (अपणयन) या अर्थात. अपणयन म्हणजे न बोलणे किंवा दूर करणे. 'हनोति', 'हनुते'. ปนุ ทาเน ปโนติ. ปนุเต. 'पणु' धातू दान देणे या अर्थात. 'पणोति', 'पणुते'. มนุ โพธเน. มโนติ. มนุเต. มโน. มนํ. มานสํ. มนุสฺโส. มานโว. มาณโว. 'मनु' धातू जाणणे (बोधन) या अर्थात. 'मनोति', 'मनुते'. 'मनो' (मन), 'मनं', 'मानसं', 'मनुस्सो' (मनुष्य), 'मानवो', 'माणवो'. เอตฺถ มโนติ มนุเต พุชฺฌตีติ มโน, เอวํ มนํ. อิเมสํ ปน ทฺวินฺนํ มนสทฺทานํ ‘‘ยสฺมึ มโน นิวิสติ. สนฺตํ ตสฺส มนํ โหตี’’ติอาทีสุ ปุนฺนปุํสกลิงฺคตา ทฏฺฐพฺพา. มานสนฺติ ราโคปิ จิตฺตมฺปิ อรหตฺตมฺปิ. ‘‘อนฺตลิกฺขจโร ปาโส, ยฺวายํ [Pg.264] จรติ มานโส’’ติ เอตฺถ หิ ราโค มานสํ. ‘‘จิตฺตํ มโน มานส’’นฺติ เอตฺถ จิตฺตํ. ‘‘อปฺปตฺตมานโส เสกฺโข, กาลํ กยิรา ชเน สุโต’’ติ เอตฺถ อรหตฺตํ. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – येथे 'मनो' म्हणजे जे जाणते (मनुते), बोध प्राप्त करते ते मन होय, तसेच 'मनं' देखील. परंतु या दोन्ही 'मन' शब्दांचे 'यस्मिं मनो निविसति' (ज्यामध्ये मन स्थिर होते) आणि 'सन्तं तस्स मनं होति' (त्याचे मन शांत होते) इत्यादींमध्ये अनुक्रमे पुल्लिंगी आणि नपुंसकलिंगी असणे पाहावे. 'मानसं' म्हणजे राग (आसक्ती) देखील, चित्त देखील आणि अर्हत्त्व देखील. 'अन्तलिक्खचरो पासो, य्वायं चरति मानसो' (हा जो अंतरीक्षामध्ये फिरणारा पाश आहे, जो मनामध्ये/आसक्तीमध्ये फिरतो) येथे 'मानसं' म्हणजे राग (आसक्ती) आहे. 'चित्तं मनो मानसं' येथे 'मानसं' म्हणजे चित्त आहे. 'अप्पत्तमानसो सेक्खो, कालं कयिरा जने सुतो' (ज्याला अजून अर्हत्त्व प्राप्त झाले नाही असा शैक्ष भिक्खू...) येथे 'मानसं' म्हणजे अर्हत्त्व आहे. याविषयी हे म्हटले आहे - ราโค จิตฺตํ อรหตฺตญฺจ, ‘‘มานส’’นฺติ สมีริตํ; สตฺถุโน สาสเน ปาป-สาสเน’ขิลสาสเน. शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) शासनात, पापरहित शासनात आणि संपूर्ण शासनात राग, चित्त आणि अर्हत्त्व या तिन्हींना 'मानसं' असे म्हटले गेले आहे. ตตฺถ สมฺปยุตฺตมนสิ ภโวติ ราโค มานโส. มโน เอว มานสนฺติ กตฺวา จิตฺตํ มานสํ. อนวเสสโต มานํ สิยติ สมุจฺฉินฺทตีติ อคฺคมคฺโค มานสํ. ตนฺนิพฺพตฺตตฺตา ปน อรหตฺตสฺส มานสตา ทฏฺฐพฺพา. มนูติ สตฺโต. ‘‘เยน จกฺขุปสาเทน, รูปานิ มนุ ปสฺสตี’’ติ เอตฺถ หิ ‘‘มนู’’ติ สตฺโต วุตฺโต. อถ วา มนูติ ปฐมกปฺปิกกาเล มนุสฺสานํ มาตาปิภุฏฺฐาเน ฐิโต มนุนามโก ปุริโส, โย สาสเน ‘‘มหาสมฺมตราชา’’ติ วุตฺโต. โส หิ สกลโลกสฺส หิตํ กาตุํ มนุเต ชานาตีติ ‘‘มนู’’ติ วุจฺจติ. ยถาพลํ อตฺตโน หิตํ มนุเต ชานาตีติ มนุสฺโส, มนสฺส วา อุสฺสนฺนตฺตา มนุสฺโส. อถ วา วุตฺตปฺปการสฺส มนุโน อปจฺจํ มนุสฺโส. เอวํ มานโว มาณโว จ, นการสฺส หิ ณกาเร กเต ‘‘มาณโว’’ติ รูปํ สิชฺฌติ. เกจิ ปนาหุ ‘‘ทนฺตชนการสหิโต มานวสทฺโท สพฺพสตฺตสาธารณวจโน, มุทฺธชณการสหิโต ปน มาณวสทฺโท กุจฺฉิตมูฬฺหาปจฺจวจโน’’ติ, ตํ วีมํสิตฺวา ยุตฺตญฺเจ, คเหตพฺพํ, น ปเนตฺถ วตฺตพฺพํ ‘‘มาณวสทฺทสฺส อตฺถุทฺธารวจเน อิทํ วจนํ วิรุชฺฌตี’’ติ อนฺตรสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาเร อนฺตรอนฺตริกาสทฺทานมฺปิ อาหรณสฺส ทสฺสนโต. तेथे संप्रयुक्त मनात असणारा भाव म्हणजे 'राग' हा 'मानसो' (मानसिक) आहे. मन हेच मानस आहे, असे मानून चित्ताला 'मानसं' म्हटले आहे. जो पूर्णपणे मानाचा (अहंकाराचा) उच्छेद करतो, तो अग्र मार्ग (अर्हत मार्ग) 'मानसं' आहे. त्यापासून उत्पन्न झाल्यामुळे अर्हतत्वाला 'मानसतत्व' (मानसतता) समजावे. 'मनु' म्हणजे प्राणी (सत्त्व). "ज्या चक्षुप्रसादाने प्राणी रूपांना पाहतो" येथे 'मनु' शब्दाने प्राणी (सत्त्व) म्हटला आहे. किंवा 'मनु' म्हणजे प्रथम कल्पकाळात मनुष्यांच्या माता-पित्यांच्या स्थानी असलेला 'मनु' नावाचा पुरुष, ज्याला शासनात (बुद्धशासनात) 'महासंमत राजा' म्हटले आहे. कारण तो संपूर्ण जगाचे हित करण्याचे विचार करतो (जाणतो), म्हणून त्याला 'मनु' म्हटले जाते. आपल्या बलानुसार स्वतःचे हित जो विचार करतो (जाणतो) तो 'मनुष्य' (मनुस्सो), किंवा मनाच्या प्रगल्भतेमुळे (उत्कटतेमुळे) तो 'मनुष्य' होय. किंवा पूर्वोक्त मनूची संतती म्हणजे 'मनुष्य' होय. याचप्रमाणे 'मानव' (माणवो) आणि 'माणव' (मणावो) शब्द बनतात; 'न' काराचा 'ण' कार केल्यावर 'माणवो' हे रूप सिद्ध होते. काही आचार्य म्हणतात की, "दंत्य 'न' कारयुक्त 'मानव' शब्द सर्व प्राण्यांसाठी साधारण वाचक आहे, तर मूर्धन्य 'ण' कारयुक्त 'माणव' शब्द निंदित किंवा अज्ञानी संततीचा वाचक आहे." त्याची परीक्षा करून जर ते योग्य असेल तर ते स्वीकारावे. येथे "माणव शब्दाच्या अर्थ-उद्धार (स्पष्टीकरण) कथनात हे वचन विरुद्ध ठरते" असे म्हणू नये, कारण 'अंतर' शब्दाच्या अर्थ-उद्धारात 'अंतर' आणि 'अंतरिका' शब्दांचेही उदाहरण दिले जाते. ตตฺร [Pg.265] ปนายํ วีมํสนา – จูฬกมฺมวิภงฺคสุตฺตสฺมิญฺหิ ‘‘สุโภ มาณโวโตเทยฺยปุตฺโต’’ติ อิมสฺมึ ปเทเส อฏฺฐกถาจริเยหิ ‘‘สุโภติ โส กิร ทสฺสนีโย อโหสิ ปาสาทิโก, เตนสฺส องฺคสุภตาย ‘สุโภ’ตฺเวว นามํ อกํสุ. ‘มาณโว’ติ ปน ตํ ตรุณกาเล โวหรึสุ, โส มหลฺลกกาเลปิ เตเนว โวหาเรน โวหริยตี’’ติ เอวํ มุทฺธชณการสฺส มาณวสทฺทสฺส อตฺโถ ปกาสิโต, ตฏฺฏีกายมฺปิ ครูหิ ‘‘ยํ อปจฺจํ กุจฺฉิตํ มุทฺธํ วา, ตตฺถ โลเก มาณวโวหาโร, เยภุยฺเยน จ สตฺตา ทหรกาเล มุทฺธธาตุกา โหนฺตีติ วุตฺตํ ‘ตรุณกาเล โวหรึสู’’ติ, เอวํ มุทฺธชณการสฺส มาณวสทฺทสฺส อตฺโถ ปกาสิโต. อิทานิ มาณวสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร ภวติ, มาณโวติ สตฺโตปิ โจโรปิ ตรุโณปิ วุจฺจติ. ‘‘โจทิตา เทวทูเตหิ, เย ปมชฺชนฺติ มาณวา’’ติอาทีสุ หิ สตฺโต ‘‘มาณโว’’ติ วุตฺโต. ‘‘มาณเวหิ สห คจฺฉนฺติ กตกมฺเมหิปิ อกตกมฺเมหิปี’’ติอาทีสุ โจโร. ‘‘อมฺพฏฺโฐ มาณโว’’ติอาทีสุ ตรุโณ ‘‘มาณโว’’ติ วุตฺโต. यावर ही परीक्षा (विचार) आहे - चूलकम्मविभंगसुत्तात "सुभ माणव तोदेय्यपुत्त" या संदर्भात अट्ठकथाचार्यांनी म्हटले आहे की, "सुभ हा दर्शनीय आणि प्रसन्न करणारा होता, म्हणून त्याच्या अंगाच्या सुंदरतेमुळे त्याचे नाव 'सुभ' असे ठेवले गेले. परंतु त्याच्या तरुण वयात त्याला 'माणव' असे संबोधले जात असे, आणि वृद्धपकाळातही त्याला त्याच नावाने संबोधले गेले." अशा प्रकारे मूर्धन्य 'ण' कारयुक्त 'माणव' शब्दाचा अर्थ स्पष्ट केला आहे. त्याच्या टीकेमध्येही गुरूंनी म्हटले आहे की, "जी संतती निंदित किंवा अज्ञानी असते, तिच्यासाठी जगात 'माणव' हा व्यवहार होतो, आणि बहुतांश प्राणी बालपणात अज्ञानी स्वभावाचे असतात, म्हणून 'तरुण वयात संबोधले जात असे' असे म्हटले आहे." अशा प्रकारे मूर्धन्य 'ण' कारयुक्त 'माणव' शब्दाचा अर्थ स्पष्ट केला आहे. आता 'माणव' शब्दाचा अर्थ-उद्धार (विविध अर्थ) असा होतो - 'माणव' शब्दाने प्राणी, चोर आणि तरुण या तिन्हींचा बोध होतो. "देवदूतांनी प्रेरित केलेले जे माणव (प्राणी) प्रमाद करतात..." इत्यादींमध्ये 'माणव' शब्दाने प्राणी (सत्त्व) अभिप्रेत आहे. "केलेल्या आणि न केलेल्या कर्मांसह चोरांच्या (माणवांच्या) सोबत जातात..." इत्यादींमध्ये 'माणव' म्हणजे चोर होय. "अम्बट्ठ माणव" इत्यादींमध्ये 'माणव' शब्दाने तरुण अभिप्रेत आहे. อปฺป ปาปุเณ. อปฺโปติ. อาโป. 'अप्प' हा धातू प्राप्त करणे (पापुणे) या अर्थात आहे. 'अप्पोति' (प्राप्त करतो). 'आपो' (पाणी/आप-धातू). เอตฺถ อาโปติ อปฺโปติ ตํ ตํ ฐานํ วิสฺสรตีติ อาโป. येथे 'आपो' म्हणजे जो त्या त्या ठिकाणी पसरतो (व्याप्त करतो) तो 'आपो' (जल) होय. มา ปริมาเณ. มิโนติ. อุปมา, อุปมานํ, วิมานํ. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. 'मा' हा धातू परिमाण (मोजणे) या अर्थात आहे. 'मिनोति' (मोजतो). उपमा, उपमान, विमान. इतरही (शब्द) योजावेत. เอตฺถ จ ยา อจฺจนฺตํ น มิโนติ น วิจฺฉินฺทติ, สา มานสฺส สมีเป วตฺตตีติ อุปมา ยถา ‘‘โคโณ วิย ควโช’’ติ. อุปมานนฺติ [Pg.266] อุปมา เอว. ตถา หิ ‘‘วีโตปมานมปฺปมาณมนาถนาถ’’นฺติ. เอตฺถ วีโตปมานนฺติ อิมสฺส วีโตปมํ, นิรุปมนฺติ อตฺโถ. อถ วา อุปมานนฺติ อุปเมตพฺพากาโร ‘‘สีโห วิย ภควา’’ติ. เอตฺถ หิ สีโห อุปมา, ภควา อุปเมยฺโย เตโชปรกฺกมาทีหิ อุปเมตพฺพตฺตา, เตโชปรกฺกมาทโย อุปเมตพฺพากาโร. เอตฺถ ปน สาติสยตฺตา กิญฺจาปิ สีหสฺส เตชาทีหิ ภควโต เตชาทิอุปเมตพฺพากาโร นตฺถิ, ตถาปิ หีนูปมาวเสน ‘‘สีโห วิย ภควา’’ติ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. วิมานนฺติ อุตุสมุฏฺฐานตฺเตปิ กมฺมปจฺจยอุตุสมุฏฺฐานตฺตา กมฺเมน วิเสสโต มินิยติ ปริจฺฉินฺทิยตีติ วิมานํ. आणि येथे जी अत्यंत मोजत नाही किंवा खंडित करत नाही, ती मापनाच्या (मोजण्याच्या) जवळ असते म्हणून ती 'उपमा' होय; जसे की "बैलासारखा रानबैल (गवय)". 'उपमान' म्हणजे उपमाच होय. तसेच "वीतोपमानमप्पमाणमनाथनाथं" (उपमारहित, अमर्याद, अनाथांचे नाथ). येथे 'वीतोपमानं' याचा अर्थ 'वीतोपम' म्हणजेच 'निरुपम' (ज्याला उपमा नाही असा) असा आहे. किंवा 'उपमान' म्हणजे उपमेय आकार (सादृश्य); जसे की "सिंहासारखे भगवान". येथे 'सिंह' ही उपमा आहे, 'भगवान' हे उपमेय आहेत कारण त्यांचे तेज, पराक्रम इत्यादींशी सादृश्य केले जाते, आणि तेज, पराक्रम इत्यादी उपमेय आकार (गुणधर्म) आहेत. येथे अतिशय श्रेष्ठत्वामुळे जरी सिंहाच्या तेजाशी भगवंतांच्या तेजाची तुलना होऊ शकत नाही, तरीही हीन उपमेच्या (कनिष्ठ उपमेच्या) स्वरूपात "सिंहासारखे भगवान" असे म्हटले आहे, असे समजावे. 'विमान' म्हणजे ऋतूमुळे उत्पन्न होणारे असले तरी, कर्मप्रत्यय आणि ऋतूमुळे उत्पन्न झाल्यामुळे कर्माद्वारे विशेष रूपाने जे मोजले (निश्चित केले) जाते, ते 'विमान' होय. กร กรเณ. ‘‘กโรติ, กยิรติ, กุพฺพติ, กฺรุพฺพติ, ปกโรติ, อุปกโรติ, อปกโรติ, ปฏิกโรติ, นิรากโรติ, ปฏิสงฺขโรติ, อภิสงฺขโรติ’’ อิจฺเจวมาทีนิ กตฺตริ ภวนฺติ. กมฺเม ปาฬินยวเสน อิการาคมฏฺฐาเน ยการสฺส ทฺเวภาโว. ตสฺมึเยวฐาเน รยการานํ วิปริยาเย สติ น ทฺเวภาโว. ตถา อีการาคมฏฺฐาเน ‘‘กริยฺยติ, กยิรติ, กรียติ, กยฺยติ, ปกรียติ, ปกริยฺยติ, ปฏิสงฺขริยฺยติ, อภิสงฺขริยฺยติ’’ อิจฺเจวมาทีนิ กมฺมนิ ภวนฺติ. 'कर' हा धातू करणे (करणे) या अर्थात आहे. "करोति, कयिरति, कुब्बति, क्रुब्बति, पकरोति, उपकरोति, अपकरोति, पटिकरोति, निराकरोति, पटिसंखरोति, अभिसंखरोति" इत्यादी रूपे कर्तरी प्रयोगात होतात. कर्मणी प्रयोगात पालि नियमानुसार 'इ' कार आगमाच्या जागी 'य' काराचे द्वित्व होते. त्याच ठिकाणी 'र' आणि 'य' कारांचा विपर्यास (क्रम बदलणे) झाल्यास द्वित्व होत नाही. तसेच 'ई' कार आगमाच्या जागी "करिय्यति, कयिरति, करीयति, कय्यति, पकरीयति, पकरिय्यति, पटिसंखरिय्यति, अभिसंखरिय्यति" इत्यादी रूपे कर्मणी प्रयोगात होतात. เอตฺถ จ กยิรตีติ ปทํ ทฺวีสุ ฐาเนสุ ทิสฺสติ กตฺตริ กมฺเม จ. เตส กตฺตุวเสน ‘‘ปุริโส กมฺมํ กยิรตี’’ติ โยเชตพฺพํ, กมฺมวเสน ปน อยํ ปาฬิ ‘‘กุฏิ เม กยิรติ อเทสิตวตฺถุกา’’ติ. ตตฺถ จ กตฺตุวเสน วุตฺตํ กตฺตุปทํ ยิรปจฺจเยน สิทฺธํ. กมฺมวเสน ปน วุตฺตํ กมฺมปทํ อิการาคมสฺส อาทิอนฺตภูตานํ รยการานํ วิปริยาเยนาติ ทฏฺฐพฺพํ. ‘‘กาเรติ, การยติ, การาเปติ, การาปยตี’’ติ จตฺตาริ การิตรูปานิ, ยานิ ‘‘เหตุกตฺตุรูปานี’’ติ วุจฺจนฺติ ตทฺทีปกตฺตา. आणि येथे 'कयिरति' हे पद कर्तरी आणि कर्मणी या दोन्ही प्रयोगांत दिसते. त्यापैकी कर्तरी प्रयोगात "पुरिसो कम्मं कयिरति" (पुरुष कर्म करतो) अशी योजना करावी. कर्मणी प्रयोगात ही पालि अशी आहे - "कुटि मे कयिरति अदेसितवत्थुका" (माझ्यासाठी अनिर्दिष्ट जागेवर कुटी बनवली जात आहे). आणि तेथे कर्तरी प्रयोगात सांगितलेले कर्तृपद 'यिर' प्रत्ययाने सिद्ध होते. कर्मणी प्रयोगात सांगितलेले कर्मपद 'इ' कार आगमाच्या आदि आणि अंत असलेल्या 'र' व 'य' कारांच्या विपर्यासाने (व्यत्ययाने) सिद्ध होते, असे समजावे. "कारेति, कारयति, कारापेति, कारापयति" ही चार कारित (प्रयोजक) रूपे आहेत, ज्यांना हेतू-कर्ता रूपे (प्रयोजक कर्तृरूपे) म्हटले जाते, कारण ती त्या अर्थाचे द्योतक आहेत. อิทานิ [Pg.267] ปน ปทมาลา วตฺตพฺพา, ตตฺร ปฐมํ ‘‘กุพฺพตี’’ติ ปทสฺเสว ปทมาลํ โยเชสฺสาม สพฺพาสุ วิภตฺตีสุ เอกากาเรน โยเชตพฺพตฺตา. ‘‘กโรตี’’ติ โอการานนฺตรตฺยนฺตปทสฺส ปน ‘‘กาเรตี’’ติ เอการานนฺตรตฺยนฺตปทสฺส จ ปทมาลํ ยถาสมฺภวํ ปจฺฉา โยเชสฺสาม เอกากาเรน อโยเชตพฺพตฺตา. आता पदमाला (रूपावली) सांगितली पाहिजे. त्यामध्ये प्रथम 'कुब्बति' या पदाचीच पदमाला योजू, कारण सर्व विभक्तींमध्ये ते एकाच प्रकारे योजले जाते. परंतु 'करोति' या ओ-कारान्त तिङन्त पदाची आणि 'कारेति' या ए-कारान्त तिङन्त पदाची पदमाला एकाच प्रकारे योजता येत नसल्यामुळे, यथासंभव नंतर योजू. ตตฺร กุพฺพติ, กุพฺพนฺติ. กุพฺพสิ, กุพฺพถ. กุพฺพามิ, กุพฺพาม. กุพฺพเต, กุพฺพนฺเต. กุพฺพเส, กุพฺพวฺเห. กุพฺเพ, กุพฺพมฺเห. วตฺตมานาวเสน วุตฺตรูปานิ. तेथे कुब्बति, कुब्बन्ति। कुब्बसि, कुब्बथ। कुब्बा मि, कुब्बा म। कुब्बते, कुब्बन्ते। कुब्बसे, कुब्बव्हे। कुब्बे, कुब्बम्हे। ही वर्तमानकाळाच्या (वत्तमाना विभक्तीच्या) अनुसार सांगितलेली रूपे आहेत. ปญฺจมิยาทีนํ วเสน ปน กุพฺพตุ, กุพฺพนฺตุ. กุพฺเพยฺย, กุพฺเพยฺยุํ. เสสํ ‘‘ภวติ, ภวนฺตี’’ติ วุตฺตนยานุสาเรน สพฺพตฺถ วิตฺถาเรตพฺพํ. पंचमी (आज्ञार्थ) इत्यादींच्या अनुसार - कुब्बतु, कुब्बन्तु। कुब्बेय्य, कुब्बेय्युं। उर्वरित रूपे "भवति, भवन्ति" या सांगितलेल्या नियमानुसार सर्वत्र सविस्तर जाणावीत. ‘‘กริยตี’’ติอาทีนิปิ อ การานนฺตรตฺยนฺตปทานิ เอวเมว โยเชตพฺพานิ. เอตฺถ จ ‘‘กุพฺพติ, กุพฺพนฺติ. กุพฺพสี’’ติอาทินา วุตฺตา อยํ ปทมาลา ปาฬินยทสฺสนโต เอทิสี วุตฺตา. สทฺทสตฺถวิทู ปน สาสนิกา สทฺทสตฺเถเยว อาทรํ กตฺวา ‘‘กุพฺพติ, กุพฺพสี’’ติ เอวํปการานิ รูปานิ ปาฬิยํ นตฺถีติ มญฺญนฺตา น อิจฺฉนฺติ. เตหิ สทฺทสตฺเถ วิย ปาฬิยมฺปิ ‘‘อสนฺโต นานุกุพฺพนฺตี’’ติอาทีสุ โอการปจฺจยสฺสาเทสภูโต อุกาโร สเรเยว ปเร วการํ ปปฺโปตีติ มญฺญมานา ‘‘กุพฺพนฺติ, กุพฺพนฺเต’’ติอาทีนิเยว รูปานิ อิจฺฉนฺติ, ปรสรสฺสาภาวโต ‘‘กุพฺพติ, กุพฺพสี’’ติอาทีนิ ปาฬิยํ นตฺถีติ น อิจฺฉนฺติ. มยํ ปน ปาฬินยทสฺสนโต ตานิ รูปานิ อิจฺฉาม. อตฺร โสตารานํ กงฺขาวิโนทนตฺถํ กิญฺจิ ปาฬินยํ วทาม – ‘‘สีลวนฺโต น กุพฺพนฺติ, พาโล สีลานิ กุพฺพตี’’ติ จ, ‘‘กสฺมา ภวํ วิชนมรญฺญนิสฺสิโต, ตโป อิธ กฺรุพฺพตี’’ติ จ, ‘‘ผรุสาหิ วาจาหิ ปกฺรุพฺพมาโน’’ติ จ. อีทิเสสุ ปน ฐาเนสุ อการาคโม กาตพฺโพ[Pg.268]. อจินฺเตยฺโย หิ ปาฬินโย, เยภุยฺเยน สทฺทสตฺถนยวิทูโร จ. ตถา หิ ยถา ‘‘อคฺคินึ สมฺปชฺชลิตํ ปวิสนฺตี’’ติ ปาฬิคติทสฺสนโต ‘‘อคฺคินิ, อคฺคินี, อคฺคินโย. อคฺคินึ, อคฺคินี, อคฺคินโย. อคฺคินินา’’ติ ปทมาลา กาตพฺพา โหติ, เอวเมว ‘‘พาโล สีลานิ กุพฺพตี’’ติ ปาฬิคติทสฺสนโต ‘‘กุพฺพติ, กุพฺพนฺติ. กุพฺพสี’’ติ ปทมาลาปิ โยเชตพฺพาว. “करियती” इत्यादी अ-कारान्त आणि अति-अन्त पदे देखील याचप्रमाणे योजावीत. आणि येथे “कुब्बति, कुब्बन्ति, कुब्बसि” इत्यादी रूपांनी सांगितलेली ही पदमाला पाळी नियमाच्या दृष्टीने अशीच सांगितली आहे. परंतु, व्याकरण जाणणारे बौद्ध विद्वान केवळ व्याकरणाचाच आदर करून “कुब्बति, कुब्बसि” अशा प्रकारची रूपे पाळीमध्ये नाहीत असे मानून ती स्वीकारत नाहीत. ते व्याकरणाप्रमाणे पाळीमध्ये देखील “असन्तो नानुकुब्बन्ति” इत्यादींमध्ये ‘ओ’ कार प्रत्ययाचा आदेश असलेला ‘उ’ कार स्वराच्या पुढे असताना ‘व’ कार बनतो असे मानून “कुब्बन्ति, कुब्बन्ते” इत्यादी रूपेच स्वीकारतात, आणि पर-स्वराच्या अभावामुळे “कुब्बति, कुब्बसि” इत्यादी रूपे पाळीमध्ये नाहीत असे मानून ती स्वीकारत नाहीत. परंतु, आम्ही पाळी नियमाच्या दृष्टीने ती रूपे स्वीकारतो. येथे श्रोत्यांच्या शंकेचे निरसन करण्यासाठी आम्ही काही पाळी नियम सांगतो – “सीलवन्तो न कुब्बन्ति, बालो सीलानि कुब्बति” (शीलवान करत नाहीत, बाल/मूर्ख शीलांचे आचरण करतो) आणि “कस्मा भवं विजनमरण्ञनिस्सितो, तपो इध क्रुब्बति” (आपण निर्जन अरण्याचा आश्रय घेऊन येथे तप का करत आहात?) आणि “फरुसाहि वाचाहि पक्रुब्बमानो” (कठोर शब्दांनी करत असताना). अशा ठिकाणी मात्र ‘अ’ काराचा आगम केला पाहिजे. कारण पाळीचा नियम अचिंत्य आहे आणि तो बहुतांश करून व्याकरण शास्त्राच्या नियमापेक्षा वेगळा आहे. तसेच, ज्याप्रमाणे “अग्गिनिं सम्पज्जलितं पविसन्ति” या पाळी प्रयोगावरून “अग्गिनि, अग्गिनी, अग्गिनयो। अग्गिनिं, अग्गिनी, अग्गिनयो। अग्गिनिना” अशी पदमाला तयार करावी लागते, त्याचप्रमाणे “बालो सीलानि कुब्बति” या पाळी प्रयोगावरून “कुब्बति, कुब्बन्ति, कुब्बसि” अशी पदमाला देखील योजावीच लागेल. ยถา จ ‘‘พหุมฺเปตํ อสพฺภิ ชาตเวทา’’ติ ปาฬิคติทสฺสนโต ‘‘สนฺโต สพฺภีหิ สทฺธึ สตํ ธมฺโม น ชรํ อุเปตีติ ปเวทยนฺตี’’ติ อฏฺฐกถาคติทสฺสนโต จ ‘‘สพฺภิ, สพฺภี, สพฺภโย. สพฺภึ, สพฺภี, สพฺภโย. สพฺภินา’’ติ ปทมาลา โยเชตพฺพา โหติ, เอวเมว ‘‘พาโล สีลานิ กุพฺพตี’’ติ ปาฬิคติทสฺสนโต ‘‘กุพฺพติ, กุพฺพนฺติ. กุพฺพสี’’ติ ปทมาลาปิ โยเชตพฺพาว. ตถา ‘‘กฺรุพฺพติ, กฺรุพฺพนฺติ. กฺรุพฺพสี’’ติอาทิ สพฺพํ สพฺพตฺถ โยเชตพฺพํ. आणि ज्याप्रमाणे “बहुम्पेतं असब्भि जातवेदा” या पाळी प्रयोगावरून आणि “सन्तो सब्भीहि सद्धिं सतं धम्मो न जरं उपेतीति पवेदयन्ति” या अट्ठकथा प्रयोगावरून “सब्भि, सब्भी, सब्भयो। सब्भिं, सब्भी, सब्भयो। सब्भिना” अशी पदमाला योजावी लागते, त्याचप्रमाणे “बालो सीलानि कुब्बति” या पाळी प्रयोगावरून “कुब्बति, कुब्बन्ति, कुब्बसि” अशी पदमाला देखील योजावीच लागेल. तसेच “क्रुब्बति, krुब्बन्ति, क्रुब्बसि” इत्यादी सर्व रूपे सर्वत्र योजावीत. อิทานิ ยถาปฏิญฺญาตา ปทมาลา อนุปฺปตฺตา. กโรติ, กโรนฺติ. กโรสิ, กโรถ. กโรมิ, กุมฺมิ, กโรม, กุมฺม. กุรุเต, กุพฺพนฺเต. กุรุเส, กุรุวฺเห. กเร, กรุมฺเห. วตฺตมานาวเสน วุตฺตรูปานิ. आता प्रतिज्ञा केल्याप्रमाणे पदमाला प्राप्त झाली आहे. करोति, करोन्ति. करोसि, करोथ. करोमि, कुम्मि, करोम, कुम्म. कुरुते, कुब्बन्ते. कुरुसे, कुरुव्हे. करे, करुम्हे. ही वर्तमानकाळाच्या (वत्तमाना) दृष्टीने सांगितलेली रूपे आहेत. กโรตุ, กุรุตุ, กโรนฺตุ. กโรหิ, กโรถ. กโรมิ, กุมฺมิ, กโรม, กุมฺม. กุรุตํ, กุพฺพนฺตํ. กรสฺสุ, กุรุสฺสุ, กุรุวฺโห. กเร, กุพฺพามเส. ปญฺจมีวเสน วุตฺตรูปานิ. करोतु, कुरुतु, करोन्तु. करोहि, करोथ. करोमि, कुम्मि, करोम, कुम्म. कुरुतं, कुब्बन्तं. करस्सु, कुरुस्सु, कुरुव्हो. करे, कुब्बामसे. ही पंचमी विभक्तीच्या (आज्ञार्थ/पंचमी) दृष्टीने सांगितलेली रूपे आहेत. เอตฺถ ปน โกจิ วเทยฺย – येथे कोणी असे म्हणू शकेल – ‘‘น โน วิวาโห นาเคหิ, กตปุพฺโพ กุทาจนํ; ตํ วิวาหํ อสํยุตฺตํ, กถํ อมฺเห กโรมเส’’ติ “नागांशी आमचा विवाह कधीही झालेला नाही; तो अयोग्य विवाह आम्ही कसा करावा (करोमसे)?” ปาฬิทสฺสนโต [Pg.269] ‘‘กโรมเส’’ติ ปทํ กสฺมา อิธ น วุตฺตํ, นนุ กรธาตุโต ปรํ โอการํ ปฏิจฺจ อามเสวจนสฺสาวยวภูโต อากาโร โลปํ ปปฺโปตีติ? ตนฺน, ‘‘กโรมเส’’ติ เอตฺถ ‘‘อามเส’’ติ วจนสฺส อภาวโต มวจนสฺส สพฺภาวโต. เอตฺถ หิ เสกาโร อาคโม, ตสฺมา ‘‘กโรมา’’ติ วตฺตมานาวจนวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ, น ปน ปญฺจมีวจนวเสน. เอวํภูโต จ เสกาโร กตฺถจิ นามิกปทโต ปโร โหติ ‘‘เย เกจิ พุทฺธํ สรณํ คตาเส. ยํ พลํ อหุวมฺหเส’’ติอาทีสุ. กตฺถจิ ปนาขฺยาติกปทโต สาเทสนิราเทสวเสน – पाळी प्रयोगावरून “करोमसे” हे पद येथे का सांगितले नाही? ‘कर’ धातूच्या पुढे ‘ओ’ कार आल्यामुळे ‘आमसे’ प्रत्ययाचा अवयव असलेला ‘आ’ कार लोप पावतो की काय? तसे नाही, “करोमसे” येथे “आमसे” प्रत्ययाचा अभाव असून ‘म’ प्रत्ययाचे अस्तित्व आहे. येथे ‘से’ कार हा आगम आहे, म्हणून “करोमा” या वर्तमानकाळाच्या वचनानुसार अर्थ घ्यावा, पंचमी विभक्तीच्या वचनानुसार नाही. आणि अशा प्रकारचा ‘से’ कार काही ठिकाणी नामपदाच्या पुढे येतो, जसे की “ये केचि बुद्धं सरणं गतासे”, “यं बलं अहुवम्हसे” इत्यादींमध्ये. तर काही ठिकाणी आख्यात पदाच्या (क्रियापदाच्या) पुढे ‘स’ च्या आदेश किंवा निरादेश रूपाने येतो – ‘‘อกรมฺหส เต กิจฺจํ; โอกฺกนฺตามสิ ภูตานิ; สุตํ เนตํ อภิณฺหโส, ตสฺมา เอวํ วเทมเส’’ติ “आम्ही तुझे कार्य केले (अकरम्हस); प्राणी उत्पन्न झाले आहेत (ओक्कन्तामसि); हे आम्ही वारंवार ऐकले आहे, म्हणून आम्ही असे बोलतो (वदेमसे)” – อาทีสุ. इत्यादींमध्ये. กเรยฺย, กเรยฺยุํ. กเรยฺยาสิ, กเรยฺยาถ. กเรยฺยามิ, กเรยฺยาม. กุพฺเพถ, กุพฺเพรํ. กุพฺเพโถ, กุพฺเพยฺยวฺโห. กเรยฺยํ, กเร, กเรยฺยามฺเห. สตฺตมีวเสน วุตฺตรูปานิ. करेय्य, करेय्युं. करेय्यासि, करेय्याथ. करेय्यामि, करेय्याम. कुब्बेथ, कुब्बेरं. कुब्बेथो, कुब्बेय्यव्हो. करेय्यं, करे, करेय्याम्हे. ही सप्तमी विभक्तीच्या (विध्यर्थ/सत्तमी) दृष्टीने सांगितलेली रूपे आहेत. กร, กรุ. กเร, กริตฺถ. กรํ, กริมฺห. กริตฺถ, กริเร. กริตฺโถ, กริวฺโห. กรึ, กริมฺเห. ปโรกฺขาวเสน วุตฺตรูปานิ. कर, करु. करे, करित्थ. करं, करिम्ह. करित्थ, करिरे. करित्तो, करिव्हो. करिं, करिम्हे. ही परोक्षा विभक्तीच्या (परोक्खा/भूतकाळ) दृष्टीने सांगितलेली रूपे आहेत. เอตฺถ กราติ ปุริโส กมฺมํ กรีติ ปฐมปุริสโยชนาย โยเชตพฺพํ. ‘‘อาคุํ กร มหาราช, อกรํ กมฺมทุกฺกฏ’’นฺติ เอตฺถาปิ ‘‘มหาราช ภวํ อาคุํ กรี’’ติ ปฐมปุริสโยชนาย โยเชตพฺพํ. เอวญฺหิ สติ อยํ ปโยโค ‘‘มญฺเญ ภวํ ปตฺถยติ, รญฺโญ ภริยํ ปติพฺพต’’นฺติอาทโย วิย ปฐมปุริสปฺปโยโค ภวติ. येथे “करा” म्हणजे “पुरुष कर्म करतो (करी)” अशा प्रथम पुरुष योजनेनुसार योजना करावी. “आगुं कर महाराज, अकरं कम्मदुक्कटं” येथे देखील “महाराज, आपण अपराध केला (करी)” अशा प्रथम पुरुष योजनेनुसार योजना करावी. असे असल्यास हा प्रयोग “मञ्ञे भवं पत्थयति, रञ्ञो भरियं पतिब्बतं” इत्यादींप्रमाणे प्रथम पुरुषाचा प्रयोग होतो. ชาตกฏฺฐกถายํ [Pg.270] ปน มชฺฌิมปุริสปฺปโยโค วุตฺโต ‘‘อาคุํ กราติ มหาราช ตฺวํ มหาปราธํ มหาปาปํ กริ. ทุกฺกฏนฺติ ยํ กตํ ทุกฺกฏํ โหติ,ตํ ลามกํ กมฺมํ อกร’’นฺติ, ตสฺมา ชาตกฏฺฐกถาวเสนาปิ กทาจิ กรอิติ จ กรีติ จ อกรนฺติ จ มชฺฌิมปุริสปฺปโยโค ภวตีติ ทฏฺฐพฺพํ. เยภุยฺยวเสน ปน ‘‘ปุริโส กมฺมํ กร, ปุริโส กมฺมํ กริ, อหํ กมฺมํ อกร’’นฺติ ปฐมุตฺตมปุริสปฺปโยโค ทฏฺฐพฺโพ. เอตฺถ จ กรอิติ ยถาวุตฺตวิภตฺติวเสน, กรีติ อชฺชตนีวเสน, อกรนฺติ หิยฺยตฺตนีวเสน วุตฺตํ. ตตฺถ ‘‘กริตฺโถ’’ติ ปทํ ‘‘อญฺญํ ภตฺตารํ ปริเยส, มา กิสิตฺโถ มยา วินา’’ติ เอตฺถ ‘‘กิสิตฺโถ’’ติ ปเทน สมํ ปโรกฺขายตฺตโนปทมชฺฌิมปุริเสกวจนวเสน, เอทิโส ปน นโย อญฺญตฺราปิ ยถาสมฺภวํ โยเชตพฺโพ. परंतु जातक-अट्ठकथेमध्ये मध्यम पुरुषाचा प्रयोग सांगितला आहे – “आगुं करा म्हणजे हे महाराज, तू मोठा अपराध, मोठे पाप केलेस (करी). दुक्कटं म्हणजे जे दुष्कृत्य केले आहे, ते वाईट कर्म केलेस (अकर).” म्हणून जातक-अट्ठकथेच्या अनुसार देखील कधीकधी ‘करा’, ‘करी’ आणि ‘अकर’ हे मध्यम पुरुषाचे प्रयोग होतात असे समजावे. परंतु बहुतांश करून “पुरिसो कम्मं कर” (पुरुषाने कर्म केले – प्रथम पुरुष), “पुरिसो कम्मं करि” (पुरुषाने कर्म केले – प्रथम पुरुष), “अहं कम्मं अकरं” (मी कर्म केले – उत्तम पुरुष) असा प्रथम आणि उत्तम पुरुषाचा प्रयोग समजावा. आणि येथे ‘करा’ हे वर सांगितलेल्या विभक्तीनुसार, ‘करी’ हे अज्जतनी (नजीकचा भूतकाळ) नुसार आणि ‘अकर’ हे हिय्यतनी (कालचा भूतकाळ) नुसार सांगितले आहे. तेथे “करित्तो” हे पद “अञ्ञं भत्तारं परियेस, मा किसित्तो मया विना” (दुसऱ्या पतीचा शोध घे, माझ्याशिवाय कृश होऊ नकोस) येथील “किसित्तो” या पदाप्रमाणे परोक्षा आणि हिय्यतनी मध्यम पुरुष एकवचनाच्या रूपाने योजले आहे, आणि असा नियम इतरत्र देखील यथासंभव योजावा. อกา, อกรา, อกร อิติ รสฺสปาโฐปิ. อกรุ. เอตฺถ ‘‘สพฺพาริวิชยํ อกา’’ติ ปทํ นิทสฺสนํ. อกราติ ปุริโส กมฺมํ อกาสีติ อตีตกฺริยาวาจโก ปฐมปุริสปฺปโยโค ทฏฺฐพฺโพ. ตถา หิ ‘‘รชฺชสฺส กิร โส ภีโต, อกรา อาลเย พหู’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. ‘‘มา เมตํ อกรา กมฺมํ, มา เม อุทกมาหรี’’ติ เอตฺถ ปน สนฺเตปิ อตีตวาจกปฏฺฐมปุริสปฺปโยคภาเว มาสทฺทโยคโต หิยฺยตฺตนชฺชตนีวิภตฺติโย ปญฺจมีวิภตฺติอตฺเถ อนุตฺตกาลิกา หุตฺวา ‘‘ตฺวํ มา กโรสิ, มา อาหรสี’’ติ มชฺฌิมปุริสปฺปโยคารหา ภวนฺติ. अका, अकरा, अकर असा र्हस्व पाठ देखील आहे. अकरु. येथे “सब्बारिविजयं अका” (सर्व शत्रूंवर विजय मिळवला) हे पद उदाहरण आहे. ‘अकरा’ म्हणजे “पुरुषाने कर्म केले (अकासि)” असा भूतकाळ दर्शवणारा प्रथम पुरुषाचा प्रयोग समजावा. कारण “रज्जस्स किर सो भीतो, अकरा आलये बहू” (राज्याला घाबरून त्याने अनेक निवासस्थाने बनवली) अशी पाळी आढळते. “मा मेतं अकरा कम्मं, मा मे उदकमाहरी” (माझ्यासाठी हे कर्म करू नकोस, माझ्यासाठी पाणी आणू नकोस) येथे भूतकाळ दर्शवणारा प्रथम पुरुषाचा प्रयोग असला तरी, ‘मा’ शब्दाच्या योगामुळे हिय्यतनी आणि अज्जतनी विभक्ती पंचमी विभक्तीच्या अर्थात वर्तमानकालीन (अनुकूल काळाची) होऊन “त्वं मा करोसि, मा आहरसि” (तू करू नकोस, आणू नकोस) अशा मध्यम पुरुषाच्या प्रयोगास योग्य ठरतात. กิญฺจ ภิยฺโย ‘‘ชราธมฺมํ มา ชีรีติ อลพฺภเนยฺยํ ฐาน’’นฺติอาทีสุปิ สนฺเตปิ อตีตวาจกปฐมปุริสปฺปโยคภาเว มาสทฺทโยคโต อชฺชตนีวิภตฺติปญฺจมีวิภตฺติอตฺเถ อนุตฺตกาลิกา หุตฺวา ‘‘มา ชีรตู’’ติอาทินา ปฐมปุริสปฺปโยคารหา [Pg.271] ภวนฺติ. เตนาหุ อฏฺฐกถาจริยา ‘‘ชราธมฺมํ มา ชีรีติ ยํ มยฺหํ ชราสภาวํ, ตํ มา ชีริตุ. เอส นโย เสเสสุปี’’ติ. ยํ ปนมฺเหหิ ‘‘อกร อิติ รสฺสปาโฐปี’’ติ วุตฺตํ, ตสฺส ‘‘อติกร’มกรา’จริย, มยฺหมฺเปตํ น รุจฺจตี’’ติ อิมาย ปาฬิยา วเสน อตฺถิตา เวทิตพฺพา. ตสฺสายมตฺโถ ‘‘อาจริย ภวํ อติกฺกนฺตกรณํ อกรา’’ติ ปฐมปุริสวเสน คเหตพฺโพ. อปิจ ‘‘ภว’’นฺติ วตฺตพฺเพ อตฺเถ ‘‘ตฺว’’นฺติ วจนํ วตฺตพฺพเมวาติ อธิปฺปายวเสน ‘‘อาจริย ตฺวํ อติกฺกนฺตกรณํ กโรสี’’ติ โยชนาปิ กาตพฺพาว. आणखी काय, 'जराधम्मं मा जीरि' (जरास्वभावाचे जीर्ण होऊ नये) हे अप्राप्य स्थान आहे, इत्यादींमध्ये भूतकाळवाचक प्रथमपुरुष प्रयोगाचा भाव असतानाही, 'मा' शब्दाच्या योगामुळे अज्जतनी (अद्यतन भूतकाळ) विभक्ती आणि पंचमी विभक्तीच्या अर्थात काळ-मर्यादेशिवाय 'मा जीरतु' (जीर्ण होऊ नये) इत्यादी रूपाने प्रथमपुरुष प्रयोगास योग्य होतात. म्हणूनच अट्ठकथाचार्यांनी म्हटले आहे - 'जराधम्मं मा जीरि म्हणजे माझा जो जरास्वभाव आहे, तो जीर्ण होऊ नये. हाच नियम इतरांच्या बाबतीतही लागू होतो.' आणि आम्ही जे 'अकर असा र्हस्व पाठ देखील आहे' असे म्हटले आहे, त्याचे अस्तित्व 'अतिकर'मकर'आचरिय, मय्हम्पेतं न रुच्चति' या पाळीच्या आधारे समजून घ्यावे. त्याचा हा अर्थ आहे - 'हे आचार्या, आपण अतिशय कृत्य केले आहे' असा प्रथमपुरुषाच्या अर्थाने घ्यावा. शिवाय, 'भवं' (आपण) असे म्हणण्याच्या अर्थात 'त्वं' (तू) हा शब्द वापरला पाहिजे, या अभिप्रायाने 'हे आचार्या, तू अतिशय कृत्य करत आहेस' अशी योजना देखील करावी. อกโร, อกตฺถ, อกโรถ. อกรํ, อกํ, อกรมฺห, อกมฺห. เอตฺถ ‘‘สํวฑฺฒยิตฺวา ปุฬินํ, อกํ ปุฬินเจติย’’นฺติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. อกตฺถ, อกตฺถุํ. อกุรุเส, อกรวฺหํ. อกรึ, อกรํ, อกรมฺหเส. หิยฺยตฺตนีวเสน วุตฺตรูปานิ. अकरो, अकत्थ, अकरोथ. अकरं, अकं, अकरम्ह, अकम्ह. येथे 'संवड्ढयित्वा पुळिनं, अकं पुळिनचेतियं' (वाळू गोळा करून, मी वाळूचे चेत्य बनवले) हे पाळीचे उदाहरण आहे. अकत्थ, अकत्थुं. अकुरुसे, अकरव्हं. अकरिं, अकरं, अकरम्हसे. ही हिय्यतनी (ह्यस्तन भूतकाळ) च्या नियमाने सांगितलेली रूपे आहेत. เอตฺถ จ ปญฺจวิโธ เสกาโร อาหริตฺวา ทสฺเสตพฺโพ. ตถา หิ ปญฺจวิโธ เสกาโร ปทาวยว อปทาวยวอเนกนฺตปทาวยว โสสทฺทตฺถ อาเทสวเสน. ตตฺถ ปทาวยโว เสกาโร ‘‘ตฺวํ กมฺมํ กุรุเส, ตฺวํ อตฺถกุสโล อภวเส’’ติอาทีสุ ทฏฺฐพฺโพ. อปทาวยโว ปน ‘‘ตสฺมา เอวํ วเทมเส. มูลา อกุสลา สมูหตาเส’’ติอาทีสุ ทฏฺฐพฺโพ. อเนกนฺตปทาวยโว ‘‘อโรคา จ ภวามเส. มณึ ตาต คณฺหามเส’’อาทีสุ ทฏฺฐพฺโพ. เอตฺถ หิ เสกาโร ยทิ ปญฺจมีวิภตฺติยํ อามเสวจนสฺสาวยโว, ตทา ปญฺจมีวิภตฺติยุตฺตานํ ปตฺถนาสีสนตฺถานํ ‘‘ภวามเส, คณฺหามเส’’ติ ปทานํ อวยโว โหติ. ยทิ ปน อาคโม, ปญฺจมีวิภตฺติยุตฺตานํ ปตฺถนาสีสนตฺถานํ ‘‘ภวาม, คณฺหามา’’ติ ปทานํ อวยโว น โหติ, เอวํ ‘‘ภวามเส’’ติอาทีสุ [Pg.272] เสการสฺส อเนกนฺตปทาวยวตฺตํ เวทิตพฺพํ. โสสทฺทตฺโถ ‘‘เอเสเส เอเก เอกฏฺเฐ’’ติ เอตฺถ ทฏฺฐพฺโพ. เอเสเสติ อิมสฺส หิ ‘‘เอโสโส เอโก เอกฏฺโฐ’’ติ อตฺโถ. อาเทโส ‘‘อกรมฺหส เต กิจฺจ’’นฺติ เอตฺถ, ‘‘โอกฺกนฺตามสิ ภูตานี’’ติ เจตฺถ ทฏฺฐพฺโพ เอการสฺส อการิการาเทสกรณวเสน. ตตฺถ ‘‘อกรมฺหส เต กิจฺจ’’นฺติ อิมสฺส ‘‘อกรมฺหเส เต กิจฺจ’’นฺติ อตฺโถ. ‘‘อกรมฺหเส’’ติ เจตฺถ สเจ เสกาโร อาคโม, ตทา ‘‘กรมฺหา’’ติ ปทํ หิยฺยตฺตนีปรสฺสปเท อุตฺตมปุริสพหุวจนนฺตํ. สเจ ปน มฺหเสวจนสฺสาวยโว, ตทา ‘‘อกรมฺหเส’’ติ ปทํ หิยฺยตฺตนีอตฺตโนปเท อุตฺตมปุริสพหุวจนนฺตํ. เอวํ ปญฺจวิโธ เสกาโร ภวตีติ อวคนฺตพฺพํ. येथे पाच प्रकारचा 'से-कार' (से हा वर्ण) आणून दाखवला पाहिजे. तो असा की, पदावयव, अपदावयव, अनैकांतिकपदावयव, 'सो' शब्दाचा अर्थ आणि आदेश या भेदांमुळे पाच प्रकारचा 'से-कार' होतो. त्यापैकी पदावयव 'से-कार' हा 'त्वं कम्मं कुरुसे, त्वं अत्थकुसलो अभवसे' इत्यादींमध्ये पाहावा. अपदावयव 'से-कार' हा 'तस्मा एवं वदेमसे. मूला अकुसला समूहत असे' इत्यादींमध्ये पाहावा. अनैकांतिकपदावयव 'से-कार' हा 'अरोगा च भवामसे. मणिं तात गण्हामसे' इत्यादींमध्ये पाहावा. येथे जर 'से-कार' हा पंचमी विभक्तीतील 'आमसे' वचनाचा अवयव असेल, तर पंचमी विभक्तीने युक्त असलेल्या प्रार्थना आणि आशीर्वाद अर्थाच्या 'भवामसे, गण्हामसे' या पदांचा अवयव होतो. पण जर तो आगम असेल, तर पंचमी विभक्तीने युक्त असलेल्या प्रार्थना आणि आशीर्वाद अर्थाच्या 'भवाम, गण्हामा' या पदांचा अवयव होत नाही; अशा प्रकारे 'भवामसे' इत्यादींमध्ये 'से-कारा'चे अनैकांतिकपदावयवत्व समजून घ्यावे. 'सो' शब्दाचा अर्थ 'एसेसे एके एकट्ठे' येथे पाहावा. कारण 'एसेसे' याचा अर्थ 'एसो सो एको एकट्ठो' (तो हा एकच अर्थ असलेला) असा आहे. आदेश 'अकरम्हस ते किच्चं' येथे आणि 'ओक्कन्तामसि भूतानि' येथे पाहावा, कारण येथे 'ए-कारा'चा 'अ-कार' आणि 'इ-कार' असा आदेश केला आहे. त्यापैकी 'अकरम्हस ते किच्चं' याचा अर्थ 'अकरम्हसे ते किच्चं' असा आहे. 'अकरम्हसे' येथे जर 'से-कार' आगम असेल, तर 'करम्हा' हे पद हिय्यतनी परस्मैपद उत्तमपुरुष बहुवचनाचे रूप होते. पण जर तो 'म्हसे' वचनाचा अवयव असेल, तर 'अकरम्हसे' हे पद हिय्यतनी आत्मनेपद उत्तमपुरुष बहुवचनाचे रूप होते. अशा प्रकारे पाच प्रकारचा 'से-कार' होतो, हे समजून घ्यावे. อกริ, กริ, อกาสิ, อกรุํ, อกรึสุ, อกํสุ, อกํสุํ. อกโร, อกริตฺถ, อกาสิตฺถ. अकरि, करि, अकासि, अकरुं, अकरिंसु, अकंसु, अकंसुं. अकरो, अकरित्थ, अकासित्थ. เอตฺถ จ อกโรติ ตฺวํ อกโรติ โยเชตพฺพํ. ‘‘อกโร’’ อิติ หิ ปทํ ‘‘วรญฺเจ เม อโท สกฺกา’’ติ เอตฺถ มชฺฌิมปุริเสกวจนตฺถํ ‘‘อโท’’ติ ปทมิว ทฏฺฐพฺพํ ปาฬิยํ อวิชฺชมานตฺเตปิ นยวเสน คเหตพฺพตฺตา. ครู ปน ‘‘อกโร’’ติ วุตฺตฏฺฐาเน ‘‘อกาสี’’ติ มชฺฌิมปุริสวจนํ อิจฺฉนฺติ. ตาทิสญฺหิ ปทํ เยภุยฺเยน ปฐมปุริสวจนเมว โหติ. ตถา หิ ‘‘อทาสิ เม, อกาสิ เม’’ติ ปฐมปุริสปาฬิโย พหู สนฺทิสฺสนฺติ. ‘‘มากาสิ มุขสา ปาปํ, มา โข สูกรมุโข อหู’’ติอาทีสุ ปน มาสทฺทโยคโต ‘‘ตฺวํ ปาปํ มา อกาสิ, มา สูกรมุโข อโหสี’’ติ ปทโยชนา กาตพฺพา โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. येथे 'अकरो' या पदाची 'त्वं अकरो' (तू केलेस) अशी योजना करावी. कारण 'अकरो' हे पद 'वरंचे मे अदो सक्का' येथे मध्यमपुरुष एकवचनाच्या अर्थातील 'अदो' या पदाप्रमाणे पाहावे, कारण पाळीमध्ये ते विद्यमान नसले तरी नियमानुसार ते ग्रहण केले जाते. परंतु आचार्य 'अकरो' असे म्हटलेल्या ठिकाणी 'अकासि' हे मध्यमपुरुषाचे वचन इच्छितात. कारण तसे पद बहुधा प्रथमपुरुषाचेच वचन असते. तसेच 'अदासि मे, अकासि me' (त्याने मला दिले, त्याने माझ्यासाठी केले) अशा प्रथमपुरुषाच्या अनेक पाळी आढळतात. परंतु 'माकासि मुखसा पापं, मा खो सूकरमुखो अहू' इत्यादींमध्ये 'मा' शब्दाच्या योगामुळे 'त्वं पापं मा अकासि, मा सूकरमुखो अहोषि' (तू मुखाने पाप करू नकोस, तू डुकराच्या तोंडाचा होऊ नकोस) अशी पदयोजना करावी लागते, असे पाहावे. อกรึ[Pg.273], กรึ, อกาสึ, อกริมฺห, กริมฺห, อกาสิมฺห. อกรา, อกรู. อกรุเส, อกริวฺหํ. อกรํ, อกริมฺเห. อชฺชตนีวเสน วุตฺตรูปานิ. अकरिं, करिं, अकासिं, अकरिम्ह, करिम्ह, अकासिम्ह. अकरा, अकरू. अकुरुसे, अकरिव्हं. अकरं, अकरिम्हे. ही अज्जतनी (अद्यतन भूतकाळ) च्या नियमाने सांगितलेली रूपे आहेत. กริสฺสติ, กริสฺสนฺติ. กริสฺสสิ, กริสฺสถ. กริสฺสามิ, กริสฺสาม. กริสฺสเต, กริสฺสนฺเต. กริสฺสเส, กริสฺสวฺเห. กริสฺสํ, กสฺสํ อิจฺจปิ. ตถา หิ ปาฬิ ทิสฺสติ ‘‘กสฺสํ ปุริสการิย’’นฺติ. กริสฺสมฺเห. ตถา กาหติ, กาหนฺติ. กาหสิ, กาหถ. กาหามิ, กาหาม. กาหิติ, กาหินฺติ. กาหิสิ อิจฺเจวมาทินา ยถาสมฺภวํ โยเชตพฺพํ. ภวิสฺสนฺตีวเสน วุตฺตรูปานิ. करिस्सति, करिस्सन्ति. करिस्ससि, करिस्सथ. करिस्सामि, करिस्साम. करिस्सते, करिस्सन्ते. करिस्ससे, करिस्सव्हे. करिस्सं, कस्सं इत्यादी. तसेच पाळीमध्ये 'कस्सं पुरिसकारियं' (मी पुरुषाचे कर्तव्य करीन) असे दिसते. करिस्सम्हे. तसेच काहति, काहन्ति. काहसि, काहथ. काहामि, काहाम. काहिति, काहिन्ति. काहिसि इत्यादी प्रकारे यथासंभव योजना करावी. ही भविस्सती (भविष्यकाळ) च्या नियमाने सांगितलेली रूपे आहेत. อกริสฺสา, อกริสฺส, อกริสฺสํสูติ เสสํ สพฺพํ โยเชตพฺพํ. กาลาติปตฺติวเสน วุตฺตรูปานิ. अकरिस्सा, अकरिस्स, अकरिस्संस्ु - याप्रमाणे उर्वरित सर्व योजना करावी. ही कालातिपत्ती (क्रियातिपत्ती भूतकाळ) च्या नियमाने सांगितलेली रूपे आहेत. กยิรติ, กยิรนฺติ. กยิรสิ, กยิราถ. กยิรามิ, กยิราม. กยิรเต. เสสํ โยเชตพฺพํ. วตฺตมานาวเสน วุตฺตรูปานิ. कयिरति, कयिरन्ति. कयिरसि, कयिराथ. कयिरामि, कयिराम. कयिरते. उर्वरित योजना करावी. ही वत्तमाना (वर्तमानकाळ) च्या नियमाने सांगितलेली रूपे आहेत. กยิรตุ, กยิรนฺตุ. เสสํ โยเชตพฺพํ. ปญฺจมีวเสน วุตฺตรูปานิ. कयिरतु, कयिरन्तु. उर्वरित योजना करावी. ही पंचमी (आज्ञार्थ/विद्यार्थ) च्या नियमाने सांगितलेली रूपे आहेत. กยิรา, กุยิรา. กยิรุํ. อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘กุมฺภิมฺหิป’ญฺชลึ กุยิรา, จาตญฺจาปิ ปทกฺขิณ’’นฺติ. ตตฺถ กุมฺภิมฺหิปิ อญฺชลินฺติ เฉโท. กยิราสิ, กยิราถ. กยิรามิ, กยิราม. กยิเรถ, กยิเรรํ. กยิเรโถ, กยิราวฺโห. กยิรํ, กยิรามฺเห. สตฺตมีวเสน วุตฺตรูปานิ. कयिरा, कुयिरा. कयिरुं. येथे ही पाळी आहे - 'कुम्भिम्हिप'ञ्जलिं कुयिरा, चातञ्चापि पदक्खिणं'. तेथे 'कुम्भिम्हि अपि अञ्जलिं' असा संधिच्छेद आहे. कयिरासि, कयिराथ. कयिरामि, कयिराम. कयिरेथ, कयिरेरं. कयिरेथो, कयिराव्हो. कयिरं, कयिराम्हे. ही सत्तमी (विध्यर्थ) च्या नियमाने सांगितलेली रूपे आहेत. ตตฺถ กยิราติ อิทํ ‘‘ปุญฺญญฺเจ ปุริโส กยิรา’’ติ ทสฺสนโต ปฐมปุริสวเสน โยเชตพฺพํ, ‘‘อธมฺมํ สารถิ กยิรา’’ติ เอตฺถาปิ ‘‘สารถิ ภวํ อธมฺมํ กเรยฺยา’’ติ [Pg.274] ปฐมปุริสวเสน โยเชตพฺพํ, น มชฺฌิมปุริสวเสน. อถ วา ‘‘กยิราสี’’ติ วตฺตพฺเพ สิการโลปํ กตฺวา ‘‘กยิรา’’ติ มชฺฌิมปุริสวจนํ วุตฺตนฺติ คเหตพฺพํ. त्यापैकी 'कयिरा' हे 'पुञ्ञञ्चे पुरिसो कयिरा' (जर माणसाने पुण्य केले तर) या उदाहरणावरून प्रथमपुरुषाच्या नियमाने योजावे, 'अधम्मं सारथि कयिरा' येथे देखील 'सारथि भवं अधम्मं करेय्या' (सारथीने अधर्म करू नये) या प्रथमपुरुषाच्या नियमाने ग्रहण करावे, मध्यमपुरुषाच्या नियमाने नाही. किंवा 'कयिरासि' असे म्हणायचे असताना 'स-कारा'चा लोप करून 'कयिरा' हे मध्यमपुरुषाचे वचन म्हटले आहे, असे ग्रहण करावे. เอตฺถ ปน สิยา – ยถา ‘‘ปุตฺตํ ลเภถ วรท’’นฺติ ปาฬิยํ ‘‘ลเภถา’’ติ อิมสฺส ปทสฺส ‘‘สพฺภิเรว สมาเสถ, สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถว’’นฺติอาทีสุ ‘‘สมาเสถา’’ติอาทีนํ วิย ปฐมปุริสวเสน อตฺถํ อคฺคเหตฺวา ปุริสวิปลฺลาสํ กตฺวา ‘‘ลเภยฺย’’นฺติ อุตฺตมปุริสวเสนตฺโถ อฏฺฐกถาจริเยหิ คหิโต, ตถา ตุมฺเหหิปิ ‘‘อธมฺมํ สารถิ กยิรา’’ติ เอตฺถ ‘‘กยิรา’’ติ ปทสฺส ปุริสวิปลฺลาสํ กตฺวา ‘‘กเรยฺยาสี’’ติ มชฺฌิมปุริสวเสนตฺโถ วตฺตพฺโพ, อฏฺฐกถาจริเยหิปิ ‘‘กเรยฺยาสี’’ติ ตทตฺโถ วุตฺโตติ? สจฺจํ, เอวํ สนฺเตปิ อฏฺฐกถาจริเยหิ โวหารตฺเถสุ ปรมโกสลฺลสมนฺนาคตตฺตา ‘‘ตฺว’’นฺติ วตฺตพฺเพ อตฺเถ ภวํสทฺโท ปวตฺตติ, ‘‘ภว’’นฺติ วตฺตพฺเพ อตฺเถ ตฺวํสทฺโท ปวตฺตตีติ จินฺเตตฺวา อธิปฺปายตฺถวเสน ‘‘กเรยฺยาสี’’ติ อตฺโถ วุตฺโต, น ปุริสวิปลฺลาสวเสน. ตถา หิ ‘‘ปุตฺตํ ลเภถ วรท’’นฺติ อิมสฺส อฏฺฐกถายํ ‘‘ลเภถา’’ติ อุลฺลิงฺคิตฺวา ‘‘ลเภยฺย’’นฺติ ปุริสวิปลฺลาสวเสน วิวรณํ กตํ. ‘‘อธมฺมํ สารถิ กยิรา’’ติ อิมสฺส ปน อฏฺฐกถายํ ‘‘กยิรา’’ติ อุลฺลิงฺคิตฺวา ‘‘กเรยฺยาสี’’ติ วิวรณํ กตํ, ตสฺมา ‘‘อธมฺมํ สารถิ กยิรา’’ติ เอตฺถ ปุริสวิปลฺลาโส น จินฺเตตพฺโพ. อถ วา ยถา ‘‘ปุตฺตํ ลเภถ วรท’’นฺติ เอตฺถ จ ‘‘กาเย รโช น ลิมฺเปถา’’ติอาทีสุ เอถวจนํ คหิตํ, เอวํ เอถวจนํ อคฺคเหตฺวา ‘‘ลเภ อถา’’ติ ปทจฺเฉโท กรณีโย. เอวญฺหิ สติ ปุริสวิปลฺลาเสน กิจฺจํ นตฺถิ. ตตฺถ ลเภติ สตฺตมิยา [Pg.275] อุตฺตมปุริสวจนํ ‘‘วชฺฌญฺจาปิ ปโมจเย’’ติ ปทมิว. อถาติ อธิการนฺตเร นิปาโต ปทปูรเณ วา. เอตฺถ จ อธิการนฺตรวเสน อปรมฺปิ วรํ ปุตฺตํ ลเภยฺยนฺติ อตฺโถ. ยสฺมา ปเนตฺถ ทฺวินฺนมตฺถานํ อุปฺปตฺติ ทิสฺสติ, ยสฺมา เจเตสุ ทฺวีสุ ทุชฺชาโน ภควโต อธิปฺปาโย, ตสฺมา ทฺเวปิ อตฺถา คเหตพฺพาว. येथे अशी शंका उपस्थित होऊ शकते की - ज्याप्रमाणे पाळी भाषेतील "पुत्तं लभेथ वरदं" (वर देणाऱ्याकडून पुत्र प्राप्त करावा) या गाथेतील "लभेथ" या पदाचा अर्थ, "सब्भिरेव समासेथ, सब्भि कुब्बेथ सन्थवं" (सज्जनांसोबतच बसावे, सज्जनांसोबतच मैत्री करावी) इत्यादी गाथांमधील "समासेथ" इत्यादी पदांप्रमाणे प्रथम पुरुषाच्या (तृतीय पुरुषाच्या) अर्थाने न घेता, पुरुष-विपर्यास (पुरुष बदल) करून "लभेय्यं" (मी प्राप्त करावे) असा उत्तम पुरुषाच्या अर्थाने अट्ठकथाचार्यांनी घेतला आहे; त्याचप्रमाणे तुम्ही सुद्धा "अधम्मं सारथि कयिरा" (हे सारथी, अधर्म करू नकोस) येथे "कयिरा" या पदाचा पुरुष-विपर्यास करून "करेय्यासि" (तू करावा/करशील) असा मध्यम पुरुषाच्या अर्थाने अर्थ सांगावा, आणि अट्ठकथाचार्यांनी सुद्धा "करेय्यासि" असाच त्याचा अर्थ सांगितला आहे काय? हे सत्य आहे, तरीही अट्ठकथाचार्यांनी व्यावहारिक अर्थांमध्ये परम कौशल्य प्राप्त केलेले असल्यामुळे, "त्वं" (तू) असे म्हणावयाच्या ठिकाणी "भवं" (आपण) हा शब्द वापरला जातो, आणि "भवं" (आपण) म्हणावयाच्या ठिकाणी "त्वं" (तू) हा शब्द वापरला जातो, असा विचार करून अभिप्रायाच्या अर्थानुसार "करेय्यासि" असा अर्थ सांगितला आहे, पुरुष-विपर्यासाच्या कारणाने नाही. कारण, "पुत्तं लभेथ वरदं" याच्या अट्ठकथेमध्ये "लभेथ" असा उल्लेख करून "लभेय्यं" असा पुरुष-विपर्यासाने खुलासा केला आहे. परंतु "अधम्मं सारथि कयिरा" याच्या अट्ठकथेमध्ये "कयिरा" असा उल्लेख करून "करेय्यासि" असा खुलासा केला आहे, म्हणून "अधम्मं सारथि कयिरा" येथे पुरुष-विपर्यासाचा विचार करू नये. अथवा, ज्याप्रमाणे "पुत्तं लभेथ वरदं" येथे आणि "काये रजो न लिम्पेथ" इत्यादींमध्ये 'एथ' (ethavacanaṃ) हे वचन घेतले आहे, त्याप्रमाणे 'एथ' वचन न घेता "लभे अथ" असा पदच्छेद करावा. असे केल्यास पुरुष-विपर्यासाची काही गरज उरत नाही. तेथे "लभे" हे सप्तमी विभक्तीचे उत्तम पुरुषाचे रूप आहे, जसे "वज्झञ्चापि पमोचये" या पदातील 'पमोचये' हे रूप आहे. "अथ" हा दुसऱ्या प्रसंगातील निपात आहे किंवा केवळ पदपूर्तीसाठी आहे. आणि येथे दुसऱ्या प्रसंगानुसार "मी आणखी एक श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करावा" असा अर्थ होतो. कारण येथे दोन्ही अर्थांची उत्पत्ती दिसून येते, आणि या दोन्ही अर्थांपैकी भगवंतांचा नेमका अभिप्राय कोणता हे जाणून घेणे कठीण असल्यामुळे, हे दोन्हीही अर्थ ग्रहण केले पाहिजेत. เอตฺถ ปน กิญฺจาปิ ลิงฺควิปลฺลาโส วิภตฺติวิปลฺลาโส วจนวิปลฺลาโส กาลวิปลฺลาโส ปุริสวิปลฺลาโส อกฺขรวิปลฺลาโสติ ฉพฺพิโธ วิปลฺลาโส อาหริตฺวา ทสฺเสตพฺโพ, ตถาปิ โส อุปริ อาวิภวิสฺสตีติ น ทสฺสิโต. ตตฺร กยิราถาติ ปทํ สตฺตมิยา ปรสฺสปทวเสน อตฺตโนปทวเสน จ ทฺวิธา ภิชฺชติ, ตถา มชฺฌิมปุริสพหุวจนวเสน ปฐมปุริเสกวจนวเสน จ. ตถา หิ ‘‘ยถา ปุญฺญานิ กยิราถ, ททนฺตา อปราปร’’นฺติ เอตฺถ ‘‘กยิราถา’’ติ อิทํ สตฺตมิยา ปรสฺสปทวเสน มชฺฌิมปุริสพหุวจนวเสน จ วุตฺตํ. ยถานุรูปํ ปุญฺญานิ กเรยฺยาถเยวาติ หิ อตฺโถ. ‘‘กยิราถ ธีโร ปุญฺญานี’’ติ เอตฺถ ปน ‘‘กยิราถา’’ติ อิทํ สตฺตมิยา อตฺตโนปทวเสน ปฐมปุริเสกวจนวเสน จ วุตฺตํ. กเรยฺยาติ หิ อตฺโถ. อิธ ปโรกฺขาทิวเสน ยิรปจฺจยสหิตานิ รูปานิ เยภุยฺเยน สาสเน อปฺปสิทฺธานีติ น ทสฺสิตานิ. येथे जरी लिंग-विपर्यास, विभक्ती-विपर्यास, वचन-विपर्यास, काळ-विपर्यास, पुरुष-विपर्यास आणि अक्षर-विपर्यास असा सहा प्रकारचा विपर्यास (बदल) उदाहरणांसह दाखवायला हवा होता, तरीही तो पुढे स्पष्ट होणार असल्यामुळे येथे दाखवला नाही. त्यामध्ये "कयिराथ" हे पद सप्तमी विभक्तीच्या परस्मैपद आणि आत्मनेपद या दोन्ही रूपांनी दोन प्रकारे विभागले जाते; तसेच मध्यम पुरुष बहुवचन आणि प्रथम पुरुष एकवचन या रूपांनीही विभागले जाते. कारण, "यथा पुञ्ञानि कयिराथ, ददन्ता अपरापरं" (ज्याप्रमाणे वारंवार दान देत पुण्य करावे) येथे "कयिराथ" हे सप्तमी विभक्तीच्या परस्मैपदाच्या मध्यम पुरुष बहुवचनाच्या रूपात सांगितले आहे. "तुम्ही योग्यतेनुसार पुण्यच करावे" असा याचा अर्थ आहे. परंतु "कयिराथ धीरो पुञ्ञानि" (धैर्यवानाने पुण्य करावे) येथे "कयिराथ" हे सप्तमी विभक्तीच्या आत्मनेपदाच्या प्रथम पुरुष एकवचनाच्या रूपात सांगितले आहे. "त्याने करावे" असा याचा अर्थ आहे. येथे परोक्षा (भूतकाल) इत्यादींच्या द्वारे 'यिर' प्रत्ययाने युक्त असलेली रूपे बहुतांश करून शासनात (बुद्धवचनात) उपयोगात आणली जात नसल्यामुळे ती दाखवली नाहीत. อตฺตโน ผลํ กโรตีติ การณํ. กโรตีติ กตฺตา, เอวํ การโก การกํ วา. เอตฺถ หิ การกสทฺโท ยตฺถ กตฺตุการกกมฺมการกาทิวาจโก, ตตฺถ ปุลฺลิงฺโคปิ โหติ, เยภุยฺเยน นปุํสกลิงฺโคปิ. ยตฺถ ปน รชตการกมฺมการโลหการาทิวาจโก, ตตฺถ ปุลฺลิงฺโค เอว. การาเปตีติ การาปโก. กรํ, กุพฺพํ, กฺรุพฺพํ, กโรนฺโต, กุพฺพนฺโต, กุพฺพาโน, กุรุมาโน, ปกฺรุํพฺพมาโน[Pg.276]. การิกา, การาปิกา. กโรนฺตี, กุพฺพนฺตี. การกํ กุลํ. การาปกํ, กโรนฺตํ, กุพฺพนฺตํ, กุรุมานํ. สงฺขาโร, ปริกฺขาโร, ปริกฺขโต, ปุรกฺขโต, กรณํ, กฺริยา. อกฺขรจินฺตกา ปน ‘‘กฺริยา’’ อิจฺจปิ ปทมิจฺฉนฺติ. เอตฺถ กฺริยาสทฺโท กิญฺจาปิ ‘‘อผลา โหติ อกฺรุพฺพโต’’ติอาทีสุ กการรการสํโยควนฺตานิ ปทานิ ทิสฺสนฺติ, ตถาปิ กฺเลสสทฺโท วิย ปาฬิยํ น ทิสฺสติ, อทิสฺสมาโนปิ โส อฏฺฐกถาจริยาทีหิ ครูหิ คหิตตฺตา คเหตพฺโพว. ตถา หิ ‘‘กฺริยากฺริยาปตฺติวิภาคเทสโก’’ติอาทิกา สทฺทรจนา ทิสฺสติ. जे स्वतःचे फळ निर्माण करते ते 'कारण' होय. जो करतो तो 'कर्ता', अशा प्रकारे 'कारको' (पुल्लिंगी) किंवा 'कारकं' (नपुंसकलिंगी) शब्द बनतो. येथे 'कारक' शब्द जेथे कर्तृकारक, कर्मकारक इत्यादींचा वाचक असतो, तेथे तो पुल्लिंगी देखील असतो आणि बहुतांश करून नपुंसकलिंगी देखील असतो. परंतु जेथे तो सुवर्णकार, चर्मकार, लोहकार इत्यादींचा वाचक असतो, तेथे तो केवळ पुल्लिंगीच असतो. जो करवून घेतो तो 'कारापको' (करवून घेणारा). करं, कुब्बं, क्रुब्बं, करन्तो, कुब्बन्तो, कुब्बानो, कुरुमानो, पक्रुम्बमानो (हे सर्व 'करणारा' या अर्थाचे कृदन्त शब्द आहेत). कारिका, कारापिका (स्त्रीलिंगी रूपे). करन्ती, कुब्बन्ती. कारकं कुलं (करणारे कुल - नपुंसकलिंगी). कारापकं, करन्तं, कुब्बन्तं, कुरुमानं. सङ्खारो (संस्कार), परिक्खारो (परिष्कार/उपकरण), परिक्खतो (वेढलेला), पुरक्खतो (सन्मानित/पुढे केलेला), करणं (करण), क्रिया. व्याकरणकार (अक्षरचिंतक) मात्र 'क्रिया' अशा पदाची इच्छा करतात (हे पद स्वीकारतात). येथे 'क्रिया' शब्द, जरी "अफला होति अक्रुब्बतो" (न करणाऱ्याचे कर्म निष्फळ होते) इत्यादींमध्ये 'क' आणि 'र' च्या संयोगाने युक्त असलेली पदे दिसत असली, तरी 'क्लेस' (क्लेश) शब्दाप्रमाणे पाळीमध्ये थेट दिसत नाही; तरीही तो दिसत नसला तरी अट्ठकथाचार्यांसारख्या आदरणीय गुरूंनी स्वीकारलेला असल्यामुळे तो स्वीकारलाच पाहिजे. कारण "क्रियाक्रियापत्तिविभागदेसको" (क्रिया आणि क्रियापत्तीच्या विभागाचा उपदेश करणारा) अशी शब्दरचना दिसून येते. กาตุํ, กตฺตุํ. กาตเว, กาเรตุํ. กตฺวา, กตฺวาน, กาตุน, กริตฺวา, กริตฺวาน, กจฺจ, อธิกจฺจ, กริย, กริยาน, ปุรกฺขิตฺวา, กาเรตฺวา. อญฺญานิปิ ตุมนฺตาทีนิ โยเชตพฺพานิ. कातुं, कत्तुं (करण्यासाठी). कातवे, कारेतुं (करवून घेण्यासाठी). कत्वा, कत्वान, कातुन, करित्वा, करित्वान, कच्च, अधिकच्च, करिय, करियान, पुरक्खित्वा, कारेत्वा (हे सर्व 'करून' किंवा 'करवून' या अर्थाचे पूर्वकालवाचक धातुसाधित अव्यय आहेत). इतरही 'तुमुन्' (तुं-प्रत्ययान्त) इत्यादी प्रत्यय जोडावेत. ตตฺร กจฺจาติ กตฺวา. อธิกจฺจาติ อธิกํ กตฺวา. อกฺขรจินฺตกา ปน สทฺทสตฺถนยํ นิสฺสาย ‘‘อธิกิจฺจ’’ อิติ รูปํ อิจฺฉนฺติ, มยํ ปเนตาทิสํ รูปํ ปาฬิยา อนุกูลํ น โหตีติ น อิจฺฉาม. ตถา หิ เถริกาคาถายํ โคตมิยา ปรินิพฺพานวจเน ‘‘ปทกฺขิณํ กจฺจ นิปจฺจ ปาเท’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. ตตฺถ หิ ปทกฺขิณํ กตฺวาติ อตฺโถ. กจฺจาติ ปทสฺส ทสฺสเนน อธิกจฺจาติ ปทมฺปิ ทิฏฺฐเมว โหติ, เอส นโย อญฺญตฺราปิ ยถารหํ เวทิตพฺโพ. त्यामध्ये "कच्च" म्हणजे 'करून' (कत्वा). "अधिकच्च" म्हणजे 'अधिक करून' (अधिकं कत्वा). व्याकरणकार (अक्षरचिंतक) मात्र व्याकरणशास्त्राच्या नियमांचा आधार घेऊन "अधिकिच्च" अशा रूपाची इच्छा करतात (ते स्वीकारतात), परंतु आम्ही असे रूप पाळी भाषेला अनुकूल नसल्यामुळे ते स्वीकारत नाही. कारण थेरीगाथेमध्ये महाप्रजापती गोतमी यांच्या परिनिर्वाण प्रसंगाच्या वचनात "पदक्खिणं कच्च निपच्च पादे" अशी पाळी रचना आढळते. तेथे "प्रदक्षिणा करून" (पदक्खिणं कत्वा) असाच अर्थ आहे. "कच्च" या पदाच्या दर्शनाने "अधिकच्च" हे पद देखील सिद्धच होते, हाच नियम इतर ठिकाणीही योग्यतेनुसार समजून घ्यावा. อิทานิ กโรติสฺส ธาตุสฺส อปฺปมตฺตกํ อตฺถาติสยโยคํ กถยาม – ตณฺหงฺกโร. การณา. ผรุสาหิ วาจาหิ ปกฺรุพฺพมาโน. สนฺเต น กุรุเต ปิยนฺติ. आता आपण 'करोति' (कृ) धातूच्या काही विशेष अर्थांच्या प्रयोगांविषयी सांगू या - तण्हङ्करो (तृष्णा नष्ट करणारा), कारणा (हिंसा करणे), फरुसाहि वाचाही पक्रुम्बमानो (कठोर शब्दांनी पीडा देणे/हिंसा करणे), सन्ते न कुरुते पियं (सज्जनांना प्रिय मानत नाही). ตตฺร [Pg.277] ตณฺหงฺกโรติ เวเนยฺยานํ ตณฺหํ โลภํ กโรติ หึสตีติ ตณฺหงฺกโร. อถ วา รูปกายธมฺมกายสมฺปตฺติยา อตฺตนิ สกลโลกสฺส ตณฺหํ สิเนหํ กโรติ ชเนตีติ ตณฺหงฺกโร. การณาติ หึสนา. ปกฺรุพฺพมาโนติ หึสมาโน. สนฺเต น กุรุเต ปิยนฺติ สปฺปุริเส อตฺตโน ปิเย อิฏฺเฐ กนฺเต มนาเป น กโรตีติ อตฺโถ. อถ วา ปิยํ ปิยายมาโน ตุสฺสมาโน โมทมาโน สนฺเต น กุรุเต น เสวตีติ อตฺโถ. ยถา ‘‘ราชานํ เสวตี’’ติ เอตสฺมึ อตฺเถ ราชานํ ปิยํ กุรุเตติ สทฺทสตฺถวิทู มนฺเตนฺติ, ทุลฺลภายํ นีติ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพา. त्यामध्ये "तण्हङ्करो" म्हणजे विनेय जनांची (उपदेश देण्यास योग्य लोकांची) तृष्णा किंवा लोभ नष्ट करतो (करोति = हिंसति/नष्ट करतो), म्हणून तो 'तण्हङ्करो' (तृष्णा नष्ट करणारा - बुद्ध) होय. अथवा, आपल्या रूपकाय आणि धम्मकाय यांच्या समृद्धीने संपूर्ण जगामध्ये स्वतःविषयी तृष्णा म्हणजे स्नेह निर्माण करतो (जनयति), म्हणून तो 'तण्हङ्करो' होय. "कारणा" म्हणजे हिंसा करणे. "पक्रुम्बमानो" म्हणजे हिंसा करणारा (पीडा देणारा). "सन्ते न कुरुते पियं" म्हणजे सज्जनांना आपले प्रिय, इष्ट, कांत किंवा मनपसंत करत नाही (त्यांच्याशी जवळीक साधत नाही) असा अर्थ आहे. अथवा, प्रिय गोष्टीची इच्छा करणारा, संतुष्ट होणारा आणि आनंदित होणारा मनुष्य सज्जनांची सेवा करत नाही (सज्जनांचा सहवास करत नाही) असा अर्थ आहे. ज्याप्रमाणे "राजाची सेवा करतो" या अर्थामध्ये "राजाला प्रिय करतो" असे व्याकरणकार मानतात, हा दुर्मिळ नियम चांगल्या प्रकारे मनात धारण केला पाहिजे. เอตฺถ จ ปริกฺขารสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร นียเต, ‘‘ปริกฺขาโรติ สตฺตหิ นครปริกฺขาเรหิ สุปริกฺขิตฺตํ โหตี’’ติอาทีสุ ปริวาโร วุจฺจติ. ‘‘รโถ เสตปริกฺขาโร, ฌานกฺโข จกฺกวีริโย’’ติอาทีสุ อลงฺกาโร. ‘‘เย จิเม ปพฺพชิเตน ชีวิตปริกฺขารา สมุทาเนตพฺพา’’ติอาทีสุ สมฺภาโร. เอตฺเถตญฺหิ วุจฺจติ – आणि येथे 'परिक्खार' (परिष्कार/साधन) शब्दाचा अर्थ स्पष्ट केला जात आहे - 'परिक्खारोति सत्तहि नगरपरिक्खारेहि सुपरिक्खित्तं होती' (सात नगर-परिष्कारांनी चांगल्या प्रकारे वेढलेले असते) इत्यादींमध्ये 'परिवारा'ला (परिवृत असणे) परिक्खार म्हटले आहे. 'रथो सेतपरिक्खारो, झानक्खो चक्कवीरियो' (पांढऱ्या परिष्काराने युक्त रथ, ध्यानरूपी अक्ष आणि वीर्यरूपी चाके असलेला) इत्यादींमध्ये 'अलंकारा'ला परिक्खार म्हटले आहे. 'ये चिमे पब्बजितेन जीवितपरिक्खारा समुदानेतब्बा' (प्रव्रजिताने जे हे जीवनोपयोगी परिष्कार गोळा केले पाहिजेत) इत्यादींमध्ये 'संभारा'ला (साहित्याला) परिक्खार म्हटले आहे. येथेच हे म्हटले आहे - สาสนญฺญูหิ วิญฺญูหิ, ปริกฺขาโรติ สาสเน; ปริวาโร อลงฺกาโร, สมฺภาโร จ ปวุจฺจติ. शासनाचा बोध असणाऱ्या विद्वानांद्वारे शासनात 'परिक्खार' हा परिवार, अलंकार आणि संभार (साहित्य) असा म्हटला जातो. ชาคร นิทฺทกฺขเย. ชาคโรติ. ชาครํ. ทีฆา ชาครโต รตฺติ. जागर (जागे राहणे) हा निद्राक्षय (झोप नष्ट होणे) या अर्थात आहे. जागोरोति (जागा राहतो). जागरं (जागणे). 'दीघा जागरतो रत्ति' (जागणाऱ्यासाठी रात्र दीर्घ असते). ตนาที เอตฺตกา ทิฏฺฐา, ธาตโว เม ยถาพลํ; สุตฺเตสฺวญฺเญปิ เปกฺขิตฺวา, คณฺหวฺโห อตฺถยุตฺติโตติ. तनावैरे (तनादिगणाचे) एवढे धातू माझ्या यथाशक्तीनुसार पाहिले गेले आहेत; इतर सूत्रांमध्येही पाहून अर्थयुक्त ग्रहण करावे. ตนาทิคโณยํ. हा तनादिगण आहे. รุธาทิฉกฺกํ [Pg.278] วิวิธตฺถสารํ,มติงฺกรํ วิญฺญุชนาธิรามํ; อุฬารฉนฺเทหิ สุเสวนียํ,สุวณฺณหํเสหิ สุจึว ฐานํ. विविध अर्थांचे सार असलेला, बुद्धी वाढवणारा, विद्वानांना आनंद देणारा, उदार छंदांनी सुसेव्य असलेला हा रुधादिषट्क (रुधादि सहा वर्ग), सुवर्णहंसांनी पवित्र स्थानाचे सेवन करावे तसा सेवनीय आहे. อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ अशा प्रकारे, अट्ठकथांसहित नऊ अंगांच्या त्रिपिटकाच्या वचनपद्धतींमध्ये विद्वानांच्या โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ รุธาทิฉกฺกํ कुशलतेसाठी रचलेल्या 'सद्दनीति' ग्रंथातील रुधादिषट्क นาม नावाचा สตฺตรสโม ปริจฺเฉโท. सतरावा परिच्छेद समाप्त. ๑๘. จุราทิคณปริทีปน १८. चुरादिगण-प्रदीपन (चुरादिगणाचे स्पष्टीकरण) อิโต ปรํ ปวกฺขามิ, ปจุรตฺถหิตกฺกรํ; จุราทิกคณนามํ, นามโต อฏฺฐมํ คณํ. यानंतर मी विपुल अर्थ आणि हितकारक अक्षरांनी युक्त, नावावरून आठवा असलेला 'चुरादिगण' सांगेन. จุร เถยฺเย. เถนนํ เถยฺยํ, โจริกาติ วุตฺตํ โหติ. ตสฺมึ เถยฺเย จุรธฺตุ วตฺตติ. โจเรติ, โจรยติ, โจโร, โจรี, โจริกา, โจเรตุ, โจรยิตุํ, โจเรตฺวา, โจรยิตฺวา. กตฺตุตฺเถสุ เณณยตา จุราทิคณลกฺขณํ. การิเต – โจราเปติ, โจราปยติ, โจราเปตุํ, โจราปยิตุํ, โจราเปตฺวา, โจราปยิตฺวา. กมฺเมธนํ โจเรหิ โจริยติ, โจริตํ ธนํ. เอส นโย สพฺพตฺถ. चुर (चुर्) धातू थेय्य (चोरी करणे) या अर्थात आहे. थेननं म्हणजे थेय्यं, ज्याला चोरिका (चोरी) म्हटले जाते. त्या चोरीच्या अर्थात चुर धातू वर्ततो. चोरेति, चोरयति (चोरी करतो), चोरो (चोर - पु.), चोरी (चोर - स्त्री.), चोरिका (चोरी), चोरेतु, चोरयितुं (चोरी करण्यासाठी), चोरेत्वा, चोरयित्वा (चोरी करून). कर्तृवाच्य अर्थांमध्ये 'णे' आणि 'णय' प्रत्यय लागणे हे चुरादिगणाचे लक्षण आहे. कारित (प्रयोजक) रूपात - चोरापेति, चोरापयति (चोरी करवतो), चोरापेतुं, चोरापयितुं (चोरी करवण्यासाठी), चोरापेत्वा, चोरापयित्वा (चोरी करवून). कर्मणी प्रयोगात - चोरांकडून धन चोरले जाते, चोरलेले धन. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. กการนฺตธาตุ ककारान्त धातू โลก ทสฺสเน. โลเกติ, โลกยติ, โอโลเกติ, โอโลกยติ, อุลฺโลเกติ, อุลฺโลกยติ, อปโลเกติ, อปโลกยติ, อาโลเกติ, อาโลกยติ, วิโลเกติ, วิโลกยติ. โลโก, อาโลโก, โลกนํ, โอโลกนํ, อุลฺโลกนํ, อาโลกนํ, วิโลกนํ, อปโลกนํ, อวโลกนํ. โอโลเกตุํ, โอโลกยิตุํ, โอโลเกตฺวา, โอโลกยิตฺวา. การิเต ปน ‘‘โอโลกาเปติ, โอโลกาปยติ, โอโลกาเปตุํ, โอโลกาปยิตุํ, โอโลกาเปตฺวา[Pg.279], โอโลกาปยิตฺวา’’ อิจฺเจวมาทีนิ โยเชตพฺพานิ. เอส นโย สพฺพตฺถาปิ. लोक (लोक्) धातू दर्शन (पाहणे) या अर्थात आहे. लोकेति, लोकयति (पाहतो), ओलोकेति, ओलोकयति (खाली पाहतो/अवलोकन करतो), उल्लोकेति, उल्लोकयति (वर पाहतो), अपलोकेति, अपलोकयति (परवानगी घेतो/निरोप घेतो), आलोकेति, आलोकयति (समोर पाहतो/आलोकित करतो), विलोकेति, विलोकयति (पाहतो/निरीक्षण करतो). लोको (लोक/जग), आलोको (प्रकाश), लोकनं (पाहणे), ओलोकनं (अवलोकन करणे), उल्लोकनं (वर पाहणे), आलोकनं (समोर पाहणे), विलोकनं (निरीक्षण करणे), अपलोकनं (परवानगी घेणे), अवलोकनं (अवलोकन करणे). ओलोकेतुं, ओलोकयितुं (पाहण्यासाठी), ओलोकेत्वा, ओलोकयित्वा (पाहून). कारित (प्रयोजक) रूपात मात्र 'ओलोकापेति, ओलोकापयति, ओलोकापेतुं, ओलोकापयितुं, ओलोकापेत्वा, ओलोकापयित्वा' इत्यादी रूपे जोडावीत. हाच नियम सर्वत्र लागू होतो. ตตฺถ โลโกติ ตโย โลกา สงฺขารโลโก สตฺตโลโก โอกาสโลโกติ. ตตฺถ ‘‘เอโก โลโก สพฺเพ สตฺตา อาหารฏฺฐิติกา’’ติ อาคตฏฺฐาเน สงฺขารโลโก เวทิตพฺโพ. ‘‘สสฺสโต โลโก’ติ วา ‘อสสฺสโต โลโก’ติ วา’’ติ อาคตฏฺฐาเน สตฺตโลโก. तेथे 'लोक' म्हणजे तीन लोक आहेत - संस्कारलोक, सत्त्वलोक आणि अवकाशलोक. त्यापैकी 'एको लोको सब्बे सत्ता आहारट्ठितिका' (एक लोक म्हणजे सर्व प्राणी आहारावर टिकून आहेत) या आलेल्या ठिकाणी 'संस्कारलोक' समजावा. 'सस्सतो लोको' (लोक शाश्वत आहे) किंवा 'असस्सतो लोको' (लोक अशाश्वत आहे) या आलेल्या ठिकाणी 'सत्त्वलोक' समजावा. ‘‘ยาวตา จนฺทิมสูริยา ปริหรนฺติ,ทิสา ภนฺติ วิโรจมานา; ตาว สหสฺสธา โลโก,เอตฺถ เต วตฺตเต วโส’’ติ “जोपर्यंत चंद्र आणि सूर्य फिरतात, आणि दिशा प्रकाशमान होऊन चमकतात, तोपर्यंत हजार पटीने असलेला हा लोक (विश्व) आहे, येथे तुझा अधिकार चालतो.” อาคตฏฺฐาเน โอกาสโลโก. या आलेल्या ठिकाणी 'अवकाशलोक' समजावा. อถ วา โลโกติ ติวิโธ โลโก กิเลสโลโก ภวโลโก อินฺทฺริยโลโกติ. ตตฺถ ราคาทิกิเลสพหุลตาย กามาวจรสตฺตา กิเลสโลโก. ฌานาภิญฺญาปริพุทฺธิยา รูปาวจรสตฺตา ภวโลโก. อาเนญฺชสมาธิพหุลตาย วิสทินฺทฺริยตฺตา อรูปาวจรสตฺตา อินฺทฺริยโลโก. อถ วา กิลิสฺสนํ กิเลโส, วิปากทุกฺขนฺติ อตฺโถ. ตสฺมา ทุกฺขพหุลตาย อปาเยสุ สตฺตา กิเลสโลโก. ตทญฺเญ สตฺตา สมฺปตฺติภวภาวโต ภวโลโก. ตตฺถ เย วิมุตฺติปริปาจเกหิ อินฺทฺริเยหิ สมนฺนาคตา สตฺตา, โส อินฺทฺริยโลโกติ เวทิตพฺพํ. अथवा 'लोक' हा तीन प्रकारचा आहे - क्लेशलोक, भवलोक आणि इंद्रियलोक. त्यापैकी राग (आसक्ती) इत्यादी क्लेशांच्या बहुलतेमुळे कामावचर प्राणी हे 'क्लेशलोक' आहेत. ध्यान आणि अभिज्ञा यांच्या जागृतीमुळे रूपावचर प्राणी हे 'भवलोक' आहेत. आणेञ्ज (अचल) समाधीच्या बहुलतेमुळे आणि स्पष्ट इंद्रियांमुळे अरूपावचर प्राणी हे 'इंद्रियलोक' आहेत. अथवा क्लेश म्हणजे क्लेशयुक्त होणे, ज्याचा अर्थ विपाकदुःख (परिणामी दुःख) असा आहे. म्हणून दुःखाच्या बहुलतेमुळे अपाय (दुर्गती) मधील प्राणी हे 'क्लेशलोक' आहेत. त्यांच्याव्यतिरिक्त इतर प्राणी संपत्ती आणि भवाच्या अस्तित्वामुळे 'भवलोक' आहेत. त्यामध्ये जे विमुक्तीला परिपक्व करणाऱ्या इंद्रियांनी युक्त प्राणी आहेत, तो 'इंद्रियलोक' समजावा. ชาตกฏฺฐกถายํ ปน – जातक-अट्ठकथेत मात्र - ‘‘สงฺขารโลโก สตฺตโลโก โอกาสโลโก ขนฺธโลโก อายตนโลโก ธาตุโลโกติ [Pg.280] อเนกวิโธ โลโก. เอตฺถ ‘เอโก โลโก สพฺเพ สตฺตา อาหารฏฺฐิติกา…เป… อฏฺฐารส โลกา อฏฺฐารส ธาตุโย’ติ เอตฺถ สงฺขารโลโก วุตฺโต. ขนฺธโลกาทโย ตทนฺโตคธาเยว. ‘อยํ โลโก ปโร โลโก พฺรหฺมโลโก สเทวโก’ติอาทีสุ ปน สตฺตโลโก วุตฺโต. ‘ยาวตา จนฺทิมสูริยา ปริหรนฺติ, ทิสา ภนฺติ วิโรจมานา. ตาว สหสฺสธา โลโก, เอตฺถ เตวตฺตเต วโส’ติ เอตฺถ โอกาสโลโก วุตฺโต’’ติ วุตฺตํ. “संस्कारलोक, सत्त्वलोक, अवकाशलोक, स्कंधलोक, आयतनलोक आणि धातूलोक असा अनेक प्रकारचा लोक आहे. येथे 'एको लोको सब्बे सत्ता आहारट्ठितिका...पे... अट्ठारस लोका अट्ठारस धातुयो' (एक लोक म्हणजे सर्व प्राणी आहारावर टिकून आहेत...पे... अठरा लोक म्हणजे अठरा धातू) यामध्ये 'संस्कारलोक' सांगितला आहे. स्कंधलोक इत्यादींचा त्यातच अंतर्भाव होतो. 'अयं लोको परो लोको ब्रह्मलोको सदेवको' (हा लोक, परलोक, देवांसह ब्रह्मलोक) इत्यादींमध्ये 'सत्त्वलोक' सांगितला आहे. 'यावता चन्दिमसूरिया परिहरन्ति, दिसा भन्ति विरोचमाना। ताव सहस्सधा लोको, एत्थ तेvअत्तते वसो' यामध्ये 'अवकाशलोक' सांगितला आहे,” असे म्हटले आहे. อตฺถโต ปน อินฺทฺริยพทฺธานํ ขนฺธานํ สมูโห สนฺตาโน จ สตฺตโลโก, รูปาทีสุ สตฺตวิสตฺตตาย สตฺโต, โลกิยติ เอตฺถ กุสลากุสลํ ตพฺพิปาโก จาติ. อนินฺทฺริยพทฺธานํ รูปานํ สมูโห สนฺตาโน จ โอกาสโลโก, โลกิยนฺติ เอตฺถ ตสา ถาวรา จ, เตสญฺจ โอกาสภูโตติ, ตทาธารณตาย เหส ‘‘ภาชนโลโก’’ติปิ วุจฺจติ. ทุวิโธปิ เจส รูปาทิธมฺเม อุปาทาย ปญฺญตฺตตฺตา อุปาทาปญฺญตฺติภูโต อปรมตฺถสภาโว สปฺปจฺจเย ปน รูปารูปธมฺเม อุปาทาย ปญฺญตฺตตฺตา ตทุภยสฺสาปิ อุปาทานานํ วเสน ปริยายโต ปจฺจยายตฺตวุตฺติตา อุปจริตพฺพา, ตทุภเย ขนฺธา สงฺขารโลโก, ปจฺจเยหิ สงฺขริยนฺติ, ลุชฺชนฺติ ปลุชฺชนฺติ จาติ เอตฺถ ปจฺจยายตฺตวุตฺติตาย มคฺคผลธมฺมานมฺปิ สติปิ ลุชฺชนปลุชฺชนตฺเต เตภูมิกธมฺมานํเยว ‘‘โลโก’’ติ อธิปฺเปตตฺตา นตฺถิ โลกตาปชฺชนํ. ตถา หิ เต ‘‘โลกุตฺตรา’’ติ วุตฺตา. अर्थाच्या दृष्टीने मात्र, इंद्रियांशी बद्ध असलेल्या स्कंधांचा समूह आणि प्रवाह म्हणजे 'सत्त्वलोक' होय; रूप इत्यादींमध्ये आसक्त (सत्त-विसत्त) असल्यामुळे त्याला 'सत्त्व' म्हणतात, आणि येथे कुशल-अकुशल व त्याचा विपाक (परिणाम) पाहिला जातो (लोकियति) म्हणून तो लोक आहे. इंद्रियांशी बद्ध नसलेल्या रूपांचा समूह आणि प्रवाह म्हणजे 'अवकाशलोक' होय; येथे त्रस (चल) आणि स्थावर (अचल) प्राणी राहतात आणि तो त्यांच्यासाठी अवकाश (स्थान) स्वरूप आहे, त्याच्या आधारभूततेमुळे याला 'भाजनलोक' (पात्ररूप लोक) असेही म्हणतात. हे दोन्ही प्रकार रूप इत्यादी धर्मांवर अवलंबून प्रज्ञप्त (प्रकट) केल्यामुळे 'उपादा-प्रज्ञप्ति' स्वरूप आणि अपरमार्थ-स्वभाव (काल्पनिक) आहेत. परंतु सप्रत्यय (कारणांसह) रूप आणि अरूप धर्मांवर अवलंबून प्रज्ञप्त केल्यामुळे, त्या दोन्हीच्या उपादानाच्या (ग्रहणाच्या) वशाने पर्यायाने प्रत्ययाधीन (कारणावर अवलंबून असणारी) वृत्ती मानली पाहिजे. त्या दोन्हीमधील स्कंध म्हणजे 'संस्कारलोक' होय, कारण ते प्रत्ययांद्वारे (कारणांद्वारे) संस्कृत (निर्मित) होतात, नष्ट होतात (लुज्जन्ति) आणि पूर्णपणे नष्ट होतात (पलुज्जन्ति). येथे प्रत्ययाधीन वृत्तीमुळे मार्ग आणि फल धर्मांचा नाश व विनाश होत असला, तरी केवळ त्रिभूमिक (तीन भूमींमधील) धर्मांनाच 'लोक' म्हणून अभिप्रेत धरल्यामुळे, त्यांच्यात लोकत्व येत नाही. म्हणूनच त्यांना 'लोकोत्तर' (लोकाच्या पलीकडचे) म्हटले गेले आहे. อาโลโกติ รสฺมิ, อาโลเกนฺติ เอเตน ภุโส ปสฺสนฺติ ชนา จกฺขุวิญฺญาณํ วาติ อาโลโก. โอโลกนนฺติ [Pg.281] เหฏฺฐา เปกฺขนํ. วิโลกนนฺติ อุทฺธํ เปกฺขนํ. อาโลกนนฺติ ปุรโต เปกฺขนํ. วิโลกนนฺติ ทฺวีสุ ปสฺเสสุ เปกฺขนํ, วิวิธา วา เปกฺขนํ. อปโลกนนฺติ ‘‘สงฺฆํ อปโลเกตฺวา’’ติอาทีสุ วิย ชานาปนํ. อวโลกนนฺติ ‘‘นาคาวโลกิตํ อวโลเกตฺวา’’ติอาทีสุ วิย ปุริมกายํ ปริวตฺเตตฺวา เปกฺขนํ. ‘‘อาโลกิเต วิโลกิเต สมฺปชานการี โหตี’’ติ เอตฺถาปิ ภาววเสน อาโลกนํ อาโลกิตํ วิโลกนํ วิโลกิตนฺติ อตฺโถ คเหตพฺโพ. 'आलोक' म्हणजे किरण (प्रकाश); ज्याच्याद्वारे लोक स्पष्टपणे पाहतात किंवा जे चक्षुर्विज्ञान आहे, तो 'आलोक' होय. 'ओलोकन' म्हणजे खाली पाहणे. 'विलोकन' म्हणजे वर पाहणे. 'आलोकन' म्हणजे समोर पाहणे. 'विलोकान' म्हणजे दोन्ही बाजूंना पाहणे किंवा विविध प्रकारे पाहणे. 'अपलोकन' म्हणजे 'संघं अपलोकेत्वा' (संघाला कळवून/परवानगी घेऊन) इत्यादींप्रमाणे कळवणे. 'अवलोकन' म्हणजे 'नागावलोकितं अवलोकेत्वा' (हत्तीप्रमाणे वळून पाहून) इत्यादींप्रमाणे शरीराचा पुढचा भाग वळवून पाहणे. 'आलोकिते विलोकिते सम्पजानकारी होती' (समोर पाहताना आणि आजूबाजूला पाहताना सजग राहतो) येथेही भाववाचक अर्थाने आलोकन म्हणजे आलोकित आणि विलोकन म्हणजे विलोकित असा अर्थ घ्यावा. ถก ปฏิฆาเต. ถเกติ, ถกยติ ทฺวารํ ปุริโส. थक (थक्) धातू प्रतिघात (बंद करणे/अडवणे) या अर्थात आहे. 'थकेति, थकयति द्वारं पुरिसो' (माणूस दार बंद करतो). ตกฺก วิตกฺเก. ตกฺเกติ, วิตกฺเกติ, วิตกฺกยติ. ตกฺโก, วิตกฺโก, วิตกฺกิตา. तक्क (तक्क्) धातू वितर्क (विचार करणे) या अर्थात आहे. तक्केति, वितक्केति, वितक्कयति (विचार करतो). तक्को (तर्क), वितक्को (वितर्क), वितक्किता (विचार करणारा). ตตฺถ ตกฺกนํ ตกฺโก, อูหนนฺติ วุตฺตํ โหติ, เอวํ วิตกฺโก. อถ วา วิตกฺเกนฺติ เอเตน, สยํ วา วิตกฺเกติ, วิตกฺกนมตฺตเมว วา เอตนฺติ วิตกฺโก. ‘‘ตกฺโก, วิตกฺโก, อปฺปนา, พฺยปฺปนา, เจตโส อภินิโรปนา’’ติ อภิธมฺเม ปริยายสทฺทา วุตฺตา. วิตกฺเกตีติ วิตกฺกิตา, ปุคฺคโล. ‘‘อวิตกฺกิตา มจฺจุมุปพฺพชนฺตี’’ติ ปาฬิ. तेथे तर्क करणे म्हणजे 'तक्क' (तर्क), विचार करणे (ऊहन) असे म्हटले आहे, अशा प्रकारे 'वितक्क' (वितर्क) होतो. अथवा ज्याच्याद्वारे विचार करतात, किंवा स्वतः विचार करतात, किंवा केवळ विचार करण्याची क्रिया म्हणजे 'वितक्क' होय. अभिधम्मात “तक्को, वितक्को, अप्पना, ब्यप्पना, चेतसो अभिनिरोपना” (तर्क, वितर्क, अर्पणा, व्यर्पणा, चित्ताचे अभिनिरोपण) हे पर्यायी शब्द सांगितले आहेत. जो विचार करतो तो 'वितक्किता' (विचार करणारा), म्हणजेच पुग्गल (व्यक्ती). “अवितक्किता मच्चुमुपब्बजन्ती” (विचार न करणारे मृत्यूच्या स्वाधीन होतात) अशी पाळी आहे. อกิ ลกฺขเณ. ลกฺขณํ สญฺญาณํ, สญฺชานนการณนฺติ วุตฺตํ โหติ. อตฺริทํ สลฺลกฺขิตพฺพํ. เย อิมสฺมึ จุราทิคเณ อเนกสฺสรา อสํโยคนฺตา อิการานุพนฺธวเสน นิทฺทิฏฺฐา ธาตโว, เต เอวํวุตฺเตหิ อิเมหิ ตีหิ ลกฺขเณหิ สมนฺนาคตา อาขฺยาตตฺตํ นามิกตฺตญฺจ ปาปุณนฺตา เอกนฺตโต นิคฺคหีตาคเมน นิปฺผนฺนรูปาเยว ภวนฺติ, น กตฺถจิปิ วิคตนิคฺคหีตาคมรูปานิ ภวนฺติ. องฺเกติ, องฺกยติ. องฺกนํ, องฺโก[Pg.282]. สมาเส ปน ‘‘สสงฺโก, จกฺกงฺกิตจรโณ’’ติอาทีนิ รูปานิ ภวนฺติ. 'अकि' हा धातू लक्षण (चिन्हांकित करणे) या अर्थात आहे. लक्षण म्हणजे संज्ञा (चिन्ह), ओळखण्याचे कारण असे म्हटले आहे. येथे हे लक्षात घेतले पाहिजे की, या चुरादिगणात जे अनेक स्वर असणारे, असंयोगान्त आणि 'इ' कार अनुबंधाने निर्देशित केलेले धातू आहेत, ते वर सांगितलेल्या या तीन लक्षणांनी युक्त होऊन आख्यात (क्रियापद) आणि नाम रूप प्राप्त करताना निश्चितपणे निग्गहीत (अनुस्वार) आगमानेच सिद्ध रूप बनतात, कुठेही निग्गहीत आगम नसलेली रूपे होत नाहीत. जसे - अङ्केति, अङ्कयति (अंकेति, अंकयति). अङ्कनं (अंकन), अङ्को (अंक). समासात मात्र “ससङ्को” (सशंक), “चक्कङ्कितचरणो” (चक्रांकितचरण) इत्यादी रूपे होतात. สกฺก วกฺก ภาสเน. สกฺเกติ, สกฺกยติ. วกฺเกติ, วกฺกยติ. 'सक्क' आणि 'वक्क' हे धातू भाषण (बोलणे) या अर्थात आहेत. सक्केति, सक्कयति. वक्केति, वक्कयति. นกฺก วกฺก นาสเน. นกฺเกติ, นกฺกยติ. วกฺเกติ, วกฺกยติ. 'नक्क' आणि 'वक्क' हे धातू नाशन (नाश करणे) या अर्थात आहेत. नक्केति, नक्कतयि. वक्केति, वक्कयति. จกฺก จุกฺก พฺยถเน. จกฺเกติ, จกฺกยติ. จุกฺเกติ, จุกฺกยติ. จกฺกํ. จกฺกนฺติ เกนฏฺเฐน จกฺกํ? จกฺเกติ พฺยถติ หึสตีติ อตฺเถน จกฺกํ. จกฺกสทฺโท – 'चक्क' आणि 'चुक्क' हे धातू व्यथन (पीडा देणे/हिंसा करणे) या अर्थात आहेत. चक्केति, चक्कयति. चुक्केति, चुक्कयति. चक्कं (चक्र). 'चक्क' हे कोणत्या अर्थाने 'चक्क' (चक्र) आहे? जे व्यथित करते, हिंसा करते या अर्थाने 'चक्क' आहे. 'चक्क' हा शब्द - สมฺปตฺติยํ ลกฺขเณ จ, รถงฺเค อิริยาปเถ; ทาเน รตฺนธมฺมขุร-จกฺกาทีสุ ปทิสฺสติ; संपत्ती (समृद्धी), लक्षण, रथाचे अंग (चाक), इरियापथ (चर्या), दान, रत्नचक्र, धम्मचक्र, खुरचक्र इत्यादी अर्थांमध्ये दिसून येतो. ‘‘จตฺตาริมานิ ภิกฺขเว จกฺกานิ เยหิ สมนฺนาคตานํ เทวมนุสฺสาน’’นฺติอาทีสุ หิ อยํ สมฺปตฺติยํ ทิสฺสติ. ‘‘ปาทตเลสุ จกฺกานิ ชาตานี’’ติ เอตฺถ ลกฺขเณ. ‘‘จกฺกํว วหโต ปท’’นฺติ เอตฺถ รถงฺเค. ‘‘จตุจกฺกํ นวทฺวาร’’นฺติ เอตฺถ อิริยาปเถ. ‘‘ทท ภุญฺช จ มา จปฺปมาโท, จกฺกํ วตฺตสฺสุ ปาณิน’’นฺติ เอตฺถ ทาเน. ‘‘ทิพฺพํ จกฺกรตนํ ปาตุรโหสี’’ติ เอตฺถ รตนจกฺเก. ‘‘มยา ปวตฺติตํ จกฺก’’นฺติ เอตฺถ ธมฺมจกฺเก. ‘‘อิจฺฉาหตสฺส โปสสฺส, จกฺกํ ภมติ มตฺถเก’’ติ เอตฺถ ขุรจกฺเก. ‘‘ขุรปริยนฺเตน เจปิ จกฺเกนา’’ติ เอตฺถ ปหรณจกฺเก. ‘‘อสนิวิจกฺก’’นฺติ เอตฺถ อสนิมณฺฑเลติ. “भिक्खूहो, ही चार चक्रे (संपत्ती) आहेत, ज्यांनी युक्त असलेल्या देव आणि मनुष्यांना...” इत्यादी वाक्यांमध्ये हा शब्द 'संपत्ती' या अर्थात दिसतो. “पावलांच्या तळव्यांवर चक्रे उत्पन्न झाली आहेत” येथे 'लक्षण' या अर्थात. “वाहून नेणाऱ्याच्या पावलांमागे चाकाप्रमाणे” येथे 'रथाचे अंग' (चाक) या अर्थात. “चार चक्रे आणि नऊ द्वारे असलेले” येथे 'इरियापथ' (शरीर/चर्या) या अर्थात. “दान दे, उपभोग घे, आळस करू नकोस, प्राण्यांसाठी दानचक्र फिरव” येथे 'दान' या अर्थात. “दिव्य चक्ररत्न प्रकट झाले” येथे 'रत्नचक्र' या अर्थात. “माझ्याद्वारे प्रवर्तित केलेले चक्र” येथे 'धम्मचक्र' या अर्थात. “इच्छेने ग्रस्त असलेल्या माणसाच्या डोक्यावर चक्र फिरते” येथे 'खुरचक्र' (तीक्ष्ण चक्र) या अर्थात. “जरी खुरपऱ्यांत (तीक्ष्ण कडा असलेल्या) चक्राने...” येथे 'प्रहार करण्याचे चक्र' (शस्त्र) या अर्थात. “असनिविचक्कं” येथे 'विजेचे मंडल' या अर्थात आहे. ตกิ [Pg.283] พนฺธเน. ตงฺเกติ, ตงฺกยติ. 'तकि' हा धातू बंधन (बांधणे) या अर्थात आहे. तङ्केति, तङ्कयति. อกฺก ถวเน. ถวนํ ถุติ. อกฺเกติ, อกฺกยติ. อกฺโก. อกฺโกติ สูริโย. โส หิ มหาชุติตาย อกฺกิยติ อภิตฺถวิยติ ตปฺปสนฺเนหิ ชเนหีติ อกฺโก. ตถา หิ ตสฺส ‘‘นตฺถิ สูริยสมา อาภา. อุเทตยํ จกฺขุมา เอกราชา’’ติอาทินา อภิกฺขุติ ทิสฺสติ. 'अक्क' हा धातू थवन (स्तुती करणे) या अर्थात आहे. थवन म्हणजे स्तुती. अक्केति, अक्कयति. अक्को (अर्क). 'अक्को' म्हणजे सूर्य. तो आपल्या महातेजामुळे प्रसन्न झालेल्या लोकांद्वारे 'अक्कीयती' (स्तुतिला पात्र ठरतो) म्हणून तो 'अक्को' आहे. तसेच त्याची “सूर्यासारखी आभा (तेज) नाही. हा चक्षुमान एकराज उदित होत आहे” इत्यादींद्वारे विशेष स्तुती दिसून येते. หิกฺก หึสายํ. หิกฺเกติ, หิกฺกยติ. 'हिक्क' हा धातू हिंसा (पीडा देणे) या अर्थात आहे. हिक्केति, हिक्कयति. นิกฺก ปริมาเณ. นิกฺเกติ, นิกฺกยติ. 'निक्क' हा धातू परिमाण (मोजमाप) या अर्थात आहे. निक्केति, nिक्कयति. พุกฺก ภสฺสเน. เอตฺถ สุนขภสฺสนํ ภสฺสนนฺติ คเหตพฺพํ, น วาจาสงฺขาตํ ภสฺสนํ. พุกฺเกติ, พุกฺกยติ. เอตฺถ จ ‘‘พุกฺกยติ สา โจเร’’ อิติ โลกิยปฺปโยโค เวทิตพฺโพ. ภูวาทิคเณ ปน ‘‘พุกฺกติ สา’’ติ รูปํ ภวติ. อญฺโญ ตุ ‘‘พุกฺก ปริภาสเน’’ อิติ ปฐติ, เอวํ ปฐนฺเตปิ สุนขภสฺสนเมวาธิปฺเปตํ. 'बुक्क' हा धातू भस्सन (भुंकणे) या अर्थात आहे. येथे कुत्र्याचे भुंकणे हेच 'भस्सन' म्हणून घ्यावे, वाणीने केलेले संभाषण नव्हे. बुक्केति, बुक्कयति. येथे “बुक्कयति सा चोरे” (ती कुत्री चोरांवर भुंकते) हा लौकिक प्रयोग समजावा. भूवादिगणात मात्र “बुक्कति सा” असे रूप होते. इतर कोणी “बुक्क परिभासने” (बुक्क हा निर्भर्त्सना करणे या अर्थात) असा पाठ वाचतात, असा पाठ वाचला तरी कुत्र्याचे भुंकणे हाच अर्थ अभिप्रेत आहे. ทก ลก อสฺสาทเน. ทเกติ, ทกยติ. ลเกติ, ลกยติ. 'दक' आणि 'लक' हे धातू आस्वादन (चव घेणे) या अर्थात आहेत. दकेति, दकयति. लकेति, लकयति. ตกฺก โลก ภาสายํ. ตกฺเกติ, ตกฺกยติ. โลเกติ, โลกยติ. 'तक्क' आणि 'लोक' हे धातू भाषा (बोलणे/प्रकाशणे) या अर्थात आहेत. तक्केति, तक्कयति. लोकेति, लोकयति. จิก สิก อามสเน. จิเกติ, จิกยติ. สิเกติ, สิกยติ. 'चिक' आणि 'सिक' हे धातू आमसन (स्पर्श करणे/परामर्श घेणे) या अर्थात आहेत. चिकेति, चिकयति. सिकेति, सिकयति. กการนฺตธาตุรูปานิ. ककारान्त धातूंची रूपे समाप्त. ขการนฺตธาตุ खकारान्त धातू ลกฺข ทสฺสนงฺเกสุ. ทสฺสนํ ปสฺสนํ. องฺโก ลญฺชนํ. ลกฺเขติ, ลกฺขยติ. สลฺลกฺเขติ, สลฺลกฺขยติ. ลกฺขํ วิชฺฌติ อุสุนา, ลกฺขํ กโรติ. 'लक्ख' हा धातू दस्सन (दर्शन/पाहणे) आणि अंक (चिन्हांकित करणे) या अर्थांमध्ये आहे. दस्सन म्हणजे पाहणे. अंक म्हणजे लांछन (चिन्ह लावणे). लक्खेति, लक्खयति. सल्लक्खेति, सल्लक्खयति. “लक्खं विज्झति उसुना” (बाणाने लक्ष्याचा वेध घेतो), “लक्खं करोति” (लक्ष्य करतो). คงฺคาย [Pg.284] วาลุกา ขีเย, อุทกํ ขีเย มหณฺณเว; มหิยา มตฺติกา ขีเย, ลกฺเข น มม พุทฺธิยา. गंगेची वाळू संपू शकते, महासागरातील पाणी संपू शकते, पृथ्वीवरील माती संपू शकते, परंतु माझ्या बुद्धीचे लक्ष्य (ज्ञानविषय) संपू शकत नाही. กปฺปลกฺขณํ. โคลกฺขณํ. อิตฺถิลกฺขณํ. ธมฺมานํ ลกฺขณํ. สลฺลกฺขนา. อุปลกฺขนา. ปจฺจุปลกฺขนา. ลกฺขธาตุยา ยุปจฺจยนฺตาย สมาทิปุพฺพานํ รูปานํ นกาโร ทนฺตโช. कप्पलक्खणं (कल्पाचे लक्षण), golक्खणं (गाईचे लक्षण), इत्थिलक्खणं (स्त्रीचे लक्षण), धम्मानं लक्खणं (धर्मांचे लक्षण). सल्लक्खना (संलक्षण), उपलक्खना (उपलक्षण), पच्चुपलक्खना (प्रत्युपलक्षण). 'लक्ख' धातूला 'यु' प्रत्यय लागून 'सम' इत्यादी पूर्वपदांसह बनणाऱ्या रूपांमधील 'न' कार दंतव्य असतो. ภกฺข อทเน. ภกฺเขติ, ภกฺขยติ. ภกฺโข โน ลทฺโธ. ภกฺขยนฺติ มิคาธมา. ภูวาทิคเณ ปน ‘‘ภกฺขตี’’ติ รูปํ. 'भक्ख' हा धातू अदन (खाणे) या अर्थात आहे. भक्खेति, भक्खयति. “भक्खो नो लद्धो” (आम्हाला भक्ष्य मिळाले नाही). “भक्खयन्ति मिगाधमा” (अधम प्राणी भक्षण करतात). भूवादिगणात मात्र “भक्खति” असे रूप होते. นกฺข สมฺพนฺเธ. นกฺเขติ, นกฺขยติ. 'नक्ख' हा धातू संबंध (जोडणे) या अर्थात आहे. नक्खेति, नक्खयति. มกฺข มกฺขเน. มกฺเขติ, มกฺขยติ. มกฺโข, มกฺขี. ตตฺถ มกฺโขติ ปเรหิ กตคุณํ มกฺเขติ ปิสตีติ มกฺโข, คุณธํสนา. ‘‘มกฺขํ อสหมาโน’’ติ เอตฺถ ปน อตฺตนิ ปเรหิ กตํ อวมญฺญนํ มกฺโขติ วุจฺจติ. 'मक्ख' हा धातू मक्खन (माखणे/पुसून टाकणे) या अर्थात आहे. मक्खेति, मक्खयति. मक्खो (गुण माखणारा/कृतघ्न), मक्खी. तेथे 'मक्खो' म्हणजे इतरांनी केलेले उपकार जो माखतो (पुसून टाकतो), नष्ट करतो तो 'मक्खो' (गुणनाशक) होय. “मक्खं असहमानो” (अपमान सहन न करणारा) येथे मात्र स्वतःवर इतरांनी केलेल्या अवमानाला 'मक्ख' म्हटले आहे. ยกฺข ปูชายํ. ยกฺเขติ, ยกฺขยติ. ยกฺโข. ยกฺโขติ มหานุภาโว สตฺโต. ตถา หิ ‘‘ปุจฺฉามิ ตํ มหายกฺข, สพฺพภูตานมิสฺสรา’’ติ เอตฺถ สกฺโก เทวราชา ‘‘ยกฺโข’’ติ วุตฺโต. อถ วา ยกฺโขติ ยกฺขโยนิยํ นิพฺพตฺตสตฺโต. สพฺเพปิ วา สตฺตา ‘‘ยกฺขา’’ติ วุจฺจนฺติ. ‘‘ปรมยกฺขวิสุทฺธึ ปญฺญาเปนฺตี’’ติ เอตฺถ หิ ยกฺขสทฺโท สตฺเต วตฺตติ. ตถา หิ ยกฺโขปิ สตฺโตปิ เทโวปิ สกฺโกปิ ขีณาสโวปิ ยกฺโขเยว นาม, มหานุภาวตาย ยกฺขิยติ สรณคเตหิ ชเนหิ นานาปจฺจเยหิ นานาพลีหิ จ ปูชิยตีติ ยกฺโข. 'यक्ख' हा धातू पूजा (पूजणे) या अर्थात आहे. यक्केति, यक्खयति. यक्खो (यक्ष). 'यक्खो' म्हणजे महानुभाव (मोठ्या प्रभावाचा) प्राणी. तसेच “मी तुला विचारतो, हे महायक्ष, सर्व प्राण्यांच्या ईश्वरा!” येथे देवराज सक्क (शक्र) यांना 'यक्ख' म्हटले आहे. अथवा 'यक्ख' म्हणजे यक्षयोनीत उत्पन्न झालेला प्राणी. किंवा सर्वच प्राण्यांना 'यक्ख' म्हटले जाते. “परम यक्षविशुद्धी प्रज्ञापित करतात” येथे 'यक्ख' शब्द प्राण्यांसाठी वापरला आहे. कारण यक्ष असो, प्राणी असो, देव असो, सक्क असो किंवा खीणासव (क्षीणास्रव/अर्हत) असो, तो 'यक्ख'च होय; कारण आपल्या महानुभावामुळे (प्रभावामुळे) शरण आलेल्या लोकांद्वारे विविध प्रत्ययांनी (साधनांनी) आणि विविध बळींनी (पूजेने) तो पूजला जातो (यक्खीयती), म्हणून तो 'यक्खो' आहे. สตฺเต เทเว จ สกฺเก จ, ขีณาสเว จ รกฺขเส; ปญฺจสฺเวเตสุ อตฺเถสุ, ยกฺขสทฺโท ปวตฺตติ. प्राणी, देव, सक्क (शक्र), खीणासव (अर्हत) आणि राक्षस, या पाच अर्थांमध्ये 'यक्ख' शब्द वापरला जातो. ลกฺข [Pg.285] อาโลจเน. ลกฺเขติ, ลกฺขยติ. ลกฺขํ วิชฺฌติ อุสุนา. 'लक्ख' हा धातू आलोचन (पाहणे/लक्ष्य करणे) या अर्थात आहे. लक्खेति, लक्खयति. “लक्खं विज्झति उसुना” (बाणाने लक्ष्याचा वेध घेतो). โมกฺข อาสเน. โมกฺเขติ, โมกฺขยติ. 'मोक्ख' हा धातू आसन (मुक्त करणे/सोडणे) या अर्थात आहे. मोक्खेति, मोक्खयति. รุกฺข ผารุสฺเส. ผารุสฺสํ ผรุสภาโว. รุกฺเขติ, รุกฺขยติ. สมาเส ‘‘รุกฺขเกโส, อติรุกฺขวจโน’’ติ รูปานิ. เอตฺถ จ ‘‘สมโณ อยํ ปาโป อติรุกฺขวาโจ’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ตตฺถ อติรุกฺขวาโจติ อติผรุสวจโนติ อตฺโถ. 'रुक्ख' हा धातू फारुस्स (परुषता/कठोरता) या अर्थात आहे. फारुस्स म्हणजे कठोर भाव. रुक्खेति, रुक्खयति. समासात “रुक्खकेसो” (कठोर केस असलेला), “अतिरुक्खवचनो” (अतिशय कठोर बोलणारा) अशी रूपे होतात. येथे “समणो अयं पापो अतिरुक्खवाचो” (हा पापी श्रमण अत्यंत कठोर बोलणारा आहे) हे पाळी उदाहरण आहे. तेथे 'अतिरुक्खवाचो' म्हणजे अत्यंत कठोर वचन बोलणारा असा अर्थ आहे. ขการนฺตธาตุรูปานิ. खकारान्त धातूंची रूपे समाप्त. คการนฺตธาตุ गकारान्त धातू ลิงฺค จิตฺตีกรเณ. จิตฺตีกรณํ วิจิตฺรภาวกรณํ. ลิงฺเคติ, ลิงฺคยติ, ลิงฺคํ. เอตฺถ ลิงฺคํ นาม ทีฆรสฺสกิสถูลปริมณฺฑลาทิเภทํ สณฺฐานนฺติ คหเณ อตีว ยุชฺชติ. ตญฺหิ นานปฺปกาเรหิ วิจิตฺรํ โหติ, ลิงฺคียติ วิจิตฺตํ กริยติ อวิชฺชาตณฺหากมฺเมหิ อุตุนา วา จุณฺณาทีหิ วา สรีรมิติ ลิงฺคํ, อชฺฌตฺตสนฺตานติณรุกฺขาทิกุณฺฑลกรณฺฑกาทีสุ ปวตฺตสณฺฐานวเสเนตํ ทฏฺฐพฺพํ. ลิงฺคสทฺโท สทฺเท สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺเต อิตฺถิพฺยญฺชเน ปุริสพฺยญฺชเน สญฺญาเณ อากาเร จาติ อิเมสุ อตฺเถสุ ทิสฺสติ. อยญฺหิ ‘‘รุกฺโขติ วจนํ ลิงฺค’’นฺติ เอตฺถ สทฺเท ทิสฺสติ. ‘‘สตลิงฺคสฺส อตฺถสฺสา’’ติ เอตฺถ สทฺทปฺปวตฺตินิมิตฺเต. ‘‘เตน โข ปน สมเยน อญฺญตรสฺส ภิกฺขุโน อิตฺถิลิงฺคํ ปาตุภวตี’’ติ เอตฺถ อิตฺถิพฺยญฺชเน. ‘‘ปุริสลิงฺคนิมิตฺตกุตฺตากปฺปาน’’นฺติ เอตฺถ ปุริสพฺยญฺชเน. ‘‘เตน ลิงฺเคน ชานาม, ธุวํ พุทฺโธ ภวิสฺสตี’’ติ เอตฺถ สญฺญาเณ[Pg.286]. ‘‘เตหิ ลิงฺเคหิ เตหิ นิมิตฺเตหิ เตหิ อากาเรหิ อาคนฺตุกภาโว ชานิตพฺโพ ‘‘อาคนฺตุกา อิเม’’ติ เอตฺถ อากาเร ทิสฺสติ. "लिंग" (liṅga) हे "चित्तीकरण" (cittīkaraṇa - विविध रूप देणे) या अर्थात आहे. चित्तीकरण म्हणजे विचित्रभाव करणे (विविधता आणणे). 'लिंगेति', 'लिंगयति' यापासून 'लिंग' (liṅgaṃ) हा शब्द बनतो. येथे 'लिंग' म्हणजे दीर्घ (लांब), रस्स (लहान), किस (बारीक), थूल (जाड), परिमंडळ (गोलाकार) इत्यादी भेदांचे 'संस्थान' (आकार/रचना) असे ग्रहण करणे अत्यंत योग्य ठरते. कारण ते विविध प्रकारे विचित्र (विविध) असते. अविद्या, तृष्णा आणि कर्म यांच्याद्वारे किंवा ऋतूद्वारे अथवा चूर्ण इत्यादींद्वारे शरीराला 'लिंगीयति' (विचित्र/चिन्हांकित केले जाते) म्हणून ते 'लिंग' होय. हे अध्यात्मसंतान (अंतर्गत प्रवाह), गवत, वृक्ष इत्यादी आणि कुंडल, करंडक इत्यादींमध्ये असलेल्या आकाराच्या स्वरूपात पाहावे. 'लिंग' हा शब्द शब्द (ध्वनी), शब्दाच्या प्रवृत्तीचे निमित्त (कारण), स्त्री-व्यंजन (स्त्री जननेंद्रिय/चिन्ह), पुरुष-व्यंजन (पुरुष जननेंद्रिय/चिन्ह), संज्ञा (चिन्ह/लक्षण) आणि आकार (स्वरूप) या अर्थांमध्ये दिसून येतो. जसे की, "रुक्खो (वृक्ष) हा शब्द लिंग आहे" येथे तो 'शब्द' या अर्थात दिसतो. "शंभर लिंगांच्या अर्थाचा" येथे तो 'शब्दाच्या प्रवृत्तीचे निमित्त' या अर्थात आहे. "त्या वेळी एका भिक्खूच्या शरीरावर स्त्री-लिंग (स्त्रीचे चिन्ह) प्रकट झाले" येथे तो 'स्त्री-व्यंजन' या अर्थात आहे. "पुरुष-लिंग, निमित्त, कुत्त (हावभाव) आणि आकल्प (वेष)" येथे तो 'पुरुष-व्यंजन' या अर्थात आहे. "त्या लिंगावरून (चिन्हावरून) आम्ही जाणतो की, ते नक्कीच बुद्ध होतील" येथे तो 'संज्ञा' (चिन्ह) या अर्थात आहे. "त्या लिंगांनी, त्या निमित्तांनी, त्या आकारांनी त्यांचा आगंतुक भाव (पाहुणे असणे) ओळखावा की 'हे आगंतुक आहेत'" येथे तो 'आकार' या अर्थात दिसतो. สทฺเท จ ตนฺนิมิตฺเต จ, กาฏโกฏจิกาย จ; ลกฺขเณ เจว อากาเร, ลิงฺคสทฺโท ปวตฺตติ. शब्द, त्याचे निमित्त (कारण), स्त्री-पुरुष जननेंद्रिय (व्यंजन), लक्षण आणि आकार या अर्थांमध्ये 'लिंग' हा शब्द प्रवृत्त होतो. มค อนฺเวสเน. มเคติ, มคยติ. มิโค, มโค, มโค, มคยมาโน. मग् (maga) धातू अन्वेषण (शोध घेणे) या अर्थात आहे. 'मगेति', 'मगयति' यापासून 'मिगो' (migo), 'मगो' (mago), 'मगो' (mago), 'मगयमानो' (magayamāno) हे शब्द बनतात. เอตฺถ จ ‘‘ยถา พิฬาโร มูสิกํ มคยมาโน’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ‘‘มิโค’’ติ จ ‘‘มโค’’ติ จ จตุปฺปโท ปวุจฺจติ. เอตฺถ มิโคติ มคยติ อิโต จิโต โคจรํ อนฺเวสติ ปริเยสตีติ มิโค. เอวํ มโค. เอตฺถ วิเสสโต หริณ มิโค มิโค นาม. สามญฺญโต ปน อวเสสาปิ จตุปฺปทา ‘‘มิโค’’ อิจฺเจว วุจฺจนฺติ. ตถา หิ สุสีมชาตเก ‘‘กาฬา มิคา เสตทนฺตา ตว อิเม, ปโรสหสฺสํ เหมชาลาภิสญฺฉนฺนา’’ติ เอตสฺมึ ปาฬิปฺปเทเส หตฺถิโนปิ มิคสทฺเทน วุตฺตา ‘‘กาฬมิคา’’ติ. อถ วา มคิยติ ชีวิตกปฺปนตฺถาย มํสาทีหิ อตฺถิเกหิ ลุทฺเทหิ อนฺเวสิยติ ปริเยสิยตีติ มิโค, อรญฺญชาตา สสปสทหริเณเณยฺยาทโย จตุปฺปาทา, เอวํ มโค. ‘‘อตฺถํ น ลภเต มโค’’ติ เอตฺถ ปน มโค วิยาติ มโค, พาโลติ อตฺโถ. येथे 'जसे मांजर उंदराचा शोध घेते' (yathā biḷāro mūsikaṃ magayamāno) हे पाळी भाषेतील उदाहरण आहे. 'मिगो' आणि 'मगो' हे शब्द चौपाया प्राण्यांसाठी (चतुष्पाद) वापरले जातात. येथे 'मिगो' म्हणजे जो इकडेतिकडे आपल्या भक्ष्याचा (गोचराचा) शोध घेतो, तो 'मिगो' होय. याचप्रमाणे 'मगो' देखील आहे. येथे विशेषतः हरिण या प्राण्याला 'मिगो' (मृग) म्हटले जाते. परंतु सामान्यतः इतर चौपाया प्राण्यांनाही 'मिगो' असेच म्हटले जाते. जसे की, सुसीम जातकामध्ये 'हे तुझे काळे मृग (हत्ती) पांढऱ्या दातांचे आहेत, जे हजारो सुवर्णजाळ्यांनी झाकलेले आहेत' या पाळी उताऱ्यात हत्तींनाही 'मिगो' शब्दाने 'काळा मृग' (काळे हत्ती) असे म्हटले आहे. अथवा, शिकारी लोकांद्वारे आपल्या उपजीविकेसाठी मांसाच्या इच्छेने ज्याचा शोध घेतला जातो, तो 'मिगो' होय; जसे की जंगलात राहणारे ससे, हरिण, काळवीट इत्यादी चौपाया प्राणी. याचप्रमाणे 'मगो' देखील आहे. 'मूर्ख मनुष्य अर्थ (हित) प्राप्त करत नाही' (atthaṃ na labhate mago) या वाक्यात 'मगो' म्हणजे मूर्ख (बाल) असा अर्थ आहे. มคฺค คเวสเน. มคฺเคติ, มคฺคยติ. มคฺโค, มคฺคนํ. मग्ग् (magga) धातू गवेषण (शोध घेणे) या अर्थात आहे. 'मग्गेति', 'मग्गयति' यापासून 'मग्गो' (maggo - मार्ग), 'मग्गनं' (magganaṃ - शोधणे) हे शब्द बनतात. เอตฺถ จ มคฺโคติ ปฏิปทาย จ ปกติมคฺคสฺส จ อุปายสฺส จ อธิวจนํ. ‘‘มหาวิหารวาสีนํ, วาจนามคฺคนิสฺสิต’’นฺติอาทีสุ ปน กถาปพนฺโธปิ ‘‘มคฺโค’’ติ วุจฺจติ. ตตฺร ปฏิปทา เอกนฺตโต ชาติชราพฺยาธิทุกฺขาทีหิ ปีฬิเตหิ สตฺเตหิ ทุกฺขกฺขยํ นิพฺพานํ ปาปุณตฺถาย มคฺคิตพฺโพ คเวสิตพฺโพติ มคฺโค. ปกติมคฺโค [Pg.287] ปน มคฺคมูฬฺเหหิ มคฺคิตพฺโพติ มคฺโค. ปกติมคฺคมูฬฺเหหิ จ ปฏิปทาสงฺขาตาริยมคฺคมูฬฺหา เอว พหโว สนฺติ. ปกติมคฺโค หิ กทาจิ เอว อทฺธิกานํ มุยฺหติ, ‘‘เอส มคฺโค’’ติ นายกา น ทุลฺลภา. อริยมคฺโค ปน สพฺพทาเยว สพฺพโลกสฺส มุยฺหติ, นายกา ปรมทุลฺลภา. ตสฺมา โส เอว อวิชฺชาสมฺมูฬฺเหหิ มคฺคิตพฺโพติ มคฺโค. อญฺเญสํ ปน ทฺวินฺนํ ธาตูนํ วเสนปิ อตฺถํ วทนฺติ ครู ‘‘กิเลเส มาเรนฺโต คจฺฉตีติ มคฺโค’’ติ. ตํ ตํ กิจฺจํ หิตํ วา นิปฺผาเทตุกาเมหิ มคฺคิยติ คเวสิยตีติ มคฺโค, อุปาโย. มคฺคสทฺโท หิ ‘‘อภิธมฺมกถามคฺคํ, เทวานํ สมฺปวตฺตยี’’ติ เอตฺถ อุปาเยปิ วตฺตติ. ตถา หิ อภิธมฺมฏีกายํ ‘‘มคฺโคติ อุปาโย, ขนฺธายตนาทีนํ กุสลาทีนญฺจ ธมฺมานํ อวโพธสฺส สจฺจปฺปฏิเวธสฺเสว วา อุปายภาวโต อภิธมฺมกถามคฺโค’’ติ วุตฺโต, ปพนฺโธ วา ‘‘มคฺโค’’ติ วุจฺจติ. โส หิ ทีฆตฺตา มคฺโค วิยาติ มคฺโค, ตสฺมา อภิธมฺมกถาปพนฺโธ อภิธมฺมกถามคฺโคติ วุตฺโต. อิทานิ ปกติปฏิปทามคฺคานํ นามานิ กถยาม. เตสุ ปกติมคฺคสฺส – येथे 'मग्गो' (मार्ग) हा शब्द प्रतिपदा (आचरण/मार्ग), प्रकृती मार्ग (साधारण रस्ता) आणि उपाय यांचा वाचक (समानार्थी) आहे. 'महाविहारवासीयांच्या वाचनामार्गावर आधारित' इत्यादी वाक्यांमध्ये कथाप्रबंधालाही 'मग्गो' म्हटले जाते. त्यामध्ये, जन्म, जरा, व्याधी आणि दुःख इत्यादींनी पीडित असलेल्या प्राण्यांनी दुःखाचा क्षय करून निर्वाण प्राप्त करण्यासाठी ज्याचा शोध घेतला पाहिजे, तो 'मग्गो' (प्रतिपदा मार्ग) होय. प्रकृती मार्ग (साधारण रस्ता) म्हणजे जो रस्ता चुकलेल्या प्रवाशांनी शोधायचा असतो, तो 'मग्गो' होय. आणि रस्ता चुकलेल्या प्रवाशांपेक्षा प्रतिपदा नावाचा आर्यमार्ग चुकलेले लोकच अधिक आहेत. कारण प्रकृती मार्ग कधीतरीच प्रवाशांना चुकवतो आणि 'हा मार्ग आहे' असे सांगणारे मार्गदर्शक सहज मिळतात. परंतु आर्यमार्ग हा नेहमीच संपूर्ण जगाला चुकवतो (भ्रमित करतो) आणि त्याचे मार्गदर्शक (बुद्ध) अत्यंत दुर्मिळ असतात. म्हणून अविद्येने मोहित झालेल्यांनी ज्याचा शोध घेतला पाहिजे, तो 'मग्गो' (आर्यमार्ग) होय. इतर दोन धातूंच्या आधारे आचार्य असाही अर्थ सांगतात की, 'जो क्लेशांना मारत जातो, तो मार्ग (मग्गो) होय.' ज्यांना आपले हित किंवा कार्य साध्य करायचे आहे, त्यांच्याद्वारे ज्याचा शोध घेतला जातो, तो 'मग्गो' म्हणजे उपाय होय. 'मग्गो' हा शब्द 'देवांना अभिधम्म कथेचा मार्ग प्रवृत्त केला' या वाक्यात 'उपाय' या अर्थातही वापरला जातो. तसेच अभिधम्मटीकेमध्ये म्हटले आहे की, 'मग्गो म्हणजे उपाय; स्कंध, आयतन इत्यादी आणि कुशल इत्यादी धर्मांच्या आकलनाचा किंवा सत्य साक्षात्काराचा उपाय असल्यामुळे त्याला अभिधम्मकथामार्ग म्हटले आहे', किंवा प्रबंधाला 'मग्गो' म्हटले जाते. तो लांब असल्यामुळे मार्गासारखा असतो, म्हणून अभिधम्मकथाप्रबंधाला 'अभिधम्मकथामार्ग' म्हटले आहे. आता आपण प्रकृती मार्ग आणि प्रतिपदा मार्ग यांच्या नावांची चर्चा करू. त्यापैकी प्रकृती मार्गाची नावे खालीलप्रमाणे आहेत – ‘‘มคฺโค ปนฺโถ ปโถ ปชฺโช, อญฺฌสํ วฏุมา’ยนํ; อทฺธาน’มทฺธา ปทวี, วตฺตนิ เจว สนฺตตี’’ติ 'मग्गो' (मार्ग), 'पंथो' (पंथ), 'पथो' (पथ), 'पज्जो' (पद्य), 'अंजसं' (अंजस), 'वटुमं' (वाट), 'अयनं' (अयन), 'अद्धानं' (अध्वान), 'अद्धा' (अध्वा), 'पदवी' (पदवी), 'वत्तनी' (वर्तनी) आणि 'संतती' (संतती) ही नावे आहेत. อิมานิ นามานิ. ปฏิปทามคฺคสฺส ปน – ही (प्रकृती मार्गाची) नावे आहेत. तर प्रतिपदा मार्गाची (नावे खालीलप्रमाणे आहेत) – ‘‘มคฺโค ปนฺโถ ปโถ ปชฺโช, อญฺชสํ วฏุมา’ยนํ; นาว อุตฺตร เสตุ จ, กุลฺโล จ ภิสิ สงฺกโม’’ติ 'मग्गो' (मार्ग), 'पंथो' (पंथ), 'पथो' (पथ), 'पज्जो' (पद्य), 'अंजसं' (अंजस), 'वटुमं' (वाट), 'अयनं' (अयन), 'नावा' (नाव/नौका), 'उत्तरं' (तारक/पार करणारा), 'सेतु' (सेतू/पूल), 'कुल्लो' (तराफा), 'भिसि' (तट्टा) आणि 'संकमो' (संक्रम/साकव) ही नावे आहेत. อเนกานิ นามานิ. เอตฺถ ปน เกจิ ‘‘นาวาติอาทีนิ ปกติมคฺคสฺส นามานี’’ติ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ, ปกติมคฺคสฺส กิสฺมิญฺจิปิ ปาฬิปฺปเทเส ‘‘นาวา’’ติอาทีหิ ปเทหิ วุตฺตฏฺฐานาภาวโต, อภิธานสตฺเถสุ จ ‘‘นาวา’’ อิจฺจาทิกานํ ตทภิธานานํ อนาคตตฺตา. अशी अनेक नावे आहेत. येथे काही लोक म्हणतात की 'नावा' (नाव) इत्यादी प्रकृती मार्गाची (साधारण रस्त्याची) नावे आहेत, परंतु ते स्वीकारू नये. कारण पाळी साहित्यात कोणत्याही ठिकाणी प्रकृती मार्गासाठी 'नावा' इत्यादी शब्दांचा वापर केलेला आढळत नाही, आणि अभिधानशास्त्रात (कोशग्रंथात) देखील 'नावा' इत्यादी शब्दांचा त्या अर्थाने उल्लेख आलेला नाही. อยํ [Pg.288] ปเนตฺถ วจนตฺโถ – นาวาวิยาติ นาวา, อุตฺตรนฺติ เอเตนาติ อุตฺตรํ, นาวาเยว อุตฺตรนฺติ. อยญฺหิ นาวาปริยาโย ‘‘ตรํ, ตรณํ, โปโต, ปฺลโว’’ติ. อิเมปิ ตํปริยายาเยว. อุตฺตรํ วิยาติ อุตฺตรํ. เสตุ วิยาติ เสตุ. กุลฺโล วิยาติ กุลฺโล. ภิสิ วิยาติ ภิสิ. สงฺกโม วิย, สงฺกมนฺติ วา เอเตนาติ สงฺกโม, สพฺพเมตํ อริยมคฺคสฺเสว นามํ, น ปกติมคฺคสฺส. ตถา หิ ‘‘ธมฺมนาวํ สมารูยฺห, สนฺตาเรสฺสํ สเทวก’’นฺติ จ, ‘‘ธมฺมเสตุํ ทฬฺหํ กตฺวา, นิพฺพุโต โส นราสโภ’’ติ จ, ‘‘กุลฺโล’ติ โข ภิกฺขเว อริยมคฺคสฺเสตํ อธิวจน’’นฺติ จ เอวมาทินา ตตฺถ ตตฺถ ภควตา อริยมคฺโค ‘‘นาวา’’ติอาทีหิ อเนเกหิ นาเมหิ วุตฺโต. อฏฺฐกถาจริเยหิปิ สุตฺตนิปาตฏฺฐกถายํ ‘‘พทฺธา ภิสิ สุสงฺขตา ภควา’’ติ เอตสฺมึ ปเทเส เอวํ อตฺถสํวณฺณนา กตา ‘‘ภิสีติ ปตฺถริตฺวา ปุถุลํ กตฺวา พทฺธา ‘กุลฺลา’ติ วุจฺจติ โลเก, อริยสฺส วินเย ปน อริยมคฺโค’ติ. येथे शब्दांचा अर्थ असा आहे – जी नावेसारखी (नौकेसारखी) असते ती 'नावा' (नाव), ज्याच्याद्वारे पार केले जाते ते 'उत्तरं' (तारक), म्हणजेच नाव हेच पार पाडणारे साधन आहे. 'नावा' या शब्दाचे समानार्थी शब्द 'तरं', 'तरणं', 'पोतो', 'प्लवो' हे आहेत. हे देखील त्याचेच समानार्थी आहेत. जे उत्तर (पार पाडणारे) सारखे असते ते 'उत्तरं'. जे सेतूसारखे (पुलासारखे) असते तो 'सेतु'. जो कुल्लासारखा (तराफ्यासारखा) असतो तो 'कुल्लो'. जो भिसिसारखा (तट्ट्यासारखा) असतो ती 'भिसि'. जो संक्रमासारखा (साकवासारखा) असतो किंवा ज्याच्याद्वारे लोक पार जातात तो 'संकमो' (संक्रम). हे सर्व केवळ आर्यमार्गाचेच नाव आहे, प्रकृती मार्गाचे नाही. तसेच, 'धम्मरूपी नौकेवर आरूढ होऊन मी देवलोकासह सर्वांना पार करीन', 'धम्मरूपी सेतू मजबूत करून तो नरश्रेष्ठ निर्वाण पावला', आणि 'हे भिक्खूंनो, कुल्लो (तराफा) हे आर्यमार्गाचेच नाव आहे' इत्यादी वाक्यांद्वारे भगवंतांनी ठिकठिकाणी आर्यमार्गाला 'नावा' इत्यादी अनेक नावांनी संबोधले आहे. अट्ठकथाचार्यांनी देखील सुत्तनिपात अट्ठकथेमध्ये 'बद्धा bhisi सुसंखता भगवा' या पाठावर अशी अर्थ-स्पष्टता केली आहे की – 'लोकात पसरवून आणि रुंद करून बांधलेल्या तराफ्याला भिसि (कुल्ला) म्हटले जाते, परंतु आर्यांच्या विनयात (शासनात) 'भिसि' म्हणजे आर्यमार्ग होय.' ‘มคฺโค ปชฺโช ปโถ ปนฺโถ, อญฺชสํ วฏุมา’ยนํ; นาวา อุตฺตร เสตุ จ, กุลฺโล จ ภิสิ สงฺกโม; อทฺธานํ ปภโว’จฺเจว, ตตฺถ ตตฺถ ปกาสิโต’’ติ. 'मग्गो' (मार्ग), 'पज्जो' (पद्य), 'पथो' (पथ), 'पंथो' (पंथ), 'अंजसं' (अंजस), 'वटुमं' (वाट), 'अयनं' (अयन), 'नावा' (नाव), 'उत्तरं' (तारक), 'सेतु' (सेतू), 'कुल्लो' (तराफा), 'भिसि' (तट्टा), 'संकमो' (संक्रम), 'अद्धानं' (अध्वान) आणि 'प्रभव' हे शब्द ठिकठिकाणी (मार्गाचे वाचक म्हणून) प्रकाशित केले आहेत. เอวํ อาจริเยหิ กตาย อตฺถสํวณฺณนาย ทสฺสนโต จ ‘‘นาวาติอาทีนิปิ ปกติมคฺคสฺส นามานี’’ติ วจนํ น คเหตพฺพํ, ยถาวุตฺตเมว วจนํ คเหตพฺพํ. अशा प्रकारे आचार्यांनी केलेल्या अर्थ-वर्णनावरून आणि दर्शनावरून 'नावा' इत्यादी देखील नैसर्गिक मार्गाची नावे आहेत, असे वचन स्वीकारू नये, तर जसे सांगितले आहे तसेच वचन स्वीकारावे. โกจิ ปเนตฺถ เอวํ วเทยฺย ‘‘ธมฺมเสตุํ ทฬฺหํ กตฺวา’ติ เอตฺถ ‘ธมฺมเสตุนฺติ มคฺคเสตุ’นฺติ วจนโต ธมฺมสทฺโท มคฺเค วตฺตติ, น เสตุสทฺโท’’ติ. ตนฺน, ธมฺมสทฺโท วิย เสตุสทฺโทปิ มคฺเค วตฺตตีติ เสตุ วิยาติ เสตุ, ธมฺโม เอว เสตุ ธมฺมเสตูติ อตฺถวเสน, เอส นโย อญฺญตฺราปิ. อปรมฺปิ วเทยฺย [Pg.289] ‘‘นนุ พฺรหฺมชาลสุตฺตนฺตฏฺฐกถายํ ‘ทกฺขิณุตฺตเรน โพธิมณฺฑํ ปวิสิตฺวา อสฺสตฺถทุมราชานํ ปทกฺขิณํ กตฺวา ปุพฺพุตฺตรภาเค ฐิโต’ติ อิมสฺมึ ฐาเน ทกฺขิณุตฺตรสทฺเทน ทกฺขิโณ มคฺโค วุตฺโต’’ติ. น, อเนเกสุ ปาฬิปฺปเทเสสุ อฏฺฐกถาปเทเสสุ จ อภิธานสตฺเถสุ จ มคฺควาจกสฺส อุตฺตรสทฺทสฺส อนาคตตฺตา, ตสฺมา ตตฺถ เอวมตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ ‘‘ทกฺขิณทิสโต คนฺตพฺโพ อุตฺตรทิสาภาโค ทกฺขิณุตฺตโรติ วุจฺจติ, เอวํภูเตน ทกฺขิณุตฺตเรน โพธิมณฺฑปวิสนํ สนฺธาย ทกฺขิณุตฺตเรน โพธิมณฺฑํ ปวิสิตฺวาติ วุตฺต’’นฺติ. อถ วา ทกฺขิณุตฺตเรนาติ ทกฺขิณปจฺฉิมุตฺตเรน, เอตฺถ อาทิอวสานคฺคหเณน มชฺฌสฺสปิ คหณํ ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ คหณํเยว หิ ยํ ชาตกนิทาเน วุตฺตํ ‘‘โพธิสตฺโต ติณํ คเหตฺวา โพธิมณฺฑํ อารูยฺห ทกฺขิณทิสาภาเค อุตฺตราภิมุโข อฏฺฐาสิ, ตสฺมึ ขเณ ทกฺขิณจกฺกวาฬํ โอสีทิตฺวา เหฏฺฐา อวีจิสมฺปตฺตํ วิย อโหสิ, อุตฺตรจกฺกวาฬํ อุลฺลงฺฆิตฺวา อุปริ ภวคฺคปฺปตฺตํ วิย อโหสิ, โพธิสตฺโต อิทํ สมฺโพธิปาปุณฏฺฐานํ น ภวติ มญฺเญติ ปทกฺขิณํ กโรนฺโต ปจฺฉิมทิสาภาคํ คนฺตฺวา ปุรตฺถาภิมุโข อฏฺฐาสี’’ติอาทิ, เตน สเมติ. อถาปิ วเทยฺย ‘‘ยทิ อุตฺตรสทฺโท ทิสาวาจโก, เอวญฺจ สติ ‘‘ทกฺขิณุตฺตเรนา’’ติ เอนโยคํ อวตฺวา ‘‘ทกฺขิณุตฺตรายา’’ติ อายโยโค วตฺตพฺโพ’’ติ. ตนฺน, ทิสาวาจกสฺสปิ สทฺทสฺส ‘‘อุตฺตเรน นที สีตา, คมฺภีรา ทุรติกฺกมา’’ติ เอนโยควเสน วจนโต. อปิจ ทิสาภาคํ สนฺธาย ‘‘ทกฺขิณุตฺตเรนา’’ติ วจนํ วุตฺตํ. ทิสาภาโค หิ ทิสา เอวาติ นิฏฺฐเมตฺถาวคนฺตพฺพํ. येथे कोणी असे म्हणू शकेल की, 'धम्मसेतुं दळ्हं कत्वा' (धम्मरूपी पूल मजबूत करून) यामध्ये 'धम्मसेतु म्हणजे मार्गसेतु (मार्गरूपी पूल)' अशा वचनामुळे 'धम्म' शब्द मार्गाच्या अर्थात वापरला जातो, 'सेतु' शब्द नाही. हे योग्य नाही, कारण 'धम्म' शब्दाप्रमाणे 'सेतु' शब्दही मार्गाच्या अर्थात वापरला जातो. 'सेतु सारखा तो सेतु' आणि 'धम्म हाच सेतु तो धम्मसेतु' या अर्थानुसार, हाच नियम इतर ठिकाणीही लागू होतो. आणखी कोणी असे म्हणू शकेल की, 'ब्रह्मजालसुत्तन्त-अट्ठकथा' मध्ये 'दक्खिणुत्तरेण बोधिमण्डं पविसित्वा अस्सत्थदुमराजानं पदक्खिणं कत्वा पुब्बुत्तरभागे ठितो' (दक्षिण-उत्तरेकडून बोधिमंडळात प्रवेश करून, अश्वत्थ वृक्षाला प्रदक्षिणा घालून ईशान्य भागात उभे राहिले) या ठिकाणी 'दक्खिणुत्तर' शब्दाने 'दक्षिण मार्ग' असा अर्थ सांगितला आहे. नाही, कारण अनेक पालि संदर्भांमध्ये, अट्ठकथांच्या संदर्भांमध्ये आणि अभिधानशास्त्रांमध्ये (कोशग्रंथांमध्ये) 'उत्तर' शब्द मार्गाचा वाचक म्हणून आलेला नाही. म्हणून तेथे असा अर्थ समजला पाहिजे की, 'दक्षिण दिशेकडून जाण्याचा उत्तर दिशेचा भाग म्हणजे दक्खिणुत्तर' असे म्हटले जाते. अशा प्रकारच्या दक्षिण-उत्तर मार्गाने बोधिमंडळात प्रवेश करण्याच्या संदर्भाने 'दक्खिणुत्तरेण बोधिमण्डं पविसित्वा' असे म्हटले आहे. अथवा 'दक्खिणुत्तरेण' म्हणजे दक्षिण-पश्चिम-उत्तर (नैऋत्य-वायव्य-उत्तर) असा अर्थ होतो. येथे आदि (सुरुवात) आणि अवसान (शेवट) यांच्या ग्रहणाने मधल्या भागाचेही ग्रहण (समावेश) समजले पाहिजे. अशा प्रकारे ग्रहण करणे हे जातकनिदानात जे म्हटले आहे, त्याच्याशी सुसंगत आहे: 'बोधिसत्त्व तृण (गवत) घेऊन बोधिमंडळावर चढले आणि दक्षिण दिशेच्या भागात उत्तरेकडे तोंड करून उभे राहिले. त्या क्षणी दक्षिण चक्रवाळ खाली खचून खाली अवीची (नरक) पर्यंत पोहोचल्यासारखे झाले आणि उत्तर चक्रवाळ वर उचलले जाऊन वर भवग्ग (भवाग्र) पर्यंत पोहोचल्यासारखे झाले. बोधिसत्त्वांनी विचार केला की, हे संबोधी प्राप्त करण्याचे स्थान नाही असे वाटते, म्हणून प्रदक्षिणा घालत ते पश्चिम दिशेच्या भागात गेले आणि पूर्वेकडे तोंड करून उभे राहिले' इत्यादी. या विधानाशी हे सुसंगत आहे. जर कोणी असे म्हणेल की, 'जर उत्तर शब्द दिशावाचक आहे, तर असे असताना 'दक्खिणुत्तरेण' असा 'एन' प्रत्यय न वापरता 'दक्खिणुत्तराय' असा 'आय' प्रत्यय वापरायला हवा होता.' हे योग्य नाही, कारण दिशावाचक शब्दाचाही 'उत्तरेण नदी सीता, गम्भीरा दुरतिक्कमा' (उत्तरेकडे सीता नदी आहे, जी खोल आणि पार करण्यास कठीण आहे) याप्रमाणे 'एन' प्रत्ययाच्या योगाने प्रयोग होतो. शिवाय, दिशाभागाच्या संदर्भाने 'दक्खिणुत्तरेण' असे वचन म्हटले आहे. दिशाभाग म्हणजेच दिशा होय, असा येथे निष्कर्ष काढला पाहिजे। คการนฺตธาตุรูปานิ. ग-कारान्त धातूंची रूपे. ฆการนฺตธาตุ घ-कारान्त धातू. ลิฆิ [Pg.290] ภาสเน. ลงฺเฆติ, ลงฺฆยติ. เอตานิ พุทฺธวจเน อปฺปสิทฺธานิปิ โลกิกปฺปโยคทสฺสนวเสน อาคตานิ. สาสนสฺมิญฺหิ ภูวาทิคณจุราทิคณปริยาปนฺนสฺส คตฺยตฺถวาจกอุลฺลงฺฆนตฺถปริทีปกสฺส ธาตุสฺส รูปํ อตีว ปสิทฺธํ. लिघि भाषणात (बोलण्याच्या अर्थात). लङ्घेति, लङ्घयति. जरी ही बुद्धवचनात आढळत नसली तरी लौकिक प्रयोगाच्या दर्शनानुसार आलेली आहेत. कारण शासनात (बुद्धशासनात) भूवादिगण आणि चुरादिगण अंतर्गत येणाऱ्या, गत्यर्थक आणि उल्लंघनाचा अर्थ दर्शवणाऱ्या धातूचे रूप अत्यंत प्रसिद्ध आहे. ลงฺฆ ลงฺฆเน. ลงฺเฆติ, ลงฺฆยติ. लङ्घ उल्लंघनाच्या (ओलांडण्याच्या) अर्थात. लङ्घेति, लङ्घयति. ‘‘อติกร’มกรา’จริย, มยฺหมฺเปตํ น รุจฺจติ; จตุตฺเถ ลงฺฆยิตฺวาน, ปญฺจมิยมฺปิ อาวุโต’’ติ 'हे आचार्या, तुम्ही अतिशय कठीण काम केले आहे, मला हे आवडत नाही; हे मित्रा, चौथ्या (तलवारीवरून) उडी मारून (उल्लंघन करून) पाचव्या तलवारीवरही (उडी मारली)' असे. อิมสฺมึ สตฺติลงฺฆนชาตเก จุราทิคณปริยาปนฺนสฺส คตฺยตฺถวาจกสฺส อุลฺลงฺฆนตฺถปริทีปกสฺส ลงฺฆธาตุสฺส ‘‘ลงฺฆยิตฺวา, ลงฺฆยิตฺวานา’’ติ รูเป ทิฏฺเฐเยว ‘‘ลงฺเฆติ, ลงฺฆยตี’’ติ รูปานิ ทิฏฺฐานิ เอว โหนฺติ. ภาสตฺถวาจกสฺส ปน ตถารูปานิ รูปานิ น ทิฏฺฐานิ, เอวํ สนฺเตปิ ปุพฺพาจริเยหิ ทีฆทสฺสีหิ อภิมตตฺตา ภาสตฺถวาจิกาปิ ลงฺฆธาตุ อตฺถีติ คเหตพฺพา, เอวํ สพฺเพสุปิ ภูวาทิคณาทีสุ สาสเน อปฺปสิทฺธานมฺปิ รูปานํ สาสนานุกูลานํ คหณํ เวทิตพฺพํ, อนนุกูลานญฺจ อปฺปสิทฺธานํ ฉฑฺฑนํ. या सत्तिलङ्घन जातकामध्ये चुरादिगण अंतर्गत येणाऱ्या, गत्यर्थक आणि उल्लंघनाचा अर्थ दर्शवणाऱ्या 'लङ्घ' धातूचे 'लङ्घयित्वा, लङ्घयित्वान' ही रूपे दिसतातच, तसेच 'लङ्घेति, Lङ्घयति' ही रूपे देखील दिसतात. परंतु भाषणाच्या (बोलण्याच्या) अर्थाचे तशा प्रकारचे रूप आढळत नाही. असे असले तरी, दीर्घद्रष्ट्या पूर्वाचार्यांनी मान्य केल्यामुळे भाषणाचा अर्थ सांगणारा 'लङ्घ' धातू देखील आहे, असे मानले पाहिजे. अशा प्रकारे सर्व भूवादिगणादींमध्ये शासनात (बुद्धशासनात) न आढळणाऱ्या रूपांचेही शासनाला अनुकूल असल्यास ग्रहण करावे आणि जे अनुकूल नसतील अशा न आढळणाऱ्या रूपांचा त्याग करावा, असे समजले पाहिजे. อฆ ปาปกรเณ. อเฆติ, อฆยติ. อฆํ, อโฆ, อนโฆ. अघ पाप करण्याच्या अर्थात. अघेति, अघयति. अघं, अघो, अनघो. ตตฺถ อฆนฺติ ทุกฺขํ. ‘‘อฆนฺตํ ปฏิเสวิสฺสํ. วเน วาฬมิคากิณฺเณ. ขคฺคทีปินิเสวิเต’’ติ อิทํ นิทสฺสนํ. อโฆติ กิเลโส. เตน อเฆน อรหา อนโฆ. ตตฺถ อฆยนฺติ ปาปํ กโรนฺติ สตฺตา เอเตนาติ อฆํ, กินฺตํ? ทุกฺขํ, เอวํ อโฆ. นนุ จ สปฺปุริสา ทุกฺขเหตุปิ กิเลสเหตุปิ จ อตฺตโน สุขตฺถาย ปาปํ น กโรนฺติ. ตถา หิ – त्यामध्ये 'अघ' म्हणजे दुःख. 'हिंस्र श्वापदांनी भरलेल्या आणि गेंडा व बिबट्यांनी वास्तव्य केलेल्या वनात मी त्या दुःखाचा (अघाचा) सामना करीन' हे याचे उदाहरण आहे. 'अघ' म्हणजे क्लेश. त्या अघापासून (क्लेशापासून) मुक्त असल्यामुळे अर्हत हे 'अनघ' (क्लेशरहित) असतात. तेथे 'अघयन्ति' म्हणजे प्राणी ज्याच्याद्वारे पाप करतात ते 'अघ' होय. ते काय आहे? दुःख, तसेच क्लेश (अघो). परंतु सत्पुरुष दुःखाच्या कारणाने किंवा क्लेशाच्या कारणाने देखील स्वतःच्या सुखासाठी पाप करत नाहीत. कारण असे म्हटले आहे की - ‘‘น [Pg.291] ปณฺฑิตา อตฺตสุขสฺส เหตุ,ปาปานิ กมฺมานิ สมาจรนฺติ; ทุกฺเขน ผุฏฺฐา ขลิตาปิ สนฺตา,ฉนฺทา จ โทสา น ชหนฺติ ธมฺม’’นฺติ 'पंडित (ज्ञानी लोक) स्वतःच्या सुखासाठी पाप कर्मे करत नाहीत; दुःखाने पीडित किंवा स्खलित झाले तरीही संत (सत्पुरुष) छंद (आसक्ती) आणि द्वेषामुळे धम्माचा त्याग करत नाहीत' असे. วุตฺตํ. เอวํ สนฺเต กสฺมา ‘‘อฆ ปาปกรเณ’’ติ ธาตุ จ ‘‘อฆยนฺติ ปาปํ กโรนฺติ สตฺตา เอเตนาติ อฆ’’นฺติอาทิวจนญฺจ วุตฺตนฺติ? สจฺจํ, เยภุยฺเยน ปน สตฺตา ทุกฺขาทิเหตุ ปาปกมฺมํ กโรนฺติ, เอเตสุ สปฺปุริสา เอว น กโรนฺติ, อิตเร กโรนฺติ. เอวํ ปาปกรณสฺส หิ ทุกฺขํ กิเลโส จ เหตุ. ตถา หิ – असे म्हटले आहे. असे असताना 'अघ पाप करण्याच्या अर्थात' हा धातू आणि 'प्राणी ज्याच्याद्वारे पाप करतात ते अघ होय' इत्यादी वचन का म्हटले आहे? हे सत्य आहे, परंतु बहुतांश प्राणी दुःखादी कारणांमुळे पाप कर्म करतात; त्यांच्यामध्ये केवळ सत्पुरुषच पाप करत नाहीत, इतर करतात. अशा प्रकारे पाप करण्यामागे दुःख आणि क्लेश हेच कारण आहे. कारण असे म्हटले आहे की - สุขีปิ เหเก น กโรนฺติ ปาปํ,อวณฺณสํสคฺคภยา ปุเนเก; ปหู สมาโน วิปุลตฺถจินฺตี,กึการณา เม น กโรสิ ทุกฺข’’นฺติ 'काही लोक सुखी असतानाही पाप करत नाहीत, तर काही लोक अपकीर्ती आणि वाईट संगतीच्या भयाने पाप करत नाहीत; हे समर्थ आणि विपुल हिताचा विचार करणाऱ्या (राजा), तू मला कोणत्या कारणाने दुःख देत आहेस?' असे. วุตฺตํ. อยญฺหิ คาถา ทุกฺขเหตุปิ สตฺตา ปาปํ กโรนฺตีติ เอตมตฺถํ ทีเปติ. ‘‘กุทฺโธ หิ ปิตรํ หนฺติ, กุทฺโธ หนฺติ สมาตร’’นฺติ อยํ ปน กิเลสเหตุปิ ปาปํ กโรนฺตีติ เอตมตฺถํ ทีเปติ, ตสฺมา อมฺเหหิ ‘‘อฆ ปาปกรเณ’’ติอาทิวจนํ วุตฺตํ. असे म्हटले आहे. ही गाथा 'प्राणी दुःखाच्या कारणाने देखील पाप करतात' हा अर्थ स्पष्ट करते. 'क्रोधाने अंध झालेला मनुष्य पित्याचा वध करतो, क्रोधाने अंध झालेला मनुष्य मातेचा वध करतो' हे वचन 'प्राणी क्लेशाच्या कारणाने देखील पाप करतात' हा अर्थ स्पष्ट करते. म्हणून आम्ही 'अघ पाप करण्याच्या अर्थात' इत्यादी वचन म्हटले आहे. ฆการนฺตธาตุรูปานิ. घ-कारान्त धातूंची रूपे. จการนฺตธาตุ च-कारान्त धातू. โลจ ทสฺสเน. โลเจติ, โลจยติ. โลจนํ. รูปารมฺมณํ โลจยติ ปสฺสตีติ โลจนํ, จกฺขุ. लोच दर्शनाच्या (पाहण्याच्या) अर्थात. लोचेति, लोचयति. लोचनं. जे रूपाचे (दृश्याचे) दर्शन घडवते किंवा पाहते ते 'लोचन' म्हणजे चक्षु (डोळा). กิจิ มทฺทเน. กิญฺเจติ, กิญฺจยติ. กิญฺจนํ, อกิญฺจโน. किचि मर्दनाच्या (दडपण्याच्या/पीडा देण्याच्या) अर्थात. किञ्चेति, किञ्चयति. किञ्चनं, अकिञ्चनो. ตตฺถ [Pg.292] กิญฺจนนฺติ ปลิโพโธ. กิญฺเจติ สตฺเต มทฺทตีติ กิญฺจนํ. กิญฺจนสทฺโท มทฺทนตฺเถ วตฺตติ. มนุสฺสา หิ วีหึ มทฺทนฺตา โคณํ ‘‘กิญฺเจหิ กาปิล, กิญฺเจหิ กาปิลา’’ติ วทนฺติ. त्यामध्ये 'किञ्चन' म्हणजे अडथळा (पळिबोध). जे प्राण्यांना दडपते (पीडा देते) ते 'किञ्चन' होय. 'किञ्चन' शब्द मर्दनाच्या अर्थात वापरला जातो. कारण लोक भाताची मळणी करताना बैलाला 'हे कपिला (तांबड्या बैला), मळणी कर (किञ्चेहि), हे कपिला मळणी कर' असे म्हणतात. ปจิ วิตฺถาเร. ปญฺเจติ, ปญฺจยติ. ปปญฺเจติ, ปปญฺจยติ. ปปญฺจา. पचि विस्ताराच्या अर्थात. पञ्चेति, पञ्चयति. प्रपञ्चेति, प्रपञ्चयति. प्रपञ्चा (प्रपंच). เอตฺถ ปปญฺจาติ ตณฺหามานทิฏฺฐิโย. เอตา หิ อตฺตนิสฺสิตานํ สตฺตานํ สํสารํ ปปญฺเจนฺติ วิตฺถินฺนํ กโรนฺตีติ ปปญฺจาติ วุจฺจนฺติ. อถ วา ปปญฺเจนฺติ ยตฺถ สยํ อุปฺปนฺนา ตํสนฺตานํ วิตฺถาเรนฺติ จิรํ ฐเปนฺตีติ ปปญฺจา. โลกิยา ปน ‘‘อมฺหากํ ตุมฺเหหิ สทฺธึ กเถนฺตานํ ปปญฺโจ โหตี’’ติอาทีนิ วทนฺตา กาลสฺส จิรภาวํ ปปญฺโจติ วทนฺติ, สาสเน ปน ทฺวยมฺปิ ลพฺภติ. येथे 'पपञ्च' (प्रपंच) म्हणजे तण्हा (तृष्णा), मान (अहंकार) आणि दिट्ठि (दृष्टी/मिथ्यादृष्टी) होय. कारण हे स्वतःवर अवलंबून असणाऱ्या प्राण्यांच्या संसाराला प्रपंचित (विस्तारित) करतात, विस्तृत करतात, म्हणून त्यांना 'पपञ्च' असे म्हटले जाते. अथवा, जेथे स्वतः उत्पन्न होतात, त्या संतानला (चित्तसंततीला) विस्तारित करतात आणि दीर्घकाळ टिकवून ठेवतात, म्हणून ते 'पपञ्च' होत. परंतु, लौकिक लोक 'तुमच्याशी बोलताना आमचा प्रपंच (विलंब) होतो' इत्यादी बोलताना काळाच्या दीर्घत्वाला 'प्रपंच' म्हणतात, परंतु शासनात (बुद्धशासनात) दोन्ही अर्थ प्राप्त होतात. สิจฺจ กุฑฺฑเน. สิจฺเจติ, สิจฺจยติ. सिच्च् (धातू) सिंचन करणे (शिंपडणे) या अर्थात. सिच्चेति, सिच्चयति. วญฺจุ ปลมฺภเน. ปลมฺภนํ อุปลาปนํ. วญฺเจติ, วญฺจยติ. วญฺจโก, วญฺจนํ. ภูวาทิคเณ ปน วญฺจธาตุ คตฺยตฺเถ วตฺตติ. ‘‘สนฺติ ปาทา อวญฺจนา’’ติ หิ ปาฬิ वञ्चु (धातू) फसवणे (ठकवणे) या अर्थात. 'पलम्भन' म्हणजे फसवणूक (मनधरणी). वञ्चेति, वञ्चयति. वञ्चको (फसवणारा), वञ्चनम् (फसवणूक). परंतु भूवादि गणात 'वञ्च्' धातू गती (गमन) या अर्थात वर्ततो. कारण 'सन्ति पादा अवञ्चना' (पाय आहेत पण ते चालत नाहीत) असे पाळीमध्ये आहे. จจฺจ อชฺฌยเน. จจฺเจติ, จจฺจยติ. चच्च् (धातू) अध्ययन करणे (अभ्यास करणे) या अर्थात. चच्चेति, चच्चयति. จุ จวเน. จาเวติ, จาวยติ. อญฺโญ ‘‘จุ สหเน’’ อิติ พฺรุเต. จาเวติ, จาวยติ, สหตีติ อตฺโถ. चु (धातू) च्युत होणे (पतन होणे/दूर करणे) या अर्थात. चावेति, चावयति. दुसरा कोणी 'चु सहने' (सहन करणे या अर्थात) असे म्हणतो. चावेति, चावयति, सहन करतो असा अर्थ आहे. อญฺจุ วิเสสเน. อญฺเจติ, อญฺจยติ. अञ्चु (धातू) विशेष करणे या अर्थात. अञ्चेति, अञ्चयति. โลจ ภาสายํ. โลเจติ, โลจยติ. โลจนํ, โลจยติ สมวิสมํ อาจิกฺขนฺตํ วิย ภวตีติ โลจนํ, จกฺขุ. लोच् (धातू) बोलणे (किंवा प्रकाशणे) या अर्थात. लोचेति, लोचयति. लोचनम्; जे सम आणि विषम दाखवल्यासारखे करते, म्हणून ते 'लोचन' म्हणजेच चक्खु (डोळा) होय. รจ ปติยตเน. รเจติ, รจยติ. รจนา, วิรจิตํ, เกสรจนา, คาถารจนา. रच् (धातू) तयार करणे (रचना करणे) या अर्थात. रचेति, रचयति. रचना, विरचित, केसरचना (केसांची रचना), गाथारचना. สูจ [Pg.293] เปสุญฺเญ. ปิสุณภาโว เปสุญฺญํ. สูเจติ, สูจยติ. สูจโก. सूच् (धातू) चुगली करणे या अर्थात. पिसुणभाव (चुगलखोरपणा) म्हणजेच 'पेसुञ्ञ' (चुगली) होय. सूचेति, सूचयति. सूचको (चुगलखोर/माहिती देणारा). ปจฺจ สํยมเน. ปจฺเจติ, ปจฺจยติ. पच्च् (धातू) संयमन करणे (नियंत्रण करणे) या अर्थात. पच्चेति, पच्चयति. ริจ วิโยชนสมฺปชฺชเนสุ. เรเจติ, เรจยติ. เสฏฺฐิปุตฺตํ วิเรเจยฺย. วิเรเจติ, วิเรจยติ. วิเรจโก, วิเรจนํ. रिच् (धातू) वियोग करणे (वेगळे करणे) आणि रेचन करणे (जुलाब देणे) या अर्थात. रेचेति, रेचयति. 'सेट्ठिपुत्तं विरेचेय्य' (श्रेष्ठीपुत्राला जुलाब द्यावा). विरेचेति, विरेचयति. विरेचको (रेचक), विरेचनम् (जुलाब/रेचन). วจ ภาสเน. วเจติ, วจยติ. ภูวาทิคเณปิ อยํ วตฺตติ. ตทา ตสฺสา ‘‘วตฺติ, วจติ, อโวจ, อโวจุ’’นฺติอาทีนิ รูปานิ ภวนฺติ. การิเต ปน ‘‘อนฺเตวาสิกํ ธมฺมํ วาเจติ, วาจยตี’’ติ รูปานิ. วตฺตุํ, วตฺตเว, วตฺวา, วุตฺตํ, วุจฺจติ. वच् (धातू) बोलणे या अर्थात. वचेति, वचयति. हा भूवादि गणातही वर्ततो. तेव्हा त्याची 'वत्ति, वचति, अवोच, अवोचुं' इत्यादी रूपे होतात. परंतु कारित (प्रयोजक) मध्ये 'अन्तेवासिकं धम्मं वाचेति, वाचयति' (शिष्याला धम्म शिकवतो) अशी रूपे होतात. वत्तुं, वत्तवे, वत्वा, वृत्तं, वुच्चति. อจฺจ ปูชายํ. อจฺเจติ, อจฺจยติ. พฺรหฺมาสุรสุรจฺจิโต. अच्च् (धातू) पूजा करणे या अर्थात. अच्चेति, अच्चयति. 'ब्रह्मासुरसुरच्चितो' (ब्रह्मा, असुर आणि देवांद्वारे पूजलेला). สูจ คนฺธเน. สุเจติ, สูจยติ. สูจโก, สุตฺตํ. सूच् (धातू) गुंफणे (किंवा सूचित करणे) या अर्थात. सुचेति, सूचयति. सूचको, सुत्तं (सूत्र). เอตฺถ จ อตฺตตฺถปรตฺถาทิเภเท อตฺเถ สูเจตีติ สุตฺตํ. เตปิฏกํ พุทฺธวจนํ. आणि येथे स्वतःचे हित (अत्तत्थ), दुसऱ्याचे हित (परत्थ) इत्यादी भेदांचे अर्थ जे सूचित करते, ते 'सुत्त' (सूत्र) होय. त्रिपिटकातील बुद्धवचन. กจ ทิตฺติยํ. กจฺเจติ, กจฺจยติ. กจฺโจ. कच् (धातू) चमकणे (दीप्ती) या अर्थात. कच्चेति, कच्चयति. कच्चो. เอตฺถ กจฺโจติ รูปสมฺปตฺติยา กจฺเจติ ทิพฺพติ วิโรจตีติ กจฺโจ, เอวํนามโก อาทิปุริโส, ตพฺพํเส ชาตา ปุริสา ‘‘กจฺจานา’’ติปิ ‘‘กจฺจายนา’’ติปิ ‘‘กาติยานา’’ติปิ วุจฺจนฺติ, อิตฺถิโย ปน ‘‘กจฺจานี’’ติปิ ‘‘กจฺจายนี’’ติปิ ‘‘กาติยานี’’ติปิ วุจฺจนฺติ. येथे 'कच्च' म्हणजे जो रूपसंपत्तीने चमकतो, क्रीडा करतो, शोभून दिसतो तो 'कच्च' होय. या नावाचा एक आदिपुरुष होता, त्याच्या वंशात जन्मलेल्या पुरुषांना 'कच्चान', 'कच्चायन' किंवा 'कातियान' असे म्हटले जाते, तर स्त्रियांना 'कच्चानी', 'कच्चायनी' किंवा 'कातियानी' असे म्हटले जाते. จการนฺตธาตุรูปานิ. चकारान्त धातूंची रूपे. ฉการนฺตธาตุ छकारान्त धातू. มิเลฉ [Pg.294] อพฺยตฺตายํ วาจายํ. มิเลจฺเฉติ, มิเลจฺฉยติ. มิลกฺขุ. मिलेछ् (धातू) अव्यक्त (अस्पष्ट) वाणी या अर्थात. मिलेच्छेति, मिलेच्छयति. मिलक्खु (म्लेच्छ). เอตฺถ มิลกฺขูติ มิเลจฺเฉติ อพฺยตฺตวาจํ ภาสตีติ มิลกฺขุ. येथे 'मिलक्खु' म्हणजे जो अस्पष्ट बोलतो, अव्यक्त वाणी बोलतो तो 'मिलक्खु' होय. กุจฺฉ อวกฺเขเป. อวกฺเขโป อโธขิปนํ. กุจฺเฉติ, กุจฺฉยติ. कुच्छ् (धातू) खाली फेकणे (किंवा निंदा करणे) या अर्थात. 'अवक्खेप' म्हणजे खाली फेकणे. कुच्छेति, कुच्छयति. วิจฺฉ ภาสายํ. วิจฺเฉติ, วิจฺฉยติ. विच्छ् (धातू) बोलणे या अर्थात. विच्छेति, विच्छयति. ฉการนฺตธาตุรูปานิ. छकारान्त धातूंची रूपे. ชการนฺตธาตุ जकारान्त धातू. วชฺช วชฺชเน. วชฺเชติ, วชฺชยติ. ปริวชฺชนโก. วชฺชิโต สีลวนฺเตหิ, กถํ ภิกฺขุ กริสฺสสีติ. वज्ज (धातू) त्याग करणे (वर्जन करणे) या अर्थात. वज्जेति, वज्जयति. परिवज्जनको (पूर्णपणे टाळणारा). 'वज्जितो शीलवन्तेहि, कथं भिक्खु करिस्ससि' (शीलवंतांनी त्याग केलेला, हे भिक्खू, तू कसा करशील?). ตุชฺช พลปาลเนสุ. ตุชฺเชติ, ตุชฺชยติ. तुज्ज (धातू) शक्ती आणि पालन करणे या अर्थात. तुज्जेति, तुज्जयति. ตุชิ ปิชิ หึสาพลทานนิเกตเนสุ. นิเกตนํ นิวาโส. ตุญฺเชติ, ตุญฺชยติ. ปิญฺเชติ. ปิญฺชยติ. तुजि, पिजि (धातू) हिंसा, शक्ती, दान आणि निवास या अर्थात. 'निकेतन' म्हणजे निवास. तुञ्जेति, तुञ्जयति. पिञ्जेति, पिञ्जयति. ขชิ กิจฺฉชีวเน. ขญฺเชติ, ขญฺชยติ. ขญฺโช. खजि (धातू) कष्टाने जगणे (लंगडणे) या अर्थात. खञ्जेति, खञ्जयति. खञ्जो (लंगडा). ขชิ รกฺขเณ. ตาทิสานิเยว รูปานิ. ภูวาทิคเณ ‘‘ขชิ คติเวกลฺเลติ อิมิสฺสา ‘‘ขญฺชตี’’ติ รูปํ. खजि (धातू) रक्षण करणे या अर्थात. तशीच रूपे होतात. भूवादि गणात 'खजि गतिवैकल्य' (लंगडणे) या अर्थात असणाऱ्या या धातूचे 'खञ्जति' असे रूप होते. ปูช ปูชายํ. ปูเชติ, ปูชยติ. ปูชา. เอสาว ปูชนา เสยฺโย. ปูชโก, ปูชิโต, ปูชนีโย, ปูชเนยฺโย, ปูเชตพฺโพ, ปุชฺโช. पूज (धातू) पूजा करणे या अर्थात. पूजेति, पूजयति. पूजा. 'एसाव पूजना सेय्यो' (हीच पूजा श्रेष्ठ आहे). पूजको, पूजितो, पूजनीयो, पूजनेय्यो, पूजेतब्बो, पुज्जो. คช [Pg.295] มทฺทนสทฺเทสุ. คเชติ, คชยติ. คโช. गज (धातू) मर्दन करणे आणि शब्द करणे (गर्जना करणे) या अर्थात. गजेति, गजयति. गजो (हत्ती). ติช นิสาเน. เตเชติ, เตชยติ. तिज (धातू) तीक्ष्ण करणे (तेजस्वी करणे) या अर्थात. तेजेति, तेजयति. วช มคฺคนสงฺขาเรสุ. วเชติ, วชยติ. वज (धातू) मार्ग शोधणे आणि संस्कार करणे या अर्थात. वजेति, वजयति. ตชฺช สนฺตชฺชเน. ตชฺเชติ, ตชฺชยติ. สนฺตชฺเชติ, สนฺตชฺชยติ. สนฺตชฺชิโต. तज्ज (धातू) धमकावणे (घाबरवणे) या अर्थात. तज्जेति, तज्जयति. सन्तज्जेति, सन्तज्जयति. सन्तज्जितो (धमकावलेला). อชฺช ปฏิสชฺชเน. อชฺเชติ, อชฺชยติ. अज्ज (धातू) मिळवणे (अर्जन करणे) या अर्थात. अज्जेति, अज्जयति. สชฺช สชฺชเน. สชฺเชติ, สชฺชยติ ทานํ. คมนสชฺโช หุตฺวา. सज्ज (धातू) सज्ज करणे (तयार करणे) या अर्थात. सज्जेति, सज्जयति दानं (दान सज्ज करतो). 'गमनसज्जो हुत्वा' (जाण्यासाठी सज्ज होऊन). ภช วิสฺสาเส. ภเชติ, ภชยติ. ภูวาทิคเณ ปน ‘‘ภชตี’’ติ รูปํ, ภตฺติ, สมฺภตฺติ. भज (धातू) विश्वास ठेवणे (सेवा करणे) या अर्थात. भजेति, भजयति. परंतु भूवादि गणात 'भजति' असे रूप होते, भत्ति (भक्ती), सम्भत्ति (संभक्ती). ตุชิ ปิชิ ลุชิ ภชิ ภาสายํ. ตุญฺเชติ, ตุญฺชยติ. ปิญฺเชติ, ปิญฺชยติ. ลุญฺเชติ, ลุญฺชยติ. ภญฺเชติ, ภญฺชยติ. กเถตีติ อตฺโถ. तुजि, पिजि, luजि, भजि (धातू) बोलणे या अर्थात. तुञ्जेति, तुञ्जयति. पिञ्जेति, पिञ्जयति. लुञ्जेति, luञ्जयति. भञ्जेति, भञ्जयति. बोलतो असा अर्थ आहे. รุช หึสายํ. โรเชติ, โรชยติ. โรโค. रुज (धातू) पीडा देणे (हिंसा) या अर्थात. रोजेति, रोजयति. रोगो (रोग). ภาช ปุถกมฺมนิ. ปุถกมฺมํ ปุถกฺกรณํ, วิสุํ กฺริยาติ อตฺโถ. ภาเชติ, ภาชยติ. วิภาเชติ, วิภาชยติ. วิภตฺติ. भाज् (धातू) पृथक्कर्मामध्ये (वेगळे करण्याच्या अर्थात). पृथक्कर्म म्हणजे पृथक्करण करणे, वेगळे करण्याची क्रिया असा अर्थ आहे. भाजेति, भाजयति. विभाजेति, विभाजयति. विभक्ति. สภาช สีติเสวเนสุ. สภาเชติ, สภาชยติ. सभाज् (धातू) प्रीती आणि सेवा करण्याच्या अर्थात. सभाजेति, सभाजयति. ลช ปกาสเน. ลเชติ, ลชยติ. ลาชา. लज् (धातू) प्रकाशने (प्रकट करण्याच्या अर्थात). लाजेति, लाजयति. लाजा (लाह्या). ยุช สํยมเน. สํปุพฺโพ พนฺธเน. โยเชติ, โยชยติ. สํโยเชติ, สํโยชยติ. สํโยชนํ. युज् (धातू) संयमनाच्या अर्थात. 'सं' उपसर्ग लागल्यास बंधनाच्या अर्थात. योजेति, योजयति. संयोजेति, संयोजयति. संयोजनं (संयोजन). มชฺช โสเจยฺยาลงฺกาเรสุ. มชฺเชติ, มชฺชยติ. สมฺมชฺเชติ, สมฺมชฺชยติ. สมฺมชฺชา. मज्ज् (धातू) स्वच्छता आणि अलंकाराच्या अर्थात. मज्जेति, मज्जयति. सम्मज्जेति, सम्मज्जयति. सम्मज्जा (झाडू मारणे/स्वच्छता). ภาช [Pg.296] ภาชนทาเนสุ. ภาเชติ, ภาชยติ. กถํ เวสฺสนฺตโร ปุตฺโต, คชํ ภาเชติ สญฺจย. भाज् (धातू) विभागणी आणि दानाच्या अर्थात. भाजेति, भाजयति. 'हे संचय! वेस्सन्तर पुत्राने हत्तीचे दान कसे केले?' ชการนฺตธาตุรูปานิ. ज-कारान्त धातूंची रूपे. ฌญนฺตา อปฺปสิทฺธา. สทฺทสตฺเถ ปน ‘‘ญา นิโยชเน’’ติ ปฐนฺติ, รูปํ ปน พุทฺธวจนานุกูลํ น ภวติ, ตสฺมา น ทสฺสิตํ อมฺเหหิ. झ आणि ञ कारान्त धातू. व्याकरणशास्त्रामध्ये (सद्दसत्थ) तर 'ञा नियोजने' असा पाठ वाचतात, परंतु हे रूप बुद्धवचनाच्या अनुकूल नाही, म्हणून आम्ही ते दाखवले नाही. ฏการนฺตธาตุ ट-कारान्त धातू. ฆฏฺฏ ฆฏฺฏเน. ฆฏฺฏนํ วายามกรณํ. ฆฏฺเฏติ, ฆฏฺฏยติ. เอตฺถ ตุ ‘‘ฆฏฺเฏสิ, ฆฏฺเฏสิ, กึการณา ฆฏฺเฏสิ, อหํ ตํ ชานามี’’ติ นิทสฺสนํ. घट्ट् (धातू) घट्टन (स्पर्श करणे/आघात करणे) या अर्थात. घट्टन म्हणजे प्रयत्न करणे. घट्टेति, घट्टयति. येथे 'तू स्पर्श केलास, स्पर्श केलास, कोणत्या कारणाने स्पर्श केलास? मी तुला ओळखतो' हे उदाहरण आहे. ฆฏ สงฺฆาเต. ปุพฺเพ วิย กฺริยาปทานิ, นามิกตฺเต ‘‘ฆโฏ, ฆฏา’’ติ รูปานิ. เอตฺถ คโฏติ ปานียฆโฏ. ฆฏาติ สมูโห ‘‘มจฺฉฆฏา’’ติอาทีสุ วิย. घट् (धातू) संघात (एकत्र येणे/समूह) या अर्थात. पूर्वीप्रमाणेच क्रियापदे होतात, नाम रूपात 'घटो, घटा' अशी रूपे होतात. येथे 'घटो' म्हणजे पाण्याचा घडा. 'घटा' म्हणजे समूह, जसे की 'मच्छघटा' (माशांचा समूह) इत्यादींमध्ये. ฆฏฺฏ จลเน. ฆฏฺเฏติ, ฆฏฺฏยติ. घट्ट् (धातू) चलन (हालचाल करणे) या अर्थात. घट्टेति, घट्टयति. นฏ อวสนฺทเน. อวสนฺทนํ คตฺตวิกฺเขโป. นเฏติ, นฏยติ. नट् (धातू) अवसंदन (अंगविक्षेप/नृत्य) या अर्थात. अवसंदन म्हणजे शरीराची हालचाल (अंगविक्षेप). नटेति, नटयति. จุฏ ฉุฏ กุฏฺฏ เฉทเน. จุเฏติ, จุฏยติ. ฉุเฏติ, ฉุฏยติ. กุฏฺเฏติ, กุฏฺฏยติ. चुट्, छुट्, कुट्ट् (धातू) छेदन (कापणे/तुकडे करणे) या अर्थात. चुटेति, चुटयति. छुटेति, छुटयति. कुट्टेति, kuट्टयति. ปุฏฺฏ จฏฺฏ อปฺปภาเว. ปุฏฺเฏติ, ปุฏฺฏยติ. จุฏฺเฏติ, จุฏฺฏยติ, อปฺปํ ภวตีติ อตฺโถ. पुट्ट्, चट्ट् (धातू) अल्पभावात (कमी होणे) या अर्थात. पुट्टेति, पुट्टयति. चुट्टेति, चुट्टयति, 'कमी होते' असा अर्थ आहे. มุฏ สญฺจุณฺณเน. โมเฏติ, โมฏยติ. मुट् (धातू) संचूर्णन (बारीक करणे/चक्काचूर करणे) या अर्थात. मोटेति, मोटयति. อฏฺฏ สุฏฺฏ อนาทเร. อฏฺเฏติ, อฏฺฏยติ. สุฏฺเฏติ, สุฏฺฏยติ. अट्ट्, सुट्ट् (धातू) अनादर करण्याच्या अर्थात. अट्टेति, अट्टयति. सुट्टेति, सुट्टयति. ขฏฺฏ [Pg.297] สํวรเณ ขฏฺเฏติ, ขฏฺฏยติ. खट्ट् (धातू) संवरण (झाकणे/नियंत्रण करणे) या अर्थात. खट्टेति, खट्टयति. สฏฺฏ หึสาพลทานนิเกตเนสุ. สฏฺเฏติ, สฏฺฏยติ. सट्ट् (धातू) हिंसा, बल देणे आणि निवास (निकेतन) या अर्थात. सट्टेति, सट्टयति. ตุวฏฺฏ นิปชฺชายํ. ตุวฏฺเฏติ, ตุวฏฺฏยติ. ฉพฺพคฺคิยา ภิกฺขู เอกมญฺเจ ตุวฏฺเฏนฺติ. तुवट्ट् (धातू) निजणे/झोपणे या अर्थात. तुवट्टेति, तुवट्टयति. 'षड्वर्गीय भिक्खू एकाच मंचावर (खाटेवर) झोपतात.' ฉฏฺฏ ฉฏฺฏเน. ฉฏฺเฏติ, ฉฏฺฏยติ. อตฺรายํ ปาฬิ – สเจ โส ฉฏฺเฏติ, อิจฺเจตํ กุสลํ. โนเจ ฉฏฺเฏติ, ปญฺจหงฺเคหิ สมนฺนาคโต ภิกฺขุ รูปิยฉฏฺฏโก สมฺมนฺนิตพฺโพ. छट्ट् (धातू) फेकून देणे (छट्टन) या अर्थात. छट्टेति, छट्टयति. येथे ही पाळी (बुद्धवचन) आहे – 'जर तो फेकून देतो, तर हे चांगले आहे. जर फेकून देत नाही, तर पाच अंगांनी युक्त भिक्खूला चांदी फेकून देणारा म्हणून नियुक्त केले जावे.' ปุฏ หึสายํ. โปเฏติ, โปฏยติ. पुट् (धातू) हिंसेच्या अर्थात. पोटेति, पोटयति. กีฏ พนฺเธ. พนฺโธ พนฺธนํ. กีเฏติ, กีฏยติ. กีโฏ. कीट् (धातू) बंधनाच्या अर्थात. बंध म्हणजे बंधन. कीटेति, कीटयति. कीटो (कीटक). จุฏิ เฉทเน. จุณฺเฏติ, จุณฺฏยติ. चुटि (धातू) छेदनाच्या (कापण्याच्या) अर्थात. चुण्टेति, चुण्टयति. ลุฏิ เถยฺเย. ลุณฺเฏติ, ลุณฺฏยติ. लुटि (धातू) चोरीच्या (स्तेय) अर्थात. लुण्टेति, लुण्टयति. กูฏ อปฺปสาเท. กูเฏติ, กูฏยติ. กูฏํ รชตํ. กูฏา คาวี. กุฏตาปโส. कूट् (धातू) अप्रसाद (असमाधान/खोटेपणा) या अर्थात. कूटेति, कूटयति. कूटं रजतं (खोटे चांदी). कूटा गावी (कपटी गाय). कुटतापसो (कपटी तापस). จุฏ ปุฏ ผุฏ วิเภเท. จุเฏติ, จุฏยติ. โปเฏติ, โปฏยติ. โผเฏติ, โผฏยติ. องฺคุลิโย โผเฏสุํ. चुट्, पुट्, फुट् (धातू) विभेदन (फोडणे/विभक्त करणे) या अर्थात. चुटेति, चुटयति. पोटेति, पोटयति. फोटेति, फोटयति. 'त्यांनी बोटे मोडली (फोडली).' ฆฏ สงฺฆาเฏ หนฺตฺยตฺเถ จ. ฆเฏติ, ฆฏยติ. घट् (धातू) संघात (एकत्र करणे) आणि मारणे या अर्थात. घटेति, घटयति. ปฏ ปุฏ ลุฏ ฆฏ ฆฏิ ภาสายํ. ปาเฏติ, ปาฏยติ. โปเฏติ, โปฏยติ. โลเฏติ, โลฏยติ. ฆาเฏติ, ฆาฏยติ. ฆณฺเฏติ, ฆณฺฏยติ. पट्, पुट्, लुट्, घट्, घटि (धातू) भाषणाच्या (बोलण्याच्या) अर्थात. पाटेति, पाटयति. पोटेति, पोटयति. लोटेति, लोटयति. घाटेति, घाटयति. घण्टेति, घण्टयति. ปฏ วฏ คนฺเถ. ปเฏติ, ปฏยติ. วเฏติ, วฏยติ. पट्, वट् (धातू) ग्रंथन (बांधणे/गुंफणे) या अर्थात. पाटेति, पाटयति. वटेति, वटयति. เขฏ ภกฺขเณ. เขเฏติ, เขฏยติ. खेट् (धातू) भक्षण करण्याच्या अर्थात. खेटेति, खेटयति. โขฏ เขเป. โขเฏติ, โขฏยติ. खोट् (धातू) क्षेप (फेकणे/निंदा करणे) या अर्थात. खोटेति, खोटयति. กุฏิ ทาเห. กุเฏติ, กุฏยติ. कुटि (धातू) दाह (जळणे) या अर्थात. कुटेति, कुटयति. ยุฏ สํสคฺเค. โยเฏติ, โยฏยติ. युट् (धातू) संसर्ग (एकत्र येणे) या अर्थात. योटेति, योटयति. วฏ วิภชเน. วเฏติ, วฏยติ. वट् (धातू) विभाजन करण्याच्या अर्थात. वटेति, वटयति. ฏการนฺตธาตุรูปานิ. ट-कारान्त धातूंची रूपे. ฐการนฺตธาตุ ठ-कारान्त धातू. สฐ [Pg.298] สงฺขารคตีสุ. สเฐติ, สฐยติ. सठ् (धातू) संस्कार आणि गतीच्या अर्थात. सठेति, सठयति. สุฐ อาลสิเย. โสเฐติ, โสฐยติ. सुठ् (धातू) आळसाच्या अर्थात. सोठेति, सोठयति. สุฐิ โสสเน. สุณฺเฐติ, สุณฺฐยติ. सुठि (धातू) शोषणाच्या (वाळवण्याच्या) अर्थात. सुण्ठेति, सुण्ठयति. สฐ สิลาฆายํ. สเฐติ, สฐยติ. 'सठ्' (धातू) हा स्तुती (प्रशंसा) करण्याच्या अर्थात आहे. सठेति, सठयति (अशी रूपे होतात). สฐ อสมฺมาภาสเน. สเฐติ. สฐยติ, สโฐ. 'सठ्' (धातू) हा अयोग्य भाषणाच्या (असत्य बोलण्याच्या) अर्थात आहे. सठेति, सठयति, सठो (अशी रूपे होतात). เอตฺถ สโฐติ เกราฏิโก. สฐยตีติ สโฐ, น สมฺมา ภาสตีติ อตฺโถ. येथे 'सठो' म्हणजे कपटी (धूर्त). 'सठयति' म्हणजे जो धूर्तपणा करतो तो 'सठो' (कपटी), जो योग्य प्रकारे बोलत नाही असा याचा अर्थ आहे. สฐ เกตเว. รูปํ ตาทิสเมว. 'सठ्' (धातू) हा कपट (धूर्तता) या अर्थात आहे. रूपे तशीच (पूर्वीसारखीच) होतात. ‘‘สุทสฺสํ วชฺชมญฺเญสํ, อตฺตโน ปน ทุทฺทสํ…เป…อตฺตโน ปน ฉาเทติ, กลึว กิตวาสโฐ’’ติ. "दुसऱ्यांचे दोष सहज दिसतात, परंतु स्वतःचे दोष दिसणे कठीण आहे... परंतु स्वतःचे दोष तो लपवतो, ज्याप्रमाणे कपटी जुगारी (कितावा) आपला वाईट डाव लपवतो." เอตฺถ สากุณิโก ‘‘กิตวา’’ติ วุตฺโต. ตสฺส อิทํ เกตวํ, ตสฺมึ เกตเว อยํ ธาตุ วตฺตตีติ อตฺโถ. येथे पक्षी पकडणाऱ्याला (पारध्याला) 'कितावा' असे म्हटले आहे. त्याचे हे कपट (केतव) आहे, त्या कपटाच्या अर्थात हा धातू वापरला जातो असा अर्थ आहे. กฐิ โสเก. กณฺเฐติ, กณฺฐยติ. 'कठ्' (धातू) हा शोकाच्या अर्थात आहे. कण्ठेति, कण्ठयति (अशी रूपे होतात). ฐการนฺตธาตุรูปานิ. 'ठ' कारान्त धातूंची रूपे. ฑการนฺตธาตุ 'ड' कारान्त धातू. ปฏิ ปริหาเส. ปณฺเฑติ, ปณฺฑยติ. อุปฺปณฺเฑติ, อุปฺปณฺฑยติ. มนุสฺสานํ นํ ภิกฺขุนึ อุปฺปณฺฑึสุ. 'पट्' (धातू) हा परिहासाच्या (उपहासाच्या) अर्थात आहे. पण्डेति, पण्डयति, उप्पण्डेति, उप्पण्डयति (अशी रूपे होतात). लोकांनी त्या भिक्खुणीचा उपहास केला. ลฑิ อุกฺเขเป. ลณฺเฑติ, ลณฺฑยติ. 'लड्' (धातू) हा वर फेकण्याच्या (उचलण्याच्या) अर्थात आहे. लण्डेति, लण्डयति (अशी रूपे होतात). ขฑิ กฑิ เฉเท. ขณฺเฑติ, ขณฺฑยติ. กณฺเฑติ, กณฺฑยติ. ขณฺโฑ, กณฺโฑ. 'खड्' आणि 'कड्' (धातू) हे छेदनाच्या (तुकडे करण्याच्या) अर्थात आहेत. खण्डेति, खण्डयति, कण्डेति, कण्डयति, खण्डो, कण्डो (अशी रूपे होतात). ปิฑิ [Pg.299] สงฺฆาเต. ปิณฺเฑติ, ปิณฺฑยติ. ปิณฺโฑ. 'पिड्' (धातू) हा संघाताच्या (एकत्र करण्याच्या) अर्थात आहे. पिण्डेति, piṇḍayati, पिण्डो (अशी रूपे होतात). เอตฺถ จ ปิณฺโฑติ สมูหสงฺขาโต กลาโปปิ ‘‘โจฬํ ปิณฺโฑ รติ ขิฑฺฑา’’ติ เอตฺถ วุตฺโต อาหารสงฺขาโต ปิณฺโฑปิ ปิณฺโฑเยว. येथे 'पिण्डो' म्हणजे समूहाचा वाचक असलेला 'कलाप' (समुदाय) देखील आहे, जसे "चोळं पिण्डो रति खिळ्ळा" (वस्त्र, अन्न, रती, क्रीडा) यामध्ये म्हटले आहे, आणि आहाराचा वाचक असलेला 'पिण्ड' (अन्नाचा घास) देखील 'पिण्ड'च आहे. กุฑิ เวธเน. กุณฺเฑติ, กุณฺฑยติ. กุณฺฑลํ. 'कुड्' (धातू) हा वेधनाच्या (वेढण्याच्या किंवा छिद्र करण्याच्या) अर्थात आहे. कुण्डेति, कुण्डयति, कुण्डलं (अशी रूपे होतात). มฑิ ภูสายํ หสเน จ. มณฺเฑติ, มณฺฑยติ. มณฺโฑ, มณฺฑนํ, มณฺฑิโต. 'मड्' (धातू) हा सुशोभित करणे (सजवणे) आणि हसणे या अर्थात आहे. मण्डेति, मण्डयति, मण्डो, मण्डनं, मण्डितो (अशी रूपे होतात). ภฑิ กลฺยาเณ. กลฺยาณํ กลฺยาณตา. ภณฺเฑติ, ภณฺฑยติ. ภณฺโฑ. 'भड्' (धातू) हा कल्याणाच्या (कल्याणतेच्या) अर्थात आहे. भण्डेति, भण्डayati, भण्डो (अशी रूपे होतात). เอตฺถ จ ภณฺโฑติ ธนํ, อลงฺกาโร วา. ‘‘ภณฺฑํ คณฺหาติ. สมลงฺกริตฺวา ภณฺเฑนา’’ติ จ อาทีสุ วิย. येथे 'भण्डो' म्हणजे धन किंवा अलंकार होय. जसे "भण्डं गण्हाति" (वस्तू/धन घेतो) किंवा "समलङ्करित्वा भण्डेन" (अलंकाराने सुशोभित करून) इत्यादी उदाहरणांमध्ये आहे. ทณฺฑ ทณฺฑวินิปาเต. ทณฺเฑติ, ทณฺฑยติ. ทณฺโฑ. 'दण्ड्' (धातू) हा दण्ड देण्याच्या (शिक्षा करण्याच्या) अर्थात आहे. दण्डेति, दण्डयति, दण्डो (अशी रूपे होतात). ฉฑฺฑ ฉฑฺฑเน. ฉฑฺเฑติ, ฉฑฺฑยติ. ฉฑฺฑนโก. ฉฑฺฑิยติ, ฉฑฺฑิโต. ฉฑฺฑิตุํ, ฉฑฺฑยิตุํ, ฉฑฺเฑตฺวา, ฉฑฺฑยิตฺวา. 'छड्ड्' (धातू) हा टाकून देण्याच्या अर्थात आहे. छड्डेति, छड्डयति, छड्डनको, छड्डियति, छड्डितो, छड्डितुं, छड्डयितुं, छड्डित्वा, छड्डयित्वा (अशी रूपे होतात). ฑการนฺตธาตุรูปานิ. 'ड' कारान्त धातूंची रूपे. ฒการนฺตธาตุ 'ढ' कारान्त धातू. วฑฺฒ อากิรเณ. กํสปาติยา ปายาสํ วฑฺเฒติ, วฑฺฒยติ. ภตฺตํ วฑฺเฒตฺวา อทาสิ. 'वड्dh' (धातू) हा वाढण्याच्या (वाढून देण्याच्या) अर्थात आहे. काशाच्या थाळीत खीर वाढतो (वड्ढेति, वड्ढयति). भात वाढून दिला. อิมานิ ฒการนฺตธาตุรูปานิ. ही 'ढ' कारान्त धातूंची रूपे आहेत. ณการนฺตธาตุ 'ण' कारान्त धातू. วณฺณ วณฺณกฺริยาวิตฺถารคุณวจเนสุ. วณฺโณ ปสํสา. กฺริยา กรณํ. วิตฺถาโร วิตฺถินฺนตา. คุโณ สีลาทิธมฺโม. วจนํ [Pg.300] วาจา. วณฺเณติ, วณฺณยติ. วณฺโณ, วณฺณํ, สุวณฺณํ, สํวณฺณนา. 'वण्ण्' (धातू) हा वर्ण (रंग), क्रिया, विस्तार, गुण आणि वचन या अर्थांमध्ये आहे. 'वण्णो' म्हणजे प्रशंसा. 'क्रिया' म्हणजे करणे. 'विस्तारो' म्हणजे विस्तीर्णता. 'गुणो' म्हणजे शीलादी धर्म. 'वचनं' म्हणजे वाणी. वण्णेति, वण्णयति, वण्णो, वण्णं, सुवण्णं, संवण्णना (अशी रूपे होतात). วณฺณสทฺโท ฉวิถุติกุลวคฺคการณสณฺฐานปมาณรูปายตนาทีสุ ทิสฺสติ. ตตฺถ ‘‘สุวณฺณวณฺโณสิ ภควา’’ติ เอวมาทีสุ ฉวิยํ. ‘‘กทา สญฺญูฬฺหา ปน เต คหปติ สมณสฺส โคตมสฺส วณฺณา’’ติ เอวมาทีสุ ถุติยํ. ‘‘จตฺตาโรเม โภ โคตม วณฺณา’’ติเอวมาทีสุ กุลวคฺเค. ‘‘อถ เกน นุ วณฺเณน, คนฺธเถโนติ วุจฺจตี’’ติ เอวมาทีสุ การเณ. ‘‘มหนฺตํ หตฺถิราชวณฺณํ อภินิมฺมินิตฺวา’’ติเอวมาทีสุ สณฺฐาเน. ‘‘ตโย ปตฺตสฺส วณฺณา’’ติ เอวมาทีสุ ปมาเณ. ‘‘วณฺโณ คนฺโธ รโส โอชา’’ติ เอวมาทีสุ รูปายตเนติ. 'वण्ण' (वर्ण) शब्द त्वचा, स्तुती, कुल/वर्ग, कारण, आकार (संस्थान), प्रमाण आणि रूपायतन इत्यादी अर्थांमध्ये आढळतो. त्यामध्ये "सुवण्णवण्णोसि भगवा" (भगवान सुवर्णवर्णाचे आहेत) इत्यादींमध्ये 'त्वचा' या अर्थात आहे. "कदा सञ्ञूळ्हा पन ते gahapati समणस्स गोतमस्स वण्णा" (हे गृहपती, श्रमण गोतमांची प्रशंसा तुम्ही कधी ऐकली आहे का?) इत्यादींमध्ये 'स्तुती' या अर्थात आहे. "चत्तारोमे भो गोतम वण्णा" (हे गोतमा, हे चार वर्ण आहेत) इत्यादींमध्ये 'कुल/वर्ग' या अर्थात आहे. "अथ केन नु वण्णेन, गन्धथेनोति वुच्चती" (तर मग कोणत्या कारणाने मला गंधचोर म्हटले जात आहे?) इत्यादींमध्ये 'कारण' या अर्थात आहे. "महन्तं हत्थिराजवण्णं अभिनिम्मिणित्वा" (मोठ्या हत्तीराजाचा आकार धारण करून) इत्यादींमध्ये 'आकार' या अर्थात आहे. "तयो पत्तस्स वण्णा" (पात्राचे तीन प्रमाण आहेत) इत्यादींमध्ये 'प्रमाण' या अर्थात आहे. "वण्णो गन्धो रसो ओजा" (वर्ण, गंध, रस, ओज) इत्यादींमध्ये 'रूपायतन' या अर्थात आहे. ตตฺถ ฉวิยนฺติ ฉวิคตา วณฺณธาตุ เอว ‘‘สุวณฺณวณฺโณ’’ติ เอตฺถ วณฺณคฺคหเณน คหิตาติ อปเร. วณฺณนํ กิตฺติยา อุคฺโฆสนนฺติ วณฺโณ, ถุติ. วณฺณิยติ อสงฺกรโต ววตฺถปิยตีติ วณฺโณ, กุลวคฺโค. วณฺณิยติ ผลํ เอเตน ยถาสภาวโต วิภาวิยตีติ วณฺโณ, การณํ, วณฺณํ ทีฆรสฺสาทิวเสน สณฺฐหนนฺติ วณฺโณ, สณฺฐานํ. วณฺณิยติ อฑฺฒมหนฺตาทิวเสน ปมิยตีติ วณฺโณ, ปมาณํ. วณฺเณติ วิการมาปชฺชมานํ หทยงฺคตภาวํ ปกาเสตีติ วณฺโณ, รูปายตนํ. เอวํ เตน เตน ปวตฺตินิมิตฺเตน วณฺณสทฺทสฺส ตสฺมึ ตสฺมึ อตฺเถ ปวตฺติ เวทิตพฺพา. त्यामध्ये 'त्वचेच्या' अर्थात त्वचेचा रंग हाच "सुवण्णवण्णो" यामध्ये 'वण्ण' शब्दाने घेतला आहे, असे इतर म्हणतात. कीर्तीची घोषणा करणे म्हणजे 'वण्ण' (स्तुती). संकर न करता व्यवस्थापित केले जाते म्हणून 'वण्ण' म्हणजे कुल/वर्ग. ज्याच्याद्वारे फळ त्याच्या स्वभावानुसार स्पष्ट केले जाते ते 'वण्ण' म्हणजे कारण. दीर्घ, र्हस्व इत्यादीनुसार जे आकार घेते ते 'वण्ण' म्हणजे आकार (संस्थान). अर्धा, मोठा इत्यादीनुसार जे मोजले जाते ते 'वण्ण' म्हणजे प्रमाण. विकाराला प्राप्त होऊन मनातील भाव जो प्रकट करतो तो 'वण्ण' म्हणजे रूपायतन. अशा प्रकारे त्या त्या प्रवृत्तीच्या निमित्ताने 'वण्ण' शब्दाची त्या त्या अर्थातील प्रवृत्ती जाणावी. อปรมฺปิ [Pg.301] วณฺณสทฺทสฺส อตฺถุทฺธารํ วทาม. วณฺณสทฺโท สณฺฐานชาติ รูปายตนการณปมาณคุณปสํสาชาตรูปปุฬินกฺขราทีสุ ทิสฺสติ. อยญฺหิ ‘‘มหนฺตํ สปฺปราชวณฺณํ อภินิมฺมินิตฺวา’’ติอาทีสุ สณฺฐาเน ทิสฺสติ, ‘‘พฺราหฺมโณว เสฏฺโฐ วณฺโณ, หีโน อญฺโญ วณฺโณ’’ติอาทีสุ ชาติยํ. ‘‘ปรมาย วณฺณโปกฺขรตาย สมนฺนาคโต’’ติอาทีสุ รูปายตเน. आम्ही 'वण्ण' शब्दाचा दुसराही अर्थविस्तार सांगतो. 'वण्ण' शब्द आकार (संस्थान), जाती, रूपायतन, कारण, प्रमाण, गुण, प्रशंसा, सुवर्ण (जातरूप), वाळू (पुळिन), अक्षर इत्यादी अर्थांमध्ये आढळतो. हा शब्द "महन्तं सप्पराजवण्णं अभिनिम्मिणित्वा" (मोठ्या सर्पराजाचा आकार धारण करून) इत्यादींमध्ये 'आकार' या अर्थात दिसतो; "ब्राह्मणोव सेट्ठो वण्णो, हीनो अञ्ञो वण्णो" (ब्राह्मणच श्रेष्ठ वर्ण आहे, इतर वर्ण हीन आहेत) इत्यादींमध्ये 'जाती' या अर्थात; "परमाय वण्णपोक्खरताय समन्नागतो" (परम वर्णसौंदर्याने युक्त) इत्यादींमध्ये 'रूपायतन' या अर्थात. ‘‘น หรามิ น ภญฺชามิ, อารา สิงฺฆามิ วาริชํ; อถ เกน นุ วณฺเณน, คนฺธเถโนติ วุจฺจตี’’ติ "मी (कमळ) हरण करत नाही, तोडत नाही, लांबूनच फक्त त्या जलातील कमळाचा सुवास घेतो; तरी मग कोणत्या कारणाने मला गंधचोर म्हटले जात आहे?" อาทีสุ การเณ. ‘‘ตโย ปตฺตสฺส วณฺณา’’ติอาทีสุ ปมาเณ. ‘‘กทา สญฺญูฬฺหา ปน เต คหปติ สมณสฺส โคตมสฺส วณฺณา’’ติอาทีสุ คุเณ. ‘‘วณฺณารหสฺส วณฺณํ ภาสตี’’ติอาทีสุ ปสํสายํ. ‘‘วณฺณํ อญฺชนวณฺเณน, กาลิงฺคมฺหิ วนิมฺหเส’’ติ เอตฺถ ชาตรูเป. ‘‘อกิลาสุโน วณฺณปเถ ขณนฺตา’’ติ เอตฺถ ปุฬิเน. ‘‘วณฺณาคโม วณฺณวิปริยาโย’’ติอาทีสุ อกฺขเร ทิสฺสติ. อิจฺเจวํ สพฺพถาปิ – इत्यादींमध्ये 'कारण' या अर्थात. "तयो पत्तस्स वण्णा" इत्यादींमध्ये 'प्रमाण' या अर्थात. "कदा सञ्ञूळ्हा पन ते..." इत्यादींमध्ये 'गुण' या अर्थात. "वण्णारहस्स वण्णं भासति" (प्रशंसेस पात्र असलेल्याची प्रशंसा करतो) इत्यादींमध्ये 'प्रशंसा' या अर्थात. "वण्णं अञ्जनवण्णेन..." येथे 'सुवर्ण' (जातरूप) या अर्थात. "अकिलासुनो वण्णपथे खणन्ता" (आळस न करता वाळवंटात खोदणारे) येथे 'वाळू' (पुळिन) या अर्थात. "वण्णागमो वण्णविपरियायो" (वर्णागम, वर्णविपर्यय) इत्यादींमध्ये 'अक्षर' या अर्थात दिसतो. अशा प्रकारे सर्व प्रकारे - ฉวิยํ ถุติยํ เหเม, กุลวคฺเค จ การเณ; สณฺฐาเน จ ปมาเณ จ, รูปายตนชาติสุ; คุณกฺขเรสุ ปุฬิเน, วณฺณสทฺโท ปวตฺตติ; त्वचा, स्तुती, सुवर्ण, कुल/वर्ग, कारण, आकार (संस्थान), प्रमाण, रूपायतन, जाती, गुण, अक्षर आणि वाळू (पुळिन) या अर्थांमध्ये 'वण्ण' शब्द प्रवृत्त होतो. สุวณฺณสทฺโท ฉวิสมฺปตฺติครุฬชาตรูเปสุ อาคโต. อยญฺหิ ‘‘สุวณฺเณ ทุพฺพณฺเณ, สุคเต ทุคฺคเต’’ติ, ‘‘สุวณฺณตา สุสฺสรตา’’ติ [Pg.302] จ เอวมาทีสุ ฉวิสมฺปตฺติยํ อาคโต. ‘‘กากํ สุวณฺณา ปริวารยนฺตี’’ติอาทีสุ ครุเฬ. ‘‘สุวณฺณวณฺโณ กญฺจนสนฺนิภตฺตโจ’’ติอาทีสุ ชาตรูเปติ. 'सुवण्ण' शब्द त्वचासंपत्ती (सुंदर त्वचा), गरुड आणि सुवर्ण (जातरूप) या अर्थांमध्ये आला आहे. हा शब्द "सुवण्णे दुब्बण्णे, सुगते दुग्गते" किंवा "सुवण्णता सुस्सरता" इत्यादींमध्ये 'त्वचासंपत्ती' या अर्थात आला आहे. "काकं सुवण्णा परिवारयन्ति" (कावळ्याला गरुड वेढतात) इत्यादींमध्ये 'गरुड' या अर्थात. "सुवण्णवण्णो कञ्चनसन्निभत्तचो" (सुवर्णवर्ण, सोन्यासारखी त्वचा असलेला) इत्यादींमध्ये 'सुवर्ण' (जातरूप) या अर्थात. ปุณ สงฺฆาเต. ปุเณติ, ปุณยติ. 'पुण्' (धातू) हा संघाताच्या (एकत्र करण्याच्या) अर्थात आहे. पुणेति, पुणयति (अशी रूपे होतात). จุณ สงฺโกจเน. จุเณติ, จุณยติ. 'चुण्' (धातू) हा संकोचनाच्या अर्थात आहे. चुणेति, चुणयति (अशी रूपे होतात). จุณฺณ เปรเณ. จุณฺเณติ, จุณฺณยติ. จุณฺณํ. จุณฺณวิจุณฺณํ กโรติ. 'चुण्ण्' (धातू) हा प्रेरणेच्या अर्थात आहे. चुण्णेति, चुण्णयति, चुण्णं (अशी रूपे होतात). 'चुण्णविचुण्णं करोति' (चूर्ण-विचूर्ण करतो). สณ ทาเน. สเณติ, สณยติ. 'सण्' (धातू) हा दानाच्या अर्थात आहे. सणेति, सणयति (अशी रूपे होतात). กุณ สงฺโกจเน. กุเณติ, กุณยติ. กุโณ. กุณหตฺโถ. หตฺเถน กุณี. 'कुण्' (धातू) हा संकोचनाच्या अर्थात आहे. कुणेति, kuṇayati, कुणो, कुणहत्थो, हत्थेन कुणी (अशी रूपे होतात). ตูณ ปูรเณ. ตูเณติ, ตูณยติ. ตูณี. 'तूण्' (धातू) हा भरण्याच्या अर्थात आहे. तूणेति, तूणयति, तूणी (अशी रूपे होतात). เอตฺถ ตูณีติ สรกลาโป. สา หิ ตูเณนฺติ ปูเรนฺติ สเร เอตฺถาติ ตูณี. येथे 'तूणी' म्हणजे बाणांचा भाता होय. कारण ज्यामध्ये बाण भरले जातात, ती 'तूणी' (भाता) होय. ภูณ ภาสายํ. ภูเณติ, ภูณยติ. भूण (bhūṇa) - बोलणे या अर्थात. भूणेति (bhūṇeti), भूणयति (bhūṇayati). กณ นิมีลเน. กาเณติ, กาณยติ. กาโณ. कण (kaṇa) - डोळे मिटणे किंवा अंध होणे या अर्थात. काणेति (kāṇeti), काणयति (kāṇayati). काणो (kāṇo - एका डोळ्याने आंधळा). เอตฺถ กาโณติ เอเกน วา ทฺวีหิ วา อกฺขีหิ ปริหีนกฺขิ. อฏฺฐกถาจริยา ปน ‘‘กาโณ นาม เอกกฺขินา กาโณ, อนฺโธ นาม อุภยกฺขิกาโณ’’ติ วทนฺติ, ตํ กาณนฺธสทฺทานํ เอกตฺถสนฺนิปาเต ยุชฺชติ. อิตรถา กาณกจฺฉโปปมสุตฺเต วุตฺโต กจฺฉโป เอกสฺมึ กาโณ สิยา, เอกกฺขิกาโณ จ ปน ปุริโส ‘‘อนฺโธ’’ติ น วตฺตพฺโพ สิยา, ตสฺมา เตสมยุคฬตฺเต เอเกกสฺส ยถาสมฺภวํ ทฺวินฺนํ ทฺวินฺนมาการานํ วาจกตา ทฏฺฐพฺพา. ตถา หิ โกสลสํยุตฺตฏฺฐกถายํ ‘‘กาโณติ เอกจฺฉิกาโณ วา [Pg.303] อุภยจฺฉิกาโณ วา’’ติ วุตฺตํ. อถ วา ‘‘โอวเทยฺยานุสาเสยฺยา’’ติ เอตฺถ โอวาทานุสาสนานํ วิย สวิเสสตา อวิเสสตา จ ทฏฺฐพฺพา. येथे 'काणो' (kāṇo) म्हणजे एका किंवा दोन्ही डोळ्यांनी दृष्टीहीन असलेला. परंतु अट्ठकथाचार्य (अट्ठकथांचे आचार्य) म्हणतात की, 'काणो म्हणजे एका डोळ्याने आंधळा आणि अंध म्हणजे दोन्ही डोळ्यांनी आंधळा', हे 'काण' आणि 'अंध' या शब्दांच्या एकाच अर्थाने एकत्र येण्याच्या संदर्भात योग्य ठरते. अन्यथा, 'काणकच्छपोपम सुत्ता'मध्ये (काणा कासव उपमा सुत्तात) सांगितलेला कासव एका डोळ्याने काणा असावा, आणि एका डोळ्याने काणा असलेल्या माणसाला 'अंध' म्हटले जाऊ नये. म्हणून, त्यांच्या जोडीच्या अभावामुळे, प्रत्येकासाठी यथासंभव दोन-दोन प्रकारांचे वाचकत्व समजले पाहिजे. तसेच कोसलसंयुत्त अट्ठकथेत म्हटले आहे की, 'काणो म्हणजे एका डोळ्याने काणा किंवा दोन्ही डोळ्यांनी काणा'. किंवा 'ओवदेय्य अनुसासेय्य' (उपदेश करावा आणि अनुशासून मार्गदर्शन करावे) येथे उपदेश आणि अनुशासन यांच्याप्रमाणेच विशेषत्व आणि सामान्यत्व समजले पाहिजे. คณ สงฺขฺยาเน. คเณติ, คณยติ. คณนา, คโณ. गण (gaṇa) - मोजणे (संख्या मोजणे) या अर्थात. गणेति (gaṇeti), गणयति (gaṇayati). गणना (gaṇanā), गणो (gaṇo - समूह). เอตฺถ คณนาติ สงฺขฺยา. คโณติ ภิกฺขุสมูโห. เยสํ วา เกสญฺจิ สมูโห. สมูหสฺส จ อเนกานิ นามานิ. เสยฺยถิทํ – येथे 'गणना' म्हणजे संख्या. 'गणो' म्हणजे भिक्खूंचा समूह किंवा इतर कोणत्याही गोष्टींचा समूह. समूहाची अनेक नावे आहेत, जसे की – สงฺโฆ คโณ สมูโห จ,ขนฺโธ สนฺนิจโย จโย; สมุจฺจโย จ นิจโย,วคฺโค ปูโค จ ราสิ จ. संघो (संघ), गणो (गण), समूहो (समूह), खन्धो (स्कंध), सन्निचयो (संचय), चयो (चय), समुच्चयो (समुच्चय), निचयो (निचय), वग्गो (वर्ग), पूगो (पूग) आणि रासि (राशी). กาโย นิกาโย นิกโร,กทมฺโพ วิสโร ฆฏา; สมุทาโย จ สนฺเทโห,สงฺฆาโต สมโย กโร. कायो (काय), निकायो (निकाय), निकरो (निकर), कदम्बो (कदंब), विसरो (विसर), घटा (घटा), समुदायो (समुदाय), सन्देहो (संदेह), सङ्घातो (संघात), समयो (समय) आणि करो (कर). โอโฆ ปุญฺโช กลาโป จ,ปิณฺโฑ ชาลญฺจ มณฺฑลํ; สณฺโฑ ปวาโห อิจฺเจเต,สมูหตฺถาภิธายกาติ. ओघो (ओघ), पुञ्जो (पुंज), कलापो (कलाप), पिण्डो (पिंड), जालं (जाल), मण्डलं (मंडल), sण्डो (संड) आणि प्रवाहो (प्रवाह) - हे सर्व समूहाचा अर्थ दर्शवणारे शब्द आहेत. กิญฺจาปิ เอเต สงฺฆคณสมูหาทโย สทฺทา สมูหตฺถวาจกา, ตถาปิ สงฺฆคณสทฺทาเยว วินาปิ วิเสสกปเทน ภิกฺขุสมูเห วตฺตนฺติ, นาญฺเญ, อญฺเญ ปน สงฺฆคณสทฺเทหิ สทฺธึ อญฺญมญฺญญฺจ กทาจิ สมานตฺถวิสยา โหนฺติ, กทาจิ อสมานตฺถวิสยา, ตสฺมา ยถาปาวจนํ อสมฺมุยฺหนฺเตน โยเชตพฺพา. ‘‘เอโก, ทฺเว’’ติอาทินา คเณตพฺโพติ คโณ. जरी हे संघ, गण, समूह इत्यादी शब्द समूहाचा अर्थ दर्शवणारे असले, तरीही 'संघ' आणि 'गण' हे शब्द कोणत्याही विशेषण पदाशिवाय केवळ भिक्खूंच्या समूहासाठीच वापरले जातात, इतरांसाठी नाही. इतर शब्द मात्र संघ आणि गण या शब्दांसोबत कधी समान अर्थाचे विषय होतात, तर कधी असमान अर्थाचे विषय होतात. म्हणून, बुद्धवचनानुसार गोंधळात न पडता त्यांचे योजन केले पाहिजे. 'एक, दोन' इत्यादी प्रकारे मोजले जावे म्हणून तो 'गणो' (गण) होय. กณฺณ [Pg.304] สวเน. กณฺเณติ, กณฺณยติ. กณฺโณ. กณฺณยนฺติ สทฺทํ สุณนฺติ เอเตนาติ กณฺโณ, โย โลเก ‘‘สวนํ, โสต’’นฺติ จ วุจฺจติ. कण्ण (kaṇṇa) - ऐकणे या अर्थात. कण्णेति (kaṇṇeti), कण्णयति (kaṇṇayati). कण्णो (kaṇṇo - कान). ज्याच्याद्वारे शब्द ऐकतात तो 'कण्णो' (कान) होय, ज्याला जगात 'सवनं' (श्रवण) आणि 'सोतं' (श्रोत्र) असेही म्हटले जाते. กุณ คุณ อามนฺตเน. กุเณติ, กุณยติ. คุเณติ, คุณยติ. คุโณ. โคโณ. कुण (kuṇa) आणि गुण (guṇa) - आमंत्रित करणे किंवा बोलावणे या अर्थात. कुणेति (kuṇeti), कुणयति (kuṇayati). गुणेति (guṇeti), गुणयति (guṇayati). गुणो (guṇo), गोणो (goṇo). เอตฺถ คุโณติ สีลาทโย ธมฺมา, เกนฏฺเฐน เต คุณา. โคณาปิยติ อามนฺตาปิยติ อตฺตนิ ปติฏฺฐิโต ปุคฺคโล ทฏฺฐุํ โสตุํ ปูชิตุญฺจ อิจฺฉนฺเตหิ ชเนหีติ คุโณ. เอตฺถ กิญฺจาปิ สีลาทิธมฺมานํ อามนฺตาปนํ นตฺถิ, ตถาปิ ตํเหตุอามนฺตนํ นิมนฺตนญฺจ เตเยว กโรนฺติ นามาติ เอวํ วุตฺตํ. ตถา หิ – येथे 'गुणो' म्हणजे शील इत्यादी धर्म. कोणत्या अर्थाने ते गुण आहेत? स्वतःमध्ये (शीलादी गुणांमध्ये) प्रतिष्ठित असलेल्या व्यक्तीला पाहण्याची, ऐकण्याची आणि तिची पूजा करण्याची इच्छा असणाऱ्या लोकांद्वारे तो आमंत्रित केला जातो (बोलावला जातो), म्हणून तो 'गुणो' होय. येथे जरी शील इत्यादी धर्मांचे स्वतःहून आमंत्रित करणे नसले, तरी त्यांच्यामुळेच आमंत्रण आणि निमंत्रण दिले जाते, म्हणून असे म्हटले आहे. तसेच म्हटले आहे की – ‘‘ยถาปิ เขตฺตสมฺปนฺเน,พีชํ อปฺปมฺปิ โรปิตํ; สมฺมา ธารํ ปวสฺสนฺเต,ผลํ โตเสติ กสฺสก’’นฺติ “ज्याप्रमाणे सुपीक शेतात पेरलेले थोडेसे बी देखील, योग्य प्रकारे पाऊस पडल्यास, शेतकऱ्याला फळाने संतुष्ट करते.” เอตฺถ กสฺสกสฺส ตุฏฺฐิอุปฺปตฺติการณตฺตา เหตุวเสน นิจฺเจตนสฺสปิ ผลสฺส โตสนํ วุตฺตํ, เอวมิธาปิ อามนฺตาปนการณตฺตา เอวํ วุตฺตํ. อญฺเญ ปน ‘‘คุญฺชนฺเต อพฺยยนฺเต อิติ คุณา’’ติ อตฺถํ วทนฺติ. ตทนุรูปํ ปน ธาตุสทฺทํ น ปสฺสาม, ‘‘คุณ อามนฺตเน’’ อิจฺเจว ปสฺสาม, วิจาเรตฺวา คเหตพฺพํ. येथे शेतकऱ्याच्या आनंदाच्या उत्पत्तीचे कारण असल्यामुळे, हेतूच्या रूपाने अचेतन फळाचेही 'संतुष्ट करणे' असे म्हटले आहे; त्याचप्रमाणे येथेही आमंत्रित करण्याचे कारण असल्यामुळे असे म्हटले आहे. इतर काही जण 'जे गुंजतात (आवाज करतात) किंवा अव्यय राहतात ते गुण' असा अर्थ सांगतात. परंतु, त्याला अनुरूप असा धातूचा शब्द आम्हाला आढळत नाही, आम्हाला केवळ 'गुण आमंतने' (आमंत्रित करणे या अर्थात गुण धातू) असाच आढळतो, म्हणून विचार करूनच याचा स्वीकार करावा. วณ คตฺตวิจุณฺณเน. วเณติ, วณยติ. วโณ. वण (vaṇa) - शरीराला छिन्नविच्छिन्न करणे या अर्थात. वणेति (vaṇeti), वणयति (vaṇayati). वणो (vaṇo - जखम). เอตฺถ วโณติ อรุ. สา หิ สรีรํ วณยติ วิจุณฺเณติ ฉิทฺทาวฉิทฺทํ กโรตีติ วโณติ วุจฺจติ. येथे 'वणो' म्हणजे जखम (व्रण). कारण ती शरीराला छिन्नविच्छिन्न करते, त्याचे तुकडे करते आणि त्याला छिद्रयुक्त करते, म्हणून तिला 'वणो' (जखम) म्हटले जाते. ปณฺณ หริเต. ปณฺเณติ, ปณฺณยติ. ตาลปณฺณํ. สูเปยฺยปณฺณํ. पण्ण (paṇṇa) - हिरवे असणे या अर्थात. पण्णेति (paṇṇeti), पण्णयति (paṇṇayati). तालपण्णं (ताडपत्र), सूपेय्यपण्णं (भाजीचे पान). เอตฺถ [Pg.305] จ หริตภาววิคเตปิ วตฺถุสฺมึ ปณฺณภาโว รูฬฺหิโต ปวตฺโตติ ทฏฺฐพฺโพ. ‘‘ปณฺณํ, ปตฺตํ, ปลาโส, ทลํ’’ อิจฺเจเต สมานตฺถา. आणि येथे हिरवेपणा नष्ट झाल्यावरही त्या वस्तूमध्ये 'पण्ण' (पान) हा भाव रूढीने प्रचलित झाला आहे, असे समजले पाहिजे. 'पण्णं' (पर्ण), 'पत्तं' (पत्र), 'पलासो' (पळस/पान), 'दलं' (दल) हे सर्व समान अर्थाचे शब्द आहेत. ปณ พฺยวหาเร. ปเณติ, ปณยติ. ราชา จ ทณฺฑํ ครุกํ ปเณติ. पण (paṇa) - व्यवहार करणे किंवा शिक्षा देणे या अर्थात. पणेति (paṇeti), पणयति (paṇayati). 'राजा च दण्डं गरुकं पणेति' (आणि राजा कठोर शिक्षा सुनावतो). อิมานิ ณการนฺตธาตุรูปานิ. ही 'ण'कारान्त धातूंची रूपे आहेत. ตการนฺตธาตุ 'त'कारान्त धातू จินฺต จินฺตายํ. จินฺเตติ, จินฺตยติ. จิตฺตํ, จินฺตา, จินฺตนา, จินฺตนโก. การิเต ‘‘จินฺตาเปติ, จินฺตาปยตี’’ติ รูปานิ. चिन्त (cinta) - विचार करणे या अर्थात. चिन्तेति (cinteti), चिन्तयति (cintayati). चित्तं (चित्त), चिन्ता (चिंता), चिन्तना (चिंतन), चिन्तनको (चिंतन करणारा). प्रयोजक (णिच्) रूपात 'चिन्तापेति' (cintāpeti), 'चिन्तापयति' (cintāpayati) अशी रूपे होतात. ตตฺถ จิตฺตนฺติ อารมฺมณํ จินฺเตตีติ จิตฺตํ, วิชานาตีติ อตฺโถ, สพฺพจิตฺตสาธารณวเสเนตํ ทฏฺฐพฺพํ. เอตฺถ สิยา – กสฺมา ‘‘อารมฺมณํ จินฺเตตีติ จิตฺต’’นฺติ วตฺวาปิ ‘‘วิชานาตีติ อตฺโถ’’ติ วุตฺตํ, นนุ จินฺตนวิชานนา นานาสภาวา. น หิ ‘‘จินฺเตตี’’ติ ปทสฺส ‘‘วิชานาตี’’ติ อตฺโถ สมฺภวติ, ทุปฺปญฺญสฺส หิ นานปฺปกาเรหิ จินฺตยโตปิ สุขุมตฺถาธิคโม น โหตีติ? สจฺจํ, ‘‘วิชานาตี’’ติ อิทํ ปทํ จิตฺตสฺส สญฺญาปญฺญากิจฺเจหิ วิสิฏฺฐวิสยคฺคหณํ ทีเปตุํ วุตฺตํ สพฺพจิตฺตสาธารณตฺตา จิตฺตสทฺทสฺส. ยญฺหิ ธมฺมชาตํ ‘‘จิตฺต’’นฺติ วุจฺจติ, ตเทว วิญฺญาณํ, ตสฺมา วิชานนตฺถํ คเหตฺวา สญฺญาปญฺญากิจฺจาวิสิฏฺฐวิสยคฺคหณํ ทีเปตุํ ‘‘วิชานาตี’’ติ วุตฺตํ. त्यामध्ये 'चित्तं' म्हणजे जे आलंबनाचा (विषयाचा) विचार करते ते चित्त होय, 'जाणून घेते' असा याचा अर्थ आहे; हे सर्व चित्तांच्या सामान्य स्वरूपाच्या संदर्भात समजले पाहिजे. येथे शंका येऊ शकते की – 'जे आलंबनाचा विचार करते ते चित्त' असे म्हणूनही पुन्हा 'जाणून घेते असा अर्थ आहे' असे का म्हटले गेले? विचार करणे आणि जाणून घेणे हे दोन्ही भिन्न स्वभावाचे आहेत ना? 'विचार करतो' या शब्दाचा अर्थ 'जाणून घेतो' असा असणे शक्य नाही, कारण मंदबुद्धीचा माणूस अनेक प्रकारे विचार करत असला तरी त्याला सूक्ष्म अर्थाचे आकलन होत नाही? हे सत्य आहे, 'जाणून घेते' हे पद चित्ताच्या संज्ञा आणि प्रज्ञा यांच्या कार्यापेक्षा वेगळे असे विशिष्ट विषयाचे ग्रहण स्पष्ट करण्यासाठी म्हटले आहे, कारण 'चित्त' हा शब्द सर्व चित्तांसाठी सामान्य आहे. जो धर्म स्वभावतः 'चित्त' म्हणून ओळखला जातो, तोच 'विञ्ञाण' (विज्ञान/विज्ञाण) देखील आहे. म्हणून, जाणून घेण्याचा अर्थ घेऊन, संज्ञा आणि प्रज्ञा यांच्या कार्यापेक्षा वेगळे असे विशिष्ट विषयाचे ग्रहण स्पष्ट करण्यासाठी 'जाणून घेते' असे म्हटले आहे. อิทานิ อญฺญคณิกธาตุวเสนปิ นิพฺพจนํ ปกาสยาม – สพฺเพสุ จิตฺเตสุ ยํ โลกิยกุสลากุสลมหากฺริยจิตฺตํ, ตํ ชวนวีถิวเสน อตฺตโน สนฺตานํ จิโนตีติ จิตฺตํ, วิปากํ กมฺมกิเลเสหิ จิตนฺติ จิตฺตํ, อิทํ จิธาตุวเสน นิพฺพจนํ. ยํ กิญฺจิ โลเก วิจิตฺตํ สิปฺปชาตํ, สพฺพสฺส ตสฺส [Pg.306] จิตฺเตเนว กรณโต จิตฺเตติ วิจิตฺเตติ วิจิตฺตํ กริยติ เอเตนาติ จิตฺตํ, จิตฺตกรณตาย จิตฺตนฺติ วุตฺตํ โหติ, อิทํ จิตฺตธาตุวเสน นิพฺพจนํ. จิตฺตตาย จิตฺตํ, อิทํ ปาฏิปทิกวเสน นิพฺพจนํ. เตนาหุ อฏฺฐกถาจริยา ‘‘สพฺพมฺปิ ยถานุรูปโต จิตฺตตาย จิตฺตํ, จิตฺตกรณตาย จิตฺตนฺติ เอวเมตฺถ อตฺโถ เวทิตพฺโพ’’ติ. आता आम्ही इतर गणांतील धातूंच्या आधारेही व्युत्पत्ती स्पष्ट करतो – सर्व चित्तांमध्ये जे लौकिक कुशल, अकुशल आणि महाक्रिया चित्त आहे, ते जवनवीथीच्या (जवन प्रक्रियेच्या) द्वारे स्वतःच्या प्रवाहाला संचित करते म्हणून ते 'चित्त' होय; विपाकाला (कर्तव्याच्या फळाला) कर्म आणि क्लेशांद्वारे संचित करते म्हणून ते 'चित्त' होय, ही 'चि' (ci) धातूच्या आधारे केलेली व्युत्पत्ती आहे. जगात जे काही विविध प्रकारचे शिल्प (कला) आहे, ते सर्व चित्ताद्वारेच निर्माण केले जात असल्यामुळे, जे चित्रविचित्र करते, ज्याच्याद्वारे विविध गोष्टी केल्या जातात ते 'चित्त' होय; चित्रविचित्र करण्याच्या (विविधता निर्माण करण्याच्या) गुणधर्मामुळे त्याला 'चित्त' म्हटले गेले आहे, ही 'चित्त' (citta) धातूच्या आधारे केलेली व्युत्पत्ती आहे. विविधतेमुळे ते 'चित्त' आहे, ही प्रातिपदिक (मूळ शब्द) आधारे केलेली व्युत्पत्ती आहे. म्हणूनच अट्ठकथाचार्यांनी म्हटले आहे की – 'सर्व काही योग्यतेनुसार विविधतेमुळे चित्त आहे, आणि विविधता निर्माण करण्याच्या गुणधर्मामुळे चित्त आहे, असा येथे अर्थ समजला पाहिजे.' เอตฺถ หิ จิตฺตสฺส สราคสโทสาทิเภทภินฺนตฺตา สมฺปยุตฺตภูมิอารมฺมณหีนมชฺฌิมปณีตาธิปตีนํ วเสน จิตฺตสฺส จิตฺตตา เวทิตพฺพา. กิญฺจาปิ เอกสฺส จิตฺตสฺส เอวํ วิจิตฺตตา นตฺถิ, ตถาปิ วิจิตฺตานํ อนฺโตคธตฺตา สมุทายโวหาเรน อวยโวปิ ‘‘จิตฺต’’นฺติ วุจฺจติ, ยถา ปพฺพตนทีสมุทฺทาทิเอกเทเสสุ ทิฏฺเฐสุ ปพฺพตาทโย ทิฏฺฐาติ วุจฺจนฺติ. เตนาหุ อฏฺฐกถาจริยา ‘‘กามญฺเจตฺถ เอกเมว เอวํ จิตฺตํ น โหติ, จิตฺตานํ ปน อนฺโตคธตฺตา เอเตสุ ยํ กิญฺจิ เอกมฺปิ จิตฺตตาย ‘จิตฺต’นฺติ วตฺตุํ วฏฺฏตี’’ติ. येथे चित्ताच्या सराग-सदोष (रागयुक्त, द्वेषयुक्त) इत्यादी भेदांमुळे भिन्न असल्यामुळे, संप्रयुक्त भूमी, आलंबन (आरम्मण), हीन, मध्यम, प्रणीत आणि अधिपती यांच्या वशाने चित्ताची 'चित्तता' (चित्त असणे) जाणून घ्यावी. जरी एकाच चित्तामध्ये अशी विचित्रता (विविधता) नसते, तरीही विविध चित्तांचा त्यात अंतर्भाव असल्यामुळे, समूहाच्या व्यवहाराने त्याच्या एका अवयवाला (भागाला) देखील 'चित्त' असे म्हटले जाते; जसे की पर्वत, नदी, समुद्र इत्यादींच्या एका भागाला पाहिले असता 'पर्वत इत्यादी पाहिले' असे म्हटले जाते. म्हणूनच अट्ठकथाचार्यांनी म्हटले आहे - 'जरी येथे अशा प्रकारे एकच चित्त नसते, तरीही चित्तांचा अंतर्भाव असल्यामुळे, यांपैकी कोणत्याही एकालाही चित्तत्वामुळे 'चित्त' म्हणणे योग्यच आहे.' เอตฺถ จ วุตฺตปฺปการานมตฺถานํ วินิจฺฉโย พวติ. กถํ? ยสฺมา ยตฺถ ยตฺถ ยถา ยถา อตฺโถ ลพฺภติ, ตตฺถ ตตฺถ ตถา ตถา คเหตพฺโพ. ตสฺมา ยํ อาเสวนปจฺจยภาเวน จิโนติ, ยญฺจ กมฺมุนา อภิสงฺขตตฺตา จิตํ, ตํ เตน การเณน จิตฺตนฺติ วุตฺตํ. ยํ ปน ตถา น โหติ, ตํ ปริตฺตกฺริยทฺวยํ อนฺติมชวนญฺจ ลพฺภมานจินฺตนวิจิตฺตตาทิวเสน จิตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ, หสิตุปฺปาโท ปน อญฺญชวนคติโกเยวาติ. आणि येथे सांगितलेल्या प्रकारच्या अर्थांचा निश्चय होतो. कसा? कारण जिथे जिथे जसा जसा अर्थ प्राप्त होतो, तिथे तिथे तसा तसा तो ग्रहण केला पाहिजे. म्हणून, जे आसेवनप्रत्ययभावाने (पुनरावृत्तीच्या प्रभावाने) संचय करते, आणि जे कर्माद्वारे अभिसंस्कृत (निर्मित) झाल्यामुळे संचित (चित) आहे, त्याला त्या कारणाने 'चित्त' म्हटले गेले आहे. परंतु जे तसे नसते, ते परीत्त-क्रियाद्वय (दोन लहान क्रियाचित्ते) आणि अंतिम जवन हे प्राप्त होणाऱ्या चिंतन-विचित्रता इत्यादींच्या वशाने 'चित्त' म्हणून जाणावे; हसितुत्पाद (हसविणारे चित्त) तर इतर जवनांच्या गतीचेच आहे. อิมานิ จิตฺตสฺส นามานิ – ही चित्ताची नावे आहेत – จิตฺตํ มโน มานสญฺจ, วิญฺญาณํ หทยํ มนํ; นามาเนตานิ โวหาร-ปเถ วตฺตนฺติ ปายโต. चित्त, मन, मानस, विज्ञान (विञ्ञाण), हृदय आणि मनस्; ही नावे सामान्यतः व्यवहाराच्या मार्गात वापरली जातात. จิตฺตสทฺโท [Pg.307] ปญฺญตฺติยํ วิญฺญาเณ วิจิตฺเต จิตฺตกมฺเม อจฺฉริเยติ เอวมาทีสุ อตฺเถสุ ทิสฺสติ. อยญฺหิ ‘‘จิตฺโต คหปติ. จิตฺตมาโส’’ติอาทีสุ ปญฺญตฺติยํ ทิสฺสติ. ‘‘จิตฺตํ มโน มานส’’นฺติอาทีสุ วิญฺญาเณ. ‘‘วิจิตฺตวตฺถาภรณา’’ติอาทีสุ วิจิตฺเต. ‘‘ทิฏฺฐํ โว ภิกฺขเว จรณํ นาม จิตฺต’’นฺติอาทีสุ จิตฺตกมฺเม. ‘‘อิงฺฆ มทฺทิ นิสาเมหิ, จิตฺตรูปํว ทิสฺสตี’’ติอาทีสุ อจฺฉริเยติ. 'चित्त' हा शब्द प्रज्ञप्ती (नाव/संकल्पना), विज्ञान, विचित्र (विविध), चित्रकर्म (कलाकृती) आणि आश्चर्य इत्यादी अर्थांमध्ये दिसून येतो. जसे की, 'चित्त गृहपती' (चित्तो गहपति), 'चित्त मास' (चित्तमासो - चैत्र महिना) इत्यादींमध्ये तो प्रज्ञप्तीमध्ये दिसतो. 'चित्तं मनो मानसं' इत्यादींमध्ये विज्ञानात दिसतो. 'विचित्र वस्त्र आणि आभूषणे' (विचित्तवत्थाभरणा) इत्यादींमध्ये विचित्र या अर्थात दिसतो. 'भिक्खूहो, तुम्ही चरण नावाचे चित्र (चित्त) पाहिले आहे का?' इत्यादींमध्ये चित्रकर्माच्या अर्थात दिसतो. 'हे मद्दी, जरा पाहा, हे आश्चर्यकारक रूपासारखे दिसत आहे' इत्यादींमध्ये आश्चर्याच्या अर्थात दिसतो. จิต สญฺเจตเน. เจเตติ, เจตยติ. รตฺโต โข พฺราหฺมณ ราเคน อภิภูโต อตฺตพฺยาพาธายปิ เจเตติ, ปรพฺยาพาธายปิ เจเตติ, อุภยพฺยาพาธายปิ เจเตติ. อากงฺขติ เจตยติ, ตํ นิเสธ ชุตินฺธร. เจตนา, สญฺเจตนา. เจตยิตํ, เจเตตฺวา, เจตยิตฺวา. สญฺจิจฺจ ปาณํ ชีวิตา โวโรเปติ. 'चित' धातू संचेतन (विचार करणे/चेतना करणे) या अर्थात आहे. 'चेतेति, चेतयति' (तो विचार करतो/चेतवतो). 'हे ब्राह्मणा, रागाने अभिभूत झालेला मनुष्य स्वतःच्या नुकसानीचाही विचार करतो, दुसऱ्याच्या नुकसानीचाही विचार करतो आणि दोघांच्याही नुकसानीचा विचार करतो.' 'इच्छा करतो, विचार करतो, हे द्युतिंधर (तेजस्वी), त्याला रोख.' चेतना, संचेतना. चेतयित (विचार केलेले), चेतेत्वा, चेतयित्वा (विचार करून). 'जाणूनबुजून (सञ्चिच्च) प्राण्याला जीवितापासून वंचित करतो.' ตตฺถ เจตนาติ เจตยตีติ เจตนา, สทฺธึ อตฺตนา สมฺปยุตฺตธมฺเม อารมฺมเณ อภิสนฺทหตีติ อตฺโถ. สญฺเจตนาติ อุปสคฺควเสน ปทํ วฑฺฒิตํ. เจตยิตนฺติ เจตนากาโร. สญฺจิจฺจาติ สยํ ญตฺวา, เจจฺจ อภิวิตริตฺวาติ อตฺโถ. อิมานิ เจตนาย นามานิ – तेथे 'चेतना' म्हणजे जी चेतवते (विचार करते) ती चेतना; स्वतःसोबत संप्रयुक्त असलेल्या धर्मांना आलंबनावर (आरम्मणावर) जोडते, असा याचा अर्थ आहे. 'संचेतना' हे उपसर्गाच्या योगाने पद वाढवले गेले आहे. 'चेतयित' म्हणजे चेतनेचा आकार (प्रकार). 'सञ्चिच्च' म्हणजे स्वतः जाणून, विचारपूर्वक किंवा जाणूनबुजून असा अर्थ आहे. ही चेतनेची नावे आहेत – สญฺเจตนา เจตยิตํ, เจตนา กมฺมเมว จ; กมฺมญฺหิ ‘‘เจตนา’’ ตฺเวว, ชิเนนาหจฺจ ภาสิตํ. संचेतना, चेतयित, चेतना आणि कर्म; कारण जिनांनी (बुद्धांनी) स्वतः 'चेतना म्हणजेच कर्म' असे सांगितले आहे. อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘เจตนาหํ ภิกฺขเว กมฺมํ วทามิ, เจตยิตฺวา กมฺมํ กโรติ กาเยน วาจาย มนสา’’ติ. याविषयी ही पाळी (वचन) आहे - 'भिक्खूहो, मी चेतनेलाच कर्म म्हणतो. विचार करून (चेतवून) मनुष्य कायेने, वाचेने आणि मनाने कर्म करतो.' มนฺต [Pg.308] คุตฺตภาสเน. มนฺเตติ, มนฺตยติ, นิมนฺเตติ, นิมนฺตยติ, อามนฺเตติ, อามนฺตยติ. ชนา สงฺคมฺม มนฺเตนฺติ, มนฺตยนฺติ, มนฺตยึสุ รโหคตา. นิมนฺตยิตฺถ ราชานํ. อามนฺตยิตฺถ เทวินฺโท, วิสุกมฺมํ มหิทฺธิกํ. มนฺตา, มนฺโต. การิเต ‘‘มนฺตาเปติ, มนฺตาปยตี’’ติ รูปานิ. 'मन्त' धातू गुप्त भाषणाच्या (गुपित बोलण्याच्या) अर्थात आहे. 'मन्तेति, mन्तयति' (तो गुप्त सल्लामसलत करतो), 'निमन्तेति, निमन्तयति' (तो आमंत्रित करतो), 'आमन्तेति, आमन्तयति' (तो संबोधित करतो/बोलावतो). 'लोक एकत्र येऊन गुप्त सल्लामसलत करतात, त्यांनी एकांतात सल्लामसलत केली.' 'राजाला आमंत्रित केले.' 'देवेंद्राने महाऋद्धीवान विसुकम्माला (विश्वकर्माला) आमंत्रित केले/बोलावले.' मन्ता, मन्तो. प्रयोजक (कारित) रूपात 'मन्तापेति, मन्तापयति' अशी रूपे होतात. เอตฺถ มนฺตาติ ปญฺญา, ‘‘คเวสนสญฺญา’’ติปิ วทนฺติ. มนฺโตติ คุตฺตภาสนํ. ‘‘อุปสฺสุติกาปิ สุณนฺติ มนฺตํ, ตสฺมา หิ มนฺโต ขิปฺปมุเปติ เภท’’นฺติ เอตฺถ หิ คุตฺตภาสนํ ‘‘มนฺโต’’ติ วุจฺจติ. อปิจ มนฺโตติ ฉฬงฺคมนฺโต. วุตฺตญฺจ ‘‘เย มนฺตํ ปริวตฺเตนฺติ, ฉฬงฺคํ พฺรหฺมจินฺติต’’นฺติ. เอตฺถ สิกฺขา นิรุตฺติ กปฺป พฺยากรณ โชติสตฺถ ฉนฺโทวิจิติวเสน มนฺโต ‘‘ฉฬงฺโค’’ติ เวทิตพฺโพ. เอตานิ เอว ฉ ‘‘เวทงฺคานี’’ติ วุจฺจนฺติ. เวโท เอว หิ ‘‘มนฺโต, สุตี’’ติ จ วุตฺโต. อถ วา มนฺโตติ เวทาทิวิชฺชา. येथे 'मन्ता' म्हणजे प्रज्ञा, याला 'गवेषणासंज्ञा' असेही म्हणतात. 'मन्तो' म्हणजे गुप्त भाषण (गुपित). 'चोरीछुपे ऐकणारेही गुप्त सल्लामसलत ऐकतात, म्हणूनच गुप्त सल्लामसलत (मंत) लवकरच उघड होते' येथे गुप्त भाषणाला 'मंत' म्हटले आहे. तसेच 'मंत' म्हणजे षडंगमंत्र (सहा अंगांचा मंत्र). आणि म्हटले आहे - 'जे मंत्राचे आवर्तन करतात, जे ब्रह्मचिंतित षडंग आहे.' येथे शिक्षा, निरुक्त, कल्प, व्याकरण, ज्योतिषशास्त्र आणि छंदोविचिती यांच्या वशाने मंत्राला 'षडंग' (सहा अंगे असलेला) जाणावे. यांनाच सहा 'वेदांगे' असे म्हणतात. वेदच 'मंत' आणि 'श्रुती' (सुती) म्हणूनही सांगितले गेले आहेत. किंवा 'मंत' म्हणजे वेदादी विद्या होय. ยนฺต สงฺโกจเน. ยนฺเตติ, ยนฺตยติ. ยนฺตํ, เตลยนฺตํ ยถาจกฺกํ, เอวํ กมฺปติ เมทนี. 'यन्त' धातू संकोचन (नियंत्रण/आकुंचन) या अर्थात आहे. 'यन्तेति, यन्तयति'. 'यंत्र, जसे तेलाचे यंत्र चक्राप्रमाणे फिरते, तशी ही पृथ्वी कंपित होते.' สตฺต คติยํ. สตฺเตติ, สตฺตยติ. 'सत्त' धातू गती या अर्थात आहे. 'सत्तेति, सत्तयति'. สนฺต อามปฺปโยเค. อามปฺปโยโค นาม อุสฺสนฺนกฺริยา. สนฺเตติ, สนฺตยติ. 'sन्त' धातू आमप्रयोगाच्या अर्थात आहे. आमप्रयोग म्हणजे तीव्र किंवा निरंतर क्रिया. 'सन्तेति, सन्तयति'. กิตฺต สํสนฺทเน. กิตฺเตติ, กิตฺตยติ. ‘‘เย โวหํ กิตฺตยิสฺสามิ, คิราหิ อนุปุพฺพโส. กิตฺตนา ปริกิตฺตนา’’ติอาทีสุ ปน กตฺถนา ‘‘กิตฺตนา’’ติ วุจฺจติ. 'कित्त' धातू संसंदन (संकीर्तन/प्रशंसा/एकत्र करणे) या अर्थात आहे. 'कित्तेति, कित्तयति'. 'ज्यांची मी अनुक्रमाने वाणीने प्रशंसा (कीर्तन) करीन. कीर्तना, परिकीर्तना' इत्यादींमध्ये तर कथनाला (प्रशंसेला) 'कीर्तना' म्हटले जाते. ตนฺต กุฏุมฺพธารเณ. ตนฺเตติ, ตนฺตยติ. สตนฺโต, สปฺปธาโนติ อตฺโถ. 'तन्त' धातू कुटुंबधारणाच्या (कुटुंबाचे पालनपोषण करण्याच्या) अर्थात आहे. 'तन्तेति, तन्तयति'. 'सतंतो' म्हणजे जो प्रधान (मुख्य) आहे असा अर्थ आहे. ยต [Pg.309] นิกาโรปกาเรสุ. ยเตติ, ยตยติ. นีโต จ ปฏิทาเน, ยตธาตุ นิอุปสคฺคโต ปโร ปฏิทาเน วตฺตติ, นิยฺยาเตติ, นิยฺยาตยติ. ตการสฺส ปน ทการตฺเต กเต ‘‘นิยฺยาเทติ, นิยฺยาทยติ. รถํ นิยฺยาทยิตฺวาน, อณโณ เอหิ สารถี’’ติ รูปานิ. 'यत' धातू निकार (अपमान/नाश) आणि उपकार या अर्थांमध्ये आहे. 'यतेति, यतयति'. आणि 'नी' धातू प्रतिदानात (परत देण्यात) वापरला जातो, 'यत' धातू 'नि' उपसर्गाच्या पुढे आल्यावर प्रतिदानाच्या अर्थात वापरला जातो, जसे की 'निय्यातेति, निय्यातयति'. 'त' काराचा 'द' कार झाल्यावर 'निय्यादेति, निय्यादयति' अशी रूपे होतात. जसे की - 'हे सारथी, रथ परत देऊन (निय्यादयित्वान) ऋणमुक्त होऊन ये.' วตุ ภาสายํ. วตฺเตติ, วตฺตยติ. 'वतु' धातू भाषणाच्या (बोलण्याच्या) अर्थात आहे. 'वत्तेति, वत्तयति'. ปต คติยํ. ปเตติ, ปตยติ. 'पत' धातू गती (पडणे/जाणे) या अर्थात आहे. 'पतेति, पतयति'. วาต คติสุขเสวเนสุ. คติ สุขํ เสวนนฺติ ตโย อตฺถา. ตตฺถ สุขนํ สุขํ. วาเตติ, วาตยติ. วาโต, วาตปุปฺผํ. จีวรสฺส อนุวาโต. 'वात' धातू गती, सुख आणि सेवन या तीन अर्थांमध्ये आहे. तेथे सुखी करणे म्हणजे सुख होय. 'वातेति, वातयति'. वात (वारा), वातपुष्प. चीवराचा अनुवात (काठ/पट्टी). เกต อามนฺตเน. เกเตติ, เกตยติ. เกตโก. 'केत' धातू आमंत्रण (बोलावणे) या अर्थात आहे. 'केतेति, केतयति'. केतक (केवडा). สตฺต สนฺตานกฺริยายํ. สนฺตานกฺริยา นาม ปพนฺธกฺริยา อวิจฺเฉทกรณํ. สตฺเตติ, สตฺตยติ. สตฺโต. 'सत्त' धातू संतानक्रियेच्या (प्रवाहाच्या/सातत्याच्या क्रियेच्या) अर्थात आहे. संतानक्रिया म्हणजे प्रबंधक्रिया (सातत्य राखणे) किंवा अविच्छेद (खंड न पडू देणे). 'सत्तेति, सत्तयति'. सत्त (प्राणी/सत्त्व). ‘‘กินฺนุ สนฺตรมาโนว, ลายิตฺวา หริตํ ติณํ; ขาท ขาทาติ ลปสิ, คตสตฺตํ ชรคฺคว’’นฺติ 'हिरवे गवत कापून, एवढ्या घाईघाईने तू या गतप्राण (मृत) म्हाताऱ्या बैलाला 'खा, खा' असे काय म्हणून बोलत आहेस?' ปาฬิยํ ปน ‘‘คตสตฺตํ ชรคฺคว’’นฺติ ปาฐสฺส ‘‘วิคตชีวิตํ ชิณฺณโคณ’’นฺติ อตฺถํ สํวณฺเณสุํ. อิมินา สตฺตสทฺทสฺส ชีวิตวจนํ วิย ทิสฺสติ, ‘‘น สุกรา อุญฺเฉน ปคฺคเหน ยาเปตุ’’นฺติ เอตฺถ ปคฺคหสทฺทสฺส ปตฺตกถนํ วิย. สุฏฺฐุ วิจาเรตพฺพํ. पाळीमध्ये (पाठात) 'गतसत्तं जरग्गवं' या पाठाचा अर्थ 'विगतजीवितं जिण्णगोणं' (ज्याचे जीवन निघून गेले आहे असा म्हातारा बैल) असा वर्णिला आहे. यावरून 'सत्त' शब्दाचा अर्थ 'जीवित' (प्राण) असा असल्याचे दिसते, जसे की 'न सुकरा उञ्छेन पग्गहेन यापेतुं' येथे 'पग्गह' शब्दाचा अर्थ 'पात्र' असा सांगितले गेल्यासारखे आहे. यावर चांगला विचार केला पाहिजे. สุตฺต อวโมจเน. สุตฺเตติ, สุตฺตยติ. 'सुत्त' धातू अवमोचन (मुक्त करणे/सोडवणे) या अर्थात आहे. 'सुत्तेति, सुत्तयति'. มุตฺต ปสวเน. มุตฺเตติ, มุตฺตยติ. โอมุตฺเตติ, โอมุตฺตยติ. มุตฺตํ. อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘มุตฺเตติ โอหเทติ จา’’ติ. ตตฺถ มุตฺเตตีติ ปสฺสาวํ กโรติ. โอหเทตีติ กรีสํ วิสฺสชฺเชติ. การิเต ‘‘มุตฺตาเปติ, มุตฺตาปยตี’’ติ รูปานิ. 'मुत्त' धातू प्रसवण (उत्सर्जन/मूत्रविसर्जन) या अर्थात आहे. 'मुत्तेति, मुत्तयति'. 'ओमुत्तेति, ओमुत्तयति'. मुत्त (मूत्र). याविषयी ही पाळी आहे - 'मुत्तेति ओहदेति चा' (तो मूत्रविसर्जन करतो आणि मलोत्सर्जन करतो). तेथे 'मुत्तेति' म्हणजे लघवी (लघूशंका) करतो. 'ओहदेति' म्हणजे विष्ठा (मलोत्सर्जन) विसर्जित करतो. प्रयोजक (कारित) रूपात 'मुत्तापेति, मुत्तापयति' अशी रूपे होतात. กตฺตร [Pg.310] เสถิลฺเล. กตฺตเรติ, กตฺตรยติ. กตฺตโร. กตฺตรทณฺโฑ, กตฺตรสุปฺปํ. 'कत्तर' धातू शैथिल्य (शिथिलता/कमकुवतपणा) या अर्थात आहे. 'कत्तरेति, कत्तरयति'. कत्तरो (कमकुवत/वृद्ध). कत्तरदण्ड (वृद्धाची काठी), कत्तरसुप्प (जुने/शिथिल सूप). ตตฺถ กตฺตโรติ ชิณฺโณ. มหลฺลโกติ วุตฺตํ โหติ. เกนฏฺเฐน? กตฺตรยติ องฺคานํ สิถิลภาเวน สิถิโล ภวตีติ อตฺเถน. กตฺตรทณฺโฑติ กตฺตเรหิ ชิณฺณมนุสฺเสหิ เอกนฺตโต คเหตพฺพตาย กตฺตรานํ ทณฺโฑ กตฺตรทณฺโฑ. เตนาหุ อฏฺฐกถาจริยา ‘‘กตฺตรทณฺโฑติ ชิณฺณกาเล คเหตพฺพทณฺโฑ’’ติ. กตฺตรสุปฺปนฺติ ชิณฺณสุปฺปํ. กตฺตรญฺจ ตํ สุปฺปญฺจาติ กตฺตรสุปฺปนฺติ สมาโส. तेथे 'कत्तर' म्हणजे जीर्ण (वृद्ध). 'महल्लक' (म्हातारा) असे म्हटले आहे. कोणत्या अर्थाने? अवयवांच्या शिथिलतेमुळे जो शिथिल होतो, या अर्थाने. 'कत्तरदण्ड' म्हणजे जीर्ण (वृद्ध) माणसांनी निश्चितपणे हातात धरण्यायोग्य असल्यामुळे वृद्धांची काठी म्हणजे 'कत्तरदण्ड' होय. म्हणूनच अट्ठकथाचार्यांनी म्हटले आहे - 'कत्तरदण्ड म्हणजे वृद्धपकाळात हातात धरण्याची काठी'. 'कत्तरसुप्प' म्हणजे जीर्ण सूप. 'कत्तर' आणि 'सूप' यांचा 'कत्तरसुप्प' असा समास होतो. จิตฺต จิตฺตกรเณ, กทาจิ ทสฺสเนปิ. จิตฺตกรณํ วิจิตฺตภาวกรณํ. จิตฺเตติ, จิตฺตยติ. จิตฺตํ. चित्त (धातू) चित्रित करणे (विविध करणे) या अर्थात, कधीकधी पाहणे या अर्थातही. 'चित्तकरण' म्हणजे विचित्र (विविध) करणे. चित्तेति, चित्तयति. चित्तं. ตการนฺตธาตุรูปานิ. तकारान्त धातूंची रूपे. ถการนฺตธาตุ थकारान्त धातू. กถ กถเน. กเถติ, กถยติ. ธมฺมํ สากจฺฉติ. สากจฺฉา, กถา, ปริกถา, อฏฺฐกถา. कथ (धातू) सांगणे (कथन करणे) या अर्थात. कथेति, कथयति. 'धम्मं साकच्छति' (धम्माची चर्चा करतो). साकच्छा (चर्चा), कथा, परिकथा, अट्ठकथा (अर्थकथा). ตตฺถ สากจฺฉตีติ สห กถยติ. อตฺโถ กถิยติ เอตายาติ อฏฺฐกถา, ตฺถการสฺส ฏฺฐการตฺตํ. तेथे 'साकच्छति' म्हणजे एकत्र बोलणे (चर्चा करणे). जिच्याद्वारे अर्थ सांगितला जातो ती 'अट्ठकथा' होय, येथे 'त्थ' काराचा 'ट्ठ' कार झाला आहे. ยาย’ตฺถมภิวณฺเณนฺติ, พฺยญฺชนตฺถปทานุคํ; นิทานวตฺถุสมฺพนฺธํ, เอสา อฏฺฐกถา มตา. जिच्याद्वारे व्यंजने, अर्थ आणि पदांचे अनुसरण करून, निदान (कारण) आणि वस्तूच्या (कथेच्या) संबंधासह अर्थाचे वर्णन केले जाते, ती 'अट्ठकथा' मानली जाते. ‘‘อฏฺฐกถา’’ติ จ ‘‘อตฺถสํวณฺณนา’’ติ จ นินฺนานากรณํ. 'अट्ठकथा' आणि 'अत्थसंवण्णना' (अर्थवर्णन) यात काहीही भेद नाही (दोन्ही एकच आहेत). ปถิ คติยํ. ปนฺเถนฺติ, ปนฺถยนฺติ. ปนฺโถ. ภูวาทิคเณ ‘‘ปถ คติย’’นฺติ อการนฺตวเสน กถิตสฺส ‘‘ปถติ, ปโถ’’ติ [Pg.311] นิคฺคหีตาคมวชฺชิตานิ รูปานิ ภวนฺติ, อิธ ปน อิการนฺตวเสน กถิตสฺส สนิคฺคหีตาคมานิ รูปานิ นิจฺจํ ภวนฺตีติ ทฏฺฐพฺพํ. पथि (धातू) गती या अर्थात. पन्थेन्ति, पन्थयन्ति. पन्थो (मार्ग). भूवादि गणात 'पथ गतिया' अशा अकारान्त रूपाने सांगितलेल्या धातूची 'पथति, पतो' अशी निग्गहीत (अनुस्वार) आगम नसलेली रूपे होतात, परंतु येथे इकारान्त रूपाने सांगितलेल्या धातूची निग्गहीत आगमासह रूपे नेहमी होतात, असे समजावे. ปุตฺถ อาทรานาทเรสุ. ปุตฺเถติ, ปุตฺถยติ. पुत्थ (धातू) आदर आणि अनादर या अर्थात. पुत्थेति, पुत्थयति. มุตฺถ สงฺฆาเต. มุตฺเถติ, มุตฺถยติ. मुत्थ (धातू) संघात (एकत्र करणे) या अर्थात. मुत्थेति, मुत्थयति. วตฺถ อทฺทเน. วตฺเถติ, วตฺถยติ. वत्थ (धातू) अद्दन (पीडा देणे/हिंसा) या अर्थात. वत्थेति, वत्थयति. ปุถ ภาสายํ. โปเถติ, โปถยติ. กเถตีติ อตฺโถ. पुथ (धातू) बोलणे या अर्थात. पोथेति, पोथयति. बोलतो असा अर्थ आहे. ปุถ ปหาเร. โปเถติ, โปถยติ. กุมาเร โปเถตฺวา อคมาสิ. पुथ (धातू) प्रहार करणे (मारणे) या अर्थात. पोथेति, पोथयति. 'कुमारे पोथेत्वा अगमासि' (मुलांना मारून तो निघून गेला). กถ วากฺยปพนฺเธ. กเถติ, กถยติ. กถา. कथ (धातू) वाक्यरचना (भाषण प्रबंध) या अर्थात. कथेति, कथयति. कथा. สถ ทุพฺพลฺเย. สเถติ, สถยติ. सथ (सथ्) धातू दौर्बल्य (कमकुवत होणे) या अर्थात आहे. सथेति, सथयति. อตฺถ ปตฺถ ยาจนายํ. อตฺเถติ, อตฺถยติ. อตฺโถ. ปตฺเถติ, ปตฺถยติ. ปตฺถนา. ปฏิปกฺขํ อตฺถยนฺติ อิจฺฉนฺตีติ ปจฺจตฺถิกา. अत्थ (अत्थ्) आणि पत्थ (पत्थ्) धातू याचना (मागणी करणे/इच्छा करणे) या अर्थात आहेत. अत्थेति, अत्थयति. अत्थो (अर्थ/गरज). पत्थेति, पत्थयति (प्रार्थना करतो/इच्छा करतो). पत्थना (प्रार्थना/इच्छा). जे प्रतिपक्षाची (शत्रूची) इच्छा करतात, त्यांना 'पच्चत्थिक' (शत्रू/विरोधी) म्हणतात. โถม สิลาฆายํ. โถเมติ, โถมยติ. โถมนา. थोम (थोम्) धातू श्लाघा (स्तुती करणे) या अर्थात आहे. थोमेति, थोमयति (स्तुती करतो). थोमना (स्तुती). กาถ หึสายํ. กาเถติ, กาถยติ. काथ (काथ्) धातू हिंसा (इजा करणे) या अर्थात आहे. काथेति, काथयति. สถ พนฺธเน. สเถติ, สถยติ. सथ (सथ्) धातू बंधन (बांधणे) या अर्थात आहे. सथेति, सथयति. สนฺถ คนฺถ สนฺถมฺเภ. สนฺเถติ, สนฺถยติ. คนฺเถติ, คนฺถยติ. คนฺโถ. सन्थ (सन्थ्) आणि गन्थ (गन्थ्) धातू संस्तंभ (स्तंभित करणे/घट्ट बांधणे) या अर्थात आहेत. सन्थेति, सन्थयति. गन्थेति, गन्थयति (ग्रंथित करतो/बांधतो). गन्थो (ग्रंथ/गाठ). ถการนฺตธาตุรูปานิ. थकारान्त धातूंची रूपे. ทการนฺตธาตุ दकारान्त धातू หท [Pg.312] กรีสุสฺสคฺเค. กรีสุสฺสคฺโค กรีสสฺส อุสฺสคฺโค วิสฺสชฺชนํ. หเทติ, หทยติ. โอหเทติ, โอหทยติ. हद (हद्) धातू करीसोत्सर्ग (मलविसर्जन करणे) या अर्थात आहे. करीसोत्सर्ग म्हणजे करीसाचा (मलाचा) उत्सर्ग किंवा विसर्जन करणे. हदेति, हदयति (मलविसर्जन करतो). ओहदेति, ओहदयति (घाण करतो/मल विसर्जन करतो). วิท ลาเภ. อิมสฺมึ ฐาเน ลาโภ นาม อนุภวนํ, ตสฺมา วิทธาตุ อนุภวเน วตฺตตีติ อตฺโถ คเหตพฺโพ. สุขํ เวทนํ เวเทติ. ทุกฺขํ เวทนํ เวเทติ. เวทยติ. เวทนา, วิตฺติ. เวทยิตํ. สุขํ เวทนํ เวทยมาโน. विद (विद्) धातू लाभ (प्राप्ती) या अर्थात आहे. या ठिकाणी लाभ म्हणजे अनुभव घेणे, म्हणून 'विद' धातू अनुभवाच्या अर्थात वर्ततो असा अर्थ घ्यावा. 'सुखं वेदनं वेदेति' (सुखद वेदनेचा अनुभव घेतो). 'दुक्खं वेदनं वेदेति' (दुःखद वेदनेचा अनुभव घेतो). वेदयति. वेदना (अनुभूती), वित्ती (जाणीव/आनंद). वेदयितं (अनुभवलेले). 'सुखं वेदनं वेदयमानो' (सुखद वेदनेचा अनुभव घेणारा). กุทิ อนตภาสเน. กุนฺเทติ, กุนฺทยติ. कुदि (कुद्) धातू अनृतभाषण (खोटे बोलणे) या अर्थात आहे. कुन्देति, कुन्दयति. มิท สิเนหเน. อตฺร สิเนโห นาม ปีติ. เมเทติ, เมทยติ. मिद (मिद्) धातू स्नेह (प्रेम/स्नेहन) या अर्थात आहे. येथे स्नेह म्हणजे प्रीती (प्रेम). मेदेति, मेदयति. ฉท สํวรเณ. เคหํ ฉาเทติ, ฉาทยติ. โทสํ ฉาเทติ, ฉาทยติ. ปฏิจฺฉาเทติ, ปฏิจฺฉาทยติ. ฉตฺตํ. ฉนฺนา กุฏิ. छद (छद्) धातू संवरण (झाकणे/आच्छादित करणे) या अर्थात आहे. 'गेहं छादेति, छादयति' (घर झाकतो/छप्पर घालतो). 'दोसं छादेति, छादयति' (दोष झाकतो). पटिच्छादेति, पटिच्छादयति (पूर्णपणे झाकतो). छत्तं (छत्र/छत्री). छन्ना कुटि (झाकलेली कुटी). ตตฺร ฉตฺตนฺติ อาตปตฺตํ. อาตปํ ฉาเทตีติ ฉตฺตํ. ปฏิจฺฉาทิยเตติ ฉนฺนา. तेथे 'छत्तं' म्हणजे आतपत्र (उन्हापासून संरक्षण करणारे छत्र). जे उन्हापासून (आतपापासून) संरक्षण करते (झाकते) ते छत्र होय. जे झाकले जाते ते 'छन्ना' (झाकलेली). จุท สญฺโจทเน อาณตฺติยญฺจ. โจเทติ, โจทยติ. โจทโก, จุทิตโก, โจทนา. อานนฺโท พุทฺธโจทิโต. चुद (चुद्) धातू संचोदन (प्रेरित करणे) आणि आज्ञा देणे या अर्थात आहे. चोदेति, चोदयति (प्रेरित करतो/चोदित करतो). चोदको (प्रेरक/चोदक), चुदितको (प्रेरित केलेला), चोदना (प्रेरणा/चोदना). 'आनन्दो बुद्धचोदितो' (बुद्धांद्वारे प्रेरित झालेले आनंद). ตตฺร โจทนาติ จาลนา. จาลนาติ โทสาโรปนาติ อตฺโถ. तेथे 'चोदना' म्हणजे चालना (हलवणे/प्रेरित करणे). चालना म्हणजे दोषांचे आरोपण करणे असा अर्थ आहे. ฉทฺท วมเน. ฉทฺเทติ, ฉทฺทยติ. छड्ड (छड्ड्) धातू वमन (उलटी करणे/टाकून देणे) या अर्थात आहे. छड्डेति, छड्डयति. มท วิตฺติโยเค. มเทติ, มทยติ. मद (मद्) धातू वित्तीयोग (आनंद किंवा मदाचा योग) या अर्थात आहे. मदेति, मदयति. วิท เจหนาขฺยานนิวาเสสุ. เจหนา สญฺญาณํ. อาขฺยานํ กถนํ. นิวาโส นิวสนํ. เวเทติ, เวทยติ. ปฏิเวเทติ, ปฏิเวทยติ. ปฏิเวทยามิ เต มหาราช. विद (विद्) धातू चेहना (संज्ञा/ज्ञान), आख्यान (सांगणे) आणि निवास (राहणे) या अर्थांमध्ये आहे. चेहना म्हणजे संज्ञान (ओळख/ज्ञान). आख्यान म्हणजे कथन (सांगणे). निवास म्हणजे निवसन (राहणे). वेदेति, वेदयति (जाणवतो/सांगतो). पटिवेदेति, पटिवेदयति (निवेदन करतो/कळवतो). 'पटिवेदयामि ते महाराज' (महाराज, मी आपल्याला निवेदन करतो). สทฺท [Pg.313] สทฺทเน. สทฺเทติ, สทฺทยติ. วิสทฺเทติ, วิสทฺทยติ. สทฺโท, สทฺทิโต. ทีฆตฺเต ‘‘สทฺทายตี’’ติ รูปํ. सद्द (सद्द्) धातू शब्दन (आवाज करणे/बोलवणे) या अर्थात आहे. सद्देति, सद्दयति (आवाज करतो/बोलवतो). विसद्देति, विसद्दयति (विशेष आवाज करतो). सद्धो (शब्द/आवाज), सद्दितो (शब्दांकित/आवाज केलेला). दीर्घत्व आल्यावर 'सद्दायति' असे रूप होते. เอตฺถ จ ‘‘มํ สทฺทายตีติ สญฺญาย เวเคน อุทเก ปตี’’ติ อฏฺฐกถาปาโฐ นิทสฺสนํ, อิทํ ‘‘ปพฺพตายตี’’ติ รูปํ วิย ธาตุวเสน นิปฺผนฺนํ น โหตีติ น วตฺตพฺพํ, ธาตุวเสน นิปฺผนฺนํเยวาติ คเหตพฺพํ. สทฺโทติ สทฺทิยตีติ สทฺโท, ยถาวุจฺจตีติ วจนํ. อถ วา สทฺทิยติ อตฺโถ อเนนาติ สทฺโท. ครโว ปน ‘‘สปฺปตีติ สทฺโท. อุทีริยติ อภิลปิยตีติ อตฺโถ’’ติ วทนฺติ. สูท อาเสจเน. สูเทติ, สูทยติ. สูโท. สูโทติ ภตฺตการโก, โย ‘‘รสโก’’ติปิ วุจฺจติ. กนฺท สาตจฺเจ. สาตจฺจํ สตตภาโว นิรนฺตรภาโว. กนฺเทติ, กนฺทยติ. มุท สํสคฺเค. เอกโตกรณํ สํสคฺโค. โมเทติ, โมทยติ สตฺตูนิ สปฺปินา. นท ภาสายํ. นาเทติ, นาทยติ. เหตุกตฺตุรูปานีติ น วตฺตพฺพานิ ปาฬิทสฺสนโต ‘‘สีโห จ สีหนาเทน, ททฺทรํ อภินาทยี’’ติ. อญฺญตฺราปิ สํสโย น กาตพฺโพ. อิมสฺมึ จุราทิคเณ เหตุกตฺตุรูปสทิสานมฺปิ สุทฺธกตฺตุรูปานํ สนฺทิสฺสนโต. नद (nada) हा धातू भाषणात (बोलण्यात) वापरला जातो. 'नादेति' (nādeti), 'नादयति' (nādayati) ही रूपे बनतात. पाळी साहित्यातील 'सीहो च सीहनादेन, दद्दरं अभिनादयी' (सिंह आणि सिंहनादाने, दद्दर पर्वताला त्याने गुंजवून सोडले) या दर्शनावरून ही प्रयोजक (हेतुकर्तृ) रूपे आहेत असे म्हणू नये. इतर ठिकाणीही संशय घेऊ नये. कारण या चुरादि गणात प्रयोजक रूपांसारखी दिसणारी रूपे देखील प्रयोजक नसतानाही आढळतात. สท อสฺสาทเน. สาเทติ, สาทยติ. อสฺสาเทติ, อสฺสาทยติ. เอตฺถ อาอุปสคฺโค รสฺสวเสน ฐิโต. सद (sada) हा धातू आस्वाद घेण्याच्या (assādana) अर्थात आहे. 'सादेति' (sādeti), 'सादयति' (sādayati) ही रूपे बनतात. 'अस्सादेति' (assādeti), 'अस्सादयति' (assādayati) ही रूपे होतात. येथे 'आ' (ā) हा उपसर्ग र्हस्व (ऱ्हस्व) रूपाने स्थित आहे. คท เทวสทฺเท. เทวสทฺโท วุจฺจติ เมฆสทฺโท. คเทติ, คทยติ. गद (gada) हा धातू देवशब्दाच्या (meghasadda) अर्थात आहे. देवशब्द म्हणजे ढगांचा आवाज (मेघशब्द) असे म्हटले जाते. 'गदेति' (gadeti), 'गदयति' (gadayati) ही रूपे बनतात. ปท [Pg.314] คติยํ. ปเทติ, ปทยติ. ปทํ. อิมิสฺสา ทิวาทิคเณ ‘‘ปชฺชตี’’ติ รูปํ ภวติ, อิธ ปน อีทิสานิ. पद (pada) हा धातू गतीच्या (gati) अर्थात आहे. 'पदेति' (padeti), 'पदयति' (padayati) ही रूपे बनतात. 'पदं' (padaṃ) हे नाम बनते. या धातूचे दिवादि गणात 'पज्जति' (pajjati) असे रूप होते, परंतु येथे (चुरादि गणात) अशी (पदेति, पदयति) रूपे होतात. ฉิทฺท กณฺณเภเท. ฉิทฺเทติ, ฉิทฺทยติ. ฉิทฺทํ. छिद्द (chidda) हा धातू कान टोचण्याच्या (kaṇṇabheda) अर्थात आहे. 'छिद्देति' (chiddeti), 'छिद्दयति' (chiddayati) ही रूपे बनतात. 'छिद्दं' (chiddaṃ) हे नाम बनते. ฉิท ทฺเวธากรเณ. นนุ โภ โย จตุธา วา ปญฺจธา วา อเนกสตธา วา ฉินฺทติ, ตสฺส ตํ เฉทนํ ทฺเวธากรณํ นาม น โหติ, เอวํ สนฺเต กสฺมา สามญฺเญน อวตฺวา ‘‘ทฺเวธากรเณ’’ติ ทฺวิธา คหณํ กตนฺติ? ทฺวิธากรณํ นาม น โหตีติ น วตฺตพฺพํ, อเนกสตธา เฉทนมฺปิ ทฺวิธากรณํเยว. อปรสฺส หิ อปรสฺส ฉินฺนโกฏฺฐาสสฺส ปุพฺเพน เอเกน โกฏฺฐาเสน สทฺธึ อเปกฺขนวเสน ทฺวิธากรณํ โหติเยว. เฉเทติ, เฉทยติ. छिद् (chida) हा धातू दोन भाग करण्याच्या (dvedhākaraṇa) अर्थात आहे. शंका: 'अहो! जो चार, पाच किंवा अनेक शेकडो भाग करतो, त्याचे ते छेदणे दोन भाग करणे (द्विधाकरण) ठरत नाही. असे असताना, सामान्यपणे न सांगता 'द्वेधाकरणे' (दोन भाग करणे) असे विशिष्ट ग्रहण का केले आहे?' उत्तर: 'दोन भाग करणे होत नाही' असे म्हणू नये, कारण अनेक शेकडो भाग करणे देखील दोन भाग करणेच आहे. कारण कापलेल्या प्रत्येक नवीन भागाची आधीच्या एका भागाशी तुलना केली असता, ते दोन भाग करणेच ठरते. 'छेदेति' (chedeti), 'छेदयति' (chedayati) ही रूपे बनतात. โย เต หตฺเถ จ ปาเท จ, กณฺณนาสญฺจ เฉทยิ; ตสฺส กุชฺฌ มหาวีร, มา รฏฺฐํ วินสฺส อิทํ; ज्याने तुमचे हात आणि पाय, तसेच कान आणि नाक कापले; हे महावीरा! तुम्ही त्याच्यावर रागवा, जेणेकरून हे राष्ट्र नष्ट होणार नाही. โย เม หตฺเถ จ ปาเท จ, กณฺณนาสญฺจ เฉทยิ; จิรํ ชีวตุ โส ราชา, น หิ กุชฺฌนฺติ มาทิสาติ. ज्याने माझे हात आणि पाय, तसेच कान आणि नाक कापले; तो राजा दीर्घायुषी होवो, कारण माझ्यासारखे लोक कधीही रागवत नाहीत. ฉท อปวารเณ. ฉาเทติ, ฉาทยติ. ฉตฺตํ. ปุริสสฺส ภตฺตํ ฉาทยติ. छद (chada) हा धातू झाकण्याच्या (apavāraṇa) अर्थात आहे. 'छादेति' (chādeti), 'छादयति' (chādayati) ही रूपे बनतात. 'छत्तं' (chattaṃ - छत्री) हे नाम बनते. 'पुरिसस्स भत्तं छादेति' (तो माणसाचे अन्न झाकतो). อีที สนฺทีปเน. อีเทติ, อีทยติ. อีการนฺตวเสน นิทฺทิฏฺฐตฺตา สนิคฺคหีตาคมานิ รูปานิ น ภวนฺติ. ईदी (īdī) हा धातू स्पष्ट करण्याच्या (sandīpana) अर्थात आहे. 'ईदेति' (īdeti), 'ईदयति' (īdayati) ही रूपे बनतात. 'ई' कारान्त म्हणून निर्देश केल्यामुळे अनुस्वार आगम (saniggahītāgama) असलेली रूपे होत नाहीत. อทฺท หึสายํ. อทฺเทติ, อทฺทยติ. अद्द (adda) हा धातू हिंसेच्या अर्थात आहे. 'अद्देति' (addeti), 'अद्दयति' (addayati) ही रूपे बनतात. วท ภาสายํ. วาเทติ, วาทยติ. วาโท. वद (vada) हा धातू भाषणाच्या (बोलण्याच्या) अर्थात आहे. 'वादेति' (vādeti), 'वादयति' (vādayati) ही रूपे बनतात. 'वादो' (vādo) हे नाम बनते. ตตฺถ ‘‘วาเทติ, วาทยตี’’ติ อิเมสํ ‘‘วทตี’’ติ สุทฺธกตฺตุวเสเนว อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ, น เหตุกตฺตุวเสน. ตถา หิ ‘‘สงฺเกตํ กตฺวา วิสํวาเทติ. โอวเทยฺยานุสาเสยฺย. อิทเมว สจฺจนฺติ จ วาทยนฺติ. อวิสํวาทโก โลกสฺสา’’ติ สุทฺธกตฺตุทีปกปาฬินยา ทิสฺสนฺติ[Pg.315], สทฺทสตฺเถ จ ‘‘วาทยตี’’ติ สุทฺธกตฺตุปทํ ทิสฺสติ. ตตฺถ วิสํวาเทตีติ มุสา วเทติ, อถ วา วิปฺปลมฺเภติ, วาโทติ วจนํ. ‘‘วาโท ชปฺโป วิตณฺฑา’’ติ เอวํวิธาสุ ตีสุ กถาสุ วาทสงฺขาตา กถา. ‘‘วาทาเปติ, วาทาปยตี’’ติ ทฺเวเยว เหตุกตฺตุปทานิ ภวนฺติ. तेथे 'वादेति, वादयति' यांचा अर्थ 'वदति' (बोलतो) या शुद्धकर्तृ (suddhakattu) रूपाप्रमाणेच समजावा, प्रयोजक (hetukattari) रूपाप्रमाणे नाही. कारण 'सङ्केतं कत्वा विसंवादेति' (संकेत करून फसवितो), 'ओवदेय्यानुसासेय्य' (उपदेश व अनुशासने करावीत), 'इदमेव सच्चन्ति च वादयन्ति' (हेच सत्य आहे असे ते म्हणतात), 'अविसंवादको लोकस्स' (जगाला न फसवणारा) इत्यादी प्रयोजक अर्थ स्पष्ट करणाऱ्या पाळी पद्धती आढळतात, आणि व्याकरणशास्त्रातही 'वादयति' हे शुद्धकर्तृ पद दिसते. तेथे 'विसंवादेति' म्हणजे खोटे बोलतो किंवा फसवितो. 'वाद' म्हणजे वचन. 'वादो जप्पो वितण्डा' अशा प्रकारच्या तीन कथांमध्ये 'वाद' संज्ञक कथा होय. 'वादापेति, वादापयति' ही दोनच प्रयोजक (हेतुकर्तृ) रूपे होतात. ฉที อิจฺฉายํ. อีการนฺโตยํ ธาตุ, ตสฺมา สนิคฺคหีตาคมานิสฺส รูปานิ น ภวนฺติ. ปุริสสฺส ภตฺตํ ฉาเทติ, ฉาทยติ, รุจฺจตีติ อตฺโถ. ปุริสสฺส ภตฺตํ ฉาทยมานํ ติฏฺฐติ ฉาเทนฺตํ วา. छदी (chadī) हा धातू इच्छेच्या अर्थात आहे. हा 'ई' कारान्त धातू आहे, म्हणून याची अनुस्वार आगम असलेली रूपे होत नाहीत. 'पुरिसस्स भत्तं छादेति, छादयति' याचा अर्थ 'त्याला अन्न आवडते' (ruccati) असा आहे. 'पुरिसस्स भत्तं छादयमानं तिट्ठति छादेन्तं वा' (माणसाला अन्न आवडत राहते). วที อภิวาทนถุตีสุ. อยมฺปิ อีการนฺโต ธาตุ, ตสฺมา อิมสฺสปิ สนิคฺคหีตาคมานิ รูปานิ น ภวนฺติ. วาเทติ, วาทยติ, วนฺทติ, โถเมติ วาติ อตฺโถ. อิมานิ อนุปสคฺคานิ รูปานิ. สทฺทสตฺเถปิ จ ‘‘วาทยตี’’ติ อนุปสคฺควนฺทนถุติอตฺถํ ปทํ วุตฺตํ, สาสเน ปน ‘‘อภิวาเทติ, อภิวาทยติ, อภิวาทนํ, ภควนฺตํ อภิวาเทตฺวา’’ติอาทีนิ โสปสคฺคานิ รูปานิ ทิสฺสนฺติ. वदी (vadī) हा धातू अभिवादन आणि स्तुती या अर्थांमध्ये आहे. हा देखील 'ई' कारान्त धातू आहे, म्हणून याचीही अनुस्वार आगम असलेली रूपे होत नाहीत. 'वादेति, वादयति' म्हणजे वंदन करतो (vandati) किंवा स्तुती करतो (thometi) असा अर्थ आहे. ही उपसर्ग नसलेली (अनुपसर्ग) रूपे आहेत. व्याकरणशास्त्रातही 'वादयति' हे उपसर्ग नसलेले पद वंदन आणि स्तुती या अर्थात सांगितले आहे, परंतु शासनात (बुद्धवचनात) 'अभिवादेति, अभिवादायति, अभिवादनं, भगवन्तं अभिवादेत्वा' इत्यादी उपसर्गासहित (सोपसर्ग) रूपे आढळतात. ตตฺถ อภิวาเทตฺวาติ วนฺทิตฺวา, โถเมตฺวา วา, อยมสฺมากํ รุจิ. อาคมฏฺฐกถายํ ปน ‘‘อภิวาเทตฺวาติ ‘สุขี อโรโค โหตู’ติ วทาเปตฺวา, วนฺทนฺโต หิ อตฺถโต เอวํ วทาเปติ นามา’’ติ เหตุกตฺตุวเสน อภิวาทนสทฺทตฺโถ วุตฺโต, อมฺเหหิ ปน วนฺทนสทฺทํ สทฺทสตฺถนยมคฺคเหตฺวา สุทฺธกตฺตุวเสน อตฺโถ กถิโต. อภิวาทนญฺหิ วนฺทนํเยว, น วทาปนํ อภิสทฺเทน สมฺพนฺธิตตฺตา ‘‘อภิวาทนสีลิสฺสา’’ติ เอตฺถ วิย. อิทญฺหิ ‘‘อภิวาทาปนสีลิสฺสา’’ติ น วุตฺตํ. ยทิ จ สทฺทสตฺเถ วทาปนมธิปฺเปตํ สิยา, ‘‘วที วทาปนถุตีสู’’ติ นิสฺสนฺเทหวจนํ วตฺตพฺพํ สิยา[Pg.316], เอวญฺจ น วุตฺตํ, เอวํ ปน วุตฺตํ ‘‘วที อภิวาทนถุตีสู’’ติ, เตน วทาปนมนธิปฺเปตนฺติ ญายติ. तेथे 'अभिवादेत्वा' म्हणजे वंदन करून किंवा स्तुती करून, हे आमचे मत आहे. परंतु आगम-अट्ठकथेत 'अभिवादेत्वा म्हणजे 'सुखी व निरोगी व्हा' असे बोलवून (वदवून), कारण वंदन करणारा अर्थाच्या दृष्टीने असे वदवून घेतो' असा प्रयोजक (हेतुकर्तृ) अभिवादन शब्दाचा अर्थ सांगितला आहे. परंतु आम्ही वंदन शब्दाला व्याकरणशास्त्राच्या नियमानुसार घेऊन शुद्धकर्तृ अर्थ सांगितला आहे. कारण 'अभिवादन' म्हणजे वंदनच होय, वदवून घेणे (प्रयोजक) नव्हे, कारण 'अभि' शब्दाशी संबंध असल्यामुळे, जसे 'अभिवादनसीलस्स' यामध्ये आहे. येथे 'अभिवादापनसीलस्स' असे म्हटलेले नाही. जर व्याकरणशास्त्रात 'वदवून घेणे' (प्रयोजक) अभिप्रेत असते, तर 'वदी वदापनथुतीसु' असे संशयरहित वचन सांगितले असते, परंतु तसे म्हटलेले नाही, तर 'वदी अभिवादनथुतीसु' असे म्हटले आहे, यावरून 'वदवून घेणे' अभिप्रेत नाही हे समजते. อถาปิ สิยา ‘‘กสฺสจิ วุทฺเธน วิสิฏฺฐํ วทาปนํ อภิวาทน’’นฺติ, เอวมฺปิ นุปปชฺชติ การิตวเสน ธาตุอตฺถสฺส อกเถตพฺพโต. ตถา หิ ‘‘ปจ ปาเก, ฉิทิ ทฺวิธากรเณ’’ติอาทินา ภาววเสน อตฺถปฺปกาสนมตฺเตเยว ‘‘ปจติ, ปจฺจติ, ปาเจติ. ฉินฺทติ, ฉิชฺชติ, เฉทาเปตี’’ติอาทีนิ สกมฺมกานิ เจว อกมฺมกานิ จ สการิตานิ จ รูปานิ นิปฺผชฺชนฺติ, น จ ตทตฺถาย วิสุํ วิสุํ ธาตุนิทฺเทโส กริยติ. ตสฺมา ‘‘วที อภิวาทนถุตีสู’’ติ เอตฺถ การิตวเสน ธาตุอตฺโถ กถิโตติปิ วตฺตุํ น สกฺกา กฺริยาสภาวตฺตา ธาตูนํ. ยถา ปน ‘‘ตกฺเกติ, วิตกฺเกติ. ตกฺโก, วิตกฺโก’’ติอาทีนิ สมานตฺถานิ, ตถา ‘‘วาเทติ, อภิวาเทตี’’ติอาทีนิ สมานตฺถานิ. อโต สทฺทสตฺเถปิ สทฺทสตฺถวิทูหิ ‘‘ตกฺก วิตกฺเก, วที อภิวาทนถุตีสู’’ติอาทีนํ ธาตูนํ ‘‘ตกฺกยติ, วาทยตี’’ติอาทีนิ อนุปสคฺคานิเยว รูปานิ ทสฺสิตานิ, ตานิ จ โข สุทฺธกตฺตุปทานิเยว, น เหตุกตฺตุปทานิ, ตสฺมา ‘‘อภิวาทนถุตีสู’’ติ เอตสฺส ‘‘วทาปนถุตีสู’’ติ อตฺโถ นุปปชฺชติ. जरी असे म्हटले की 'कोणा वृद्धाकडून विशिष्ट प्रकारे वदवून घेणे म्हणजे अभिवादन होय', तरीही हे योग्य ठरत नाही, कारण प्रयोजक (कारित) भावामुळे धातूचा अर्थ तसा सांगता येत नाही. कारण 'पच पाके, छिदि द्विधाकरणे' इत्यादींद्वारे केवळ भाव रूपाने अर्थ प्रकट केल्यावरच 'पचति, पच्चति, पाचेति' आणि 'छिन्दति, छिज्जति, छेदापेति' इत्यादी कर्तरी, कर्मणी आणि प्रयोजक रूपे सिद्ध होतात, आणि त्या अर्थासाठी स्वतंत्रपणे धातूचा निर्देश केला जात नाही. म्हणून 'वदी अभिवादनथुतीसु' येथे प्रयोजक भावामुळे धातूचा अर्थ सांगितला आहे असे म्हणता येत नाही, कारण धातूंचा स्वभाव क्रिया दर्शवणे हाच आहे. ज्याप्रमाणे 'तक्केति, वितक्केति' आणि 'तक्को, वितक्को' इत्यादी समान अर्थाचे आहेत, त्याचप्रमाणे 'वादेति, अभिवादेति' इत्यादी समान अर्थाचे आहेत. म्हणूनच व्याकरणशास्त्रातही व्याकरणकारांनी 'तक्क वितक्के, वदी अभिवादनथुतीसु' इत्यादी धातूंची 'तक्कयति, वादयति' अशी उपसर्ग नसलेलीच रूपे दाखवली आहेत, आणि ती केवळ शुद्धकर्तृ पदेच आहेत, प्रयोजक पदे नाहीत. म्हणून 'अभिवादनथुतीसु' याचा अर्थ 'वदापनथुतीसु' (वदवून घेणे व स्तुती करणे) असा लावणे अयोग्य आहे. กิญฺจ ภิยฺโย – ‘‘อภิวาเทติ, อภิวาทยติ. อภิวาเทตฺวา, อภิวาทยิตฺวา’’ติอาทีนิ สมานตฺถานิ, เณณยมตฺเตน หิ สวิเสสานิ. ยทิ ‘‘อภิวาเทตฺวา’’ติ อิมสฺส ปทสฺส ‘‘สุขี อโรโค โหตู’ติ วทาเปตฺวา’’ติ อตฺโถ สิยา, ‘‘สิรสา อภิวาทยิ’’นฺติ เอตฺถ ‘‘สิรสา’’ติ ปทํ น วตฺตพฺพํ สิยา วทาปเนน อสมฺพนฺธตฺตา. ยสฺมา วุตฺตํ ตํ ปทํ, เตน ญายติ ‘‘อภิวาเทตฺวา’’ติอาทีสุ วทาปนตฺโถ น อิจฺฉิตพฺโพ, วนฺทนตฺโถ อิจฺฉิตพฺโพ โถมนตฺโถ จ. ยสฺมา ภูวาทิคเณ ‘‘วนฺท อภิวาทานถุตีสู’’ติ อิมสฺส ธาตุสฺส ‘‘วนฺทตี’’ติ [Pg.317] ปทรูปสฺส ‘‘อภิวนฺทติ, โถเมติ จา’’ติ อตฺโถเยว อิจฺฉิตพฺโพ, น วทาปนตฺโถ. ตถา หิ ‘‘วนฺเท สุคตํ คติวิมุตฺต’’นฺติ ปทานมตฺถํ วทนฺเตน ฏีกาจริเยนปิ ‘‘วนฺเทติ วนฺทามิ, โถเมมิ จา’’ติ วนฺทนโถมนตฺโถเยว ทสฺสิโต, น อภิวาทนสทฺทตฺถํ ปฏิจฺจ วทาปนตฺโถ, ตสฺมา ‘‘อภิวาเทตฺวา’’ติ เอตฺถาปิ วนฺทนโถมนตฺถาเยว อิจฺฉิตพฺพา, น วทาปนตฺโถ. आणखी काय – 'अभिव्यादेति, अभिव्यादयति' (अभिवादन करतो). 'अभिव्यादेत्वा, अभिव्यादयित्वा' (अभिवादन करून) इत्यादी समान अर्थाचे शब्द आहेत, कारण ते केवळ 'णे' आणि 'णय' प्रत्ययांमुळेच थोडे भिन्न आहेत. जर 'अभिव्यादेत्वा' या शब्दाचा अर्थ 'सुखी व निरोगी व्हा' असे म्हणायला लावणे (वदापेत्वा) असा असता, तर 'शिरसा अभिव्यादयि' (डोक्याने अभिवादन केले) यामध्ये 'शिरसा' (डोक्याने) हा शब्द वापरण्याची गरज नसती, कारण म्हणायला लावण्याशी त्याचा काही संबंध नाही. ज्याअर्थी तो शब्द वापरला आहे, त्यावरून हे समजते की 'अभिव्यादेत्वा' इत्यादी शब्दांमध्ये 'म्हणायला लावणे' हा अर्थ अपेक्षित नसून, 'वंदन करणे' आणि 'स्तुती करणे' हाच अर्थ अपेक्षित आहे. कारण भूवादिगणातील 'वन्द अभिवादनथुतीसु' या धातूच्या 'वन्दति' या क्रियापदाचा अर्थ 'अभिवादन करतो आणि स्तुती करतो' असाच अपेक्षित आहे, 'म्हणायला लावणे' असा नाही. तसेच 'वन्दे सुगतं गतिविमुत्तं' या शब्दांचा अर्थ सांगताना टीकाकारांनीही 'वन्दे म्हणजे वंदन करतो आणि स्तुती करतो' असा वंदन व स्तुतीचाच अर्थ दर्शवला आहे, अभिवादन शब्दाच्या आधारे 'म्हणायला लावणे' असा अर्थ घेतलेला नाही. म्हणून 'अभिव्यादेत्वा' येथेही वंदन आणि स्तुती हेच अर्थ अपेक्षित धरले पाहिजेत, 'म्हणायला लावणे' हा अर्थ नाही. อถาปิ สิยา ‘‘วนฺเท’ติ ปเท การิตปจฺจโย นตฺถิ, ‘อภิวาเทตฺวา’ติ อิมสฺมึ ปน อตฺถิ, ตสฺมา ตตฺถ วทาปนตฺโถ น ลพฺภติ, อิธ ปน ลพฺภตี’’ติ. ตนฺน, ‘‘กโรตี’’ติสุทฺธกตฺตุปทสฺสปิ ‘‘นิปฺผาเทตี’’ติ เหตุกตฺตุปทวเสน วิวรณสฺส วิย ‘‘วนฺเท’’ติ ปทสฺสปิ ‘‘สุขี อโรโค โหตู’ติ วทาเปตฺวา’’ติ วิวรณสฺส วตฺตพฺพตฺตา. ‘‘อภิวาเทตฺวา’’ติ อิทญฺจ ‘‘วนฺเท’’ติ ปทมิว การิตปจฺจยนฺตํ น โหติ. กสฺมาติ เจ? ยสฺมา ‘‘จินฺเตติ, จินฺตยติ. มนฺเตติ, มนฺตยตี’’ติอาทีนํ จุราทิคณิกานํ สุทฺธกตฺตุปทานํ ‘‘จินฺตาเปติ, จินฺตาปยตี’’ติอาทีนิเยว เหตุกตฺตุปทานิ ทิสฺสนฺติ, ตสฺมา ยทิ เหตุกตฺตุปทํ อธิปฺเปตํ สิยา, ‘‘อภิวาทาเปตฺวา’’ติ วา ‘‘อภิวาทาปยิตฺวา’’ติ วา วตฺตพฺพํ สิยา, ยสฺมา ปเนวํ น วุตฺตํ, ตสฺมา ตํ การิตปจฺจยนฺตํ น โหตีติ สิทฺธํ. असेही असू शकते की, 'वन्दे' या शब्दात कारित (प्रयोजक) प्रत्यय नाही, परंतु 'अभिव्यादेत्वा' यामध्ये तो आहे, म्हणून तिथे 'म्हणायला लावणे' हा अर्थ मिळत नाही, पण येथे मिळतो. ते योग्य नाही, कारण 'करोति' (करतो) या शुद्ध कर्तृपदाचे 'निप्फादेति' (निष्पन्न करतो) या हेतुकर्तृपदाच्या (प्रयोजक) स्वरूपात स्पष्टीकरण दिल्याप्रमाणे, 'वन्दे' या शब्दाचेही 'सुखी व निरोगी व्हा असे म्हणायला लावून' असे स्पष्टीकरण द्यावे लागेल. आणि 'अभिव्यादेत्वा' हा शब्द 'वन्दे' या शब्दाप्रमाणे कारित प्रत्ययाने संपणारा (प्रयोजक) नाही. ते कशामुळे? कारण 'चिन्तेति, चिन्तयति; मन्तेति, मन्तयति' इत्यादी चुरादिगणातील शुद्ध कर्तृपदांची 'चिन्तापेति, चिन्तापयति' इत्यादी हेतुकर्तृपदेच (प्रयोजक रूपे) दिसतात. म्हणून जर हेतुकर्तृपद (प्रयोजक रूप) अभिप्रेत असते, तर 'अभिव्यादापेत्वा' किंवा 'अभिव्यादापयित्वा' असे म्हणावे लागले असते. परंतु तसे म्हटलेले नसल्यामुळे, तो शब्द कारित प्रत्ययाने संपणारा (प्रयोजक) नाही हे सिद्ध होते. อิมสฺสตฺถสฺส อาวิภาวตฺถํ อิมสฺมึ ฐาเน สาฏฺฐกถํ วิธุรชาตกปฺปเทสํ วทาม. हा अर्थ स्पष्ट करण्यासाठी आपण या ठिकाणी अट्ठकथेसह विधुरजातकाचा संदर्भ सांगू या. ‘‘กถํ โน อภิวาเทยฺย, อภิวาทาปเยถ เว; ยํ นโร หนฺตุมิจฺเฉยฺย, ตํ กมฺมํ นุปปชฺชตี’’ติ ‘ज्या माणसाला मारण्याची इच्छा असेल, त्याला तो कसा बरे अभिवादन करेल किंवा स्वतःला अभिवादन करायला लावेल? ते कर्म घडून येत नाही.’ อยํ ตาว ชาตกปาฬิ. อยํ ปน อฏฺฐกถาปาโฐ ‘‘ยญฺหิ นโร หนฺตุมิจฺเฉยฺย, โส ตํ กถํ นุ อภิวาเทยฺย, กถํ วา [Pg.318] เตน อตฺตานํ อภิวาทาปเยถ เว. ตสฺส หิ ตํ กมฺมํ น อุปปชฺชตี’’ติ. ตตฺถ ปาฬิยํ อภิวาเทยฺยาติ สุทฺธกตฺตุปทํ ตพฺพาจกตฺตา. อภิวาทาปเยถ เวติ เหตุกตฺตุปทํ ตพฺพาจกตฺตา. เอวํ วิภาคํ ปน ญตฺวา ปาฬิยา อฏฺฏกถาย จ อธิปฺปาโย คเหตพฺโพ ‘‘นโร ยํ ปุคฺคลํ หนฺตุํ อิจฺเฉยฺย, โส หนฺตา ตํ วชฺฌํ ปุคฺคลํ กถํ นุ อภิวาเทยฺย, โส วา หนฺตา, เตน วชฺเฌน มํ วนฺทาหีติ อตฺตานํ กถํ วนฺทาเปยฺยา’’ติ. เอตฺถ ปน ‘‘ราชาโน โจรํ สุนเขหิปิ ขาทาเปนฺตี’’ติอาทีสุ วิย กรณวเสน ‘‘เตน วชฺเฌนา’’ติ ปทํ โยชิตํ, อตฺโถ ปน ‘‘ตํ วชฺฌ’’นฺติ อุปโยควจนวเสน ทฏฺฐพฺโพ ทฺวิกมฺมกตฺตา สการิตปจฺจยสฺส สกมฺมกธาตุยาติ. นนุ เอวํ สนฺเต ‘‘อฏฺฐกถาจริยา ปสฺสิตพฺพํ น ปสฺสนฺติ, อติตฺเถ ปกฺขนฺทนฺตี’’ติ เตสํ โทโส โหตีติ? น โหติ, สุณาถ อสฺมากํ โสธนํ, ตถา หิ อฏฺฐกถาจริเยหิ ‘‘อภิวาเทตฺวา’’ติ เอตฺถ ‘‘วที อภิวาทนถุตีสู’’ติ ธาตุยา อตฺถมคฺคเหตฺวา โวหารวิสเย โกสลฺลสมนฺนาคตตฺตา สณฺหสุขุมมตฺถํ โสตูนํ โพเธตุํ ‘‘วท วิยตฺติยํ วาจาย’’นฺติ ธาตุเยวตฺถํ คเหตฺวา การิตปจฺจยปริกปฺปเนน การิตตฺถมาทาย ‘‘อภิวาเทตฺวาติ ‘สุขี อโรโค โหตู’ติ วทาเปตฺวา, วนฺทนฺโต หิ อตฺถโต เอวํ วทาเปติ นามา’’ติ เหตุกตฺตุวเสน อภิวาทนสทฺทตฺโถ วุตฺโตติ น โกจิ เตสํ โทโส. ปูชารหา หิ เต อายสฺมนฺโต, นโมเยว เตสํ กโรม, อิทมฺปิ ฐานํ สุขุมํ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพํ. เอวญฺหิ กโรโต ปญฺญา วฑฺฒตีติ. ही तर जातकपाळी आहे. आणि हा अट्ठकथापाठ आहे: 'ज्या माणसाला मारण्याची इच्छा असेल, तो त्याला कसा बरे अभिवादन करेल, किंवा त्याच्याकडून स्वतःला कसे बरे अभिवादन करायला लावेल? कारण त्याचे ते कर्म घडून येत नाही.' तेथे पाळीमध्ये 'अभिव्यादेय्य' हे शुद्ध कर्तृपद आहे कारण ते त्याचे वाचक आहे. 'अभिव्यादापयेथ वे' हे हेतुकर्तृपद (प्रयोजक रूप) आहे कारण ते त्याचे वाचक आहे. असा विभाग जाणून पाळी आणि अट्ठकथेचा अभिप्राय असा घ्यावा: 'माणूस ज्या व्यक्तीला मारू इच्छितो, तो मारणारा त्या वधार्ह व्यक्तीला कसा बरे अभिवादन करेल, किंवा तो मारणारा त्या वधार्ह व्यक्तीकडून 'मला वंदन कर' असे म्हणून स्वतःला कसे वंदन करायला लावेल?' येथे 'राजे चोराला कुत्र्यांकडूनही खाववायला लावतात' इत्यादी वाक्यांप्रमाणे करण अर्थाने 'तेन वज्झेन' (त्या वधार्ह व्यक्तीकडून) हा शब्द जोडला आहे, परंतु अर्थ 'तं वज्झं' (त्या वधार्ह व्यक्तीला) असा द्वितीया विभक्तीच्या (उपयोगवचन) अर्थाने पाहावा, कारण प्रयोजक प्रत्यय असलेल्या सकर्मक धातूचे दोन कर्मे असतात. पण असे असल्यास 'अट्ठकथाचार्यांना जे पाहायचे ते दिसत नाही, ते अयोग्य ठिकाणी प्रवेश करतात' असा त्यांचा दोष होतो का? नाही होत, आमचे स्पष्टीकरण ऐका. कारण अट्ठकथाचार्यांनी 'अभिव्यादेत्वा' येथे 'वदि अभिवादनथुतीसु' या धातूचा अर्थ न घेता, व्यावहारिक भाषेतील कौशल्याने युक्त असल्यामुळे श्रोत्यांना सूक्ष्म अर्थ समजावून सांगण्यासाठी 'वद वियत्तियं वाचायं' (स्पष्ट बोलणे) या धातूचाच अर्थ घेऊन, कारित (प्रयोजक) प्रत्ययाची कल्पना करून आणि प्रयोजक अर्थ स्वीकारून 'अभिव्यादेत्वा म्हणजे सुखी व निरोगी व्हा असे म्हणायला लावून, कारण वंदन करणारा प्रत्यक्षात अशा प्रकारे म्हणायलाच लावतो' अशा प्रयोजक अर्थाने अभिवादन शब्दाचा अर्थ सांगितला आहे, त्यामुळे त्यांचा कोणताही दोष नाही. ते पूजनीय आयुष्यमान आहेत, आम्ही त्यांना नमस्कारच करतो. हे स्थानही सूक्ष्म असून चांगल्या प्रकारे मनात ठेवले पाहिजे. असे केल्याने प्रज्ञा वाढते. ทการนฺตธาตุรูปานิ. द-कारान्त धातूंची रूपे. ธการนฺตธาตุ ध-कारान्त धातू. รนฺธ [Pg.319] ปาเก. สูโท ภตฺตํ รนฺเธติ, รนฺธยติ. กากํ โสกาย รนฺเธหิ. รนฺธโก. สูเทน โอทโน รนฺธิยติ. รนฺธิโต. รนฺธนํ. ปุริโส สูทํ สูเทน วา โอทนํ รนฺธาเปติ, รนฺธาปยติ. รนฺเธตุํ, รนฺธยิตุํ. รนฺธิตฺวา, รนฺธยิตฺวา, รนฺธิย อิจฺจาทีนิ. 'रन्ध' शिजवणे या अर्थी. आचारी भात शिजवतो (रन्धेति, रन्धयति). कावळ्याला शोकासाठी शिजव (रन्धेहि). शिजवणारा (रन्धको). आचाऱ्याकडून भात शिजवला जातो (रन्धियति). शिजवलेला (रन्धितो). शिजवणे (रन्धनं). माणूस आचाऱ्याकडून किंवा आचाऱ्याद्वारे भात शिजवून घेतो (रन्धापेति, रन्धापयति). शिजवण्यासाठी (रन्धेतुं, रन्धयितुं). शिजवून (रन्धित्वा, रन्धयित्वा, रन्धिय) इत्यादी. ธู กมฺปเน. ธาเวติ, ธาวยติ. 'धू' कंप पावणे (थरथरणे) या अर्थी. धावेति, धावयति. คนฺธ สูจเน อทฺทเน จ. สูจนํ. ปกาสนํ. อทฺทนํ ปริปฺลุตา. คนฺเธติ, คนฺธยติ, คนฺโธ. 'गन्ध' सूचित करणे आणि आद्र करणे (ओले करणे) या अर्थी. सूचन (सूचित करणे). प्रकाशन (प्रकट करणे). अद्दन म्हणजे ओले करणे. गन्धेति, गन्धयति, गन्धो. เอตฺถ คนฺโธติ คนฺเธติ อตฺตโน วตฺถุํ สูจยติ ปกาเสตีติ คนฺโธ. ปฏิจฺฉนฺนํ วา ปุปฺผผลาทึ ‘‘อิทเมตฺถ อตฺถี’’ติ เปสุญฺญํ อุปสํหรนฺโต วิย ปกาเสตีติ คนฺโธ. คมุธรธาตุทฺวยวเสนปิ คนฺธสทฺทตฺโถ วตฺตพฺโพ ‘‘คจฺฉนฺโต ธริยตีติ คนฺโธ’’ อิติ, อาห จ ‘‘คจฺฉนฺโต ธริยตีติ คนฺโธ, สูจนโตปิ วา’’ติ. คนฺธสทฺโท จ ‘‘อุปฺปลคนฺธเถโน’’ติ เอตฺถ เฉทเน วตฺตตีติ ทฏฺฐพฺโพ. येथे 'गन्ध' म्हणजे जो आपल्या वस्तूला सूचित करतो, प्रकट करतो तो गंध होय. किंवा लपलेल्या फुले-फळे इत्यादींना 'हे येथे आहे' असे चहाडी (माहिती) आणून दिल्याप्रमाणे प्रकट करतो तो गंध होय. 'गमु' आणि 'धर' या दोन्ही धातूंच्या आधारेही गंध शब्दाचा अर्थ सांगितला पाहिजे की 'जो जात असताना धारण केला जातो तो गंध होय', आणि म्हटलेही आहे: 'जो जात असताना धारण केला जातो तो गंध होय, किंवा सूचित करण्यावरूनही'. आणि 'उप्पलंगन्धथेनो' (कमळाचा गंध चोरणारा) यामध्ये 'गन्ध' शब्द छेदून टाकणे (काढून घेणे) या अर्थी वापरला आहे असे पाहावे. วธ สํยเม. วเธติ, วธยติ. 'वध' संयम राखणे या अर्थी. वधेति, वधयति. พุธิ หึสายํ. พุนฺเธติ, พุนฺธยติ. ปลิพุนฺเธติ, ปลิพุนฺธยติ. ปลิโพโธ, ปริสทฺโท อุปสคฺโค, โส วิการวเสน อญฺญถา ชาโต. ตตฺถ ปลิโพโธติ อาวาสปลิโพธาทิ. อปิจ ปลิโพโธติ ตณฺหามานทิฏฺฐิตฺตยญฺจ. 'बुधि' हिंसा करणे या अर्थी. बुन्धेति, बुन्धयति. पलिबुन्धेति, पलिबुन्धयति. पलिबोधो, 'परि' हा उपसर्ग आहे, तो विकाराने (बदलाने) वेगळा झाला आहे. तेथे 'पलिबोध' म्हणजे आवास-पलिबोध (निवासस्थानाची आसक्ती) इत्यादी. तसेच 'पलिबोध' म्हणजे तृष्णा, मान आणि दृष्टी हे त्रय होय. วทฺธ เฉทนปูรเณสุ. วทฺเธติ, วทฺธยติ. วทฺธกี. วทฺธกีติ คหการโก. 'वद्ध' छेदणे आणि पूर्ण करणे या अर्थी. वद्धेति, वद्धयति. वद्धकी. वद्धकी म्हणजे घर बांधणारा (सुतार). คทฺธ อภิกงฺขายํ. คทฺเธติ, คทฺธยติ. คทฺโธ. คทฺโธติ คิชฺโฌ. ‘‘คทฺธพาธิปุพฺโพ’’ติ อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. 'गद्ध' तीव्र इच्छा करणे या अर्थी. गद्धेति, gaddhayati. गद्धो. गद्ध म्हणजे गिधाड. 'गद्धबाधिपुब्बो' हे येथे उदाहरण आहे. สธุ [Pg.320] ปหํสเน. สเธติ, สธยติ. 'साधु' आनंदित करणे या अर्थी. साधेति, साधयति. วทฺธ ภาสายํ. วทฺเธติ, วทฺธยติ. 'वद्ध' बोलणे या अर्थी. वद्धेति, वद्धयति. อนฺธ ทิฏฺฐูปสํหาเร. ทิฏฺฐูปสํหาโร นาม จกฺขุสญฺญิตาย ทิฏฺฐิยา อุปสํหาโร อปนยนํ วินาโส วา. จกฺขุ หิ ปสฺสนฺติ เอตายาติ ทิฏฺฐีติ วุจฺจติ. ยํ สนฺธาย อฏฺฐกถาสุ ‘‘สสมฺภารจกฺขุโน เสตมณฺฑลปริกฺขิตฺตสฺส กณฺหมณฺฑลสฺส มชฺเฌ อภิมุขํ ฐิตานํ สรีรสณฺฐานุปฺปตฺติเทสภูเต ทิฏฺฐิมณฺฑเล’’ติ วุตฺตํ. ฏีกายมฺปิ จ ‘‘ทิฏฺฐิมณฺฑเลติ อภิมุขฏฺฐิตานํ สรีรสณฺฐานุปฺปตฺติเทสภูเต จกฺขุสญฺญิตาย ทิฏฺฐิยา มณฺฑเล’’ติ วุตฺตํ. เอวํภูตาย ทิฏฺฐิยา อุปสํหาเร อนฺธธาตุ วตฺตติ. อนฺเธติ, อนฺธยติ. จกฺขูนิ อนฺธยึสุ, อนฺโธ. อนฺโธติ อนฺเธตีติ อนฺโธ. ทฺวินฺนํ จกฺขูนํ เอกสฺส วา วเสน นฏฺฐนยโน, เอวมิธ อนฺธธาตุ วุตฺโต. กจฺจายเน ปน ‘‘ขาทามคมานํ ขนฺธนฺธคนฺธา’’ติ วจเนน อมธาตุสฺส อนฺธาเทสกรณวเสน รูปนิปฺผตฺติ ทสฺสิตา. 'अन्ध' (अंध करणे/दृष्टी नाहीशी करणे) हा धातू 'दिट्ठूपसंहार' (दृष्टीचा नाश किंवा नाहीशी करणे) या अर्थात वापरला जातो. 'दिट्ठूपसंहार' म्हणजे चक्षुसंज्ञक दृष्टीचा उपसंहार, काढून टाकणे किंवा विनाश होय. कारण ज्याच्याद्वारे पाहतात त्याला 'चक्षु' (दृष्टी) असे म्हणतात. ज्याला उद्देशून अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे की, "ससंभारचक्षूच्या श्वेतमंडळाने वेढलेल्या कृष्णमंडळाच्या मध्यभागी, समोर उभ्या असलेल्या शरीराच्या आकाराच्या उत्पत्तीचे स्थान असलेल्या दृष्टीमंडळात." टीकेमध्येही म्हटले आहे की, "दृष्टीमंडळात म्हणजे समोर उभ्या असलेल्या शरीराच्या आकाराच्या उत्पत्तीचे स्थान असलेल्या चक्षुसंज्ञक दृष्टीच्या मंडळात." अशा प्रकारच्या दृष्टीच्या उपसंहारात (नाशात) 'अन्ध' धातू वापरला जातो. 'अन्धेति', 'अन्धयति' (अंध करतो). डोळे अंध केले, तो 'अन्ध' (अंधळा). 'अन्ध' म्हणजे जो अंध करतो तो अंध. दोन्ही डोळ्यांपैकी किंवा एका डोळ्याच्या दृष्टीचा नाश झाल्यामुळे ज्याचे डोळे नष्ट झाले आहेत, अशा अर्थाने येथे 'अन्ध' धातू सांगितला आहे. कच्चायनात मात्र "खादामगमानं खन्धन्धगन्धा" या वचनाने 'अम' धातूच्या जागी 'अन्ध' आदेश करण्याच्या नियमाने रूपाची सिद्धी दर्शविली आहे. พธ พนฺธเน. มิคํ พาเธติ, พาธยติ. พทฺโธ มิโค, พทฺโธสิ มารปาเสน. 'बाध' (बाध) हा धातू 'बन्धन' (बांधणे) या अर्थात वापरला जातो. 'मिगं बाधेति', 'बाधयति' (हरणाला बांधतो). 'बद्धो मिगो' (बांधलेले हरण), 'बद्धोसि मारपासेन' (तू मारपाशाने बांधला गेला आहेस). ตตฺถ พาเธตีติ พนฺธตีติ สุทฺธกตฺตุวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ. เอวํ พาธยตีติ เอตฺถาปิ. ตถา หิ ‘‘วาตํ ชาเลน พาเธสิ, โย อนิจฺฉนฺติมิจฺฉสี’’ติ เอตฺถ พาเธสีติ พนฺธสีติ สุทฺธกตฺตุวเสน อตฺโถ. ภูวาทิคเณ ปน ‘‘พาธ พทฺธาย’’นฺติ พาธธาตุสฺส วเสน ‘‘พาธตี’’ติ กตฺตุปทํ ‘‘พาเธติ, พาธยตี’’ติ เหตุกตฺตุปทํ ภวติ. พทฺโธติ พาธิยเต พนฺธิยเต โสติ พทฺโธ. तेथे 'बाधेति' म्हणजे 'बन्धति' (बांधतो) असा शुद्ध कर्तरी अर्थ घ्यावा. तसेच 'बाधयति' येथेही हाच अर्थ घ्यावा. तसेच "वातं जालेन बाधेसि, यो अनिच्छन्तिमिच्छसि" (जो न इच्छिणाऱ्याची इच्छा करतो, तो वाऱ्याला जाळ्याने बांधतो) येथे 'बाधेसि' म्हणजे 'बन्धसि' (बांधतोस) असा शुद्ध कर्तरी अर्थ आहे. भूवादिगणात मात्र "बाध बद्धायं" या सूत्राने 'बाध' धातूच्या योगाने 'बाधति' हे कर्तृपद आणि 'बाधेति, बाधयति' हे हेतुकर्तृपद (प्रयोजक) बनते. 'बद्धो' म्हणजे जो बांधला जातो तो 'बद्ध' होय. ธการนฺตธาตุรูปานิ. 'ध'कारान्त धातूंची रूपे समाप्त. นการนฺตธาตุ 'न'कारान्त धातू. มาน [Pg.321] ปูชายํ เปมเน วีมํสายํ. มาเนติ, มานยติ. มาตา. วิมาเนติ, วิมานยติ, ปฏิมาเนติ, ปฏิมานยติ. มานนา, สมฺมานนา, วิมานนา, วิมานํ, วิมานนํ, มานิโต. 'मान' (मान देणे) हा धातू 'पूजा' (आदर करणे), 'पेमन' (प्रेम करणे) आणि 'वीमंसा' (विचार/परीक्षा करणे) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'मानेति', 'मानयति' (मान देतो/आदर करतो). 'माता'. 'विमानेति', 'विमानयति' (अपमान करतो), 'पटिमानेति', 'पटिमानयति' (प्रतीक्षा करतो/आदर करतो). 'मानना' (आदर), 'सम्मानना' (सन्मान), 'विमानना' (अपमान), 'विमानं' (विमान), 'विमाननं' (अपमान करणे), 'मानितो' (मानित/आदर केलेला). อมานนา ยตฺถ สนฺโต, สนฺตานํ วา วิมานนา; หีนสมฺมานนา วาปิ, น ตตฺถ วสตึ วเส. जिथे सज्जनांचा आदर होत नाही, किंवा सज्जनांचा अपमान होतो, अथवा हीन (कमी) दर्जाचा सन्मान मिळतो, तिथे माणसाने राहू नये (वस्ती करू नये). วีมํสติ, วีมํสา, วีมํสิยตีติ วีมํสิยมาโน. วีมํสนฺโต. 'वीमंसति' (विचार करतो/परीक्षा करतो), 'वीमंसा' (मीमांसा/परीक्षा), 'वीमंसियति' म्हणून 'वीमंसियमानो' (ज्याची परीक्षा केली जात आहे तो). 'वीमंसन्तो' (परीक्षा करणारा). ตตฺถ มาเนตีติ ปูเชติ, อฏฺฐกถาสุ ปน ‘‘มาเนนฺตี’’ติ เอตสฺมึ ฐาเน อยมตฺโถ ทสฺสิโต ‘‘มาเนนฺตีติ มเนน ปิยายนฺติ. ปูเชนฺตีติ ปจฺจเยหิ ปูเชนฺตี’’ติ. โส เววจนตฺถปฺปกาสนวเสน วุตฺโตติ คเหตพฺโพ. มานนปูชนสทฺทา หิ ปริยายสทฺทตฺตา เววจนสทฺทา เอว. วิมาเนตีติ อวมญฺญติ. วิมานนฺติ โสภาวิเสสโยคโต วิสิฏฺฐมานิยตาย วิมานํ, วิเสสโต มาเนตพฺพนฺติ หิ วิมานํ, เทวานํ วสนฏฺฐานภูตํ พฺยมฺหํ. तेथे 'मानेति' म्हणजे 'पूजेति' (पूजा करतो/आदर करतो). अट्ठकथांमध्ये मात्र 'मानेन्ति' या ठिकाणी असा अर्थ दर्शविला आहे की, "'मानेन्ति' म्हणजे मनाने प्रिय मानतात. 'पूजेन्ति' म्हणजे प्रत्ययांनी (साधनांनी) पूजा करतात." तो समानार्थी शब्दांचा अर्थ प्रकट करण्यासाठी सांगितला आहे असे समजावे. कारण 'मानन' आणि 'पूजन' हे शब्द पर्यायी शब्द असल्याने समानार्थीच आहेत. 'विमानेति' म्हणजे 'अवमञ्ञति' (अपमान करतो). 'विमानं' म्हणजे विशेष शोभेच्या योगाने विशिष्ट प्रकारे मानले जाणारे ते 'विमान' होय, कारण ज्याचा विशेष रूपाने आदर केला पाहिजे ते 'विमान' होय, जे देवांचे निवासस्थान असलेले देवविमान (व्योम) आहे. มน ถมฺเภ. ถมฺโภ จิตฺตสฺส ถทฺธตา. มาเนติ, มานยติ. มาโน. 'मन' (स्तंभित होणे/ताठरणे) हा धातू 'थम्भ' (स्तंभ/मनाचा ताठरपणा) या अर्थात वापरला जातो. 'थम्भो' म्हणजे मनाचा ताठरपणा (अहंकार). 'मानेति', 'मानयति' (अहंकार करतो). 'मानो' (अभिमान/अहंकार). ถน เทวสทฺเท. เทวสทฺโท เมฆสทฺโท, ถเนติ, ถนยติ. 'थन' (गर्जना करणे) हा धातू 'देवसद्द' (देवाचा आवाज/मेघाचा आवाज) या अर्थात वापरला जातो. 'देवसद्द' म्हणजे मेघाचा (ढगांचा) आवाज. 'थनेति', 'थनयति' (गर्जना करतो). ยถาปิ เมโฆ ถนยํ, วิชฺชุมาลี สตกฺกกุ. ज्याप्रमाणे शंभर शिखरे असलेला, विजेची माळ धारण केलेला मेघ गर्जना करत... ถลํ นินฺนญฺจ ปูเรติ, อภิวสฺสํ วสุนฺธรํ. ...आणि पृथ्वीवर वर्षाव करत कोरडी जमीन आणि सखल भाग पाण्याने भरून टाकतो. ยถา ปาวุสโก เมโฆ, ถนยนฺโต สวิชฺชุโก. ज्याप्रमाणे पावसाळ्यातील मेघ विजेसह गर्जना करत... อูน ปริหานิยํ. อูเนติ, อูนยติ. อูโน โลโก. 'ऊन' (कमी होणे) हा धातू 'परिहानि' (ऱ्हास/कमी होणे) या अर्थात वापरला जातो. 'ऊनेति', 'ऊनयति' (कमी करतो). 'ऊनो लोको' (हा लोक अपूर्ण/कमी आहे). ธน สทฺเท. ธเนติ, ธนยติ, ธนิยฺยติ. ธนิ, ธนํ. 'धन' (ध्वनी करणे) हा धातू 'सद्द' (शब्द/ध्वनी) या अर्थात वापरला जातो. 'धनेति', 'धनयति', 'धनिय्यति' (ध्वनी करतो). 'धनि' (ध्वनी), 'धनं' (धन/संपत्ती). ตตฺถ [Pg.322] ธนีติ สทฺโท. ธนนฺติ สนฺตกํ, ตญฺหิ มม อิทนฺติ ธนายิตพฺพํ สทฺทายิตพฺพนฺติ ธนนฺติ. อยํ ปน ธาตุ อิจฺฉายมฺปิ วตฺตติ. ‘‘มาตา หิ ตว อิรนฺธติ, วิธูรสฺส หทยํ ธนิยฺยตี’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ตตฺถ ธนิยฺยตีติ ปตฺเถติ อิจฺฉติ. तेथे 'धनि' म्हणजे शब्द (ध्वनी). 'धनं' म्हणजे स्वतःची संपत्ती, कारण "हे माझे आहे" अशा प्रकारे ज्याची इच्छा केली जाते किंवा ज्याचा शब्द केला जातो, ते 'धन' होय. हा धातू 'इच्छा' या अर्थातही वापरला जातो. "माता हि तव इरन्धति, विधूरस्स हदयं धनिय्यति" (हे इरंधती, तुझी आई विधुराच्या हृदयाची इच्छा करते) हे पाळीतील उदाहरण आहे. तेथे 'धनिय्यति' म्हणजे प्रार्थना करतो किंवा इच्छा करतो. เถน โจริเย. โจรสฺส ภาโว โจริยํ. ยถา สูริยํ, ยถา จ ทกฺขิยํ. เถเนติ, เถนยติ. เถโน, เถเนตฺวา. 'थेन' (चोरी करणे) हा धातू 'चोरिय' (चोरी) या अर्थात वापरला जातो. चोराचा भाव म्हणजे चोरी. ज्याप्रमाणे 'सूरियं' (सूर्याचा भाव) आणि 'दक्खियं' (दक्षिणेचा भाव). 'थेनेति', 'थेनयति' (चोरी करतो). 'थेनो' (चोर), 'थेनेत्वा' (चोरी करून). ตนุ สทฺโทปตาเปสุ. ตาเนติ, ตานยติ. อิธายํ สวุทฺธิกา. ตนาทิคเณ วิตฺถารตฺถวเสน ‘‘ตโนติ, ตนุเต’’ติ อวุทฺธิกา. 'तनु' (विस्तार करणे/ध्वनी करणे) हा धातू 'सद्द' (शब्द/ध्वनी) आणि 'उपताप' (ताप देणे) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'तानेति', 'तानयति' (विस्तार करतो/ध्वनी करतो). येथे ही वृद्धीसहित रूपे आहेत. तनादिगणात मात्र विस्ताराच्या अर्थाने 'तनोति, तनुते' ही वृद्धीरहित रूपे होतात. ตวคฺคนฺตธาตุรูปานิ. 'त'वर्गान्त धातूंची रूपे समाप्त. ปการนฺตธาตุ 'प'कारान्त धातू. ญป โตสนนิสาเนสุ. ญาเปติ, ญาปยติ, ปญฺญาเปติ, ปญฺญาปยติ, ปญฺญตฺติ. 'ञप' (जाणून घेणे/संतुष्ट करणे) हा धातू 'तोसन' (संतुष्ट करणे) आणि 'निसान' (तीक्ष्ण करणे/जाणून घेणे) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'ञापेति', 'ञापयति' (जाणवतो/संतुष्ट करतो), 'पञ्ञापेति', 'पञ्ञापयति' (प्रज्ञापित करतो/मांडतो), 'पञ्ञत्ति' (प्रज्ञप्ती). เอตฺถ จ นิทฺเทเส ‘‘ปญฺญาเปตี’’ติ ปทํ นิทสฺสนํ. ตตฺถ ปญฺญาเปตีติ กตนิพฺพจเนหิ วากฺยาวยเวหิ วิตฺถารวเสน นิรวเสสโต เทสิเตหิ เวเนยฺยานํ จิตฺตปริโตสนํ พุทฺธินิสานญฺจ กโรตีติ อตฺโถ. ปปุพฺโพ นิกฺขิปเน. อาสนํ ปญฺญาเปติ, ปญฺญาปยติ. ‘‘อาสนํ ปญฺญเปตี’’ติ รสฺสตฺตมฺปิ ทิสฺสติ. อมตสฺส ทฺวารํ ปญฺญเปติ, ปญฺญา. การิเต ‘‘ปุริโส ปุริเสน อาสนํ ปญฺญปาเปตี’’ติ เอกเมว ปทํ. ตานิ ‘‘ปญฺญาเปติ, ปญฺญาปยตี’’ติ รูปานิ ยทา ‘‘ญา อวโพธเน’’ติ อิมิสฺสา รูปานิ สิยุํ, ตทา [Pg.323] เหตุกตฺตุรูปานิ ภวนฺติ. เอตฺถ ปน สุทฺธกตฺตุรูปานิ ตพฺพาจกตฺตา. आणि येथे निर्देशात 'पञ्ञापेति' हे पद उदाहरण आहे. तेथे 'पञ्ञापेति' म्हणजे केलेल्या व्युत्पत्तींनी आणि वाक्याच्या अवयवांनी विस्ताराने पूर्णपणे उपदेश केलेल्या विनेय (शिष्य) लोकांच्या मनाचे परितोषण (संतोष) आणि बुद्धीचे तीक्ष्णीकरण करतो असा अर्थ आहे. 'प' उपसर्ग लागल्यास 'निक्खिपन' (ठेवणे/मांडणे) या अर्थात होतो. 'आसनं पञ्ञापेति', 'पञ्ञापयति' (आसन मांडतो). "आसनं पञ्ञपेति" असे र्हस्व रूपही दिसते. 'अमतस्स द्वारं पञ्ञापेति' (अमृताचे द्वार उघडतो/प्रज्ञापित करतो), 'पञ्ञा' (प्रज्ञा). प्रयोजक (कारित) रूपात "पुरिसो पुरिसेन आसनं पञ्ञापेति" (माणूस माणसाकडून आसन मांडवून घेतो) असे एकच पद बनते. ती 'पञ्ञापेति, पञ्ञापयति' ही रूपे जेव्हा 'ञा अवबोधने' (जाणणे) या धातूची रूपे असतात, तेव्हा ती प्रयोजक (कारित) रूपे होतात. येथे मात्र ती प्रयोजक रूपेच आहेत कारण ती त्याचाच बोध करून देतात. ลป วิยตฺติยํ วาจายํ. ลเปติ, ลปยติ. ลาโป, ลปนํ, อาลาโป, สลฺลาโป, กถาสลฺลาโป, ลปิตํ. 'लप' (बोलणे) हा धातू 'वियत्ति' (स्पष्ट वाणी) या अर्थात वापरला जातो. 'लपेति', 'लपयति' (बोलतो). 'लापो' (भाषण), 'लपनं' (बोलणे), 'आलापो' (आलाप/संभाषण), 'सल्लापो' (संवाद), 'कथासल्लापो' (कथा-संवाद), 'लपितं' (बोललेले). พฺยป ทาเห. ฌาเปติ, ฌาปยติ. ฌตฺโต, ฌานํ. 'ब्यप' (जळणे/जाळणे) हा धातू 'दाह' (जळणे) या अर्थात वापरला जातो. 'झापेति', 'झापयति' (जाळतो). 'झत्तो' (दग्ध झालेला), 'झानं' (ध्यान). ตตฺถ ฌตฺโตติ ขุทฺทาปเรโต ปาจนคฺคินา ฌาปิโตติ ฌตฺโต, ‘‘ฌตฺตา อสฺสุ กิลนฺตา’’ติ จ ปาฬิ. ฌานนฺติ นีวรณธมฺเม ฌาเปตีติ ฌานํ, สวุทฺธิกํ. การิเต ปน – ฌาปาเปติ, ฌาปาปยติ. तेथे 'झत्तो' म्हणजे भुकेने व्याकुळ झालेला आणि पचनशक्तीच्या अग्नीने जळालेला तो 'झत्तो' होय. "झत्ता अस्सु किलन्ता" (ते जळालेले आणि थकलेले होते) असे पाळी वचन आहे. 'झानं' (ध्यान) म्हणजे जे नीवरण धर्मांना जाळून टाकते ते 'झानं' होय, हे वृद्धीसहित रूप आहे. प्रयोजक (कारित) रूपात मात्र - 'झापापेति', 'झापापयति' (जळवून घेतो) अशी रूपे होतात. รูป รูปกฺริยายํ. รูปกฺริยา นาม ปกาสนกฺริยา. รูเปติ, รูปยติ. รูปํ. 'रूप' (रूप देणे/प्रकट करणे) हा धातू 'रूपक्रिया' (रूप देण्याची क्रिया) या अर्थात वापरला जातो. 'रूपक्रिया' म्हणजे प्रकाशन क्रिया (प्रकट करण्याची क्रिया). 'रुपेति', 'रुपयति' (रूप देतो/प्रकट करतो). 'रूपं' (रूप). ตตฺถ รูปนฺติ รูปยตีติ รูปํ. วณฺณวิการํ อาปชฺชมานํ หทยงฺคตภาวํ ปกาเสตีติ อตฺโถ. ทิวาทิคเณ ปนายํ ‘‘รูปํ รุปฺปเน’’ติ ภิชฺชนาทิอตฺถํ คเหตฺวา ฐิตา. तेथे 'रूपं' म्हणजे जे रूप धारण करते (प्रकट होते) ते 'रूप' होय. रंगातील बदल प्राप्त करून मनातील भाव प्रकट करतो असा याचा अर्थ आहे. दिवादिगणात मात्र हा धातू 'रूपं रुप्पने' या सूत्राने नष्ट होणे किंवा पीडित होणे इत्यादी अर्थ घेऊन राहिला आहे. กปฺป วิธิมฺหิ. วิธิ กฺริยา. สีหเสยฺยํ กปฺเปติ. กปฺปยติ. โมโร วาสมกปฺปยิ. สีหเสยฺยํ ปกปฺเปนฺตํ, พุทฺธํ วนฺทามิ โคตมํ. 'कप्प' (कल्पना करणे/नियम करणे) हा धातू 'विधि' (नियम/क्रिया) या अर्थात वापरला जातो. 'विधि' म्हणजे क्रिया. 'सीहसेय्यं कप्पेति', 'कप्पयति' (सिंहशयन करतो/सिंहशय्येचा विधी करतो). 'मोरो वासमकप्पयि' (मोराने आपले वास्तव्य केले). "सिंहशयन करणाऱ्या गौतम बुद्धांना मी वंदन करतो." กปฺป วิตกฺเก วิธิมฺหิ เฉทเน จ. กปฺเปติ, กปฺปยติ, โมโร วาสมกปฺปยิ. กปฺปิตมสฺสุ. ปกปฺเปติ, ปกปฺปยติ. สงฺกปฺเปติ, สงฺกปฺปยติ. กปฺโป, สงฺกปฺโป, วิกปฺโป. กปฺปสมโณ อิจฺจาทีนิ. 'कप्प' हा धातू 'वितक्क' (वितर्क/विचार), 'विधि' (नियम/क्रिया) आणि 'छेदन' (कापणे) या अर्थांमध्ये वापरला जातो. 'कप्पेति', 'कप्पयति' (विचार करतो/विधी करतो/कापतो). 'मोरो वासमकप्पयि' (मोराने आपले वास्तव्य केले). 'कप्पितमस्सु' (दाढी-मिशा कापलेला). 'पकप्पेति', 'पकप्पयति' (प्रकल्पना करतो). 'सङ्कप्पेति', 'सङ्कप्पयति' (संकल्प करतो). 'कप्पो' (कल्प), 'सङ्कप्पो' (संकल्प), 'विकप्पो' (विकल्प). 'कप्पसमणो' (कल्पश्रमण) इत्यादी रूपे होतात. ตตฺถ กปฺโปติ ปริจฺเฉทวเสน กปฺปิยตีติ กปฺโป. สงฺกปฺโปติ สงฺกปฺปนํ. วิกปฺโปติ วิวิธา กปฺปนํ, อตฺถสฺส อเนกนฺติกภาโว. อิธ กปฺปสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร ภวติ. तेथे 'कप्पो' म्हणजे जो मर्यादेच्या (परिच्छेदाच्या) आधारे कल्पिला जातो तो 'कल्प' होय. 'सङ्कप्पो' म्हणजे संकल्प करणे. 'विकप्पो' म्हणजे विविध प्रकारची कल्पना करणे, किंवा अर्थाची अनिश्चितता होय. येथे 'कप्प' शब्दाचा अर्थ उद्धृत केला आहे. กปฺปสทฺโท [Pg.324] อภิสทฺทหนโวหารกาลปญฺญตฺติเฉทนวิกปฺปเลสสมนฺตภาวาทิอเนกตฺโถ. ตถา หิสฺส ‘‘โอกปฺปนียเมตํ โภโต โคตมสฺส, ยถา ตํ อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสา’’ติ เอวมาทีสุ อภิสทฺทหนมตฺโถ. ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว ปญฺจหิ สมณกปฺเปหิ ผลํ ปริภุญฺชิตุ’’นฺติ เอวมาทีสุ โวหาโร. ‘‘เยน สุทํ นิจฺจกปฺปํ วิหรามี’’ติ เอวมาทีสุ กาโล. ‘‘อิจฺจายสฺมา กปฺโป’’ติ เอวมาทีสุ ปญฺญตฺติ. ‘‘อลงฺกโต กปฺปิตเกสมสฺสู’’ติ เอวมาทีสุ เฉทนํ. ‘‘กปฺปติ ทฺวงฺคุลกปฺโป’’ติ เอวมาทีสุ วิกปฺโป. ‘‘อตฺถิ กปฺโป นิปชฺชิตุ’’นฺติ เอวมาทีสุ เลโส. ‘‘เกวลกปฺปํ เวฬุวนํ โอภาเสตฺวา’’ติ เอวมาทีสุ สมนฺตภาโว. อถ วา กปฺปสทฺโท สอุปสคฺโค อนุปสคฺโค จ วิตกฺกวิธานปฏิภาคปญฺญตฺติกาลปรมายุโวหารสมนฺตภาวาภิสทฺทหน เฉทน วินิโยค วินย กฺริยา เลสนฺตร กปฺปตณฺหาทิฏฺฐิอสงฺขฺเยยฺยกปฺปมหากปฺปาทีสุ ทิสฺสติ. ตถา เหส ‘‘เนกฺขมฺมสงฺกปฺโป อพฺยาปาทสงฺกปฺโป’’ติอาทีสุ วิตกฺเก อาคโต. ‘‘จีวเร วิกปฺปํ อาปชฺเชยฺยา’’ติอาทีสุ วิธาเน, อธิกวิธานํ อาปชฺเชยฺยาติ หิ อตฺโถ. ‘‘สตฺถุกปฺเปน วต โภ สาวเกน สทฺธึ มนฺตยมานา น ชานิมฺหา’’ติอาทีสุ ปฏิภาเค, สตฺถุสทิเสนาติ อยญฺหิ ตตฺถ อตฺโถ. ‘‘อิจฺจายสฺมา กปฺโป’’ติอาทีสุ ปญฺญตฺติยํ. ‘‘เยน [Pg.325] สุทํ นิจฺจกปฺปํ วิหรามี’’ติอาทีสุ กาเล. ‘‘อากงฺขมาโน อานนฺท ตถาคโต กปฺปํ วาติฏฺเฐยฺย กปฺปาวเสสํ วา’’ติอาทีสุ ปรมายุมฺหิ. อายุกปฺโป หิ อิธ ‘‘กปฺโป’’ติ อธิปฺเปโต. ‘‘อนุชานามิ ภิกฺขเว ปญฺจหิ สมณกปฺเปหิ ผลํ ปริภุญฺชิตุ’’นฺติอาทีสุ สมณโวหาเร. ‘‘เกวลกปฺปํ เวฬุวนํ โอภาเสตฺวา’’ติอาทีสุ สมนฺตภาเว. ‘‘สทฺธาสทฺทหนา โอกปฺปนา อภิปฺปสาโท’’ติอาทีสุ อภิสทฺทหเน, สทฺธายนฺติ อตฺโถ. ‘‘อลงฺกโต กปฺปิตเกสมสฺสู’’ติอาทีสุ เฉทเน. ‘‘เอวเมว อิโต ทินฺนํ, เปตานํ อุปกปฺปตี’’ติอาทีสุ วินิโยเค. ‘‘กปฺปกเตน อกปฺปกตํ สํสิพฺพิตํ โหตี’’ติอาทีสุ วินยกฺริยายํ. ‘‘อตฺถิ กปฺโป นิปชฺชิตุํ, หนฺทาหํ นิปชฺชามี’’ติอาทีสุ เลเส. ‘‘อาปายิโก เนรยิโก, กปฺปฏฺโฐ สงฺฆเภทโก, กปฺปํ นิรยมฺหิ ปจฺจตี’’ติ จ อาทีสุ อนฺตรกปฺเป. ‘‘น กปฺปยนฺติ น ปุรกฺขโรนฺติ,ธมฺมาปิ เตสํ น ปฏิจฺฉิตาเส; น พฺราหฺมโณ สีลวเตน เนยฺโย,ปารงฺคโต น จ ปจฺเจติ ตาที’’ติ อาทีสุ ตณฺหาทิฏฺฐีสุ. ตถา หิ วุตฺตํ นิทฺเทเส ‘‘กปฺโปติ อุทฺทานโต ทฺเว กปฺปา ตณฺหากปฺโป ทิฏฺฐิกปฺโป’’ติ. ‘‘อเนเกปิ สํวฏฺฏกปฺเป อเนเกปิ วิวฏฺฏกปฺเป’’ติอาทีสุ อสงฺขฺเยยฺยกปฺเป[Pg.326]. ‘‘จตฺตาริมานิ ภิกฺขเว กปฺปสฺส อสงฺขฺเยยฺยานี’’ติอาทีสุ มหากปฺเป. อิจฺเจวํ – วิตกฺเก จ วิธาเน จ, ปฏิภาเค ตเถว จ; ปญฺญตฺติยํ ตถา กาเล, ปรมายุมฺหิ จ เฉทเน. สมนฺตภาเว โวหาเร, อภิสทฺทหเนปิ จ; วินิโยเค จ วินย-กฺริยายํ เลสเกปิ จ. วิกปฺปนฺตรกปฺเปสุ, ตณฺหาทิฏฺฐิสฺวสงฺขเย; กปฺเป จ เอวมาทีสุ, กปฺปสทฺโท ปวตฺตติ. กปิ คติยํ. กมฺเปติ, กมฺปยติ, คจฺฉตีติ อตฺโถ. อิมานิ จลนตฺเถ ปวตฺตเหตุกตฺตุรูปสทิสานิ ภวนฺติ. จลนตฺเถ หิ ‘‘กมฺป กมฺปเน’’ติ ธาตุยา ‘‘กมฺปตี’’ติ อกมฺมกสุทฺธกตฺตุรูปํ. ‘‘กมฺเปตี’’ติอาทีนิ สกมฺมกานิ เหตุกตฺตุรูปานิ ‘‘อิทมฺปิ ทุติยํ สลฺลํ, กมฺเปติ หทยํ มมา’’ติ อกมฺมกาย ธาตุยา สกมฺมกรูปทสฺสนโต. ขปิ ขนฺติยํ. ขมฺเปติ, ขมฺปยติ. ถูป สมุสฺสเย. สมุสฺสโย อาโรโห อุพฺเพโธ. ถูเปติ, ถูปยติ. ถูโป, ถูปิกา. ตป ขเย. ตเปติ, ตปยติ. อุป ปชฺชเน. อุเปติ, อุปยติ. จป กกฺกเน. จเปติ, จปยติ. สุปฺป มาเน. สุปฺเปติ, สุปฺปยติ. ฑป ฑิป สงฺฆาเต. ฑาเปติ. ฑาปยติ. เฑเปติ, เฑปยติ. กป [Pg.327] อวกมฺปเน. กเปติ, กปยติ. กปโณ. กปโณติ กรุณายิตพฺโพ. อญฺญตฺถ ปน ‘‘กปฺปตี’’ติ รูปํ วทนฺติ. คุป กุป ธูป ภาสายํ. โคเปติ, โคปยติ. โกเปติ, โกปยติ. ธูเปติ, ธูปยติ. กิป ทุพฺพลฺเล. กิเปติ, กิปยติ. เขป เปรเณ. เปรณํ จุณฺณิกรณํ, เขเปติ, เขปยติ. ตป ปีณเน. ตเปติ, ตปยติ. อาปุ ลมฺพเน. อาเปติ, อาปยติ. อาโป. ตป ทาเห. ตเปติ, ตปยติ. ตโป, ตาโป. อาตาโป, สนฺตาโป. การิเต – ตาเปติ, ตาปยติ. ตตฺถ ตโปติ อกุสลานํ ตาปนฏฺเฐน ตโป, สีลํ. โอปถป ถปเน. โอเปติ, โอปยติ. น เตสํ โกฏฺเฐ โอเปนฺติ. ถเปติ, ถปยติ. ถปิโต. ถปยิตฺวา ปฏิจฺฉทํ ววฏฺฐเปติ. โวฏฺฐพฺพนํ. เอตฺถ จ ‘‘วิ อว ถเปติ, วิ อว ถปน’’นฺติ เฉโท. เอตฺถ ปุริเม สรโลโป ถสฺส ฐตฺตํ วิสทิสภาเวน ทฺวิตฺตญฺจ. ปจฺฉิเม ปน สรโลโป, อวสฺส โอการตฺตํ, ถสฺส ฐตฺตํ, ปสฺส วตฺตํ, วสฺส ทฺวิตฺตํ, วการทฺวยสฺส จ พการทฺวยํ ภวติ. โวฏฺฐพฺพนนฺติ จ พฺยวตฺถาปกจิตฺตสฺส นามํ. นการโลเป ‘‘โวฏฺฐพฺพ’’นฺติ อปรมฺปิ รูปํ ภวติ. มาป มาปเน. ปณฺณสาลํ มาเปติ, มาปยติ. โย ปาณมติมาเปติ, ปณฺณสาลา สุมาปิตา. ยป ยาปเน. ยาปนํ ปวตฺตนํ. เตน โส ตตฺถ ยาเปติ. ยาปยติ. ยาปนา. ตตฺถ [Pg.328] ยาเปตีติ อิทํ ยาธาตุสฺส ปโยคตฺเต สติ การิตปทํ ภวติ. ตถา หิ ‘‘อุยฺยาเปนฺติ นามา’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. ปการนฺตธาตุรูปานิ. ผการนฺตาธาตุรูปานิ อปฺปสิทฺธานิ. พการนฺตธาตุ สมฺพ สมฺพนฺเธ. สมฺพนฺโธ ทฬฺหพนฺธนํ. สมฺเพติ, สมฺพยติ. สมฺพลํ. สพิ มณฺฑเล. มณฺฑลํ ปริมณฺฑลตา. รูปํ ตาทิสเมว. กุพิ อจฺฉาทเน. กุมฺเพติ, กุมฺพยติ. ลุพิ ทุพิ อทฺทเน. อทฺทนํ หึสา. ลุมฺเพติ, ลุมฺพยติ. ทุมฺเพติ, ทุมฺพยติ. 'लुबि' आणि 'दुबि' हे 'अद्दन' (हिंसा) या अर्थात आहेत. 'अद्दन' म्हणजे हिंसा. लुम्बेति, लुम्बयति. दुम्बेति, दुम्बयति. ปุพฺพ นิเกตเน. นิเกตนํ นิวาโส. ปุพฺเพติ, ปุพฺพยติ. 'पुब्ब' हे 'निकेतन' (निवास) या अर्थात आहे. 'निकेतन' म्हणजे निवास. पुब्बेति, पुब्बयति. คพฺพ มาเน. มาโน อหํกาโร. คพฺเพติ, คพฺพยติ. คพฺพนํ, คพฺพิโต. ตตฺถ คพฺพตีติ น สงฺกุจติ. 'गब्ब' हे 'मान' (अहंकार) या अर्थात आहे. 'मान' म्हणजे अहंकार. गब्बेति, गब्बयति. गब्बनं, गब्बितो. तेथे 'गब्बति' म्हणजे संकोच न करणे (संकोच करत नाही). พการนฺตธาตุรูปานิ. 'ब'कारान्त धातूंची रूपे. ภการนฺตธาตุ 'भ'कारान्त धातू. ภู ปตฺติยํ. ปตฺติ ปาปนํ. สกมฺมิกา ธาตุ. ภาเวติ, ภาวยติ. ปภาเวติ, ปภาวยติ. อิตฺถมฺภูโต. จกฺขุภูโต, ญาณภูโต, ธมฺมภูโต, พฺรหฺมภูโต. 'भू' हा 'पत्ति' (प्राप्ती) या अर्थात आहे. 'पत्ति' म्हणजे प्राप्त करणे. हा सकर्मक धातू आहे. भावेति, भावयति. प्रभावेति, प्रभावयति. इत्थंभूतो. चक्खुभूतो, ञाणभूतो, धम्मभूतो, ब्रह्मभूतो. ตตฺถ [Pg.329] ภาเวตีติ ปุริโส คจฺฉนฺตํ ปุริสมนุคจฺฉนฺโต ปาปุณาตีติ อตฺโถ. เอส นโย เสสกฺริยาปเทสุปิ. เอตฺถ จ ‘‘ภาเวตี’’ติอาทีนิ ยตฺถ สเจ ‘‘ภู สตฺตาย’’นฺติ ธาตุยา รูปานิ โหนฺติ, ตตฺถ เหตุกตฺตุรูปานิ นาม โหนฺติ. ‘‘ภาเวติ กุสลํ ธมฺม’’นฺติอาทีเนตฺถ นิทสฺสนปทานิ. ภาเวตีติ หิ วฑฺเฒตีติ อตฺโถ. อิธ ปน สุทฺธกตฺตุรูปตฺตา ปาปุณาตีติ อตฺโถ. อิตฺถมฺภูโตติ อิมํ ปการํ ภูโต ปตฺโต. ‘‘จกฺขุภูโต’’ติอาทีนิ ปน ‘‘ภู สตฺตายํ, ภู ปตฺติย’’นฺติ ทฺวิคณิกานํ ทฺวินฺนํ ธาตูนํ วเสน อฏฺฐกถาฏีกานยนิสฺสิตํ อตฺถํ ปกาสยิสฺสาม อาคมิกานํ โกสลฺลตฺถาย. ตตฺถ จกฺขุภูโตติ ยถา จกฺขุ สตฺตานํ ทสฺสนตฺถํ ปริเณติ, เอวํ โลกสฺส ยาถาวทสฺสนสาธนโต ทสฺสนกิจฺจปริณายกฏฺเฐน จกฺขุภูโต. อถ วา จกฺขุ วิย ภูโตติปิ จกฺขุภูโต. ปญฺญาจกฺขุมยตฺตา วา สยมฺภูญาเณน ปญฺญาจกฺขุํ ภูโต ปตฺโตติ จกฺขุภูโต. วิทิตกรณฏฺเฐน ญาณภูโต, อสาธารณํ วา ญาณํ ภูโต ปตฺโตติ ญาณภูโต, อวิปรีตสภาวฏฺเฐน, ปริยตฺติธมฺมปฺปวตฺตนโต วา หทเยน จินฺเตตฺวา วาจาย นิจฺฉาริตธมฺมมโยติ ธมฺมภูโต. โพธิปกฺขิยธมฺเมหิ วา อุปฺปนฺนตฺตา โลกสฺส จ ตทุปฺปาทนโต อนญฺญสาธารณํ วา ธมฺมํ ภูโต ปตฺโตติ ธมฺมภูโต. เสฏฺฐฏฺเฐน พฺรหฺมภูโต. อถ วา พฺรหฺมํ วุจฺจติ มคฺโค เตน อุปฺปนฺนตฺตา โลกสฺส จ ตทุปฺปาทนตฺตา, ตญฺจ สยมฺภูญาเณน ภูโต ปตฺโตติ พฺรหฺมภูโต. เอวํ ทฺวินฺนํ ธาตูนํ วเสน วุตฺโต อตฺโถ เวทิตพฺโพ. तेथे 'भावेति' म्हणजे एखादा मनुष्य चालणाऱ्या मनुष्याचा पाठलाग करून त्याला गाठतो (प्राप्त करतो), असा अर्थ आहे. हाच नियम उर्वरित क्रियापदांनाही लागू होतो. आणि येथे 'भावेति' इत्यादी रूपे जर 'भू सत्तायम्' (अस्तित्व) या धातूची असतील, तर ती प्रयोजक (कारित) रूपे असतात. "भावेति कुसलं धम्मं" (कुशल धर्माची भावना करतो/वाढवतो) इत्यादी येथे उदाहरणे आहेत. कारण 'भावेति' म्हणजे 'वाढवणे' (वर्धन करणे) असा अर्थ आहे. परंतु येथे प्रयोजक रूप असल्यामुळे 'प्राप्त करणे' असा अर्थ आहे. 'इत्थंभूतो' म्हणजे या प्रकाराला प्राप्त झालेला. परंतु 'चक्खुभूतो' इत्यादी शब्दांचा अर्थ 'भू सत्तायम्' आणि 'भू पत्ति' या दोन वेगवेगळ्या गणांतील धातूंच्या आधारे, आगम (परंपरागत ज्ञान) जाणणाऱ्यांच्या कौशल्यासाठी, अट्ठकथा आणि टीकांच्या पद्धतीनुसार स्पष्ट करू. त्यामध्ये 'चक्खुभूतो' म्हणजे ज्याप्रमाणे डोळा प्राण्यांना पाहण्यासाठी मार्गदर्शन करतो, त्याचप्रमाणे जगाला यथार्थ दर्शनाचे साधन असल्यामुळे, दर्शनकार्याचे नेतृत्व करण्याच्या अर्थाने ते 'चक्खुभूत' (नेत्ररूप) आहेत. किंवा डोळ्यासारखे झाले आहेत म्हणूनही 'चक्खुभूत'. किंवा प्रज्ञाचक्षूमय असल्यामुळे, स्वयंभू ज्ञानाने प्रज्ञाचक्षूला प्राप्त झाले आहेत म्हणून 'चक्खुभूत'. (सर्व काही) ज्ञात करून देण्याच्या अर्थाने 'ञाणभूत' (ज्ञानरूप), किंवा असाधारण ज्ञानाला प्राप्त झाले आहेत म्हणून 'ञाणभूत'. अविपरीत (यथार्थ) स्वभावाच्या अर्थाने, किंवा परियत्ति धर्माचे प्रवर्तन केल्यामुळे, हृदयात चिंतन करून वाणीने उच्चारलेल्या धर्ममय असल्यामुळे 'धम्मभूत' (धर्मरूप). किंवा बोधिपक्षीय धर्मांमुळे उत्पन्न झाल्यामुळे आणि जगामध्ये ते उत्पन्न करत असल्यामुळे, असाधारण धर्माला प्राप्त झाले आहेत म्हणून 'धम्मभूत'. श्रेष्ठत्वाच्या अर्थाने 'ब्रह्मभूत' (श्रेष्ठरूप). किंवा 'ब्रह्म' म्हणजे मार्ग (अष्टांगिक मार्ग) म्हटले जाते, त्याद्वारे उत्पन्न झाल्यामुळे आणि जगामध्ये ते उत्पन्न करत असल्यामुळे, आणि स्वयंभू ज्ञानाने त्याला प्राप्त झाले आहेत म्हणून 'ब्रह्मभूत'. अशा प्रकारे दोन धातूंच्या आधारे सांगितलेला अर्थ समजून घ्यावा. อปรานิ เจตฺถ นิทสฺสนปทานิ เวทิตพฺพานิ. ‘‘ตาตา มยํ มหลฺลกา สุทฺโธทนมหาราชปุตฺตํ พุทฺธภูตํ สมฺภาเวยฺยาม วา โน วา, ตุมฺเห ตสฺส สาสเน ปพฺพเชยฺยาถา’’ติ จ ‘‘อถ [Pg.330] โข เถรา ภิกฺขู อายสฺมนฺตํ เรวตํ สหชาติยํ สมฺภาวึสู’’ติ จาติ. อญฺญานิปิ ปเนตฺถ ‘‘มนุสฺสภูโต, เทวภูโต’’ติอาทีนิ โยเชตพฺพานิ. ตถา หิ สํสารโมจกเปตวตฺถุ อฏฺฐกถายํ ‘‘มนุสฺสภูตาติมนุสฺเสสุ ชาตา, มนุสฺสภาวํ วา ปตฺตา’’ติ อตฺโถ สํวณฺณิโต. आणि येथे इतरही उदाहरणे समजून घ्यावीत. "मुलांनो, आम्ही वृद्ध झालो आहोत, शुद्धोदन महाराजांच्या पुत्राला, जे बुद्ध झाले आहेत (बुद्धभूत), आम्ही भेटू शकू की नाही (माहीत नाही), तुम्ही त्यांच्या शासनात प्रव्रजित व्हावे" आणि "त्यानंतर थेर भिक्खूंनी आयुष्मान रेवतांना सहजाती येथे सन्मानित केले (भेटले)." येथे इतरही 'मनुस्सभूतो' (मनुष्य झालेला), 'देवभूतो' (देव झालेला) इत्यादी शब्द योजावेत. कारण संसारमोचक पेतवत्थुच्या अट्ठकथेमध्ये "मनुस्सभूता म्हणजे मनुष्यांमध्ये जन्मलेली, किंवा मनुष्यभावाला प्राप्त झालेली" असा अर्थ वर्णन केला आहे. ภู อวกมฺปเน. อยมฺปิ สกมฺมโก. ภาเวติ, ภาวยติ. มโนภาวนียา ภิกฺขู. 'भू' हा 'अवकंपन' (अनुकंपा/दया) या अर्थात आहे. हा देखील सकर्मक आहे. भावेति, भावयति. मनोभावनीया भिक्खू. เอตฺถ จ ภาเวตีติ อนุกมฺปติ ปุตฺตํ วา ภาตรํ วา ยํกิญฺจิ. มโนภาวนียาติ ‘‘ทีฆายุกา โหนฺตุ ภทนฺตา อโรคา อพฺยาปชฺชา’’ติ เอวมาทินา ภาเวตพฺพา อนุกมฺปิตพฺพาติ มโนภาวนียา. อญฺญตฺถ ปน มโนภาวนียาติ มโนวฑฺฒนกาติ อตฺโถ. เยสุ หิ ทิฏฺเฐสุ มโน วฑฺฒติ, ‘‘เต มโนภาวนียา’’ติ วุจฺจนฺติ. आणि येथे 'भावेति' म्हणजे पुत्रावर, भावावर किंवा इतर कोणावरही अनुकंपा (दया) करणे. 'मनोभावनीया' म्हणजे "भदन्त दीर्घायुषी होवोत, निरोगी होवोत, उपद्रवरहित होवोत" इत्यादी प्रकारे भावना करावी, अनुकंपा करावी असे, म्हणून 'मनोभावनीया'. परंतु इतर ठिकाणी 'मनोभावनीया' म्हणजे मनाचा विकास करणारे (मन वाढवणारे) असा अर्थ आहे. कारण ज्यांना पाहिल्याने मन प्रसन्न होते (वाढते), त्यांना 'मनोभावनीया' असे म्हणतात. ลภ อาภณฺฑเน. ลเภติ, ลภยติ. 'लभ' हा 'आभंडण' (भूषण/प्राप्ती) या अर्थात आहे. लभेति, लभयति. ชภิ นาสเน. ชมฺเภติ, ชมฺภยติ. 'जभि' हा 'नासन' (नाश करणे/जांभई देणे) या अर्थात आहे. जम्भेति, जम्भयति. ลาภ เปสเน. ลาเภติ, ลาภยติ. ‘‘ลภ ลาเภติ ธาตุสฺส รูปานิ เจ, การิตรูปานิ ภวนฺติ. 'लाभ' हा 'पेसन' (प्रेषण/पाठवणे) या अर्थात आहे. लाभेति, लाभयति. जर 'लभ' धातूची 'लाभेति' अशी रूपे असतील, तर ती प्रयोजक (कारित) रूपे होतात. ทภี ภเย. อีการนฺตายํ ธาตุ, เตน สนิคฺคหีตาคมานิ รูปานิ น ภวนฺติ. ทเภติ, ทภยติ. 'दभी' हा 'भय' (भीती) या अर्थात आहे. हा ई-कारान्त धातू आहे, त्यामुळे अनुस्वार-आगम (निग्गहीत-आगम) असलेली रूपे होत नाहीत. दभेति, दभयति. ทูภ สนฺถมฺเภ. ทูเภติ, ทูภยติ. 'दूभ' हा 'संथम्भ' (स्तंभन/रोखणे) या अर्थात आहे. दूभेति, दूभयति. วมฺภ วิทฺธํสเน. วมฺเภติ, วมฺภยติ. วมฺภนา. ฉพฺพคฺคิยา ภิกฺขู ภิกฺขุํ วมฺเภนฺติ. 'वम्भ' हा 'विद्धंसन' (नाश करणे/निंदा करणे) या अर्थात आहे. वम्भेति, वम्भयति. वम्भना. छब्बग्गिय (षड्वर्गीय) भिक्खू भिक्खूची निंदा करतात. ภการนฺตธาตุรูปานิ. 'भ'कारान्त धातूंची रूपे. มการนฺตธาตุ 'म'कारान्त धातू. อาเตน [Pg.331] จมุ โธวเน. อาปุพฺโพ จมุธาตุ โธวเน วตฺตติ. อาจเมติ, อาจมยติ. อาจมนกุมฺภี. 'आ' उपसर्ग लागलेला 'चमु' धातू 'धोवन' (धुणे/आचमन करणे) या अर्थात आहे. 'आ' पूर्वपद असलेला 'चमु' धातू धुण्याच्या अर्थात वापरला जातो. आचमेति, आचमयति. आचमनकुम्भी (हात-पाय धुण्यासाठी पाण्याचा घडा). เอตฺถ ปน ‘‘ตโต หิ โส อาจมยิตฺวา ลิจฺฉวี, เถรสฺส ทตฺวา ยุคานิ อฏฺฐา’’ติ อปฺปสกฺการเปตวตฺถุปาฬิปฺปเทโส นิทสฺสนํ. ตตฺถ อาจมยิตฺวาติ หตฺถปาทโธวนปุพฺพกํ มุขํ วิกฺขาเลตฺวา. อยํ ปน ธาตุ ภูวาทิคณิกตฺเต ‘‘จมตี’’ติ ภกฺขนตฺถํ คเหตฺวา ติฏฺฐติ. आणि येथे "त्यानंतर त्या लिच्छवीने आचमन करून (हात-पाय धुवून), थेरांना वस्त्रजोडी देऊन तो उभा राहिला" हा अप्पसक्कार पेतवत्थु पाळीचा भाग उदाहरण आहे. तेथे 'आचमयित्वा' म्हणजे हात-पाय धुवून तोंड स्वच्छ करणे. परंतु हा धातू भूवादि गणाचा असताना 'चमति' या रूपाने 'भक्षण करणे' (खाणे) या अर्थात वापरला जातो. กมุ อิจฺฉากนฺตีสุ. กาเมติ, กามยติ. กาโม, กนฺติ, นิกนฺติ, กามนา, กามยมาโน,กาเมนฺโต, อภิกฺกนฺตํ. อภิกฺกนฺตวณฺณา. 'कमु' हा 'इच्छा' आणि 'कन्ति' (प्रीती/चकाकी) या अर्थात आहे. कामेति, कामयति. कामो, कन्ति, निकन्ति, कामना, कामयमानो, कामेन्तो, अभिक्कन्तं. अभिक्कन्तवण्णा. เอตฺถ จ กาโมติ รูปาทิวิสยํ กาเมตีติ กาโม. กามิยตีติ วา กาโม, กิเลสกามวตฺถุกามวเสเนตํ ทฏฺฐพฺพํ. กิเลโส หิ เตภูมกวฏฺฏสงฺขาตญฺจ วตฺถุ ‘‘กาโม’’ติ วุจฺจติ. มาโรปิ วา เทวปุตฺโต ‘‘กาโม’’ติ วุจฺจติ. โส หิ อจฺจนฺตกณฺหธมฺมสมงฺคิตาย ปปญฺจสมติกฺกนฺเตปิ พุทฺธปจฺเจกพุทฺธพุทฺธสาวเก อตฺตโน วเส ฐเปตุํ กาเมตีติ ‘‘กาโม’’ติ วุจฺจติ. आणि येथे 'काम' म्हणजे रूप इत्यादी विषयांची इच्छा करतो म्हणून 'काम'. किंवा ज्याची इच्छा केली जाते तो 'काम'; हे क्लेशकाम आणि वत्थुकाम (वस्तुकाम) यांच्या संदर्भात समजून घ्यावे. कारण क्लेश आणि त्रिभूमक वट्ट (संसारचक्र) संज्ञक वस्तू यांना 'काम' म्हटले जाते. किंवा मार देवपुत्रालाही 'काम' म्हटले जाते. कारण तो अत्यंत कृष्णधर्माने (पापधर्माने) युक्त असल्यामुळे, प्रपंचाचे उल्लंघन केलेल्या बुद्ध, प्रत्येकबुद्ध आणि बुद्धश्रावकांनाही आपल्या वशमध्ये ठेवण्याची इच्छा करतो, म्हणून त्याला 'काम' म्हटले जाते. วุตฺตญฺเจตํ โปราณกวิรจนายํ – आणि प्राचीन कवींच्या रचनेत असे म्हटले आहे – ‘‘วนฺเท วนฺเทหมสฺสตฺถํ, ยตฺถ สนฺตชฺชิโต ชิโต; กาโม กาโมฆติณฺเณน, พุทฺเธน วสตา สตา’’ติ; "मी त्या अश्वत्थ (बोधी) वृक्षाला वंदन करतो, वंदन करतो, जेथे काम-ओघाला (इच्छेच्या प्रवाहाला) पार केलेल्या, तेथे वास करणाऱ्या भगवान बुद्धांनी भयभीत झालेल्या कामाचा (माराचा) पराभव केला." อิมานิ ปนสฺส นามานิ – आणि ही त्याची नावे आहेत – กาโม นมุจิ กณฺโห จ, วสวตฺตี ปชาปติ; ปมตฺตพนฺธุ มทโน, ปาปิมา ทมฺมโกปิ จ; กนฺทปฺโป จ รติปติ, มาโร จ กุสุมายุโธ; कामो, नमुचि, कण्हो, वसवत्ती, प्रजापति, पमत्तबन्धु, मदनो, पापिमा, दम्मको, कन्दर्पो, रतिपति, मारो आणि कुसुमायुधो. อญฺเญ [Pg.332] อญฺญานิปิ วทนฺติ. ตานิ สาสนานุโลมานิ น โหนฺตีติ อิธ น ทสฺสิตานิ. อฏฺฐกถาสุ ปน ‘‘มาโร, นมุจิ, กณฺโห, ปมตฺตพนฺธู’’ติ จตฺตาริเยว นามานิ อาคตานิ. इतर लोक इतरही नावे सांगतात. ती शासनाला (बुद्धवचनाला) अनुकूल नसल्यामुळे येथे दाखवलेली नाहीत. परंतु अट्ठकथांमध्ये "मारो, नमुचि, कण्हो, पमत्तबन्धु" ही चारच नावे आली आहेत. อิทานิ อภิกฺกนฺตสทฺทสฺส ภูวาทิคเณ ‘‘กมุ ปทวิกฺเขเป’’ติ โวหารสีเสน วุตฺตสฺส กมุธาตุสฺส วเสน อิธ จ ‘‘กมุ อิจฺฉากนฺตีสู’’ติ วุตฺตสฺส กมุธาตุสฺส วเสน อตฺถุทฺธารํ กถยาม. อภิกฺกนฺตสทฺโท ขยสุนฺทราภิรูปอพฺภนุโมทเนสุ ทิสฺสติ. ‘‘อภิกฺกนฺตา ภนฺเต รตฺติ, นิกฺขนฺโต ปฐโม ยาโม, จิรนิสินฺโน ภิกฺขุสงฺโฆ’’ติอาทีสุ ขเย ทิสฺสติ. ‘‘อยํ อิเมสํ จตุนฺนํ ปุคฺคลานํ อภิกฺกนฺตตโร จ ปณีตตโร จา’’ติอาทีสุ สุนฺทเร. ‘‘โก เม วนฺทติ ปาทานิ, อิทฺธิยา ยสสา ชลํ; อภิกฺกนฺเตน วณฺเณน, สพฺพา โอภาสยํ ทิสา’’ติ อาทีสุ อภิรูเป. ‘‘อภิกฺกนฺตํ ภนฺเต’’ติอาทีสุ อพฺภนุโมทเน. อิจฺเจวํ – ขยสฺมึ สุนฺทเร เจว, อโถ อพฺภนุโมทเน; อภิรูเป อภิกฺกนฺต-สทฺโท ทิสฺสติ สาสเน. โถม สิลาฆายํ. สิลาฆา ปสํสา. โถเมติ, โถมยติ. โถมิโต, โถมนา. ยม อปริเวสเน. ยเมติ, ยมยติ. ยโม. สม [Pg.333] วิตกฺเก. สาเมติ, สามยติ. สมา. นิสาเมติ, นิสามยติ. นิสามนํ. ปฏิสาเมติ, ปฏิสามยติ. ปฏิสามนํ. ตตฺถ สมาติ สํวจฺฉโร, โส ‘‘สมา’’ติ อิตฺถิลิงฺควเสน วุจฺจติ. ‘‘โย ยเชถ สตํ สม’’นฺติ เอตฺถ หิ สมาสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค, อุปโยควเสน ปน ‘‘สม’’นฺติ วุตฺโต. อิมานิ สํวจฺฉรสฺส นามานิ ‘‘สํวจฺฉโร, วจฺฉโร, สมา, หายโน, สรโท, วสฺโส’’ติอาทีนิ ภวนฺติ. นิสาเมตีติ วิตกฺเกติ อุปธาเรติ. เอตฺถ หิ ‘‘อิงฺฆ มทฺทิ นิสาเมหิ, นิคฺโฆโส ยาทิโส วเน’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ตตฺถ นิสาเมหีติ วิตกฺเกหิ อุปธาเรหีติ อตฺโถ. ปฏิสาเมตีติ ภณฺฑํ คุตฺตฏฺฐาเน นิกฺขิปติ. สม อาโลจเน. อาโลจนํ เปกฺขนํ. สาเมติ, สามยติ. นิสามนํ. เอตฺถ ปน นิสาเมตีติ เปกฺขติ โอโลเกติ. ตถา หิ ‘‘อิงฺฆ มทฺทิ นิสาเมหิ, จิตฺตํ รูปํว ทิสฺสตี’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. ตตฺถ หิ นิสาเมหีติ โอโลเกหีติ อตฺโถ. ธาตูนมตฺถาติสเยน โยโคติ วจนโต ปน อุปสคฺคโยคโต วา สวเนปิ อยํ วตฺตติ. ตถา หิ ‘‘ตโต กณฺหาชินายาปิ, นิสาเมหิ รเถสภา’’ติอาทิกา ปาฬิโย ทิสฺสนฺติ. ตตฺถ นิสาเมหีติ สุโณหีติ อตฺโถ. อม โรเค. อเมติ, อมยติ. อนฺโธ. พิลงฺกปาโท อนฺธนโข. ตตฺถ อนฺโธติ นฏฺฐนยโน วุจฺจติ. อนฺธนโขติ ปูตินโข. อุภยถาปิ สโรคตฺตํ สูจิตํ. ภาม [Pg.334] โกเธ. ภาเมติ, ภามยติ. 'भाम' धातू क्रोधाच्या (रागाच्या) अर्थात आहे. 'भामेति', 'भामयति' (अशी रूपे होतात). โคม อุปเลปเน. โคเมติ, โคมยติ. 'गोम' धातू उपलेपनाच्या (सारवण्याच्या किंवा लेप देण्याच्या) अर्थात आहे. 'गोमेति', 'गोमयति' (अशी रूपे होतात). สาม สฺวานฺตเน อามนฺตเน. สฺวานฺตนํ สามปฺปโยโค. อามนฺตนํ อวฺหายนํ ปกฺโกสนํ. สาเมติ, สามยติ. 'साम' धातू सांत्वन (शांत करणे) आणि आमंत्रण (बोलवणे) या अर्थात आहे. सांत्वन म्हणजे सामप्रयोग (सामोपचाराचा वापर). आमंत्रण म्हणजे आव्हान (हाक मारणे) किंवा पाचारण करणे (बोलावणे). 'सामेति', 'सामयति' (अशी रूपे होतात). สงฺคาม ยุทฺเธ. สงฺคาเมติ, สงฺคามยติ. ทฺเว ราชาโน สงฺคาเมสุํ. สงฺคาโม. อาโต คมุ อีสมธิวาสเน. อาคเมติ, อาคมยติ, กามาวจรธมฺเม นิสฺสาย รูปารูปธมฺโม สมุทาคเมติ, สมุทาคมยติ. อุปาสโก ธมฺมสวนนฺตรายํ อนิจฺฉนฺโต ‘‘อาคเมถ อาคเมถา’’ติ อาห. สมุทาคมนํ, อาคมนํ. อาคเมนฺโต, อาคมยมาโน. 'संगाम' धातू युद्धाच्या अर्थात आहे. 'संगा मेति', 'संगामयति' (अशी रूपे होतात). 'द्वे राजानो संगा मेसुं' म्हणजे दोन राजांनी युद्ध केले. 'संगामो' (युद्ध). 'आ' उपसर्गपूर्वक 'गमु' धातू हा थोड्या प्रमाणात वाट पाहणे किंवा सहन करणे (ईषदधिवान) या अर्थात आहे. 'आगमेति', 'आगमयति' (अशी रूपे होतात). कामावचर धर्मांचा आश्रय घेऊन रूप आणि अरूप धर्म उत्पन्न होतात (समुदागमेति, समुदागमयति). धम्मश्रवणात अडथळा येऊ नये अशी इच्छा करणाऱ्या उपासकाने "वाट पाहा, वाट पाहा" (आगमेथ आगमेथा) असे म्हटले. 'समुदागमनं' (उत्पत्ती/प्राप्ती), 'आगमनं' (येणे/वाट पाहणे). 'आगमंतो', 'आगमयमानो' (वाट पाहत असताना/येत असताना). ตตฺร อาคเมตีติ อีสกํ อธิวาเสติ. สมุทาคเมตีติ สมฺปวตฺตติ. ภูวาทิคเณ ‘‘คมยตี’’ติ เหตุกตฺตุวเสน วุตฺตํ, อิธ ปน อุปสคฺคนิปาตปุพฺพกานิ กตฺวา ‘‘อาคเมตี’’ติอาทีนิ สุทฺธกตฺตุวเสน วุตฺตานีติ ทฏฺฐพฺพํ. तेथे 'आगमेति' म्हणजे थोडी प्रतीक्षा करणे. 'समुदागमेति' म्हणजे प्रवृत्त होणे. भूवादिगणात 'गमयति' हे हेतुकर्तरी (प्रयोजक) मध्ये सांगितले आहे, परंतु येथे उपसर्ग आणि निपात पूर्व ठेवून 'आगमेति' इत्यादी शुद्धकर्तरी मध्ये सांगितले आहे, असे समजावे. มการนฺตธาตุรูปานิ. म-कारान्त धातूंची रूपे. อิติ จุ ราทิคเณ ปวคฺคนฺตธาตุรูปานิ अशा प्रकारे चुरादिगणातील पवर्गान्त धातूंची रूपे... สมตฺตานิ. समाप्त झाली. ยการนฺตธาตุ य-कारान्त धातू. ยุ ชิคุจฺฉายํ. ยาเวติ, ยาวยติ. ยโว. यु (धातू) जुगुप्सा (घृणा) अर्थात. यावेति, यावयति. यवो. พฺยย ขเย. พฺยเยติ, พฺยยยติ. อพฺยยีภาโว. ब्यय (धातू) क्षय (नाश) अर्थात. ब्ययेति, ब्यययति. अब्ययीभावो. พฺยย จิตฺตสมุสฺสคฺเค. ตาทิสํเยว รูปํ. ब्यय (धातू) चित्त-उत्सर्जनात (चित्त सोडून देणे). तसेच रूप होते. ยการนฺตธาตุรูปานิ. य-कारान्त धातूंची रूपे. รการนฺตธาตุ र-कारान्त धातू. ปร คติยํ. ปเรติ, ปรยติ. เอตฺถ จ ‘‘อิติ โข อานนฺท กุสลานิ สีลานิ อนุปุพฺเพน อคฺคาย ปเรนฺตี’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. ตตฺถ อคฺคาย ปเรนฺตีติ อรหตฺตตฺถาย คจฺฉนฺติ. पर (धातू) गती (जाणे) अर्थात. परेति, परयति. आणि येथे 'इति खो आनंद कुसलानि सीलानि अनुपुब्बेन अग्गाय परेंति' (हे आनंदा, कुशल शील अनुक्रमाने अग्रपदाकडे जातात) हे पाळीचे उदाहरण आहे. तेथे 'अग्गाय परेंति' म्हणजे अर्हत्त्वासाठी जातात. คร อุคฺคเม. คเรติ, ครยติ. ครุ. गर (धातू) उद्गम (वर येणे) अर्थात. गरेति, गरयति. गरु. จร อสํสเย. จเรติ, จรยติ. चर (धातू) असंशय (निश्चितता) अर्थात. चरेति, चरयति. ปูริ อปฺปายเน. ปูเรติ, ปูรยติ. पूरि (धातू) तृप्ती (किंवा वृद्धी) अर्थात. पुरेति, पुरयति. วร อิจฺฉายํ. วเรติ, วรยติ. วโร, วรํ, วรนฺโต. เอเต วรานํ จตุโร วเรมิ. เอตํ สกฺก วรํ วเร. वर (धातू) इच्छा अर्थात. वरेति, वरयति. वरो, वरं, वरंतो. 'एते वरानं चतुरो वरेमि' (मी या वरांपैकी चार वर मागतो). 'एतं सक्क वरं वरे' (हे शक्रा, हा वर मागावा). ตตฺถ วโรติ วริยเต วริตพฺโพติ วโร. วรนฺติ วเรตีติ วรํ, อิจฺฉนฺโต ปตฺเถนฺโตติ อตฺโถ. तेथे 'वरो' म्हणजे ज्याची निवड केली जाते किंवा जे निवडण्यायोग्य आहे तो 'वरो'. 'वरं' म्हणजे जो निवडतो (किंवा इच्छा करतो) तो 'वरं', म्हणजेच इच्छा करणारा, प्रार्थना करणारा असा अर्थ आहे. ‘‘มหามหารหํ สกฺย-มุนิ นีวรณา รณา; มุตฺตํ มุตฺตํ สุทสฺสนํ, วนฺเท โพธิวรํ วร’’นฺติ जसे की, 'महामहारहं सक्य-मुनि नीवरणा रणा; मुत्तं मुत्तं सुदस्सनं, वन्दे बोधिवरं वरं' (अतिशय पूजनीय, नीवरण आणि क्लेशांपासून मुक्त, परम मुक्त, सुंदर दर्शन असणाऱ्या शाक्यमुनींच्या श्रेष्ठ बोधिवृक्षाला मी वंदन करतो). ปุราณกวิรจนายํ ‘‘วร’’นฺติ ปทสฺส วิย. เอวํ วเรตีติ วรนฺโต. วเรติ วเรมิ อิจฺฉามิ ยาจามิ. การิเต ‘‘ปวาเรตี’’ติ รูปํ, อิจฺฉาเปตีติ อตฺโถ. นิเสธนตฺเถ ปนิทํ การิตํ น โหติ. प्राचीन कवींच्या रचनेतील 'वरं' या शब्दाप्रमाणे. अशा प्रकारे जो निवडतो (इच्छा करतो) तो 'वरंतो'. 'वरेति' किंवा 'वरेमि' म्हणजे मी इच्छा करतो, मी याचना करतो. प्रयोजक (कारित) मध्ये 'पवारेति' असे रूप होते, ज्याचा अर्थ 'इच्छा करवणे' असा होतो. परंतु निषेध अर्थात हे प्रयोजक रूप होत नाही. สร อกฺเขเป. สเรติ, สรยติ. สโร. สโรติ สทฺโท. सर (धातू) आक्षेप (फेकणे किंवा आवाज करणे) अर्थात. सरेति, सरयति. सरो. 'सरो' म्हणजे शब्द (आवाज). สาร ทุพฺพลฺเย. สาเรติ, สารยติ. ทุพฺพโล ภวตีติ อตฺโถ. सार (धातू) दुर्बलता अर्थात. सारेति, सारयति. दुर्बल होतो असा अर्थ आहे. กุมาร กีฬายํ. กุมาเรติ, กุมารยติ. กุมาโร, กุมารโก. กุมารี, กุมาริกา. कुमार (धातू) क्रीडा (खेळणे) अर्थात. कुमारेति, कुमारायति. कुमारो, कुमारको. कुमारी, कुमारिका. เอตฺถ [Pg.336] กุมารยติ ตตฺถ ตตฺถ กีฬตีติ กุมาโร. โส เอว อติทหรตฺตา กุมารโก. เอส นโย อิตรตฺราปิ. येथे जो 'कुमारायति' म्हणजे ठिकठिकाणी खेळतो तो 'कुमारो'. तोच अतिशय लहान असल्यामुळे 'कुमारको' (म्हटला जातो). हाच नियम इतर ठिकाणीही लागू होतो. สูร วีร วิกฺกนฺติยํ. วิกฺกนฺติ วิกฺกมนํ. สูเรติ, สูรยติ. วีเรติ, วีรยติ. สูโร, วีโร. สาสนิเกหิ ปน สทฺธมฺมวิทูหิ เอวํ ธาตุสภาวานมฺปิ สูรวีรสทฺทานํ นิพฺพจนํ น ทสฺสิตํ, เกวลํ ปน ตตฺถ ตตฺถ ‘‘สูโรติ วิสิฏฺฐอุโร’’ติ จ ‘‘มหาวีโรติ มหาวิกฺกนฺโต’’ติ จ ‘‘วีโรติ วีริยวา’’ติ จ อตฺถวิวรณมตฺตเมว ทสฺสิตํ. सूर, वीर (धातू) पराक्रम (विक्रांती) अर्थात. विक्रांती म्हणजे पराक्रम गाजवणे. सूरेति, सूरयति. वीरेति, वीरयति. सूरो, वीरो. परंतु शासनातील (बुद्ध शासनातील) सद्धम्म जाणणाऱ्यांनी अशा धातूंच्या स्वभावाच्या 'सूर' आणि 'वीर' शब्दांची व्युत्पत्ती (निरुक्ती) दाखवलेली नाही, तर केवळ ठिकठिकाणी 'सूरो म्हणजे विशिष्ट छाती असलेला (पराक्रमी)' आणि 'महावीरो म्हणजे महान पराक्रमी' आणि 'वीरो म्हणजे वीर्यवान (उत्साही)' असा केवळ अर्थाचा खुलासाच दाखवला आहे. ปาร ตีร กมฺมสมฺปตฺติยํ. กมฺมสมฺปตฺติ นาม กมฺมสฺส ปริสมาปนํ นิฏฺฐาปนํ. ปาเรติ, ปารยติ. ตีเรติ, ตีรยติ. ปารํ. ตีรํ. วิกฺกมามิ น ปาเรมิ, ภูมึ สุมฺภามิ เวคสา. ตํ กิจฺจํ ตีเรตฺวา คโต. สนฺตีรณํ, ตีรณปริญฺญาติ จ อาทีนิ เอตฺถ ทสฺเสตพฺพานิ. 'पार' आणि 'तीर' हे धातू कार्यसिद्धीच्या (कम्यसंपत्तीच्या) अर्थात वापरले जातात. 'कम्यसंपत्ती' म्हणजे कर्माची समाप्ती किंवा पूर्णता होय. पारेति, पारयति. तीरेति, तीरयति. पार, तीर. "मी पराक्रम करतो पण पार पाडू शकत नाही, वेगाने जमिनीवर आदळतो." "ते कार्य पूर्ण करून गेला." 'संतीरण' (तपासणी) आणि 'तीरणपरिञ्ञा' (निर्णय-परिज्ञा) इत्यादी येथे दर्शविले पाहिजेत. ตตฺถ น ปาเรมีติ ฉินฺทิตุํ น สกฺโกมีติ อตฺโถ. तेथे 'न पारेमि' (पार पाडू शकत नाही) याचा अर्थ "छिन्न (किंवा नष्ट) करू शकत नाही" असा आहे. อีร เขปเน. อีเรติ, อีรยติ. 'ईर' धातू फेकण्याच्या (क्षेपणाच्या) अर्थात आहे. ईरेति, ईरयति. ชร วโยหานิมฺหิ. ชเรติ, ชรยติ. ชรา. ปาฬิยํ ปน ‘‘ชีรตี’’ติ ปาโฐ. 'जर' धातू वयाच्या हानीच्या (वयोवृद्धतेच्या) अर्थात आहे. जरेति, जरयति. जरा. पाळिमध्ये मात्र "जीरति" असा पाठ आहे. วร อาวรเณ. วาเรติ, วารยติ. นิวาเรติ, นิวารยติ. นิวาเรตา. ปริวาเรติ, ปริวารยติ. ปริวาโร. ปวาเรติ, ปวารยติ. ปวารณํ. ปวารณนฺติ นิเสธนํ วา กามฺยทานํ วา. 'वर' धातू रोखण्याच्या (आवरणाच्या) अर्थात आहे. वारेति, वारयति. निवारेति, निवारयति. निवारक. परिवारेति, परिवारयति. परिवार. पवारेति, पवारयति. पवारणा. 'पवारणा' म्हणजे निषेध करणे किंवा इच्छित दान देणे होय. ธร ธารเณ. ธาเรติ, ธารยติ. อาธาโร, อาธารโก, ธมฺโม อิจฺจาทีนิ. 'धर' धातू धारण करण्याच्या अर्थात आहे. धारेति, धारयति. आधार, धारक, धम्म इत्यादी. ตตฺถ ธมฺโมติ อเนกวิเธสุ ธมฺเมสุ โลกุตฺตโร อุปฺปาทิโต สจฺฉิกโต จ จตูสุ อปาเยสุ สํสาเร วา [Pg.337] สตฺเต อปตมาเน ธาเรตีติ ธมฺโม. อถ วา โสตาปนฺนาทีหิ อริเยหิ ธาริยติ, นุ ปุถุชฺชเนหีติปิ ธมฺโม. จตุภูมิโก ปน สกลกฺขณํ ธาเรตีติ ธมฺโม. กกฺขฬตฺตาทินา ผุสนาทินา สนฺติอาทินา สกสกภาเวน ปณฺฑิเตหิ ธาริยติ สลฺลกฺขิยตีติปิ ธมฺโม. เตปิฏโก ปน ปาฬิธมฺโม สกตฺถปรตฺถาทิเภเอ อตฺเถ ธาเรตีติ ธมฺโม. เกจิ ตุ วิทู ‘‘ปาปเก อกุสเล ธมฺเม ธุนาติ กมฺเปติ วิทฺธํเสตีติ ธมฺโม’’ติ ธูธาตุวเสนปิ นิพฺพจนํ วทนฺติ, ตํ มคฺคธมฺเม อตีว ยุชฺชติ, ผลนิพฺพานปริยตฺติธมฺเมสุ ปน ปริยาเยน ยุชฺชติ. तेथे 'धम्म' म्हणजे अनेक प्रकारच्या धम्मांमध्ये, जो लोकोत्तर धम्म उत्पन्न आणि साक्षात्कृत केला जातो, तो प्राण्यांना चार अपायांमध्ये किंवा संसारात पडण्यापासून धारण करतो (वाचवतो), म्हणून तो 'धम्म' होय. अथवा, जो सोतापन्न इत्यादी आर्यांद्वारे धारण केला जातो, पृथग्जनांद्वारे नाही, म्हणूनही तो 'धम्म' होय. चार भूमींचा धम्म स्वतःचे लक्षण धारण करतो, म्हणून तो 'धम्म' होय. कठीणपणा, स्पर्श, शांतता इत्यादी स्वतःच्या स्वभावाने पंडितांद्वारे जो धारण केला जातो किंवा ओळखला जातो, म्हणूनही तो 'धम्म' होय. त्रिपिटक रूपी पाळिधम्म स्वतःचा अर्थ आणि दुसऱ्याचा अर्थ (स्वार्थ-परार्थ) इत्यादी अर्थांना धारण करतो, म्हणून तो 'धम्म' होय. काही विद्वान तर "जो पापी अकुशल धम्मांना धुवून टाकतो, कंपित करतो, नष्ट करतो तो धम्म होय" अशी 'धू' धातूवरूनही व्युत्पत्ती सांगतात; ती मार्गधम्माच्या बाबतीत अत्यंत योग्य ठरते, परंतु फल, निर्वाण आणि परियत्ति धम्मांच्या बाबतीत ती पर्यायाने योग्य ठरते. ธมฺมสทฺโท ปริยตฺติเหตุคุณนิสฺสตฺตนิชฺชีวตาทีสุ ทิสฺสติ. อยญฺหิ ‘‘ธมฺมํ ปริยาปุณาติ สุตฺตํ เคยฺย’’นฺติอาทีสุ ปริยตฺติยํ ทิสฺสติ. ‘‘เหตุมฺหิ ญาณํ ธมฺมปฏิสมฺภิทา’’ติอาทีสุ เหตุมฺหิ. 'धम्म' शब्द परियत्ति (बुद्धवचन), हेतू, गुण, निस्सत्त (जीव नसणे) आणि निर्जीवता इत्यादी अर्थांमध्ये दिसून येतो. कारण हा "धम्माचा अभ्यास करतो, सुत्त, गेय..." इत्यादी वाक्यांमध्ये 'परियत्ति' या अर्थात दिसतो. "हेतूचे ज्ञान म्हणजे धम्मपटिसंभिदा" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'हेतू' या अर्थात दिसतो. ‘‘น หิ ธมฺโม อธมฺโม จ, อุโภ สมวิปากิโน; อธมฺโม นิรยํ เนติ, ธมฺโม ปาเปติ สุคฺคติ’’นฺติ "धम्म आणि अधम्म हे दोन्ही समान विपाकाचे (परिणामाचे) नसतात; अधम्म नरकात नेतो, तर धम्म सुगतीला पोहोचवतो." อาทีสุ คุเณ. ‘‘ตสฺมึ โข ปน สมเย ธมฺมา โหนฺติ. ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรตี’’ติอาทีสุ นิสฺสตฺตนิชฺชีวตายํ. इत्यादी वाक्यांमध्ये 'गुण' या अर्थात. "त्या वेळी धम्म असतात" किंवा "धम्मांमध्ये धम्मानुपस्सी होऊन विहरतो" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'निस्सत्त' (जीव नसणे) आणि 'निर्जीवता' या अर्थात. อถ วา ธมฺมสทฺโท สภาวปญฺญาปุญฺญปญฺญตฺติอาปตฺติปริยตฺตินิสฺสตฺตนิชฺชีวตาวิการคุณปจฺจ- ยปจฺจยุปฺปนฺนาทีสุ ทิสฺสติ. อยญฺหิ ‘‘กุสลา ธมฺมา อกุสลา ธมฺมา อพฺยากตา ธมฺมา’’ติอาทีสุ สภาเว ทิสฺสติ. अथवा 'धम्म' शब्द स्वभाव, प्रज्ञा, पुण्य, प्रज्ञप्ती, आपत्ती, परियत्ति, niस्सत्त-निर्जीवता, विकार, गुण, प्रत्यय (कारण) आणि प्रत्ययोत्पन्न इत्यादी अर्थांमध्ये दिसून येतो. कारण हा "कुशल धम्म, अकुशल धम्म, अव्याकृत धम्म" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'स्वभाव' या अर्थात दिसतो. ยสฺเสเต [Pg.338] จตุโร ธมฺมา, สทฺธสฺส ฆรเมสิโน; สจฺจํ ธมฺโม ธิติ จาโค, ส เว เปจฺจ น โสจตี’’ติ "ज्या श्रद्धाळू गृहस्थाकडे हे चार धम्म असतात - सत्य, धम्म (प्रज्ञा), धृती आणि त्याग, तो मृत्यूनंतर शोक करत नाही." อาทีสุ ปญฺญายํ. इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रज्ञा' या अर्थात. ‘‘น หิ ธมฺโม อธมฺโม จ, อุโภ สมวิปากิโน; อธมฺโม นิรยํ เนติ, ธมฺโม ปาเปติ สุคฺคติ’’นฺติอาทีสุ "धम्म आणि अधम्म हे दोन्ही समान विपाकाचे नसतात; अधम्म नरकात नेतो, तर धम्म सुगतीला पोहोचवतो" इत्यादी वाक्यांमध्ये... ปุญฺเญ. ‘‘ปญฺญตฺติธมฺมา, นิรุตฺติธมฺมา, อธิวจนาธมฺมา’’ติอาทีสุ ปญฺญตฺติยํ. ‘‘ปาราชิกา ธมฺมา, สงฺฆาทิเสสา ธมฺมา’’ติอาทีสุ อาปตฺติยํ. ‘‘อิธ ภิกฺขุ ธมฺมํ ชานาติ สุตฺตํ เคยฺยํ เวยฺยากรณ’’นฺติอาทีสุ ปริยตฺติยํ. ‘‘ตสฺมึ โข ปน สมเย ธมฺมา โหนฺติ. ธมฺเมสุ ธมฺมานุปสฺสี วิหรตี’’ติอาทีสุ นิสฺสตฺตนิชฺชีวตายํ. ‘‘ชาติธมฺมา ชราธมฺมา มรณธมฺมา’’ติอาทีสุ วิกาเร. ‘‘ฉนฺนํ พุทฺธธมฺมาน’’นฺติอาทีสุ คุเณ. ‘‘เหตุมฺหิ ญาณํ ธมฺมปฏิสมฺภิทา’’ติอาทีสุ ปจฺจเย. ‘‘ฐิตาวสา ธาตุ ธมฺมฏฺฐิตตา ธมฺมนิยามตา’’ติอาทีสุ ปจฺจยุปฺปนฺเน. 'पुण्य' या अर्थात. "प्रज्ञप्ती धम्म, निरुक्ती धम्म, अधिवचन धम्म" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रज्ञप्ती' या अर्थात. "पाराजिका धम्म, संघादिसेसा धम्म" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'आपत्ती' या अर्थात. "येथे भिक्खू धम्म जाणतो - सुत्त, गेय, वेय्याकरण..." इत्यादी वाक्यांमध्ये 'परियत्ति' या अर्थात. "त्या वेळी धम्म असतात", "धम्मांमध्ये धम्मानुपस्सी होऊन विहरतो" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'निस्सत्त' आणि 'निर्जीवता' या अर्थात. "जातिधम्म, जराधम्म, मरणधम्म" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'विकार' (स्वभाव) या अर्थात. "सहा बुद्धधम्मांचे" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'गुण' या अर्थात. "हेतूचे ज्ञान म्हणजे धम्मपटिसंभिदा" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रत्यय' (कारण) या अर्थात. "ती धातू स्थितच आहे, धम्मस्थितता, धम्मनियमता" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रत्ययोत्पन्न' या अर्थात. อถ วา ธมฺมสทฺโท ปริยตฺติสจฺจสมาธิปญฺญาปกติปุญฺญาปตฺติเญยฺยาทีสุ พหูสุ อตฺเถสุ ทิฏฺฐปฺปโยโค. ตถา หิ ‘‘อิธ ภิกฺขุ ธมฺมํ ปริยาปุณาตี’’ติอาทีสุ ปริยตฺติยํ ทิสฺสติ. ‘‘ทิฏฺฐธมฺโม ปตฺตธมฺโม’’ติอาทีสุ สจฺเจ. ‘‘เอวํธมฺมา เต ภควนฺโต อเหสุ’’นฺติอาทีสุ สมาธิมฺหิ. ‘‘สจฺจํ ธมฺโม ธิติ จาโค’’ติ เอวมาทีสุ ปญฺญายํ. ‘‘ชาติธมฺมานํ ภิกฺขเว สตฺตาน’’นฺติ เอวมาทีสุ ปกติยํ. ‘‘ธมฺโม หเว รกฺขติ ธมฺมจาริ’’นฺติ เอวมาทีสุ ปุญฺเญ. ‘‘จตฺตาโร ปาราชิกา ธมฺมา’’ติอาทีสุ [Pg.339] อาปตฺติยํ. ‘‘กุสลา ธมฺมา’’ติอาทีสุ เญยฺเย. เอวํ ธมฺมสทฺทปฺปวตฺติวิสยา วิวิธา อฏฺฐกถาจริเยหิ ทสฺสิตา, ตตฺถ ตตฺถ ปน อาทิสทฺเทน ยุตฺติวิสยาทโย จ อตฺถา คเหตพฺพา. ตถา หิ ธมฺมสทฺโท – अथवा 'धम्म' शब्दाचा प्रयोग परियत्ति, सत्य, समाधी, प्रज्ञा, प्रकृती (स्वभाव), पुण्य, आपत्ती, ज्ञेय इत्यादी अनेक अर्थांमध्ये पाहिलेला आहे. जसे की, "येथे भिक्खू धम्माचा अभ्यास करतो" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'परियत्ति' या अर्थात दिसतो. "ज्याने धम्म पाहिला आहे, धम्म प्राप्त केला आहे" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'सत्य' या अर्थात. "ते भगवान अशा धम्माचे होते" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'समाधी' या अर्थात. "सत्य, धम्म, धृती, त्याग" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रज्ञा' या अर्थात. "हे भिक्खूंनो, जन्मस्वभाव असणाऱ्या प्राण्यांचे..." इत्यादी वाक्यांमध्ये 'प्रकृती' (स्वभाव) या अर्थात. "धम्मचार्याचे धम्मच रक्षण करतो" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'पुण्य' या अर्थात. "चार पाराजिका धम्म" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'आपत्ती' या अर्थात. "कुशल धम्म" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'ज्ञेय' या अर्थात. अशा प्रकारे 'धम्म' शब्दाच्या प्रवृत्तीचे विविध विषय अट्ठकथाचार्यांनी दर्शविले आहेत, आणि त्या त्या ठिकाणी 'आदि' शब्दाने युक्ती, विषय इत्यादी अर्थही ग्रहण केले पाहिजेत. जसे की, 'धम्म' शब्द - ‘‘เนส ธมฺโม มหาราช, ยํ ตฺวํ คจฺเฉยฺย เอกโก; อหมฺปิ เตน คจฺฉามิ, เยน คจฺฉสิ ขตฺติยา’’ติ "हे महाराज, आपण एकटेच जाणे हा धम्म (योग्य मार्ग) नाही; हे क्षत्रिया, ज्या मार्गाने आपण जात आहात, त्याच मार्गाने मीही जाईन." อาทีสุ ยุตฺติยํ วตฺตติ. ‘‘มนญฺจ ปฏิจฺจ ธมฺเม จ อุปฺปชฺชติ มโนวิญฺญาณ’’นฺติอาทีสุ วิสเย. ‘‘สตญฺจ ธมฺโม น ชรํ อุเปตี’’ติ เอตฺถ นิพฺพาเน วตฺตติ. ตตฺร ยา นิสฺสตฺตตา, สา เอว นิชฺชีวตา. โย จ เหตุ, โส เอว ปจฺจโย. इत्यादी वाक्यांमध्ये 'युक्ती' या अर्थात वापरला जातो. "मन आणि धम्मांना अनुसरून मनोविज्ञानाची उत्पत्ती होते" इत्यादी वाक्यांमध्ये 'विषय' (आलंबन) या अर्थात. "सत्पुरुषांचा धम्म कधीही वृद्धत्वाला प्राप्त होत नाही" येथे 'निर्वाण' या अर्थात वापरला जातो. तेथे जी 'निस्सत्तता' (जीव नसणे) आहे, तीच 'निर्जीवता' आहे. आणि जो 'हेतू' आहे, तोच 'प्रत्यय' (कारण) आहे. อิจฺเจวํ – अशा प्रकारे - ปริยตฺติปจฺจเยสุ, คุเณ นิสฺสตฺตตาย จ; สภาเว เจว ปญฺญายํ, ปุญฺเญ ปญฺญตฺติยมฺปิ จ. परियत्ति, प्रत्यय, गुण, निस्सत्तता, स्वभाव, प्रज्ञा, पुण्य आणि प्रज्ञप्तीमध्येही. อาปตฺติยํ วิกาเร จ, ปจฺจยุปฺปนฺนเกปิ จ; สจฺจสมาธิปกติ-เญยฺเยสุ ยุตฺติยมฺปิ จ; วิสเย เจว นิพฺพาเน, ธมฺมสทฺโท ปวตฺตติ. आपत्ती, विकार, प्रत्ययोत्पन्न, सत्य, समाधी, प्रकृती, ज्ञेय, युक्ती, विषय आणि निर्वाणामध्ये 'धम्म' शब्द प्रवृत्त होतो. เกจิ ปน ธมฺมสทฺทสฺส ปวตฺติวิสยานํ ทสธาว ปริจฺเฉทํ วทนฺติ. काही लोक तर 'धम्म' शब्दाच्या प्रवृत्तीच्या विषयांचे केवळ दहा प्रकारे वर्गीकरण सांगतात. เญยฺยมคฺเค จ นิพฺพาเน, สภาเว อถ ชาติยํ; มเน วิสยปุญฺเญสุ, ภาเว ปาวจเนปิ จ; อิเมสุ ทสสฺวตฺเถสุ, ธมฺมสทฺโท ปวตฺตติ. ज्ञेय, मार्ग, निर्वाण, स्वभाव, जन्म (जाती), मन, विषय, पुण्य, भाव आणि प्रवचन (पावचन) या दहा अर्थांमध्ये 'धम्म' शब्द प्रवृत्त होतो. ตตฺร อตฺถุทฺธาโรติ สมานสทฺทวจนียานํ อตฺถานํ อุทฺธรณํ อตฺถุทฺธาโร. तेथे 'अत्थुद्धार' (अर्थोद्धार) म्हणजे समान शब्दांनी व्यक्त होणाऱ्या अर्थांचे प्रकटीकरण (उद्धरण) करणे होय. รการนฺตธาตุรูปานิ. 'र' कारान्त धातूंची रूपे. ลการนฺตธาตุ 'ल' कारान्त धातू. ปาล [Pg.340] รกฺขเณ. ‘‘รกฺขณํ, ตาณํ, โคปนํ, อวนํ, ปาลนํ, รกฺขา, รกฺขณา, คุตฺติ’’ อิจฺเจเต ปริยายา. ปาเลติ, ปาลยติ. ปาลโก, พุทฺธปาโล. อมฺพปาลี คณิกา. สโม ภวตุ ปาลินา. ปาลิโต, ปาลนํ, ปาฬิ. 'पाल' धातू रक्षणाच्या अर्थात आहे. "रक्षण, त्राण, गोपन, अवन, पालन, रक्षा, रक्षणा, गुत्ती (गुप्ती)" हे याचे समानार्थी शब्द आहेत. पालेति, पालयति. पालक, बुद्धपाल. अंबपाली गणिका. "पालकासोबत समान असो." पालित, पालन, पाळि. เอตฺถ ปาฬีติ อตฺถํ ปาเลตีติ ปาฬิ, ลสฺส ฬตฺตํ. อถ วา อนฺโตทกํ รกฺขณฏฺเฐน มหโต ตฬากสฺส ถิรา มหตีติ ปาฬิ วิยาติ ปาฬิ, ปริยตฺติธมฺโม. อปโร นโย ปกฏฺฐานํ อุกฺกฏฺฐานํ สีลาทิอตฺถานํ โพธนโต สภาวนิรุตฺติภาวโต พุทฺธาทีหิ ภาสิตตฺตา จ ปกฏฺฐานํ วจนปฺปพนฺธานํ อาฬีติ ปาฬิ. येथे 'पाळि' म्हणजे जी अर्थाचे पालन (रक्षण) करते ती 'पाळि', येथे 'ल' चा 'ळ' झाला आहे. किंवा, आतल्या पाण्याचे रक्षण करण्याच्या अर्थाने मोठ्या तलावाची जी मजबूत आणि मोठी 'पाळ' (तट) असते, त्याप्रमाणे जी आहे ती 'पाळि' म्हणजेच 'परियत्तिधम्म' (बुद्धवचन) होय. दुसरा प्रकार असा की, श्रेष्ठ आणि उत्कृष्ट अशा शील इत्यादी अर्थांचे बोध करून देणारी असल्यामुळे, स्वभाव-निरुक्तीच्या (नैसर्गिक भाषेच्या) स्वरूपात असल्यामुळे आणि बुद्ध इत्यादींनी भाषिलेली असल्यामुळे, श्रेष्ठ अशा वचन-प्रबंधांची (वाक्यांच्या रचनांची) जी 'आळि' (पंक्ती) आहे, ती 'पाळि' होय. ปาฬิสทฺโท ปาฬิธมฺเม, ตฬากปาฬิยมฺปิ จ; ทิสฺสเต ปนฺติยญฺเจว, อิติ เญยฺยํ วิชานตา. 'पाळि' हा शब्द पाळिधम्मामध्ये (परियत्तिधम्मामध्ये), तलावाच्या पाळीमध्ये (तटावर) आणि पंक्तीमध्ये (ओळीमध्ये) देखील दिसून येतो, असे सुज्ञांनी जाणावे. อยญฺหิ ‘‘ปาฬิยา อตฺถมุปปริกฺขนฺตี’’ติอาทีสุ ปริยตฺติธมฺมสงฺขาเต ปาฬิธมฺเม ทิสฺสติ. ‘‘มหโต ตฬากสฺส ปาฬี’’ติอาทีสุ ตฬากปาฬิยํ. ‘‘ปาฬิยา นิสีทึสู’’ติอาทีสุ ปนฺติยํ, ปฏิปาฏิยา นิสีทึสูติ อตฺโถ. อิมสฺมึ ปนตฺเถ ธาตุยา กิจฺจํ นตฺถิ. ปาฏิปทิโก หิ ปนฺติวาจโก ปาฬิสทฺโท. कारण हा शब्द 'पाळिया अत्थमुपपरिक्खन्ति' (पाळीच्या अर्थाची परीक्षा करतात) इत्यादी वाक्यांमध्ये 'परियत्तिधम्म' म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या पाळिधम्मामध्ये दिसून येतो. 'महतो तळाकस्स पाळि' (मोठ्या तलावाची पाळ) इत्यादींमध्ये तलावाच्या पाळीच्या अर्थात. 'पाळिया निसीदिंसु' (पंक्तीमध्ये बसले) इत्यादींमध्ये पंक्तीच्या अर्थात, म्हणजेच 'क्रमाने बसले' असा अर्थ आहे. परंतु या अर्थामध्ये धातूचे काही कार्य नाही. कारण पंक्तीवाचक 'पाळि' हा शब्द प्रातिपदिक (मूळ नाम) आहे. ติล สิเนหเน. เตเลติ, เตลยติ. เตลํ, ติโล, ติลํ. 'तिल' (tila) धातू स्नेह (स्निग्धता/तेल लावणे) या अर्थात आहे. 'तेलेति', 'तेलयति' (तो तेल लावतो/स्निग्ध करतो). 'तेल' (तेल), 'तिलो' (तीळ वनस्पती), 'तिल' (तीळ दाणा). ตตฺถ ติโลติ ติลคจฺโฉ. ติลนฺติ ตปฺผลํ. ตโต ปน นิกฺขนฺโต สิเนโห เตลํ. โส หิ ‘‘ติลานํ อิทนฺติ เตล’’นฺติ วุจฺจติ. ยทิ เอวํ ‘‘สาสปเตล’’นฺติอาทิวจนํ น ยุชฺเชยฺยาติ? โน น ยุชฺชติ, ‘‘ติลสิเนหเน’’ติ เอวํ วุตฺตาย ติลธาตุยา สามญฺญโต ยสฺส [Pg.341] กสฺสจิ สิเนหสฺส วจนโต. เตน ‘‘สาสปเตลํ, มธุกเตล’’นฺติอาทโย สาสเน ปโยคา ทิสฺสนฺติ. มยํ ปน ติลธาตุวเสน นิปฺผนฺนานํ ติลคจฺฉตปฺผลวาจกานํ ‘‘ติโล, ติล’’นฺติ สทฺทรูปานํ ปกาสนมุเขน ‘‘ติลานํ อิทนฺติ เตล’’นฺติ วทาม, น ปน เตน วจเนน สาสปาทีนํ สิเนหสฺส อเตลตฺตํ วทาม. อถ กิญฺจรหีติ เจ? ตทฺธิตวิธาเน วิญฺญุนํ โกสลฺลตฺถํ ติลสทฺทํ ปฏิจฺจ ‘‘ติลานํ อิทนฺติ เตล’’นฺติ วทาม. สิเนหสงฺขาตสฺส สาสปาทีนํ เตลสฺส วจนํ น ชหาม, ตสฺมา อุทาหรณปฺปกาสเน ‘‘ติโล, ติลํ, เตล’’นฺติ อวตฺวา ‘‘เตลํ, ติโล, ติล’’นฺติ อมฺเหหิ วุตฺตํ. อิทญฺหิ วจนํ เตลสฺส สามญฺญโต สิเนเห ปวตฺตึ ทีเปติ. เตเนว จ สาสเน ‘‘ติลเตลํ, สาสปเตล’’นฺติอาทินา วิเสสวจนมฺปิ ทิสฺสตีติ นิฏฺฐเมตฺถาวคนฺตพฺพํ. อปิจ เตลสทฺโท เยภุยฺเยน ติลเตเล วตฺตติ, ยถา มิคสทฺโท หริณมิเคติปิ ทฏฺฐพฺพํ. त्यामध्ये 'तिलो' म्हणजे तिळाचे झाड. 'तिल' म्हणजे त्याचे फळ (तीळ दाणा). आणि त्यापासून निघालेला स्नेह (स्निग्ध पदार्थ) म्हणजे 'तेल'. कारण त्याला 'तिळाचे ते तेल' असे म्हटले जाते. जर असे असेल, तर 'सासपतेल' (मोहरीचे तेल) इत्यादी शब्दप्रयोग योग्य ठरणार नाहीत का? नाही, ते अयोग्य नाही; कारण 'तिल सिनेहने' अशा प्रकारे सांगितलेल्या 'तिल' धातूद्वारे सामान्यतः कोणत्याही स्नेहाचा (तेलाचा) बोध होतो. म्हणूनच शासनात (बुद्धवचनात) 'सासपतेल' (मोहरीचे तेल), 'मधुकतेल' (महुआचे तेल) इत्यादी प्रयोग दिसून येतात. परंतु आम्ही 'तिल' धातूपासून निष्पन्न झालेल्या, तिळाचे झाड आणि त्याचे फळ दर्शवणाऱ्या 'तिलो', 'तिल' या शब्दरूपांच्या स्पष्टीकरणाद्वारे 'तिळाचे ते तेल' असे म्हणतो; पण त्या बोलण्याने मोहरी इत्यादींच्या स्नेहाला 'तेल' न म्हणणे असे आमचे मत नाही. तर मग काय आहे? तद्धित विधीमध्ये विद्वानांच्या कौशल्यासाठी 'तिल' शब्दाचा आश्रय घेऊन 'तिळाचे ते तेल' असे आम्ही म्हणतो. स्नेह म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या मोहरी इत्यादींच्या तेलाचा वाचक शब्द आम्ही सोडत नाही, म्हणूनच उदाहरणांच्या स्पष्टीकरणात 'तिलो, तिल, तेल' असे न म्हणता आम्ही 'तेल, tilo, तिल' असे म्हटले आहे. कारण हे वचन 'तेल' शब्दाची सामान्यतः स्नेहामध्ये (स्निग्ध पदार्थात) असणारी प्रवृत्ती दर्शवते. म्हणूनच शासनात 'तिलतेल' (तिळाचे तेल), 'सासपतेल' (मोहरीचे तेल) इत्यादी विशेष शब्दप्रयोगही दिसून येतात, असा निष्कर्ष येथे समजून घ्यावा. शिवाय, 'तेल' हा शब्द प्रामुख्याने तिळाच्या तेलासाठी वापरला जातो, ज्याप्रमाणे 'मृग' (प्राणी) हा शब्द प्रामुख्याने हरिण या प्राण्यासाठी वापरला जातो, असे पाहावे. ชล อปวารเณ. ชาเลติ, ชาลยติ. ชาลํ, ชาลา. ชาลนฺติ มจฺฉชาลํ. ชาลาติ อคฺคิชาลา. 'जल' (jala) धातू अपवारण (झाकणे/वेढणे) या अर्थात आहे. 'जालेति', 'जालयति' (तो जाळे पसरवतो/वेढतो). 'जाल' (जाळे), 'जाला' (ज्वाला). 'जाल' म्हणजे माशांचे जाळे (मत्स्यजाल). 'जाला' म्हणजे अग्नीची ज्वाला (अग्निज्वाला). ขล โสเจยฺเย. โสเจยฺยํ สุจิภาโว. ขาเลติ, ขาลยติ. ปกฺขาเลติ, ปกฺขาลยติ. 'खल' (khala) धातू शौच (स्वच्छता/शुद्धीकरण) या अर्थात आहे. शौच म्हणजे शुद्ध भाव (स्वच्छता). 'खालेति', 'खालयति' (तो धुतो/स्वच्छ करतो). 'पक्खालेति', 'पक्खालयति' (तो प्रक्षालन करतो/चांगला धुतो). ตล ปติฏฺฐายํ. ตาเลติ, ตาลยติ. ตาโล, ตลํ. 'तल' (tala) धातू प्रतिष्ठा (प्रतिष्ठापन/आधार देणे) या अर्थात आहे. 'तालेति', 'तालयति' (तो आधार देतो/प्रतिष्ठित करतो). 'तालो' (ताडाचे झाड), 'तल' (तळ/पृष्ठभाग). เอตฺถ ตาโลติ ติณราชรุกฺโข. ตลนฺติ ปาณิตลภูมิตลาทิ. ตญฺหิ ตาลยติ ปติฏฺฐาติ เอตฺถ วตฺถุชาตนฺติ ตลํ. येथे 'तालो' म्हणजे तृणराज वृक्ष (ताडाचे झाड). 'तल' म्हणजे तळहात (पाणितल), भूमीचा पृष्ठभाग (भूमितल) इत्यादी. कारण ते आधार देते किंवा त्यावर वस्तूंची उत्पत्ती प्रतिष्ठित होते, म्हणून त्याला 'तल' (तळ) म्हणतात. ตุล อุมฺมาเน. โตเลติ, โตลยติ. 'तुल' (tula) धातू उन्मान (तोलणे/मापन करणे) या अर्थात आहे. 'तोलेति', 'तोलयति' (तो तोलतो/मोजतो). ทุล [Pg.342] อุกฺเขเป. อุกฺเขโป อุทฺธํ ขิปนํ. โทเลติ, โทลยติ. โทลา. 'दुल' (dula) धातू उत्क्षेप (वर फेकणे/झुलवणे) या अर्थात आहे. उत्क्षेप म्हणजे वर फेकणे. 'दोलेति', 'दोलयति' (तो झुलवतो). 'दोला' (पाळणा/झुला). เอตฺถ จ โทลิยติ อุกฺขิปิยติ ยตฺถ นิปนฺโน ทารโก, ยถานิปนฺนโก วาติ โทลา. आणि येथे ज्यामध्ये निजलेले मूल झुलवले जाते किंवा वर उचलले जाते, त्या निजण्याच्या साधनाला 'दोला' (पाळणा) म्हणतात. วุล นิมฺมชฺชเน. โวเลติ, โวยลติ. 'वुल' (vula) धातू निमज्जन (बुडवणे) या अर्थात आहे. 'वोलेति', 'वोयलति' (तो बुडवतो). มีล นิมีลเน. มีเลติ, มีลยติ. มีลนํ, อุมฺมีลนํ, นิมีลนํ. 'मील' (mīla) धातू निमीलन (डोळे मिटणे) या अर्थात आहे. 'मीलेति', 'मीलयति' (तो डोळे मिटतो). 'मीलन' (मिटणे), 'उम्मीलन' (डोळे उघडणे), 'निमीलन' (डोळे मिटणे). มูล โรหเน. มูเลติ, มูลยติ. มูลํ. เอสา หิ ยทา ปติฏฺฐายํ วตฺตติ, ตทา ภูวาทิคณิกา, ‘‘มูลตี’’ติ จสฺสา รูปํ. 'मूल' (mūla) धातू रोहण (रुजणे/उगवणे) या अर्थात आहे. 'मूलेति', 'मूलयति' (तो रुजवतो/उगवतो). 'मूल' (मूळ). कारण जेव्हा हा धातू प्रतिष्ठा (स्थिर राहणे) या अर्थात वापरला जातो, तेव्हा तो भ्वादिगणीय असतो आणि त्याचे रूप 'मूलति' असे होते. ตตฺถ มูลนฺติ มูลยติ รูหติ รุกฺขาทิ เอเตนาติ มูลํ. อถ วา มูลยติ ฉินฺโนปิ โกจิ เอเตน อจฺฉินฺเนน ปุนเทว รูหตีติ มูลํ. วุตฺตญฺหิ – त्यामध्ये 'मूल' म्हणजे ज्याच्याद्वारे वृक्ष इत्यादी उगवतात (रुजतात), ते 'मूल' (मूळ) होय. किंवा, वृक्ष कापला गेला तरीही ज्याच्या न कापल्या गेलेल्या भागामुळे तो पुन्हा उगवतो, ते 'मूल' (मूळ) होय. कारण असे म्हटले आहे की - ‘‘ยถาปิ มูเล อนุปทฺทเว ทฬฺเห,ฉินฺโนปิ รุกฺโข ปุนเทว รูหติ; เอวมฺปิ ตณฺหานุสเย อนูหเต,นิพฺพตฺตติ ทุกฺขมิทํ ปุนปฺปุน’’นฺติ; “ज्याप्रमाणे मूळ सुरक्षित आणि मजबूत असेल, तर कापलेला वृक्षही पुन्हा उगवतो; त्याचप्रमाणे तृष्णेचा अनुशय (सुप्त वासना) नष्ट न केल्यास, हे दुःख पुन्हा पुन्हा उत्पन्न होत राहते.” มูลสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร เหฏฺฐา ภูวาทิคเณ วุตฺโต. 'मूल' शब्दाचा अर्थ-उद्धार (अर्थाचे स्पष्टीकरण) खाली भ्वादिगणामध्ये सांगितला आहे. กล ปิล เขเป. กาเลติ, กาลยติ. กาโล. ปิเลติ, ปิลยติ. 'कल' (kala) आणि 'पिल' (pila) हे धातू क्षेप (फेकणे/नष्ट करणे/वेळ घालवणे) या अर्थात आहेत. 'कालेति', 'कालयति' (तो घालवतो/नष्ट करतो). 'कालो' (काळ/वेळ/मृत्यू). 'पिलेति', 'पिलयति' (तो फेकतो/घालवतो). เอตฺถ กาโลติ สมโยปิ มจฺจุปิ. ตตฺร สมโย เตสํ เตสํ สตฺตานํ อายุํ กาลยติ เขเปติ ทิวเส ทิวเส อปฺปํ อปฺปํ กโรตีติ กาโลติ วุจฺจติ. วุตฺตมฺปิ เจตํ – येथे 'कालो' म्हणजे समय (वेळ) आणि मृत्यू देखील. त्यामध्ये समय (वेळ) हा त्या त्या प्राण्यांचे आयुष्य घालवतो, संपवतो, दिवसेंदिवस कमी कमी करतो, म्हणून त्याला 'काळ' (कालो) म्हटले जाते. हे असे म्हटलेही आहे - ‘‘กาโล ฆสติ ภูตานิ, สพฺพาเนว สหตฺตนา; โย จ กาลฆโส ภูโต, สภูตปจนึปจี’’ติ. “काळ सर्व प्राण्यांना स्वतःसह गिळंकृत करतो; आणि जो काळाला गिळंकृत करणारा (अर्हत) आहे, त्याने प्राण्यांना शिजवणाऱ्या (काळाला) शिजवले आहे (नष्ट केले आहे).” มจฺจุ [Pg.343] ปน กาลยติ เตสํ เตสํ สตฺตานํ ชีวิตํ เขเปติ สมุจฺเฉทวเสน นาเสตีติ กาโลติ วุจฺจติ. เตนาหุ อฏฺฐกถาจริยา ‘‘กาโลติ มจฺจุ. กาลยติ สตฺตานํ ชีวิตํ นาเสตีติ กาโล. กาเลน มจฺจุนา กโต นาสิโตติ กาลกโต’’ติ. ‘‘มรณํ หินฺทํ มจฺจุ มฏฺฏุ จุติ กาโล อนฺตโก นิกฺเขโป’’ติ มรณสฺสาภิธานานิ. परंतु मृत्यू हा त्या त्या प्राण्यांचे जीवन संपवतो, समूळ नष्ट करतो, म्हणून त्याला 'काळ' (कालो) म्हटले जाते. म्हणूनच अट्ठकथाचार्यांनी म्हटले आहे - 'काळ म्हणजे मृत्यू. जो प्राण्यांचे जीवन संपवतो, नष्ट करतो तो काळ. काळाने म्हणजेच मृत्यूने ज्याचा नाश केला तो कालकतो (मरण पावलेला).' 'मरणं, हिंदं, मच्चु, मट्टु, चुति, कालो, अंतको, निक्खेपो' ही मरणाची (मृत्यूची) नावे आहेत. สุลฺล สชฺชเน. สุลฺเลติ, สุลฺลยติ. 'सुल्ल' (sulla) धातू सज्जन (तयार करणे/सजवणे) या अर्थात आहे. 'सुल्लेति', 'सुल्लयति' (तो सजवतो/तयार करतो). อิล เปรเณ. อิเลติ, อิลยติ. 'इल' (ila) धातू प्रेरण (प्रेरणा देणे/चालवणे) या अर्थात आहे. 'इलेति', 'इलयति' (तो प्रेरित करतो/चालवतो). วล ภรเณ. วาเลติ, วาลยติ. วาโล. 'वल' (vala) धातू भरण (भरणपोषण करणे/धारण करणे) या अर्थात आहे. 'वालेति', 'वालयति' (तो भरणपोषण करतो/धारण करतो). 'वालो' (केस/केसांचा झुबका/वाल). ลล อิจฺฉายํ. ลเลติ, ลลยติ. 'लल' (lala) धातू इच्छा (इच्छा करणे/विलास करणे) या अर्थात आहे. 'ललेति', 'ललयति' (तो इच्छा करतो/विलास करतो). ทล วิทารเณ. ทาเลติ, ทาลยติ, ปทาเลติ, ปทาลยติ. กุทาโล. 'दल' (dala) धातू विदारण (फाडणे/भेदणे) या अर्थात आहे. 'दालेति', 'दालयति', 'पदालेति', 'पदालयति' (तो फाडतो/भेदतो/नष्ट करतो). 'कुदालो' (कुदळ). กล คติสงฺขฺยาเนสุ. กาเลติ, กาลยติ. กาโล, กลา. กลาติ อวยโว. สา หิ กาลยิตพฺพา สงฺขายิตพฺพาติ กลา. 'कल' (kala) धातू गती आणि संख्यान (मोजणे) या अर्थांत आहे. 'कालेति', 'कालयति' (तो गती करतो/मोजतो). 'कालो' (काळ), 'कला' (कला). 'कला' म्हणजे अवयव (भाग). कारण तिचे आकलन केले जाते किंवा ती मोजली जाते, म्हणून ती 'कला' होय. สีล อุปธารเณ. อุปธารณํ ภุโส ธารณํ, ปติฏฺฐาวเสน อาธารภาโว. สีเลติ, สีลยติ. สีลํ, สีลนํ. 'सील' (sīla) धातू उपधारण (धारण करणे) या अर्थात आहे. उपधारण म्हणजे दृढपणे धारण करणे, प्रतिष्ठेच्या रूपाने आधारभूत असणे. 'सीलेति', 'सीलयति' (तो धारण करतो/आचरण करतो). 'सीलं' (शील), 'सीलनं' (शीलन/आचरण). เอตฺถ สีลนฺติ สีเลติ อุปธาเรติ ตํสมงฺคีปุคฺคลํ อปาเยสุ อุปฺปตฺตินิวารณวเสน ภุโส ธาเรตีติ สีลํ. อถ วาสีลิยติ อุปจาริยติ สปฺปุริเสหิ หทยมํสนฺตรํ อุปเนตฺวา ธาริยตีติ สีลํ. สีลนนฺติ ภูวาทิคเณ อวิปฺปกิณฺณตาสงฺขาตํ สมาธานํ วุจฺจติ. ตตฺถ ‘‘สีลตี’’ติ รูปํ, อิธ ปน อาธารภาวสงฺขาตํ อุปธารณํ วุจฺจติ. เอตฺถ จ ‘‘สีเลติ, สีลยตี’’ติ รูปานิ. อฏฺฐกถาสุ หิ ‘‘กุสลานํ ธมฺมานํ [Pg.344] ปติฏฺฐาวเสน อาธารภาโว อุปธารณ’’นฺติ วุตฺโต. येथे 'सीलं' (शील) म्हणजे जे धारण करते, उपधारण करते, त्या शीलयुक्त पुद्गलाला (व्यक्तीला) अपायांमध्ये (दुर्गतीमध्ये) उत्पन्न होण्यापासून रोखून दृढपणे धारण करते, ते 'शील' होय. किंवा, सत्पुरुषांद्वारे ज्याचे आचरण केले जाते, जे हृदयाच्या गाभ्यात ठेवून धारण केले जाते, ते 'शील' होय. भ्वादिगणामध्ये 'सीलनं' म्हणजे अविक्षिप्तता (एकाग्रता) म्हणून ओळखले जाणारे समाधान (चित्ताची स्थिरता) म्हटले जाते. तेथे 'सीलति' असे रूप होते, परंतु येथे आधारभूत असणे या अर्थाने 'उपधारण' म्हटले आहे. आणि येथे 'सीलेति', 'सीलयति' अशी रूपे होतात. कारण अट्ठकथांमध्ये 'कुशल धर्मांच्या प्रतिष्ठेच्या रूपाने आधारभूत असणे म्हणजे उपधारण होय' असे म्हटले आहे. เวล กาโลปเทเส. เวเลติ, เวลยติ. เวลา. เกจิ ‘‘เวล อิติ ธาตุสทฺโท น โหตี’’ติ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ, โปราเณหิ สทฺทสตฺถวิทูหิ ‘‘เวลยตี’’ติ รูปสฺส ทสฺสิตตฺตา. 'वेल' (vela) धातू कालोपदेश (वेळ दर्शवणे/मर्यादा निश्चित करणे) या अर्थात आहे. 'वेलेति', 'वेलयति' (तो वेळ दर्शवतो/मर्यादा ठरवतो). 'वेला' (वेळ/मर्यादा/किनारा). काही लोक 'वेल हा धातू शब्द नाही' असे म्हणतात, ते स्वीकारू नये; कारण प्राचीन व्याकरणकारांनी 'वेलयति' हे रूप दाखवले आहे. ปล มูล ลวนปวเนสุ. ลวนํ เฉทนํ, ปวนํ โสธนํ. ปาเลติ, ปาลยติ. ปลํ. ปลํ นาม มานวิเสโส. โลกสฺส วิมตึ ปาเลติ ลุนาติ โสเธติ จาติ ปลํ. มูเลติ, มูลยติ. สทฺทสตฺถวิทู ปน ‘‘มูลยติ เกทารํ, มูลยติ ธญฺญ’’นฺติ ปโยคํ วทนฺติ. पल् आणि मूल् हे धातू लवन (कापणे/छेदणे) आणि पवन (शुद्ध करणे) या अर्थांमध्ये आहेत. लवन म्हणजे छेदणे, पवन म्हणजे शोधन (शुद्ध करणे). पालेति, पालयति. पल. 'पल' हे एका विशिष्ट मापाचे नाव आहे. जे लोकांच्या संशयाचे रक्षण करते, छेदन करते आणि शोधन करते, ते 'पल' होय. मूलेति, मूलयति. शब्दशास्त्रज्ञ (व्याकरणकार) मात्र 'मूलायति केदारं' (शेताची मशागत करतो), 'मूलायति धञ्ञं' (धान्य गोळा करतो) असा प्रयोग सांगतात. ถูล ปริพฺรูหเน. ปริพฺรูหนํ วฑฺฒนํ. ถูเลติ, ถูลยติ. ถูโล ปุริโส. ถูลา ชเวน หายนฺติ. थूल् धातू परिपरिब्रूहण (वाढवणे/पुष्ट करणे) या अर्थात आहे. परिब्रूहण म्हणजे वर्धन (वाढवणे). थूलेति, थूलयति. थूलो पुरिसो (स्थूल माणूस). थूला जवेन हायन्ति (स्थूल प्राणी वेगाने धावण्यात मागे पडतात). ปล คติยํ. ปเลติ, ปลยติ. อตฺถํ ปเลติ น อุเปติ สงฺขํ. ปเลติ รสมาทาย. ยถา สุตฺตคุฬํ ยตฺตเกหิ สุตฺเตหิ เวฐิตํ, ตตฺตเกหิ เอว ปลยติ. पल् धातू गती (जाणे) या अर्थात आहे. पालेति, पालयति. 'अत्थं पालेति न उपेति सङ्खं' (अस्ताला जातो, संख्येत येत नाही). 'पालेति रसमादाय' (रस घेऊन निघून जातो). 'यथा सुत्तगुळं यत्तकेहि सुत्तेhi वेठितं, तत्तकेहि एव पालयति' (ज्याप्रमाणे दोऱ्याचा गोळा जितक्या दोऱ्यांनी वेढलेला असतो, तितक्याच दोऱ्यांनी तो उलगडतो/निघून जातो). จิงฺคุล ปริพฺภมเน. จิงฺคุเลติ, จิงฺคุลยติ. จิงฺคุลยิตฺวา. อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘ยาวติกา อภิสงฺขารสฺส คติ, ตาวติกํ คนฺตฺวา จิงฺคุลยิตฺวา ภูมิยํ ปปตี’’ติ. ตตฺถ จิงฺคุลยิตฺวาติ ปริพฺภมิตฺวา. चिङ्गुल् धातू परिभ्रमण (गरगर फिरणे) या अर्थात आहे. चिङ्गुलेति, चिङ्गुलयति. चिङ्गुलयित्वा. येथे हे पाळीवचन आहे: 'यावतिका अभिसङ्खारस्स गति, तावतिकं गन्त्वा चिङ्गुलयित्वा भूमियं पपती' (अभिसंस्काराची जितकी गती असते, तितके जाऊन, गरगर फिरून जमिनीवर पडतो). तेथे 'चिङ्गुलयित्वा' म्हणजे परिभ्रमण करून (गरगर फिरून). ลการนฺตธาตุรูปานิ. 'ल' कारान्त धातूंची रूपे. วการนฺตธาตุ 'व' कारान्त धातू. ทิวุ ปริกูชเน. ปริกูชนํ คชฺชนํ. เทเวติ, เทวยติ. เทโว จ ปริเทวิตฺวา. เทโวติ เมโฆ. दिवु धातू परिकूजन (गर्जना करणे) या अर्थात आहे. परिकूजन म्हणजे गर्जना करणे. देवेति, देवयति. 'देवो च परिदेवित्वा'. 'देवो' म्हणजे मेघ (ढग). ทิวุ [Pg.345] อทฺทเน. อทฺทนํ คนฺธปิสนนฺติ วทนฺติ. เทเวติ, เทวยติ. दिवु धातू अद्दन या अर्थात आहे. अद्दन म्हणजे गंध वाटणे (पिसणे) असे म्हणतात. देवेति, देवयति. จิว ภาสายํ. จิเวติ, จิวยติ. चिव् धातू भाषा (बोलणे) या अर्थात आहे. चिवेति, चिवयति. วการนฺตธาตุรูปานิ. 'व' कारान्त धातूंची रूपे. สการนฺตธาตุ 'स' कारान्त धातू. ปุส โปสเน. โปเสติ, โปสยติ. อิมานิ รูปานิ กิญฺจาปิ ภูวาทิคณิกํ ‘‘โปเสตี’’ติ รูปํ ปฏิจฺจ เหตุกตฺตุรูปานิ วิย ทิสฺสนฺติ, ตถาปิ ‘‘อญฺเญปิ เทโว โปเสตี’’ติอาทิกสฺส จุราทิคณิกรูปสฺส ทสฺสนโต สุทฺธกตฺตุวเสน วุตฺตานีติ ทฏฺฐพฺพํ. อุภินฺนํ ปน การิตฏฺฐาเน ‘‘โปสาเปติ, โปสาปยตี’’ติ เหตุกตฺตุรูปานิ อิจฺฉิตพฺพานิ. पुस् धातू पोषण करणे या अर्थात आहे. पोसेति, पोसयति. ही रूपे जरी भ्वादिगणीय 'पोसेति' या रूपाच्या आधारे प्रयोजक (हेतुकर्तृ) रूपांसारखी दिसत असली, तरीही 'अञ्ञेपि देवो पोसेति' (इतरांचेही देव पोषण करतो) इत्यादी चुरादिगणीय रूपांच्या दर्शनावरून ती शुद्ध कर्त्याच्या अर्थात (शुद्धकर्तृ) म्हटली आहेत असे समजावे. परंतु दोन्हीच्या प्रयोजक (कारित) अर्थात 'पोसापेति, poसापयति' अशी प्रयोजक रूपे मानली पाहिजेत. เปส ปฏิหรเณ. เปเสติ, เปสยติ. पेस् धातू पटिहरण (पाठवणे/प्रेषण करणे) या अर्थात आहे. पेसेति, पेसयति. ปิส พลปาณเนสุ. ปิเสติ, ปิสยติ. पिस् धातू बल आणि प्राणन (जीवन जगणे) या अर्थात आहे. पिसेति, पिसयति. ปสิ นาสเน. ปํเสติ, ปํสยติ. पसि धातू नाशन (नाश करणे/दूषित करणे) या अर्थात आहे. पंसेति, पंसयति. ชสิ รกฺขเณ. ชํเสติ, ชํสยติ. जसि धातू रक्षण करणे या अर्थात आहे. जंसेति, जंसयति. สิเลส สิเลสเน. สิเลเสติ, สิเลสยติ. สิเลโส. सिलेस धातू सिलेसन (चिकटवणे/श्लेषण) या अर्थात आहे. सिलेसेति, सिलेसयति. सिलेसो. ลูส หึสายํ. ลูเสติ, ลูสยติ. लूस् धातू हिंसा करणे या अर्थात आहे. लूसेति, लूसयति. ปุนฺส อภิมทฺทเน. นกาโร นิคฺคหีตตฺถํ. ปุํเสติ, ปุํสยติ. นปุํสโก. ธาตุนการสฺส โลเป ‘‘โปโส’’ อิจฺจปิ รูปํ. पुन्स् धातू अभिमर्दन (मर्दन करणे/दडपून टाकणे) या अर्थात आहे. 'न' कार हा अनुस्वारासाठी (निग्गहीत) आहे. पुंसेति, पुंसयति. नपुंसको. धातूच्या 'न' काराचा लोप झाल्यावर 'पोसो' असे रूप बनते. ตตฺถ น ปุํสโกติ อิตฺถิภาวปุมฺภาวรหิโต ปุคฺคโล. โส หิ ปุริโส วิย สาติสยํ ปจฺจามิตฺเต น ปุํเสติ อภิมทฺทนํ [Pg.346] กาตุํ น สกฺโกตีติ นปุํสโกติ วุจฺจติ. เกจิ ปน ‘‘น ปุมา, น อิตฺถี’’ติ นปุํสโกติ วจนตฺถํ วทนฺติ. ตถา หิ สทฺทสตฺถวิทู ตํ ปุคฺคลํ นปุํสกลิงฺควเสน นปุํสกนฺติ วทนฺติ. तेथे 'नपुंसक' म्हणजे स्त्रीभाव आणि पुरुषभावापासून रहित असलेली व्यक्ती. कारण तो पुरुषाप्रमाणे शत्रूंना अत्यंतिकपणे दडपून टाकू (मर्दन करू) शकत नाही, म्हणून त्याला 'नपुंसक' म्हटले जाते. काही जण मात्र 'ना पुरुष, ना स्त्री' असा 'नपुंसक' शब्दाचा अर्थ सांगतात. तसेच व्याकरणकार त्या व्यक्तीला नपुंसकलिंगाच्या आधारे 'नपुंसक' असे म्हणतात. ธูส กนฺติกรเณ. ธูเสติ, ธูสยติ. धूस धातू कांती करणे (शोभा वाढवणे) या अर्थात आहे. धूसेति, धूसयति. รุส โรสเน. โรสนํ โกปกรณํ. โรเสติ, โรสยติ. โรโส. โรโสติ โกโธ. रुस् धातू रोसन (राग येणे/क्रोध करणे) या अर्थात आहे. रोसन म्हणजे क्रोध करणे. रोसेति, रोसयति. रोसो. 'रोसो' म्हणजे क्रोध. พฺยุส อุสฺสคฺเค. พฺโยเสติ, พฺโยสยติ. ब्युस् धातू उत्सर्ग (त्याग करणे) या अर्थात आहे. ब्योसेति, ब्योसयति. ชส หึสายํ. ชาเสติ, ชาสยติ. जस् धातू हिंसा करणे या अर्थात आहे. जासेति, जासयति. ทํส ทํสเน. ทํเสติ, ทํสยติ. ทํสโน. ทํสโนติ ทนฺโต. ทํสนฺติ ขาทนียํ วา โภชนียํ วา เอเตนาติ ทํสโน. दंस् धातू दंशन (चावणे) या अर्थात आहे. दंसेति, दंसयति. दंसनो. 'दंसनो' म्हणजे दात. ज्याच्याद्वारे खाण्याचे किंवा भोजनाचे पदार्थ चावले जातात, तो 'दंसनो' होय. ทสิ ทสฺสเน จ. จกาโร ทํสนํ อเปกฺขติ. ทํเสติ, ทํสยติ. วิทํเสติ, วิทํสยติ สูริโย อาโลกํ. दसि धातू दर्शन (दिसणे) आणि दंशन या अर्थात आहे. 'च' कार दंशनाची अपेक्षा करतो. दंसेति, दंसयति. 'विदंसेति, विदंसयति सूरियो आलोकं' (सूर्य प्रकाश दाखवतो). ตสฺส สนฺตชฺชเน. ตสฺเสติ, ตสฺสยติ ปุริโส โจเร. तस्स् धातू संतर्जन (धमकावणे/घाबरवणे) या अर्थात आहे. 'तस्सेति, तस्सयति पुरिसो चोरे' (माणूस चोरांना घाबरवतो). วสฺสุ สตฺติพนฺธเน. สตฺติพนฺธนํ สมตฺถตากรณํ. วสฺเสติ, วสฺสยติ. वस्सु धातू शक्तिबंधन (समर्थ करणे) या अर्थात आहे. शक्तिबंधन म्हणजे समर्थ करणे. वस्सेति, वस्सयति. ชส ตาฬเน. ตาฬนํ ปหรณํ. ชาเสติ, ชาสยติ. जस् धातू ताडन (मारणे) या अर्थात आहे. ताडन म्हणजे प्रहार करणे. जासेति, जासयति. ปส พนฺธเน. ปาเสติ, ปาสยติ. ปาโส. ปาสนฺติ พนฺธนฺติ สตฺเต เอเตนาติ ปาโส, สกุณปาสาทิ. पस् धातू बंधन (बांधणे) या अर्थात आहे. पासेति, पासयति. पासो. ज्याच्याद्वारे प्राण्यांना बांधतात तो 'पासो' (फास) होय, जसे की पक्षी पकडण्याचा फास इत्यादी. ฆุสิ วิสทฺทเน. วิสทฺทนํ อุคฺโฆสนํ. โฆเสติ, โฆสยติ. โฆโส. घुसि धातू विसद्दन (घोषणा करणे) या अर्थात आहे. विसद्दन म्हणजे उद्घोषणा करणे. घोसेति, घोसयति. घोसो. ลส สิลฺยโยเค. สิลฺยโยโค ลาสิยํ นาฏกนาฏนํ เรจกทานํ. ลาเสติ, ลาสยติ. ลาเสนฺโต, ลาเสนฺตี[Pg.347]. อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘วาเทนฺติยาปิ ลาเสนฺติ, นจฺจนฺติยาปิ ลาเสนฺติ, ลาเสนฺติยาปิ นจฺจนฺตี’’ติ. ตตฺถ ลาเสนฺตีติ ยา อุปฺลวมานา วิย อุฏฺฐหิตฺวา ลาสิยนาฏกํ นาเฏนฺติ, เรจกํ เทนฺติ. लस् धातू शिल्ययोग (नृत्य/नाट्य) या अर्थात आहे. शिल्ययोग म्हणजे लास्य (नृत्य), नाटक करणे आणि रेचक (नृत्यातील हालचाली) देणे. लासेति, लासयति. लासेन्तो, लासेन्ती. येथे हे पाळीवचन आहे: 'वादेन्तियापि लासेन्ति, नच्चन्तियापि लासेन्ति, लासेन्तियापि नच्चन्ति' (वाजवतानाही नाचवतात, नाचतानाही नाचवतात, नाचवतानाही नाचतात). तेथे 'लासेन्ती' म्हणजे ज्या तरंगल्यासारख्या उठून लास्यनाटक करतात, रेचक देतात. ภูส อลงฺกาเร. ภูเสติ, ภูสยติ. วิภูเสติ, วิภูสยติ. ภูสนํ, วิภูสนํ. भूस् धातू अलंकार (सजवणे) या अर्थात आहे. भूसेति, भूसयति. विभूसेति, विभूसयति. भूषणं, विभूषणं. วส สิเนหนเฉทาวหรเณสุ. อวหรณํ โจริกาย คหณํ. วาเสติ, วาสยติ. วสา. वस् धातू स्नेहन, छेद आणि अपहरण (चोरी करणे) या अर्थांमध्ये आहे. अपहरण म्हणजे चोरीने घेणे. वासेति, वासयति. वसा. ตาส วารเณ. วารณํ นิวารณํ. ตาเสติ, ตาสยติ. तास् धातू वारण (निवारण करणे/रोखणे) या अर्थात आहे. वारण म्हणजे निवारण करणे. तासेति, तासयति. ธส อุญฺเฉ. ธาเสติ, ธาสยติ. धस् धातू उंछ (धान्य गोळा करणे) या अर्थात आहे. धासेति, धासयति. ภส คหเณ. ภาเสติ, ภาสยติ. भस् धातू ग्रहण (पकडणे) या अर्थात आहे. भासेति, भासयति. ปุส ธารเณ. โปเสติ, โปสยติ, อาภรณํ ธาเรตีติ อตฺโถ. पुस् धातू धारण करणे या अर्थात आहे. पोसेति, पोसयति; आभूषण धारण करतो असा अर्थ आहे. ตุสิ ปิสิ กุสิ ทสิ ภาสายํ. ตุํเสติ, ตุํสยติ. ปึเสติ, ปึสยติ. กุํเสติ, กุํสยติ. ทํเสติ, ทํสยติ. तुसि, पिसि, कुसि आणि दसि हे धातू भाषा (बोलणे) या अर्थात आहेत. तुंसेति, तुंसयति. पिंसेति, पिंसयति. कुंसेति, कुंसयति. दंेसेति, दंसयति. ขุสิ อกฺโกสเน. ขุํเสติ, ขุํสยติ. ขุํสนา. खुसि धातू अक्कोसन (आक्रोश करणे/निंदा करणे) या अर्थात आहे. खुंसेति, खुंसयति. खुंसना. คเวส มคฺคเน. คเวเสติ, คเวสยติ. คเวสโก, คเวสิโต, คเวสนา, คเวฏฺฐิ. 'गवेस' धातू शोधण्याच्या (मार्गण्याच्या) अर्थात. गवेसेति, गवेसयति. गवेसको (शोधक), गवेसितो (शोधलेला), गवेसना (शोध), गवेिट्ठि (शोध). วาส อุปเสวายํ. วาเสติ, วาสยติ. วาโส, อาวาโส. 'वास' धातू उपसेवा (वास करणे किंवा सुवासित करणे) या अर्थात. वासेति, वासयति. वासो (निवास), आवासो (आवास/निवासस्थान). หิสิ หึสายํ. หึเสติ, หึสยติ. 'हिसि' धातू हिंसेच्या अर्थात. हिंसेति, हिंसयति. นิวาส อจฺฉาทเน. วตฺถํ นิวาเสติ, นิวาสยติ. ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา. 'निवास' धातू आच्छादनाच्या (वस्त्र परिधान करण्याच्या) अर्थात. वत्थं निवासेति, निवासयति (वस्त्र परिधान करतो). पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा (सकाळच्या वेळी वस्त्र परिधान करून). อํส [Pg.348] สงฺฆาเต. อํเสติ, อํสยติ. อํโส, อํสา. 'अंस' धातू संघात (एकत्र करणे किंवा आघात करणे) या अर्थात. अंसेति, अंसयति. अंसो, अंसा. เอตฺถ จ อํโสติ โกฏฺฐาโสปิ ขนฺโธปิ วุจฺจติ. อํสาติ อริสโรโค. आणि येथे 'अंस' म्हणजे हिस्सा (भाग) आणि खांदा (स्कंध) देखील म्हटले जाते. 'अंसा' म्हणजे मूळव्याध (अर्शरोग). มิส สชฺชเน. เมเสติ, เมสยติ. 'मिस' धातू सज्जन (सजवणे किंवा तयार करणे) या अर्थात. मेसेति, मेसयति. รส อสฺสาทเน. รเสติ, รสยติ. รโส. รสิยเต อสฺสาทิยเต ชเนหีติ รโส. 'रस' धातू आस्वादाच्या (चव घेण्याच्या) अर्थात. रसेति, रसयति. रसो. 'रसियते अस्सादियते जनेहीति रसो' (लोकांद्वारे ज्याचा आस्वाद घेतला जातो, तो 'रस' होय). รส สิเนหเน. รเสติ, รสยติ. รโส. 'रस' धातू स्नेहनाच्या (प्रेम किंवा स्निग्धतेच्या) अर्थात. रसेति, रसयति. रसो. ตตฺถ รเสตีติ สิเนหติ. รโสติ สิเนโห, สิเนหสมฺพนฺโธ สามคฺคิรโสติ วุจฺจติ, ยํ สนฺธาย พฺราหฺมณา ภควนฺตํ ‘‘อรสรูโป สมโณ โคตโม’’ติ อโวจุํ. तेथे 'रसेति' म्हणजे स्नेह (प्रेम) करणे. 'रसो' म्हणजे स्नेह (प्रेम), स्नेहसंबंधाला 'सामग्गीरसो' (एकतेचा रस) असे म्हटले जाते, ज्याचा संदर्भ देऊन ब्राह्मणांनी भगवंतांना "श्रमण गौतम हे अरसरूप (आसक्ती नसलेले) आहेत" असे म्हटले होते. สิย อสพฺพปฺปโยเค. เสเสติ, เสสยติ. เสโส. วิปุพฺโพ อติสเย, วิปุพฺโพ อติสเย, วิปุพฺโพ สิสธาตุ อติสเย วตฺตติ, วิเสเสติ, วิเสสยติ. วิเสโส, วิสิฏฺโฐ, วิเสสนํ. 'सिय' धातू असब्बप्पयोग (अपूर्ण प्रयोग किंवा उरलेला भाग) या अर्थात. सेसेति, सेसयति. सेसो (उर्वरित/शेष). 'वि' उपसर्ग लागून अतिशयाच्या (उत्कृष्टतेच्या) अर्थात, 'वि' उपसर्ग लागून अतिशयाच्या अर्थात, 'वि' उपसर्ग लागलेला 'सिस' धातू अतिशयाच्या अर्थात वर्ततो; विसेसेति, विसेसयति. विसेसो (विशेष), विसिट्ठो (विशिष्ट), विसेसणं (विशेषण). มิสฺส สมฺมิสฺเส. มิสฺเสติ, มิสฺสยติ. สมฺมิสฺเสติ, สมฺมิสฺสยติ. มิสฺโส, มิสฺโส, มิสฺสิโต, สมฺมิสฺสิโต, สมฺมิสฺโส อิจฺจาทีนิ. อลมฺพุสาชาตเก มิสฺสาติ อิตฺถีนํ วตฺตพฺพนามํ, ปุริเสหิ สทฺธึ สมฺมิสฺสนตาย. 'मिस्स' धातू संमिश्रणाच्या (एकत्र करण्याच्या) अर्थात. मिस्सेति, मिस्सयति. संमिस्सेति, संमिस्सयति. मिस्सो, मिस्सो, मिस्सितो, संमिस्सितो, संमिस्सो इत्यादी. अलम्बुसा जातकामध्ये 'मिस्सा' हे स्त्रियांना संबोधण्याचे नाव आहे, पुरुषांसोबत संमिश्रण (एकत्र राहणे) होत असल्यामुळे. ชุส ปริตกฺกเน. โชเสติ, โชสยติ. 'जुस' धातू परितक्कन (विचार करणे किंवा तर्क करणे) या अर्थात. जोसेति, जोसयति. มส ปหาสเน. มเสติ, มสยติ. 'मस' धातू पहासन (प्रकाशन किंवा हास्य) या अर्थात. मासेति, मासयति. มริส ติติกฺขายํ. มริเสติ. มริสยติ. 'मरिस' धातू तितिक्षा (सहनशीलता/क्षमा) या अर्थात. मरिसेति, मरिसयति. ปิส เปสเน. เปเสติ, เปสยติ. เปสโก, เปสิโต. 'पिस' धातू पेसण (पाठवणे किंवा दळणे) या अर्थात. पेसेति, पेसयति. पेसकॊ (पाठवणारा), पेसितो (पाठवलेला). ฆุส [Pg.349] สทฺเท. โฆเสติ, โฆสยติ. อุคฺโฆสยุํ โพธิมณฺเฑ ปโมทิตา. โฆโส. 'घुस' धातू शब्दाच्या (आवाजाच्या) अर्थात. घोसेति, घोसयति. 'उग्घोसयुं बोधिमण्डे पमोदिता' (बोधिमंडळावर आनंदित होऊन त्यांनी उद्घोषणा केली). घोसो (घोष/आवाज). ทิสี อุจฺจารเณ. เทเสติ, เทสยติ. เทสโก, เทเสตา, เทสิโต, เทสนา. 'दिसी' धातू उच्चारणाच्या (उपदेश करण्याच्या) अर्थात. देसेति, देसयति. देसको (उपदेशक), देसेता (उपदेश करणारा), देसितो (उपदेशिलेला), देसना (धम्मदेशना). วส อจฺฉาทเน. วาเสติ, วาสยติ. นิวาเสติ, นิวาสยติ. วตฺถํ. 'वस' धातू आच्छादनाच्या (वस्त्र परिधान करण्याच्या) अर्थात. वासेति, वासयति. निवासेति, निवासयति. वत्थं (वस्त्र). สการนฺตธาตุรูปานิ. स-कारान्त धातूंची रूपे. หการนฺตธาตุ ह-कारान्त धातू. อรห ปูชายํ. อรเหติ, อรหยติ. อรหา, อรหํ. ‘‘อรหา, ขีณาสโว, อเสกฺโข’’ติ อรหโต นามานิ. 'अरह' धातू पूजेच्या (आदराच्या) अर्थात. अरहेति, अरहयति. अरहा, अरहं. "अरहा, खीणआसवो, असेक्खो" ही अरहंतांची नावे आहेत. สิเนห สิเนหเน. สิเนเหติ, สิเนหยติ. 'सिनेह' धातू स्नेहनाच्या (प्रेम किंवा स्निग्धतेच्या) अर्थात. सिनेहेति, सिनेहयति. วรห หึสายํ. วรเหติ, วรหยติ. วราโห. 'वरह' धातू हिंसेच्या अर्थात. वरहेति, वरहयति. वराहो. วราโหติ สูกโรปิ หตฺถีปิ วุจฺจติ. ‘‘เอเณยฺยา จ วราหา จา’’ติ เอตฺถ หิ สูกโร ‘‘วราโห’’ติ วุตฺโต, ‘‘มหาวราหสฺส…เป… นทีสุ ชคฺคโต’’ติ เอตฺถ ปน หตฺถี ‘‘วราโห’’ติ. 'वराहो' म्हणजे डुकरालाही आणि हत्तीलाही म्हटले जाते. “एणेय्या च वराहा चा” येथे डुकराला 'वराहो' म्हटले आहे, तर “महावराहस्स...पे... नदीसु जग्गतो” येथे हत्तीला 'वराहो' म्हटले आहे. รห จาเค. รเหติ, รหยติ. 'रह' धातू त्यागाच्या अर्थात. रहेति, रहयति. จห ปริกตฺถเน. จเหติ, จหยติ. 'चह' धातू परिकत्थन (बढाई मारणे किंवा स्तुती करणे) या अर्थात. चहेति, चहयति. มห ปูชายํ. มเหติ, มหยติ. มหิโต ราชา มหาราชา. วิหารมโห, เจติยมโห. 'मह' धातू पूजेच्या (उत्सवाच्या/आदराच्या) अर्थात. महेति, mahayati. महितो राजा महाराजा (पूजनीय राजा तो महाराज). विहारमहो (विहार उत्सव), चेतियमहो (चैत्य उत्सव). ปิห อิจฺฉายํ. ปิเหติ, ปิหยติ. ปิหา, ปิหาลุ, อปิโห, ปิหนียา วิภูติโย. 'पिह' धातू इच्छेच्या (आकांक्षेच्या) अर्थात. पिहेति, पिहयति. पिहा (इच्छा), पिहालू (इच्छुक), अपिहो (इच्छारहित), पिहनीया विभूतियो (इच्छिण्यायोग्य ऐश्वर्य). กุห [Pg.350] วิมฺหาปเน. กุเหติ, กุหยติ. กุหโก. กุหยติ โลกวิมฺหาปนํ กโรตีติ กุหโก. กุหนา. 'कुह' धातू विम्हापन (आश्चर्यचकित करणे किंवा फसवणे) या अर्थात. कुहेति, कुहयति. कुहको. 'कुहयति लोकविम्हापनं करोतीति कुहको' (जो लोकांना आश्चर्यचकित करतो किंवा फसवतो तो 'कुहको' होय). कुहना (फसवणूक/ढोंग). สห ปริสหเน. ปริสหนํ ขนฺติ. สเหติ, สหยติ. สหนํ. ภูวาทิคณิกสฺส ปนสฺส ‘‘สหตี’’ติ รูปํ. 'सह' धातू परिसहन (सहन करणे) या अर्थात. परिसहन म्हणजे खंती (क्षमा/सहनशीलता). सहेति, सहयति. सहनं. भूवादिगणीय धातूचे रूप मात्र 'सहति' असे होते. ครห วินินฺทเน. ครเหติ, ครหยติ. ครหา. ภูวาทิคณิกสฺส ปนสฺส ‘‘ครหตี’’ติ รูปํ. 'गरह' धातू विनिंदन (निंदा करणे) या अर्थात. गरहेति, गरहयति. गरहा (निंदा). भूवादिगणीय धातूचे रूप मात्र 'गरहति' असे होते. หการนฺตธาตุรูปานิ. ह-कारान्त धातूंची रूपे. ฬการนฺตธาตุ Ḷ ळ-कारान्त धातू. ตฬ ตาฬเน. ตาเฬติ, ตาฬยติ. ปตาเฬติ, ปตาฬยติ. ตาฬํ. ตาฬนฺติ กํสตาฬาทิ. 'तळ' धातू ताळन (वाजवणे किंवा मारणे) या अर्थात. ताळेति, ताळयति. पताळेति, पताळयति. ताळं. 'ताळं' म्हणजे कांस्यताल (झांज) इत्यादी. ตฬ อาฆาเต. ปุพฺเพ วิย รูปานิ. 'तळ' धातू आघाताच्या अर्थात. पूर्वीप्रमाणेच रूपे होतात. ขฬ เภเท. ขเฬติ, ขฬยติ. 'खळ' धातू भेदाच्या (विभाजनाच्या) अर्थात. खळेति, खळयति. อิฬ ถวเน. อิเฬติ, อิฬยติ. 'इळ' धातू थवन (स्तुती करणे) या अर्थात. इळेति, इळयति. ชุฬ เปรเณ. โชเฬติ, โชฬยติ. 'जुळ' धातू पेरण (प्रेरित करणे किंवा पाठवणे) या अर्थात. जोळेति, जोळयति. ปีฬ อวคาหเน. ปีเฬติ, ปีฬยติ. นิปฺปีเฬติ, นิปฺปีฬยติ. ปีฬนโก, ปีฬิโต, ปีฬา, ปีฬนํ, นิปฺปีฬนโก. 'पीळ' धातू अवगाहन (दाबणे किंवा पिडणे) या अर्थात. पीळेति, पीळयति. निप्पीळेति, nippyālayati. पीळनको, पीळितो, पीळा, पीळनं, निप्पीळनको. ลฬ อุปเสวายํ. ลาเฬติ, ลาฬยติ. อุปลาเฬติ, อุปลาฬยติ. ภูวาทิคณฏฺฐาย ปน วิลาสนตฺเถ วตฺตมานาย เอติสฺสา ‘‘ลฬตี’’ติ รูปํ. लळ (laḷa) हा धातू उपसेवा (लाड करणे किंवा प्रेम करणे) या अर्थात आहे. 'लाळेति' (lāḷeti), 'लाळयति' (lāḷayati). 'उपलाळेति' (upalāḷeti), 'उपलाळयति' (upalāḷayati). परंतु, भूवादिगणात विलास (क्रीडा किंवा शोभा) या अर्थात वर्तमान असताना, याचे 'लळति' (laḷati) असे रूप होते. สิฬ เสฬเน. เสเฬติ, เสฬยติ. เสเฬนฺโต. เอตฺถ เสเฬตีติ เสฬิตสทฺทํ กโรติ. सिळ (siḷa) हा धातू सेळन (आवाज करणे किंवा शिट्टी वाजवणे) या अर्थात आहे. 'सेळेति' (seḷeti), 'सेळयति' (seḷayati). 'सेळेन्तो' (seḷento). येथे 'सेळेति' म्हणजे 'सेळित' (शिट्टीचा) आवाज करतो. อวคฺคนฺตธาตุรูปานิ. अवर्गान्त धातूंची रूपे. จุราที [Pg.351] เอตฺตกา ทิฏฺฐา, ธาตโว เม ยถาพลํ; สุตฺเตสฺวญฺเญปิ เปกฺขิตฺวา, คณฺหวฺโห อตฺถยุตฺติโต. माझ्या क्षमतेनुसार चुरादिगणातील एवढे धातू पाहिले गेले आहेत; सूत्रांमध्ये इतरही धातू पाहून अर्थाच्या योग्यतेनुसार ते ग्रहण करावेत. จุรปมุขคโณ เม สาสนตฺถํ ปวุตฺโต,สุปจุรหิตกาโม ตมฺปิ สิกฺเขยฺย ธีโร; สุปจุรนยปาเฐ สตฺถุโน ตญฺหิ สิกฺขํ,ปิยุสมิว มนุญฺญํ อตฺถสารํ ลเภถ. शासनाच्या (बुद्धवचनाच्या) अर्थासाठी मी चुरादि प्रमुख गणांचे वर्णन केले आहे, अत्यंत विपुल कल्याणाची इच्छा करणाऱ्या धीर पुरुषाने त्याचे अध्ययन करावे; शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) विपुल नयपाठातील त्या शिक्षणाचे अध्ययन करून, मनुष्याने अमृतासारखा मनोहर अर्थसार प्राप्त करावा. อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ अशा प्रकारे, अट्ठकथांसह नऊ अंगांनी युक्त अशा त्रिपिटकाच्या वचनमार्गांमध्ये विद्वानांच्या... โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कौशल्यासाठी (नैपुण्यासाठी) रचलेल्या 'सद्दनीति' ग्रंथातील... จุราทิคณปริทีปโน อฏฺฐารสโม ปริจฺเฉโท. चुरादिगण स्पष्ट करणारा अठरावा परिच्छेद समाप्त. ๑๙. สพฺพคณวินิจฺฉย १९. सर्वगणविनिश्चय (सर्व गणांचा निर्णय) อิโต ปรํ ปวกฺขามิ, สพฺพคณวินิจฺฉยํ; โสตูนํ ปฏุภาวตฺถํ, ปรเม ปิฏกตฺตเย. यानंतर, ऐकणाऱ्यांच्या (अभ्यासकांच्या) परम त्रिपिटकातील नैपुण्यासाठी, मी सर्व गणांचा निर्णय (सब्बगणविनिच्छय) सांगेन. ปจฺจยาทิวิภาเคหิ, นเยหิ วิวิเธหิ ตํ; สุขคฺคาหาย โสตูนํ, สุณาถ มม ภาสโต. प्रत्यय इत्यादींच्या विभागांद्वारे आणि विविध पद्धतींनी (नयांनी), ऐकणाऱ्यांना सहज समजण्यासाठी, मी सांगत असलेले ते तुम्ही ऐका. ตตฺถ ปฐโม ภูวาทิคโณ, ทุติโย รุธาทิคโณ, ตติโย ทิวาทิคโณ, จตุตฺโถ สฺวาทิคุโณ, ปญฺจโม กิยาทิคโณ, ฉฏฺโฐ คหาทิคโณ, สตฺตโม ตนาทิคโณ, อฏฺฐโม จุราทิคโณ, อิมสฺมึ ภควโต ปาวจเน อฏฺฐวิธา ธาตุคณา ภวนฺติ. เอเตสุ วิกรณปจฺจยวเสน – त्यात पहिला भूवादिगण, दुसरा रुधादिगण, तिसरा दिवादिगण, चौथा स्वादिगण, पाचवा कियादिगण (क्यादिगण), सहावा गहादिगण, सातवा तनादिगण आणि आठवा चुरादिगण; भगवंतांच्या या प्रवचनात (शासनात) आठ प्रकारचे धातूंचे गण आहेत. या गणांमध्ये विकरण प्रत्ययांच्या अनुसार – ภูวาทิโต อกาโร จ, สานุสาโร รุธาทิโต; อกาโร เจวิวณฺโณ จ, เอกาโรการเมว จ. भूवादिगणापासून 'अ'कार, रुधादिगणापासून अनुस्वारासह 'अ'कार, तसेच 'इ'वर्ण (इ, ई), 'ए'कार आणि 'ओ'कार प्रत्यय होतात. ยปจฺจโย ทิวาทิมฺหา, ณุ ณา อุณา สุวาทิโต; กฺยาทิโต ปน นาเยว, ปฺปณฺหา ปน คหาทิโต. दिवादिगणापासून 'य' प्रत्यय, स्वादिगणापासून 'णु', 'णा', 'उणा' प्रत्यय; क्यादिगणापासून केवळ 'ना' प्रत्यय, आणि गहादिगणापासून 'प्पण्ह' प्रत्यय होतो. โอยิรา [Pg.352] ตุ ตนาทิมฺหา, เณ ณยา จ จุราทิโต; อคฺคหิตคฺคหเณน, ปจฺจยา ทส ปญฺจ จ. तनादिगणापासून 'ओ' आणि 'यिर' प्रत्यय, तर चुरादिगणापासून 'णे' आणि 'णय' प्रत्यय होतात; न घेतलेल्यांच्या ग्रहणाने (एकूण) पंधरा प्रत्यय होतात. หิยฺยตฺตนี สตฺตมี จ, วตฺตมานา จ ปญฺจมี; จตสฺเสตา ปวุจฺจนฺติ, สพฺพธาตุกนามิกา. हिय्यत्तनी (भूतकाल), सप्तमी (विध्यर्थ), वर्तमाना (वर्तमानकाल) आणि पंचमी (आज्ञार्थ); या चार विभक्तींना 'सब्बधातुक' (सार्वधातुक) म्हटले जाते. เอเตสุ วิสเยสฺเวว, อกาโร สุทฺธกตฺตริ; อญฺญตฺร ข ฉ สาทีหิ, สหาปิ จุปลพฺภติ. या विषयांमध्येच (सब्बधातुक विभक्तींमध्ये) 'अ'काराचा मध्ये लोप होतो; 'ख', 'छ', 'स' इत्यादींशिवाय इतर ठिकाणी तो (विकरण प्रत्यय) मिळतो. ‘‘ภวติ โหติ สมฺโภติ, เชติ ชยติ กียติ; เฑติ ยาติ อิติ เอติ, อวติ โกติ สงฺกติ. 'भवति', 'होति', 'सम्भोति', 'जेति', 'जयति', 'कीयति'; 'डेति', 'याति', 'एति', 'अवति', 'कोति', 'सङ्कति'. ภิกฺขติ ปิวติ ปาติ, วเทติ วทติ’’ อิติ; ภูวาทิธาตุรูปานิ, ภวนฺตีติ ปกาสเย. 'भिक्खति', 'पिवति', 'पाति', 'वदेति', 'वदति' अशी भूवादिगणातील धातूंची रूपे होतात, असे स्पष्ट करावे. รูปํ ‘‘รุนฺธติ รุนฺธีติ, รุนฺเธติ ปุน รุนฺธิติ; สุมฺโภติ’’จฺจาทีรูปานิ, รุธาทีนฺติ ทีปเย. 'रुन्धति', 'रुन्धीति', 'रुन्धेति', पुन्हा 'रुन्धिति'; 'सुम्भोति' इत्यादी रूपे रुधादिगणाची आहेत, असे दर्शवावे. ‘‘ทิพฺพติ สิพฺพติ เจว, ยุชฺชติ วิชฺชติ ตถา; ฆายติ หายติ’’จฺจาทิ, รูปมาหุ ทิวาทินํ. 'दिब्बति', 'सिब्बति', तसेच 'युज्जति', 'विज्जति'; 'घायति', 'हायति' इत्यादी दिवादिगणाची रूपे आहेत असे म्हणतात. ‘‘สุโณติ จ สุณาติ จ, วุโณติ จ วุณาติ จ; ปาปุณาติ หิโนตี’’ติ, อาทิรูปํ สุวาทินํ. 'सुणोति', 'सुणाति', 'वुणोति', 'वुणाति'; 'पापुणाति', 'हिनोति' इत्यादी स्वादिगणाची रूपे आहेत. ‘‘กินาติ จ ชินาติ จ, ธุนาติ จ มุนาติ จ; อสฺนาติ’’จฺจาทิรูปญฺจ, กฺยาทีนนฺติ วิภาวเย. 'किनाति', 'जिनाति', 'धुनाति', 'मुनाति'; 'अस्नाति' इत्यादी रूपे क्यादिगणाची आहेत, असे जाणावे. ‘‘เฆปฺปติ ปฏิคฺคณฺหาติ, สณฺหญฺจ สณฺหโกติ จ; กณฺหํ ตณฺหา จ ติณฺหุณฺห’’-มิจฺจาทิ จ คหาทินํ. 'घेप्पति', 'पटिग्गण्हाति', 'सण्ह' आणि 'सण्हकोति'; 'कण्ह', 'तण्हा', 'तिण्ह', 'उण्ह' इत्यादी गहादिगणाची रूपे आहेत. ‘‘ตโนติ จ กโรติ จ, กยิรติ สโนติ จ; สกฺโกต’ปฺโปติ ปปฺโปติ’’-จฺจาทิรูปํ ตนาทินํ. 'तनोति', 'करोति', 'कयिरति', 'सनोति'; 'सक्कोति', 'अप्पोति', 'पप्पोति' इत्यादी रूपे तनादिगणाची आहेत. ‘‘โจเรติ โจรยนฺเต จ, จินฺเตติ จินฺตยนฺติ จ; มนฺเตติ’’จฺจาทิกญฺจาปิ, รูปมาหุ จุราทินํ. 'चोरेति', 'चोरयन्ते', 'चिन्तेति', 'चिन्तयन्ति'; 'मन्तेति' इत्यादी रूपे चुरादिगणाची आहेत असे म्हणतात. วิกรณวเสเนวํ, รูปเภโท ปกาสิโต; ธาตูนํ ธาตุเภทาทิ-กุสลสฺส มตานุโค. अशा प्रकारे, विकरण प्रत्ययांच्या आधारे रूपांमधील भेद स्पष्ट केला आहे; जो धातूंच्या आणि धातूंच्या भेदांविषयी कुशल असलेल्या विद्वानांच्या मतानुसार आहे. กิริยาย [Pg.353] ธารณโต, ธาตโว เอกธา มตา; ทฺวิธาปิ จ ปวุจฺจนฺติ, สกมฺมากมฺมโต ปน. क्रियेचे धारण करत असल्यामुळे धातू एकाच प्रकारचे मानले जातात; परंतु सकर्मक आणि अकर्मक असण्याच्या आधारे ते दोन प्रकारचे देखील सांगितले जातात. ตตฺถ สกมฺมกา นาม, คมิภกฺขาทยา สิยุํ; ฐาสาทโย อกมฺมา จ, อุปสคฺคํ วินา วเท; त्यात 'गमि' (जाणे), 'भक्ख' (खाणे) इत्यादी धातू सकर्मक (सकम्मक) आहेत; आणि उपसर्गाशिवाय 'ठा' (थांबणे), 'स' (शयन करणे) इत्यादी धातू अकर्मक (अकम्मक) आहेत असे म्हणावे. สกมฺมกกมฺมภูโต, ทิวุ อิจฺจาทโย ปุน; คเหตฺวาน ติธา โหนฺติ, เอวญฺจาปิ วิภาวเย. पुन्हा, 'दिवु' इत्यादी धातू सकर्मक आणि अकर्मक दोन्ही रूपांत ग्रहण करून तीन प्रकारचे होतात, असे देखील जाणावे. สกมฺมเก ทฺวิธา ภิตฺวา, เอกกมฺมทฺวิกมฺมโต; อกมฺมเกหิ สทฺธึ เต, ติวิธาปิ ภวนฺติ หิ. सकर्मक धातूंचे एककर्मक आणि द्विकर्मक असे दोन भेद करून, अकर्मक धातूंसह ते तीन प्रकारचे होतात. อกมฺมกา รุตาเยว, เอกกมฺมา คมาทโย; โหนฺติ ทฺวิกมฺมกา นาม, ทุหิกรวหาทโย. केवळ 'रु' (आवाज करणे) इत्यादी अकर्मक आहेत, 'गमु' इत्यादी एककर्मक आहेत; आणि 'दुह' (दूध काढणे), 'कर' (करणे), 'वह' (वाहून नेणे) इत्यादी द्विकर्मक आहेत. สกมฺมากมฺมกตฺตมฺหิ, ธาตูนมุปสคฺคโต; นิยโม นตฺถิ โส ตสฺมา, น มยา เอตฺถ วุจฺจติ. धातूंच्या सकर्मक किंवा अकर्मक असण्यामध्ये उपसर्गामुळे कोणताही निश्चित नियम राहत नाही, म्हणून मी येथे त्याचे वर्णन करत नाही. เอกฏฺฐานา คมิจฺจาที, ทฺวิฏฺฐานา ภูปจาทโย; ติฏฺฐานา สฺวาทโย เอวํ, ฐานโตปิ ติธา มตา. स्थानभेदाने देखील ते तीन प्रकारचे मानले जातात; जसे 'गमु' इत्यादी एकस्थानी, 'भू', 'पच' इत्यादी द्विस्थानी, आणि 'सु' इत्यादी त्रिस्थानी आहेत. คุปาทโย นิโยเคน, อาขฺยาตตฺเต สวุทฺธิกา; วจ ตุราทโย น หิ, วุทฺธิกา การิตํ วินา; आख्यात (क्रियापद) रूपात 'गुप' इत्यादी धातू नियमाने वृद्धियुक्त होतात; परंतु 'वच', 'तुर' इत्यादी धातू कारित (प्रयोजक) प्रत्ययाशिवाय वृद्धियुक्त होत नाहीत. ขิ ชิ อิจฺจาทโย ธาตู, สวุทฺธาวุทฺธิกา มตา; อิติ วุทฺธิวเสนาปิ, ติวิโธ ธาตุสงฺคโห. ‘खि’, ‘जि’ इत्यादी धातू वृद्धियुक्त आणि वृद्धिरहित दोन्ही मानले जातात; अशा प्रकारे वृद्धीच्या आधारे देखील धातूंचा संग्रह तीन प्रकारचा आहे. อลุตฺตวิกรณา จ, ลุตฺตวิกรณา ตถา; ลุตฺตาลุตฺตวิกรณา, เอวมฺปิ ติวิธา สิยุํ. तसेच, विकरण प्रत्ययाचा लोप न होणारे (अलुप्तविकरण), विकरण प्रत्ययाचा लोप होणारे (लुप्तविकरण) आणि विकरण प्रत्ययाचा लोप होणारे व न होणारे (लुप्तालुप्तविकरण) असेही तीन प्रकारचे धातू असतात. ตตฺราลุตฺตวิกรณา, คมิ รุธิ ทิวาทโย; ปา ภาทโย ชินิจฺจาที, กมโต อิตเร สิยุํ. त्यात 'गमि', 'रुधि', 'दिवा' इत्यादी अलुप्तविकरण आहेत; 'पा', 'भा' इत्यादी आणि 'जि' इत्यादी अनुक्रमे इतर (लुप्तविकरण आणि लुप्तालुप्तविकरण) आहेत. สุทฺธสฺสรา เอกสฺสรา, ตถาเนกสฺสราติ จ; ติธา ภวนฺติ ยุยาตา-ปาภาลาที กราทโย. शुद्धस्वरयुक्त, एकस्वरयुक्त आणि अनेकस्वरयुक्त असेही तीन प्रकारचे धातू असतात; जसे 'यु', 'या', 'ता', 'पा', 'भा' इत्यादी आणि 'कर' इत्यादी. จตุธาทินโย จาปิ, ลพฺภมานวเสน จ; คเหตพฺโพ นยญฺญูหิ, ยถาวุตฺตานุสารโต. नय जाणणाऱ्यांनी (पद्धती समजणाऱ्यांनी) वर सांगितलेल्या पद्धतीनुसार उपलब्धतेच्या आधारे चार प्रकार इत्यादींचे नियम देखील ग्रहण करावेत. ปุน [Pg.354] สุทฺธสฺสรา ธาตู, เอกสฺสรา จ สตฺตธา; อาอิวณฺณอุวณฺณนฺต-เอโอนฺตวสา มตา. पुन्हा शुद्ध स्वर असणारे धातू आणि एकाक्षरी धातू सात प्रकारचे मानले जातात; जे आ-वर्ण, इ-वर्ण, उ-वर्ण, ए आणि ओ यांनी अंत होणारे आहेत. อวณฺณิวณฺณุวณฺณนฺเต-การนฺตานํ วเสน เว; อเนกสฺสรธาตู จ, สตฺตธาว ปกิตฺติตา. अ-वर्ण, इ-वर्ण, उ-वर्ण आणि ए-कारान्त यांच्याद्वारे अनेकाक्षरी धातू देखील सात प्रकारचेच सांगितले आहेत. เอวํ ปนฺนรสธาปิ, ธาตูนมิธ สงฺคโห; ตปฺปเภทํ ปกาเสยฺยุํ, อิอุอิจฺจาทินา วิทู. अशा प्रकारे येथे धातूंचा पंधरा प्रकारांनी संग्रह केला आहे; विद्वान लोक 'इ, उ' इत्यादींद्वारे त्यांचे भेद प्रकट करतात. ตตฺร ‘‘อิคติยํ, อิ อชฺฌยเน, อุ สทฺเท’’ อิจฺเจเต สุทฺธสฺสรา ธาตโว. ยา รา ลา อิจฺจาทโย เอกสฺสรา อาการนฺตา. ขิชินิอิจฺจาทโย เอกสฺสรา อิการนฺตา. ปีอิจฺจาทโย เอกสฺสรา อีการนฺตา. ขุ ทุ กุ อิจฺจาทโย เอกสฺสรา อุการนฺตา, ภู หู อิจฺจาทโย เอกสฺสรา อูการนฺตา. เข เช เส อิจฺจาทโย เอกสฺสรา เอการนฺตา. โส อิจฺจาทโย เอกสฺสรา โอการนฺตา. तेथे 'इ गती अर्थात, इ अध्ययनात, उ शब्दात' हे शुद्ध स्वर असणारे धातू आहेत. या, रा, ला इत्यादी एकाक्षरी आ-कारान्त आहेत. खिजिनि इत्यादी एकाक्षरी इ-कारान्त आहेत. पी इत्यादी एकाक्षरी ई-कारान्त आहेत. खु, दु, कु इत्यादी एकाक्षरी उ-कारान्त आहेत, भू, हू इत्यादी एकाक्षरी ऊ-कारान्त आहेत. खे, जे, से इत्यादी एकाक्षरी ए-कारान्त आहेत. सो इत्यादी एकाक्षरी ओ-कारान्त आहेत. กร ปจ สงฺคาม อิจฺจาทโย อเนกสฺสรา อการนฺตา, โอมาอิจฺจาทโย อเนกสฺสรา อาการนฺตา, สกิ อิจฺจาทโย อเนกสฺสรา อิการนฺตา. จกฺขี อิจฺจาทโย อเนกสฺสรา อีการนฺตา. อนฺธุอิจฺจาทโย อเนกสฺสรา อุการนฺตา. กกฺขู อิจฺจาทโย อเนกสฺสรา อูการนฺตา. คิเล มิเล อิจฺจาทโย อเนกสฺสรา เอการนฺตาติ เอวํ ปนฺนรสวิเธน ธาตุสงฺคโห. कर, पच, संगाम इत्यादी अनेकाक्षरी अ-कारान्त आहेत, ओमा इत्यादी अनेकाक्षरी आ-कारान्त आहेत, सकि इत्यादी अनेकाक्षरी इ-कारान्त आहेत. चक्खी इत्यादी अनेकाक्षरी ई-कारान्त आहेत. अन्धु इत्यादी अनेकाक्षरी उ-कारान्त आहेत. कक्खू इत्यादी अनेकाक्षरी ऊ-कारान्त आहेत. गिले, मिले इत्यादी अनेकाक्षरी ए-कारान्त आहेत; अशा प्रकारे पंधरा प्रकारांनी धातूंचा संग्रह होतो. อถ เตตฺตึสวิเธนปิ ธาตุสงฺคโห ภวติ. กถํ? आता तेहेतीस प्रकारांनी देखील धातूंचा संग्रह होतो. तो कसा? ธาตู สุทฺธสฺสรา เจว, ปุน เจกสฺสราปิ จ; กการนฺตา ขการนฺตา, คนฺตา ฆนฺตา จ ธาตโว. धातू शुद्ध स्वर असणारे, तसेच एकाक्षरी देखील, आणि क-कारान्त, kh-कारान्त, ग-कारान्त व घ-कारान्त धातू. จการนฺตา ฉการนฺตา, ชนฺตา ฌนฺตา จ ญนฺตกา; ฏการนฺตา ฐการนฺตา, ฑนฺตา ฒนฺตา จ ณนฺตกา. च-कारान्त, छ-कारान्त, ज-कारान्त, झ-कारान्त आणि ञ-कारान्त; ट-कारान्त, ठ-कारान्त, ड-कारान्त, ढ-कारान्त आणि ण-कारान्त. ตนฺตา เจว ตถา ถนฺตา, ทนฺตา ธนฺตา จ นนฺตกา; ปนฺตา ผนฺตา พการนฺตา, ภนฺตา มนฺตา จ ยนฺตกา. त-कारान्त तसेच थ-कारान्त, द-कारान्त, ध-कारान्त आणि न-कारान्त; प-कारान्त, फ-कारान्त, ब-कारान्त, भ-कारान्त, म-कारान्त आणि य-कारान्त. รนฺตา [Pg.355] ลนฺตา วการนฺตา, สนฺตา หนฺตา จ ฬนฺตกา; อิติ เตตฺตึสธา เญยฺโย, ธาตูนมิธ สงฺคโห. र-कारान्त, ल-कारान्त, व-कारान्त, स-कारान्त, ह-कारान्त आणि ळ-कारान्त; अशा प्रकारे येथे धातूंचा तेहेतीस प्रकारांनी संग्रह समजावा. มเต สตฺถุสฺส ฒณฬา, ปทาทิมฺหิ น ทิสฺสเร; เตเนกสฺสรธาตูสุ, ฒณฬา น กถียเร. शास्त्यांच्या (बुद्धांच्या) मतात शब्दाच्या सुरुवातीला ढ, ण, ळ हे वर्ण दिसत नाहीत; त्यामुळे एकाक्षरी धातूंमध्ये ढ, ण, ळ हे सांगितले जात नाहीत. อิการนฺตติการนฺต-วเสน ตุ ยถารหํ; นามํ สมฺโภติ ธาตูนํ, อิติปฺปจฺจยโยคโต. इ-कारान्त आणि ति-कारान्त यांच्याद्वारे योग्यतेनुसार 'इति' प्रत्ययाच्या योगाने धातूंचे नाव सिद्ध होते. ปจิภิกฺขิฉิทิขาทิ, กโรติ ภวติ คมิ; คติคจฺฉติโหตีติ, อาทิโวหารมุทฺธเร. पचि, भिक्खि, छिदि, खादि, करोति, भवति, गमि; गती, गच्छति, होति इत्यादी व्यवहार (संज्ञा) उद्धृत करावेत. เอวํ เตตฺตึสเภเทหิ คหิเตสุ นิขิเลสุ ธาตูสุ – अशा प्रकारे तेहेतीस भेदांनी सर्व धातू ग्रहण केले असता - สหหึสอีหวสา, สีหสทฺทคตึ วเท; สหนโต หนนโต, สีโหติ หิ ครู วทุํ. सहन करणे, हिंसा करणे आणि चेष्टा (प्रयत्न) करणे या अर्थांवरून 'सीह' (सिंह) शब्दाची उत्पत्ती सांगावी; कारण सहन करण्यावरून आणि हनन करण्यावरून पूजनीय आचार्य त्याला 'सीह' म्हणतात. ตถา หิ สีโห วาตาตปาทิปริสฺสยมฺปิ สหติ, ‘‘กึ เม พหูหิ ฆาฏิเตหี’’ติ อตฺตโน โคจรตฺถาย ขุทฺทเก ปาเณ อคณฺหนฺโต, ‘‘มาหํ ขุทฺทเก ปาเณ วิสมคเต สงฺฆาตํ อาปาเทสี’’ติ อนุทฺทยวเสน สหิตพฺเพ ขุทฺทกสตฺเตปิ สหติ. หึสิตพฺเพ ปน กายูปปนฺเน สูกรมหึสาทโย สตฺเต หึสติ, ตสฺมาปิ ‘‘สีโห’’ติ วุจฺจติ. ยถา ปน กนฺตนฏฺเฐน อาทิอนฺตวิปลฺลาสโต ตกฺกํ วุจฺจติ, เอวํ หึสนฏฺเฐนปิ สีโหติ เวทิตพฺโพ. อถ วา สพฺพิริยาปเถสุ ทฬฺหวีริยตฺตา สุฏฺฐุ อีหตีติ สีโห. วุตฺตญฺหิ – तसेच सिंह वारा, ऊन इत्यादी संकटांना देखील सहन करतो, 'मला अनेक प्राण्यांना मारून काय करायचे आहे?' असे म्हणून स्वतःच्या आहारासाठी लहान प्राण्यांना न पकडता, 'मी संकटात सापडलेल्या लहान प्राण्यांचा संहार करू नये' अशा दयेपोटी सहन करण्यायोग्य लहान प्राण्यांना देखील अभय देतो (सहन करतो). परंतु हिंसेला पात्र असणाऱ्या, समोर आलेल्या डुक्कर, म्हैस इत्यादी प्राण्यांची तो हिंसा करतो, म्हणूनही त्याला 'सीह' (सिंह) म्हटले जाते. ज्याप्रमाणे कापण्याच्या अर्थावरून आद्य आणि अंत वर्णांच्या विपर्यासाने (उलटपालट करून) 'तक्क' (तक्र/ताक) म्हटले जाते, त्याचप्रमाणे हिंसेच्या अर्थावरून 'सीह' (हिंस -> सीह) असे समजावे. किंवा सर्व इरियापथांमध्ये (हालचालींमध्ये) दृढ वीर्यामुळे (उत्साहामुळे) तो चांगला प्रयत्न करतो म्हणून तो 'सीह' आहे. कारण म्हटले आहे - ‘‘ยถา สีโห มิคราชา, นิสชฺชฏฺฐานจงฺกเม; อลีนวีริโย โหติ, ปคฺคหิตมโน สทา’’ติ. 'ज्याप्रमाणे श्वापदांचा राजा सिंह बसण्याच्या, उभे राहण्याच्या आणि चंक्रमण करण्याच्या ठिकाणी नेहमी आळस नसलेला (उत्साही) आणि दृढ मनाचा असतो.' อปโร นโย – दुसरा प्रकार - สหนา จ หึสนา จ, ตถา สีฆชวตฺตโต; สีโห อิจฺจปิ ภาเสยฺย, สกฺยสีหสฺส สาสเน. सहन करणे, हनन करणे आणि वेगाने धावणे यांमुळे शाक्यसिंहाच्या (बुद्धांच्या) शासनात त्याला 'सीह' (सिंह) असेच म्हणावे. วุตฺตญฺหิ [Pg.356] สุตฺตนิปาตฏฺฐกถายํ ‘‘สหรา จ หนนา จ สีฆชวตฺตา จ สีโห’’ติ. कारण सुत्तनिपात अट्ठकथेत म्हटले आहे - 'सहन करणे, हनन करणे आणि वेगाने धावणे यांमुळे तो सीह (सिंह) आहे.' อิทานิ ตทตฺถุทฺธาโร วุจฺจเต, สีหสทฺโท ‘‘สีโห ภิกฺขเว มิคราชา’’ติอาทีสุ มิคราเช อาคโต. ‘‘อถ โข สีโห เสนาปติ เยน ภควา เตนุปสงฺกมี’’ติอาทีสุ ปญฺญตฺติยํ. ‘‘สีโหติ โข ภิกฺขเว ตถาคตสฺเสตํ อธิวจนํ อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสา’’ติอาทีสุ ตถาคเต. ตตฺถ ตถาคเต สทิสกปฺปนาย อาคโต. आता त्याचा अर्थ उद्धृत केला जात आहे, 'भिक्खूहो, सिंह हा श्वापदांचा राजा आहे' इत्यादी वाक्यांमध्ये 'सीह' शब्द श्वापदांच्या राजासाठी (सिंहासाठी) आला आहे. 'त्यानंतर सिंह सेनापती जेथे भगवान होते तेथे गेले' इत्यादी वाक्यांमध्ये तो संज्ञेसाठी (नावासाठी) आला आहे. 'भिक्खूहो, सीह हे अर्हत सम्यक्संबुद्ध तथागतांचेच नाव (अधिवचन) आहे' इत्यादी वाक्यांमध्ये तो तथागतांसाठी आला आहे. तेथे तथागतांसाठी तो सादृश्याच्या कल्पनेने (उपमेने) आला आहे. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – या संदर्भात हे म्हटले आहे - สีเห ปญฺญตฺติยญฺจาปิ, พุทฺเธ อปฺปฏิปุคฺคเล; อิเมสุ ตีสุ อตฺเถสุ, สีหสทฺโท ปวตฺตติ. सिंह (प्राणी), प्रज्ञप्ती (संज्ञा) आणि अद्वितीय पुद्गल असलेले बुद्ध; या तीन अर्थांमध्ये 'सिंह' हा शब्द वापरला जातो. รูปิรุปฺปติธาตูหิ, รูปสทฺทคตึ วเท; ‘‘รูปยติ รุปฺปตี’’ติ, วตฺวา นิพฺพจนทฺวยํ. 'रूपि' आणि 'रुप्पति' या धातूंवरून 'रूप' या शब्दाची उत्पत्ती सांगावी. 'रूपयति' (रूप धारण करतो) आणि 'रुप्पति' (पीडित होतो) असे म्हणून दोन व्युत्पत्ती सांगाव्यात. วุตฺตญฺเหตํ ครูหิ ‘‘รูปยตีติ รูปํ, วณฺณวิการํ อาปชฺชมานํ หทยงฺคตภาวํ ปกาเสตีติ อตฺโถ’’ติ. วุตฺตมฺปิ เจตํ ‘‘รูปนฺติ เกนฏฺเฐน รูปํ? รุปฺปนฏฺเฐนา’’ติ. ภควตา ปเนตํ วุตฺตํ ‘‘กิญฺจ ภิกฺขเว รูปํ วเทถ, รุปฺปตีติ โข ภิกฺขเว ตสฺมา รูปนฺติ วุจฺจติ. เกน รุปฺปติ, สีเตนปิ รุปฺปตี’’ติ วิตฺถาโร. อตฺถุทฺธาโร ปนสฺส เหฏฺฐา วุตฺโตว. आचार्यांनी म्हटले आहे की, 'रूपयति इति रूपं' म्हणजे जो रंगात बदल घडवून आणून मनातील भाव प्रकट करतो, तो रूप होय. असेही म्हटले आहे की, 'रूप' कोणत्या अर्थाने रूप आहे? 'रुप्पन' (पीडित होणे किंवा बदलणे) या अर्थाने. भगवंतांनी देखील म्हटले आहे, 'भिक्खूहो, तुम्ही कशाला रूप म्हणता? जे पीडित होते (बदलते), भिक्खूहो, म्हणून त्याला रूप म्हटले जाते. कशाने पीडित होते? थंडीनेही पीडित होते...' इत्यादी सविस्तर. याचा अर्थाचा उलगडा खाली आधीच केला आहे. ปสวเตมนตฺเถน, ธาตุนา อุทินา ปน; สมุทฺทสทฺทนิปฺผตฺตึ, วเทยฺย มติมา นโร. बुद्धिमान मनुष्याने 'पसवत' (उत्पन्न करणे) या अर्थातील धातूपासून आणि 'उद' (पाणी) या शब्दापासून 'समुद्र' या शब्दाची उत्पत्ती सांगावी. เอตฺถ [Pg.357] หิ สมุทฺโทติ อฏฺฐหิ อจฺฉริยพฺภุตธมฺเมหิ สมนฺนาคตตฺตา สมุทฺทติ อตฺตสนฺนิสฺสิตานํ มจฺฉมกราทีนํ ปีติโสมนสฺสํ ปสวติ ชเนตีติ สมุทฺโท. อยมสฺมากํ ขนฺติ. อฏฺฐกถาจริยา ปน ‘‘สมุทฺทนฏฺเฐน สมุทฺโท, กิเลทนฏฺเฐน เตนมนฏฺเฐนาติ วุตฺตํ โหตี’’ติ วทนฺติ. มิลินฺทปญฺเห ปน อายสฺมา นาคเสโน ‘‘ภนฺเต นาคเสน สมุทฺโท สมุทฺโทติ วุจฺจติ, เกน การเณน อาปํ อุทกํ สมุทฺโทติ วุจฺจตี’’ติ มิลินฺเทน รญฺญา ปุฏฺโฐ อาห ‘‘ยตฺตกํ มหาราช อุทกํ, ตตฺตกํ โลณํ, ยตฺตกํ โลณํ, ตตฺตกํ อุทกํ, อุทกสมตฺตา สมุทฺโทติ วุจฺจตี’’ติ. ตทา รญฺญา มิลินฺเทน ‘‘กลฺโลสิ ภนฺเต นาคเสนา’’ติ วุตฺตํ. เอตฺถ หิ สมํ อุทเกน โลณํ เอตฺถาติ สมุทฺโทติ นิพฺพจนํ เวทิตพฺพํ ‘‘นีโลท’’นฺติอาทีสุ วิย. ตตฺถ ภทนฺตนาคเสนมตญฺจ อมฺหากํ มตญฺจ ปกติสมุทฺทํ สนฺธาย วุตฺตตฺตา น วิรุชฺฌติ, อฏฺฐกถาจริยานํ มตมฺปิ ‘‘ตณฺหาสมุทฺโท’’ติ จ ‘‘สมุทฺโทเปโส’’ติ จ อาคตานิ สมุทฺทสริกฺขกานิ จ ตณฺหาจกฺขุโสตาทีนิ สนฺธาย วุตฺตตฺตา น วิรุชฺฌตีติ ทฏฺฐพฺพํ. येथे 'समुद्र' म्हणजे आठ आश्चर्यकारक व अद्भुत गुणांनी युक्त असल्यामुळे, तो स्वतःमध्ये राहणाऱ्या मासे, मकर इत्यादी प्राण्यांमध्ये प्रीती व सोमनस्य 'पसवति' (उत्पन्न करतो), म्हणून तो 'समुद्र' होय. हे आमचे मत आहे. परंतु अट्ठकथाचार्य म्हणतात, 'समुद्दन' (एकत्र करणे किंवा ओले करणे) या अर्थाने, क्लेदन (ओले करणे) या अर्थाने आणि तेमन (भिजवणे) या अर्थाने समुद्र म्हटले जाते. मिलिंदप्रश्नात मात्र आयुष्यमान नागसेनांना राजा मिलिंदाने विचारले, 'भंते नागसेन, समुद्राला समुद्र का म्हणतात? कोणत्या कारणाने पाण्याला समुद्र म्हटले जाते?' तेव्हा नागसेन म्हणाले, 'महाराज, जेवढे पाणी आहे, तेवढेच मीठ आहे; जेवढे मीठ आहे, तेवढेच पाणी आहे. पाण्याच्या समानतेमुळे (उदक-समतेमुळे) त्याला समुद्र म्हटले जाते.' तेव्हा राजा मिलिंदाने 'भंते नागसेन, आपण योग्य बोललात' असे म्हटले. येथे 'सम' (समान) आणि 'उदक' (पाणी) यावरून 'समुद्र' अशी व्युत्पत्ती समजावी, जसे 'नीलोद' इत्यादी शब्दांमध्ये होते. तेथे भदंत नागसेनांचे मत आणि आमचे मत हे नैसर्गिक समुद्राला उद्देशून असल्यामुळे त्यात कोणताही विरोध नाही. अट्ठकथाचार्यांचे मत देखील 'तण्हा-समुद्र' (तृष्णा-समुद्र) आणि 'समुद्रोपेश' इत्यादी ठिकाणी आलेल्या समुद्रासारख्या तृष्णा, चक्षु, श्रोत्र इत्यादींना उद्देशून असल्यामुळे त्यातही विरोध नाही, असे समजावे. ขาทธาตุวสา จาปิ, ขนุธาตุวเสน วา; ขนิโต วาปิ ธาตุมฺหา, ธาโต ขํปุพฺพโตปิ วา; ขนฺธสทฺทสฺส นิปฺผตฺตึ, สทฺทกฺขนฺธวิทู วเท. 'खाद्' धातूच्या प्रभावाने किंवा 'खन्' धातूच्या प्रभावाने, अथवा 'खन्' धातूपासून किंवा 'ख' पूर्वपदावरून 'स्कंध' (खन्ध) या शब्दाची उत्पत्ती शब्दस्कंधाचे जाणकार सांगतात. ตตฺถ ‘‘สํขิตฺเตน ปญฺจุปาทานกฺขนฺธาปิ ทุกฺขา’’ติ วจนโต สยมฺปิ ทุกฺขธมฺโมเยว สมาโน ชาติชราพฺยาธิมรณทุกฺขาทีหิ อเนเกหิ ทุกฺเขหิ ขชฺชติ ขาทิยตีติ ขนฺโธ, เตเหว ทุกฺเขหิ ขญฺญติ อวทาริยตีติปิ ขนฺโธ, ขนิยติ ปริขญฺญตีติปิ ขนฺโธ, อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา ตุจฺฉตฺตา ขํ สุญฺญาการํ ธาเรตีติปิ ขนฺโธ, รูปกฺขนฺธาทิ. อตฺถุทฺธารโต ปน – त्यामध्ये, 'थोडक्यात सांगायचे तर पाच उपादानस्कंध देखील दुःखकारक आहेत' या वचनावरून, स्वतः देखील दुःखस्वरूप असतानाच, जन्म, जरा, व्याधी, मरण इत्यादी अनेक दुःखांद्वारे जो खाल्ला जातो (पीडित केला जातो), तो 'स्कंध' होय. त्याच दुःखांद्वारे जो विदीर्ण (नष्ट) केला जातो, म्हणूनही तो 'स्कंध' होय. जो खणला जातो (नष्ट केला जातो), म्हणूनही तो 'स्कंध' होय. आत्मा किंवा आत्मीय भावाने शून्य (तुच्छ) असल्यामुळे जो 'ख' म्हणजे शून्याकार धारण करतो, म्हणूनही तो 'स्कंध' होय, जसे की रूपस्कंध इत्यादी. अर्थाच्या स्पष्टीकरणाच्या दृष्टीने तर - ขนฺธสทฺโท [Pg.358] ราสิคุณ-ปณฺณตฺตีสุ จ รูฬฺหิยํ; โกฏฺฐาเส เจว อํเส จ, วตฺตตีติ วิภาวเย. 'स्कंध' हा शब्द राशी (समूह), गुण, प्रज्ञप्ती (संकल्पना), रूढी (प्रचलित अर्थ), तसेच भाग (कोष्ठास) आणि अंश (खांदा) या अर्थांमध्ये वापरला जातो, असे जाणावे. วุตฺตญฺเหตํ สมฺโมหวิโนทนิยํ วิภงฺคฏฺฐกถายํ – ขนฺธสทฺโท สมฺพหุเลสุ ฐาเนสุ นิปตติ ราสิมฺหิ คุเณ ปณฺณตฺติยํ รูฬฺหิยนฺติ. ‘‘เสยฺยถาปิ ภิกฺขเว มหาสมุทฺเท น สุกรํ อุทกสฺส ปมาณํ คเหตุํ ‘‘เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกานี’ติ วา ‘เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสตานี’ติ วา ‘เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสหสฺสานี’ติ วา ‘เอตฺตกานิ อุทกาฬฺหกสตสหสฺสานี’ติ วา, อถ โข อสงฺขฺเยยฺโย อปฺปเมยฺโย มหาอุทกกฺขนฺโธตฺเวว สงฺขํ คจฺฉตี’’ติอาทีสุ หิ ราสิโต ขนฺโธ นาม. น หิ ปริตฺตกํ อุทกํ อุทกกฺขนฺโธติ วุจฺจติ, พหุกเมว วุจฺจติ, ตถา น ปริตฺตกํ รโช รชกฺขนฺโธ, น อปฺปมตฺตกา คาโว ควกฺขนฺโธ, น อปฺปมตฺตกํ พลํ พลกฺขนฺโธ, น อปฺปมตฺตกํ ปุญฺญํ ปุญฺญกฺขนฺโธติ วุจฺจติ. พหุกเมว หิ รโช รชกฺขนฺโธ, พหุกา จ ควาทโย ควกฺขนฺโธ, พลกฺขนฺโธ, ปุญฺญกฺขนฺโธติ วุจฺจนฺติ. ‘‘สีลกฺขนฺโธ สมาธิกฺขนฺโธ’’ติอาทีสุ ปน คุณโต ขนฺโธ นาม. ‘‘อทฺทสา ขา ภควา มหนฺตํ ทารุกฺขนฺธํ คงฺคาย นทิยา โสเตน วุยฺหมาน’’นฺติ เอตฺถ ปณฺณตฺติโต ขนฺโธ นาม. ‘‘ยํ จิตฺตํ มโน มานสํ…เป… วิญฺญาณํ วิญฺญาณกฺขนฺโธ’’ติอาทีสุ รูฬฺหีโต ขนฺโธ นาม. สฺวายมิธ ราสิโต อธิปฺเปโต. อยญฺหิ ขนฺธฏฺโฐ นาม ปิณฺฑฏฺโฐ ปูคฏฺโฐ ฆฏฏฺโฐ ราสฏฺโฐ, ตสฺมา ราสิลกฺขณา ขนฺธาติ เวทิตพฺพา. โกฏฺฐาสฏฺฐาติปิ วตฺตุํ วฏฺฏติ. โลกสฺมิญฺหิ อิณํ คเหตฺวา โจทิยมานา ‘‘ทฺวีหิ ขนฺเธหิ ทสฺสาม, ตีหิ ขนฺเธหิ ทสฺสามา’’ติ [Pg.359] วทนฺติ. อิติ โกฏฺฐาสลกฺขณา ขนฺธาติปิ วตฺตุํ วฏฺฏติ. เอวเมตฺถ ‘‘รูปกฺขนฺโธติ รูปราสิ รูปโกฏฺฐาโส, เวทนากฺขนฺโธติ เวทนาราสิ เวทนาโกฏฺฐาโส’’ติ อิมินา นเยน อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ‘‘ขนฺเธ ภารํ. ขนฺธโต โอตาเรติ, มหาหนุสภกฺขนฺโธ’’ติอาทีสุ ปน อํโส ‘‘ขนฺโธ’’ติ วุจฺจติ. विभंग-अट्ठकथा असलेल्या 'सम्मोहविनोदनी' मध्ये हे म्हटले आहे - 'स्कंध' हा शब्द अनेक ठिकाणी राशी, गुण, प्रज्ञप्ती आणि रूढी या अर्थांमध्ये येतो. 'हे भिक्खूहो, ज्याप्रमाणे महासागरातील पाण्याचे प्रमाण मोजणे सोपे नाही की, 'इतके आढक (एक माप) पाणी आहे' किंवा 'इतके शेकडो आढक पाणी आहे' किंवा 'इतके हजारो आढक पाणी आहे' किंवा 'इतके लाखो आढक पाणी आहे', तर तो केवळ असंख्य, अप्रमेय असा 'महा-उदक-स्कंध' (पाण्याचा मोठा संचय/राशी) म्हणूनच ओळखला जातो,' इत्यादी वाक्यांमध्ये राशीच्या अर्थाने 'स्कंध' शब्द आला आहे. कारण थोड्याशा पाण्याला 'उदकस्कंध' म्हटले जात नाही, तर पुष्कळ पाण्यालाच म्हटले जाते. त्याचप्रमाणे थोड्याशा धुळीला 'रजस्कंध' म्हटले जात नाही, थोड्याशा गाईंना 'गोस्कंध' म्हटले जात नाही, थोड्याशा बलाला 'बलस्कंध' म्हटले जात नाही, आणि थोड्याशा पुण्याला 'पुण्यस्कंध' म्हटले जात नाही. तर पुष्कळ धुळीलाच 'रजस्कंध' आणि पुष्कळ गाई इत्यादींना 'गोस्कंध', 'बलस्कंध', 'पुण्यस्कंध' असे म्हटले जाते. 'शीलस्कंध, समाधीस्कंध' इत्यादींमध्ये गुणांच्या अर्थाने 'स्कंध' शब्द आला आहे. 'भगवंतांनी गंगेच्या प्रवाहामध्ये वाहून जाणारा एक मोठा लाकडाचा ओंडका (दारुस्कंध) पाहिला' यामध्ये प्रज्ञप्तीच्या (संकल्पनेच्या) अर्थाने 'स्कंध' शब्द आला आहे. 'जे चित्त, मन, मानस...पे... विज्ञान आहे, तो विज्ञानस्कंध होय' इत्यादींमध्ये रूढीच्या अर्थाने 'स्कंध' शब्द आला आहे. येथे (या संदर्भात) तो राशी (समूह) या अर्थाने अभिप्रेत आहे. कारण हा स्कंधाचा अर्थ म्हणजे पिंडाचा (गोळ्याचा) अर्थ, समूहाचा अर्थ, घटकाचा अर्थ, राशीचा अर्थ आहे; म्हणून राशीचे लक्षण केलेले ते 'स्कंध' आहेत असे जाणावे. त्याला 'भाग' (कोष्ठास) या अर्थानेही म्हणणे योग्य आहे. कारण लोकव्यवहारात कर्ज घेऊन विचारणा केली असता लोक म्हणतात, 'आम्ही दोन हप्त्यांत (भागांत) देऊ, तीन हप्त्यांत (भागांत) देऊ.' अशा प्रकारे, भागाचे लक्षण केलेले ते 'स्कंध' आहेत असे म्हणणे देखील योग्य आहे. अशा प्रकारे येथे, 'रूपस्कंध म्हणजे रूपाची राशी, रूपाचा भाग; वेदनास्कंध म्हणजे वेदनेची राशी, वेदनेचा भाग' या पद्धतीने अर्थ समजून घ्यावा. 'खांद्यावर ओझे, खांद्यावरून खाली उतरवणे, मोठ्या जबड्याच्या बैलाचा खांदा' इत्यादींमध्ये 'अंश' (खांदा) या अर्थाने 'स्कंध' शब्द वापरला जातो. อาปุพฺพยตโต จาปิ, อายูปปทโต ปุน; ตนุโต ตนิโต วาปิ, อายตนรโว คโต. 'आ' पूर्वपद आणि 'यत' धातूवरून, तसेच 'आय' उपपद आणि 'तनु' (विस्तार करणे) किंवा 'तनि' धातूवरून 'आयतन' हा शब्द सिद्ध झाला आहे. วุตฺตมฺปิ เจตํ – อายตนโต, อายานํ วา ตนนโต, อายตสฺส จ นยนโต อายตนนฺติ เวทิตพฺพํ. จกฺขุ รูปาทีสุ หิ ตํตํทฺวารารมฺมณา จิตฺตเจตสิกา ธมฺมา เสน เสน อนุภวนาทิกิจฺเจน อายตนฺติ อุฏฺฐหนฺติ ฆฏนฺติ วายมนฺตีติ วา วุตฺตํ โหติ. เต จ ปน อายภูเต ธมฺเม เอตานิ ตนนฺติ วิตฺถาเรนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. อิทญฺจ อนมตคฺเค สํสาเร ปวตฺตํ อตีว อายตํ สํสารทุกฺขํ ยาว น นิวตฺตติ, ตาว นยนฺติ, ปวตฺตยนฺตีติ วุตฺตํ โหติ. อิติ สพฺเพปิเม ธมฺมา อายตนโต, อายานํ วา ตนนโต, อายตสฺส จ นยนโต อายตนนฺติ วุจฺจนฺติ. हे देखील म्हटले आहे - आयतन असल्यामुळे, किंवा आयांचा (उत्पत्तीचा) विस्तार (तणन) करत असल्यामुळे, आणि दीर्घकाळापर्यंत (आयताचा) नेणारा (नयन) असल्यामुळे त्याला 'आयतन' असे जाणावे. कारण चक्षू, रूप इत्यादींमध्ये त्या त्या द्वारांच्या आणि आलंबनांच्या द्वारे चित्त आणि चैतसिक धर्म आपापल्या अनुभव घेण्याच्या इत्यादी कृत्यांद्वारे प्रयत्नशील होतात (आयतन्ति), म्हणजेच उत्पन्न होतात, घटतात किंवा प्रयत्न करतात, असे म्हटले आहे. आणि ते पुन्हा उत्पत्तीरूप (आयभूत) धर्मांचा विस्तार करतात (तणन्ति), असे म्हटले आहे. आणि या अनादी संसारात चालत आलेले अत्यंत दीर्घ (आयत) असे संसारदुःख जोपर्यंत थांबत नाही, तोपर्यंत ते त्याला पुढे नेतात (नयन्ति) म्हणजेच चालू ठेवतात, असे म्हटले आहे. अशा प्रकारे, हे सर्व धर्म आयतन असल्यामुळे, किंवा आयांचा (उत्पत्तीचा) विस्तार करत असल्यामुळे, आणि दीर्घकाळापर्यंत नेणारे असल्यामुळे 'आयतन' म्हटले जातात. อปิจ นิวาสฏฺฐานฏฺเฐน อากรฏฺเฐน สโมสรณฏฺฐานฏฺเฐน สญฺชาติเทสฏฺเฐน การณฏฺเฐน อายตนํ เวทิตพฺพํ. ตถา หิ ‘‘โลเก อิสฺสรายตนํ วาสุเทวายตน’’นฺติอาทีสุ นิวาสฏฺฐานํ อายตนนฺติ วุจฺจติ. ‘‘สุวณฺณายตนํ รชตายตน’’นฺติอาทีสุ อากโร, สาสเน ปน ‘‘มโนรเม อายตเน, เสวนฺติ นํ วิหงฺคมา’’ติอาทีสุ สโมสรณฏฺฐานํ[Pg.360]. ‘‘ทกฺขิณาปโถ คุนฺนํ อายตน’’นฺติอาทีสุ สญฺชาติเทโส. ‘‘ตตฺร ตตฺเรว สกฺขิภพฺพตํ ปาปุณาติ สติ สติอายตเน’’ติอาทีสุ การณํ. शिवाय, निवासस्थान, खाण (आकर), एकत्र येण्याचे स्थान (समवसरण स्थान), उत्पत्तीचे स्थान (संजाती देश) आणि कारण या अर्थांनी देखील 'आयतन' समजले पाहिजे. जसे की, 'जगात ईश्वराचे आयतन, वासुदेवाचे आयतन' इत्यादींमध्ये निवासस्थानाला 'आयतन' म्हटले जाते. 'सुवर्णाचे आयतन, रजताचे आयतन' इत्यादींमध्ये खाणीला, आणि बुद्धशासनात तर 'मनोरम आयतनात पक्षी वास्तव्य करतात' इत्यादींमध्ये एकत्र येण्याच्या स्थानाला, 'दक्षिणापथ हा गाईंचे आयतन आहे' इत्यादींमध्ये उत्पत्तीच्या स्थानाला, आणि 'त्या त्या ठिकाणी कारण (आयतन) असतानाच तो साक्षात्काराची योग्यता प्राप्त करतो' इत्यादींमध्ये कारणाला 'आयतन' म्हटले जाते. จกฺขุอาทีสุ จาปิ จิตฺตเจตสิกา ธมฺมา นิวสนฺติ ตทายตฺตวุตฺติตายาติ จกฺขาทโย จ เนสํ นิวาสฏฺฐานํ. จกฺขาทีสุ เต อากิณฺณา ตนฺนิสฺสิตตฺตา ตทารมฺมณตฺตา จาติ จกฺขาทโย จ เนสํ อากโร. จกฺขาทโย จ เนสํ สโมสรณฏฺฐานํ ตตฺถ ตตฺถ ทฺวารารมฺมณวเสน สโมสรณโต. จกฺขาทโย จ เนสํ สญฺชาติเทโส ตนฺนิสฺสยารมฺมณภาเวน ตตฺเถว อุปฺปตฺติโต, จกฺขาทโย จ เนสํ การณํ เตสํ อภาเว อภาวโต. อิติ นิวาสฏฺฐานฏฺเฐน อากรฏฺเฐน สโมสรณฏฺฐานฏฺเฐน สญฺชาติเทสฏฺเฐน การณฏฺเฐนาติ อิเมหิ การเณหิ เอเต ธมฺมา อายตนนฺติ วุจฺจนฺติ, ตสฺมา ยถาวุตฺเตนตฺเถน จกฺขุ จ ตํ อายตนญฺจาติ จกฺขายตนํ…เป… ธมฺมา จ เต อายตนญฺจาติ ธมฺมายตนนฺติ เอวํ ตาเวตฺถ อตฺถโต วิญฺญาตพฺโพ วินิจฺฉโยติ. อิจฺเจวํ – चक्षू इत्यादींमध्ये देखील चित्त आणि चैतसिक धर्म त्यांच्यावर अवलंबून राहून कार्य करत असल्यामुळे निवास करतात, म्हणून चक्षू इत्यादी हे त्यांचे निवासस्थान आहे. चक्षू इत्यादींवर ते आश्रित असल्यामुळे आणि त्यांना आलंबन बनवत असल्यामुळे ते चक्षू इत्यादींमध्ये पसरलेले असतात, म्हणून चक्षू इत्यादी हे त्यांची खाण (आकर) आहे. चक्षू इत्यादी हे त्यांचे एकत्र येण्याचे स्थान (समवसरण स्थान) आहे, कारण त्या त्या ठिकाणी द्वार आणि आलंबनाच्या रूपाने ते एकत्र येतात. चक्षू इत्यादी हे त्यांचे उत्पत्तीचे स्थान (संजाती देश) आहे, कारण त्यांचा आश्रय आणि आलंबन घेऊन ते तेथेच उत्पन्न होतात. आणि चक्षू इत्यादी हे त्यांचे कारण आहे, कारण त्यांच्या अभावी ते उत्पन्न होऊ शकत नाहीत. अशा प्रकारे, निवासस्थान, खाण, एकत्र येण्याचे स्थान, उत्पत्तीचे स्थान आणि कारण या कारणांमुळे हे धर्म 'आयतन' म्हटले जातात. म्हणून, वर सांगितलेल्या अर्थानुसार चक्षू आणि ते आयतन म्हणजे 'चक्षुरायतन'...पे... धर्म आणि ते आयतन म्हणजे 'धर्मायतन', अशा प्रकारे येथे अर्थाच्या दृष्टीने निर्णय समजून घ्यावा. अशा प्रकारे - นิวาโส อากโร เจว, ชาติเทโส จ การณํ; สโมสรณฏฺฐานญฺจ, วุจฺจตา’ยตนํ อิติ; निवासस्थान, खाण (आकर), उत्पत्तीचे स्थान (जाती देश), कारण आणि एकत्र येण्याचे स्थान (समवसरण स्थान) यांना 'आयतन' असे म्हटले जाते. วิทิวิเทหิ ธาตูหิ, อการปุพฺพเกหิ วา; อนฺตวิรหิตสทฺทู-ปปเทน ชุนาปิ วา.อวิชฺชาสทฺทนิปฺผตฺติ, ทีเปตพฺพา สุธีมตา. 'विद्' (जाणणे) किंवा 'विद्' (मिळवणे) या धातूंपासून, किंवा त्यांच्यापूर्वी 'अ' कार लागून, अथवा 'अंतविरहित' शब्दाच्या उपपदाने किंवा 'जु' धातूने 'अविद्या' या शब्दाची उत्पत्ती बुद्धिमान पुरुषाने स्पष्ट करावी. เอตฺถ ปูเรตุํ อยุตฺตฏฺเฐน กายทุจฺจริตาทิ อวินฺทิยํ นาม, อลทฺธพฺพนฺติ อตฺโถ, ตํ อวินฺทิยํ วินฺทตีติ อวิชฺชา, ตพฺพิปรีตโต กายสุจริตาทิ วินฺทิยํ นาม, ตํ วินฺทิยํ น วินฺทตีติ อวิชฺชา. ขนฺธานํ ราสฏฺฐํ, อายตนานํ อายตนฏฺฐํ, ธาตูนํ สุญฺญฏฺฐํ, สจฺจานํ ตถฏฺฐํ, อินฺทฺริยานํ อธิปติยฏฺฐํ อวิทิตํ กโรตีติ [Pg.361] อวิชฺชา. ทุกฺขาทีนํ ปีฬนาทิวเสน วุตฺตํ จตุพฺพิธํ อตฺถํ อวิทิตํ กโรตีติ อวิชฺชา, อนฺตวิรหิเต สํสาเร สพฺพภวโยนิคติวิญฺญาณฏฺฐิติสตฺตาวาเสสุ สตฺเต ชวาเปตีติ อวิชฺชา, ปรมตฺถโต อวิชฺชมาเนสุ อิตฺถิปุริสาทีสุ ชวติ, วิชฺชมาเนสุปิ ขนฺธาทีสุ น ชวตีติ อวิชฺชา. येथे पूर्ण करण्यास अयोग्य असल्यामुळे कायदुश्चरित (शारीरिक गैरवर्तन) इत्यादींना 'अविंदिय' (मिळवण्यास अयोग्य) म्हटले जाते, ज्याचा अर्थ 'न मिळवण्याजोगे' असा आहे. त्या अविंदियाला जे मिळवते (जाणते/अनुभवते) ती 'अविज्जा' (अविद्या) होय. त्याच्या उलट, कायसुचरित (शारीरिक सत्कृत्य) इत्यादींना 'विंदिय' (मिळवण्यास योग्य) म्हटले जाते, त्या विंदियाला जे मिळवत नाही (जाणत नाही) ती 'अविज्जा' होय. स्कंधांचा राशी-अर्थ (समूह अर्थ), आयतनांचा आयतन-अर्थ (उत्पत्तीचे स्थान), धातूंचा शून्य-अर्थ, सत्यांचा तथ्य-अर्थ (यथार्थ अर्थ), आणि इंद्रियांचा अधिपती-अर्थ (प्रभुत्व अर्थ) जे अज्ञात करते (जाणू देत नाही), ती 'अविज्जा' होय. दुःखादींच्या पीडन (त्रास देणे) इत्यादींच्या स्वरूपात सांगितलेला चार प्रकारचा अर्थ जे अज्ञात करते, ती 'अविज्जा' होय. अंत नसलेल्या संसारात सर्व भव, योनी, गती, विज्ञानाची स्थिती आणि सत्त्वांच्या आवासांमध्ये (निवासस्थानांमध्ये) प्राण्यांना जे भटकवायला लावते, ती 'अविज्जा' होय. परमार्थतः जे अस्तित्वात नाही अशा स्त्री-पुरुष इत्यादींमध्ये जे धावते (प्रवृत्त होते), आणि जे खरोखर अस्तित्वात आहेत अशा स्कंधादींमध्ये जे धावत नाही (प्रवृत्त होत नाही), ती 'अविज्जा' होय. ยํ ปน อฏฺฐกถายํ ‘‘อปิจ จกฺขุวิญฺญาณาทีนํ วตฺถารมฺมณปฏิจฺจสมุปฺปาทปฏิจฺจสมุปฺปนฺนา นํ ธมฺมานํ ฉาทนโตปิ อวิชฺชา’’ติ วุตฺตํ, เอตํ น สทฺทตฺถโต วุตฺตํ, อถ โข อวิชฺชาย ฉาทนกิจฺจตฺตา วุตฺตํ. ตถา หิ อภิธมฺมฏีกายํ อิทํ วุตฺตํ – परंतु, अट्ठकथेत जे म्हटले आहे की, 'शिवाय, चक्षुविज्ञान इत्यादींचे वस्तू (आश्रय), आलंबन (विषय), पटिच्चसमुप्पाद (प्रतीत्यसमुत्पाद) आणि पटिच्चसमुप्पन्न (प्रतीत्यसमुत्पन्न) धर्मांना झाकून टाकण्यामुळेही ती अविज्जा आहे,' हे शाब्दिक अर्थाने म्हटलेले नाही, तर अविज्जेच्या झाकण्याच्या कार्यामुळे (आवरण घालण्याच्या कार्यामुळे) म्हटले आहे. तसेच अभिधम्मटीकेमध्ये हे म्हटले आहे – ‘‘พฺยญฺชนตฺถํ ทสฺเสตฺวา สภาวตฺถํ ทสฺเสตุํ ‘อปิจา’ติอาทิมาห, จกฺขุวิญฺญาณาทีนํ วตฺถารมฺมณานิ ‘อิทํ วตฺตุ, อิทมารมฺมณ’นฺติ อวิชฺชาย ญาตุํ น สกฺกาติ อวิชฺชา ตปฺปฏิจฺฉาทิกา วุตฺตา, วตฺถารมฺมณสภาวจฺฉาทนโต เอว อวิชฺชาทีนํ ปฏิจฺจสมุปฺปาทภาวสฺส, ชรามรณาทีนํ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนภาวสฺส จ ฉาทนโต ปฏิจฺจสมุปฺปาทปฏิจฺจสมุปฺปนฺนฉาทนํ เวทิตพฺพนฺติ. ตตฺถ ทุคฺคติคามิกมฺมสฺส วิเสสปฺปจฺจยตฺตา อวิชฺชา ‘อวินฺทิยํ วินฺทตี’ติ วุตฺตา, ตถา วิเสสปจฺจโย วินฺทนียสฺส น โหตีติ ‘วินฺทิยํ น วินฺทตี’ติ จ, อตฺตนิสฺสิตานํ จกฺขุวิญฺญาณาทีนํ ปวตฺตาปนํ อุปฺปาทนํ อายตนํ, สมฺโมหภาเวเนว อนภิสมยภูตตฺตา ‘อวิทิตํ อญฺญาตํ กโรติ, อนฺตวิรหิเต ชวาเปตี’ติ วณฺณาคมวิปริยายวิการวินาสธาตุอตฺถวิเสสโยเคหิ ปญฺจวิธสฺส นิรุตฺติลกฺขณสฺส วเสน ตีสุปิ ปเทสุ อการวิการชกาเร คเหตฺวา อญฺเญสํ วณฺณานํ โลปํ กตฺวา ชการสฺส จ ทุติยสฺส อาคมํ กตฺวา อวิชฺชาติ วุตฺตา’’ติ. 'व्यंजनाचा (शब्दाचा) अर्थ दाखवून स्वभावाचा अर्थ दाखवण्यासाठी 'अपि च' (शिवाय) इत्यादी म्हटले आहे. चक्षुविज्ञान इत्यादींचे वस्तू आणि आलंबन 'हे वस्तू आहे, हे आलंबन आहे' असे अविज्जेमुळे जाणणे शक्य नाही, म्हणून अविज्जेला त्यांचे आवरण घालणारी (झाकणारी) म्हटले आहे. वस्तू आणि आलंबनाच्या स्वभावाला झाकल्यामुळेच, अविज्जा इत्यादींच्या पटिच्चसमुप्पादभावाला (प्रतीत्यसमुत्पादत्वाला) आणि जरामरण इत्यादींच्या पटिच्चसमुप्पन्नभावाला (प्रतीत्यसमुत्पन्नत्वाला) झाकल्यामुळे, 'पटिच्चसमुप्पाद आणि पटिच्चसमुप्पन्न यांना झाकणारी' असे समजले पाहिजे. त्यामध्ये, दुर्गतिकडे नेणाऱ्या कर्माचा विशेष प्रत्यय (कारण) असल्यामुळे अविज्जेला 'अविंदियाला मिळवणारी' म्हटले आहे. तसेच, मिळवण्यास योग्य असलेल्या गोष्टीचा ती विशेष प्रत्यय होत नाही, म्हणून 'विंदियाला न मिळवणारी' असे म्हटले आहे. स्वतःवर आश्रित असलेल्या चक्षुविज्ञान इत्यादींचे प्रवर्तन आणि उत्पादन हेच आयतन आहे. संमोहभावामुळेच (अज्ञानामुळेच) सत्य न समजल्यामुळे 'अज्ञात करते, अंत नसलेल्या संसारात भटकवायला लावते' असे म्हटले आहे. वर्णागम (अक्षराचा आगम), वर्णविपर्यय (अक्षरांचे मागेपुढे होणे), वर्णविकार (अक्षरात बदल होणे), वर्णविनाश (अक्षराचा लोप होणे) आणि धातूच्या अर्थाचा विशेष योग या पाच प्रकारच्या निरुक्तीच्या लक्षणांच्या आधारे, तिन्ही पदांमध्ये 'अ' कार, विकार आणि 'ज' कार घेऊन, इतर वर्णांचा लोप करून आणि दुसऱ्या 'ज' काराचा आगम करून 'अविज्जा' असे म्हटले आहे.' อรหธาตุโต [Pg.362] เญยฺยา, อรหํสทฺทสณฺฐิติ; อรารูปปทหน-ธาตุโต วาถวา ปน. 'अरह' धातूपासून 'अरहं' या शब्दाची उत्पत्ती जाणावी; किंवा 'अर' (आरे), 'रूप' आणि 'पदहन' (प्रहार करणे/नाश करणे) या धातूंपासून जाणावी. รหโต รหิโต จาปิ, อการปุพฺพโต อิธ; วุจฺจเต อสฺส นิปฺผตฺติ, อารกาทิรวสฺสิตา. तसेच येथे 'रह' (गुप्त/एकांत) आणि 'रहित' या शब्दांच्या मागे 'अ' कार लावून; 'आरक' (दूर असणे) इत्यादी अर्थांच्या आश्रयाने याची निष्पत्ती (व्युत्पत्ती) सांगितली जाते. ตถา หิ อรหนฺติ อคฺคทกฺขิเณยฺยตฺตา จีวราทิปจฺจเย อรหติ ปูชาวิเสสญฺจาติ อรหํ. วุตฺตญฺจ – कारण, ते सर्वश्रेष्ठ दक्षिणेय (दान देण्यास योग्य) असल्यामुळे चीवर इत्यादी प्रत्यय (गरजा) आणि विशेष पूजेस पात्र आहेत, म्हणून ते 'अरहं' (अर्हत) होत. आणि म्हटले आहे – ‘‘ปูชาวิเสสํ สห ปจฺจเยหิ,ยสฺมา อยํ อรหติ โลกนาโถ; อตฺถานุรูปํ อรหนฺติ โลเก,ตสฺมา ชิโน อรหติ นามเมต’’นฺติ. 'ज्या अर्थी हे लोकनाथ (बुद्ध) प्रत्ययांसह (चीवरादी सामग्रीसह) विशेष पूजेस पात्र आहेत; जगामध्ये अर्थाला अनुरूप अशा पूजेस ते पात्र आहेत, म्हणूनच त्या जिनांना (विजेत्याला) 'अरहं' हे नाव योग्य आहे.' ตถา โส กิเลสารโย มคฺเคน หนีติ อรหํ. วุตฺตญฺจ – तसेच, त्यांनी क्लेशांच्या शत्रूंना (किलेस-अरी) मार्गाने (आर्यमार्गाने) मारले (नष्ट केले), म्हणून ते 'अरहं' होत. आणि म्हटले आहे – ‘‘ยสฺมา ราคาทิสงฺขาตา, สพฺเพปิ อรโย หตา; ปญฺญาสตฺเถน นาเถน, ตสฺมาปิ อรหํ มโต’’ติ. 'ज्या अर्थी राग (आसक्ती) इत्यादी नावाचे सर्व शत्रू मारले गेले आहेत; प्रज्ञा रूपी शस्त्राने त्या नाथांनी (बुद्धांनी) त्यांना मारले आहे, म्हणूनही त्यांना 'अरहं' मानले जाते.' ยญฺเจตํ อวิชฺชาภวตณฺหามยนาภึ ปุญฺญาทิอภิสงฺขารารํ ชรามรณเนมึ อาสวสมุทยมเยน อกฺเขน วิชฺฌิตฺวา วิภวรเถ สมาโยชิตํ อนาทิกาลปฺปวตฺตํ สํสารจกฺกํ, ตสฺส โส โพธิมณฺเฑ วีริยปาเทหิ สีลปถวิยํ ปติฏฺฐาย สทฺธาหตฺเถน กมฺมกฺขยกรํ ญาณปรสุํ คเหตฺวา สพฺเพ อเร หนีติปิ อรหํ. วุตฺตญฺจ – आणि हे जे अविज्जा (अविद्या) आणि भवतण्हा (भवतृष्णा) रूपी नाभी (कणा) असलेले, पुण्यादी अभिसंस्कार (पुण्य-अपुण्य कर्म) रूपी आरे (काठ्या) असलेले, जरामरण रूपी नेमी (धाव/कडा) असलेले, आसवांच्या उत्पत्ती रूपी अक्षाने (धुरीने) वेधलेले आणि विभव रूपी रथाला जोडलेले, अनादी काळापासून चालत आलेले संसारचक्र आहे; त्या संसारचक्राचे सर्व आरे त्यांनी बोधिमंडळावर, वीर्य रूपी पायांनी शील रूपी पृथ्वीवर स्थिर राहून, श्रद्धा रूपी हाताने कर्माचा क्षय करणारी ज्ञानरूपी कुऱ्हाड घेऊन मारले (नष्ट केले), म्हणूनही ते 'अरहं' होत. आणि म्हटले आहे – ‘‘อรา สํสารจกฺกสฺส, หตา ญาณาสินา ยโต; โลกนาเถน เตเนส, อรหนฺติ ปวุจฺจตี’’ติ. 'ज्या अर्थी संसारचक्राचे आरे ज्ञानरूपी तलवारीने नष्ट केले गेले आहेत; त्या लोकनाथांनी (बुद्धांनी) ते नष्ट केले आहेत, म्हणूनच त्यांना 'अरहं' असे म्हटले जाते.' ตถา อตฺตหิตํ ปรหิตญฺจ ปริปูเรตุํ สมฺมา ปฏิปชฺชนฺเตหิ สาธูหิ ทูรโต รหิตพฺพา ปริจฺจชิตพฺพา ปริหาตพฺพาติ รหา, ราคาทโย ปาปธมฺมา, น สนฺติ เอตสฺส รหาติ [Pg.363] อรหํ. ‘‘อรโห’’ติ วตฺตพฺเพ โอการสฺส สานุสารํ อการาเทสํ กตฺวา ‘‘อรหํ’’นฺติ วุตฺตํ. อาห จ – तसेच, स्वतःचे हित आणि दुसऱ्यांचे हित पूर्ण करण्यासाठी सम्यक प्रतिपन्न (योग्य आचरण) करणाऱ्या सज्जनांनी ज्यांच्यापासून दूर राहिले पाहिजे, ज्यांचा त्याग केला पाहिजे आणि जे टाळले पाहिजेत, ते 'रहा' म्हणजे राग इत्यादी पापधर्म होत. त्यांच्यामध्ये हे 'रहा' (पापधर्म) नाहीत, म्हणून ते 'अरहं' होत. 'अरहो' असे म्हणायचे असताना 'ओ' काराच्या जागी सानुस्वार 'अ' कार आदेश करून 'अरहं' असे म्हटले आहे. आणि म्हटले आहे – ‘‘ปาปธมฺมา รหา นาม, สาธูหิ รหิตพฺพโต; เตสํ สุฏฺฐุ ปหีนตฺตา, ภควา อรหํ มโต’’ติ. 'सज्जनांनी त्याग करण्यायोग्य असल्यामुळे पापधर्मांना 'रहा' म्हटले जाते; त्यांचा पूर्णपणे प्रहाण (नाश) केल्यामुळे भगवान 'अरहं' मानले जातात.' อถ วา ขีณาสเวหิ เสกฺเขหิ กลฺยาณปุถุชฺชเนหิ จ น รหิตพฺโพ น ปริจฺจชิตพฺโพ, เต จ ภควาติ อรหํ. อาห จ – किंवा, क्षीणास्रव (अर्हत), शैक्ष आणि कल्याण-पृथग्जनांनी ज्यांचा त्याग करू नये, ज्यांना सोडू नये, आणि ते भगवान आहेत, म्हणून ते 'अरहं' होत. आणि म्हटले आहे – ‘‘เย จ สจฺฉิกตธมฺมา,อริยา สุทฺธโคจรา; น เตหิ รหิโต โหติ,นาโถ เตนา’รหํ มโต’’ติ. 'ज्यांनी धर्माचा साक्षात्कार केला आहे, जे आर्य आणि शुद्ध आचरण असणारे आहेत; त्यांच्यापासून हे नाथ (बुद्ध) कधीही विलग (रहित) होत नाहीत, म्हणून त्यांना 'अरहं' मानले जाते.' รโหติ จ คมนํ วุจฺจติ, นตฺถิ เอตสฺส รโห คมนํ คตีสุ ปจฺจาชาตีติ อรหํ. อาห จ – 'रहो' म्हणजे गमन (जाणे/जन्म घेणे) असे म्हटले जाते. विविध गतींमध्ये पुन्हा जन्म घेण्यासाठी त्यांचे गमन (पुनर्जन्म) उरलेले नाही, म्हणून ते 'अरहं' होत. आणि म्हटले आहे – ‘‘รโห วา คมนํ ยสฺส, สํสาเร นตฺถิ สพฺพโส; ปหีนชาติมรโณ, อรหํ สุคโต มโต’’ติ. 'ज्यांचे संसारात कोणत्याही प्रकारे गमन (पुनर्जन्म) उरलेले नाही; ज्यांनी जन्म आणि मरण नष्ट केले आहे, त्या सुगतांना 'अरहं' मानले जाते.' ปาสํสตฺตา วา ภควา อรหํ. อกฺขรจินฺตกา หิ ปสํสายํ อรหสทํ วณฺเณนฺติ. ปาสํสภาโว จ ภควโต อนญฺญสาธารโณ ยถาภุจฺจคุณาธิคโต สเทวเก โลเก สุปฺปติฏฺฐิโต. อิติ ปาสํสตฺตาปิ ภควา อรหํ. อาห จ – किंवा, प्रशंसनीय (स्तुतीस पात्र) असल्यामुळे भगवान 'अरहं' होत. कारण व्याकरणकार (अक्षरचिंतक) स्तुतीच्या अर्थामध्ये 'अरह' शब्दाचे वर्णन करतात. आणि भगवंतांचा प्रशंसनीय भाव हा असाधारण (इतरांमध्ये नसलेला), यथार्थ गुणांच्या प्राप्तीमुळे देवलोकासह संपूर्ण जगात चांगल्या प्रकारे प्रस्थापित झालेला आहे. अशा प्रकारे, प्रशंसनीय असल्यामुळेही भगवान 'अरहं' होत. आणि म्हटले आहे – ‘‘คุเณหิ สทิโส นตฺถิ, ยสฺมา โลเก สเทวเก; ตสฺมา ปาสํสิยตฺตาปิ, อรหํ ทฺวิปทุตฺตโม’’ติ. 'ज्या अर्थी देवलोकासह संपूर्ण जगात गुणांच्या बाबतीत त्यांच्यासारखा कोणीही नाही; त्यामुळे प्रशंसनीय असल्यामुळेही ते द्विपदोत्तम (मनुष्यांमध्ये श्रेष्ठ) 'अरहं' आहेत.' อิมานิ [Pg.364] นิพฺพจนานิ ‘‘อรห ปูชายํ, หน หึสายํ, รห จาเค, รหิ คติย’’นฺติ อิเมสํ ธาตูนํ วเสน อิธ วุตฺตานิ กิเลเสหิ อารกตฺตา ‘‘อรห’’นฺติ จ ปาปกรเณ รหาภาวา ‘‘อรห’’นฺติ จ อสปฺปุริสานํ อารกา ทูเรติ ‘‘อรห’’นฺติ จ สปฺปุริสานํ อารกา อาสนฺเนติ ‘‘อรห’’นฺติ จ. นิพฺพจนานิ ปน ธาตุสทฺทนิสฺสิตานิ น โหนฺตีติ อิธ น คหิตานิ. ปสํสา ปน อตฺถโต ปูชา เอวาติ ‘‘อรห ปูชาย’’นฺติ ธาตุสฺส อตฺโถ ภวิตุํ ยุตฺโตติ อิธ อมฺเหหิ คหิตา, อฏฺฐกถาจริเยหิ ตุ อรหสทฺทสฺส ลพฺภมานวเสน สพฺเพปิ อตฺถา คหิตา ธาตุนิสฺสิตา จ อธาตุนิสฺสิตา จ. กถํ? – ही निर्वचने (व्युत्पत्ती) 'अरह पूजायं' (पूजा करणे), 'हन हिंसायं' (नाश करणे), 'रह चागे' (त्याग करणे), 'रहि गतियं' (गमन करणे) या धातूंच्या आधारे येथे सांगितली आहेत – क्लेशांपासून दूर (आरक) असल्यामुळे 'अरह' असे, पाप कृत्य करण्यात एकांत (रह) नसल्यामुळे 'अरह' असे, असत्पुरुषांपासून अत्यंत दूर असल्यामुळे 'अरह' असे, आणि सत्पुरुषांच्या अत्यंत जवळ असल्यामुळे 'अरह' असे. परंतु, ही निर्वचने धातूच्या शब्दांवर आधारित नसल्यामुळे येथे घेतलेली नाहीत. प्रशंसा ही अर्थाच्या दृष्टीने पूजाच आहे, म्हणून 'अरह पूजायं' या धातूचा अर्थ असणे योग्य आहे, म्हणून ती आम्ही येथे घेतली आहे. परंतु अट्ठकथाचार्यांनी तर 'अरह' शब्दाच्या उपलब्धतेनुसार धातूवर आधारित आणि धातूवर आधारित नसलेले सर्वच अर्थ घेतले आहेत. ते कसे? – อารกตฺตา หตตฺตา จ, กิเลสารีน โส มุนิ; หตสํสารจกฺกาโร, ปจฺจยาทีน จารโห; น รโห กโรติ ปาปานิ, อรหํ เตน วุจฺจตีติ. 'क्लेशांच्या शत्रूंपासून दूर असल्यामुळे आणि त्यांचा नाश केल्यामुळे ते मुनी; संसारचक्राचा नाश केल्यामुळे आणि प्रत्ययादींना (चीवरादी दानाला) पात्र असल्यामुळे; एकांतातही पापकृत्ये करत नसल्यामुळे, त्यांना 'अरहं' म्हटले जाते.' ฏีกาจริเยหิปิ ตเถว คหิตา. กถํ? – टीकाकारांनीही तसेच ग्रहण केले आहे. ते कसे? – อารกา มนฺทพุทฺธีนํ, อารกา จ วิชานตํ; รหานํ สุปฺปหีนตฺตา, วิทูนมรเหยฺยโต; ภเวสุ จ รหาภาวา, ปาสํสา อรหํ ชิโนติ. जे मंदबुद्धीच्या लोकांपासून अत्यंत दूर आहेत, आणि सुज्ञ लोकांना अत्यंत जवळ (विशिष्ट ज्ञानाने जाणता येणारे) आहेत; ज्यांनी सर्व गुप्त पापे पूर्णपणे नष्ट केली आहेत; जे ज्ञानी लोकांकडून पूजनीय (अर्ह) आहेत; आणि ज्यांच्यामध्ये पुनर्जन्माचा (भवांचा) अभाव आहे; असे ते प्रशंसनीय अर्हत बुद्ध विजयी आहेत. ยถา ปน อรหํสทฺทสฺส, เอวํ อรหาสทฺทสฺสาปิ นิพฺพจนานิ เวทิตพฺพานิ. ज्याप्रमाणे 'अर्हं' या शब्दाची व्युत्पत्ती आहे, त्याचप्रमाणे 'अर्हा' या शब्दाचीही व्युत्पत्ती समजावी. สุปุพฺพคมิโต เจว, สุปุพฺพคทิโตปิ จ; ธีโร สุคตสทฺทสฺส, นิปฺผตฺตึ สมุทีรเย. ज्ञानी पुरुषाने 'सु' पूर्वपदासह 'गम्' धातूपासून आणि 'सु' पूर्वपदासह 'गद्' धातूपासून 'सुगत' या शब्दाची उत्पत्ती सांगावी. เอตฺถ หิ สุคโตติ โสภนํ คตํ เอตสฺสาติ สุคโต, สุนฺทรํ ฐานํ คโตติ สุคโต, สมฺมา คโตติ สุคโต, สมฺมา จ คทตีติ สุคโตติ ธาตุนิสฺสิตํ อตฺถํ คเหตฺวา สทฺทนิปฺผตฺติ กาตพฺพา. วุตฺตญฺหิ อฏฺฐกถาสุ – येथे 'सुगत' म्हणजे ज्यांचे गमन कल्याणकारी आहे ते सुगत; जे सुंदर स्थानाला (निर्वाणाला) गेले आहेत ते सुगत; जे सम्यक प्रकारे गेले आहेत ते सुगत; आणि जे सम्यक प्रकारे भाषण करतात ते सुगत; अशा प्रकारे धातूवर आधारित अर्थ घेऊन शब्दाची उत्पत्ती करावी. अट्ठकथांमध्ये म्हटले आहे की – ‘‘โสภนคมนตฺตา[Pg.365], สุนฺทรํ ฐานํ คตตฺตา, สมฺมา คตตฺตา, สมฺมา จ คทตฺตา สุคโต. คมนมฺปิ หิ คตนฺติ วุจฺจติ, ตญฺจ ภควโต โสภนํ ปริสุทฺธมนวชฺชํ. กึ ปน ตนฺติ? อริยมคฺโค, เตเนส คมเนน เขมํ ทิสํ อสชฺชมาโน คโตติ โสภนคมนตฺตา สุคโต’’ติอาทิ. “शोभन (कल्याणकारी) गमनामुळे, सुंदर स्थानाला गेल्यामुळे, सम्यक प्रकारे गेल्यामुळे आणि सम्यक भाषण केल्यामुळे ते 'सुगत' आहेत. गमन म्हणजेच 'गत' असे म्हटले जाते, आणि ते भगवंतांचे गमन शोभन, अत्यंत शुद्ध व निर्दोष आहे. ते गमन कोणते? तर तो आर्यमार्ग आहे. त्या गमनाने ते कोणत्याही आसक्तीशिवाय क्षेम अशा दिशेला (निर्वाणाला) गेले, म्हणून शोभन गमनामुळे ते 'सुगत' आहेत” इत्यादी. ภคสทฺทูปปทโต, วนุโต วมุโตปิ จ; ภควาสทฺทนิปฺผตฺตึ, ปวเท อญฺญถาปิ วา. 'भग' या शब्दाला उपपद जोडून, 'वन्' धातूपासून किंवा 'वम्' धातूपासून 'भगवंत' (भगवा) या शब्दाची उत्पत्ती सांगावी, किंवा इतर प्रकारेही सांगावी. อตฺริมานิ นิพฺพจนานิ – ภคสงฺขาตา โลกิยโลกุตฺตรสมฺปตฺติโย วนิ ภชิ เสวีติ ภควา. โสมนสฺสกุมารตฺตภาวาทีสุ จริมตฺตภาเว จ ภคสงฺขาตํ สิรึ อิสฺสริยํ ยสญฺจ วมิ อุคฺคิริ เขฬปิณฺฑํ วิย อนเปกฺโข ฉฑฺฑยีติ ภควา. อถ วา นกฺขตฺเตหิ สมํ ปวตฺตตฺตา ภคสงฺขาเต สิเนรุยุคนฺธรอุตฺตรกุรุหิมวนฺตาทิภาชนโลเก วมิ, ตนฺนิวาสิตตฺตาวาสสมติกฺกมนโต ตปฺปฏิพทฺธฉนฺทราคปฺปหาเนน ปชหีติ ภควาติ. यावर खालील व्युत्पत्ती आहेत – 'भग' संज्ञक लौकिक आणि लोकोत्तर संपत्तीचे ज्यांनी सेवन केले, भजन केले, ते 'भगवंत' (भगवा). सोमनस्य, कुमार अवस्था इत्यादींमध्ये आणि अंतिम जन्मामध्ये ज्यांनी 'भग' संज्ञक ऐश्वर्य, यश आणि कीर्तीचा थुंकीच्या गोळ्याप्रमाणे निरपेक्षपणे त्याग केला (वमन केले), ते 'भगवंत'. अथवा, नक्षत्रांसोबत फिरणाऱ्या 'भग' संज्ञक सुमेरू, युगंधर, उत्तरकुरु, हिमवंत इत्यादी भाजनलोकांचे (भौतिक जगाचे) ज्यांनी उल्लंघन केले आणि त्यावरील तृष्णा व राग नष्ट करून त्याचा त्याग केला, ते 'भगवंत' होत. ปรธาตุวสา วาปิ, ปรูปปทโตปิ วา; มุโต ตถา มชโต จ, มยโต มุนโต มิโต. 'पर' धातूच्या प्रभावाने किंवा 'पर' उपपदावरून; तसेच 'मुत्', 'मज्', 'मय्', 'मुन्' आणि 'मित्' या धातूंपासून; ปุน มิโตติ เอเตหิ, ธาตูหิ ขลุ สตฺตหิ; วเท ปรมสทฺทสฺส, นิปฺผตฺตึ ชินสาสเน. तसेच 'मित्' या धातूपासून; अशा या सात धातूंवरून बुद्धशासनात 'परम' या शब्दाची उत्पत्ती सांगावी. อุตฺตมวาจีปรม-สทฺเทน สห อฏฺฐหิ; ปเทหิ ปารมีสทฺทํ, วเท ตทฺธิตปจฺจยึ. उत्कृष्टता दर्शवणाऱ्या 'परम' या शब्दासह आठ पदांनी तद्धित प्रत्यय लावून 'पारमी' या शब्दाची उत्पत्ती सांगावी. ปารสทฺทูปปทโต, มชโตปิ มุโตถ วา; มยโต วา มุนโต วา, มิโต วา ปุนปิ มิโต. 'पार' या शब्दाला उपपद जोडून, 'मज्' धातूपासून किंवा 'मुत्' धातूपासून; अथवा 'मय्', 'मुन्', 'मित्' किंवा पुन्हा 'मित्' धातूपासून; เอเตหิ ฉหิ ธาตูหิ, มหาปุริสวาจกํ; ปารมีสทฺทมีเรนฺติ, ตโต ปารมิตารวํ. या सहा धातूंवरून महापुरुषाला दर्शवणाऱ्या 'पारमी' या शब्दाची उत्पत्ती सांगतात, आणि त्यावरून 'पारमिता' हा शब्द सिद्ध होतो. เอตฺถ [Pg.366] ตาว อุตฺตมตฺถวาจกปรมสทฺทวเสน ปารมีนิพฺพจนํ กเถสฺสาม. ตโต ปรธาตุวเสน, ตโต ปรสทฺทูปปทมุธาตาทิวเสน ตโต ปารสทฺทูปปทมชธาตาทิวเสน. येथे प्रथम आपण उत्तम अर्थ दर्शवणाऱ्या 'परम' शब्दाच्या आधारे 'पारमी'ची व्युत्पत्ती सांगू. त्यानंतर 'पर' धातूच्या आधारे, त्यानंतर 'पर' उपपद आणि 'मुत्' इत्यादी धातूंच्या आधारे, आणि त्यानंतर 'पार' उपपद आणि 'मज्' इत्यादी धातूंच्या आधारे व्युत्पत्ती सांगू. ทานสีลาทิคุณวิเสสโยเคน สตฺตุตฺตมตาย ปรมา. มหาโพธิสตฺตา โพธิสตฺตา, เตสํ ภาโว, กมฺมํ วา ปารมี, ทานาทิกฺริยา. อถ วา ปรติ ปาเลติ ปูเรติ จาติ ปรโม, ทานาทีนํ คุณานํ ปาลโก ปูรโก จ โพธิสตฺโต, ปรมสฺส อยํ, ปรมสฺส วา ภาโว, กมฺมํ วา ปารมี, ทานาทิกฺริยา. อถ วา ปรํ สตฺตํ อตฺตนิ มวติ พนฺธติ คุณวิเสสโยเคนาติ ปรโม, ปรํ วา อธิกตรํ มชฺชติ สุชฺฌติ กิเลสมลโตติ ปรโม, ปรํ วา เสฏฺฐํ นิพฺพานํ มยติ คจฺฉตีติ ปรโม, ปรํ วา โลกํ ปมาณภูเตน ญาณวิเสเสน อิธโลกํ วิย มุนาติ ปริจฺฉินฺทตีติ ปรโม, ปรํ วา อติวิย สีลาทิคุณคณํ อตฺตโน สนฺตาเน มิโนติ ปกฺขิปตีติ ปรโม, ปรํ วา อตฺตภูตโต ธมฺมกายโต อญฺญํ ปฏิปกฺขํ วา ตทนตฺถกรํ กิเลสโจรคณํ มินาติ หึสตีติ ปรโม, มหาสตฺโต, ปรมสฺส อยํ, ปรมสฺส วา ภาโว, กมฺมํ วา ปารมี, ทานาทิกฺริยา. दान, शील इत्यादी विशेष गुणांच्या योगाने जे प्राण्यांमध्ये सर्वोत्तम आहेत, ते 'परम' (सर्वश्रेष्ठ) होत. ते म्हणजे महाबोधिसत्व किंवा बोधिसत्व; त्यांचा भाव किंवा त्यांचे कर्म म्हणजे 'पारमी', म्हणजेच दानादी क्रिया होय. अथवा, जो इतरांचे रक्षण करतो आणि त्यांना परिपूर्ण करतो तो 'परम' होय; दान इत्यादी गुणांचे रक्षण करणारा आणि ते पूर्ण करणारा तो बोधिसत्व होय. अशा सर्वश्रेष्ठ (परम) पुरुषाचा हा भाव किंवा कर्म म्हणजे 'पारमी', म्हणजेच दानादी क्रिया होय. अथवा, जो आपल्या विशेष गुणांच्या योगाने इतर प्राण्यांना स्वतःकडे आकर्षित करतो (बाँधतो), तो 'परम' होय. किंवा जो क्लेशांच्या मळापासून अत्यंत शुद्ध होतो, तो 'परम' होय. किंवा जो सर्वश्रेष्ठ अशा निर्वाणाला प्राप्त करतो, तो 'परम' होय. किंवा जो या लोकाप्रमाणेच परलोकालाही आपल्या प्रमाणभूत विशेष ज्ञानाने जाणतो, तो 'परम' होय. किंवा जो शील इत्यादी गुणांच्या समूहाला आपल्या अंतःकरणात अत्यंत साठवतो, तो 'परम' होय. किंवा जो आपल्या धर्मकायापेक्षा भिन्न असलेल्या, अहित करणाऱ्या क्लेशरूपी शत्रूंचा नाश करतो, तो 'परम' म्हणजेच महासत्व होय. अशा सर्वश्रेष्ठ (परम) महापुरुषाचा हा भाव किंवा कर्म म्हणजे 'पारमी', म्हणजेच दानादी क्रिया होय. อปโร นโย – ปาเร นิพฺพาเน มชฺชติ สุชฺฌติ, สตฺเต จ มชฺเชติ โสเธตีติ ปารมี, มหาปุริโส, ตสฺส ภาโว, กมฺมํ วา ปารมิตา. ปาเร นิพฺพาเน สตฺเต มวติ พนฺธติ โยเชอีติ ปารมี, ปารํ วา นิพฺพานํ มยติ คจฺฉติ, สตฺเต จ มาเยติ คเมตีติ ปารมี, มุนาติ วา ปารํ นิพฺพานํ ยาถาวโต, ตตฺถ วา สตฺเต มิโนติ ปกฺขิปตีติ ปารมี, กิเลสารึ วา สตฺตานํ ปาเร นิพฺพาเน มินาติ หึสตีติ ปารมี, มหาปุริโส, ตสฺส ภาโว, กมฺมํ วา ปารมิตา, ทานาทิกฺริยาว. อิมินา นเยน ปารมีนํ สทฺทตฺโถ เวทิตพฺโพ. दुसरा नय (पद्धत) – जो पलीकडच्या तीरावर असलेल्या निर्वाणात मग्न होतो, शुद्ध होतो आणि प्राण्यांना मग्न करतो, शुद्ध करतो ती 'पारमी' होय. महापुरुष, त्याचा भाव किंवा त्याचे कर्म म्हणजे 'पारमिता' होय. जो पलीकडच्या तीरावर असलेल्या निर्वाणात प्राण्यांना बांधतो, जोडतो ती 'पारमी' होय; किंवा जो पलीकडच्या तीरावर असलेल्या निर्वाणाप्रत जातो आणि प्राण्यांना तेथे पोहोचवतो ती 'पारमी' होय; किंवा जो पलीकडच्या तीरावर असलेल्या निर्वाणाला यथार्थपणे जाणतो, किंवा प्राण्यांना तेथे प्रस्थापित करतो ती 'पारमी' होय; किंवा जो प्राण्यांच्या क्लेशरूप शत्रूचा पलीकडच्या तीरावर असलेल्या निर्वाणात नाश करतो, हिंसा करतो ती 'पारमी' होय. महापुरुष, त्याचा भाव किंवा त्याचे कर्म म्हणजे 'पारमिता' होय, जसे की दानादी क्रिया. या पद्धतीने पारमींचा शब्दार्थ समजून घ्यावा। กรธาตุวสา [Pg.367] วาปิ, กิรธาตุวเสน วา; กํสทฺทูปปทรุธิ-ธาตุโต วาปิ ทีปเย; กรุณาสทฺทนิปฺผตฺตึ, มหากรุณสาสเน. महाकरुणा शासनामध्ये 'करुणा' या शब्दाची उत्पत्ती 'कर' धातूवरून किंवा 'किर' धातूवरून किंवा 'कम्' शब्दाच्या उपपदासह 'रुध्' धातूवरून स्पष्ट करावी। ตตฺถ กรุณาติ ปรทุกฺเข สติ สาธูนํ หทยกมฺปนํ กโรตีติ กรุณา. กิรติ ปรทุกฺกํ วิกฺขิปตีติ กรุณา. กํ วุจฺจติ สุขํ, ตํ รุนฺธติ วิพาธติ การุณิกํ น สุขาเปตีติปิ กรุณา. त्यात 'करुणा' म्हणजे – दुसऱ्याचे दुःख पाहून सज्जनांच्या हृदयाला कंपित करते ती 'करुणा' होय. दुसऱ्याचे दुःख दूर करते (विखुरते) ती 'करुणा' होय. 'कम्' म्हणजे सुख म्हटले जाते, त्या सुखाला जे रोखते, बाधा आणते, कारुणिक व्यक्तीला सुखी होऊ देत नाही (जोपर्यंत इतर दुःखी आहेत), ती देखील 'करुणा' होय। วิทิวิธวิทธาตุ-วเสน ปริทีปเย; วิชฺชาสทฺทสฺส นิปฺผตฺตึ, สทฺทนิปฺผตฺติโกวิโท. शब्दोत्पत्तीमध्ये कुशल असलेल्याने 'विद्' (जाणणे), 'विद्' (लाभणे) आणि 'विद्' (असणे/विचार करणे) या धातूंच्या आधारे 'विज्जा' (विद्या) या शब्दाची उत्पत्ती स्पष्ट करावी। ตตฺถ วิชฺชาติ วินฺทิยํ กายสุจริตาทึ วินฺทติ ยาถาวโต อุปลภตีติ วิชฺชา. ตโมขนฺธาทิปทาลนฏฺเฐน วา อตฺตโน ปฏิปกฺขํ วิชฺฌตีติ วิชฺชา. ตโต เอว อตฺตโน วิสยํ วิทิตํ กโรตีติปิ วิชฺชา. त्यात 'विज्जा' (विद्या) म्हणजे – जी जाणण्यायोग्य अशा कायसुचरित इत्यादींना यथार्थपणे प्राप्त करते, मिळवते ती 'विज्जा' होय. किंवा अज्ञानाचा अंधकार इत्यादींचा नाश करण्याच्या अर्थाने जी आपल्या विरोधी पक्षाचा (अज्ञानाचा) वेध घेते (नाश करते) ती 'विज्जा' होय. म्हणूनच जी आपल्या विषयाला ज्ञात करते ती देखील 'विज्जा' होय। เมธธาตุวสา เจว, เมธาธาตูหิ จ ทฺวิธา; เมธาสทฺทสฺส นิปฺผตฺตึ, เมธาวี สมุทีรเย. बुद्धिमान मनुष्याने 'मेध' धातूवरून आणि 'मेधा' धातूवरून अशा दोन प्रकारे 'मेधा' शब्दाची उत्पत्ती सांगावी। ตตฺถ เมธาติ สมฺโมหํ เมธติ หึสตีติ เมธา. ปาปเก วา อกุสเล ธมฺเม เมธติ หึสตีติปิ เมธา. อถ วา – त्यात 'मेधा' म्हणजे – जी संमोहाचा (अज्ञानाचा) नाश करते, हिंसा करते ती 'मेधा' होय. किंवा जी पापी व अकुशल धर्मांचा नाश करते, हिंसा करते ती देखील 'मेधा' होय. अथवा – ‘‘ปญฺญา หิ เสฏฺฐา กุสลา วทนฺติ,นกฺขตฺตราชาริว ตารกานํ; สีลํ สิริญฺจาปิ สตญฺจ ธมฺโม,อนฺวายิกา ปญฺญวโต ภวนฺตี’’ติ “कुशल लोक प्रज्ञेलाच श्रेष्ठ मानतात, जसा नक्षत्रांचा राजा (चंद्र) ताऱ्यांमध्ये श्रेष्ठ असतो; शील, श्री (समृद्धी) आणि सज्जनांचा धर्म हे प्रज्ञावंताचे अनुगामी असतात.” วจนโต ปน เมธติ สีเลน สิริยา สตญฺจ ธมฺเมหิ สห คจฺฉติ, น เอกิกา หุตฺวา ติฏฺฐตีติปิ เมธา. อปโร นโย – สุขุมมฺปิ อตฺถํ ธมฺมญฺจ ขิปฺปเมว เมติ จ ธาเรติ จาติ เมธา, เอตฺถ เมตีติ คณฺหาตีติ อตฺโถ. ตถา หิ [Pg.368] อฏฺฐสาลินิยํ วุตฺตํ ‘‘อสนิ วิย สิลุจฺจเย กิเลเส เมธติ หึสตีติ เมธา, ขิปฺปํ คหณธารณฏฺเฐน วา เมธา’’ติ. या वचनानुसार, जी शील, श्री आणि सज्जनांच्या धर्मांसोबत जाते (युक्त असते), एकटी राहत नाही ती 'मेधा' होय. दुसरा नय (पद्धत) – जी सूक्ष्म अर्थ आणि धर्माला देखील अत्यंत वेगाने ग्रहण करते आणि धारण करते ती 'मेधा' होय, येथे 'मेति' म्हणजे ग्रहण करते असा अर्थ आहे. म्हणूनच अट्ठसालिनीमध्ये म्हटले आहे – 'जशी पर्वतावर वीज पडते, तशी जी क्लेशांचा नाश करते, हिंसा करते ती 'मेधा' होय, किंवा वेगाने ग्रहण व धारण करण्याच्या अर्थाने ती 'मेधा' होय.' รนฺชธาตุวสา เจว, ราปุพฺพติรโตปิ จ; รตฺติสทฺทสฺส นิปฺผตฺตึ, สทฺทตฺถญฺญู วิภาวเย. शब्दाचा अर्थ जाणणाऱ्याने 'रंज्' धातूवरून आणि 'रा' पूर्वी असलेल्या 'रम्' धातूवरून 'रत्ति' (रात्र/आसक्ती) या शब्दाची उत्पत्ती स्पष्ट करावी। รนฺชนฺติ สตฺตา เอตฺถาติ รตฺติ, รา สทฺโท ติยฺยติ ฉิชฺชติ เอตฺถาติ รตฺติ, สตฺตานํ สทฺทสฺส วูปสมกาโลติ อตฺโถ. ज्यामध्ये प्राणी रममाण होतात (आसक्त होतात) ती 'रत्ति' (रात्र) होय. किंवा ज्यामध्ये 'रा' हा शब्द नष्ट होतो (छिन्न होतो) ती 'रत्ति' होय. प्राण्यांच्या आवाजाच्या उपशमनाचा (शांत होण्याचा) काळ, असा याचा अर्थ आहे। มา มาเน อิติ โสอนฺต, กมฺมนีติ จุโภหิ ตุ; ธาตูหิ มาสสทฺทสฺส, นิปฺผตฺตึ สมุทีรเย. 'मा' (मोजणे या अर्थी) आणि 'कमु' (इच्छा करणे किंवा पाऊल टाकणे) या दोन्ही धातूंपासून 'मास' (महिना) या शब्दाची निष्पत्ती सांगावी। ตถา หิ สตฺตานํ อายุํ มานนฺโต วิย สิยติ อนฺตํ กโรตีติ มาโส, จิตฺตมาสาทโย ทฺวาทส มาสา. เสยฺยถิทํ? จิตฺโต วิสาโข เชฏฺโฐ อาสาฬฺโห สาวโณ ภทฺโท อสฺสยุโช กตฺติโก มาคสิโร ผุสฺโส มาโฆ ผคฺคุโณติ. ตตฺร จิตฺโต มาโส ‘‘รมฺมโก’’ติ วุจฺจติ. ‘‘ยถาปิ รมฺมเก มาเส, พหู ปุปฺผนฺติ วาริชา’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. ภทฺโท ปน ‘‘โปฏฺฐปาโท’’ติ วุจฺจติ. तसेच, जो प्राण्यांच्या आयुष्याचे मोजमाप केल्यासारखा अंत करतो, तो 'मास' (महिना) होय. चित्त (चैत्र) इत्यादी बारा महिने आहेत. ते खालीलप्रमाणे आहेत – चित्त (चैत्र), विसाख (वैशाख), जेट्ठ (ज्येष्ठ), आसाळ्ह (आषाढ), सावण (श्रावण), भद्द (भाद्रपद), अस्सयुज (अश्विन), कत्तिक (कार्तिक), मागसिर (मार्गशीर्ष), फुस्स (पौष), माघ आणि फग्गुण (फाल्गुन). त्यापैकी चित्त महिन्याला 'रम्मक' (रमणीय) असे म्हणतात. 'ज्याप्रमाणे रम्मक (रमणीय) महिन्यात अनेक कमळे फुलतात' असा पाळी पाठ आढळतो. तर भद्द महिन्याला 'पोट्ठपाद' असे म्हणतात। อถ วา มาโสติ อปรณฺณวิเสสสฺสปิ สุวณฺณมาสสฺสปิ นามํ. ตตฺถ อปรณฺณวิเสโส ยถาปริมิเต กาเล อสิยติ ภกฺขิยตีติ มาโส, อิตโร ปน ‘‘มม อิท’’นฺติ มสิยติ อามสิยติ คณฺหิยตีติ มาโสติ วุจฺจติ. अथवा 'मास' हे एका विशिष्ट कडधान्याचे (उडीद इत्यादी) आणि सुवर्णमासाचे (सोन्याचे नाणे) देखील नाव आहे. त्यापैकी, विशिष्ट कडधान्य हे योग्य प्रमाणात वेळेवर खाल्ले जाते (भक्षण केले जाते) म्हणून त्याला 'मास' म्हणतात; तर दुसरे (सोन्याचे नाणे) 'हे माझे आहे' असे मानले जाते, स्पर्श केले जाते आणि ग्रहण केले जाते म्हणून त्याला 'मास' म्हणतात। สํปุพฺพวทจเรหิ, สํวจฺฉรรวสฺส ตุ; นิปฺผตฺตึ สมุทีเรยฺย, สกฺยสีหสฺส สาสเน. शाक्यसिंहाच्या (बुद्धांच्या) शासनात 'सं' उपसर्गासह 'वद' आणि 'चर' धातूंपासून 'संवत्सर' (वर्ष) या शब्दाची निष्पत्ती सांगावी। ตถา หิ ตํ ตํ สตฺตํ ธมฺมปฺปวตฺติญฺจ สงฺคมฺม วทนฺโต วิย จรติ ปวตฺตตีติ สํวจฺฉโร. कारण, जो त्या त्या प्राण्याशी आणि धर्माच्या (गोष्टींच्या) प्रवृत्तीशी मिळून-मिसळून बोलल्यासारखा चालतो (प्रवृत्त होतो), तो 'संवत्सर' होय। ภิทิภิกฺขิธาตุวสา[Pg.369], อถ วา ภยวาจกํ; ภีสทฺทํ ปุริมํ กตฺวา, อิกฺขธาตุวเสน จ; ภิกฺขุสทฺทสฺส นิปฺผตฺตึ, กถเยยฺย วิจกฺขโณ. बुद्धिमान मनुष्याने 'भिदि' (भेदणे/तोडणे) आणि 'भिक्खि' (भिक्षा मागणे) या धातूंच्या आधारे, किंवा भयवाचक 'भी' शब्दाला पुढे ठेवून 'इक्ख' (पाहणे) धातूच्या आधारे 'भिक्खू' शब्दाची निष्पत्ती सांगावी। ตถา หิ กิเลเส ภินฺทตีติ ภิกฺขุ. ฉินฺนภินฺนปฏธโรติปิ ภิกฺขุ. ภิกฺขนสีโลติปิ ภิกฺขุ. สํสาเร ภยํ อิกฺขติ, อิกฺขนสีโลติ วา ภิกฺขุ. तसेच, जो क्लेशांचा नाश करतो (भेदतो) तो 'भिक्खू' होय. फाटलेले आणि ठिगळ लावलेले वस्त्र परिधान करणारा तोही 'भिक्खू' होय. भिक्षा मागण्याचा स्वभाव असलेला तोही 'भिक्खू' होय. किंवा जो संसारात भय पाहतो, ज्याचा (भय) पाहण्याचा स्वभाव आहे, तो 'भिक्खू' होय। สทภิทีหิ ธาตูหิ, สพฺภิสทฺทคตึ วเท; สปฺปุริเส จ นิพฺพาเน, เอส สทฺโท ปวตฺตติ. 'सद' (बसणे/नष्ट होणे) आणि 'भिदि' (भेदणे) या धातूंपासून 'सब्भि' शब्दाची उत्पत्ती सांगावी. हा शब्द 'सत्पुरुष' आणि 'निब्बान' (निर्वाण) या दोन्ही अर्थांत वापरला जातो। อตฺริมานิ นิพฺพจนานิ – สีทนสภาเว กิเลเส ภินฺทตีติ สพฺภิ, สปฺปุริโส, โย ‘‘อริโย’’ติปิ ‘‘ปณฺฑิโต’’ติปิ วุจฺจติ. อปิจ สีทนสภาวา กิเลสา ภิชฺชนฺติ เอตฺถาติ สพฺภิ, นิพฺพานํ, ยํ ‘‘ราคกฺขโย’’ติอาทินามํ ลภติ. ตถา หิ สํยุตฺตฏฺฐกถายํ วุตฺตํ ‘‘ยสฺมา นิพฺพานํ อาคมฺม สีทนสภาวา กิเลสา ภิชฺชนฺติ, ตสฺมา ตํ สพฺภีติ วุจฺจตี’’ติ. येथे या निरुक्ती (व्याख्या) आहेत – शिथिल करणाऱ्या (संसारात बुडवणाऱ्या) स्वभावाच्या क्लेशांचा जो नाश करतो तो 'सब्भि' म्हणजेच 'सत्पुरुष' होय, ज्याला 'अरीय' (आर्य) आणि 'पंडित' असेही म्हटले जाते. तसेच, ज्यामध्ये शिथिल करणाऱ्या स्वभावाचे क्लेश नष्ट होतात ते 'सब्भि' म्हणजेच 'निब्बान' (निर्वाण) होय, ज्याला 'रागक्खय' (रागाचा क्षय) इत्यादी नाव मिळते. म्हणूनच संयुत्त-अट्ठकथेत म्हटले आहे – 'ज्या अर्थी निब्बानाचा आश्रय घेऊन शिथिल करणाऱ्या स्वभावाचे क्लेश नष्ट होतात, त्या अर्थी त्याला सब्भि असे म्हटले जाते।' เอตฺเถตํ วทาม – या संदर्भात आम्ही हे सांगतो – ‘‘ยสฺมา นิพฺพานมาคม, สํสีทนสภาวิโน; กฺเลสา ภิชฺชนฺติ ตํ ตสฺมา, สพฺภีติ อมตํ’พฺรวุ’’นฺติ. 'ज्या अर्थी निब्बानाचा (निर्वाणाचा) आश्रय घेऊन संसारात बुडवणाऱ्या स्वभावाचे क्लेश नष्ट होतात, त्या अर्थी त्या अमृताला (अमरणशील तत्त्वाला) 'सब्भि' असे म्हटले आहे।' พฺรูธาตุสทธาตูหิ, ภิสิสทฺทสฺส สมฺภวํ; คุเณหิ พฺรูหิตา ธีรา, โปราณาจริยา’พฺรวุํ. गुणांनी समृद्ध असलेल्या धीर (बुद्धिमान) प्राचीन आचार्यांनी 'ब्रू' आणि 'सद' या धातूंपासून 'भिसि' (आसन/उशी) या शब्दाची उत्पत्ती सांगितली आहे। ตถา หิ พฺรวนฺตา เอตฺถ สีทนฺตีติ ภิสีติ ภิสิสทฺทสฺส สมฺภวํ โปราณา กถยึสุ. कारण, प्राचीन आचार्यांनी 'भिसि' शब्दाची उत्पत्ती अशी सांगितली आहे की, ज्यावर बोलणारे (किंवा वाढणारे) लोक बसतात (विश्रांती घेतात) ते 'भिसि' होय। สุขธาตุวสา จาปิ, สุปุพฺพขาทโตปิ วา; สุปุพฺพขนุโต วาปิ, สุขสทฺทคตึ วเท. 'सुख' धातूच्या आधारे, किंवा 'सु' उपसर्गासह 'खाद' (खाणे) धातूपासून, अथवा 'सु' उपसर्गासह 'खनु' (खणणे) धातूपासून 'सुख' या शब्दाची उत्पत्ती सांगावी। สุขนฺติ [Pg.370] หิ สุขยตีติ สุขํ. ยสฺสุปฺปชฺชติ, ตํ สุขิตํ กโรตีติ อตฺโถ. สุฏฺฐุ ทุกฺขํ ขาทตีติปิ สุขํ. สุฏฺฏุ ทุกฺขํ ขนตีติปิ สุขํ. कारण, जे सुखी करते ते 'सुख' होय. ज्याच्यामध्ये ते उत्पन्न होते, त्याला ते सुखी करते, असा याचा अर्थ आहे. जे दुःखाचा चांगल्या प्रकारे नाश करते (खाऊन टाकते), ते देखील 'सुख' होय. जे दुःखाला चांगल्या प्रकारे खणून काढते (उखडून टाकते), ते देखील 'सुख' होय। ทุกฺขธาตุวสา จาปิ, ทุปุพฺพขาทโตปิ วา; ทุปุพฺพขนุโต วาปิ, ทุกฺขสทฺทคตึ วเท. 'दुःख' धातूच्या आधारे, किंवा 'दु' उपसर्गासह 'खाद' (खाणे) धातूपासून, अथवा 'दु' उपसर्गासह 'खनु' (खणणे) धातूपासून 'दुःख' या शब्दाची उत्पत्ती सांगावी। ทุกฺขนฺติ หิ ทุกฺขยตีติ ทุกฺขํ. ยสฺสุปฺปชฺชติ, ตํ ทุกฺขิตํ กโรตีติ อตฺโถ. ทุฏฺฐุ สุขํ ขาทตีติปิ ทุกฺขํ. ทุฏฺฐุ สุขํ ขนตีติปิ ทุกฺขํ. อถ วา ทฺวิธา สุขํ ขนตีติปิ ทุกฺขํ. कारण, जे दुःख देते ते 'दुःख' होय. ज्याच्यामध्ये ते उत्पन्न होते, त्याला ते दुःखी करते, असा याचा अर्थ आहे. जे सुखाचा वाईट प्रकारे नाश करते (खाऊन टाकते), ते देखील 'दुःख' होय. जे सुखाला वाईट प्रकारे खणून काढते (उखडून टाकते), ते देखील 'दुःख' होय. अथवा, जे सुखाला दोन प्रकारे खणून काढते (नष्ट करते), ते देखील 'दुःख' होय। คนฺธธาตุวสา จาปิ, คมุธาตุวเสน วา; คมุธาธาตุโต วาปิ, คนฺธสทฺทคตึ วเท. 'गंध' धातूच्या आधारे, किंवा 'गमु' (जाणे) धातूच्या आधारे, अथवा 'गमु' आणि 'धा' (धारण करणे) या धातूंपासून 'गंध' या शब्दाची उत्पत्ती सांगावी। ตถา หิ คนฺธยตีติ คนฺโธ, อตฺตโน วตฺถุํ สูจยติ ‘‘อิทํ สุคนฺธํ, อิทํ ทุคฺคนฺธ’’นฺติ ปกาเสติ, ปฏิจฺฉนฺนํ, วา ปุปฺผผลาทึ ‘‘อิทเมตฺถ อตฺถี’’ติ เปสุญฺญํ กโรนฺโต วิย อโหสีติ อตฺโถ. อถ วา คนฺธยติ ฉินฺทติ มนาปคนฺโธ สุคนฺธภาเวน ทุคฺคนฺธํ, อมนาปคนฺโธ จ ทุคฺคนฺธภาเวน สุคนฺธนฺติ คนฺโธ. เอตฺถ ปน คนฺธสทฺทสฺส เฉทนวาจกตฺเต – कारण, जो सुवास देतो (किंवा सूचित करतो) तो 'गंध' होय; तो स्वतःच्या वस्तूची सूचना देतो, 'हा सुगंध आहे, हा दुर्गंध आहे' असे प्रकट करतो. याचा अर्थ असा की, लपलेल्या फुला-फळांविषयी 'ते येथे आहे' असे सांगून जणू काही चहाडीच करत असतो. अथवा, जो नष्ट करतो (कापतो) तो 'गंध' होय – मनपसंत गंध (सुगंध) आपल्या सुवासिकतेने दुर्गंधाचा नाश करतो आणि नापसंत गंध (दुर्गंध) आपल्या घाणेरड्या वासाने सुगंधाचा नाश करतो. येथे 'गंध' शब्दाचा अर्थ 'नाश करणे' (कापणे) या अर्थाने घेतला असता – ‘‘อติชาตํ อนุชาตํ, ปุตฺตมิจฺฉนฺติ ปณฺฑิตา; อวชาตํ น อิจฺฉนฺติ, โย โหติ กุลคนฺธโน’’ติ 'बुद्धिमान लोक अतिजात (कुळापेक्षा श्रेष्ठ) आणि अनुजात (कुळासारखाच) पुत्राची इच्छा करतात; ते अवजात (कुळापेक्षा हीन) पुत्राची इच्छा करत नाहीत, जो कुळाचा नाश करणारा (कुलगंधन) असतो।' อยํ ปาฬิ นิทสฺสนํ. วายุนา วา นียมาโน คจฺฉตีติ คนฺโธ. กจฺจายนสฺมิญฺหิ ‘‘ขาทามคมานํ ขนฺธนฺธคนฺธา’’ติ ขาทอมคมิอิจฺเจเตสํ ธาตูนํ ยถากฺกมํ ขนฺธ อนฺธคนฺธาเทสา วุตฺตา. อถ วา คจฺฉนฺโต ธริยเต โสติ คนฺโธ. วุตฺตญฺเหตํ ภทนฺเตน พุทฺธทตฺตาจริเยน เวยฺยากรเณน นิรุตฺตินยทสฺสินา ‘‘ธริยตีติ คจฺฉนฺโต, คนฺโธ สูจนโตปิ วา’’ติ. हे पाळीचे उदाहरण आहे. किंवा वाऱ्याद्वारे वाहून नेला जात असताना जो जातो (पसरतो), तो 'गंध' होय. कच्चायन व्याकरणात 'खादामगमानं खन्धन्धगन्धा' या सूत्रात 'खाद', 'अम' आणि 'गमु' या धातूंचे अनुक्रमे 'खन्ध', 'अन्ध' आणि 'गन्ध' असे आदेश सांगितले आहेत. अथवा, जो जात असताना ग्रहण केला (धारण केला) जातो, तो 'गंध' होय. व्याकरणकार आणि निरुक्तीचे जाणकार भदन्त बुद्धदत्ताचार्यांनी म्हटलेच आहे – 'जो जात असताना ग्रहण केला जातो तो गंध होय, किंवा सूचकतेमुळेही त्याला गंध म्हणतात।' รสธาตุวสา เจว, รมาสธาตุโตปิ จ; รสสทฺทสฺส นิปฺผตฺตึ, อาหุ ธมฺมรสญฺญุโน. धम्मरसाचे जाणकार 'रस' धातूच्या आधारे, तसेच 'रम' (रममाण होणे) आणि 'अस' (खाणे) या धातूंपासून 'रस' या शब्दाची निष्पत्ती सांगतात। รโสติ [Pg.371] หิ รสนฺติ ตํ อสฺสาเทนฺตีติ รโส, รมนฺตา ตํ อสนฺตีติปิ รโส. วุตฺตมฺปิ เจตํ ‘‘รมมานา น’สนฺตีติ รโสติ ปริทีปิโต’’ติ. ตตฺรายมตฺโถ – เทวมนุสฺสาทโย สตฺตา ยสฺมา รมมานา นํ ธมฺมชาตํ อสนฺติ ภกฺขนฺติ, ตสฺมา ตํ ธมฺมชาตํ รโส นามาติ นิรุตฺตญฺญูหิ ปริทีปิโตติ. ปทจฺเฉโท ปน เอวํ เวทิตพฺโพ – कारण, ज्याची चव घेतात (आस्वाद घेतात) तो 'रस' होय; किंवा ज्यामध्ये रममाण होऊन लोक त्याचे सेवन करतात (खातात) तोही 'रस' होय. असे म्हटलेही आहे – 'रममाण होऊन ज्याचे सेवन करतात, म्हणून त्याला रस असे स्पष्ट केले आहे.' त्याचा अर्थ असा आहे – देव, मनुष्य इत्यादी प्राणी ज्या अर्थी रममाण होऊन त्या धम्मरूपाचे सेवन करतात (भक्षण करतात), त्या अर्थी त्या धम्मरूपाला 'रस' म्हणतात, असे निरुक्तीकारांनी स्पष्ट केले आहे. शब्दाचा विग्रह (पदच्छेद) असा समजावा – นํ อสนฺติ น สนฺตีติ, ปทจฺเฉโท สิยา ตหึ; กมฺมการกภาเวน, อตฺโถ หิ ตตฺถ อิจฺฉิโต. तेथे 'णं असन्ति' (त्याचे सेवन करतात) असा पदच्छेद असावा, 'न सन्ति' (ते नाहीत) असा नाही; कारण तेथे कर्मकारकाच्या भावाने अर्थ अभिप्रेत आहे। อิติ วุตฺตานุสาเรน, อวุตฺเตสุ ปเทสุปิ; ยถารหํ นยญฺญูหิ, นโย เนยฺโย สุโสภโน. या सांगितलेल्या नियमांनुसार, न सांगितलेल्या शब्दांच्या बाबतीतही पद्धती जाणणाऱ्यांनी योग्य प्रकारे सुंदर पद्धत योजावी। ธาตุจินฺตาย เย มุตฺตา, อนิปฺผนฺนาติ เต มตา; เต จาปิ พหโว สนฺติ, ปีตโลหิตกาทโย; जे शब्द धातूच्या विचारापासून मुक्त आहेत, ते 'अनिष्पन्न' (अव्युत्पन्न) मानले जातात. पिवळा (पीत), लाल (लोहित) इत्यादी असे अनेक शब्द आहेत। นิปฺผนฺเน อปิ ธาตูหิ, สทฺเท ธคาอิติอาทโย; อนิปฺผนฺนํว เปกฺขนฺติ, ควาทิวิธิเภทโต. जरी 'धगा' इत्यादी शब्द धातूंपासून निष्पन्न झालेले असले, तरी 'गवा' (गाय) इत्यादी नियमांच्या भेदांमुळे ते अनिष्पन्नासारखेच पाहिले जातात। ตถา หิ ‘‘คจฺฉตีติ โค’’, อิติ วุตฺตปทํ ปุน; อนิปฺผนฺนํ กริตฺวาน, ‘‘คาโว’’ อิจฺจาทิกํพฺรวุํ. कारण, 'जी चालते ती गो (गाय)' असे म्हटलेले असतानाही, पुन्हा त्या शब्दाला अनिष्पन्न मानून 'गावो' (गायी) इत्यादी रूपे सांगतात। เอกนฺเตน อนิปฺผนฺนา, สทฺทา วิฑูฑภาทโย; ธาตุรูปกสทฺทา จ, ‘‘ปพฺพตายติ’’อาทโย. 'विडूडभ' इत्यादी शब्द आणि 'पब्बतायति' (पर्वतासारखे आचरण करणे) इत्यादी धातूंसारखे वाटणारे शब्द पूर्णपणे अनिष्पन्न (अव्युत्पन्न) आहेत। เสยฺยถิทํ? ‘‘วิฑูฑโภ, ติสฺโส, เยวาปโน, ปีตํ, โลหิตํ’’ อิจฺเจวมาทีนิ นามิกปทานิ อนิปฺผนฺนานิ ภวนฺติ. ‘‘นีลํ, ปีตํ, เยวาปนโก’’ อิจฺจาทีนิ ปน นีลวณฺเณ ปีตวณฺเณ. เก เร เค สทฺเทติ ธาตุวเสน อาคตตฺตา นีลตีติ นีลํ, ปีตตีติ ปีตํ, เย วา ปน อิติวจเนน ภควตา กิยเต กถิยเตติ เยวาปนโกติ นิพฺพจนมรหนฺตีติ นิปฺผนฺนานีติ วตฺตพฺพานิ. เกจิ ปเนตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘นนุ นีลติ ปีตตีติอาทีนิ กฺริยาปทานิ เตปิฏเก พุทฺธวจเน น ทิสฺสนฺตี’’ติ? กิญฺจาปิ [Pg.372] น ทิสฺสนฺติ, ตถาปิ เอตรหิ อวิชฺชมานา ปุราณภาสา เอสาติ คเหตพฺพานิ. ยถา หิ ‘‘นาถตีติ นาโถ’’ติ เอตฺถ กิญฺจาปิ ‘‘นาถตี’’ติ กฺริยาปทํ พุทฺธวจเน น ทิสฺสติ, ตถาปิ นาถ ยาจโนปตาปิสฺสริยาสีสเนสูติ ธาตุโน ทิฏฺฐตฺตา อฏฺฐกถาจริยา คณฺหึสุเยว, เอวํ สมฺปทมิทํ ทฏฺฐพฺพํ. น หิ กฺริยาปทปริหีโน ธาตุ วุจฺเจยฺย. जसे की? 'विडूडभो, तिस्सो, येवापनो, पीतं, लोहितं' इत्यादी नामिक पदे अनिष्पन्न असतात. परंतु 'नीलं, पीतं, येवापनको' इत्यादी पदे निळ्या रंगात आणि पिवळ्या रंगात (वापरली जातात). 'के रे गे' या ध्वनींच्या धातूंच्या प्रभावामुळे आल्यामुळे 'नीलतीति नीलं' (जे निळे होते ते नील), 'पीततीति पीतं' (जे पिवळे होते ते पीत), 'ये वा पाना' या वचनाने भगवंतांद्वारे जे केले जाते किंवा सांगितले जाते ते 'येवापनको' असे निरुक्तिलक्षण प्राप्त करत असल्यामुळे ती निष्पन्न आहेत असे म्हटले पाहिजे. येथे काही जण असे म्हणू शकतील की, 'काय नीलति, पीतति इत्यादी क्रियापदे त्रिपिटकातील बुद्धवचनात दिसत नाहीत?' जरी ती दिसत नसली, तरी ती सध्या अस्तित्वात नसलेली प्राचीन भाषा आहे असे मानले पाहिजे. जसे की 'नाथतीति नाथो' यामध्ये जरी 'नाथति' हे क्रियापद बुद्धवचनात दिसत नसले, तरी 'नाथ' धातू याचना, उपताप, ऐश्वर्य आणि आशिष या अर्थांमध्ये दिसून येत असल्यामुळे अट्ठकथाचार्यांनी त्याचा स्वीकार केलाच आहे, त्याचप्रमाणे हे देखील समजले पाहिजे. कारण क्रियापदाशिवाय धातू सांगितला जाऊ शकत नाही. กิญฺจ ภิยฺโย – ยถา ‘‘ยาว พฺยาติ นิมีสติ, ตตฺราปิ รสติพฺพโย’’ติ ชาตกปาฬิยํ อิมสฺมึ พุทฺธุปฺปาเท เทวมนุสฺสานํ โวหารปเถ อสญฺจรนฺตํ ปุราณภาสาภูตํ ‘‘พฺยาตี’’ติ กฺริยาปทมฺปิ ทิสฺสติ, ตถา ‘‘นีลติ, ปีตตี’’ติอาทีหิปิ ปุราณภาสาภูเตหิ กฺริยาปเทหิ ภวิตพฺพํ. ตตฺถ ยาว พฺยาตีติ ยาว อุมฺมีสติ. อยญฺหิ ตสฺมึ กาเล โวหาโร, ยสฺมึ กาเล โพธิสตฺโต จูฬโพธิ นาม ปริพฺพาชโก อโหสิ. ยถา ปน วิฑูฑภสทฺทาทโย ธาตุวเสน อนิปฺผนฺนา นาม วุจฺจนฺติ, ตถา ‘‘ปพฺพตายติ, สมุทฺทายติ, จิจฺจิฏายติ, ธูมายติ, ทุทฺทุภายติ, เมตฺตายติ, กรุณายติ, มมายติ’’ อิจฺเจวมาทโย จ ‘‘ฉตฺตียติ, วตฺถียติ, ปริกฺขารียติ, ธนียติ, ปฏียติ’’ อิจฺเจวมาทโย จ ‘‘อติหตฺถยติ, อุปวีณยติ, ทฬฺหยติ, ปมาณยติ, กุสลยติ, วิสุทฺธยติ’’ อิจฺเจวมาทโย จ ธาตุวเสน อนิปฺผนฺนาเยว นาม วุจฺจนฺติ. आणखी काय - जसे जातकपाळीमध्ये 'याव ब्याति निमीसति, तत्रापि रसतिब्बयो' यामध्ये या बुद्धोत्पाद काळात देव आणि मनुष्यांच्या व्यवहारात न चालणारे, प्राचीन भाषेचे रूप असलेले 'ब्याति' हे क्रियापद देखील दिसते, तसेच 'नीलति, पीतति' इत्यादी देखील प्राचीन भाषेतील क्रियापदे असली पाहिजेत. तेथे 'याव ब्याति' म्हणजे 'जोपर्यंत डोळे उघडतात'. कारण हा त्या काळातील व्यवहार आहे, ज्या काळात बोधिसत्व चूळबोधी नावाचे परिव्राजक होते. परंतु जसे 'विडूडभ' इत्यादी शब्द धातूच्या दृष्टीने अनिष्पन्न म्हटले जातात, तसेच 'पब्बतायति, समुद्दायति, चिच्चिटायति, धूमायति, दुद्दुभायति, मेत्तायति, करुणायति, mमायति' इत्यादी आणि 'छत्तीयति, वत्थीयति, परिक्खारीयति, धनीयति, पटीयति' इत्यादी आणि 'अतिहत्थयति, उपवीणयति, दळ्हयति, पमाणयति, कुसलयति, विसुद्धयति' इत्यादी देखील धातूच्या दृष्टीने अनिष्पन्नच म्हटले जातात. ตตฺถ ‘‘ปพฺพตายตี’’ติอาทีสุ สงฺโฆ ปพฺพตมิว อตฺตานมาจรติ ปพฺพตายติ, เอวํ สมุทฺทายติ. สทฺโท จิจฺจิฏมิว อตฺตานมาจรติ จิจฺจิฏายติ. วตฺถุ ธูมมิว อตฺตานมาจรติ ธูมายติ. สทฺโท ทุทฺทุภอิติ อาจรติ ทุทฺทุภายติ, ภิกฺขุ เมตฺตายติ, ตถา กรุณายติ. ‘‘มม อิท’’นฺติ คณฺหติ มมายติ. อฉตฺตํ ฉตฺตมิว อาจรติ ฉตฺตียติ. อปุตฺตํ [Pg.373] ปุตฺตมิว อาจรติ ปุตฺตียติ, สิสฺสํ อาจริโย, อตฺตโน ปตฺตมิจฺฉติ ปตฺตียติ. เอวํ วตฺถียติ, ปริกฺขารียติ, จีวรียติ, ธนียติ, ปฏียติ. หตฺถินา อติกฺกมติ อติหตฺถยติ. วีณาย อุปคายติ อุปวีณยติ. ทฬฺหํ กโรติ วีริยํ ทฬฺหยติ. ปมาณํ กโรติ ปมาณยติ. กุสลํ ปุจฺฉติ กุสลยติ. วิสุทฺธา โหติ รตฺติ วิสุทฺธายติ. तेथे 'पब्बतायति' इत्यादींमध्ये - संघ पर्वतासारखा स्वतःचे आचरण करतो म्हणून 'पब्बतायति', याचप्रमाणे 'समुद्दायति'. आवाज 'चिच्चिट' सारखा स्वतःचे आचरण करतो म्हणून 'चिच्चिटायति'. वस्तू धुरासारखे स्वतःचे आचरण करते म्हणून 'धूमायति'. आवाज 'दुद्दुभ' सारखा आचरण करतो म्हणून 'दुद्दुभायति'. भिक्खू मैत्रीचे आचरण करतात म्हणून 'मेत्तायति', तसेच 'करुणायति'. 'हे माझे आहे' असे ग्रहण करतो म्हणून 'ममायति'. जे छत्र नाही ते छत्रासारखे आचरण करते म्हणून 'छत्तीयति'. जो पुत्र नाही त्याला पुत्रासारखे वागवतो म्हणून 'पुत्तीयति' - जसे आचार्य शिष्याला वागवतात. स्वतःच्या पात्राची इच्छा करतो म्हणून 'पत्तीयति'. याचप्रमाणे 'वत्थीयति, परिक्खारीयति, चीवरीयति, धनीयति, pटीयति'. हत्तीने ओलांडून जातो म्हणून 'अतिहत्थयति'. विणेने गातो म्हणून 'उपवीणयति'. दृढ करतो, वीर्याला दृढ करतो म्हणून 'दळ्हयति'. प्रमाण करतो म्हणून 'पमाणयति'. कुशल विचारतो म्हणून 'कुसलयति'. रात्र विशुद्ध होते म्हणून 'विसुद्धायति'. ตตฺรายํ ปทมาลา – ‘‘ปพฺพตายติ, ปพฺพตายนฺติ. ปพฺพตายสิ, ปพฺพตายถ. ปพฺพตายามิ, ปพฺพตายามา’’ติ อิมินา นเยน อฏฺฐนฺนํ วิภตฺตีนํ วเสน เสสํ สพฺพํ โยเชตพฺพํ, เอวํ ‘‘สมุทฺทายติ, ฉตฺตียตี’’ติอาทีสุ. ตตฺร การิตวเสนปิ ‘‘ปพฺพตายนฺตํ ปโยชยติ ปพฺพตายติ, ปุตฺติยนฺตํ ปโยชยติ ปุตฺตียติ’’ อิจฺจาทิ ปทสิทฺธิ ภวติ. อยํ ปน ปทมาลา – ปพฺพตายติ, ปพฺพตายนฺติ. ปพฺพตายสิ. เสสํ โยเชตพฺพํ. อิจฺเจวํ ธาตุวเสน นิปฺผนฺนานิปฺผนฺนปทานิ วิภาวิตานิ. तेथे ही पदमाला आहे - 'पब्बतायति, pब्बतायन्ति। पब्बतायसि, पब्बतायथ। पब्बतायामि, पब्बतायाम' या पद्धतीने आठही विभक्तींच्या नियमांनुसार उर्वरित सर्व योजना करावी, याचप्रमाणे 'समुद्दायति, छत्तीयति' इत्यादींमध्ये देखील करावी. तेथे कारित भावाच्या दृष्टीने देखील 'पब्बतायन्तं पयोजयति पब्बतायति', 'पुत्तियन्तं पयोजयति पुत्तीयति' इत्यादी पदांची सिद्धी होते. ही पदमाला अशी आहे - पब्बतायति, पब्बतायन्ति। पब्बतायसि। उर्वरित योजना करावी. अशा प्रकारे धातूच्या दृष्टीने निष्पन्न आणि अनिष्पन्न पदे स्पष्ट केली आहेत. อิทานิ ธาตุคณลกฺขณํ, อธาตุลกฺขณํ, การิตปจฺจยโยคํ, สการิเตกกมฺมทฺวิกมฺมติกมฺมปทํ, อูหนียรูปคณํ, ธาตูนํ เอกคณิกทฺวิคณิกเตคณิกปทํ, สุทฺธกตฺตุเหตุกตฺตุปทรูปํ, กมฺมภาวปทรูปํ, เอกการิตทฺวิการิตปทํ, อการิตทฺวิกมฺมกปทญฺจ สพฺพเมตํ ยถารหํ กถยาม. आता धातूंच्या गणांचे लक्षण, अधातूचे लक्षण, कारित प्रत्ययांचा योग, सकारित एककर्मक, द्विकर्मक आणि त्रिकर्मक पदे, ऊहनीय रूपगण, धातूंचे एकगणिक, द्विगणीक आणि त्रिगणिक पद, शुद्धकर्तृ आणि हेतुकर्तृ पदांचे रूप, कर्म आणि भाव पदांचे रूप, एककारित आणि द्विकारित पद, आणि अकारित द्विकर्मक पद - हे सर्व आम्ही योग्यतेनुसार सांगतो. ตตฺร สพฺพธาตุกนิสฺสิเต สุทฺธกตฺตุปฺปโยเค สุทฺธสฺสรธาตุโต วา เอกสฺสรโต วา อเนกสฺสรโต วา อปจฺจยสฺส ปรภาโว ภูวาทิคณลกฺขณํ สามญฺญลกฺขณวเสน, วิเสสลกฺขณวเสน ปน อาขฺยาตตฺเต อิการนฺตาเนกสฺสรธาตุโต สห อปจฺจเยน นิจฺจํ นิคฺคหีตาคมนญฺจ นามิกตฺเต นิคฺคหีตาคมนมตฺตญฺจ ภูวาทิคณลกฺขณํ. อากฺยาตตฺเต กตฺตริ ธาตูหิ อปจฺจเยน สทฺธึนิยตวเสน นิคฺคหีตาคมนํ รุธาทิคณลกฺขณํ สามญฺญลกฺขณวเสน, วิเสสลกฺขณวเสน [Pg.374] ปน อาขฺยาตตฺเต กตฺตริ ธาตูหิ อิวณฺเณกาโรการปจฺจเยหิ สทฺธึ นิยตวเสน นิคฺคหีตาคมนญฺจ นามกตฺเต อนิยตวเสน นิคฺคหีตาคมนมตฺตญฺจ รุธาทิคณลกฺขณํ. กตฺตริ ธาตูหิ อาเทสลาภาลาภิโน ยปจฺจยสฺส ปรภาโว ทิวาทิคณลกฺขณํ. กตฺตริ ธาตูหิ ยถารหํ ณุ ณา อุณาปจฺจยานํ ปรภาโว สฺวาทิคณลกฺขณํ. กตฺตริ ธาตูหิ นาปจฺจยสฺส ปรภาโว กิยาทิคณลกฺขณํ. กตฺตริ ธาตูหิ อาขฺยาตตฺเต อปฺปกตรปฺปโยควเสน นามิกตฺเต ปจุรปฺปโยควเสน ปฺปณฺหาปจฺจยานํ ปรภาโว คหาทิคณลกฺขณํ. กตฺตริ ธาตูหิ ยถาสมฺภวํ โอยิรปฺปจฺจยานํ ปรภาโว ตนาทิคณลกฺขณํ. อาขฺยาตตฺเต กตฺตริ ธาตูหิ สพฺพถา เณณยปฺปจฺจยานํ ปรภาโว จุราทิคณลกฺขณํ สามญฺญลกฺขณวเสน, วิเสสลกฺขณวเสน ปน อาขฺยาตตฺเต อิการนฺตธาตุโต สห เณ ณยปจฺจเยหิ นิจฺจํ นิคฺคหีตาคมนญฺจ นามิกตฺเต นิคฺคหีตาคมนมตฺตญฺจ จุราทิคณลกฺขณํ. คณสูจกานํ ปจฺจยานมปรตฺตํ อธาตุลกฺขณํ. อิติ ธาตุคณลกฺขณมธาตุลกฺขณํ วิภาวิตํ. तेथे सर्वधातुकांशी संबंधित प्रयोगात, शुद्ध स्वर असलेल्या धातूपासून किंवा एक स्वर असलेल्या किंवा अनेक स्वर असलेल्या धातूपासून 'अ' प्रत्ययाचा परभाव हे सामान्य लक्षणाच्या दृष्टीने 'भूवादि' गणाचे लक्षण आहे. विशेष लक्षणाच्या दृष्टीने आख्यात रूपात इ-कारान्त अनेक स्वर असलेल्या धातूपासून 'अ' प्रत्ययासोबत नेहमी निग्गहीत (अनुस्वार) आगम होणे आणि नाम रूपात केवळ निग्गहीत आगम होणे हे 'भूवादि' गणाचे लक्षण आहे. आख्यात रूपात कर्तरि प्रयोगात धातूंपासून 'अ' प्रत्ययासोबत निश्चितपणे निग्गहीत आगम होणे हे सामान्य लक्षणाच्या दृष्टीने 'रुधादि' गणाचे लक्षण आहे. विशेष लक्षणाच्या दृष्टीने आख्यात रूपात कर्तरि प्रयोगात धातूंपासून इ-वर्ण, ए-कार आणि ओ-कार प्रत्ययांसोबत निश्चितपणे निग्गहीत आगम होणे आणि नाम रूपात अनिश्चितपणे केवळ निग्गहीत आगम होणे हे 'रुधादि' गणाचे लक्षण आहे. कर्तरि प्रयोगात धातूंपासून आदेश प्राप्त होणाऱ्या किंवा न होणाऱ्या 'य' प्रत्ययाचा परभाव हे 'दिवादि' गणाचे लक्षण आहे. कर्तरि प्रयोगात धातूंपासून योग्यतेनुसार 'णु', 'णा', 'उणा' प्रत्ययांचा परभाव हे 'स्वादि' गणाचे लक्षण आहे. कर्तरि प्रयोगात धातूंपासून 'ना' प्रत्ययाचा परभाव हे 'कियादि' गणाचे लक्षण आहे. कर्तरि प्रयोगात धातूंपासून आख्यात रूपात अत्यंत कमी प्रयोगामुळे आणि नाम रूपात विपुल प्रयोगामुळे 'प्प', 'ण्हा' प्रत्ययांचा परभाव हे 'गहादि' गणाचे लक्षण आहे. कर्तरि प्रयोगात धातूंपासून संभवानुसार 'ओ', 'यिर' प्रत्ययांचा परभाव हे 'तनादि' गणाचे लक्षण आहे. आख्यात रूपात कर्तरि प्रयोगात धातूंपासून सर्व प्रकारे 'णे', 'णय' प्रत्ययांचा परभाव हे सामान्य लक्षणाच्या दृष्टीने 'चुरादि' गणाचे लक्षण आहे. विशेष लक्षणाच्या दृष्टीने आख्यात रूपात इ-कारान्त धातूपासून 'णे', 'णय' प्रत्ययांसोबत नेहमी निग्गहीत आगम होणे आणि नाम रूपात केवळ निग्गहीत आगम होणे हे 'चुरादि' गणाचे लक्षण आहे. गण दर्शवणाऱ्या प्रत्ययांचा अभाव असणे हे 'अधातू'चे लक्षण आहे. अशा प्रकारे धातूंच्या गणांचे लक्षण आणि अधातूचे लक्षण स्पष्ट केले आहे. การิตปจฺจยสฺส โยเค ‘‘เณ ณโย ณาเป ณาปโย จา’’ติ อิเม จตฺตาโร การิตปจฺจยา. कारित प्रत्ययाच्या योगात 'णे, णय, णापे आणि णापय' हे चार कारित प्रत्यय आहेत. เณ ณยาสุํ อุวณฺณนฺตา,อาทนฺตา ปจฺฉิมา ทุเว; เสสโต จตุโรทฺเว วา,ณโยเยว อธาตุโต. ‘णे’ आणि ‘णय’ हे प्रत्यय ‘उ’ वर्णाने अंत होणाऱ्या धातूंना लागतात, तर शेवटचे दोन (‘आपे’ आणि ‘आपय’) हे ‘आ’ वर्णाने अंत होणाऱ्या धातूंना लागतात. उर्वरित चार किंवा दोन प्रत्यय (‘णे’, ‘णय’ इत्यादी) धातू नसलेल्या शब्दांशिवाय इतर धातूंना लागतात. ตตฺร สาเวติ, สาวยติ. ภาเวติ, ภาวยติ, โอภาเสติ, โอภาสยติ. อิมานิ การิเต อุวณฺณนฺตธาตุรูปานิ. तेथे ‘सावेति’ (ऐकवतो), ‘सावयति’ (ऐकवतो); ‘भावेति’ (भावना करतो/वाढवतो), ‘भावयति’ (भावना करतो/वाढवतो); ‘ओभासेति’ (प्रकाशित करतो), ‘ओभासयति’ (प्रकाशित करतो). ही प्रयोजक (कारित) रूपांमधील ‘उ’ वर्णाने अंत होणाऱ्या धातूंची रूपे आहेत. ทาเปติ[Pg.375], ทาปยติ. หาเปติ, หาปยติ. นฺหาเปติ, นฺหาปยติ. นหาเปติ, นหาปยติ. อาการนฺตธาตุรูปานิ. ‘दापेति’ (द्यायला लावतो), ‘दापयति’ (द्यायला लावतो); ‘हापेति’ (कमी करवतो), ‘हापयति’ (कमी करवतो); ‘न्हापेति’ (आंघोळ घालतो), ‘न्हापयति’ (आंघोळ घालतो); ‘नहापेति’ (आंघोळ घालतो), ‘नहापयति’ (आंघोळ घालतो). ही ‘आ’ कारान्त धातूंची रूपे आहेत. โสเสติ, โสสยติ. โสสาเปติ, โสสาปยติ. โฆสาเปติ, โฆสาปยติ. อการนฺตธาตุรุปานิ. ‘सोसेति’ (वाळवतो), ‘सोसयति’ (वाळवतो); ‘सोसापेति’ (वाळवायला लावतो), ‘सोसापयति’ (वाळवायला लावतो); ‘घोसापेति’ (घोषणा करायला लावतो), ‘घोसापयति’ (घोषणा करायला लावतो). ही ‘अ’ कारान्त धातूंची रूपे आहेत. มคฺโค สํสารโต โลกํ ญาเปติ, ญาปยติ. อิธาตุรูปานิ นิคฺคจฺฉาเปตีติ เอเตสมตฺโถ. อิมานิ หิ นิปุพฺพาย อิธาตุยา วเสน สมฺภูตานิ เหตุกตฺตุรูปานิ. ตถา หิ สุทฺธกตฺตุภาเวน มคฺโค สยํ ญายติ, สํสารโต นิคฺคจฺฉตีติ ญาโยติ วุจฺจติ. ‘मार्ग संसारातून जगाला बाहेर काढतो’ या अर्थाने ‘ञापेति’ (जाणवून देतो), ‘ञापयति’ (जाणवून देतो) ही ‘इ’ धातूची रूपे आहेत. ‘निग्गच्छापेति’ (बाहेर काढतो) हा या शब्दांचा अर्थ आहे. कारण ही रूपे ‘नि’ उपसर्गासह ‘इ’ धातूच्या प्रभावाने निर्माण झालेली प्रयोजक (कारित) रूपे आहेत. तसेच, प्रयोजक भावामुळे मार्ग स्वतः जाणला जातो, संसारातून बाहेर पडतो, म्हणून त्याला ‘न्याय’ (ञाय) असे म्हटले जाते. ปาเวติ, ปาวยติ, อุธาตุรูปานิ. วทาเปตีติ เอเตสมตฺโถ. อิมานิ หิ ปปุพฺพาย อุธาตุยา วเสน สมฺภูตานิ เหตุกตฺตุรูปานิ. ตถา หิ ‘‘โย อาตุมานํ สยเมว ปาวา’’ติ สุทฺธกตฺตุปทํ อาหจฺจภาสิตํ ทิสฺสติ. ‘पावेति’ (बोलवतो), ‘पावयति’ (बोलवतो) ही ‘उ’ धातूची रूपे आहेत. ‘वदापेति’ (बोलायला लावतो) हा या शब्दांचा अर्थ आहे. कारण ही रूपे ‘प’ उपसर्गासह ‘उ’ धातूच्या प्रभावाने निर्माण झालेली प्रयोजक (कारित) रूपे आहेत. तसेच, ‘जो स्वतःला स्वतःच बोलतो (प्रशंसा करतो)’ या वाक्यात ‘पावा’ हे शुद्ध कर्तापद स्पष्टपणे वापरलेले दिसते. เขเปติ, เขปยติ. กงฺเขติ, กงฺขยติ, กงฺขาเปติ, กงฺขาปยติ. อาจิกฺขาเปติ, อาจิกฺขาปยติ. อิวณฺณนฺตธาตุรูปานิ. ‘खेपेति’ (क्षय करतो/वेळ घालवतो), ‘खेपयति’ (क्षय करतो); ‘कङ्खेति’ (शंका घेतो), ‘कङ्खयति’ (शंका घेतो), ‘कङ्खापेति’ (शंका घ्यायला लावतो), ‘कङ्खापयति’ (शंका घ्यायला लावतो); ‘आचिक्खापेति’ (सांगायला लावतो), ‘आचिक्खापयति’ (सांगायला लावतो). ही ‘इ’ वर्णाने अंत होणाऱ्या धातूंची रूपे आहेत. ขิเยติ, ขิยยติ. มิลาเยติ, มิลายยติ. เอการนฺตธาตุรูปานิ. ‘खियेति’ (क्षीण होतो), ‘खिययति’ (क्षीण होतो); ‘मिलायेति’ (कोमेजतो), ‘मिलाययति’ (कोमेजतो). ही ‘ए’ कारान्त धातूंची रूपे आहेत. สิเยติ, สิยยติ. โอการนฺตธาตุรูปานิ. ‘सियेeti’ (शिवणकाम करतो), ‘सिययति’ (शिवणकाम करतो). ही ‘ओ’ कारान्त धातूंची रूपे आहेत. ปพฺพตายายติ, ปุตฺติยายติ. อธาตุนิสฺสิตานิ รูปานิ. อิมินา นเยน เสสานิ อวุตฺตานิปิ รูปานิ สกฺกา วิญฺญาตุํ วิญฺญุนา ปาฬินยญฺญุนาติ วิตฺถาโร น ทสฺสิโต. อิติ การิตปจฺจยโยโค สงฺเขเปน วิภาวิโต. ‘पब्बतायायति’ (पर्वतासारखा आचरण करतो), ‘पुत्तियायति’ (पुत्रासारखा मानतो). ही नामधातूची (धातू नसलेल्या शब्दांवरून बनलेली) रूपे आहेत. या पद्धतीने, पाळी भाषेच्या नियमांचे ज्ञान असणाऱ्या विद्वानांना इतर न सांगितलेली रूपे देखील समजून घेणे शक्य आहे, म्हणून येथे अधिक विस्तार दाखवलेला नाही. अशा प्रकारे, प्रयोजक (कारित) प्रत्ययांचा संबंध थोडक्यात स्पष्ट केला आहे. อิทานิ [Pg.376] สการิเตกกมฺมาทีนิ พฺรูม – आता आपण प्रयोजक रूपांमधील एककर्मक इत्यादींविषयी सांगू – อกมฺมกา เอกกมฺมา, ทฺวิกมฺมา วาปิ โหนฺติ หิ; การิตปจฺจเย ลทฺเธ, สกมฺมา จ ทฺวิกมฺมกา. अकर्मक धातू हे एककर्मक होतात, आणि एककर्मक धातू हे द्विकर्मक होतात; प्रयोजक (कारित) प्रत्यय लागल्यावर, अकर्मक धातू सकर्मक (एककर्मक) आणि सकर्मक धातू द्विकर्मक होतात. สยํ โสเธติ โส ภูมึ, โสธาเปติ ปเรมหึ; นรํ กมฺมํ การยติ, วิญฺเญยฺยํ กมโต อิทํ. ‘तो स्वतः जमिनीची साफसफाई करतो’ (सकर्मक), ‘तो इतरांकडून जमीन साफ करून घेतो’ (द्विकर्मक); ‘तो माणसाकडून काम करवून घेतो’ (त्रिकर्मक), हे क्रमाने समजून घ्यावे. ทฺวิกมฺมิกา สมฺภวนฺติ, ติกมฺมา เอตฺถ ทีปเย; ‘‘อิสฺสโร เสวกํ คามํ, อชํ นาเยติ’’ อิจฺจปิ. येथे द्विकर्मक धातू त्रिकर्मक होतात, हे स्पष्ट करावे; जसे की, ‘मालक सेवकाकडून गावाला शेळी नेववतो’ (इस्सरो सेवकं गामं अजं नायेति). ‘‘นโร นเรน วา คามํ, อชํ นาเยติ’’อิจฺจปิ; กมฺมตฺถทีปกํเยว, กรณํ เอตฺถ อิจฺฉิตํ. ‘माणूस माणसाकडून गावाला शेळी नेववतो’ (नरो नरेन वा गामं अजं नायेति); येथे तृतीया विभक्तीचे ‘करण’ कारक हे कर्माचा अर्थ स्पष्ट करणारेच मानले गेले आहे. อิติ สการิเตกกมฺมาทีนิ วิภาวิตานิ. अशा प्रकारे, प्रयोजक रूपांमधील एककर्मक इत्यादींचे स्पष्टीकरण संपले. อิทานิ อูหนียรูปคณํ พฺรูม – โหติ, โภติ, สมฺโภติ, อิทํ ภูวาทิรูปํ. สุมฺโภติ, ปริสุมฺโภติ, อิทํ รุธาทิคูปํ. นินฺทติ, วินินฺทติ, พนฺธติ, อิทํ ภูวาทิรูปํ. ฉินฺทติ, ภินฺทติ, รุนฺธติ, อิทํ รุธาทิรูปํ. เทติ, เนติ, วเทติ, อนฺเวติ, อิทํ ภูวาทิรูปํ. รุนฺเธติ, ปฏิรุนฺเธติ, อิทํ รุธาทิรูปํ. พุทฺเธติ, ปลิพุทฺเธติ, อิทํ จุราทิรูปํ. ชยติ, สยติ, ปลายติ, มิลายติ, คายติ, อิทํ ภูวาทิรูปํ. หายติ, สายติ, นฺหายติ, อิทํ ทิวาทิรูปํ. กถยติ, จินฺตยติ, ภาชยติ, อิทํ จุราทิรูปํ. คพฺพติ, ปคพฺพติ, อิทํ ภูวาทิรูปํ. กุพฺพติ, กฺรุพฺพติ, อิทํ ตนาทิรูปํ. หิโนติ, จิโนติ, อิทํ สฺวาทิรูปํ. ตโนติ, สโนติ, กโรติ, อิทํ ตนาทิรูปํ. จินฺเตติ, จินฺตยติ, อิทํ กตฺตุรูปญฺเจว เหตุกตฺตุรูปญฺจ. กนฺเตติ, กนฺตยติ, อิทํ เหตุกตฺตุรูปเมว. ภกฺเขติ, ภกฺขยติ, วาเทติ, วาทยติ, อิทํ สุทฺธกตฺตุรูปญฺเจว เหตุกตฺตุรูปญฺจ. มิยฺยตีติ กตฺตุปทญฺเจว กมฺมปทญฺจ. ภาเวถาติ พหุวจนญฺเจว เอกวจนญฺจ. สํยมิสฺสนฺติ อนาคตวจนญฺเจว อตีตวจนญฺจ. อนุสาสตีติ อาขฺยาตญฺเจว นามิกญฺจ. คจฺฉํ วิธมํ นิกฺขณนฺติ นามิกญฺเจว [Pg.377] อาขฺยาตญฺจ. เอตฺถ อาขฺยาตตฺเต คจฺฉนฺติ อนาคตวจนํ, วิธมนฺติ อตีตวจนํ, นิขณนฺติ ปริกปฺปวจนํ, สพฺพํ วา เอตํ ปทํ อนาคตาธิวจนนฺติปิ วตฺตุํ วฏฺฏเตว. อิมินา นเยน อญฺญานิปิ อูหนียปทานิ นานปฺปการโต โยเชตพฺพานิ. อิมานิ ปทานิ ทุพฺพิญฺเญยฺยวิเสสานิ มนฺทพุทฺธีนํ สมฺโมหกรานิ อาจริยปาจริเย ปยิรุปาสิตฺวา เวทนียานีติ อูหนียรูปคโณ วิภาวิโต. आता आपण तर्क करून समजून घेण्याच्या रूपांच्या समूहाविषयी (ऊहनीय रूपगण) सांगू – ‘होति’ (होतो), ‘भोति’ (होतो), ‘सम्भॉति’ (उत्पन्न होतो), हे भूवादि गणाचे रूप आहे. ‘सुम्भोति’ (मारतो), ‘परिसुम्भोति’ (चोहोबाजूने मारतो), हे रुधादि गणाचे रूप आहे. ‘निन्दति’ (निंदा करतो), ‘विनिन्दति’ (विशेष निंदा करतो), ‘बन्धति’ (बांधतो), हे भूवादि गणाचे रूप आहे. ‘छिन्दति’ (कापतो), ‘भिन्दति’ (फोडतो), ‘रुन्धति’ (रोखतो), हे रुधादि गणाचे रूप आहे. ‘देति’ (देतो), ‘नेति’ (नेतो), ‘वदेति’ (बोलतो), ‘अन्वेति’ (अनुसरण करतो), हे भूवादि गणाचे रूप आहे. ‘रुन्धेति’ (रोखतो), ‘पठिरुन्धेति’ (प्रतिकार करतो), हे रुधादि गणाचे रूप आहे. ‘बुद्धेति’ (जाणतो), ‘पलिबुद्धेति’ (बाधित करतो), हे चुरादि गणाचे रूप आहे. ‘जयति’ (जिंकतो), ‘सयति’ (झोपतो), ‘पलायति’ (पळून जातो), ‘मिलायति’ (कोमेजतो), ‘गायति’ (गातो), हे भूवादि गणाचे रूप आहे. ‘हायति’ (कमी होतो), ‘सायति’ (चव घेतो), ‘न्हायति’ (आंघोळ करतो), हे दिवादि गणाचे रूप आहे. ‘कथयति’ (सांगतो), ‘चिन्तयति’ (विचार करतो), ‘भाजयति’ (विभागणी करतो), हे चुरादि गणाचे रूप आहे. ‘गब्बति’ (गर्व करतो), ‘पगब्बति’ (धिटाई करतो), हे भूवादि गणाचे रूप आहे. ‘कुब्बति’ (करतो), ‘क्रुब्बति’ (करतो), हे तनादि गणाचे रूप आहे. ‘हिनोति’ (फेकतो/पाठवतो), ‘चिनोति’ (एकत्र करतो), हे स्वादि गणाचे रूप आहे. ‘तनोति’ (विस्तार करतो), ‘सनोति’ (मिळवतो), ‘करोति’ (करतो), हे तनादि गणाचे रूप आहे. ‘चिन्तेति’, ‘चिन्तयति’ हे कर्तृरूप आणि प्रयोजकरूप (कारितरूप) दोन्ही आहे. ‘कन्तेति’, ‘कन्तयति’ हे केवळ प्रयोजकरूपच आहे. ‘भक्खेति’, ‘भक्खयति’, ‘वादेति’, ‘वादयति’ हे कर्तृरूप आणि प्रयोजकरूप दोन्ही आहे. ‘मिय्यति’ (मरतो) हे कर्तृपद आणि कर्मपद दोन्ही आहे. ‘भावेथ’ हे बहुवचन आणि एकवचन दोन्ही आहे. ‘संयमिसन्ति’ हे भविष्यकाळ आणि भूतकाळ दोन्हीचे वाचक आहे. ‘अनुसासति’ हे क्रियापद (आख्यात) आणि नाम (नामिक) दोन्ही आहे. ‘गच्छं’, ‘विधमं’, ‘निक्खणन्ति’ हे नाम आणि क्रियापद दोन्ही आहेत. येथे क्रियापद म्हणून ‘गच्छन्ति’ हे भविष्यकाळ, ‘विधमन्ति’ हे भूतकाळ, ‘निखणन्ति’ हे विध्यर्थ (परिकल्प) दर्शवते, किंवा हे सर्व शब्द भविष्यकाळाचे वाचक आहेत असे म्हणणे देखील योग्यच आहे. या पद्धतीने इतरही तर्क करून समजून घेण्याचे शब्द वेगवेगळ्या प्रकारे योजले पाहिजेत. हे शब्द समजण्यास कठीण असून मंद बुद्धीच्या लोकांमध्ये संभ्रम निर्माण करणारे आहेत, म्हणून आचार्य आणि उपाध्यायांची सेवा करून ते शिकले पाहिजेत. अशा प्रकारे तर्क करून समजून घेण्याच्या रूपांचा समूह (ऊहनीय रूपगण) स्पष्ट केला आहे. อิทานิ เอกคณิกาทีนิ วทาม – ธา ธารเณ, ภูวาทิคณิกวเสนายํ เอกคณิกา สกมฺมิกา ธาตุ. ภควา สกลโลกสฺส หิตํ ทธาติ วิทธาติ, ปุริโส อตฺถํ สํวิเธติ, นิธึ นิเธติ, อิมานิ สุทฺธกตฺตริ ภวนฺติ. ‘‘สํวิธาเปติ, วิธาเปตี’’ติ อิมานิ เหตุกตฺตริ ภวนฺติ. กมฺเม ปน ภาเว จ ‘‘อนุวิธียตี’’ติอาทีนิ ภวนฺติ. ตถา หิ กมฺเม ‘‘นิธิ นาม นิธียตี’’ติ จ ‘‘ธียติ ธปิยตีติ เธยฺย’’นฺติ จ รูปานิ ทิสฺสนฺติ. ตตฺถ กมฺเม ‘‘กมฺมํ สตฺเตหิ อนุวิธิยฺยติ, กมฺมานิ สตฺเตหิ อนุวิธิยฺยนฺติ. โภ กมฺม ตฺวํ สตฺเตหิ อนุวิธิยฺยสิ, อหํ กมฺมํ สตฺเตหิ อนุวิธิยฺยามี’’ติอาทินา โยเชตพฺพํ. ภาเว ปน ‘‘สตฺโต ทุกฺขํ อนุวิธิยฺยติ, สตฺตา ทุกฺขํ อนุวิธิยฺยนฺติ, โต สตฺต ตฺวํ ทุกฺขํ อนุวิธิยฺยสี’’ติ โยเชตพฺพํ. อยํ นโย อติวิย สุขุโม ปาฬินยานุกูโล. आता आपण एकगणक इत्यादींविषयी सांगू – ‘धा’ हा धारण करण्याच्या अर्थातील, भूवादि गणाच्या नियमानुसार एकगणक सकर्मक धातू आहे. भगवान संपूर्ण जगाचे हित धारण करतात (दधाति), विधान करतात (विदधाति); माणूस अर्थाची व्यवस्था करतो (संविधेति), संपत्ती ठेवतो (निधेति); ही कर्तरी रूपे आहेत. ‘संविधापेति’ (व्यवस्था करवतो), ‘विधापेति’ (विधान करवतो) ही प्रयोजक (कारित) रूपे आहेत. कर्मणि आणि भावे प्रयोगात ‘अनुविधीयति’ इत्यादी रूपे होतात. तसेच कर्मणि प्रयोगात ‘निधी नावाचा ठेवला जातो’ (निधि नाम निधीयति) आणि ‘ठेवले जाते किंवा ठेवले जाण्यास योग्य ते धेय्य’ (धीयति धपियतीति धेय्यं) अशी रूपे दिसतात. तेथे कर्मणि प्रयोगात ‘प्राण्यांद्वारे कर्म केले जाते’ (कम्मं सत्तेहि अनुविधीयति), ‘प्राण्यांद्वारे कर्मे केली जातात’ (कम्मानि सत्तेहि अनुविधीयन्ति); ‘हे कर्मा, तू प्राण्यांद्वारे केला जातोस’ (भो कम्म त्वं सत्तेहि अनुविधीयसि), ‘मी प्राण्यांद्वारे कर्म केले जातो’ (अहं कम्मं सत्तेहि अनुविधीयामि) इत्यादी प्रकारे योजना करावी. भावे प्रयोगात ‘प्राणी दुःखाचे अनुसरण करतो’ (सत्तो दुक्खं अनुविधीयति), ‘प्राणी दुःखाचे अनुसरण करतात’ (सत्ता दुक्खं अनुविधीयन्ति), ‘हे प्राण्या, तू दुःखाचे अनुसरण करतोस’ (तो सत्त त्वं दुक्खं अनुविधीयसि) अशी योजना करावी. हा नियम अत्यंत सूक्ष्म आणि पाळी भाषेच्या नियमांना अनुकूल असा आहे. นามิกปทตฺเต ‘‘ธาตู’’ติอาทีนิ ภวนฺติ. ตตฺถ ธาตูติ สลกฺขณํ ทธาติ ธาเรตีติ ธาตุ. อฏฺฐกถาสุ ปน ‘‘สลกฺขณธารณโต ทุกฺขวิธานโต ทุกฺขธานโต จ ธาตู’’ติ วุตฺตํ. ธาตูติ ปถวีธาตาทิธาตุโย. ตตฺถ สลกฺขณธารณโตติ ยถา ติตฺถิยปริกปฺปิโต ปกติ อตฺตาติ เอวมาทิโก สภาวโต นตฺถิ, น เอวเมตา, เอตา ปน สลกฺขณํ สภาวํ ธาเรนฺตีติ ธาตุโย[Pg.378]. ทุกฺขวิธานโตติ ทุกฺขสฺส วิทหนโต. เอตา หิ ธาตุโย การณภาเวน ววตฺถิตา หุตฺวา ยถา อยโลหาทิธาตุโย อยโลหาทิอเนกปฺปการํ สํสารทุกฺขํ วิทหนฺติ. ทุกฺขธานโตติ อนปฺปกสฺส ทุกฺขสฺส วิธานมตฺตโต อวสวตฺตนโต, ตํ วา ทุกฺขํ เอตาหิ การณภูตาหิ สตฺเตหิ อนุวิธียติ, ตถาวิหิตญฺจ ตํ เอเตสฺเวว ธียติ ฐปิยติ, เอวํ ทุกฺขธานโต ธาตุโย. อปิจ นิชฺชีวฏฺโฐ ธาตโวติ คเหตพฺพํ. ตถา หิ ภควา ‘‘ฉ ธาตุโยสํ ภิกฺขุ ปุริโส’’ติอาทีสุ ชีวสญฺญาสมูหนตฺถํ ธาตุเทสนํ อกาสีติ. โย ปน ตตฺถ อมฺเหหิ ภาวฏฺฐาเน ‘‘สตฺโต ทุกฺขํ อนุวิธิยฺยตี’’ติ ติปุริสมณฺฑิโต เอกวจนพหุวจนิโก ปฐมาวิภตฺติปฺปโยโค วุตฺโต. โส – नामिकपदामध्ये 'धातू' इत्यादी असतात. तेथे 'धातू' म्हणजे जे स्वतःचे लक्षण धारण करते किंवा ठेवते, तो 'धातू' होय. परंतु अट्ठकथांमध्ये 'स्वतःचे लक्षण धारण करण्यामुळे, दुःखाची मांडणी (विधान) करण्यामुळे आणि दुःख धारण करण्यामुळे धातू' असे म्हटले आहे. धातू म्हणजे पृथ्वीधातू इत्यादी धातू होत. तेथे 'स्वतःचे लक्षण धारण करण्यामुळे' म्हणजे जसे तीर्थकरांनी (इतर पंथीयांनी) कल्पिलेला 'प्रकृती', 'आत्मा' इत्यादी स्वभावतः अस्तित्वात नाही, तसे हे (धातू) नाहीत; तर हे स्वतःचे लक्षण किंवा स्वभाव धारण करतात, म्हणून हे 'धातू' आहेत. 'दुःखाची मांडणी करण्यामुळे' म्हणजे दुःखाची निर्मिती करण्यामुळे. कारण हे धातू कारणरूपाने प्रस्थापित होऊन, जसे लोखंड-तांबे इत्यादी धातू लोखंड-तांब्यादी अनेक प्रकारच्या वस्तू बनवतात, तसेच हे धातू अनेक प्रकारचे संसारदुःख निर्माण करतात. 'दुःख धारण करण्यामुळे' म्हणजे विपुल दुःखाच्या केवळ विधानामुळे (मांडणीमुळे) ते वश न होणारे (अवशवर्तन) असल्यामुळे, किंवा ते दुःख या कारणभूत धातूंमुळे प्राण्यांद्वारे अनुभवले जाते (अनुविधीयते), आणि तसे विहित केलेले ते दुःख यांच्यामध्येच ठेवले जाते (धीयते/स्थापित केले जाते), अशा प्रकारे दुःख धारण करण्यामुळे हे 'धातू' आहेत. शिवाय, 'धातू' हे निर्जीव अर्थाने घेतले पाहिजेत. म्हणूनच भगवंतांनी 'भिक्खू, हा पुरुष सहा धातूंचा बनलेला आहे' इत्यादी उपदेशांमध्ये जीव-संज्ञेचे (आत्म्याच्या कल्पनेचे) समूळ उच्चाटन करण्यासाठी धातूंचा उपदेश केला. परंतु, तेथे आमच्याद्वारे भाव-अर्थामध्ये 'प्राणी दुःखाचे अनुकरण करतो (अनुविधीयते)' असा जो तिन्ही पुरुषांनी युक्त, एकवचन आणि बहुवचनाचा प्रथमा विभक्तीचा प्रयोग सांगितला आहे, तो — ‘‘ทูสิโต คิริทตฺเตน, หโย สามสฺส ปณฺฑโว; โปราณํ ปกตึ หิตฺวา, ตสฺเสวานุวิธิยฺยตี’’ติ จ 'गिरिदत्ताने दूषित केलेला, स्वामीचा पांढरा घोडा (पाण्डव); आपला जुना स्वभाव सोडून, त्याचेच अनुकरण करतो (अनुविधीयते)' आणि ‘‘มาตา หิ ตว อิรนฺธติ, วิธุรสฺส หทยํ ธนิยฺยตี’’ติ จ ‘‘เต สํกิเลสิกา ธมฺมา ปหียิสฺสนฺตี’’ติ จ อิมาสํ ปาฬีนํ วเสน สารโต ปจฺเจตพฺโพ. ตตฺถ ปณฺฑโว นาม อสฺโส คิริทตฺตนามกสฺส อสฺสโคปกสฺส ปกตึ อนุวิธิยฺยติ อนุกโรตีติ อตฺโถ. เอตฺถ จ ยทิ กตฺตุปทํ อิจฺฉิตํ สิยา, ‘‘อนุวิทธาตี’’ติ ปาฬิ วตฺตพฺพา สิยา. ยทิ กมฺมปทํ อิจฺฉิตํ สิยา, ‘‘ปณฺฑเวนา’’ติ ตติยนฺตํ กตฺตุปทํ วตฺตพฺพํ สิยา, เอวํ อวจเนน ‘‘อนุวิธิยฺยตี’’ติ อิทํ ภาวปทนฺติ สิทฺธํ. น เกนจิ เอตฺถ วตฺตุํ สกฺกา ‘‘ทิวาทิคเณ กตฺตริ วิหิตยปจฺจยสฺส วเสน วุตฺตํ อิทํ รูป’’นฺติ, ธาธาตุยา ทิวาทิคเณ อปฺปวตฺตนโต, เอกนฺตภูวาทิคณิกตฺตา จ. ทุติยปฺปโยเค ปน ยทิ กตฺตุปทํ อิจฺฉิตํ สิยา, ‘‘ธนุเต’’ติ ปาฬิ วตฺตพฺพา สิยา. ยทิ กมฺมปทํ อิจฺฉิตํ สิยา, ‘‘ธาตุยา’’ติ วตฺตพฺพํ สิยา[Pg.379]. เอวํ อวจเนน ‘‘ธนิยฺยตี’’ติ อิทมฺปิ ภาวปทนฺติ สิทฺธํ. เอตฺถ ‘‘ธนิยฺยตีติ ปตฺเถติ, อิจฺฉตีติ อตฺโถ’’ติ อฏฺฐกถายํ วุตฺตํ. ‘‘ธนุ ยาจเน’’ติ ธาตุ เอสา เอกนฺเตน ตนาทิคเณเยว วตฺตติ. ตติยปฺปโยเค ‘‘ปหียิสฺสนฺตี’’ติ ยทิ ภูวาทิคเณ ‘‘หา จาเค’’ติ ธาตุยา รูปํ สิยา, กตฺตริ ‘‘ปชหิสฺสนฺตี’’ติ รูปํ สิยา, ‘‘กสฺมา โน ปชหิสฺสตี’’ติ เอตฺถ วิย. กมฺมปทํ ปน ‘‘ปชหิยิสฺสนฺตี’’ติ สิยา. ยสฺมา ‘‘ปหียิสฺสนฺตี’’ติ อิทํ ทิวาทิคเณ ‘‘หา ปริหานิย’’นฺติ ธาตุยา รูปตฺตา ‘‘ปหายิสฺสนฺตี’’ติ กตฺตุปทรูปํ สิยา ‘‘อาชญฺโญ กุรุเต เวคํ, หายนฺติ ตตฺถ วฬวา’’ติ อกมฺมกสฺส กตฺตุปทรูปสฺส ทสฺสนโต, ตสฺมา ‘‘ปหายิสฺสนฺตี’’ติ อวตฺวา ‘‘ปหียิสฺสนฺตี’’ติ วจเนน ยปจฺจโย ภาเว วตฺตตีติ ญายติ. 'हे इरंधती, तुझी माता विधुराचे हृदय इच्छिते (धनीयती)' आणि 'ते संक्लेशिक (मळकट/अशुद्ध) धर्म नष्ट होतील (पहीयिस्संती)' या पाळी सूत्रांच्या आधारे याचा सारांश समजून घेतला पाहिजे. तेथे 'पाण्डव' नावाचा घोडा 'गिरिदत्त' नावाच्या अश्वपालाच्या स्वभावाचे अनुकरण करतो (अनुविधीयती) असा अर्थ आहे. आणि येथे जर कर्तृपद अपेक्षित असते, तर 'अनुविदधाती' अशी पाळी भाषा असावी लागली असती. जर कर्मपद अपेक्षित असते, तर 'पाण्डवेन' असे तृतीयान्त कर्तृपद म्हणावे लागले असते, अशा प्रकारे न बोलल्यामुळे 'अनुविधीयती' हे भावपद आहे हे सिद्ध होते. येथे कोणीही असे म्हणू शकत नाही की 'दिवादिगणात कर्त्यामध्ये विहित केलेल्या 'य' प्रत्ययाच्या बळावर हे रूप सांगितले आहे', कारण 'धा' धातूचा दिवादिगणात प्रवेश होत नाही आणि तो पूर्णपणे भ्वादिगणाचाच आहे. दुसऱ्या प्रयोगात जर कर्तृपद अपेक्षित असते, तर 'धनुते' अशी पाळी म्हणावी लागली असती. जर कर्मपद अपेक्षित असते, तर 'धातुया' असे म्हणावे लागले असते. अशा प्रकारे न बोलल्यामुळे 'धनीयती' हे देखील भावपद आहे हे सिद्ध होते. येथे 'धनीयती म्हणजे प्रार्थना करतो, इच्छा करतो असा अर्थ आहे' असे अट्ठकथेमध्ये म्हटले आहे. 'धनु याचने' हा धातू निश्चितपणे तनादिगणातच चालतो. तिसऱ्या प्रयोगात 'पहीयिस्संती' हे जर भ्वादिगणातील 'हा चागे' (त्याग करणे) या धातूचे रूप असते, तर कर्त्यामध्ये 'पजहिस्संती' असे रूप झाले असते, जसे 'कस्मा नो पजहिस्सती' (तो आमचा त्याग का करणार नाही?) यामध्ये आहे. कर्मपद तर 'पजहियिस्संती' असे झाले असते. ज्याअर्थी 'पहीयिस्संती' हे दिवादिगणातील 'हा परिहानियं' (ऱ्हास होणे) या धातूचे रूप असल्यामुळे 'पहायिस्संती' असे कर्तृपदाचे रूप झाले असते, जसे 'आजन्य (उत्कृष्ट घोडा) वेग करतो, तेथे घोड्या मागे पडतात (हायंती)' या प्रयोगात कर्तृपदाचे रूप दिसते, म्हणून 'पहायिस्संती' असे न म्हणता 'पहीयिस्संती' या वचनाने 'य' प्रत्यय भाव प्रयोगात आहे हे समजते. เกจิ ปเนตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘โส ปหียิสฺสติ. เต สํกิเลสิกา ธมฺมา ปหียิสฺสนฺติ. รูปํ วิภวิยฺยติ. อคฺคิชาหิ ปุพฺเพว ภูยเต’ติอาทีสุ ยปจฺจโย กมฺเมเยว วิหิโต, น ภาเว. กมฺมกตฺตุวเสน หิ อิเม ปโยคา ทฏฺฐพฺพา, สยเมว ปียเต ปานียํ, สยเมว กโฏ กริยเตติ ปโยคา วิยา’’ติ. ตํ น, เอวญฺหิ สติ ‘‘ปชหิยิสฺสนฺตี’’ติอาทีนิ สกมฺมกธาตุรูปานิ วตฺตพฺพานิ ‘‘ปียเต กริยเต’’ติ รูปานิ วิย. เอตฺถ ปน ภาวฏฺฐาเน กตฺตุโน ฐิตภาโว เหฏฺฐา นานปฺปกาเรน ทสฺสิโตติ น วุตฺโต. เย สทฺทสตฺเถ มตํ คเหตฺวา สาสนิกา ครู ภาเว อทพฺพวุตฺติโน ภาวสฺเสกตฺตา เอกวจนเมว, ตญฺจ ปฐมปุริสสฺเสว ‘‘ภูยเต เทวทตฺเตน เทวทตฺเตน สมฺปตฺตึ อนุภวนนฺติ อตฺโถ’’ติ ปโยคญฺจ ตทตฺถโยชนญฺจ [Pg.380] วทนฺติ. เตสํ ตํ วจนํ ปาฬิยา, อฏฺฐกถาทีหิ จ น สเมติ, ตสฺมา ยถาวุตฺโตเยวตฺโถ อายสฺมนฺเตหิ ธาเรตพฺโพ. परंतु येथे काही जण असे म्हणू शकतात की, 'तो नष्ट होईल (पहीयिस्सती). ते संक्लेशिक धर्म नष्ट होतील (पहीयिस्संती). रूप नष्ट होईल (विभवीयती). अग्नीच्या ज्वाळांद्वारे पूर्वीच अस्तित्वात आले जाते (भूयते)' इत्यादींमध्ये 'य' प्रत्यय कर्मामध्येच विहित केला आहे, भावे प्रयोगात नाही. कारण हे प्रयोग कर्मकर्तरी (कर्मवद्भाव) मानले पाहिजेत, जसे 'पाणी स्वतःच प्यायले जाते (पीयते)', 'चटई स्वतःच बनवली जाते (करियते)' या प्रयोगांप्रमाणे.' ते योग्य नाही, कारण असे असल्यास 'पीयते, करियते' या रूपांप्रमाणे 'पजहियिस्संती' इत्यादी सकर्मक धातूंची रूपे म्हणावी लागली असती. परंतु येथे भाव-अर्थात कर्त्याची स्थिती खाली विविध प्रकारे दर्शविली असल्यामुळे ती पुन्हा सांगितली नाही. जे व्याकरणशास्त्रातील मत स्वीकारून, शासनातील (धम्मातील) आदरणीय आचार्य भावे प्रयोगात द्रव्यरहित भावाच्या एकत्वामुळे केवळ एकवचनच आणि तेही केवळ प्रथम पुरुषाचेच असते असे मानून 'देवदत्ताद्वारे अस्तित्वात आले जाते (भूयते देवदत्तेन) म्हणजे देवदत्त संपत्तीचा अनुभव घेतो असा अर्थ आहे' असा प्रयोग आणि त्याचा अर्थ लावतात; त्यांचे ते वचन पाळी आणि अट्ठकथा इत्यादींशी सुसंगत नाही. म्हणून, आयुष्यमानांनी वर सांगितलेलाच अर्थ लक्षात ठेवावा. ชร โรเค. ชรติ, ชริยฺยติ. ชรวโยหานิยํ. ชีรติ, ชิยฺยติ. อิมา ทฺเวปิ ภูวาทิ คณิกวเสน เอกคณิกา. ตาสํ อยํ สาธารณรูปวิภาวนา. ‘‘เยน จ สนฺตปฺปติ, เยน จ ชริยฺยตี’’ติอาทิ. ตตฺถ เยน จ ชริยฺยตีติ เยน เตโชคเตน กุปิเตน อยํ กาโย เอกาหิกาทิชรโรเคน ชริยฺยติ ชรติ. อถ วา เยน จ ชริยติ เยน อยํ กาโย ชีรติ อินฺทฺริยเวกลฺยตํ พลกฺขยํ ปลิตวลิตาทิญฺจ ปาปุณาติ. 'जर्' हा धातू रोगाच्या अर्थात आहे. 'जरती', 'जरिय्यती' अशी रूपे होतात. 'जर्' वयोवृद्धी किंवा ऱ्हासाच्या अर्थात आहे. 'जीरती', 'जिय्यती' अशी रूपे होतात. हे दोन्ही धातू भ्वादिगणाच्या नियमानुसार एकाच गणाचे आहेत. त्यांचे हे सामान्य रूप स्पष्टीकरण आहे: 'ज्यामुळे तो संतप्त होतो, आणि ज्यामुळे तो जर्जर होतो (जरिय्यती)' इत्यादी. तेथे 'ज्यामुळे तो जर्जर होतो' म्हणजे ज्या प्रकोपित झालेल्या तेजोधातूमुळे (उष्णतेमुळे) हा शरीररूपी देह एका दिवसाच्या तापासारख्या ज्वररोगाने जर्जर होतो (जरिय्यती/जरती). किंवा 'ज्यामुळे तो जर्जर होतो' म्हणजे ज्याच्यामुळे हा देह जीर्ण होतो, इंद्रियांची दुर्बलता, शक्तीचा ऱ्हास आणि केस पांढरे होणे, त्वचेवर सुरकुत्या पडणे इत्यादी अवस्थेला प्राप्त होतो. มร ปาณจาเค. ภูวาทิคณิโกยํ อกมฺมโก จ. สตฺโต มรติ, มิยฺยติ. กิญฺจาปิ อยํ ธาตุ ‘‘มร ปาณจาเค’’ติ วจนโต สกมฺมโก วิย ทิสฺสติ, ตถาปิ ‘‘ปุตฺโต มรติ. กิจฺฉํ วตายํ โลโก อาปนฺโน ชายติ จ ชิยฺยติ จ มิยฺยติ จา’’ติ เอวมาทีนํ กมฺมรหิตปฺปโยคานํ ทสฺสนโต อกมฺมโกเยวาติ ทฏฺฐพฺพํ. อตฺถโยชนานเยน ปน มรตีติ ปาณํ จชตีติ กมฺมํ อาเนตฺวา กเถตุํ ลพฺภติ. ‘‘มรติ, มิยตี’’ติ อิมานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ, ‘‘สตฺโต สตฺตํ มาเรติ, มารยติ, มาราเปติ, มาราปยตี’’ติ อิมานิ การิตปทสงฺขาตานิ เหตุกตฺตุปทานิ. เอตฺถ จ โย อมตํ สตฺตํ มรณํ ปาเปติ, โส วธโก มาเรติ มารยติ มาราเปติ มาราปยตีติ จ วุจฺจติ. สตฺโต สตฺเตหิ มาริยติ มาราปิยตีติ อิมานิ กมฺมปทานิ. ภาวปทมปฺปสิทฺธํ. เอวมญฺญตฺราปิ ปสิทฺธตา จ อปฺปสิทฺธตา จ อุปปริกฺขิตพฺพา. 'मर्' हा धातू प्राणत्यागाच्या अर्थात आहे. हा भ्वादिगणाचा आणि अकर्मक धातू आहे. प्राणी मरतो (मरती, मिय्यती). जरी हा धातू 'मर् प्राणत्यागे' या वचनामुळे सकर्मक असल्यासारखा दिसतो, तरीही 'पुत्र मरतो. हा लोक खरोखरच कष्टाला प्राप्त झाला आहे, जो जन्मतो, वृद्ध होतो आणि मरतो (मिय्यती)' इत्यादी कर्मरहित प्रयोगांच्या दर्शनावरून हा अकर्मकच आहे असे मानले पाहिजे. परंतु अर्थ लावण्याच्या पद्धतीने 'मरतो म्हणजे प्राणाचा त्याग करतो' असे कर्माला आणून सांगता येते. 'मरती, मियती' ही शुद्ध कर्तृपदे आहेत; 'प्राणी प्राण्याला मारतो (मारेती, मारयती, मारापेती, मारापयती)' ही कारितपदे म्हणून ओळखली जाणारी हेतुकर्तृपदे आहेत. आणि येथे जो न मरणार्या प्राण्याला मरणाप्रत पोहोचवतो, तो वधक 'मारतो (मारेती, मारयती, मारापेती, मारापयती)' असे म्हटले जाते. 'प्राणी प्राण्यांद्वारे मारला जातो (मारियती, मारापियती)' ही कर्मपदे आहेत. भावपद अप्रसिद्ध आहे. अशा प्रकारे इतर ठिकाणीही प्रसिद्धी आणि अप्रसिद्धी तपासून पाहिली पाहिजे. ขาท ภกฺขเณ. อยํ ปน ภูวาทิคณิกวเสน เอกคณิโก สกมฺมโก ธาตุ. ขาทติ, สงฺขาทติ, อิมานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ[Pg.381]. ปุริโส ปุริเสน ปุริสํ วา ปูวํ ขาเทติ ขาทยติ ขาทาเปติ ขาทาปยติ, อิมานิ เหตุกตฺตุปทานิ. เอตฺถ จ โย อขาทนฺตํ ขาทนฺตํ วา ขาทาหีติ ปโยเชติ, โส ขาทาปโก ขาเทติ ขาทยติ ขาทาเปติ ขาทาปยตีติ จ วุจฺจติ. ขชฺชติ, สํขชฺชติ, สงฺขาทิยติ. อิมานิ กมฺมปทานิ. อตฺรปนายํ ปาฬิ ‘‘อตีตํ ปาหํ อทฺธานํ รูเปน ขชฺชึ, เสยฺยถาปาหํ เอตรหิ ปจฺจุปฺปนฺเนน รูเปน ขชฺชามิ. อหญฺเจว โข ปน อนาคตํ รูปํ อภินนฺเทยฺยํ, อนาคเตนปาหํ รูเปน ขชฺเชยฺยํ, เสยฺยถาเปตรหิ ขชฺชามี’’ติ. ภาวปทํ น ลพฺภติ สกมฺมกตฺตา อิมสฺส ธาตุสฺส. ภูวาทิคโณ. อยํ นามธาตุ เอกนฺตรุธาทิคณิโกติ อปฺปสิทฺโธ. 'खाद' (धातू) खाण्याच्या (भक्षण करण्याच्या) अर्थात आहे. हा भूवादिगणाच्या नियमानुसार एकगणी, सकर्मक धातू आहे. 'खादति' (खातो), 'संखादति' (चावून खातो), ही शुद्ध कर्तृपदे आहेत. 'पुरुष दुसऱ्या पुरुषाकडून किंवा पुरुषाला वडा (पिष्टक) खाऊ घालतो' (खादेति, खादयति, खादापेति, खादापयति), ही प्रयोजक कर्तृपदे (हेतुकर्तृपदे) आहेत. आणि येथे जो न खाणाऱ्याला किंवा खाणाऱ्याला 'खा!' अशी प्रेरणा देतो, तो 'खादापक' (खाऊ घालणारा) म्हटला जातो आणि 'खादेति', 'खादयति', 'खादापेति', 'खादापयति' असे म्हटले जाते. 'खज्जति' (खाल्ले जाते), 'संखज्जति', 'संखादियति', ही कर्मपदे आहेत. येथे ही पालि (वचन) आहे - "भूतकाळात मी रूपाने खाल्ला गेलो (पीडित झालो), जसा मी आता वर्तमानकाळात रूपाने खाल्ला जात आहे. जर मी अनागत (भविष्यातील) रूपाचे अभिनंदन केले (त्यात आनंद मानला), तर मी भविष्यातही रूपाने खाल्ला जाईन, जसा मी आता खाल्ला जात आहे." या धातूच्या सकर्मकत्वामुळे भावपद (भावे प्रयोग) मिळत नाही. भूवादिगण. हा नामधातू एकांतराने रुधादिगणाचा आहे असे समजावे. ทิวาทิคเณ ตา ปาลเน. โลกํ ตายติ สนฺตายติ. อิมานิ สกมฺมกานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ. เหตุกตฺตุปทํ ปน กมฺมปทญฺจ ภาวปทญฺจ อปฺปสิทฺธานิ. दिवादिगणात 'ता' (धातू) रक्षणाच्या (पालनाच्या) अर्थात आहे. 'लोकाचे रक्षण करतो' (लोकं तायति संतायति). ही सकर्मक शुद्ध कर्तृपदे आहेत. प्रयोजक कर्तृपद, कर्मपद आणि भावपद हे (इतर उदाहरणांप्रमाणे) समजून घ्यावेत. สุธ สํสุทฺธิยํ. จิตฺตํ สุชฺฌติ วิสุชฺฌติ. อิมานิ อกมฺมกานิ สุทฺธกตฺตุปทานิ. โสเธติ, โสธยติ, โสธาเปติ, โสธาปยติ, อิมานิ เหตุกตฺตุรูปานิ. เอตฺถ จ โย อสุทฺธํ ฐานํ สุทฺธํ กโรติ, โส โสธโก โสเธติ, โสธยตีติ วุจฺจติ, เอส นโย อญฺญตฺราปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ. โย ปน อสุทฺธฏฺฐานํ สยํ อโสเธตฺวา ‘‘ตฺวํ โสเธหี’’ติ อญฺญํ ปโยเชติ, โส โสธาปโก โสธาเปติ โสธาปยตีติ วุจฺจติ. เอส นโย อญฺญตฺราปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ. ตถา หิ ‘‘กาเรติ, การยติ, การาเปติ, การาปยตี’’ติอาทีสุ อยํ นโย น ลพฺภติ, เอวํ ลพฺภมานนโย จ อลพฺภมานนโย จ สพฺพตฺถ อุปปริกฺขิตพฺโพ. อิมา ปเนตฺถ ปาฬิโย – 'सुध' (धातू) पूर्ण शुद्धीच्या (संशुद्धीच्या) अर्थात आहे. 'चित्त शुद्ध होते, विशुद्ध होते' (चित्तं सुज्झति विसुज्झति). ही अकर्मक शुद्ध कर्तृपदे आहेत. 'सोधेति', 'सोधयति', 'सोधापेति', 'सोधापयति', ही प्रयोजक (हेतु) रूपे आहेत. आणि येथे जो अशुद्ध स्थान शुद्ध करतो, तो 'शोधक' (शुद्ध करणारा) म्हटला जातो आणि 'सोधेति', 'सोधयति' असे म्हटले जाते; हाच नियम इतर अशाच ठिकाणीही लागू होतो. परंतु जो अशुद्ध स्थान स्वतः शुद्ध न करता "तू शुद्ध कर!" अशी दुसऱ्याला प्रेरणा देतो, तो 'सोधापक' (शुद्ध करवून घेणारा) म्हटला जातो आणि 'सोधापेति', 'सोधापयति' असे म्हटले जाते. हाच नियम इतर अशाच ठिकाणीही लागू होतो. कारण की, 'कारेति, कारयति, कारापेति, कारापयति' इत्यादींमध्ये हा नियम मिळत नाही; अशा प्रकारे लागू होणारा नियम आणि लागू न होणारा नियम सर्वत्र तपासून पाहिला पाहिजे. या संदर्भात खालील पालि (वचने) आहेत - ‘‘ปจฺจนฺตเทสวิสเย, นิมนฺเตตฺวา ตถาคตํ; ตสฺส อาคมนํ มคฺคํ, โสเธนฺติ ตุฏฺฐมานสา’’ติ จ “प्रत्यंत देशात (सीमावर्ती भागात) तथागतांना निमंत्रित करून, प्रसन्न मनाने त्यांच्या येण्याचा मार्ग ते शुद्ध (साफ) करतात.” आणि ‘‘มคฺคํ [Pg.382] โสเธมหํ ตทา’’ติ จ. อิมา หิ ปาฬิโย สหตฺถา โสธนํ สนฺธาย วุตฺตา. ‘‘อายสฺมา ปิลินฺทวจฺโฉ ราชคเห ปพฺภารํ โสธาเปติ เลณํ กตฺตุกาโม’’ติ ปน ปาฬิ, ‘‘กึ ภนฺเต เถโร การาเปตี’’ติ, ‘‘ปพฺภารํ มหาราช โสธาเปมิ เลณํ กตฺตกาโม’’ติ จ ปาฬิ. อิมา ปเรหิ โสธาปนํ สนฺธาย วุตฺตา. ‘‘กสฺส โสธิยติ มคฺโค’’ติ อิทํ กมฺมปทํ, ภาวปทํ ปน อปฺปสิทฺธํ. อิมินา นเยน ยาว จุราทิคณา โยเชตพฺพํ. “तेव्हा मी मार्ग शुद्ध (साफ) केला.” आणि ही पालि वचने स्वतःच्या हाताने शुद्ध करण्याच्या (साफ करण्याच्या) संदर्भात म्हटली आहेत. “आयुष्यमान पिलिन्दवच्छ राजगृहात लेणे (गुहा) बनवण्याच्या इच्छेने डोंगर-उतार (पब्भार) साफ करवून घेत आहेत,” ही पालि, “भन्ते, थेर काय करवून घेत आहेत?” “महाराज, लेणे बनवण्याच्या इच्छेने मी डोंगर-उतार साफ करवून घेत आहे,” ही पालि. ही वचने दुसऱ्यांकडून साफ करवून घेण्याच्या संदर्भात म्हटली आहेत. “कोणासाठी मार्ग साफ केला जात आहे?” (कस्स सोधियति मग्गो) हे कर्मपद आहे, आणि भावपद (भावे प्रयोग) समजून घ्यावे. या नियमाने चुरादिगणापर्यंत योजना करावी. ทฺวิคณิกตฺเต สุภ โสเภ. โสภติ วตายํ ปุริโส. สุภ ปหาเร. โย โน คาโวว สุมฺภติ สุมฺโภติ อิจฺจปิ ทิสฺสติ. ‘‘สุมฺโภตี’’ติ จ กจฺจายนมเต รูปํ, อิมานิ กตฺตุปทานิ. นครํ โสเภติ, โสภยติ. ปุริโส ปุริเส โจรํ สุมฺเภติ, สุมฺภยติ, สุมฺภาเปติ, สุมฺภาปยติ. อิมานิ เหตุกตฺตุปทานิ. กมฺมภาวปทานิ ลพฺภมานาลพฺภมานวเสน ยถาสมฺภวํ โยเชตพฺพานิ. ภูวาทิรุธาทิคณิกรูปานิ. दोन गणांमध्ये असण्याच्या संदर्भात, 'सुभ' (धातू) शोभून दिसण्याच्या (शोभे) अर्थात आहे. 'हा पुरुष खरोखर शोभून दिसतो' (सोभति वतायं पुरिसो). 'सुभ' (धातू) प्रहाराच्या (मारण्याच्या) अर्थात आहे. 'जो आमच्या बैलाप्रमाणे मारतो (सुम्भति/सुम्भोति)' असे दिसते. आणि 'सुम्भोति' हे कच्चायनाच्या मते रूप आहे; ही कर्तृपदे आहेत. 'नगर सुशोभित करतो' (नगरं सोभेति, सोभयति). 'पुरुष दुसऱ्या पुरुषाकडून चोराला मारवतो' (पुरिसो पुरिसे चोरं सुम्भेति, सुम्भayati, सुम्भापेति, सुम्भापयति). ही प्रयोजक कर्तृपदे आहेत. कर्मपदे आणि भावपदे उपलब्ध असणे किंवा नसणे यानुसार यथासंभव योजावीत. ही भूवादि आणि रुधादिगणाची रूपे आहेत. ปจ ปาเก. ปุริโส ภตฺตํ ปจติ. เนรยิโก นิรเย ปจฺจติ. กมฺมํ ปจฺจติ. ภตฺตํ ปจฺจติ. ปารมิโย ปริปจฺจนฺติ. ผลานิ ปริปจฺจนฺติ, ปกฺกานิ โหนฺตีติ อตฺโถ. ครโว ปน – 'पच' (धातू) शिजवण्याच्या किंवा पिकण्याच्या (पाके) अर्थात आहे. 'पुरुष भात शिजवतो' (पुरिसो भत्तं पचति). 'नारकीय प्राणी नरकात शिजतो (यातना भोगतो)' (नेरयिको निरये पच्चति). 'कर्म परिपक्व होते' (कम्मं पच्चति). 'भात शिजतो' (भत्तं पच्चति). 'पारमिता परिपक्व होतात' (पारमियो परिपच्चन्ति). 'फळे पिकतात' (फलानि परिपच्चन्ति), म्हणजेच ती पक्व होतात असा अर्थ आहे. परंतु आदरणीय आचार्य तर - ญาณยุตฺตวรํ ตตฺถ, ทตฺวา สนฺธึ ติเหตุกํ; ปจฺฉา ปจฺจติ ปากานํ, ปวตฺเต อฏฺฐเก ทุเวติ จ – “तेथे ज्ञानयुक्त श्रेष्ठ तिहेतुक प्रतिसंधी देऊन, नंतर प्रवृत्तीमध्ये (विपाकांच्या उत्पत्तीत) आठ विपाकांपैकी दोन विपाक परिपक्व होतात.” आणि - ‘‘อสงฺขารํ สสงฺขาร-วิปากานิ น ปจฺจตี’’ติ จ เอวํ ปจติปทสฺส ทฺวิคณิกรูปสฺส สกมฺมกตฺตํ อิจฺฉนฺติ. เอวํ ปน สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเน กุโต ลพฺภา. เตปิฏเก หิ พุทฺธวจเน ‘‘กปฺปํ นิรยมฺหิ ปจฺจติ. ยาว ปาปํ น ปจฺจติ. นิรยมฺหิ [Pg.383] อปจฺจิ โส’’ติ เอวํ อกมฺมกตฺตํเยว ทิสฺสติ. เอตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘นนุ ปจ ปาเก’ติ อยํ ธาตุ สกมฺมโก, เตน ‘ปจฺจตี’ติ ปทสฺส ทิวาทิคณิกรูปสฺสปิ สโต สกมฺมกตฺตํ ยุชฺชติ, ตสฺมาเยว ‘ปจฺจติ ปากานํ ปวตฺเต อฏฺฐเก ทุเว’ติอาทีสุ วุตฺต’’นฺติ. เอตฺถ วุจฺจเต – ยถา ‘‘ฉิทิ ทฺวิธากรเณ, ภิทิ วิทารเณ’’ติ ธาตูนํ รุธาทิคเณ ปวตฺตานํ ‘‘รุกฺขํ ฉินฺทติ, ภิตฺตึ ภินฺทตี’’ติ รูปปทานํ สกมฺมกตฺเตปิ สติ ทิวาทิคณํ ปตฺตานํ เตสํ ธาตูนํ ‘‘อุทกํ ฉิชฺชติ, ฆโฏ ภิชฺชตี’’ติ รูปปทานิ อกมฺมกานิเยว ภวนฺติ, ยถา ภูวาทิคเณ ปวตฺตสฺส ปจธาตุสฺส ‘‘ภตฺตํ ปจตี’’ติ รูปปทสฺส สกมฺมกตฺเตปิ สติ ทิวาทิคณํ ปตฺตสฺส ‘‘นิรเย ปจฺจติ, กมฺมานิ วิปจฺจนฺตี’’ติ รูปปทานิ อกมฺมกานิเยว ภวนฺติ. “असंस्कारिक आणि ससंस्कारिक विपाक परिपक्व होत नाहीत,” अशा प्रकारे 'पचति' या दोन गणांच्या रूपाचे सकर्मकत्व इच्छितात (मानतात). परंतु असे अट्ठकथासहित त्रिपिटक बुद्धवचनात कोठे मिळते? कारण त्रिपिटक बुद्धवचनात “कल्पापर्यंत नरकात शिजतो (यातना भोगतो)”, “जोपर्यंत पाप परिपक्व होत नाही”, “तो नरकात शिजला (यातना भोगल्या)”, अशा प्रकारे केवळ अकर्मकत्वच दिसून येते. येथे काही जण म्हणू शकतात - “नक्कीच 'पच पाके' हा धातू सकर्मक आहे, त्यामुळे 'पच्चति' या दिवादिगणाच्या रूपाचेही सकर्मकत्व योग्य ठरते, म्हणूनच 'पच्चति पाकानं पवत्ते अट्ठके दुवे' इत्यादींमध्ये असे म्हटले आहे.” यावर उत्तर दिले जाते - ज्याप्रमाणे 'छिदि' (दोन भाग करणे) आणि 'भिदि' (फाडणे/फोडणे) हे धातू रुधादिगणात प्रवृत्त असताना 'रुक्खं छिन्दति' (झाड तोडतो), 'भित्तिं भिन्दति' (भिंत फोडतो) ही रूपपदे सकर्मक असूनही, दिवादिगणात आल्यावर त्या धातूंची 'उदकं छिज्जति' (पाणी तुटते/थांबते), 'घटो भिज्जति' (घडा फुटतो) ही रूपपदे केवळ अकर्मकच होतात; त्याचप्रमाणे भूवादिगणात प्रवृत्त असलेल्या 'पच' धातूचे 'भत्तं पचति' (भात शिजवतो) हे रूपपद सकर्मक असूनही, दिवादिगणात आल्यावर त्याचे 'निरये पच्चति' (नरकात शिजतो), 'कम्मानि विपच्चन्ति' (कर्मे परिपक्व होतात) ही रूपपदे केवळ अकर्मकच होतात. อถาปิ วเทยฺยุํ ‘‘นนุ จ โภ ยถา ‘อาสเวหิ จิตฺตานิ วิมุจฺจึสู’ติ เอตฺถ ‘‘อาสวโต จิตฺตานิ วิมุจฺจึสู’ติ จ ‘อาสเวหิ กตฺตุภูเตหิ จิตฺตานิ วิมุจฺจึสู’ติ จ เอวํ ทิวาทิคณิกสฺส ธาตุสฺส ‘วิมุจฺจึสู’ติ รูปปทสฺส อกมฺมกตฺตญฺจ สกมฺมกตฺตญฺจ ภวติ, ตถา ‘นิรเย ปจฺจติ, กมฺมานิ วิปจฺจนฺตี’ติ จ อกมฺมกตฺเตนปิ ภวิตพฺพํ. ‘ปจฺจติ ปากานํ ปวตฺเต อฏฺฐเก ทุเว, อสงฺขารํ สสงฺขารวิปากานิ น ปจฺจตี’ติ สกมฺมกตฺเตนปิ ภวิตพฺพ’’นฺติ. อกมฺมกตฺเตเนว ภวิตพฺพํ, น สกมฺมกตฺเตน, ‘‘ปจฺจติ ปากาน’’นฺติอาทินา วุตฺตปฺปโยคานํ ‘‘อาสเวหิ จิตฺตานิ วิมุจฺจึสู’’ติ ปโยเคน อสมานตฺตา. ตถา เหตฺถ ‘‘วิมุจฺจึสู’’ติ ปทํ กมฺมรหิตกตฺตุวาจกยปจฺจยนฺตมฺปิ ภวติ กตฺตุสหิตกมฺมวาจกยปจฺจยนฺตมฺปิ. ‘‘วิมุจฺจึสู’’ติ อิมสฺส หิ ปทสฺส กมฺมรหิตยปจฺจยวนฺตตฺตา ‘‘อาสเวหี’’ติ กรณวจนํ อปาทานการกวาจกํ ภวติ. ‘จิตฺตานี’’ติ ปจฺจตฺตวจนํ ปน กตฺตุการกวาจกํ ภวติ. ตถา ‘‘วิมุจฺจึสู’’ติ ปทสฺส กตฺตุสหิตกมฺมวาจกตฺตา ‘‘อาสเวหี’’ติ [Pg.384] กรณวจนํ กตฺตุการกวาจกํ ภวติ. ‘‘จิตฺตานี’’ติ ปจฺจตฺตวจนํ ปน กมฺมการกวาจกํ ภวติ. อยํ นโย ‘‘ปจฺจติ ปากาน’’นฺติอาทินา วุตฺตปฺปโยเคสุ น ลพฺภติ. ตถา หิ ตตฺถ ปจฺจตฺตวจนํ กตฺตารํ วทติ, อุปโยควจนํ กมฺมํ วทตีติ ทฏฺฐพฺพํ. การิเต ‘‘ปุริโส ปุริเสน ปุริสํ วา ภตฺตํ ปาเจติ ปาจยติ ปาจาเปติ ปาจาปยตี’’ติ จ, ‘‘อนนฺเต โพธิสมฺภาเร, ปริปาเจสิ นายโก’’ติ ทสฺสนโต ปน ‘‘ปริปาเจติ, ปริปาจยตี’’ติ จ รูปานิ ภวนฺติ. อิมานิ เหตุกตฺตุปทานิ. กมฺเม – ยญฺญทตฺเตน โอทโน ปจฺจเต, ภาวปทํ อปฺปสิทฺธํ. อิมานิ ภูวาทิทิวาทิคณิกรูปานิ. อิมินา นเยน อญฺญานิปิ ทฺวิคณิกรูปานิ โยเชตพฺพานิ. जरी असे म्हटले गेले की, 'ज्याप्रमाणे "आसवेहि चित्तानि विमुच्चिंसु" (आसवांपासून चित्त विमुक्त झाले) येथे "आसवतो चित्तानि विमुच्चिंसु" आणि "आसवेहि कत्तुभूतेहि चित्तानि विमुच्चिंसु" (कर्ता बनलेल्या आसवांपासून चित्त विमुक्त झाले) अशा प्रकारे दिवादिगणातील धातूच्या "विमुच्चिंसु" या क्रियापदाचे अकर्मकत्व आणि सकर्मकत्व दोन्ही सिद्ध होते, त्याचप्रमाणे "निरये पच्चति" (नरकात शिजतो/पचतो) आणि "कम्माणि विपच्चन्ति" (कर्मे परिपक्व होतात) येथे अकर्मकत्व देखील असले पाहिजे. आणि "पच्चति पाकानं पवत्ते अट्ठके दुवे, असङ्खारं ससङ्खारविपाकानि न पच्चती" येथे सकर्मकत्व देखील असले पाहिजे.' तर (त्यावर उत्तर असे की) ते केवळ अकर्मकच असले पाहिजे, सकर्मक नाही. कारण "पच्चति पाकानं" इत्यादींमध्ये सांगितलेले प्रयोग "आसवेहि चित्तानि विमुच्चिंसु" या प्रयोगासारखे समान नाहीत. कारण येथे "विमुच्चिंसु" हे पद कर्मरहित कर्ता दर्शवणारा 'य' प्रत्यय लागलेले देखील होते आणि कर्त्यासह कर्म दर्शवणारा 'य' प्रत्यय लागलेले देखील होते. "विमुच्चिंसु" या पदाला कर्मरहित 'य' प्रत्यय लागल्यामुळे "आसवेहि" ही तृतीया विभक्ती अपादान कारकाची वाचक होते, तर "चित्तानि" ही प्रथमा विभक्ती कर्ता कारकाची वाचक होते. तसेच "विमुच्चिंसु" या पदाला कर्त्यासह कर्मवाचक प्रत्यय लागल्यामुळे "आसवेहि" ही तृतीया विभक्ती कर्ता कारकाची वाचक होते, तर "चित्तानि" ही प्रथमा विभक्ती कर्म कारकाची वाचक होते. हा नियम "पच्चति पाकानं" इत्यादी प्रयोगांमध्ये लागू होत नाही. कारण तेथे प्रथमा विभक्ती कर्ता सांगते आणि द्वितीया विभक्ती कर्म सांगते, असे समजले पाहिजे. प्रयोजक (कारित) प्रयोगात "पुरिसो पुरिसेन पुरिसं वा भत्तं पाचेति, पाचयति, पाचापेति, पाचापयति" (माणूस दुसऱ्या माणसाकडून भात शिजवून घेतो) आणि "अनन्ते बोधिसम्भारे, परिपाचेसि नायको" (नायकाने अनंत बोधिसंभारांना परिपक्व केले) या प्रयोगांवरून "परिपाचेति, परिपाचयति" अशी रूपे होतात. ही प्रयोजक कर्ता (हेतुकर्तृ) पदे आहेत. कर्म प्रयोगात – "यञ्ञदत्तेन ओदनो पच्चते" (यज्ञदत्ताकडून भात शिजवला जातो), येथे भावपद देखील असेच समजावे. ही भूवादि आणि दिवादि गणातील रूपे आहेत. याच नियमाने इतरही द्विगणिक (दोन गणांतील) रूपे जोडावीत. เตคณิกตฺเต สุ ปสเว. เหตุผลํ สวติ, ปสวติ. สุ สวเน. สทฺโธ ธมฺมํ สุโณติ, สุณาติ. สุ หึสายํ. โยโธ ปจฺจามิตฺตํ สุนาติ. อิมานิ ยถากฺกมํ ภูวาทิสฺวาทิกิยาทิคณิกานิ กตฺตุปทานิ. ตถา เหตุนา ผลํ สวิยฺยติ, อุนฺนาทสทฺโท ปถวีอุนฺทฺริยสทฺโท วิย สุยฺยติ. โยเธน ปจฺจมิตฺโต สุนิยฺยติ. อิมานิ กมฺมปทานิ. ภาวปทํ น ลพฺภติ สกมฺมกตฺตา อิเมสํ ธาตูนํ. อิมินา นเยน อญฺญานิปิ เตคณิกรูปานิ อุปปริกฺขิตฺวา โยเชตพฺพานิ. อตฺร ปนายํ นยวิภาวนา – त्रिगणिक (तीन गणांतील) धातूंमध्ये 'सु' धातू प्रसव (उत्पत्ती) अर्थात आहे. 'हेतुफलं सवति, पसवति' (हेतू फलाला प्रसवतो/उत्पन्न करतो). 'सु' धातू श्रवण (ऐकणे) अर्थात – 'सद्धो धम्मं सुणोति, सुणाति' (श्रद्धावान मनुष्य धम्म ऐकतो). 'सु' धातू हिंसा अर्थात – 'योधो पच्चामित्तं सुनाति' (योद्धा शत्रूला मारतो). ही अनुक्रमे भूवादि, स्वादि आणि क्र्यादि गणातील कर्तावाचक पदे आहेत. तसेच 'हेतुना फलं सविय्यति' (हेतूद्वारे फल प्रसवले जाते), 'उन्नादशब्दो पथवीउन्द्रियशब्दो विय सुय्यति' (मोठा आवाज पृथ्वीच्या इंद्रियशब्दाप्रमाणे ऐकू येतो). 'योधेन पच्चमित्तो सुनिय्यति' (योद्ध्याकडून शत्रू मारला जातो). ही कर्मवाचक पदे आहेत. हे धातू सकर्मक असल्यामुळे यांचे भावपद मिळत नाही. याच नियमाने इतरही त्रिगणिक रूपे तपासून जोडावीत. येथे हा नियम स्पष्ट केला आहे – ภฺวาทิรุธาทิกา ธาตู, สฺวาทิทิวาทิกา ตถา; รุธาทิกทิวาทิฏฺฐา, ภูวาทิกจุราทิกา. काही धातू भूवादि आणि रुधादि गणातील असतात, तसेच काही स्वादि आणि दिवादि गणातील असतात; काही रुधादि आणि दिवादि गणात आढळतात, तर काही भूवादि आणि चुरादि गणात आढळतात. ภูวาทิกคหาทิฏฺฐา, ภฺวาทิสฺวาทิกิยาทิกา; เอวมาทิปฺปเภเทหิ, วิตฺถาเรนฺตุ วิจกฺขณา. काही भूवादि आणि ग्रहादि गणात आढळतात, तर काही भूवादि, स्वादि आणि क्र्यादि गणात आढळतात; अशा विविध प्रकारांनी विद्वानांनी याचा विस्तार करावा. อิจฺเจวํ สงฺเขปโต ยถารหํ เอกคณิกทฺวิคณิกเตคณิกวเสน สุทฺธกตฺตุเหตุกตฺตุกมฺมภาวปทานิ จ สการิเตกกมฺมานิ [Pg.385] จ สการิตทฺวิกมฺมานิ จ สการิตติกมฺมานิ จ ทสฺสิตานิ. अशा प्रकारे संक्षेपाने योग्यतेनुसार एकगणिक, द्विगणिक आणि त्रिगणिक रूपांच्या आधारे शुद्ध कर्ता, प्रयोजक कर्ता, कर्म आणि भाव पदे, तसेच एककर्मक प्रयोजक, द्विकर्मक प्रयोजक आणि त्रिकर्मक प्रयोजक पदे दाखवली आहेत. อิทานิ เอกการิตทฺวิการิตปทานํ วจโนกาโส อนุปฺปตฺโต, ตสฺมา ตํ วทาม. โส อนฺตกมฺมนิ. อรหตฺตมคฺโค มานํ สิยติ, กมฺมํ ปริโยสิยติ. อิมานิ ตาว สุทฺธกตฺตุปทานิ. เอตฺถ มานํ สิยตีติ มานํ สมุจฺฉินฺทติ. กมฺมํ ปริโยสิยตีติ กมฺมํ นิปฺผชฺชติ. ปริ อว อิจฺจุปสคฺควเสน หิ อิทํ ปทํ อกมฺมกํ ภวติ, อตฺโถ ปน ‘‘ปริโยสานํ คจฺฉตี’’ติ สกมฺมกวเสน คเหตพฺโพ. อตฺตนา วิปฺปกตํ อตฺตนา ปริโยสาเปติ. อิทเมกํ การิตํ เหตุกตฺตุปทํ. เอตฺถ ปน ปริอว อิจฺจุปสคฺควเสน อกมฺมกภูตสฺส โสธาตุสฺส ลทฺธการิตปจฺจยตฺตา เอกกมฺมเมว สการิตปทํ ภวติ. อตฺตนา วิปฺปกตํ ปเรหิ ปริโยสาวาเปติ. อิทํ ทฺวิการิตํ เหตุกตฺตุปทํ. เอตฺถ จ ปน ปริ อว อิจฺจุปสคฺควเสน อกมฺมกภูตสฺส โสธาตุสฺส ลทฺธการิตปจฺจยทฺวยตฺตา ทฺวิกมฺมกํ สการิตปทํ ภวติ. ‘‘ปริโยสาวาเปตี’’ติ อิทมฺปิ ปริ อว ปุพฺพสฺมา โสธาตุมฺหา ณาเป ณาเป อิติ ปจฺจยทฺวยํ กตฺวา อวสทฺทสฺโสการญฺจ กตฺวา ตโต ยการาคมญฺจ อนุพนฺธณการโลปญฺจ ปฐมปจฺจเย ปการสฺส วการญฺจ ทฺวีสุ จ ฐาเนสุ ปุพฺพสรโลปํ กตฺวา นิปฺผชฺชตีติ ทฏฺฐพฺพํ. आता एक-प्रयोजक (एककारित) आणि द्वि-प्रयोजक (द्विकारित) पदांच्या विधानाचा प्रसंग आला आहे, म्हणून आम्ही ते सांगतो. 'सो' धातू अंत (नाश किंवा समाप्ती) आणि कर्म अर्थात आहे. 'अरहत्तमग्गो मानं सियति' (अर्हतमार्ग मानाचा नाश करतो), 'कम्मं परियोसियति' (कर्म समाप्त होते). ही आधी शुद्ध कर्तावाचक पदे आहेत. येथे 'मानं सियति' म्हणजे मानाचा समूळ नाश करतो. 'कम्मं परियोसियति' म्हणजे कर्म पूर्ण होते. 'परि' आणि 'अव' या उपसर्गांच्या प्रभावामुळे हे पद अकर्मक होते, परंतु याचा अर्थ 'परियोसानं गच्छति' (शेवटास जातो) अशा सकर्मक अर्थाने घ्यावा. 'अत्तना विप्पकतं अत्तना परियोसापेति' (स्वतः सुरू केलेले काम स्वतःच पूर्ण करतो). हे एक प्रयोजक (एककारित) हेतुकर्तृपद आहे. येथे 'परि' आणि 'अव' उपसर्गांमुळे सकर्मक झालेल्या 'सो' धातूला एक प्रयोजक प्रत्यय लागल्यामुळे हे एककर्मक प्रयोजक पद बनते. 'अत्तना विप्पकतं परेहि परियोसावापेति' (स्वतः सुरू केलेले काम इतरांकडून पूर्ण करून घेतो). हे द्वि-प्रयोजक (द्विकारित) हेतुकर्तृपद आहे. येथे 'परि' आणि 'अव' उपसर्गांमुळे सकर्मक झालेल्या 'सो' धातूला दोन प्रयोजक प्रत्यय लागल्यामुळे हे द्विकर्मक प्रयोजक पद बनते. "परियोसावापेति" हे रूप 'परि' आणि 'अव' पूर्व असलेल्या 'सो' धातूपासून 'णापे' आणि 'णापे' हे दोन प्रत्यय लावून, 'अव' शब्दाचा 'ओ' करून, त्यानंतर 'य' काराचा आगम करून आणि अनुबंध 'ण' काराचा लोप करून, पहिल्या प्रत्ययातील 'प' काराचा 'व' कार करून आणि दोन ठिकाणी पूर्व स्वराचा लोप करून सिद्ध होते, असे समजावे. อิทานิ ตา ปาฬิโย อตฺถนฺตรวิญฺญาปนตฺถํ อาหจฺจเทสิตากาเรน เอกโต กถยาม – ‘‘อตฺตนา วิปฺปกตํ อตฺตนา ปริโยสาเปติ, อาปตฺติ สงฺฆาทิเสสสฺส. อตฺตนา วิปฺปกตํ ปเรหิ ปริโยสาวาเปติ, อาปตฺติ สงฺฆาทิเสสสฺสา’’ติ เอตฺถ ‘‘ภิกฺขู’’ติ เหตุกตฺตุปทํ อาเนตพฺพํ. อตฺตนา วิปฺปกตนฺติ เอตฺถ จ อตฺตนาติ วิปฺปกรณกฺริยาย กตฺตุการกวาจกํ กรณวจนํ. วิปฺปกตนฺติ กมฺมการกวาจกํ [Pg.386] อุปโยควจนํ. อตฺตนา ปริโยสาเปตีติ เอตฺถ ปน อตฺตนาติ อพฺยยปทภูเตน สยํสทฺเทน สมานตฺถํ วิภตฺยนฺตปติรูปกํ อพฺยยปทํ, สยํสทฺทสทิสํ วา ตติยาวิภตฺยนฺตํ อพฺยยปทํ. ตถา หิ ‘‘อตฺตนา ปริโยสาเปตี’’ติ วุตฺตวจนสฺส ‘‘สยํ ปริโยสาเปตี’’ติ อตฺโถ ภวติ ‘‘อตฺตนา จ ปาณาติปาตี’’ติอาทีสุ วิย. ปเรหิ ปริโยสาวาเปตีติ เอตฺถ ปน ปเรหีติ กมฺมการกวาจกํ กรณวจนนฺติ คเหตพฺพํ, ‘‘สุนเขหิปิ ขาทาเปนฺตี’’ติ เอตฺถ ‘‘สุนเขหี’’ติ ปทํ วิย. เอตฺถ หิ ยถา ‘‘ราชาโน โจรํ สุนเข ขาทาเปนฺตี’’ติ อุปโยควเสน อตฺโถ ภวติ, ตถา ‘‘ภิกฺขุ อตฺตนา วิปฺปกตํ ปเร ชเน ปริโยสาวาเปตี’’ติ อุปโยควเสน อตฺโถ ภวติ. เอวํ อิมสฺมึ อจฺฉริยพฺภุตนยวิจิตฺเต ภควโต ปาวจเน ทฺวิการิตปจฺจยวนฺตมฺปิ ปทมตฺถีติ สารโต ปจฺเจตพฺพํ. อยํ นโย สุขุโม สาสเน อาทรํ กตฺวา อายสฺมนฺเตหิ สาธุกํ มนสิ กาตพฺโพ. ยสฺส หิ อตฺถาย อิทํ ปกรณํ กริมฺห, น อยํ อตฺตโน มติ, อถ โข ปุพฺพาจริยานํ สนฺติกา ลทฺธตฺตา เตสญฺเญว มตีติ ทฏฺฐพฺพํ. आता त्या पाळी (वचने) अर्थाचा भेद स्पष्ट करण्यासाठी प्रत्यक्ष उपदेशिलेल्या रूपाने एकत्र सांगतो - "स्वतः अपूर्ण ठेवलेले कार्य स्वतःच पूर्ण करतो, तर संघादिसेस आपत्ती होते. स्वतः अपूर्ण ठेवलेले कार्य इतरांकडून पूर्ण करून घेतो, तर संघादिसेस आपत्ती होते." येथे "भिक्खू" हे हेतुकर्तृपद आणले पाहिजे. "अत्तना विप्पकतं" (स्वतः अपूर्ण ठेवलेले) येथे "अत्तना" (स्वतःद्वारे) हे अपूर्ण ठेवण्याच्या क्रियेच्या कर्त्याचे वाचक असणारे तृतीया विभक्तीचे रूप (करणवचन) आहे. "विप्पकतं" हे कर्मकारकाचे वाचक असणारे द्वितीया विभक्तीचे रूप (उपयोगवचन) आहे. "अत्तना परियोसापेति" (स्वतः पूर्ण करतो) येथे "अत्तना" हे अव्ययपद बनलेल्या "सयं" (स्वतः) या शब्दाशी समान अर्थ असणारे, विभक्तीच्या रूपासारखे दिसणारे अव्ययपद आहे, किंवा "सयं" शब्दासारखे तृतीया विभक्तीचे अव्ययपद आहे. कारण "अत्तना परियोसापेति" या म्हटलेल्या वचनाचा अर्थ "सयं परियोसापेति" (स्वतः पूर्ण करतो) असा होतो, जसे "अत्तना च पाणातिपाती" (आणि स्वतः प्राणातिपाती असणारा) इत्यादींमध्ये होते. "परेहि परियोसावापेति" (इतरांकडून पूर्ण करून घेतो) येथे "परेहि" (इतरांद्वारे) हे कर्मकारकाचे वाचक असणारे तृतीया विभक्तीचे रूप (करणवचन) मानले पाहिजे, जसे "सुनखेहिपि खादापेन्ति" (कुत्र्यांकडूनही खाववितात) येथे "सुनखेहि" हे पद आहे. येथे जसे "राजाने चोराला कुत्र्यांकडून खावविले" असा द्वितीयेच्या (उपयोगाच्या) अर्थाने अर्थ होतो, तसेच "भिक्खू स्वतः अपूर्ण ठेवलेले कार्य इतर लोकांकडून पूर्ण करून घेतो" असा द्वितीयेच्या अर्थाने अर्थ होतो. अशा प्रकारे, भगवंतांच्या या आश्चर्यकारक आणि अद्भुत नय-विचित्र प्रवचनात द्विकारित प्रत्यय असणारे पद देखील आहे, हे सार रूपाने समजून घेतले पाहिजे. हा सूक्ष्म नय शासनाविषयी आदर ठेवून आयुष्यमानांनी चांगल्या प्रकारे मनात धारण केला पाहिजे. ज्या अर्थासाठी आम्ही हा ग्रंथ रचला आहे, ते आमचे स्वतःचे मत नाही, तर पूर्वाचार्यांच्या जवळून प्राप्त झाल्यामुळे त्यांचेच मत आहे, असे मानले पाहिजे. อิทานิ อการิตทฺวิกมฺมิกปทานํ วจโนกาโส อนุปฺปตฺโต, ตสฺมา ตานิ กถยาม, ตานิ จ โข ธาตุวเสน เอวํ เวทิตพฺพานิ สวินิจฺฉยานิ. เสยฺยถิทํ? आता अकारित (प्रयोजक नसलेल्या) द्विकर्मक पदांच्या विधानाचा प्रसंग प्राप्त झाला आहे, म्हणून आम्ही ती सांगतो. आणि ती धातूंच्या नियमांनुसार अशा प्रकारे निर्णयांसह समजून घेतली पाहिजेत. ते खालीलप्रमाणे आहेत: ทุหิกรวหิปุจฺฉิ, ยาจิ ภิกฺขิ จ นิพฺรูติ; ภณิวทิวจิภาสิ, สาสิทหินาถธาตุ. दुह (दुभणे), कर (करणे), वह (वाहणे), पुच्छि (विचारणे), याचि (याचना करणे), भिक्खि (भिक्षा मागणे), निब्रू (सांगणे), भण (म्हणणे), वद (बोलणे), वच (सांगणे), भास (भाषण करणे), सासि (शासन करणे), दहि (धारण करणे/दहन करणे) आणि नाथ (याचना करणे) हे धातू; รุธิ ชิ จิปภุตีติ, เย เต ทฺวิกมฺมกา ธีรา; ปวทุมปิ วิยุตฺตา, การิตปฺปจฺจเยหิ จ. रुधि (अडवणे), जि (जिंकणे), चि (एकत्र करणे) इत्यादी जे द्विकर्मक धातू आहेत, त्यांना विद्वानांनी कारित (प्रयोजक) प्रत्ययांशिवाय देखील द्विकर्मक म्हटले आहे. อปาทานาทิเก ปุพฺพ-วิธิมฺหา สหิเม’พฺรวุํ; อุปโยควจนสฺส, นิมิตฺตนฺติ สนนฺตนา. प्राचीन आचार्यांनी अपादान इत्यादी पूर्व नियमांच्या ऐवजी या धातूंच्या बाबतीत द्वितीया विभक्तीचे (उपयोगवचनाचे) निमित्त सांगितले आहे. เอเต [Pg.387] ทุหาทโย ธาตู, ติกมฺมาปิ ภวนฺติ ตุ; การิตปฺปจฺจเย ลทฺเธ, อิติ อาจริยา’พฺรวุํ. हे दुह इत्यादी धातू कारित (प्रयोजक) प्रत्यय लागल्यावर त्रिकर्मक देखील होतात, असे आचार्यांनी सांगितले आहे. ตตฺริมานิ อุทาหรณานิ – ควํ ปโย ทุหติ โคปาลโก. คาวึ ขีรํ ทุหติ โคปาลทารโก. ตตฺถ ปโยติ อุปโยควจนํ, ‘‘ยโส ลทฺธา น มชฺเชยฺยา’’ติ เอตฺถ ‘‘ยโส’’ติ ปทมิว. มโนคณิกสฺส หิ อีทิสมฺปิ อุปโยควจนํ โหติ อญฺญาทิสมฺปิ. อิสฺสโร โคปาลํ ควํ ปโย ทุหาเปติ. โคปาเลน คาโว ขีรํ ทุหิตา. โคหิ ปโย ทุหตีติ เอตฺถ อปาทานวิสยตฺตา ทฺวิกมฺมกภาโว นตฺถิ. ‘‘วิสาณโต ควํ ทุหํ, ยตฺถ ขีรํ น วินฺทตี’’ติ เอตฺถ ปน อปาทานวิสยตฺเตปิ ควาวยวภูตสฺส วิสาณสฺส วิสุํ คหิตตฺตา ‘‘ควํ ขีรํ ทุหนฺโต’’ติ ทฺวิกมฺมิกภาโว ลพฺภตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ทุหิโน ปโยโคยํ. त्यात ही उदाहरणे आहेत - 'गवं पयो दुहति गोपालको' (गोपाळ गाईचे दूध काढतो). 'गाविं खीरं duhati गोपालदारको' (गोपाळपुत्र गाईचे दूध काढतो). तेथे 'पयो' हे द्वितीया विभक्तीचे रूप (उपयोगवचन) आहे, जसे "यसो लद्धा न मज्जेय्या" (यश मिळवून उन्मत्त होऊ नये) येथे 'यसो' हे पद आहे. कारण मनोगण (मनस्-गणी) शब्दांचे असेही द्वितीया विभक्तीचे रूप होते आणि इतरही होते. 'इस्सरो गोपालं गवं पयो दुहापेति' (मालक गोपाळाकडून गाईचे दूध काढवतो). 'गोपालेन गावो खीरं दुहिता' (गोपाळाकडून गाईंचे दूध काढले गेले). 'गोहि पयो दुहति' (गाईंपासून दूध काढतो) येथे अपादान कारक असल्यामुळे द्विकर्मक भाव नाही. "विसाणतो गवं दुहं, यत्थ खीरं न विन्दती" (शिंगातून गाईचे दूध काढणारा, जेथे दूध मिळत नाही) येथे अपादान कारक असूनही, गाईचा अवयव असलेल्या शिंगाचे वेगळे ग्रहण केल्यामुळे "गवं खीरं दुहन्तो" (गाईचे दूध काढणारा) असा द्विकर्मक भाव प्राप्त होतो, असे मानले पाहिजे. हा 'दुह' धातूचा प्रयोग आहे. กโรติสฺส ปโยเค กฏฺฐมงฺคารํ กโรติ, สุวณฺณํ กฏกํ กโรติ, สเจ เช สจฺจํ ภณสิ, อทาสึ ตํ กโรมิ. เอตฺถ จ องฺคารํ กโรตีติ ปริจฺจตฺตการณวเสน วุตฺตํ. กฏฺฐญฺหิ องฺคารภาวสฺส การณํ, องฺคาเร กเต การณภูตสฺส กฏฺฐสฺส กฏฺฐภาโว วิคจฺฉติ. กฏกํ กโรตีติ อิทํ อปริจฺจตฺตการณวเสน วุตฺตํ. สุวณฺณญฺหิ กฏกภาวสฺส การณํ, กฏเก กเตปิ การกภูตสฺส สุวณฺณสฺส สุวณฺณภาโว น วิคจฺฉติ, อถ โข วิเสสนฺตรุปฺปตฺติภาเวน สมฺปชฺชติ. อทาสึ ตํ กโรมีติ อิทํ ปน ฐานนฺตรทานวเสน วุตฺตํ ‘‘อุปราชํ มหาราชํ กโรมี’’ติ เอตฺถ วิย. ตตฺถ ‘‘อิสฺสโร ปุริเสน ปุริสํ วา กฏฺฐมงฺคารํ กาเรติ. ตถา สุวณฺณํ กฏกํ กาเรตี’’ติ ติกมฺมิกปฺปโยโคปิ ทฏฺฐพฺโพ. ตถา ‘‘พฺรหฺมทตฺโต รชฺชํ กาเรตี’’ติ, ‘‘พฺรหฺมทตฺเต รชฺชํ กาเรนฺเต’’ติ ทฺวิกมฺมกปฺปโยโค. 'करोति' (करू धातू) च्या प्रयोगात 'कट्ठमङ्गारं करोति' (लाकडाचा कोळसा करतो), 'सुवण्णं कटकं करोति' (सोन्याचे कडे करतो), 'सचे जे सच्चं भणसि, अदासिं तं करोमि' (हे दासी, जर तू खरे बोललीस, तर मी तुला अ-दासी [मुक्त] करीन). आणि येथे 'अङ्गारं करोति' हे कारण सोडून देण्याच्या (रूपांतरणाच्या) अर्थाने म्हटले आहे. कारण लाकूड हे कोळसा होण्याचे कारण आहे, कोळसा झाल्यावर कारणभूत असलेल्या लाकडाचा लाकूडपणा नष्ट होतो. 'कटकं करोति' हे कारण न सोडण्याच्या अर्थाने म्हटले आहे. कारण सोने हे कड्याचे कारण आहे, कडे बनविल्यावरही कारणभूत असलेल्या सोन्याचा सोनेपणा नष्ट होत नाही, तर एका विशिष्ट रूपाच्या उत्पत्तीने तो प्राप्त होतो. 'अदासिं तं करोमि' हे पदवी किंवा स्थान देण्याच्या अर्थाने म्हटले आहे, जसे "उपराजं महाराजं करोमि" (उपराजाला महाराज करतो) येथे आहे. तेथे "इस्सरो पुरिसेन पुरिसं वा कट्ठमङ्गारं कारेति" (मालक माणसाकडून लाकडाचा कोळसा करवतो. तसेच सोन्याचे कडे करवतो) असा त्रिकर्मक प्रयोग देखील समजून घेतला पाहिजे. तसेच "ब्रह्मदत्तो रज्जं कारेति" (ब्रह्मदत्त राज्य करवतो), "ब्रह्मदत्ते रज्जं कारेन्ते" (ब्रह्मदत्त राज्य करवीत असताना) हा द्विकर्मक प्रयोग आहे. เอตฺเถเก [Pg.388] วเทยฺยุํ ‘‘นนุ จ โภ เอตฺถ เอกเมว กมฺมํ ทิสฺสติ, เกนายํ ปโยโค ทฺวิกมฺมิกปฺปโยโค โหตี’’ติ. กิญฺจาปิ เอกเมว ทิสฺสติ, ตถาปิ อตฺถโต ทฺเวเยว กมฺมานิ ทิสฺสนฺตีติ คเหตพฺพํ. ตถา หิ พฺรหฺมทตฺโต รชฺชํ กาเรตีติ เอตฺถ พฺรหฺมทตฺโต อตฺตโน ราชภาวํ มหาชเนน การยตีติ อตฺโถ. เอวํ ปน อตฺเถ คหิเต ‘‘รชฺชํ กาเรหิ ภทฺทนฺเต, กึ อรญฺเญ กริสฺสสี’’ติอาทีสุปิ ตฺวํ อตฺตโน ราชภาวํ อมฺเหหิ การาเปหิ, อตฺตานํ รชฺเช อภิสิญฺจาเปหิ, มยํ ตํ รชฺเช อภิสิญฺจิตุกามาติ อตฺโถ สมตฺถิโต ภวติ. येथे काही जण म्हणू शकतात - "अहो, येथे तर एकच कर्म दिसत आहे, मग हा प्रयोग द्विकर्मक प्रयोग कसा होतो?" जरी एकच कर्म दिसत असले, तरी अर्थाच्या दृष्टीने दोनच कर्मे दिसतात, असे मानले पाहिजे. कारण "ब्रह्मदत्तो रज्जं कारेति" येथे ब्रह्मदत्त स्वतःचा राजा असण्याचा भाव (राजत्व) महाजनांकडून करवून घेतो, असा अर्थ होतो. आणि असा अर्थ घेतल्यावर "रज्जं कारेहि भद्दनते, किं अरञ्ञे करिससि" (भदंत, राज्य करवून घ्या, अरण्यात काय कराल?) इत्यादींमध्ये देखील 'तुम्ही स्वतःचे राजत्व आमच्याकडून करवून घ्या, स्वतःला राज्यावर अभिषिक्त करून घ्या, आम्ही तुम्हाला राज्यावर अभिषिक्त करू इच्छितो' असा अर्थ सिद्ध होतो. พฺรหฺมทตฺเต รชฺชํ กาเรนฺเตติ เอตฺถาปิ พฺรหฺมทตฺเต อตฺตโน ราชภาวํ มหาชเนน การยนฺเตติ อตฺโถ ภวติ. สาสนสฺมิญฺหิ การิตวิสเย กรณวจนํ อุปโยคตฺถญฺเญว ทีเปติ, ตสฺมา อตฺถโต ทฺเวเยว กมฺมนิ ทิสฺสนฺตีติ วทาม. อยมตฺโถ อภิธมฺมฏีกายํ จกฺขุนฺทฺริยาทินิพฺพจนตฺถวิภาวนาย ทีเปตพฺโพ. ตถา หิ อภิธมฺมฏีกายํ อิทํ วุตฺตํ ‘‘จกฺขุทฺวาเร อินฺทตฺตํ กาเรตีติ จกฺขุทฺวารภาเว ตํทฺวาริเกหิ อตฺตโน อินฺทภาวํ ปรมิสฺสรภาวํ การยตีติ อตฺโถ. ตญฺหิ เต รูปคฺคหเณ อตฺตานํ อนุวตฺเตติ, เต จ ตํ อนุวตฺตนฺตี’’ติ. ยทิ ปน กรธาตุ ทฺวิกมฺมโก, เอวํ สนฺเต ‘‘พฺรหฺมทตฺโต รชฺชํ กาเรตี’’ติอาทีสุ ลทฺธการิตปจฺจยตฺตา ‘‘กาเรตี’’ติอาทีหิ ปเทหิ ติกมฺมเกหิเยว ภวิตพฺพนฺติ? น, นิยมาภาวโต, ตาทิสสฺส จ ปโยคสฺส โวหารปเถ อนาคตตฺตา. "ब्रह्मदत्ते रज्जं कारेन्ते" येथे देखील 'ब्रह्मदत्त स्वतःचे राजत्व महाजनांकडून करवून घेत असताना' असा अर्थ होतो. कारण शासनात (बुद्धवचनात) कारित (प्रयोजक) च्या विषयात तृतीया विभक्ती (करणवचन) ही द्वितीयेचाच (उपयोगवचनाचा) अर्थ दर्शवते, म्हणून अर्थाच्या दृष्टीने दोनच कर्मे दिसतात, असे आम्ही म्हणतो. हा अर्थ अभिधम्मटीकेमध्ये चक्षुइंद्रिय इत्यादींच्या निरुक्तीच्या अर्थाच्या स्पष्टीकरणात स्पष्ट केला पाहिजे. कारण अभिधम्मटीकेमध्ये असे म्हटले आहे - "चक्खुद्वारे इन्दत्तं कारेति" (चक्षुद्वारात इंद्रत्व करवतो) म्हणजे चक्षुद्वारभावामध्ये त्या द्वाराशी संबंधित असलेल्यांकडून स्वतःचे इंद्रत्व (परमेश्वरत्व/प्रभुत्व) करवून घेतो, असा अर्थ आहे. कारण ते रूपग्रहणामध्ये स्वतःचे अनुकरण करते आणि ते त्याचे अनुकरण करतात. पण जर 'कर' धातू द्विकर्मक आहे, तर अशा स्थितीत "ब्रह्मदत्तो रज्जं कारेति" इत्यादींमध्ये कारित प्रत्यय लागल्यामुळे "कारेति" इत्यादी पदांनी त्रिकर्मकच असायला हवे का? नाही, कारण असा कोणताही नियम नाही, आणि तशा प्रयोगाचा व्यवहारात वापर आढळत नाही. กฏฺฐํ ปุริเสน องฺคารํ กตํ. สุวณฺณํ กมฺมาเรน กฏกํ กตํ, ทาสี สามิเกน อทาสึ กตา, เอวมฺเปตฺถ ทฺวิกมฺมกปฺปโยคา เวทิตพฺพา. สุวณฺเณน กฏกํ กโรตีติ เอตฺถ [Pg.389] หิ วิเสสนตฺเถ ปวตฺตกรณวิสยตฺตา ทฺวิกมฺมิกภาโว น ลพฺภตีติ ทฏฺฐพฺพํ. อยํ นโย อญฺญตฺราปิ อุปปริกฺขิตฺวา ยถาสมฺภวํ เนตพฺโพ. กโรติสฺส ปโยโคยํ. माणसाने लाकडाचा कोळसा केला. सुवर्णकाराने सोन्याचे कडे केले, मालकाने दासीला मुक्त (अ-दासी) केले, अशा प्रकारे येथे द्विकर्मक प्रयोग जाणावेत. 'सोन्याने कडे करतो' (सुवण्णेन कटकं करोति) येथे विशेषण अर्थात प्रवृत्त होणाऱ्या करण-विषयत्वामुळे द्विकर्मक भाव प्राप्त होत नाही, असे समजावे. हा नियम इतर ठिकाणीही तपासून यथासंभव लागू करावा. हा 'करोति' (कृ धातूचा) प्रयोग आहे. วหิอาทีนํ ปโยเค ราชปุริสา รถํ คามํ วหนฺติ. อยํ ราชา มํ นามํ ปุจฺฉติ. ปราภวนฺตํ ปุริสํ, มยํ ปุจฺฉาม โคตมํ. อายสฺมา อุปาลิ อายสฺมตา มหากสฺสเปน วินยํ ปุฏฺโฐ. เทวทตฺโต ราชานํ กมฺพลํ ยาจติ. เต มํ อสฺเส อยาจิสุํ. ธนํ ตํ ตาต ยาจติ. พฺราหฺมโณ นาคํ มณึ ยาจติ. นาโค มณึ ยาจิโต พฺราหฺมเณน พฺรหฺมุนา อายาจิโต ธมฺมเทสนํ ภควา. ตาปโส กุลํ โภชนํ ภิกฺขติ. อชํ คามํ เนติ. อโช คามํ นีโต. มุตฺโต จมฺเปยฺยโก นาโค, ราชานํ เอตทพฺรวิ. 'वह्' (वाहून नेणे) इत्यादींच्या प्रयोगात, 'राजपुरुष रथाला गावाकडे वाहून नेतात'. 'हा राजा मला नाव विचारतो'. 'पतन पावणाऱ्या माणसाविषयी आम्ही गोतमांना विचारतो'. 'आयुष्यमान उपालि यांना आयुष्यमान महाकस्सपांनी विनयाविषयी विचारले'. 'देवदत्त राजाकडे घोंगडीची याचना करतो'. 'त्यांनी माझ्याकडे घोड्यांची याचना केली'. 'हे तात! तो तुझ्याकडे धनाची याचना करतो'. 'ब्राह्मण नागाकडे मण्याची याचना करतो'. 'ब्राह्मणाने नागाकडे मण्याची याचना केली; ब्रह्मदेवाने भगवंतांकडे धम्मदेशनेची याचना केली'. 'तापस कुळाकडे भोजनाची भिक्षा मागतो'. 'तो शेळीला गावाकडे नेतो'. 'बोकड गावाकडे नेला गेला'. 'मुक्त झालेल्या चंपेय्यक नागाने राजाला असे म्हटले'. เอตฺถ ราชานนฺติ มุขฺยโต กมฺมํ วุตฺตํ. เอตนฺติ คุณโต. ตถา ราชานนฺติ อกถิตกมฺมํ วุตฺตํ. เอตนฺติ กถิตกมฺมํ. เอส นโย อญฺญตฺราปิ อุปปริกฺขิตฺวา ยถารหํ โยเชตพฺโพ. เอวเมว ‘‘พฺรูหิ ภควา’’ติอาทีสุ สมฺปทานวิสยตฺตา ทฺวิกมฺมกภาโว น ลพฺภติ. ภิกฺขุ มหาราชานํ ธมฺมํ ภณติ. ยํ มํ ภณสิ สารถิ. ยํ มํ วทติ. ภควนฺตํ เอตทโวจ. ปิตา ปุตฺตํ ภาสติ. ยํ มํ ตฺวํ อนุสาสสิ. สกฺยา โข ปน อมฺพฏฺฐ ราชานํ โอกฺกากํ ปิตามหํ ทหนฺติ. ภควา ภิกฺขู ตํ ตํ หิตปฏิปตฺตึ นาถติ. คาโว วชํ รุนฺธติ โคปาลโก. ธุตฺโต ธุตฺตชนํ ธนํ ชินาติ. เอตฺถ จ ‘‘กมนุตฺตรํ รตฺนวรํ ชินามา’’ติ ปุณฺณกชาตกปาฬิ นิทสฺสนํ. ตตฺถายมตฺโถ ‘‘มยํ ชนินฺทา กตรํ ราชานํ อนุตฺตรํ รตฺนวรํ ชินามา’’ติ. อิฏฺฐกาโย ปาการํ จิโนติ วฑฺฒกี. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. येथे 'राजानं' (राजाला) हे मुख्य कर्म म्हटले आहे आणि 'एतं' (हे) हे गौण कर्म. तसेच 'राजानं' हे अकथित कर्म म्हटले आहे आणि 'एतं' हे कथित कर्म. हाच नियम इतर ठिकाणीही तपासून योग्यतेनुसार लावावा. याचप्रमाणे 'ब्रूहि भगवा' (हे भगवन्, सांगा) इत्यादींमध्ये संप्रदान-विषयत्वामुळे द्विकर्मक भाव प्राप्त होत नाही. 'भिक्खू महाराजांना धम्म सांगतात'. 'हे सारथी, तू मला जे सांगतोस'. 'जे मला सांगतो'. 'भगवंतांना असे म्हणाले'. 'पिता पुत्राशी बोलतो'. 'तू मला जे अनुशासित करतोस'. 'हे अंबट्ठ! शाक्य लोक राजा ओक्काकला आपला पूर्वज (पितामह) मानतात'. 'भगवान भिक्खूंना त्या त्या हितकारक प्रतिपदेचा उपदेश करतात'. 'गोपाळ गाईंना गोठ्यात कोंडतो'. 'धूर्त माणूस धूर्त लोकांचे धन जिंकतो'. आणि येथे 'कमनुत्तरं रत्नवरं जिनाम' (आम्ही कोणत्या अनुत्तर श्रेष्ठ रत्नाला जिंकू?) ही पुण्णक जातक पाळीचे उदाहरण आहे. तेथे हा अर्थ आहे: 'हे जनेंद्र! आम्ही कोणत्या राजाचे अनुत्तर श्रेष्ठ रत्न जिंकू?'. 'गवंडी विटांनी भिंत बांधतो'. इतर उदाहरणेही अशीच जोडावीत. เอตฺถ [Pg.390] เกจิ ปุจฺเฉยฺยุํ ‘‘คนฺธกุฏึ ปทกฺขิณํ กโรติ, พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามิ. อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตู’ติ ปโยเคสุ กึ ทฺวิกมฺมกภาโว ลพฺภตี’’ติ? เอตฺถ วุจฺจเต – ‘‘คนฺธกุฏึ ปทกฺขิณํ กโรตี’’ติ เอตฺถ น ลพฺภติ คุณคุณีนํ วเสน คหิตตฺตา. ‘‘พุทฺธํ สรณํ คจฺฉามี’’ติ เอตฺถาปิ น ลพฺภติ ‘‘สรณํ อิติ คจฺฉามี’’ติ อิติสทฺทโลปวเสน วุตฺตตฺตา. ตถา หิ พุทฺธนฺติ อุปโยควจนํ. สรณนฺติ ปจฺจตฺตวจนํ. ‘‘พุทฺธํ มม สรณํ ปรายณํ, อฆสฺส ตาตา หิตสฺส จ วิธาตา’’ติ อิมินา อธิปฺปาเยน ‘‘ภชามิ เสวามิ พุชฺฌามี’’ติ อตฺโถ. ‘‘อุปาสกํ มํ ภวํ โคตโม ธาเรตู’’ติ เอตฺถ ปน ทฺวิกมฺมกภาโว ลพฺภตีติ วตฺตพฺโพ ‘‘มํ อิโต ปฏฺฐาย อุปาสกํ ธาเรตู’’ติ อตฺถสมฺภวโต ‘‘สกฺยา โข ปน อมฺพฏฺฐ ราชานํ โอกฺกากํ ปิตามหํ ทหนฺตี’’ติ ทหธาตุปฺปโยเคน สมานตฺตา จ, อธิปฺปายตฺถโต ปน ‘‘มํ ‘อุปาสโก เม อย’นฺติ ธาเรตู’’ติ อตฺโถ สมฺภวตีติ ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ อการิตานิ ทฺวิกมฺมิกธาตุรูปานิ วิภาวิตานิ. येथे काही जण विचारू शकतात: 'गंधकुटीला प्रदक्षिणा करतो', 'बुद्धांना शरण जातो', 'पूज्य गोतमांनी मला उपासक म्हणून स्वीकारावे' या प्रयोगांमध्ये काय द्विकर्मक भाव प्राप्त होतो? यावर सांगितले जाते – 'गंधकुटीला प्रदक्षिणा करतो' येथे गुण आणि गुणी यांच्या संबंधाने ग्रहण केल्यामुळे द्विकर्मक भाव प्राप्त होत नाही. 'बुद्धांना शरण जातो' येथेही प्राप्त होत नाही, कारण 'शरण असे जातो' यातील 'इति' शब्दाचा लोप करून हे म्हटले गेले आहे. कारण 'बुद्धं' हे द्वितीया विभक्तीचे रूप आहे आणि 'सरणं' हे प्रथमा विभक्तीचे रूप आहे. 'बुद्ध माझे शरण आणि परायण आहेत, दुःखाचे निवारक आणि हिताचे विधाता आहेत' या अभिप्रायाने 'मी भजतो, सेवा करतो, जाणतो' असा अर्थ होतो. परंतु 'पूज्य गोतमांनी मला उपासक म्हणून स्वीकारावे' येथे द्विकर्मक भाव प्राप्त होतो असे म्हणावे, कारण 'मला आजपासून उपासक म्हणून स्वीकारावे' असा अर्थ संभवतो आणि 'हे अंबट्ठ! शाक्य लोक राजा ओक्काकला आपला पूर्वज मानतात' यातील 'दह' धातूच्या प्रयोगाशी हे समान आहे. अभिप्रायाच्या अर्थाने 'मला हा माझा उपासक आहे असे स्वीकारावे' असा अर्थ संभवतो, असे समजावे. अशा प्रकारे अकारित (प्रयोजक नसलेली) द्विकर्मक धातुरूपांचे स्पष्टीकरण केले आहे. อิจฺเจวมมฺเหหิ อาทิโต ปฏฺฐาย ภควโต สาสนตฺถํ ยถาสตฺติ ยถาพลํ ธาตุโย จ ตํรูปานิ จ ตทนุรูเปหิ นานาปเทหิ นานาอตฺเถหิ นานานเยหิ จ โยเชตฺวา วิภาวิตานิ, เอวํ วิภาเวนฺเตหิปิ อมฺเหหิ ตาสํ สรูปปริจฺเฉโท อตฺถปริจฺเฉโท วา น สกฺกา สพฺพโส วตฺตุํ. ตทุภยญฺหิ โก สพฺพโส วตฺตุํ สกฺขิสฺสติ อญฺญตฺร อาคมาธิคมสมฺปนฺเนหิ ปภินฺนปฏิสมฺภิเทหิ มหาขีณาสเวหิ. अशा प्रकारे, आम्ही सुरुवातीपासून भगवंतांच्या शासनाच्या अर्थासाठी, आमच्या शक्ती व बलानुसार, धातू आणि त्यांची रूपे, त्यांच्याशी सुसंगत अशा विविध पदांनी, विविध अर्थांनी आणि विविध नियमांनी जोडून स्पष्ट केली आहेत. असे स्पष्टीकरण केले असले तरी, आमच्याद्वारे स्वरूप निश्चित करणे किंवा अर्थ निश्चित करणे पूर्णपणे सांगणे शक्य नाही. कारण आगम (श्रुत) आणि अधिगम (साक्षात्कार) यांनी संपन्न, प्रतिसंभिदा प्राप्त केलेल्या महान क्षीणासवांच्या (अर्हतांच्या) व्यतिरिक्त, ते दोन्ही पूर्णपणे सांगण्यास कोण समर्थ असेल? อตฺถาติสยยุตฺตาปิ, ธาตู โหนฺติ ยโต ตโต. ปโยคโตนุคนฺตพฺพา, อเนกตฺถา หิ ธาตโว. ज्या अर्थी धातू हे अत्यंत विपुल अर्थांनी युक्त असतात, त्या अर्थी प्रयोगांनुसारच त्यांचे अनुसरण केले पाहिजे, कारण धातू हे अनेक अर्थांचे असतात. เยเนกตฺถธรา [Pg.391] จรนฺติ วิวิธา นาถสฺส ปาเฐ วเร,เตเนกตฺถธราว โหนฺติ สหิตา นานูปสคฺเคหิเว; ธาตูนํ ปน เตสมตฺถปรมํ ขีณาสเว ปณฺฑิเต,วชฺเชตฺวา ปฏิสมฺภิทามติยุเต โก สพฺพโส ภณตีติ. ज्या कारणाने नाथांच्या (बुद्धांच्या) श्रेष्ठ पाठात विविध धातू अनेक अर्थ धारण करून प्रवृत्त होतात, त्याच कारणाने विविध उपसर्गांनी युक्त होऊन ते एकाच अर्थाचे धारक देखील बनतात. परंतु त्या धातूंचा परम अर्थ, क्षीणासव (अर्हत) पंडितांना आणि प्रतिसंभिदा बुद्धीने युक्त असलेल्यांना वगळता, इतर कोण पूर्णपणे सांगू शकेल? อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ अशा प्रकारे, अट्ठकथांसह नऊ अंगांनी युक्त अशा त्रिपिटकाच्या वचनमार्गांमध्ये विद्वानांच्या... โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कौशल्यासाठी रचलेल्या 'सद्दनीति' प्रकरणामध्ये... สพฺพคณวินิจฺฉโย นาม เอกูนวีสติโม ปริจฺเฉโท 'सब्बगणविनिच्छय' (सर्व गण निश्चय) नावाचा एकोणिसावा परिच्छेद. สห รูปวิภาวนาย ธาตุวิภาวนา นิฏฺฐิตา. रूपविभावने (रूपांच्या स्पष्टीकरणा) सह धातूंचे स्पष्टीकरण (धातुविभावना) समाप्त झाले. ธาตุมาลา นิฏฺฐิตา. धातुमाला समाप्त झाली. | |||
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |