| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Français | |||
| Canon Pali | Commentaires | Sous-commentaires | Autres |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| Deutsch | |||
| Pali-Kanon | Kommentare | Subkommentare | Sonstige |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส उन भगवन्, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। สทฺทนีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) सद्दनीतिप्पकरणं (पद्माला) คนฺถารมฺภกถา ग्रन्थारम्भकथा ธีเรหิ [Pg.1] มคฺคนาเยน, เยน พุทฺเธน เทสิตํ; สิตํ ธมฺมมิธญฺญาย, ญายเต อมตํ ปทํ. धीर पुरुषों द्वारा (खोजे गए) मार्ग की नीति से, जिस बुद्ध द्वारा उपदिष्ट किया गया है; इस धवल (शुद्ध) धर्म को जानकर, अमृत पद (निर्वाण) जाना जाता है। ตํ นมิตฺวา มหาวีรํ, สพฺพญฺญุํ โลกนายกํ; มหาการุณิกํ เสฏฺฐํ, วิสุทฺธํ สุทฺธิทายกํ. उन महावीर, सर्वज्ञ, लोकनायक, महाकारुणिक, श्रेष्ठ, विशुद्ध और शुद्धि प्रदान करने वाले को नमस्कार करके। สทฺธมฺมญฺจสฺส ปูเชตฺวา, สุทฺธํ สนฺตมสงฺขตํ; อตกฺกาวจรํ สุฏฺฐุ, วิภตฺตํ มธุรํ สิวํ. और उनके सद्धर्म की पूजा करके, जो शुद्ध, शान्त, असंस्कृत, तर्क से परे, भली-भाँति विभक्त, मधुर और कल्याणकारी है। สงฺฆสฺส จ’ญฺชลึ กตฺวา, ปุญฺญกฺเขตฺตสฺส ตาทิโน; สีลสมาธิปญฺญาทิ-วิสุทฺธคุณโชติโน. और उस संघ को अंजलि (प्रणाम) करके, जो पुण्य का क्षेत्र है, तथा शील, समाधि, प्रज्ञा आदि विशुद्ध गुणों से देदीप्यमान है। นมสฺสนาทิปุญฺญสฺส, กตสฺส รตนตฺตเย; เตชสาหํ ปหนฺตฺวาน, อนฺตราเย อเสสโต. रत्नत्रय के प्रति किए गए नमस्कार आदि पुण्य के तेज से, मैं सभी अन्तरायों (बाधाओं) को पूर्णतः नष्ट करके। โลกนีติวิยตฺตสฺส, สตฺถุ สทฺธมฺมนีติโน; สาสนตฺถํ ปวกฺขามิ, สทฺทนีติมนากุลํ. लोकनीति में निपुण शास्ता (बुद्ध) की सद्धर्म-नीति के अनुसार, शासन (बुद्ध-शासन) के हित के लिए, मैं स्पष्ट 'सद्दनीति' (शब्द-नीति) कहूँगा। อาสวกฺขยลาเภน, โหติ สาสนสมฺปทา; อาสวกฺขยลาโภ จ, สจฺจาธิคมเหตุโก. आस्रवों के क्षय की प्राप्ति से शासन की सम्पन्नता होती है; और आस्रव-क्षय की प्राप्ति सत्यों (चार आर्य सत्यों) के अधिगम (साक्षात्कार) के कारण होती है। สจฺจาธิคมนํ [Pg.2] ตญฺจ, ปฏิปตฺติสฺสิตํ มตํ; ปฏิปตฺติ จ สา กามํ, ปริยตฺติปรายณา. और वह सत्यों का अधिगम प्रतिपत्ति (अभ्यास) पर आश्रित माना गया है; और वह प्रतिपत्ति निश्चित रूप से पर्यप्ति (शास्त्र-ज्ञान) के अधीन है। ปริยตฺตาภิยุตฺตานํ, วิทิตฺวา สทฺทลกฺขณํ; ยสฺมา น โหติ สมฺโมโห, อกฺขเรสุ ปเทสุ จ. क्योंकि पर्यप्ति में लगे हुए लोगों को शब्द-लक्षण (व्याकरण) जानकर अक्षरों और पदों में सम्मोह (भ्रम) नहीं होता है। ยสฺมา จาโมหภาเวน, อกฺขเรสุ ปเทสุ จ; ปาฬิยตฺถํ วิชานนฺติ, วิญฺญู สุคตสาสเน. और क्योंकि अक्षरों और पदों में सम्मोह न होने के कारण, विद्वान सुगत-शासन (बुद्ध-शासन) में पालि के अर्थ को भली-भाँति जानते हैं। ปาฬิยตฺถาวโพเธน, โยนิโส สตฺถุสาสเน; สปฺปญฺญา ปฏิปชฺชนฺติ, ปฏิปตฺติมตนฺทิกา. पालि के अर्थ के बोध से, प्रज्ञावान लोग शास्ता के शासन में योनिशः (उचित रूप से) आलस्य रहित होकर प्रतिपत्ति (साधना) में प्रवृत्त होते हैं। โยนิโส ปฏิปชฺชิตฺวา, ธมฺมํ โลกุตฺตรํ วรํ; ปาปุณนฺติ วิสุทฺธาย, สีลาทิปฏิปตฺติยา. योनिशः प्रतिपत्ति करके, वे शील आदि की विशुद्ध प्रतिपत्ति द्वारा श्रेष्ठ लोकोत्तर धर्म को प्राप्त करते हैं। ตสฺมา ตทตฺถิกา สุทฺธํ, นยํ นิสฺสาย วิญฺญุนํ; ภญฺญมานํ มยา สทฺท-นีตึ คณฺหนฺตุ สาธุกํ. इसलिए, उसके (कल्याण के) इच्छुक लोग, विद्वानों के शुद्ध नय (पद्धति) का आश्रय लेकर मेरे द्वारा कही जाने वाली 'सद्दनीति' को भली-भाँति ग्रहण करें। ธาตุ ธาตูหิ นิปฺผนฺน-รูปานิ จ สลกฺขโณ; สนฺธินามาทิเภโท จ, ปทานํ ตุ วิภตฺติ จ. धातु, धातुओं से निष्पन्न रूप और उनके लक्षण; सन्धि, नाम आदि के भेद और पदों की विभक्ति। ปาฬินยาทโยจฺเจว-เมตฺถ นานปฺปการโต; สาสนสฺโสปการาย, ภวิสฺสติ วิภาวนา. यहाँ पालि-नय आदि अनेक प्रकार से शासन के उपकार के लिए स्पष्ट किए जाएँगे। ๑. สวิกรณาขฺยาตวิภาค १. सविकरण आख्यात विभाग (विकरण सहित क्रिया-पद विभाग) ตตฺถ ธาตูติ เกนฏฺเฐน ธาตุ? สกตฺถมฺปิ ธาเรตีติ ธาตุ, อตฺถาติสยโยคโต ปรตฺถมฺปิ ธาเรตีติ ธาตุ, วีสติยา อุปสคฺเคสุ เยน เกนจิ อุปสคฺเคน อตฺถวิเสสการเณน ปฏิพทฺธา อตฺถวิเสสมฺปิ ธาเรตีติ ธาตุ, ‘‘อยํ อิมิสฺสา อตฺโถ, อยมิโต ปจฺจโย ปโร’’ติอาทินา อเนกปฺปกาเรน ปณฺฑิเตหิ ธาริยติ เอสาติปิ ธาตุ, วิทหนฺติ วิทุโน เอตาย สทฺทนิปฺผตฺตึ อยโลหาทิมยํ [Pg.3] อยโลหาทิธาตูหิ วิยาติปิ ธาตุ. เอวํ ตาว ธาตุสทฺทสฺสตฺโถ เวทิตพฺโพ. वहाँ 'धातु' किस अर्थ में धातु है? जो अपने अर्थ को धारण करती है, वह धातु है; अर्थ की अतिशयता के योग से जो दूसरे अर्थ को भी धारण करती है, वह धातु है; बीस उपसर्गों में से किसी भी उपसर्ग द्वारा अर्थ-विशेष के कारण से सम्बद्ध होकर जो अर्थ-विशेष को भी धारण करती है, वह धातु है; "यह इसका अर्थ है, इसके बाद यह प्रत्यय है" इत्यादि अनेक प्रकार से विद्वानों द्वारा जो धारण की जाती है, वह भी धातु है; विद्वान जिसके द्वारा शब्द की निष्पत्ति का विधान करते हैं, जैसे लोहे आदि की धातुओं से लोहे आदि की वस्तुओं की (निष्पत्ति होती है), वह भी धातु है। इस प्रकार धातु शब्द का अर्थ जानना चाहिए। ธาตุสทฺโท ชินมเต, อิตฺถิลิงฺคตฺตเน มโต; สตฺเถ ปุลฺลิงฺคภาวสฺมึ, กจฺจายนมเต ทฺวิสุ. जिन-मत (बुद्ध-मत) में 'धातु' शब्द स्त्रीलिंग माना गया है; शास्त्र (व्याकरण) में पुल्लिंग भाव में, और कच्चायन के मत में दोनों (लिंगों) में। อถ วา ชินมเต ‘‘ตโต โคตมิธาตูนี’’ติ เอตฺถ ธาตุสทฺโท ลิงฺควิปลฺลาเส วตฺตติ ‘‘ปพฺพตานิ วนานิ จา’’ติ เอตฺถ ปพฺพตสทฺโท วิย, น ปเนตฺถ วตฺตพฺพํ ‘‘อฏฺฐิวาจกตฺตา นปุํสกนิทฺเทโส’’ติ อฏฺฐิวาจกตฺเตปิ ‘‘ธาตุโย’’ติ อิตฺถิลิงฺคทสฺสนโต. ภูวาทโย สทฺทา ธาตโว. เสยฺยถิทํ? ภู อิ กุ เก ตกฺก ตก ตกิ สุกอิจฺจาทโย. คณโต เต อฏฺฐวิธา ภูวาทิคโณ รุธาทิคโณ ทิวาทิคโณ สฺวาทิคโณ กิยาทิคโณ คหาทิคโณ ตนาทิคโณ จุราทิคโณ จาติ. อิทานิ เตสํ วิกรณสญฺญิเต ปจฺจเย ทสฺเสสฺสาม. อเนกวิธา หิ ปจฺจยา นานปฺปกาเรสุ นามนาม กิตนาม สมาสนาม ตทฺธิตนามาขฺยาเตสุ ปวตฺตนโต. สงฺเขปโต ปน ทุวิธาว นามปจฺจโย อาขฺยาตปจฺจโย จาติ. ตตฺราปิ อาขฺยาตปจฺจยา ทุวิธา วิกรณปจฺจยโนวิกรณปจฺจยวเสน. ตตฺถ วิกรณปจฺจโย อการาทิสตฺตรสวิโธ อคฺคหิตคฺคหเณน ปนฺนรสวิโธ จ. โนวิกรณปจฺจโย ปน ข ฉ สาทิเนกวิโธ. เย รูปนิปฺผตฺติยา อุปการกา อตฺถวิเสสสฺส โชตกา วา อโชตกา วา โลปนียา วา อโลปนียา วา, เต สทฺทา ปจฺจยา. अथवा जिन-मत में "ततो गोतमि धातूनी" यहाँ 'धातु' शब्द लिंग-विपर्यास (लिंग परिवर्तन) में प्रयुक्त है, जैसे "पब्बतानि वनानि च" यहाँ 'पब्बत' शब्द (नपुंसक लिंग की तरह); यहाँ यह नहीं कहना चाहिए कि "अस्थि (हड्डी) का वाचक होने के कारण नपुंसक लिंग का निर्देश है", क्योंकि अस्थि-वाचक होने पर भी "धातुल्यो" (धातुएँ) ऐसा स्त्रीलिंग प्रयोग देखा जाता है। 'भू' आदि शब्द धातुएँ हैं। जैसे कि? भू, इ, कु, के, तक्क, तक, तकि, सुक इत्यादि। गण की दृष्टि से वे आठ प्रकार के हैं: भूवादि गण, रुधादि गण, दिवादि गण, स्वादि गण, कियादि गण, गहादि गण, तनादि गण और चुरादि गण। अब हम उनके 'विकरण' नामक प्रत्ययों को दिखाएंगे। अनेक प्रकार के प्रत्यय होते हैं क्योंकि वे विभिन्न प्रकार के नाम-नाम (संज्ञा), कित-नाम (कृदन्त), समास-नाम, तद्धित-नाम और आख्यात (क्रिया) में प्रवृत्त होते हैं। संक्षेप में वे दो ही प्रकार के हैं: नाम-प्रत्यय और आख्यात-प्रत्यय। वहाँ भी आख्यात-प्रत्यय दो प्रकार के हैं: विकरण-प्रत्यय और अ-विकरण-प्रत्यय के भेद से। वहाँ विकरण-प्रत्यय 'अ' कार आदि सत्रह प्रकार के हैं, और न लिए गए को ग्रहण करने (पुनरावृत्ति हटाने) पर पन्द्रह प्रकार के हैं। अ-विकरण-प्रत्यय 'ख', 'छ', 'स' आदि अनेक प्रकार के हैं। जो रूप-सिद्धि में उपकारक होते हैं, अर्थ-विशेष के द्योतक हों या न हों, लोप होने योग्य हों या न हों, वे शब्द 'प्रत्यय' हैं। ปฏิจฺจ การณํ ตํ ตํ, เอนฺตีติ ปจฺจยาถ วา; ปฏิจฺจ สทฺทนิปฺผตฺติ, อิโต เอตีติ ปจฺจยา. उन-उन कारणों के आश्रित होकर जो आते हैं, वे 'प्रत्यय' हैं; अथवा, जिससे शब्द-निष्पत्ति आश्रित होकर आती है, वे 'प्रत्यय' हैं। นามิกปฺปจฺจยานํ [Pg.4] โย, วิภาโค อาวิ เหสฺสติ; นามกปฺเป ยโต ตสฺมา, น ตํ วิตฺถารยามเส. नामिक प्रत्ययों का जो विभाग है, वह 'नामकल्प' (संज्ञा प्रकरण) में स्पष्ट होगा, इसलिए हम यहाँ उसका विस्तार नहीं कर रहे हैं। โย โนวิกรณานํ ตุ, ปจฺจยานํ วิภาคโต; โส ปนาขฺยาตกปฺปมฺหิ, วิตฺถาเรนา’คมิสฺสตีติ. और जो अ-विकरण प्रत्ययों का विभाग है, वह 'आख्यात-कल्प' (क्रिया प्रकरण) में विस्तार से आएगा। อิจฺจาเนกวิเธสุ ปจฺจเยสุ ‘‘วิกรณปจฺจยา นาม อิเม’’ติ สลฺลกฺเขตพฺพา. กถํ? ภูวาทิคณโต อปจฺจโย โหติ กตฺตริ, รุธาทิคณโต อการิวณฺเณกาโรการปจฺจยา โหนฺติ กตฺตริ, ปุพฺพมชฺฌฏฺฐาเน นิคฺคหีตาคโม จ, ทิวาทิคณโต ยปจฺจโย โหติ กตฺตริ, สฺวาทิคณโต ณุ ณา อุณาปจฺจยา โหนฺติ กตฺตริ, กิยาทิคณโต นาปจฺจโย โหติ กตฺตริ, คหาทิคณโต ปฺป ณฺหาปจฺจยา โหนฺติ กตฺตริ, ตนาทิคณโต โอ ยิรปจฺจยา โหนฺติ กตฺตริ, จุราทิคณโต เณ ณยปจฺจยา โหนฺติ กตฺตริ. इस प्रकार अनेक प्रकार के प्रत्ययों में "ये विकरण प्रत्यय हैं" ऐसा समझना चाहिए। कैसे? भूवादि गण से कर्ता अर्थ में 'अ' प्रत्यय होता है; रुधादि गण से कर्ता अर्थ में 'अ', 'इ-वर्ण' (इ, ई), 'ए', 'ओ' प्रत्यय होते हैं और पूर्व-मध्य स्थान में निग्गृहीत (अनुस्वार) का आगम होता है; दिवादि गण से कर्ता अर्थ में 'य' प्रत्यय होता है; स्वादि गण से कर्ता अर्थ में 'णु', 'णा', 'उणा' प्रत्यय होते हैं; कियादि गण से कर्ता अर्थ में 'ना' प्रत्यय होता है; गहादि गण से कर्ता अर्थ में 'प्प', 'ण्हा' प्रत्यय होते हैं; तनादि गण से कर्ता अर्थ में 'ओ', 'यिर' प्रत्यय होते हैं; चुरादि गण से कर्ता अर्थ में 'णे', 'णय' प्रत्यय होते हैं। อกาโร จ อิวณฺโณ จ, เอ โอการา จ โย ตถา; ณุ ณา อุณา จ นา ปฺป ณฺหา-ยิรา เณ ณยปจฺจยา. अ-कार, इ-वर्ण (इ, ई), ए, ओ-कार और वैसे ही 'य'; णु, णा, उणा और ना, प्प, ण्हा, यिर, णे, णय प्रत्यय। อคฺคหิตคฺคหเณน, เอวํ ปนฺนรเส’ริตา; วิกรณวฺหยา เอเต, ปจฺจยาติ วิภาวเย. न लिए गए को ग्रहण करने (पुनरावृत्ति हटाने) से इस प्रकार पन्द्रह कहे गए हैं; इन्हें 'विकरण' नामक प्रत्यय समझना चाहिए। เย เอวํ นิทฺทิฏฺเฐหิ วิกรณปจฺจเยหิ ตทญฺเญหิ จ สปฺปจฺจยา อฏฺฐวิธา ธาตุคณา สุตฺตนฺเตสุ พหูปการา, เตสฺวายํ ภูวาทิคโณ. ภู สตฺตายํ, ภูธาตุ วิชฺชมานตายํ วตฺตติ. สกมฺมิกากมฺมิกาสุ ธาตูสุ อยํ อกมฺมิกา ธาตุ, น ปน ‘‘ธมฺมภูโต’’ติอาทีสุ ปตฺติอตฺถวาจิกา อปรา ภูธาตุ วิย สกมฺมิกา. เอสา หิ ปริอภิอาทีหิ อุปสคฺเคหิ ยุตฺตาเยว สกมฺมิกา ภวติ, น อุป ปรา ปาตุอาทีหิ อุปสคฺคนิปาเตหิ ยุตฺตาปิ. อโต อิมิสฺสา สิทฺธานิ รูปานิ ทฺวิธา เญยฺยานิ อกมฺมกปทานิ สกมฺมกปทานิ จาติ. इस प्रकार निर्दिष्ट विकरण प्रत्ययों और उनके अतिरिक्त अन्य प्रत्ययों के साथ जो आठ प्रकार के धातु-गण सुत्तन्तों में बहुत उपकारी हैं, उनमें यह 'भ्वादिगण' (bhūvādigaṇa) है। 'भू' सत्ता (होने) के अर्थ में है, 'भू' धातु विद्यमानता के अर्थ में प्रयुक्त होती है। सकर्मक और अकर्मक धातुओं में यह अकर्मक धातु है, किन्तु 'धम्मभूतो' आदि में प्राप्ति अर्थ को बताने वाली अन्य 'भू' धातु की तरह सकर्मक नहीं है। क्योंकि यह 'परि', 'अभि' आदि उपसर्गों से युक्त होने पर ही सकर्मक होती है, 'उप', 'परा', 'पातु' आदि उपसर्गों और निपातों से युक्त होने पर भी नहीं। इसलिए इसके सिद्ध रूपों को दो प्रकार से जानना चाहिए—अकर्मक पद और सकर्मक पद। สุทฺธกตฺตุกฺริยาปทนิทฺเทส शुद्ध-कर्तृ-क्रियापद निर्देश ตตฺร [Pg.5] ภวติ อุพฺภวติ สมุพฺภวติ ปภวติ ปราภวติ สมฺภวติ วิภวติ, โภติ สมฺโภติ วิโภติ ปาตุภวติ ปาตุพฺภวติ ปาตุโภติ, อิมานิ อกมฺมกปทานิ. เอตฺถ ปาตุอิติ นิปาโต, โส ‘‘อาวิภวติ ติโรภวตี’’ติอาทีสุ อาวิ ติโรนิปาตา วิย ภูธาตุโต นิปฺผนฺนาขฺยาตสทฺทสฺส เนว วิเสสกโร, น จ สกมฺมกตฺตสาธโก. อุอิจฺจาทโย อุปสคฺคา, เต ปน วิเสสกรา, น สกมฺมกตฺตสาธกา. เยสมตฺโถ กมฺเมน สมฺพนฺธนีโย น โหติ, ตานิ ปทานิ อกมฺมกานิ. อกมฺมกปทานํ ยถารหํ สกมฺมกากมฺมกวเสน อตฺโถ กเถตพฺโพ. ปริโภติ ปริภวติ, อภิโภติ อภิภวติ, อธิโภติ อธิภวติ, อติโภติ อติภวติ, อนุโภติ อนุภวติ, สมนุโภติ สมนุภวติ, อภิสมฺโภติ อภิสมฺภวติ, อิมานิ สกมฺมกปทานิ. เอตฺถ ปริอิจฺจาทโย อุปสคฺคา, เต ภูธาตุโต นิปฺผนฺนาขฺยาตสทฺทสฺส วิเสสกรา เจว สกมฺมกตฺตสาธกา จ. เยสมตฺโถ กมฺเมน สมฺพนฺธนีโย, ตานิ ปทานิ สกมฺมกานิ. สกมฺมกปทานํ สกมฺมกวเสน อตฺโถ กเถตพฺโพ, กฺวจิ อกมฺมกวเสนปิ. เอวํ สุทฺธกตฺตุกฺริยาปทานิ ภวนฺติ. อุทฺเทโสยํ. वहाँ 'भवति', 'उब्भवति', 'समुब्भवति', 'पभवति', 'पराभवति', 'सम्भवति', 'विभवति', 'भोति', 'सम्भोति', 'विभोति', 'पातुभवति', 'पातुब्भवति', 'पातुभोति'—ये अकर्मक पद हैं। यहाँ 'पातु' एक निपात है, वह 'आविभवति', 'तिरोभवति' आदि में 'आवि' और 'तिरो' निपातों की तरह 'भू' धातु से निष्पन्न आख्यात शब्द का केवल विशेषण (विशेष अर्थ करने वाला) है, न कि सकर्मकत्व का साधक। 'उ' आदि उपसर्ग हैं, वे भी विशेष अर्थ करने वाले हैं, सकर्मकत्व के साधक नहीं। जिनका अर्थ कर्म के साथ सम्बद्ध नहीं होता, वे पद अकर्मक कहलाते हैं। अकर्मक पदों का अर्थ यथायोग्य सकर्मक और अकर्मक के अनुसार कहना चाहिए। 'परिभोति', 'परिभवति', 'अभिभोति', 'अभिभवति', 'अधिभोति', 'अधिभवति', 'अतिभोति', 'अतिभवति', 'अनुभोति', 'अनुभवति', 'समनुभोति', 'समनुभवति', 'अभिसम्भोति', 'अभिसम्भवति'—ये सकर्मक पद हैं। यहाँ 'परि' आदि उपसर्ग हैं, वे 'भू' धातु से निष्पन्न आख्यात शब्द के विशेष अर्थ करने वाले भी हैं और सकर्मकत्व के साधक भी। जिनका अर्थ कर्म के साथ सम्बद्ध होता है, वे पद सकर्मक कहलाते हैं। सकर्मक पदों का अर्थ सकर्मक के रूप में कहना चाहिए, कहीं-कहीं अकर्मक के रूप में भी। इस प्रकार शुद्ध-कर्तृ-क्रियापद होते हैं। यह उद्देश (संक्षिप्त कथन) है। ตตฺร ภวตีติ โหติ วิชฺชติ ปญฺญายติ สรูปํ ลภติ. อุพฺภวตีติ อุปฺปชฺชติ สรูปํ ลภติ. สมุพฺภวตีติ สมุปฺปชฺชติ สรูปํ ลภติ. ปภวตีติ โหติ สมฺภวติ. อถ วา ปภวตีติ ยโต กุโตจิ สนฺทติ, น วิจฺฉิชฺชติ, อวิจฺฉินฺนํ โหติ, ตํ ตํ ฐานํ วิสรติ. ปราภวตีติ ปราภโว โหติ พฺยสนํ อาปชฺชติ อวุทฺธึ ปาปุณาติ. สมฺภวตีติ สุฏฺฐุ ภวติ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ อาปชฺชติ. วิภวตีติ อุจฺฉิชฺชติ วินสฺสติ วิปชฺชติ, วิเสสโต วา ภวติ สมฺปชฺชติ. โภติ สมฺโภติ วิโภตีติ อิมานิ ‘‘ภวติ [Pg.6] สมฺภวติ วิภวตี’’ติ อิเมหิ ยถากฺกมํ สมานนิทฺเทสานิ. ปาตุภวตีติ ปกาสติ ทิสฺสติ ปญฺญายติ ปากฏํ โหติ. ปาตุพฺภวติ ปาตุโภตีติ อิมานิ ‘‘ปาตุภวตี’’ติ อิมินา สมานนิทฺเทสานิ. เอวํ อกมฺมกปทานํ ยถารหํ สกมฺมกากมฺมกวเสน อตฺถกถนํ ทฏฺฐพฺพํ. เอวมุตฺตรตฺราปิ อญฺเญสมฺปิ อกมฺมกปทานํ. वहाँ 'भवति' का अर्थ है—होता है, विद्यमान है, प्रज्ञायमान (प्रकट) होता है, स्वरूप प्राप्त करता है। 'उब्भवति' का अर्थ है—उत्पन्न होता है, स्वरूप प्राप्त करता है। 'समुब्भवति' का अर्थ है—सम्यक् रूप से उत्पन्न होता है, स्वरूप प्राप्त करता है। 'पभवति' का अर्थ है—होता है, सम्भव होता है। अथवा 'पभवति' का अर्थ है—जहाँ कहीं से बहता है, विच्छिन्न नहीं होता, अविच्छिन्न होता है, उस-उस स्थान पर फैलता है। 'पराभवति' का अर्थ है—पराभव (पतन) होता है, व्यसन (विपत्ति) को प्राप्त होता है, अवनति को प्राप्त होता है। 'सम्भवति' का अर्थ है—भली-भाँति होता है, वृद्धि, विरूढ़ि (प्रगति) और विपुलता को प्राप्त होता है। 'विभवति' का अर्थ है—उच्छिन्न होता है, विनष्ट होता है, विपत्ति में पड़ता है, अथवा विशेष रूप से होता है, सम्पन्न होता है। 'भोति', 'सम्भोति', 'विभोति'—ये 'भवति', 'सम्भवति', 'विभवति' के साथ क्रमशः समान निर्देश वाले हैं। 'पातुभवति' का अर्थ है—प्रकाशित होता है, दिखाई देता है, प्रज्ञायमान होता है, प्रकट होता है। 'पातुब्भवति', 'पातुभोति'—ये 'पातुभवति' के साथ समान निर्देश वाले हैं। इस प्रकार अकर्मक पदों का यथायोग्य सकर्मक और अकर्मक के अनुसार अर्थ-वर्णन समझना चाहिए। इसी प्रकार आगे अन्य अकर्मक पदों का भी। ปริโภติทุกาทีสุ ปน สตฺตสุ ทุเกสุ ยถากฺกมํ ทฺเว ทฺเว ปทานิ สมานตฺถานิ, ตสฺมา ทฺเว ทฺเว ปทานิเยว คเหตฺวา นิทฺทิสิสฺสาม. ตตฺร ปริโภติ ปริภวตีติ ปรํ หึสติ ปีเฬติ, อถ วา หีเฬติ อวชานาติ. อภิโภติ อภิภวตีติ ปรํ อชฺโฌตฺถรติ มทฺทติ. อธิโภติ อธิภวตีติ ปรํ อภิมทฺทิตฺวา ภวติ อตฺตโน วสํ วตฺตาเปติ. อติโภติ อติภวตีติ ปรํ อติกฺกมิตฺวา ภวติ. อนุโภติ อนุภวตีติ สุขทุกฺขํ เวเทติ ปริภุญฺชติ สุขทุกฺขปฏิสํเวที โหติ. สมนุโภติ สมนุภวตีติ สุขทุกฺขํ สุฏฺฐุ เวเทติ สุฏฺฐุ ปริภุญฺชติ สุฏฺฐุ สุขทุกฺขปฏิสํเวที โหติ. อภิสมฺโภติ อภิสมฺภวตีติ ปรํ อชฺโฌตฺถรติ มทฺทติ. เอวํ สกมฺมกปทานํ สกมฺมกวเสน อตฺถกถนํ ทฏฺฐพฺพํ. กตฺถจิ ปน คจฺฉตีติ ปวตฺตตีติ เอวํ อกมฺมกวเสนปิ. เอวมุตฺตรตฺราปิ อญฺเญสํ สกมฺมกปทานํ. किन्तु 'परिभोति' आदि सात युगलों (जोड़ों) में क्रमशः दो-दो पद समान अर्थ वाले हैं, इसलिए दो-दो पदों को ही लेकर निर्देश करेंगे। वहाँ 'परिभोति-परिभवति' का अर्थ है—दूसरे की हिंसा करता है, पीड़ित करता है, अथवा तिरस्कार करता है, अवज्ञा करता है। 'अभिभोति-अभिभवति' का अर्थ है—दूसरे को अभिभूत (दबाना) करता है, मर्दन करता है। 'अधिभोति-अधिभवति' का अर्थ है—दूसरे का मर्दन करके होता है (ऊपर रहता है), अपने वश में करता है। 'अतिभोति-अतिभवति' का अर्थ है—दूसरे का अतिक्रमण करके होता है। 'अनुभोति-अनुभवति' का अर्थ है—सुख-दुःख का वेदन करता है, उपभोग करता है, सुख-दुःख का प्रतिसंवेदी होता है। 'समनुभोति-समनुभवति' का अर्थ है—सुख-दुःख का भली-भाँति वेदन करता है, भली-भाँति उपभोग करता है, भली-भाँति सुख-दुःख का प्रतिसंवेदी होता है। 'अभिसम्भोति-अभिसम्भवति' का अर्थ है—दूसरे को अभिभूत करता है, मर्दन करता है। इस प्रकार सकर्मक पदों का सकर्मक के रूप में अर्थ-वर्णन समझना चाहिए। किन्तु कहीं-कहीं 'जाता है', 'प्रवृत्त होता है'—इस प्रकार अकर्मक के रूप में भी। इसी प्रकार आगे अन्य सकर्मक पदों का भी। อปจฺจโย ปโร โหติ, ภูวาทิคณโต สติ; สุทฺธกตฺตุกฺริยาขฺยาเน, สพฺพธาตุกนิสฺสิเต. भ्वादिगण के होने पर, सभी धातु-प्रत्ययों (सार्वधातुक) के आश्रित शुद्ध-कर्तृ-क्रिया के आख्यात में 'अ' प्रत्यय बाद में होता है। อยํ สุทฺธกตฺตุกฺริยาปทานํ นิทฺเทโส. यह शुद्ध-कर्तृ-क्रियापदों का निर्देश है। เหตุกตฺตุกฺริยาปทนิทฺเทส हेतु-कर्तृ-क्रियापद निर्देश ภาเวติ วิภาเวติสมฺภาเวติ ปริภาเวติ, เอวํ เหตุกตฺตุกฺริยาปทานิ ภวนฺติ. เอกกมฺมกวเสเนสมตฺโถ คเหตพฺโพ[Pg.7]. ปจฺฉิมสฺส ปน ทฺวิกมฺมกวเสนปิ. ปริภาวาเปติ อภิภาวาเปติ อนุภาวาเปติ, เอวมฺปิ เหตุกตฺตุกฺริยาปทานิ ภวนฺติ. ทฺวิกมฺมกวเสเนสมตฺโถ คเหตพฺโพ. อิจฺเจวํ ทฺวิธา เหตุกตฺตุกฺริยาปทานิ เญยฺยานิ, อญฺญานิปิ คเหตพฺพานิ. 'भावेति', 'विभावेति', 'सम्भावेति', 'परिभावेति'—इस प्रकार हेतु-कर्तृ-क्रियापद होते हैं। इनका अर्थ एक-कर्मक के रूप में ग्रहण करना चाहिए। किन्तु पिछले (परिभावेति) का द्विकर्मक के रूप में भी। 'परिभावापेति', 'अभिभावापेति', 'अनुभावापेति'—इस प्रकार भी हेतु-कर्तृ-क्रियापद होते हैं। इनका अर्थ द्विकर्मक के रूप में ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार दो प्रकार के हेतु-कर्तृ-क्रियापदों को जानना चाहिए, और अन्यों को भी ग्रहण करना चाहिए। ตตฺร ภาเวตีติ ปุคฺคโล ภาเวตพฺพํ ยํ กิญฺจิ ภาเวติ อาเสวติ พหุลีกโรติ, อถ วา ภาเวตีติ วฑฺเฒติ. วิภาเวตีติ ภาเวตพฺพํ ยํ กิญฺจิ วิภาเวติ วิเสเสน ภาเวติ, วิวิเธน วา อากาเรน ภาเวติ ภาวยติ วฑฺเฒติ, อถ วา วิภาเวตีติ อภาเวติ อนฺตรธาเปติ. สมฺภาเวตีติ ยสฺส กสฺสจิ คุณํ สมฺภาเวติ สมฺภาวยติ สุฏฺฐุ ปกาเสติ อุกฺกํเสติ. ปริภาเวตีติ ปริภาเวตพฺพํ ยํ กิญฺจิ ปริภาเวติ ปริภาวยติ สมนฺตโต วฑฺเฒติ. เอวํ เอกกมฺมกวเสนตฺโถ คเหตพฺโพ. อถ วา ปริภาเวตีติ วาเสตพฺพํ วตฺถุํ ปริภาเวติ ปริภาวยติ วาเสติ คนฺธํ คาหาเปติ. เอวํ ทฺวิกมฺมกวเสนาปิ อตฺโถ คเหตพฺโพ. ปริภาวาเปตีติ ปุคฺคโล ปุคฺคเลน สปตฺตํ ปริภาวาเปติ หึสาเปติ, อถ วา ปริภาวาเปตีติ หีฬาเปติ อวชานาเปติ. อภิภาวาเปตีติ ปุคฺคโล ปุคฺคเลน สปตฺตํ อภิภาวาเปติ อชฺโฌตฺถราเปติ. อนุภาวาเปตีติ ปุคฺคโล ปุคฺคเลน สมฺปตฺตึ อนุภาวาเปติ ปริโภเชติ. तत्र 'भावेति' (भावना करता है) का अर्थ है—पुद्गल जिस किसी भावना करने योग्य वस्तु की भावना करता है, सेवन करता है, बार-बार करता है; अथवा 'भावेति' का अर्थ है—बढ़ाता है। 'विभावेति' का अर्थ है—जिस किसी भावना करने योग्य वस्तु की विशेष रूप से भावना करता है, अथवा विविध प्रकार से भावना करता है, बढ़ाता है; अथवा 'विभावेति' का अर्थ है—अभाव करता है, अन्तर्धान करता है। 'सम्भावेति' का अर्थ है—जिस किसी के गुण की सम्भावना करता है, भली-भाँति प्रकाशित करता है, प्रशंसा करता है। 'परिभावेति' का अर्थ है—जिस किसी परिभावना करने योग्य वस्तु की परिभावना करता है, चारों ओर से बढ़ाता है। इस प्रकार एक-कर्मक के वश से अर्थ ग्रहण करना चाहिए। अथवा 'परिभावेति' का अर्थ है—वासित करने योग्य वस्तु को वासित करता है, सुगन्धित करता है। इस प्रकार द्विकर्मक के वश से भी अर्थ ग्रहण करना चाहिए। 'परिभावापेति' का अर्थ है—पुद्गल, पुद्गल के द्वारा शत्रु को अपमानित करवाता है, हिंसा करवाता है; अथवा 'परिभावापेति' का अर्थ है—निन्दा करवाता है, अवज्ञा करवाता है। 'अभिभावापेति' का अर्थ है—पुद्गल, पुद्गल के द्वारा शत्रु को अभिभूत करवाता है, दमन करवाता है। 'अनुभावापेति' का अर्थ है—पुद्गल, पुद्गल के द्वारा सम्पत्ति का अनुभव करवाता है, उपभोग करवाता है। ปยุตฺโต กตฺตุนา โยเค, ฐิโตเยวาปฺปธานิเย; กฺริยํ สาเธติ เอตสฺส, ทีปกํ สาสเน ปทํ. कर्ता के योग में प्रयुक्त, अप्राधान्य (गौण) में स्थित पद ही इस शासन (बुद्ध-वचन) में क्रिया को सिद्ध करने वाला दीपक पद है। กรณวจนํเยว, เยภุยฺเยน ปทิสฺสติ; อาขฺยาเต การิตฏฺฐานํ, สนฺธาย กถิตํ อิทํ. प्रायः करण विभक्ति (तृतीया) ही देखी जाती है; यह आख्यात (क्रिया) में कारित (प्रयोजक) स्थान के सन्दर्भ में कहा गया है। น [Pg.8] นาเม การิตฏฺฐานํ, ‘‘โพเธตา’’ อิติอาทิกํ; ‘‘สุนเขหิปิ ขาทาเปนฺติ’’, อิจฺจาทีนิ ปทานิ จ; อาหริตฺวาน ทีเปยฺย, ปโยคกุสโล พุโธ. नाम (संज्ञा) में कारित स्थान नहीं होता, जैसे 'बोधेता' (बोध कराने वाला) आदि; 'कुत्तों से भी खिलवाते हैं' (सुनखेहिपि खादापेन्ति) इत्यादि पदों को लाकर प्रयोग-कुशल विद्वान को स्पष्ट करना चाहिए। ตตฺริทํ กรณวจนํ กมฺมตฺถทีปกํ, อุปโยคสามิวจนานิปิ ตทฺทีปกานิ โยเชตพฺพานิ. กถํ? ปริภาวาเปตีติ ปุคฺคโล ปุคฺคลํ สปตฺตํ ปริภาวาเปตีติ, ตถา ปริภาวาเปตีติ ปุคฺคโล ปุคฺคลสฺส สปตฺตํ ปริภาวาเปตีติ. เสสานิ นยานุสาเรน นิทฺทิสิตพฺพานิ. เอวํ สพฺพาเนตานิ กรโณปโยคสามิวจนานิ กมฺมตฺถทีปกานิเยว โหนฺติ, ตสฺมา ทฺวิกมฺมกวเสนตฺโถ คเหตพฺโพ. यहाँ यह करण विभक्ति कर्म के अर्थ को प्रकाशित करने वाली है, उपभोग (द्वितीया) और स्वामी (षष्ठी) वचनों को भी उसके प्रकाशक के रूप में जोड़ना चाहिए। कैसे? 'परिभावापेति'—पुद्गल, पुद्गल को (द्वितीया) शत्रु को अपमानित करवाता है; वैसे ही 'परिभावापेति'—पुद्गल, पुद्गल के (षष्ठी) शत्रु को अपमानित करवाता है। शेष को नय के अनुसार निर्दिष्ट करना चाहिए। इस प्रकार ये सभी करण, उपभोग और स्वामी वचन कर्म के अर्थ को ही प्रकाशित करने वाले होते हैं, इसलिए द्विकर्मक के वश से अर्थ ग्रहण करना चाहिए। อยํ เหตุกตฺตุกฺริยาปทานํ นิทฺเทโส. यह हेतु-कर्तृ क्रियापदों का निर्देश है। กมฺมกฺริยาปทนิทฺเทส कर्म-क्रियापद निर्देश ภวิยเต วิภวิยเต ปริภวิยเต อภิภวิยเต อนุภวิยเต ปริภูยเต อภิภูยเต อนุภูยเต, เอวํ กมฺมุโน กฺริยาปทานิ ภวนฺติ. อญฺญถา จ ภวิยฺยเต วิภวิยฺยเต ปริภวิยฺยเต อภิภวิยฺยเต อนุภวิยฺยเต ปริภุยฺยเต อภิภุยฺยเต อนุภุยฺยเตติ. เอตฺถ กมฺมุโน กฺริยาปทานิเยว กมฺมกตฺตุโน กฺริยาปทานิ กตฺวา โยเชตพฺพานิ. วิสุญฺหิ กมฺมกตฺตุโน กฺริยาปทานิ น ลพฺภนฺติ. 'भवियते, विभवियते, परिभवियते, अभिभवियते, अनुभवियते, परिभूयते, अभिभूयते, अनुभूयते'—इस प्रकार कर्म (Passive) के क्रियापद होते हैं। और दूसरे प्रकार से 'भविय्यते, विभविय्यते, परिभविय्यते, अभिभविय्यते, अनुभविय्यते, परिभुय्यते, अभिभुय्यते, अनुभुय्यते' भी होते हैं। यहाँ कर्म के क्रियापदों को ही कर्म-कर्त्ता के क्रियापद बनाकर जोड़ना चाहिए। क्योंकि कर्म-कर्त्ता के क्रियापद अलग से प्राप्त नहीं होते। ตตฺร ภวิยเตติ ภาเวตพฺพํ ยํ กิญฺจิ ปุคฺคเลน ภาวิยเต อาเสวิยเต พหุลีกริยเต, อถ วา ภวิยเตติ วฑฺฒิยเต. วิภวิยเตติ วิภาเวตพฺพํ ยํ กิญฺจิ ปุคฺคเลน วิภวิยเต วิเสเสน ภวิยเต, วิวิเธน [Pg.9] วา อากาเรน ภวิยเต วฑฺฒิยเต, อถ วา วิภวิยเตติ อภวิยเต อนฺตรธาปิยเต. ปริภวิยเตติ สปตฺโต ปุคฺคเลน ปริภวิยเต หึสิยเต, อถ วา ปริภวิยเตติ หีฬิยเต อวชานิยเต. อภิภวิยเตติ สปตฺโต ปุคฺคเลน อภิภวิยเต อชฺโฌตฺถริยเต อภิมทฺทิยเต. อนุภวิยเตติ สมฺปตฺติ ปุคฺคเลน อนุภวิยเต ปริภุญฺชิยเต. ปริภูยเตติอาทีนิ ตีณิ ‘‘ปริภวิยเต’’ติอาทีหิ ตีหิ สมานนิทฺเทสานิ. เสสานิ ปน ยถาวุตฺเตหิ ยํ กมฺมเมว ปธานโต คเหตฺวา นิทฺทิสิยติ ปทํ, ตํ กมฺมตฺถทีปกํ. ตสฺมา กตฺตริ เอกวจเนน นิทฺทิฏฺเฐปิ ยทิ กมฺมํ พหุวจนวเสน วตฺตพฺพํ, พหุวจนนฺตญฺเญว กมฺมุโน กฺริยาปทํ ทิสฺสติ. ยทิ ปเนกวจนวเสน วตฺตพฺพํ, เอกวจนนฺตญฺเญว. ตถา กตฺตริ พหุวจเนน นิทฺทิฏฺเฐปิ ยทิ กมฺมํ เอกวจนวเสน วตฺตพฺพํ, เอกวจนนฺตญฺเญว กมฺมุโน กฺริยาปทํ ทิสฺสติ. ยทิ ปน พหุวจนวเสน วตฺตพฺพํ, พหุวจนนฺตญฺเญว. กถํ? ภิกฺขุนา ธมฺโม ภวิยเต, ภิกฺขุนา ธมฺมา ภวิยนฺเต, ภิกฺขูหิ ธมฺโม ภวิยเต, ภิกฺขูหิ ธมฺมา ภวิยนฺเตติ. อิมินา นเยน สพฺพตฺถ กมฺมุโน กฺริยาปเทสุ โวหาโร กาตพฺโพ. ยสฺมึ ปน กมฺมุโน กฺริยาปเท กมฺมตฺถทีปเก กมฺมภูตสฺเสวตฺถสฺส กตฺตุภาวปริกปฺโป โหติ, ตํ กมฺมกตฺตุตฺถทีปกํ, ตํ กมฺมุโน กฺริยาปทโต วิสุํ น ลพฺภติ. อยํ ปเนตฺถ อตฺถวิญฺญาปเน ปโยครจนา. สยเมว ปริภวิยเต ทุพฺภาสิตํ ภณํ พาโล ตปฺปจฺจยา อญฺเญหิ ปริภูโตปิ, สยเมว อภิภวิยเต ปาปการี นิรเย นิรยปาเลหิ อภิภูโตปิ ตถารูปสฺส กมฺมสฺส สยํ กตตฺตาติ. เอตฺถ หิ สยเมว ปียเต ปานียํ, สยเมว กโฏ กริยเตติอาทีสุ วิย [Pg.10] สุขาภิสงฺขรณียตา ลพฺภเตว, ตโต กมฺมกตฺตุตา จ. वहाँ 'भवियते' का अर्थ है—पुद्गल के द्वारा जिस किसी भावना करने योग्य वस्तु की भावना की जाती है, सेवन किया जाता है, बार-बार किया जाता है; अथवा 'भवियते' का अर्थ है—बढ़ाया जाता है। 'विभवियते' का अर्थ है—पुद्गल के द्वारा जिस किसी विभावना करने योग्य वस्तु की विशेष रूप से भावना की जाती है, अथवा विविध प्रकार से भावना की जाती है, बढ़ाया जाता है; अथवा 'विभवियते' का अर्थ है—अभाव किया जाता है, अन्तर्धान किया जाता है। 'परिभवियते' का अर्थ है—पुद्गल के द्वारा शत्रु का तिरस्कार किया जाता है, हिंसा की जाती है; अथवा 'परिभवियते' का अर्थ है—निन्दा की जाती है, अवज्ञा की जाती है। 'अभिभवियते' का अर्थ है—पुद्गल के द्वारा शत्रु को अभिभूत किया जाता है, दबाया जाता है, मर्दन किया जाता है। 'अनुभवियते' का अर्थ है—पुद्गल के द्वारा सम्पत्ति का अनुभव किया जाता है, उपभोग किया जाता है। 'परिभूयते' आदि तीन पद 'परिभवियते' आदि तीन पदों के समान निर्देश वाले हैं। शेष में, जैसा कहा गया है, जिस कर्म को ही प्रधानता से लेकर पद निर्दिष्ट किया जाता है, वह कर्म-अर्थ-दीपक है। इसलिए कर्ता में एकवचन निर्दिष्ट होने पर भी यदि कर्म बहुवचन के वश से कहना हो, तो कर्म का क्रियापद बहुवचन में ही देखा जाता है। यदि एकवचन के वश से कहना हो, तो एकवचन में ही। वैसे ही कर्ता में बहुवचन निर्दिष्ट होने पर भी यदि कर्म एकवचन के वश से कहना हो, तो कर्म का क्रियापद एकवचन में ही देखा जाता है। यदि बहुवचन के वश से कहना हो, तो बहुवचन में ही। कैसे? भिक्षु के द्वारा धर्म की भावना की जाती है, भिक्षु के द्वारा धर्मों की भावना की जाती है, भिक्षुओं के द्वारा धर्म की भावना की जाती है, भिक्षुओं के द्वारा धर्मों की भावना की जाती है। इस नय से सर्वत्र कर्म के क्रियापदों में व्यवहार करना चाहिए। जिस कर्म-अर्थ-दीपक कर्म-क्रियापद में कर्म-भूत अर्थ की ही कर्ता-भाव की परिकल्पना होती है, वह कर्म-कर्तृ-अर्थ-दीपक है, वह कर्म के क्रियापद से अलग प्राप्त नहीं होता। यहाँ अर्थ समझाने के लिए यह प्रयोग-रचना है—'स्वयं ही तिरस्कृत होता है दुर्भाषित बोलने वाला बाल (मूर्ख), उस कारण से दूसरों के द्वारा तिरस्कृत होने पर भी; स्वयं ही अभिभूत होता है पाप करने वाला नरक में नरकपालों के द्वारा अभिभूत होने पर भी, उस प्रकार के कर्म के स्वयं किए जाने के कारण।' यहाँ 'स्वयं ही पानी पिया जाता है', 'स्वयं ही चटाई बनाई जाती है' आदि के समान सुखाभिसंस्करणीयता प्राप्त होती ही है, और उससे कर्म-कर्तृता भी। อยํ กมฺมุโน กฺริยาปทานํ นิทฺเทโส. यह कर्म-क्रियापदों का निर्देश है। ภาวกฺริยาปทนิทฺเทส भाव-क्रियापद निर्देश ภูยเต ภวิยเต อุพฺภวิยเต, เอวํ ภาวสฺส กฺริยาปทานิ ภวนฺติ. อญฺญถา จ ภุยฺยเต ภวิยฺยเต อุพฺภวิยฺยเตติ. ตตฺร ยถา ฐียเตปทสฺส ฐานนฺติ ภาววเสน อตฺถกถนมิจฺฉนฺติ, เอวํ ภูยเตติอาทีนมฺปิ ภวนนฺติอาทินา ภาววเสน อตฺถกถนมิจฺฉิตพฺพํ. ยถา จ ฐานํ ฐิติ ภวนนฺติอาทีหิ ภาววาจกกิตนฺตนามปเทหิ สทฺธึ สมฺพนฺเธ ฉฏฺฐิโยชนมิจฺฉนฺติ, น ตถา ฐียเต ภูยเตติอาทีหิ ภาววาจกาขฺยาตปเทหิ สทฺธึ สมฺพนฺเธ ฉฏฺฐิโยชนา อิจฺฉิตพฺพา สมฺพนฺเธ ปวตฺตฉฏฺฐิยนฺตสทฺเทหิ อสมฺพนฺธนียตฺตา อาขฺยาติกปทานํ. ยสฺมึ ปโยเค ยํ กมฺมุโน กฺริยาปเทน สมานคติกํ กตฺวา วินา กมฺเมน นิทฺทิสิยติ กฺริยาปทํ, กตฺตุวาจกปทํ ปน ปจฺจตฺตวจเนน วา กรณวจเนน วา นิทฺทิสิยติ, ตํ ตตฺถ ภาวตฺถทีปกํ. น หิ สพฺพถา กตฺตารมนิสฺสาย ภาโว ปวตฺตติ. เอวํ สนฺเตปิ ภาโว นาม เกวโล ภวนลวนปจนาทิโก ธาตุอตฺโถเยว. อกฺขรจินฺตกา ปน ‘‘ฐียเต ภูยเต’’ติอาทีสุ ภาววิสเยสุ กรณวจนเมว ปยุญฺชนฺติ ‘‘นนุ นาม ปพฺพชิเตน สุนิวตฺเถน ภวิตพฺพํ สุปารุเตน อากปฺปสมฺปนฺเนนา’’ติอาทีสุ วิย, ตสฺมา เตสํ มเต ‘‘เตน อุพฺภวิยเต’’ติ กรณวจเนน โยเชตพฺพํ. ชินมเตน ปน ‘‘โส ภูยเต’’ติอาทินา ปจฺจตฺตวจเนเนว. สจฺจสงฺเขปปฺปกรเณ หิ ธมฺมปาลาจริเยน, นิทฺเทสปาฬิยํ ปน ธมฺมเสนาปตินา, ธชคฺคสุตฺตนฺเต ภควตา จ ภาวปทํ ปจฺจตฺตวจนาเปกฺขวเสนุ’จฺจาริตํ. भूयते, भवियते, उब्भवियते - इस प्रकार भाव के क्रियापद होते हैं। अन्यथा 'भुय्यते, भविय्यते, उब्भविय्यते' भी होते हैं। वहाँ जैसे 'ठीयते' पद का 'ठान' (स्थिति) इस प्रकार भाव के रूप में अर्थ-कथन चाहते हैं, वैसे ही 'भूयते' आदि का भी 'भवन' (होना) आदि के रूप में भाव के अनुसार अर्थ-कथन करना चाहिए। और जैसे 'ठान', 'ठिति', 'भवन' आदि भाववाचक कृदन्त नामपदों के साथ सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति का प्रयोग चाहते हैं, वैसे 'ठीयते', 'भूयते' आदि भाववाचक आख्यात (क्रिया) पदों के साथ सम्बन्ध में षष्ठी का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि सम्बन्ध में प्रयुक्त षष्ठी-अन्त शब्दों के साथ आख्यात पदों का सम्बन्ध नहीं होता है। जिस प्रयोग में जो कर्म के क्रियापद के समान गति वाला होकर कर्म के बिना क्रियापद निर्दिष्ट किया जाता है, और कर्तावाचक पद प्रथमा (पच्चत्त) विभक्ति या तृतीया (करण) विभक्ति द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है, वह वहाँ 'भावार्थ' का द्योतक होता है। क्योंकि सर्वथा कर्ता के बिना भाव प्रवृत्त नहीं होता। ऐसा होने पर भी 'भाव' नाम केवल 'भवन' (होना), 'लवन' (काटना), 'पचन' (पकाना) आदि धातु का अर्थ ही है। किन्तु वैयाकरण (अक्खरचिन्तक) 'ठीयते, भूयते' आदि भाव-विषयों में तृतीया विभक्ति का ही प्रयोग करते हैं, जैसे 'ननु नाम पब्बजितेन सुनिवत्थेन भवितब्बं...' (निश्चित ही प्रव्रजित द्वारा सुनिवास्त होना चाहिए...) आदि में; इसलिए उनके मत में 'तेन उब्भवियते' (उसके द्वारा उत्पन्न हुआ जाता है) इस प्रकार तृतीया विभक्ति से जोड़ना चाहिए। किन्तु जिन-मत (बुद्ध के मत) के अनुसार 'सो भूयते' (वह होता है) आदि के समान प्रथमा विभक्ति से ही। 'सच्चसंखेप' प्रकरण में आचार्य धम्मपाल द्वारा, 'निद्देसपाळि' में धम्मसेनापति (सारिपुत्र) द्वारा, और 'ध्वजग्ग सुत्त' में भगवान द्वारा भावपद प्रथमा विभक्ति की अपेक्षा से ही उच्चारित किया गया है। กถิโต [Pg.11] สจฺจสงฺเขเป, ปจฺจตฺตวจเนน เว,‘‘ภูยเต’’ อิติ สทฺทสฺส, สมฺพนฺโธ ภาวทีปโน. सच्चसंखेप में कहा गया है कि 'भूयते' इस शब्द का सम्बन्ध प्रथमा विभक्ति (पच्चत्तवचन) से ही निश्चित रूप से भाव का द्योतक है। นิทฺเทสปาฬิยํ ‘‘รูปํ, วิโภติ วิภวิยฺยติ’’; อิติ ทสฺสนโต วาปิ, ปจฺจตฺตวจนํ ถิรํ. निद्देसपाळि में 'रूपं, विभोति विभविय्यति' (रूप नष्ट होता है, नष्ट होगा) - इस दर्शन से भी प्रथमा विभक्ति ही स्थिर (सिद्ध) है। ตถา ธชคฺคสุตฺตนฺเต, มุนินาหจฺจภาสิเต; ‘‘โส ปหียิสฺสติ’’ อิติ, ปาฬิทสฺสนโตปิ จ. उसी प्रकार ध्वजग्ग सुत्त में मुनि (बुद्ध) द्वारा स्वयं भाषित 'सो पहीयिस्सति' (वह प्रहीण होगा) - इस पालि दर्शन से भी (यही सिद्ध होता है)। ปารมิตานุภาเวน, มเหสีนํว เทหโต; สนฺติ นิปฺผาทนา, เนว, สกฺกตาทิวโจ วิย. पारमिताओं के अनुभाव से, महर्षियों के देह के समान, (शब्दों की) निष्पत्तियाँ होती हैं, न कि संस्कृत आदि वचनों के समान। ปจฺจตฺตทสฺสเนเนว, ปุริสตฺตยโยชนํ; เอกวจนิกญฺจาปิ, พหุวจนิกมฺปิ จ; กาตพฺพมิติ โน ขนฺติ, ปรสฺสปทอาทิเก. प्रथमा विभक्ति के दर्शन से ही तीनों पुरुषों (प्रथम, मध्यम, उत्तम) का योजन, और एकवचन तथा बहुवचन का भी प्रयोग करना चाहिए - ऐसा परस्मैपद आदि के विषय में हमारा मत (खन्ति) है। ตสฺมา รูปํ วิภวิยฺยติ, รูปานิ วิภวิยฺยนฺติ, ตฺวํ วิภวิยฺยสิ, ตุมฺเห วิภวิยฺยถ, อหํ วิภวิยฺยามิ, มยํ วิภวิยฺยาม, รูปํ วิภวิยฺยเต, รูปานิ วิภวิยฺยนฺเต อิจฺเจวมาทิ ชินวจนานุรูปโต โยเชตพฺพํ. อตฺรายํ ปทโสธนา – इसलिए 'रूपं विभविय्यति' (रूप नष्ट होगा), 'रूपाणि विभविय्यन्ति' (रूप नष्ट होंगे), 'त्वं विभविय्यसि' (तुम नष्ट होगे), 'तुम्हे विभविय्यथ' (तुम सब नष्ट होगे), 'अहं विभविय्यामि' (मैं नष्ट होऊँगा), 'मयं विभविय्याम' (हम नष्ट होंगे), 'रूपं विभविय्यते' (रूप नष्ट होता है), 'रूपाणि विभविय्यन्ते' (रूप नष्ट होते हैं) - इस प्रकार जिन-वचन के अनुरूप जोड़ना चाहिए। यहाँ यह पद-शोधन है— วิภวิยฺยตีติ อิทํ, กมฺมปทสมานกํ; น จ กมฺมปทํ นาปิ, กมฺมกตฺตุปทาทิกํ. 'विभविय्यति' यह (पद) कर्म-पद के समान है; किन्तु न तो यह कर्म-पद है और न ही कर्मादि-कर्तृपद। ยทิ กมฺมปทํ เอตํ, ปจฺจตฺตวจนํ ปน; กมฺมํ ทีเปยฺย กรณ-วจนํ กตฺตุทีปกํ. यदि यह कर्म-पद होता, तो प्रथमा विभक्ति कर्म को दर्शाती और तृतीया विभक्ति कर्ता को दर्शाती। ยทิ กมฺมกตฺตุปทํ, ‘‘ปียเต’’ติ ปทํ วิย; สิยา สกมฺมกํ, เนตํ, ตถา โหตีติ ทีปเย. यदि यह 'पीयते' (पिया जाता है) पद के समान कर्मादि-कर्तृपद होता, तो यह सकर्मक होता; किन्तु यह वैसा नहीं है, ऐसा समझना चाहिए। ยทิ กตฺตุปทํ เอตํ, วิภวติปทํ วิย; วินา ยปจฺจยํ ติฏฺเฐ, น ตถา ติฏฺฐเต อิทํ. यदि यह 'विभवति' पद के समान कर्तृपद (कर्तृवाच्य) होता, तो यह 'य' प्रत्यय के बिना होता; किन्तु यह वैसा नहीं रहता है। น กตฺตริ ภุวาทีนํ, คเณ ยปจฺจโย รุโต; ทิวาทีนํ คเณเยว, กตฺตริ สมุทีริโต. भ्वादि गण की धातुओं में कर्ता अर्थ में 'य' प्रत्यय नहीं सुना गया है; दिवादि गण में ही कर्ता अर्थ में (य प्रत्यय) कहा गया है। น [Pg.12] ภูธาตุ ทิวาทีนํ, ธาตูนํ ทิสฺสเต คเณ; ภูวาทิกจุราทีนํ, คเณสุเยว ทิสฺสติ. भू-धातु दिवादि गण की धातुओं में नहीं देखी जाती; यह केवल भ्वादि और चुरादि गणों में ही देखी जाती है। ‘‘วิภวิยฺยติ’’ อิจฺจาโท, ตสฺมา ยปจฺจโย ปน; ภาเวเยวาติ วิญฺเญยฺยํ, วิญฺญุนา สมยญฺญุนา. इसलिए 'विभविय्यति' आदि में 'य' प्रत्यय भाव अर्थ में ही है - ऐसा आगम के ज्ञाता विद्वान को समझना चाहिए। เอตฺถ หิ ปากฏํ กตฺวา, ภาวการกลกฺขณํ; ทสฺสยิสฺสามหํ ทานิ, สกฺกจฺจํ เม นิโพธถ. यहाँ भाव-कारक के लक्षण को स्पष्ट करते हुए अब मैं दिखाऊँगा; इसे मुझसे आदरपूर्वक सुनें। ‘‘ติสฺโส คจฺฉติ’’อิจฺจตฺร, กตฺตารํ กตฺตุโน ปทํ; ‘‘ธมฺโม เทสิยติ’’จฺจตฺร, กมฺมํ ตุ กมฺมุโน ปทํ. 'तिस्सो गच्छति' (तिस्स जाता है) यहाँ कर्ता (तिस्स) कर्ता का पद है; 'धम्मो देसियति' (धम्म देशित किया जाता है) यहाँ कर्म (धम्म) कर्म का पद है। สรูปโต ปกาเสติ, ตสฺมา เต ปากฏา อุโภ; ตถา วิภวิยฺยตีติ-อาทิภาวปทํ ปน. वे दोनों (कर्ता और कर्म) अपने स्वरूप से प्रकाशित होते हैं, इसलिए वे दोनों स्पष्ट हैं; उसी प्रकार 'विभविय्यति' आदि भाव-पद भी हैं। สรูปโต น ทีเปติ, การกํ ภาวนามกํ; ทพฺพภูตํ ตุ กตฺตารํ, ปกาเสติ สรูปโต. (भाव-पद) भाव नामक कारक को अपने स्वरूप से प्रकाशित नहीं करता; किन्तु द्रव्यभूत कर्ता को अपने स्वरूप से प्रकाशित करता है। กตฺตารํ ปน ทีเปนฺตํ, กตฺตุสนฺนิสฺสิตมฺปิ ตํ; ภาวํ ทีเปติ สฺวากาโร, ปจฺจเยน วิภาวิโต. कर्ता को प्रकाशित करते हुए भी, वह (पद) कर्ता के आश्रित उस भाव (क्रिया) को ही प्रकाशित करता है, जो प्रत्यय द्वारा स्पष्ट किया गया है। ยสฺมา จ กตฺตุภาเวน, ภาโว นาม น ติฏฺฐติ; กตฺตาว กตฺตุภาเวน, ภาวฏฺฐาเน ฐิโต ตโต. चूँकि भाव, कर्ता के भाव के बिना नहीं रहता; इसलिए कर्ता ही कर्ता के भाव से भाव के स्थान पर स्थित होता है। ยชฺเชวํ กตฺตุโวหาโร, ภาวสฺส ตุ กถํ สิยา; ‘‘สาวกานํ สนฺนิปาโต, อโหสิ’’อิติอาทิสุ. यदि ऐसा है, तो भाव के लिए कर्ता का व्यवहार कैसे होगा? जैसे 'सावकानं सन्निपातो अहोसि' (श्रावकों का सन्निपात हुआ) आदि में। อิติ เจ นิสฺสยานํ ตุ, วสา นิสฺสิตสมฺภวา; กตฺตุฏฺฐาเนปิ ภาวสฺส, กตฺตุปญฺญตฺติ สิชฺฌติ. यदि ऐसा कहें, तो आश्रयों (कर्ताओं) के वश से आश्रित (भाव) की उत्पत्ति होने के कारण, कर्ता के स्थान पर भी भाव की 'कर्ता' संज्ञा सिद्ध होती है। การเก กตฺตุกมฺมวฺเห, กฺริยาสนฺนิสฺสเย ยถา; ธาเรนฺตี อาสนถาลี, กฺริยาธาโรติ กปฺปิตา. जैसे कर्ता और कर्म नामक कारकों में, क्रिया के आश्रय होने पर, धारण करने वाले 'आसन' और 'थाली' को क्रिया का आधार (अधिकरण) कल्पित किया जाता है। ตถา ภาวปทํ ธีรา, กตฺตารํ ภาวนิสฺสยํ; ทีปยนฺตมฺปิ กปฺเปนฺติ, ภาวสฺส วาจกํ อิติ. वैसे ही विद्वान लोग भाव-पद को, भाव के आश्रय कर्ता को प्रकाशित करते हुए भी, 'भाव का वाचक' ऐसा कल्पित करते हैं। เกจิ [Pg.13] อทพฺพภูตสฺส, ภาวสฺเสกตฺตโต พฺรวุํ; ภาเวเทกวโจวาทิ-ปุริสสฺเสว โหติติ. कुछ लोग कहते हैं कि अद्रव्यभूत भाव की एकता के कारण, भाव (वाच्य) में केवल एकवचन और प्रथम पुरुष ही होता है। ปาฬึ ปตฺวาน เตสํ ตุ, วจนํ อปฺปมาณกํ; ‘‘เต สํกิเลสิกา ธมฺมา, ปหียิสฺสนฺติ’’ อิติ หิ. किन्तु पालि (त्रिपिटक) को देखने पर उनका वचन प्रमाणहीन है; क्योंकि 'ते संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति' (वे संक्लेशिक धर्म प्रहीण होंगे) ऐसा (पाठ मिलता है)। ปาโฐ ปาวจเน ทิฏฺโฐ, ตสฺมา เอวํ วเทมเส; ปจฺจตฺตทสฺสเนเนว, ปุริสตฺตยโยชนํ. बुद्ध-वचन में ऐसा पाठ देखा गया है, इसलिए हम ऐसा कहते हैं; प्रथमा विभक्ति के दर्शन से ही तीनों पुरुषों का योजन (करना चाहिए)। วจเนหิ ยุตํ ทฺวีหิ, อิจฺฉิตพฺพนฺติ โน รุจิ; ภาเว กฺริยาปทํ นาม, ปาฬิยํ อติทุทฺทสํ; ตสฺมา ตคฺคหณูปาโย, วุตฺโต เอตฺตาวตา มยาติ. दो वचनों (एकवचन और बहुवचन) से युक्त होना इष्ट है - यह हमारी रुचि (मत) है; पालि में भाव में क्रियापद का होना अत्यन्त दुर्लभ है; इसलिए उसे ग्रहण करने का उपाय मेरे द्वारा यहाँ तक कहा गया है। อยํ ภาวสฺส กฺริยาปทานํ นิทฺเทโส. यह भाव के क्रियापदों का निर्देश है। เอวํ สุทฺธกตฺตุกฺริยาปทานิ เหตุกตฺตุกฺริยาปทานิ กมฺมุโน กฺริยาปทานิ, ภาวสฺส กฺริยาปทานิ จาติ จตุธา, กมฺมกตฺตุกฺริยาปเทหิ วา ปญฺจธา ภูธาตุโต นิปฺผนฺนานิ กฺริยาปทานิ นานปฺปกาเรน นิทฺทิฏฺฐานิ, เอตานิ โลกิยานํ ภาวเภทวเสน โวหารเภโท โหตีติ ทสฺสนตฺถํ วิสุํ วิสุํ วุตฺตานิ. อตฺถโต ปน กมฺมกตฺตุภาวการกตฺตยวเสน ติวิธาเนว. เหตุกตฺตา หิ สุทฺธกตฺตุสงฺขาเต การเก ตสฺสงฺคภาวโต สงฺคหมุปคจฺฉติ, ตถา กมฺมกตฺตา กมฺมการเก, ภาโว ปน เกวโล. โส หิ คมนปจนลวนาทิวเสนาเนกวิโธปิ กฺริยาสภาวตฺตา เภทรหิโต การกนฺตโร. เอวํ สนฺเตปิ ทพฺพสนฺนิสฺสิตตฺตา ทพฺพเภเทน ภิชฺชติ. เตน ปาวจเน ภาววาจกํ ปทํ พหุวจนนฺตมฺปิ ทิสฺสติ. อาขฺยาติกปเท ภาวการกโวหาโร นิรุตฺตินยํ นิสฺสาย คโต, อตฺถโต ปน ภาวสฺส การกตา นุปปชฺชติ. โส หิ น [Pg.14] กิญฺจิ ชเนติ, น จ กฺริยาย นิมิตฺตํ. กฺริยานิมิตฺตภาโวเยว หิ การกลกฺขณํ. อิติ มุขฺยโต วา เหตุโต วา ภาวสฺส การกตา น ลพฺภติ. เอวํ สนฺเตปิ โส กรณมตฺตตฺตา การกํ. ตถา หิ กรณํ กาโร, กฺริยา, ตเทว การกนฺติ ภาวสฺส การกตา ทฏฺฐพฺพา. ยสฺมา ปน กฺริยานิมิตฺตภาโวเยว การกลกฺขณํ, ตสฺมา นามิกปเท การกลกฺขเณ ภาวการกนฺติ โวหารํ ปหาย กตฺตุกมฺมกรณสมฺปทานาปาทานาธิกรณานํ ฉนฺนํ วตฺถูนํ กตฺตุการกกมฺมการกนฺติอาทิ โวหาโร กริยติ เวยฺยากรเณหิ. เอวํ นิรุตฺตินยํ นิสฺสาย วุตฺตํ ภาวการกญฺจ ทฺเว จ กมฺมกตฺตุการกานีติ การกตฺตยํ ภวติ. ตทฺทีปกญฺจาขฺยาติกปทํ ติการกํ. इस प्रकार कर्तृ-क्रियापद, हेतु-कर्तृ-क्रियापद, कर्म-क्रियापद और भाव-क्रियापद के रूप में चार प्रकार के, अथवा कर्म-कर्तृ-क्रियापदों के साथ पाँच प्रकार के 'भू' धातु से निष्पन्न क्रियापद नाना प्रकार से निर्दिष्ट किए गए हैं। ये लौकिक भाव-भेद के कारण व्यवहार-भेद होते हैं, यह दिखाने के लिए अलग-अलग कहे गए हैं। अर्थ की दृष्टि से तो कर्म-कर्तृ-भाव कारक के भेद से तीन प्रकार के ही हैं। हेतु-कर्ता 'हेतु' नामक कारक में उसके अंग होने के कारण समाहित हो जाता है, वैसे ही कर्म-कर्ता कर्म-कारक में, और भाव तो केवल (अकेला) है। वह गमन, पचन, लवन आदि के भेद से अनेक प्रकार का होने पर भी क्रिया-स्वभाव होने के कारण भेद-रहित अन्य कारक है। ऐसा होने पर भी द्रव्य के आश्रित होने के कारण द्रव्य-भेद से भिन्न होता है। इसलिए प्रवचन (बुद्ध-वचन) में भाववाचक पद बहुवचन में भी देखा जाता है। आख्यात पद में भाव-कारक का व्यवहार निरुक्ति-नय के आश्रय से आया है, अर्थ की दृष्टि से भाव की कारकता उपपन्न नहीं होती। वह न कुछ उत्पन्न करता है, न क्रिया का निमित्त है। क्रिया-निमित्त होना ही कारक का लक्षण है। इस प्रकार मुख्य रूप से या हेतु रूप से भाव की कारकता प्राप्त नहीं होती। ऐसा होने पर भी वह केवल 'करण' (साधन) होने से कारक है। क्योंकि 'करण' ही 'कार' (करने वाला) है, क्रिया है, वही कारक है - इस प्रकार भाव की कारकता देखनी चाहिए। चूँकि क्रिया-निमित्त होना ही कारक का लक्षण है, इसलिए नामिक पद के कारक-लक्षण में 'भाव-कारक' इस व्यवहार को छोड़कर कर्तृ, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण - इन छह वस्तुओं का 'कर्तृ-कारक', 'कर्म-कारक' आदि व्यवहार वैयाकरणों द्वारा किया जाता है। इस प्रकार निरुक्ति-नय के आश्रय से कहा गया भाव-कारक और दो कर्म-कर्तृ-कारक मिलकर तीन कारक होते हैं। उसे प्रकाशित करने वाला आख्यात पद 'त्रि-कारक' है। อิมมตฺถญฺหิ สนฺธาย, วุตฺตมาจริเยหิปิ; มหาเวยฺยากรเณหิ, นิรุตฺตินยทสฺสิภิ. इसी अर्थ को ध्यान में रखकर, निरुक्ति-नय के ज्ञाता महान वैयाकरण आचार्यों द्वारा भी कहा गया है। ‘‘ยํ ติกาลํ ติปุริสํ, กฺริยาวาจิ ติการกํ; อติลิงฺคํ ทฺวิวจนํ, ตทาขฺยาตนฺติ วุจฺจตี’’ติ. “जो तीन काल, तीन पुरुष, क्रियावाची, तीन कारक वाला, लिंग-रहित और दो वचनों वाला है, उसे 'आख्यात' कहा जाता है।” อิธ ภาวกมฺเมสุ อตฺตโนปทุปฺปตฺตึ เกจิ อกฺขรจินฺตกา อวสฺสมิจฺฉนฺตีติ เตสํ มติวิภาวนตฺถมมฺเหหิ ภาวกมฺมานํ กฺริยาปทานิ อตฺตโนปทวเสนุทฺทิฏฺฐานิ เจว นิทฺทิฏฺฐานิ จ. สพฺพานิปิ ปเนตานิ ติการกานิ กฺริยาปทานิ กฺริยาปทมาลมิจฺฉตา ปรสฺสปทตฺตโนปทวเสน โยเชตพฺพานิ. ปาฬิอาทีสุ หิ ติการกานิ กฺริยาปทานิ ปรสฺสปทตฺตโนปทวเสน ทฺวิธา ฐิตานิ. เสยฺยถิทํ? ภควา สาวตฺถิยํ วิหรติ. สมาธิชฺฌานกุสลา, วนฺทนฺติ โลกนายกํ. โมนํ วุจฺจติ ญาณํ. อตฺถาภิสมยา ธีโร, ปณฺฑิโตติ ปวุจฺจติ. กถํ ปฏิปนฺนสฺส ปุคฺคลสฺส รูปํ วิโภติ วิภวิยฺยติ. โส [Pg.15] ปหียิสฺสติ. ปณฺฑุกมฺพเล นิกฺขิตฺตํ ภาสเต ตปเต. ปูชโก ลภเต ปูชํ. ปุตฺตกามา ถิโย ยาจํ, ลภนฺเต ตาทิสํ สุตํ. อสิโต ตาทิ วุจฺจเต สพฺรหฺมา. อคฺคิชาทิ ปุพฺเพว ภูยเต. โส ปหีเยถาปิ โน ปหีเยถาติ เอวํ ทฺวิธา ฐิตานิ. อตฺริทํ ปาฬิววตฺถานํ – यहाँ भाव और कर्म में आत्मनेपद की उत्पत्ति को कुछ वैयाकरण (अक्षरचिन्तक) आवश्यक मानते हैं, इसलिए उनके मत को स्पष्ट करने के लिए हमने भाव और कर्म के क्रियापदों को आत्मनेपद के रूप में निर्दिष्ट और व्याख्यायित किया है। क्रियापद-माला की इच्छा रखने वाले के द्वारा ये सभी त्रि-कारक क्रियापद परस्मैपद और आत्मनेपद के अनुसार जोड़े जाने चाहिए। पालि आदि में त्रि-कारक क्रियापद परस्मैपद और आत्मनेपद के रूप में दो प्रकार से स्थित हैं। जैसे कि - 'भगवा सावत्थियं विहरति' (भगवान श्रावस्ती में विहार करते हैं)। 'समाधिज्झानकुसला, वन्दन्ति लोकनायकं' (समाधि और ध्यान में कुशल लोकनायक की वन्दना करते हैं)। 'मोनं वुच्चति ञाणं' (ज्ञान को मौन कहा जाता है)। 'अत्थाभिसमया धीरो, पण्डितोति पवुच्चति' (अर्थ के अभिसमय से धीर पुरुष पण्डित कहा जाता है)। 'कथं पटिपन्नस्स पुग्गलस्स रूपं विभोति विभविय्यति' (कैसे प्रतिपन्न पुद्गल का रूप विभूत होता है, विभूत होगा)। 'सो पहीयिस्सति' (वह प्रहीण होगा)। 'पण्डुकम्बले निक्खित्तं भासते तापते' (पाण्डुकम्बल पर रखा हुआ चमकता है, तपता है)। 'पूजको लभते पूजं' (पूजक पूजा प्राप्त करता है)। 'पुत्तकामा थियो याचं, लभन्ते तादिसं सुतं' (पुत्र की कामना वाली स्त्रियाँ याचना करती हुई वैसा पुत्र प्राप्त करती हैं)। 'असितो तादि वुच्चते सब्रह्मा' (असित वैसा ही सब्रह्म कहा जाता है)। 'अग्गिजादि पुब्बेव भूयते' (अग्नि आदि पहले ही उत्पन्न होते हैं)। 'सो पहीयेथापि नो पहीयेथा' (वह प्रहीण हो भी सकता है और नहीं भी) - इस प्रकार दो प्रकार से स्थित हैं। यहाँ यह पालि-व्यवस्था है - ติการกานิ สพฺพานิ, กฺริยาปทานิ ปายโต; ปรสฺสปทโยเคน, ทิสฺสนฺติ ปิฏกตฺตเย. प्रायः सभी त्रि-कारक क्रियापद त्रिपिटक में परस्मैपद के प्रयोग के साथ देखे जाते हैं। อตฺตโนปทยุตฺตานิ, จุณฺณิเยสุ ปเทสุ หิ; อตีวปฺปานิ คาถาสุ, ปทานีติ พหูนิ ตุ. गद्य (चूर्णिय) पदों में आत्मनेपद से युक्त पद बहुत कम हैं, किन्तु गाथाओं में बहुत से पद हैं। คาถาสุ เจวิตรานิ, จุณฺณิเยสุ ปเทสุ จ; สุพหูเนว หุตฺวาน, ทิสฺสนฺตีติ ปกาสเย. गाथाओं में और अन्य गद्य पदों में भी वे बहुत अधिक होकर दिखाई देते हैं, ऐसा प्रकाशित करना चाहिए। ปทานํ นิทฺเทโส ปนติ อนฺติอาทีนํ เตสํ เตสํ วจนานมนุรูเปน โยเชตพฺโพ. เอวํ ติการกกฺริยาปทานิ สรูปโต ววตฺถานโต นิทฺเทสโต จ เวทิตพฺพานิ. पदों का निर्देश तो 'ति', 'अन्ति' आदि उन-उन वचनों के अनुरूप जोड़ना चाहिए। इस प्रकार त्रि-कारक क्रियापदों को उनके स्वरूप, व्यवस्था और निर्देश से जानना चाहिए। อิทานิ โนปสคฺคากมฺมิกาทิวเสน ภวติสฺส ธาตุสฺส วินิจฺฉยํ วทาม – अब हम उपसर्ग-रहित, अकर्मक आदि के भेद से 'भवति' (भू) धातु का निश्चय कहते हैं - โนปสคฺคา อกมฺมา จ, โสปสคฺคา อกมฺมิกา; โสปสคฺคา สกมฺมา จ, อิติ ภูติ วิภาวิตา. उपसर्ग-रहित अकर्मक, उपसर्ग-सहित अकर्मक, और उपसर्ग-सहित सकर्मक - इस प्रकार 'भू' धातु स्पष्ट की गई है। อิทํ ตุ วจนํ ‘‘ธมฺม-ภูโต ภุตฺวา’’ติอาทิสุ; ปตฺตานุภวนตฺถํ เม, วิวชฺเชตฺวา อุทีริตํ. यह वचन तो 'धम्म-भूतो भुत्वा' आदि में प्राप्ति और अनुभव के अर्थ में मेरे द्वारा (उपर्युक्त वर्गीकरण को) छोड़कर कहा गया है। เอเตน ปน อตฺเถน, โนปสคฺคสกมฺมิกํ; คเหตฺวา จตุธา โหติ, อิติ เญยฺยํ วิเสสโต. इस अर्थ के साथ, उपसर्ग-रहित सकर्मक को लेकर विशेष रूप से चार प्रकार का जानना चाहिए। โนปสคฺคา อกมฺมา จ, โสปสคฺคา อกมฺมิกา; ภูธาตุ การิเต สนฺเต, เอกกมฺมา ภวนฺติ หิ. उपसर्ग-रहित अकर्मक और उपसर्ग-सहित अकर्मक 'भू' धातु 'कारित' (णिच् प्रत्यय) होने पर एक-कर्मक हो जाते हैं। ‘‘ภาเวติ [Pg.16] กุสลํ ธมฺมํ, วิภาเวตี’’ติมานิธ; ทสฺเสตพฺพานิ วิญฺญูหิ, สาสนญฺญูหิ สาสเน. 'भावेति कुसलं धम्मं' (कुशल धर्म की भावना करता है), 'विभावेति' - इन्हें यहाँ शासन के ज्ञाता विद्वानों द्वारा शासन में दिखाना चाहिए। โสปสคฺคา สกมฺมา ตุ, การิตปฺปจฺจเย สติ; ทฺวิกมฺมาเยว โหตีติ, ญาตพฺพํ วิญฺญุนา กถํ. उपसर्ग-सहित सकर्मक तो 'कारित' प्रत्यय होने पर द्वि-कर्मक ही होते हैं, यह विद्वान द्वारा कैसे जाना जाए? อภิภาเวนฺติ ปุริสา, ปุริเส ปาณชาติกํ; อนุภาเวติ ปุริโส, สมฺปตฺตึ ปุริสํ อิติ. 'अभिभावेंति पुरिसा, पुरिसे पाणजातिकं' (पुरुष, पुरुषों को प्राणियों पर अभिभूत कराते हैं), 'अनुभावेति पुरिसो, सम्पत्तिं पुरिसं' (पुरुष, पुरुष को सम्पत्ति का अनुभव कराता है) - इस प्रकार। อิทํ สกมฺมกํ นาม, อกมฺมกมิทํ อิติ; กถมมฺเหหิ ญาตพฺพํ, วิตฺถาเรน วเทถ โน. “यह सकर्मक है और यह अकर्मक है” - यह हमारे द्वारा कैसे जाना जाए? हमें विस्तार से बताएँ। วิตฺถาเรเนว กึ วตฺตุํ, สกฺโกมิ เอกเทสโต; กถยิสฺสามิ สกฺกจฺจํ, วทโต เม นิโพธถ. विस्तार से ही क्या कहना, मैं एक अंश से कह सकता हूँ; मैं ध्यानपूर्वक कहूँगा, मेरे कहते हुए को समझें। อาขฺยาติกปทํ นาม, ทุวิธํ สมุทีริตํ; สกมฺมกมกมฺมญฺจ, อิติ วิญฺญู วิภาวเย. आख्यात पद दो प्रकार का कहा गया है - सकर्मक और अकर्मक; विद्वान को ऐसा समझना चाहिए। ตตฺร ยสฺส ปโยคมฺหิ, ปทสฺส กตฺตุนา กฺริยา; นิปฺผาทิตา วินา กมฺมํ, น โหติ ตํ สกมฺมกํ. वहाँ जिसके प्रयोग में कर्ता द्वारा निष्पादित क्रिया कर्म के बिना नहीं होती, वह 'सकर्मक' है। ‘‘ปจตี’’ติ หิ วุตฺเต ตุ, เยน เกนจิ ชนฺตุนา; โอทนํ วา ปนญฺญํ วา, กิญฺจิ วตฺถุนฺติ ญายติ. क्योंकि 'पचति' (पकाता है) ऐसा कहने पर किसी प्राणी द्वारा 'ओदन' (भात) या कोई अन्य वस्तु (पकाई जा रही है), ऐसा जाना जाता है। ยสฺส ปน ปโยคมฺหิ, กมฺเมน รหิตา กฺริยา; ปทสฺส ญายเต เอตํ, อกมฺมกนฺติ ตีรเย. जिसके प्रयोग में क्रिया कर्म के बिना ही जानी जाती है, उसे 'अकर्मक' निश्चित करना चाहिए। ‘‘ติฏฺฐติ เทวทตฺโต’’ติ, วุตฺเต เกนจิ ชนฺตุนา; ฐานํว พุทฺธิวิสโย, กมฺมภูตํ น กิญฺจิปิ. जब किसी प्राणी द्वारा कहा जाता है कि 'देवदत्त खड़ा है', तब 'खड़ा होना' (स्थान) ही बुद्धि का विषय है, कर्म-भूत कुछ भी नहीं है। สกมฺมกปทํ ตตฺถ, กตฺตารํ กมฺมเมว จ; ปกาเสติ ยถาโยค-มิติ วิญฺญู วิภาวเย. वहाँ सकर्मक पद कर्ता और कर्म को यथासंभव प्रकाशित करता है—ऐसा विद्वान को स्पष्ट करना चाहिए। ‘‘โอทนํ ปจติ โปโส, โอทโน ปจฺจเต สยํ’’; อิจฺจุทาหรณา เญยฺยา, อวุตฺเตปิ อยํ นโย. “व्यक्ति भात पकाता है, भात स्वयं पकता है”; इन उदाहरणों से यह जानना चाहिए कि (कर्ता के) न कहे जाने पर भी यही नियम है। อกมฺมกปทํ [Pg.17] นาม, กตฺตารํ ภาวเมว จ; ยถารหํ ปกาเสติ, อิติ ธีโรปลกฺขเย. अकर्मक पद कर्ता और भाव को यथायोग्य प्रकाशित करता है, ऐसा बुद्धिमान को समझना चाहिए। กตฺตารํ ‘‘ติฏฺฐติ’’จฺจตฺร, สูเจติ ภาวนามกํ; ‘‘อุปฏฺฐียติ’’ อิจฺจตฺร, อวุตฺเตปิ อยํ นโย. “तिट्ठति” (खड़ा होता है) यहाँ कर्ता को सूचित करता है, और “उपट्ठीयति” (उपस्थित होता है) यहाँ भाव को; न कहे जाने पर भी यही नियम है। เอวํ สกมฺมกากมฺมํ, ญตฺวา โยเชยฺย พุทฺธิมา; ติกมฺมกญฺจ ชาเนยฺย, กราโท การิเต สติ. इस प्रकार बुद्धिमान को सकर्मक और अकर्मक को जानकर प्रयोग करना चाहिए; और 'कर' आदि धातुओं के प्रेरणार्थक (कारित) होने पर त्रिकर्मक भी जानना चाहिए। ‘‘สุวณฺณํ กฏกํ โปโส, กาเรติ ปุริส’’นฺติ จ; ‘‘ปุริโส ปุริเส คามํ, รถํ วาเหติ’’อิจฺจปิ. “व्यक्ति पुरुष से सोने का कंगन बनवाता है” और “पुरुष पुरुषों से गाँव को रथ लेवाता है” (ऐसे उदाहरणों में)। เอตฺถ ภวติธาตุมฺหิ, นโย เอโส น ลพฺภติ; ตสฺมา ทฺวิกมฺมกญฺเญว, ปทเมตฺถ วิภาวิตํ. यहाँ 'भवति' धातु में यह नियम नहीं मिलता है; इसलिए यहाँ केवल द्विकर्मक पद ही स्पष्ट किया गया है। เอทิโส จ นโย นาม, ปาฬิยํ ตุ น ทิสฺสติ; เอกจฺจานํ มเตเนว, มยา เอวํ ปกาสิโต. और इस प्रकार का नियम पालि (त्रिपिटक) में तो नहीं दिखाई देता; कुछ आचार्यों के मत के अनुसार ही मेरे द्वारा इसे इस प्रकार प्रकाशित किया गया है। เอตฺถ จ ‘‘ตเมนํ ราชา, วิวิธา กมฺมการณา; การาเปตี’’ติ โย ปาโฐ, นิทฺเทเส ตํ สุนิทฺทิเส. और यहाँ “उसको राजा विविध कर्म-यातनाएँ करवाता है” यह जो पाठ है, उसे निर्देश (महानिद्देस) में अच्छी तरह निर्दिष्ट करना चाहिए। ‘‘มนุสฺเสหี’’ติ อาหริตฺวา, ปาฐเสสํ สุเมธโส; ‘‘สุนเขหิปิ ขาทาเปนฺติ’’, อิติ ปาฐสฺส ทสฺสนา. बुद्धिमान को “मनुष्येहि” (मनुष्यों द्वारा) पद लाकर शेष पाठ को पूरा करना चाहिए, क्योंकि “कुत्तों से भी खिलवाते हैं” ऐसा पाठ देखा जाता है। เอตํ นยํ วิทู ญตฺวา, โยเช ปาฐานุรูปโต; ‘‘สุวณฺณํ กฏกํ โปโส, กาเรติ ปุริเสนิ’’ติ. विद्वान इस नियम को जानकर पाठ के अनुसार प्रयोग करे: “व्यक्ति पुरुष द्वारा सोने का कंगन बनवाता है।” วิกรณปฺปจฺจยาว, วุตฺตา เอตฺถ สรูปโต; สคเณ สคเณ เตสํ, วุตฺตึ ทีเปตุเมว จ. यहाँ विकरण प्रत्यय ही उनके स्वरूप के साथ कहे गए हैं, और प्रत्येक गण में उनकी वृत्ति (प्रयोग) को स्पष्ट करने के लिए। ‘‘อสฺมึ คเณ อยํ ธาตุ, โหตี’’ติ เตหิ วิญฺญุโน; วิญฺญาเปตุญฺจ อญฺเญหิ, ญาปนา ปจฺจเยหิ น. “इस गण में यह धातु होती है” - उनके द्वारा विद्वानों को यह समझाने के लिए है; अन्य ज्ञापक प्रत्ययों द्वारा नहीं। ตถา หิ ภาวกมฺเมสุ, วิหิโต ปจฺจโย ตุ โย; อฏฺฐวิเธปิ ธาตูนํ, คณสฺมึ สมฺปวตฺตติ. क्योंकि भाव और कर्म में जो प्रत्यय विहित है, वह धातुओं के आठों गणों में प्रवृत्त होता है। ภูธาตุเชสุ [Pg.18] รูเปสุ, อสมฺโมหาย โสตุนํ; นานาวิโธ นโย เอวํ, มยา เอตฺถ ปกาสิโต. भू-धातु से उत्पन्न रूपों में श्रोताओं के मोह (भ्रम) को दूर करने के लिए, मेरे द्वारा यहाँ इस प्रकार के नानाविध नियम प्रकाशित किए गए हैं। เย โลเก อปฺปยุตฺตา วิวิธวิกรณาขฺยาตสทฺเทสฺวเฉกา,เต ปตฺวาขฺยาตสทฺเท อวิคตวิมตี โหนฺติ ญาณีปิ ตสฺมา; อจฺจนฺตญฺเญว ธีโร สปรหิตรโต สาสเน ทฬฺหเปโม,โยคํ เตสํ ปโยเค ปฏุตรมติตํ ปตฺถยาโน กเรยฺย. जो लोग लोक में अप्रयुक्त विविध विकरणों वाले आख्यात शब्दों में कुशल नहीं हैं, वे आख्यात शब्दों को प्राप्त कर ज्ञानी होने पर भी संशय मुक्त नहीं होते; इसलिए स्व-पर हित में रत और शासन में दृढ़ प्रेम रखने वाला धीर पुरुष, अत्यंत प्रखर बुद्धि की इच्छा करते हुए उनके प्रयोग में अभ्यास करे। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ इस प्रकार, अट्ठकथा सहित नौ अंगों वाले त्रिपिटक के वचनों के मार्गों में। วิญฺญูนํ โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ विद्वानों की कुशलता के लिए रचित 'सद्दनीति' प्रकरण में। สวิกรณาขฺยาตวิภาโค นาม 'स-विकरण आख्यात विभाग' नामक। ปฐโม ปริจฺเฉโท. प्रथम परिच्छेद। ๒. ภวติกฺริยาปทมาลาวิภาค २. 'भवति' क्रियापद माला विभाग। อิโต ปรํ ปวกฺขามิ, โสตูนํ มติวฑฺฒนํ; กฺริยาปทกฺกมํ นาม, วิภตฺตาทีนิ ทีปยํ. इसके बाद मैं श्रोताओं की बुद्धि बढ़ाने के लिए, विभक्तियों आदि को स्पष्ट करते हुए 'क्रियापद क्रम' कहूँगा। ตตฺร อาขฺยาติกสฺส กฺริยาลกฺขณตฺตสูจิกา ตฺยาทโย วิภตฺติโย, ตา อฏฺฐวิธา วตฺตมานาปญฺจมีสตฺตมีปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีภวิสฺสนฺตี กาลาติปตฺติวเสน. वहाँ आख्यात के क्रिया-लक्षण को सूचित करने वाली 'ति' आदि विभक्तियाँ हैं; वे वर्तमान, पंचमी, सप्तमी, परोक्षा, हिय्यत्तनी, अज्जतनी, भविष्यन्ती और कालातिपत्ति के भेद से आठ प्रकार की हैं। ตตฺถติ อนฺติ, สิ ถ, มิ ม, เต อนฺเต, เส วฺเห, เอ มฺเห อิจฺเจตา วตฺตมานาวิภตฺติโย นาม. उनमें ति-अन्ति, सि-थ, मि-म, ते-अन्ते, से-व्वे, ए-म्हे - ये 'वर्तमाना' विभक्तियाँ कहलाती हैं। ตุ อนฺตุ, หิ ถ, มิ ม, ตํ อนฺตํ, สุ วฺโห, เอ อามเส อิจฺเจตา ปญฺจมีวิภตฺติโย นาม. तु-अन्तु, हि-थ, मि-म, तं-अन्तं, सु-व्वो, ए-आमसे - ये 'पंचमी' विभक्तियाँ कहलाती हैं। เอยฺย [Pg.19] เอยฺยุํ, เอยฺยาสิ เอยฺยาถ, เอยฺยามิ เอยฺยาม, เอถ เอรํ, เอโถ เอยฺยาวฺโห, เอยฺยํ เอยฺยามฺเห อิจฺเจตา สตฺตมีวิภตฺติโย นาม. एय्य-एय्युं, एय्यासि-एय्याथ, एय्यामि-एय्याम, एथ-एरं, एथो-एय्याव्वो, एय्यं-एय्याम्हे - ये 'सप्तमी' विभक्तियाँ कहलाती हैं। อ อุ, เอ ตฺถ, อํ มฺห, ตฺถ เร, ตฺโถ วฺโห, อึ มฺเห อิจฺเจตา ปโรกฺขาวิภตฺติโย นาม. अ-उ, ए-त्थ, अं-म्ह, त्थ-रे, त्थो-व्वो, इं-म्हे - ये 'परोक्षा' विभक्तियाँ कहलाती हैं। อา อู, โอ ตฺถ, อํ มฺหา, ตฺถ ตฺถุํ, เส วฺหํ, อึ มฺหเส อิจฺเจตา หิยฺยตฺตนีวิภตฺติโย นาม. आ-ऊ, ओ-त्थ, अं-म्हा, त्थ-त्थुं, से-व्वं, इं-म्हसे - ये 'हिय्यत्तनी' विभक्तियाँ कहलाती हैं। อี อุํ, โอ ตฺถ, อึ มฺหา, อา อู, เส วฺหํ, อํ มฺเห อิจฺเจตา อชฺชตนีวิภตฺติโย นาม. ई-उं, ओ-त्थ, इं-म्हा, आ-ऊ, से-व्वं, अं-म्हे - ये 'अज्जतनी' विभक्तियाँ कहलाती हैं। สฺสติ สฺสนฺติ, สฺสสิ สฺสถ, สฺสามิ สฺสาม, สฺสเต สฺสนฺเต, สฺสเส สฺสวฺเห, สฺสํ สฺสามฺเห อิจฺเจตา ภวิสฺสนฺตีวิภตฺติโย นาม. 'स्सति स्सन्ति, स्ससि स्सथ, स्सामि स्साम, स्सते स्सन्ते, स्ससे स्सव्हे, स्सं स्साम्हे' - ये 'भविष्यन्ती' (भविष्य काल) विभक्तियाँ कहलाती हैं। สฺสา สฺสํสุ, สฺเส สฺสถ, สฺสํ สฺสามฺหา, สฺสถ สฺสิสุ, สฺสเส สฺสวฺเห, สฺสึ สฺสามฺหเส อิจฺเจตา กาลาติปตฺติวิภตฺติโย นาม. 'स्सा स्संसु, स्से स्सथ, स्सं स्साम्हा, स्सथ स्सिसु, स्ससे स्सव्हे, स्सिं स्साम्हसे' - ये 'कालातिपत्ति' विभक्तियाँ कहलाती हैं। สพฺพาสเมตาสํ วิภตฺตีนํ ยานิ ยานิ ปุพฺพกานิ ฉ ปทานิ, ตานิ ตานิ ปรสฺสปทานิ นาม. ยานิ ยานิ ปน ปรานิ ฉ ปทานิ, ตานิ ตานิ อตฺตโนปทานิ นาม. ตตฺถ ปรสฺสปทานิ วตฺตมานา ฉ, ปญฺจมิโย ฉ, สตฺตมิโย ฉ, ปโรกฺขา ฉ, หิยฺยตฺตนิโย ฉ, อชฺชตนิโย ฉ, ภวิสฺสนฺติโย ฉ, กาลาติปตฺติโย ฉาติ อฏฺฐจตฺตาลีสวิธานิ โหนฺติ, ตถา อิตรานิ, สพฺพานิ ตานิ ปิณฺฑิตานิ ฉนฺนวุติวิธานิ. इन सभी विभक्तियों में जो-जो पहले के छह पद हैं, वे 'परस्सपद' कहलाते हैं। और जो-जो बाद के छह पद हैं, वे 'अत्तनोपद' कहलाते हैं। वहाँ परस्सपद के वर्तमान के छह, पञ्चमी के छह, सप्तमी के छह, परोक्खा के छह, हिय्यत्तनी के छह, अज्जतनी के छह, भविष्यन्ती के छह और कालातिपत्ति के छह - इस प्रकार अड़तालीस (४८) प्रकार के होते हैं; वैसे ही दूसरे (अत्तनोपद) भी। वे सब मिलकर छियानवे (९६) प्रकार के होते हैं। ปรสฺสปทานมตฺตโนปทานญฺจ ทฺเว ทฺเว ปทานิ ปฐมมชฺฌิมุตฺตมปุริสา นาม. เต วตฺตมานาทีสุ จตฺตาโร จตฺตาโร, อฏฺฐนฺนํ วิภตฺตีนํ วเสน ทฺวตฺตึส, ปิณฺฑิตานิ ปริมาณาเนว. परस्सपद और अत्तनोपद के दो-दो पद क्रमशः प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष कहलाते हैं। वे वर्तमाना आदि (आठों विभक्तियों) में चार-चार होते हैं, आठ विभक्तियों के अनुसार बत्तीस (३२) होते हैं, और कुल मिलाकर उतनी ही संख्या (९६) होती है। ทฺวีสุ [Pg.20] ทฺวีสุ ปเทสุ ปฐมํ ปฐมํ เอกวจนํ, ทุติยํ ทุติยํ พหุวจนํ. दो-दो पदों में पहला-पहला एकवचन है और दूसरा-दूसरा बहुवचन है। ตตฺร วตฺตมานวิภตฺตีนนฺติ อนฺติ, สิ ถ, มิ ม อิจฺเจตานิ ปรสฺสปทานิ. เต อนฺเต, เส วฺเห, เอ มฺเห อิจฺเจตานิ อตฺตโนปทานิ. ปรสฺสปทตฺตโนปเทสุปิติ อนฺติ อิติ ปฐมปุริสา, สิถ อิติ มชฺฌิมปุริสา, มิ ม อิติ อุตฺตมปุริสา, เต อนฺเต อิติ ปฐมปุริสา, เส วฺเห อิติ มชฺฌิมปุริสา, เอ มฺเห อิติ อุตฺตมปุริสา. वहाँ वर्तमान विभक्तियों में 'ति अन्ति, सि थ, मि म' - ये परस्सपद हैं। 'ते अन्ते, से व्हे, ए म्हे' - ये अत्तनोपद हैं। परस्सपद और अत्तनोपद में भी 'ति अन्ति' प्रथम पुरुष हैं, 'सि थ' मध्यम पुरुष हैं, 'मि म' उत्तम पुरुष हैं; (तथा अत्तनोपद में) 'ते अन्ते' प्रथम पुरुष हैं, 'से व्हे' मध्यम पुरुष हैं, 'ए म्हे' उत्तम पुरुष हैं। ปฐมมชฺฌิมุตฺตมปุริเสสุปิ ติ-อิติ เอกวจนํ, อนฺติ-อิติ พหุวจนนฺติ เอวํ เอกวจนพหุวจนานิ กมโต เญยฺยานิ. เอวํ เสสาสุ วิภตฺตีสุ ปรสฺสปทตฺตโนปทปฐมมชฺฌิมุตฺตมปุริเสกวจนพหุวจนานิ เญยฺยานิ. प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुषों में भी 'ति' एकवचन है और 'अन्ति' बहुवचन है - इस प्रकार एकवचन और बहुवचन को क्रम से जानना चाहिए। इसी प्रकार शेष विभक्तियों में भी परस्सपद, अत्तनोपद, प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष तथा एकवचन और बहुवचन को जानना चाहिए। ตตฺถ วิภตฺตีติ เกนฏฺเฐน วิภตฺติ? กาลาทิวเสน ธาตฺวตฺถํ วิภชตีติ วิภตฺติ, สฺยาทีหิ นามิกวิภตฺตีหิ สห สพฺพสงฺคาหกวเสน ปน สกตฺถปรตฺถาทิเภเท อตฺเถ วิภชตีติ วิภตฺติ, กมฺมาทโย วา การเก เอกวจนพหุวจนวเสน วิภชตีติ วิภตฺติ, วิภชิตพฺพา ญาเณนาติปิ วิภตฺติ, วิภชนฺติ อตฺเถ เอตายาติปิ วิภตฺติ, อถ วา สติปิ ชินสาสเน อวิภตฺติกนิทฺเทเส สพฺเพน สพฺพํ วิภตฺตีหิ วินา อตฺถสฺสา’นิทฺทิสิตพฺพโต วิเสเสน วิวิเธน วา อากาเรน ภชนฺติ เสวนฺติ นํ ปณฺฑิตาติปิ วิภตฺติ. ตตฺถ อวิภตฺติกนิทฺเทสลกฺขณํ วทาม สห ปโยคนิทสฺสนาทีหิ. वहाँ 'विभक्ति' किस अर्थ में है? काल आदि के अनुसार धातु के अर्थ को विभाजित करती है, इसलिए 'विभक्ति' है। 'सि-आदि' नामिक विभक्तियों के साथ सर्व-संग्राहक भाव से स्वार्थ-परार्थ आदि भेदों में अर्थ को विभाजित करती है, इसलिए 'विभक्ति' है। अथवा कर्म आदि कारकों को एकवचन और बहुवचन के अनुसार विभाजित करती है, इसलिए 'विभक्ति' है। ज्ञान के द्वारा विभाजित की जानी चाहिए, इसलिए भी 'विभक्ति' है। इसके द्वारा अर्थों को विभाजित करते हैं, इसलिए भी 'विभक्ति' है। अथवा, यद्यपि जिन-शासन में विभक्ति-रहित निर्देश भी हैं, तथापि पूर्ण रूप से विभक्तियों के बिना अर्थ का निर्देश नहीं किया जा सकता, इसलिए विद्वान विशेष रूप से या विविध प्रकार से इसका सेवन (उपयोग) करते हैं, इसलिए भी 'विभक्ति' है। वहाँ प्रयोग के उदाहरणों के साथ विभक्ति-रहित निर्देश के लक्षण को कहते हैं। อวิภตฺติกนิทฺเทโส, นามิเกสุปลพฺภติ; นาขฺยาเตสูติ วิญฺเญยฺย-มิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. विभक्ति-रहित निर्देश संज्ञाओं (नामिक) में पाया जाता है, आख्यातों (क्रियाओं) में नहीं - ऐसा यहाँ उदाहरण स्वरूप समझना चाहिए। นิคฺโรโธว มหารุกฺโข, เถร วาทานมุตฺตโม; อนูนํ อนธิกญฺจ, เกวลํ ชินสาสนํ. जैसे न्यग्रोध (बरगद) एक महान वृक्ष है, वैसे ही 'थेर' (स्थविरों का) वाद वादों में उत्तम है; यह जिन-शासन न कम है, न अधिक है, बल्कि पूर्ण है। ตตฺร [Pg.21] เถร-อิติ อวิภตฺติโก นิทฺเทโส, เถรานํ อยนฺติ เถโร. โก โส? วาโท. เถรวาโท อญฺเญสํ วาทานํ อุตฺตโมติ อยมตฺโถ เวทิตพฺโพ. वहाँ 'थेर' यह विभक्ति-रहित निर्देश है, 'थेरों (स्थविरों) का यह' - इस अर्थ में 'थेरो' है। वह क्या है? वाद। 'थेरवाद अन्य वादों में उत्तम है' - यह अर्थ समझना चाहिए। ‘‘กาโย เต สพฺพ โสวณฺโณ’’, อิจฺจาทิมฺหิปิ นามิเก; อวิภตฺติกนิทฺเทโส, คเหตพฺโพ นยญฺญุนา. "कायो ते सब्ब सोवण्णो" (तुम्हारा शरीर पूर्णतः स्वर्णमयी है) - इस प्रकार के नामिक पदों में भी नीतिज्ञों द्वारा विभक्ति-रहित निर्देश ग्रहण करना चाहिए। อวิภตฺติกนิทฺเทโส, นนฺวาขฺยาเตปิ ทิสฺสติ; ‘‘โภ ขาท ปิว’’อิจฺจตฺร, วเท โย โกจิ โจทโก. यदि कोई आक्षेप करने वाला कहे कि विभक्ति-रहित निर्देश क्या आख्यातों (क्रियाओं) में भी नहीं देखा जाता? जैसे "भो खाद पिव" (हे, खाओ पियो) यहाँ। ยทิ เอวํ มเตนสฺส, ภเวยฺย อวิภตฺติกํ; ‘‘ภิกฺขุ, โภ ปุริสิ’’จฺจาทิ, ปทมฺปิ, น หิทํ ตถา. यदि ऐसा माना जाए, तो "भिक्खु, भो पुरिस" आदि पद भी विभक्ति-रहित हो जाएँगे, किन्तु ऐसा नहीं है। ‘‘ภิกฺขุ, โภ ปุริสิ’’จฺจาทิ, สิ ค โลเปน วุจฺจติ; ตถา ‘‘ขาทา’’ติอาทีนิ, หิ โลเปน ปวุจฺจเร. "भिक्खु, भो पुरिस" आदि पदों में 'सि' (सम्बोधन) विभक्ति के लोप से कहा जाता है; वैसे ही "खाद" आदि पदों में 'हि' विभक्ति के लोप से कहा जाता है। เอวํ อวิภตฺติกนิทฺเทโส อาขฺยาเตสุ น ลพฺภติ, นาเมสุเยว ลพฺภติ. ตตฺราปิ ‘‘อฏฺฐ จ ปุคฺคล ธมฺมทสา เต’’ติ เอตฺถ ฉนฺทวเสน ปุคฺคล อิติ รสฺสกรณํ ทฏฺฐพฺพํ, น ‘‘กกุสนฺธ โกณาคมโน จ กสฺสโป’’ติ เอตฺถ กกุสนฺธ อิติ อวิภตฺติกนิทฺเทโส วิย อวิภตฺติกนิทฺเทโส ทฏฺฐพฺโพ. ‘‘ภิกฺขุ นิสินฺเน มาตุคาโม อุปนิสินฺโน วา โหติ อุปนิปนฺโน วา’’ติ เอตฺถ ปน ภิกฺขูติ อิทํ ภิกฺขุมฺหีติ วตฺตพฺพตฺถตฺตา ภุมฺเม ปจฺจตฺตนฺติปิ อทิฏฺฐวิภตฺติกนิทฺเทโสติปิ วตฺตุํ ยุชฺชติ. ตตฺถ ปน ฉนฺทวเสน กตรสฺสตฺตา ตานิ ปทานิ อวิภตฺติกนิทฺเทสปกฺขมฺปิ ภชนฺตีติ วตฺตุํ น ยุชฺชติ. इस प्रकार विभक्ति-रहित निर्देश आख्यातों में नहीं पाया जाता, केवल नामों (संज्ञाओं) में ही पाया जाता है। वहाँ भी "अट्ठ च पुग्गल धम्मदसा ते" यहाँ छन्द के कारण 'पुग्गल' ऐसा ह्रस्व करना देखना चाहिए, न कि "ककुसन्ध कोणागमनो च कस्सपो" यहाँ 'ककुसन्ध' के समान विभक्ति-रहित निर्देश समझना चाहिए। "भिक्खु निसिन्ने मातुगामो उपनिसिन्नो वा होति उपनिपन्नो वा" यहाँ 'भिक्खु' यह 'भिक्खुम्हि' (भिक्षु के पास) कहने के अर्थ में होने के कारण सप्तमी के स्थान पर प्रथमा (पच्चत्त) अथवा अदृष्ट-विभक्ति-निर्देश कहना उचित है। वहाँ छन्द के कारण किए गए ह्रस्व होने से उन पदों को विभक्ति-रहित निर्देश के पक्ष में कहना उचित नहीं है। ตตฺถ ปรสฺสปทานีติ ปรสฺส อตฺถภูตานิ ปทานิ ปรสฺสปทานิ. เอตฺถุตฺตมปุริเสสุ อตฺตโน อตฺเถสุปิ อตฺตโนปทโวหาโร น กริยติ. वहाँ 'परस्सपद' का अर्थ है - दूसरे के लिए अर्थभूत पद। यहाँ उत्तम पुरुष में अपने अर्थ में होने पर भी 'अत्तनोपद' का व्यवहार नहीं किया जाता है। กิญฺจาปิ [Pg.22] อตฺตโน อตฺถา, ปุริสา อุตฺตมวฺหยา; ตถาปิ อิตเรสาน-มุสฺสนฺนตฺตาว ตพฺพสา; ตพฺโพหาโร อิเมสานํ, โปราเณหิ นิโรปิโต. यद्यपि उत्तम पुरुष अपने अर्थ के लिए होते हैं, तथापि दूसरों (प्रथम और मध्यम पुरुष) की प्रधानता के कारण, प्राचीन आचार्यों द्वारा उनके वश में ही इनका व्यवहार स्थापित किया गया है। อตฺตโนปทานีติ อตฺตโน อตฺถภูตานิ ปทานิ อตฺตโนปทานิ. เอตฺถ ปน ปฐมมชฺฌิมปุริเสสุ ปรสฺสตฺเถสุปิ ปรสฺสปทโวหาโร น กริยติ. 'अत्तनोपद' का अर्थ है - अपने लिए अर्थभूत पद। यहाँ प्रथम और मध्यम पुरुष में दूसरे के अर्थ में होने पर भी 'परस्सपद' का व्यवहार नहीं किया जाता है। ปฐมมชฺฌิมา เจเต, ปรสฺสตฺถา ตถาปิ จ; อิตเรสํ นิรูฬฺหตฺตา, ตพฺโพหารสฺส สจฺจโต. ये प्रथम और मध्यम पुरुष यद्यपि परार्थ (दूसरे के लिए) हैं, तथापि दूसरों (उत्तम पुरुष) की रूढ़ि के कारण उस व्यवहार की सत्यता बनी रहती है। อิมสฺส ปนิเมสานํ, ปุพฺพโวหารตาย จ; ตถา สงฺกรโทสสฺส, หรณตฺถาย โส อยํ; อตฺตโนปทโวหาโร, เอสมาโรปิโต ธุวํ. इसके और इनके प्राचीन व्यवहार होने के कारण तथा संकर-दोष (मिश्रण के दोष) को दूर करने के लिए, यह 'अत्तनोपद' का व्यवहार निश्चित रूप से आरोपित किया गया है। ปรสฺสปทสญฺญาทิ-สญฺญาโย พหุกา อิธ; โปราเณหิ กตตฺตาตา, สญฺญา โปราณิกา มตา. यहाँ 'परस्सपद' आदि अनेक संज्ञाएँ प्राचीन आचार्यों द्वारा की गई होने के कारण 'पौराणिक' (प्राचीन) संज्ञाएँ मानी गई हैं। ตสฺมา อิธ ปฐมปุริสาทีนํ ติณฺณํ ปุริสานํ วจนตฺถํ น ปริเยสาม. รูฬฺหิยา หิ โปราเณหิ ตฺยาทีนํ ปุริสสญฺญา วิหิตา. इसलिए यहाँ हम प्रथम पुरुष आदि तीनों पुरुषों के शब्दों के अर्थ की खोज नहीं करते हैं। क्योंकि प्राचीन आचार्यों द्वारा 'ति' आदि की 'पुरुष' संज्ञा रूढ़ि के आधार पर ही की गई है। เอกวจนพหุวจเนสุ ปน เอกสฺสตฺถสฺส วจนํ เอกวจนํ. พหูนมตฺถานํ วจนํ พหุวจนํ. อถ วา พหุตฺเตปิ สติ สมุทายวเสน ชาติวเสน วา จิตฺเตน สมฺปิณฺเฑตฺวา เอกีกตสฺสตฺถสฺส เอกสฺส วิย วจนมฺปิ เอกวจนํ, พหุตฺเต นิสฺสิตสฺส นิสฺสยโวหาเรน วุตฺตสฺส นิสฺสยวเสน เอกสฺส วิย วจนมฺปิ เอกวจนํ, เอกตฺตลกฺขเณน พวฺหตฺถานํ เอกวจนํ วิย วจนมฺปิ เอกวจนํ. อพหุตฺเตปิ สติ อตฺตครุการาปริจฺเฉทมาติกานุสนฺธินยปุจฺฉาสภาคปุถุจิตฺต- สมาโยคปุถุอารมฺมณวเสน เอกตฺถสฺส พหูนํ วิย วจนํ พหุวจนํ, ตถา เย เย พหโว ตนฺนิวาสตํปุตฺตสงฺขาตสฺเสกสฺสตฺถสฺส รูฬฺหีวเสน พหูนํ วิย วจนมฺปิ พหุวจนํ, เอกสฺสตฺถสฺส อญฺเญนตฺเถน เอกาภิธานวเสน พหูนํ [Pg.23] วิย วจนมฺปิ พหุวจนํ, เอกสฺสตฺถสฺส นิสฺสิตวเสน พหูนํ วิย วจนมฺปิ พหุวจนํ, เอกสฺสตฺถสฺส อารมฺมณเภทกิจฺจเภทวเสน พหูนํ วิย วจนมฺปิ พหุวจนํ. เอวมิเมหิ อากาเรหิ เอกมฺหิ วตฺตพฺเพ, เอกมฺหิ วิย จ วตฺตพฺเพ เอกวจนํ, พหุมฺหิ วตฺตพฺเพ, พหุมฺหิ วิย จ วตฺตพฺเพ พหุวจนํ โหตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ปุถุวจนํ, อเนกวจนนฺติ จ อิมสฺเสว นามํ. एकवचन और बहुवचन में, एक अर्थ का कथन 'एकवचन' है। बहुत अर्थों का कथन 'बहुवचन' है। अथवा, बहुत्व होने पर भी समुदाय के कारण या जाति के कारण मन से एकत्रित कर एक किए गए अर्थ का एक के समान कथन भी 'एकवचन' है; बहुत्व पर आश्रित होने पर भी आश्रय के व्यवहार से कहे गए आश्रय के कारण एक के समान कथन भी 'एकवचन' है; एकत्व के लक्षण के कारण बहुत अर्थों का एकवचन के समान कथन भी 'एकवचन' है। बहुत्व न होने पर भी आत्म-गौरव, अपरिच्छेद, मातृका, अनुसन्धि, नय, पृच्छा, सभाग, पृथुचित्त-समायोग और पृथु-आलम्बन के कारण एक अर्थ का बहुतों के समान कथन 'बहुवचन' है; उसी प्रकार जो बहुत हैं, उनमें निवास करने वाले या पुत्र संज्ञक एक अर्थ का रूढ़ि के कारण बहुतों के समान कथन भी 'बहुवचन' है; एक अर्थ का दूसरे अर्थ के साथ एक ही नाम से कहे जाने के कारण बहुतों के समान कथन भी 'बहुवचन' है; एक अर्थ का आश्रित होने के कारण बहुतों के समान कथन भी 'बहुवचन' है; एक अर्थ का आलम्बन-भेद और कार्य-भेद के कारण बहुतों के समान कथन भी 'बहुवचन' है। इस प्रकार इन रूपों में एक के कहे जाने पर और एक के समान कहे जाने पर 'एकवचन' होता है, और बहुत के कहे जाने पर और बहुत के समान कहे जाने पर 'बहुवचन' होता है - ऐसा समझना चाहिए। 'पृथुवचन' और 'अनेकवचन' भी इसी के नाम हैं। วจเนสุ อยํ อตฺโถ, นามาขฺยาตวิภตฺตินํ; วเสน อธิคนฺตพฺโพ, สาสนตฺถคเวสินา. वचनों में यह अर्थ, नाम और आख्यात की विभक्तियों के वश से शासन के अर्थ की खोज करने वाले द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिए। ตสฺมา ตทตฺถวิญฺญาปนตฺถํ อิธ นามิกปโยเคหิ สเหวาขฺยาตปโยเค ปวกฺขาม – ‘‘ราชา อาคจฺฉติ, สหาโย เม อาคจฺฉติ, เอกํ จิตฺต’’ มิจฺเจวมาทโย เอกสฺสตฺถสฺส เอกวจนปโยคา. ‘‘ราชาโน อาคจฺฉนฺติ, สหายา เม อาคจฺฉนฺติ, น เม เทสฺสา อุโภ ปุตฺตา, ทฺเว ตีณิ’’ อิจฺเจวมาทโย พวฺหตฺถานํ พหุวจนปโยคา. इसलिए उस अर्थ को समझाने के लिए यहाँ नामिक प्रयोगों के साथ ही आख्यात (क्रिया) प्रयोगों को कहेंगे - "राजा आता है, मेरा मित्र आता है, एक चित्त" इत्यादि एक अर्थ के लिए एकवचन के प्रयोग हैं। "राजा आते हैं, मेरे मित्र आते हैं, मुझे दोनों पुत्र अप्रिय नहीं हैं, दो, तीन" इत्यादि बहुत अर्थों के लिए बहुवचन के प्रयोग हैं। ‘‘สา เสนา มหตี อาสิ, พหุชฺชโน ปสนฺโนสิ, สพฺโพ ตํ ชโน โอชินายตุ, อิตฺถิคุมฺพสฺส ปวรา, พุทฺธสฺสาหํ วตฺถยุคํ อทาสึ, ทฺวยํ โว ภิกฺขเว เทเสสฺสามิ, เปมํ มหนฺตํ รตนตฺตยสฺส, กเร ปสาทญฺจ นโร อวสฺสํ, ภิกฺขุสงฺโฆ, พลกาโย, เทวนิกาโย, อริยคโณ’’- อิจฺเจวมาทโย, ‘‘ทฺวิกํ ติก’’มิจฺจาทโย จ สมุทายวเสน พวฺหตฺถานํ เอกวจนปโยคา. "वह सेना बड़ी थी, बहुत लोग प्रसन्न हुए, सब लोग उसे ओजस्वी बनाएँ, स्त्रियों के समूह में श्रेष्ठ, मैंने बुद्ध को वस्त्र-युगल दिया, भिक्षुओं! मैं तुम्हें द्वय (दो) का उपदेश दूँगा, रत्नत्रय के प्रति महान प्रेम, मनुष्य को अवश्य ही श्रद्धा करनी चाहिए, भिक्षुसंघ, बलकाय (सेना), देवनिकाय, आर्यगण" - इत्यादि, और "द्विक, त्रिक" इत्यादि समुदाय के कारण बहुत अर्थों के लिए एकवचन के प्रयोग हैं। กตฺถจิ ปน อีทิเสสุ ฐาเนสุ พหุวจนปโยคาปิ ทิสฺสนฺติ. ตถา หิ ‘‘ปูชิตา ญาติสงฺเฆหิ, เทวกายา สมาคตา, สพฺเพเต เทวนิกายา, ทฺเว เทวสงฺฆา, ตีณิ [Pg.24] ทุกานิ, จตฺตาริ นวกานิ’’ อิจฺเจวมาทโย ปโยคาปิ ทิสฺสนฺติ. อิเม เอกวจนวเสน วตฺตพฺพสฺส สมุทายสฺส พหุสมุทายวเสน พหุวจนปโยคาติ คเหตพฺพา, สงฺคยฺหมานา จ พวฺหตฺถพหุวจเน สงฺคหํ คจฺฉนฺติ วิสุํเยว วา, ตสฺมา พหุสมุทายาเปกฺขพหุวจนนฺติ เอเตสํ นามํ เวทิตพฺพํ. किन्तु कहीं-कहीं ऐसे स्थानों पर बहुवचन के प्रयोग भी देखे जाते हैं। जैसे कि "ज्ञाति-संघों द्वारा पूजित, देवकाय (देव-समूह) एकत्रित हुए, ये सभी देवनिकाय, दो देवसंघ, तीन द्विक, चार नवक" इत्यादि प्रयोग भी देखे जाते हैं। इन्हें एकवचन के रूप में कहे जाने वाले समुदाय के बहुत समुदायों के कारण बहुवचन प्रयोग समझना चाहिए, और संगृहीत होते हुए वे बहुत अर्थों वाले बहुवचन में सम्मिलित होते हैं या अलग से ही, इसलिए इनका नाम 'बहु-समुदायापेक्ष बहुवचन' जानना चाहिए। ‘‘ปาณํ น หเน, สสฺโส สมฺปชฺชติ’’ อิจฺเจวมาทโย ชาติวเสน พวฺหตฺถานํ เอกวจนปโยคา, ตพฺภาวสามญฺเญน พวฺหตฺถานํ เอกวจนปโยคาติปิ วตฺตุํ วฏฺฏติ. "प्राणी की हत्या न करे, फसल अच्छी होती है" इत्यादि जाति के कारण बहुत अर्थों के लिए एकवचन के प्रयोग हैं, इन्हें 'तद्भाव-सामान्य' (उस भाव की सामान्यता) के कारण बहुत अर्थों के लिए एकवचन प्रयोग कहना भी उचित है। ‘‘นาคํ รฏฺฐสฺส ปูชิตํ, สาวตฺถี สทฺธา อโหสิ ปสนฺนา’’ อิจฺเจวมาทโย นิสฺสยวเสน ปวตฺตานํ นิสฺสยโวหาเรน วุตฺตานเมกวจนปโยคา. "राष्ट्र के पूजित नाग (हाथी/श्रेष्ठ पुरुष) को, श्रावस्ती श्रद्धावान और प्रसन्न थी" इत्यादि आश्रय के कारण प्रवृत्त होने वाले आश्रय-व्यवहार से कहे गए एकवचन के प्रयोग हैं। ‘‘ติลกฺขณํ, กุสลากุสลํ, วิญฺญาณปจฺจยา นามรูปํ, นามรูปปจฺจยา สฬายตนํ, ธมฺมวินโย, จิตฺตเสโน จ คนฺธพฺโพ, นติยา อสติ อาคติคติ น โหติ, อาคติคติยา อสติ จุตูปปาโต น โหติ’’ อิจฺเจวมาทโย เอกตฺตลกฺขเณ พวฺหตฺถานํ เอกวจนปโยคา. "त्रिलक्षण, कुशल-अकुशल, विज्ञान के प्रत्यय से नामरूप, नामरूप के प्रत्यय से षड़ायतन, धर्म-विनय, चित्तसेन और गन्धर्व, नति (झुकाव) न होने पर आना-जाना नहीं होता, आने-जाने के न होने पर च्युति और उपपत्ति (जन्म-मरण) नहीं होता" इत्यादि एकत्व-लक्षण में बहुत अर्थों के लिए एकवचन के प्रयोग हैं। ‘‘เอวํ มยํ คณฺหาม, อมฺหากํ ปกติ, ปธานนฺติ โข เมฆิย วทมานํ กินฺติ วเทยฺยาม’’ อิจฺเจวมาทโย เอกสฺสตฺถสฺส อตฺตวเสน พหุวจนปโยคา. "इस प्रकार हम ग्रहण करते हैं, हमारी प्रकृति, 'मेघिय! प्रधान (कहते हुए) को हम क्या कहें'" इत्यादि एक अर्थ के लिए आत्म-वाचक (स्वयं के लिए) बहुवचन के प्रयोग हैं। ‘‘เต มนุสฺสา ตํ ภิกฺขุํ เอตทโวจุํ ‘ภุญฺชถ ภนฺเต’ติ, อหํ มนุสฺเสสุ มนุสฺสภูตา, อพฺภาคตานา’สนกํ อทาสึ’’ อิจฺเจวมาทโย เอกสฺสตฺถสฺส ครุการวเสน พหุวจนปโยคา. "उन मनुष्यों ने उस भिक्षु से यह कहा 'भन्ते! भोजन करें', 'मैं मनुष्यों में मनुष्य होकर, आए हुए अतिथियों को आसन दिया'" इत्यादि एक अर्थ के लिए गौरव (आदर) के कारण बहुवचन के प्रयोग हैं। ‘‘อปฺปจฺจยา [Pg.25] ธมฺมา, อสงฺขตา ธมฺมา’’ อิจฺเจวมาทโย เอกสฺสตฺถสฺส อปริจฺเฉทวเสน พหุวจนปโยคา, อนิยมิตสงฺขาวเสน พหุวจนปโยคา วา. "अप्रत्यय धर्म, असंस्कृत धर्म" इत्यादि एक अर्थ के लिए अपरिच्छेद (सीमा रहित होने) के कारण बहुवचन के प्रयोग हैं, अथवा अनिश्चित संख्या के कारण बहुवचन के प्रयोग हैं। เกจิ ปน ‘‘เทสนาโสตปาตวเสน พหุวจนปโยคา’’ติปิ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ. น หิ ตถาคโต สติสมฺปชญฺญรหิโต ธมฺมํ เทเสติ, ยุตฺติ จ น ทิสฺสติ ‘‘มาติกายํ ปุจฺฉายํ วิสฺสชฺชเน จาติ ตีสุปิ ฐาเนสุ อปฺปจฺจยาทิธมฺเม เทเสนฺโต สตฺถา ปุนปฺปุนํ พหุวจนวเสน เทสนาโสเต ปติตฺวา ธมฺมํ เทเสตี’’ติ. किन्तु कुछ लोग "देशना के प्रवाह में पड़ने के कारण बहुवचन के प्रयोग हैं" ऐसा भी कहते हैं, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि तथागत स्मृति और सम्प्रजन्य से रहित होकर धर्म का उपदेश नहीं देते हैं, और यह युक्ति भी नहीं दिखती कि "मातृका, प्रश्न और विसर्जन (उत्तर) इन तीनों ही स्थानों पर अप्रत्यय आदि धर्मों का उपदेश देते हुए शास्ता बार-बार बहुवचन के रूप में देशना-प्रवाह में पड़कर धर्म का उपदेश देते हैं।" ‘‘กตเม ธมฺมา อปฺปจฺจยา’’ อิจฺเจวมาทโย เอกสฺสตฺถสฺส มาติกานุสนฺธินเยน พหุวจนปโยคา. "कौन से धर्म अप्रत्यय हैं" इत्यादि एक अर्थ के लिए मातृका के अनुसन्धान (क्रम) की नीति से बहुवचन के प्रयोग हैं। ‘‘อิเม ธมฺมา อปฺปจฺจยา’’ อิจฺเจวมาทโย เอกสฺสตฺถสฺส ปุจฺฉานุสนฺธินเยน พหุวจนปโยคา. "ये धर्म अप्रत्यय हैं" इत्यादि एक अर्थ के लिए प्रश्न के अनुसन्धान की नीति से बहुवचन के प्रयोग हैं। ‘‘กตเม ธมฺมา โน ปรามาสา, เต ธมฺเม ฐเปตฺวา อวเสสา กุสลากุสลาพฺยากตา ธมฺมา’’ อิจฺเจวมาทโย เอกสฺสตฺถสฺส ปุจฺฉาสภาเคน พหุวจนปโยคา. "कौन से धर्म परामर्श (मोह) नहीं हैं, उन धर्मों को छोड़कर शेष कुशल, अकुशल और अव्याकृत धर्म" इत्यादि एक अर्थ के लिए प्रश्न के समान भाग (स्वभाव) के कारण बहुवचन के प्रयोग हैं। ‘‘อตฺถิ ภิกฺขเว อญฺเญว ธมฺมา คมฺภีรา ทุทฺทสา ทุรนุโพธา สนฺตา ปณีตา อตกฺกาวจรา นิปุณา ปณฺฑิตเวทนียา, เย ตถาคโต สยํ อภิญฺญา สจฺฉิกตฺวา ปเวเทตี’’ติ อยเมกสฺสตฺถสฺส ปุถุจิตฺตสมาโยคปุถุอารมฺมณวเสน พหุวจนปโยโค. “भिक्षुओं, अन्य भी ऐसे धर्म हैं जो गंभीर, दुर्दर्श (कठिनता से दिखने वाले), दुरनुबोध (कठिनता से समझने योग्य), शांत, प्रणीत, अतर्कावचर (तर्क से परे), निपुण और पंडितों द्वारा वेदनीय हैं, जिन्हें तथागत स्वयं अभिज्ञा (उच्च ज्ञान) से साक्षात्कार कर प्रवेदित (प्रकाशित) करते हैं।” यह एक ही अर्थ के लिए अनेक चित्तों के संयोग और अनेक आलम्बनों के कारण बहुवचन का प्रयोग है। ‘‘เอกํ สมยํ ภควา สกฺเกสุ วิหรติ กปิลวตฺถุสฺมึ มหาวเน, “एक समय भगवान शाक्यों में कपिलवस्तु के महावन में विहार कर रहे थे।” สนฺติ [Pg.26] ปุตฺตา วิเทหานํ, ทีฆาวุ รฏฺฐวฑฺฒโน; เต รชฺชํ การยิสฺสนฺติ, มิถิลายํ ปชาปติ’’ – “विदेहों के पुत्र हैं, दीर्घायु और राष्ट्रवर्धक; वे मिथिला में राज्य करेंगे, हे प्रजापति!” – อิจฺเจวมาทโย สทฺทา เย เย พหโว, ตนฺนิวาสตํปุตฺตสงฺขาตสฺเสกตฺถสฺส รูฬฺหีวเสน พหุวจนปโยคา. इस प्रकार के जो भी अनेक शब्द हैं, वे वहाँ निवास करने के कारण और पुत्रों की संख्या के रूप में एक ही अर्थ के लिए रूढ़ि के कारण बहुवचन के प्रयोग हैं। ‘‘สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเน อามนฺเตสิ ‘คจฺฉถ ตุมฺเห สาริปุตฺตา กีฏาคิรึ คนฺตฺวา อสฺสชิปุนพฺพสุกานํ ภิกฺขูนํ กีฏาคิริสฺมา ปพฺพาชนียกมฺมํ กโรถ, ตุมฺหากํ เอเต สทฺธิวิหาริโน’ติ’’, ‘‘กจฺจิ โว กุลปุตฺตา, เอถ พฺยคฺฆา นิวตฺตวฺโห’’ อิจฺเจวมาทโย เอกสฺสตฺถสฺส อญฺเญนตฺเถน เอกาภิธานวเสน พหุวจนปโยคา. “उन्होंने सारिपुत्र और मोग्गल्लान को आमंत्रित किया—'हे सारिपुत्रों (सारिपुत्र और मोग्गल्लान), तुम जाओ और कीटागिरि जाकर अस्सजि और पुनब्बसुक भिक्षुओं के लिए कीटागिरि से निष्कासन (पब्बाजनिय-कम्म) करो, ये तुम्हारे सार्धविहारी (शिष्य) हैं'।” “हे कुलपुत्रों, क्या तुम ठीक हो? हे व्याघ्रों, यहाँ से लौट जाओ।” इस प्रकार के प्रयोग एक ही अर्थ के लिए अन्य अर्थ के साथ एक ही नाम (अभिधान) के कारण बहुवचन के प्रयोग हैं। ‘‘มญฺจา อุกฺกุฏฺฐึ กโรนฺติ’’ อิจฺเจวมาทโย เอกสฺสตฺถสฺส นิสฺสิตวเสน พหุวจนปโยคา. “मंच (चारपाइयाँ) शोर कर रहे हैं”—इस प्रकार के प्रयोग एक ही अर्थ (मंच पर बैठे लोग) के आश्रित होने के कारण बहुवचन के प्रयोग हैं। ‘‘จตฺตาโร สติปฏฺฐานา’’ติ อยมารมฺมณเภเทน เอกสฺสตฺถสฺส พหุวจนปโยโค. “चार स्मृतिप्रस्थान”—यह आलम्बन के भेद से एक ही अर्थ (स्मृति) के लिए बहुवचन का प्रयोग है। ‘‘จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา’’ติ อยํ ปน กิจฺจเภเทน เอกสฺสตฺถสฺส พหุวจนปโยโค. “चार सम्यक् प्रधान”—यह कार्य (कृत्य) के भेद से एक ही अर्थ (वीर्य) के लिए बहुवचन का प्रयोग है। ตตฺถ เอกตฺเถกวจนํ, สมุทายาเปกฺเขกวจนํ, ชาตฺยาเปกฺเขกวจนํ, ตนฺนิสฺสยาเปกฺเขกวจนํ, เอกตฺตลกฺขเณกวจนนฺติ ปญฺจวิธํ เอกวจนํ ภวติ. เอตฺถ ปน ชาตฺยาเปกฺเขกวจนํ อตฺถโต สามญฺญาเปกฺเขกวจนเมวาติ ทฏฺฐพฺพํ. वहाँ एकवचन पाँच प्रकार का होता है: एक अर्थ में एकवचन, समुदाय की अपेक्षा से एकवचन, जाति की अपेक्षा से एकवचन, उसके आश्रय की अपेक्षा से एकवचन, और एकत्व के लक्षण वाला एकवचन। यहाँ जाति की अपेक्षा वाले एकवचन को अर्थतः सामान्य की अपेक्षा वाला एकवचन ही समझना चाहिए। พวฺหตฺถพหุวจนํ, พหุสมุทายาเปกฺขพหุวจนํ, อตฺตพหุวจนํ, ครุการพหุวจนํ, อปริจฺเฉทพหุวจนํ, มาติกานุสนฺธินยพหุวจนํ, ปุจฺฉานุสนฺธินยพหุวจนํ, ปุจฺฉาสภาคพหุวจนํ, ปุถุจิตฺตสมาโยคปุถุอารมฺมณพหุวจนํ, ตนฺนิวาสพหุวจนํ, ตํปุตฺตพหุวจนํ, เอกาภิธานพหุวจนํ, ตนฺนิสฺสิตาเปกฺขพหุวจนํ[Pg.27], อารมฺมณเภทพหุวจนํ, กิจฺจเภทพหุวจนนฺติ ปนฺนรสวิธํ พหุวจนํ ภวติ. อิจฺเจวํ วีสธา สพฺพานิ เอกวจนพหุวจนานิ สงฺคหิตานิ. อตฺริทํ ปาฬิววตฺถานํ – बहुवचन पंद्रह प्रकार का होता है: बहुत अर्थों में बहुवचन, बहुत समुदायों की अपेक्षा से बहुवचन, आत्म-बहुवचन (स्वयं के लिए), आदरसूचक बहुवचन, अपरिच्छेद (अनिश्चितता) बहुवचन, मातृका-अनुसन्धि-नय बहुवचन, प्रश्न-अनुसन्धि-नय बहुवचन, प्रश्न-सभाग बहुवचन, अनेक चित्तों के संयोग और अनेक आलम्बनों वाला बहुवचन, तन्निवास (वहाँ रहने वाले) बहुवचन, तत्पुत्र (उनके पुत्र) बहुवचन, एक-अभिधान (एक ही नाम) बहुवचन, तन्निश्रित (उस पर आश्रित) की अपेक्षा वाला बहुवचन, आलम्बन-भेद बहुवचन, और कृत्य-भेद बहुवचन। इस प्रकार कुल बीस प्रकार के सभी एकवचन और बहुवचन संगृहीत हैं। यहाँ यह पालि का निर्धारण है— เอกตฺเถ เทกวจน-ญฺจิตรสฺมิตรมฺปิ จ; สมุทายชาติเอกตฺต-ลกฺขเณกวโจปิ จ; สาฏฺฐกเถ ปิฏกมฺหิ, ปาเฐ ปาเยน ทิสฺสเร. एक अर्थ में एकवचन और दूसरे (बहुवचन) में भी; समुदाय, जाति और एकत्व-लक्षण वाले एकवचन भी; अट्ठकथा सहित पिटक के पाठों में प्रायः देखे जाते हैं। ครุมฺหิ จตฺตเนกสฺมึ, พหุวจนกํ ปน; ปาฬิยํ อปฺปกํ อฏฺฐ-กถาฏีกาสุ ตํ พหุํ. आदर के अर्थ में और स्वयं के लिए बहुवचन का प्रयोग पालि (मूल पाठ) में कम है, किन्तु अट्ठकथाओं और टीकाओं में वह बहुत है। ตถา หิ พหุกํ เทก-วจนํเยว ปาฬิยํ; ครุมฺหิ จตฺตเนกสฺมึ, อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. क्योंकि पालि में आदर और स्वयं के लिए भी प्रायः एकवचन ही अधिक है; यहाँ इसका उदाहरण है। ‘‘นโม เต ปุริสาชญฺญ, นโม เต ปุริสุตฺตม; ตว สาสนมาคมฺม, ปตฺโตมฺหิ อมตํ ปทํ’’. “हे पुरुषश्रेष्ठ! आपको नमस्कार है, हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है; आपके शासन में आकर मैंने अमृत पद (निर्वाण) प्राप्त कर लिया है।” อิจฺเจวมาทโย ปาฐา, พหุธา ชินสาสเน; ทิสฺสนฺตีติ วิชาเนยฺย, วิทฺวา อกฺขรจินฺตโก. इस प्रकार के पाठ जिन-शासन (बुद्ध के शासन) में बहुत प्रकार से देखे जाते हैं, ऐसा विद्वान अक्षर-चिन्तक को जानना चाहिए। สาติสยํ ครุการา-รหสฺสาปิ มเหสิโน; เอกวจนโยเคน, นิทฺเทโส ทิสฺสเต ยโต. क्योंकि अत्यधिक आदर के योग्य महर्षि (बुद्ध) के लिए भी एकवचन के प्रयोग द्वारा निर्देश देखा जाता है। ตโต โวหารกุสโล, กเรยฺยตฺถานุรูปโต; เอกวจนโยคํ วา, อิตรํ วา สุเมธโส. इसलिए व्यवहार-कुशल बुद्धिमान व्यक्ति को अर्थ के अनुरूप ही एकवचन या अन्य (बहुवचन) का प्रयोग करना चाहिए। ปาเยน ตนฺนิวาสมฺหิ, พหุวจนกํ ฐิตํ; ตํปุตฺเต อปฺปกํ ตนฺนิ-สฺสเยกวจนมฺปิ จ. प्रायः 'तन्निवास' (वहाँ रहने वाले) के अर्थ में बहुवचन स्थित है; 'तत्पुत्र' (उनके पुत्र) और 'तन्निश्रय' (उस पर आश्रित) के अर्थ में एकवचन कम है। ปุถุจิตฺตาปริจฺเฉท-มาติกาสนฺธิอาทิสุ; พหุวจนกญฺจาปิ, อปฺปกนฺติ ปกาสเย. अनेक चित्त, अपरिच्छेद, मातृका-सन्धि आदि में भी बहुवचन कम ही है, ऐसा प्रकाशित करना चाहिए। เอกาภิธานโต กิจฺจา, ตถา โคจรโตปิ จ; พหุวจนกํ ตนฺนิ-สฺสิตาเปกฺขญฺจ อปฺปกํ. एक-अभिधान, कृत्य, तथा गोचर (आलम्बन) के कारण और तन्निश्रित की अपेक्षा वाला बहुवचन भी कम ही है। อิจฺเจวํ [Pg.28] สปฺปโยคํ ตุ, ญตฺวาน วจนทฺวยํ; กาตพฺโพ ปน โวหาโร, ยถาปาฬิ วิภาวินา. इस प्रकार इन दोनों वचनों के सही प्रयोग को जानकर, विद्वान को पालि के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए। อิทานิ กาลาทิวเสน อาขฺยาตปฺปวตฺตึ ทีปยิสฺสาม – กาลการกปุริสปริทีปกํ กฺริยาลกฺขณํ อาขฺยาติกํ. ตตฺร กาลนฺติ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนวเสน ตโย กาลา, อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนาณตฺติปริกปฺปกาลาติปตฺติวเสน ปน ฉ, เต เอเกกา ติปุริสกา. अब हम काल आदि के अनुसार आख्यात (क्रिया) की प्रवृत्ति को स्पष्ट करेंगे—काल, कारक और पुरुष को प्रकाशित करने वाला क्रिया का लक्षण 'आख्यात' है। वहाँ काल के रूप में अतीत, अनागत और प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) के भेद से तीन काल हैं; किन्तु अतीत, अनागत, प्रत्युत्पन्न, आज्ञा (आणत्ति), परिकल्प और कालातिपत्ति के भेद से छह काल हैं, और उनमें से प्रत्येक तीन-तीन पुरुषों वाले हैं। วุตฺตปฺปการกาเลสุ, ยทิทํ วตฺตเต ยโต; อาขฺยาติกํ ตโต ตสฺส, กาลทีปนตา มตา. क्योंकि यह आख्यात उक्त प्रकार के कालों में प्रवृत्त होता है, इसलिए इसे काल को प्रकाशित करने वाला माना गया है। การกนฺติ กมฺมกตฺตุภาวา. เต หิ อุปจารมุขฺยสภาววเสน กโรนฺติ กรณนฺติ จ ‘‘การกา’’ติ วุจฺจนฺติ. เตว ยถากฺกมํ กฺริยานิมิตฺต ตํสาธก ตํสภาวาติ เวทิตพฺพา. कारक का अर्थ कर्म, कर्ता और भाव है। वे उपचार (गौण) और मुख्य स्वभाव के कारण 'करते हैं' और 'करण' (साधन) होने से 'कारक' कहे जाते हैं। उन्हें क्रमशः क्रिया का निमित्त, उसका साधक और उसका स्वभाव समझना चाहिए। กมฺมํ กตฺตา จ ภาโว จ, อิจฺเจวํ การกา ติธา; วิภตฺติปจฺจยา เอตฺถ, วุตฺตา นาญฺญตฺร สจฺจโต. कर्म, कर्ता और भाव—इस प्रकार कारक तीन प्रकार के हैं; यहाँ विभक्ति और प्रत्यय इन्हीं के लिए कहे गए हैं, वास्तव में अन्य किसी के लिए नहीं। ‘‘ปริภวิยฺยติ’’จฺจาที, กมฺเม สิชฺฌนฺติ การเก; ‘‘สมฺภวตี’’ติอาทีนิ, สิชฺฌเร กตฺตุการเก. “परिभूयते” (तिरस्कृत किया जाता है) आदि कर्म कारक में सिद्ध होते हैं; “सम्भवति” आदि कर्ता कारक में सिद्ध होते हैं। ‘‘วิภวิยฺยติ’’อิจฺจาที, ภาเว สิชฺฌนฺติ การเก; ติวิเธสฺเววเมเตสุ, วิภตฺติปจฺจยา มตา. “विभूयते” आदि भाव कारक में सिद्ध होते हैं; इन तीनों प्रकारों में ही विभक्ति और प्रत्यय माने गए हैं। การกตฺตยมุตฺตํ ยํ, อาขฺยาตํ นตฺถิ สพฺพโส; ตสฺมา ตทฺทีปนตฺตมฺปิ, ตสฺสาขฺยาตสฺส ภาสิตํ. ऐसा कोई भी आख्यात (क्रिया) सर्वथा नहीं है जो इन तीन कारकों से मुक्त हो; इसलिए उस आख्यात का उन कारकों को प्रकाशित करना भी कहा गया है। การกตฺตํ ตุ ภาวสฺส, สเจปิ น สมีริตํ; การกลกฺขเณ เตน, ภาเวน จ อวตฺถุนา. यदि भाव का कारकत्व नहीं भी कहा गया है, तो भी कारक के लक्षण के कारण उस भाव और अवस्तु (अद्रव्य) के द्वारा— กฺริยานิปฺผตฺติ [Pg.29] นตฺถีติ, ยุตฺติโตปิ จ นตฺถิ ตํ; ตถาปาขฺยาติเก ตสฺส, ตพฺโพหาโร นิรุตฺติยํ; ปติฏฺฐิตนโยวาติ, มนฺตฺวา อมฺเหหิ ภาสิโต. क्रिया की निष्पत्ति नहीं होती, ऐसा युक्ति से भी नहीं है; फिर भी आख्यात में उसका वह व्यवहार निरुक्ति (व्याकरण) में प्रतिष्ठित पद्धति ही है, ऐसा मानकर हमारे द्वारा कहा गया है। ปุริโสติ เอกวจนพหุวจนกา ปฐมมชฺฌิมุตฺตมปุริสา. ตตฺถ ปฐมปุริโส อาขฺยาตปเทน ตุลฺยาธิกรเณ สาธกวาจเก วา กมฺมวาจเก วา ตุมฺหา’มฺหสทฺทวชฺชิเต ปจฺจตฺตวจนภูเต นามมฺหิ ‘‘อภินีหาโร สมิชฺฌติ, โพธิ วุจฺจติ จตูสุ มคฺเคสุญาณ’’นฺติอาทีสุ วิย ปยุชฺชมาเนปิ, ตฏฺฐานิยตฺเต สติ ‘‘ภาสติ วา กโรติ วา, ปีฬิยกฺโขติ มํ วิทู, วุจฺจตีติ วจน’’นฺติอาทีสุ วิย อปฺปยุชฺชมาเนปิ สพฺพธาตูหิ ปโร โหติ. กตฺถจิ ปน ปาฬิปฺปเทเส นามสฺส อปฺปยุตฺตตฺตา ปฐมปุริสปโยคตฺโถ ทุรนุโพโธ ภวติ, ยถา ‘‘ทุกฺขํ เต เวทยิสฺสามิ, ตตฺถ อสฺสาสยนฺตุ ม’’นฺติ. ตถา หิ เอตฺถ ‘‘ปาทา’’ติ ปาฐเสโส, ตสฺมึ ทุกฺขสาสนาโรจเน วตฺตุํ อวิสหนวเสน กิลมนฺตํ มํ เทวสฺส อุโภ ปาทา อสฺสาเสนฺตุ, วิสฺสฏฺโฐ กเถหีติ มํ วทถาติ อธิปฺปาโย จ ภวติ. 'पुरुष' का अर्थ एकवचन और बहुवचन वाले प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष हैं। वहाँ प्रथम पुरुष, आख्यात पद (क्रिया) के साथ समानाधिकरण होने पर, साधक-वाचक (कर्तृवाच्य) या कर्म-वाचक (कर्मवाच्य) में, 'तुम' और 'मैं' शब्दों को छोड़कर प्रथमा विभक्ति वाले नाम के साथ "अभिनिहार सिद्ध होता है, चार मार्गों के ज्ञान को बोधि कहा जाता है" इत्यादि के समान प्रयोग किए जाने पर भी, और उसके स्थान पर होने पर "बोलता है या करता है, मुझे पीलियक्ष के रूप में जानते हैं, कहा जाता है इसलिए वचन है" इत्यादि के समान प्रयोग न किए जाने पर भी सभी धातुओं से परे होता है। किन्तु कहीं-कहीं पालि पाठ में नाम का प्रयोग न होने से प्रथम पुरुष के प्रयोग का अर्थ समझना कठिन हो जाता है, जैसे "मैं तुम्हें दुःख बताऊंगा, वहाँ वे मुझे आश्वस्त करें"। क्योंकि यहाँ "पाद" (चरण) पाठ शेष है, उस दुःखद सन्देश को कहने में असमर्थता के कारण थकते हुए मुझे देव के दोनों चरण आश्वस्त करें, 'निश्चिंत होकर कहो' ऐसा मुझसे कहें - यह अभिप्राय होता है। อธิปฺปาโย สุทุพฺโพโธ, ยสฺมา วิชฺชติ ปาฬิยํ; ตสฺมา อุปฏฺฐหํ คณฺเห, ครุํ ครุมตํ วิทู. चूँकि पालि में अभिप्राय बहुत दुर्बोध (कठिनता से समझने योग्य) होता है; इसलिए विद्वान को चाहिए कि वह गुरुजनों के पास उपस्थित होकर (उनकी सेवा कर) अर्थ ग्रहण करे। ตตฺริมานิ ภูธาตาธิการตฺตา ภูธาตุวเสน นิทสฺสนปทานิ. โส ปริภวติ, เต ปริภวนฺติ, ปริภวติ, ปริภวนฺติ. สปตฺโต อภิภวิยเต, สพฺพา วิตฺยา’นุภูยเต, อภิภวิยเต, อนุภูยเตติ. ยตฺถ สติปิ นามสฺส สาธกวาจกตฺเต อปจฺจตฺตวจนตฺตา อาขฺยาตปเทน ตุลฺยาธิกรณตา น ลพฺภติ, ตตฺถ กมฺมวาจกํ ปจฺจตฺตวจนภูตํ ตุลฺยาธิกรณปทํ ปฏิจฺจ ปฐมปุริสาทโย ตโย ลพฺภนฺติ. ตํ [Pg.30] ยถา? ปริภวิยฺยเต ปุริโส เทวทตฺเตน, ปริภวิยฺยเส ตฺวํ เทวทตฺเตน, ปริภวิยฺยมฺเห มยํ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ. เอตฺถ ปนิทํ วจนํ น วตฺตพฺพํ ‘‘นินฺทนฺติ ตุณฺหิมาสิน’นฺติอาทีสุ สติปิ นามสฺส กมฺมวาจกตฺเต อปจฺจตฺตวจนตฺตา อาขฺยาตปเทน ตุลฺยาธิกรณตา น ลพฺภตีติ ปฐมปุริสุปฺปตฺติ น สิยา’’ติ. กสฺมาติ เจ? ‘‘นินฺทนฺติ ตุณฺหิมาสิน’’นฺติอาทีสุ ‘‘ชนา’’ติ อชฺฌาหริตพฺพสฺส สาธกวาจกสฺส นามสฺส สทฺธิมาขฺยาตปเทน ตุลฺยาธิกรณภาวสฺส อิจฺฉิตตฺตา. เอวมุตฺตรตฺราปิ นโย. यहाँ 'भू' धातु के अधिकार के कारण 'भू' धातु के अनुसार ये उदाहरण के पद हैं। वह तिरस्कार करता है, वे तिरस्कार करते हैं, तिरस्कार करता है, तिरस्कार करते हैं। शत्रु पराजित किया जाता है, सभी संपत्ति का अनुभव किया जाता है, पराजित किया जाता है, अनुभव किया जाता है। जहाँ नाम के कर्तावाचक होने पर भी प्रथमा विभक्ति न होने के कारण आख्यात पद (क्रिया) के साथ समानाधिकरणता प्राप्त नहीं होती, वहाँ कर्मवाचक प्रथमा विभक्ति वाले समानाधिकरण पद की अपेक्षा से प्रथम पुरुष आदि तीनों प्राप्त होते हैं। जैसे- देवदत्त द्वारा पुरुष का तिरस्कार किया जाता है, देवदत्त द्वारा तुम्हारा तिरस्कार किया जाता है, अकुशल धर्मों द्वारा हमारा तिरस्कार किया जाता है। यहाँ यह नहीं कहना चाहिए कि 'निन्दन्ति तुण्हिमासीनं' आदि में नाम के कर्मवाचक होने पर भी प्रथमा विभक्ति न होने के कारण आख्यात पद के साथ समानाधिकरणता प्राप्त नहीं होती, इसलिए प्रथम पुरुष की उत्पत्ति नहीं होगी। क्यों? क्योंकि 'निन्दन्ति तुण्हिमासीनं' आदि में 'जनाः' (लोग) इस अध्याहृत कर्तावाचक नाम का आख्यात पद के साथ समानाधिकरण भाव इष्ट है। इसी प्रकार आगे भी नियम है। มชฺฌิมปุริโส อาขฺยาตปเทน ตุลฺยาธิกรเณ สาธกวาจเก วา กมฺมวาจเก วา ปจฺจตฺตวจนภูเต ตุมฺหสทฺเท ปยุชฺชมาเนปิ, ตฏฺฐานิยตฺเต สติ อปฺปยุชฺชมาเนปิ สพฺพธาตูหิ ปโร โหติ. ตฺวํ อติภวสิ, ตุมฺเห อติภวถ, อติภวสิ, อติภวถ. ตฺวํ ปริภวิยเส เทวทตฺเตน, ตุมฺเห ปริภวิยวฺเห. ยตฺถ สติปิ ตุมฺหสทฺทสฺส สาธกวาจกตฺเต อปจฺจตฺตวจนตฺตา อาขฺยาตปเทน ตุลฺยาธิกรณตา น ลพฺภติ, น ตตฺถ มชฺฌิมปุริโส โหติ. อิตเร ปน ทฺเว โหนฺติ กมฺมวาจกํ ปจฺจตฺตวจนภูตํ ตุลฺยาธิกรณปทํ ปฏิจฺจ. ตํ ยถา? ตยา อภิภวิยเต สปตฺโต, ตยา อภิภวิเย อหํ. मध्यम पुरुष आख्यात पद के साथ समानाधिकरण होने पर, कर्तावाचक या कर्मवाचक प्रथमा विभक्ति वाले 'तुम्ह' (तुम) शब्द के प्रयोग होने पर, अथवा उसके स्थान पर होने के कारण प्रयोग न होने पर भी सभी धातुओं से परे होता है। तुम अतिक्रमण करते हो, तुम सब अतिक्रमण करते हो, अतिक्रमण करते हो, अतिक्रमण करते हो। देवदत्त द्वारा तुम्हारा तिरस्कार किया जाता है, तुम सबका तिरस्कार किया जाता है। जहाँ 'तुम्ह' शब्द के कर्तावाचक होने पर भी प्रथमा विभक्ति न होने के कारण आख्यात पद के साथ समानाधिकरणता प्राप्त नहीं होती, वहाँ मध्यम पुरुष नहीं होता। किन्तु कर्मवाचक प्रथमा विभक्ति वाले समानाधिकरण पद की अपेक्षा से अन्य दो (प्रथम और उत्तम पुरुष) होते हैं। जैसे- तुम्हारे द्वारा शत्रु पराजित किया जाता है, तुम्हारे द्वारा मैं पराजित किया जाता हूँ। อุตฺตมปุริโส อาขฺยาตปเทน ตุลฺยาธิกรเณ สาธกวาจเก วา กมฺมวาจเก วา ปจฺจตฺตวจนภูเต อมฺหสทฺเท ปยุชฺชมาเนปิ, ตฏฺฐานิยตฺเต สติ อปฺปยุชฺชมาเนปิ สพฺพธาตูหิ ปโร โหติ. อหํ ปริภวามิ, มยํ ปริภวาม, ปริภวามิ, ปริภวาม. อหํ ปริภวิยฺยามิ อกุสเลหิ ธมฺเมหิ, มยํ ปริภวิยฺยาม, ปริภวิยฺยามิ, ปริภวิยฺยาม. ยตฺถ สติปิ อมฺหสทฺทสฺส สาธกวาจกตฺเต อปจฺจตฺตวจนตฺตา อาขฺยาตปเทน ตุลฺยาธิกรณตา น ลพฺภติ, น ตตฺถ [Pg.31] อุตฺตมปุริโส โหติ. อิตเร ปน ทฺเว โหนฺติ กมฺมวาจกํ ปจฺจตฺตวจนภูตํ ตุลฺยาธิกรณปทํ ปฏิจฺจ. ตํ ยถา? มยา อนุภวิยเต สมฺปตฺติ, มยา อภิภวิยเส ตฺวํ. เอวํ ยตฺถ ยตฺถ สาธกวาจกานํ วา กมฺมวาจกานํ วา นามาทีนํ ปจฺจตฺตวจนภูตานํ อาขฺยาตปเทหิ ตุลฺยาธิกรณตฺเต ลทฺเธ ตตฺถ ตตฺถ ปฐมปุริสาทโย ลพฺภนฺติ, ตสฺมา นามาทีนํ ปจฺจตฺตวจนภูตานํ ตุลฺยาธิกรณภาโวเยว ปฐมปุริสาทีนมุปฺปตฺติยา การณํ. उत्तम पुरुष आख्यात पद के साथ समानाधिकरण होने पर, कर्तावाचक या कर्मवाचक प्रथमा विभक्ति वाले 'अम्ह' (मैं) शब्द के प्रयोग होने पर, अथवा उसके स्थान पर होने के कारण प्रयोग न होने पर भी सभी धातुओं से परे होता है। मैं तिरस्कार करता हूँ, हम तिरस्कार करते हैं, तिरस्कार करता हूँ, तिरस्कार करते हैं। अकुशल धर्मों द्वारा मेरा तिरस्कार किया जाता है, हमारा तिरस्कार किया जाता है, तिरस्कार किया जाता है, तिरस्कार किया जाता है। जहाँ 'अम्ह' शब्द के कर्तावाचक होने पर भी प्रथमा विभक्ति न होने के कारण आख्यात पद के साथ समानाधिकरणता प्राप्त नहीं होती, वहाँ उत्तम पुरुष नहीं होता। किन्तु कर्मवाचक प्रथमा विभक्ति वाले समानाधिकरण पद की अपेक्षा से अन्य दो (प्रथम और मध्यम पुरुष) होते हैं। जैसे- मेरे द्वारा संपत्ति का अनुभव किया जाता है, मेरे द्वारा तुम पराजित किए जाते हो। इस प्रकार जहाँ-जहाँ कर्तावाचक या कर्मवाचक नाम आदि की प्रथमा विभक्ति होने पर आख्यात पदों के साथ समानाधिकरणता प्राप्त होती है, वहाँ-वहाँ प्रथम पुरुष आदि प्राप्त होते हैं, इसलिए नाम आदि की प्रथमा विभक्ति का समानाधिकरण भाव ही प्रथम पुरुष आदि की उत्पत्ति का कारण है। ทฺวินฺนํ ติณฺณํ วา ปุริสานเมกาภิธาเน ปโร ปุริโส คเหตพฺโพ. เอตฺถ เอกาภิธานํ นาม เอกโต อภิธานํ เอกกาลาภิธานญฺจ. ตญฺจ โข จสทฺทปโยเคเยว, อจสทฺทปโยเค ภินฺนกาลาภิธาเน ตคฺคหณาภาวโต. ‘‘ตุมฺเห อตฺถกุสลา ภวถ, มยมตฺถกุสลา ภวาม’’ อิจฺเจวมาทโย ตปฺปโยคา. ตตฺถ ตุมฺเห อตฺถกุสลา ภวถ – อิจฺเจตสฺมึ โวหาเร ‘‘โส จ อตฺถกุสโล ภวติ, ตฺวญฺจ อตฺถกุสโล ภวสิ, ตุมฺเห อตฺถกุสลา ภวถา’’ติ เอวํ ทฺวินฺนเมกาภิธาเน ปโร ปุริโส คเหตพฺโพ. ‘‘มยมตฺถกุสลา ภวาม’’ อิจฺเจตสฺมึ ปน ‘‘โส จ อตฺถกุสโล ภวติ, อหญฺจ อตฺถกุสโล ภวามิ, มยมตฺถกุสลา ภวามา’’ติ วา ‘‘ตฺวญฺจ อตฺถกุสโล ภวสิ, อหญฺจ อตฺถกุสโล ภวามิ, มยมตฺถกุสลา ภวามา’’ติ วา เอวมฺปิ ทฺวินฺนเมกาภิธาเน ปโร ปุริโส คเหตพฺโพ. ‘‘โส จ อตฺถกุสโล ภวติ, ตฺวญฺจ อตฺถกุสโล ภวสิ, อหญฺจ อตฺถกุสโล ภวามิ, มยมตฺถกุสลา ภวามา’’ติ วา ‘‘โส จ อตฺถกุสโล ภวติ, เต จ อตฺถกุสลา ภวนฺติ, ตฺวญฺจ อตฺถกุสโล ภวสิ, ตุมฺเห จ อตฺถกุสลา ภวถ, อหญฺจ อตฺถกุสโล ภวามิ, มยมตฺถกุสลา ภวามา’’ติ วา เอวํ ติณฺณเมกาภิธาเน ปโร ปุริโส คเหตพฺโพ. दो या तीन पुरुषों के एक साथ कथन (एकाभिधान) में बाद वाला पुरुष ग्रहण करना चाहिए। यहाँ एकाभिधान का अर्थ है एक साथ कथन और एक ही काल में कथन। और वह 'च' शब्द के प्रयोग में ही होता है, 'च' शब्द के प्रयोग के बिना भिन्न काल में कथन होने पर उसे ग्रहण नहीं किया जाता। 'तुम सब अर्थ-कुशल हो, हम सब अर्थ-कुशल हैं' इत्यादि इसके प्रयोग हैं। वहाँ 'तुम सब अर्थ-कुशल हो' - इस व्यवहार में 'वह भी अर्थ-कुशल है और तुम भी अर्थ-कुशल हो, तुम सब अर्थ-कुशल हो' इस प्रकार दो के एकाभिधान में बाद वाला पुरुष (मध्यम पुरुष) ग्रहण करना चाहिए। 'हम सब अर्थ-कुशल हैं' इसमें 'वह भी अर्थ-कुशल है और मैं भी अर्थ-कुशल हूँ, हम सब अर्थ-कुशल हैं' अथवा 'तुम भी अर्थ-कुशल हो और मैं भी अर्थ-कुशल हूँ, हम सब अर्थ-कुशल हैं' इस प्रकार भी दो के एकाभिधान में बाद वाला पुरुष (उत्तम पुरुष) ग्रहण करना चाहिए। 'वह भी अर्थ-कुशल है, तुम भी अर्थ-कुशल हो और मैं भी अर्थ-कुशल हूँ, हम सब अर्थ-कुशल हैं' अथवा 'वह भी अर्थ-कुशल है, वे भी अर्थ-कुशल हैं, तुम भी अर्थ-कुशल हो, तुम सब भी अर्थ-कुशल हो, मैं भी अर्थ-कुशल हूँ और हम सब भी अर्थ-कुशल हैं' इस प्रकार तीन के एकाभिधान में बाद वाला पुरुष (उत्तम पुरुष) ग्रहण करना चाहिए। อปโรปิ [Pg.32] อตฺถนโย วุจฺจติ – ‘‘ตฺวญฺจ อตฺถกุสโล ภวสิ, โส จ อตฺถกุสโล ภวติ, ตุมฺเห อตฺถกุสลา ภวถา’’ติ วา ‘‘อหญฺจ อตฺถกุสโล ภวามิ, โส จ อตฺถกุสโล ภวติ, มยมตฺถกุสลา ภวามา’’ติ วา อิมินา นเยน อเนกปฺปเภโท อตฺถนโย. เอวํ เสสาสุ วิภตฺตีสุ ปญฺจมีสตฺตมิยาทีสุ ปโรปุริโส คเหตพฺโพ. สพฺเพสุ จ กฺริยาปเทสุ พวฺหตฺถวาจเกสุ พหุวจนนฺเตสุ, น ปน พหุวจนนฺเตสุปิ เอกสฺสตฺตโน วาจเกสุ ครุกาตพฺพสฺเสกสฺสตฺถสฺส วาจเกสุ จ กฺริยาปเทสุ. เอตฺถ โจทนาสนฺทีปนิโย อิมา คาถา – एक अन्य अर्थ-नय भी कहा जाता है - 'तुम भी अर्थ-कुशल हो और वह भी अर्थ-कुशल है, तुम सब अर्थ-कुशल हो' अथवा 'मैं भी अर्थ-कुशल हूँ और वह भी अर्थ-कुशल है, हम सब अर्थ-कुशल हैं' इस नय से अनेक प्रकार के अर्थ-नय हैं। इसी प्रकार शेष विभक्तियों जैसे पंचमी, सप्तमी आदि में भी बाद वाला पुरुष ग्रहण करना चाहिए। और बहुत्व अर्थ को बताने वाले सभी क्रियापदों में बहुवचन होता है, किन्तु बहुवचन होने पर भी स्वयं एक के वाचक और आदरणीय एक व्यक्ति के वाचक क्रियापदों में (यह नियम) नहीं होता। यहाँ प्रेरणा और स्पष्टीकरण के लिए ये गाथाएँ हैं - ‘‘ตฺวญฺจ ภวสิ โส จาปิ, ภวติ’’จฺจาทิภาสเน; ‘‘ตุมฺเห ภวถ’’ อิจฺจาทิ, ปโรโปโส กถํ สิยา?; “तुम हो और वह भी है” इत्यादि भाषण में; “तुम सब हो” इत्यादि मध्यम पुरुष (पर-पुरुष) कैसे होता है? ‘‘อหํ ภวามิ โส จาปิ, ภวติ’’จฺจาทิภาสเน; ‘‘มยํ ภวาม’’อิจฺจาทิ, อุตฺตโม จ กถํ สิยา?; “मैं हूँ और वह भी है” इत्यादि भाषण में; “हम सब हैं” इत्यादि उत्तम पुरुष कैसे होता है? เอตฺถ จ วุจฺจเต – यहाँ यह कहा जाता है – ปจฺฉา วุตฺโต ปโร นาม, สญฺญาย ปฏิปาฏิยา; เอวํ ปน คเหตพฺโพ, ปโรปุริสนามโก. संज्ञा के क्रम के अनुसार जो बाद में कहा गया है उसे 'पर' (मध्यम) नाम दिया गया है; इस प्रकार 'परोपुरिस' (मध्यम पुरुष) को ग्रहण करना चाहिए। ปฐมมฺหา ปโร นาม, มชฺฌิโม อุตฺตโมปิ จ; มชฺฌิมมฺหา ปโร นาม, อุตฺตโม ปุริโส รุโต. प्रथम पुरुष के बाद मध्यम और उत्तम पुरुष 'पर' कहलाते हैं; मध्यम पुरुष के बाद उत्तम पुरुष को 'पर' कहा गया है। เอวํ ตุ คหณญฺเหตฺถ, โวหารสฺสานุโลมกํ; โทโส ตทนุโลมมฺหิ, คหณสฺมึ น วิชฺชติ. यहाँ इस प्रकार का ग्रहण लोक-व्यवहार के अनुकूल है; उसके अनुकूल ग्रहण करने में कोई दोष नहीं है। ‘‘ตฺวญฺจ ภทฺเท สุขี โหหิ, เอโส จาปิ มหามิโค’’; อิติ ปาโฐ ยโต ทิฏฺโฐ, ตสฺมา เอวํ วเทมเส. “हे भद्रे! तुम सुखी होओ और यह मृगराज भी”; चूँकि ऐसा पाठ देखा गया है, इसलिए हम ऐसा कहते हैं। ‘‘ตุมฺเห ทฺเว สุขิตา โหถ’’, อิจฺจตฺโถ ตตฺถ ทิสฺสติ; เอวํปฺยยํ นโย วุตฺโต, อตฺตโนมติยา มม. “तुम दोनों सुखी होओ”, ऐसा अर्थ वहाँ दिखाई देता है; इस प्रकार यह नियम मेरी अपनी मति (विचार) से कहा गया है। อตฺตโนมติ [Pg.33] กิญฺจาปิ, กถิตา สพฺพทุพฺพลา; ตถาปิ นยมาทาย, กถิตตฺตา อโกปิยา. यद्यपि अपनी मति (निजी विचार) को सर्वथा दुर्बल कहा गया है, तथापि (व्याकरण के) नियम को लेकर कहे जाने के कारण यह अमान्य नहीं है। ‘‘ธมฺเมน รชฺชํ กาเรนฺตํ, รฏฺฐา ปพฺพาชยิตฺถ มํ; ตฺวญฺจ ชานปทา เจว, เนคมา จ สมาคตา’’. “धर्मपूर्वक राज्य करते हुए मुझे, तुमने और यहाँ एकत्र हुए जनपदवासियों तथा नगरवासियों ने राष्ट्र से निर्वासित कर दिया।” ‘‘อหญฺจ มทฺทิเทวี จ, ชาลีกณฺหาชินา จุโภ; อญฺญมญฺญํ โสกนุทา, วสาม อสฺสเม ตทา’’. “मैं और मद्री देवी, तथा जाली और कन्हाजिना दोनों; एक-दूसरे के शोक को दूर करते हुए, तब हम आश्रम में रहते थे।” เอตา คาถาปิ เอตสฺส, อตฺถสฺส ปน สาธิกา; ตาสุ วุตฺตนเยเนว, อตฺโถ สุปากโฏ สิยา; เอวํ วิญฺญูหิ วิญฺเญยฺยํ, พหุนา ภาสิเตน กึ. ये गाथाएँ भी इस अर्थ को सिद्ध करने वाली हैं; उनमें बताए गए नियम से ही अर्थ भली-भाँति स्पष्ट हो जाता है; विद्वानों को इसी प्रकार समझना चाहिए, अधिक कहने से क्या लाभ? อากาเรน มนาเปน, กถเน เยน เกนจิ; น วิรุชฺฌติ เจ อตฺโถ, ตํ ปมาณํ สุธีมตํ. जिस किसी भी प्रिय ढंग से कहने पर यदि अर्थ में विरोध न हो, तो बुद्धिमानों के लिए वही प्रमाण है। ปุริสตฺตยโต เอโส, ปโรปุริสนามโก; นุปลพฺภติ ปจฺเจกํ, ตทนฺโตคธโตว ยํ. तीनों पुरुषों में से यह 'परोपुरिस' (पर-पुरुष) नाम वाला अलग से नहीं पाया जाता, क्योंकि यह उन्हीं के अन्तर्गत समाहित है। ปาฏวตฺถาย โสตูนํ, โวหารตฺเถสุ สพฺพโส; วิสุํ อลพฺภมาโนปิ, ลพฺภมาโนว อุทฺธโฏ. श्रोताओं की लोक-व्यवहार के अर्थों में कुशलता के लिए, अलग से न पाए जाने पर भी, इसे पाए जाने वाले के समान ही उद्धृत किया गया है। สงฺเขปโตเปตฺถ ปุริสปฺปวตฺติ เอวํ อุปลกฺขิตพฺพา ‘‘อมฺหวจนตฺเถ อุตฺตโม, ตุมฺหวจนตฺเถ มชฺฌิโม, อญฺเญสํ วจนตฺเถ ปฐโม’’ติ. संक्षेप में यहाँ पुरुषों की प्रवृत्ति इस प्रकार समझनी चाहिए— “अस्मद् (मैं) शब्द के अर्थ में उत्तम पुरुष, युष्मद् (तुम) शब्द के अर्थ में मध्यम पुरुष, और अन्य शब्दों के अर्थ में प्रथम पुरुष होता है।” ตฺยาทีนํ ปุริสสญฺญา, ยสฺมา วุตฺตา ตโต อิทํ; ตพฺพนฺตาขฺยาติกํ เญยฺยํ, ปุริสปริทีปกํ. चूँकि 'ति' आदि (प्रत्ययों) की पुरुष संज्ञा कही गई है, इसलिए उन प्रत्ययों से अन्त होने वाले आख्यात (क्रिया) को पुरुष का बोध कराने वाला समझना चाहिए। เอวํ สพฺพถาปิ อาขฺยาติกสฺส กาลการกปุริสปริทีปนตา วุตฺตา. इस प्रकार सब प्रकार से आख्यात (क्रिया) की काल, कारक और पुरुष को प्रकाशित करने वाली प्रकृति कही गई है। กฺริยาลกฺขณนฺติ เอตฺถ กถํ อาขฺยาติกสฺส กฺริยาลกฺขณตา เวทิตพฺพา? “क्रिया-लक्षण”—यहाँ आख्यात (क्रिया) की क्रिया-लक्षणता कैसे समझनी चाहिए? ลกฺขิยติ [Pg.34] กฺริยาเยตํ, กฺริยา วา อสฺส ลกฺขณํ; กฺริยาลกฺขณตา เอวํ, เวทิตพฺพา ตถา หิ จ. यह क्रिया के द्वारा लक्षित होता है, अथवा क्रिया ही इसका लक्षण है; इस प्रकार इसकी क्रिया-लक्षणता समझनी चाहिए, क्योंकि ऐसा ही है। ‘‘คจฺฉติ’’จฺจาทิกํ สุตฺวา, กฺริยาสนฺทีปนํ ปทํ; ‘‘อาขฺยาติก’’นฺติ ธีเรหิ, อาขฺยาตญฺญูหิ สญฺญิตํ. “गच्छति” (वह जाता है) इत्यादि क्रिया को प्रकाशित करने वाले पद को सुनकर, आख्यात के ज्ञाता विद्वानों ने उसे “आख्यात” (क्रियापद) की संज्ञा दी है। ลกฺขณํ โหติ นามสฺส, ยถา สตฺวาภิธานตา; กฺริยาภิธานตา เอวํ, อาขฺยาตสฺเสว ลกฺขณํ. जिस प्रकार सत्त्व (द्रव्य/वस्तु) का कथन करना नाम (संज्ञा) का लक्षण है, उसी प्रकार क्रिया का कथन करना आख्यात (क्रियापद) का ही लक्षण है। อตฺถโต ปน เอตสฺส, กฺริยาวาจกตา อิธ; ลกฺขณํ อิติ วิญฺเญยฺยํ, ลกฺขณญฺญูหิ ลกฺขิตํ. अर्थ की दृष्टि से, यहाँ इसकी क्रिया-वाचकता को ही लक्षण समझना चाहिए, जैसा कि लक्षण-शास्त्र के ज्ञाताओं द्वारा लक्षित किया गया है। ‘‘กึ กโรสี’’ติ ปุฏฺฐสฺส, ‘‘ปจามิ’’จฺจาทินา ‘‘อหํ’’; ปฏิวาจาย ทาเนน, กฺริยาวาจกตา มตา. “तुम क्या कर रहे हो?” ऐसा पूछे जाने पर, “मैं पका रहा हूँ” इत्यादि प्रतिवचन (उत्तर) देने से इसकी क्रिया-वाचकता मानी गई है। เอวมาขฺยาติกสฺส กฺริยาลกฺขณตา เวทิตพฺพา; อิทานิ กาเลสุ วิภตฺติปฺปวตฺติ เอวํ เวทิตพฺพา – इस प्रकार आख्यात की क्रिया-लक्षणता समझनी चाहिए; अब कालों में विभक्तियों की प्रवृत्ति इस प्रकार समझनी चाहिए – ปจฺจุปฺปนฺนมฺหิ กาลสฺมึ, วตฺตมานา ปวตฺตติ; อาสิฏฺฐาณาปนตฺเถสุ, ปจฺจุปฺปนฺนมฺหิ ปญฺจมี. वर्तमान काल में 'वर्तमाना' (लट् लकार) विभक्ति होती है; आशीर्वाद और आज्ञा के अर्थ में वर्तमान काल में 'पञ्चमी' (लोट् लकार) होती है। ปจฺจุปฺปนฺเน ปริกปฺปา-นุมตฺยตฺเถสุ สตฺตมี; อปฺปจฺจกฺเข อตีตมฺหิ, ปโรกฺขา สมฺปวตฺตติ. वर्तमान काल में सम्भावना (परिकल्प) और अनुमति के अर्थ में 'सत्तमी' (विधिलिङ् लकार) होती है; परोक्ष (जो आँखों के सामने न हो) भूतकाल में 'परोक्खा' (लिट् लकार) होती है। หิยฺโย ปภุติ กาลสฺมึ, อตีตมฺหิ ปวตฺตติ; ปจฺจกฺเข วา อปจฺจกฺเข, หิยฺยตฺตนี นิรุตฺติตา. कल से लेकर बीते हुए समय (अनद्यतन भूत) में 'हिय्यत्तनी' (लङ् लकार) होती है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या परोक्ष। อชฺชปฺปภุติ กาลสฺมึ, อตีตมฺหิ ปวตฺตติ; ปจฺจกฺเข วา อปจฺจกฺเข, สมีเปชฺชตนวฺหยา. आज से लेकर बीते हुए समय (अद्यतन भूत) में 'अज्जतनी' (लुङ् लकार) होती है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या परोक्ष। อนาคเต ภวิสฺสนฺตี, กาลสฺมึ สมฺปวตฺตติ; กฺริยาติปนฺนมตฺตมฺหิ, ตีเต กาลาติปตฺติกา; อนาคเตปิ โหตีติ, นิรุตฺตญฺญูหิ ภาสิตา. भविष्य काल में 'भविस्सन्ती' (लृट् लकार) होती है; क्रिया की असिद्धि (विफलता) होने पर भूतकाल में 'कालातिपत्तिका' (लृङ् लकार) होती है; वैयाकरणों ने कहा है कि यह भविष्य काल में भी होती है। เอวํ กาเลสุ วิภตฺติปฺปวตฺตึ ญตฺวา เย เต สุตฺตนฺเตสุ วิจิตฺตา สุวิสทวิปุลติขิณพุทฺธิวิสยภูตา ปโยคา ทิสฺสนฺติ, เตสุ ปาฏวมิจฺฉนฺเตหิ ตฺยาทิกฺกเมน วุจฺจมานา กฺริยาปทมาลา [Pg.35] สลฺลกฺขิตพฺพา – ภวติ, ภวนฺติ. ภวสิ, ภวถ. ภวามิ, ภวาม. ภวเต, ภวนฺเต. ภวเส, ภววฺเห. ภเว, ภวามฺเห. อยํ อญฺญโยคาทิรหิตา กฺริยาปทมาลา. इस प्रकार कालों में विभक्तियों की प्रवृत्ति को जानकर, जो वे सुत्तन्तों में विचित्र, सुविशद, विपुल और तीक्ष्ण बुद्धि के विषयभूत प्रयोग दिखाई देते हैं, उनमें कुशलता चाहने वालों के द्वारा 'ति' आदि के क्रम से कही जाने वाली क्रियापद-माला को लक्षित करना चाहिए - भवति, भवन्ति। भवसि, भवथ। भवामि, भवाम। भवते, भवन्ते। भवसे, भववहे। भवे, भवामहे। यह 'अन्ययोग' आदि से रहित क्रियापद-माला है। ทิสฺสนฺติ จ สุตฺตนฺเตสุ อตฺถสมฺภเวปิ อญฺญโยคาทิรหิตานิ กฺริยาปทานิ. เสยฺยถิทํ? ‘‘สพฺเพ สงฺขารา อนิจฺจาติ, ยทา ปญฺญาย ปสฺสติ. ยํ มํ ภณสิ สารถิ. อญฺญํ เสปณฺณิ คจฺฉามิ’’ อิจฺเจวมาทีนิ เอตสฺสตฺถสฺส ปริทีปนิยา กฺริยาปทมาลา. और सुत्तन्तों में अर्थ के संभव होने पर भी 'अन्ययोग' आदि से रहित क्रियापद दिखाई देते हैं। जैसे कि - 'सब्बे सङ्खारा अनिच्चाति, यदा पञ्ञाय पस्सति' (जब प्रज्ञा से देखता है कि सभी संस्कार अनित्य हैं)। 'यं मं भणसि सारथि' (हे सारथि! जो तुम मुझे कहते हो)। 'अञ्ञं सेपण्णि गच्छामि' (हे सेपण्णि! मैं दूसरे स्थान पर जाता हूँ) - इस प्रकार आदि इस अर्थ को प्रकाशित करने वाली क्रियापद-माला है। เอตฺถ ติวิโธ กฺริยาปเทสุ โยโค ตโยโค, มโยโค, อญฺญโยโค จ. ตตฺถ มชฺฌิมปุริสา ตโยควเสน คเหตพฺพา, อุตฺตมปุริสา มโยควเสน. ปฐมปุริสา อญฺญโยควเสน. ตฺยาทีนเมตฺถ ปฏิปาฏิยา อยํ อนุคีติ – यहाँ क्रियापदों में तीन प्रकार का योग है - त-योग (मध्यम पुरुष), म-योग (उत्तम पुरुष) और अन्य-योग (प्रथम पुरुष)। वहाँ मध्यम पुरुष 'त-योग' के वश से ग्रहण करने चाहिए, उत्तम पुरुष 'म-योग' के वश से, और प्रथम पुरुष 'अन्य-योग' के वश से। यहाँ 'ति' आदि के क्रम से यह अनुगीति (श्लोक) है - อญฺญโยเคน ปฐมา, ตโยเคน ตุ มชฺฌิมา; มโยเคนุตฺตมา โหนฺติ, คเหตพฺพา วิภาวินา. अन्य-योग से प्रथम (पुरुष), त-योग से मध्यम (पुरुष) और म-योग से उत्तम (पुरुष) होते हैं; विद्वान को ऐसा ग्रहण करना चाहिए। โสตูนํ ปโยเคสุ โกสลฺลตฺถํ อญฺญโยคาทิสหิตมปรมฺปิ กฺริยาปทมาลํ วทาม – โส ภวติ, เต ภวนฺติ. ตฺวํ ภวสิ, ตุมฺเห ภวถ. อหํ ภวามิ, มยํ ภวาม. โส ภวเต, เต ภวนฺเต. ตฺวํ ภวเส, ตุมฺเห ภววฺเห. อหํ ภเว, มยํ ภวามฺเห. อยํ อญฺญโยคาทิสหิตา กฺริยาปทมาลา. श्रोताओं के प्रयोगों में कुशलता के लिए अन्य-योग आदि सहित दूसरी भी क्रियापद-माला कहते हैं - सो भवति (वह होता है), ते भवन्ति (वे होते हैं)। त्वं भवसि (तुम होते हो), तुम्हे भवथ (तुम सब होते हो)। अहं भवामि (मैं होता हूँ), मयं भवाम (हम होते हैं)। सो भवते, ते भवन्ते। त्वं भवसे, तुम्हे भववहे। अहं भवे, मयं भवामहे। यह अन्य-योग आदि सहित क्रियापद-माला है। ทิสฺสนฺติ จ สุตฺตนฺเตสุ อญฺญโยคาทิสหิตานิปิ กฺริยาปทานิ. เสยฺยถิทํ? ‘‘ยํปายํ เทว กุมาโร สุปฺปติฏฺฐิตปาโท, อิทมฺปิมสฺส มหาปุริสสฺส มหาปุริสลกฺขณํ ภวติ, ตสฺสิมานิ สตฺต รตนานิ ภวนฺติ. โย ทนฺธกาเล ตรติ[Pg.36], ตรณีเย จ ทนฺธติ, ตฺวํสิ อาจริโย มม, อหมฺปิ ทฏฺฐุกาโมสฺมิ, ปิตรํ เม อิธาคตํ’’ อิจฺเจวมาทีนิ เอตสฺสตฺถสฺส ปริทีปนิยา กฺริยาปทมาลา. और सुत्तन्तों में अन्य-योग आदि सहित भी क्रियापद दिखाई देते हैं। जैसे कि - 'यं पायं देव कुमारो सुप्पतिट्ठितपादो, इदम्पिमस्स महापुरिसस्स महापुरिसलक्खणं भवति, तस्सिमानि satta ratanāni bhavanti' (हे देव! चूँकि यह कुमार सुप्रतिष्ठित चरणों वाला है, यह भी इस महापुरुष का महापुरुष लक्षण होता है, उसके ये सात रत्न होते हैं)। 'यो दन्धकाले तरति, तरणीये च दन्धति' (जो विलम्ब के समय शीघ्रता करता है, और शीघ्रता के समय विलम्ब करता है)। 'त्वंसि आचरियो मम' (तुम मेरे आचार्य हो)। 'अहम्पि दट्ठुकामोस्मि, पितरं मे इधागतं' (मैं भी यहाँ आए हुए अपने पिता को देखना चाहता हूँ) - इस प्रकार आदि इस अर्थ को प्रकाशित करने वाली क्रियापद-माला है। โย ตุมฺหสทฺเทน วตฺตพฺเพ อตฺเถ นิปตติ, น ปน โหติ ตุมฺหตฺถวาจโก, เนโส สทฺโท กฺริยาปทสฺส ตโยคสหิตตฺตํ สาเธติ, อญฺญทตฺถุ อญฺญโยคสหิตตฺตญฺเญว สาเธติ. โย จ อมฺหสทฺเทน วตฺตพฺเพ อตฺเถ นิปตติ, น ปน โหติ อมฺหตฺถวาจโก, น โสปิ สทฺโท กฺริยาปทสฺส มโยคสหิตตฺตํ สาเธติ, อญฺญทตฺถุ อญฺญโยคสหิตตฺตญฺเญว สาเธติ. जो 'तुम्ह' (तुम) शब्द के द्वारा कहे जाने वाले अर्थ में आता है, किन्तु 'तुम्ह' अर्थ का वाचक नहीं होता, वह शब्द क्रियापद के 'त-योग' सहित होने को सिद्ध नहीं करता, बल्कि वह 'अन्य-योग' सहित होने को ही सिद्ध करता है। और जो 'अम्ह' (मैं) शब्द के द्वारा कहे जाने वाले अर्थ में आता है, किन्तु 'अम्ह' अर्थ का वाचक नहीं होता, वह शब्द भी क्रियापद के 'म-योग' सहित होने को सिद्ध नहीं करता, बल्कि वह 'अन्य-योग' सहित होने को ही सिद्ध करता है। ตตฺร ตุมฺหสทฺเทน ตาว วตฺตพฺพตฺเถ – ‘‘น ภวํ เอติ ปุญฺญตฺถํ, สิวิราชสฺส ทสฺสนํ. มายสฺมา สมคฺคสฺส สงฺฆสฺส เภทาย ปรกฺกมิ. อิธ ภนฺเต ภควา ปํสุกูลํ โธวตู’’ติ อิจฺเจวมาทโย ปโยคา. อมฺหสทฺเทน ปน วตฺตพฺพตฺเถ ‘‘อุปาลิ ตํ มหาวีร, ปาเท วนฺทติ สตฺถุโน. สาวโก เต มหาวีร, สรโณ วนฺทติ สตฺถุโน’’ติ จ อิจฺเจวมาทโย ปโยคา. อิทเมตฺถุปลกฺขิตพฺพํ ‘‘ตฺวํ ตุมฺเห อหํ มย’’นฺติ อตฺถทีปก ตโยค มโยคโต อญฺโญ อญฺญตฺถทีปโน ปโยโคเยว อญฺญโยโค นาม, ตตฺถ ปฐมปุริโส ภวตีติ. वहाँ 'तुम्ह' शब्द के द्वारा कहे जाने वाले अर्थ में - 'न भवं एति पुञ्ञत्थं, सिविराजस्स दस्सनं' (आप पुण्य के लिए शिविराज के दर्शन को नहीं जाते हैं)। 'मायस्मा समग्गस्स सङ्घस्स भेदाय परक्कमि' (आयुष्मान् समग्र संघ के भेद के लिए प्रयत्न न करें)। 'इध भन्ते भगवा पंसुकूलं धोवतु' (भन्ते! यहाँ भगवान पांसुकुल धोएँ) - इस प्रकार आदि प्रयोग हैं। 'अम्ह' शब्द के द्वारा कहे जाने वाले अर्थ में - 'उपालि तं महावीर, पादे वन्दति सत्थुनो' (हे महावीर! उपालि शास्ता के उन चरणों की वन्दना करता है)। 'सावको ते महावीर, सरणो वन्दति सत्थुनो' (हे महावीर! आपका श्रावक शरण शास्ता की वन्दना करता है) - इस प्रकार आदि प्रयोग हैं। यहाँ यह लक्षित करना चाहिए कि 'त्वं, तुम्हे, अहं, मयं' - इन अर्थों को प्रकाशित करने वाले त-योग और म-योग से भिन्न, अन्य अर्थ को प्रकाशित करने वाला प्रयोग ही 'अन्य-योग' कहलाता है, वहाँ प्रथम पुरुष 'भवति' आदि होता है। ยชฺเชวํ ‘‘สพฺพายสํ กูฏมติปฺปมาณํ, ปคฺคยฺห โส ติฏฺฐสิ อนฺตลิกฺเข. เอส สุตฺวา ปสีทามิ, วโจ เต อิสิสตฺตมา’’ติอาทีสุ กถํ. เอตฺถ หิ มชฺฌิมุตฺตมปุริสสมฺภโวเยว ทิสฺสติ, น ตุ ปฐมปุริสสมฺภโวติ? วุจฺจเต – ‘‘สพฺพายสํ กูฏมติปฺปมาณํ, ปคฺคยฺห โส ติฏฺฐสิ อนฺตลิกฺเข’’ติอาทีสุ ‘‘โส’’ติอาทิกสฺส นามสทฺทสฺส ตุมฺห’มฺหสทฺทสฺสตฺถวาจกสทฺเทหิ‘‘ติฏฺฐสี’’ติอาทีนํ สฺยาทฺยนฺตานํ ปทานํ ทสฺสนโต อจฺจนฺตมชฺฌาหริตพฺเพหิ [Pg.37] สมานาธิกรณตฺตา ตคฺคุณภูตตฺตา จ มชฺฌิมุตฺตมปุริสสมฺภโว สมธิคนฺตพฺโพ. อีทิเสสุ ปโยเคสุ สฺยาทฺยนฺตานํ ทสฺสนวเสน อวิชฺชมานานิปิ อชฺฌาหริตพฺพานิ ‘‘ตฺวมห’’มิจฺจาทีนิ ปทานิ ภวนฺติ. กตฺถจิ ปน ปริปุณฺณานิ ทิสฺสนฺติ ‘‘สาตฺวํ วงฺกมนุปฺปตฺตา, กถํ มทฺทิ กริสฺสสิ. โส อหํ วิจริสฺสามิ, คามา คามํ ปุรา ปุร’’นฺติ อิจฺเจวมาทีสุ. यदि ऐसा है, तो 'सब्बायसं कूटमतिप्पमाणं, पग्गय्ह सो तिट्ठसि अन्तलिक्खे' (अत्यधिक परिमाण वाले लोहे के कूट को पकड़कर वह तुम अंतरिक्ष में स्थित हो)। 'एस सुत्वा पसीदामि, वचो ते इसिसत्तमा' (हे ऋषियों में श्रेष्ठ! यह सुनकर मैं प्रसन्न होता हूँ) - आदि में कैसे? क्योंकि यहाँ मध्यम और उत्तम पुरुष का होना ही दिखाई देता है, प्रथम पुरुष का होना नहीं? कहा जाता है - 'सब्बायसं कूटमतिप्पमाणं...' आदि में 'सो' आदि नाम शब्दों का, 'तिट्ठसि' आदि 'सि' आदि प्रत्ययान्त पदों के देखे जाने से, 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के अर्थवाचक शब्दों के साथ अत्यन्त अध्याहार किए जाने योग्य पदों के साथ सामानाधिकरण्य होने के कारण और उनके गुणभूत होने के कारण मध्यम और उत्तम पुरुष का होना समझना चाहिए। इस प्रकार के प्रयोगों में 'सि' आदि प्रत्ययान्त पदों के देखे जाने से, अविद्यमान होने पर भी 'त्वं, अहं' आदि पदों का अध्याहार करना चाहिए। कहीं-कहीं तो वे परिपूर्ण दिखाई देते हैं - 'सा त्वं वङ्कमनुप्पत्ता, कथं मद्धि करिस्ससि' (वह तुम वंक पर्वत पर पहुँचकर, हे मद्री! कैसे करोगी?)। 'सो अहं विचरिस्सामि, गामा गामं पुरा पुरं' (वह मैं गाँव-गाँव और नगर-नगर विचरूँगा) - इस प्रकार आदि में। อาขฺยาติกสฺส กฺริยาลกฺขณตฺตา อลิงฺคเภทตฺตา จ ติณฺณํ ลิงฺคานํ สาธารณภาวปริทีปนตฺถํ อปรมฺปิ กฺริยาปทมาลํ วทาม – आख्यात (क्रिया) का क्रिया-लक्षण होने के कारण और लिंग-भेद न होने के कारण, तीनों लिंगों में साधारण भाव को प्रकाशित करने के लिए दूसरी भी क्रियापद-माला कहते हैं - ปุริโส ภวติ, กญฺญา ภวติ, จิตฺตํ ภวติ, ปุริสา ภวนฺติ, กญฺญาโย ภวนฺติ, จิตฺตานิ ภวนฺติ. โภ ปุริส ตฺวํ ภวสิ, โภติ กญฺเญ ตฺวํ ภวสิ, โภ จิตฺต ตฺวํ ภวสิ, ภวนฺโต ปุริสา ตุมฺเห ภวถ, โภติโย กญฺญาโย ตุมฺเห ภวถ, ภวนฺโต จิตฺตานิ ตุมฺเห ภวถ. อหํ ปุริโส ภวามิ, อหํ กญฺญา ภวามิ, อหํ จิตฺตํ ภวามิ, มยํ ปุริสา ภวาม, มยํ กญฺญาโย ภวาม, มยํ จิตฺตานิ ภวาม. पुरुषो भवति (पुरुष होता है), कञ्ञा भवति (कन्या होती है), चित्तं भवति (चित्त होता है)। पुरिसा भवन्ति, कञ्ञायो भवन्ति, चित्तानि भवन्ति। भो पुरिस त्वं भवसि (हे पुरुष! तुम होते हो), भोति कञ्ञे त्वं भवसि (हे कन्या! तुम होती हो), भो चित्त त्वं भवसि (हे चित्त! तुम होते हो)। भवन्तो पुरिसा तुम्हे भवथ, bhotiyo kaññāyo tumhe bhavatha, bhavanto cittāni tumhe bhavatha। अहं पुरिसो भवामि (मैं पुरुष होता हूँ), अहं कञ्ञा भवामि (मैं कन्या होती हूँ), अहं चित्तं भवामि (मैं चित्त होता हूँ)। मयं पुरिसा भवाम, मयं कञ्ञायो भवाम, मयं चित्तानि भवाम। เอส นโย อตฺตโนปเทสุ, เสสวิภตฺตีนํ สพฺพปเทสุปิ. อยมาขฺยาติกสฺส ติณฺณํ ลิงฺคานํ สาธารณภาวปริทีปนี กฺริยาปทมาลาว. यही नियम आत्मनेपद के पदों में और शेष विभक्तियों के सभी पदों में भी है। यह आख्यात (क्रिया) के तीनों लिंगों के साधारण भाव को प्रकाशित करने वाली क्रियापदमाला ही है। วุตฺตญฺเหตํ นิรุตฺติปิฏเก ‘‘กฺริยาลกฺขณมาขฺยาติกมลิงฺคเภท’’มิติ. ตตฺร อลิงฺคเภทมิติ โก อตฺโถ? อิตฺถิปุมนปุํสกานํ อวิเสสตฺโถ วุจฺจเต ‘‘อลิงฺคเภท’’มิติ. ยถา ‘‘ปุริโส คจฺฉติ, กญฺญา คจฺฉติ, จิตฺตํ คจฺฉตี’’ติ. จตุธา อุทฺทิฏฺฐกฺริยาปเทสุ ยถา ‘‘ภวตี’’ติ อการานนฺตรตฺยนฺตปทํ คเหตฺวา ‘‘ภวติ ภวนฺติ ภวสี’’ติอาทินา กฺริยาปทมาลา สพฺพถา กตา, เอวํ ‘‘อุพฺภวติ’’จฺจาทีนิปิ อการานนฺตรตฺยนฺตปทานิ คเหตฺวา ‘‘อุพฺภวติ อุพฺภวนฺติ อุพฺภวสี’’ติอาทินา [Pg.38] กฺริยาปทมาลา สพฺพถา กาตพฺพา. ‘‘โภติ สมฺโภตี’’ติอาทีนิ ปน โอการานนฺตรตฺยนฺตปทานิ, ‘‘ภาเวติ วิภาเวตี’’ติอาทีนิ จ เอการานนฺตรตฺยนฺตปทานิ คเหตฺวา ปาฬินยานุสาเรเนว ปทมาลา กาตพฺพา, นยิธ วุตฺตนยานุสาเรน. อีทิเสสุ หิ ฐาเนสุ ทุรนุโพธา กฺริยาปทคติ. อโต ลพฺภมานวเสน กฺริยาปทมาลา กาตพฺพา. น หิ โลเก โลกิยา สพฺเพ ธาตุสทฺเท ปจฺเจกํ สพฺเพหิปิ ฉนฺนวุติยา วจเนหิ โยเชตฺวา วทนฺติ, เอวํ อวทนฺตานมฺปิ เนสํ กถา อปริปุณฺณา นาม น โหติ, ตสฺมา วชฺเชตพฺพฏฺฐานํ วชฺเชตฺวา ยถาสมฺภวํ ปทมาลา กาตพฺพา. เอวํ ปญฺจมิยาทีสุปิ วิภตฺตีสุ. อยํ วตฺตมานวิภตฺติวเสน กฺริยาปทมาลานิทฺเทโส. निरुत्तिपिटक में यह कहा गया है— 'आख्यात (क्रिया) का लक्षण लिंग-भेद से रहित होना है।' वहाँ 'लिंग-भेद से रहित' का क्या अर्थ है? स्त्री, पुरुष और नपुंसक के भेद का न होना ही 'लिंग-भेद से रहित' कहा जाता है। जैसे— 'पुरुष जाता है (puriso gacchati), कन्या जाती है (kaññā gacchati), चित्त जाता है (cittaṃ gacchati)'। चार प्रकार से निर्दिष्ट क्रियापदों में जैसे 'bhavatī' इस 'अ'कारान्त 'ति' प्रत्ययान्त पद को लेकर 'bhavati, bhavanti, bhavasī' आदि के द्वारा क्रियापदमाला पूर्ण की गई है, वैसे ही 'ubbhavati' आदि 'अ'कारान्त 'ति' प्रत्ययान्त पदों को लेकर 'ubbhavati, ubbhavanti, ubbhavasī' आदि के द्वारा क्रियापदमाला पूर्ण करनी चाहिए। 'bhoti, sambhotī' आदि 'ओ'कारान्त 'ति' प्रत्ययान्त पदों और 'bhāveti, vibhāvetī' आदि 'ए'कारान्त 'ति' प्रत्ययान्त पदों को लेकर पालि नियम के अनुसार ही पदमाला बनानी चाहिए, यहाँ बताए गए नियम के अनुसार नहीं। क्योंकि ऐसे स्थानों में क्रियापदों की गति (रूप) समझना कठिन है। इसलिए उपलब्ध प्रयोगों के अनुसार क्रियापदमाला बनानी चाहिए। लोक में सभी लौकिक लोग प्रत्येक धातु शब्द को सभी छियानवे (96) वचनों (रूपों) के साथ जोड़कर नहीं बोलते हैं, और ऐसा न बोलने पर भी उनकी कथा अपूर्ण नहीं होती है, इसलिए वर्जित स्थानों को छोड़कर यथासंभव पदमाला बनानी चाहिए। इसी प्रकार पञ्चमी आदि विभक्तियों में भी समझना चाहिए। यह वर्तमान विभक्ति के अनुसार क्रियापदमाला का निर्देश है। อิโต ปฏฺฐาย ปน ยถุทฺทิฏฺฐปทาเนว ปริณาเมตฺวา ปริณาเมตฺวา ปญฺจมิยาทีนํ มาติกาภาเวน คเหตพฺพานิ. อิทานิ ปน ตโยคาทิสหิตาสหิตวเสน ทฺวิธา กฺริยาปทมาลาโย ทสฺเสสฺสาม กฺวจาเทสวเสน สมฺภูตานิ จ รูปนฺตรานิ โสตูนํ สุขธารณตฺถญฺเจว ปุริสปฺปโยเค อสมฺโมหตฺถญฺจ. इसके आगे अब निर्दिष्ट पदों को ही परिवर्तित कर-करके पञ्चमी आदि विभक्तियों की मातृका (तालिका) के रूप में ग्रहण करना चाहिए। अब हम श्रोताओं के सुखपूर्वक धारण करने के लिए और पुरुषों (उत्तम, मध्यम, प्रथम) के प्रयोग में सम्मोह (भ्रम) न होने के लिए, त्रियोग (तीनों पुरुषों) आदि के सहित और रहित होने के भेद से दो प्रकार की क्रियापदमालाएँ और कहीं-कहीं आदेश के कारण उत्पन्न हुए अन्य रूपों को दिखाएंगे। ภวตุ, ภวนฺตุ. ภวาหิ, ภว, ภวถ. ภวามิ, ภวาม. ภวตํ, ภวนฺตํ. ภวสฺสุ, ภววฺโห. ภเว, ภวามเส. โส ภวตุ, เต ภวนฺตุ. ตฺวํ ภวาหิ, ภว, ตุมฺเห ภวถ. อหํ ภวามิ, มยํ ภวาม. โส ภวตํ, เต ภวนฺตํ. ตฺวํ ภวสฺสุ, ตุมฺเห ภววฺโห. อหํ ภเว, มยํ ภวามเส. อยํ ปญฺจมีวิภตฺติวเสน กฺริยาปทมาลานิทฺเทโส. भवतु, भवन्तु। भवाहि, भव, भवथ। भवामि, भवाम। भवतं, भवन्तं। भवस्सु, भवव्हो। भवे, भवामसे। सो भवतु, ते भवन्तु। त्वं भवाहि, भव, तुम्हे भवथ। अहं भवामि, मयं भवाम। सो भवतं, ते भवन्तं। त्वं भवस्सु, तुम्हे भवव्हो। अहं भवे, मयं भवामसे। यह पञ्चमी विभक्ति के अनुसार क्रियापदमाला का निर्देश है। ภเวยฺย, ภเว, ภเวยฺยุํ. ภเวยฺยาสิ, ภเวยฺยาถ. ภเวยฺยามิ, ภเวยฺยาม, ภเวมุ. ภเวถ, ภเวรํ. ภเวโถ, ภเวยฺยาวฺโห. ภเวยฺยํ, ภเวยฺยามฺเห อิติ วา, โส ภเวยฺย[Pg.39], ภเว, เต ภเวยฺยุํ. ตฺวํ ภเวยฺยาสิ, ตุมฺเห ภเวยฺยาถ. อหํ ภเวยฺยามิ, มยํ ภเวยฺยาม, ภเวมุ. โส ภเวถ, เต ภเวรํ. ตฺวํ ภเวโถ, ตุมฺเห ภเวยฺยาวฺโห. อหํ ภเวยฺยํ, มยํ ภเวยฺยามฺเห อิติ วา. อยํ สตฺตมีวิภตฺติวเสน กฺริยาปทมาลานิทฺเทโส. भवेय्य, भवे, भवेय्युं। भवेय्यासि, भवेय्याथ। भवेय्यामि, भवेय्याम, भवेमु। भवेथ, भवेरं। भवेथो, भवेय्याव्हो। भवेय्यं, भवेय्यामहे—इस प्रकार। सो भवेय्य, भवे, ते भवेय्युं। त्वं भवेय्यासि, तुम्हे भवेय्याथ। अहं भवेय्यामि, मयं भवेय्याम, भवेमु। सो भवेथ, ते भवेरं। त्वं भवेथो, तुम्हे भवेय्याव्हो। अहं भवेय्यं, मयं भवेय्यामहे—इस प्रकार। यह सप्तमी विभक्ति के अनुसार क्रियापदमाला का निर्देश है। พภูว, พภูวุ. พภูเว, พภูวิตฺถ. พภูวํ, พภูวิมฺห. พภูวิตฺถ, พภูวิเร. พภูวิตฺโถ, พภูวิวฺโห. พภูวึ, พภูวิมฺเห อิติ วา, โส พภูว, เต พภูวุ. ตฺวํ พภูเว, ตุมฺเห พภูวิตฺถ. อหํ พภูวํ, มยํ พภูวิมฺห. โส พภูวิตฺถ, เต พภูวิเร. ตฺวํ พภูวิตฺโถ, ตุมฺเห พภูวิวฺโห. อหํ พภูวึ, มยํ พภูวิมฺเห อิติ วา. อยํ ปโรกฺขาวิภตฺติวเสน กฺริยาปทมาลานิทฺเทโส. बभूव, बभूवु। बभूवे, बभूवित्थ। बभूवं, बभूविम्ह। बभूवित्थ, बभूविरे। बभूवित्थो, बभूविव्हो। बभूविं, बभूविमहे—इस प्रकार। सो बभूव, ते बभूवु। त्वं बभूवे, तुम्हे बभूवित्थ। अहं बभूवं, मयं बभूविम्ह। सो बभूवित्थ, ते बभूविरे। त्वं बभूवित्थो, तुम्हे बभूविव्हो। अहं बभूविं, मयं बभूविमहे—इस प्रकार। यह परोक्षा विभक्ति के अनुसार क्रियापदमाला का निर्देश है। อภวา, อภวู. อภโว, อภวตฺถ. อภวํ, อภวมฺหา. อภวตฺถ, อภวตฺถุํ. อภวเส, อภววฺหํ. อภวึ, อภวมฺหเส อิติ วา, โส อภวา, เต อภวู. ตฺวํ อภโว, ตุมฺเห อภวตฺถ. อหํ อภวํ, มยํ อภวมฺหา. โส อภวตฺถ, เต อภวตฺถุํ. ตฺวํ อภวเส, ตุมฺเห อภววฺหํ. อหํ อภวึ, มยํ อภวมฺหเส อิติ วา. อยํ หิยฺยตฺตนีวิภตฺติวเสน กฺริยาปทมาลานิทฺเทโส. अभवा, अभवू। अभवो, अभवत्थ। अभवं, अभवम्हा। अभवत्थ, अभवत्थुं। अभवसे, अभवव्हं। अभविं, अभवम्हसे—इस प्रकार। सो अभवा, ते अभवू। त्वं अभवो, तुम्हे अभवत्थ। अहं अभवं, मयं अभवम्हा। सो अभवत्थ, ते अभवत्थुं। त्वं अभवसे, तुम्हे अभवव्हं। अहं अभविं, मयं अभवम्हसे—इस प्रकार। यह हिय्यत्तनी विभक्ति के अनुसार क्रियापदमाला का निर्देश है। อภวิ, อภวุํ. อภโว, อภวิตฺถ. อภวึ, อภวิมฺหา. อภวา, อภวู. อภวเส, อภวิวฺหํ. อภวฺหํ, อภวิมฺเห อิติ วา, โส อภวิ, เต อภวุํ. ตฺวํ อภโว, ตุมฺเห อภวิตฺถ. อหํ อภวึ, มยํ อภวิมฺหา. โส อภวา, เต อภวู. ตฺวํ อภวเส, ตุมฺเห อภวิวฺหํ. อหํ อภวํ, มยํ อภวิมฺเห อิติ วา. อยํ อชฺชตนีวิภตฺติวเสน กฺริยาปทมาลานิทฺเทโส. अभवि, अभवुं। अभवो, अभवित्थ। अभविं, अभविम्हा। अभवा, अभवू। अभवसे, अभविव्हो। अभव्हं, अभविमहे—इस प्रकार। सो अभवि, ते अभवुं। त्वं अभवो, तुम्हे अभवित्थ। अहं अभविं, मयं अभविम्हा। सो अभवा, ते अभवू। त्वं अभवसे, तुम्हे अभविव्हो। अहं अभवं, मयं अभविमहे—इस प्रकार। यह अज्जतनी विभक्ति के अनुसार क्रियापदमाला का निर्देश है। เอตฺถ ปนชฺชตนิยา อุํวจนสฺส อึสุมาเทสวเสน ภวติโน รูปนฺตรานิปิ เวทิตพฺพานิ. เสยฺยถิทํ? เต ภวึสุ, สมุพฺภวึสุ, ปภวึสุ, ปราภวึสุ, สมฺภวึสุ, ปาตุภวึสุ, ปาตุพฺภวึสุ[Pg.40], อิมานิ อกมฺมกปทานิ. ปริภวึสุ, อภิภวึสุ, อธิภวึสุ, อติภวึสุ, อนุภวึสุ, สมนุภวึสุ, อภิสมฺภวึสุ. यहाँ अज्जतनी के 'उं' वचन के स्थान पर 'इंसु' आदेश होने से 'भवति' के अन्य रूप भी जानने चाहिए। जैसे कि— ते भविंसु, समुब्भविंसु, पभविंसु, पराभविंसु, सम्भविंसु, पातुभविंसु, पातुब्भविंसु—ये अकर्मक क्रियापद हैं। परिभविंसु, अभिभविंसु, अधिभविंसु, अतिभविंसु, अनुभविंसु, समनुभविंसु, अभिसम्भविंसु। ‘‘อธิโภสุ’’นฺติ รูปมฺปิ, ยสฺมา ทิสฺสติ ปาฬิยํ; ตสฺมา หิ นยโต เญ ยฺยํ, ‘‘ปริโภสุ’’นฺติอาทิกํ. “अधिभोसुं” ऐसा रूप भी चूँकि पालि में देखा जाता है; इसलिए इसी नियम से “परिभोसुं” आदि को भी जानना चाहिए। ตตฺรายํ ปาฬิ – ‘‘เอวํวิหาริญฺจาวุโส ภิกฺขุํ รูปา อธิโภสุํ, น ภิกฺขุ รูเป อธิโภสี’’ติ. อิมานิ สกมฺมกปทานิ, เอวมชฺชตนิยา อุํวจนสฺส อึสุมาเทสวเสน ภวติโน รูปนฺตรานิ ภวนฺติ. อปิจ वहाँ यह पालि (पाठ) है— “हे आयुष्मानों! इस प्रकार विहार करने वाले भिक्षु को रूप अभिभूत कर लेते हैं (adhibhosuṃ), भिक्षु रूपों को अभिभूत नहीं करता है (adhibhosī)।” ये सकर्मक क्रियापद हैं, इस प्रकार अज्जतनी के 'उं' वचन के स्थान पर 'इंसु' आदेश होने से 'भवति' के अन्य रूप होते हैं। और भी— ‘‘อนฺวภิ’’ อิติรูปมฺปิ, อชฺชตนฺยา ปทิสฺสติ; ตสฺมา หิ นยโต เญยฺยํ, ‘‘อชฺฌภิ’’จฺจาทิกมฺปิ จ. ‘‘अन्वभि’’ यह रूप भी अद्यतनी (Aorist) में देखा जाता है; इसलिए इसी पद्धति से ‘‘अज्झभि’’ आदि रूपों को भी जानना चाहिए। ตตฺรายํ ปาฬิ – โส เตน กมฺเมน ทิวํ สมกฺกมิ, สุขญฺจ ขิฑฺฑารติโย จ อนฺวภีติ. ตตฺถ อนฺวภีติ อนุ อภีติ เฉโท. อนูติ อุปสคฺโค. อภีติ อาขฺยาติกปทนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. वहाँ यह पालि है - ‘‘वह उस कर्म से स्वर्ग गया, और सुख तथा क्रीड़ा-रति का अनुभव किया (अन्वभि)।’’ वहाँ ‘‘अन्वभि’’ का विच्छेद ‘‘अनु’’ + ‘‘अभि’’ है। ‘‘अनु’’ उपसर्ग है। ‘‘अभि’’ को आख्यात पद (क्रिया पद) समझना चाहिए। ภวิสฺสติ, ภวิสฺสนฺติ. ภวิสฺสสิ, ภวิสฺสถ. ภวิสฺสามิ, ภวิสฺสาม. ภวิสฺสเต, ภวิสฺสนฺเต. ภวิสฺสเส, ภวิสฺสวฺเห. ภวิสฺสํ, ภวิสฺสามฺเห อิติ วา, โส ภวิสฺสติ, เต ภวิสฺสนฺติ. ตฺวํ ภวิสฺสสิ, ตุมฺเห ภวิสฺสถ. อหํ ภวิสฺสามิ, มยํ ภวิสฺสาม. โส ภวิสฺสเต, เต ภวิสฺสนฺเต. ตฺวํ ภวิสฺสเส, ตุมฺเห ภวิสฺสวฺเห. อหํ ภวิสฺสํ, มยํ ภวิสฺสามฺเห อิติ วา. อยํ ภวิสฺสนฺตีวิภตฺติวเสน กฺริยาปทมาลานิทฺเทโส. भविष्यति, भविष्यन्ति। भविष्यसि, भविष्यथ। भविष्यामि, भविष्यामा। भविष्यते, भविष्यन्ते। भविष्यसे, भविष्यवहे। भविस्सं, भविष्यामहे अथवा, वह होगा, वे होंगे। तुम होगे, तुम सब होगे। मैं होऊँगा, हम सब होंगे। वह होगा, वे होंगे। तुम होगे, तुम सब होगे। मैं होऊँगा, हम सब होंगे। यह भविष्यन्ती विभक्ति के अनुसार क्रियापद-माला का निर्देश है। อภวิสฺสา, อภวิสฺสํสุ. อภวิสฺเส, อภวิสฺสถ. อภวิสฺสํ, อภวิสฺสามฺหา. อภวิสฺสถ, อภวิสฺสิสุ. อภวิสฺสเส, อภวิสฺสวฺเห. อภวิสฺสึ, อภวิสฺสามฺหเส อิติ วา, โส อภวิสฺสา, เต อภวิสฺสํสุ. ตฺวํ อภวิสฺเส, ตุมฺเห [Pg.41] อภวิสฺสถ. อหํ อภวิสฺสํ, มยํ อภวิสฺสามฺหา. โส อภวิสฺสถ, เต อภวิสฺสิสุ. ตฺวํ อภวิสฺสเส, ตุมฺเห อภวิสฺสวฺเห. อหํ อภวิสฺสึ, มยํ อภวิสฺสามฺหเส อิติ วา. อยํ กาลาติปตฺติวิภตฺติวเสน กฺริยาปทมาลานิทฺเทโส. अभविस्सा, अभविस्संुसु। अभविस्से, अभविस्सथ। अभविस्सं, अभविस्साम्हा। अभविस्सथ, अभविस्सिसु। अभविस्ससे, अभविस्सव्हे। अभविस्सिं, अभविस्साम्हसे अथवा, वह होता (यदि), वे होते। तुम होते, तुम सब होते। मैं होता, हम सब होते। वह होता, वे होते। तुम होते, तुम सब होते। मैं होता, हम सब होते। यह कालातिपत्ति विभक्ति के अनुसार क्रियापद-माला का निर्देश है। โวหารเภทกุสเลน สุพุทฺธินา โย,กจฺจายเนน กถิโต ชินสาสนตฺถํ; ตฺยาทิกฺกโม ตทนุคํ กิริยาปทานํ,กตฺวา กโม ภวติธาตุวเสน วุตฺโต. व्यवहार के भेदों में कुशल सुबुद्धि कच्चायन द्वारा जिन-शासन के अर्थ के लिए जो ‘ति’ आदि का क्रम कहा गया है; उसी का अनुसरण करते हुए क्रियापदों का क्रम ‘भवति’ (भू) धातु के अनुसार कहा गया है। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार नौ अंगों वाले, अट्ठकथा सहित त्रिपिटक के वचन-मार्गों में विद्वानों के โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कौशल (दक्षता) के लिए रचित सद्दनीति प्रकरण में ภวติโน กฺริยาปทมาลาวิภาโค นาม ‘भवति’ (भू धातु) का क्रियापद-माला विभाग नामक ทุติโย ปริจฺเฉโท. द्वितीय परिच्छेद। ๓. ปกิณฺณกวินิจฺฉย ३. प्रकीर्णक विनिश्चय (विविध निर्णय) อิโต ปรํ ปวกฺขามิ, ปกิณฺณกวินิจฺฉยํ; สปฺปโยเคสุ อตฺเถสุ, วิญฺญูนํ ปาฏวตฺถยา. इसके बाद, मैं विद्वानों की कुशलता के लिए प्रयोगों सहित अर्थों के विषय में प्रकीर्णक विनिश्चय (विविध निर्णय) कहूँगा। ตตฺถ อตฺถุทฺธาโร, อตฺถสทฺทจินฺตา, อตฺถาติสยโยโค, สมานาสมานวเสนวจนสงฺคโห, อาคมลกฺขณวเสน วิภตฺติวจนสงฺคโห, กาลวเสน วิภตฺติวจนสงฺคโห, กาลสงฺคโห, ปกรณสํสนฺทนา, วตฺตมานาทีนํ วจนตฺถวิภาวนา จาติ นวธา วินิจฺฉโย เวทิตพฺโพ. वहाँ नौ प्रकार का विनिश्चय (निर्णय) समझना चाहिए: अर्थोद्धार (अर्थ का उद्धरण), अर्थ-शब्द-चिन्ता, अर्थातिशय-योग, समान-असमान के अनुसार वचन-संग्रह, आगम-लक्षण के अनुसार विभक्ति-वचन-संग्रह, काल के अनुसार विभक्ति-वचन-संग्रह, काल-संग्रह, प्रकरण-संसन्दना (तुलना), और वर्तमान आदि के वचन-अर्थ की विभाबना। อตฺถุทฺธาเร ตาว สมานสุติกปทานมตฺถุทฺธารณํ กริสฺสาม. เอตฺถาขฺยาตปทสญฺญิตานํ โภติสทฺท ภเวสทฺทานมตฺโถ อุทฺธริตพฺโพ. ตถา เหเต นามิกปทสญฺญิเตหิ อปเรหิ โภติสทฺท ภเวสทฺเทหิ สมานสุติกาปิ อสมานตฺถา เจว โหนฺติ อสมานวิภตฺติกา จ. สาสนสฺมิญฺหิ [Pg.42] เกจิ สทฺทา อญฺญมญฺญํ สมานสุติกา สมานาปิ อสมานตฺถา อสมานปวตฺตินิมิตฺตา อสมานลิงฺคา อสมานวิภตฺติกา อสมานวจนกา อสมานนฺตา อสมานกาลิกา อสมานปทชาติกา จ ภวนฺติ. अर्थोद्धार में सबसे पहले हम समान ध्वनि वाले पदों के अर्थ का उद्धरण करेंगे। यहाँ आख्यात-पद (क्रिया) के रूप में प्रसिद्ध ‘भोति’ और ‘भवे’ शब्दों का अर्थ उद्धृत करना चाहिए। उसी प्रकार, ये नामिक-पद (संज्ञा) के रूप में प्रसिद्ध अन्य ‘भोति’ और ‘भवे’ शब्दों के समान ध्वनि वाले होने पर भी भिन्न अर्थ वाले और भिन्न विभक्ति वाले होते हैं। शासन (बुद्ध-वचन) में कुछ शब्द एक-दूसरे के समान ध्वनि वाले होते हुए भी भिन्न अर्थ वाले, भिन्न प्रवृत्ति-निमित्त वाले, भिन्न लिंग वाले, भिन्न विभक्ति वाले, भिन्न वचन वाले, भिन्न अन्त वाले, भिन्न काल वाले और भिन्न पद-जाति वाले होते हैं। เตสมสมานตฺถตฺเต ‘‘สพฺพญฺหิ ตํ ชีรติ เทหนิสฺสิตํ. อปฺปสฺสุตายํ ปุริโส, พลิพทฺโทว ชีรติ. สนฺโต ตสิโต. ปหุ สนฺโต น ภรติ. สนฺโต อาจิกฺขเต มุนิ. สนฺโต สปฺปุริสา โลเก. สนฺโต สํวิชฺชมานา โลกสฺมิ’’นฺติ เอวมาทโย ปโยคา. เอตฺถ ชีรติสทฺททฺวยํ ยถาสมฺภวํ นวภาวาปคมวฑฺฒนวาจกํ. สนฺโตสทฺทปญฺจกํ ยถาสมฺภวํ ปริสฺสมปฺปตฺตสมาโนปสนฺโตปลพฺภมานวาจกนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. उनके भिन्न अर्थ होने के विषय में - ‘‘शरीर के आश्रित वह सब जीर्ण (जिरति) होता है। अल्पश्रुत मनुष्य बैल की तरह बूढ़ा (जिरति) होता है। थका हुआ (सन्तो) प्यासा। समर्थ होते हुए (सन्तो) भी भरण-पोषण नहीं करता। शान्त (सन्तो) मुनि उपदेश देते हैं। लोक में सत्पुरुष (सन्तो) हैं। लोक में विद्यमान (सन्तो) हैं।’’ - इत्यादि प्रयोग हैं। यहाँ दो ‘जिरति’ शब्द यथासंभव नवीनता के अभाव और वृद्धावस्था के वाचक हैं। पाँच ‘सन्तो’ शब्द यथासंभव थकावट, समानता, उपशान्त, विद्यमान और सत्पुरुष के वाचक समझने चाहिए। อสมานปวตฺตินิมิตฺตตฺเต ปน ‘‘อกตญฺญู มิตฺตทุพฺภี, อสฺสทฺโธ อกตญฺญูจา’’ติเอวมาทโย. เอตฺถ จ อกตญฺญูสทฺททฺวยํ กตากตาชานนชานนปวตฺตินิมิตฺตํ ปฏิจฺจ สมฺภูตตฺตา อสมานปวตฺตินิมิตฺตกนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. भिन्न प्रवृत्ति-निमित्त होने के विषय में - ‘‘कृतघ्न (अकतञ्ञू) और मित्रद्रोही, अश्रद्धालु और अकतञ्ञू (निर्वाण को जानने वाला)...’’ इत्यादि। यहाँ दो ‘अकतञ्ञू’ शब्द ‘किए हुए को न जानना’ और ‘अकृत (निर्वाण) को जानना’ - इन प्रवृत्ति-निमित्तों के कारण उत्पन्न होने से भिन्न प्रवृत्ति-निमित्त वाले समझने चाहिए। อสมานลิงฺคตฺเต ‘‘สุขี โหตุ ปญฺจสิข สกฺโก เทวานมินฺโท. ตฺวญฺจ ภทฺเท สุขี โหหิ. ยตฺถ สา อุปฏฺฐิโต โหติ. มาตา เม อตฺถิ, สา มยา โปเสตพฺพา’’ติ เอวมาทโย. เอตฺถ สุขีสทฺททฺวยํ สาสทฺททฺวยญฺจ ปุมิตฺถิลิงฺควเสน อสมานลิงฺคนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. भिन्न लिंग होने के विषय में - ‘‘देवराज शक्र पञ्चशिख सुखी (सुखी) हो। और हे भद्रे! तुम सुखी (सुखी) हो। जहाँ वह (सा) उपस्थित होती है। मेरी माता है, वह (सा) मेरे द्वारा पोषणीय है।’’ इत्यादि। यहाँ दो ‘सुखी’ शब्द और दो ‘सा’ शब्द पुल्लिंग और स्त्रीलिंग के भेद से भिन्न लिंग वाले समझने चाहिए। อสมานวิภตฺติกตฺเต ‘‘อาหาเร อุทเร ยโต. ยโต ปชานาติ สเหตุธมฺม’’นฺติ เอวมาทโย. เอตฺถ ยโตสทฺททฺวยํ [Pg.43] ปฐมาปญฺจมีวิภตฺติสหิตตฺตา อสมานวิภตฺติกนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. भिन्न विभक्ति होने के विषय में - ‘‘आहार और उदर में संयत (यतो)। जिससे (यतो) वह हेतु सहित धर्म को जानता है।’’ इत्यादि। यहाँ दो ‘यतो’ शब्द प्रथमा और पञ्चमी विभक्ति से युक्त होने के कारण भिन्न विभक्ति वाले समझने चाहिए। อสมานวจนกตฺเต อิเม ปโยคา – भिन्न वचन होने के विषय में ये प्रयोग हैं - ‘‘ยาย มาตุ ภโต โปโส, อิมํ โลกํ อเวกฺขติ; ตมฺปิ ปาณททึ สนฺตึ, หนฺติ กุทฺโธ ปุถุชฺชโน’’ติ ‘‘जिस माता द्वारा पालित पुरुष इस लोक को देखता है; उस प्राण देने वाली शान्त (माता) को भी क्रुद्ध पृथग्जन मारता (हन्ति) है।’’ อาทีสุ หนฺติสทฺโท เอกวจโน. इत्यादि में ‘हन्ति’ शब्द एकवचन है। ‘‘อิเม นูน อรญฺญสฺมึ, มิคสงฺฆานิ ลุทฺทกา; วากุราหิ ปริกฺขิปฺป, โสพฺภํ ปาเตตฺวา ตาวเท; วิกฺโกสมานา ติพฺพาหิ, หนฺติ เนสํ วรํ วร’’นฺติ. ‘‘निश्चय ही वन में ये शिकारी, मृग-समूहों को जालों से घेरकर, तुरंत गड्ढे में गिराकर; तीव्र स्वर में चिल्लाते हुए, उनमें से श्रेष्ठ-श्रेष्ठ को मारते (हन्ति) हैं।’’ อาทีสุ ปน พหุวจโน. ‘‘สีลวา วตฺตสมฺปนฺโน. เอถ ตุมฺเห อายสฺมนฺโต สีลวา โหถ. สนฺโต ทนฺโต นิยโต พฺรหฺมจารี. สนฺโต หเว สพฺภิ ปเวทยนฺติ. มหาราชา ยสสฺสี โส. จตฺตาโร มหาราชา’’ติ เอวมาทีสุ สีลวาสทฺทาทโย เอกวจนพหุวจนกา. इनमें यह बहुवचन है। ‘‘शीलवान (सीलवा) और व्रत-सम्पन्न। आओ आयुष्मानों! तुम शीलवान (सीलवा) होओ। शान्त, दान्त, नियत ब्रह्मचारी। सन्त (सत्पुरुष) ही सत्पुरुषों को बताते हैं। वह यशस्वी महाराज। चार महाराज।’’ इत्यादि में ‘सीलवा’ आदि शब्द एकवचन और बहुवचन वाले हैं। อสมานนฺตตฺเต ปน ยตฺถ สมานสุติกานํ อสมานวิภตฺติกตฺตํ วา อสมานวจนตฺตํ วา อุปลพฺภติ. เตเยว ปโยคา. ตํ ยถา? ‘‘สตํ สมฺปชานํ, สตํ ธมฺโม, สนฺโต ทนฺโต, สนฺโต สปฺปุริสา’’ อิจฺเจวมาทโย. भिन्न अन्त होने के विषय में, जहाँ समान ध्वनि वाले शब्दों में भिन्न विभक्ति या भिन्न वचन पाया जाता है। वे ही प्रयोग हैं। जैसे क्या? ‘‘स्मृतिमान (सतं) और सम्प्रजान, सत्पुरुषों (सतं) का धर्म, शान्त (सन्तो) और दान्त, सत्पुरुष (सन्तो) सज्जन हैं’’ इत्यादि। อสมานกาลตฺเต ‘‘นนุ เต สุตํ พฺราหฺมณ ภญฺญมาเน, เทวา น อิสฺสนฺติ ปุริสปรกฺกมสฺส. เต ชนา ปารมิสฺสนฺติ, มจฺจุเธยฺยํ สุทุตฺตร’’นฺติ เอวมาทโย. เอตฺถ อิสฺสนฺติสทฺททฺวยํ วตฺตมานาภวิสฺสนฺตีกาลวเสน อสมานกาลนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. วตฺตมานาภวิสฺสนฺตีวิภตฺติวเสน ปน อสมานวิภตฺติกนฺติปิ. असमान काल के होने पर (उदाहरण): 'हे ब्राह्मण! क्या तुमने सुना है कि जब (धर्म) कहा जा रहा हो, तो देवता पुरुष-पराक्रम से ईर्ष्या नहीं करते (issanti)। वे लोग मृत्यु के उस पार चले जाएँगे (pāramissanti), जो पार करना अत्यंत कठिन है' इत्यादि। यहाँ 'issanti' शब्द के दो रूपों को वर्तमान और भविष्य काल के भेद से असमान काल वाला समझना चाहिए। वर्तमान और भविष्य काल की विभक्तियों के भेद से इसे असमान विभक्ति वाला भी कहा जाता है। อสมานปทชาติกตฺเต [Pg.44] ‘‘สยํ สมาหิโต นาโค, สยํ อภิญฺญาย กมุทฺทิเสยฺยํ. ปเถ ธาวนฺติยา ปติ, เอกํสํ อชินํ กตฺวา, ปาเทสุ สิรสา ปติ. คิรึ จณฺโฑรณํ ปตี’’ติ เอวมาทโย. เอตฺถ สยํสทฺททฺวยํ นามนิปาตวเสน ปติสทฺทตฺตยํ นามาขฺยาโตปสคฺควเสน อสมานปทชาติกนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. असमान पद-जाति के होने पर (उदाहरण): 'नाग स्वयं (sayaṃ) समाहित है, स्वयं (sayaṃ) जानकर मैं किसे निर्दिष्ट करूँ? पथ पर दौड़ती हुई का पति (pati), एक कंधे पर मृगचर्म धारण कर, चरणों में सिर से गिरा (pati)। पर्वत चण्डोरण के प्रति (pati)' इत्यादि। यहाँ 'sayaṃ' शब्द के दो रूपों को नाम (संज्ञा) और निपात के भेद से, तथा 'pati' शब्द के तीन रूपों को नाम, आख्यात (क्रिया) और उपसर्ग के भेद से असमान पद-जाति वाला समझना चाहिए। อิมินา นเยน สพฺพตฺถ วิตฺถาเรตพฺพํ. เอวํ สาสนสฺมึ เกจิ สทฺทา อญฺญมญฺญํ สมานสุติกา สมานาปิ อสมานตฺถา อสมานปวตฺตินิมิตฺตา อสมานลิงฺคา อสมานวิภตฺติกา อสมานวจนกา อสมานนฺตา อสมานกาลิกา อสมานปทชาติกา จ ภวนฺติ. เอตาทิเสสุ สทฺเทสุ โย กฺริยาปทตฺตํ ปกาเสติ, น โส นามิกปทตฺตํ. โย จ นามิกปทตฺตํ ปกาเสติ, น โส กฺริยาปทตฺตํ. เอวํ สนฺเตปิ สุติสามญฺญโต เอกตฺเตน คเหตฺวา อตฺถุทฺธาโร กรณีโยติ ยถาวุตฺตกฺริยาปทานํ นามปเทหิ สมานสุติกานํ โภติสทฺท ภเว สทฺทานมตฺถุทฺธารํ วทาม. इस पद्धति से सर्वत्र विस्तार करना चाहिए। इस प्रकार शासन (बुद्ध वचन) में कुछ शब्द परस्पर समान ध्वनि वाले होते हुए भी असमान अर्थ, असमान प्रवृत्ति-निमित्त, असमान लिंग, असमान विभक्ति, असमान वचन, असमान अंत, असमान काल और असमान पद-जाति वाले होते हैं। ऐसे शब्दों में जो क्रियापद के भाव को प्रकट करता है, वह नामिक पद (संज्ञा आदि) के भाव को नहीं। और जो नामिक पद के भाव को प्रकट करता है, वह क्रियापद के भाव को नहीं। ऐसा होने पर भी, श्रुति (ध्वनि) की समानता के कारण उन्हें एक मानकर अर्थ का उद्धार (निश्चय) करना चाहिए; इसलिए हम पूर्वोक्त क्रियापदों और उनके समान ध्वनि वाले नामपदों जैसे 'भोति' (bhoti) और 'भवे' (bhave) शब्दों के अर्थ-उद्धार को कहते हैं। กถํ? โภติสทฺโท กตฺตุโยเค กฺริยาปทํ, กฺริยาโยเค นามิกปทํ, ตสฺมา โส ทฺวีสุ อตฺเถสุ วตฺตติ กฺริยาปทตฺเถ นามิกปทตฺเถ จ. ตตฺถ กฺริยาปทตฺเถ วตฺตมานวเสน, นามิกปทตฺเถ ปนาลปนวเสน. กฺริยาปทตฺเถ ตาว ‘‘เอโก โภติ’’, นามิกปทตฺเถ ‘‘มา โภติ ปริเทเวสิ’’. อตฺริทํ วุจฺจติ – कैसे? 'भोति' (bhoti) शब्द कर्ता के योग में क्रियापद है, और क्रिया के योग में नामिक पद है; इसलिए वह दो अर्थों में प्रयुक्त होता है—क्रियापद के अर्थ में और नामिक पद के अर्थ में। वहाँ क्रियापद के अर्थ में वर्तमान काल के रूप में, और नामिक पद के अर्थ में संबोधन के रूप में। क्रियापद के अर्थ में जैसे—'एक होता है' (eko bhoti); नामिक पद के अर्थ में जैसे—'हे भद्रे! विलाप मत करो' (mā bhoti paridevesi)। इसके विषय में यह कहा गया है— ภาเว นามปทตฺเถ จ, อาลปนวิเสสิเต; อิเมสุ ทฺวีสุ อตฺเถสุ, โภติสทฺโท ปวตฺตติ. होने के अर्थ (क्रिया) में और संबोधन से विशेषित नामपद के अर्थ में; इन दो अर्थों में 'भोति' शब्द प्रयुक्त होता है। ภเวสทฺโท [Pg.45] ปน ‘‘ภวามี’’ติมสฺส วตฺตมานาวิภตฺติยุตฺตสฺส สทฺทสฺสตฺเถปิ วตฺตติ. ‘‘ภวามี’’ติมสฺส ปญฺจมีวิภตฺติยุตฺตสฺส สทฺทสฺส อาณตฺยาสีสนตฺเถสุปิ วตฺตติ. ‘‘ภเวยฺยามี’’ติมสฺส สตฺตมีวิภตฺติสหิตสฺส สทฺทสฺส อนุมติปริกปฺปตฺเถสุปิ วตฺตติ. ตตฺริทํ ปฐมตฺถสฺส สาธกํ อาหจฺจวจนํ – पुनः 'भवे' (bhave) शब्द वर्तमान विभक्ति युक्त 'भवामि' (bhavāmi) शब्द के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। पंचमी विभक्ति युक्त 'भवामि' शब्द के आज्ञा और आशीर्वाद के अर्थों में भी प्रयुक्त होता है। सप्तमी विभक्ति युक्त 'भवेय्यामि' (bhaveyyāmi) शब्द के अनुमति और परिकल्पना के अर्थों में भी प्रयुक्त होता है। वहाँ प्रथम अर्थ (वर्तमान काल) को सिद्ध करने वाला यह आगम वचन है— ‘‘เทวานํ อธิโก โหมิ, ภวามิ มนุชาธิโป; รูปลกฺขณสมฺปนฺโน, ปญฺญาย อสโม ภเว’’ติ. 'मैं देवताओं से श्रेष्ठ होता हूँ, मनुष्यों का अधिपति होता हूँ (bhavāmi); रूप-लक्षणों से संपन्न और प्रज्ञा में असमान होता हूँ (bhave)'। อยํ ปน สพฺเพสํ เตสมตฺถานํ สาธิกา อมฺหากํ คาถารจนา – उन सभी अर्थों को सिद्ध करने वाली हमारी यह गाथा-रचना है— ‘‘สุขี ภวติ เอโส จ, อหญฺจาปิ สุขี ภเว; สุขี ภวตุ เอโส จ, อหญฺจาปิ สุขี ภเว. 'वह भी सुखी होता है और मैं भी सुखी होता हूँ (bhave); वह भी सुखी हो और मैं भी सुखी होऊँ (bhave)। อิมาย พุทฺธปูชาย, ภวนฺตุ สุขิตา ปชา; ภเว’หญฺจ สุขปฺปตฺโต, สามจฺโจ สห ญาติภิ. इस बुद्ध-पूजा से प्रजा सुखी हो; और मैं मंत्रियों तथा ज्ञातियों के साथ सुख प्राप्त करूँ (bhave)। สุขี ภเวยฺย เอโส จ, อหญฺจาปิ สุขี ภเว; สุขี ภเวยฺย เจ เอโส, อหญฺจาปิ สุขี ภเว’’ติ. वह भी सुखी हो सके और मैं भी सुखी हो सकूँ (bhave); यदि वह सुखी हो सके, तो मैं भी सुखी हो सकूँ (bhave)'। อิจฺเจวํ – इस प्रकार— วตฺตมานาย ปญฺจมฺยํ, สตฺตมฺยญฺจ วิภตฺติยํ; เอเตสุ ตีสุ ฐาเนสุ, ภเวสทฺโท ปวตฺตติ. वर्तमान, पंचमी और सप्तमी विभक्ति में; इन तीन स्थानों (स्थितियों) में 'भवे' शब्द प्रयुक्त होता है। เอกธา วตฺตมานายํ, ปญฺจมีสตฺตมีสุ จ; ทฺเวธา ทฺเวธาติมสฺสตฺถํ, ปญฺจธา ปริทีปเย. वर्तमान में एक प्रकार से, और पंचमी तथा सप्तमी में दो-दो प्रकार से—इस प्रकार इसके अर्थ को पाँच प्रकार से प्रकाशित करना चाहिए। ทฺเวธา วา วตฺตมานาย-มาทิปุริสวาจโก; อตฺโถ ‘‘ภเว’’ติ เอตสฺส, ‘‘ภวตี’’ติปิยุชฺชติ. अथवा वर्तमान काल में 'भवे' का अर्थ दो प्रकार का (प्रथम और उत्तम पुरुष वाचक) होता है; यह 'भवति' (bhavati) के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। อิทานิ ปน เอตสฺส, วุตฺตสฺสตฺถสฺส สาธกํ; เอตฺถ ปาฬิปฺปเทสํ ตุ, อาหริสฺสํ สุณาถ เม. अब इस कहे गए अर्थ को सिद्ध करने वाले पालि-प्रदेश (उद्धरण) को यहाँ प्रस्तुत करूँगा, उसे मुझसे सुनें। โก’ยํ [Pg.46] มชฺเฌสมุทฺทสฺมึ, อปสฺสํ ตีรมายุเห; กํ ตฺวํ อตฺถวสํ ญตฺวา, เอวํ วายมเส ภุสํ. 'मध्य समुद्र में तट न देखते हुए भी यह कौन प्रयास कर रहा है (āyuhe)? तुम किस प्रयोजन को जानकर इस प्रकार अत्यधिक व्यायाम (प्रयत्न) कर रहे हो?' นิสมฺม วตฺตํ โลกสฺส, วายามสฺส จ เทวเต; ตสฺมา มชฺเฌสมุทฺทสฺมึ, อปสฺสํ ตีรมายุเห. 'हे देवता! लोक के स्वभाव और व्यायाम (प्रयत्न) के फल को जानकर; इसलिए मैं मध्य समुद्र में तट न देखते हुए भी प्रयास कर रहा हूँ (āyuhe)।' อสฺสํ ปุริมคาถายํ, ‘‘อายุเห’’ติปทสฺส หิ; ‘‘อายูหตี’’ติ อตฺโถติ, วิญฺญาตพฺโพ วิภาวินา. इस पूर्व गाथा में 'आयुहे' (āyuhe) पद का अर्थ 'आयूहिति' (āyūhati - वह प्रयास करता है) है, ऐसा विद्वान को जानना चाहिए। วิภตฺติยา วิปลฺลาส-วเสนายํ สมีริโต; วตฺตมาเน สตฺตมีติ, ติสฺเสการวเสน วา. विभक्ति के विपर्यास (परिवर्तन) के कारण यह कहा गया है; अथवा वर्तमान काल में सप्तमी के 'ए' कार के कारण। ปจฺฉิมาย จ คาถายํ, ‘‘อายุเห’’ติปทสฺส ตุ; ‘‘อายูหามี’’ติ อตฺโถติ, สทฺทตฺถญฺญู วิภาวเย. और पिछली गाथा में 'आयुहे' पद का अर्थ 'आयूहामि' (āyūhāmi - मैं प्रयास करता हूँ) है, ऐसा शब्दार्थ के ज्ञाता को स्पष्ट करना चाहिए। ตถา ‘‘ภเว’’ติเอตสฺส, วตฺตมานาวิภตฺติยํ; ‘‘ภวตี’’ติ, ‘‘ภวามี’’ติ, จตฺถํ ทฺเวธา วิภาวเย. उसी प्रकार वर्तमान विभक्ति में 'भवे' के 'भवति' और 'भवामि'—इन दो अर्थों को स्पष्ट करना चाहिए। เอวํวิเธสุ อญฺเญสุ, ปาเฐสุปิ อยํ นโย; เนตพฺโพ นยทกฺเขน, นยสาครสาสเน. इस प्रकार के अन्य पाठों में भी, नीति-सागर रूपी शासन में नीति-दक्ष (विद्वान) द्वारा इसी पद्धति को ले जाना (लागू करना) चाहिए। เอวมยํ ภเวสทฺโท ปญฺจสุ ฉสุ วา กฺริยาปทตฺเถสุ ปวตฺตติ. ตถา สตฺตมีวิภตฺยนฺตนามิกปทสฺส วุทฺธิสํสารกมฺมภวูปปตฺติภวสงฺขาเตสุ อตฺเถสุปิ. ตถา หิ ‘‘อภเว นนฺทติ ตสฺส, ภเว ตสฺส น นนฺทตี’’ติอาทีสุ วุทฺธิมฺหิ. ‘‘ภเว วิจรนฺโต’’ติอาทีสุ สํสาเร. ‘‘ภเว โข สติ ชาติ โหติ, ชาติปจฺจยา ชรามรณ’’นฺติอาทีสุ กมฺมภเว. ‘‘เอวํ ภเววิชฺชมาเน’’ติอาทีสุ อุปปตฺติภเวติ ทฏฺฐพฺพํ. อิมินา นเยน ภูธาตุโต นิปฺผนฺนานํ อญฺญโตปิ อญฺเญสํ กฺริยาปทานํ ยถาสมฺภวมตฺโถ อุทฺธริตพฺโพ. इस प्रकार यह 'भवे' शब्द पाँच या छह क्रियापद के अर्थों में प्रयुक्त होता है। उसी प्रकार सप्तमी विभक्ति के अंत वाले नामिक पद के रूप में वृद्धि, संसार, कर्मभव और उपपत्तिभव नामक अर्थों में भी। जैसे—'अभव (हानि) में वह प्रसन्न होता है, भव (वृद्धि) में वह प्रसन्न नहीं होता' इत्यादि में 'वृद्धि' के अर्थ में। 'भव (संसार) में विचरते हुए' इत्यादि में 'संसार' के अर्थ में। 'भव होने पर जाति होती है, जाति के प्रत्यय से जरा-मरण' इत्यादि में 'कर्मभव' के अर्थ में। 'इस प्रकार भव के विद्यमान होने पर' इत्यादि में 'उपपत्तिभव' के अर्थ में समझना चाहिए। इस पद्धति से 'भू' धातु से निष्पन्न अन्य क्रियापदों का भी यथासंभव अर्थ उद्धृत करना चाहिए। อาขฺยาตตฺถมฺหิเม [Pg.47] อตฺถา, น ลาตพฺพา กุทาจนํ; อตฺถุทฺธารวเสเนเต, อุทฺธฏา นามโต ยโต. ये अर्थ कभी भी केवल आख्यात (क्रिया) के अर्थ से नहीं लेने चाहिए; क्योंकि ये अर्थ-उद्धार के वश से नाम (संज्ञा) से उद्धृत किए गए हैं। อิทเมตฺถ สงฺเขปโต อตฺถุทฺธารนยนิทสฺสนํ. यहाँ यह संक्षेप में अर्थ-उद्धार की पद्धति का निदर्शन (उदाहरण) है। อตฺถสทฺทจินฺตายํ ปน เอวมุปลกฺเขตพฺพํ – ‘‘ภวนฺเต, ปราภวนฺเต, ปราภเว’’อิจฺจาทโย คจฺฉติ คจฺฉํ คจฺฉโตสทฺทาทโย วิย วิเสสสทฺทา, น ยาจโนปตาปนตฺถาทิวาจโก นาถติสทฺโท วิย, น จ ราชเทวตาทิวาจโก เทวสทฺโท วิย สามญฺญสทฺทา. เย เจตฺถ วิเสสสทฺทา, เต สพฺพกาลํ วิเสสสทฺทาว. เย จ สามญฺญสทฺทา, เตปิ สพฺพกาลํ สามญฺญสทฺทาว. अर्थ-शब्द-चिन्तन में इस प्रकार समझना चाहिए - 'भवन्ते, पराभवन्ते, पराभवे' इत्यादि शब्द 'गच्छति, गच्छं, गच्छतो' शब्दों की तरह विशेष शब्द हैं, न कि याचना, उपतापन आदि अर्थों के वाचक 'नाथति' शब्द की तरह, और न ही राजा, देवता आदि के वाचक 'देव' शब्द की तरह सामान्य शब्द हैं। जो यहाँ विशेष शब्द हैं, वे सदा विशेष शब्द ही हैं। और जो सामान्य शब्द हैं, वे भी सदा सामान्य शब्द ही हैं। ตตฺร คจฺฉตีติอาทีนํ วิเสสสทฺทตา เอวํ ทฏฺฐพฺพา – คจฺฉตีติ เอกํ นามปทํ, เอกมาขฺยาตํ. ตถา คจฺฉนฺติ เอกํ นามปทํ, เอกมาขฺยาตํ. คจฺฉโตติ เอโก กิตนฺโต, อปโร รูฬฺหีสทฺโท. สติปิ วิเสสสทฺทตฺเต สทิสตฺตา สุติสามญฺญโต ตพฺพิสยํ พุทฺธึ นุปฺปาเทติ วินาว’ตฺถปฺปกรณสทฺทนฺตราภิสมฺพนฺเธน. ตถา หิ สทฺทนฺตราภิสมฺพนฺเธน ‘‘คจฺฉติ ปติฏฺฐิต’’นฺติ วุตฺเต สตฺตมฺยนฺตํ นามปทนฺติ วิญฺญายติ. ‘‘คจฺฉติ ติสฺโส’’ติ วุตฺเต ปนาขฺยาตนฺติ. ตถา ‘‘ส คจฺฉํ น นิวตฺตตี’’ติ วุตฺเต ปฐมนฺตํ นามปทนฺติ วิญฺญายติ. ‘‘คจฺฉํ ปุตฺตนิเวทโก’’ติ วุตฺเต อาขฺยาตนฺติ วิญฺญายติ. ‘‘คจฺฉโต หยโต ปติโต’’ติ วุตฺเต กิตนฺโตติ วิญฺญายติ. ‘‘คจฺฉโต ปณฺณปุปฺผานิ ปตนฺตี’’ติ วุตฺเต รุกฺขวาจโก รูฬฺหีสทฺโทติ. อิติ วิเสสสทฺทานํ อาขฺยาตนามานํ นามาขฺยาเตหิ สมานสุติกานํ อตฺถาภิสมฺพนฺธาทีสุ โย โกจิ อตฺถวิเสสญาปโก สมฺพนฺโธ อวสฺสมิจฺฉิตพฺโพ. เอวํ ‘‘คจฺฉตี’’ติอาทีนํ อาขฺยาตนามตฺตาทิวเสน ปจฺเจกํ ฐิตานํ เอเกกตฺถวาจกานํ วิเสสสทฺทตา ทฏฺฐพฺพา. वहाँ 'गच्छति' आदि की विशेष-शब्दता इस प्रकार देखनी चाहिए - 'गच्छति' एक नामपद है, एक आख्यात (क्रिया) है। उसी प्रकार 'गच्छन्ति' एक नामपद है, एक आख्यात है। 'गच्छतो' एक कृदन्त है, दूसरा रूढ़ि शब्द है। विशेष शब्द होने पर भी, समानता के कारण श्रुति-सामान्यता (सुनने में एक जैसा होने) से, अर्थ-प्रकरण और अन्य शब्दों के सम्बन्ध के बिना उस विषय की बुद्धि उत्पन्न नहीं होती। जैसे कि अन्य शब्दों के सम्बन्ध से 'गच्छति पतिट्ठितं' (वृक्ष में स्थित) कहने पर यह सप्तमी-अन्त वाला नामपद है, ऐसा जाना जाता है। 'गच्छति तिस्सो' (तिस्स जाता है) कहने पर यह आख्यात है। उसी प्रकार 'स गच्छं न निवत्तति' (वह जाता हुआ नहीं लौटता) कहने पर प्रथमा-अन्त नामपद जाना जाता है। 'गच्छं पुत्तनिवेदको' (पुत्र की सूचना देते हुए जाओ) कहने पर आख्यात जाना जाता है। 'गच्छतो हयतो पतितो' (चलते हुए घोड़े से गिरा) कहने पर कृदन्त जाना जाता है। 'गच्छतो पण्णपुप्फानि पतन्ति' (वृक्ष से पत्ते-फूल गिरते हैं) कहने पर वृक्ष-वाचक रूढ़ि शब्द जाना जाता है। इस प्रकार आख्यात और नाम वाले विशेष शब्दों का, जो नाम और आख्यात के साथ समान श्रुति वाले हैं, अर्थ-सम्बन्ध आदि में कोई न कोई अर्थ-विशेष का बोधक सम्बन्ध अवश्य स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार 'गच्छति' आदि के आख्यात-नामत्व आदि के वश से पृथक-पृथक स्थित एक-एक अर्थ के वाचक होने के कारण विशेष-शब्दता देखनी चाहिए। ‘‘นาถติ [Pg.48] เทโว’’ติอาทีนํ ปน อาขฺยาตนามานํ นามาขฺยาเตหิ อสมานสุติกานํ อเนกตฺถวาจกานํ สามญฺญสทฺทตา เอว ทฏฺฐพฺพา. อตฺถสมฺพนฺธาทีสุ หิ วินา เยน เกนจิ สมฺพนฺเธน ‘‘นาถตี’’ติ วุตฺเต ‘‘ยาจตี’’ติ วา ‘‘อุปตาเปตี’’ติ วา ‘‘อิสฺสริยํ กโรตี’’ติ วา ‘‘อาสีสตี’’ติ วา อตฺโถ ปฏิภาติ, ตถา ‘‘เทโว’’ติ วุตฺเต ‘‘เมโฆ’’ติ วา ‘‘อากาโส’’ติ วา ‘‘ราชา’’ติ วา ‘‘เทวตา’’ติ วา ‘‘วิสุทฺธิเทโว’’ติ วา อตฺโถ ปฏิภาติ. ยทา ปน สทฺทนฺตราภิสมฺพนฺเธน ‘‘นาถติ สุปฺปฏิปตฺติ’’นฺติ วุตฺเต ตทา ‘‘นาถตี’’ติ กฺริยาปทสฺส ‘‘ยาจตี’’ติ อตฺโถ วิญฺญายติ, ‘‘นาถติ สพฺพกิเลเส’’ติ วุตฺเต ‘‘อุปตาเปตี’’ติ อตฺโถ วิญฺญายติ. ‘‘นาถติ สกจิตฺเต’’ติ วุตฺเต ‘‘อิสฺสริยํ กโรตี’’ติ อตฺโถ วิญฺญายติ. ‘‘นาถติ โลกสฺส หิต’’นฺติ วุตฺเต ‘‘อาสีสตี’’ติ อตฺโถ วิญฺญายติ. ตถา ‘‘เทโว คชฺชตี’’ติ วุตฺเต ‘‘เทโว’’ติ นามปทสฺส ‘‘เมโฆ’’ติ อตฺโถ วิญฺญายติ. ‘‘วิทฺโธ วิคตวลาหโก เทโว’’ติ วุตฺเต ‘‘อากาโส’’ติ อตฺโถ วิญฺญายติ. ‘‘ปิวตุ เทโว ปานีย’’นฺติ วุตฺเต ‘‘ราชา’’ติ อตฺโถ วิญฺญายติ. ‘‘เทโว เทวกายา จวติ อายุสงฺขยา’’ติ วุตฺเต ‘‘เทวตา’’ติ อตฺโถ วิญฺญายติ. ‘‘เทวาติเทโว สตปุญฺญลกฺขโณ’’ติ วุตฺเต ‘‘วิสุทฺธิเทโว’’ติ อตฺโถ วิญฺญายติ. อิมินา นเยน อญฺเญปิ สามญฺญสทฺทา ญาตพฺพา. परन्तु 'नाथति, देव' आदि आख्यात और नामों की, जो नाम और आख्यात के साथ असमान श्रुति वाले और अनेक अर्थों के वाचक हैं, सामान्य-शब्दता ही देखनी चाहिए। क्योंकि अर्थ-सम्बन्ध आदि में किसी भी सम्बन्ध के बिना 'नाथति' कहने पर 'याचना करता है' या 'संताप देता है' या 'ऐश्वर्य करता है' या 'आशीर्वाद देता है' ऐसा अर्थ प्रतिभासित होता है; उसी प्रकार 'देव' कहने पर 'मेघ' या 'आकाश' या 'राजा' या 'देवता' या 'विशुद्धिदेव' ऐसा अर्थ प्रतिभासित होता है। परन्तु जब अन्य शब्दों के सम्बन्ध से 'नाथति सुप्पटिपत्तिं' कहा जाता है, तब 'नाथति' क्रियापद का 'याचना करता है' यह अर्थ जाना जाता है; 'नाथति सब्बकिलेसे' कहने पर 'संताप देता है' यह अर्थ जाना जाता है। 'नाथति सकचित्ते' कहने पर 'ऐश्वर्य करता है' यह अर्थ जाना जाता है। 'नाथति लोकस्स हितं' कहने पर 'आशीर्वाद देता है' यह अर्थ जाना जाता है। उसी प्रकार 'देवो गज्जति' कहने पर 'देव' नामपद का 'मेघ' यह अर्थ जाना जाता है। 'विद्धो विगतवलाहको देवो' कहने पर 'आकाश' यह अर्थ जाना जाता है। 'पिवतु देवो पानीयं' कहने पर 'राजा' यह अर्थ जाना जाता है। 'देवो देवकाया चवति आयुसंखया' कहने पर 'देवता' यह अर्थ जाना जाता है। 'देवातिदेवो सतपुञ्ञलक्खणो' कहने पर 'विशुद्धिदेव' यह अर्थ जाना जाता है। इस पद्धति से अन्य सामान्य शब्दों को भी जानना चाहिए। สพฺพเมตํ ญตฺวา ยถา อตฺโถ สทฺเทน, สทฺโท จตฺเถน น วิรุชฺฌติ, ตถาตฺถสทฺทา จินฺตนียา. ตตฺริทํ อุปลกฺขณมตฺตํ จินฺตาการนิทสฺสนํ – ‘‘อตฺถกุสลา ภวนฺเต’’ติ วา ‘‘กิจฺจานิ ภวนฺเต’’ติ วา วุตฺเต ‘‘ภวนฺเต’’ติ อิทํ ‘‘ภวนฺตี’’ติมินา สมานตฺถมาขฺยาตปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘ภวนฺเต ปสฺสามี’’ติ วา ‘‘อิจฺฉามี’’ติ วา วุตฺเต อุปโยคตฺถวํ [Pg.49] นามปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘ภวนฺเต ชเน ปสํสตี’’ติ วา ‘‘กาเมตี’’ติ วา วุตฺเต ปจฺจตฺโตปโยคตฺถวนฺตานิ ทฺเว นามปทานีติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘โจรา ปราภวนฺเต’’ติ วุตฺเต ‘‘ปราภวนฺเต’’ติ อิทํ ‘‘ปราภวนฺตี’’ติมินา สมานตฺถมาขฺยาติกปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘ปราภวนฺเต ชนา อิจฺฉนฺติ อมิตฺตาน’’นฺติ วุตฺเต ‘‘ปราภวนฺเต’’ติ อิมานิ อุปโยคปจฺจตฺตตฺถวนฺตานิ ทฺเว นามปทานีติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘เอโส ปราภเว’’ติ วุตฺเต ‘‘ปราภเว’’ติ อิทํ ‘‘ปราภเวยฺยา’’ติมินา สมานตฺถมาขฺยาตปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘เอเต ปราภเว โลเก, ปณฺฑิโต สมเวกฺขิยา’’ติ วุตฺเต ‘‘ปราภเว’’ติ อิทํ อุปโยคตฺถวํ พหุวจนํ นามปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘ปราภเว สตี’’ติ วุตฺเต ภาวลกฺขณภุมฺมตฺเถกวจนกํ นามปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘ตุมฺเห เม ปสาทา สมฺภเว’’ติ วุตฺเต ‘‘สมฺภเว’’ติ อิทํ ‘‘สมฺภวถา’’ติมินา สมานตฺถมาขฺยาตปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘เอหิ ตฺวํ สมฺภววฺเห’’ติ วุตฺเต ‘‘สมฺภววฺเห’’ติ อิทํ สมฺภวาย นาม อิตฺถิยา วาจกํ อิตฺถิลิงฺคํ สาลปนํ นามิกปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘เอหิ ตฺวํ สมฺภววฺเหปติฏฺฐิต’’นฺติ วุตฺเต สมฺภวนามกสฺส ปุริสสฺส วาจกํ ปุลฺลิงฺคํ ภุมฺมวจนนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. यह सब जानकर, जिस प्रकार अर्थ शब्द के साथ और शब्द अर्थ के साथ विरोध न करे, उस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। यहाँ विचार करने के ढंग का यह मात्र उदाहरण है - 'अत्थकुसला भवन्ते' (आप अर्थ-कुशल हों) या 'किच्चानि भवन्ते' (कार्य हो रहे हैं) कहने पर, यहाँ 'भवन्ते' यह 'भवन्ति' के समान अर्थ वाला आख्यात (क्रिया) पद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'भवन्ते पस्सामि' (मैं आपको देखता हूँ) या 'इच्छामि' (चाहता हूँ) कहने पर, यह द्वितीया विभक्ति (उपयोगत्थ) वाला नामपद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'भवन्ते जने पसंसति' (वह आप लोगों की प्रशंसा करता है) या 'कामेति' (चाहता है) कहने पर, ये प्रथमा और द्वितीया विभक्ति वाले दो नामपद हैं, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'चोरा पराभवन्ते' (चोर पराजित होते हैं) कहने पर, 'पराभवन्ते' यह 'पराभवन्ति' के समान अर्थ वाला आख्यात पद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'पराभवन्ते जना इच्छन्ति अमित्तानं' (पराभव को प्राप्त लोग शत्रुओं को चाहते हैं) कहने पर, 'पराभवन्ते' ये द्वितीया और प्रथमा विभक्ति वाले दो नामपद हैं, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'एसो पराभवे' (यह पराभव हो/हो सकता है) कहने पर, 'पराभवे' यह 'पराभवेय्य' के समान अर्थ वाला आख्यात पद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'एते पराभवे लोके, पण्डितो समवेक्खिया' (लोक में इन पराभवों को पण्डित अच्छी तरह देखे) कहने पर, 'पराभवे' यह द्वितीया विभक्ति का बहुवचन नामपद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'पराभवे सति' (पराभव होने पर) कहने पर, यह भाव-लक्षण अर्थ में सप्तमी विभक्ति का एकवचन नामपद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'तुम्हे मे पसादा सम्भवे' (आप मेरे प्रसाद से उत्पन्न हों) कहने पर, 'सम्भवे' यह 'सम्भवथ' के समान अर्थ वाला आख्यात पद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'एहि त्वं सम्भवव्हे' (हे सम्भवव्हे! तुम आओ) कहने पर, 'सम्भवव्हे' यह 'सम्भवा' नामक स्त्री का वाचक स्त्रीलिंग सम्बोधन नामपद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'एहि त्वं सम्भवव्हे पतिट्ठितं' (हे तुम! सम्भव [नामक पुरुष] में प्रतिष्ठित [वस्तु को लाओ]) कहने पर, यह सम्भव नामक पुरुष का वाचक पुल्लिंग सप्तमी विभक्ति का पद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। ‘‘วรุโณ พฺรหฺมเทโว จ, อเหสุํ อคฺคสาวกา; สมฺภโว นามุปฏฺฐาโก, เรวตสฺส มเหสิโน’’ติ – वरुण और ब्रह्मदेव अग्रश्रावक थे; महर्षि रेवत के सम्भव नामक उपस्थापक (सेवक) थे। หิ ปาฬิ. ‘‘ธมฺมา ปาตุภวนฺเต’’ติ วุตฺเต ‘‘ปาตุภวนฺเต’’ติ อิทํ ‘‘ปาตุภวนฺตี’’ติมินา สมานตฺถํ สนิปาตมาขฺยาตปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘ปาตุ ภวนฺเต ชเน’’ติ วุตฺเต ‘‘เต ชเน ภวํ รกฺขตู’’ติ อตฺถวาจกานิ อาขฺยาตกิตนฺตสพฺพนามิกปทานีติ [Pg.50] เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘ปาตุภวเส ตฺวํ คุเณหี’’ติ วุตฺเต ‘‘ปาตุภวเส’’ติ อิทํ ‘‘ปาตุภวสี’’ติมินา สมานตฺถมาขฺยาตปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘ปาตุภวเส คุเณ โย ตฺว’’นฺติ วุตฺเต ‘‘ปาตุภวาหิ อตฺตโน คุณเหตุ ตฺว’’นฺติ อตฺถวาจกานินิปาตยุตฺตาขฺยาตนามปทานีติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘อหมตฺตโน คุเณหิ ปาตุภเว’’ติ วุตฺเต ‘‘ปาตุภเว’’ติ อิทํ ‘‘ปาตุภวามี’’ติมินา สมานตฺถํ สนิปาตมาขฺยาตปทนฺติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. ‘‘มํ ปาตุ ภเว อิทํ ปุญฺญกมฺม’’นฺติ วุตฺเต ‘‘มํ รกฺขตุ สํสาเร อิทํ ปุญฺญกมฺม’’นฺติ อตฺถวาจกานิ อาขฺยาตนามปทานีติ เอวมตฺโถ จ สทฺโท จ จินฺตนีโย. อิมินา นเยน สพฺพตฺถ ยถารหมตฺถสทฺทา จินฺตนียา. ตตฺถ สมานสุติกานํ เกสญฺจิ สทฺทานํ ‘‘น เตสํ โกฏฺเฐ โอเปนฺติ. น เตสํ อนฺตรา คจฺเฉ. สตฺต โว ลิจฺฉวี อปริหานีเย ธมฺเม เทเสสฺสามิ, อิเม เต เทว สตฺตโว, ตฺวญฺจ อุตฺตมสตฺตโว’’ติอาทีสุ สมานสุติกานํ วิย อุจฺจารณวิเสโส อิจฺฉนีโย. อุจฺจารณวิเสเส หิ สติ ปทานิ ปริพฺยตฺตานิ, ปเทสุ ปริพฺยตฺเตสุ อตฺโถ ปริพฺยตฺโต โหติ, อตฺถปริคฺคาหกานํ อตฺถาธิคโม อกิจฺโฉ โหติ, สุปริสุทฺธาทาสตเล ปฏิพิมฺพทสฺสนํ วิย, โส จ คหิตปุพฺพสงฺเกตสฺส อตฺถสมฺพนฺธาทีสุ อญฺญตรสฺมึ ญาเตเยว โหติ, น อิตรถา. วุตฺตญฺเหตํ โปราเณหิ – यह पालि है। 'धम्मा पातुभवन्ते' (धर्म प्रकट होते हैं) कहने पर, 'पातुभवन्ते' यह 'पातुभवन्ति' के समान अर्थ वाला निपात-युक्त आख्यात पद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'पातु भवन्ते जने' कहने पर, 'भगवान उन लोगों की रक्षा करें' - इस अर्थ को बताने वाले आख्यात, कृदन्त और सर्वनाम पद हैं, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'पातुभवसे त्वं गुणेहि' (तुम गुणों से प्रकट होते हो) कहने पर, 'पातुभवसे' यह 'पातुभवसि' के समान अर्थ वाला आख्यात पद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'पातुभवसे गुणे यो त्वं' कहने पर, 'तुम अपने गुणों के कारण प्रकट होओ' - इस अर्थ को बताने वाले निपात-युक्त आख्यात और नामपद हैं, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'अहमत्तनो गुणेहि पातुभवे' (मैं अपने गुणों से प्रकट होता हूँ) कहने पर, 'पातुभवे' यह 'पातुभवमि' के समान अर्थ वाला निपात-युक्त आख्यात पद है, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। 'मं पातु भवे इदं पुञ्ञकम्मं' कहने पर, 'यह पुण्य कर्म संसार में मेरी रक्षा करे' - इस अर्थ को बताने वाले आख्यात और नामपद हैं, इस प्रकार अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। इस विधि से सर्वत्र यथायोग्य अर्थ और शब्द का विचार करना चाहिए। वहाँ समान ध्वनि वाले कुछ शब्दों में, जैसे - 'न तेसं कोट्टे ओपेन्ति' (वे कोठार में संग्रह नहीं करते), 'न तेसं अन्तरा गच्छे' (उनके बीच में न जाए), 'सत्त वो लिच्छवी अपरिहानीये धम्मे देसेस्सामि' (हे लिच्छवियों! मैं तुम्हें सात अपरिहाणीय धर्मों का उपदेश दूँगा), 'इमे ते देव सत्तवो' (हे देव! ये तुम्हारे शत्रु हैं), 'त्वञ्च उत्तमसत्तवो' (और तुम उत्तम प्राणी हो) - आदि में समान ध्वनि वालों के समान ही उच्चारण-विशेष (विशिष्ट उच्चारण) वांछित है। क्योंकि उच्चारण-विशेष होने पर पद स्पष्ट होते हैं, पदों के स्पष्ट होने पर अर्थ स्पष्ट होता है, और अर्थ को ग्रहण करने वालों के लिए अर्थ की प्राप्ति बिना कठिनाई के होती है, जैसे अत्यन्त स्वच्छ दर्पण के तल पर प्रतिबिम्ब का दिखना; और वह (अर्थाधिगम) पहले से ग्रहण किए गए संकेत के अर्थ-सम्बन्ध आदि में से किसी एक के ज्ञात होने पर ही होता है, अन्यथा नहीं। जैसा कि प्राचीन आचार्यों ने कहा है - ‘‘วิสยตฺตมนาปนฺนา, สทฺทา เนวตฺถโพธกา; น ปทมตฺตโต อตฺเถ, เต อญฺญาตา ปกาสกา’’ติ. विषयत्व (अर्थ के साथ सम्बन्ध) को प्राप्त न हुए शब्द अर्थ का बोध नहीं कराते; केवल पद होने मात्र से वे अज्ञात अर्थों को प्रकाशित नहीं करते। ยทิทเมตฺถ วุตฺตมมฺเหหิ ‘‘อุจฺจารณวิเสโส อิจฺฉนีโย’’ติ. อตฺรายมุจฺจารณวิเสสทีปนี คาถา สหตฺถปฺปกาสนนยทานคาถาย. यहाँ जो हमने कहा है कि 'उच्चारण-विशेष वांछित है', इस विषय में उच्चारण-विशेष को स्पष्ट करने वाली यह गाथा 'सहत्थप्पकासन-नय' (स्व-हस्त-प्रकाशन विधि) देने वाली गाथा के साथ है। ‘‘น [Pg.51] เต สํ โกฏฺเฐ โอเปนฺติ’’, อิติ ปาเฐ สุเมธโส; ปทํ ‘‘น เต’’ติ ฉินฺทิตฺวา, ‘‘สํ โกฏฺเฐ’’ติ ปเฐยฺย เว. 'न ते सं कोट्टे ओपेन्ति' - इस पाठ में बुद्धिमान व्यक्ति को 'न ते' पद को अलग करके 'सं कोट्टे' ऐसा पढ़ना चाहिए। ‘‘สํ น โอเปนฺติ โกฏฺเฐ เต, ภิกฺขู’’ติ อตฺถมีรเย; เอวมิเมสุ อญฺเญสุ, ปาเฐสุปิ อยํ นโย. 'वे भिक्षु (अपने) कोठार में संग्रह नहीं करते' - ऐसा अर्थ कहना चाहिए; इसी प्रकार अन्य पाठों में भी यही विधि अपनानी चाहिए। อถ ยํ ปนิทมฺปิ วุตฺตํ ‘‘เกสญฺจี’’ติ, ตํ กิมตฺถํ? ‘‘คจฺฉติ ปติฏฺฐิตํ, คจฺฉติ ติสฺโส, ภวนฺเต ปสฺสามิ, อตฺถกุสลา ภวนฺเต, วทนฺตํ เอกโปกฺขรา, วทนฺตํ ปฏิวทตี’’ติอาทีสุ สมานสุติกานมุจฺจารณวิเสโส น ลพฺภตีติ ทสฺสนตฺถํ. ตสฺมา อิทเมตฺถ สลฺลกฺเขตพฺพํ – ยตฺถ สมานสุติกานมุจฺจารณวิเสโส ลพฺภติ อตฺถวิเสโส จ ปทานํ วิภาควเสน วา อวิภาควเสน วา, ตตฺถ ปโยเค สมานสุติกเมกจฺจํ ปทํ วิจฺฉินฺทิตฺวา อุจฺจาเรตพฺพํ. เสยฺยถิทํ? ‘‘เหตุ เหตุสมฺปยุตฺตกานํ ธมฺมานํ ตํสมุฏฺฐานานญฺจ รูปานํ เหตุปจฺจเยน ปจฺจโย. โส เตน สทฺธึ ภาสติ, โสเตน วุยฺหติ. ภวนฺเต ชเน ปสํสติ, ภวนฺเต ปสฺสามี’’ติ เอวมาทโย ปโยคา. เอตฺถ ‘‘เหตู’’ติ อีสกํ วิจฺฉินฺทิตฺวา ‘‘เหตุสมฺปยุตฺตาน’’นฺติ อุจฺจาเรตพฺพํ. ตถา ‘‘โส’’ติ วิจฺฉินฺทิตฺวา ‘‘เตน สทฺธิ’’นฺติ อุจฺจาเรตพฺพํ. ‘‘ภว’’นฺติ วิจฺฉินฺทิตฺวา ‘‘เต ชเน’’ติ อุจฺจาเรตพฺพํ. अब जो यह कहा गया है कि 'किन्हीं के लिए' (केसञ्चि), वह किसलिए है? 'गच्छति पतिट्ठितं, गच्छति तिस्सो, भवन्ते पस्सामि, अत्थकुसला भवन्ते, वदन्तं एकपोक्खरा, वदन्तं पटिवदती' आदि में समान ध्वनि वाले शब्दों के उच्चारण में कोई विशेष अंतर नहीं पाया जाता है, यह दिखाने के लिए। इसलिए यहाँ यह ध्यान देना चाहिए - जहाँ समान ध्वनि वाले शब्दों के उच्चारण में विशेष अंतर पाया जाता है और पदों के विभाग (विभाजन) या अविभाग (अविभाजन) के कारण अर्थ में विशेषता होती है, वहाँ प्रयोग में समान ध्वनि वाले किसी पद को अलग करके (विच्छेद करके) उच्चारित करना चाहिए। जैसे कि - 'हेतु हेतुसम्पयुत्तकानं धम्मानं तंसमुट्ठानानञ्च रूपानं हेतुपच्चयेन पच्चयो। सो तेन सद्धिं भासति, सोतेन वुय्हति। भवन्ते जने पसंसति, भवन्ते पस्सामी' इत्यादि प्रयोग। यहाँ 'हेतू' को थोड़ा अलग करके 'हेतुसम्पयुत्तानं' उच्चारित करना चाहिए। वैसे ही 'सो' को अलग करके 'तेन सद्धिं' उच्चारित करना चाहिए। 'भवं' को अलग करके 'ते जने' उच्चारित करना चाहिए। เสสํ ปน สมานสุติกํ วิจฺฉินฺทิตฺวา น อุจฺจาเรตพฺพํ. อวิจฺฉินฺทนียสฺมิญฺหิ ฐาเน วิจฺฉินฺทิตฺวา ปฐิตสฺส อตฺโถ ทุฏฺโฐ โหติ. เอวํ ปทวิภาคาวิภาควเสน สมานสุติกานมตฺถุจฺจารณวิเสโส เวทิตพฺโพ. เอตฺถ หิ ‘‘โส เตนา’’ติอาทีสุ ทฺวิปทตฺถคฺคหณํ วิภาโค, เอกปทตฺถคฺคหณมวิภาโคติ อธิปฺเปโต. เอตฺถ จ วิสุํ ววตฺถิตานํ อสมานสุติกานํ เอกโต กตฺวา สมานสุติกภาวปริกปฺปนํ อตฺถนฺตรวิญฺญาปนตฺถญฺเจว อุจฺจารณวิเสสทสฺสนตฺถญฺจ. น หิ เอตานิ [Pg.52] ‘‘สปฺโป สปฺโป’’ติอาทีสุ วิย เอกสฺมึเยวตฺเถ สมานสุติกานิ. เอวํ สนฺเตปิ เอกชฺฌกรเณน ลทฺธํ สมานสุติเลสํ คเหตฺวา อตฺถนฺตรวิญฺญาปนตฺถํ อุจฺจารณวิเสสทสฺสนตฺถญฺจ ‘‘สมานสุติกานี’’ติ วุตฺตานิ. เอส นโย อญฺญตฺราปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ. อิทเมตฺถ สลฺลกฺเขตพฺพํ – किन्तु शेष समान ध्वनि वाले शब्दों को अलग करके उच्चारित नहीं करना चाहिए। क्योंकि जहाँ विच्छेद नहीं करना चाहिए, वहाँ विच्छेद करके पढ़ने से अर्थ दूषित हो जाता है। इस प्रकार पद-विभाग और अविभाग के वश से समान ध्वनि वाले शब्दों के अर्थ और उच्चारण का विशेष अंतर समझना चाहिए। यहाँ 'सो तेन' आदि में दो पदों के अर्थ का ग्रहण 'विभाग' है, और एक पद के अर्थ का ग्रहण 'अविभाग' अभिप्रेत है। और यहाँ अलग-अलग स्थित असमान ध्वनि वाले शब्दों को एक साथ करके समान ध्वनि होने की कल्पना करना, अन्य अर्थ को समझाने के लिए और उच्चारण की विशेषता दिखाने के लिए है। ये शब्द 'सप्पो सप्पो' (साँप साँप) आदि की तरह एक ही अर्थ में समान ध्वनि वाले नहीं हैं। ऐसा होने पर भी, एक साथ करने से प्राप्त समान ध्वनि के लेश को लेकर अन्य अर्थ समझाने और उच्चारण की विशेषता दिखाने के लिए इन्हें 'समानसुतिकानि' (समान ध्वनि वाले) कहा गया है। यही नियम अन्यत्र भी ऐसे स्थानों पर लागू होता है। यहाँ यह ध्यान देना चाहिए - ยตฺถ สมานสุติกานํ อฏฺฐารสากาเรสุ เยน เกนจิ อากาเรน อตฺถวิเสโส ลพฺภติ, วิจฺฉินฺทิตฺวา ปน อุจฺจารเณ สทฺทวิลาโส น โหติ, อตฺโถ วา ทุฏฺโฐ โหติ, น ตาทิเสสุ ปโยเคสุ สมานสุติกานิ ปทานิ วิจฺฉินฺทิตฺวา อุจฺจาเรตพฺพานิ. ตตฺร กตเมน จากาเรน อตฺถวิเสสลาโภ ภวติ? ปทานํ วิภาควเสน วา อวิภาควเสน วา อกฺขรสนฺนิธานวเสน วา ปทสนฺนิธานวเสน วา ปทกฺขรสนฺนิธานวเสน วา วิจฺฉาวเสน วา กมฺมปฺปวจนียวเสน วา ภยโกธาทีสุ อุปฺปนฺเนสุ กถิตาเมฑิตวจนวเสน วา คุณวาจกสทฺทสฺส ทฺวิรุตฺตวเสน วา กฺริยาปทสฺส ทฺวิรุตฺตวเสน วา สํหิตาปทจฺเฉทวเสน วา อคารวตฺถปริทีปนวเสน วา นิรนฺตรตฺถปริทีปนวเสน วา นนิรนฺตรตฺถปริทีปนวเสน วา ‘‘ปุนปฺปุน’’มิจฺจตฺถปริทีปนวเสน วา อุปมาเน อิว สทฺทวเสน วา อิติสทฺทํ ปฏิจฺจ สทฺทปทตฺถวาจกตฺถปริทีปนวเสน วา ตถาปวตฺตจิตฺตปริทีปนวเสน วาติ อิเมสุฏฺฐารสากาเรสุ, วิตฺถารโต ปน ฉพฺพีสาย อากาเรสุ ตโต วาธิเกสุ เยน เกนจิ อากาเรน อตฺถวิเสสลาโภ ภวติ. जहाँ समान ध्वनि वाले शब्दों के अठारह प्रकारों में से किसी भी प्रकार से अर्थ-विशेष प्राप्त होता है, किन्तु अलग करके उच्चारण करने पर शब्द का सौन्दर्य (सद्दविलासो) नहीं रहता या अर्थ दूषित हो जाता है, वहाँ ऐसे प्रयोगों में समान ध्वनि वाले पदों को अलग करके उच्चारित नहीं करना चाहिए। वहाँ किस प्रकार से अर्थ-विशेष की प्राप्ति होती है? पदों के विभाग या अविभाग के कारण, अक्षरों के सान्निध्य (निकटता) के कारण, पदों के सान्निध्य के कारण, पद और अक्षरों के सान्निध्य के कारण, वीप्सा (पुनरावृत्ति) के कारण, कर्मप्रवचनीय के कारण, भय-क्रोध आदि उत्पन्न होने पर कहे गए आम्रेडित (दोहराए गए) वचनों के कारण, गुणवाचक शब्द की द्विरुक्ति (दो बार कहना) के कारण, क्रियापद की द्विरुक्ति के कारण, संहिता (संधि) और पद-च्छेद के कारण, अनादर की वस्तु को प्रकट करने के कारण, निरंतर अर्थ को प्रकट करने के कारण, अनिरंतर अर्थ को प्रकट करने के कारण, 'पुनः-पुनः' इस अर्थ को प्रकट करने के कारण, उपमान में 'इव' शब्द के कारण, 'इति' शब्द के आश्रय से शब्द और पद के अर्थ के वाचक अर्थ को प्रकट करने के कारण, अथवा उस प्रकार प्रवृत्त चित्त को प्रकट करने के कारण - इन अठारह प्रकारों में, और विस्तार से छब्बीस या उससे अधिक प्रकारों में से किसी भी प्रकार से अर्थ-विशेष की प्राप्ति होती है। เอตฺถ ปทานํ ตาว วิภาควเสน วา อวิภาควเสน วา สมานสุติกานมตฺถวิเสสลาเภ ‘‘สา นํ สงฺคติ ปาเลติ, อภิกฺกโม สานํ ปญฺญายติ. มา โน เทว อวธิ, มาโน มยฺหํ น วิชฺชตี’’ติ เอวมาทโย ปโยคา. यहाँ पहले पदों के विभाग या अविभाग के कारण समान ध्वनि वाले शब्दों में अर्थ-विशेष की प्राप्ति के उदाहरण: 'सा नं सङ्गति पालेति, अभिक्कमो सानं पञ्ञायति। मा नो देव अवधि, मानो मय्हं न विज्जती' इत्यादि प्रयोग हैं। อกฺขรสนฺนิธานวเสน [Pg.53] ปน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘สนฺเตหิ มหิโต หิโต. สงฺคา สงฺคามชึ มุตฺตํ, ตมหํ พฺรูมิ พฺราหฺมณํ. ทาฐี ทาฐีสุ ปกฺขนฺทิ, มญฺญมาโน ยถา ปุเร. สพฺพาภิภุํว สิรสาสิรสา นมามิ. ภูมิโต อุฏฺฐิตา ยาว, พฺรหฺมโลกา วิธาวติ. อจฺจิ อจฺจิมโต โลเก, ฑยฺหมานมฺหิ เตชสา’’ติ เอวมาทโย ปโยคา. अक्षरों के सान्निध्य के कारण अर्थ-विशेष की प्राप्ति में: 'सन्तेहि महितो हितो। सङ्गा सङ्गामजिं मुत्तं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं। दाठी दाठीसु पक्खन्दि, मञ्ञमानो यथा पुरे। सब्बाभिभुं व सिरसा सिरसा नमामि। भूमितो उट्ठिता याव, ब्रह्मलोका विधावति। अच्चि अच्चिमतो लोके, डय्हमानम्हि तेजसा' इत्यादि प्रयोग हैं। ปทสนฺนิธานวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘อาโป อาโปคตํ. ราชราชมหามตฺตาทโย, สุโข’โลกสฺส โลกสฺส, การโก ญาณจกฺขุโท, นิราปเท ปเท นินฺโน, อนนฺตญาณํ กรุณาลยํ ลยํ, มลสฺส พุทฺธํ สุสมาหิตํ หิตํ. นมามิ ธมฺมํ ภวสํวรํ วรํ, คุณากรญฺเจว นิรงฺคณํ คณ’’นฺติ เอวมาทโย ปโยคา. पदों के सान्निध्य के कारण अर्थ-विशेष की प्राप्ति में: 'आपो आपोगतं। राजराजमहामत्तादयो, सुखो’लोकस्स लोकस्स, कारको ञाणचक्खुदो, निरापदे पदे निन्नो, अनन्तञाणं करुणालयं लयं, मलस्स बुद्धं सुसमाहितं हितं। नमामि धम्मं भवसंवरं वरं, गुणाकरञ्चेव निरङ्गणं गणं' इत्यादि प्रयोग हैं। ปทกฺขรสนฺนิธานวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘ปมาณรหิตํ หิตํ, สิทฺธตฺโถ สพฺพสิทฺธตฺโถ, ติโลกมหิโต หิโต. อุปคนฺตฺวาน สมฺพุทฺโธ, อิทํ วจนมพฺรวี’’ติ เอวมาทโย ปโยคา. ตตฺริมา อกฺขรสนฺนิธานาทีสุ อธิปฺปายวิญฺญาปนิโย คาถา – पद और अक्षरों के सान्निध्य के कारण अर्थ-विशेष की प्राप्ति में: 'पमाणरहितं हितं, सिद्धत्थो सब्बसिद्धत्थो, तिलोकमहितो हितो। उपगन्त्वान सम्बुद्धो, इदं वचनमब्रवी' इत्यादि प्रयोग हैं। वहाँ इन अक्षर-सान्निध्य आदि में अभिप्राय को समझाने वाली गाथाएँ ये हैं - มหิโตอิติ สทฺทมฺหา, มกาโร เจ วิเวจิโต; สทฺโท นิรตฺถโก เอตฺถ, ‘‘อกฺขร’’นฺติ วเท พุโธ. 'महितो' इस शब्द से यदि 'म' कार को अलग कर दिया जाए, तो यहाँ शब्द निरर्थक हो जाता है; विद्वान इसे 'अक्षर' कहते हैं। เญยฺยา อกฺขรโยเคน,‘‘สนฺเตหิ มหิโต หิโต’’; อิจฺจาทีสุ สรูปานํ,โหติ อตฺถวิเสสตา. 'सन्तेहि महितो हितो' इत्यादि में अक्षरों के योग से समान रूप वाले शब्दों में अर्थ की विशेषता जाननी चाहिए। อุปสคฺคา นิปาตา จ, ยญฺจญฺญํ อตฺถโชตกํ; เอกกฺขรมฺปิ วิญฺญูหิ, ตํ ‘‘ปท’’นฺติ สมีริตํ. उपसर्ग, निपात और जो अन्य अर्थ को प्रकट करने वाले हैं, विद्वानों द्वारा उन्हें एक अक्षर वाला होने पर भी 'पद' कहा गया है। ปทานํ [Pg.54] สนฺนิธานญฺจ, ปทกฺขรานเมว จ; สมาเส ลพฺภมานตฺตํ, สนฺธาย ลปิตํ มยา. पदों का सान्निध्य और पद-अक्षरों का सान्निध्य समास में प्राप्त होता है, यह मेरे द्वारा (संधि को) ध्यान में रखकर कहा गया है। วิจฺฉาวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘คาเม คาเม สตํ กุมฺภา, คาโม คาโม รมณีโย’’ติ เอวมาทโย ปโยคา. เอตฺถ หิ วิจฺฉาวเสน สพฺเพปิ คามา ปริคฺคหิตา. वीप्सा (vicchā) के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'गाँव-गाँव में सौ कुंभ हैं, गाँव-गाँव रमणीय है' इत्यादि प्रयोग होते हैं। यहाँ वीप्सा के कारण सभी गाँवों का ग्रहण किया गया है। นานาธิกรณานํ ตุ, วตฺตุเมกกฺขณมฺหิ ยา; อิจฺฉโต พฺยาปิตุํ อิจฺฉา, สา วิจฺฉาติ ปกิตฺติตา. विभिन्न आधारों (अधिकरणों) को एक ही क्षण में कहने की जो इच्छा है, और जो व्याप्त करने की इच्छा है, उसे 'वीप्सा' कहा गया है। กมฺมปฺปวจนียวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘รุกฺขํ รุกฺขํ ปติ วิชฺโชตเต จนฺโท, รุกฺขํ รุกฺขํ ปริ วิชฺโชตเต จนฺโท’’ติ ปโยคา, รุกฺขานํ อุปริ อุปริ วิชฺโชตเตติ อตฺโถ. 'कर्मप्रवचनीय' के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'वृक्ष-वृक्ष के प्रति चन्द्रमा प्रकाशित होता है, वृक्ष-वृक्ष के चारों ओर चन्द्रमा प्रकाशित होता है' ये प्रयोग हैं; इसका अर्थ है कि वृक्षों के ऊपर-ऊपर चन्द्रमा प्रकाशित होता है। ภยโกธาทีสุ อุปฺปนฺเนสุ กถิตาเมฑิตวจนวเสน ปน อตฺถวิเสสลาเภ อิเม ปโยคา – ภเย ตาว ‘‘โจโร โจโร, สปฺโป สปฺโป’’อิจฺจาทโย. โกเธ ‘‘วสล วสล, จณฺฑาล จณฺฑาล, วิชฺฌ วิชฺฌ, ปหร ปหร’’อิจฺจาทโย. ปสํสายํ ‘‘สาธุ สาธุ สาริปุตฺต, อภิกฺกนฺตํ ภนฺเต อภิกฺกนฺตํ ภนฺเต’’อิจฺจาทโย. ตุริเต ‘‘อภิกฺกม วาเสฏฺฐ อภิกฺกม วาเสฏฺฐ, คจฺฉ คจฺฉ, ลุนาหิ ลุนาหิ’’อิจฺจาทโย. โกตูหเล ‘‘อาคจฺฉ อาคจฺฉ’’อิจฺจาทโย. อจฺฉริเย ‘‘อโห พุทฺโธ อโห พุทฺโธ’’อิจฺจาทโย. หาเส ‘‘อโห สุขํ อโห สุขํ, อโห มนาปํ อโห มนาปํ’’อิจฺจาทโย. โสเก ‘‘กหํ เอกปุตฺตก กหํ เอกปุตฺตก’’อิจฺจาทโย. ปสาเท ‘‘ภวิสฺสนฺติ วชฺชี ภวิสฺสนฺติ วชฺชี’’อิจฺจาทโย. เอวํ ภยโกธาทีสุ อุปฺปนฺเนสุ กถิตาเมฑิตวจนวเสน อตฺถวิเสสลาโภ ภวติ. เอตฺถ ปน อตฺถนฺตราภาเวปิ ทฬฺหีกมฺมวเสน ปทานมตฺถโชตกภาโวเยว อตฺถวิเสสลาโภ. भय, क्रोध आदि के उत्पन्न होने पर कहे गए 'आम्रेडित' (द्विरुक्ति) वचनों के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में ये प्रयोग हैं—भय में जैसे 'चोर-चोर, सर्प-सर्प' इत्यादि। क्रोध में 'वृषल-वृषल, चाण्डाल-चाण्डाल, बींधो-बींधो, प्रहार करो-प्रहार करो' इत्यादि। प्रशंसा में 'साधु-साधु सारिपुत्र, अति सुंदर भन्ते, अति सुंदर भन्ते' इत्यादि। शीघ्रता में 'आगे बढ़ो वासेट्ठ, आगे बढ़ो वासेट्ठ, जाओ-जाओ, काटो-काटो' इत्यादि। कौतूहल में 'आओ-आओ' इत्यादि। आश्चर्य में 'अहो बुद्ध! अहो बुद्ध!' इत्यादि। हास (हर्ष) में 'अहो सुख! अहो सुख! अहो मनभावन! अहो मनभावन!' इत्यादि। शोक में 'कहाँ है इकलौता पुत्र? कहाँ है इकलौता पुत्र?' इत्यादि। प्रसाद (श्रद्धा/प्रसन्नता) में 'वज्जी होंगे, वज्जी होंगे' इत्यादि। इस प्रकार भय, क्रोध आदि के उत्पन्न होने पर कथित आम्रेडित वचनों के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति होती है। यहाँ अर्थान्तर (अन्य अर्थ) के अभाव में भी दृढ़ीकरण (बल देने) के कारण पदों का अर्थ-द्योतक होना ही अर्थ-विशेष की प्राप्ति है। ภเย [Pg.55] โกเธ ปสํสายํ,ตุริเต โกตูหล’จฺฉเร; หาเส โสเก ปสาเท จ,กเร อาเมฑิตํ พุโธ. भय, क्रोध, प्रशंसा, शीघ्रता, कौतूहल, आश्चर्य, हास, शोक और प्रसाद में विद्वान को 'आम्रेडित' (द्विरुक्ति) करना चाहिए। จสทฺโท อวุตฺตสมุจฺจยตฺโถ, เตน ครหาอสมฺมานาทีนํ สงฺคโห ทฏฺฐพฺโพ. ‘‘ปาโป ปาโป’’ติอาทีสุ หิ ครหายํ. ‘‘อภิรูปก อภิรูปกา’’ติอาทีสุ อสมฺมาเน. ‘‘กฺวายํ อพลพโล วิยา’’ติอาทีสุ อติสยตฺเถ อาเมฑิตํ ทฏฺฐพฺพํ. คุณวาจกสฺส ทฺวิรุตฺตวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘กณฺโห กณฺโห จ โฆโร จา’’ติ เอวมาทโย. ‘‘กณฺโห กณฺโห’’ติ หิ อตีว กณฺโหติ อตฺโถ. กฺริยาปทสฺส ทฺวิรุตฺตวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘ธเม ธเม นาติธเม’’ติ เอวมาทโย. ตตฺถ ธเม ธเมติ ธเมยฺย โน น ธเมยฺย. นาติธเมติ ปมาณาติกฺกนฺตํ ปน น ธเมยฺย. สํหิตาปทจฺเฉทวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘นรานรา, สุราสุรา, กตากตกุสลากุสลวิสยํ วิปฺปฏิสารากาเรน ปวตฺตํ อนุโสจนํ กุกฺกุจฺจ’’นฺติ เอวมาทโย. เอตฺถ ปน วิญฺญูนํ ปรมโกสลฺลชนนตฺถํ สิโลกํ รจยาม – 'च' शब्द अनुक्त (जो कहा नहीं गया है) के समुच्चय के लिए है, उससे निन्दा, असम्मान आदि का संग्रह समझना चाहिए। 'पापी-पापी' इत्यादि में निन्दा में; 'अभीरूपक-अभीरूपक' (हे रूपवान!) इत्यादि में असम्मान में; 'यह अत्यंत दुर्बल की तरह कहाँ है' इत्यादि में अतिशय अर्थ में आम्रेडित समझना चाहिए। गुणवाचक शब्द की द्विरुक्ति के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'कृष्ण-कृष्ण (अत्यंत काला) और घोर' इत्यादि प्रयोग हैं। 'कृष्ण-कृष्ण' का अर्थ है 'अत्यंत काला'। क्रियापद की द्विरुक्ति के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'बजाए-बजाए, बहुत अधिक न बजाए' इत्यादि प्रयोग हैं। वहाँ 'बजाए-बजाए' का अर्थ है—बजाना चाहिए, न बजाना नहीं। 'बहुत अधिक न बजाए' का अर्थ है—प्रमाण (सीमा) का अतिक्रमण करके न बजाए। संहिता और पद-च्छेद के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'नर और अनर (मनुष्य और जो मनुष्य नहीं हैं), सुर और असुर, कृत-अकृत (किया हुआ और न किया हुआ) तथा कुशल-अकुशल के विषय में विप्रतिसार (पश्चाताप) के रूप में प्रवृत्त अनुशोचन कुक्कुच्च है' इत्यादि प्रयोग हैं। यहाँ विद्वानों में परम कौशल उत्पन्न करने के लिए हम एक श्लोक की रचना करते हैं— หิตาหิตา หิตํหิตํ, อานุภาเวน เต ชิน; ปวราปวราหจฺจ, ภวามา’นามยา มยนฺติ. हे जिन! आपके अनुभाव (प्रभाव) से हित और अहित में से अत्यंत हितकारी को, तथा श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ में से श्रेष्ठ को प्राप्त कर हम नीरोग (स्वस्थ) हों। อคารวตฺถปริทีปนวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘ตุวํตุวํ เปสุญฺญกลหวิคฺคหวิวาทา’’ติ เอวมาทโย. นิรนฺตรตฺถปริทีปนวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘ทิวเส ทิวเส ปริภุญฺชตี’’ติ เอวมาทโย. นนิรนฺตรตฺถปริทีปนวเสน อตฺถวิเสสลาเภ [Pg.56] ‘‘ขเณ ขเณ ปีติ อุปฺปชฺชตี’’ติ เอวมาทโย. ‘‘ปุนปฺปุน’’มิจฺจตฺถปริทีปนวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘มุหุํ มุหุํ ภายยเต กุมาเร’’ติ เอวมาทโย. อุปมาเน อิวสทฺทวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘ราชา รกฺขตุ ธมฺเมน, อตฺตโนว ปชํ ปช’’นฺติ เอวมาทโย. อิติสทฺทํ ปฏิจฺจ สทฺทปทตฺถวาจกตฺตปริทีปนวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘พุทฺโธ พุทฺโธติ กถยนฺโต, โสมนสฺสํ ปเวทยิ’’นฺติ เอวมาทโย. ตถาปวตฺตจิตฺตปริทีปนวเสน อตฺถวิเสสลาเภ ‘‘พุทฺโธ พุทฺโธติ จินฺเตนฺโต, มคฺคํ โสเธมหํ ตทา’’ติ เอวมาทโย. เอวํ อีทิเสสุ ปโยเคสุ สมานสุติกปทํ วิจฺฉินฺทิตฺวา น อุจฺจาเรตพฺพํ. วิจฺฉินฺทิตฺวา หิ อุจฺจารเณ สติ สทฺทวิลาโส น ภวติ, กตฺถจิ ปน ‘‘กตากตากุสลากุสลวิสย’’นฺติ เอวมาทีสุ วิจฺฉินฺทิตฺวา อุจฺจาริตสฺส อตฺโถ ทุฏฺโฐ โหติ, ตสฺมา วิจฺฉินฺทิตฺวา น อุจฺจาเรตพฺพํ, เอกาพทฺธํเยว กตฺวา อุจฺจาเรตพฺพํ. อิติ สมานสุติเกสุ วินิจฺฉโย ฉพฺพีสาย อากาเรหิ อธิเกหิ จ มณฺเฑตฺวา ทสฺสิโต. अनादर की वस्तु को प्रकाशित करने के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'तू-तू (तू-तड़ाक), चुगली, कलह, विग्रह और विवाद' इत्यादि प्रयोग हैं। निरंतरता के अर्थ को प्रकाशित करने के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'दिन-दिन (प्रतिदिन) उपभोग करता है' इत्यादि प्रयोग हैं। अनिरंतरता (रुक-रुक कर) के अर्थ को प्रकाशित करने के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'क्षण-क्षण में प्रीति उत्पन्न होती है' इत्यादि प्रयोग हैं। 'बार-बार' इस अर्थ को प्रकाशित करने के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'क्षण-क्षण में कुमारों को डराता है' इत्यादि प्रयोग हैं। उपमान में 'इव' शब्द के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा की रक्षा वैसे ही करे जैसे अपनी संतान (प्रजा) की' इत्यादि प्रयोग हैं। 'इति' शब्द के कारण शब्द के अर्थ-वाचकत्व को प्रकाशित करने के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'बुद्ध-बुद्ध' कहते हुए उसने सौमनस्य (प्रसन्नता) प्रकट की इत्यादि प्रयोग हैं। उसी प्रकार प्रवृत्त चित्त को प्रकाशित करने के माध्यम से अर्थ-विशेष की प्राप्ति में 'बुद्ध-बुद्ध' ऐसा चिंतन करते हुए, तब मैंने मार्ग को शुद्ध किया इत्यादि प्रयोग हैं। इस प्रकार के प्रयोगों में समान ध्वनि वाले पदों को अलग-अलग करके उच्चारित नहीं करना चाहिए। क्योंकि अलग-अलग करके उच्चारण करने पर शब्द का विलास (सौन्दर्य) नहीं रहता, और कहीं-कहीं 'कृत-अकृत-कुशल-अकुशल-विषय' इत्यादि में अलग-अलग उच्चारित करने पर अर्थ दूषित हो जाता है, इसलिए अलग-अलग उच्चारित नहीं करना चाहिए, बल्कि एक साथ जोड़कर ही उच्चारित करना चाहिए। इस प्रकार समान ध्वनि वाले शब्दों का निर्णय छब्बीस और उससे अधिक प्रकारों से अलंकृत करके दिखाया गया है। ยสฺมา ปน สมานสุติเกสุ วินิจฺฉเย ทสฺสิเต อสมานสุติเกสุปิ วินิจฺฉโย ทสฺเสตพฺโพ โหติ, ตสฺมา ตมฺปิ ทสฺเสสฺสาม – ยตฺถ นิคฺคหีตมฺหา ปราการโลโปปิ ปาโฐ ปญฺญายติ, สํโยคพฺยญฺชนสฺส วิสํโยคตฺตมฺปิ. เตสุ ปโยเคสุ นิคฺคหีตปทํ อนนฺตรปเทน สทฺธึ เอกาพทฺธํเยว กตฺวา อุจฺจาเรตพฺพํ. กตมานิ ตานิ? ‘‘สเจ ภุตฺโต ภเวยฺยาหํ-สา’ชีโว ครหิโต มม. ปุปฺผํ’สา อุปฺปชฺชิ. ขยมตฺตํ น นิพฺพานํ’ส คมฺภีราทิวาจโต’’ติ เอวมาทโย. เอตฺถ หิ ‘‘สเจ ภุตฺโต ภเวยฺยาห’’นฺติอาทินา วิจฺเฉทมกตฺวา [Pg.57] อนนฺตเร ทฺวีสุ คาถาปเทสุ อนฺตรีภูตานํ ทฺวินฺนํ สมานสุติกปทานํ เอกโต อุจฺจารณมิว อนนฺตรปเทหิ สทฺธึ เอกาพทฺธุจฺจารณวเสน ‘‘สเจ ภุตฺโต ภเวยฺยาหํ-สา’ชีโว ครหิโต มมา’’ติอาทินา อุจฺจาเรตพฺพํ. เอวรูโปเยว หิ อุจฺจารณวิเสโส สกเลหิปิ โปราเณหิ วิญฺญูหิ อนุมโต อุจฺจาริโต จ ‘‘อสฺส อาชีโว ครหิโต มม, อสฺสา อุปฺปชฺชิ, อสฺส คมฺภีราทิวาจโต’’ติเอวมาทิอตฺถปฺปฏิปาทนสฺสานุรูปตฺตา. चूँकि समान श्रुति (समान ध्वनि) वाले पदों के विषय में निर्णय दिखाने के बाद, असमान श्रुति वाले पदों के विषय में भी निर्णय दिखाया जाना चाहिए, इसलिए हम उसे भी दिखाएंगे - जहाँ निग्गहीत के बाद आकार का लोप भी पाठ में दिखाई देता है, और संयुक्त व्यंजन का वियोग भी। उन प्रयोगों में निग्गहीत पद को अगले पद के साथ एकबद्ध (जोड़कर) ही उच्चारित करना चाहिए। वे कौन से हैं? जैसे - ‘‘सचे भुत्तो भवेय्याहं-सा’जीवो गरहितो मम (यदि मैं भोजन कर चुका होता, तो मेरी आजीविका निन्दित होती)। पुप्फं’सा उप्पज्जि (उसका पुष्प उत्पन्न हुआ)। खयमत्तं न निब्बानं’सा गम्भीरादिवाचतो (गम्भीर आदि वचनों के कारण उसका निर्वाण केवल क्षय मात्र नहीं है)’’ इत्यादि। यहाँ ‘‘सचे भुत्तो भवेय्याहं’’ इत्यादि में विच्छेद न करके, बाद के दो गाथा-पदों में समाहित दो समान श्रुति वाले पदों के एक साथ उच्चारण की तरह, अगले पदों के साथ एकबद्ध उच्चारण के कारण ‘‘सचे भुत्तो भवेय्याहं-सा’जीवो गरहितो मम’’ इत्यादि के रूप में उच्चारण करना चाहिए। इस प्रकार का उच्चारण विशेष ही सभी प्राचीन विद्वानों द्वारा स्वीकृत और उच्चारित है, क्योंकि यह ‘‘अस्स आजीवो गरहितो मम (उसकी आजीविका मेरे लिए निन्दित है), अस्सा उप्पज्जि (उसका उत्पन्न हुआ), अस्स गम्भीरादिवाचतो (उसके गम्भीर आदि वचनों से)’’ इत्यादि अर्थों के प्रतिपादन के अनुरूप है। ยตฺถ ปน ยาทิเส อุจฺจารเณ กริยมาเน อตฺโถ ปริพฺยตฺโต โหติ, เตสุ ปโยเคสุ กฺวจิ จสทฺท ปนสทฺทาทิโยคฏฺฐาเน อีสกํ วิจฺฉินฺทิตฺวา ปทมุจฺจาเรตพฺพํ. เสยฺยถิทํ? ‘‘วาฬา จ ลปสกฺขรา. อจฺจนฺตสนฺตา ปน ยา, อยํ นิพฺพานสมฺปทา, ‘‘อิทํ ทุกฺข’’นฺติ วาจํ ภาสโต ‘‘อิทํ ทุกฺข’’นฺติ ญาณํ ปวตฺตตีติ? อามนฺตา. อิติ จ ทนฺติ จ ทุติ จ ขนฺติ จ ญาณํ ปวตฺตตีติ? น เหวํ วตฺตพฺเพ’’ติ เอวมาทโย ปโยคา. जहाँ जिस प्रकार का उच्चारण करने पर अर्थ स्पष्ट होता है, उन प्रयोगों में कहीं-कहीं 'च' शब्द, 'पन' शब्द आदि के योग के स्थान पर थोड़ा रुककर (विच्छेद करके) पद का उच्चारण करना चाहिए। जैसे कि - ‘‘वाळा च लपसक्खरा (क्रूर और मीठी वाणी वाले)। अच्चन्तसन्ता पन या, अयं निब्बानसम्पदा (किन्तु जो अत्यन्त शान्त है, वह यह निर्वाण-सम्पदा है), ‘‘इदं दुक्खं’’ (यह दुःख है) इस वाणी को बोलते हुए क्या ‘‘इदं दुक्खं’’ ऐसा ज्ञान प्रवृत्त होता है? हाँ। क्या इति च, दन्ति च, दुति च, खन्ति च ऐसा ज्ञान प्रवृत्त होता है? ऐसा नहीं कहना चाहिए’’ इत्यादि प्रयोग। เอเตสุ หิ ปฐมปโยเค ‘‘วาฬา จา’’ติ อีสกํ วิจฺฉินฺทิตฺวา ‘‘ลปสกฺขรา’’ติ อุจฺจาเรตพฺพํ. ตตฺถ ลปสกฺขราติ สกฺขรสทิสมธุรวจนา. ชาตกฏฺฐกถายํ ปน ‘‘นิรตฺถกวจเนหิ สกฺขรา วิย มธุรา’’ติ วุตฺตํ, ตสฺมาตฺร พหุพฺพีหิตปฺปุริสวเสน ทฺวิธา สมาโส ทฏฺฐพฺโพ ‘‘ลปา สกฺขรา วิย ยาสํ ตา ลปสกฺขรา, ลเปหิ วา สกฺขรา วิยาติ ลปสกฺขรา’’ติ. इनमें से पहले प्रयोग में ‘‘वाळा चा’’ के बाद थोड़ा रुककर ‘‘लपसक्खरा’’ ऐसा उच्चारण करना चाहिए। वहाँ 'लपसक्खरा' का अर्थ है - शर्करा (चीनी) के समान मधुर वचन वाले। जातक-अट्ठकथा में तो ‘‘निरर्थक वचनों से शर्करा के समान मधुर’’ ऐसा कहा गया है, इसलिए यहाँ बहुब्रीहि और तत्पुरुष के भेद से दो प्रकार का समास देखना चाहिए - ‘‘लपा सक्खरा विय यासं ता लपसक्खरा (जिनके आलाप शर्करा के समान हैं, वे लपसक्खरा) अथवा लपेहि वा सक्खरा वियाति लपसक्खरा (आलापों से शर्करा के समान, वे लपसक्खरा)’’। ทุติยปโยเค ‘‘อจฺจนฺตสนฺตา ปน’’อิติ อีสกํ วิจฺฉินฺทิตฺวา ‘‘ยา’’ติ อุจฺจาเรตพฺพํ. ยา ปน อยํ นิพฺพานสมฺปทา อจฺจนฺตสนฺตาติ หิ อตฺโถ. दूसरे प्रयोग में ‘‘अच्चन्तसन्ता पन’’ के बाद थोड़ा रुककर ‘‘या’’ ऐसा उच्चारण करना चाहिए। क्योंकि अर्थ यह है - ‘‘या पन अयं निब्बानसम्पदा अच्चन्तसन्ता’’ (किन्तु जो यह निर्वाण-सम्पदा है, वह अत्यन्त शान्त है)। ตติยปโยเค [Pg.58] อิติ จ ทนฺติ จ ทุติ จ ขนฺติ จาติ เอเตสุ จตูสุ ฐาเนสุ อิการญฺจ ทํการญฺจ ทุการญฺจ ขํการญฺจ อีสกํ วิจฺฉินฺทิตฺวา ตทนนฺตรํ ติ จ สทฺทา อุจฺจาเรตพฺพา. तीसरे प्रयोग में 'इति च', 'दन्ति च', 'दुति च', 'खन्ति च' - इन चार स्थानों पर इ-कार, दं-कार, दु-कार और खं-कार को थोड़ा अलग करके (विच्छेद करके) उसके बाद 'ति' और 'च' शब्दों का उच्चारण करना चाहिए। เอตฺถ หิ อวิจฺฉินฺทิตฺวา อุจฺจารเณ สติ อญฺญถา คเหตพฺพตฺตา อตฺโถ ทุฏฺโฐ ภวติ. กถํ? อีทิเสสุ ฐาเนสุ อวิจฺฉินฺทิตฺวา อุจฺจารเณ สติ อิติสทฺโท เอวนฺติ อตฺถวาจโก นิปาโต สิยา, สนฺธิวเสน ปน อิการตฺถวาจโก รูฬฺหีสทฺโท น สิยา. ทนฺติสทฺโท ทมนตฺโถ สิยา, ทํการวาจโก น สิยา. ทุติสทฺโท นิรตฺถโก สิยา, ทุการวาจโก น สิยา. ขนฺติสทฺโท ขมนตฺโถ สิยา, ขํการวาจโก น สิยา. ตสฺมา อิการ ทํการ ทุการ ขํการานิ อีสกํ วิจฺฉินฺทิตพฺพานิ. क्योंकि यहाँ विच्छेद किए बिना उच्चारण करने पर, अन्यथा (गलत) ग्रहण किए जाने के कारण अर्थ दूषित हो जाता है। कैसे? इस प्रकार के स्थानों पर विच्छेद किए बिना उच्चारण करने पर 'इति' शब्द 'एवं' (इस प्रकार) अर्थ का वाचक निपात हो जाएगा, किन्तु सन्धि के कारण 'इ-कार' अर्थ का वाचक रूढ़ि शब्द नहीं रहेगा। 'दन्ति' शब्द दमन के अर्थ में हो जाएगा, 'दं-कार' का वाचक नहीं रहेगा। 'दुति' शब्द निरर्थक हो जाएगा, 'दु-कार' का वाचक नहीं रहेगा। 'खन्ति' शब्द क्षमा के अर्थ में हो जाएगा, 'खं-कार' का वाचक नहीं रहेगा। इसलिए इ-कार, दं-कार, दु-कार और खं-कार को थोड़ा विच्छेद करके पढ़ना चाहिए। เอตฺถ หิ อิอิติ ทํอิติ ทุอิติ ขํอิตีติอาทินา สํหิตาปทจฺเฉโท เวทิตพฺโพ, ปรภูตสฺส จ อิการสฺส โลโป. น ปเนตฺถ อิทํ วตฺตพฺพํ ‘‘สรูปสรานํ วิสเย ปรภูตสฺส สรูปสรสฺส โลโป น โหติ, ปุพฺพสรสฺเสว โลโป โหติ ตตฺรายนฺติ เอตฺถ วิยา’’ติ ‘‘อกิลาสุโน วณฺณปเถ ขณนฺตา, อุทงฺคเณ ตตฺถ ปปํ อวินฺทุ’’นฺติ ปาฬิยํ สรูปปรสรสฺส โลปทสฺสนโต. ตถา หิ อฏฺฐกถาจริเยหิ ‘‘ปวทฺธํ อาปํ ปป’’นฺติ อตฺโถ สํวณฺณิโต. ตสฺมา ‘‘อิติ จา’’ติ เอตฺถาปิ อิอิติ จาติ เฉทํ กตฺวา ทฺวีสุ อิกาเรสุ ปรสฺส อิการสฺส โลโป กาตพฺโพ, น ปุพฺพสฺส. यहाँ 'इ इति', 'दं इति', 'दु इति', 'खं इति' इत्यादि के रूप में संहिता का पद-च्छेद समझना चाहिए, और बाद वाले 'इ-कार' का लोप समझना चाहिए। यहाँ यह नहीं कहना चाहिए कि ‘‘समान स्वरों के विषय में बाद वाले समान स्वर का लोप नहीं होता, बल्कि पूर्व स्वर का ही लोप होता है, जैसे 'तत्रायं' (तत्र + अयं) में’’, क्योंकि पालि में ‘‘अकिलासुनो वण्णपथे खणन्ता, उदङ्गणे तत्थ पपं अविन्दुं’’ (थके बिना मरुस्थल में खोदते हुए, उन्होंने वहाँ जल पाया) में समान पर-स्वर का लोप देखा जाता है। क्योंकि अट्ठकथाचार्यों ने 'पपं' का अर्थ 'पवद्धं आपं' (प्रवृद्ध जल) ऐसा वर्णित किया है। इसलिए ‘‘इति चा’’ यहाँ भी 'इ इति च' ऐसा छेद करके दो इ-कारों में से बाद वाले इ-कार का लोप करना चाहिए, पहले का नहीं। ปุพฺพสฺมิญฺหิ อิการวาจเก อิกาเร นฏฺเฐ สติ นิปาตภูเตน อิติสทฺเทน อิการสงฺขาโต อตฺโถ น วิญฺญาเยยฺย, นิปาตภูตสฺส ปน อิติสทฺทสฺส อิกาเร นฏฺเฐปิ โส อตฺโถ วิญฺญายเตว ‘‘เทวทตฺโตติ เม สุต’’นฺติ เอตฺถ [Pg.59] เทวทตฺตปทตฺโถ วิย. ตสฺมา อิติสทฺทสฺส ปรภูตสฺส อิการสฺเสว โลโป กาตพฺโพ, น ปุพฺพสฺส อิการวาจกสฺส อิการสฺส. กจฺจายเน ปน เยภุยฺยปฺปวตฺตึ สนฺธาย อสรูปสรโต ปรสฺเสว อสรูปสรสฺส โลโป วุตฺโต, น สรูปสรโต ปรสฺส สรูปสรสฺส. มหาปเทสสุตฺเตหิ วา สรูปสฺส ปรสรสฺส โลโป วุตฺโตติ ทฏฺฐพฺพํ. क्योंकि यदि पूर्ववर्ती 'इ-कार' वाचक 'इ' का लोप हो जाए, तो निपात रूप 'इति' शब्द से 'इ-कार' रूप अर्थ का बोध नहीं होगा; किन्तु निपात रूप 'इति' शब्द के 'इ' का लोप होने पर भी वह अर्थ ज्ञात हो ही जाता है, जैसे ‘‘देवदत्तोति मे सुतं’’ (देवदत्त, ऐसा मैंने सुना) यहाँ 'देवदत्त' पद के अर्थ की तरह। इसलिए 'इति' शब्द के बाद वाले 'इ-कार' का ही लोप करना चाहिए, पूर्ववर्ती 'इ-कार' वाचक 'इ' का नहीं। कच्चायन में तो प्रायः होने वाली प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर असमान स्वर से परे असमान स्वर का ही लोप कहा गया है, समान स्वर से परे समान स्वर का नहीं। अथवा महापदेस सूत्रों के अनुसार समान पर-स्वर का लोप कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। ‘‘อนฺตรา จ ราชคหํ อนฺตรา จ นาฬนฺท’’นฺติอาทีสุ ปน จสทฺทาทิโยคฏฺฐาเนปิ สติ วิจฺฉินฺทิตฺวา ปทํ น อุจฺจาเรตพฺพํ. ยตฺถ จ อาคมกฺขราทีนิ ทิสฺสนฺติ, เตสุ ปโยเคสุ ปุพฺพปทานิ วิจฺฉินฺทิตฺวา น อุจฺจาเรตพฺพานิ, อาคมกฺขรวนฺเตหิ ปรปเทหิ สทฺธึเยว อุจฺจาเรตพฺพานิ. เสยฺยถิทํ? ‘‘นกฺขตฺตราชาริว ตารกานํ. ภควา เอตทโวจ’’อิจฺเจวมาทโย ปโยคา. ยตฺถ เยสํ วิสุํ วิสุํ สมฺพนฺโธ ทิสฺสติ, อตฺโถ จ ยุชฺชติ, ตตฺถ ตานิ อตฺถานุรูปํ วิจฺฉินฺทิตฺวา อุจฺจาเรตพฺพานิ. เสยฺยถิทํ? ‘‘นหาเน อุสฺสุกฺกํ อกาสิ, อุสฺสุกฺกมฺปิ อกาสิ ยาคุยา ขาทนีเย ภตฺตสฺมึ’’ อิจฺเจวมาทโย ปโยคา. เอตฺถ หิ ‘‘นหาเน อุสฺสุกฺกํ อกาสี’’ติ วิจฺฉินฺทิตฺวา ‘‘อุสฺสุกฺกมฺปิ อกาสิ ยาคุยา ขาทนีเย ภตฺตสฺมิ’’นฺติ อุจฺจาเรตพฺพํ. เอวญฺหิ สติ น เกวลํ โส ภิกฺขุ นหาเนเยว อุสฺสุกฺกํ อกาสิ, อถ โข ยาคุยาปิ ขาทนีเยปิ ภตฺตสฺมิมฺปิ อุสฺสุกฺกํ อกาสีติ อตฺถปฺปกาสเน สมตฺโถ ภวติ, อฏฺฐานปฺปยุตฺโต สมุจฺจยตฺถวาจโก อปิสทฺโท. ‘‘अन्तरा च राजगहं अन्तरा च नाळन्दा’’ आदि में 'च' शब्द आदि के योग का स्थान होने पर भी पद को विच्छेद करके उच्चारण नहीं करना चाहिए। जहाँ आगम अक्षर आदि दिखाई देते हैं, उन प्रयोगों में पूर्व पदों को विच्छेद करके उच्चारण नहीं करना चाहिए, बल्कि आगम अक्षर वाले पर-पदों के साथ ही उच्चारण करना चाहिए। जैसे कि— ‘‘नक्खत्तराजारीव तारकानं। भगवा एतदवोच’’ इत्यादि प्रयोग। जहाँ जिनका अलग-अलग सम्बन्ध दिखाई देता है और अर्थ भी युक्त होता है, वहाँ उन्हें अर्थ के अनुसार विच्छेद करके उच्चारण करना चाहिए। जैसे कि— ‘‘नहाने उस्सुक्कं अकासि, उस्सुक्कम्पि अकासि यागुया खादनीये भत्तस्मिं’’ इत्यादि प्रयोग। यहाँ ‘‘नहाने उस्सुक्कं अकासि’’ ऐसा विच्छेद करके ‘‘उस्सुक्कम्पि अकासि यागुया खादनीये भत्तस्मिं’’ ऐसा उच्चारण करना चाहिए। ऐसा होने पर न केवल वह भिक्षु स्नान में ही उत्सुक हुआ, बल्कि वह यवागू (कांजी), खादनीय और भात में भी उत्सुक हुआ—इस अर्थ को प्रकाशित करने में 'अपि' शब्द समर्थ होता है, जो अस्थान में प्रयुक्त न होकर समुच्चय अर्थ का वाचक है। ยตฺถ ปน เยสมิตเรน วา อิตเรน วา เอเกกปเทน อุภยปเทหิ วา สมฺพนฺโธ ทิสฺสติ สเหวตฺถยุตฺติยา, ตตฺถ ตานิ ยถารหํ วิจฺฉินฺทิตฺวา อุจฺจาเรตพฺพานิ. เสยฺยถิทํ? ‘‘โส ธมฺมํ เทเสติอาทิกลฺยาณํ มชฺเฌกลฺยาณํ ปริโยสานกลฺยาณํ สาตฺถํ สพฺยญฺชนํ เกวลปริปุณฺณํ ปริสุทฺธํ พฺรหฺมจริยํ [Pg.60] ปกาเสติ. ปฏิจฺจสมุปฺปาทํ โว ภิกฺขเว เทเสสฺสามิ, ตํ สุณาถ สาธุกํ มนสิกโรถ. อชฺฌตฺตํ สมฺปสาทนํ เจตโส เอโกทิภาว’’นฺติ เอวมาทโย ปโยคา. ตตฺริมา อธิปฺปายวิญฺญาปิกา คาถา – जहाँ फिर जिनका दूसरे या दूसरे एक-एक पद के साथ अथवा दोनों पदों के साथ अर्थ की युक्ति के साथ सम्बन्ध दिखाई देता है, वहाँ उन्हें यथायोग्य विच्छेद करके उच्चारण करना चाहिए। जैसे कि— ‘‘सो धम्मं देसेति आदिकल्याणं मज्झेकल्याणं परियोसानकल्याणं सत्थं सब्यञ्जनं केवलपरिपुण्णं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेति। पटिच्चसमुप्पादं वो भिक्खवे देसेस्सामि, तं सुणाथ साधुकं मनसिकरोथ। अज्झत्तं सम्पसादनं चेतसो एकोदिभावं’’ इत्यादि प्रयोग। वहाँ ये अभिप्राय को बताने वाली गाथाएँ हैं— ธมฺมสทฺเทน วา พฺรหฺม-จริยสทฺเทน วา ปทํ; โยเชตฺวา อีรเย วิญฺญู, ‘‘สาตฺถํ สพฺยญฺชน’’นฺติทํ. विद्वान को 'सत्थं सब्यञ्जनं' इस पद को 'धम्म' शब्द के साथ या 'ब्रह्मचरिय' शब्द के साथ जोड़कर बोलना चाहिए। ‘‘สาธุก’’นฺติ ปทํ วิญฺญู, ‘‘สุณาถา’’ติ ปเทน วา; ตถา ‘‘มนสิกโรถ’’, อิติ วุตฺตปเทน วา; อีรเย โยชยิตฺวาน, อุภเยหิ ปเทหิ วา. विद्वान 'साधुकं' पद को 'सुणाथ' पद के साथ, या 'मनसिकरोथ' इस कहे गए पद के साथ, अथवा दोनों पदों के साथ जोड़कर बोलें। เอกเมเกน สมฺพนฺโธ, สมฺพนฺโธ อุภเยหิ วา; ทิสฺสตีติ วิชาเนยฺย, สทฺธิเมวตฺถยุตฺติยา. एक-एक के साथ सम्बन्ध है, या दोनों के साथ सम्बन्ध है—ऐसा अर्थ की युक्ति के साथ ही जानना चाहिए। นตฺตโนมติยา เอโส, อตฺโถ เอตฺถ มยา รุโต; ปุพฺพาจริยสีหานํ, นยํ นิสฺสาย เม รุโต. यह अर्थ यहाँ मेरे द्वारा अपनी मति से नहीं कहा गया है; पूर्व आचार्यों रूपी सिंहों के नय (पद्धति) के आश्रय से मेरे द्वारा कहा गया है। เอวํวิเธสุ อญฺเญสุ, ปาเฐสุปิ อยํ นโย; เนตพฺโพ นยทกฺเขน, สาสนตฺถคเวสินา. इसी प्रकार के अन्य पाठों में भी शासन के अर्थ की खोज करने वाले नय-दक्ष (पद्धति में कुशल) व्यक्ति द्वारा यह नय ले जाना चाहिए। อตฺถานุรูปโต สทฺทํ, อตฺถํ สทฺทานุรูปโต; จินฺตยิตฺวาน เมธาวี, โวหเร น ยถา ตถาติ. बुद्धिमान व्यक्ति अर्थ के अनुरूप शब्द को और शब्द के अनुरूप अर्थ को विचार कर, जैसे-तैसे व्यवहार न करे। อยเมตฺถ อตฺถสทฺทจินฺตา. यह यहाँ अर्थ और शब्द का विचार है। อตฺถาติสยโยเค เอวํ อุปลกฺเขตพฺพํ – ภูธาตุอตฺถาติสยโยคโต วฑฺฒเน ทิฏฺฐา ‘‘เอกมนฺตํ นิสินฺโน โข มหานาโม ลิจฺฉวี อุทานํ อุทาเนสิ ‘ภวิสฺสนฺติ วชฺชี ภวิสฺสนฺติ วชฺชี’ติ’’ อิติ วา ‘‘อหเมว ทูสิยา ภูนหตา, รญฺโญ มหาปตาปสฺสา’’ติ วา ‘‘เวทา น ตาณาย ภวนฺติทสฺส, มิตฺตทฺทุโน ภูนหุโน นรสฺสา’’ติ วา ‘‘ภูนหจฺจํ กตํ มยา’’ติ วา เอวํ วฑฺฒเน ทิฏฺฐา. अर्थ के अतिशय के योग में इस प्रकार पहचानना चाहिए— 'भू' धातु के अर्थ के अतिशय के योग से 'वर्द्धन' (बढ़ने) के अर्थ में देखा गया है, जैसे— ‘‘एकान्त में बैठे हुए महानाम लिच्छवि ने उदान कहा 'वज्जी होंगे, वज्जी होंगे' (समृद्ध होंगे)’’ अथवा ‘‘मैं ही दूषी (मार) द्वारा विनष्ट किया गया हूँ, राजा महाप्रताप का’’ अथवा ‘‘वेद उस मनुष्य के त्राण के लिए नहीं होते जो अदृश्य है, मित्रद्रोही है और भ्रूणहन्ता (विकास को रोकने वाला) है’’ अथवा ‘‘मेरे द्वारा भ्रूणहत्या की गई’’—इस प्रकार वर्द्धन (विकास/वृद्धि) के अर्थ में देखा गया है। วจนสงฺคเห [Pg.61] เอวํ อุปลกฺเขตพฺพํ – วตฺตมานาย วิภตฺติยา ปรสฺสปทํ มชฺฌิมปุริสพหุวจนํ ปญฺจมิยา ปรสฺสปเทน มชฺฌิมปุริสพหุวจเนน สทิสํ. ตุมฺเห ภวถ. वचन-संग्रह में इस प्रकार पहचानना चाहिए— वर्तमान काल की विभक्ति का परस्मैपद मध्यम पुरुष बहुवचन, पञ्चमी (आज्ञार्थ) के परस्मैपद मध्यम पुरुष बहुवचन के समान होता है। (जैसे) 'तुम्हे भवथ' (तुम सब होते हो / तुम सब होओ)। วตฺตมานปญฺจมีนํ ปรสฺสปเท อุตฺตมปุริสจตุกฺเก เอกวจนํ เอกวจเนน, พหุวจนมฺปิ พหุวจเนน สทิสํ. อหํ ภวามิ, มยํ ภวาม. वर्तमान और पञ्चमी के परस्मैपद में उत्तम पुरुष के चारों (दोनों कालों के एकवचन और बहुवचन) में एकवचन एकवचन के साथ, और बहुवचन भी बहुवचन के साथ समान होता है। (जैसे) 'अहं भवामि' (मैं होता हूँ / मैं होऊँ), 'मयं भवाम' (हम होते हैं / हम हों)। วตฺตมานาย อตฺตโนปทํ มชฺฌิมปุริเสกวจนํ หิยฺยตฺตนชฺชตนีนํ อตฺตโนปเทหิ ทฺวีหิ มชฺฌิมปุริเสกวจเนหิ สทิสํ กตฺถจิ วณฺณสมุทายวเสน กิญฺจิ วิเสสํ วชฺเชตฺวา, เอส นโย อุตฺตรตฺราปิ โยเชตพฺโพ. ตฺวํ ภวเส, อิทํ วตฺตมานาย รูปํ. ตฺวํ อภวเส, อิทํ หิยฺยตฺตนชฺชตนีนํ รูปํ. वर्तमान काल का आत्मनेपद मध्यम पुरुष एकवचन, हिय्यत्तनी (अपूर्ण भूत) और अज्जतनी (सामान्य भूत) के दो आत्मनेपद मध्यम पुरुष एकवचन के समान होता है, कहीं-कहीं वर्ण-समुदाय के कारण कुछ विशेष को छोड़कर; यही नियम आगे भी जोड़ना चाहिए। 'त्वं भवसे'—यह वर्तमान काल का रूप है। 'त्वं अभवसे'—यह हिय्यत्तनी और अज्जतनी का रूप है। วตฺตมานาย อตฺตโนปทํ อุตฺตมปุริเสกวจนํ ปญฺจมิยา อตฺตโนปเทนุตฺตมปุริเสกวจเนน จ ปโรกฺขาย ปรสฺสปเทน มชฺฌิมปุริเสกวจเนน จาติ ทฺวีหิ วจเนหิ สทิสํ. อหํ ภเว, อิทํ วตฺตมานปญฺจมีนํ รูปํ. ตฺวํ พภูเว, อิทํ ปโรกฺขาย รูปํ. वर्तमान काल का आत्मनेपद उत्तम पुरुष एकवचन, पञ्चमी के आत्मनेपद उत्तम पुरुष एकवचन के साथ और परोक्षा (परोक्ष भूत) के परस्मैपद मध्यम पुरुष एकवचन के साथ—इन दो वचनों के समान होता है। 'अहं भवे'—यह वर्तमान और पञ्चमी का रूप है। 'त्वं बभूवे'—यह परोक्षा का रूप है। วตฺตมานาย อตฺตโนปทํ อุตฺตมปุริสพหุวจนํ ปโรกฺขชฺชตนีนํ อตฺตโนปเทหิ ทฺวีหิ อุตฺตมปุริสพหุวจเนหิ สทิสํ. มยํ ภวามฺเห, อิทํ วตฺตมานาย รูปํ. มยํ พภูวิมฺเห, อิทํ ปโรกฺขาย รูปํ. มยํ อภวิมฺเห, อิทมชฺชตนิยา รูปํ. वर्तमान काल का आत्मनेपद उत्तम पुरुष बहुवचन, परोक्षा और अज्जतनी के दो आत्मनेपद उत्तम पुरुष बहुवचन के समान होता है। 'मयं भवामहे'—यह वर्तमान काल का रूप है। 'मयं बभूविमहे'—यह परोक्षा का रूप है। 'मयं अभविमहे'—यह अज्जतनी का रूप है। ปญฺจมิยา อตฺตโนปทํ มชฺฌิมปุริสพหุวจนํ ปโรกฺขาย อตฺตโนปเทน มชฺฌิมปุริสพหุวจเนน สทิสํ. ตุมฺเห ภววฺโห, อิทํ ปญฺจมิยา รูปํ. ตุมฺเห พภูวิวฺโห, อิทํ ปโรกฺขาย รูปํ. पञ्चमी का आत्मनेपद मध्यम पुरुष बहुवचन, परोक्षा के आत्मनेपद मध्यम पुरुष बहुवचन के समान होता है। 'तुम्हे भवव्हो'—यह पञ्चमी का रूप है। 'तुम्हे बभूविव्हो'—यह परोक्षा का रूप है। ปโรกฺขาย ปรสฺสปทํ ปฐมปุริสพหุวจนํ หิยฺยตฺตนิยา ปรสฺสปเทน ปฐมปุริสพหุวจเนน จ อชฺชตนิยา อตฺตโนปเทน ปฐมปุริสพหุวจเนน จาติ ทฺวีหิ วจเนหิ สทิสํ. เต พภูวุ, อิทํ ปโรกฺขาย รูปํ. เต อภวุ, อิทํ หิยฺยตฺตนชฺชตนีนํ รูปํ. परोक्षा का परस्मैपद प्रथम पुरुष बहुवचन, हिय्यत्तनी के परस्मैपद प्रथम पुरुष बहुवचन के साथ और अज्जतनी के आत्मनेपद प्रथम पुरुष बहुवचन के साथ—इन दो वचनों के समान होता है। 'ते बभूवु'—यह परोक्षा का रूप है। 'ते अभवु'—यह हिय्यत्तनी और अज्जतनी का रूप है। ปโรกฺขาย [Pg.62] ปรสฺสปทํ มชฺฌิมปุริสพหุวจนํ อตฺตโนปเทน ปฐมปุริเสกวจเนน จ หิยฺยตฺตนิยา ปรสฺสปเทน มชฺฌิมปุริสพหุวจเนน จ อตฺตโนปเทน ปฐมปุริเสกวจเนน จ อชฺชตนิยา ปรสฺสปเทน มชฺฌิมปุริสพหุวจเนน จาติ จตูหิ วจเนหิ สทิสํ. ตุมฺเห พภูวิตฺถ, โส พภูวิตฺถ, อิมานิ ปโรกฺขาย รูปานิ. ตุมฺเห อภวตฺถ, โส อภวตฺถ, อิมานิ หิยฺยตฺตนิยา รูปานิ. ตุมฺเห อภวิตฺถ, อิทมชฺชตนิยา รูปํ. परोक्षा परस्मैपद मध्यम पुरुष बहुवचन, आत्मनेपद प्रथम पुरुष एकवचन और हिय्यत्तनी परस्मैपद मध्यम पुरुष बहुवचन और आत्मनेपद प्रथम पुरुष एकवचन और अज्जतनी परस्मैपद मध्यम पुरुष बहुवचन - इन चार वचनों के समान है। 'तुम्हे बभूवित्थ' (तुम सब हुए), 'सो बभूवित्थ' (वह हुआ) - ये परोक्षा के रूप हैं। 'तुम्हे अभवत्थ', 'सो अभवत्थ' - ये हिय्यत्तनी के रूप हैं। 'तुम्हे अभवित्थ' - यह अज्जतनी का रूप है। ปโรกฺขาย ปรสฺสปทํ อุตฺตมปุริเสกวจนํ หิยฺยตฺตนิยา ปรสฺสปเทนุตฺตมปุริเสกวจเนน จ อชฺชตนิยา อตฺตโนปเทนุตฺตมปุริเสกวจเนน จาติ ทฺวีหิ วจเนหิ สทิสํ. อหํ พภูวํ, อิทํ ปโรกฺขาย รูปํ. อหํ อภวํ, อิทํ หิยฺยตฺตนชฺชตนีนํ รูปํ. परोक्षा परस्मैपद उत्तम पुरुष एकवचन, हिय्यत्तनी परस्मैपद उत्तम पुरुष एकवचन और अज्जतनी आत्मनेपद उत्तम पुरुष एकवचन - इन दो वचनों के समान है। 'अहं बभूवं' - यह परोक्षा का रूप है। 'अहं अभवं' - यह हिय्यत्तनी और अज्जतनी का रूप है। ปโรกฺขาย ปรสฺสปทํ อุตฺตมปุริสพหุวจนํ หิยฺยตฺตนิยา ปรสฺสปเทนุตฺตมปุริสพหุวจเนน สทิสํ. มยํ พภูวิมฺห, อิทํ ปโรกฺขาย รูปํ. มยํ อภวมฺห, อิทํ หิยฺยตฺตนิยา รูปํ. परोक्षा परस्मैपद उत्तम पुरुष बहुवचन, हिय्यत्तनी परस्मैपद उत्तम पुरुष बहुवचन के समान है। 'मयं बभूविम्ह' - यह परोक्षा का रूप है। 'मयं अभवम्ह' - यह हिय्यत्तनी का रूप है। ปโรกฺขาย อตฺตโนปทอุตฺตมปุริเสกวจนํ หิยฺยตฺตนิยา อตฺตโนปเทนุตฺตมปุริเสกวจเนน จ อชฺชตนิยา ปรสฺสปเทนุตฺตมปุริเสกวจเนน จาติ ทฺวีหิ วจเนหิ สทิสํ. อหํ พภูวึ, อิทํ ปโรกฺขาย รูปํ. อหํ อภวึ, อิทํ หิยฺยตฺตนชฺชตนีนํ รูปํ. परोक्षा आत्मनेपद उत्तम पुरुष एकवचन, हिय्यत्तनी आत्मनेपद उत्तम पुरुष एकवचन और अज्जतनी परस्मैपद उत्तम पुरुष एकवचन - इन दो वचनों के समान है। 'अहं बभूविं' - यह परोक्षा का रूप है। 'अहं अभविं' - यह हिय्यत्तनी और अज्जतनी का रूप है। หิยฺยตฺตนิยา ปรสฺสปทํ ปฐมปุริเสกวจนํ อชฺชตนิยา อตฺตโนปเทน ปฐมปุริเสกวจเนน สทิสํ. โส อภวา. हिय्यत्तनी परस्मैपद प्रथम पुरुष एकवचन, अज्जतनी आत्मनेपद प्रथम पुरुष एकवचन के समान है। 'सो अभवा' (वह हुआ)। หิยฺยตฺตนิยา ปรสฺสปทํ มชฺฌิมปุริเสกวจนํ อชฺชตนิยา ปรสฺสปเทน มชฺฌิมปุริเสกวจเนน สทิสํ. ตฺวํ อภโว. हिय्यत्तनी परस्मैपद मध्यम पुरुष एकवचन, अज्जतनी परस्मैपद मध्यम पुरुष एकवचन के समान है। 'त्वं अभवो' (तुम हुए)। ภวิสฺสนฺติยา ปรสฺสปทํ มชฺฌิมปุริสพหุวจนํ กาลาติปตฺติยา ปรสฺสปเทน มชฺฌิมปุริสพหุวจเนน อตฺตโนปเทน ปฐมปุริเสกวจเนน จาติ ทฺวีหิ วจเนหิ สทิสํ. ตุมฺเห [Pg.63] ภวิสฺสถ, อิทํ ภวิสฺสนฺติยา รูปํ. ตุมฺเห อภวิสฺสถ, โส อภวิสฺสถ, อิมานิ กาลาติปตฺติยา รูปานิ. भविष्यन्ती परस्मैपद मध्यम पुरुष बहुवचन, कालातिपत्ति परस्मैपद मध्यम पुरुष बहुवचन और आत्मनेपद प्रथम पुरुष एकवचन - इन दो वचनों के समान है। 'तुम्हे भविस्सथ' - यह भविष्यन्ती का रूप है। 'तुम्हे अभविस्सथ', 'सो अभविस्सथ' - ये कालातिपत्ति के रूप हैं। ภวิสฺสนฺติยา อตฺตโนปทํ มชฺฌิมปุริเสกวจนํ กาลาติปตฺติยา อตฺตโนปเทน มชฺฌิมปุริเสกวจเนน สทิสํ. ตฺวํ ภวิสฺสเส, อิทํ ภวิสฺสนฺติยา รูปํ. ตฺวํ อภวิสฺสเส, อิทํ กาลาติปตฺติยา รูปํ. भविष्यन्ती आत्मनेपद मध्यम पुरुष एकवचन, कालातिपत्ति आत्मनेपद मध्यम पुरुष एकवचन के समान है। 'त्वं भविस्ससे' - यह भविष्यन्ती का रूप है। 'त्वं अभविस्ससे' - यह कालातिपत्ति का रूप है। ภวิสฺสนฺติยา อตฺตโนปทํ มชฺฌิมปุริสพหุวจนํ กาลาติปตฺติยา อตฺตโนปเทน มชฺฌิมปุริสพหุวจเนน สทิสํ. ตุมฺเห ภวิสฺสวฺเห, อิทํ ภวิสฺสนฺติยา รูปํ. ตุมฺเห อภวิสฺสวฺเห, อิทํ กาลาติปตฺติยา รูปํ. भविष्यन्ती आत्मनेपद मध्यम पुरुष बहुवचन, कालातिपत्ति आत्मनेपद मध्यम पुरुष बहुवचन के समान है। 'तुम्हे भविस्सव्हे' - यह भविष्यन्ती का रूप है। 'तुम्हे अभविस्सव्हे' - यह कालातिपत्ति का रूप है। ภวิสฺสนฺติยา อตฺตโนปทํ อุตฺตมปุริเสกวจนํ กาลาติปตฺติยา ปรสฺสปเทนุตฺตมปุริเสกวจเนน สทิสํ. อหํ ภวิสฺสํ, อิทํ ภวิสฺสนฺติยา รูปํ. อหํ อภวิสฺสํ, อิทํ กาลาติปตฺติยา รูปํ. เสสานิ สพฺพาสมฏฺฐนฺนํ วิภตฺตีนํ วจนานิ อญฺญมญฺญํ วิสทิสานีติ ทฏฺฐพฺพํ. ภวนฺติ จตฺร – भविष्यन्ती आत्मनेपद उत्तम पुरुष एकवचन, कालातिपत्ति परस्मैपद उत्तम पुरुष एकवचन के समान है। 'अहं भविस्सं' - यह भविष्यन्ती का रूप है। 'अहं अभविस्सं' - यह कालातिपत्ति का रूप है। शेष सभी आठों विभक्तियों के वचन एक-दूसरे से भिन्न समझने चाहिए। यहाँ ये (गाथाएँ) हैं - วตฺตมานาปญฺจมีสุ, ถทฺวยํ สมุทีริตํ; ‘‘ตุมฺเห ภวถ’’อิจฺจตฺร, อุทาหรณกํ ทฺวิธา. वर्तमान और पञ्चमी विभक्तियों में 'थ' के दो रूप कहे गए हैं; 'तुम्हे भवथ' यहाँ दो प्रकार के उदाहरण हैं। มิทฺวยํ มทฺวยญฺเจว, ตาสุ วุตฺตํ ทฺวิธา ทฺวิธา; ‘‘ภวามี’’ติ ‘‘ภวามา’’ติ, เจตฺถ รูปานิ นิทฺทิเส. उनमें 'मि' के दो रूप और 'म' के दो रूप दो-दो प्रकार से कहे गए हैं; 'भवामि' और 'भवाम' - यहाँ इन रूपों का निर्देश करना चाहिए। วตฺตมานกหิยฺยตฺต-นชฺชตนีวิภตฺติสุ; เสตฺตยํ ‘‘ภวเส ตฺว’’นฺติ, วตฺตมานาวิภตฺติโต; ‘‘อภวเส’’ติ หิยฺยตฺต-นชฺชตนีวิภตฺติโต. वर्तमान, हिय्यत्तनी और अज्जतनी विभक्तियों में; वर्तमान विभक्ति से 'त्वं भवसे' यह 'से' का रूप है; हिय्यत्तनी और अज्जतनी विभक्तियों से 'अभवसे' (रूप होता है)। วตฺตมานาปญฺจมิกา-ปโรกฺขาสุ วิภตฺติสุ; เอตฺตยํ ลปิตํ ตตฺถ, อาโท ทฺวินฺนํ วเสน ตุ. वर्तमान, पञ्चमी और परोक्षा विभक्तियों में; वहाँ 'ए' का रूप कहा गया है, जो आदि की दो (विभक्तियों) के वश से है। ชญฺญา ‘‘อหํ ภเว’’ติ ‘‘ตฺวํ, พภูเว’’ติ ปโรกฺขโต; วตฺตมานาปโรกฺขชฺช-ตนีสุ ตีสุ สทฺทิตํ. यह जानना चाहिए कि 'अहं भवे' (वर्तमान/पञ्चमी) और परोक्षा से 'त्वं बभूवे' है; वर्तमान, परोक्षा और अज्जतनी इन तीनों में (समान रूप) कहे गए हैं। มฺเหตฺตยํ [Pg.64] กมโต รูปํ, มยํสทฺทวิเสสิยํ; ‘‘สมฺภวามฺเห พภูวิมฺเห, อภวิมฺเห’’ติ นิทฺทิเส. 'म्हे' का रूप क्रमशः 'मयं' शब्द से विशेषित है; 'सम्भवम्हे, बभूविम्हे, अभविम्हे' - ऐसा निर्देश करना चाहिए। ปญฺจมิกาปโรกฺขาสุ, วฺโหทฺวยํ รูปเมตฺถ หิ; ‘‘ภววฺโห พภูวิวฺโห’’ติ, ตุมฺเหสทฺทวิเสสิยํ. पञ्चमी और परोक्षा में 'व्हो' के दो रूप यहाँ हैं; 'भवव्हो, बभूविव्हो' - ये 'तुम्हे' शब्द से विशेषित हैं। ปโรกฺขมฺหิ วา หิยฺยตฺต-นชฺชตนีวิภตฺติสุ; อุตฺตยํ ‘‘เต พภูวู’’ติ, รูปํ ชญฺญา ปโรกฺขโต; परोक्षा में अथवा हिय्यत्तनी और अज्जतनी विभक्तियों में; 'उ' का रूप 'ते बभूवू' - ऐसा परोक्षा से जानना चाहिए; หิยฺยตฺตนชฺชตนิโต, ชญฺญา ‘‘เต อภวู’’อิติ. हिय्यत्तनी और अज्जतनी से 'ते अभवू' - ऐसा जानना चाहिए। ปโรกฺขมฺหิ วา หิยฺยตฺต-นชฺชตนีวิภตฺติสุ; สทฺทิตํ ตถสํโยค- ปญฺจกํ อิติ นิทฺทิเส. परोक्षा में अथवा हिय्यत्तनी और अज्जतनी विभक्तियों में; 'त्थ' संयोग के पाँच (रूप) कहे गए हैं, ऐसा निर्देश करना चाहिए। พภูวิตฺถทฺวยํ ตตฺถ, รูปํ ชญฺญา ปโรกฺขชํ; พวฺหตฺเตกตฺตโต วุตฺตํ, มชฺฌิมปฐมวฺหยํ. वहाँ 'बभूवित्थ' के दो रूप परोक्षा से उत्पन्न जानने चाहिए; जो बहुवचन और एकवचन से कहे गए हैं, जिन्हें मध्यम और प्रथम (पुरुष) कहा जाता है। อภวตฺถทฺวยํ เญยฺยํ, หิยฺยตฺตนีวิภตฺติชํ; พวฺหตฺเตกตฺตโต วุตฺตํ, มชฺฌิโม ปฐโม จ โส; ‘‘อภวิตฺถา’’ติทํ รูปํ, อชฺชตนีวิภตฺติชํ. 'अभवत्थ' के दो रूप हिय्यत्तनी विभक्ति से उत्पन्न जानने चाहिए; वे बहुवचन और एकवचन में मध्यम और प्रथम (पुरुष) कहे गए हैं; 'अभवित्थ' यह रूप अज्जतनी विभक्ति से उत्पन्न है। ตญฺจ โข พหุกตฺตมฺหิ, ตุมฺเหสทฺเทน โยชเย; ปโรกฺขาวฺหยหิยฺยตฺต-นชฺชตนีสุ กิตฺติตํ. और उसे (अभवित्थ) बहुवचन में 'तुम्हे' शब्द के साथ जोड़ना चाहिए; (यह) परोक्षा, हिय्यत्तनी और अज्जतनी में कहा गया है। อํตยํ ตตฺถ อาทิยํ, ‘‘พภูวํ’’รูปมีริตํ; ทุวินฺนํ อภวํรูปํ, อหํสทฺเทน โยชเย. वहाँ आदि में 'अं' का रूप 'बभूवं' कहा गया है; 'अभवं' के दो रूपों को 'अहं' शब्द के साथ जोड़ना चाहिए। ปโรกฺขกาหิยฺยตฺตนี-วเสน มฺหทุกํ ‘‘มยํ; พภูวิมฺห อภวิมฺห’’, อิติ รูปทฺวยํ กมา. परोक्षा और हिय्यत्तनी के वश से 'म्ह' के दो रूप 'मयं बभूविम्ह, अभवम्ह' - ये दो रूप क्रमशः हैं। ปโรกฺขาวฺหยหิยฺยตฺต-นชฺชตนีวิภตฺติสุ; อึตยํ ตุ ตหึ รูปํ, ‘‘พภูวิ’’นฺติ ปโรกฺขชํ; ‘‘อภวิ’’นฺตีตราสํ ตุ, อหํสทฺทยุตาขิลํ. परोक्षा, हिय्यत्तनी और अज्जतनी विभक्तियों में; वहाँ 'इं' का रूप 'बभूविं' परोक्षा से उत्पन्न है; 'अभाविं' अन्य (दो) का है, ये सभी 'अहं' शब्द से युक्त हैं। หิยฺยตฺตนชฺชตนีสุ[Pg.65], อาทฺวยํ มตเมตฺถ หิ; ‘‘อภวา’’ อิติ เอกตฺเต, รูปํ ปฐมโปริสํ. हिय्यत्तनी और अज्जतनी में यहाँ 'आ' के दो रूप माने गए हैं; 'अभवा' - यह एकवचन में प्रथम पुरुष का रूप है। หิยฺยตฺตนชฺชตนีสุ, โอทฺวยํ วุตฺตเมตฺถ ตุ; ‘‘อภโว’’อิติ เอกตฺเต, รูปํ มชฺฌิมโปริสํ. हिय्यत्तनी और अज्जतनी में, यहाँ 'ओ' (o) का द्वय (दो बार) कहा गया है; 'अभवो' (abhavō) इस एकवचन में, मध्यम पुरुष का रूप है। ภวิสฺสนฺติยกาลาติ-ปตฺตีสุ ทฺวีสุ ภาสิตํ; พวฺหตฺเต พหุเอกตฺเต, สสํโยคํ สฺสถตฺตยํ. भविष्यन्ती और कालातिपत्ति इन दोनों में कहा गया है; बहुवचन में और बहुत से एकवचन में, 'स' (sa) के संयोग के साथ 'स्सथ' (ssatha) का त्रय (तीन) होता है। ‘‘ตุมฺเห ภวิสฺสถิ’’จฺเจตํ, ภวิสฺสนฺติยโต มตํ; ‘‘อภวิสฺสถ ตุมฺเห’’ติ, ‘‘อภวิสฺสถ โส’’ติ จ; กาลาติปตฺติโต วุตฺตํ, เอตญฺหิ วจนทฺวยํ. "तुम्हे भविस्सथ" (tumhē bhavissatha) यह भविष्यन्ती से माना गया है; "अभविस्सथ तुम्हे" और "अभविस्सथ सो" - ये दो वचन कालातिपत्ति से कहे गए हैं। ภวิสฺสนฺติยกาลาติ-ปตฺตีสุ สมุทีริตํ; มชฺฌิมปุริสฏฺฐาเน, สสํโยคํ สฺสเสยุคํ. भविष्यन्ती और कालातिपत्ति में मध्यम पुरुष के स्थान पर 'स' के संयोग के साथ 'स्ससे' (ssasē) का युगल (जोड़ा) कहा गया है। ‘‘ภวิสฺสเส ตฺว’’มิจฺเจตํ, ‘‘ตฺวํ อภวิสฺสเส’’ติ จ; อิมานิ ตุ ปโยคานิ, ตตฺถ วิญฺญู ปกาสเย. "भविस्ससे त्वं" और "त्वं अभविस्ससे" - विद्वान को वहाँ इन प्रयोगों को प्रकाशित करना चाहिए। สฺสวฺเหทฺวยํ เสน ยุตํ, สฺสํทฺวยญฺจ จตุกฺกกํ; อิทมฺปิ กถิตํ ทฺวีสุ, ยถารุตวิภตฺติสุ. 'स' से युक्त 'स्सव्हे' (ssavhē) का द्वय और 'स्सं' (ssaṃ) का द्वय - यह चतुष्क (चार) भी इन दो विभक्तियों में यथाश्रुत कहा गया है। ‘‘ภวิสฺสวฺเห’’ติ พวฺหตฺเต, ภวิสฺสนฺติกมชฺฌิโม; พวฺหตฺเต ‘‘อภวิสฺสวฺเห’’, กาลาติปตฺติมชฺฌิโม. बहुवचन में "भविस्सव्हे" भविष्यन्ती का मध्यम पुरुष है; बहुवचन में "अभविस्सव्हे" कालातिपत्ति का मध्यम पुरुष है। ‘‘ภวิสฺสํ’’ อิติ เอกตฺเต, ภวิสฺสนฺติกมุตฺตโม; ‘‘อภวิสฺส’’นฺติ เอกตฺเต, กาลาติปตฺติกุตฺตโม. एकवचन में "भविस्सं" भविष्यन्ती का उत्तम पुरुष है; एकवचन में "अभविस्सं" कालातिपत्ति का उत्तम पुरुष है। อิติ วุตฺตานิ วุตฺเตหิ, วจเนหิ สมานตํ; ยนฺเต’กจฺเจหิ ตํ สพฺพํ, เอกตาลีสธา ฐิตํ. इस प्रकार कहे गए वचनों के साथ समानता के कारण, जो कुछ (रूप) दूसरों के द्वारा कहे गए हैं, वे सब इकतालीस (41) प्रकार के होते हैं। เสสานิ ปญฺจปญฺญาส, อสมานานิ สพฺพถา; เอตํ นยํ คเหตฺวาน, วเท สพฺพตฺถ สมฺภวาติ. शेष पचपन (55) सर्वथा असमान हैं; इस नय (विधि) को ग्रहण करके, सब जगह सम्भव (रूपों) को कहना चाहिए। อยเมตฺถ สมานาสมานวเสน วจนสงฺคโห. यहाँ यह समान और असमान के भेद से वचनों का संग्रह है। อาคมลกฺขณวเสน [Pg.66] วิภตฺติวจนสงฺคเห เอวํ อุปลกฺเขตพฺพํ – आगम के लक्षण के अनुसार विभक्ति और वचनों के संग्रह में इस प्रकार समझना चाहिए - ภวิสฺสนฺตีปโรกฺขชฺช-ตนีกาลาติปตฺติสุ; นิจฺจํ กฺวจิ กฺวจา’นิจฺจํ, อิการาคมนํ ภเว. भविष्यन्ती, परोक्खा, अज्जतनी और कालातिपत्ति में; कहीं नित्य और कहीं अनित्य रूप से 'इ' (i) कार का आगम होता है। อิการาคมนํ ตญฺหิ, ปโรกฺขายํ วิภตฺติยํ; พวฺหตฺเต มชฺฌิมฏฺฐาเน, พวฺหตฺเต จุตฺตเม สิยา; ปรสฺสปทํ สนฺธาย, อิทํ วจนมีริตํ. वह 'इ' कार का आगम परोक्खा विभक्ति में, बहुवचन मध्यम पुरुष में और बहुवचन उत्तम पुरुष में होता है; यह वचन परस्सपद के सन्दर्भ में कहा गया है। อุตฺตเมกวโจ จาปิ, เนตสฺส อตฺตโนปเท; โหตีติ อวคนฺตพฺพํ, ภวิสฺสนฺติมฺหิ สพฺพโส. और उत्तम पुरुष एकवचन में भी, अत्तनोपद में यह (इ-आगम) नहीं होता है; भविष्यन्ती में यह सर्वथा समझना चाहिए। หิยฺยตฺตนชฺชตนิก-กาลาติปตฺตีสุ ปน; อการาคมนํ โหติ, สพฺพโส อิติ ลกฺขเย. किन्तु हिय्यत्तनी, अज्जतनी और कालातिपत्ति में; 'अ' (a) कार का आगम सर्वथा होता है, ऐसा लक्षित करना चाहिए। อชฺชตนิมฺหิ พวฺหตฺเต, มชฺฌิเม อุตฺตเม ตถา; พวฺหตฺตมฺหิ อกาเรน, อิการาคมนํ ภเว. अज्जतनी के बहुवचन में, मध्यम और उत्तम पुरुष में; बहुवचन में 'अ' कार के साथ 'इ' कार का आगम होता है। อิการาคมนํ นิจฺจํ, กาลาติปตฺติยํ ภเว; อการาคมนํ ตตฺถ, อเนกนฺติกมีริตํ. कालातिपत्ति में 'इ' कार का आगम नित्य होता है; वहाँ 'अ' कार का आगम अनैकान्तिक (अनित्य) कहा गया है। อการาคมนํเยว, หิยฺยตฺตนฺยํ ปกาสติ; ปโรกฺขายํ ภวิสฺสนฺตฺย-ญฺจิกาโรเยว ทิสฺสติ. हिय्यत्तनी में केवल 'अ' कार का आगम प्रकाशित होता है; परोक्खा और भविष्यन्ती में केवल 'इ' कार ही देखा जाता है। อการาคมนญฺเจว, อิการาคมนมฺปิ จ; อชฺชตนิกกาลาติ-ปตฺตีสุ ปน ทิสฺสติ. और 'अ' कार का आगम तथा 'इ' कार का आगम भी; अज्जतनी और कालातिपत्ति में देखा जाता है। ตีสุ เสสวิภตฺตีสุ, นา’การตฺตยมีริตํ; วตฺตมานาย ปญฺจมฺยํ, สตฺตมิยนฺติ สพฺพโส. शेष तीन विभक्तियों में - वत्तमाना, पञ्चमी और सत्तमी में - तीनों 'अ' कार (आगम) सर्वथा नहीं कहे गए हैं। อิกาเรเนว สหิตา, ทฺเว ภวนฺติ วิภตฺติโย; สตฺต ทฺวาทส โหนฺเตตฺถ, วจนานีติ ลกฺขเย. 'इ' कार के साथ ही दो विभक्तियाँ होती हैं; यहाँ सात और बारह वचन होते हैं, ऐसा लक्षित करना चाहिए। อกาเรเนว สหิตา, เอกาเยว วิภตฺติ ตุ; ทฺวาทส วจนาเนตฺถ, ภวนฺตีติ จ ลกฺขเย. किन्तु 'अ' कार के साथ केवल एक ही विभक्ति होती है; यहाँ बारह वचन होते हैं, ऐसा भी लक्षित करना चाहिए। อการิการสหิตา[Pg.67], ทุเวเยว วิภตฺติโย; จตฺตาริ ทฺวาทสญฺเจว, วจนานิ ภวนฺติธ. 'अ' कार और 'इ' कार के साथ दो ही विभक्तियाँ होती हैं; यहाँ चार और बारह वचन होते हैं। อาการตฺตยมุตฺตา ตุ, ติสฺโสเยว วิภตฺติโย; วจนาเนตฺถ ฉตฺตึส, โหนฺตีติ ปริทีปเย. तीनों आगमों से मुक्त केवल तीन ही विभक्तियाँ हैं; यहाँ छत्तीस (36) वचन होते हैं, ऐसा स्पष्ट करना चाहिए। ปโรกฺขาอชฺชตนีสุ, ปญฺจฏฺฐ จ ยถากฺกมํ; อิการโต วิมุตฺตานิ, วจนานิ ภวนฺติติ. परोक्खा और अज्जतनी में क्रमशः पाँच और आठ वचन 'इ' कार से मुक्त होते हैं। เอวเมตฺถ วิภตฺตีนํ, ฉนฺนวุติวิธาน จ; สงฺคโห วจนานนฺติ, วิญฺญาตพฺโพ วิภาวินาติ. इस प्रकार यहाँ विभक्तियों के छियानवे (96) प्रकार के वचनों का संग्रह विद्वानों द्वारा जानना चाहिए। อยเมตฺถ อาคมลกฺขณวเสน วิภตฺติวจนสงฺคโห. यहाँ यह आगम के लक्षण के अनुसार विभक्ति और वचनों का संग्रह है। กาลวเสน ปน วิภตฺติวจนสงฺคเห ทุวิโธ สงฺคโห กาลตฺตยวเสน สงฺคโห, กาลฉกฺกวเสน สงฺคโห จาติ. ตตฺถ วตฺตมานาปญฺจมีสตฺตมีวิภตฺติโย ปจฺจุปฺปนฺนกาลิกา, วตฺตมานาปญฺจมีสตฺตมีวิภตฺยนฺตานิ ปทานิ ปจฺจุปฺปนฺนวจนานิ. ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีวิภตฺติโย อตีตกาลิกา, ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีวิภตฺยนฺตานิ ปทานิ อตีตวจนานิ. ภวิสฺสนฺตีวิภตฺติ อนาคตกาลิกา, ภวิสฺสนฺตีวิภตฺยนฺตานิ ปทานิ อนาคตวจนานิ. กาลาติปตฺติวิภตฺติ ปน กตฺถจิ อตีตกาลิกา กตฺถจิ อนาคตกาลิกา, ตสฺมา ตทนฺตานิ ปทานิ อตีตวจนานิปิ อนาคตวจนานิปิ โหนฺติ. อยํ กาลตฺตยวเสน วิภตฺติวจนสงฺคโห. काल के अनुसार विभक्ति और वचनों का संग्रह दो प्रकार का है - त्रिकाल (तीन काल) के अनुसार संग्रह और षट्काल (छह काल) के अनुसार संग्रह। उनमें वत्तमाना, पञ्चमी और सत्तमी विभक्तियाँ वर्तमानकालिक हैं, वत्तमाना, पञ्चमी और सत्तमी विभक्तियों से अन्त होने वाले पद वर्तमानवचन हैं। परोक्खा, हिय्यत्तनी और अज्जतनी विभक्तियाँ अतीतकालिक (भूतकालिक) हैं, परोक्खा, हिय्यत्तनी और अज्जतनी विभक्तियों से अन्त होने वाले पद अतीतवचन हैं। भविष्यन्ती विभक्ति अनागतकालिक (भविष्यकालिक) है, भविष्यन्ती विभक्ति से अन्त होने वाले पद अनागतवचन हैं। किन्तु कालातिपत्ति विभक्ति कहीं अतीतकालिक है और कहीं अनागतकालिक है, इसलिए उससे अन्त होने वाले पद अतीतवचन भी और अनागतवचन भी होते हैं। यह त्रिकाल के अनुसार विभक्ति और वचनों का संग्रह है। อยํ ปน กาลฉกฺกวเสน วิภตฺติวจนสงฺคโห – ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีวิภตฺติโย อตีตกาลิกา, ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีวิภตฺยนฺตานิ ปทานิ อตีตวจนานิ. ภวิสฺสนฺตีวิภตฺติ อนาคตกาลิกา, ภวิสฺสนฺตีวิภตฺยนฺตานิ ปทานิ อนาคตวจนานิ. วตฺตมานาวิภตฺติ ปจฺจุปฺปนฺนกาลิกา, วตฺตมานาวิภตฺยนฺตานิ ปทานิ ปจฺจุปฺปนฺนวจนานิ. ปญฺจมีวิภตฺติ อาณตฺติกาลิกา[Pg.68], ปญฺจมีวิภตฺยนฺตานิ ปทานิ อาณตฺติวจนานิ. สตฺตมีวิภตฺติ ปริกปฺปกาลิกา, สตฺตมีวิภตฺยนฺตานิ ปทานิ ปริกปฺปวจนานิ. เอตฺถ ปน ‘‘อาณตฺติวจนานี’’ติ จ ‘‘ปริกปฺปวจนานี’’ติ จ อิทํ ตถาสีสมตฺตํ อาสิฏฺฐานุมตฺยาทีสุ ปญฺจมฺยาทีนํ ทิสฺสนโต. กาลาติปตฺติวิภตฺติ กาลาติปตฺติกาลิกา, กาลาติปตฺติวิภตฺยนฺตานิ ปทานิ กาลาติปตฺติวจนานิ. เอวํ กาลฉกฺกวเสน วิภตฺติวจนสงฺคโห เวทิตพฺโพ. और यह षट्काल के अनुसार विभक्ति और वचनों का संग्रह है - परोक्खा, हिय्यत्तनी और अज्जतनी विभक्तियाँ अतीतकालिक हैं, परोक्खा, हिय्यत्तनी और अज्जतनी विभक्तियों से अन्त होने वाले पद अतीतवचन हैं। भविष्यन्ती विभक्ति अनागतकालिक है, भविष्यन्ती विभक्ति से अन्त होने वाले पद अनागतवचन हैं। वत्तमाना विभक्ति वर्तमानकालिक है, वत्तमाना विभक्ति से अन्त होने वाले पद वर्तमानवचन हैं। पञ्चमी विभक्ति आज्ञाकालिक (आणत्तिकालिक) है, पञ्चमी विभक्ति से अन्त होने वाले पद आज्ञावचन (आणत्तिवचन) हैं। सत्तमी विभक्ति परिकल्पकालिक है, सत्तमी विभक्ति से अन्त होने वाले पद परिकल्पवचन हैं। यहाँ "आज्ञावचन" और "परिकल्पवचन" - यह केवल मुख्यता के आधार पर कहा गया है, क्योंकि पञ्चमी आदि विभक्तियाँ आशीर्वाद, अनुमति आदि अर्थों में भी देखी जाती हैं। कालातिपत्ति विभक्ति कालातिपत्तिकालिक है, कालातिपत्ति विभक्ति से अन्त होने वाले पद कालातिपत्तिवचन हैं। इस प्रकार षट्काल के अनुसार विभक्ति और वचनों का संग्रह समझना चाहिए। กาลสงฺคเห ติวิโธ กาลสงฺคโห กาลตฺตยสงฺคโห กาลจตุกฺกสงฺคโห กาลฉกฺกสงฺคโห จาติ. काल-संग्रह में, काल-संग्रह तीन प्रकार का है: त्रिकाल-संग्रह, चतुष्काल-संग्रह और षट्काल-संग्रह। ปจฺจุปฺปนฺเน วตฺตมานา, ปญฺจมี สตฺตมี จิมา; โหนฺตาตีเต ปโรกฺขาที, สห กาลาติปตฺติยา. वर्तमान काल में 'वत्तमाना' (लट्), 'पञ्चमी' (लोट्) और 'सत्तमी' (विधिलिङ्) होती हैं; अतीत काल में 'परोक्खा' (लिट्) आदि, 'कालातिपत्ति' (लृङ्) के साथ होती हैं। อนาคเต ภวิสฺสนฺตี, กาลาติปตฺติกาปิ วา; เอวํ กาลตฺตยํ เญยฺยํ, อาขฺยาตํ ตปฺปกาสกํ. भविष्य काल में 'भविस्सती' (लृट्) अथवा 'कालातिपत्ति' (लृङ्) भी होती है; इस प्रकार आख्यात (क्रिया) को उन तीनों कालों को प्रकाशित करने वाला जानना चाहिए। นนุ กจฺจายเน คนฺเถ, กาโล วุตฺโต จตุพฺพิโธ; ปจฺจุปฺปนฺเนนุตฺตกาเล, อตีเตนาคเต อิติ. क्या कच्चायन ग्रन्थ में काल चार प्रकार का नहीं कहा गया है? वर्तमान, अनुत्तकाल (अकथित काल), अतीत और अनागत (भविष्य)। สจฺจํ วุตฺโต นุตฺตกาโล, ปจฺจุปฺปนฺโนติ อิจฺฉิโต; สมีเป วุตฺตกาโลติ, อตฺถสมฺภวโต ปน. सत्य है, 'अनुत्तकाल' कहा गया है, जिसे वर्तमान ही माना गया है; अथवा अर्थ की सम्भावना से उसे 'समीप-भूत' (निकट अतीत) काल कहा गया है। ตถา หิ ‘‘ยํ ติกาล’’นฺติ, วุตฺตมาจริเยหิปิ; น กาลโต วินิมุตฺตํ, อาขฺยาตํ กิญฺจิ ทิสฺสติ. क्योंकि आचार्यों द्वारा भी "जो त्रिकाल है" ऐसा कहा गया है; काल से मुक्त कोई भी आख्यात (क्रिया) नहीं दिखाई देता है। นนุ จาวุตฺตกาเลติ, อตฺโถ ตตฺร ตุ ยุชฺชติ; ตถา หิ ฉพฺพิโธ กาโล, นิรุตฺติมฺหิ ปกาสิโต. क्या वहाँ 'अवुत्तकाल' (अकथित काल) अर्थ ही युक्त नहीं है? क्योंकि निरुक्ति (व्याकरण) में काल छह प्रकार का प्रकाशित किया गया है। อตีตานาคโต ปจฺจุ-ปฺปนฺโน อาณตฺติเมว จ; ปริกปฺโป จ กาลสฺส, อติปตฺตีติ ฉพฺพิโธ. अतीत, अनागत, वर्तमान, आज्ञा (आणत्ति), परिकल्प (सम्भावना) और काल की अतिपत्ति (कालातिपत्ति) - ये छह प्रकार हैं। ทุเว วิภตฺติโย ตตฺถ, อาณตฺติปริกปฺปิกา; กาลมนามสิตฺวาปิ, นิรุตฺตญฺญูหิ ภาสิตา. वहाँ दो विभक्तियाँ - आज्ञा (पञ्चमी) और परिकल्प (सत्तमी) - व्याकरण के ज्ञाताओं द्वारा काल का निर्देश किए बिना भी कही गई हैं। ‘‘คจฺฉตุ [Pg.69] คจฺเฉยฺยิ’’จฺจาทิ-วจเน กถิเต น หิ; กฺริยา นิปฺผชฺชติ นิฏฺฐํ, นาคตา นาติปนฺนิกา. "गच्छतु" (वह जाए), "गच्छेय्य" (वह जा सकता है) आदि वचनों के कहे जाने पर क्रिया निश्चित रूप से निष्पन्न नहीं होती, न वह भविष्य की है और न ही अतीत की। กาลาติปตฺติกา สทฺทา, อตีเตนาคเตปิ จ; ภวนฺตีติ ยถาวุตฺตา, นิรุตฺติมฺหิ วิทูหิ เว. 'कालातिपत्ति' शब्द अतीत और अनागत (भविष्य) दोनों में होते हैं, जैसा कि व्याकरण के विद्वानों द्वारा कहा गया है। ปญฺจมีสตฺตมีวฺหิตา, อาณตฺติปริกปฺปิกา; ปจฺจุปฺปนฺเน ภวนฺตีติ, น ตถา ตตฺถ ภาสิตา. 'पञ्चमी' और 'सत्तमी' नाम वाली आज्ञा और परिकल्प विभक्तियाँ वर्तमान काल में होती हैं, ऐसा वहाँ (कच्चायन में) उस प्रकार नहीं कहा गया है। ตสฺมา กจฺจายเน คนฺเถ, ‘‘นุตฺตกาเล’’ติ ยํ ปทํ; อตฺโถ ‘‘อวุตฺตกาเล’’ติ, ตสฺส ญายติเมวิทํ. इसलिए कच्चायन ग्रन्थ में जो 'अनुत्तकाले' पद है, उसका अर्थ 'अवुत्तकाले' (अकथित काल में) ऐसा यहाँ जानना चाहिए। สจฺจเมวํ ตุ สนฺเตปิ, อาณตฺติปริกปฺปิกา; ปจฺจุปฺปนฺเนปิ ทฏฺฐพฺพา, ปณฺฑิเตน นยญฺญุนา. ऐसा होने पर भी, नीति के ज्ञाता विद्वान द्वारा आज्ञा और परिकल्प को वर्तमान काल में भी देखा जाना चाहिए। กสฺมาติ เจ อาณาปนํ, ปริกปฺโป จ สจฺจโต; ปจฺจุปฺปนฺเน ยโต อตฺถา, นิปฺผนฺนา ทิสฺสเร อิเม. यदि पूछा जाए कि क्यों? क्योंकि आज्ञा देना और परिकल्प करना वास्तव में वर्तमान काल में ही निष्पन्न अर्थों के रूप में देखे जाते हैं। ‘‘อนุตฺตกาเล’’ติ ปทํ, เอตสฺสตฺถสฺส โชตกํ; ‘‘สมีเป วุตฺตกาเล’’ติ, อตฺถทีปนโตถ วา. 'अनुत्तकाले' पद इस अर्थ का द्योतक है; अथवा 'समीप-भूत काल' के अर्थ को प्रकाशित करने वाला है। อตฺถานํ คมนาทีนํ, นิปฺผตฺติ น ตุ ทิสฺสติ; ‘‘คจฺฉตุ คจฺเฉยฺยิ’’จฺจาทิ, วุตฺตกาเล ยโต ตโต; อวุตฺตกาเล นิทฺทิฏฺฐา, ตทฺทีปกวิภตฺติโย. चूँकि "गच्छतु", "गच्छेय्य" आदि में गमन आदि अर्थों की निष्पत्ति कथित काल में नहीं दिखाई देती, इसलिए उन अर्थों को प्रकाशित करने वाली विभक्तियाँ 'अकथित काल' (अवुत्तकाल) में निर्दिष्ट की गई हैं। กาโล วา วุตฺตกาโลติ, อิจฺเจวํ คหิโต อิธ; ทกฺขิณาสุทฺธิปาฐมฺหิ, กตาว ตติยา อยํ; กาลทีปนตา ตาสํ, อิติ ยุชฺชติ นาญฺญถา. यहाँ 'काल' या 'कथित काल' ऐसा ग्रहण किया गया है; दक्षिणा-शुद्धि पाठ में यह तृतीया विभक्ति की गई है; उनकी काल-दीपकता इसी प्रकार युक्त होती है, अन्यथा नहीं। อตฺถทฺวยํ ปกาเสตุํ, คนฺเถ กจฺจายนวฺหเย; เถโร กจฺจายโน ‘‘นุตฺต-กาเล’’ติ ปทมพฺรวิ. कच्चायन नामक ग्रन्थ में दोनों अर्थों को प्रकाशित करने के लिए स्थविर कच्चायन ने 'अनुत्तकाले' पद कहा। เอวํ ติธา จตุธาปิ, วุตฺโต กาลาน สงฺคโห; ฉธา อิทานิ กาลานํ, สงฺคโห นาม นิยฺยเต. इस प्रकार कालों का संग्रह तीन प्रकार और चार प्रकार से कहा गया है; अब कालों का छह प्रकार का संग्रह प्रस्तुत किया जा रहा है। วิภตฺติโย [Pg.70] ปโรกฺขา จ, หิยฺยตฺตนีวิภตฺติโย; อถ อชฺชตนี จาติ, ติสฺโส’ตีเต ปกาสิตา. 'परोक्खा', 'हिय्यत्तनी' और 'अज्जतनी' - ये तीन विभक्तियाँ अतीत काल में प्रकाशित की गई हैं। อนาคเต ภวิสฺสนฺตี, ภวตีติ ปกิตฺติตา; ปจฺจุปฺปนฺเน วตฺตมานา, ติกาเล ปญฺจธา กตา. अनागत (भविष्य) काल में 'भविस्सती' होती है, ऐसा कहा गया है; वर्तमान काल में 'वत्तमाना' होती है; इस प्रकार तीन कालों में पाँच (विभक्तियाँ) की गई हैं। ปญฺจมีสตฺตมีวฺหิตา, อาณตฺติปริกปฺปิกา; สงฺคยฺหมานา ตา ยนฺติ, ปจฺจุปฺปนฺนมฺหิ สงฺคหํ. 'पञ्चमी' और 'सत्तमी' नाम वाली आज्ञा और परिकल्प विभक्तियाँ, संगृहीत होने पर वर्तमान काल के संग्रह में आती हैं। ยสฺมา ปญฺจมิภูตาย, วตฺตมานาย ฐานโต; สมานา ปญฺจมี โหติ, ตสฺมา สา ปญฺจมี มตา. चूँकि पञ्चमी (लोट्) वर्तमान काल के स्थान के समान होती है, इसलिए उसे 'पञ्चमी' माना गया है। สตฺตมี ปน กิญฺจาปิ, สมานา ตาหิ สตฺตมา; โหติ ยสฺมา ตโต วุตฺตา, สตฺตมีตฺเวว โน มติ. और 'सत्तमी' (विधिलिङ्) यद्यपि उन (पञ्चमी आदि) के समान है, फिर भी चूँकि वह सातवीं है, इसलिए उसे 'सत्तमी' कहा गया है, ऐसा हमारा मत है। กาลาติปตฺติยาทีหิ, ยชฺเชวํ วตฺตมานิกา; ฉฏฺฐี ภเวยฺย กาลาติ-ปตฺติกาตีตวาจิกา. यदि इस प्रकार 'कालातिपत्ति' आदि के साथ वर्तमान वाली (विभक्ति) छठी हो, तो अतीतवाचक 'कालातिपत्ति' भी छठी होनी चाहिए। ปญฺจมี ตาย ฉฏฺฐสฺส, ตุลฺยตฺตา ฐานโต นนุ; ตาหิ สตฺตวิภตฺตีหิ, สตฺตมี อฏฺฐมี สิยา. क्या स्थान की समानता के कारण पञ्चमी उस छठी के तुल्य नहीं होगी? उन सात विभक्तियों के साथ सत्तमी आठवीं हो जाएगी। อิติ เจ โกจิ ภาเสยฺย, ‘‘ตนฺนา’’ติ ปฏิเสธเย; อตีเตนาคเต จาปิ, กาลาติปตฺติสมฺภวา. यदि कोई ऐसा कहे, तो "वैसा नहीं है" कहकर निषेध करना चाहिए; क्योंकि अतीत और अनागत दोनों में 'कालातिपत्ति' की सम्भावना होती है। ตถา หิ ภาสิตา จูฬ-นิรุตฺติมฺหิ วิสุํ อยํ; กาลาติปตฺยตีตมฺหา-นาคเต จาติ ทีปเย. क्योंकि 'चूल-निरुत्ति' में इसे अलग से कहा गया है; 'कालातिपत्ति' अतीत और अनागत से भिन्न है, ऐसा दर्शाना चाहिए। กฺริยาติปนฺเนตีเตติ, กสฺมา กจฺจายเน รุตํ; อถาปิ เจ วเทยฺยตฺร, ‘‘ปาเยนา’’ติ ปกาสเย. "क्रिया के अतिपन्न (बीत जाने) पर अतीत में" ऐसा कच्चायन में क्यों कहा गया है? यदि ऐसा पूछा जाए, तो वहाँ "प्रायः" (बाहुल्य से) ऐसा उत्तर देना चाहिए। เยภุยฺเยน หิ โลกสฺมึ, อตีตมฺหิ ปวตฺตติ; กาลาติปตฺติสํยุตฺโต, โวหาโร อิติ ลกฺขเย. प्रायः लोक में, कालातिपत्ति (हेतुहेतुमद्भाव) से युक्त व्यवहार अतीत काल में प्रवृत्त होता है; ऐसा लक्षण समझना चाहिए। อตฺริทํ กาลาติปตฺติยา อตีตวจนํ – ‘‘สจายํ ภิกฺขเว ราชา ปิตรํ ธมฺมิกํ ธมฺมราชานํ ชีวิตา น โวโรเปสฺสถ, อิมสฺมึเยวสฺส อาสเน วิรชํ วีตมลํ ธมฺมจกฺขุ [Pg.71] อุปฺปชฺชิสฺสถา’’ติ. ‘‘ปสฺสานนฺท อิมํ มหาธนเสฏฺฐิปุตฺตํ อิมสฺมึเยว นคเร ทฺเวอสีติโกฏิธนํ เขเปตฺวา ภริยํ อาทาย ภิกฺขาย จรนฺตํ. สเจ หิ อยํ ปฐมวเย โภเค อเขเปตฺวา กมฺมนฺเต ปโยชยิสฺสา, อิมสฺมึเยว นคเร อคฺคเสฏฺฐิ อภวิสฺสา. สเจ ปน นิกฺขมิตฺวา ปพฺพชิสฺสา, อรหตฺตํ ปาปุณิสฺสา, ภริยาปิสฺส อนาคามิผเล ปติฏฺฐหิสฺสา. สเจ มชฺฌิมวเย โภเค อเขเปตฺวา กมฺมนฺเต ปโยชยิสฺสา, ทุติยเสฏฺฐิ อภวิสฺสา. นิกฺขมิตฺวา ปพฺพชนฺโต อนาคามี อภวิสฺสา, ภริยาปิสฺส สกทาคามิผเล ปติฏฺฐหิสฺสา. สเจ ปจฺฉิมวเย โภเค อเขเปตฺวา กมฺมนฺเต ปโยชยิสฺสา, ตติยเสฏฺฐิ อภวิสฺสา. นิกฺขมิตฺวา ปพฺพชนฺโต สกทาคามี อภวิสฺสา, ภริยาปิสฺส โสตาปตฺติผเล ปติฏฺฐหิสฺสา’’ อิติ วา, ‘‘สเจ สตฺถา อคารํ อชฺฌาวสิสฺสา, จกฺกวตฺติราชา อภวิสฺสา. ราหุลสามเณโร ปริณายกรตนํ, เถรี อิตฺถิรตนํ, สกลจกฺกวาฬรชฺชํ เอเตสญฺเญว อภวิสฺสา’’ อิติ วา เอวํ กาลาติปตฺติยา อตีตวจนํ ภวติ. यहाँ कालातिपत्ति का अतीत वचन इस प्रकार है— 'भिक्षुओं, यदि यह राजा अपने धार्मिक पिता धर्मराज को जीवन से वंचित न करता, तो इसी आसन पर उसे विरज, विमल धर्मचक्षु उत्पन्न हो जाता।' 'आनंद, इस महाधन श्रेष्ठीपुत्र को देखो जो इसी नगर में बयासी करोड़ धन नष्ट कर अपनी पत्नी के साथ भिक्षा माँगता फिर रहा है। यदि इसने प्रथम अवस्था में भोगों को नष्ट न कर व्यापार में लगाया होता, तो इसी नगर में अग्र श्रेष्ठी होता। यदि निकलकर प्रव्रजित हो जाता, तो अर्हत्व प्राप्त कर लेता, और इसकी पत्नी भी अनागामी फल में प्रतिष्ठित हो जाती। यदि मध्यम अवस्था में भोगों को नष्ट न कर व्यापार में लगाया होता, तो द्वितीय श्रेष्ठी होता। निकलकर प्रव्रजित होने पर अनागामी होता, और इसकी पत्नी भी सकदागामी फल में प्रतिष्ठित हो जाती। यदि अंतिम अवस्था में भोगों को नष्ट न कर व्यापार में लगाया होता, तो तृतीय श्रेष्ठी होता। निकलकर प्रव्रजित होने पर सकदागामी होता, और इसकी पत्नी भी स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हो जाती।' अथवा, 'यदि शास्ता गृहस्थ जीवन में रहते, तो चक्रवर्ती राजा होते। राहुल सामणेर परिणायकरत्न होते, थेरी (यशोधरा) स्त्रीरत्न होतीं, और संपूर्ण चक्रवाल का राज्य इन्हीं का होता।' इस प्रकार कालातिपत्ति का अतीत वचन होता है। กถํ กาลาติปตฺติยา อนาคตวจนํ ภวติ? ‘‘จิรมฺปิ ภกฺโข อภวิสฺสา, สเจ น วิวทามเส. อสีสกํ อนงฺคุฏฺฐํ, สิงฺคาโล หรติ โรหิตํ’’อิติวา, ‘‘สเจ อานนฺท นาลภิสฺสา มาตุคาโม ตถาคตปฺปเวทิเต ธมฺมวินเย อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชฺชํ, จิรฏฺฐิติกํ อานนฺท พฺรหฺมจริยํ อภวิสฺสา’’ติ อิติ วา, ‘‘อยํ องฺคุลิมาลสฺส มาตา ‘องฺคุลิมาลํ อาเนสฺสามี’ติ คจฺฉติ, สเจ สมาคมิสฺสติ, องฺคุลิมาโล ‘องฺคุลิสหสฺสํ ปูเรสฺสามี’ติ มาตรํ มาเรสฺสติ. สจาหํ น คมิสฺสามิ, มหาชานิโก อภวิสฺสา’’ อิติ วา เอวํ กาลาติปตฺติยา อนาคตวจนํ ภวติ[Pg.72]. กจฺจายเน ปน เยภุยฺเยน อตีตปฺปวตฺตึ สนฺธาย กาลาติปตฺติวิภตฺติยา อตีตกาลิกตา วุตฺตาติ ทฏฺฐพฺพํ. कालातिपत्ति का अनागत (भविष्य) वचन कैसे होता है? 'यदि हम विवाद न करते, तो यह दीर्घकाल तक भक्ष्य (भोजन) होता। बिना सिर और बिना पूंछ के, सियार रोहित (मछली) को ले जा रहा है।' अथवा, 'आनंद, यदि तथागत द्वारा प्रवेदित धर्म-विनय में स्त्रियाँ घर से बेघर होकर प्रव्रज्या प्राप्त न करतीं, तो आनंद, यह ब्रह्मचर्य चिरस्थायी होता।' अथवा, 'यह अंगुलिमाल की माता यह सोचकर जा रही है कि अंगुलिमाल को ले आऊँगी, यदि वह मिलेगी, तो अंगुलिमाल हजार अंगुलियाँ पूरी करने के लिए माता को मार देगा। यदि मैं नहीं जाऊँगा, तो बड़ी हानि होगी।' इस प्रकार कालातिपत्ति का अनागत वचन होता है। कच्चायन में तो प्रायः अतीत की प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर कालातिपत्ति विभक्ति की अतीतकालिता कही गई है, ऐसा समझना चाहिए। กจฺจายเนปิ วา เอสา, กาลาติปตฺติกา ปน; อนาคเตปิ โหตีติ, อยมตฺโถปิ ทิสฺสติ. कच्चायन में भी यह कालातिपत्ति अनागत (भविष्य) में भी होती है, ऐसा अर्थ भी दिखाई देता है। อปฺปจฺจกฺเข ปโรกฺขาย-ตีเต อิติ หิ ลกฺขเณ; สนฺเตปฺยตีตคฺคหเณ, อนเปกฺขิย ตํ อิทํ. 'परोक्ष अतीत' के लक्षण में 'अप्रत्यक्ष' होने पर भी, उस अतीत के ग्रहण की अपेक्षा न करते हुए यह (कालातिपत्ति) है। อนาคเต ภวิสฺสนฺตี, อิติ สุตฺตสฺสนนฺตรํ; กาลาติปตฺติวจนา, อนาคตานุกฑฺฒนํ; ตสฺมา อนิยตํ กาลํ, กาลาติปตฺติกํ วินา. 'अनागते भविस्सन्ती' इस सूत्र के बाद कालातिपत्ति का वचन होने से अनागत का अनुकर्षण होता है; इसलिए कालातिपत्ति के बिना काल अनियत (अनिश्चित) है। อตีตานาคตปจฺจุ-ปฺปนฺนิกาหิ วิภตฺติหิ; สตฺตมี สตฺตมีเยว, ภวเต น ตุ อฏฺฐมี. अतीत, अनागत और वर्तमान विभक्तियों में सप्तमी (विभक्ति) सातवीं ही होती है, आठवीं नहीं। ปญฺจมีสตฺตมีนํ ตุ, ปจฺจุปฺปนฺนวิภตฺติยํ; สงฺคณฺหนตฺถเมตาสํ, มชฺเฌ ฉฏฺฐี น วุจฺจติ. वर्तमान विभक्तियों में पंचमी और सप्तमी के संग्रह के लिए, इनके बीच में छठी (विभक्ति) नहीं कही गई है। ตถา ปญฺจ อุปาทาย, ภวิตพฺพญฺจ ฉฏฺฐิยา; ปญฺจมิยา ตุ สา เอสา, ‘‘ฉฏฺฐี’’ติ น สมีริตา. उसी प्रकार पाँच को लेकर छठी होनी चाहिए थी; किन्तु पंचमी के बाद उसे 'छठी' नहीं कहा गया है। ฉฏฺฐีภาวมฺหิ สนฺเตปิ, ‘‘ปญฺจมี’’ติ วโจ ปน; ปญฺจมิยา วิภตฺติยา, ปจฺจุปฺปนฺนวิภตฺติยํ. छठी होने पर भी 'पंचमी' ऐसा वचन है; पंचमी विभक्ति वर्तमान विभक्तियों में है। สงฺคณฺหนตฺถํ วุตฺตนฺติ, วิญฺญาตพฺพา วิภาวินา; ปญฺจมึ ตุ อุปาทาย, สตฺตมิยา วิภตฺติยา. विद्वानों को समझना चाहिए कि यह संग्रह के लिए कहा गया है; पंचमी को लेकर सप्तमी विभक्ति के विषय में। ฉฏฺฐิยา จ ภวิตพฺพํ, น สา ‘‘ฉฏฺฐี’’ติ อีริตา; ฉฏฺฐึ ปน อุปาทาย, ‘‘สตฺตมี’’ตฺเวว อีริตา. और छठी होनी चाहिए थी, (परन्तु) उसे 'छठी' नहीं कहा गया; छठी को लेकर उसे 'सप्तमी' ही कहा गया है। มชฺเฌ ฉฏฺฐึ อทสฺเสตฺวา, เอวํ ตุ กถนมฺปิ จ; สตฺตมิยา วิภตฺติยา, ปจฺจุปฺปนฺนวิภตฺติยํ; สงฺคณฺหนตฺถํ วุตฺตนฺติ, อธิปฺปายํ วิภาวเย. बीच में छठी को न दिखाकर इस प्रकार का कथन भी, वर्तमान विभक्तियों में सप्तमी विभक्ति के संग्रह के लिए कहा गया है, ऐसा अभिप्राय समझना चाहिए। สภาโว เหส วตฺถูนํ, คมฺภีรตฺเถสุ อตฺตโน; เยน เกนจากาเรน, อธิปฺปายสฺส ญาปนํ. वस्तुओं का यह स्वभाव ही है कि अपने गंभीर अर्थों में किसी न किसी प्रकार से अभिप्राय का बोध कराया जाता है। ยชฺเชวํ [Pg.73] ปฐมํตีเต-นาคเต จ วิภตฺติโย; วตฺวา ตโต ปจฺจุปฺปนฺเน, กเถตพฺพา วิภตฺติโย. यदि इस प्रकार पहले अतीत और अनागत की विभक्तियों को कहकर, उसके बाद वर्तमान की विभक्तियाँ कहनी चाहिए थीं। กจฺจายนวฺหเย คนฺเถ, กสฺมา เอวํ น ภาสิตา; ปจฺจุปฺปนฺนวิภตฺโยว, กสฺมา อาทิมฺหิ ภาสิตา? कच्चायन नामक ग्रंथ में ऐसा क्यों नहीं कहा गया? वर्तमान की विभक्तियाँ ही प्रारंभ में क्यों कही गई हैं? ยสฺมา วทนฺติ โวหาร-ปเถ เอตาว ปายโต; ตสฺมา พหุปฺปโยคตฺตํ, โหเตตาสํ วิภตฺตินํ. क्योंकि व्यवहार के मार्ग में प्रायः इन्हीं (वर्तमान विभक्तियों) को बोलते हैं; इसलिए इन विभक्तियों का प्रयोग बहुत अधिक होता है। อาโทพหุปฺปโยโคว, กเถตพฺโพติ ญายโต; ปจฺจุปฺปนฺนมฺหิ สมฺภูตา, วิภตฺโยวาทิโต มตา. नियम के अनुसार प्रारंभ में बहुत प्रयोग होने वाले को ही कहना चाहिए; इसलिए वर्तमान में उत्पन्न विभक्तियाँ ही आदि में मानी गई हैं। อตีตานาคตํ วตฺวา, ปจฺจุปฺปนฺเน ตโต ปรํ; ยสฺมา วุตฺตมฺหิ โลกสฺมึ, โหติ วาจาสิลิฏฺฐตา. क्योंकि लोक में अतीत और अनागत को कहकर उसके बाद वर्तमान को कहने से वाणी में सुसंबद्धता होती है। ตสฺมา สิลิฏฺฐกถเน, อตีตาทิมเปกฺขิย; ปญฺจมี สตฺตมี เจตา, วตฺตมานายนนฺตรํ; สงฺคณฺหนตฺถมกฺขาตา, ปจฺจุปฺปนฺนวิภตฺติสุ. इसलिए सुसंबद्ध कथन में अतीत आदि की अपेक्षा करके, ये पंचमी और सप्तमी वर्तमान के बाद वर्तमान विभक्तियों में संग्रह के लिए कही गई हैं। เอตฺถ หิ ยถา ‘‘มาตาปิตโร’’ติ วุตฺเต สิลิฏฺฐกถนํ โหติ, ตสฺมึเยว วจเน วิปริยยํ กตฺวา สมาสวเสน ‘‘ปิตามาตโร’’ติ วุตฺเต สิลิฏฺฐกถนํ น โหติ, ตสฺมา ตาทิสี สทฺทรจนา อปูชนียา, ‘‘ปิตา มาตา จ เม ทชฺชุ’’นฺติ ปาโฐ ปน พฺยาสวเสน ยถิจฺฉิตปฺปโยคตฺตา ปูชนีโย, เอวเมว ‘‘อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺน’’นฺติ วุตฺเต สิลิฏฺฐกถนํ โหติ, ‘‘อตีตปจฺจุปฺปนฺนานาคต’’นฺติ เอวมาทินา วุตฺเต สิลิฏฺฐกถนํ น โหติ, ตสฺมา ตาทิสี สทฺทรจนา อปูชนียา สิยา. ‘‘อตีตารมฺมณา ปจฺจุ-ปฺปนฺนานาคตโคจรา’’ติ วจนํ ปน คาถาพนฺธสุขตฺถํ ยถิจฺฉิตปฺปโยคตฺตา ปูชนียเมว. อยเมตฺถ ปาฬิ เวทิตพฺพา – यहाँ जैसे 'मातापितरो' (माता-पिता) कहने पर सुगठित कथन (स्रिष्टकथन) होता है, उसी वचन में विपर्यय करके समास के वश से 'पितामातरो' कहने पर सुगठित कथन नहीं होता, इसलिए वैसी शब्द-रचना अमान्य (अपूजनीय) है। 'पिता माता च मे दज्जुं' यह पाठ तो व्यास (विस्तार) के वश से इच्छित प्रयोग होने के कारण मान्य है। इसी प्रकार 'अतीतानागतपच्चुप्पन्नं' (अतीत-अनागत-प्रत्युत्पन्न) कहने पर सुगठित कथन होता है, 'अतीतपच्चुप्पन्नानागतं' इत्यादि कहने पर सुगठित कथन नहीं होता, इसलिए वैसी शब्द-रचना अमान्य होनी चाहिए। 'अतीतारम्मणा पच्चुप्पन्नानागतगोचरा' यह वचन तो गाथा-रचना की सुगमता के लिए इच्छित प्रयोग होने के कारण मान्य ही है। यहाँ यह पालि (मूल पाठ) जाननी चाहिए— ‘‘ยํกิญฺจิ รูปํ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺน’’นฺติ จ, “जो कुछ भी रूप है—अतीत, अनागत या प्रत्युत्पन्न...” और, ‘‘เอกายนํ [Pg.74] ชาติขยนฺตทสฺสี,มคฺคํ ปชานาติ หิตานุกมฺปี; เอเตน มคฺเคน อตํสุ ปุพฺเพ,ตริสฺสนฺติ เย จ ตรนฺติ โอฆ’’นฺติ จ, “एकमात्र मार्ग (एकायन), जो जन्म के अंत को देखने वाला है, हित और अनुकम्पा करने वाला उस मार्ग को जानता है; इसी मार्ग से पहले लोग पार हुए, और जो ओघ (संसार-सागर) को तैर रहे हैं और तैरेंगे...” और, ‘‘เย จพฺภตีตา สมฺพุทฺธา, เย จ พุทฺธา อนาคตา; เย เจตรหิ สมฺพุทฺธา, พหูนํ โสกนาสกา. “जो अतीत के सम्बुद्ध हैं, जो अनागत के बुद्ध हैं, और जो अभी के सम्बुद्ध हैं, जो बहुतों के शोक का नाश करने वाले हैं। สพฺเพ สทฺธมฺมครุโน, วิหํสุ วิหรนฺติ จ; อโถปิ วิหริสฺสนฺติ, เอสา พุทฺธาน ธมฺมตา’’ติ จ वे सभी सद्धर्म का गौरव करने वाले हैं, वे विहार करते थे, विहार करते हैं और विहार करेंगे; यह बुद्धों की धम्मता (नियम) है।” เอวมเนเกสุ สทฺทปฺปโยเคสุ. อิธ ยถิจฺฉิตปฺปโยควเสน อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนกาลิกาสุ อฏฺฐสุ วิภตฺตีสุ ติสฺโส ปจฺจุปฺปนฺนกาลิกา วิภตฺติโย อาทิมฺหิ กถิตา, ตญฺจ กถนํ ตาสญฺเญว โวหารปเถ เยภุยฺเยน ปวตฺติโต พหุปฺปโยคตาญาปนตฺถํ. ตาสุ ปน ทฺวินฺนํ วิภตฺตีนํ ‘‘ปญฺจมีสตฺตมี’’ติสญฺญา สิลิฏฺฐกถนิจฺฉายํ กเมน วตฺตพฺพา, อตีตานาคตกาลิกา วิภตฺติโย อเปกฺขิตฺวา กตา. อิจฺเจวํ ऐसे अनेक शब्द-प्रयोगों में। यहाँ इच्छित प्रयोग के वश से अतीत-अनागत-प्रत्युत्पन्न कालिक आठ विभक्तियों में से तीन प्रत्युत्पन्नकालिक विभक्तियाँ आदि में कही गई हैं, और वह कथन उन्हीं के व्यवहार-पथ में बहुलता से प्रवृत्त होने के कारण उनके बहु-प्रयोग को बताने के लिए है। उनमें से दो विभक्तियों की 'पञ्चमी' और 'सत्तमी' संज्ञाएँ सुगठित कथन की इच्छा से क्रम से कहनी चाहिए, जो अतीत और अनागत काल की अपेक्षा करके की गई हैं। इस प्रकार— ยถิจฺฉิตปฺปโยเคน, ปจฺจุปฺปนฺนวิภตฺติโย; ติธา กตฺวาน อาทิมฺหิ, กจฺจาเนน อุทีริตา. इच्छित प्रयोग के द्वारा, प्रत्युत्पन्न विभक्तियों को तीन प्रकार से करके आदि में कच्चायन द्वारा कहा गया है। อาทิมฺหิ กถนํ ตญฺจ, ตาสํ ปาเยน วุตฺติโต; พหุปฺปโยคภาวสฺส, ญาปนตฺถนฺติ นิทฺทิเส. आदि में उनका कथन प्रायः उनके प्रयोग की बहुलता को बताने के लिए है, ऐसा निर्देश करना चाहिए। อตีตาทิมเปกฺขิตฺวา, สิลิฏฺฐกถเน ธุวํ; ‘‘ปญฺจมี สตฺตมิ’’จฺเจว, ทฺวินฺนํ นามํ กตนฺติ จ; กาลาติปตฺตึ วชฺเชตฺวา, อิทํ วจนมีริตํ. अतीत आदि की अपेक्षा करके, सुगठित कथन में निश्चित रूप से उन दोनों का नाम 'पञ्चमी' और 'सत्तमी' किया गया है; कालातिपत्ति को छोड़कर यह वचन कहा गया है। ยทิ เอวํ อยํ โทโส, อาปชฺชติ น สํสโย; อิติ เจ โกจิ ภาเสยฺย, อตฺเถ อกุสโลนโร. “यदि ऐसा है, तो यह दोष आता है, इसमें संशय नहीं है”—यदि कोई अर्थ में अकुशल मनुष्य ऐसा कहे। เตกาลิกาขฺยาตปเท[Pg.75], กาลาติปตฺติยา ปน; อสงฺคโหว โหตีติ, ‘‘ตนฺนา’’ติ ปฏิเสธเย. त्रैकालिक आख्यात पद में कालातिपत्ति का संग्रह नहीं होता है, तो 'वैसा नहीं है' (तन्न) कहकर निषेध करना चाहिए। เตกาลิกาขฺยาตปเท, น โน กาลาติปตฺติยา; อิฏฺโฐ อสงฺคโห ตตฺถ, สงฺคโหเยว อิจฺฉิโต. त्रैकालिक आख्यात पद में कालातिपत्ति का असंग्रह इष्ट नहीं है, वहाँ संग्रह ही इष्ट है। ปญฺจมีสตฺตมีสญฺญา, กาลาติปตฺติกํ ปน; วิภตฺติมนเปกฺขิตฺวา, กตา อิจฺเจว โน มติ. पञ्चमी और सत्तमी संज्ञाएँ कालातिपत्ति विभक्ति की अपेक्षा न करके की गई हैं, ऐसा हमारा मत है। นานานยํ คเหตฺวาน,ปจฺเจตพฺพํ ตุ สารโต; ยาย เอโส รุโต อตฺโถ,ตสฺมา เอสา น ทุพฺพลา. नाना नयों (विधियों) को ग्रहण करके सार रूप में समझना चाहिए; जिस (नय) से यह अर्थ कहा गया है, इसलिए वह दुर्बल नहीं है। อตฺโถ ลพฺภติ ปาสํโส,ยตฺถ ยตฺถ ยถา ยถา; ตถา ตถา คเหตพฺโพ,ตตฺถ ตตฺถ วิภาวินา. जहाँ-जहाँ, जैसे-जैसे प्रशंसनीय अर्थ प्राप्त होता है, वहाँ-वहाँ, वैसे-वैसे बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा उसे ग्रहण करना चाहिए। วุตฺตญฺเหตํ อภิธมฺมฏีกายํ ‘‘ยตฺถ ยตฺถ ยถา ยถา อตฺโถ ลพฺภติ, ตตฺถ ตตฺถ ตถา ตถา คเหตพฺโพ’’ติ. अभिधम्म-टीका में यह कहा गया है— “जहाँ-जहाँ जैसे-जैसे अर्थ प्राप्त होता है, वहाँ-वहाँ वैसे-वैसे ग्रहण करना चाहिए।” ปญฺจมีสตฺตมีสญฺญา, รูฬฺหีสญฺญาติ เกจน; น ปเนวํ คเหตพฺพํ, อชานิตฺวา วทนฺติ เต. कुछ लोग कहते हैं कि 'पञ्चमी' और 'सत्तमी' संज्ञाएँ रूढ़ि संज्ञाएँ हैं; लेकिन ऐसा नहीं समझना चाहिए, वे बिना जाने ऐसा कहते हैं। เนสา ปุริสสญฺญาทิ, ฌล สญฺญาทโย วิย; รูฬฺหิยา ภาสิตา สญฺญา, ภูเตนตฺเถน ภาสิตา. यह पुरुष-संज्ञा आदि या झ-ल संज्ञा आदि की तरह रूढ़ि से कही गई संज्ञा नहीं है, बल्कि यथार्थ अर्थ (भूत अर्थ) से कही गई संज्ञा है। อุปนิธาย ปญฺญตฺติ, เอสา สญฺญา ยโต ตโต; อนฺวตฺถสญฺญา ฐปิตา, โปราเณหีติ ลกฺขเย. चूँकि यह प्रज्ञप्ति (संज्ञा) तुलना (उपनिधा) के आधार पर है, इसलिए इसे प्राचीन आचार्यों द्वारा अन्वर्थ संज्ञा (सार्थक नाम) के रूप में स्थापित किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। อิจฺเจวํ กาลฉกฺกํ ตุ, สงฺเขเปน ติธา มตํ; เอตมตฺถญฺหิ สนฺธาย, ‘‘ยํ ติกาล’’นฺติ ภาสิตํ. इस प्रकार काल-चक्र संक्षेप में तीन प्रकार का माना गया है; इसी अर्थ को ध्यान में रखकर 'यं तिकालं' (जो त्रिकाल है) कहा गया है। อยเมตฺถ กาลฉกฺกสงฺคโห. यहाँ यह काल-चक्र का संग्रह है। เอวํ [Pg.76] ติธา จตุธา วา, ฉธา วาปิ สุเมธโส; กาลเภทํ วิภาเวยฺย, กาลญฺญูหิ วิภาวิตํ. इस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को काल-भेद को तीन, चार या छह प्रकार से स्पष्ट करना चाहिए, जैसा कि काल के ज्ञाताओं द्वारा स्पष्ट किया गया है। อตีตานาคตํ กาลํ, วิสุํ กาลาติปตฺติกํ; คเหตฺวา ปญฺจธา โหติ, เอวญฺจาปิ วิภาวเย. अतीत और अनागत काल को अलग-अलग और कालातिपत्ति को लेकर पाँच प्रकार का होता है, ऐसा भी स्पष्ट करना चाहिए। เอตฺถ นโยว ‘‘อชฺฌตฺต-พหิทฺธา วา’’ติ ปาฬิยํ; อตีตานาคตกาลี, วิภตฺติ สมุทีริตา. यहाँ 'अज्झत्त-बहिद्धा वा' (आध्यात्मिक या बाह्य) इस पालि के नय के समान ही अतीत-अनागत कालिक विभक्तियाँ कही गई हैं। อิจฺเจวํ สพฺพถาปิ กาลสงฺคโห สมตฺโต. इस प्रकार सब प्रकार से काल-संग्रह समाप्त हुआ। อิทานิ วิญฺญูนํ อตฺถคฺคหเณ โกสลฺลชนนตฺถํ ปกรณนฺตรวเสนปิ อิมสฺมึ ปกรเณ วตฺตมานานนฺตรํ วุตฺตานํ อาณตฺติปริกปฺปกาลิกานํ ‘‘ปญฺจมีสตฺตมี’’ติสงฺขาตานํ ทฺวินฺนํ วิภตฺตีนํ ปฏิปาฏิฏฺฐปเน ปกรณสํสนฺทนํ กถยาม – กาตนฺตปฺปกรณสฺมิญฺหิ สกฺกตภาสานุรูเปน ทสธา อาขฺยาตวิภตฺติโย ฐปิตา, กจฺจายนปฺปกรเณ ปน มาคธภาสานุรูเปน อฏฺฐธา ฐปิตา, นิรุตฺติยญฺจ ปน มาคธภาสานุรูเปเนว อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนาณตฺติปริกปฺปกาลาติปตฺติวเสน ฉธา ฐปิตา. เตสุ หิ กาตนฺเต วตฺตมานา, สตฺตมี, ปญฺจมี, หิยฺยตฺตนี, อชฺชตนี, ปโรกฺขา, สฺวาตนี, อาสี, ภวิสฺสนฺตี, กฺริยาติปตฺติ จาติ ทสธา วิภตฺตา. กจฺจายเน ปน วตฺตมานา, ปญฺจมี, สตฺตมี, ปโรกฺขา, หิยฺยตฺตนี, อชฺชตนี, ภวิสฺสนฺตี, กาลาติปตฺติ จาติ อฏฺฐธา วิภตฺตา. อิติ เอเตสุ ทฺวีสุ กาตนฺตกจฺจายเนสุ วิภตฺติโย วิสทิสาย ปฏิปาฏิยา ฐปิตา. กิญฺจาเปตฺถ วิสทิสา ปฏิปาฏิ, ตถาเปตา นิรุตฺติยํ วุตฺตาตีตาทิกาลวิภาควเสน เอกโต สํสนฺทนฺติ สเมนฺติ กิญฺจิ วิเสสํ ฐเปตฺวา. अब विद्वानों के अर्थ-ग्रहण में कुशलता उत्पन्न करने के लिए, अन्य प्रकरणों के वश से भी इस प्रकरण में वर्तमान के अनन्तर कही गई आज्ञा (आणत्ति) और परिकल्प (संभावना) कालिक 'पञ्चमी' और 'सत्तमी' नामक दो विभक्तियों के क्रम की स्थापना के विषय में प्रकरण-तुलना कहते हैं— कातन्त्र प्रकरण में संस्कृत भाषा के अनुरूप दस प्रकार की आख्यात विभक्तियाँ रखी गई हैं, कच्चायन प्रकरण में मागधी भाषा के अनुरूप आठ प्रकार की, और निरुत्ति में मागधी भाषा के अनुरूप ही अतीत, अनागत, प्रत्युत्पन्न, आज्ञा, परिकल्प और कालातिपत्ति के वश से छह प्रकार की रखी गई हैं। उनमें कातन्त्र में— वर्तमान, सत्तमी, पञ्चमी, हिय्यत्तनी, अज्जतनी, परोक्खा, स्वातनी, आसी, भविसन्ती और क्रियातिपत्ति—ये दस विभक्तियाँ हैं। कच्चायन में— वर्तमान, पञ्चमी, सत्तमी, परोक्खा, हिय्यत्तनी, अज्जतनी, भविसन्ती और कालातिपत्ति—ये आठ विभक्तियाँ हैं। इस प्रकार इन दोनों कातन्त्र और कच्चायन में विभक्तियाँ भिन्न क्रम से रखी गई हैं। यद्यपि यहाँ क्रम भिन्न है, फिर भी वे निरुत्ति में कहे गए अतीत आदि काल-विभाग के वश से कुछ विशेष को छोड़कर एक साथ मिलती और समान होती हैं। กถํ[Pg.77]? กาตนฺเต ตาว หิยฺยตฺตนี อชฺชตนี ปโรกฺขา จาติ อิมา ติสฺโส เอกนฺเตน อตีตกาลิกา, สฺวาตนี อาสี ภวิสฺสนฺติ จาติ อิมา ติสฺโส เอกนฺเตน อนาคตกาลิกา, วตฺตมานา เอกาเยว ปจฺจุปฺปนฺนกาลิกา, สตฺตมี ปน ปญฺจมี จ ปจฺจุปฺปนฺนานาคตกาลวเสน ทฺวิกาลิกา ‘‘อชฺช ปุญฺญํ กเรยฺย, สฺเวปิ กเรยฺย. อชฺช คจฺฉตุ, สฺเว วา คจฺฉตู’’ติ ปโยคารหตฺตา. กฺริยาติปตฺติ อนิยตกาลิกา ‘‘โส เจ หิยฺโย ยานํ อลภิสฺสา, อคจฺฉิสฺสา. โส เจ อชฺช อนตฺถงฺคเต สูริเย ยานํ อลภิสฺสา, อคจฺฉิสฺสา. โส เจ สฺเว ยานํ อลภิสฺสา, อคจฺฉิสฺสา’’ติ ปโยคารหตฺตา. เอวํ อสงฺกรโต ววตฺถเปตพฺพํ. कैसे? कातन्त्र (व्याकरण) में हिय्यत्तनी, अज्जतनी और परोक्खा - ये तीन निश्चित रूप से अतीतकालिक (भूतकाल) हैं; स्वातनी, आसी और भविष्यन्ती - ये तीन निश्चित रूप से अनागतकालिक (भविष्यकाल) हैं; वर्तमाना केवल एक ही प्रत्युत्पन्नकालिक (वर्तमानकाल) है। सप्तमी और पञ्चमी वर्तमान और भविष्य काल के भेद से द्विकालिक हैं, क्योंकि 'आज पुण्य करे, कल भी करे' (सप्तमी) और 'आज जाए, या कल जाए' (पञ्चमी) - इस प्रकार के प्रयोगों के योग्य होने के कारण। क्रियातिपत्ति अनियतकालिक है, क्योंकि 'यदि वह कल सवारी पाता, तो जाता। यदि वह आज सूर्यास्त से पहले सवारी पाता, तो जाता। यदि वह कल सवारी पाता, तो जाता' - इस प्रकार के प्रयोगों के योग्य होने के कारण। इस प्रकार बिना किसी संकर (मिश्रण) के व्यवस्थापित करना चाहिए। เอวํ ววตฺถเปตฺวา อยมมฺเหหิ วุจฺจมาโน นโย สาธุกํ สลฺลกฺเขตพฺโพ. กถํ? หิยฺยตฺตนชฺชตนีปโรกฺขาสฺวาตนฺยาสีภวิสฺสนฺติวเสน เอกนฺตาตีตานาคตกาลิกา วิภตฺติโย ฉ, วตฺตมานวเสน เอกนฺตปจฺจุปฺปนฺนกาลิกา วิภตฺติ เอกาเยว, สา ปฏิปาฏิยา คณิยมานา สตฺตมํ ฐานํ ภชติ. เอวํ เอตสฺมึ วตฺตมานาสงฺขาเต สตฺตมฏฺฐาเน ปกฺขิปิตุํ นิรุตฺตินเยน ‘‘ปริกปฺปกาลิกา’’ติ สงฺขํ คตํ สตฺถนเยน ‘‘ปจฺจุปฺปนฺนานาคตกาลิกา’’ติวตฺตพฺพํ เอกํ วิภตฺตึ สตฺตมีภูตาย วตฺตมานาย สมานฏฺฐานตฺตา สตฺตมีสญฺญํ กตฺวา ฐเปสิ. ตโต ปุนเทว สฺวาตนฺยาสีภวิสฺสนฺติวเสน เอกนฺตานาคตกาลิกา ติสฺโส วิภตฺติโย คเณตฺวา ตํ ปจฺจุปฺปนฺนานาคตกาลิกํ ‘‘สตฺตมี’’ติ ลทฺธสญฺญํ วิภตฺตึ อนาคตกาลิกภาเวน ตาหิ ตีหิ สทฺธึ สมานฏฺฐานตฺตา จตุตฺถํ กตฺวา นิรุตฺตินเยน ‘‘อาณตฺติกาลิกา’’ติ สงฺขํ คตํ สตฺถนเยน ‘‘ปจฺจุปฺปนฺนานาคตกาลิกา’’ติ วตฺตพฺพํ เอกํ วิภตฺตึ ปญฺจนฺนํ สงฺขฺยานํ ปูรเณน ปญฺจมีสญฺญํ กตฺวา ฐเปสิ. इस प्रकार व्यवस्थापित करके हमारे द्वारा कहे जाने वाले इस नय (पद्धति) को अच्छी तरह समझना चाहिए। कैसे? हिय्यत्तनी, अज्जतनी, परोक्खा, स्वातनी, आसी और भविष्यन्ती के भेद से छह विभक्तियाँ निश्चित रूप से अतीत और अनागत काल की हैं; वर्तमाना के रूप में केवल एक ही निश्चित रूप से प्रत्युत्पन्नकालिक विभक्ति है, जो क्रम से गिने जाने पर सातवें स्थान को प्राप्त होती है। इस प्रकार, इस वर्तमाना संज्ञक सातवें स्थान में रखने के लिए, निरुक्ति के नय से 'परिकप्पकालिका' (संभावना काल) संज्ञा प्राप्त और शास्त्र के नय से 'प्रत्युत्पन्न-अनागतकालिक' कही जाने वाली एक विभक्ति को, सप्तमी बनी हुई वर्तमाना के समान स्थान होने के कारण 'सप्तमी' संज्ञा देकर स्थापित किया। उसके बाद फिर से स्वातनी, आसी और भविष्यन्ती के भेद से तीन निश्चित रूप से अनागतकालिक विभक्तियों को गिनकर, उस प्रत्युत्पन्न-अनागतकालिक 'सप्तमी' संज्ञा प्राप्त विभक्ति को अनागतकालिक होने के कारण उन तीनों के साथ समान स्थान होने से चौथा करके, निरुक्ति के नय से 'आणत्तिकालिका' (आज्ञा काल) संज्ञा प्राप्त और शास्त्र के नय से 'प्रत्युत्पन्न-अनागतकालिक' कही जाने वाली एक विभक्ति को पाँच की संख्या को पूरा करने के कारण 'पञ्चमी' संज्ञा देकर स्थापित किया। กฺริยาติปตฺติยา [Pg.78] ปน อนิยตกาลิกตฺตา ตํ วชฺเชตฺวา อยํ วินิจฺฉโย กโต, โส จ โข นิรุตฺตินยํเยว นิสฺสาย. อยํ ตาว กาตนฺเต วตฺตมานานนฺตรํ วุตฺตานํ สตฺตมีปญฺจมีนํ อนฺวตฺถสญฺญํ อิจฺฉนฺตานํ อมฺหากํ รุจิ, เอสา สทฺธมฺมวิทูหิ ครูหิ อปฺปฏิกฺโกสิตา อนุมตา สมฺปฏิจฺฉิตา ‘‘เอวเมวํ อาวุโส, เอวเมวํ อาวุโส’’ติ. เวยฺยากรเณหิปิ อปฺปฏิกฺโกสิตา อนุมตา สมฺปฏิจฺฉิตา ‘‘เอวเมวํ ภนฺเต, เอวเมวํ ภนฺเต’’ติ. เอวํ สพฺเพหิปิ เตหิ ปุพฺพาจริเยหิ อพฺภนุโมทิตา อปฺปฏิกฺโกสิตา. क्रियातिपत्ति के अनियतकालिक होने के कारण उसे छोड़कर यह निश्चय किया गया है, और वह निरुक्ति-नय के ही आश्रित है। कातन्त्र में वर्तमाना के बाद कही गई सप्तमी और पञ्चमी की अन्वर्थ संज्ञा (सार्थक नाम) चाहने वाले हमारी यह रुचि (मत) है; यह सद्धर्म के ज्ञाता गुरुओं द्वारा अस्वीकृत नहीं है, बल्कि अनुमत और स्वीकृत है—'ऐसा ही है आयुष्मान्, ऐसा ही है आयुष्मान्'। वैयाकरणों द्वारा भी यह अस्वीकृत नहीं है, बल्कि अनुमत और स्वीकृत है—'ऐसा ही है भन्ते, ऐसा ही है भन्ते'। इस प्रकार उन सभी पूर्वाचार्यों द्वारा यह अनुमोदित और अस्वीकृत नहीं है। กจฺจายนปฺปกรเณ ปน พุทฺธวจนานุรูเปน อฏฺฐธา วิภตฺตีนํ วุตฺตตฺตา วตฺตมานาวิภตฺติ ปญฺจมฏฺฐาเน ฐิตา. กถํ? ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีภวิสฺสนฺติวเสน เอกนฺตาตีตานาคตกาลิกา จตสฺโส วิภตฺติโย, วตฺตมานวเสน เอกนฺตปจฺจุปฺปนฺนกาลิกา วิภตฺติ เอกาเยว, สา ปฏิปาฏิยา คณิยมานา ปญฺจมํ ฐานํ ภชติ. เอวํ เอตสฺมึ วตฺตมานาสงฺขาเต ปญฺจมฏฺฐาเน ปกฺขิปิตุํ นิรุตฺตินเยน ‘‘อาณตฺติกาลิกา’’ติ สงฺขํ คตํ ‘‘อนุตฺตกาลิกา’’ติ วุตฺตํ วิภตฺตึ ปญฺจมีภูตาย วตฺตมานาย สมานฏฺฐานตฺตา ปญฺจมีสญฺญํ กตฺวา ฐเปสิ. ตโต ปรํ ตํ ปญฺจมํ ฉฏฺฐิฏฺฐาเน ฐเปตฺวา ปโรกฺขา หิยฺยตฺตนี อชฺชตนี ภวิสฺสนฺตี วตฺตมานา ปญฺจมีติ เอวํ คณนาวเสน ฉ วิภตฺติโย อุปาทาย นิรุตฺตินเยน ‘‘ปริกปฺปกาลิกา’’ติ สงฺขํ คตํ ‘‘อนุตฺตกาลิกา’’ติ วุตฺตํ วิภตฺตึ สตฺตนฺนํ สงฺขฺยานํ ปูรเณน สตฺตมีสญฺญํ กตฺวา ฐเปสิ. कच्चायन प्रकरण में बुद्धवचन के अनुरूप आठ प्रकार की विभक्तियों के कहे जाने के कारण वर्तमाना विभक्ति पाँचवें स्थान पर स्थित है। कैसे? परोक्खा, हिय्यत्तनी, अज्जतनी और भविष्यन्ती के भेद से चार निश्चित रूप से अतीत और अनागत काल की विभक्तियाँ हैं; वर्तमाना के रूप में केवल एक ही निश्चित रूप से प्रत्युत्पन्नकालिक विभक्ति है, जो क्रम से गिने जाने पर पाँचवें स्थान को प्राप्त होती है। इस प्रकार, इस वर्तमाना संज्ञक पाँचवें स्थान में रखने के लिए, निरुक्ति के नय से 'आणत्तिकालिका' संज्ञा प्राप्त और 'अनुत्तकालिका' कही गई विभक्ति को, पञ्चमी बनी हुई वर्तमाना के समान स्थान होने के कारण 'पञ्चमी' संज्ञा देकर स्थापित किया। उसके बाद उस पञ्चमी को छठे स्थान पर रखकर—परोक्खा, हिय्यत्तनी, अज्जतनी, भविष्यन्ती, वर्तमाना और पञ्चमी—इस प्रकार गणना के वश से छह विभक्तियों को लेकर, निरुक्ति के नय से 'परिकप्पकालिका' संज्ञा प्राप्त और 'अनुत्तकालिका' कही गई विभक्ति को सात की संख्या को पूरा करने के कारण 'सप्तमी' संज्ञा देकर स्थापित किया। กาลาติปตฺติยา ปน อตีตานาคตกาลิกตฺตา ตํ วชฺเชตฺวา อยํ วินิจฺฉโย กโต, โส จ โข นิรุตฺตินยํเยว นิสฺสาย. อยํ กจฺจายเน วตฺตมานานนฺตรํ วุตฺตานํ ปญฺจมีสตฺตมีนํ อนฺวตฺถสญฺญํ อิจฺฉนฺตานํ อมฺหากํ รุจิ, เอสา จ สทฺธมฺมวิทูหิ ครูหิ อปฺปฏิกฺโกสิตา อนุมตา สมฺปฏิจฺฉิตา [Pg.79] ‘‘เอวเมวํ อาวุโส, เอวเมวํ อาวุโส’’ติ. เวยฺยากรเณหิปิ อปฺปฏิกฺโกสิตา อนุมตา สมฺปฏิจฺฉิตา ‘‘เอวเมวํ ภนฺเต, เอวเมวํ ภนฺเต’’ติ. เอวํ สพฺเพหิปิ เตหิ ปุพฺพาจริเยหิ อพฺภนุโมทิตา อปฺปฏิกฺโกสิตา. कालातिपत्ति के अतीत और अनागत कालिक होने के कारण उसे छोड़कर यह निश्चय किया गया है, और वह निरुक्ति-नय के ही आश्रित है। कच्चायन में वर्तमाना के बाद कही गई पञ्चमी और सप्तमी की अन्वर्थ संज्ञा चाहने वाले हमारी यह रुचि है; और यह सद्धर्म के ज्ञाता गुरुओं द्वारा अस्वीकृत नहीं है, बल्कि अनुमत और स्वीकृत है—'ऐसा ही है आयुष्मान्, ऐसा ही है आयुष्मान्'। वैयाकरणों द्वारा भी यह अस्वीकृत नहीं है, बल्कि अनुमत और स्वीकृत है—'ऐसा ही है भन्ते, ऐसा ही है भन्ते'। इस प्रकार उन सभी पूर्वाचार्यों द्वारा यह अनुमोदित और अस्वीकृत नहीं है। ยสฺมา หิ กาตนฺตกจฺจายนานิ อญฺญมญฺญํ วิสทิสวิภตฺติกฺกมานิปิ อนฺตเรน กิญฺจิ วิเสสํ นิรุตฺติยํ วุตฺตาตีตาทิกาลวิภาควเสเนกชฺฌํ สํสนฺทนฺติ สเมนฺติ, ตสฺมา นิรุตฺตินยญฺเญว สารโต คเหตฺวา ปญฺจมีสตฺตมีวิภตฺตีนํ อนฺวตฺถสญฺญาปริกปฺปเน อมฺหากํ รุจิ ปุพฺพาจริเยหิ อพฺภนุโมทิตา อปฺปฏิกฺโกสิตา, ตสฺมา เอว โย โกจิ อิมํ วาทํ มทฺทิตฺวา อญฺญํ วาทํ ปติฏฺฐาเปตุํ สกฺขิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ. อยญฺหิ นโย อตีว สุขุโม ทุทฺทโส จ ปรมาณุริว, ทุกฺโขคาฬฺโห จ มหาคหนมิว, อติคมฺภีโร จ มหาสมุทฺโท วิย, ตสฺมา อิมิสฺสํ สทฺทนีติยํ สทฺธาสมฺปนฺเนหิ กุลปุตฺเตหิ สาสโนปการตฺถํ โยโค สุฏฺฐุ กรณีโย. ตถา หิ อิธ กตโยเคหิ นามาขฺยาตาทีสุ จตูสุ ปเทสุ อุปฺปนฺนวาทา ปรวาทิโน ชิตาว โหนฺติ. क्योंकि कातन्त्र और कच्चायन एक-दूसरे से भिन्न विभक्ति-क्रम वाले होने पर भी, बिना किसी विशेष अंतर के निरुक्ति में कहे गए अतीत आदि काल-विभाजन के अनुसार एक साथ मिलते और समान होते हैं, इसलिए निरुक्ति-नय को ही सार रूप में ग्रहण करके पञ्चमी और सप्तमी विभक्तियों की अन्वर्थ संज्ञा की कल्पना में हमारी रुचि पूर्वाचार्यों द्वारा अनुमोदित और अस्वीकृत नहीं है; इसलिए कोई भी इस वाद का खंडन करके अन्य वाद स्थापित कर सकेगा, ऐसा संभव नहीं है। यह नय परमाणु के समान अत्यंत सूक्ष्म और दुर्दर्श है, महावन के समान कठिनता से प्रवेश करने योग्य है, और महासमुद्र के समान अत्यंत गंभीर है; इसलिए इस सद्दनीति में श्रद्धा-सम्पन्न कुलपुत्रों द्वारा शासन के उपकार के लिए भली-भांति योग (प्रयत्न) करना चाहिए। क्योंकि यहाँ प्रयत्न करने वालों द्वारा नाम, आख्यात आदि चार पदों में उत्पन्न विवादों में परवादी (विपक्षी) पराजित ही होते हैं। มุนินา มุนินาเคน, ทุฏฺฐา ปพฺพชิตา ชิตา; ยถา ยถา อสทฺธมฺม-ปูรณา ปูรณาทโย. मुनि (बुद्ध) रूपी मुनि-नाग (श्रेष्ठ मुनि) द्वारा दुष्ट प्रव्रजितों को जीत लिया गया; जैसे-जैसे असद्धर्म से पूर्ण पूरण (पूरण कस्सप) आदि थे। ตถา ตถาคตาทายา-นุคายํ สทฺทนีติยํ; กตโยเคหิปิ ชิตา, สวนฺติ ปรวาทิโนติ. उसी प्रकार तथागत के उपदेशों का अनुसरण करने वाली इस सद्दनीति में, (व्याकरण के) प्रयोग करने वालों द्वारा भी परवादी (अन्य मत वाले) जीत लिए जाते हैं और वे परास्त हो जाते हैं। อยํ ปญฺจมีสตฺตมีนํ ปฏิปาฏิฏฺฐปเน ปกรณสํสนฺทนา. यह पंचमी और सप्तमी (विभक्तियों) के क्रम की स्थापना में प्रकरण का मिलान है। อถ วตฺตมานาทีนํ วจนตฺถํ กถยาม – ตตฺถ วตฺตมานาติ เกนฏฺเฐน วตฺตมานา? วตฺตมานกาลวจนฏฺเฐน. ปจฺจุปฺปนฺนภาเวน หิ วตฺตตีติ วตฺตมาโน, ปจฺจุปฺปนฺนกฺริยาสงฺขาโต กาโล. ตพฺพาจกวเสน วตฺตมาโน กาโล เอติสฺสา อตฺถีติ อยํ ติ อนฺติอาทิวิภตฺติ วตฺตมานา. ตถา [Pg.80] หิ ‘‘คจฺฉติ เทวทตฺโต’’ติ เอตฺถ เทวทตฺตสฺส ปจฺจุปฺปนฺนํ คมนกฺริยํ วิภตฺติภูโต ติสทฺโทเยว วทติ, ตสฺมา ตพฺพาจกวเสน วตฺตมาโน กาโล เอติสฺสา อตฺถีติ วตฺตมานาติ วุจฺจติ. ปญฺจมีติ เกนฏฺเฐน ปญฺจมี? ปญฺจมํ วตฺตมานฏฺฐานํ คมนฏฺเฐน, ปญฺจนฺนญฺจ สงฺขฺยานํ ปูรณฏฺเฐน. ตถา หิ นิโยคา อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนกาลิกานํ ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีภวิสฺสนฺตีวตฺตมานาสงฺขาตานํ ปญฺจนฺนํ วิภตฺตีนมนฺตเร ปญฺจมีภูตาย วตฺตมานาย สยมฺปิ ปจฺจุปฺปนฺนกาลิกภาเวน สมานฏฺฐานตฺตา ปญฺจมํ วตฺตมานฏฺฐานํ คจฺฉตีติ ปญฺจมี. ยถา นทนฺตี คจฺฉตีติ นที. ตถา นิโยคา อตีตานาคตกาลิกา ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีภวิสฺสนฺตีสงฺขาตา จตสฺโส วิภตฺติโย อุปาทาย สยมฺปิ วตฺตมานาวิภตฺติ วิย ปญฺจนฺนํ สงฺขฺยานํ ปูรณีติ ปญฺจมี. สตฺตมีติ เกนฏฺเฐน สตฺตมี? สตฺตนฺนํ สงฺขฺยานํ ปูรณฏฺเฐน. ตถา หิ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนกาลิกา ปโรกฺขาหิยฺยตฺตนชฺชตนีภวิสฺสนฺตีวตฺตมานาปญฺจมีสงฺขาตา ฉ วิภตฺติโย อุปาทาย สยมฺปิ ปจฺจุปฺปนฺนกาลิกา หุตฺวา สตฺตนฺนํ สงฺขฺยานํ ปูรณีติ สตฺตมี. अब हम 'वर्तमाना' आदि के शब्दों का अर्थ कहते हैं - वहाँ 'वर्तमाना' किस अर्थ में 'वर्तमाना' है? वर्तमान काल के वाचक होने के अर्थ में। क्योंकि जो वर्तमान भाव से विद्यमान है वह 'वर्तमान' है, जो वर्तमान क्रिया रूप काल है। उस (काल) के वाचक होने के कारण 'वर्तमान काल' जिसमें है, वह यह 'ति', 'अन्ति' आदि विभक्ति 'वर्तमाना' है। जैसे 'देवदत्त जाता है' (गच्छति देवदत्तो) यहाँ देवदत्त की वर्तमान गमन क्रिया को विभक्ति रूप 'ति' शब्द ही कहता है, इसलिए उस (काल) के वाचक होने के कारण 'वर्तमान काल' जिसमें है, उसे 'वर्तमाना' कहा जाता है। 'पंचमी' किस अर्थ में 'पंचमी' है? पाँचवें वर्तमान स्थान को प्राप्त होने के अर्थ में, और पाँच संख्याओं को पूर्ण करने के अर्थ में। क्योंकि नियम से अतीत, अनागत और वर्तमान कालिक - परोक्षा, हिय्यत्तनी, अज्जतनी, भविष्यन्ती और वर्तमाना नामक पाँच विभक्तियों के बीच में, पंचमी रूप वर्तमाना के साथ स्वयं भी वर्तमान कालिक होने के कारण समान स्थान वाली होने से पाँचवें वर्तमान स्थान को प्राप्त होती है, इसलिए 'पंचमी' है। जैसे शब्द करती हुई जाती है वह 'नदी' है। उसी प्रकार नियम से अतीत और अनागत कालिक - परोक्षा, हिय्यत्तनी, अज्जतनी और भविष्यन्ती नामक चार विभक्तियों को लेकर स्वयं भी वर्तमाना विभक्ति की तरह पाँच संख्याओं की पूरक है, इसलिए 'पंचमी' है। 'सप्तमी' किस अर्थ में 'सप्तमी' है? सात संख्याओं को पूर्ण करने के अर्थ में। क्योंकि अतीत, अनागत और वर्तमान कालिक - परोक्षा, हिय्यत्तनी, अज्जतनी, भविष्यन्ती, वर्तमाना और पंचमी नामक छह विभक्तियों को लेकर स्वयं भी वर्तमान कालिक होकर सात संख्याओं की पूरक है, इसलिए 'सप्तमी' है। ปโรกฺขาติ เกนฏฺเฐน ปโรกฺขา? ปโรกฺเข ภวาติ อตฺเถน. ตถา หิ จกฺขาทินฺทฺริยสงฺขาตสฺส อกฺขสฺส ปโร ติโรภาโว ปโรกฺขํ, ตพฺพาจกภาเวน ปโรกฺเข ภวาติ ปโรกฺขา. หิยฺยตฺตนีติ เกนฏฺเฐน หิยฺยตฺตนี? หิยฺโย ปภุติ อตีเต กาเล ภวา ตพฺพาจกภาเวนาติ อตฺเถน. อชฺชตนีติ เกนฏฺเฐน อชฺชตนี? อชฺช ปภุติ อตีเต กาเล ภวา ตพฺพาจกภาเวนาติ อตฺเถน. ภวิสฺสนฺตีติ เกนฏฺเฐน ภวิสฺสนฺตี? ‘‘เอวํ อนาคเต ภวิสฺสตี’’ติ อตฺถํ ปกาเสนฺตี เอติ คจฺฉตีติ อตฺเถน. กาลาติปตฺตีติ เกนฏฺเฐน กาลาติปตฺติ? กาลสฺสาติปตนวจนฏฺเฐน. ตถา หิ กาลสฺส อติปตนํ อจฺจโย อติกฺกมิตฺวา ปวตฺติ กาลาติปตฺติ, ลภิตพฺพสฺส อตฺถสฺส นิปฺผตฺติรหิตํ กฺริยาติกฺกมนํ[Pg.81]. กาโลติ เจตฺถ กฺริยา อธิปฺเปตา. กรณํ กาโร, กาโร เอว กาโล รการสฺส ลการํ กตฺวา อุจฺจารณวเสน. อยํ ปน วิภตฺติ ตพฺพาจกตฺตา กาลาติปตฺตีติ. อยํ ปน วตฺตมานาทีนํ วจนตฺถวิภาวนา. 'परोक्षा' किस अर्थ में 'परोक्षा' है? 'परोक्ष' (आँखों से ओझल) में होने के अर्थ में। क्योंकि चक्षु आदि इन्द्रिय रूप 'अक्ष' से परे (तिरोभाव) होना 'परोक्ष' है, उसके वाचक होने से परोक्ष में होने वाली 'परोक्षा' है। 'हिय्यत्तनी' किस अर्थ में 'हिय्यत्तनी' है? 'हिय्यो' (कल) से लेकर अतीत काल में होने वाली और उसकी वाचक होने के अर्थ में। 'अज्जतनी' किस अर्थ में 'अज्जतनी' है? 'अज्ज' (आज) से लेकर अतीत काल में होने वाली और उसकी वाचक होने के अर्थ में। 'भविष्यन्ती' किस अर्थ में 'भविष्यन्ती' है? "इस प्रकार भविष्य में होगा" इस अर्थ को प्रकाशित करती हुई जो प्राप्त होती है, उस अर्थ में। 'कालातिपत्ति' किस अर्थ में 'कालातिपत्ति' है? काल के अतिपतन (बीत जाने) के वचन के अर्थ में। क्योंकि काल का अतिपतन, व्यय या उल्लंघन करके प्रवृत्ति होना 'कालातिपत्ति' है, जो प्राप्त होने योग्य अर्थ की निष्पत्ति के बिना क्रिया का उल्लंघन है। यहाँ 'काल' से 'क्रिया' अभिप्रेत है। 'करण' ही 'कार' है, और 'कार' ही 'काल' है, 'र' कार को 'ल' कार करके उच्चारण करने के कारण। यह विभक्ति उसकी वाचक होने से 'कालातिपत्ति' है। यह वर्तमाना आदि के शब्दों के अर्थ की व्याख्या है। วิปฺปกิณฺณวิวิธนเย, สํกิณฺณลกฺขณธรวรสาสเน; สุมติมติวฑฺฒนตฺถํ, กถิโต ปกิณฺณกวินิจฺฉโย. बिखरे हुए विविध नयों वाले और संकीर्ण लक्षणों को धारण करने वाले श्रेष्ठ शासन (बुद्ध वचन) में, सुमति (अच्छी बुद्धि) वालों की बुद्धि बढ़ाने के लिए यह 'प्रकीर्णक विनिश्चय' कहा गया है। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार अट्ठकथा सहित नौ अंगों वाले त्रिपिटक के वचनों के मार्ग में विद्वानों के โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कौशल (निपुणता) के लिए रचित 'सद्दनीति' प्रकरण में ปกิณฺณกวินิจฺฉโย นาม 'प्रकीर्णक विनिश्चय' नामक ตติโย ปริจฺเฉโท. तीसरा परिच्छेद (समाप्त हुआ)। ๔. ภูธาตุมยนามิกรูปวิภาค ४. भू-धातु से बने नामिक रूपों का विभाग। ‘‘ภู สตฺตาย’’นฺติ ธาตุสฺส, รูปมาขฺยาตสญฺญิตํ; ตฺยาทฺยนฺตํ ลปิตํ นาน-ปฺปกาเรหิ อนากุลํ. 'भू सत्तायाम्' इस धातु का 'आख्यात' (क्रिया) संज्ञक रूप, जो 'ति' आदि प्रत्ययों से अंत होने वाला है, अनेक प्रकार से स्पष्ट रूप से कहा गया है। สฺยาทฺยนฺตํ, ทานิ ตสฺเสว, รูปํ นามิกสวฺหยํ; ภาสิสฺสํ ภาสิตตฺเถสุ, ปฏุภาวาย โสตุนํ. अब उसी (धातु) का 'सि' आदि प्रत्ययों से अंत होने वाला 'नामिक' नामक रूप, श्रोताओं की कुशलता के लिए कहे गए अर्थों में कहूँगा। ยทตฺเถ’ตฺตนิ นาเมติ, ปร’มตฺเถสุ วา สยํ; นมตีติ ตทาหํสุ, นามํ อิติ วิภาวิโน. जो अपने अर्थ में झुकता है या स्वयं दूसरे अर्थों में झुकता है, उसे विद्वानों ने 'नाम' कहा है। นามํ นามิกมิจฺจตฺร, เอกเมเวตฺถโต ภเว; ตเทวํ นามิกํ เญ ยฺยํ, สลิงฺคํ สวิภตฺติกํ. यहाँ 'नाम' और 'नामिक' एक ही अर्थ में होने चाहिए; इस प्रकार उस नामिक को लिंग और विभक्ति के साथ जानना चाहिए। สตฺวาภิธานํ ลิงฺคนฺติ, อิตฺถิปุมนปุํสกํ; วิภตฺตีติธ สตฺเตว, ตตฺถ จฏฺฐ ปวุจฺจเร. सत्त्व (द्रव्य) का अभिधान 'लिंग' है, जो स्त्री, पुरुष और नपुंसक (के भेद से तीन) है। यहाँ विभक्तियाँ सात ही हैं, और वहाँ आठ कही जाती हैं। ปฐมา ทุติยา ตติยา, จตุตฺถี ปญฺจมี ตถา; ฉฏฺฐี จ สตฺตมี จาติ, โหนฺติ สตฺต วิภตฺติโย. प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी और सप्तमी - ये सात विभक्तियाँ होती हैं। ลิงฺคตฺเถ ปฐมา สายํ, ภินฺนา ทฺเวธา สิโย อิติ; กมฺมตฺเถ ทุติยา สาปิ, ภินฺนา อํ โย อิติ ทฺวิธา. लिंग के अर्थ में प्रथमा होती है, वह 'सि', 'यो' के रूप में दो प्रकार की है। कर्म के अर्थ में द्वितीया होती है, वह भी 'अं', 'यो' के रूप में दो प्रकार की है। กรเณ [Pg.82] ตติยา สาปิ, ภินฺนา นา หิ อิติ ทฺวิธา; สมฺปทาเน จตุตฺถี สา, ภินฺนา ทฺเวธา ส นํ อิติ. करण के अर्थ में तृतीया होती है, वह भी 'ना', 'हि' के रूप में दो प्रकार की है। सम्प्रदान के अर्थ में चतुर्थी होती है, वह 'स', 'नं' के रूप में दो प्रकार की है। อปาทาเน ปญฺจมี สา, ภินฺนา ทฺเวธา สฺมา หิ อิติ; ฉฏฺฐี สามิมฺหิ สา จาปิ, ภินฺนา ทฺเวธา ส นํ อิติ. अपादान के अर्थ में पंचमी होती है, वह 'स्मा', 'हि' के रूप में दो प्रकार की है। स्वामी (सम्बन्ध) के अर्थ में षष्ठी होती है, वह भी 'स', 'नं' के रूप में दो प्रकार की है। โอกาเส สตฺตมี สาปิ, ภินฺนา ทฺเวธา สฺมึสุ อิติ; อามนฺตนฏฺฐมี สายํ, สิโยเยวาติ จุทฺทส. अवकाश (अधिकरण) के अर्थ में सप्तमी होती है, वह भी 'स्मिं', 'सु' के रूप में दो प्रकार की है। आमंत्रण (सम्बोधन) के अर्थ में आठवीं (विभक्ति) है, वह 'सि', 'यो' ही है - इस प्रकार ये चौदह (प्रत्यय) हैं। วจนทฺวยสํยุตฺตา, เอเกกา ตา วิภตฺติโย; สตฺวมิติห วิญฺเญยฺโย, อตฺโถ โส ทพฺพสญฺญิโต. वे प्रत्येक विभक्तियाँ दो वचनों (एकवचन और बहुवचन) से युक्त होती हैं। यहाँ 'सत्त्व' को जानना चाहिए, वह अर्थ 'द्रव्य' संज्ञक है। โย กโรติส กตฺตาตุ, ตํ กมฺมํ ยํ กโรติ วา; กุพฺพเต เยน วา ตนฺตุ, กรณํ อิติ สญฺญิตํ. जो करता है वह 'कर्ता' है, और जिसे करता है वह 'कर्म' है; जिसके द्वारा किया जाता है वह 'करण' संज्ञक है। เทติ โรจติ วา ยสฺส, สมฺปทานนฺติ ตํ มตํ; ยโตเปติ ภยํ วา ตํ, อปาทานนฺติ กิตฺติตํ. जिसे देता है या जिसे अच्छा लगता है, वह 'सम्प्रदान' माना गया है; जिससे अलग होता है या जिससे भय होता है, वह 'अपादान' कहा गया है। ยสฺสายตฺโต สมูโหวา, ตํ เว สามีติ เทสิตํ; ยสฺมึ กโรติ กิริยํ, ตโทกาสนฺติ สทฺทิตํ. जिसके अधीन समूह आदि हो, उसे 'स्वामी' (सम्बन्ध) बताया गया है; जिसमें क्रिया करता है, उसे 'अवकाश' (अधिकरण) कहा गया है। ยทาลปติ ตํ วตฺถุ, อามนฺตนมุทีริตํ; สทฺเทนาภิมุขีกาโร, วิชฺชมานสฺส วา ปน. जिसे पुकारता है वह वस्तु 'आमंत्रण' (सम्बोधन) कही गई है; शब्द के द्वारा (किसी को) सम्मुख करना, या विद्यमान (व्यक्ति) को (सम्बोधित करना)। วินา อาลปนตฺถํ ลิงฺคตฺถาทีสุ ปฐมาทิวิภตฺตุปฺปตฺติ อุปลกฺขณวเสน วุตฺตาติ ทฏฺฐพฺพํ. संबोधन के अर्थ के बिना, लिंग के अर्थ आदि में प्रथमा आदि विभक्तियों की उत्पत्ति उपलक्षण के रूप में कही गई है, ऐसा समझना चाहिए। อิทเมตฺถ นิรุตฺติลกฺขณํ ทฏฺฐพฺพํ – ปจฺจตฺตวจเน ปฐมา วิภตฺติ ภวติ, อุปโยควจเน ทุติยา วิภตฺติ ภวติ, กรณวจเน ตติยา วิภตฺติ ภวติ, สมฺปทานวจเน จตุตฺถี วิภตฺติ ภวติ, นิสฺสกฺกวจเน ปญฺจมี วิภตฺติ ภวติ, สามิวจเน ฉฏฺฐี วิภตฺติ ภวติ, ภุมฺมวจเน สตฺตมี วิภตฺติ ภวติ, อามนฺตนวจเน อฏฺฐมี วิภตฺติ ภวติ. ตตฺรุทฺทานํ – यहाँ यह निरुक्ति-लक्षण समझना चाहिए – कर्ता (पच्चत्त) वचन में प्रथमा विभक्ति होती है, कर्म (उपयोग) वचन में द्वितीया विभक्ति होती है, करण वचन में तृतीया विभक्ति होती है, सम्प्रदान वचन में चतुर्थी विभक्ति होती है, अपादान (निस्सक्क) वचन में पञ्चमी विभक्ति होती है, स्वामी (सम्बन्ध) वचन में षष्ठी विभक्ति होती है, अधिकरण (भुम्म) वचन में सप्तमी विभक्ति होती है, संबोधन (आमन्तन) वचन में अष्टमी विभक्ति होती है। वहाँ यह संग्रह (उद्दान) है – ปจฺจตฺตมุปโยคญฺจ, กรณํ สมฺปทานิยํ; นิสฺสกฺกํ สามิวจนํ, ภุมฺมมาลปนฏฺฐมํ. कर्ता (पच्चत्त), कर्म (उपयोग), करण, सम्प्रदान, अपादान (निस्सक्क), स्वामी (सम्बन्ध) वचन, अधिकरण (भुम्म) और आठवाँ संबोधन (आलपन)। ตตฺร [Pg.83] ปจฺจตฺตวจนํ นาม ติวิธลิงฺคววตฺถานคตานํ อิตฺถิปุมนปุํสกานํ ปจฺจตฺตสภาวนิทฺเทสตฺโถ. อุปโยควจนํ นาม โย ยํ กโรติ, เตน ตทุปยุตฺตปริทีปนตฺโถ. กรณวจนํ นาม ตชฺชาปกตนิพฺพตฺตกปริทีปนตฺโถ. สมฺปทานวจนํ นาม ตปฺปทานปริทีปนตฺโถ. นิสฺสกฺกวจนํ นาม ตนฺนิสฺสฏตทปคมปริทีปนตฺโถ. สามิวจนํ นาม ตทิสฺสรปริทีปนตฺโถ. ภุมฺมวจนํ นาม ตปฺปติฏฺฐาปริทีปนตฺโถ. อามนฺตนวจนํ นาม ตทามนฺตนปริทีปนตฺโถ. เอวํ ญตฺวา ปโยคานิ อสมฺมุยฺหนฺเตน โยเชตพฺพานิ. वहाँ कर्ता (पच्चत्त) वचन का अर्थ तीन प्रकार के लिंगों (स्त्री, पुरुष, नपुंसक) के अपने स्वभाव का निर्देश करना है। कर्म (उपयोग) वचन का अर्थ है – जो जिसे करता है, उसके द्वारा उस उपयुक्त (कर्म) को प्रकाशित करना। करण वचन का अर्थ उसके ज्ञापक और निष्पादक को प्रकाशित करना है। सम्प्रदान वचन का अर्थ उसे प्रदान करने को प्रकाशित करना है। अपादान (निस्सक्क) वचन का अर्थ उससे निकलने या दूर होने को प्रकाशित करना है। स्वामी (सम्बन्ध) वचन का अर्थ उसके स्वामी (ईश्वर) को प्रकाशित करना है। अधिकरण (भुम्म) वचन का अर्थ उसके आधार (प्रतिष्ठा) को प्रकाशित करना है। संबोधन (आमन्तन) वचन का अर्थ उसे बुलाने (आमन्त्रण) को प्रकाशित करना है। इस प्रकार जानकर प्रयोगों को बिना भ्रमित हुए जोड़ना चाहिए। ภูโต, ภาวโก, ภโว, อภโว, ภาโว, อภาโว, สภาโว, สพฺภาโว, สมฺภโว, ปภโว, ปภาโว, อนุภโว, อานุภาโว, ปราภโว, วิภโว, ปาตุภาโว, อาวิภาโว, ติโรภาโว, วินาภาโว, โสตฺถิภาโว, อตฺถิภาโว, นตฺถิภาโวติ โอการนฺตปุลฺลิงฺคํ. भूतो, भावको, भवो, अभवो, भावो, अभावो, सभावो, सब्भावो, सम्भवो, पभवो, पभावो, अनुभवो, आनुभावो, पराभवो, विभवो, पातुभावो, आविभावो, तिरोभावो, विनाभावो, सोत्थिभावो, अत्थिभावो, नत्थिभावो – ये ओ-कारान्त पुल्लिंग हैं। อภิภวิตา, ปริภวิตา, อนุภวิตา, สมนุภวิตา, ภาวิตา, ปจฺจนุภวิตาติ อาการนฺตปุลฺลิงฺคํ. अभिभविता, परिभविता, अनुभविता, समनुभविता, भाविता, पच्चनुभविता – ये आ-कारान्त पुल्लिंग हैं। ภวํ, ปราภวํ, ปริภวํ, อภิภวํ, อนุภวํ, สมนุภวํ, ปจฺจนุภวํ, ปภวํ, อปฺปภวนฺติ นิคฺคหีตนฺตปุลฺลิงฺคํ. भवं, पराभवं, परिभवं, अभिभवं, अनुभवं, समनुभवं, पच्चनुभवं, पभवं, अप्पभवं – ये निग्गहीत-अन्त (अनुस्वारान्त) पुल्लिंग हैं। ธนภูติ, สิริภูติ, โสตฺถิภูติ, สุวตฺถิภูตีติ อิการนฺตปุลฺลิงฺคํ. धनभूति, सिरिभूति, सोत्थिभूति, सुवत्थिभूति – ये इ-कारान्त पुल्लिंग हैं। ภาวี, วิภาวี, สมฺภาวี, ปริภาวีติ อีการนฺตปุลฺลิงฺคํ. भावी, विभावी, सम्भावी, परिभावी – ये ई-कारान्त पुल्लिंग हैं। สยมฺภู, ปภู, อภิภู, วิภู, อธิภู, ปติภู, โคตฺรภู, วตฺรภู, ปราภิภู, รูปาภิภู, สทฺทาภิภู, คนฺธาภิภู, รสาภิภู, โผฏฺฐพฺพาภิภู, ธมฺมาภิภู, สพฺพาภิภูติ อูการนฺตปุลฺลิงฺคํ. सयम्भू, पभू, अभिभू, विभू, अधिभू, पतिभू, गोत्रभू, वत्रभू, पराभिभू, रूपाभिभू, सद्दाभिभू, गन्धाभिभू, रसाभिभू, फोट्ठब्बाभिभू, धम्माभिभू, सब्बाभिभू – ये ऊ-कारान्त पुल्लिंग हैं। อิมาเนตฺถ ฉพฺพิธานิ ปุลฺลิงฺคานิ ภูธาตุมยานิ อุทฺทิฏฺฐานิ. यहाँ ये छह प्रकार के 'भू' धातु से बने पुल्लिंग शब्द निर्दिष्ट किए गए हैं। อุการนฺตํ [Pg.84] ปุลฺลิงฺคํตุ ภูธาตุมยมปฺปสิทฺธํ, อญฺญธาตุมยํ ปนุการนฺตปุลฺลิงฺคํ ปสิทฺธํ ‘‘ภิกฺขุ, เหตุ’’อิติ. เตน สทฺธึ สตฺตวิธานิ ปุลฺลิงฺคานิ โหนฺติ, สพฺพาเนตานิ สภาวโตเยว ปุลฺลิงฺคานีติ ทฏฺฐพฺพานิ. เอตฺถ สตฺโตติ อตฺถวาจโก ภูตสทฺโทเยว นิโยคา ปุลฺลิงฺคนฺติปิ ทฏฺฐพฺโพ. 'भू' धातु से बना उ-कारान्त पुल्लिंग तो अप्रसिद्ध है, किन्तु अन्य धातुओं से बने उ-कारान्त पुल्लिंग प्रसिद्ध हैं जैसे 'भिक्खु' (भिक्षु), 'हेतु'। उनके साथ सात प्रकार के पुल्लिंग होते हैं, इन सबको स्वभाव से ही पुल्लिंग समझना चाहिए। यहाँ 'सत्तो' (प्राणी) अर्थ वाला 'भूत' शब्द भी निश्चित रूप से पुल्लिंग ही समझना चाहिए। เย ปน ‘‘โย ธมฺโม ภูโต, ยา ธมฺมชาติ ภูตา, ยํ ธมฺมชาตํ ภูต’’นฺติ เอวํ ลิงฺคตฺตเย โยชนารหตฺตา อนิยตลิงฺคา อญฺเญปิ ภูตปราภูตสมฺภูตสทฺทาทโย สนฺทิสฺสนฺติ ปาวจนวเร, เตปิ นาโนปสคฺคนิปาตปเทหิ โยชนวเสน สทฺทรจนายํ สุขุมตฺถคฺคหเณ จ วิญฺญูนํ โกสลฺลชนนตฺถํ นิยตปุลฺลิงฺเคสุ ปกฺขิปิตฺวา ทสฺเสสฺสาม. जो फिर "यो धम्मो भूतो" (जो धर्म हुआ), "या धम्मजाति भूता" (जो धर्म-जाति हुई), "यं धम्मजातं भूतं" (जो धर्म-जात हुआ) – इस प्रकार तीनों लिंगों में प्रयोग के योग्य होने के कारण अनियत-लिंगी (अनिश्चित लिंग वाले) अन्य भी 'भूत', 'पराभूत', 'सम्भूत' आदि शब्द श्रेष्ठ बुद्ध-वचन (पावचन) में दिखाई देते हैं, उन्हें भी विभिन्न उपसर्गों और निपातों के साथ जोड़कर शब्द-रचना में और सूक्ष्म अर्थ ग्रहण करने में विद्वानों की कुशलता उत्पन्न करने के लिए, नियत-पुल्लिंगों में सम्मिलित करके दिखाएंगे। เสยฺยถิทํ? ภูโต, ปราภูโต, สมฺภูโต, วิภูโต, ปาตุภูโต, อาวิภูโต, ติโรภูโต, วินาภูโต, ภพฺโพ, ปริภูโต, อภิภูโต, อธิภูโต, อทฺธภูโต, อนุภูโต, สมนุภูโต, ปจฺจนุภูโต, ภาวิโต, สมฺภาวิโต, วิภาวิโต, ปริภาวิโต, อนุปริภูโต, ปริภวิตพฺโพ, ปริโภตพฺโพ, ปริภวนีโย, อภิภวิตพฺโพ, อภิโภตพฺโพ, อภิภวนีโย, อธิภวิตพฺโพ, อธิโภตพฺโพ, อธิภวนีโย, อนุภวิตพฺโพ, อนุโภตพฺโพ, อนุภวนีโย, สมนุภวิตพฺโพ, สมนุโภตพฺโพ, สมนุภวนีโย, ปจฺจนุภวิตพฺโพ, ปจฺจนุโภตพฺโพ, ปจฺจนุภวนีโย, ภาเวตพฺโพ, ภาวนีโย, สมฺภาเวตพฺโพ, สมฺภาวนีโย, วิภาเวตพฺโพ, วิภาวนีโย, ปริภาเวตพฺโพ, ปริภาวนีโย, ภวมาโน, วิภวมาโน, ปริภวมาโน, อภิภวมาโน, อนุภวมาโน, สมนุภวมาโน, ปจฺจนุภวมาโน, อนุโภนฺโต, สมนุโภนฺโต, ปจฺจนุโภนฺโต, สมฺโภนฺโต, อภิสมฺโภนฺโต, ภาเวนฺโต, สมฺภาเวนฺโต, วิภาเวนฺโต[Pg.85], ปริภาเวนฺโต, ปริภวิยมาโน, ปริภุยฺยมาโน, อภิภวิยมาโน, อภิภูยมาโน, อนุภวิยมาโน, อนุภุยฺยมาโน, สมนุภวิยมาโน, สมนุภุยฺยมาโน, ปจฺจนุภวิยมาโน, ปจฺจนุภุยฺยมาโนติ อิมานิ นิยตปุลฺลิงฺเคสุ ปกฺขิตฺตลิงฺคานิ. เอวโมการนฺตาทิวเสน ฉพฺพิธานิ ปุลฺลิงฺคานิ ภูธาตุมยานิ ปกาสิตานิ. อยํ ตาว ปุลฺลิงฺควเสน อุทาหรณุทฺเทโส. जैसे कि – भूतो, पराभूतो, सम्भूतो, विभूतो, पातुभूतो, आविभूतो, तिरोभूतो, विनाभूतो, भब्बो, परिभूतो, अभिभूतो, अधिभूतो, अद्धभूतो, अनुभूतो, समनुभूतो, पच्चनुभूतो, भावितो, सम्भावितो, विभावितो, परिभावितो, अनुपरिभूतो, परिभवितब्बो, परिभोतब्बो, परिभवनीयो, अभिभवितब्बो, अभिभोतब्बो, अभिभवनीयो, अधिभवितब्बो, अधिभोतब्बो, अधिभवनीयो, अनुभवितब्बो, अनुभोतब्बो, अनुभवनीयो, समनुभवितब्बो, समनुभोतब्बो, समनुभवनीयो, पच्चनुभवितब्बो, पच्चनुभोतब्बो, पच्चनुभवनीयो, भावेतब्बो, भावनीयो, सम्भावेतब्बो, सम्भावनीयो, विभावेतब्बो, विभावनीयो, परिभावेतब्बो, परिभावनीयो, भवमानो, विभवमानो, परिभवमानो, अभिभवमानो, अनुभवमानो, समनुभवमानो, पच्चनुभवमानो, अनुभोन्तो, समनुभोन्तो, पच्चनुभोन्तो, सम्भोन्तो, अभिसम्भोन्तो, भावेन्तो, सम्भावेन्तो, विभावेन्तो, परिभावेन्तो, परिभवियमानो, परिभुय्यमानो, अभिभवियमानो, अभिभूयमानो, अनुभवियमानो, अनुभुय्यमानो, समनुभवियमानो, समनुभुय्यमानो, पच्चनुभवियमानो, पच्चनुभुय्यमानो – ये नियत-पुल्लिंगों में सम्मिलित लिंग हैं। इस प्रकार ओ-कारान्त आदि के भेद से 'भू' धातु से बने छह प्रकार के पुल्लिंग प्रकाशित किए गए हैं। यह पुल्लिंग के अनुसार उदाहरणों का निर्देश है। ภาวิกา, ภาวนา, วิภาวนา, สมฺภาวนา, ปริภาวนาติ อาการนฺตอิตฺถิลิงฺคํ. भाविका, भावना, विभावना, सम्भावना, परिभावना – ये आ-कारान्त स्त्रीलिंग हैं। ภูมิ, ภูติ, วิภูติ. อิการนฺตอิตฺถิลิงฺคํ. भूमि, भूति, विभूति – ये इ-कारान्त स्त्रीलिंग हैं। ภูรี, ภูตี, โภตี, วิภาวินี, ปริวิภาวินี, สมฺภาวินี, ปาตุภวนฺตี, ปาตุโภนฺตี, ปริภวนฺตี, ปริโภนฺตี, อภิภวนฺตี, อภิโภนฺตี, อธิภวนฺตี, อธิโภนฺตี, อนุภวนฺตี, อนุโภนฺตี, สมนุภวนฺตี, สมนุโภนฺตี, ปจฺจนุภวนฺตี, ปจฺจนุโภนฺตี, อภิสมฺภวนฺตี, อภิสมฺโภนฺตีติ อีการนฺตอิตฺถิลิงฺคํ. भूरी, भूती, भोती, विभावनी, परिविभावनी, सम्भावनी, पातुभवन्ती, पातुभोन्ती, परिभवन्ती, परिभोन्ती, अभिभवन्ती, अभिभोन्ती, अधिभवन्ती, अधिभोन्ती, अनुभवन्ती, अनुभोन्ती, समनुभवन्ती, समनुभोन्ती, पच्चनुभवन्ती, पच्चनुभोन्ती, अभिसम्भवन्ती, अभिसम्भोन्ती - ये ईकारान्त स्त्रीलिंग हैं। ภู, อภู. อูการนฺตอิตฺถิลิงฺคํ. भू, अभू। ये ऊकारान्त स्त्रीलिंग हैं। อิมาเนตฺถ จตุพฺพิธานิ อิตฺถิลิงฺคานิ ภูธาตุมยานิ อุทฺทิฏฺฐานิ. यहाँ ये चार प्रकार के स्त्रीलिंग शब्द भू-धातु से बने हुए निर्दिष्ट किए गए हैं। อุการนฺติตฺถิลิงฺคํ ภูธาตุมยมปฺปสิทฺธํ, อญฺญธาตุมยํ ปน อุการนฺติตฺถิลิงฺคํ ปสิทฺธํ ‘‘ธาตุ, เธนุ’’อิติ. เตน สทฺธึ ปญฺจวิธานิ อิตฺถิลิงฺคานิ โหนฺติ, โอการนฺตสฺส วา โคสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคภาเว เตน สทฺธึ ฉพฺพิธานิปิ โหนฺติ, สพฺพาเนตานิ สภาวโตเยวิตฺถิลิงฺคานีติ ทฏฺฐพฺพานิ. เอตฺถาปิ อนิยตลิงฺคา ภูตปราภูตสมฺภูตสทฺทาทโย อิตฺถิลิงฺควเสน ยุชฺชนฺเต. भू-धातु से बना उकारान्त स्त्रीलिंग अप्रसिद्ध है, किन्तु अन्य धातुओं से बने उकारान्त स्त्रीलिंग जैसे 'धातु', 'धेनु' प्रसिद्ध हैं। उनके साथ पाँच प्रकार के स्त्रीलिंग होते हैं, अथवा ओकारान्त 'गो' शब्द के स्त्रीलिंग होने पर उसके साथ छह प्रकार के भी होते हैं; इन सबको स्वभाव से ही स्त्रीलिंग समझना चाहिए। यहाँ भी अनियतलिंगी 'भूत', 'पराभूत', 'सम्भूत' आदि शब्द स्त्रीलिंग के रूप में प्रयुक्त होते हैं। กถํ? ภูตา, ปราภูตา, สมฺภูตาติ สพฺพํ วิตฺถารโต คเหตพฺพํ ‘‘อนุโภนฺโต สมนุโภนฺโต’’ติอาทีนิ นว ปทานิ [Pg.86] วชฺเชตฺวา. ตานิ หิ อีการนฺตวเสน โยชิตานิ. อิมานิ นิยตลิงฺเคสุ ปกฺขิตฺตลิงฺคานิ. เอวํ อาการนฺตาทิวเสน จตุพฺพิธานิ อิตฺถิลิงฺคานิ ภูธาตุมยานิ ปกาสิตานิ. อยํ อิตฺถิลิงฺควเสน อุทาหรณุทฺเทโส. कैसे? 'भूता', 'पराभूता', 'सम्भूता' इत्यादि सब विस्तार से ग्रहण करना चाहिए, 'अनुभोन्तो', 'समनुभोन्तो' आदि नौ पदों को छोड़कर। क्योंकि वे ईकारान्त के रूप में योजित हैं। ये नियतलिंगों में प्रक्षिप्त लिंग हैं। इस प्रकार आकारान्त आदि के भेद से भू-धातु से बने चार प्रकार के स्त्रीलिंग प्रकाशित किए गए हैं। यह स्त्रीलिंग के अनुसार उदाहरणों का निर्देश है। ภูตํ, มหาภูตํ, ภวิตฺตํ, ภูนํ, ภวนํ, ปราภวนํ, สมฺภวนํ, วิภวนํ, ปาตุภวนํ, อาวิภวนํ, ติโรภวนํ, วินาภวนํ, โสตฺถิภวนํ, ปริภวนํ, อภิภวนํ, อธิภวนํ, อนุภวนํ, สมนุภวนํ, ปจฺจนุภวนนฺติ นิคฺคหีตนฺตนปุํสกลิงฺคํ. भूतं, महाभूतं, भवत्तं, भूनं, भवनं, पराभवनं, सम्भवनं, विभवं, पातुभवनं, आविभवनं, तिरोभवनं, विनाभवनं, सोत्थिभवनं, परिभवनं, अभिभवनं, अधिभवनं, अनुभवनं, समनुभवनं, पच्चनुभवनं - ये निग्गहीतान्त (अनुस्वारान्त) नपुंसक लिंग हैं। อตฺถวิภาวิ, ธมฺมวิภาวิ. อิการนฺตนปุํสกลิงฺคํ. अत्थविभावि, धम्मविभावि। ये इकारान्त नपुंसक लिंग हैं। โคตฺรภุ, จิตฺตสหภุ, นจิตฺตสหภุ. อุการนฺตนปุํสกลิงฺคํ. गोत्रभु, चित्तसहभु, नचित्तसहभु। ये उकारान्त नपुंसक लिंग हैं। สพฺพาเนตานิ สภาวโตเยว นปุํสกลิงฺคานีติ ทฏฺฐพฺพานิ. เอตฺถ สตฺตภูตรูปวาจโก ภูตสทฺโทเยว นิโยคา นปุํสกลิงฺโคติปิ ทฏฺฐพฺพํ. เอตฺถาปิ อนิยตลิงฺคา ภูต ปราภูต สมฺภูตสทฺทาทโย นปุํสกลิงฺควเสน ยุชฺชนฺเต. इन सबको स्वभाव से ही नपुंसक लिंग समझना चाहिए। यहाँ सत्त्व और भूत-रूप का वाचक 'भूत' शब्द ही निश्चित रूप से नपुंसक लिंग है, ऐसा भी समझना चाहिए। यहाँ भी अनियतलिंगी 'भूत', 'पराभूत', 'सम्भूत' आदि शब्द नपुंसक लिंग के रूप में प्रयुक्त होते हैं। กถํ? ภูตํ, ปราภูตํ, สมฺภูตํ, วิภูตํ. เปยฺยาโล. สมนุภวมานํ, ปจฺจนุภวมานํ, อนุโภนฺตํ, อนุภวนฺตํ, สมนุโภนฺตํ, สมนุภวนฺตํ, ปจฺจนุโภนฺตํ, ปจฺจนุภวนฺตํ, สมฺโภนฺตํ, สมฺภวนฺตํ, อภิสมฺโภนฺตํ, อภิสมฺภวนฺตํ, ปาตุโภนฺตํ, ปาตุภวนฺตํ, ปริโภนฺตํ, ปริภวนฺตํ, อภิโภนฺตํ, อภิภวนฺตํ, อธิโภนฺตํ, อธิภวนฺตํ, ภาเวนฺตํ, สมฺภาเวนฺตํ, วิภาเวนฺตํ, ปริภาเวนฺตํ, ปริภาวิยมานํ, ปริภุยฺยมานํ, เปยฺยาโล. ปจฺจนุภวิยมานํ, ปจฺจนุภุยฺยมานนฺติ อิมานิ นิยตนปุํสกลิงฺเคสุ ปกฺขิตฺตลิงฺคานิ. เอวํ นิคฺคหีตนฺตาทิวเสน ติวิธานิ นปุํสกลิงฺคานิ ภูธาตุมยานิ ปกาสิตานิ[Pg.87]. อยํ นปุํสกลิงฺควเสน อุทาหรณุทฺเทโส, เอวํ ปุลฺลิงฺคาทิวเสน ลิงฺคตฺตยํ ภูธาตุมยมุทฺทิฏฺฐํ. कैसे? भूतं, पराभूतं, सम्भूतं, विभूतं। पेयालो (इत्यादि)। समनुभवमानं, पच्चनुभवमानं, अनुभोन्तं, अनुभवन्तं, समनुभोन्तं, समनुभवन्तं, पच्चनुभोन्तं, पच्चनुभवन्तं, सम्भोन्तं, सम्भवन्तं, अभिसम्भोन्तं, अभिसम्भवन्तं, पातुभोन्तं, पातुभवन्तं, परिभोन्तं, परिभवन्तं, अभिभोन्तं, अभिभवन्तं, अधिभोन्तं, अधिभवन्तं, भावेन्तं, सम्भावेन्तं, विभावेन्तं, परिभावेन्तं, परिभावियमानं, परिभुय्यमानं, पेयालो। पच्चनुभावियमानं, पच्चनुभुय्यमानं - ये नियत नपुंसक लिंगों में प्रक्षिप्त लिंग हैं। इस प्रकार निग्गहीतान्त आदि के भेद से भू-धातु से बने तीन प्रकार के नपुंसक लिंग प्रकाशित किए गए हैं। यह नपुंसक लिंग के अनुसार उदाहरणों का निर्देश है, इस प्रकार पुल्लिंग आदि के भेद से भू-धातु से बने तीनों लिंग निर्दिष्ट किए गए हैं। เอตฺถ เม อปฺปสิทฺธาติ, เย เย สทฺทา ปกาสิตา; เต เต ปาฬิปฺปเทเสสุ, มคฺคิตพฺพา วิภาวินา. यहाँ मेरे द्वारा जो-जो शब्द प्रकाशित किए गए हैं; विद्वानों को उन-उन शब्दों को पालि प्रदेशों (ग्रन्थों) में खोजना चाहिए। โอ, อา, พินฺทุ, อิ, อี, อุ, อู-อนฺติเม สตฺตธา ฐิตา; เญ ยฺยา ปุลฺลิงฺคเภทาติ, นิรุตฺตญฺญูหิ ภาสิตา. ओ, आ, बिन्दु (अनुस्वार), इ, ई, उ, ऊ - इन सात अन्तों में स्थित; पुल्लिंग के भेदों को वैयाकरणों द्वारा कहा गया जानना चाहिए। อา อิวณฺโณ จุวณฺโณ จ, ปญฺจ อนฺตา สรูปโต; อิตฺถิเภทาติ วิญฺเญยฺยา, โอการนฺเตน ฉาปิ วา. आ, इ-वर्ण (इ, ई) और उ-वर्ण (उ, ऊ) - ये पाँच अन्त्य स्वरूप से; स्त्रीलिंग के भेद जानने चाहिए, अथवा ओकारान्त के साथ छह भी होते हैं। พินฺทุ, อิ, อุ-อิเม อนฺตา, ตโย เญยฺยา วิภาวินา; นปุํสกปฺปเภทาติ, นิรุตฺตญฺญูหิ ภาสิตา. बिन्दु (अनुस्वार), इ, उ - इन तीन अन्तों को विद्वानों द्वारा; नपुंसक लिंग के भेद जानना चाहिए, ऐसा वैयाकरणों ने कहा है। อนฺตา สตฺเตว ปุลฺลิงฺเค, อิตฺถิยํ ปญฺจ วา ฉ วา; นปุํสเก ตโย เอวํ, ทส ปญฺจหิ ฉพฺพิธา. पुल्लिंग में सात ही अन्त होते हैं, स्त्रीलिंग में पाँच या छह; नपुंसक लिंग में तीन, इस प्रकार (कुल) पन्द्रह या सोलह प्रकार के होते हैं। ยสฺมา ปเนตฺถ ‘‘ภูโต’’ติอาทโย สทฺทา นิพฺพจนาภิเธยฺยกถนตฺถสาธกวจนปริยายวจนตฺถุทฺธารวเสน วุจฺจมานา ปากฏา โหนฺติ สุวิญฺเญยฺยา จ, ตสฺมา อิเมสํ นิพฺพจนาทีนิ ยถาสมฺภวํ วกฺขาม วิญฺญูนํ ตุฏฺฐิชนนตฺถญฺเจว โสตารานมตฺเถสุ ปฏุตรพุทฺธิปฏิลาภาย จ. ตตฺร ภูโตติ ขนฺธปาตุภาเวน ภวตีติ ภูโต, อิทํ ตาว นิพฺพจนํ. ‘‘ภูโต’’ติ สพฺพสงฺคาหกวเสน สตฺโต วุจฺจติ, อิทมภิเธยฺยกถนํ. ‘‘โย จ กาลฆโส ภูโต. สพฺเพว นิกฺขิปิสฺสนฺติ, ภูตา โลเก สมุสฺสย’’นฺติ จ อิทเมตสฺส อตฺถสฺส สาธกวจนํ. อถ วา ภูโตติ เอวํนามโก อมนุสฺสชาติโย สตฺตวิเสโส, อิทมภิเธยฺยกถนํ. ‘‘ภูตวิชฺชา, ภูตเวชฺโช, ภูตวิคฺคหิโต’’ติ จ อิทเมตสฺส อตฺถสฺส สาธกวจนํ. ยญฺจ ปน ‘‘สตฺโต มจฺโจ ปชา’’ติอาทิกํ ตตฺถ ตตฺถ อาคตํ วจนํ, อิทํ สตฺโตติ [Pg.88] อตฺถวาจกสฺส ภูตสทฺทสฺส ปริยายวจนํ. ยญฺจ นิทฺเทสปาฬิยํ ‘‘มจฺโจติ สตฺโต นโร มานโว โปโส ปุคฺคโล ชีโว ชคุ ชนฺตุ หินฺทคุ มนุโช’’ติ อาคตํ, อิทมฺปิ ปริยายวจนเมว. ตานิ สพฺพานิ ปิณฺเฑตฺวา วุจฺจนฺเต – क्योंकि यहाँ 'भूतो' आदि शब्द व्युत्पत्ति, अभिधेय कथन, अर्थ-साधक वचन, पर्याय वचन और अर्थ-उद्धार के द्वारा कहे जाने पर स्पष्ट और सुबोध होते हैं, इसलिए हम विद्वानों की प्रसन्नता के लिए और श्रोताओं के अर्थों में अधिक प्रखर बुद्धि प्राप्त करने के लिए इनकी व्युत्पत्ति आदि यथासम्भव कहेंगे। वहाँ 'भूतो' - जो स्कन्धों के प्रादुर्भाव से होता है वह 'भूतो' है, यह इसकी व्युत्पत्ति है। 'भूतो' - सब का संग्रह करने के कारण 'सत्त्व' को कहा जाता है, यह अभिधेय कथन है। 'यो च कालघसो भूतो... भूता लोके समुस्सयं' - यह इस अर्थ का साधक वचन है। अथवा 'भूतो' इस नाम का अमनुष्य जाति का विशेष प्राणी है, यह अभिधेय कथन है। 'भूतविज्जा, भूतवेज्जो, भूतविग्गहितो' - यह इस अर्थ का साधक वचन है। और जो 'सत्तो मच्चो पजा' आदि वहाँ-वहाँ आए हुए वचन हैं, वे 'सत्तो' अर्थ के वाचक 'भूत' शब्द के पर्याय वचन हैं। और जो निर्देशपालि में 'मच्चोति सत्तो नरो मानवो पोसो पुग्गलो जीवो जगु जन्तु हिन्दगु मनुजो' आया है, वह भी पर्याय वचन ही है। उन सबको संक्षेप में कहा जाता है - สตฺโต มจฺโจ ชโน ภูโต, ปาโณ หินฺทคุ ปุคฺคโล; ชนฺตุ ชีโว ชคุ ยกฺโข, ปาณี เทหี ตถาคโต. सत्त्व, मर्त्य, जन, भूत, प्राण, हिन्दगु, पुद्गल; जन्तु, जीव, जगु, यक्ष, प्राणी, देही, तथागत (ये सब प्राणी के पर्यायवाची हैं)। สตฺตโว มาติโย โลโก, มนุโช มานโว นโร; โปโส สรีรีติ ปุเม, ภูตมิติ นปุํสเก. 'सत्त', 'मातिय', 'लोक', 'मनुज', 'मानव', 'नर', 'पोस' और 'शरीरी' - ये शब्द पुल्लिंग में प्रयुक्त होते हैं; 'भूत' शब्द नपुंसक लिंग में होता है। ปชาติ อิตฺถิยํ วุตฺโต, ลิงฺคโต, น จ อตฺถโต; เอวํ ติลิงฺคิกา โหนฺติ, สทฺทา สตฺตาภิธานกา. 'पजा' (प्रजा) शब्द स्त्रीलिंग में कहा गया है, यह लिंग के अनुसार है, अर्थ के अनुसार नहीं। इस प्रकार, 'सत्त' (प्राणी) के वाचक शब्द तीनों लिंगों में होते हैं। โย โส ชงฺฆาย อุลติ, โส สตฺโต ชงฺฆโล อิธ; ปาณเทหาภิธาเนหิ, สตฺตนามํ ปปญฺจิตํ. जो जंघा (पैर) से चलता है, वह यहाँ 'जङ्घल' (जंघाल) कहलाता है। प्राण और देह के अभिधानों (नामों) से 'सत्त' नाम का विस्तार किया गया है। อิมสฺมึ ปกรเณ ‘‘ปริยายวจน’’นฺติ จ ‘‘อภิธาน’’นฺติ จ ‘‘สงฺขา’’ติอาทีนิ จ เอกตฺถานิ อธิปฺเปตานิ, อตฺถุทฺธารวเสน ปน ภูตสทฺโท ปญฺจกฺขนฺธามนุสฺสธาตุสสฺสตวิชฺชมานขีณาสวสตฺตรุกฺขาทีสุ ทิสฺสติ, ตปฺปโยโค อุปริ อตฺถตฺติกวิภาเค อาวิภวิสฺสติ. ภาวโกติ ภาเวตีติ ภาวโก, อิทํ นิพฺพจนํ. โย ภาวนํ กโรติ, โส ภาวโก. อิทมภิเธยฺยกถนํ. ‘‘ภาวโก นิปโก ธีโร’’ติ อิทเมตสฺส อตฺถสฺส สาธกวจนํ. ‘‘ภาวโก ภาวนาปสุโต ภาวนาปยุตฺโต ภาวนาสมฺปนฺโน’’ติ อิทํ ปริยายวจนํ. อิมานิ ‘‘ภูโต ภาวโก’’ติ ทฺเว ปทานิ สุทฺธกตฺตุเหตุกตฺตุวเสน วุตฺตานีติ. อิโต ปรํ นยานุสาเรน สุวิญฺเญยฺยตฺตา ‘‘อิทํ นิพฺพจน’’นฺติ จ อาทีนิ [Pg.89] อวตฺวา กตฺถจิ อตฺถสาธกวจนํ ปริยายวจนํ อตฺถุทฺธารญฺจ ยถารหํ ทสฺเสสฺสาม. เตสุ หิ สพฺพตฺถ ทสฺสิเตสุ คนฺถวิตฺถาโร สิยา, ตสฺมา เยสมตฺโถ อุตฺตาโน, เตสมฺปิ ปทานมภิเธยฺยํ น กเถสฺสาม, นิพฺพจนมตฺตเมว เนสํ กเถสฺสาม. เยสํ ปน คมฺภีโร อตฺโถ, เตสมภิเธยฺยํ กเถสฺสาม. इस प्रकरण में 'पर्यायवचन', 'अभिधान' और 'संखा' (संज्ञा) आदि एक ही अर्थ में अभिप्रेत हैं। अर्थ-उद्धार के वश से 'भूत' शब्द पञ्चस्कन्ध, मनुष्य, धातु, शाश्वत, विद्यमान, क्षीणास्त्रव, सत्त्व (प्राणी), वृक्ष आदि के अर्थ में देखा जाता है, इसका प्रयोग आगे 'अत्थत्तिक' (अर्थ-त्रिक) विभाग में स्पष्ट होगा। 'भावक' वह है जो भावना करता है (भावेति), यह इसका निर्वचन है। जो भावना करता है, वह 'भावक' है। यह अभिधेय (वाच्य) का कथन है। "भावको निपको धीरो" यह इस अर्थ का साधक वचन है। "भावको भावनापसुतो भावनापयुत्तो भावनासम्पन्नो" ये इसके पर्यायवचन हैं। ये 'भूत' और 'भावक' दो पद शुद्ध कर्ता और हेतु-कर्ता के रूप में कहे गए हैं। इसके बाद, पद्धति के अनुसार सुविज्ञ होने के कारण "यह निर्वचन है" आदि न कहकर, कहीं-कहीं अर्थ-साधक वचन, पर्यायवचन और अर्थ-उद्धार को यथायोग्य दिखाएंगे। यदि सभी जगह ये दिखाए जाएं तो ग्रन्थ का विस्तार हो जाएगा, इसलिए जिनका अर्थ स्पष्ट है, उन पदों का अभिधेय नहीं कहेंगे, केवल उनका निर्वचन ही कहेंगे। जिनका अर्थ गम्भीर है, उनका अभिधेय कहेंगे। ภวนํ ภโว, ภโว วุจฺจติ วุทฺธิ. ภูสทฺทสฺส อตฺถาติสยโยคโต วฑฺฒเนปิ ทิสฺสมานตฺตา ภวนํ วฑฺฒนนฺติ กตฺวา. ‘‘ภโว จ รญฺโญ อภโว จ รญฺโญ’’ติ อิทํ วุทฺธิอตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. อถ วา ภโวติ วุจฺจติ สสฺสตํ. ‘‘สสฺสโต อตฺตา จ โลโก จา’’ติ หิ สสฺสตวเสน ปวตฺตา ทิฏฺฐิ สสฺสตทิฏฺฐิ, ตสฺมา ภวทิฏฺฐี’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. ตถา ภโวติ ภวทิฏฺฐิ, ภวติ สสฺสตํ ติฏฺฐตีติ ปวตฺตนโต สสฺสตทิฏฺฐิ ภวทิฏฺฐิ นาม. ภวทิฏฺฐิ หิ อุตฺตรปทโลเปน ภโวติ วุจฺจติ. ‘‘ภเวน ภวสฺส วิปฺปโมกฺขมาหํสู’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. เอตฺถายํ ปาฬิวจนตฺโถ – เอกจฺเจ สมณา วา พฺราหฺมณา วา ภวทิฏฺฐิยา วา กามภวาทินา วา สพฺพภวโต วิมุตฺตึ สํสารวิสุทฺธึ กถยึสูติ. อถ วา ภวนฺติ วฑฺฒนฺติ สตฺตา เอเตนาติ ภโวติ อตฺเถน สมฺปตฺติปุญฺญานิ ภโวติ จ วุจฺจนฺติ. ‘‘อิติภวาภวตญฺจ วีติวตฺโต’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. เอตฺถ ปนายํ ปาฬิวจนตฺโถ – ภโวติ สมฺปตฺติ, อภโวติ วิปตฺติ. ตถา ภโวติ วุทฺธิ, อภโวติ หานิ. ภโวติ สสฺสตํ, อภโวติ อุจฺเฉโท. ภโวติ ปุญฺญํ, อภโวติ ปาปํ, ตํ สพฺพํ วีติวตฺโตติ. 'भवन' ही 'भव' है, 'भव' वृद्धि को कहा जाता है। 'भू' धातु का अर्थ अतिशय योग से बढ़ने में भी देखे जाने के कारण 'भवन' का अर्थ 'वर्धन' (बढ़ना) है। "भवो च रञ्ञो अभवो च रञ्ञो" (राजा की वृद्धि और राजा की अ-वृद्धि) यह वृद्धि अर्थ का साधक वचन है। अथवा 'भव' शाश्वत को कहा जाता है। "आत्मा और लोक शाश्वत हैं" - इस प्रकार शाश्वत के रूप में प्रवृत्त दृष्टि 'शाश्वतदृष्टि' है, इसलिए 'भवदृष्टि' इस अर्थ का साधक वचन है। वैसे ही 'भव' का अर्थ 'भवदृष्टि' है; "होता है, शाश्वत रहता है" इस प्रकार प्रवृत्त होने से शाश्वतदृष्टि 'भवदृष्टि' कहलाती है। उत्तरपद का लोप होने से 'भवदृष्टि' को 'भव' कहा जाता है। "भवेन भवस्स विप्पमोक्खमंहासु" यह इसका साधक वचन है। यहाँ इस पालि वचन का अर्थ है - कुछ श्रमण या ब्राह्मण भवदृष्टि से या कामभव आदि से सभी भवों से विमुक्ति (संसार-विशुद्धि) कहते हैं। अथवा, जिससे प्राणी बढ़ते हैं, उस अर्थ में सम्पत्ति और पुण्य को 'भव' कहा जाता है। "इतिभवाभवतञ्च वीतिवत्तो" यह इसका साधक वचन है। यहाँ इस पालि वचन का अर्थ है - 'भव' यानी सम्पत्ति, 'अभव' यानी विपत्ति। वैसे ही 'भव' यानी वृद्धि, 'अभव' यानी हानि। 'भव' यानी शाश्वत, 'अभव' यानी उच्छेद। 'भव' यानी पुण्य, 'अभव' यानी पाप; वह उन सबको पार कर गया है। สโหกาสา [Pg.90] ขนฺธาปิ ภโว. ‘‘กามภโว รูปภโว’’ อิจฺเจวมาทิ เอตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. เอตฺถ ปน ขนฺธา ‘‘โย ปญฺญายติ, โส สรูปํ ลภตี’’ติ กตฺวา ‘‘ภวติ อวิชฺชาตณฺหาทิสมุทยา นิรนฺตรํ สมุเทตี’’ติ อตฺเถน วา ‘‘ภวา’’ติ วุจฺจนฺติ. โอกาโส ปน ‘‘ภวนฺติ ชายนฺติ เอตฺถ สตฺตา นามรูปธมฺมา จา’’ติ อตฺเถน ‘‘ภโว’’ติ. อปิจ กมฺมภโวปิ ภโว, อุปปตฺติภโวปิ ภโว. ‘‘อุปาทานปจฺจยา ภโว ทุวิเธน อตฺถิ กมฺมภโว, อตฺถิ อุปปตฺติภโว’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. ตตฺถ กมฺมเมว ภโว กมฺมภโว. ตถา อุปปตฺติ เอว ภโว อุปปตฺติภโว. เอตฺถูปปตฺติ ภวตีติ ภโว, กมฺมํ ปน ยถา สุขการณตฺตา ‘‘สุโข พุทฺธานมุปฺปาโท’’ติ วุตฺโต. เอวํ ภวการณตฺตา ผลโวหาเรน ภโวติ ทฏฺฐพฺพํ. อถ วา ภาวนลกฺขณตฺตา ภาเวตีติ ภโว. กึ ภาเวติ? อุปปตฺตึ. อิติ อุปปตฺตึ ภาเวตีติ ภโวติ วุจฺจติ. ภาเวตีติมสฺส จ นิพฺพตฺเตตีติ เหตุกตฺตุวเสนตฺโถ. อถ วา ‘‘ภวปจฺจยา ชาตี’’ติ วจนโต ภวติ เอเตนาติ ภโวติ กมฺมภโว วุจฺจติ. अवकाश (स्थान) के साथ स्कन्ध भी 'भव' हैं। "कामभव, रूपभव" इत्यादि इसका साधक वचन है। यहाँ स्कन्धों को इस अर्थ में 'भव' कहा जाता है कि "जो जाना जाता है, वह स्वरूप प्राप्त करता है" अथवा "अविद्या, तृष्णा आदि के उदय से निरन्तर उत्पन्न (भवति) होता है"। अवकाश (स्थान) को इस अर्थ में 'भव' कहते हैं कि "यहाँ प्राणी और नाम-रूप धर्म उत्पन्न होते हैं"। इसके अतिरिक्त, 'कर्मभव' भी भव है और 'उपपत्तिभव' (पुनर्जन्म) भी भव है। "उपादान के प्रत्यय से भव दो प्रकार का है - कर्मभव और उपपत्तिभव" यह इसका साधक वचन है। वहाँ कर्म ही भव है - 'कर्मभव'। वैसे ही उपपत्ति ही भव है - 'उपपत्तिभव'। यहाँ उपपत्ति होती है, इसलिए 'भव' है; किन्तु कर्म, जैसे सुख का कारण होने से "बुद्धों का उत्पन्न होना सुख है" कहा गया है, वैसे ही भव का कारण होने से फल के उपचार (फल-व्यवहार) से 'भव' समझना चाहिए। अथवा, भावन लक्षण वाला होने से जो भावित करता है (भावेति), वह 'भव' है। क्या भावित करता है? उपपत्ति (पुनर्जन्म) को। इस प्रकार उपपत्ति को भावित करने के कारण 'भव' कहा जाता है। 'भावेति' का अर्थ हेतु-कर्ता के रूप में 'निब्वत्तेति' (उत्पन्न करना) है। अथवा, "भव के प्रत्यय से जाति होती है" इस वचन से, जिसके द्वारा प्राणी होता है, वह 'कर्मभव' 'भव' कहलाता है। ‘‘ขนฺธานญฺจ ปฏิปาฏิ, ธาตุอายตนาน จ; อพฺโพจฺฉินฺนํ วตฺตมานา, สํสาโรติ ปวุจฺจตี’’ติ "स्कन्धों, धातुओं और आयतनों की जो अविच्छिन्न रूप से वर्तमान परम्परा है, उसे 'संसार' कहा जाता है।" วุตฺตลกฺขโณ สํสาโรปิ ภโว. ‘‘ภเว ทุกฺขํ ภวทุกฺขํ, ภเว สํสรนฺโต’’ติ อิมาเนตสฺสตฺถสฺส สาธกานิ วจนานิ. ตตฺร เกนฏฺเฐน สํสาโร ภโวติ กถียติ? ภวติ เอตฺถ สตฺตสมฺมุติ ขนฺธาทิปฏิปาฏิสงฺขาเต ธมฺมปุญฺชสฺมินฺติ อตฺเถน[Pg.91]. อิทํ ภวสทฺทสฺส ภาวกตฺตุกรณาธิกรณสาธนวเสนตฺถกถนํ. उक्त लक्षणों वाला संसार भी 'भव' है। "भव में दुःख भव-दुःख है, भव में संसरण करता हुआ" - ये इसके साधक वचन हैं। वहाँ किस अर्थ में संसार को 'भव' कहा जाता है? स्कन्ध आदि की परम्परा संज्ञक धर्म-पुञ्ज में 'सत्त्व' की सम्मति (प्रज्ञप्ति) होती है, इस अर्थ में। यह 'भव' शब्द का भाव, कर्ता, करण और अधिकरण साधनों के वश से अर्थ-कथन है। เอตฺถ ภวสทฺทสฺส อตฺถุทฺธารํ วทาม – यहाँ 'भव' शब्द का अर्थ-उद्धार (अर्थों का संग्रह) कहते हैं - วุทฺธิสมฺปตฺติปุญฺญานิ, ขนฺธา โสกาสสญฺญิตา; สํสาโร สสฺสตญฺเจตํ, ภวสทฺเทน สทฺทิตํ. वृद्धि, सम्पत्ति, पुण्य, अवकाश (स्थान) सहित स्कन्ध, संसार और शाश्वत - ये 'भव' शब्द से कहे गए हैं। ภวตณฺหา ภวทิฏฺฐิ, อุปปตฺติภโว ตถา; กมฺมภโว จ สพฺพนฺตํ, ภวสทฺเทน สทฺทิตํ. भव-तृष्णा, भव-दृष्टि, वैसे ही उपपत्ति-भव और कर्म-भव - ये सब 'भव' शब्द से कहे गए हैं। ภวตณฺหาภวทิฏฺฐิ-ทฺวยํ กตฺถจิ ปาฬิยํ; อุตฺตรปทโลเปน, ภวสทฺเทน สทฺทิตํ. पालि में कहीं-कहीं उत्तरपद का लोप होने से 'भव-तृष्णा' और 'भव-दृष्टि' इन दोनों को 'भव' शब्द से कहा गया है। อภโวติ น ภโว อภโว. अभव - जो भव नहीं है वह अभव है। วิปตฺติ หานิ อุจฺเฉโท, ปาปญฺเจว จตุพฺพิธา; อิเม อภวสทฺเทน, อตฺถา วุจฺจนฺติ สาสเน. विपत्ति, हानि, उच्छेद और पाप - ये चार प्रकार के अर्थ शासन (बुद्ध के उपदेश) में 'अभव' शब्द से कहे जाते हैं। ภาโวติ อชฺฌาสโย, โย ‘‘อธิปฺปาโย’’ติปิ วุจฺจติ. ‘‘ถีนํภาโว ทุราชาโน. นามจฺโจ ราชภริยาสุ, ภาวํ กุพฺเพถ ปณฺฑิโต. หทยงฺคตภาวํ ปกาเสตี’’ติ เอวมาทิ เอตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. อปิจ วตฺถุธมฺโมปิ ภาโว. ‘‘ภาวสงฺเกตสิทฺธีน’’นฺติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ, จิตฺตมฺปิ ภาโว. ‘‘อจฺจาหิตํ กมฺมํ กโรสิ ลุทฺทํ, ภาเว จ เต กุสลํ นตฺถิ กิญฺจี’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. กฺริยาปิภาโว. ‘‘ภาวลกฺขณํ ภาวสตฺตมี’’ติ จ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. อปิจ ภาโวติ สตฺตเววจนนฺติ ภณนฺติ, ธาตุ วา เอตํ อธิวจนํ. ตตฺถ อชฺฌาสโย จ วตฺถุธมฺโม จ จิตฺตญฺจ สตฺโต จาติ อิเม ภวตีติ ภาโว. ตถา ปน ภาเวตีติ ภาโว, กฺริยา [Pg.92] ตุ ภวนนฺติ ภาโว. สา จ ภวนคมนปจนาทิวเสนาเนกวิธา. อปิจ ภาวรูปมฺปิ ภาโว, ยํ อิตฺถิภาโว ปุมฺภาโว อิตฺถินฺทฺริยนฺติ จ วุจฺจติ. ตตฺรายํ วจนตฺโถ – ‘‘อิตฺถี’’ติ วา ‘‘ปุริโส’’ติ วา ภวติ เอเตน จิตฺตํ อภิธานญฺจาติ ภาโว. 'भाव' का अर्थ है अध्याशय, जिसे 'अधिप्राय' भी कहा जाता है। "स्त्रियों का स्वभाव (भाव) जानना कठिन है। बुद्धिमान मंत्री को राजा की पत्नियों के प्रति (अनुचित) भाव नहीं रखना चाहिए। वह हृदयगत भाव को प्रकट करता है" - इत्यादि वचन इस अर्थ के साधक हैं। इसके अतिरिक्त, वस्तुधर्म भी 'भाव' है। "भाव-संकेत की सिद्धि" - यह वचन इस अर्थ का साधक है। चित्त भी 'भाव' है। "हे लुब्धक! तुम अत्यंत क्रूर कर्म करते हो और तुम्हारे भाव (चित्त/स्वभाव) में कुछ भी कुशल नहीं है" - यह वचन इस अर्थ का साधक है। क्रिया भी 'भाव' है। "भाव-लक्षण और भाव-सप्तमी" - यह वचन भी इस अर्थ का साधक है। इसके अतिरिक्त, 'भाव' को 'सत्त्व' (प्राणी) का पर्यायवाची भी कहते हैं, अथवा यह 'धातु' का ही एक नाम है। वहाँ अध्याशय, वस्तुधर्म, चित्त और सत्त्व - ये 'होते हैं' (भवन्ति), इसलिए 'भाव' हैं। उसी प्रकार, जो 'भावित करता है' (भावयति), वह 'भाव' है; और क्रिया 'होना' (भवन) के अर्थ में 'भाव' है। वह (क्रिया) होने, जाने, पकने आदि के भेद से अनेक प्रकार की है। इसके अतिरिक्त, 'भावरूप' भी 'भाव' है, जिसे स्त्रीभाव, पुंभाव और स्त्री-इन्द्रिय कहा जाता है। यहाँ इसका व्युत्पत्तिपरक अर्थ यह है - "स्त्री" या "पुरुष" के रूप में इसके द्वारा चित्त और अभिधान (नाम) 'होते हैं', इसलिए यह 'भाव' है। นตฺตโนมติยา เอตํ, นิพฺพจนมุทาหฏํ; ปุพฺพาจริยสีหานํ, มตํ นิสฺสาย มาหฏํ. यह मेरी अपनी मति (विचार) से नहीं कहा गया है, बल्कि पूर्वाचार्य रूपी सिंहों के मत के आश्रय से यहाँ लाया गया है। วุตฺตญฺเหตํ โปราเณหิ ‘‘อิตฺถิยา ภาโว อิตฺถิภาโว, อิตฺถีติ วา ภวติ เอเตน จิตฺตํ อภิธานญฺจาติ อิตฺถิภาโว’’ติ, ตสฺมา ปุมฺภาโวติ เอตฺถาปิ ปุมสฺส ภาโว ปุมฺภาโว, ปุมาติ วา ภวติ เอเตน จิตฺตํ อภิธานญฺจาติ ปุมฺภาโวติ นิพฺพจนํ สมธิคนฺตพฺพํ. อิทํ ภาวสทฺทสฺส กตฺตุภาวกรณสาธนวเสนตฺถกถนํ. प्राचीन आचार्यों द्वारा यह कहा गया है - "स्त्री का भाव 'स्त्रीभाव' है, अथवा जिसके द्वारा चित्त और अभिधान (नाम) 'स्त्री' के रूप में होते हैं, वह 'स्त्रीभाव' है।" इसलिए 'पुंभाव' (पुरुषत्व) के विषय में भी - पुरुष का भाव 'पुंभाव' है, अथवा जिसके द्वारा चित्त और अभिधान 'पुरुष' के रूप में होते हैं, वह 'पुंभाव' है - ऐसी निरुक्ति समझनी चाहिए। यह 'भाव' शब्द की कर्ता, भाव और करण साधनों के अनुसार अर्थ-व्याख्या है। อภาโวติ น ภาโวติ อภาโว, โก โส? สุญฺญตา นตฺถิตา. สภาโวติ อตฺตโน ภาโว สภาโว, อตฺตโน ปกติ อิจฺเจวตฺโถ. อถ วา สภาโวติ ธมฺมานํ สติ อตฺถสมฺภเว โย โกจิ สรูปํ ลภติ, ตสฺส ภาโว ลกฺขณมิติ สญฺญิโต นมนรุปฺปนกกฺขฬผุสนาทิอากาโร อิจฺเจวตฺโถ. ‘‘สามญฺญํ วา สภาโว วา, ธมฺมานํ ลกฺขณํ มต’’นฺติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. อปิจ สภาโวติ สลกฺขโณ ปรมตฺถธมฺโม. เกนฏฺเฐน? สห ภาเวนาติ อตฺเถน. สพฺภาโวติ สตํ ภาโว สพฺภาโว, สปฺปุริสธมฺโม อิจฺเจวตฺโถ. อถ วา อตฺตโน ภาโว สพฺภาโว. ‘‘คาหาปยนฺติ สพฺภาว’’นฺติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. สํวิชฺชมาโน วา ภาโว สพฺภาโว. ‘‘เอวํ คหณสพฺภาโว’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ [Pg.93] วจนํ. อิทํ สภาว สพฺภาวสทฺทานํ ภาวสาธนวเสนตฺถกถนํ. 'अभाव' का अर्थ है 'भाव' का न होना। वह क्या है? शून्यता और नास्तिकता (अविद्यमानता)। 'स्वभाव' का अर्थ है अपना भाव (स्वयं का होना), अर्थात् अपनी प्रकृति। अथवा, 'स्वभाव' का अर्थ है - धर्मों के अस्तित्व की संभावना होने पर जो कोई भी स्वरूप प्राप्त होता है, उसका भाव 'लक्षण' कहलाता है, जैसे नमन (झुकना), रूपण (विकार), कर्कशता (कठोरता), स्पर्शन आदि आकार। "धर्मों का लक्षण सामान्य या स्वभाव (विशेष) माना गया है" - यह वचन इस अर्थ का साधक है। इसके अतिरिक्त, 'स्वभाव' स्वलक्षणयुक्त परमार्थ धर्म है। किस अर्थ में? 'भाव के साथ' (सह भावेन) इस अर्थ में। 'सद्भाव' का अर्थ है सत् (सज्जन) का भाव, अर्थात् सत्पुरुष धर्म। अथवा, अपना भाव 'सद्भाव' है। "वे सद्भाव को ग्रहण कराते हैं" - यह वचन इस अर्थ का साधक है। अथवा, विद्यमान भाव 'सद्भाव' है। "इस प्रकार ग्रहण का सद्भाव" - यह वचन इस अर्थ का साधक है। यह 'स्वभाव' और 'सद्भाव' शब्दों की 'भाव-साधन' के अनुसार अर्थ-व्याख्या है। สมฺภโวติ สมฺภวนํ สมฺภโว, สมฺภวนกฺริยา, ยุตฺติ วา. ยุตฺติ หิ สมฺภโวติ วุจฺจติ ‘‘สมฺภโว คหณสฺส การณ’’นฺติอาทีสุ. อถ วา สมฺภวติ เอตสฺมาติ สมฺภโว. ยโต หิ ยํ กิญฺจิ สมฺภวติ, โส สมฺภโว. ปภโวติ ปภวนํ ปภโว, อจฺฉินฺนตา, ปภวติ เอตสฺมาติ วา ปภโว. ยโต หิ ยํ กิญฺจิ ปภวติ, โส ปภโว. อิเม ปน สมฺภวปภวสทฺทา กตฺถจิ สมานตฺถา กตฺถจิ ภินฺนตฺถาติ เวทิตพฺพา. กถํ? สมฺภวสทฺโท หิ ภวนกฺริยมฺปิ วทติ ยุตฺติมฺปิ ปญฺญตฺติมฺปิ สมฺภวรูปมฺปิ ปจฺจยตฺถมฺปิ, ปภวสทฺโท ปน ภวนกฺริยมฺปิ วทติ นทิปฺปภวมฺปิ ปจฺจยตฺถมฺปิ, ตสฺมา ปจฺจยตฺถํ วชฺเชตฺวา ภินฺนตฺถาติ คเหตพฺพา, ปจฺจยตฺเถน ปน สมานตฺถาติ คเหตพฺพา. วุตฺตญฺเหตํ ‘‘ปจฺจโย เหตุ นิทานํ การณํ สมฺภโว ปภโวติอาทิ อตฺถโต เอกํ, พฺยญฺชนโต นาน’’นฺติ. 'सम्भव' का अर्थ है सम्भवन (उत्पन्न होना), सम्भवन-क्रिया, अथवा युक्ति (तर्कसंगतता)। "सम्भव ग्रहण का कारण है" इत्यादि में युक्ति को ही 'सम्भव' कहा गया है। अथवा, जिससे कुछ उत्पन्न होता है, वह 'सम्भव' है। 'प्रभव' का अर्थ है प्रभवन (उत्पत्ति), अविच्छिन्नता (निरंतरता), अथवा जिससे कुछ प्रभवित (उत्पन्न) होता है, वह 'प्रभव' है। ये 'सम्भव' और 'प्रभव' शब्द कहीं समानार्थक हैं और कहीं भिन्नार्थक, ऐसा समझना चाहिए। कैसे? 'सम्भव' शब्द भवन-क्रिया, युक्ति, प्रज्ञप्ति, सम्भव-रूप और प्रत्यय (कारण) के अर्थ को कहता है; जबकि 'प्रभव' शब्द भवन-क्रिया, नदी के उद्गम और प्रत्यय के अर्थ को कहता है। इसलिए, प्रत्यय के अर्थ को छोड़कर वे भिन्नार्थक हैं, किन्तु प्रत्यय के अर्थ में वे समानार्थक हैं। यह कहा भी गया है - "प्रत्यय, हेतु, निदान, कारण, सम्भव, प्रभव आदि अर्थ की दृष्टि से एक हैं, किन्तु व्यंजन (शब्द) की दृष्टि से भिन्न हैं।" ‘‘มูลํ เหตุ นิทานญฺจ, สมฺภโว ปภโว ตถา; สมุฏฺฐานาหารารมฺมณํ, ปจฺจโย สมุทเยน จา’’ติ "मूल, हेतु, निदान, सम्भव, प्रभव, समुत्थान, आहार, आलम्बन, प्रत्यय और समुदय (ये सब पर्यायवाची हैं)।" อยมฺปิ คาถา เอตสฺสตฺถสฺส สาธิกา. อิทํ สมฺภวปภวสทฺทานํ ภาวาปาทานสาธนวเสนตฺถกถนํ. यह गाथा भी इसी अर्थ की साधिका है। यह 'सम्भव' और 'प्रभव' शब्दों की भाव और अपादान साधनों के अनुसार अर्थ-व्याख्या है। เอวเมตฺถ ภาวกตฺตุกมฺมกรณาปาทานาธิกรณวเสน ฉ สาธนานิ ปกาสิตานิ. ตานิ สมฺปทานสาธเนน สตฺตวิธานิ ภวนฺติ, ตํ ปน อุตฺตริ อาวิภวิสฺสติ ‘‘ธนมสฺส ภวตูติ ธนภูตี’’ติอาทินา. อิจฺเจวํ กิตกวเสน สพฺพถาปิ สตฺตวิธานิ สาธนานิ โหนฺติ, ยานิ ‘‘การกานี’’ติปิ วุจฺจติ, อิโต อญฺญํ สาธนํ นตฺถิ. อิธ ปโยเคสฺวตฺเถสุ จ วิญฺญูนํ [Pg.94] ปาฏวตฺถํ สาธนนามํ ปกาสิตํ. ตถา หิ ทุนฺนิกฺขิตฺตสาธเนหิ ปเทหิ โยชิตา สทฺทปฺปโยคา ทุพฺโพธตฺถา โหนฺติ, สุนิกฺขิตฺตสาธเนหิ ปน ปเทหิ โยชิตา สุโพธตฺถา โหนฺติ, ตสฺมา ปโยคาสาธนมูลกา, อตฺโถ จ ปโยคมูลโก. ปโยคานุรูปญฺหิ อวิปรีตํ กตฺวา อตฺถํ กถนสีลา ‘‘ยาจิโตว พหุลํ จีวรํ ปริภุญฺชติ, อปฺปํ อยาจิโต’’ติ เอวมาทีสุ สาธนวเสน คเหตพฺเพสุ อตฺเถสุ, อญฺเญสุ จตฺเถสุ ปฏุตรพุทฺธิโน ปณฺฑิตาเยว เอกนฺเตน ภควโต ปริยตฺติสาสนธรา นาม โหนฺตีติ เวทิตพฺพํ. อิโต ปรํ นยานุสาเรน สุวิญฺเญยฺยตฺตา ‘‘อิทํ นาม สาธน’’นฺติ น วกฺขาม, เกวลมิธ ทสฺสิเตสุ ปโยเคสุ วิญฺญูนํ พหุมานุปฺปาทนตฺถญฺเจว วิวิธวิจิตฺตปาฬิคติเก วิวิธตฺถสาเร ชินวรวจเน โสตูนํ พุทฺธิวิชมฺภนตฺถญฺจ อตฺถสาธกวจนานิเยว ยถารหํ สุตฺตเคยฺยเวยฺยากรณคาถาทีสุ ตโต ตโต อาหริตฺวา ทสฺเสสฺสาม. इस प्रकार यहाँ भाव, कर्ता, कर्म, करण, अपादान और अधिकरण के वश से छह साधन प्रकाशित किए गए हैं। वे सम्प्रदान साधन के साथ सात प्रकार के होते हैं, वह आगे 'धनमस्स भवतु इति धनभूति' (जिसका धन हो वह धनभूति है) आदि के द्वारा स्पष्ट होगा। इस प्रकार कृदन्त (कितक) के वश से भी सब प्रकार से सात साधन होते हैं, जिन्हें 'कारक' भी कहा जाता है, इससे अन्य कोई साधन नहीं है। यहाँ प्रयोगों और अर्थों में विद्वानों की कुशलता के लिए 'साधन' नाम प्रकाशित किया गया है। क्योंकि अनुचित रूप से रखे गए साधनों वाले पदों से युक्त शब्द-प्रयोग कठिनता से समझने योग्य होते हैं, जबकि भली-भांति रखे गए साधनों वाले पदों से युक्त शब्द-प्रयोग सुगमता से समझने योग्य होते हैं, इसलिए प्रयोग साधन-मूलक हैं और अर्थ प्रयोग-मूलक है। प्रयोग के अनुरूप ही यथार्थ अर्थ कहने के स्वभाव वाले विद्वान ही, जैसे 'याचित ही बहुत चीवर का परिभोग करता है, अयाचित कम' इत्यादि में साधन के वश से ग्रहण करने योग्य अर्थों में और अन्य अर्थों में प्रखर बुद्धि वाले होकर निश्चित रूप से भगवान के पर्यत्ति-शासन के धारक होते हैं, ऐसा जानना चाहिए। इसके बाद नय के अनुसार सुगमता से समझने योग्य होने के कारण 'यह अमुक साधन है' ऐसा हम नहीं कहेंगे, केवल यहाँ दिखाए गए प्रयोगों में विद्वानों के प्रति बहुमान उत्पन्न करने के लिए और विविध विचित्र पालि-प्रवृत्तियों वाले विविध अर्थ-सार युक्त बुद्ध-वचनों में श्रोताओं की बुद्धि के विकास के लिए अर्थ-साधक वचनों को ही यथाशक्ति सुत्त, गेय्य, वेय्याकरण, गाथा आदि से जहाँ-तहाँ से लाकर दिखाएंगे। ปภาโวติ ปการโต ภวตีติ ปภาโว, โสยมานุภาโวเยว. ‘‘ปภาวํ เต น ปสฺสามิ, เยน ตฺวํ มิถิลํ วเช’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. อนุภโวติ อนุภวนํ อนุภโว, กึ ตํ? ปริภุญฺชนํ. อานุภาโวติ เตชุสฺสาหมนฺตปภูสตฺติโย. ‘‘เตชสงฺขโต อุสฺสาหมนฺตปภูสตฺติสงฺขาโต วา มหนฺโต อานุภาโว เอตสฺสาติ มหานุภาโว’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. 'प्रभव' (पभाव) का अर्थ है जो विशेष प्रकार से होता है, वह यही अनुभाव ही है। 'मैं तुम्हारे उस प्रभाव को नहीं देखता हूँ, जिससे तुम मिथिला जाओ' - यह इस अर्थ का साधक वचन है। 'अनुभव' का अर्थ है अनुभव करना, वह क्या है? परिभोग करना। 'अनुभाव' (आनुभाव) का अर्थ है तेज, उत्साह, मन्त्र, प्रभुत्व और शक्ति। 'तेज रूपी उत्साह, मन्त्र, प्रभुत्व और शक्ति रूपी महान अनुभाव जिसका है, वह महानुभाव है' - यह इस अर्थ का साधक वचन है। เตโช อุสฺสาหมนฺตา จ, ปภูสตฺตีติ ปญฺจิเม; อานุภาวาติ วุจฺจนฺติ, ปภาวาติ จ เต วเท. तेज, उत्साह, मन्त्र, प्रभुत्व और शक्ति - ये पाँच 'अनुभाव' कहे जाते हैं, और उन्हें 'प्रभाव' भी कहना चाहिए। เตชาทิวาจกตฺตมฺหิ, อานุภาวปทสฺส ตุ; อตฺถนิพฺพจนํ ธีโร, ยถาสมฺภวมุทฺทิเส. तेज आदि के वाचक होने पर 'अनुभाव' पद का अर्थ-निर्वचन विद्वान को यथासम्भव बताना चाहिए। อถ [Pg.95] วา อานุภาโวติ อนุภวิตพฺพผลํ. ‘‘อนุภวิตพฺพสฺส ผลสฺส มหนฺตตาย มหานุภาโว’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. ปราภโวติ ปราภวนํ ปราภโว, อถ วา ปราภวตีติ ปราภโว. ‘‘สุวิชาโน ปราภโว’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. อปิจ ‘‘ธมฺมเทสฺสี ปราภโว’’ติ ปาฐานุรูปโต ปราภวิสฺสตีติ ปราภโวติ อนาคตกาลวเสนปิ นิพฺพจนํ ทฏฺฐพฺพํ. อถ วา ปราภวนฺติ เอเตนาติ ปราภโว. กึ ตํ? ธมฺมเทสฺสิตาทิ. ‘‘ปฐโม โส ปราภโว’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. วิภโวติ นิพฺพานํ. ตญฺหิ ภวโต วิคตตฺตา ภวโต วิคโตติ วิภโว, ภวสฺส จ ตํเหตุ วิคตตฺตา วิคโต ภโว เอตสฺมาติ วิภโว. วิภวนฺติ อุจฺฉิชฺชนฺติ วินสฺสนฺติ อิโต อริยธนวิโลมกา กิเลสมหาโจราติปิ วิภโว. วิภวสทฺทสฺส นิพฺพานาภิธานตฺเต ‘‘เอวํ ภเว วิชฺชมาเน, วิภโว อิจฺฉิตพฺพโก’’ติ อิทเมตฺถ สาธกํ วจนํ. อิมานิ ปน นิพฺพานสฺส ปริยายวจนานิ – अथवा 'अनुभाव' का अर्थ है अनुभव करने योग्य फल। 'अनुभव करने योग्य फल की महानता के कारण महानुभाव' - यह इस अर्थ का साधक वचन है। 'पराभव' का अर्थ है पराभूत होना, अथवा जो पराभूत होता है वह पराभव है। 'पराभव को जानना सुगम है' - यह इस अर्थ का साधक वचन है। इसके अतिरिक्त 'धम्मदेस्सी पराभवो' (धर्म से द्वेष करने वाला पराभव है) इस पाठ के अनुरूप 'पराभूत होगा' इस अर्थ में भविष्य काल के वश से भी निर्वचन देखना चाहिए। अथवा जिसके द्वारा पराभूत होते हैं वह पराभव है। वह क्या है? धर्म-द्वेष आदि। 'वह प्रथम पराभव है' - यह इस अर्थ का साधक वचन है। 'विभव' का अर्थ है निर्वाण। क्योंकि वह भव (अस्तित्व) से विगत (रहित) होने के कारण 'विभव' है, और भव का हेतु विगत होने के कारण जिससे भव विगत हो गया है वह 'विभव' है। जिससे आर्य-धन के विरोधी क्लेश रूपी महाचोर नष्ट (विभवन्ति) हो जाते हैं, वह भी 'विभव' है। 'विभव' शब्द के निर्वाण-वाचक होने पर 'इस प्रकार भव के विद्यमान होने पर विभव (निर्वाण) की इच्छा करनी चाहिए' - यह यहाँ साधक वचन है। ये निर्वाण के पर्यायवाची शब्द हैं - นิพฺพานํ วิภโว โมกฺโข, นิโรโธ อมตํ สมํ; สงฺขารูปสโม ทุกฺข-นิโรโธ อจฺจุต’กฺขโย. निर्वाण, विभव, मोक्ष, निरोध, अमृत, शम, संस्कारोपशम, दुःख-निरोध, अच्युत, अक्षय। วิวฏฺฏ’มกตํ อตฺถํ, สนฺติปท’มสงฺขตํ; ปารํ ตณฺหากฺขโย ทุกฺข-กฺขโย สญฺโญชนกฺขโย. विवट्ट (विवर्त), अकृत, अर्थ, शान्तिपद, असंस्कृत, पार, तृष्णाक्षय, दुःखक्षय, संयोजनक्षय। โยคกฺเขโม วิราโค จ,โลกนฺโต จ ภวกฺขโย; อปวคฺโค วิสงฺขาโร,สพฺภิ สุทฺธิ วิสุทฺธิ จ. योगक्षेम, विराग, लोकान्त, भवक्षय, अपवर्ग, विसंस्कार, सत्पुरुषों द्वारा (सेवित) शुद्धि और विशुद्धि। วิมุตฺยา’ปจโย มุตฺติ, นิพฺพุติ อุปธิกฺขโย; สนฺติ อสงฺขตา ธาตุ, ทิสา จ สพฺพโตปภํ. विमुक्ति, अपचय, मुक्ति, निवृत्ति, उपधिक्षय, शान्ति, असंस्कृत धातु और सब ओर से प्रकाशमान दिशा। วินาเปตานิ [Pg.96] นามานิ, วิเสสกปทํ อิธ; นิพฺพานวาจกานีติ, สลฺลกฺเขยฺย สุเมธโส. इन नामों को छोड़कर, यहाँ विशेषक पदों को निर्वाण का वाचक समझना चाहिए, ऐसा बुद्धिमान को ध्यान देना चाहिए। ‘‘ตาณํ เลณ’’นฺติอาทีนิ-เปกฺขิกานิ ภวนฺติ หิ; วิเสสกปทานนฺติ, เอตฺเถตานิ ปกาสเย. 'त्राण, लेण' (शरण, लय) आदि शब्द प्रेक्षक (दर्शक) होते हैं; वे विशेषक पद हैं, ऐसा यहाँ प्रकाशित करना चाहिए। ตาณํ เลณ’มรูปญฺจ, สนฺตํ สจฺจ’มนาลยํ; สุทุทฺทสํ สรณญฺจ, ปรายณ’มนีติกํ. त्राण (रक्षा), लेण (लय/शरण), अरूप, शान्त, सत्य, अनालय (आलय-रहित), सुदुर्दर्श (कठिनता से दिखने वाला), शरण, परायण, अनीतिक (उपद्रव-रहित)। อนาสวํ ธุวํ นิจฺจํ, วิญฺญาณ’มนิทสฺสนํ; อพฺยาปชฺชํ สิวํ เขมํ, นิปุณํ อปโลกิกํ. अनास्रव, ध्रुव, नित्य, विज्ञान (विशेष ज्ञान), अनिदर्शन (अदृश्य), अव्यापज्झ (अव्यापन्न), शिव, क्षेम, निपुण, अपलोकिक (विनाश-रहित)। อนนฺต’มกฺขรํ ทีโป, อจฺจนฺตํ เกวลํ ปทํ; ปณีตํ อจฺจุตญฺจาติ, พหุธาปิ วิภาวเย. अनन्त, अक्षर, द्वीप, अत्यन्त, केवल पद, प्रणीत और अच्युत - इस प्रकार बहुत प्रकार से स्पष्ट करना चाहिए। โคตฺรภูติ ปทสฺสตฺถํ, วทนฺเตหิ ครูหิ ตุ; โคตฺตํ วุจฺจติ นิพฺพาน-มิติ โคตฺตนฺติ ภาสิตํ. 'गोत्रभू' पद का अर्थ कहते हुए गुरुओं द्वारा 'गोत्र' निर्वाण को कहा जाता है, ऐसा 'गोत्र' कहा गया है। วิภโวติ วา วินาสสมฺปตฺติธนุจฺเฉททิฏฺฐิโยปิ วุจฺจนฺติ. ตตฺถ วินาโส วิภวนํ อุจฺฉิชฺชนํ นสฺสนนฺติ อตฺเถน วิภโว. ‘‘วิภโว สพฺพธมฺมานํ, อิตฺเถเก สโต สตฺตสฺส อุจฺเฉทํ วินาสํ วิภวํ ปญฺญเปนฺตี’’ติ จ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. สมฺปตฺติ ปน วิเสสโต ภวตีติ วิภโว. ‘‘รญฺโญ สิริวิภวํ ทฏฺฐุกามา’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. ธนํ ปน ภวนฺติ วฑฺฒนฺติ วุทฺธึ วิรูฬฺหึ เวปุลฺลํ อาปชฺชนฺติ สตฺตา เอเตนาติ วิภโว. ‘‘อสีติโกฏิวิภวสฺส พฺราหฺมณสฺส ปุตฺโต หุตฺวา นิพฺพตฺตี’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. อิทํ ปน ปริยายวจนํ – 'विभव' शब्द का प्रयोग विनाश, सम्पत्ति, धन और उच्छेददृष्टि के लिए भी किया जाता है। वहाँ विनाश के अर्थ में 'विभव' का अर्थ है—विभवन (नष्ट होना), उच्छेदन (मिट जाना) और नसन (विनाश)। "सभी धर्मों का विभव (विनाश) होता है, यहाँ कुछ लोग सत्त्व के उच्छेद, विनाश और विभव को प्रज्ञापित करते हैं"—यह वचन इस अर्थ का साधक है। सम्पत्ति के अर्थ में, जो विशेष रूप से होता है, वह 'विभव' है। "राजा के श्री-विभव (ऐश्वर्य) को देखने की इच्छा रखने वाले"—यह वचन इस अर्थ का साधक है। धन के अर्थ में, जिससे प्राणी होते हैं, बढ़ते हैं, वृद्धि, विरूढ़ि और विपुलता को प्राप्त होते हैं, वह 'विभव' है। "अस्सी करोड़ के विभव (सम्पत्ति) वाले ब्राह्मण के पुत्र होकर उत्पन्न हुआ"—यह वचन इस अर्थ का साधक है। इसके पर्यायवाची शब्द ये हैं— ธนํ สํ วิภโว ทพฺพํ, สาปเตยฺยํ ปริคฺคโห; โอฑฺฑํ ภณฺฑํ สกํ อตฺโถ, อิจฺเจเต ธนวาจกา. धन, स्व (सं), विभव, द्रव्य, सापतेय, परिग्रह, ओड्ड, भाण्ड, स्वक और अर्थ—ये धन के वाचक (पर्यायवाची) हैं। อุจฺเฉททิฏฺฐิ ปน วิภวติ อุจฺฉิชฺชติ ‘‘อตฺตา จ โลโก จ ปุน จุติโต อุทฺธํ น ชายตี’’ติ คหณโต วิภโวติ. ‘‘วิภวตณฺหา’’ติ [Pg.97] อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. วิภวตณฺหาติ หิ อุจฺเฉททิฏฺฐิสหคตาย ตณฺหาย นามํ. เอตฺถ อตฺถุทฺธาโร วุจฺจติ – उच्छेददृष्टि के अर्थ में, "आत्मा और लोक मृत्यु के बाद पुनः उत्पन्न नहीं होते" इस प्रकार ग्रहण करने से 'विभव' (विनाश/उच्छेद) होता है। "विभवतण्हा" (विभव-तृष्णा) यह वचन इस अर्थ का साधक है। विभव-तृष्णा उच्छेददृष्टि के साथ रहने वाली तृष्णा का नाम है। यहाँ अर्थों का उद्धरण (संग्रह) कहा जाता है— ธนนิพฺพานสมฺปตฺติ-วินาสุจฺเฉททิฏฺฐิโย; วุตฺตา วิภวสทฺเทน, อิติ วิญฺญู วิภาวเย. धन, निर्वाण (या सम्पत्ति), समृद्धि, विनाश और उच्छेददृष्टि—ये 'विभव' शब्द से कहे गए हैं, ऐसा विद्वानों को समझना चाहिए। ปาตุภาโวติ ปาตุภวนํ ปาตุภาโว. อาวิภาโวติ อาวิภวนํ อาวิภาโว, อุภินฺนเมเตสํ ปากฏตา อิจฺเจวตฺโถ. ติโรภาโวติ ติโรภวนํ ติโรภาโว, ปฏิจฺฉนฺนภาโว. วินาภาโวติ วินาภวนํ วินาภาโว, วิโยโค. โสตฺถิภาโวติ โสตฺถิภวนํ โสตฺถิภาโว, สุวตฺถิภาโว สุขสฺส อตฺถิตา, อตฺถโต ปน นิพฺภยตา นิรุปทฺทวตา เอว. อตฺถิภาโวติ อตฺถิตา วิชฺชมานตา อวิวิตฺตตา. นตฺถิภาโวติ นตฺถิตา อวิชฺชมานตา วิวิตฺตตา ริตฺตตา ตุจฺฉตา สุญฺญตา. โอการนฺตปุลฺลิงฺคนิทฺเทโส. 'प्रादुर्भाव' का अर्थ है प्रकट होना। 'आविर्भाव' का अर्थ है प्रकट होना, इन दोनों का अर्थ 'प्रकटता' ही है। 'तिरोभाव' का अर्थ है छिप जाना, तिरोहित होना या प्रच्छन्न भाव। 'विनाभाव' का अर्थ है वियोग या अलग होना। 'स्वस्तिभाव' का अर्थ है कल्याणमय होना, सुख की विद्यमानता, अर्थतः निर्भयता और निरुपद्रवता ही है। 'अस्तिभाव' का अर्थ है विद्यमानता, उपस्थिति या रिक्त न होना। 'नास्तिभाव' का अर्थ है अविद्यमानता, रिक्तता, तुच्छता या शून्यता। यह ओकारान्त पुल्लिंग का निर्देश है। อภิภวตีติ อภิภวิตา, ปรํ อภิภวนฺโต โย โกจิ. เอวํ ปริภวิตา, อนุภวตีติ อนุภวิตา, สุขํ วา ทุกฺขํ วา อทุกฺขมสุขํ วา อนุภวนฺโต โย โกจิ. เอวํ สมนุภวิตา. ปจฺจนุภวิตา, เอตฺถ ปน ยถา ‘‘อมตสฺส ทาตา. อนุปฺปนฺนสฺส มคฺคสฺส อุปฺปาเทตา’’ติอาทีสุ ‘‘ทาตา’’ติ ปทานํ กตฺตุวาจกานํ ‘‘อมตสฺสา’’ติอาทีหิ ปเทหิ กมฺมวาจเกหิ ฉฏฺฐิยนฺเตหิ สทฺธึ โยชนา ทิสฺสติ, ตถา อิเมสมฺปิ ปทานํ ‘‘ปจฺจามิตฺตสฺส อภิภวิตา’’ติอาทินา โยชนา กาตพฺพา. เอวํ อญฺเญสมฺปิ เอวรูปานํ ปทานํ. อาการนฺตปุลฺลิงฺคนิทฺเทโส. जो अभिभव (पराजित) करता है, वह 'अभिभविता' है, जो दूसरे को पराजित करने वाला कोई भी हो। इसी प्रकार 'परिभविता' (तिरस्कार करने वाला)। जो अनुभव करता है, वह 'अनुभविता' है, जो सुख, दुःख या अदुःख-असुख का अनुभव करने वाला कोई भी हो। इसी प्रकार 'समनुभविता' और 'पच्चनुभविता' (प्रत्यनुभविता)। यहाँ जैसे "अमृत का दाता, अनुत्पन्न मार्ग का उत्पादक" आदि में 'दाता' आदि कर्तावाचक पदों का 'अमृत' आदि कर्मवाचक षष्ठी विभक्ति वाले पदों के साथ सम्बन्ध देखा जाता है, वैसे ही इन पदों का भी "शत्रु का अभिभविता" आदि के रूप में प्रयोग करना चाहिए। इसी प्रकार अन्य इस प्रकार के पदों का भी। यह आकारान्त पुल्लिंग का निर्देश है। ภวตีติ ภวํ. ภวิสฺสตีติ วา ภวํ, วฑฺฒมาโน ปุคฺคโล. ‘‘สุวิชาโน ภวํ โหติ, สุวิชาโน ปราภโว. ธมฺมกาโม [Pg.98] ภวํ โหติ, ธมฺมเทสฺสี ปราภโว’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. อถ วา เยน สทฺธึ กเถติ, โส ‘‘ภว’’นฺติ วตฺตพฺโพ, ‘‘ภวํ กจฺจายโน. ภวํ อานนฺโท. มญฺเญ ภวํ ปตฺถยติ, รญฺโญ ภริยํ ปติพฺพต’’นฺติอาทีสุ. เอตฺถ ปน ธาตุอตฺเถ อาทโร น กาตพฺโพ, สมฺมุติอตฺเถเยวาทโร กาตพฺโพ ‘‘สงฺเกตวจนํ สจฺจํ, โลกสมฺมุติการณ’’นฺติ วจนโต. โวหารวิสยสฺมิญฺหิ โลกสมฺมุติ เอว ปธานา อวิลงฺฆนียา. ปราภวตีติ ปราภวํ. เอวํ ปริภวํ. อภิภวํ. อนุภวํ. ปภวติ ปโหติ สกฺโกตีติ ปภวํ, ปโหนฺโต โย โกจิ. น ปภวํ อปฺปภวํ, ‘‘อปฺปภว’’นฺติ จ อิทํ ชาตเก ทิฏฺฐํ – जो होता है, वह 'भवं' है। अथवा जो होगा, वह 'भवं' है, अर्थात् बढ़ता हुआ पुद्गल। "भवं (उन्नतिशील व्यक्ति) को जानना सुगम है, पराभव (पतनशील व्यक्ति) को जानना सुगम है। धर्मप्रेमी भवं होता है, धर्मद्वेषी पराभव होता है"—यह वचन इस अर्थ का साधक है। अथवा जिसके साथ बात की जाती है, उसे 'भवं' (आप/महाशय) कहना चाहिए, जैसे—"भवं कच्चायन, भवं आनन्द, मैं मानता हूँ कि भवं (आप) राजा की पतिव्रता पत्नी की इच्छा करते हैं" आदि में। यहाँ धातु के अर्थ में आग्रह नहीं करना चाहिए, बल्कि लोक-सम्मति (रूढ़ि) के अर्थ में ही आग्रह करना चाहिए, क्योंकि कहा गया है—"संकेत वचन सत्य है, जो लोक-सम्मति का कारण है।" व्यवहार के विषय में लोक-सम्मति ही प्रधान और अनुलंघनीय होती है। जो पराभव (पतन) प्राप्त करता है, वह 'पराभवं' है। इसी प्रकार 'परिभवं', 'अभिभवं', 'अनुभवं'। जो समर्थ होता है, प्रभुत्व रखता है या कर सकता है, वह 'प्रभवं' है, अर्थात् समर्थ व्यक्ति। जो समर्थ नहीं है, वह 'अप्रभवं' है। यह 'अप्रभवं' शब्द जातक में देखा गया है— ‘‘ฉินฺนพฺภมิว วาเตน, รุณฺโณ รุกฺขมุปาคมึ; โสหํ อปฺปภวํ ตตฺถ, สาขํ หตฺเถหิ อคฺคหิ’’นฺติ "वायु से छिन्न-भिन्न मेघ की तरह, मैं रोता हुआ वृक्ष के पास गया; वहाँ मुझ असमर्थ (अप्रभव) ने अपने हाथों से शाखा को पकड़ लिया।" ตตฺถ สาธกวจนมิทํ. นิคฺคหีตนฺตปุลฺลิงฺคนิทฺเทโส. वहाँ यह साधक वचन है। यह निग्गहीतान्त (अं-कारान्त) पुल्लिंग का निर्देश है। ธนภูตีติ ธนมสฺส ภวตูติ ธนภูติ. สิริภูตีติ โสภาย เจว ปญฺญาปุญฺญานญฺจ อธิวจนํ. สา อสฺส ภวตูติ สิริภูติ. เอวํ โสตฺถิภูติ, สุวตฺถิภูติ. อิการนฺตปุลฺลิงฺคนิทฺเทโส. 'धनभूति' का अर्थ है—इसका धन हो। 'श्रीभूति' शोभा, प्रज्ञा और पुण्यों का अधिवाचक (नाम) है। वह इसकी हो, इसलिए 'श्रीभूति' है। इसी प्रकार 'सोत्थिभूति' (स्वस्तिभूति) और 'सुवत्थिभूति'। यह इकारान्त पुल्लिंग का निर्देश है। ภาวีติ ภวนสีโล ภาวี, ภวนธมฺโม ภาวี, ภวเน สาธุการี ภาวี. เอวํ วิภาวี. สมฺภาวี. ปริภาวีติ. ตตฺร วิภาวีติ อตฺถวิภาวเน สมตฺโถ ปณฺฑิโต วุจฺจติ. เอตฺถ วิทฺวา, วิชฺชาคโต, ญาณีติอาทิ ปริยายวจนํ ทฏฺฐพฺพํ. ภวนฺติ จตฺร – 'भावी' का अर्थ है—होने के स्वभाव वाला, होने के धर्म वाला, या होने में कुशल। इसी प्रकार 'विभावी', 'संभावी', 'परिभावी'। उनमें 'विभावी' उसे कहा जाता है जो अर्थ का विवेचन (विभावन) करने में समर्थ पण्डित हो। यहाँ विद्वान्, विद्यागत, ज्ञानी आदि पर्यायवाची शब्द देखने चाहिए। इस विषय में ये गाथाएँ हैं— วิทฺวา วิชฺชาคโต ญาณี, วิภาวี ปณฺฑิโต สุธี; พุโธ วิสารโท วิญฺญู, โทสญฺญู วิทฺทสุ วิทู. विद्वान्, विद्यागत, ज्ञानी, विभावी, पण्डित, सुधी, बुध, विशारद, विञ्ञू (विज्ञ), दोषज्ञ, विद्दसु और विदू। วิปสฺสี [Pg.99] ปฏิภาณี จ, เมธาวี นิปโก กวิ; กุสโล วิทุโร ธีมา, คติมา มุติมา จยํ. विपस्सी (विपश्यी), प्रतिभानी, मेधावी, निपक, कवि, कुशल, विदुर, धीमान्, गतिमान् और मतिमान्। จกฺขุมา กณฺณวา ทพฺโพ, ธีโร ภูริ วิจกฺขโณ; สปฺปญฺโญ พุทฺธิมา ปญฺโญ, เอวํนามา วิภาวิโนติ. चक्षुमान्, कर्णवान्, भव्य (दब्ब), धीर, भूरि, विचक्षण, सप्रज्ञ, बुद्धिमान् और प्रज्ञ—ये 'विभावी' के नाम हैं। อีการนฺตปุลฺลิงฺคนิทฺเทโส. यह ईकारान्त पुल्लिंग का निर्देश है। สยมฺภูติ สยเมว ภวตีติ สยมฺภู. โก โส? อนฺตเรน ปโรปเทสํ สามํเยว สพฺพํ เญยฺยธมฺมํ ปฏิวิชฺฌิตฺวา สพฺพญฺญุตํ ปตฺโต สกฺยมุนิ ภควา. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – 'स्वयम्भू' का अर्थ है—जो स्वयं ही होता है। वह कौन है? जो दूसरे के उपदेश के बिना स्वयं ही सभी ज्ञेय धर्मों का साक्षात्कार कर सर्वज्ञता को प्राप्त हुए, वे शाक्यमुनि भगवान् हैं। भगवान् ने यह कहा भी है— ‘‘น เม อาจริโย อตฺถิ, สทิโส เม น วิชฺชติ; สเทวกสฺมึ โลกสฺมึ, นตฺถิ เม ปฏิปุคฺคโล. "मेरा कोई आचार्य नहीं है, मेरे समान कोई विद्यमान नहीं है; देवलोक सहित इस समस्त लोक में मेरा कोई प्रतिपुद्गल (प्रतिद्वन्द्वी या समकक्ष) नहीं है। อหญฺหิ อรหา โลเก, อหํ สตฺถา อนุตฺตโร; เอโกมฺหิ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, สีตีภูโตสฺมิ นิพฺพุโต’’ติ. मैं ही लोक में अर्हत् हूँ, मैं ही अनुत्तर शास्ता (गुरु) हूँ; मैं अकेला ही सम्यक्सम्बुद्ध हूँ, मैं शीतल और निर्वाण को प्राप्त हूँ।" อตฺถโต ปน ปารมิตาปริภาวิโต สยมฺภูญาเณน สห วาสนาย วิคตวิทฺธสฺตนิรวเสสกิเลโส มหากรุณาสพฺพญฺญุตญฺญาณาทิอปริเมยฺยคุณคณาธาโร ขนฺธสนฺตาโน สยมฺภู. โส เอวํภูโต ขนฺธสนฺตาโน โลเก อคฺคปุคฺคโลติ วุจฺจติ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา ‘‘เอกปุคฺคโล ภิกฺขเว โลเก อุปฺปชฺชมาโน อุปฺปชฺชติ อจฺฉริยมนุสฺโส, กตโม เอกปุคฺคโล? ตถาคโต ภิกฺขเว อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ’’ติ. โส เอกปุคฺคโล เอตรหิ ‘‘สพฺพญฺญู, สุคโต’’ติอาทีหิ ยถาภุจฺจคุณาธิคตนาเมหิ จ ปสิทฺโธ, ‘‘โคตโม อาทิจฺจพนฺธู’’ติ โคตฺตโต จ ปสิทฺโธ, สกฺยปุตฺโต สกฺโก สกฺยมุนิ สกฺยสีโห สกฺยปุงฺคโวติ กุลโต จ ปสิทฺโธ, สุทฺโธทนิมายาเทวีสุโตติ [Pg.100] มาตาปิติโต จ ปสิทฺโธ, สิทฺธตฺโถติ คหิตนาเมน จ ปสิทฺโธ. ภวนฺติ จตฺร – अर्थतः, पारमिताओं से परिभावित, स्वयंभू-ज्ञान के साथ वासना सहित समस्त क्लेशों को पूर्णतः नष्ट कर देने वाले, महाकरुणा और सर्वज्ञता-ज्ञान आदि अपरिमेय गुणों के समूह के आधारभूत स्कन्ध-सन्तान ही 'स्वयंभू' हैं। इस प्रकार के स्कन्ध-सन्तान को ही लोक में 'अग्रपुद्गल' (श्रेष्ठ पुरुष) कहा जाता है। भगवान ने भी कहा है— 'भिक्षुओं! लोक में उत्पन्न होता हुआ एक पुद्गल आश्चर्यमय मनुष्य के रूप में उत्पन्न होता है। वह एक पुद्गल कौन है? भिक्षुओं! वह तथागत, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध है।' वह एक पुद्गल इस समय 'सर्वज्ञ', 'सुगत' आदि यथार्थ गुणों से प्राप्त नामों से प्रसिद्ध है; गोत्र से 'गोतम' और 'आदित्यबन्धु' के रूप में प्रसिद्ध है; कुल से 'शाक्यपुत्र', 'शाक्य', 'शाक्यमुनि', 'शाक्यसिंह' और 'शाक्यपुङ्गव' के रूप में प्रसिद्ध है; माता-पिता से 'शुद्धोदन और मायादेवी के पुत्र' के रूप में प्रसिद्ध है; और ग्रहण किए गए नाम से 'सिद्धार्थ' के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ ये गाथाएँ हैं— โย เอกปุคฺคโล อาสิ, พุทฺโธ โส วทตํ วโร; โคตฺตโต โคตโม นาม, ตเถวาทิจฺจพนฺธุ จ. जो वह एक पुद्गल थे, वे बुद्ध वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं; गोत्र से उनका नाम 'गोतम' है, और वैसे ही 'आदित्यबन्धु' भी है। สกฺยกุเล ปสูตตฺตา, สกฺยปุตฺโตติ วิสฺสุโต; สกฺโก อิติ จ อวฺหิโต, ตถา สกฺยมุนีติ จ. शाक्य कुल में उत्पन्न होने के कारण वे 'शाक्यपुत्र' के रूप में विख्यात हैं; उन्हें 'शाक्य' और वैसे ही 'शाक्यमुनि' भी कहा जाता है। สพฺพตฺถ เสฏฺฐภาเวน, สกฺเย จ เสฏฺฐภาวโต; สกฺยสีโหติ โส สกฺย-ปุงฺคโวติ จ สมฺมโต. सर्वत्र श्रेष्ठ होने के कारण और शाक्यों में श्रेष्ठ होने के कारण, वे 'शाक्यसिंह' और 'शाक्यपुङ्गव' के रूप में माने जाते हैं। สุทฺโธทนีติ ปิติโต, นเภ จนฺโทว วิสฺสุโต; มาติโตปิ จ สญฺญาโต, มายาเทวีสุโต อิติ. पिता की ओर से वे 'शुद्धोदनि' के रूप में आकाश में चन्द्रमा के समान विख्यात हैं; और माता की ओर से भी 'मायादेवीसुत' के रूप में जाने जाते हैं। สพฺพญฺญู สุคโต พุทฺโธ, ธมฺมราชา ตถาคโต; สมนฺตภทฺโท ภควา, ชิโน ทสพโล มุนิ. सर्वज्ञ, सुगत, बुद्ध, धर्मराज, तथागत, समन्तभद्र, भगवान, जिन, दशबल, मुनि। สตฺถา วินายโก นาโถ,มุนินฺโท โลกนายโก; นราสโภ โลกชิโน,สมฺพุทฺโธ ทฺวิปทุตฺตโม. शास्ता, विनायक, नाथ, मुनीन्द्र, लोकनायक, नराषभ, लोकजिन, सम्बुद्ध, द्विपदोत्तम। เทวเทโว โลกครุ, ธมฺมสฺสามี มหามุนิ; สมนฺตจกฺขุ ปุริส-ทมฺมสารถิ มารชิ. देवदेव, लोकगुरु, धर्मस्वामी, महामुनि, समन्तचक्षु, पुरुषदम्यसारथि, मारजित्। ธมฺมิสฺสโร จ อทฺเวชฺฌ-วจโน สตฺถวาหโก; วิสุทฺธิเทโว เทวาติ-เทโว จ สมณิสฺสโร. धम्मीश्वर, अद्वैयवचन, सार्थवाह, विशुद्धिदेव, देवातिदेव, श्रमणेश्वर। ภูริปญฺโญ’นธิวโร, นรสีโห จ จกฺขุมา; มุนิมุนิ นรวโร, ฉฬภิญฺโญ ชเน สุโต. भूरिप्रज्ञ, अनधिवर, नरसिंह, चक्षुमान्, मुनिमुनि, नरवर, षडभिज्ञ, जनश्रुत। องฺคีรโส ยติราชา, โลกพนฺธุ’มตนฺทโท; วตฺตา ปวตฺตา สทฺธมฺม-จกฺกวตฺตี ยติสฺสโร. अङ्गीरस, यतिराज, लोकबन्धु, अमृतद, वक्ता, प्रवर्त्ता, सद्धर्मचक्रवर्ती, यतीश्वर। โลกทีโป [Pg.101] สิรีฆโน, สมณินฺโท นรุตฺตโม; โลกตฺตยวิทู โลก-ปชฺโชโต ปุริสุตฺตโม. लोकदीप, श्रीघन, श्रमणेन्द्र, नरोत्तम, लोकत्रयविद्, लोकप्रद्योत, पुरुषोत्तम। สจฺจทโส สตปุญฺญ-ลกฺขโณ สจฺจสวฺหโย; รวิพนฺธา’สมสโม, ปญฺจเนตฺต’คฺคปุคฺคโล. सत्यदर्श, शतपुण्यलक्षण, सत्यनाम, रविबन्धु, असमसम, पञ्चनेत्र, अग्रपुद्गल। สพฺพาภิภู สพฺพวิทู, สจฺจนาโม จ ปารคู; ปุริสาติสโย สพฺพ-ทสฺสาวี นรสารถิ. सर्वाभिभू, सर्वविद्, सत्यनाम, पारगू, पुरुषातिशय, सर्वदर्शी, नरसारथि। สมฺมาสมฺพุทฺโธ อิติ โส, ญาโต สตฺตุตฺตโมติ จ; ตาที วิภชฺชวาทีติ, มหาการุณิโกติ จ. वे 'सम्यक्सम्बुद्ध' और 'सत्त्वोत्तम' के रूप में जाने जाते हैं; 'तादी', 'विभज्यवादी' और 'महाकारुणिक' के रूप में भी। จกฺขุภูโต ธมฺมภูโต, ญาณภูโตติ วณฺณิโต; พฺรหฺมภูโตติ ปุริสา-ชญฺโญ อิติ จ โถมิโต. उन्हें 'चक्षुभूत', 'धर्मभूत' और 'ज्ञानभूत' के रूप में वर्णित किया गया है; 'ब्रह्मभूत' और 'पुरुषाजन्य' (पुरुषों में श्रेष्ठ) के रूप में उनकी स्तुति की गई है। โลกเชฏฺโฐ สยมฺภู จ, มเหสิ มารภญฺชโน; อโมฆวจโน ธมฺม-กาโย มาราภิภู อิติ. लोकज्येष्ठ, स्वयंभू, महर्षि, मारभञ्जन, अमोघवचन, धर्मकाय, माराभिभू। อสงฺขฺเยยฺยานิ นามานิ, สคุเณน มเหสิโน; นามํ คุเณหิ นิสฺสิตํ, โก กวินฺโท กเถสฺสติ. महर्षि (बुद्ध) के गुणों के अनुसार उनके असंख्य नाम हैं; नाम गुणों पर आश्रित होते हैं, कौन कविराज उन्हें पूर्णतः कह सकेगा? ตตฺร สพฺพญฺญุ อิจฺจาทิ-นามํ สาธารณํ ภเว; สพฺเพสานมฺปิ พุทฺธานํ, โคตโม อิติอาทิ น. उनमें 'सर्वज्ञ' आदि नाम सभी बुद्धों के लिए साधारण (समान) होते हैं; किन्तु 'गोतम' आदि नाम नहीं। พุทฺโธ ปจฺเจกพุทฺโธ จ, ‘‘สยมฺภู’’อิติ สาสเน; เกจิ ‘‘พฺรหฺมา สยมฺภู’’ติ, สาสนาวจรํ น ตํ. शासन (बुद्ध-शासन) में 'बुद्ध' और 'प्रत्येकबुद्ध' को 'स्वयंभू' कहा जाता है; कुछ लोग 'ब्रह्मा स्वयंभू हैं' ऐसा कहते हैं, किन्तु वह शासन के अनुकूल नहीं है। ‘‘พุทฺโธ ตถาคโต สตฺถา, ภควา’’ติ ปทานิ ตุ; ฐาเนเนกสหสฺสมฺหิ, สญฺจรนฺติ อภิณฺหโส. किन्तु 'बुद्ध', 'तथागत', 'शास्ता', 'भगवान'—ये पद हजारों स्थानों पर बार-बार आते हैं। ตตฺร จาทิปทํ อนฺต-ปทญฺเจว อิมานิ ตุ; เอกโตปิ จรนฺตีติ, วิภาเวยฺย วิสารโท. वहाँ आदि पद और अन्तिम पद, तथा ये (अन्य पद) भी एक साथ प्रयुक्त होते हैं; एक विशेषज्ञ को इनका विभाग (भेद) करना चाहिए। วิเสสกปทานํ ตุ, อเปกฺขกปทานิ จ; อนเปกฺขปทานีติ, ปทานิ ทุวิธา สิยุํ. विशेषक पदों के सन्दर्भ में, पद दो प्रकार के होते हैं: अपेक्षक (सापेक्ष) पद और अनपेक्षक (निरपेक्ष) पद। ตถา [Pg.102] หิ สตฺถวาโห นรวโร ฉฬภิญฺโญติ เอวํปการานิ อภิธานปทานิ วิเสสกปทาเปกฺขกานิ. กถํ? जैसे कि 'सार्थवाह', 'नरवर', 'षडभिज्ञ'—इस प्रकार के अभिधान पद विशेषक पदों की अपेक्षा रखने वाले (सापेक्ष) होते हैं। कैसे? ‘‘เอวํ วิชิตสงฺคามํ, สตฺถวาหํ อนุตฺตรํ; สาวกา ปยิรุปาสนฺติ, เตวิชฺชา มจฺจุหายิโน. "इस प्रकार संग्राम को जीतने वाले, अनुत्तर सार्थवाह की, मृत्यु को त्यागने वाले त्रैविद्य श्रावक सेवा करते हैं।" ยํ โลโก ปูชยเต,สโลกปาโล สทา นมสฺสติ จ; ตสฺเสต สาสนวรํ,วิทูหิ เญยฺยํ นรวรสฺสา’’ติ, "लोक जिसकी पूजा करता है, और लोकपालों सहित (लोक) जिसे सदा नमस्कार करता है; विद्वानों द्वारा उस नरवर के इस श्रेष्ठ शासन को जानना चाहिए।" ‘‘ฉฬภิญฺญสฺส สาสน’’นฺติ จ เอวํ วิเสสกปทาเปกฺขกานิ ภวนฺติ. พุทฺโธ ชิโน ภควาติ เอวํปการานิ ปน โน วิเสสกาเปกฺขานีติ ทฏฺฐพฺพํ. "'षडभिज्ञ का शासन'—इस प्रकार ये विशेषक पदों की अपेक्षा रखने वाले होते हैं। किन्तु 'बुद्ध', 'जिन', 'भगवान'—इस प्रकार के पद विशेषक की अपेक्षा नहीं रखते, ऐसा समझना चाहिए।" เกจิ ปเนตฺถ เอวํ วเทยฺยุํ ‘‘มุนินฺโท สมณินฺโท สมณิสฺสโร ยติสฺสโร อาทิจฺจพนฺธุ รวิพนฺธูติ เอวํปการานํ อิธ วุตฺตานมภิธานานํ วิเสสตฺถาภาวโต ปุนรุตฺติโทโส อตฺถี’’ติ. ตนฺน, อภิธานานํ อภิสงฺขรณียานภิสงฺขรณียวเสน อภิสงฺขตาภิธานานิ อนภิสงฺขตาภิธานานีติ ทฺเวธา ทิสฺสนโต. ตถา หิ กตฺถจิ เกจิ ‘‘สกฺยสีโห’’ติ อภิธานํ ปฏิจฺจ ‘‘สกฺยเกสรี สกฺยมิคาธิโป’’ติอาทินา นานาวิวิธมภิธานมภิสงฺขโรนฺติ, ปาวจเนปิ หิ ‘‘ทฺวิทุคฺคมวรหนุตฺต’มลตฺถา’’ติ ปาโฐ ทิสฺสติ. ตถา เกจิ ‘‘ธมฺมราชา’’ติ อภิธานํ ปฏิจฺจ ‘‘ธมฺมทิสมฺปตี’’ติอาทีนิ อภิสงฺขโรนฺติ. ‘‘สพฺพญฺญู’’ติ อภิธานํ ปฏิจฺจ ‘‘สพฺพทสฺสาวี สพฺพทสฺสี’’ติอาทีนิ อภิสงฺขโรนฺติ, ‘‘สหสฺสกฺโข’’ติ อภิธานํ ปฏิจฺจ ‘‘ทสสตโลจโน’’ติอาทีนิ อภิสงฺขโรนฺติ. ‘‘อาทิจฺจพนฺธู’’ติ อภิธานํ ปฏิจฺจ ‘‘อรวินฺทสหายพนฺธู’’ติอาทีนิ อภิสงฺขโรนฺติ. ‘‘อมฺพุช’’นฺติ อภิธานํ ปฏิจฺจ ‘‘นีรชํ กุญฺช’’นฺติอาทีนิ อภิสงฺขโรนฺติ. ปาวจเนปิ หิ [Pg.103] ยํ ปทุมํ, ตํ ชลชํ นามาติ มนฺตฺวา ปฏิสมฺภิทาปฺปตฺเตหิ อริเยหิ เทสนาวิลาสวเสน วุตฺโต ‘‘ปทุมุตฺตรนามิโน’’ติ วตฺตพฺพฏฺฐาเน ‘‘ชลชุตฺตรนามิโน’’ติ ปาโฐ ทิสฺสติ. เอวํ อภิสงฺขตาภิธานานิ ทิสฺสนฺติ. यहाँ कुछ लोग ऐसा कह सकते हैं कि 'मुनिन्द', 'समणिन्द', 'समणिस्सर', 'यतिस्सर', 'आदिच्चबन्धु', 'रविबन्धु' आदि यहाँ कहे गए नामों में विशेष अर्थ के अभाव के कारण पुनरुक्ति दोष है। ऐसा नहीं है, क्योंकि नामों को 'अभिसंखरणीय' (रचना करने योग्य) और 'अनभिसंखरणीय' (रचना न करने योग्य) के भेद से 'अभिसंखत' (रचित) और 'अनभिसंखत' (अरचित) के रूप में दो प्रकार से देखा जाता है। जैसे कि कहीं कोई 'सक्यसीह' (शाक्यसिंह) नाम के आधार पर 'सक्यकेसरी', 'सक्यमिगाधिपो' (शाक्यमृगाधिप) आदि अनेक प्रकार के नामों की रचना करते हैं, प्रवचन (त्रिपिटक) में भी 'द्विदुग्गमवरहनुत्त'मलत्था' यह पाठ देखा जाता है। वैसे ही कुछ 'धम्मराजा' नाम के आधार पर 'धम्मदिम्पती' आदि की रचना करते हैं। 'सब्बञ्ञू' (सर्वज्ञ) नाम के आधार पर 'सब्बदस्सावी', 'सब्बदस्सी' आदि की रचना करते हैं, 'सहस्सक्खो' (सहस्राक्ष) नाम के आधार पर 'दसतलोचनो' आदि की रचना करते हैं। 'आदिच्चबन्धु' नाम के आधार पर 'अरविन्दसहायबन्धु' आदि की रचना करते हैं। 'अम्बुज' नाम के आधार पर 'नीरज', 'कुञ्ज' आदि की रचना करते हैं। प्रवचन में भी जो 'पदुम' (पद्म) है, वह 'जलज' नाम वाला है, ऐसा मानकर प्रतिसंभिदा प्राप्त आर्यों द्वारा देशना के विलास (सौन्दर्य) के कारण 'पदुमुत्तरनामिणो' कहने के स्थान पर 'जलजुत्तरनामिणो' पाठ देखा जाता है। इस प्रकार अभिसंखत (रचित) नाम देखे जाते हैं। ‘‘พุทฺโธ ภควา’’ติ อภิธานานิ ปน อนภิสงฺขตาภิธานานิ. วุตฺตญฺเหตํ ธมฺมเสนาปตินา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน ‘‘พุทฺโธติ เนตํ นามํ มาตรา กตํ, น ปิตรา กตํ, น ภคินิยา กตํ, น ญาติสาโลหิเตหิ กตํ, น เทวตาหิ กตํ, วิโมกฺขนฺติกเมตํ พุทฺธานํ ภควนฺตานํ โพธิยา มูเล สห สพฺพญฺญุตญฺญาณปฺปฏิลาภา สจฺฉิกา ปญฺญตฺติ ยทิทํ พุทฺโธ’’ติ, ตถา ‘‘ภควาติ เนตํ นามํ มาตรา กตํ…เป… สจฺฉิกา ปญฺญตฺติ ยทิทํ ภควา’’ติ. เอวํ ‘‘พุทฺโธ ภควา’’ติ อภิธานานิ อนภิสงฺขตาภิธานานิ. น หิ ตานิ อภิธานานิ เจว ‘‘สตฺถา สุคโต ชิโน’’ติอาทีนิ จ อญฺญํ กิญฺจิ อภิธานํ ปฏิจฺจ อภิสงฺขตานิ, นาปิ อญฺญานิ อภิธานานิ เอตานิ ปฏิจฺจ อภิสงฺขตานิ ทิสฺสนฺติ. ตถา หิ ‘‘พุทฺโธ’’ติ อภิธานํ ปฏิจฺจ ‘‘พุชฺฌิตา โพเธตา โพธโก’’ติอาทีนิ นามาภิธานานิ น อภิสงฺขโรนฺติ. ตถา ‘‘ภควา สตฺถา สุคโต’’ติอาทีนิ นามาภิธานานิ ปฏิจฺจ ‘‘สมฺปนฺนภโค อนุสาสโก สุนฺทรวจโน’’ติอาทีนิ นามาภิธานานิ นาภิสงฺขโรนฺติ. เอวํ อิมํ วิภาคํ ทสฺเสตุํ ‘‘มุนินฺโท สมณินฺโท สมณิสฺสโร ยติสฺสโร อาทิจฺจพนฺธุ รวิพนฺธู’’ติอาทินา นเยน ปุนรุตฺติ อมฺเหหิ กตาติ ทฏฺฐพฺพา. เอวมญฺญตฺราปิ นโย เนตพฺโพ. อตฺริทํ วุจฺจติ – 'बुद्ध' और 'भगवा' ये नाम तो अनभिसंखत (अरचित) नाम हैं। आयुष्मान् धर्मसेनापति सारिपुत्र द्वारा यह कहा गया है— 'बुद्ध' यह नाम माता द्वारा नहीं किया गया, पिता द्वारा नहीं किया गया, बहन द्वारा नहीं किया गया, ज्ञाति-संबंधियों द्वारा नहीं किया गया, देवताओं द्वारा नहीं किया गया; बुद्धों, भगवानों का यह विमोक्ष के अंत में होने वाला, बोधि के मूल में सर्वज्ञता-ज्ञान की प्राप्ति के साथ साक्षात्कृत प्रज्ञप्ति (नाम) है, जो कि 'बुद्ध' है। वैसे ही 'भगवा' यह नाम माता द्वारा नहीं किया गया... (पेय्याल)... साक्षात्कृत प्रज्ञप्ति है जो कि 'भगवा' है। इस प्रकार 'बुद्ध' और 'भगवा' ये नाम अनभिसंखत नाम हैं। न तो वे नाम और न ही 'सत्था', 'सुगत', 'जिन' आदि अन्य कोई नाम किसी दूसरे नाम के आधार पर रचित हैं, और न ही इन नामों के आधार पर अन्य नामों की रचना देखी जाती है। जैसे कि 'बुद्ध' नाम के आधार पर 'बुज्झिता', 'बोधेता', 'बोधको' आदि नामों की रचना नहीं करते हैं। वैसे ही 'भगवा', 'सत्था', 'सुगत' आदि नामों के आधार पर 'सम्पन्नभगो', 'अनुसासको', 'सुन्दरवचनो' आदि नामों की रचना नहीं करते हैं। इस प्रकार इस विभाग को दिखाने के लिए 'मुनिन्द', 'समणिन्द', 'समणिस्सर', 'यतिस्सर', 'आदिच्चबन्धु', 'रविबन्धु' आदि विधि से हमारे द्वारा पुनरुक्ति की गई है, ऐसा समझना चाहिए। अन्यत्र भी इसी प्रकार विधि ले जानी चाहिए। यहाँ यह कहा जाता है— ‘‘อภิสงฺขตนามญฺจ, นามญฺจานภิสงฺขตํ; ทฺวิทุคฺคมวโร พุทฺโธ, อิติ นามํ ทฺวิธา ภเว’’ติ. 'अभिसंखत (रचित) नाम और अनभिसंखत (अरचित) नाम; बुद्ध नाम दो प्रकार का होता है, जैसे द्विदुग्गमवर (दो दुर्गमों में श्रेष्ठ)।' ปภูติ ปรํ ปสยฺห ภวตีติ ปภู, อิสฺสโร. ‘‘อรญฺญสฺส ปภู อยํ ลุทฺทโก’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. อภิภูติ [Pg.104] อภิภวตีติ อภิภู, อสญฺญสตฺโต. กึ โส อภิภวิ? จตฺตาโร ขนฺเธ อรูปิโน. อิติ จตฺตาโร ขนฺเธ อรูปิโน อภิภวีติ อภิภู. โส จ โข นิจฺเจตนตฺตา อภิภวนกฺริยายาสติ ปุพฺเพวา’สญฺญุปฺปตฺติโต ฌานลาภิกาเล อตฺตนา อธิคตปญฺจมชฺฌานํ สญฺญาวิราควเสน ภาเวตฺวา จตฺตาโร อรูปกฺขนฺเธ อสญฺญิภเว อปฺปวตฺติกรเณน อภิภวิตุมารภิ, ตทภิภวนกิจฺจํ อิทานิ สิทฺธนฺติ อภิภวีติ อภิภูติ วุจฺจติ. อปิจ นิจฺเจตนภาเวน อภิภวนพฺยาปาเร อสติปิ ปุพฺเพ สเจตนกาเล สพฺยาปารตฺตา สเจตนสฺส วิย นิจฺเจตนสฺสาปิ สโต ตสฺส อุปจาเรน สพฺยาปารตาวจนํ ยุชฺชเตว. ทิสฺสติ หิ โลเก สาสเน จ สเจตนสฺส วิย อเจตนสฺสปิ อุปจาเรน สพฺยาปารตาวจนํ. ตํ ยถา? กูลํ ปติตุกามํ, เอวํ โลเก. สาสเน ปน – 'पभू' (प्रभु) अर्थात् जो दूसरों को अभिभूत करके होता है, वह प्रभु है, ईश्वर है। 'यह शिकारी जंगल का प्रभु है'—यह इस अर्थ का साधक वचन है। 'अभिभू' अर्थात् जो अभिभूत करता है वह अभिभू है, असञ्ञसत्त (असंज्ञी सत्त्व)। उसने क्या अभिभूत किया? चार अरूपी स्कन्धों को। इस प्रकार चार अरूपी स्कन्धों को अभिभूत किया, इसलिए 'अभिभू' है। और वह अचेतन होने के कारण अभिभूत करने की क्रिया के अभाव में भी, पहले असंज्ञी होने से पूर्व ध्यान प्राप्ति के समय स्वयं प्राप्त पाँचवें ध्यान को संज्ञा-विराग के वश से भावित कर चार अरूपी स्कन्धों को असंज्ञी भव में अप्रवृत्त (न होने वाला) करने के द्वारा अभिभूत करना आरम्भ किया, वह अभिभूत करने का कार्य अब सिद्ध हो गया है, इसलिए 'अभिभूत किया' इस अर्थ में 'अभिभू' कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, अचेतन होने के कारण अभिभूत करने के व्यापार (क्रिया) के न होने पर भी, पहले सचेतन काल में व्यापारयुक्त होने के कारण, सचेतन के समान अचेतन होने पर भी उसका उपचार से व्यापारयुक्त कहना उचित ही है। लोक और शासन (बुद्ध-वचन) में सचेतन के समान अचेतन का भी उपचार से व्यापारयुक्त कहना देखा जाता है। वह कैसे? जैसे लोक में— 'तट गिरना चाहता है'। शासन में तो— ‘‘โรทนฺเต ทารเก ทิสฺวา, อุพฺพิคฺคา วิปุลา ทุมา; สยเมโวนมิตฺวาน, อุปคจฺฉนฺติ ทารเก’’ติ จ 'रोते हुए बालकों को देखकर, उद्विग्न हुए विशाल वृक्ष; स्वयं ही झुककर बालकों के पास पहुँच जाते हैं।' ‘‘องฺคาริโน ทานิ ทุมา ภทนฺเต, ผเลสิโน ฉทนํ วิปฺปหายา’’ติ จ ‘‘ผลํ โตเสติ กสฺสก’’นฺติ จ อาทิ. อภิภูสทฺทสฺส อสญฺญสตฺตาภิธานตฺเต ‘‘อภิภุํ อภิภุโต มญฺญตี’’ติ อิทเมตฺถ สาธกํ วจนํ. อถ วา อภิภวตีติ อภิภู, ปเรสมภิภวิตา โย โกจิ. วิเสสโต ปน ตถาคโตเยว อภิภู. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา ‘‘ตถาคโต ภิกฺขเว อภิภู อนภิภูโต อญฺญทตฺถุทโส วสวตฺตี’’ติ. เกจิ ปน ‘‘อภิภู นาม สหสฺโส พฺรหฺมา’’ติ วทนฺติ. 'हे भदन्त! अब वृक्ष अंगार वाले (लाल फूलों वाले) हो गए हैं, फलों की इच्छा करने वाले पत्तों को त्याग रहे हैं' और 'फल किसान को संतुष्ट करता है' आदि। 'अभिभू' शब्द के असंज्ञी सत्त्व का नाम होने में 'अभिभू को अभिभू के रूप में मानता है'—यह यहाँ साधक वचन है। अथवा, जो अभिभूत करता है वह 'अभिभू' है, दूसरों को अभिभूत करने वाला कोई भी। विशेष रूप से तो तथागत ही 'अभिभू' हैं। भगवान् द्वारा यह कहा गया है— 'भिक्षुओं! तथागत अभिभू (अभिभावी) हैं, अनभिभूत (किसी से न जीते जाने वाले), सर्वद्रष्टा और वशवर्ती हैं।' कुछ लोग तो कहते हैं कि 'अभिभू' नाम का सहस्र (हजार) वाला ब्रह्मा है। วิภูติ วิเสสภูโตติ วิภู, ‘‘ภวโสตํ สเจ พุทฺโธ, ติณฺโณ โลกนฺตคู วิภู’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ [Pg.105] วจนํ. วิภูติ เหตฺถ รูปกายธมฺมกายสมฺปตฺติยา วิเสสภูโตติ อตฺโถ. อาห จ – 'विभू' अर्थात् जो विशेष रूप से हुआ है वह विभू है। 'यदि बुद्ध भव-स्रोत को पार कर गए हैं, लोक के अंत तक पहुँच गए हैं, तो वे विभू हैं'—यह इस अर्थ का साधक वचन है। यहाँ 'विभू' का अर्थ रूपकाय और धर्मकाय की सम्पत्ति से विशेष रूप से युक्त होना है। और कहा भी है— ‘‘ทิสฺสมาโนปิ ตาวสฺส, รูปกาโย อจินฺติโย; อสาธารณญาณฏฺเฐ, ธมฺมกาเย กถาว กา’’ติ. यद्यपि उनका दृश्यमान रूपकाय भी अचिन्त्य है; तो फिर असाधारण ज्ञान के आधारभूत धर्मकाय के विषय में क्या कहना! อธิภูติ อธิภวตีติ อธิภู, อิสฺสโร. अधिभू अर्थात् जो अभिभूत करता है (अधिभवति), वह अधिभू है, ईश्वर (स्वामी)। ‘‘ตทา มํ ตปเตเชน, สนฺตตฺโต ติทิวาธิภู; ธาเรนฺโต พฺราหฺมณํ วณฺณํ, ภิกฺขาย มํ อุปาคมี’’ติ – तब मेरी तपस्या के तेज से संतप्त होकर, स्वर्ग के अधिपति (तिदिवाधिभू) ने ब्राह्मण का रूप धारण कर भिक्षा के लिए मेरे पास आए। อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. ปติภูติ ปติภูโตติ ปติภู, ‘‘โคณสฺส ปติภู’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. โคตฺรภูติ โคตฺตสงฺขาตํ อมตมหานิพฺพานํ อารมฺมณํ กตฺวา ภูโตติ โคตฺรภู, โสตาปตฺติมคฺคสฺส อนนฺตรปจฺจเยน สิขาปฺปตฺตพลววิปสฺสนาจิตฺเตน สมนฺนาคโต ปุคฺคโล. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา ‘‘กตโม จ ปุคฺคโล โคตฺรภู? เยสํ ธมฺมานํ สมนนฺตรา อริยธมฺมสฺส อวกฺกนฺติ โหติ, เตหิ ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต ปุคฺคโล โคตฺรภู’’ติ, อิทเมเวตฺถ อตฺถสาธกํ วจนํ. อปิจ สมโณติ โคตฺตมตฺตมนุภวมาโน กาสาวกณฺฐสมโณปิ โคตฺรภู. โส หิ ‘‘สมโณ’’ติ โคตฺตมตฺตํ อนุภวติ วินฺทติ, น สมณธมฺเม อตฺตนิ อวิชฺชมานตฺตาติ ‘‘โคตฺรภู’’ติ วุจฺจติ, ‘‘ภวิสฺสนฺติ โข ปนานนฺท อนาคตมทฺธานํ โคตฺรภุโน กาสาวกณฺฐา ทุสฺสีลา ปาปธมฺมา’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. วตฺรภูติ สกฺโก. โส หิ มาตาปิติภรณาทีหิ สตฺตหิ วตฺเตหิ สกฺกตฺตํ ลภิตฺวา อญฺเญ เทเว วตฺเตน อภิภวตีติ วตฺรภู. อาคมฏฺฐกถายํ ปน ภูธาตุมฺหิ ลพฺภมานํ ปตฺติอตฺถมฺปิ คเหตฺวา ‘‘วตฺเตน อญฺเญ อภิภวิตฺวา เทวิสฺสริยํ ปตฺโตติ วตฺรภู’’ติ [Pg.106] วุตฺตํ, ‘‘วตฺรนามกํ วา อสุรํ อภิภวตีติ วตฺรภู’’ติ จ, ‘‘วตฺรภู ชยตํปิตา’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. เอตฺถ หิ วตฺรภูติ วตฺรนามกสฺส อสุรสฺส อภิภวิตา. ชยตํ ปิตาติ ชยนฺตานํ ปิตา. ‘‘สกฺโก อินฺโท ปุรินฺทโท’’ อิจฺจาทิ ปริยายวจนํ. อิทํ ตุ ธาตาธิกาเร ปกาเสสฺสาม. ปราภิภูติ ปรมภิภวตีติ ปราภิภู. เอวํ รูปาภิภูติอาทีสุปิ. สพฺพาภิภูติ สพฺพมภิภวิตพฺพํ อภิภวตีติ สพฺพาภิภู. สพฺพาภิภูติ จ อิทํ นามํ ตถาคตสฺเสว ยุชฺชติ. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – यह इस अर्थ का साधक वचन है। प्रतिभू अर्थात् जो प्रतिभूत (प्रतिज्ञाबद्ध) है, वह प्रतिभू है; 'बैल का प्रतिभू' यह इस अर्थ का साधक वचन है। गोत्रभू अर्थात् गोत्र संज्ञक अमृत महानिर्वाण को आलम्बन बनाकर जो हुआ है, वह गोत्रभू है; जो स्रोतापत्ति मार्ग के अनन्तर प्रत्यय से शिखर पर पहुँचे हुए बलवान विपश्यना चित्त से युक्त पुद्गल है। भगवान ने कहा भी है— 'कौन सा पुद्गल गोत्रभू है? जिन धर्मों के अनन्तर आर्य धर्म का अवतरण होता है, उन धर्मों से युक्त पुद्गल गोत्रभू है', यही यहाँ अर्थ-साधक वचन है। इसके अतिरिक्त, 'श्रमण' इस गोत्र मात्र का अनुभव करने वाला काषाय-कण्ठ (गेरुआ वस्त्र गले में धारण करने वाला) श्रमण भी गोत्रभू है। वह 'श्रमण' इस गोत्र मात्र का अनुभव करता है, प्राप्त करता है, किन्तु स्वयं में श्रमण-धर्मों के न होने के कारण उसे 'गोत्रभू' कहा जाता है; 'हे आनन्द! भविष्य में काषाय-कण्ठ वाले, दुःशील और पापधर्मी गोत्रभू होंगे'—यह इस अर्थ का साधक वचन है। वत्रभू अर्थात् शक्र। वह माता-पिता के भरण-पोषण आदि सात व्रतों से शक्रत्व प्राप्त कर अन्य देवों को व्रत से अभिभूत करता है, इसलिए वत्रभू है। आगम-अट्ठकथा में तो 'भू' धातु में प्राप्त होने वाले 'प्राप्ति' अर्थ को भी लेकर 'व्रत से अन्यों को अभिभूत कर देव-ऐश्वर्य को प्राप्त हुआ, इसलिए वत्रभू है' ऐसा कहा गया है, और 'वत्र नामक असुर को अभिभूत करता है, इसलिए वत्रभू है' ऐसा भी; 'वत्रभू जयताम्पिता' यह इस अर्थ का साधक वचन है। यहाँ वत्रभू का अर्थ वत्र नामक असुर का अभिभविता (विजेता) है। जयताम्पिता अर्थात् जीतने वालों का पिता। 'शक्र, इन्द्र, पुरिन्दद' इत्यादि पर्यायवाची शब्द हैं। इसे हम धातु-अधिकार में प्रकाशित करेंगे। पराभिभू अर्थात् जो दूसरों को अभिभूत करता है, वह पराभिभू है। इसी प्रकार रूपाभिभू आदि में भी। सर्वाभिभू अर्थात् जो सब अभिभूत करने योग्य को अभिभूत करता है, वह सर्वाभिभू है। और यह 'सर्वाभिभू' नाम तथागत के लिए ही उपयुक्त है। भगवान ने कहा भी है— ‘‘สพฺพาภิภู สพฺพวิทูหมสฺมิ,สพฺเพสุ ธมฺเมสุ อนูปลิตฺโต; สพฺพญฺชโห ตณฺหกฺขเย วิมุตฺโต,สยํ อภิญฺญาย กมุทฺทิเสยฺย’’นฺติ. मैं सबको जीतने वाला, सबको जानने वाला हूँ, सभी धर्मों में निर्लिप्त हूँ; सबको त्यागने वाला, तृष्णा के क्षय होने पर विमुक्त हूँ, स्वयं जानकर मैं किसे (गुरु) निर्दिष्ट करूँ? อูการนฺตปุลฺลิงฺคนิทฺเทโส. นิยตปุลฺลิงฺคนิทฺเทโสยํ. ऊकारान्त पुल्लिंग निर्देश। यह नियत पुल्लिंग निर्देश है। อิทานิ อนิยตลิงฺคานํ นิยตลิงฺเคสุ ปกฺขิตฺตานํ ภูตปราภูต สมฺภูตสทฺทาทีนํ นิทฺเทโส วุจฺจติ. ตตฺร ภูโตติ อตฺตโน ปจฺจเยหิ อภวีติ ภูโต, ภูโตติ ชาโต สญฺชาโต นิพฺพตฺโต อภินิพฺพตฺโต ปาตุภูโต, ภูโตติ วา ลทฺธสรูโป โย โกจิ สวิญฺญาณโก วา อวิญฺญาณโก วา. อถ วา ตถากาเรน ภวตีติ ภูโต, ภูโตติ สจฺโจ ตโถ อวิตโถ อวิปรีโต โย โกจิ, เอตฺถ โย ภูตสทฺโท สจฺจตฺโถ, ตสฺส ‘‘ภูตฏฺโฐ’’ติ อิทเมตฺถ สาธกํ วจนํ. ปราภูโตติ ปราภวีติ ปราภูโต. สุฏฺฐุ ภูโตติ สมฺภูโต. วิเสเสน ภูโตติ วิภูโต. วิสฺสุโต ภูโตติ วา วิภูโต, ‘‘วิภูตารมฺมณ’’นฺติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. วิภวีติ วา วิภูโต, วินฏฺโฐติ อตฺโถ, ‘‘รูเป วิภูเต น ผุสนฺติ ผสฺสา’’ติ [Pg.107] อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. ปากโฏ ภูโตติ ปาตุภูโต. อาวิ ภวตีติ อาวิภูโต. เอวํ ติโรภูโต. วินาภูโต. ภวิตุมนุจฺฉวิโกติ ภพฺโพ. ปริภวิยเต โสติ ปริภูโต. เยน เกนจิ โย ปีฬิโต หีฬิโต วา, โส ปริภูโต. คมฺยมานตฺโถ ยถากามจารี. อภิภวิยฺยเต โสติ อภิภูโต. อธิภวิยเต โสติ อธิภูโต. เอวํ อทฺธภูโต. เอตฺถ อธิสทฺเทน สมานตฺโถ อทฺธสทฺโท, ‘‘จกฺขุ ภิกฺขเว อทฺธภูตํ, รูปา อทฺธภูตา, จกฺขุวิญฺญาณํ อทฺธภูต’’นฺติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ, ตถา ‘‘อิธ ภิกฺขเว ภิกฺขุ น เหว อนทฺธภูตํ อตฺตานํ น อทฺธภาเวตี’’ติ ปทมฺปิ. ตตฺถ อนทฺธภูตนฺติ ทุกฺเขน อนธิภูตํ. ทุกฺเขน อนธิภูโต นาม มนุสฺสตฺตภาโว วุจฺจติ, ตํ น อทฺธภาเวติ นาภิภวตีติ สุตฺตปทตฺโถ. अब अनियत लिंग वाले शब्दों का, जिन्हें नियत लिंगों में रखा गया है, जैसे भूत, पराभूत, सम्भूत आदि शब्दों का निर्देश कहा जाता है। वहाँ 'भूत' अर्थात् जो अपने प्रत्ययों (कारणों) से हुआ है, वह भूत है; भूत अर्थात् जो उत्पन्न, संजात, निर्वृत्त, अभिनिर्वृत्त, प्रादुर्भूत हुआ है; अथवा भूत अर्थात् जिसने स्वरूप प्राप्त कर लिया है, चाहे वह सविज्ञानक हो या अविज्ञानक। अथवा जो उस प्रकार से होता है, वह भूत है; भूत अर्थात् जो सत्य, तथ्य, अवितथ, अविपरीत है; यहाँ जो 'भूत' शब्द सत्य के अर्थ में है, उसके लिए 'भूतत्थो' (सत्य अर्थ) यह यहाँ साधक वचन है। पराभूत अर्थात् जो पराभव को प्राप्त हुआ, वह पराभूत है। भली-भाँति हुआ, वह सम्भूत है। विशेष रूप से हुआ, वह विभूत है। अथवा जो विख्यात हुआ, वह विभूत है; 'विभूतारम्मणं' यह इस अर्थ का साधक वचन है। अथवा जो विभव (विनाश) को प्राप्त हुआ, वह विभूत है, जिसका अर्थ विनष्ट है; 'रूप के विभूत (नष्ट) होने पर स्पर्श स्पर्श नहीं करते' यह इस अर्थ का साधक वचन है। जो प्रकट हुआ, वह प्रादुर्भूत है। जो आविर्भूत होता है, वह आविर्भूत है। इसी प्रकार तिरोभूत, विनाभूत। जो होने के योग्य है, वह भव्य है। जिसका परिभव किया जाता है, वह परिभूत है। जो किसी के द्वारा पीड़ित या तिरस्कृत किया गया है, वह परिभूत है। गम्यमान अर्थ वाला 'यथाकामचारी' है। जिसका अभिभव किया जाता है, वह अभिभूत है। जिसका अधिभव किया जाता है, वह अधिभूत है। इसी प्रकार अद्धभूत। यहाँ 'अधि' शब्द के समान अर्थ वाला 'अद्ध' शब्द है; 'हे भिक्षुओं! चक्षु अद्धभूत (अभिभूत) है, रूप अद्धभूत हैं, चक्षु-विज्ञान अद्धभूत है' यह इस अर्थ का साधक वचन है; उसी प्रकार 'यहाँ भिक्षुओं! भिक्षु अनद्धभूत आत्मा को अद्धभावित नहीं करता' यह पद भी है। वहाँ 'अनद्धभूत' का अर्थ है जो दुःख से अनभिभूत है। दुःख से अनभिभूत मनुष्य-आत्मभाव को कहा जाता है, उसे 'अद्धभावित' नहीं करता अर्थात् अभिभूत नहीं करता, यह सूत्र-पद का अर्थ है। อนุภวิยเต โสติ อนุภูโต. เอวํ สมนุภูโต. ปจฺจนุภูโต. ภาวิโต. เอตฺถ ภาวิโตติ อิมินา สมานาธิกรณํ ‘‘สติสมฺโพชฺฌงฺโค โข กสฺสป มยา สมฺมทกฺขาโต ภาวิโต’’ติอาทีสุ คุณีวาจกํ ปธานปทํ สาสเน ทฏฺฐพฺพํ. ติตฺถิยสมเย ปน ภาวิโตติ กามคุโณ วุจฺจติ. วุตฺตญฺเหตํ ปาฬิยํ ‘‘น ภาวิตมาสีสตี’’ติ. ตตฺร ภาวิตา นาม ปญฺจ กามคุณา, เต น อาสีสติ น เสวตีติ สุตฺตปทตฺโถ. สมฺภาวิยเต โสติ สมฺภาวิโต. เอวํ วิภาวิโต. ปริภาวิโต. อนุปริภูโต. มนํปริภูโตติ มนํ ปริภวิยิตฺถ โสติ มนํปริภูโต. เอตฺถ มนํปริภูโตติ อีสกํ อปฺปตฺตปริภวโน วุจฺจติ. มนนฺติ หิ นิปาตปทํ. ‘‘อติปณฺฑิเตน ปุตฺเตน, มนมฺหิ อุปกูลิโต, เทวทตฺเตน อตฺตโน อพุทฺธภาเวน เจว ขนฺติเมตฺตาทีนญฺจ [Pg.108] อภาเวน กุมารกสฺสปตฺเถโร จ เถรี จ มนํ นาสิโต, มนํ วุฬฺโห อโหสี’’ติอาทีสุ จสฺส ปโยโค เวทิตพฺโพ. อตฺร มนํสทฺทสฺส กิญฺจิ ยุตฺตึ วทาม. जिसका अनुभव किया जाता है, वह 'अनुभूत' है। इसी प्रकार 'समनुभूत', 'प्रत्यनुभूत' और 'भावित' हैं। यहाँ शासन में "हे कस्सप! मेरे द्वारा स्मृति-सम्बोध्यङ्ग भली-भाँति कहा गया और भावित किया गया है" इत्यादि में 'भावित' शब्द को गुणवाचक प्रधान पद के रूप में देखना चाहिए। किन्तु तीर्थिकों (अन्य मतों) के सिद्धान्त में 'भावित' कामगुणों को कहा जाता है। पालि में यह कहा गया है - "न भावितमासीसति" (वह भावित की इच्छा नहीं करता)। वहाँ 'भावित' का अर्थ पाँच कामगुण हैं; वह उनकी इच्छा नहीं करता, उनका सेवन नहीं करता - यह सूत्र का अर्थ है। जिसकी सम्भावना (प्रशंसा) की जाती है, वह 'सम्भावित' है। इसी प्रकार 'विभावित', 'परिभावित', 'अनुपरिभूत' हैं। 'मनां-परिभूत' का अर्थ है - जिसका थोड़ा (मनां) तिरस्कार किया गया हो। यहाँ 'मनां-परिभूत' उसे कहा जाता है जिसे अल्प तिरस्कार प्राप्त हुआ हो। 'मनां' एक निपात पद है। "अति-पण्डित पुत्र के द्वारा वह थोड़ा (मनां) संतप्त किया गया", "देवदत्त के द्वारा अपने अबुद्ध-भाव (बुद्धत्व की कमी) तथा क्षान्ति-मैत्री आदि के अभाव के कारण कुमार कस्सप स्थविर और स्थेरी को थोड़ा (मनां) नष्ट किया गया, थोड़ा (मनां) बहाया गया" - इत्यादि में इसका प्रयोग समझना चाहिए। यहाँ 'मनां' शब्द की कुछ युक्ति (तर्क) कहते हैं। มนํสทฺโท ทฺวิธา ภินฺโน, นามํ เนปาติกญฺจิติ; สนฺตํ ตสฺส มนํ โหติ, มนมฺหิ อุปกูลิโตติ. 'मन' शब्द दो प्रकार से विभाजित है - नाम (संज्ञा) और निपात। उसका मन शांत होता है, मन में झुलसा हुआ (उपकुलित)। ปริภวิตพฺโพติ อญฺเญน ปริภวิตุํ สกฺกุเณยฺโยติ ปริภวิตพฺโพ. เอวํ ปริโภตฺตพฺโพ ปริภวนีโย. ตพฺพปจฺจยฏฺฐาเน หิ สกฺกุเณยฺยปทโยชนา ทิสฺสติ ‘‘อลทฺธํ อารมฺมณํ ลทฺธพฺพํ ลภนียํ ลทฺธุํ วา สกฺกุเณยฺย’’นฺติ. อถ วา ปริภวนมรหตีติ ปริภวิตพฺโพ. เอวํ ปริโภตฺตพฺโพ ปริภวนีโย. ตถา หิ ตพฺพปจฺจยฏฺฐาเน อรหติปทโยชนา ทิสฺสติ ‘‘ปริสกฺกุเณยฺยํ ลาภมรหตีติ ลทฺธพฺพ’’นฺติ. เอตฺถ ปน ปริโภตฺตพฺโพติ ปทสฺส อตฺถิภาเว ‘‘ขตฺติโย โข มหาราช ทหโรติ น อุญฺญาตพฺโพ น ปริโภตฺตพฺโพ’’ติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. อภิอธิปุพฺพา ภูธาตุโย สมานตฺถา. เสสานิ ทุกานิ นยานุสาเรน เญยฺยานิ. ภมาโนติ ภวตีติ ภมาโน, มชฺเฌ วการโลโป ทฏฺฐพฺโพ. อตฺริทํ วตฺตพฺพํ – 'परिभवितब्बो' का अर्थ है - दूसरे के द्वारा तिरस्कृत किए जाने योग्य। इसी प्रकार 'परिभोत्तब्बो' और 'परिभवनीयो' भी हैं। 'तब्ब' प्रत्यय के स्थान पर 'सक्कुणेय्य' (समर्थ) पद का प्रयोग देखा जाता है, जैसे - 'अलद्धं आरम्मणं लद्धब्बं लभनीयं लद्धुं वा सक्कुणेय्यं' (अप्राप्त आलम्बन प्राप्त करने योग्य, प्राप्त करने में समर्थ)। अथवा 'परिभवन' के योग्य होने के कारण 'परिभवितब्बो' है। इसी प्रकार 'परिभोत्तब्बो' और 'परिभवनीयो' भी हैं। क्योंकि 'तब्ब' प्रत्यय के स्थान पर 'अरहति' (योग्य) पद का प्रयोग देखा जाता है, जैसे - 'परिसक्कुणेय्यं लाभमरहतीति लद्धब्बं'। यहाँ 'परिभोत्तब्बो' पद के अस्तित्व के विषय में पालि उदाहरण है - 'हे महाराज! क्षत्रिय छोटा होने पर भी अवज्ञा या तिरस्कार के योग्य (परिभोत्तब्बो) नहीं है।' 'अभि' और 'अधि' उपसर्ग पूर्वक 'भू' धातु समान अर्थ वाले हैं। शेष द्विकों को नय के अनुसार समझना चाहिए। 'भमानो' का अर्थ 'भवति' (होता हुआ) है, यहाँ मध्य में 'व' कार का लोप समझना चाहिए। यहाँ यह कहना चाहिए - ‘‘กึ โส ภมาโน สจฺจโก’’, อิจฺจตฺร ปาฬิยํ ปน; รูปํ ภวติธาตุสฺส, วโลเปเนว ทิสฺสติ. 'क्या वह सचक (भमानो) है', यहाँ पालि में 'भवति' धातु का रूप 'व' के लोप के साथ ही दिखाई देता है। อตฺรายํ ปาฬิ ‘‘กึ โส ภมาโน สจฺจโก นิคณฺฐปุตฺโต, โย ภควโต วาทํ อาโรเปสฺสตี’’ติ. วิภวมาโนติ วิภวตีติ วิภวมาโน. เอวํ ปริภวมาโนติอาทีสุ. ตตฺถ ‘‘อภิสมฺโภนฺโต’’ติมสฺส กโรนฺโต นิปฺผาเทนฺโต อิจฺเจวตฺโถ. ‘‘สพฺพานิ อภิสมฺโภนฺโต, ส ราชวสตึ วเส’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. ยสฺมา ปนิมานิ [Pg.109] ‘‘ภวมาโน’’ติอาทีนิ วิปฺปกตปจฺจตฺตวจนานิ, ตสฺมา สรมาโน โรทติ, คจฺฉนฺโต คณฺหาติ, ‘‘คจฺฉนฺโต โส ภารทฺวาโช, อทฺทส อจฺจุตํ อิสิ’’นฺติอาทีนิ วิย ปริปุณฺณุตฺตรกฺริยาปทานิ กตฺวา ราชา ภวมาโน สมฺปตฺติมนุภวตีติอาทินา โยเชตพฺพานิ. ‘‘สรมาโน คจฺฉนฺโต’’ติอาทีนิ หิ ‘‘ยาโต คโต ปตฺโต’’ติอาทีหิ สทิสานิ น โหนฺติ, อุตฺตรกฺริยาปทาเปกฺขกานิ โหนฺติ ตฺวาปจฺจยนฺตปทานิ วิยาติ. यहाँ यह पालि है - 'वह सचक निगण्ठपुत्त कौन (होता हुआ) है, जो भगवान पर वाद (आरोप) लगाएगा?' 'विभवमानो' का अर्थ है 'विभवति' (विनाश होता हुआ या ऐश्वर्यवान होता हुआ)। इसी प्रकार 'परिभवमानो' आदि में भी। वहाँ 'अभिसम्भोन्तो' का अर्थ है - उसे करता हुआ या निष्पन्न करता हुआ। 'सबको वश में करता हुआ (अभिसम्भोन्तो), वह राजभवन में रहे' - यह इस अर्थ का साधक वचन है। चूँकि ये 'भवमानो' आदि वर्तमानकालिक कृदन्त हैं, इसलिए 'सरमानो रोदति' (याद करता हुआ रोता है), 'गच्छन्तो गण्हाति' (जाता हुआ पकड़ता है), 'जाता हुआ वह भारद्वाज, अच्युत ऋषि को देखा' आदि के समान पूर्ण उत्तर-क्रिया पदों के साथ जोड़कर 'राजा होता हुआ (भवमानो) सम्पत्ति का अनुभव करता है' आदि के रूप में जोड़ना चाहिए। 'सरमानो गच्छन्तो' आदि 'यातो गतो पत्तो' आदि के समान (स्वतंत्र) नहीं होते, बल्कि 'त्वा' प्रत्ययान्त पदों की तरह उत्तर-क्रिया पद की अपेक्षा रखते हैं। ปริภวิยมาโนติ ปริภวิยเต โสติ ปริภวิยมาโน. เอวํ ปริภุยฺยมาโนติอาทีสุปิ. อิมานิปิ วิปฺปกตปจฺจตฺตวจนานิ, ตสฺมา ‘‘ราชปุริเสหิ นียมาโน โจโร เอวํ จินฺเตสี’’ติอาทีนิ วิย ปริปุณฺณุตฺตรกฺริยาปทานิ กตฺวา อญฺเญหิ ปริภวิยมาโน ตาณํ คเวสติ. โภโค ปุคฺคเลนานุภวิยมาโน ปริกฺขยํ คจฺฉตีติอาทินา โยเชตพฺพานิ. เอวํ สพฺพตฺร อีทิเสสุ วิปฺปกตวจเนสุ โยเชตพฺพานิ. อยํ อนิยตลิงฺคานํ นิยตลิงฺเคสุ ปกฺขิตฺตานํ ภูต ปราภูต สมฺภูตสทฺทานํ นิทฺเทโส. อิจฺเจวํ ปุลฺลิงฺคานํ ภูธาตุมยานํ ยถารหํ นิพฺพจนาทิวเสน นิทฺเทโส วิภาวิโต. 'परिभवियमानो' का अर्थ है - जो तिरस्कृत किया जा रहा है। इसी प्रकार 'परिभुय्यमानो' आदि में भी। ये भी वर्तमानकालिक कर्मवाच्य पद हैं, इसलिए 'राजपुरुषों द्वारा ले जाया जाता हुआ (नीयमानो) चोर ऐसा सोचने लगा' आदि के समान पूर्ण उत्तर-क्रिया पदों के साथ जोड़कर 'दूसरों द्वारा तिरस्कृत किया जाता हुआ (परिभवियमानो) रक्षा खोजता है' - ऐसा समझना चाहिए। 'भोग व्यक्ति द्वारा अनुभव किया जाता हुआ क्षय को प्राप्त होता है' आदि के रूप में जोड़ना चाहिए। इस प्रकार सभी जगह ऐसे वर्तमानकालिक पदों में जोड़ना चाहिए। यह अनियत लिंग वाले शब्दों का नियत लिंगों में प्रक्षिप्त 'भूत', 'पराभूत', 'सम्भूत' शब्दों का निर्देश है। इस प्रकार 'भू' धातु से बने पुल्लिंग शब्दों का यथायोग्य प्रयोग आदि के अनुसार निर्देश स्पष्ट किया गया। อิทานิ อิตฺถิลิงฺคนิทฺเทโส วุจฺจติ – ตตฺร ภาวิกาติ ภาเวตีติ ภาวิกา. ยา ภาวนํ กโรติ, สา ภาวิกา. ภาวนาติ วฑฺฒนา พฺรูหนา ผาติกรณํ อาเสวนา พหุลีกาโร. วิภาวนาติ ปกาสนา สนฺทสฺสนา. อถ วา วิภาวนาติ อภาวนา อนฺตรธาปนา. สมฺภาวนาติ อุกฺกํสนา โถมนา. ปริภาวนาติ วาสนา, สมนฺตโต วา วฑฺฒนา. อาการนฺติตฺถิลิงฺคนิทฺเทโส. अब स्त्रीलिंग का निर्देश कहा जाता है - वहाँ 'भाविका' का अर्थ है - जो भावित करती है। जो भावना करती है, वह 'भाविका' है। 'भावना' का अर्थ है - बढ़ाना, संवर्धन करना, वृद्धि करना, सेवन करना, बार-बार करना। 'विभावना' का अर्थ है - प्रकाशन, प्रदर्शन। अथवा 'विभावना' का अर्थ है - अभावना, अन्तर्धान करना। 'सम्भावना' का अर्थ है - उत्कर्ष, प्रशंसा। 'परिभावना' का अर्थ है - वासना (संस्कार) अथवा चारों ओर से बढ़ाना। यह आकारान्त स्त्रीलिंग का निर्देश है। ภูมีติ สตฺตายมานา ภวตีติ ภูมิ, อถ วา ภวนฺติ ชายนฺติ วฑฺฒนฺติ เจตฺถ ถาวรา จ ชงฺคมา จาติ ภูมิ. ภูมิ วุจฺจติ [Pg.110] ปถวี. ‘‘ปฐมาย ภูมิยา ปตฺติยา’’ติอาทีสุ ปน โลกุตฺตรมคฺโค ภูมีติ วุจฺจติ. ยา ปนนฺธพาลมหาชเนน วิญฺญาตา ปถวี, ตสฺสิมานิ อภิธานานิ – 'भूमि' का अर्थ है - जहाँ सत्तावान (प्राणी) होते हैं, अथवा जहाँ स्थावर और जंगम (प्राणी) उत्पन्न होते हैं और बढ़ते हैं, वह 'भूमि' है। भूमि को 'पृथ्वी' कहा जाता है। 'प्रथम भूमि की प्राप्ति के लिए' आदि में लोकोत्तर मार्ग को 'भूमि' कहा जाता है। जो अज्ञानी जनसाधारण द्वारा जानी गई पृथ्वी है, उसके ये नाम (पर्यायवाची) हैं - ‘‘ปถวี เมทนี ภูมิ, ภูรี ภู ปุถุวี มหี; ฉมา วสุมตี อุพฺพี, อวนี กุ วสุนฺธรา; ชคตี ขิติ วสุธา, ธรณี โค ธรา’’อิติ. 'पृथ्वी, मेदनी, भूमि, भूरी, भू, पुथुवी, मही; क्षमा, वसुमती, उर्वी, अवनी, कु, वसुन्धरा; जगती, क्षिति, वसुधा, धरणी, गो, धरा।' อตฺร ภู กุ โคสทฺทา ปถวีปทตฺเถ วตฺตนฺตีติ กุตฺร ทิฏฺฐปุพฺพาติ เจ? यहाँ 'भू', 'कु' और 'गो' शब्द पृथ्वी के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, यह पहले कहाँ देखा गया है? วิทฺวา ภูปาล กุมุท-โครกฺขาทิปเทสุ เว; ภู กุ โคอิติ ปถวี, วุจฺจตีติ วิภาวเย. विद्वान 'भूपाल', 'कुमुद' और 'गोरक्ष' आदि पदों में 'भू', 'कु' और 'गो' को पृथ्वी ही कहा जाता है - ऐसा स्पष्ट करें। ภูตีติ ภวนํ ภูติ. วิภูตีติ วินาโส, วิเสสโต ภวนํ วา, อถ วา วิเสสโต ภวนฺติ สตฺตา เอตายาติ วิภูติ, สมฺปตฺติเยว, ‘‘รญฺโญ วิภูติ. ปิหนียา วิภูติโย’’ติ จ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. อิการนฺติตฺถิลิงฺคนิทฺเทโส. 'भूति' का अर्थ है - होना (भवन) या समृद्धि। 'विभूति' का अर्थ है - विनाश, अथवा विशेष रूप से होना, अथवा जिसके द्वारा प्राणी विशेष रूप से होते हैं, वह 'विभूति' है, अर्थात् सम्पत्ति ही। 'राजा की विभूति' और 'स्पृहणीय विभूतियाँ' - यह इस अर्थ का साधक वचन है। यह इकारान्त स्त्रीलिंग का निर्देश है। ภูรีติ ปถวี. สา หิ ภวนฺติ เอตฺถาติ ภูรีติ วุจฺจติ, ภวติ วา ปญฺญายติ วฑฺฒติ จาติ ภูรี, อถ วา ภูตาภูตา ตนฺนิสฺสิตา สตฺตา รมนฺติ เอตฺถาติ ภูรี. ปถวีนิสฺสิตา หิ สตฺตา ปถวิยํเยว รมนฺติ, ตสฺมา สา อิมินาปิ อตฺเถน ภูรีติ วุจฺจติ. ภูรีสทฺทสฺส ปถวีวจเน ‘‘ภูริปญฺโญ’’ติ อตฺถสาธกํ วจนํ. อปิจ ภูรี วิยาติ ภูรี, ปญฺญา, ภูรีติ ปถวีสมาย วิตฺถตาย ปญฺญาย นามํ, ‘‘โยคา เว ชายตี ภูรี, อโยคา ภูริสงฺขโย’’ติ เอตฺถ อฏฺฐกถาวจนํ อิมสฺสตฺถสฺส สาธกํ. อถ วา ภูเต อตฺเถ รมตีติ ภูรี, ปญฺญาเยตํ นามํ, ‘‘ภูรี เมธา ปริณายิกา’’ติ เอตฺถ [Pg.111] อฏฺฐกถาวจนํ อิมสฺสตฺถสฺส สาธกํ. อถ วา ปญฺญาเยว ราคาทโย ธมฺเม อภิภวตีติ ภูรี, ราคาทิอรโย อภิภวตีติปิ ภูรี. ตถา หิ ปฏิสมฺภิทามคฺเค อายสฺมตา สาริปุตฺเตน วุตฺตํ ‘‘ราคํ อภิภูยตีติ ภูรี, ปญฺญา. โทสํ โมหํ…เป… ราโค อริ, ตํ อรึ มทฺทตีติ ภูรี, ปญฺญา. โทโส. โมโห…เป… สพฺเพ ภวคามิโน กมฺมา อริ, ตํ อรึ มทฺทตีติ ภูรี, ปญฺญา’’. เอตฺถ ปน ‘‘โคตฺรภู’’ติ ปทมิว ‘‘อริภู’’ติ วตฺตพฺเพปิ ภูสทฺทํ ปุพฺพนิปาตํ กตฺวา สนฺธิวเสน ภูรีติ ปทมุจฺจาริตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. อปิจ อีทิเสสุ นามิกปเทสุ วินาปิ อุปสคฺเคน อภิภวนาทิอตฺถา ลพฺภนฺติเยว, นาขฺยาติกปเทสูติ ทฏฺฐพฺพํ. อิทํ ปน ปญฺญาย ปริยายวจนํ – 'भूरी' का अर्थ पृथ्वी है। क्योंकि इसमें (प्राणी) उत्पन्न होते हैं, इसलिए इसे 'भूरी' कहा जाता है, अथवा यह उत्पन्न होती है, जानी जाती है और बढ़ती है, इसलिए 'भूरी' है; अथवा इसमें उत्पन्न और अनुत्पन्न उस पर आश्रित प्राणी रमण करते हैं, इसलिए 'भूरी' है। पृथ्वी पर आश्रित प्राणी पृथ्वी में ही रमण करते हैं, इसलिए इस अर्थ में भी इसे 'भूरी' कहा जाता है। 'भूरी' शब्द के पृथ्वी के अर्थ में 'भूरिपञ्ञो' (विशाल प्रज्ञा वाला) यह वचन अर्थ-साधक है। इसके अतिरिक्त, पृथ्वी के समान होने के कारण प्रज्ञा को 'भूरी' कहा जाता है; पृथ्वी के समान विस्तृत प्रज्ञा का नाम 'भूरी' है, 'योग से प्रज्ञा (भूरी) उत्पन्न होती है, अयोग से प्रज्ञा का क्षय होता है' - यहाँ अट्ठकथा का यह वचन इस अर्थ का साधक है। अथवा जो विद्यमान अर्थों में रमण करती है, वह 'भूरी' है, यह प्रज्ञा का नाम है; 'भूरी मेधा परिणायिका' - यहाँ अट्ठकथा का यह वचन इस अर्थ का साधक है। अथवा प्रज्ञा ही राग आदि धर्मों को अभिभूत (पराजित) करती है, इसलिए 'भूरी' है; राग आदि शत्रुओं (अरि) को अभिभूत करती है, इसलिए भी 'भूरी' है। जैसा कि प्रतिसम्भिदामग्ग में आयुष्मान सारिपुत्र द्वारा कहा गया है - 'राग को अभिभूत करती है, इसलिए प्रज्ञा भूरी है। द्वेष को, मोह को... राग शत्रु है, उस शत्रु का मर्दन करती है, इसलिए प्रज्ञा भूरी है। द्वेष... मोह... सभी भवगामी कर्म शत्रु हैं, उन शत्रुओं का मर्दन करती है, इसलिए प्रज्ञा भूरी है।' यहाँ 'गोत्रभू' पद के समान 'अरिभू' कहना चाहिए था, फिर भी 'भू' शब्द को पहले रखकर संधि के कारण 'भूरी' पद उच्चारित किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। इसके अतिरिक्त, ऐसे नामिक पदों में उपसर्ग के बिना भी अभिभव (पराजित करना) आदि अर्थ प्राप्त होते ही हैं, आख्यातिक (क्रिया) पदों में नहीं, ऐसा समझना चाहिए। यह प्रज्ञा के पर्यायवाची शब्द हैं - ปญฺญา ปชานนา จินฺตา, วิจโย อุปลกฺขณา; ปวิจโย จ ปณฺฑิจฺจํ, ธมฺมวิจยเมว จ. प्रज्ञा, प्रजानना, चिन्ता, विचय, उपलक्षणा, प्रविचय, पाण्डित्य और धर्मविचय। สลฺลกฺขณา จ โกสลฺลํ, ภูรี ปจฺจุปลกฺขณา; เนปุญฺญญฺเจว เวภพฺยา, เมธา จุปปริกฺขกา. संलक्षणा, कौशल, भूरी, प्रत्युपलक्षणा, नैपुण्य, वैभव्य, मेधा और उपपरीक्षा। สมฺปชญฺญญฺจ ปริณา-ยิกา เจว วิปสฺสนา; ปญฺญินฺทฺริยํ ปญฺญาพลํ, อโมโห สมฺมาทิฏฺฐิ จ; ปโตโท จาภิธมฺมสฺมา, อิมานิ คหิตานิ เม. सम्प्रजन्य, परिणायिका, विपश्यना, प्रज्ञेन्द्रिय, प्रज्ञाबल, अमोह और सम्यग्दृष्टि; तथा अभिधर्म से 'प्रतोद' (अंकुश), ये मेरे द्वारा ग्रहण किए गए हैं। ญาณํ ปญฺญาณมุมฺมงฺโค, สตฺโถ โสโต จ ทิฏฺฐิ จ; มนฺตา โพโธ พุทฺธิ พุทฺธํ, ปฏิภานญฺจ โพธิติ. ज्ञान, प्रज्ञान, उन्मङ्ग, शस्त्र, स्रोत, दृष्टि, मन्त्रा, बोध, बुद्धि, बुद्ध, प्रतिभान और बोधि। ธมฺโม วิชฺชา คติ โมนํ, เนปกฺกํ โค มตี มุติ; วีมํสา โยนิ โธนา จ, ปณฺฑา ปณฺฑิจฺจยมฺปิ จ; เวโท ปณฺฑิติยญฺเจว, จิกิจฺฉา มิริยาปิ จ. धर्म, विद्या, गति, मौन, नैपक्क्य, गो, मति, मुति, मीमांसा, योनि, धोना, पण्डा, पाण्डित्य, वेद, पाण्डित्य, चिकित्सा और मिरिया। ‘‘โสโต โพธี’’ติ ยํ วุตฺตํ, ญาณนามทฺวยํ อิทํ; พุทฺธปจฺเจกสมฺพุทฺธ-สาวกานมฺปิ รูหติ. 'स्रोत' और 'बोधि' - ये जो दो ज्ञान के नाम कहे गए हैं, ये बुद्धों, प्रत्येकबुद्धों और श्रावकों के लिए भी प्रयुक्त होते हैं। ‘‘อภิสมฺโพธิ [Pg.112] สมฺโพธิ’’, อิติ นามทฺวยํ ปน; ปจฺเจกพุทฺธสพฺพญฺญุ-พุทฺธานํเยว รูหติ. किन्तु 'अभिसम्बोधि' और 'सम्बोधि' - ये दो नाम केवल प्रत्येकबुद्धों और सर्वज्ञ बुद्धों के लिए ही प्रयुक्त होते हैं। อภิสมฺโพธิสงฺขาตา, ปรโมปปทา ปน; ญาณปณฺณตฺติ สพฺพญฺญุ-สมฺพุทฺธสฺเสว รูหติ. अभिसम्बोधि कही जाने वाली परम प्रज्ञप्ति (नाम) केवल सर्वज्ञ बुद्ध के लिए ही प्रयुक्त होती है। สมฺมาสมฺโพธิสงฺขาตา, อนุตฺตรปทาทิกา; พุทฺธา วา ญาณปณฺณตฺติ, สพฺพญฺญุสฺเสว รูหติ. सम्यक्सम्बोधि कही जाने वाली अनुत्तर पद आदि वाली बुद्ध-ज्ञान प्रज्ञप्ति केवल सर्वज्ञ के लिए ही प्रयुक्त होती है। ‘‘สพฺพญฺญุตา’’ติ ยํ วุตฺตํ, ญาณํ สพฺพญฺญุโนว ตํ; ยุชฺชเต อวเสสา ตุ, ญาณปญฺญตฺติ สพฺพคา. 'सर्वज्ञता' जो कहा गया है, वह ज्ञान केवल सर्वज्ञ का ही होता है; शेष ज्ञान-प्रज्ञप्तियाँ तो सभी (ज्ञानियों) के लिए सामान्य हैं। ญาณภาวมฺหิ สนฺเตปิ, ธมฺมจกฺขาทิกํ ปน; ปโยชนนฺตราภาวา, นาตฺร สนฺทสฺสิตํ มยาติ. ज्ञान का स्वभाव होने पर भी, 'धर्मचक्षु' आदि को अन्य प्रयोजन के अभाव के कारण यहाँ मेरे द्वारा नहीं दिखाया गया है। ภูตีติ ภูตสฺส ภริยา. ยถา หิ เปตสฺส ภริยา ‘‘เปตี’’ติ วุจฺจติ, เอวเมว ภูตสฺส ภริยา ‘‘ภูตี’’ติ วุจฺจติ. โภตีติ ยาย สทฺธึ กเถนฺเตน สา อิตฺถี ‘‘โภตี’’ อิติ วตฺตพฺพา, ตสฺมา อิมินา ปเทน อิตฺถี โวหริยตีติ จ ทฏฺฐพฺพํ. ยถา หิ ปุริเสน สทฺธึ กเถนฺเตน ปุริโส ‘‘ภวํ’’ อิติ โวหริยติ, เอวเมว อิตฺถิยา สทฺธึ กเถนฺเตน อิตฺถี ‘‘โภตี’’อิติ โวหริยติ. ‘‘กุโต นุ ภวํ ภารทฺวาโช, อิเม อาเนสิ ทารเก’’ติ, ‘‘อหํ โภตึ อุปฏฺฐิสฺสํ, มา โภตี กุปิตา อหู’’ติ เจตฺถ นิทสฺสนํ. อถ วา อิเธกจฺโจ สตฺโต อิตฺถิลิงฺควเสน ลทฺธนาโม, โส ‘‘โภตี’’อิติ วตฺตพฺโพ, ตสฺมา อิมินา ปเทน อิตฺถีปิ อิตฺถิลิงฺเคน ลทฺธนามา อนิตฺถีปิ โวหริยตีติ จ ทฏฺฐพฺพา. ตถา หิ เทวปุตฺโตปิ ‘‘เทวตา’’ติ อิตฺถิลิงฺควเสน โวหริตพฺพตฺตา เทวตาสทฺทมเปกฺขิตฺวา ‘‘โภตี’’อิติ โวหริโต, ปเคว เทวธีตา. ตถา หิ ‘‘โภตี จรหิ ชานาติ, ตํ เม อกฺขาหิ ปุจฺฉิตา’’ติ เอตฺถ ปน เทวตาสทฺทมเปกฺขิตฺวา ‘‘โภตี’’อิติ อิตฺถิ ลิงฺคโวหาโร กโต. อตฺรายํ [Pg.113] สุตฺตปทตฺโถ ‘‘ยทิ โส กุหโก ธนตฺถิโก ตาปโส น ชานาติ, โภตี เทวตา ปน ชานาติ กิ’’นฺติ. อปิจ – 'भूती' का अर्थ भूत की पत्नी है। जैसे प्रेत की पत्नी 'प्रेती' कहलाती है, वैसे ही भूत की पत्नी 'भूती' कहलाती है। 'भोती' वह शब्द है जिससे बात करते समय उस स्त्री को 'भोती' (आदरणीया/आप) कहना चाहिए, इसलिए इस पद से स्त्री का व्यवहार किया जाता है, ऐसा समझना चाहिए। जैसे पुरुष के साथ बात करते समय पुरुष को 'भवं' (आप) कहकर संबोधित किया जाता है, वैसे ही स्त्री के साथ बात करते समय स्त्री को 'भोती' कहकर संबोधित किया जाता है। 'हे भारद्वाज! आप (भवं) इन बालकों को कहाँ से लाए?' और 'मैं आपकी (भोती) सेवा करूँगा, आप (भोती) क्रोधित न हों' - यहाँ ये उदाहरण हैं। अथवा यहाँ कोई प्राणी स्त्रीलिंग के कारण नाम प्राप्त करता है, उसे 'भोती' कहना चाहिए, इसलिए इस पद से स्त्रीलिंग नाम प्राप्त स्त्री और जो स्त्री नहीं है (जैसे देवता), दोनों का व्यवहार किया जाता है, ऐसा समझना चाहिए। जैसे देवपुत्र को भी 'देवता' इस स्त्रीलिंग शब्द के कारण 'भोती' कहकर संबोधित किया जाता है, तो देवपुत्री की तो बात ही क्या है। जैसा कि 'आप (भोती) अब जानती हैं, पूछे जाने पर मुझे वह बताएँ' - यहाँ 'देवता' शब्द की अपेक्षा से 'भोती' इस स्त्रीलिंग शब्द का प्रयोग किया गया है। यहाँ सूत्र का अर्थ यह है - 'यदि वह कपटी धन का इच्छुक तापस नहीं जानता, तो क्या आप (भोती) देवता जानती हैं?' और भी - ‘‘อตฺถกาโมสิ เม ยกฺข, หิตกามาสิ เทวเต; กโรมิ เต ตํ วจนํ, ตฺวํสิ อาจริโย มมา’’ติ – हे यक्ष! तुम मेरे अर्थकामी हो, हे देवते! तुम मेरी हितकामी हो; मैं तुम्हारा वह वचन मानता हूँ, तुम मेरे आचार्य हो। มฏฺฐกุณฺฑลีวตฺถุสฺมึ ปุลฺลิงฺคยกฺขสทฺทมเปกฺขิตฺวา ‘‘อตฺถกาโม’’ติ ปุลฺลิงฺควเสน อิตฺถิลิงฺคญฺจ เทวตาสทฺทมเปกฺขิตฺวา ‘‘หิตกามา’’ติ อิตฺถิลิงฺควเสน ปุริสภูโต มฏฺฐกุณฺฑลี โวหริโต. อญฺญตฺราปิ เทวตาสทฺทมเปกฺขิตฺวา เทวปุตฺโต อิตฺถิลิงฺควเสน โวหริโต – मट्ठकुण्डली की कथा में, पुल्लिंग 'यक्ष' शब्द की अपेक्षा से 'अर्थकामी' इस पुल्लिंग का और स्त्रीलिंग 'देवता' शब्द की अपेक्षा से 'हितकामी' इस स्त्रीलिंग का प्रयोग करके, पुरुष रूप मट्ठकुण्डली को संबोधित किया गया है। अन्यत्र भी 'देवता' शब्द की अपेक्षा से देवपुत्र को स्त्रीलिंग के रूप में संबोधित किया गया है। ‘‘น ตฺวํ พาเล วิชานาสิ, ยถา อรหตํ วโจ’’ติ; ‘‘อตฺถกามาสิ เม อมฺม, หิตกามาสิ เทวเต’’ติ. ‘‘हे मूर्ख! तुम अर्हतों के वचनों को नहीं जानती हो’’; ‘‘हे माता! तुम मेरी अर्थकामा (कल्याण चाहने वाली) हो, हे देवी! तुम मेरी हितकामा हो’’। เอตฺถ ปน ‘‘เอหิ พาเล ขมาเปหิ, กุสราชํ มหพฺพล’’นฺติ เอตฺถ จ อิตฺถีเยว อิตฺถิลิงฺควเสน โวหริตา, ตสฺมา กตฺถจิ อิตฺถิปุริสปทตฺถสงฺขาตํ อตฺถํ อนเปกฺขิตฺวา ลิงฺคมตฺตเมวาเปกฺขิตฺวา โภตี เทวตา, โภตี สิลา, โภตี ชมฺพู, โภตึ เทวตนฺติอาทีหิ สทฺธึ ปจฺจตฺตวจนาทีนิ โยเชตพฺพานิ. กตฺถจิ ปน ลิงฺคญฺจ อตฺถญฺจ อเปกฺขิตฺวา ‘‘โภตี อิตฺถี, โภตึ เทว’’นฺติอาทินา โยเชตพฺพานิ. วิภาวินีติ วิภาเวตีติ วิภาวินี. เอวํ ปริภาวินีติอาทีสุปิ. อีการนฺติตฺถิลิงฺคนิทฺเทโส. यहाँ पुनः ‘‘हे बाले! आओ, महाबली कुसराज से क्षमा माँगो’’ - यहाँ स्त्री ही स्त्रीलिंग के रूप में व्यवहृत है, इसलिए कहीं-कहीं स्त्री-पुरुष रूपी अर्थ की अपेक्षा न कर केवल लिंग मात्र की अपेक्षा कर 'भोती देवता', 'भोती सिला', 'भोती जम्बू', 'भोतिं देवतं' आदि के साथ प्रथमा आदि विभक्तियों को जोड़ना चाहिए। कहीं-कहीं लिंग और अर्थ दोनों की अपेक्षा कर 'भोती इत्थी', 'भोतिं देवं' आदि के साथ जोड़ना चाहिए। 'विभाविनी' का अर्थ है जो विभावित (स्पष्ट) करती है। इसी प्रकार 'परिभाविनी' आदि में भी। यह ई-कारान्त स्त्रीलिंग का निर्देश है। ภูติ สตฺตายมานา ภวตีติ ภู. อถ วา ภวนฺติ ชายนฺติ วฑฺฒนฺติ เจตฺถ สตฺตสงฺขาราติ ภู. ภู วุจฺจติ ปถวี. อภูติ วฑฺฒิวิรหิตา กถา, น ภูตปุพฺพาติ วา อภู, อภูตปุพฺพา กถา. น ภูตาติ วา อภู, อภูตา กถา. ‘‘อภุํ เม กถํ นุ ภณสิ, ปาปกํ วต ภาสสี’’ติ อิทเมเตสมตฺถานํ [Pg.114] สาธกํ วจนํ. อูการนฺติตฺถิลิงฺคนิทฺเทโส. นิยติตฺถิลิงฺคนิทฺเทโสยํ. 'भू' उसे कहते हैं जो सत्तावान होकर होती है। अथवा, जहाँ सत्त्व और संस्कार उत्पन्न होते हैं और बढ़ते हैं, वह 'भू' है। 'भू' पृथ्वी को कहा जाता है। 'अभू' का अर्थ है वृद्धि रहित कथा, अथवा जो पहले नहीं हुआ वह 'अभू' है, अर्थात् अभूतपूर्व कथा। अथवा जो नहीं हुआ वह 'अभू' है, अर्थात् असत्य कथा। ‘‘तुम मुझसे अभूत (असत्य) कथा क्यों कहते हो, निश्चय ही तुम पापपूर्ण बात कह रहे हो’’ - यह इन अर्थों का साधक वचन है। यह ऊ-कारान्त स्त्रीलिंग का निर्देश है। यह नियत स्त्रीलिंग का निर्देश है। อนิยตลิงฺคานํ ปน นิยติตฺถิลิงฺเคสุ ปกฺขิตฺตานํ ภูตปราภูตสมฺภูตสทฺทาทีนํ นิทฺเทโส นยานุสาเรน สุวิญฺเญยฺโยว. อิจฺเจวํ อิตฺถิลิงฺคานํ ภูธาตุมยานํ ยถารหํ นิพฺพจนาทิวเสน นิทฺเทโส วิภาวิโต. अनियतलिंगी शब्दों का, जिन्हें नियत स्त्रीलिंगों में रखा गया है, जैसे 'भूत', 'पराभूत', 'सम्भूत' आदि शब्दों का निर्देश नय के अनुसार सुविज्ञेय ही है। इस प्रकार 'भू' धातु से बने स्त्रीलिंग शब्दों का यथायोग्य निर्वचन आदि के द्वारा निर्देश स्पष्ट किया गया है। อิทานิ นปุํสกลิงฺคนิทฺเทโส วุจฺจติ – ตตฺร ภูตนฺติ จตุพฺพิธํ ปถวีธาตุอาทิกํ มหาภูตรูปํ. ตญฺหิ อญฺเญสํ นิสฺสยภาเวน ภวตีติ ภูตํ, ภวติ วา ตสฺมึ ตทธีนวุตฺติตาย อุปาทารูปนฺติ ภูตํ. อถ วา ภูตนฺติ สตฺโต ภูตนามโก วา. ภูตนฺติ หิ นปุํสกวเสน สกโล สตฺโต เอวํนามโก จ ยกฺขาทิโก วุจฺจติ. ‘‘กาโล ฆสติ ภูตานิ, สพฺพาเนว สหตฺตนา. ยานีธ ภูตานิ สมาคตานิ, อุชฺฌาเปตฺวาน ภูตานิ, ตมฺหา ฐานา อปกฺกมี’’ติ เอวมาทีสุ นปุํสกปฺปโยโค เวทิตพฺโพ. คาตาพนฺธสุขตฺถํ ลิงฺควิปลฺลาโสติ เจ? ตนฺน, ‘‘ยกฺขาทีนิ มหาภูตานิ ยํ คณฺหนฺติ, เนว เตสํ ตสฺส อนฺโต, น พหิ ฐานํ อุปลพฺภตี’’ติ จุณฺณิยปทรจนายมฺปิ ภูตสทฺทสฺส นปุํสกลิงฺคตฺตทสฺสนโตติ อวคนฺตพฺพํ. มหาภูตนฺติ วุตฺตปฺปการํ จตุพฺพิธํ มหาภูตรูปํ. ตสฺส มหนฺตปาตุภาวาทีหิ การเณหิ มหาภูตตา เวทิตพฺพา. กถํ? มหนฺตํ ภูตนฺติ มหาภูตํ, มายาการสงฺขาเตน มหาภูเตน สมนฺติปิ มหาภูตํ, ยกฺขาทีหิ มหาภูเตหิ สมนฺติปิ มหาภูตํ, มหนฺเตหิ ฆาสจฺฉาทนาทิปจฺจเยหิ ภูตํ ปวตฺตนฺติปิ มหาภูตํ, มหาวิการภูตนฺติปิ มหาภูตํ. เอวํ มหนฺตปาตุภาวาทีหิ การเณหิ มหาภูตตา เวทิตพฺพา. อตฺริทํ สุฏฺฐุปลกฺขิตพฺพํ – अब नपुंसक लिंग का निर्देश कहा जाता है - वहाँ 'भूत' का अर्थ चार प्रकार के पृथ्वी धातु आदि महाभूत रूप हैं। क्योंकि वह अन्यों के आश्रय होने के कारण 'भूत' होता है, अथवा उसमें उसके अधीन होने के कारण उपादा रूप होते हैं, इसलिए वह 'भूत' है। अथवा 'भूत' का अर्थ प्राणी (सत्त्व) या 'भूत' नामक प्राणी है। क्योंकि नपुंसक लिंग के प्रयोग से समस्त प्राणी और यक्ष आदि को 'भूत' कहा जाता है। ‘‘काल सभी भूतों (प्राणियों) को स्वयं ही खा जाता है। जो भी भूत यहाँ एकत्रित हुए हैं, भूतों को रुलाकर उस स्थान से चला गया’’ - इत्यादि में नपुंसक लिंग का प्रयोग समझना चाहिए। यदि कहें कि गाथा के छंद की सुगमता के लिए लिंग विपर्यास (परिवर्तन) है? तो ऐसा नहीं है, क्योंकि ‘‘यक्ष आदि महाभूत जिसे पकड़ते हैं, न उसका अंत और न बाहर स्थान पाया जाता है’’ - इस चूर्णिका (गद्य) रचना में भी 'भूत' शब्द का नपुंसक लिंग के रूप में दर्शन होने से ऐसा समझना चाहिए। 'महाभूत' का अर्थ उक्त प्रकार के चार महाभूत रूप हैं। उसके महान प्रादुर्भाव आदि कारणों से 'महाभूतता' समझनी चाहिए। कैसे? महान भूत ही 'महाभूत' है; मायाकार रूपी महाभूत के समान होने से भी 'महाभूत' है; यक्ष आदि महाभूतों के समान होने से भी 'महाभूत' है; भोजन-वस्त्र आदि महान प्रत्ययों (कारणों) से उत्पन्न होकर प्रवृत्त होने से भी 'महाभूत' है; महान विकार रूप होने से भी 'महाभूत' है। इस प्रकार महान प्रादुर्भाव आदि कारणों से महाभूतता समझनी चाहिए। यहाँ यह अच्छी तरह लक्षित करना चाहिए - ปุนฺนปุํสกลิงฺโค [Pg.115] จ, ภูตสทฺโท ปวตฺตติ; ปณฺณตฺติยํ คุเณ เจว, คุเณเยวิตฺถิลิงฺคโก. 'भूत' शब्द पुल्लिंग और नपुंसक लिंग में प्रज्ञप्ति (संज्ञा) और गुण के अर्थ में प्रवृत्त होता है; और गुण के अर्थ में ही यह स्त्रीलिंग होता है। ภูต สมฺภูตสทฺทาทิ-นเย ปณฺณตฺติวาจกา; โยเชตพฺพา ติลิงฺเค เต, อิติ เญ ยฺยํ วิเสสโต. 'भूत', 'सम्भूत' आदि शब्दों के नय में प्रज्ञप्तिवाचक शब्दों को तीनों लिंगों में जोड़ना चाहिए, ऐसा विशेष रूप से जानना चाहिए। ‘‘ภูโต ติฏฺฐติ, ภูตานิ, ติฏฺฐนฺติ, สมโณ อยํ; อิทานิ ภูโต, จิตฺตานิ, ภูตานิ วิมลานิ ตุ. ‘‘भूत (प्राणी) खड़ा है, भूत (प्राणी) खड़े हैं, यह श्रमण अब भूत (उत्पन्न) हुआ है, चित्त निर्मल भूत (हुए) हैं। วญฺฌา ภูตา วธู เอสา’’, อิจฺจุทาหรณานิเม; วุตฺตานิ สุฏฺฐุ ลกฺเขยฺย, สาสนตฺถคเวสโก. यह वधू बाँझ (वन्ध्या) हो गई है’’ - शासन के अर्थ की खोज करने वाले को इन कहे गए उदाहरणों को अच्छी तरह लक्षित करना चाहिए। ภวิตฺตนฺติ วฑฺฒิตฏฺฐานํ. ตญฺหิ ภวนฺติ วฑฺฒนฺติ เอตฺถาติ ภวิตฺตนฺติ วุจฺจติ, ‘‘ชนิตฺตํ เม ภวิตฺตํ เม, อิติ ปงฺเก อวสฺสยิ’’นฺติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. 'भवित्त' का अर्थ है वृद्धि का स्थान। क्योंकि जहाँ उत्पन्न होते हैं और बढ़ते हैं, उसे 'भवित्त' कहा जाता है, ‘‘यह मेरा जनित्र (जन्मस्थान) है, यह मेरा भवित्त (वृद्धि का स्थान) है, ऐसा कहकर वह कीचड़ में सो गया’’ - यह इस अर्थ का साधक वचन है। ‘‘ภวิตฺตํ’’ อิติ ‘‘ภาวิตฺต’’-นฺติ จ ปาโฐ ทฺวิธา มยา; รสฺสตฺตทีฆภาเวน, ทิฏฺโฐ ภคฺควชาตเก. 'भवित्त' और 'भावित्त' - यह पाठ मेरे द्वारा ह्रस्व और दीर्घ के भेद से भग्गव जातक में दो प्रकार का देखा गया है। ภูนนฺติ ภวนํ ภูนํ วทฺธิ. ‘‘อหเมว ทูสิยา ภูนหตา, รญฺโญ มหาปตาปสฺสา’’ติ, ‘‘ภูนหจฺจํ กตํ มยา’’ติ จ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. 'भून' का अर्थ है भवन (होना) या वृद्धि। ‘‘मैं ही महाप्रतापी राजा की दूषिका और भ्रूणहन्ता (भूनहता) हूँ’’ और ‘‘मेरे द्वारा भ्रूणहत्या (भूनहच्च) की गई है’’ - यह इस अर्थ का साधक वचन है। ภวนนฺติ ภวนกฺริยา. อถ วา ภวนฺติ วฑฺฒนฺติ เอตฺถ สตฺตา ปุตฺตธีตาหิ นานาสมฺปตฺตีหิ จาติ ภวนํ วุจฺจติ เคโห, ‘‘เปตฺติกํ ภวนํ มมา’’ติ อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. ‘‘เคโห ฆรญฺจ อาวาโส, ภวนญฺจ นิเกตน’’นฺติ อิทํ ปริยายวจนํ. ปราภวนนฺติ อวทฺธิมาปชฺชนํ. สมฺภวนนฺติ สุฏฺฐุ ภวนํ. วิภวนนฺติ อุจฺเฉโท วินาโส วา. ปาตุภวนนฺติ ปากฏตา สรูปลาโภ อิจฺเจวตฺโถ. อาวิภวนนฺติ ปจฺจกฺขภาโว. ติโรภวนนฺติ ปฏิจฺฉนฺนภาโว. วินาภวนนฺติ วินาภาโว. โสตฺถิภวนนฺติ สุวตฺถิตา. ปริภวนนฺติ ปีฬนา หีฬนา วา. อภิภวนนฺติ วิธมนํ. อธิภวนนฺติ อชฺโฌตฺถรณํ[Pg.116]. อนุภวนนฺติ ปริภุญฺชนํ. สมนุภวนนฺติ สุฏฺฐุ ปริภุญฺชนํ. ปจฺจนุภวนนฺติ อธิปติภาเวนปิ สุฏฺฐุ ปริภุญฺชนํ. นิคฺคหีตนฺตนปุํสกลิงฺคนิทฺเทโส. 'भवन' का अर्थ है होने की क्रिया। अथवा, जहाँ प्राणी पुत्र-पुत्रियों और नाना प्रकार की सम्पत्तियों के साथ बढ़ते हैं, वह 'भवन' घर कहलाता है, ‘‘यह मेरा पैतृक भवन है’’ - यह इस अर्थ का साधक वचन है। 'गेह', 'घर', 'आवास', 'भवन' और 'निकेतन' - ये पर्यायवाची शब्द हैं। 'पराभवन' का अर्थ है वृद्धि न होना (पतन)। 'सम्भवन' का अर्थ है भली-भाँति होना। 'विभवन' का अर्थ है उच्छेद या विनाश। 'प्रादुर्भावन' का अर्थ है प्रकट होना या स्वरूप की प्राप्ति। 'आविभवन' का अर्थ है प्रत्यक्ष होना। 'तिरोभवन' का अर्थ है ओझल (अदृश्य) होना। 'विनाभवन' का अर्थ है वियोग। 'सोत्थिभवन' का अर्थ है कल्याण होना। 'परिभवन' का अर्थ है पीड़ित करना या तिरस्कार करना। 'अभिभवन' का अर्थ है परास्त करना। 'अधिभवन' का अर्थ है अभिभूत करना (दबा लेना)। 'अनुभवन' का अर्थ है उपभोग करना। 'समनुभवन' का अर्थ है भली-भाँति उपभोग करना। 'पच्चनुभवन' का अर्थ है अधिपति भाव से भी भली-भाँति उपभोग करना। यह निगृहीत (अं)-अन्त नपुंसक लिंग का निर्देश है। อตฺถวิภาวีติ อตฺถสฺส วิภาวนสีลํ จิตฺตํ วา ญาณํ วา กุลํ วา อตฺถวิภาวิ. เอวํ ธมฺมวิภาวิ. อิการนฺตนปุํสกลิงฺคนิทฺเทโส. 'अर्थविभावी' का अर्थ है अर्थ को स्पष्ट करने के स्वभाव वाला चित्त, ज्ञान या कुल। इसी प्रकार 'धम्मविभावी' (धर्मविभावी) है। यह इ-कारान्त नपुंसक लिंग का निर्देश है। โคตฺรภูติ ปญฺญตฺตารมฺมณํ มหคฺคตารมฺมณํ วา โคตฺรภุจิตฺตํ. ตญฺหิ กามาวจรโคตฺตมภิภวติ, มหคฺคตโคตฺตญฺจ ภาเวติ นิพฺพตฺเตตีติ ‘‘โคตฺรภู’’ติ วุจฺจติ. อปิจ โคตฺรภูติ นิพฺพานารมฺมณํ มคฺควีถิยํ ปวตฺตํ โคตฺรภุญาณํ วา สงฺขารารมฺมณํ วา ผลสมาปตฺติวีถิยํ ปวตฺตํ โคตฺรภุญาณํ. เตสุ หิ ปฐมํ ปุถุชฺชนโคตฺตมภิภวติ, อริยโคตฺตญฺจ ภาเวติ, โคตฺตาภิธานา จ นิพฺพานโต อารมฺมณกรณวเสน ภวตีติ ‘‘โคตฺรภู’’ติ วุจฺจติ, ทุติยํ ปน สงฺขารารมฺมณมฺปิ สมานํ อาเสวนปจฺจยภาเวน สสมฺปยุตฺตานิ ผลจิตฺตานิ โคตฺตาภิธาเน นิพฺพานมฺหิ ภาเวตีติ ‘‘โคตฺรภู’’ติ วุจฺจติ. อิทํ ปาฬิววตฺถานํ – ‘गोत्रभू’ प्रज्ञप्ति-आरम्बन या महग्गत-आरम्बन वाला गोत्रभू-चित्त है। क्योंकि यह कामावचर-गोत्र को अभिभूत करता है और महग्गत-गोत्र को भावित (विकसित) या उत्पन्न करता है, इसलिए इसे ‘गोत्रभू’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, गोत्रभू का अर्थ निर्वाण-आरम्बन वाला मार्ग-वीथि में प्रवृत्त गोत्रभू-ज्ञान है, या संस्कार-आरम्बन वाला फल-समापत्ति-वीथि में प्रवृत्त गोत्रभू-ज्ञान है। उनमें से पहला पृथग्जन-गोत्र को अभिभूत करता है और आर्य-गोत्र को भावित करता है, और निर्वाण को आरम्बन बनाने के कारण ‘गोत्र’ संज्ञा से ‘गोत्रभू’ कहा जाता है। दूसरा, संस्कार-आरम्बन होने पर भी, आसेवन-प्रत्यय के रूप में अपने सम्प्रयुक्त फल-चित्तों को ‘गोत्र’ संज्ञा वाले निर्वाण में भावित करता है, इसलिए ‘गोत्रभू’ कहा जाता है। यह पालि-व्यवस्थापन है - ‘‘โคตฺรภุ’’อิติ รสฺสตฺต-วเสน กถิตํ ปทํ; นปุํสกนฺติ วิญฺเญยฺยํ, ญาณจิตฺตาทิเปกฺขกํ. ‘गोत्रभु’ यह पद ह्रस्वत्व के कारण कहा गया है; इसे नपुंसक लिंग समझना चाहिए, जो ज्ञान और चित्त आदि की अपेक्षा रखता है। ‘‘โคตฺรภู’’อิติ ทีฆตฺต-วเสน กถิตํ ปน; ปุลฺลิงฺคมิติ วิญฺเญยฺยํ, ปุคฺคลาทิกเปกฺขกํ. ‘गोत्रभू’ यह पद दीर्घत्व के कारण कहा गया है; इसे पुल्लिंग समझना चाहिए, जो पुद्गल (व्यक्ति) आदि की अपेक्षा रखता है। ทีฆภาเวน วุตฺตํ ตุ, นปุํสกนฺติ โน วเท; พินฺทุวนฺตี’ตเร เภทา, ตโย อิติ หิ ภาสิตา. दीर्घ भाव से कहे गए को नपुंसक नहीं कहना चाहिए; अन्य भेदों में बिन्दु (अनुस्वार) वाले तीन रूप कहे गए हैं। อีการนฺตา จ อูทนฺตา, รสฺสตฺตํ ยนฺติ สาสเน; นปุํสกตฺตํ ปตฺวาน, สหภุ สีฆยายิติ. शासन (बुद्ध-वचन) में ईकारान्त और ऊकारान्त शब्द नपुंसकत्व प्राप्त होने पर ह्रस्व हो जाते हैं, जैसे ‘सहभु’ और ‘सीघयायि’। จิตฺเตน สห ภวตีติ จิตฺตสหภุ, จิตฺเตน สห น ภวตีติ นจิตฺตสหภุ, รูปํ. อุการนฺตนปุํสกลิงฺคนิทฺเทโส. นิยตนปุํสกลิงฺคนิทฺเทโสยํ. जो चित्त के साथ होता है वह ‘चित्तसहभु’ है; जो चित्त के साथ नहीं होता वह ‘नचित्तसहभु’ है, जैसे रूप। यह उकारान्त नपुंसक लिंग का निर्देश है। यह नियत नपुंसक लिंग का निर्देश है। อนิยตลิงฺคานํ [Pg.117] นิยตนปุํสกลิงฺเคสุ ปกฺขิตฺตานํ ภูตปราภูตสทฺทาทีนํ นิทฺเทโส นยานุสาเรน สุวิญฺเญยฺโยว. อิจฺเจวํ นปุํสกลิงฺคานํ ภูธาตุมยานํ ยถารหํ นิพฺพจนาทิวเสน นิทฺเทโส วิภาวิโต. อิจฺเจวํ สพฺพถาปิ ลิงฺคตฺตยนิทฺเทโส สมตฺโต. अनियत लिंग वाले शब्दों का, जिन्हें नियत नपुंसक लिंग में रखा गया है, जैसे ‘भूत’, ‘परभूत’ आदि शब्दों का निर्देश नय (विधि) के अनुसार सुविज्ञेय ही है। इस प्रकार भू-धातु से बने नपुंसक लिंगों का यथायोग्य निरुक्ति आदि के द्वारा निर्देश स्पष्ट किया गया। इस प्रकार सभी प्रकार से तीनों लिंगों का निर्देश समाप्त हुआ। อุลฺลิงฺคเนน วิวิเธน นเยน วุตฺตํ,ภูธาตุสทฺทมยลิงฺคติกํ ยเทตํ; อาลิงฺคิยํ ปิยตรญฺจ สุตํ สุลิงฺคํ,โปโส กเร มนสิ ลิงฺควิทุตฺตมิจฺฉํ. विभिन्न विधियों से जो यह भू-धातु के शब्दों से बने तीनों लिंगों का वर्णन किया गया है; लिंग-विद्या के ज्ञाता बनने के इच्छुक व्यक्ति को इस प्रिय और उत्तम श्रुत (ज्ञान) को मन में धारण करना चाहिए। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार नौ अंगों वाले, अट्ठकथा सहित त्रिपिटक के वाक्-पथों में विद्वानों के โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कुशलता के लिए रचित ‘सद्दनीति’ प्रकरण में ภูธาตุมยานํ ติวิธลิงฺคิกานํ นามิกรูปานํ วิภาโค भू-धातु से बने त्रिविध लिंग वाले नामिक रूपों का विभाग จตุตฺโถ ปริจฺเฉโท. चौथा परिच्छेद। ๕. โอการนฺตปุลฺลิงฺคนามิกปทมาลา ५. अकारान्त पुल्लिंग नामिक पदमाला (शब्द-रूप)। ภู ธาตุโต ปวตฺตานํ, นามิกานมิโต ปรํ; นามมาลํ ปกาสิสฺสํ, นามมาลนฺตรมฺปิ จ. इसके बाद मैं भू-धातु से प्रवृत्त होने वाले नामिक शब्दों की नाममाला और अन्य नाममालाओं को भी प्रकाशित करूँगा। วิปฺปกิณฺณกถา เอตฺถ, เอวํ วุตฺเต น เหสฺสติ; ปเภโท นามมาลานํ, ปริปุณฺโณว เหหิติ. ऐसा कहने पर यहाँ बिखरी हुई कथाएँ नहीं होंगी; नाममालाओं का भेद पूर्ण ही होगा। ปุพฺพาจริยสีหานํ, ตสฺมา อิธ มตํ สุตํ; ปุเรจรํ กริตฺวาน, วกฺขามิ สวินิจฺฉยํ. इसलिए यहाँ पूर्वाचार्यों रूपी सिंहों के श्रुत मत को आगे रखकर मैं निश्चय के साथ कहूँगा। ปุริโส, ปุริสา. ปุริสํ, ปุริเส. ปุริเสน, ปุริเสหิ, ปุริเสภิ. ปุริสสฺส, ปุริสานํ. ปุริสา, ปุริสสฺมา, ปุริสมฺหา, ปุริเสหิ, ปุริเสภิ. ปุริสสฺส, ปุริสานํ. ปุริเส, ปุริสสฺมึ, ปุริสมฺหิ, ปุริเสสุ. โภ ปุริส, ภวนฺโต ปุริสา. पुरिसो, पुरिसा। पुरिसं, पुरिसे। पुरिसेन, पुरिसेहि, पुरिसेभि। पुरिसस्स, पुरिसानं। पुरिसा, पुरिसस्मा, पुरिसम्हा, पुरिसेहि, पुरिसेभि। पुरिसस्स, पुरिसानं। पुरिसे, पुरिसस्मिं, पुरिसम्हि, पुरिसेसु। भो पुरिस, भवन्तो पुरिसा। อยมายสฺมตา มหากจฺจาเนน ปภินฺนปฏิสมฺภิเทน กตสฺมา นิรุตฺติปิฏกโต อุทฺธริโต ปุริสอิจฺเจตสฺส ปกติรูปสฺส [Pg.118] นามิกปทมาลานโย. ตตฺร ปุริสวจนเอกวจนปุถุวจเนสุ ปจฺจตฺตวจนาทีนิ ภวนฺติ. ตํ ยถา? ปุริโส ติฏฺฐติ, ปุริสา ติฏฺฐนฺติ. ตตฺร ปุริโสติ ปุริสวจเน เอกวจเน ปจฺจตฺตวจนํ ภวติ, ปุริสาติ ปุริสวจเน ปุถุวจเน ปจฺจตฺตวจนํ ภวติ. यह आयुष्मान महाकात्यायन, जो प्रभिन्न-प्रतिसम्भिदा (विशिष्ट ज्ञान) वाले थे, उनके द्वारा रचित ‘निरुत्तिपिटक’ से उद्धृत ‘पुरिस’ (पुरुष) इस प्रकृति रूप की नामिक पदमाला की विधि है। वहाँ पुरुष शब्द के एकवचन और बहुवचन में प्रथमा विभक्ति आदि होती हैं। वह कैसे? ‘पुरिसो तिट्ठति’ (पुरुष खड़ा होता है), ‘पुरिसा तिट्ठन्ति’ (पुरुष खड़े होते हैं)। वहाँ ‘पुरिसो’ यह पुरुष शब्द के एकवचन में प्रथमा विभक्ति है, ‘पुरिसा’ यह पुरुष शब्द के बहुवचन में प्रथमा विभक्ति है। ปุริสํ ปสฺสติ, ปุริเส ปสฺสติ. ตตฺร ปุริสนฺติ ปุริสวจเน เอกวจเน อุปโยควจนํ ภวติ, ปุริเสติ ปุริสวจเน ปุถุวจเน อุปโยควจนํ ภวติ. ‘पुरिसं पस्सति’ (पुरुष को देखता है), ‘पुरिसे पस्सति’ (पुरुषों को देखता है)। वहाँ ‘पुरिसं’ यह पुरुष शब्द के एकवचन में द्वितीया विभक्ति है, ‘पुरिसे’ यह पुरुष शब्द के बहुवचन में द्वितीया विभक्ति है। ปุริเสน กตํ, ปุริเสหิ กตํ, ปุริเสภิ กตํ. ตตฺร ปุริเสนาติ ปุริสวจเน เอกวจเน กรณวจนํ ภวติ, ปุริเสหิ, ปุริเสภีติ ปุริสวจเน ปุถุวจเน กรณวจนํ ภวติ. ‘पुरिसेन कतं’ (पुरुष द्वारा किया गया), ‘पुरिसेहि कतं’, ‘पुरिसेभि कतं’ (पुरुषों द्वारा किया गया)। वहाँ ‘पुरिसेना’ यह पुरुष शब्द के एकवचन में तृतीया विभक्ति है, ‘पुरिसेहि’, ‘पुरिसेभि’ यह पुरुष शब्द के बहुवचन में तृतीया विभक्ति है। ปุริสสฺส ทียเต, ปุริสานํ ทียเต. ตตฺร ปุริสสฺสาติ ปุริสวจเน เอกวจเน สมฺปทานวจนํ ภวติ, ปุริสานนฺติ ปุริสวจเน ปุถุวจเน สมฺปทานวจนํ ภวติ. ‘पुरिसस्स दीयते’ (पुरुष को दिया जाता है), ‘पुरिसानं दीयते’ (पुरुषों को दिया जाता है)। वहाँ ‘पुरिसस्स’ यह पुरुष शब्द के एकवचन में चतुर्थी विभक्ति है, ‘पुरिसानं’ यह पुरुष शब्द के बहुवचन में चतुर्थी विभक्ति है। ปุริสา นิสฺสฏํ, ปุริสสฺมา นิสฺสฏํ, ปุริสมฺหา นิสฺสฏํ, ปุริเสหิ นิสฺสฏํ, ปุริเสภิ นิสฺสฏํ. ตตฺร ปุริสาติ ปุริสวจเน เอกวจเน นิสฺสกฺกวจนํ ภวติ. ปุริสสฺมาติ…เป… ปุริสมฺหาติ ปุริสวจเน เอกวจเน นิสฺสกฺกวจนํ ภวติ, ปุริเสหิ, ปุริเสภีติ ปุริสวจเน ปุถุวจเน นิสฺสกฺกวจนํ ภวติ. ‘पुरिसा निस्सटं’, ‘पुरिसस्मा निस्सटं’, ‘पुरिसम्हा निस्सटं’ (पुरुष से निकला हुआ), ‘पुरिसेहि निस्सटं’, ‘पुरिसेभि निस्सटं’ (पुरुषों से निकला हुआ)। वहाँ ‘पुरिसा’ यह पुरुष शब्द के एकवचन में पञ्चमी विभक्ति है। ‘पुरिसस्मा’... पे... ‘पुरिसम्हा’ यह पुरुष शब्द के एकवचन में पञ्चमी विभक्ति है, ‘पुरिसेहि’, ‘पुरिसेभि’ यह पुरुष शब्द के बहुवचन में पञ्चमी विभक्ति है। ปุริสสฺส ปริคฺคโห, ปุริสานํ ปริคฺคโห. ตตฺร ปุริสสฺสาติ ปุริสวจเน เอกวจเน สามิวจนํ ภวติ, ปุริสานนฺติ ปุริสวจเน ปุถุวจเน สามิวจนํ ภวติ. ‘पुरिसस्स परिग्गहो’ (पुरुष का स्वामित्व), ‘पुरिसानं परिग्गहो’ (पुरुषों का स्वामित्व)। वहाँ ‘पुरिसस्स’ यह पुरुष शब्द के एकवचन में षष्ठी विभक्ति है, ‘पुरिसानं’ यह पुरुष शब्द के बहुवचन में षष्ठी विभक्ति है। ปุริเส ปติฏฺฐิตํ, ปุริสสฺมึ ปติฏฺฐิตํ, ปุริสมฺหิ ปติฏฺฐิตํ, ปุริเสสุ ปติฏฺฐิตํ. ตตฺร ปุริเสติ ปุริสวจเน เอกวจเน ภุมฺมวจนํ ภวติ, ปุริสสฺมินฺติ…เป… ปุริสมฺหีติ…เป… ปุริเสสูติ ปุริสวจเน ปุถุวจเน ภุมฺมวจนํ ภวติ. ‘पुरिसे पतिट्ठितं’, ‘पुरिसस्मिं पतिट्ठितं’, ‘पुरिसम्हि पतिट्ठितं’ (पुरुष में प्रतिष्ठित), ‘पुरिसेसु पतिट्ठितं’ (पुरुषों में प्रतिष्ठित)। वहाँ ‘पुरिसे’ यह पुरुष शब्द के एकवचन में सप्तमी विभक्ति है, ‘पुरिसस्मिं’... पे... ‘पुरिसम्हि’... पे... ‘पुरिसेसु’ यह पुरुष शब्द के बहुवचन में सप्तमी विभक्ति है। โภ [Pg.119] ปุริส ติฏฺฐ, ภวนฺโต ปุริสา ติฏฺฐถ. ตตฺร โภ ปุริสอิติ ปุริสวจเน เอกวจเน อาลปนํ ภวติ, ภวนฺโต ปุริสาอิติ ปุริสวจเน ปุถุวจเน อาลปนํ ภวตีติ อิมินา นเยน สพฺพตฺถ นโย วิตฺถาเรตพฺโพ. हे पुरुष! ठहरो, हे पुरुषों! ठहरो। वहाँ 'भो पुरिस' (हे पुरुष) यह पुरुषवाचक एकवचन में संबोधन होता है, 'भवन्तो पुरिसा' (हे पुरुषों) यह पुरुषवाचक बहुवचन में संबोधन होता है - इस विधि से सर्वत्र विस्तार करना चाहिए। ยมกมหาเถเรน กตาย ปน จูฬนิรุตฺติยํ ‘‘โภ ปุริส’’อิติ รสฺสวเสน อาลปเนกวจนํ วตฺวา ‘‘โภ ปุริสา’’อิติ ทีฆวเสน อาลปนพหุวจนํ วุตฺตํ. กิญฺจาปิ ตาทิโส นโย นิรุตฺติปิฏเก นตฺถิ, ตถาปิ พหูนมาลปนวิสเย ‘‘โภ ยกฺขา’’อิติอาทีนํ อาลปนพหุวจนานํ ชาตกฏฺฐกถาทีสุ ทิสฺสนโต ปสตฺถตโรว โหติ วิญฺญูนํ ปมาณญฺจ, ตสฺมา อิมินา ยมกมหาเถรมเตนปิ ‘‘ปุริโส ปุริสา ปุริส’’นฺติอาทีนิ วตฺวา อามนฺตเน ‘‘โภ ปุริส, โภ ปุริสา, ภวนฺโต ปุริสา’’ติ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. यमक महाथेर द्वारा रचित 'चूलनिरुत्ति' में 'भो पुरिस' इस प्रकार ह्रस्व के द्वारा संबोधन एकवचन कहकर 'भो पुरिसा' इस प्रकार दीर्घ के द्वारा संबोधन बहुवचन कहा गया है। यद्यपि वैसा नियम निरुत्तिपिटक में नहीं है, तथापि बहुतों के संबोधन के विषय में 'भो यक्खा' (हे यक्षों) आदि संबोधन बहुवचनों के जातक-अट्ठकथा आदि में दिखाई देने से, यह विद्वानों के लिए अधिक प्रशंसनीय और प्रमाणभूत ही है। इसलिए, इस यमक महाथेर के मत से भी 'पुरिसो, पुरिसा, पुरिस' आदि कहकर संबोधन में 'भो पुरिस, भो पुरिसा, भवन्तो पुरिसा' इस प्रकार नामिक पदमाला (शब्द-रूप) जोड़नी चाहिए। ตตฺถ ปุริโสติ ปฐมาย เอกวจนํ. ปุริสาติ พหุวจนํ. ปุริสนฺติ ทุติยาย เอกวจนํ. ปุริเสติ พหุวจนํ. ปุริเสนาติ ตติยาย เอกวจนํ. ปุริเสหิ, ปุริเสภีติ ทฺเว พหุวจนานิ. ปุริสสฺสาติ จตุตฺถิยา เอกวจนํ. ปุริสานนฺติ พหุวจนํ. ปุริสา, ปุริสสฺมา, ปุริสมฺหาติ ตีณิ ปญฺจมิยา เอกวจนานิ. ปุริเสหิ, ปุริเสภีติ ทฺเว พหุวจนานิ. ปุริสสฺสาติ ฉฏฺฐิยา เอกวจนํ. ปุริสานนฺติ พหุวจนํ. ปุริเส, ปุริสสฺมึ, ปุริสมฺหีติ ตีณิ สตฺตมิยา เอกวจนานิ. ปุริเสสูติ พหุวจนํ. โภ ปุริสาติ อฏฺฐมิยา เอกวจนํ. โภ ปุริสา, ภวนฺโต ปุริสาติ ทฺเว พหุวจนานิ. वहाँ 'पुरिसो' प्रथमा का एकवचन है। 'पुरिसा' बहुवचन है। 'पुरिसं' द्वितीया का एकवचन है। 'पुरिसे' बहुवचन है। 'पुरिसेन' तृतीया का एकवचन है। 'पुरिसेहि, पुरिसेभि' ये दो बहुवचन हैं। 'पुरिसस्स' चतुर्थी का एकवचन है। 'पुरिसानं' बहुवचन है। 'पुरिसा, पुरिसस्मा, पुरिसम्हा' ये तीन पञ्चमी के एकवचन हैं। 'पुरिसेहि, पुरिसेभि' ये दो बहुवचन हैं। 'पुरिसस्स' षष्ठी का एकवचन है। 'पुरिसानं' बहुवचन है। 'पुरिसे, पुरिसस्मिं, पुरिसम्हि' ये तीन सप्तमी के एकवचन हैं। 'पुरिसेसु' बहुवचन है। 'भो पुरिस' संबोधन का एकवचन है। 'भो पुरिसा, भवन्तो पुरिसा' ये दो बहुवचन हैं। กิญฺจาเปเตสุ ‘‘ปุริสา’’ติ อิทํ ปฐมาปญฺจมีอฏฺฐมีนํ, ‘‘ปุริเส’’ติ อิทํ ทุติยาสตฺตมีนํ, ‘‘ปุริเสหิ, ปุริเสภี’’ติ ตติยาปญฺจมีนํ, ‘‘ปุริสาน’’นฺติ จตุตฺถีฉฏฺฐีนํ เอกสทิสํ, ตถาปิ อตฺถวเสน อสงฺกรภาโว เวทิตพฺโพ. กถํ? ‘‘ปุริโส [Pg.120] ติฏฺฐติ, ปุริสา ติฏฺฐนฺติ. ปุริสํ ปสฺสติ, ปุริเส ปสฺสตี’’ติอาทินา. यद्यपि इनमें 'पुरिसा' यह प्रथमा, पञ्चमी और संबोधन का; 'पुरिसे' यह द्वितीया और सप्तमी का; 'पुरिसेहि, पुरिसेभि' ये तृतीया और पञ्चमी का; 'पुरिसानं' यह चतुर्थी और षष्ठी का एक समान (रूप) है, तथापि अर्थ के अनुसार असंकर भाव (स्पष्टता) समझना चाहिए। कैसे? 'पुरिसो तिट्ठति' (पुरुष खड़ा होता है), 'पुरिसा तिट्ठन्ति' (पुरुष खड़े होते हैं)। 'पुरिसं पस्सति' (पुरुष को देखता है), 'पुरिसे पस्सति' (पुरुषों को देखता है) इत्यादि के द्वारा। ตตฺถ จ โภติ อามนฺตนตฺเถ นิปาโต. โส น เกวลํ เอกวจนํเยว โหติ, อถ โข พหุวจนมฺปิ โหตีติ ‘‘โภ ปุริสา’’อิติ พหุวจนปฺปโยโคปิ คหิโต. ‘‘ภวนฺโต’’ติทํ ปน พหุวจนเมว โหตีติ ‘‘ปุริสา’’ติ ปุน วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. อิติ ยมกมหาเถเรน ‘‘โภ ปุริส’’อิติ รสฺสวเสน อาลปเนกวจนํ วตฺวา ‘‘โภ ปุริสา’’อิติ ทีฆวเสน อาลปนพหุวจนํ วุตฺตํ. ตถา หิ ปาฬิยํ อฏฺฐกถาสุ จ นิปาตภูโต โภสทฺโท เอกวจนพหุวจนวเสน ทฺวิธา ภิชฺชติ. อตฺริมานิ นิทสฺสนปทานิ – ‘‘อปิ นุ โข สปริคฺคหานํ เตวิชฺชานํ พฺราหฺมณานํ อปริคฺคเหน พฺรหฺมุนา สทฺธึ สํสนฺทติ สเมตีติ, โน หิทํ โภ โคตม. อจฺฉริยํ โภ อานนฺท, อพฺภุตํ โภ อานนฺท, เอหิ โภ สมณ, โภ ปพฺพชิต’’อิจฺจาทิปาฬิโต อฏฺฐกถาโต จ โภสทฺทสฺส เอกวจนปฺปโยเค ปวตฺตินิทสฺสนํ, ‘‘เตน หิ โภ มมปิ สุณาถ. ยถา มยเมว อรหาม ตํ ภวนฺตํ โคตมํ ทสฺสนาย อุปสงฺกมิตุํ, นาหํ โภ สมณสฺส โคตมสฺส สุภาสิตํ สุภาสิตโต นาพฺภนุโมทามิ, ปสฺสถ โภ อิมํ กุลปุตฺตํ. โภ ยกฺขา อหํ อิมํ ตุมฺหากํ ภาเชตฺวา ทเทยฺยํ. อปริสุทฺโธ ปนมฺหิ, โภ ธุตฺตา ตุมฺหากํ กฺริยา มยฺหํ น รุจฺจติ. โส เต ปุริเส อาห โภ ตุมฺเห มํ มาเรนฺตา รญฺโญ ทสฺเสตฺวาว มาเรถา’’ติ อิจฺจาทิ ปน ปาฬิโต อฏฺฐกถาโต จ โภสทฺทสฺส พหุวจนปฺปโยเค ปวตฺตินิทสฺสนํ. กจฺจายนปฺปกรเณ ปน ‘‘โภ ปุริส, โภ ปุริสา’’ติ ปททฺวยํ อาลปเนกวจนวเสน วุตฺตํ. ตํ ยถา อาคเมหิ น วิรุชฺฌติ, ตถา คเหตพฺพํ. और वहाँ 'भो' संबोधन के अर्थ में निपात है। वह न केवल एकवचन ही होता है, बल्कि बहुवचन भी होता है, इसलिए 'भो पुरिसा' इस बहुवचन प्रयोग को भी ग्रहण किया गया है। 'भवन्तो' यह तो बहुवचन ही होता है, इसलिए 'पुरिसा' पुनः कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। इस प्रकार यमक महाथेर द्वारा 'भो पुरिस' इस प्रकार ह्रस्व के द्वारा संबोधन एकवचन कहकर 'भो पुरिसा' इस प्रकार दीर्घ के द्वारा संबोधन बहुवचन कहा गया है। क्योंकि पालि और अट्ठकथाओं में निपात स्वरूप 'भो' शब्द एकवचन और बहुवचन के भेद से दो प्रकार का होता है। इसके ये उदाहरण पद हैं - 'क्या उन परिग्रहयुक्त त्रैविद्य ब्राह्मणों का अपरिग्रही ब्रह्मा के साथ मेल होता है? हे गौतम! ऐसा नहीं है। हे आनन्द! आश्चर्य है, हे आनन्द! अद्भुत है, हे श्रमण! आओ, हे प्रव्रजित!' इत्यादि पालि और अट्ठकथा से 'भो' शब्द के एकवचन प्रयोग की प्रवृत्ति का उदाहरण है। 'तो हे (मित्रों)! मेरी भी सुनो। जैसे हम स्वयं उन भगवान् गौतम के दर्शन के लिए जाने के योग्य हैं, मैं हे (मित्रों)! श्रमण गौतम के सुभाषित का सुभाषित के रूप में अनुमोदन नहीं करता हूँ, हे (मित्रों)! इस कुलपुत्र को देखो। हे यक्षों! मैं इसे तुम लोगों में बाँटकर दूँगा। मैं अशुद्ध हूँ, हे धूर्तों! तुम्हारा कार्य मुझे पसंद नहीं है। उसने उन पुरुषों से कहा - हे (मित्रों)! तुम मुझे मारते हुए राजा को दिखाकर ही मारो' इत्यादि पालि और अट्ठकथा से 'भो' शब्द के बहुवचन प्रयोग की प्रवृत्ति का उदाहरण है। कच्चायन प्रकरण में तो 'भो पुरिस, भो पुरिसा' ये दो पद संबोधन एकवचन के रूप में कहे गए हैं। वह जैसे आगमों (शास्त्रों) से विरुद्ध न हो, वैसे ग्रहण करना चाहिए। เกจิ [Pg.121] ปน อทูรฏฺฐสฺสาลปเน ‘‘โภ ปุริส’’อิติ รสฺสวเสน อาลปเนกวจนํ อิจฺฉนฺติ, ทูรฏฺฐสฺสาลปเน ปน ‘‘โภ ปุริสา’’อิติ ทีฆวเสน อาลปเนกวจนํ อิจฺฉนฺติ. อทูรฏฺฐานํ ทูรฏฺฐานญฺจ ปุริสานํ อิตฺถีนญฺจ อาลปเน น กิญฺจิ วทนฺติ. ตถา อทูรฏฺฐาย ทูรฏฺฐาย จ อิตฺถิยา อาลปเน เต ปุจฺฉิตพฺพา ‘‘อทูรฏฺฐานํ ทูรฏฺฐานญฺจ ปุริสานมาลปเน กถํ วตฺตพฺพ’’นฺติ. อทฺธา เต เอวํ ปุฏฺฐา อุตฺตริ กิญฺจิ วตฺตุํ น สกฺขิสฺสนฺติ. เอวมฺปิ เต เจ วเทยฺยุํ ‘‘ภวนฺโต ปุริสาติ อิมินาว อทูรฏฺฐานํ ทูรฏฺฐานญฺจ ปุริสานมาลปนํ ภวตี’’ติ. ตทา เต วตฺตพฺพา ‘‘ยทิ ภวนฺโต ปุริสา’’ติ อิมินา อทฺเวชฺเฌน วจเนน อทูรฏฺฐานํ ทูรฏฺฐานญฺจ ปุริสานมาลปนํ ภวติ, เอวํ สนฺเต ‘‘โภ ปุริส’’อิติ รสฺสปเทนปิ ทูรฏฺฐสฺส จ ปุริสสฺสาลปนํ วตฺตพฺพํ, เอวํ อวตฺวา กิมตฺถํ อทูรฏฺฐสฺสาลปเน ‘‘โภ ปุริส’’อิติ รสฺสวเสน อาลปเนกวจนํ อิจฺฉถ, กิมตฺถญฺจ ทูรฏฺฐสฺสาลปเน ‘‘โภ ปุริสา’’อิติ ทีฆวเสน อาลปเนกวจนํ อิจฺฉถ. किन्तु कुछ लोग समीप स्थित के संबोधन में 'भो पुरिस' इस प्रकार ह्रस्व के द्वारा संबोधन एकवचन चाहते हैं, और दूर स्थित के संबोधन में 'भो पुरिसा' इस प्रकार दीर्घ के द्वारा संबोधन एकवचन चाहते हैं। वे समीप स्थित और दूर स्थित पुरुषों और स्त्रियों के संबोधन के विषय में कुछ नहीं कहते। वैसे ही समीप स्थित और दूर स्थित स्त्री के संबोधन के विषय में उनसे पूछा जाना चाहिए - 'समीप स्थित और दूर स्थित पुरुषों के संबोधन में कैसे कहना चाहिए?' निश्चित ही वे इस प्रकार पूछे जाने पर आगे कुछ कहने में समर्थ नहीं होंगे। यदि वे ऐसा भी कहें - 'भवन्तो पुरिसा' इसके द्वारा ही समीप स्थित और दूर स्थित पुरुषों का संबोधन होता है। तब उनसे कहना चाहिए - 'यदि भवन्तो पुरिसा' इस असंदिग्ध वचन से समीप स्थित और दूर स्थित पुरुषों का संबोधन होता है, तो ऐसा होने पर 'भो पुरिस' इस ह्रस्व पद से भी दूर स्थित पुरुष का संबोधन कहना चाहिए। ऐसा न कहकर किसलिए समीप स्थित के संबोधन में 'भो पुरिस' इस प्रकार ह्रस्व के द्वारा संबोधन एकवचन चाहते हो, और किसलिए दूर स्थित के संबोधन में 'भो पुरिसा' इस प्रकार दीर्घ के द्वारा संबोधन एकवचन चाहते हो? นนุ ‘‘ตคฺฆ ภควา โพชฺฌงฺคา, ตคฺฆ สุคต โพชฺฌงฺคา’’ติอาทีสุ อาลปนปทภูตํ ‘‘ภควา’’อิติ ทีฆปทํ สมีเป ฐิตกาเลปิ ทูเร ฐิตกาเลปิ พุทฺธสฺสาลปนปทํ ภวิตุมรหเตว, ตถา อาลปนปทภูตํ ‘‘สุคต’’อิติ รสฺสปทมฺปิ. ยสฺมา ปเนเตสุ ‘‘ภควา’’ติ อาลปนปทสฺส น กตฺถจิปิ รสฺสตฺตํ ทิสฺสติ, ‘‘สุคตา’’ติ อาลปนปทสฺส จ น กตฺถจิปิ ทีฆตฺตํ ทิสฺสติ, ตสฺมา ทีฆรสฺสมตฺตาเภทํ อจินฺเตตฺวา ‘‘ปุริส’’อิติ รสฺสวเสน วุตฺตปทํ ปกติสฺสรวเสน สมีเป ฐิตสฺส ปุริสสฺส อามนฺตนกาเล อทูรฏฺฐสฺสาลปนปทํ ภวติ, อายตสฺสรวเสน ทูเร ฐิตปุริสสฺส อามนฺตนกาเล ทูรฏฺฐสฺสาลปนปทํ ภวตีติ คเหตพฺพํ. ตถา ‘‘ภวนฺโต ปุริสา, โภ ยกฺขา, โภ ธุตฺตา’’ติอาทีนิ [Pg.122] ทีฆวเสน วุตฺตานิ อาลปนพหุวจนปทานิปิ ปกติสฺสรวเสน สมีเป ฐิตปุริสานํ อามนฺตนกาเล อทูรฏฺฐานมาลปนปทานิ ภวนฺติ, อายตสฺสรวเสน ทูเร ฐิตปุริสาทีนํ อามนฺตนกาเล ทูรฏฺฐานมาลปนปทานิ ภวนฺตีติ คเหตพฺพานิ. ตถา หิ พฺราหฺมณา กตฺถจิ กตฺถจิ รสฺสฏฺฐาเนปิ ทีฆฏฺฐาเนปิ อายเตน สเรน มชฺฌิมายเตน สเรน อจฺจายเตน จ สเรน เวทํ ปฐนฺติ ลิขิตุมสกฺกุเณยฺเยน คีตสฺสเรน วิย. อิติ สพฺพกฺขเรสุปิ อายเตน สเรนุจฺจารณํ ลพฺภเตว ลิขิตุมสกฺกุเณยฺยํ, ตสฺมา อสมฺปถมโนตริตฺวา ‘‘โภ ปุริส’’อิติ วจเนน ทูรฏฺฐสฺส จ อทูรฏฺฐสฺส จ ปุริสสฺสาลปนํ ภวติ, ‘‘โภ ปุริสา, ภวนฺโต ปุริสา’’ติ อิเมหิ วจเนหิปิ ทูรฏฺฐานญฺจ อทูรฏฺฐานญฺจ ปุริสานมาลปนํ ภวตีติ ทฏฺฐพฺพํ. อิติ ทูรฏฺฐสฺส อทูรฏฺฐานญฺจ อายเตน สเรน อามนฺตนเมว ปมาณํ, น ทีฆรสฺสมตฺตาวิเสโส, ตสฺมา ‘‘โภ สตฺถ, โภ ราช, โภ คจฺฉ, โภ มุนิ, โภ ทณฺฑิ, โภ ภิกฺขุ, โภ สยมฺภุ, โภติ กญฺเญ, โภติ ปตฺติ, โภติ อิตฺถิ, โภติ ยาคุ, โภติ วธุ, โภ กุล, โภ อฏฺฐิ, โภ จกฺขุ’’อิจฺเจวมาทีหิ ปเทหิ อทูรฏฺฐสฺสาลปนญฺจ ทูรฏฺฐสฺสาลปนญฺจ ภวติ. ‘‘ภวนฺโต สตฺถา, สตฺถาโร, โภติโย กญฺญา, กญฺญาโย’’ติ เอวมาทีหิปิ ปเทหิ อทูรฏฺฐานญฺจาลปนํ ภวตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ननु ‘तग्घ भगवा बोज्झङ्गा, तग्घ सुगत बोज्झङ्गा’ इत्यादि में संबोधन पद के रूप में ‘भगवा’ यह दीर्घ पद समीप स्थित होने पर भी और दूर स्थित होने पर भी बुद्ध का संबोधन पद होने योग्य ही है, वैसे ही संबोधन पद के रूप में ‘सुगत’ यह ह्रस्व पद भी। चूँकि इनमें ‘भगवा’ इस संबोधन पद का कहीं भी ह्रस्व रूप नहीं दिखता, और ‘सुगत’ इस संबोधन पद का कहीं भी दीर्घ रूप नहीं दिखता, इसलिए दीर्घ-ह्रस्व की मात्रा के भेद की चिंता न करते हुए ‘पुरिस’ इस ह्रस्व रूप में कहे गए पद को प्राकृत स्वर (सामान्य स्वर) के कारण समीप स्थित पुरुष के आमंत्रण काल में अदूरस्थ संबोधन पद होता है, और आयत स्वर (लम्बे स्वर) के कारण दूर स्थित पुरुष के आमंत्रण काल में दूरस्थ संबोधन पद होता है - ऐसा समझना चाहिए। वैसे ही ‘भवन्तो पुरिसा, भो यक्खा, भो धुत्ता’ आदि दीर्घ रूप में कहे गए संबोधन बहुवचन पद भी प्राकृत स्वर के कारण समीप स्थित पुरुषों के आमंत्रण काल में अदूरस्थ संबोधन पद होते हैं, और आयत स्वर के कारण दूर स्थित पुरुषों आदि के आमंत्रण काल में दूरस्थ संबोधन पद होते हैं - ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि ब्राह्मण कहीं-कहीं ह्रस्व स्थान पर भी और दीर्घ स्थान पर भी आयत स्वर से, मध्यम आयत स्वर से और अत्यन्त आयत स्वर से वेद पढ़ते हैं, जैसे कि जिसे लिखा न जा सके ऐसे गीत स्वर के समान। इस प्रकार सभी अक्षरों में भी आयत स्वर से उच्चारण प्राप्त होता ही है जिसे लिखा नहीं जा सकता, इसलिए मार्ग से न भटकते हुए ‘भो पुरिस’ इस वचन से दूर स्थित और समीप स्थित पुरुष का संबोधन होता है, ‘भो पुरिसा, भवन्तो पुरिसा’ इन वचनों से भी दूर स्थित और समीप स्थित पुरुषों का संबोधन होता है - ऐसा देखना चाहिए। इस प्रकार दूर स्थित और समीप स्थित का आयत स्वर से आमंत्रण ही प्रमाण है, न कि दीर्घ-ह्रस्व मात्रा का विशेष, इसलिए ‘भो सत्थ, भो राज, भो गच्छ, भो मुनि, भो दण्डि, भो भिक्खु, भो सयम्भू, भोति कञ्ञे, भोति पत्ति, भोति इत्थि, भोति यागु, भोति वधु, भो कुल, भो अट्ठि, भो चक्खु’ इत्यादि पदों से समीप स्थित और दूर स्थित का संबोधन होता है। ‘भवन्तो सत्था, सत्थारो, भोतियो कञ्ञा, कञ्ञायो’ इत्यादि पदों से भी समीप स्थित का संबोधन होता है - ऐसा देखना चाहिए। อิทํ ปเนตฺถ สนฺนิฏฺฐานํ – यहाँ यह निष्कर्ष है - ตสฺส ตํ วจนํ สุตฺวา, รญฺโญ ปุตฺตํ อทสฺสยุํ; ปุตฺโต จ ปิตรํ ทิสฺวา, ทูรโตวชฺฌภาสถ. उसके उस वचन को सुनकर, उन्होंने राजा को पुत्र दिखाया; और पुत्र ने पिता को देखकर, दूर से ही यह कहा। อาคจฺฉุ โทวาริกา ขคฺคพนฺธา,กาสาวิยา หนฺตุ มมํ ชนินฺท; อกฺขาหิ เม ปุจฺฉิโต เอตมตฺถํ,อปราโธ โก นฺวิธ มมชฺช อตฺถิ. तलवार बाँधे हुए द्वारपाल आए, हे जनिन्द (राजाओं के स्वामी)! काषाय वस्त्र धारी मुझे मारें; मेरे पूछने पर मुझे यह बात बताएँ, आज यहाँ मेरा क्या अपराध है। เอวํ [Pg.123] สทฺธมฺมราเชน, โวหารกุสเลน เว; สุเทสิเต โสมนสฺส-ชาตเก สพฺพทสฺสินา. इस प्रकार व्यवहार में कुशल सद्धर्मराज, सर्वदर्शी (बुद्ध) द्वारा सोमनस्स-जातक का भली-भाँति उपदेश दिया गया। ทูรฏฺฐาเนปิ รสฺสตฺตํ, ‘‘ชนินฺท’’อิติ ทิสฺสติ; น กตฺถจิปิ ทีฆตฺตํ, อิติ นีติ มยา มตา. दूर स्थित होने पर भी ‘जनिन्द’ इसमें ह्रस्वता देखी जाती है; कहीं भी दीर्घता नहीं देखी जाती, यह नीति (नियम) मेरे द्वारा मानी गई है। อิทมฺเปตฺถ วตฺตพฺพํ ‘‘กุโต นุ โภ อิทมายาตํ ‘ทูรฏฺฐสฺสาลปนํ อทูรฏฺฐสฺสาลปนมิ’ติ’’? สทฺทสตฺถโต. สทฺทสตฺถํ นาม น สพฺพโส พุทฺธวจนสฺโสปการกํ, เอกเทเสน ปน โหติ. यहाँ यह भी कहना चाहिए कि ‘यह दूरस्थ संबोधन और अदूरस्थ संबोधन कहाँ से आया है?’ शब्दशास्त्र (व्याकरण) से। शब्दशास्त्र बुद्धवचन के लिए पूरी तरह उपकारक नहीं है, बल्कि एक अंश में होता है। อิมสฺมึ ปกรเณ ‘‘พหุวจน’’นฺติ วา ‘‘ปุถุวจน’’นฺติ วา ‘‘อเนกวจน’’นฺติ วา อตฺถโต เอกํ, พฺยญฺชนเมว นานํ, ตสฺมา สพฺพตฺถ ‘‘พหุวจน’’นฺติ วา ‘‘ปุถุวจน’’นฺติ วา ‘‘อเนกวจน’’นฺติ วา โวหาโร กาตพฺโพ, ปุถุวจนํ อเนกวจนนฺติ จ อิทํ สาสเน นิรุตฺตญฺญูนํ โวหาโร, อิตรํ สทฺทสตฺถวิทูนํ. इस प्रकरण में ‘बहुवचन’ या ‘पुथुवचन’ या ‘अनेकवचन’ अर्थतः एक ही हैं, केवल व्यंजन (शब्द) ही भिन्न हैं, इसलिए सर्वत्र ‘बहुवचन’ या ‘पुथुवचन’ या ‘अनेकवचन’ ऐसा व्यवहार करना चाहिए, ‘पुथुवचन’ और ‘अनेकवचन’ यह शासन (बुद्ध शासन) की निरुक्ति जानने वालों का व्यवहार है, और दूसरा (बहुवचन) शब्दशास्त्र के विद्वानों का। กสฺมา ปน อิมสฺมึ ปกรเณ ทฺวิวจนํ น วุตฺตนฺติ? ยสฺมา พุทฺธวจเน ทฺวิวจนํ นาม นตฺถิ, ตสฺมา น วุตฺตนฺติ. นนุ พุทฺธวจเน วจนตฺตยํ อตฺถิ, ตถา หิ ‘‘อายสฺมา’’ติ อิทํ เอกวจนํ, ‘‘อายสฺมนฺตา’’ติ อิทํ ทฺวิวจนํ, ‘‘อายสฺมนฺโต’’ติ อิทํ พหุวจนนฺติ? ตนฺน, ยทิ ‘‘อายสฺมนฺตา’’ติ อิทํ วจนํ ทฺวิวจนํ ภเวยฺย, ‘‘ปุริโส ปุริสา’’ติอาทีสุ กตรํ ทฺวิวจนนฺติ วเทยฺยาถ, ตสฺมา พุทฺธวจเน ทฺวิวจนํ นาม นตฺถิ. เตเนว หิ สิ โย อํ โย นา หีติอาทินา เอกวจนพหุวจนาเนว ทสฺสิตานีติ. इस प्रकरण में द्विवचन क्यों नहीं कहा गया? क्योंकि बुद्धवचन में द्विवचन नाम की कोई चीज़ नहीं है, इसलिए नहीं कहा गया। क्या बुद्धवचन में तीन वचन नहीं हैं, जैसे कि ‘आयुस्मा’ यह एकवचन है, ‘आयुस्मन्ता’ यह द्विवचन है, ‘आयुस्मन्तो’ यह बहुवचन है? ऐसा नहीं है, यदि ‘आयुस्मन्ता’ यह वचन द्विवचन होता, तो ‘पुरिसो पुरिसा’ आदि में आप किसे द्विवचन कहेंगे? इसलिए बुद्धवचन में द्विवचन नाम की कोई चीज़ नहीं है। इसीलिए ‘सि यो अं यो’ आदि के द्वारा केवल एकवचन और बहुवचन ही दिखाए गए हैं। นนุ จ โภ ‘‘สุณนฺตุ เม อายสฺมนฺตา, อชฺช อุโปสโถ ปนฺนรโส. ยทายสฺมนฺตานํ ปตฺตกลฺลํ, มยํ อญฺญมญฺญํ ปาริสุทฺธิอุโปสถํ กเรยฺยามา’’ติ ปาฬิยํ ทฺเว สนฺธาย ‘‘อายสฺมนฺตา’’ติ วุตฺตํ, ‘‘อุทฺทิฏฺฐา โข อายสฺมนฺโต จตฺตาโร ปาราชิกา ธมฺมา’’ติอาทีสุ ปน ปาฬีสุ พหโว สนฺธาย ‘‘อายสฺมนฺโต’’ติ วุตฺตํ, น จ สกฺกา วตฺตุํ ‘‘ยถา ตถา วุตฺต’’นฺติ[Pg.124], ปริวาสาทิอาโรจเนปิ อฏฺฐกถาจริเยหิ วิญฺญาตสุคตาธิปฺปาเยหิ ‘‘ทฺวินฺนํ อาโรเจนฺเตน ‘อายสฺมนฺตา ธาเรนฺตู’ติ, ติณฺณํ อาโรเจนฺเตน ‘อายสฺมนฺโต ธาเรนฺตู’ติ วตฺตพฺพ’’นฺติ วุตฺตตฺตาติ? สจฺจํ วุตฺตํ, ตํ ปน วินยโวหารวเสน วุตฺตนฺติ. นนุ วินโย พุทฺธวจนํ, กสฺมา ‘‘พุทฺธวจเน ทฺวิวจนํ นาม นตฺถี’’ติ วทถาติ? สจฺจํ วินโย พุทฺธวจนํ, ตถาปิ วินยกมฺมวเสน วุตฺตตฺตา อุปลกฺขณมตฺตํ, น สพฺพสาธารณพหุวจนปริยาปนฺนํ. ยทิ หิ ‘‘อายสฺมนฺตา’’ติ อิทํ ทฺวิวจนํ สิยา, ตปฺปโยคานิปิ กฺริยาปทานิ ทฺวิวจนาเนว สิยุํ, ตถารูปานิปิ กฺริยาปทานิ น สนฺติ. น หิ อกฺขรสมยโกวิโท ฌานลาภีปิ ทิพฺพจกฺขุนา วสฺสสตมฺปิ วสฺสสหสฺสมฺปิ สมเวกฺขนฺโต พุทฺธวจเน เอกมฺปิ กฺริยาปทํ ทฺวิวจนนฺติ ปสฺเสยฺย, เอวํ กฺริยาปเทสุ ทฺวิวจนสฺสาภาวา นามิกปเทสุ ทฺวิวจนํ นตฺถิ. นามิกปเทสุ ตทภาวาปิ กฺริยาปเทสุ ตทภาโว เวทิตพฺโพ. สกฺกฏภาสายํ ทฺวีสุปิ ทฺวิวจนานิ สนฺติ, มาคธภาสายํ ปน นตฺถิ. हे महोदय! क्या पालि में ‘सुणन्तु मे आयस्मन्ता, अज्जो उपोसथो पन्नरसो। यदायस्मन्तानं पत्तकल्लं, मयं अञ्ञमञ्ञं पारिसुद्धिउपोसथं करेय्यामा’ (हे आयुष्मानों, मेरी सुनें, आज पन्द्रहवीं का उपोसथ है। यदि आयुष्मानों के लिए उचित हो, तो हम परस्पर पारिशुद्धि उपोसथ करें) इस पालि पाठ में दो को लक्ष्य कर ‘आयस्मन्ता’ (द्विवचन) कहा गया है, और ‘उद्दिद्वा खो आयस्मन्तो चत्तारो पाराजिका धम्मा’ (हे आयुष्मानों, चार पाराजिक धर्मों का पाठ किया गया है) आदि पालि पाठों में बहुतों को लक्ष्य कर ‘आयस्मन्तो’ (बहुवचन) कहा गया है? और यह नहीं कहा जा सकता कि ‘जैसे-तैसे कह दिया गया है’, क्योंकि सुगत (बुद्ध) के अभिप्राय को जानने वाले अट्ठकथाचार्यों ने भी परिवास आदि की सूचना देने के प्रसंग में कहा है कि— ‘दो को सूचित करते समय ‘आयस्मन्ता धारन्तु’ (आयुष्मान् धारण करें) और तीन को सूचित करते समय ‘आयस्मन्तो धारन्तु’ (आयुष्मान् गण धारण करें) ऐसा कहना चाहिए’? यह सत्य कहा गया है, किन्तु वह विनय के व्यवहार (विनयवोहारा) के वश से कहा गया है। यदि विनय बुद्धवचन है, तो आप ऐसा क्यों कहते हैं कि ‘बुद्धवचन में द्विवचन नाम की कोई चीज़ नहीं है’? यह सत्य है कि विनय बुद्धवचन है, फिर भी विनय-कर्म के वश से कहे जाने के कारण यह मात्र एक लक्षण (उपलक्षण) है, न कि सभी के लिए सामान्य बहुवचन के अन्तर्गत आने वाला। यदि यह ‘आयस्मन्ता’ द्विवचन होता, तो इसके प्रयोग में आने वाली क्रियाएँ भी द्विवचन ही होतीं, किन्तु वैसी क्रियाएँ नहीं हैं। अक्षर-विद्या में निपुण और ध्यान-लब्ध व्यक्ति भी यदि दिव्यचक्षु से सौ वर्ष या हज़ार वर्ष तक खोजे, तो भी बुद्धवचन में एक भी क्रियापद द्विवचन में नहीं देखेगा। इस प्रकार क्रियापदों में द्विवचन के अभाव के कारण नामपदों (संज्ञाओं) में भी द्विवचन नहीं है। नामपदों में उसके अभाव से ही क्रियापदों में भी उसका अभाव समझना चाहिए। संस्कृत भाषा में दोनों (नाम और क्रिया) में द्विवचन होते हैं, किन्तु मागधी भाषा (पालि) में नहीं होते। อปิจ ‘‘ปุถุวจน’’นฺติ นิรุตฺติโวหาโรปิ ‘‘พุทฺธวจเน ทฺวิวจนํ นตฺถี’’ติ เอตมตฺถํ ทีเปติ. ตญฺหิ สกฺกฏภาสายํ วุตฺตา ทฺวิวจนโต พหุวจนโต จ วิสุํภูตํ วจนํ, ตตฺถ วา วุตฺเตหิ อตฺเถหิ วิสุํภูตสฺส อตฺถสฺส วจนํ ‘‘ปุถุวจน’’นฺติ วุจฺจติ. กถมิทํ สกฺกฏภาสายํ วุตฺตา ทฺวิวจนโต พหุวจนโต จ วิสุํภูตํ วจนนฺติ เจ? ยสฺมา สกฺกฏภาสายํ ‘‘ปุถุวจน’’นฺติ โวหาโร นตฺถิ, ตสฺมา อิทํ เตหิ สกฺกฏภาสายํ วุตฺเตหิ ทฺวิวจนพหุวจเนหิ วิสุํภูตอตฺถสฺส วจนนฺติ วุจฺจติ. กถญฺจ ปน สกฺกฏภาสายํ วุตฺเตหิ วิสุํภูตสฺส อตฺถสฺส วจนนฺติ ปุถุวจนนฺติ เจ? ยสฺมา สกฺกฏภาสายํ ทฺเว อุปาทาย ทฺวิวจนํ วุตฺตํ, น ติจตุปญฺจาทิเก [Pg.125] พหโว อุปาทาย, พหโว ปน อุปาทาย พหุวจนํ วุตฺตํ, น ทฺเว อุปาทาย, อยํ สกฺกฏภาสาย วิเสโส. มาคธภาสายํ ปน ทฺวิติจตุปญฺจาทิเก พหโว อุปาทาย ปุถุวจนํ วุตฺตํ, ตสฺมา สกฺกฏภาสายํ วุตฺเตหิ อตฺเถหิ วิสุํภูตสฺส อตฺถสฺส วจนนฺติ ปุถุวจนนฺติ วุจฺจติ. อยํ มาคธภาสาย วิเสโส. ตสฺมาตฺร ปุถุภูตสฺส, ปุถุโน วา อตฺถสฺส วจนํ ‘‘ปุถุวจน’’นฺติ อตฺโถ สมธิคนฺตพฺโพ. इसके अतिरिक्त ‘पुथुवचन’ (बहुवचन) यह निरुक्ति व्यवहार भी इस अर्थ को स्पष्ट करता है कि ‘बुद्धवचन में द्विवचन नहीं है’। वह (पुथुवचन) संस्कृत भाषा में कहे गए द्विवचन और बहुवचन से भिन्न वचन है, अथवा वहाँ (संस्कृत में) कहे गए अर्थों से भिन्न अर्थ वाले वचन को ‘पुथुवचन’ कहा जाता है। यदि कहें कि यह संस्कृत भाषा में कहे गए द्विवचन और बहुवचन से भिन्न वचन कैसे है? क्योंकि संस्कृत भाषा में ‘पुथुवचन’ ऐसा व्यवहार नहीं है, इसलिए इसे उन संस्कृत भाषा में कहे गए द्विवचन और बहुवचन के अर्थों से भिन्न अर्थ वाला वचन कहा जाता है। और संस्कृत भाषा में कहे गए अर्थों से भिन्न अर्थ वाला वचन ‘पुथुवचन’ कैसे है? क्योंकि संस्कृत भाषा में दो को लेकर द्विवचन कहा गया है, न कि तीन, चार, पाँच आदि बहुतों को लेकर; और बहुतों को लेकर बहुवचन कहा गया है, न कि दो को लेकर—यह संस्कृत भाषा की विशेषता है। किन्तु मागधी भाषा में दो, तीन, चार, पाँच आदि बहुतों को लेकर ‘पुथुवचन’ कहा गया है, इसलिए इसे संस्कृत भाषा में कहे गए अर्थों से भिन्न अर्थ वाला वचन अर्थात् ‘पुथुवचन’ कहा जाता है। यह मागधी भाषा की विशेषता है। इसलिए यहाँ पृथक् हुए या विस्तृत अर्थ के वचन को ‘पुथुवचन’ समझना चाहिए। อิทานิ ‘‘ปุริโส, ปุริสา, ปุริส’’นฺติ นิรุตฺติปิฏกโต อุทฺธริตนยํ นิสฺสาย ปกติรูปภูตสฺส ภูตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब ‘पुरिसो, पुरिसा, पुरिसं’ इस निरुत्तिपिटक से उद्धृत विधि के आधार पर प्रकृति रूप ‘भूत’ शब्द की पद-माला (विभक्ति रूप) कही जाती है— ภูโต, ภูตา. ภูตํ, ภูเต. ภูเตน, ภูเตหิ, ภูเตภิ. ภูตสฺส, ภูตานํ. ภูตา, ภูตสฺมา, ภูตมฺหา, ภูเตหิ, ภูเตภิ. ภูตสฺส, ภูตานํ. ภูเต, ภูตสฺมึ, ภูตมฺหิ, ภูเตสุ. โภ ภูต, ภวนฺโต ภูตา. भूतो, भूता (प्रथमा)। भूतं, भूते (द्वितीया)। भूतेन, भूतेहि, भूतेभि (तृतीया)। भूतस्स, भूतानं (चतुर्थी)। भूता, भूतस्मा, भूतम्हा, भूतेहि, भूतेभि (पञ्चमी)। भूतस्स, भूतानं (षष्ठी)। भूते, भूतस्मिं, भूतम्हि, भूतेसु (सप्तमी)। भो भूत, भवन्तो भूता (सम्बोधन)। อถ วา ‘‘โภ ภูตา’’อิติ พหุวจนํ วิญฺเญยฺยํ. ยถา ปเนตฺถ ภูตอิจฺเจตสฺส ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลา ปุริสนเยน โยชิตา, เอวํ ภาวกาทีนญฺจ อญฺเญสญฺจ ตํสทิสานํ นามิกปทมาลา ปุริสนเยน โยเชตพฺพา. เอตฺถญฺญานิ ตํสทิสานิ นาม ‘‘พุทฺโธ’’ติอาทีนํ ปทานํ พุทฺธอิจฺจาทีนิ ปกติรูปานิ. अथवा ‘भो भूता’ इसे बहुवचन समझना चाहिए। जैसे यहाँ ‘भूत’ इस प्रकृति रूप की पद-माला ‘पुरिस’ के समान जोड़ी गई है, वैसे ही भावक आदि अन्य समान शब्दों की पद-माला भी ‘पुरिस’ के समान ही जोड़नी चाहिए। यहाँ ‘बुद्ध’ आदि शब्दों के ‘बुद्ध’ आदि प्रकृति रूप उसके समान हैं। พุทฺโธ ธมฺโม สงฺโฆ มคฺโค,ขนฺโธ กาโย กาโม กปฺโป; มาโส ปกฺโข ยกฺโข ภกฺโข,นาโค เมโฆ โภโค ยาโค. बुद्ध, धर्म, संघ, मार्ग, स्कन्ध, काय, काम, कल्प; मास, पक्ष, यक्ष, भक्ष्य, नाग, मेघ, भोग, याग। ราโค โทโส โมโห มาโน,มกฺโข ถมฺโภ โกโธ โลโภ; หาโส เวโร ทาโห เตโช,ฉนฺโท กาโส สาโส โรโค. राग, दोष, मोह, मान, म्रक्ष (ईर्ष्या), स्तम्भ, क्रोध, लोभ; हास, वैर, दाह, तेज, छन्द, कास (खाँसी), श्वास, रोग। อสฺโส [Pg.126] สสฺโส อิสฺโส สิสฺโส,สีโห พฺยคฺโฆ รุกฺโข เสโล; อินฺโท สกฺโก เทโว คาโม,จนฺโท สูโร โอโฆ ทีโป. अश्व, सस्य (फसल), ईर्ष्या, शिष्य, सिंह, व्याघ्र, वृक्ष, शैल; इन्द्र, शक्र, देव, ग्राम, चन्द्र, सूर्य, ओघ, द्वीप। ปสฺโส ยญฺโญ จาโค วาโท,หตฺโถ ปตฺโต โสโส เคโธ; โสโม โยโธ คจฺโฉ อจฺโฉ,เคโห มาโฬ อฏฺโฏ สาโล. पार्श्व, यज्ञ, त्याग, वाद, हस्त, पात्र, शोष, गेध (लोभ); सोम, योध, गुच्छ, अच्छ (भालू), गेह, माल, अट्ट, साल। นโร นโค มิโค สโส,สุโณ พโก อโช ทิโช; หโย คโช ขโร สโร,ทุโม ตโล ปโฏ ธโช. नर, नग (पर्वत), मृग, शश (खरगोश), कुत्ता, बक (बगुला), अज (बकरा), द्विज (पक्षी); हय (घोड़ा), गज, खर (गधा), शर (बाण), द्रुम, ताल, पट (कपड़ा), ध्वज। อุรโค ปฏโค วิหโค ภุชโค,ขรโภ สรโภ ปสโท ควโช; มหิโส วสโภ อสุโร ครุโฬ,ตรุโณ วรุโณ พลิโส ปลิโฆ. उरग (सर्प), पतग (पक्षी), विहग, भुजग, खरभ, शरभ, प्रासाद (महल), गवज; महिष (भैंसा), वृषभ, असुर, गरुड़, तरुण, वरुण, बलिश (मछली पकड़ने का काँटा), परिघ। สาโล ธโว จ ขทิโร,โคธุโม สฏฺฐิโก ยโว; กฬาโย จ กุลตฺโถ จ,ติโล มุคฺโค จ ตณฺฑุโล. साल, धव और खदिर; गोधूम (गेहूँ), षष्टिक (साँठी चावल), यव (जौ); कलाय (मटर) और कुलत्थ, तिल, मुद्र (मूँग) और तण्डुल (चावल)। ขตฺติโย พฺราหฺมโณ เวสฺโส,สุทฺโท ธุตฺโต จ ปุกฺกุโส; จณฺฑาโล ปติโก ปฏฺโฐ,มนุสฺโส รถิโก รโถ. क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, धूर्त और पुक्कस; चण्डाल, पति, पठ, मनुष्य, रथिक, रथ। ปพฺพชิโต [Pg.127] คหฏฺโฐ จ,โคโณ โอฏฺโฐ จ คทฺรโภ; มาตุคาโม จ โอโรโธ,อิจฺจาทีนิ วิภาวเย. प्रव्रजित और गृहस्थ, बैल, ऊँट और गधा; मातृग्राम (स्त्री) और अवरोध (अन्तःपुर), इत्यादि शब्दों को समझना चाहिए। เกเจตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘นนุ โภ ‘โอโรธา จ กุมารา จา’ติ ปาฐสฺส ทสฺสนโต โอโรธสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค’’ติ? ตนฺน, ตตฺถ หิ ‘‘โอโรธา’’ติ อิทํ โอการนฺตปุลฺลิงฺคเมว, นา’การนฺติตฺถิลิงฺคํ, ตุมฺเห ปน ‘‘อาการนฺติตฺถิลิงฺค’’นฺติ มญฺญมานา เอวํ วทถ, น ปนิทํ อาการนฺติตฺถิลิงฺคํ, อถ โข ‘‘มาตุคามา’’ติปทํ วิย พหุวจนวเสน วุตฺตมาการนฺตปทนฺติ. นนุ จ โภ สมฺโมหวิโนทนิยาทีสุ โอโรธสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคตา ปากฏา, กถนฺติ เจ? ‘‘รุกฺเข อธิวตฺถา เทวตา เถรสฺส กุทฺธา ปฐมเมว มนํ ปโลเภตฺวา ‘อิโต เต สตฺตทิวสมตฺถเก อุปฏฺฐาโก ราชา มริสฺสตี’ติ สุปิเน อาโรเจสิ. เถโร ตํ กถํ สุตฺวา ราโชโรธานํ อาจิกฺขิ. ตา เอกปฺปหาเรเนว มหาวิรวํ วิรวึสู’’ติ. เอตฺถ หิ ‘‘ราโชโรธาน’’นฺติ วตฺวา ‘‘ตา’’ติ วุตฺตตฺตาว โอโรธสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคตา ปากฏาติ? ตนฺน, อตฺถสฺส ทุคฺคหณโต. ทุคฺคหิโต หิ เอตฺถ ตุมฺเหหิ อตฺโถ, เอตฺถ ปน โอโรธสทฺเทน อิตฺถิปทตฺถสฺส กถนโต อิตฺถิปทตฺถํ สนฺธาย ‘‘ตา’’ติ วุตฺตตฺตา ‘‘ตา อิตฺถิโย’’ติ อยเมวตฺโถ. ตุมฺเห ปน อมาตาปิตรสํวทฺธตฺตา อาจริยกุเล จ อนิวุฏฺฐตฺตา เอตํ สุขุมตฺถมชานนฺตา ยํ วา ตํ วา มุขารูฬฺหํ วทถ. यहाँ कुछ लोग कह सकते हैं—"हे महानुभाव! क्या 'ओरोधा च कुमारा च' (अन्तःपुर की स्त्रियाँ और राजकुमार) इस पाठ के देखे जाने से 'ओरोध' शब्द स्त्रीलिंग नहीं है?" यह सही नहीं है, क्योंकि वहाँ 'ओरोधा' यह ओकारान्त पुल्लिंग ही है, न कि आकारान्त स्त्रीलिंग। आप लोग इसे आकारान्त स्त्रीलिंग मानकर ऐसा कह रहे हैं, परन्तु यह आकारान्त स्त्रीलिंग नहीं है, बल्कि 'मातुगामा' (स्त्रियाँ) पद की तरह बहुवचन के कारण प्रयुक्त आकारान्त पद है। क्या सम्मोहविनोदनी आदि में 'ओरोध' शब्द की स्त्रीलिंगता स्पष्ट नहीं है? कैसे? "वृक्ष पर रहने वाली देवता ने स्थविर पर क्रोधित होकर पहले उनके मन को लुभाया और फिर स्वप्न में बताया कि 'आज से सातवें दिन तुम्हारा उपस्थापक राजा मर जाएगा'। स्थविर ने वह बात सुनकर राजा के अन्तःपुर (राज-ओरोध) को बता दी। उन्होंने एक साथ ही महान क्रन्दन किया।" यहाँ 'राज-ओरोधानं' कहकर 'ता' (वे स्त्रियाँ) कहने से 'ओरोध' शब्द की स्त्रीलिंगता स्पष्ट है? यह सही नहीं है, क्योंकि अर्थ को गलत समझा गया है। यहाँ आपके द्वारा अर्थ गलत ग्रहण किया गया है, क्योंकि यहाँ 'ओरोध' शब्द से स्त्री-पद के अर्थ का कथन होने के कारण, स्त्री-पद के अर्थ के सन्दर्भ में 'ता' कहने से 'ता इत्थियो' (वे स्त्रियाँ) यही अर्थ है। आप लोग माता-पिता द्वारा संवर्धित न होने के कारण और आचार्य-कुल में न रहने के कारण इस सूक्ष्म अर्थ को न जानते हुए जो कुछ भी मुँह में आता है, कह देते हैं। ภุญฺชนตฺถํ กถนตฺถํ, มุขํ โหตีติ โน วเท; ยํ วา ตํ วา มุขารูฬฺหํ, วจนํ ปณฺฑิโต นโรติ. "भोजन करने और बोलने के लिए मुख होता है"—ऐसा सोचकर विद्वान व्यक्ति को वह सब नहीं बोलना चाहिए जो मुँह में आए। น มยํโภ ยํ วา ตํ วา มุขารูฬฺหํ วทาม, อฏฺฐกถาจริยานญฺเญว วจนํ คเหตฺวา วทาม, อฏฺฐกถาเยว อมฺหากํ ปฏิสรณํ[Pg.128], น มยํ ตุมฺหากํ สทฺทหามาติ. อมฺหากํ สทฺทหถ วา มา วา, มา ตุมฺเห ‘‘อฏฺฐกถาจริยานญฺเญว วจนํ คเหตฺวา วทามา’’ติ อฏฺฐกถาจริเย อพฺภาจิกฺขถ. น หิ อฏฺฐกถาจริเยหิ ‘‘โอโรธสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค’’ติ วุตฺตฏฺฐานมตฺถิ, ตสฺมาปิ อฏฺฐกถาจริเย อพฺภาจิกฺขถ, น ยุตฺตํ พุทฺธาทีนํ ครูนมพฺภาจิกฺขนํ มหโต อนตฺถสฺส ลาภาย สํวตฺตนโต. วุตฺตญฺเหตํ ภควตา ‘‘อตฺตนา ทุคฺคหิเตน อมฺเห เจว อพฺภาจิกฺขติ, พหุญฺจ อปุญฺญํ ปสวติ, ตโต อตฺตานญฺจ ขณตี’’ติ. "हे महानुभाव! हम वह सब नहीं कहते जो मुँह में आता है, हम तो अट्ठकथाचार्यों के ही वचनों को ग्रहण करके कहते हैं, अट्ठकथा ही हमारी शरण है, हम आपकी बात पर विश्वास नहीं करते।" आप हमारी बात पर विश्वास करें या न करें, परन्तु "हम अट्ठकथाचार्यों के ही वचनों को ग्रहण करके कहते हैं"—ऐसा कहकर अट्ठकथाचार्यों पर झूठा आरोप न लगाएँ। क्योंकि अट्ठकथाचार्यों द्वारा 'ओरोध शब्द स्त्रीलिंग है'—ऐसा कहीं नहीं कहा गया है, इसलिए भी आप अट्ठकथाचार्यों पर झूठा आरोप लगा रहे हैं। बुद्ध आदि गुरुजनों पर झूठा आरोप लगाना उचित नहीं है, क्योंकि यह महान अनर्थ की प्राप्ति का कारण होता है। भगवान ने भी कहा है—"अपने द्वारा गलत ग्रहण किए गए (ज्ञान) से वह हमें भी दोष लगाता है, बहुत अपुण्य (पाप) अर्जित करता है और स्वयं का विनाश करता है।" เอวํ อพฺภาจิกฺขนสฺส อยุตฺตตํ สาวชฺชตญฺจ ทสฺเสตฺวา ปุนปิ เต อิทํ วตฺตพฺพา – ชาตกฏฺฐกถายมฺปิ ตุมฺเหหิ อาหฏอุทาหรณสทิสํ อุทาหรณมตฺถิ, ตํ สุณาถ. โกสิยชาตกฏฺฐกถายญฺหิ ‘‘สตฺถา เชตวเน วิหรนฺโต เอกํ สาวตฺถิยํ มาตุคามํ อารพฺภ กเถสิ. สา กิเรกสฺส สทฺธสฺส ปสนฺนสฺส อุปาสกพฺราหฺมณสฺส พฺราหฺมณี ทุสฺสีลา ปาปธมฺมา’’ติ ปาโฐ ทิสฺสติ. เอตฺถ หิ ‘‘มาตุคามํ อารพฺภ กเถสี’’ติ วตฺวา ‘‘สา’’ติ วุตฺตตฺตา ตุมฺหากํ มเตน มาตุคามสทฺโท อิตฺถิลิงฺโคเยว สิยา, น ปุลฺลิงฺโค, กิมิทํ อฏฺฐกถาวจนมฺปิ น ปสฺสถ, ตเทว ปน อฏฺฐกถาวจนํ ปสฺสถ, กึ สา เอว อฏฺฐกถา ตุมฺหากํ ปฏิสรณํ, น ตทญฺญาติ. इस प्रकार झूठा आरोप लगाने की अनुचितता और सदोषता को दिखाकर, फिर से उनसे यह कहना चाहिए—जातक-अट्ठकथा में भी आपके द्वारा दिए गए उदाहरण के समान उदाहरण है, उसे सुनें। कोसिय-जातक-अट्ठकथा में "शास्ता जेतवन में विहार करते हुए श्रावस्ती की एक स्त्री (मातुगाम) के विषय में कहा। वह (सा) एक श्रद्धालु प्रसन्न उपासक ब्राह्मण की ब्राह्मणी थी, जो दुःशील और पापिनी थी"—यह पाठ दिखाई देता है। यहाँ 'मातुगामं आरब्भ कथेसि' (स्त्री के विषय में कहा) कहकर 'सा' (वह) कहने से आपके मत के अनुसार 'मातुगाम' शब्द स्त्रीलिंग ही होना चाहिए, पुल्लिंग नहीं। क्या आप इस अट्ठकथा वचन को नहीं देखते? केवल उसी अट्ठकथा वचन को देखते हैं? क्या वही अट्ठकथा आपकी शरण है, अन्य नहीं? ยทิ ตาสทฺทํ อเปกฺขิตฺวา โอโรธสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคตฺตมิจฺฉถ, เอตฺถาปิ สาสทฺทมเปกฺขิตฺวา มาตุคามสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคตฺตมิจฺฉถาติ. เอวํ วุตฺตา เต นิรุตฺตรา อปฺปฏิภานา มงฺกุภูตา ปตฺตกฺขนฺธา อโธมุขา ปชฺฌาเยยฺยุํ. เอตฺถาปิ มาตุคามสทฺเทน อิตฺถิปทตฺถสฺส กถนโต อิตฺถิปทตฺถํ สนฺธาย ‘‘สา’’ติ วุตฺตตฺตา ‘‘สา อิตฺถี’’ติ อยเมวตฺโถ. กตฺถจิ [Pg.129] หิ ปธานวาจเกน ปุลฺลิงฺเคน นปุํสกลิงฺเคน วา สมานาธิกรณสฺส คุณสทฺทสฺส อภิเธยฺยลิงฺคานุวตฺติตฺตาปุลฺลิงฺควเสน วา นปุํสกลิงฺควเสน วา นิทฺทิสิตพฺพตฺเตปิ ลิงฺคมนเปกฺขิตฺวา อิตฺถิปทตฺถเมวาเปกฺขิตฺวา อิตฺถิลิงฺคนิทฺเทโส ทิสฺสติ. ตํ ยถา? ‘‘อิธ วิสาเข มาตุคาโม สุสํวิหิตกมฺมนฺตา โหติ สงฺคหิตปริชนา ภตฺตุมนาปํ จรติ, สมฺภตํ อนุรกฺขตี’’ติ จ, ‘‘โก นุ โข ภนฺเต เหตุ โก ปจฺจโย, เยน มิเธกจฺโจ มาตุคาโม ทุพฺพณฺณา จ โหติ ทุรูปา สุปาปิกา ทสฺสนาย, ทลิทฺทา จ โหติ อปฺปสฺสกา อปฺปโภคา อปฺเปสกฺขา จ. อิธ มลฺลิเก เอกจฺโจ มาตุคาโม โกธนา โหติ อุปายาสพหุลา, อปฺปมฺปิ วุตฺตา สมานา อภิสชฺชติ กุปฺปติ พฺยาปชฺชติ ปติตฺถิยติ โกปญฺจ โทสญฺจ อปฺปจฺจยญฺจ ปาตุกโรตี’’ติ จ, ‘‘ตํ โข ปน ภิกฺขเว อิตฺถิรตนํ รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส ปุพฺพุฏฺฐายินี ปจฺฉานิปาตินี กึการปฏิสฺสาวินี’’ติ จ อิเม ปโยคา. यदि 'ता' शब्द की अपेक्षा से आप 'ओरोध' शब्द को स्त्रीलिंग मानते हैं, तो यहाँ भी 'सा' शब्द की अपेक्षा से 'मातुगाम' शब्द को स्त्रीलिंग मानें। ऐसा कहे जाने पर वे निरुत्तर, प्रतिभाहीन, लज्जित, कंधे झुकाए हुए और नीचे मुँह किए हुए चिन्तामग्न हो जाएँगे। यहाँ भी 'मातुगाम' शब्द से स्त्री-पद के अर्थ का कथन होने के कारण, स्त्री-पद के अर्थ के सन्दर्भ में 'सा' कहने से 'सा इत्थी' (वह स्त्री) यही अर्थ है। कहीं-कहीं प्रधान वाचक पुल्लिंग या नपुंसक लिंग के साथ समानाधिकरण होने वाले गुण-शब्द के अभिधेय लिंग के अनुसार पुल्लिंग या नपुंसक लिंग में निर्देश किए जाने योग्य होने पर भी, लिंग की अपेक्षा न कर केवल स्त्री-पद के अर्थ की अपेक्षा से स्त्रीलिंग निर्देश देखा जाता है। वह कैसे? जैसे—"विशाखे! यहाँ स्त्री (मातुगाम) सुव्यवस्थित कर्मों वाली होती है, परिजनों का संग्रह करने वाली होती है, पति के मन के अनुकूल चलती है, संचित धन की रक्षा करती है" और "भन्ते! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है, जिससे यहाँ कोई स्त्री (मातुगाम) दुर्वर्ण, कुरूप और देखने में बहुत बुरी होती है, दरिद्र, अल्प-सम्पत्ति वाली, अल्प-भोग वाली और अल्प-यश वाली होती है। मल्लिका! यहाँ कोई स्त्री (मातुगाम) क्रोधी और बहुत क्लेश वाली होती है, थोड़ा सा कहे जाने पर भी चिढ़ जाती है, कुपित होती है, द्वेष करती है, विरोध करती है और क्रोध, दोष तथा अप्रसन्नता प्रकट करती है" और "भिक्षुओं! वह स्त्री-रत्न (इत्थिरतनं) चक्रवर्ती राजा के लिए पहले उठने वाली, बाद में सोने वाली, 'क्या करूँ' ऐसा पूछने वाली होती है"—ये प्रयोग हैं। กตฺถจิ ปน ปธานวาจเกน นปุํสกลิงฺเคน สมานาธิกรณสฺส คุณสทฺทสฺส อภิเธยฺยลิงฺคานุวตฺติตฺตา นปุํสกลิงฺควเสน นิทฺทิสิตพฺพตฺเตปิ ลิงฺคมนเปกฺขิตฺวา ปุริสปทตฺถเมวาเปกฺขิตฺวา ปุลฺลิงฺคนิทฺเทโส ทิสฺสติ. ตํ ยถา? ‘‘ปญฺจ ปจฺเจกพุทฺธสตานิ อิมสฺมึ อิสิคิลิสฺมึ ปพฺพเต จิรนิวาสิโน อเหสุํ. ตํ โข ปน รญฺโญ จกฺกวตฺติสฺส ปริณายกรตนํ ญาตานํ ปเวเสตา อญฺญาตานํ นิวาเรตา’’ติ. กตฺถจิ ปธานวาจเกน ลิงฺคตฺตเยน สมานาธิกรณสฺส คุณสทฺทสฺส อภิเธยฺยลิงฺคานุรูปํ นิทฺเทโส ทิสฺสติ. ตํ ยถา? สา อิตฺถี ‘‘สีลวตี กลฺยาณธมฺมา. อฏฺฐหิ โข นกุลมาเต ธมฺเมหิ สมนฺนาคโต มาตุคาโม กายสฺส เภทา ปรมฺมรณา มนาปกายิกานํ เทวานํ [Pg.130] สหพฺยตํ อุปปชฺชติ. สทฺโธ ปุริสปุคฺคโล, สทฺธํ กุลํ, จิตฺตํ ทนฺตํ สุขาวห’’นฺติ. कहीं-कहीं प्रधानवाचक नपुंसकलिङ्ग के साथ समानाधिकरण होने पर भी गुणवाचक शब्द के अभिधेयलिङ्ग (जिसका वर्णन हो रहा है उसके लिङ्ग) के अनुसार होने के कारण नपुंसकलिङ्ग में निर्देश होना चाहिए, फिर भी लिङ्ग की अपेक्षा न कर केवल पुरुष अर्थ की अपेक्षा करके पुल्लिंग निर्देश देखा जाता है। वह कैसे? 'इस ऋषिगिरि पर्वत पर पाँच सौ प्रत्येक बुद्ध चिरकाल से निवास करते थे। वह (रत्न) राजा चक्रवर्ती का परिणायक रत्न है, जो ज्ञातों को प्रवेश कराने वाला और अज्ञातों को रोकने वाला है।' कहीं-कहीं प्रधानवाचक तीनों लिङ्गों के साथ समानाधिकरण होने पर गुणवाचक शब्द का अभिधेयलिङ्ग के अनुरूप निर्देश देखा जाता है। वह कैसे? वह स्त्री 'शीलवती और कल्याणधर्मा है। आठ धर्मों से युक्त मातृग्राम (स्त्री) काया के भेद के बाद मृत्यु के उपरांत मनापकायिक देवों की सभा में उत्पन्न होती है। श्रद्धालु पुरुषपुद्गल, श्रद्धालु कुल, दमित चित्त सुखदायक होता है'। เสยฺยอิติ สทฺโท ปน เยภุยฺเยน โอการนฺตภาเว ฐตฺวา ลิงฺคตฺตยานุกูโล ภวติ เอกากาเรเนว ติฏฺฐนโต. กถํ? เสยฺโย อมิตฺโต มติยา อุเปโต. เอสาว ปูชนา เสยฺโย, เอกาหํ ชีวิตํ เสยฺโย. किन्तु 'सेय्य' (seyya) शब्द प्रायः 'ओ'कारान्त भाव में स्थित होकर तीनों लिङ्गों के अनुकूल होता है क्योंकि वह एक ही रूप में रहता है। कैसे? बुद्धिमान् के लिए शत्रु भी 'सेय्यो' (श्रेष्ठ) है। यही पूजा 'सेय्यो' (श्रेष्ठ) है, एक दिन का जीवन 'सेय्यो' (श्रेष्ठ) है। ‘‘ธมฺเมน จ อลาโภ โย,โย จ ลาโภ อธมฺมิโก; อลาโภ ธมฺมิโก เสยฺโย,ยญฺเจ ลาโภ อธมฺมิโก. धर्मपूर्वक जो अलाभ (हानि) है और जो अधार्मिक लाभ है; धार्मिक अलाभ 'सेय्यो' (श्रेष्ठ) है, अधार्मिक लाभ की अपेक्षा। ยโส จ อปฺปพุทฺธีนํ, วิญฺญูนํ อยโส จ โย; อยโสว เสยฺโย วิญฺญูนํ, น ยโส อปฺปพุทฺธินํ. अल्पबुद्धि वालों का यश और विद्वानों का जो अपयश है; विद्वानों का अपयश ही 'सेय्यो' (श्रेष्ठ) है, अल्पबुद्धि वालों का यश नहीं। ทุมฺเมเธหิ ปสํสา จ, วิญฺญูหิ ครหา จ ยา; ครหาว เสยฺโย วิญฺญูหิ, ยญฺเจ พาลปฺปสํสนา. मूर्खों द्वारा प्रशंसा और विद्वानों द्वारा जो निन्दा है; विद्वानों द्वारा निन्दा ही 'सेय्यो' (श्रेष्ठ) है, मूर्खों की प्रशंसा की अपेक्षा। สุขญฺจ กามมยิกํ, ทุกฺขญฺจ ปวิเวกิกํ; ปวิเวกํ ทุกฺขํ เสยฺโย, ยญฺเจ กามมยํ สุขํ. काममय सुख और विवेकजन्य (एकान्त का) दुःख; विवेकजन्य दुःख 'सेय्यो' (श्रेष्ठ) है, काममय सुख की अपेक्षा। ชีวิตญฺจ อธมฺเมน, ธมฺเมน มรณญฺจ ยํ; มรณํ ธมฺมิกํ เสยฺโย, ยญฺเจ ชีเว อธมฺมิก’’นฺติ. अधर्म से जीवन और धर्म से जो मृत्यु है; धार्मिक मृत्यु 'सेय्यो' (श्रेष्ठ) है, अधर्म से जीने की अपेक्षा। เอวมยํ เสยฺย อิติ สทฺโท โอการนฺตภาเว ฐตฺวา ลิงฺคตฺตยานุกูโล ภวติ. กตฺถจิ ปน อาการนฺตภาเว ฐตฺวา อิตฺถิลิงฺคานุกูโล ทิสฺสติ ‘‘อิตฺถีปิ หิ เอกจฺจิยา, เสยฺยา โปส ชนาธิปา’’ติ. นิคฺคหีตนฺโต ปน หุตฺวา นปุํสกลิงฺคานุกูโล อปสิทฺโธ. เอวํปกาเร ปโยเค กึ ตุมฺเห น ปสฺสถาติ. เอวํ วุตฺตา จ เต นิรุตฺตราว ภวิสฺสนฺติ. इस प्रकार यह 'सेय्य' शब्द 'ओ'कारान्त भाव में रहकर तीनों लिङ्गों के अनुकूल होता है। कहीं-कहीं 'आ'कारान्त भाव में रहकर स्त्रीलिंग के अनुकूल देखा जाता है - 'हे जनाधिप! कोई-कोई स्त्री भी पुरुष से श्रेष्ठा (सेय्या) होती है'। किन्तु मकारान्त (निग्गहीत अन्त वाला) होकर नपुंसकलिङ्ग के अनुकूल होना अप्रसिद्ध है। इस प्रकार के प्रयोग में क्या तुम नहीं देखते? ऐसा कहने पर वे निरुत्तर ही होंगे। สเจปิ [Pg.131] เต เอตฺถ เอวํ วเทยฺยุํ ‘‘ตตฺถ ตตฺถ สุตฺตปฺปเทเส อฏฺฐกถาทีสุ จ ‘มาตุคาโม’ติ วา ‘มาตุคาเมนา’ติ วา โอการนฺตปุลฺลิงฺคภาเวน มาตุคามสทฺทสฺส ทสฺสนโต ปุลฺลิงฺคภูตํ มาตุคามสทฺทํ อนเปกฺขิตฺวา อิตฺถิปทตฺถเมว อเปกฺขิตฺวา ‘‘สา อิตฺถี’’ติ อิตฺถีสทฺเทน สาสทฺทสฺส สมฺพนฺธคฺคหณํ มยํ สมฺปฏิจฺฉาม, ‘โอโรโธ’ติ วา ‘โอโรเธนา’ติ วา โอการนฺตปุลฺลิงฺคภาเวน ฐิตสฺส โอโรธสทฺทสฺส อทสฺสนโต ปน ตุมฺเหหิ วุตฺตํ ปุริมตฺถํ น สมฺปฏิจฺฉามา’’ติ. ตทา เตสํ อิมานิ วินยปาฬิยํ อาคตปทานิ ทสฺเสตพฺพานิ ‘‘เตน โข ปน สมเยน ราชา อุเทโน อุยฺยาเน ปริจาเรสิ สทฺธึ โอโรเธน, อถ โข รญฺโญ อุเทนสฺส โอโรโธ ราชานํ อุเทนํ เอตทโวจา’’ติ. เอวํ อิมานิ สุตฺตปทานิ ทสฺเสตฺวา สุตฺตนิปาตฏฺฐกถายํ ‘‘ราโม นาม ราชา กุฏฺฐโรคี โอโรเธหิ จ นาฏเกหิ จ ชิคุจฺฉมาโน’’ติ วจนญฺจ ทสฺเสตฺวา ‘‘คจฺฉถ ตุมฺเห ครุกุลมุปคนฺตฺวา ภควโต สทฺธมฺมสฺส จิรฏฺฐิตตฺถํ สาธุกํ ปทพฺยญฺชนานิ อุคฺคณฺหถา’’ติ อุยฺโยเชตพฺพา. यदि वे यहाँ ऐसा कहें - 'विभिन्न सुत्त प्रदेशों और अट्ठकथा आदि में 'मातृग्रामः' (मातुगामो) या 'मातृग्रामेण' (मातुगामेन) इस प्रकार ओकारान्त पुल्लिंग भाव में मातृग्राम शब्द के देखे जाने के कारण, पुल्लिंग रूप मातृग्राम शब्द की अपेक्षा न कर केवल स्त्री अर्थ की अपेक्षा करके 'सा इत्थी' इस स्त्री शब्द के साथ 'सा' शब्द का सम्बन्ध ग्रहण हम स्वीकार करते हैं; किन्तु 'ओरोध' (अन्तःपुर/रानी) या 'ओरोधेन' इस प्रकार ओकारान्त पुल्लिंग भाव में स्थित ओरोध शब्द के न देखे जाने के कारण तुम्हारे द्वारा कही गई पूर्व बात को हम स्वीकार नहीं करते'। तब उन्हें विनयपिटक में आए ये पद दिखाने चाहिए - 'उस समय राजा उदयन अन्तःपुर (ओरोधेन) के साथ उद्यान में विहार कर रहे थे, तब राजा उदयन के अन्तःपुर (ओरोधो) ने राजा उदयन से यह कहा'। इस प्रकार इन सुत्त पदों को दिखाकर और सुत्तनिपात अट्ठकथा में 'राम नामक राजा कुष्ठरोगी होने के कारण अन्तःपुर की स्त्रियों (ओरोधेहि) और नर्तकियों द्वारा घृणा किया जाता हुआ' इस वचन को भी दिखाकर उन्हें यह कहकर विदा करना चाहिए - 'जाओ, तुम गुरु-कुल में जाकर भगवान् के सद्धर्म की चिरस्थिति के लिए भली-भाँति पद-व्यञ्जनों को सीखो'। อิทานิ มาตุคามสทฺทาทีสุ กิญฺจิ วินิจฺฉยํ วทาม – มาตุคามสทฺโท จ โอโรธสทฺโท จ ทารสทฺโท จาติ อิเม อิตฺถิปทตฺถวาจกาปิ สมานา เอกนฺเตน ปุลฺลิงฺคา ภวนฺติ. เตสุ ทารสทฺทสฺส เอกสฺมึ อตฺเถ วตฺตมานสฺสาปิ พหุวจนกตฺตเมว สทฺทสตฺถวิทู อิจฺฉนฺติ, น เอกวจนกตฺตํ. มยํ ปน ทารสทฺทสฺส เอกสฺมึ อตฺเถ เอกวจนกตฺตํ, เยภุยฺเยน ปน พหุวจนกตฺตํ อนุชานาม, พวฺหตฺเถ วตฺตพฺพเมว นตฺถิ. ปาฬิยญฺหิ ทารสทฺโท เยภุยฺเยน พหุวจนโก ภวติ, เอกวจนโก อปฺโป. ตตฺริเม ปโยคา – अब मातृग्राम आदि शब्दों के विषय में कुछ निर्णय कहते हैं - मातृग्राम शब्द, ओरोध शब्द और दार शब्द - ये स्त्री अर्थ के वाचक होने पर भी एकान्ततः (निश्चित रूप से) पुल्लिंग होते हैं। उनमें से 'दार' शब्द के एक अर्थ में वर्तमान होने पर भी शब्दशास्त्र के ज्ञाता उसे बहुवचन ही चाहते हैं, एकवचन नहीं। किन्तु हम 'दार' शब्द का एक अर्थ में एकवचन होना और प्रायः बहुवचन होना स्वीकार करते हैं, बहुत अर्थों में तो कहना ही क्या है। पालि में 'दार' शब्द प्रायः बहुवचन होता है, एकवचन कम। वहाँ ये प्रयोग हैं - ‘‘ทาสา [Pg.132] จ ทาสฺโย อนุชีวิโน จ,ปุตฺตา จ ทารา จ มยญฺจ สพฺเพ; ธมฺมญฺจรามปฺปรโลกเหตุ,ตสฺมา หิ อมฺหํ ทหรา น มิยฺยเร’’ติ จ, 'दास और दासियाँ, अनुजीवी (सेवक), पुत्र और पत्नियाँ (दारा) और हम सब; परलोक के लिए धर्म का आचरण करते हैं, इसीलिए हमारे यहाँ युवा नहीं मरते'। ‘‘โย ญาตีนํ สขีนํ วา, ทาเรสุ ปฏิทิสฺสติ; สหสา สมฺปิยาเยน, ตํ ชญฺญาวสโล อิตี’’ติ จ, 'जो सम्बन्धियों या मित्रों की पत्नियों (दारेसु) के साथ देखा जाता है, बलपूर्वक या प्रेम से, उसे 'वसल' (नीच) जानना चाहिए'। ‘‘เสหิ ทาเรหิ’สนฺตุฏฺโฐ, เวสิยาสุ ปทิสฺสติ; ทิสฺสติ ปรทาเรสุ, ตํ ปราภวโต มุข’’นฺติ จ, 'अपनी पत्नियों (दारेहि) से सन्तुष्ट न होकर जो वेश्याओं में देखा जाता है, और पराई स्त्रियों (परदारेसु) में देखा जाता है, वह पराभव (पतन) का मुख है'। ‘‘ปุตฺเตสุ ทาเรสุ จ ยา อเปกฺขา’’ติ จ พฺยาเส, สมาเส ปน ‘‘ปุตฺตทารา ทิสา ปจฺฉา, ปุตฺตทาเรหิ มตฺตโน’’ติ จ เอวมาทโย พหุวจนปฺปโยคา พหโว ภวนฺติ. 'पुत्रों और पत्नियों (दारेसु) में जो आसक्ति है' - इस प्रकार विग्रह में, और समास में 'पुत्र-पत्नी (पुत्तदारा) पीछे की दिशा है, अपने पुत्र-पत्नियों (पुत्तदारेहि) के साथ' इत्यादि बहुत से बहुवचन प्रयोग होते हैं। เอกวจนปฺปโยคา ปน อปฺปา. เสยฺยถิทํ? ‘‘ครูนํ ทาเร, ธมฺมํ จเร โยปิ สมุญฺชกํ จเร, ทารญฺจ โปสํ ททมปฺปกสฺมิ’’นฺติ จ, एकवचन प्रयोग तो कम हैं। जैसे कि - 'गुरुओं की पत्नी (दारे) के प्रति, जो उञ्छवृत्ति (अनाज के दाने चुनकर) जीवन बिताता है वह भी धर्म का आचरण करे, और थोड़े (धन) में से भी पत्नी (दारञ्च) का पोषण करे'। ‘‘เย คหฏฺฐา ปุญฺญกรา, สีลวนฺโต อุปาสกา; ธมฺเมน ทารํ โปเสนฺติ, เต นมสฺสามิ มาตลี’’ติ จ, 'जो गृहस्थ पुण्य करने वाले, शीलवान् उपासक हैं और धर्मपूर्वक पत्नी (दारं) का पोषण करते हैं, हे मातलि! मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ'। ‘‘ปรทารํ น คจฺเฉยฺยํ, สทารปสุโต สิย’’นฺติ จ, 'परस्त्री (परदारं) के पास न जाए, अपनी पत्नी (सदार) में ही लगा रहे'। ‘‘โย อิจฺเฉ ปุริโส โหตุํ, ชาตึ ชาตึ ปุนปฺปุนํ; ปรทารํ วิวชฺเชยฺย, โธตปาโทว กทฺทม’’นฺติ จ 'जो पुरुष बार-बार जन्म-जन्म में पुरुष होना चाहता है, वह परस्त्री (परदारं) को वैसे ही त्याग दे जैसे धुले हुए पैर कीचड़ को'। เอวมาทโย เอกวจนปฺปโยคา อปฺปา. इत्यादि एकवचन प्रयोग कम हैं। สมาหารลกฺขณวเสน ปเนส ทารสทฺโท นปุํสกลิงฺเคกวจโนปิ กตฺถจิ ภวติ. ‘‘อาทาย ปุตฺตทารํ. ปุตฺตทารสฺส สงฺคโห’’อิติ เอวํ อิธ วุตฺตปฺปกาเรน ลิงฺคญฺจ อตฺถญฺจ สลฺลกฺเขตฺวา ‘‘ปุริโส ปุริสา’’ติ ปวตฺตํ ปุริสสทฺทนยํ นิสฺสาย [Pg.133] สพฺเพสํ ‘‘ภูโต ภาวโก ภโว’’ติอาทีนํ ภูธาตุมยานํ อญฺเญสญฺโจการนฺตปทานํ นามิกปทมาลาสุ สทฺธาสมฺปนฺเนหิ กุลปุตฺเตหิ สทฺธมฺมฏฺฐิติยา โกสลฺลมุปฺปาเทตพฺพํ. समाहार लक्षण के वश से यह 'दार' शब्द कहीं-कहीं नपुंसकलिङ्ग एकवचन में भी होता है। जैसे— 'आदाय पुत्तदारं' (पुत्र और पत्नी को लेकर), 'पुत्तदारस्स सङ्गहो' (पुत्र और पत्नी का संग्रह)। इस प्रकार यहाँ कहे गए प्रकार से लिङ्ग और अर्थ को लक्षित कर 'पुरिसो पुरिसा' इस प्रकार प्रवृत्त 'पुरिस' शब्द की पद्धति का आश्रय लेकर, 'भूतो भावको भवो' इत्यादि सभी भू-धातु से बने हुए तथा अन्य ओ-कारान्त शब्दों की नामिक पदमालाओं में श्रद्धासम्पन्न कुलपुत्रों को सद्धर्म की स्थिति के लिए कौशल उत्पन्न करना चाहिए। กึ ปน สพฺพานิ โอการนฺตปทานิ ปุริสนเย สพฺพปฺปกาเรน เอกสทิสาเนว หุตฺวา ปวิฏฺฐานีติ? น ปวิฏฺฐานิ. กานิจิ หิ โอการนฺตปทานิ ปุริสนเย สพฺพถา ปวิฏฺฐานิ จ โหนฺติ, เอกเทเสน ปวิฏฺฐานิ จ, กานิจิ โอการนฺตปทานิ ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺฐานิ จ โหนฺติ, เอกเทเสน น ปวิฏฺฐานิ จ, กานิจิ โอการนฺตปทานิ ปุริสนเย สพฺพถา อปฺปวิฏฺฐาเนว. ตตฺร กตมานิ กานิจิ โอการนฺตปทานิ ปุริสนเย สพฺพถา ปวิฏฺฐานิ จ โหนฺติ, เอกเทเสน ปวิฏฺฐานิ จ? ‘‘สโร วโย เจโต’’ติอาทีนิ. สโรอิติ หิ อยํสทฺโท อุสุสทฺทสรวนอการาทิสรวาจโก เจ, ปุริสนเย สพฺพถา ปวิฏฺโฐ. รหทวาจโก เจ, มโนคณปกฺขิกตฺตา ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺโฐ. วโยอิติ สทฺโท ปริหานิวาจโก เจ, ปุริสนเย สพฺพถา ปวิฏฺโฐ. อายุโกฏฺฐาสวาจโก เจ, มโนคณปกฺขิกตฺตา ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺโฐ. เจโต อิติ สทฺโท ยทิ ปณฺณตฺติวาจโก, ปุริสนเย สพฺพถา ปวิฏฺโฐ. ยทิ ปน จิตฺตวาจโก, มโนคณปกฺขิกตฺตา ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺโฐ. มโนคโณ จ นาม – क्या सभी ओ-कारान्त पद 'पुरिस' की पद्धति में सब प्रकार से एक समान होकर प्रविष्ट हुए हैं? नहीं प्रविष्ट हुए हैं। क्योंकि कुछ ओ-कारान्त पद 'पुरिस' की पद्धति में सर्वथा प्रविष्ट हैं और एकदेश (आंशिक) से भी प्रविष्ट हैं; कुछ ओ-कारान्त पद 'पुरिस' की पद्धति में एकदेश से प्रविष्ट हैं और एकदेश से प्रविष्ट नहीं हैं; कुछ ओ-कारान्त पद 'पुरिस' की पद्धति में सर्वथा अप्रविष्ट ही हैं। वहाँ कौन से कुछ ओ-कारान्त पद 'पुरिस' की पद्धति में सर्वथा प्रविष्ट हैं और एकदेश से प्रविष्ट हैं? 'सरो, वयो, चेतो' इत्यादि। यदि 'सरो' यह शब्द बाण, शब्द, सरवन (सरकंडा) या अकार आदि स्वर का वाचक है, तो 'पुरिस' की पद्धति में सर्वथा प्रविष्ट है। यदि वह जलाशय (सरोवर) का वाचक है, तो मनोगण के पक्ष का होने के कारण 'पुरिस' की पद्धति में एकदेश से प्रविष्ट है। यदि 'वयो' शब्द हानि (क्षय) का वाचक है, तो 'पुरिस' की पद्धति में सर्वथा प्रविष्ट है। यदि वह आयु के भाग का वाचक है, तो मनोगण के पक्ष का होने के कारण 'पुरिस' की पद्धति में एकदेश से प्रविष्ट है। यदि 'चेतो' शब्द प्रज्ञप्ति (संज्ञा) का वाचक है, तो 'पुरिस' की पद्धति में सर्वथा प्रविष्ट है। यदि वह चित्त का वाचक है, तो मनोगण के पक्ष का होने के कारण 'पुरिस' की पद्धति में एकदेश से प्रविष्ट है। और मनोगण इस प्रकार है— มโน วโจ วโย เตโช,ตโป เจโต ตโม ยโส; อโย ปโย สิโร ฉนฺโท,สโร อุโร รโห อโห – मन, वच, वय, तेज, तप, चेत, तम, यश, अय, पय, शिर, छन्द, सर, उर, रह, अह— อิเม โสฬส. ये सोलह हैं। อิทานิ ยถาวุตฺตสฺส ปากฏีกรณตฺถํ มนสทฺทาทีนํ นามิกปทมาลํ กถยาม – अब पूर्वोक्त को स्पष्ट करने के लिए 'मन' आदि शब्दों की नामिक पदमाला (शब्द-रूप) कहते हैं— มโน[Pg.134], มนา. มนํ, มโน, มเน. มนสา, มเนน, มเนหิ, มเนภิ. มนโส, มนสฺส, มนานํ. มนา, มนสฺมา, มนมฺหา, มเนหิ, มเนภิ. มนโส, มนสฺส, มนานํ. มนสิ, มเน, มนสฺมึ, มนมฺหิ, มเนสุ. โภ มน, ภวนฺโต มนา. मनो, मना (प्रथमा)। मनं, मनो, मने (द्वितीया)। मनसा, मनेन, मनेहि, मनेभि (तृतीया)। मनसो, मनस्स, मनानं (चतुर्थी)। मना, मनस्मा, मनम्हा, मनेहि, मनेभि (पञ्चमी)। मनसो, मनस्स, मनानं (षष्ठी)। मनसि, मने, मनस्मिं, मनम्हि, मनेसु (सप्तमी)। भो मन, भवन्तो मना (सम्बोधन)। อถ วา ‘‘โภ มนา’’อิติ พหุวจนมฺปิ เญยฺยํ. เอวํ วโจ, วจา. วจํ, วโจ, วเจ. วจสาติอาทินา นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. อหสทฺทสฺส ปน ภุมฺเมกวจนฏฺฐาเน อหสิ, อเห, อหสฺมึ, อหมฺหิ, อหุ, อหนีติ โยเชตพฺพา. अथवा 'भो मना' यह बहुवचन भी जानना चाहिए। इसी प्रकार वचो, वचा। 'वचसा' इत्यादि के द्वारा नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। 'अह' शब्द के सप्तमी एकवचन के स्थान पर अहसि, अहे, अहस्मिं, अहम्हि, अहु, अहनि—ये रूप जोड़ने चाहिए। อิทานิ รูปนฺตรวิเสสทสฺสนตฺถํ นปุํสกลิงฺคสฺส มนสทฺทสฺสปิ นามิกปทมาลํ วทาม, อฏฺฐาเน อยํ กถิตาติ น โจเทตพฺพํ. अब रूपान्तर के विशेष दर्शन के लिए नपुंसकलिङ्ग 'मन' शब्द की भी नामिक पदमाला कहते हैं, यह अस्थान (अनुचित स्थान) पर कही गई है, ऐसा आक्षेप नहीं करना चाहिए। มนํ, มนานิ, มนา. มนํ, มนานิ, มเน. มเนน, มเนหิ, มเนภิ. มนสฺส, มนโส, มนานํ. มนา, มนสฺมา, มนมฺหา, มเนหิ, มเนภิ. มนสฺส, มนโส, มนานํ. มเน, มนสฺมึ, มนมฺหิ, มเนสุ. โภ มน, ภวนฺโต มนา. อถ วา ‘‘โภ มนานิ, โภ มนา’’เอวมฺปิ พหุวจนํ เวทิตพฺพํ. เอวมุตฺตรตฺราปิ นโย. मनं, मनानि, मना (प्रथमा)। मनं, मनानि, मने (द्वितीया)। मनेन, मनेहि, मनेभि (तृतीया)। मनस्स, मनसो, मनानं (चतुर्थी)। मना, मनस्मा, मनम्हा, मनेहि, मनेभि (पञ्चमी)। मनस्स, मनसो, मनानं (षष्ठी)। मने, मनस्मिं, मनम्हि, मनेसु (सप्तमी)। भो मन, भवन्तो मना। अथवा 'भो मनानि, भो मना'—इस प्रकार भी बहुवचन जानना चाहिए। इसी प्रकार आगे भी विधि है। เอตฺถ จ ปุลฺลิงฺคสฺส มนสทฺทสฺส ปจฺจตฺตกรณสมฺปทานสามิภุมฺมวจนานิ มโน มนสา มนโส มนสีติ รูปานิ ฐเปตฺวา ยานิ เสสานิ, นปุํสกลิงฺคสฺส จ มนสทฺทสฺส ปจฺจตฺตวจนานิ ‘‘มนํ มนานี’’ติ รูปานิ จ, อฏฺฐมฺโยปโยควจนานํ ‘‘มนํ มนานี’’ติ รูปทฺวยญฺจ ฐเปตฺวา ยานิ เสสานิ, ตานิ สพฺพานิ กมโต สมสมานิ. और यहाँ पुल्लिंग 'मन' शब्द के प्रथमा, तृतीया, चतुर्थी, षष्ठी और सप्तमी विभक्ति के 'मनो, मनसा, मनसो, मनसि' इन रूपों को छोड़कर जो शेष हैं, और नपुंसकलिङ्ग 'मन' शब्द के प्रथमा विभक्ति के 'मनं, मनानि' इन रूपों को तथा द्वितीया विभक्ति के 'मनं, मनानि' इन दो रूपों को छोड़कर जो शेष हैं, वे सभी क्रमशः समान ही हैं। เกจิ โอการนฺโต มโนอิติ สทฺโท นปุํสกลิงฺโคติ วทนฺติ, เต วตฺตพฺพา – ยทิ โส นปุํสกลิงฺโค สิยา, ตสฺสทิเสหิ วโจ วโยติอาทิสทฺเทหิปิ นปุํสกลิงฺเคเหว ภวิตพฺพํ, น ‘‘เต นปุํสกลิงฺคา’’ติ ครู วทนฺติ, ‘‘ปุลฺลิงฺคา’’อิจฺเจว วทนฺติ. ยสฺมา จ ปาฬิยํ ‘‘กาโย อนิจฺโจ; มโน [Pg.135] อนิจฺโจ’’ติ จ ‘‘กาโย ทุกฺโข, มโน ทุกฺโข’’ติ จ ‘‘นิจฺโจ วา อนิจฺโจ วาติ อนิจฺโจ ภนฺเต’’ติ จ เอวมาทโย ปุลฺลิงฺคปฺปโยคา พหโว ทิฏฺฐา. เตน ญายติ มโนสทฺโท เอกนฺเตน ปุลฺลิงฺโคติ. ยทิ ปน นปุํสกลิงฺโคสิยา, ‘‘อนิจฺโจ ทุกฺโข’’ติ เอวมาทีนิ ตํสมานาธิกรณานิ อเนกปทสตานิปิ นปุํสกลิงฺคาเนว สิยุํ. น หิ ตานิ นปุํสกลิงฺคานิ, อถ โข อภิเธยฺยลิงฺคานุวตฺตกานิ วาจฺจลิงฺคานิ. เอวํ มโนสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺคตา ปจฺเจตพฺพาติ, สเจ มโนสทฺโท นปุํสกลิงฺโค น โหติ, กถํ ‘‘มนานี’’ติ นปุํสกรูปํ ทิสฺสตีติ? สจฺจํ ‘‘มนานี’’ติ นปุํสกลิงฺคเมว, ตถาปิ มโนคเณ ปมุขภาเวน คหิตสฺโสการนฺตสฺส มนสทฺทสฺส รูปํ น โหติ. อถ กิญฺจรหีติ เจ? จิตฺตสทฺเทน สมานลิงฺคสฺส สมานสุติตฺเตปิ มโนคเณ อปริยาปนฺนสฺส นิคฺคหีตนฺตสฺเสว มนสทฺทสฺส รูปํ. มนสทฺโท หิ ปุนฺนปุํสกวเสน ทฺวิธา ภิชฺชติ ‘‘มโน มนํ’’อิติ ยถา ‘‘อชฺชโวอชฺชว’’นฺติ. ‘‘มโน เจ นปฺปทุสฺสติ. สนฺตํ ตสฺส มนํ โหตี’’ติ หิ ปาฬิ. ยทิ จ โส มโนสทฺโท นปุํสกลิงฺโค น โหติ. कुछ लोग ओ-कारान्त 'मनो' शब्द को नपुंसकलिङ्ग कहते हैं, उनसे कहना चाहिए—यदि वह नपुंसकलिङ्ग होता, तो उसके समान 'वचो, वयो' आदि शब्दों को भी नपुंसकलिङ्ग ही होना चाहिए था, किन्तु आचार्य उन्हें 'नपुंसकलिङ्ग' नहीं कहते, अपितु 'पुल्लिङ्ग' ही कहते हैं। और चूँकि पालि में 'कायो अनिच्चो; मनो अनिच्चो' और 'कायो दुक्खो, मनो दुक्खो' तथा 'निच्चो वा अनिच्चो वाति अनिच्चो भन्ते' इत्यादि बहुत से पुल्लिङ्ग प्रयोग देखे जाते हैं। उससे ज्ञात होता है कि 'मन' शब्द एकान्ततः (निश्चित रूप से) पुल्लिङ्ग है। यदि वह नपुंसकलिङ्ग होता, तो 'अनिच्चो दुक्खो' इत्यादि उसके समानाधिकरण सैकड़ों पद भी नपुंसकलिङ्ग ही होते। वे नपुंसकलिङ्ग नहीं हैं, बल्कि वे अभिधेय (विशेष्य) के लिङ्ग का अनुसरण करने वाले वाच्यलिङ्ग (विशेषण) हैं। इस प्रकार 'मन' शब्द की पुल्लिङ्गता स्वीकार करनी चाहिए। यदि 'मन' शब्द नपुंसकलिङ्ग नहीं है, तो 'मनानि' यह नपुंसक रूप कैसे दिखाई देता है? सत्य है, 'मनानि' नपुंसकलिङ्ग ही है, फिर भी वह मनोगण में प्रमुख रूप से गृहीत ओ-कारान्त 'मन' शब्द का रूप नहीं है। तो फिर किसका है? 'चित्त' शब्द के समान लिङ्ग वाला होने के कारण, समान श्रुति (ध्वनि) होने पर भी मनोगण में अपर्यापन्न (शामिल न होने वाले) निग्गहीत-अन्त (अं-कारान्त) 'मनं' शब्द का ही वह रूप है। क्योंकि 'मन' शब्द पुल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग के भेद से दो प्रकार से विभाजित होता है— 'मनो' और 'मनं', जैसे 'अज्जवो' और 'अज्जवं'। क्योंकि पालि है— 'मनो चे नप्पदुस्सति' (यदि मन प्रदूषित नहीं होता) और 'सन्तं तस्स मनं होति' (उसका मन शान्त होता है)। और यदि वह 'मनो' शब्द नपुंसकलिङ्ग नहीं होता। ‘‘ครุ เจติยปพฺพตวตฺตนิยา,ปมทา ปมทา ปมทา วิมทํ; สมณํ สุนิสมฺม อกา หสิตํ,ปติตํ อสุเภสุ มุนิสฺส มโน’’ติ "चेतियपब्बत (चैत्यपर्वत) के मार्ग पर रहने वाली गौरवमयी स्त्री ने, मदमत्त होकर, मद को दूर करने वाले श्रमण को सुनकर हँसी की, जिससे मुनि का मन अशुभ (विषयों) में गिर गया।" เอตฺถ มโนสทฺเทน สมานาธิกรโณ ‘‘ปติต’’นฺติ สทฺโท นปุํสกลิงฺคภาเวน กสฺมา สนฺนิหิโต. ยสฺมา จ สมานาธิกรณปทํ นปุํสกลิงฺคภาเวน สนฺนิหิตํ, ตสฺมา สทฺทนฺตรสนฺนิธานวเสน มโนสทฺโท นปุํสกลิงฺโคติ ญายตีติ? ตนฺน, สมานาธิกรณปทสฺส สพฺพตฺถ ลิงฺควิเสสาโชตนโต. ยทิ หิ สมานาธิกรณปทํ สพฺพตฺถ ลิงฺควิเสสํ โชเตยฺย, ‘‘จตฺตาโร อินฺทฺริยานี’’ติ เอตฺถาปิ ‘‘จตฺตาโร’’ติ [Pg.136] ปทํ อินฺทฺริยสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺคตฺตํ กเรยฺย, น จ กาตุํ สกฺโกติ. อินฺทฺริยสทฺโท หิ เอกนฺเตน นปุํสกลิงฺโค. ยทิ ตุมฺเห ‘‘ปติต’’นฺติ สมานาธิกรณปทํ นิสฺสาย มโนสทฺทสฺส นปุํสกลิงฺคตฺตมิจฺฉถ, ‘‘จตฺตาโร อินฺทฺริยานี’’ติ เอตฺถปิ ‘‘จตฺตาโร’’ติ สมานาธิกรณปทํ นิสฺสาย อินฺทฺริยสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺคตฺตํ อิจฺฉถาติ. น มยํ โภ อินฺทฺริยสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺคตฺตํ อิจฺฉาม, อถ โข นปุํสกลิงฺคตฺตํเยว อิจฺฉาม, ‘‘จตฺตาโร’’ติ ปทํ ลิงฺควิปลฺลาสวเสน ฐิตตฺตา ‘‘จตฺตารี’’ติ คณฺหาม, ตสฺมา ‘‘จตฺตาริ อินฺทฺริยานี’’ติ อตฺถํ ธาเรมาติ. ยทิ เอวํ ‘‘ปติตํ อสุเภสุ มุนิสฺส มโน’’ติ เอตฺถาปิ ‘‘ปติต’’นฺติ ปทํ ลิงฺควิปลฺลาสวเสน ฐิตนฺติ มนฺตฺวา ‘‘ปติโต’’ติ อตฺถํ ธาเรถาติ. น ธาเรม เอตฺถ ลิงฺควิปลฺลาสสฺส อนิจฺฉิตพฺพโต. ยทิ หิ มโนสทฺโท ปุลฺลิงฺโค สิยา, ตํสมานาธิกรณปทํ ‘‘ปติโต’’ติ วตฺตพฺพํ สิยา. กิมาจริโย เอวํ วตฺตุํ น ชานิ, ชานมาโน เอว โส ‘‘ปติโต’’ติ นาโวจ, ‘‘ปติต’’นฺติ ปนาโวจ, เตน ญายติ ‘‘มโนสทฺโท นปุํสกลิงฺโค’’ติ. มา ตุมฺเห เอวํ วเทถ, สมานาธิกรณปทํ นาม กตฺถจิ ปธานลิงฺคมนุวตฺตติ, กตฺถจิ นานุวตฺตติ, ตสฺมา น ตํ ลิงฺควิเสสโชตเน เอกนฺตโต ปมาณํ. ‘‘มาตุคาโม, โอโรโธ, อาวุโส วิสาข, เอหิ วิสาเข, จิตฺตานิ อฏฺฐีนี’’ติ เอวมาทิรูปวิเสโสเยว ปมาณํ. ยทิ สมานาธิกรณปเทเยว ลิงฺควิเสโส อธิคนฺตพฺโพ สิยา, ‘‘จตฺตาโร จ มหาภูตา’’ติอาทีสุ ลิงฺคววตฺถานํ น สิยา. ยสฺมา เอวมาทีสุปิ ฐาเนสุ ลิงฺคววตฺถานํ โหติเยว. กถํ? ‘‘จตฺตาโร’’ติ ปุลฺลิงฺคํ ‘‘มหาภูตา’’ติ นปุํสกนฺติ, ตสฺมา ‘‘ปติตํ อสุเภสุ มุนิสฺส มโน’’ติ เอตฺถาปิ ‘‘ปติต’’นฺติ นปุํสกลิงฺคํ ‘‘มโน’’ติ ปุลฺลิงฺคนฺติ ววตฺถานํ ภวตีติ. อิทํ สุตฺวา เต ตุณฺหี ภวิสฺสนฺติ. ตโต [Pg.137] เตสํ ตุณฺหีภูตานํ อิทํ วตฺตพฺพํ – ยสฺมา มโนคเณ ปวตฺตานํ ปทานํ สมานาธิกรณปทานิ กตฺถจิ นปุํสกวเสน โยเชตพฺพานิ, ตสฺมา มโนคเณ ปมุขสฺส มโนสทฺทสฺสปิ สมานาธิกรณปทานิ กตฺถจิ นปุํสกวเสน โยชิตานิ. ตถา หิ ปุพฺพาจริยา ‘‘สทฺธมฺมเตชวิหตํ วิลยํ ขเณน, เวเนยฺยสตฺตหทเยสุ ตโม’ปยาติ. ทุกฺขํ วโจ เอตสฺมินฺติ ทุพฺพโจ. อวนตํ สิโร ยสฺส โสยํ อวํสิโร, อปฺปกํ ราคาทิ รโช เยสํ ปญฺญามเย อกฺขิมฺหิ เต อปฺปรชกฺขา’’ติอาทินา สทฺทรจนํ กุพฺพึสุ, น ปน เตหิ วโจ สิโร รโชสทฺทาทีนํ นปุํสกลิงฺคตฺตํ วิภาเวตุํ อีทิสี สทฺทรจนา กตา, อถ โข สิโรมโนสทฺทานํ มโนคเณ ปวตฺตานํ ปุลฺลิงฺคสทฺทานํ กตฺถจิปิ อีทิสานิปิ ลิงฺควิปลฺลาสวเสน ฐิตานิ สมานาธิกรณปทานิ โหนฺตีติ ปเรสํ ชานาปนาธิปฺปายวติยา อนุกมฺปาย วิรจิตา. เอตฺถาปิ ตุมฺหากํ มเตน มโนสทฺทสฺส นปุํสกลิงฺคตฺเต สติ วโจ สิโร อิจฺจาทโยปิ นปุํสกลิงฺคตฺตมาปชฺชนฺติ นปุํสกลิงฺควเสน สมานาธิกรณปทานํ นิทฺทิฏฺฐตฺตา. กึ ปเนเตสมฺปิ นปุํสกลิงฺคตฺตํ อิจฺฉถาติ. อทฺธา เต อิทมฺปิ สุตฺวา นิพฺเพเฐตุมสกฺโกนฺตา ตุณฺหี ภวิสฺสนฺติ. กิญฺจาปิ เต อญฺญํ คเหตพฺพการณํ อปสฺสนฺตา เอวํ วเทยฺยุํ ‘‘ยทิ โภ มโน สทฺโท นปุํสกลิงฺโคน โหติ, กสฺมา เวยฺยากรณา ‘มโนสทฺโท นปุํสกลิงฺโค’ติ วทนฺตี’’ติ? เต วตฺตพฺพา – ยทิ ตุมฺเห เวยฺยากรณมตํ คเหตฺวา มโนสทฺทสฺส นปุํสกลิงฺคตฺตํ โรเจถ, นนุ ภควาเยว โลเก อสทิโส มหาเวยฺยากรโณ มหาปุริโส วิสารโท ปรปฺปวาทมทฺทโน. ภควนฺตญฺหิ ปทกา เวยฺยากรณา อมฺพฏฺฐมาณวโปกฺขรสาติโสณทณฺฑาทโย จ พฺราหฺมณา สจฺจกนิคณฺฐาทโย จ ปริพฺพาชกา [Pg.138] วาเทน น สมฺปาปุณึสุ, อญฺญทตฺถุ ภควาเยว มตฺตวารณคณมชฺเฌ เกสรสีโห วิย อสมฺภีโต เนสํ เนสํ วาทํ มทฺเทสิ, มหนฺเต จ เน อตฺเถ ปติฏฺฐาเปสิ, เอวํวิเธน ภควตา โวหารกุสเลน ยสฺมา ‘‘กาโย อนิจฺโจ’’ติ จ ‘‘กาโย ทุกฺโข, มโน อนิจฺโจ, มโน ทุกฺโข’’ติ จ เอวมาทินา วุตฺตา มโนสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺคภาวสูจนิกา พหู ปาฬิโย ทิสฺสนฺติ, ตสฺมา มโนสทฺโท ปุลฺลิงฺโคเยวาติ สารโต ปจฺเจตพฺโพติ. เอวํ วุตฺตา เต นิรุตฺตรา อปฺปฏิภานา มงฺกุภูตา ปตฺตกฺขนฺธา อโธมุขา ปชฺฌายิสฺสนฺติ. यहाँ 'मन' शब्द के साथ समानाधिकरण 'पतितं' शब्द नपुंसक लिंग के रूप में क्यों स्थित है? और चूँकि समानाधिकरण पद नपुंसक लिंग के रूप में स्थित है, इसलिए अन्य शब्द के सान्निध्य के कारण 'मन' शब्द नपुंसक लिंग है, ऐसा ज्ञात होता है? यह सही नहीं है, क्योंकि समानाधिकरण पद सर्वत्र लिंग विशेष को प्रकट नहीं करता। यदि समानाधिकरण पद सर्वत्र लिंग विशेष को प्रकट करता, तो 'चत्तारो इन्द्रियानि' यहाँ भी 'चत्तारो' पद 'इन्द्रिय' शब्द को पुल्लिंग बना देता, किन्तु वह ऐसा नहीं कर सकता। क्योंकि 'इन्द्रिय' शब्द निश्चित रूप से नपुंसक लिंग है। यदि आप 'पतितं' इस समानाधिकरण पद के आधार पर 'मन' शब्द का नपुंसक लिंग होना चाहते हैं, तो 'चत्तारो इन्द्रियानि' यहाँ भी 'चत्तारो' इस समानाधिकरण पद के आधार पर 'इन्द्रिय' शब्द का पुल्लिंग होना स्वीकार करें। हे महानुभाव! हम 'इन्द्रिय' शब्द का पुल्लिंग होना नहीं चाहते, बल्कि नपुंसक लिंग ही चाहते हैं; 'चत्तारो' पद लिंग-विपर्यास (लिंग परिवर्तन) के कारण स्थित होने से हम उसे 'चत्तारि' के रूप में ग्रहण करते हैं, इसलिए 'चत्तारि इन्द्रियानि' ऐसा अर्थ धारण करते हैं। यदि ऐसा है, तो 'पतितं असुभेसु मुनिस्स मनो' यहाँ भी 'पतितं' पद लिंग-विपर्यास के कारण स्थित है ऐसा मानकर 'पतितो' अर्थ धारण करें। हम यहाँ लिंग-विपर्यास को स्वीकार नहीं करते। यदि 'मन' शब्द पुल्लिंग होता, तो उसका समानाधिकरण पद 'पतितो' कहना चाहिए था। क्या आचार्य ऐसा कहना नहीं जानते थे? जानते हुए भी उन्होंने 'पतितो' नहीं कहा, बल्कि 'पतितं' कहा, इससे ज्ञात होता है कि 'मन' शब्द नपुंसक लिंग है। आप ऐसा न कहें; समानाधिकरण पद कहीं मुख्य लिंग का अनुसरण करता है, कहीं नहीं करता, इसलिए वह लिंग विशेष को प्रकट करने में पूर्णतः प्रमाण नहीं है। 'मातुगामो, ओरोधो, आवुसो विसाख, एहि विसाखे, चित्तानि अट्ठीनि' इत्यादि रूप-विशेष ही प्रमाण हैं। यदि समानाधिकरण पद से ही लिंग विशेष का ज्ञान होना होता, तो 'चत्तारो च महाभूता' आदि में लिंग का निर्धारण नहीं हो पाता। क्योंकि ऐसे स्थानों पर भी लिंग का निर्धारण होता ही है। कैसे? 'चत्तारो' पुल्लिंग है और 'महाभूता' नपुंसक लिंग है, इसलिए 'पतितं असुभेसु मुनिस्स मनो' यहाँ भी 'पतितं' नपुंसक लिंग है और 'मनो' पुल्लिंग है, ऐसा निर्धारण होता है। यह सुनकर वे मौन हो जाएँगे। तब उन मौन हुए लोगों से यह कहना चाहिए - चूँकि मन-गण (मनस्-गण) में प्रयुक्त शब्दों के समानाधिकरण पद कहीं-कहीं नपुंसक लिंग के अनुसार जोड़े जाने चाहिए, इसलिए मन-गण के प्रमुख 'मन' शब्द के समानाधिकरण पद भी कहीं-कहीं नपुंसक लिंग के अनुसार जोड़े गए हैं। क्योंकि पूर्वाचार्यों ने 'सद्धम्मतेजविहतं विलयं खणेन, वेनेय्यसत्तहदयसु तमोपयाति। दुक्खं वचो एतस्मिन्ति दुब्बचो। अवनतं सिरो यस्स सोयं अवंसिरो, अप्पकं रागादि रजो येसं पञ्ञामये अक्खिम्हि ते अप्परजक्खा' इत्यादि शब्द-रचना की है। किन्तु उन्होंने 'वचो', 'सिरो', 'रजो' आदि शब्दों के नपुंसक लिंग होने को स्पष्ट करने के लिए ऐसी शब्द-रचना नहीं की, बल्कि 'सिर' और 'मन' जैसे मन-गण में प्रयुक्त पुल्लिंग शब्दों के समानाधिकरण पद कहीं-कहीं लिंग-विपर्यास के कारण ऐसे भी होते हैं, यह दूसरों को समझाने के अभिप्राय वाली अनुकम्पा से इसकी रचना की गई है। यहाँ भी आपके मत के अनुसार 'मन' शब्द के नपुंसक लिंग होने पर 'वचो', 'सिरो' इत्यादि भी नपुंसक लिंग हो जाएँगे, क्योंकि उनके समानाधिकरण पद नपुंसक लिंग के रूप में निर्दिष्ट हैं। क्या आप इनका भी नपुंसक लिंग होना चाहते हैं? निश्चित ही वे यह भी सुनकर समाधान न कर पाने के कारण मौन हो जाएँगे। यद्यपि वे अन्य कोई ग्रहण करने योग्य कारण न देखते हुए ऐसा कह सकते हैं कि 'हे महानुभाव! यदि मन शब्द नपुंसक लिंग नहीं है, तो वैयाकरण मन शब्द नपुंसक लिंग है ऐसा क्यों कहते हैं?' उनसे कहना चाहिए - यदि आप वैयाकरणों के मत को लेकर 'मन' शब्द का नपुंसक लिंग होना पसंद करते हैं, तो क्या भगवान ही इस लोक में अद्वितीय महावैयाकरण, महापुरुष, विशारद और पर-प्रवादों का मर्दन करने वाले नहीं हैं? क्योंकि पद-वेत्ता वैयाकरण, अम्बट्ठ माणव, पोक्खरसाति, सोणदण्ड आदि ब्राह्मण और सच्चक निगण्ठ आदि परिव्राजक वाद-विवाद में भगवान तक नहीं पहुँच सके, बल्कि भगवान ने ही मतवाले हाथियों के झुंड के बीच केसरिया सिंह के समान निर्भय होकर उनके वादों का मर्दन किया और उन्हें महान अर्थों में प्रतिष्ठित किया। इस प्रकार व्यवहार-कुशल भगवान के द्वारा चूँकि 'कायो अनिच्चो' और 'कायो दुक्खो, मनो अनिच्चो, मनो दुक्खो' इत्यादि 'मन' शब्द के पुल्लिंग होने की सूचक बहुत सी पालियाँ देखी जाती हैं, इसलिए 'मन' शब्द पुल्लिंग ही है, ऐसा सार रूप में समझना चाहिए। ऐसा कहे जाने पर वे निरुत्तर, प्रतिभा-रहित, लज्जित, कंधे झुकाए हुए और नीचे मुँह किए हुए चिंतामग्न हो जाएँगे। อิทานิ สรสทฺทาทีนํ นามิกปทมาลา วิเสสโต วุจฺจเต – अब 'सर' शब्द आदि की नामिक पदमाला (विभक्ति रूप) विशेष रूप से कही जाती है – สโร, สรา. สรํ, สเร. สเรน, สเรหิ, สเรภิ. สรสฺส, สรานํ. สรา, สรสฺมา, สรมฺหา, สเรหิ, สเรภิ. สรสฺส, สรานํ. สเร, สรสฺมึ, สรมฺหิ, สเรสุ. โภ สร, ภวนฺโต สรา. सरो, सरा। सरं, सरे। सरेन, सरेहि, सरेभि। सरस्स, सरानं। सरा, सरस्मा, सरम्हा, सरेहि, सरेभि। सरस्स, सरानं। सरे, सरस्मिं, सरम्हि, सरेसु। भो सर, भवन्तो सरा। อยํ ปุริสนเย สพฺพถา ปวิฏฺฐสฺส อุสุสทฺทสรวนอการาทิสรวาจกสฺส สรสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. यह 'पुरिस' (पुरुष) न्याय में पूरी तरह से प्रविष्ट, बाण (उसु), स्वर (सद्दसर), वन और अकार आदि 'सर' वाचक 'सर' शब्द की नामिक पदमाला है। อยํ ปน ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺฐสฺส มโนคณปกฺขิกสฺส รหทวาจกสฺส สรสทฺทสฺส นามิกปทมาลา – और यह 'पुरिस' न्याय में आंशिक रूप से प्रविष्ट, मन-गण (मनोगण) के पक्ष वाले, सरोवर (रहद) वाचक 'सर' शब्द की नामिक पदमाला है – สโร, สรา. สรํ, สโร, สเร. สรสา, สเรน, สเรหิ, สเรภิ. สรโส, สรสฺส, สรานํ. สรา, สรสฺมา, สรมฺหา, สเรหิ, สเรภิ. สรโส, สรสฺส, สรานํ. สรสิ, สเร, สรสฺมึ, สรมฺหิ, สเรสุ. โภ สร, ภวนฺโต สรา, โภ สรา อิติ วา. सरो, सरा। सरं, सरो, सरे। सरसा, सरेन, सरेहि, सरेभि। सरसो, सरस्स, सरानं। सरा, सरस्मा, सरम्हा, सरेहि, सरेभि। सरसो, सरस्स, सरानं। सरसि, सरे, सरस्मिं, सरम्हि, सरेसु। भो सर, भवन्तो सरा, अथवा भो सरा। วโย, วยา. วยํ, วเย. วเยน, วเยหิ, วเยภีติ ปุริสนเยน เญ ยฺโย. อยํ ปุริสนเย สพฺพถา ปวิฏฺฐสฺส ปริหานิวาจกสฺส วยสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. वयो, वया। वयं, वये। वयेन, वयेहि, वयेभि - इस प्रकार 'पुरिस' न्याय के अनुसार जानना चाहिए। यह 'पुरिस' न्याय में पूरी तरह से प्रविष्ट, हानि (परिहानि) वाचक 'वय' शब्द की नामिक पदमाला है। อยํ [Pg.139] ปน ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺฐสฺส มโนคณปกฺขิกสฺส อายุโกฏฺฐาสวาจกสฺส วยสทฺทสฺส นามิกปทมาลา – วโย, วยา. วยํ, วโย, วเย. วยสา, วเยน, วเยหิ, วเยภีติ มนนเยน เญยฺโย. ตสฺส เจโต ปฏิสฺโสสิ, อรญฺเญ ลุทฺทโคจโร. เจตา หนึสุ เวทพฺพํ. और यह 'पुरिस' न्याय में आंशिक रूप से प्रविष्ट, मन-गण के पक्ष वाले, आयु के भाग (अवस्था) वाचक 'वय' शब्द की नामिक पदमाला है – वयो, वया। वयं, वयो, वये। वयसा, वयेन, वयेहि, वयेभि - इस प्रकार 'मन' न्याय के अनुसार जानना चाहिए। "उसका चित्त (चेतो) प्रतिश्रुत हुआ, अरण्य में व्याध का गोचर।" "चेताओं (चित्तों) ने वेदब्ब को मारा।" เจโต, เจตา. เจตํ, เจเต. เจเตน, เจเตหิ, เจเตภีติ ปุริสนเยน เญยฺโย. อยํ ปุริสนเย สพฺพถา ปวิฏฺฐสฺส ปณฺณตฺติวาจกสฺส เจตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. चेतो, चेता। चेतं, चेते। चेतेन, चेतेहि, चेतेभि - इस प्रकार 'पुरिस' न्याय के अनुसार जानना चाहिए। यह 'पुरिस' न्याय में पूरी तरह से प्रविष्ट, प्रज्ञप्ति (नाम) वाचक 'चेत' शब्द की नामिक पदमाला है। อยํ ปน ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺฐสฺส จิตฺตวาจกสฺส เจตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา – เจโต, เจตา. เจตํ, เจโต, เจเต. เจตสา, เจเตน, เจเตหิ, เจเตภีติ มนนเยน เญยฺโย. ยโส กุลปุตฺโต, ยสํ กุลปุตฺตํ, ยเสน กุลปุตฺเตนาติ เอกวจนวเสน ปุริสนเยน โยเชตพฺพา, เอกวจนปุถุวจนวเสน วา. เอวํ กานิจิ โอการนฺตปทานิ ปุริสนเย สพฺพถา ปวิฏฺฐานิ จ โหนฺติ, เอกเทเสน ปวิฏฺฐานิ จาติ อิมินา นเยน สพฺพปทานิ ปญฺญาจกฺขุนา อุปปริกฺขิตฺวา วิเสโส เวทิตพฺโพ. อวิเสสญฺญุโน หิ เอวมาทิวิภาคํ อชานนฺตา ยํ วา ตํ วา พฺยญฺชนํ โรเปนฺตา ยถาธิปฺเปตํ อตฺถํ วิราเธนฺติ, ตสฺมา โย เอตฺถ อมฺเหหิ ปกาสิโต วิภาโค, โส สทฺธาสมฺปนฺเนหิ กุลปุตฺเตหิ สกฺกจฺจมุคฺคเหตพฺโพ. กตมานิ กานิจิ โอการนฺตปทานิ ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺฐานิ จ เอกเทเสน น ปวิฏฺฐานิ จ? มโน วโจ เตโชสทฺทาทโย เจว อยฺยสทฺโท จ, ตตฺร มนสทฺทาทีนํ นามิกปทมาลา เหฏฺฐา วิภาวิตา. और यह 'पुरिस' न्याय में आंशिक रूप से प्रविष्ट, चित्त वाचक 'चेत' शब्द की नामिक पदमाला है – चेतो, चेता। चेतं, चेतो, चेते। चेतसा, चेतेन, चेतेहि, चेतेभि - इस प्रकार 'मन' न्याय के अनुसार जानना चाहिए। 'यसो कुलपुत्तो', 'यसं कुलपुत्तं', 'यसेन कुलपुत्तेन' - इस प्रकार एकवचन के अनुसार 'पुरिस' न्याय में जोड़ना चाहिए, अथवा एकवचन और बहुवचन के अनुसार। इस प्रकार कुछ अकारान्त पद 'पुरिस' न्याय में पूरी तरह से प्रविष्ट होते हैं और कुछ आंशिक रूप से प्रविष्ट होते हैं - इस नियम से सभी पदों को प्रज्ञा-चक्षु से परीक्षित कर विशेषता जाननी चाहिए। क्योंकि विशेषता न जानने वाले इस प्रकार के विभाग को न जानते हुए, जो-त्यों व्यंजन (शब्द) आरोपित करते हुए इच्छित अर्थ को बिगाड़ देते हैं, इसलिए यहाँ हमारे द्वारा जो विभाग प्रकाशित किया गया है, उसे श्रद्धा-सम्पन्न कुलपुत्रों द्वारा आदरपूर्वक ग्रहण करना चाहिए। कौन से कुछ अकारान्त पद 'पुरिस' न्याय में आंशिक रूप से प्रविष्ट हैं और आंशिक रूप से प्रविष्ट नहीं हैं? मन, वच, तेज शब्द आदि और 'अय्य' शब्द; उनमें से 'मन' शब्द आदि की नामिक पदमाला नीचे स्पष्ट की गई है। อยฺยสทฺทสฺส [Pg.140] ปน นามิกปทมาลายํ ‘‘อยฺโย, อยฺยา. อยฺยํ, อยฺเย’’ติ ปุริสนเยน วตฺวา อาลปนฏฺฐาเน ‘‘โภ อยฺย, โภ อยฺโย’’ติ ทฺเว เอกวจนานิ, ‘‘ภวนฺโต อยฺยา, ภวนฺโต อยฺโย’’ติ ทฺเว พหุวจนานิ จ วตฺตพฺพานิ. เอตฺถ อยฺโย อิติ สทฺโท ปจฺจตฺตวจนภาเว เอกวจนํ, อาลปนวจนภาเว เอกวจนญฺเจว พหุวจนญฺจ. ตตฺริเม ปโยคา ‘‘อยฺโย กิร สาคโต อมฺพติตฺถิเกน นาเคน สงฺคาเมสิ, ปิวตุ ภนฺเต อยฺโย สาคโต กาโปติกํ ปสนฺน’’นฺติ เอวมาทีนิ อยฺโยสทฺทสฺส ปจฺจตฺเตกวจนปฺปโยคานิ, ‘‘อถ โข สา อิตฺถี ตํ ปุริสํ เอตทโวจ ‘นายฺโย โส ภิกฺขุ มํ นิปฺปาเฏสิ, อปิจ อหเมว เตน ภิกฺขุนา คจฺฉามิ, อการโก โส ภิกฺขุ, คจฺฉ ขมาเปหี’ติ’’ เอวมาทีนิ อยฺโยสทฺทสฺส อาลปเนกวจนปฺปโยคานิ, ‘‘เอถ’ยฺโย ราชวสตึ, นิสีทิตฺวา สุณาถ เม. เอถ มยํ อยฺโย สมเณสุ สกฺยปุตฺติเยสุ ปพฺพชิสฺสามา’’ติ เอวมาทีนิ อยฺโยสทฺทสฺส อาลปนพหุวจนปฺปโยคานิ. ภวติ จตฺร – 'अय्य' शब्द की नामिक पदमाला में 'अय्यो, अय्या। अय्यं, अय्ये' - इस प्रकार 'पुरिस' न्याय के अनुसार कहकर, सम्बोधन के स्थान पर 'भो अय्य, भो अय्यो' - ये दो एकवचन, और 'भवन्तो अय्या, भवन्तो अय्यो' - ये दो बहुवचन कहने चाहिए। यहाँ 'अय्यो' यह शब्द प्रथमा विभक्ति (पच्चत्तवचन) में एकवचन है, और सम्बोधन में एकवचन और बहुवचन दोनों है। वहाँ ये प्रयोग हैं - "आर्य (अय्यो) स्वागत ने अम्बतित्थिक नाग के साथ युद्ध किया, भन्ते आर्य स्वागत कापोतिक प्रसन्न (मदिरा) पिएं" - इत्यादि 'अय्यो' शब्द के प्रथमा एकवचन के प्रयोग हैं। "तब उस स्त्री ने उस पुरुष से यह कहा - 'आर्य (अय्यो) वह भिक्षु मुझे नहीं ले गया, अपितु मैं ही उस भिक्षु के साथ जाती हूँ, वह भिक्षु अकारक है, जाओ क्षमा मांगो'" - इत्यादि 'अय्यो' शब्द के सम्बोधन एकवचन के प्रयोग हैं। "आर्यों (अय्यो)! राजभवन आइए, बैठकर मेरी बात सुनिए। आइए हम आर्य (अय्यो) शाक्यपुत्रीय श्रमणों में प्रव्रजित होंगे" - इत्यादि 'अय्यो' शब्द के सम्बोधन बहुवचन के प्रयोग हैं। और यहाँ यह (श्लोक) है – อยฺโย อิติ อยํ สทฺโท, ปจฺจตฺเตกวโจ ภเว; อาลปเน พหุวโจ, ภเว เอกวโจปิ จ – 'अय्यो' यह शब्द प्रथमा में एकवचन होता है; सम्बोधन में बहुवचन और एकवचन भी होता है – เอวํ กานิจิ โอการนฺตปทานิ ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺฐานิ จ โหนฺติ เอกเทเสน น ปวิฏฺฐานิ จ. इस प्रकार कुछ अकारान्त पद 'पुरिस' न्याय में आंशिक रूप से प्रविष्ट होते हैं और आंशिक रूप से प्रविष्ट नहीं होते। กตมานิ กานิจิ โอการนฺตปทานิ ปุริสนเย สพฺพถา อปฺปวิฏฺฐานิ? โคสทฺโทเยว. โคสทฺทสฺส หิ อยํ นามิกปทมาลา – कौन से कुछ अकारान्त पद 'पुरिस' न्याय में पूरी तरह से प्रविष्ट नहीं हैं? केवल 'गो' शब्द। 'गो' शब्द की यह नामिक पदमाला है – โค, คาโว, คโว. คาวุํ, คาวํ, ควํ, คาโว, คโว. คาเวน, คเวน, โคหิ, โคภิ. คาวสฺส, ควสฺส, ควํ, คุนฺนํ, โคนํ. คาวา, คาวสฺมา, คาวมฺหา, ควา, ควสฺมา, ควมฺหา, โคหิ, โคภิ. คาวสฺส, ควสฺส, ควํ, คุนฺนํ, โคนํ. คาเว, คาวสฺมึ, คาวมฺหิ, คเว, ควสฺมึ[Pg.141], ควมฺหิ, คาเวสุ, คเวสุ, โคสุ. โภ โค, ภวนฺโต คาโว, คโว. อยํ ปุริสนเย สพฺพถา อปฺปวิฏฺฐสฺส โคสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. गो, गावो, गवो। गावुं, गावं, गवं, गावो, गवो। गावेन, गवेन, गोहि, गोभि। गावस्स, गवस्स, गवं, गुन्नं, गोनं। गावा, गावस्मा, गावम्हा, गवा, गवस्मा, गवम्हा, गोहि, गोभि। गावस्स, गवस्स, गवं, गुन्नं, गोनं। गावे, गावस्मिं, गावम्हि, गवे, गवस्मिं, गवम्हि, गावेसु, गवेसु, गोसु। भो गो, भवन्तो गावो, गवो। यह 'पुरिस' न्याय में पूरी तरह से अप्रविष्ट 'गो' शब्द की नामिक पदमाला है। นนุ จ โภ โคสทฺโท อตฺตนา สมฺภูตโคณสทฺทมาลาวเสน ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺโฐ เจว เอกเทเสน น ปวิฏฺโฐ จาติ? สจฺจํ. โคณสทฺโท โคสทฺทวเสน สมฺภูโตปิ ‘‘วตฺติจฺฉานุปุพฺพิกา สทฺทปฏิปตฺตี’’ติ วจนโต โคสทฺทโต วิสุํ อมฺเหหิ คเหตฺวา ปุริสนเย ปกฺขิตฺโต. ตสฺส หิ วิสุํ คหเณ ยุตฺติ ทิสฺสติ สฺยาทีสุ เอกากาเรเนว ติฏฺฐนโต, ตสฺมา โคสทฺทโต สมฺภูตมฺปิ โคณสทฺทํ อนเปกฺขิตฺวา สุทฺธํ โคสทฺทเมว คเหตฺวา ปุริสนเย สพฺพถา โคสทฺทสฺส อปฺปวิฏฺฐตา วุตฺตา. हे महानुभाव! क्या 'गो' शब्द स्वयं से उत्पन्न 'गोण' शब्द की पदमाला के कारण 'पुरिस' (पुरुष) पद्धति में एक अंश से प्रविष्ट है और एक अंश से नहीं? सत्य है। यद्यपि 'गोण' शब्द 'गो' शब्द के माध्यम से उत्पन्न हुआ है, फिर भी 'वक्ता की इच्छा के अनुसार शब्दों की प्रवृत्ति होती है' इस वचन के अनुसार हमने 'गो' शब्द से अलग करके उसे 'पुरिस' पद्धति में रखा है। उसके अलग ग्रहण करने में युक्ति दिखाई देती है क्योंकि वह 'सि' आदि प्रत्ययों में एक ही आकार में रहता है, इसलिए 'गो' शब्द से उत्पन्न होने पर भी 'गोण' शब्द की अपेक्षा न करके केवल शुद्ध 'गो' शब्द को ही ग्रहण कर 'पुरिस' पद्धति में 'गो' शब्द का सर्वथा अप्रवेश कहा गया है। นนุ จ โภ ปจฺจตฺตวจนภูโต โคอิติ สทฺโท ปุริโสติ สทฺเทน สทิสตฺตา ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺโฐติ? ตนฺน, โคสทฺโท หิ นิจฺจโมการนฺโต, น ปุริสสทฺทาทโย วิย ปฐมํ อการนฺตภาเว ฐตฺวา ปจฺฉา ปฏิลทฺโธการนฺตฏฺโฐ. เตเนว หิ ปจฺจตฺตวจนฏฺฐาเนปิ อาลปนวจนฏฺฐาเนปิ โคอิจฺเจว ติฏฺฐติ. ยทิ ปจฺจตฺตวจนตฺตํ ปฏิจฺจ โคสทฺทสฺส ปุริสนเย เอกเทเสน ปวิฏฺฐตา อิจฺฉิตพฺพา, ‘‘กานิจิ โอการนฺตปทานี’’ติ เอวํ วุตฺตา โอการนฺตกถา กมตฺถํ ทีเปยฺย, นิปฺผลาว สา กถา สิยา, ตสฺมา อมฺเหหิ ยถาวุตฺโต นโยเยว อายสฺมนฺเตหิ มนสิ กาตพฺโพ. เอวํ โคสทฺทสฺส ปุริสนเย สพฺพถา อปฺปวิฏฺฐตา ทฏฺฐพฺพา. हे महानुभाव! क्या प्रथमा विभक्ति (पच्चत्तवचन) में स्थित 'गो' शब्द 'पुरिस' शब्द के समान होने के कारण 'पुरिस' पद्धति में एक अंश से प्रविष्ट है? ऐसा नहीं है, क्योंकि 'गो' शब्द नित्य ओ-कारान्त है, वह 'पुरिस' आदि शब्दों की तरह पहले अ-कारान्त रहकर बाद में ओ-कारान्त भाव को प्राप्त नहीं होता। इसी कारण प्रथमा विभक्ति के स्थान में और सम्बोधन के स्थान में भी 'गो' ही रहता है। यदि प्रथमा विभक्ति होने के कारण 'गो' शब्द का 'पुरिस' पद्धति में आंशिक प्रवेश स्वीकार किया जाए, तो 'कुछ ओ-कारान्त पद' इस प्रकार कही गई ओ-कारान्त कथा किस अर्थ को प्रकाशित करेगी? वह कथा निष्फल ही होगी। इसलिए हमारे द्वारा कहे गए न्याय को ही आयुष्मानों को मन में धारण करना चाहिए। इस प्रकार 'पुरिस' पद्धति में 'गो' शब्द का सर्वथा अप्रवेश देखना चाहिए। เกเจตฺถ เอวํ ปุจฺเฉยฺยุํ ‘‘โคสทฺทสฺส ตาว ‘โค, คาโว, คโว. คาวุํ, คาวํ, ควํ’ อิจฺจาทินา นเยน ปุริสนเย สพฺพถา อปฺปวิฏฺฐตา อมฺเหหิ ญาตา, ชรคฺคว ปุงฺควาทิสทฺทา ปน กุตฺร นเย [Pg.142] ปวิฏฺฐา’’ติ? เตสํ เอวํ พฺยากาตพฺพํ ‘‘ชรคฺคว ปุงฺควาทิสทฺทา สพฺพถาปิ ปุริสนเย ปวิฏฺฐา’’ติ. ตถา หิ เตสํ โคสทฺทโต อยํ วิเสโส, ชรนฺโต จ โส โค จาติ ชรคฺคโว. เอตฺถ นการโลโป ตการสฺส จ คการตฺตํ ภวติ สมาสปทตฺตา, สมาเส จ สิมฺหิ ปเร โคสทฺทสฺโสการสฺส อวาเทโส ลพฺภติ, ตสฺมา ปาฬิยํ ‘‘วิสาเณน ชรคฺคโว’’ติ เอกวจนรูปํ ทิสฺสติ. ตถา หิ อญฺญตฺถ อนุปปทตฺตา คโวอิติ พหุวจนปทํเยว ทิสฺสติ. อิธ ปน โสปปทตฺตา สมาสปทภาวมาคมฺม ‘‘ชรคฺคโว’’ติ เอกวจนปทํเยว ทิสฺสติ. ตถา หิ ชรคฺคโวติ เอตฺถ ชรนฺตา จ เต คโว จาติ เอวํ พหุวจนวเสน นิพฺพจนียตา น ลพฺภติ โลกสงฺเกตวเสน เอกสฺมึ อตฺเถ นิรูฬฺหตฺตาติ. ‘‘ชรคฺคโว, ชรคฺควา. ชรคฺควํ, ชรคฺคเว. ชรคฺคเวนา’’ติ ปุริสนเยน นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. เอส นโย ปุงฺคโว สกฺยปุงฺคโวติอาทีสุปิ. यहाँ कुछ लोग ऐसा पूछ सकते हैं—'गो' शब्द की तो 'गो, गावो, गवो। गावुं, गावं, गवं' इत्यादि रीति से 'पुरिस' पद्धति में सर्वथा अप्रविष्टि हमें ज्ञात हुई, किन्तु 'जरग्गव', 'पुङ्गव' आदि शब्द किस पद्धति में प्रविष्ट हैं? उन्हें इस प्रकार उत्तर देना चाहिए—'जरग्गव', 'पुङ्गव' आदि शब्द सर्वथा 'पुरिस' पद्धति में प्रविष्ट हैं। क्योंकि 'गो' शब्द से उनमें यह विशेषता है—'जरन्तो च सो गो चाति जरग्गवो' (वह जो बूढ़ा है और बैल है, वह जरग्गव है)। यहाँ समास पद होने के कारण 'न' कार का लोप और 'त' कार का 'ग' कार हो जाता है, और समास में 'सि' प्रत्यय परे होने पर 'गो' शब्द के ओ-कार को 'अव' आदेश प्राप्त होता है, इसलिए पालि में 'विसाणेन जरग्गवो' (सींग से बूढ़ा बैल) ऐसा एकवचन रूप दिखाई देता है। क्योंकि अन्यत्र उपपद न होने से 'गवो' ऐसा बहुवचन पद ही दिखाई देता है। किन्तु यहाँ उपपद होने से समास पद भाव को प्राप्त होकर 'जरग्गवो' ऐसा एकवचन पद ही दिखाई देता है। क्योंकि 'जरग्गवो' यहाँ 'जरन्ता च ते गवो च' (वे जो बूढ़े हैं और बैल हैं) इस प्रकार बहुवचन के रूप में व्युत्पत्ति प्राप्त नहीं होती, क्योंकि लोक-संकेत के अनुसार यह एक ही अर्थ में रूढ़ है। 'जरग्गवो, जरग्गवा। जरग्गवं, जरग्गवे। जरग्गवेन' इस प्रकार 'पुरिस' पद्धति के अनुसार नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। यही न्याय 'पुङ्गव', 'सक्यपुङ्गव' आदि में भी है। ตตฺร ปุงฺคโวติ คุนฺนํ ยูถปติ นิสภสงฺขาโต อุสโภ. โย ปาฬิยํ ‘‘มุหุตฺตชาโตว ยถา ควํปติ, สเมหิ ปาเทหิ ผุสี วสุนฺธร’’นฺติ จ ‘‘ควญฺเจ ตรมานานํ, อุชุํ คจฺฉติ ปุงฺคโว’’ติ จ อาคโต. อีทิเสสุ ปน ฐาเนสุ เกจิ ‘‘ปุมา จ โส โค จาติ ปุงฺคโว’’ติ วจนตฺถํ ภณนฺติ. มยํ ปน ปธาเน นิรูฬฺโห อยํ สทฺโทติ วจนตฺถํ น ภณาม. น หิ ปุงฺโกกิโลติอาทิสทฺทานํ โกกิลาทีนํ ปุมฺภาวปฺปกาสนมตฺเต สมตฺถตา วิย อิมสฺส ปุมฺภาวปฺปกาสนมตฺเต สมตฺถตา สมฺภวติ, อถ โข ปธานภาวปฺปกาสเน จ สมตฺถตา สมฺภวติ. เตน ‘‘สกฺยปุงฺคโว’’ติอาทีสุ นิสภสงฺขาโต ปุงฺคโว วิยาติ ปุงฺคโว, สกฺยานํ, สกฺเยสุ [Pg.143] วา ปุงฺคโว สกฺยปุงฺคโวติอาทินา สมาสปทตฺโถ คเหตพฺโพ. อถ วา อุตฺตรปทตฺเต ฐิตานํ สีหพฺยคฺฆนาคาทิสทฺทานํ เสฏฺฐวาจกตฺตา ‘‘สกฺยปุงฺคโว’’ติอาทีนํ ‘‘สกฺยเสฏฺโฐ’’ติอาทินา อตฺโถ คเหตพฺโพ. อิติ สพฺพถาปิ ปุริสนเย ปวตฺตนโต ชรคฺคว ปุงฺควาทิสทฺทานํ โคสทฺทสฺส ปทมาลโต วิสทิสปทมาลตา ววตฺถเปตพฺพา. โคสทฺทสฺส ปน ปุริสนเย สพฺพถา อปฺปวิฏฺฐตา จ ววตฺถเปตพฺพา. वहाँ 'पुङ्गव' का अर्थ है गायों का यूथपति, जिसे 'निसभ' संज्ञक वृषभ (साँड) कहा जाता है। जो पालि में 'मुहुत्तजातोव यथा गवं पति...' और 'गवञ्चे तरमानानं, उजुं गच्छति पुङ्गवो' के रूप में आया है। ऐसे स्थानों पर कुछ लोग 'पुमा च सो गो चाति पुङ्गवो' (वह जो नर है और बैल है) ऐसा वचनार्थ कहते हैं। किन्तु हम इसे प्रधानता में रूढ़ शब्द मानते हैं, इसलिए ऐसा वचनार्थ नहीं कहते। जैसे 'पुंकोकिल' आदि शब्दों में कोकिल आदि के केवल पुं-भाव (नर होने) को प्रकाशित करने की सामर्थ्य होती है, वैसे इस शब्द में केवल पुं-भाव प्रकाशित करने की सामर्थ्य नहीं है, बल्कि प्रधानता के भाव को प्रकाशित करने की सामर्थ्य है। इसलिए 'सक्यपुङ्गव' आदि में 'निसभ' संज्ञक पुङ्गव के समान होने के कारण 'पुङ्गव' है; 'शाक्यों का' या 'शाक्यों में' जो पुङ्गव है वह 'सक्यपुङ्गव' है—इस प्रकार समास का अर्थ ग्रहण करना चाहिए। अथवा उत्तरपद में स्थित सिंह, व्याघ्र, नाग आदि शब्दों के श्रेष्ठवाचक होने के कारण 'सक्यपुङ्गव' आदि का 'शाक्यश्रेष्ठ' आदि अर्थ ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार सर्वथा 'पुरिस' पद्धति में प्रवृत्त होने के कारण 'जरग्गव', 'पुङ्गव' आदि शब्दों की पदमाला 'गो' शब्द की पदमाला से भिन्न निश्चित करनी चाहिए। और 'गो' शब्द की 'पुरिस' पद्धति में सर्वथा अप्रविष्टि निश्चित करनी चाहिए। อาปสทฺเท อาจริยานํ ลิงฺควจนวเสน มติเภโท วิชฺชติ, ตสฺมา ตํมเตน ตสฺส ปุริสนเย สพฺพถา อปฺปวิฏฺฐตา ภวติ. ‘‘องฺคุตฺตราเปสู’’ติ ปาฬิยา อฏฺฐกถายํ ‘‘มหิยา ปน นทิยา อุตฺตเรน อาโป’’ติ วุตฺตํ, ฏีกายํ ปน ตํ อุลฺลิงฺคิตฺวา ‘‘มหิยา นทิยา อาโป ตสฺส ชนปทสฺส อุตฺตเรน โหนฺติ, ตาสํ อวิทูรตฺตา โส ชนปโท อุตฺตราโป’’ติ วุตฺตํ. เอวํ อาปสทฺทสฺส เอกนฺเตน อิตฺถิลิงฺคตา พหุวจนตา จ อาจริเยหิ อิจฺฉิตา, เตสํ มเต อาโปอิติ อิตฺถิลิงฺเค ปฐมาพหุวจนรูเป โหนฺเต ทุติยาตติยาปญฺจมีสตฺตมีนํ พหุวจนรูปานิ กีทิสานิ สิยุํ. ตถา หิ ‘‘ปุริเส, ปุริเสหิ ปุริเสภิ ปุริเสสู’’ติ รูปวโต ปุลฺลิงฺคสฺส วิย โอการนฺติตฺถิลิงฺคสฺส เอการเอหิ การาทิยุตฺตานิ รูปานิ กตฺถจิปิ น ทิสฺสนฺติ. อโต เตสํ มเต ปทมาลานโย อตีว ทุกฺกโร. 'आप' शब्द के विषय में आचार्यों के बीच लिंग और वचन के अनुसार मतभेद है, इसलिए उनके मत में 'पुरिस' पद्धति में उसका सर्वथा अप्रवेश होता है। 'अङ्गुत्तरापेसु' इस पालि की अट्ठकथा में 'मही नदी के उत्तर में आप (जल/क्षेत्र)' कहा गया है, किन्तु टीका में उसे उद्धृत कर 'मही नदी के आप (जल) उस जनपद के उत्तर में हैं, उनके समीप होने के कारण वह जनपद उत्तर-आप है' ऐसा कहा गया है। इस प्रकार 'आप' शब्द का एकान्त रूप से स्त्रीलिंग और बहुवचन होना आचार्यों द्वारा इष्ट है; उनके मत में 'आपो' यह स्त्रीलिंग प्रथमा बहुवचन रूप होने पर द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी और सप्तमी के बहुवचन रूप कैसे होंगे? क्योंकि 'पुरिसे, पुरिसेहि पुरिसेभि पुरिसेसु' इस प्रकार के रूप वाले पुल्लिंग के समान ओ-कारान्त स्त्रीलिंग के एकार और एहि-कार आदि से युक्त रूप कहीं भी नहीं देखे जाते। अतः उनके मत में पदमाला की पद्धति अत्यन्त कठिन है। อาปสทฺทสฺส ครโว, สทฺทสตฺถนยํ ปติ; พหุวจนตญฺจิตฺถิ-ลิงฺคภาวญฺจ อพฺรวุํ. गुरुजनों ने शब्दशास्त्र के नियम के अनुसार 'आप' शब्द को बहुवचनान्त और स्त्रीलिंग कहा है। อิจฺจาปสทฺทสฺส [Pg.144] อิตฺถิลิงฺคพหุวจนนฺตตา เวยฺยากรณานํ มตํ นิสฺสาย อนุมตาติ เวทิตพฺพา. อฏฺฐสาลินิยํ ปน อาโป อิติ สทฺทสฺส นปุํสกลิงฺเคกวจนวเสน วุตฺโต ปโยโค ทิฏฺโฐ ‘‘โอมตฺตํ ปน อาโป อธิมตฺตปถวีคติกํ ชาต’’นฺติ. ชาตกปาฬิยํ ตุ ตสฺเสกวจนนฺตตา ทิฏฺฐา. ตถา หิ ‘‘สุจึ สุคนฺธํ สลิลํ, อาโป ตตฺถาภิสนฺทตี’’ติ. อิมสฺมึ ปเทเส อาโป อิติ สทฺโท เอกวจนฏฺฐาเน ฐิโต ทิฏฺโฐ. เกเจตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘อาโปติ สงฺขํ คตํ สลิลํ สุจิ สุคนฺธํ หุตฺวา ตตฺถ อภิสนฺทตีติ สลิลํสทฺทวเสน เอกวจนปฺปโยโค กโต, น นามสทฺทวเสน. อาปสทฺโท หิ เอกนฺเตนิตฺถิลิงฺโค เจว พหุวจนนฺโต จ. ตถา หิ ‘อาโป ตตฺถาภิสนฺทนฺตี’ติ พหุวจนวเสน ตปฺปโยโค วตฺตพฺโพปิ ฉนฺทานุรกฺขณตฺถํ วจนวิปลฺลาสวเสน นิทฺทิฏฺโฐ’’ติ. ตนฺน, ‘‘อาโป ตตฺถาภิสนฺทเร’’ติ วตฺตุํ สกฺกุเณยฺยตฺตา ‘‘ตานิ อชฺช ปทิสฺสเร’’ติ พหุวจนปฺปโยคา วิย. ยสฺมา เอวํ น วุตฺตํ, ยสฺมา จ ปน ปาฬิยํ ‘‘อาโป ลพฺภติ, เตโช ลพฺภติ, วาโย ลพฺภตี’’ติ เอกวจนปฺปโยโค ทิสฺสติ, ตสฺมา ‘‘อาโป’’ติ สทฺทสฺส เอกวจนนฺตตา ปจฺจกฺขโต ทิฏฺฐาติ. इस प्रकार 'आप' शब्द का स्त्रीलिंग और बहुवचनान्त होना वैयाकरणों के मत के आधार पर अनुमत (स्वीकृत) समझना चाहिए। किन्तु अट्ठसालिनी में 'आप' शब्द का नपुंसक लिंग और एकवचन के रूप में प्रयोग देखा गया है - "अल्प मात्रा में 'आप' (जल) अधिक मात्रा वाली पृथ्वी की अवस्था को प्राप्त हो गया है।" जातकपालि में तो इसका एकवचनान्त होना देखा गया है। जैसे कि - "स्वच्छ और सुगन्धित जल, वहाँ 'आप' (जल) प्रवाहित होता है।" इस पद में 'आप' शब्द एकवचन के स्थान पर स्थित देखा गया है। यहाँ कुछ लोग कह सकते हैं - "'आप' संज्ञा को प्राप्त जल स्वच्छ और सुगन्धित होकर वहाँ प्रवाहित होता है, इस प्रकार 'सलिल' शब्द के कारण एकवचन का प्रयोग किया गया है, न कि नाम शब्द (आप) के कारण। क्योंकि 'आप' शब्द निश्चित रूप से स्त्रीलिंग और बहुवचनान्त ही है। जैसे कि 'आपो तत्थाभिसन्दन्ति' (वहाँ जल प्रवाहित होते हैं) - इस प्रकार बहुवचन के रूप में उसका प्रयोग कहा जाना चाहिए था, फिर भी छन्द की रक्षा के लिए वचन-विपर्यास (वचन परिवर्तन) के कारण (एकवचन में) निर्दिष्ट किया गया है।" यह सही नहीं है, क्योंकि "तानि अज्ज पदिसरे" (वे आज दिखाई देते हैं) जैसे बहुवचन प्रयोगों की तरह "आपो तत्थाभिसन्दरे" कहना संभव था। चूँकि ऐसा नहीं कहा गया है, और चूँकि पालि में "आपो लब्भति, तेजो लब्भति, वायो लब्भति" (जल मिलता है, तेज मिलता है, वायु मिलती है) - ऐसा एकवचन प्रयोग दिखाई देता है, इसलिए 'आप' शब्द का एकवचनान्त होना प्रत्यक्ष रूप से देखा गया है। อถาปิ เจ วเทยฺยุํ – นนุ ปาฬิยํเยว ตสฺส พหุวจนนฺตตา ปจฺจกฺขโต ทิฏฺฐา ‘‘อาโป จ เทวา ปถวี จ, เตโช วาโย ตทาคมุ’’นฺติ? ตมฺปิ น. เอตฺถ หิ ‘‘เทวา’’ติ สทฺทํ อเปกฺขิตฺวา ‘‘อาคมุ’’นฺติ พหุวจนปฺปโยโค กโต, น ‘‘อาโป’’ติ สทฺทํ. ยทิ ‘‘อาโป’’ติ สทฺทํ สนฺธาย พหุวจนปฺปโยโค กโต สิยา, ‘‘ปถวี’’ติ ‘‘เตโช’’ติ ‘‘วาโย’’ติ จ สทฺทมฺปิ สนฺธาย พหุวจนปฺปโยโค กโต สิยา[Pg.145]. เอวํ สนฺเต ปถวี เตโช วาโยสทฺทาปิ พหุวจนกภาวมาปชฺเชยฺยุํ, น ปน อาปชฺชนฺติ. น เหเต พหุวจนกา, อถ โข เอกวจนกา เอว. รูฬฺหีวเสน เต ปวตฺตา ปกติอาปาทีสุ อตฺเถสุ อปฺปวตฺตนโต. ตถา หิ อาโปกสิณาทีสุ ปริกมฺมํ กตฺวา นิพฺพตฺตา เทวา อารมฺมณวเสน ‘‘อาโป’’ติอาทินามํ ลภนฺตีติ. เอวํ วุตฺตาปิ เต เอวํ วเทยฺยุํ ‘‘นนุ จ โภ ‘องฺคุตฺตราเปสู’ติ พหุวจนปาฬิ ทิสฺสตี’’ติ? เต วตฺตพฺพา – อสมฺปถมวติณฺณา ตุมฺเห, น หิ ตุมฺเห สทฺทปฺปวตฺตึ ชานาถ, ‘‘องฺคุตฺตราเปสู’’ติ พหุวจนํ ปน ‘‘กุรูสุ องฺเคสุ องฺคานํ มคธาน’’นฺติอาทีนิ พหุวจนานิ วิย รูฬฺหีวเสน เอกสฺสาปิ ชนปทสฺส วุตฺตํ, น อาปสงฺขาตํ อตฺถํ สนฺธาย. ‘‘องฺคุตฺตราเปสู’’ติ เอตฺถ หิ อาปสงฺขาโต อตฺโถ อุปสชฺชนีภูโต, ปุลฺลิงฺคพหุวจเนน ปน วุตฺโต ชนปทสงฺขาโต อตฺโถเยว ปธาโน ‘‘อาคตสมโณ สงฺฆาราโม’’ติ เอตฺถ สมณสงฺขาตํ อตฺถํ อุปสชฺชนกํ กตฺวา ปวตฺตสฺส อาคตสมณสทฺทสฺส สงฺฆารามสงฺขาโต อตฺโถ วิย, ตสฺมา อาปสงฺขาตํ อตฺถํ คเหตฺวา โย องฺคุตฺตราโป นาม ชนปโท, ตสฺมึ องฺคุตฺตราเปสุ ชนปเทติ อตฺโถ เวทิตพฺโพ. ตถา หิ ‘‘องฺคุตฺตราเปสุ วิหรติ อาปณํ นาม องฺคานํ นิคโม’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. ตตฺถ อุตฺตเรน มหามหิยา นทิยา อาโป เยสํ เต อุตฺตราปา, องฺคา จ เต อุตฺตราปา จาติ องฺคุตฺตราปา, เตสุ องฺคุตฺตราเปสุ. เอวํ เอกสฺมึ ชนปเทเยว พหุวจนํ น อาปสงฺขาเต อตฺเถ, เตน อฏฺฐกถายํ วุตฺตํ ‘‘ตสฺมึ องฺคุตฺตราเปสุ ชนปเท’’ติ. เอวํ วุตฺตา เต นิรุตฺตรา ภวิสฺสนฺติ. और यदि वे कहें - क्या पालि में ही उसका बहुवचनान्त होना प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा गया है - "आपो च देवा पथवी च, तेजो वायो तदागमुं" (जल, देव, पृथ्वी, तेज और वायु तब आए)? वह भी सही नहीं है। यहाँ 'देवा' शब्द की अपेक्षा 'आगमुं' इस बहुवचन का प्रयोग किया गया है, न कि 'आप' शब्द की अपेक्षा। यदि 'आप' शब्द के सन्दर्भ में बहुवचन का प्रयोग किया गया होता, तो 'पथवी', 'तेजो' और 'वायो' शब्दों के सन्दर्भ में भी बहुवचन का प्रयोग किया गया होता। ऐसा होने पर पृथ्वी, तेज और वायु शब्द भी बहुवचन भाव को प्राप्त हो जाते, किन्तु वे प्राप्त नहीं होते। क्योंकि ये बहुवचन वाले नहीं हैं, बल्कि एकवचन वाले ही हैं। वे रूढ़ि के कारण प्रवृत्त हुए हैं, क्योंकि वे प्रकृति आदि अर्थों में प्रवृत्त नहीं होते। जैसे कि आप-कसिण आदि में परिकर्म करके उत्पन्न हुए देव आलम्बन के कारण 'आप' आदि नाम प्राप्त करते हैं। ऐसा कहे जाने पर भी वे ऐसा कह सकते हैं - "हे महानुभाव! क्या 'अङ्गुत्तरापेसु' (अंगुत्तराप देश में) - ऐसी बहुवचन वाली पालि नहीं दिखाई देती?" उन्हें कहना चाहिए - आप लोग सही मार्ग पर नहीं आए हैं, क्योंकि आप शब्द की प्रवृत्ति को नहीं जानते। 'अङ्गुत्तरापेसु' यह बहुवचन तो 'कुरुसु', 'अङ्गेसु', 'अङ्गानं', 'मगधानं' आदि बहुवचनों की तरह रूढ़ि के कारण एक ही जनपद के लिए कहा गया है, न कि 'आप' (जल) नामक अर्थ के सन्दर्भ में। 'अङ्गुत्तरापेसु' यहाँ 'आप' नामक अर्थ गौण (उपसर्जन) हो गया है, और पुल्लिंग बहुवचन द्वारा कहा गया जनपद नामक अर्थ ही प्रधान है; जैसे 'आगतसमणो संघाराम' (जहाँ श्रमण आए हैं वह संघाराम) यहाँ श्रमण नामक अर्थ को गौण करके प्रवृत्त 'आगतसमण' शब्द का संघाराम नामक अर्थ (प्रधान) होता है। इसलिए 'आप' नामक अर्थ को लेकर जो 'अङ्गुत्तराप' नामक जनपद है, उस 'अङ्गुत्तराप' जनपद में - ऐसा अर्थ समझना चाहिए। जैसे कि पालि में दिखाई देता है - "अङ्गुत्तराप (जनपद) में अंग देश का आपण नामक निगम (कस्बा) स्थित है।" वहाँ महानदी मही के उत्तर में जिनका जल (आप) है, वे 'उत्तराप' हैं; और जो अंग हैं और उत्तराप हैं, वे 'अङ्गुत्तराप' हैं; उन अङ्गुत्तरापों में। इस प्रकार एक ही जनपद में बहुवचन है, न कि 'आप' (जल) नामक अर्थ में; इसीलिए अट्ठकथा में कहा गया है - "उस अङ्गुत्तराप जनपद में"। ऐसा कहे जाने पर वे निरुत्तर हो जाएँगे। ตถาปิ เย เอวํ วทนฺติ ‘‘อาปสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค เจว พหุวจนโกจา’’ติ. เต ปุจฺฉิตพฺพา ‘‘กึ ปฏิจฺจ ตุมฺเห อายสฺมนฺโต ‘อาปสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค เจว พหุวจนโก จา’ติ วทถา’’ติ[Pg.146]? เต เอวํ ปุฏฺฐา เอวํ วเทยฺยุํ – ‘‘องฺคาเยว โส ชนปโท, มหิยา ปน นทิยา อุตฺตเรน อาโป, ตาสํ อวิทูรตฺตา อุตฺตราโปติ วุจฺจตี’’ติ จ ‘‘มหิยา ปน นทิยา อาโป ตสฺส ชนปทสฺส อุตฺตเรน โหนฺติ, ตาสํ อวิทูรตฺตา โส ชนปโท อุตฺตราโปติ วุจฺจตี’’ติ จ เอวํ ปุพฺพาจริเยหิ อภิสงฺขโต สทฺทรจนาวิเสโส ทิสฺสติ, ตสฺมา อิตฺถิลิงฺโค เจว พหุวจนโก จา’’ติ วทามาติ. สจฺจํ ทิสฺสติ, โส ปน สทฺทสตฺเถ เวยฺยากรณานํ มตํ คเหตฺวา อภิสงฺขโต, สทฺทสตฺถญฺจ นาม น สพฺพถา พุทฺธวจนสฺโสปการกํ, เอกเทเสน ปน โหติ, ตสฺมา กจฺจายนปฺปกรเณ อิจฺฉิตานิจฺฉิตสงฺคหวิวชฺชนํ กาตุํ ‘‘ชินวจนยุตฺตญฺหิ, ลิงฺคญฺจ นิปฺปชฺชเต’’ติ ลกฺขณานิ วุตฺตานิ. फिर भी जो ऐसा कहते हैं - "'आप' शब्द स्त्रीलिंग और बहुवचन वाला ही है।" उनसे पूछा जाना चाहिए - "हे आयुष्मानों! आप किस आधार पर कहते हैं कि 'आप' शब्द स्त्रीलिंग और बहुवचन वाला ही है?" ऐसा पूछे जाने पर वे ऐसा कह सकते हैं - "वह जनपद अंग ही है, किन्तु मही नदी के उत्तर में जल (आप) है, उनके समीप होने के कारण 'उत्तराप' कहा जाता है" और "मही नदी का जल उस जनपद के उत्तर में है, उनके समीप होने के कारण वह जनपद 'उत्तराप' कहा जाता है" - इस प्रकार पूर्वाचार्यों द्वारा रचित शब्द-रचना की विशेषता दिखाई देती है, इसलिए हम कहते हैं कि यह स्त्रीलिंग और बहुवचन वाला ही है। यह सच दिखाई देता है, किन्तु वह शब्दशास्त्र (व्याकरण) में वैयाकरणों के मत को लेकर रचा गया है। और शब्दशास्त्र सर्वथा बुद्धवचन का उपकारक नहीं होता, बल्कि आंशिक रूप से होता है। इसलिए कच्चायन प्रकरण में इच्छित और अनिश्चित के संग्रह और वर्जन को करने के लिए "जिनवचन के अनुकूल ही लिंग सिद्ध होता है" - ऐसे लक्षण कहे गए हैं। ยทิ จ อาปสทฺโท อิตฺถิลิงฺคพหุวจนโก, กถํ อาโปติ ปทํ สิชฺฌตีติ? อาปสทฺทโต ปฐมาโยวจนํ กตฺวา ตสฺโสการาเทสญฺจ กตฺวา อาโปติ ปทํ สิชฺฌติ ‘‘คาโว’’ติ ปทมิวาติ. วิสมมิทํ นิทสฺสนํ, ‘‘คาโว’’ติ ปทญฺหิ นิจฺโจการนฺเตน โคสทฺเทน สมฺภูตํ. ตถา หิ โยมฺหิ ปเร โคสทฺทนฺตสฺสาวาเทสํ กตฺวา ตโต โยนโมการาเทสํ กตฺวา ‘‘คาโว’’ติ นิปฺผชฺชติ, อาปสทฺเท ปน ทฺเว อาเทสา น สนฺติ. พุทฺธวจนญฺหิ ปตฺวา อาปสทฺโท อการนฺตตาปกติโก ชาโต, น อญฺญถาปกติโกติ. यदि 'आप' शब्द स्त्रीलिंग बहुवचन है, तो 'आपो' पद कैसे सिद्ध होता है? 'आप' शब्द से प्रथमा बहुवचन 'यो' प्रत्यय करके और उसका 'ओ' आदेश करके 'आपो' पद सिद्ध होता है, जैसे 'गावो' पद। यह उदाहरण विषम (अनुपयुक्त) है, क्योंकि 'गावो' पद नित्य ओकारान्त 'गो' शब्द से बना है। जैसे 'यो' परे होने पर 'गो' शब्द के अन्त को 'आव' आदेश करके और फिर 'यो' को 'ओ' आदेश करके 'गावो' निष्पन्न होता है, किन्तु 'आप' शब्द में दो आदेश नहीं हैं। बुद्धवचन को प्राप्त होकर 'आप' शब्द अकारान्त प्रकृति वाला हो गया है, अन्य प्रकृति वाला नहीं। เอวํ วุตฺตาปิ เต ‘‘อิทเมว สจฺจํ, นาญฺญ’’นฺติ เจตสิ สนฺนิธาย อาธานคฺคาหิทุปฺปฏินิสฺสคฺคิภาเว, ‘‘น วจนปจฺจนีกสาเตน สุวิชานํ สุภาสิต’’นฺติ เอวํ วุตฺตปจฺจนีกสาตภาเว จ ฐตฺวา เอวํ วเทยฺยุํ ‘‘ยเถว คาโวสทฺโท, ตเถว อาโปสทฺโท กึ อิตฺถิลิงฺโค น ภวิสฺสติ พหุวจนโก จา’’ติ? ตโต เตสํ อิมานิ สุตฺตปทานิ ทสฺเสตพฺพานิ. เสยฺยถิทํ? ‘‘อาปํ อาปโต สญฺชานาติ, อาปํ อาปโต [Pg.147] สญฺญตฺวา อาปํ มญฺญติ, อาปสฺมึ มญฺญติ, อาปํ เมติ มญฺญติ, อาปํ อภินนฺทตี’’ติ เอวํ สุตฺตปทานิ ทสฺเสตฺวา ‘‘อาปนฺติ อิทํ กตรวจน’’นฺติ ปุจฺฉิตพฺพา. อทฺธา เต อาปสทฺทสฺส พหุวจนนฺตภาวเมว อิจฺฉมานา วกฺขนฺติ ‘‘ทุติยาพหุวจน’’นฺติ. เต วตฺตพฺพา ‘‘นนุ โยวจนํ น สุยฺยตี’’ติ? เต วเทยฺยุํ ‘‘โยวจนํ กตอมาเทสตฺตา น สุยฺยตี’’ติ. ยํ ยํ โภนฺโต อิจฺฉนฺติ, ตํ ตํ มุขารูฬฺหํ วทนฺติ. ऐसा कहे जाने पर भी वे "यही सत्य है, दूसरा नहीं" ऐसा मन में धारण करके, हठग्राही और दुस्त्याज्य स्वभाव में, तथा "वचन के प्रतिकूल होने के कारण सुभाषित को समझना आसान नहीं है" इस प्रकार के प्रतिकूल स्वभाव में स्थित होकर ऐसा कह सकते हैं— "जैसे 'गावो' शब्द है, वैसे ही 'आपो' शब्द स्त्रीलिंग और बहुवचन क्यों नहीं होगा?" तब उन्हें ये सूत्र-पद दिखाने चाहिए। जैसे कि— "आपं आपतो संजानाति, आपं आपतो सञ्ञत्वा आपं मञ्ञति, आपसस्मिं मञ्ञति, आपं मेति मञ्ञति, आपं अभिनन्दति"—इस प्रकार सूत्र-पदों को दिखाकर पूछना चाहिए कि "यह 'आपं' कौन सा वचन है?" निश्चित ही वे 'आप' शब्द को बहुवचनान्त ही मानते हुए कहेंगे— "द्वितीया बहुवचन"। उनसे कहना चाहिए— "क्या 'यो' वचन सुनाई नहीं देता?" वे कहेंगे— "यो वचन का आदेश हो जाने के कारण सुनाई नहीं देता।" जो-जो वे महानुभाव चाहते हैं, वही-वही मुखाग्र कहते हैं। ‘‘อาปโต’’ติ อิทํ ปน กึ โภนฺโต วทนฺตีติ? ‘‘อาปโต’’ติ อิทมฺปิ ‘‘พหุวจนกํ โตปจฺจยนฺต’’นฺติ วทาม โตปจฺจยสฺส เอกตฺเถ จ พวฺหตฺเถ จ ปวตฺตนโต. อิติ ตุมฺเห พหุวจนกตฺตํเยว อิจฺฉมานา ‘‘อาโปสทฺโท จ โยวจนนฺโต’’ติ ภณถ, ‘‘อาปโต’’ติ อิทมฺปิ ‘‘พหุวจนกํ โตปจฺจยนฺต’’นฺติ ภณถ, ‘‘อาปสฺมึ มญฺญตี’’ติ เอตฺถ ปน ‘‘อาปสฺมิ’’นฺติทํ กตรวจนนฺตํ กตราเทเสน สมฺภูตนฺติ? อทฺธา เต เอวํ ปุฏฺฐา นิรุตฺตรา ภวิสฺสนฺติ. ตถา เยสํ เอวํ โหติ ‘‘อาปสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค เจว พหุวจนโก จา’’ติ, เต ปุจฺฉิตพฺพา ‘‘ยํ อาจริเยหิ เวยฺยากรณมตํ คเหตฺวา ‘ยา อาโป’ติ จ ‘ตาส’นฺติ จ วุตฺตํ, ตตฺถ ‘กึ ตาส’นฺติ วจเน ‘อาปาน’นฺติ ปทํ อาเนตฺวา อตฺโถ วตฺตพฺโพ, อุทาหุ อาปสฺสา’’ติ? ‘‘อาปาน’นฺติ ปทมาเนตฺวา อตฺโถ วตฺตพฺโพ’’ติ เจ, เอวญฺจ สติ ‘‘ยา อาปา’’ติ วตฺตพฺพํ ‘‘ยา กญฺญา ติฏฺฐนฺตี’’ติ ปทมิว. อถ ‘‘อาปา’’ติ ปทํ นาม นตฺถิ, ‘‘อาโป’’ติ ปทํเยว พหุวจนกนฺติ เจ, เอวํ สติ ‘‘ตาส’’นฺติ เอตฺถาปิ ‘‘อาปสฺสา’’ติ ปทํ อาเนตฺวา อตฺโถ เวทิตพฺโพ. กสฺมาติ เจ? ยสฺมา ‘‘อาโป’’ติ ปจฺจตฺเตกวจนสฺส ตุมฺหากํ มเตน พหุวจนตฺเต สติ ‘‘อาปสฺสา’’ติ ปทมฺปิ พหุวจนนฺติ กตฺวา ตาสํสทฺเทน โยเชตฺวา วตฺตุํ ยุตฺติโตติ. เอวํ สติ ‘‘อาปาน’’นฺติ [Pg.148] ปทสฺส อภาเวเนว ภวิตพฺพํ. ยถา ปน ‘‘ปุริโส, ปุริสา. ปุริสํ, ปุริเส’’ติ จ, ‘‘โค, คาโว, คโว. คาวุ’’นฺติ จ เอกวจนพหุวจนานิ ภวนฺติ, เอวํ ‘‘อาโป, อาปา. อาปํ, อาเป’’ติ เอกวจนพหุวจเนหิ ภวิตพฺพํ. เอวญฺจ สติ ‘‘อาปสทฺโท พหุวจนโกเยว โหตี’’ติ น วตฺตพฺพํ. "और 'आपतो' के विषय में आप क्या कहते हैं?" "हम 'आपतो' को भी 'बहुवचन वाला तो-प्रत्ययान्त' कहते हैं, क्योंकि 'तो' प्रत्यय एकवचन और बहुवचन दोनों में प्रवृत्त होता है।" इस प्रकार आप बहुवचनत्व ही चाहते हुए कहते हैं कि "'आपो' शब्द 'यो' वचनान्त है" और "'आपतो' भी बहुवचन वाला 'तो' प्रत्ययान्त है", तो फिर "आपस्मिं मञ्ञति" यहाँ 'आपस्मिं' कौन सा वचनान्त है और किस आदेश से बना है? निश्चित ही वे ऐसा पूछे जाने पर निरुत्तर हो जाएंगे। इसी प्रकार जिन्हें ऐसा लगता है कि "'आप' शब्द स्त्रीलिंग और बहुवचन ही है", उनसे पूछा जाना चाहिए— "आचार्यों ने व्याकरण के मत को लेकर जो 'या आपो' और 'तासं' कहा है, वहाँ 'तासं' वचन में 'आपानं' पद लाकर अर्थ कहना चाहिए, अथवा 'आपस्स'?" यदि कहें कि "'आपानं' पद लाकर अर्थ कहना चाहिए", तो ऐसी स्थिति में 'या आपा' कहना चाहिए, जैसे 'या कञ्ञा तिट्ठन्ति' पद। यदि कहें कि 'आपा' पद तो है ही नहीं, 'आपो' पद ही बहुवचन वाला है, तो ऐसी स्थिति में 'तासं' यहाँ भी 'आपस्स' पद लाकर अर्थ समझना चाहिए। क्यों? क्योंकि आपके मत में 'आपो' इस प्रथमा एकवचन के बहुवचन होने पर 'आपस्स' पद को भी बहुवचन मानकर 'तासं' शब्द के साथ जोड़कर कहना उचित है। ऐसा होने पर 'आपानं' पद का अभाव ही होना चाहिए। जैसे 'पुरिसो, पुरिसा; पुरिसं, पुरिसे' और 'गो, गावो, गवो; गावुं' इस प्रकार एकवचन और बहुवचन होते हैं, वैसे ही 'आपो, आपा; आपं, आपे' इस प्रकार एकवचन और बहुवचन होने चाहिए। और ऐसा होने पर "आप शब्द केवल बहुवचन ही होता है" ऐसा नहीं कहना चाहिए। เย เอวํ วทนฺติ, เตสํ วจนํ สโทสํ ทุปฺปริหรณียํ มูลปริยายสุตฺเต ‘‘อาปํ มญฺญติ อาปสฺมิ’’นฺติ เอกวจนปาฬีนํ ทสฺสนโต, วิสุทฺธิมคฺคาทีสุ จ ‘‘วิสฺสนฺทนภาเวน ตํ ตํ ฐานํ อาโปติ อปฺโปตีติ อาโป’’ติอาทิกสฺส เอกวจนวเสน วุตฺตนิพฺพจนสฺส ทสฺสนโต. ยถา ปน ปาฬิยํ อิตฺถิลิงฺเคปิ ปริยาปนฺโน โคสทฺโท ‘‘ตา คาโว ตโต ตโต ทณฺเฑน อาโกเฏยฺยา’’ติ จ ‘‘อนฺนทา พลทา เจตา’’ติ จ อาทินา พวฺหตฺถทีปเกหิ อิตฺถิลิงฺคภูเตหิ สพฺพนามิกปเทหิ จ อสพฺพนามิกปเทหิ จ สมานาธิกรณภาเวน วุตฺโต ทิสฺสติ, น ตถา ปาฬิยํ พวฺหตฺถทีปเกหิ อิตฺถิลิงฺคภูเตหิ สพฺพนามิกปเทหิ วา อสพฺพนามิกปเทหิ วา สมานาธิกรณภาเวน วุตฺโต อาปสทฺโท ทิสฺสติ. ยทิ หิ อาปสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค สิยา, กญฺญสทฺทโต อาปจฺจโย วิย อาปสทฺทโต อาปจฺจโย วา สิยา, นทสทฺทโต วิย จ อีปจฺจโย วา สิยา, อุภยมฺปิ นตฺถิ, อุภยาภาวโต อิตฺถิลิงฺเค วุตฺตํ สพฺพมฺปิ วิธานํ ตตฺถ น ลพฺภติ, เตน ญายติ ‘‘อาปสทฺโท อนิตฺถิลิงฺโค’’ติ. นนุ จ โภ โคสทฺทโตปิ อาปจฺจโย นตฺถิ, ตทภาวโต อิตฺถิลิงฺเค วุตฺตวิธานํ น ลพฺภติ, เอวํ สนฺเต กสฺมา โสเยว อิตฺถิลิงฺโค โหติ, น ปนายํ อาปสทฺโทติ? जो ऐसा कहते हैं, उनका वचन दोषपूर्ण और अपरिहार्य है, क्योंकि मूलपरियाय सुत्त में 'आपं मञ्ञति, आपस्मिं' इस प्रकार एकवचन वाली पालियों का दर्शन होता है, और विशुद्धिमार्ग आदि में "बहने के स्वभाव से उस-उस स्थान को प्राप्त (आप्नोति) करता है, इसलिए 'आपो' है" आदि एकवचन के रूप में कहे गए निर्वचन (व्युत्पत्ति) का दर्शन होता है। जैसे पालि में स्त्रीलिंग के अन्तर्गत आने वाला 'गो' शब्द "ता गावो ततो ततो दण्डेन आकोटेय्या" और "अन्नदा बलदा चेता" आदि बहुवचन के द्योतक स्त्रीलिंग सर्वनाम पदों और असर्वनाम पदों के साथ सामानाधिकरण्य भाव में प्रयुक्त दिखता है, वैसे पालि में बहुवचन के द्योतक स्त्रीलिंग सर्वनाम पदों या असर्वनाम पदों के साथ सामानाधिकरण्य भाव में प्रयुक्त 'आप' शब्द नहीं दिखता। यदि 'आप' शब्द स्त्रीलिंग होता, तो 'कन्या' शब्द की तरह 'आप' शब्द से 'आ' प्रत्यय होता, या 'नद' शब्द की तरह 'ई' प्रत्यय होता; दोनों ही नहीं हैं। दोनों के अभाव के कारण स्त्रीलिंग में कहे गए सभी विधान वहाँ प्राप्त नहीं होते, इससे ज्ञात होता है कि "आप शब्द स्त्रीलिंग नहीं है"। हे महानुभाव! क्या 'गो' शब्द से भी 'आ' प्रत्यय नहीं है? उसके अभाव में स्त्रीलिंग में कहा गया विधान प्राप्त नहीं होता, ऐसा होने पर वह (गो शब्द) स्त्रीलिंग क्यों होता है, और यह 'आप' शब्द क्यों नहीं?"}]``` เอตฺถ วุจฺจเต – โคสทฺโท น นิโยคา อิตฺถิลิงฺโค, อถ โข ปุลฺลิงฺโคว. อิตฺถิลิงฺคภาเว ปน ตมฺหา อาปจฺจเย [Pg.149] อโหนฺเตปิ อีปจฺจโย วิกปฺเปน โหติ, อญฺญมฺปิ อิตฺถิลิงฺเค วุตฺตวิธานํ ลพฺภติ. โส หิ นิจฺจโมการนฺตตาปกติยํ ฐตฺวา ‘‘โค, คาวี’’ติอาทินา อตฺตโน อิตฺถิลิงฺครูปานํ นิพฺพตฺติการณภูโต, เตน โส อิตฺถิลิงฺโค ภวติ. อาปสทฺเท ปน อีปจฺจยาทิ น ลพฺภติ. เตน โส อิตฺถิลิงฺโคติ น วตฺตพฺโพ. ยถา วา โคสทฺทสฺส อวิสทาการโวหารตํ ปฏิจฺจ อิตฺถิลิงฺคภาโว อุปปชฺชติ, น ตถา อาปสทฺทสฺส. อาปสทฺทสฺส หิ อนากุลรูปกฺกมตฺตา อวิสทาการโวหารตา น ทิสฺสติ, ยาย เอโส อิตฺถิลิงฺโค สิยา. เอวํ วุตฺตา เต นิรุตฺตรา ภวิสฺสนฺติ. यहाँ कहा जाता है – 'गो' शब्द अनिवार्य रूप से स्त्रीलिंग नहीं है, बल्कि वह पुल्लिंग ही है। स्त्रीलिंग होने पर, उससे 'आ' प्रत्यय न होने पर भी 'ई' प्रत्यय विकल्प से होता है, और स्त्रीलिंग में कहे गए अन्य विधान भी प्राप्त होते हैं। क्योंकि वह (गो शब्द) नित्य ओ-कारान्त प्रकृति में स्थित होकर 'गो', 'गावी' आदि के द्वारा अपने स्त्रीलिंग रूपों की उत्पत्ति का कारण बनता है, इसलिए वह स्त्रीलिंग होता है। किन्तु 'आप' शब्द में 'ई' प्रत्यय आदि प्राप्त नहीं होते। इसलिए उसे स्त्रीलिंग नहीं कहना चाहिए। अथवा जैसे 'गो' शब्द के अस्पष्ट आकार वाले व्यवहार के कारण स्त्रीलिंग भाव सिद्ध होता है, वैसे 'आप' शब्द का नहीं। क्योंकि 'आप' शब्द के रूपों का क्रम व्याकुल (अस्पष्ट) न होने के कारण उसमें अस्पष्ट आकार वाला व्यवहार नहीं दिखता, जिससे वह स्त्रीलिंग हो सके। इस प्रकार कहे जाने पर वे निरुत्तर हो जाएंगे। ตถา เยสํ เอวํ โหติ ‘‘อาปสทฺโท สพฺพทา อิตฺถิลิงฺโค เจว พหุวจนโก จา’’ติ, เต วตฺตพฺพา – ยถา อิตฺถิลิงฺคภูตสฺส กญฺญาสทฺทสฺส ปฐมํ กญฺญอิติ รสฺสวเสน ฐปิตสฺส อาปจฺจยโต ปรํ สฺมึวจนํ สรูปโต น ติฏฺฐติ, ยํภาเวน จ ยาภาเวน จ ติฏฺฐติ ‘‘กญฺญายํ, กญฺญายา’’ติ, น ตถา ‘‘อิตฺถิลิงฺค’’นฺติ ตุมฺเหหิ คหิตสฺส อาโปสทฺทสฺส ปฐมํ อาปอิติ รสฺสวเสน ฐปิตสฺส ปรํ สฺมึวจนํ ยํภาเวน จ ยาภาเวน จ ติฏฺฐติ, อถ โข สรูปโตเยว ติฏฺฐติ ‘‘อาปสฺมึ มญฺญตี’’ติ. ยทิ ปน อาปสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค สิยา, สฺมึวจนํ สรูปโต น ติฏฺเฐยฺย. ยสฺมา จ สฺมึวจนํ สรูปโต ติฏฺฐติ, ตสฺมา อาปสทฺโท น อิตฺถิลิงฺโค. น หิ จตุราสีติธมฺมกฺขนฺธสหสฺสสงฺคเหสุ อเนกโกฏิสตสหสฺเสสุ ปาฬิปฺปเทเสสุ เอกสฺมิมฺปิ ปาฬิปฺปเทเส ปฐมํ อการนฺตภาเวน ฐเปตพฺพานํ อิตฺถิลิงฺคสทฺทานํ ปรโต ฐิตํ สฺมึวจนํ สรูปโต ติฏฺฐตีติ. เอวํ วุตฺตา เต นิรุตฺตรา ภวิสฺสนฺติ. इसी प्रकार जिनका ऐसा मानना है कि "'आप' शब्द सदैव स्त्रीलिंग और बहुवचन ही है", उनसे कहना चाहिए – जैसे स्त्रीलिंग 'कन्या' शब्द को पहले 'कञ्ञ' (ह्रस्व) के रूप में रखने पर 'आ' प्रत्यय के बाद 'स्मिं' विभक्ति अपने मूल रूप में नहीं रहती, बल्कि 'यं' भाव और 'या' भाव से 'कञ्ञायं', 'कञ्ञाया' के रूप में रहती है, वैसे आपके द्वारा 'स्त्रीलिंग' माने गए 'आपो' शब्द को पहले 'आप' (ह्रस्व) के रूप में रखने पर उसके बाद 'स्मिं' विभक्ति 'यं' भाव और 'या' भाव से नहीं रहती, बल्कि अपने मूल रूप में ही रहती है जैसे 'आपस्मिं मञ्ञति'। यदि 'आप' शब्द स्त्रीलिंग होता, तो 'स्मिं' विभक्ति अपने मूल रूप में नहीं रहती। और चूँकि 'स्मिं' विभक्ति अपने मूल रूप में रहती है, इसलिए 'आप' शब्द स्त्रीलिंग नहीं है। क्योंकि चौरासी हजार धर्मस्कन्धों के संग्रहों में, अनेक कोटि-शत-सहस्र पालि प्रदेशों में, एक भी पालि प्रदेश में ऐसा नहीं है जहाँ पहले अ-कारान्त के रूप में रखे जाने वाले स्त्रीलिंग शब्दों के बाद स्थित 'स्मिं' विभक्ति अपने मूल रूप में रहती हो। इस प्रकार कहे जाने पर वे निरुत्तर हो जाएंगे। เกจิ ปเนตฺถ เอวํ วเทยฺยุํ ‘‘อาปสทฺโท นปุํสกลิงฺโค, ตถา หิ อฏฺฐสาลินิยํ ‘โอมตฺตํ ปน อาโป อธิมตฺตปถวีคติกํ [Pg.150] ชาต’นฺติ นปุํสกลิงฺคภาเวน ตํสมานาธิกรณปทานิ นิทฺทิฏฺฐานี’’ติ? ตนฺน, มโนคเณ ปวตฺเตหิ ตม วจ สิรสทฺทาทีหิ วิย อาปสทฺเทนปิ สมานาธิกรณปทานํ กตฺถจิ นปุํสกลิงฺคภาเวน นิทฺทิสิตพฺพตฺตา. ปุพฺพาจริยานญฺหิ สทฺทรจนาสุ ‘‘สทฺธมฺมเตชวิหตํ วิลยํ ขเณน, เวเนยฺยสตฺตหทเยสุ ตโม ปยาตี’’ติ เอตฺถ ‘‘ตโม’’ติปเทน สมานาธิกรณํ ‘‘วิหต’’นฺติ นปุํสกลิงฺคํ ทิสฺสติ, ตถา ‘‘ทุกฺขํ วโจ เอตสฺมึ วิปจฺจนีกสาเต ปุคฺคเลติ ทุพฺพโจ’’ติ เอตฺถ ‘‘วโจ’’ติ ปเทน สมานาธิกรณํ ‘‘ทุกฺข’’นฺติ นปุํสกลิงฺคํ, ‘‘อวนตํ สิโร ยสฺส โส อวนตสิโร’’ติ เอตฺถ ‘‘สิโร’’ติ ปเทน สมานาธิกรณํ ‘‘อวนต’’นฺติ นปุํสกลิงฺคํ, ‘‘อปฺปํ ราคาทิรโช เยสํ ปญฺญามเย อกฺขิมฺหิ เต อปฺปรชกฺขา’’ติ เอตฺถ ‘‘รโช’’ติ ปเทน สมานาธิกรณํ ‘‘อปฺป’’นฺติ นปุํสกลิงฺคํ ทิสฺสติ. น เต อาจริยา เตหิ สมานาธิกรณปเทหิ ตมวจสิรสทฺทาทีนํ นปุํสกลิงฺคตฺตวิญฺญาปนตฺถํ ตถาวิธํ สทฺทรจนํ กุพฺพึสุ, อถ โข ‘‘โสภนํ มโน ตสฺสาติ สุมโน’’ติ เอตฺถ วิย มโนคเณ ปวตฺตปุลฺลิงฺคานํ ปโยเค นปุํสกลิงฺคภาเวนปิ สมานาธิกรณปทานิ กตฺถจิ โหนฺตีติ ทสฺสนตฺถํ กุพฺพึสุ. ยถา จ ‘‘วิหต’’นฺติอาทิกา สทฺทรจนา ตมวจสิรสทฺทาทีนํ นปุํสกลิงฺคตฺตวิญฺญาปนตฺถํ น กตา, ตถา ‘‘โอมตฺต’’นฺติ จ ‘‘อธิมตฺตปถวีคติกํ ชาต’’นฺติ จ สทฺทรจนาปิ อาปสทฺทสฺส นปุํสกลิงฺคตฺตวิญฺญาปนตฺถํ น กตา. ยสฺมา ปน มโนคเณ ปวตฺเตหิ มนสทฺทาทีหิ เอกเทเสน สมานคติกตฺตา อาปสทฺเทนปิ นปุํสกลิงฺคสฺส สมานาธิกรณตา ยุชฺชติ, ตสฺมา อฏฺฐสาลินิยํ ‘‘โอมตฺตํ ปน อาโป อธิมตฺตปถวีคติกํ ชาต’’นฺติ นปุํสกลิงฺคสฺส อาปสทฺเทน สมานาธิกรณตา กตา. ตถาปิ อาปสทฺโท [Pg.151] มนสทฺทาทีหิ เอกเทเสน สมานคติโก สมาสปทตฺเต มชฺโฌการสฺส ‘‘อาโปกสิณํ, อาโปคต’’นฺติอาทิปฺปโยคสฺส ทสฺสนโต, ตสฺมา ‘‘โอมตฺต’’นฺติอาทิวจนํ อาปสทฺทสฺส นปุํสกลิงฺคตฺตวิญฺญาปนตฺถํ วุตฺตนฺติ น คเหตพฺพํ, ลิงฺควิปริยยวเสน ปน กตฺถจิ เอวมฺปิ สทฺทคติ โหตีติ ญาปนตฺถํ วุตฺตนฺติ คเหตพฺพํ. ‘‘โอมตฺโต’’ติ จ ‘‘อธิมตฺตปถวีคติโก ชาโต’’ติ จ ลิงฺคํ ปริวตฺเตตพฺพํ. ยทิ หิ อาปสทฺโท นปุํสกลิงฺโค สิยา, สนิการานิ’สฺส ปจฺจตฺโตปโยครูปานิ พุทฺธวจนาทีสุ วิชฺเชยฺยุํ, น ตาทิสานิ สนฺติ. กิญฺจิ ภิยฺโย – โอการนฺตํ นาม นปุํสกลิงฺคํ กตฺถจิปิ นตฺถิ, นิคฺคหีตนฺตอิการนฺต อุการนฺตวเสน หิ ติวิธานิเยว นปุํสกลิงฺคานิ. เตน อาปสทฺทสฺส นปุํสกลิงฺคตา นุปปชฺชตีติ. เอวํ วุตฺตา เต นิรุตฺตรา ภวิสฺสนฺติ. อิจฺโจการนฺตวเสน คหิตสฺส อาปสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคตา จ นปุํสกลิงฺคตา จ เอกนฺตโต นตฺถิ, นิคฺคหีตนฺตวเสน ปน คหิตสฺส กตฺถจิ นปุํสกลิงฺคตา สิยา ‘‘ภนฺเต นาคเสน สมุทฺโท สมุทฺโทติ วุจฺจติ, เกน การเณน อาปํ อุทกํ สมุทฺโทติ วุจฺจตี’’ติ ปโยคทสฺสนโต. เอตฺถ ปเนเก วเทยฺยุํ ‘‘ยทิ โภ โอการนฺตวเสน คหิตสฺส อาปสทฺทสฺส อิตฺถินปุํสกลิงฺควเสน ทฺวิลิงฺคตา นตฺถิ, โอการนฺโต อาปสทฺโท กตรลิงฺโค’’ติ? ปุลฺลิงฺโคติ มยํ วทามาติ. यहाँ कुछ लोग ऐसा कह सकते हैं— ‘‘‘आप’ शब्द नपुंसकलिङ्ग है, क्योंकि अट्ठसालिनी में ‘ओमतं पन आपो अधिमत्तपथवीगतिकं जातं’ (किन्तु अल्प मात्रा वाला जल अधिक मात्रा वाली पृथ्वी के स्वभाव वाला हो गया है) इस प्रकार नपुंसकलिङ्ग होने के कारण उसके समानाधिकरण पद निर्दिष्ट किए गए हैं’’? यह ठीक नहीं है, क्योंकि मनोगण में प्रवृत्त तम, वच, शिर आदि शब्दों के समान ‘आप’ शब्द के साथ भी कहीं-कहीं नपुंसकलिङ्ग के समानाधिकरण पदों का निर्देश किया जा सकता है। पूर्वाचार्यों की शब्द-रचनाओं में ‘‘सद्धम्मतेजविहतं विलयं खणेन, वेनेय्यसत्तहृदयेसु तमोपयाति’’ यहाँ ‘तमो’ पद के साथ समानाधिकरण ‘विहतं’ यह नपुंसकलिङ्ग देखा जाता है; वैसे ही ‘‘दुक्खं वचो एतस्मिं विपच्चनीकसाते पुग्गलेति दुब्बचो’’ यहाँ ‘वचो’ पद के साथ समानाधिकरण ‘दुक्खं’ नपुंसकलिङ्ग है; ‘‘अवनतं सिरो यस्स सो अवनतसिरो’’ यहाँ ‘सिरो’ पद के साथ समानाधिकरण ‘अवनतं’ नपुंसकलिङ्ग है; ‘‘अप्पं रागादिरजो येसं पञ्ञामये अक्खिम्हि ते अप्परजक्खा’’ यहाँ ‘रजो’ पद के साथ समानाधिकरण ‘अप्पं’ नपुंसकलिङ्ग देखा जाता है। उन आचार्यों ने उन समानाधिकरण पदों के द्वारा तम, वच, शिर आदि के नपुंसकलिङ्ग होने का ज्ञान कराने के लिए वैसी शब्द-रचना नहीं की, बल्कि ‘‘सोभनं मनो तस्साति सुमनो’’ यहाँ के समान मनोगण में प्रवृत्त पुल्लिङ्गों के प्रयोग में नपुंसकलिङ्ग समानाधिकरण पद भी कहीं-कहीं होते हैं, यह दिखाने के लिए की। और जैसे ‘विहतं’ आदि शब्द-रचना तम, वच, शिर आदि के नपुंसकलिङ्ग होने का ज्ञान कराने के लिए नहीं की गई, वैसे ही ‘ओमतं’ और ‘अधिमत्तपथवीगतिकं जातं’ यह शब्द-रचना भी ‘आप’ शब्द के नपुंसकलिङ्ग होने का ज्ञान कराने के लिए नहीं की गई। चूँकि मनोगण में प्रवृत्त मन आदि शब्दों के साथ एक अंश में समान गति होने के कारण ‘आप’ शब्द के साथ भी नपुंसकलिङ्ग की समानाधिकरणता उचित है, इसलिए अट्ठसालिनी में ‘‘ओमतं पन आपो अधिमत्तपथवीगतिकं जातं’’ इस प्रकार नपुंसकलिङ्ग की ‘आप’ शब्द के साथ समानाधिकरणता की गई है। फिर भी ‘आप’ शब्द मन आदि शब्दों के साथ एक अंश में समान गति वाला है, क्योंकि समास पद होने पर मध्यवर्ती ‘ओ’ कार का ‘आपोकसिणं, आपोगतं’ आदि प्रयोगों में दर्शन होता है, इसलिए ‘‘ओमतं’’ आदि वचन ‘आप’ शब्द के नपुंसकलिङ्ग होने का ज्ञान कराने के लिए कहे गए हैं, ऐसा नहीं समझना चाहिए; बल्कि लिङ्ग-विपर्यय के कारण कहीं-कहीं ऐसी शब्द-गति होती है, यह बताने के लिए कहे गए हैं, ऐसा समझना चाहिए। ‘‘ओमत्तो’’ और ‘‘अधिमत्तपथवीगतिको जातो’’ इस प्रकार लिङ्ग परिवर्तित कर देना चाहिए। यदि ‘आप’ शब्द नपुंसकलिङ्ग होता, तो बुद्धवचन आदि में इसके ‘इ’ कारान्त प्रथमा-द्वितीया के रूप विद्यमान होते, पर वैसे नहीं हैं। कुछ और भी— ओ-कारान्त नपुंसकलिङ्ग कहीं भी नहीं है, क्योंकि निग्गहीत-अन्त, इ-कारान्त और उ-कारान्त के भेद से तीन प्रकार के ही नपुंसकलिङ्ग होते हैं। इसलिए ‘आप’ शब्द की नपुंसकलिङ्गता उपपन्न नहीं होती। ऐसा कहने पर वे निरुत्तर हो जाएँगे। इस प्रकार ओ-कारान्त के रूप में ग्रहण किए गए ‘आप’ शब्द की स्त्रीलिङ्गता और नपुंसकलिङ्गता एकान्ततः नहीं है, किन्तु निग्गहीत-अन्त के रूप में ग्रहण करने पर कहीं नपुंसकलिङ्गता हो सकती है, जैसा कि ‘‘भन्ते नागसेन समुद्दो समुद्दोति वुच्चति, केन कारणेन आपं उदकं समुद्दोति वुच्चति’’ (भन्ते नागसेन! समुद्र को समुद्र कहा जाता है, किस कारण से जल को समुद्र कहा जाता है?) इस प्रयोग में देखा जाता है। यहाँ कुछ लोग कह सकते हैं— ‘‘यदि, हे महानुभाव! ओ-कारान्त के रूप में ग्रहण किए गए ‘आप’ शब्द की स्त्री और नपुंसक लिङ्ग के भेद से द्विलिङ्गता नहीं है, तो ओ-कारान्त ‘आप’ शब्द किस लिङ्ग का है?’’ हम कहते हैं कि वह पुल्लिङ्ग है। ยทิ จ โภ อาปสทฺโท ปุลฺลิงฺโค. ยถา อาปสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺคตา ปญฺญาเยยฺย, นิชฺฌานกฺขมตา จ ภเวยฺย, ตถา สุตฺตํ อาหรถาติ. ‘‘อาหริสฺสามิสุตฺตํ, น โน สุตฺตาหรเณ ภาโร อตฺถี’’ติ เอวญฺจ ปน วตฺวา เตสํ อิมานิ สุตฺตปทานิ ทสฺเสตพฺพานิ. เสยฺยถิทํ? ‘‘อาโป อุปลพฺภตีติ? อามนฺตา. อาปสฺส กตฺตา กาเรตา อุปลพฺภตีติ? น [Pg.152] เหวํ วตฺตพฺเพ. อตีโต อาโป อตฺถีติ? อามนฺตา. เตน อาเปน อาปกรณียํ กโรตีติ? น เหวํ วตฺตพฺเพ. อาปํ มญฺญติ อาปสฺมึ มญฺญตี’’ติ อิมานิ สุตฺตปทานิ. और यदि, हे महानुभाव! ‘आप’ शब्द पुल्लिङ्ग है, तो जिस प्रकार ‘आप’ शब्द की पुल्लिङ्गता ज्ञात हो और वह विचार-क्षम (तर्कसंगत) हो, वैसा सूत्र प्रस्तुत करें। ‘‘मैं सूत्र प्रस्तुत करूँगा, हमारे लिए सूत्र प्रस्तुत करना कोई भार नहीं है’’—ऐसा कहकर उन्हें ये सूत्र-पद दिखाने चाहिए। जैसे कि— ‘‘क्या ‘आप’ (जल) उपलब्ध होता है? हाँ। क्या ‘आप’ का कर्ता और कराने वाला उपलब्ध होता है? ऐसा नहीं कहना चाहिए। क्या अतीत ‘आप’ है? हाँ। क्या उस ‘आप’ से आप-करणीय कार्य करता है? ऐसा नहीं कहना चाहिए। वह ‘आप’ को (आत्मा) मानता है, ‘आप’ में (आत्मा) मानता है’’—ये सूत्र-पद हैं। เอตฺถ จ ‘‘อุปลพฺภตี’’ติอาทินา อาปสทฺทสฺส เอกวจนตา สิทฺธา, ตาย สิทฺธาย พหุวจนตาปิ สิทฺธาเยว. เอกวจนตาเยว หิ สทฺทสตฺเถ ปฏิสิทฺธา, น พหุวจนตา, เตน ‘‘อาเปนา’’ติ อิมินา ปน อาปสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคภาววิคโม สิทฺโธ อิตฺถิลิงฺเค เอนาเทสาภาวโต. ‘‘อาปสฺส, อาปสฺมิ’’นฺติ อิมินาปิ อิตฺถิลิงฺคภาววิคโมเยว อิตฺถิลิงฺเค สรูปโต นา สฺมา สฺมึ วจนานมภาวา. ‘‘อตีโต’’ติ อิมินา อิตฺถิลิงฺคนปุํสกลิงฺคภาววิคโม โอการนฺตนปุํสกลิงฺคสฺส อภาวโต, โอการนฺตสฺส คุณนามภูตสฺส อิตฺถิลิงฺคสฺส จ อภาวโต. और यहाँ ‘‘उपलब्भति’’ आदि के द्वारा ‘आप’ शब्द की एकवचनता सिद्ध होती है, और उसके सिद्ध होने पर बहुवचनता भी सिद्ध ही है। शब्दशास्त्र में केवल एकवचनता का ही निषेध किया गया है, बहुवचनता का नहीं; इसलिए ‘‘आपेन’’ इसके द्वारा ‘आप’ शब्द के स्त्रीलिङ्ग होने का अभाव सिद्ध होता है, क्योंकि स्त्रीलिङ्ग में ‘एन’ आदेश नहीं होता। ‘‘आपस्स, आपस्मिं’’ इसके द्वारा भी स्त्रीलिङ्ग होने का अभाव ही सिद्ध होता है, क्योंकि स्त्रीलिङ्ग में स्वरूपतः ‘न, स्मा, स्मिं’ विभक्तियाँ नहीं होतीं। ‘‘अतीतो’’ इसके द्वारा स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग होने का अभाव सिद्ध होता है, क्योंकि ओ-कारान्त नपुंसकलिङ्ग का अभाव है, और ओ-कारान्त गुणवाचक नाम वाले स्त्रीलिङ्ग का भी अभाव है। อปิจ พุทฺธวจนาทีสุ ‘‘จิตฺตานิ, รูปานี’’ติอาทีนิ วิย สนิการานํ รูปานํ อทสฺสนโต โอการนฺตภาเวน คหิตสฺส นปุํสกลิงฺคภาววิคโม อตีว ปากโฏ. อปรมฺเปตฺถ วตฺตพฺพํ – ‘‘อตีโต อาโป อตฺถีติ? อามนฺตา’’ติ เอตฺถ ‘‘อตีโต’’ติ อิมินา อาปสทฺทสฺส วิสทาการโวหารตาสูจเกน โอการนฺตปเทน ตสฺส อวิสทาการโวหารตาย จ อุภยมุตฺตาการโวหารตาย จ อภาโว สิทฺโธ. ตสฺส จ อวิสทาการโวหารตาย อภาเว สิทฺเธ อิตฺถิลิงฺคภาโว ทูรตโร. อุภยมุตฺตาการโวหารตาย จ อภาเว สิทฺเธ นปุํสกลิงฺคภาโวปิ ทูรตโรเยว. อิติ น กตฺถจิปิ โอการนฺตภาเวน คหิโต อาปสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค วา นปุํสกลิงฺโค วา ภวติ. มิลินฺทปญฺเห ปน นิคฺคหีตนฺตวเสน อาคโต นปุํสกลิงฺโคติ เวทิตพฺโพ, น เจตฺถ วตฺตพฺพํ ‘‘อตีโต’’ติ ‘‘เตนา’’ติ [Pg.153] จ อิมานิ ลิงฺควิปลฺลาสวเสน วุตฺตานีติ วาจฺจลิงฺคานมนุวตฺตาปกสฺส อภิเธยฺยลิงฺคภูตสฺส อาปสทฺทสฺส ‘‘กญฺญาย จิตฺตานี’’ติอาทีนํ วิย อิตฺถินปุํสกลิงฺครูปานํ อภาวโต. อปิจ โวหารกุสลา ตถาคตา ตถาคตสาวกา จ, เตหิเยว อุตฺตมปุริเสหิ โวหารกุสเลหิ ‘‘อตีโต อาโป’’ติอาทินา วุตฺตตฺตาปิ ‘‘อตีโต’’ติ ‘‘เตนา’’ติ จ อิมานิ ลิงฺควิปลฺลาสวเสน วุตฺตานีติ น จินฺเตตพฺพานิ, ตสฺมา ตํสมานาธิกรโณ โอการนฺตภาเวน คหิโต อาปสทฺโท เอกวจนนฺโต ปุลฺลิงฺโค เจว ยถาปโยคํ เอกวจนพหุวจนโก จาติ เวทิตพฺโพ ‘‘อาโป, อาปา. อาปํ, อาเป’’ติอาทินา โยเชตพฺพตฺตา. เอวํ วุตฺตานิ สุตฺตปทานิ สวินิจฺฉยานิ สุตฺวา อทฺธา เต อาปสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคพหุวจนตาวาทิโน นิรุตฺตรา ภวิสฺสนฺติ. इसके अतिरिक्त, बुद्धवचनों आदि में 'चित्तानि', 'रूपाणि' आदि के समान 'नि' कार वाले रूपों के न दिखने के कारण, ओ-कारान्त रूप में ग्रहण किए गए (आप शब्द) का नपुंसकलिङ्ग भाव का अभाव अत्यंत स्पष्ट है। यहाँ एक और बात कहनी चाहिए – "क्या अतीत 'आप' (जल) है? हाँ" – यहाँ 'अतीतो' इस 'आप' शब्द के स्पष्ट आकार वाले व्यवहार के सूचक ओ-कारान्त पद के द्वारा, उसके अस्पष्ट आकार वाले व्यवहार और दोनों से मुक्त आकार वाले व्यवहार के अभाव की सिद्धि होती है। और उसके अस्पष्ट आकार वाले व्यवहार के अभाव के सिद्ध होने पर स्त्रीलिंग भाव और भी दूर हो जाता है। तथा दोनों से मुक्त आकार वाले व्यवहार के अभाव के सिद्ध होने पर नपुंसकलिङ्ग भाव भी अत्यंत दूर ही है। इस प्रकार कहीं भी ओ-कारान्त रूप में ग्रहण किया गया 'आप' शब्द न तो स्त्रीलिंग होता है और न ही नपुंसकलिङ्ग। मिलिन्दपञ्ह में तो निग्गृहीत (अनुस्वार) अन्त वाले होने के कारण आया हुआ शब्द नपुंसकलिङ्ग समझना चाहिए, और यहाँ यह नहीं कहना चाहिए कि 'अतीतो' और 'तेन' ये लिङ्ग-विपर्यास (लिङ्ग परिवर्तन) के कारण कहे गए हैं, क्योंकि वाच्य-लिङ्गों का अनुवर्तन न करने वाले और अभिधेय-लिङ्ग स्वरूप 'आप' शब्द के 'कञ्ञाय चित्तानि' आदि के समान स्त्री-नपुंसकलिङ्ग रूपों का अभाव है। इसके अतिरिक्त, तथागत और तथागत-श्रावक व्यवहार में कुशल हैं, उन व्यवहार-कुशल उत्तम पुरुषों द्वारा ही 'अतीतो आपो' आदि कहे जाने के कारण भी 'अतीतो' और 'तेन' को लिङ्ग-विपर्यास के कारण कहा गया है, ऐसा नहीं सोचना चाहिए। इसलिए उसके समानाधिकरण ओ-कारान्त रूप में ग्रहण किया गया 'आप' शब्द एकवचनान्त पुल्लिंग ही है और प्रयोग के अनुसार एकवचन एवं बहुवचन वाला समझना चाहिए, क्योंकि इसे 'आपो, आपा; आपं, आपे' आदि के रूप में संयोजित किया जाना चाहिए। इस प्रकार सविनिश्चय सुत्त-पदों को सुनकर निश्चित ही वे 'आप' शब्द को स्त्रीलिंग और बहुवचन मानने वाले निरुत्तर हो जाएंगे। เอตฺถ โกจิ วเทยฺย – ปาฬิยํ ปุลฺลิงฺคนโย เอกวจนนโย จ กึ อฏฺฐกถาฏีกาจริเยหิ น ทิฏฺโฐ, เย อาปสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคพหุวจนตฺตํ วณฺเณสุนฺติ? โน น ทิฏฺโฐ, ทิฏฺโฐเยว โส นโย เตหิ. ยสฺมา ปน เต น เกวลํ สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเนเยว วิสารทา, อถ โข สกเลปิ สทฺทสตฺเถ วิสารทา, ตสฺมา สทฺทสตฺเถ อตฺตโน ปณฺฑิจฺจํ ปกาเสตุํ, ‘‘สทฺทสตฺเถ จ อีทิโส นโย วุตฺโต’’ติ วิญฺญาเปตุญฺจ สทฺทสตฺถนยํ คเหตฺวา อาปสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคพหุวจนกตฺตํ วณฺเณสุนฺติ นตฺถิ เตสํ โทโส. ตถา หิ มูลปริยายสุตฺตนฺตฏฺฐกถายํ เตหิเยว วุตฺตํ อาปสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺเคกวจนกตฺตสูจนกํ ‘‘ลกฺขณสสมฺภารารมฺมณสมฺมุติวเสน จตุพฺพิโธ อาโป, เตสู’’ติอาทิ, ตสฺมา นตฺถิ เตสํ โทโส. ปูชารหา หิ เต อายสฺมนฺโต, นโมเยว เตสํ [Pg.154] กโรม, น เตสํ วจนํ โจทนาภาชนํ. เย ปน อุชุวิปจฺจนีกวาทา ทฬฺหเมว อาปสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคพหุวจนตฺตํ มมายนฺติ, เตสํเยว วจนํ โจทนาภาชนํ. ยสฺมา ปน มยํ ปาฬินยานุสาเรน อนฺตทฺวยวโต อาปสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺคตฺตํ นปุํสกลิงฺคตฺตญฺจ วิทธาม, ตสฺมา โย โกจิ อิทํ วาทํ มทฺทิตฺวา อญฺญํ วาทํ ปติฏฺฐาเปตุํ สกฺขิสฺสตีติ เนตํ ฐานํ วิชฺชติ, อิทญฺจ ปน ฐานํ มหาคหนํ ทุปฺปฏิวิชฺฌนฏฺเฐน, ปรมสุขุมญฺจ กตญาณสมฺภาเรหิ ปรมสุขุมญาเณหิ ปณฺฑิเตหิ เวทนียตฺตา. สพฺพมิทญฺหิ วจนํ เตสุ เตสุ ฐาเนสุ อตฺถพฺยญฺชนปริคฺคหเณ โสตูนํ ปรมโกสลฺลชนนตฺถญฺเจว สาสเน อาทรํ อกตฺวา สทฺทสตฺถมเตน กาลํ วีตินาเมนฺตานํ สาถลิกานํ ปมาทวิหารนิเสธนตฺถญฺจ สาสนสฺสาติมหนฺตภาวทีปนตฺถญฺจ วุตฺตํ, น อตฺตุกฺกํสนปรวมฺภนตฺถนฺติ อิมิสฺสํ นีติยํ สทฺธาสมฺปนฺเนหิ กุลปุตฺเตหิ โยโค กรณีโย ภควโต สาสนสฺส จิรฏฺฐิตตฺถํ. यहाँ कोई कह सकता है – पालि में पुल्लिंग और एकवचन का प्रयोग क्या अट्ठकथा और टीका के आचार्यों ने नहीं देखा, जिन्होंने 'आप' शब्द के स्त्रीलिंग और बहुवचन होने का वर्णन किया है? नहीं, ऐसा नहीं है कि उन्होंने नहीं देखा, उन्होंने उस प्रयोग को देखा ही है। चूँकि वे न केवल अट्ठकथा सहित तिपिटक बुद्धवचन में निपुण हैं, बल्कि संपूर्ण व्याकरण शास्त्र में भी निपुण हैं, इसलिए व्याकरण शास्त्र में अपनी विद्वत्ता प्रकट करने के लिए और 'व्याकरण शास्त्र में ऐसा प्रयोग कहा गया है' यह बताने के लिए व्याकरण शास्त्र के नियम को लेकर उन्होंने 'आप' शब्द के स्त्रीलिंग और बहुवचन होने का वर्णन किया है, इसमें उनका कोई दोष नहीं है। वैसे ही मूलपरियाय सुत्त की अट्ठकथा में उन्हीं के द्वारा 'आप' शब्द के पुल्लिंग और एकवचन होने का सूचक 'लक्षण, संभार, आलम्बन और सम्मति के वश से चार प्रकार का आप (जल) है, उनमें...' इत्यादि कहा गया है, इसलिए उनका कोई दोष नहीं है। वे आयुष्मान पूजनीय हैं, हम उन्हें नमस्कार ही करते हैं, उनके वचन आक्षेप के पात्र नहीं हैं। परंतु जो सीधे प्रतिकूल तर्क देने वाले हैं और दृढ़ता से 'आप' शब्द के स्त्रीलिंग और बहुवचन होने का ही आग्रह करते हैं, उनके ही वचन आक्षेप के पात्र हैं। चूँकि हम पालि के नियमों के अनुसार दोनों अंतों वाले 'आप' शब्द के पुल्लिंग और नपुंसक लिंग होने का विधान करते हैं, इसलिए कोई इस वाद को खंडित कर अन्य वाद स्थापित कर सकेगा, ऐसा संभव नहीं है। और यह विषय अत्यंत गहन है क्योंकि इसे समझना कठिन है, और यह परम सूक्ष्म है क्योंकि इसे कृत-ज्ञान के संभार वाले परम सूक्ष्म बुद्धि वाले पंडितों द्वारा ही जाना जा सकता है। यह सारा कथन विभिन्न स्थानों पर अर्थ और व्यंजन के ग्रहण में श्रोताओं की परम कुशलता उत्पन्न करने के लिए, और शासन में आदर न कर केवल व्याकरण शास्त्र के मत से समय बिताने वाले शिथिल और प्रमादी लोगों के विहार को रोकने के लिए तथा शासन की अति महानता को दर्शाने के लिए कहा गया है, न कि अपनी प्रशंसा और दूसरों की निंदा के लिए। अतः श्रद्धा संपन्न कुलपुत्रों को भगवान के शासन की चिरस्थायित्व के लिए इस नीति में प्रयत्न करना चाहिए। ยสฺมา ปน ปาฬิโต อฏฺฐกถา พลวตี นาม นตฺถิ, ตสฺมา ปาฬินยานุรูเปเนว อาปสทฺทสฺส นามิกปทมาลํ โยเชสฺสาม โสตูนมสมฺโมหตฺถํ, กิเมตฺถ สทฺทสตฺถนโย กริสฺสติ. อตฺรายํ อุทานปาฬิ ‘‘กึ กยิรา อุทปาเนน, อาปา เจ สพฺพทา สิยุ’’นฺติ. चूँकि पालि से बढ़कर कोई अट्ठकथा बलवती नहीं है, इसलिए पालि के नियमों के अनुसार ही श्रोताओं की स्पष्टता के लिए 'आप' शब्द की नामिक पदमाला को जोड़ेंगे, यहाँ व्याकरण शास्त्र का नियम क्या करेगा? यहाँ यह उदान पालि है – 'कुएँ से क्या प्रयोजन, यदि सब ओर जल ही हो'। อาโป, อาปา. อาปํ, อาเป. อาเปน, อาเปหิ, อาเปภิ. อาปสฺส, อาปานํ. อาปา, อาปสฺมา, อาปมฺหา, อาเปหิ, อาเปภิ. อาปสฺส, อาปานํ. อาเป, อาปสฺมึ, อาปมฺหิ, อาเปสุ. โภ อาป, ภวนฺโต อาปา. आपो, आपा। आपं, आपे। आपेन, आपेहि, आपेभि। आपस्स, आपानं। आपा, आपस्मा, आपम्हा, आपेहि, आपेभि। आपस्स, आपानं। आपे, आपस्मिं, आपम्हि, आपेसु। भो आप, भवन्तो आपा। สพฺพนามาทีหิปิ โยเชสฺสาม – โย อาโป, เย อาปา. ยํ อาปํ, เย อาเป. เยน อาเปน, เสสํ เนยฺยํ[Pg.155], โส อาโป, เต อาปา. อตีโต อาโป, อตีตา อาปา. เสสํ เนยฺยํ. อิจฺเจวํ – सर्वनाम आदि के साथ भी जोड़ेंगे – यो आपो, ये आपा। यं आपं, ये आपे। येन आपेन, शेष इसी प्रकार समझना चाहिए। सो आपो, ते आपा। अतीतो आपो, अतीता आपा। शेष इसी प्रकार समझना चाहिए। इस प्रकार – ปุริเสน สมา อาป-สทฺทาที สพฺพถา มตา; น สพฺพถาว โคสทฺโท, ปุริเสน สโม มโต. 'आप' शब्द आदि सभी प्रकार से 'पुरिस' शब्द के समान माने गए हैं; 'गो' शब्द सभी प्रकार से 'पुरिस' के समान नहीं माना गया है। มนาที เอกเทเสน, ปุริเสน สมา มตา; สราที เอกเทเสน, สพฺพถา วา สมา มตา. 'मन' आदि शब्द एक अंश में 'पुरिस' के समान माने गए हैं; 'सर' आदि शब्द एक अंश में या सभी प्रकार से समान माने गए हैं। เย ปเนตฺถ สทฺทา ‘‘มโนคโณ’’ติ วุตฺตา, กถํ เตสํ มโนคณภาโว สลฺลกฺเขตพฺโพติ? วุจฺจเต เตสํ มโนคณภาวสลฺลกฺขณการณํ – यहाँ जो शब्द 'मनोगण' कहे गए हैं, उनके मनोगण होने को कैसे पहचाना जाए? उनके मनोगण होने को पहचानने का कारण कहा जाता है – มโนคโณ มโนคณา-ทิกา เจวา’มโนคโณ; อิติ สทฺทา ติธา เญยฺยา,มโนคณวิภาวเน. मनोगण के विवेचन में शब्दों को तीन प्रकार का समझना चाहिए – मनोगण, मनोगणादिक और अमनोगण। เย เต นา ส สฺมึวิสเย,สา โส สฺยนฺตา ภวนฺติ จ; สมาสตทฺธิตนฺตตฺเต,มชฺโฌการา จ โหนฺติ หิ. जो 'ना', 'स', 'स्मिं' के विषय में 'सा', 'सो', 'सि' अंत वाले होते हैं; और समास तथा तद्धित के अंत में होने पर जिनके मध्य में 'ओ' कार होता है। โสการนฺตปโยคา จ, กฺริยาโยคมฺหิ ทิสฺสเร; เอวํวิธา จ เต สทฺทา, เญยฺยา ‘‘มโนคโณ’’อิติ. और क्रिया के योग में 'ओ' कार अंत वाले प्रयोग देखे जाते हैं; इस प्रकार के शब्दों को 'मनोगण' समझना चाहिए। อตฺร ตสฺสตฺถสฺส สาธกานิ ปโยคานิ สาสนโต จ โลกโต จ ยถารหมาหริตฺวา ทสฺเสสฺสาม – มนสา เจ ปสนฺเนน, ภาสติ วา กโรติ วา. น มยฺหํ มนโส ปิโย. สาธุกํ มนสิ กโรถ. มโนปุพฺพงฺคมา ธมฺมา. มโนรมํ, มโนธาตุ, มโนมเยน กาเยน, อิทฺธิยา อุปสงฺกมิ. โย เว ‘‘ทสฺส’’นฺติ วตฺวาน, อทาเน กุรุเต มโน. วจสา ปริจิตา. วจโส วจสิ. यहाँ उस अर्थ के साधक प्रयोगों को शासन और लोक से यथासंभव लाकर दिखाएंगे – 'मनसा चे पसन्नेन' (यदि प्रसन्न मन से), बोलता है या करता है। 'न मय्हं मनसो पियो' (वह मेरे मन को प्रिय नहीं है)। 'साधुकं मनसि करोथ' (अच्छी तरह मन में धारण करो)। 'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' (मन सभी धर्मों का पूर्वगामी है)। 'मनोरमं', 'मनोधातु', 'मनोमयेन कायेन', ऋद्धि से पास पहुँचा। जो 'दूँगा' ऐसा कहकर न देने में मन लगाता है। 'वचसा परिचिता'। 'वचसो', 'वचसि'। วโจรสฺมีหิ [Pg.156] โพเธสิ, เวเนยฺยกุมุทญฺจิทํ; ราโค สาราครหิโต, วิสุทฺโธ พุทฺธจนฺทิมา. वाणी रूपी किरणों से इस विनेय रूपी कुमुद को प्रबुद्ध किया; राग से रहित, विशुद्ध बुद्ध रूपी चंद्रमा ने। กสฺสปสฺส วโจ สุตฺวา, อลาโต เอตทพฺรวิ; เอส ภิยฺโย ปสีทามิ, สุตฺวาน มุนิโน วโจ. कस्सप के वचन सुनकर अलात ने यह कहा – मुनि के वचन सुनकर मैं और भी अधिक प्रसन्न होता हूँ। สขา จ มิตฺโต จ มมาสิ สีวิก, สุสิกฺขิโต สาธุ กโรหิ เม วโจ. เอกูนตึโส วยสา สุภทฺท. วยโส, วยสิ, วโยวุทฺโธ, วโยคุณา อนุปุพฺพํ ชหนฺติ. ชลนฺตมิว เตชสา. เตชโส, เตชสิ, เตโชธาตุกุสโล. เตโชกสิณํ. ตปสา อุตฺตโม, ตปโส, ตปสิ, ตโปธโน, ตโปชิคุจฺฉา. กสฺมา ภวํ วิชนมรญฺญนิสฺสิโต, ตโป อิธ กฺรุพฺพสิ พฺรหฺมปตฺติยา. เจตสา อญฺญาสิ, เอวํ เจตโส ปริวิตกฺโก อุทปาทิ, เอตมตฺถํ เจตสิ สนฺนิธาย, เจโตปริวิตกฺกมญฺญาย. เจโตปริยญาณํ, เจโต ปริจฺฉินฺทติ, โส ปรสตฺตานํ ปรปุคฺคลานํ เจตสา เจโต ปริจฺจ ชานาติ. ตมสา, ตมโส, ตมสิ, ตโมนุโท, ตโมหโร. นวาหเมตํ ยสสา ททามิ. ยสโส, ยสสิ, ยโส โภคสมปฺปิโต. ยโสลทฺธาโข ปนสฺมากํ โภคา. ยโสธรา เทวี, ยโส ลทฺธา น มชฺเชยฺย. อยสาว มลํ สมุฏฺฐิตํ. อยโส, อยสิ, อโยปาการปริยนฺตํ, อยสา ปฏิกุชฺชิตํ. เสยฺโย อโยคุโฬ ภุตฺโต, อโยปตฺโต[Pg.157], อโยมยํ, อโย กนฺตตีติ อโยกนฺโต. ฆเตน วา ภุญฺชสฺสุ ปยสา วา, สาธุ ขลุ ปยโส ปานํ ยญฺญทตฺเตน, ปยสิ โอชา, ปโยธรา, ปโยนิธิ. สหสฺสเนตฺโต สิรสา ปฏิคฺคหิ. สิรโส, สิรสิ อญฺชลึ กตฺวา, วนฺทิตพฺพํ อิสิทฺธชํ. สิโรรุหา, สิโร ฉินฺทติ. โย กาเม ปริวชฺเชติ, สปฺปสฺเสว ปทาสิโร. สิโร เต วชฺฌยิตฺวาน. สรสา, สรโส, ตีณิ อุปฺปลชาตานิ, ตสฺมึ สรสิ พฺราหฺมณ. สโรรุหํ. ยํ เอตา อุปเสวนฺติ, ฉนฺทสาวา ธเนนวา. สาวิตฺตี ฉนฺทโส มุขํ. ฉนฺทสิ, ฉนฺโทวิจิติ, ฉนฺโทภงฺโค, อุรสา ปนุทหิสฺสามิ, อุรโส, อุรสิ ชายติ, อุรสิโลโม, อุโรมชฺเฌ วิชฺฌิ. รหสา, รหโส, รหสิ, รโหคโต นิสีทิตฺวา, เอวํ จินฺเตสหํ ตทา. อหสา, อหสิ. ชายนฺติ ตตฺถ ปาโรหา, อโหรตฺตานมจฺจเยติ อิมานิ ปโยคานิ. เอตฺถ จ ‘‘มเนน, มนสฺส, มเน, มนสฺมึ, มนมฺหี’’ติอาทีนิ จ ‘‘มนอายตนํ ตมปรายโน อยปตฺโต ฉนฺทหานี’’ติอาทีนิ จ ‘‘น มนํ อญฺญาสิ. ยสํ ลทฺธาน ทุมฺเมโธ. ‘‘สิรํ ฉินฺทตี’’ติอาทีนิ จ รูปานิ มโนคณภาวปฺปกาสกานิ น โหนฺตีติ น ทสฺสิตานิ, น อลพฺภมานวเสน, ตสฺมาตฺร อิมา อาทิโต ปฏฺฐาย มโนคณภาววิภาวินี คาถาโย ภวนฺติ – हे सीविक! तुम मेरे सखा और मित्र थे, सुशिक्षित होकर मेरे वचनों का पालन करो। सुभद्र आयु में उनतीस वर्ष का है। वयसा, वयसो, वयसि; वयोवृद्ध, वयोगुण क्रमशः क्षीण होते हैं। तेज से प्रज्वलित के समान। तेजसा, तेजसो, तेजसि; तेजोधातु-कुशल, तेजोकसिण। तप से उत्तम; तपसा, तपसो, तपसि; तपोधन, तपोजिगुच्छा। आप विजन अरण्य का आश्रय लेकर यहाँ ब्रह्म-प्राप्ति के लिए तप क्यों करते हैं? मन से जाना; इस प्रकार मन में वितर्क उत्पन्न हुआ; इस अर्थ को मन में धारण कर; मन के वितर्क को जानकर। चेतोपरिय-ज्ञान; वह चित्त का परिच्छेद करता है, वह दूसरे सत्त्वों और दूसरे पुद्गलों के चित्त को अपने चित्त से जानकर जानता है। तमसा, तमसो, तमसि, तमोनुद, तमोहर। मैं इसे यश के साथ देता हूँ। यशसा, यशसो, यशसि; यश और भोग से सम्पन्न। हमारे भोग यश से प्राप्त हुए हैं। यशोधरा देवी; यश पाकर मत्त न हो। लोहे से ही मैल उत्पन्न हुआ। अयसा, अयसो, अयसि; अयोप्राकार-पर्यन्त, लोहे से ढका हुआ। खाया हुआ लोहे का गोला श्रेष्ठ है; अयोपात्र, अयौमय; लोहा काटता है इसलिए अयोकान्त। घी के साथ खाओ या दूध के साथ; यज्ञदत्त द्वारा दूध का पान वास्तव में अच्छा है; दूध में ओज, पयोधरा, पयोनिधि। सहस्रनेत्र (इन्द्र) ने सिर से स्वीकार किया। शिरसा, शिरसो, शिरसि; अंजलिबद्ध होकर ऋषियों के ध्वज की वन्दना करनी चाहिए। शिरोरुह, सिर काटता है। जो काम-वासनाओं को त्याग देता है, वह सर्प के सिर को पैर से [कुचलने के समान] है। तुम्हारा सिर फट जाए। सरसा, सरसो; तीन प्रकार के कमल; उस सरोवर में हे ब्राह्मण! सरोरुह। जिसका ये सेवन करते हैं, छन्द से या धन से। सावित्री छन्दों का मुख है। छन्दसि, छन्दोविचिति, छन्दोभङ्ग। छाती से हटाऊँगा; उरसा, उरसो, उरसि उत्पन्न होता है, उरसिलोम, छाती के बीच में बींधा। रहस्य से; रहसा, रहसो, रहसि; एकान्त में बैठकर तब मैंने ऐसा सोचा। अहसा, अहसि। वहाँ अंकुर उत्पन्न होते हैं; अहोरात्र के बीतने पर - ये प्रयोग हैं। और यहाँ 'मनेन, मनस्स, मने, मनस्मिं, मनम्हि' आदि और 'मनायतनं, तमपरायणो, अयपत्तो, छन्दहानी' आदि और 'न मनं अञ्ञासि, यशं लद्धान दुम्मेधो, सिरं छिन्दति' आदि रूप मनोगण के भाव को प्रकाशित करने वाले नहीं होते, इसलिए वे नहीं दिखाए गए हैं, न कि उनके अप्राप्य होने के कारण। इसलिए यहाँ आरम्भ से मनोगण के भाव को स्पष्ट करने वाली ये गाथाएँ हैं - ‘‘มนสา [Pg.158] มนโส มนสิ’’,อิติอาทิวสา ฐิตา; สา โส สฺยนฺตา สทฺทรูปา,วุตฺตา ‘‘มโนคโณ’’อิติ. 'मनसा, मनसो, मनसि' आदि के रूप में जो स्थित हैं; वे 'सा', 'सो', 'सि' अन्त वाले शब्द-रूप 'मनोगण' कहे गए हैं। มโนธาตุ วโจรสฺมิ,วโยวุทฺโธ ตโปคุโณ; เตโชธาตุ ตโมนาโส,ยโสโภคสมปฺปิโต. मनोधातु, वचोरश्मि, वयोवृद्ध, तपोगुण; तेजोधातु, तमोनारा, यशोभोग-समर्पित। เจโตปริวิตกฺโก จ, อโยปตฺโต ปโยธรา; สิโรรุหา สโรรุหํ, อุโรมชฺเฌ รโหคโต. चेतोपरिवितर्क, अयोपात्र, पयोधरा; शिरोरुह, सरोरुह, उरोमध्य, रहोगत। ฉนฺโทภงฺโค อโหรตฺตํ, มโนมย’มโยมยํ; เอวํวิโธ วิเสโส โย, ลกฺขณนฺตํ มโนคเณ. छन्दोभङ्ग, अहोरात्र, मनोमय, अयोमय; इस प्रकार की जो विशेषता है, वह मनोगण का लक्षण है। ‘‘วโจ สุตฺวา, สิโร ฉินฺทิ, อโย กนฺตติ’’ อิจฺจปิ; อุปโยคสฺส สํสิทฺธิ, ลกฺขณนฺตํ มโนคเณ. 'वचो सुत्वा', 'शिरो छिन्दि', 'अयो कन्ति' आदि; द्वितीया विभक्ति (उपयोग) की सिद्धि मनोगण का लक्षण है। มโนคเณ วุตฺตนโย, อิตฺถิลิงฺเค น ลพฺภติ; ปุนฺนปุํสกลิงฺเคสุ, ลพฺภเตว ยถารหํ. मनोगण में कहा गया नियम स्त्रीलिंग में नहीं पाया जाता; पुल्लिंग और नपुंसक लिंग में यथायोग्य पाया जाता है। อิจฺเจวํ สพฺพถาปิ – इस प्रकार सब प्रकार से - สา โส สฺยนฺตานิ รูปานิ, สนฺทิสฺสนฺติ มโนคเณ; มชฺโฌการนฺตรูปา จ, โสการนฺตูปโยคตา. 'सा', 'सो', 'सि' अन्त वाले रूप मनोगण में दिखाई देते हैं; और मध्य में 'ओ' कार वाले रूप तथा द्वितीया में 'ओ' कार अन्त वाले रूप भी। อิทํ มโนคณลกฺขณํ. เอวํ มโนคณลกฺขณํ อนากุลํ นิคฺคุมฺพํ นิชฺชฏํ สมุทฺทิฏฺฐํ. यह मनोगण का लक्षण है। इस प्रकार मनोगण का लक्षण स्पष्ट, व्याकुलता-रहित, सुलझा हुआ और ग्रंथि-रहित कहा गया है। อถ มโนคณาทิลกฺขณํ กถยาม – अब हम मनोगणादि के लक्षण कहते हैं - เย เต นา สสฺมึวิสเย,สา โส สฺยนฺตา ยถารหํ; สมาสตทฺธิตนฺตตฺเต,มชฺโฌกาโร น โหนฺติ ตุ. जो शब्द अपने विषय में यथायोग्य 'सा', 'सो', 'सि' अन्त वाले होते हैं; किन्तु समास और तद्धित होने पर मध्य में 'ओ' कार वाले नहीं होते। โสการนฺตูปโยคา [Pg.159] จ,กฺริยาโยเค น โหนฺติ เต; สทฺทา เอวํวิธา สพฺเพ; มโนคณาทิกา มตา. और क्रिया के योग में द्वितीया विभक्ति में 'ओ' कार अन्त वाले नहीं होते; वे सभी इस प्रकार के शब्द 'मनोगणादि' माने गए हैं। เสยฺยถิทํ? ‘‘พิลํ ปทํ มุข’’มิจฺจาทโย. เตสํ รูปานิ ภวนฺติ – พิลสา, พิลโส, พิลสิ, พิลคโต, พิลํ ปาวิสิ. ปทสาว อคมาสิ, ตีณิ ปทวารานิ, มากาสิ มุขสา ปาปํ, มุขคตํ โภชนํ ฉฑฺฑาเปติ. สจฺเจน ทนฺโต ทมสา อุเปโต. รสวรํ รสมยํ รสํ ปิวีติ. อิทํ มโนคณาทิกลกฺขณํ. जैसे कि? 'बिल, पद, मुख' आदि। उनके रूप होते हैं - बिलसा, बिलसो, बिलसि, बिलगत, बिल में प्रवेश किया। पैदल ही गया, तीन पदवार, मुख से पाप मत करो, मुख में आए भोजन को उगलवाता है। सत्य से दान्त और दम से युक्त। श्रेष्ठ रस, रसमय, रस पीता है। यह मनोगणादि का लक्षण है। อปรมฺปิ ภวติ – एक और भी होता है - เย สมาสาทิภาวมฺหิ, มชฺโฌการาว โหนฺติ ตุ; นา ส สฺมึวิสเย สาโส-สฺยนฺตา ปน น โหนฺติหิ. जो समास आदि होने पर मध्य में 'ओ' कार वाले ही होते हैं; किन्तु विभक्ति के विषय में 'सा', 'सो', 'सि' अन्त वाले नहीं होते। โสการนฺตูปโยคา จ,กฺริยาโยเค น โหนฺติ เต; สทฺทา เอวํวิธา จาปิ,มโนคณาทิกา มตา. और क्रिया के योग में द्वितीया विभक्ति में 'ओ' कार अन्त वाले नहीं होते; वे शब्द भी इस प्रकार के 'मनोगणादि' माने गए हैं। เสยฺยถิทํ? ‘‘อาโป วาโย สรโท’’อิจฺเจวมาทโย. เตสํ รูปานิ ภวนฺติ – อาโปธาตุ, วาโยธาตุ, อาโปกสิณํ, วาโยกสิณํ, อาโปมยํ, วาโยมยํ, ชีว ตฺวํ สรโทสตํ, สรทกาโล. อาเปน, อาปสฺส, อาเป, อาปสฺมึ, อาปมฺหิ. วาเยน, วายสฺส, วาเย, วายสฺมึ, วายมฺหิ. สรเทน, สรทสฺส, สรเท, สรทสฺมึ, สรทมฺหิ. อาปํ อาปโต สญฺชานาติ. วายํ วายโต สญฺชานาติ. สรทํ ปตฺเถติ, สรทํ รมณียา นที. जैसे कि? 'आप, वाय, शरद' इत्यादि। उनके रूप होते हैं - आपोधातु, वायोधातु, आपोकसिण, वायोकसिण, आपोमय, वायोमय, 'तुम सौ शरद तक जीओ', शरदकाल। आपेन, आपस्स, आपे, आपस्मिं, आपम्हि। वायेन, वायस्स, वाये, वायस्मिं, वायम्हि। शरदेन, शरदस्स, शरदे, शरदस्मिं, शरदमहि। जल को जल के रूप में जानता है। वायु को वायु के रूप में जानता है। शरद की इच्छा करता है, शरद ऋतु में नदी रमणीय होती है। เกจิ [Pg.160] ปเนตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘นนุ สาสเน วายสทฺโท วิย วายุสทฺโทปิ มโนคณาทีสุ อิจฺฉิตพฺโพ’’ติ? เอตฺถ วุจฺจเต – यहाँ कुछ लोग कह सकते हैं - 'क्या शासन में 'वाय' शब्द के समान 'वायु' शब्द को भी मनोगणादि में नहीं मानना चाहिए?' यहाँ कहा जाता है - ‘‘วายุ วาโย’’ติ เอเตสุ, ปจฺฉิโมเยว อิจฺฉิโต; มโนคณาทีสุ นาทิ, อาทิคฺคหวเสนิธ. 'वायु' और 'वायो' इनमें से यहाँ केवल बाद वाला ही इष्ट है; यहाँ 'आदि' ग्रहण के कारण मनोगणादि में पहला नहीं लिया गया है। ‘‘มโนธาตุ วาโยธาตุ’’, อิจฺจาทีนิ ปทานิ หิ; อการนฺตวเสเนว, มชฺโฌการานิ สิชฺฌเร. 'मनोधातु, वायोधातु' आदि पद अकारान्त होने के कारण ही मध्य में 'ओ' कार वाले सिद्ध होते हैं। วายุสทฺทมฺหิ คหิเต, อาทิคฺคหวเสนิธ; ‘‘วาโยธาตู’’ติ โอมชฺฌํ, รูปเมว น เหสฺสติ. यहाँ 'वायु' शब्द के ग्रहण किए जाने पर, आदि-ग्रहण के वश से; 'वायुधातु' इस पद के मध्य में (ओ-कार वाला) रूप नहीं होगा। ยถา หิ อายุสทฺทสฺส, รูปํ ทิสฺสติ สาคมํ; ‘‘อายุสา เอกปุตฺต’’นฺติ, มนสาทิปทํ วิย. क्योंकि जैसे 'आयु' शब्द का आगम सहित रूप 'आयुसा एकपुत्तं' (आयु से एक पुत्र) के समान 'मनस्' आदि पदों की तरह दिखाई देता है। น ตถา วายุสทฺทสฺส, รูปํ ทิสฺสติ สาคมํ; ตสฺมา มโนคณาทิมฺหิ, ตสฺโส’กาโส น วิชฺชติ. वैसे 'वायु' शब्द का आगम सहित रूप नहीं दिखाई देता है; इसलिए 'मनोगण' आदि में उसका (वायु शब्द का) स्थान नहीं है। ตถา หิ ‘‘วายติ อิติ, วาโย’’ อิติ ครู วทุํ; ‘‘วาโยธาตู’’ติ เอตสฺส, ปทสฺสตฺถํ ตหึ ตหึ. क्योंकि गुरुओं ने 'वायति इति वायो' (जो बहता है वह वायु है) ऐसा कहा है; 'वायुधातु' इस पद का अर्थ वहाँ-वहाँ (विभिन्न स्थानों पर) इसी प्रकार है। ยตฺถ ปถวี จ อาโป จ, เตโช วาโย น คาธติ; เอตฺถ อาปาทิกํ สทฺท-ตฺติกํ มโนคณาทิเก. जहाँ पृथ्वी, आप (जल), तेज और वायु प्रवेश नहीं करते; यहाँ 'आप' आदि तीन शब्द 'मनोगण' आदि में (सम्मिलित) हैं। อิทมฺปิ มโนคณาทิกลกฺขณํ. เอตฺถ มโนคณาทิกา ทฺวิธา ภิชฺชนฺติ พิล ปทาทิโต อาปาทิโต จ. เอวํ มโนคณาทิกลกฺขณํ อนากุลํ นิคฺคุมฺพํ นิชฺชฏํ สมุทฺทิฏฺฐํ. यह भी मनोगण आदि का लक्षण है। यहाँ मनोगण आदि 'बिल' पद आदि से और 'आप' आदि से दो प्रकार से विभाजित होते हैं। इस प्रकार मनोगण आदि का लक्षण स्पष्ट, जटिलता रहित और सुलझा हुआ कहा गया है। อถ อมโนคณลกฺขณํ กถยาม – अब हम 'अमनोगण' (जो मनोगण नहीं हैं) का लक्षण कहते हैं – เย จ นาวิสเย โสนฺตา, เย จ สฺมาวิสเย สิยุํ; สทฺทา เอวํปการา เต, อมโนคณสญฺญิตา. जो 'ना' (तृतीया एकवचन) के विषय में 'सो' अन्त वाले होते हैं, और जो 'स्मा' (पञ्चमी एकवचन) के विषय में (सो अन्त वाले) हो सकते हैं; इस प्रकार के शब्द 'अमनोगण' संज्ञक कहलाते हैं। เก [Pg.161] เต? อตฺถพฺยญฺชนกฺขรสทฺทาทโย เจว ทีโฆรสทฺทา จ. เอเตสุ หิ อตฺถสทฺทาทีนํ นาวจนฏฺฐาเน ‘‘อตฺถโส พฺยญฺชนโส อกฺขรโส สุตฺตโส อุปายโส สพฺพโส ฐานโส’’ติอาทีนิ โสนฺตานิ รูปานิ ภวนฺติ. ทีโฆรสทฺทานํ ปน สฺมาวจนฏฺฐาเน ‘‘ทีฆโส โอรโส’’ติ โสนฺตานิ รูปานิ ภวนฺติ. อิทํ อมโนคณลกฺขณํ. वे कौन से हैं? अर्थ, व्यंजन, अक्षर शब्द आदि और दीर्घ एवं ओरस शब्द। इनमें 'अर्थ' शब्द आदि के 'ना' विभक्ति के स्थान पर 'अर्थसो, व्यंजनसो, अक्षरसो, सुत्तसो, उपायसो, सब्बसो, ठानसो' आदि 'सो' अन्त वाले रूप होते हैं। किन्तु 'दीर्घ' और 'ओरस' शब्दों के 'स्मा' विभक्ति के स्थान पर 'दीर्घसो, ओरससो' जैसे 'सो' अन्त वाले रूप होते हैं। यह अमनोगण का लक्षण है। อปรมฺปิ ภวติ – एक और (लक्षण) होता है – สพฺพถา วินิมุตฺตา เย, สา โส สฺยนฺตาทิภาวโต; เอวํวิธาปิ เต สทฺทา, อมโนคณสญฺญิตา. जो 'सा', 'सो', 'सि' आदि अन्तों के भाव से सर्वथा मुक्त हैं; इस प्रकार के शब्द भी 'अमनोगण' संज्ञक कहलाते हैं। เก เต? ‘‘ปุริโส กญฺญา จิตฺต’’มิจฺจาทโย. อิทมฺปิ อมโนคณลกฺขณํ. เอวํ อมโนคณลกฺขณํ อนากุลํ นิคฺคุมฺพํ นิชฺชฏํ สมุทฺทิฏฺฐํ. वे कौन से हैं? 'पुरिसो' (पुरुष), 'कञ्ञा' (कन्या), 'चित्तं' आदि। यह भी अमनोगण का लक्षण है। इस प्रकार अमनोगण का लक्षण स्पष्ट, जटिलता रहित और सुलझा हुआ कहा गया है। เอวํ ทสฺสิเตสุ มโนคณลกฺขณาทีสุ โกจิ วเทยฺย ‘‘ยทิทํ ตุมฺเหหิ วุตฺตํ ‘เย สมาสาทิภาวมฺหิ, มชฺโฌการาว โหนฺติ ตู’ติอาทินา มโนคณาทิกลกฺขณํ, เตน ‘‘ปโรสตํ โคมยํ โคธโน’’อิจฺจาทีสุ โคปรสทฺทาทโยปิ มโนคณาทิกภาวํ อาปชฺชนฺตีติ? นาปชฺชนฺติ. กสฺมาติ เจ? ยสฺมา – इस प्रकार मनोगण आदि के लक्षणों को दिखाए जाने पर, कोई कह सकता है— "जो आपने 'ये समासादिभावम्हि, मज्झोकाराव होन्ति तु' आदि के द्वारा मनोगण आदि का लक्षण कहा है, उससे 'परोसतं, गोमयं, गोधनो' इत्यादि में 'गो', 'पर' शब्द आदि भी मनोगण आदि भाव को प्राप्त हो जाएँगे?" (उत्तर है—) वे प्राप्त नहीं होते। यदि पूछें क्यों? क्योंकि – เอตฺถ มโนคณาทีนํ, อนฺตสฺโสตฺตํ ปฏิจฺจิทํ; ‘‘มชฺโฌการา’’ติ วจนํ, วุตฺตํ น ตฺวาคมาทิกํ. यहाँ मनोगण आदि के अन्त्य (अकार) के 'ओ' होने की अपेक्षा से 'मज्झोकारा' (मध्य में ओ-कार) यह वचन कहा गया है, न कि आगम आदि के कारण। ‘‘ปโรสตํ โคมย’’นฺติ-อาทีสุ อมโนคโณ; ปุพฺพภูตํ ปทํ โอสฺสา-คมตฺตา’นิจฺจตาย จ. 'परोसतं, गोमयं' इत्यादि में पूर्व पद अमनोगण है, क्योंकि वहाँ 'ओ' का आगम होता है और वह अनित्य है। ตสฺมา นาปชฺชนฺติ. อิติ สพฺพถาปิ อมโนคณลกฺขณํ นิสฺเสสโต ทสฺสิตํ. อิจฺเจวํ มโนคณวิภาวนายํ มโนคโณ มโนคณาทิโก อมโนคโณ จาติ ติธา เภโท เวทิตพฺโพ. इसलिए वे (मनोगण भाव को) प्राप्त नहीं होते। इस प्रकार सभी प्रकार से अमनोगण का लक्षण पूर्णतः दिखाया गया है। इस प्रकार 'मनोगणविभावना' में मनोगण, मनोगण-आदि और अमनोगण—ये तीन प्रकार के भेद समझने चाहिए। ตตฺถ [Pg.162] มโนคเณ ปริยาปนฺนสทฺทานํ สมาสํ ปตฺวา ‘‘อพฺยคฺคมนโส นโร, ถิรเจตสํ กุลํ, สทฺเธยฺยวจสา อุปาสิกาติอาทินา ลิงฺคตฺตยวเสน อญฺญถาปิ รูปานิ ภวนฺติ. เอตฺถ ปน เกจิ เอวํ วทนฺติ ‘‘ยทา มนสทฺโท สกตฺเถ อวตฺติตฺวา ‘อพฺยคฺโค มโน ยสฺส โสยํ อพฺยคฺคมนโส, อลีโน มโน ยสฺส โสยํ อลีนมนโส’ติ เอวํ อญฺญตฺเถ วตฺตติ, ตทา ปุริสนเยเนว นามิกปทมาลา ลพฺภติ, น มโนคณนเยนา’’ติ. ตํ น คเหตพฺพํ อุภินฺนมฺปิ ยถารหํ ลพฺภนโต. ตถา หิ วิสุทฺธิมคฺเค ปุคฺคลาเปกฺขนวเสน ‘‘ขนฺติโสรจฺจเมตฺตาทิ-คุณภูสิตเจตโส. อชฺเฌสนํ คเหตฺวานา’’ติ เอตฺถ มโนคณนโย ทิสฺสติ. ตฏฺฏีกายมฺปิ ‘‘อชฺเฌสิโต ทาฐานาค-ตฺเถเรน ถิรเจตสา’’ติ มโนคณนโย ทิสฺสติ, ตสฺมา เตสํ วจนํ น คเหตพฺพํ. เอวํ วทนฺตา จ เต อพฺยคฺคมนสทฺทาทีนํ อพฺยคฺคมนสอิจฺจาทินา สการนฺตปกติภาเวน ฐเปตพฺพภาวํ วิพฺภนฺตมติวเสน จินฺเตตฺวา สพฺพาสุ วิภตฺตีสุ, ทฺวีสุ จ วจเนสุ ปุริสนเยน โยเชตพฺพตํ มญฺญนฺติ. เอวญฺจ สติ ‘‘คุณภูสิตเจตโส, ถิรเจตสา’’ติ ฉฏฺฐีจตุตฺถีตติยารูปานิ นสิยุํ, อญฺญานิเยว อนภิมตานิ รูปานิ สิยุํ. ยสฺมา สิยุํ, ตสฺมา เอวํ อคฺคเหตฺวา อยํ วิเสโส คเหตพฺโพ. वहाँ मनोगण के अन्तर्गत आने वाले शब्दों के समास होने पर 'अव्यग्गमनसो नरो' (एकाग्र मन वाला मनुष्य), 'थिरचेतसं कुलं' (स्थिर चित्त वाला कुल), 'सद्धेय्यवचसा उपासिका' (श्रद्धेय वचन वाली उपासिका) आदि के द्वारा तीनों लिंगों के अनुसार अन्य रूप भी होते हैं। यहाँ कुछ लोग ऐसा कहते हैं— "जब 'मन' शब्द अपने अर्थ में न रहकर 'अव्यग्र है मन जिसका वह अव्यग्गमनसो', 'अलीन है मन जिसका वह अलीगमनसो' इस प्रकार अन्य अर्थ (बहुव्रीहि) में प्रवृत्त होता है, तब 'पुरिस' (पुरुष) शब्द की तरह ही शब्द-रूप चलते हैं, मनोगण की तरह नहीं।" इसे स्वीकार नहीं करना चाहिए क्योंकि दोनों ही यथायोग्य प्राप्त होते हैं। जैसे कि विशुद्धिमार्ग में पुद्गल की अपेक्षा से 'खन्तिसोरच्चमेत्तादि-गुणभूसितचेतसो। अज्झेसनं गहेत्वाना' यहाँ मनोगण का नियम दिखाई देता है। उसकी टीका में भी 'अज्झेसितो दाठानगत्वेरेन थिरचेतसा' यहाँ मनोगण का नियम दिखाई देता है, इसलिए उनका कथन स्वीकार्य नहीं है। ऐसा कहने वाले लोग 'अव्यग्गमनस' आदि शब्दों को 'अव्यग्गमनस' आदि स-कारान्त प्रकृति भाव में स्थित होने योग्य मानकर, भ्रान्त बुद्धि के कारण सभी विभक्तियों और दोनों वचनों में 'पुरिस' शब्द की तरह जोड़ने योग्य मानते हैं। ऐसा होने पर 'गुणभूसितचेतसो', 'थिरचेतसा' जैसे षष्ठी, चतुर्थी और तृतीया के रूप नहीं बनेंगे, बल्कि अन्य ही अनचाहे रूप बनेंगे। चूँकि वे (अनचाहे रूप) बनेंगे, इसलिए वैसा न मानकर यह विशेषता ग्रहण करनी चाहिए। ยตฺถ หิ สมาสวเสน มนสทฺโท เจตสทฺทาทโย จ สกตฺเถ อวตฺติตฺวา อญฺญตฺเถ วตฺตนฺติ, ตตฺถ สการาคมานํ ปทานํ นามิกปทมาลา ปุริสนเยน จ มโนคเณ มนนเยน จ ยถารหํ ลพฺภติ. นิสฺสการาคมานํ ปน ปุริสนเยเนว ลพฺภติ. ยตฺถ ปน สมาสวิสเยเยว มนาทิสทฺทา สกตฺเถ วตฺตนฺติ, ตตฺถ นิสฺสการาคมานํ นามิกปทมาลา ปุริสนเยน จ มโนคเณ มนนเยน จ ลพฺภติ. जहाँ समास के कारण 'मन' शब्द और 'चेत' आदि शब्द अपने अर्थ में न रहकर अन्य अर्थ में प्रवृत्त होते हैं, वहाँ 'स' कार के आगम वाले पदों की शब्द-रूपावली पुरुष-नय (अ-कारान्त पुल्लिंग) और मनोगण (मनस्-गण) के अनुसार यथायोग्य प्राप्त होती है। 'स' कार के आगम के बिना केवल पुरुष-नय के अनुसार प्राप्त होती है। जहाँ समास के विषय में ही 'मन' आदि शब्द अपने अर्थ में प्रवृत्त होते हैं, वहाँ 'स' कार के आगम के बिना शब्द-रूपावली पुरुष-नय और मनोगण के अनुसार प्राप्त होती है। อิทานิ [Pg.163] อิมสฺสตฺถสฺส อาวิภาวตฺถํ, สทฺทคตีสุ จ วิญฺญูนํ โกสลฺลุปฺปาทนตฺถํ ยถาวุตฺตานํ ปทานํ ปทมาลา ติธา กตฺวา ทสฺสยิสฺสาม – ‘‘พฺยาสตฺโต มโน ยสฺส โสยํ พฺยาสตฺตมนโส นโร’’ติ เอวมจฺจนฺตํ ปุคฺคลาเปกฺขกสฺส อิมสฺส ปทสฺส – अब इस अर्थ को स्पष्ट करने के लिए और शब्दों की गति में विद्वानों की कुशलता उत्पन्न करने के लिए, पूर्वोक्त पदों की शब्द-रूपावली को तीन प्रकार से करके दिखाएंगे - "जिसका मन आसक्त है, वह यह आसक्त-मन वाला मनुष्य है" (ब्यासत्तमनासो नरो), इस प्रकार अत्यन्त पुद्गल (व्यक्ति) की अपेक्षा रखने वाले इस पद की - พฺยาสตฺตมนโส นโร, พฺยาสตฺตมนสา นรา. พฺยาสตฺตมนสํ นรํ, พฺยาสตฺตมนเส นเร. พฺยาสตฺตมนสา, พฺยาสตฺตมเนน นเรน, พฺยาสตฺตมเนหิ, พฺยาสตฺตมเนภิ นเรหิ. พฺยาสตฺตมนโส, พฺยาสตฺตมนสฺส นรสฺส, พฺยาสตฺตมนานํ นรานํ. พฺยาสตฺตมนา, พฺยาสตฺตมนสฺมา, พฺยาสตฺตมนมฺหา นรา, พฺยาสตฺตมเนหิ, พฺยาสตฺตมเนภิ นเรหิ. พฺยาสตฺตมนโส, พฺยาสตฺตมนสฺส นรสฺส, พฺยาสตฺตมนานํ นรานํ. พฺยาสตฺตมนสิ, พฺยาสตฺตมเน, พฺยาสตฺตมนสฺมึ, พฺยาสตฺตมนมฺหิ นเร, พฺยาสตฺตมเนสุ นเรสุ. โภ พฺยาสตฺตมนส นร, ภวนฺโต พฺยาสตฺตมนสา นราติ นามิกปทมาลา ภวติ. ब्यासत्तमनासो नरो, ब्यासत्तमनासा नरा। ब्यासत्तमनासं नरं, ब्यासत्तमनासे नरे। ब्यासत्तमनासा, ब्यासत्तमनेन नरेन, ब्यासत्तमनेहि, ब्यासत्तमनेभि नरेहि। ब्यासत्तमनासो, ब्यासत्तमनास्स नरस्स, ब्यासत्तमनानं नरानं। ब्यासत्तमना, ब्यासत्तमनास्मा, ब्यासत्तमनाम्हा नरा, ब्यासत्तमनेहि, ब्यासत्तमनेभि नरेहि। ब्यासत्तमनासो, ब्यासत्तमनास्स नरस्स, ब्यासत्तमनानं नरानं। ब्यासत्तमनासि, ब्यासत्तमने, ब्यासत्तमनास्मिं, ब्यासत्तमनाम्हि नरे, ब्यासत्तमनेसु नरेसु। हे ब्यासत्तमनास नर, हे ब्यासत्तमनासा नरा - इस प्रकार शब्द-रूपावली होती है। เอวํ สการาคมสฺส ลพฺภมานาลพฺภมานตา ววตฺถเปตพฺพา. เอตฺถ หิ ปฐมาทุติยาวิภตฺตีนํ เอกวจนพหุวจนฏฺฐาเน จ ตติยาจตุตฺถีฉฏฺฐีสตฺตมีนํ เอกวจนฏฺฐาเน จ ยถารหํ สาคโม ภวติ อาเทสสรวิภตฺติสรปรตฺตา. อยญฺจ นโย สุขุโม สาธุกํ มนสิ กาตพฺโพ. इस प्रकार 'स' कार के आगम की प्राप्ति और अप्राप्ति का निर्धारण करना चाहिए। यहाँ प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के एकवचन और बहुवचन के स्थान पर, तथा तृतीया, चतुर्थी, षष्ठी और सप्तमी के एकवचन के स्थान पर यथायोग्य 'स' का आगम होता है, क्योंकि आदेश स्वर और विभक्ति स्वर बाद में होते हैं। यह नियम सूक्ष्म है, इसे अच्छी तरह मन में धारण करना चाहिए। อปโร นโย – ‘‘พฺยาสตฺโต มโน ยสฺส โสยํ พฺยาสตฺตมโน’’ติ เอวมฺปิ ปุคฺคลาเปกฺขกสฺส อิมสฺส ปทสฺส ‘‘พฺยาสตฺตมโน นโร, พฺยาสตฺตมนา นรา. พฺยาสตฺตมนํ นร’’นฺติอาทินา ปุริสนเยเนว นามิกปทมาลา ภวติ. เอตฺถ ปน สพฺพถาปิ สาคโม นตฺถิ. อปโรปิ นโย – ‘‘พฺยาสตฺโต จ โส มโน จาติ พฺยาสตฺตมโน’’ติ เอวํ จิตฺตาเปกฺขกสฺสปิ อิมสฺส ปทสฺส ‘‘พฺยาสตฺตมโน, พฺยาสตฺตมนา. พฺยาสตฺตมนํ, พฺยาสตฺตมเน. พฺยาสตฺตมนสา, พฺยาสตฺตมเนนา’’ติอาทินา มโนคเณ มนนเยน นามิกปทมาลา ภวติ, เอตฺถ ปน ตติยาจตุตฺถีฉฏฺฐีสตฺตมีนํ [Pg.164] เอกวจนฏฺฐาเนเยว สาคโม ภวติ อาเทสสรปรตฺตา. ยถา จ เอตฺถ, เอวํ ‘‘อลีนมนโส นโร’’ติอาทีสุปิ อยํ ติวิโธ นโย เวทิตพฺโพ. दूसरा प्रकार - "जिसका मन आसक्त है, वह यह आसक्त-मना है" (ब्यासत्तमना), इस प्रकार भी व्यक्ति की अपेक्षा रखने वाले इस पद की "ब्यासत्तमना नरो, ब्यासत्तमना नरा, ब्यासत्तमनां नरं" आदि के रूप में पुरुष-नय के अनुसार ही शब्द-रूपावली होती है। यहाँ किसी भी प्रकार से 'स' का आगम नहीं होता। एक और प्रकार - "जो आसक्त है वही मन है, वह आसक्त-मन है" (ब्यासत्तमना), इस प्रकार चित्त की अपेक्षा रखने वाले इस पद की भी "ब्यासत्तमना, ब्यासत्तमना, ब्यासत्तमनां, ब्यासत्तमने, ब्यासत्तमनासा, ब्यासत्तमनेन" आदि के रूप में मनोगण के मन-नय के अनुसार शब्द-रूपावली होती है; यहाँ केवल तृतीया, चतुर्थी, षष्ठी और सप्तमी के एकवचन के स्थान पर ही 'स' का आगम होता है, क्योंकि आदेश स्वर बाद में होता है। जैसे यहाँ है, वैसे ही "अलीनमनासो नरो" आदि में भी यह तीन प्रकार का नियम समझना चाहिए। นปุํสกลิงฺเค ปน วตฺตพฺเพ ‘‘พฺยาสตฺตมนสํ กุลํ, พฺยาสตฺตมนานิ กุลานิ. พฺยาสตฺตมนสํ กุลํ, พฺยาสตฺตมนานิ กุลานิ. พฺยาสตฺตมนสา กุเลนา’’ติอาทินา นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. เอตฺถ ปน ปฐมาทุติยาตติยาจตุตฺถีฉฏฺฐีสตฺตมีนํ เอกวจนฏฺฐาเนเยว ยถารหํ สาคโม ภวติ อาเทสสรวิภตฺติสรปรตฺตา, อยมฺปิ นโย สุขุโม สาธุกํ มนสิ กาตพฺโพ. नपुंसक लिंग में कहे जाने पर "ब्यासत्तमनासं कुलं, ब्यासत्तमनानि कुलानि। ब्यासत्तमनासं कुलं, ब्यासत्तमनानि कुलानि। ब्यासत्तमनासा कुलेन" आदि के अनुसार शब्द-रूपावली जोड़नी चाहिए। यहाँ प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, षष्ठी और सप्तमी के एकवचन के स्थान पर ही यथायोग्य 'स' का आगम होता है, क्योंकि आदेश स्वर और विभक्ति स्वर बाद में होते हैं; यह नियम भी सूक्ष्म है, इसे अच्छी तरह मन में धारण करना चाहिए। อิตฺถิลิงฺเค ปน วตฺตพฺเพ ‘‘พฺยาสตฺตมนสา อิตฺถี’’ติ เอวํ ปฐเมกวจนฏฺฐาเนเยว สาคมํ วตฺวา ตโต ‘‘พฺยาสตฺตมนา, พฺยาสตฺตมนาโย อิตฺถิโย. พฺยาสตฺตมนํ อิตฺถิ’’นฺติ กญฺญานเยน โยเชตพฺพา. ‘‘เอวํ สทฺเธยฺยวจสา อุปาสิกา, สทฺเธยฺยวจาโย อุปาสิกาโย. สทฺเธยฺยวจํ อุปาสิก’’นฺติอาทินาปิ. ‘‘พฺยาสตฺตมนํ กุลํ, พฺยาสตฺตมนา อิตฺถี’’ติอาทินา ปน จิตฺตกญฺญานเยน โยเชตพฺพา. เอตฺถ ปน สพฺพถาปิ สาคโม นตฺถิ. स्त्रीलिंग में कहे जाने पर "ब्यासत्तमनासा इत्थी" इस प्रकार प्रथमा के एकवचन के स्थान पर ही 'स' का आगम कहकर, उसके बाद "ब्यासत्तमना, ब्यासत्तमनायो इत्थियो। ब्यासत्तमनां इत्थिं" के रूप में कन्या-नय के अनुसार जोड़ना चाहिए। इसी प्रकार "सद्धेय्यवचसा उपासिका, सद्धेय्यवचायो उपासिकायो, सद्धेय्यवचं उपासिकं" आदि भी। "ब्यासत्तमनां कुलं, ब्यासत्तमना इत्थी" आदि के रूप में चित्त और कन्या के नय के अनुसार जोड़ना चाहिए। यहाँ किसी भी प्रकार से 'स' का आगम नहीं होता। โสตูนํ ญาณปฺปเภทชนนตฺถํ อปราปิ นามิกปทมาลาโย ทสฺสยิสฺสาม สหนิพฺพจเนน – มโน เอว มานสํ, สมุสฺสาหิตํ มานสํ ยสฺส โสยํ สมุสฺสาหิตมานโส. ‘‘สมุสฺสาหิตมานโส, สมุสฺสาหิตมานสา. สมุสฺสาหิตมานสํ, สมุสฺสาหิตมานเส. สมุสฺสาหิตมานเสนา’’ติ ปุริสนเยน โยเชตพฺพา. สุนฺทรา เมธา อสฺส อตฺถีติ สุเมธโส. ‘‘สุเมธโส, สุเมธสา. สุเมธสํ, สุเมธเส. สุเมธเสนา’’ติ ปุริสนเยน, เอวํ ‘‘ภูริเมธโส’’ติอาทีนมฺปิ. ตตฺริเม ปโยคา – श्रोताओं के ज्ञान में विस्तार उत्पन्न करने के लिए निर्वचन के साथ अन्य शब्द-रूपावलियाँ भी दिखाएंगे - मन ही मानस है, जिसका मानस उत्साहित है वह 'समुत्साहित-मानस' है। "समुत्साहितमानसो, समुत्साहितमानसा। समुत्साहितमानसं, समुत्साहितमानसे। समुत्साहितमानसेन" - इसे पुरुष-नय के अनुसार जोड़ना चाहिए। जिसकी मेधा सुन्दर है वह 'सुमेधस' है। "सुमेधसो, सुमेधसा। सुमेधसं, सुमेधसे। सुमेधसेन" - इसे पुरुष-नय के अनुसार, इसी प्रकार "भूरिमेधसो" आदि को भी। उनके ये प्रयोग हैं - ‘‘ยํ [Pg.165] วทนฺติ สุเมโธติ, ภูริปญฺญํ สุเมธสํ; กึ นุ ตมฺหา วิปฺปวสิ, มุหุตฺตมปิ ปิงฺคิย; โคตมา ภูริปญฺญาณา, โคตมา ภูริเมธสา. "जिसे वे सुमेध कहते हैं, उस विशाल प्रज्ञा वाले सुमेधस से; हे पिंगिय! तुम क्षण भर के लिए भी क्यों दूर रहे? विशाल प्रज्ञा वाले गौतम से, विशाल बुद्धि वाले गौतम से।" นาหํ ตมฺหา วิปฺปวสามิ, มุหุตฺตมปิ พฺราหฺมณ; โคตมา ภูริปญฺญาณา, โคตมา ภูริเมธสา’’ติ. "हे ब्राह्मण! मैं उस विशाल प्रज्ञा वाले गौतम से, उस विशाल बुद्धि वाले गौतम से क्षण भर के लिए भी दूर नहीं रहता हूँ।" อิตฺถิลิงฺเค วตฺตพฺเพ ‘‘สมุสฺสาหิตมานสา สุเมธสา’’ติ รูปานิ, นปุํสเก วตฺตพฺเพ ‘‘สมุสฺสาหิตมานสํ สุเมธส’’นฺติ รูปานิ, กญฺญา จิตฺตนเยน เอเตสํ ปทมาลา โยเชตพฺพา. โอการนฺตปุลฺลิงฺคฏฺฐาเน อิตฺถิลิงฺคาทิวินิจฺฉโย นยปฺปกาสนตฺถํ กโต. วิเสสโต หิ โอการนฺตกถาเยว อิธาธิปฺเปตา. อปิจ โลเก นีติ นาม นานปฺปกาเรหิ กถิตา เอว โสภติ, อยญฺจ สาสเน นีติ, ตสฺมา นานปฺปกาเรหิ กถิตาติ. स्त्रीलिंग में कहे जाने पर "समुत्साहितमानसा सुमेधसा" ये रूप होते हैं, नपुंसक लिंग में कहे जाने पर "समुत्साहितमानसं सुमेधसं" ये रूप होते हैं; इनकी शब्द-रूपावली कन्या और चित्त के नय के अनुसार जोड़नी चाहिए। ओ-कारान्त पुल्लिंग के स्थान पर स्त्रीलिंग आदि का निर्णय नियम को प्रकाशित करने के लिए किया गया है। विशेष रूप से यहाँ ओ-कारान्त की चर्चा ही अभिप्रेत है। इसके अतिरिक्त, लोक में नीति अनेक प्रकार से कही गई ही सुशोभित होती है, और यह शासन की नीति है, इसलिए इसे अनेक प्रकार से कहा गया है। สพฺพานิ นยโต เอวํ, โอการนฺตปทานิเม; ปุลฺลิงฺคานิ ปวุตฺตานิ, สาสนตฺถํ มเหสิโน. इस प्रकार, महान ऋषि (बुद्ध) के शासन (शिक्षा) के अर्थ के लिए, ये सभी 'ओ' कारान्त पुल्लिंग शब्द विधिपूर्वक कहे गए हैं। วิเสโส เตสุ เกสญฺจิ, ปาฬิยํ โย ปทิสฺสติ; ปจฺจตฺตวจนฏฺฐาเน, ปกาเสสฺสามิ ตํ’ธุนา. उनमें से कुछ में जो विशेषता पालि में दिखाई देती है, प्रथमा विभक्ति (पच्चत्तवचन) के स्थान पर, उसे मैं अब प्रकाशित करूँगा। ‘‘วนปฺปคุมฺเพ ยถ ผุสฺสิตคฺเค’’, อิติอาทินเยน หิ; กตฺถโจทนฺตปุลฺลิงฺค-รูปานิ อญฺญถา สิยุํ. “वनप्पगुम्बे यथा फुस्सितग्गे” (जैसे खिले हुए शिखरों वाला वन-गुल्म) इत्यादि विधि से, कहीं-कहीं 'ओ' कारान्त पुल्लिंग रूप अन्यथा (भिन्न) हो सकते हैं। ปจฺจตฺตวจนิจฺเจว, ตญฺจ รูปํ ปกาสเย; ‘‘ปจฺจตฺเต ภุมฺมนิทฺเทโส’’, อิติ ภาสนฺติ เกจน. उस रूप को प्रथमा विभक्ति के रूप में ही प्रकाशित करना चाहिए; “प्रथमा में सप्तमी का निर्देश है”, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। ตตฺร กานิจิ สุตฺตปทานิ ทสฺเสสฺสาม – นตฺถิ อตฺตกาเร, นตฺถิ ปรกาเร, นตฺถิ ปุริสกาเร, ปริยนฺตกเต สํสาเร, ชีเว สตฺตเม, น เหวํ วตฺตพฺเพ, พาเล จ ปณฺฑิเต จ สนฺธาวิตฺวา สํสริตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสนฺตีติ. อิมานิ [Pg.166] เอกวจนพหุวจนวเสน ทฺวิธา คเหตพฺพานิ. ปจฺจตฺเตกวจนพหุวจนานญฺจ เอการาเทโส เวทิตพฺโพ. वहाँ कुछ सूत्र-पद दिखाएंगे - 'नत्थि अत्तकारे' (स्वयं का किया हुआ नहीं है), 'नत्थि परकारे' (दूसरे का किया हुआ नहीं है), 'नत्थि पुरिसकारे' (पुरुष का किया हुआ नहीं है), 'परियन्तकते संसारे' (परिमित संसार में), 'जीवे सत्तमे' (सातवें जीव में), 'न हेव वत्तब्बे' (ऐसा नहीं कहना चाहिए), 'बाले च पण्डिते च' (मूर्ख और विद्वान) दौड़कर और संसार में भटककर दुःख का अंत करेंगे। इन्हें एकवचन और बहुवचन के भेद से दो प्रकार से ग्रहण करना चाहिए। प्रथमा एकवचन और बहुवचन के लिए 'ए' कार का आदेश समझना चाहिए। เย ปน ‘‘วนปฺปคุมฺเพติ ปจฺจตฺตวจนสฺส ภุมฺมวจนนิทฺเทโส’’ติ วทนฺติ, เต วตฺตพฺพา ‘‘ยทิ วนปฺปคุมฺเพติ ปจฺจตฺตวจนสฺส ภุมฺมวจนนิทฺเทโส, เอวญฺจ สติ ‘ถาลิยํ โอทนํ ปจตี’ติ เอตฺถ วิย อาธารสุติสมฺภวโต ‘คิมฺหาน มาเส ปฐมสฺมึ คิมฺเห’ติ อิทํ กตรตฺถํ โชเตตี’’ติ? เต วเทยฺยุํ ‘‘น มยํ โภ ‘วนปฺปคุมฺเพติ อิทํ ภุมฺมวจน’นฺติ วทาม, อถ โข ‘ปจฺจตฺตวจนสฺส ภุมฺมวจนนิทฺเทโส’ติ วทามา’’ติ. เอวมฺปิ โทโสเยว ตุมฺหากํ, นนุ ‘‘สงฺเฆ โคตมิ เทหี’’ติ เอตฺถาปิ สมฺปทานวจนสฺส ภุมฺมวจนนิทฺเทโสติ วุตฺเตปิ สงฺฆสฺส ทานกฺริยาย อาธารภาวโต ‘‘สงฺเฆ’’ติ วจนํ สุณนฺตานํ อาธารสุติ จ อาธารปริกปฺโป จ โหติเยว. น หิ สกฺกา เอวํ ปวตฺตํ จิตฺตํ นิวาเรตุํ, ตสฺมา เอตฺถ เอวํ ปน วิเสโส คเหตพฺโพ ‘‘ปจฺจตฺตวจนสฺสปิ กตฺถจิ ภุมฺมวจนสฺส วิย รูปํ โหตี’’ติ. เอวญฺหิ คหิเต น โกจิ วิโรโธ. อีทิเสสุ หิ ฐาเนสุ นิรุตฺติปฺปเภทกุสโล โลกานุกมฺปโก ภควา ปจฺจตฺตวจนวเสน นิทฺทิสิตพฺเพ สติ เอวํ อนิทฺทิสิตฺวา โลกสฺส สมฺโมหมุปฺปาทยนฺโต วิย กถํ ภุมฺมวจนนิทฺเทสํ กริสฺสติ, ตสฺมา สทฺทสามญฺญเลสมตฺตํ คเหตฺวา ‘‘ภุมฺมวจนนิทฺเทโส’’ติ น วตฺตพฺพํ. ยทิ สทฺทสามญฺญํ คเหตฺวา ภุมฺมวจนนิทฺเทสํ อิจฺฉถ, ‘‘ปจฺจตฺเตกวจนสฺส อุปโยคพหุวจนนิทฺเทโส’’ติปิ อิจฺฉิตพฺพํ สิยา. जो लोग कहते हैं कि “वनप्पगुम्बे” प्रथमा विभक्ति के लिए सप्तमी विभक्ति का निर्देश है, उनसे कहना चाहिए - “यदि 'वनप्पगुम्बे' प्रथमा विभक्ति के लिए सप्तमी का निर्देश है, और ऐसा होने पर जैसे 'स्थाली में भात पकाता है' (थालियं ओदनं पचति) यहाँ आधार की प्रतीति होती है, तो 'ग्रीष्म ऋतु के महीनों में, प्रथम ग्रीष्म में' (गिम्हान मासे पठमस्मिं गिम्हे) यह किस अर्थ को प्रकाशित करता है?” वे कह सकते हैं - “हे महानुभाव! हम यह नहीं कहते कि 'वनप्पगुम्बे' यह सप्तमी विभक्ति है, बल्कि यह 'प्रथमा विभक्ति के लिए सप्तमी का निर्देश' है।” ऐसा होने पर भी आपका दोष ही है; क्या “हे गौतमी! संघ को दान दो” (संघे गोतमि देहि) यहाँ भी सम्प्रदान विभक्ति के लिए सप्तमी का निर्देश कहने पर, संघ के दान-क्रिया का आधार होने के कारण “संघे” शब्द सुनने वालों को आधार की प्रतीति और आधार की कल्पना होती ही है। इस प्रकार उत्पन्न चित्त को रोकना संभव नहीं है, इसलिए यहाँ यह विशेषता ग्रहण करनी चाहिए कि “प्रथमा विभक्ति का भी कहीं-कहीं सप्तमी विभक्ति के समान रूप होता है।” ऐसा मानने पर कोई विरोध नहीं होता। ऐसे स्थानों पर निरुक्ति-प्रभेद में कुशल और लोक पर अनुकम्पा करने वाले भगवान्, जब प्रथमा विभक्ति के द्वारा निर्देश करना चाहिए, तब वैसा निर्देश न करके लोक में सम्मोह (भ्रम) उत्पन्न करते हुए सप्तमी का निर्देश कैसे करेंगे? इसलिए शब्द की थोड़ी सी समानता मात्र को लेकर “सप्तमी का निर्देश” नहीं कहना चाहिए। यदि शब्द-समानता को लेकर सप्तमी का निर्देश चाहते हैं, तो “प्रथमा एकवचन के लिए द्वितीया बहुवचन का निर्देश” भी मानना पड़ेगा। อปิจ ตเถว ‘‘อตฺตกาเร’’ติ ปจฺจตฺตวจนสฺส ภุมฺมวจนนิทฺเทเส สติ อาธารสุติสมฺภวโต ‘‘อตฺตการสฺมึ กิญฺจิ วตฺถุ นตฺถี’’ติ อนธิปฺเปโต อตฺโถ สิยา, น ปน ‘‘อตฺตกาโร นตฺถี’’ติ อธิปฺเปโต อตฺโถ. ‘‘อุปโยคพหุวจนนิทฺเทโส’’ติ คหเณปิ อุปโยคตฺถสฺส นตฺถิสทฺเทน [Pg.167] อวตฺตพฺพตฺตา โทโสเยว สิยา, อตฺถิสทฺทาทีนํ วิย ปน นตฺถิสทฺทสฺสปิ ปฐมาย โยคโต ‘‘อตฺตกาเร’’ติ อิทํ ปจฺจตฺตวจนเมวาติ วิญฺญายติ. ‘‘พาเล จ ปณฺฑิเต จ สนฺธาวิตฺวา สํสริตฺวา ทุกฺขสฺสนฺตํ กริสฺสนฺตี’’ติ เอตฺถาปิ ปจฺจตฺตวจนสฺส ‘‘ภุมฺมวจนนิทฺเทโส’’ติ วา ‘‘อุปโยควจนนิทฺเทโส’’ติ วา คหเณ สติ ‘‘พาลา จ ปณฺฑิตา จา’’ติ เอตฺตกมฺปิ วตฺตุํ อชานนโทโส สิยา, ‘‘กริสฺสนฺตี’’ติ ปทโยคโต ปน ‘‘พาเล จา’’ติอาทิ ปจฺจตฺตวจนเมวาติ วิญฺญายติ. ยถา ปน นิคฺคหีตาคมวเสนุจฺจาริเต ‘‘จกฺขุํ อุทปาที’’ติ ปเท ปจฺจตฺตวจนสฺส ‘‘จกฺขุํ เม เทหิ ยาจิโต’’ติ เอตฺถ อุปโยควจเนน สุติวเสน สมานตฺเตปิ ปจฺจตฺตวจนตฺโถเยว โสตาเร ปฏิภาติ ‘‘อุทปาที’’ติอาขฺยาเตน กถิตตฺตา, น ปน วิภตฺติวิปลฺลาสตฺถภูโต อุปโยควจนตฺโถ ‘‘อุทปาที’’ติอาขฺยาเตน อวจนียตฺตา, ‘‘จกฺขุํ อุทปาที’’ติ หิ ภควตา วุตฺตกาเล โก ‘‘จกฺขุํ อุทปาที’’ติ ปทํ ปริวตฺติตฺวา อตฺถมาจิกฺขติ, ตถา ‘‘พาเล ปณฺฑิเต’’ติอาทีนมฺปิ ปจฺจตฺตวจนานํ อปเรหิ ‘‘พาเล ปณฺฑิเต’’ติอาทีหิ ภุมฺโมปโยควจเนหิ สุติวเสน สมานตฺเตปิ ปจฺจตฺตวจนตฺโถเยว โสตาเร ปฏิภาติ, น อิตรวจนตฺโถ ยถาปโยคํ อตฺถสฺส คเหตพฺพตฺตา. อิติ ‘‘วนปฺปคุมฺเพ, พาเล, ปณฺฑิเต’’ติอาทีนํ สุทฺธปจฺจตฺตวจนตฺตญฺเญว สารโต ปจฺเจตพฺพํ, น สุติสามญฺเญน ภุมฺโมปโยควจนตฺตํ. इसके अतिरिक्त, उसी प्रकार 'अत्तकारे' में प्रथमा विभक्ति के लिए सप्तमी का निर्देश होने पर, आधार की प्रतीति होने के कारण “स्वयं के कर्म (आत्मकार) में कोई वस्तु नहीं है” यह अनपेक्षित अर्थ होगा, न कि “स्वयं का कर्म नहीं है” यह अपेक्षित अर्थ। “द्वितीया बहुवचन का निर्देश” मानने पर भी, 'नत्थि' शब्द के साथ द्वितीया अर्थ का प्रयोग न हो पाने के कारण दोष ही होगा; किन्तु 'अत्थि' आदि शब्दों की तरह 'नत्थि' शब्द का भी प्रथमा के साथ योग होने से 'अत्तकारे' यह प्रथमा विभक्ति ही है, ऐसा जाना जाता है। “मूर्ख और विद्वान (बाले च पण्डिते च) दौड़कर और संसार में भटककर दुःख का अंत करेंगे” यहाँ भी प्रथमा विभक्ति के लिए “सप्तमी का निर्देश” या “द्वितीया का निर्देश” ग्रहण करने पर, “बाला च पण्डिता च” इतना भी कहना न जानने का दोष होगा; किन्तु 'करिस्सन्ति' (करेंगे) क्रिया के योग से 'बाले च' आदि प्रथमा विभक्ति ही है, ऐसा जाना जाता है। जैसे अनुस्वार के आगम के कारण उच्चारित 'चक्खुं उदापादि' (चक्षु उत्पन्न हुआ) पद में, प्रथमा विभक्ति का 'चक्खुं मे देहि' (मुझे चक्षु दो) यहाँ की द्वितीया विभक्ति के साथ श्रुति (सुनने) में समानता होने पर भी, 'उदापादि' इस आख्यात (क्रिया) के द्वारा कहे जाने के कारण सुनने वाले को प्रथमा विभक्ति का अर्थ ही प्रतीत होता है; न कि विभक्ति-विपर्यास वाला द्वितीया का अर्थ, क्योंकि 'उदापादि' क्रिया के द्वारा वह नहीं कहा जा सकता। जब भगवान् ने “चक्खुं उदापादि” कहा, तब कौन “चक्खुं उदापादि” पद को बदलकर अर्थ बताता है? उसी प्रकार “बाले पण्डिते” आदि प्रथमा विभक्तियों का अन्य “बाले पण्डिते” आदि सप्तमी और द्वितीया विभक्तियों के साथ श्रुति में समानता होने पर भी, प्रयोग के अनुसार अर्थ ग्रहण किए जाने के कारण सुनने वाले को प्रथमा विभक्ति का अर्थ ही प्रतीत होता है। इस प्रकार “वनप्पगुम्बे, बाले, पण्डिते” आदि को सार रूप में शुद्ध प्रथमा विभक्ति ही समझना चाहिए, न कि श्रुति की समानता के कारण सप्तमी या द्वितीया विभक्ति। ยํ ปนาจริเยน ชาตกฏฺฐกถายํ – जो आचार्य द्वारा जातक-अट्ठकथा में (कहा गया है) - ‘‘ตโย คิรึ ติอนฺตรํ กามยามิ,ปญฺจาลา กุรุโย เกกเก จ; ตตุตฺตรึ พฺราหฺมณ กามยามิ,ติกิจฺฉ มํ พฺราหฺมณ กามนีต’’นฺติ – “मैं तीन पर्वतों और तीन अन्तरालों की इच्छा करता हूँ, पांचाल, कुरु और केकक देशों की; हे ब्राह्मण! मैं उससे भी आगे की इच्छा करता हूँ, हे ब्राह्मण! काम-पीड़ित मेरा उपचार करें” - อิมสฺส [Pg.168] กามนีตชาตกสฺส สํวณฺณนายํ ‘‘เกกเก จาติ ปจฺจตฺเต อุปโยควจนํ, เตน เกกกสฺส รฏฺฐํ ทสฺเสตี’’ติ วุตฺตํ. เอวํ วทนฺโต จ โส ‘‘ปุริเส ปสฺสติ, ปุริเส ปติฏฺฐิต’’นฺติ, ‘‘ปสฺสามิ โลเก สธเน มนุสฺเส’’ติ จ อาทีสุ เยภุยฺเยน ‘‘ปุริเส, โลเก, สธเน, มนุสฺเส’’ติอาทีนํ อุปโยคพหุวจนภุมฺเมกวจนภาเวน อาคตตฺตา ปจฺจตฺเตกวจนพหุวจนภาวสฺส ปน อปากฏตฺตา เยภุยฺยปฺปวตฺตึ สนฺธาย ‘‘อิทมฺปิ ตาทิสเมวา’’ติ มญฺญมาโน วทติ มญฺเญ. อาจริยา หิ กตฺถจิ อตฺตโน รุจิยาปิ วิสุํ วิสุํ กเถนฺติ. อยํ ปน อมฺหากํ รุจิ – ‘‘เกกเก’’ติ อิทํ ปจฺจตฺตวจนเมว ‘‘ปญฺจาลา, กุรุโย’’ติ สหชาตปทานิ วิย, รฏฺฐวาจกตฺตา ปน ‘‘กุรุโย’’ติ ปทมิว พหุวจนวเสน วุตฺตํ. น หิ ภควา ‘‘ขตฺติโย, พฺราหฺมโณ, เวสฺโส’’ติอาทีสุ วิย สมานวิภตฺตีหิ นิทฺทิสิตพฺเพสุ สหชาตปเทสุ ปจฺฉิมํ อุปโยควจนวเสน นิทฺทิเสยฺย, ยุตฺติ จ น ทิสฺสติ ‘‘ปญฺจาลา’’ติ, ‘‘กุรุโย’’ติ ปจฺจตฺตวจนํ วตฺวา ‘‘เกกเก’’ติ อุปโยควจนสฺส วจเน, ตสฺมา ‘‘เกกเก’’ติ อิทํ ปจฺจตฺตวจนเมว. ตถา หิ สนฺธิวิโสธนวิธายโก อาจริโย ตาทิสานํ ปทานํ ปจฺจตฺตวจนตฺตญฺเญว วิภาเวนฺโต สามํ กเต ปกรเณ ‘‘วนปฺปคุมฺโพ วนปฺปคุมฺเพ, สุขํ ทุกฺขํ ชีโว, สุเข ทุกฺเข ชีเว’’ติ อาห, ฏีกายมฺปิ จ เตสํ ปจฺจตฺตวจนภาวเมว วิภาเวนฺโต ‘‘วนปฺปคุมฺโพ, สุขํ, ทุกฺขํ, ชีโว’’ติ สาธนียํ รูปํ ปติฏฺฐเปตฺวา นิคฺคหีตโลปวเสน อกาโรการานญฺจ เอการาเทสวเสน ‘‘วนปฺปคุมฺเพ, สุเข, ทุกฺเข, ชีเว’’ติ รูปนิปฺผตฺติมาห. สา ปาฬินยานุ กูลา. กจฺจายนาจริเยนปิ ปาฬินยํ นิสฺสาย ‘‘ทฺวิปเท ตุลฺยาธิกรเณ’’ติ ปจฺจตฺตพหุวจนปทํ วุตฺตํ. เตนาห วุตฺติยํ ‘‘ทฺเว ปทานิ ตุลฺยาธิกรณานี’’ติ. ‘‘ทฺวิปเท ตุลฺยาธิกรเณ’’ติ [Pg.169] จ อิทํ ‘‘อฏฺฐ นาคาวาสสตานี’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘อฏฺฐ นาคาวาสสเต’’ติ ปทมิว วุจฺจตีติ ทฏฺฐพฺพํ. इस कामनीत जातक की व्याख्या में 'केकके' (kekake) के विषय में कहा गया है कि यह प्रथमा विभक्ति (paccatta) के स्थान पर द्वितीया विभक्ति (upayogavacana) का प्रयोग है, जिससे केकक राज्य का बोध होता है। ऐसा कहते हुए वह 'पुरिसे पस्सति' (purise passati), 'पुरिसे पतिट्ठितं' (purise patiṭṭhitaṃ) और 'पस्सामि लोके सधने मनुस्से' (passāmi loke sadhane manusse) आदि में प्रायः 'पुरिसे, लोके, सधने, मनुस्से' आदि के द्वितीया बहुवचन और सप्तमी एकवचन के रूप में आने के कारण, प्रथमा एकवचन और बहुवचन के रूप के स्पष्ट न होने से, सामान्य प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए 'यह भी वैसा ही है' ऐसा मानकर कहता है। आचार्य कहीं-कहीं अपनी रुचि के अनुसार भी अलग-अलग व्याख्या करते हैं। किन्तु हमारी रुचि (मत) यह है - 'केकके' यह प्रथमा विभक्ति ही है, जैसे 'पञ्चाला, कुरुयो' (pañcālā, kuruyo) सहजात पद हैं, राज्य का वाचक होने के कारण 'कुरुयो' पद की भाँति बहुवचन में कहा गया है। क्योंकि भगवान 'खत्तियो, ब्राह्मणो, वेस्सो' आदि की भाँति समान विभक्तियों द्वारा निर्दिष्ट किए जाने वाले सहजात पदों में पिछले पद को द्वितीया विभक्ति के रूप में निर्दिष्ट नहीं करेंगे, और 'पञ्चाला' तथा 'कुरुयो' को प्रथमा विभक्ति में कहकर 'केकके' को द्वितीया विभक्ति में कहने का कोई तर्क भी नहीं दिखता, इसलिए 'केकके' यह प्रथमा विभक्ति ही है। इसी प्रकार सन्धि-विशोधन करने वाले आचार्य ने उस प्रकार के पदों को प्रथमा विभक्ति के रूप में ही स्पष्ट करते हुए स्वयं रचित प्रकरण में 'वनप्पगुम्बो वनप्पगुम्बे, सुखं दुक्खं जीवो, सुखे दुक्खे जीवे' ऐसा कहा है। टीका में भी उनके प्रथमा विभक्ति होने को ही स्पष्ट करते हुए 'वनप्पगुम्बो, सुखं, दुक्खं, जीवो' इस सिद्ध रूप को स्थापित कर, निग्गहीत (अनुस्वार) के लोप और 'अ'कार एवं 'ओ'कार के स्थान पर 'ए'कार आदेश होने से 'वनप्पगुम्बे, सुखे, दुक्खे, जीवे' इस रूप की निष्पत्ति कही है। वह पालि पद्धति के अनुकूल है। आचार्य कच्चायन ने भी पालि पद्धति का आश्रय लेकर 'द्विपदे तुल्याधिकरणे' (dvipade tulyādhikaraṇe) यह प्रथमा बहुवचन का पद कहा है। इसीलिए वृत्ति में कहा है - 'द्वे पदानि तुल्याधिकरणानि' (dve padāni tulyādhikaraṇāni)। और 'द्विपदे तुल्याधिकरणे' इसे 'अट्ठ नागवासासतानि' (aṭṭha nāgāvāsasatāni) कहने के स्थान पर 'अट्ठ नागवासासतें' (aṭṭha nāgāvāsasate) पद की भाँति कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। เกจิ ปน เตสํ ภุมฺเมกวจนตฺตํ อิจฺฉนฺติ. ตตฺถ ยทิ ‘‘วนปฺปคุมฺเพ’’ติ ปจฺจตฺเต ภุมฺมวจนํ, ‘‘เกกเก’’ติ จ ปจฺจตฺเต อุปโยควจนํ, ‘‘เอเสเส เอเก เอกฏฺเฐ’’ติ เอตฺถ ‘‘เอเสเส’’ติ อิมานิปิ ปจฺจตฺเต ภุมฺมวจนานิ วา สิยุํ, อุปโยควจนานิ วา. ยเถตานิ เอวํวิธานิ น โหนฺติ, สุทฺธปจฺจตฺตวจนานิเยว โหนฺติ, ตถา ‘‘วนปฺปคุมฺเพ, เกกเก’’ติอาทีนิปิ ตถาวิธานิ น โหนฺติ, สุทฺธปจฺจตฺตวจนานิเยว โหนฺติ. อิจฺเจวํ สพฺพถาปิ ‘‘วนปฺปคุมฺเพ, พาเล, ปณฺฑิเต, เกกเก’’ติ, ‘‘วิรตฺเต โกสิยายเน, อฏฺฐ นาคาวาสสเต, เก ปุริเส, เอเสเส’’ติ เอวมาทีนํ อเนเกสํ ปุริสลิงฺคอิตฺถิลิงฺคนปุํสกลิงฺคสพฺพนามเอกวจนอเนกวจนวเสน สาสนวเร ฐิตานํ ปทานํ นิปฺผตฺติ ปจฺจตฺเตกวจนปุถุวจนานเมการาเทสวเสเนว ภวตีติ อวสฺสมิทํ สมฺปฏิจฺฉิตพฺพํ. เอวํ ‘‘วนปฺปคุมฺเพ, พาเล, ปณฺฑิเต’’ติอาทีนํ สุทฺธปจฺจตฺตวจนตา อตีว สุขุมา ทุพฺพิญฺเญยฺยา, สทฺเธน กุลปุตฺเตน อาจริเย ปยิรุปาสิตฺวา ตทุปเทสํ สกฺกจฺจํ คเหตฺวา ชานิตพฺพา. พุทฺธวจนสฺมิญฺหิ สทฺทโต จ อตฺถโต จ อธิปฺปายโต จ อกฺขรจินฺตกานํ ญาณจกฺขุสมฺมุยฺหนฏฺฐานภูตา ปาฬินยา วิวิธา ทิสฺสนฺติ. कुछ लोग उन्हें सप्तमी एकवचन (bhummekavacana) मानते हैं। वहाँ यदि 'वनप्पगुम्बे' प्रथमा के स्थान पर सप्तमी विभक्ति है, और 'केकके' प्रथमा के स्थान पर द्वितीया विभक्ति है, तो 'एसेसे एके एकट्ठे' (esese eke ekaṭṭhe) यहाँ 'एसेसे' ये भी प्रथमा के स्थान पर या तो सप्तमी विभक्ति होंगे या द्वितीया विभक्ति। जैसे ये इस प्रकार के नहीं हैं, अपितु शुद्ध प्रथमा विभक्ति ही हैं, वैसे ही 'वनप्पगुम्बे, केकके' आदि भी उस प्रकार के नहीं हैं, अपितु शुद्ध प्रथमा विभक्ति ही हैं। इस प्रकार सर्वथा 'वनप्पगुम्बे, बाले, पण्डिते, केकके', 'विरत्ते कोसियायने, अट्ठ नागवासासतें, के पुरिसे, एसेसे' इत्यादि अनेक पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसक लिंग, सर्वनाम, एकवचन और बहुवचन के रूप में श्रेष्ठ शासन में स्थित पदों की निष्पत्ति प्रथमा एकवचन और बहुवचन के स्थान पर 'ए'कार आदेश होने से ही होती है, यह अवश्य स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार 'वनप्पगुम्बे, बाले, पण्डिते' आदि की शुद्ध प्रथमा विभक्ति होना अत्यंत सूक्ष्म और कठिनता से समझने योग्य है, जिसे श्रद्धावान कुलपुत्र को आचार्य की सेवा कर उनके उपदेश को आदरपूर्वक ग्रहण करके जानना चाहिए। क्योंकि बुद्धवचन में शब्द, अर्थ और अभिप्राय की दृष्टि से व्याकरणविदों के ज्ञान-चक्षु को भ्रमित करने वाले विविध पालि-नय दिखाई देते हैं। ตตฺถ สทฺทโต ตาว อิทํ สมฺมุยฺหนฏฺฐานํ – ‘‘วิรตฺตา โกสิยายนี’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘วิรตฺเต โกสิยายเน’’ติ อิตฺถิลิงฺคปจฺจตฺตวจนํ ทิสฺสติ, ‘‘โก ปุริโส’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘เก ปุริเส’’ติ สพฺพนามิกปจฺจตฺตวจนํ ทิสฺสติ, ‘‘กินฺนาโม เต อุปชฺฌาโย’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘โกนาโม เต อุปชฺฌาโย’’ติ สมาสปทํ ปุลฺลิงฺควิสยํ ทิสฺสติ. กึ นามํ เอตสฺสาติ [Pg.170] โกนาโมติ หิ สมาโส. เตน ‘‘โกนามา อิตฺถี, โกนามํ กุล’’นฺติ อยมฺปิ นโย คเหตพฺโพ. ‘‘กฺว เต พลํ มหาราชา’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘โก เต พลํ มหาราชา’’ติ เอตฺถ กฺวสทฺเทน อีสกํ สมานสุติโก สตฺตมิยนฺโต โกสทฺโท ทิสฺสติ, กฺว โกสทฺทา หิ อญฺญมญฺญมีสกสมานสุติกา. ตถา ‘‘อิธ เหมนฺตคิมฺเหสุ, อิธ เหมนฺตคิมฺหิสุ, น เตนตฺถํ อพนฺธิ โส, น เตนตฺถํ อพนฺธิสู’’ติ อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. वहाँ शब्द की दृष्टि से भ्रम का स्थान यह है - जहाँ 'विरत्ता कोसियायनी' (virattā kosiyāyanī) कहना चाहिए, वहाँ 'विरत्ते कोसियायने' (viratte kosiyāyane) यह स्त्रीलिंग प्रथमा विभक्ति दिखाई देती है; जहाँ 'को पुरिसो' (ko puriso) कहना चाहिए, वहाँ 'के पुरिसे' (ke purise) यह सर्वनामयुक्त प्रथमा विभक्ति दिखाई देती है; जहाँ 'किन्नामो ते उपज्झायो' (kinnāmo te upajjhāyo) कहना चाहिए, वहाँ 'कोनामो ते उपज्झायो' (konāmo te upajjhāyo) यह पुल्लिंग विषयक समास पद दिखाई देता है। 'इसका क्या नाम है' (kiṃ nāmaṃ etassa) इस विग्रह में 'कोनामो' (konāmo) यह समास है। उससे 'कोनामा इत्थी, कोनामं कुलं' यह पद्धति भी ग्रहण करनी चाहिए। 'हे महाराज, तुम्हारा बल कहाँ है' (kva te balaṃ mahārājā) ऐसा कहने के स्थान पर 'को ते बलं महाराजा' यहाँ 'क्व' (kva) शब्द के साथ थोड़ी समान ध्वनि वाला सप्तमी विभक्ति का 'को' (ko) शब्द दिखाई देता है, क्योंकि 'क्व' और 'को' शब्द एक-दूसरे के साथ थोड़ी समान ध्वनि वाले हैं। इसी प्रकार 'इध हेमन्तगिम्हेसु, इध हेमन्तगिम्हिसु, न तेनत्थं अबन्धि सो, न तेनत्थं अबन्धिसु' आदि अन्य उदाहरणों को भी जोड़ना चाहिए। อตฺถโต ปน อิทํ สมฺมุยฺหนฏฺฐานํ – ‘‘ยํ น กญฺจนทฺเวปิญฺฉ, อนฺเธน ตมสา คต’’นฺติ เอตฺถ นกาโร ‘‘กต’’นฺติ อิมินา สมฺพนฺธิตพฺโพ. น กตนฺติ กตํ วิยาติ อตฺโถ. เอตฺถ หิ นกาโร อุปมาเน วตฺตติ, น ปฏิเสเธ. अर्थ की दृष्टि से भ्रम का स्थान यह है - 'यं न कञ्चनद्वेपिञ्छ, अन्धेन तमसा गतं' यहाँ 'न' कार को 'कतं' (kataṃ) इसके साथ जोड़ना चाहिए। 'न कतं' का अर्थ 'कतं विय' (किए हुए के समान) है। यहाँ 'न' कार उपमान के अर्थ में प्रयुक्त है, निषेध के अर्थ में नहीं। ‘‘อสฺสทฺโธ อกตญฺญู จ,สนฺธิจฺเฉโท จ โย นโร; หตาวกาโส วนฺตาโส,ส เว อุตฺตมโปริโส’’ติ "जो मनुष्य अश्रद्ध (अंधविश्वासी नहीं), अकृतज्ञ (निर्वाण को जानने वाला), संधिच्छेदक (पुनर्जन्म की कड़ियों को तोड़ने वाला), हतावकाश (कर्म के अवसरों को नष्ट करने वाला) और वन्तास (तृष्णा का त्याग करने वाला) है, वही वास्तव में उत्तम पुरुष है।" เอวมาทีนิปิ อญฺญานิ โยเชตพฺพานิ. इसी प्रकार अन्य उदाहरणों को भी जोड़ना चाहिए। อธิปฺปายโต อิทํ สมฺมุยฺหนฏฺฐานํ – ‘‘ตณฺหํ อสฺมิมานํ สสฺสตุจฺเฉททิฏฺฐิโย ทฺวาทสายตนนิสฺสิตํ นนฺทิราคญฺจ หนฺตฺวา พฺราหฺมโณ อนีโฆ ยาตี’’ติ วตฺตพฺเพปิ ตถา อวตฺวา ตเมวตฺถํ คเหตฺวา อญฺเญน ปริยาเยน अभिप्राय की दृष्टि से यह सम्मोह (भ्रम) का स्थान है - 'तृष्णा, अस्मिमान, शाश्वत और उच्छेद दृष्टियों तथा बारह आयतनों पर आश्रित नन्दिराग को मारकर ब्राह्मण दुखरहित होकर जाता है' - ऐसा कहे जाने योग्य होने पर भी, वैसा न कहकर उसी अर्थ को ग्रहण कर अन्य पर्याय (विधि) से... ‘‘มาตรํ ปิตรํ หนฺตฺวา, ราชาโน ทฺเว จ ขตฺติเย; รฏฺฐํ สานุจรํ หนฺตฺวา, อนีโฆ ยาติ พฺราหฺมโณ’’ติ 'माता और पिता को मारकर, और दो क्षत्रिय राजाओं को मारकर; अनुचरों सहित राष्ट्र को मारकर, ब्राह्मण दुखरहित होकर जाता है'। วุตฺตํ. कहा गया है। ‘‘วนํ [Pg.171] ฉินฺทถ มา รุกฺขํ, วนโต ชายเต ภยํ; เฉตฺวา วนญฺจ วนถํ, นิพฺพนา โหถ ภิกฺขโว’’ติ 'वन को काटो, वृक्ष को नहीं; वन से भय उत्पन्न होता है। वन और वनथ (तृष्णा रूपी झाड़ियों) को काटकर, हे भिक्षुओं! तुम निर्वन (तृष्णारहित) हो जाओ'। เอวมาทีนิปิ อญฺญานิ โยเชตพฺพานิ. เอวํ พุทฺธวจเน สทฺทโต จ อตฺถโต จ อธิปฺปายโต จ อกฺขรจินฺตกานํ ญาณจกฺขุสมฺมุยฺหนฏฺฐานภูตา ปาฬินยา วิวิธา ทิสฺสนฺติ. ยถาห – इसी प्रकार अन्य उदाहरणों को भी जोड़ना चाहिए। इस प्रकार बुद्धवचन में शब्द से, अर्थ से और अभिप्राय से अक्षर-चिन्तकों (व्याकरणविदों) के ज्ञान-चक्षु के लिए सम्मोह के स्थान बने हुए विविध पालि-नय (पद्धतियाँ) दिखाई देते हैं। जैसा कि कहा गया है - ‘‘ชานนฺตา อปิ สทฺทสตฺถมขิลํ มุยฺหนฺติ ปาฐกฺกเม,เยภุยฺเยน หิ โลกนีติวิธุรา ปาเฐ นยา วิชฺชเร; ปณฺฑิจฺจมฺปิ ปหาย พาหิรคตํ เอตฺเถว ตสฺมา พุโธ,สิกฺเขยฺยามลธมฺมสาครตเร นิพฺพานติตฺถูปเค’’ติ. 'सम्पूर्ण शब्द-शास्त्र (व्याकरण) को जानते हुए भी लोग पाठ-क्रम में मोहित (भ्रमित) हो जाते हैं, क्योंकि पाठ में प्रायः लोक-नीति (लौकिक व्याकरण) से विपरीत नय (पद्धतियाँ) विद्यमान होते हैं; इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति बाहरी पाण्डित्य को छोड़कर, निर्वाण-तीर्थ तक पहुँचाने वाले इस निर्मल धर्म-सागर को पार करने के लिए यहीं शिक्षा ग्रहण करे'। เอวํ ปาฬินยานํ ทุพฺพิญฺเญยฺยตฺตา ‘‘วนปฺปคุมฺเพ, พาเล จ, ปณฺฑิเต จา’’ติอาทีนํ สุทฺธปจฺจตฺตวจนตฺตญฺเญว สารโต ปจฺเจตพฺพํ, น สุติสามญฺเญน ภุมฺโมปโยควจนตฺตํ ภุมฺโมปโยควจเนหิ เตสํ สมานสุติกตฺเตปิ ปจฺจตฺตโชตกตฺตา. สมานสุติกาปิ หิ สทฺทา อตฺถปฺปกรณลิงฺคสทฺทนฺตราภิสมฺพนฺธาทิวเสน อตฺถวิเสสโชตกา ภวนฺติ. ตํ ยถา? ‘‘สีโห คายตี’’ติ วุตฺเต ‘‘เอวํนามโก ปุริโส’’ติ อตฺโถ วิญฺญายติ. ‘‘สีโห นงฺคุฏฺฐํ จาเลตี’’ติ วุตฺเต ปน ‘‘มิคราชา’’ติ วิญฺญายติ. เอวํ อตฺถวเสน สมานสุติกานํ อตฺถวิเสสโชตนํ ภวติ. สงฺคาเม ฐตฺวา ‘‘สินฺธวมาเนหี’’ติ วุตฺเต ‘‘อสฺโส’’ติ วิญฺญายติ. โรคิสาลายํ ปน ‘‘สินฺธวมาเนหี’’ติ วุตฺเต ‘‘ลวณ’’นฺติ วิญฺญายติ. เอวํ ปกรณวเสน สมานสุติกานํ อตฺถวิเสสโชตนํ ภวติ. ‘‘อิสฺสา’’ติ วุตฺเต ‘‘เอวํนามิกา ธมฺมชาตี’’ติ วิญฺญายติ. ‘‘อิสฺโส’’ติ วุตฺเต ปน ‘‘อจฺฉมิโค’’ติ วิญฺญายติ. เอวํ ลิงฺควเสน เอกเทสสมานสุติกานํ อตฺถวิเสสโชตนํ ภวติ. เอตฺถ ปน กิญฺจาปิ ‘‘เทวทตฺตํ ปกฺโกส ฆฏธารกํ [Pg.172] ทณฺฑธารก’’นฺติอาทีสุปิ ฆฏทณฺฑาทีนิ ลิงฺคํ, ตถาปิ สมานสุติกาธิการตฺตา น ตํ อิธาธิปฺเปตํ. इस प्रकार पालि-नयों के दुर्विज्ञेय होने के कारण 'वनप्पगुम्बे', 'बाले च', 'पण्डिते च' आदि को शुद्ध प्रथमा विभक्ति के वचन के रूप में ही सारतः स्वीकार करना चाहिए, न कि श्रुति-साम्य से सप्तमी या द्वितीया विभक्ति के वचन के रूप में, क्योंकि सप्तमी और द्वितीया के वचनों के साथ उनकी समान ध्वनि होने पर भी वे प्रथमा विभक्ति के ही द्योतक हैं। समान ध्वनि वाले शब्द भी अर्थ, प्रकरण, लिंग और अन्य शब्दों के सम्बन्ध आदि के वश से अर्थ-विशेष के द्योतक होते हैं। वह कैसे? जैसे 'सीहो गायति' कहने पर 'इस नाम का पुरुष' यह अर्थ समझा जाता है। 'सीहो नङ्गुट्ठं चालेति' कहने पर 'मृगराज' समझा जाता है। इस प्रकार अर्थ के वश से समान ध्वनि वाले शब्दों का अर्थ-विशेष द्योतन होता है। युद्ध में खड़े होकर 'सिन्धवमानेहि' कहने पर 'घोड़ा' समझा जाता है। रोगीशाला में 'सिन्धवमानेहि' कहने पर 'नमक' समझा जाता है। इस प्रकार प्रकरण के वश से समान ध्वनि वाले शब्दों का अर्थ-विशेष द्योतन होता है। 'इस्सा' कहने पर 'इस नाम की धर्म-जाति' (ईर्ष्या) समझी जाती है। 'इस्सो' कहने पर 'रीछ' समझा जाता है। इस प्रकार लिंग के वश से एक-देश-समान ध्वनि वाले शब्दों का अर्थ-विशेष द्योतन होता है। यहाँ यद्यपि 'देवदत्तं पक्कोस घटधारकं दण्डधारकं' आदि में भी घड़ा, दण्ड आदि लिंग (चिह्न) हैं, तथापि समान ध्वनि के अधिकार (प्रकरण) के कारण वह यहाँ अभिप्रेत नहीं है। ‘‘อิสฺสา อุปฺปชฺชตี’’ติ จ ‘‘อิสฺสา ปุริสมนุพนฺธึสู’’ติ จ วุตฺเต ปน สพฺพถา สมานสุติกานํ สทฺทนฺตราภิสมฺพนฺธวเสน ยถาวุตฺตอตฺถวิเสสโชตนํ ภวติ. ตถา ‘‘สีโห ภิกฺขเว มิคราชา สายนฺหสมยํ อาสยา นิกฺขมตี’’ติ วุตฺเต ‘‘มิคาธิโป เกสรสีโห’’ติ วิญฺญายติ. ‘‘สีโห สมณุทฺเทโส, สีโห เสนาปตี’’ติ จ วุตฺเต ปน ‘‘สีโห นาม สามเณโร, สีโห นาม เสนาปตี’’ติ วิญฺญายติ. เอวมฺปิ สทฺทนฺตราภิสมฺพนฺธวเสน สมานสุติกานํ อตฺถวิเสสโชตนํ ภวติ. ‘‘อทฺทสํสุ โข ฉพฺพคฺคิยา ภิกฺขู สตฺตรสวคฺคิเย ภิกฺขู วิหารํ ปฏิสงฺขโรนฺเต’’ติ เอวมฺปิ สทฺทนฺตราภิสมฺพนฺธวเสน สมานสุติกานํ ปจฺจตฺโตปโยคตฺถสงฺขาตอตฺถวิเสสโชตนํ ภวติ. ตถา ‘‘สิญฺจ ภิกฺขุ อิมํ นาวํ, อญฺญตโร ภิกฺขุ ภควนฺตํ เอตทโวจา’’ติ เอวมฺปิ สทฺทนฺตราภิสมฺพนฺธวเสน สมานสุติกานํ อาลปนตฺถปจฺจตฺตตฺถสงฺขาตอตฺถวิเสสโชตนํ ภวติ, ตสฺมา ‘‘วนปฺปคุมฺเพ ยถ ผุสฺสิตคฺเค’’ติอาทีนิ ภุมฺโมปโยควจเนหิ สทิสตฺเตปิสทฺทนฺตราภิสมฺพนฺธวเสน สุทฺธปจฺจตฺตวจนานีติ คเหตพฺพานิ. ปจฺจตฺเตกวจนพหุวจนานํ เอว หิ เอการาเทสวเสน เอวํวิธานิ รูปานิ ภวนฺติ ภุมฺโมปโยควจนานิ วิยาติ. นนุ จ โภ เอวํวิธานํ รูปานํ ปาฬิยํ ทิสฺสนโต ‘เอการนฺตมฺปิ ปุลฺลิงฺคํ อตฺถี’ติ วตฺตพฺพนฺติ? น วตฺตพฺพํ, โอการนฺตภาโวคธรูปวิเสสตฺตา เตสํ รูปานํ. อาเทสวเสน หิ สิทฺธตฺตา วิสุํ เอการนฺตปุลฺลิงฺคํ นาม นตฺถิ, ตสฺมา ปุลฺลิงฺคานํ ยถาวุตฺตสตฺตวิธตาเยว คเหตพฺพาติ. 'इस्सा उप्पज्जति' और 'इस्सा पुरिसमनुबन्धिंसु' कहने पर सर्वथा समान ध्वनि वाले शब्दों का अन्य शब्दों के सम्बन्ध के वश से यथोक्त अर्थ-विशेष का द्योतन होता है। वैसे ही 'भिक्षुओं! मृगराज सिंह सायंकाल अपने निवास से निकलता है' कहने पर 'मृगाधिपति केसर-सिंह' समझा जाता है। 'सीहो समणुद्देसो, सीहो सेनापती' कहने पर 'सिंह नामक श्रमणेर, सिंह नामक सेनापति' समझा जाता है। इस प्रकार भी अन्य शब्दों के सम्बन्ध के वश से समान ध्वनि वाले शब्दों का अर्थ-विशेष द्योतन होता है। 'अद्दसं सु खो छब्बग्गिया भिक्खू सत्तरसवग्गिये भिक्खू विहारं पटिसङ्खरोन्ते' - यहाँ भी अन्य शब्दों के सम्बन्ध के वश से समान ध्वनि वाले शब्दों का प्रथमा और द्वितीया अर्थ के रूप में कहे गए अर्थ-विशेष का द्योतन होता है। वैसे ही 'सिञ्च भिक्खु इमं नावं, अञ्ञतरो भिक्खु भगवन्तं एतदवोच' - यहाँ भी अन्य शब्दों के सम्बन्ध के वश से समान ध्वनि वाले शब्दों का सम्बोधन और प्रथमा अर्थ के रूप में कहे गए अर्थ-विशेष का द्योतन होता है, इसलिए 'वनप्पगुम्बे यथा फुस्सितग्गे' आदि को सप्तमी और द्वितीया वचनों के समान होने पर भी अन्य शब्दों के सम्बन्ध के वश से शुद्ध प्रथमा विभक्ति के वचन ही समझना चाहिए। प्रथमा विभक्ति के एकवचन और बहुवचन के ही 'ए' कार आदेश के वश से सप्तमी और द्वितीया वचनों की तरह इस प्रकार के रूप होते हैं। हे महाशय! पालि में इस प्रकार के रूप दिखने के कारण 'ए-कारान्त पुल्लिंग भी होता है' ऐसा कहना चाहिए? नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वे रूप 'ओ-कारान्त' भाव को समाहित करने वाले विशेष रूप हैं। आदेश के वश से सिद्ध होने के कारण अलग से 'ए-कारान्त पुल्लिंग' नाम की कोई चीज़ नहीं है, इसलिए पुल्लिंगों की यथोक्त सात प्रकार की अवस्था ही ग्रहण करनी चाहिए। เกจิ [Pg.173] ปน วเทยฺยุํ ‘‘ยายํ ปุริสสทฺทนยํ คเหตฺวา ‘ภูโต, ภูตา. ภูต’นฺติอาทินา สพฺเพสโมการนฺตปทานํ นามิกปทมาลา วิภตฺตา, ตตฺถ จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสสหิตานิ รูปานิ กิมตฺถํ น วุตฺตานี’’ติ? วิเสสทสฺสนตฺถํ. ตาทิสานิ หิ จตุตฺเถกวจนรูปานิ ปาฬินเย โปราณฏฺฐกถานเย จ อุปปริกฺขิยมาเน ‘‘คตฺยตฺถกมฺมนิ, นยนตฺถกมฺมนิ, วิภตฺติวิปริณาเม, ตทตฺเถ จา’’ติ สงฺเขปโต อิเมสุ จตูสุเยว ฐาเนสุ, ปเภทโต ปน สตฺตสุ ฐาเนสุ ทิสฺสนฺติ. ทานโรจนธารณนโมโยคาทิเภเท ปน ยตฺถ กตฺถจิ สมฺปทานวิสเย น ทิสฺสนฺติ, อิติ อิมํ วิเสสํ ทสฺเสตุํ น วุตฺตานีติ. นนุ ทานกฺริยาโยเค ‘‘อภิรูปาย กญฺญา เทยฺยา’’ติ จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสสหิตรูปทสฺสนโต อิมสฺมิมฺปิ สทฺทนีติปฺปกรเณ ‘‘ปุริสาย, ภูตายา’’ติอาทีนิ วตฺตพฺพานิ, เอวํ สนฺเต กสฺมา ‘‘ทานโรจนธารณนโมโยคาทิเภเท ปน ยตฺถ กตฺถจิ สมฺปทานวิสเย น ทิสฺสนฺตี’’ติ วุตฺตนฺติ? อปาฬินยตฺตา. ‘‘อภิรูปาย กญฺญา เทยฺยา’’ติ อยญฺหิ สทฺทสตฺถโต อาคโต นโย, น พุทฺธวจนโต. พุทฺธวจนญฺหิ ปตฺวา ‘‘อภิรูปสฺส กญฺญา เทยฺยา’’ติ ปทรูปํ ภวิสฺสตีติ. นนุ จ โภ นโมโยคาทีสุปิ จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทโส ทิสฺสตีติ. สาสนาวจราปิ หิ นิปุณา ปณฺฑิตา ‘‘นโม พุทฺธายา’’ติอาทีนิ วตฺวา รตนตฺตยํ วนฺทนฺติ. เกจิ ปน – किन्तु कुछ लोग कह सकते हैं कि 'इस पुरुष-शब्द-नय को ग्रहण कर 'भूतः, भूताः, भूतम्' इत्यादि के द्वारा सभी अकारान्त पदों की नामिक पदमाला विभक्त की गई है, तो वहाँ चतुर्थी एकवचन के 'आय' आदेश सहित रूपों को किसलिए नहीं कहा गया?' विशेष दिखाने के लिए। क्योंकि वैसे चतुर्थी एकवचन के रूप पालि-नय और प्राचीन अट्ठकथा-नय में विचार करने पर 'गत्यर्थक कर्म में, नयनार्थक कर्म में, विभक्ति-विपरिणाम में, और तदर्थ में' - संक्षेप में इन चार ही स्थानों पर, और विस्तार से सात स्थानों पर दिखाई देते हैं। दान, रोचन, धारण, नमः-योग आदि भेदों में जहाँ कहीं भी सम्प्रदान के विषय में वे नहीं दिखाई देते, इसलिए इस विशेष को दिखाने के लिए वे नहीं कहे गए। क्या दान-क्रिया के योग में 'अभिरूपाय कञ्ञा देय्या' (सुन्दर कन्या दी जानी चाहिए) - यहाँ चतुर्थी एकवचन के 'आय' आदेश सहित रूप के देखे जाने से इस सद्दनीति-प्रकरण में भी 'पुरिसाय, भूताय' इत्यादि कहना चाहिए? ऐसा होने पर 'दान, रोचन, धारण, नमः-योग आदि भेदों में जहाँ कहीं भी सम्प्रदान के विषय में नहीं दिखाई देते' - ऐसा क्यों कहा गया? अपालि-नय होने के कारण। 'अभिरूपाय कञ्ञा देय्या' - यह शब्द-शास्त्र (व्याकरण) से आया हुआ नय है, बुद्धवचन से नहीं। बुद्धवचन को प्राप्त होने पर 'अभिरूपस्स कञ्ञा देय्या' - ऐसा पद-रूप होगा। क्या, हे महाशय! नमः-योग आदि में भी चतुर्थी एकवचन का 'आय' आदेश देखा जाता है? शासन में रहने वाले निपुण पण्डित भी 'नमो बुद्धाय' इत्यादि कहकर रत्नत्रय की वन्दना करते हैं। कुछ तो - ‘‘นโม พุทฺธาย พุทฺธสฺส,นโม ธมฺมาย ธมฺมิโน; นโม สงฺฆาย สงฺฆสฺส,นโมกาเรน โสตฺถิ เม’’ติ จ, 'बुद्ध के लिए (बुद्धाय) और बुद्ध का (बुद्धस्स) नमस्कार हो, धर्म के लिए (धम्माय) और धर्मी (धम्मिनो) का नमस्कार हो; संघ के लिए (संघाय) और संघ का (संघस्स) नमस्कार हो, इस नमस्कार से मेरा कल्याण हो' - ऐसा भी, ‘‘มุเข [Pg.174] สรสิ สมฺผุลฺเล, นยนุปฺปลปงฺกเช; ปาทปงฺกชปูชาย, พุทฺธาย สตตํ ทเท’’ติ จ, 'मुख रूपी विकसित सरोवर में, नेत्र रूपी उत्पल-कमल में; पाद-कमल की पूजा के लिए, बुद्ध को (बुद्धाय) सतत दान दूँ' - ऐसा भी, ‘‘นโร นรํ ยาจติ กิญฺจิ วตฺถุํ, นเรน ทูโต ปหิโต นรายา’’ติ จ คาถารจนมฺปิ กุพฺพนฺตีติ? สจฺจํ, สาสนาวจราปิ นิปุณา ปณฺฑิตา ‘‘นโม พุทฺธายา’’ติอาทีนิวตฺวา รตนตฺตยํ วนฺทนฺติ, คาถารจนมฺปิ กุพฺพนฺติ, เอวํ สนฺเตปิ เต สทฺทสตฺเถ กตปริจยวเสน สทฺทสตฺถโต นยํ คเหตฺวา ตถารูปา คาถาปิ จุณฺณิยปทานิปิ อภิสงฺขโรนฺติ, ‘‘นโม พุทฺธายา’’ติอาทีนิ วตฺวา รตนตฺตยํ วนฺทนฺติ. เย ปน สทฺทสตฺเถ อกตปริจยา อนฺตมโส พาลทารกา, เตปิ อญฺเญสํ วจนํ สุตฺวา กตปริจยวเสน ‘‘นโม พุทฺธายา’’ติอาทีนิ วตฺวา รตนตฺตยํ วนฺทนฺติ, ‘‘นโม พุทฺธสฺสา’’ติ วทนฺตา ปน อปฺปกตรา. กตฺถจิ หิ ปเทเส กุมารเก อกฺขรสมยํ อุคฺคณฺหาเปนฺตา ครู อกฺขรานมาทิมฺหิ ‘‘นโม พุทฺธายา’’ติ สิกฺขาเปนฺติ, น ปน ‘‘นโม พุทฺธสฺสา’’ติ, เอวํ สนฺเตปิ ปาฬินเย โปราณฏฺฐกถานเย จ อุปปริกฺขิยมาเน ฐเปตฺวา คตฺยตฺถกมฺมาทิฏฺฐานจตุกฺกํ, ปเภทโต สตฺตฏฺฐานํ วา ทานโรจนธารณนโมโยคาทิเภเท ยตฺถ กตฺถจิ สมฺปทานวิสเย จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสสหิตานิ รูปานิ น ทิสฺสนฺติ, ตสฺมา เกหิจิ อภิสงฺขตานิ ‘‘นโม พุทฺธาย, พุทฺธาย ทานํ เทนฺตี’’ติ ปทานิ ปาฬึ ปตฺวา ‘‘นโม พุทฺธสฺส, พุทฺธสฺส ทานํ เทนฺตี’’ติ อญฺญรูปานิ ภวนฺตีติ ทฏฺฐพฺพํ. อยํ ปน ปาฬินยอฏฺฐกถานยานุรูเปน อายาเทสสฺส ปโยครจนา – ‘‘พุทฺธาย สรณํ คจฺฉติ, พุทฺธํ สรณํ คจฺฉตี’’ติ วา, ‘‘พุทฺธาย นครํ เนนฺติ, พุทฺธํ นครํ เนนฺตี’’ติ วา, ‘‘พุทฺธาย สกฺกโต ธมฺโม, พุทฺเธน สกฺกโต ธมฺโม’’ติ วา, ‘‘พุทฺธาย ชีวิตํ ปริจฺจชติ, พุทฺธสฺส อตฺถาย ชีวิตํ ปริจฺจชตี’’ติ วา, ‘‘พุทฺธาย อเปนฺติ อญฺญติตฺถิยา, พุทฺธสฺมา อเปนฺติ อญฺญติตฺถิยา’’ติ วา[Pg.175], ‘‘พุทฺธาย ธมฺมตา, พุทฺธสฺส ธมฺมตา’’ติ วา, ‘‘พุทฺธาย ปสนฺโน, พุทฺเธ ปสนฺโน’’ติ วา อิติ ปเภทโต อิมํ สตฺตฐานํ วิวชฺเชตฺวา อญฺญตฺถ อายาเทโส น ทิสฺสติ. ตถา หิ – 'मनुष्य मनुष्य से कुछ वस्तु माँगता है, मनुष्य द्वारा दूत मनुष्य के लिए (नराय) भेजा गया' - ऐसी गाथा-रचना भी करते हैं? सत्य है, शासन में रहने वाले निपुण पण्डित भी 'नमो बुद्धाय' इत्यादि कहकर रत्नत्रय की वन्दना करते हैं, गाथा-रचना भी करते हैं, ऐसा होने पर भी वे शब्द-शास्त्र में किए गए अभ्यास के वश से शब्द-शास्त्र से नय लेकर उस प्रकार की गाथाएँ और गद्य-पद (चूर्णिका-पद) भी रचते हैं, 'नमो बुद्धाय' इत्यादि कहकर रत्नत्रय की वन्दना करते हैं। जो शब्द-शास्त्र में अनभ्यस्त हैं, यहाँ तक कि छोटे बालक भी, वे भी दूसरों के वचन सुनकर अभ्यास के वश से 'नमो बुद्धाय' इत्यादि कहकर रत्नत्रय की वन्दना करते हैं, 'नमो बुद्धस्स' कहने वाले तो बहुत कम हैं। किसी प्रदेश में बालकों को अक्षर-ज्ञान सिखाते समय गुरु अक्षरों के आदि में 'नमो बुद्धाय' सिखाते हैं, न कि 'नमो बुद्धस्स'। ऐसा होने पर भी पालि-नय और प्राचीन अट्ठकथा-नय में विचार करने पर गत्यर्थक-कर्मादि चार स्थानों को, या विस्तार से सात स्थानों को छोड़कर दान, रोचन, धारण, नमः-योग आदि भेदों में जहाँ कहीं भी सम्प्रदान के विषय में चतुर्थी एकवचन के 'आय' आदेश सहित रूप नहीं देखे जाते, इसलिए किन्हीं के द्वारा रचित 'नमो बुद्धाय, बुद्धाय दानं देन्ति' - ये पद पालि को प्राप्त होकर 'नमो बुद्धस्स, बुद्धस्स दानं देन्ति' - इस प्रकार अन्य रूपों वाले हो जाते हैं, ऐसा समझना चाहिए। पालि-नय और अट्ठकथा-नय के अनुरूप 'आय' आदेश का प्रयोग-रचना इस प्रकार है - 'बुद्धाय सरणं गच्छति' (बुद्ध की शरण जाता है) या 'बुद्धं सरणं गच्छति', 'बुद्धाय नगरं नेन्ति' (बुद्ध को नगर ले जाते हैं) या 'बुद्धं नगरं नेन्ति', 'बुद्धाय सक्कतो धम्मो' (बुद्ध द्वारा सत्कृत धर्म) या 'बुद्धेन सक्कतो धम्मो', 'बुद्धाय जीवितं परिच्चजति' (बुद्ध के लिए जीवन त्यागता है) या 'बुद्धस्स अत्थाय जीवितं परिच्चजति', 'बुद्धाय अपेन्ति अञ्ञतित्थिया' (बुद्ध से अन्यतीर्थिक दूर होते हैं) या 'बुद्धस्मा अपेन्ति अञ्ञतित्थिया', 'बुद्धाय धम्मता' (बुद्ध की धर्मता) या 'बुद्धस्स धम्मता', 'बुद्धाय पसन्नो' (बुद्ध में प्रसन्न) या 'बुद्धे पसन्नो' - इस प्रकार विस्तार से इन सात स्थानों को छोड़कर अन्यत्र 'आय' आदेश नहीं देखा जाता। क्योंकि - ปาเฐ มหานมกฺการ-สงฺขาเต สาธุนนฺทเน; สมฺปทาเน นโมโยเค, อายาเทโส น ทิสฺสติ. पाठ में, महा-नमक्कार (महान नमस्कार) कहे जाने वाले साधु-नन्दन में; सम्प्रदान और नमः-योग में, 'आय' आदेश नहीं देखा जाता। เอตฺถ มหานมกฺการปาโฐ นาม ‘‘นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺสา’’ติ ปาโฐ. อตฺราปิ อายาเทโส น ทิสฺสติ. วมฺมิกสุตฺเตปิ ‘‘นโม กโรหิ นาคสฺสา’’ติ เอวํ อายาเทโส น ทิสฺสติ. อมฺพฏฺฐสุตฺเตปิ ‘‘โสตฺถิ ภทนฺเต โหตุ รญฺโญ, โสตฺถิ ชนปทสฺส’’. เอวํ อายาเทโส น ทิสฺสติ. यहाँ महा-नमक्कार पाठ का अर्थ 'नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स' यह पाठ है। यहाँ भी 'आय' आदेश नहीं देखा जाता। वम्मिक सुत्त में भी 'नमो करोहि नागस्स' - इस प्रकार 'आय' आदेश नहीं देखा जाता। अम्बट्ठ सुत्त में भी 'सोत्थि भदन्ते होतु रञ्ञो, सोत्थि जनपदस्स'। इस प्रकार 'आय' आदेश नहीं देखा जाता। ‘‘สุปฺปพุทฺธ’’นฺติ ปาฐสฺส, อตฺถสํวณฺณนายปิ; สมฺปทาเน นโมโยเค, อายาเทโส น ทิสฺสติ. 'सुप्पबुद्धं' इस पाठ की अर्थ-व्याख्या में भी; सम्प्रदान और नमः-योग में, 'आय' आदेश नहीं देखा जाता। ตถา หิ जैसे कि ‘‘สุปฺปพุทฺธํ ปพุชฺฌนฺติ, สทา โคตมสาวกา; เยสํ ทิวา จ รตฺโต จ, นิจฺจํ พุทฺธคตา สตี’’ติ 'गौतम के श्रावक सदा भली-भाँति जागते हुए उठते हैं; जिनकी दिन और रात में नित्य बुद्ध-गत स्मृति बनी रहती है' - อิมิสฺสา ปาฬิยา อฏฺฐกถายํ ‘‘สมฺมาทิฏฺฐิกสฺส ปุตฺโต คุฬํ ขิปมาโน พุทฺธานุสฺสตึ อาวชฺเชตฺวา ‘นโม พุทฺธสฺสา’ติ วตฺวา คุฬํ ขิปตี’’ติ อายาเทสวชฺชิโต สทฺทรจนาวิเสโส ทิสฺสติ. สคาถาวคฺควณฺณนายมฺปิ ธนญฺชานีสุตฺตฏฺฐกถายํ ‘‘ตฺวํ ฐิตาปิ นิสินฺนาปิ ขิปิตฺวาปิ กาเสตฺวาปิ ‘นโม พุทฺธสฺสา’ติ ตสฺส มุณฺฑกสฺส สมณกสฺส นมกฺการํ กโรสี’’ติ อายาเทสวชฺชิโต สทฺทรจนาวิเสโส ทิสฺสติ. ตถา ตตฺถ ตตฺถ ‘‘พุทฺธปฺปมุขสฺส ภิกฺขุสงฺฆสฺส ทานํ เทติ. ตสฺส [Pg.176] ปุริสสฺส ภตฺตํ น รุจฺจติ. สมณสฺส โรจเต สจฺจํ, พุทฺธสฺส ฉตฺตํ ธาเรติ, พุทฺธสฺส สิลาฆเต’’ติอาทินา อายาเทสวิวชฺชิโต สทฺทรจนาวิเสโส ทิสฺสติ. เอวํ ทานโรจนาทีสุ พหูสุ สมฺปทานวิสเยสุ จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสสหิตํ รูปํ น ทิสฺสติ. इस पालि की अट्ठकथा में "सम्यग्दृष्टि का पुत्र गुली (गोली) फेंकते समय बुद्धानुस्मृति का आवर्जन कर 'नमो बुद्धस्स' कहकर गुली फेंकता है" - इस प्रकार 'आय' आदेश से रहित शब्द-रचना विशेष दिखाई देती है। सगाथावग्ग की वर्णना में भी धनञ्जानी सुत्त की अट्ठकथा में "तुम खड़ी हुई भी, बैठी हुई भी, छींकते हुए भी, खाँसते हुए भी 'नमो बुद्धस्स' कहकर उस मुण्डक श्रमण को नमस्कार करती हो" - इस प्रकार 'आय' आदेश से रहित शब्द-रचना विशेष दिखाई देती है। उसी प्रकार वहाँ-वहाँ "बुद्ध-प्रमुख भिक्षु संघ को दान देता है। उस पुरुष को भात (भोजन) अच्छा नहीं लगता। श्रमण को सत्य रुचता है, बुद्ध के लिए छत्र धारण करता है, बुद्ध की प्रशंसा करता है" - इत्यादि के द्वारा 'आय' आदेश से विवर्जित शब्द-रचना विशेष दिखाई देती है। इस प्रकार दान, रोचन (रुचि) आदि बहुत से सम्प्रदान के विषयों में चतुर्थी एकवचन का 'आय' आदेश सहित रूप नहीं दिखाई देता है। คตฺยตฺถกมฺมาทีสุ ปน จตูสุ ฐาเนสุ ทิสฺสติ. ตถา หิ ‘‘มูลาย ปฏิกสฺเสยฺย, อปฺโป สคฺคาย คจฺฉตี’’ติ เจตฺถ คตฺยตฺถกมฺมนิ ทิสฺสติ. เอตฺถ หิ ‘‘มูลํ ปฏิกสฺเสยฺย, อปฺโป สคฺคํ คจฺฉตี’’ติ จ อตฺโถ. ‘‘ปฏิกสฺเสยฺยา’’ติ เจตฺถ กส คติยนฺติ ธาตุสฺส ปติอุปสคฺเคน วิเสสิตตฺตา ‘‘อากฑฺเฒยฺยา’’ติ อตฺโถ ภวติ. ‘‘อยํ ปุริโส มม อตฺถกาโม, โย มํ คเหตฺวาน ทกาย เนตี’’ติ เอตฺถ นยนตฺถกมฺมนิ ทิสฺสติ. เอตฺถ หิ มํ อุทกํ เนติ, อตฺตโน วสนกโสพฺภํ ปาเปตีติ อตฺโถ. ‘‘วิรมถายสฺมนฺโต มม วจนายา’’ติ เอตฺถ วิภตฺติวิปริณาเม ทิสฺสติ. มม วจนโต วิรมถาติ หิ นิสฺสกฺกวจนวเสน อตฺโถ. ‘‘มหาคณาย ภตฺตา เม’’ติ เอตฺถาปิ วิภตฺติวิปริณาเม ทิสฺสติ. มม มหโต หํสคณสฺส ภตฺตาติ หิ สามิวจนวเสน อตฺโถ. มม หํสราชาติ เจตฺถ อธิปฺปาโย. ‘‘อสกฺกตา จสฺม ธนญฺจยายา’’ติ เอตฺถาปิ วิภตฺติวิปริณาเม ทิสฺสติ. มยํ ธนญฺจยสฺส รญฺโญ อสกฺกตา จ ภวามาติ หิ กตฺตุตฺเถ สามิวจนํ. ตถา หิ ‘‘ธนญฺจยสฺสา’’ติ วา ‘‘ธนญฺจเยนา’’ติ วา วตฺตพฺเพ เอวํ อวตฺวา ‘‘ธนญฺจยายา’’ติ สมฺปทานวจนํ ทานกฺริยาทิกสฺส สมฺปทานวิสยสฺส อภาวโต วิภตฺติวิปริณาเมเยว ยุชฺชติ, ตสฺมา ธนญฺจยราเชน มยํ อสกฺกตา จ ภวามาติ อตฺโถ คเหตพฺโพ. อญฺญมฺปิ วิภตฺติวิปริณามฏฺฐานํ มคฺคิตพฺพํ. किन्तु गत्यर्थक कर्म आदि चार स्थानों में (यह) दिखाई देता है। जैसे कि "जड़ की ओर खींचे, थोड़े (लोग) स्वर्ग को जाते हैं" - यहाँ गत्यर्थक कर्म में दिखाई देता है। यहाँ "जड़ को खींचे, थोड़े स्वर्ग को जाते हैं" - ऐसा अर्थ है। "पटिकस्सेय्य" यहाँ 'कस' (गति अर्थ में) धातु के 'पति' उपसर्ग से विशेषित होने के कारण "आकर्षित करे (खींचे)" यह अर्थ होता है। "यह पुरुष मेरा हित चाहने वाला है, जो मुझे पकड़कर जल की ओर ले जाता है" - यहाँ नयनार्थक (ले जाने के अर्थ वाले) कर्म में दिखाई देता है। यहाँ "मुझे जल (की ओर) ले जाता है, अपने रहने के गड्ढे तक पहुँचाता है" - यह अर्थ है। "आयुष्मन्तों! मेरे वचन से विरत होओ" - यहाँ विभक्ति-विपरिणाम (विभक्ति परिवर्तन) में दिखाई देता है। "मेरे वचन से विरत होओ" - ऐसा अपादान (निसक्क) वचन के वश से अर्थ है। "मेरे महान् गण का भर्ता (स्वामी)" - यहाँ भी विभक्ति-विपरिणाम में दिखाई देता है। "मेरे महान् हंसगण का भर्ता" - ऐसा षष्ठी (सामि) वचन के वश से अर्थ है। "मेरा हंसराज" - यहाँ यह अभिप्राय है। "और हम धनञ्जय के द्वारा असत्कृत (तिरस्कृत) हैं" - यहाँ भी विभक्ति-विपरिणाम में दिखाई देता है। "हम राजा धनञ्जय के असत्कृत होते हैं" - यहाँ कर्ता के अर्थ में षष्ठी वचन है। क्योंकि "धनञ्जयस्स" (षष्ठी) अथवा "धनञ्जयेन" (तृतीया) कहना चाहिए था, वैसा न कहकर "धनञ्जयाय" यह सम्प्रदान वचन, दान-क्रिया आदि सम्प्रदान विषय के अभाव के कारण विभक्ति-विपरिणाम में ही युक्त होता है, इसलिए "राजा धनञ्जय के द्वारा हम असत्कृत होते हैं" - यह अर्थ ग्रहण करना चाहिए। अन्य भी विभक्ति-विपरिणाम के स्थान खोजने चाहिए। ‘‘วิราคาย [Pg.177] อุปสมาย นิโรธายา’’ติอาทีนิ ปน อเนกสหสฺสานิ อายาเทสสหิตานิ สทฺทรูปานิ ตทตฺเถ ปวตฺตนฺติ. อฏฺฐกถาจริยาปิ หิ ธมฺมวินยสทฺทตฺถํ วณฺเณนฺตา ‘‘ธมฺมานํ วินยาย. อนวชฺชธมฺมตฺถญฺเหส วินโย, น ภวโภคาทิอตฺถ’’นฺติ ตทตฺถวเสเนว อายาเทสสหิตํ สทฺทรูปํ ปยุญฺชึสุ, เอวํ จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสสหิตานิ รูปานิ คตฺยตฺถกมฺมนิ นยนตฺถกมฺมนิ วิภตฺติวิปริณาเม ตทตฺเถ จาติ อิเมสุ จตูสุเยว ฐาเนสุ ทิสฺสนฺติ, น ปน ทานโรจนาทิเภเท ยตฺถ กตฺถจิ สมฺปทานวิสเย. ตถา หิ นิรุตฺติปิฏเก ‘‘อตฺถายาติ สมฺปทานวจน’’นฺติ อายาเทสสหิตํ สทฺทรูปํ วุตฺตํ, ปุริสสทฺทาทิวเสน ปน ตาทิสานิ รูปานิ น วุตฺตานิ ตาทิสานํ สทฺทรูปานํ ยตฺถ กตฺถจิ อปฺปวตฺตนโต. กจฺจายนปฺปกรเณปิ หิ ‘‘อาย จตุตฺเถกวจนสฺส ตู’’ติ ลกฺขณสฺส วุตฺติยํ ‘‘อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’’นฺติ วุตฺตํ. ‘‘ปุริสายา’’ติ วา ‘‘สมณายา’’ติ วา ‘‘พฺราหฺมณายา’’ติ วา น วุตฺตนฺติ. लेकिन "विराग के लिए, उपशम के लिए, निरोध के लिए" - इत्यादि अनेक सहस्रों 'आय' आदेश सहित शब्द-रूप 'तदर्थ' (उसके प्रयोजन के लिए) में प्रवृत्त होते हैं। अट्ठकथाचार्य भी धर्म-विनय शब्द के अर्थ की व्याख्या करते हुए "धर्मों के विनय के लिए। यह विनय अनवद्य (निर्दोष) धर्म के अर्थ (प्रयोजन) के लिए ही है, भव-भोग आदि के अर्थ के लिए नहीं" - इस प्रकार 'तदर्थ' के वश से ही 'आय' आदेश सहित शब्द-रूप का प्रयोग करते थे। इस प्रकार चतुर्थी एकवचन के 'आय' आदेश सहित रूप गत्यर्थक कर्म में, नयनार्थक कर्म में, विभक्ति-विपरिणाम में और 'तदर्थ' में - इन चार ही स्थानों में दिखाई देते हैं, न कि दान, रोचन आदि भेदों वाले किसी भी सम्प्रदान विषय में। जैसा कि निरुत्तिपिटक में "अत्थाय - यह सम्प्रदान वचन है" - इस प्रकार 'आय' आदेश सहित शब्द-रूप कहा गया है, किन्तु 'पुरिस' शब्द आदि के वश से वैसे रूप नहीं कहे गए हैं, क्योंकि वैसे शब्द-रूपों की कहीं भी प्रवृत्ति नहीं होती। कच्चायन प्रकरण में भी "आय चतुत्थेकवचनस्स तु" इस लक्षण की वृत्ति में "देव-मनुष्यों के अर्थ के लिए, हित के लिए, सुख के लिए" कहा गया है। "पुरिसाय" अथवा "समणाय" अथवा "ब्राह्मणाय" - ऐसा नहीं कहा गया है। เอตฺถ สิยา – นนุ โภ ตสฺเสว วุตฺติยํ ‘‘จตุตฺถีติ กิมตฺถํ ปุริสสฺส มุขํ. เอกวจนสฺสาติ กิมตฺถํ ปุริสานํ ททาติ. วาติ กิมตฺถํ ทาตา โหติ สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา’’ติ วุตฺตตฺตา ‘‘ปุริสาย สมณาย พฺราหฺมณายา’’ติอาทีนิ ปทรูปานิ นยโต ทสฺสิตานิ, เกวลํ ปน มุขสทฺทโยคโต พหุวจนภาวโต วิกปฺปนโต จ ‘‘ปุริสายา’’ติอาทีนิ น สิชฺฌนฺติ, มุขสทฺทโยคาทิวิรหิเต ปน ฐาเน อวสฺสํ สิชฺฌนฺตีติ? เอตฺถ วุจฺจเต – ‘‘จตุตฺถีติ กิมตฺถํ ปุริสสฺส มุข’’นฺติ วทนฺโต ‘‘สเจ อายาเทโส ภเวยฺย[Pg.178], จตุตฺถิยา เอว ภวติ, น ฉฏฺฐิยา’’ติ ทสฺเสนฺโต ‘‘มุข’’นฺติ ปทํ ทสฺเสสิ, น จ เตน ‘‘มุขสทฺทฏฺฐาเน เทตีติอาทิเก สมฺปทานวิสยภูเต กฺริยาปเท ฐิเต อายาเทโส โหตี’’ติ ทสฺเสติ. ‘‘เอกวจนสฺสาติ กิมตฺถํ ปุริสานํ ททาตี’’ติ วทนฺโตปิ ‘‘เอกวจนสฺเสว อายาเทโส โหติ, น พหุวจนสฺสา’’ติ ทสฺเสติ. ‘‘ททาตี’’ติ อิทํ ปทํ ‘‘ปุริสาน’’นฺติ ปทสฺส สมฺปทานวจนตฺตํ ญาเปตุํ อโวจ, น จ ‘‘เทตีติอาทิเก สมฺปทานวิสยภูเต กฺริยาปเท สติ จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทโส โหตี’’ติ อิมมตฺถํ วิญฺญาเปติ. ‘‘วาติ กิมตฺถํ ทาตา โหติ สมณสฺส วา พฺราหฺมณสฺส วา’’ติ จ วทนฺโตปิ ‘‘สมฺปทาเนเยว วิกปฺเปน อายาเทโส โหตี’’ติ วิญฺญาเปติ, น ทานาทิกฺริยํ ปฏิจฺจ อายาเทสวิธานํ ญาเปติ. यहाँ यह हो सकता है – हे भो! उसी (सूत्र) की वृत्ति में 'चतुर्थी किसलिए? पुरुष का मुख (purisassa mukhaṃ)', 'एकवचन के लिए किसलिए? पुरुषों को देता है (purisānaṃ dadāti)', 'वा (विकल्प) किसलिए? श्रमण को या ब्राह्मण को देने वाला होता है (dātā hoti samaṇassa vā brāhmaṇassa vā)' – ऐसा कहे जाने के कारण 'पुरिसाय (purisāya), समणाय (samaṇāya), ब्राह्मणाय (brāhmaṇāya)' आदि पद-रूप न्यायतः दिखाए गए हैं; केवल मुख शब्द के योग से, बहुवचन होने से और विकल्प होने से 'पुरिसाय' आदि सिद्ध नहीं होते, किन्तु मुख शब्द के योग आदि से रहित स्थान पर तो वे अवश्य सिद्ध होते हैं? यहाँ कहा जाता है – 'चतुर्थी किसलिए? पुरुष का मुख' ऐसा कहते हुए (वृत्तिकार) यह दिखा रहे हैं कि 'यदि आय-आदेश हो, तो वह चतुर्थी का ही होता है, षष्ठी का नहीं', इसलिए उन्होंने 'मुख' पद को दर्शाया; न कि उससे यह दिखा रहे हैं कि 'देता है (deti)' आदि सम्प्रदान विषयक क्रिया पदों के रहने पर 'आय-आदेश' होता है। 'एकवचन के लिए किसलिए? पुरुषों को देता है' ऐसा कहते हुए भी वे यह दिखा रहे हैं कि 'एकवचन का ही आय-आदेश होता है, बहुवचन का नहीं'। 'देता है (dadātī)' यह पद उन्होंने 'पुरिसानं (purisānaṃ)' पद के सम्प्रदानत्व को बताने के लिए कहा, न कि इस अर्थ को समझाने के लिए कि 'देता है' आदि सम्प्रदान विषयक क्रिया पद होने पर चतुर्थी एकवचन का आय-आदेश होता है। 'वा (विकल्प) किसलिए? श्रमण को या ब्राह्मण को देने वाला होता है' ऐसा कहते हुए भी वे यह समझा रहे हैं कि 'सम्प्रदान में ही विकल्प से आय-आदेश होता है', न कि दान आदि क्रिया के आधार पर आय-आदेश के विधान को सूचित कर रहे हैं। ยทิ ปน ทานาทิกฺริยํ ปฏิจฺจ อายาเทสวิธานํ สิยา, วุตฺติการเกน ลกฺขณสฺส วุตฺติยํ มูโลทาหรเณเยว ‘‘อตฺถาย หิตายา’’ติ ตทตฺถปโยคานิ วิย ‘‘ปุริสาย ทียเต’’ติอาทิ วตฺตพฺพํ สิยา, น จ วุตฺตํ. กสฺมาติ เจ? พุทฺธวจเน โปราณฏฺฐกถาสุ จ ตาทิสสฺส ปโยคสฺส อภาวา. นิรุตฺติปิฏเก หิ ปภินฺนปฏิสมฺภิโท โส อายสฺมา มหากจฺจาโน ‘‘ปุริสสฺส ทียเต’’ติ อายาเทสรหิตานิเยว รูปานิ ทสฺเสติ, ‘‘อตฺถายาติ สมฺปทานวจน’’นฺติ ภณนฺโตปิ จ เถโร ทานาทิกฺริยาเปกฺขํ อกตฺวา จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสสหิตํ รูปเมว นิทฺทิสิ. เตน โส ปโยโค ตทตฺถปฺปโยโคติ วิญฺญายติ. อิติ อิเมหิ การเณหิ ชานิตพฺพํ ‘‘ทานาทิกฺริยํ ปฏิจฺจ อายาเทสวิธานํ น กต’’นฺติ. ยชฺเชวํ ‘‘อตฺถาย หิตายา’’ติอาทีนิเยว ตทตฺถปฺปโยคานิ ‘‘อาย จตุตฺเถกวจนสฺส ตู’’ติ ลกฺขณสฺส วิสยา ภเวยฺยุํ, นาญฺญานีติ? ตนฺน, อญฺญานิปิ วิสยาเยว ตสฺส. กตมานิ? ‘‘มูลาย ปฏิกสฺเสยฺย, อปฺโป [Pg.179] สคฺคาย คจฺฉติ, ทกาย เนติ, วิรมถายสฺมนฺโต มมวจนาย, คณาย ภตฺตา’’ติอาทีนิ. ‘‘สคฺคสฺส คมเนน วา’’ติอาทีนิ ปน วาธิการตฺตา อวิสยาวาติ. यदि दान आदि क्रिया के आधार पर आय-आदेश का विधान होता, तो वृत्तिकार द्वारा लक्षण की वृत्ति के मूल उदाहरणों में ही 'अत्थाय हिताय' (अर्थ के लिए, हित के लिए) के समान 'पुरिसाय दीयते' (पुरुष के लिए दिया जाता है) आदि कहना चाहिए था, किन्तु ऐसा नहीं कहा गया। यदि कहें कि क्यों? क्योंकि बुद्धवचन और प्राचीन अट्ठकथाओं में उस प्रकार के प्रयोग का अभाव है। निरुत्तिपिटक में प्रभिन्नप्रतिसंभिदा वाले उन आयुष्मान महाकाच्चान ने 'पुरिसस्स दीयते' (पुरुष को दिया जाता है) ऐसे आय-आदेश रहित रूप ही दिखाए हैं, और 'अत्थाय इति सम्प्रदानवचनं' (अत्थाय यह सम्प्रदान वचन है) ऐसा कहते हुए भी उन स्थविर ने दान आदि क्रिया की अपेक्षा न करके चतुर्थी एकवचन के आय-आदेश सहित रूप का ही निर्देश किया। उससे वह प्रयोग 'तदर्थ-प्रयोग' (प्रयोजन के लिए प्रयोग) समझा जाता है। इसलिए इन कारणों से यह जानना चाहिए कि 'दान आदि क्रिया के आधार पर आय-आदेश का विधान नहीं किया गया है'। यदि ऐसा है, तो क्या 'अत्थाय हिताय' आदि तदर्थ-प्रयोग ही 'आय चतुत्थेकवचनस्स तु' इस लक्षण के विषय होंगे, अन्य नहीं? ऐसा नहीं है, अन्य भी इसके विषय ही हैं। वे कौन से हैं? 'मूल के लिए पीछे खींचे (mūlāya paṭikasseyya)', 'अल्प स्वर्ग को जाता है (appo saggāya gacchati)', 'जल के लिए ले जाता है (dakāya neti)', 'आयुष्मानों! मेरे वचनों के लिए रुकें (viramathāyasmanto mamavacanāya)', 'गण के लिए भोजन (gaṇāya bhattā)' आदि। 'स्वर्ग के गमन से (saggassa gamanena vā)' आदि तो 'वा' के अधिकार के कारण (इस आदेश के) विषय नहीं हैं। นนุ จ โภ เอวํ สนฺเต วุตฺติการเกน มูโลทาหรเณสุ ‘‘อตฺถาย หิตาย สุขาย เทวมนุสฺสาน’’นฺติ วตฺวา ‘‘มูลาย ปฏิกสฺเสยฺยา’’ติอาทีนิปิ วตฺตพฺพานิ, กิมุทาหรเณ ปน ‘‘วาติ กิมตฺถํ สคฺคสฺส คมเนน วา’’ติ วตฺตพฺพนฺติ? สจฺจํ, อวจเน การณมตฺถิ, ตํ สุณาถ – ‘‘มูลาย ปฏิกสฺเสยฺย, อปฺโป สคฺคาย คจฺฉตี’’ติ เอตฺถ หิ ‘‘มูลาย, สคฺคายา’’ติ ปทานิ สุทฺธสมฺปทานวจนานิ น โหนฺติ คตฺยตฺถกมฺมนิ วตฺตนโต, ตสฺมา มูโลทาหรเณสุ น วุตฺตานิ. ตถา ‘‘ทกาย เนตี’’ติ เอตฺถ ‘‘ทกายา’’ติ ปทํ นยนตฺถกมฺมนิ วตฺตนโต สุทฺธสมฺปทานวจนํ น โหตีติ น วุตฺตํ. ‘‘วิรมถายสฺมนฺโต มม วจนายา’’ติ เอตฺถ ปน ‘‘วจนายา’’ติ ปทํ นิสฺสกฺกวจนตฺเถ วตฺตนโต, ‘‘คณาย ภตฺตา’’ติ เอตฺถ ‘‘คณายา’’ติ ปทํ สามิวจนตฺเถ วตฺตนโต, ‘‘อสกฺกตา จสฺม ธนญฺจยายา’’ติ เอตฺถ ‘‘ธนญฺจยายา’’ติ ปทํ กตฺตุวเสน สามิอตฺเถ วตฺตนโต สุทฺธสมฺปทานวจนํ น โหตีติ น วุตฺตํ. กิมุทาหรเณปิ ‘‘สคฺคสฺสา’’ติ ปทํ คมนสทฺทสนฺนิธานโต คตฺยตฺถกมฺมนิ วตฺตนโต สุทฺธสมฺปทานวจนํ น โหตีติ ‘‘วาติ กิมตฺถํ สคฺคสฺส คมเนน วา’’ติ น วุตฺตํ. เอวญฺเหตฺถ วุตฺตนเยน พุทฺธวจนํ โปราณฏฺฐกถานยญฺจ ปตฺวา จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสสหิตานิ รูปานิ คตฺยตฺถกมฺมาทีสุ จตูสุเยว ฐาเนสุ ทิสฺสนฺติ, น ปน ทานโรจนาทิเภเท ยตฺถ กตฺถจิ สมฺปทานวิสเยติ ทฏฺฐพฺพํ. हे भो! यदि ऐसा है, तो वृत्तिकार को मूल उदाहरणों में 'अत्थाय हिताय सुखाय देवमनुस्सानं' कहकर 'मूलाय पटिकस्सेय्य' आदि भी कहने चाहिए थे, फिर उदाहरण में 'वा किसलिए? स्वर्ग के गमन से (saggassa gamanena vā)' ऐसा क्यों कहना चाहिए? सत्य है, न कहने में कारण है, उसे सुनें – 'मूलाय पटिकस्सेय्य, अप्पो सग्गाय गच्छति' यहाँ 'मूलाय, सग्गाय' पद गत्यर्थक कर्म में होने के कारण शुद्ध सम्प्रदान वचन नहीं हैं, इसलिए उन्हें मूल उदाहरणों में नहीं कहा गया। उसी प्रकार 'दकाय नेति' यहाँ 'दकाय' पद ले जाने के अर्थ वाली क्रिया के कर्म में होने से शुद्ध सम्प्रदान वचन नहीं है, इसलिए नहीं कहा गया। 'विरमथायस्मन्तो मम वचनाय' यहाँ 'वचनाय' पद अपादान (निसक्क) वचन के अर्थ में होने से, 'गणाय भत्ता' यहाँ 'गणाय' पद स्वामी (षष्ठी) वचन के अर्थ में होने से, 'असक्कता चस्म धनञ्जयाय' यहाँ 'धनञ्जयाय' पद कृदन्त के योग में स्वामी (षष्ठी) के अर्थ में होने से शुद्ध सम्प्रदान वचन नहीं हैं, इसलिए नहीं कहे गए। उदाहरण में भी 'सग्गस्स' पद गमन शब्द के सान्निध्य से गत्यर्थक कर्म में होने के कारण शुद्ध सम्प्रदान वचन नहीं है, इसलिए 'वा किसलिए? स्वर्ग के गमन से' ऐसा नहीं कहा गया। इस प्रकार यहाँ बताए गए न्याय से बुद्धवचन और प्राचीन अट्ठकथाओं के मार्ग को प्राप्त कर चतुर्थी एकवचन के आय-आदेश सहित रूप गत्यर्थक कर्म आदि चार ही स्थानों में देखे जाते हैं, न कि दान, रोचन (पसंद करना) आदि भेदों वाले जहाँ कहीं भी सम्प्रदान के विषय में; ऐसा समझना चाहिए। นนุ จ โภ ‘‘จนฺทนสารํ เชฏฺฐิกาย อทาสิ สุวณฺณมาลํ กนิฏฺฐายา’’ติ ทานปฺปโยเค จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสสหิตรูปทสฺสนโต ‘‘ราชกญฺญาย ทียเต, ราชกญฺญาย [Pg.180] รุจฺจติ อลงฺกาโร, ราชกญฺญาย ฉตฺตํ ธาเรติ, ราชกญฺญาย นโม กโรหิ, ราชกญฺญาย โสตฺถิ ภวตุ, ราชกญฺญาย สิลาฆเต’’ติอาทีหิปิ ปโยเคหิ ภวิตพฺพํ, อถ กสฺมา ‘‘พุทฺธวจนํ โปราณฏฺฐกถานยญฺจ ปตฺวา จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสสหิตานิ รูปานิ คตฺยตฺถกมฺมาทีสุ จตูสุเยว ฐาเนสุ ทิสฺสนฺติ, น ปน ทานโรจนาทิเภเท ยตฺถ กตฺถจิ สมฺปทานวิสเย’’ติ วทถาติ? อุปฺปถมวติณฺโณ ภวํ, น หิ ภวํ อมฺหากํ วจนตฺถํ ชานาติ. อยญฺเหตฺถ อมฺหากํ วจนตฺโถ – สพฺพานิปิ อิตฺถิลิงฺคานิ เอกวจนวเสน ตติยาจตุตฺถีปญฺจมีฉฏฺฐีสตฺตมีฐาเนสุ สมสมานิ โหนฺติ, อปฺปานิ อสมานิ, ตสฺมา ตานิ ฐเปตฺวา ปุลฺลิงฺคนปุํสกลิงฺเคสุ ปุริสาทิ จิตฺตาทิสทฺทานํ อการนฺตปกติภาเว ฐิตานํ จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสสหิตานิ รูปานิ พุทฺธวจนาทีสุ ทานโรจนาทิเภเท ยตฺถ กตฺถจิ สมฺปทานวิสเย น ทิสฺสนฺติ. เตเนว หิ ‘‘มูลาย, สคฺคาย, ทกาย, วจนาย, คณายา’’ติอาทีนิ คตฺยตฺถกมฺมาทีสุ ตีสุ ‘‘อภิญฺญาย, สมฺโพธาย, นิพฺพานายา’’ติ เอวมาทีนิ ปน อเนกสตานิ ติลิงฺคปทานิ ตทตฺเถเยวาติ อิเมสุ จตูสุ ฐาเนสุ ทิสฺสนฺติ. ‘‘เทติ, โรจติ, ธาเรตี’’ติอาทีสุ ปน สุทฺธสมฺปทานวิสเยสุ น ทิสฺสนฺติ. ภวนฺติ จตฺร – हे महानुभाव! क्या 'चन्दनसारं जेट्ठिकाय अदासि सुवण्णमालं कनिठ्ठाय' (बड़ी बहन को चंदन का सार दिया, छोटी को स्वर्णमाला दी) इस दान के प्रयोग में चतुर्थी एकवचन के 'आय' आदेश सहित रूप के दर्शन होने से 'राजकञ्ञाय दीयते' (राजकन्या को दिया जाता है), 'राजकञ्ञाय रुच्चति अलङ्कारो' (राजकन्या को अलंकार अच्छा लगता है), 'राजकञ्ञाय छत्तं धारेति' (राजकन्या के लिए छत्र धारण करता है), 'राजकञ्ञाय नमो करोहि' (राजकन्या को नमस्कार करो), 'राजकञ्ञाय सोत्थि भवतु' (राजकन्या का कल्याण हो), 'राजकञ्ञाय सिलाघते' (राजकन्या की प्रशंसा करता है) आदि प्रयोग भी होने चाहिए? फिर आप ऐसा क्यों कहते हैं कि 'बुद्धवचन और प्राचीन अट्ठकथाओं की पद्धति के अनुसार चतुर्थी एकवचन के 'आय' आदेश सहित रूप गत्यर्थक कर्म आदि चार ही स्थानों पर देखे जाते हैं, न कि दान, रोचन आदि भेदों वाले किसी भी सम्प्रदान के विषय में'? आप गलत मार्ग पर जा रहे हैं, आप हमारे कथन का अर्थ नहीं समझ रहे हैं। यहाँ हमारे कथन का अर्थ यह है - सभी स्त्रीलिंग शब्द एकवचन में तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी और सप्तमी के स्थानों पर समान होते हैं, कुछ ही असमान होते हैं। इसलिए उन्हें छोड़कर, पुल्लिंग और नपुंसकलिङ्ग में 'पुरिस' आदि और 'चित्त' आदि अकारान्त प्रकृति वाले शब्दों के चतुर्थी एकवचन के 'आय' आदेश सहित रूप बुद्धवचनों आदि में दान, रोचन आदि भेदों वाले किसी भी सम्प्रदान के विषय में नहीं देखे जाते। इसीलिए 'मूलाय, सग्गाय, दकाय, वचनाय, गणाय' आदि गत्यर्थक कर्म आदि तीन (स्थानों) में और 'अभिञ्ञाय, सम्बोधाय, निब्बानाय' आदि अनेक सौ तीनों लिङ्गों के पद 'तदर्थ' (प्रयोजन) में ही, इन चार स्थानों पर देखे जाते हैं। 'देति, रोचति, धारेति' आदि शुद्ध सम्प्रदान के विषयों में नहीं देखे जाते। यहाँ ये (गाथाएँ) हैं - จตุตฺเถกวจนสฺส, อายาเทเสน สํยุตํ; รูปํ อนิตฺถิลิงฺคานํ, ฐาเนสุ จตุสุฏฺฐิตํ. चतुर्थी एकवचन का 'आय' आदेश से युक्त रूप, स्त्रीलिंग के अतिरिक्त (पुल्लिंग-नपुंसकलिङ्ग) शब्दों का चार स्थानों पर स्थित होता है। คตฺยตฺถกมฺมนิ เจว, นยนตฺถสฺส กมฺมนิ; วิภตฺติยา วิปลฺลาเส, ตทตฺเถ จาติ นิทฺทิเส. गत्यर्थक कर्म में, नयनार्थक (ले जाने के अर्थ) कर्म में, विभक्ति के विपर्यास (परिवर्तन) में और 'तदर्थ' (प्रयोजन) में - ऐसा निर्देश करना चाहिए। ‘‘มูลาย ปฏิกสฺเสยฺย, อปฺโป สคฺคาย คจฺฉติ’’; เอวํ คตฺยตฺถกมฺมสฺมึ, ทิฏฺฐมมฺเหหิ สาสเน. 'मूलाय पटिकस्सेय्य' (जड़ की ओर खींचे), 'अप्पो सग्गाय गच्छति' (थोड़े लोग स्वर्ग को जाते हैं) - इस प्रकार गत्यर्थक कर्म में हमने शासन (बुद्धवचन) में देखा है। ‘‘ทกาย [Pg.181] เนติ’’ อิจฺเจวํ, นยนตฺถสฺส กมฺมนิ; ‘‘วจนายา’’ติ นิสฺสกฺเก, วิรมณปฺปโยคโต. 'दकाय नेति' (जल के लिए ले जाता है) - इस प्रकार नयनार्थक कर्म में; 'वचनाय' - इस प्रकार अपादान (निसक्क) में विरमण (हटने) के प्रयोग से। ‘‘คณาย’’อิติ สามิสฺมึ, ‘‘ภตฺตา’’ติ สทฺทโยคโต; ‘‘ธนญฺจยายา’’ติ ปทํ, กตฺตุตฺเถ สามิสูจกํ. 'गणाय' - इस प्रकार षष्ठी (सामि) में 'भत्ता' शब्द के योग से; 'धनञ्जयाय' यह पद कर्ता के अर्थ में षष्ठी का सूचक है। ‘‘อสกฺกตา’’ติ สทฺทสฺส, โยคโตติ วินิทฺทิเส; อญฺโญ จาปิ วิปลฺลาโส, มคฺคิตพฺโพ วิภาวินา. 'असक्कत' शब्द के योग से (विभक्ति विपर्यास) का निर्देश करना चाहिए; विद्वान को अन्य भी विपर्यासों की खोज करनी चाहिए। ‘‘อภิญฺญาย สมฺโพธาย, นิพฺพานายา’’ติมานิ ตุ; ลิงฺคตฺตยวเสเนว, ตทตฺถสฺมึ วินิทฺทิเส. 'अभिञ्ञाय, सम्बोधाय, निब्बानाय' - ये तो तीनों लिङ्गों के अनुसार 'तदर्थ' (प्रयोजन) में ही निर्दिष्ट करने चाहिए। เอวํ ปาฐานุโลเมน, กถิโต อายสมฺภโว; อิทนฺตุ สุขุมํ ฐานํ, จินฺเตตพฺพํ ปุนปฺปุนํ. इस प्रकार पाठ के अनुसार 'आय' की उत्पत्ति कही गई है; यह सूक्ष्म स्थान है, इस पर बार-बार विचार करना चाहिए। โอการนฺตวเสเนว, นานานยสุมณฺฑิตา; ปทมาลา มเหสิสฺส, สาสนตฺถํ ปกาสิตา. ओकारान्त के आधार पर अनेक विधियों से सुसज्जित यह पदमाला महर्षि (बुद्ध) के शासन के अर्थ को प्रकाशित करने के लिए कही गई है। อิมมติมธุรญฺเจ จิตฺติกตฺวา สุเณยฺยุํ,วิวิธนยวิจิตฺตํ สาธโว สทฺทนีตึ; ชินวรวจเนเต สทฺทโต ชาตกงฺขํ,กุมุทมิว’สินา เว สุฏฺฐุ ฉินฺเทยฺยุเมตฺถ. यदि सज्जन लोग इस अति मधुर और विविध विधियों से विचित्र 'सद्द्नीति' को आदरपूर्वक सुनें, तो वे श्रेष्ठ जिन (बुद्ध) के वचनों में शब्दों के प्रति उत्पन्न संशय को तलवार की तरह यहाँ भली-भाँति काट देंगे, जैसे (तलवार) कुमुद को काट देती है। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार अट्ठकथा सहित नौ अंगों वाले त्रिपिटक के वचनों के मार्ग में विद्वानों की โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कुशलता के लिए रचित 'सद्द्नीति' प्रकरण में สวินิจฺฉโย โอการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส ओकारान्त पुल्लिंग शब्दों के प्रकृति रूप का विनिश्चय นามิกปทมาลาวิภาโค นาม नामिक पदमाला विभाग नामक ปญฺจโม ปริจฺเฉโท. पाँचवाँ परिच्छेद। อการนฺโตการนฺตตาปกติกโอการนฺตปุลฺลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. अकारान्त और ओकारान्त प्रकृति वाले ओकारान्त पुल्लिंग शब्द समाप्त हुए। ๖. อาการนฺตปุลฺลิงฺคนามิกปทมาลา ६. आकारान्त पुल्लिंग नामिक पदमाला อถ ปุพฺพาจริยมตํ ปุเรจรํ กตฺวา อาการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ปกติรูเปสุ อภิภวิตุ อิจฺเจตสฺส ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลํ [Pg.182] วกฺขาม – สตฺถา, สตฺถา, สตฺถาโร. สตฺถารํ, สตฺถาโร. สตฺถารา, สตฺถาเรหิ, สตฺถาเรภิ. สตฺถุ, สตฺถุสฺส, สตฺถุโน, สตฺถานํ, สตฺถารานํ. สตฺถารา, สตฺถาเรหิ, สตฺถาเรภิ. สตฺถุ, สตฺถุสฺส, สตฺถุโน, สตฺถานํ, สตฺถารานํ. สตฺถริ, สตฺถาเรสุ. โภ สตฺถ, โภ สตฺถา, ภวนฺโต สตฺถาโร. अब पूर्वाचार्यों के मत को आगे रखकर आकारान्त पुल्लिंग शब्दों के प्रकृति रूपों में 'अभिभवितु' (जीतने की इच्छा रखने वाला) इस प्रकृति रूप की नामिक पदमाला कहेंगे - सत्था, सत्था, सत्थारो। सत्थारं, सत्थारो। सत्थारा, सत्थारेहि, सत्थारेभि। सत्थु, सत्थुस्स, सत्थुनो, सत्थानं, सत्थारानं। सत्थारा, सत्थारेहि, सत्थारेभि। सत्थु, सत्थुस्स, सत्थुनो, सत्थानं, सत्थारानं। सत्थरि, सत्थारेसु। भो सत्था, भो सत्था, भवन्तो सत्थारो। อยํ ยมกมหาเถเรน กตาย จูฬนิรุตฺติยา อาคโต นโย. เอตฺถ จ นิรุตฺติปิฏเก จ กจฺจายเน จ ‘‘สตฺถุนา’’ติ ปทํ อนาคตมฺปิ คเหตพฺพเมว ‘‘ธมฺมราเชน สตฺถุนา’’ติ ทสฺสนโต. ‘‘สตฺถารา, สตฺถุนา, สตฺถาเรหิ, สตฺถาเรภี’’ติ กโม จ เวทิตพฺโพ. เอตฺถ จ อสติปิ อตฺถวิเสเส พฺยญฺชนวิเสสวเสน, พฺยญฺชนวิเสสาภาเวปิ อตฺถนานตฺถตาวเสน สทฺทนฺตรสนฺทสฺสนํ นิรุตฺติกฺกโมติ ‘‘สตฺถา’’ติ ปทํ เอกวจนพหุวจนวเสน ทฺวิกฺขตฺตุํ วุตฺตนฺติ เวทิตพฺพํ. นิรุตฺติปิฏกาทีสุ ปน ‘‘สตฺถา’’ติ ปฐมาพหุวจนํ น อาคตํ. กิญฺจาปิ น อาคตํ, ตถาปิ ‘‘อวิตกฺกิตา มจฺจุมุปพฺพชนฺตี’’ติ ปาฬิยํ ‘‘อวิตกฺกิตา’’ติ ปฐมาพหุวจนสฺส ทสฺสนโต ‘‘สตฺถา’’ติ ปทสฺส ปฐมาพหุวจนตฺตํ อวสฺสมิจฺฉิตพฺพํ. ตถา วตฺตา, ธาตา, คนฺตาทีนมฺปิ ตคฺคติกตฺตา. ตถา นิรุตฺติปิฏเก ‘‘สตฺถาเร’’ติ ทุติยาพหุวจนญฺจ ‘‘สตฺถุสฺส, สตฺถาน’’นฺติ จตุตฺถีฉฏฺเฐกวจนพหุวจนานิ จ อาคตานิ, จูฬนิรุตฺติยํ ปน น อาคตานิ. ตตฺถ ‘‘มาตาปิตโร โปเสติ. ภาตโร อติกฺกมตี’’ติ ทสฺสนโต ‘‘สตฺถาเร’’ติ ทุติยาพหุวจนรูปํ อยุตฺตํ วิย ทิสฺสติ. กจฺจายนาทีสุ ‘‘โภ สตฺถ, โภ สตฺถา’’ อิติ รสฺสทีฆวเสน อาลปเนกวจนทฺวยํ วุตฺตํ. นิรุตฺติปิฏเก ‘‘โภ สตฺถ’’ อิติรสฺสวเสน อาลปเนกวจนํ วตฺวา ‘‘ภวนฺโต สตฺถาโร’’ติ อาราเทสวเสน อาลปนพหุวจนํ วุตฺตํ. จูฬนิรุตฺติยํ [Pg.183] ‘‘โภ สตฺถ’’ อิติ รสฺสวเสน อาลปเนกวจนํ วตฺวา ‘‘โภ สตฺถา’’ อิติ ทีฆวเสน อาลปนพหุวจนํ ลปิตํ. สพฺพเมตํ อาคเม อุปปริกฺขิตฺวา ยถา น วิรุชฺฌติ, ตถา คเหตพฺพํ. यह यमकमहास्थविर द्वारा रचित चूलनिरुत्ति में आया हुआ नियम है। यहाँ निरुत्तिपिटक और कच्चायन में भी 'सत्थुना' (satthunā) पद को अनागत (अप्राप्त) होने पर भी 'धम्मराजेन सत्थुना' (dhammarājena satthunā) के प्रयोग के कारण ग्रहण करना चाहिए। 'सत्थारा, सत्थुना, सत्थारेहि, सत्थारेभि' - यह क्रम भी जानना चाहिए। यहाँ अर्थ-विशेष के न होने पर भी व्यंजन-विशेष के कारण, और व्यंजन-विशेष के अभाव में भी अर्थ की भिन्नता के कारण अन्य शब्दों का प्रदर्शन 'निरुत्ति-क्रम' कहलाता है; इसलिए 'सत्था' पद को एकवचन और बहुवचन के भेद से दो बार कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। निरुत्तिपिटक आदि में 'सत्था' यह प्रथमा बहुवचन का रूप नहीं आया है। यद्यपि नहीं आया है, फिर भी पालि में 'अवितक्किता मच्चुमुपब्बजन्ति' (avitakkitā maccumupabbajantī) में 'अवितक्किता' प्रथमा बहुवचन के रूप में देखे जाने के कारण 'सत्था' पद का प्रथमा बहुवचन होना अवश्य स्वीकार करना चाहिए। इसी प्रकार वत्ता, धाता, गन्ता आदि का भी उसी नियम के अनुसार समझना चाहिए। वैसे ही निरुत्तिपिटक में 'सत्थारे' यह द्वितीया बहुवचन और 'सत्थुस्स, सत्थानं' ये चतुर्थी-षष्ठी एकवचन और बहुवचन के रूप आए हैं, परंतु चूलनिरुत्ति में नहीं आए हैं। वहाँ 'मातापितरो पोसेति, भातरो अतिक्कमति' आदि प्रयोगों के कारण 'सत्थारे' यह द्वितीया बहुवचन का रूप अयुक्त सा प्रतीत होता है। कच्चायन आदि में 'भो सत्थ, भो सत्था' - इस प्रकार ह्रस्व और दीर्घ के भेद से दो संबोधन एकवचन कहे गए हैं। निरुत्तिपिटक में 'भो सत्थ' इस ह्रस्व के द्वारा संबोधन एकवचन कहकर 'भवन्तो सत्थारो' इस आदेश के द्वारा संबोधन बहुवचन कहा गया है। चूलनिरुत्ति में 'भो सत्थ' इस ह्रस्व के द्वारा संबोधन एकवचन कहकर 'भो सत्था' इस दीर्घ के द्वारा संबोधन बहुवचन कहा गया है। यह सब आगम (शास्त्र) में भली-भाँति विचार कर, जिससे विरोध न हो, वैसे ग्रहण करना चाहिए। อิทานิ สตฺถุสทฺทสฺส ยํ รูปนฺตรํ อมฺเหหิ ทิฏฺฐํ, ตํ ทสฺเสสฺสาม – ตถา หิ ‘‘อิเมสํ มหานาม ติณฺณํ สตฺถูนํ เอกา นิฏฺฐา อุทาหุ ปุถุ นิฏฺฐา’’ติ ปาฬิยํ ‘‘สตฺถูน’’นฺติ ปทํ ทิฏฺฐํ, ตสฺมา อยมฺปิ กโม เวทิตพฺโพ ‘‘สตฺถุ, สตฺถุสฺส, สตฺถุโน, สตฺถานํ, สตฺถารานํ, สตฺถูน’’นฺติ. อภิภวิตา, อภิภวิตา, อภิภวิตาโร. อภิภวิตารํ, อภิภวิตาโร. อภิภวิตารา, อภิภวิตุนา, อภิภวิตาเรหิ, อภิภวิตาเรภิ. อภิภวิตุ, อภิภวิตุสฺส, อภิภวิตุโน, อภิภวิตานํ, อภิภวิตารานํ, อภิภวิตูนํ. อภิภวิตารา, อภิภวิตาเรหิ, อภิภวิตาเรภิ. อภิภวิตุ, อภิภวิตุสฺส, อภิภวิตุโน, อภิภวิตานํ, อภิภวิตารานํ. อภิภวิตริ, อภิภวิตาเรสุ. โภ อภิภวิต, โภ อภิภวิตา, ภวนฺโต อภิภวิตาโร. ยถา ปเนตฺถ อภิภวิตุ อิจฺเจตสฺส ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลา สตฺถุนเยน โยชิตา, เอวํ ปริภวิตุอาทีนญฺจ อญฺเญสญฺจ ตํสทิสานํ นามิกปทมาลา สตฺถุนเยน โยเชตพฺพา. เอตฺถญฺญานิ ตํสทิสานิ นาม ‘‘วตฺตา, ธาตา’’อิจฺจาทีนํ ปทานํ วตฺตุธาตุ อิจฺจาทีนิ ปกติรูปานิ. अब सत्थु शब्द का जो अन्य रूप हमारे द्वारा देखा गया है, उसे दिखाएंगे - जैसे कि पालि में 'इमेसं महानाम तिण्णं सत्थूनं एका निट्ठा उदाहु पुथु निट्ठा' यहाँ 'सत्थूनं' पद देखा गया है, इसलिए यह क्रम भी जानना चाहिए - 'सत्थु, सत्थुस्स, सत्थुनो, सत्थानं, सत्थारानं, सत्थूनं'। अभिभविता, अभिभविता, अभिभवितारो। अभिभवितारं, अभिभवितारो। अभिभवितारा, अभिभवितुना, अभिभवितारेहि, अभिभवितारेभि। अभिभवितु, अभिभवितुस्स, अभिभवितुनो, अभिभवितानं, अभिभवितारानं, अभिभवितूनं। अभिभवितारा, अभिभवितारेहि, अभिभवितारेभि। अभिभवितु, अभिभवितुस्स, अभिभवितुनो, अभिभवितानं, अभिभवितारानं। अभिभवितरि, अभिभवितारेसु। भो अभिभविता, भो अभिभविता, भवन्तो अभिभवितारो। जैसे यहाँ 'अभिभवितु' इस प्रकृति रूप की नामिक पदमाला सत्थु के नियम के अनुसार जोड़ी गई है, वैसे ही परिभवितु आदि और अन्य उनके समान शब्दों की नामिक पदमाला सत्थु के नियम के अनुसार जोड़नी चाहिए। यहाँ उनके समान अन्य शब्द 'वत्ता, धाता' आदि पदों के 'वत्तु, धातु' आदि प्रकृति रूप हैं। วตฺตา ธาตา คนฺตา เนตา,ทาตา กตฺตา เจตา ตาตา; เฉตฺตา เภตฺตา หนฺตา เมตา,เชตา โพทฺธา ญาตา โสตา. वत्ता (वक्ता), धाता (धारण करने वाला), गन्ता (जाने वाला), नेता (ले जाने वाला), दाता (देने वाला), कत्ता (कर्ता), चेता (चेतन करने वाला), ताता (रक्षक); छेत्ता (काटने वाला), भेत्ता (भेदने वाला), हन्ता (मारने वाला), मेता (मापने वाला), जेता (जीतने वाला), बोद्धा (जानने वाला), ज्ञाता (जानने वाला), सोता (सुनने वाला)। คชฺชิตา วสฺสิตา ภตฺตา, มุจฺฉิตา ปฏิเสธิตา; ภาสิตา ปุจฺฉิตา ขนฺตา, อุฏฺฐาโตกฺกมิตา ตตา. गज्जिता (गर्जना करने वाला), वस्सिता (वर्षा करने वाला/बोलने वाला), भत्ता (भर्ता/पति), मुच्छिता (मूर्छित होने वाला), पटिसेधिता (प्रतिषेध करने वाला); भासिता (भाषी), पुच्छिता (पूछने वाला), खन्ता (क्षमा करने वाला), उट्ठाता (उठने वाला), ओक्कमिता (उतरने वाला), तता (विस्तार करने वाला)। นตฺตา [Pg.184] ปนตฺตา อกฺขาตา, สหิตา ปฏิเสวิตา; เนตา วิเนตา อิจฺจาที, วตฺตเร สุทฺธกตฺตริ. नत्ता (पौत्र), पनत्ता (प्रपौत्र), अक्खाता (कहने वाला), सहिता (सहन करने वाला), पटिसेविता (सेवन करने वाला); नेता, विनेता इत्यादि शब्द तद्धित के अंतर्गत कहे जाते हैं। อุปฺปาเทตา วิญฺญาเปตา, สนฺทสฺเสตา ปพฺรูเหตา; โพเธตาที จญฺเญ สทฺทา, เญยฺยา เหตุสฺมึ อตฺถสฺมึ. उप्पादेता (उत्पन्न करने वाला), विञ्ञापेता (विज्ञप्ति करने वाला), सन्दस्सेता (संदर्शन कराने वाला), पब्रूहेता (प्रवचन करने वाला); बोधेता आदि अन्य शब्द हेतु (प्रेरणार्थक) अर्थ में जानने चाहिए। กตฺตา ขตฺตา เนตฺตา ภตฺตา, ปิตา ภาตาติเม ปน; กิญฺจิ ภิชฺชนฺติ สุตฺตสฺมึ, ตํ ปเภทํ กเถสฺสหํ. कत्ता (कर्ता), खत्ता (क्षत्ता/सारथी), नेता (नेता), भत्ता (भर्ता), पिता (पिता), भाता (भ्राता) - ये शब्द सूत्र में कुछ भिन्न होते हैं, उस भेद को मैं कहूँगा। สตฺถาติอาทีสุ เกจิ, อุปโยเคน สามินา; สเหว นิจฺจํ วตฺตนฺติ, เนว วตฺตนฺติ เกจิ ตุ. सत्था आदि शब्दों में से कुछ शब्द कर्म (द्वितीया) और स्वामी (षष्ठी) के साथ ही नित्य प्रवृत्त होते हैं, परंतु कुछ वैसे प्रवृत्त नहीं होते। ตตฺร กตฺตุสทฺทาทโย รูปนฺตรวเสน สตฺถุสทฺทโต กิญฺจิ ภิชฺชนฺติ. ตถา หิ ‘‘อุฏฺเฐหิ กตฺเต ตรมาโน, คนฺตฺวา เวสฺสนฺตรํวทา’’ติ เอตฺถ ‘‘กตฺเต’’ติ อิทํ อาลปเนกวจนรูปํ, เอวญฺหิ ‘‘โภ กตฺตา’’ติ รูปโต รูปนฺตรํ นาม. ‘‘เตน หิ โภ ขตฺเต เยน จมฺเปยฺยกา พฺราหฺมณคหปติกา เตนุปสงฺกมา’’ติ เอตฺถ ‘‘ขตฺเต’’ติ อิทญฺจาลปเนกวจนรูปํ. เอวมฺปิ ‘‘โภ ขตฺตา’’ติ รูปโต รูปนฺตรํ นาม. ‘‘เนตฺเต อุชุํ คเต สตี’’ติ เอตฺถ ‘‘เนตฺเต’’ติ อิทํ สตฺตมิยา เอกวจนรูปํ, เอตมฺปิ ‘‘เนตฺตรี’’ติ รูปโต รูปนฺตรํ. ‘‘อาราธยติ ราชานํ, ปูชํ ลภติ ภตฺตุสู’’ติ เอตฺถ ‘‘ภตฺตูสู’’ติ อิทํ สตฺตมิยา พหุวจนรูปํ. ‘‘ภตฺตาเรสู’’ติ รูปโต รูปนฺตรํ, อตฺร ‘‘ภตฺตูสู’’ติ ทสฺสนโต, ‘‘มาตาปิตูสุ ปณฺฑิตา’’ติ เอตฺถ ‘‘ปิตูสู’’ติ ทสฺสนโต จ ‘‘วตฺตูสุ ธาตูสุ คนฺตูสุ เนตูสุ ทาตูสุ กตฺตูสู’’ติ เอวมาทินโยปิ คเหตพฺโพ. อยํ นโย สตฺถุสทฺเทปิ อิจฺฉิตพฺโพ วิย อมฺเห ปฏิภาติ. वहाँ कत्तु शब्द आदि रूपान्तर के कारण सत्थु शब्द से कुछ भिन्न होते हैं। जैसे कि - 'उट्ठेहि कत्ते तरमानो, गन्त्वा वेस्सन्तरं वद' यहाँ 'कत्ते' यह संबोधन एकवचन का रूप है, इस प्रकार 'भो कत्ता' इस रूप से यह रूपान्तर है। 'तेन हि भो खत्ते येन चम्पेय्यका ब्राह्मणगहपतिका तेनुपसङ्कमा' यहाँ 'खत्ते' यह संबोधन एकवचन का रूप है। इस प्रकार 'भो खत्ता' इस रूप से यह रूपान्तर है। 'नेत्ते उजुं गते सति' यहाँ 'नेत्ते' यह सप्तमी एकवचन का रूप है, यह भी 'नेत्तरि' इस रूप से रूपान्तर है। 'आराधयति राजानं, पूजं लभति भत्तूसु' यहाँ 'भत्तूसु' यह सप्तमी बहुवचन का रूप है। 'भत्तारेसु' इस रूप से यह रूपान्तर है; यहाँ 'भत्तूसु' के प्रयोग के कारण और 'मातापितूसु पण्डिता' यहाँ 'पितूसु' के प्रयोग के कारण 'वत्तूसु, धातूसु, गन्तूसु, नेतूसु, दातूसु, कत्तूसु' इत्यादि नियम भी ग्रहण करना चाहिए। यह नियम सत्थु शब्द में भी इष्ट (स्वीकार्य) है, ऐसा हमें प्रतीत होता है। ปิตา, ปิตา, ปิตโร. ปิตรํ, ปิตโร. ปิตรา, ปิตุนา, เปตฺยา, ปิตเรหิ, ปิตเรภิ, ปิตูหิ, ปิตูภิ. ปิตุ, ปิตุสฺส, ปิตุโน[Pg.185], ปิตานํ, ปิตรานํ, ปิตูนํ. ปิตรา, เปตฺยา, ปิตเรหิ, ปิตเรภิ, ปิตูหิ, ปิตูภิ. ปิตุ, ปิตุสฺส, ปิตุโน, ปิตานํ, ปิตรานํ, ปิตูนํ. ปิตริ, ปิตเรสุ, ปิตูสุ. โภ ปิต, โภ ปิตา, ภวนฺโต ปิตโร. เอตฺถ ปน ‘‘เปตฺยา, ปิตูน’’นฺติ อิมํ นยทฺวยํ วชฺเชตฺวา ภาตุสทฺทสฺส จ ปทมาลา โยเชตพฺพา. ตตฺถ ‘‘มตฺยา จ เปตฺยา จ กตํ สุสาธุ, อนุญฺญาโตสิ มาตาปิตูหิ, มาตาปิตูนํ อจฺจเยนา’’ติ จ ทสฺสนโต ปิตุสทฺทสฺส ‘‘เปตฺยา, ปิตูหิ, ปิตูภิ. ปิตูน’’นฺติ รูปเภโท จ, ‘‘ปิตโร’’ อิจฺจาทีสุ รสฺสตฺตญฺจ สตฺถุสทฺทโต วิเสโส. ตตฺถ จ ‘‘เปตฺยา’’ติ อิทํ ‘‘ชนฺตุโย, เหตุโย, เหตุยา, อธิปติยา’’ติ ปทานิ วิย อจินฺเตยฺยํ ปุลฺลิงฺครูปนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. पिता, पिता, पितरो (प्रथमा)। पितरं, पितरो (द्वितीया)। पितरा, पितुना, पेत्या, पितरेहि, पितरेभि, पितूहि, पितूभि (तृतीया)। पितु, पितुस्स, पितुनो, पितानं, पितरानं, पितूनं (चतुर्थी)। पितरा, पेत्या, पितरेहि, पितरेभि, पितूहि, पितूभि (पञ्चमी)। पितु, पितुस्स, पितुनो, पितानं, पितरानं, पितूनं (षष्ठी)। पितरि, पितरेसु, पितूसु (सप्तमी)। भो पित, भो पिता, भवन्तो पितरो (सम्बोधन)। यहाँ 'पेत्या' और 'पितूनं' इन दो नयों (रूपों) को छोड़कर 'भातु' (भाई) शब्द की पदमाला जोड़नी चाहिए। वहाँ 'मत्या च पेत्या च कतं सुसाधु' (माता और पिता द्वारा किया गया बहुत अच्छा है), 'अनुञ्ञातोसि मातापितूहि' (माता-पिता द्वारा अनुज्ञात हो), 'मातापितूनं अच्चयेन' (माता-पिता के देहान्त के बाद) इत्यादि प्रयोगों के कारण 'पितु' शब्द के 'पेत्या, पितूहि, पितूभि, पितूनं' ये रूप-भेद और 'पितरो' आदि में ह्रस्वत्व 'सत्थु' शब्द से विशेषता है। वहाँ 'पेत्या' यह 'जन्तुयो, हेतुयो, हेतुया, अधिपतिया' इन पदों की तरह अचिन्त्य पुल्लिंग रूप समझना चाहिए। โจทนา โสธนา จาตฺร ภวติ – สตฺถา ปิตา อิจฺเจวมาทีนิ นิปฺผนฺนตฺตมุปาทาย อาการนฺตานีติ จ, ปฐมํ ฐเปตพฺพํ ปกติรูปมุปาทาย อุการนฺตานีติ จ ตุมฺเห ภณถ, ‘‘เหตุ สตฺถารทสฺสนํ. อมาตาปิตรสํวฑฺโฒ. กตฺตารนิทฺเทโส’’ติอาทีสุ ปน สตฺถาร อิจฺจาทีนิ กถํ ตุมฺเห ภณถาติ? เอตานิปิ มยํ ปกติรูปมุปาทาย อุการนฺตานีติ ภณามาติ. นนุ จ โภ เอตานิ อการนฺตานีติ? น, อุการนฺตานิเยว ตานิ. นนุ จ โภ โย อํ นาทีนิ ปรภูตานิ วจนานิ น ทิสฺสนฺติ เยหิ อุการนฺตสทฺทานมนฺตสฺส อาราเทโส สิยา, ตสฺมา อการนฺตานีติ? น, อีทิเส ฐาเน ปรภูตานํ โย อํ นาทีนํ วจนานมโนกาสตฺตา. ตถา หิ สมาสวิสโย เอโส. สมาสวิสยสฺมิญฺหิ อจินฺเตยฺยานิปิ รูปานิ ทิสฺสนฺตีติ. เอวํ สนฺเตปิ โภ ‘‘คามโต นิกฺขมตี’’ติ ปโยคสฺส วิย อสมาสวิสเย ‘‘สตฺถารโต สตฺถารํ คจฺฉตี’’ติ นิทฺเทสปาฬิทสฺสนโต ‘‘เหตุ [Pg.186] สตฺถารทสฺสน’’นฺติอาทีสุ สตฺถาร อิจฺจาทีนิ อการนฺตานีติ จินฺเตตพฺพานีติ? น จินฺเตตพฺพานิ ‘‘สตฺถารโต สตฺถารํ คจฺฉตี’’ติ เอตฺถาปิ อุการนฺตตฺตา. เอตฺถ หิ อสมาสตฺเตปิ โตปจฺจยํ ปฏิจฺจ สตฺถุสทฺทสฺส อุกาโร อาราเทสํ ลภติ. ยานิ ปน ตุมฺเห อุการสฺส อาราเทสนิมิตฺตานิ โย อํนาทีนิ วจนานิ อิจฺฉถ, ตานิ อีทิเส ฐาเน วิญฺญูนํ ปมาณํ น โหนฺติ. กานิ ปน โหนฺตีติ เจ? อสมาสวิสเย โตปจฺจโย จ สมาสวิสเย ปรปทานิ จ ปรปทาภาเว สฺยาทิวิภตฺติโย จาติ อิมาเนว อีทิเส ฐาเน เอกนฺเตน ปมาณํ โหนฺติ. ตถา หิ ธมฺมปทฏฺฐกถายํ ‘‘ยาวเทว อนตฺถาย, ญตฺตํ พาลสฺส ชายตี’’ติ อิมิสฺสา ปาฬิยา อตฺถสํวณฺณนายํ ‘‘อยํ นิมฺมาตาปิตโรติ อิมสฺมึ ปหเฏ ทณฺโฑ นตฺถี’’ติ เอตฺถ นิมฺมาตาปิตโรติ อิมสฺส สมาสวิสยตฺตา สิมฺหิ ปเร อุกาโร อาราเทสํ ลภติ, ตโต สิสฺส โอการาเทโส, อิจฺเจตํ ปทํ ปกติรูปวเสน อุการนฺตํ ภวติ. นิปฺผนฺนตฺตมุปาทาย ‘‘ปุริโส, อุรโค’’ติ ปทานิ วิย โอการนฺตญฺจ ภวติ. อยํ ปเนตฺถ สมาสวิคฺคโห ‘‘มาตา จ ปิตา จ มาตาปิตโร, นตฺถิ มาตาปิตโร เอตสฺสาติ นิมฺมาตาปิตโร’’ติ. ปกติรูปวเสน หิ ‘‘นิมฺมาตาปิตุ’’ อิติ ฐิเต สิวจนสฺมึ ปเร อุการสฺส อาราเทโส โหติ. กตฺถจิ ปน ธมฺมปทฏฺฐกถาโปตฺถเก ‘‘อยํ นิมฺมาตาปิติโก’’ติ ปาโฐ ทิสฺสติ, เอโส ปน ‘‘อยํ นิมฺมาตาปิตโร’’ติ ปทสฺส อยุตฺตตํ มญฺญมาเนหิ ฐปิโตติ มญฺญาม, น โส อยุตฺโต อฏฺฐกถาปาโฐ. โส หิ อุมงฺคชาตกฏฺฐกถายํ เอกปิตโรติ สิมฺหิ อาราเทสปโยเคน สเมติ. ตถา หิ – यहाँ आक्षेप और समाधान होता है - 'सत्था', 'पिता' इत्यादि सिद्ध होने के कारण आकारान्त हैं, और आप कहते हैं कि मूल रूप के आधार पर ये उकारान्त हैं। 'हेतु सत्थारदस्सनं', 'अमातापितरसंवड्ढो', 'कत्तारनिद्देसो' इत्यादि में 'सत्थार' आदि को आप कैसे कहते हैं? इन्हें भी हम मूल रूप के आधार पर उकारान्त ही कहते हैं। क्या ये आकारान्त नहीं हैं? नहीं, वे उकारान्त ही हैं। क्या 'यो', 'अं' आदि विभक्ति प्रत्यय परे होने पर उकारान्त शब्दों के अन्त में 'आर' आदेश नहीं देखा जाता, इसलिए क्या वे आकारान्त नहीं हैं? नहीं, ऐसे स्थान पर परे होने वाले 'यो', 'अं' आदि विभक्तियों का अवकाश नहीं होता। क्योंकि यह समास का विषय है। समास के विषय में अचिन्त्य रूप भी देखे जाते हैं। ऐसा होने पर भी, जैसे 'गामतो निक्खमति' प्रयोग के समान असमस्त विषय में 'सत्थारतो सत्थारं गच्छति' इस निर्देश पालि के दर्शन से 'हेतु सत्थारदस्सनं' आदि में 'सत्थार' आदि को आकारान्त मानना चाहिए? नहीं मानना चाहिए, क्योंकि 'सत्थारतो सत्थारं गच्छति' यहाँ भी उकारान्तता ही है। यहाँ समास न होने पर भी 'तो' प्रत्यय के कारण 'सत्थु' शब्द का उकार 'आर' आदेश प्राप्त करता है। जिन 'यो', 'अं' आदि विभक्तियों को आप उकार के 'आर' आदेश का निमित्त मानते हैं, वे ऐसे स्थान पर विद्वानों के लिए प्रमाण नहीं हैं। तो प्रमाण क्या हैं? असमस्त विषय में 'तो' प्रत्यय, समस्त विषय में पर-पद, और पर-पद के अभाव में 'सि' आदि विभक्तियाँ ही ऐसे स्थान पर निश्चित रूप से प्रमाण होती हैं। जैसे धम्मपद अट्ठकथा में 'यावदेव अनत्थाय, ञत्तं बालस्स जायती' इस पालि की अर्थ-व्याख्या में 'अयं निम्मातापितरोति इमस्मिं पहटे दण्डो नत्थी' यहाँ 'निम्मातापितरो' यह समास का विषय होने के कारण 'सि' परे रहते उकार 'आर' आदेश प्राप्त करता है, फिर 'सि' का 'ओ' आदेश होता है, इस प्रकार यह पद मूल रूप से उकारान्त होता है। सिद्ध होने पर 'पुरिसो, उरगो' पदों की तरह ओकारान्त भी होता है। यहाँ यह समास-विग्रह है - 'माता च पिता च मातापितरो, नत्थि मातापितरो एतस्सति निम्मातापितरो'। मूल रूप में 'निम्मातापितु' रहने पर 'सि' वचन परे होने पर उकार का 'आर' आदेश होता है। कहीं-कहीं धम्मपद अट्ठकथा की पुस्तक में 'अयं निम्मातापितिको' यह पाठ दिखता है, वह 'अयं निम्मातापितरो' इस पद को अयुक्त मानते हुए किसी ने रखा होगा ऐसा हम मानते हैं, वह अट्ठकथा पाठ अयुक्त नहीं है। वह उमङ्ग जातक अट्ठकथा में 'एकपितरो' इस 'सि' में 'आर' आदेश के प्रयोग के साथ मेल खाता है। जैसे कि - ‘‘ยถาปิ [Pg.187] นิยโก ภาตา,สอุทริโย เอกมาตุโก; เอวํ ปญฺจาลจนฺโท เต,ทยิตพฺโพ รเถสภา’’ติ "जैसे अपना सगा भाई, एक ही माँ से उत्पन्न सहोदर होता है; वैसे ही यह पाञ्चालचण्ड तुम्हारे लिए प्रिय होना चाहिए, हे रथेसभ!" อิมิสฺสา ปาฬิยา อตฺถํ สํวณฺเณนฺเตหิ ปาฬินยญฺญูหิ ครูหิ ‘‘นิยโกติ อชฺฌตฺติโก เอกปิตโร เอกมาตุยา ชาโต’’ติ สิมฺหิ อาราเทสปโยครจนา กตา. น เกวลญฺจ สิมฺหิ อาราเทเส ปุลฺลิงฺคปฺปโยโคเยวมฺเหหิ ทิฏฺโฐ, อถ โข อิตฺถิลิงฺคปฺปโยโคปิ สาสเน ทิฏฺโฐ. ตถา หิ วินยปิฏเก จูฬวคฺเค ‘‘อสฺสมณี โหติ อสกฺยธีตรา’’ติ ปทํ ทิสฺสติ. อยํ ปเนตฺถ สมาสวิคฺคโห ‘‘สกฺยกุเล อุปฺปนฺนตฺตา สกฺยสฺส ภควโต ธีตา สกฺยธีตรา, น สกฺยธีตรา อสกฺยธีตรา’’ติ. อิธาปิ สิมฺหิ ปเร อุการสฺส อาราเทโส กโต, อิตฺถิลิงฺคภาวสฺส อิจฺฉิตตฺตา อาปจฺจโย, ตโต สิโลโป จ ทฏฺฐพฺโพ. เอวํ สมาสปทตฺเต สตฺถุ ปิตุ กตฺตุสทฺทานํ นามิกปทมาลายํ วุตฺตรูปโต โกจิ โกจิ รูปวิเสโส ทิสฺสติ. อญฺเญสมฺปิ รูปวิเสโส นยญฺญุนา มคฺคิตพฺโพ สุตฺตนฺเตสุ. โก หิ นาม สมตฺโถ นิสฺเสสโต พุทฺธวจนสาคเร สํกิณฺณานิ วิจิตฺรานิ ปณฺฑิตชนานํ หทยวิมฺหาปนกรานิ ปทรูปรตนานิ สมุทฺธริตฺวา ทสฺเสตุํ, ตสฺมา อมฺเหหิ อปฺปมตฺตกานิเยว ทสฺสิตานิ. इस पालि का अर्थ वर्णन करते हुए पालि-नय के ज्ञाता गुरुओं ने 'नियकोति अज्झत्तिको एकपितरो एकमातुया जातो' यहाँ 'सि' में 'आर' आदेश का प्रयोग किया है। न केवल 'सि' में 'आर' आदेश का पुल्लिंग प्रयोग हमने देखा है, बल्कि शासन में स्त्रीलिंग प्रयोग भी देखा गया है। जैसे विनय पिटक के चुल्लवग्ग में 'असमणी होति असक्यधीतरा' पद दिखता है। यहाँ यह समास-विग्रह है - 'सक्यकुले उत्पन्न होने के कारण शाक्य बुद्ध की पुत्री शाक्यधीतरा, जो शाक्यधीतरा नहीं है वह अशाक्यधीतरा'। यहाँ भी 'सि' परे रहते उकार का 'आर' आदेश किया गया है, स्त्रीलिंग की विवक्षा होने से 'आ' प्रत्यय और फिर 'सि' का लोप समझना चाहिए। इस प्रकार समास पद होने पर 'सत्थु', 'पितु', 'कत्तु' शब्दों की नामिक पदमाला में कहे गए रूपों से कुछ-कुछ रूप-विशेष दिखाई देते हैं। अन्य रूप-विशेषों को भी नय-ज्ञाताओं द्वारा सुत्तन्तों में खोजना चाहिए। बुद्ध-वचन रूपी समुद्र में बिखरे हुए, विद्वानों के हृदय को विस्मित करने वाले विचित्र पद-रूप रूपी रत्नों को पूर्णतः निकाल कर दिखाने में कौन समर्थ है? इसलिए हमने थोड़े ही दिखाए हैं। อทนฺธชาติโก วิญฺญุ-ชาติโก สตตํ อิธ; โยคํ กโรติ เจ สตฺถุ, ปาฬิยํ โส น กงฺขติ. जो मन्द बुद्धि वाला नहीं है, जो बुद्धिमान है, यदि वह यहाँ निरन्तर शास्ता की पालि में योग (अभ्यास) करता है, तो वह संशय नहीं करता। เย ปนิธ อมฺเหหิ ‘‘สตฺถา, อภิภวิตา, วตฺตา, กตฺตา’’ทโย สทฺทา ปกาสิตา, เตสุ เกจิ อุปโยควจเนน สทฺธึ นิจฺจํ วตฺตนฺติ ‘‘ปุจฺฉิตา, โอกฺกมิตา’’อิจฺจาทโย. ตถา หิ ‘‘อภิชานาสิ [Pg.188] โน ตฺวํ มหาราช อิมํ ปญฺหํ อญฺเญ สมณพฺราหฺมเณ ปุจฺฉิตา. นิทฺทํ โอกฺกมิตา’’ติอาทิปโยคา พหู ทิสฺสนฺติ. เกจิ สามิวจเนน สทฺธึ นิจฺจํ วตฺตนฺติ ‘‘อภิภวิตา, วตฺตา’’อิจฺจาทโย. ตถา หิ ‘‘ปจฺจามิตฺตานํ อภิภวิตา, ตสฺส ภวนฺติ วตฺตาโร. อมตสฺส ทาตา. ปริสฺสยานํ สหิตา. อนุปฺปนฺนสฺส มคฺคสฺส, อุปฺปาเทตา นรุตฺตโม’’ติอาทิปโยคา พหู ทิสฺสนฺติ. เกจิ ปน อุปโยควจเนนปิ สทฺธึ เนว วตฺตนฺติ นิโยคา ปญฺญตฺติยํ ปวตฺตนโต. ตํ ยถา? ‘‘สตฺถา, ปิตา, ภาตา, นตฺตา’’อิจฺจาทโย. เอตฺถ ปน ‘‘อุปโยควจเนน สทฺธึ นิจฺจํ วตฺตนฺตี’’ติอาทิวจนํ กมฺมภูตํ อตฺถํ สนฺธาย กตนฺติ เวทิตพฺพํ. यहाँ जो हमने 'सत्था (शास्ता), अभिभविता (अभिभावक), वत्ता (वक्ता), कत्ता (कर्ता)' आदि शब्द प्रकाशित किए हैं, उनमें से कुछ 'पुच्छिता (पूछने वाला), ओक्कमिता (उतरने वाला)' आदि शब्द सदा द्वितीया विभक्ति (उपयोगवचन) के साथ प्रयुक्त होते हैं। जैसे कि 'अभिजानासि नो त्वं महाराज इमं पञ्हं अञ्ञे समणब्राह्मणे पुच्छिता' (हे महाराज! क्या आप जानते हैं कि आपने अन्य श्रमण-ब्राह्मणों से यह प्रश्न पूछा था?) और 'निद्दं ओक्कमिता' (नींद में उतरने वाला) आदि अनेक प्रयोग देखे जाते हैं। कुछ शब्द 'अभिभविता, वत्ता' आदि सदा षष्ठी विभक्ति (सामिवचन) के साथ प्रयुक्त होते हैं। जैसे कि 'पच्चामित्तानं अभिभविता' (शत्रुओं का विजेता), 'तस्स भवन्ति वत्तारो' (उसके वक्ता होते हैं), 'अमतस्स दाता' (अमृत का दाता), 'परिसयानं सहिता' (उपद्रवों को सहने वाला), 'अनुप्पन्नस्स मग्गस्स उप्पादेता नरुत्तमो' (अनुत्पन्न मार्ग को उत्पन्न करने वाला नरोत्तम) आदि अनेक प्रयोग देखे जाते हैं। परन्तु कुछ शब्द संज्ञा (प्रज्ञप्ति) में प्रवृत्त होने के कारण द्वितीया विभक्ति के साथ बिल्कुल प्रयुक्त नहीं होते हैं। जैसे कि 'सत्था, पिता, भाता, नत्ता' आदि। यहाँ 'द्वितीया विभक्ति के साथ सदा प्रयुक्त होते हैं' आदि कथन कर्मभूत अर्थ को ध्यान में रखकर कहे गए हैं, ऐसा समझना चाहिए। เอวํ อุการนฺตตาปกติกานํ อาการนฺตปทานํ ปวตฺตึ วิทิตฺวา สทฺเทสุ อตฺเถสุ จ โกสลฺลมิจฺฉนฺเตหิ ปุน ลิงฺคอนฺตวเสน ‘‘สตฺถา, สตฺโถ, สตฺถ’’นฺติ ติกํ กตฺวา ปทานมตฺโถ จ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลา จ ปทานํ สทิสาสทิสตา จ ววตฺถเปตพฺพา. ตตฺร หิ ‘‘สตฺถา’’ติ อิทํ ปฐมํ อุการนฺตตาปกติยํ ฐตฺวา ปจฺฉา อาการนฺตภูตํ ปุลฺลิงฺคํ, ‘‘สตฺโถ’’ติ อิทํ ปฐมํ อการนฺตตาปกติยํ ฐตฺวา ปจฺฉา โอการนฺตภูตํ ปุลฺลิงฺคํ, ‘‘สตฺถ’’นฺติทํ ปน ปฐมํ อการนฺตตาปกติยํ ฐตฺวา ปจฺฉา นิคฺคหีตนฺตภูตํ นปุํสกลิงฺคํ. ตตฺร สตฺถาติ สเทวกํ โลกํ สาสติ อนุสาสตีติ สตฺถา, โก โส? ภควา. สตฺโถติ สห อตฺเถนาติ สตฺโถ, ภณฺฑมูลํ คเหตฺวา วาณิชฺชาย เทสนฺตรํ คโต ชนสมูโห. สตฺถนฺติ สาสติ อาจิกฺขติ อตฺเถ เอเตนาติ สตฺถํ, พฺยากรณาทิคนฺโถ, อถ วา สสติ หึสติ สตฺเต เอเตนาติ สตฺถํ, อสิอาทิ. ‘‘สตฺถา, สตฺถา, สตฺถาโร. สตฺถารํ, สตฺถาโร’’ติ ปุเร วิย [Pg.189] ปทมาลา. ‘‘สตฺโถ, สตฺถา. สตฺถํ, สตฺเถ’’ติ ปุริสนเยน ปทมาลา. ‘‘สตฺถํ, สตฺถานิ, สตฺถา. สตฺถํ, สตฺถานิ, สตฺเถ’’ติ นปุํสเก วตฺตมาน จิตฺตนเยน ปทมาลา โยเชตพฺพา. เอวํ ติธา ภินฺนาสุ นามิกปทมาลาสุ ปทานํ สทิสาสทิสตา ววตฺถเปตพฺพา. इस प्रकार उकारान्त प्रकृति वाले आकारान्त पदों की प्रवृत्ति को जानकर, शब्दों और अर्थों में कुशलता चाहने वालों को पुनः लिंग और अन्त के भेद से 'सत्था, सत्थो, सत्थं'—यह त्रिक बनाकर पदों का अर्थ, प्रकृति रूप की शब्द-रूप तालिका (नामिक पदमाला) और पदों की समानता एवं असमानता का निर्धारण करना चाहिए। वहाँ 'सत्था' यह पहले उकारान्त प्रकृति में रहकर बाद में आकारान्त हुआ पुल्लिंग शब्द है; 'सत्थो' यह पहले अकारान्त प्रकृति में रहकर बाद में ओकारान्त हुआ पुल्लिंग शब्द है; और 'सत्थं' यह पहले अकारान्त प्रकृति में रहकर बाद में निग्गहीत (अनुस्वार) अन्त वाला नपुंसक लिंग शब्द है। वहाँ 'सत्था' का अर्थ है—जो देवों सहित लोक को अनुशासित करता है, वह 'सत्था' (शास्ता) है; वह कौन है? भगवान। 'सत्थो' का अर्थ है—जो अर्थ (धन) के साथ हो, वह 'सत्थो' (सार्थ/काफिला) है, अथवा मूल पूँजी लेकर व्यापार के लिए देशान्तर गया हुआ जन-समूह। 'सत्थं' का अर्थ है—जिसके द्वारा अर्थ को सिखाया या बताया जाता है, वह 'सत्थं' (शास्त्र) है, जैसे व्याकरण आदि ग्रन्थ; अथवा जिसके द्वारा प्राणियों की हिंसा की जाती है, वह 'सत्थं' (शस्त्र) है, जैसे तलवार आदि। 'सत्था, सत्था, सत्थारो। सत्थारं, सत्थारो'—यह पहले की तरह पदमाला है। 'सत्थो, सत्था। सत्थं, सत्थे'—यह 'पुरिस' के समान पदमाला है। 'सत्थं, सत्थानि, सत्था। सत्थं, सत्थानि, सत्थे'—यह नपुंसक लिंग में प्रयुक्त 'चित्त' के समान पदमाला जोड़नी चाहिए। इस प्रकार तीन प्रकार से भिन्न शब्द-रूप तालिकाओं में पदों की समानता और असमानता का निर्धारण करना चाहिए। สตฺถา ติฏฺฐติ สพฺพญฺญู, สตฺถา ยนฺติ ธนตฺถิกา; สตฺถา อเปติ ปุริโส, โภนฺโต สตฺถา ททาถ สํ. सर्वज्ञ शास्ता खड़े हैं, धन के इच्छुक सार्थ (काफिले) जाते हैं; पुरुष शस्त्र को हटाता है, हे महानुभावों! (शास्ताओं/सार्थों/शस्त्रों) अपना-अपना प्रदान करें। เอวํ สุติสามญฺญวเสน สทิสตา ภวติ. इस प्रकार श्रुति-सामान्यता (ध्वनि की समानता) के कारण समानता होती है। สตฺถํ ยํ ติขิณํ เตน, สตฺโถ กตฺวาน กปฺปิยํ; ผลํ สตฺถุสฺส ปาทาสิ, สตฺถา ตํ ปริภุญฺชติ. जो तीक्ष्ण शस्त्र है उससे, सार्थ (व्यापारी) ने कप्पिय (उपयुक्त वस्तु) बनाकर; शास्ता को फल प्रदान किया, शास्ता उसका परिभोग करते हैं। เอวํ อสุติสามญฺญวเสน อสทิสตา ภวติ, ตถา ลิงฺคอนฺตวเสน. ‘‘เจตา เจโต’’ติ จ ‘‘ตาตา ตาโต’’ติ จ ทุกํ กตฺวา ปทานมตฺโถ จ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลา จ ปทานํ สทิสาสทิสตา จ ววตฺถเปตพฺพา. इस प्रकार श्रुति-असामान्यता के कारण असमानता होती है, वैसे ही लिंग और अन्त के भेद से भी। 'चेता चेतो' और 'ताता तातो'—यह द्विक बनाकर पदों का अर्थ, प्रकृति रूप की शब्द-रूप तालिका और पदों की समानता एवं असमानता का निर्धारण करना चाहिए। ตตฺร หิ ‘‘เจตา’’ติ ปฐมํ อุการนฺตตาปกติยํ ฐตฺวา ปจฺฉา อาการนฺตภูตํ ปุลฺลิงฺคํ, ตถา ‘‘ตาตา’’ติ ปทมฺปิ. ‘‘เจโต’’ติ อิทํ ปน ปฐมํ อการนฺตตาปกติยํ ฐตฺวา ปจฺฉา โอการนฺตภูตํ ปุลฺลิงฺคํ, ตถา ‘‘ตาโต’’ติ ปทมฺปิ. ตตฺร เจตาติ จิโนติ ราสึ กโรตีติ เจตา, ปาการจินนโก ปุคฺคโล, อิฏฺฐกวฑฺฒกีติ อตฺโถ. เจโตติ จิตฺตํ, เอวํนามโก วา ลุทฺโท. เอตฺถ จ จิตฺตํ ‘‘เจตยติ จินฺเตตี’’ติ อตฺถวเสน เจโต, ลุทฺโท ปน ปณฺณตฺติวเสน. ตาตาติ ตายตีติ ตาตา. ‘‘อฆสฺส ตาตา หิตสฺส วิธาตา’’ติสฺส ปโยโค. ‘‘ตาโต’’ติ เอตฺถาปิ ตายตีติ ตาโต, ปุตฺตานํ ปิตูสุ, ปิตรานํ ปุตฺเตสุ, อญฺเญสญฺจ อญฺเญสุ ปิยปุคฺคเลสุ วตฺตพฺพโวหาโร [Pg.190] เอโส. ‘‘โส นูน กปโณ ตาโต, จิรํ รุจฺจติ อสฺสเม. กิจฺเฉนาธิคตา โภคา, เต ตาโต วิธมํ ธมํ. เอหิ ตาตา’’ติอาทีสุ จสฺส ปโยโค เวทิตพฺโพ. ‘‘เจตา, เจตา, เจตาโร. เจตารํ, เจตาโร’’ติ สตฺถุนเยน ปทมาลา. ‘‘เจโต, เจตา. เจตํ, เจเต. เจตสา, เจเตนา’’ติ มโนคณนเยน เญยฺยา. อยํ จิตฺตวาจกสฺส เจตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. ‘‘เจโต, เจตา. เจตํ, เจเต. เจเตนา’’ติ ปุริสนเยน เญยฺยา. อยํ ปณฺณตฺติวาจกสฺส เจตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. ‘‘ตาตา, ตาตา, ตาตาโร. ตาตาร’’นฺติ สตฺถุนเยน เญยฺยา. ‘‘ตาโต, ตาตา, ตาต’’นฺติ ปุริสนเยน เญยฺยา. เอวมิมาสุปิ นามิกปทมาลาสุ ปทานํ สทิสาสทิสตา ววตฺถเปตพฺพา, ตถา ลิงฺคอนฺตวเสน ‘‘ญาตา, ญาโต, ญาตํ, ญาตา’’ติ จตุกฺกํ กตฺวา ปทานมตฺโถ จ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลา จ ปทานํ สทิสาสทิสตา จ ววตฺถเปตพฺพา. वहाँ 'चेता' यह पहले उकारान्त प्रकृति में रहकर बाद में आकारान्त हुआ पुल्लिंग शब्द है, वैसे ही 'ताता' पद भी। 'चेतो' यह पहले अकारान्त प्रकृति में रहकर बाद में ओकारान्त हुआ पुल्लिंग शब्द है, वैसे ही 'तातो' पद भी। वहाँ 'चेता' का अर्थ है—जो चयन करता है या राशि बनाता है, वह 'चेता' है, अर्थात् राजमिस्त्री (ईंटों का काम करने वाला)। 'चेतो' का अर्थ है—चित्त, अथवा इस नाम का कोई व्याध (शिकारी)। यहाँ चित्त 'चेतयति चिन्तेति' इस अर्थ के कारण 'चेतो' है, जबकि व्याध संज्ञा (प्रज्ञप्ति) के कारण। 'ताता' का अर्थ है—जो रक्षा करता है, वह 'ताता' (त्राता) है। 'अघस्स ताता हितस्स विधाता' इसका प्रयोग है। 'तातो' यहाँ भी 'तायति' (रक्षा करता है) इस अर्थ में 'तातो' है; पिताओं द्वारा पुत्रों के लिए, पुत्रों द्वारा पिताओं के लिए और अन्य प्रिय व्यक्तियों के लिए एक-दूसरे के प्रति यह संबोधन है। 'वह बेचारा पिता निश्चय ही आश्रम में देर तक रोता है। कठिनाई से प्राप्त भोगों को पिता नष्ट कर रहा है। हे तात! आओ' आदि में इसका प्रयोग समझना चाहिए। 'चेता, चेता, चेतारो। चेतारं, चेतारो'—यह 'सत्थु' के समान पदमाला है। 'चेतो, चेता। चेतं, चेते। चेतसा, चेतेन'—यह मनोगण के समान जाननी चाहिए। यह चित्त-वाचक 'चेत' शब्द की पदमाला है। 'चेतो, चेता। चेतं, चेते। चेतेन'—यह 'पुरिस' के समान जाननी चाहिए। यह संज्ञा-वाचक 'चेत' शब्द की पदमाला है। 'ताता, ताता, तातारो। तातारं'—यह 'सत्थु' के समान जाननी चाहिए। 'तातो, ताता, तात'—यह 'पुरिस' के समान जाननी चाहिए। इस प्रकार इन पदमालाओं में भी पदों की समानता और असमानता का निर्धारण करना चाहिए। वैसे ही लिंग और अन्त के भेद से 'ञाता, ञातो, ञातं, ञाता'—यह चतुष्क बनाकर पदों का अर्थ, प्रकृति रूप की पदमाला और पदों की समानता एवं असमानता का निर्धारण करना चाहिए। ตตฺร หิ ‘‘ญาตา’’ติ อิทํ ปฐมํ อุการนฺตตาปกติยํ ฐตฺวา ปจฺฉา อาการนฺตภูตํ ปุลฺลิงฺคํ. ‘‘ญาโต ญาต’’นฺติ อิมานิ ยถากฺกมํ ปฐมํ อการนฺตตาปกติยํ ฐตฺวา ปจฺโฉการนฺตนิคฺคหีตนฺตภูตานิ วาจฺจลิงฺเคสุ ปุนฺนปุํสกลิงฺคานิ. ตถา หิ ‘‘ญาโต อตฺโถ สุขาวโห. ญาตเมตํ กุรงฺคสฺสา’’ติ เนสํ ปโยคา ทิสฺสนฺติ. ‘‘ญาตา’’ติ อิทํ ปน ปฐมํ อาการนฺตตาปกติยํ ฐตฺวา ปจฺฉาปิ อาการนฺตภูตํ วาจฺจลิงฺเคสุ อิตฺถิลิงฺคํ. ตถา หิ ‘‘เอสา อิตฺถิมยา ญาตา’’ติ ปโยโค. ตตฺร ปุลฺลิงฺคปกฺเข ‘‘ชานาตีติ ญาตา’’ติ กตฺตุการกวตฺตมานกาลวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ. อิตฺถิลิงฺคาทิปกฺเข ‘‘ญายิตฺถาติ ญาตา ญาโต [Pg.191] ญาต’’นฺติ กมฺมการกาตีตกาลวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ. เอส นโย อญฺญตฺถาปิ ยถาสมฺภวํ ทฏฺฐพฺโพ. ‘‘ญาตา, ญาตา, ญาตาโร. ญาตาร’’นฺติ สตฺถุนเยน เญยฺยา. ‘‘ญาโต, ญาตา. ญาต’’นฺติ ปุริสนเยน เญยฺยา. ‘‘ญาตํ, ญาตานิ, ญาตา. ญาตํ, ญาตานิ, ญาเต’’ติ วกฺขมานจิตฺตนเยน เญยฺยา. ‘‘ญาตา, ญาตา, ญาตาโย. ญาตํ, ญาตา, ญาตาโย’’ติ วกฺขมานกญฺญานเยน เญยฺยา. เอวมิมาสุปิ นามิกปทมาลาสุ ปทานํ สทิสาสทิสตา ววตฺถเปตพฺพา. อญฺเญสุปิ ฐาเนสุ ยถารหํ อิมินา นเยน สทิสาสทิสตา อุปปริกฺขิตพฺพา. วตฺตา ธาตา คนฺตาทีนมฺปิ ‘‘วทตีติ วตฺตา, ธาเรตีติ ธาตา, คจฺฉตีติ คนฺตา’’ติอาทินา ยถาสมฺภวํ นิพฺพจนานิ เญยฺยานิ. वहाँ 'ञाता' (ñātā) यह पहले उकारान्त प्रकृति में स्थित होकर बाद में आकारान्त बना पुल्लिंग है। 'ञातो, ञातं' ये क्रमशः पहले अकारान्त प्रकृति में स्थित होकर बाद में ओकारान्त और निग्गहीत-अन्त बने वाच्यलिंगों में पुल्लिंग और नपुंसक लिंग हैं। क्योंकि उनके प्रयोग 'ञातो अत्थो सुखावहो' (ज्ञात अर्थ सुखद होता है) और 'ञातमेतं कुरङ्गस्स' (यह मृग को ज्ञात है) देखे जाते हैं। 'ञाता' यह पहले आकारान्त प्रकृति में स्थित होकर बाद में भी आकारान्त बना वाच्यलिंगों में स्त्रीलिंग है। क्योंकि 'एसा इत्थिमया ञाता' (यह स्त्री मेरे द्वारा ज्ञात है) ऐसा प्रयोग है। वहाँ पुल्लिंग पक्ष में 'जानातीति ञाता' (जानता है इसलिए ज्ञाता है) इस प्रकार कर्तृकारक वर्तमान काल के अनुसार अर्थ लेना चाहिए। स्त्रीलिंग आदि के पक्ष में 'ञायित्थाति ञाता, ञातो, ञातं' (जाना गया इसलिए ज्ञात है) इस प्रकार कर्मकारक भूतकाल के अनुसार अर्थ लेना चाहिए। यही नियम अन्यत्र भी यथासंभव देखना चाहिए। 'ञाता, ञाता, ञातारो। ञातारं' को 'सत्थु' के समान समझना चाहिए। 'ञातो, ञाता। ञातं' को 'पुरिस' के समान समझना चाहिए। 'ञातं, ञातानि, ञाता। ञातं, ञातानि, ञाते' को कहे जाने वाले 'चित्त' के समान समझना चाहिए। 'ञाता, ञाता, ञातायो। ञातं, ञाता, ञातायो' को कहे जाने वाले 'कञ्ञा' के समान समझना चाहिए। इस प्रकार इन नामिक पदमालाओं में भी पदों की समानता और असमानता निर्धारित करनी चाहिए। अन्य स्थानों पर भी यथायोग्य इस पद्धति से समानता और असमानता की परीक्षा करनी चाहिए। वत्ता, धाता, गन्ता आदि के भी 'वदतीति वत्ता, धारेतीति धाता, गच्छतीति गन्ता' आदि के अनुसार यथासंभव व्युत्पत्ति जाननी चाहिए। ยํ ปเนตฺถ อมฺเหหิ ปกิณฺณกวจนํ กถิตํ, ตํ ‘‘อฏฺฐาเน อิทํ กถิต’’นฺติ น วตฺตพฺพํ. ยสฺมา อยํ สทฺทนีติ นาม สทฺทานมตฺถานญฺจ ยุตฺตายุตฺติปกาสนตฺถํ กตารมฺภตฺตา นานปฺปกาเรน สพฺพํ มาคธโวหารํ สงฺโขเภตฺวา กถิตาเยว โสภติ, น อิตรถา, ตสฺมา นานปฺปเภเทน วตฺตุมิจฺฉาย สมฺภวโต ‘‘อฏฺฐาเน อิทํ กถิต’’นฺติ น วตฺตพฺพํ. นานาอุปาเยหิ วิญฺญูนํ ญาปนตฺถํ กตารมฺภตฺตา จ ปน ปุนรุตฺติโทโสเปตฺถ น จินฺเตตพฺโพ, อญฺญทตฺถุ สทฺธาสมฺปนฺเนหิ กุลปุตฺเตหิ อยํ สทฺทนีติ ปิฏกตฺตโยปการาย สกฺกจฺจํ ปริยาปุณิตพฺพา. यहाँ जो हमारे द्वारा प्रकीर्णक वचन कहे गए हैं, उन्हें 'यह अनुचित स्थान पर कहा गया है' ऐसा नहीं कहना चाहिए। क्योंकि यह सद्दनीति नामक ग्रन्थ शब्दों और अर्थों की युक्ति-अयुक्ति को प्रकाशित करने के लिए आरम्भ किया गया है, इसलिए नाना प्रकार से सम्पूर्ण मागधी भाषा को मथकर कहना ही शोभा देता है, अन्यथा नहीं। इसलिए नाना भेदों से कहने की इच्छा होने के कारण 'यह अनुचित स्थान पर कहा गया है' ऐसा नहीं कहना चाहिए। और नाना उपायों से विद्वानों को समझाने के लिए आरम्भ किए जाने के कारण यहाँ पुनरुक्ति दोष की भी चिन्ता नहीं करनी चाहिए; बल्कि श्रद्धासम्पन्न कुलपुत्रों को इस सद्दनीति का त्रिपिटक के उपकार के लिए आदरपूर्वक अध्ययन करना चाहिए। อิติ อภิภวิตาปทสทิสานิ วตฺตา, ธาตา, คนฺตาทีนิ ปทานิ ทสฺสิตานิ. อิทานิ อตํสทิสานิ ทสฺเสสฺสาม. เสยฺยถิทํ – इस प्रकार 'अभिभवितार' पद के समान वत्ता, धाता, गन्ता आदि पद दिखाए गए। अब हम उनके असमान (पदों) को दिखाएंगे। जैसे कि - คุณวา คณวา เจว, พลวา ยสวา ตถา; ธนวา สุตวา วิทฺวา, ธุตวา กตวาปิ จ. गुणवा, गणवा, बलवा, यसवा, धनवा, सुतवा, विद्वा, धुतवा और कतवा भी। หิตวา [Pg.192] ภควา เจว, ธิตวา ถามวา ตถา; ยตวา จาควา จาถ, หิมวิจฺจาทโย รวา. हितवा, भगवा, धितवा, थामवा, यतवा, चागवा और हिमवा आदि शब्द हैं। ปุนฺนปุํสกลิงฺเคหิ, อการนฺเตหิ ปายโต; วนฺตุสทฺโท ปโร โหติ, ตทนฺตา คุณวาทโย. प्रायः अकारान्त पुल्लिंग और नपुंसक लिंग शब्दों के बाद 'वन्तु' शब्द होता है, उनसे अन्त होने वाले गुणवा आदि शब्द बनते हैं। สญฺญาวา รสฺมิวา เจว, มสฺสุวา จ ยสสฺสิวา; อิจฺจาทิทสฺสนาเปโส, อาการิวณฺณุการโต; อิตฺถิลิงฺคาทีสุ โหติ, กตฺถจีติ ปกาสเย. संज्ञावान, रश्मिमान, श्मश्रुमान और यशस्वी; यह (वन्तु प्रत्यय) आकार, इकार और उकार के बाद भी स्त्रीलिंग आदि में कहीं-कहीं होता है, ऐसा प्रकट करना चाहिए। สติมา คติมา อตฺถ-ทสฺสิมา ธิติมา ตถา; มุติมา มติมา เจว, ชุติมา หิริมาปิ จ. सतिमा, गतिमा, अत्थदस्सिमा, धितिमा, मुतिमा, मतिमा, जुतिमा और हिरिमा भी। ถุติมา รติมา เจว, ยติมา พลิมา ตถา; กสิมา สุจิมา ธีมา, รุจิมา จกฺขุมาปิ จ. थुतिमा, रतिमा, यतिमा, बलिमा, कसिमा, सुचिमा, धीमा, रुचिमा और चक्खुमा भी। พนฺธุมา เหตุมา’ยสฺมา, เกตุมา ราหุมา ตถา; ขาณุมา ภาณุมา โคมา, วิชฺชุมา วสุมาทโย. बन्धुमा, हेतुमा, आयस्मा, केतुमा, राहुमा, खाणुमा, भाणुमा, गोमा, विज्जुमा, वसुमा आदि। ปาปิมา ปุตฺติมา เจว, จนฺทิมิจฺจาทโยปิ จ; อตํสทิสสทฺทาติ, วิญฺญาตพฺพา วิภาวินา. पापिमा, पुत्तिमा और चन्दिमा आदि भी; बुद्धिमान व्यक्ति को इन्हें 'अतंसदिस' (असमान) शब्द समझना चाहिए। อิวณฺณุกาโรกาเรหิ, มนฺตุสทฺโท ปโร ภเว; อาการนฺตา จิการนฺตา, อิมนฺตูติ วิภาวเย. इ-वर्ण और उ-वर्ण के बाद 'मन्तु' शब्द होता है; आकारान्त और इकारान्त के बाद भी 'मन्तु' होता है, ऐसा समझना चाहिए। คุณวา, คุณวา, คุณวนฺโต. คุณวนฺตํ, คุณวนฺเต. คุณวตา, คุณวนฺเตน, คุณวนฺเตหิ, คุณวนฺเตภิ. คุณวโต, คุณวนฺตสฺส, คุณวตํ, คุณวนฺตานํ. คุณวตา, คุณวนฺตา, คุณวนฺตสฺมา, คุณวนฺตมฺหา, คุณวนฺเตหิ, คุณวนฺเตภิ. คุณวโต, คุณวนฺตสฺส, คุณวตํ, คุณวนฺตานํ. คุณวติ, คุณวนฺเต, คุณวนฺตสฺมึ, คุณวนฺตมฺหิ, คุณวนฺเตสุ. โภ คุณวา, ภวนฺโต คุณวา, โภนฺโต คุณวนฺโต. गुणवा, गुणवा, गुणवन्तो। गुणवन्तं, गुणवन्ते। गुणवता, गुणवन्तेन, गुणवन्तेहि, गुणवन्तेभि। गुणवato, गुणवन्तस्स, गुणवतां, गुणवन्तानं। गुणवता, गुणवन्ता, गुणवन्तस्मा, गुणवन्तम्हा, गुणवन्तेहि, गुणवन्तेभि। गुणवतो, गुणवन्तस्स, गुणवतां, गुणवन्तानं। गुणवति, गुणवन्ते, गुणवन्तस्मिं, गुणवन्तम्हि, गुणवन्तेसु। भो गुणवा, भवन्तो गुणवा, भोन्तो गुणवन्तो। เอตฺถ [Pg.193] ปน ‘‘เอถ ตุมฺเห อาวุโส สีลวาโหถา’’ติ จ, यहाँ 'एथ तुम्हे आवुसो सीलवाहोथा' (आओ तुम आयुष्मानों, शीलवान बनो) और, ‘‘พลวนฺโต ทุพฺพลา โหนฺติ, ถามวนฺโตปิ หายเร; จกฺขุมา อนฺธิกา โหนฺติ, มาตุคามวสํ คตา’’ติ จ 'बलवान दुर्बल हो जाते हैं, शक्तिमान भी क्षीण हो जाते हैं; चक्षुमान अंधे हो जाते हैं, (जब वे) स्त्रियों के वश में हो जाते हैं' - ऐसा (प्रयोग देखा जाता है)। ปาฬิยํ ‘‘สีลวา, จกฺขุมา’’ติ ปฐมาพหุวจนสฺส ทสฺสนโต ‘‘คุณวา’’ติ ปจฺจตฺตาลปนฏฺฐาเน พหุวจนํ วุตฺตํ. ‘‘คุณวา สติมา’’ติอาทีสุปิ เอเสว นโย. จูฬนิรุตฺติยมฺปิ หิ ‘‘คุณวา’’ติ ปจฺจตฺตาลปนพหุวจนานิ อาคตานิ, นิรุตฺติปิฏเก ปจฺจตฺเตกวจนภาเวเนว อาคตํ, จูฬนิรุตฺติยํ ปน นิรุตฺติปิฏเก จ ‘‘โภ คุณว’’อิติ รสฺสวเสน อาลปเนกวจนํ อาคตํ. มยํ ปน ‘‘ตคฺฆ ภควา โพชฺฌงฺคา. กถํ นุ ภควา ตุยฺหํ สาวโก สาสเน รโต’’ติเอวมาทีสุ อเนกสเตสุ ปาเฐสุ ‘‘ภควา’’อิติ อาลปเนกวจนสฺส ทีฆภาวทสฺสนโต วนฺตุปจฺจยฏฺฐาเน ‘‘โภ คุณวา’’อิจฺจาทิ ทีฆวเสน วจนํ ยุตฺตตรํ วิย มญฺญาม, มนฺตุปจฺจยฏฺฐาเน ปน อิมนฺตุปจฺจยฏฺฐาเน จ ‘‘สพฺพเวรภยาตีต, ปาเท วนฺทามิ จกฺขุม. เอวํ ชานาหิ ปาปิม’’อิจฺจาทีสุ ปาฬิปเทเสสุ ‘‘จกฺขุม’’อิจฺจาทิอาลปเนกวจนสฺส รสฺสภาวทสฺสนโต ‘‘โภ สติม, โภ คติม’’อิจฺจาทิ รสฺสวเสน วจนํ ยุตฺตตรํ วิย มญฺญาม, อถ วา มหาปรินิพฺพานสุตฺตฏฺฐกถายํ ‘‘อายสฺมา ติสฺส’’ อิติทีฆวเสน วุตฺตาลปเนกวจนสฺส ทสฺสนโต ‘‘ภควา, อายสฺมา’’ อิติทีฆวเสน วุตฺตปทมตฺตํ ฐเปตฺวา วนฺตุปจฺจยฏฺฐาเนปิ มนฺตุปจฺจยนโย เนตพฺโพ, มนฺตุปจฺจยฏฺฐาเนปิ วนฺตุปจฺจยนโย เนตพฺโพ. ตถา หิ กจฺจายนาทีสุ ‘‘โภ คุณวํ, โภ คุณว, โภ คุณวา’’อิติ นิคฺคหีตรสฺสทีฆวเสน ตีณิ อาลปเนกวจนานิ วุตฺตานิ, อิมินา ‘‘โภ สติมํ, โภ สติม, โภ สติมา’’ติ เอวมาทินโยปิ ทสฺสิโต[Pg.194]. ปฐมาพหุวจนฏฺฐาเน ปน ‘‘คุณวนฺโต, คุณวนฺตา, คุณวนฺตี’’ติ ตีณิ ปทานิ วุตฺตานิ, อิมินาปิ ‘‘สติมนฺโต, สติมนฺตา, สติมนฺตี’’ติ เอวมาทินโยปิ ทสฺสิโต. เตสุ ‘‘โภ คุณวํ โภ สติมํ, คุณวนฺตา, คุณวนฺตี’’ติ อิมานิ ปทานิ เอวํคติกานิ จ อญฺญานิ ปทานิ ปาฬิยํ อปฺปสิทฺธานิ ยถา ‘‘อายสฺมนฺตา’’ติ ปทํ ปสิทฺธํ, ตสฺมา ยํ จูฬนิรุตฺติยํ วุตฺตํ, ยญฺจ นิรุตฺติปิฏเก, ยญฺจ กจฺจายนาทีสุ, ตํ สพฺพํ ปาฬิยา อฏฺฐกถาหิ จ สทฺธึ ยถา น วิรุชฺฌติ, คงฺโคทเกน ยมุโนทกํ วิย อญฺญทตฺถุ สํสนฺทติ สเมติ, ตถา คเหตพฺพํ. पालि में ‘सीलवा, चक्खुमा’ (sīlavā, cakkhumā) को प्रथमा बहुवचन के रूप में देखे जाने के कारण, ‘गुणवा’ (guṇavā) को प्रथमा संबोधन (आलपन) के स्थान पर बहुवचन कहा गया है। ‘गुणवा सतिमा’ आदि में भी यही नियम है। चूलनिरुत्ति में भी ‘गुणवा’ के रूप में प्रथमा संबोधन के बहुवचन रूप आए हैं, जबकि निरुत्तिपिटक में यह केवल प्रथमा एकवचन के रूप में आया है। चूलनिरुत्ति और निरुत्तिपिटक में ‘भो गुणव’ (bho guṇava) के रूप में ह्रस्व स्वर वाला संबोधन एकवचन आया है। लेकिन हम ‘तग्घ भगवा बोज्झङ्गा’ (taggha bhagavā bojjhaṅgā), ‘कथं नु भगवा तुय्हं सावको सासने रतो’ (kathaṃ nu bhagavā tuyhaṃ sāvako sāsane rato) आदि सैकड़ों पाठों में ‘भगवा’ (bhagavā) संबोधन एकवचन के दीर्घ रूप को देखते हुए, ‘वन्तु’ प्रत्यय वाले शब्दों में ‘भो गुणवा’ (bho guṇavā) आदि दीर्घ रूप को अधिक उपयुक्त मानते हैं। ‘मन्तु’ और ‘इमन्तु’ प्रत्यय वाले शब्दों में ‘सब्बवेरभयातीत, पादे वन्दामि चक्खुम। एवं जानाहि पापिमि’ (sabbaverabhayātīta, pāde vandāmi cakkhuma. evaṃ jānāhi pāpima) आदि पालि पदों में ‘चक्खुम’ (cakkhuma) आदि संबोधन एकवचन के ह्रस्व रूप को देखते हुए, ‘भो सतिम, भो गतिम’ (bho satima, bho gatima) आदि ह्रस्व रूप को अधिक उपयुक्त मानते हैं। अथवा, महापरिनिब्बानसुत्त की अट्ठकथा में ‘आयस्मा तिस्स’ (āyasmā tissa) इस प्रकार दीर्घ संबोधन एकवचन के प्रयोग को देखते हुए, ‘भगवा, आयस्मा’ इन दीर्घ पदों को छोड़कर ‘वन्तु’ प्रत्यय के स्थान पर ‘मन्तु’ प्रत्यय का नियम और ‘मन्तु’ प्रत्यय के स्थान पर ‘वन्तु’ प्रत्यय का नियम लागू करना चाहिए। क्योंकि कच्चायन आदि व्याकरणों में ‘भो गुणवं, भो गुणव, भो गुणवा’ (bho guṇavaṃ, bho guṇava, bho guṇavā) इस प्रकार निग्गहीत, ह्रस्व और दीर्घ के भेद से तीन संबोधन एकवचन कहे गए हैं; इससे ‘भो सतिमं, भो सतिम, भो सतिमा’ (bho satimaṃ, bho satima, bho satimā) आदि का भी निर्देश होता है। प्रथमा बहुवचन के स्थान पर ‘गुणवन्तो, गुणवन्ता, गुणवन्ती’ (guṇavanto, guṇavantā, guṇavantī) ये तीन पद कहे गए हैं, इससे ‘सतिमन्तो, सतिमन्ता, सतिमन्ती’ (satimanto, satimantā, satimantī) आदि का भी निर्देश होता है। उनमें से ‘भो गुणवं, भो सतिमं, गुणवन्ता, गुणवन्ती’ ये पद और इसी प्रकार के अन्य पद पालि में देखे जाने चाहिए, जैसे ‘आयस्मन्ता’ (āyasmantā) पद प्रसिद्ध है। इसलिए जो चूलनिरुत्ति में कहा गया है, जो निरुत्तिपिटक में है, और जो कच्चायन आदि में है, वह सब पालि और अट्ठकथाओं के साथ इस प्रकार ग्रहण करना चाहिए कि उनमें कोई विरोध न हो, जैसे गंगा का जल यमुना के जल के साथ पूरी तरह मिल जाता है। อปิเจตฺถ อยมฺปิ วิเสโส คเหตพฺโพ. ตํ ยถา? ‘‘ตุยฺหํ ธีตา มหาวีร, ปญฺญวนฺต ชุตินฺธรา’’ติ ปาฬิยํ ‘‘ปญฺญวนฺต’’อิติ อาลปเนกวจนสฺส ทสฺสนโต. इसके अतिरिक्त यहाँ यह विशेषता भी ग्रहण करनी चाहिए। वह क्या है? ‘तुय्हं धीता महावीर, पञ्ञवन्त जुतिन्धरा’ (tuyhaṃ dhītā mahāvīra, paññavanta jutindharā) इस पालि पाठ में ‘पञ्ञवन्त’ (paññavanta) संबोधन एकवचन के रूप में देखा जाता है। ‘‘สพฺพา กิเรวํ ปรินิฏฺฐิตานิ,ยสสฺสิ นํ ปญฺญวนฺตํ วิสยฺห; ยโส จ ลทฺธา ปุริมํ อุฬารํ,นปฺปชฺชเห วณฺณพลํ ปุราณ’’นฺติ. “सब्बा किरेवं परिनिट्ठितानि, यसस्सि नं पञ्ञवन्तं विसह्य; यसो च लद्धा पुरिमं उळारं, नप्पज्जहे वण्णबलं पुराण”न्ति। อิมิสฺสา ชาตกปาฬิยา อฏฺฐกถายํ ‘‘ปญฺญวนฺต’’อิติ อาลปเนกวจนสฺส ทสฺสนโต จ ‘‘โภ คุณวนฺต, โภ คุณวนฺตา, โภ สติมนฺต, โภ สติมนฺตา’’ติอาทีนิปิ อาลปเนกวจนานิ อวสฺสมิจฺฉิตพฺพานิ. ตถา หิ ติสฺสํ ปาฬิยํ ‘‘ยสสฺสิ ปญฺญวนฺต’’ อิจฺจาลปนวจนํ อฏฺฐกถาจริยา อิจฺฉนฺติ. นนฺติ หิ ปทปูรเณ นิปาตมตฺตํ. ปญฺญวนฺตนฺติ ปน ฉนฺทานุรกฺขณตฺถํ อนุสาราคมํ กตฺวา วุตฺตํ. เอวํ ปาวจเน วนฺตุปจฺจยาทิสหิตานํ สทฺทานํ ‘‘ภควา, อายสฺมา, ปญฺญวนฺต, จกฺขุม, ปาปิม’’อิติทสฺสิตนเยน อาลปนปฺปวตฺติ เวทิตพฺพา. เอตฺถ จ ‘‘คงฺคาภาคีรถี นาม, หิมวนฺตา ปภาวิตา’’ติ จ ‘‘กุโต อาคตตฺถ ภนฺเตติ, หิมวนฺตา มหาราชา’’ติ จ ทสฺสนโต [Pg.195] ‘‘คุณวนฺตา’’ติ ปญฺจมิยา เอกวจนํ กถิตํ. ยถา คุณวนฺตุ สทฺทสฺส นามิกปทมาลา โยชิตา, เอวํ ธนวนฺตุพลวนฺตาทีนํ สติมนฺตุ คติมนฺตาทีนญฺจ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. इस जातक पालि की अट्ठकथा में ‘पञ्ञवन्त’ (paññavanta) संबोधन एकवचन के रूप में देखे जाने के कारण ‘भो गुणवन्त, भो गुणवन्ता, भो सतिमन्त, भो सतिमन्ता’ (bho guṇavanta, bho guṇavantā, bho satimanta, bho satimantā) आदि संबोधन एकवचन भी अवश्य स्वीकार किए जाने चाहिए। क्योंकि उस पालि में ‘यसस्सि पञ्ञवन्त’ (yasassi paññavanta) इस संबोधन पद को अट्ठकथाचार्य स्वीकार करते हैं। यहाँ ‘नं’ (naṃ) केवल पद की पूर्ति के लिए एक निपात है। ‘पञ्ञवन्तं’ (paññavantaṃ) पद छंद की रक्षा के लिए अनुस्वार का आगम करके कहा गया है। इस प्रकार बुद्धवचन में ‘वन्तु’ प्रत्यय आदि से युक्त शब्दों के ‘भगवा, आयस्मा, पञ्ञवन्त, चक्खुम, पापिमि’ (bhagavā, āyasmā, paññavanta, cakkhuma, pāpima) के दिखाए गए उदाहरणों के अनुसार संबोधन का प्रयोग समझना चाहिए। और यहाँ ‘गङ्गाभागीरथी नाम, हिमवन्ता पभाविता’ (gaṅgābhāgīrathī nāma, himavantā pabhāvitā) और ‘कुतो आगतत्थ भन्तेति, हिमवन्ता महाराज’ (kuto āgatattha bhanteti, himavantā mahārāja) के प्रयोगों से ‘गुणवन्ता’ (guṇavantā) को पंचमी एकवचन कहा गया है। जिस प्रकार ‘गुणवन्तु’ शब्द की शब्द-रूपावली (नमिकपदमला) बनाई गई है, उसी प्रकार ‘धनवन्तु, बलवन्तु’ आदि और ‘सतिमन्तु, गतिमन्तु’ आदि की भी शब्द-रूपावली बनानी चाहिए। อิทานิ วิทฺวาทิปทานํ คุณวาปเทน สมานคติกตฺตมฺปิ โสตูนํ ปโยเคสุ สมฺโมหาปคมตฺถํ เอกเทสโต นิพฺพจนาทีหิ สทฺธึ วิทฺวนฺตุอิจฺจาทิปกติรูปสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – ญาณสงฺขาโต เวโท อสฺส อตฺถีติ วิทฺวา, ปณฺฑิโต. เอตฺถ จ วิทฺวาสทฺทสฺส อตฺถิภาเว ‘‘อิติ วิทฺวา สมํ จเร’’ติอาทิ อาหจฺจปาโฐ นิทสฺสนํ. อตฺรายํ ปทมาลา – วิทฺวา, วิทฺวา, วิทฺวนฺโต. วิทฺวนฺตํ, วิทฺวนฺเต. วิทฺวตา, วิทฺวนฺเตน. เสสํ สพฺพํ เนยฺยํ. เวทนาวา, เวทนาวา, เวทนาวนฺโต. เวทนาวนฺตํ, เวทนาวนฺเต. เวทนาวตา, เวทนาวนฺเตน. เสสํ สพฺพํ เนยฺยํ. เอวํ ‘‘สญฺญาวาเจตนาวา สทฺธาวา ปญฺญวา สพฺพาวา’’อิจฺจาทีสุปิ. เอตฺถ จ ‘‘เวทนาวนฺตํ วา อตฺตานํ สพฺพาวนฺตํ โลก’’นฺติอาทีนิ นิทสฺสนปทานิ. ตตฺถ สพฺพาวนฺตนฺติ สพฺพสตฺตวนฺตํ, สพฺพสตฺตยุตฺตนฺติ อตฺโถ. มชฺเฌทีฆญฺหิ อิทํ ปทํ. เยภุยฺเยน ปน ‘‘ปญฺญวาปญฺญวนฺโต’’ติอาทีนิ มชฺเฌรสฺสานิปิ ภวนฺติ. ยสสฺสิโน ปริวารภูตา ชนา อสฺส อตฺถีติ ยสสฺสิวา, อถ วา ยสสฺสี จ ยสสฺสิวา จาติ ยสสฺสิวา. เอกเทสสรูเปกเสโสยํ. ‘‘ยสสฺสิวา’’ติ ปทสฺส ปน อตฺถิภาเว – अब ‘विद्व’ (vidvā) आदि पदों की ‘गुणवा’ पद के समान गति होने पर भी, श्रोताओं के प्रयोगों में सम्मोह (भ्रम) दूर करने के लिए, निरुक्ति आदि के साथ ‘विद्वन्तु’ (vidvantu) आदि मूल रूपों की शब्द-रूपावली संक्षेप में कही जाती है—ज्ञान रूपी वेद जिसका है, वह ‘विद्व’ (vidvā) अर्थात् पंडित है। यहाँ ‘विद्व’ शब्द के अस्तित्व के विषय में ‘इति विद्वा समं चरे’ (iti vidvā samaṃ care) आदि मूल पाठ उदाहरण हैं। इसकी शब्द-रूपावली इस प्रकार है—विद्वा, विद्वा, विद्वन्तो (प्रथमा)। विद्वन्तं, विद्वन्ते (द्वितीया)। विद्वता, विद्वन्तेन (तृतीया)। शेष सभी रूप इसी प्रकार समझने चाहिए। वेदनावा, वेदनावा, वेदनावन्तो। वेदनावन्तं, वेदनावन्ते। वेदनावता, वेदनावन्तेन। शेष सभी रूप इसी प्रकार समझने चाहिए। इसी प्रकार ‘सञ्ञावा, चेतनावा, सद्धावा, पञ्ञावा, सब्बावा’ (saññāvā, cetanāvā, saddhāvā, paññavā, sabbāvā) आदि में भी समझना चाहिए। यहाँ ‘वेदना वन्तं वा अत्तानं सब्बावन्तं लोकं’ (vedanā vantaṃ vā attānaṃ sabbāvantaṃ lokaṃ) आदि उदाहरण पद हैं। वहाँ ‘सब्बावन्तं’ (sabbāvantaṃ) का अर्थ ‘सभी सत्त्वों वाला’ या ‘सभी सत्त्वों से युक्त’ है। यह पद मध्य में दीर्घ है। प्रायः ‘पञ्ञवा, पञ्ञवन्तो’ आदि मध्य में ह्रस्व भी होते हैं। यशस्वी (यश वाले) परिचारक जन जिसके हैं, वह ‘यशस्सिवा’ (yasassivā) है, अथवा ‘यशस्सी’ और ‘यशस्सिवा’ दोनों का अर्थ एक ही होने से ‘यशस्सिवा’ है। यह एकदेश-सरूप-एकशेष है। ‘यशस्सिवा’ पद के अस्तित्व के विषय में— ‘‘ขตฺติโย ชาติสมฺปนฺโน, อภิชาโต ยสสฺสิวา; ธมฺมราชา วิเทหานํ, ปุตฺโต อุปฺปชฺชเต ตวา’’ติ एक उच्च कुल में उत्पन्न, यशस्वी और अभिजात क्षत्रिय, विदेहों का धर्मराज पुत्र तुम्हारे यहाँ उत्पन्न होगा। อิทํ นิทสฺสนํ. ‘‘ยสสฺสิวา, ยสสฺสิวา, ยสสฺสิวนฺโต. ยสสฺสิวนฺตํ’’ อิจฺจาทิ เนตพฺพํ. อตฺเถ ทสฺสนสีลํ อตฺถทสฺสิ, กึ [Pg.196] ตํ? ญาณํ. อตฺถทสฺสิ อสฺส อตฺถีติ อตฺถทสฺสิมา, เอตฺถ จ – यह उदाहरण है। 'यशस्सिवा, यशस्सिवा, यशस्सिवन्तो, यशस्सिवन्तं' इत्यादि समझना चाहिए। अर्थ को देखने का स्वभाव 'अत्थदस्सी' है, वह क्या है? ज्ञान। जिसके पास 'अत्थदस्सी' है वह 'अत्थदस्सिमा' है, और यहाँ— ‘‘ตํ ตตฺถ คติมา ธิติมา, มุติมา อตฺถทสฺสิมา; สงฺขาตา สพฺพธมฺมานํ, วิธุโร เอตทพฺรวี’’ติ तब वहाँ गतिमान (बुद्धिमान), धृतिमान (धैर्यवान), मतिमान और अर्थदर्शी, सभी धर्मों के ज्ञाता विधुर ने यह कहा। อิทเมตสฺสตฺถสฺส สาธกํ วจนํ. ‘‘อตฺถทสฺสิมา, อตฺถทสฺสิมา, อตฺถทสฺสิมนฺโต. อตฺถทสฺสิมนฺตํ’’ อิจฺจาทิ เนตพฺพํ. ปาปํ อสฺส อตฺถีติ ปาปิมา, อกุสลราสิสมนฺนาคโต มาโร. ปุตฺตา อสฺส อตฺถีติ ปุตฺติมา, พหุปุตฺโต. ‘‘โสจติ ปุตฺเตหิ ปุตฺติมา’’ติ เอตฺถ หิ พหุปุตฺโต ‘‘ปุตฺติมา’’ติ วุจฺจติ. จนฺโท อสฺส อตฺถีติ จนฺทิมา. จนฺโทติ เจตฺถ จนฺทวิมานมธิปฺเปตํ, จนฺทวิมานวาสี ปน เทวปุตฺโต ‘‘จนฺทิมา’’ติ. ตถา หิ ‘‘จนฺโท อุคฺคโต, ปมาณโต จนฺโท อายามวิตฺถารโต อุพฺเพธโต จ เอกูนปญฺญาสโยชโน, ปริกฺเขปโต ตีหิ โยชเนหิ อูนทิยฑฺฒสตโยชโน’’ติอาทีสุ จนฺทวิมานํ ‘‘จนฺโท’’ติ วุตฺตํ. ‘‘ตถาคตํ อรหนฺตํ, จนฺทิมา สรณํ คโต’’ติอาทีสุ ปน จนฺทเทวปุตฺโต ‘‘จนฺทิมา’’ติ. อปโร นโย – จนฺโท อสฺส อตฺถีติ จนฺทิมา. จนฺโทติ เจตฺถ จนฺทเทวปุตฺโต อธิปฺเปโต, ตนฺนิวาสฏฺฐานภูตํ ปน จนฺทวิมานํ ‘‘จนฺทิมา’’ติ. ตถา หิ ‘‘ราหุ จนฺทํ ปมุญฺจสฺสุ, จนฺโท มณิมยวิมาเน วสตี’’ติอาทีสุ จนฺทเทวปุตฺโต ‘‘จนฺโท’’ติ วุตฺโต. यह इस अर्थ का साधक वचन है। 'अत्थदस्सिमा, अत्थदस्सिमा, अत्थदस्सिमन्तो, अत्थदस्सिमन्तं' इत्यादि समझना चाहिए। जिसके पास पाप है वह 'पापिमा' है, जो अकुशल राशियों से युक्त मार है। जिसके पास पुत्र हैं वह 'पुत्तिमा' है, अर्थात् बहुत पुत्रों वाला। 'पुत्रों वाला पुत्रों के कारण शोक करता है'—यहाँ बहुत पुत्रों वाले को 'पुत्तिमा' कहा गया है। जिसके पास चन्द्र है वह 'चन्दिमा' है। यहाँ 'चन्द' से चन्द्र-विमान अभिप्रेत है, और चन्द्र-विमान में रहने वाला देवपुत्र 'चन्दिमा' है। जैसा कि 'चन्द्र उदित हुआ, परिमाण में चन्द्र लम्बाई-चौड़ाई और ऊँचाई में उनचास योजन है, और परिधि में तीन योजन कम डेढ़ सौ योजन है' इत्यादि में चन्द्र-विमान को 'चन्द' कहा गया है। 'तथागत अर्हत् की चन्दिमा शरण में गया' इत्यादि में चन्द्र-देवपुत्र को 'चन्दिमा' कहा गया है। दूसरा तरीका—जिसके पास चन्द्र है वह 'चन्दिमा' है। यहाँ 'चन्द' से चन्द्र-देवपुत्र अभिप्रेत है, और उसके निवास स्थान चन्द्र-विमान को 'चन्दिमा' कहा गया है। जैसा कि 'राहु, चन्द्र को छोड़ दो, चन्द्र मणिमय विमान में रहता है' इत्यादि में चन्द्र-देवपुत्र को 'चन्द' कहा गया है। ‘‘โย หเว ทหโร ภิกฺขุ, ยุญฺชติ พุทฺธสาสเน; โสมํโลกํปภาเสติ, อพฺภา มุตฺโตว จนฺทิมา’’ติ जो युवा भिक्षु बुद्ध के शासन में योग (साधना) करता है, वह इस लोक को उसी प्रकार प्रकाशित करता है जैसे बादलों से मुक्त चन्द्रमा। อาทีสุ ปน ตนฺนิวาสฏฺฐานภูตํ จนฺทวิมานํ ‘‘จนฺทิมา’’ติ วุตฺตํ. อิติ ‘‘จนฺโท’’ติ จ ‘‘จนฺทิมา’’ติ จ จนฺทเทวปุตฺตสฺสปิ จนฺทวิมานสฺสปิ [Pg.197] นามนฺติ เวทิตพฺพํ. ตตฺร ‘‘ปาปิมา ปุตฺติมา จนฺทิมา’’ติ อิมานิ ปาปสทฺทาทิโต ‘‘ตทสฺสตฺถิ’’ อิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ ปวตฺตสฺส อิมนฺตุปจฺจยสฺส วเสน สิทฺธิมุปาคตานีติ คเหตพฺพานิ. आदि में उसके निवास स्थान चन्द्र-विमान को 'चन्दिमा' कहा गया है। इस प्रकार 'चन्द' और 'चन्दिमा' चन्द्र-देवपुत्र और चन्द्र-विमान दोनों के नाम हैं, ऐसा समझना चाहिए। वहाँ 'पापिमा, पुत्तिमा, चन्दिमा'—ये शब्द 'पाप' आदि शब्दों से 'वह इसका है' (तदस्सत्थि) इस अर्थ में प्रयुक्त 'इमन्तु' प्रत्यय के कारण सिद्ध हुए हैं, ऐसा ग्रहण करना चाहिए। นนุ จ โภ มนฺตุปจฺจยวเสเนว สาเธตพฺพานีติ? น, กตฺถจิปิ อการนฺตโต มนฺตุโน อภาวา. นนุ จ โภ เอวํ สนฺเตปิ ปาป ปุตฺต จนฺทโต ปฐมํ อิการาคมํ กตฺวา ตโต มนฺตุปจฺจยํ กตฺวา สกฺกา สาเธตุนฺติ? สกฺกา รูปมตฺตสิชฺฌนโต, นโย ปน โสภโน น โหติ. ตถา หิ ปาป ปุตฺตาทิโต อการนฺตโต อิการาคมํ กตฺวา มนฺตุปจฺจเย วิธิยมาเน อญฺเญหิ คุณยสาทีหิ อการนฺเตหิ อิการาคมํ กตฺวา มนฺตุปจฺจยสฺส กาตพฺพตาปสงฺโค สิยา. น หิ อเนเกสุ ปาฬิสตสหสฺเสสุ กตฺถจิปิ อการนฺตโต คุณ ยสาทิโต อิการาคเมน สทฺธึ มนฺตุปจฺจโย ทิสฺสติ, อฏฺฐานตฺตา ปน ปาป ปุตฺตาทิโต อการนฺตโต อิการาคมํ อกตฺวา อิมนฺตุปจฺจเย กเตเยว ‘‘ปาปิมา ปุตฺติมา’’ติอาทีนิ สิชฺฌนฺตีติ. हे महानुभाव! क्या इन्हें 'मन्तु' प्रत्यय के द्वारा ही सिद्ध नहीं किया जाना चाहिए? नहीं, क्योंकि कहीं भी अकारान्त शब्दों के बाद 'मन्तु' का अभाव है। हे महानुभाव! यदि ऐसा है, तो क्या 'पाप', 'पुत्त', 'चन्द' शब्दों के बाद पहले 'इ' कार का आगम करके फिर 'मन्तु' प्रत्यय लगाकर इन्हें सिद्ध किया जा सकता है? रूप की सिद्धि मात्र के लिए यह संभव है, किन्तु यह पद्धति शोभनीय नहीं है। क्योंकि यदि 'पाप', 'पुत्त' आदि अकारान्त शब्दों से 'इ' कार का आगम करके 'मन्तु' प्रत्यय का विधान किया जाए, तो अन्य 'गुण', 'यस' आदि अकारान्त शब्दों से भी 'इ' कार का आगम करके 'मन्तु' प्रत्यय करने का प्रसंग आ जाएगा। लाखों पालियों में कहीं भी 'गुण', 'यस' आदि अकारान्त शब्दों से 'इ' कार के आगम के साथ 'मन्तु' प्रत्यय नहीं देखा जाता है। अतः अयुक्त होने के कारण 'पाप', 'पुत्त' आदि अकारान्त शब्दों से 'इ' कार का आगम न करके 'इमन्तु' प्रत्यय करने पर ही 'पापिमा', 'पुत्तिमा' आदि सिद्ध होते हैं। เอวํ สนฺเตปิ โภ กสฺมา กจฺจายนปฺปกรเณ มนฺตุปจฺจโยว วุตฺโต, น อิมนฺตุปจฺจโยติ? ทฺวยมฺปิ วุตฺตเมว. กถํ ญายตีติ เจ? ยสฺมา ตตฺถ ‘‘ตปาทิโต สี, ทณฺฑาทิโต อิก อี, มธฺวาทิโต โร, คุณาทิโต วนฺตู’’ติ อิมานิ จตฺตาริ สุตฺตานิ สนฺนิหิตโตทนฺตสทฺทภาเวน วตฺวา มชฺเฌ ‘‘สตฺยาทีหิ มนฺตู’’ติ อญฺญถา สุตฺตํ วตฺวา ตโต สนฺนิหิตโตทนฺตวเสน ‘‘สทฺธาทิโต ณา’’ติ สุตฺตํ วุตฺตํ, ตสฺมา ตตฺถ ‘‘สตฺยาทีหิมนฺตู’’ติ วิสทิสํ กตฺวา วุตฺตสฺส สุตฺตสฺส วเสน อิมนฺตุ ปจฺจโย จ วุตฺโตติ วิญฺญายติ. ปกติ เหสาจริยานํ เยน เกนจิ อากาเรน อตฺตโน อธิปฺปายวิญฺญาปนํ. เอตฺถ จ ทุติโย อตฺโถ สรสนฺธิวเสน คเหตพฺโพ. ตถา หิสฺส ‘‘สตฺยาทีหิ มนฺตู’’ติ [Pg.198] ปฐโม อตฺโถ, ‘‘สตฺยาทีหิ อิมนฺตู’’ติ ทุติโย อตฺโถ. อิติ ‘‘เสโต ธาวตี’’ติ ปโยเค วิย ‘‘สตฺยาทีหิ มนฺตู’’ติ สุตฺเต ภินฺนสตฺติสมเวตวเสน อตฺถทฺวยปฏิปตฺติ ภวติ, ตสฺมา ปรมสุขุมสุคมฺภีรตฺถวตา อเนน สุตฺเตน กตฺถจิ สติ คติ เสตุ โคอิจฺจาทิโต มนฺตุปจฺจโย อิจฺฉิโต. กตฺถจิ สติ ปาป ปุตฺตอิจฺจาทิโต อิมนฺตุปจฺจโย อิจฺฉิโตติ ทฏฺฐพฺพํ. ऐसा होने पर भी, हे महानुभाव! कच्चायन व्याकरण में केवल 'मन्तु' प्रत्यय ही क्यों कहा गया है, 'इमन्तु' प्रत्यय क्यों नहीं? दोनों ही कहे गए हैं। यह कैसे ज्ञात होता है? क्योंकि वहाँ 'तपादितो सी, दण्डादितो इक ई, मध्वादितो रो, गुणादितो वन्तू'—इन चार सूत्रों को सन्नहित अदन्त शब्दों के भाव से कहकर, बीच में 'सत्यादीहि मन्तू' इस प्रकार भिन्न सूत्र कहकर, फिर सन्नहित अदन्त के वश से 'सद्धादितो णा' सूत्र कहा गया है; इसलिए वहाँ 'सत्यादीहि मन्तू' इस विलक्षण रूप से कहे गए सूत्र के द्वारा 'इमन्तु' प्रत्यय भी कहा गया है, ऐसा समझा जाता है। आचार्यों का यह स्वभाव है कि वे किसी न किसी प्रकार से अपना अभिप्राय प्रकट करते हैं। और यहाँ स्वर-सन्धि के कारण दूसरा अर्थ ग्रहण करना चाहिए। जैसे इसके 'सत्यादीहि मन्तू' यह पहला अर्थ है, और 'सत्यादीहि इमन्तू' यह दूसरा अर्थ है। इस प्रकार 'सेतो धावति' (श्वेत दौड़ता है / कुत्ता दौड़ता है) के प्रयोग की तरह 'सत्यादीहि मन्तू' सूत्र में भिन्न शक्तियों के समावेश के कारण दो अर्थों की प्रतीति होती है। इसलिए परम सूक्ष्म और गम्भीर अर्थ वाले इस सूत्र से कहीं 'सति, गति, सेतु, गो' आदि से 'मन्तु' प्रत्यय इष्ट है, और कहीं 'पाप, पुत्त' आदि से 'इमन्तु' प्रत्यय इष्ट है, ऐसा समझना चाहिए। ยสฺมา ปน สติสทฺโท มนฺตุวเสน คติธีเสถุโค อิจฺจาทีหิ, อิมนฺตุวเสน ปาปปุตฺตาทีหิ จ สมานคติกตฺตา เตสํ ปการภาเวน คหิโต, ตสฺมา เอวํ สุตฺตตฺโถ ภวติ ‘‘สตฺยาทีหิ มนฺตุ สติปฺปกาเรหิ สทฺเทหิ มนฺตุปจฺจโย โหติ อิมนฺตุปจฺจโย จ ยถารหํ ‘ตทสฺสตฺถิ’ อิจฺเจตสฺมึ อตฺเถ’’ติ. อยํ ปเนตฺถ อธิปฺปาโย – ยถา ‘‘สติมา’’ติ เอตฺถ สตีติ อิการนฺตโต มนฺตุปจฺจโย โหติ, ตถา ‘‘คติมา, ธีมา, เสตุมา, โคมา’’ติอาทีสุ อิการนฺต อีการนฺต อุการนฺตนิจฺโจการนฺตโต มนฺตุปจฺจโย โหติ. ยถา จ ‘‘สติมา’’ติ เอตฺถ ‘‘สตี’’ติ อิการนฺตโต อิมนฺตุปจฺจโย โหติ, ตถา ‘‘คติมา, ปาปิมา, ปุตฺติมา’’ติอาทีสุ อิการนฺต อการนฺตโต อิมนฺตุปจฺจโย โหติ. เอวํ สติปฺปกาเรหิ สทฺเทหิ ยถาสมฺภวํ มนฺตุ อิมนฺตุปจฺจยา โหนฺตีติ. चूँकि 'सति' शब्द 'मन्तु' प्रत्यय के माध्यम से 'गति', 'धी', 'सेतु', 'गो' आदि के साथ और 'इमन्तु' प्रत्यय के माध्यम से 'पाप', 'पुत्त' आदि के साथ समान प्रवृत्ति वाला होने के कारण उनके प्रकार (समूह) के रूप में ग्रहण किया गया है, इसलिए सूत्र का अर्थ इस प्रकार होता है— 'सति आदि मन्तु (सति के प्रकार वाले) शब्दों से 'मन्तु' प्रत्यय होता है और 'इमन्तु' प्रत्यय भी यथायोग्य 'वह इसका है' (तदस्सत्थि) इस अर्थ में होता है।' यहाँ यह अभिप्राय है— जैसे 'सतिमा' यहाँ 'सति' इस इकारान्त शब्द से 'मन्तु' प्रत्यय होता है, वैसे ही 'गतिमा, धीमा, सेतुमा, गोमा' आदि में इकारान्त, ईकारान्त, उकारान्त और नित्य ओकारान्त शब्दों से 'मन्तु' प्रत्यय होता है। और जैसे 'सतिमा' यहाँ 'सति' इस इकारान्त शब्द से 'इमन्तु' प्रत्यय होता है, वैसे ही 'गतिमा, पापिमा, पुत्तिमा' आदि में इकारान्त और अकारान्त शब्दों से 'इमन्तु' प्रत्यय होता है। इस प्रकार सति के प्रकार वाले शब्दों से यथासंभव 'मन्तु' और 'इमन्तु' प्रत्यय होते हैं। ยชฺเชวํ ปจฺจยทฺวยวิธายกํ ‘‘ทณฺฑาทิโต อิก อี’’ติ สุตฺตํ วิย ‘‘สตฺยาทิโต อิมนฺตุ มนฺตู’’ติ วตฺตพฺพํ, กสฺมา นาโวจาติ? ตถา อวจเน การณมตฺถิ. ยทิ หิ ‘‘ทณฺฑาทิโต อิก อี’’ติ สุตฺตํ วิย ‘‘สตฺยาทิโต อิมนฺตุ มนฺตู’’ติ สุตฺตํ วุตฺตํ สิยา, เอกกฺขเณเยว อิมนฺตุ มนฺตูนํ วจเนน ทณฺฑสทฺทโต สมฺภูตํ ‘‘ทณฺฑิโก ทณฺฑี’’ติ รูปทฺวยมิว สติคติอาทิโตปิ วิสทิสรูปทฺวยมิจฺฉิตพฺพํ สิยา, ตญฺจ นตฺถิ, ตสฺมา [Pg.199] ‘‘สตฺยาทิโต อิมนฺตุ มนฺตู’’ติ น วุตฺตํ. อปิจ ตถา วุตฺเต พวฺหกฺขรตาย คนฺถครุตา สิยา. ยสฺมา จ สุตฺเตน นาม อปฺปกฺขเรน อสนฺทิทฺเธน สารวนฺเตน คูฬฺหนินฺนเยน สพฺพโตมุเขน อนวชฺเชน ภวิตพฺพํ. กจฺจายเน จ เยภุยฺเยน ตาทิสานิ คมฺภีรตฺถานิ สุวิสทญาณวิสยภูตานิ สุตฺตานิ ทิสฺสนฺติ ‘‘อุปาฌธิกิสฺสรวจเน, สรา สเร โลป’’นฺติอาทีนิ, อิทมฺปิ เตสมญฺญตรํ, ตสฺมา ‘‘สตฺยาทิโต อิมนฺตุ มนฺตู’’ติ น วุตฺตํ. เอวํ สุตฺโตปเทเส อกเตปิ อิมนฺตุโนปิ คหณตฺถํ ภินฺนสตฺติสมเวตวเสน ‘‘สตฺยาทีหิ มนฺตู’’ติ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. यदि ऐसा है, तो दो प्रत्ययों का विधान करने वाले 'दण्डादितो इक ई' सूत्र की तरह 'सत्यादितो इमन्तु मन्तू' ऐसा कहना चाहिए था, तो क्यों नहीं कहा? वैसा न कहने का कारण है। यदि 'दण्डादितो इक ई' सूत्र की तरह 'सत्यादितो इमन्तु मन्तू' सूत्र कहा गया होता, तो एक ही क्षण में 'इमन्तु' और 'मन्तु' के कहने से 'दण्ड' शब्द से बने 'दण्डिको' और 'दण्डी' इन दो रूपों की तरह 'सति', 'गति' आदि से भी दो भिन्न रूपों की अपेक्षा की जाती, और वैसा नहीं है, इसलिए 'सत्यादितो इमन्तु मन्तू' नहीं कहा गया। इसके अतिरिक्त, वैसा कहने पर अधिक अक्षरों के कारण ग्रन्थ का विस्तार हो जाता। चूँकि सूत्र को अल्प अक्षर वाला, असंदिग्ध, सारवान्, गूढ़ अर्थ वाला, सर्वतोमुख और निर्दोष होना चाहिए। और कच्चायन में प्रायः वैसे ही गम्भीर अर्थ वाले और सुविशद ज्ञान के विषयभूत सूत्र देखे जाते हैं जैसे 'उपाज्झधिकिस्सरवचने', 'सरा सरे लोपं' आदि, यह भी उनमें से एक है, इसलिए 'सत्यादितो इमन्तु मन्तू' नहीं कहा गया। इस प्रकार सूत्र का उपदेश न करने पर भी 'इमन्तु' के ग्रहण के लिए भिन्न शक्ति के समावेश के कारण 'सत्यादीहि मन्तू' कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। อปโร นโย – ‘‘ตปาทิโต สี’’ติอาทีสุ โตทนฺตสทฺทสฺส พหุวจนนฺตตา น สุฏฺฐุ ปากฏา โตปจฺจยสฺส เอกตฺถพวฺหตฺเถสุ วตฺตนโต, ‘‘สตฺยาทีหิ มนฺตู’’ติ เอตฺถ ปน หิสทฺทสฺส พหุวจนตฺถตา อตีว ปากฏา, ตสฺมา พหุวจนคฺคหเณน อิมนฺตุ ปจฺจโย โหตีติปิ ทฏฺฐพฺพํ. นนุ จ โภ วินาปิ อิมนฺตุปจฺจเยน ปาปมสฺสตฺถีติ ปาปี, ปาปี เอว ปาปิมาติ สกตฺเถ มาปจฺจเย กเตเยว ‘‘ปาปิมา ปุตฺติมา’’ติอาทีนิ สิชฺฌนฺติ ‘‘ฉฏฺฐโม โส ปราภโว’’ติ เอตฺถ มปจฺจเยน ‘‘ฉฏฺฐโม’’ติ ปทํ วิยาติ? อตินยญฺญู ภวํ, อตินยญฺญู นามาติ ภวํ วตฺตพฺโพ, น ปน ภวํ สทฺทคตึ ชานาติ, สทฺทคติโย จ นาม พหุวิธา. ตถา หิ ฉฏฺโฐเยว ฉฏฺฐโม, ‘‘สุตฺตเมว สุตฺตนฺโต’’ติอาทีสุ ปุริสนเยน โยเชตพฺพา สทฺทคติ, ‘‘เทโวเยว เทวตา’’ติอาทีสุ กญฺญานเยน โยเชตพฺพา สทฺทคติ, ‘‘ทิฏฺฐิ เอว ทิฏฺฐิคต’’นฺติอาทีสุ จิตฺตนเยน โยเชตพฺพา สทฺทคติ. เอวํวิธาสุ สทฺทคตีสุ ‘‘ปาปี เอว ปาปิมา’’ติอาทิกํ กตรํ สทฺทคตึ วเทสิ? ‘‘สตฺถา ราชา พฺรหฺมา สขา อตฺตา สา ปุมา’’ติอาทีสุ [Pg.200] จ กตรํ สทฺทคตึ วเทสิ? กตรสทฺทนฺโตคธํ กตราย จ นามิกปทมาลายํ โยเชตพฺพํ มญฺญสีติ? โส เอวํ ปุฏฺโฐ อทฺธา อุตฺตริ กิญฺจิ อทิสฺวา ตุณฺหี ภวิสฺสติ, ตสฺมา ตาทิโส นโย น คเหตพฺโพ. ตาทิสสฺมิญฺหิ นเย ‘‘ปาปิมตา ปาปิมโต’’ติอาทีนิ รูปานิ น สิชฺฌนฺติ, อิมนฺตุปจฺจยนเยน ปน สิชฺฌนฺติ, ตสฺมา อยเมว นโย ปสตฺถตโร อายสฺมนฺเตหิ สมฺมา จิตฺเต ฐเปตพฺโพ. อตฺริทํ นิทสฺสนํ – दूसरा तरीका— 'तपादितो सी' आदि में 'त' अन्त वाले शब्द की बहुवचनान्तता भली-भाँति प्रकट नहीं है क्योंकि 'त' प्रत्यय एक अर्थ और बहुत अर्थों में प्रयुक्त होता है, परन्तु 'सत्यादीहि मन्तू' यहाँ 'हि' शब्द की बहुवचनान्तता अत्यन्त स्पष्ट है, इसलिए बहुवचन के ग्रहण से 'इमन्तु' प्रत्यय भी होता है, ऐसा समझना चाहिए। हे महानुभाव! क्या 'इमन्तु' प्रत्यय के बिना भी 'पाप इसका है' इस अर्थ में 'पापी' और 'पापी' ही 'पापिमा' है, इस प्रकार स्वार्थ में 'मा' प्रत्यय करने पर ही 'पापिमा', 'पुत्तिमा' आदि सिद्ध नहीं हो जाते, जैसे 'छट्ठमो सो पराभवो' यहाँ 'म' प्रत्यय से 'छट्ठमो' पद सिद्ध होता है? आप अति-नीतिज्ञ हैं, आपको अति-नीतिज्ञ ही कहना चाहिए, परन्तु आप शब्दों की गति को नहीं जानते, और शब्दों की गतियाँ अनेक प्रकार की होती हैं। जैसे 'छट्ठो' ही 'छट्ठमो' है, 'सुत्तमेव सुत्तन्तो' आदि में पुरुष-नय से शब्द-गति जोड़नी चाहिए, 'देवोयेव देवता' आदि में कन्या-नय से शब्द-गति जोड़नी चाहिए, 'दिट्ठि एव दिट्ठिगतं' आदि में चित्त-नय से शब्द-गति जोड़नी चाहिए। इस प्रकार की शब्द-गतियों में 'पापी एव पापिमा' आदि को आप कौन सी शब्द-गति कहते हैं? और 'सत्था राजा ब्रह्मा सखा अत्ता सा पुमा' आदि में कौन सी शब्द-गति कहते हैं? आप इसे किस शब्द के अन्तर्गत और किस नामिक पदमाला में जोड़ने योग्य मानते हैं? ऐसा पूछे जाने पर वह निश्चित रूप से आगे कुछ न देख पाने के कारण चुप हो जाएगा, इसलिए वैसा तर्क नहीं ग्रहण करना चाहिए। क्योंकि वैसे तर्क में 'पापिमता', 'पापिमतो' आदि रूप सिद्ध नहीं होते, परन्तु 'इमन्तु' प्रत्यय के नियम से सिद्ध होते हैं, इसलिए आयुष्मानों को यही मत श्रेष्ठ मानकर भली-भाँति चित्त में स्थापित करना चाहिए। यहाँ यह उदाहरण है— ‘‘ชโย หิ พุทฺธสฺส สิรีมโต อยํ,มารสฺส จ ปาปิมโต ปราชโย; อุคฺโฆสยุํ โพธิมณฺเฑ ปโมทิตา,ชยํ ตทา เทวคณา มเหสิโน’’ติ จ, “निश्चित ही यह श्रीमान् बुद्ध की विजय है और पापी मार की पराजय है; तब बोधिमण्ड पर प्रमुदित देवगणों ने महर्षि की विजय की घोषणा की।” ‘‘สาขาปตฺตผลูเปโต, ขนฺธิมาวมหาทุโม’’ติ จ. “शाखाओं, पत्तों और फलों से युक्त, तने वाले महान वृक्ष की तरह।” ปาปิมา, ปาปิมา, ปาปิมนฺโต. ปาปิมนฺตํ. เสสํ เนยฺยํ, เอส นโย ‘‘ขนฺธิมา, ปุตฺติมา’’ติอาทีสุปิ. पापिमा, पापिमा, पापिमन्तो। पापिमन्तं। शेष इसी प्रकार समझना चाहिए, यही नियम 'खन्धिमा', 'पुत्तिमा' आदि में भी है। อิทานิ ยถาปาวจนํ กิญฺจิเทว หิมวนฺตุ สติมนฺตาทีนํ วิเสสํ พฺรูม. หิมวนฺโตว ปพฺพโต. สติมํ ภิกฺขุํ. พนฺธุมํ ราชานํ. จนฺทิมํ เทวปุตฺตํ. สติมสฺส ภิกฺขุโน. พนฺธุมสฺส รญฺโญ. อิทฺธิมสฺส จ ปรสฺส จ เอกกฺขเณ จิตฺตํ อุปฺปชฺชติ. อิจฺจาทิ วิเสโส เวทิตพฺโพ. อปิเจตฺถ ‘‘อายสฺมนฺตา’’ติ ทฺวินฺนํ วตฺตพฺพวจนํ, ‘‘อายสฺมนฺโต’’ติ พหูนํ วตฺตพฺพวจนนฺติ อยมฺปิ วิเสโส เวทิตพฺโพ. ตถา หิ ‘‘ทฺวินฺนํ อาโรเจนฺเตน ‘อายสฺมนฺตา ธาเรนฺตู’ติ, ติณฺณํ อาโรเจนฺเตน ‘อายสฺมนฺโต ธาเรนฺตู’ติ วตฺตพฺพ’’นฺติ วุตฺตํ. ‘‘ติณฺณ’’นฺติ เจตฺถ กถาสีสมตฺตํ, เตน จตุนฺนมฺปิ ปญฺจนฺนมฺปิ อติเรกสตานมฺปีติ ทสฺสิตํ [Pg.201] โหติ. พหโวหิ อุปาทาย ‘‘อุทฺทิฏฺฐา โข อายสฺมนฺโต จตฺตาโร ปาราชิกา ธมฺมา’’ติอาทิกา ปาฬิโย ฐปิตา. ตตฺถ ‘‘อายสฺมนฺตา’’ติทํ วินยโวหารวเสน ทฺเวเยว สนฺธาย วุตฺตตฺตา น สพฺพสาธารณํ. วินยโวหารญฺหิ วชฺเชตฺวา อญฺญสฺมึ โวหาเร น ปวตฺตติ. ‘‘อายสฺมนฺโต’’ติทํ ปน สพฺพตฺถ ปวตฺตตีติ ทฺวินฺนํ วิเสโส เวทิตพฺโพ. अब हम वचनों के अनुसार 'हिमवन्तु', 'सतिमन्तु' आदि के कुछ विशेष भेदों को कहते हैं। 'हिमवन्तो' ही पर्वत है। 'सतिमं' (स्मृतिमान) भिक्षु। 'बन्धुमं' राजा। 'चन्दिमं' देवपुत्र। 'सतिमस्स' भिक्षु का। 'बन्धुमस्स' राजा का। ऋद्धिमान और दूसरे का चित्त एक ही क्षण में उत्पन्न होता है। इस प्रकार के विशेष जानने चाहिए। इसके अतिरिक्त यहाँ 'आयुष्मन्ता' यह दो के लिए कहने योग्य वचन है, 'आयुष्मन्तो' यह बहुतों के लिए कहने योग्य वचन है - यह विशेष भी जानना चाहिए। जैसा कि कहा गया है - 'दो को सूचित करते हुए आयुष्मन्ता धारयन्तु कहना चाहिए, तीन को सूचित करते हुए आयुष्मन्तो धारयन्तु कहना चाहिए।' यहाँ 'तीन' केवल उदाहरण मात्र है, इससे चार, पाँच या सौ से अधिक का भी बोध होता है। क्योंकि बहुतों को लेकर 'उद्दिद्वा खो आयुष्मन्तो चत्तारो पाराजिका धम्मा' आदि पालियाँ स्थापित की गई हैं। वहाँ 'आयुष्मन्ता' यह विनय-व्यवहार के वश से केवल दो के लिए ही कहे जाने के कारण सर्व-साधारण नहीं है। विनय-व्यवहार को छोड़कर अन्य व्यवहार में यह प्रवृत्त नहीं होता। 'आयुष्मन्तो' यह तो सर्वत्र प्रवृत्त होता है - इस प्रकार दोनों का विशेष जानना चाहिए। ตตฺร ‘‘หิมวนฺโต’’ติ อิทํ เยภุยฺเยเนกวจนํ ภวติ, กตฺถจิ พหุวจนมฺปิ, เตนาห นิรุตฺติปิฏเก เถโร ‘‘หิมวา ติฏฺฐติ, หิมวนฺโต ติฏฺฐนฺตี’’ติ. ‘‘หิมวนฺโตว ปพฺพโต’’ติ อยํ เอกวจนนโย ยถารุตปาฬิวเสน คเหตพฺโพ. ยถารุตปาฬิ จ นาม – वहाँ 'हिमवन्तो' यह प्रायः एकवचन होता है, कहीं-कहीं बहुवचन भी; इसीलिए निरुत्तिपिटक में स्थविर ने कहा है - 'हिमवा तिट्ठति' (हिमालय खड़ा है), 'हिमवन्तो तिट्ठन्ति' (हिमालय खड़े हैं)। 'हिमवन्तोव पब्बतो' यह एकवचन का नियम मूल पालि के अनुसार ग्रहण करना चाहिए। और मूल पालि इस प्रकार है - ‘‘ทูเร สนฺโต ปกาสนฺติ, หิมวนฺโตว ปพฺพโต; อสนฺเตตฺถ น ทิสฺสนฺติ, รตฺตึ ขิตฺตา ยถา สรา. सज्जन दूर से ही प्रकाशित होते हैं, जैसे हिमालय पर्वत; असज्जन यहाँ नहीं दिखाई देते, जैसे रात्रि में छोड़े गए बाण। อหํ เตน สมเยน, นาคราชา มหิทฺธิโก; อตุโล นาม นาเมน, ปุญฺญวนฺโต ชุตินฺธโร. मैं उस समय अतुल नाम का महान ऋद्धिमान, पुण्यवान और तेजस्वी नागराज था। คติมนฺโต สติมนฺโต, ธิติมนฺโต จ โส อิสิ; สทฺธมฺมธารโก เถโร, อานนฺโท รตนากโร’’ वे ऋषि (बुद्ध) गतिमान, स्मृतिमान और धृतिमान थे; सद्धर्म के धारक स्थविर आनन्द रत्नों की खान थे। อิจฺจาทิ. เอตฺถ ‘‘ปุญฺญวนฺโต’’ติอาทีนิ อเนเกสุ ฐาเนสุ พหุวจนภาเวน ปุนปฺปุนํ วทนฺตานิปิ กตฺถจิ เอกวจนานิ โหนฺติ, เอกวจนภาโว จ เนสํ คาถาวิสเย ทิสฺสติ, ตสฺมา ตานิ ยถาปาวจนํ คเหตพฺพานิ. इत्यादि। यहाँ 'पुण्यवन्तो' आदि अनेक स्थानों पर बहुवचन के रूप में बार-बार कहे जाने पर भी कहीं-कहीं एकवचन होते हैं, और उनका एकवचन भाव गाथाओं के विषय में देखा जाता है, इसलिए उन्हें वचनों के अनुसार ग्रहण करना चाहिए। เอวํ หิมวนฺตุสติมนฺตุสทฺทาทีนํ วิเสสํ ญตฺวา ปุน ลิงฺคนฺตวเสน ทฺวิลิงฺคกปทานมตฺโถ จ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลา จ ปทานํ สทิสาสทิสตา จ ววตฺถเปตพฺพา. इस प्रकार 'हिमवन्तु', 'सतिमन्तु' आदि शब्दों के विशेष को जानकर, पुनः लिंग के भेद से द्विलिंगी पदों का अर्थ, प्रकृति रूप की नामिक पदमाला (शब्द-रूप) और पदों की समानता-असमानता का निर्धारण करना चाहिए। ตตฺร [Pg.202] หิ ‘‘สิริมา’’ติ ปทํ สุติสามญฺญวเสน ลิงฺคทฺวเย วตฺตนโต ทฺวิธา ภิชฺชติ. ‘‘สิริมา ปุริโส’’ติ หิ อตฺเถ อาการนฺตํ ปุลฺลิงฺคํ, ‘‘สิริมา นาม เทวี’’ติ อตฺเถ อาการนฺตํ อิตฺถิลิงฺคํ, อุภยมฺเปตํ อุการนฺตตาปกติกา. อถ วา ปน ปจฺฉิมํ อาการนฺตตาปกติกํ, สิรี ยสฺส อตฺถิ โส สิริมาติ ปุลฺลิงฺควเสน นิพฺพจนํ, สิรี ยสฺสา อตฺถิ สา สิริมาติ อิตฺถิลิงฺควเสน นิพฺพจนํ. อตฺริมานิ กิญฺจาปิ สุติวเสน นิพฺพจนตฺถวเสน จ อญฺญมญฺญํ สมานตฺถานิ, ตถาปิ ปุริสปทตฺถอิตฺถิปทตฺถวาจกตฺตา ภินฺนตฺถานีติ เวทิตพฺพานิ. เอส นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. สิริมา, สิริมา, สิริมนฺโต. สิริมนฺตํ, สิริมนฺเต. สิริมตา, สิริมนฺเตน. คุณวนฺตุสทฺทสฺเสว นามิกปทมาลา. สิริมา, สิริมา, สิริมาโย. สิริมํ, สิริมา, สิริมาโย. สิริมาย. วกฺขมานกญฺญานเยน เญยฺยา. เอวํ ทฺวิธา ภินฺนานํ สมานสุติกสทฺทานํ นามิกปทมาลาสุ ปทานํ สทิสาสทิสตา ววตฺถเปตพฺพา. สมานนิพฺพจนตฺถสฺสปิ หิ อสมานสุติกสฺส ‘‘สิริมา’’ติ สทฺทสฺส นามิกปทมาลายํ ปทานํ อิเมหิ ปเทหิ กาจิปิ สมานตา น ลพฺภติ. อตฺริทํ วุจฺจติ – वहाँ 'सिरिमा' (श्रीमान/श्रीमती) यह पद सुनने में समान होने के कारण दो लिंगों में प्रवृत्त होने से दो प्रकार से विभाजित होता है। 'सिरिमा पुरिसो' (श्रीमान पुरुष) इस अर्थ में आकारान्त पुल्लिंग है, 'सिरिमा नाम देवी' (सिरिमा नाम की देवी) इस अर्थ में आकारान्त स्त्रीलिंग है, ये दोनों ही उकारान्त प्रकृति वाले हैं। अथवा पिछला (स्त्रीलिंग) आकारान्त प्रकृति वाला है। 'श्री जिसकी है वह सिरिमा' - यह पुल्लिंग के अनुसार व्युत्पत्ति है, 'श्री जिसकी है वह सिरिमा' - यह स्त्रीलिंग के अनुसार व्युत्पत्ति है। यद्यपि ये सुनने में और व्युत्पत्ति के अर्थ में एक-दूसरे के समान हैं, तथापि पुरुष-पद के अर्थ और स्त्री-पद के अर्थ का वाचक होने के कारण इन्हें भिन्न अर्थ वाला जानना चाहिए। यही नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लगाना चाहिए। (पुल्लिंग:) सिरिमा, सिरिमा, सिरिमन्तो। सिरिमन्तं, सिरिमन्ते। सिरिमता, सिरिमन्तेन। गुणवन्तु शब्द के समान ही इसकी पदमाला है। (स्त्रीलिंग:) सिरिमा, सिरिमा, सिरिमायो। सिरिमं, सिरिमा, सिरिमायो। सिरिमाय। इसे आगे कही जाने वाली 'कञ्ञा' (कन्या) के नियम के अनुसार जानना चाहिए। इस प्रकार दो प्रकार से भिन्न समान ध्वनि वाले शब्दों की नामिक पदमालाओं में पदों की समानता और असमानता निर्धारित करनी चाहिए। समान व्युत्पत्ति और अर्थ वाले होने पर भी, असमान ध्वनि वाले 'सिरिमा' शब्द की पदमाला में इन पदों के साथ कोई समानता नहीं पाई जाती। इसके विषय में यह कहा जाता है - ‘‘สิริมา’’ติ ปทํ ทฺเวธา, ปุมิตฺถีสุ ปวตฺติโต; ภิชฺชตีติ วิภาเวยฺย, เอตฺถ ปุลฺลิงฺคมิจฺฉิตํ. 'सिरिमा' यह पद पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में प्रवृत्त होने के कारण दो प्रकार का है; ऐसा विभाग करना चाहिए, यहाँ पुल्लिंग इष्ट है। อิติ อภิภวิตา ปเทน วิสทิสานิ คุณวาสติมาทีนิ ปทานิ ทสฺสิตานิ สทฺธึ นามิกปทมาลาหิ. อิทานิ อปรานิปิ ตพฺพิสทิสานิ ปทานิ ทสฺเสสฺสาม สทฺธึ นามิกปทมาลาหิ. เสยฺยถิทํ? इस प्रकार 'अभिभविता' पद से भिन्न 'गुणवा', 'सतिमा' आदि पदों को उनकी नामिक पदमालाओं के साथ दिखाया गया है। अब अन्य भी उनके समान पदों को नामिक पदमालाओं के साथ दिखाएंगे। जैसे कि - ราชา พฺรหฺมา สขา อตฺตา, อาตุมา สา ปุมา รหา; ทฬฺหธมฺมา จ ปจฺจกฺข-ธมฺมา จ วิวฏจฺฉทา. राजा, ब्रह्मा, सखा (मित्र), अत्ता (आत्मा), आतुमा, सा (कुत्ता), पुमा (पुरुष), रहा; और दळ्हधम्मा, पच्चक्खधम्मा तथा विवटच्छदा। วตฺตหา [Pg.203] จ ตถา วุตฺต-สิรา เจว ยุวาปิ จ; มฆว อทฺธ มุทฺธาทิ, วิญฺญาตพฺพา วิภาวินา. वत्तहा, तथा वुत्तसिरा, युवा, मघवा, अद्धा, मुद्धा आदि को बुद्धिमानों द्वारा जानना चाहिए। เอตฺถ ‘‘สา’’ติ ปทเมว อาการนฺตตาปกติกมาการนฺตํ, เสสานิ ปน อการนฺตตาปกติกานิ อาการนฺตานิ. यहाँ 'सा' पद ही आकारान्त प्रकृति वाला आकारान्त है, शेष तो अकारान्त प्रकृति वाले आकारान्त हैं। ราชา, ราชา, ราชาโน. ราชานํ, ราชํ, ราชาโน. รญฺญา, ราชินา, ราชูหิ, ราชูภิ. รญฺโญ, ราชิโน, รญฺญํ, ราชูนํ, ราชานํ. รญฺญา, ราชูหิ, ราชูภิ. รญฺโญ, ราชิโน, รญฺญํ, ราชูนํ, ราชานํ. รญฺเญ, ราชินิ, ราชูสุ. โภ ราช, ภวนฺโต ราชาโน, ภวนฺโต ราชา อิติ วา, อยมมฺหากํ รุจิ. राजा, राजा, राजानो (प्रथमा)। राजानं, राजं, राजानो (द्वितीया)। रञ्ञा, राजिना, राजूहि, राजूब्ही (तृतीया)। रञ्ञो, राजिनो, रञ्ञं, राजूनं, राजानं (चतुर्थी)। रञ्ञा, राजूहि, राजूब्ही (पञ्चमी)। रञ्ञो, राजिनो, रञ्ञं, राजूनं, राजानं (षष्ठी)। रञ्ञे, राजिनि, राजूसु (सप्तमी)। भो राजा, आप सब राजागण, अथवा आप सब राजा (सम्बोधन) - यह हमारी रुचि है। นิรุตฺติปิฏกาทีสุ ‘‘ราชา’’ติ พหุวจนํ น อาคตํ, จูฬนิรุตฺติยํ ปน อาคตํ. กิญฺจาปิ นิรุตฺติปิฏกาทีสุ น อาคตํ, ตถาปิ ‘‘เนตาทิสา สขา โหนฺติ, ลพฺภา เม ชีวโต สขา’’ติ ปาฬิยํ พหุวจเนกวจนวเสน ‘‘สขา’’ติ ปทสฺส ทสฺสนโต ‘‘ราชา’’ติ พหุวจนํ อิจฺฉิตพฺพเมว. ตถา ‘‘พฺรหฺมา, อตฺตา’’อิจฺจาทีนิปิ พหุวจนานิ ตคฺคติกตฺตา วินา เกนจิ รูปวิเสเสน. निरुत्तिपिटक आदि में 'राजा' यह बहुवचन नहीं आया है, किन्तु चुलनिरुत्ति में आया है। भले ही निरुत्तिपिटक आदि में न आया हो, फिर भी पालि में 'नेतदिसा सखा होन्ति, लब्भा मे जीवतो सखा' इस गाथा में बहुवचन और एकवचन के रूप में 'सखा' पद के देखे जाने से 'राजा' का बहुवचन भी स्वीकार करना ही चाहिए। उसी प्रकार 'ब्रह्मा', 'अत्ता' आदि के बहुवचन भी बिना किसी विशेष रूप के उसी के समान होते हैं। เอตฺถ จ ‘‘คหปติโก นาม ฐเปตฺวา ราชํ ราชโภคํ พฺราหฺมณํ อวเสโส คหปติโก นามา’’ติ ทสฺสนโต ราชนฺติ วุตฺตํ, อิทํ ปน นิรุตฺติปิฏเก น อาคตํ. ‘‘สพฺพทตฺเตน ราชินา’’ติ ทสฺสนโต ‘‘ราชินา’’ติ วุตฺตํ. ‘‘อาราธยติ ราชานํ, ปูชํ ลภติ ภตฺตุสู’’ติ ทสฺสนโต จตุตฺถีฉฏฺฐีวเสน ‘‘ราชาน’’นฺติ วุตฺตํ. กจฺจายนรูปสิทฺธิคนฺเถสุ ปน ‘‘ราเชน, ราเชหิ, ราเชภิ. ราเชสู’’ติ ปทานิ วุตฺตานิ. จูฬนิรุตฺตินิรุตฺติปิฏเกสุ ตานิ นาคตานิ, อนาคตภาโวเยว เตสํ ยุตฺตตโร ปาฬิยํ อทสฺสนโต, ตสฺมา เอตฺเถตานิ [Pg.204] อมฺเหหิ น วุตฺตานิ. ปาฬินเย หิ อุปปริกฺขิยมาเน อีทิสานิ ปทานิ สมาเสเยว ปสฺสาม, น ปนาญฺญตฺร, อตฺริเม ปโยคา – ‘‘อาวุตฺถํ ธมฺมราเชนา’’ติ จ, ‘‘สิวิราเชน เปสิโต’’ติ จ, ‘‘ปชาปติสฺส เทวราชสฺส ธชคฺค’’นฺติ จ, ‘‘นิกฺขมนฺเต มหาราเช, สิวีนํ รฏฺฐวฑฺฒเน’’ติ จ, เอวํ ปาฬินเย อุปปริกฺขิยมาเน ‘‘ราเชนา’’ติอาทีนิ สมาเสเยว ปสฺสาม, น เกวลํ ปาฬินเย โปราณฏฺฐกถานเยปิ อุปปริกฺขิยมาเน สมาเสเยว ปสฺสาม, น ปนาญฺญตฺร, เอวํ สนฺเตปิ สุฏฺฐุ อุปปริกฺขิตพฺพมิทํ ฐานํ. โก หิ นาม สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเน สพฺพโส นยํ สลฺลกฺเขตุํ สมตฺโถ อญฺญตฺร ปภินฺนปฏิสมฺภิเทหิ ขีณาสเวหิ. यहाँ यह भी कहा गया है कि 'राजा, राजभोग और ब्राह्मण को छोड़कर शेष गृहपति कहलाता है' - इस उल्लेख के कारण 'राजा' कहा गया है, परंतु यह निरुत्तिपिटक में नहीं आया है। 'सब्बदत्तेन राजिना' - इस प्रयोग के कारण 'राजिना' कहा गया है। 'आराधयति राजानं, पूजं लभति भत्तुसू' - इस प्रयोग में चतुर्थी और षष्ठी के अर्थ में 'राजानं' कहा गया है। कच्चायन और रूपसिद्धि ग्रंथों में तो 'राजेन, राजेहि, राजेभि, राजेसु' पद कहे गए हैं। चुलनिरुत्ति और निरुत्तिपिटक में वे नहीं आए हैं, और उनका न आना ही अधिक उचित है क्योंकि वे पालि में नहीं देखे जाते, इसलिए यहाँ हमारे द्वारा वे नहीं कहे गए हैं। पालि पद्धति का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर हम इस प्रकार के पदों को केवल समास में ही देखते हैं, अन्यत्र नहीं। यहाँ ये प्रयोग हैं - 'आवुत्थं धम्मराजेन', 'सिविराजेन पेसितो', 'पजापतिस्स देवराजस्स धजग्गं', और 'निक्खमन्ते महाराजे, सिवीनं रट्ठवड्ढने'। इस प्रकार पालि पद्धति का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर 'राजेन' आदि पदों को हम केवल समास में ही देखते हैं। न केवल पालि पद्धति में, बल्कि प्राचीन अट्ठकथा पद्धति का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर भी हम उन्हें केवल समास में ही देखते हैं, अन्यत्र नहीं। ऐसा होने पर भी इस विषय का भली-भाँति निरीक्षण किया जाना चाहिए। क्योंकि अट्ठकथा सहित त्रिपिटक बुद्धवचन में पूर्णतः पद्धति को लक्षित करने में प्रभिन्नप्रतिसंविद् प्राप्त क्षीणास्त्रों के अतिरिक्त और कौन समर्थ हो सकता है? เอตฺถ จ สมาสนฺตคตราช-สทฺทสฺส นามิกปทมาลาโย ทฺวิธา วุจฺจนฺเต โอการนฺตาการนฺตวเสน. ตตฺโรการนฺตา ‘‘มหาราโช ยุวราโช สิวิราโช ธมฺมราโช’’อิจฺเจวมาทโย ภวนฺติ. อาการนฺตา ปน ‘‘มหาราชา ยุวราชา สิวิราชา ธมฺมราชา’’อิจฺเจวมาทโย. เอตฺถ กิญฺจาปิ ปาฬิยํ โปราณฏฺฐกถาสุ จ ‘‘มหาราโช’’ติอาทีนิ น สนฺติ, ตถาปิ ‘‘สพฺพมิตฺโต สพฺพสโข, สพฺพภูตานุกมฺปโก’’ติ ปาฬิยํ ‘‘สพฺพสโข’’ติ ทสฺสนโต ‘‘มหาราโช’’ติอาทีนิปิ อวสฺสมิจฺฉิตพฺพานิ. ตถา หิ สมาเสสุ ‘‘ธมฺมราเชน, ธมฺมราชสฺสา’’ติอาทีนิ ทิสฺสนฺติ. เอตานิ โอการนฺตรูปานิ เอว, นาการนฺตรูปานิ. มหาราโช, มหาราชา. มหาราชํ, มหาราเช. มหาราเชน, มหาราเชหิ, มหาราเชภิ. มหาราชสฺส, มหาราชานํ. มหาราชา, มหาราชสฺมา, มหาราชมฺหา, มหาราเชหิ, มหาราเชภิ. มหาราชสฺส, มหาราชานํ. มหาราเช, มหาราชสฺมึ, มหาราชมฺหิ, มหาราเชสุ. โภ มหาราช, ภวนฺโต มหาราชา[Pg.205]. กจฺจายนจูฬนิรุตฺตินเยหิ ปน ‘‘โภ มหาราชา’’อิติ เอกวจนพหุวจนานิปิ ทฏฺฐพฺพานิ. ยถา ‘‘มหาราโช’’ติ โอการนฺตปทสฺส วเสน, เอวํ ‘‘สิวิราโช ธมฺมราโช เทวราโช’’ติอาทีนมฺปิ โอการนฺตปทานํ วเสน ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. यहाँ समास के अंत में आने वाले 'राज' शब्द की शब्द-रूपावली ओ-कारान्त और आ-कारान्त के भेद से दो प्रकार से कही जाती है। उनमें ओ-कारान्त 'महाराजो, युवराजो, सिविराजो, धम्मराजो' इत्यादि होते हैं। आ-कारान्त तो 'महाराजा, युवराजा, सिविराजा, धम्मराजा' इत्यादि होते हैं। यहाँ यद्यपि पालि और प्राचीन अट्ठकथाओं में 'महाराजो' आदि स्वतंत्र रूप से नहीं हैं, तथापि पालि में 'सब्बमित्तो सब्बसखो, सब्बभूतानुकम्पको' में 'सब्बसखो' के प्रयोग से 'महाराजो' आदि को भी अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए। क्योंकि समासों में 'धम्मराजेन, धम्मराजस्स' आदि देखे जाते हैं। ये ओ-कारान्त रूप ही हैं, आ-कारान्त रूप नहीं। महाराजो, महाराजा। महाराजं, महाराजे। महाराजेन, महाराजेहि, महाराजेभि। महाराजस्स, महाराजानां। महाराजा, महाराजस्मा, महाराजम्हा, महाराजेहि, महाराजेभि। महाराजस्स, महाराजानां। महाराजे, महाराजस्मिं, महाराजम्हि, महाराजेसु। भो महाराज, भवन्तो महाराजा। कच्चायन और चुलनिरुत्ति की पद्धति से 'भो महाराजा' - ये एकवचन और बहुवचन भी देखे जाने चाहिए। जिस प्रकार 'महाराजो' इस ओ-कारान्त पद के अनुसार है, उसी प्रकार 'सिविराजो, धम्मराजो, देवराजो' आदि ओ-कारान्त पदों के अनुसार मूल रूप की शब्द-रूपावली जोड़ी जानी चाहिए। อยํ ปนาการนฺตวเสน นามิกปทมาลา – यह आ-कारान्त के अनुसार शब्द-रूपावली है - มหาราชา, มหาราชา, มหาราชาโน. มหาราชานํ, มหาราชํ, มหาราชาโน. มหารญฺญา, มหาราชินา, มหาราชูหิ, มหาราชูภิ. มหารญฺโญ, มหาราชิโน, มหารญฺญํ, มหาราชูนํ. มหารญฺญา, มหาราชูหิ, มหาราชูภิ. มหารญฺโญ, มหาราชิโน, มหารญฺญํ, มหาราชูนํ. มหารญฺเญ, มหาราชินิ, มหาราชูสุ. โภ มหาราช, ภวนฺโต มหาราชาโน. महाराजा, महाराजा, महाराजानो। महाराजानं, महाराजं, महाराजानो। महाराञ्ञा, महाराजिनो, महाराजूनं, महाराजूनं। महाराञ्ञो, महाराजिनो, महाराञ्ञं, महाराजूनं। महाराञ्ञा, महाराजूनं, महाराजूनं। महाराञ्ञो, महाराजिनो, महाराञ्ञं, महाराजूनं। महाराञ्ञे, महाराजिनि, महाराजूसु। भो महाराज, भवन्तो महाराजानो। อิธาปิ ปกรณทฺวยนเยน ‘‘โภ มหาราชา’’ อิติ เอกวจนพหุวจนานิปิ ทฏฺฐพฺพานิ. ยถา จ ‘‘มหาราชา’’ติ อาการนฺตปทสฺส วเสน, เอวํ ‘‘สิวิราชา, ธมฺมราชา, เทวราชา’’ติอาทีนมฺปิ อาการนฺตปทานํ วเสน ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. यहाँ भी दो प्रकरणों की पद्धति से 'भो महाराजा' - ये एकवचन और बहुवचन भी देखे जाने चाहिए। और जिस प्रकार 'महाराजा' इस आ-कारान्त पद के अनुसार है, उसी प्रकार 'सिविराजा, धम्मराजा, देवराजा' आदि आ-कारान्त पदों के अनुसार मूल रूप की शब्द-रूपावली जोड़ी जानी चाहिए। อิธ อปราปิ อตฺถสฺส ปากฏีกรณตฺถํ กฺริยาปเทหิ สทฺธึ โยเชตฺวา อาการนฺโตการนฺตานํ มิสฺสกวเสน นามิกปทมาลา วุจฺจเต – यहाँ अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के साथ जोड़कर आ-कारान्त और ओ-कारान्त के मिश्रित रूप से शब्द-रूपावली कही जाती है - มหาราชา, มหาราโช ติฏฺฐติ, มหาราชาโน, มหาราชา ติฏฺฐนฺติ. มหาราชานํ, มหาราชํ ปสฺสติ, มหาราชาโน, มหาราเช ปสฺสติ. มหารญฺญา, มหาราชินา, มหาราเชน กตํ, มหาราชูหิ, มหาราชูภิ, มหาราเชหิ, มหาราเชภิ กตํ. มหารญฺโญ, มหาราชิโน, มหาราชสฺส ทียเต, มหารญฺญา, มหาราชา, มหาราชสฺมา, มหาราชมฺหา นิสฺสฏํ, มหาราชูหิ, มหาราชูภิ, มหาราเชหิ[Pg.206], มหาราเชภิ นิสฺสฏํ. มหารญฺโญ, มหาราชิโน, มหาราชสฺส ปริคฺคโห, มหารญฺญํ, มหาราชูนํ, มหาราชานํ ปริคฺคโห. มหารญฺเญ, มหาราชินิ, มหาราเช, มหาราชสฺมึ, มหาราชมฺหิ ปติฏฺฐิตํ, มหาราชูสุ, มหาราเชสุ ปติฏฺฐิตํ. โภ มหาราช ตฺวํ ติฏฺฐ, โภนฺโต มหาราชาโน, มหาราชา ตุมฺเห ติฏฺฐถาติ. เอวํ ‘‘ยุวราชา, ยุวราโช’’ติอาทีสุปิ. महाराजा, महाराजो तिट्ठति, महाराजानो, महाराजा तिट्ठन्ति। महाराजानं, महाराजं पस्सति, महाराजानो, महाराजे पस्सति। महाराञ्ञा, महाराजिनो, महाराजेन कतं, महाराजूनं, महाराजूनं, महाराजेहि, महाराजेंभि कतं। महाराञ्ञो, महाराजिनो, महाराजस्स दीयते, महाराञ्ञा, महाराजा, महाराजस्मा, महाराजम्हा निस्सटं, महाराजूनं, महाराजूनं, महाराजेहि, महाराजेंभि निस्सटं। महाराञ्ञो, महाराजिनो, महाराजस्स परिग्गहो, महाराञ्ञं, महाराजूनं, महाराजानं परिग्गहो। महाराञ्ञे, महाराजिनि, महाराजे, महाराजस्मिं, महाराजम्हि पतिट्ठितं, महाराजूसु, महाराजेसु पतिट्ठितं। भो महाराज त्वं तिट्ठ, भन्तो महाराजानो, महाराजा तुम्हे तिट्ठथाति। इसी प्रकार 'युवराजा, युवराजो' आदि में भी। เกเจตฺถ วเทยฺยุํ ‘‘กสฺมา ปกรณกตฺตุนา อิมสฺมึ ฐาเน มหนฺโต วายาโม จ มหนฺโต จ ปรกฺกโม กโต, นนฺเวเตสุปิ ปเทสุ กานิจิ พุทฺธวจเน วิชฺชนฺติ, กานิจิ น วิชฺชนฺตีติ? วิญฺญูหิ เต เอวํ วตฺตพฺพา ‘‘ปกรณกตฺตาเรเนตฺถ โส จ มหนฺโต วายาโม โส จ มหนฺโต ปรกฺกโม สาฏฺฐกเถ นวงฺเค สตฺถุสาสเน สทฺเทสุ จ อตฺเถสุ จ โสตารานํ สุฏฺฐุ โกสลฺลุปฺปาทเนน สาสนสฺโสปการตฺถํ กโต, ยานิ เจตานิ เตน ปทานิ ทสฺสิตานิ, เอเตสุ กานิจิ พุทฺธวจเน วิชฺชนฺติ, กานิจิ น วิชฺชนฺติ. เอตฺถ ยานิ พุทฺธวจเน วิชฺชนฺติ, ตานิ วิชฺชมานวเสน คหิตานิ. ยานิ น วิชฺชนฺติ, ตานิ โปราณฏฺฐกถาทีสุ วิชฺชมานวเสน ปาฬินยวเสน จ คหิตานี’’ติ. อตฺรายํ สงฺเขปโต อธิปฺปายวิภาวนา – यहाँ कुछ लोग कह सकते हैं— 'प्रकरणकार (ग्रन्थकार) ने इस स्थान पर इतना महान् प्रयत्न और महान् पराक्रम क्यों किया है? क्या इन पदों में से कुछ बुद्धवचन में विद्यमान हैं और कुछ विद्यमान नहीं हैं?' विद्वानों द्वारा उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया जाना चाहिए— 'प्रकरणकार द्वारा यहाँ वह महान् प्रयत्न और वह महान् पराक्रम अट्ठकथा सहित नौ अंगों वाले शास्ता के शासन के शब्दों और अर्थों में श्रोताओं को भली-भाँति कौशल उत्पन्न करने के माध्यम से शासन के उपकार के लिए किया गया है। जो ये पद उनके द्वारा दिखाए गए हैं, उनमें से कुछ बुद्धवचन में विद्यमान हैं और कुछ विद्यमान नहीं हैं। यहाँ जो बुद्धवचन में विद्यमान हैं, उन्हें विद्यमान होने के कारण ग्रहण किया गया है। जो विद्यमान नहीं हैं, उन्हें प्राचीन अट्ठकथाओं आदि में विद्यमान होने के कारण और पालि-पद्धति (पालि-नय) के अनुसार ग्रहण किया गया है।' यहाँ संक्षेप में यह अभिप्राय का स्पष्टीकरण है— ‘‘อิทํ วตฺวา มหาราชา, กํโส พาราณสิคฺคโห; ธนุํ ตูณิญฺจ นิกฺขิปฺป, สํยมํ อชฺฌุปาคมี’’ติ “यह कहकर वाराणसी के अधिपति महाराज कंस ने धनुष और तरकश को रखकर संयम को प्राप्त किया।” อิทํ อาการนฺตสฺส มหาราชสทฺทสฺส นิทสฺสนํ. ยสฺมา ‘‘สพฺพสโข’’ติ ปาฬิ วิชฺชติ, ตสฺมา เตน นเยน ‘‘มหาราโช’’ติปิ โอการนฺโต ทิฏฺโฐ นาม โหติ ปุริสนเยน โยเชตพฺโพ จ. เตเนว จ ‘‘ตมพฺรวิ มหาราชา. นิกฺขมนฺเต มหาราเช’’ติอาทีนิ ทิสฺสนฺติ. यह 'आ'कारान्त 'महाराज' शब्द का उदाहरण है। चूँकि 'सब्बसखो' (सबका सखा) ऐसी पालि विद्यमान है, इसलिए उस पद्धति (नय) से 'महाराजो' भी 'ओ'कारान्त देखा गया है और उसे 'पुरिस' (पुरुष) शब्द की पद्धति के अनुसार जोड़ना चाहिए। इसी कारण 'तमब्रवि महाराजा' (उससे महाराज ने कहा), 'निक्खमन्ते महाराजे' (महाराज के निकलते समय) आदि देखे जाते हैं। เอวํ [Pg.207] มหาราชสทฺทสฺส โอการนฺตตฺเต สิทฺเธ ‘‘มหาราชา, มหาราชสฺมา, มหาราชมฺหา’’ติ ปญฺจมิยา เอกวจนญฺจ ‘‘มหาราเช, มหาราชสฺมึ, มหาราชมฺหี’’ติ สตฺตมิยา เอกวจนญฺจ สิทฺธานิ เอว โหนฺติ ปาฬิยํ อวิชฺชมานานมฺปิ นยวเสน คเหตพฺพตฺตา. ‘‘ราเชน, ราชสฺสา’’ติอาทีนิ ปน นยวเสน คเหตพฺพานิ น โหนฺติ. กสฺมาติ เจ? ยสฺมา ‘‘ราชา พฺรหฺมา สขา อตฺตา’’อิจฺเจวมาทีนิ ‘‘ปุริโส อุรโค’’ติอาทีนิ วิย อญฺญมญฺญํ สพฺพถา สทิสานิ น โหนฺติ. ตถา หิ เนสํ ‘‘รญฺญา พฺรหฺมุนา สขินา อตฺตนา อตฺเตน สานา ปุมุนา’’ติอาทีนิ วิสทิสานิปิ รูปานิ ภวนฺติ, ตสฺมา ตานิ น สกฺกา นยวเสน ชานิตุํ. เอวํ ทุชฺชานตฺตา ปน ปาฬิยํ โปราณฏฺฐกถาสุ จ ยถารุตปทาเนว คเหตพฺพานิ. มหาราชสทฺทาทีนํ ปน โอการนฺตภาเว สิทฺเธเยว ‘‘ปุริสนโยคธา อิเม สทฺทา’’ติ นยคฺคหณํ ทิสฺสติ, ตสฺมา อมฺเหหิ นยวเสน ‘‘มหาราชา, มหาราชสฺมา’’ติอาทีนิ วุตฺตานิ. ยถา หิ – इस प्रकार 'महाराज' शब्द के 'ओ'कारान्त सिद्ध होने पर, 'महाराजा, महाराजस्मा, महाराजम्हा'—ये पञ्चमी विभक्ति के एकवचन, और 'महाराजे, महाराजस्मिं, महाराजम्हि'—ये सप्तमी विभक्ति के एकवचन सिद्ध ही होते हैं, क्योंकि पालि में विद्यमान न होने पर भी उन्हें पद्धति (नय) के अनुसार ग्रहण किया जाना चाहिए। किन्तु 'राजेन, राजस्स' आदि को पद्धति के अनुसार ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए। क्यों? क्योंकि 'राजा, ब्रह्मा, सखा, अत्ता' आदि शब्द 'पुरिसो, उरगो' आदि की तरह एक-दूसरे के सर्वथा समान नहीं होते। क्योंकि उनके 'रञ्ञा, ब्रहुना, सखिना, अत्तना, अत्तेन, साना, पुमुना' आदि विसदृश (असमान) रूप भी होते हैं, इसलिए उन्हें पद्धति (नय) के अनुसार नहीं जाना जा सकता। इस प्रकार कठिनता से जाने जाने योग्य होने के कारण, पालि और प्राचीन अट्ठकथाओं में केवल यथाश्रुत (जैसे शब्द हैं) पदों को ही ग्रहण करना चाहिए। किन्तु 'महाराज' आदि शब्दों के 'ओ'कारान्त होने के सिद्ध होने पर ही 'ये शब्द पुरुष-शब्द की पद्धति वाले हैं'—ऐसा पद्धति-ग्रहण देखा जाता है, इसलिए हमारे द्वारा पद्धति के अनुसार 'महाराजा, महाराजस्मा' आदि कहे गए हैं। जैसे कि— ‘‘เอตญฺหิ เต ทุราชานํ, ยํ เสสิ มตสายิกํ; ยสฺส เต กฑฺฒมานสฺส, หตฺถา ทณฺโฑน มุจฺจตี’’ติ “यह तुम्हारे लिए बुरा राज्य (या स्थिति) है, जो तुम मृतक की तरह सो रहे हो; खींचे जाने पर भी तुम्हारे हाथ से दण्ड नहीं छूटता है।” เอตฺถ ‘‘หตฺถา’’ติ, ‘‘อตฺตทณฺฑา ภยํ ชาต’’นฺติ เอตฺถ ปน ‘‘ทณฺฑา’’ติ จ โอการนฺตสฺส ปญฺจมิเยกวจนสฺส ทสฺสนโต ‘‘อุรคา, ปฏงฺคา, วิหคา’’ติอาทีนิปิ โอการนฺตานิ ปญฺจมิเยกวจนานิ คเหตพฺพานิ โหนฺติ. ยถา จ ‘‘ทาฐินิ มาติมญฺญวฺโห, สิงฺคาโล มม ปาณโท’’ติ เอตฺถ ‘‘มญฺญวฺโห’’ติ, ‘‘สุทฺธา สุทฺเธหิ สํวาสํ, กปฺปยวฺโห ปติสฺสตา’’ติ เอตฺถ ปน ‘‘กปฺปยวฺโห’’ติ จ กฺริยาปทสฺส ทสฺสนโต ‘‘คจฺฉวฺโห, ภุญฺชวฺโห, สยวฺโห’’ติอาทีนิปิ คเหตพฺพานิ โหนฺติ. คณฺหนฺติ จ ตาทิสานิ ปทรูปานิ สาสเน สุกุสลา กุสลา, ตสฺมา อมฺเหหิปิ นยคฺคาหวเสน ‘‘มหาราชา[Pg.208], มหาราชสฺมา’’ติอาทีนิ วุตฺตานิ. นยคฺคาหวเสน ปน คหเณ อสติ กถํ นามิกปทมาลา ปริปุณฺณา ภวิสฺสนฺติ, สติเยว ตสฺมึ ปริปุณฺณา ภวนฺติ. यहाँ 'हत्था' (हाथ से) और 'अत्तदण्डा भयं जातं' (स्वयं के दण्ड से भय उत्पन्न हुआ) में 'दण्डा' (दण्ड से)—इन 'ओ'कारान्त शब्दों के पञ्चमी एकवचन के प्रयोग देखे जाने के कारण 'उरगा, पटङ्गा, विहगा' आदि को भी 'ओ'कारान्त पञ्चमी एकवचन के रूप में ग्रहण करना चाहिए। और जैसे 'दाठिनि मातिमञ्ञव्हो, सिङ्गालो मामा पाणदो' यहाँ 'मञ्ञव्हो' और 'सुद्धा सुद्धेहि संवासं, कप्पयव्हो पतिस्सता' यहाँ 'कप्पयव्हो'—इन क्रियापदों के प्रयोग देखे जाने के कारण 'गच्छव्हो, भुञ्जव्हो, सयव्हो' आदि को भी ग्रहण करना चाहिए। शासन में सुकुशल विद्वान इस प्रकार के पद-रूपों को ग्रहण करते हैं, इसलिए हमारे द्वारा भी पद्धति-ग्रहण के कारण 'महाराजा, महाराजस्मा' आदि कहे गए हैं। यदि पद्धति-ग्रहण के अनुसार ग्रहण न किया जाए, तो नामिक पदमाला (शब्द-रूप) कैसे पूर्ण होगी? उसके होने पर ही वे पूर्ण होते हैं। ตถา หิ พุทฺธวจเน อเนกสตสหสฺสานิ นามิกปทานิ กฺริยาปทานิ จ ปาฏิเอกฺกํ ปาฏิเอกฺกํ เอกวจนพหุวจนกาหิ สตฺตหิ อฏฺฐหิ วา นามวิภตฺตีหิ ฉนฺนวุติยา จ อาขฺยาติกวจเนหิ โยชิตานิ น สนฺติ, นยวเสน ปน สนฺติเยว, อิติ นยวเสน ‘‘มหาราชา, มหาราชสฺมา’’ติอาทีนิ อมฺเหหิ ฐปิตานิ. ‘‘มหาราชา ติฏฺฐนฺติ, มหาราชา ตุมฺเห ติฏฺฐถา’’ติ อิมานิ ปน ‘‘อถ โข จตฺตาโร มหาราชา มหติยา จ ยกฺขเสนาย มหติยา จ กุมฺภณฺฑเสนายา’’ติ ทสฺสนโต, तथैव बुद्धवचन में अनेक लाख नामिक पद और क्रियापद अलग-अलग एकवचन और बहुवचन की सात या आठ नाम-विभक्तियों और छियानवे आख्यात-वचनों (तिङ्-प्रत्ययों) के साथ प्रयुक्त नहीं हैं, किन्तु पद्धति (नय) के अनुसार वे विद्यमान ही हैं; इस प्रकार पद्धति के अनुसार 'महाराजा, महाराजस्मा' आदि हमारे द्वारा स्थापित किए गए हैं। 'महाराजा तिट्ठन्ति' (महाराज खड़े हैं), 'महाराजा तुम्हे तिट्ठथ' (महाराजों, तुम खड़े रहो)—ये प्रयोग तो 'अथ खो चत्तारो महाराजा महतिया च यक्खसेनाय महतिया च कुम्भाण्डसेनाय' (तब चार महाराज बड़ी यक्ष-सेना और बड़ी कुम्भाण्ड-सेना के साथ...) इस प्रयोग के देखे जाने के कारण, ‘‘จตฺตาโร เต มหาราชา, สมนฺตา จตุโร ทิสา; ททฺทฬฺหมานา อฏฺฐํสุ, วเน กาปิลวตฺถเว’’ติ “वे चारों महाराज, चारों दिशाओं में चारों ओर, देदीप्यमान होते हुए कपिलवस्तु के वन में खड़े हुए।” ทสฺสนโต จ วุตฺตานิ. ‘‘มหาราช’’นฺติอาทีนิปิ ปาฬิญฺจ ปาฬินยญฺจ ทิสฺวา เอว วุตฺตานิ. อสมาเส ‘‘ราชํ, ราเชนา’’ติอาทีนิ น ปสฺสาม, ตสฺมา สุฏฺฐุ วิจาเรตพฺพมิทํ ฐานํ. อิทญฺหิ ทุทฺทสํ วีรชาตินา ชานิตพฺพฏฺฐานํ. สเจ ปนายสฺมนฺโต พุทฺธวจเน วา โปราณิกาสุ วา อฏฺฐกถาสุ อสมาเส ‘‘ราชํ, ราเชนา’’ติอาทีนิ ปสฺเสยฺยาถ, ตทา สาธุกํ มนสิ กโรถ. โก หิ นาม สพฺพปฺปกาเรน พุทฺธวจเน โวหารปฺปเภทํ ชานิตุํ สมตฺโถ อญฺญตฺร ปภินฺนปฏิสมฺภิเทหิ มหาขีณาสเวหิ. —के देखे जाने के कारण कहे गए हैं। 'महाराजं' आदि भी पालि और पालि-पद्धति को देखकर ही कहे गए हैं। हम समास के बिना 'राजं, राजेन' आदि को नहीं देखते, इसलिए इस विषय पर भली-भाँति विचार किया जाना चाहिए। यह स्थान दुर्दर्श (कठिनता से दिखने वाला) है और विद्वानों (वीरजाति) द्वारा जानने योग्य है। यदि आप आयुष्मान् बुद्धवचन में या प्राचीन अट्ठकथाओं में बिना समास के 'राजं, राजेन' आदि देखें, तो उसे भली-भाँति मन में धारण करें। क्योंकि प्रभिन्न-प्रतिसम्भिदा (विशिष्ट ज्ञान) वाले महाक्षीणाल्रवों (अर्हतों) के अतिरिक्त भला कौन बुद्धवचन में व्यवहार-भेद को सभी प्रकार से जानने में समर्थ है? วุตฺตญฺเหตํ ภควตา – भगवान द्वारा यह कहा गया है— ‘‘วีตตณฺโห อนาทาโน, นิรุตฺติปทโกวิโท; อกฺขรานํ สนฺนิปาตํ, ชญฺญา ปุพฺพาปรานิ จา’’ติ. “जो तृष्णा-रहित है, उपादान-रहित है, निरुक्ति और पदों में कुशल है; वह अक्षरों के संयोग और उनके पूर्वापर (क्रम) को जाने।” พฺรหฺมา[Pg.209], พฺรหฺมา, พฺรหฺมาโน. พฺรหฺมานํ, พฺรหฺมํ, พฺรหฺมาโน. พฺรหฺมุนา, พฺรหฺเมหิ, พฺรหฺเมภิ, พฺรหฺมูหิ, พฺรหฺมูภิ. พฺรหฺมสฺส, พฺรหฺมุโน, พฺรหฺมานํ, พฺรหฺมูนํ. พฺรหฺมุนา, พฺรหฺเมหิ, พฺรหฺเมภิ, พฺรหฺมูหิ, พฺรหฺมูภิ. พฺรหฺมสฺส, พฺรหฺมุโน, พฺรหฺมานํ, พฺรหฺมูนํ. พฺรหฺมนิ, พฺรหฺเมสุ, โภ พฺรหฺม, โภ พฺรหฺเม, ภวนฺโต พฺรหฺมาโน. ब्रह्मा, ब्रह्मा, ब्रह्माणो। ब्रह्मानं, ब्रह्मं, ब्रह्माणो। ब्रह्मुना, ब्रह्मेहि, ब्रह्मेभि, ब्रह्मूहि, ब्रह्मूभि। ब्रह्मस्स, ब्रह्मुनो, ब्रह्मानं, ब्रह्मूनं। ब्रह्मुना, ब्रह्मेहि, ब्रह्मेभि, ब्रह्मूहि, ब्रह्मूभि। ब्रह्मस्स, ब्रह्मुनो, ब्रह्मानं, ब्रह्मूनं। ब्रह्मणि, ब्रह्मेसु, भो ब्रह्म, भो ब्रह्मे, भवन्तो ब्रह्माणो। ยมกมหาเถรรุจิยา ‘‘โภ พฺรหฺมา’’อิติ พหุวจนํ วา. เอตฺถ ปน ‘‘ปณฺฑิตปุริเสหิ เทเวหิ พฺรหฺมูหี’’ติ ฏีกาวจนสฺส ทสฺสนโต, ‘‘พฺรหฺมูนํ วจีโฆโส โหตี’’ติ จ ‘‘พฺรหฺมูนํ วิมานาทีสุ ฉนฺทราโค กามาสโว น โหตี’’ติ จ อฏฺฐกถาวจนสฺส ทสฺสนโต, ‘‘วิหึสสญฺญี ปคุณํ น ภาสึ, ธมฺมํ ปณีตํ มนุเชสุ พฺรหฺเม’’ติ อาหจฺจภาสิตสฺส จ ทสฺสนโต ‘‘พฺรหฺมูหิ, พฺรหฺมูภิ, พฺรหฺมูนํ, พฺรหฺเม’’ติ ปทานิ วุตฺตานิ, เอตานิ จูฬนิรุตฺตินิรุตฺติปิฏกกจฺจายเนสุ น อาคตานิ. यमक महाथेर की रुचि के अनुसार 'भो ब्रह्मा' यह बहुवचन भी होता है। यहाँ 'पण्डितपुरिसेहि देवेहि ब्रह्मूहि' इस टीका के वचन के देखे जाने से, 'ब्रह्मूनं वचीघोषो होति' और 'ब्रह्मूनं विमानादीसु छन्दरागो कामासवो ना होति' इन अट्ठकथा वचनों के देखे जाने से, और 'विहिंसासञ्ञी पगुणं न भासिं, धम्मं पणीतं मनुजेसु ब्रह्मे' इस आगम वचन के देखे जाने से 'ब्रह्मूहि, ब्रह्मूभि, ब्रह्मूनं, ब्रह्मे' ये पद कहे गए हैं; ये चूलनिरुत्ति, निरुत्तिपिटक और कच्चायन में नहीं आए हैं। สขา, สขา, สขิโน, สขาโน, สขาโย. สขํ, สขารํ, สขานํ, สขิโน, สขาโน, สขาโย. สขินา, สขาเรหิ, สขาเรภิ, สเขหิ, สเขภิ. สขิสฺส, สขิโน, สขีนํ, สขารานํ, สขานํ. สขารสฺมา, สขินา, สขาเรหิ, สขาเรภิ, สเขหิ, สเขภิ. สขิสฺส, สขิโน, สขีนํ, สขารานํ, สขานํ. สเข, สเขสุ, สขาเรสุ. โภ สข, โภ สขา, โภ สขิ, โภ สขี, โภ สเข, ภวนฺโต สขิโน, สขาโน, สขาโย. सखा, सखा, सखिनो, सखानो, सखायो। सखं, सखारं, सखानं, सखिनो, सखानो, सखायो। सखिना, सखारेहि, सखारेभि, सखेहि, सखेभि। सखिस्स, सखिनो, सखीनं, सखारानं, सखानं। सखारस्मा, सखिना, सखारेहि, सखारेभि, सखेहि, सखेभि। सखिस्स, सखिनो, सखीनं, सखारानं, सखानं। सखे, सखेसु, सखारेसु। भो सख, भो सखा, भो सखि, भो सखी, भो सखे, भवन्तो सखिनो, सखानो, सखायो। ยมกมหาเถรมเตน ‘‘โภ สขา’’อิติ พหุวจนํ วา. ปาฬิยํ ปน สุวณฺณกกฺกฏชาตเก ‘‘หเร สขา กิสฺส นุ มํ ชหาสี’’ติ ทีฆวเสน วุตฺโต สขาสทฺโท อาลปเนกวจนํ, ตสฺมา ยมกมหาเถรนโย น ยุชฺชตีติ เจ[Pg.210]? โน น ยุชฺชติ. ยสฺมา ‘‘เนตาทิสา สขา โหนฺติ, ลพฺภา เม ชีวโต สขา’’ติ มโนชชาตเก สขาสทฺโท เอกวจนมฺปิ โหติ พหุวจนมฺปิ. ตถา หิ ตตฺถ ปฐมปาเท พหุวจนํ, ทุติยปาเท ปเนกวจนํ, ตสฺมา ยมกมหาเถเรน ปจฺจตฺตาลปนพหุวจนฏฺฐาเน สขาสทฺโท วุตฺโต. เอตฺถ จ ‘‘สพฺพมิตฺโต สพฺพสโข, สพฺพภูตานุกมฺปโก’’ติ ปาฐานุโลเมน สมาเส ลพฺภมานสฺส สขสทฺทสฺส นามิกปทมาลา ภวติ ‘‘สพฺพสโข, สพฺพสขา, สพฺพสขํ, สพฺพสเข’’ติอาทินา ปุริสนเยน. ตตฺรายํ สมาสวิคฺคโห – สพฺเพสํ ชนานํ สขา, สพฺเพ วา ชนา สขิโน เอตสฺสาติ สพฺพสโข, ยถา สพฺพเวรีติ. यमक महाथेर के मत से 'भो सखा' यह बहुवचन भी होता है। पालि में सुवण्णकक्कट जातक में 'हरे सखा किस्स नु मं जहासि' यहाँ दीर्घ के रूप में कहा गया 'सखा' शब्द सम्बोधन एकवचन है, इसलिए यदि कहा जाए कि यमक महाथेर का नियम सही नहीं है? नहीं, यह गलत नहीं है। क्योंकि 'नेतादिसा सखा होन्ति, लब्भा मे जीवतो सखा' इस मनोज जातक में 'सखा' शब्द एकवचन भी होता है और बहुवचन भी। क्योंकि वहाँ प्रथम पाद में बहुवचन है, और द्वितीय पाद में एकवचन है, इसलिए यमक महाथेर द्वारा प्रथमा सम्बोधन बहुवचन के स्थान पर 'सखा' शब्द कहा गया है। और यहाँ 'सब्बमित्तो सब्बसखो, सब्बभूतानुकम्पको' इस पाठ के अनुसार समास में प्राप्त होने वाले 'सख' शब्द की नामिक पदमाला 'सब्बसखो, सब्बसखा, सब्बसखं, सब्बसखे' आदि के रूप में 'पुरिस' (पुरुष) शब्द के समान होती है। वहाँ यह समास विग्रह है - 'सब्बेसं जनानं सखा' अथवा 'सब्बे वा जना सखिनो एतस्स' वह 'सब्बसखो' है, जैसे 'सब्बवेरी'। อตฺตา, อตฺตา, อตฺตาโน. อตฺตานํ, อตฺตํ, อตฺตาโน. อตฺตนา, อตฺเตน, อตฺตเนหิ, อตฺตเนภิ. อตฺตโน, อตฺตานํ. อตฺตนา, อตฺตเนหิ, อตฺตเนภิ. อตฺตโน, อตฺตานํ. อตฺตนิ, อตฺตเนสุ. โภ อตฺต, ภวนฺโต อตฺตา, โภนฺโต อตฺตาโน. अत्ता, अत्ता, अत्तानो। अत्तानं, अत्तं, अत्तानो। अत्तना, अत्तेन, अत्तेहि, अत्तेभि। अत्तनो, अत्तानं। अत्तना, अत्तेहि, अत्तेभि। अत्तनो, अत्तानं। अत्तनि, अत्तेसु। भो अत्त, भवन्तो अत्ता, भोन्तो अत्तानो। เอตฺถ ปน อตฺตํ นิรงฺกตฺวาน ปิยานิ เสวติ. यहाँ 'अत्तं निरंकत्वान पियानि सेवति' (स्वयं को त्यागकर प्रिय वस्तुओं का सेवन करता है)। ‘‘สเจ คจฺฉสิ ปญฺจาลํ, ขิปฺป’มตฺตํ ชหิสฺสสิ; มิคํ ปนฺถานุปนฺนํว, มหนฺตํ ภยเมสฺสตี’’ติ 'यदि तुम पञ्चाल जाओगे, तो शीघ्र ही स्वयं को त्याग दोगे; जैसे मार्ग में आया हुआ मृग महान भय को प्राप्त होता है।' ปาฬีสุ ‘‘อตฺต’’นฺติ ทสฺสนโต ‘‘อตฺต’’นฺติ อิธ วุตฺตํ, ‘‘อตฺเตน วา อตฺตนิเยน วา’’ติ ปาฬิทสฺสนโต ปน ‘‘อตฺเตนา’’ติ. จูฬนิรุตฺติยํ ปน ‘‘อตฺตสฺสา’’ติ จตุตฺถีฉฏฺฐีนเมกวจนํ อาคตํ, เอตํ กจฺจายเน นิรุตฺติปิฏเก จ น ทิสฺสติ. กตฺถจิ ปน ‘‘อตฺเตสู’’ติ อาคตํ. สพฺพาเนตานิ สาฏฺฐกถํ ชินตนฺตึ โอโลเกตฺวา คเหตพฺพานิ. पालि ग्रन्थों में 'अत्तं' ऐसा देखे जाने से यहाँ 'अत्तं' कहा गया है, और 'अत्तेन वा अत्त नियेन वा' इस पालि के देखे जाने से 'अत्तेना' कहा गया है। चूलनिरुत्ति में 'अत्तस्स' यह चतुर्थी-षष्ठी एकवचन आया है, यह कच्चायन और निरुत्तिपिटक में नहीं दिखता है। कहीं-कहीं 'अत्तेसु' भी आया है। इन सबको अट्ठकथा सहित बुद्धवचन को देखकर ग्रहण करना चाहिए। ‘‘อาตุมา[Pg.211], อาตุมา, อาตุมาโน. อาตุมานํ, อาตุมํ, อาตุมาโน. อาตุเมน, อาตุเมหิ, อาตุเมภี’’ติอาทินา ปุริสนเยน วตฺวา ‘‘โภ อาตุม, ภวนฺโต อาตุมา, อาตุมาโน’’ติ วตฺตพฺพํ. 'आतुमा, आतुमा, आतुमानो। आतुमानं, आतुमं, आतुमानो। आतुमेन, आतुमेहि, आतुमेभि' आदि 'पुरिस' (पुरुष) शब्द के समान कहकर 'भो आतुम, भवन्तो आतुमा, आतुमानो' ऐसा कहना चाहिए। ตตฺร อตฺตสทฺทสฺส สมาเส ‘‘ภาวิตตฺโต, ภาวิตตฺตา. ภาวิตตฺตํ, ภาวิตตฺเต. ภาวิตตฺเตน, ภาวิตตฺเตหิ, ภาวิตตฺเตภี’’ติ ปุริสนเยเนว นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. वहाँ 'अत्त' शब्द के समास में 'भावितत्तो, भावितत्ता। भावितत्तं, भावितत्ते। भावितत्तेन, भावितत्तेहि, भावितत्तेभि' इस प्रकार 'पुरिस' (पुरुष) शब्द के समान ही नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। สา, สา, สาโน. สานํ, สาเน. สานา, สาเนหิ, สาเนภิ. สาสฺส, สานํ. สานา, สาเนหิ, สาเนภิ. สาสฺส, สานํ. สาเน, สาเนสุ. โภ สา, ภวนฺโต สาโน. สา วุจฺจติ สุนโข. सा, सा, सानो। सानं, साने। साना, सानेहि, सानेभि। सास्स, सानं। साना, सानेहि, सानेभि। सास्स, सानं। साने, सानेसु। भो सा, भवन्तो सानो। 'सा' कुत्ते को कहा जाता है। เอตฺถ จ ‘‘น ยตฺถ สา อุปฏฺฐิโต โหติ. สาว วาเรนฺติ สูกร’’นฺติ นิทสฺสนปทานิ. เกจิ ปน สาสทฺทสฺส ทุติยาตติยาทีสุ ‘‘สํ, เส. เสนา’’ติอาทีนิ รูปานิ วทนฺติ, ตํ น ยุตฺตํ. น หิ ตานิ ‘‘สํ, เส. เสนา’’ติอาทีนิ รูปานิ พุทฺธวจเน เจว อฏฺฐกถาทีสุ จ นิรุตฺติปิฏเก จ ทิสฺสนฺติ. เอวํ ปน นิรุตฺติปิฏเก วุตฺตํ ‘‘สา ติฏฺฐติ, สาโน ติฏฺฐนฺติ. สานํ ปสฺสติ, สาเน ปสฺสติ. สานา กตํ, สาเนหิ กตํ, สาเนภิ กตํ. สาสฺส ทียเต, สานํ ทียเต. สานา นิสฺสฏํ, สาเนหิ นิสฺสฏํ, สาเนภิ นิสฺสฏํ. สาสฺส ปริคฺคโห, สานํ ปริคฺคโห. สาเน ปติฏฺฐิตํ, สาเนสุ ปติฏฺฐิตํ. โภ สา, ภวนฺโต สาโน’’ติ, ตสฺมา นิรุตฺติปิฏเก วุตฺตนเยเนว นามิกปทมาลา คเหตพฺพา. और यहाँ 'न यत्थ सा उपट्ठितो होति' और 'साव वारन्ति सूकरं' ये उदाहरण पद हैं। कुछ लोग 'सा' शब्द के द्वितीया, तृतीया आदि में 'सं, से, सेना' आदि रूप कहते हैं, वह उचित नहीं है। क्योंकि वे 'सं, से, सेना' आदि रूप बुद्धवचन में, अट्ठकथा आदि में और निरुत्तिपिटक में नहीं दिखते हैं। निरुत्तिपिटक में इस प्रकार कहा गया है - 'सा तिट्ठति, सानो तिट्ठन्ति। सानं पस्सति, साने पस्सति। साना कतं, सानेहि कतं, सानेभि कतं। सास्स दीयते, सानं दीयते। साना निस्सटं, सानेहि निस्सटं, सानेभि निस्सटं। सास्स परिग्गहो, सानं परिग्गहो। साने पतिट्ठितं, सानेसु पतिट्ठितं। भो सा, भवन्तो सानो'। इसलिए निरुत्तिपिटक में कहे गए नियम के अनुसार ही नामिक पदमाला ग्रहण करनी चाहिए। อตฺริทํ [Pg.212] วตฺตพฺพํ – ยถา ‘‘เสหิ ทาเรหิ อสนฺตุฏฺโฐ’’ติอาทีสุ ปุลฺลิงฺเค วตฺตมานสฺส ‘‘สโก’’อิติ อตฺถวาจกสฺส สสทฺทสฺส ‘‘อตฺตโน อยนฺติ โส’’ติ เอตสฺมึ อตฺเถ ‘‘โส, สา. สํ, เส. เสน, เสหิ, เสภิ. สสฺส, สานํ. สา, สสฺมา, สมฺหา, เสหิ, เสภิ. สสฺส, สานํ. เส, สสฺมึ, สมฺหิ, เสสู’’ติ ปุริสนเยน รูปานิ ภวนฺติ, น ตถา สุนขวาจกสฺส สาสทฺทสฺส รูปานิ ภวนฺติ. ยถา วา ‘‘หึสนฺติ อตฺตสมฺภูตา, ตจสารํว สํ ผลํ. สานิ กมฺมานิ ตปฺเปนฺติ, โกสลํ เสน’สนฺตุฏฺฐํ, ชีวคฺคาหํ อคาหยี’’ติอาทีสุ นปุํสกลิงฺเค วตฺตมานสฺส สกมิจฺจตฺถวาจกสฺส สสทฺทสฺส ‘‘สํ, สานิ, สา. สํ, สานิ, เส. เสน, เสหิ, เสภิ. สสฺส, สานํ. สา, สสฺมา, สมฺหา, เสหิ, เสภิ. สสฺส, สานํ. เส, สสฺมึ, สมฺหิ, เสสู’’ติ จิตฺตนเยน รูปานิ ภวนฺติ, น ตถา สุนขวาจกสฺส สาสทฺทสฺส รูปานิ ภวนฺติ. เอวํ สนฺเต กสฺมา เตหิ อาจริเยหิ ทุติยาตติยาฐาเน ‘‘สํ, เส. เสนา’’ติ วุตฺตํ, กสฺมา จ ปญฺจมีฐาเน ‘‘สา, สสฺมา, สมฺหา’’ติ วุตฺตํ, สตฺตมีฐาเน จ ‘‘เส, สสฺมึ, สมฺหี’’ติ จ วุตฺตํ? สพฺพเมตํ อการณํ, ตกฺกคาหมตฺเตน คหิตํ อการณํ. สุนขวาจโก หิ สาสทฺโท อาการนฺตตาปกติโก, น ปุริส จิตฺตสทฺทาทโย วิย อการนฺตตาปกติโก. ยาย อิมสฺส อีทิสานิ รูปานิ สิยุํ, สา จ ปกติ นตฺถิ. น เจโส ‘‘ราชา, พฺรหฺมา, สขา, อตฺตา’’ อิจฺเจวมาทโย วิย ปฐมํ อการนฺตภาเว ฐตฺวา ปจฺฉา ปฏิลทฺธอาการนฺตตา, อถ โข นิจฺจโมการนฺตตาปกติโก โคสทฺโท วิย นิจฺจมาการนฺตตาปกติโก. นิจฺจมาการนฺตตาปกติกสฺส จ เอวรูปานิ รูปานิ น ภวนฺติ, ตสฺมา นิรุตฺติปิฏเก ปภินฺนปฏิสมฺภิเทน อายสฺมตา มหากจฺจายเนน น วุตฺตานิ. สเจปิ มญฺเญยฺยุํ ‘‘อตฺตํ, อตฺเตนา’ติ [Pg.213] จ ทสฺสนโต ‘สํ, เสนา’ติ อิมานิ ปน คเหตพฺพานี’’ติ. น คเหตพฺพานิ ‘‘ราชา, พฺรหฺมา, สขา, อตฺตา, สา, ปุมา’’อิจฺเจวมาทีนํ อญฺญมญฺญํ ปทมาลาวเสน วิสทิสตฺตา นยวเสน คเหตพฺพาการสฺส อสมฺภวโต. อีทิเส หิ ฐาเน นยคฺคาหวเสน คหณํ นาม สโทสํเยว สิยา, ตสฺมา นยคฺคาหวเสนปิ น คเหตพฺพานิ. यहाँ यह कहना चाहिए - जैसे 'सेहि दारेहि असन्तुट्ठो' आदि में पुल्लिंग में प्रयुक्त 'स्वकीय' (अपना) अर्थ के वाचक 'स' शब्द के 'यह अपना है' इस अर्थ में 'सो, सा। सं, से। सेन, सेहि, सेभि। सस्स, सानं। सा, सस्मा, सम्हा, सेहि, सेभि। सस्स, सानं। से, सस्मिं, सम्हि, सेसु' इस प्रकार पुरुष-नय (पुरिस शब्द के समान) से रूप होते हैं, कुत्ते के वाचक 'सा' शब्द के रूप वैसे नहीं होते। अथवा जैसे 'हिंसन्ति अत्तसम्भूता, तचसारंव सं फलं। सानि कम्मानि तप्पन्ति, कोसलं सेन'सन्तुट्ठं, जीवग्गाहं अगाहयी' आदि में नपुंसक लिंग में प्रयुक्त 'स्वकीय' अर्थ के वाचक 'स' शब्द के 'सं, सानि, सा। सं, सानि, से। सेन, सेहि, सेभि। सस्स, सानं। सा, सस्मा, सम्हा, सेहि, सेभि। सस्स, सानं। से, सस्मिं, सम्हि, सेसु' इस प्रकार चित्त-नय (चित्त शब्द के समान) से रूप होते हैं, कुत्ते के वाचक 'सा' शब्द के रूप वैसे नहीं होते। ऐसा होने पर उन आचार्यों ने द्वितीया और तृतीया के स्थान पर 'सं, से। सेना' क्यों कहा, और पञ्चमी के स्थान पर 'सा, सस्मा, सम्हा' क्यों कहा, और सप्तमी के स्थान पर 'से, सस्मिं, सम्ही' क्यों कहा? यह सब अकारण है, केवल तर्क के आधार पर ग्रहण किया गया अकारण है। क्योंकि कुत्ते का वाचक 'सा' शब्द आकारांत प्रकृति का है, न कि पुरुष और चित्त आदि शब्दों की तरह अकारांत प्रकृति का। जिससे इसके इस प्रकार के रूप हों, वैसी प्रकृति इसमें नहीं है। और यह 'राजा, ब्रह्मा, सखा, अत्ता' आदि शब्दों की तरह पहले अकारांत भाव में रहकर बाद में आकारांतता प्राप्त करने वाला नहीं है, बल्कि हमेशा ओकारांत प्रकृति वाले 'गो' शब्द की तरह हमेशा आकारांत प्रकृति वाला है। और नित्य आकारांत प्रकृति वाले शब्द के इस प्रकार के रूप नहीं होते, इसलिए निरुत्तिपिटक में प्रभिन्नप्रतिसंभिदा वाले आयुष्मान महाकात्यायन द्वारा ये नहीं कहे गए हैं। यदि वे ऐसा मानें कि 'अत्तं, अत्तेना' आदि के दर्शन से 'सं, सेना' इन्हें ग्रहण करना चाहिए, तो उन्हें ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि 'राजा, ब्रह्मा, सखा, अत्ता, सा, पुमा' आदि की पदमालाओं में परस्पर भिन्नता होने के कारण नय के अनुसार ग्रहण करने का आकार असंभव है। ऐसे स्थान पर नय के आग्रह से ग्रहण करना दोषपूर्ण ही होगा, इसलिए नय के आग्रह से भी इन्हें ग्रहण नहीं करना चाहिए। อปรมฺปิ อตฺร วตฺตพฺพํ – ยถา หิ ‘‘สาหิ นารีหิ เต ยนฺตี’’ติ วุตฺเต ‘‘อตฺตโน นารี’’ติ, ‘‘สา นารี’’ติ เอวํ อตฺถวโต อิตฺถิลิงฺคสฺส กญฺญาสทฺเทน สทิสสฺส สาสทฺทสฺส ‘‘สา, สา, สาโย. สํ, สา, สาโย. สาย, สาหิ, สาภิ. สาย, สานํ. สาย, สาหิ, สาภิ. สาย, สานํ. สาย, สายํ, สาสู’’ติ กญฺญานเยน รูปานิ ภวนฺติ, น ตถา อิมสฺส สุนขวาจกสฺส สาสทฺทสฺส รูปานิ ภวนฺติ. เอวํ สนฺเต กสฺมา เต อาจริยา ตติยาพหุวจนฏฺฐาเน จ ‘‘สาหิ, สาภี’’ติ รูปานิ อิจฺฉนฺติ, กสฺมา จ สตฺตมีพหุวจนฏฺฐาเน ‘‘สาสู’’ติ? อิทมฺปิ อการณํ อาการนฺตปุลฺลิงฺคตฺตา. กสฺมา จ ปน จตุตฺถีฉฏฺเฐกวจนฏฺฐาเน ปุพฺพกฺขรสฺส รสฺสวเสน ‘‘สสฺส’’อิติ รูปํ อิจฺฉนฺติ? อิทมฺปิ อการณํ สุนขวาจกสฺส สาสทฺทสฺส อาการนฺตตาปกติกตฺตา. อาการนฺตตาปกติกสฺส จ สาสทฺทสฺส ยถา อการนฺตตาปกติกสฺส ปุริสสทฺทสฺส ‘‘ปุริสสฺสา’’ติ จตุตฺถีฉฏฺเฐกวจนรูปํ ภวติ เอวรูปสฺส รูปสฺส อภาวโต. เตเนว อายสฺมา กจฺจาโน นิรุตฺติปิฏเก สุนขวาจกสฺส สาสทฺทสฺส รูปํ ทสฺเสนฺโต จตุตฺถีฉฏฺเฐกวจนฏฺฐาเน ปุพฺพกฺขรสฺส ทีฆวเสน ‘‘สาสฺส’’อิติ รูปมาห. กสฺมา จ ปน เต อาจริยา จตุตฺเถกวจนฏฺฐาเน ‘‘สาย’’อิติ รูปํ อิจฺฉนฺติ? อิทมฺปิ อการณํ, ฐเปตฺวา หิ อาการนฺติตฺถิลิงฺเค ฆสญฺญโต อาการโต ปเรสํ นาทีนํ อายาเทสญฺจ อการนฺตโต ปุนฺนปุํสกลิงฺคโต [Pg.214] ปรสฺส จตุตฺเถกวจนสฺส อายาเทสญฺจ อาการนฺตปุลฺลิงฺเค อฆโต อาการนฺตโต ปรสฺส จตุตฺเถกวจนสฺส กตฺถจิปิ อายาเทโส น ทิสฺสติ. นิรุตฺติปิฏเก จ ตาทิสํ รูปํ น วุตฺตํ, อวจนํเยว ยุตฺตตรํ พุทฺธวจเน อฏฺฐกถาทีสุ จ อนาคมนโต. ยา ปนมฺเหหิ นิรุตฺติปิฏกํ นิสฺสาย พุทฺธวจนญฺจ สุนขวาจกสฺส สาสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุตฺตา, สาเยว สารโต ปจฺเจตพฺพา. เอตฺถาปิ นานาอตฺเถสุ วตฺตมานานํ ลิงฺคตฺตยปริยาปนฺนานํ สา โส สํอิจฺเจเตสํ ติณฺณํ ปทานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาสุ ปทานํ สทิสาสทิสตา ทฏฺฐพฺพา. यहाँ एक और बात कहनी चाहिए - जैसे 'साहि नारीहि ते यन्ती' कहने पर 'अपनी स्त्री' या 'वह स्त्री' इस अर्थ वाले स्त्रीलिंग के कन्या शब्द के समान 'सा' शब्द के 'सा, सा, सायो। सं, सा, सायो। साय, साहि, साभि। साय, सानं। साय, साहि, साभि। साय, सानं। साय, सायं, सासु' इस प्रकार कन्या-नय से रूप होते हैं, वैसे इस कुत्ते के वाचक 'सा' शब्द के रूप नहीं होते। ऐसा होने पर वे आचार्य तृतीया बहुवचन के स्थान पर 'साहि, साभि' रूप क्यों चाहते हैं, और सप्तमी बहुवचन के स्थान पर 'सासु' क्यों? यह भी अकारण है क्योंकि यह आकारांत पुल्लिंग है। और फिर वे चतुर्थी और षष्ठी एकवचन के स्थान पर पूर्व अक्षर के ह्रस्व होने से 'सस्स' रूप क्यों चाहते हैं? यह भी अकारण है क्योंकि कुत्ते का वाचक 'सा' शब्द आकारांत प्रकृति का है। और आकारांत प्रकृति वाले 'सा' शब्द का, जैसे अकारांत प्रकृति वाले पुरुष शब्द का 'पुरिसस्स' चतुर्थी-षष्ठी एकवचन रूप होता है, वैसा रूप नहीं होता। इसीलिए आयुष्मान कात्यायन ने निरुत्तिपिटक में कुत्ते के वाचक 'सा' शब्द का रूप दिखाते हुए चतुर्थी और षष्ठी एकवचन के स्थान पर पूर्व अक्षर के दीर्घ होने से 'सास्स' रूप कहा है। और फिर वे आचार्य चतुर्थी एकवचन के स्थान पर 'साय' रूप क्यों चाहते हैं? यह भी अकारण है, क्योंकि आकारांत स्त्रीलिंग में 'घ' संज्ञक 'आ' कार से परे 'ना' आदि के 'आय' आदेश को और अकारांत पुल्लिंग-नपुंसक लिंग से परे चतुर्थी एकवचन के 'आय' आदेश को छोड़कर, आकारांत पुल्लिंग में 'अघ' आकारांत से परे चतुर्थी एकवचन का कहीं भी 'आय' आदेश नहीं देखा जाता। और निरुत्तिपिटक में वैसा रूप नहीं कहा गया है, बुद्धवचन और अट्ठकथा आदि में न आने के कारण न कहना ही अधिक उचित है। जो हमारे द्वारा निरुत्तिपिटक और बुद्धवचन के आधार पर कुत्ते के वाचक 'सा' शब्द की नामिक पदमाला कही गई है, उसे ही सार रूप में स्वीकार करना चाहिए। यहाँ भी विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त और तीनों लिंगों के अंतर्गत आने वाले 'सा, सो, सं' इन तीन पदों की प्रकृति रूप की नामिक पदमालाओं में पदों की समानता और असमानता देखी जानी चाहिए। เอตฺถ สิยา – โย ตุมฺเหหิ สาสทฺโท ‘‘ตํสทฺทตฺเถ จ สุนเข จ สกมิจฺจตฺเถ จ วตฺตตี’’ติ อิจฺฉิโต, กถํ ตํ ‘‘สา’’ติ วุตฺเตเยว ‘‘อิมสฺส อตฺถสฺส วาจโก’’ติ ชานนฺตีติ? น ชานนฺติ, ปโยควเสน ปน ชานนฺติ โลกิยชนา เจว ปณฺฑิตา จ. ปโยควเสน หิ ‘‘สา มทฺที นาคมารุหิ, นาติพทฺธํว กุญฺชร’’นฺติอาทีสุ สาสทฺทสฺส ตํสทฺทตฺถตา วิญฺญายติ, เอวํ สาสทฺโท ตํสทฺทตฺเถ จ วตฺตติ. ‘‘น ยตฺถ สา อุปฏฺฐิโต โหติ. ภควโต สาชาติมฺปิ สุตฺวา สตฺตา อมตรสภาคิโน ภวนฺตี’’ติอาทีสุ สาสทฺทสฺส สุนขวาจกตา วิญฺญายติ. यहाँ यह हो सकता है - जो 'सा' शब्द आपके द्वारा 'उस' (तद्) शब्द के अर्थ में, 'कुत्ते' के अर्थ में और 'अपने' (स्वकीय) अर्थ में माना गया है, वह 'सा' कहने पर ही 'इस अर्थ का वाचक है' ऐसा कैसे जानते हैं? वे (केवल शब्द से) नहीं जानते, बल्कि प्रयोग के वश से लौकिक जन और पंडित जानते हैं। प्रयोग के वश से ही 'सा मद्दी नागमार्ुहि...' आदि में 'सा' शब्द की 'तद्' शब्दार्थता जानी जाती है, इस प्रकार 'सा' शब्द 'तद्' शब्द के अर्थ में प्रयुक्त होता है। 'न यत्थ सा उपट्ठितो होति...' आदि में 'सा' शब्द की कुत्ता-वाचकता जानी जाती है। ‘‘อนฺนํ ตเวทํ ปกตํ ยสสฺสิ,ตํ ขชฺชเร ภุญฺชเร ปิยฺยเร จ; ชานาสิ มํ ตฺวํ ปรทตฺตูปชีวึ,อุตฺติฏฺฐปิณฺฑํ ลภตํ สปาโก’’ติ "हे यशस्वी! यह अन्न तुम्हारे लिए तैयार है, उसे वे खाते हैं, उपभोग करते हैं और पीते हैं; तुम मुझे परदत्तभोगी (दूसरों के दिए पर जीने वाला) जानते हो, चाण्डाल (कुत्ते को पकाने वाला) उच्छिष्ट पिण्ड प्राप्त करे।" เอตฺถ ปน สาสทฺทสฺส รสฺสภาวกรเณน ‘‘สปาโก’’ติ ปาฬิ ฐิตาติ อตฺถํ อคฺคเหตฺวา ‘‘สานํ สุนขานํ อิทํ มํสนฺติ ส’’มิติ อตฺถํ คเหตฺวา ‘‘สํ ปจตีติ สปาโก’’ติ วุตฺตนฺติ [Pg.215] ทฏฺฐพฺพํ. อฏฺฐกถายํ ปน ‘‘สปาโกติ สปากจณฺฑาโล’’ อิจฺเจว วุตฺตํ. ตมฺปิ เอตเทวตฺถํ ทีเปติ. เอวํ สาสทฺโท สุนเข จ วตฺตติ. ‘‘สา ทารา ชนฺตูนํ ปิยา’’ติ วุตฺเต ปน ‘‘สกา ทารา สตฺตานํ ปิยา’’ติ อตฺถทีปนวเสน สาสทฺทสฺส สกวาจกตา ปญฺญายติ. เอวํ สาสทฺโท สกมิจฺจตฺเถ จ วตฺตติ. อิติ สาสทฺทํ ปโยควเสน อีทิสตฺถสฺส วาจโกติ ชานนฺติ. อตฺริทํ วุจฺจติ – यहाँ 'सा' शब्द को ह्रस्व करने से 'सपाको' यह पालि स्थित है - ऐसा अर्थ न लेकर, 'सानं सुनखानं इदं मंसन्ति सं' (कुत्तों का यह मांस है, ऐसा 'स') यह अर्थ लेकर 'सं पचतीति सपाको' (जो कुत्ते के मांस को पकाता है वह सपाको है) ऐसा कहा गया है, यह देखना चाहिए। अट्ठकथा में तो 'सपाकोति सपाकचण्डालो' ही कहा गया है। वह भी इसी अर्थ को प्रकाशित करता है। इस प्रकार 'सा' शब्द कुत्ते के अर्थ में प्रयुक्त होता है। 'सा दारा जन्तूनं पिया' कहने पर 'सका दारा सत्तानं पिया' (अपनी पत्नियाँ प्राणियों को प्रिय होती हैं) इस अर्थ के प्रकाशन के कारण 'सा' शब्द की स्व-वाचकता (अपना) जानी जाती है। इस प्रकार 'सा' शब्द 'स्व' (अपना) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इस प्रकार 'सा' शब्द को प्रयोग के वश से इस प्रकार के अर्थ का वाचक जानते हैं। यहाँ यह कहा गया है - ตํสทฺทตฺเถ จ สุนเข,สกสฺมิมฺปิ จ วตฺตติ; สาสทฺโท โส จ โข เญยฺโย,ปโยคานํ วเสน เว. 'तद्' शब्द के अर्थ में, कुत्ते के अर्थ में और 'अपने' (स्व) के अर्थ में भी 'सा' शब्द प्रयुक्त होता है; वह प्रयोगों के वश से ही जानना चाहिए। เอตฺถ จ ปาฬิยํ ‘‘น ยตฺถ สา อุปฏฺฐิโต โหตี’’ติ เอกวจนปฺปโยคทสฺสนโต จ, और यहाँ पालि में 'न यत्थ सा उपट्ठितो होति' इस एकवचन प्रयोग के देखे जाने से, ‘‘อสนฺตา กิร มํ ชมฺมา, ตาต ตาตาติ ภาสเร; รกฺขสา ปุตฺตรูเปน, สาว วาเรนฺติ สูกร’’นฺติ "वे नीच असंत पुरुष मुझे 'तात तात' कहते हैं; राक्षस पुत्र के रूप में, कुत्तों की तरह सूअर को रोकते हैं।" พหุวจนปฺปโยคทสฺสนโต จ, นิรุตฺติปิฏเก ‘‘สาโน’’อิจฺจาทิทสฺสนโต จ ‘‘สา, สา, สาโน. สานํ, สาเน. สานา’’ติอาทินา สุนขวาจกสฺส สาสทฺทสฺส นามิกปทมาลา กถิตา. और बहुवचन प्रयोग के देखे जाने से, तथा निरुत्तिपिटक में 'सानो' इत्यादि के देखे जाने से 'सा, सा, सानो। सानं, साने। साना' इत्यादि के द्वारा कुत्ता-वाचक 'सा' शब्द की नामिक पदमाला (शब्द-रूप) कही गई है। อิทานิ ปุมสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'पुम' (पुरुष) शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - ปุมา, ปุมา, ปุมาโน. ปุมานํ, ปุมาเน. ปุมานา, ปุมุนา, ปุเมน, ปุมาเนหิ, ปุมาเนภิ. ปุมสฺส, ปุมุโน, ปุมานํ. ปุมานา, ปุมุนา, ปุมาเนหิ, ปุมาเนภิ. ปุมสฺส, ปุมุโน, ปุมานํ. ปุมาเน, ปุมาเนสุ. โภ ปุม, ภวนฺโต ปุมา, ปุมาโน. ‘‘โภ ปุมา’’อิติ พหุวจเน นโยปิ เญยฺโย. पुमा, पुमा, पुमानो। पुमानं, पुमाने। पुमाना, पुमुना, पुमेन, पुमानेहि, पुमानेभि। पुमस्स, पुमुनो, पुमानं। पुमाना, पुमुना, पुमानेहि, पुमानेभि। पुमस्स, पुमुनो, पुमानं। पुमाने, पुमानेसु। भो पुम, भवन्तो पुमा, पुमानो। 'भो पुमा' इस प्रकार बहुवचन में भी विधि जाननी चाहिए। เอตฺถ [Pg.216] ปน – यहाँ - ‘‘ถิโย ตสฺส ปชายนฺติ, น ปุมา ชายเร กุเล; โย ชานํ ปุจฺฉิโต ปญฺหํ, อญฺญถา นํ วิยากเร’’ติ "उसके कुल में स्त्रियाँ ही पैदा होती हैं, पुरुष (पुमा) पैदा नहीं होते; जो जानते हुए भी पूछे गए प्रश्न की अन्यथा व्याख्या करता है।" อยํ ปาฬิ ปุมสทฺทสฺส พหุวจนภาวสาธิกา, กจฺจายเน ‘‘เห ปุมํ’’อิติ สานุสารํ อาลปเนกวจนํ ทิสฺสติ. ตทเนเกสุ ปาฬิปฺปเทเสสุ จ อฏฺฐกถาสุ จ สานุสารานํ อาลปนวจนานํ อทสฺสนโต อิธ น วทามิ. อุปปริกฺขิตฺวา ยุตฺตํ เจ, คเหตพฺพํ. ‘‘ยสสฺสิ นํ ปญฺญวนฺตํ วิสยฺหา’’ติ เอตฺถ ปน ฉนฺทานุรกฺขณตฺถํ อาคมวเสเนวานุสาโร โหติ, น สภาวโตติ ทฏฺฐพฺพํ. อยมาการนฺตวเสน นามิกปทมาลา. यह पालि 'पुम' शब्द के बहुवचन भाव को सिद्ध करने वाली है, कच्चायन व्याकरण में 'हे पुमं' इस प्रकार अनुस्वार सहित सम्बोधन एकवचन देखा जाता है। उसके अनेक पालि प्रदेशों और अट्ठकथाओं में अनुस्वार वाले सम्बोधन वचनों के न देखे जाने के कारण यहाँ नहीं कहता हूँ। यदि परीक्षा करने पर उचित हो, तो ग्रहण करना चाहिए। 'यसस्सि नं पञ्ञवन्तं विसह्या' यहाँ तो छन्द की रक्षा के लिए आगम के वश से ही अनुस्वार होता है, स्वभाव से नहीं, ऐसा देखना चाहिए। यह आकारान्त के वश से नामिक पदमाला है। ‘‘โสฬสิตฺถิสหสฺสานํ,น วิชฺชติ ปุโม ตทา; อโหรตฺตานมจฺจเยน,นิพฺพตฺโต อหเมกโก’’ติ จ, "सोलह हजार स्त्रियों के बीच तब कोई पुरुष (पुमो) नहीं था; दिन-रात बीतने पर मैं अकेला ही उत्पन्न हुआ।" ‘‘ยถา พลากโยนิมฺหิ, น วิชฺชติ ปุโม สทา; เมเฆสุ คชฺชมาเนสุ, คพฺภํ คณฺหนฺติ ตา ตทา’’ติ จ "जैसे बगुले की योनि में सदा पुरुष (पुमो) नहीं होता; मेघों के गरजने पर वे तब गर्भ धारण करती हैं।" ปาฬิทสฺสนโต ปน โอการนฺตวเสนปิ นามิกปทมาลา เวทิตพฺพา. पालि के देखे जाने से ओकारान्त के वश से भी नामिक पदमाला जाननी चाहिए। ปุโม, ปุมา. ปุมํ, ปุเม. ปุเมน, ปุเมหิ, ปุเมภิ. ปุมสฺส, ปุมานํ. ปุมา, ปุมสฺมา, ปุมมฺหา, ปุเมหิ, ปุเมภิ. ปุมสฺส, ปุมานํ. ปุเม, ปุมสฺมึ, ปุมมฺหิ, ปุเมสุ. โภ ปุม, ภวนฺโต ปุมา. ‘‘โภ ปุมา’’อิติ วา, เอวํ ปุมสทฺทสฺส ทฺวิธา นามิกปทมาลา ภวติ. पुमो, पुमा। पुमं, पुमे। पुमेन, पुमेहि, पुमेभि। पुमस्स, पुमानं। पुमा, पुमस्मा, पुमम्हा, पुमेहि, पुमेभि। पुमस्स, पुमानं। पुमे, पुमस्मिं, पुमम्हि, पुमेसु। भो पुम, भवन्तो पुमा। अथवा 'भो पुमा', इस प्रकार 'पुम' शब्द की दो प्रकार की नामिक पदमाला होती है। อิทานิ มิสฺสกนโย วุจฺจเต – अब मिश्रित विधि कही जाती है - ปุมา[Pg.217], ปุโม, ปุมา, ปุมาโน. ปุมานํ, ปุมํ, ปุมาเน, ปุเม. ปุมานา, ปุมุนา, ปุเมน, ปุมาเนหิ, ปุมาเนภิ, ปุเมหิ, ปุเมภิ. ปุมสฺส, ปุมุโน, ปุมานํ. ปุมานา, ปุมุนา, ปุมา, ปุมสฺมา, ปุมมฺหา, ปุมาเนหิ, ปุมาเนภิ, ปุเมหิ, ปุเมภิ. ปุมสฺส, ปุมุโน, ปุมานํ. ปุมาเน, ปุเม, ปุมสฺมึ, ปุมมฺหิ, ปุมาเนสุ, ปุเมสุ. โภ ปุม, ภวนฺโต ปุมาโน, ภวนฺโต ปุมา. ‘‘โภ ปุมาโน, โภ ปุมา’’อิติ วา. पुमा, पुमो, पुमा, पुमानो। पुमानं, पुमं, पुमाने, पुमे। पुमाना, पुमुना, पुमेन, पुमानेहि, पुमानेभि, पुमेहि, पुमेभि। पुमस्स, पुमुनो, पुमानं। पुमाना, पुमुना, पुमा, पुमस्मा, पुमम्हा, पुमानेहि, पुमानेभि, पुमेहि, पुमेभि। पुमस्स, पुमुनो, पुमानं। पुमाने, पुमे, पुमस्मिं, पुमम्हि, पुमानेसु, पुमेसु। भो पुम, भवन्तो पुमानो, भवन्तो पुमा। अथवा 'भो पुमानो, भो पुमा'। อิทานิ รหสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'रह' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - รหา วุจฺจติ ปาปธมฺโม. รหา, รหา, รหิโน. รหานํ, รหาเน. รหินา, รหิเนหิ, รหิเนภิ. รหสฺส, รหานํ. รหา, รหาเนหิ, รหาเนภิ. รหสฺส, รหานํ. รหาเน, รหาเนสุ. โภ รห, ภวนฺโต รหิโน, ภวนฺโต รหา. 'रहा' पापधर्म को कहा जाता है। रहा, रहा, रहिनो। रहानं, रहाने। रहिना, रहिनेहि, रहिनेभि। रहस्स, रहानं। रहा, रहानेहि, रहानेभि। रहस्स, रहानं। रहाने, रहानेसु। भो रह, भवन्तो रहिनो, भवन्तो रहा। อิทานิ ทฬฺหธมฺมสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'दळ्हधम्म' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - ทฬฺหธมฺมา, ทฬฺหธมฺมา, ทฬฺหธมฺมาโน. ทฬฺหธมฺมานํ, ทฬฺหธมฺมาเน. ทฬฺหธมฺมินา, ทฬฺหธมฺเมหิ, ทฬฺหธมฺเมภิ. ทฬฺหธมฺมสฺส, ทฬฺหธมฺมานํ. ทฬฺหธมฺมินา, ทฬฺหธมฺเมหิ, ทฬฺหธมฺเมภิ. ทฬฺหธมฺมสฺส, ทฬฺหธมฺมานํ. ทฬฺหธมฺเม ทฬฺหธมฺเมสุ. โภ ทฬฺหธมฺม, ภวนฺโต ทฬฺหธมฺมาโน, ภวนฺโต ทฬฺหธมฺมา. ‘‘โภ ทฬฺหธมฺมาโน, โภ ทฬฺหธมฺมา’’อิติ ปุถุวจนมฺปิ เญยฺยํ, เอวํ ปจฺจกฺขธมฺมสทฺทสฺส นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. दळ्हधम्मा, दळ्हधम्मा, दळ्हधम्मानो। दळ्हधम्मानं, दळ्हधम्माने। दळ्हधम्मिना, दळ्हधम्मेहि, दळ्हधम्मेभि। दळ्हधम्मस्स, दळ्हधम्मानं। दळ्हधम्मिना, दळ्हधम्मेहि, दळ्हधम्मेभि। दळ्हधम्मस्स, दळ्हधम्मानं। दळ्हधम्मे, दळ्हधम्मेसु। भो दळ्हधम्म, भवन्तो दळ्हधम्मानो, भवन्तो दळ्हधम्मा। 'भो दळ्हधम्मानो, भो दळ्हधम्मा' - यह बहुवचन भी जानना चाहिए, इसी प्रकार 'पच्चक्खधम्म' शब्द की पदमाला जोड़नी चाहिए। เอตฺถ จ ‘‘เสยฺยถาปิ ภิกฺขเว จตฺตาโร ธนุคฺคหา ทฬฺหธมฺมา’’ติ อิทํ นิทสฺสนํ. อิมิสฺสํ ปน ปาฬิยํ ‘‘ทฬฺหธมฺมา’’ อิติ พหุวจนวเสน อาคตตฺตา ทฬฺหธมฺมสทฺโท อาการนฺโตติปิ โอการนฺโตติปิ อปฺปสิทฺโธ ตทนฺตานํ พหุวจนภาเว ตุลฺยรูปตฺตา. ตถาปิ อมฺเหหิ ปทมาลา อาการนฺตวเสเนว โยชิตา. อีทิเสสุ หิ ฐาเนสุ ทฬฺหธมฺมสทฺโท อาการนฺโตติปิ โอการนฺโตติปิ วตฺตุํ ยุชฺชเตว [Pg.218] อปริพฺยตฺตรูปตฺตา. อญฺญสฺมึ ปน ปาฬิปฺปเทเส อตีว ปริพฺยตฺโต หุตฺวา โอการนฺต ทฬฺหธมฺมสทฺโท ทฺวิธา ทิสฺสติ คุณสทฺทปณฺณตฺติวาจกสทฺทวเสน. ตตฺถ ‘‘อิสฺสตฺเต จสฺมิ กุสโล, ทฬฺหธมฺโมติ วิสฺสุโต’’ติ เอตฺถ ทฬฺหธมฺมสทฺโท โอการนฺโต คุณสทฺโท. ‘‘พาราณสิยํ ทฬฺหธมฺโม นาม ราชา รชฺชํ กาเรสี’’ติ เอตฺถ ปน ปณฺณตฺติวาจกสทฺโท. เอวํ โอการนฺโต ทฬฺหธมฺมสทฺโท ทฺวิธา ทิฏฺโฐ. ตสฺส ปน ‘‘ทฬฺหธมฺโม, ทฬฺหธมฺมา. ทฬฺหธมฺมํ, ทฬฺหธมฺเม’’ติ ปุริสนเยน นามิกปทมาลา เญยฺยา, อาการนฺโตการนฺตานํ วเสน มิสฺสกปทมาลา จ. กถํ? और यहाँ "जैसे कि भिक्षुओं, चार दृढ़धनुर्धर (दळ्हधम्मा)" यह उदाहरण है। इस पालि में "दळ्हधम्मा" इस बहुवचन के रूप में आने के कारण 'दळ्हधम्म' शब्द आकारान्त भी है और ओकारान्त भी है, क्योंकि उनके अन्त में बहुवचन होने पर समान रूप होते हैं। फिर भी हमने आकारान्त के अनुसार ही पदमाला जोड़ी है। ऐसे स्थानों पर 'दळ्हधम्म' शब्द को आकारान्त और ओकारान्त दोनों कहना उचित ही है क्योंकि रूप स्पष्ट नहीं हैं। अन्य पालि प्रदेशों में ओकारान्त 'दळ्हधम्म' शब्द गुणवाचक और संज्ञावाचक के रूप में दो प्रकार से अत्यंत स्पष्ट दिखाई देता है। वहाँ "धनुर्विद्या में कुशल हूँ, 'दळ्हधम्म' नाम से विख्यात हूँ" यहाँ 'दळ्हधम्म' शब्द ओकारान्त गुणवाचक है। "वाराणसी में 'दळ्हधम्म' नामक राजा राज्य करता था" यहाँ यह संज्ञावाचक शब्द है। इस प्रकार ओकारान्त 'दळ्हधम्म' शब्द दो प्रकार का देखा गया है। उसकी "दळ्हधम्मो, दळ्हधम्मा। दळ्हधम्मं, दळ्हधम्मे" इस प्रकार 'पुरिस' शब्द के समान पदमाला जाननी चाहिए, और आकारान्त-ओकारान्त के अनुसार मिश्रित पदमाला भी। कैसे? ทฬฺหธมฺมา, ทฬฺหธมฺโม, ทฬฺหธมฺมาโน, ทฬฺหธมฺมา. ทฬฺหธมฺมานํ, ทฬฺหธมฺมํ, ทฬฺหธมฺมาเน, ทฬฺหธมฺเม. ทฬฺหธมฺมินา, ทฬฺหธมฺเมน, ทฬฺหธมฺเมหิ, ทฬฺหธมฺเมภิ. ทฬฺหธมฺมสฺส, ทฬฺหธมฺมานํ. ทฬธมฺมินา, ทฬฺหธมฺมา, ทฬฺหธมฺมสฺมา, ทฬฺหธมฺมมฺหา, ทฬฺหธมฺเมหิ, ทฬฺหธมฺเมภิ. ทฬฺหธมฺมสฺส, ทฬฺหธมฺมานํ. ทฬฺหธมฺเม, ทฬฺหธมฺมสฺมึ, ทฬฺหธมฺมมฺหิ, ทฬฺหธมฺเมสุ. โภ ทฬฺหธมฺม, ภวนฺโต ทฬฺหธมฺมาโน, ภวนฺโต ทฬฺหธมฺมาติ. เอวํ ปจฺจกฺขธมฺมา, ปจฺจกฺขธมฺโมติ มิสฺสกปทมาลา จ โยเชตพฺพา. दळ्हधम्मा, दळ्हधम्मो, दळ्हधम्मानो, दळ्हधम्मा। दळ्हधम्मानं, दळ्हधम्मं, दळ्हधम्माने, दळ्हधम्मे। दळ्हधम्मिना, दळ्हधम्मेन, दळ्हधम्मेहि, दळ्हधम्मेभि। दळ्हधम्मस्स, दळ्हधम्मानं। दळ्हधम्मिना, दळ्हधम्मा, दळ्हधम्मस्मा, दळ्हधम्मम्हा, दळ्हधम्मेहि, दळ्हधम्मेभि। दळ्हधम्मस्स, दळ्हधम्मानं। दळ्हधम्मे, दळ्हधम्मस्मिं, दळ्हधम्मम्हि, दळ्हधम्मेसु। भो दळ्हधम्म, भवन्तो दळ्हधम्मानो, भवन्तो दळ्हधम्मा। इस प्रकार 'पच्चक्खधम्मा', 'पच्चक्खधम्मो' ऐसी मिश्रित पदमाला भी जोड़नी चाहिए। อิทานิ วิวฏจฺฉทสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'विवटच्छद' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - วิวฏจฺฉทา, วิวฏจฺฉทา, วิวฏจฺฉทาโน. วิวฏจฺฉทานํ, วิวฏจฺฉทาเน. วิวฏจฺฉเทน, วิวฏจฺฉเทหิ, วิวฏจฺฉเทภิ. วิวฏจฺฉทสฺส, วิวฏจฺฉทานํ. วิวฏจฺฉทา, วิวฏจฺฉเทหิ, วิวฏจฺฉเทภิ. วิวฏจฺฉทสฺส, วิวฏจฺฉทานํ. วิวฏจฺฉเท, วิวฏจฺฉเทสุ. โภ วิวฏจฺฉท, ภวนฺโต วิวฏจฺฉทา, ภวนฺโต วิวฏจฺฉทาโน. विवटच्छदा, विवटच्छदा, विवटच्छदानो। विवटच्छदानं, विवटच्छदाने। विवटच्छदेन, विवटच्छदेहि, विवटच्छदेभि। विवटच्छदस्स, विवटच्छदानं। विवटच्छदा, विवटच्छदेहि, विवटच्छदेभि। विवटच्छदस्स, विवटच्छदानं। विवटच्छदे, विवटच्छदेसु। भो विवटच्छद, भवन्तो विवटच्छदा, भवन्तो विवटच्छदानो। อยํ นามิกปทมาลา ‘‘สเจ ปน อคารสฺมา อนคาริยํ ปพฺพชติ อรหํ โหติ สมฺมาสมฺพุทฺโธ โลเก วิวฏจฺฉทา’’ติ [Pg.219] ปาฬิทสฺสนโต อาการนฺตวเสน กถิตา. ‘‘โลเก วิวฏจฺฉโท’’ติปิ ปาฬิทสฺสนโต ปน โอการนฺตวเสนปิ กเถตพฺพา ‘‘วิวฏจฺฉโท, วิวฏจฺฉทา, วิวฏจฺฉทํ, วิวฏจฺฉเท’’ติ. มิสฺสกวเสนปิ กเถตพฺพา ‘‘วิวฏจฺฉทา, วิวฏจฺฉโท, วิวฏจฺฉทาโน, วิวฏจฺฉทา. วิวฏจฺฉทานํ, วิวฏจฺฉทํ, วิวฏจฺฉทาเน, วิวฏจฺฉเท’’อิติ. यह नामिक पदमाला "यदि वह घर से बेघर होकर प्रव्रजित होता है, तो वह अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध, लोक में विवटच्छदा (आवरण रहित) होता है" इस पालि दर्शन से आकारान्त के रूप में कही गई है। "लोके विवटच्छदो" इस पालि दर्शन से ओकारान्त के रूप में भी "विवटच्छदो, विवटच्छदा, विवटच्छदं, विवटच्छदे" कहना चाहिए। मिश्रित रूप में भी "विवटच्छदा, विवटच्छदो, विवटच्छदानो, विवटच्छदा। विवटच्छदानं, विवटच्छदं, विवटच्छदाने, विवटच्छदे" कहना चाहिए। อิทานิ วตฺตหสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – วตฺตหาติ สกฺโก. अब 'वत्तहा' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - 'वत्तहा' का अर्थ शक्र है। วตฺตหา, วตฺตหาโน. วตฺตหานํ, วตฺตหาเน. วตฺตหานา, วตฺตหาเนหิ, วตฺตหาเนภิ. วตฺตหิโน, วตฺตหานํ. วตฺตหานา, วตฺตหาเนหิ, วตฺตหาเนภิ. วตฺตหิโน, วตฺตหานํ. วตฺตหาเน, วตฺตหาเนสุ. โภ วตฺตห, ภวนฺโต วตฺตหาโน. อถ วา ‘‘โภ วตฺตหา, โภ วตฺตหาโน’’อิจฺจปิ. वत्तहा, वत्तहानो। वत्तहानं, वत्तहाने। वत्तहाना, वत्तहानेहि, वत्तहानेभि। वत्तहिनो, वत्तहानं। वत्तहाना, वत्तहानेहि, वत्तहानेभि। वत्तहिनो, वत्तहानं। वत्तहाने, वत्तहानेसु। भो वत्तहा, भवन्तो वत्तहानो। अथवा "भो वत्तहा, भो वत्तहानो" ऐसा भी। อิทานิ วุตฺตสิรสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'वुत्तसिर' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - วุตฺตสิรา, วุตฺตสิรา, วุตฺตสิราโน. วุตฺตสิรานํ, วุตฺตสิราเน. วุตฺตสิรานา, วุตฺตสิราเนหิ, วุตฺตสิราเนภิ. วุตฺตสิรสฺส, วุตฺตสิรานํ, วุตฺตสิรา, วุตฺตสิเรหิ, วุตฺตสิเรภิ. วุตฺตสิรสฺส, วุตฺตสิรานํ. วุตฺตสิเร, วุตฺตสิเรสุ. โภ วุตฺตสิร, ภานฺโต วุตฺตสิราโนติ. ‘‘วุตฺตสิโร’’ติ โอการนฺตปาโฐปิ ทิสฺสติ. वुत्तसिरा, वुत्तसिरा, वुत्तसिरानो। वुत्तसिरानं, वुत्तसिराने। वुत्तसिराना, वुत्तसिरानेहि, वुत्तसिरानेभि। वुत्तसिरस्स, वुत्तसिरानं, वुत्तसिरा, वुत्तसिरेहि, वुत्तसिरेभि। वुत्तसिरस्स, वुत्तसिरानं। वुत्तसिरे, वुत्तसिरेसु। भो वुत्तसिर, भन्तो वुत्तसिरानो। "वुत्तसिरो" ऐसा ओकारान्त पाठ भी देखा जाता है। อิทานิ ยุวสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'युव' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - ยุวา, ยุวา, ยุวาโน, ยุวานา. ยุวานํ, ยุวํ, ยุวาเน, ยุเว. ยุวานา, ยุเวน, ยุวาเนน, ยุวาเนหิ, ยุวาเนภิ, ยุเวหิ, ยุเวภิ. ยุวานสฺส, ยุวสฺส, ยุวานานํ, ยุวานํ. ยุวานา[Pg.220], ยุวานสฺมา, ยุวานมฺหา, ยุวาเนหิ, ยุวาเนภิ, ยุเวหิ, ยุเวภิ. ยุวานสฺส, ยุวสฺส, ยุวานานํ, ยุวานํ. ยุวาเน, ยุวานสฺมึ, ยุวานมฺหิ, ยุเว, ยุวสฺมึ, ยุวมฺหิ, ยุวาเนสุ, ยุวาสุ, ยุเวสุ. โภ ยุว, ยุวาน, ภวนฺโต ยุวานา. युवा, युवा, युवानो, युवाना। युवानं, युवं, युवाने, युवे। युवाना, युवेन, युवानेन, युवानेहि, युवानेभि, युवेहि, युवेभि। युवानस्स, युवस्स, युवानानं, युवानं। युवाना, युवानस्मा, युवानम्हा, युवानेहि, युवानेभि, युवेहि, युवेभि। युवानस्स, युवस्स, युवानानं, युवानं। युवाने, युवानस्मिं, युवानम्हि, युवे, युवस्मिं, युवम्हि, युवानेसु, युवासु, युवेसु। भो युव, युवान, भवन्तो युवाना। อิมสฺมึ ฐาเน เอกเทเสน อาการนฺตนโย จ สพฺพถา โอการนฺตนโย จ เอกเทเสน จ โอการนฺตนโยติ ตโย นยา ทิสฺสนฺติ. इस स्थान पर आंशिक रूप से आकारान्त पद्धति, पूर्ण रूप से ओकारान्त पद्धति और आंशिक रूप से ओकारान्त पद्धति - ये तीन पद्धतियाँ दिखाई देती हैं। มฆวสทฺทสฺสปิ ‘‘มฆวา, มฆวา, มฆวาโน, มฆวานา’’ติอาทินา ยุวสทฺทสฺเสว นามิกปทมาลาโยชนํ กุพฺพนฺติ ครู. นิรุตฺติปิฏเก ปน ‘‘มฆวา ติฏฺฐติ, มฆวนฺโต ติฏฺฐนฺติ. มฆวนฺตํ ปสฺสติ, มฆวนฺเต ปสฺสติ. มฆวตา กตํ, มฆวนฺเตหิ กตํ, มฆวนฺเตภิ กตํ. มฆวโต ทียเต, มฆวนฺตานํ ทียเต. มฆวตา นิสฺสฏํ, มฆวนฺเตหิ นิสฺสฏํ, มฆวนฺเตภิ นิสฺสฏํ. มฆวโต ปริคฺคโห, มฆวนฺตานํ ปริคฺคโห. มฆวติ ปติฏฺฐิตํ, มฆวนฺเตสุ ปติฏฺฐิตํ. โภ มฆวา, ภวนฺโต มฆวนฺโต’’ติ คุณวาปทนเยน วุตฺตํ, ตถา จูฬนิรุตฺติยมฺปิ. ตํ ปาฬิยา สํสนฺทติ สเมติ. ปาฬิยญฺหิ ‘‘สกฺโก มหาลิ เทวานมินฺโท ปุพฺเพ มนุสฺสภูโต สมาโน มโฆ นาม มาณโว อโหสิ, ตสฺมา มฆวาติ วุจฺจตี’’ติ วุตฺตํ. เอเตน ‘‘มโฆติ นามํ อสฺส อตฺถีติ มฆวา’’ติ อตฺถิ อตฺถวาจกวนฺตุปจฺจยวเสน ปทสิทฺธิ ทสฺสิตา โหติ, ตสฺมาสฺส คุณวนฺตุสทฺทสฺส วิย จ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. गुरुजन 'मघवा' शब्द की भी 'मघवा, मघवा, मघवानो, मघवाना' इत्यादि के रूप में 'युव' शब्द के समान ही नामिक पदमाला की योजना करते हैं। किन्तु निरुत्तिपिटक में 'मघवा तिठ्ठति, मघवन्तो तिठ्ठन्ति। मघवन्तं पस्सति, मघवन्ते पस्सति। मघवता कतं, मघवन्तेहि कतं, मघवन्तेभि कतं। मघवतो दीयते, मघवन्तानं दीयते। मघवता निस्सटं, मघवन्तेहि निस्सटं, मघवन्तेभि निस्सटं। मघवतो परिग्गहो, मघवन्तानं परिग्गहो। मघवति पतिट्ठितं, मघवन्तेसु पतिट्ठितं। भो मघवा, भवन्तो मघवन्तो' इस प्रकार 'गुणवा' शब्द की पद्धति से कहा गया है, और वैसा ही चूलनिरुत्ति में भी है। वह पालि (त्रिपिटक) से मेल खाता है। पालि में ही कहा गया है— 'शक्र महालि! देवों का इन्द्र पहले मनुष्य होते हुए मघ नामक माणवक (युवक) था, इसलिए उसे मघवा कहा जाता है।' इससे 'मघ नामक नाम जिसका है वह मघवा है'— इस प्रकार 'अत्थि' (होना) अर्थ वाले 'वन्तु' प्रत्यय के वश से पद-सिद्धि दिखाई गई है, इसलिए इसकी 'गुणवन्तु' शब्द के समान ही नामिक पदमाला संयोजित करनी चाहिए। อิทานิ อทฺธสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – อทฺธสทฺทสฺส หิ ยํ กาเล มคฺเค จ วตฺตมานสฺส ‘‘อตีโต อทฺธา. ทีโฆ อทฺธา สุทุคฺคโม’’ติอาทีสุ ‘‘อทฺธา’’ติ ปฐมนฺตํ รูปํ ทิสฺสติ, ตํ ‘‘อทฺธา อิทํ มนฺตปทํ สุทุทฺทส’’นฺติอาทีสุ เอกํสตฺเถ [Pg.221] วตฺตมาเนน ‘‘อทฺธา’’ติ นิปาตปเทน สมานํ. นิปาตานํ ปน ปทมาลา น รูหติ, นามิกานํเยว รูหติ. अब 'अद्ध' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है— 'अद्ध' शब्द के काल और मार्ग के अर्थ में वर्तमान होने पर 'अतीतो अद्धा। दीघो अद्धा सुदुग्गमो' इत्यादि में 'अद्धा' यह प्रथमान्त रूप दिखाई देता है, वह 'अद्धा इदं मन्तपदं सुदुद्दसं' इत्यादि में 'निश्चित' अर्थ में वर्तमान 'अद्धा' इस निपात पद के समान है। किन्तु निपातों की पदमाला नहीं होती, केवल नामिकों (संज्ञाओं) की ही होती है। อทฺธา, อทฺธา, อทฺธาโน. อทฺธานํ, อทฺธาเน. อทฺธุนา, อทฺธาเนหิ, อทฺธาเนภิ. อทฺธุโน, อทฺธานํ. อทฺธุนา, อทฺธาเนหิ, อทฺธาเนภิ. อทฺธุโน, อทฺธานํ. อทฺธนิ, อทฺธาเน, อทฺธาเนสุ. โภ อทฺธ, ภวนฺโต อทฺธา, อทฺธาโน. अद्धा, अद्धा, अद्धानो। अद्धानं, अद्धाने। अद्धुना, अद्धानेहि, अद्धानेभि। अद्धुनो, अद्धानं। अद्धुना, अद्धानेहि, अद्धानेभि। अद्धुनो, अद्धानं। अद्धनि, अद्धाने, अद्धानेसु। भो अद्ध, भवन्तो अद्धा, अद्धानो। เอตฺถ กิญฺจิ ปโยคํ ทสฺเสสฺสาม – ตโย อทฺธา. อทฺธานํ วีติวตฺโต. อิมินา ทีเฆน อทฺธุนา. ทีฆสฺส อทฺธุโน อจฺจเยน. ปถทฺธุโน ปนฺนรเสว จนฺโท. อหู อตีตมทฺธาเน, สมโณ ขนฺติทีปโน. อทฺธาเน คจฺฉนฺเต ปญฺญายิสฺสติ. อิจฺจาทโย เญยฺยา. อยมฺปิ ปเนตฺถ นีติ เวทิตพฺพา ‘‘อทฺธานนฺติ ทุติเยกวจนนฺตวเสน จตุตฺถีฉฏฺฐีพหุวจนวเสน จ วุตฺตํ รูปํ. ‘‘อทฺธานมคฺคปฏิปฺปนฺโน โหตี’’ติอาทีสุ ทีฆมคฺควาจเกน ‘‘อทฺธาน’’นฺติ นปุํสเกน สทิสํ สุติสามญฺญวเสนาติ. यहाँ कुछ प्रयोग दिखाएंगे— तयो अद्धा (तीन काल)। अद्धानं वीतिवत्तो (मार्ग पार किया हुआ)। इमिना दीघेन अद्धुना (इस लम्बे काल से)। दीघस्स अद्धुनो अच्चयेन (लम्बे काल के बीतने पर)। पथद्धुनो पन्नरसेव चन्दो (मार्ग के पथिक के लिए पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान)। अहू अतीतमद्धाने, समणो खन्तिदीपनो (अतीत काल में क्षान्तिवादी श्रमण हुए)। अद्धाने गच्छन्ते पञ्ञायिस्सति (समय बीतने पर ज्ञात होगा)। इत्यादि जानने चाहिए। यहाँ यह नीति भी जाननी चाहिए कि 'अद्धानं' यह द्वितीया एकवचन के रूप में और चतुर्थी-षष्ठी बहुवचन के रूप में कहा गया रूप है। 'अद्धानमग्गपटिपन्नो होति' इत्यादि में दीर्घ मार्ग के वाचक 'अद्धानं' इस नपुंसक लिंगी शब्द के समान श्रुति-सामान्यता के कारण है। อิทานิ มุทฺธสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'मुद्ध' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है— มุทฺธา, มุทฺธา, มุทฺธาโน. มุทฺธํ, มุทฺเธ, มุทฺธาเน. มุทฺธานา, มุทฺเธหิ, มุทฺเธภิ. มุทฺธสฺส, มุทฺธานํ. มุทฺธานา, มุทฺเธหิ, มุทฺเธภิ. มุทฺธสฺส, มุทฺธานํ. มุทฺธนิ, มุทฺธเนสุ. โภ มุทฺธ, ภวนฺโต มุทฺธา, มุทฺธาโน. मुद्धा, मुद्धा, मुद्धानो। मुद्धं, मुद्दे, मुद्धानो। मुद्धाना, मुद्धेहि, मुद्धेभि। मुद्धस्स, मुद्धानं। मुद्धाना, मुद्धेहि, मुद्धेभि। मुद्धस्स, मुद्धानं। मुद्धनि, मुद्धनेसु। भो मुद्ध, भवन्तो मुद्धा, मुद्धानो। เอวํ อภิภวิตาปเทน วิสทิสปทานิ ภวนฺติ. อิติ นานานเยหิ อภิภวิตาปเทน สทิสานิ วตฺตาทีนิ วิสทิสานิ คุณวาทีนิ ราชสาอิจฺจาทีนิ จ อาการนฺตปทานิ ทสฺสิตานิ สทฺธึ นามิกปทมาลาหิ. इस प्रकार 'अभिभवितु' पद से विसदृश (भिन्न) पद होते हैं। इस प्रकार नाना विधियों से 'अभिभवितु' पद के सदृश 'वत्तृ' आदि और विसदृश 'गुणवन्तु' आदि तथा 'राजस' आदि आकारान्त पदों को नामिक पदमालाओं के साथ दिखाया गया है। เอตฺถ [Pg.222] โยคํ สเจ โปโส, กเร ปณฺฑิตชาติโก; ตสฺส โวหารเภเทสุ, วิชมฺเภ ญาณมุตฺตมํ. यदि कोई पण्डित स्वभाव वाला व्यक्ति इसमें योग (अभ्यास) करे, तो व्यवहार के भेदों में उसकी उत्तम प्रज्ञा विकसित होगी। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार अट्टकथा सहित नौ अंगों वाले त्रिपिटक के वचन-मार्गों में विद्वानों की โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कुशलता के लिए रचित सद्दनीति प्रकरण में สวินิจฺฉโย อาการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส आकारान्त पुल्लिंग शब्दों के प्रकृति रूप का विनिश्चय นามิกปทมาลาวิภาโค นาม 'नामिक पदमाला विभाग' नामक ฉฏฺโฐ ปริจฺเฉโท. छठा परिच्छेद (समाप्त)। อุการนฺต อวณฺณนฺตตาปกติกํ उकारान्त और अ-वर्ण (अ/आ) अन्त वाली प्रकृति वाला อาการนฺตปุลฺลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. आकारान्त पुल्लिंग समाप्त हुआ। ๗. นิคฺคหีตนฺตปุลฺลิงฺคนามิกปทมาลา ७. निग्गहीत-अन्त (अनुस्वारान्त) पुल्लिंग नामिक पदमाला। อถ ปุพฺพาจริยมตํ ปุเรจรํ กตฺวา นิคฺคหีตนฺตปุลฺลิงฺคานํ ภวนฺต กโรนฺตอิจฺจาทิกสฺส ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลํ วกฺขาม – अब पूर्वाचार्यों के मत को आगे रखकर निग्गहीत-अन्त पुल्लिंग 'भवन्त', 'करोन्त' इत्यादि के प्रकृति रूप की नामिक पदमाला कहेंगे— คจฺฉํ มหํ จรํ ติฏฺฐํ, ททํ ภุญฺชํ สุณํ ปจํ; ชยํ ชรํ จวํ มียํ, สรํ กุพฺพํ ชปํ วชํ. गच्छं (जाता हुआ), महं (पूजा करता हुआ), चरं (चलता हुआ), तिट्ठं (खड़ा होता हुआ), ददं (देता हुआ), भुञ्जं (खाता हुआ), सुणं (सुनता हुआ), पचं (पकाता हुआ); जयं (जीतता हुआ), जरं (बूढ़ा होता हुआ), चवं (च्युत होता हुआ), मीयं (मरता हुआ), सरं (स्मरण करता हुआ), कुब्बं (करता हुआ), जपं (जपता हुआ), वजं (जाता हुआ)। คจฺฉํ, คจฺฉนฺโต, คจฺฉนฺตา. คจฺฉนฺตํ, คจฺฉนฺเต. คจฺฉตา, คจฺฉนฺเตหิ, คจฺฉนฺเตติ. คจฺฉโต, คจฺฉนฺตสฺส, คจฺฉนฺตานํ, คจฺฉตํ. คจฺฉตา, คจฺฉนฺเตหิ, คจฺฉนฺเตภิ. คจฺฉโต, คจฺฉนฺตสฺส, คจฺฉนฺตานํ, คจฺฉตํ. คจฺฉติ, คจฺฉนฺเตสุ. โภ คจฺฉํ, โภ คจฺฉา, ภวนฺโต คจฺฉนฺโต. गच्छं, गच्छन्तो, गच्छन्ता। गच्छन्तं, गच्छन्ते। गच्छता, गच्छन्तेहि, गच्छन्तेभि। गच्छतो, गच्छन्तस्स, गच्छन्तानं, गच्छतं। गच्छता, गच्छन्तेहि, गच्छन्तेभि। गच्छतो, गच्छन्तस्स, गच्छन्तानं, गच्छतं। गच्छति, गच्छन्तेसु। भो गच्छं, भो गच्छा, भवन्तो गच्छन्तो। คจฺฉาทีนิ อญฺญานิ จ ตํสทิสานํ เอวํ เญยฺยานีติ ยมกมหาเถรมตํ. กิญฺจาเปตฺถ ตติเยกวจนฏฺฐานาทีสุ ‘‘คจฺฉนฺเตน, คจฺฉนฺตา, คจฺฉนฺตสฺมา, คจฺฉนฺตมฺหา, คจฺฉนฺตสฺมึ, คจฺฉนฺตมฺหี’’ติ อิมานิ ปทานิ นาคตานิ, ตถาปิ ตตฺถ ตตฺถ ปโยคทสฺสนโต คเหตพฺพานิ. 'गच्छ' आदि और उनके सदृश अन्य शब्दों को इसी प्रकार जानना चाहिए— यह यमकमहाथेर का मत है। यद्यपि यहाँ तृतीया एकवचन आदि के स्थानों में 'गच्छन्तेन, गच्छन्ता, गच्छन्तस्मा, गच्छन्तम्हा, गच्छन्तस्मिं, गच्छन्तम्हि' ये पद नहीं आए हैं, तथापि जहाँ-तहाँ प्रयोग देखे जाने के कारण उन्हें ग्रहण करना चाहिए। ตตฺร ยมกมหาเถเรน อาลปนวจนฏฺฐาเนเยว ‘‘คจฺฉนฺโต, มหนฺโต, จรนฺโต’’ติอาทีนํ พหุวจนตฺตํ กถิตํ, ปจฺจตฺตวจนฏฺฐาเน [Pg.223] เอกวจนตฺตํ. เกหิจิ ปน ปจฺจตฺตวจนฏฺฐาเน เอกวจนพหุวจนตฺตํ, อาลปนวจนฏฺฐาเน พหุวจนตฺตํเยว กถิตํ. ‘‘คจฺฉํ, มหํ, จร’’นฺติอาทีนํ ปน อาลปนฏฺฐาเน เอกวจนตฺตํ. มยํ ปน พุทฺธวจเน อเนกาสุ จาฏฺฐกถาสุ ‘‘คจฺฉนฺโต, มหนฺโต’’ติอาทีนํ พหุวจนปฺปโยคานํ ‘‘คจฺฉํ, มหํ’’อิจฺจาทีนญฺจ สานุสาราลปเนกวจนปฺปโยคานํ อทสฺสนโต ‘‘คจฺฉนฺโต ภารทฺวาโช. ส คจฺฉํ น นิวตฺตติ. มหนฺโต โลกสนฺนิวาโส’’ติอาทีนํ ปน ปจฺจตฺเตกวจนปฺปโยคานญฺเญว ทสฺสนโต ตาทิสานิ รูปานิ อนิชฺฌานกฺขมานิ วิย มญฺญาม. นิรุตฺติปิฏเก ปจฺจตฺตาลปนฏฺฐาเน ‘‘มหนฺโต, ภวนฺโต, จรนฺโต’’ติอาทีนํ พหุวจนตฺตเมว กถิตํ, น เอกวจนตฺตํ. ตถา หิ ตตฺถ ‘‘มหํ ภวํ จรํ ติฏฺฐ’’นฺติ คาถํ วตฺวา ‘‘มหํ ติฏฺฐติ, มหนฺโต ติฏฺฐนฺตี’’ติ จ, ‘‘โภ มหา, ภวนฺโต มหนฺโต’’ติ จ, ‘‘ภวํ ติฏฺฐติ, ภวนฺโต ติฏฺฐนฺตี’’ติ จ อาทิ วุตฺตํ. वहाँ यमकमहास्थविर द्वारा सम्बोधन के स्थान पर ही 'गच्छन्तो, महन्तो, चरन्तो' आदि का बहुवचनत्व कहा गया है, और प्रथमा विभक्ति के स्थान पर एकवचनत्व। किन्तु कुछ के द्वारा प्रथमा के स्थान पर एकवचन-बहुवचनत्व और सम्बोधन के स्थान पर केवल बहुवचनत्व कहा गया है। 'गच्छं, महं, चरं' आदि का सम्बोधन के स्थान पर एकवचनत्व है। परन्तु हम बुद्धवचन और अनेक अट्ठकथाओं में 'गच्छन्तो, महन्तो' आदि के बहुवचन प्रयोगों को और 'गच्छं, महं' आदि के अनुस्वारयुक्त सम्बोधन एकवचन प्रयोगों को न देखने के कारण, तथा 'गच्छन्तो भारद्वाजो। स गच्छं न निवत्तति। महन्तो लोकसन्निव़ासो' आदि के प्रथमा एकवचन प्रयोगों को ही देखने के कारण, वैसे रूपों को विचार के अयोग्य मानते हैं। निरुत्तिपिटक में प्रथमा और सम्बोधन के स्थान पर 'महन्तो, भवन्तो, चरन्तो' आदि का बहुवचनत्व ही कहा गया है, एकवचनत्व नहीं। क्योंकि वहाँ 'महं भवं चरं तिट्ठं' गाथा कहकर 'महं तिट्ठति, महन्तो तिट्ठन्ति' और 'भो महा, भवन्तो महन्तो' तथा 'भवं तिट्ठति, भवन्तो तिट्ठन्ति' आदि कहा गया है। เอตฺถ ปน ‘‘ภวํ, ภวนฺโต’’ติ ปทานิ ยตฺถ ‘‘โหนฺโต โหนฺตา’’ติ กฺริยตฺถํ น วทนฺติ, ตตฺถ ‘‘ภวํ กจฺจาโน. มา ภวนฺโต เอวํ อวจุตฺถา’’ติอาทีสุ วิย อญฺญสฺมึ อตฺเถ ปตนโต เอกวจนพหุวจนานิ ภวนฺติ, ตสฺมา ‘‘สนฺโต สปฺปุริสา โลเก’’ติ เอตฺถ ‘‘สนฺโต’’ติ ปทสฺส วิย ‘‘อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา’’ติ เอตฺถ ‘‘อรหนฺโต’’ติ ปทสฺส วิย จ ‘‘ภวนฺโต’’ติ ปทสฺส พหุวจนตฺตํ นิชฺฌานกฺขมํ. ‘‘มหนฺโต, จรนฺโต, ติฏฺฐนฺโต’’ติอาทีนํ ปน พหุวจนตฺตํ น นิชฺฌานกฺขมํ วิย อมฺเห ปฏิภาติ. น หิ กตฺถจิปิ ‘‘สนฺโต, อรหนฺโต, ภวนฺโต’’ติ ปทวชฺชิตานํ ‘‘คจฺฉนฺโต, มหนฺโต, จรนฺโต’’ติอาทีนํ อเนกปทสตานํ พหุวจนนฺตตาปโยเค ปสฺสาม. ตถา หิ – यहाँ 'भवं, भवन्तो' पद जहाँ 'होन्तो, होन्ता' (होते हुए) क्रिया के अर्थ को नहीं कहते, वहाँ 'भवं कच्चानो। मा भवन्तो एवं अवचुत्था' आदि के समान अन्य अर्थ में प्रवृत्त होने से एकवचन और बहुवचन होते हैं, इसलिए 'सन्तो सप्पुरिसा लोके' यहाँ 'सन्तो' पद के समान और 'अरहन्तो सम्मासम्बुद्धा' यहाँ 'अरहन्तो' पद के समान 'भवन्तो' पद का बहुवचनत्व विचारणीय है। परन्तु 'महन्तो, चरन्तो, तिट्ठन्तो' आदि का बहुवचनत्व हमें विचारणीय नहीं प्रतीत होता। क्योंकि कहीं भी 'सन्तो, अरहन्तो, भवन्तो' पदों को छोड़कर 'गच्छन्तो, महन्तो, चरन्तो' आदि अनेक सैकड़ों पदों का बहुवचनान्त प्रयोग नहीं देखते हैं। जैसा कि - พวฺหตฺเต [Pg.224] กตฺถจิ ฐาเน, ‘‘ชาน’’มิจฺจาทโย ยถา; ทิสฺสนฺติ เนวํ พวฺหตฺเต, ‘‘คจฺฉนฺโต’’ อิติอาทโย. बहुवचन में कहीं-कहीं 'जानं' आदि के समान (रूप) देखे जाते हैं, किन्तु बहुवचन में 'गच्छन्तो' आदि इस प्रकार नहीं देखे जाते। พวฺหตฺเต กตฺถจิ ฐาเน, ‘‘สนฺโต’’ อิจฺจาทโยปิ จ; ทิสฺสนฺติ เนวํ พวฺหตฺเต, ‘‘คจฺฉนฺโต’’ อิติอาทโย. बहुवचन में कहीं-कहीं 'सन्तो' आदि भी देखे जाते हैं, किन्तु बहुवचन में 'गच्छन्तो' आदि इस प्रकार नहीं देखे जाते। ‘‘อรหนฺโต’’ติ พวฺหตฺเต, เอกนฺเตเนว ทิสฺสติ; เนวํ ทิสฺสนฺติ พวฺหตฺเต, ‘‘คจฺฉนฺโต’’ อิติอาทโย. 'अरहन्तो' यह बहुवचन में निश्चित रूप से देखा जाता है; किन्तु बहुवचन में 'गच्छन्तो' आदि इस प्रकार नहीं देखे जाते। อเนกสตปาเฐสุ, ‘‘วิหรนฺโต’’ติอาทีสุ; เอกสฺสปิ พหุกตฺเต, ปวตฺติ น ตุ ทิสฺสติ. अनेक सैकड़ों पाठों में 'विहरन्तो' आदि में एक का भी बहुवचन में प्रयोग नहीं देखा जाता है। พหุวจนนเยน, ‘‘คจฺฉนฺโต’’ติ ปทสฺส หิ; คหเณ สติ พหโว, โทสา ทิสฺสนฺติ สจฺจโต. बहुवचन के नियम से 'गच्छन्तो' पद को ग्रहण करने पर वास्तव में बहुत से दोष देखे जाते हैं। ยเถกมฺหิ ฆเร ทฑฺเฒ, ทฑฺฒา สามีปิกา ฆรา; ตถา พวฺหตฺตวาจิตฺเต, ‘‘คจฺฉนฺโต’’ติ ปทสฺส ตุ. जैसे एक घर के जलने पर समीपवर्ती घर भी जले हुए (कहे जाते) हैं, वैसे ही 'गच्छन्तो' पद के बहुवचनवाचक होने पर - ‘‘วิหรนฺโต’’ติอาทีนํ, พวฺหตฺตวาจิตา สิยา; รูปนโย อนิฏฺโฐ จ, คเหตพฺโพ อเนกธา. 'विहरन्तो' आदि की भी बहुवचनवाचिता हो जाएगी; और अनिष्ट रूप-नियम को अनेक प्रकार से ग्रहण करना होगा। เอวํ สนฺเตปิ ยสฺมา ‘‘นิรุตฺติปิฏกํ นาม ปภินฺนปฏิสมฺภิเทน มหาขีณาสเวน มหากจฺจายเนน กต’’นฺติ โลเก ปสิทฺธํ, ตสฺมา อิทํ ฐานํ ปุนปฺปุนํ อุปปริกฺขิตพฺพํ. กิญฺจาเปตฺถ เถเร คารเวน เอวํ วุตฺตํ, ตถาปิ ปาฬินยํ ครุํ กตฺวา ทิฏฺเฐเนกวจนนเยน อทิฏฺโฐ พหุวจนนโย ฉฑฺเฑตพฺโพ. เอวํ สติ นิคฺคหีตนฺเตสุ นโย โสภโน ภวติ. อยํ ปน อมฺหากํ รุจิ – ऐसा होने पर भी, चूँकि लोक में यह प्रसिद्ध है कि 'निरुत्तिपिटक नामक ग्रन्थ प्रभिन्नप्रतिसम्भिदा प्राप्त महाक्षीणास्रव महाकात्यायन द्वारा रचित है', इसलिए इस स्थान की बार-बार परीक्षा करनी चाहिए। यद्यपि यहाँ स्थविर के प्रति गौरव के कारण ऐसा कहा गया है, तथापि पालि-नियम को प्रधान मानकर देखे गए एकवचन-नियम के अनुसार अनदेखे बहुवचन-नियम को छोड़ देना चाहिए। ऐसा होने पर अनुस्वारान्त (पदों) में नियम शोभनीय होता है। यह हमारा मत है - ‘‘ภวํ กรํ อรหํ สํ, มหํ’’ อิติ ปทานิ ตุ; วิสทิสานิ สมฺโภนฺติ, อญฺญมญฺญนฺติ ลกฺขเย. 'भवं, करं, अरहं, सं, महं' ये पद तो विसदृश (भिन्न) होते हैं, इन्हें एक-दूसरे से अलग समझना चाहिए। ‘‘คจฺฉํ จรํ ททํ ติฏฺฐํ, จินฺตยํ ภาวยํ วทํ; ชานํ ปสฺส’’นฺติอาทีนิ, สทิสานิ ภวนฺติ หิ. 'गच्छं, चरं, ददं, तिट्ठं, चिन्तयं, भावयं, वदं, जानं, पस्सं' आदि तो वास्तव में सदृश (समान) होते हैं। ตตฺร ‘‘ชาน’’นฺติอาทีนิ, กตฺถจิ ปริวตฺตเร; วิภตฺติลิงฺควจน-วเสนาติ วิภาวเย. वहाँ 'जानं' आदि कहीं-कहीं विभक्ति, लिंग और वचन के वश से परिवर्तित होते हैं, ऐसा समझना चाहिए। ตตฺร [Pg.225] ตาว ภวนฺตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจติ – ภวํสทฺโท หิ ‘‘วฑฺฒนฺโต, โหนฺโต’’ติ อตฺเถปิ วทติ. เตสํ วเสน อยํ นามิกปทมาลา. वहाँ पहले 'भवन्त' शब्द की शब्द-रूपावली कही जाती है - 'भवं' शब्द 'बढ़ते हुए, होते हुए' अर्थ में भी कहा जाता है। उनके अनुसार यह शब्द-रूपावली है। ภวํ, ภวนฺโต, ภวนฺตา. ภวนฺตํ, ภวนฺเต. ภวนฺเตน, ภวนฺเตหิ, ภวนฺเตภิ. ภวนฺตสฺส, ภวนฺตานํ. ภวนฺตา, ภวนฺตสฺมา, ภวนฺตมฺหา, ภวนฺเตหิ, ภวนฺเตภิ. ภวนฺตสฺส, ภวนฺตานํ. ภวนฺเต, ภวนฺตสฺมึ, ภวนฺตมฺหิ, ภวนฺเตสุ. เห ภวนฺต, เห ภวนฺตา. भवं, भवन्तो, भवन्ता। भवन्तं, भवन्ते। भवन्तेन, भवन्तेहि, भवन्तेभि। भवन्तस्स, भवन्तानं। भवन्ता, भवन्तस्मा, भवन्तम्हा, भवन्तेहि, भवन्तेभि। भवन्तस्स, भवन्तानं। भवन्ते, भवन्तस्मिं, भवन्तम्हि, भवन्तेसु। हे भवन्त, हे भवन्ता। ตตฺถ ‘‘ภวํ, ภวนฺโต’’ติอาทีนํ ‘‘วฑฺฒนฺโตโหนฺโต’’ติอาทินา อตฺโถ ทฏฺฐพฺโพ. ตถา หิ ‘‘สุวิชาโน ภวํ โหติ. ธมฺมกาโม ภวํ โหติ. ราชา ภวนฺโต นานาสมฺปตฺตีหิ โมทติ. กุฬีรทโห คงฺคาย เอกาพทฺโธ, คงฺคาย ปูรณกาเล คงฺโคทเกน ปูรติ, อุทเก มนฺที ภวนฺเต ทหโต อุทกํ คงฺคาย โอตรตี’’ติ ปโยคา ภวนฺติ, ตสฺมา อยํ นามิกปทมาลา สารโต ปจฺเจตพฺพา. เอตฺถ ภวํสทฺทมตฺตํ วชฺเชตฺวา คจฺฉมานจรมานสทฺทาทีสุ วิย ภวนฺตสทฺเท ‘‘ภวนฺโต, ภวนฺตา’’ติ ปุริสนโยปิ ลพฺภติ, นปุํสกลิงฺเค วตฺตพฺเพ ‘‘ภวนฺตํ, ภวนฺตานี’’ติ จิตฺตนโยปิ ลพฺภติ. เอวํ วฑฺฒนภวนตฺถวาจกสฺส ภวนฺตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา เวทิตพฺพา. वहाँ 'भवं, भवन्तो' आदि का 'बढ़ते हुए, होते हुए' आदि अर्थ देखना चाहिए। जैसे - 'सुविजानो भवं होति' (होने वाला पुरुष सुविज्ञ होता है)। 'धम्मकामो भवं होति' (होने वाला पुरुष धर्मप्रेमी होता है)। 'राजा भवन्तो नानासम्पत्तीहि मोदति' (होता हुआ राजा नाना सम्पत्तियों से प्रसन्न होता है)। 'कुलीरदह गंगा से जुड़ा हुआ है, गंगा के भरने के समय गंगा के जल से भर जाता है, जल के कम होने पर दह का जल गंगा में उतर जाता है' - ऐसे प्रयोग होते हैं, इसलिए इस शब्द-रूपावली को सार रूप में समझना चाहिए। यहाँ केवल 'भवं' शब्द को छोड़कर 'गच्छमान, चरमान' आदि शब्दों के समान 'भवन्त' शब्द में 'भवन्तो, भवन्ता' यह पुरुष-नियम (पुल्लिंग) भी प्राप्त होता है, और नपुंसक लिंग में कहे जाने पर 'भवन्तं, भवन्तानि' यह चित्त-नियम (नपुंसक लिंग) भी प्राप्त होता है। इस प्रकार वृद्धि और होने के अर्थ के वाचक 'भवन्त' शब्द की शब्द-रूपावली जाननी चाहिए। อยญฺจ วิเสโส ‘‘ภวนฺโต’’ติ ปทํ วฑฺฒนภวนตฺถโต อญฺญตฺเถ วตฺตมานํ พหุวจนเมว โหติ, ยถา ‘‘ภวนฺโต อาคจฺฉนฺตี’’ติ. วฑฺฒนภวนตฺเถสุ วตฺตมานํ เอกวจนเมว. อตฺริเม ปโยคา ‘‘อนุปุพฺเพน ภวนฺโต วิญฺญุตํ ปาปุณาติ. สมเณน นาม อีทิเสสุ กมฺเมสุ อพฺยาวเฏน ภวิตพฺพํ, เอวํ ภวนฺโต หิ สมโณ สุสมโณ อสฺสา’’ติ. ‘‘ภวํ’’ อิติ ปทํ ปน อุภยตฺถาปิ เอกวจนเมว, ตสฺมา [Pg.226] อิทานิ ‘‘ภวํ อานนฺโท. ภวนฺโต อาคจฺฉนฺติ, อปฺปสทฺทา ภวนฺโต โหนฺตุ, มา โภนฺโต สทฺทมกตฺถา’’ติ เอวมาทิปโยคทสฺสนวเสน โวหารวิเสเส ปวตฺตํ อญฺญํ อตฺถํ ปฏิจฺจ อปราปิ นามิกปทมาลา วุจฺจเต – और यह विशेषता है कि 'भवन्तो' यह पद 'बढ़ने' और 'होने' के अर्थ से भिन्न अर्थ में प्रयुक्त होने पर बहुवचन ही होता है, जैसे 'भवन्तो आगच्छन्ति' (आप लोग आते हैं)। 'बढ़ने' और 'होने' के अर्थ में प्रयुक्त होने पर यह एकवचन ही होता है। यहाँ ये प्रयोग हैं— 'अनुपुब्बेन भवन्तो विञ्ञुतं पापुणाति' (क्रमशः बढ़ता हुआ वह विद्वत्ता को प्राप्त करता है)। 'समणेन नाम ईदिसेसु कम्मेसु अब्यावटेन भवितब्बं, एवं भवन्तो हि समणो सुसमणो अस्सा'ति (श्रमण को इस प्रकार के कार्यों में व्यस्त नहीं होना चाहिए, इस प्रकार होता हुआ श्रमण ही उत्तम श्रमण होता है)। 'भवं' यह पद तो दोनों ही अर्थों में एकवचन ही है, इसलिए अब 'भवं आनन्दो। भवन्तो आगच्छन्ति, अप्पसद्दा भवन्तो होन्तु, मा भोन्तो सद्दमकत्था' इत्यादि प्रयोगों को देखने के अनुसार व्यवहार विशेष में प्रवृत्त अन्य अर्थ की अपेक्षा से एक और नामिक पदमाला (शब्द-रूप) कही जाती है— ภวํ, ภวนฺโต, โภนฺโต. ภวนฺตํ, ภวนฺเต. ภวตา, โภตา, ภวนฺเตน, ภวนฺเตหิ, ภวนฺเตภิ. ภวโต, โภโต, ภวนฺตสฺส, ภวนฺตานํ, ภวตํ. ภวตา, โภตา, ภวนฺเตหิ, ภวนฺเตภิ. ภวโต, โภโต, ภวนฺตสฺส, ภวนฺตานํ, ภวตํ. ภวติ, ภวนฺเต, ภวนฺตสฺมึ, ภวนฺตมฺหิ, ภวนฺเตสุ. โภ, ภวนฺโต, โภนฺโต อิติ. भवं, भवन्तो, भोन्तो (प्रथमा)। भवन्तं, भवन्ते (द्वितीया)। भवता, भोता, भवन्तेन, भवन्तेहि, भवन्तेभि (तृतीया)। भवतो, भोतो, भवन्तस्स, भवन्तानं, भवतं (चतुर्थी)। भवता, भोता, भवन्तेहि, भवन्तेभि (पञ्चमी)। भवतो, भोतो, भवन्तस्स, भवन्तानं, भवतं (षष्ठी)। भवति, भवन्ते, भवन्तस्मिं, भवन्तम्हि, भवन्तेसु (सप्तमी)। भो, भवन्तो, भोन्तो (सम्बोधन)। เอตฺถ ปน ‘‘โภ’’อิจฺจาทีนิ ตีณิ ปทานิ ยสฺมา โวหารวิเสสปวตฺตานิ อาลปนปทานิ โหนฺติ, ตสฺมา ‘‘อาวุโส, ภนฺเต’’ติ ปทานิ วิย โภสทฺทาทิอุปปทวนฺตานิ น ภวนฺติ, ‘‘โภ ปุริส, ภวนฺโต พฺราหฺมณา, โภนฺโต สมณา, โภ ราช’’อิจฺจาทีสุ หิ ปุริสสทฺทาทโยเยว โภสทฺทาทิ อุปปทวนฺโต ภวนฺติ. อิธ จ ‘‘ภวํ อานนฺโท’’ติ เอตฺถ ภวํสทฺเทน สมานตฺถานิ ‘‘โภ, ภวนฺโต, โภนฺโต’’ติ ปทานิ วุตฺตานิ, น ปน ‘‘ธมฺมกาโม ภวํ โหตี’’ติ เอตฺถ ภวํสทฺเทน สมานตฺถานิ. ปฐมสฺมิญฺหิ นเย วฑฺฒนตฺถวเสน ‘‘โภ ภวนฺต, ภวนฺโต ภวนฺตา, โภนฺโต ภวนฺตา’’ติ โภสทฺทาทโย อาลปนปทานํ อุปปทานิ ภวนฺติ, น ทุติยสฺมึ นเย. อาเมฑิตวเสน ปน ‘‘โภ โภ, ภวนฺโต ภวนฺโต, โภนฺโต โภนฺโต’’ติ ปทานิ ภวนฺติ ยถา ‘‘ภนฺเต ภนฺเต’’ติ. यहाँ 'भो' इत्यादि तीन पद क्योंकि व्यवहार विशेष में प्रवृत्त सम्बोधन पद हैं, इसलिए 'आवुसो, भन्ते' पदों के समान 'भोसद्द' आदि उपपद वाले नहीं होते हैं; 'भो पुरिस, भवन्तो ब्राह्मणा, भोन्तो समणा, भो राज' इत्यादि में 'पुरिस' शब्द आदि ही 'भोसद्द' आदि उपपद वाले होते हैं। और यहाँ 'भवं आनन्दो' इसमें 'भवं' शब्द के समान अर्थ वाले 'भो, भवन्तो, भोन्तो' पद कहे गए हैं, न कि 'धम्मकामो भवं होति' यहाँ 'भवं' शब्द के समान अर्थ वाले। पहले नियम में 'बढ़ने' के अर्थ के कारण 'भो भवन्त, भवन्तो भवन्ता, भोन्तो भवन्ता' इस प्रकार 'भोसद्द' आदि सम्बोधन पदों के उपपद होते हैं, दूसरे नियम में नहीं। पुनरावृत्ति (आमेड़ित) के कारण 'भो भो, भवन्तो भवन्तो, भोन्तो भोन्तो' पद होते हैं, जैसे 'भन्ते भन्ते'। อตฺริทํ ภูธาตุวเสน สงฺเขปโต ปาฬินิทสฺสนํ – กสฺมา ภวํ วิชฺชนมรญฺญนิสฺสิโต. กถํ ปนาหํ โภ ตํ ภวนฺตํ โคตมํ ชานิสฺสามิ. เอวํ โภติ โข อมฺพฏฺโฐ มาณโว [Pg.227] พฺราหฺมณสฺส โปกฺขรสาติสฺส ปฏิสฺสุตฺวา. มา ภวนฺโต เอวํ อวจุตฺถ. อิมํ โภนฺโต นิสาเมถ. เอวํ โภ ปุริส ชานาหิ, ปาปธมฺมา อสญฺญตา อิจฺเจวมาทิ. เอตฺถ ‘‘ภวํ’’อิจฺจาทีนิ ภูธาตุมยานิ นามปทานีติ เวทิตพฺพานิ. यहाँ 'भू' धातु के अनुसार संक्षेप में पालि उदाहरण है— 'कस्मा भवं विज्जनमरण्ञनिस्सितो' (आप क्यों विज्जन अरण्य के आश्रित हैं?)। 'कथं पनाहं भो तं भवन्तं गोतमं जानिस्सामि' (हे भो! मैं उन भगवान् गौतम को कैसे जानूँगा?)। 'एवं भोति खो अम्बट्ठो माणवो ब्राह्मणस्स पोक्खरसातिस्स पटिस्सुत्वा' (हे भोति! अम्बट्ठ माणवक ने ब्राह्मण पोक्खरसाति को 'हाँ' कहकर उत्तर दिया)। 'मा भवन्तो एवं अवचुत्थ' (आप लोग ऐसा न कहें)। 'इमं भोन्तो निसामेथ' (आप लोग इसे सुनें)। 'एवं भो पुरिस जानाहि, पापिधम्मा असञ्ञता' (हे पुरुष! इस प्रकार जानो, पापी और असंयमी) इत्यादि। यहाँ 'भवं' आदि 'भू' धातु से बने नामपद समझने चाहिए। อปิจ เตสุ ‘‘โภ, ภวนฺโต, โภนฺโต’’ติ อิมานิ นิปาตปทานิปิ โหนฺตีติ ววตฺถเปตพฺพํ. ‘‘โภ ปุริสา’’ติอาทีสุ เตสํ นิปาตานิปาตภาเว วิวาโท น กรณีโย. กจฺจายนสฺมิญฺหิ ‘‘โภ เค ตู’’ติ วุตฺตํ. อญฺญตฺถ ปน ‘‘อามนฺตนตฺเถ นิปาโต’’ติอาทิ วุตฺตํ. ตถา หิ นิรุตฺติมญฺชูสายํ วุตฺตํ ‘‘โภติทํ อามนฺตนตฺเถ นิปาโต. โส น เกวลํ เอกวจนเมว โหติ, อถ โข พหุวจนมฺปิ โหตีติ ‘โภ ปุริสา’ติ พหุวจนปฺปโยโคปิ คหิโต. ‘ภวนฺโต’ติ ปทํ ปน พหุวจนเมว โหตีติ ‘ปุริสา’ติ ปุน วุตฺต’’นฺติ. ปาฬิยญฺหิ อฏฺฐกถาสุ จ นิปาตภูโต โภสทฺโท เอกวจนพหุวจนวเสน ทฺวิธา ทิสฺสติ, อิตเร ปน พหุวจนวเสเนว ทิสฺสนฺติ. เตสํ ตุ นิปาตปทตฺเต รูปนิปฺผาทนกิจฺจํ นตฺถิ. เตสุ โภสทฺทสฺส นิปาตปทตฺตา อาหจฺจภาสิเต นิชฺชีวาลปเน อิตฺถิลิงฺควิสโย ‘‘อุมฺมุชฺช โภ ปุถุสิเล, ปริปฺลว โภ ปุถุสิเล’’ติ ปโยโคปิ ทิสฺสติ. อตฺริมา โภสทฺทสฺส ปวตฺติปริทีปนี คาถาโย – इसके अतिरिक्त उनमें 'भो, भवन्तो, भोन्तो' ये निपात पद भी होते हैं, ऐसा निश्चित करना चाहिए। 'भो पुरिसा' इत्यादि में उनके निपात या अनिपात होने में विवाद नहीं करना चाहिए। कच्चायन में 'भो गे तू' कहा गया है। अन्यत्र 'आमन्तनत्थे निपातो' (सम्बोधन के अर्थ में निपात) इत्यादि कहा गया है। जैसा कि निरुत्तिमञ्जूसा में कहा गया है— 'भोतिदं आमन्तनत्थे निपातो। सो न केवलं एकवचनमेव होति, अथ खो बहुवचनम्पि होतीति ‘भो पुरिसा’ति बहुवचनप्पयोगोपि गहितो। ‘भवन्तो’ति पदं पन बहुवचनमेव होतीति ‘पुरिसा’ति पुन वुत्तं' (यह 'भो' सम्बोधन के अर्थ में निपात है। वह न केवल एकवचन ही होता है, बल्कि बहुवचन भी होता है, इसलिए 'भो पुरिसा' यह बहुवचन प्रयोग भी ग्रहण किया गया है। 'भवन्तो' पद तो बहुवचन ही होता है, इसलिए 'पुरिसा' पुनः कहा गया है)। पालि और अट्ठकथाओं में निपात स्वरूप 'भोसद्द' एकवचन और बहुवचन के भेद से दो प्रकार का देखा जाता है, किन्तु अन्य (भवन्तो, भोन्तो) केवल बहुवचन के रूप में ही देखे जाते हैं। उनके निपात पद होने पर रूप-सिद्धि का कार्य नहीं होता है। उनमें 'भोसद्द' के निपात पद होने के कारण अचेतन के सम्बोधन में स्त्रीलिंग के विषय में 'उम्मुज्ज भो पुथुसिले, परिप्लव भो पुथुसिले' (हे विशाल शिला! ऊपर आओ, हे विशाल शिला! तैरो) यह प्रयोग भी देखा जाता है। यहाँ 'भोसद्द' की प्रवृत्ति को स्पष्ट करने वाली गाथाएँ हैं— ‘‘อิโต โภ สุคตึ คจฺฉ, มนุสฺสานํ สหพฺยตํ’’; เอวมาทีสุ โภสทฺโท, เอกวจนโก มโต. 'इतो भो सुगतिं गच्छ, मनुस्सानं सहब्यतां' (हे भो! यहाँ से सुगति को जाओ, मनुष्यों की संगति में); इत्यादि में 'भोसद्द' एकवचन माना गया है। ‘‘ปสฺสถ โภ อิมํ กุล-ปุตฺต’’มิจฺเจวมาทิสุ; พหุวจนโก เอโส, โภสทฺโทติ วิภาวเย. 'पस्सथ भो इमं कुलपुत्तं' (हे भो! इस कुलपुत्र को देखो) इत्यादि में यह 'भोसद्द' बहुवचन है, ऐसा समझना चाहिए। ปุคฺคลาลปเน [Pg.228] เจว, ธมฺมสฺสาลปเนปิ จ; นิชฺชีวาลปเน จาติ, โภสทฺโท ตีสุ ทิสฺสติ. पुद्गल (व्यक्ति) के सम्बोधन में, धर्म के सम्बोधन में और निर्जीव (अचेतन) के सम्बोधन में—इन तीनों में 'भोसद्द' देखा जाता है। ตตฺร ธมฺมาลปนมฺหิ, เอกวโจว ลพฺภติ; อิตเรสุ สิยา เทก-วโจ พหุวโจปิ จ. वहाँ धर्म के सम्बोधन में केवल एकवचन ही प्राप्त होता है; दूसरों (पुद्गल और निर्जीव) में एकवचन और बहुवचन भी हो सकता है। นิจฺฉิตพฺพํ คุณีปทํ, ธมฺมสฺสาลปเน ธุวํ; ‘‘อจฺฉริยํ วต โภ’’ติ, อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. धर्म के सम्बोधन में निश्चित रूप से गुणी पद (विशेष्य) होना चाहिए; 'अच्छरियं वत भो' (अहो! आश्चर्य है) यह यहाँ उदाहरण है। อิจฺฉิตพฺพํ คุณีปทํ, ปุคฺคลาลปเน ปน; ‘‘เอวํ โภ ปุริส ชานาหิ’’, อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. पुद्गल के सम्बोधन में भी गुणी पद (विशेष्य) इष्ट है; 'एवं भो पुरिस जानाहि' (हे पुरुष! ऐसा जानो) यह यहाँ उदाहरण है। คุณีปทํ อสนฺตมฺปิ, ปุคฺคลาลปนมฺหิ ตุ; อชฺฌาหริตฺวา ปาวเท, อตฺถํ ‘‘โภ เอหิ’’อาทิสุ. पुद्गल के सम्बोधन में गुणी पद के न होने पर भी, 'भो एहि' (हे भो! आओ) आदि में अर्थ का अध्याहार करके कहना चाहिए। ฆฏาทีนํ อาลปนํ, นิชฺชีวาลปนํ ภเว; ชีวํว โลกิยา โลเก, อาลปนฺติ กทาจิ ตุ. घड़े आदि का सम्बोधन निर्जीव सम्बोधन होता है; लोक में लौकिक लोग कभी-कभी उन्हें सजीव के समान सम्बोधित करते हैं। นิชฺชีวาลปนํ อปฺปํ, อตฺถวิญฺญาปเน สิยา; ‘‘อุมฺมุชฺช โภ ปุถุสิเล’’, อิติ ปาฬิ นิทสฺสนํ. अर्थ का बोध कराने के लिए निर्जीव सम्बोधन थोड़ा (विरल) होता है; 'उम्मुज्ज भो पुथुसिले' यह पालि उदाहरण है। เอตฺถ ลิงฺควิปลฺลาสํ, เกจิ อิจฺฉนฺติ ปณฺฑิตา; เตสํ มเตน โภตีติ, ลิงฺคํ วิปริณามเย. यहाँ कुछ विद्वान लिंग-विपर्यास (लिंग परिवर्तन) चाहते हैं; उनके मत के अनुसार 'भोति' इस प्रकार लिंग परिवर्तित करना चाहिए। อถ วา ปน โภสทฺโท, นิปาโต โสปทํ วิย; ตสฺมา วิโรธตา นาสฺส, ติลิงฺเค วจนทฺวเย. अथवा 'भोसद्द' निपात है, जैसे 'सोपदं' (उपपद सहित पद); इसलिए तीनों लिंगों और दोनों वचनों में इसका कोई विरोध नहीं है। เอวํ สนฺเตปิ โภสทฺโท, ทฺวิลิงฺเคเยว ปายโต; ยสฺมา ทิฏฺโฐ ตโต วิญฺญู, ทฺวิลิงฺเคเยว ตํ วเท. ऐसा होने पर भी 'भोसद्द' प्रायः दो लिंगों (पुल्लिंग और स्त्रीलिंग) में ही देखा गया है, इसलिए विद्वान उसे दो लिंगों में ही कहें। อิตฺถิลิงฺคมฺหิ สมฺปตฺเต, ‘‘โภ’’ติ อิติ ปโยชเย; เอวํวิธํ ปโยคญฺหิ, สุปฺปโยคํ พุธาพฺรวุํ. स्त्रीलिंग के प्राप्त होने पर (स्त्रीलिंग के विषय में), 'भो' (bho) का प्रयोग करना चाहिए; विद्वानों ने इस प्रकार के प्रयोग को ही सुप्रयोग (सही प्रयोग) कहा है। ยชฺเชวํ [Pg.229] ทุปฺปโยคํว, สิยา ตุมฺเหหิ ทสฺสิตํ; ‘‘อุมฺมุชฺช โภ ปุถุสิเล’’, อิจฺจาหจฺจปทนฺติ เจ. यदि इस प्रकार का कोई दुष्प्रयोग (गलत प्रयोग) आपके द्वारा दिखाया जाए, जैसे कि 'उम्मुज्ज भो पुथुसिले' (हे विशाल शिला! ऊपर आओ), तो यह एक आकस्मिक पद (अपवाद) है। ทุปฺปโยคํ น ตํ ยสฺมา, โวหารกุสเลน เว; ชิเนน ภาสิเต ธมฺเม, ทุปฺปโยคา น วิชฺชเร. वह दुष्प्रयोग नहीं है, क्योंकि व्यवहार-कुशल जिन (बुद्ध) द्वारा भाषित धर्म में दुष्प्रयोग नहीं पाए जाते हैं। อิตฺถิลิงฺคสฺส วิสเย, โภติสทฺทปฺปโยชนํ; กวีนํ เปมนียนฺติ, มยา เอวมุทีริตํ. स्त्रीलिंग के विषय में 'भोति' (bhoti) शब्द का प्रयोग कवियों के लिए प्रिय है, ऐसा मेरे द्वारा कहा गया है। เอวํ ภวนฺตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา ปาฬินยานุรูปํ ทฺวิธา วิภตฺตา วฑฺฒนภวนตฺถตทญฺญตฺถวเสน. इस प्रकार 'भवन्त' शब्द की नामिक पदमाला (शब्द-रूप) पालि नियम के अनुसार दो प्रकार से विभाजित है - वर्धन-भवन अर्थ (वृद्धि और होने के अर्थ) और उससे भिन्न अर्थ (सम्बोधन आदि) के आधार पर। กโรนฺตสทฺทสฺส ปน – और 'करोन्त' (करते हुए) शब्द की (रूपमाला) – กรํ, กโรนฺโต, กโรนฺตา. กโรนฺตํ, กโรนฺเต. กโรตา, กโรนฺเตน, กโรนฺเตหิ, กโรนฺเตภิ. กโรโต, กโรนฺตสฺส, กโรนฺตานํ, กโรตํ. กโรตา, กโรนฺตา, กโรนฺตสฺมา, กโรนฺตมฺหา, กโรนฺเตหิ, กโรนฺเตภิ. กโรโต, กโรนฺตสฺส, กโรนฺตานํ, กโรตํ. กโรนฺเต, กโรนฺตสฺมึ, กโรนฺตมฺหิ, กโรนฺเตสุ. โภ กโรนฺต, ภวนฺโต กโรนฺตาติ รูปานิ ภวนฺติ. करं, करोन्तो, करोन्ता (प्रथमा)। करोन्तं, करोन्ते (द्वितीया)। करोता, करोन्तेन, करोन्तेहि, करोन्तेभि (तृतीया)। करोतो, करोन्तस्स, करोन्तानं, करोतं (चतुर्थी)। करोता, करोन्ता, करोन्तस्मा, करोन्तम्हा, करोन्तेहि, करोन्तेभि (पञ्चमी)। करोतो, करोन्तस्स, करोन्तानं, करोतं (षष्ठी)। करोन्ते, करोन्तस्मिं, करोन्तम्हि, करोन्तेसु (सप्तमी)। भो करोन्त, भवन्तो करोन्ता (सम्बोधन) - ये रूप होते हैं। ‘‘กโรโต น กริยติ ปาป’’นฺติ อิทเมตฺถ กโรโตสทฺทสฺส อตฺถิตานิทสฺสนํ. อิตฺถิลิงฺเค วตฺตพฺเพ ‘‘กโรนฺตี, กโรนฺติโย’’ติอาทินา โยเชตพฺพานิ, นปุํสกลิงฺเค วตฺตพฺเพ ‘‘กโรนฺตํ, กโรนฺตานี’’ติอาทินา โยเชตพฺพานิ. 'करोतो न करियति पापं' (करने वाले के द्वारा पाप नहीं किया जाता) - यहाँ यह 'करोतो' शब्द की उपस्थिति का उदाहरण है। स्त्रीलिंग में कहना हो तो 'करोन्ती, करोन्तियो' आदि के रूप में जोड़ना चाहिए, और नपुंसक लिंग में कहना हो तो 'करोन्तं, करोन्तानि' आदि के रूप में जोड़ना चाहिए। อรหนฺตสทฺทสฺส – 'अरहन्त' शब्द की (रूपमाला) – อรหํ, อรหนฺโต. อรหนฺตํ, อรหนฺเต. อรหตา, อรหนฺเตน, อรหนฺเตหิ, อรหนฺเตภิ. อรหโต, อรหนฺตสฺส, อรหนฺตานํ, อรหตํ. อรหตา, อรหนฺตา, อรหนฺตสฺมา, อรหนฺตมฺหา, อรหนฺเตหิ, อรหนฺเตภิ. อรหโต, อรหนฺตสฺส, อรหนฺตานํ, อรหตํ. อรหนฺเต, อรหนฺตสฺมึ[Pg.230], อรหนฺตมฺหิ, อรหนฺเตสุ. โภ อรหนฺต, ภวนฺโต อรหนฺโต อิติ รูปานิ ภวนฺติ. अरहं, अरहन्तो (प्रथमा)। अरहन्तं, अरहन्ते (द्वितीया)। अरहता, अरहन्तेन, अरहन्तेहि, अरहन्तेभि (तृतीया)। अरहतो, अरहन्तस्स, अरहन्तानं, अरहतं (चतुर्थी)। अरहता, अरहन्ता, अरहन्तस्मा, अरहन्तम्हा, अरहन्तेहि, अरहन्तेभि (पञ्चमी)। अरहतो, अरहन्तस्स, अरहन्तानं, अरहतं (षष्ठी)। अरहन्ते, अरहन्तस्मिं, अरहन्तम्हि, अरहन्तेसु (सप्तमी)। भो अरहन्त, भवन्तो अरहन्तो (सम्बोधन) - ये रूप होते हैं। อยํ คุณวาจกสฺส อรหนฺตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. ‘‘อรหา, อรหนฺโต, อรหนฺตา’’อิติ จ. เอตญฺหิ รูปํ สมนฺตปาสาทิกายํ มนุสฺสวิคฺคหฏฺฐาเน ทิสฺสติ. อุตฺตริมนุสฺสธมฺมปาฬิยํ ปน ‘‘มยญฺจมฺหา อนรหนฺโต’’ติ ปทํ ทิสฺสติ. อรหนฺตํ, อรหนฺเต. อรหตา, เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. อยํ ปณฺณตฺติวาจกสฺส อรหนฺตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. यह गुणवाचक 'अरहन्त' शब्द की नामिक पदमाला है। 'अरहा, अरहन्तो, अरहन्ता' भी (होते हैं)। यह रूप समन्तपासादिका में 'मनुस्सविग्गह' के प्रसंग में देखा जाता है। उत्तरिमनुस्सधम्म पालि में 'मयञ्चम्हा अनरहन्तो' (और हम अरहन्त नहीं हैं) पद देखा जाता है। अरहन्तं, अरहन्ते, अरहता - शेष का विस्तार कर लेना चाहिए। यह प्रज्ञप्तिवाचक (संज्ञावाचक) 'अरहन्त' शब्द की नामिक पदमाला है। ตถา หิ ‘‘อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ. อรหํ สุคโต โลเก. อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา’’ติอาทีสุ อรหํสทฺทาทโย คุณวาจกา. ‘‘อรหา อโหสิ. อหญฺหิ อรหา โลเก. เอโก อรหา, เอกสฏฺฐิ อรหนฺโต โลเก อเหสุํ. जैसे कि 'अरहं सम्मासम्बुद्धो' (अरहन्त सम्यक्सम्बुद्ध), 'अरहं सुगतो लोके' (लोक में अरहन्त सुगत), 'अरहन्तो सम्मासम्बुद्धा' (अरहन्त सम्यक्सम्बुद्धगण) आदि में 'अरहं' आदि शब्द गुणवाचक हैं। 'अरहा अहोसि' (वह अरहन्त हुआ), 'अहञ्हि अरहा लोके' (मैं ही लोक में अरहन्त हूँ), 'एको अरहा' (एक अरहन्त), 'एकसट्ठि अरहन्तो लोके अहेसुं' (लोक में इकसठ अरहन्त हुए)। คาเม วา ยทิ วารญฺเญ, นินฺเน วา ยทิ วา ถเล; ยตฺถ อรหนฺโต วิหรนฺติ, ตํ ภูมิรามเณยฺยกํ. गाँव में हो या अरण्य (जंगल) में, निम्न भूमि (घाटी) में हो या स्थल (मैदान) पर; जहाँ अरहन्त विहार करते हैं, वह भूमि रमणीय है। มยญฺจมฺหา อนรหนฺโต’’ติอาทีสุ อรหาสทฺทาทโย ปณฺณตฺติวาจกาติ ทฏฺฐพฺพา. อิธ อิตฺถินปุํสกลิงฺควเสน วิสุํ วตฺตพฺพนโย อปฺปสิทฺโธ. ยทิ เอวํ อาสวกฺขยํ ปตฺตา อิตฺถี กถํ วตฺตพฺพา, อาสวกฺขยํ ปตฺตํ จิตฺตํ กถํ วตฺตพฺพนฺติ? อิตฺถี ตาว ‘‘ยํ อิตฺถี อรหํ อสฺส สมฺมาสมฺพุทฺโธ’’ติ วจนโต ‘‘อรห’’นฺติ วตฺตพฺพา คุณวเสน, ปณฺณตฺติวเสน ปน ‘‘อิตฺถี อรหา อโหสี’’ติ วตฺตพฺพา. จิตฺตํ ปน คุณวเสเนว ‘‘อรหํ จิตฺต’’นฺติ วตฺตพฺพนฺติ. 'मयञ्चम्हा अनरहन्तो' आदि में 'अरहा' आदि शब्द प्रज्ञप्तिवाचक (संज्ञावाचक) समझने चाहिए। यहाँ स्त्री और नपुंसक लिंग के अनुसार अलग से कहने की विधि नहीं दी गई है। यदि ऐसा है, तो आस्रव-क्षय को प्राप्त स्त्री को क्या कहना चाहिए, और आस्रव-क्षय को प्राप्त चित्त को क्या कहना चाहिए? स्त्री के लिए तो 'यं इत्थी अरहं अस्स सम्मासम्बुद्धो' (जो स्त्री अरहन्त सम्यक्सम्बुद्ध हो) इस वचन के अनुसार गुण के कारण 'अरहं' कहना चाहिए, किन्तु प्रज्ञप्ति (संज्ञा) के कारण 'इत्थी अरहा अहोसि' (स्त्री अरहन्त हुई) कहना चाहिए। चित्त के लिए तो गुण के कारण ही 'अरहं चित्तं' (अरहन्त चित्त) कहना चाहिए। สนฺตสทฺทสฺส [Pg.231] – 'सन्त' (सत्/सज्जन) शब्द की (रूपमाला) – สํ, สนฺโต, สนฺโต, สนฺตา. สํ, สนฺตํ, สนฺเต. สตา, สนฺเตน, สนฺเตหิ, สนฺเตภิ, สพฺภิ. สโต, สนฺตสฺส, สนฺตานํ, สตํ, สตานํ. สตา, สนฺตา, สนฺตสฺมา, สนฺตมฺหา, สนฺเตหิ, สนฺเตภิ, สพฺภิ. สโต, สนฺตสฺส, สนฺตานํ, สตํ, สตานํ. สติ, สนฺเต, สนฺตสฺมึ, สนฺตมฺหิ, สนฺเตสุ. โภ สนฺต, ภวนฺโต สนฺโตติ รูปานิ ภวนฺติ. सं, सन्तो, सन्तो, सन्ता (प्रथमा)। सं, सन्तं, सन्ते (द्वितीया)। सता, सन्तेन, सन्तेहि, सन्तेभि, सब्भि (तृतीया)। सतो, सन्तस्स, सन्तानं, सतं, सतानं (चतुर्थी)। सता, सन्ता, सन्तस्मा, सन्तम्हा, सन्तेहि, सन्तेभि, सब्भि (पञ्चमी)। सतो, सन्तस्स, सन्तानं, सतं, सतानं (षष्ठी)। सति, सन्ते, सन्तस्मिं, सन्तम्हि, सन्तेसु (सप्तमी)। भो सन्त, भवन्तो सन्तो (सम्बोधन) - ये रूप होते हैं। เอตฺถ ปน ‘‘อทฺธา หิ ตาต สตเนส ธมฺโม’’ติ ชยทฺทิสชาตกปาฬิทสฺสนโต ‘‘สตาน’’นฺติ วุตฺตํ. ตตฺถ หิ สตเนสาติ สตานํ เอสาติ เฉโท, รสฺสตฺตนิคฺคหีตสรโลปวเสน จ รูปนิฏฺฐานํ เวทิตพฺพํ. ตถา หิ ตทฏฺฐกถายํ ‘‘อทฺธา เอกํเสน เอส ตาต สตานํ ปณฺฑิตานํ ธมฺโม สภาโว’’ติ อตฺโถ วุตฺโต. อยํ เย โลเก ‘‘สปฺปุริสา’’ติ จ ‘‘อริยา’’ติ จ ‘‘ปณฺฑิตา’’ติ จ วุจฺจนฺติ, เตสํ วาจกสฺส สนฺตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. ตปฺปฏิเสธสฺส ปน อสํ, อสนฺโต, กตฺถจิ อสนฺตา อิจฺจปิ. ตถา หิ ‘‘อสนฺตา กิร มํ ชมฺมา, ตาต ตาตาติ ภาสเร’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. ‘‘อสํ, อสนฺตํ, อสนฺเต. อสตา’’ติอาทินา โยเชตพฺพา. อิมสฺมึ อตฺเถ ‘‘สนฺโต, อสนฺโต’’ติมานิ พหุวจนกานิเยว ภวนฺติ, น กตฺถจิปิ เอกวจนกานิ. กสฺมา? ปณฺณตฺติวาจกตฺตา. อญฺญตฺร ปน ‘‘สนฺโต, ทนฺโต’’ติอาทีสุ เอกวจนานิเยว ฐเปตฺวา วิชฺชมานตฺถวาจกสนฺโตสทฺทํ, กสฺมา? อปณฺณตฺติวาจกตฺตาติ ทฏฺฐพฺพํ. यहाँ 'अद्धा हि तात सतानेसा धम्मो' इस जयद्दिस जातक पालि के अनुसार 'सतानं' कहा गया है। वहाँ 'सतानेसा' का विच्छेद 'सतानं एसा' है, और ह्रस्वत्व, निगृहीत (अनुस्वार) और स्वर लोप के कारण रूप की सिद्धि समझनी चाहिए। जैसा कि उसकी अट्ठकथा में अर्थ कहा गया है - 'अद्धा एकंसेन एस तात सतानं पण्डितानं धम्मो सभाओ' (निश्चित रूप से हे तात! यह सज्जनों और पंडितों का धर्म/स्वभाव है)। यह उन लोगों के लिए है जिन्हें लोक में 'सत्पुरुष', 'आर्य' और 'पंडित' कहा जाता है, उनके वाचक 'सन्त' शब्द की नामिक पदमाला है। उसके निषेध (विपरीत) के लिए 'असं, असन्तो', कहीं-कहीं 'असन्ता' आदि होते हैं। जैसे कि पालि में देखा जाता है - 'असन्ता किर मं जम्मा, तात ताताति भासरे' (नीच असज्जन मुझे 'तात तात' कहकर पुकारते हैं)। 'असं, असन्तं, असन्ते, असता' आदि के रूप में जोड़ना चाहिए। इस अर्थ में 'सन्तो, असन्तो' ये बहुवचन ही होते हैं, कहीं भी एकवचन नहीं होते। क्यों? प्रज्ञप्तिवाचक (संज्ञावाचक) होने के कारण। अन्यत्र 'सन्तो, दन्तो' आदि में एकवचन ही रखकर विद्यमान अर्थ के वाचक 'सन्त' शब्द को (देखना चाहिए), क्यों? क्योंकि वह अप्रज्ञप्तिवाचक (संज्ञावाचक नहीं) है, ऐसा समझना चाहिए। อิทานิ ปณฺณตฺติวาจกานํ เตสํ กานิจิ ปโยคานิ กถยาม – अब उन प्रज्ञप्तिवाचकों (संज्ञावाचकों) के कुछ प्रयोग कहते हैं – สเมติ [Pg.232] อสตา อสํ. ยํ ยญฺหิ ราช ภชติ, สนฺตํ วา ยทิ วา อสํ. น สา สภา ยตฺถ น สนฺติ สนฺโต. อสนฺโต นิรยํ ยนฺติ, สนฺโต สคฺคปรายณา. อสนฺเต โนปเสเวยฺย, สนฺเต เสเวยฺย ปณฺฑิโต. สพฺภิเรว สมาเสถ. สตํ ธมฺโม อิจฺเจวมาทีนิ ภวนฺติ. 'समेति असता असं' (असज्जन असज्जन से ही मिलता है)। 'यं यञ्हि राज भजति, सन्तं वा यदि वा असं' (हे राजन्! वह जिसका भी सेवन करता है, चाहे वह सज्जन हो या असज्जन)। 'न सा सभा यत्थ न सन्ति सन्तो' (वह सभा नहीं जहाँ सज्जन नहीं होते)। 'असन्तो निरयं यन्ति, सन्तो सग्गपरायणा' (असज्जन नरक जाते हैं, सज्जन स्वर्गगामी होते हैं)। 'असन्ते नोपसेवेय्य, सन्ते सेवेय्य पण्डितो' (पंडित को असज्जनों की सेवा नहीं करनी चाहिए, सज्जनों की सेवा करनी चाहिए)। 'सब्भिरेव समासेथ' (सज्जनों के साथ ही बैठना चाहिए)। 'सतं धम्मो' (सज्जनों का धर्म) - इस प्रकार आदि प्रयोग होते हैं। โย ปนมฺเหหิ ปทมาลายํ ‘‘สพฺภี’’ติ อยํ สทฺโท ตติยาปญฺจมีพหุวจนวเสน โยชิโต, โส จ โข สนฺตอิติ อการนฺตปกติวเสน, อญฺญตฺถ ปน ‘‘สพฺภี’’ติ อิการนฺตปกติวเสน โยเชตพฺโพ. ตถา หิ สพฺภีติ สปฺปุริโส นิพฺพานญฺจ, สุนฺทราธิวจนํ วา เอตํ สพฺภีติ. สพฺโพ จายมตฺโถ สาฏฺฐกถาย ‘‘พหุมฺเปตํ อสพฺภิ ชาตเวทา’’ติ อิมาย ปาฬิยา ‘‘สนฺโต หเว สพฺภิ ปเวทยนฺตี’’ติ อิมาย จ ทีเปตพฺโพ. जो हमारे द्वारा पदमाला में 'सब्भी' (sabbhī) यह शब्द तृतीया और पञ्चमी बहुवचन के रूप में प्रयुक्त किया गया है, वह 'सन्त' (santa) इस अकारान्त प्रकृति के वश से है; किन्तु अन्यत्र 'सब्भी' को इकारान्त प्रकृति के वश से प्रयुक्त करना चाहिए। क्योंकि 'सब्भी' का अर्थ सत्पुरुष और निर्वाण है, अथवा यह 'सब्भी' सुन्दर का पर्यायवाची है। यह सम्पूर्ण अर्थ अट्ठकथा में 'बहुम्पेतं असब्भि जातवेदा' इस पालि और 'सन्तो हवे सब्भि पवेदयन्ति' इसके द्वारा स्पष्ट किया जाना चाहिए। อาลปเน จ ปจฺจตฺเต, ตติยาปญฺจมีสุ จ; สมาสมฺหิ จ โยเชยฺย, สพฺภิสทฺทํ สุเมธโส. बुद्धिमान व्यक्ति को 'सब्भि' शब्द का प्रयोग सम्बोधन, प्रथमा, तृतीया, पञ्चमी और समास में करना चाहिए। อตฺรายํ โยชนา – โภ สพฺภิ ติฏฺฐ, สพฺภิ ติฏฺฐติ, สพฺภิ สห คจฺฉติ, สพฺภิ อเปหิ, อสพฺภิรูโป ปุริโส. ยสฺมา ปนายํ สาสนานุกูลา, ตสฺมา อิมิสฺสา ตทนุกูลตฺตํ ทสฺเสตุํ อิธ สาสนโต ปโยเค ทสฺเสสฺสาม อตกฺกาวจเร วิจิตฺเต สุคตปาฬินเย โสตูนํ วิสารทมติปฏิลาภตฺถํ. ตํ ยถา? พหุมฺเปตํ อสพฺภิ ชาตเวท, ยํ ตํ วาลธินา’ภิปูชยาม. สพฺภิ กุพฺเพถ สนฺถวํ. ยํ สาลวนสฺมึ เสนโก, ปาปกมฺมมกริ อสพฺภิรูปํ. อาพาโธยํ อสพฺภิรูโป. อสมฺโมทโก ถทฺโธ อสพฺภิรูโป’’ติ[Pg.233]. ตตฺถ อาลปนวจเน ทิฏฺเฐเยว ปจฺจตฺตวจนํ ปาฬิยํ สรูปโต อนาคตมฺปิ ทิฏฺฐเมว โหติ. ตถา กรณวจเน ทิฏฺเฐเยว นิสฺสกฺกวจนมฺปิ ทิฏฺฐเมว โหติ. สมาเส สทฺทรูเป ทิฏฺเฐเยว พฺยาเส สทฺทรูปํ ยถาสมฺภวํ ทิฏฺฐเมว โหติ ฐเปตฺวา ‘‘เหตุสตฺถารทสฺสน’’นฺติอาทีนิ. ตตฺถ จ นิพฺพานวาจโก เจ, สพฺภิสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค สนฺติวิสุทฺธิ นิพฺพุติสทฺทา วิย, โส จ ยมกมหาเถรมเต รตฺตินเยน โยเชตพฺโพ. สพฺเพสมิการนฺติตฺถิลิงฺคานํ สาธารโณ หิ โส นโย. สุนฺทรตฺถวาจโก เจ, อคฺคิ รตฺติ อฏฺฐินเยหิ โยเชตพฺโพ วาจฺจลิงฺคตฺตา. ‘‘สพฺภิธมฺมภูตํ นิพฺพาน’’นฺติ เอตฺถ หิ สุนฺทรธมฺมภูตํ นิพฺพานนฺติ อตฺโถ. เอวํ ปาฬินยวเสน อาลปนาทีสุ ปญฺจสุ ฐาเนสุ สพฺภิสทฺทสฺส ปวตฺตึ ญตฺวา ปุน อฏฺฐกถานยวเสนปิ ตปฺปวตฺติ เวทิตพฺพา. กถํ? ยสฺมา สคาถาวคฺคสฺส อฏฺฐกถายํ ‘‘สนฺโต ‘สพฺภีหิ สทฺธึ สตํ ธมฺโม น ชรํ อุเปตี’ติ ปเวทยนฺตี’’ติ อิมสฺมึ ปเทเส ‘‘สพฺภีหี’’ติ หิวจนวเสน สทฺทรจนาวิเสโส อฏฺฐกถาจริเยหิ ทสฺสิโต, ตสฺมา สพฺภิสทฺโท สพฺเพสุปิ วิภตฺติวจเนสุ โยเชตพฺโพ. อตฺริทํ วทาม – यहाँ यह योजना है - 'भो सब्भि तिट्ठ' (हे सज्जन! ठहरें), 'सब्भि तिट्ठति' (सज्जन ठहरता है), 'सब्भि सह गच्छति' (सज्जन के साथ जाता है), 'सब्भि अपेहि' (सज्जन से दूर हो), 'असब्भिरूपो पुरिसो' (असाधु रूप वाला पुरुष)। चूँकि यह शासन के अनुकूल है, इसलिए इसकी अनुकूलता दिखाने के लिए, यहाँ तर्क से परे और विचित्र सुगत-पालि नय से, श्रोताओं की विशारद मति की प्राप्ति के लिए शासन से प्रयोग दिखाएंगे। वह कैसे? 'बहुम्पेतं असब्भि जातवेद...', 'सब्भि कुब्बेथ सन्थवं'। 'यं सालवनस्मिं सेनको, पापकम्ममकरि असब्भिरूपं'। 'आबाधोयं असब्भिरूपो'। 'असम्मोंदको थद्धो असब्भिरूपो'। वहाँ सम्बोधन वचन के देखे जाने पर पालि में प्रथमा विभक्ति का रूप साक्षात् न आने पर भी देखा हुआ ही माना जाता है। वैसे ही करण (तृतीया) विभक्ति के देखे जाने पर अपादान (पञ्चमी) विभक्ति भी देखी हुई ही होती है। समास के शब्द-रूप के देखे जाने पर विग्रह में शब्द-रूप यथासम्भव देखा हुआ ही होता है, 'हेतुसत्थारदस्सनं' आदि को छोड़कर। और वहाँ यदि 'सब्भि' शब्द निर्वाण का वाचक हो, तो वह 'सन्ति', 'विसुद्धि', 'निब्बुति' शब्दों की तरह स्त्रीलिंग होता है, और यमकमहाथेर के मत में उसे 'रत्ति' के नय के अनुसार प्रयुक्त करना चाहिए। क्योंकि वह सभी इकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों का साधारण नय है। यदि वह 'सुन्दर' अर्थ का वाचक हो, तो वाच्य के लिंग के अनुसार उसे 'अग्गि', 'रत्ति' और 'अट्ठि' के नयों के अनुसार प्रयुक्त करना चाहिए। 'सब्भिधम्मभूतं निब्बानं' यहाँ 'सुन्दर धर्म स्वरूप निर्वाण' यह अर्थ है। इस प्रकार पालि नय के अनुसार सम्बोधन आदि पाँच स्थानों में 'सब्भि' शब्द की प्रवृत्ति को जानकर पुनः अट्ठकथा के नय के अनुसार भी उसकी प्रवृत्ति जाननी चाहिए। कैसे? चूँकि सगाथवग्ग की अट्ठकथा में 'सन्तो सब्भीहि सद्धिं सतं धम्मो न जरं उपेतीति पवेदयन्ति' इस स्थान पर 'सब्भीहि' इस 'हि' वचन के रूप में शब्द रचना की विशेषता अट्ठकथाचार्यों द्वारा दिखाई गई है, इसलिए 'सब्भि' शब्द को सभी विभक्तियों में प्रयुक्त करना चाहिए। यहाँ हम यह कहते हैं - ครู ‘‘สพฺภีหิ สทฺธิ’’นฺติ, อตฺถํ ภาสึสุ ปาฬิยา; ยโต ตโต สพฺภิสทฺทํ, ธีโร สพฺพตฺถ โยชเย. गुरुओं ने पालि का अर्थ 'सब्भीहि सद्धिं' (सज्जनों के साथ) ऐसा कहा है; इसलिए धीर पुरुष को 'सब्भि' शब्द का प्रयोग सब जगह (सभी विभक्तियों में) करना चाहिए। ‘‘อสพฺภิรูโป’’อิติปิ, สมาสวิสเย สุตํ; ยสฺมา ตสฺมา สพฺภิสทฺทํ, วิญฺญู สพฺพธิ โยชเย. चूँकि 'असब्भिरूपो' ऐसा भी समास के विषय में सुना गया है, इसलिए विद्वान को 'सब्भि' शब्द का प्रयोग सब जगह करना चाहिए। ‘‘โอวเทยฺยานุสาเสยฺย[Pg.234], อสพฺภา จ นิวารเย’’ติ เอตฺถ ปน ‘‘อสพฺภา’’ติปทํ วิจิตฺรวุตฺตีสุ ตทฺธิตปจฺจเยสุ ณฺยปจฺจยวเสน นิปฺผตฺติมุปาคตนฺติ เวทิตพฺพํ. กถํ? เยภุยฺเยน อสพฺภีสุ ภวํ อสพฺภํ. กึ ตํ? อกุสลํ, ตโต อสพฺภา อกุสลธมฺมา นิวารเย จ, กุสลธมฺเม ปติฏฺฐเปยฺยาติ อตฺโถ. ‘‘อมฺเห อสพฺภาหิ วาจาหิ วิกฺโกสมานา ติพฺพาหิ สตฺตีหิ หนิสฺสนฺตี’’ติ เอตฺถ ตุ อสพฺภีนํ เอตาติ อสพฺภา, น วา สพฺภีนํ เอตาติปิ อสพฺภาติ นิพฺพจนํ, ณฺยปจฺจยวเสน จ ปทสิทฺธิ เวทิตพฺพา. ยา จ ปเนตฺถ อมฺเหหิ สนฺตสทฺทสฺส ‘‘สํ, สนฺโต. สํ, สนฺตํ, สนฺเต’’ติอาทินา ปทมาลา ทสฺสิตา, ตตฺถ ‘‘สเมติ อสตา อส’’นฺติ ปาฬิยํ ‘‘อส’’นฺติ ปเท ทิฏฺเฐเยว ‘‘ส’’นฺติ ปทํ ปาฬิยํ อนาคตมฺปิ ทิฏฺฐเมว โหติ ยุคฬภาเวน วิชฺชมานตารหตฺตา. เอวํ ทิฏฺเฐน อทิฏฺฐสฺส คหณํ เวทิตพฺพํ. อถ วา ‘‘อส’’นฺติ เอตฺถ น สํ อสนฺติ สมาสวิคฺคหวเสนาธิคนฺตพฺพตฺตา ‘‘ส’’มิติ ปทํ ทิฏฺฐเมว โหติ. เอวมญฺญตฺราปิ นโย. ตตฺร สนฺติ สปฺปุริโส. อสนฺติ อสปฺปุริโส. อิตฺถิลิงฺเควตฺตพฺเพ ‘‘อสตี, อสา’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. ‘‘อสตี, อสตี, อสติโย, อสา. อสตึ, อสตี, อสติโย. อสาย, อสติยา, อสตีหิ, อสตีภิ. อสติยา, อสตีน’’นฺติ วกฺขมาน อิตฺถินเยน นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. 'ओवदेय्यानुसासेय्य, असब्भा च निवारये' यहाँ 'असब्भा' यह पद विचित्र वृत्तियों में तद्धित प्रत्ययों में 'ण्य' प्रत्यय के द्वारा सिद्ध हुआ जानना चाहिए। कैसे? प्रायः 'असब्भियों (असाधुओं) में होने वाला' वह 'असब्भ' है। वह क्या है? अकुशल, इसलिए 'असब्भा' अर्थात् अकुशल धर्मों से निवारण करे और कुशल धर्मों में प्रतिष्ठित करे, यह अर्थ है। 'अम्हे असब्भाहि वाचाहि विक्कोसमाना तिब्बाहि सत्तीहि हनिस्सन्ति' यहाँ तो 'जो असब्भियों की हैं' वे 'असब्भा' हैं, अथवा 'जो सब्भियों की नहीं हैं' वे 'असब्भा' हैं - ऐसा निर्वचन है, और 'ण्य' प्रत्यय के द्वारा पद की सिद्धि जाननी चाहिए। और यहाँ हमारे द्वारा 'सन्त' शब्द की जो 'सं, सन्तो। सं, सन्तं, सन्ते' आदि पदमाला दिखाई गई है, वहाँ पालि में 'समेति असता असं' इस 'असं' पद के देखे जाने पर 'सं' पद पालि में न आने पर भी देखा हुआ ही माना जाता है, क्योंकि वे युगल के रूप में विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार देखे हुए से अनदेखे का ग्रहण जानना चाहिए। अथवा 'असं' यहाँ 'न सं असं' इस समास विग्रह के द्वारा प्राप्त होने के कारण 'सं' पद देखा हुआ ही है। इसी प्रकार अन्यत्र भी नय समझना चाहिए। वहाँ 'सन्ति' का अर्थ सत्पुरुष है। 'असन्ति' का अर्थ असत्पुरुष है। स्त्रीलिंग में कहे जाने पर 'असती', 'असा' ये रूप होते हैं। 'असती, असती, असतियो, असा। असतिं, असती, असतियो। असाय, असतिया, असतीहि, असतीभि। असतिया, असतीनं' - इस प्रकार आगे कहे जाने वाले स्त्रीलिंग नय के अनुसार नामिक पदमाला प्रयुक्त करनी चाहिए। เอตฺถ ปน ‘‘อสา โลกิตฺถิโย นาม, เวลา ตาสํ น วิชฺชติ. มา จ วสํ อสตีนํ นิคจฺเฉ’’ติอาทีนิ ทสฺเสตพฺพานิ. อสาติ เจตฺถ อสตีติ จ สมานตฺถา, อสนฺตชาติกาติ หิ เตสํ อตฺโถ. ยสฺมา ปน ชาตกฏฺฐกถายํ ‘‘อสาติ อสติโย ลามิกา, อถ วา สาตํ วุจฺจติ สุขํ, ตํ ตาสุ นตฺถิ, อตฺตนิ ปฏิพทฺธจิตฺตานํ อสาตเมว เทนฺตีติปิ อสา[Pg.235], ทุกฺขา, ทุกฺขวตฺถุภูตาติ อตฺโถ’’ติ อตฺถํ สํวณฺเณสุํ, ตสฺมา สาตํ นตฺถิ เอติสฺสนฺติ อสาติ อตฺเถ ‘‘อสา’’ติ ปทสฺส ยถา ริตฺโต อสฺสาโท เอตฺถาติ ริตฺตสฺสนฺติปทสฺส ลุตฺตุตฺตรกฺขรสฺส ‘‘ริตฺตสฺสํ, ริตฺตสฺสานิ. ริตฺตสฺส’’นฺติ จิตฺตนเยน นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา, ตถา ‘‘อสา, อสา, อสาโย. อสํ, อสา, อสาโย. อสายา’’ติ กญฺญานเยน โยเชตพฺพา. यहाँ "असा लोकित्थियो नाम, वेला तासं न विज्जति। मा च वसं असतीनं निगच्छे" (संसार में स्त्रियाँ 'असा' कहलाती हैं, उनकी कोई सीमा नहीं होती। उन असती स्त्रियों के वश में न हों) इत्यादि दिखाना चाहिए। यहाँ 'असा' और 'असती' समान अर्थ वाले हैं, क्योंकि उनका अर्थ 'असत-जाति वाली' (बुरे स्वभाव वाली) है। चूँकि जातक-अट्ठकथा में "असा अर्थात् असती, नीच; अथवा 'सात' सुख को कहते हैं, वह उनमें नहीं है, अपने में आसक्त चित्त वालों को वे 'असात' (दुःख) ही देती हैं, इसलिए वे 'असा' हैं, दुःखी हैं, दुःख का कारण हैं" ऐसा अर्थ वर्णित है, इसलिए 'जिसमें सुख (सात) नहीं है वह असा है' इस अर्थ में 'असा' शब्द की रूपमाला 'रित्तस्सं, रित्तस्सानि' की तरह या 'कञ्ञा' (कन्या) की तरह 'असा, असा, असायो' आदि जोड़नी चाहिए। เอตฺถ จ โย อมฺเหหิ ‘‘สนฺโต’’อิติ สทฺโท ทสฺสิโต. โส กตฺถจิ เอกวจนพหุวจนภาเวน สํวิชฺชมานสทฺทสฺสตฺถมฺปิ วทติ, ตสฺส วเสน อยํ นามิกปทมาลา – यहाँ हमारे द्वारा जो 'सन्तो' शब्द दिखाया गया है, वह कहीं एकवचन और बहुवचन के रूप में 'विद्यमान' (संविज्जमान) शब्द का अर्थ भी कहता है, उसके अनुसार यह नामिक पदमाला है - สนฺโต, สนฺโต, สนฺตา. สนฺตํ, สนฺเต. สตา, สนฺเตน, สนฺเตหิ, สนฺเตภิ. สโต, สนฺตสฺส, สตํ, สนฺตานํ. สตา, สนฺตา, สนฺตสฺมา, สนฺตมฺหา, สนฺเตหิ, สนฺเตภิ. สโต, สนฺตสฺส, สตํ, สนฺตานํ. สติ, สนฺเต, สนฺตสฺมึ, สนฺตมฺหิ, สนฺเตสุ. โภ สนฺต, ภวนฺโต สนฺโต, ภวนฺโต สนฺตา. सन्तो, सन्तो, सन्ता (प्रथमा)। सन्तं, सन्ते (द्वितीया)। सता, सन्तेन, सन्तेहि, सन्तेभि (तृतीया)। सतो, सन्तस्स, सतं, सन्तानं (चतुर्थी)। सता, सन्ता, सन्तस्मा, सन्तम्हा, सन्तेहि, सन्तेभि (पञ्चमी)। सतो, सन्तस्स, सतं, सन्तानं (षष्ठी)। सति, सन्ते, सन्तस्मिं, सन्तम्हि, सन्तेसु (सप्तमी)। भो सन्त, भवन्तो सन्तो, भवन्तो सन्ता (सम्बोधन)। เอตฺถ ปน ‘‘อยํ โข ภิกฺขเว อฏฺฐโม ภทฺโท อสฺสาชานีโย สนฺโต สํวิชฺชมาโน โลกสฺมึ. จตฺตาโรเม ภิกฺขเว ปุคฺคลา สนฺโต สํวิชฺชมานา โลกสฺมึ. อสตา ตุจฺฉา มุสา อภูเตน อพฺภาจิกฺขนฺติ. ภเว โข สติ ชาติ โหติ’’อิจฺเจวมาทีนิ ปโยคานิ ภวนฺติ. ‘‘สงฺขาเรสุ โข สติ วิญฺญาณํ โหตี’’ติอาทีสุ ปน สติสทฺโท วจนวิปลฺลาสวเสน ฐิโตติ คเหตพฺโพ. यहाँ "अयं खो भिक्खवे अट्ठमो भद्दो अस्साजानीयो सन्तो संविज्जमानो लोकस्मिं" (भिक्षुओं, यह आठवाँ भद्र श्रेष्ठ अश्व संसार में विद्यमान है), "चत्तारोमे भिक्खवे पुग्गला सन्तो संविज्जमाना लोकस्मिं" (भिक्षुओं, ये चार पुद्गल संसार में विद्यमान हैं), "असता तुच्छा मुसा अभूतेन अब्भाचिक्खन्ति" (असत्य, तुच्छ, मृषा और अभूत से दोषारोपण करते हैं), "भवे खो सति जाति होति" (भव होने पर जाति होती है) - इस प्रकार के प्रयोग होते हैं। "सङ्खारेसु खो सति विञ्ञाणं होती" इत्यादि में 'सति' शब्द वचन-विपर्यास (वचन के परिवर्तन) के कारण स्थित समझना चाहिए। ตตฺร เอกวจนพหุวจนวเสน ทฺวิธา ฐิเตสุ สนฺโตสทฺเทสุ พหุวจนสนฺโตสทฺทํ ฐเปตฺวา เสสา สมานสทฺทสฺสตฺถมฺปิ วทนฺติ, ตสฺมา ‘‘สนฺโตติ สมาโน, สนฺตาติ สมานา’’ติอาทินา [Pg.236] อตฺโถ กเถตพฺโพ. สมาโนติ อิมสฺส จ ‘‘โหนฺโต’’ติ อตฺโถ ‘‘ปหุ สมาโน วิปุลตฺถจินฺตี, กึ การณา เม น กโรสิ ทุกฺข’’นฺติอาทีสุ วิย. ปโยคานิ ปน – वहाँ एकवचन और बहुवचन के रूप में दो प्रकार से स्थित 'सन्तो' शब्दों में से बहुवचन 'सन्तो' शब्द को छोड़कर शेष 'समान' (होते हुए) शब्द का अर्थ भी कहते हैं, इसलिए "सन्तो अर्थात् समान (होता हुआ), सन्ता अर्थात् समाना (होते हुए)" इत्यादि अर्थ कहना चाहिए। 'समानो' का अर्थ 'होन्तो' (होता हुआ) है, जैसे "पहु समानो विपुुलत्थचिन्ती, किं कारणा मे ना करोसि दुक्खं" (समर्थ होते हुए भी विशाल अर्थ का चिन्तक, किस कारण से मेरा दुःख दूर नहीं करते) इत्यादि में। प्रयोग इस प्रकार हैं - ‘‘โย มาตรํ ปิตรํ วา, ชิณฺณกํ คตโยพฺพนํ; ปหุ สนฺโต น ภรติ, ตํ ปราภวโต มุขํ. "जो अपनी वृद्ध और ढलती उम्र वाली माता या पिता का, समर्थ होते हुए (पहु सन्तो) भी भरण-पोषण नहीं करता, वह पराभव (पतन) का मुख है।" อิเธว ติฏฺฐมานสฺส, เทวภูตสฺส เม สโต; ปุนรายุ จ เม ลทฺโธ, เอวํ ชานาหิ มาริสา’’ติ "यहीं स्थित, देव बने हुए मुझ (सतो) को पुनः आयु प्राप्त हुई है, हे मारिष! ऐसा जानो।" เอวมาทีนิ ภวนฺติ. इस प्रकार के (प्रयोग) होते हैं। อปิจ สนฺโตสทฺโท ยสฺมา ‘‘กิลนฺโต’’ติ จ ‘‘อุปสนฺโต’’ติ จ ‘‘นิรุทฺโธ’’ติ จ อตฺถํ วทติ, ตสฺมา เตสํ วเสน สนฺตสทฺทสฺส ‘‘สนฺโต, สนฺตา. สนฺตํ, สนฺเต. สนฺเตนา’’ติ ปุริสนเยน นามิกปทมาลา เวทิตพฺพา. เอตฺถ จ ‘‘สนฺโต ตสิโต. ทีฆํ สนฺตสฺส โยชนํ. สนฺโต ทนฺโต นิยโต พฺรหฺมจารี. สนฺโต นิรุทฺโธ อตฺถงฺคโต อพฺภตฺถงฺคโต’’ติอาทีนิ ปโยคานิ. นปุํสกลิงฺเค วตฺตพฺเพ ‘‘สนฺตํ, สนฺตานี’’ติ จิตฺตนเยน นามิกปทมาลา. สา จ ‘‘สํวิชฺชมานํ สมานํ กิลนฺตํ อุปสนฺตํ นิรุทฺธ’’มิติ อตฺถทีปกาปทวตีติ เวทิตพฺพา. อถ วา ‘‘อุปาทาเน โข สติ ภโว โหตี’’ติอาทีสุ นปุํสกปฺปโยคทสฺสนโต สนฺตสทฺทสฺส สํวิชฺชมานสทฺทตฺถวาจกตฺเต ตติยาปญฺจมีจตุตฺถีฉฏฺฐีสตฺตมีฐาเน ‘‘สตา, สโต, สตํ, สตี’’ติ ปทานิ อธิกานิ วตฺตพฺพานิ, เสสานิ จิตฺตนเยน เญยฺยานิ. อิตฺถิลิงฺเค ปน วตฺตพฺเพ ‘‘สนฺตา, สนฺตา, สนฺตาโย. สนฺตํ, สนฺตา, สนฺตาโย. สนฺตายา’’ติ กญฺญานเยน จ, สนฺตี, สนฺตี, สนฺติโย[Pg.237]. สนฺตึ, สนฺตี, สนฺติโย. สนฺติยา’’ติ อิตฺถินเยน จ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. เอตาสุ ปฐมา ‘‘สํวิชฺชมานา กิลนฺตา อุปสนฺตา นิรุทฺธา’’ติ อตฺถทีปกาปทวตี, เอตฺถ ปโยคา สุวิญฺเญยฺยาว. ทุติยา ปน ‘‘สํวิชฺชมานา สมานา’’ติ อตฺถทีปกาปทวตี. ตถา หิ ‘‘สนฺตี อาปตฺติ อาวิกาตพฺพา’’ติ เอตฺถ สํวิชฺชมานา ‘‘สนฺตี’’ติ วุจฺจติ. इसके अतिरिक्त 'सन्तो' शब्द चूँकि 'थका हुआ' (किलन्तो), 'उपशान्त' (उपसन्तो) और 'निरुद्ध' (निरुद्धो) अर्थ भी कहता है, इसलिए उनके अनुसार 'सन्त' शब्द की 'सन्तो, सन्ता। सन्तं, सन्ते। सन्तेन' इत्यादि 'पुरिस' (पुरुष) के समान नामिक पदमाला जाननी चाहिए। यहाँ "सन्तो तसितो" (थका हुआ और प्यासा), "दीघं सन्तस्स योजनं" (थके हुए के लिए योजन लम्बा होता है), "सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी" (शान्त, दान्त, नियत और ब्रह्मचारी), "सन्तो निरुद्धो अत्थङ्गतो अब्भत्थङ्गतो" (शान्त, निरुद्ध, अस्त हुआ, पूर्णतः अस्त हुआ) इत्यादि प्रयोग हैं। नपुंसक लिंग में 'सन्तं, सन्तानि' इस प्रकार 'चित्त' के समान पदमाला होगी। वह 'विद्यमान, समान, थका हुआ, उपशान्त, निरुद्ध' अर्थ को प्रकट करने वाले पदों वाली जाननी चाहिए। अथवा "उपादाने खो सति भवो होति" इत्यादि में नपुंसक प्रयोग देखे जाने के कारण, 'सन्त' शब्द के 'विद्यमान' अर्थ का वाचक होने पर तृतीया, पञ्चमी, चतुर्थी, षष्ठी और सप्तमी के स्थान पर 'सता, सतो, सतं, सति' ये पद अधिक कहने चाहिए, शेष 'चित्त' के समान समझने चाहिए। स्त्रीलिंग में 'सन्ता, सन्ता, सन्तायो। सन्तं, सन्ता, सन्तायो। सन्ताया' इत्यादि 'कञ्ञा' (कन्या) के समान और 'सन्ती, सन्ती, सन्तियो। सन्तिं, सन्ती, सन्तियो। सन्तिया' इत्यादि 'इत्थी' (स्त्री) के समान पदमाला जोड़नी चाहिए। इनमें से पहली 'विद्यमान, थकी हुई, उपशान्त, निरुद्ध' अर्थ को प्रकट करने वाली है, यहाँ प्रयोग सुविज्ञ (आसानी से समझने योग्य) ही हैं। दूसरी 'विद्यमान, समान' अर्थ को प्रकट करने वाली है। जैसे "सन्ती आपत्ति आविकातब्बा" (विद्यमान आपत्ति को प्रकट करना चाहिए) यहाँ विद्यमान को 'सन्ती' कहा गया है। ‘‘ยาย มาตุ ภโต โปโส,อิมํ โลกํ อเวกฺขติ; ตมฺปิ ปาณททึ สนฺตึ,หนฺติ กุทฺโธ ปุถุชฺชโน’’ติ "जिस माता द्वारा पालित पुरुष इस लोक को देखता है, उस प्राण देने वाली शान्त (या विद्यमान/समान) माता को भी क्रुद्ध पृथग्जन मार देता है।" เอตฺถ ปน สมานา ‘‘สนฺตี’’ติ วุจฺจติ. อปราปิ อิตฺถิลิงฺเค วตฺตพฺเพ ปทมาลา เวทิตพฺพา. สนฺตีสทฺทสฺส หิ สํวิชฺชมานสทฺทตฺถวาจกตฺเต ‘‘ชาติยา โข สติ ชรามรณํ โหตี’’ติอาทินา อิตฺถิลิงฺคปฺปโยคทสฺสนโต สตฺตมีฐาเน ‘‘สติ, สติยา, สติยํ, สนฺติยา, สนฺติยํ, สนฺตีสู’’ติ รูปานิ วตฺตพฺพานิ. เสสานิ อิตฺถินเยน เญยฺยานิ. อยํ ตติยา, เอตฺถ จ ‘‘อสนฺติยา อาปตฺติยา ตุณฺหี ภวิตพฺพ’’นฺติ ปาฬิ ‘‘สนฺติยา’’อิจฺจาทีนํ อตฺถิภาเว นิทสฺสนํ. อปโร นโย – สตีสทฺทสฺส ‘‘สมานา’’ติ อิมสฺมึ อตฺเถ ‘‘ยา ตฺวํ วสสิ ชิณฺณสฺส, เอวํ ทหริยา สตี’’ติ จ ‘‘เย ตํ ชิณฺณสฺส ปาทํสุ, เอวํ ทหริยํ สติ’’นฺติ จ ปาฬิทสฺสนโต ‘‘สตี, สตี, สติโย. สตึ, สตี, สติโย. สติยา’’ติอาทีนิปิ รูปานิ โยเชตพฺพานิ, สํโยเค นการโลปวเสน วา. यहाँ 'समाना' (होती हुई) को 'सन्ती' कहा गया है। स्त्रीलिंग में एक और पदमाला जाननी चाहिए। 'सन्ती' शब्द के 'विद्यमान' अर्थ का वाचक होने पर "जातिया खो सति जरामरणं होति" (जाति होने पर जरामरण होता है) इत्यादि स्त्रीलिंग प्रयोग देखे जाने के कारण सप्तमी के स्थान पर 'सति, सतिया, सतियं, सन्तिया, सन्तियं, सन्तीसु' ये रूप कहने चाहिए। शेष 'इत्थी' के समान समझने चाहिए। यह तीसरी (रीति) है, और यहाँ "असन्तिया आपत्तिया तुम्ही भवितब्बं" (आपत्ति के न होने पर मौन रहना चाहिए) यह पालि 'सन्तिया' आदि के अस्तित्व भाव का उदाहरण है। दूसरा तरीका - 'सती' शब्द के 'समाना' (होती हुई) इस अर्थ में "या त्वं वससि जिण्णस्स, एवं दहरिया सती" (जो तुम वृद्ध के पास रहती हो, इस प्रकार युवती होती हुई) और "ये तं जिण्णस्स पादंसु, एवं दहरियं सतिं" (जिन्होंने तुम्हें वृद्ध को दिया, इस प्रकार युवती होती हुई को) - इन पालि प्रयोगों को देखने से 'सती, सती, सतियो। सतिं, सती, सतियो। सतिया' इत्यादि रूप भी जोड़ने चाहिए, अथवा संयोग में 'न' कार के लोप के कारण (ये रूप बनते हैं)। อิทานิ ‘‘สนฺโต, สนฺตา’’ติ ปททฺวยสฺส ปโยคนิจฺฉยํ กถยาม ปโยเคสุ โสตูนํ อสมฺมูฬฺหภาวาย. ตถา หิ ‘‘สปฺปุริสา’’ติ วา ‘‘ปณฺฑิตา’’ติ วา พหุวจนวเสน อตฺถํ [Pg.238] วตฺตุกาเมน ‘‘สนฺโต ทนฺโต’’ติ เอวํ วุตฺตเอกวจนสทิสํ ‘‘สนฺโต’’ติ พหุวจนํ วตฺตพฺพํ. ‘‘สํวิชฺชมาโน’’ติ เอกวจนวเสน อตฺถํ วตฺตุกาเมน ‘‘สนฺโต’’ติ เอกวจนํ วตฺตพฺพํ. ‘‘สํวิชฺชมานา’’ติ พหุวจนวเสน อตฺถํ วตฺตุกาเมน ‘‘สนฺโต สปฺปุริสา’’ติ, ‘‘สนฺโต สํวิชฺชมานา’’ติ จ เอวํ วุตฺตพหุวจนสทิสํ ‘‘สนฺโต’’ติ วา ‘‘สนฺตา’’ติ วา พหุวจนํ วตฺตพฺพํ, ‘‘กิลนฺโต’’ติ วา ‘‘สมาโน’’ติ วา ‘‘อุปสนฺโต’’ติ วา ‘‘นิรุทฺโธ’’ติ วา เอกวจนวเสน อตฺถํ วตฺตุกาเมน ‘‘สนฺโต สปฺปุริสา’’ติ เอวํ วุตฺตพหุวจนสทิสํ ‘‘สนฺโต’’ติ เอกวจนํ วตฺตพฺพํ. เตเยวตฺเถ พหุวจนวเสน วตฺตุกาเมน ปน ‘‘สนฺตา สูเนหิ ปาเทหิ, โก เน หตฺเถ คเหสฺสตี’’ติ เอตฺถ วิย ‘‘สนฺตา’’ติ พหุวจนํ วตฺตพฺพํ. อยํ นีติ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพา. อิทญฺหิ มนฺทพุทฺธีนํ สมฺโมหฏฺฐานํ. อยมฺปิ ปเนตฺถ สงฺคโห เวทิตพฺโพ – अब हम 'सन्तो, सन्ता' इन दो पदों के प्रयोग का निश्चय प्रयोगों में श्रोताओं के भ्रमरहित होने के लिए कहते हैं। जैसे 'सप्पुरिसा' (सत्पुरुष) या 'पण्डिता' (पण्डित) के बहुवचन के अर्थ को कहने की इच्छा से 'सन्तो दन्तो' इस प्रकार कहे गए एकवचन के समान 'सन्तो' यह बहुवचन कहना चाहिए। 'संविज्जमानो' (विद्यमान) इस एकवचन के अर्थ को कहने की इच्छा से 'सन्तो' यह एकवचन कहना चाहिए। 'संविज्जमाना' (विद्यमान) इस बहुवचन के अर्थ को कहने की इच्छा से 'सन्तो सप्पुरिसा' और 'सन्तो संविज्जमाना' इस प्रकार कहे गए बहुवचन के समान 'सन्तो' या 'सन्ता' यह बहुवचन कहना चाहिए। 'किलन्तो' (थका हुआ) या 'समानो' (होता हुआ) या 'उपसन्तो' (शान्त) या 'निरुद्धो' (निरुद्ध) इस एकवचन के अर्थ को कहने की इच्छा से 'सन्तो सप्पुरिसा' इस प्रकार कहे गए बहुवचन के समान 'सन्तो' यह एकवचन कहना चाहिए। उसी अर्थ में बहुवचन के रूप में कहने की इच्छा होने पर 'सन्ता सूनेहि पादेहि, को ने हत्थे गहेस्सति' यहाँ की तरह 'सन्ता' यह बहुवचन कहना चाहिए। इस नीति को अच्छी तरह मन में धारण करना चाहिए। क्योंकि यह मन्दबुद्धि वालों के लिए सम्मोह (भ्रम) का स्थान है। यहाँ यह संग्रह भी जानना चाहिए - ‘‘ติลิงฺคตฺเถ จ เอกตฺเถ, พวฺหตฺเถปิ จ ทิสฺสติ; สตฺตมฺยนฺโต สติสทฺโท, วิปลฺลาเส พหุมฺหิ โส’’ติ. 'सति' शब्द तीनों लिंगों में, एकवचन में और बहुवचन में भी देखा जाता है; वह सप्तमी विभक्ति वाला 'सति' शब्द विपर्यास (विभिन्न अर्थों) में बहुत प्रकार से प्रयुक्त होता है। อิทานิ มหนฺตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'महन्त' शब्द की नामिक पदमाला (रूप-रचना) कही जाती है - มหํ, มหา, มหนฺโต, มหนฺตา. มหนฺตํ, มหนฺเต. มหตา, มหนฺเตน, มหนฺเตหิ, มหนฺเตภิ. มหโต, มหนฺตสฺส, มหนฺตานํ, มหตํ. มหตา, มหนฺตา, มหนฺตสฺมา, มหนฺตมฺหา, มหนฺเตหิ, มหนฺเตภิ. มหโต, มหนฺตสฺส, มหนฺตานํ, มหตํ. มหติ, มหนฺเต, มหนฺตสฺมึ, มหนฺตมฺหิ, มหนฺเตสุ. โภ มห, โภ มหา, ภวนฺโต มหนฺโตติ อยมมฺหากํ รุจิ. महं, महा, महन्तो, महन्ता। महन्तं, महन्ते। महता, महन्तेन, महन्तेहि, महन्तेभि। महतो, महन्तस्स, महन्तानं, महतं। महता, महन्ता, महन्तस्मा, महन्तम्हा, महन्तेहि, महन्तेभि। महतो, महन्तस्स, महन्तानं, महतं। महति, महन्ते, महन्तस्मिं, महन्तम्हि, महन्तेसु। भो मह, भो महा, भवन्तो महन्तो - यह हमारी रुचि (अभिमत) है। เอตฺถ ‘‘มหนฺโต, มหนฺตา. มหนฺตํ, มหนฺเต. มหนฺเตนา’’ติ ปุริสนโยปิ ลพฺภติ, ตสฺมา ‘‘โภ มหนฺต, ภวนฺโต มหนฺตา’’ติ อาลปนปทานิ โยเชตพฺพานิ. นปุํสกลิงฺเค วตฺตพฺเพ [Pg.239] ‘‘มหนฺตํ, มหนฺตานี’’ติ จิตฺตนโยปิ ลพฺภติ. อิตฺถิลิงฺเค วตฺตพฺเพ ‘‘มหตี, มหตี, มหติโย. มหตึ, มหตี, มหติโย. มหติยา, มหตีหิ มหตีภี’’ติ อิตฺถินโยปิ ลพฺภติ. ‘‘มหติยา จ ยกฺขเสนายา’’ติอาทีเนตฺถ นิทสฺสนปทานิ. อปโรปิ ‘‘มหนฺตา, มหนฺตา, มหนฺตาโย. มหนฺต’’นฺติ กญฺญานโยปิ ลพฺภติ, ‘‘มหนฺตา นิธิกุมฺภิโย’’ติอาทีเนตฺถ นิทสฺสนปทานิ. กจฺจายเน ปน ‘‘มหนฺตี’’อิติ ปทํ ทิฏฺฐํ. ตํ ‘‘คุณวนฺตี, กุลวนฺตี’’อิจฺจาทีนิ วิย ปาฬิยํ อปฺปสิทฺธตฺตา วีมํสิตพฺพํ. यहाँ 'महन्तो, महन्ता। महन्तं, महन्ते। महन्तेन' आदि पुरुष-नय (पुल्लिंग) भी प्राप्त होता है, इसलिए 'भो महन्त, भवन्तो महन्ता' ये सम्बोधन पद जोड़ने चाहिए। नपुंसक लिंग में कहने पर 'महन्तं, महन्तानि' आदि चित्त-नय (नपुंसक लिंग) भी प्राप्त होता है। स्त्रीलिंग में कहने पर 'महती, महती, महतियो। महतिं, महती, महतियो। महतिया, महतीहि महतीभि' आदि स्त्री-नय (स्त्रीलिंग) भी प्राप्त होता है। 'महतिया च यक्खसेनाया' आदि यहाँ उदाहरण पद हैं। दूसरा 'महन्ता, महन्ता, महन्तायो। महन्तं' आदि कन्या-नय भी प्राप्त होता है, 'महन्ता निधिकुम्भियो' आदि यहाँ उदाहरण पद हैं। कच्चायन में तो 'महन्ती' यह पद देखा गया है। वह 'गुणवन्ती, कुलवन्ती' आदि के समान पालि में प्रयोग न होने के कारण विचारणीय है। นนุ โภ ยสฺมา สาสเนปิ ‘‘คจฺฉนฺตี, จรนฺตี’’ติอาทีนิ จ ‘‘อิทฺธิมนฺตี’’ติ จ ปทํ ทิสฺสติ, ตสฺมา ‘‘มหนฺตี, คุณวนฺตี’’ติอาทีนิปิ ภวิตพฺพนฺติ? น ภวิตพฺพํ ตถารูปสฺส นยสฺส วเสน อคฺคเหตพฺพตฺตา, ‘‘มหตี, คุณวตี’’อิจฺจาทินยสฺเสว ทสฺสนโต จ. ตถา หิ ปาฬิยํ อฏฺฐกถาสุ จ ‘‘เสยฺยถาปิ นาม มหตี นงฺคลสีสา, อิตฺถี สิยา รูปวตี, สา จ สีลวตี สิยา. สติมตี จกฺขุมตี. อิทฺธิมตี ปตฺติมตี’’ติ จ ‘‘มหตึ เสนํ ทิสฺวา มโหสธเสนา มนฺทา, อยํ อติวิย มหตี เสนา ทิสฺสตี’’ติ จ อาทีนิ ปโยคานิ ทิสฺสนฺติ, น ‘‘มหนฺตี, รูปวนฺตี’’อิจฺจาทีนิ. हे महानुभाव! चूँकि शासन में भी 'गच्छन्ती, चरन्ती' आदि और 'इद्धिमन्ती' पद देखे जाते हैं, तो क्या 'महन्ती, गुणवन्ती' आदि भी होने चाहिए? नहीं होने चाहिए, क्योंकि उस प्रकार के नियम के अनुसार उन्हें ग्रहण नहीं किया गया है, और 'महती, गुणवती' आदि नियम ही देखे जाते हैं। जैसे पालि और अट्ठकथाओं में 'सेय्यथापि नाम महती नङ्गलसीसा, इत्थी सिया रूपवती, सा च सीलवती सिया। सतिमती चक्खुमती। इद्धिमती पत्तिमती' और 'महतिं सेनं दिस्वा महोसधसेना मन्दा, अयं अतिविय महती सेना दिस्सति' आदि प्रयोग देखे जाते हैं, न कि 'महन्ती, रूपवन्ती' आदि। เกจิ ปน ‘‘มหาอิติ สทฺโท พฺยาเส น ลพฺภติ, สมาเสเยว ลพฺภติ ‘มหาปุริโส’ติ เอตฺถ วิยา’’ติ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ. ‘‘มหา เต อุปาสก ปริจฺจาโค. มหา วตายํ ภนฺเต ภูมิจาโล. โฆโส จ วิปุโล มหา. พาราณสิรชฺชํ นาม มหา. เสนา สาทิสฺสเต มหา’’ติ ปโยคทสฺสนโต. เอวํ พฺยาเสปิ ลพฺภตีติ [Pg.240] เวทิตพฺพํ, ตสฺมา ‘‘มหํ, มหา, มหนฺโต, มหนฺตา. โภ มหนฺต, ภวนฺโต มหนฺตา’’ติ ปุลฺลิงฺเค, ‘‘มหนฺตํ, มหา, มหนฺตานิ. โภ มหนฺต, ภวนฺโต มหนฺตานี’’ติ นปุํสกลิงฺเค, ‘‘มหนฺตา, มหา, มหนฺตา, มหนฺตาโย. โภติ มหนฺเต, โภติโย มหนฺตา, มหนฺตาโย’’ติ อิตฺถิลิงฺเค สพฺพํ สมฺปุณฺณํ โยเชตพฺพํ. สมาเส ปน ‘‘มหาสตฺโต มหาอุปาสโก มหาอุปาสิกา มหพฺพโล มหาวนํ มหคฺคตํ มหปฺผลํ มหพฺภย’’นฺติอาทีนิ รูปานิ ภวนฺติ, ตทฺธิเต ‘‘มหตฺตโน มหตฺตํ มหนฺตตฺตํ มหนฺตตา’’ติ รูปานิ ภวนฺติ. คจฺฉนฺตสทฺทสฺส ปน ‘‘คจฺฉนฺโต คจฺฉนฺตา’’ติ รูปานิ วตฺวา เสสานิ มหนฺตสทฺเท วุตฺตนเยน วิตฺถาเรตฺวา นามิกปทมาลา เวทิตพฺพา. ตถา ‘‘คจฺฉนฺโต, คจฺฉนฺตา’’ติ ปุริสนโย จ ‘‘คจฺฉนฺตํ, คจฺฉนฺตานี’’ติ จิตฺตนโย จ ‘‘คจฺฉนฺตี, คจฺฉนฺตี, คจฺฉนฺติโย’’ติ อิตฺถินโย จ คเหตพฺโพ. เอวํ ลิงฺคตฺตยวเสน ‘‘จรํ จรนฺโต จรนฺตํ จรนฺตี, ททํ ททนฺโต ททนฺตํ ททนฺตี’’ติอาทีนํ อเนกปทสหสฺสานํ นามิกปทมาลา วิตฺถาเรตพฺพา. किन्तु कुछ लोग कहते हैं कि 'महा' यह शब्द व्यास (अकेले) में नहीं मिलता, केवल समास में ही मिलता है जैसे 'महापुरिसो' यहाँ, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि 'महा ते उपासक परिच्चागो। महा वतायं भन्ते भूमिचालो। घोसो च विपुलो महा। बाराणसिरज्जं नाम महा। सेना सादिस्सते महा' आदि प्रयोग देखे जाते हैं। इस प्रकार व्यास में भी प्राप्त होता है, ऐसा जानना चाहिए। इसलिए 'महं, महा, महन्तो, महन्ता। भो महन्त, भवन्तो महन्ता' पुल्लिंग में; 'महन्तं, महा, महन्तानि। भो महन्त, भवन्तो महन्तानि' नपुंसक लिंग में; 'महन्ता, महा, महन्ता, महन्तायो। भोति महन्ते, भोतियो महन्ता, महन्तायो' स्त्रीलिंग में - यह सब पूर्ण रूप से जोड़ना चाहिए। समास में तो 'महासत्तो, महाउपासको, महाउपासिका, महब्बलो, महावनं, महग्गतं, महप्फलं, महब्भयं' आदि रूप होते हैं। तद्धित में 'महत्तनो, महत्तं, महन्तत्तं, महन्तता' रूप होते हैं। 'गच्छन्त' शब्द के तो 'गच्छन्तो, गच्छन्ता' रूप कहकर शेष 'महन्त' शब्द में कही गई विधि के अनुसार विस्तार से नामिक पदमाला जाननी चाहिए। वैसे ही 'गच्छन्तो, गच्छन्ता' यह पुरुष-नय और 'गच्छन्तं, गच्छन्तानि' यह चित्त-नय और 'गच्छन्ती, गच्छन्ती, गच्छन्तियो' यह स्त्री-नय ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार तीनों लिंगों के अनुसार 'चरं चरन्तो चरन्तं चरन्ती, ददं ददन्तो ददन्तं ददन्ती' आदि अनेक सहस्र पदों की नामिक पदमाला का विस्तार करना चाहिए। เย ปนาจริยา ‘‘คจฺฉนฺโต’’ติอาทีนํ ปจฺจตฺตาลปนพหุวจนตฺตญฺจ ‘‘คจฺฉํ’’อิจฺจาทีนํ อาลปเนกวจนตฺตญฺจ อิจฺฉนฺติ, เต สมมฺเหหิ ปโยโค สาสเน น ทิฏฺโฐ นยวเสนาคเหตพฺพตฺตา. ตสฺมา ตานิ เอตฺถ น วทาม. อยํ ปน วิเสโส ทิฏฺโฐ. เสยฺยถิทํ? जो आचार्य 'गच्छन्तो' आदि का प्रथमा और सम्बोधन बहुवचन होना और 'गच्छं' आदि का सम्बोधन एकवचन होना स्वीकार करते हैं, वे हमारे द्वारा (स्वीकार्य नहीं हैं क्योंकि) शासन में ऐसा प्रयोग नहीं देखा गया है और नय के अनुसार ग्रहण करने योग्य नहीं होने के कारण। इसलिए, हम उन्हें यहाँ नहीं कहते हैं। लेकिन यह विशेषता देखी गई है। वह क्या है? ‘‘คจฺฉํ วิธม’’มิจฺจาทิ-ปทานิ มุนิสาสเน; กตฺถจาขฺยาติกา โหนฺติ, กตฺถจิ ปน นามิกา. मुनि के शासन (बुद्ध वचन) में 'गच्छं', 'विधमं' आदि पद कहीं आख्यात (क्रिया) होते हैं और कहीं नामिक (संज्ञा/विशेषण) होते हैं। ‘‘ตสฺสาหํ สนฺติเก คจฺฉํ,โส เม สตฺถา ภวิสฺสติ; วิธมํ เทว เต รฏฺฐํ,ปุตฺโต เวสฺสนฺตโร ตว. "मैं उसके पास जाऊँगा (गच्छं), वह मेरा शास्ता होगा; हे देव! आपका पुत्र वेस्सन्तर आपके राष्ट्र को विनष्ट (विधमं) कर रहा है।" อธมฺมํ [Pg.241] สารถิ กยิรา, มญฺเจ ตฺวํ นิกฺขนํ วเน’’; อิจฺเจวมาทโย เญยฺยา, ปโยคา เอตฺถ ธีมตา. "सारथि अधर्म करे, यदि तुम मुझे वन में गाड़ दो (निक्खनं)"; इस प्रकार के प्रयोगों को यहाँ बुद्धिमानों द्वारा जानना चाहिए। ‘‘คจฺฉิสฺสามิ วิธมี’’ติ-อาทินา ชินสาสเน; นานากาลปุริสานํ, วเสนตฺถํ วเท วิทู. जिन-शासन में 'गच्छिस्सामि' (जाऊँगा), 'विधमि' (नष्ट किया) आदि के द्वारा विद्वान विभिन्न कालों और पुरुषों के अनुसार अर्थ कहें। นามตฺเต ปน ‘‘คจฺฉนฺโต, วิธมนฺโต’’ติอาทินา; ‘‘คจฺฉ’’มิจฺเจวมาทีน-มตฺถมตฺถวิทู วเท. नाम (संज्ञा/विशेषण) होने पर, अर्थ के ज्ञाता 'गच्छन्तो', 'विधमन्तो' आदि के द्वारा 'गच्छं' आदि पदों का अर्थ कहें। อิทานิ สมคติกตฺเตปิ ‘‘ชานํ, ปสฺส’’นฺติอาทีนํ ลิงฺควิภตฺติวจนนฺตรวเสน โย วิเสโส ทิสฺสติ, ตํ วทาม. ตถา หิ ‘‘สา ชานํเยว อาห น ชานามีติ, ปสฺสํเยว อาห น ปสฺสามี’’ติ เอวมาทีสุ ชานํ ปสฺสํ สทฺทานํ ‘‘ชานนฺตี ปสฺสนฺตี’’ติ ลิงฺคนฺตรวเสน ปริวตฺตนํ ภวตีติ ทฏฺฐพฺพํ. อิมินา ‘‘คจฺฉํ’’อิติ สทฺทสฺสปิ ยถาปโยคํ ‘‘คจฺฉนฺตี’’ติ อิตฺถิยา กถนตฺโถ ลพฺภติ เตหิ สมานคติกตฺตา, น ‘‘คจฺฉนฺโต’’ติ สทฺทสฺส ‘‘คจฺฉนฺตี’’ติ อิตฺถิยา กถนตฺโถ ลพฺภติ เตหิ อสมานคติกตฺตาติ การณํ ทสฺสิตํ โหติ. ‘‘อปิ นุ ตุมฺเห อายสฺมนฺโต เอกนฺตสุขํ โลกํ ชานํ ปสฺสํ วิหรถา’’ติ เอตฺถ ‘‘ชานนฺตา ปสฺสนฺตา’’ติ วจนนฺตรวเสน ปริวตฺตนํ ภวตีติ ทฏฺฐพฺพํ. อิมินา ปน ‘‘คจฺฉํ’’อิติ สทฺทสฺสปิ ยถาปโยคํ ‘‘คจฺฉนฺตา’’ติ พหุวจนตฺโถ ลพฺภติ เตหิ สมานคติกตฺตา, น ‘‘คจฺฉนฺเต’’ติ สทฺทสฺส ‘‘คจฺฉนฺตา’’ติ พหุวจนตฺโถ ลพฺภติ เตหิ อสมานคติกตฺตาติ การณํ ทสฺสิตํ โหติ. เอส นโย อุตฺตรตฺราปิ. ‘‘ภรนฺติ มาตาปิตโร, ปุพฺเพ กตมนุสฺสร’’นฺติ เอตฺถ อนุสฺสรํสทฺทสฺส ‘‘อนุสฺสรนฺตา’’ติ วจนนฺตรวเสน ปริวตฺตนํ ภวติ. ‘‘สทฺธมฺโม ครุกาตพฺโพ, สรํ พุทฺธาน สาสน’’นฺติ เอตฺถ สรํสทฺทสฺส สรนฺเตนาติ วิภตฺตนฺตรวเสน ปริวตฺตนํ ภวติ. ‘‘ผุสํ ภูตานิ สณฺฐานํ, มนสา คณฺหโต [Pg.242] ยถา’’ติ เอตฺถ ผุสํสทฺทสฺสปิ ‘‘ผุสนฺตสฺสา’’ติ วิภตฺตนฺตรวเสน ปริวตฺตนํ ภวติ. ตถา ‘‘ยาจํ อททมปฺปิโย’’ติ เอตฺถาปิ ยาจํสทฺทสฺส ‘‘ยาจนฺตสฺสา’’ติ วิภตฺตนฺตรวเสน ปริวตฺตนํ ภวติ. ยาจนฺติ วา ยาจิตพฺพํ ธนํ, อิมินา นเยน นานปฺปการโต ปริวตฺตนํ เวทิตพฺพํ. อิติ ‘‘ภวํกร’’นฺติอาทีนํ วิสทิสปทมาลา จ ‘‘คจฺฉํ, จร’’นฺติอาทีนํ สทิสปทมาลา จ ‘‘ชานํ, ปสฺส’’นฺติอาทีนํ ลิงฺควิภตฺติวจนนฺตรวเสน กตฺถจิ ปริวตฺตนนฺติ อยํ ติวิโธปิ อากาโร อาขฺยาติกปทตฺถวิภาวนาย สทฺธึ กถิโต ปาวจนวเร โสตูนํ สทฺเทสฺวตฺเถสุ จ วิสารทพุทฺธิปฏิลาภตฺถํ. สพฺพเมตญฺหิ สนฺธาย อิมา คาถา วุตฺตา – अब, समान गति (अर्थ) होने पर भी 'जानं', 'पस्सं' आदि में लिंग, विभक्ति और वचन के भेद से जो विशेषता देखी जाती है, उसे हम कहते हैं। जैसे कि "सा जानंयेव आह न जानामीति, पस्संयेव आह न पस्सामीति" (वह जानते हुए भी बोली कि मैं नहीं जानती, देखते हुए भी बोली कि मैं नहीं देखती) - यहाँ 'जानं' और 'पस्सं' शब्दों का 'जानन्ती' और 'पस्सन्ती' के रूप में लिंग-परिवर्तन होता है, ऐसा समझना चाहिए। इससे यह कारण दिखाया गया है कि 'गच्छं' शब्द का भी प्रयोग के अनुसार 'गच्छन्ती' स्त्री-लिंग में कहने का अर्थ प्राप्त होता है क्योंकि वे समान गति वाले हैं, न कि 'गच्छन्तो' शब्द का 'गच्छन्ती' स्त्री-लिंग में कहने का अर्थ प्राप्त होता है क्योंकि वे असमान गति वाले हैं। "अपि नु तुम्हे आयस्मन्तो एकन्तसुखं लोकं जानं पस्सं विहरथ" (क्या आप आयुष्मान् एकान्त सुखमय लोक को जानते और देखते हुए विहार करते हैं?) - यहाँ 'जानन्ता' और 'पस्सन्ता' के रूप में वचन-परिवर्तन होता है, ऐसा समझना चाहिए। इससे यह कारण दिखाया गया है कि 'गच्छं' शब्द का भी प्रयोग के अनुसार 'गच्छन्ता' बहुवचन अर्थ प्राप्त होता है क्योंकि वे समान गति वाले हैं, न कि 'गच्छन्ते' शब्द का 'गच्छन्ता' बहुवचन अर्थ प्राप्त होता है क्योंकि वे असमान गति वाले हैं। यही नियम आगे भी है। "भरन्ति मातापितरो, पुब्बे कतमनुस्सरं" (माता-पिता का भरण-पोषण करते हैं, पूर्व में किए गए को याद करते हुए) - यहाँ 'अनुस्सरं' शब्द का 'अनुस्सरन्ता' के रूप में वचन-परिवर्तन होता है। "सद्धम्मो गरुकातब्बो, सरं बुद्धाना सासनं" (सद्धर्म का गौरव करना चाहिए, बुद्धों के शासन का स्मरण करते हुए) - यहाँ 'सरं' शब्द का 'सरन्तेन' के रूप में विभक्ति-परिवर्तन होता है। "फुसं भूतानि सण्ठानं, मनसा गण्हतो यथा" - यहाँ 'फुसं' शब्द का भी 'फुसन्तस्स' के रूप में विभक्ति-परिवर्तन होता है। वैसे ही "याचं अददमप्पियो" - यहाँ भी 'याचं' शब्द का 'याचन्तस्स' के रूप में विभक्ति-परिवर्तन होता है। अथवा 'याचन्ति' (वे माँगते हैं) या 'याचितब्बं' (माँगने योग्य) धन; इस नियम से अनेक प्रकार से परिवर्तन जानना चाहिए। इस प्रकार 'भवं', 'करं' आदि की विसदृश पदमाला और 'गच्छं', 'चरं' आदि की सदृश पदमाला और 'जानं', 'पस्सं' आदि का लिंग, विभक्ति और वचन के भेद से कहीं-कहीं परिवर्तन - ये तीनों प्रकार आख्यात पदों के अर्थ के स्पष्टीकरण के साथ श्रेष्ठ बुद्ध-वचन में श्रोताओं को शब्दों और अर्थों में विशारद बुद्धि प्राप्त करने के लिए कहे गए हैं। इन सबको ध्यान में रखकर ये गाथाएँ कही गई हैं - ‘‘ภวํ กรํ อรหํ สํ, มหํ’’อิติ ปทานิ ตุ; วิสทิสานิ สมฺโภนฺติ, อญฺญมญฺญนฺติ ลกฺขเย. "भवं, करं, अरहं, सं, महं - ये पद तो एक-दूसरे से विसदृश (भिन्न) होते हैं, ऐसा लक्षित करना चाहिए।" ‘‘คจฺฉํ จรํ ททํ ติฏฺฐํ, จินฺตยํ ภาวยํ วทํ; ชานํ ปสฺส’’นฺติอาทีนิ, สมานานิ ภวนฺติ หิ. "गच्छं, चरं, ददं, तिट्ठं, चिन्तयं, भावयं, वदं, जानं, पस्सं आदि पद समान होते हैं।" ตตฺร ‘‘ชาน’’นฺติอาทีนํ, กตฺถจิ ปริวตฺตนํ; ลิงฺควิภตฺติวจน-นฺตรโต ปน ทิสฺสตีติ. "उनमें 'जानं' आदि का कहीं-कहीं लिंग, विभक्ति और वचन के भेद से परिवर्तन देखा जाता है।" อปิจ อยํ สพฺเพสมฺปิ นิคฺคหีตนฺตปุลฺลิงฺคานํ ปกติ, ยทิทํ ทฺวีสุ ลิงฺเคสุ ฉสุ วิภตฺตีสุ เตรสสุ วจเนสุ อญฺญตรลิงฺควิภตฺติวจนวเสน ปริวตฺตนํ. อยมฺปิ ปเนตฺถ นีติ เวทิตพฺพา. और भी, यह सभी निग्गहीतान्त (अं-अन्त) पुल्लिंग शब्दों की प्रकृति है, जो कि दो लिंगों, छह विभक्तियों और तेरह वचनों में से किसी अन्य लिंग, विभक्ति या वचन के अनुसार परिवर्तित होती है। यहाँ यह नीति भी जाननी चाहिए। ‘‘คจฺฉํ จร’’นฺติอาทีนิ, วิปฺปกตวโจ สิยุํ; ‘‘คจฺฉมาโน จรมาโน’’, อิจฺจาทีนิ ปทานิ จ. "गच्छं, चरं आदि और गच्छमानो, चरमानो आदि पद 'विप्पकतवच' (अपूर्ण क्रिया/वर्तमान कृदंत) होने चाहिए।" ‘‘มหํ ภว’’นฺติ เอตานิ, วิปฺปกตวโจปิ จ; อวิปฺปกตวโจ จ, สิยุํ อตฺถานุรูปโต. "महं, भवं - ये पद अर्थ के अनुसार 'विप्पकतवच' (अपूर्ण) और 'अविप्पकतवच' (पूर्ण) भी होने चाहिए।" ‘‘อรหํ [Pg.243] ส’’นฺติ เอตานิ, วินิมุตฺตานิ สพฺพถา; อาการํ ติวิธมฺเปตํ, กเร จิตฺเต สุเมธโสติ. "अरहं, सं - ये पद सर्वथा (इनसे) मुक्त हैं; बुद्धिमान व्यक्ति को इन तीनों प्रकारों को अपने चित्त में धारण करना चाहिए।" สวินิจฺฉโยยํ นิคฺคหีตนฺตปุลฺลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह निग्गहीतान्त पुल्लिंग शब्दों के प्रकृति रूप का सविनिश्चय नामिक पदमाला विभाग है। อาการนฺตตาปกติกํ นิคฺคหีตนฺตปุลฺลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. आकारान्त प्रकृति वाला निग्गहीतान्त पुल्लिंग समाप्त हुआ। อิทานิ ธนภูติอิจฺเจตสฺส ปกติรูปสฺส อญฺเญสญฺจ ตํสทิสานํ นามิกปทมาลาวิภาคํ วกฺขามิ ปุพฺพาจริยมตํ ปุเรจรํ กตฺวา. अब मैं 'धनभूति' इस प्रकृति रूप और उसके समान अन्य शब्दों का नामिक पदमाला विभाग पूर्वाचार्यों के मत को आगे रखकर कहूँगा। อคฺคิ, อคฺคี, อคฺคโย. อคฺคึ, อคฺคี, อคฺคโย. อคฺคินา, อคฺคีหิ, อคฺคีภิ. อคฺคิสฺส, อคฺคิโน, อคฺคีนํ. อคฺคินา, อคฺคีหิ, อคฺคีภิ. อคฺคิสฺส, อคฺคิโน, อคฺคีนํ. อคฺคิสฺมึ, อคฺคิมฺหิ, อคฺคีสุ. โภ อคฺคิ, โภ อคฺคี, ภวนฺโต อคฺคโย. ยมกมหาเถรมตํ. अग्गि, अग्गी, अग्गयो (प्रथमा)। अग्गिं, अग्गी, अग्गयो (द्वितीया)। अग्गिना, अग्गीहि, अग्गीभि (तृतीया)। अग्गिस्स, अग्गिनो, अग्गीनं (चतुर्थी)। अग्गिना, अग्गीहि, अग्गीभि (पञ्चमी)। अग्गिस्स, अग्गिनो, अग्गीनं (षष्ठी)। अग्गिस्मिं, अग्गिम्हि, अग्गीसु (सप्तमी)। भो अग्गि, भो अग्गी, भवन्तो अग्गयो (सम्बोधन)। यह यमक महास्थविर का मत है। เอตฺถ กิญฺจาปิ นิสฺสกฺกวจนฏฺฐาเน ‘‘อคฺคิสฺมา, อคฺคิมฺหา’’ติ อิมานิ นาคตานิ, ตถาปิ ตตฺถ ตตฺถ ตํสทิสปฺปโยคทสฺสนโต คเหตพฺพานิ. ‘‘อคฺคินา, อคฺคิสฺมา, อคฺคิมฺหา’’ติ กโม จ เวทิตพฺโพ. यहाँ यद्यपि अपादान (निसक्क) के स्थान पर 'अग्गिस्मा', 'अग्गिम्हा' ये रूप नहीं आए हैं, फिर भी जहाँ-तहाँ उनके समान प्रयोग देखे जाने के कारण उन्हें ग्रहण करना चाहिए। और 'अग्गिना', 'अग्गिस्मा', 'अग्गिम्हा' - यह क्रम जानना चाहिए। ธนภูติ, ธนภูตี, ธนภูตโย. ธนภูตึ, ธนภูตี, ธนภูตโย. ธนภูตินา, ธนภูตีหิ, ธนภูตีภิ. ธนภูติสฺส, ธนภูติโน, ธนภูตีนํ. ธนภูตินา, ธนภูติสฺมา, ธนภูติมฺหา, ธนภูตีหิ, ธนภูตีภิ. ธนภูติสฺส, ธนภูติโน, ธนภูตีนํ. ธนภูติสฺมึ, ธนภูติมฺหิ, ธนภูตีสุ. โภ ธนภูติ, โภ ธนภูตี, ภวนฺโต ธนภูตโย. धनभूति, धनभूती, धनभूतयो (प्रथमा)। धनभूतिं, धनभूती, धनभूतयो (द्वितीया)। धनभूतिना, धनभूतीहि, धनभूतीभि (तृतीया)। धनभूतिस्स, धनभूनिनो, धनभूतीनं (चतुर्थी)। धनभूतिना, धनभूतिस्मा, धनभूतिम्हा, धनभूतीहि, धनभूतीभि (पञ्चमी)। धनभूतिस्स, धनभूनिनो, धनभूतीनं (षष्ठी)। धनभूतिस्मिं, धनभूतिम्हि, धनभूतीसु (सप्तमी)। भो धनभूति, भो धनभूती, भवन्तो धनभूतयो (सम्बोधन)। สิริภูติ โสตฺถิภูติ, สุวตฺถิภูติ อคฺคินิ; คินิ โชติ ทธิ ปาณิ, อิสิ สนฺธิ มุนิ มณิ. सिरिभूति (श्रीभूति), सोत्थिभूति (स्वस्तिभूति), सुवत्थिभूति, अग्गिनी; गिनी, जोति, दधि, पाणि, इसि (ऋषि), सन्धि, मुनि, मणि। พฺยาธิ [Pg.244] คณฺฐิ รวิ มุฏฺฐิ, กวิ คิริ กปิ นิธิ; กุจฺฉิ วตฺถิ วิธิ สาลิ, วีหิ ราสิ อหิ มสิ. व्याधि, गण्ठि (गाँठ), रवि, मुट्ठि (मुट्ठी), कवि, गिरि, कपि, निधि; कुच्छि (कुक्षि/पेट), वत्थि (बस्ति), विधि, सालि (शालि/चावल), वीहि (व्रीहि), रासि (राशि), अहि (सर्प), मसि (स्याही)। สาติ เกสิ กิมิ โพนฺทิ, โพธิ ทีปิ ปติ หริ; อริ ธนิ ติมิ กลิ, สารถฺยุทธิ อญฺชลิ, साति, केसि, किमि (कृमि), बोन्दि (शरीर), बोधि, दीपि (तेंदुआ), पति, हरि; अरि (शत्रु), धनि, तिमि (मछली), कलि, सारथि, उदधि (समुद्र), अञ्जलि। อธิปติ นรปติ, อสิ ญาติ นิรูปธิ; สมาธิ ชลธิจฺจาที, ธนภูติสมา มตา. अधिपति, नरपति, असि (तलवार), ज्ञाति (रिश्तेदार), निरुपधि; समाधि, जलधि इत्यादि शब्द 'धनभूति' के समान (रूप वाले) माने गए हैं। อถ วา เอเตสุ อธิปติสทฺทสฺส ‘‘อธิปติยา สตฺตา’’ติ ปาฬิทสฺสนโต ‘‘อธิปติยา’’ติ สตฺตมีรูปมฺปิ อิจฺฉิตพฺพํ. อปิจ ‘‘อสาเร สารมติโน’’ติ ปาฬิยํ อิการนฺตสมาสปทโต โยวจนสฺส โนอาเทสทสฺสนโต กฺวจิ อธิปติอิจฺจาทีนํ อิการนฺตสมาสปทานํ ‘‘อธิปติโน’’ติอาทินาปิ ปจฺจตฺโตปโยครูปานิ อิจฺฉิตพฺพานิ อีการนฺตานํ ทณฺฑีสทฺทาทีนํ ‘‘ทณฺฑิโน’’ติอาทีนิ ปจฺจตฺโตปโยคสมฺปทานสามิวจนรูปานิ วิย. คหปติชานิปติสทฺทาทีนํ ปน สมาสปทานมฺปิ เอวรูปานิ ปจฺจตฺโตปโยครูปานิ น อิจฺฉิตพฺพานิ ‘‘คหปตโย ชานิปตโย’’ติอาทินา นเยน ยถาปาวจนํ คเหตพฺพรูปตฺตา. อิสิ มุนิสทฺทานํ ปนาลปนฏฺฐาเน ‘‘อิเส, มุเส’’ติ รูปนฺตรมฺปิ คเหตพฺพํ ‘‘ปุตฺโต อุปฺปชฺชตํ อิเส. ปฏิคฺคณฺห มหามุเน’’ติ ทสฺสนโต. अथवा, इनमें 'अधिपति' शब्द का पालि में 'अधिपतिया सत्ता' (अधिपति में स्थित) देखे जाने के कारण 'अधिपतिया' यह सप्तमी रूप भी स्वीकार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, पालि में 'असार सारमतिनो' इस इकारान्त समास पद में 'यो' वचन के स्थान पर 'नो' आदेश देखे जाने के कारण, कहीं-कहीं 'अधिपति' आदि इकारान्त समास पदों के 'अधिपत्तिनो' आदि प्रथमा और द्वितीया के रूप भी स्वीकार करने चाहिए, जैसे ईकारान्त 'दण्डी' आदि शब्दों के 'दण्डिनो' आदि प्रथमा, द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी के रूप होते हैं। परन्तु 'गृहपति', 'जानिपति' आदि समास पदों के इस प्रकार के प्रथमा और द्वितीया के रूप स्वीकार नहीं करने चाहिए, क्योंकि 'गृहपतयो', 'जानिपतयो' आदि के रूप में वचनों के अनुसार ग्रहण करने योग्य रूप हैं। 'इसि' (ऋषि) और 'मुनि' शब्दों के सम्बोधन में 'इसे', 'मुने' ये अन्य रूप भी ग्रहण करने चाहिए, क्योंकि 'पुत्तो उप्पज्जतं इसे' और 'पटिग्गण्ह महामुने' ऐसा देखा जाता है। เย ปเนตฺถ อมฺเหหิ อคฺคินิ คินิสทฺทา วุตฺตา, ตตฺเรเก เอวํ วทนฺติ ‘‘อคฺคินิสทฺโท ปจฺจตฺเตกวจนภาเวเยว ลพฺภติ, น ปจฺจตฺตพหุวจนภาเว อุปโยคภาวาทีสุ วา’’ติ. เกจิ ปน ‘‘ปาฬิยํ อคฺคินิสทฺโท นาม นตฺถิ, คินิสทฺโทเยว อตฺถี’’ติ วทนฺติ. เกจิ ‘‘คินิสทฺโท นาม นตฺถิ, อคฺคินิสทฺโทเยวตฺถี’’ติ [Pg.245] วทนฺติ. สพฺพเมตํ น ยุชฺชติ อคฺคินิ คินิสทฺทานมุปลพฺภนโต, สพฺพาสุปิ วิภตฺตีสุ ทฺวีสุ วจเนสุ โยเชตพฺพตาทสฺสนโต จ. ตถา หิ สุตฺตนิปาเต โกกาลิกสุตฺเต – यहाँ जो हमारे द्वारा 'अग्गिनी' और 'गिनी' शब्द कहे गए हैं, वहाँ कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि 'अग्गिनी' शब्द केवल प्रथमा एकवचन में ही प्राप्त होता है, प्रथमा बहुवचन या द्वितीया आदि में नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि 'पालि में अग्गिनी नाम का शब्द नहीं है, केवल गिनी शब्द ही है'। कुछ कहते हैं कि 'गिनी शब्द नहीं है, केवल अग्गिनी शब्द ही है'। यह सब उचित नहीं है क्योंकि 'अग्गिनी' और 'गिनी' दोनों शब्द उपलब्ध होते हैं, और सभी विभक्तियों के दोनों वचनों में उनका प्रयोग देखा जाता है। जैसा कि सुत्तनिपात के कोकालिक सुत्त में है - ‘‘น หิ วคฺคุ วทนฺติ วทนฺตา,นาภิชวนฺติ น ตาณมุเปนฺติ; องฺคาเร สนฺถเต เสนฺติ,อคฺคินึ สมฺปชฺชลิตํ ปวิสนฺตี’’ติ “वे (नरक के प्राणी) बोलते हुए मधुर नहीं बोलते, न ही वे भाग सकते हैं और न ही शरण पाते हैं; वे बिछाए हुए अंगारों पर सोते हैं और प्रज्वलित अग्नि (अग्गिनिं) में प्रवेश करते हैं।” อิมสฺมึ ปเทเส ‘‘อคฺคินิ’’นฺติ อุปโยควจนํ ทิสฺสติ. เตนาห อฏฺฐกถาจริโย ‘‘อคฺคินึ สมฺปชฺชลิตนฺติ สมนฺตโตชาลํ สพฺพทิสาสุ จ สมฺปชฺชลิตมคฺคิ’’นฺติ. ตตฺเรว จ สุตฺตนิปาเต โกกาลิกสุตฺเต – इस स्थान पर 'अग्गिनिं' यह द्वितीया विभक्ति (उपयोग वचन) का रूप दिखता है। इसीलिए अट्ठकथाचार्य ने कहा है - “अग्गिनिं सम्पज्जलितं अर्थात् चारों ओर से और सभी दिशाओं में प्रज्वलित अग्नि।” और उसी सुत्तनिपात के कोकालिक सुत्त में - ‘‘อถ โลหมยํ ปน กุมฺภึ,อคฺคินิสญฺชลิตํ ปวิสนฺติ; ปจฺจนฺติ หิ ตาสุ จิรรตฺตํ,อคฺคินิสมาสุ สมุปฺลวาเต’’ติ “फिर वे लोहे के कुम्भ (घड़े) में प्रवेश करते हैं, जो अग्नि से प्रज्वलित है; वे उनमें लम्बे समय तक पकते हैं, जो अग्नि के समान (अग्गिनिसमासु) दहकते हैं।” อิมสฺมึ ปเทเส สมาสวิสยตฺตา อคฺคินิสญฺชลิตนฺติ อคฺคินีหิ สญฺชลิตนฺติ อตฺโถ ลพฺภติ, ตถา อคฺคินิสมาสูติ อคฺคินีหิ สทิสาสูติ อตฺโถปิ. เอวํ สมาสวิธานมุเขน ‘‘อคฺคินีหี’’ติ กรณวจนมฺปิ ทิสฺสติ. इस स्थान पर समास होने के कारण 'अग्गिनिसञ्जलितं' का अर्थ 'अग्नि के द्वारा प्रज्वलित' (अग्गिनीहि सञ्जलितं) प्राप्त होता है, वैसे ही 'अग्गिनिसमासु' का अर्थ 'अग्नि के समान' (अग्गिनीहि सदिसामु) भी है। इस प्रकार समास विधान के माध्यम से 'अग्गिनीहि' यह तृतीया (करण) विभक्ति का रूप भी दिखाई देता है। คินิสทฺโทปิ จ ปาฬิยํ ทิสฺสติ. ตถา หิ ‘‘ตเมว กฏฺฐํ ทหติ, ยสฺมา โส ชายเต คินี’’ติ จูฬโพธิจริยายํ คินิสทฺโท ทิฏฺโฐ. เกจิ ปเนตฺถ สนฺธิวเสน อการโลปํ สญฺโญคาทิสฺส จ คการสฺส โลปํ วทนฺติ, ตมฺปิ น ยุชฺชติ ตสฺสา ปาฬิยา อฏฺฐกถายํ ‘‘ยสฺมาติ [Pg.246] ยโต กฏฺฐา. คินีติ อคฺคี’’ติ เอวํ คินิสทฺทสฺส อุลฺลิงฺเคตฺวา วจนโต. ตถา ‘‘ฉนฺนา กุฏิ อาหิโต คินี’’ติ อิมสฺส ธนิยสุตฺตสฺส อฏฺฐกถายํ ‘‘อาหิโตติ อาภโต ชาลิโต วา. คินีติ อคฺคี’’ติ วจนโต, ตเถว จ ‘‘มหาคินิ ปชฺชลิโต, อนาหาโรปสมฺมตี’’ติ อิมิสฺสา เถรคาถาย สํวณฺณนายํ ‘‘คินีติ อคฺคี’’ติ วจนโต. ยทิ หิ คินิสทฺโท วิสุํ น สิยา, อฏฺฐกถาจริยา ‘‘ชายเต คินี’’ติอาทีนิ ‘‘ชายเต อคฺคินี’’ติอาทินา ปทจฺเฉทวเสน อตฺถํ วเทยฺยุํ. ยสฺมา เอวํ น วทึสุ, ‘‘คินีติ อคฺคี’’ติ ปน วทึสุ, เตน ญายติ ‘‘คินิสทฺโทปิ วิสุํ อตฺถี’’ติ. เย ‘‘คินิสทฺโท นตฺถี’’ติ วทนฺติ, เตสํ วจนํ น คเหตพฺพเมว สาสเน คินิสทฺทสฺสุปลพฺภนโต. สุตฺตนิปาตฏฺฐกถายญฺหิ ‘‘ฉนฺนา กุฏิ อาหิโต คินี’’ติ ปาฐสฺส สํวณฺณนายเมว ‘‘เตสุ ฐาเนสุ อคฺคินิ ‘คินี’ติ โวหริยตี’’ติ ตสฺส อภิธานนฺตรํ วุตฺตํ, ตสฺมา มยเมตฺถ คาถารจนํ กริสฺสาม – 'गिनी' शब्द भी पालि में दिखाई देता है। जैसे कि चूलबोधिचरिया में 'तमेव कट्ठं दहति, यस्मा सो जायते गिनी' (वह उसी लकड़ी को जलाता है जिससे वह अग्नि उत्पन्न होती है) में 'गिनी' शब्द देखा गया है। यहाँ कुछ लोग सन्धि के कारण 'अ' कार का लोप और संयोग के आदि 'ग' कार का लोप बताते हैं, वह भी उचित नहीं है क्योंकि उस पालि की अट्ठकथा में 'यस्माति यतो कट्ठं। गिनीति अग्गी' इस प्रकार 'गिनी' शब्द का उल्लेख करके व्याख्या की गई है। वैसे ही 'छन्ना कुटि आहितो गिनी' इस धनिय सुत्त की अट्ठकथा में 'आहितोति आभतो जालितो वा। गिनीति अग्गी' ऐसा कहने के कारण, और वैसे ही 'महागिनी पज्जलितो, अनाहारोपसम्मति' इस थेरगाथा की व्याख्या में 'गिनीति अग्गी' ऐसा कहने के कारण। यदि 'गिनी' शब्द अलग से न होता, तो अट्ठकथाचार्य 'जायते गिनी' आदि का 'जायते अग्गिनी' आदि पदच्छेद करके अर्थ बताते। चूँकि उन्होंने ऐसा नहीं कहा, बल्कि 'गिनीति अग्गी' कहा, इससे ज्ञात होता है कि 'गिनी' शब्द भी अलग से विद्यमान है। जो कहते हैं कि 'गिनी शब्द नहीं है', उनकी बात शासन (बुद्ध वचन) में 'गिनी' शब्द की उपलब्धि होने के कारण स्वीकार नहीं करनी चाहिए। सुत्तनिपात अट्ठकथा में 'छन्ना कुटि आहितो गिनी' इस पाठ की व्याख्या में ही 'उन स्थानों पर अग्नि को गिनी कहा जाता है' ऐसा उसका दूसरा नाम कहा गया है, इसलिए हम यहाँ एक गाथा की रचना करेंगे - วิเทหรฏฺฐมชฺฌมฺหิ, ยํ ตํ นาเมน วิสฺสุตํ; รฏฺฐํ ปพฺพตรฏฺฐนฺติ, ทสฺสเนยฺยํ มโนรมํ. विदेह राष्ट्र के मध्य में, जो नाम से प्रसिद्ध है; पर्वत राष्ट्र नामक वह देश, दर्शनीय और मनोरम है। ธมฺมโกณฺฑวฺหยํ ตตฺถ, นครํ อตฺถิ โสภนํ; ตมฺหิ ฐาเน มนุสฺสานํ, ภาสา เอว คินิจฺจยํ. वहाँ धम्मकोण्ड नामक एक शोभनीय नगर है; उस स्थान पर मनुष्यों की भाषा में ही 'गिनी' शब्द का समूह (प्रयोग) है। ‘‘คินิ คินี คินโย’’ติ-อาทินา ปวเท วิทู; ปทมาลํ ยถา อคฺคิ-สทฺทสฺเสว สุเมธโส. विद्वान लोग 'गिनी, गिनी, गिनयो' आदि के रूप में पदमाला (शब्द-रूप) कहें, जैसे बुद्धिमान लोग 'अग्गि' शब्द की पदमाला कहते हैं। อิติ อลาพุ ลาพุสทฺทา วิย อคฺคินิ คินิสทฺทาปิ ภควโต ปาจเน ทิสฺสนฺตีติ เวทิตพฺพา. ยถา ปน อคฺคินิสทฺทสฺส สพฺพาสุ วิภตฺตีสุ ทฺวีสุ วจเนสุ โยเชตพฺพตา สิทฺธา, ตถา คินิสทฺทสฺสปิ สิทฺธาว โหติ. ตสฺมาตฺร – इस प्रकार, जैसे 'अलाबु' शब्द से 'लाबु' शब्द बनता है, वैसे ही भगवान के वचनों में 'अग्गिनि' से 'गिनि' शब्द भी देखे जाते हैं, ऐसा जानना चाहिए। जैसे 'अग्गिनि' शब्द की सभी विभक्तियों और दोनों वचनों में योजना सिद्ध है, वैसे ही 'गिनि' शब्द की भी सिद्ध ही होती है। इसलिए यहाँ - อคฺคินิ[Pg.247], อคฺคินี, อคฺคินโย. อคฺคินึ, อคฺคินี, อคฺคินโย. อคฺคินินา, อคฺคินีหิ, อคฺคินีภิ. อคฺคินิสฺส, อคฺคินีนํ. อคฺคินินา, อคฺคินิสฺมา, อคฺคินิมฺหา, อคฺคินีหิ, อคฺคินีภิ. อคฺคินิสฺส, อคฺคินีนํ. อคฺคินิสฺมึ, อคฺคินิมฺหิ, อคฺคินีสุ. โภ อคฺคินิ, ภวนฺโต อคฺคินี, ภวนฺโต อคฺคินโย. अग्गिनि, अग्गिनी, अग्गिनयो। अग्गिनिं, अग्गिनी, अग्गिनयो। अग्गिनिना, अग्गिनीहि, अग्गिनीभि। अग्गिनिस्स, अग्गिनीनं। अग्गिनिना, अग्गिनिस्मा, अग्गिनिम्हा, अग्गिनीहि, अग्गिनीभि। अग्गिनिस्स, अग्गिनीनं। अग्गिनिस्मिं, अग्गिनिम्हि, अग्गिनीसु। भो अग्गिनि, भवन्तो अग्गिनी, भवन्तो अग्गिनयो। ‘‘คินิ, คินี, คินโย. คินึ, คินี, คินโย, คินินา’’ติ สพฺพํ โยเชตพฺพํ. อิติ ปาฬินยานุสาเรน อคฺคินิ คินิสทฺทานํ นามิกปทมาลา โยชิตา. อถ วา ยถา สกฺกฏภาสายํ สตฺว ปทฺธสฺวามินีติ สญฺโญควเสน วุตฺตานํ สทฺทานํ มาคธภาสํ ปตฺวา สตฺตวปทุมสุวามินีติ นิสฺสญฺโญควเสน อุจฺจาริตา ปาฬิ ทิสฺสติ ‘‘ตฺวญฺจ อุตฺตมสตฺตโว’’ติอาทินา, ตถา สกฺกฏภาสายํ อคฺนีติ สญฺโญควเสน วุตฺตสฺส มาคธภาสํ ปตฺวา ‘‘อคฺคินี’’ติ สญฺโญคนการวเสน อุจฺจาริตา ปาฬิ ทิสฺสติ ‘‘อคฺคินึ สมฺปชฺชลิตํ ปวิสนฺตี’’ติอาทิกา. ยถา จ เวยฺยากรเณหิ สกฺกฏภาสาภูโต อคฺนิสทฺโท สพฺพาสุ วิภตฺตีสุ ตีสุ วจเนสุ โยชิยติ, ตถา มาคธภาสาภูโต อคฺคินิสทฺโทปิ สพฺพาสุ วิภตฺตีสุ ทฺวีสุ วจเนสุ โยเชตพฺโพว โหติ, ตสฺมา โส อิธมฺเหหิ โยชิยติ, คินิสทฺโทปิ อคฺคินิสทฺเทน สมานตฺถตฺตา, อีสกญฺจ สรูปตฺตา ตเถว โยชิยตีติ ทฏฺฐพฺพํ. ''गिनि, गिनी, गिनयो। गिनिं, गिनी, गिनयो, गिनिना'' - इस प्रकार सब जोड़ना चाहिए। इस प्रकार पालि नियम के अनुसार 'अग्गिनि' और 'गिनि' शब्दों की नामिक पदमाला संयोजित की गई है। अथवा, जैसे संस्कृत भाषा में 'सत्व', 'पद्म', 'स्वामी' - इस प्रकार संयोग के वश में कहे गए शब्दों को मागधी भाषा में प्राप्त होने पर 'सत्तव', 'पदुम', 'सुवामी' - इस प्रकार बिना संयोग के उच्चारित पालि देखी जाती है, जैसे ''त्वञ्च उत्तमसत्तवो'' आदि में; वैसे ही संस्कृत भाषा में 'अग्नि' - इस प्रकार संयोग के वश में कहे गए शब्द को मागधी भाषा में प्राप्त होने पर ''अग्गिनी'' - इस प्रकार संयोग के अभाव के वश में उच्चारित पालि देखी जाती है, जैसे ''अग्गिनिं सम्पज्जलितं पविसन्ति'' आदि में। और जैसे वैयाकरणों द्वारा संस्कृत भाषा का 'अग्नि' शब्द सभी विभक्तियों और तीनों वचनों में प्रयुक्त किया जाता है, वैसे ही मागधी भाषा का 'अग्गिनि' शब्द भी सभी विभक्तियों और दोनों वचनों में प्रयुक्त किया जाना ही चाहिए, इसलिए वह यहाँ हमारे द्वारा संयोजित किया गया है; 'गिनि' शब्द भी 'अग्गिनि' शब्द के समान अर्थ वाला होने के कारण और थोड़ा समान रूप होने के कारण वैसे ही संयोजित किया जाता है, ऐसा देखना चाहिए। เอตฺถ สิยา – ยทิ อคฺคินิสทฺโท สพฺเพสุ วิภตฺติวจเนสุ โยเชตพฺโพ, อถ กสฺมา กจฺจายเน ‘‘อคฺคิสฺสินี’’ติ ลกฺขเณน สิมฺหิ ปเร อคฺคิสทฺทนฺตสฺส อินิอาเทโส ทสฺสิโตติ? สจฺจํ, ยถา นวกฺขตฺตุํ ฐเปตฺวา กเตกเสสสฺส ทสสทฺทสฺส โยวจนมฺหิ นวาเทสํ กตฺวา โยวจนสฺส อุติอาเทสํ กสฺมา ‘‘นวุตี’’ติ รูเป นิปฺผนฺเน ปุน ‘‘นวุตี’’ติ ปกตึ ฐเปตฺวา ตโต นํวจนํ กตฺวา ‘‘นวุตีน’’นฺติ รูปํ นิปฺผาทิตํ[Pg.248]. อิตฺถิลิงฺเค ปน นาทิเอกวจนานิ กตฺวา เตสํ ยาอาเทสํ กตฺวา ‘‘นวุติยา’’ติ รูปํ นิปฺผาทิตํ. ตถา หิ ‘‘ฉนฺนวุตีนํ ปาสณฺฑานํ ธมฺมานํ ปวรํ ยทิทํ สุคตวินยํ นวุติยา หํสสหสฺเสหิ ปริวุโต’’ติอาทีนิ ปโยคานิ ทิสฺสนฺติ. ตถา สิมฺหิ อคฺคิสทฺทนฺตสฺส อินิอาเทสกรณวเสน ‘‘อคฺคินี’’ติ รูเป นิปฺผนฺเนปิ ปุน ‘‘อคฺคินี’’ติ ปกตึ ฐเปตฺวา ตโต โยอํนาทโย วิภตฺติโย กตฺวา ‘‘อคฺคินิ, อคฺคินี, อคฺคินโย. อคฺคินึ, อคฺคินี, อคฺคินโย. อคฺคินินา’’ติอาทีนิ กถํ น นิปฺผชฺชิสฺสนฺตีติ สนฺนิฏฺฐานํ กาตพฺพํ. यहाँ यह शंका हो सकती है - यदि 'अग्गिनि' शब्द सभी विभक्ति-वचनों में प्रयुक्त किया जाना चाहिए, तो फिर कच्चायन में ''अग्गिस्सिनी'' इस लक्षण द्वारा 'सि' विभक्ति परे होने पर 'अग्गि' शब्द के अन्त में 'इनि' आदेश क्यों दिखाया गया है? सत्य है, जैसे नौ बार रखकर शेष बचे 'दस' शब्द के 'यो' वचन में 'नव' आदेश करके और 'यो' वचन का 'उति' आदेश करके ''नवुती'' रूप सिद्ध होने पर, पुनः ''नवुती'' को प्रकृति मानकर उससे 'नं' वचन करके ''नवुतीनं'' रूप निष्पन्न किया गया है। स्त्रीलिंग में 'ना' आदि एकवचन करके उनका 'या' आदेश करके ''नवुतिया'' रूप निष्पन्न किया गया है। क्योंकि ''छन्नवुतीनं पासण्डानं धम्मानं पवरं यदिदं सुगतविनयं नवुतिया हंससहस्सेहि परिवुतो'' आदि प्रयोग देखे जाते हैं। वैसे ही 'सि' विभक्ति में 'अग्गि' शब्द के अन्त में 'इनि' आदेश करने के कारण ''अग्गिनी'' रूप सिद्ध होने पर भी, पुनः ''अग्गिनी'' को प्रकृति मानकर उससे 'यो', 'अं' आदि विभक्तियाँ लगाकर ''अग्गिनि, अग्गिनी, अग्गिनयो। अग्गिनिं, अग्गिनी, अग्गिनयो। अग्गिनिना'' आदि रूप क्यों नहीं सिद्ध होंगे? ऐसा निश्चय करना चाहिए। สวินิจฺฉโยยํ อิการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह इकारान्त पुल्लिंग शब्दों के प्रकृति रूप का स-विनिश्चय नामिक पदमाला विभाग है। อิการนฺตตาปกติกํ อิการนฺตปุลฺลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. इकारान्त प्रकृति वाला इकारान्त पुल्लिंग समाप्त हुआ। อิทานิ ภาวี อิจฺเจตสฺส ปกติรูปสฺส อญฺเญสญฺจ ตํสทิสานํ นามิกปทมาลาวิภาคํ วกฺขาม ปุพฺพาจริยมตํ ปุเรจรํ กตฺวา. अब 'भावी' इस प्रकृति रूप का और उसके समान अन्य शब्दों का नामिक पदमाला विभाग, पूर्वाचार्यों के मत को आगे रखकर कहेंगे। ทณฺฑี, ทณฺฑี, ทณฺฑิโน. ทณฺฑึ, ทณฺฑี, ทณฺฑิโน. ทณฺฑินา, ทณฺฑีหิ, ทณฺฑีภิ. ทณฺฑิสฺส, ทณฺฑิโน, ทณฺฑีนํ. ทณฺฑินา, ทณฺฑีหิ, ทณฺฑีภิ. ทณฺฑิสฺส, ทณฺฑิโน, ทณฺฑีนํ. ทณฺฑิสฺมึ, ทณฺฑิมฺหิ, ทณฺฑีสุ. โภ ทณฺฑิ, โภ ทณฺฑี, ภวนฺโต ทณฺฑิโน. ยมกมหาเถรมตํ. दण्डी, दण्डी, दण्डिनो। दण्डिं, दण्डी, दण्डिनो। दण्डिना, दण्डीहि, दण्डीभि। दण्डिस्स, दण्डिनो, दण्डीनं। दण्डिना, दण्डीहि, दण्डीभि। दण्डिस्स, दण्डिनो, दण्डीनं। दण्डिस्मिं, दण्डिम्हि, दण्डीसु। भो दण्डि, भो दण्डी, भवन्तो दण्डिनो। यह यमकमहाथेर का मत है। เอตฺถ กิญฺจาปิ ‘‘ทณฺฑิน’’นฺติ อุปโยเคกวจนญฺจ ‘‘ทณฺฑิสฺมา, ทณฺฑิมฺหา’’ติ นิสฺสกฺกวจนญฺจ ‘‘ทณฺฑินี’’ติ ภุมฺเมกวจนญฺจ นาคตํ, ตถาปิ ตตฺถ ตตฺถ ตํสทิสสฺส ปโยคสฺส ทสฺสนโต คเหตพฺพเมว. यहाँ यद्यपि ''दण्डिनं'' यह द्वितीया एकवचन, ''दण्डिस्मा, दण्डिम्हा'' यह पञ्चमी एकवचन और ''दण्डिनी'' यह सप्तमी एकवचन नहीं आया है, फिर भी जहाँ-तहाँ उसके समान प्रयोगों के देखे जाने के कारण उन्हें ग्रहण करना ही चाहिए। ‘‘ภณ [Pg.249] สมฺม อนุญฺญาโต, อตฺถํ ธมฺมญฺจ เกวลํ; สนฺติ หิ ทหรา ปกฺขี, ปญฺญวนฺโต ชุตินฺธรา’’ติ ''हे सौम्य! अनुमत होकर केवल अर्थ और धर्म का कथन करो; क्योंकि छोटे पक्षी भी प्रज्ञावान और दीप्तिमान होते हैं।'' ปาฬิยํ ‘‘ปกฺขี’’อิติ ปจฺจตฺตพหุวจนสฺส ทสฺสนโต ปน ‘‘ทณฺฑี’’อิติ ปจฺจตฺโตปโยคพหุวจนานิ วุตฺตานีติ ทฏฺฐพฺพํ. पालि में ''पक्खी'' इस प्रथमा बहुवचन के देखे जाने के कारण ''दण्डी'' इस प्रथमा और द्वितीया बहुवचन के रूप कहे गए हैं, ऐसा देखना चाहिए। ภาวี, ภาวี, ภาวิโน. ภาวึ, ภาวินํ, ภาวี, ภาวิโน. ภาวินา, ภาวีหิ, ภาวีภิ. ภาวิสฺส, ภาวิโน, ภาวีนํ. ภาวินา, ภาวิสฺมา, ภาวิมฺหา, ภาวีหิ, ภาวีภิ. ภาวิสฺส, ภาวิโน, ภาวีนํ. (ภาวินิ) ภาวิสฺมึ, ภาวิมฺหิ, ภาวีสุ. โภ ภาวิ, โภ ภาวี, ภวนฺโต ภาวิโน. भावी, भावी, भाविनो। भाविं, भाविनं, भावी, भाविनो। भाविना, भावीहि, भावीभि। भाविस्स, भाविनो, भावीनं। भाविना, भाविस्मा, भाविम्हा, भावीहि, भावीभि। भाविस्स, भाविनो, भावीनं। (भाविनि) भाविस्मिं, भाविम्हि, भावीसु। भो भावि, भो भावी, भवन्तो भाविनो। เอวํ วิภาวี สมฺภาวี, ปริภาวี ธชี คณี; สุขี โรคี สสี กุฏฺฐี, มกุฏี กุสลี พลี. इसी प्रकार विभावी, सम्भावी, परिभावी, धजी, गणी; सुखी, रोगी, ससी, कुट्ठी, मकुटी, कुसली, बली। ชฏี โยคี กรี ยานี, โตมรี มุสลี ผลี; ทนฺตี มนฺตี สุธี เมธี, ภาคี โภคี นขี สิขี. जटी, योगी, करी, यानी, तोमरी, मुसली, फली; दन्ती, मन्ती, सुधी, मेधी, भागी, भोगी, nakhī, सिखी। ธมฺมี สงฺฆี ญาณี อตฺถี, หตฺถี จกฺขี ปกฺขี ทาฐี; รฏฺฐี ฉตฺตี มาลี จมฺมี, จารี จาคี กามี สามี. धम्मी, संघी, ञाणी, अत्थी, हत्थी, चक्खी, पक्खी, दाठी; रट्ठी, छत्ती, माली, चम्मी, चारी, चागी, कामी, सामी। มลฺลการี ปาปการี, สตฺตุฆาตี ทีฆชีวี; ธมฺมวาที สีหนาที, ภูมิสายี สีฆยายี. मल्लकारी, पापकारी, सत्तुघाती, दीर्घजीवी; धम्मवादी, सीहनादी, भूमिसायी, सीघयायी। วชฺชทสฺสี จ ปาณี จ, ยสสฺสิจฺจาทโยปิ จ; เอเตสํ โกจิ เภโท ตุ, เอกเทเสน วุจฺจเต. वज्जदस्सी और पाणी, तथा यशस्सी आदि भी; इनमें जो कुछ भेद है, वह एक अंश में कहा जाता है। อีการนฺตปุลฺลิงฺคปเทสุ หิ ‘‘วชฺชทสฺสี, ปาณี’’อิจฺเจวมาทีนํ อุปโยคภุมฺมวจนฏฺฐาเน ‘‘วชฺชทสฺสินํ, ปาณิเน’’ติอาทีนิปิ รูปานิ ภวนฺติ. เอตฺถ จ – ईकारान्त पुल्लिंग शब्दों में ''वज्जदस्सी, पाणी'' इत्यादि के द्वितीया और सप्तमी वचन के स्थान पर ''वज्जदस्सिनं, पाणिने'' इत्यादि रूप भी होते हैं। और यहाँ - ‘‘นิธีนํว ปวตฺตารํ, ยํ ปสฺเส วชฺชทสฺสินํ; เอวํ ชรา จ มจฺจุ จ, อธิวตฺตนฺติ ปาณิเน. जैसे कोई निधियों (खजाने) के बताने वाले को देखे, जो दोषों को दिखाने वाला हो; इसी प्रकार बुढ़ापा और मृत्यु प्राणियों पर आक्रमण करते हैं। สมุปคจฺฉติ [Pg.250] สสินิ คคนตลํ. चंद्रमा आकाश के तल पर पहुँचता है। อุปหจฺจ มนํ มชฺโฌ, มาตงฺคสฺมึ ยสสฺสิเน; อุจฺฉินฺโน สห รฏฺเฐน, มชฺฌารญฺญํ ตทา อหุ. यशस्वी मातंग (ऋषि) के प्रति मन में अपराध (द्वेष) करके, राजा मज्झ अपने राष्ट्र के साथ नष्ट हो गया, तब वह मज्झारण्य (मज्झ का जंगल) हो गया। สุสุขํ วต ชีวาม, เวริเนสุ อเวริโน’’ติ “अहो! हम वैरियों के बीच वैर-रहित होकर बड़े सुख से जीते हैं।” เอวมาทโย ปโยคา เวทิตพฺพา, อยํ นโย ทณฺฑีปทาทีสุปิ ลพฺภเตว สมานคติกตฺตา ทณฺฑีปทาทีนํ วชฺชทสฺสีปทาทีหิ. ตสฺมา อุปโยคฏฺฐาเน ‘‘ทณฺฑึ, ทณฺฑินํ, ทณฺฑิโน, ทณฺฑิเน’’ติ โยเชตพฺพํ. ภุมฺมฏฺฐาเน ‘‘ทณฺฑิสฺมึ, ทณฺฑิมฺหิ, ทณฺฑินิ, ทณฺฑิเน, ทณฺฑีสุ, ทณฺฑิเนสู’’ติ โยเชตพฺพํ. เอส นโย คามณี เสนานีอิจฺจาทีนิ วชฺเชตฺวา ยถารหํ อีการนฺตปุลฺลิงฺเคสุ เนตพฺโพ. इस प्रकार के प्रयोगों को जानना चाहिए, यह नियम 'दण्डी' आदि शब्दों में भी प्राप्त होता है क्योंकि 'दण्डी' आदि शब्दों की प्रकृति 'वज्जदस्सी' आदि शब्दों के समान ही है। इसलिए द्वितीया विभक्ति (उपयोगस्थान) में 'दण्डिं, दण्डिनं, दण्डिनो, दण्डिने' जोड़ना चाहिए। सप्तमी विभक्ति (भुम्मस्थान) में 'दण्डिस्मिं, दण्डिम्हि, दण्डिनि, दण्डिने, दण्डीसु, दण्डिनेसू' जोड़ना चाहिए। यह नियम 'गामणी', 'सेनानी' आदि को छोड़कर यथायोग्य ईकारान्त पुल्लिंग शब्दों में लागू करना चाहिए। สวินิจฺฉโยยํ อีการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह ईकारान्त पुल्लिंग शब्दों के प्रकृति रूप की नामिक पदमाला (शब्द-रूप) का विनिश्चय सहित विभाग है। อีการนฺตตาปกติกํ อีการนฺตปุลฺลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. ईकारान्त प्रकृति वाला ईकारान्त पुल्लिंग समाप्त हुआ। อิทานิ ภูธาตุมยานํ อุการนฺตปุลฺลิงฺคานํ อปฺปสิทฺธตฺตา อญฺเญสํ อุการนฺตปุลฺลิงฺคานํ วเสน ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลํ ปูเรสฺสาม. กตมานิ ตานิ? ‘‘ภิกฺขุ เหตุ เสตุ เกตุ ราหุ ภาณุ ขาณุ สงฺกุ อุจฺฉุ เวฬุ มจฺจุ ชนฺตุ สินฺธุ พนฺธุ รุรุ เนรุ สตฺตุ พพฺพุ ปฏุ พินฺทุ ครุ’’อิจฺจาทีนิ. अब 'भू' धातु से बने उकारान्त पुल्लिंग शब्दों के अल्प होने के कारण, अन्य उकारान्त पुल्लिंग शब्दों के अनुसार प्रकृति रूप की नामिक पदमाला को पूर्ण करेंगे। वे कौन से हैं? 'भिक्खु (भिक्षु), हेतु, सेतु, केतु, राहु, भाणु (सूर्य), खाणु (ठूँठ), सङ्कु (शंकु), उच्छु (ईख), वेळु (बाँस), मच्चु (मृत्यु), जन्तु, सिन्धु, बन्धु, रुरु (मृग), नेरु (मेरु), सत्तु (शत्रु), बब्बु (बिल्ली), पटु (चतुर), बिन्दु, गरु (गुरु)' इत्यादि। ภิกฺขุ, ภิกฺขู, ภิกฺขโว. ภิกฺขุํ, ภิกฺขู, ภิกฺขโว. ภิกฺขุนา, ภิกฺขูหิ, ภิกฺขูภิ. ภิกฺขุสฺส, ภิกฺขุโน, ภิกฺขูนํ. ภิกฺขุนา, ภิกฺขุสฺมา, ภิกฺขุมฺหา, ภิกฺขูหิ, ภิกฺขูภิ. ภิกฺขุสฺส, ภิกฺขุโน, ภิกฺขูนํ. ภิกฺขุสฺมึ, ภิกฺขุมฺหิ, ภิกฺขูสุ. โภ ภิกฺขุ, ภวนฺโต ภิกฺขู, ภิกฺขเว, ภิกฺขโว. ภิกฺขุอาทีนิ อญฺญานิ จ ตํสทิสานิ เอวํ เญยฺยานิ. भिक्खु, भिक्खू, भिक्खवो (प्रथमा)। भिक्खुं, भिक्खू, भिक्खवो (द्वितीया)। भिक्खुना, भिक्खूहि, भिक्खूभि (तृतीया)। भिक्खुस्स, भिक्खुनो, भिक्खूनं (चतुर्थी)। भिक्खुना, भिक्खुस्मा, भिक्खुम्हा, भिक्खूहि, भिक्खूभि (पञ्चमी)। भिक्खुस्स, भिक्खुनो, भिक्खूनं (षष्ठी)। भिक्खुस्मिं, भिक्खुम्हि, भिक्खूसु (सप्तमी)। भो भिक्खु, भवन्तो भिक्खू, भिक्खवे, भिक्खवो (सम्बोधन)। भिक्खु आदि और अन्य उसके समान शब्दों को इसी प्रकार जानना चाहिए। อยมฺปิ [Pg.251] ปเนตฺถ วิเสโส เญยฺโย – เหตุ, เหตู, เหตุโย, เหตโว. เหตุํ, เหตู, เหตุโย, เหตโว. โภ เหตุ, ภวนฺโต เหตู, เหตเว, เหตโว. เสสํ ภิกฺขุสมํ. यहाँ यह विशेष भी जानना चाहिए - हेतु, हेतू, हेतुयो, हेतवो (प्रथमा)। हेतुं, हेतू, हेतुयो, हेतवो (द्वितीया)। भो हेतु, भवन्तो हेतू, हेतवे, हेतवो (सम्बोधन)। शेष भिक्खु के समान है। อถ วา ‘‘เหตุยา’’ติอาทีนํ ทสฺสนโต ‘‘เธนุยา’’ติ อิตฺถิลิงฺครูเปน สทิสํ ‘‘เหตุยา’’ติ ปุลฺลิงฺครูปมฺปิ สตฺตมีฐาเน อิจฺฉิตพฺพํ. กานิจิ หิ ปุลฺลิงฺครูปานิ เกหิจิ อิตฺถิลิงฺครูเปหิ สทิสานิ ภวนฺติ. ตํ ยถา? ‘‘อุฏฺเฐหิ กตฺเต ตรมาโน. เอหิ พาเลขมาเปหิ, กุสราชํ มหพฺพลํ. ภาตรา มาตรา อธิปติยา รตฺติยา เหตุโย เธนุโย มตฺยา เปตฺยา’’ติ เอวํ นยทสฺสเนน ‘‘เหตุยา ตีณิ. อธิปติยา สตฺต. อุฏฺเฐหิ กตฺเต’’ติอาทีสุ ลิงฺควิปลฺลาสจินฺตา น อุปฺปาเทตพฺพา. अथवा 'हेतुया' आदि के देखे जाने से, 'धेनुया' इस स्त्रीलिंग रूप के समान 'हेतुया' यह पुल्लिंग रूप भी सप्तमी के स्थान पर इष्ट (स्वीकार्य) है। क्योंकि कुछ पुल्लिंग रूप कुछ स्त्रीलिंग रूपों के समान होते हैं। जैसे कि? 'उठो कर्ता (हे कत्ते!), शीघ्रता करते हुए। आओ बालक, लिखवाओ, महाबली कुसराज को। भ्रातरा, मातरा, अधिपतिया, रत्तिया, हेतुयो, धेनुयो, मत्या, पेत्या' - इस प्रकार के उदाहरणों को देखने से 'हेतुया' (तीन विभक्तियों में), 'अधिपतिया' (सात विभक्तियों में), 'उठो कर्ता' इत्यादि में लिंग-विपर्यय की चिंता नहीं करनी चाहिए। ชนฺตุ, ชนฺตู, ชนฺตุโย, ชนฺตุโน, ชนฺตโว. ชนฺตุํ, ชนฺตู, ชนฺตุโย, ชนฺตุโน, ชนฺตโว. โภ ชนฺตุ, ภวนฺโต ชนฺตู, ชนฺตเว ชนฺตโว. เสสํ ภิกฺขุสมํ. जन्तु, जन्तू, जन्तुयो, जन्तुनो, जन्तवो (प्रथमा)। जन्तुं, जन्तू, जन्तुयो, जन्तुनो, जन्तवो (द्वितीया)। भो जन्तु, भवन्तो जन्तू, जन्तवे, जन्तवो (सम्बोधन)। शेष भिक्खु के समान है। ครุ, ครู, ครโว, ครุโน. ครุํ, ครู, ครโว, ครุโน. โภ ครุ, ภวนฺโต ครู, ครโว, ครุโน. เสสํ ภิกฺขุสมํ. เอตฺถ ปน ‘‘ภตฺตุ จ ครุโน สพฺเพ, ปฏิปูเชติ ปณฺฑิตา’’ติปาฬินิทสฺสนํ. ตตฺร ‘‘ภิกฺขเว’’ติ อามนฺตนปทํ จุณฺณิยปเทสฺเวว ทิสฺสติ, น คาถาสุ. ‘‘ภิกฺขโว’’ติ ปจฺจตฺตปทํ คาถาสุเยว ทิสฺสติ, น จุณฺณิยปเทสุ, อปิจ ‘‘ภิกฺขเว’’ติ อามนฺตนปทํ สาวกสฺส ภิกฺขูนํ อามนฺตนปาฬิยํ สนฺธิวิสเยเยว ทิสฺสติ, น อสนฺธิวิสเย, พุทฺธสฺส ปน ภิกฺขูนํ อามนฺตนปาฬิยํ สนฺธิวิสเยปิ อสนฺธิวิสเยปิ ทิสฺสติ. ‘‘ภิกฺขโว’’ติ อามนฺตนปทํ พุทฺธสฺส ภิกฺขูนํ อามนฺตนปาฬิยํ คาถาสุ จ ทิสฺสติ[Pg.252], จุณฺณิยปเทสุ จ สนฺธิวิสเยเยว ทิสฺสติ. สาวกสฺส ปน ภิกฺขูนํ อามนฺตนปาฬิยํ น ทิสฺสตีติ อยํ ทฺวินฺนํ วิเสโส ทฏฺฐพฺโพ. ตถา หิ ‘‘เอวญฺจ ปน ภิกฺขเว อิมํ สิกฺขาปทํ อุทฺทิเสยฺยาถา’’ติอาทีสุ ‘‘ภิกฺขเว’’ติ ปทํ จุณฺณิยปเทสฺเวว ทิฏฺฐํ. ‘‘ภิกฺขโว ติสตา อิเม, ยาจนฺติ ปญฺชลีกตา’’ติอาทีสุ ‘‘ภิกฺขโว’’ติ ปจฺจตฺตปทํ คาถาสุเยว ทิฏฺฐํ. ‘‘อายสฺมา สาริปุตฺโต ภิกฺขู อามนฺเตสิ อาวุโส ภิกฺขเว’’ติ เอวมาทีสุ สาวกสฺส ภิกฺขูนํ อามนฺตนปาฬีสุ สนฺธิวิสเยเยว ‘‘ภิกฺขเว’’ติ ปทํ ทิฏฺฐํ. ‘‘ภิกฺขู อามนฺเตสิ โสตุกามตฺถ ภิกฺขเว’’ติ ‘‘อิธ ภิกฺขเว ภิกฺขู’’ติอาทีสุ ปน พุทฺธสฺส ภิกฺขูนํ อามนฺตนปาฬีสุ สนฺธิวิสยาวิสเยสุ ‘‘ภิกฺขเว’’ติ ปทํ ทิฏฺฐํ. ‘‘อรญฺเญ รุกฺขมูเล วา, สุญฺญาคาเรว ภิกฺขโว’’ติ ‘‘ตตฺร โข ภควา ภิกฺขู อามนฺเตสิ ภิกฺขโว’’ติ เอวมาทีสุ พุทฺธสฺส ภิกฺขูนํ อามนฺตนปาฬีสุ ‘‘ภิกฺขโว’’ติ อามนฺตนปทํ คาถาสุ จ ทิฏฺฐํ, จุณฺณิยปเทสุ จ สนฺธิวิสเยเยว ทิฏฺฐํ. อิจฺเจวํ – गरु, गरू, गरवो, गरुनो (प्रथमा)। गरुं, गरू, गरवो, गरुनो (द्वितीया)। भो गरु, भवन्तो गरू, गरवो, गरुनो (सम्बोधन)। शेष भिक्खु के समान है। यहाँ 'भत्तु च गरुनो सब्बे, पटिपूजेति पण्डिता' यह पालि उदाहरण है। वहाँ 'भिक्खवे' यह संबोधन पद केवल गद्य (चुण्णिय) पदों में ही देखा जाता है, गाथाओं में नहीं। 'भिक्खवो' यह प्रथमा पद केवल गाथाओं में ही देखा जाता है, गद्य पदों में नहीं। इसके अतिरिक्त, 'भिक्खवे' यह संबोधन पद श्रावक द्वारा भिक्षुओं को संबोधित करने वाली पालि में केवल संधि के विषय में ही देखा जाता है, असंधि के विषय में नहीं; परंतु बुद्ध द्वारा भिक्षुओं को संबोधित करने वाली पालि में संधि और असंधि दोनों विषयों में देखा जाता है। 'भिक्खवो' यह संबोधन पद बुद्ध द्वारा भिक्षुओं को संबोधित करने वाली पालि में गाथाओं में भी देखा जाता है और गद्य पदों में केवल संधि के विषय में देखा जाता है। श्रावक द्वारा भिक्षुओं को संबोधित करने वाली पालि में यह नहीं देखा जाता - यह इन दोनों का विशेष अंतर देखना चाहिए। जैसे कि 'एवञ्च पन भिक्खवे इमं सिक्खापदं उद्दिसेय्याथ' इत्यादि में 'भिक्खवे' पद केवल गद्य पदों में ही देखा गया है। 'भिक्खवो तिसता इमे, याचन्ति पञ्जलीकता' इत्यादि में 'भिक्खवो' यह प्रथमा पद केवल गाथाओं में ही देखा गया है। 'आयुष्मा सारिपुत्त ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया - आवुसो भिक्खवे' इत्यादि श्रावक द्वारा भिक्षुओं को संबोधित करने वाली पालियों में केवल संधि के विषय में ही 'भिक्खवे' पद देखा गया है। 'भिक्षुओं को आमंत्रित किया - सोतुकामत्य भिक्खवे' और 'इध भिक्खवे भिक्खू' इत्यादि बुद्ध द्वारा भिक्षुओं को संबोधित करने वाली पालियों में संधि और असंधि दोनों विषयों में 'भिक्खवे' पद देखा गया है। 'अरण्ये रुक्खमूले वा, सुञ्ञागारेव भिक्खवो' और 'तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि भिक्खवो' इत्यादि बुद्ध द्वारा भिक्षुओं को संबोधित करने वाली पालियों में 'भिक्खवो' संबोधन पद गाथाओं में भी देखा गया है और गद्य पदों में केवल संधि के विषय में देखा गया है। इस प्रकार - จุณฺณิเยว ปเท ทิฏฺฐํ, ‘‘ภิกฺขเว’’ติ ปทํ ทฺวิธา; ยโต ปวตฺตเต สนฺธิ-วิสยาวิสเยสุ ตํ. 'भिक्खवे' यह पद दो प्रकार से गद्य पद में ही देखा गया है; क्योंकि वह संधि के विषय और अविषय (असंधि) दोनों में प्रवृत्त होता है। ‘‘ภิกฺขโว’’ติ ปทํ ทิฏฺฐํ, คาถายญฺเจว จุณฺณิเย; ปทสฺมิมฺปิ จ สนฺธิสฺส, วิสเยวาติ นิทฺทิเสติ. 'भिक्खवो' यह पद गाथा में और गद्य पद में भी देखा गया है, परंतु (गद्य में) केवल संधि के विषय में ही - ऐसा निर्देश करना चाहिए। สวินิจฺฉโยยํ อุการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह उकारान्त पुल्लिंग शब्दों के प्रकृति रूप की नामिक पदमाला का विनिश्चय सहित विभाग है। อุการนฺตตาปกติกํ อุการนฺตปุลฺลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. उकारान्त प्रकृति वाला उकारान्त पुल्लिंग समाप्त हुआ। อิทานิ ปน สยมฺภูอิจฺเจตสฺส ปกติรูปสฺส ตํสทิสานญฺจ นามิกปทมาลํ กถยาม – अब हम 'स्वयम्भू' इस प्रकृति रूप और उसके समान शब्दों की नामिक पदमाला (शब्द-रूप) कहते हैं। สยมฺภู[Pg.253], สยมฺภู, สยมฺภุโว. สยมฺภุํ, สยมฺภู, สยมฺภุโว. สยมฺภุนา, สยมฺภูหิ, สยมฺภูภิ. สยมฺภุสฺส, สยมฺภุโน, สยมฺภูนํ. สยมฺภุนา, สยมฺภุสฺมา, สยมฺภุมฺหา, สยมฺภูหิ, สยมฺภูภิ. สยมฺภุสฺส, สยมฺภุโน, สยมฺภูนํ. สยมฺภุสฺมึ, สยมฺภุมฺหิ, สยมฺภูสุ. โภ สยมฺภุ, โภ สยมฺภู, ภวนฺโต สยมฺภู, สยมฺภุโว. เอวํ ปภู อภิภูวิภู อิจฺจาทีนิปิ. स्वयम्भू, स्वयम्भू, स्वयम्भुवो। स्वयम्भुं, स्वयम्भू, स्वयम्भुवो। स्वयम्भुना, स्वयम्भूहि, स्वयम्भूभि। स्वयम्भुस्स, स्वयम्भुनो, स्वयम्भूनां। स्वयम्भुना, स्वयम्भुस्मा, स्वयम्भुम्हा, स्वयम्भूहि, स्वयम्भूभि। स्वयम्भुस्स, स्वयम्भुनो, स्वयम्भूनां। स्वयम्भुस्मिं, स्वयम्भुम्हि, स्वयम्भूुसु। भो स्वयम्भु, भो स्वयम्भू, भवन्तो स्वयम्भू, स्वयम्भुवो। इसी प्रकार पभू, अभिभू, विभू आदि भी। สพฺพญฺญู, สพฺพญฺญู, สพฺพญฺญุโน. สพฺพญฺญุํ, สพฺพญฺญู, สพฺพญฺญุโน. โภ สพฺพญฺญุ, ภวนฺโต สพฺพญฺญู, สพฺพญฺญุโน, เสสาสุ วิภตฺตีสุ ปทานิ ภิกฺขุสทิสานิ ภวนฺติ, เอวํ วิทู วิญฺญู กตญฺญู มคฺคญฺญู ธมฺมญฺญู อตฺถญฺญู กาลญฺญู รตฺตญฺญู มตฺตญฺญู วทญฺญู อวทญฺญู อิจฺจาทีนิ. सब्बञ्ञू, सब्बञ्ञू, सब्बञ्ञुनो। सब्बञ्ञुं, सब्बञ्ञू, सब्बञ्ञुनो। भो सब्बञ्ञु, भवन्तो सब्बञ्ञू, सब्बञ्ञुनो, शेष विभक्तियों में पद भिक्खु के समान होते हैं, इसी प्रकार विदू, विञ्ञू, कृतञ्ञू, मग्गञ्ञू, धम्मञ्ञू, अत्थञ्ञू, कालञ्ञू, रत्तञ्ञू, मत्तञ्ञू, वदञ्ञू, अवदञ्ञू आदि। ตตฺร ‘‘เย จ ลทฺธา มนุสฺสตฺตํ, วทญฺญู วีตมจฺฉรา’’ติ เอตฺถ ‘‘วทญฺญู’’ติ ปจฺจตฺตพหุวจนสฺส ทสฺสนโต สยมฺภู สพฺพญฺญู อิจฺจาทีนมฺปิ ปจฺจตฺโตปโยคพหุวจนตฺตํ คเหตพฺพํ. อปิจ ‘‘วิทู, วิญฺญู’’ติอาทีสุ ‘‘ปรจิตฺตวิทุนี’’ติ อิตฺถิลิงฺคทสฺสนโต อิตฺถิลิงฺเค วตฺตพฺเพ ‘‘วิทุนี, วิทุนี, วิทุนิโย. วิทุนึ, วิทุนี, วิทุนิโย. วิทุนิยา’’ติ อิตฺถินเยน ปทมาลา กาตพฺพา. ตถา ‘‘วิญฺญู ปฏิพลา สุภาสิตทุพฺภาสิตํ ทุฏฺฐุลฺลาทุฏฺฐุลฺลํ อาชานิตุ’’นฺติ เอตฺถ ‘‘วิญฺญู’’ติ อิตฺถิลิงฺคทสฺสนโต ‘‘โกธนา อกตญฺญู จ, ปิสุณา มิตฺตเภทิกา’’ติ เอตฺถ จ ‘‘อกตญฺญู’’ติ อิตฺถิลิงฺคทสฺสนโตปิ ‘‘วิญฺญู, วิญฺญู, วิญฺญุโย. วิญฺญุํ, วิญฺญู, วิญฺญุโย. วิญฺญุยา’’ติ จ ‘‘กตญฺญู, กตญฺญู, กตญฺญุโย. กตญฺญุํ, กตญฺญู, กตญฺญุโย, กตญฺญุยาติ จ ชมฺพูนเยน ปทมาลา กาตพฺพา. เอวํ ‘‘มคฺคญฺญู, ธมฺมญฺญู’’อิจฺจาทีสุปิ. ‘‘สยมฺภู’’ติ ปเท ปน [Pg.254] ‘‘สยมฺภุ ญาณํ โคตฺรภุ จิตฺต’’นฺติ ทสฺสนโต นปุํสกลิงฺคตฺเต วตฺตพฺเพ ‘‘สยมฺภุ, สยมฺภู, สยมฺภูนิ. สยมฺภุํ, สยมฺภู, สยมฺภูนี’’ติ นปุํสเก อายุนโยปิ คเหตพฺโพ. เอส นโย เสเสสุปิ ยถารหํ คเหตพฺโพ. वहाँ ‘‘ये च लद्धा मनुस्सत्तं, वदञ्ञू वीतमच्छरा’’ यहाँ ‘‘वदञ्ञू’’ यह प्रथमा बहुवचन के रूप में देखे जाने के कारण स्वयम्भू, सब्बञ्ञू आदि के भी प्रथमा और द्वितीया बहुवचन के रूप ग्रहण करने चाहिए। इसके अतिरिक्त ‘‘विदू, विञ्ञू’’ आदि में ‘‘परचित्तविदुनी’’ इस प्रकार स्त्रीलिंग देखे जाने के कारण स्त्रीलिंग में कहे जाने पर ‘‘विदुनी, विदुनी, विदुनियो। विदुनिं, विदुनी, विदुनियो। विदुनिया’’ इस प्रकार स्त्रीलिंग के अनुसार पदमाला बनानी चाहिए। उसी प्रकार ‘‘विञ्ञू पटिबला सुभासितदुब्भासितं दुट्ठुल्लादुट्ठुल्लं आजानितुं’’ यहाँ ‘‘विञ्ञू’’ स्त्रीलिंग में देखे जाने के कारण और ‘‘कोधना अकतञ्ञू च, पिसुणा मित्तभेदिका’’ यहाँ ‘‘अकतञ्ञू’’ स्त्रीलिंग में देखे जाने के कारण भी ‘‘विञ्ञू, विञ्ञू, विञ्ञुयो। विञ्ञुं, विञ्ञू, विञ्ञुयो। विञ्ञुया’’ और ‘‘कतञ्ञू, कतञ्ञू, कतञ्ञुयो। कतञ्ञुं, कतञ्ञू, कतञ्ञुयो, कतञ्ञुया’’ इस प्रकार जम्बू के नियम के अनुसार पदमाला बनानी चाहिए। इसी प्रकार ‘‘मग्गञ्ञू, धम्मञ्ञू’’ आदि में भी। ‘‘स्वयम्भू’’ पद में तो ‘‘स्वयम्भु ञाणं गोत्रभु चित्तं’’ देखे जाने के कारण नपुंसक लिंग होने पर ‘‘स्वयम्भु, स्वयम्भू, स्वयम्भूनि। स्वयम्भुं, स्वयम्भू, स्वयम्भूनी’’ इस प्रकार नपुंसक लिंग में आयु के नियम के अनुसार ग्रहण करना चाहिए। यही नियम शेष में भी यथायोग्य ग्रहण करना चाहिए। สวินิจฺฉโยยํ อูการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह ऊकारान्त पुल्लिंग शब्दों के प्रकृति रूप का सविनिश्चय नामिक पदमाला विभाग है। อูการนฺตตาปกติกํ อูการนฺตปุลฺลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. ऊकारान्त प्रकृति वाला ऊकारान्त पुल्लिंग समाप्त हुआ। อิติ สพฺพถาปิ ปุลฺลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส इस प्रकार सभी प्रकार से पुल्लिंगों के प्रकृति रूप का— นามิกปทมาลาวิภาโค สมตฺโต. नामिक पदमाला विभाग समाप्त हुआ। ยสฺมา ปนายํ สมตฺโตปิ ปาวจนาทีสุ ยํ ยํ ฐานํ โสตูนํ สมฺมุยฺหนฏฺฐานํ ทิสฺสติ, ตตฺถ ตตฺถ โสตูนมนุคฺคหาย โจทนาโสธนาวเสน สํสยํ สมุคฺฆาเฏตฺวา ปุน วตฺตพฺโพ โหติ, ตสฺมา กิญฺจิ ปเทสเมตฺถ กถยาม. क्योंकि यह समाप्त होने पर भी प्रवचन आदि में जहाँ-जहाँ श्रोताओं के लिए सम्मोह का स्थान दिखाई देता है, वहाँ-वहाँ श्रोताओं के अनुग्रह के लिए चोदना और शोधन के द्वारा संशय का उन्मूलन करके पुनः कहना चाहिए, इसलिए यहाँ कुछ अंश कहते हैं। ยํ กิร โภ ปาฬิยํ ‘‘สญฺญเต พฺรหฺมจารโย, อปเจ พฺรหฺมจารโย’’ติ จ รูปํ อิการนฺตสฺส อคฺคิสทฺทสฺส ‘‘อคฺคโย’’ติ รูปมิว วุตฺตํ, ตํ ตถา อวตฺวา อีการนฺตสฺส ทณฺฑีสทฺทสฺส ‘‘ทณฺฑิโน’’ติ รูปมิว ‘‘พฺรหฺมจาริโน’’อิจฺเจว วตฺตพฺพนฺติ? สจฺจํ, ตตฺถ ‘‘พฺรหฺมํ จรตีติ พฺรหฺมจาริ ยถา มุนาตีติ มุนี’’ติ เอวํ อิการนฺตวเสน อิจฺฉิตตฺตา. ‘‘มุนโย อคฺคโย’’ติ รูปานิ วิย ‘‘พฺรหฺมจารโย’’ติ รูปํ ภวติ. อญฺญตฺถ ปน ‘‘พฺรหฺมํ จรณสีโลติ พฺรหฺมจารี, ยถา ทุกฺกฏํ กมฺมํ กรณสีโลติ ทุกฺกฏกมฺมการี’’ติ เอวํ ตสฺสีลตฺถํ คเหตฺวา อีการนฺตวเสน คหเณ ‘‘ทุกฺกฏกมฺมการิโน’’ติ รูปมิว ‘‘ทณฺโฑ อสฺส อตฺถีติ ทณฺฑี’’ติ อีการนฺตสฺส สทฺทสฺส ‘‘ทณฺฑิโน’’ติ รูปมิว จ ‘‘พฺรหฺมจาริโน’’ติ รูปํ ภวติ. ตถา หิ ‘‘อิเม หิ นาม ธมฺมจาริโน สมจาริโน พฺรหฺมจาริโน สจฺจวาทิโน [Pg.255] สีลวนฺโต กลฺยาณธมฺมา ปฏิชานิสฺสนฺตี’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. เอวํ อิการนฺตวเสน ‘‘พฺรหฺมจารโย’’ติ ปจฺจตฺโตปโยคาลปนพหุวจนรูปํ ยุชฺชติ, ปุน อีการนฺตวเสน ‘‘พฺรหฺมจาริโน’’ติ ปจฺจตฺโตปโยคาลปนพหุวจนรูปมฺปิ ยุชฺชติ, ตสฺมา ‘‘พฺรหฺมจาริ, พฺรหฺมจารี, พฺรหฺมจารโย’’ติ อคฺคินเยน, ‘‘พฺรหฺมจารี, พฺรหฺมจารี, พฺรหฺมจาริโน’’ติ ทณฺฑีนเยน จ ปทมาลา คเหตพฺพา. हे महानुभाव! पालि में जो ‘‘सञ्ञते ब्रह्मचारयो, अपचे ब्रह्मचारयो’’ यह रूप इकारान्त अग्गि शब्द के ‘‘अग्गयो’’ रूप के समान कहा गया है, उसे वैसा न कहकर ईकारान्त दण्डी शब्द के ‘‘दण्डिनो’’ रूप के समान ‘‘ब्रह्मचारिनो’’ ही कहना चाहिए क्या? सत्य है, वहाँ ‘‘ब्रह्मं चरतीति ब्रह्मचारि यथा मुनातीति मुनी’’ इस प्रकार इकारान्त के रूप में इष्ट होने के कारण ‘‘मुनयो अग्गयो’’ रूपों के समान ‘‘ब्रह्मचारयो’’ रूप होता है। अन्यत्र तो ‘‘ब्रह्मं चरणसीलोति ब्रह्मचारी, यथा दुक्कटं कम्मं करणसीलोति दुक्कटकम्मकारी’’ इस प्रकार तच्छील अर्थ में ग्रहण करके ईकारान्त के रूप में ग्रहण करने पर ‘‘दुक्कटकम्मकारिनो’’ रूप के समान और ‘‘दण्डो अस्स अत्थीति दण्डी’’ इस ईकारान्त शब्द के ‘‘दण्डिनो’’ रूप के समान ‘‘ब्रह्मचारिनो’’ रूप होता है। क्योंकि पालि में ‘‘इमे हि नाम धम्मचारिनो समचारिनो ब्रह्मचारिनो सच्चवादिनो सीलवन्तो कल्याणधम्मा पटिजानिस्सन्ति’’ ऐसा देखा जाता है। इस प्रकार इकारान्त के रूप में ‘‘ब्रह्मचारयो’’ यह प्रथमा, द्वितीया और सम्बोधन बहुवचन का रूप युक्त है, और पुनः ईकारान्त के रूप में ‘‘ब्रह्मचारिनो’’ यह प्रथमा, द्वितीया और सम्बोधन बहुवचन का रूप भी युक्त है, इसलिए ‘‘ब्रह्मचारि, ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारयो’’ इस प्रकार अग्नि के अनुसार, और ‘‘ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिनो’’ इस प्रकार दण्डी के अनुसार पदमाला ग्रहण करनी चाहिए। ยํ ปน อายสฺมา พุทฺธโฆโส ‘‘ยถา โสภนฺติ ยติโน, สีลภูสนภูสิตา’’ติ เอตฺถ ยติสทฺทสฺส อิการนฺตสฺส อคฺคิสทฺทสฺส ‘‘อคฺคโย’’ติ รูปํ วิย ‘‘ยตโย’’ติ รูปํ อวตฺวา กสฺมา อีการนฺตสฺส ทณฺฑีสทฺทสฺส ‘‘ทณฺฑิโน’’ติ รูปํ วิย ‘‘ยติโน’’ติ รูปํ ทสฺเสติ. นนฺเวสา ปมาทเลขา วิย ทิสฺสติ. ยถา หิ ‘‘กุกฺกุฏา มณโย ทณฺฑา สิวโย เทว เต กุทฺธา’’ติ ปาฬิคติยา อุปปริกฺขิยมานาย ‘‘ยตโย’’ติ รูเปเนว ภวิตพฺพํ อิการนฺตตฺตาติ? นายํ ปมาทเลขา. ‘‘วทนสีโล วาที’’ติ เอตฺถ วิย ตสฺสีลตฺถํ คเหตฺวา อีการนฺตวเสน โยชเน นิทฺโทสตฺตา, ตสฺมา ‘‘ยตนสีโล ยตี’’ติ เอวํ ตสฺสีลตฺถํ เจตสิ สนฺนิธาย อีการนฺตวเสน ‘‘ยติโน’’ติ สมฺปทานสามีนเมกวจนสทิสํ ปจฺจตฺตพหุวจนรูปํ ภทนฺเตน พุทฺธโฆเสน ทสฺสิตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. อุปโยคาลปนพหุวจนรูปมฺปิ ตาทิสเมว. किन्तु आयुष्मान बुद्धघोष ने 'यथा सोभन्ति यतिनो, सीलभूषणभूसिता' यहाँ इकारान्त 'यति' शब्द का 'अग्नि' शब्द के 'अग्गयो' रूप के समान 'यतयो' रूप न कहकर, ईकारान्त 'दण्डी' शब्द के 'दण्डिनो' रूप के समान 'यतिनो' रूप क्यों दिखाया है? क्या यह प्रमाद-लेख जैसा नहीं दिखता? क्योंकि 'कुक्कुटा मणयो दण्डा सिवयो देव ते कुद्धा' इस पालि पद्धति के अनुसार विचार करने पर इकारान्त होने के कारण 'यतयो' रूप ही होना चाहिए? यह प्रमाद-लेख नहीं है। 'वदनसीलो वादी' यहाँ के समान 'तच्छील' अर्थ को ग्रहण कर ईकारान्त के रूप में योजना करने पर निर्दोष होने से, इसलिए 'यतनसीलो यती' इस प्रकार तच्छील अर्थ को मन में रखकर ईकारान्त के रूप में 'यतिनो' यह सम्प्रदान और स्वामी के एकवचन के समान प्रथमा बहुवचन का रूप भदन्त बुद्धघोष द्वारा दिखाया गया है, ऐसा समझना चाहिए। द्वितीया और सम्बोधन बहुवचन के रूप भी वैसे ही हैं। ยตฺถ ปน ตสฺสีลตฺถํ อคฺคเหตฺวา ‘‘โย มุนาติ อุโภ โลเก, มุนิ เตน ปวุจฺจตี’’ติ เอตฺถ วิย ‘‘ยตติ วีริยํ กโรตีติ ยตี’’ติ กตฺตุการกวเสน อิการนฺตภาโว คยฺหติ. ตตฺถ ‘‘มุนโย มณโย สิวโย’’ติ โยการนฺตรูปานิ วิย ‘‘ยตโย’’ติ โยการนฺตํ ปจฺจตฺตพหุวจนรูปญฺจ [Pg.256] อุปโยคาลปนพหุวจนรูปญฺจ ภวติ, เอวํ อีการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ตีสุ ฐาเนสุ โยการนฺตาเนว รูปานิ ภวนฺตีติ ทฏฺฐพฺพํ. जहाँ 'तच्छील' अर्थ को ग्रहण न कर 'यो मुनाति उभो लोके, मुनि तेन पवुच्चति' यहाँ के समान 'यतति वीरियं करोतीति यति' इस प्रकार कर्तृकारक के रूप में इकारान्त भाव ग्रहण किया जाता है, वहाँ 'मुनयो मणयो सिवयो' इन योकारान्त रूपों के समान 'यतयो' यह योकारान्त प्रथमा बहुवचन रूप और द्वितीया तथा सम्बोधन बहुवचन रूप होता है। इस प्रकार ईकारान्त पुल्लिंग शब्दों के तीन स्थानों में योकारान्त रूप ही होते हैं, ऐसा समझना चाहिए। ยทิ เอวํ อิการนฺตปุลฺลิงฺคานํ สารมติ สุทฺธทิฏฺฐิสมฺมาทิฏฺฐิมิจฺฉาทิฏฺฐิวชิรพุทฺธิ สทฺทาที กถนฺติ? เอเตสํ ปน อิการนฺตวเสน นิทฺทิฏฺฐานมฺปิ สมาสปทตฺตา อคฺคินเย อฏฺฐตฺวา ยถาสมฺภวํ ทณฺฑีนเย ติฏฺฐนโต โนการนฺตาเนว รูปานิ. ตถา หิ ‘‘อสาเร สารมติโน’’ติ โนการนฺตปจฺจตฺตพหุวจนปาฬิ ทิสฺสติ, อุปโยคาลปนพหุวจนรูปมฺปิ ตาทิสเมว ทฏฺฐพฺพํ. นนุ จ โภ กจฺจายนปฺปกรเณ ‘‘อตฺเถ วิสารทมตโย’’ติ เอตฺถ สมาสปทสฺส อิการนฺตปุลฺลิงฺคสฺส โยการนฺตสฺส ปจฺจตฺตพหุวจนปาฐสฺส ทสฺสนโต สารมติสทฺทาทีนมฺปิ ‘‘วิสารทมตโย’’ติ รูเปน วิย โยการนฺเตหิ รูเปหิ ภวิตพฺพนฺติ? นปิ ภวิตพฺพํ พุทฺธวจเน สมาสปทานํ อิการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ‘‘วิสารทมตโย’’ติ รูปสทิสสฺส รูปสฺส อทสฺสนโตติ. यदि ऐसा है, तो इकारान्त पुल्लिंग 'सारमति', 'शुद्धदिट्ठि', 'सम्मादिट्ठि', 'मिच्छादिट्ठि', 'वजिरबुद्धि', 'सद्धा' आदि का क्या होगा? इनका इकारान्त के रूप में निर्देश होने पर भी समास पद होने के कारण 'अग्नि' के नियम में न रहकर यथासम्भव 'दण्डी' के नियम में रहने से नो-कारान्त ही रूप होते हैं। क्योंकि 'असारे सारमतिनो' यह नो-कारान्त प्रथमा बहुवचन का पालि पाठ देखा जाता है, द्वितीया और सम्बोधन बहुवचन के रूप भी वैसे ही समझने चाहिए। हे भो! क्या कच्चायन प्रकरण में 'अत्थे विसारदमतयो' यहाँ समास पद इकारान्त पुल्लिंग के योकारान्त प्रथमा बहुवचन पाठ के दिखने से 'सारमति' आदि शब्दों के भी 'विसारदमतयो' रूप के समान योकारान्त रूपों के साथ होने चाहिए? नहीं होने चाहिए, क्योंकि बुद्धवचन में 'विसारदमतयो' रूप के समान समास पद इकारान्त पुल्लिंग शब्दों का रूप नहीं देखा जाता है। นนุ จ โภ พุทฺธวจเน ‘‘ปญฺจิเม คหปตโย อานิสํสา. เต โหนฺติ ชานิปตโย, อญฺญมญฺญํ ปิยํวทา’’ติ สมาสปทานํ อิการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ‘‘วิสารทมตโย’’ติ รูปสทิสานิ โยการนฺตานิ รูปานิ ทิสฺสนฺติ. เอวํ สนฺเต กสฺมา ‘‘พุทฺธวจเน สมาสปทานํ อิการนฺตปุลฺลิงฺคานํ ‘‘วิสารทมตโย’’ติ รูปสทิสสฺส โยการนฺตสฺส รูปสฺส อทสฺสนโต’’ติ วุตฺตนฺติ? เอตฺถ วุจฺจเต – วิสทิสตฺตํ ปฏิจฺจ. คหปติสทฺทาทีสุ หิ ยสฺมา ปติสทฺโท สภาเวเนว ปุลฺลิงฺโค, น ตุ สมาสโต ปุพฺเพ อิตฺถิลิงฺคปกติโก หุตฺวา ปจฺฉา ปุลฺลิงฺคภาวํ ปตฺโต, ตสฺมา อีทิเสสุ ฐาเนสุ ‘‘คหปตโย, ชานิปตโย’’ติ โยการนฺตานิ, ‘‘เสนาปตโย, เสนาปติโน’’ติ โย โนการนฺตานิ [Pg.257] จ ปจฺจตฺโตปโยคาลปนพหุวจนรูปานิ ภวนฺติ. ตถา หิ ‘‘ตตฺตกา เสนาปติโน’’ติ อฏฺฐกถาปาโฐ ทิสฺสติ. ยสฺมา ปน สารมติ สุทฺธทิฏฺฐิสมฺมาทิฏฺฐิ มิจฺฉาทิฏฺฐิ วชิรพุทฺธิ สทฺทาทีสุ มติทิฏฺฐิสทฺทาทโย สมาสโต ปุพฺเพ อิตฺถิลิงฺคปกติกา หุตฺวา ปจฺฉา พหุพฺพีหิสมาสวเสน ปุลฺลิงฺคภาวปฺปตฺตา, ตสฺมา อีทิเสสุ ฐาเนสุ ‘‘สารมติโน สุทฺธทิฏฺฐิโน สมฺมาทิฏฺฐิโน มิจฺฉาทิฏฺฐิโน วชิรพุทฺธิโน’’ติอาทีนิ’โนการนฺตานิเยว ปจฺจตฺโตปโยคาลปนพหุวจนรูปานิ ภวนฺติ, สมฺปทานสามีนเมกวจเนหิ สทิสานีติ นิฏฺฐเมตฺถาวคนฺตพฺพํ. हे भो! क्या बुद्धवचन में 'पञ्चिमे गहपतयो आनिसंसा। ते होन्ति जानिपतयो, अञ्ञमञ्ञं पियंवदा' यहाँ समास पद इकारान्त पुल्लिंग शब्दों के 'विसारदमतयो' रूप के समान योकारान्त रूप देखे जाते हैं? ऐसा होने पर 'बुद्धवचन में समास पद इकारान्त पुल्लिंग शब्दों का विसारदमतयो रूप के समान योकारान्त रूप नहीं दिखने के कारण' ऐसा क्यों कहा गया? यहाँ कहा जाता है—विसदृशता के कारण। क्योंकि 'गृहपति' आदि शब्दों में 'पति' शब्द स्वभाव से ही पुल्लिंग है, न कि समास से पूर्व स्त्रीलिंग प्रकृति का होकर बाद में पुल्लिंग भाव को प्राप्त हुआ है। इसलिए ऐसे स्थानों पर 'गहपतयो, जानिपतयो' ये योकारान्त, और 'सेनापतयो, सेनापतिनो' ये यो और नो-कारान्त प्रथमा, द्वितीया और सम्बोधन बहुवचन के रूप होते हैं। क्योंकि 'तत्तका सेनापतिनो' यह अट्ठकथा पाठ देखा जाता है। किन्तु चूँकि 'सारमति', 'शुद्धदिट्ठि', 'सम्मादिट्ठि', 'मिच्छादिट्ठि', 'वजिरबुद्धि', 'सद्धा' आदि में 'मति', 'दिट्ठि' आदि शब्द समास से पूर्व स्त्रीलिंग प्रकृति के होकर बाद में बहुव्रीहि समास के कारण पुल्लिंग भाव को प्राप्त हुए हैं, इसलिए ऐसे स्थानों पर 'सारमतिनो, शुद्धदिट्ठिनो, सम्मादिट्ठिनो, मिच्छादिट्ठिनो, वजिरबुद्धिनो' आदि नो-कारान्त ही प्रथमा, द्वितीया और सम्बोधन बहुवचन के रूप होते हैं, जो सम्प्रदान और स्वामी के एकवचन के समान होते हैं—ऐसा यहाँ निश्चय समझना चाहिए। เสฏฺฐิ สารถิจกฺกวตฺติสามิอิจฺเจเตสุ กถนฺติ? เอตฺถ ปน อยํ วิเสโส เวทิตพฺโพ – กตฺถจิ ปาเฐ ‘‘เสฏฺฐี สารถี จกฺกวตฺตี สามี’’ติ อนฺตกฺขรสฺส ทีฆตฺตํ ทิสฺสติ, กตฺถจิ ปน ‘‘เสฏฺฐิ สารถิ จกฺกวตฺติ สามิ’’อิติ อนฺตกฺขรสฺส รสฺสตฺตํ ทิสฺสติ. กิญฺจาปิ รสฺสตฺตเมเตสํ ทิสฺสติ, ตถาปิ ตตฺถ ตตฺถ ปจฺจตฺตวจนาทิภาเวน ‘‘เสฏฺฐิโน สารถิโน’’ติอาทิปโยคทสฺสนโต รสฺสํ กตฺวา เอตานิ อุจฺจาริยนฺตีติ ญายติ, ตสฺมา เอวํ นิพฺพจนตฺโถ คเหตพฺโพ – เสฏฺฐํ ธนสารํ, ฐานนฺตรํ วา อสฺส อตฺถีติ เสฏฺฐี. อสฺสทมฺมาทโย สารณสีโลติ สารถี. จกฺกํ ปวตฺตนสีโลติ จกฺกวตฺตี. สํ เอตสฺส อตฺถีติ สามีติ. อสฺสตฺถิกตสฺสีลตฺถสทฺทา หิ โนการนฺตรูปวเสน สมานคติกา ภวนฺติ ยถา ‘‘ทณฺฑิโน ภูมิสายิโน’’ติ. อปโรปิ นิพฺพจนตฺโถ อีการนฺตวเสน อสฺสทมฺมาทโย สาเรตีติ สารถี. ตถา หิ ‘‘ปุริสทมฺเม สาเรตีติ ปุริสทมฺมสารถี’’ติ วุตฺตํ. จกฺกํ วตฺเตตีติ จกฺกวตฺตี. เอวํ กตฺตุการกวเสน อีการนฺตตฺตํ คเหตฺวา กตฺถจิ ลพฺภมานมฺปิ อิการนฺตตฺตํ อนเปกฺขิตฺวา พุทฺธวจนานุรูเปน ‘‘สารถิโน [Pg.258] จกฺกวตฺติโน’’ติอาทีนิ โนการนฺตรูปานิ คเหตฺวา ทณฺฑีนเยน โยเชตพฺพานิ ‘‘ทณฺฑินี’’ติอาทิกํ วชฺชิตพฺพํ วชฺเชตฺวา. เอวํ ‘‘เสฏฺฐิโน สารถิโน จกฺกวตฺติโน สามิโน’’ติอาทีนิ โนการนฺตานิเยว รูปานิ เญยฺยานิ. सेट्ठि, सारथि, चक्कवत्ति, सामि - इनके विषय में क्या (कहा जाए)? यहाँ यह विशेषता जाननी चाहिए - कहीं पाठ में 'सेट्ठी, सारथी, चक्कवत्ती, सामी' इस प्रकार अन्तिम अक्षर की दीर्घता देखी जाती है, और कहीं 'सेट्ठि, सारथि, चक्कवत्ति, सामि' इस प्रकार अन्तिम अक्षर की ह्रस्वता देखी जाती है। यद्यपि इनकी ह्रस्वता देखी जाती है, फिर भी वहाँ-वहाँ प्रथमा विभक्ति आदि के रूप में 'सेट्ठिनो, सारथिनो' आदि प्रयोगों के दर्शन से, ह्रस्व करके इनका उच्चारण किया जाता है, ऐसा ज्ञात होता है। इसलिए इस प्रकार व्युत्पत्ति का अर्थ ग्रहण करना चाहिए - श्रेष्ठ धन-सार या उच्च स्थान जिसका है, वह 'सेट्ठी' है। अश्व-दम्य आदि को प्रेरित करने के स्वभाव वाला 'सारथी' है। चक्र को प्रवृत्त करने के स्वभाव वाला 'कक्कवत्ती' है। 'स्व' (अपना/धन) जिसका है, वह 'सामी' है। 'अत्थितद्धित' (अस्ति-अर्थ वाले), 'तच्छील' (स्वभाव वाले) और 'अत्थ' शब्द 'नोकारान्त' (इन-प्रत्ययान्त) रूप के कारण 'दण्डिनो, भूमिसायिनो' के समान गति वाले होते हैं। एक अन्य व्युत्पत्ति का अर्थ ईकारान्त के अनुसार है - अश्व-दम्य आदि को प्रेरित करता है, इसलिए 'सारथी' है। जैसा कि कहा गया है - 'पुरुष-दम्यों को प्रेरित करता है, इसलिए पुरुषदम्यसारथी है'। चक्र को वर्तित (चलाता) है, इसलिए 'चक्कवत्ती' है। इस प्रकार कर्तृ-कारक के अनुसार ईकारान्तता को ग्रहण करके, कहीं प्राप्त होने वाली इकारान्तता की अपेक्षा न करते हुए, बुद्धवचन के अनुरूप 'सारथिनो, चक्कवत्तिनो' आदि नोकारान्त रूपों को ग्रहण करके 'दण्डी' के नियम के अनुसार जोड़ना चाहिए, 'दण्डिनी' आदि (स्त्रीलिंग) को छोड़कर। इस प्रकार 'सेट्ठिनो, सारथिनो, चक्कवत्तिनो, सामिनो' आदि नोकारान्त रूप ही जानने चाहिए। อตฺร กิญฺจิ ปโยคํ นิทสฺสนมตฺตํ กถยาม. ‘‘ตาต ตโย เสฏฺฐิโน อมฺหากํ พหูปการา’’ติ จ ‘‘เต กตภตฺตกิจฺจา ‘มหาเสฏฺฐิโน มยํ คมิสฺสามา’ติ วทึสู’’ติ จ ‘‘สารถิโน อาหํสู’’ติ จ ‘‘ทฺเว จกฺกวตฺติโน’’ติ จ เอวมาทีนิ. ตตฺถ กิญฺจาปิ กตฺถจิ ‘‘เสฏฺฐิ สารถิ’’อิจฺจาทิ รสฺสตฺตปาโฐ ทิสฺสติ, ตถาปิ โส สภาเวน รสฺสตฺตภาโว ปาโฐ น โหติ, ทีฆสฺส รสฺสตฺตกรณปาโฐติ เวทิตพฺโพ. ปทมาลา จสฺส วุตฺตนเยน เวทิตพฺพา. यहाँ उदाहरण मात्र के लिए कुछ प्रयोग कहते हैं। 'तात! तीन श्रेष्ठी (सेट्ठिनो) हमारे बहुत उपकारी हैं' और 'वे भोजन का कृत्य कर चुके, हम महाश्रेष्ठी (महासेट्ठिनो) जाएँगे - ऐसा बोले' और 'सारथियों (सारथिनो) ने कहा' और 'दो चक्रवर्ती (चक्कवत्तिनो)' इत्यादि। वहाँ यद्यपि कहीं 'सेट्ठि, सारथि' आदि ह्रस्व पाठ देखा जाता है, फिर भी वह स्वभाव से ह्रस्व पाठ नहीं है, उसे दीर्घ को ह्रस्व करने वाला पाठ समझना चाहिए। इसकी पदमाला (रूप-रचना) पूर्वोक्त विधि से जाननी चाहिए। มเหสีติ เอตฺถ กถนฺติ? ‘‘มเหสี’’ติ เอตฺถ กิญฺจาปิ มเหสีสทฺโท อีการนฺตวเสน นิทฺทิสิยติ, ตถาปิ อิสิสทฺเทน สมานคติกตฺตา อิสิสทฺทสฺส อคฺคิสทฺเทน สมานปทมาลตฺตา อคฺคินเยน ปทมาลา กาตพฺพา. นนุ จ โภ เอตฺถ ตสฺสีลตฺโถ ทิสฺสติ ‘‘มหนฺเต สีลกฺขนฺธาทโย ธมฺเม เอสนสีโลติ มเหสี’’ติ, ตสฺมา ‘‘ภูมิสายี’’ติ ปทสฺส วิย ทณฺฑีนเยเนว ปทมาลา กาตพฺพาติ? น กาตพฺพา ตสฺสีลตฺถสฺส อสมฺภวโต. อิมสฺส หิ ‘‘มหนฺเต สีลกฺขนฺธาทโย ธมฺเม เอสิ คเวสิ เอสิตฺวา ฐิโตติ มเหสี’’ติ อตสฺสีลตฺโถ เอว ยุชฺชติ. กตกรณีเยสุ พุทฺธาทีสุ อริเยสุ ปวตฺตนามตฺตา. อิสิสทฺเทน จายํ สทฺโท อีสกํ สมาโน เกวลํ สมาสปริโยสาเน ทีฆวเสน อุจฺจาริยติ, รสฺสวเสน ปน ‘‘มหา อิสิ มเหสี’’ติ สนฺธิวิคฺคโห[Pg.259]. ยสฺมา รสฺสตฺตํ คเหตฺวา ตสฺส ปทมาลากรณํ ยุชฺชติ, ตสฺมา ‘‘สงฺคายึสุ มเหสโย’’ติ อิการนฺตรูปํ ทิสฺสติ. น หิ สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเน กตฺถจิปิ จตุตฺถีฉฏฺเฐกวจนรูปํ วิย ‘‘มเหสิโน’’ติ ปจฺจตฺโตปโยคาลปนพหุวจนรูปํ ทิสฺสติ. ตสฺมา อีการนฺตวเสน อุจฺจาริตสฺสปิ สโต รสฺสวเสน อุจฺจาริตสฺส วิย ‘‘มเหสิ, มเหสี, มเหสโย. มเหสึ, มเหสี, มเหสโย. มเหสินา’’ติ ปทมาลา กาตพฺพา. อปิจ มเหสีสทฺโท ยตฺถ ราชคฺคุพฺพริวาจโก, ตตฺถ อิตฺถิลิงฺโค โหติ, ตพฺพเสน ปน ‘‘มเหสี, มเหสี, มเหสิโย. มเหสึ, มเหสี, มเหสิโย. มเหสิยา’’ติ จ วกฺขมานอิตฺถีนเยน ปทมาลา กาตพฺพา. หตฺถีสทฺเท กถนฺติ? หตฺถีสทฺทสฺส ปน หตฺโถ อสฺส อตฺถีติ เอวํ อีการนฺตวเสน คหเณ ‘‘หตฺถิโน’’ติ รูปํ ภวติ. ตถา หิ ‘‘วเน หตฺถิโน’’ติ ปโยโค ทิสฺสติ. ตสฺเสว ตสฺมึเยวตฺเถ รสฺสํ กตฺวา คหเณ ‘‘หตฺถโย’’ติ รูปํ ภวติ. ตถา หิ – 'महेसी' (महर्षि) यहाँ क्या (कहा जाए)? 'महेसी' यहाँ यद्यपि 'महेसी' शब्द ईकारान्त के रूप में निर्दिष्ट है, फिर भी 'इसि' शब्द के समान गति वाला होने से और 'इसि' शब्द की 'अग्गि' शब्द के समान पदमाला होने से, 'अग्गि' के नियम के अनुसार पदमाला करनी चाहिए। क्या यहाँ 'तच्छील' अर्थ नहीं दिखता - 'महान शीलस्कन्ध आदि धर्मों की एषणा (खोज) करने के स्वभाव वाला महेसी है', इसलिए 'भूमिसायी' पद के समान 'दण्डी' के नियम से ही पदमाला करनी चाहिए? (उत्तर:) नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'तच्छील' अर्थ का अभाव है। इसके लिए 'महान शीलस्कन्ध आदि धर्मों को खोजा, अन्वेषण किया, खोजकर स्थित हुआ, वह महेसी है' - यह 'अ-तच्छील' अर्थ ही युक्त है। कृतकृत्य बुद्ध आदि आर्यों में प्रवृत्त नाम मात्र होने के कारण। 'इसि' शब्द के साथ यह शब्द थोड़ा समान है, केवल समास के अन्त में दीर्घ के रूप में उच्चारित होता है, ह्रस्व के रूप में तो 'महा इसि महेसी' यह सन्धि-विग्रह है। चूँकि ह्रस्वता को ग्रहण करके उसकी पदमाला करना उचित है, इसलिए 'सङ्गायिंसु महेसयो' (महर्षियों ने संगायन किया) यह इकारान्त रूप देखा जाता है। अट्टकथा सहित त्रिपिटक बुद्धवचन में कहीं भी चतुर्थी-षष्ठी एकवचन के रूप 'महेसिनो' के समान प्रथमा, द्वितीया और सम्बोधन बहुवचन का रूप नहीं देखा जाता है। इसलिए ईकारान्त के रूप में उच्चारित होने पर भी, ह्रस्व के रूप में उच्चारित के समान 'महेसि, महेसी, महेसयो। महेसिं, महेसी, महेसयो। महेसिना' - ऐसी पदमाला करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त 'महेसी' शब्द जहाँ राजा की प्रधान महिषी (रानी) का वाचक है, वहाँ स्त्रीलिंग होता है, उसके अनुसार 'महेसी, महेसी, महेसियो। महेसिं, महेसी, महेसियो। महेसिया' - इस प्रकार आगे कहे जाने वाले स्त्री-प्रत्यय के नियम से पदमाला करनी चाहिए। 'हत्थी' शब्द में क्या (कहा जाए)? 'हत्थी' शब्द का 'हस्त (सूंड) जिसका है' इस प्रकार ईकारान्त के रूप में ग्रहण करने पर 'हत्थिनो' रूप होता है। जैसा कि 'वने हत्थिनो' (वन में हाथी) यह प्रयोग देखा जाता है। उसी का उसी अर्थ में ह्रस्व करके ग्रहण करने पर 'हत्थयो' रूप होता है। जैसा कि - ‘‘หํสา โกญฺจา มยูรา จ, หตฺถโย ปสทา มิคา; สพฺเพ สีหสฺส ภายนฺติ, นตฺถิ กายสฺมิ ตุลฺยตา. हंस, क्रौंच और मयूर, हाथी और पृषत मृग; सभी सिंह से डरते हैं, शरीर (के आकार) में कोई समानता नहीं है। เอวเมว มนุสฺเสสุ, ทหโร เจปิ ปญฺญวา; โสปิ ตตฺถ มหา โหติ, เนว พาโล สรีรวา’’ติ इसी प्रकार मनुष्यों में, यदि छोटा भी प्रज्ञावान है; तो वह वहाँ महान होता है, न कि शरीर वाला मूर्ख। อิมสฺมึ เกฬิสีลชาตเก ‘‘หตฺถโย’’ติ อาหจฺจปทํ ทิสฺสติ. เอวมสฺส ทณฺฑีนเยน จ อคฺคินเยน จ ทฺวิธา ปทมาลา, เวทิตพฺพา. อิมินา นเยน อวุตฺเตสุปิ ฐาเนสุ ปาฬินยานุรูเปน [Pg.260] โปราณฏฺฐกถานุรูเปน จ ปทมาลา โยเชตพฺพา. इस केलिसील जातक में 'हत्थयो' यह स्पष्ट पद देखा जाता है। इस प्रकार इसकी 'दण्डी' के नियम से और 'अग्गि' के नियम से दो प्रकार की पदमाला जाननी चाहिए। इस विधि से, न कहे गए स्थानों में भी पालि-नियम के अनुरूप और प्राचीन अट्टकथा के अनुरूप पदमाला जोड़नी चाहिए। เอตฺตาวตา ภูธาตุมยานํ ปุลฺลิงฺคานํ นามิกปทมาลา สทฺธึ ลิงฺคนฺตเรหิ สทฺทนฺตเรหิ อตฺถนฺตเรหิ จ นานปฺปการโต ทสฺสิตา. इतने से भू-धातु से बने पुल्लिंग शब्दों की नामिक पदमाला, अन्य लिंगों, अन्य शब्दों और अन्य अर्थों के साथ अनेक प्रकार से दिखाई गई है। อิมํ สทฺทนีตึ สุนีตึ วิจิตฺตํ,สปญฺเญหิ สมฺมา ปรีปาลนียํ; สทา สุฏฺฐุ จินฺเตติ วาเจติ โย โส,นโร ญาณวิตฺถินฺนตํ ยาติ เสฏฺฐํ. इस विचित्र और उत्तम नीति वाली सद्धनीति की बुद्धिमानों द्वारा भली-भाँति रक्षा की जानी चाहिए; जो मनुष्य सदा इसका अच्छी तरह चिन्तन करता है और पढ़ाता है, वह श्रेष्ठ और विस्तृत ज्ञान को प्राप्त करता है। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार नौ अंगों वाली अट्टकथा सहित त्रिपिटक की वचन-पद्धतियों में विद्वानों की โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कुशलता के लिए रचित सद्धनीति प्रकरण में สวินิจฺฉโย นิคฺคหีตนฺตาทิปุลฺลิงฺคานํ निग्गहीत-अन्त (मकारान्त) आदि पुल्लिंग शब्दों के विनिश्चय सहित ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค प्रकृति-रूप की नामिक पदमाला का विभाग (समाप्त हुआ)। สตฺตโม ปริจฺเฉโท. सातवाँ परिच्छेद। สพฺพถาปิ ปุลฺลิงฺคํ สมตฺตํ. सभी प्रकार से पुल्लिंग समाप्त हुआ। ๘. อิตฺถิลิงฺคนามิกปทมาลา ८. स्त्रीलिंग नामिक पदमाला। อถ อิตฺถิลิงฺเคสุ อาการนฺตสฺส ภูธาตุมยสฺส ปกติรูปภูตสฺส ภาวิกาสทฺทสฺส นามิกปทมาลายํ วตฺตพฺพายมฺปิ ปสิทฺธสฺส ตาว กญฺญาสทฺทสฺส นามิกปทมาลํ วกฺขาม – अब स्त्रीलिंगों में आकारान्त भू-धातु से बने प्रकृति रूप भाविका शब्द की पदमाला कहे जाने पर भी, पहले प्रसिद्ध कञ्ञा शब्द की पदमाला कहेंगे— กญฺญา, กญฺญา, กญฺญาโย. กญฺญํ, กญฺญา, กญฺญาโย. กญฺญาย, กญฺญาหิ, กญฺญาภิ. กญฺญาย, กญฺญานํ. กญฺญาย, กญฺญาหิ, กญฺญาภิ. กญฺญาย, กญฺญานํ. กญฺญาย, กญฺญายํ, กญฺญาสุ. โภติ กญฺเญ, โภติโย กญฺญา, กญฺญาโย. อยมมฺหากํ รุจิ. कञ्ञा, कञ्ञा, कञ्ञायो। कञ्ञं, कञ्ञा, कञ्ञायो। कञ्ञाय, कञ्ञाहि, कञ्ञाभि। कञ्ञाय, कञ्ञानं। कञ्ञाय, कञ्ञाहि, कञ्ञाभि। कञ्ञाय, कञ्ञानं। कञ्ञाय, कञ्ञायं, कञ्ञासु। भोति कञ्ञे, भोतियो कञ्ञा, कञ्ञायो। यह हमारी रुचि है। เอตฺถ [Pg.261] ‘‘กญฺญา’’ติ เอกวจนพหุวจนวเสน วุตฺตํ, นิรุตฺติปิฏเก พหุวจนวเสน วุตฺโต นโย นตฺถิ. ตถา หิ ตตฺถ ‘‘สทฺธา ติฏฺฐติ, สทฺธาโย ติฏฺฐนฺติ. สทฺธํ ปสฺสติ, สทฺธาโย ปสฺสตี’’ติ เอตฺตกเมว วุตฺตํ, ‘‘สทฺธา’’ติ พหุวจนํ น อาคตํ. กิญฺจาปิ นาคตํ, ตถาปิ ‘‘พาหา ปคฺคยฺห ปกฺกนฺทุํ, สิวิกญฺญา สมาคตา. อเหตุ อปฺปจฺจยา ปุริสสฺส สญฺญา อุปฺปชฺชนฺติปิ นิรุชฺฌนฺติปี’’ติอาทิปาฬิทสฺสนโต พาหากญฺญา สญฺญาสทฺทาทีนํ พหุวจนตา คเหตพฺพา. จูฬนิรุตฺติยํ ‘‘โภติ กญฺเญ, โภติ กญฺญา’’ติ ทฺเว เอกวจนานิ วตฺวา ‘‘โภติโย กญฺญาโย’’ติ เอกํ พหุวจนํ วุตฺตํ. นิรุตฺติปิฏเก ปน ‘‘โภติ สทฺธา’’ติ เอกวจนํ วตฺวา ‘‘โภติโย สทฺธาโย’’ติ เอกํ พหุวจนํ วุตฺตํ. มยํ ปเนตฺถ ‘‘เอหิ พาเล ขมาเปหิ, กุสราชํ มหพฺพลํ. ผุสฺสตี วรวณฺณาเภ. เอหิ โคเธ นิวตฺตสฺสู’’ติอาทิปาฬิทสฺสนโต ‘‘โภติ กญฺเญ, โภติโย กญฺญา, กญฺญาโย’’ติ เอวํปการานิเยว อาลปเนกวจนพหุวจนานิ อิจฺฉาม. เอตฺถ ‘‘โภติ กญฺเญ’’ติ อยํ นโย อมฺมาทีสุ มาตาทีสุ จ น ลพฺภติ. यहाँ 'कन्या' (kaññā) शब्द एकवचन और बहुवचन के भेद से कहा गया है, निरुत्तिपिटक में बहुवचन के रूप में कोई नियम नहीं है। जैसे वहाँ 'सद्धा तिट्ठति' (श्रद्धा ठहरती है), 'सद्धायो तिट्ठन्ति' (श्रद्धाएँ ठहरती हैं)। 'सद्धं पस्सति' (श्रद्धा को देखता है), 'सद्धायो पस्सति' (श्रद्धाओं को देखता है) - इतना ही कहा गया है, 'सद्धा' बहुवचन के रूप में नहीं आया है। यद्यपि नहीं आया है, फिर भी 'बाहा पग्गय्ह पकन्दुं, सिविकञ्ञा समागता। अहेतु अप्पच्चया पुरिसस्स सञ्ञा उप्पज्जन्तिपि निरुज्झन्तिपि' आदि पालि प्रयोगों को देखने से 'बाहा', 'कन्या', 'सञ्ञा' आदि शब्दों की बहुवचनता ग्रहण करनी चाहिए। चुलनिरुत्ति में 'भोति कञ्ञे, भोति कञ्ञा' - ये दो एकवचन कहकर 'भोतियो कञ्ञायो' - यह एक बहुवचन कहा गया है। निरुत्तिपिटक में 'भोति सद्धा' एकवचन कहकर 'भोतियो सद्धायो' एक बहुवचन कहा गया है। हम यहाँ 'एहि बाले खमापेहि, कुसराजं महब्बलं। फुस्सती वरवण्णाभे। एहि गोधे निवत्तस्सू' आदि पालि प्रयोगों के आधार पर 'भोति कञ्ञे, भोतियो कञ्ञा, कञ्ञायो' - इस प्रकार के संबोधन एकवचन और बहुवचन चाहते हैं। यहाँ 'भोति कञ्ञे' यह नियम 'अम्मा' आदि और 'माता' आदि शब्दों में नहीं मिलता। ภาวิกา, ภาวิกา, ภาวิกาโย. ภาวิกํ, ภาวิกา, ภาวิกาโย. ภาวิกาย, ภาวิกาหิ, ภาวิกาภิ. ภาวิกาย, ภาวิกานํ. ภาวิกาย, ภาวิกาหิ, ภาวิกาภิ. ภาวิกาย, ภาวิกานํ. ภาวิกาย, ภาวิกายํ, ภาวิกาสุ. โภติ ภาวิเก, โภติโย ภาวิกา, ภาวิกาโย. भाविका, भाविका, भाविकायो। भाविकं, भाविका, भाविकायो। भाविकाय, भाविकाहि, भाविकाभि। भाविकाय, भाविकानं। भाविकाय, भाविकाहि, भाविकाभि। भाविकाय, भाविकानं। भाविकाय, भाविकायं, भाविकासु। भोति भाविके, भोतियो भाविका, भाविकायो। เอวํ เหฏฺฐุทฺทิฏฺฐานํ สพฺเพสํ ภูธาตุมยานํ ‘‘ภาวนา วิภาวนา’’อิจฺเจวมาทีนํอาการนฺตปทานํ อญฺเญสญฺจาการนฺตปทานํ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. เอตฺถญฺญานิ อาการนฺตปทานิ นาม สทฺธาทีนิ. इसी प्रकार ऊपर निर्दिष्ट सभी 'भू' धातु से बने 'भावना, विभावना' आदि आकारान्त शब्दों और अन्य आकारान्त शब्दों की नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। यहाँ अन्य आकारान्त शब्द 'सद्धा' आदि हैं। สทฺธา [Pg.262] เมธา ปญฺญา วิชฺชา, จินฺตา มนฺตา ตณฺหา’ภิชฺฌา; อิจฺฉา ปุจฺฉา ชายา มายา, เมตฺตา มตฺตา สิกฺขา สงฺขา. श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, विद्या, चिन्ता, मन्ता, तण्हा (तृष्णा), अभिज्झा; इच्छा, पुच्छा, जाया, माया, मेत्ता, मत्ता, सिक्खा, सङ्खा। ชงฺฆา พาหา คีวา ชิวฺหา, วาจา ฉายา คงฺคา นาวา; นิทฺทา กนฺตา สาลา มาลา, เวลา วีณา ภิกฺขา ลาขา. जङ्घा, बाहा, गीवा, जिव्हा, वाचा, छाया, गङ्गा, नावा; निद्दा, कन्ता, साला, माला, वेला, वीणा, भिक्खा, लाखा। คาถา เสนา เลขา’เปกฺขา, อาสา ปูชา เอสา กงฺขา; อญฺญา มุทฺทา ขิฑฺฑา ภสฺสา, ภาสา กีฬา สตฺตา เจตา. गाथा, सेना, लेखा, अपेक्खा, आसा, पूजा, एसा, कङ्खा; अञ्ञा, मुदा, खिड्डा, भस्सा, भासा, कीळा, सत्ता, चेता। ปิปาสา เวทนา สญฺญา, เจตนา ตสิณา ปชา; เทวตา วฏฺฏกา โคธา, พลากา วสุธา สภา. पिपासा, वेदना, सञ्ञा, चेतना, तसिणा, पजा; देवता, वट्टका, गोधा, बलाका, वसुधा, सभा। อุกฺกา เสผาลิกา สิกฺกา, สลากา วาลิกา สิขา; การณา วิสิขา สาขา, วจา วญฺฌา ชฏา ฆฏา. उक्का, सेफालिका, सिक्का, सलाका, वालिका, सिखा; कारणा, विसिखा, साखा, वचा, वञ्झा, जटा, घटा। ปีฬา โสณฺฑา วิตณฺฑา จ, กรุณา วนิตา ลตา; กถา นินฺทา สุธา ราธา, วาสนา สึสปา ปปา. पीळा, सोण्डा, वितण्डा, करुणा, वनिता, लता; कथा, निन्दा, सुधा, राधा, वासना, सिंसपा, पपा। ปภา สีมา ขมา เอชา,ขตฺติยา สกฺขรา สุรา; โทลา ตุลา สิลา ลีลา,ลาเล’ฬา เมขลา กลา. पभा, सीमा, खमा, एजा, खत्तिया, सक्खरा, सुरा; डोला, तुला, सिला, लीला, लाले, एळा, मेखला, कला। วฬวา สุณิสา มูสา, มญฺชูสา สุลสา ทิสา; นาสา ชุณฺหา คุหา อีหา, ลสิกา ปริสา นิสา; มาติกิจฺจาทโย เจว, ภาวิกาปทสาทิสา. वळवा, सुणिसा, मूसा, मञ्जूसा, सुलसा, दिसा; नासा, जुण्हा, गुहा, ईहा, लसिका, परिसा, निसा; मातृका (मातिका) आदि शब्द भी 'भाविका' शब्द के समान हैं। อมฺมนฺนมฺพา จ ตาตา จ, กิญฺจิเทว สมา สิยุํ; มาตา ธีตา ปนตฺตาที, ปุถเคว อิโต สิยุํ. 'अम्मा', 'अम्बा' और 'ताता' (माता के अर्थ में) कुछ समान हो सकते हैं; 'माता', 'धीता', 'पनत्ता' आदि इनसे अलग ही होने चाहिए। ปริสาสทฺทสฺส ปน สตฺตมีฐาเน ‘‘ปริสาย, ปริสายํ, ปริสติ, ปริสาสู’’ติ โยเชตพฺพํ ‘‘เอกมิทํ โภ โคตม สมยํ โตเทยฺยสฺส พฺราหฺมณสฺส ปริสติ ปรูปารมฺภํ วตฺเตนฺตี’’ติ ปาฬิทสฺสนโต. อมฺมาทีนํ ปน ‘‘อมฺมา, อมฺมา, อมฺมาโย’’ติอาทินา [Pg.263] กญฺญานเยน วตฺวา อวสาเน ‘‘โภติ อมฺม, โภติ อมฺมา, โภติโย อมฺมา, อมฺมาโย’’ติอาทินา โยเชตพฺพํ. 'परिसा' शब्द के सप्तमी स्थान में 'परिसाय, परिसायं, परिसति, परिसासु' ऐसा जोड़ना चाहिए, क्योंकि 'एकमदं भो गोतम समयं तोदेय्यस्स ब्राह्मणस्स परिसति परूपारम्भं वत्तेन्ति' इस पालि प्रयोग से ऐसा सिद्ध होता है। 'अम्मा' आदि शब्दों के लिए 'अम्मा, अम्मा, अम्मायो' आदि कन्या के समान रूप कहकर अंत में 'भोति अम्म, भोति अम्मा, भोतियो अम्मा, अम्मायो' आदि जोड़ना चाहिए। มาตา, มาตา, มาตโร. มาตรํ, มาตโร. มาตรา, มาตุยา, มตฺยา, มาตูหิ, มาตูภิ. มาตุ, มาตุยา, มตฺยา, มาตรานํ, มาตานํ, มาตูนํ. มาตรา, มาตุยา, มตฺยา, มาตูหิ, มาตูภิ. มาตุ, มาตุยา, มตฺยา, มาตรานํ, มาตานํ, มาตูนํ. มาตริ, มาตุยา, มตฺยา, มาตุยํ, มตฺยํ, มาตูสุ. โภติ มาตา, โภติโย มาตา, มาตโร. माता, माता, मातरो। मातरं, मातरो। मातारा, मातुया, मत्या, मातूह्नि, मातूब्भि। मातु, मातुया, मत्या, मातरानं, मातानं, मातूनं। मातारा, मातुया, मत्या, मातूह्नि, मातूब्भि। मातु, मातुया, मत्या, मातरानं, मातानं, मातूनं। मातरि, मातुया, मत्या, मातुयं, मत्यं, मातूसु। भोति माता, भोतियो माता, मातरो। เอตฺถ ปน ยสฺมา ปาฬิยํ อิตฺถิลิงฺคานํ สการนฺตานิ รูปานิ เอหิ เอภิ เอสุการนฺตาทีนิ จ เอนนฺตาทีนิ จ น ทิสฺสนฺติ, ตสฺมา เกหิจิ วุตฺตานิปิ ‘‘มาตุสฺส มาตเรหี’’ติอาทีนิ น วุตฺตานิ, เอส นโย อิตเรสุปิ. ‘‘ยํกิญฺจิตฺถิกตํ ปุญฺญํ, มยฺหญฺจ มาตุยา จ เต. อนุญฺญาโต อหํ มตฺยา’’ติ ปาฬิทสฺสนโต ปน กรณสมฺปทานนิสฺสกฺกสามิภุมฺมวจนฏฺฐาเน ‘‘มาตุยา, มตฺยา’’ติ จ วุตฺตํ อิตฺถิลิงฺคฏฺฐาเน สมานคติกตฺตา เตสํ วจนานํ. ตถา หิ อุมฺมาทนฺติชาตเก ‘‘มตฺยา’’ติ ปทํ ปญฺจมีตติเยกวจนวเสน อาคตํ, ยถา ปน ‘‘ขตฺติยา’’ติ ปทํ มชฺฌสรโลปวเสน ‘‘ขตฺยา’’ติ ภวติ, ตถา ‘‘มาตุยา มาตุย’’นฺติ จ ปทํ ‘‘มตฺยา, มตฺย’’นฺติ ภวติ, อยํ นโย ธีตุสทฺทาทีสุ น ลพฺภติ. यहाँ क्योंकि पालि में स्त्रीलिंग शब्दों के 'स' कारान्त रूप और 'एहि', 'एभि', 'एसु' कारान्त आदि तथा 'एन' आदि रूप नहीं देखे जाते, इसलिए कुछ लोगों द्वारा कहे गए 'मातुस्स', 'मातरेहि' आदि रूप नहीं कहे गए हैं, यही नियम दूसरों में भी है। 'यंकिञ्चित्थिकतं पुञ्ञं, मय्हञ्च मातुया च ते। अनुञ्ञातो अहं मत्या' इस पालि प्रयोग से करण, सम्प्रदान, अपादान, स्वामी और भूम वचनों के स्थान पर 'मातुया' और 'मत्या' कहा गया है, क्योंकि स्त्रीलिंग के स्थान पर उनकी गति समान है। जैसे उन्मादन्ती जातक में 'मत्या' पद पञ्चमी और तृतीया एकवचन के रूप में आया है। जैसे 'खत्तिया' पद मध्य स्वर के लोप होने से 'खत्या' हो जाता है, वैसे ही 'मातुया' और 'मातुयं' पद 'मत्या' और 'मत्यं' हो जाते हैं। यह नियम 'धीतु' आदि शब्दों में नहीं मिलता। ธีตา, ธีตา, ธีตโร. ธีตํ, ธีตรํ, ธีตโร. ธีตุยา, ธีตูหิ, ธีตูภิ. ธีตุ, ธีตุยา, ธีตรานํ, ธีตานํ, ธีตูนํ. ธีตรา, ธีตุยา, ธีตูหิ, ธีตูภิ. ธีตุ, ธีตุยา, ธีตรานํ, ธีตานํ, ธีตูนํ. ธีตริ, ธีตุยา, ธีตุยํ, ธีตูสุ. โภติ ธีตุ, โภติ ธีตา, โภติโย ธีตา, ธีตโร. เอตฺถ ปน. धीता, धीता, धीतरो (प्रथमा)। धीतं, धीतरं, धीतरो (द्वितीया)। धीतुया, धीतूहि, धीतूब्रि (तृतीया)। धीतु, धीतुया, धीतरानं, धीतानं, धीतूनं (चतुर्थी)। धीतरा, धीतुया, धीतूहि, धीतूब्रि (पञ्चमी)। धीतु, धीतुया, धीतरानं, धीतानं, धीतूनं (षष्ठी)। धीतरि, धीतुया, धीतुयं, धीतूसु (सप्तमी)। भोति धीतु, भोति धीता, भोतियो धीता, धीतरो (सम्बोधन)। यहाँ फिर— ‘‘ชาลึ [Pg.264] กณฺหาชินํ ธีตํ, มทฺทิเทวึ ปติพฺพตํ; จชมาโน น จินฺเตสึ, โพธิยาเยว การณา’’ติ “जालि, कन्हाजिना (पुत्री), और पतिव्रता मद्दी देवी का त्याग करते हुए, मैंने केवल बोधि के निमित्त (उनके बारे में) विचार नहीं किया।” ปาฬิยํ ‘‘ธีต’’นฺติ ทสฺสนโต อุปโยควจนฏฺฐาเน ‘‘ธีต’’นฺติ วุตฺตํ, ตสฺมา อิทํ สารโต คเหตพฺพํ, ตถา ปาฬิยํ ‘‘อสฺสมณี โหติ อสกฺยธีตรา’’ติ สมาสปทสฺส ทสฺสนโต ตติเยกวจนนฺตปทสทิสํ ‘‘เสฏฺฐิธีตรา’’ติอาทิกํ ปฐเมกวจนนฺตมฺปิ สมาสปทํ คเหตพฺพเมว, นิรุตฺติปิฏเก ปน ‘‘มาตา ธีตา’’ติ ปททฺวยํ สทฺธานเย ปกฺขิตฺต, ตมมฺเหหิ ‘‘สทฺธายา’’ติ ปทสฺส วิย ‘‘มาตายา’’ติอาทีนํ ปาฬิอาทีสุ พฺยาเส อทสฺสนโต วิสุํ คหิตํ สมาเสเยว หิ อีทิสึ สทฺทคตึ ปสฺสาม ‘‘ราชมาตาย ราชธีตาย เสฏฺฐิธีตายา’’ติ. เอวํ กญฺญานโยปิ เอกเทเสน ลพฺภติ, ตถา ‘‘อจฺฉริยํ นนฺทมาเต, อพฺภุตํ นนฺทมาเต’’ติ ปาฬิยํ ‘‘นนฺทมาเต’’ติ ทสฺสนโต ‘‘โภติ ราชมาเต, โภติ ราชธีเต’’ติ เอวมาทินโยปิ ลพฺภติ, ตตฺร นนฺทมาเตติ นนฺทสฺส มาตา นนฺทมาตา, โภติ นนฺทมาเต, เอวํ สมาเสเยว อีทิสี สทฺทคติ โหติ, ตสฺมา สมาสปทตฺเต ‘‘มาตุ ธีตุ ทุหิตุ’’อิจฺเจเตสํ ปกติรูปานํ ทฺเว โกฏฺฐาสา คเหตพฺพา ปฐมํ ทสฺสิตรูปโกฏฺฐาโส จ กญฺญานโย รูปโกฏฺฐาโส จาติ. นตฺตาทีนิ ปทานิ น เกวลํ ปุลฺลิงฺคานิเยว โหนฺติ, อถ โข อิตฺถิลิงฺคานิปิ. ตถา หิ ‘‘วิสาขาย นตฺตา กาลงฺกตา โหติ. จตสฺโส มูสิกา คาธํ กตฺตา, โน วสิตา’’ติอาทีนิ ปโยคานิ สาสเน ทิสฺสนฺติ. पालि में ‘धीतं’ ऐसा देखे जाने से द्वितीया विभक्ति के स्थान पर ‘धीतं’ कहा गया है, इसलिए इसे सार रूप में ग्रहण करना चाहिए। उसी प्रकार पालि में ‘असमणी होति असक्यधीतरा’ इस समस्त पद के देखे जाने से तृतीया एकवचन के समान ‘सेट्ठिधीतरा’ आदि प्रथमा एकवचन वाले समस्त पद को भी ग्रहण करना ही चाहिए। निरुत्तिपिटक में तो ‘माता धीता’ इन दो पदों को ‘सद्धा’ (श्रद्धा) के नियम में रखा गया है, परन्तु हमारे द्वारा ‘सद्धाय’ पद के समान ‘माताय’ आदि का पालि आदि में विस्तार से न देखे जाने के कारण इसे अलग से ग्रहण किया गया है। समास में ही इस प्रकार की शब्द-गति (रूप) देखते हैं जैसे ‘राजमाताय, राजधीताय, सेट्ठिधीताय’। इस प्रकार ‘कञ्ञा’ (कन्या) के नियम के अनुसार भी एक अंश में प्राप्त होता है। उसी प्रकार पालि में ‘अच्छरियं नन्दमाते, अब्भुतं नन्दमाते’ ऐसा देखे जाने से ‘भोति राजमाते, भोति राजधीते’ इत्यादि नियम भी प्राप्त होता है। वहाँ ‘नन्दमाते’ का अर्थ है नन्द की माता ‘नन्दमाता’, ‘हे नन्दमाता!’ (सम्बोधन)। इस प्रकार समास में ही ऐसी शब्द-गति होती है। इसलिए समस्त पद होने पर ‘मातु, धीतु, दुहितु’ इन प्रकृति रूपों के दो भाग ग्रहण करने चाहिए—पहले दिखाया गया रूप समूह और कन्या के नियम वाला रूप समूह। ‘नत्ता’ (पोता/पोती) आदि शब्द न केवल पुल्लिंग होते हैं, बल्कि स्त्रीलिंग भी होते हैं। क्योंकि शासन (बुद्ध वचन) में ‘विसाखाय नत्ता कालङ्कता होति’ (विशाखा की पोती कालगत/मृत हो गई), ‘चतस्सो मूसिका गाधं कत्ता, नो वसिता’ (चार चुहिया गहरा करने वाली हैं, रहने वाली नहीं) आदि प्रयोग देखे जाते हैं। นตฺตา, นตฺตา, นตฺตาโร. นตฺตํ, นตฺตารํ, นตฺตาโร. นตฺตารา, นตฺตุยา, นตฺตูหิ, นตฺตูภิ. นตฺตุ, นตฺตุยา, นตฺตารานํ [Pg.265] นตฺตานํ, นตฺตูนํ. นตฺตารา, นตฺตุยา, นตฺตูหิ, นตฺตูภิ. นตฺตุ, นตฺตุยา, นตฺตารานํ, นตฺตานํ, นตฺตูนํ. นตฺตริ, นตฺตุยา, นตฺตุยํ, นตฺตูสุ. โภติ นตฺต, โภติ นตฺตา, โภติโย นตฺตา, นตฺตาโร. नत्ता, नत्ता, नत्तारो (प्रथमा)। नत्तं, नत्तारं, नत्तारो (द्वितीया)। नत्तारा, नत्तुया, नत्तूहि, नत्तूब्रि (तृतीया)। नत्तु, नत्तुया, नत्तारानं, नत्तानं, नत्तूनं (चतुर्थी)। नत्तारा, नत्तुया, नत्तूहि, नत्तूब्रि (पञ्चमी)। नत्तु, नत्तुया, नत्तारानं, नत्तानं, नत्तूनं (षष्ठी)। नत्तरि, नत्तुया, नत्तुयं, नत्तूसु (सप्तमी)। भोति नत्त, भोति नत्ता, भोतियो नत्ता, नत्तारो (सम्बोधन)। เอวํ ‘‘กตฺตา วสิตา ภาสิตา’’ อิจฺจาทีสุปิ สมาสปทตฺเต ปน ‘‘ราชมาตาย นนฺทมาเต’’ติอาทีนิ วิย ‘‘ราชนตฺตาย, ราชนตฺเต’’ติอาทีนิ รูปานิ ภวนฺติ. इसी प्रकार ‘कत्ता, वसिता, भासिता’ इत्यादि में भी समस्त पद होने पर ‘राजमाताय, नन्दमाते’ आदि के समान ‘राजनत्ताय, राजनत्ते’ आदि रूप होते हैं। สวินิจฺฉโยยํ อาการนฺตุการนฺติตฺถิลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह आकारांत और उकारांत स्त्रीलिंग के प्रकृति रूप की नामिक पदमाला (शब्द-रूप) का निश्चय के साथ विभाग है। อาการนฺตุการนฺตตาปกติกํ आकारांत और उकारांत प्रकृति वाला। อาการนฺติตฺถิลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. आकारांत स्त्रीलिंग समाप्त। อิทานิ ภูมิปทาทีนํ นามิกปทมาลํ วกฺขาม ปุพฺพาจริยมตํ ปุเรจรํ กตฺวา – अब पूर्वाचार्यों के मत को आगे रखकर ‘भूमि’ आदि पदों की नामिक पदमाला (शब्द-रूप) कहेंगे— รตฺติ, รตฺตี, รตฺติโย. รตฺตึ, รตฺตี, รตฺติโย. รตฺติยา, รตฺตีหิ, รตฺตีภิ. รตฺติยา, รตฺตีนํ. รตฺติยา, รตฺตีหิ, รตฺตีภิ. รตฺติยา, รตฺตีนํ. รตฺติยา, รตฺติยํ, รตฺตีสุ. โภติ รตฺติ, โภติโย รตฺติโย. ยมกมหาเถรมตํ. रत्ति, रत्ती, रत्तियो (प्रथमा)। रत्तिं, रत्ती, रत्तियो (द्वितीया)। रत्तिया, रत्तीहि, रत्तीब्रि (तृतीया)। रत्तिया, रत्तीनं (चतुर्थी)। रत्तिया, रत्तीहि, रत्तीब्रि (पञ्चमी)। रत्तिया, रत्तीनं (षष्ठी)। रत्तिया, रत्तियं, रत्तीसु (सप्तमी)। भोति रत्ति, भोतियो रत्तियो (सम्बोधन)। यमक महाथेर का मत। ‘‘ภูมิ, ภูมี, ภูมิโย. ภูมึ, ภูมี, ภูมิโย’’ติ สพฺพํ เนยฺยํ. เอวํ ‘‘ภูติ สตฺติ ปตฺติ วุตฺติ มุตฺติ กิตฺติ ขนฺติ ติตฺติ สิทฺธิ อิทฺธิ วุทฺธิ สุทฺธิ พุทฺธิ โพธิ ปีติ นนฺทิ มติ อสนิ วสนิ สติ คติ วุฑฺฒิ ยุวติ องฺคุลิ โพนฺทิ ทิฏฺฐิ ตุฏฺฐิ นาภิ’’ อิจฺจาทีนมฺปิ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. อปิจ ‘‘รตฺโย อโมฆา คจฺฉนฺติ. ทิวา จ รตฺโต จ หรนฺติ เย พลึ. น ภูมฺยา จตุรงฺคุโล. เสติ ภูมฺยา อนุตฺถุนํ. ภูมฺยา โส ปติตํ ปาสํ. คีวาย ปฏิมุญฺจติ. อิมา จ นภฺโย สตราชิจิตฺติตา. สเตรตา วิชฺชุริวปฺปภาสเร’’ติ เอวมาทีนํ [Pg.266] ปโยคานํ ทสฺสนโต รตฺติ ภูมิ นาภิสทฺทาทีนํ อยมฺปิ นามิกปทมาลาวิเสโส เวทิตพฺโพ. กถํ? ‘भूमि, भूमी, भूमियो। भूमिं, भूमी, भूमियो’—इस प्रकार सब जानना चाहिए। इसी प्रकार ‘भूति, सत्ति, पत्ति, वुत्ति, मुत्ति, कित्ति, खन्ति, तित्ति, सिद्धि, इद्धि, वुद्धि, सुद्धि, बुद्धि, बोधि, पीति, नन्दि, मति, असनि, वसनि, सति, गति, वुड्ढि, युवति, अङ्गुलि, बोन्दि, दिट्ठि, तुट्ठि, नाभि’ इत्यादि की भी नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। इसके अतिरिक्त ‘रतयो अमोघा गच्छन्ति’ (रातें व्यर्थ नहीं जातीं), ‘दिवा च रत्तो च हरन्ति ये बलिं’ (जो दिन और रात कर/भेंट हरते हैं), ‘न भूम्या चतुरङ्गुलों’ (भूमि पर चार अंगुल नहीं), ‘सेति भूम्या अनुत्थुनं’ (भूमि पर विलाप करते हुए सोता है), ‘भूम्या सो पतितं पासां’ (भूमि पर गिरे हुए पाश को), ‘गीवाय पटिमुञ्चति’ (गर्दन में बाँधता है), ‘इमा च नभ्यो सतराजिचित्तिता’ (और ये सौ रेखाओं से चित्रित नाभियाँ), ‘सतेरता विज्जुरिवप्पभासरे’ (बिजली की तरह चमकती हैं)—इत्यादि प्रयोगों के देखे जाने से ‘रत्ति, भूमि, नाभि’ आदि शब्दों की यह भी नामिक पदमाला की विशेषता जाननी चाहिए। कैसे? รตฺติ, รตฺตี, รตฺติโย, รตฺโย. รตฺตึ, รตฺตี, รตฺติโย, รตฺโย. รตฺติยา, รตฺยา, รตฺตีหิ, รตฺตีภิ. รตฺติยา, รตฺยา, รตฺตีนํ. รตฺติยา, รตฺยา, รตฺตีหิ, รตฺตีภิ. รตฺติยา, รตฺยา, รตฺตีนํ. รตฺติยา, รตฺยา, รตฺติยํ รตฺยํ, รตฺโต, รตฺตีสุ. โภติ รตฺติ, โภติโย รตฺตี, รตฺติโย, รตฺโย. रत्ति, रत्ती, रत्तियो, रतयो (प्रथमा)। रत्तिं, रत्ती, रत्तियो, रतयो (द्वितीया)। रत्तिया, रत्या, रत्तीहि, रत्तीब्रि (तृतीया)। रत्तिया, रत्या, रत्तीनं (चतुर्थी)। रत्तिया, रत्या, रत्तीहि, रत्तीब्रि (पञ्चमी)। रत्तिया, रत्या, रत्तीनं (षष्ठी)। रत्तिया, रत्या, रत्तियं, रत्यं, रत्तो, रत्तीसु (सप्तमी)। भोति रत्ति, भोतियो रत्ती, रत्तियो, रतयो (सम्बोधन)। เอตฺถ ‘‘รตฺโต’’ติ รูปนยํ วชฺเชตฺวา ‘‘ภูมิ, ภูมี, ภูมิโย, ภูมฺโย’’ติ สพฺพํ เนยฺยํ. यहाँ ‘रत्तो’ इस रूप-नियम को छोड़कर ‘भूमि, भूमी, भूमियो, भूम्यो’—इस प्रकार सब जानना चाहिए। นาภิ, นาภี, นาภิโย, นภฺโย. นาภึ, นาภี, นาภิโย, นภฺโย. นาภิยา, นภฺยา, นาภีหิ, นาภีภิ. นาภิยา, นภฺยา, นาภีนํ. นาภิยา, นภฺยา, นาภีหิ, นาภีภิ. นาภิยา, นภฺยา, นาภีนํ. นาภิยา, นภฺยา, นาภิยํ, นภฺยํ, นาภีสุ. โภติ นาภิ, โภติโย นาภี, นาภิโย, นภฺโย. नाभि, नाभी, नाभियो, नभ्यो (प्रथमा)। नाभिं, नाभी, नाभियो, नभ्यो (द्वितीया)। नाभिया, नभ्या, नाभीहि, नाभीब्रि (तृतीया)। नाभिया, नभ्या, नाभीनं (चतुर्थी)। नाभिया, नभ्या, नाभीहि, नाभीब्रि (पञ्चमी)। नाभिया, नभ्या, नाभीनं (षष्ठी)। नाभिया, नभ्या, नाभियं, नभ्यं, नाभीसु (सप्तमी)। भोति नाभि, भोतियो नाभी, नाभियो, नभ्यो (सम्बोधन)। โพธิ, โพธี, โพธิโย, โพชฺโฌ. โพธึ, โพธิยํ, โพชฺฌํ, โพธี, โพธิโย, โพชฺโฌ. โพธิยา, โพชฺฌา, โพธีหิ, โพธีภิ. โพธิยา, โพชฺฌา, โพธีนํ. โพธิยา, โพชฺฌา, โพธีหิ, โพธีภิ. โพธิยา, โพชฺฌา, โพธีนํ. โพธิยา, โพชฺฌา, โพธิยํ, โพชฺฌํ, โพธีสุ. โภติ โพธิ, โภติโย โพธี, โพธิโย, โพชฺโฌ. बोधि, बोधी, बोधियो, बोज्झो (प्रथमा)। बोधिं, बोधियं, बोज्झं, बोधी, बोधियो, बोज्झो (द्वितीया)। बोधिया, बोज्झा, बोधीहि, बोधीब्रि (तृतीया)। बोधिया, बोज्झा, बोधीनं (चतुर्थी)। बोधिया, बोज्झा, बोधीहि, बोधीब्रि (पञ्चमी)। बोधिया, बोज्झा, बोधीनं (षष्ठी)। बोधिया, बोज्झा, बोधियं, बोज्झं, बोधीसु (सप्तमी)। भोति बोधि, भोतियो बोधी, बोधियो, बोज्झो (सम्बोधन)। เอตฺถ ปน ‘‘พุชฺฌสฺสุ ชิน โพธิยํ. อญฺญตฺร โพชฺฌา ตปสา’’ติ วิจิตฺรปาฬินยทสฺสนโต วิจิตฺรนยา นามิกปทมาลา วุตฺตา. สพฺโพปิ จายํ นโย อญฺญตฺถาปิ ยถารหํ โยเชตพฺโพ. यहाँ, 'बुज्झस्सु जिन बोधियं। अञ्ञत्र बोज्झा तपसा' इत्यादि विचित्र पालि नयों (विधियों) के दर्शन से विचित्र नयों वाली नामिक पदमाला कही गई है। यह सारा नय अन्यत्र भी यथायोग्य जोड़ना चाहिए। สวินิจฺฉโยยํ อิการนฺติตฺถิลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. इकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के प्रकृति रूप की नामिक पदमाला का यह विनिश्चय सहित विभाग है। อิการนฺตตาปกติกํ อิการนฺติตฺถิลิงฺคํ इकारान्तता-प्रकृतिक इकारान्त स्त्रीलिंग। นิฏฺฐิตํ. समाप्त। อิทานิ [Pg.267] ภูรีสทฺทาทีนํ นามิกปทมาลํ วกฺขาม ปุพฺพาจริยมตํ ปุเรจรํ กตฺวา – अब हम पूर्वाचार्यों के मत को आगे रखकर 'भूरी' आदि शब्दों की नामिक पदमाला कहेंगे - อิตฺถี, อิตฺถี, อิตฺถิโย. อิตฺถึ, อิตฺถี, อิตฺถิโย. อิตฺถิยา, อิตฺถีหิ, อิตฺถีภิ. อิตฺถิยา, อิตฺถีนํ. อิตฺถิยา, อิตฺถีหิ, อิตฺถีภิ. อิตฺถิยา, อิตฺถีนํ. อิตฺถิยา, อิตฺถิยํ, อิตฺถีสุ. โภติ อิตฺถิ, โภติโย อิตฺถิโย. ยมกมหาเถรมตํ. इत्थी, इत्थी, इत्थियो। इत्थिं, इत्थी, इत्थियो। इत्थिया, इत्थीहि, इत्थीभि। इत्थिया, इत्थीनं। इत्थिया, इत्थीहि, इत्थीभि। इत्थिया, इत्थीनं। इत्थिया, इत्थियं, इत्थीसु। भोति इत्थि, भोतियो इत्थियो। यह यमक महाथेर का मत है। ‘‘ภูรี, ภูรี, ภูริโย. ภูรึ, ภูรี, ภูริ โย’’ติ อิตฺถิยา สมํ. เอวํ ภูตี โภตี วิภาวินี อิจฺจาทีนํ ภูธาตุมยานํ อญฺเญสญฺจ อีการนฺตสทฺทานํ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. เอตฺถญฺเญ อีการนฺตสทฺทา นาม – 'भूरी, भूरी, भूरियो। भूरिं, भूरी, भूरियो' - यह 'इत्थी' के समान है। इसी प्रकार 'भूती', 'भोती', 'विभाविनी' इत्यादि भू-धातु से बने तथा अन्य ईकारान्त शब्दों की नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। यहाँ अन्य ईकारान्त शब्द ये हैं - ‘‘มาตุลานี จ ภคินี, ภิกฺขุนี สามุคี อชี; วาปี โปกฺขรณี เทวี, นาคี ยกฺขินี ราชินี. 'मातुलानी च भगिनी, भिक्खुनी सामुगी अजी; वापी पोक्खरणी देवी, नागी यक्खिनी राजिनी। ทาสี จ พฺราหฺมณี มุฏฺฐ-สฺสตินี สีฆยายินี; สากิยานี’’ติ จาทีนิ, ปโยคานิ ภวนฺติ หิ. दासी च ब्राह्मणी मुट्ठस्सतिनी सीघयायिनी; साकियानी' इत्यादि प्रयोग होते हैं। ตตฺร ‘‘โปกฺขรณี ทาสี, พฺราหฺมณิ’’จฺจาทินํ คติ; อญฺญถาปิ สิยา คาถา-จุณฺณิเยสุ ยถารหํ. वहाँ 'पोक्खरणी, दासी, ब्राह्मणी' इत्यादि की गति (रूप) गाथाओं और चूर्णिकाओं (गद्य) में यथायोग्य अन्यथा (भिन्न) भी हो सकती है। ‘‘กุสาวตี’’ติอาทีนํ, คาถาสฺเวว วิเสสโต; รูปานิ อญฺญถา โหนฺติ, เอกวจนโต วเท. 'कुसावती' इत्यादि के रूप विशेष रूप से गाथाओं में ही अन्यथा (भिन्न) होते हैं, एकवचन में कहता हूँ। ‘‘กาสี อวนฺตี’’อิจฺจาที, พหุวจนโต วเท; ‘‘จนฺทวตี’’ติอาทีนิ, ปโยคสฺสานุรูปโต. 'कासी, अवन्ती' इत्यादि बहुवचन में कहता हूँ; 'चन्दवती' इत्यादि प्रयोग के अनुरूप। ตถา หิ ‘‘โปกฺขรญฺโญ สุมาปิตา. ตา จ สตฺตสตา ภริยา, ทาสฺโย สตฺตสตานิ จ. ทารเก จ อหํ เนสฺสํ[Pg.268], พฺราหฺมณฺยา ปริจารเก. นชฺโช สนฺทนฺติ. นชฺชา เนรญฺชราย ตีเร. ลกฺขฺยา ภว นิเวสนํ. जैसे कि - 'पोक्खरञ्ञो सुमापिता (पोखरियाँ अच्छी तरह बनाई गईं)। ता च सत्तसता भरिया, दास्यो सत्तसतानि च (वे सात सौ पत्नियाँ और सात सौ दासियाँ)। दारके च अहं नेस्सं, ब्रह्मण्या परिचारके (मैं बच्चों को ले जाऊँगा, ब्राह्मणी के परिचारकों को)। नज्जो सन्दन्ति (नदियाँ बहती हैं)। नज्जा नेरञ्जराय तीरे (नेरञ्जरा नदी के तट पर)। लक्ख्या भव निवेसनं (लक्ष्मी का निवास बनो)।' พาราณสฺยํ มหาราช, กากราชา นิวาสโก; อสีติยา สหสฺเสหิ, สุปตฺโต ปริวาริโต. 'बाराणस्यं महाराज, काकराजा निवासको; असीतिया सहस्सेहि, सुपत्तो परिवारितो (हे महाराज! वाराणसी में अस्सी हजार सुपक्षियों से घिरा हुआ काकराज रहता था)।' ราชา ยถา เวสฺสวโณ นฬิญฺญ’’นฺติ 'राजा यथा वेस्सवणो नळिञ्ञं' (जैसे राजा वैश्रवण नलिनी/कमलिनी के पास)। เอวมาทีนํ ปาฬีนํ ทสฺสนโต โปกฺขรณี อิจฺจาทีนํ นามิกปทมาลาโย สวิเสสา โยเชตพฺพา. กถํ? ‘โปกฺขรณี, โปกฺขรณี, โปกฺขรณิโย, โปกฺขรญฺโญ. โปกฺขรณิ’’นฺติอาทินา วตฺวา กรณสมฺปทานนิสฺสกฺกสามิวจนฏฺฐาเน ‘‘โปกฺขรณิยา, โปกฺขรญฺญา’’ติ เอกวจนานิ วตฺตพฺพานิ. ภุมฺมวจนฏฺฐาเน ปน ‘‘โปกฺขรณิยา, โปกฺขรญฺญา, โปกฺขรณิยํ, โปกฺขรญฺญ’’นฺติ จ เอกวจนานิ วตฺตพฺพานิ. สพฺพตฺถ จ ปทานิ ปริปุณฺณานิ กาตพฺพานิ. ตถา ‘‘ทาสี, ทาสี, ทาสิโย, ทาสฺโย. ทาสึ, ทาสิยํ, ทาสี, ทาสิโย, ทาสฺโย’’ติ วตฺวา กรณวจนฏฺฐานาทีสุ ‘‘ทาสิยา, ทาสฺยา’’ติ เอกวจนานิ วตฺตพฺพานิ. ภุมฺมวจนฏฺฐาเน ปน ‘‘ทาสิยา, ทาสฺยา, ทาสิยํ, ทาสฺย’’นฺติ จ เอกวจนานิ วตฺตพฺพานิ. สพฺพตฺถ ปทานิ ปริปุณฺณานิ กาตพฺพานิ. เอตฺถ ปน ‘‘ยฏฺฐิยา ปฏิโกเฏติ, ฆเร ชาตํว ทาสิยํ. ผุสิสฺสามิ วิมุตฺติย’’นฺติ ปโยคานํ ทสฺสนโต อํวจนสฺส ยมาเทสวเสน ‘‘ทาสิย’’นฺติ วุตฺตํ. เตสุ จ ‘‘ฆเร ชาตํว ทาสิย’’นฺติ เอตฺถ อํวจนสฺส ยมาเทสโต อญฺโญปิ สทฺทนโย ลพฺภติ. กถํ? ยถา ทหรี เอว ‘‘ทหริยา’’ติ วุจฺจติ, เอวํ ทาสี เอว ‘‘ทาสิยา’’ติ. इस प्रकार की पालियों के दर्शन से 'पोक्खरणी' इत्यादि की नामिक पदमालाएँ विशेष रूप से जोड़नी चाहिए। कैसे? 'पोक्खरणी, पोक्खरणी, पोक्खरणियो, पोक्खरञ्ञो। पोक्खरणिं' इत्यादि कहकर करण, सम्प्रदान, अपादान और स्वामी (सम्बन्ध) वचनों के स्थान पर 'पोक्खरणिया, पोक्खरञ्ञा' - ये एकवचन कहने चाहिए। सप्तमी (भूम) वचन के स्थान पर 'पोक्खरणिया, पोक्खरञ्ञा, पोक्खरणियं, पोक्खरञ्ञं' - ये एकवचन कहने चाहिए। सर्वत्र पदों को परिपूर्ण करना चाहिए। उसी प्रकार 'दासी, दासी, दासियो, दास्यो। दासिं, दासियं, दासी, दासियो, दास्यो' कहकर करण वचन आदि के स्थानों पर 'दासिया, दास्या' - ये एकवचन कहने चाहिए। सप्तमी वचन के स्थान पर 'दासिया, दास्या, दासियं, दास्यं' - ये एकवचन कहने चाहिए। सर्वत्र पदों को परिपूर्ण करना चाहिए। यहाँ 'यट्ठिया पटिकोटेति, घरे जातंव दासियं। फुसिस्सामि विमुत्तियं' इत्यादि प्रयोगों के दर्शन से 'अं' वचन के 'यम्' आदेश के कारण 'दासियं' कहा गया है। उनमें 'घरे जातंव दासियं' यहाँ 'अं' वचन के 'यम्' आदेश के अतिरिक्त अन्य शब्द-विधि भी प्राप्त होती है। कैसे? जैसे 'दहरी' को ही 'दहरिया' कहा जाता है, वैसे ही 'दासी' को ही 'दासिया' कहा जाता है। เอตฺถ ปน ‘‘ปสฺสามิ โวหํ ทหรึ, กุมารึ จารุทสฺสน’’นฺติ จ ‘‘เย ตํ ชิณฺณสฺส ปาทํสุ, เอวํ ทหริยํ สติ’’นฺติ จ ปาฬิ นิทสฺสนํ[Pg.269], อุปโยควจนิจฺฉาย ‘‘ทาสิย’’นฺติ วุตฺตํ, อิมสฺมึ ปนาธิปฺปาเย ‘‘ทาสิยา, ทาสิยา, ทาสิยาโย. ทาสิยํ, ทาสิยา, ทาสิยาโย. ทาสิยายา’’ติ กญฺญานเยเนว นามิกปทมาลา ภวติ ‘‘กุมาริยา’’ติ สทฺทสฺเสว. ตถา หิ ‘‘กุมาริเย อุปเสนิเย’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. ตถา ‘‘ปุปฺผวติยา, ปุปฺผวติยํ, ปุปฺผวติยาย, ปุปฺผวติยายํ, โภติ ปุปฺผวติเย’’ติ กญฺญานยนิสฺสิเตน เอกวจนนเยน นามิกปทมาลา ภวติ. यहाँ 'पस्सामि वोहं दहरिं, कुमारिं चारुदस्सनं' और 'ये तं जिण्णस्स पादंसु, एवं दहरियं सति' - ये पालि उदाहरण हैं; द्वितीया (उपयोग) वचन की इच्छा से 'दासियं' कहा गया है। इस अभिप्राय में 'दासिया, दासिया, दासियायो। दासियं, दासिया, दासियायो। दासियाया' - इस प्रकार 'कञ्ञा' के नय (विधि) के समान ही नामिक पदमाला होती है, जैसे 'कुमारिया' शब्द की। जैसे कि 'कुमारिये उपसेनिये' यह पालि देखी जाती है। उसी प्रकार 'पुप्फवतिया, पुप्फवतियं, पुप्फवतियाय, पुप्फवतियायं, भोति पुप्फवतिये' - इस प्रकार 'कञ्ञा' नय पर आधारित एकवचन विधि से नामिक पदमाला होती है। เอตฺถ ปน ‘‘อตีเต อยํ พาราณสี ปุปฺผวติยา นาม อโหสิ. ราชาสิ ลุทฺทกมฺโม, เอกราชา ปุปฺผวติยายํ. อุยฺยสฺสุ ปุพฺเพน ปุปฺผวติยายา’’ติ ปาฬิ จ อฏฺฐกถาปาโฐ จ นิทสฺสนํ. อปโร นโย – ‘‘ทาสิยา ทหริยา กุมาริยา’’ติอาทีสุ กการสฺส ยการาเทโสปิ ทฏฺฐพฺโพ. พฺราหฺมณีสทฺทสฺส ตุ ‘‘พฺราหฺมณี, พฺราหฺมณี, พฺราหฺมณิโย, พฺราหฺมณฺโย. พฺราหฺมณิ’’นฺติอาทีนิ วตฺวา กรณวจนฏฺฐานาทีสุ ‘‘พฺราหฺมณิยา, พฺราหฺมณฺยา’’ติ เอกวจนานิ วตฺตพฺพานิ, สพฺพตฺถ จ ปทานิ ปริปุณฺณานิ กาตพฺพานิ. นทีสทฺทสฺส ‘‘นที, นที, นทิโย, นชฺโช. นทิ’’นฺติอาทินา วตฺวา ‘‘นทิยา, นชฺชา’’ติ จ ‘‘นทิยํ, นชฺช’’นฺติ จ วตฺตพฺพํ, สพฺพตฺถ จ ปทานิ ปริปุณฺณานิ กาตพฺพานิ. อิตฺถิลิงฺเคสุ หิ ปจฺจตฺตพหุวจเน ทิฏฺเฐเยว อุปโยคพหุวจนํ อนาคตมฺปิ ทิฏฺฐเมว โหติ, ตถา อุปโยคพหุวจเน ทิฏฺเฐเยว ปจฺจตฺตพหุวจนํ อนาคตมฺปิ ทิฏฺฐเมว โหติ, กรณสมฺปทานนิสฺสกฺกสามิภุมฺมวจนานมฺปิ อญฺญตรสฺมึ ทิฏฺเฐเยว อญฺญตรํ ทิฏฺฐเมว โหติ. ตถา หิ ‘‘ทาสา จ ทาสฺโย อนุชีวิโน จา’’ติ เอตฺถ ‘‘ทาสฺโย’’ติ ปจฺจตฺตพหุวจเน ทิฏฺเฐเยว อปรมฺปิ ‘‘ทาสฺโย’’ติ อุปโยคพหุวจนํ ตํสทิสตฺตา ทิฏฺฐเมว โหติ. यहाँ "अतीत में यह वाराणसी पुष्पवती नाम की थी। राजा लुद्दकम्मा, पुष्पवती में एकराजा था। पुष्पवती के पूर्व की ओर जाओ" - यह पालि और अट्ठकथा पाठ उदाहरण है। दूसरा तरीका - "दासिया दहरिया कुमारिया" आदि में 'क' कार के स्थान पर 'य' कार का आदेश भी देखना चाहिए। 'ब्राह्मणी' शब्द के लिए तो "ब्राह्मणी, ब्राह्मणी, ब्राह्मणियो, ब्रह्मण्यो। ब्राह्मणिं" आदि कहकर करण वचन आदि के स्थानों पर "ब्राह्मणिया, ब्रह्मण्या" ये एकवचन कहने चाहिए, और सभी जगह पदों को परिपूर्ण करना चाहिए। 'नदी' शब्द के लिए "नदी, नदी, नदियो, नज्जो। नदिं" आदि कहकर "नदिया, नज्जा" और "नदियं, नज्जं" कहना चाहिए, और सभी जगह पदों को परिपूर्ण करना चाहिए। क्योंकि स्त्रीलिंगों में प्रथमा बहुवचन के देखे जाने पर द्वितीया बहुवचन न आने पर भी देखा हुआ ही होता है, वैसे ही द्वितीया बहुवचन के देखे जाने पर प्रथमा बहुवचन न आने पर भी देखा हुआ ही होता है, करण, सम्प्रदान, अपादान, स्वामी (षष्ठी) और भूम्म (सप्तमी) वचनों में से भी किसी एक के देखे जाने पर दूसरा देखा हुआ ही होता है। जैसे कि "दासा च दास्यो अनुजीविनो च" यहाँ "दास्यो" यह प्रथमा बहुवचन के देखे जाने पर दूसरा भी "दास्यो" यह द्वितीया बहुवचन उसके समान होने के कारण देखा हुआ ही होता है। ‘‘สกฺโก [Pg.270] จ เม วรํ ทชฺชา, โส จ ลพฺเภถ เม วโร; เอกรตฺตํ ทฺวิรตฺตํ วา, ภเวยฺยํ อภิปารโก; อุมฺมาทนฺตฺยา รมิตฺวาน, สิวิราชา ตโต สิย’’นฺติ "सक्क (शक्र) मुझे वरदान दें, और वह वरदान मुझे प्राप्त हो; एक रात या दो रात के लिए, मैं अधिपति (अभिपाकरो) होऊँ; उम्मदन्ती के साथ रमण करके, उसके बाद शिविराज होऊँ।" เอตฺถ ‘‘อุมฺมาทนฺตฺยา’’ติ กรณวจเน ทิฏฺเฐเยว ตํสทิสานิ สมฺปทานนิสฺสกฺกสามิภุมฺมวจนานิปิ ทิฏฺฐานิเยว โหนฺติ. ‘‘พฺราหฺมณฺยา ปริจารเก’’ติ เอตฺถ ‘‘พฺราหฺมณฺยา’’ติ สามิวจเน ทิฏฺเฐเยว ตํสทิสานิ กรณสมฺปทานนิสฺสกฺกภุมฺมวจนานิปิ ทิฏฺฐานิเยว โหนฺติ. ‘‘เสติ ภูมฺยา อนุตฺถุน’’นฺติ เอตฺถ ‘‘ปถพฺยา จารุปุพฺพงฺคี’’ติ เอตฺถ จ ‘‘ภูมฺยา, ปถพฺยา’’ติ สตฺตมิยา เอกวจเน ทิฏฺเฐเยว ตํสทิสานิ กรณสมฺปทานนิสฺสกฺกสามิวจนานิปิ ทิฏฺฐานิเยว โหนฺติ. ‘‘พาราณสฺยํ มหาราชา’’ติ เอตฺถ ‘‘พาราณสฺย’’นฺติ ภุมฺมวจเน ทิฏฺเฐเยว ตํสทิสานิ อญฺญานิปิ ‘‘พฺราหฺมณฺยํ เอกาทสฺยํ ปญฺจมฺย’’นฺติอาทีนิ ภุมฺมวจนานิ ทิฏฺฐานิเยว โหนฺติ. यहाँ "उम्मदन्त्या" इस करण वचन के देखे जाने पर उसके समान सम्प्रदान, अपादान, स्वामी और भूम्म वचन भी देखे हुए ही होते हैं। "ब्राह्मण्या परिचारके" यहाँ "ब्राह्मण्या" इस स्वामी (षष्ठी) वचन के देखे जाने पर उसके समान करण, सम्प्रदान, अपादान और भूम्म वचन भी देखे हुए ही होते हैं। "सेति भूम्या अनुत्थुनं" यहाँ और "पथब्या चारुपुब्बङ्गी" यहाँ "भूम्या, पथब्या" इस सप्तमी एकवचन के देखे जाने पर उसके समान करण, सम्प्रदान, अपादान और स्वामी वचन भी देखे हुए ही होते हैं। "बाराणस्यं महाराज" यहाँ "बाराणस्यं" इस भूम्म वचन के देखे जाने पर उसके समान अन्य भी "ब्राह्मण्यं एकादस्यं पञ्चम्यं" आदि भूम्म वचन देखे हुए ही होते हैं। คณฺหนฺติ จ ตาทิสานิ รูปานิ ปุพฺพาจริยาสภาปิ คาถาภิสงฺขรณวเสน. สาสเนปิ ปน เอตาทิสานิ รูปานิ เยภุยฺเยน คาถาสุ สนฺทิสฺสนฺติ. और पूर्वाचार्यों ने भी गाथाओं की रचना के वश से उस प्रकार के रूपों को ग्रहण किया है। शासन में भी इस प्रकार के रूप प्रायः गाथाओं में ही दिखाई देते हैं। กุสาวตี. กุสาวตึ. กุสาวติยา, กุสาวตฺยา. กุสาวติยํ, กุสาวตฺยํ. โภติ กุสาวติ. कुसावती। कुसावतिं। कुसावतिया, कुसावत्या। कुसावतियं, कुसावत्यं। भोति कुसावति। พาราณสี. พาราณสึ. พาราณสิยา, พาราณสฺยา. พาราณสิยํ, พาราณสฺยํ, พาราณสฺสํ อิจฺจปิ, โภติ พาราณสิ. वाराणसी। वाराणसिं। वाराणसिया, वाराणस्या। वाराणसियं, वाराणस्यं, वाराणस्सं भी कहा जाता है, भोति वाराणसि। นฬินี. นฬินึ. นฬินิยา, นฬิญฺญา. นฬินิยํ, นฬิญฺญํ. โภติ นฬินิ. อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. नलिनी। नलिणिं। नलिणिया, नलिञ्ञा। नलिणियं, नलिञ्ञं। भोति नलिणि। अन्यों को भी इसी प्रकार जोड़ना चाहिए। คาถาวิสยํ ปน ปตฺวา ‘‘กุสาวติมฺหิ, พาราณสิมฺหิ, นฬินิมฺหี’’ติอาทินา สทฺทรูปานิปิโยเชตพฺพานิ. ตถา หิ ปาฬิยํ ‘‘กุสาวติมฺหิ’’อาทีนิ มฺหิยนฺตานิ อิตฺถิลิงฺครูปานิ คาถาสุเยว [Pg.271] ปญฺญายนฺติ, น จุณฺณิยปทรจนายํ. อกฺขรสมเย ปน ตาทิสานิ รูปานิ อนิวาริตานิ ‘‘นทิมฺหา จา’’ติอาทิทสฺสนโต. ยํ ปน อฏฺฐกถาสุ จุณฺณิยปทรจนายํ ‘‘สมฺมาทิฏฺฐิมฺหี’’ติอาทิกํ อิตฺถิลิงฺครูปํ ทิสฺสติ, ตํ อกฺขรวิปลฺลาสวเสน วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ จุณฺณิยปทฏฺฐาเน ‘‘สมฺมาทิฏฺฐิยํ ปฏิสนฺธิยํ สุคติยํ ทุคฺคติย’’นฺติอาทิทสฺสนโต. อยํ ปเนตฺถ นิยโม สุคตสาสเน คาถายํ จุณฺณิยปทฏฺฐาเน จ ‘‘กญฺญา รตฺติ อิตฺถี ยาคุ วธู’’ติ เอวํ ปญฺจนฺเตหิ อิตฺถิลิงฺเคหิ สทฺธึ นา ส สฺมา สฺมึ มฺหา มฺหิอิจฺเจเต สทฺทา สรูปโต ปรตฺตํ น ยนฺติ. มฺหิสทฺโท ปน คาถายํ อิวณฺณนฺเตหิ อิตฺถิลิงฺเคหิ สทฺธึ ปรตฺตํ ยาติ. ตตฺริทํ วุจฺจติ – गाथा के विषय में पहुँचकर तो "कुसावतिम्हि, वाराणसिम्हि, नलिणिम्हि" आदि शब्द-रूपों को भी जोड़ना चाहिए। क्योंकि पालि में "कुसावतिम्हि" आदि 'म्हि' अन्त वाले स्त्रीलिंग रूप गाथाओं में ही ज्ञात होते हैं, चूर्णिय पद रचना (गद्य) में नहीं। अक्षर-समय (व्याकरण) में तो उस प्रकार के रूप "नदिम्हा च" आदि के दर्शन से निवारित नहीं हैं। जो अट्ठकथाओं की चूर्णिय पद रचना में "सम्मादिट्ठिम्हि" आदि स्त्रीलिंग रूप दिखाई देते हैं, उन्हें अक्षर-विपर्यास के वश से कहा गया समझना चाहिए, क्योंकि चूर्णिय पद के स्थान पर "सम्मादिट्ठियं पटिसन्धियं सुगतियं दुग्गतियं" आदि देखे जाते हैं। यहाँ यह नियम है - सुगत शासन में गाथा में और चूर्णिय पद के स्थान पर "कञ्ञा, रत्ति, इत्थी, यागु, वधू" इन पाँच अन्त वाले स्त्रीलिंगों के साथ 'ना, स, स्मा, स्मिं, म्हा, म्हि' ये शब्द अपने मूल रूप में बाद में नहीं आते। 'म्हि' शब्द तो गाथा में 'इ' वर्ण अन्त वाले स्त्रीलिंगों के साथ बाद में आता है। वहाँ यह कहा गया है - ‘‘คาถายํ จุณฺณิเย จาปิ, นา สสฺมาที สรูปโต; นาการนฺตอิวณฺณนฺต-อิตฺถีติ ปรตํ คตา. "गाथा में और चूर्णिय (गद्य) में भी, 'ना', 'स', 'स्मा' आदि अपने मूल रूप में; आकारान्त और इवर्णान्त स्त्रीलिंगों से परे नहीं जाते।" มฺหิสทฺโท ปน คาถายํ, อิวณฺณนฺติตฺถิภี สห; ย’โต ปรตฺตเมตสฺส, ปโยคานิ ภวนฺติ หิ. "किन्तु 'म्हि' शब्द गाथा में, इवर्णान्त स्त्रीलिंगों के साथ; इससे परे जाता है, क्योंकि इसके प्रयोग होते हैं।" ยถา พลากโยนิมฺหิ, น วิชฺชติ ปุโม สทา; กุสาวภิมฺหิ นคเร, ราชา อาสิ มหีปตี’’ติ. "जैसे - बलाकायोनि (बगुली की योनि) में, सदा पुरुष नहीं होता; कुसावती नगर में, राजा महीपति था।" เอวํ กุสาวตี อิจฺจาทีนิ อญฺญถา ภวนฺติ, นครนามตฺตา ปเนกวจนานิปิ, น ชนปทนามานิ วิย พหุวจนานิ. ‘‘กาสี, กาสิโย. กาสีหิ, กาสีภิ. กาสีนํ. กาสีสุ. โภติโย กาสิโย. เอวํ อวนฺตี อวนฺติโย’’ติอาทินาปิ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. อญฺญานิปิ ปทานิ คเหตพฺพานิ. เอวํ กาสีอิจฺจาทีนิ ชนปทนามตฺตา รูฬฺหีวเสน พหุวจนาเนว ภวนฺติ อตฺถสฺส เอกตฺเตปิ. इस प्रकार कुसावती इत्यादि अन्य प्रकार से होते हैं, नगर का नाम होने के कारण एकवचन ही होते हैं, जनपद के नामों की तरह बहुवचन नहीं। "कासी, कासियो। कासीहि, कासीभि। कासीनं। कासीसु। भोतियो कासियो। इसी प्रकार अवन्ती, अवन्तियो" आदि के द्वारा नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। अन्य पदों को भी ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार कासी इत्यादि जनपद का नाम होने के कारण रूढ़ि के वश से अर्थ के एक होने पर भी बहुवचन ही होते हैं। จนฺทวตี, จนฺทวตึ, จนฺทวติยา, จนฺทวติยํ, โภติ จนฺทวติ, เอวํ เอกวจนวเสน วา, จนฺทวติโย, จนฺทวติโย, จนฺทวตีหิ, จนฺทวตีภิ, จนฺทวตีนํ, จนฺทวตีสุ, โภติโย [Pg.272] จนฺทวติโย, เอวํ พหุวจนวเสน วา นามิกปทมาลา เวทิตพฺพา, อญฺญานิปิ ปทานิ โยเชตพฺพานิ. ‘‘จนฺทวตี’’อิจฺจาทีนิ หิ เอกิสฺสา พหูนญฺจิตฺถีนํ ปณฺณตฺติภาวโต ปโยคานุรูเปน เอกวจนวเสน วา พหุวจนวเสน วา โยเชตพฺพานิ ภวนฺติ. เอส นโย อญฺญตฺราปิ. चन्दवती, चन्दवतिं, चन्दवतिया, चन्दवतियं, हे चन्दवती! - इस प्रकार एकवचन के रूप में, अथवा चन्दवतियो, चन्दवतियो, चन्दवतीहि, चन्दवतीभि, चन्दवतीनं, चन्दवतीसु, भोतियो चन्दवतियो - इस प्रकार बहुवचन के रूप में शब्द-रूप (नामिक पदमाला) समझना चाहिए, अन्य पदों को भी इसी प्रकार जोड़ना चाहिए। 'चन्दवती' आदि शब्द एक या अनेक स्त्रियों की संज्ञा होने के कारण प्रयोग के अनुसार एकवचन या बहुवचन में जोड़ने चाहिए। यही नियम अन्यत्र भी है। สวินิจฺฉโยยํ อีการนฺติตฺถิลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के प्रकृति रूप की शब्द-रूपों (नामिक पदमाला) के विभाग का निश्चय है। อีการนฺตตาปกติกํ อีการนฺติตฺถิลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. ईकारान्त प्रकृति वाला ईकारान्त स्त्रीलिंग समाप्त हुआ। อิทานิ ภูธาตุมยานํ อุการนฺติตฺถิลิงฺคานํ อปฺปสิทฺธตฺตา อญฺเญน อุการนฺติตฺถิลิงฺเคน นามิกปทมาลํ ปูเรสฺสาม – अब भू-धातु से बने उकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के सुलभ होने के कारण, हम अन्य उकारान्त स्त्रीलिंग शब्द से शब्द-रूपों को पूर्ण करेंगे - ยาคุ, ยาคู, ยาคุโย. ยาคุํ, ยาคู, ยาคุโย. ยาคุยา, ยาคูหิ, ยาคูภิ. ยาคุยา, ยาคูนํ. ยาคุยา, ยาคูหิ, ยาคูภิ. ยาคุยา, ยาคูนํ. ยาคุยา, ยาคุยํ, ยาคูสุ. โภติ ยาคุ, โภติโย ยาคู, ยาคุโย. यागु, यागू, यागुयो। यागुं, यागू, यागुयो। यागुया, यागूहि, यागूभि। यागुया, यागूनं। यागुया, यागूहि, यागूभि। यागुया, यागूनं। यागुया, यागुयं, यागूसु। हे यागु!, भोतियो यागू, यागुयो। เอวํ ‘‘ธาตุ เธนุ กาสุ ททฺทุ กณฺฑุ กจฺฉุ รชฺชุ’’อิจฺจาทีนิ. ตตฺร ธาตุสทฺโท รสรุธิรมํสเมทนฺหารุอฏฺฐิอฏฺฐิมิญฺชสุกฺกสงฺขาตธาตุวาจโก ปุลฺลิงฺโค, สภาววาจโก ปน สุคตาทีนํ สารีริกวาจโก โลกธาตุวาจโก จ จกฺขาทิวาจโก จ อิตฺถิลิงฺโค, ภู หู กรปจาทิสทฺทวาจโก อิตฺถิลิงฺโคเจว ปุลฺลิงฺโค จ. อตฺร ปนิตฺถิลิงฺโค อธิปฺเปโต. इसी प्रकार 'धातु, धेनु, कासु, दद्दु, कण्डु, कच्छु, रज्जु' आदि। वहाँ 'धातु' शब्द रस, रुधिर, मांस, मेद, स्नायु, अस्थि, अस्थि-मज्जा और शुक्र नामक धातुओं का वाचक होने पर पुल्लिंग है; स्वभाव का वाचक, सुगत आदि के शारीरिक (अवशेषों) का वाचक, लोकधातु का वाचक और चक्षु आदि का वाचक होने पर स्त्रीलिंग है; तथा भू, हू, कर, पच आदि शब्दों का वाचक होने पर स्त्रीलिंग और पुल्लिंग दोनों है। यहाँ स्त्रीलिंग अभिप्रेत है। สวินิจฺฉโยยํอุการนฺติตฺถิลิงฺคานํ นามิกปทมาลาวิภาโค. यह उकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों की शब्द-रूपों का विभाग निश्चय के साथ है। อุการนฺตตาปกติกํ อุการนฺติตฺถิลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. उकारान्त प्रकृति वाला उकारान्त स्त्रीलिंग समाप्त हुआ। อิทานิ ภูสทฺทาทีนํ นามิกปทมาลํ วกฺขาม ปุพฺพาจริยมตํ ปุเรจรํ กตฺวา – अब हम पूर्वाचार्यों के मत को प्रमुख मानकर 'भू' आदि शब्दों के शब्द-रूप कहेंगे - ชมฺพู, ชมฺพู, ชมฺพุโย. ชมฺพุํ, ชมฺพู, ชมฺพุโย. ชมฺพุยา, ชมฺพูหิ, ชมฺพูภิ. ชมฺพุยา, ชมฺพูนํ. ชมฺพุยา, ชมฺพูหิ, ชมฺพูภิ. ชมฺพุยา[Pg.273], ชมฺพูนํ. ชมฺพุยา, ชมฺพุยํ, ชมฺพูสุ. โภติ ชมฺพุ, โภติโย ชมฺพู, ชมฺพุโย. ยมกมหาเถรมตํ. जम्बू, जम्बू, जम्बुयो। जम्बुं, जम्बू, जम्बुयो। जम्बुया, जम्बूहि, जम्बूभि। जम्बुया, जम्बूनं। जम्बुया, जम्बूहि, जम्बूभि। जम्बुया, जम्बूनं। जम्बुया, जम्बुयं, जम्बूसु। हे जम्बु!, भोतियो जम्बू, जम्बुयो। यह यमक महास्थविर का मत है। เอตฺถ ชมฺพูสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคตฺตํ ‘‘อมฺพา สาลา จ ชมฺพุโย’’ติอาทินา ปสิทฺธํ. ‘‘อิเม เต ชมฺพุกา รุกฺขา’’ติ เอตฺถ ปน รุกฺขสทฺทํ อเปกฺขิตฺวา ‘‘ชมฺพุกา’’ติ ปุลฺลิงฺคนิทฺเทโส กโตติ ทฏฺฐพฺพํ. ตถา หิ ชมฺพูติ กเถตพฺพาติ ชมฺพุกา. เก เร เค สทฺเทติ ธาตุ. อถ วา อิตฺถิลิงฺควเสน ชมฺพู เอว ชมฺพุกา, ชมฺพุกา จ ตา รุกฺขา จาติ ชมฺพุการุกฺขา, ยถา ลงฺกาทีโป, ปุลฺลิงฺคปกฺเข วา สมาสวเสน ‘‘ชมฺพุกรุกฺขา’’ติ วตฺตพฺเพ คาถาวิสยตฺตา ฉนฺทานุรกฺขณตฺถํ ทีฆํ กตฺวา ‘‘ชมฺพุการุกฺขา’’ติ วุตฺตํ ‘‘สรณาคมเน กญฺจี’’ติ เอตฺถ วิย. यहाँ 'जम्बू' शब्द का स्त्रीलिंग होना 'अम्बा साला च जम्बुयो' आदि से प्रसिद्ध है। 'इमे ते जम्बुका रुक्खा' यहाँ 'रुक्ख' शब्द की अपेक्षा से 'जम्बुका' ऐसा पुल्लिंग निर्देश किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि 'जम्बू' कहना चाहिए इसलिए 'जम्बुका' है। 'के रे गे' शब्द धातु है। अथवा स्त्रीलिंग के कारण जम्बू ही जम्बुका है, और वे जम्बुका ही वृक्ष हैं, इसलिए जम्बुकारुक्खा, जैसे लङ्कादीप। अथवा पुल्लिंग पक्ष में समास के कारण 'जम्बुकरुक्खा' कहना चाहिए था, किन्तु गाथा होने के कारण छन्द की रक्षा के लिए दीर्घ करके 'जम्बुकारुक्खा' कहा गया है, जैसे 'सरणागमने कञ्ची' यहाँ हुआ है। ภู, ภู, ภุโย. ภุํ, ภู, ภุโย. ภุยา, ภูหิ, ภูภิ. ภุยา, ภูนํ. ภุยา, ภูหิ, ภูภิ. ภุยา, ภูนํ. ภุยา, ภุยํ, ภูสุ. โภติ ภุ, โภติโย ภู, ภุโย. भू, भू, भुयो। भुं, भू, भुयो। भुया, भूहि, भूभि। भुया, भूनं। भुया, भूहि, भूभि। भुया, भूनं। भुया, भुयं, भूसु। हे भु!, भोतियो भू, भुयो। เอวํ ‘‘อภู, อภู, อภุโย. อภุํ, อภู, อภุโย. อภุยา’’ติอาทินา โยเชตพฺพา. อตฺร ‘‘อภุํ เม กถํ นุ ภณสิ, ปาปกํ วต ภาสสี’’ติ นิทสฺสนปทํ. इसी प्रकार 'अभू, अभू, अभुयो। अभुं, अभू, अभुयो। अभुया' आदि जोड़ने चाहिए। यहाँ 'अभुं मे कथं नु भणसि, पापकं वत भाससि' उदाहरण पद है। ‘‘วธู จ สรภู เจว, สรพู สุตนู จมู; วามูรู นาคนาสูรู’’, อิจฺจาที ชมฺพุยา สมา. 'वधू, सरभू, सरबू, सुतनू, चमू, वामूरू, नागनासूरू' आदि शब्द जम्बू के समान हैं। อิทํ ปน สุขุมํ ฐานํ สุฏฺฐุ มนสิ กาตพฺพํ. ‘‘วทญฺญู, วทญฺญู, วทญฺญุโย. วทญฺญุํ, วทญฺญู, วทญฺญุโย. วทญฺญุยา’’ติ ชมฺพูสมํ โยเชตพฺพํ. เอวํ ‘‘มคฺคญฺญู ธมฺมญฺญู กตญฺญู’’อิจฺจาทีสุปิ. इस सूक्ष्म स्थान को भली-भाँति मन में रखना चाहिए। 'वदञ्ञू, वदञ्ञू, वदञ्ञुयो। वदञ्ञुं, वदञ्ञू, वदञ्ञुयो। वदञ्ञुया' - इस प्रकार जम्बू के समान जोड़ना चाहिए। इसी प्रकार 'मग्गञ्ञू, धम्मञ्ञू, कतञ्ञू' आदि में भी। นนุ จ โภ – किन्तु हे महानुभाव! - ‘‘โสหํ นูน อิโต คนฺตฺวา, โยนึ ลทฺธาน มานุสึ; วทญฺญู สีลสมฺปนฺโน, กาหามิ กุสลํ พหุ’’นฺติ 'वह मैं निश्चय ही यहाँ से जाकर, मनुष्य योनि प्राप्त कर, वदान्य और शील-सम्पन्न होकर बहुत कुशल करूँगा' - เอวมาทิปฺปโยคทสฺสนโต วทญฺญูสทฺทาทีนํ ปุลฺลิงฺคภาโว ปสิทฺโธ, เอวํ สนฺเต กสฺมา อิธ อิตฺถิลิงฺคนโย ทสฺสิโตติ? วทญฺญูอิจฺจาทีนํ เอกนฺตปุลฺลิงฺคภาวาภาวโต ทฺวิลิงฺคานิ เตสํ วาจฺจลิงฺคตฺตา. ตถา หิ – इस प्रकार के प्रयोगों के दिखने से 'वदञ्ञू' आदि शब्दों का पुल्लिंग होना प्रसिद्ध है, ऐसा होने पर यहाँ स्त्रीलिंग का नियम क्यों दिखाया गया है? क्योंकि 'वदञ्ञू' आदि शब्द केवल पुल्लिंग ही नहीं हैं, बल्कि वाच्यलिङ्ग (विशेष्य के अनुसार लिंग वाले) होने के कारण द्विलिंगी हैं। जैसे कि - ‘‘สาหํ คนฺตฺวา มนุสฺสตฺตํ, วทญฺญู วีตมจฺฉรา; สงฺเฆ ทานานิ ทสฺสามิ, อปฺปมตฺตา ปุนปฺปุน’’นฺติ จ, 'वह मैं मनुष्यत्व प्राप्त कर, वदान्य और मत्सर-रहित होकर, संघ में बार-बार प्रमाद-रहित होकर दान दूँगी', और ‘‘โกธนา อกตญฺญู จา’’ติ จ อิตฺถิลิงฺคปโยคิกา พหู ปาฬิโย ทิสฺสนฺติ, ตสฺมา เอวํ นีติ อมฺเหหิ ฐปิตา. 'क्रोधी और अकृतज्ञ' - ऐसे स्त्रीलिंग प्रयोग वाली बहुत सी पालियाँ दिखती हैं, इसलिए हमारे द्वारा यह नियम स्थापित किया गया है। สวินิจฺฉโยยํ อูการนฺติตฺถิลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह ऊकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के प्रकृति रूप की शब्द-रूपों का विभाग निश्चय के साथ है। อูการนฺตตาปกติกํ อูการนฺติตฺถิลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. ऊकारान्त प्रकृति वाला ऊकारान्त स्त्रीलिंग समाप्त हुआ। โอการนฺตปทํ ภูธาตุมยํ อิตฺถิลิงฺคมปฺปสิทฺธํ, อญฺญํ ปโนการนฺตํ อิตฺถิลิงฺคํ ปสิทฺธํ. भू-धातु से बना ओकारान्त स्त्रीलिंग पद अप्रसिद्ध है, किन्तु अन्य ओकारान्त स्त्रीलिंग प्रसिद्ध है। โอการนฺตํ อิตฺถิลิงฺคํ, โคสทฺโทติ วิภาวเย; โคสทฺทสฺเสว ปุลฺลิงฺเค, รูปมสฺสาหุ เกจน; ओकारान्त स्त्रीलिंग 'गो' शब्द है, ऐसा समझना चाहिए; कुछ लोग पुल्लिंग में 'गो' शब्द के समान ही इसका रूप कहते हैं। ตถา หิ เกจิ ‘‘โค, คาโว, คโว. คาวุ’’นฺติอาทินา นเยน วุตฺตานิ ปุลฺลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส รูปานิ วิย อิตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส รูปานิ อิจฺฉนฺติ, เตสํ มเต มชฺเฌ ภินฺนสุวณฺณานํ วณฺณวิเสสาภาโว วิย รูปวิเสสาภาวโต โคสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคภาวปฏิปาทนํ อนิชฺฌานกฺขมํ. กสฺมาติ เจ? ยสฺมา มาตุคามสทฺทสฺส ‘‘มาตุคาโม, มาตุคามา. มาตุคาม’’นฺติอาทินา นเยน ทฺเว ปทมาลา กตฺวา เอกา ปุลฺลิงฺคสฺส ปทมาลา, เอกา อิตฺถิลิงฺคปทมาลาติ วุตฺตวจนํ วิย อิทํ วจนํ อมฺเห ปฏิภาติ, ตสฺมา อนิชฺฌานกฺขมํ. तथापि कुछ लोग 'गो, गावो, गवो, गावुं' इत्यादि रीति से कहे गए पुल्लिंग 'गो' शब्द के रूपों के समान ही स्त्रीलिंग 'गो' शब्द के रूपों को भी स्वीकार करते हैं। उनके मत में, जैसे टूटे हुए स्वर्ण के टुकड़ों के बीच वर्ण (रंग) का कोई विशेष अंतर नहीं होता, वैसे ही रूपों में विशेष अंतर न होने के कारण 'गो' शब्द के स्त्रीलिंग भाव का प्रतिपादन विचारणीय (असंगत) है। ऐसा क्यों? क्योंकि जैसे 'मातुगाम' शब्द के 'मातुगामो, मातुगामा, मातुगामं' इत्यादि रीति से दो पदमालाएँ बनाकर एक पुल्लिंग की पदमाला और एक स्त्रीलिंग की पदमाला कहना है, वैसा ही यह वचन हमें प्रतीत होता है, इसलिए यह विचारणीय है। อปิจ อิตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส รูเปสุ ปุลฺลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส รูเปหิ สเมสุ สนฺเตสุ กถํ โคสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคภาโว [Pg.275] สิยา? รูปมาลาวิเสสาภาวโต. ยถา หิ รตฺติ อคฺคิ อฏฺฐิสทฺทานํ อิการนฺตภาเวน สมตฺเตปิ อิตฺถิลิงฺคปุมนปุํสกลิงฺคลกฺขณภูโต รูปมาลาวิเสโส ทิสฺสติ. ยถา ปน ทฺวินฺนํ ธาตุสทฺทานํ ปุมิตฺถิลิงฺคปริยาปนฺนานํ รูปมาลาวิเสโส ทิสฺสติ, น ตถา เตหาจริเยหิ อภิมตสฺส อิตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส รูปมาลาวิเสโส ทิสฺสติ. ยถา ปน ทฺวินฺนํ ธาตุสทฺทานํ ปุมิตฺถิลิงฺคปริยาปนฺนานํ รูปมาลาวิเสโส ภวติ, ยถา ทฺวินฺนํ โคสทฺทานํ ปุมิตฺถิลิงฺคปริยาปนฺนานํ รูปมาลาวิเสเสน ภวิตพฺพํ, ยถา จ ทฺวินฺนํ อายุสทฺทานํ ปุนฺนปุํสกลิงฺคปริยาปนฺนานํ รูปมาลาวิเสโส ทิสฺสติ, ตถา ทฺวินฺนํ โคสทฺทานํ ปุมิตฺถิลิงฺคปริยาปนฺนานํ รูปมาลาวิเสเสน ภวิตพฺพํ. อวิเสสตฺเต สติ กถํ เตสํ ปุมิตฺถิลิงฺคววตฺถานํ สิยา, กถญฺจ วิสทาวิสทาการโวหารตา สิยา. อิทํ ฐานํ อตีว สณฺหสุขุมํ ปรมคมฺภีรํ มหาคหนํ น สกฺกา สพฺพสตฺตานํ มูลภาสาภูตาย สพฺพญฺญุชิเนริตาย มาคธิกาย สภาวนิรุตฺติยา นยํ สมฺมา อชานนฺเตน อกตญาณสมฺภาเรน เกนจิ อชฺโฌคาเหตุํ วา วิชเฏตุํ วา, อมฺหากํ ปน มเต ทฺวินฺนํ โคสทฺทานํ รูปมาลาวิเสโส เจว ทิสฺสติ, ปุมิตฺถิลิงฺคววตฺถานญฺจ ทิสฺสติ, วิสทาวิสทาการโวหารตา จ ทิสฺสติ, นปุํสกลิงฺคสฺส ตทุภยมุตฺตาการโวหารตา จ ทิสฺสตีติ ทฏฺฐพฺพํ. इसके अतिरिक्त, स्त्रीलिंग 'गो' शब्द के रूपों के पुल्लिंग 'गो' शब्द के रूपों के समान होने पर 'गो' शब्द का स्त्रीलिंग भाव कैसे हो सकता है? क्योंकि रूपमाला में कोई विशेष अंतर नहीं है। जैसे 'रत्ति' (रात्रि), 'अग्गि' (अग्नि) और 'अट्ठि' (अस्थि) शब्दों के इ-कारान्त होने में समानता होने पर भी स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसक लिंग के लक्षणभूत रूपमाला का विशेष अंतर दिखाई देता है। जैसे पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में प्रयुक्त दो 'धातु' शब्दों की रूपमाला का विशेष अंतर दिखाई देता है, वैसे उन आचार्यों द्वारा अभिमत स्त्रीलिंग 'गो' शब्द की रूपमाला का विशेष अंतर नहीं दिखाई देता। जैसे पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में प्रयुक्त दो 'धातु' शब्दों की रूपमाला का विशेष अंतर होता है, जैसे पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में प्रयुक्त दो 'गो' शब्दों की रूपमाला का विशेष अंतर होना चाहिए, और जैसे पुल्लिंग और नपुंसक लिंग में प्रयुक्त दो 'आयु' शब्दों की रूपमाला का विशेष अंतर दिखाई देता है, वैसे ही पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में प्रयुक्त दो 'गो' शब्दों की रूपमाला का विशेष अंतर होना चाहिए। विशेष अंतर न होने पर उनका पुल्लिंग और स्त्रीलिंग के रूप में व्यवस्थापन कैसे होगा, और स्पष्ट एवं अस्पष्ट आकार वाले व्यवहार कैसे होंगे? यह स्थान अत्यंत सूक्ष्म, परम गंभीर और महान गहन है; इसे सभी प्राणियों की मूलभाषा, सर्वज्ञ जिन (बुद्ध) द्वारा भाषित मागधी स्वभाव-निरुक्ति के नय (नियम) को सम्यक् रूप से न जानने वाले और ज्ञान के संभार को संचित न करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा समझना या सुलझाना संभव नहीं है। परंतु हमारे मत में, दो 'गो' शब्दों की रूपमाला का विशेष अंतर भी दिखाई देता है, पुल्लिंग और स्त्रीलिंग का व्यवस्थापन भी दिखाई देता है, स्पष्ट और अस्पष्ट आकार का व्यवहार भी दिखाई देता है, और नपुंसक लिंग का उन दोनों से मुक्त आकार का व्यवहार भी दिखाई देता है, ऐसा समझना चाहिए। อิทานิ อิมสฺสตฺถสฺส อาวิภาวตฺถํ อิมสฺมึ ฐาเน อิมํ นีตึ ฐเปสฺสาม. เอวญฺหิ สติ ปริยตฺติสาสเน ปฏิปนฺนกา นิกฺกงฺขภาเวน น กิลมิสฺสนฺติ. เอตฺถ ตาว อตฺถคฺคหเณ วิญฺญูนํ โกสลฺลุปฺปาทนตฺถํ ติสฺโส นามิกปทมาลาโย กเถสฺสาม – เสยฺยถิทํ? अब इस अर्थ को स्पष्ट करने के लिए इस स्थान पर इस नीति (नियम) को स्थापित करेंगे। ऐसा होने पर पर्यत्ति शासन में प्रतिपन्न (लगे हुए) लोग संशयरहित होकर कष्ट नहीं पाएंगे। यहाँ अर्थ ग्रहण करने में विद्वानों की कुशलता उत्पन्न करने के लिए तीन नामिक पदमालाएँ कहेंगे - वे कौन सी हैं? คาวี, คาวี, คาวิโย. คาวึ, คาวี, คาวิโย. คาวิยา, คาวีหิ, คาวีภิ. คาวิยา, คาวีนํ. คาวิยา, คาวีหิ, คาวีภิ. คาวิยา[Pg.276], คาวีนํ. คาวิยา, คาวิยํ, คาวีสุ. โภติ คาวิ, โภติโย คาวี, คาวิโย. गावी, गावी, गावियो (प्रथमा)। गाविं, गावी, गावियो (द्वितीया)। गाविया, गावीहि, गावीभि (तृतीया)। गाविया, गावीनं (चतुर्थी)। गाविया, गावीहि, गावीभि (पञ्चमी)। गाविया, गावीनं (षष्ठी)। गाविया, गावियं, गावीसु (सप्तमी)। भोति गावि, भोतियो गावी, गावियो (सम्बोधन)। อยํ โคสทฺทโต วิหิตสฺส อีปจฺจยสฺส วเสน นิปฺผนฺนสฺส อิตฺถิวาจกสฺส อีการนฺติตฺถิลิงฺคสฺส คาวีสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. यह 'गो' शब्द से विहित 'ई' प्रत्यय के वश से निष्पन्न, स्त्री-वाचक, ई-कारान्त स्त्रीलिंग 'गावी' शब्द की नामिक पदमाला है। โค, คาโว, คโว. คาวุํ, คาวํ, ควํ, คาโว, คโว. คาเวน, คเวน, โคหิ, โคภิ. คาวสฺส, ควสฺส, ควํ, คุนฺนํ, โคนํ. คาวา, คาวสฺมา, คาวมฺหา, ควา, ควสฺมา, ควมฺหา, โคหิ, โคภิ. คาวสฺส, ควสฺส, ควํ, คุนฺนํ, โคนํ. คาเว, คาวสฺมึ, คาวมฺหิ, คเว, ควสฺมึ, ควมฺหิ, คาเวสุ, คเวสุ, โคสุ. โภ โค, ภวนฺโต คาโว, คโว. गो, गावो, गवो (प्रथमा)। गावुं, गावं, गवं, गावो, गवो (द्वितीया)। गावेन, गवेन, गोहि, गोभि (तृतीया)। गावस्स, गवस्स, गवं, गुन्नं, गोनं (चतुर्थी)। गावा, गावस्मा, गावम्हा, गवा, गवस्मा, गवम्हा, गोहि, गोभि (पञ्चमी)। गावस्स, गवस्स, गवं, गुन्नं, गोनं (षष्ठी)। गावे, गावस्मिं, गावम्हि, गवे, गवस्मिं, गवम्हि, गावेसु, गवेसु, गोसु (सप्तमी)। भो गो, भवन्तो गावो, गवो (सम्बोधन)। อยํ ปุมวาจกสฺส โอการนฺตปุลฺลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส นามิกปทมาลา. यह पुं-वाचक (पुल्लिंग), ओ-कारान्त पुल्लिंग 'गो' शब्द की नामिक पदमाला है। โค, คาวี, คาโว, คาวี, คโว. คาวํ, ควํ, คาวึ, คาโว, คาวี คโว. โคหิ, โคภิ. ควํ, คุนฺนํ, โคนํ. โคหิ, โคภิ. ควํ, คุนฺนํ, โคนํ. โคสุ. โภติ โค, โภติโย คาโว, คาวี, คโว. อยํ ปุมิตฺถิวาจกสฺส โอการนฺตสฺสิตฺถิปุลฺลิงฺคสฺส โคสทฺทนามิกปทมาลา. गो, गावी, गावो, गावी, गवो (प्रथमा)। गावं, गवं, गाविं, गावो, गावी, गवो (द्वितीया)। गोहि, गोभि (तृतीया)। गवं, गुन्नं, गोनं (चतुर्थी)। गोहि, गोभि (पञ्चमी)। गवं, गुन्नं, गोनं (षष्ठी)। गोसु (सप्तमी)। भोति गो, भोतियो गावो, गावी, गवो (सम्बोधन)। यह स्त्री-पुं-वाचक (स्त्रीलिंग और पुल्लिंग), ओ-कारान्त स्त्रीलिंग-पुल्लिंग 'गो' शब्द की नामिक पदमाला है। เอตฺถ ปน ‘‘คาวุ’’นฺติ ปทํ เอกนฺตปุมวาจกตฺตา น วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, เอกนฺตปุมวาจกตฺตญฺจสฺส อาหจฺจปาฬิยา ญายติ ‘‘อิธ ปน ภิกฺขเว วสฺสูปคตํ ภิกฺขุํ อิตฺถี นิมนฺเตสิ ‘เอหิ ภนฺเต, หิรญฺญํ วา เต เทมิ, สุวณฺณํ วา เต เทมิ, เขตฺตํ วา เต เทมิ, วตฺถุํ วา เต เทมิ, คาวุํ วา เต เทมิ, คาวึ วา เต เทมิ. ทาสํ วา เต เทมิ, ทาสึ วา เต เทมิ, ธีตรํ วา เต เทมิ ภริยตฺถาย, อหํ วา เต ภริยา โหมิ, อญฺญํ วา เต ภริยํ อาเนมี’ติ’’ เอวํ อาหจฺจปาฬิยา ญายติ. यहाँ 'गावुं' यह पद एकांततः (पूर्णतः) पुल्लिंग-वाचक होने के कारण नहीं कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। इसका एकांततः पुल्लिंग-वाचक होना आगम-पालि (मूल पाठ) से ज्ञात होता है— 'यहाँ, भिक्षुओं! वर्षावास में उपगत भिक्षु को किसी स्त्री ने निमंत्रित किया— आइए भंते! मैं आपको हिरण्य (चांदी) देती हूँ, या सुवर्ण (सोना) देती हूँ, या खेत देती हूँ, या वास्तु (मकान) देती हूँ, या बैल (गावुं) देती हूँ, या गाय (गाविं) देती हूँ। दास देती हूँ, या दासी देती हूँ, या भार्या के लिए पुत्री देती हूँ, या मैं स्वयं आपकी भार्या बनती हूँ, या दूसरी भार्या लाती हूँ'— इस प्रकार आगम-पालि से यह ज्ञात होता है। เอตฺถ [Pg.277] หิ ‘‘คาวุ’’นฺติ วจเนน ปุมา วุตฺโต, ‘‘คาวิ’’นฺติ วจเนน อิตฺถี, ยํ ปน อิมิสฺสํ โอการนฺติตฺถิลิงฺคปทมาลายํ ‘‘คาวี’’ติ ปทํ จตุกฺขตฺตุํ วุตฺตํ, ตํ ‘‘กญฺญา’’ติ ปทํ วิย อิตฺถิลิงฺคสฺส อวิสทาการโวหารตาวิญฺญาปเน สมตฺถํ โหติ. น หิ อิตเรสุ ลิงฺเคสุ สมานสุติกภาเวน จตุกฺขตฺตุํ อาคตปทํ เอกมฺปิ อตฺถิ, ‘‘คาวี คาวิ’’นฺติ จ อิเมสํ สทฺทานํ กตฺถจิ ฐาเน อิตฺถิปุเมสุ สามญฺญวเสน ปวตฺตึ อุปริ กถยิสฺสาม. ยา ปนมฺเหหิ โอการนฺติตฺถิลิงฺคสฺส ‘‘โค, คาวี, คาโว, คาวี, คโว. คาวํ, ควํ, คาวิ’’นฺติอาทินา นเยน ปทมาลา กตา, ตตฺถ โคสทฺทโต สิโยนํ อีการาเทโส อํวจนสฺส จ อึการาเทโส ภวติ, เตน โอการนฺติตฺถิลิงฺคสฺส ‘‘คาวี คาวี คาวิ’’นฺติ รูปานิ ทสฺสิตานิ. ตถา หิ มุขมตฺตทีปนิยํ สทฺทสตฺถวิทุนา วชิรพุทฺธาจริเยน นิรุตฺตินเย โกสลฺลวเสน โคสทฺทโต โยนมีการาเทโส วุตฺโต. ยถา ปน โคสทฺทโต โยนมีการาเทโส ภวติ, ตถา สิสฺสีการาเทโส อํวจนสฺส จ อึการาเทโส ภวติ. อตฺริมา นยคฺคาหปริทีปนิโย คาถา – यहाँ 'गावु' इस वचन से पुरुष (बैल) कहा गया है, 'गावि' इस वचन से स्त्री (गाय); किन्तु इस ओकारान्त स्त्रीलिंग शब्दमाला में जो 'गावी' यह पद चार बार कहा गया है, वह 'कन्या' पद की तरह स्त्रीलिंग के अस्पष्ट आकार वाले व्यवहार को समझाने में समर्थ होता है। अन्य लिंगों में समान श्रुति होने के कारण चार बार आया हुआ एक भी पद नहीं है। 'गावी' और 'गावि' इन शब्दों की कहीं किसी स्थान पर स्त्री और पुरुष में सामान्य रूप से प्रवृत्ति के विषय में हम आगे कहेंगे। हमारे द्वारा ओकारान्त स्त्रीलिंग की जो 'गो, गावी, गावो, गावी, गवो। गावं, गवं, गाविं' आदि विधि से पदमाला बनाई गई है, वहाँ 'गो' शब्द से 'सि' और 'यो' के स्थान पर 'ई' आदेश और 'अं' वचन के स्थान पर 'इ' आदेश होता है, उससे ओकारान्त स्त्रीलिंग के 'गावी, गावी, गाविं' ये रूप दिखाए गए हैं। उसी प्रकार मुखमत्तदीपनी में शब्दशास्त्र के ज्ञाता वजिरबुद्ध आचार्य द्वारा निरुत्ति के मार्ग में कुशलता के कारण 'गो' शब्द से 'यो' के स्थान पर 'ई' आदेश कहा गया है। जैसे 'गो' शब्द से 'यो' के स्थान पर 'ई' आदेश होता है, वैसे ही 'सि' के स्थान पर 'ई' आदेश और 'अं' वचन के स्थान पर 'इ' आदेश होता है। इस नियम को ग्रहण करने वाली ये गाथाएँ हैं - อีปจฺจยา สิทฺเธสฺวปิ, ‘‘คาวี คาวี’’ติอาทิสุ; ปฐเมกวจนาทิ-อนฺเตสุ ชินสาสเน. 'ई' प्रत्यय से सिद्ध होने पर भी, 'गावी गावी' आदि पदों में; जिन-शासन में प्रथमा एकवचन आदि के अन्त में (ये प्रयुक्त हैं)। วทตา โยนมีการํ, โคสทฺทสฺสิตฺถิยํ ปน; อวิสทตฺตมกฺขาตุํ, นโย ทินฺโนติ โน รุจิ. स्त्रीलिंग में 'गो' शब्द के 'यो' विभक्ति के स्थान पर 'ई' कार कहते हुए, अस्पष्टता को बताने के लिए जो नियम दिया गया है, वह हमारा मत है। กิญฺจ ภิยฺโย อฏฺฐกถาสุ จ – और भी क्या, अट्ठकथाओं में भी - ‘‘คาโว’’ติ วตฺวา ‘‘คาวิ’’นฺติ-วจเนน ปนิตฺถิยํ; อวิสทตฺตมกฺขาตุํ, นโย ทินฺโนติ โน รุจิ. 'गावो' कहकर फिर 'गाविं' शब्द से स्त्रीलिंग में अस्पष्टता को बताने के लिए जो नियम दिया गया है, वह हमारा मत है। ตถา หิ สมนฺตปาสาทิกาทีสุ อฏฺฐกถาสุ ‘‘เฉโก หิ โคปาลโก สกฺขราโย อุจฺฉงฺเคน คเหตฺวา รชฺชุทณฺฑหตฺโถ ปาโตว วชํ คนฺตฺวา คาโว ปิฏฺฐิยํ ปหริตฺวา ปลิฆถมฺภมตฺถเก [Pg.278] นิสินฺโน ทฺวารํ ปตฺตํ ปตฺตํ คาวึ ‘เอโก ทฺเว’ติ สกฺขรํ ขิปิตฺวา คเณตี’’ติ อิมสฺมึ ปเทเส ‘‘คาโว’’ติ วตฺวา ‘‘คาวิ’’นฺติ วจเนน อิตฺถิปุมวาจกสฺส โอการนฺติตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส อวิสทาการโวหารตา วิหิตา. ‘‘คาโว’’ติ หิ อิมินา สามญฺญโต อิตฺถิปุมภูตา โคณา คหิตา, ตถา ‘‘คาวิ’’นฺติ อิมินาปิ อิตฺถิภูโต ปุมภูโต จ โคโณ. เอวํ ‘‘คาโว’’ติ จ ‘‘คาวิ’’นฺติ จ อิเม สทฺทา สทฺทสตฺถวิทูหิ อฏฺฐกถาจริเยหิ นิรุตฺตินยกุสลตาย สมานลิงฺควเสน เอกสฺมึเยว ปกรเณ เอกสฺมึเยว วากฺเย ปิณฺฑีกตา. ยทิ หิ อิตฺถิลิงฺเค วตฺตมานสฺส อิตฺถิปุมวาจกสฺส โอการนฺติตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส ปทมาลายํ ‘‘คาวี คาวิ’’มิจฺเจตานิ รูปานิ น ลพฺเภยฺยุํ, อฏฺฐกถายํ ‘‘คาโว’’ติ วตฺวา ‘‘คาว’’นฺติจฺเจว วตฺตพฺพํ สิยา, ‘‘คาวิ’’นฺติ ปน น วตฺตพฺพํ. ยถา จ ปน อฏฺฐกถาจริเยหิ ‘‘คาโว’’ติ อิตฺถิปุมวเสน สพฺเพสํ คุนฺนํ สงฺคาหกวจนํ วตฺวา เตเยว คาโว สนฺธาย ปุน ‘‘ทฺวารํ ปตฺตํ ปตฺตํ คาวิ’’นฺติ สทฺทรจนํ กุพฺพึสุ, ตสฺมา ‘‘คาวิ’’นฺติ อิทมฺปิ สพฺพสงฺคาหกวจนเมวาติ ทฏฺฐพฺพํ. อสพฺพสงฺคาหกวจนํ อิทํ คาวีสทฺเทน อิตฺถิยาเยว คเหตพฺพตฺตาติ เจ? น, ปกรณวเสน อตฺถนฺตรสฺส วิทิตตฺตา. น หิ สพฺพวเชสุ ‘‘อิตฺถิโยเยว วสนฺติ, น ปุมาโน’’ติ จ, ‘‘ปุมาโนเยว วสนฺติ, น อิตฺถิโย’’ติ จ สกฺกา วตฺตุํ. อปิจ ‘‘คาวิมฺปิ ทิสฺวา ปลายนฺติ ‘ภิกฺขู’ติ มญฺญมานา’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ, เอตฺถาปิ ‘‘คาวิ’’นฺติ วจเนน อิตฺถิภูโต ปุมภูโต จ สพฺโพ โค คหิโตติ ทฏฺฐพฺพํ. อิตรถา ‘‘อิตฺถิภูโตเยว โค ภิกฺขูติ มญฺญิตพฺโพ’’ติ อาปชฺชติ. อิติ ปาฬินเยน อิตฺถิลิงฺเค วตฺตมานมฺหา อิตฺถิปุมวาจกสฺมา โคสทฺทโต อํวจนสฺส อึการาเทโส โหตีติ วิญฺญายติ. जैसे कि समन्तपासाधिका आदि अट्ठकथाओं में - 'चतुर ग्वाला कंकड़ अपनी गोद में लेकर, हाथ में रस्सी और डंडा लिए सुबह ही बाड़े में जाकर, गायों (गावो) को पीठ पर मारकर, अर्गला के खंभे के ऊपर बैठकर, द्वार पर पहुँची हुई प्रत्येक गाय (गाविं) को 'एक, दो' कहकर कंकड़ फेंककर गिनता है' - इस स्थान पर 'गावो' कहकर 'गाविं' शब्द के प्रयोग से स्त्री और पुरुष दोनों को कहने वाले ओकारान्त स्त्रीलिंग 'गो' शब्द की अस्पष्ट व्यवहार्यता विहित है। क्योंकि 'गावो' इससे सामान्य रूप से स्त्री और पुरुष रूप बैल/गायें ग्रहण किए गए हैं, वैसे ही 'गाविं' इससे भी स्त्री रूप और पुरुष रूप बैल/गाय। इस प्रकार 'गावो' और 'गाविं' इन शब्दों को शब्दशास्त्र के ज्ञाता अट्ठकथाचार्यों ने निरुत्ति के नियम में कुशलता के कारण समान लिंग के रूप में एक ही प्रकरण में और एक ही वाक्य में एकत्रित किया है। यदि स्त्रीलिंग में प्रयुक्त होने वाले स्त्री-पुरुष वाचक ओकारान्त स्त्रीलिंग 'गो' शब्द की पदमाला में 'गावी, गाविं' ये रूप प्राप्त नहीं होते, तो अट्ठकथा में 'गावो' कहकर 'गावं' ही कहना चाहिए था, 'गाविं' नहीं। और जैसे अट्ठकथाचार्यों ने 'गावो' इस शब्द से स्त्री-पुरुष के भेद से सभी गायों का संग्राहक वचन कहकर, उन्हीं गायों के संदर्भ में पुनः 'द्वारं पत्तं पत्तं गाविं' इस शब्द की रचना की, इसलिए 'गाविं' इसे भी सबका संग्राहक वचन ही समझना चाहिए। यदि कहें कि यह सबका संग्राहक वचन नहीं है क्योंकि 'गावी' शब्द से केवल स्त्री ही ग्रहण करनी चाहिए? नहीं, प्रकरण के कारण अन्य अर्थ ज्ञात होने से। क्योंकि सभी बाड़ों के विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि 'केवल स्त्रियाँ ही रहती हैं, पुरुष नहीं' और 'केवल पुरुष ही रहते हैं, स्त्रियाँ नहीं'। इसके अतिरिक्त 'गाविं पि दिस्वा पलायन्ति भिक्खूति मञ्ञमाना' यह पालि देखी जाती है, यहाँ भी 'गाविं' शब्द से स्त्री रूप और पुरुष रूप सभी 'गो' ग्रहण किए गए हैं, ऐसा समझना चाहिए। अन्यथा 'केवल स्त्री रूप गो को ही भिक्षु समझना चाहिए' ऐसा प्रसंग आ जाएगा। इस प्रकार पालि के नियम से स्त्रीलिंग में प्रयुक्त होने वाले स्त्री-पुरुष वाचक 'गो' शब्द से 'अं' वचन के स्थान पर 'इ' आदेश होता है, ऐसा जाना जाता है। วชิรพุทฺธาจริเยนปิ [Pg.279] โคสทฺทโต อีปจฺจเย กาตพฺเพปิ อกตฺวา โยนมีการาเทโส กโต. ตสฺสาธิปฺปาโย เอวํ สิยา โคสทฺทโต อีปจฺจเย กเต สติ อีปจฺจยวเสน ‘‘คาวี’’ติ นิปฺผนฺนสทฺโท ยตฺถ กตฺถจิ วิสเย ‘‘มิคี โมรี กุกฺกุฏี’’อิจฺจาทโย วิย อิตฺถิวาจโกเยว สิยา, น กตฺถจิปิ อิตฺถิปุมวาจโก, ตสฺมา สาสนานุกูลปฺปโยควเสน โยนมีการาเทโส กาตพฺโพติ. อิติ วชิรพุทฺธาจริยมเต โคสทฺทโต โยนํ อีการาเทโส โหตีติ ญายติ. वजिरबुद्ध आचार्य द्वारा भी 'गो' शब्द से 'ई' प्रत्यय किए जाने योग्य होने पर भी, उसे न करके 'यो' के स्थान पर 'ई' आदेश किया गया है। उनका अभिप्राय ऐसा होगा कि 'गो' शब्द से 'ई' प्रत्यय करने पर 'ई' प्रत्यय के कारण 'गावी' यह निष्पन्न शब्द किसी भी विषय में 'मिगी, मोरी, कुक्कुटी' आदि की तरह केवल स्त्रीवाचक ही होगा, कहीं भी स्त्री-पुरुष वाचक नहीं होगा; इसलिए शासन के अनुकूल प्रयोग के कारण 'यो' के स्थान पर 'ई' आदेश करना चाहिए। इस प्रकार वजिरबुद्ध आचार्य के मत में 'गो' शब्द से 'यो' के स्थान पर 'ई' आदेश होता है, ऐसा ज्ञात होता है। กิญฺจ ภิยฺโย – ยสฺมา อฏฺฐกถาจริเยหิ ‘‘คาโว ปิฏฺฐิยํ ปหริตฺวา’’ติอาทินา นเยน รจิตาย ‘‘ทฺวารํ ปตฺตํ ปตฺตํ คาวึ ‘เอโก ทฺเว’ติ สกฺขรํ ขิปิตฺวา คเณตี’’ติ วจนปริโยสานาย สทฺทรจนายํ ‘‘เอโก คาวี, ทฺเว คาวี’’ติ อตฺถโยชนานโย วตฺตพฺโพ โหติ, ‘‘คาวิ’’นฺติ อุปโยควจนญฺจ ทิสฺสติ. อิติ อฏฺฐกถาจริยานํ มเต โคสทฺทโต สิโยนมีการาเทโส อํวจนสฺส อึการาเทโส โหตีติ ญายติ. ตสฺมาเยวมฺเหหิ ยา สา โอการนฺตตาปกติกสฺส อิตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส ‘‘โค, คาวี, คาโว, คาวี, คโว, คาวํ, คาวิ’’นฺติอาทินา นเยน ปทมาลา ฐปิตา, สา ปาฬินยานุกูลา อฏฺฐกถานยานุกูลา กจฺจายนาจริยมตํ คเหตฺวา ปทนิปฺผตฺติชนกสฺส ครุโน จ มตานุกูลา, ‘‘คาวี’’ติ ปทสฺส จตุกฺขตฺตุํ อาคตตฺตา ปน โอการนฺติตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส อวิสทาการโวหารตฺตญฺจ สาเธติ. อิจฺเจสา ปาฬินยาทีสุ ญาเณน สมฺมา อุปปริกฺขิยมาเนสุ อตีว ยุชฺชติ, นตฺเถตฺถ อปฺปมตฺตโกปิ โทโส. เอตฺถ ปน ปจฺจตฺโตปโยคาลปนานํ พหุวจนฏฺฐาเน ‘‘คาวิโย’’ติ ปทญฺจ กรณสมฺปทานนิสฺสกฺกสามีนเมกวจนฏฺฐาเน ‘‘คาวิยา’’ติ ปทญฺจ กรณนิสฺสกฺกานํ พหุวจนฏฺฐาเน ‘‘คาวีหิ คาวีภี’’ติ ปทานิ จ สมฺปทานสามีนํ [Pg.280] พหุวจนฏฺฐาเน ‘‘คาวีน’’นฺติ ปทญฺจ ภุมฺมวจนฏฺฐาเน ‘‘คาวิยา, คาวิยํ, คาวีสู’’ติ ปทานิ จาติ อิมานิ วิตฺถารโต โสฬส ปทานิ เอกนฺเตน อีปจฺจยวเสน สิทฺธตฺตา เอกนฺติตฺถิวาจกตฺตา จ น วุตฺตานีติ ทฏฺฐพฺพํ. और भी अधिक - क्योंकि अट्ठकथाचार्यों द्वारा 'गावो पिट्ठियं पहरित्वा' (पीठ पर गायों को मारकर) आदि विधि से रचित 'द्वारं पत्तं पत्तं गाविं एको द्वेति सक्खरं खपित्वा गणेति' (द्वार पर पहुँची प्रत्येक गाय को 'एक, दो' इस प्रकार कंकड़ फेंककर गिनता है) इस वाक्य रचना के अंत में 'एको गावी, द्वे गावी' इस प्रकार अर्थ-योजना का नियम कहना चाहिए, और 'गाविं' ऐसा द्वितीय विभक्ति का रूप भी दिखाई देता है। इस प्रकार अट्ठकथाचार्यों के मत में 'गो' शब्द से 'सि' और 'यो' के स्थान पर 'ई' कार का आदेश और 'अं' विभक्ति के स्थान पर 'इ' कार का आदेश होता है, ऐसा ज्ञात होता है। इसीलिए हमारे द्वारा जो वह ओ-कारान्त प्रकृति वाले स्त्रीलिंग 'गो' शब्द की 'गो, गावी, गावो, गावी, गवो, गावं, गाविं' आदि विधि से पदमाला (शब्द-रूप) स्थापित की गई है, वह पालि विधि के अनुकूल, अट्ठकथा विधि के अनुकूल और कच्चायनाचार्य के मत को ग्रहण करके पद-सिद्धि करने वाले गुरु के मत के भी अनुकूल है; 'गावी' इस पद के चार बार आने के कारण यह ओ-कारान्त स्त्रीलिंग 'गो' शब्द के स्पष्ट आकार वाले व्यवहार को सिद्ध करता है। इस प्रकार पालि विधि आदि में ज्ञान के द्वारा सम्यक् रूप से परीक्षा करने पर यह अत्यंत उपयुक्त है, इसमें अल्पमात्र भी दोष नहीं है। यहाँ प्रथमा, द्वितीया और संबोधन के बहुवचन के स्थान पर 'गावियो' पद, और करण, संप्रदान, अपादान तथा स्वामी (षष्ठी) के एकवचन के स्थान पर 'गाविया' पद, और करण तथा अपादान के बहुवचन के स्थान पर 'गावीहि, गावीभि' पद, और संप्रदान तथा स्वामी के बहुवचन के स्थान पर 'गावीनं' पद, और सप्तमी विभक्ति के स्थान पर 'गाविया, गावियं, गावीसु' पद - ये विस्तार से सोलह पद एकांत रूप से 'ई' प्रत्यय के वश से सिद्ध होने के कारण और एकांत रूप से स्त्री-वाचक होने के कारण यहाँ नहीं कहे गए हैं, ऐसा समझना चाहिए। อยํ ปเนตฺถ นิจฺฉโย วุจฺจเต โสตูนํ นิกฺกงฺขภาวาย – อิตฺถิลิงฺคปเทสุ หิ ‘‘คาวี คาวิ’’นฺติ อิมานิ อีปจฺจยวเสน วา อีการึการาเทสวเสน วา สิชฺฌนฺติ. เอเตสุ ปจฺฉิมนโย อิธาธิปฺเปโต, ปุพฺพนโย อญฺญตฺถ. ตถา ‘‘คาวี คาวิ’’นฺติ อิมานิ อีปจฺจยวเสนปิ สิทฺธตฺตา เยภุยฺเยน อิตฺถิวาจกานิ ภวนฺติ อีการึการาเทสวเสนปิ สิทฺธตฺตา. กตฺถจิ เอกกฺขเณเยว สพฺพสงฺคาหกวเสน อิตฺถิปุมวาจกานิ ภวนฺติ. เอเตสุปิ ปจฺฉิโมเยว นโย อิธาธิปฺเปโต, ปุพฺพนโย อญฺญตฺถ. ‘‘คาวิโย. คาวิยา, คาวีหิ, คาวีภิ. คาวีนํ. คาวิยํ, คาวีสู’’ติ เอตานิ ปน อีปจฺจยวเสเนว สิทฺธตฺตา สพฺพถาปิ อิตฺถีนํเยว วาจกานิ ภวนฺติ. อิตฺถิภูเตสฺเวว โคทพฺเพสุ โลกสงฺเกตวเสน วิเสสโต ปวตฺตตฺตา เอกนฺตโต อิตฺถิทพฺเพสุ ปวตฺตานิ ‘‘มิคี โมรี กุกฺกุฏี’’อิจฺจาทีนิ ปทานิ วิย. กิญฺจาปิ ปน ‘‘นที มหี’’อิจฺจาทีนิปิ อิตฺถิลิงฺคานิ อีปจฺจยวเสเนว สิทฺธานิ, ตถาปิ ตานิ อวิญฺญาณกตฺตา ตทตฺถานํ อิตฺถิทพฺเพสุ วตฺตนฺตีติ วตฺตุํ น ยุชฺชติ. อิตฺถิปุมนปุํสกภาวรหิตา หิ ตทตฺถา. ยสฺมา ปน อิตฺถิลิงฺเค โคสทฺเท เอนโยโค เอสุกาโร จ น ลพฺภติ, ตสฺมา ‘‘คาเวน คเวน คาเวสุ คเวสู’’ติ ปทานิ น วุตฺตานิ. ยสฺมา จ อิตฺถิลิงฺเคน โคสทฺเทน สทฺธึ สสฺมาสฺมึวจนานิ สรูปโต ปรตฺตํ น ยนฺติ, ตสฺมา ‘‘คาวสฺส ควสฺส คาวสฺมา ควสฺมา คาวสฺมึ ควสฺมิ’’นฺติ ปทานิ น วุตฺตานิ. ยสฺมา จ ตตฺถ สฺมาวจนสฺส อาเทสภูโต อากาโร จ มฺหากาโร จ น ลพฺภติ, ตสฺมา ‘‘คาวา ควา คาวมฺหา ควมฺหา’’ติ ปทานิ น วุตฺตานิ. ยสฺมา จ สฺมึวจนสฺส อาเทสภูโต เอกาโร [Pg.281] จ มฺหิกาโร จ น ลพฺภติ, ตสฺมา ‘‘คาเว คเว คาวมฺหิ ควมฺหี’’ติ ปทานิ น วุตฺตานิ. อปิจ ‘‘ยาย ตายา’’ติอาทีหิ สมานาธิกรณปเทหิ โยเชตุํ อยุตฺตตฺตาปิ ‘‘คาเวน คเวนา’’ติอาทีนิ อิตฺถิลิงฺคฏฺฐาเน น วุตฺตานิ. ตถา หิ ‘‘ยาย ตาย’’อิจฺจาทีหิ สทฺธึ ‘‘คาเวน คเวนา’’ติอาทีนิ น โยเชตพฺพานิ เอกนฺตปุลฺลิงฺครูปตฺตา. यहाँ श्रोताओं की शंका दूर करने के लिए यह निश्चय कहा जाता है - स्त्रीलिंग पदों में 'गावी, गाविं' ये पद 'ई' प्रत्यय के द्वारा अथवा 'ई-कार' और 'इ-कार' के आदेश के द्वारा सिद्ध होते हैं। इनमें से पिछला नियम (आदेश वाला) यहाँ अभिप्रेत है, पिछला (प्रत्यय वाला) अन्यत्र। वैसे ही 'गावी, गाविं' ये पद 'ई' प्रत्यय के द्वारा भी सिद्ध होने के कारण प्रायः स्त्री-वाचक होते हैं और 'ई-कार' एवं 'इ-कार' के आदेश के द्वारा भी सिद्ध होते हैं। कहीं-कहीं एक ही क्षण में सबको समाहित करने के कारण वे स्त्री और पुरुष दोनों के वाचक होते हैं। इनमें भी पिछला ही नियम यहाँ अभिप्रेत है, पिछला अन्यत्र। 'गावियो, गाविया, गावीहि, गावीभि, गावीनं, गावियं, गावीसु' - ये पद तो 'ई' प्रत्यय के द्वारा ही सिद्ध होने के कारण सर्वथा स्त्रियों के ही वाचक होते हैं। स्त्रीलिंगी गो-द्रव्यों में ही लोक-संकेत के कारण विशेष रूप से प्रवृत्त होने से, ये एकांत रूप से स्त्री-द्रव्यों में प्रवृत्त 'मिगी' (हिरणी), 'मोरी' (मोरनी), 'कुक्कुटी' (मुर्गी) आदि पदों के समान हैं। यद्यपि 'नदी, मही' आदि भी स्त्रीलिंग शब्द 'ई' प्रत्यय के द्वारा ही सिद्ध हैं, तथापि वे अचेतन होने के कारण उनके अर्थों को स्त्री-द्रव्यों में कहना उचित नहीं है। उनके अर्थ तो स्त्री, पुरुष और नपुंसक भाव से रहित हैं। क्योंकि स्त्रीलिंग 'गो' शब्द में 'एन' योग और 'एसु' कार प्राप्त नहीं होता, इसलिए 'गावेन, गवेन, गावेसु, गवेसु' पद नहीं कहे गए हैं। और क्योंकि स्त्रीलिंग 'गो' शब्द के साथ 'स, स्मा, स्मिं' विभक्तियाँ अपने मूल रूप में आगे नहीं जातीं, इसलिए 'गावस्स, गवस्स, गावस्मा, गवस्मा, गावस्मिं, गवस्मिं' पद नहीं कहे गए हैं। और क्योंकि वहाँ 'स्मा' विभक्ति के आदेश स्वरूप 'आ' कार और 'म्ह' कार प्राप्त नहीं होते, इसलिए 'गावा, गवा, गावम्हा, गवम्हा' पद नहीं कहे गए हैं। और क्योंकि 'स्मिं' विभक्ति के आदेश स्वरूप 'ए' कार और 'म्हि' कार प्राप्त नहीं होते, इसलिए 'गावे, गवे, गावम्हि, गवम्हि' पद नहीं कहे गए हैं। इसके अतिरिक्त 'याय, ताय' आदि (स्त्रीलिंग) समानाधिकरण पदों के साथ जोड़ना अयुक्त होने के कारण भी 'गावेन, गवेन' आदि पद स्त्रीलिंग के स्थान पर नहीं कहे गए हैं। क्योंकि 'याय, ताय' आदि के साथ 'गावेन, गवेन' आदि को नहीं जोड़ना चाहिए क्योंकि वे एकांत रूप से पुल्लिंग रूप हैं। เกจิ ปเนตฺถ วเทยฺยุํ – ยา ตุมฺเหหิ โอการนฺตตาปกติกสฺส อิตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส ‘‘โค, คาวี, คาโว, คาวี, คโว’’ติอาทินา นเยน ปทมาลา ฐปิตา, สา ‘‘มาตุคาโม อิตฺถี มาตุคามา อิตฺถิโย’’ติ วุตฺตสทิสา จ โหตีติ? ตนฺน. มาตุคามอิตฺถีสทฺทา หิ นานาลิงฺคา ปุมิตฺถิลิงฺคภาเวน, นานาธาตุกา จ คมุ อิสุธาตุวเสน, อิมสฺมึ ปน ฐาเน โค คาวีสทฺทา เอกลิงฺคา อิตฺถิ ลิงฺคภาเวน, เอกธาตุกา จ คมุธาตุวเสนาติ. ยชฺเชวํ โคณสทฺทสฺส โคสทฺทสฺสาเทสวเสน กจฺจายเนน วุตฺตตฺตา ตทาเทสตฺตํ เอกธาตุกตฺตญฺจาคมฺม เตนาปิ สทฺธึ มิสฺเสตฺวา ปทมาลา วตฺตพฺพาติ? น, โคณสทฺทสฺส อจฺจนฺตปุลฺลิงฺคตฺตา อการนฺตตาปกติกตฺตา จ. ตถา หิ โส วิสุํ ปุลฺลิงฺคฏฺฐาเน อุทฺทิฏฺโฐ. อยํ ปน ‘‘โค, คาวี, คาโว, คาวี, คโว’’ติอาทิกา ปทมาลา โอการีการนฺตปทานิ มิสฺเสตฺวา กตาติ น สลฺลกฺเขตพฺพา, อถ โข วิกปฺเปน โคสทฺทโต ปเรสํ สิ โย อํวจนานํ อีการึการาเทสวเสน วุตฺตปทวนฺตตฺตา โอการนฺติตฺถิลิงฺคปทมาลา อิจฺเจว สารโต ปจฺเจตพฺพา. यहाँ कुछ लोग कह सकते हैं - आपके द्वारा जो ओ-कारान्त प्रकृति वाले स्त्रीलिंग 'गो' शब्द की 'गो, गावी, गावो, गावी, गवो' आदि विधि से पदमाला स्थापित की गई है, वह 'मातुगामो इत्थी, मातुगामा इत्थियो' इस प्रकार कहे गए के समान ही है? ऐसा नहीं है। क्योंकि 'मातुगाम' और 'इत्थी' शब्द पुल्लिंग और स्त्रीलिंग होने के कारण भिन्न लिंग वाले हैं, और 'गमु' तथा 'इसु' धातु होने के कारण भिन्न धातु वाले हैं; परंतु इस स्थान पर 'गो' और 'गावी' शब्द स्त्रीलिंग होने के कारण एक ही लिंग वाले हैं, और 'गमु' धातु होने के कारण एक ही धातु वाले हैं। यदि ऐसा है, तो 'गोण' शब्द को 'गो' शब्द के आदेश के रूप में कच्चायन द्वारा कहे जाने के कारण, उसके आदेश होने और एक ही धातु होने के कारण, उसके साथ मिलाकर भी पदमाला कहनी चाहिए? नहीं, क्योंकि 'गोण' शब्द अत्यंत पुल्लिंग है और अ-कारान्त प्रकृति वाला है। इसीलिए उसे पुल्लिंग के स्थान पर अलग से निर्दिष्ट किया गया है। यह 'गो, गावी, गावो, गावी, गवो' आदि पदमाला ओ-कार और ई-कारान्त पदों को मिलाकर बनाई गई है, ऐसा नहीं समझना चाहिए; बल्कि विकल्प से 'गो' शब्द से परे 'सि, यो, अं' विभक्तियों के स्थान पर 'ई-कार' और 'इ-कार' के आदेश वाली पद-योजना होने के कारण, इसे ओ-कारान्त स्त्रीलिंग पदमाला ही सार रूप में समझना चाहिए। อิทานิ โคสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคภาวสาธกานิ สุตฺตปทานิ โลกิกปฺปโยคานิ จ กถยาม – ‘‘เสยฺยถาปิ ภิกฺขเว วสฺสานํ ปจฺฉิเม มาเส สรทสมเย กิฏฺฐสมฺพาเธ โคปาลโก [Pg.282] คาโว รกฺเขยฺย, ตา คาโว ตโต ตโต ทณฺเฑน อาโกเฏยฺย. अब 'गो' शब्द के स्त्रीलिंग होने को सिद्ध करने वाले सूत्र-पद और लौकिक प्रयोगों को कहते हैं - 'जैसे, भिक्षुओं! वर्षा ऋतु के अंतिम महीने में, शरद ऋतु के समय, जब फसलें घनी हों, तब ग्वाला गायों की रक्षा करे, वह उन गायों को यहाँ-वहाँ से डंडे से मारे'। อนฺนทา พลทา เจตา, วณฺณทา สุขทา จ ตา; เอตมตฺถํ วสํ ญตฺวา, นาสฺสุ คาโว หนึสุ เต. 'वे (गायें) अन्न देने वाली, बल देने वाली, वर्ण (कांति) देने वाली और सुख देने वाली हैं; इस अर्थ (महत्व) को जानकर, उन्होंने गायों को नहीं मारा'। สพฺพา คาโว สมาหรติ. คมิสฺสนฺติ ภนฺเต คาโว วจฺฉคิทฺธินิโย’’ติ อิมานิ สุตฺตปทานิ. ‘‘โคสุ ทุยฺหมานาสุ คโต’’ติอาทีนิ ปน โลกิกปฺปโยคานิ. อิติ โคสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคภาโวปิ ปุลฺลิงฺคภาโว วิย สารโต ปจฺเจตพฺโพ. 'वह सभी गायों को इकट्ठा करता है। भन्ते! बछड़ों के प्रति स्नेह रखने वाली गायें जाएँगी' - ये सूत्र-पद हैं। 'गायों के दुहे जाते समय वह गया' आदि लौकिक प्रयोग हैं। इस प्रकार 'गो' शब्द का स्त्रीलिंग होना भी पुल्लिंग होने के समान ही सार रूप में स्वीकार करना चाहिए। ตตฺร ‘‘โค, คาวี, คาโว, คาวี, คโว’’ติอาทีนิ กิญฺจาปิ อิตฺถิลิงฺคภาเวน วุตฺตานิ, ตถาปิ ยถาปโยคํ ‘‘ปชา เทวตา’’ติปทานิ วิย อิตฺถิปุริสวาจกาเนว ภวนฺติ, ตสฺมา อิตฺถิลิงฺควเสน ‘‘สา โค’’ติ วา ‘‘ตา คาโว’’ติ วา วุตฺเต อิตฺถิปุมภูตา สพฺเพปิ โคณา คหิตาติ เวทิตพฺพา. น หิ อีทิเส ฐาเน เอกนฺตโต ลิงฺคํ ปธานํ, อตฺโถเยว ปธาโน. ‘‘วเชคาโว ทุหนฺตี’’ติ วุตฺเต กิญฺจาปิ ‘‘คาโว’’ติ อยํ สทฺโท ปุเมปิ วตฺตติ, ตถาปิ ทุหนกฺริยาย ปุเม อสมฺภวโต อตฺถวเสน อิตฺถิโย ญายนฺเต. ‘‘คาวี ทุหนฺตี’’ติ วุตฺเต ปน ลิงฺควเสน อตฺถวเสน จ วจนโต โก สํสยมาปชฺชิสฺสติ วิญฺญู. ‘‘ตา คาโว จรนฺตี’’ติ วุตฺเต อิตฺถิลิงฺควเสน วจนโต กทาจิ กสฺสจิ สํสโย สิยา ‘‘นนุ อิตฺถิโย’’ติ, ปุลฺลิงฺควเสน ปน ‘‘เต คาโว จรนฺตี’’ติ วุตฺเต สํสโย นตฺถิ, อิตฺถิโย จ ปุมาโน จ ญายนฺเต ปุลฺลิงฺคพหุวจเนน กตฺถจิ อิตฺถิปุมสฺส คหิตตฺตา. ‘‘อเถตฺถ สีหา พฺยคฺฆา จา’’ติอาทีสุ วิย ‘‘คาวี จรตี’’ติ จ ‘‘คาวึ ปสฺสตี’’ติ จ วุตฺเต อิตฺถี วิญฺญายเต คาวีสทฺเทน อิตฺถิยา คเหตพฺพตฺตา[Pg.283]. โลกิกปฺปโยเคสุ หิ สาสนิกปฺปโยเคสุ จ คาวีสทฺเทน อิตฺถี คยฺหติ. เอกจฺจํ ปน สาสนิกปฺปโยคํ สนฺธาย ‘‘คาวี’’ติ, ‘‘คาวิ’’นฺติ จ ‘‘อิตฺถิปุริสสาธารณวจนมโวจุมฺห. ตถา หิ ‘‘เสยฺยถาปิ ภิกฺขเว ทกฺโข โคฆาตโก วา โคฆาตกนฺเตวาสี วา คาวึ วธิตฺวา จตุมหาปเถ พิลโส วิภชิตฺวา นิสินฺโน อสฺสา’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. อฏฺฐกถาสุ จ ‘‘คาโว’’ติ อิตฺถิปุมสาธารณํ สทฺทรจนํ กตฺวา ปุน ตเทว อิตฺถิปุมํ สนฺธาย ‘‘ทฺวารํ ปตฺตํ ปตฺตํ คาวิ’’นฺติ รจิตา สทฺทรจนา ทิสฺสติ. यहाँ 'गो, गावी, गावो, गावी, गवो' आदि यद्यपि स्त्रीलिंग के रूप में कहे गए हैं, फिर भी प्रयोग के अनुसार 'पजा' (प्रजा) और 'देवता' शब्दों की तरह वे स्त्री और पुरुष दोनों के वाचक होते हैं। इसलिए स्त्रीलिंग के वश से 'सा गो' (वह गाय) या 'ता गावो' (वे गायें) कहने पर स्त्री और पुरुष दोनों रूप वाले सभी गो-वंश (बैल और गाय) ग्रहण किए गए हैं, ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि ऐसे स्थान पर एकांततः लिंग प्रधान नहीं होता, अर्थ ही प्रधान होता है। 'व्रज में गायें दुही जाती हैं' (वजे गावो दुहन्ति) कहने पर, यद्यपि 'गावो' यह शब्द पुल्लिंग में भी प्रयुक्त होता है, फिर भी दुहने की क्रिया के पुरुष (बैल) में असंभव होने के कारण अर्थ के वश से स्त्रियाँ (गायें) ही जानी जाती हैं। 'गावी दुहन्ति' (गायें दुही जाती हैं) कहने पर तो लिंग और अर्थ दोनों के वश से कहे जाने के कारण कौन विद्वान संदेह करेगा? 'ता गावो चरन्ति' (वे गायें चरती हैं) कहने पर स्त्रीलिंग के वश से कहे जाने के कारण कभी किसी को संदेह हो सकता है कि 'क्या ये स्त्रियाँ (गायें) ही हैं?', परंतु पुल्लिंग के वश से 'ते गावो चरन्ति' कहने पर संदेह नहीं होता, क्योंकि पुल्लिंग बहुवचन द्वारा कहीं-कहीं स्त्री और पुरुष दोनों का ग्रहण होता है। जैसे 'अथ एत्थ सीहा ब्यग्घा च' (यहाँ सिंह और बाघ हैं) आदि में। 'गावी चरति' और 'गाविं पस्सति' कहने पर स्त्री ही जानी जाती है क्योंकि 'गावी' शब्द से स्त्री का ही ग्रहण होना चाहिए। लौकिक और शासनिक (धार्मिक) प्रयोगों में 'गावी' शब्द से स्त्री ही ग्रहण की जाती है। किसी शासनिक प्रयोग के संदर्भ में 'गावी' और 'गाविं' को हमने स्त्री-पुरुष साधारण वचन कहा है। जैसा कि पालि में देखा जाता है - 'जैसे, भिक्षुओं! कोई चतुर कसाई या कसाई का शिष्य गाय (गाविं) को मारकर चौराहे पर टुकड़ों में बाँटकर बैठा हो।' अट्ठकथाओं में भी 'गावो' इस प्रकार स्त्री-पुरुष साधारण शब्द रचना करके, पुनः उसी स्त्री-पुरुष के संदर्भ में 'द्वारं पत्तं पत्तं गाविं' ऐसी शब्द रचना देखी जाती है। เอตฺถ หิ โคชาติยํ ฐิตา อิตฺถีปิ ปุมาปิ ‘‘คาวี’’ติ สงฺขํ คจฺฉติ. วิเสสโต ปน ‘‘คาวี’’ติ อิทํ อิตฺถิยา อธิวจนํ. ตถา หิ ตตฺถ ตตฺถ ปาฬิปฺปเทสาทีสุ ‘‘อจิรปกฺกนฺตสฺส ภควโต พาหิยํ ทารุจีริยํ คาวี ตรุณวจฺฉา อธิปติตฺวา ชีวิตา โวโรเปสี’’ติ, ‘‘คาวุํ วา เต เทมิ, คาวึ วา เต เทมี’’ติ จ ‘‘ติณสีโห กโปตวณฺณคาวีสทิโส’’ติ จ ปโยคทสฺสนโต อิตฺถี กถิยตีติ วตฺตพฺพํ. โคสทฺเทน ปน ‘‘โคทุหนํ. คทฺทุหนํ. โคขีรํ โคธโน โครูปานิ จา’’ติ ทสฺสนโต อิตฺถีปิ ปุมาปิ กถิยตีติ วตฺตพฺพํ. यहाँ गो-जाति में स्थित स्त्री और पुरुष दोनों ही 'गावी' संज्ञा को प्राप्त होते हैं। विशेष रूप से 'गावी' यह स्त्री का ही पर्यायवाची है। क्योंकि विभिन्न पालि प्रदेशों आदि में 'भगवान के प्रस्थान करने के कुछ ही समय बाद बाहिय दारुचीरिय को एक छोटे बछड़े वाली गाय (गावी) ने टक्कर मारकर प्राणों से रहित कर दिया', 'मैं तुम्हें बैल (गावुं) देता हूँ या तुम्हें गाय (गाविं) देता हूँ' और 'तृण-सिंह कपोत-वर्ण वाली गाय (गावी) के समान है' - ऐसे प्रयोगों के दर्शन से यह कहना चाहिए कि स्त्री (गाय) ही कही जाती है। 'गो' शब्द से तो 'गो-दोहन, गद्-दोहन (गो-दोहन), गो-क्षीर, गो-धन और गो-रूप' - ऐसे प्रयोगों के दर्शन से स्त्री और पुरुष दोनों कहे जाते हैं, ऐसा कहना चाहिए। อิทานิ โอการนฺตสฺส อิตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส ปทมาลายํ ปาฬินยาทินิสฺสิโต อตฺถยุตฺตินโย วุจฺจเต วิญฺญูนํ โกสลฺลชนนตฺถํ – अब ओ-कारान्त स्त्रीलिंग 'गो' शब्द की पदमाला (रूप-सिद्धि) में पालि-नय आदि पर आधारित अर्थ-युक्ति-नय विद्वानों के कौशल को बढ़ाने के लिए कहा जाता है - สา โค คจฺฉติ, สา คาวี คจฺฉติ, ตา คาโว, คาวี, คโว คจฺฉนฺติ. ตํ คาวํ, คาวึ, ควํ ปสฺสติ, ตา คาโว, คาวี, คโว ปสฺสติ. ตาหิ โคหิ, โคภิ กตํ. ตาสํ ควํ, คุนฺนํ, โคนํ เทติ. ตาหิ โคหิ, โคภิ อเปติ. ตาสํ ควํ[Pg.284], คุนฺนํ, โคนํ สิงฺคานิ. ตาสุ โคสุ ปติฏฺฐิตํ. โภติ โค ตฺวํ ติฏฺฐ, โภติโย คาโว คาวี, ควา ตุมฺเห ติฏฺฐถ. वह गाय जाती है, वह गाय जाती है, वे गायें जाती हैं। उस गाय को देखता है, उन गायों को देखता है। उन गायों के द्वारा किया गया। उन गायों को देता है। उन गायों से अलग होता है। उन गायों के सींग। उन गायों में स्थित। हे गाय! तुम खड़ी रहो, हे गायों! तुम सब खड़ी रहो। อปโรปิ วุจฺจเต – दूसरा भी कहा जाता है - สา โค นทึ ตรนฺตี คจฺฉติ, สา คาวี นทึ ตรนฺตี คจฺฉติ, ตา คาโว, คาวี, คโว นทึ ตรนฺตีโย คจฺฉนฺติ. ตํ คาวํ, คาวึ, ควํ นทึ ตรนฺตึ ปสฺสติ, ตา คาโว, คาวี, คโว นทึ ตรนฺติโย ปสฺสติ. ตาหิ โคหิ, โคภิ นทึ ตรนฺตีหิ กตํ. ตาสํ ควํ, คุนฺนํ, โคนํ นทึ ตรนฺตีนํ เทติ. ตาหิ โคหิ, โคภิ นทึ ตรนฺตีหิ อเปติ. ตาสํ ควํ, คุนฺนํ, โคนํ นทึ ตรนฺตีนํ สนฺตกํ. ตาสุ โคสุ นทึ ตรนฺตีสุ ปติฏฺฐิตนฺติ. वह गाय नदी पार करती हुई जाती है, वह गाय नदी पार करती हुई जाती है, वे गायें नदी पार करती हुई जाती हैं। उस नदी पार करती हुई गाय को देखता है, उन नदी पार करती हुई गायों को देखता है। उन नदी पार करती हुई गायों द्वारा किया गया। उन नदी पार करती हुई गायों को देता है। उन नदी पार करती हुई गायों से अलग होता है। उन नदी पार करती हुई गायों का। उन नदी पार करती हुई गायों में स्थित। ตตฺร ยา สา ‘‘โค, คาวี, คาโว, คาวี, คโว’’ติอาทินา โอการนฺตสฺสิตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส ปทมาลา ฐปิตา, สา ‘‘โค, คาโว คโว’’ติอาทินา วุตฺตสฺส โอการนฺตปุลฺลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส ปทมาลาโต สวิเสสา ปจฺจตฺโตปโยคาลปนฏฺฐาเน จตุนฺนํ กญฺญาสทฺทานํ วิย คาวีสทฺทานํ วุตฺตตฺตา. ยสฺมา ปนายํ วิเสโส, ตสฺมา อิมสฺส โอการนฺติตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส อญฺเญสมิตฺถิลิงฺคานํ วิย อวิสทาการโวหารตา สลฺลกฺเขตพฺพา, น ปุลฺลิงฺคานํ วิย วิสทาการโวหารตา, นาปิ นปุํสกลิงฺคานํ วิย อุภยมุตฺตาการโวหารตา สลฺลกฺเขตพฺพา. เอตฺถ นิจฺฉยกรณี คาถา วุจฺจติ – वहाँ जो यह 'गो, गावी, गावो, गावी, गवो' आदि के द्वारा ओ-कारान्त स्त्रीलिंग 'गो' शब्द की पदमाला स्थापित की गई है, वह 'गो, गावो, गवो' आदि के द्वारा कहे गए ओ-कारान्त पुल्लिंग 'गो' शब्द की पदमाला से विशिष्ट है, क्योंकि प्रथमा, द्वितीया और संबोधन के स्थान पर चार 'कन्या' शब्दों की तरह 'गावी' शब्दों का प्रयोग किया गया है। चूँकि यह विशेषता है, इसलिए इस ओ-कारान्त स्त्रीलिंग 'गो' शब्द का अन्य स्त्रीलिंग शब्दों की तरह अस्पष्ट आकार वाला व्यवहार लक्षित करना चाहिए, पुल्लिंग शब्दों की तरह स्पष्ट आकार वाला व्यवहार नहीं, और न ही नपुंसक लिंग शब्दों की तरह दोनों से मुक्त आकार वाला व्यवहार लक्षित करना चाहिए। यहाँ निश्चय करने वाली गाथा कही जाती है - ทุวินฺนํ ธาตุสทฺทานํ, ยถา ทิสฺสติ นานตา; โคสทฺทานํ ตถา ทฺวินฺนํ, อิจฺฉิตพฺพาว นานตา. जैसे दो धातु-शब्दों में भिन्नता देखी जाती है, वैसे ही दो 'गो' शब्दों (पुल्लिंग और स्त्रीलिंग) में भी भिन्नता स्वीकार करनी चाहिए। ตถา หิ ปุมิตฺถิลิงฺควเสน ทฺวินฺนํ ธาตุสทฺทานํ วิเสโส ทิสฺสติ. ตํ ยถา? क्योंकि पुल्लिंग और स्त्रीलिंग के भेद से दो 'धातु' शब्दों में विशेषता (भेद) दिखाई देती है। वह कैसे? ธาตุ[Pg.285], ธาตู, ธาตโว. ธาตุํ, ธาตู, ธาตโว. ธาตุนา, ธาตูหิ, ธาตูภิ. ธาตุสฺส, ธาตูนํ. ธาตุสฺมา, ธาตุมฺหา, ธาตูหิ, ธาตูภิ. ธาตุสฺส, ธาตูนํ. ธาตุสฺมึ, ธาตุมฺหิ, ธาตูสุ. อยํ ปุลฺลิงฺควิเสโส. धातु, धातू, धातवो। धातुं, धातू, धातवो। धातुना, धातूहि, धातूभि। धातुस्स, धातूनं। धातुस्मा, धातुम्हा, धातूहि, धातूभि। धातुस्स, धातूनं। धातुस्मिं, धातुम्हि, धातूसु। यह पुल्लिंग की विशेषता है। ธาตุ, ธาตู, ธาตุโย. ธาตุํ, ธาตู, ธาตุโย. ธาตุยา, ธาตูหิ, ธาตูภิ. ธาตุยา, ธาตูนํ. ธาตุยา, ธาตูหิ, ธาตูภิ. ธาตุยา, ธาตูนํ. ธาตุยา, ธาตุยํ, ธาตูสุ. อยํ อิตฺถิลิงฺคสฺส วิเสโส. धातु, धातू, धातुयो। धातुं, धातू, धातुयो। धातुया, धातूहि, धातूभि। धातुया, धातूनं। धातुया, धातूहि, धातूभि। धातुया, धातूनं। धातुया, धातुयं, धातूसु। यह स्त्रीलिंग की विशेषता है। ยถา จ ทฺวินฺนํ ธาตุสทฺทานํ วิเสโส ปญฺญายติ, ตถา ทฺวินฺนมฺปิ โคสทฺทานํ วิเสโส ปญฺญายเตว. ยถา จ ปุนฺนปุํสกลิงฺคานํ ทฺวินฺนํ อายุสทฺทานํ ‘‘อายุ, อายู, อายโว’’ติอาทินา, ‘‘อายุ, อายู, อายูนี’’ติอาทินา จ วิเสโส ปญฺญายติ, ยถา ทฺวินฺนมฺปิ โคสทฺทานํ วิเสโส ปญฺญายเตว. ตถา หิ วิสทาการโวหาโร ปุลฺลิงฺคํ, อวิสทาการโวหาโร อิตฺถิลิงฺคํ, อุภยมุตฺตาการโวหาโร นปุํสกลิงฺคํ. और जैसे दो 'धातु' शब्दों का भेद जाना जाता है, वैसे ही दो 'गो' शब्दों का भेद भी जाना ही जाता है। और जैसे पुल्लिंग और नपुंसक लिंग वाले दो 'आयु' शब्दों का भेद ''आयु, आयू, आयवो'' आदि के द्वारा और ''आयु, आयू, आयूनी'' आदि के द्वारा जाना जाता है, वैसे ही दो 'गो' शब्दों का भेद भी जाना ही जाता है। क्योंकि स्पष्ट आकार वाला व्यवहार पुल्लिंग है, अस्पष्ट आकार वाला व्यवहार स्त्रीलिंग है, और दोनों से मुक्त आकार वाला व्यवहार नपुंसक लिंग है। อิทานิ อิมเมวตฺถํ ปากฏตรํ กตฺวา สงฺเขปโต กถยาม – ปุริโสติ วิสทาการโวหาโร, กญฺญาติ อวิสทาการโวหาโร, รูปนฺติ อุภยมุตฺตาการโวหาโร. ปุริโส ติฏฺฐติ, กญฺญา ติฏฺฐติ, กญฺญา ติฏฺฐนฺติ, กญฺญา ปสฺสติ, โภติโย กญฺญา ติฏฺฐถ, เอตฺเถกปทมสมํ, จตฺตาริ สมานิ. ปุริสา ติฏฺฐนฺติ, ปุริสา นิสฺสฏํ, ภวนฺโต ปุริสา คจฺฉถ. กญฺญาโย ติฏฺฐนฺติ, กญฺญาโย ปสฺสติ, โภติโย กญฺญาโย คจฺฉถ, ตีณิ ตีณิ สมานิ. ปุริสํ ปสฺสติ, กญฺญํ ปสฺสติ, ทฺเว อสมานิ. ปุริเส ปสฺสติ, ปุริเส ปติฏฺฐิตํ, ทฺเว สมานิ. เตน ปุริเสน กตํ, ตาย กญฺญาย กตํ, ตาย กญฺญาย เทติ, ตาย กญฺญาย [Pg.286] อเปติ, ตาย กญฺญาย สนฺตกํ, ตาย กญฺญาย ปติฏฺฐิตํ, เอกมสมํ, ปญฺจ สมานิ. เอวํ ปุลฺลิงฺคสฺส วิสทาการโวหารตา ทิสฺสติ, อิตฺถิลิงฺคสฺส อวิสทาการโวหารตา ทิสฺสติ. นปุํสกลิงฺคสฺส ปน ‘‘รูปํ, รูปานิ, รูปา. รูปํ, รูปานิ, รูเป. โภ รูป, ภวนฺโต รูปานิ, รูปา’’ติ เอวํ ตีสุ ปจฺจตฺโตปโยคาลปนฏฺฐาเนสุ สนิการาย วิเสสาย รูปมาลาย วเสน อุภยมุตฺตาการโวหารตา ทิสฺสติ, ปุมิตฺถิลิงฺคานํ ตีสุ ฐาเนสุ สนิการานิ รูปานิ สพฺพทา น สนฺติ, อิติ วิสทาการโวหาโร ปุลฺลิงฺคํ, อวิสทาการโวหาโร อิตฺถิลิงฺคํ, อุภยมุตฺตาการโวหาโร นปุํสกลิงฺคนฺติ เวทิตพฺพํ. अब इसी अर्थ को और अधिक स्पष्ट करते हुए संक्षेप में कहते हैं - 'पुरिसो' स्पष्ट आकार वाला व्यवहार है, 'कञ्ञा' अस्पष्ट आकार वाला व्यवहार है, 'रूपं' दोनों से मुक्त आकार वाला व्यवहार है। 'पुरिसो तिट्ठति', 'कञ्ञा तिट्ठति', 'कञ्ञा तिट्ठन्ति', 'कञ्ञा पस्सति', 'भोतियो कञ्ञा तिट्ठथ', यहाँ एक पद असमान है और चार समान हैं। 'पुरिसा तिट्ठन्ति', 'पुरिसा निस्सटं', 'भवन्तो पुरिसा गच्छथ'। 'कञ्ञायो तिट्ठन्ति', 'कञ्ञायो पस्सति', 'भोतियो कञ्ञायो गच्छथ', यहाँ तीन-तीन समान हैं। 'पुरिसं पस्सति', 'कञ्ञं पस्सति', ये दो असमान हैं। 'पुरिसे पस्सति', 'पुरिसे पतिट्ठितं', ये दो समान हैं। 'तेन पुरिसेन कतं', 'ताय कञ्ञाय कतं', 'ताय कञ्ञाय देति', 'ताय कञ्ञाय अपेति', 'ताय कञ्ञाय सन्तकं', 'ताय कञ्ञाय पतिट्ठितं', यहाँ एक असमान है और पाँच समान हैं। इस प्रकार पुल्लिंग की स्पष्ट आकार वाली व्यवहारिकता दिखाई देती है और स्त्रीलिंग की अस्पष्ट आकार वाली व्यवहारिकता दिखाई देती है। किन्तु नपुंसक लिंग के लिए ''रूपं, रूपाणि, रूपा। रूपं, रूपाणि, रूपे। भो रूप, भवन्तो रूपाणि, रूपा'' - इस प्रकार प्रथमा, द्वितीया और संबोधन इन तीन स्थानों में विशेष विकारों वाली रूपमाला के कारण दोनों से मुक्त आकार वाली व्यवहारिकता दिखाई देती है; पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में इन तीन स्थानों में विकारों वाले रूप सदैव नहीं होते हैं। इस प्रकार, स्पष्ट आकार वाला व्यवहार पुल्लिंग है, अस्पष्ट आकार वाला व्यवहार स्त्रीलिंग है और दोनों से मुक्त आकार वाला व्यवहार नपुंसक लिंग है - ऐसा जानना चाहिए। อยํ นโย ‘‘สทฺธา สติ หิรี, ยา อิตฺถี สทฺธา ปสนฺนา, เต มนุสฺสา สทฺธา ปสนฺนา, ปหูตํ สทฺธํ ปฏิยตฺตํ, สทฺธํ กุล’’นฺติอาทีสุ สมานสุติกสทฺเทสุปิ ปทมาลาวเสน ลพฺภเตว. ยา จ ปน อิตฺถิลิงฺคสฺส อวิสทาการโวหารตา วุตฺตา, สา เอกจฺเจสุปิ สงฺขฺยาสทฺเทสุ ลพฺภติ. ตถา หิ วีสติอาทโย นวุติปริยนฺตา สทฺทา เอกวจนนฺตา อิตฺถิลิงฺคาติ วุตฺตา, เอตฺถ ‘‘วีสติยา’’ติ ปญฺจกฺขตฺตุํ วตฺตพฺพํ, ตถา ‘‘ตึสายา’’ติอาทีนํ ‘‘นวุติยา’’ติ ปทปริยนฺตานํ, เอวํ วีสติอาทีนํ กญฺญาสทฺทสฺเสว อวิสทาการโวหารตา ลพฺภตีติ อวคนฺตพฺพํ. ยทิ เอวํ ติจตุสทฺเทสุ กถนฺติ? ติจตุสทฺทา ปน ยสฺมา ‘‘ตโย ติสฺโส ตีณิ, จตฺตาโร จตุโร จตสฺโส จตฺตารี’’ติ อตฺตโน อตฺตโน รูปานิ อภิเธยฺยลิงฺคานุคภตฺตา ยถาสกลิงฺควเสน ‘‘ปุริสา กญฺญาโย จิตฺตานี’’ติอาทีหิ วิสทาวิสโทภยรหิตาการโวหารสงฺขาเตหิ สทฺเทหิ โยคํ คจฺฉนฺติ, ตสฺมา ปจฺเจกลิงฺควเสน วิสทาวิสโทภยรหิตาการโวหาราติ วตฺตุมรหนฺติ. यह नियम ''सद्धा, सति, हिरी, या इत्थी सद्धा पसन्ना, ते मनुस्सा सद्धा पसन्ना, पहूतं सद्धं पटियत्तं, सद्धं कुलं'' आदि समान ध्वनि वाले शब्दों में भी पदमाला के माध्यम से प्राप्त होता ही है। और जो स्त्रीलिंग की अस्पष्ट आकार वाली व्यवहारिकता कही गई है, वह कुछ संख्यावाचक शब्दों में भी प्राप्त होती है। क्योंकि बीस (वीसति) आदि से लेकर नब्बे (नवुति) तक के शब्द एकवचनांत स्त्रीलिंग कहे गए हैं, यहाँ ''वीसतिया'' पाँच बार कहना चाहिए, वैसे ही ''तिंसाय'' आदि से लेकर ''नवुतिया'' पद के अंत तक; इस प्रकार यह समझना चाहिए कि बीस आदि शब्दों में 'कञ्ञा' शब्द के समान ही अस्पष्ट आकार वाली व्यवहारिकता प्राप्त होती है। यदि ऐसा है, तो 'ति' और 'चतु' शब्दों में कैसा है? 'ति' और 'चतु' शब्द क्योंकि ''तयो, तिस्सो, तीणि, चत्तारो, चतुरो, चतस्सो, चत्तारी'' इस प्रकार अपने-अपने रूपों में अभिधेय (विशेष्य) के लिंग का अनुसरण करने के कारण, अपने-अपने लिंग के अनुसार ''पुरिसा, कञ्ञायो, चित्तानि'' आदि स्पष्ट, अस्पष्ट और दोनों से रहित आकार वाले व्यवहार कहे जाने वाले शब्दों के साथ संबंध प्राप्त करते हैं, इसलिए वे प्रत्येक लिंग के अनुसार स्पष्ट, अस्पष्ट और दोनों से रहित आकार वाले व्यवहार कहे जाने योग्य हैं। สพฺพนาเมสุปิ [Pg.287] อยํ ติวิโธ อากาโร ลพฺภติ รูปวิเสสโยคโต. กถํ? ปุนฺนปุํสกวิสเย ‘‘ตสฺส กสฺส’’ อิจฺจาทีนิ สพฺพานิ สพฺพนามิกรูปานิ จตุตฺถีฉฏฺฐิยนฺตานิ ภวนฺติ, อิตฺถิลิงฺควิสเย ‘‘ตสฺสา กสฺสา’’ อิจฺจาทีนิ สพฺพนามิกรูปานิ ตติยาจตุตฺถีปญฺจมีฉฏฺฐีสตฺตมิยนฺตานิ ภวนฺติ, ตสฺมา สพฺพนามตฺเตปิ อิตฺถิลิงฺคสฺส อวิสทาการโวหารตา เอกนฺตโต สมฺปฏิจฺฉิตพฺพา. เอตฺถ ปน สุลภานิ จตุตฺถีฉฏฺฐีรูปานิ อนาหริตฺวา สุทุลฺลภภาเวน ตติยาปญฺจมีสตฺตมีรูปานิ สาสนโต อาหริตฺวา ทสฺเสสฺสาม ภควโต ปาวจเน นิกฺกงฺขภาเวน โสตูนํ ปรมสณฺหสุขุมญาณาธิคมตฺถํ. ตํ ยถา? ‘‘อายสฺมา อุทายี เยน สา กุมาริกา เตนุปสงฺกมิ, อุปสงฺกมิตฺวา ตสฺสา กุมาริกาย สทฺธึ เอโก เอกาย รโห ปฏิจฺฉนฺเน อาสเน อลํกมฺมนีเย นิสชฺชํ กปฺเปสี’’ติ. เอตฺถ ‘‘ตสฺสา’’ติ ตติยาย รูปํ, ‘‘ตสฺสา’’ติ ตติยาย รูเป ทิฏฺเฐเยว ‘‘สพฺพสฺสา กตริสฺสา’’ติอาทีนิ ตติยารูปานิ ปาฬิยํ อนาคตานิปิทิฏฺฐานิเยว นาม เตสํ อญฺญมญฺญสมานคติกตฺตา, ทิฏฺเฐน จ อทิฏฺฐสฺสปิ ยุตฺตสฺส คเหตพฺพตฺตา. ‘‘กสฺสาหํ เกน หายามี’’ติ เอตฺถ ‘‘กสฺสา’’ติ ปญฺจมิยา รูปํ, ‘‘กสฺสา’’ติ ปญฺจมิยา รูเป ทิฏฺเฐเยว ‘‘สพฺพสฺสา กตริสฺสา’’ติอาทีนิ ปญฺจมิยา รูปานิ ปาฬิยํ อนาคตานิปิ ทิฏฺฐานิเยว นาม. ‘‘อญฺญตโร ภิกฺขุ เวสาลิยํ มหาวเน มกฺกฏึ อามิเสน อุปลาเปตฺวา ตสฺสา เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสวติ. อญฺญตโร ภิกฺขุ อญฺญตริสฺสา อิตฺถิยา ปฏิพทฺธจิตฺโต โหตี’’ติ จ เอตฺถ ‘‘ตสฺสา อญฺญตริสฺสา’’ติ จ สตฺตมิยา รูปํ, ตสฺมึ ทิฏฺเฐเยว ‘‘สพฺพสฺสา กตริสฺสา’’ติอาทีนิ สตฺตมิยา รูปานิ ปาฬิยํ อนาคตานิปิ ทิฏฺฐานิเยว นามาติ. सर्वनामों में भी रूप-विशेष के योग से यह तीन प्रकार का आकार प्राप्त होता है। कैसे? पुल्लिंग और नपुंसक लिंग के विषय में 'तस्स', 'कस्स' इत्यादि सभी सर्वनाम रूप चतुर्थी और षष्ठी विभक्ति के अंत वाले होते हैं, स्त्रीलिंग के विषय में 'तस्सा', 'कस्सा' इत्यादि सभी सर्वनाम रूप तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी और सप्तमी विभक्ति के अंत वाले होते हैं, इसलिए सर्वनाम होने पर भी स्त्रीलिंग के अस्पष्ट आकार वाले व्यवहार को निश्चित रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। यहाँ सुलभ चतुर्थी और षष्ठी रूपों को न लेकर, दुर्लभ होने के कारण तृतीया, पंचमी और सप्तमी रूपों को शासन से लाकर दिखाएंगे, ताकि श्रोताओं को भगवान के प्रवचन में निःशंक होकर परम सूक्ष्म ज्ञान की प्राप्ति हो सके। वह कैसे? 'आयुष्मान उदायी जहाँ वह कुमारी थी, वहाँ गए। जाकर उस कुमारी के साथ एकांत में, ढके हुए आसन पर, जो मैथुन के योग्य था, अकेले में बैठे।' यहाँ 'तस्सा' तृतीया का रूप है। 'तस्सा' को तृतीया के रूप में देख लेने पर 'सब्बस्सा', 'कतरिस्सा' इत्यादि तृतीया के रूप, जो पालि में नहीं आए हैं, वे भी देखे हुए ही माने जाते हैं, क्योंकि उनकी प्रक्रिया एक समान है और देखे हुए के आधार पर अनदेखे को भी ग्रहण करना उचित है। 'कस्साहं केन हायामि' यहाँ 'कस्सा' पंचमी का रूप है। 'कस्सा' को पंचमी के रूप में देख लेने पर 'सब्बस्सा', 'कतरिस्सा' इत्यादि पंचमी के रूप, जो पालि में नहीं आए हैं, वे भी देखे हुए ही माने जाते हैं। 'कोई भिक्षु वैशाली के महावन में बंदरिया को भोजन से फुसलाकर उसके साथ मैथुन धर्म का सेवन करता है। कोई भिक्षु किसी स्त्री के प्रति आसक्त चित्त वाला होता है।' यहाँ 'तस्सा' और 'अञ्ञतरिस्सा' सप्तमी के रूप हैं। उनके देख लिए जाने पर 'सब्बस्सा', 'कतरिस्सा' इत्यादि सप्तमी के रूप, जो पालि में नहीं आए हैं, वे भी देखे हुए ही माने जाते हैं। นนุ [Pg.288] จ โภ ‘‘ตสฺสา กุมาริกาย สทฺธิ’’นฺติ เอตฺถ ‘‘ตสฺสา’’ติ อิทํ วิภตฺติวิปลฺลาเสน วุตฺตํ, ‘‘ตายา’’ติ หิสฺส อตฺโถ, ตถา ‘‘กสฺสาหํ เกน หายามี’’ติ อิทมฺปิ วิภตฺติวิปลฺลาเสน วุตฺตํ. ‘‘กายา’’ติ หิสฺส อตฺโถ. ‘‘อญฺญตริสฺสา อิตฺถิยา ปฏิพทฺธจิตฺโต’’ติ เอตฺถาปิ ‘‘อญฺญตริสฺสา’’ติ อิทํ วิภตฺติวิปลฺลาเสน วุตฺตํ. ‘‘อญฺญตริสฺส’’นฺติ หิสฺส อตฺโถติ? ตนฺน, อีทิเสสุ จุณฺณิยปทวิสเยสุ วิภตฺติวิปลฺลาสสฺส อนิจฺฉิตพฺพตฺตา. นนุ จ โภ จุณฺณิยปทวิสเยปิ ‘‘สงฺเฆ โคตมิ เทหี’’ติอาทีสุ ‘‘สงฺฆสฺสา’’ติ วิภตฺติวิปลฺลาสตฺถํ วทนฺติ ครูติ? สจฺจํ, ตถาปิ ตาทิเสสุ ฐาเนสุ ทฺเว อธิปฺปายา ภวนฺติ อาธารปฏิคฺคาหกภาเวน ภุมฺมสมฺปทานานมิจฺฉิตพฺพตฺตา. ตถา หิ ‘‘สงฺฆสฺส เทถา’’ติ วตฺตุกามสฺส สโต ‘‘สงฺเฆ เทถา’’ติ วจนํ น วิรุชฺฌติ, ยุชฺชติเยว. ตถา ‘‘สงฺเฆ เทถา’’ติ วตฺตุกามสฺสปิ สโต ‘‘สงฺฆสฺส เทถา’’ติ วจนมฺปิ น วิรุชฺฌติ, ยุชฺชติเยว, ยถา ปน อลาพุ ลาพุสทฺเทสุ วิสุํ วิสุํ วิชฺชมาเนสุปิ ‘‘ลาพูนิ สีทนฺติ สิลา ปฺลวนฺตี’’ติ เอตฺถ ฉนฺทานุรกฺขณตฺถํ อการโลโป โหตีติ อกฺขรโลโป พุทฺธิยา กริยติ. ตถา ‘‘สงฺเฆ โคตมิ เทหี’’ติอาทีสุปิ พุทฺธิยา วิภตฺติวิปลฺลาสสฺส ปริกปฺปนํ กตฺวา ‘‘สงฺฆสฺสา’’ติ วิปลฺลาสตฺถมิจฺฉนฺติ อาจริยา. ตสฺมา ‘‘สงฺเฆ โคตมิ เทหิ. เวสฺสนฺตเร วรํ ทตฺวา’’ติอาทีสุ วิภตฺติวิปลฺลาโส ยุตฺโต ‘‘ตสฺสา กุมาริกายา’’ติอาทีสุ ปน น ยุตฺโต, วิภตฺติวิปลฺลาโส จ นาม เยภุยฺเยน ‘‘เนว ทานํ วิรมิสฺส’’นฺติอาทีสุ คาถาสุ อิจฺฉิตพฺโพ. क्या 'तस्सा कुमारिकाय सद्धिं' यहाँ 'तस्सा' यह विभक्ति-विपर्यास से कहा गया है, क्योंकि इसका अर्थ 'ताय' है? वैसे ही 'कस्साहं केन हायामि' यह भी विभक्ति-विपर्यास से कहा गया है, क्योंकि इसका अर्थ 'काय' है। 'अञ्ञतरिस्सा इत्थिया पटिबद्धचित्तो' यहाँ भी 'अञ्ञतरिस्सा' यह विभक्ति-विपर्यास से कहा गया है, क्योंकि इसका अर्थ 'अञ्ञतरिस्सं' है? ऐसा नहीं है, क्योंकि इस प्रकार के चूर्णिय पदों के विषय में विभक्ति-विपर्यास इष्ट नहीं है। क्या चूर्णिय पदों के विषय में भी 'संघे गोतमि देहि' इत्यादि में आचार्य 'संघस्स' के लिए विभक्ति-विपर्यास का अर्थ नहीं बताते हैं? सत्य है, फिर भी ऐसे स्थानों पर दो अभिप्राय होते हैं, क्योंकि आधार और प्रतिग्राहक के भाव से सप्तमी और चतुर्थी दोनों इष्ट हो सकते हैं। जैसे 'संघ को दो' कहने की इच्छा होने पर 'संघ में दो' कहना विरुद्ध नहीं है, वह उचित ही है। वैसे ही 'संघ में दो' कहने की इच्छा होने पर 'संघ को दो' कहना भी विरुद्ध नहीं है, वह उचित ही है। जैसे 'अलाबु' और 'लाबु' शब्दों के अलग-अलग विद्यमान होने पर भी 'लाबूनि सीदन्ति सिला प्लवन्ति' यहाँ छंद की रक्षा के लिए 'अ' कार का लोप होता है, ऐसा अक्षर-लोप बुद्धि से किया जाता है। वैसे ही 'संघे गोतमि देहि' इत्यादि में भी बुद्धि से विभक्ति-विपर्यास की कल्पना करके आचार्य 'संघस्स' ऐसा विपर्यास का अर्थ चाहते हैं। इसलिए 'संघे गोतमि देहि', 'वेस्सन्तरे वरं दत्वा' इत्यादि में विभक्ति-विपर्यास उचित है, किंतु 'तस्सा कुमारिकाय' इत्यादि में उचित नहीं है। विभक्ति-विपर्यास प्रायः 'नेव दानं विरमिस्सं' इत्यादि गाथाओं में ही स्वीकार किया जाना चाहिए। ตถาปิ วเทยฺย ยา สา ตุมฺเหหิ ‘‘ตสฺสา เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสวตี’’ติ ปาฬิ อาภตา, น สา สตฺตมีปโยคา. ‘‘ตสฺสา’’ติ [Pg.289] หิ อิทํ ฉฏฺฐิยนฺตปทํ ‘‘ตสฺสามกฺกฏิยาองฺคชาเต เมถุนํ ธมฺมํ ปฏิเสวตี’’ติ อตฺถสมฺภวโตติ? ตนฺน, อฏฺฐกถายํ ‘‘ตสฺสาติ ภุมฺมวจน’’นฺติ วุตฺตตฺตา. กิญฺจ ภิยฺโย – อฏฺฐกถายํเยว ‘‘ตสฺสา จ สิกฺขาย สิกฺขํ ปริปูเรนฺโต สิกฺขติ, ตสฺมิญฺจ สิกฺขาปเท อวีติกฺกมนฺโต สิกฺขตี’’ติ อิมสฺมึ ปเทเส ‘‘ตสฺสา’’ติ ภุมฺมวจนํ นิทฺเทโส กโตติ. นนุ จ โภ ตตฺถาปิ ‘‘ตสฺสา’’ติ อิทํ วิภตฺติวิปลฺลาสวเสน ภุมฺมตฺเถ สามิวจนนฺติ? ‘‘อติวิย ตฺวํ วิภตฺติวิปลฺลาสนเย กุสโลสิ, วิภตฺติวิปลฺลาสิโก นามา’’ติ ภวํ วตฺตพฺโพ. โย ตฺวํ ธมฺมสงฺคาหกตฺเถเรหิ วุตฺตปาฬิมฺปิ อุลฺลงฺฆสิ, อฏฺฐกถาวจนมฺปิ อุลฺลงฺฆสิ, อปรมฺปิ เต นิทฺเทสปาฬึ อาหริสฺสาม. สเจ ตฺวํ ปณฺฑิตชาติโก, สญฺญตฺตึ คมิสฺสสิ. สเจ อปณฺฑิตชาติโก, อตฺตโน คาหํ อมุญฺจนฺโตเยว สญฺญตฺตึ น คมิสฺสติ, สาสเน จิตฺตึ กตฺวา สุโณหีติ. ‘‘ตสฺมา หิ สิกฺเขถ อิเธว ชนฺตู’’ติ อิมิสฺสา ปาฬิยา อตฺถํ นิทฺทิสนฺเตน ปภินฺนปฏิสมฺภิเทน สตฺถุกปฺเปน อคฺคสาวเกน ธมฺมเสนาปตินา อายสฺมตา สาริปุตฺเตน ‘‘อิธาติ อิมิสฺสา ทิฏฺฐิยา อิมิสฺสา ขนฺติยา อิมิสฺสา รุจิยา อิมสฺมึ อาทาเย อิมสฺมึ ธมฺเม’’ติ เอวํ ‘‘อิมิสฺสา’’ติ ปทํ ภุมฺมวจนวเสน วุตฺตํ. ตญฺหิ ‘‘อิธา’’ติ ปทสฺส อตฺถวาจกตฺตา สตฺตมิยา รูปนฺติ วิญฺญายติ. อิติ ‘‘อิมิสฺสา’’ติ สตฺตมิยา รูเป ทิฏฺเฐเยว ‘‘สพฺพสฺสา กตริสฺสา’’ติอาทีนิ สตฺตมิยา รูปานิ ปาฬิยํ อนาคตานิปิ ทิฏฺฐานิเยว นาม. फिर भी, यदि आप कहें कि जो पालि आपने उद्धृत की है—"तस्सा मेथुनं धम्मं पटिसेवति" (वह उसके साथ मैथुन धर्म का सेवन करता है)—वह सप्तमी विभक्ति का प्रयोग नहीं है। क्योंकि "तस्सा" यह षष्ठी विभक्ति का पद है, जिसका अर्थ "उस बंदरिया के अंग-जात (जननांग) में मैथुन धर्म का सेवन करता है" संभव होने के कारण है? तो यह सही नहीं है, क्योंकि अट्ठकथा में कहा गया है कि "तस्सा" यहाँ भूम-वचन (सप्तमी) है। और भी—अट्ठकथा में ही "तस्सा च सिक्खाय सिक्खं परिपूरेन्तो सिक्खति, तस्मिञ्च सिक्खापदे अवीतिक्कमन्तो सिक्खति" इस स्थल पर "तस्सा" को भूम-वचन के रूप में निर्दिष्ट किया गया है। क्या आप यह कहेंगे कि वहाँ भी "तस्सा" विभक्ति-विपर्यास के कारण भूम-अर्थ में स्वामी-वचन (षष्ठी) है? तो आपको कहना चाहिए: "आप विभक्ति-विपर्यास के नियम में बहुत कुशल हैं, आप 'विभक्ति-विपर्यासक' कहलाने योग्य हैं।" आप, जो धर्म-संग्राहक स्थविरों द्वारा कही गई पालि का भी उल्लंघन करते हैं और अट्ठकथा के वचनों का भी उल्लंघन करते हैं, हम आपके लिए एक और निर्देश-पालि लाएंगे। यदि आप बुद्धिमान हैं, तो आप समझ जाएंगे। यदि आप अबुद्धिमान हैं, तो अपनी पकड़ को न छोड़ते हुए नहीं समझेंगे; शासन में श्रद्धा रखकर सुनें। "तस्मा हि सिक्खेथ इधेव जन्तू" इस पालि का अर्थ बताते हुए, प्रभिन्न-प्रतिसंभिदा वाले, शास्ता के समान, अग्रश्रावक, धर्मसेनापति आयुष्मान सारिपुत्र ने "इध—इस दृष्टि में, इस क्षान्ति में, इस रुचि में, इस ग्रहण में, इस धर्म में" इस प्रकार "इमिस्सा" पद को भूम-वचन (सप्तमी) के रूप में कहा है। क्योंकि यह "इध" पद के अर्थ का वाचक होने के कारण सप्तमी का रूप समझा जाता है। इस प्रकार "इमिस्सा" को सप्तमी के रूप में देख लेने पर, "सब्बस्सा", "कतरिस्सा" आदि सप्तमी के रूप, पालि में न आने पर भी, देखे हुए ही माने जाते हैं। อปรมฺปิ เต สพฺพโลกานุกมฺปเกน สพฺพญฺญุนา อาหจฺจภาสิตํ ปาฬึ อาหริสฺสาม, จิตฺตึ กตฺวา สุโณหิ, ‘‘อฏฺฐานเมตํ ภิกฺขเว อนวกาโส, ยํ เอกิสฺสา โลกธาตุยา [Pg.290] อปุพฺพํ อจริมํ ทฺเว อรหนฺโต สมฺมาสมฺพุทฺธา อุปฺปชฺเชยฺยุ’’นฺติ เอตฺถ ‘‘เอกิสฺสา’’ติ อิทํ สตฺตมิยา รูปํ. เอวํ ‘‘เอกิสฺสา’’ติ สตฺตมิยา รูเป ทิฏฺเฐเยว ‘‘สพฺพสฺสา กตริสฺสา’’ติอาทีนิ สตฺตมิยา รูปานิ ปาฬิยํ อนาคตานิปิ ทิฏฺฐานิเยว นาม. น หิ สพฺพถาปิ โวหารา สรูปโต ปาฬิอาทีสุ ทิสฺสนฺติ, เอกจฺเจ ทิสฺสนฺติ, เอกจฺเจ น ทิสฺสนฺติเยว. อตฺริทํ วุจฺจติ – हम आपके लिए समस्त लोक पर अनुकम्पा करने वाले सर्वज्ञ (बुद्ध) द्वारा साक्षात् कही गई एक और पालि लाएंगे, एकाग्र होकर सुनें—"भिक्षुओं, यह स्थान नहीं है, यह अवसर नहीं है कि एक ही लोकधातु में दो अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध एक साथ (न पूर्व न पश्चात्) उत्पन्न हों।" यहाँ "एकिस्सा" यह सप्तमी का रूप है। इस प्रकार "एकिस्सा" को सप्तमी के रूप में देख लेने पर, "सब्बस्सा", "कतरिस्सा" आदि सप्तमी के रूप पालि में न आने पर भी देखे हुए ही माने जाते हैं। क्योंकि सभी व्यवहार अपने मूल रूप में पालि आदि में नहीं दिखाई देते; कुछ दिखाई देते हैं, कुछ नहीं दिखाई देते। इसके विषय में यह कहा गया है— ‘‘ตสฺสา’’อิจฺจาทโย สทฺทา, ‘‘ตาย’’อิจฺจาทโย วิย; เญยฺยา ปญฺจสุ ฐาเนสุ, ตติยาทีสุ ธีมตา. "तस्सा" इत्यादि शब्द, "ताय" इत्यादि शब्दों की तरह; बुद्धिमान व्यक्ति को तृतीया आदि पाँच स्थानों (विभक्तियों) में समझने चाहिए। ติณฺณนฺนํ ปน นาทีนํ, โหติ สพฺยปเทสโต; ‘‘ตสฺสา กสฺสา’’ติอาทีนิ, ภวนฺติ ตติยาทิสุ. तीन 'न' आदि (सर्वनामों) के लिए, व्यपदेश (निर्देश) के साथ; "तस्सा", "कस्सा" इत्यादि रूप तृतीया आदि में होते हैं। อตฺร ปนายํ ปาฬินยวิภาวนา อฏฺฐกถานยวิภาวนา จ – ตสฺสา กญฺญาย สทฺธึ คจฺฉติ, ตสฺสา กญฺญาย กตํ, ตสฺสา กญฺญาย เทติ, ตสฺสา กญฺญาย อเปติ, ตสฺสา กญฺญาย อยํ กญฺญา หีนา, ตสฺสา กญฺญาย อยํ กญฺญา อธิกา, ตสฺสา กญฺญาย สนฺตกํ, ตสฺสา กญฺญาย ปติฏฺฐิตนฺติ. ทุลฺลภายํ นีติ สาธุกํ จิตฺตึ กตฺวา ปริยาปุณิตพฺพา สาสนสฺส จิรฏฺฐิตตฺถํ. เอวํ สพฺพถาปิ ปาฬิอฏฺฐกถานยานุสาเรน อิตฺถิลิงฺคสฺส อวิสทาการโวหารตา ญาตพฺพา. यहाँ पालि-नय और अट्ठकथा-नय का स्पष्टीकरण इस प्रकार है—उस कन्या के साथ जाता है (तृतीया), उस कन्या द्वारा किया गया (तृतीया), उस कन्या को देता है (चतुर्थी), उस कन्या से दूर होता है (पञ्चमी), उस कन्या से यह कन्या हीन है (पञ्चमी), उस कन्या से यह कन्या अधिक है (पञ्चमी), उस कन्या का स्वत्व (षष्ठी), उस कन्या में प्रतिष्ठित (सप्तमी)। यह दुर्लभ नीति शासन की चिर-स्थिति के लिए अच्छी तरह एकाग्र होकर सीखनी चाहिए। इस प्रकार सर्वथा पालि और अट्ठकथा के नय के अनुसार स्त्रीलिंग के अविशदाकार (अस्पष्ट रूप वाले) व्यवहार को जानना चाहिए। เอวํ ปน ญตฺวา วิญฺญุชาตินา ‘‘ทฺวินฺนํ โคสทฺทานํ รูปมาลาวิเสเสน ลิงฺคนานตฺตํ โหตี’’ติ นิฏฺฐเมตฺถาวคนฺตพฺพํ. โคสทฺโท หิ ‘‘ปุริโส มาตุคาโม โอโรโธ อาโป สตฺถา’’ติอาทโย วิย น นิโยคา วิสทาการโวหาโร, นาปิ ‘‘กญฺญา รตฺติ อิตฺถี’’ติอาทโย วิย นิโยคา อวิสทาการโวหาโร. ตถา หิ อยํ ปุลฺลิงฺคภาเว ธาตุสทฺโท วิย วิสทาการโวหาโร, อิตฺถิลิงฺคภาเว อวิสทาการโวหาโร[Pg.291]. อิติ อิมสฺส อตฺถสฺส โสตูนํ ญาปเนน ปรมสณฺหสุขุมญาณปฺปฏิลาภตฺตํ ‘‘โค, คาวี คาโว. คาวึ, คโว’’ติอาทินา โอการนฺตสฺส อิตฺถิลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส อาเวณิกา นามิกปทมาลา วุตฺตา. เอตฺถ ปน ‘‘คาวิ’’นฺติ เอกกฺขตฺตุมาคตํ, ‘‘โค โคหี’’ติอาทีนิ ทฺวิกฺขตฺตุํ, ‘‘คาโว คาวี คาว’’นฺติ ติกฺขตฺตุํ, ‘‘คาวิยา’’ติ ปญฺจกฺขตฺตุํ, เอวเมตฺถ ปญฺจกฺขตฺตุํ อาคตปทานํ วเสน อวิสทากาโร ทิสฺสตีติ อิทํ อิตฺถิลิงฺคนฺติ คเหตพฺพํ. อิมญฺหิ นยํ มุญฺจิตฺวา นตฺถิ อญฺโญ นโย เยน โคสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค สิยา. ตสฺมา อิทเมว อมฺหากํ มตํ สารโต ปจฺเจตพฺพํ. ปุมิตฺถิลิงฺคสงฺขาตานํ ทฺวินฺนํ โคสทฺทานํ รูปมาลาย นิพฺพิเสสตํ วทนฺตานํ ปน อาจริยานํ มตํ ปุลฺลิงฺเค วตฺตมาเนน โคสทฺเทนิ’ตฺถิลิงฺเค วตฺตมานสฺส โคสทฺทสฺส รูปมาลาย สทิสตฺเต สติ มาตุคามสทฺทสฺส นามิกปทมาลาโย สมํ โยเชตฺวา ปุมิตฺถิลิงฺคภาวปริกปฺปนํ วิย โหตีติ น สารโต ปจฺเจตพฺพํ. ऐसा जानकर विद्वान व्यक्ति को यह निष्कर्ष समझना चाहिए कि "दो 'गो' शब्दों की रूपमाला के विशेष भेद से लिंग-भेद होता है।" क्योंकि 'गो' शब्द "पुरिस, मातुगाम, ओरोध, आप, सत्था" आदि की तरह अनिवार्य रूप से विशदाकार (स्पष्ट रूप वाला) व्यवहार नहीं है, और न ही "कञ्ञा, रत्ति, इत्थी" आदि की तरह अनिवार्य रूप से अविशदाकार व्यवहार है। क्योंकि यह पुल्लिंग होने पर 'धातु' शब्द की तरह विशदाकार व्यवहार वाला है, और स्त्रीलिंग होने पर अविशदाकार व्यवहार वाला है। इस प्रकार इस अर्थ को श्रोताओं को समझाने के लिए और परम सूक्ष्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए "गो, गावी, गावो। गाविं, गवो" इत्यादि के द्वारा ओ-कारान्त स्त्रीलिंग 'गो' शब्द की विशिष्ट नामिक पदमाला कही गई है। यहाँ "गाविं" यह एक बार आया है, "गो, गोही" इत्यादि दो बार, "गावो, गावी, गावा" तीन बार, "गाविया" पाँच बार; इस प्रकार यहाँ पाँच बार आए पदों के कारण जो अविशदाकार (अस्पष्टता) दिखाई देती है, उसे स्त्रीलिंग के रूप में ग्रहण करना चाहिए। इस नय को छोड़कर दूसरा कोई नय नहीं है जिससे 'गो' शब्द स्त्रीलिंग हो सके। इसलिए हमारे इसी मत को सार रूप में स्वीकार करना चाहिए। जो आचार्य पुल्लिंग और स्त्रीलिंग के दोनों 'गो' शब्दों की रूपमाला में कोई भेद नहीं मानते, उनका मत—पुल्लिंग में प्रयुक्त 'गो' शब्द और स्त्रीलिंग में प्रयुक्त 'गो' शब्द की रूपमाला समान होने पर 'मातुगाम' शब्द की पदमाला को समान रूप से जोड़कर पुल्लिंग-स्त्रीलिंग भाव की कल्पना करने जैसा है—सार रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। เอตฺถ ปน กิญฺจิ ลิงฺคสํสนฺทนํ กถยาม – เหฏฺฐา นิทฺทิฏฺฐสฺส โอการนฺตปุลฺลิงฺคสฺส โคสทฺทสฺส นามิกปทมาลายํ ‘‘คาวุํ คาวํ คาเวนา’’ติอาทีนิ เอกกฺขตฺตุมาคตานิ, ‘‘โค โคหี’’ติอาทีนิ ทฺวิกฺขตฺตุํ, ‘‘คาโว คโว คว’’นฺติ อิมานิ ปน ‘‘สตฺถา ราชา’’ติอาทีนิ วิย ติกฺขตฺตุํ, จตุกฺขตฺตุํ วา ปเนตฺถ ปญฺจกฺขตฺตุํ วา อาคตปทานิ น สนฺติ. ตทภาวโต วิสทากาโร ทิสฺสติ. ปุริสสทฺทสฺส นามิกปทมาลายมฺปิ ‘‘ปุริโส ปุริส’’นฺติอาทีนิ เอกกฺขตฺตุมาคตานิ, ‘‘ปุริเส’’ติอาทีนิ ทฺวิกฺขตฺตุํ, ‘‘ปุริสา’’ติ ติกฺขตฺตุํ. เอวํ วิสทากาโร ทิสฺสติ. อาการนฺติตฺถิลิงฺคสฺส ปน ‘‘กญฺญ’’นฺติอาทีนิ เอกกฺขตฺตุมาคตานิ, ‘‘กญฺญาหี’’ติอาทีนิ ทฺวิกฺขตฺตุํ, ‘‘กญฺญาโย’’ติอาทีนิ ติกฺขตฺตุํ, ‘‘กญฺญา’’ติ อิทํ จตุกฺขตฺตุํ, ‘‘กญฺญายา’’ติ อิทํ ปน ปญฺจกฺขตฺตุํ. เอวํ อวิสทากาโร ทิสฺสติ. อาการนฺตปุลฺลิงฺคสฺสตุ ‘‘สตฺถรี’’ติอาทีนิ เอกกฺขตฺตุมาคตานิ, ‘‘สตฺถู’’ติอาทีนิ [Pg.292] ทฺวิกฺขตฺตุํ, ‘‘สตฺถา’’ติอาทีนิ ติกฺขตฺตุํ, เอวํ วิสทากาโร ทิสฺสติ. อิมินา นเยน สพฺพาสุปิ ปุมิตฺถิลิงฺคปทมาลาสุ วิสทากาโร จ อวิสทากาโร จ เวทิตพฺโพ. นปุํสกลิงฺคสฺส ปน นามิกปทมาลายํ ‘‘จิตฺเตนา’’ติอาทีนิ เอกกฺขตฺตุมาคตานิ, ‘‘จิตฺต’’นฺติอาทีนิ ทฺวิกฺขตฺตุํ, ‘‘จิตฺตานี’’ติ อิทํ ติกฺขตฺตุํ อาคตํ. อฏฺฐิ อายุสทฺทาทีสุปิ เอเสว นโย. เอตฺถ อุภยมุตฺตากาโร ทิสฺสติ. กิญฺจาเปตฺถ จตุกฺขตฺตุํ ปญฺจกฺขตฺตุํ วา อาคตปทานํ อภาวโต วิสทากาโร อุปลพฺภมาโน วิย ทิสฺสติ, ตถาปิ ยสฺมา ‘‘จิตฺตํ อฏฺฐิ อายู’’ติอาทีนิ นปุํสกานิ ‘‘คจฺฉํ อคฺคิ ภิกฺขู’’ติอาทีนํ ปุลฺลิงฺคานํ นเยน อปฺปวตฺตนโต วิสทาการญฺจ, ‘‘รตฺติ ยาคู’’ติอาทีนํ อิตฺถิลิงฺคานํ นเยน อปฺปวตฺตนโต อวิสทาการญฺจ อุภยมนุปคมฺม วิเสสโต ‘‘จิตฺตํ, จิตฺตานิ, จิตฺตา. จิตฺตํ, จิตฺตานิ, จิตฺเต’’ติอาทินา สนิการาย รูปมาลาย รูปวนฺตานิ ภวนฺติ, ตสฺมา เตสมากาโร อุภยมุตฺโตติ ทฏฺฐพฺโพ. यहाँ हम कुछ लिंग-तुलना कहते हैं - नीचे निर्दिष्ट ओकारान्त पुल्लिंग 'गो' शब्द की नामिक पदमाला में 'गावुं, गावं, गावेन' आदि एक बार आए हैं, 'गो, गोहि' आदि दो बार, 'गावो, गवो, गवं' ये 'सत्था, राजा' आदि की तरह तीन बार आए हैं, यहाँ चार बार या पाँच बार आए पद नहीं हैं। उसके अभाव के कारण विशदाकार दिखाई देता है। 'पुरिस' शब्द की पदमाला में भी 'पुरिसो, पुरिस' आदि एक बार आए हैं, 'पुरिसे' आदि दो बार, 'पुरिसा' तीन बार। इस प्रकार विशदाकार दिखाई देता है। आकारान्त स्त्रीलिंग में 'कञ्ञं' आदि एक बार आए हैं, 'कञ्ञाहि' आदि दो बार, 'कञ्ञायो' आदि तीन बार, 'कञ्ञा' यह चार बार, 'कञ्ञाय' यह पाँच बार। इस प्रकार अविशदाकार दिखाई देता है। आकारान्त पुल्लिंग में तो 'सत्थरि' आदि एक बार आए हैं, 'सत्थू' आदि दो बार, 'सत्था' आदि तीन बार, इस प्रकार विशदाकार दिखाई देता है। इस विधि से सभी पुल्लिंग और स्त्रीलिंग पदमालाओं में विशदाकार और अविशदाकार जानना चाहिए। नपुंसक लिंग की पदमाला में 'चित्तेन' आदि एक बार आए हैं, 'चित्तं' आदि दो बार, 'चित्तानि' यह तीन बार आया है। 'अट्ठि', 'आयु' शब्दों आदि में भी यही विधि है। यहाँ उभयमुक्त-आकार दिखाई देता है। यद्यपि यहाँ चार बार या पाँच बार आए पदों के अभाव के कारण विशदाकार जैसा उपलब्ध होता हुआ दिखाई देता है, तथापि चूँकि 'चित्तं, अट्ठि, आयू' आदि नपुंसक शब्द 'गच्छं, अग्गि, भिक्खु' आदि पुल्लिंगों की विधि से प्रवृत्त न होने के कारण विशदाकार को, और 'रत्ति, यागू' आदि स्त्रीलिंगों की विधि से प्रवृत्त न होने के कारण अविशदाकार को - इन दोनों को प्राप्त न कर विशेष रूप से 'चित्तं, चित्तानि, चित्ता। चित्तं, चित्तानि, चित्ते' आदि के द्वारा स-निकार रूपमाला वाले होते हैं, इसलिए उनका आकार उभयमुक्त देखना चाहिए। ติวิโธปายํ อากาโร สกฺกฏภาสาสุ น ลพฺภติ. เตเนส สพฺเพสุปิ พฺยากรณสตฺเถสุ น วุตฺโต. สพฺพสตฺตานํ ปน มูลภาสาภูตาย ชิเนริตาย มาคธิกาย สภาวนิรุตฺติยา ลพฺภติ. ตถา หิ อยํ นิรุตฺติมญฺชูสายํ วุตฺโต – यह त्रिविध उपाय वाला आकार संस्कृत भाषाओं में नहीं पाया जाता है। इसलिए यह सभी व्याकरण शास्त्रों में नहीं कहा गया है। परन्तु सभी प्राणियों की मूल भाषा स्वरूप, बुद्ध द्वारा कथित मागधी स्वभाव-निरुक्ति में पाया जाता है। जैसा कि यह निरुक्तिमञ्जूषा में कहा गया है - กึ ปเนตํ ลิงฺคํ นาม? เกจิ ตาว วทนฺติ – यह लिंग वास्तव में क्या है? कुछ लोग तो कहते हैं - ‘‘ถนเกสวตี อิตฺถี, มสฺสุวา ปุริโส สิยา. อุภินฺนมนฺตรํ เอตํ, อิตโร’ภยมุตฺตโก’ติ "स्तन और केशों वाली स्त्री होती है, मूँछों वाला पुरुष होता है। इन दोनों के बीच का यह (नपुंसक) है, और अन्य दोनों से मुक्त है।" วุตฺตตฺตา วิสิฏฺฐา ถนเกสาทโย ลิงฺค’’นฺติ, เอตํ น สพฺพตฺถ, คงฺคาสาลารุกฺขาทีนํ ถนาทินา สมฺพนฺธาภาวโต. ऐसा कहे जाने के कारण विशिष्ट स्तन-केश आदि लिंग हैं, यह सब जगह लागू नहीं होता, क्योंकि गंगा, साल वृक्ष आदि का स्तनों आदि से संबंध नहीं है। อปเร [Pg.293] วทนฺติ – ‘‘น ลิงฺคํ นาม ปรมตฺถโต กิญฺจิ อตฺถิ, โลกสงฺเกตรูฬฺโห ปน โวหาโร ลิงฺคํ นามา’’ติ. อิทเมตฺถ สนฺนิฏฺฐานํ. สพฺพลิงฺคิโกปิ สทฺโท โหติ ตฏํ ตฏี ตโฏติ. ยทิ จ ปรมตฺถโต ลิงฺคํ นาม สิยา, กถํ อญฺญมญฺญวิรุทฺธานํ เตสํ เอกตฺถ สมาเวโส ภวติ, ตสฺมา ยสฺส กสฺสจิ อตฺถสฺส อวิสทาการโวหาโร อิตฺถิลิงฺคํ, วิสทาการโวหาโร ปุลฺลิงฺคํ, อุภยมุตฺตาการโวหาโร นปุํสกลิงฺคนฺติ เวทิตพฺพนฺติ. दूसरे कहते हैं - "परमार्थतः लिंग नाम की कोई चीज़ नहीं है, बल्कि लोक-संकेत में रूढ़ व्यवहार ही लिंग कहलाता है।" यहाँ यही निष्कर्ष है। शब्द सभी लिंगों वाला भी होता है, जैसे - तटं, तटी, तटों। और यदि परमार्थतः लिंग होता, तो एक ही अर्थ में उन परस्पर विरुद्ध लिंगों का समावेश कैसे होता? इसलिए जिस किसी अर्थ का अविशदाकार व्यवहार स्त्रीलिंग है, विशदाकार व्यवहार पुल्लिंग है, और उभयमुक्त-आकार व्यवहार नपुंसक लिंग है - ऐसा जानना चाहिए। เอตฺถ ปน นามิกปทมาลาสงฺขาตปพนฺธวเสเนว อวิสทาการโวหาราทิตา คเหตพฺพา, น เอเกกปทวเสน. ตถา หิ ‘‘กญฺญา ปุริโส จิตฺต’’นฺติ จ, ‘‘กญฺญาโย ปุริสา จิตฺตานี’’ติ จ เอวมาทิกสฺส เอเกกปทสฺส อวิสทาการโวหาราทิตา น ทิสฺสติ. ยสฺมา ปน ปพนฺธวเสน วิสทาการโวหาราทิภาเว สิทฺเธเยว สมุทายาวยวตฺตา เอเกกปทสฺสปิ อวิสทาการโวหาราทิตา สิชฺฌเตว. यहाँ नामिक पदमाला कहे जाने वाले प्रबंध के वश से ही अविशदाकार व्यवहार आदि को ग्रहण करना चाहिए, न कि एक-एक पद के वश से। क्योंकि 'कञ्ञा, पुरिसो, चित्तं' और 'कञ्ञायो, पुरिसा, चित्तानि' इत्यादि एक-एक पद में अविशदाकार व्यवहार आदि नहीं दिखाई देता। परन्तु चूँकि प्रबंध के वश से विशदाकार व्यवहार आदि का भाव सिद्ध होने पर ही, समुदाय का अवयव होने के कारण, एक-एक पद का भी अविशदाकार व्यवहार आदि सिद्ध ही होता है। เกจิ ปน นามิกปทมาลาสงฺขาตํ ปพนฺธํ อปรามสิตฺวา เอเกกปทวเสเนว อวิสทาการโวหาราทิกํ อิจฺฉนฺติ, เต วตฺตพฺพา ‘‘ยทิ เอเกกปทสฺเสว อวิสทาการโวหาราทิตา สิยา, เอวํ สนฺเต ‘กญฺญา ปุริสา สตฺถา คุณวา ราชา’ติอาทีนํ ปทานํ อาการสุติวเสน, ‘ปุริโส สตฺถาโร กญฺญาโย’ติอาทีนํ ปน โอการสุติวเสน, ‘จิตฺตํ ปุริสํ กญฺญ’นฺติอาทีนํ อนุสารสุติวเสน อญฺญมญฺญํ สมานสุติสมฺภวา กถํ อวิสทาการโวหาราทิตา สิยา’’ติ? กิญฺจาปิ เต เอวํ วเทยฺยุํ ‘‘สิยา เอว, นานตฺตํ ปน เตสํ ทุปฺปฏิเวธ’’นฺติ. เต วตฺตพฺพา ‘‘มา ตุมฺเห เอวมวจุตฺถ, ทุชฺชานตรมฺปิ นิพฺพานํ กถนสมตฺถํ ปุคฺคลํ นิสฺสาย ชานนฺติ, ตสฺมา สุฏฺฐุ อุปปริกฺขิตฺวา วเทถา’’ติ. เอวญฺจ ปน วตฺวา [Pg.294] ตโต อุตฺตริ เต ปญฺหํ ปุจฺฉิตพฺพา ‘‘โพธิสทฺโท อายุสทฺโท จ กตรลิงฺโค’’ติ. เต ชานนฺตา เอวํ วกฺขนฺติ ‘‘โพธิสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค เจว ปุลฺลิงฺโค จ, อายุสทฺโท จ ปน นปุํสกลิงฺโค จ ปุลฺลิงฺโค จาติ ทฺวิลิงฺคา เอเต สทฺทา’’ติ. เต วตฺตพฺพา ‘‘ยทิ โพธิสทฺโท จ อายุสทฺโท จ ทฺวิลิงฺคา เอเต สทฺทา, เอวํ สนฺเต ทฺวินฺนํ โพธิสทฺทานํ เอกปทภาเวน ววตฺถิตานํ อจฺจนฺตสมานสุติกานํ กถํ อวิสทาการโวหารตา จ วิสทาการโวหารตา จ สิยา, กถญฺจ ปน ทฺวินฺนํ อายุสทฺทานํ เอกปทภาเวน ววตฺถิตานํ อจฺจนฺตสมานสุติกานํ อุภยมุตฺตาการโวหารตา จ วิสทาการโวหารตา จ สิยา’’ติ? เอวํ วุตฺตา เต อทฺธา กิญฺจิ อุตฺตริ อปสฺสนฺตา นิรุตฺตรา ภวิสฺสนฺติ. สทฺทสตฺถวิทู ปน สทฺทสตฺถโต นยํ คเหตฺวา วทนฺติ – किन्तु कुछ लोग नामिक पदमाला (शब्द-रूपों की श्रृंखला) के प्रबन्ध पर विचार न करके केवल एक-एक पद के आधार पर ही 'अविशदाकार-व्यवहार' (स्त्रीलिंग) आदि को मानते हैं। उनसे यह कहना चाहिए - 'यदि एक-एक पद की ही अविशदाकार-व्यवहारिता आदि हो, तो ऐसी स्थिति में 'कञ्ञा, पुरिसा, सत्था, गुणवा, राजा' आदि पदों के 'आ' कार की श्रुति के कारण, और 'पुरिसो, सत्थारो, कञ्ञायो' आदि के 'ओ' कार की श्रुति के कारण, तथा 'चित्तं, पुरिसं, कञ्ञं' आदि के अनुस्वार की श्रुति के कारण परस्पर समान श्रुति होने से अविशदाकार-व्यवहारिता आदि कैसे हो सकती है?' यद्यपि वे ऐसा कह सकते हैं - 'होती ही है, किन्तु उनका भेद कठिनता से जानने योग्य है।' उनसे कहना चाहिए - 'आप ऐसा न कहें, अत्यन्त कठिनता से जानने योग्य निर्वाण को भी लोग (बुद्ध जैसे) कथन-समर्थ पुद्गल के आश्रय से जान लेते हैं, इसलिए भली-भाँति विचार कर कहें।' और ऐसा कहकर उनसे आगे यह प्रश्न पूछना चाहिए - ''बोधि' शब्द और 'आयु' शब्द किस लिंग के हैं?' वे जानते हुए ऐसा कहेंगे - ''बोधि' शब्द स्त्रीलिंग और पुल्लिंग दोनों है, और 'आयु' शब्द नपुंसक लिंग और पुल्लिंग दोनों है - इस प्रकार ये द्विलिंगी शब्द हैं।' उनसे कहना चाहिए - 'यदि 'बोधि' शब्द और 'आयु' शब्द ये दोनों द्विलिंगी शब्द हैं, तो ऐसी स्थिति में एक पद के रूप में व्यवस्थित और अत्यन्त समान श्रुति वाले दो 'बोधि' शब्दों में कैसे 'अविशदाकार-व्यवहारिता' (स्त्रीलिंग) और 'विशदाकार-व्यवहारिता' (पुल्लिंग) हो सकती है? और एक पद के रूप में व्यवस्थित और अत्यन्त समान श्रुति वाले दो 'आयु' शब्दों में कैसे 'उभयमुक्त-आकार-व्यवहारिता' (नपुंसक लिंग) और 'विशदाकार-व्यवहारिता' (पुल्लिंग) हो सकती है?' ऐसा कहे जाने पर वे निश्चित रूप से आगे कुछ न देख पाने के कारण निरुत्तर हो जाएँगे। किन्तु शब्दशास्त्र के ज्ञाता शब्दशास्त्र से नय (नियम) लेकर कहते हैं - ‘‘เอเส’สา เอต’มิติ จ,ปสิทฺธิ อตฺเถสุ เยสุ โลกสฺส; ‘ถีปุมนปุํสกานี’ติ,วุจฺจนฺเต ตานิ นามานี’’ติ. 'यह (पुल्लिंग), यह (स्त्रीलिंग) और यह (नपुंसक लिंग)' - लोक में जिन अर्थों में ये प्रसिद्ध हैं, उन नामों को 'स्त्री, पुरुष और नपुंसक' कहा जाता है। เตสํ กิร อยมธิปฺปาโย – ‘‘เอโส ปุริโส, เอโส มาตุคาโม, เอโส ราชา, เอสา อิตฺถี, เอสา ลตา, เอตํ นปุํสกํ, เอตํ จิตฺต’’นฺติ เอวํ ปุริสาทีสุ เยสุ อตฺเถสุ โลกสฺส ‘‘เอโส เอสา เอต’’นฺติ จ ปสิทฺธิ โหติ, เตสุ อตฺเถสุ ตานิ นามานิ ‘‘ปุมิตฺถินปุํสกลิงฺคานี’’ติ วุจฺจนฺติ, ตํทฺวาเรน อญฺญานิปีติ. เอวํ วทนฺเตหิ เตหิ ‘‘อิมินา นาม อากาเรน ‘เอโส เอสา เอต’นฺติ นามานิ อญฺญานิ จ ปุลฺลิงฺคาทินามํ ลภนฺตี’’ติ อยํ วิเสโส น ทสฺสิโต, สทฺธมฺมนยญฺญูหิ ปน เนรุตฺติเกหิ ทสฺสิโต ‘‘ยสฺส กสฺสจิ อตฺถสฺส อวิสทาการโวหาโร อิตฺถิลิงฺค’’นฺติอาทินา. उनका यह अभिप्राय है - 'यह पुरुष है, यह मातृग्राम (स्त्री) है, यह राजा है, यह स्त्री है, यह लता है, यह नपुंसक है, यह चित्त है' - इस प्रकार पुरुष आदि जिन अर्थों में लोक की 'एषः, एषा, एतत्' (यह) के रूप में प्रसिद्धि होती है, उन अर्थों में वे नाम 'पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग' कहे जाते हैं, और उनके माध्यम से अन्य भी। ऐसा कहने वालों के द्वारा 'इस नाम-आकार से 'एषः, एषा, एतत्' और अन्य नाम पुल्लिंग आदि नाम प्राप्त करते हैं' - यह विशेषता नहीं दिखाई गई है, किन्तु सद्धर्म के नय को जानने वाले वैयाकरणों ने 'जिस किसी अर्थ का अविशदाकार-व्यवहार स्त्रीलिंग है' आदि के द्वारा इसे दिखाया है। เกจิ [Pg.295] ปน ‘‘อวิสทาการานํ อตฺถานํ วาจโก โวหาโร อิตฺถิลิงฺค’’นฺติอาทีนิ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ. ยทิ หิ อวิสทาการานํ อตฺถานํ วาจโก โวหาโร อิตฺถิลิงฺคํ, เอวํ สนฺเต มาตุคามกลตฺตกนฺตกณฺฏกคุมฺพาทโยปิ โวหารา อิตฺถิลิงฺคานิ สิยุํ อวิสทาการตฺตา ตทตฺถานํ. ยทิ ปน วิสทาการานํ อตฺถานํ วาจโก โวหาโร ปุลฺลิงฺคํ, เอวํ สนฺเต ‘‘เทวตา สทฺธา ญาณ’’มิจฺจาทโยปิ โวหารา ปุลฺลิงฺคานิ สิยุํ วิสทาการตฺตา ตทตฺถานํ. อถ วา ยทิ อวิสทาการานํ อตฺถานํ วาจโก โวหาโร อิตฺถิลิงฺคํ, วิสทาการานํ ปนตฺถานํ วาจโก โวหาโร ปุลฺลิงฺคํ, เอวํ สนฺเต เอกสฺเสวตฺถสฺส เอกกฺขเณ ทฺวีหิ ลิงฺเคหิ น วตฺตพฺพตา สิยา – किन्तु कुछ लोग कहते हैं कि 'अविशदाकार अर्थों का वाचक व्यवहार स्त्रीलिंग है' आदि, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि यदि अविशदाकार अर्थों का वाचक व्यवहार स्त्रीलिंग हो, तो ऐसी स्थिति में 'मातृग्राम (स्त्री), कलत्र (पत्नी), कण्टक (काँटा), गुम्ब (झाड़ी)' आदि व्यवहार भी स्त्रीलिंग होने चाहिए, क्योंकि उनके अर्थ अविशदाकार हैं। यदि विशदाकार अर्थों का वाचक व्यवहार पुल्लिंग हो, तो ऐसी स्थिति में 'देवता, श्रद्धा, ज्ञान' आदि व्यवहार भी पुल्लिंग होने चाहिए, क्योंकि उनके अर्थ विशदाकार हैं। अथवा, यदि अविशदाकार अर्थों का वाचक व्यवहार स्त्रीलिंग है और विशदाकार अर्थों का वाचक व्यवहार पुल्लिंग है, तो ऐसी स्थिति में एक ही अर्थ को एक ही क्षण में दो लिंगों से नहीं कहा जा सकेगा - ‘‘อตฺถกาโมสิ เม ยกฺข, หิตกามาสิ เทวเต; กโรมิ เต ตํ วจนํ, ตฺวํสิ อาจริโย มมา’’ติ. 'हे यक्ष! तुम मेरे अर्थकामी (भला चाहने वाले) हो, हे देवते! तुम हितकामी हो; मैं तुम्हारा वह वचन मानता हूँ, तुम मेरे आचार्य हो'। ยทิ จ อุภยมุตฺตาการานํ อตฺถานํ วาจโก โวหาโร นปุํสกลิงฺคํ, เอวํ สนฺเต อุภยมุตฺตาการานํ อตฺถานํ ติณรุกฺขาทีสุ ‘‘อิทํ นามา’’ติ นิยมาภาวโต ลิงฺควจนํ วิรุทฺธํ สิยา. อปิจ ‘‘ปญฺญารตนํ. สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานํ สาวกยุค’’นฺติ จ อาทินา นปุํสกลิงฺควจเนน ตทตฺถานมฺปิ อุภยมุตฺตาการตา วุตฺตา สิยา. อปิจ เอกมฺปิ ตีรํ ‘‘ตฏํ ตฏี ตโฏ’’ติ ตีหิ ลิงฺเคหิ น วตฺตพฺพํ สิยา. เอกมฺปิ จ ญาณํ ‘‘ปญฺญาณํ ปญฺญา ปชานนา อโมโห’’ติอาทินา ตีหิ ลิงฺเคหิ น วตฺตพฺพํ สิยา, ตสฺมา ตํ นยํ อคฺคเหตฺวา ยถาวุตฺโตเยว นโย คเหตพฺโพ. और यदि दोनों आकारों से मुक्त अर्थों का वाचक व्यवहार नपुंसक लिंग है, तो ऐसी स्थिति में तृण, वृक्ष आदि दोनों आकारों से मुक्त अर्थों में 'यह नाम है' - इस प्रकार का नियम न होने से लिंग और वचन विरुद्ध हो जाएँगे। इसके अतिरिक्त 'प्रज्ञा-रत्न, सारिपुत्र-मौद्गल्यायन श्रावक-युगल' आदि नपुंसक लिंग के वचनों से उनके अर्थों की भी उभयमुक्त-आकारता (नपुंसकत्व) कही गई मानी जाएगी। इसके अतिरिक्त, एक ही तट (किनारे) को 'तटं, तटी, तटों' - इन तीन लिंगों में नहीं कहा जा सकेगा। और एक ही ज्ञान को 'प्रज्ञानं, प्रज्ञा, प्रजानना, अमोह' आदि तीन लिंगों में नहीं कहा जा सकेगा, इसलिए उस नय को ग्रहण न करके यथोक्त नय ही ग्रहण करना चाहिए। โลกสฺมิญฺหิ อิตฺถีนํ เหฏฺฐิมกาโย วิสโท โหติ, อุปริมกาโย อวิสโท, อุรมํสํ อวิสทํ, คมนาทีนิปิ อวิสทานิ[Pg.296]. อิตฺถิโย หิ คจฺฉมานา อวิสทํ คจฺฉนฺติ, ติฏฺฐมานา นิปชฺชมานา นิสีทมานา ขาทมานา ภุญฺชมานา อวิสทํ ภุญฺชนฺติ. ปุริสมฺปิ หิ อวิสทํ ทิสฺวา ‘‘มาตุคาโม วิย คจฺฉติ ติฏฺฐติ นิปชฺชติ นิสีทติ ขาทติ ภุญฺชตี’’ติ วทนฺติ. อิติ ยถา อิตฺถิโย เยภุยฺเยน อวิสทาการา, ตถา ยสฺส กสฺสจิ สวิญฺญาณกสฺส วา อวิญฺญาณกสฺส วา อตฺถสฺส เย โวหารา เยภุยฺเยน อวิสทาการา, เตเยว อิตฺถิลิงฺคานิ นาม ภวนฺติ. ตํ ยถา? ‘‘กญฺญา เทวตา ธีตลิกา ทุพฺพา สทฺธา รตฺติ อิตฺถี ยาคุ วธู’’ อิจฺเจวมาทีนิ. ปุริสานํ ปน เหฏฺฐิมกาโย อวิสโท โหติ, อุปริมกาโย วิสโท, อุรมํสํ วิสทํ, คมนาทีนิปิ วิสทานิ โหนฺติ. ปุริสา หิ คจฺฉมานา วิสทํ คจฺฉนฺติ, ติฏฺฐมานา นิปชฺชมานา นิสีทมานา ขาทมานา ภุญฺชมานา วิสทํ ภุญฺชนฺติ. อิตฺถิมฺปิ หิ คมนาทีนิ วิสทานิ กุรุมานํ ทิสฺวา ‘‘ปุริโส วิย คจฺฉตี’’ติอาทีนิ วทนฺติ. อิติ ยถา ปุริสา เยภุยฺเยน วิสทาการา, ตถา ยสฺส กสฺสจิ สวิญฺญาณกสฺส วา อวิญฺญาณกสฺส วา อตฺถสฺส เย โวหารา เยภุยฺเยน วิสทาการา, เตเยว ปุลฺลิงฺคานิ นาม ภวนฺติ. ตํ ยถา? ‘‘ปุริโส มาตุคาโม โอโรโธ อาโป รุกฺโข โมโห สตฺถา’’ อิจฺเจวมาทีนิ. ยถา จ ปน นปุํสกา อุภยมุตฺตาการา, ตถา ยสฺส กสฺสจิ สวิญฺญาณกสฺส วา อวิญฺญาณกสฺส วา อตฺถสฺส เย โวหารา อุภยมุตฺตาการา, เตเยว นปุํสกลิงฺคานิ นาม ภวนฺติ. ตํ ยถา? ‘‘จิตฺตํ รูปํ อิตฺถาคารํ กลตฺตํ นาฏกํ รตนํ ญาณํ อฏฺฐิ อายุ’’อิจฺเจวมาทีนิ. อิจฺเจวํ นามิกานํ สพฺเพสมฺปิ โวหารานํ – लोक में स्त्रियों का निचला शरीर स्पष्ट (विशद) होता है, ऊपरी शरीर अस्पष्ट (अविशद) होता है, वक्ष का मांस अस्पष्ट होता है, और चलना आदि भी अस्पष्ट होते हैं। स्त्रियाँ चलते समय अस्पष्ट रूप से चलती हैं, खड़े होते, लेटते, बैठते, खाते और भोजन करते समय अस्पष्ट रूप से भोजन करती हैं। पुरुष को भी अस्पष्ट (अविशद) देखकर लोग कहते हैं— 'यह स्त्री के समान चलता है, खड़ा होता है, लेटता है, बैठता है, खाता है और भोजन करता है।' इस प्रकार जैसे स्त्रियाँ प्रायः अस्पष्ट आकार वाली होती हैं, वैसे ही जिस किसी सचेतन या अचेतन वस्तु के व्यवहार प्रायः अस्पष्ट आकार वाले होते हैं, वे ही 'स्त्रीलिंग' कहलाते हैं। जैसे कि? 'कन्या, देवता, पुतली (धीतलिका), दूर्वा, श्रद्धा, रात्रि, स्त्री, यवागू (कांजी), वधू' इत्यादि। पुरुषों का निचला शरीर अस्पष्ट होता है, ऊपरी शरीर स्पष्ट होता है, वक्ष का मांस स्पष्ट होता है, और चलना आदि भी स्पष्ट होते हैं। पुरुष चलते समय स्पष्ट रूप से चलते हैं, खड़े होते, लेटते, बैठते, खाते और भोजन करते समय स्पष्ट रूप से भोजन करते हैं। स्त्री को भी चलना आदि स्पष्ट करते हुए देखकर लोग कहते हैं— 'यह पुरुष के समान चलता है' इत्यादि। इस प्रकार जैसे पुरुष प्रायः स्पष्ट आकार वाले होते हैं, वैसे ही जिस किसी सचेतन या अचेतन वस्तु के व्यवहार प्रायः स्पष्ट आकार वाले होते हैं, वे ही 'पुल्लिंग' कहलाते हैं। जैसे कि? 'पुरुष, मातृग्राम (स्त्री), अवरोध (अन्तःपुर), जल (आपो), वृक्ष, मोह, शास्ता' इत्यादि। और जैसे नपुंसक दोनों (स्पष्ट और अस्पष्ट) आकारों से मुक्त होते हैं, वैसे ही जिस किसी सचेतन या अचेतन वस्तु के व्यवहार दोनों आकारों से मुक्त होते हैं, वे ही 'नपुंसक लिंग' कहलाते हैं। जैसे कि? 'चित्त, रूप, स्त्री-गृह (इत्थागार), कलत्र (पत्नी), नाटक, रत्न, ज्ञान, अस्थि, आयु' इत्यादि। इस प्रकार सभी नामिक व्यवहारों के— วิสทาวิสทาการา, อากาโร’ภยมุตฺตโก; ลิงฺคสฺส ลกฺขณํ เอตํ, เญยฺยํ สฺยาทิปฺปพนฺธโต. स्पष्ट और अस्पष्ट आकार, तथा दोनों से मुक्त आकार; यह लिंग का लक्षण है, जिसे विभक्ति के प्रयोग (स्यादि-प्रबन्ध) से जानना चाहिए। อิทํ [Pg.297] ฐานํ ทุพฺพินิวิชฺฌํ มหาวนคหนํ นิคฺคุมฺพํ นิชฺชฏํ กตฺวา ทสฺสิตํ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพํ. อิติ สพฺเพสํ นามิกปทานํ ปพนฺธนิสฺสิเตน อวิสทาการโวหาราทิภาเวน อิตฺถิลิงฺคาทิภาวสฺส สมฺภวโต ทฺวินฺนมฺปิ โคสทฺทานํ ปพนฺธนิสฺสิเตน อวิสทาการโวหาราทิภาเวน ยถาสกํ อิตฺถิลิงฺคาทิภาโว เวทิตพฺโพ. यह स्थान (विषय) कठिनता से समझने योग्य है, जिसे घने वन के समान दुर्गम होने पर भी झाड़ियों और उलझनों से रहित करके दिखाया गया है, इसे अच्छी तरह मन में धारण करना चाहिए। इस प्रकार सभी नामिक पदों के प्रबन्ध (प्रयोग) पर आश्रित अस्पष्ट आकार वाले व्यवहार आदि के होने से स्त्रीलिंग आदि का होना संभव है, अतः दोनों 'गो' शब्दों के प्रबन्ध पर आश्रित अस्पष्ट आकार वाले व्यवहार आदि के अनुसार उनका अपना-अपना स्त्रीलिंग आदि भाव समझना चाहिए। สวินิจฺฉโยยํ โอการนฺติตฺถิลิงฺคสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह ओ-कारान्त स्त्रीलिंग के नामिक पदमाला का स-विनिश्चय विभाग है। โอการนฺตตาปกติกํ โอการนฺติตฺถิลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. ओ-कारान्त प्रकृति वाला ओ-कारान्त स्त्रीलिंग समाप्त हुआ। เอวํ สพฺพถาปิ อาการนฺต อิวณฺณนฺต อุวณฺณนฺโตการนฺตวเสน ฉพฺพิธานิ อิตฺถิลิงฺคานิ นิรวเสสโต คหิตานิ ภวนฺติ. เอเตสุ ปน เกสญฺจิ อาการนฺตานํ อีการนฺตานญฺจ กตฺถจิ ปจฺจตฺเตกวจนสฺส เอการาเทสวเสน โย ปเภโท ทิสฺสติ, โส อิทานิ วุจฺจติ. ตถา หิ – इस प्रकार सभी प्रकार से आ-कारान्त, इ-वर्णान्त (इ, ई), उ-वर्णान्त (उ, ऊ) और ओ-कारान्त के भेद से छह प्रकार के स्त्रीलिंग पूर्णतः ग्रहण किए गए हैं। इनमें से कुछ आ-कारान्त और ई-कारान्त शब्दों के कहीं-कहीं प्रथमा एकवचन में 'ए' आदेश होने के कारण जो भेद दिखाई देता है, वह अब कहा जाता है। जैसे कि— ‘‘น ตฺวํ ราธ วิชานาสิ, อฑฺฒรตฺเต อนาคเต; อพฺยยตํ วิลปสิ, วิรตฺเต โกสิยายเน’’ติ “हे राध! तुम नहीं जानते, अभी आधी रात नहीं आई है; तुम व्यर्थ ही विलाप कर रहे हो, (जबकि) कोसियायनी विरक्त हो गई है।” อิมสฺมึ ราธชาตเก ‘‘วิรตฺตา’’ติ อาการนฺตวเสน วตฺตพฺเพ ปจฺจตฺตวจนสฺส เอการาเทสวเสน ‘‘วิรตฺเต’’ติ วุตฺตํ. ตถา ‘‘โกสิยายนี’’ติ อีการนฺตวเสน วตฺตพฺเพ ปจฺจตฺตวจนสฺส เอการาเทสวเสน ‘‘โกสิยายเน’’ติ วุตฺตํ. เตน อฏฺฐกถาจริโย ‘‘วิรตฺเต โกสิยายเนติ มาตา โน โกสิยายนี พฺราหฺมณี วิรตฺตา อมฺหากํ ปิตริ นิปฺเปมา ชาตา’’ติ อตฺถํ สํวณฺเณสิ. นนุ จ โภ ปาฬิยํ ‘‘วิรตฺเต’’ติ, ‘‘โกสิยายเน’’ติ จ ปจฺจตฺตวจนสฺส ทสฺสนโต ‘‘เอการนฺตมฺปิ อิตฺถิลิงฺคํ อตฺถี’’ติ วตฺตพฺพนฺติ? น วตฺตพฺพํ อาการีการนฺโตคธรูปวิเสสตฺตา เตสํ รูปานํ. อาเทสวเสน [Pg.298] หิ สิทฺธตฺตา วิสุํ เอการนฺตํ อิตฺถิลิงฺคํ นาม นตฺถิ, ตสฺมา อิตฺถิลิงฺคานํ ยถาวุตฺตา ฉพฺพิธตาเยว คเหตพฺพา. इस राधजातक में 'विरत्ता' इस आ-कारान्त के स्थान पर प्रथमा विभक्ति में 'ए' आदेश होने से 'विरत्ते' कहा गया है। उसी प्रकार 'कोसियायनी' इस ई-कारान्त के स्थान पर प्रथमा विभक्ति में 'ए' आदेश होने से 'कोसियायने' कहा गया है। इसलिए अट्ठकथाचार्य ने अर्थ स्पष्ट किया— 'विरत्ते कोसियायने' अर्थात् हमारी माता कोसियायनी ब्राह्मणी विरक्त हो गई है, हमारे पिता के प्रति प्रेम-रहित हो गई है। क्या यहाँ पालि में 'विरत्ते' और 'कोसियायने' में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग देखकर यह नहीं कहना चाहिए कि 'ए-कारान्त स्त्रीलिंग भी होता है'? नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वे रूप आ-कारान्त और ई-कारान्त के अन्तर्गत ही विशेष रूप हैं। आदेश के कारण सिद्ध होने से अलग से 'ए-कारान्त' नाम का कोई स्त्रीलिंग नहीं है, इसलिए स्त्रीलिंगों की पूर्वोक्त छह प्रकार की विविधता ही ग्रहण करनी चाहिए। อิจฺเจวํ อิตฺถิลิงฺคานํ, ปกิณฺณนยสาลินี; ปทมาลา วิภตฺตา เม, สาสนตฺถํ สยมฺภุโน. इस प्रकार स्त्रीलिंगों की प्रकीर्ण (विविध) नियमों से युक्त पदमाला मेरे द्वारा स्वयंभू (बुद्ध) के शासन के हित के लिए विभक्त (वर्णित) की गई है। สทฺทนีติสูริโยยํ,อเนกสุวินิจฺฉยรสฺมิกลาโป; สํสยนฺธการนุโท,กสฺส มติปทุมํ น วิกาเส. यह सद्दनीति रूपी सूर्य, जो अनेक श्रेष्ठ निश्चयों (विनिश्चयों) की किरणों का समूह है और संशय रूपी अन्धकार को दूर करने वाला है, किसके बुद्धि रूपी कमल को विकसित नहीं करेगा? อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार नौ अंगों वाले, अट्ठकथा सहित त्रिपिटक की वचन-पद्धतियों में विद्वानों के— โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कौशल (निपुणता) के लिए रचित सद्दनीति प्रकरण में— อิตฺถิลิงฺคานํ นามิกปทมาลาวิภาโค स्त्रीलिंगों का नामिक पदमाला विभाग। อฏฺฐโม ปริจฺเฉโท. आठवाँ परिच्छेद। ๙. นปุํสกลิงฺคนามิกปทมาลา ९. नपुंसक लिंग नामिक पदमाला อถ ปุพฺพาจริยมตํ ปุเรจรํ กตฺวา นิคฺคหีตนฺตนปุํสกลิงฺคานํ ‘‘ภูตํ’’อิจฺจาทิกสฺส ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลํ วกฺขาม – अब पूर्वाचार्यों के मत को आगे रखकर, निग्गहीत-अन्त (अं-अन्त) वाले नपुंसक लिंगों के 'भूतं' इत्यादि प्रकृति रूपों की नामिक पदमाला कहेंगे— จิตฺตํ, จิตฺตานิ. จิตฺตํ, จิตฺตานิ. จิตฺเตน, จิตฺเตหิ, จิตฺเตภิ. จิตฺตสฺส, จิตฺตานํ. จิตฺตา, จิตฺตสฺมา, จิตฺตมฺหา, จิตฺเตหิ, จิตฺเตภิ. จิตฺตสฺส, จิตฺตานํ. จิตฺเต, จิตฺตสฺมึ, จิตฺตมฺหิ, จิตฺเตสุ. โภ จิตฺต, โภ จิตฺตา, ภวนฺโต จิตฺตานิ. ยมกมหาเถรมตํ. चित्तं, चित्तानि। चित्तं, चित्तानि। चित्तेन, चित्तेहि, चित्तेभि। चित्तस्स, चित्तानं। चित्ता, चित्तस्मा, चित्तम्हा, चित्तेहि, चित्तेभि। चित्तस्स, चित्तानं। चित्ते, चित्तस्मिं, चित्तम्हि, चित्तेसु। भो चित्त, भो चित्ता, भवन्तो चित्तानि। यह यमक महास्थविर का मत है। เอตฺถ กิญฺจาปิ ‘‘จิตฺตา’’ติ ปจฺจตฺตพหุวจนํ ‘‘จิตฺเต’’ติ อุปโยคพหุวจนญฺจ อนาคตํ, ตถาปิ ตตฺถ ตตฺถ อญฺเญสมฺปิ ตาทิสานํ นิคฺคหีตนฺตนปุํสกรูปานํ ทสฺสนโต วิภงฺคปาฬิยญฺจ ‘‘ฉ จิตฺตา อพฺยากตา’’ติอาทิทสฺสนโต คเหตพฺพเมว[Pg.299], ตสฺมา ‘‘จิตฺตํ, จิตฺตานิ, จิตฺตา. จิตฺตํ, จิตฺตานิ, จิตฺเต’’ติ กโม เวทิตพฺโพ. นิคฺคหีตนฺตานญฺหิ นปุํสกลิงฺคานํ กตฺถจิ โอการนฺตปุลฺลิงฺคานํ วิย ปจฺจตฺโตปโยคพหุวจนานิ ภวนฺติ. ตานิ จ ปุลฺลิงฺเคน วา สลิงฺเคน วา อลิงฺเคน วา สทฺธึ สมานาธิกรณานิ หุตฺวา เกวลานิ วา ปาวจเน สญฺจรนฺติ. อตฺร ‘‘จตฺตาโร สติปฏฺฐานา. จตฺตาโร สมฺมปฺปธานา. สพฺเพ มาลา อุเปนฺติมํ. ยสฺส เอเต ธนา อตฺถิ. จตฺตาโร มหาภูตา. ตีณินฺทฺริยา. ทฺเว อินฺทฺริยา. ทสินฺทฺริยา. ทฺเว มหาภูเต นิสฺสาย ทฺเว มหาภูตา, ปญฺจ วิญฺญาณา, จตุโร องฺเค อธิฏฺฐาย, เสมิ วมฺมิกมตฺถเก, รูปา สทฺทา รสา คนฺธา. รูเป จ สทฺเท จ อโถ รเส จ. จกฺขุญฺจ ปฏิจฺจ รูเป จ อุปฺปชฺชติ จกฺขุวิญฺญาณ’’นฺติ เอวมาทโย อเนกสตา ปาฬิปฺปเทสา ทฏฺฐพฺพา. यहाँ यद्यपि 'चित्ता' यह प्रथमा बहुवचन और 'चित्ते' यह द्वितीया बहुवचन नहीं आए हैं, तथापि वहाँ-वहाँ अन्य वैसे ही निग्गहीत-अन्त वाले नपुंसक रूपों के देखे जाने से और विभङ्गपालि में 'छ चित्ता अब्याकता' (छह चित्त अव्याकृत हैं) आदि के देखे जाने से इन्हें ग्रहण करना ही चाहिए, इसलिए 'चित्तं, चित्तानि, चित्ता; चित्तं, चित्तानि, चित्ते' - यह क्रम समझना चाहिए। क्योंकि निग्गहीत-अन्त वाले नपुंसकलिङ्ग शब्दों के प्रथमा और द्वितीया बहुवचन के रूप कहीं-कहीं अकारान्त पुल्लिंग शब्दों के समान होते हैं। वे पुल्लिंग के साथ, अपने लिंग के साथ या लिंग-रहित शब्दों के साथ समानाधिकरण होकर अथवा अकेले ही बुद्धवचन में प्रयुक्त होते हैं। यहाँ 'चत्तारो सतिपट्ठाना' (चार स्मृतिप्रस्थान), 'चत्तारो सम्मप्पधाना' (चार सम्यक् प्रधान), 'सब्बे माला उपेन्ति मं' (सभी मालाएँ मेरे पास आती हैं), 'यस्स एते धना अत्थि' (जिसके पास ये धन हैं), 'चत्तारो महाभूता' (चार महाभूत), 'तीणिन्द्रिया' (तीन इन्द्रियाँ), 'द्वे इन्द्रिया' (दो इन्द्रियाँ), 'दसिन्द्रिया' (दस इन्द्रियाँ), 'द्वे महाभूते निस्साय द्वे महाभूता' (दो महाभूतों के आश्रय से दो महाभूत), 'पञ्च विञ्ञाणा' (पाँच विज्ञान), 'चतुरो अङ्गे अधिट्ठाय' (चार अंगों पर अधिष्ठित होकर), 'सेमि वम्मिकमत्थके' (बाँबी के शिखर पर सोता हूँ), 'रूपा सद्दा रसा गन्धा' (रूप, शब्द, रस, गन्ध), 'रूपे च सद्दे च अथो रसे च' (रूपों में, शब्दों में और रसों में), 'चक्खुञ्च पटिच्च रूपे च उप्पज्जति चक्खुविञ्ञाणं' (चक्षु और रूपों के प्रतीत्य होने पर चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है) - इस प्रकार के सैकड़ों पालि प्रदेश (उदाहरण) देखे जाने चाहिए। เอตฺถ ปน ‘‘สติปฏฺฐานา’’ติอาทีนิ ปทานิ ลิงฺควิปลฺลาสวเสน วุตฺตานีติ น คเหตพฺพานิ สติปฏฺฐานสทฺทาทีนํ ปฐเมกวจนฏฺฐาเน โอการนฺตปุลฺลิงฺคภาเวน ฐิตภาวสฺส อทสฺสนโต. ‘‘จตฺตาโร’’ติอาทีนิเยว ปน ปทานิ ลิงฺควิปลฺลาสวเสน วุตฺตานีติ คเหตพฺพานิ นิโยคา นิคฺคหีตนฺเตหิ นปุํสกลิงฺเคหิ สติปฏฺฐานสทฺทาทีหิ สทฺธึ เตสํ สมานาธิกรณภาวสฺส ทสฺสนโตติ. यहाँ 'सतिपट्ठाना' आदि पदों को लिंग-विपर्यास के कारण कहा गया है, ऐसा नहीं समझना चाहिए; क्योंकि 'सतिपट्ठान' आदि शब्दों का प्रथमा एकवचन के स्थान पर अकारान्त पुल्लिंग रूप में स्थित होना नहीं देखा जाता है। बल्कि 'चत्तारो' आदि पदों को ही लिंग-विपर्यास के कारण कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए; क्योंकि निश्चित रूप से निग्गहीत-अन्त वाले नपुंसकलिङ्ग 'सतिपट्ठान' आदि शब्दों के साथ उनका समानाधिकरण भाव देखा जाता है। เกเจตฺถ วเทยฺยุํ – นนุ ‘‘สติปฏฺฐาโน ธมฺโม, จิตฺโต ธมฺโม, จิตฺตา ธมฺมา’’ติอาทิปฺปโยคทสฺสนโต สติปฏฺฐานสทฺทาทีนํ [Pg.300] โอการนฺตปุลฺลิงฺคภาโว ลพฺภติ. เอวํ สนฺเต กสฺมา ตุมฺเหหิ ‘‘สติปฏฺฐานสทฺทาทีนํ ปฐเมกวจนฏฺฐาเน โอการนฺตปุลฺลิงฺคภาเวน ฐิตภาวสฺส อทสฺสนโต’’ติ วุตฺตํ, กสฺมา จ เอกนฺตโต สติปฏฺฐานสทฺทาทีนํ นิคฺคหีตนฺตนปุํสกลิงฺคตา อนุมตา, นนุ ‘‘สติปฏฺฐาโน ธมฺโม, จิตฺโต ธมฺโม, จิตฺตา ธมฺมา’’ติอาทิทสฺสนโต ‘‘จตฺตาโร สติปฏฺฐานา’’ติอาทีสุปิ ‘‘สติปฏฺฐานสทฺทาทโย ลิงฺควิปลฺลาสวเสน วุตฺตา’’ติ วตฺตพฺพาติ? น วตฺตพฺพา, กสฺมาติ เจ? ‘‘สติปฏฺฐาโน ธมฺโม, จิตฺโต ธมฺโม, จิตฺตา ธมฺมา’’ติอาทีสุปิ สติปฏฺฐานจิตฺตสทฺทาทีนํ ลิงฺควิปลฺลาสวเสน อนิจฺฉิตพฺพโต. ตตฺถ หิ ปุลฺลิงฺเคน ธมฺมสทฺเทน โยเชตุํ ธมฺมิสฺสโร ภควา ธมฺมาเปกฺขํ กตฺวา ‘‘สติปฏฺฐาโน, จิตฺโต, จิตฺตา’’ติ จ อภาสิ. เกวลา หิ สติปฏฺฐาน จิตฺตสทฺทาทโย โอการนฺตปุลฺลิงฺคภาเวน กตฺถจิปิ โยชิตา น สนฺติ, นิคฺคหีตนฺตนปุํสกภาเวน ปน โยชิตา สนฺติ. यहाँ कुछ लोग कह सकते हैं - क्या 'सतिपट्ठानो धम्मो, चित्तो धम्मो, चित्ता धम्मा' आदि प्रयोगों के देखे जाने से 'सतिपट्ठान' आदि शब्दों का अकारान्त पुल्लिंग होना सिद्ध नहीं होता? ऐसा होने पर आपने यह क्यों कहा कि 'सतिपट्ठान आदि शब्दों का प्रथमा एकवचन के स्थान पर अकारान्त पुल्लिंग रूप में स्थित होना नहीं देखा जाता', और क्यों निश्चित रूप से 'सतिपट्ठान' आदि शब्दों का निग्गहीत-अन्त वाला नपुंसकलिङ्ग होना ही स्वीकार किया गया है? क्या 'सतिपट्ठानो धम्मो...' आदि के देखे जाने से 'चत्तारो सतिपट्ठाना' आदि में भी 'सतिपट्ठान आदि शब्द लिंग-विपर्यास के कारण कहे गए हैं' - ऐसा नहीं कहना चाहिए? (उत्तर है -) नहीं कहना चाहिए। क्यों? क्योंकि 'सतिपट्ठानो धम्मो, चित्तो धम्मो, चित्ता धम्मा' आदि में भी सतिपट्ठान और चित्त शब्दों का लिंग-विपर्यास इष्ट नहीं है। वहाँ पुल्लिंग 'धम्म' शब्द के साथ जोड़ने के लिए धम्मेश्वर भगवान् ने 'धम्म' की अपेक्षा रखकर 'सतिपट्ठानो, चित्तो, चित्ता' ऐसा कहा था। क्योंकि अकेले 'सतिपट्ठान', 'चित्त' आदि शब्द अकारान्त पुल्लिंग के रूप में कहीं भी प्रयुक्त नहीं हैं, बल्कि निग्गहीत-अन्त वाले नपुंसकलिङ्ग के रूप में प्रयुक्त हैं। ตถา หิ ‘‘จิตฺโต คหปตี’’ติ เอตฺถาปิ ปุลฺลิงฺคคหปติสทฺทํ อเปกฺขิตฺวา วิญฺญาเณ ปวตฺตํ จิตฺตนามํ ปณฺณตฺติวเสน ปุคฺคเล อาโรเปตฺวา ปุคฺคลวาจกํ กตฺวา ‘‘จิตฺโต’’ติ วุตฺตํ. ยทิ ปน วิญฺญาณสงฺขาตํ จิตฺตมธิปฺเปตํ สิยา, ‘‘จิตฺต’’มิจฺเจว วุจฺเจยฺย. ตสฺมา ‘‘จิตฺโต คหปติ, จิตฺตา อิตฺถี’’ติอาทีสุ ลิงฺควิปลฺลาโส น อิจฺฉิตพฺโพ สาเปกฺขตฺตา จิตฺตสทฺทาทีนํ. ยถา จ เอตฺถ, เอวํ ‘‘สติปฏฺฐาโน ธมฺโม, จิตฺโต ธมฺโม, จิตฺตา ธมฺมา’’ติอาทีสุปิ ลิงฺควิปลฺลาโส น อิจฺฉิตพฺโพ. ‘‘จตฺตาโร สติปฏฺฐานา’’ติอาทีสุ ปน สติปฏฺฐานสทฺทาทีนํ อเปกฺขิตพฺพานิ ปทานิ น สนฺติ, เยหิ เต ปุลฺลิงฺคานิ สิยุํ, ตสฺมา ‘‘จตฺตาโร’’ติอาทีนิเยว ปทานิ ปริวตฺเตตฺวา ‘‘จตฺตาริ, สพฺพานิ, เอตานี’’ติ นปุํสกลิงฺควเสน คเหตฺวา ‘‘สติปฏฺฐานา[Pg.301], สมฺมปฺปธานา’’ติอาทีหิ ปเทหิ โยเชตพฺพานิ. อีทิเสสุ ฐาเนสุ เกจิ อฏฺฐกถาจริยา นิการโลปํ อิจฺฉนฺติ ‘‘ยา ปุพฺเพ โพธิสตฺตานํ, ปลฺลงฺกวรมาภุเช, นิมิตฺตานิ ปทิสฺสนฺตี’’ติ เอตฺถ วิย. อทสฺสนญฺหิ โลโป, ตสฺมา ‘‘จตฺตาริ สติปฏฺฐานานิ, จตฺตาริ สมฺมปฺปธานานิ, สพฺพานิ มาลานี’ติอาทิกา โยชนา กาตพฺพา. जैसे कि 'चित्तो गहपति' (चित्त गृहपति) यहाँ भी पुल्लिंग 'गहपति' शब्द की अपेक्षा रखकर, विज्ञान में प्रवृत्त 'चित्त' नाम को प्रज्ञप्ति के वश से पुद्गल पर आरोपित कर, उसे पुद्गलवाचक बनाकर 'चित्तो' कहा गया है। यदि विज्ञान-संज्ञक 'चित्त' अभिप्रेत होता, तो 'चित्तं' ही कहा जाता। इसलिए 'चित्तो गहपति, चित्ता इत्थी' आदि में चित्त आदि शब्दों का लिंग-विपर्यास इष्ट नहीं है, क्योंकि वे (अन्य शब्दों के) सापेक्ष हैं। और जैसे यहाँ है, वैसे ही 'सतिपट्ठानो धम्मो, चित्तो धम्मो, चित्ता धम्मा' आदि में भी लिंग-विपर्यास इष्ट नहीं है। किन्तु 'चत्तारो सतिपट्ठाना' आदि में सतिपट्ठान आदि शब्दों के लिए कोई अपेक्षित पद नहीं हैं, जिनसे वे पुल्लिंग हो सकें; इसलिए 'चत्तारो' आदि पदों को ही बदलकर 'चत्तारि, सब्बानि, एतानि' इस प्रकार नपुंसकलिङ्ग के रूप में ग्रहण कर 'सतिपट्ठाना, सम्मप्पधाना' आदि पदों के साथ जोड़ना चाहिए। ऐसे स्थानों पर कुछ अट्ठकथाचार्य 'नि' कार का लोप मानते हैं, जैसे 'या पुब्बे बोधिसत्तानं, पल्लङ्कवरमाभुजे, निमित्तानि पदिसन्ति' यहाँ। चूँकि अदर्शन ही लोप है, इसलिए 'चत्तारि सतिपट्ठानानि, चत्तारि सम्मप्पधानानि, सब्बानि मालानि' - इस प्रकार योजना करनी चाहिए। เกจิ ปน ‘‘สพฺเพ มาลา อุเปนฺติ ม’’นฺติ เอตฺถ มาลาสทฺทํ อิตฺถิลิงฺคนฺติ มญฺญิตฺวา ปุลฺลิงฺคภูตํ สพฺเพสทฺทํ อิตฺถิลิงฺควเสน ปริวตฺเตตฺวา ‘‘สพฺพา มาลา’’ติ อตฺถํ กเถนฺติ. ตํ กิญฺจาปิ ยุตฺตตรํ วิย ทิสฺสติ, ตถาปิ น คเหตพฺพํ. น หิ โส ภควา ลิงฺคํ นญฺญาสิ, น จ ‘‘สพฺพา มาลา อุเปนฺติ ม’’นฺติ ทฺเว ปทานิ อิตฺถิลิงฺคานิ กตฺวา วตฺตุํ น สกฺขิ. โย เอวํ วิสทิสลิงฺคานิ ปทานิ อุจฺจาเรสิ. ชานนฺโตเยว ปน ภควา วตฺตุํ สกฺโกนฺโตเยว จ ‘‘สพฺเพ มาลา อุเปนฺติ ม’’นฺติ วิสทิสลิงฺคานิ ปทานิ อุจฺจาเรสิ, ตสฺมา ปุลฺลิงฺคภูตํ สพฺเพสทฺทํ ‘‘สพฺพานี’’ติ นปุํสกลิงฺควเสน ปริวตฺเตตฺวา วิภงฺคปาฬิยํ ‘‘ตีณินฺทฺริยา’’ติ ปทํ วิย ลุตฺตนิกาเรน นปุํสกลิงฺเคน มาลาสทฺเทน โยเชตฺวา ‘‘สพฺพานิ มาลานี’’ติ อตฺโถ คเหตพฺโพ กตฺถจิ ‘‘ยสฺส เอเต ธนา อตฺถี’’ติ เอตฺถ วิย. เอตฺถ หิ ยสฺส เอตานิ ธนานีติ อตฺโถ. อิทมฺเปตฺถ สลฺลกฺขิตพฺพํ. มาลาสทฺโท ทฺวิลิงฺโค อิตฺถินปุํสกวเสน. ติฏฺฐตุ ตสฺสิตฺถิลิงฺคตฺตํ สุวิญฺเญยฺยตฺตา, นปุํสกตฺเต ปน ตีณิ มาลานิ. ‘‘มาเลหิ จ คนฺเธหิ จ ภควโต สรีรํ ปูเชนฺตี’’ติอาทโย นปุํสกปฺปโยคานิปิ พหู สนฺทิสฺสนฺตีติ. किन्तु कुछ लोग 'सब्बे माला उपेन्ति मं' (sabbe mālā upenti maṃ) यहाँ 'माला' शब्द को स्त्रीलिंग मानकर, पुल्लिंग रूप 'सब्बे' शब्द को स्त्रीलिंग के अनुसार बदलकर 'सब्बा माला' (sabbā mālā) ऐसा अर्थ कहते हैं। यद्यपि वह कुछ अधिक युक्तियुक्त सा प्रतीत होता है, फिर भी उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए। क्योंकि ऐसा नहीं है कि वे भगवान लिंग (व्याकरणिक लिंग) को नहीं जानते थे, और न ही ऐसा है कि वे 'सब्बा माला उपेन्ति मं' इस प्रकार दोनों पदों को स्त्रीलिंग बनाकर कहने में समर्थ नहीं थे। जिन्होंने इस प्रकार विसदृश लिंग वाले पदों का उच्चारण किया। किन्तु जानते हुए और बोलने में समर्थ होते हुए भी भगवान ने 'सब्बे माला उपेन्ति मं' इस प्रकार विसदृश लिंग वाले पदों का उच्चारण किया, इसलिए पुल्लिंग रूप 'सब्बे' शब्द को 'सब्बानि' इस प्रकार नपुंसक लिंग के अनुसार बदलकर, विभंगपालि में 'तीणिन्द्रिया' (tīṇindriyā) पद के समान लुप्त-नकार (नकार के लोप वाले) नपुंसक लिंग 'माला' शब्द के साथ जोड़कर 'सब्बानि मालानि' (sabbāni mālānī) ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिए, जैसे कहीं 'यस्स एते धना अत्थि' (yassa ete dhanā atthi) यहाँ होता है। यहाँ 'यस्स एतानि धनानि' ऐसा अर्थ है। यहाँ यह भी ध्यान देना चाहिए कि 'माला' शब्द स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग के भेद से द्विलिंगी है। उसका स्त्रीलिंग होना सुविज्ञेय होने के कारण रहने दें, किन्तु नपुंसक लिंग में 'तीणि मालानि' (tīṇi mālāni) होता है। 'मालेहि च गन्धेहि च भगवतो सरीरं पूजेन्ति' इत्यादि नपुंसक लिंग के प्रयोग भी बहुत देखे जाते हैं। ยทิ ปน โภ มาลสทฺโท อิตฺถินปุํสกวเสน ทฺวิลิงฺโค, ‘‘สพฺเพ มาลา อุเปนฺติ ม’’นฺติ เอตฺถ มาลาสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคภาวปริกปฺปเน โก โทโส อตฺถีติ? อตฺเถว อิตฺถิลิงฺคสทฺทสฺส [Pg.302] ปุลฺลิงฺคภูเตน สพฺพนามิกปเทน สทฺธึ สมานาธิกรณภาวสฺสาภาวโต, นปุํสกลิงฺคสฺส ปน ปุลฺลิงฺคภูเตน สพฺพนามิกปเทน สทฺธึ สมานาธิกรณภาวสฺส อุปลพฺภนโต. เตเนว จ ‘‘เอเต ธนา’’ติอาทโย ปโยคา ปาวจเน พหุธา ทิฏฺฐา. เอตฺถาปิ ปน วเทยฺยุํ ‘‘ธนาติอาทีนิ วิปลฺลาสวเสน ปุลฺลิงฺคานิเยว ‘‘เอเต’’ติอาทีหิ สมานาธิกรณปเทหิ โยชิตตฺตา’’ติ. น, นปุํสกานิเยเวตานิ. ยทิ หิ ‘‘ธนา’’ติอาทีนิ ปุลฺลิงฺคานิ สิยุํ, กตฺถจิ ปจฺจตฺเตกวจนฏฺฐาเน ‘‘เอโส’’ติอาทีหิ โอการนฺตสมานาธิกรณปเทหิ โยชิตา โอการนฺตธนสทฺทาทโย สิยุํ. ตถารูปานํ อภาวโต ปน ‘‘ธนา อินฺทฺริยา วิญฺญาณา’’ติอาทโย สทฺทา นปุํสกลิงฺคานิเยว โหนฺติ. อยํ นโย ปจฺจตฺตพหุวจนฏฺฐาเนเยว ลพฺภติ. นปุํสกลิงฺคานิ หิ วิสทาการานิ ปุลฺลิงฺครูปานิ วิย หุตฺวา ปุลฺลิงฺเคหิปิ สทฺธึ จรนฺติ, นปุํสกา วิย ปุริสเวสธาริโน ปุริเสหีติ นิฏฺฐเมตฺถาวคนฺตพฺพํ. यदि, हे महानुभाव! 'माला' शब्द स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग के भेद से द्विलिंगी है, तो 'सब्बे माला उपेन्ति मं' यहाँ 'माला' शब्द के स्त्रीलिंग होने की कल्पना करने में क्या दोष है? दोष है ही, क्योंकि स्त्रीलिंग शब्द का पुल्लिंग सर्वनाम पद के साथ समानाधिकरण भाव (व्याकरणिक अन्वय) नहीं होता, जबकि नपुंसक लिंग का पुल्लिंग सर्वनाम पद के साथ समानाधिकरण भाव पाया जाता है। इसी कारण 'एते धना' इत्यादि प्रयोग बुद्धवचन में बहुत देखे गए हैं। यहाँ भी वे कह सकते हैं कि 'धना' इत्यादि शब्द विपर्यास (व्यतिक्रम) के कारण पुल्लिंग ही हैं, क्योंकि वे 'एते' इत्यादि समानाधिकरण पदों के साथ प्रयुक्त हुए हैं। नहीं, ये नपुंसक लिंग ही हैं। यदि 'धना' इत्यादि पुल्लिंग होते, तो कहीं प्रथमा एकवचन के स्थान पर 'एसो' इत्यादि ओ-कारान्त समानाधिकरण पदों के साथ प्रयुक्त ओ-कारान्त 'धन' शब्द आदि (जैसे 'धनो') होते। वैसे रूपों के अभाव के कारण 'धना, इन्द्रिया, विञ्ञाणा' इत्यादि शब्द नपुंसक लिंग ही हैं। यह नियम प्रथमा बहुवचन के स्थान पर ही प्राप्त होता है। क्योंकि नपुंसक लिंग शब्द विसदृश आकार वाले पुल्लिंग रूपों के समान होकर पुल्लिंगों के साथ भी चलते हैं, जैसे पुरुष का वेष धारण करने वाले नपुंसक (हिजड़े) पुरुषों के साथ चलते हैं - ऐसा यहाँ निष्कर्ष समझना चाहिए। อถาปิ เต ปุพฺเพ วุตฺตวจนํ ปุน ปริวตฺเตตฺวา เอวํ วเทยฺยุํ ‘‘จิตฺโต คหปติ, จิตฺตา อิตฺถี’’ติอาทีสุ จิตฺตํ เอตสฺส อตฺถีติ จิตฺโต, จิตฺตํ เอติสฺสา อตฺถีติ จิตฺตา ยถา ‘‘สทฺโธ, สทฺธา’’ติ เอวํ อสฺสตฺถีติ อตฺถวเสน คเหตพฺพโต ลิงฺควิปลฺลาโส นิจฺฉิตพฺโพ, ‘‘สติปฏฺฐาโน ธมฺโม, จิตฺโต ธมฺโม, จิตฺตา ธมฺมา’’ติอาทีนิ ปน เอวรูปสฺส อตฺถสฺส อคฺคเหตพฺพโต ‘‘สติปฏฺฐานํ ธมฺโม, จิตฺตํ ธมฺโม, จิตฺตานิ ธมฺมา’’ติ วตฺตพฺเพ ลิงฺควิปลฺลาเสน ‘‘สติปฏฺฐาโน ธมฺโม, จิตฺโต ธมฺโม, จิตฺตา ธมฺมา’’ติอาทิ วุตฺตนฺติ ลิงฺควิปลฺลาโส อิจฺฉิตพฺโพ’’ติ? ตนฺน, ‘‘จิตฺโต คหปตี’’ติอาทีสุ ปน ‘‘สติปฏฺฐาโน ธมฺโม’’ติอาทีสุ จ จิตฺตสติปฏฺฐานสทฺทาทีนํ คหปติ ธมฺมาทีนํ อเปกฺขนวเสน นิจฺจํ ปุลฺลิงฺคภาวสฺส อิจฺฉิตตฺตา. और यदि वे पूर्व में कहे गए वचन को फिर से बदलकर ऐसा कहें कि 'चित्तो गहपति, चित्ता इत्थी' इत्यादि में 'चित्त' इसका है इसलिए 'चित्तो', 'चित्त' इसका है इसलिए 'चित्ता' - जैसे 'सद्धो, सद्धा' - इस प्रकार 'इसका है' (अस्सात्थि) इस अर्थ के कारण ग्रहण किए जाने से लिंग-विपर्यास निश्चित करना चाहिए, किन्तु 'सतिपट्ठानो धम्मो, चित्तो धम्मो, चित्ता धम्मा' इत्यादि में इस प्रकार का अर्थ ग्रहण न किए जा सकने के कारण, जहाँ 'सतिपट्ठानं धम्मो, चित्तं धम्मो, चित्तानि धम्मा' कहना चाहिए था, वहाँ लिंग-विपर्यास से 'सतिपट्ठानो धम्मो, चित्तो धम्मो, चित्ता धम्मा' आदि कहा गया है, इसलिए लिंग-विपर्यास मानना चाहिए? यह सही नहीं है, क्योंकि 'चित्तो गहपति' इत्यादि में और 'सतिपट्ठानो धम्मो' इत्यादि में 'चित्त', 'सतिपट्ठान' आदि शब्दों का 'गहपति', 'धम्म' आदि (विशेष्यों) की अपेक्षा के कारण नित्य पुल्लिंग होना ही अभीष्ट है। ตถา [Pg.303] หิ เอกนฺตนปุํสกลิงฺโคปิ ปุญฺญสทฺโท อภิสงฺขาราเปกฺขนวเสน ‘‘ปุญฺโญ อภิสงฺขาโร’’ติ ปุลฺลิงฺโค ชาโต, ตถา เอกนฺตนปุํสกลิงฺคาปิ ปทุม มงฺคลสทฺทาทโย อญฺญสฺสตฺถสฺสาเปกฺขนวเสน ‘‘ปทุโม ภควา, ปทุมา เทวี, มงฺคโล ภควา, มงฺคลา อิตฺถี’’ติ จ ปุมิตฺถิลิงฺคา ชาตา. เอกนฺตปุลฺลิงฺคาปิ หตฺถิวิเสสวาจกา กาลาวก คงฺเคยฺยสทฺทาทโย กุลาเปกฺขนวเสน ‘‘กาลาวกญฺจ คงฺเคยฺย’’นฺติอาทินา นปุํสกลิงฺคา ชาตา. ตทเปกฺขนวเสน หิ อฏฺฐกถายํ ‘‘กาลาวโก จ คงฺเคยฺโย’’ติอาทิ ปุลฺลิงฺคนิทฺเทโส ทิสฺสติ. เอวํ ตํตทตฺถานมเปกฺขนวเสน ตํตํปกติลิงฺคํ นาเสตฺวา อปรํ ลิงฺคํ ปติฏฺฐาเปตฺวา นิทฺเทโส ทิสฺสติ, น จ ตานิ สพฺพานิปิ ลิงฺคานิ ตทฺธิตวเสน อญฺญลิงฺคานิ ชาตานิ, อถ โข คหปติธมฺมาทีนํ อเปกฺขนวเสเนว อญฺญลิงฺคานิ ชาตานิ, ตสฺมา ‘‘เปตานิ โภติ ปุตฺตานิ, ขาทมานา ตุวํ ปุเร. สิวิปุตฺตานิ จวฺหย. เอวํ ธมฺมานิ สุตฺวาน, วิปฺปสีทนฺติ ปณฺฑิตา’’ติอาทีสุเยว ลิงฺควิปลฺลาโส อิจฺฉิตพฺโพ อนญฺญาเปกฺขกตฺตา วุตฺตธมฺมสทฺทาทีนํ, น ปน ‘‘จิตฺโต คหปติ, จิตฺตา อิตฺถี, สติปฏฺฐาโน ธมฺโม, จิตฺโต ธมฺโม, จิตฺตา ธมฺมา’’ติอาทีสุ จิตฺตสทฺทาทีนํ วิปลฺลาโส อิจฺฉิตพฺโพ คหปติ ธมฺมาทีนํ อเปกฺขกตฺตา เตสนฺติ นิฏฺฐเมตฺถาวคนฺตพฺพํ, อิทญฺจ เอกจฺจานํ สมฺโมหฏฺฐานํ, ตสฺมา สทฺธมฺมฏฺฐิติยา อยํ นีติ สทฺธาสมฺปนฺเนหิ กุลปุตฺเตหิ สาธุกํ มนสิ กาตพฺพา. जैसे कि पूर्णतः नपुंसकलिङ्ग होने पर भी 'पुञ्ञ' (पुण्य) शब्द 'अभिसङ्खार' की अपेक्षा से 'पुञ्ञो अभिसङ्खारो' इस प्रकार पुलिङ्ग हो गया है, वैसे ही पूर्णतः नपुंसकलिङ्ग होने पर भी 'पदुम' (पद्म), 'मङ्गल' आदि शब्द अन्य अर्थों की अपेक्षा से 'पदुमो भगवा, पदुमा देवी, मङ्गलो भगवा, मङ्गला इत्थी' इस प्रकार पुलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग हो गए हैं। पूर्णतः पुलिङ्ग होने पर भी हाथी विशेष के वाचक 'कालावक', 'गङ्गेय्य' आदि शब्द कुल की अपेक्षा से 'कालावकञ्च गङ्गेय्यं' इत्यादि के रूप में नपुंसकलिङ्ग हो गए हैं। उनकी अपेक्षा से ही अट्ठकथा में 'कालावको च गङ्गेय्यो' इत्यादि पुलिङ्ग निर्देश दिखाई देता है। इस प्रकार उन-उन अर्थों की अपेक्षा से उस-उस प्रकृति-लिङ्ग को हटाकर अन्य लिङ्ग को स्थापित करके निर्देश देखा जाता है, और वे सभी लिङ्ग तद्धित के कारण अन्य लिङ्ग नहीं हुए हैं, बल्कि गृहपति, धर्म आदि की अपेक्षा के कारण ही अन्य लिङ्ग हुए हैं। इसलिए 'पेतानि भोति पुत्तानि, खादमाना तुवं पुरे। सिविपुत्तानि चव्हय। एवं धम्मानि सुत्वान, विप्पसीदन्ति पण्डिता' इत्यादि में ही लिङ्ग-विपर्यास (लिङ्ग परिवर्तन) मानना चाहिए क्योंकि वहाँ 'धम्म' आदि शब्द किसी अन्य की अपेक्षा नहीं रखते हैं। परन्तु 'चित्तो गहपति, चित्ता इत्थी, सतिपट्ठानो धम्मो, चित्तो धम्मो, चित्ता धम्मा' इत्यादि में 'चित्त' आदि शब्दों का विपर्यास नहीं मानना चाहिए क्योंकि वे गृहपति, धर्म आदि की अपेक्षा रखते हैं - ऐसा यहाँ निश्चय समझना चाहिए। और यह कुछ लोगों के लिए सम्मोह (भ्रम) का स्थान है, इसलिए सद्धर्म की स्थिति के लिए श्रद्धा-सम्पन्न कुलपुत्रों को इस नीति को अच्छी तरह मन में धारण करना चाहिए। พทรติตฺถวิหารวาสี อาจริยธมฺมปาโล ปน ‘‘อปริมาณา ปทา อปริมาณา อกฺขรา อปริมาณา พฺยญฺชนาติ ปาฬิปฺปเทเส [Pg.304] ‘ปทา อกฺขรา พฺยญฺชนา’ติ ลิงฺควิปลฺลาโส กโตติ ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ อาห. เอตฺถาปิ มยํ ‘‘ปทา’’ติ อิทํ ‘‘อินฺทฺริยา รูปา’’ติอาทีนิ วิย นปุํสกลิงฺคเมวาติ วทาม โอการนฺตวเสน ปฐเมกวจนนฺตภาวาภาวโต, อิตรทฺวยํ ปน นปุํสกลิงฺคนฺติปิ ปุลฺลิงฺคนฺติปิ คเหตพฺพํ นิคฺคหีตนฺโตการนฺตวเสน ปฐเมกวจนนฺตภาวสฺสูปลพฺภนโต. ตถา หิ ‘‘ปุตฺตานิ ลตานิ ปพฺพตานิ ธมฺมานี’’ติอาทีนํเยว ลิงฺควิปลฺลาสานิ อิจฺฉิตพฺพานิ นิคฺคหีตนฺตวเสน ปฐเมกวจนนฺตตาย อนุปลทฺธิโต, เตสญฺโจการนฺตาการนฺตวเสน ปฐเมกวจนนฺตตาทสฺสนโต. ‘‘ชราธมฺมํ มา ชีรี’’ติ อิทํ ปน อญฺญปทตฺถวเสน นปุํสกํ ชาตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. बदरतित्थविहार के निवासी आचार्य धम्मपाल ने तो कहा है कि 'अपरिमाणा पदा अपरिमाणा अक्खरा अपरिमाणा ब्यञ्जना' इस पालि प्रदेश में 'पदा अक्खरा ब्यञ्जना' में लिङ्ग-विपर्यास किया गया है, ऐसा समझना चाहिए। यहाँ भी हम कहते हैं कि 'पदा' यह 'इन्द्रिया रूपा' इत्यादि की तरह नपुंसकलिङ्ग ही है, क्योंकि 'ओ' कारान्त के रूप में प्रथमा एकवचन का अभाव है। शेष दो (अक्खर, ब्यञ्जन) को तो नपुंसकलिङ्ग और पुलिङ्ग दोनों में ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि निग्गहीत-अन्त और 'ओ' कारान्त के रूप में प्रथमा एकवचन के रूप उपलब्ध होते हैं। जैसे कि 'पुत्तानि लतानि पब्बतानि धम्मानी' इत्यादि में ही लिङ्ग-विपर्यास मानना चाहिए क्योंकि निग्गहीत-अन्त के रूप में प्रथमा एकवचन की उपलब्धि नहीं होती, और उनके 'ओ' कारान्त एवं 'आ' कारान्त के रूप में प्रथमा एकवचन के रूप देखे जाते हैं। 'जराधम्मं मा जीरी' यह तो अन्य पद के अर्थ के कारण नपुंसक हो गया है, ऐसा समझना चाहिए। ภูตํ, ภูตานิ, ภูตา. ภูตํ, ภูตานิ, ภูเต. ภูเตน, ภูเตหิ, ภูเตภิ. ภูตสฺส, ภูตานํ. ภูตา, ภูตสฺมา, ภูตมฺหา, ภูเตหิ, ภูเตภิ. ภูตสฺส, ภูตานํ. ภูเต, ภูตสฺมึ, ภูตมฺหิ, ภูเตสุ. โภ ภูต, ภวนฺโต ภูตานิ, ภวนฺโต ภูตา. เอวํ จิตฺตนเยน นามิกปทมาลา ภวติ. भूतं, भूतानि, भूता (प्रथमा)। भूतं, भूतानि, भूते (द्वितीया)। भूतेन, भूतेहि, भूतेभि (तृतीया)। भूतस्स, भूतानं (चतुर्थी)। भूता, भूतस्मा, भूतुम्हा, भूतेहि, भूतेभि (पञ्चमी)। भूतस्स, भूतानं (षष्ठी)। भूते, भूतस्मिं, भूतुम्हि, भूतेसु (सप्तमी)। भो भूत, भवन्तो भूतानि, भवन्तो भूता (सम्बोधन)। इस प्रकार 'चित्त' शब्द की विधि के अनुसार नामिक पदमाला होती है। อิมินา นเยน ‘‘มหาภูตํ ภวิตฺตํ ภูนํ ภวน’’มิจฺจาทีนํ ภูธาตุมยานํ นิคฺคหีตนฺตปทานํ อญฺเญสญฺจ ‘‘วตฺต’’มิจฺจาทีนํ นิคฺคหีตนฺตปทานํ นามิกปทมาลา เวทิตพฺพา. इस विधि से 'महाभूतं, भवित्तं, भूनं, भवनं' इत्यादि 'भू' धातु से बने निग्गहीत-अन्त वाले शब्दों और अन्य 'वत्तं' इत्यादि निग्गहीत-अन्त वाले शब्दों की नामिक पदमाला (शब्द-रूप) जाननी चाहिए। วตฺตํ รูปํ โสตํ ฆานํ, ทุกฺขํ ปุปฺผํ ฌานํ ญาณํ; ทานํ สีลํ ปุญฺญํ ปาปํ, วชฺชํ สจฺจํ ยานํ ฉตฺตํ. वत्तं (व्रत), रूपं, सोतं (श्रोत्र), घानं (घ्राण), दुक्खं, पुप्फं (पुष्प), झानं (ध्यान), ञाणं (ज्ञान); दानं, सीलं, पुञ्ञं (पुण्य), पापं, वज्जं (वर्ज्य/दोष), सच्चं (सत्य), यानं, छत्तं (छत्र)। สกฏํ กนกํ ตครํ นครํ, ตรณํ จรณํ ธรณํ มรณํ; นยนํ วทนํ กรณํ ลวนํ, วสนํ ปวนํ ภวนํ คคนํ. सकटं (शकट/गाड़ी), कनकं, तगरं, नगरं, तरणं, चरणं, धरणं, मरणं; नयनं, वदनं, करणं, लवनं, वसनं, पवनं, भवनं, गगनं। อมตํ ปุฬินํ มาลํ, อาสนํ สวนํ มุขํ; ปทุมํ อุปฺปลํ วสฺสํ, โลจนํ สาธนํ สุขํ. अमतं (अमृत), पुळिनं (पुलिन/रेत), मालं, आसनं, सवनं, मुखं; पदुमं (पद्म), उप्पलं (उत्पल), वस्सं (वर्ष), लोचनं, साधनं, सुखं। ตาณํ [Pg.305] มูลํ ธนํ กูลํ, มงฺคลํ นฬินํ ผลํ; หิรญฺญํ อมฺพุชํ ธญฺญํ, ชาลํ ลิงฺคํ ปทํ ชลํ. ताणं (त्राण/शरण), मूलं, धनं, कूलं, मङ्गलं, नळिनं (नलिन), फलं; हिरञ्ञं (हिरण्य), अम्बुजं, धञ्ञं (धान्य), जालं, लिङ्गं, पदं, जलं। องฺคํ ปณฺณํ สุสานํ สํ, อาวุธํ หทยํ วนํ; โสปานํ จีวรํ ปาณํ, อลาตํ อินฺทฺริยํ กุลํ. अङ्गं, पण्णं (पर्ण/पत्ता), सुसानं (श्मशान), सं, आवुधं (आयुध), हदयं (हृदय), वनं; सोपानं, चीवरं, पाणं (प्राण), अलातं, इन्द्रियं, कुलं। โลหํ กณํ พลํ ปีฐํ, อณฺฑํ อารมฺมณํ ปุรํ; อรญฺญํ ตีรมสฺสตฺถ-มิจฺจาทีนิ สมุทฺธเร. लोहं, कणं, बलं, पीठं, अण्डं, आरम्मणं (आलम्बन), पुरं; अरञ्ञं (अरण्य), तीरं, अस्सत्थ (अश्वत्थ) इत्यादि शब्दों का उद्धरण करना चाहिए। อิมานิ จิตฺตสทฺเทน สพฺพถาปิ สทิสานิ, อิมานิ ปน วิสทิสานิ. เสยฺยถิทํ – ये 'चित्त' शब्द के साथ सभी प्रकार से समान हैं, परन्तु ये असमान हैं। जैसे कि - ‘‘จมฺมํ เวสฺม’’นฺติอาทีนิ, เอกธาเยว ภิชฺชเร; ‘‘กมฺมํ ถามํ คุณว’’นฺติ-อาทีนิ ตุ อเนกธา. 'चम्मं' (चर्म), 'वेस्मं' (वेश्म) इत्यादि एक ही प्रकार से विभक्त होते हैं; परन्तु 'कम्मं' (कर्म), 'थामं' (स्थाम/शक्ति), 'गुणवं' (गुणवान्) इत्यादि अनेक प्रकार से। กถํ? कैसे? จมฺเม, จมฺมสฺมึ, จมฺมมฺหิ, จมฺมนิ, เวสฺเม, เวสฺมสฺมึ, เวสฺมมฺหิ, เวสฺมนิ, ฆมฺเม, ฆมฺมสฺมึ, ฆมฺมมฺหิ, ฆมฺมนิ. เอวํ อญฺญานิปิ โยเชตพฺพานิ. चम्मे, चम्मस्मिं, चम्मम्हि, चम्मनि; वेस्मे, वेस्मस्मिं, वेस्मम्हि, वेस्मनि; घम्मे, घम्मस्मिं, घम्मम्हि, घम्मनि। इसी प्रकार अन्यों को भी जोड़ना चाहिए। กมฺมํ, กมฺมานิ, กมฺมา. กมฺมํ, กมฺมานิ, กมฺเม. กมฺเมน, กมฺมุนา, กมฺมนา, กมฺเมหิ, กมฺเมภิ. กมฺมสฺส, กมฺมุโน, กมฺมานํ. กมฺมสฺมา, กมฺมมฺหา, กมฺมุนา, กมฺเมหิ, กมฺเมภิ. กมฺมสฺส, กมฺมุโน, กมฺมานํ. กมฺเม, กมฺมสฺมึ, กมฺมมฺหิ, กมฺมนิ, กมฺเมสุ. โภ กมฺม, ภวนฺโต กมฺมานิ, ภวนฺโต กมฺมา. कम्मं, कम्मानि, कम्मा (प्रथमा)। कम्मं, कम्मानि, कम्म्मे (द्वितीया)। कम्म्मेन, कम्मुना, कम्मना, कम्म्मेहि, कम्म्मेभि (तृतीया)। कम्मस्स, कम्मुनो, कम्मानं (चतुर्थी)। कम्मस्मा, कम्मम्हा, कम्मुना, कम्म्मेहि, कम्म्मेभि (पञ्चमी)। कम्मस्स, कम्मुनो, कम्मानं (षष्ठी)। कम्म्मे, कम्मस्मिं, कम्मम्हि, कम्मनि, कम्म्मेसु (सप्तमी)। भो कम्म, भवन्तो कम्मानि, भवन्तो कम्मा (सम्बोधन)। ถามสทฺทสฺส ปน ตติเยกวจนฏฺฐานาทีสุ ‘‘ถาเมน, ถามุนา, ถามสฺส, ถามุโน’’ติ จ, ‘‘ถามา, ถามสฺมา, ถามมฺหา, ถามุนา’’ติ จ โยเชตพฺพํ. 'थाम' शब्द के तृतीया एकवचन आदि स्थानों में 'थामेन, थामुना, थामस्स, थामुनो' और 'थामा, थामस्मा, थामम्हा, थामुना' ऐसा जोड़ना चाहिए। วนฺตุ มนฺตุ อิมนฺตุปจฺจยวตํ ปน นิคฺคหีตนฺตสทฺทานํ ‘‘คุณวํ จิตฺตํ, รุจิมํ ปุปฺผํ, ปาปิมํ กุลํ’’ อิจฺจาทิปโยควเสน – वन्तु, मन्तु, इमन्तु प्रत्यय वाले निग्गहीत-अन्त शब्दों के 'गुणवं चित्तं, रुचिमं पुप्फं, पापिमिं कुलं' इत्यादि प्रयोगों के अनुसार - คุณวํ[Pg.306], คุณวนฺตานิ, คุณวนฺตา, คุณวนฺติ. คุณวนฺตํ, คุณวนฺตานิ, คุณวนฺเต คุณวนฺติ. คุณวตา, คุณวนฺเตน, คุณวนฺเตหิ, คุณวนฺเตภิ. คุณวโต, คุณวนฺตสฺส, คุณวตํ, คุณวนฺตานํ. คุณวตา, คุณวนฺตา, คุณวนฺตสฺมา, คุณวนฺตมฺหา, คุณวนฺเตหิ, คุณวนฺเตภิ. คุณวโต, คุณวนฺตสฺส, คุณวตํ, คุณวนฺตานํ. คุณวติ, คุณวนฺเต, คุณวนฺตสฺมึ, คุณวนฺตมฺหิ, คุณวนฺเตสุ. โภ คุณว, ภวนฺโต คุณวนฺตานิ, คุณวนฺติ. गुणवं, गुणवन्तानि, गुणवन्ता, गुणवन्ति। गुणवन्तं, गुणवन्तानि, गुणवन्ते, गुणवन्ति। गुणवता, गुणवन्तेन, गुणवन्तेहि, गुणवन्तेभि। गुणवतो, गुणवन्तस्स, गुणवतं, गुणवन्तानं। गुणवता, गुणवन्ता, गुणवन्तस्मा, गुणवन्तम्हा, गुणवन्तेहि, गुणवन्तेभि। गुणवतो, गुणवन्तस्स, गुणवतं, गुणवन्तानं। गुणवति, गुणवन्ते, गुणवन्तस्मिं, गुणवन्तम्हि, गुणवन्तेसु। भो गुणव, भवन्तो गुणवन्तानि, गुणवन्ति। เอวํ ‘‘รุจิมํ, รุจิมนฺตานิ, รุจิม’’นฺติอิจฺจาทินา, ‘‘ปาปิมํ, ปาปิมนฺตานิ, ปาปิม’’นฺติ อิจฺจาทินา จ โยเชตพฺพํ. อปิเจตฺถ ‘‘คุณวํ พลวํ ยสวํ สติมํ คติมํ’’อิจฺจาทินา ปโยคา วิตฺถาเรตพฺพา. इसी प्रकार 'रुचिमं, रुचिमन्तानि, रुचिमा' इत्यादि के द्वारा, और 'पापिमं, पापिमन्तानि, पापिमा' इत्यादि के द्वारा (रूपों को) जोड़ना चाहिए। इसके अतिरिक्त यहाँ 'गुणवं, बलवं, यसवं, सतिमं, गतिमं' इत्यादि के प्रयोगों का विस्तार करना चाहिए। กโรนฺตสทฺทสฺส ‘‘กโรนฺตํ จิตฺตํ, กโรนฺตํ กุล’’นฺติ ปโยควเสน – 'करोन्त' शब्द का 'करोन्तं चित्तं' (करता हुआ चित्त), 'करोन्तं कुलं' (करता हुआ कुल) के प्रयोग के अनुसार - กโรนฺตํ, กโรนฺตานิ, กโรนฺตา, กโรนฺติ. กโรนฺตํ, กโรนฺตานิ, กโรนฺเต, กโรนฺติ. กโรตา, กโรนฺเตน, กโรนฺเตหิ, กโรนฺเตภิ. กโรโต, กรโต, กโรนฺตสฺส, กโรนฺตานํ, กโรตํ. กโรตา, กโรนฺตา, กโรนฺตสฺมา, กโรนฺตมฺหา, กโรนฺเตหิ, กโรนฺเตภิ. กโรโต, กรโต, กโรนฺตสฺส, กโรนฺตานํ, กโรตํ. กโรติ, กโรนฺเต, กโรนฺตสฺมึ, กโรนฺตมฺหิ, กโรนฺเตสุ. โภ กโรนฺต, ภวนฺโต, กโรนฺตานิ, กโรนฺตา, กโรนฺตีติ โยเชตพฺพํ. करोन्तं, करोन्तानि, करोन्ता, करोन्ति। करोन्तं, करोन्तानि, करोन्ते, करोन्ति। करोता, करोन्तेन, करोन्तेहि, करोन्तेभि। करोतो, करातो, करोन्तस्स, करोन्तानं, करोतं। करोता, करोन्ता, करोन्तस्मा, करोन्तम्हा, करोन्तेहि, करोन्तेभि। करोतो, करातो, करोन्तस्स, करोन्तानं, करोतं। करोति, करोन्ते, करोन्तस्मिं, करोन्तम्हि, करोन्तेसु। भो करोन्त, भवन्तो करोन्तानि, करोन्ता, करोन्तीति - इस प्रकार जोड़ना चाहिए। คจฺฉนฺตสทฺทสฺส ตุ ‘‘คจฺฉนฺตํ จิตฺตํ, คจฺฉนฺตํ กุล’’นฺติ ปโยควเสน – किन्तु 'गच्छन्त' शब्द का 'गच्छन्तं चित्तं' (जाता हुआ चित्त), 'गच्छन्तं कुलं' (जाता हुआ कुल) के प्रयोग के अनुसार - คจฺฉนฺตํ, คจฺฉนฺตานิ, คจฺฉนฺตา. คจฺฉนฺตํ, คจฺฉนฺตานิ, คจฺฉนฺเต. คจฺฉตา, คจฺฉนฺเตน, คจฺฉนฺเตหิ, คจฺฉนฺเตภิ. คจฺฉโต, คจฺฉนฺตสฺส, คจฺฉนฺตานํ, คจฺฉตํ. คจฺฉตา, คจฺฉนฺตา, คจฺฉนฺตสฺมา, คจฺฉนฺตมฺหา, คจฺฉนฺเตหิ[Pg.307], คจฺฉนฺเตภิ. คจฺฉโต, คจฺฉนฺตสฺส, คจฺฉนฺตานํ, คจฺฉตํ. คจฺฉติ, คจฺฉนฺเต, คจฺฉนฺตสฺมึ, คจฺฉนฺตมฺหิ, คจฺฉนฺเตสุ. โภ คจฺฉํ, โภ คจฺฉนฺตา, ภวนฺโต คจฺฉนฺตานิ, คจฺฉนฺตาติ โยเชตพฺพํ. गच्छन्तं, गच्छन्तानि, गच्छन्ता। गच्छन्तं, गच्छन्तानि, गच्छन्ते। गच्छता, गच्छन्तेन, गच्छन्तेहि, गच्छन्तेभि। गच्छतो, गच्छन्तस्स, गच्छन्तानं, गच्छतं। गच्छता, गच्छन्ता, गच्छन्तस्मा, गच्छन्तम्हा, गच्छन्तेहि, गच्छन्तेभि। गच्छतो, गच्छन्तस्स, गच्छन्तानं, गच्छतं। गच्छति, गच्छन्ते, गच्छन्तस्मिं, गच्छन्तम्हि, गच्छन्तेसु। भो गच्छं, भो गच्छन्ता, भवन्तो गच्छन्तानि, गच्छन्ता - इस प्रकार जोड़ना चाहिए। เอวํ ‘‘จรนฺตํ ททนฺตํ ติฏฺฐนฺตํ จินฺตยนฺต’’นฺติอาทีสุปิ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. इसी प्रकार 'चरन्तं, ददन्तं, तिट्ठन्तं, चिन्तयन्तं' इत्यादि में भी नामिक पदमाला (शब्द-रूप) जोड़नी चाहिए। มหนฺตสทฺทสฺส ปน โกจิ เภโท, ตถา หิ ‘‘พาราณสิรชฺชํ นาม มหา’’ติ เอวํ ‘‘มหา’’อิติ นปุํสกปโยคทสฺสนโต ‘‘มหนฺตํ, มหา, มหนฺตานิ, มหนฺตา. มหนฺตํ, มหนฺตานิ, มหนฺเต. มหตา’’ติ กโม เวทิตพฺโพ. สพฺพาเนตานิ จิตฺตสทฺเทน วิสทิสานิ. 'महन्त' शब्द में तो कुछ भेद है, जैसे कि 'बाराणसिरज्जं नाम महा' (वाराणसी राज्य महान है) - इस प्रकार 'महा' ऐसा नपुंसक प्रयोग देखे जाने से 'महन्तं, महा, महन्तानि, महन्ता। महन्तं, महन्तानि, महन्ते। महता' - यह क्रम समझना चाहिए। ये सभी 'चित्त' शब्द के समान हैं। สวินิจฺฉโยยํ นิคฺคหีตนฺตนปุํสกลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह निग्गहीत-अन्त (अनुस्वारान्त) नपुंसक लिंगों के प्रकृति रूप की नामिक पदमाला का विनिश्चय सहित विभाग है। อวณฺณุการนฺตตาปกติกํ นิคฺคหีตนฺตํ अ-वर्ण (अकार) अन्त वाली प्रकृति वाला निग्गहीत-अन्त। นปุํสกลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. नपुंसक लिंग समाप्त। อิทานิ ตสฺสีลตฺถสฺส กตรสฺสสฺส อตฺถวิภาวิ อิจฺเจตสฺส สทฺทสฺส นามิกปทมาลํ วกฺขาม ปุพฺพาจริยมตํ ปุเรจรํ กตฺวา – अब तच्छील अर्थ वाले 'अत्थविभावि' इस शब्द की नामिक पदमाला पूर्वाचार्यों के मत को आगे रखकर कहेंगे - อฏฺฐิ, อฏฺฐี, อฏฺฐีนิ. อฏฺฐึ, อฏฺฐี, อฏฺฐีนิ. อฏฺฐินา, อฏฺฐีหิ, อฏฺฐีภิ. อฏฺฐิสฺส, อฏฺฐิโน, อฏฺฐีนํ. อฏฺฐินา, อฏฺฐีหิ, อฏฺฐีภิ. อฏฺฐิสฺส, อฏฺฐิโน, อฏฺฐีนํ. อฏฺฐิสฺมึ, อฏฺฐิมฺหิ, อฏฺฐีสุ. โภ อฏฺฐิ, ภวนฺโต อฏฺฐี, ภวนฺโต อฏฺฐีนิ. ยมกมหาเถรมตํ. अट्ठि, अट्ठी, अट्ठीनि। अट्ठिं, अट्ठी, अट्ठीनि। अट्ठिना, अट्ठीहि, अट्ठीभि। अट्ठिस्स, अट्ठिनो, अट्ठीनं। अट्ठिना, अट्ठीहि, अट्ठीभि। अट्ठिस्स, अट्ठिनो, अट्ठीनं। अट्ठिस्मिं, अट्ठिम्हि, अट्ठीसु। भो अट्ठि, भवन्तो अट्ठी, भवन्तो अट्ठीनि। यह यमक महाथेर का मत है। กิญฺจาเปตฺถ นิสฺสกฺกวจนฏฺฐาเน ‘‘อฏฺฐิสฺมา, อฏฺฐิมฺหา’’ติ ปทานิ อนาคตานิ, ตถาปิ ตตฺถ ตตฺถ ตํสทิสปฺปโยคทสฺสนา คเหตพฺพานิ. ยถา ปน อฏฺฐิสทฺทสฺส, เอวํ ‘‘สตฺถิ ทธิ วาริ อกฺขิ อจฺฉิ’’อิจฺจาทีนมฺปิ รูปานิ ภวนฺติ. यद्यपि यहाँ अपादान कारक (निसक्क वचन) के स्थान पर 'अट्ठिस्मा, अट्ठिम्हा' ये पद नहीं आए हैं, फिर भी वहाँ-वहाँ उनके समान प्रयोग देखे जाने से उन्हें ग्रहण करना चाहिए। जैसे 'अट्ठि' शब्द के रूप होते हैं, वैसे ही 'सत्थि, दधि, वारि, अक्खि, अच्छि' इत्यादि के भी रूप होते हैं। อตฺถวิภาวิ[Pg.308], อตฺถวิภาวี, อตฺถวิภาวีนิ. อตฺถวิภาวึ, อตฺถวิภาวี, อตฺถวิภาวีนิ. อตฺถวิภาวินา, อตฺถวิภาวีหิ, อตฺถวิภาวีภิ. อตฺถวิภาวิสฺส, อตฺถวิภาวิโน, อตฺถวิภาวีนํ. อตฺถวิภาวินา, อตฺถวิภาวิสฺมา อตฺถวิภาวิมฺหา, อตฺถวิภาวีหิ, อตฺถวิภาวีภิ. อตฺถวิภาวิสฺส, อตฺถวิภาวิโน, อตฺถวิภาวีนํ. อตฺถวิภาวิสฺมึ, อตฺถวิภาวิมฺหิ, อตฺถวิภาวีสุ. โภ อตฺถวิภาวิ, ภวนฺโต อตฺถวิภาวี, ภวนฺโต อตฺถวิภาวีนิ. अत्थविभावि, अत्थविभावी, अत्थविभावीनि। अत्थविभाविं, अत्थविभावी, अत्थविभावीनि। अत्थविभाविना, अत्थविभावीहि, अत्थविभावीभि। अत्थविभाविस्स, अत्थविभाविनो, अत्थविभावीनं। अत्थविभाविना, अत्थविभाविस्मा, अत्थविभाविम्हा, अत्थविभावीहि, अत्थविभावीभि। अत्थविभाविस्स, अत्थविभाविनो, अत्थविभावीनं। अत्थविभाविस्मिं, अत्थविभाविम्हि, अत्थविभावीसु। भो अत्थविभावि, भवन्तो अत्थविभावी, भवन्तो अत्थविभावीनि। เอวํ ‘‘ธมฺมวิภาวิ, จิตฺตานุปริวตฺติ, สุขการิ’’อิจฺจาทีนิปิ. ตตฺถ อฏฺฐิ สตฺถิอาทีนิ ปธานลิงฺคานิ อนญฺญาเปกฺขกตฺตา, อตฺถวิภาวิ ธมฺมวิภาวิอาทีนิ อปฺปธานลิงฺคานิ อญฺญาเปกฺขกตฺตา. इसी प्रकार 'धम्मविभावि, चित्तानुपरिवत्ति, सुखकारि' इत्यादि भी। वहाँ 'अट्ठि, सत्थि' आदि प्रधान लिंग हैं क्योंकि वे अन्य की अपेक्षा नहीं रखते, 'अत्थविभावि, धम्मविभावि' आदि अप्रधान लिंग हैं क्योंकि वे अन्य की अपेक्षा रखते हैं (विशेषण होने के कारण)। สวินิจฺฉโยยํ อิการนฺตนปุํสกลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह इ-कारान्त नपुंसक लिंगों के प्रकृति रूप की नामिक पदमाला का विनिश्चय सहित विभाग है। อิวณฺณนฺตตาปกติกํ อิการนฺตนปุํสกลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. इ-वर्ण (इकार) अन्त वाली प्रकृति वाला इकारान्त नपुंसक लिंग समाप्त। อิทานิ กตรสฺสสฺส โคตฺรภุ อิจฺเจตสฺส สทฺทสฺส นามิกปทมาลํ วกฺขาม ปุพฺพาจริยมตํ ปุเรจรํ กตฺวา – अब 'गोत्रभू' (यहाँ आयु शब्द का उदाहरण दिया गया है) इस शब्द की नामिक पदमाला पूर्वाचार्यों के मत को आगे रखकर कहेंगे - อายุ, อายู, อายูนิ. อายุํ, อายู, อายูนิ. อายุนา, อายูหิ, อายูภิ. อายุสฺส, อายุโน, อายูนํ. อายุนา, อายูหิ, อายูภิ. อายุสฺส, อายุโน, อายูนํ. อายุสฺมึ, อายุมฺหิ, อายูสุ. โภ อายุ, ภวนฺโต อายู, ภวนฺโต อายูนิ. ยมกมหาเถรมตํ. आयु, आयू, आयूनि। आयुं, आयू, आयूनि। आयुना, आयूहि, आयूभि। आयुस्स, आयुनो, आयूनं। आयुना, आयूहि, आयूभि। आयुस्स, आयुनो, आयूनं। आयुस्मिं, आयुम्हि, आयूसु। भो आयु, भवन्तो आयू, भवन्तो आयूनि। यह यमक महाथेर का मत है। กิญฺจาเปตฺถ นิสฺสกฺกวจนฏฺฐาเน ‘‘อายุสฺมา, อายุมฺหา’’ติ ปทานิ อนาคตานิ, ตถาปิ ตตฺถ ตตฺถ ตํสทิสปฺปโยคทสฺสนโต คเหตพฺพานิ. เอตฺถ จ อายุสทฺโท ปุํนปุํสกลิงฺโค ทฏฺฐพฺโพ. ตถา หิ ปาฬิยํ อฏฺฐกถาสุ จ ตสฺส ทฺวิลิงฺคตา [Pg.309] ทิสฺสติ. ‘‘ปุนรายุ จ เม ลทฺโธ, เอวํ ชานาหิ มาริส. อายุ จสฺสา ปริกฺขีโณ อโหสี’’ติอาทีสุ หิ อายุสทฺโท ปุลฺลิงฺโค, ตพฺพเสน ‘‘อายุ, อายู, อายโว’’ติอาทินา ภิกฺขุนเยน ยถาสมฺภวํ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. ‘‘อคฺคํ อายุ จ วณฺโณ จ. กิตฺตกํ ปนสฺส อายู’’ติอาทีสุ ปน นปุํสกลิงฺโค, ตพฺพเสน ‘‘อายุ, อายู, อายูนี’’ติ โยชิตา. यद्यपि यहाँ अपादान कारक के स्थान पर 'आयुस्मा', 'आयुम्हा' जैसे पद नहीं आए हैं, तथापि वहाँ-वहाँ उनके समान प्रयोगों को देखकर उन्हें ग्रहण करना चाहिए। और यहाँ 'आयु' शब्द को पुल्लिंग और नपुंसकलिङ्ग दोनों समझना चाहिए। क्योंकि पालि और अट्ठकथाओं में इसकी द्विलिङ्गता देखी जाती है। 'पुनरायु च मे लद्धो, एवं जानाहि मारिस। आयु चस्सा परिक्खीणो अहोसि' इत्यादि में 'आयु' शब्द पुल्लिंग है, उसके अनुसार 'आयु, आयू, आयवो' इत्यादि भिक्षु-नय (पुल्लिंग उ-कारान्त) के अनुसार यथासंभव नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। 'अग्गं आयु च वण्णो च। कित्तकं पनस्स आयू' इत्यादि में यह नपुंसकलिङ्ग है, उसके अनुसार 'आयु, आयू, आयूनी' इस प्रकार जोड़ा गया है। โคตฺรภุ, โคตฺรภู, โคตฺรภูนิ. โคตฺรภุํ, โคตฺรภู, โคตฺรภูนิ. โคตฺรภุนา, โคตฺรภูหิ, โคตฺรภูภิ. โคตฺรภุสฺส, โคตฺรภุโน, โคตฺรภูนํ. โคตฺรภุนา, โคตฺรภุสฺมา, โคตฺรภุมฺหา, โคตฺรภูหิ, โคตฺรภูภิ. โคตฺรภุสฺส, โคตฺรภุโน, โคตฺรภูนํ. โคตฺรภุสฺมึ, โคตฺรภุมฺหิ, โคตฺรภูสุ. โภ โคตฺรภุ, ภวนฺโต โคตฺรภู, ภวนฺโต โคตฺรภูนิ. โภ โคตฺรภู, โภ โคตฺรภูนิ, เอวํ พหุวจนํ วา. อยมมฺหากํ มตํ, เอวํ ‘‘จิตฺตสหภุ’’อิจฺจาทีนํ ภูธาตุมยานํ อุการนฺตสทฺทานํ อญฺเญสมฺปิ ตํสทิสานํ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. ปุคฺคลวาจโก ปน อูการนฺโต โคตฺรภูสทฺโท ปุลฺลิงฺคปริยาปนฺนตฺตา สพฺพญฺญูนเย ปวิฏฺโฐ. ตตฺรญฺเญ สทฺทา นาม ‘‘จกฺขุ วสุ ธนุ ทารุ ติปุ มธุ สิงฺคุ หิงฺคุ จิตฺตคุ’’อิจฺจาทโย. गोत्रभु, गोत्रभू, गोत्रभूनि। गोत्रभुं, गोत्रभू, गोत्रभूनि। गोत्रभुना, गोत्रभूहि, गोत्रभूभि। गोत्रभुस्स, गोत्रभुनो, गोत्रभूनं। गोत्रभुना, गोत्रभुस्मा, गोत्रभुम्हा, गोत्रभूहि, गोत्रभूभि। गोत्रभुस्स, गोत्रभुनो, गोत्रभूनं। गोत्रभुस्मिं, गोत्रभुम्हि, गोत्रभूसु। भो गोत्रभु, भवन्तो गोत्रभू, भवन्तो गोत्रभूनि। भो गोत्रभू, भो गोत्रभूनि, इस प्रकार बहुवचन भी होता है। यह हमारा मत है, इसी प्रकार 'चित्तसहभु' इत्यादि 'भू' धातु से बने अन्य उ-कारान्त शब्दों और उनके समान अन्य शब्दों की भी नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। पुद्गलवाचक ऊ-कारान्त 'गोत्रभू' शब्द पुल्लिंग के अंतर्गत होने के कारण 'सब्बञ्ञू-नय' में प्रविष्ट है। वहाँ अन्य शब्द 'चक्खु, वसु, धनु, दारु, तिपु, मधु, सिङ्गु, हिङ्गु, चित्तगु' इत्यादि हैं। สวินิจฺฉโยยํ อุการนฺตนปุํสกลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค. यह उ-कारान्त नपुंसकलिङ्गों के प्रकृति-रूप का नामिक पदमाला विभाग विनिश्चय के साथ समाप्त हुआ। อุวณฺโณการนฺตตาปกติกํ उ-वर्ण और ओ-कारान्त प्रकृति वाला। อุการนฺตนปุํสกลิงฺคํ นิฏฺฐิตํ. उ-कारान्त नपुंसकलिङ्ग समाप्त। เอวํ นิคฺคหีตนฺต อิการนฺต อุการนฺตวเสน ติวิธานิ นปุํสกลิงฺคานิ นิรวเสสโต คหิตาเนว โหนฺติ. เตสุ เกสญฺจิ [Pg.310] นิคฺคหีตนฺตานํ กฺวจิ ปจฺจตฺเตกวจนสฺส พหุวจนสฺส เอการาเทสวเสน เภโท ทิสฺสติ. เสยฺยถิทํ? ‘‘สุเข ทุกฺเข. เอกูนปญฺญาส อาชีวกสเต เอกูนปญฺญาส ปริพฺพาชกสเต’’อิจฺเจวมาทิ. นนุ โภ เอวํวิธานํ รูปานํ ปาฬิยํ ทสฺสนโต ‘‘เอการนฺตมฺปิ นปุํสกลิงฺคํ อตฺถี’’ติ วตฺตพฺพนฺติ? น วตฺตพฺพํ นิคฺคหีตนฺโตคธรูปวิเสสตฺตา เตสํ รูปานํ. อาเทสวเสน หิ สิทฺธตฺตา วิสุํ เอการนฺตํ นปุํสกลิงฺคํ นาม นตฺถิ. ตสฺมา นปุํสกลิงฺคานํ ยถาวุตฺตา ติวิธตาเยว คเหตพฺพาติ. इस प्रकार निग्गहीत-अन्त, इ-कारान्त और उ-कारान्त के भेद से तीन प्रकार के नपुंसकलिङ्ग पूर्णतः ग्रहण कर लिए गए हैं। उनमें से कुछ निग्गहीत-अन्त शब्दों में कहीं-कहीं प्रथमा एकवचन और बहुवचन में 'ए' आदेश के कारण भेद दिखाई देता है। जैसे कि? 'सुखे दुक्खे। एकूनपञ्ञास आजीवकसते एकूनपञ्ञास परिब्बाजकसते' इत्यादि। हे महानुभाव! क्या पालि में इस प्रकार के रूपों के देखे जाने से यह नहीं कहना चाहिए कि 'ए-कारान्त नपुंसकलिङ्ग भी होता है'? ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वे रूप निग्गहीत-अन्त के ही विशेष रूप हैं। आदेश के कारण सिद्ध होने से अलग से 'ए-कारान्त' नामक कोई नपुंसकलिङ्ग नहीं है। इसलिए नपुंसकलिङ्गों की पूर्वोक्त त्रिविधता ही ग्रहण करनी चाहिए। นปุํสกานมิจฺเจวํ, ลิงฺคานํ นยสาลินี; ปทมาลา วิภตฺตา เม, สาสนตฺถํ มเหสิโน. इस प्रकार नपुंसकलिङ्गों की यह नय-युक्त पदमाला महर्षि के शासन के अर्थ के लिए मेरे द्वारा विभक्त की गई है। ยสฺเสสา ปคุณา สทฺท-นีติเรสา สุภาวิตา; สาสเน กุลปุตฺตานํ, สรณํ โส ปรายณํ. जिसके द्वारा यह भली-भांति भावित 'सद्दनीति' कंठस्थ है, वह शासन में कुलपुत्रों के लिए शरण और परायण है। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार नौ अंगों और अट्ठकथाओं सहित त्रिपिटक के वचनों के मार्ग में विद्वानों की... โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कुशलता के लिए रचित 'सद्दनीति' प्रकरण में... นปุํสกลิงฺคานํ ปกติรูปสฺส นามิกปทมาลาวิภาโค नपुंसकलिङ्गों के प्रकृति-रूप का नामिक पदमाला विभाग... นวโม ปริจฺเฉโท. नौवां परिच्छेद। ๑๐. ลิงฺคตฺตยมิสฺสกนามิกปทมาลา १०. तीनों लिङ्गों की मिश्रित नामिक पदमाला। อธิกูนกโต เจก-กฺขรโต จ อิโต ปรํ; ตีณิ ลิงฺคานิ มิสฺเสตฺวา, ปทมาลมนากุลํ. इसके बाद, अधिक और कम अक्षरों वाले तथा एक अक्षर वाले शब्दों के तीनों लिङ्गों को मिलाकर, स्पष्ट पदमाला (कही जाएगी)। นานาสุขุมสงฺเกต-คเตสฺวตฺเถสุ วิญฺญุนํ; คมฺภีรพุทฺธิจารตฺถํ, ปวกฺขามิ ยถาพลํ. विद्वानों की गम्भीर बुद्धि के विचरण के लिए, विभिन्न सूक्ष्म संकेतों में स्थित अर्थों में, यथाशक्ति (पदमाला) कहूँगा। อิตฺถี ถี จ ปภา ภา จ, คิรา รา ปวนํ วนํ; อุทกญฺจ ทกํ กญฺจ, วิตกฺโก อิติ จาทโย. इत्थी और थी, पभा और भा, गिरा और रा, पवनं और वनं, उदकं और दकं और कं, वितक्को इत्यादि। ภู [Pg.311] ภูมิ เจว อรญฺญํ, อรญฺญานีติ จาทโย; ปญฺญา ปญฺญาณํ ญาณญฺจ, อิจฺจาที จ ติธา สิยุํ. भू और भूमि, अरञ्ञं और अरञ्ञानी इत्यादि; पञ्ञा, पञ्ञाणं और ञाणं इत्यादि तीन प्रकार के हो सकते हैं। โก วิ สา เจว ภา รา จ, ถี ธี กุ ภู ตเถว กํ; ขํ โค โม มา จ สํ ยํ ตํ, กิมิจฺจาที จ เอกิกาติ. को, वि, सा, भा, रा, थी, धी, कु, भू, कं, खं, गो, मो, मा, सं, यं, तं, किं इत्यादि एक-अक्षरी शब्द हैं। อยํ ลิงฺคตฺตยมิสฺสโก นามิกปทมาลาอุทฺเทโส. ตตฺร อิตฺถี, อิตฺถี, อิตฺถิโย. อิตฺถึ…เป… โภติโย อิตฺถิโย. यह तीनों लिङ्गों की मिश्रित नामिक पदमाला का निर्देश है। वहाँ 'इत्थी': इत्थी, इत्थी, इत्थियो। इत्थिं... इत्यादि... भोतियो इत्थियो। ถี ถี, ถิโย. ถึ, ถี, ถิโย. ถิยา, ถีหิ, ถีภิ. ถิยา, ถีนํ. ถิยา, ถีหิ, ถีภิ. ถิยา, ถีนํ. ถิยา, ถิยํ, ถีสุ. โภติ ถิ, โภติโย ถี, โภติโย ถิโย. เอตฺถ – थी: थी, थियो। थिं, थी, थियो। थिया, थीहि, थीभि। थिया, थीनं। थिया, थीहि, थीभि। थिया, थीनं। थिया, थियं, थीसु। भोति थि, भोतियो थी, भोतियो थियो। यहाँ - ‘‘กุกฺกุฏา มณโย ทณฺฑา, ถิโย จ ปุญฺญลกฺขณา; อุปฺปชฺชนฺติ อปาปสฺส, กตปุญฺญสฺส ชนฺตุโน; ถิยา คุยฺหํ น สํเสยฺย; ถีนํ ภาโว ทุราชาโน’’ติ "मुर्गे, मणियाँ, दण्ड और पुण्य-लक्षणों वाली स्त्रियाँ; निष्पाप और पुण्यवान मनुष्य को प्राप्त होते हैं। स्त्री के साथ रहस्य की बात नहीं कहनी चाहिए; स्त्रियों का स्वभाव जानना कठिन है।" อาทีนิ นิทสฺสนปทานิ. इत्यादि निदर्शन पद हैं। ปภา, ปภา, ปภาโย. ปภํ…เป… โภติโย ปภาโย. पभा: पभा, पभा, पभायो। पभं... इत्यादि... भोतियो पभायो। ภา, ภา, ภาโย. ภํ, ภา, ภาโย. ภาย, ภาหิ, ภาภิ. ภาย, ภานํ. ภาย, ภาหิ, ภาภิ. ภาย, ภานํ. ภาย, ภายํ, ภาสุ. โภติ เภ, โภติโย ภา, โภติโย ภาโย. เอตฺถ จ ‘‘ภากโร ภานุ’’อิจฺจาทีนิ นิทสฺสนปทานิ. भा: भा, भायो। भं, भा, भायो। भाया, भाहि, भाभि। भाया, भानं। भाया, भाहि, भाभि। भाया, भानं। भाया, भायं, भासु। भोति भे, भोतियो भा, भोतियो भायो। और यहाँ 'भाकरो भानु' इत्यादि निदर्शन पद हैं। คิรา[Pg.312], คิรา, คิราโย. คิรํ…เป… โภติโย คิราโย. ‘‘วาจา คิรา พฺยปฺปโถ. เย โวหํ กิตฺตยิสฺสามิ, คิราหิ อนุปุพฺพโส’’ติ อิมานิ คิราสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคภาเว นิทสฺสนปทานิ. गिरा: गिरा, गिरायो। गिरं... इत्यादि... भोतियो गिरायो। "वाचा गिरा ब्यप्पथो। ये वोहं कित्तयिस्सामि, गिराहि अनुपुब्बसो" - ये 'गिरा' शब्द के स्त्रीलिंग होने में निदर्शन पद हैं। สุวณฺณวาจโก ราสทฺโท ปุลฺลิงฺโค, อิธ ปน สทฺทวาจโก ราสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค. स्वर्णवाचक 'रा' शब्द पुल्लिंग है, किन्तु यहाँ शब्दवाचक 'रा' शब्द स्त्रीलिंग है। รา, รา, ราโย. รํ, รา, ราโย. ราย, ราหิ, ราภิ. ราย, รานํ. ราย, ราหิ, ราภิ. ราย, รานํ. ราย, รายํ, ราสุ. โภติ เร, โภติโย รา, โภติโย ราโย. रा: रा, रा, रायो। रं, रा, रायो। राया, राहि, राभि। राया, रानं। राया, राहि, राभि। राया, रानं। राया, रायं, रासु। भोति रे, भोतियो रा, भोतियो रायो। รา วุจฺจติ สทฺโท. อคฺคญฺญสุตฺตฏีกายญฺหิ ‘‘รา สทฺโท ติยติ ฉิชฺชติ เอตฺถาติ รตฺติ, สตฺตานํ สทฺทสฺส วูปสมกาโล’’ติ วุตฺตํ. ตสฺมา ราสทฺทสฺส สทฺทวาจกตฺเต ‘‘รตฺตี’’ติ ปทํ นิทสฺสนํ. 'रा' (rā) शब्द को कहा जाता है। अग्गञ्ञसुत्त टीका में कहा गया है कि "जहाँ 'रा' शब्द क्षीण होता है या कट जाता है, वह 'रत्ति' (रात्रि) है, जो प्राणियों के शब्द के शांत होने का समय है।" इसलिए, 'रा' शब्द के शब्द-वाचक होने में 'रत्ति' पद एक उदाहरण है। ปวนํ, ปวนานิ, ปวนา. ปวนํ, ปวนานิ, ปวเน. पवनं, पवनानि, पवना। पवनं, पवनानि, पवने। วนํ, วนานิ, วนา. วนํ, วนานิ, วเน. เสสํ สพฺพํ เนยฺยํ. वनं, वनानि, वना। वनं, वनानि, वने। शेष सब इसी प्रकार समझना चाहिए। ปวน วนสทฺทา กทาจิ สมานตฺถา กทาจิ ภินฺนตฺถา. เต หิ อรญฺญวาจกตฺเต สมานตฺถา ‘‘เต ธมฺเม ปริปูเรนฺโต, ปวนํ ปาวิสึ ตทา. สปุตฺโต ปาวิสึ วน’’นฺติอาทีสุ. ยถากฺกมํ ปน เต วายุตณฺหาวนวาจกตฺเต ภินฺนตฺถา ‘‘ปรมทุคฺคนฺธปวนวิจริเต. เฉตฺวา วนญฺจ วนถํ, นิพฺพนา โหถ ภิกฺขโว’’ติอาทีสุ. 'पवन' और 'वन' शब्द कभी समानार्थक होते हैं और कभी भिन्नार्थक। वे अरण्य (जंगल) के वाचक होने पर समानार्थक होते हैं, जैसे— "उन धर्मों को परिपूर्ण करते हुए, तब मैंने पवन (वन) में प्रवेश किया। पुत्र सहित वन में प्रवेश किया" आदि में। किन्तु, क्रमशः वायु, तृष्णा और वन के वाचक होने पर वे भिन्नार्थक होते हैं, जैसे— "अत्यधिक दुर्गन्धित पवन (वायु) में विचरित। वन और वनथ (तृष्णा) को काटकर, हे भिक्षुओं, निर्वन (तृष्णा रहित) हो जाओ" आदि में। อุทกํ, อุทกานิ, อุทกา. อุทกํ, อุทกานิ, อุทเก. उदकं, उदकानि, उदका। उदकं, उदकानि, उदके। ทกํ, ทกานิ, ทกา. ทกํ, ทกานิ, ทเก. เสสํ สพฺพํ เนยฺยํ. दकं, दकानि, दका। दकं, दकानि, दके। शेष सब इसी प्रकार समझना चाहिए। ‘‘อมฺพปกฺกํ [Pg.313] ทกํ สีตํ. ถลชา ทกชา ปุปฺผา’’ติอาทีเนตฺถ นิทสฺสนปทานิ. ‘‘นีโลทํ วนมชฺฌโต. มโหทธิ. อุทพินฺทุนิปาเตน, อุทกุมฺโภปิ ปูรตี’’ติ ปาฬิปฺปเทเสสุ ปน สมาสนฺตคตนามตฺตา อุทสทฺเทเนว อุทกตฺโถ วุตฺโต ‘‘ริตฺตสฺสาท’’นฺติ วตฺตพฺพฏฺฐาเน ‘‘ริตฺตสฺส’’นฺติ สทฺเทน ริตฺตสฺสาทตฺโถ วิย. ปาฬิยญฺหิ เกวโล อุทสทฺโท น ทิฏฺฐปุพฺโพ. อตฺถิ เจ, สุฏฺฐุ มนสิ กาตพฺโพ. "पका हुआ आम, शीतल जल (दकं)। स्थलज और जलज (दकज) पुष्प" आदि यहाँ उदाहरण पद हैं। "वन के मध्य से नीला जल (नीलोदं)। महासागर (महोदधि)। जल की बूंद गिरने से जल का घड़ा (उदकुम्भो) भी भर जाता है" इन पालि प्रदेशों में समास के अन्त में होने के कारण 'उद' शब्द से ही 'उदक' का अर्थ कहा गया है, जैसे 'रित्तस्साद' (रिक्त स्वाद) कहने के स्थान पर 'रित्तस्स' शब्द से 'रित्तस्साद' का अर्थ लिया जाता है। पालि में केवल 'उद' शब्द पहले कभी नहीं देखा गया है। यदि है, तो उसे अच्छी तरह मन में धारण करना चाहिए। กํ, กานิ, กา. กํ, กานิ, เก. เกน, เกหิ, เกภิ. กสฺส, กานํ. กา, กสฺมา, กมฺหา, เกหิ, เกภิ. กสฺส, กานํ. เก, กสฺมึ, กมฺหิ, เกสุ. โภ ก, ภวนฺโต กา, ภวนฺโต กานิ. โภสทฺเทน วา พหุวจนํ โยเชตพฺพํ ‘‘โภ กานิ, โภ กา’’ติ. कं, कानि, का। कं, कानि, के। केन, केहि, केभि। कस्स, कानं। का, कस्मा, कम्हा, केहि, केभि। कस्स, कानं। के, कस्मिं, कम्हि, केसु। भो क, भवन्तो का, भवन्तो कानि। 'भो' शब्द के साथ बहुवचन जोड़ना चाहिए— "भो कानि, भो का"। เอตฺถ กํ วุจฺจติ อุทกํ สีสํ สุขญฺจ. อตฺร ‘‘กนฺตาโร กนฺทโร เกวฏฺฏา เกสา กรุณา นาโก’’ติอาทีนิ ปโยคานิ เวทิตพฺพานิ. ตตฺร กนฺตาโรติ กํ วุจฺจติ อุทกํ, เตน ตริตพฺโพ อติกฺกมิตพฺโพติ กนฺตาโร, นิรุทกปฺปเทโส. โจรกนฺตารนฺติอาทีสุ ปน รูฬฺหิยา ทุคฺคมนฏฺฐาเนปิ กนฺตารสทฺโท ปวตฺตตีติ ทฏฺฐพฺพํ. กนฺทโรติ เอตฺถาปิ กํ วุจฺจติ อุทกํ, เตน ทาริโต ภินฺโนติ กนฺทโร. เกวฏฺฏาติอาทีสุ ปน เก อุทเก วตฺตนโต คหณตฺถํ ปวตฺตนโต เกวฏฺฏา. เก สีเส เสนฺติ อุปฺปชฺชนฺตีติ เกสา. กํ สุขํ รุนฺธตีติ กรุณา. นาโกติ สคฺโค. กนฺติ หิ สุขํ, น กํ อกํ, ทุกฺขํ, ตํ นตฺถิ เอตฺถาติ นาโกติ อตฺโถ คเหตพฺโพ[Pg.314]. ยเถตฺถ อิตฺถีสทฺทาทีนํ นามิกปทมาลา โยชิตา, เอวํ ‘‘วิตกฺโก วิจาโร อาภา ปทีโป’’ติอาทีนมฺปิ โยเชตพฺพา. यहाँ 'कं' जल, सिर और सुख को कहा जाता है। यहाँ "कान्तार, कन्दर, केवट, केश, करुणा, नाक (स्वर्ग)" आदि प्रयोग जानने चाहिए। वहाँ 'कान्तार' में 'कं' जल को कहते हैं, जिससे पार करना (अतिक्रमण करना) कठिन हो, वह कान्तार है, अर्थात् जलरहित प्रदेश। 'चोरकान्तार' आदि में रूढ़ि से दुर्गम स्थान के लिए भी 'कान्तार' शब्द प्रयुक्त होता है, ऐसा देखना चाहिए। 'कन्दर' में भी 'कं' जल को कहते हैं, उसके द्वारा जो विदीर्ण या भिन्न किया गया हो, वह कन्दर (गुफा) है। 'केवट' आदि में 'के' (जल में) रहने या पकड़ने के अर्थ में प्रवृत्त होने से 'केवट' हैं। जो 'के' (सिर पर) रहते हैं या उत्पन्न होते हैं, वे 'केश' हैं। जो 'कं' (सुख) को रोकता है, वह 'करुणा' है। 'नाक' स्वर्ग है। 'कं' ही सुख है, 'न कं' अर्थात् 'अकं' दुःख है, वह जहाँ नहीं है, वह 'नाक' है—ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिए। जैसे यहाँ 'इत्थी' शब्द आदि की नामिक पदमाला जोड़ी गई है, वैसे ही 'वितर्क, विचार, आभा, प्रदीप' आदि की भी जोड़नी चाहिए। ภู, ภู, ภุโย. ภุํ, ภู, ภุโย. ภุยา, ภูหิ, ภูภิ. ภุยา, ภูนํ. ภุยา, ภูหิ, ภูภิ. ภุยา, ภูนํ. ภุยา, ภุยํ, ภูสุ. โภติ ภุ, โภติโย ภู, โภติโย ภุโย. เอตฺถ จ ‘‘ภูรุโห ภูปาโล ภูภุโช ภูตล’’นฺติ นิทสฺสนปทานิ. भू, भू, भुयो। भुं, भू, भुयो। भुया, भूहि, भूभि। भुया, भूनं। भुया, भूहि, भूभि। भुया, भूनं। भुया, भुयं, भूसु। भोति भु, भोतियो भू, भोतियो भुयो। और यहाँ "भूरुह, भूपाल, भूभुज, भूतल" उदाहरण पद हैं। ภูมิ, ภูมี, ภูมิโย; เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ; อรญฺญํ, อรญฺญานิ, อรญฺญา; เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. भूमि, भूमी, भूमियो; शेष विस्तार करना चाहिए। अरण्यं, अरण्यानि, अरण्या; शेष विस्तार करना चाहिए। อรญฺญานี วุจฺจติ มหาอรญฺญํ, ‘‘คหปตานี’’ติ ปทมิว อินีปจฺจยวเสน สาเธตพฺพํ ปทํ อิตฺถิลิงฺคญฺจ. ‘‘อรญฺญานี’’ติ หิ อฏฺฐกถาปาโฐปิ ทิสฺสติ. 'अरञ्ञानी' (अरण्यानी) महा-अरण्य को कहा जाता है, 'गहपतानी' पद की तरह 'इनी' प्रत्यय के वश से सिद्ध होने वाला पद है और स्त्रीलिंग है। "अरञ्ञानी" ऐसा अट्ठकथा पाठ भी देखा जाता है। อรญฺญานี, อรญฺญานี, อรญฺญานิโย. อรญฺญานึ, อรญฺญานี, อรญฺญานิโย. อรญฺญานิยา, อรญฺญานีหิ, อรญฺญานีภิ. อรญฺญานิยา, อรญฺญานีนํ. อรญฺญานิยา, อรญฺญานีหิ, อรญฺญานีภิ. อรญฺญานิยา, อรญฺญานีนํ. อรญฺญานิยา, อรญฺญานิยํ, อรญฺญานีสุ. โภติ อรญฺญานิ, โภติโย อรญฺญานี, โภติโย อรญฺญานิโย. अरञ्ञानी, अरञ्ञानी, अरञ्ञानियो। अरञ्ञानिं, अरञ्ञानी, अरञ्ञानियो। अरञ्ञानिया, अरञ्ञानीहि, अरञ्ञानीभि। अरञ्ञानिया, अरञ्ञानीनं। अरञ्ञानिया, अरञ्ञानीहि, अरञ्ञानीभि। अरञ्ञानिया, अरञ्ञानीनं। अरञ्ञानिया, अरञ्ञानियं, अरञ्ञानीसु। भोति अरञ्ञानि, भोतियो अरञ्ञानी, भोतियो अरञ्ञानियो। ยเถตฺถ อุตฺตราธิกวเสน โยชิตา, เอวํ ‘‘สภา, สภาย’’นฺติอาทีสุปิ โยเชตพฺพา. สภายนฺติ สภา เอว[Pg.315], ลิงฺคพฺยตฺตยวเสน ปน เอวํ วุตฺตํ. ‘‘สภาเย วา ทฺวารมูเล วา วตฺถพฺพ’’นฺติ ปาฬิ เอตฺถ นิทสฺสนํ. जैसे यहाँ उत्तराधिकार (क्रम) के वश से योजना की गई है, वैसे ही "सभा, सभायं" आदि में भी योजना करनी चाहिए। 'सभायं' का अर्थ 'सभा' ही है, लिंग-व्यत्यय के कारण ऐसा कहा गया है। "सभा में या द्वार के मूल में रहना चाहिए" यह पालि यहाँ उदाहरण है। ปญฺญา, ปญฺญา, ปญฺญาโย. ปญฺญํ, ปญฺญา, ปญฺญาโย. ปญฺญาย. पञ्ञा, पञ्ञा, पञ्ञायो। पञ्ञं, पञ्ञा, पञ्ञायो। पञ्ञाय। ปญฺญาณํ, ปญฺญาณานิ, ปญฺญาณา. ปญฺญาณํ, ปญฺญาณานิ, ปญฺญาเณ. ปญฺญาเณน. पञ्ञाणं, पञ्ञाणानि, पञ्ञाणा। पञ्ञाणं, पञ्ञाणानि, पञ्ञाणे। पञ्ञाणेन। ‘‘ตถา หิ ภนฺเต ภควโต สีลปญฺญาณํ. สาธุ ปญฺญาณวา นโร’’ติอาทีเนตฺถ นิทสฺสนปทานิ. "तथा ही भन्ते! भगवान का शील-प्रज्ञान। प्रज्ञावान मनुष्य साधु है" आदि यहाँ उदाहरण पद हैं। ญาณํ, ญาณานิ, ญาณา. ญาณํ, ญาณานิ, ญาเณ. ญาเณน. เสสํ สพฺพํ เนยฺยํ. ‘‘อคฺคิ อคฺคินิ คินิ’’อิจฺจาทีสุปิ อุตฺตราธิกวเสน นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. ञाणं, ञाणानि, ञाणा। ञाणं, ञाणानि, ञाणे। ञाणेन। शेष सब इसी प्रकार समझना चाहिए। "अग्गि, अग्गिनि, गिनि" इत्यादि में भी उत्तराधिकार (क्रम) के वश से नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। โก วี สาทีสุปิ เอกกฺขเรสุ โก วุจฺจติ พฺรหฺมา วาโต จ สรีรญฺจ, ตสฺส ตพฺพาจกตฺเต อิเม ปโยคา. เสยฺยถิทํ? 'को', 'वी' आदि एकाक्षरों में भी 'को' ब्रह्मा, वायु और शरीर को कहा जाता है, उसके वाचक होने में ये प्रयोग हैं। जैसे कि? ‘‘ชิเนน เยน อานีตํ, โลกสฺส อมิตํ หิตํ; ตสฺส ปาทมฺพุชํ วนฺเท, กโมฬิอลิเสวิตํ. "जिस जिन (बुद्ध) के द्वारा लोक का असीमित हित लाया गया है; उनके चरण-कमल की वंदना करता हूँ, जो ब्रह्मा के मुकुट रूपी भौरों द्वारा सेवित है।" กกุธรุกฺโข. กรชกาโย’’ อิจฺเจวมาทโย. ตตฺถ กโมฬิอลิเสวิตนฺติ วนฺทนฺตานํ อเนกสตานํ พฺรหฺมานํ โมฬิภมรเสวิตนฺติ กวโย อิจฺฉนฺติ. กกุธรุกฺโขติ เอตฺถ ปน โก วุจฺจติ วาโต, ตสฺส โย กุชฺฌติ, วาตโรคาปนยนวเสน ตํ นิวาเรติ, ตสฺมา โส รุกฺโข กกุโธติ วุจฺจตีภิ อาจริยา. กรชกาโยติ เอตฺถ ตุ โก วุจฺจติ สรีรํ, ตตฺถ ปวตฺโต รโช กรโช. กึ ตํ[Pg.316]? สุกฺกโสณิตํ. ตญฺหิ ‘‘ราโค รโช, น จ ปน เรณุ วุจฺจตี’’ติ เอวํ วุตฺตราครชผลตฺตา สรีรวาจเกน กสทฺเทน วิเสเสตฺวา ผลโวหาเรน ‘‘กรโช’’ติ วุจฺจติ. เตน สุกฺกโสณิตสงฺขาเตน กรเชน สมฺภูโต กาโย กรชกาโยติ อาจริยา. ตถา หิ ‘‘กาโย มาตาเปตฺติกสมฺภโว’’ติ วุตฺโต, มหาอสฺสปูรสุตฺตฏีกายํ ปน ‘‘กริยติ คพฺภาสเย ขิปิยตีติ กโร, สมฺภโว. กรโต ชาโตติ กรโช, มาตาเปตฺติกสมฺภโวติ อตฺโถ. มาตุอาทีนํ สณฺฐาปนวเสน กรโต ชาโตติ อปเร, อุภยถาปิ กรชกายนฺติ จตุสนฺตติรูปมาหา’’ติ วุตฺตํ. อยํ ปนตฺโถ อิธ นาธิปฺเปโต, ปุริโมเยวตฺโถ อธิปฺเปโต กสทฺทาธิการตฺตา. 'ककुधरुक्खो' (ककुध वृक्ष), 'करजकायो' (करज काय) इत्यादि। वहाँ 'कमोळिअलिसेवितं' का अर्थ है—वन्दना करने वाले अनेक सौ ब्रह्माओं के मुकुट-भ्रमरों द्वारा सेवित, ऐसा कवि चाहते हैं। 'ककुधरुक्खो' यहाँ 'क' का अर्थ वायु (वात) कहा जाता है, जो उसे कुपित करता है, वायु रोगों को दूर करने के कारण उसे रोकता है, इसलिए आचार्यों द्वारा उस वृक्ष को 'ककुध' कहा जाता है। 'करजकायो' यहाँ 'क' का अर्थ शरीर कहा जाता है, उसमें जो रज (मल) प्रवृत्त है वह 'करज' है। वह क्या है? शुक्र और शोणित (रक्त)। क्योंकि "राग रज है, धूल नहीं कही जाती" इस प्रकार कहे गए राग-रूपी रज का फल होने के कारण, शरीर-वाचक 'क' शब्द से विशेषित कर फल के व्यवहार से इसे 'करज' कहा जाता है। उस शुक्र-शोणित संज्ञक करज से उत्पन्न काया 'करजकाया' है, ऐसा आचार्यों का मत है। जैसा कि कहा गया है—"काया माता-पिता के संयोग से उत्पन्न है", महाअस्सपुर सुत्त की टीका में कहा गया है—"गर्भाशय में किया जाता है या डाला जाता है, इसलिए 'कर' अर्थात् उत्पत्ति है। कर से उत्पन्न होने के कारण 'करज' है, जिसका अर्थ माता-पिता से उत्पन्न होना है। दूसरों के अनुसार माता आदि के संस्थान (आकार) के कारण 'कर' से उत्पन्न 'करज' है, दोनों ही प्रकार से 'करजकाय' चार संतति वाले रूप को कहता है।" परन्तु यहाँ यह अर्थ अभिप्रेत नहीं है, 'क' शब्द के अधिकार के कारण पूर्ववर्ती अर्थ ही अभिप्रेत है। โก, กา. กํ, เก. เกน, เกหิ, เกภิ. กสฺส, กานํ. กา, กสฺมา, กมฺหา, เกหิ, เกภิ. กสฺส, กานํ. เก, กสฺมึ, กมฺหิ, เกสุ. โภ ก, ภวนฺโต กา. को, का। कं, के। केन, केहि, केभि। कस्स, कानं। का, कस्मा, कम्हा, केहि, केभि। कस्स, कानं। के, कस्मिं, कम्हि, केसु। भो क, भवन्तो का। ตตฺร วิ วุจฺจติ ปกฺขี. ตถา หิ ปกฺขีนํ อิสฺสโร สุปณฺณราชา วินฺโทติ กถิยติ. เอตมตฺถญฺหิ สนฺธาย ปุพฺพาจริเยนปิ อยํ คาถา ภาสิตา – वहाँ 'वि' पक्षी को कहा जाता है। उसी प्रकार पक्षियों का स्वामी सुपर्णराज 'विन्द' कहा जाता है। इसी अर्थ को ध्यान में रखते हुए पूर्वाचार्य द्वारा भी यह गाथा कही गई है— ‘‘สทฺธานเต มุทฺธนิ สณฺฐเปมิ, มุนินฺท นินฺทาปคตํ ตวคฺคํ; เทวินฺทนาคินฺทนรินฺทวินฺท-น ตํ วิภินฺนํ จรณารวินฺท’’นฺติ. "हे मुनीन्द्र! मैं श्रद्धापूर्वक आपके उस श्रेष्ठ मस्तक पर (अपने मस्तक को) रखता हूँ जो निन्दा से रहित है; देवेन्द्रों, नागेन्द्रों और नरेन्द्रों के समूहों द्वारा वन्दित आपके उन चरण-कमलों को कोई अलग नहीं कर सकता।" ตตฺถ วีนํ อินฺโทติ วินฺโท, ปกฺขิชาติยา ชาตานํ สุปณฺณานํ ราชาติ อตฺโถ. वहाँ 'वियों' (पक्षियों) का इन्द्र 'विन्द' है, जिसका अर्थ पक्षी जाति में उत्पन्न सुपर्णों का राजा है। วึ, วี, วโย. วึ, วี, วโย. วินา, วีหิ, วีภิ. วิสฺส, วิโน, วีนํ. วินา, วิสฺมา, วิมฺหา, วีหิ, วีภิ. วิสฺส, วิโน, วีนํ. วิสฺมึ, วิมฺหิ, วีสุ. โภ วิ, ภวนฺโต วโย. विं, वी, वयो। विं, वी, वयो। विना, वीहि, वीभि। विस्स, विनो, वीनं। विना, विस्मा, विम्हा, वीहि, वीभि। विस्स, विनो, वीनं। विस्मिं, विम्हि, वीसु। भो वि, भवन्तो वयो। สา [Pg.317] วุจฺจติ สุนโข, ‘‘มาตา เม อตฺถิ, สา มยา โปเสตพฺพา’’ติอาทีสุ ปน สาสทฺโท สพฺพนามิกปริยาปนฺโน ปรมฺมุขวจโน ตสทฺเทน สมฺภูโต ทฏฺฐพฺโพ. สาสทฺทสฺส ภา รา ถี ภู กสทฺทานญฺจ นามิกปทมาลา เหฏฺฐา ปกาสิตา. 'सा' कुत्ते को कहा जाता है, परन्तु "मेरी माता है, वह मेरे द्वारा पोष्य है" इत्यादि में 'सा' शब्द सर्वनाम के अन्तर्गत परोक्ष वाचक 'त' शब्द से उत्पन्न समझना चाहिए। 'सा' शब्द तथा भा, रा, थी, भू और 'क' शब्दों की नामिक पदमाला नीचे प्रकाशित की गई है। ธี วุจฺจติ ปญฺญา. เอตฺถ จ ‘‘อมจฺเจ ตาต ชานาหิ, ธีเร อตฺถสฺส โกวิเท’’ติ. ‘‘ธีมา, ธีมติ, สุธี, สุธินี, ธียุตฺต’’นฺติ จ อาทีนิ นิทสฺสนปทานิ. 'धी' प्रज्ञा (बुद्धि) को कहा जाता है। और यहाँ "हे तात! अमात्यों को जानो, जो धीर (बुद्धिमान) और अर्थ के विद्वान हों।" "धीमा, धीमति, सुधी, सुधिनी, धीयुत्त" इत्यादि उदाहरण के पद हैं। ธี, ธี, ธิโย. ธึ, ธี, ธิโย. ธิยา, ธีหิ, ธีภิ. ธิยา, ธีนํ. ธิยา, ธีหิ, ธีภิ. ธิยา, ธีนํ. ธิยา, ธิยํ, ธีสุ. โภติ ธิ, โภติโย ธี, โภติโย ธิโย. धी, धी, धियो। धिं, धी, धियो। धिया, धीहि, धीभि। धिया, धीनं। धिया, धीहि, धीभि। धिया, धीनं। धिया, धियं, धीसु। भोति धि, भोतियो धी, भोतियो धियो। กุ วุจฺจติ ปถวี. เอตฺถ จ ‘‘กุทาโล. กุมุทํ. กุญฺชโร’’ติ อิมานิ นิทสฺสนปทานิ. ตตฺร กุํ ปถวึ ทาลยติ ปทาเลติ ภินฺทติ เอเตนาติ กุทาโล. กุยํ ปถวิยํ โมทตีติ กุมุทํ. กุํ ชรตีติ กุญฺชโร. ตถา หิ วิมานวตฺถุอฏฺฐกถายํ วุตฺตํ ‘‘กุํ ปถวึ ตทภิฆาเตน ชรยตีติ กุญฺชโร’’ติ. 'कु' पृथ्वी को कहा जाता है। और यहाँ "कुदालो (कुदाल), कुमुदं (कुमुद), कुञ्जरो (कुंजर)" ये उदाहरण के पद हैं। वहाँ 'कु' अर्थात् पृथ्वी को जिससे दलते हैं, विदीर्ण करते हैं या भेदते हैं, वह 'कुदाल' है। 'कु' अर्थात् पृथ्वी (या जल) में जो मोद (प्रसन्न) होता है, वह 'कुमुद' है। 'कु' को जो जर्जर (घिसता) करता है, वह 'कुंजर' है। जैसा कि विमानवत्थु की अट्ठकथा में कहा गया है—"कु अर्थात् पृथ्वी को उसके प्रहार से जो जर्जर करता है, वह कुंजर है।" กุ, กู, กุโย. กุํ, กู, กุโย. กุยา, กูหิ, กูภิ. กุยา, กูนํ. กุยา, กูหิ, กูภิ. กุยา, กูนํ. กุยา, กุยํ, กูสุ. โภติ กุ, โภติโย กู, โภติโย กุโย. कु, कू, कुयो। कुं, कू, कुयो। कुया, कूहि, कूभि। कुया, कूनं। कुया, कूहि, कूभि। कुया, कूनं। कुया, कुयं, कूसु। भोति कु, भोतियो कू, भोतियो कुयो। ข’มินฺทฺริยํ ปกถิตํ, ข’มากาสมุทีริตํ; สคฺคฏฺฐานมฺปิ ขํ วุตฺตํ, สุญฺญตฺตมฺปิ จ ขํ มตํ. 'ख' इन्द्रिय कहा गया है, 'ख' आकाश कहा गया है; स्वर्ग के स्थान को भी 'ख' कहा गया है, और शून्यता को भी 'ख' माना गया है। ตตฺรินฺทฺริยํ [Pg.318] จกฺขุวิญฺญาณาทีนํ คตินิวาสภาวโต ‘‘ข’’นฺติ วุจฺจติ, อากาสํ วิวิตฺตฏฺเฐน. สคฺโค กตสุจริเตหิ เอกนฺเตน คนฺตพฺพตาย ‘‘ข’’นฺติ สงฺขํ คจฺฉติ. ‘‘ขโค ยถา หิ รุกฺขคฺเค, นิลียนฺโตว สาขิโน. สาขํ ฆฏฺเฏตี’’ติ จ, ‘‘เข นิมฺมิโต อจริ อฏฺฐสตํ สยมฺภู’’ติ จ อาทิ เอตฺถ นิทสฺสนํ. वहाँ इन्द्रिय को चक्षु-विज्ञान आदि की गति और निवास होने के कारण 'ख' कहा जाता है, आकाश को विविक्त (रिक्त) होने के कारण। स्वर्ग को सुचरित कर्मों द्वारा निश्चित रूप से जाने योग्य होने के कारण 'ख' की संज्ञा दी जाती है। "जैसे वृक्ष के अग्र भाग पर पक्षी (खग), शाखाओं पर ही बैठते हुए शाखा को स्पर्श करता है" और "स्वयंभू ने आकाश (खे) में निर्मित होकर एक सौ आठ बार विचरण किया" इत्यादि यहाँ उदाहरण हैं। ขํ, ขานิ, ขา. ขํ, ขานิ, เข. เขน, เขหิ, เขภิ. ขสฺส, ขานํ. ขา, ขสฺมา, ขมฺหา, เขหิ, เขภิ. ขสฺส, ขานํ. เข, ขสฺมึ, ขมฺหิ, เขสุ. โภ ข, ภวนฺโต ขานิ, ภวนฺโต ขา. खं, खानि, खा। खं, खानि, खे। खेन, खेहि, खेभि। खस्स, खानं। खा, खस्मा, खम्हा, खेहि, खेभि। खस्स, खानं। खे, खस्मिं, खम्हि, khesu। भो ख, भवन्तो खानि, भवन्तो खा। โคสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร วุจฺจเต – 'गो' शब्द के अर्थों का उद्धरण कहा जाता है— โค โคเณ จินฺทฺริเย ภูมฺยํ, วจเน เจว พุทฺธิยํ; อาทิจฺเจ รสฺมิยญฺเจว, ปานีเยปิ จ วตฺตเต; เตสุ อตฺเถสุ โคเณ ถิ-ปุมา จ อิตเร ปุมา. 'गो' शब्द बैल (वृषभ), इन्द्रिय, भूमि, वचन (वाणी), बुद्धि, सूर्य, किरण और जल के अर्थ में प्रयुक्त होता है; इन अर्थों में 'बैल' के अर्थ में यह स्त्रीलिंग और पुल्लिंग है, अन्य अर्थों में पुल्लिंग है। ตถา หิ ‘‘โคสุ ทุยฺหมานาสุ คโต. โคปญฺจโม’’ติอาทีสุ โคสทฺโท โคเณ วตฺตติ. โคจโรติ เอตฺถินฺทฺริเยปิ วตฺตติ คาโว จกฺขาทีนินฺทฺริยานิ จรนฺติ เอตฺถาติ โคจโร. ตถา หิ โปราณา กถยึสุ ‘‘คาโว จรนฺติ เอตฺถาติ โคจโร, โคจโร วิย โคจโร, อภิณฺหํ จริตพฺพฏฺฐานํ. คาโววาจกฺขาทีนินฺทฺริยานิ, เตหิ จริตพฺพฏฺฐานํ โคจโร’’ติ. ‘‘โคมตึ โคตมํ นเม’’ติ โปราณกวิรจนายํ ปน ปถวิยํ วตฺตติ. ‘‘ภูริปญฺญํ โคตมํ สมฺมาสมฺพุทฺธํวนฺทามี’’ติ หิ อตฺโถ. ตถา สุตฺตนิปาตฏฺฐกถายวาเสฏฺฐสุตฺตสํวณฺณนปฺปเทเส ‘‘โครกฺขนฺติ เขตฺตรกฺขํ, กสิรกฺขนฺติ วุตฺตํ โหติ. ปถวี หิ ‘‘โค’’ติ วุจฺจติ, ตปฺปเภโท จ เขตฺต’’นฺติ วุตฺตํ. जैसा कि "गायों के दुहे जाते समय गया, पाँचवाँ बैल" इत्यादि में 'गो' शब्द बैल के अर्थ में प्रयुक्त होता है। 'गोचर' यहाँ इन्द्रिय के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है—इन्द्रियाँ (गाँव) जैसे चक्षु आदि इसमें विचरण करती हैं, इसलिए यह 'गोचर' है। जैसा कि पुरातन आचार्यों ने कहा—"गाएँ इसमें चरती हैं इसलिए गोचर है, गोचर के समान गोचर, बार-बार विचरण करने का स्थान। गाएँ ही चक्षु आदि इन्द्रियाँ हैं, उनके द्वारा विचरण करने का स्थान गोचर है।" प्राचीन काव्य रचना में "गोमती (पृथ्वी/बुद्धि वाली) गौतम को नमस्कार करें" यहाँ पृथ्वी के अर्थ में प्रयुक्त है। क्योंकि अर्थ है—"विशाल प्रज्ञा वाले गौतम सम्यक्सम्बुद्ध को मैं वन्दना करता हूँ।" उसी प्रकार सुत्तनिपात की अट्ठकथा के वासेट्ठ सुत्त के वर्णन में "गोरक्ख का अर्थ खेत की रक्षा, कृषि की रक्षा कहा गया है। क्योंकि पृथ्वी को 'गो' कहा जाता है, और उसका एक भेद खेत है" ऐसा कहा गया है। ‘‘โคตฺตวเสน [Pg.319] โคตโม’’ติ เอตฺถ ตุ วจเน พุทฺธิยญฺจ วตฺตติ. เตนาหุ โปราณา ‘‘คํ ตายตีติ โคตฺตํ. โคตโมติ หิ ปวตฺตมานํ คํ วจนํ พุทฺธิญฺจ ตายติ เอกํสิกวิสยตาย รกฺขตีติ โคตฺตํ. ยถา หิ พุทฺธิ อารมฺมณภูเตน อตฺเถน วินา น วตฺตติ, เอวํ อภิธานํ อภิเธยฺยภูเตน, ตสฺมา โส โคตฺตสงฺขาโต อตฺโถ ตานิ ตายติ รกฺขตีติ วุจฺจติ. โก ปน โสติ? อญฺญกุลปรมฺปราสาธารณํ ตสฺส กุลสฺส อาทิปุริสสมุทาคตํ ตํกุลปริยาปนฺนสาธารณํ สามญฺญรูปนฺติ ทฏฺฐพฺพ’’นฺติ. ตถา หิ ตํโคตฺตชาตา สุทฺโธทนมหาราชาทโยปิ โคตโมตฺเวว วุจฺจนฺติ. เภน ภควา อตฺตโน ปิตรํ สุทฺโธทนมหาราชานํ ‘‘อติกฺกนฺตวรา โข โคตม ตถาคตา’’ติ อโวจ. เวสฺสวโณปิ มหาราชา ภควนฺตํ ‘‘วิชฺชาจรณสมฺปนฺนํ, พุทฺธํ วนฺทาม โคตม’’นฺติ อโวจ, อายสฺมาปิ วงฺคีโส อายสฺมนฺตํ อานนฺทํ ‘‘สาธุ นิพฺพาปนํ พฺรูหิ, อนุกมฺปาย โคตมา’’ติ อโวจ. เอวํ อิทํ สามญฺญรูปํ คํ ตายตีติ โคตฺตนฺติ วุตฺตํ. ตํ ปน โคตมโคตฺตกสฺสปโคตฺตาทิวเสน พหุวิธํ. गोत्र के वश से 'गोतम' (गौतम) है, यहाँ यह शब्द 'वचन' और 'बुद्धि' के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसीलिए प्राचीन आचार्यों ने कहा है— 'गां त्रायते इति गोत्रम्' (जो वाणी की रक्षा करता है, वह गोत्र है)। 'गोतम' के रूप में प्रवृत्त होने वाली 'गा' (वाणी) और 'बुद्धि' की जो एकांतिक विषयता के कारण रक्षा करता है, वह गोत्र है। जैसे बुद्धि आलम्बनभूत अर्थ के बिना प्रवृत्त नहीं होती, वैसे ही अभिधान (नाम) अभिधेय (अर्थ) के बिना नहीं होता; इसलिए वह गोत्र संज्ञक अर्थ उनकी रक्षा करता है, ऐसा कहा जाता है। वह क्या है? उसे अन्य कुल-परम्पराओं से साधारण (भिन्न), उस कुल के आदि-पुरुष से उत्पन्न और उस कुल के अंतर्गत सभी के लिए सामान्य रूप समझना चाहिए। इसीलिए उस गोत्र में उत्पन्न महाराज शुद्धोदन आदि को भी 'गोतम' ही कहा जाता है। इसीलिए भगवान ने अपने पिता महाराज शुद्धोदन से कहा— 'हे गोतम! तथागत श्रेष्ठता को प्राप्त कर चुके हैं।' महाराज वैश्रवण ने भी भगवान से कहा— 'विद्या और चरण से संपन्न बुद्ध गोतम की हम वंदना करते हैं।' आयुष्मान वंगीस ने भी आयुष्मान आनंद से कहा— 'हे गोतम! अनुकम्पा करके उत्तम निर्वाण का उपदेश दें।' इस प्रकार, यह सामान्य रूप 'गा' (वाणी) की रक्षा करता है, इसलिए इसे 'गोत्र' कहा गया है। वह गोतम-गोत्र, कस्सप-गोत्र आदि के भेद से अनेक प्रकार का है। ตถา โคสทฺโท อาทิจฺเจ วตฺตติ. ‘‘โคโคตฺตํ โคตมํ นเม’’ติ โปราณกวิรจนา เอตฺถ นิทสฺสนํ, อาทิจฺจพนฺธุํ โคตมํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ วนฺทามีติ อตฺโถ. อาทิจฺโจปิ หิ โคตมโคตฺเต ชาโต ภควาปิ, เอวํ เตน สมานโคตฺตตาย ตตฺถ ตตฺถ ‘‘อาทิจฺจพนฺธู’’ติอาทินา ภควโต โถมนา ทิสฺสติ ‘‘ปุจฺฉามิ ตํ อาทิจฺจพนฺธุ, วิเวกํ สนฺติปทญฺจ มเหสี’’ติ จ, ‘‘วนฺเท เชตวนํ นิจฺจํ, วิหารํ รวิพนฺธุโน’’ติ จ, ‘‘โลเกกพนฺธุ’มรวินฺทสหายพนฺธุ’’นฺติ จ. ‘‘อุณฺหคู’’ติ เอตฺถ ปน โคสทฺโท รสฺมิยํ [Pg.320] วตฺตติ. อุณฺหา คาโว รสฺมิโย เอตสฺสาติ อุณฺหคู, สูริโย. ปุพฺพาจริยาปิ หิ ฉนฺโทวิจิติสตฺเถ อิมเมวตฺถํ พฺยากรึสุ. उसी प्रकार 'गो' शब्द 'आदित्य' (सूर्य) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। 'गोगोत्तं गोतमं नमे' (गो-गोत्रीय गोतम को नमस्कार करें)—यह प्राचीन कवियों की रचना यहाँ उदाहरण है, जिसका अर्थ है— आदित्यबन्धु गोतम सम्यक्सम्बुद्ध की मैं वंदना करता हूँ। क्योंकि आदित्य (सूर्य) भी गोतम गोत्र में उत्पन्न हुए और भगवान भी; इस प्रकार समान गोत्र होने के कारण स्थान-स्थान पर 'आदित्यबन्धु' आदि शब्दों से भगवान की स्तुति देखी जाती है, जैसे— 'हे आदित्यबन्धु! मैं आपसे विवेक और शान्तिपद के विषय में पूछता हूँ, हे महर्षि!' और 'मैं रविबन्धु (सूर्य के सम्बन्धी) के विहार जेतवन की नित्य वंदना करता हूँ' तथा 'लोक के एकमात्र बन्धु, कमल के मित्र (सूर्य) के बन्धु'। 'उण्हगू' (उष्णगु) शब्द में 'गो' शब्द 'रश्मि' (किरण) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। जिसकी रश्मियाँ (गावो) उष्ण हैं, वह 'उण्हगू' अर्थात् सूर्य है। पूर्वाचार्यों ने भी छन्दोविचिति शास्त्र में इसी अर्थ की व्याख्या की है। ‘‘โคสีตจนฺทน’’นฺติ เอตฺถ ปานีเย วตฺตติ. โคสทฺเทน หิ ชลํ วุจฺจติ. โค วิย สีตํ จนฺทนํ, ตสฺมึ ปน อุทฺธนโต อุทฺธริตปกฺกุถิตเตลมฺหิ ปกฺขิตฺเต ตงฺขณญฺเญว ตํ เตลํ สุสีตลํ โหติ. 'गोसीतचन्दन' (गोशीतचन्दन) में 'गो' शब्द 'पानी' के अर्थ में प्रयुक्त होता है। 'गो' शब्द से जल कहा जाता है। जल के समान शीतल चन्दन; जब चूल्हे से उतारे गए खौलते हुए तेल में उसे डाला जाता है, तो वह तेल उसी क्षण अत्यंत शीतल हो जाता है। เอตฺเถเก วทนฺติ ‘‘กสฺมา โภ ‘โคปทตฺเถ วตฺตมาโน โคสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค เจว ปุลฺลิงฺโค จา’ติ วทถ, กสฺมา จ ปน ‘อินฺทฺริยปถวีวจนพุทฺธิสูริยรสฺมิปานีเยสุ วตฺตมาโน ปุลฺลิงฺโค’ติ วทถ, เอเตสุ สูริยตฺเถ วตฺตมาโน ปุลฺลิงฺโค โหตุ, นนุ อินฺทฺริยวจนปานีเยสุ วตฺตมาเนน ปน โคสทฺเทน นปุํสกลิงฺเคน ภวิตพฺพํ, ปถวีพุทฺธิรสฺมีสุ วตฺตมาเนน อิตฺถิลิงฺเคน ภวิตพฺพํ อินฺทฺริยาทิปถวาทิปทตฺเถสุ วตฺตมานานํ อินฺทฺริยสทฺทาทิปถวีสทฺทาทีนํ นปุํสกิตฺถิลิงฺควเสน นิทฺเทสสฺส ทสฺสนโต’’ติ? ตนฺน, นิยมาภาวโต. อิตฺถิปทตฺเถ วตฺตมานสฺสาปิ หิ สโต กสฺสจิ สทฺทสฺส ปุลฺลิงฺควเสน นิทฺเทโส ทิสฺสติ ยถา ‘‘โอโรโธ’’ติ. ปุริสปทตฺเถ วตฺตมานสฺสาปิ จ สโต กสฺสจิ อิตฺถิลิงฺควเสน นิทฺเทโส ทิสฺสติ, ยถา ‘‘อตฺถกาโมสิ เม ยกฺข, หิตกามาสิ เทวเต’’ติ. อิตฺถิปุริสปทตฺเถสุ ปน อวตฺตมานานมฺปิ สตํ เกสญฺจิ สทฺทานํ เอกสฺมึเยว ญาณาทิอตฺเถ วตฺตมานานํ อิตฺถิปุมนปุํสกลิงฺควเสน นิทฺเทโส ทิสฺสติ ยถา ‘‘ปญฺญา อโมโห ญาณ’’นฺติ, ‘‘ตฏํตฏีตโฏ’’ติ จ. ตถา หิ อนิตฺถิภูโตปิ สมาโน ‘‘มาตุลา’’ติ อิตฺถิลิงฺควเสน รุกฺโขปิ [Pg.321] นามํ ลภติ, ตพฺพเสน นครมฺปิ. เตนาห จกฺกวตฺติสุตฺตฏีกายํ ‘‘มาตุลาติ อิตฺถิลิงฺควเสน ลทฺธนาโม เอโก รุกฺโข, ตาย อาสนฺนปฺปเทเส มาปิตตฺตา นครมฺปิ ‘มาตุลา’ตฺเวว ปญฺญายิตฺถ. เตน วุตฺตํ มาตุลายนฺติ เอวํนามเก นคเร’’ติ. यहाँ कुछ लोग कहते हैं— 'हे महानुभाव! आप ऐसा क्यों कहते हैं कि 'गाय' के अर्थ में प्रयुक्त 'गो' शब्द स्त्रीलिंग और पुल्लिंग दोनों है? और आप ऐसा क्यों कहते हैं कि इन्द्रिय, पृथ्वी, वचन, बुद्धि, सूर्य, रश्मि और पानी के अर्थ में प्रयुक्त होने पर यह पुल्लिंग है? इनमें से सूर्य के अर्थ में प्रयुक्त होने पर यह पुल्लिंग हो सकता है, किन्तु क्या इन्द्रिय, वचन और पानी के अर्थ में प्रयुक्त होने पर 'गो' शब्द को नपुंसक लिंग नहीं होना चाहिए, और पृथ्वी, बुद्धि तथा रश्मि के अर्थ में प्रयुक्त होने पर इसे स्त्रीलिंग नहीं होना चाहिए? क्योंकि इन्द्रिय आदि और पृथ्वी आदि के अर्थों में प्रयुक्त होने वाले इन्द्रिय-शब्द और पृथ्वी-शब्द आदि का निर्देश नपुंसक लिंग और स्त्रीलिंग के रूप में देखा जाता है।' यह सही नहीं है, क्योंकि इसका कोई (निश्चित) नियम नहीं है। स्त्री के अर्थ में प्रयुक्त होने पर भी किसी शब्द का निर्देश पुल्लिंग में देखा जाता है, जैसे 'ओरोधो' (अन्तःपुर)। पुरुष के अर्थ में प्रयुक्त होने पर भी किसी शब्द का निर्देश स्त्रीलिंग में देखा जाता है, जैसे 'अत्थकामोसि मे यक्ख, हितकामासि देवते' (हे यक्ष! तुम मेरे अर्थकामी हो, हे देवता! तुम हितकामी हो)। स्त्री और पुरुष के अर्थ में प्रयुक्त न होने पर भी, कुछ शब्दों का एक ही 'ज्ञान' आदि अर्थ में प्रयुक्त होने पर स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसक लिंग के रूप में निर्देश देखा जाता है, जैसे 'पञ्ञा' (स्त्री.), 'अमोहो' (पुं.), 'ञाणं' (नपुं.), और 'तटं, तटी, तटों'। इसी प्रकार, स्त्री न होने पर भी 'मातुला' इस स्त्रीलिंग नाम से एक वृक्ष भी जाना जाता है, और उसी के आधार पर एक नगर भी। इसीलिए चक्रवर्ती सुत्त की टीका में कहा गया है— 'मातुला स्त्रीलिंग के रूप में प्राप्त नाम वाला एक वृक्ष है, उसके निकटवर्ती प्रदेश में बसाए जाने के कारण नगर भी 'मातुला' के रूप में ही जाना गया। इसीलिए कहा गया— मातुला नामक नगर में'। โคสทฺทสฺส นามิกปทมาลา เหฏฺฐา ปกาสิตา. 'गो' शब्द की शब्द-रूपावली (नामपदमाला) नीचे प्रकाशित की गई है। โม วุจฺจติ จนฺโท, อฏฺฐกถายํ ปน ‘‘มา วุจฺจติ จนฺโท’’ติ อาการนฺตปาโฐ ทิสฺสติ, โอการนฺตปาเฐน เตน ภวิตพฺพํ สกฺกฏภาสาย เอกกฺขรโกสโต นยํ คเหตฺวา ‘‘โม สิโว จนฺทิมา เจวา’’ติ โอการนฺตวเสน วตฺตพฺพตฺตา. เอตฺถ จ โอการนฺตวเสน วุตฺตสฺส มสทฺทสฺส จนฺทวาจกตฺเต ‘‘ปุณฺณมี, ปุณฺณมา’’ติ จ นิทสฺสนปทานิ. ตตฺถ ปุณฺโณ โม เอตฺถาติ ปุณฺณมี, เอวํ ปุณฺณมา, รตฺตาเปกฺขํ อิตฺถิลิงฺควจนํ. เอตฺถ ปน ‘‘วิสาขปุณฺณมาย รตฺติยา ปฐมยาเมปุพฺเพนิวาสํ อนุสฺสรี’’ติ อิทํ นิทสฺสนํ. เอตฺถ สิยา – ยทิ ‘‘ปุณฺณมา’’ติ อยํสทฺโท รตฺตาเปกฺโข อิตฺถิลิงฺโค. 'मो' चन्द्रमा को कहा जाता है, किन्तु अट्ठकथा में 'मा वुच्चति चन्दो' (मा चन्द्रमा को कहा जाता है) ऐसा आकारान्त पाठ दिखाई देता है। उसे ओकारान्त पाठ होना चाहिए, क्योंकि संस्कृत भाषा के एकाक्षर-कोश से नियम लेकर 'मो सिवो चन्दिमा चेवा' इस प्रकार ओकारान्त के रूप में कहा जाना चाहिए। यहाँ ओकारान्त के रूप में कहे गए 'म' शब्द के चन्द्र-वाचक होने में 'पुण्णमी' और 'पुण्णमा' उदाहरण शब्द हैं। वहाँ, जिसमें 'मो' (चन्द्रमा) पूर्ण हो, वह 'पुण्णमी' है, इसी प्रकार 'पुण्णमा' है, जो रात्रि की अपेक्षा से स्त्रीलिंग शब्द है। यहाँ 'विसाखपुण्णमाय रत्तिया पठमयामे पुब्बेनिवासं अनुस्सरी' (वैशाख पूर्णिमा की रात्रि के प्रथम याम में पूर्व-निवास का स्मरण किया)—यह उदाहरण है। यहाँ यह हो सकता है— यदि 'पुण्णमा' यह शब्द रात्रि की अपेक्षा से स्त्रीलिंग है। ‘‘ปุณฺณมาเย ยถา จนฺโท, ปริสุทฺโธ วิโรจติ; ตเถว ตฺวํ ปุณฺณมโน, วิโรจ ทสสหสฺสิยํ. जैसे पूर्णिमा (की रात्रि) में चन्द्रमा पूर्ण शुद्ध होकर प्रकाशित होता है; वैसे ही तुम पूर्ण मन वाले होकर दस हजार (लोकधातुओं) में प्रकाशित हो। อนฺวทฺธมาเส ปนฺนรเส, ปุณฺณมาเย อุโปสเถ; ปจฺจยํ นาคมารุยฺห, ทานํ ทาตุมุปาคมิ’’นฺติ प्रत्येक आधे महीने (पक्ष) के पन्द्रहवें दिन, पूर्णिमा के उपोसथ पर, हाथी (नाग) रूपी वाहन पर आरूढ़ होकर वह दान देने के लिए आया। อาทีสุ กถํ ‘‘ปุณฺณมาเย’’ติ ปทสิทฺธีติ? ยการสฺส เยการาเทสวเสน. ธมฺมิสฺสเรน หิ ภควตา ‘‘ปุณฺณมายา’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘ปุณฺณมาเย’’ติ วทตา ยการสฺส ฐาเน เยกาโร ปฐิโต อิตฺถิลิงฺควิสเย ตฺตาการสฺส ฐาเน ตฺเตกาโร [Pg.322] วิย, นีการสฺส ฐาเน เนกาโร วิย จ. ตถา หิ ยถา ‘‘อพฺยยตํ วิลปสิ วิรตฺเต โกสิยายเน’’ติ อิมสฺมึ ราธชาตเก ‘‘วิรตฺตา’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘วิรตฺเต’’ติ วทนฺเตน ตฺตาการสฺส ฐาเน ตฺเตกาโร ปฐิโต, ‘‘โกสิยายนี’’ติ จ วตฺตพฺเพ ‘‘โกสิยายเน’’ติ วทนฺเตน นีการสฺส ฐาเน เนกาโร ปฐิโต. เอวํ ‘‘ปุณฺณมายา’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘ปุณฺณมาเย’’ติ วทตา ยการสฺส ฐาเน เยกาโร ปฐิโต. ยถา จ ‘‘ทกฺขิตาเย อปราชิตสงฺฆ’’นฺติ อิมสฺมึ มหาสมยสุตฺตปฺปเทเส ‘‘ทกฺขิตายา’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘ทกฺขิตาเย’’ติ วทตา ยการสฺส ฐาเน เยกาโร ปฐิโต, เอวมิธาปิ. ยถา ปน ‘‘สภาเย วา ทฺวารมูเล วา’’ติ เอตฺถ ‘‘สภาย’’นฺติ ลิงฺคพฺยตฺตยวเสน สภา วุตฺตา, น ตถา อิธ ‘‘ปุณฺณมาย’’นฺติ ลิงฺคพฺยตฺตเยน ปุณฺณมา วุตฺตา, อถ โข ‘‘ปุณฺณมา’’ติ อาการนฺติตฺถิลิงฺควเสน วุตฺตา. ตถา หิ ‘‘ปุณฺณมาโย’’ติ ปทํ ยการฏฺฐาเน เยการุจฺจารณวเสน สมฺภูตํ ภุมฺมวจนนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. प्रारम्भ में 'पुण्णमाये' (puṇṇamāye) पद की सिद्धि कैसे होती है? यकार के स्थान पर येकार आदेश होने के कारण। धर्म के स्वामी भगवान द्वारा 'पुण्णमाये' कहते हुए, जहाँ 'पुण्णमाय' कहना चाहिए था, वहाँ यकार के स्थान पर येकार पढ़ा गया है, जैसे स्त्रीलिंग के विषय में 'त्त' के स्थान पर 'त्ते' और 'नी' के स्थान पर 'ने' होता है। जैसे 'अव्ययतं विलपसि विरत्ते कोसियायने' इस राधजातक में 'विरत्ता' के स्थान पर 'विरत्ते' और 'कोसियायनी' के स्थान पर 'कोसियायने' पढ़ा गया है। इसी प्रकार 'पुण्णमाय' के स्थान पर 'पुण्णमाये' पढ़ा गया है। जैसे 'दक्खिताये अपराजितसङ्घं' इस महासमयसुत्त के अंश में 'दक्खिताय' के स्थान पर 'दक्खिताये' पढ़ा गया है, वैसे ही यहाँ भी। किन्तु जैसे 'सभाये वा द्वारमूले वा' यहाँ 'सभायं' के लिंग-व्यत्यय (लिंग परिवर्तन) से 'सभा' कहा गया है, वैसे यहाँ 'पुण्णमायं' के लिंग-व्यत्यय से 'पुण्णमा' नहीं कहा गया है, बल्कि 'पुण्णमा' आकारान्त स्त्रीलिंग के रूप में कहा गया है। इसलिए 'पुण्णमाये' पद यकार के स्थान पर येकार के उच्चारण से उत्पन्न सप्तमी विभक्ति (भुम्मवचन) समझना चाहिए। มา วุจฺจติ สิรี. ตถา หิ วิทฺวมุขมณฺฑนฏีกายํ ‘‘มาลินี’’ติ ปทสฺสตฺถํ วทตา ‘‘มา วุจฺจติ ลกฺขี, อลินี ภมรี’’ติ วุตฺตํ. ลกฺขีสทฺโท จ สิรีสทฺเทน สมานตฺโถ, เตน ‘‘มา วุจฺจติ สิรี’’ติ อตฺโถ อมฺเหหิ อนุมโต, ตถา โปราเณหิปิ ‘‘มํ สิรึ ธาเรติ วิทธาติ จาติ มนฺธาตา’’ติ อตฺโถ ปกาสิโต, ตสฺมา ‘‘มาลินี มนฺธาตา’’ติ จ อิมาเนตฺถ นิทสฺสนปทานิ. ตตฺร ปุลฺลิงฺคสฺส ตาว มสทฺทสฺส อยํ นามิกปทมาลา – 'मा' (mā) श्री (लक्ष्मी) को कहा जाता है। जैसा कि विद्वमुखमण्डनटीका में 'मालिनी' पद का अर्थ बताते हुए कहा गया है— 'मा लक्ष्मी को कहा जाता है, अलिनी भ्रमरी को'। 'लक्खी' शब्द 'सिरी' शब्द का समानार्थक है, इसलिए 'मा श्री को कहा जाता है' यह अर्थ हमें मान्य है। वैसे ही प्राचीन आचार्यों द्वारा भी 'मं सिरिं धारेति विदधाति चाति मन्धाता' (जो श्री को धारण और विधान करता है वह मान्धाता है) यह अर्थ प्रकाशित किया गया है, इसलिए 'मालिनी' और 'मन्धाता' यहाँ उदाहरण के पद हैं। वहाँ पुल्लिंग 'म' शब्द की यह नामिक पदमाला (रूप) है— โม, มา. มํ, เม. เมน, เมหิ, เมภิ. มสฺส, มานํ. มา, มสฺมา, มมฺหา, เมหิ, เมภิ. มสฺส, มานํ. เม, มสฺมึ, มมฺหิ, เมสุ. โภ ม, ภวนฺโต มา. मो, मा। मं, मे। मेन, मेहि, मेभि। मस्स, मानं। मा, मस्मा, मम्हा, मेहि, मेभि। मस्स, मानं। मे, मस्मिं, मम्हि, मेसु। भो म, भवन्तो मा। อยํ [Pg.323] ปน อิตฺถิลิงฺคสฺส มาสทฺทสฺส นามิกปทมาลา – यह स्त्रीलिंग 'मा' शब्द की नामिक पदमाला है— มา, มา, มาโย. มํ, มา, มาโย. มาย, มาหิ, มาภิ. มาย, มานํ. มาย, มาหิ, มาภิ. มาย, มานํ. มาย, มายํ, มาสุ. โภติ เม, โภติโย มาโย. मा, मा, मायो। मं, मा, मायो। माय, माहि, माभि। माय, मानं। माय, माहि, माभि। माय, मानं। माय, मायं, मासु। भोति मे, भोतियो मायो। เอตฺถ ปน สิรีวาจโก มาสทฺโท จ สทฺทวาจโก ราสทฺโท จาติ อิเม สมานคติกา เอกกฺขรตฺตา นิจฺจมาการนฺตปกติกตฺตา อิตฺถิลิงฺคตฺตา จ. यहाँ श्रीवाचक 'मा' शब्द और शब्दवाचक 'रा' शब्द समान गति वाले हैं क्योंकि ये एकाक्षर हैं, नित्य आकारान्त प्रकृति वाले हैं और स्त्रीलिंग हैं। ตตฺร สํ วุจฺจติ สนฺตจิตฺโต ปุริโส. ยํ โลเก ‘‘สปฺปุริโส’’ติ จ, ‘‘อริโย’’ติ จ, ‘‘ปณฺฑิโต’’ติ จ วทนฺติ, ตสฺเสตํ อธิวจนํ ยทิทํ ‘‘ส’’นฺติ. เอวํ สปฺปุริสาริยปณฺฑิตวาจกสฺส สํสทฺทสฺส ปจฺจตฺตวจนวเสน อตฺถิภาเว ‘‘สเมติ อสตา อส’’นฺติ อิทํ ปโยคนิทสฺสนํ. เอตฺถ หิ ‘‘น สํ อส’’นฺติ สมาสจินฺตาย สปฺปุริสาสปฺปุริสปทตฺถา สํ อสํสทฺเทหิ วุตฺตาติ ญายนฺติ, ตสฺมา ‘‘สปฺปุริสปทตฺโถ ปจฺจตฺตวจเนน สํสทฺเทน วุตฺโต นตฺถี’’ติ วจนํ น วตฺตพฺพํ. เย ‘‘นตฺถี’’ติ วทนฺติ, เตสํ วจนํ น คเหตพฺพํ. นามิกปทมาลา ปนสฺส ‘‘สํ, สนฺตํ, สนฺเต’’ติอาทินา เหฏฺฐา ปกาสิตา. นปุํสกลิงฺคตฺเต สํ วุจฺจติ ธนํ, ‘‘มนุสฺสสฺสํ. ปรสฺสํ. สพฺพสฺสํ. สพฺพสฺสหรณํ. ปรสฺสหรณ’’นฺติอาทีเนตฺถ นิทสฺสนปทานิ. ตตฺถ มนุสฺสสฺส สํ มนุสฺสสฺสํ. เอวํ ปรสฺส สํ ปรสฺสํ. สพฺพสฺส สํ สพฺพสฺสํ. ตสฺส หรณํ ปรสฺสหรณํ สพฺพสฺสหรณนฺติ สมาโส. ตถา สํ วุจฺจติ สุขํ สนฺติ จ. วุตฺตญฺหิ ตพฺพาจกตฺตํ โปราณกวิรจนายํ – वहाँ 'सं' (saṃ) शान्त चित्त वाले पुरुष को कहा जाता है। लोक में जिसे 'सत्पुरुष', 'आर्य' और 'पण्डित' कहते हैं, यह 'सं' उसी का पर्यायवाची है। इस प्रकार सत्पुरुष, आर्य और पण्डित के वाचक 'सं' शब्द के प्रथमा विभक्ति के रूप में अस्तित्व होने पर 'समेति असता अस' यह प्रयोग का उदाहरण है। यहाँ 'न सं असं' इस समास के विचार में सत्पुरुष और असत्पुरुष के अर्थ 'सं' और 'असं' शब्दों द्वारा कहे गए हैं, ऐसा जाना जाता है। इसलिए 'सत्पुरुष का अर्थ प्रथमा विभक्ति वाले सं शब्द से नहीं कहा गया है'—यह वचन नहीं कहना चाहिए। जो 'नहीं है' कहते हैं, उनका वचन स्वीकार नहीं करना चाहिए। इसकी नामिक पदमाला तो 'सं, सन्तं, सन्ते' आदि के रूप में नीचे प्रकाशित की गई है। नपुंसक लिंग में 'सं' धन को कहा जाता है, जैसे— 'मनुस्सस्सं (मनुष्य का धन), परस्सं (दूसरे का धन), सब्बस्सं (सबका धन), सब्बस्सहरणं, परस्सहरणं' आदि यहाँ उदाहरण पद हैं। वहाँ मनुष्य का सं 'मनुस्सस्सं' है। इसी प्रकार दूसरे का सं 'परस्सं'। सबका सं 'सब्बस्सं'। उसका हरण 'परस्सहरणं', 'सब्बस्सहरणं'—यह समास है। वैसे ही 'सं' सुख और शान्ति को भी कहा जाता है। प्राचीन रचनाओं में उसके वाचक होने के बारे में कहा गया है— ‘‘เทวเทโว [Pg.324] สํเทหี โน, หีโน เทวาติเทหโต; หโตปปาตสํสาโร, สาโร สํ เทตุ เทหิน’’นฺติ. “देवाधिदेव (बुद्ध) हमें शान्ति प्रदान करें, जो देवातिदेव होने के कारण हीन नहीं हैं; जिन्होंने जन्म-मरण के संसार को नष्ट कर दिया है, वे सारभूत (बुद्ध) प्राणियों को सुख/शान्ति प्रदान करें।” ตสฺมา อยเมตฺถ คาถา, ‘‘สกลโลกสงฺกโร ทีปงฺกโร’’ติ เอตฺถ ‘‘สงฺกโร’’ติ ปทญฺจนิทสฺสนํ. ‘‘สํ, สานิ, สา. สํ, สานิ, เส. เสน’’อิจฺจาทิ ปุพฺเพ ปกาสิตนเยน เญยฺยํ. เอตฺถ จ โสตูนํ สุคตมตวเร โกสลฺลชนนตฺถํ สมาสนฺตคตสฺส สํสทฺทสฺส นามิกปทมาลํ ปริปุณฺณํ กตฺวา กถยาม – इसलिए यहाँ यह गाथा है, 'सकललोकसङ्करो दीपङ्करो' यहाँ 'सङ्करो' पद भी उदाहरण है। 'सं, सानि, सा। सं, सानि, से। सेन' इत्यादि पहले बताए गए तरीके से जानना चाहिए। यहाँ श्रोताओं को श्रेष्ठ सुगत-मत में कुशलता उत्पन्न करने के लिए समास के अन्त में आए 'सं' शब्द की नामिक पदमाला पूर्ण करके कहते हैं— มนุสฺสสฺสํ, มนุสฺสสฺสานิ, มนุสฺสสฺสา. มนุสฺสสฺสํ, มนุสฺสสฺสานิ, มนุสฺสสฺเส. มนุสฺสสฺเสน, มนุสฺสสฺเสหิ, มนุสฺสสฺเสภิ. มนุสฺสสฺสสฺส, มนุสฺสสฺสานํ. มนุสฺสสฺสา, มนุสฺสสฺสสฺมา, มนุสฺสสฺสมฺหา, มนุสฺสสฺเสหิ, มนุสฺสสฺเสภิ. มนุสฺสสฺสสฺส, มนุสฺสสฺสานํ. มนุสฺสสฺเส, มนุสฺสสฺสสฺมึ, มนุสฺสสฺสมฺหิ, มนุสฺสสฺเสสุ. โภ มนุสฺสสฺส, โภนฺโต มนุสฺสสฺสานิ, มนุสฺสสฺสา. เอส นโย ‘‘ปรสฺสํ สพฺพสฺส’’นฺติอาทีสุปิ, สพฺพาเนตานิ ปทานิ อภิเธยฺยลิงฺคานีติ คเหตพฺพานิ. मनुस्सस्सं, मनुस्सस्सानी, मनुस्सस्सा। मनुस्सस्सं, मनुस्सस्सानी, मनुस्सस्से। मनुस्सस्सेन, मनुस्सस्सेहि, मनुस्सस्सेभि। मनुस्सस्सस्स, मनुस्सस्सानं। मनुस्सस्सा, मनुस्सस्सस्मा, मनुस्सस्सन्हा, मनुस्सस्सेहि, मनुस्सस्सेभि। मनुस्सस्सस्स, मनुस्सस्सानं। मनुस्सस्से, मनुस्सस्सस्मिं, मनुस्सस्सम्हि, मनुस्सस्सेसु। भो मनुस्सस्स, भोन्तो मनुस्सस्सानी, मनुस्सस्सा। यही नियम 'परस्सं सब्बस्सं' आदि में भी है, इन सभी पदों को अभिधेय (विशेष्य) के लिंग के अनुसार समझना चाहिए। ยํ ตํ กิมิติสทฺทานํ, นามมาลํ ปนตฺตริ; สพฺพนามปริจฺเฉเท, ปกาสิสฺสํ ติลิงฺคโต. यं, तं, किं और इति शब्दों की नाममाला तो मैं आगे सर्वनाम परिच्छेद में तीनों लिंगों में प्रकाशित करूँगा। อิจฺเจวํ เหฏฺฐา อุทฺทิฏฺฐานํ โก วิ สาทีนํ นามิกปทมาลา สทฺธึ อตฺถนฺตรนิทสฺสนปเทหิ วิภตฺตา. ตตฺริทํ ลิงฺคววตฺถานํ – इस प्रकार ऊपर निर्दिष्ट 'को, वि, सा' आदि की नामिक पदमाला अन्य अर्थों के उदाहरण पदों के साथ विभक्त की गई है। वहाँ यह लिंग-व्यवस्था है— โก วิ สา โหนฺติ ปุลฺลิงฺเค, ภา รา ถี ธี กุ ภู ถิยํ; กํ ขํ นปุํสเก โค ตุ, ปุเม เจวิตฺถิลิงฺคเก. 'को', 'वि', 'सा' पुल्लिंग में होते हैं; 'भा', 'रा', 'थी', 'धी', 'कु', 'भू' स्त्रीलिंग में; 'कं', 'खं' नपुंसक लिंग में; और 'गो' पुल्लिंग और स्त्रीलिंग दोनों में होता है। โม ปุเม อิตฺถิลิงฺเค มา, สํ ปุเม จ นปุํสเก; ยํ ตํ กิมิติ สพฺพตฺร, ลิงฺเคสฺเวว ปวตฺตเร. 'मो' पुल्लिंग में, 'मा' स्त्रीलिंग में, 'सं' पुल्लिंग और नपुंसक लिंग में; 'यं', 'तं', 'किं' और 'इति' सभी लिंगों में प्रयुक्त होते हैं। อิโต อญฺญานิปิ เอกกฺขรานิ อุปปริกฺขิตฺวา คเหตพฺพานิ. इसके अतिरिक्त अन्य एकाक्षरों की भी परीक्षा करके उन्हें ग्रहण करना चाहिए। เอวํ [Pg.325] วิญฺญูนํ นยญฺญูนํ สทฺทรจนาวิสเย ปรมวิสุทฺธวิปุลพุทฺธิปฏิลาภตฺถํ ปรมสณฺหสุขุมตฺเถสุ ปโยเคสุ อสมฺโมหตฺถํ สุวณฺณตเล สีหวิชมฺภเนน เกสรีสีหสฺส วิชมฺภนมิว เตปิฏเก พุทฺธวจเน ญาณวิชมฺภเนน วิชมฺภนตฺถญฺจ อธิกูเนกกฺขรวเสน ลิงฺคตฺตยํ มิสฺเสตฺวา นามิกปทมาลา วิภตฺตา. इस प्रकार, विद्वानों और नीतिज्ञों के लिए शब्द-रचना के विषय में परम विशुद्ध और विशाल बुद्धि की प्राप्ति के लिए, अत्यंत सूक्ष्म और गहन अर्थों वाले प्रयोगों में मोह-रहित होने के लिए, और स्वर्ण-तल पर सिंह की जम्हाई के समान त्रिपिटक बुद्ध-वचन में ज्ञान के विस्तार के साथ विस्तार करने के लिए, अधिक और ऊन (कम) एकाक्षरों के वश से तीनों लिंगों को मिश्रित करके नामिक पदमाला विभक्त की गई है। สทฺเท ภวนฺติ กุสลา น ตุ เกจิ อตฺเถ,อตฺเถ ภวนฺติ กุสลา น ตุ เกจิ สทฺเท. कुछ लोग शब्दों में कुशल होते हैं पर अर्थों में नहीं, और कुछ लोग अर्थों में कुशल होते हैं पर शब्दों में नहीं। โกสลฺลเมว ปรมํ ทุภยตฺถ ตสฺมา,โยคํ กเรยฺย สตตํ มติมา วรนฺติ. इसलिए दोनों (शब्द और अर्थ) में कुशलता ही श्रेष्ठ है, अतः बुद्धिमान व्यक्ति को निरंतर इसमें योग (प्रयत्न) करना चाहिए। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ इस प्रकार, अट्ठकथा सहित नौ अंगों वाले त्रिपिटक के वाक्-पथों में। วิญฺญูนํ โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ विद्वानों की कुशलता के लिए रचित सद्दनीति प्रकरण में। ลิงฺคตฺตยมิสฺสโก นามิกปทมาลาวิภาโค तीनों लिंगों से मिश्रित नामिक पदमाला का विभाग। ทสโม ปริจฺเฉโท. दसवाँ परिच्छेद। ๑๑. วาจฺจาภิเธยฺยลิงฺคาทิปริทีปนนามิกปทมาลา ११. वाच्य और अभिधेय लिंग आदि को प्रकाशित करने वाली नामिक पदमाला। วาจฺจาภิเธยฺยลิงฺคาทิ-วเสนปิ อิโต ปรํ; ภาสิสฺสํ ปทมาลาโย, ภาสิตสฺสานุรูปโต. इसके बाद, वाच्य और अभिधेय लिंग आदि के अनुसार भी, कहे गए के अनुरूप पदमालाओं को कहूँगा। ตตฺถ วาจฺจลิงฺคานีติ อปฺปธานลิงฺคานิ, คุณนามสงฺขาตานิ วา ลิงฺคานิ. อภิเธยฺยลิงฺคานีติ ปธานลิงฺคานิ, คุณีปทสงฺขาตานิ วา ลิงฺคานิ. ยสฺมา ปน เตสุ วาจฺจลิงฺคานิ นาม อภิเธยฺยลิงฺคานุวตฺตกานิ ภวนฺติ, ตสฺมา สพฺพานิ ภูธาตุมยานิ จ วาจฺจลิงฺคานิ อภิเธยฺยลิงฺคานุรูปโต โยเชตพฺพานิ. เตสํ ภูธาตุมยานิ วาจฺจลิงฺคานิ สรูปโต นามิกปทมาลาย อโยชิตานิปิ ตตฺถ ตตฺถ นยโต โยชิตานิ[Pg.326], ตสฺมา น ทานิ ทสฺเสสฺสาม. อภูธาตุมยานิปิ กิญฺจาปิ นยโต โยชิตานิ, ตถาปิ โสตารานํ ปโยเคสุ โกสลฺลชนนตฺถํ กถยาม, นามิกปทมาลญฺจ เนสํ ทสฺเสสฺสาม กิญฺจิ ปโยคํ วทนฺตา. वहाँ 'वाच्य लिंग' का अर्थ है अप्रधान लिंग, या गुणवाचक संज्ञाओं के रूप में कहे गए लिंग। 'अभिधेय लिंग' का अर्थ है प्रधान लिंग, या गुणी (विशेष्य) पदों के रूप में कहे गए लिंग। चूँकि उनमें वाच्य लिंग अभिधेय लिंगों का अनुसरण करने वाले होते हैं, इसलिए 'भू' धातु से बने सभी वाच्य लिंगों को अभिधेय लिंगों के अनुरूप जोड़ना चाहिए। यद्यपि 'भू' धातु से बने वे वाच्य लिंग साक्षात् रूप में नामिक पदमाला में नहीं जोड़े गए हैं, फिर भी वे वहाँ-वहाँ न्याय (नियम) के अनुसार जोड़े गए हैं, इसलिए अब उन्हें नहीं दिखाएंगे। यद्यपि 'अ-भू' धातु से बने शब्द भी नियमतः जोड़े गए हैं, फिर भी श्रोताओं के प्रयोगों में कुशलता उत्पन्न करने के लिए हम उन्हें कहेंगे, और कुछ प्रयोग बताते हुए उनकी नामिक पदमाला दिखाएंगे। ทีโฆ รสฺโส นีโล ปีโต,สุกฺโก กณฺโห เสฏฺโฐ ปาโป; สทฺโธ สุทฺโธ อุจฺโจ นีโจ,กโตตีโต อิจฺจาทีนิ. दीर्घ (लंबा), ह्रस्व (छोटा), नील (नीला), पीत (पीला), शुक्ल (सफेद), कृष्ण (काला), श्रेष्ठ, पाप (बुरा), श्रद्धावान, शुद्ध, उच्च, नीच, कृत (किया हुआ), अतीत (बीता हुआ) इत्यादि। ทีฆา ชาครโต รตฺติ, ทีฆํ สนฺตสฺส โยชนํ; ทีโฆ พาลาน สํสาโร, สทฺธมฺมํ อวิชานตํ. जागने वाले के लिए रात लंबी होती है, थके हुए के लिए योजन लंबा होता है; सद्धर्म को न जानने वाले मूर्खों के लिए संसार लंबा होता है। ทีโฆ, ทีฆา. ทีฆํ, ทีเฆ. ทีเฆน, ทีเฆหิ, ทีเฆภิ. ทีฆสฺส, ทีฆานํ. ทีฆา, ทีฆสฺมา, ทีฆมฺหา, ทีเฆหิ, ทีเฆภิ. ทีฆสฺส, ทีฆานํ. ทีเฆ, ทีฆสฺมึ, ทีฆมฺหิ, ทีเฆสุ. โภ ทีฆ, ภวนฺโต ทีฆา. ‘‘ทีฆาติ มํ ปกฺโกเสยฺยาถา’’ติ อิทเมตฺถ นิทสฺสนํ. दीघो, दीघा। दीघं, दीघे। दीघेन, दीघेहि, दीघेभि। दीघस्स, दीघानं। दीघा, दीघस्मा, दीघम्हा, दीघेहि, दीघेभि। दीघस्स, दीघानं। दीघे, दीघस्मिं, दीघम्हि, दीघेसु। भो दीघ, भवन्तो दीघा। "मुझे 'दीघ' कहकर पुकारना" - यह यहाँ उदाहरण है। ทีฆา, ทีฆา, ทีฆาโย. ทีฆํ, ทีฆา, ทีฆาโย. ทีฆาย. เสสํ กญฺญานเยน เญยฺยํ. दीघा, दीघा, दीघायो। दीघं, दीघा, दीघायो। दीघाय। शेष 'कन्या' के समान समझना चाहिए। ทีฆํ, ทีฆานิ, ทีฆา. ทีฆํ, ทีฆานิ, ทีเฆ. ทีเฆน. เสสํ จิตฺตนเยน เญยฺยํ. รสฺสาทีนิ จ เอวเมว วิตฺถาเรตพฺพานิ. อยํ วาจฺจลิงฺคานํ นามิกปทมาลา, ‘‘คุณนามานํ นามิกปทมาลา’’ติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. दीघं, दीघानि, दीघा। दीघं, दीघानि, दीघे। दीघेन। शेष 'चित्त' के समान समझना चाहिए। ह्रस्व आदि का भी इसी प्रकार विस्तार करना चाहिए। यह वाच्य लिंगों की नामिक पदमाला है, इसे "गुणवाचक संज्ञाओं की नामिक पदमाला" कहना उचित है। อภิเธยฺยกลิงฺเคสุ, สวิเสสานิ ยานิ หิ; เตสํ ทานิ ยถาปาฬึ, ปทมาลํ กเถสฺสหํ. अभिधेय लिंगों में जो विशेष (विशिष्ट) हैं, अब मैं पालि के अनुसार उनकी पदमाला कहूँगा। กตมานิ ตานิ ปทานิ, ยานิ สวิเสสานิ? वे कौन से पद हैं जो विशेष हैं? ภวาภวาทิกํ ลงฺกา-ทีโป อิจฺจาทิกานิ จ; โพธิ สนฺธีติ จาทีนิ, สวิเสสานิ โหนฺติ ตุ. भवाभव आदि, लंका-दीप आदि, और बोधि, संधि आदि विशेष पद हैं। เอเตสุ [Pg.327] หิ – इनमें से - ภวาภวปทํ เทก-วโจ พหุวโจ กฺวจิ; สมาเส อสมาเสปิ, สมฺภโว ตสฺส อิจฺฉิโต. 'भवाभव' पद कहीं एकवचन और कहीं बहुवचन में होता है; समास में और बिना समास के भी इसका प्रयोग इष्ट है। วิคฺคหญฺจ ปทตฺถญฺจ, วตฺวา ปทสฺสิมสฺส เม; วุจฺจมานมวิกฺขิตฺตา, ปทมาลํ นิโพธถ. इस पद का विग्रह और अर्थ बताकर, मेरे द्वारा कही जा रही पदमाला को एकाग्र होकर समझें। ภโว จ อภโว จ ภวาภวํ. อถ วา ภโว จ อภโว จ ภวาภวานิ, อยํ วิคฺคโห. ตตฺร ภโวติ ขุทฺทโก ภโว. อภโวติ มหนฺโต ภโว. วุทฺธตฺถวาจโก เหตฺถ อกาโร. เอตฺถ จ สุคติทุคฺคติวเสน หีนปณีตวเสน จ ขุทฺทกมหนฺตตา เวทิตพฺพา. อถ วา ภโวติ วุทฺธิ. อภโวติ อวุทฺธิ. อยํ ปทตฺโถ. อยํ ปน นามิกปทมาลา – 'भवो च अभवो च भवाभवं' (भव और अभव मिलकर भवाभव)। अथवा 'भवो च अभवो च भवाभवानि', यह विग्रह है। वहाँ 'भव' का अर्थ छोटा भव है। 'अभव' का अर्थ बड़ा भव है। यहाँ 'अ' कार वृद्धि के अर्थ का वाचक है। और यहाँ सुगति-दुर्गति के वश से तथा हीन-प्रणीत के वश से लघुता और महानता समझनी चाहिए। अथवा 'भव' का अर्थ वृद्धि है और 'अभव' का अर्थ अ-वृद्धि है। यह इसका अर्थ है। और यह नामिक पदमाला है - ภวาภวํ, ภวาภวํ, ภวาภเวน, ภวาภวสฺส, ภวาภวา, ภวาภวสฺมา, ภวาภวมฺหา, ภวาภวสฺส, ภวาภเว, ภวาภวสฺมึ, ภวาภวมฺหิ, โภ ภวาภว. อิติ ภวาภวปทํ เอกวจนกํ ภวติ. ทิสฺสติ จ ตสฺเสกวจนตา ปาฬิยํ อฏฺฐกถายญฺจ – भवाभवं, भवाभवं, भवाभवेन, भवाभवस्स, भवाभवा, भवाभवस्मा, भवाभवम्हा, भवाभवस्स, भवाभवे, भवाभवस्मिं, भवाभवम्हि, भो भवाभव। इस प्रकार 'भवाभव' पद एकवचन में होता है। पालि और अट्ठकथा में इसकी एकवचनता देखी जाती है - ‘‘อตีตกปฺเป จริตํ, ฐปยิตฺวา ภวาภเว; อิมสฺมึ กปฺเป จริตํ, ปวกฺขิสฺสํ สุโณหิ เม’’ "पिछले कल्पों के चरित्र को छोड़कर, इस कल्प के भवाभव (विभिन्न जन्मों) में जो चरित्र है, उसे कहूँगा, मुझसे सुनें।" อิติ วา, अथवा इस प्रकार, ‘‘เอวํ พหุวิธํ ทุกฺขํ, สมฺปตฺติญฺจ พหูวิธํ; ภวาภเว อนุภวิตฺวา, ปตฺโต สมฺโพธิมุตฺตมํ’’ "इस प्रकार अनेक प्रकार के दुःख और अनेक प्रकार की संपत्ति को भवाभव (विभिन्न जन्मों) में अनुभव करके, उत्तम संबोधि को प्राप्त किया।" อิติ วา เอวํ ปาฬิยํ ภวาภว ปทสฺส เอกวจนตา ทิฏฺฐา. इस प्रकार पालि में 'भवाभव' पद की एकवचनता देखी गई है। อฏฺฐกถายมฺปิ [Pg.328] – अट्ठकथा (अट्टकथा) में भी - ‘‘อสมฺพุธํ พุทฺธนิเสวิตํ ยํ,ภวาภวํ คจฺฉติ ชีวโลโก; นโม อวิชฺชาทิกิเลสชาล-วิทฺธํสิโน ธมฺมวรสฺส ตสฺสา’’ติ “जो बुद्धों द्वारा सेवित है (किन्तु अज्ञानी जनों द्वारा) नहीं समझा गया है, जिसके कारण यह जीवलोक भव-अभव (पुनर्जन्म के चक्र) में जाता है; अविद्या आदि क्लेश-जाल का विनाश करने वाले उस श्रेष्ठ धर्म को नमस्कार है।” เอวํ ตสฺเสกวจนตา ทิฏฺฐา. इस प्रकार उसकी एकवचनता देखी जाती है। ภวาภวานิ, ภวาภวา, ภวาภวานิ, ภวาภเว, ภวาภเวหิ, ภวาภเวภิ, ภวาภวานํ, ภวาภเวหิ, ภวาภเวภิ, ภวาภวานํ, ภวาภเวสุ, ภวนฺโต ภวาภวานิ. อิติ ภวาภวปทํ พหุวจนกมฺปิ ภวติ. ทิสฺสติ จ ตสฺส พหุวจนกตา ปาฬิยํ ‘‘โธนสฺส หิ นตฺถิ กุหิญฺจิ โลเก. ปกปฺปิกา ทิฏฺฐิ ภวาภเวสู’’ติ. อุภยมฺปิ นยํ โวมิสฺเสตฺวา นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. กถํ? ‘‘ภวาภวํ, ภวาภวานิ. ภวาภวํ, ภวาภวานิ. ภวาภเวน, ภวาภเวหิ, ภวาภเวภิ’’อิจฺเจวมาทินา จิตฺตนเยน โยเชตพฺพา. भवाभवानि, भवाभवा, भवाभवानि, भवाभवे, भवाभवेहि, भवाभवेभि, भवाभवानं, भवाभवेहि, भवाभवेभि, भवाभवानं, भवाभवेसु, भवन्तो भवाभवानि। इस प्रकार 'भवाभव' पद बहुवचन में भी होता है। और पालि में उसकी बहुवचनता देखी जाती है— 'धोन (शुद्ध पुरुष) की इस लोक में कहीं भी कल्पित दृष्टि भवाभवों (अस्तित्व और अनस्तित्व) में नहीं है।' दोनों ही विधियों को मिलाकर नामिक पदमाला (शब्द-रूप) बनानी चाहिए। कैसे? 'भवाभवं, भवाभवानि। भवाभवं, भवाभवानि। भवाभवेन, भवाभवेहि, भवाभवेभि'—इस प्रकार 'चित्त' शब्द की विधि के अनुसार जोड़ना चाहिए। นปุํสเกกวจน-พหุวจนกา อิมา; ปทมาลา สมาสตฺเต, กตาติ ปริทีปเย. नपुंसक लिंग के एकवचन और बहुवचन वाली ये पदमालाएँ समास होने पर की गई हैं, ऐसा समझना चाहिए। สมาสกปทญฺเจว, อสมาสกเมว จ; ภวาภวปทํ ทฺเวธา, อิติ วิทฺวา วิภาวเย. विद्वान को यह समझना चाहिए कि 'भवाभव' पद दो प्रकार का है—समासयुक्त पद और समास-रहित पद। นปุํสกํ สมาสตฺเต, ปุลฺลิงฺคมิตรตฺตเน; นปุํสกํ ตุ ปาเยน, เอกวจนกํ วเท. समास होने पर यह नपुंसक लिंग होता है, और अन्य स्थिति (असमास) में पुल्लिंग होता है; नपुंसक लिंग में तो प्रायः इसे एकवचन में कहना चाहिए। ‘‘ภโว จ อภโว จา’’ติ, สมาสตฺถํ วเท พุโธ; ‘‘ภวโต ภว’’มิจฺจตฺถํ, อสมาสสฺส ภาสเย. बुद्धिमान व्यक्ति को 'भव और अभव'—यह समास का अर्थ कहना चाहिए; और 'भव से भव'—यह असमास (विग्रह) का अर्थ कहना चाहिए। ปุลฺลิงฺคตฺตมฺหิ โส เญยฺโย, นิสฺสกฺกอุปโยคโต; เอวํ วิเสสโต ชญฺญา, ภวาภวปทํ วิทู. पुल्लिंग होने पर उसे अपादान (निसक्क) और कर्म (उपयोग) कारक के अनुसार जानना चाहिए; इस प्रकार विद्वान को 'भवाभव' पद को विशेष रूप से जानना चाहिए। ยถา [Pg.329] เจตฺถ ภวาภวปทสฺส นามิกปทมาลา โยชิตา, เอวํ ‘‘กมฺมากมฺมํ ผลาผล’’นฺติอาทีนมฺปิ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. อตฺโถปิ เนสํ ยถารหํ วตฺตพฺโพ. เยภุยฺเยเนตานิ เอกวจนกานิ ภวนฺติ. เอวํ ตาว ภวาภวปทาทีนํ วิเสสวนฺตตา ทฏฺฐพฺพา. जैसे यहाँ 'भवाभव' पद की शब्द-रूप माला बनाई गई है, वैसे ही 'कर्माकर्म', 'फलाफल' आदि की भी शब्द-रूप माला बनानी चाहिए। उनका अर्थ भी यथायोग्य कहना चाहिए। प्रायः ये एकवचन में होते हैं। इस प्रकार 'भवाभव' आदि पदों की विशिष्टता देखनी चाहिए। ลงฺกาทีโป, ลงฺกาทีปํ, ลงฺกาทีเปน, ลงฺกาทีปสฺส, ลงฺกาทีปา, ลงฺกาทีปสฺมา, ลงฺกาทีปมฺหา, ลงฺกาทีปสฺส, ลงฺกาทีเป, ลงฺกาทีปสฺมึ, ลงฺกาทีปมฺหิ, โภ ลงฺกาทีป. อยํ สมาสตฺเต นามิกปทมาลา. อสมาสตฺเตปิ ปน โยเชตพฺพา. लङ्कादीपो, लङ्कादीपं, लङ्कादीपेन, लङ्कादीपस्स, लङ्कादीपा, लङ्कादीपस्मा, लङ्कादीपम्हा, लङ्कादीपस्स, लङ्कादीपे, लङ्कादीपस्मिं, लङ्कादीपम्हि, भो लङ्कादीप। यह समास होने पर शब्द-रूप माला है। किन्तु असमास (विग्रह) होने पर भी इसे जोड़ना चाहिए। ลงฺกา ทีโป, ลงฺกํ ทีปํ, ลงฺกาย ทีเปน, ลงฺกาย ทีปสฺส, ลงฺกาย ทีปา, ลงฺกาย ทีปสฺมา, ลงฺกาย ทีปมฺหา, ลงฺกาย ทีปสฺส, ลงฺกาย ทีเป, ลงฺกาย ทีปสฺมึ, ลงฺกาย ทีปมฺหิ, โภติ ลงฺเก ทีป. อยํ พฺยาเส นามิกปทมาลา. อยํ นโย ‘‘ชมฺพุทีโป’’ติ เอตฺถ น ลพฺภติ เกวเลน ชมฺพูสทฺเทน ชมฺพุทีปสฺส อกถนโต, ยถา เกวเลน ลงฺกาสทฺเทน ลงฺกาทีโป กถิยติ. อยํ ปน พฺยาเส ปทมาลานโย วิเสสโต กพฺพรจนายํ กวีนํ อุปการาย สํวตฺตติ สาสนสฺสาปิ. ตถา หิ พฺยาสวเสน โปราณกวิรจนา ทิสฺสติ – लङ्का दीपो, लङ्कं दीपं, लङ्काय दीपेन, लङ्काय दीपस्स, लङ्काय दीपा, लङ्काय दीपस्मा, लङ्काय दीपम्हा, लङ्काय दीपस्स, लङ्काय दीपे, लङ्काय दीपस्मिं, लङ्काय दीपम्हि, भोति लङ्के दीप। यह विग्रह (व्यास) में शब्द-रूप माला है। यह विधि 'जम्बुदीपो' (जम्बूद्वीप) में प्राप्त नहीं होती क्योंकि केवल 'जम्बु' शब्द से जम्बूद्वीप नहीं कहा जाता, जैसे केवल 'लङ्का' शब्द से लङ्काद्वीप कहा जाता है। किन्तु यह विग्रह वाली पदमाला विधि विशेष रूप से काव्य रचना में कवियों के उपकार के लिए और शासन (धर्म) के लिए भी प्रवृत्त होती है। क्योंकि प्राचीन कवियों की रचना इस प्रकार देखी जाती है— ‘‘วนฺทามิ เสลมฺหิ สมนฺตกูเฏ,ลงฺกาย ทีปสฺส สิขายมาเน; อาวาสภูเต สุมนามรสฺส,พุทฺธสฺส ตํ ปาทวฬญฺชมคฺค’’นฺติ. “मैं लङ्काद्वीप के शिखर के समान समन्तकूट पर्वत पर स्थित, सुमन नामक देव के आवास-भूत, बुद्ध के उस चरण-चिह्न मार्ग की वन्दना करता हूँ।” สาสเนปิ พฺยาสวเสน ‘‘ทิพฺโพ รโถ ปาตุรหุ, เวเทหสฺส ยสสฺสิโน’’ติอาทิกา ปาฬิ ทิสฺสติ. शासन (पालि साहित्य) में भी विग्रह के कारण 'यशस्वी विदेह का दिव्य रथ प्रकट हुआ' आदि पालि देखी जाती है। ยถา [Pg.330] ปน ‘‘ชมฺพุทีโป’’ติ เอตฺถ อยํ นโย น ลพฺภติ, ตถา ‘‘นาคทีโป’’ติอาทีสุปิ เกวเลน ชมฺพูสทฺเทน ชมฺพุทีปสฺส อกถนมิว เกวเลน นาคสทฺทาทินา นาคทีปาทีนํ อกถนโตติ. นนุ จ โภ ‘‘พุทฺธสฺส ชมฺพุนทรํสิโน ตํ, ทาฐํ มยํ ชมฺพุนรา นมามา’’ติ โปราณกวิรจนายํ ชมฺพูสทฺเทน ชมฺพุทีโป วุตฺโต ‘‘ชมฺพุทีปนรา’’ติ อตฺถสมฺภวโตติ? สจฺจํ ‘‘ชมฺพุทีปนรา’’ติ อตฺโถ สมฺภวติ, เกวเลน ปน ชมฺพูสทฺเทน ชมฺพุทีปตฺถํ น วทติ, กินฺตุ ‘‘ชมฺพุทีปนรา’’ติ วตฺตพฺเพ คาถาวิสยตฺตา อธิกกฺขรโทสํ ปริวชฺชนฺเตน ทีปสทฺทโลปํ กตฺวา ‘‘ชมฺพุนรา’’ติ วุตฺตํ, เอวํ อุตฺตรปทโลปวเสน วุตฺโต ชมฺพุสทฺโท นรสทฺทํ ปฏิจฺจ สมาสพเลน ‘‘ชมฺพุทีปนรา’’ติ อตฺถปฺปกาสเน สมตฺโถ โหติ, น เกวโล พฺยาสกาเล, ตถา หิ ‘‘ชมฺพู’’ติ วุตฺเต ชมฺพุทีโป น ญายติ, อถ โข ชมฺพุรุกฺโขเยว ญายติ. जैसे 'जम्बुदीपो' में यह विधि प्राप्त नहीं होती, वैसे ही 'नागदीपो' आदि में भी, केवल 'जम्बु' शब्द से जम्बूद्वीप न कहे जाने की तरह केवल 'नाग' आदि शब्दों से नागद्वीप आदि नहीं कहे जाते। हे महानुभाव! क्या प्राचीन काव्य रचना में 'जम्बु' शब्द से जम्बूद्वीप नहीं कहा गया है— 'जम्बु-नद (स्वर्ण) के समान कान्ति वाले बुद्ध की उस दाढ़ (दन्त धातु) को हम जम्बु-नर नमस्कार करते हैं', यहाँ 'जम्बुद्वीप के मनुष्य' यह अर्थ सम्भव होने से? सत्य है, 'जम्बुद्वीप के मनुष्य' यह अर्थ सम्भव है, किन्तु केवल 'जम्बु' शब्द जम्बूद्वीप का अर्थ नहीं कहता, बल्कि 'जम्बुद्वीप-नरा' कहना चाहिए था, पर गाथा (छन्द) का विषय होने के कारण अधिक अक्षर के दोष से बचने के लिए 'दीप' शब्द का लोप करके 'जम्बु-नरा' कहा गया है। इस प्रकार उत्तरपद के लोप के कारण कहा गया 'जम्बु' शब्द 'नर' शब्द की अपेक्षा रखते हुए समास के बल से 'जम्बुद्वीप के मनुष्य' अर्थ को प्रकाशित करने में समर्थ होता है, न कि केवल विग्रह के समय। क्योंकि 'जम्बु' कहने पर जम्बूद्वीप का बोध नहीं होता, बल्कि जम्बू (जामुन) के वृक्ष का ही बोध होता है। กึ ปน โภ ‘‘กาโก ทาโส, กากํ ทาสํ, กาเกน ทาเสนา’’ติ อยํ นโย ลพฺภติ, น ลพฺภตีติ? ลพฺภติ, กากสทฺเทน กากนามกสฺส ทาสสฺส กถนํ โหติ. ยทิ เอวํ ‘‘ชมฺพุทีโป’’ติ เอตฺถาปิ ‘‘ชมฺพุนามโก ทีโป’’ติ อตฺถํ คเหตฺวา ‘‘ชมฺพู ทีโป, ชมฺพุํ ทีปํ, ชมฺพุยา ทีเปนา’’ติ อยํ นโย ลพฺภตีติ? น ลพฺภติ ชมฺพูสทฺทสฺส ปณฺณตฺติวเสน ทีเป อปฺปวตฺตนโต. ชมฺพูสทฺโท หิ รุกฺเขเยว ปณฺณตฺติวเสน ปวตฺตติ, น ทีเป. ยถา ปน จิตฺตโวหาโร จิตฺตนามเก คหปติมฺหิปิ มเนปิ ปวตฺตติ ‘‘จิตฺโต คหปติ. จิตฺตํ มโน มานส’’นฺติอาทีสุ. ยถา จ กุสโวหาโร กุสนามเก รญฺเญปิ กุสติเณปิ ปวตฺตติ – तो क्या, हे महानुभाव! 'काको दासो, काकं दासं, काकेन दासेन'—यह विधि प्राप्त होती है या नहीं? प्राप्त होती है, 'काक' शब्द से काक नामक दास का कथन होता है। यदि ऐसा है, तो 'जम्बुदीपो' यहाँ भी 'जम्बु नामक द्वीप' यह अर्थ लेकर 'जम्बु दीपो, जम्बुं दीपं, जम्बुया दीपेन'—यह विधि प्राप्त होगी क्या? नहीं प्राप्त होती, क्योंकि 'जम्बु' शब्द संज्ञा (प्रज्ञप्ति) के रूप में द्वीप के लिए प्रवृत्त नहीं होता। 'जम्बु' शब्द तो वृक्ष के लिए ही संज्ञा के रूप में प्रवृत्त होता है, द्वीप के लिए नहीं। जैसे 'चित्त' शब्द का व्यवहार चित्त नामक गृहपति के लिए भी और मन के लिए भी प्रवृत्त होता है— 'चित्त गृहपति, चित्त मन मानस' आदि में। और जैसे 'कुश' शब्द का व्यवहार कुश नामक राजा के लिए भी और कुश तृण (घास) के लिए भी प्रवृत्त होता है— ‘‘ปภาวติญฺจ [Pg.331] อาทาย, มณึ เวโรจนํ กุโส; กุสาวตึ กุสราชา, อคมาสิ มหพฺพโล; กุโส ยถา ทุคฺคหิโต, หตฺถเมวานุกนฺตตี’’ติ “महाबली कुश राजा प्रभावती और वैरोचन मणि को लेकर कुशावती नगरी को गए; जैसे गलत तरीके से पकड़ा गया कुश (घास) हाथ को ही काट देता है।” อาทีสุ, ตถา กากสทฺโทปิ วายเส, เอวํนามเก ทาเสปิ ปวตฺตติ ‘‘กาโก รวติ, กาโก นาม ทาโส สฏฺฐิโยชนานิ คจฺฉตี’’ติอาทีสุ. ชมฺพูสทฺโท ปน คหปติมนาทีสุ จิตฺต กุส กากสทฺทา วิย ปณฺณตฺติวเสน ทีปสฺมึ น ปวตฺตติ, ตสฺมา ยถาวุตฺโตเยว นโย มนสิกรณีโย. आदि में, उसी प्रकार 'काक' शब्द कौवे (वायस) के लिए और इसी नाम के दास के लिए भी प्रयुक्त होता है, जैसे "काक बोलता है, काक नामक दास साठ योजन जाता है" आदि में। परन्तु 'जम्बू' शब्द गृहपति आदि के नामों में 'चित्त', 'कुश', 'काक' शब्दों की तरह प्रज्ञप्ति (संज्ञा) के रूप में द्वीप के लिए प्रयुक्त नहीं होता है, इसलिए पूर्वोक्त विधि को ही मन में रखना चाहिए। ยถา ปเนตฺถ ‘‘ลงฺกาทีโป’’ติ สทฺทสฺส นามิกปทมาลา สมาสวเสน พฺยาสวเสน จ โยชิตา, เอวํ ‘‘ปุพฺพวิเทหทีโป, อปรโคยานทีโป, อุตฺตรกุรุทีโป, อสฺสยุชนกฺขตฺตํ, จิตฺรมาโส, เวสฺสนฺตรราชา, เสตวตฺถํ, ทิพฺพรโถ’’ติอาทีนมฺปิ นามิกปทมาลา สมาสวเสน พฺยาสวเสน จ โยเชตพฺพา. ปุพฺพวิเทหาทิสทฺเทหิ ปุพฺพวิเทหทีปาทีนํ กถนญฺจ เวทิตพฺพํ. ‘‘ทิพฺพรโถ’’ติอาทีนํ สมาสคตปทานํ ปโยชเน สติ พฺยาสวเสน วิสุํ กตฺตพฺพตา จ เวทิตพฺพา. ตถา หิ พฺยาสวเสน ‘‘ทิพฺโพ รโถ’’ติอาทินา ทฺวินฺนํ ทฺวินฺนํ ปทานํ สมานาธิกรณวเสน ปจฺเจกวิภตฺติยุตฺตภาเว สติ คาถาสุ วุตฺติปาลนสุขุจฺจารณคุโณ ภวติ. โส จ สาสนานุกูโล หิ อยํ นโย ฐปิโต. ตถา หิ ปาวจเน ‘‘ทิพฺโพ รโถ ปาตุรหุ, เวเทหสฺส ยสสฺสิโน’’ติอาทิกา ปาฬิโย พหู ทิสฺสนฺติ, เอวํ ลงฺกาทีปาทิสทฺทานํ วิเสสวนฺตตา ภวติ. जैसे यहाँ 'लङ्कादीप' शब्द की नामिक पदमाला (शब्द-रूप) समास और व्यास (विग्रह) के अनुसार जोड़ी गई है, वैसे ही 'पुब्बविदेहदीप', 'अपरगोयानदीप', 'उत्तरकुरुदीप', 'अस्सयुजनक्खत्त', 'चित्तमास', 'वेस्सन्तरराजा', 'सेतवत्थ', 'दिब्बरथ' आदि की भी नामिक पदमाला समास और व्यास के अनुसार जोड़नी चाहिए। 'पुब्बविदेह' आदि शब्दों से 'पुब्बविदेहदीप' आदि का कथन समझना चाहिए। 'दिब्बरथ' आदि सामासिक पदों का प्रयोजन होने पर व्यास (विग्रह) के द्वारा उनकी पृथकता भी समझनी चाहिए। क्योंकि व्यास के द्वारा "दिब्बो रथो" (दिव्य रथ) आदि के समान दो-दो पदों के समानाधिकरण होने पर प्रत्येक में विभक्ति युक्त होने से गाथाओं में छन्द-रक्षा और सुखोच्चारण का गुण होता है। यह विधि शासन (बुद्ध-वचन) के अनुकूल ही स्थापित की गई है। क्योंकि पालि (बुद्ध-वचन) में "दिब्बो रथो पातुरहु, वेदेहस्स यसस्सिनो" (यशस्वी विदेह के लिए दिव्य रथ प्रकट हुआ) आदि अनेक पाठ देखे जाते हैं, इस प्रकार लङ्कादीप आदि शब्दों की विशिष्टता होती है। อิทานิ โพธิสนฺธิอาทีนํ วิเสสวนฺตตา วุจฺจติ – अब 'बोधि', 'सन्धि' आदि की विशिष्टता कही जाती है – โพธิ สนฺธิ วิภตฺตา’ยุ, ธาตุเยว ปชาปติ; ทามา ทามํ ตถา สทฺธา, สทฺธํ ตฏํ ตฏี ตโฏ. बोधि, सन्धि, विभक्ति, आयु, धातु और प्रजापति; दामा (स्त्री.) और दाम (नपुं.), उसी प्रकार श्रद्धा (स्त्री.) और श्रद्ध (नपुं.), तट (नपुं.), तटी (स्त्री.) और तट (पुं.)। พฺยญฺชนํ [Pg.332] พฺยญฺชโน อตฺโถ, อตฺถมกฺขรมกฺขโร; อชฺชวํ อชฺชโว เจว, ตถา มทฺทวคารวา. व्यञ्जन (नपुं.) और व्यञ्जन (पुं.), अर्थ (पुं.) और अर्थ (नपुं.), अक्षर (नपुं.) और अक्षर (पुं.); आर्जव (नपुं.) और आर्जव (पुं.) तथा मार्दव और गौरव। วโจ วจีติ จาทีนิ, สมรูปา สรูปโต; ทฺวิตฺติลิงฺคานิ สมฺโภนฺติ, ยถาสมฺภวมุทฺทิเส. 'वच' और 'वाची' आदि शब्द, स्वरूप से समान रूप वाले होकर; दो या तीन लिङ्गों में होते हैं, उन्हें यथासम्भव बताना चाहिए। เอเตสุ หิ โพธิสทฺทสฺส ตาว ‘‘โพธิ ราชกุมาโร’’ติ จ, ‘‘อริยสาวโก ‘โพธี’ติ วุจฺจติ, ตสฺส โพธิสฺส องฺโคติ โพชฺฌงฺโค’’ติ จ เอวํ ปุคฺคลวจนสฺส ‘‘โพธิ, โพธี, โพธโย. โพธึ, โพธี, โพธโย. โพธินา’’ติ ปุลฺลิงฺเค อคฺคินเยน นามิกปทมาลา ภวติ. इनमें से 'बोधि' शब्द के विषय में, पहले "बोधि राजकुमार" और "आर्य श्रावक 'बोधि' कहा जाता है, उस बोधि का अङ्ग बोध्यङ्ग है" - इस प्रकार पुद्गल (व्यक्ति) के अर्थ में 'बोधि, बोधी, बोधयो। बोधिं, बोधी, बोधयो। बोधिना' आदि पुल्लिंग में 'अग्नि' शब्द के अनुसार नामिक पदमाला होती है। รุกฺขมคฺคนิพฺพานสพฺพญฺญุตญฺญาณวจนสฺส ปน ‘‘โพธิ, โพธี, โพธิโย. โพธึ, โพธี, โพธิโย. โพธิยา’’ติ อิตฺถิลิงฺเค รตฺตินเยน นามิกปทมาลา ภวติ. परन्तु वृक्ष, मार्ग, निर्वाण और सर्वज्ञता-ज्ञान के अर्थ में 'बोधि, बोधी, बोधियो। बोधिं, बोधी, बोधयो। बोधिया' आदि स्त्रीलिंग में 'रात्रि' शब्द के अनुसार नामिक पदमाला होती है। เกจิ ปน ‘‘รุกฺขวจโน โพธิสทฺโท ปุลฺลิงฺโค’’ติ วทนฺติ, ตํ อาคเมน วิรุทฺธํ วิย ทิสฺสนโต วิจาเรตพฺพํ. น หิ อาคเม รุกฺขวจนสฺส โพธิสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺคภาโว ทิสฺสติ, ปุคฺคลวจนสฺส ปน ทิสฺสติ. ยทิ จ ‘‘สาโล ธโว ขทีโร’’ติอาทีนํ วิย รุกฺขวจนสฺส โพธิสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺคตฺตํ สิยา, ชมฺพู สิมฺพลี ปาฏลีสทฺทาทีนํ รุกฺขวาจกตฺตา ปุลฺลิงฺคตฺตํ สิยา, น เตสํ อิมสฺส จ รุกฺขวาจกตฺเตปิ ปุลฺลิงฺคภาโว อุปลพฺภติ. ยทิ หิ รุกฺขวจโน โพธิสทฺโท ปุลฺลิงฺโค, เอวํ สนฺเต นิพฺพานวจโน สพฺพญฺญุตญฺญาณวจโน จ โพธิสทฺโท นปุํสกลิงฺโค สิยา ‘‘นิพฺพาน’’นฺติอาทินา นปุํสกลิงฺควเสน นิทฺทิฏฺฐสฺส นิพฺพานาทิโน อตฺถสฺส กถนโต. परन्तु कुछ लोग कहते हैं कि "वृक्षवाची 'बोधि' शब्द पुल्लिंग है", आगम (शास्त्र) से विरुद्ध दिखने के कारण इस पर विचार करना चाहिए। क्योंकि आगम में वृक्षवाची 'बोधि' शब्द का पुल्लिंग होना नहीं देखा जाता, परन्तु पुद्गलवाची का देखा जाता है। और यदि 'साल', 'धव', 'खदिर' आदि के समान वृक्षवाची 'बोधि' शब्द पुल्लिंग होता, तो 'जम्बू', 'सिम्बली', 'पाटली' आदि शब्द भी वृक्षवाचक होने के कारण पुल्लिंग होते, परन्तु वृक्षवाचक होने पर भी उनका और इसका पुल्लिंग होना नहीं पाया जाता। यदि वृक्षवाची 'बोधि' शब्द पुल्लिंग होता, तो निर्वाणवाची और सर्वज्ञता-ज्ञानवाची 'बोधि' शब्द नपुंसक लिंग होता, क्योंकि "निर्वाणम्" आदि के समान नपुंसक लिंग के रूप में निर्दिष्ट निर्वाण आदि के अर्थ का कथन होने से। เย เอวํ วทนฺติ ‘‘รุกฺขวจโน โพธิสทฺโท ปุลฺลิงฺโค’’ติ, เต ‘‘โพธิ วุจฺจติ จตูสุ มคฺเคสุ ญาณํ, ตํ เอตฺถ ภควา ปตฺโตติ [Pg.333] รุกฺโขปิ โพธิจฺเจว วุจฺจตี’’ติ วุตฺตมตฺถํ เจตสิ สนฺนิธาย ‘‘พุชฺฌติ เอตฺถาติ โพธี’’ติ นิพฺพจนวเสน ‘‘กึ รุกฺขวจโน โพธิสทฺโท ปุลฺลิงฺโค น ภวิสฺสตี’’ติ มญฺญมานา วทนฺติ มญฺเญ. เนวํ ทฏฺฐพฺพํ, เอวญฺจ ปน ทฏฺฐพฺพํ, ‘‘โพธิ วุจฺจติ จตูสุ มคฺเคสุ ญาณํ, ตํ เอตฺถ ภควา ปตฺโตติ รุกฺโขปิ โพธิจฺเจว วุจฺจตี’’ติ วทนฺเตหิ ครูหิ ญาณวจนํ อิตฺถิ ลิงฺคภูตํ โพธีติ ญาณสฺส นามํ ปณฺณตฺติอนฺตรปริกปฺปเนนตฺถํ ปริกปฺเปนฺเตน พุชฺฌนฏฺฐานภูเต รุกฺเข อาโรเปตฺวา รุกฺโข ‘‘โพธี’’ติ วุตฺโต, ตสฺมา อีทิเสสุ ฐาเนสุ นิพฺพจเน อาทโร น กาตพฺโพ. น หิ ‘‘พุชฺฌติ เอตฺถาติ โพธี’’ติ นิพฺพจนกรณํ รุกฺขวจนสฺส โพธิสทฺทสฺส ปุลฺลิงฺคตฺตํ กาตุํ สกฺโกติ สงฺเกตสิทฺธตฺตา โวหารสฺส, ตสฺมา รุกฺขํ สยํ อโพธิมฺปิ สมานํ โพธิยา ปฏิลาภฏฺฐานตฺตา สงฺเกตสิทฺเธน ‘‘โพธี’’ติ อิตฺถิลิงฺคโวหาเรน โวหรนฺติ สาสนิกา, โพธิยา วา การณตฺตา ผลโวหาเรน. เอตมตฺถํเยว หิ สนฺธาย ‘‘โพธิ วุจฺจติ จตูสุ มคฺเคสุ ญาณํ, ตํ เอตฺถ ภควา ปตฺโตติ รุกฺโขปิ โพธิจฺเจว วุจฺจตี’’ติ วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ, เอวํ ‘‘โพธี’’ติ อิตฺถิลิงฺควเสน รุกฺขนามํ ปวตฺตตีติ. เตนาห อายสฺมา สาริปุตฺโต ธมฺมเสนาปติ อนุธมฺมจกฺกวตฺตี โวหารกุสโล อิตฺถิลิงฺคโวหาเรน ‘‘พุทฺธานํ ภควนฺตานํ โพธิยา มูเล สห สพฺพญฺญุตญฺญาณปฺปฏิลาภา สจฺฉิกา ปญฺญตฺติ ยทิทํ พุทฺโธ’’ติ. อปิจ ตตฺถ ตตฺถ ‘‘โพธิยา สาขา’’ติ จ, ‘‘เกนฏฺเฐน มหาโพธิ, กสฺส สมฺพนฺธินี จ สา’’ติ จ, जो ऐसा कहते हैं कि "वृक्षवाची 'बोधि' शब्द पुल्लिंग है", वे "चारों मार्गों के ज्ञान को बोधि कहा जाता है, उसे यहाँ भगवान ने प्राप्त किया, इसलिए वृक्ष को भी बोधि ही कहा जाता है" - इस कहे गए अर्थ को मन में रखकर "यहाँ बोध (ज्ञान) प्राप्त होता है, इसलिए बोधि है" - इस व्युत्पत्ति के कारण "क्या वृक्षवाची 'बोधि' शब्द पुल्लिंग नहीं होगा?" - ऐसा मानते हुए कहते हैं। ऐसा नहीं देखना चाहिए, बल्कि ऐसा देखना चाहिए - "चारों मार्गों के ज्ञान को बोधि कहा जाता है, उसे यहाँ भगवान ने प्राप्त किया, इसलिए वृक्ष को भी बोधि ही कहा जाता है" - ऐसा कहने वाले आचार्यों द्वारा स्त्रीलिंग रूप 'बोधि' जो ज्ञान का नाम है, उसे अन्य प्रज्ञप्ति की कल्पना के द्वारा अर्थ की कल्पना करते हुए, बोध के स्थानभूत वृक्ष पर आरोपित करके वृक्ष को 'बोधि' कहा गया है, इसलिए ऐसे स्थानों पर व्युत्पत्ति में आग्रह नहीं करना चाहिए। क्योंकि "यहाँ बोध प्राप्त होता है, इसलिए बोधि है" - ऐसी व्युत्पत्ति करना वृक्षवाची 'बोधि' शब्द को पुल्लिंग बनाने में समर्थ नहीं है, क्योंकि व्यवहार संकेत (रूढ़ि) से सिद्ध होता है। इसलिए, वृक्ष स्वयं 'अबोधि' (ज्ञान रहित) होते हुए भी, बोधि (ज्ञान) की प्राप्ति का स्थान होने के कारण शासन के अनुयायी संकेत-सिद्ध 'बोधि' इस स्त्रीलिंग व्यवहार से व्यवहार करते हैं, अथवा बोधि (फल) के कारण (वृक्ष) में फल के व्यवहार (उपचार) से। इसी अर्थ को ध्यान में रखकर "चारों मार्गों के ज्ञान को बोधि कहा जाता है... वृक्ष को भी बोधि ही कहा जाता है" - ऐसा कहा गया है, इस प्रकार 'बोधि' इस स्त्रीलिंग के रूप में वृक्ष का नाम प्रवृत्त होता है। इसीलिए आयुष्मान सारिपुत्र धर्मसेनापति अनुधम्मचक्रवर्ती, जो व्यवहार में कुशल हैं, ने स्त्रीलिंग व्यवहार के साथ कहा - "बुद्धों, भगवानों की बोधि के मूल में सर्वज्ञता-ज्ञान की प्राप्ति के साथ ही यह 'बुद्ध' ऐसी साक्षात् प्रज्ञप्ति (संज्ञा) होती है।" इसके अतिरिक्त जगह-जगह "बोधि की शाखा" (बोधिया साखा) और "किस अर्थ में महाबोधि है, और वह (सा - स्त्रीलिंग) किसकी सम्बन्धिनी है?" आदि (पाठ देखे जाते हैं)। ‘‘หตฺถโต มุตฺตมตฺตา สา, อสีติรตนํ นภํ; อุคฺคนฺตฺวาน ตทา มุญฺจิ, ฉพฺพณฺณา รสฺมิโย สุภา’’ติ จ ‘‘जैसे ही वह हाथ से मुक्त हुई, वह अस्सी रत्न (हाथ) आकाश में ऊपर उठी और तब उसने छह रंगों वाली शुभ रश्मियाँ छोड़ीं।’’ เอวมาทโย [Pg.334] รุกฺขวาจกสฺส โพธิสทฺทสฺส อิตฺถิลิงฺคภาเว ปโยคา ทิสฺสนฺติ. इस प्रकार वृक्ष के वाचक 'बोधि' शब्द के स्त्रीलिंग होने के प्रयोग देखे जाते हैं। อถ วา รุกฺขวาจโก โพธิสทฺโท ทฺวิลิงฺโค ปุมิตฺถิลิงฺควเสน. ตถา หิ สมนฺตปาสาทิกายํ วินยสํวณฺณนายํ มหาเวยฺยากรณสฺส ปาฬินยวิทุโน พุทฺธโฆสาจริยสฺส เอวํ สทฺทรจนา ทิสฺสติ ‘‘สกฺขิสฺสสิ ตฺวํ ตาต ปาฏลิปุตฺตํ คนฺตฺวา มหาโพธินา สทฺธึ อยฺยํ สงฺฆมิตฺตตฺเถรึ อาเนตุ’’นฺติ จ, ‘‘สาปิ โข มหาโพธิสมารูฬฺหา นาวา ปสฺสโต มหาราชสฺส มหาสมุทฺทตลํ ปกฺขนฺทา’’ติ จ ตสฺส รุกฺขวาจกสฺส โพธิสทฺทสฺส ‘‘พุชฺฌติ เอตฺถาติ โพธี’’ติ นิพฺพจนวเสน ‘‘โพธิ, โพธี, โพธโย. โพธึ, โพธี, โพธโย. โพธินา’’ติอาทินา ปทมาลา เวทิตพฺพา. รุกฺขวาจกสฺเสว ปน ตสฺส ญาเณ ปวตฺติตฺถิลิงฺคโวหาเรน สงฺเกตสิทฺเธน รูฬฺหตฺถทีปเกน ‘‘โพธิ, โพธี, โพธิโย. โพธึ, โพธี, โพธิโย. โพธิยา’’ติอาทินา ปทมาลา เวทิตพฺพา. อิจฺเจวํ – अथवा वृक्ष का वाचक 'बोधि' शब्द पुल्लिंग और स्त्रीलिंग के भेद से द्विलिंगी है। जैसा कि समन्तपासादिका नामक विनय-अट्ठकथा में महान वैयाकरण और पालि पद्धति के ज्ञाता आचार्य बुद्धघोष की यह शब्द-रचना देखी जाती है— ‘तात! तुम पाटलिपुत्र जाकर महाबोधि के साथ आर्या संघमित्ता थेरी को लाने में समर्थ होगे’ और ‘वह महाबोधि पर आरूढ़ नौका, देखते हुए महाराज के (सामने) महासमुद्र के तल में प्रविष्ट हो गई’। उस वृक्षवाचक ‘बोधि’ शब्द की ‘यहाँ बुद्धत्व प्राप्त होता है, इसलिए बोधि’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार ‘बोधि, बोधी, बोधयो। बोधिं, बोधी, बोधयो। बोधिना’ इत्यादि रूप में पदमाला जाननी चाहिए। परंतु उसी वृक्षवाचक शब्द की, ज्ञान में प्रवृत्त स्त्रीलिंग व्यवहार द्वारा संकेत-सिद्ध रूढ़ि अर्थ को प्रकट करने के लिए ‘बोधि, बोधी, बोधियो। बोधिं, बोधी, बोधियो। बोधिया’ इत्यादि रूप में पदमाला जाननी चाहिए। इस प्रकार— ปุคฺคลวาจโก โพธิ-สทฺโท ปุลฺลิงฺคิโก ภเว; ญาณาทิวาจโก อิตฺถิ-ลิงฺโคเยว สิยา สทา. पुद्गल (व्यक्ति) का वाचक ‘बोधि’ शब्द पुल्लिंग होता है; ज्ञान आदि का वाचक (बोधि शब्द) सदा स्त्रीलिंग ही होता है। โพธิปาทปวจโน, ปุมิตฺถิลิงฺคิโก ภเว; เอวํ สนฺเตปิ เอตสฺส, อิตฺถิลิงฺคตฺตเมว ตุ; อิจฺฉิตพฺพตรํ ยสฺมา, ธมฺมเสนาปตีริตํ. बोधि वृक्ष का वाचक (शब्द) पुल्लिंग और स्त्रीलिंग होता है; ऐसा होने पर भी इसका स्त्रीलिंग होना ही अधिक इष्ट है, क्योंकि यह धम्मसेनापति (सारिपुत्र) द्वारा कहा गया है। สนฺธิสทฺทาทีนมฺปิ นยานุสาเรน นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. สนฺธิสทฺโท หิ สรสนฺธิอาทิวาจโก ปุลฺลิงฺโค, ปฏิสนฺธิยาทิวาจโก อิตฺถิลิงฺโค ‘‘สนฺธิโน. สนฺธิยา’’ติอาทิทสฺสนโต. วิภตฺติสทฺโท วิภชนวาจโก อิตฺถิลิงฺโค[Pg.335], สฺยาทิวาจโก ปุลฺลิงฺโค เจว อิตฺถิลิงฺโค จ ‘‘วิภตฺติสฺส. วิภตฺติยา’’ติอาทิทสฺสนโต. संधि शब्द आदि की भी नियम के अनुसार नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। संधि शब्द स्वर-संधि आदि का वाचक होने पर पुल्लिंग है, और प्रतिसंधि आदि का वाचक होने पर स्त्रीलिंग है, जैसा कि ‘संधिनो, संधिया’ इत्यादि के दर्शन से सिद्ध है। विभक्ति शब्द विभाजन का वाचक होने पर स्त्रीलिंग है, और ‘सि’ आदि (प्रत्ययों) का वाचक होने पर पुल्लिंग और स्त्रीलिंग दोनों है, जैसा कि ‘विभत्तिस्स, विभत्तिया’ इत्यादि के दर्शन से सिद्ध है। อายุสทฺโท ปน ชีวิตินฺทฺริยวาจโกเยว หุตฺวา ปุนฺนปุํสกลิงฺโค, ‘‘ปุนรายุ จ เม ลทฺโธ, เอวํ ชานาหิ มาริสา’’ติ ‘‘เอตฺตกํเยว เต อายุ, จวนกาโล ภวิสฺสตี’’ติ จ ทสฺสนโต. आयु शब्द तो जीवितिन्द्रिय का वाचक ही होकर पुल्लिंग और नपुंसक लिंग है, जैसा कि ‘हे मारिष! मुझे पुनः आयु प्राप्त हुई है, ऐसा जानो’ और ‘तुम्हारी इतनी ही आयु है, च्युति का काल होगा’ इत्यादि के दर्शन से सिद्ध है। ธาตุสทฺโท สภาวาทิวาจโก อิตฺถิลิงฺโค, กรปจาทิวาจโก ปุมิตฺถิลิงฺโค ‘‘จกฺขุธาตุยา. กโรติสฺส ธาตุสฺส. ธาตุโย ธาตุยา’’ติ ทสฺสนโต. धातु शब्द स्वभाव आदि का वाचक होने पर स्त्रीलिंग है, और ‘कृ’, ‘पच्’ आदि का वाचक होने पर पुल्लिंग और स्त्रीलिंग है, जैसा कि ‘चक्खुधातुया’, ‘करोतिस्स धातुस्स’, ‘धातुयो, धातुया’ इत्यादि के दर्शन से सिद्ध है। ปชาปติสทฺโท เทววิเสสวาจโก ปุลฺลิงฺโค, กลตฺตชินมาตุจฺฉาวาจโก อิตฺถิลิงฺโค ‘‘ปชาปติสฺส เทวราชสฺส ธชคฺคํ อุลฺโลเกยฺยาถ’’, ‘‘อตฺตโน ปชาปติยา สทฺธึ มหาปชาปติยา’’ติ จ ทสฺสนโต. प्रजापति शब्द विशेष देव का वाचक होने पर पुल्लिंग है, और पत्नी तथा जिन-मातृष्वसा का वाचक होने पर स्त्रीलिंग है, जैसा कि ‘प्रजापति देवराज के ध्वजाग्र को देखें’, ‘अपनी पत्नी के साथ’ और ‘महाप्रजापति के साथ’ इत्यादि के दर्शन से सिद्ध है। ทามา ทามํ สทฺทา มาลตีทามาทิเภทภินฺนสฺส เอกสฺส วตฺถุสฺส ยถากฺกมํ อิตฺถินปุํสกลิงฺคา. ตถา หิ ‘‘มาลตีทามา โลลาฬิงฺคลีลา. มาลตีทามํ. สิงฺฆิตํ ทามํ ภมเรหิ. รตนทามา. รตนทาม’’นฺติ จ ทฺวิลิงฺคภาเว โลกิกปฺปโยคา ทิสฺสนฺติ สาสนานุกูลา. ‘दामा’ और ‘दामं’ शब्द मालती की माला आदि के भेद से भिन्न एक ही वस्तु के क्रमशः स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग हैं। जैसा कि ‘मालतीदामा लोलालिङ्गलीला’, ‘मालतीदामं’, ‘भौरों द्वारा सूंघी गई माला’, ‘रतनदामा’ और ‘रतनदामं’ इत्यादि द्विलिंगी होने के शासन के अनुकूल लौकिक प्रयोग देखे जाते हैं। สทฺธํ สทฺธาสทฺทา ปน ภินฺนวตฺถูนํ วาจกา อิตฺถินปุํสกลิงฺคา, สทฺธาสทฺโท ปสาทลกฺขณวาจโก อิตฺถิลิงฺโค, สทฺธํสทฺโท มตกภตฺตวาจโก นปุํสกลิงฺโค ‘‘สทฺธา สทฺทหนา. มยมสฺสุโภ โคตมพฺราหฺมณา นาม ทานานิ เทม สทฺธานิ กโรมา’’ติ ทสฺสนโต. อิมสฺมึ ปน ฐาเน ‘‘สทฺโธ ปุริโส[Pg.336], สทฺธา อิตฺถี, สทฺธํ กุล’’นฺติ อิมานิ วาจฺจลิงฺคตฺตา สงฺคหํ น คจฺฉนฺตีติ ทฏฺฐพฺพานิ. ‘सद्धं’ और ‘सद्धा’ शब्द तो भिन्न वस्तुओं के वाचक स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग हैं; ‘सद्धा’ शब्द श्रद्धा (प्रसाद) लक्षण का वाचक होने पर स्त्रीलिंग है, और ‘सद्धं’ शब्द मृतक-भोज (श्राद्ध) का वाचक होने पर नपुंसक लिंग है, जैसा कि ‘सद्धा सद्दहना’ और ‘हम उन पूज्य गौतम ब्राह्मण के नाम पर दान देते हैं और श्राद्ध करते हैं’ इत्यादि के दर्शन से सिद्ध है। परंतु इस स्थान पर ‘सद्धो पुरिसो’, ‘सद्धा इत्थी’, ‘सद्धं कुलं’—ये विशेषण होने के कारण संगृहीत नहीं होते, ऐसा समझना चाहिए। ตฏํ ตฏี ตโฏติเม สทฺทา ตีรสงฺขาเต เอกสฺมึเยวตฺเถ ถีปุนฺนปุํสกลิงฺคา. ‘तटं’, ‘तटी’ और ‘तटो’—ये शब्द ‘तीर’ (किनारा) कहे जाने वाले एक ही अर्थ में स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसक लिंग हैं। พฺยญฺชนสทฺโท อุปเสจนลิงฺควากฺยาเวณิกสรีราวยววาจโก นปุํสกลิงฺโค, อกฺขรวาจโก ปุนฺนปุํสกลิงฺโค. ตตฺรุปเสจเน ‘‘สูปํ วา พฺยญฺชนํ วา’’ติ นปุํสกนิทฺเทโส ทิสฺสติ. ตถา ลิงฺเค ‘‘อิตฺถิพฺยญฺชนํ ปุริสพฺยญฺชน’’นฺติ นปุํสกนิทฺเทโส. วากฺเย ‘‘ปทพฺยญฺชนานิ สาธุกํ อุคฺคเหตฺวา’’ติ นปุํสกลิงฺคนิทฺเทโส. อาเวณิเก ‘‘อสีติ อนุพฺยญฺชนานี’’ติ นปุํสกนิทฺเทโส. สรีราวยเว ‘‘กิเลสานํ อนุ อนุ พฺยญฺชนโต ปากฏภาวกรณโต อนุพฺยญฺชน’’นฺติ เอวํ นปุํสกนิทฺเทโส. เอตฺถ หิ อนุพฺยญฺชนํ นาม หตฺถปาทสิตหสิตกถิตวิโลกิตาทิเภโท อากาโร. โส เอว ‘‘สรีราวยโว’’ติ วุจฺจตีติ. อกฺขเร ‘‘พฺยญฺชโน. พฺยญฺชน’’นฺติ จ ปุนฺนปุํสกนิทฺเทโส. व्यंजन शब्द उपसेचन, लिंग, वाक्य, आवेणिक और शरीर के अवयव का वाचक होने पर नपुंसक लिंग है, और अक्षर का वाचक होने पर पुल्लिंग और नपुंसक लिंग है। वहाँ उपसेचन में ‘सूपं वा ब्यञ्जनं वा’ ऐसा नपुंसक लिंग निर्देश देखा जाता है। वैसे ही लिंग में ‘इत्थिब्यञ्जनं पुरिसब्यञ्जनं’ ऐसा नपुंसक लिंग निर्देश है। वाक्य में ‘पदब्यञ्जनानि साधुकं उग्गहेत्वा’ ऐसा नपुंसक लिंग निर्देश है। आवेणिक में ‘असीति अनुब्यञ्जनानि’ ऐसा नपुंसक लिंग निर्देश है। शरीर के अवयव में ‘क्लेशों के पीछे-पीछे प्रकट होने के कारण अनुव्यंजन’ ऐसा नपुंसक लिंग निर्देश है। यहाँ अनुव्यंजन का अर्थ हाथ, पैर, मुस्कान, हँसना, बोलना, देखना आदि के भेद वाला आकार है। वही ‘शरीर का अवयव’ कहा जाता है। अक्षर में ‘ब्यञ्जनो’ और ‘ब्यञ्जनं’ ऐसा पुल्लिंग और नपुंसक लिंग निर्देश है। อตฺถสทฺโท นิพฺพานวจโน นปุํสกลิงฺโค, อภิเธยฺยธนการณปโยชนนิวตฺยาภิสนฺธานาทิวจโน ปน ปุลฺลิงฺโค. ตถา หิ กถาวตฺถุมฺหิ ‘‘อตฺถตฺถมฺหี’’ติ อิมิสฺสา ปาฬิยา อตฺถสํวณฺณนายํ ‘‘อตฺถํ วุจฺจติ นิพฺพาน’’นฺติ นปุํสกลิงฺคนิทฺเทเสน อตฺถสทฺโท วุตฺโต. อิติ อตฺถสทฺโท ทฺวิลิงฺโค. अर्थ शब्द निर्वाण का वाचक होने पर नपुंसक लिंग है, परंतु अभिधेय, धन, कारण, प्रयोजन, निवृत्ति और अभिप्राय आदि का वाचक होने पर पुल्लिंग है। जैसा कि कथावस्तु में ‘अत्थत्थम्हि’ इस पालि की अर्थ-व्याख्या में ‘अत्थं वुच्चति निब्बानं’ इस नपुंसक लिंग निर्देश से ‘अर्थ’ शब्द कहा गया है। इस प्रकार ‘अर्थ’ शब्द द्विलिंगी है। อกฺขรสทฺโท จ ‘‘โย ปุพฺโพ อกฺขโร อกฺขรานี’’ติ จ ทสฺสนโต. อปิจ อกฺขรสทฺโท นิพฺพานวจโน นามปณฺณตฺติวจโน จ สพฺพทานปุํสกลิงฺโค ภวติ ‘‘ปทมจฺจุตมกฺขรํ, มหาชนสมฺมโตติ [Pg.337] โข วาเสฏฺฐ ‘มหาสมฺมโต’ตฺเวว ปฐมํ อกฺขรํ นิพฺพตฺต’’นฺติ เอวมาทีสุ. ‘‘อกฺขราย เทเสติ, อกฺขรกฺขราย อาปตฺติ ปาจิตฺติยสฺสา’’ติ เอตฺถ ปน ปุลฺลิงฺโคติปิ นปุํสกลิงฺโคติปิ วตฺตพฺโพ, อิตฺถิลิงฺโคติ ปน น วตฺตพฺโพ. อยญฺหิ ‘‘อสกฺกตา จสฺม ธนญฺจยาย. วิรมถายสฺมนฺโต มมวจนายา’’ติอาทีสุ ‘‘ธนญฺจยาย, วจนายา’’ติ สทฺทา วิย วิภตฺติวิปลฺลาเสน วุตฺโต, น ลิงฺควิปลฺลาสวเสนาติ. अक्खर (अक्षर) शब्द 'यो पुब्बो अक्खरो अक्खरानीति' इत्यादि प्रयोगों से देखा जाता है। इसके अतिरिक्त, अक्खर शब्द निर्वाणवाचक और नाम-प्रज्ञप्तिवाचक होने पर सदा नपुंसकलिङ्ग होता है, जैसे 'पदमच्चुतमक्खरं' (अच्युत पद अक्षर है), 'महाजनसम्मत इति खो वासेट्ठ महासम्मतोत्वेव पठमं अक्खरं निब्बत्तं' (हे वासेट्ठ! महाजन द्वारा सम्मत होने के कारण 'महासम्मत' यह प्रथम अक्षर/नाम उत्पन्न हुआ) इत्यादि में। 'अक्खराय देसेति, अक्खरक्खराय आपत्ति पाचित्तियस्स' यहाँ तो पुल्लिंग अथवा नपुंसकलिङ्ग कहना चाहिए, किन्तु स्त्रीलिंग नहीं कहना चाहिए। क्योंकि यह 'असक्कता चस्म धनञ्जयाय। विरमथायस्मन्तो ममवचनाया' इत्यादि में 'धनञ्जयाय, वचनाय' शब्दों की तरह विभक्ति-विपर्यास (विभक्ति के परिवर्तन) के कारण कहा गया है, न कि लिङ्ग-विपर्यास के कारण। อชฺชว มทฺทว คารวสทฺทา ปน ปุนฺนปุํสกลิงฺคา. ‘‘อชฺชโว จ มทฺทโว จ. อชฺชวมทฺทวํ. คารโว จ นิวาโต จ. สห อาวชฺชิเต ถูเป, คารวํ โหติ เม ตทา’’ติ จ อาทิทสฺสนโต. अज्जव (आर्जव), मद्दव (मार्दव) और गारव (गौरव) शब्द तो पुल्लिंग और नपुंसकलिङ्ग हैं। जैसा कि 'अज्जवो च मद्दवो च। अज्जवमद्दवं। गारवो च निवातो च। सह आवज्जिते थूपे, गारवं होति मे तदा' इत्यादि में देखा जाता है। วโจวจีสทฺทา ปน ฆโฏฆฏีสทฺทา วิย ปุมิตฺถิลิงฺคา, ตตฺถ วจีสทฺทสฺส ‘‘วจี, วจี, วจิโย. วจึ, วจี, วจิโย. วจิยา’’ติ นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. เกจิ ‘‘ทุจฺจริตปโยควิญฺญตฺติสทฺทาทีสุ ปเรสุ วจสทฺทสฺสนฺโต อีกาโร โหติ, เตน ‘‘วจีทุจฺจริต’’นฺติอาทีนิ รูปานิ ทิสฺสนฺตี’’ติ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ วจสทฺทโต วิสุํ วจีสทฺทสฺส ทสฺสนโต. อตฺริมานิ ปาฬิโต จ อฏฺฐกถาโต จ นิทสฺสนปทานิ. ‘‘วจี วจีสงฺขาโร, วจีสงฺขาโร วจี, วจิญฺจ วจีสงฺขาเร จ ฐเปตฺวา อวเสสา น เจว วจี, น จ วจีสงฺขาโร. คทิโต วจีภิ สติมาภินนฺเท’’ติ อิมานิ ปาฬิโต นิทสฺสนปทานิ. ‘‘โจปนสงฺขาตา วจี เอว วิญฺญตฺติ วจีวิญฺญตฺติ, วจิยา เภโท วจีเภโท’’ติ อิมานิ อฏฺฐกถาโต นิทสฺสนปทานิ. อิมินา นเยน อญฺเญสมฺปิ สรูปาสรูปปทานํ [Pg.338] ยถารหํ ทฺวิติลิงฺคตา ววตฺถเปตพฺพา. เอวํ อภิเธยฺยกลิงฺเคสุ สวิเสสานิ อภิเธยฺยลิงฺคานิ เวทิตพฺพานิ. वच और वची शब्द तो घट और घटी शब्दों के समान पुल्लिंग और स्त्रीलिंग हैं; वहाँ वची शब्द की 'वची, वची, वचियो। वचिं, वची, वचियो। वचिया' ऐसी नामिक पदमाला (शब्द-रूप) जोड़नी चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि 'दुच्चरित-पयोग-विञ्ञत्ति' आदि शब्दों के परे होने पर वच शब्द का अन्त्य ई-कार हो जाता है, जिससे 'वचीदुच्चरितं' आदि रूप दिखाई देते हैं; इसे स्वीकार नहीं करना चाहिए क्योंकि वच शब्द से अलग वची शब्द देखा जाता है। पालि और अट्ठकथा से ये उदाहरण शब्द हैं - 'वची वचीसङ्खारो, वचीसङ्खारो वची, वचिञ्च वचीसङ्खारे च ठपत्वा अवसेसा न चेव वची, न च वचीसङ्खारो। गदितो वचीभि सतिमाभिनन्दे' ये पालि से उदाहरण शब्द हैं। 'चोपनसङ्खाता वची एव विञ्ञत्ति वचीविञ्ञत्ति, वचिया भेदो वचीभेदो' ये अट्ठकथा से उदाहरण शब्द हैं। इसी विधि से अन्य समान रूप और असमान रूप वाले शब्दों की भी यथायोग्य दो या तीन लिङ्गों वाली व्यवस्था करनी चाहिए। इस प्रकार अभिधेय-लिङ्गों में विशेष सहित अभिधेय-लिङ्गों को जानना चाहिए। อิทานิ กตฺถจิ วาจฺจลิงฺคภูตานํ อภิเธยฺยลิงฺคานญฺจ ตทฺธิภนฺตลิงฺคานญฺจ ธมฺมาทิวเสน นามิกปทมาลา วุจฺจเต. ตถา หิ – अब कहीं वाच्यलिङ्ग (विशेषण) रूप और अभिधेयलिङ्ग (विशेष्य) रूप तथा तद्धितान्त लिङ्गों की धर्म आदि के अनुसार नामिक पदमाला कही जाती है। जैसे कि - ธมฺมโภ ปุคฺคลา เจว, ธมฺมปุคฺคลโตปิ จ; เอกนฺตธมฺมโต เจว, ตเถเวกนฺตปุคฺคลา. धर्म (गुण) और पुद्गल (व्यक्ति) के रूप में, धर्म-पुद्गल के रूप में, एकान्त धर्म के रूप में और वैसे ही एकान्त पुद्गल के रूप में। ปทมาลา สิยุํ ตาสุ, ปจฺจตฺตาทิวเสน ตุ; ปทํ สมํ วิสมญฺจ, ชญฺญา สพฺพสมมฺปิ จ. उनमें प्रथमा आदि के अनुसार पदमालाएँ होती हैं; पद को समान, विषम और सर्वसमान जानना चाहिए। กถํ? ‘‘มิจฺฉาทิฏฺฐิ, มิจฺฉาสงฺกปฺโป, มิจฺฉาวาจา, มิจฺฉาวาโจ, มิจฺฉาทิฏฺฐิโก, มิจฺฉาสงฺกปฺปี’’ อิจฺเจเตสํ นามิกปทมาลา เอวํ เวทิตพฺพา. कैसे? 'मिच्छादिट्ठि, मिच्छासङ्कप्पो, मिच्छावाचा, मिच्छावाचो, मिच्छादिट्ठिको, मिच्छासङ्कप्पी' - इन सबकी नामिक पदमाला इस प्रकार जाननी चाहिए। ‘‘มิจฺฉาทิฏฺฐิ, มิจฺฉาทิฏฺฐี, มิจฺฉาทิฏฺฐิโย. มิจฺฉาทิฏฺฐึ, มิจฺฉาทิฏฺฐี, มิจฺฉาทิฏฺฐิโย. มิจฺฉาทิฏฺฐิยา’’ติ เอวํ ธมฺมโต, ‘‘มิจฺฉาทิฏฺฐิ, มิจฺฉาทิฏฺฐี, มิจฺฉาทิฏฺฐิโน. มิจฺฉาทิฏฺฐึ, มิจฺฉาทิฏฺฐี, มิจฺฉาทิฏฺฐิโน. มิจฺฉาทิฏฺฐินา’’ติ เอวํ ปุคฺคลโต, ‘‘มิจฺฉาสงฺกปฺโป, มิจฺฉาสงฺกปฺปา. มิจฺฉาสงฺกปฺป’’นฺติ เอวํ ธมฺมปุคฺคลโต, ‘‘มิจฺฉาวาจา, มิจฺฉาวาจา, มิจฺฉาวาจาโย. มิจฺฉาวาจํ, มิจฺฉาวาจา มิจฺฉาวาจาโย. มิจฺฉาวาจาย’’ เอวํ เอกนฺตธมฺมโต, ‘‘มิจฺฉาวาโจ, มิจฺฉาวาจา. มิจฺฉาวาจํ, มิจฺฉาวาเจ. มิจฺฉาวาเจน’’ เอวํ เอกนฺตปุคฺคลโต, ‘‘มิจฺฉาทิฏฺฐิโก. มิจฺฉาทิฏฺฐิกา. มิจฺฉาทิฏฺฐิก’’นฺติ เอวมฺปิ เอกนฺตปุคฺคลโต, ‘‘มิจฺฉาสงฺกปฺปี, มิจฺฉาสงฺกปฺปิโน. มิจฺฉาสงฺกปฺปิ’’นฺติ เอวมฺปิ เอกนฺตปุคฺคลโต นามิกปทมาลา ภวติ. ปจฺจตฺโตปโยควจนาทิวเสน ปน ปทํ สทิสํ วิสทิสํ สพฺพถา สทิสมฺปิ จ ภวติ. เอส นโย สมฺมาทิฏฺฐิสมฺมาสงฺกปฺปาทีสุปิ. 'मिच्छादिट्ठि, मिच्छादिट्ठी, मिच्छादिट्ठियो। मिच्छादिट्ठिं, मिच्छादिट्ठी, मिच्छादिट्ठियो। मिच्छादिट्ठिया' इस प्रकार धर्म (गुण) के रूप में; 'मिच्छादिट्ठि, मिच्छादिट्ठी, मिच्छादिट्ठिनो। मिच्छादिट्ठिं, मिच्छादिट्ठी, मिच्छादिट्ठिनो। मिच्छादिट्ठिना' इस प्रकार पुद्गल (व्यक्ति) के रूप में; 'मिच्छासङ्कप्पो, मिच्छासङ्कप्पा। मिच्छासङ्कप्पं' इस प्रकार धर्म-पुद्गल के रूप में; 'मिच्छावाचा, मिच्छावाचा, मिच्छावाचायो। मिच्छावाचं, मिच्छावाचा मिच्छावाचायो। मिच्छावाचाय' इस प्रकार एकान्त धर्म के रूप में; 'मिच्छावाचो, मिच्छावाचा। मिच्छावाचं, मिच्छावाचे। मिच्छावाचेन' इस प्रकार एकान्त पुद्गल के रूप में; 'मिच्छादिट्ठिको। मिच्छादिट्ठिका। मिच्छादिट्ठिकं' इस प्रकार भी एकान्त पुद्गल के रूप में; 'मिच्छासङ्कप्पी, मिच्छासङ्कप्पिनो। मिच्छासङ्कप्पि' इस प्रकार भी एकान्त पुद्गल के रूप में नामिक पदमाला होती है। प्रथमा और द्वितीया विभक्ति आदि के अनुसार पद समान, असमान और सर्वथा समान भी होता है। यही नियम सम्मादिट्ठि, सम्मासङ्कप्प आदि में भी है। อตฺริเม [Pg.339] อาหจฺจภาสิตา ปโยคา – อวิชฺชาคตสฺส ภิกฺขเว อวิทฺทสุโน มิจฺฉาทิฏฺฐิ ปโหติ. มิจฺฉาทิฏฺฐิสฺส มิจฺฉาสงฺกปฺโป ปโหติ. มิจฺฉาสงฺกปฺปสฺส มิจฺฉาวาจา ปโหติ. มิจฺฉาวาจสฺส มิจฺฉากมฺมนฺโต ปโหติ. มิจฺฉากมฺมนฺตสฺส มิจฺฉาอาชีโว ปโหติ. มิจฺฉาอาชีวสฺส มิจฺฉาวายาโม ปโหติ. มิจฺฉาวายามสฺส มิจฺฉาสติ ปโหติ. มิจฺฉาสติสฺส มิจฺฉาสมาธิ ปโหตีติ. วิชฺชาคตสฺส ภิกฺขเว วิทฺทสุโน สมฺมาทิฏฺฐิ ปโหติ. สมฺมาทิฏฺฐิสฺส สมฺมาสงฺกปฺโป ปโหตีติ วิตฺถาโร, เอวํ กตฺถจิ วาจฺจลิงฺคภูตานํ อภิเธยฺยลิงฺคานญฺจ ตทฺธิตนฺตลิงฺคานญฺจ นามิกปทมาลา สปฺปโยคา กถิตา. यहाँ ये आगम-वचन (साक्षात् बुद्ध वचन) के प्रयोग हैं - भिक्षुओं, अविद्याग्रस्त अज्ञानी की मिथ्यादृष्टि उत्पन्न होती है। मिथ्यादृष्टि वाले का मिथ्या संकल्प उत्पन्न होता है। मिथ्या संकल्प वाले की मिथ्या वाणी उत्पन्न होती है। मिथ्या वाणी वाले का मिथ्या कर्मान्त उत्पन्न होता है। मिथ्या कर्मान्त वाले की मिथ्या आजीविका उत्पन्न होती है। मिथ्या आजीविका वाले का मिथ्या व्यायाम उत्पन्न होता है। मिथ्या व्यायाम वाले की मिथ्या स्मृति उत्पन्न होती है। मिथ्या स्मृति वाले का मिथ्या समाधि उत्पन्न होता है। भिक्षुओं, विद्या प्राप्त विद्वान की सम्यग्दृष्टि उत्पन्न होती है। सम्यग्दृष्टि वाले का सम्यक् संकल्प उत्पन्न होता है - इत्यादि विस्तार से। इस प्रकार कहीं वाच्यलिङ्ग रूप और अभिधेयलिङ्ग तथा तद्धितान्त लिङ्गों की नामिक पदमाला प्रयोगों सहित कही गई है। อิทานิ เนวาภิเธยฺยลิงฺคสฺส ภวิตพฺพสทฺทสฺส จ อภิเธยฺยลิงฺคานํ โสตฺถิ สุวตฺถิ สทฺทานญฺจ วาจฺจลิงฺคาภิเธยฺยลิงฺคสฺส อพฺภุตสทฺทสฺส จ วาจฺจลิงฺคสฺส อภูตสทฺทสฺสจาติ อิเมสํ กิญฺจิ วิเสสํ กถยาม, นามิกปทมาลญฺจ ยถารหํ โยเชสฺสาม. เอเตสุ หิ ภวิตพฺพสทฺโท เอกนฺตภาววาจโก นปุํสกลิงฺโค เอกวจนนฺโตเยว โหติ. ตติยนฺตปเทหิ เอวํสทฺท นสทฺทาทีหิ จ โยเชตพฺโพ จ โหติ. นาสฺส นามิกปทมาลา ลพฺภติ, อตฺริเม จ ปโยคา ‘‘สทฺธมฺมครุเกน ภวิตพฺพํ, โน อามิสครุเกน, อิมินา โจเรน ภวิตพฺพํ, อิเมหิ โจเรหิ ภวิตพฺพํ, อิมาย โจริยา ภวิตพฺพํ, อิมาหิ โจรีหิ ภวิตพฺพํ, อเนน จิตฺเตน ภวิตพฺพํ, อิเมหิ จิตฺเตหิ ภวิตพฺพํ, เอวํ ภวิตพฺพํ, อญฺญถา ภวิตพฺพ’’นฺติ. อตฺริทํ วุจฺจติ – अब हम 'अभिधेयलिंग' (विशेष्य के लिंग के अनुसार) और 'भवितब्ब' शब्द के, तथा 'अभिधेयलिंग' वाले 'सोत्थि' (स्वस्ति) और 'सुवत्थि' शब्दों के, और 'वाच्यलिंग-अभिधेयलिंग' वाले 'अब्भुत' शब्द के तथा 'वाच्यलिंग' वाले 'अभूत' शब्द के कुछ विशेष अंतर को कहेंगे, और यथायोग्य नामिक पदमाला (शब्द-रूप) को जोड़ेंगे। इनमें 'भवितब्ब' शब्द एकांततः 'भाव' (होना) का वाचक, नपुंसक लिंग और एकवचन में ही होता है। इसे तृतीया विभक्ति वाले पदों और 'एवं', 'न' आदि शब्दों के साथ जोड़ना चाहिए। इसकी (सामान्य) नामिक पदमाला नहीं प्राप्त होती है, और यहाँ ये प्रयोग हैं - 'सद्धम्मगरुकेन भवितब्बं' (सद्धर्म को गुरु मानने वाला होना चाहिए), 'नो आमिसगरुकेन' (आमिष को गुरु मानने वाला नहीं), 'इमिना चोरेन भवितब्बं' (यह चोर होना चाहिए), 'इमेहि चोरेहि भवितब्बं' (ये चोर होने चाहिए), 'इमाय चोरिया भवितब्बं' (यह चोरनी होनी चाहिए), 'इमाहि चोरीहि भवितब्बं' (ये चोरनियाँ होनी चाहिए), 'अनेन चित्तेन भवितब्बं' (यह चित्त होना चाहिए), 'इमेहि चित्तेहि भवितब्बं' (ये चित्त होने चाहिए), 'एवं भवितब्बं' (ऐसा होना चाहिए), 'अञ्ञथा भवितब्बं' (अन्यथा होना चाहिए)। यहाँ यह कहा जाता है - ภวิตพฺพปทํ นิจฺจํ, สพฺพญฺญุวรสาสเน; ปฐเมกวโจ ภาว-วาจกญฺจ นปุํสกํ. सर्वज्ञ (बुद्ध) के श्रेष्ठ शासन में 'भवितब्ब' पद नित्य ही प्रथमा विभक्ति, एकवचन, भाववाचक और नपुंसक लिंग होता है। ตติยนฺตปเทเหวํ-สทฺทาทีหิ [Pg.340] จ ธีมตา; โยเชตพฺพํว สมฺโภติ, อิติ วิทฺวา วิภาวเย. बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा इसे तृतीया विभक्ति वाले पदों और 'एवं' आदि शब्दों के साथ ही जोड़ना संभव होता है, ऐसा विद्वान को समझना चाहिए। อยํ ‘‘ภวิตพฺพ’’นฺติ ปทสฺส วิเสโส. यह 'भवितब्ब' पद की विशेषता है। โสตฺถิ ภทฺทนฺเต โหตุ รญฺโญ, โสตฺถึ คจฺฉติ นฺหาปิโต. โสตฺถินามฺหิ สมุฏฺฐิโต. สุวตฺถิ, สุวตฺถึ, สุวตฺถินา, อยํ ธสาตฺถิสทฺทาทีนํ วิเสโส. 'सोत्थि भद्दन्ते होतु रञ्ञो' (हे भदन्त! राजा का कल्याण हो), 'सोत्थिं गच्छति न्हापितो' (नाई कुशलतापूर्वक जाता है)। 'सोत्थिनम्हि समुट्ठितो' (मैं कुशलता में स्थित हूँ)। 'सुवत्थि', 'सुवत्थिं', 'सुवत्थिना' - यह 'धसात्थि' आदि शब्दों की विशेषता है। อยํ ปน ‘‘อพฺภุตํ อภูต’’นฺติ ทฺวินฺนํ วิเสโส. ภูสทฺทสฺส พฺภู, สํโยคปเร ปฏิเสธตฺถวติ ออิตินิปาเต อุปปเท สติ เอกนฺเตน รสฺสตฺตมุปยาติ. กฺวตฺเถ? ‘‘อภูตปุพฺพํ ภูต’’นฺติอาทีสฺวตฺเถสุ. ตถาวิเธ อสญฺโญคปเร รสฺสตฺตํ น อุปยาติ. กฺวตฺเถ? ‘‘อสจฺจ’’นฺติอาทีสฺวตฺเถสุ. ตถา หิ ‘‘อพฺภุต’’นฺติ ปทสฺส ‘‘อภูตปุพฺพํ ภูต’’นฺติปิ อตฺโถ ภวติ, ‘‘อพฺภุตกรณ’’นฺติปิ อตฺโถ ภวติ. ‘‘อภูต’’นฺติ ปทสฺส ปน ‘‘อสจฺจ’’นฺติปิ อตฺโถ ภวติ, ‘‘อชาต’’นฺติปิ อตฺโถ ภวติ. ตตฺร ‘‘อจฺฉริยํ วต โภ อพฺภุตํ วต โภ. อจฺเฉรํ วต โลกสฺมึ, อพฺภุตํ โลมหํสนํ’’ อิจฺเจวมาทโย ‘‘อภูตปุพฺพํ ภูต’’นฺติ อตฺเถ ปโยคา. यह 'अब्भुत' और 'अभूत' इन दोनों का विशेष अंतर है। 'भू' शब्द का 'ब्भु' हो जाता है, संयोग (द्वित्व) परे होने पर और निषेधार्थक 'अ' निपात उपपद होने पर वह निश्चित रूप से ह्रस्व हो जाता है। किस अर्थ में? 'अभूतपुब्बं भूतं' (जो पहले कभी नहीं हुआ, वह हुआ) आदि अर्थों में। उस प्रकार के असंयोग परे होने पर ह्रस्व नहीं होता है। किस अर्थ में? 'असच्चं' (असत्य) आदि अर्थों में। क्योंकि 'अब्भुत' पद का अर्थ 'अभूतपुब्बं भूतं' (अपूर्व घटना) भी होता है और 'अब्भुतकरणं' (आश्चर्यजनक कार्य) भी होता है। 'अभूत' पद का अर्थ 'असच्चं' (असत्य) भी होता है और 'अजातं' (जो उत्पन्न न हुआ हो) भी होता है। वहाँ 'अच्छरियं वत भो अब्भुतं वत भो' (अरे! आश्चर्य है, अरे! अद्भुत है), 'अच्छेरं वत लोकस्मिं, अब्भुतं लोमहंसनं' (लोक में आश्चर्य है, रोंगटे खड़े कर देने वाला अद्भुत है) - इस प्रकार के प्रयोग 'अभूतपुब्बं भूतं' के अर्थ में हैं। ‘‘ตฺวํ มํ นาเคน อาลมฺป,อหํ มณฺฑูกฉาปิยา; โหตุ โน อพฺภุตํ ตตฺถ,อาสหสฺเสหิ ปญฺจหี’’ติ 'तुम मुझे हाथी से डराओ, मैं मेंढकी के बच्चे से; वहाँ हमारा अद्भुत (चमत्कार) होने दो, पाँच हजार (लोगों) के सामने।' อิจฺเจวมาทโย อพฺภุตกรณตฺเถ ปโยคา. เอวํ รสฺสวเสน, ทีฆวเสน ปน นิสฺสํโยเค ‘‘อภูตํ อตจฺฉํ. อตถํ’’อิจฺเจวมาทโย [Pg.341] อสจฺจตฺเถ ปโยคา, ‘‘อภูตํ อชาตํ อสญฺชาต’’นฺติ อิจฺเจวมาทโย อชาตตฺเถ ปโยคา. ภวนฺติ จตฺร – इस प्रकार के प्रयोग 'अद्भुत कार्य' (चमत्कार) के अर्थ में हैं। इस प्रकार ह्रस्व के कारण (अब्भुत), और दीर्घ के कारण असंयोग में 'अभूतं अतच्छं, अतथं' आदि प्रयोग असत्य के अर्थ में हैं, 'अभूतं अजातं असञ्जातं' आदि प्रयोग 'अजात' के अर्थ में हैं। यहाँ ये (गाथाएँ) हैं - ‘‘อภูตปุพฺพํ ภูต’’นฺติ, อตฺถสฺมึ อพฺภุตนฺติทํ; ปทํ วิญฺญูหิ วิญฺเญยฺยํ, รสฺสภาเวน สณฺฐิตํ. 'अभूतपुब्बं भूतं' (जो पहले नहीं हुआ, वह हुआ) इस अर्थ में यह 'अब्भुत' पद विद्वानों द्वारा ह्रस्व भाव में स्थित समझना चाहिए। อพฺภุตกรณตฺเถปิ, อพฺภุตนฺติ ปทํ ตถา; สณฺฐิตํ รสฺสภาเวน, อิติ วิทฺวา วิภาวเย. 'अद्भुत कार्य' (चमत्कार) के अर्थ में भी 'अब्भुत' पद उसी प्रकार ह्रस्व भाव में स्थित होता है, ऐसा विद्वान को समझना चाहिए। อภูตมิติ ทีฆตฺต-วเสน กถิตํ ปน; ปทํ สมธิคนฺตพฺพ-มสจฺจาชาตวาจกํ. किन्तु दीर्घत्व के कारण कहा गया 'अभूत' पद असत्य और अजात (अनुत्पन्न) का वाचक समझना चाहिए। อพฺภุตํ, อพฺภุตานิ. จิตฺตนเยน, อพฺภุโต, อพฺภุตา. อพฺภุตํ, ปุริสนเยน, อพฺภุตา, อพฺภุตา, อพฺภุตาโย. อพฺภุตํ. กญฺญานเยน เญยฺยํ. เอวํ ภูตสทฺทสฺสปิ นามิกปทมาลา ติธา คเหตพฺพา. อตฺร ‘‘อพฺภุต’’มิติ ปทํ วาจฺจลิงฺคมฺปิ ภวติ อภิเธยฺยลิงฺคมฺปิ. ‘‘อภูต’’มิติ ปทํ ปน วาจฺจลิงฺคํ อภิเธยฺยลิงฺคมฺปิ วา สจฺจสทฺโท วิย กตฺถจิ. อิติสฺส ยถารหํ อยมฺปิ สปฺปโยคา นามิกปทมาลา กถิตา. 'अब्भुतं', 'अब्भुतानि' (नपुंसक लिंग)। चित्त के समान (रूप चलेंगे), 'अब्भुतो', 'अब्भुता' (पुल्लिंग)। 'अब्भुतं', पुरुष के समान, 'अब्भुता', 'अब्भुता', 'अब्भुतायो' (स्त्रीलिंग)। 'अब्भुतं' कन्या के समान समझना चाहिए। इसी प्रकार 'भूत' शब्द की भी नामिक पदमाला तीनों लिंगों में ग्रहण करनी चाहिए। यहाँ 'अब्भुत' पद वाच्यलिंग (विशेषण) भी होता है और अभिधेयलिंग (विशेष्य) भी। 'अभूत' पद तो 'सच्च' शब्द की तरह कहीं वाच्यलिंग और कहीं अभिधेयलिंग होता है। इस प्रकार यथायोग्य यह प्रयोगों सहित नामिक पदमाला कही गई। อิทานิ อาคมิกานํ โกสลฺลชนนตฺถํ ปทสโมธานวเสน นามิกปทมาลา วุจฺจเต – พุทฺโธ ภควา, พุทฺธา ภควนฺโต. พุทฺธํ ภควนฺตํ, พุทฺเธ ภควนฺเต. พุทฺเธน ภควตา, เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. อยํ ปทมาลา เอกวจนพหุวจนวเสน เญยฺยา. अब आगम के ज्ञाताओं की कुशलता के लिए पदों के संयोजन के अनुसार नामिक पदमाला कही जाती है - 'बुद्धो भगवा' (बुद्ध भगवान), 'बुद्धा भगवन्तो' (बुद्धगण भगवानगण)। 'बुद्धं भगवन्तं', 'बुद्धे भगवन्ते'। 'बुद्धेन भगवता', शेष का विस्तार कर लेना चाहिए। यह पदमाला एकवचन और बहुवचन के अनुसार समझनी चाहिए। เทวา ตาวตึสา. เทเว ตาวตึเส. เทเวหิ ตาวตึเสหิ. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. พหุวจนวเสน เญยฺยา ปทมาลา. 'देवा तावतिंसा' (तावतिंस देवगण)। 'देवे तावतिंसे'। 'देवेहि तावतिंसेहि'। शेष का विस्तार कर लेना चाहिए। यह पदमाला बहुवचन के अनुसार समझनी चाहिए। โส [Pg.342] ภควา ชานํ ปสฺสํ อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, ตํ ภควนฺตํ ชานนฺตํ ปสฺสนฺตํ อรหนฺตํ สมฺมาสมฺพุทฺธํ, เตน ภควตา ชานตา ปสฺสตา อรหตา สมฺมาสมฺพุทฺเธน, ตสฺส ภควโต ชานโต ปสฺสโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. เอกวจนวเสน เญยฺยา ปทมาลา. 'सो भगवा जानं पस्सं अरहं सम्मासम्बुद्धो' (वे भगवान जानते हुए, देखते हुए, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध हैं), 'तं भगवन्तं जानन्तं पस्सन्तं अरहन्तं सम्मासम्बुद्धं', 'तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन', 'तस्स भगवतो जानतो पस्सतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स'। शेष का विस्तार कर लेना चाहिए। यह पदमाला एकवचन के अनुसार समझनी चाहिए। ราชา สุทฺโธทโน, ราชานํ สุทฺโธทนํ, รญฺญา สุทฺโธทเนน. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. 'राजा सुद्धोदनो' (राजा शुद्धोदन), 'राजानं सुद्धोदनं', 'रञ्ञा सुद्धोदनेन'। शेष का विस्तार कर लेना चाहिए। ราชา ปสฺเสนที โกสโล, ราชานํ ปสฺเสนทึ โกสลํ, รญฺญา ปสฺเสนทินา โกสเลน. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. 'राजा पस्सेनदी कोसलो' (राजा प्रसेनजित कोसल), 'राजानं पस्सेनदिं कोसलं', 'रञ्ञा पस्सेनदिना कोसलेन'। शेष का विस्तार कर लेना चाहिए। ราชา มาคโธ เสนิโย พิมฺพิสาโร, ราชานํ มาคธํ เสนิยํ พิมฺพิสารํ, รญฺญา มาคเธน เสนิเยน พิมฺพิสาเรน. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. 'राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो' (मगध राज श्रेणिक बिम्बिसार), 'राजानं मागधं सेनियं बिम्बिसारं', 'रञ्ञा मागधेन सेनियेन बिम्बिसारेन'। शेष का विस्तार कर लेना चाहिए। ราชา มาคโธ อชาตสตฺตุ เวเทหิปุตฺโต, ราชานํ มาคธํ อชาตสตฺตุํ เวเทหิปุตฺตํ, รญฺญา มาคเธน อชาตสตฺตุนา เวเทหิปุตฺเตน. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. 'राजा मागधो अजातसत्तु वेदेहिपुत्तो' (मगध राज अजातशत्रु वैदेहीपुत्र), 'राजानं मागधं अजातसत्तुं वेदेहिपुत्तं', 'रञ्ञा मागधेन अजातसत्तुना वेदेहिपुत्तेन'। शेष का विस्तार कर लेना चाहिए। มหาปชาปตี โคตมี, มหาปชาปตึ โคตมึ, มหาปชาปติยา โคตมิยาติ ปญฺจกฺขตฺตุํ วตฺตพฺพํ. มหาปชาปติยํ โคตมิยํ, โภติ มหาปชาปติ โคตมิ. 'महापजापती गोतमी' (महाप्रजापती गौतमी), 'महापजापतिं गोतमिं', 'महापजापतिया गोतमिया' - ऐसा पाँच बार कहना चाहिए। 'महापजापतियं गोतमियं', 'भोति महापजापति गोतमि'। มกฺขลิ โคสาโล. มกฺขลึ โคสาลํ. มกฺขลินา โคสาเลน. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. 'मक्खलि गोसालो' (मक्खलि गोशाल)। 'मक्खलिं गोसालं'। 'मक्खलिना गोसालेन'। शेष का विस्तार कर लेना चाहिए। สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานํ สาวกยุคํ. สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานํ สาวกยุคํ, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเนน สาวกยุเคน, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานสฺส [Pg.343] สาวกยุคสฺส. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. สพฺพาเปตา ปทมาลา เอกวจนวเสน เญยฺยา. สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานา อคฺคสาวกา, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเน อคฺคสาวเก, สาริปุตฺตโมคฺคลฺลาเนหิ อคฺคสาวเกหิ. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. พหุวจนวเสน เญยฺยา. อิโต อญฺเญสุปิ เอเสว นโย. सारिपुत्त-मोग्गल्लान श्रावक-युगल। सारिपुत्त-मोग्गल्लान श्रावक-युगल, सारिपुत्त-मोग्गल्लान श्रावक-युगल के द्वारा, सारिपुत्त-मोग्गल्लान श्रावक-युगल का। शेष का विस्तार करना चाहिए। यह पूरी पदमाला एकवचन के अनुसार जाननी चाहिए। सारिपुत्त-मोग्गल्लान अग्रश्रावक (बहुवचन), सारिपुत्त-मोग्गल्लान अग्रश्रावकों को, सारिपुत्त-मोग्गल्लान अग्रश्रावकों के द्वारा। शेष का विस्तार करना चाहिए। बहुवचन के अनुसार जानना चाहिए। इससे अन्य में भी यही नियम है। โส ทาโร, สา ทารา. สํ ทารํ, เส ทาเร. เสน ทาเรน. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. สา นารี, สา นาริโย. สํ นารึ, สา นาริโย. สาย นาริยา. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. สํ กมฺมํ, สานิ กมฺมานิ. เสน กมฺเมน. สํ ผลํ, สานิ ผลานิ. เสน ผเลน. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. वह पत्नी, वे पत्नियाँ। उस पत्नी को, उन पत्नियों को। उस पत्नी के द्वारा। शेष का विस्तार करना चाहिए। वह नारी, वे नारियाँ। उस नारी को, उन नारियों को। उस नारी के द्वारा। शेष का विस्तार करना चाहिए। वह कर्म, वे कर्म। उस कर्म के द्वारा। वह फल, वे फल। उस फल के द्वारा। शेष का विस्तार करना चाहिए। ปฐมํ ฌานํ, ปฐมํ ฌานํ, ปฐเมน ฌาเนน, ปฐมสฺส ฌานสฺส. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. प्रथम ध्यान, प्रथम ध्यान (को), प्रथम ध्यान के द्वारा, प्रथम ध्यान का। शेष का विस्तार करना चाहिए। จตุตฺถี ทิสา, จตุตฺถึ ทิสํ, จตุตฺถิยา ทิสาย. चौथी दिशा, चौथी दिशा को, चौथी दिशा के द्वारा/से। ธมฺมี กถา, ธมฺมึ กถํ, ธมฺมิยา กถาย, ธมฺมิยํ กถายํ. เอวํ อนุปุพฺพี กถา, เอวรูปี กถา. อิมินา นเยน อญฺเญสุปิ ฐาเนสุ ปทสโมธานวเสน ลิงฺคโต จ อนฺตโต จ วจนโต จ อเปกฺขิตพฺพํ. ปทโต จ นานปฺปการา นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. धार्मिक कथा, धार्मिक कथा को, धार्मिक कथा के द्वारा, धार्मिक कथा में। इसी प्रकार अनुपूर्वी कथा, इस प्रकार की कथा। इस नियम से अन्य स्थानों में भी पदों के मेल के अनुसार लिंग, अन्त और वचन के अनुसार विचार करना चाहिए। और पद के अनुसार विभिन्न प्रकार की नामिक पदमाला जोड़नी चाहिए। อิทานิ เอกปฺปการานํ สทฺทานํ ลิงฺคอนฺตวเสน นานตฺตํ เวทิตพฺพํ. กถํ? ยาทิโส, ยาทิสี, ยาทิสํ. ตาทิโส, ตาทิสี, ตาทิสํ. เอตาทิโส, เอตาทิสี, เอตาทิสํ. กีทิโส, กีทิสี, กีทิสํ. อีทิโส, อีทิสี, อีทิสํ. เอทิโส[Pg.344], เอทิสี, เอทิสํ. สทิโส, สทิสี, สทิสํ. กทาจิ ปน ‘‘ยาทิสา ตาทิสา’’ติ เอวมาทีนิ อิตฺถิลิงฺครูปานิปิ ภวนฺติ. นามิกปทมาลา เนสํ ปุริส อิตฺถี จิตฺตนเยน โยเชตพฺพา. अब एक ही प्रकार के शब्दों का लिंग और अन्त के अनुसार भेद जानना चाहिए। कैसे? जैसा (पुं.), जैसी (स्त्री.), जैसा (नपुं.)। वैसा, वैसी, वैसा। इस प्रकार का, इस प्रकार की, इस प्रकार का। कैसा, कैसी, कैसा। ऐसा, ऐसी, ऐसा। ऐसा, ऐसी, ऐसा। समान, समान, समान। कभी-कभी 'यादिसा तादिसा' आदि स्त्रीलिंग रूप भी होते हैं। इनकी नामिक पदमाला पुरुष, स्त्री और चित्त (नपुं.) के नियम के अनुसार जोड़नी चाहिए। อิทานิ สมาสตทฺธิตปทภูตานํ อมมสทฺทาทีนํ นามิกปทมาลา วุจฺจเต – อมโม, อมมา, อมมํ, อมเม. อมเมน. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. अब समास और तद्धित पद बने हुए 'अमम' आदि शब्दों की नामिक पदमाला कही जाती है - अमम (ममतारहित), अमम (बहु.), अमम (नपुं.), अमम (बहु.)। अमम के द्वारा। शेष का विस्तार करना चाहिए। มยฺหโก, มยฺหกา. มยฺหกํ, มยฺหเก. มยฺหเกน. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. मय्हक (पक्षी), मय्हक (बहु.)। मय्हक को, मय्हकों को। मय्हक के द्वारा। शेष का विस्तार करना चाहिए। อามา, อามา, อามาโย. อามํ, อามา, อามาโย. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. आमा (दासी), आमा, आमाएँ। आमा को, आमा, आमाओं को। शेष का विस्तार करना चाहिए। ตตฺร อมโมติ นตฺถิ ตณฺหามมตฺตํ ทิฏฺฐิมมตฺตญฺจ เอตสฺสาติ อมโม, โก โส, อรหาเยวาติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. อปิจ เยสตณฺหาปิ สทิฏฺฐีปิ ‘‘มม อิท’’นฺติ มมตฺตํ น กโรนฺติ, เตปิ อมมาเยว. เอตฺถ จ ‘‘มนุสฺสา ตตฺถ ชายนฺติ, อมมา อปริคฺคหา’’ติ อิทํ สาสนโต นิทสฺสนํ. ‘‘อมโม นิรหงฺกาโร’’ติ อิทํ ปน โลกโต นิทสฺสนํ. อิตฺถิลิงฺเค วตฺตพฺเพ ‘‘อมมา, อมมา, อมมาโย’’ติ ปทมาลา. นปุํสเก วตฺตพฺเพ ‘‘อมมํ, อมมานี’’ติ ปทมาลา. ตตฺร มยฺหโกติ ‘‘อิทมฺปิ มยฺหํ อิทมฺปิ มยฺห’’นฺติ วิปฺปลปตีติ มยฺหโก, เอโก ปกฺขิวิเสโส. วุตฺตญฺเหตํ ชาตเก – वहाँ 'अमम' का अर्थ है - जिसके पास तृष्णा-ममत्व और दृष्टि-ममत्व नहीं है, वह 'अमम' है; वह कौन है, 'अर्हत्' ही है, ऐसा कहना उचित है। इसके अतिरिक्त, जो तृष्णा और दृष्टि होने पर भी 'यह मेरा है' ऐसा ममत्व नहीं करते, वे भी 'अमम' ही हैं। और यहाँ 'मनुष्य वहाँ उत्पन्न होते हैं, जो ममतारहित (अमम) और परिग्रहरहित हैं' - यह शासन (बुद्ध वचन) से उदाहरण है। 'ममतारहित और अहंकाररहित' - यह लोक (सामान्य साहित्य) से उदाहरण है। स्त्रीलिंग में कहे जाने पर 'अममा, अममा, अममायो' यह पदमाला होती है। नपुंसक लिंग में 'अममं, अममानि' यह पदमाला होती है। वहाँ 'मय्हक' का अर्थ है - 'यह भी मेरा है, यह भी मेरा है' ऐसा जो प्रलाप करता है, वह 'मय्हक' है, जो एक विशेष प्रकार का पक्षी है। जातक में यह कहा गया है - ‘‘สกุโณ มยฺหโก นาม, คิริสานุทรีจโร; ปกฺกํ ปิปฺผลิมารุยฺห, ‘มยฺหํ มยฺห’นฺติ กนฺทตี’’ติ. 'मय्हक' नामक पक्षी, जो पर्वत के शिखर की गुफाओं में विचरता है; पके हुए पीपल के पेड़ पर चढ़कर 'मेरा है, मेरा है' (मय्हं मय्हं) चिल्लाता है। อิตฺถิลิงฺเค วตฺตพฺเพ ‘‘มยฺหกี, มยฺหกี, มยฺหกิโย’’ติ ปทมาลา. ตตฺร อามาติ ‘‘อาม อหํ ตุมฺหากํ ทาสี’’ติ เอวํ ทาสิภาวํ ปฏิชานาตีติ อามา. เคหทาสี. วุตฺตญฺเหตํ ชาตเกสุ [Pg.345] ‘‘ยตฺถ ทาโส อามชาโต, ฐิโต ถุลฺลานิ คจฺฉตี’’ติ จ, ‘‘อามาย ทาสาปิ ภวนฺติ โลเก’’ติ จ, ตสฺมา อิมาเนเวตฺถ นิทสฺสนปทานิ. स्त्रीलिंग में कहे जाने पर 'मय्हकी, मय्हकी, मय्हकियो' यह पदमाला होती है। वहाँ 'आमा' का अर्थ है - 'हाँ, मैं आपकी दासी हूँ' इस प्रकार जो दासत्व स्वीकार करती है, वह 'आमा' है। गृह-दासी। जातकों में यह कहा गया है - 'जहाँ घर में पैदा हुआ (आमजात) दास खड़ा होकर कठोर वचन बोलता है' और 'लोक में आमा (दासी) के भी दास होते हैं', इसलिए यहाँ ये ही उदाहरण के पद हैं। อิทานิ กติ กติปย กติมีสทฺทานํ วิเสโส วุจฺจเต ยถารหํ นามิกปทมาลา จ. ตตฺร กติมีสทฺทสฺส นามิกปทมาลา น ลพฺภติ ‘‘อชฺช ภนฺเต กติมี’’ติ เอวํ ปุจฺฉาวเสน อาคตมตฺตโต. กติ กติปยสทฺทานํ ปน ลพฺภเตว, สา จ พหุวจนิกา. วิสุทฺธิมคฺคฏีกายํ ปน กติปยสทฺโท เอกวจนิโก วุตฺโต. กติ ปุริสา ติฏฺฐนฺติ, กติ ปุริเส ปสฺสติ. กติ อิตฺถิโย, กติ กุลานิ. กติ โลกสฺมึ ฉิทฺทานิ ยตฺถ จิตฺตํ น ติฏฺฐติ. กติ กุสลา. กติ ธาตุโย. กติ อายตนานิ. กติหิ ขนฺเธหิ กติหายตเนหิ กติหิ ธาตูหิ สงฺคหิตํ. กติภิ รชมาเนติ, กติภิ ปริสุชฺฌติ. กติปยา ปุริสา, กติปยา อิตฺถิโย, กติปยานิ จิตฺตานิ. อิมา ปน นามิกปทมาลา. अब 'कति', 'कतिपय' और 'कतिमी' शब्दों की विशेषता और यथासंभव नामिक पदमाला कही जाती है। वहाँ 'कतिमी' शब्द की नामिक पदमाला प्राप्त नहीं होती है, क्योंकि वह केवल 'आज कौन सी तिथि (कतिमी) है, भन्ते?' इस प्रकार प्रश्न के रूप में ही आता है। 'कति' और 'कतिपय' शब्दों की तो प्राप्त होती ही है, और वह बहुवचन में होती है। विशुद्धिमार्ग-टीका में 'कतिपय' शब्द एकवचन में कहा गया है। कितने पुरुष खड़े हैं? कितने पुरुषों को देखता है? कितनी स्त्रियाँ? कितने कुल? लोक में कितने छिद्र हैं जहाँ चित्त नहीं ठहरता? कितने कुशल (धर्म)? कितनी धातुएँ? कितने आयतन? कितने स्कन्धों से, कितने आयतनों से, कितनी धातुओं से संगृहीत है? कितनों के द्वारा रंजित होता है? कितनों के द्वारा शुद्ध होता है? कुछ पुरुष, कुछ स्त्रियाँ, कुछ चित्त। ये नामिक पदमालाएँ हैं। กติ. กติหิ, กติภิ. กตินํ. กติสุ. कति (कितने)। कतिहि, कतिभि (कितनों के द्वारा)। कतिनं (कितनों का)। कतिसु (कितनों में)। กติปยา. กติปเยหิ, กติปเยภิ. กติปยานํ. กติปเยสุ. กติปยาโย. กติปยาหิ, กติปยาภิ. กติปยานํ. กติปยาสุ. กติปยานิ. กติปเย. กติปเยหิ, กติปเยภิ. กติปยานํ. กติปเยสูติ. สพฺพาเปตา สตฺตนฺนํ วิภตฺตีนํ วเสน เญยฺยา, สมาสวิธิมฺหิปิ กติ [Pg.346] กติปยสทฺทา พหุวจนวเสเนว โยเชตพฺพา. ‘‘กติสงฺคาติโค ภิกฺขุ, โอฆติณฺโณติ วุจฺจติ. กติปยชนกต’’นฺติอาทีสุ หิ ‘‘กติ กิตฺตกา สงฺคา กติสงฺคา’’ติอาทินา สพฺพทา พหุวจนสมาโส ทฏฺฐพฺโพ. कतिपय (पुं. बहु.)। कतिपयेहि, कतिपयेभि। कतिपयानां। कतिपयेसु। कतिपयायो (स्त्री. बहु.)। कतिपयाहि, कतिपयाभि। कतिपयानां। कतिपयासु। कतिपयानि (नपुं. बहु.)। कतिपये। कतिपयेहि, कतिपयेभि। कतिपयानां। कतिपयेसु। ये सभी सातों विभक्तियों के अनुसार जानने चाहिए, समास विधि में भी 'कति' और 'कतिपय' शब्द बहुवचन के अनुसार ही जोड़ने चाहिए। 'कतिसङ्गातिगो भिक्खु' (कितने संगों को पार किया हुआ भिक्षु), 'ओघतिण्णो' (ओघ को पार किया हुआ) कहा जाता है। 'कतिपयजनकतं' आदि में 'कति (कितने) संग (आसक्तियाँ) कति-संग' आदि के द्वारा हमेशा बहुवचन समास देखना चाहिए। อิทานิ รูฬฺหีสทฺทานํ นามิกปทมาลา วุจฺจเต – อิธ รูฬฺหีสทฺทา นาม เยวาปนกสทฺทาทโย. เยวาปนโก, เยวาปนกา. เยวาปนกํ. เยวาปโน, เยวาปนา. เยวาปนํ. ยํวาปนกํ, ยํวาปนกานิ. เสสํ สพฺพตฺถ วิตฺถาเรตพฺพํ. ตตฺร เยวาปนโกติ ‘‘ผสฺโส โหติ เวทนา โหตี’’ติอาทินา วุตฺตา ผสฺสาทโย วิย สรูปโต อวตฺวา ‘‘เย วา ปน ตสฺมึ สมเย อญฺเญปิ อตฺถิ ปฏิจฺจสมุปฺปนฺนา อรูปิโน ธมฺมา’’ติ เอวํ ‘‘เยวาปนา’’ติ ปเทน วุตฺโต เยวาปนโก, เอวํ ‘‘เยวาปโน’’ติ เอตฺถาปิ. ตถา ‘‘ยํ วา ปนญฺญมฺปิ อตฺถิ รูป’’นฺติ เอวํ ‘‘ยํวาปนา’’ติ ปเทน วุตฺตํ ยํวาปนกํ. เอส นโย ยถารหํ ยสฺสกํ ยตฺถกนฺติอาทีสุปิ เนตพฺโพ. अब रूढ़ि शब्दों की नामिक पदमाला कही जाती है - यहाँ रूढ़ि शब्द 'येवापनक' आदि शब्द हैं। येवापनको, येवापनका। येवापनकं। येवापनो, येवापना। येवापनं। यंवापनकं, यंवापनकानि। शेष सब जगह विस्तार करना चाहिए। वहाँ 'येवापनको' का अर्थ है - 'फस्सो होति वेदना होति' आदि के द्वारा कहे गए स्पर्श आदि के समान स्वरूप से न कहकर 'ये वा पन तस्मिं समये अञ्ञेपि अत्थि पटिच्चसमुप्पन्ना अरूपिनो धम्मा' (जो और भी उस समय अन्य प्रतीत्यसमुत्पन्न अरूपी धर्म हैं) इस प्रकार 'येवापना' इस पद से जो कहा गया है वह 'येवापनको' है, इसी प्रकार 'येवापनो' यहाँ भी। वैसे ही 'यं वा पनञ्ञम्पि अत्थि रूपं' इस प्रकार 'यंवापना' इस पद से जो कहा गया है वह 'यंवापनकं' है। यही नियम यथायोग्य 'यस्सकं', 'यत्थकं' आदि में भी ले जाना चाहिए। เอตฺถ สิยา – นนุ จ โภ ปนสทฺโท นิปาโต, นิปาตานญฺจ อพฺยยภาโว สิทฺโธ ตีสุ ลิงฺเคสุ สพฺพวิภตฺติวจเนสุ จ วยาภาวโต, โส กสฺมา ‘‘เยวาปโน’’ติ โอการนฺโต ชาโตติ? สจฺจํ ปนสทฺโท นิปาโต, โส จ โข ‘‘เย วา ปน ตสฺมึ สมเย’’ติ วา, ‘‘ยํ วา ปนญฺญมฺปี’’ติ วา, ‘‘พฺราหฺมณา ปนา’’ติ วา เอวมาทีสุ นิปาโต, ‘‘เยวาปนโก’’ติ วา, ‘‘เยวาปโน’’ติ วา เอวมาทีสุ นิปาโต นาม น โหติ. อนุกรณมตฺตญฺเหตํ, ตสฺมา อีทิเสสุ ปนสทฺทสหิตา ปโยคา รูฬฺหีสทฺทาติ คเหตพฺพา. ยชฺเชวํ กสฺมา นิพฺพจนมุทาหฏนฺติ? อตฺถสฺส ปากฏีกรณตฺถํ. यहाँ यह (शंका) हो सकती है - हे भो! 'पन' शब्द तो निपात है, और निपातों का अव्यय भाव तीनों लिंगों और सभी विभक्ति-वचनों में व्यय (परिवर्तन) न होने से सिद्ध है, तो वह 'येवापनो' इस प्रकार ओ-कारान्त कैसे हो गया? सत्य है, 'पन' शब्द निपात है, और वह 'ये वा पन तस्मिं समये' अथवा 'यं वा पनञ्ञम्पि' अथवा 'ब्राह्मणा पना' इत्यादि में निपात है, (किन्तु) 'येवापनको' अथवा 'येवापनो' इत्यादि में निपात नहीं होता। यह केवल अनुकरण मात्र है, इसलिए इस प्रकार के 'पन' शब्द सहित प्रयोगों को रूढ़ि शब्द समझना चाहिए। यदि ऐसा है, तो किसलिए उदाहरण दिया गया है? अर्थ को स्पष्ट करने के लिए। ตโยธมฺมชาตกํ[Pg.347]. ตโยธมฺมชาตกํ. ตโยธมฺมชาตเกน. ตโยธมฺมชาตกสฺส. ตโยธมฺมชาตกา, ตโยธมฺมชาตกสฺมา. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. तयोधम्मजातकं (तीन धर्मों वाला जातक)। तयोधम्मजातकं। तयोधम्मजातकेन। तयोधम्मजातकस्स। तयोधम्मजातका, तयोधम्मजातकस्मा। शेष विस्तार करना चाहिए। ตโยสงฺขารา. ตโยสงฺขาเร. ตโยสงฺขาเรหิ, ตโยสงฺขาเรภิ. ตโยสงฺขารานํ. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. तयो सङ्खारा (तीन संस्कार)। तयो सङ्खारे। तयो सङ्खारेहि, तयो सङ्खारेभि। तयो सङ्खारानं। शेष विस्तार करना चाहिए। จตฺตาริปุริสยุโค สงฺโฆ. จตฺตาริปุริสยุคํ สงฺฆํ. จตฺตาริปุริสยุเคน สงฺเฆน. จตฺตาริปุริสยุคสฺส สงฺฆสฺส. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. चत्तारिपुरिसयुगो सङ्घो (चार पुरुष-युगों वाला संघ)। चत्तारिपुरिसयुगं सङ्घं। चत्तारिपुरिसयुगेन सङ्घेन। चत्तारिपुरिसयुगस्स सङ्घस्स। शेष विस्तार करना चाहिए। สโตการี, สโตการี, สโตการิโน. สโตการึ, สโตการี, สโตการิโน. สโตการินา, สโตการีหิ, สโตการีภิ. สโตการิสฺส. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. เอตฺถ สโตการีติ สรตีติ สโต, สโต เอว หุตฺวา กรณสีโลติ สโตการี. सतोकारी, सतोकारी, सतोकारिनो। सतोकारिं, सतोकारी, सतोकारिनो। सतोकारिना, सतोकारीहि, सतोकारीभि। सतोकारिस्स। शेष विस्तार करना चाहिए। यहाँ 'सतोकारी' का अर्थ है - जो स्मरण करता है वह 'सतो' (स्मृतिमान) है, स्मृतिमान होकर ही करने के स्वभाव वाला 'सतोकारी' है। อปเรสมฺปิ รูฬฺหีสทฺทานํ นามิกปทมาลา วุจฺจเต สทฺธิมตฺถวิภาวนาย. องฺคา. องฺเค. องฺเคหิ, องฺเคภิ. องฺคานํ. องฺเคหิ, องฺเคภิ. องฺคานํ. องฺเคสุ. โภนฺโต องฺคา. अन्य भी रूढ़ि शब्दों की नामिक पदमाला अर्थ-विभावन (स्पष्टीकरण) के साथ कही जाती है। अङ्गा। अङ्गे। अङ्गेहि, अङ्गेभि। अङ्गानं। अङ्गेहि, अङ्गेभि। अङ्गानं। अङ्गेसु। भोन्तो अङ्गा। องฺคา ชนปโท. องฺเค ชนปทํ. องฺเคหิ, องฺเคภิ ชนปเทน. องฺคานํ ชนปทสฺส. องฺเคหิ, องฺเคภิ ชนปทสฺมา. องฺคานํ ชนปทสฺส. องฺเคสุ ชนปเท. โภนฺโต องฺคา ชนปท. เอวํ มคธโกสลาทีนมฺปิ โยเชตพฺพา. अङ्गा जनपदो (अंग जनपद)। अङ्गे जनपदं। अङ्गेहि, अङ्गेभि जनपदेन। अङ्गानं जनपदस्स। अङ्गेहि, अङ्गेभि जनपदस्मा। अङ्गानं जनपदस्स। अङ्गेसु जनपदे। भोन्तो अङ्गा जनपदा। इसी प्रकार मगध, कोसल आदि का भी योजन करना चाहिए। อิตฺถิลิงฺเค กาสี, กาสิโย, กาสี, กาสิโย. กาสีหิ, กาสีภิ. กาสีนํ. กาสีหิ, กาสีภิ. กาสีนํ. กาสีสุ. โภติโย กาสิโย. อตฺรายมตฺถวิภาวนา – กาสี, กาสิโย ชนปโท. กาสี, กาสิโย ชนปทํ[Pg.348]. กาสีหิ, กาสีภิ ชนปเทน. กาสีนํ ชนปทสฺส. กาสีหิ, กาสีภิ ชนปทสฺมา. กาสีนํ ชนปทสฺส. กาสีสุ ชนปเท. โภติโย กาสิโย ชนปท. เอวํ อวนฺตีเจตี วชฺชี อิจฺเจเตสมฺปิ ปทานํ โยเชตพฺพา. เตนาหุ อฏฺฐกถาจริยา ‘‘กุรูสุ ชนปเท’’ติ. เอวํ องฺคาทีนิ อตฺถสฺส เอกตฺเตปิ ชนปทนามตฺตา รูฬฺหีวเสน พหุวจนาเนว ภวนฺติ. ตถา หิ ตตฺถ ตตฺถ ‘‘องฺเคสุ วิหรติ. มคเธสุ จาริกํ จรมาโน’’ติอาทินา, ‘‘องฺคานํ มคธานํ กาสีนํ โกสลาน’’นฺติอาทินา จ พหุวจนปาฬิโย ทิสฺสนฺติ. เอวํ รูฬฺหีสทฺทานํ นามิกปทมาลา ภวนฺติ. स्त्रीलिंग में - कासी, कासियो, कासी, कासियो। कासीहि, कासीभि। कासीनं। कासीहि, कासीभि। कासीनं। कासीसु। भोतियो कासियो। यहाँ यह अर्थ-विभावन है - कासी, कासियो जनपदो। कासी, कासियो जनपदं। कासीहि, कासीभि जनपदेन। कासीनं जनपदस्स। कासीहि, कासीभि जनपदस्मा। कासीनं जनपदस्स। कासीसु जनपदे। भोतियो कासियो जनपदा। इसी प्रकार अवन्ती, चेती, वज्जी इन पदों का भी योजन करना चाहिए। इसीलिए अट्ठकथाचार्यों ने कहा है "कुरुसु जनपदे"। इस प्रकार अंग आदि अर्थ की एकता होने पर भी जनपद का नाम होने के कारण रूढ़ि के वश बहुवचन ही होते हैं। क्योंकि वहाँ-वहाँ "अङ्गेसु विहरति", "मगधेसु चारिकं चरमानो" इत्यादि, और "अङ्गानं मगधानं कासीनं कोसलानं" इत्यादि बहुवचन वाली पालियाँ देखी जाती हैं। इस प्रकार रूढ़ि शब्दों की नामिक पदमालाएँ होती हैं। อิทานิ อปราปิ อิโต สวิเสสตรา สทฺทเภเท สมฺโมหวิทฺธํสนการิกา ปรมสุขุมญาณาวหา นามิกปทมาลาโย กถยาม โสตูนํ อตฺถพฺยญฺชนคฺคหเณ ปรมโกสลฺลสมฺปาทนตฺถํ. ตา จ โข ‘‘สมฺพุทฺโธ ปฏิชานาสิ. กสฺสโก ปฏิชานาสิ. อุปาสโก ปฏิชานาสิ. สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เต ปฏิชานโต อิเม ธมฺมา อนภิสมฺพุทฺธา’’ติอาทโย ปาฬินเย นิสฺสาเยว. ตตฺถ สมฺพุทฺโธปฏิชานาสีติ ‘‘ตฺวํ ‘อหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ’ติ ปฏิชานาสี’’ติ อิติสทฺทโลปวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ. เอส นโย ‘‘กสฺสโก ปฏิชานาสี’’ติอาทีสุปิ. ‘‘สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เต ปฏิชานโต’’ติ เอตฺถ ปน ‘‘อหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ’’ติ ปฏิชานนฺตสฺส ตวาติ เอวํ อิติสทฺทโลปโยชนาวเสน อญฺโญ สทฺทสนฺนิเวโส เตเนว อญฺโญ อตฺถปฏิเวโธ จ ภวติ. ‘‘ขีณาสวสฺส เต ปฏิชานโตติ’’อาทีสุปิ เอเสว นโย. อฏฺฐกถายํ ปน สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เต ปฏิชานโตติ ‘‘อหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ, สพฺเพ ธมฺมา มยา อภิสมฺพุทฺธา’’ติ [Pg.349] เอวํ ปฏิชานโต ตวาติ โย อตฺโถ วุตฺโต, โสปิ ยถาทสฺสิโต อตฺโถเยว. เอวํปการํ ญตฺวา ปณฺฑิตชาติเยน กุลปุตฺเตน อมฺเหหิ วุจฺจมานา ‘‘อหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ’ติ ตฺวํ ปฏิชานาสี’’ติ เอตสฺมึ อตฺเถ สกฺริยาปทา อยํ ปทมาลา ววตฺถเปตพฺพา – अब इससे भी अधिक विशेष, शब्द-भेद में सम्मोह (भ्रम) का विनाश करने वाली और परम सूक्ष्म ज्ञान को लाने वाली अन्य नामिक पदमालाएँ श्रोताओं के अर्थ और व्यंजन के ग्रहण में परम कौशल प्राप्त करने के लिए कहते हैं। और वे "सम्बुद्धो पटिजानसि", "कस्सको पटिजानसि", "उपासको पटिजानसि", "सम्मासम्बुद्धस्स ते पटिजानतो इमे धम्मा अनभिसम्बुद्धा" इत्यादि पालि नय के आश्रय से ही हैं। वहाँ 'सम्बुद्धो पटिजानसि' का अर्थ 'इति' शब्द के लोप के कारण "तुम 'मैं सम्म्यासम्बुद्ध हूँ' ऐसा दावा करते हो" इस प्रकार ग्रहण करना चाहिए। यही नियम 'कस्सको पटिजानसि' आदि में भी है। "सम्मासम्बुद्धस्स ते पटिजानतो" यहाँ तो "मैं सम्म्यासम्बुद्ध हूँ ऐसा दावा करने वाले तुम्हारे" इस प्रकार 'इति' शब्द के लोप के योजन के कारण अन्य शब्द-विन्यास और उसी से अन्य अर्थ-प्रतिवेध (बोध) होता है। "खीणासवस्स ते पटिजानतो" आदि में भी यही नियम है। अट्ठकथा में तो "सम्मासम्बुद्धस्स ते पटिजानतो" का जो अर्थ "मैं सम्म्यासम्बुद्ध हूँ, सभी धर्म मेरे द्वारा अभिसम्बुद्ध हैं, ऐसा दावा करने वाले तुम्हारे" कहा गया है, वह भी दिखाए गए अर्थ के समान ही है। इस प्रकार जानकर पंडित जाति के कुलपुत्र द्वारा हमारे द्वारा कही जाने वाली "मैं सम्म्यासम्बुद्ध हूँ ऐसा तुम दावा करते हो" इस अर्थ में क्रिया-पद सहित यह पदमाला व्यवस्थित करनी चाहिए - สมฺมาสมฺพุทฺโธ ตฺวํ ปฏิชานํ ติฏฺฐสิ. สมฺมาสมฺพุทฺธํ ตํ ปฏิชานนฺตํ ปสฺสติ. สมฺมาสมฺพุทฺเธน เต ปฏิชานตา ธมฺโม เทสิโต. สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เต ปฏิชานโต ทียเต. สมฺมาสมฺพุทฺธสฺมา ตยา ปฏิชานตา อเปติ. สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส เต ปฏิชานโต ธมฺโม. สมฺมาสมฺพุทฺธสฺมึ ตยิ ปฏิชานนฺเต ปติฏฺฐิตนฺติ. ตถา ‘‘ขีณาสโว ตฺวํ ปฏิชานาสี’’ติอาทินาปิ วิตฺถาเรตพฺพํ. आप सम्यक्सम्बुद्ध होने की प्रतिज्ञा करते हुए स्थित हैं। सम्यक्सम्बुद्ध होने की प्रतिज्ञा करते हुए आपको (कोई) देखता है। सम्यक्सम्बुद्ध होने की प्रतिज्ञा करने वाले आपके द्वारा धर्म देशित किया गया है। सम्यक्सम्बुद्ध होने की प्रतिज्ञा करने वाले आपको (दान) दिया जाता है। सम्यक्सम्बुद्ध होने की प्रतिज्ञा करने वाले आपसे (दोष) दूर होता है। सम्यक्सम्बुद्ध होने की प्रतिज्ञा करने वाले आपका धर्म है। सम्यक्सम्बुद्ध होने की प्रतिज्ञा करने वाले आपमें (गुण) प्रतिष्ठित हैं। इसी प्रकार 'आप क्षीणास्त्रव होने की प्रतिज्ञा करते हैं' आदि के द्वारा भी विस्तार करना चाहिए। อิทฺธิมา ภิกฺขุ เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหติ, พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหติ. อิทฺธิมนฺโต ภิกฺขู เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺติ, พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺตีติ อิมสฺมึ ปนตฺเถ อยมฺปิ สกฺริยาปทา ปทมาลา ววตฺถเปตพฺพา – ऋद्धिमान भिक्षु एक होकर भी बहुत प्रकार का होता है, और बहुत प्रकार का होकर भी एक होता है। ऋद्धिमान भिक्षु एक होकर भी बहुत प्रकार के होते हैं, और बहुत प्रकार के होकर भी एक होते हैं - इस अर्थ में यह क्रियापद सहित पदमाला भी व्यवस्थित की जानी चाहिए - เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺโต พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺโต ภิกฺขุ ติฏฺฐติ, เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺตา พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺตา ภิกฺขู ติฏฺฐนฺติ. เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺตํ พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺตํ ภิกฺขุํ ปสฺสติ, เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺเต พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺเต ภิกฺขู ปสฺสติ. เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺเตน พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺเตน ภิกฺขุนา ธมฺโม เทสิโต, เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺเตหิ พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺเตหิ ภิกฺขูหิ ธมฺโม เทสิโต. เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺตสฺส พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺตสฺส ภิกฺขุโน ทียเต. เสสํ [Pg.350] วิตฺถาเรตพฺพํ. โภ เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺต พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺต ภิกฺขุ ตฺวํ ธมฺมํ เทเสหิ, โภนฺโต เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺตา พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺตา ตุมฺเห ธมฺมํ เทเสถาติ. อิมสฺมึ ฐาเน เกวฏฺฏสุตฺตํ สาธกํ. ‘‘อิธ เกวฏฺฏ ภิกฺขุ อเนกวิหิตํ อิทฺธิวิธํ ปจฺจนุโภติ. เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหติ, พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหติ, อาวิภาวํ…เป… ตเมนํ อญฺญตโร สทฺโธ ปสนฺโน ปสฺสติ ตํ ภิกฺขุํ อเนกวิหิตํ อิทฺธิวิธํ ปจฺจนุโภนฺตํ เอโกปิ หุตฺวา พหุธา โหนฺตํ พหุธาปิ หุตฺวา เอโก โหนฺต’’นฺติ อิทํ เกวฏฺฏสุตฺตํ. एक होकर भी बहुत प्रकार का होता हुआ और बहुत प्रकार का होकर भी एक होता हुआ भिक्षु स्थित है; एक होकर भी बहुत प्रकार के होते हुए और बहुत प्रकार के होकर भी एक होते हुए भिक्षु स्थित हैं। एक होकर भी बहुत प्रकार का होते हुए और बहुत प्रकार का होकर भी एक होते हुए भिक्षु को (कोई) देखता है; एक होकर भी बहुत प्रकार के होते हुए और बहुत प्रकार के होकर भी एक होते हुए भिक्षुओं को (कोई) देखता है। एक होकर भी बहुत प्रकार का होते हुए और बहुत प्रकार का होकर भी एक होते हुए भिक्षु के द्वारा धर्म देशित किया गया है; एक होकर भी बहुत प्रकार के होते हुए और बहुत प्रकार के होकर भी एक होते हुए भिक्षुओं के द्वारा धर्म देशित किया गया है। एक होकर भी बहुत प्रकार का होते हुए और बहुत प्रकार का होकर भी एक होते हुए भिक्षु को (दान) दिया जाता है। शेष का विस्तार करना चाहिए। हे एक होकर भी बहुत प्रकार का होते हुए और बहुत प्रकार का होकर भी एक होते हुए भिक्षु! तुम धर्म का उपदेश करो; हे एक होकर भी बहुत प्रकार के होते हुए और बहुत प्रकार के होकर भी एक होते हुए भिक्षुओं! तुम सब धर्म का उपदेश करो। इस स्थान पर केवट्ट सुत्त प्रमाण है। 'यहाँ केवट्ट! भिक्षु अनेक प्रकार की ऋद्धि-विधियों का अनुभव करता है। एक होकर भी बहुत प्रकार का होता है, बहुत प्रकार का होकर भी एक होता है, आविर्भाव... पे... उसे कोई श्रद्धालु प्रसन्न (व्यक्ति) देखता है, उस भिक्षु को अनेक प्रकार की ऋद्धि-विधियों का अनुभव करते हुए, एक होकर भी बहुत प्रकार का होते हुए और बहुत प्रकार का होकर भी एक होते हुए' - यह केवट्ट सुत्त है। เอโกเอกาย มาตุคาเมน สทฺธึ รโห นิสชฺชํ กปฺเปนฺโต ภิกฺขุ เอวํ วทติ, เอโกเอกาย มาตุคาเมน สทฺธึ รโห นิสชฺชํ กปฺเปนฺตา ภิกฺขู เอวํ วทนฺติ. เอโกเอกาย มาตุคาเมน สทฺธึ รโห นิสชฺชํ กปฺเปนฺตํ ภิกฺขุํ ปสฺสติ, เอโกเอกาย มาตุคาเมน สทฺธึ รโห นิสชฺชํ กปฺเปนฺเต ภิกฺขู ปสฺสติ. สพฺพํ วิตฺถาเรตพฺพํ. เอตฺถ ปน ‘‘น ตฺเวว เอโกเอกาย, มาตุคาเมน สลฺลเป’’ติอาทิกํ ปาฬิปทํ สาธกํ. เอตฺถ หิ เอโกเอกายาติ อิทํ อพฺยยปทสทิสํ รูฬฺหีปทนฺติ คเหตพฺพํ, อญฺญมญฺญนฺติ สทฺทสฺส วิย จ เอกปทตฺตูปคมนญฺจสฺส เวทิตพฺพํ. ภิกฺขุ วินา ทุติเยน สยํ เอโก หุตฺวา เอกาย อิตฺถิยา สทฺธินฺติ อิมสฺมึ อตฺเถ ‘‘เอโกเอกายา’’ติ อิทํ ปทํ น รูฬฺหีปทนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. เอวํ สนฺเตปิ น ‘‘เอโก’’ติ สทฺโท ‘‘ภิกฺขู’’ติ ปเทน สมานาธิกรโณ. ยทิ สมานาธิกรโณ สิยา, ‘‘นิสชฺชํ กปฺเปนฺต’’นฺติอาทิ น วตฺตพฺพํ สิยา. ‘‘เอกายา’’ติ สทฺโทปิ น อชฺฌาหริตพฺเพน ‘‘อิตฺถิยา’’ติ ปเทน สมานาธิกรโณ. ยทิ สมานาธิกรโณ สิยา, ‘‘มาตุคาเมนา’’ติ [Pg.351] น วตฺตพฺพํ สิยา วิเสสาภาวโต ทฺวิรุตฺตภาวาปชฺชนโต จ. กิญฺจ ภิยฺโย ‘‘มาตุคาเมนา’’ติ วุตฺตตฺตา ‘‘เอเกนา’’ติ วตฺตพฺพํ สิยา, เอกนฺตโต ปน ‘‘เอโกเอกายา’’ติ อิทํ ปทํ ปุมิตฺถิสงฺขาตํ อตฺถํ อเปกฺขติ, น สมานาธิกรณปทํ, ตสฺมา ‘‘ทฺเว ชานิปตโย อญฺญมญฺญํ สลฺลเปนฺตี’’ติอาทีสุ ‘‘อญฺญมญฺญ’’นฺติ ปทสฺส วิย จ ‘‘เอโกเอกายา’’ติ อิมสฺส เอกปทตฺตญฺจ นิสชฺชํ กปฺเปนฺตสฺส ภิกฺขุโน วิเสสนตฺตญฺจ เวทิตพฺพํ. อถ วา ยสฺสํ นิสชฺชกฺริยายํ ภิกฺขุปิ เอโกว โหติ, อิตฺถีปิ เอกาว. สา กฺริยา รูฬฺหีวเสน ‘‘เอโกเอกายา’’ติ วุจฺจติ, ตาทิสาย เอโกเอกาย นิสชฺชกฺริยาย ภิกฺขุ มาตุคาเมน สทฺธินฺติปิ อตฺโถ คเหตพฺโพ. อิมินา นเยน อญฺเญสมฺปิ รูฬฺหีสทฺทานํ นามิกปทมาลา ยถาปโยคํ เอกวจนพหุวจนวเสน โยเชตพฺพา. อิจฺเจวํ วาจฺจาภิเธยฺยลิงฺคาทีนํ นามิกปทมาลา นานปฺปการโต ปกาสิตา. एक-एक (अकेला) महिला के साथ एकांत में बैठने वाला भिक्षु ऐसा कहता है; एक-एक महिला के साथ एकांत में बैठने वाले भिक्षु ऐसा कहते हैं। एक-एक महिला के साथ एकांत में बैठने वाले भिक्षु को (कोई) देखता है; एक-एक महिला के साथ एकांत में बैठने वाले भिक्षुओं को (कोई) देखता है। सब विस्तार करना चाहिए। यहाँ 'न त्वेव एकोएकया, मातुगामेन सल्लपे' (एक-एक महिला के साथ बात न करे) आदि पालि पद प्रमाण है। यहाँ 'एकोएकया' इसे अव्यय पद के समान रूढ़ि पद के रूप में ग्रहण करना चाहिए, और 'अञ्ञमञ्ञं' (एक-दूसरे) शब्द की तरह इसे एक पद के रूप में समझना चाहिए। भिक्षु दूसरे के बिना स्वयं अकेला होकर एक स्त्री के साथ - इस अर्थ में 'एकोएकया' यह पद रूढ़ि पद नहीं है, ऐसा देखना चाहिए। ऐसा होने पर भी 'एको' शब्द 'भिक्खु' पद के साथ समानाधिकरण नहीं है। यदि समानाधिकरण होता, तो 'निसज्जं कप्पेन्तं' आदि नहीं कहना चाहिए था। 'एकया' शब्द भी अध्याहार किए जाने वाले 'इत्थिया' पद के साथ समानाधिकरण नहीं है। यदि समानाधिकरण होता, तो 'मातुगामेन' नहीं कहना चाहिए था, क्योंकि विशेषता के अभाव में द्विरुक्ति का दोष आता। और भी, 'मातुगामेन' कहे जाने के कारण 'एकेन' कहना चाहिए था, परंतु निश्चित रूप से 'एकोएकया' यह पद पुरुष और स्त्री रूप अर्थ की अपेक्षा रखता है, समानाधिकरण पद की नहीं। इसलिए 'द्वे जानिपतयो अञ्ञमञ्ञं सल्लपेन्ति' (दो पति-पत्नी एक-दूसरे से बात करते हैं) आदि में 'अञ्ञमञ्ञं' पद की तरह 'एकोएकया' का एकपदत्व और बैठने वाले भिक्षु के विशेषण के रूप में समझना चाहिए। अथवा जिस बैठने की क्रिया में भिक्षु भी अकेला होता है और स्त्री भी अकेली होती है, वह क्रिया रूढ़ि के कारण 'एकोएकया' कही जाती है, वैसी एक-एक बैठने की क्रिया के द्वारा भिक्षु महिला के साथ (बैठता है) - ऐसा भी अर्थ ग्रहण करना चाहिए। इसी विधि से अन्य रूढ़ि शब्दों की नामिक पदमाला भी प्रयोग के अनुसार एकवचन और बहुवचन के रूप में जोड़नी चाहिए। इस प्रकार वाच्य, अभिधेय, लिंग आदि की नामिक पदमाला अनेक प्रकार से प्रकाशित की गई है। สุมธุรตรสทฺทนิตึ อิมํ,ปฏุตรมติตํ สุสิเข วรํ; วิทุวิมติตโมปหรึ รวึ,มติกุมุทปโพธินิสาปตึ. अत्यंत मधुर इस सद्दनीति को, जो प्रखर बुद्धि वालों के लिए श्रेष्ठ शिक्षा है; विद्वानों के संशय को दूर करने वाले सूर्य के समान और बुद्धि रूपी कुमुद को खिलाने वाले चंद्रमा के समान (इस ग्रंथ को मैंने रचा है)। กตวิญฺญูชนสฺสาส-สาสนสฺสาภิวุทฺธิยา; ธิยา นีติมิมํ สาธุ, สาธุกญฺเญว ลกฺขเย. विद्वानों के आश्वासन और शासन की अभिवृद्धि के लिए, बुद्धि के द्वारा इस नीति (ग्रंथ) को भली-भाँति और अच्छी तरह से ही देखना (समझना) चाहिए। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार अर्थकथा सहित नौ अंगों वाले त्रिपिटक के वचनों के मार्गों में विद्वानों के โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कौशल (निपुणता) के लिए रचित सद्दनीति प्रकरण में วาจฺจาภิเธยฺยลิงฺคาทิปริทีปโน นามิกปทมาลาวิภาโค वाच्य, अभिधेय, लिंग आदि का प्रतिपादन करने वाला नामिक पदमाला विभाग เอกาทสโม ปริจฺเฉโท. ग्यारहवाँ परिच्छेद। เอตฺตาวตา [Pg.352] ภูธาตุมยานํ ปุลฺลิงฺคานํ อิตฺถิลิงฺคานํ นปุํสกลิงฺคานญฺจ นามิกปทมาลา ยถารหํ ลิงฺคนฺตเรหิ สทฺทนฺตเรหิ อตฺถนฺตเรหิ จ สทฺธึ นานปฺปการโต ทสฺสิตา. สพฺพนามานิ หิ ฐเปตฺวา นยโต อญฺญานิ กานิจิ นามานิ อคฺคหิตานิ นาม นตฺถิ. इतने से 'भू' धातु से बने पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंगों की नामिक पदमाला यथायोग्य अन्य लिंगों, अन्य शब्दों और अन्य अर्थों के साथ अनेक प्रकार से दिखाई गई है। सर्वनामों को छोड़कर पद्धति के अनुसार अन्य कोई भी नाम अपगृहीत (छूटा हुआ) नहीं है। ๑๒. สพฺพนามตํสทิสนามนามิกปทมาลา १२. सर्वनाम और उसके समान नामों की नामिक पदमाला। อิโต ปรํ ปวกฺขามิ, สพฺพนามญฺจ ตสฺสมํ; นามญฺจ โยชิตํ นานา-นาเมเหว วิเสสโต. इसके बाद मैं सर्वनाम और उसके समान (शब्दों) को कहूँगा; और विभिन्न नामों के साथ विशेष रूप से प्रयुक्त नाम को भी। ยานิ โหนฺติ ติลิงฺคานิ, อนุกูลานิ ยานิ จ; ติลิงฺคานํ วิเสเสน, ปทาเนตานิ นามโต. जो तीनों लिंगों में होते हैं और जो (उनके) अनुकूल होते हैं; तीनों लिंगों की विशेषता के कारण ये नाम से पद हैं। ‘‘สพฺพสาธารณกานิ, นามานิ’’จฺเจว อตฺถโต; สพฺพนามานิ วุจฺจนฺติ, สตฺตวีสติ สงฺขโต. अर्थ की दृष्टि से "सबके लिए साधारण नाम" ही सर्वनाम कहे जाते हैं, जिनकी संख्या सत्ताईस (27) है। เตสุ กานิจิ รูเปหิ, เสสาญฺเญหิ จ ยุชฺชเร; กานิจิ ปน สเหว, เอเตสํ ลกฺขณํ อิทํ. उनमें से कुछ रूपों के द्वारा और अन्य शेष के साथ जुड़ते हैं; और कुछ साथ ही (जुड़ते हैं), यह इनका लक्षण है। เอตสฺมา ลกฺขณา มุตฺตํ, น ปทํ สพฺพนามิกํ; ตสฺมาตีตาทโย สทฺทา, คุณนามานิ วุจฺจเร. इस लक्षण से मुक्त पद सर्वनाम नहीं है; इसलिए 'अतीत' आदि शब्द गुणवाचक नाम कहे जाते हैं। สพฺพนามานิ นาม – สพฺพ กตร กตม อุภย อิตรอญฺญ อญฺญตร อญฺญตม ปุพฺพ ปร อปร ทกฺขิณ อุตฺตร อธรยต เอต อิม อมุกึ เอก อุภ ทฺวิติ จตุ ตุมฺห อมฺห อิจฺเจตานิ สตฺตวีส. सर्वनाम ये हैं – सब्ब (सब), कतर, कतम, उभय, इतर, अञ्ञ (अन्य), अञ्ञतर, अञ्ञतम, पुब्ब (पूर्व), पर, अपर, दक्खिण (दक्षिण), उत्तर, अधर, य, त, एत, इम, अमु, किं, एक, उभ, द्वि, ति, चतु, तुम्हा, अम्हा - ये सत्ताईस हैं। เอเตสุ สพฺพสทฺโท สกลตฺโถ, โส จ สพฺพสพฺพาทิวเสน เญยฺโย. กตร กตมสทฺทา ปุจฺฉนตฺถา. อุภยสทฺโท ทฺวิอวยวสมุทายวจโน. อิตรสทฺโท วุตฺตปฏิโยคีวจโน. อญฺญสทฺโท อธิคตาปรวจโน. อญฺญตร อญฺญตมสทฺทา อนิยมตฺถา. ปุพฺพาทโย อุตฺตรปริยนฺตา ทิสากาลาทิววตฺถาวจนา. ตถา หิ ปุพฺพ [Pg.353] ปรา ปร ทกฺขิณุตฺตรสทฺทา ปุลฺลิงฺคตฺเต ยถารหํ กาลเทสาทิวจนา, อิตฺถิลิงฺคตฺเต ทิสาทิวจนา, นปุํสกลิงฺคตฺเต ฐานาทิวจนา. อธรสทฺโทปิ เหฏฺฐิมตฺถวาจโก ววตฺถาวจโนเยว, โส จ ติลิงฺโค ‘‘อธโร ปตฺโต. อธรา อรณี, อธรํ ภาชน’’มิติ, ยํสทฺโท อนิยมตฺโถ. ตํสทฺโท ปรมฺมุขาวจโน. เอตสทฺโท สมีปวจโน. อิมสทฺโท อจฺจนฺตสมีปวจโน. อมุสทฺโท ทูรวจโน. กึสทฺโท ปุจฺฉนตฺโถ. เอกสทฺโท สงฺขาทิวจโน. วุตฺตญฺหิ – इनमें 'सब्ब' शब्द 'सकल' (सम्पूर्ण) के अर्थ में है, और उसे 'सब्ब-सब्ब' आदि के भेद से जानना चाहिए। 'कतर' और 'कतम' शब्द प्रश्न के अर्थ में हैं। 'उभय' शब्द दो अवयवों के समुदाय का वाचक है। 'इतर' शब्द कहे गए के प्रतिपक्षी (दूसरे) का वाचक है। 'अञ्ञ' शब्द प्राप्त से अन्य का वाचक है। 'अञ्ञतर' और 'अञ्ञतम' शब्द अनिश्चित अर्थ वाले हैं। 'पुब्ब' से लेकर 'उत्तर' तक के शब्द दिशा, काल आदि की व्यवस्था के वाचक हैं। जैसे कि 'पुब्ब', 'पर', 'अपर', 'दक्खिण' और 'उत्तर' शब्द पुल्लिंग में यथासंभव काल और देश आदि के वाचक होते हैं, स्त्रीलिंग में दिशा आदि के वाचक होते हैं, और नपुंसक लिंग में स्थान आदि के वाचक होते हैं। 'अधर' शब्द भी नीचे के अर्थ का वाचक और व्यवस्थावाचक ही है, और वह तीनों लिंगों में होता है जैसे 'अधरो पत्तो' (नीचा पत्ता), 'अधरा अरणी' (नीची अरणी), 'अधरं भाजनं' (नीचा बर्तन)। 'य' शब्द अनिश्चित अर्थ वाला है। 'त' शब्द परोक्ष (वह) का वाचक है। 'एत' शब्द समीप का वाचक है। 'इम' शब्द अत्यंत समीप का वाचक है। 'अमु' शब्द दूर का वाचक है। 'किं' शब्द प्रश्न के अर्थ में है। 'एक' शब्द संख्या आदि का वाचक है। जैसा कि कहा गया है – เอกสทฺโท อญฺญตฺถเสฏฺฐอสหายสงฺขาทีสุ ทิสฺสติ. ตถา เหส ‘‘สสฺสโต อตฺตา จ โลโก จ, อิทเมว สจฺจํ โมฆมญฺญนฺติ, อิตฺเถเก อภิวทนฺตี’’ติอาทีสุ อญฺญตฺเถ ทิสฺสติ. ‘‘เจตโส เอโกทิภาว’’นฺติอาทีสุ เสฏฺเฐ. ‘‘เอโก วูปกฏฺโฐ’’ติอาทีสุ อสหาเย. ‘‘เอโกว โข ภิกฺขเว ขโณ จ สมโย จ พฺรหฺมจริยวาสายา’’ติอาทีสุ สงฺขายนฺติ. 'एक' शब्द अन्य अर्थ, श्रेष्ठ, असहाय (अकेला) और संख्या आदि में देखा जाता है। जैसे कि "शाश्वत आत्मा और लोक है, यही सत्य है, दूसरा मोह है, ऐसा कुछ (एके) कहते हैं" आदि में 'अन्य' के अर्थ में देखा जाता है। "चित्त की एकाग्रता (एकोदिभाव)" आदि में 'श्रेष्ठ' के अर्थ में। "एक (अकेला) एकांत में स्थित" आदि में 'असहाय' के अर्थ में। "हे भिक्षुओं, ब्रह्मचर्य वास के लिए एक ही क्षण और समय है" आदि में 'संख्या' के अर्थ में। ยตฺเถส สงฺขาวจโน, ตตฺเถกวจนนฺโตว. อุภสทฺโท ทฺวิสทฺทปริยาโย. ทฺวิติจตุสทฺทา สงฺขาวจนา, สพฺพกาลํ พหุวจนนฺตาว. ตุมฺหสทฺโท เยน กเถติ, ตสฺมึ วตฺตพฺพวจนํ. อมฺหสทฺโท อตฺตนิ วตฺตพฺพวจนํ. जहाँ यह संख्यावाचक है, वहाँ केवल एकवचन में होता है। 'उभ' शब्द 'द्वि' शब्द का पर्यायवाची है। 'द्वि', 'ति' और 'चतु' शब्द संख्यावाचक हैं और हमेशा बहुवचन में ही होते हैं। 'तुम्ह' शब्द जिससे बात की जाती है, उसके लिए कहा जाने वाला शब्द है। 'अम्ह' शब्द अपने लिए कहा जाने वाला शब्द है। อิทานิ เตสํ นามิกปทมาลํ กถยาม – अब हम उनकी नामिक पदमाला (रूप-सिद्धि) कहते हैं – สพฺโพ, สพฺเพ. สพฺพํ, สพฺเพ. สพฺเพน, สพฺเพหิ, สพฺเพภิ. สพฺพสฺส, สพฺเพสํ, สพฺเพสานํ. สพฺพสฺมา, สพฺพมฺหา, สพฺเพหิ, สพฺเพภิ. สพฺพสฺส, สพฺเพสํ, สพฺเพสานํ. สพฺพสฺมึ, สพฺพมฺหิ, สพฺเพสุ. โภ สพฺพ, ภวนฺโต สพฺเพ. सब्बो, सब्बे। सब्बं, सब्बे। सब्बेन, सब्बेहि, सब्बेभि। सब्बस्स, सब्बेसं, सब्बेसानं। सब्बस्मा, सब्बम्हा, सब्बेहि, सब्बेभि। सब्बस्स, सब्बेसं, सब्बेसानं। सब्बस्मिं, सब्बम्हि, सब्बेसु। भो सब्ब, भवन्तो सब्बे। ตตฺร [Pg.354] ‘‘สพฺโพ ภูโต, สพฺเพ ภูตา’’ติอาทินา, ‘‘สพฺโพ ปุริโส, สพฺเพ ปุริสา’’ติอาทินา จ นเยน สพฺพานิ ปุลฺลิงฺคนาเมหิ สทฺธึ โยเชตพฺพานิ. ยานิ ปน ยมกมหาเถเรน ปุนฺนปุํสกวิสเย สพฺพ กตร กตมาทีนํ อญฺญานิปิ รูปานิ วุตฺตานิ. ตํ ยถา? वहाँ "सब्बो भूतो, सब्बे भूता" आदि के अनुसार और "सब्बो पुरिसो, सब्बे पुरिसा" आदि की रीति से सभी (सर्वनामों) को पुल्लिंग नामों के साथ जोड़ना चाहिए। किन्तु यमक महास्थविर द्वारा पुल्लिंग और नपुंसक लिंग के विषय में 'सब्ब', 'कतर', 'कतम' आदि के जो अन्य रूप भी कहे गए हैं, वे कैसे हैं? ‘‘สพฺพา’’ อิจฺจาทิกํ รูปํ, นิสฺสกฺเก ภุมฺมเก ปน; ‘‘สพฺเพ’’ อิจฺจาทิกํ รูปํ, ยมเกน ปกาสิตํ. "सब्बा" इत्यादि रूप अपादान (निसक्क) में, और "सब्बे" इत्यादि रूप सप्तमी (भुम्मक) में यमक (स्थविर) द्वारा प्रकाशित किए गए हैं। ตญฺเจ อุปปริกฺขิตฺวา, ยุตฺตํ คณฺหนฺตุ โยคิโน; สพฺพนามิกรูปญฺหิ, วิวิธํ ทุพฺพุธํ ยโต. योगी उसकी परीक्षा करके जो उचित हो उसे ग्रहण करें; क्योंकि सर्वनाम के रूप विविध और कठिनता से समझने योग्य होते हैं। สพฺพา, สพฺพา, สพฺพาโย. สพฺพํ, สพฺพา, สพฺพาโย. สพฺพาย, สพฺพสฺสา, สพฺพาหิ, สพฺพาภิ. สพฺพาย, สพฺพสฺสา, สพฺพาสํ. สพฺพาย, สพฺพสฺสา, สพฺพาหิ, สพฺพาภิ. สพฺพาย, สพฺพสฺสา, สพฺพาสํ. สพฺพายํ, สพฺพสฺสา, สพฺพสฺสํ, สพฺพาสุ. โภติ สพฺเพ, โภติโย สพฺพา, สพฺพาโย. อิตฺถิลิงฺคตฺเต นามิกปทมาลา. सब्बा, सब्बा, सब्बायो। सब्बं, सब्बा, सब्बायो। सब्बाय, सब्बस्सा, सब्बाहि, सब्बाभि। सब्बाय, सब्बस्सा, सब्बासं। सब्बाय, सब्बस्सा, सब्बाहि, सब्बाभि। सब्बाय, सब्बस्सा, सब्बासं। सब्बायं, सब्बस्सा, सब्बस्सं, सब्बासु। भोति सब्बे, भोतियो सब्बा, सब्बायो। यह स्त्रीलिंग में नामिक पदमाला है। เอตฺถ ‘‘สพฺพา ภาวิกา, สพฺพา ภาวิกาโย’’ติ, ‘‘สพฺพา กญฺญา, สพฺพา กญฺญาโย’’ติ จ อาทินา อิตฺถิลิงฺคสพฺพนามานิ สพฺเพหิ อิตฺถิลิงฺเคหิ สทฺธึ โยเชตพฺพานิ. เอตฺถ จ ‘‘สพฺพสฺสา’’ติ ปทํ ตติยาจตุตฺถีปญฺจมีฉฏฺฐีสตฺตมีวเสน ปญฺจธา วิภตฺตํ ‘‘ตสฺสา กุมาริกาย สทฺธิ’’นฺติ กรณปฺปโยคาทิทสฺสนโต. สพฺพสฺสา กญฺญาย กตํ. สพฺพสฺสา กญฺญาย เทติ. อยํ กญฺญา สพฺพสฺสา กญฺญาย หีนา วิรูปา. อยํ กญฺญา สพฺพสฺสา กญฺญาย อุตฺตมา อภิรูปา. สพฺพสฺสา กญฺญาย อเปติ, สพฺพสฺสา กญฺญาย ธนํ. สพฺพสฺสา กญฺญาย ปติฏฺฐิตํ. यहाँ "सब्बा भाविका, सब्बा भाविकायो" और "सब्बा कञ्ञा, सब्बा कञ्ञायो" आदि के अनुसार स्त्रीलिंग सर्वनामों को सभी स्त्रीलिंग शब्दों के साथ जोड़ना चाहिए। और यहाँ "सब्बस्सा" यह पद तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी और सप्तमी के भेद से पाँच प्रकार की विभक्तियों में देखा जाता है, जैसे "तस्सा कुमारिकाय सद्धिं" (उस कुमारी के साथ) इस करण प्रयोग आदि के दर्शन से। सब्बस्सा कञ्ञाय कतं। सब्बस्सा कञ्ञाय देति। अयं कञ्ञा सब्बस्सा कञ्ञाय हीना विरूपा। अयं कञ्ञा सब्बस्सा कञ्ञाय उत्तमा अभिरूपा। सब्बस्सा कञ्ञाय अपेति, सब्बस्सा कञ्ञाय धनं। सब्बस्सा कञ्ञाय पतिट्ठितं। สพฺพํ, สพฺพานิ. สพฺพํ, สพฺพานิ. สพฺเพน, สพฺเพหิ, สพฺเพภิ. สพฺพสฺส, สพฺเพสํ, สพฺเพสานํ. สพฺพสฺมา, สพฺพมฺหา, สพฺเพหิ, สพฺเพภิ[Pg.355]. สพฺพสฺส, สพฺเพสํ, สพฺเพสานํ. สพฺพสฺมึ, สพฺพมฺหิ, สพฺเพสุ. โภ สพฺพ, ภวนฺโต สพฺพานิ. นปุํสกลิงฺคตฺเต นามิกปทมาลา. सब्बं, सब्बानि। सब्बं, सब्बानि। सब्बेन, सब्बेहि, सब्बेभि। सब्बस्स, सब्बेसं, सब्बेसानं। सब्बस्मा, सब्बम्हा, सब्बेहि, सब्बेभि। सब्बस्स, सब्बेसं, सब्बेसानं। सब्बस्मिं, सब्बम्हि, सब्बेसु। भो सब्ब, भवन्तो सब्बानि। यह नपुंसक लिंग में नामिक पदमाला है। เอตฺถ ‘‘สพฺพํ ภูตํ, สพฺพานิ ภูตานิ. สพฺพํ จิตฺตํ, สพฺพานิ จิตฺตานี’’ติ จ อาทินา นปุํสกลิงฺคสพฺพนามานิ สพฺเพหิ นปุํสกลิงฺเคหิ สทฺธึ โยเชตพฺพานิ. เอวํ สพฺพสทฺทสฺส ลิงฺคตฺตยวเสน ปทมาลา ภวติ. यहाँ "सब्बं भूतं, सब्बानि भूतानि। सब्बं चित्तं, सब्बानि चित्तानि" आदि के अनुसार नपुंसक लिंग सर्वनामों को सभी नपुंसक लिंग शब्दों के साथ जोड़ना चाहिए। इस प्रकार 'सब्ब' शब्द की तीनों लिंगों के अनुसार पदमाला होती है। อิทานิสฺส ปรปเทน สทฺธึ สมาโส เวทิตพฺโพ ‘‘สพฺพสาธารโณ สพฺพเวรี’’อิติ. ตตฺถ สพฺเพสํ สาธารโณ สพฺพสาธารโณ. สพฺเพสํ เวรี, สพฺเพ วา เวริโน ยสฺส โสยํ สพฺพเวรีติ สมาสวิคฺคโห. ยถา ปน สพฺพสทฺทสฺส ปทมาลา ลิงฺคตฺตยวเสน โยชิตา, เอวํ กตรสทฺทาทีนมฺปิ อธรสทฺทปริยนฺตานํ โยเชตพฺพา. अब इसका अन्य पद के साथ समास 'सब्बसाधारणो' (सबके लिए साधारण) और 'सब्बवेरी' (सबका वैरी) के रूप में समझना चाहिए। वहाँ 'सब्बेसं साधारणो' (सबके लिए साधारण) 'सब्बसाधारणो' है। 'सब्बेसं वेरी' (सबका वैरी) अथवा 'सब्बे वा वेरिनो यस्स' (सब जिसके वैरी हैं) वह 'सब्बवेरी' है - यह समास-विग्रह है। जैसे 'सब्ब' शब्द की पदमाला तीनों लिंगों के अनुसार प्रयुक्त होती है, वैसे ही 'कतर' आदि शब्दों से लेकर 'अधर' शब्द पर्यन्त तक प्रयुक्त करनी चाहिए। ตตฺรายํ อุภยสทฺทวชฺชิโต ปุลฺลิงฺคเปยฺยาโล – वहाँ यह 'उभय' शब्द को छोड़कर पुल्लिंग का पेयाल (संक्षेप) है - กตโร, กตเร. กตรํ…เป… โภ กตร, ภวนฺโต กตเร. กตโม, กตเม. อิตโร, อิตเร. อญฺโญ, อญฺเญ. อญฺญตโร, อญฺญตเร. อญฺญตโม, อญฺญตเม. ปุพฺโพ, ปุพฺเพ. ปโร, ปเร. อปโร, อปเร. ทกฺขิโณ, ทกฺขิเณ. อุตฺตโร, อุตฺตเร. อธโร, อธเร…เป… โภ อธร, ภวนฺโต อธเรติ. कतरो, कतरे। कतरं...पे... भो कतर, भवन्तो कतरे। कतमो, कतमे। इतरो, इतरे। अञ्ञो, अञ्ञे। अञ्ञतरो, अञ्ञतरे। अञ्ञतमो, अञ्ञतमे। पुब्बो, पुब्बे। परो, परे। अपरो, अपरे। दक्खिणो, दक्खिणे। उत्तरो, उत्तरे। अधरो, अधरे...पे... भो अधर, भवन्तो अधरे। อยํ ปน อุภยสทฺทสหิโต นปุํสกลิงฺคเปยฺยาโล – यह 'उभय' शब्द सहित नपुंसक लिंग का पेयाल है - กตรํ, กตรานิ. กตรํ…เป… โภ กตร, ภวนฺโต กตรานิ. กตมํ. อุภยํ. อิตรํ. อญฺญํ. อญฺญตรํ. อญฺญตมํ. ปุพฺพํ. ปรํ. อปรํ. ทกฺขิณํ. อุตฺตรํ. อธรํ, อธรานิ. อธรํ…เป… โภ อธร, ภวนฺโต อธรานีติ. कतरं, कतरानि। कतरं...पे... भो कतर, भवन्तो कतरानि। कतमं। उभयं। इतरं। अञ्ञं। अञ्ञतरं। अञ्ञतमं। पुब्बं। परं। अपरं। दक्खिणं। उत्तरं। अधरं, अधरानि। अधरं...पे... भो अधर, भवन्तो अधरानि। อิทานิ [Pg.356] ปุนฺนปุํสกลิงฺคานํ ปรสทฺทาทีนํ รูปนฺตรนิทฺเทโส วุจฺจติ. กจฺจายนสฺมิญฺหิ ‘‘ปุริสา’’ติ วิย ‘‘ปรา’’ติ ปฐมาพหุวจนํ ทิสฺสติ. เอวรูโป นโย อปรสพฺพกตราทีสุ อญฺญตมปริโยสาเนสุ นวสุ อปฺปสิทฺโธ, ลพฺภมาโน ปุพฺพทกฺขิณุตฺตราธเรสุ จตูสุ ลพฺเภยฺย. ตถา ‘‘ปุริเส’’ติ วิย ปาฬิอาทีสุ ‘‘ปุพฺเพ’’ติ สจฺจสงฺเขเป ‘‘อิตเร’’ติ, กจฺจายเน จ ‘‘ปเร’’ติ สตฺตมีเอกวจนํ ทิสฺสติ. เอวรูโป นโย สพฺพ อญฺญสทฺเทสุ อปฺปสิทฺโธ, ลพฺภมาโน กตรกตมาทีสุ เสเสสุ อธรปริโยสาเนสุ ทฺวาทสสุ ลพฺเภยฺย. ตถา ‘‘ปุริสา’’ติ วิย สพฺพา กตรา อิจฺจาทิ ปญฺจมีเอกวจนนโย ปาฬิอาทีสุ อปฺปสิทฺโธ. เอวํ สนฺเตปิ อยํ นโย ปุนปฺปุนํ อุปปริกฺขิตฺวา ยุตฺโต เจ, คเหตพฺโพ. अब पुल्लिंग और नपुंसक लिंग वाले 'पर' आदि शब्दों के रूपान्तर का निर्देश कहा जाता है। कच्चायन में 'पुरिसा' के समान 'परा' यह प्रथमा बहुवचन देखा जाता है। इस प्रकार का नियम 'अपर', 'सब्ब', 'कतर' आदि 'अञ्ञतम' पर्यन्त नौ शब्दों में नहीं देखा गया है, यदि प्राप्त हो तो 'पुब्ब', 'दक्खिण', 'उत्तर', 'अधर' इन चार में प्राप्त हो सकता है। उसी प्रकार 'पुरिसे' के समान पालि आदि में 'पुब्बे', सच्चसंखेप में 'इतरे' और कच्चायन में 'परे' यह सप्तमी एकवचन देखा जाता है। इस प्रकार का नियम 'सब्ब' और 'अञ्ञ' शब्दों में नहीं देखा गया है, यदि प्राप्त हो तो 'कतर', 'कतम' आदि शेष 'अधर' पर्यन्त बारह शब्दों में प्राप्त हो सकता है। उसी प्रकार 'पुरिसा' के समान 'सब्बा', 'कतरा' इत्यादि पंचमी एकवचन का नियम पालि आदि में नहीं देखा गया है। ऐसा होने पर भी, यदि बार-बार परीक्षा करने पर यह नियम उचित लगे, तो इसे ग्रहण करना चाहिए। อยํ ปน อุภยสทฺทสหิโต อิตฺถิลิงฺคเปยฺยาโล – यह 'उभय' शब्द सहित स्त्रीलिंग का पेयाल है - กตรา, กตรา, กตราโย. กตรํ…เป… โภติ กตเร, โภติโย กตรา, กตราโย. กตมา. อุภยา. อิตรา. อญฺญตรา. อญฺญตมา. ปุพฺพา. ปรา. อปรา. ทกฺขิณา. อุตฺตรา. อธรา, อธรา, อธราโย. อธรํ…เป… โภติ อธเร, โภติโย อธรา, อธราโยติ. कतरा, कतरा, कतरायो। कतरं...पे... भोति कतरे, भोतियो कतरा, कतरायो। कतमा। उभया। इतरा। अञ्ञतरा। अञ्ञतमा। पुब्बा। परा। अपरा। दक्खिणा। उत्तरा। अधरा, अधरा, अधरायो। अधरं...पे... भोति अधरे, भोतियो अधरा, अधरायो। ยสฺมา ปเนเตสุ อิตร อญฺญ อญฺญตร อญฺญตมานํ ปาฬิยาทีสุ ‘‘อิตริสฺสา’’ติอาทิทสฺสนโต โกจิ เภโท วตฺตพฺโพ[Pg.357], ตสฺมา จตุตฺถีฉฏฺฐีนํ เอกวจนฏฺฐาเน ‘‘อิตริสฺสา, อิตราย, อญฺญิสฺสา, อญฺญาย. อญฺญตริสฺสา, อญฺญตราย, อญฺญตมิสฺสา, อญฺญตมายา’’ติ โยเชตพฺพํ. ตถา ตติยาปญฺจมีนเมกวจนฏฺฐาเน ‘‘ตสฺสา กุมาริกาย สทฺธึ. กสฺสาหํ เกน หายามี’’ติ กรณนิสฺสกฺกปฺปโยคทสฺสนโต สตฺตมิยา ปเนกวจนฏฺฐาเน ‘‘อิตริสฺสา, อิตริสฺสํ, อิตราย, อิตรายํ, อญฺญิสฺสา, อญฺญิสฺสํ, อญฺญาย, อญฺญายํ, อญฺญตริสฺสา, อญฺญตริสฺสํ, อญฺญตราย, อญฺญตรายํ, อญฺญตมิสฺสา, อญฺญตมิสฺสํ, อญฺญตมาย, อญฺญตมาย’’นฺติ โยเชตพฺพํ ‘‘อญฺญตโร ภิกฺขุ อญฺญตริสฺสา อิตฺถิยา ปฏิพทฺธจิตฺโต โหตี’’ติ ปาฬิทสฺสนโต. चूँकि इन 'इतर', 'अञ्ञ', 'अञ्ञतर', 'अञ्ञतम' शब्दों में पालि आदि में 'इतरिस्सा' आदि देखे जाने के कारण कुछ भेद कहना चाहिए, इसलिए चतुर्थी और षष्ठी एकवचन के स्थान पर 'इतरिस्सा, इतराय, अञ्ञिस्सा, अञ्ञाय, अञ्ञतरिस्सा, अञ्ञतराय, अञ्ञतमिस्सा, अञ्ञतमाय' प्रयुक्त करना चाहिए। उसी प्रकार तृतीया और पंचमी एकवचन के स्थान पर 'तस्सा कुमारिकाय सद्धिं' (उस कुमारी के साथ) और 'कस्साहं केन हायामि' (किसके द्वारा मैं किससे हारता हूँ?) इस प्रकार करण और अपादान के प्रयोग देखे जाने के कारण, तथा सप्तमी एकवचन के स्थान पर 'इतरिस्सा, इतरिस्सं, इतराय, इतरायं, अञ्ञिस्सा, अञ्ञिस्सं, अञ्ञाय, अञ्ञायं, अञ्ञतरिस्सा, अञ्ञतरिस्सं, अञ्ञतराय, अञ्ञतरायं, अञ्ञतमिस्सा, अञ्ञतमिस्सं, अञ्ञतमाय, अञ्ञतमायं' प्रयुक्त करना चाहिए, जैसा कि पालि में देखा जाता है - "अञ्ञतरो भिक्खु अञ्ञतरिस्सा इत्थिया पटिबद्धचित्तो होति" (कोई भिक्षु किसी स्त्री के प्रति आसक्त चित्त वाला होता है)। ตตฺร สพฺพสทฺโท สพฺพสพฺพํ, ปเทสสพฺพํ, อายตนสพฺพํ, สกฺกายสพฺพนฺติ จตูสุ วิสเยสุ ทิฏฺฐปฺปโยโค. ตถา เหส ‘‘สพฺเพ ธมฺมา สพฺพากาเรน พุทฺธสฺส ภควโต ญาณมุเข อาปาถมาคจฺฉนฺตี’’ติอาทีสุ สพฺพสพฺพสฺมึ อาคโต. ‘‘สพฺเพสํ โว สาริปุตฺตา สุภาสิตํ ปริยาเยนา’’ติอาทีสุ ปเทสสพฺพสฺมึ. ‘‘สพฺพํ โว ภิกฺขเว เทเสสฺสามิ, ตํ สุณาถ สาธุกํ มนสิ กโรถ, ภาสิสฺสามิ…เป… กตมญฺจ ภิกฺขเว สพฺพํ จกฺขุญฺเจว รูปา จ…เป… มโน เจว ธมฺมา จา’’ติ เอตฺถ อายตนสพฺพสฺมึ. ‘‘สพฺพํ สพฺพโต สญฺชานาตี’’ติอาทีสุ สกฺกายสพฺพสฺมึ. ตตฺถ สพฺพสพฺพสฺมึ อาคโต นิปฺปเทโส, อิตเรสุ ตีสุ สปฺปเทโสติ เวทิตพฺโพ. อิจฺเจวํ – वहाँ 'सब्ब' शब्द का प्रयोग चार विषयों में देखा जाता है - सब्बसब्ब (पूर्ण सर्व), पदेससब्ब (आंशिक सर्व), आयतनसब्ब (आयतन सर्व) और सक्कायसब्ब (सत्काय सर्व)। जैसे, "सब्बे धम्मा सब्बाकारेण बुद्धस्स भगवतो ञाणमुखे आपाथमागच्छन्ति" (सभी धर्म सभी प्रकार से बुद्ध भगवान के ज्ञान के मुख में आते हैं) आदि में यह 'सब्बसब्ब' में आया है। "सब्बेसं वो सारिपुत्ता सुभासितं परियायेन" (हे सारिपुत्र, तुम सबका सुभाषित पर्याय से है) आदि में 'पदेससब्ब' में। "सब्बं वो भिक्खवे देसेस्सामि, तं सुणाथ साधुकं मनसि करोथ, भासिस्सामि... पे... कतमञ्च भिक्खवे सब्बं चक्खुञ्चेव रूपा च... पे... मनो चेव धम्मा चा" (भिक्षुओं, मैं तुम्हें 'सब' का उपदेश दूँगा, उसे अच्छी तरह सुनो और मन में धारण करो, मैं कहूँगा... और भिक्षुओं, 'सब' क्या है? चक्षु और रूप... मन और धर्म) यहाँ 'आयतनसब्ब' में। "सब्बं सब्बतो सञ्जानाति" (सबको सब प्रकार से जानता है) आदि में 'सक्कायसब्ब' में। वहाँ 'सब्बसब्ब' में आया हुआ 'निप्पदेस' (निरवशेष) है, और शेष तीन में 'सप्पदेस' (सावशेष) समझना चाहिए। इस प्रकार - สพฺพสพฺพปเทเสสุ[Pg.358], อโถ อายตเนปิ จ; สกฺกาเย จาติ จตูสุ, สพฺพสทฺโท ปวตฺตติ. सब्बसब्ब, पदेस, आयतन और सक्काय - इन चारों में 'सब्ब' शब्द प्रवृत्त होता है। กตร กตมสทฺเทสุ กตรสทฺโท อปฺเปสุ เอกํ วา ทฺเว วา ตีณิ วา ภิยฺโย วา อปฺปมุปาทาย วตฺตติ. กตมสทฺโท พหูสุ เอกํ วา ทฺเว วา ตีณิ วา พหุํ วา อุปาทาย วตฺตติ. กตรสทฺโท หิ อปฺปวิสโย, กตมสทฺโท พหุวิสโย. ตตฺริเม ปโยคา ‘‘กตเรน มคฺเคน คนฺตพฺพํ. สมุทฺโท กตโร อยํ. กตโม ตสฺมึ สมเย ผสฺโส โหติ. กตเม ธมฺมา กุสลา. ทิสา จตสฺโส วิทิสา จตสฺโส, อุทฺธํ อโธ ทส ทิสตา, อิมาโย, กตมํ ทิสํ ติฏฺฐติ นาคราชา’’. อิจฺเจวมาทโย ภวนฺติ. อุภโย. อุภยํ. อุภโย. อุภเยน. เสสํ ปุลฺลิงฺเค สพฺพสทฺทสมํ. อุภโย ชนา ติฏฺฐนฺติ. อุภโย ชเน ปสฺสติ. ยถา อุโภ ปุตฺตา. อุโภ ปุตฺเตติ. ‘‘อุภโย’’ติ หิ ปทํ ‘‘อุโภ’’ติ ปทมิว พหุวจนนฺตภาเวน ปสิทฺธํ, น ตฺเวกวจนนฺตภาเวน. เอตฺถ หิ – 'कतर' और 'कतम' शब्दों में, 'कतर' शब्द अल्प (थोड़े) में से एक, दो, तीन या अधिक अल्प को लेकर प्रवृत्त होता है। 'कतम' शब्द बहुतों में से एक, दो, तीन या बहुतों को लेकर प्रवृत्त होता है। क्योंकि 'कतर' शब्द का विषय अल्प है और 'कतम' शब्द का विषय बहु (विस्तृत) है। वहाँ ये प्रयोग हैं - "कतरेन मग्गेन गन्तब्बं" (किस मार्ग से जाना चाहिए?), "समुद्दो कतरो अयं" (यह कौन सा समुद्र है?), "कतमो तस्मिं समये फस्सो होति" (उस समय कौन सा स्पर्श होता है?), "कतमे धम्मा कुसला" (कौन से धर्म कुशल हैं?), "चार दिशाएँ, चार विदिशाएँ, ऊपर और नीचे - दस दिशाएँ; नागराज किस (कतमं) दिशा में खड़ा है?"। इस प्रकार के आदि प्रयोग होते हैं। उभयो। उभयं। उभयो। उभयेन। शेष पुल्लिंग में 'सब्ब' शब्द के समान है। "उभयो जना तिट्ठन्ति" (दोनों लोग खड़े हैं)। "उभयो जने पस्सति" (दोनों लोगों को देखता है)। जैसे 'उभो पुत्ता' (दोनों पुत्र), 'उभो पुत्ते'। क्योंकि 'उभयो' यह पद 'उभो' पद के समान बहुवचनान्त के रूप में प्रसिद्ध है, न कि एकवचनान्त के रूप में। यहाँ - ‘‘เอกรตฺเตน อุภโย, ตุวญฺจ ธนุเสข จ; อนฺนเมวาภินนฺทนฺติ, อุภโย เทวมานุสา’’ “एक ही रात में दोनों, तुम और धनुसेख; दोनों देव और मनुष्य अन्न का ही अभिनन्दन करते हैं।” ‘‘อุภโย เต ปิตาภาตโร’’ติ ตทตฺถสาธกานิ นิทสฺสนปทานิ เวทิตพฺพานิ. ยทา ปนายสฺมนฺโต ‘‘อุภโย’’ติ เอกวจนนฺตํ ปสฺเสยฺยาถ, ตทา สาธุกํ มนสิ กโรถ. โก หิ สมตฺโถ อนนฺตนยปฏิมณฺฑิเต สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก ชินสาสเน นิรวเสสโต นยํ ทฏฺฐุํ [Pg.359] ทสฺเสตุญฺจ อญฺญตฺร อาคมาธิคมสมฺปนฺเนน ปภินฺนปฏิสมฺภิเทน. อิทญฺเจตฺถุปลกฺขิตพฺพํ – “‘वे दोनों तुम्हारे पिता और भाई हैं’ - इस अर्थ को सिद्ध करने वाले उदाहरण पदों को जानना चाहिए। किन्तु जब आयुष्मान् ‘उभयो’ को एकवचनान्त देखें, तब उसे अच्छी तरह मन में धारण करें। क्योंकि आगम और अधिगम से सम्पन्न तथा प्रभिन्न प्रतिसम्भिदा वाले (महापुरुष) के अतिरिक्त, अनन्त नयों से अलंकृत, अट्ठकथा सहित त्रिपिटक रूपी जिन-शासन में पूर्णतः नय को देखने और दिखाने में कौन समर्थ है? और यहाँ यह ध्यान देने योग्य है -” อญฺญสทฺโท ปุพฺพสทฺโท, ทกฺขิโณ จุตฺตโร ปโร; สพฺพนาเมสุ คยฺหนฺติ, อสพฺพนามิเกสุปิ. “‘अञ्ञ’ शब्द, ‘पुब्ब’ शब्द, ‘दक्खिण’, ‘उत्तर’ और ‘पर’ शब्द; ये सर्वनामों में ग्रहण किए जाते हैं और असर्वनामों में भी।” เอเตสญฺหิ สพฺพนาเมสุ สงฺคโห วิภาวิโตว. “इनका सर्वनामों में संग्रह (समावेश) स्पष्ट ही है।” อิทานิ อสพฺพนาเมสุ สงฺคโห วุจฺจเต – ตตฺถ อญฺญสทฺโท ตาว ยทา พาลวาจโก, ตทา สพฺพนามํ นาม น โหติ. อสพฺพนามตฺตา จ สพฺพถาปิ ปุริส กญฺญา จิตฺตนเยเนว โยเชตพฺโพ. ตถา หิ น ชานาตีติ อญฺโญ, พาโล ปุริโส. น ชานาตีติ อญฺญา, พาลา อิตฺถี. น ชานาตีติ อญฺญํ, พาลํ กุลนฺติ วจนตฺโถ. เอวํ วิทิตฺวา ปุลฺลิงฺคฏฺฐาเน ‘‘อญฺโญ, อญฺญา. อญฺญํ, อญฺเญ’’ติอาทินา ปุริสนเยเนว นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. อิตฺถิลิงฺคฏฺฐาเน ‘‘อญฺญา, อญฺญา, อญฺญาโย’’ติอาทินา กญฺญานเยเนว, นปุํสกลิงฺคฏฺฐาเน ‘‘อญฺญํ, อญฺญานี’’ติอาทินา จิตฺตนเยเนว โยเชตพฺพา. “अब असर्वनामों में संग्रह कहा जाता है - वहाँ ‘अञ्ञ’ शब्द जब ‘मूर्ख’ (बाल) का वाचक होता है, तब वह सर्वनाम नहीं होता। असर्वनाम होने के कारण उसे सर्वथा ‘पुरिस’, ‘कञ्ञा’ और ‘चित्त’ के नय (रूप) के अनुसार ही जोड़ना चाहिए। जैसे कि - ‘नहीं जानता है इसलिए अञ्ञो’ अर्थात् मूर्ख पुरुष। ‘नहीं जानती है इसलिए अञ्ञा’ अर्थात् मूर्ख स्त्री। ‘नहीं जानता है इसलिए अञ्ञं’ अर्थात् मूर्ख कुल - यह शब्दार्थ है। ऐसा जानकर पुल्लिंग के स्थान पर ‘अञ्ञो, अञ्ञा। अञ्ञं, अञ्ञे’ आदि के रूप में ‘पुरिस’ के नय के अनुसार ही शब्द-रूपों की माला जोड़नी चाहिए। स्त्रीलिंग के स्थान पर ‘अञ्ञा, अञ्ञा, अञ्ञायो’ आदि के रूप में ‘कञ्ञा’ के नय के अनुसार, और नपुंसक लिंग के स्थान पर ‘अञ्ञं, अञ्ञानि’ आदि के रूप में ‘चित्त’ के नय के अनुसार जोड़नी चाहिए।” อิมสฺมิญฺหิ อตฺถวิเสเส พาลชเน วตฺตุกาเมน ‘‘อญฺญา ชนา’’ติ อวตฺวา ‘‘อญฺเญ ชนา’’ติ วุตฺเต ตสฺส ตํ วจนํ อธิปฺเปตตฺถํ น สาเธติ อญฺญถา อตฺถสฺส คเหตพฺพตฺตา. ตถา ‘‘อญฺญานํ ชนาน’’นฺติ อวตฺวา ‘‘อญฺเญสํ ชนานํ, อญฺเญสานํ ชนาน’’นฺติ วา วุตฺเต ตสฺส ตํ วจนํ อธิปฺเปตตฺถํ น สาเธติ. ตถา ‘‘อญฺญานํ อิตฺถีน’’นฺติ อวตฺวา ‘‘อญฺญาสํ อิตฺถีน’’นฺติ วุตฺเตปิ, ‘‘อญฺญานํ กุลาน’’นฺติ อวตฺวา ‘‘อญฺเญสํ กุลานํ, อญฺเญสานํ กุลาน’’นฺติ วา วุตฺเตปิ. สพฺพนามิกวเสน ปน อธิคตาปรวจนิจฺฉายํ ‘‘อญฺเญ ชนา’’ติอาทินา วตฺตพฺพํ, น ‘‘อญฺญา ชนา’’ติอาทินา. ตถา หิ ‘‘อญฺญา ชนา’’ติอาทินา วุตฺตวจนํ อธิปฺเปตตฺถํ น สาเธติ อญฺญถา อตฺถสฺส [Pg.360] คเหตพฺพตฺตา. อิติ ยตฺถ ‘‘อญฺญา ชนา’’ติอาทิวจนํ อุปปชฺชติ, ‘‘อญฺเญ ชนา’’ติอาทิวจนํ นุปปชฺชติ, ยตฺถ ปน ‘‘อญฺเญ ชนา’’ติอาทิวจนํ อุปปชฺชติ, ‘‘อญฺญา ชนา’’ติอาทิวจนํ นุปปชฺชติ. ยา เอตสฺมึ อตฺถวิเสเส สลฺลกฺขณา ปญฺญา, อยํ นีติยา มคฺโค ยุตฺตายุตฺติวิจารเณ เหตุตฺตา, โลกสฺมิญฺหิ ยุตฺตายุตฺติวิจารณา นีตีติ วุตฺตา. สา จ วินา ปญฺญาย น สิชฺฌติ. เอวํ อญฺญสทฺโท อสพฺพนามิโกปิ ภวติ. “इस विशिष्ट अर्थ में, मूर्ख जनों के विषय में कहने की इच्छा रखने वाले के द्वारा यदि ‘अञ्ञा जना’ न कहकर ‘अञ्ञे जना’ कहा जाता है, तो उसका वह वचन अभीष्ट अर्थ को सिद्ध नहीं करता, क्योंकि अर्थ अन्यथा (दूसरे रूप में) ग्रहण कर लिया जाएगा। उसी प्रकार ‘अञ्ञानं जनानं’ न कहकर यदि ‘अञ्ञेसं जनानं’ या ‘अञ्ञेसानं जनानं’ कहा जाता है, तो उसका वह वचन अभीष्ट अर्थ को सिद्ध नहीं करता। उसी प्रकार ‘अञ्ञानं इत्थीनं’ न कहकर यदि ‘अञ्ञासं इत्थीनं’ कहा जाए, और ‘अञ्ञानं कुलानं’ न कहकर यदि ‘अञ्ञेसं कुलानं’ या ‘अञ्ञेसानं कुलानं’ कहा जाए (तो भी अर्थ सिद्ध नहीं होता)। किन्तु सर्वनाम के रूप में ‘अन्य’ (दूसरा) कहने की इच्छा होने पर ‘अञ्ञे जना’ आदि कहना चाहिए, न कि ‘अञ्ञा जना’ आदि। क्योंकि ‘अञ्ञा जना’ आदि कहने से अभीष्ट अर्थ सिद्ध नहीं होता क्योंकि अर्थ अन्यथा ग्रहण कर लिया जाएगा। इस प्रकार जहाँ ‘अञ्ञा जना’ आदि वचन घटित होता है, वहाँ ‘अञ्ञे जना’ आदि वचन घटित नहीं होता; और जहाँ ‘अञ्ञे जना’ आदि वचन घटित होता है, वहाँ ‘अञ्ञा जना’ आदि वचन घटित नहीं होता। इस विशिष्ट अर्थ में जो विवेचनात्मक प्रज्ञा है, वही नीति का मार्ग है क्योंकि यह युक्तायुक्त (उचित-अनुचित) के विचार में हेतु है; लोक में युक्तायुक्त का विचार ही ‘नीति’ कहा गया है। और वह प्रज्ञा के बिना सिद्ध नहीं होती। इस प्रकार ‘अञ्ञ’ शब्द असर्वनाम भी होता है।” ปุพฺพ ทกฺขิณุตฺตร ปรสทฺเทสุ ปุพฺพสทฺโท ยตฺถ ปธานวาจโก, ยตฺถ จ ‘‘เสมฺหํ ปุพฺโพ’’ติอาทีสุ โลหิตโกปชวาจโก, ตตฺถ อสพฺพนามิโก. ปฐมตฺเถ ติลิงฺโค, ทุติยตฺเถ เอกลิงฺโค. อุตฺตมตฺถวาจโก ปน อุตฺตรสทฺโท จ ปรสทฺโท จ อสพฺพนามิโก ติลิงฺโคเยว. ตถา ‘‘ทกฺขิณสฺสา วหนฺติม’’นฺติ เอตฺถ วิย สุสิกฺขิตตฺถจตุรตฺถวาจโก ทกฺขิณสทฺโท. ‘‘เปตานํ ทกฺขิณํ ทชฺชา’’ติอาทีสุ ปน เทยฺยธมฺมวาจโก ทกฺขิณาสทฺโท นิโยคา อิตฺถิลิงฺโค อสพฺพนามิโกเยว. เอวํ อญฺญ ปุพฺพ ทกฺขิณุตฺตร ปรสทฺทา อสพฺพนามิกาปิ สนฺตีติ เตสํ สพฺพนาเมสุปิ อสพฺพนาเมสุปิ สงฺคโห เวทิตพฺโพ. “‘पुब्ब’, ‘दक्खिण’, ‘उत्तर’ और ‘पर’ शब्दों में, जहाँ ‘पुब्ब’ शब्द प्रधान का वाचक है, और जहाँ ‘सेम्हं पुब्बो’ (कफ और पीप) आदि में रक्त से उत्पन्न (पीप) का वाचक है, वहाँ वह असर्वनाम है। पहले अर्थ में वह तीनों लिंगों में होता है, दूसरे अर्थ में एक लिंग में। श्रेष्ठ अर्थ के वाचक ‘उत्तर’ शब्द और ‘पर’ शब्द असर्वनाम होकर तीनों लिंगों में ही होते हैं। उसी प्रकार ‘दक्खिणस्सा वहन्ति मं’ यहाँ की तरह सुशिक्षित या चतुर अर्थ का वाचक ‘दक्खिण’ शब्द है। ‘पेतानं दक्खिणं दज्जा’ आदि में देय-धर्म (दान) का वाचक ‘दक्खिणा’ शब्द नियमतः स्त्रीलिंग और असर्वनाम ही है। इस प्रकार ‘अञ्ञ’, ‘पुब्ब’, ‘दक्खिण’, ‘उत्तर’ और ‘पर’ शब्द असर्वनाम भी हैं, इसलिए उनका सर्वनामों और असर्वनामों दोनों में संग्रह (समावेश) समझना चाहिए।” อิทานิ กตรสทฺทาทีนํ ปรปเทน สทฺธึ สมาโส นียเต ‘‘กตรคามวาสี กตมคามวาสี. อุภยคามวาสิโน, อิตรคามวาสี อญฺญตรคามวาสี, ปุพฺพทิสา, ปรชโน, ทกฺขิณทิสา, อุตฺตรทิสา, อธรปตฺโต’’ติ. ตตฺร ‘‘กตโร คาโม กตรคาโม, กตโม คาโม กตมคาโม, อุภโย คามา อุภยคามา’’ติอาทินา ยถารหํ สมาสวิคฺคโห, กตรสทฺทสฺส ปน กตมสทฺเทน สทฺธึ สมาสํ อิจฺฉนฺติ ทฺวิธา จ รูปานิ ครู ‘‘กตโร จ กตโม จ กตรกตเม กตรกตมา วา’’ติ[Pg.361]. ตสฺมา สพฺพนามิกนเยน สุทฺธนามิเกสุ ปุริสนเยน จ กตร กตมสทฺทสฺส นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา, เตนสฺส สมฺปทานสามิวจนฏฺฐาเนสุ ‘‘กตรกตเมสํ, กตรกตเมสานํ, กตรกตมาน’’นฺติ ตีณิ รูปานิ สิยุํ ‘‘กตรา จ กตมา จ กตรกตมา’’ติ เอวํ อิตฺถิลิงฺควเสน กตสมาเส ปน สพฺพนามิกนเยน, สุทฺธนามิเกสุ กญฺญานเยน จ โยเชตพฺพา. ‘‘กตรญฺจ กตมญฺจ กตรกตมานี’’ติ เอวํ นปุํสกลิงฺควเสน กตสมาเส สพฺพนามิกนเยน, สุทฺธนามิเกสุ จิตฺตนเยน จ โยเชตพฺพา. “अब ‘कतर’ आदि शब्दों का पर-पद (बाद वाले शब्द) के साथ समास दिखाया जाता है - ‘कतरगामवासी, कतमगामवासी, उभयगामवासिनो, इतरगामवासी, अञ्ञतरगामवासी, पुब्बदिसा, परजनो, दक्खिणदिसा, उत्तरदिसा, अधरपत्तो’ आदि। वहाँ ‘कतरो गामो कतरगामो, कतमो गामो कतमगामो, उभयो गामा उभयगामा’ आदि के अनुसार यथायोग्य समास-विग्रह होता है। ‘कतर’ शब्द का ‘कतम’ शब्द के साथ भी समास इष्ट है और हे गुरुओ! इसके दो प्रकार के रूप होते हैं - ‘कतरो च कतमो च कतरकतमे’ अथवा ‘कतरकतमा’। इसलिए सर्वनाम के नय से और शुद्ध संज्ञाओं में ‘पुरिस’ के नय से ‘कतर-कतम’ शब्द की शब्द-रूप माला जोड़नी चाहिए, जिससे इसके सम्प्रदान और स्वामी (षष्ठी) विभक्ति के स्थानों में ‘कतरकतमेसं, कतरकतमेसानं, कतरकतमानं’ - ये तीन रूप होंगे। ‘कतरा च कतमा च कतरकतमा’ - इस प्रकार स्त्रीलिंग के अनुसार किए गए समास में सर्वनाम के नय से और शुद्ध संज्ञाओं में ‘कञ्ञा’ के नय से जोड़ना चाहिए। ‘कतरञ्च कतमञ्च कतरकतमानि’ - इस प्रकार नपुंसक लिंग के अनुसार किए गए समास में सर्वनाम के नय से और शुद्ध संज्ञाओं में ‘चित्त’ के नय से जोड़ना चाहिए।” อยํ ปเนตฺถ วิเสโสปิ เวทิตพฺโพ – ปุพฺพาปราทิสทฺทา ทฺวนฺทสมาสาทิวิธึ ปตฺวา เสหิ รูเปหิ รูปวนฺโต น โหนฺติ, ตํ ยถา? ปุพฺพาปรา, อธรุตฺตรา, มาสปุพฺพา ปุริสา, ทิฏฺฐปุพฺพา ปุริสา, ตถาคตํ ทิฏฺฐปุพฺพา สาวกา, อิทํ ปุลฺลิงฺคตฺเต ปฐมาพหุวจนรูปํ. เอตฺเถกาโร อาเทสภูโต น ทิสฺสติ. ปุพฺพาปรานํ อธรุตฺตรานํ, มาสปุพฺพานํ ปุริสานํ, อิทํ ปุลฺลิงฺคตฺเต จตุตฺถีฉฏฺฐีนํ พหุวจนรูปํ. เอตฺถ สํ สานมิจฺเจเต อาเทสภูตา น ทิสฺสนฺติ. ตถาคตํ ทิฏฺฐปุพฺพานํ สาวกานํ, ตถาคตํ ทิฏฺฐปุพฺพานํ สาวิกานํ, กุลานํ วา, อิทํ ติลิงฺคตฺเต จตุตฺถีฉฏฺฐีนํ พหุวจนรูปํ. เอตฺถาปิ สํ สานมิจฺเจเต อาเทสภูตา น ทิสฺสนฺติ. มาสปุพฺพายํ มาสปุพฺพาย, ปิยปุพฺพายํ ปิยปุพฺพาย, อิทมิตฺถิลิงฺคตฺเต สตฺตมีจตุตฺถีฉฏฺฐีนํ เอกวจนรูปํ. เอตฺถาเทสภูตา สํ สา น ทิสฺสนฺติ. มาสปุพฺพานํ อิตฺถีนํ, ปิยปุพฺพานํ อิตฺถีนํ, อิทมิตฺถิลิงฺคตฺเต จตุตฺถีฉฏฺฐีพหุวจนรูปํ. เอตฺถ ปนาเทสภูโต สมิจฺเจโส น ทิสฺสติ. อญฺญานิปิ ยถาสมฺภวํ โยเชตพฺพานิ, ปุพฺพาปราทีนํ สมาสวิคฺคหํ สมาสปริจฺเฉเท ปกาเสสฺสาม. यहाँ यह विशेष बात भी जाननी चाहिए - 'पुब्बापर' आदि शब्द द्वन्द्व समास आदि की विधि प्राप्त कर अपने (मूल) रूपों से युक्त नहीं होते हैं, वह कैसे? पुब्बापरा (पूर्व और अपर), अधरुत्तरा (अधर और उत्तर), मासपुब्बा पुरिसा (एक महीने पहले के पुरुष), दिट्ठपुब्बा पुरिसा (पहले देखे गए पुरुष), तथागतं दिट्ठपुब्बा सावका (तथागत को पहले देखने वाले श्रावक), यह पुल्लिंग में प्रथमा बहुवचन का रूप है। यहाँ आदेश के रूप में 'ए' कार नहीं दिखाई देता है। पुब्बापरानं, अधरुत्तरानं, मासपुब्बानं पुरिसानं - यह पुल्लिंग में चतुर्थी और षष्ठी का बहुवचन रूप है। यहाँ 'सं' और 'सानं' ये आदेश नहीं दिखाई देते हैं। तथागतं दिट्ठपुब्बानं सावकानं, तथागतं दिट्ठपुब्बानं साविकानं, अथवा कुलानं - यह तीनों लिंगों में चतुर्थी और षष्ठी का बहुवचन रूप है। यहाँ भी 'सं' और 'सानं' ये आदेश नहीं दिखाई देते हैं। मासपुब्बायं, मासपुब्बाय, पियपुब्बायं, पियपुब्बाय - यह स्त्रीलिंग में सप्तमी, चतुर्थी और षष्ठी का एकवचन रूप है। यहाँ आदेश के रूप में 'सं' और 'सा' नहीं दिखाई देते हैं। मासपुब्बानं इत्थीनं, पियपुब्बानं इत्थीनं - यह स्त्रीलिंग में चतुर्थी और षष्ठी का बहुवचन रूप है। यहाँ आदेश के रूप में 'सं' और 'एस' नहीं दिखाई देते हैं। अन्य भी यथासंभव जोड़ने चाहिए, पुब्बापर आदि का समास विग्रह हम समास परिच्छेद में प्रकाशित करेंगे। อิทานิ [Pg.362] ยํสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'यं' शब्द की नामिक पदमाला (रूप-रचना) कही जाती है - โย, เย. ยํ, เย. เยน, เยหิ, เยภิ. ยสฺส, เยสํ, เยสานํ. ยสฺมา, ยมฺหา, เยหิ, เยภิ. ยสฺส, เยสํ, เยสานํ. ยสฺมึ, ยมฺหิ, เยสุ. อิทํ ปุลฺลิงฺคํ. ยํ, ยานิ. ยํ, ยานิ. เยน. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. อถ วา ยํ, ยานิ, ยา. ยํ, ยานิ, เย. เยน. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. กตฺถจิ หิ นิการโลโป ภวติ. อถ วา ปน นิการสฺส อากาเรการาเทสาปิ คาถาวิสเย. यो, ये। यं, ये। येन, येहि, येभि। यस्स, येसं, येसानं। यस्मा, यम्हा, येहि, येभि। यस्स, येसं, येसानं। यस्मिं, यम्हि, येसु। यह पुल्लिंग है। यं, यानि। यं, यानि। येन। शेष पुल्लिंग के समान है। अथवा यं, यानि, या। यं, यानि, ये। येन। शेष पुल्लिंग के समान है। कहीं-कहीं 'नि' कार का लोप होता है। अथवा गाथा के विषय में 'नि' कार के स्थान पर 'आ' कार और 'ए' कार के आदेश भी होते हैं। ‘‘ยา ปุพฺเพ โพธิสตฺตานํ, ปลฺลงฺกวรมาภุเช; นิมิตฺตานิ ปทิสฺสนฺติ, ตานิ อชฺช ปทิสฺสเร’’ติ จ, “जो (या) पहले बोधिसत्वों के श्रेष्ठ पलंग पर बैठने के समय निमित्त दिखाई देते थे, वे आज दिखाई दे रहे हैं” - और, ‘‘กึ มาณวสฺส รตนานิ อตฺถิ, เย ตํ ชินนฺโต หเร อกฺขธุตฺโต’’ติ จ อิทเมตฺถ ปาฬินิทสฺสนํ. อิทํ นปุํสกลิงฺคํ. “माणवक के पास क्या रत्न हैं, जिन्हें (ये) जुआरी उसे जीतते हुए हर ले” - यह यहाँ पालि का उदाहरण है। यह नपुंसक लिंग है। ยา, ยา, ยาโย. ยํ, ยา, ยาโย. ยาย, ยาหิ, ยาภิ. ยาย, ยสฺสา, ยาสํ. ยาย, ยาหิ, ยาภิ. ยาย, ยสฺสา, ยาสํ. ยสฺสํ, ยายํ, ยาสุ. อิตฺถิลิงฺคํ. เอวํ ยํสทฺทสฺส ลิงฺคตฺตยวเสน ปทมาลา ภวติ. เอตฺถาลปนปทานิ น ลพฺภนฺติ. ตถา ตํสทฺทาทีนํ ปทมาลาทีสุปิ. या, या, यायो। यं, या, यायो। याय, याहि, याभि। याय, यस्सा, यासं। याय, याहि, याभि। याय, यस्सा, यासं। यस्सं, यायं, यासु। स्त्रीलिंग। इस प्रकार 'यं' शब्द की तीनों लिंगों के अनुसार पदमाला होती है। यहाँ संबोधन के पद नहीं प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार 'तं' शब्द आदि की पदमालाओं में भी (संबोधन नहीं होते)। เอตฺถ ปน ยนฺติ สทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร วุจฺจเต – ยนฺติ สทฺโท ‘‘ยํ เม ภนฺเต เทวานํ ตาวตึสานํ สมฺมุขา สุตํ สมฺมุขา ปฏิคฺคหิตํ, อาโรเจมิ ตํ ภนฺเต ภควโต’’ติอาทีสุ ปจฺจตฺตวจเน ทิสฺสติ. ‘‘ยนฺตํ อปุจฺฉิมฺห อกิตฺตยี โน, อญฺญํ ตํ ปุจฺฉาม ตทิงฺฆ พฺรูหี’’ติอาทีสุ อุปโยควจเน. ‘‘อฏฺฐา นเมตํ ภิกฺขเว อนวกาโส, ยํ เอกิสฺสา โลกธาตุยา’’ติอาทีสุ กรณวจเน. ‘‘ยํ วิปสฺสี ภควา อรหํ สมฺมาสมฺพุทฺโธ [Pg.363] โลเก อุทปาที’’ติอาทีสุ ภุมฺมวจเน ทิสฺสติ. เอตฺเถทํ วุจฺจติ – यहाँ 'यं' शब्द का अर्थ-उद्धार (विभिन्न अर्थों में प्रयोग) कहा जाता है - 'यं' शब्द “भन्ते! जो (यं) मैंने तावतिंस देवों के सम्मुख सुना, सम्मुख ग्रहण किया, भन्ते! उसे मैं भगवान् को सूचित करता हूँ” आदि में प्रथमा विभक्ति (पच्चत्तवचन) में दिखाई देता है। “जिससे (यन्तं) हमने पूछा, उसने हमें बताया, हम उससे दूसरा पूछते हैं, वह हमें बताओ” आदि में द्वितीया विभक्ति (उपयोगवचन) में। “भिक्षुओं! यह असंभव है, जो (यं) एक ही लोकधातु में...” आदि में तृतीया विभक्ति (करणवचन) में। “जो (यं) विपस्सी भगवान् अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध लोक में उत्पन्न हुए” आदि में सप्तमी विभक्ति (भुम्मवचन) में दिखाई देता है। यहाँ यह कहा गया है - ‘‘ปจฺจตฺเต อุปโยเค จ, ภุมฺเม จ กรเณปิ จ; จตูสฺเวเตสุ ฐาเนสุ, ยนฺติ สทฺโท ปวตฺตตี’’ติ. “प्रथमा, द्वितीया, सप्तमी और तृतीया - इन चार स्थानों में 'यं' शब्द प्रयुक्त होता है।” ปรปเทน สทฺธึ ยํสทฺทสฺส สมาโสปิ เวทิตพฺโพ ‘‘ยํขนฺธาทิ, ยํคุณา, ยคฺคุณา’’ติ. ตตฺถ โย ขนฺธาทิ ยํขนฺธาทิ, เย คุณา ยํคุณาติ สมาสวิคฺคโห. ตถา หิ วิสุทฺธิมคฺเค ‘‘ยํคุณเนมิตฺติกญฺเจตํ นามํ, เตสํ คุณานํ ปกาสนตฺถํ อิมํ คาถํ วทนฺตี’’ติ เอตสฺมึ ปเท ‘‘เย คุณา ยํคุณา, ยํคุณา เอว นิมิตฺตํ ยํคุณนิมิตฺตํ, ตโต ชาตํ ‘ภควา’ติ อิทํ นามนฺติ ยํคุณเนมิตฺติก’’นฺติ นิพฺพจนมิจฺฉิตพฺพํ. ยคฺคุณาติ เอตฺถ ปน ‘‘ยสฺส คุณา ยคฺคุณา’’ติ นิพฺพจนํ. ตถา หิ – पर-पद (दूसरे शब्द) के साथ 'यं' शब्द का समास भी जानना चाहिए, जैसे - “यंखन्धादि, यंगुणा, यग्गुणा”। वहाँ 'यो खन्धादि यंखन्धादि' (जो स्कन्ध आदि), 'ये गुणा यंगुणा' (जो गुण) - यह समास विग्रह है। जैसा कि विशुद्धिमार्ग में कहा गया है - “यह नाम गुणों के कारण (यंगुणनेमित्तिकं) है, उन गुणों के प्रकाशन के लिए इस गाथा को कहते हैं” - इस पद में 'ये गुणा यंगुणा' (जो गुण), 'यंगुणा एव निमित्तं यंगुणनिमित्तं' (जो गुण ही निमित्त हैं), उससे उत्पन्न 'भगवान्' यह नाम 'यंगुणनेमित्तिक' है - ऐसा अर्थ समझना चाहिए। 'यग्गुणा' यहाँ “यस्स गुणा यग्गुणा” (जिसके गुण) ऐसा निर्वचन है। क्योंकि - ‘‘อปิ สพฺพญฺญุตา ปญฺญา, ยคฺคุณนฺตํ น ชานิยา; อถ กา ตสฺส วิชญฺญา, ตํ พุทฺธํ ภูคุณํ นเม’’ติ “सर्वज्ञता प्रज्ञा भी जिसके गुणों (यग्गुणन्तं) को नहीं जान सकती, फिर उसे कौन जान सकता है? उन पृथ्वी के समान गुणों वाले बुद्ध को नमस्कार है।” โปราณกวิรจนายํ ‘‘ยสฺส คุณา ยคฺคุณา’’ติ นิพฺพจนมิจฺฉิตพฺพํ. प्राचीन कवियों की रचना में “यस्स गुणा यग्गुणा” (जिसके गुण) ऐसा अर्थ समझना चाहिए। ยสทฺทสฺส สมาสมฺหิ, สทฺธึ ปรปเทหิ เว; นิคฺคหีตาคโม วาถ, ทฺวิภาโว วา สิยา ทฺวิธา. 'य' शब्द के पर-पदों के साथ समास होने पर, निश्चय ही निग्गहीत का आगम अथवा द्वित्व (दो प्रकार से) होता है। เอวํ ยสทฺทสฺส สมาโส สลฺลกฺขิตพฺโพ. इस प्रकार 'य' शब्द का समास समझना चाहिए। อิทานิ ตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'त' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - โส, เต. นํ, ตํ, เน, เต. เนน, เตน, เนหิ, เตหิ, เนภิ, เตภิ. อสฺส, นสฺส, ตสฺส, ‘เนสํ, เตสํ (อาสํ). อสฺมา, นสฺมา, ตสฺมา, นมฺหา, ตมฺหา, เนหิ, เตหิ, เนภิ, เตภิ. อสฺส, นสฺส, ตสฺส, เนสํ, เตสํ (อาสํ). อสฺมึ, นสฺมึ, ตสฺมึ, อมฺหิ, นมฺหิ, ตมฺหิ, ตฺยมฺหิ, เนสุ, เตสุ. อิทํ ปุลฺลิงฺคํ. เอตฺถ [Pg.364] จ อาสํสทฺทสฺส อตฺถิภาเว ‘‘เนวาสํ เกสา ทิสฺสนฺติ, หตฺถปาทา จ ชาลิโน’’ติ คาถา นิทสฺสนํ, โส จ ติลิงฺโค ทฏฺฐพฺโพ. ตฺยมฺหีติ ปทสฺส อตฺถิภาเว – सो, ते। नं, तं, ने, ते। नेन, तेन, नेहि, तेहि, नेभि, तेभि। अस्स, नस्स, तस्स, नेसं, तेसं (आसं)। अस्मा, नस्मा, तस्मा, नम्हा, तम्हा, नेहि, तेहि, नेभि, तेभि। अस्स, नस्स, तस्स, नेसं, तेसं (आसं)। अस्मिं, नस्मिं, तस्मिं, अम्हि, नम्हि, तम्हि, त्यम्हि, नेसु, तेसु। यह पुल्लिंग है। यहाँ 'आसं' शब्द के अस्तित्व के विषय में “उनके (आसं) न बाल दिखाई देते हैं, और हाथ-पैर जालयुक्त हैं” - यह गाथा उदाहरण है, और वह (आसं) तीनों लिंगों में समझना चाहिए। 'त्यम्हि' पद के अस्तित्व के विषय में - ‘‘ยทาสฺส สีลํ ปญฺญญฺจ, โสเจยฺยญฺจาธิคจฺฉติ; อถ วิสฺสาสเต ตฺยมฺหิ, คุยฺหญฺจสฺส น รกฺขตี’’ติ “जब वह उसके शील, प्रज्ञा और शुचिता को जान लेता है, तब वह उस पर (त्यम्हि) विश्वास करता है और उससे अपना रहस्य नहीं छिपाता है।” อยํ คาถา นิทสฺสนํ. อยเมตฺถ รูปวิเสโส สลฺลกฺขิตพฺโพ – อริยวินเยติ วา สปฺปุริสวินเยติ วา. เอเส เส เอเก เอกฏฺเฐติ ปาฬิปฺปเทเส ปจฺจตฺเตกวจนกานเมต ตสทฺทานํ เอการนฺตนิทฺเทโสปิ ทิสฺสตีติ. यह गाथा उदाहरण है। यहाँ यह रूप-विशेष ध्यान देना चाहिए - 'अरियविनये' अथवा 'सप्पुरिसविनये' आदि पालि प्रदेशों में इन 'त' शब्दों के प्रथमा एकवचन में 'एसे', 'से', 'एके', 'एकट्ठे' - इस प्रकार एकारान्त निर्देश भी दिखाई देते हैं। เอตฺถ ปน เตสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร วุจฺจเต – เตสทฺโท ‘‘น เต สุขํ ปชานนฺติ, เย น ปสฺสนฺติ นนฺทน’’นฺติอาทีสุ ตํสทฺทสฺส วเสน ปจฺจตฺตพหุวจเน อาคโต, ‘‘เต น ปสฺสามิ ทารเก’’ติอาทีสุ อุปโยคพหุวจเน. ‘‘นโม เต ปุริสาชญฺญ, นโม เต ปุริสุตฺตม. นโม เต พุทฺธ วีรตฺถู’’ติ จ อาทีสุ ตุมฺหสทฺทสฺส วเสน สมฺปทาเน, ตุยฺหนฺติ อตฺโถติ วทนฺติ. ‘‘กินฺเต ทิฏฺฐํ กินฺติ เต ทิฏฺฐํ, อุปธี เต สมติกฺกนฺตา, อาสวา เต ปทาลิตา’’ติ จ อาทีสุ กรเณ. ‘‘กินฺเต วตํ กึ ปน พฺรหฺมจริย’’นฺติอาทีสุ สามิอตฺเถ, ตวาติ อตฺโถติ วทนฺติ. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – यहाँ 'ते' शब्द का अर्थ-उद्धार (व्याख्या) कहा जाता है - 'ते' शब्द "ना ते सुखं पजानन्ति, ये न पस्सन्ति नन्दनं" आदि में 'तं' शब्द के अनुसार प्रथमा बहुवचन में आया है, "ते न पस्सामि दारके" आदि में द्वितीया बहुवचन में। "नमो ते पुरिसाजञ्ञ, नमो ते पुरिसुत्तम। नमो ते बुद्ध वीरत्थू" आदि में 'तुम्ह' शब्द के अनुसार सम्प्रदान (चतुर्थी) में, 'तुय्हं' (तुम्हारे लिए) के अर्थ में कहते हैं। "किन्ते दिट्ठं किन्ति ते दिट्ठं, उपधी ते समतिक्कन्ता, आसवा ते पदालिता" आदि में करण (तृतीया) में। "किन्ते वतं किं पन ब्रह्मचरियं" आदि में स्वामी अर्थ (षष्ठी) में, 'तव' (तुम्हारा) के अर्थ में कहते हैं। यहाँ यह कहा जाता है - ‘‘ปจฺจตฺเต อุปโยเค จ, กรเณ สมฺปทานิเย; สามิมฺหิ จาติ เตสทฺโท, ปญฺจสฺวตฺเถสุ ทิสฺสตี’’ติ. "प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी और षष्ठी - इन पाँच अर्थों में 'ते' शब्द देखा जाता है।" ตํ, ตานิ. ตํ, ตานิ. เนน, เตน อิจฺจาทิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. อิทํ นปุํสกลิงฺคํ. तं, तानि। तं, तानि। नेन, तेन इत्यादि। शेष पुल्लिंग के समान है। यह नपुंसक लिंग है। สา[Pg.365], ตา, ตาโย. นํ, ตํ, นา, ตา, นาโย, ตาโย. นาย, ตาย, นาหิ, ตาหิ, นาภิ, ตาภิ. อสฺสา, นสฺสา, (ติสฺสา,) ตสฺสา, นาย, ตาย, นาสํ, ตาสํ, สานํ, อาสํ. อสฺสา, นสฺสา, ตสฺสา, นาย, ตาย, นาหิ, ตาหิ, นาภิ, ตาภิ. อสฺสา, นสฺสา, (ติสฺสา,) ตสฺสา, นาย, ตาย, นาสํ, ตาสํ, สานํ, อาสํ. นาย, ตาย, อสฺสํ, นสฺสํ, ติสฺสํ, ตสฺสํ, นายํ, ตายํ, นาสุ, ตาสุ, ตฺยาสุ. อิทํ อิตฺถิลิงฺคํ. सा, ता, तायो। नं, तं, ना, ता, नायो, तायो। नाय, ताय, नाहि, ताहि, नाभि, ताभि। अस्सा, नस्सा, (तिस्सा,) तस्सा, नाय, ताय, नासं, तासं, सानं, आसं। अस्सा, नस्सा, तस्सा, नाय, ताय, नाहि, ताहि, नाभि, ताभि। अस्सा, नस्सा, (तिस्सा,) तस्सा, नाय, ताय, नासं, तासं, सानं, आसं। नाय, ताय, अस्सं, नस्सं, तिस्सं, तस्सं, नायं, तायं, नासु, तासु, त्यासु। यह स्त्रीलिंग है। เอตฺถ ปน ‘‘อภิกฺกโม สานํ ปญฺญายติ, นาสํ กุชฺฌนฺติ ปณฺฑิตา. ขิฑฺฑา ปณิหิตา ตฺยาสุ, รติ ตฺยาสุ ปติฏฺฐิตา. พีชานิ ตฺยาสุ รุหนฺตี’’ติ ปโยคทสฺสนโต ‘‘สานํ อาสํ ตฺยาสู’’ติ อิมานิ วุตฺตานิ อกฺขรจินฺตกานํ ญาณจกฺขุสมฺมุยฺหนฏฺฐานภูตานิ. เอวํ ปรมฺมุขวจนสฺส ตํสทฺทสฺส นามิกปทมาลา ภวติ. यहाँ "अभिक्कमो सानं पञ्ञायति, नासं कुज्झन्ति पण्डिता। खिड्डा पणिहिता त्यासु, रति त्यासु पतिट्ठिता। बीजानि त्यासु रुहन्ति" आदि प्रयोगों के दर्शन से "सानं, आसं, त्यासु" - ये व्याकरणविदों के ज्ञानचक्षु के सम्मोह के स्थानभूत कहे गए हैं। इस प्रकार परोक्षवाचक 'तं' शब्द की नामिक पदमाला होती है। เอตฺถ จ อิทํ วตฺตพฺพํ – यहाँ यह कहना चाहिए - ‘‘ตํ ตฺวํ คนฺตฺวาน ยาจสฺสุ’’, อิจฺจาทีสุ ปทิสฺสเร; อาโท ตํ เตติอาทีนิ, นนฺติอาทีนิ โน ตถา. "तं त्वं गन्त्वान याचस्सु" इत्यादि में (वाक्य के) आदि में 'तं', 'ते' आदि देखे जाते हैं, किन्तु 'नं' आदि उस तरह (आदि में) नहीं होते। นํ เน เนนาติอาทีนิ, โว โนอิจฺจาทโย วิย; ปทโต ปรภาวมฺหิ, ทิฏฺฐานิ ชินสาสเน. 'नं', 'ने', 'नेन' इत्यादि, 'वो', 'नो' आदि की तरह, पद के बाद होने पर ही जिन-शासन में देखे गए हैं। ‘‘อถ นํ อถ เน อาห, น จ นํ ปฏินนฺทติ’’; อิจฺจาทีนิ ปโยคานิ, ทสฺเสตพฺพานิ วิญฺญุนา. "अथ नं अथ ने आह, न च नं पटिनन्दति" इत्यादि प्रयोग विद्वानों द्वारा दिखाए जाने चाहिए। โก เจตฺถ วเทยฺย – यहाँ कौन कहेगा - ‘‘ยถา นที จ ปนฺโถ จ, ปานาคารํ สภา ปปา; เอวํ โลกิตฺถิโย นาม, นาสํ กุชฺฌนฺติ ปณฺฑิตา’’ติ "जैसे नदी, मार्ग, मदिरालय, सभा और प्याऊ; वैसे ही लोक में स्त्रियाँ हैं, विद्वान उन पर (नासं) क्रोध नहीं करते।" เอตฺถ [Pg.366] – यहाँ - ปทโต อปรตฺเตปิ, นาสํสทฺทสฺส ทสฺสนา; อาโทปิ อิจฺฉิตพฺพาว, นํ เนอิจฺจาทโย อิติ. पद के बाद न होने पर भी 'नासं' शब्द के दर्शन से, 'नं', 'ने' आदि को भी (वाक्य के) आदि में इष्ट मानना चाहिए। โส ปเนวนฺตุ วตฺตพฺโพ, ‘‘ตว วาเท น ลพฺภติ; นาสํสทฺโท นสทฺโท จ, อาสํสทฺโท จ ลพฺภเร. उसे इस प्रकार कहना चाहिए - "तुम्हारे वाद (तर्क) में यह सिद्ध नहीं होता; 'नासं' शब्द 'न' शब्द और 'आसं' शब्द के रूप में प्राप्त होता है। ตสฺมา ‘อาสํ น กุชฺฌนฺติ, อิตฺถีนํ ปณฺฑิตา’อิติ; อตฺโถว ภวเต เอวํ, สุฏฺฐุ ธาเรหิ ปณฺฑิตา’’ติ. इसलिए 'आसं न कुज्झन्ति, इत्थीनं पण्डिता' (विद्वान स्त्रियों पर क्रोध नहीं करते) - ऐसा ही अर्थ होता है, हे विद्वान! इसे अच्छी तरह धारण करो।" อถ วา ยสฺมา นิรุตฺติปิฏเก ‘‘นํ ปุริสํ ปสฺสติ, เน ปุริเส ปสฺสตี’’ติอาทินา ปทโต อปรตฺเตปิ ‘‘นํ, เน’’ อิจฺจาทีนิ ปทานิ วุตฺตานิ, ตสฺมา เตนาปิ นเยน ปทโต อปรานิปิ ตานิ กทาจิ สิยุํ. มยํ ปน ปาฬินยานุสาเรน เตสํ ปวตฺตึ วทาม, อิทํ ฐานํ สุฏฺฐุ วิจาเรตพฺพํ. अथवा, क्योंकि निरुत्तिपिटक में "नं पुरिसं पस्सति, ने पुरिसे पस्सति" आदि के द्वारा पद के बाद न होने पर भी 'नं', 'ने' आदि पद कहे गए हैं, इसलिए उस नय से भी वे कभी पद के बाद न होने पर (आदि में) हो सकते हैं। किन्तु हम पालि-नय के अनुसार उनकी प्रवृत्ति कहते हैं, इस स्थान पर अच्छी तरह विचार करना चाहिए। เอตฺถ ปน ตสทฺทสฺส ปรปเทหิ สทฺธึ สมาโสปิ เวทิตพฺโพ ‘‘ตํปุตฺโต, ตํสทิโส, ตนฺนินฺโน, ตปฺโปโณ, ตปฺปพฺภาโร, ตพฺภูโต, ตคฺคุโณ, ตสฺสทิโส’’ติ. यहाँ 'त' शब्द का पर-पदों के साथ समास भी जानना चाहिए - "तंपुत्तो, तंसदिसो, तन्निन्नो, तप्पोणो, तप्पब्भारो, तब्भूतो, तग्गुणो, तस्सदिसो" इत्यादि। ตสทฺทสฺส สมาสมฺหิ, สทฺธึ ปรปเทหิ เว; นิคฺคหีตาคโม ปุพฺพ-ปเท ทฺวิตฺตนฺตุ ปจฺฉิเม. 'त' शब्द के पर-पदों के साथ समास होने पर, पूर्व-पद में निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम और उत्तर-पद (के प्रथम वर्ण) का द्वित्व होता है। เอวํ ตสทฺทสฺส สมาโส สลฺลกฺขิตพฺโพ. इस प्रकार 'त' शब्द का समास लक्षित करना चाहिए। อิทานิ เอตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'एत' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - เอโส, เอเต. เอตํ, เอเต. เอเตน, เอเตหิ, เอเตภิ. เอตสฺส, เอเตสํ, เอเตสานํ. เอตสฺมา, เอตมฺหา, เอเตหิ, เอเตภิ. เอตสฺส, เอเตสํ, เอเตสานํ. เอตสฺมึ, เอตมฺหิ, เอเตสุ. อิทํ ปุลฺลิงฺคํ. एसो, एते। एतं, एते। एतेन, एतेहि, एतेभि। एतस्स, एतेसं, एतेसानं। एतस्मा, एतम्हा, एतेहि, एतेभि। एतस्स, एतेसं, एतेसानं। एतस्मिं, एतम्हि, एतेसु। यह पुल्लिंग है। เอตํ, เอตานิ. เอตํ, เอตานิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ, อิทํ นปุํสกลิงฺคํ. एतं, एतानि। एतं, एतानि। शेष पुल्लिंग के समान है, यह नपुंसक लिंग है। เอสา[Pg.367], เอตา, เอตาโย. เอตํ, เอตา, เอตาโย. เอตาย, เอตาหิ, เอตาภิ. เอตาย, เอติสฺสา, เอติสฺสาย, เอตาสํ. เอตาย, เอตาหิ, เอตาภิ. เอตาย, เอติสฺสา, เอติสฺสาย, เอตาสํ. เอตาย, เอติสฺสํ, เอตาสุ. อิทํ อิตฺถิลิงฺคํ. เอวํ เอตสทฺทสฺส นามิกปทมาลา ภวติ. एसा, एता, एतायो। एतं, एता, एतायो। एताय, एताहि, एताभि। एताय, एतिस्सा, एतिस्साय, एतासं। एताय, एताहि, एताभि। एताय, एतिस्सा, एतिस्साय, एतासं। एताय, एतिस्सं, एतासु। यह स्त्रीलिंग है। इस प्रकार 'एत' शब्द की नामिक पदमाला होती है। ปรปเทเนตฺถ สทฺธึ สมาโสปิสฺส เวทิตพฺโพ ‘‘เอตทตฺถาย โลกสฺมึ, นิธิ นาม นิธิยฺยติ. เอตปฺปรมาเยว เทวตา สนฺนิปติตา อเหสุ’’นฺติอาทีสุ. यहाँ पर-पद के साथ इसका समास भी जानना चाहिए, जैसे - "एतदत्थाय लोकस्मिं, निधि नाम निधिय्यति। एतप्परमायेव देवता सन्निपतिता अहेसुं" इत्यादि में। สมาเส เอตสทฺทสฺส, สทฺธึ ปรปเทหิ เว; นิคฺคหีตาคโม ปุพฺพ-ปเท โหติ น โหติ จ. समास में 'एत' शब्द का पर-पदों के साथ होने पर, पूर्व-पद में निग्गहीत का आगम होता भी है और नहीं भी होता है। อิทานิ อิทํสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'इदं' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - อยํ, อิเม. อิมํ, อิเม. อเนน, อิมินา, เอหิ, เอภิ, อิเมหิ, อิเมภิ. อสฺส, อิมสฺส, เอสํ, เอสานํ, อิเมสํ, อิเมสานํ. อสฺมา, อิมสฺมา, อิมมฺหา, เอหิ, เอภิ, อิเมหิ, อิเมภิ. อสฺส, อิมสฺส, เอสํ, เอสานํ, อิเมสํ, อิเมสานํ. อสฺมึ, อิมสฺมึ, อมฺหิ, อิมมฺหิ, เอสุ, อิเมสุ. อิทํ ปุลฺลิงฺคํ. अयं, इमे। इमं, इमे। अनेन, इमिना, एहि, एभि, इमेहि, इमेभि। अस्सा, इमस्स, एसं, एसानं, इमेसं, इमेसानं। अस्मा, इमास्मा, इमम्हा, एहि, एभि, इमेहि, इमेभि। अस्सा, इमस्स, एसं, एसानं, इमेसं, इमेसानं। अस्मिं, इमस्मिं, अम्हि, इमम्हि, एसु, इमेसु। यह पुल्लिंग है। อิทํ, อิมานิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. อิทํ นปุํสกลิงฺคํ. इदं, इमानि। शेष पुल्लिंग के समान है। यह नपुंसक लिंग है। อยํ, อิมา, อิมาโย. อิมํ, อิมา, อิมาโย. อิมาย, อิมาหิ, อิมาภิ. อสฺสา, อสฺสาย, อิมิสฺสา, อิมิสฺสาย, อิมาย, อิมาสํ. อสฺสา, อิมิสฺสา, อิมาย, อิมาหิ, อิมาภิ. อสฺสา, อสฺสาย, อิมิสฺสา, อิมิสฺสาย, อิมาย, อิมาสํ. อสฺสํ, อิมิสฺสํ, อิมาย, อิมายํ, อิมาสุ. อิทํ อิตฺถิลิงฺคํ. เอวํ อิทํสทฺทสฺส นามิกปทมาลา ภวติ. अयं, इमा, इमायो। इमं, इमा, इमायो। इमाय, इमाहि, इमाभि। अस्सा, अस्साय, इमिस्सा, इमिस्साय, इमाय, इमासं। अस्सा, इमिस्सा, इमाय, इमाहि, इमाभि। अस्सा, अस्साय, इमिस्सा, इमिस्साय, इमाय, इमासं। अस्सं, इमिस्सं, इमाय, इमायं, इमासु। यह स्त्रीलिंग है। इस प्रकार 'इदं' शब्द की नामिक पदमाला होती है। กจฺจายเน ตุ ‘‘อิมสฺสิทมํสิสุ นปุํสเก’’ติ อิมสทฺโทเยว ปกติภาเวน วุตฺโต, อิธ ปน อิทํสทฺโทเยว ‘‘อิทปฺปจฺจยตา’’ติ เอตฺถ ‘‘อิท’’นฺติ ปกติยา ทสฺสนโต. ตถา [Pg.368] หิ ‘‘อิเมสํ ปจฺจยา อิทปฺปจฺจยา, อิทปฺปจฺจยา เอว อิทปฺปจฺจยตา, อิทปฺปจฺจยานํ วา สมูโห อิทปฺปจฺจยตา’’ติ วุตฺตํ. เอตฺถ จ อิทปฺปจฺจยา เอว อิทปฺปจฺจยตาติ ตาสทฺเทน ปทํ วฑฺฒิตํ น กิญฺจิ อตฺถนฺตรํ ยถา เทโว เอว เทวตาติ. อิทปฺปจฺจยานํ สมูโห อิทปฺปจฺจยตาติ สมูหตฺถํ ตาสทฺทมาห ยถา ชนานํ สมูโห ชนตาติ. จูฬนิรุตฺติยํ นิรุตฺติปิฏเก จ อิทํสทฺโทเยว ปกติภาเวน วุตฺโต. कच्चायन में तो 'इमस्सिदमंसिसु नपुंसके' इस सूत्र से 'इम' शब्द ही प्रकृति भाव से कहा गया है, किन्तु यहाँ 'इदं' शब्द ही 'इदप्पच्चयता' यहाँ 'इद' इस प्रकृति के रूप में देखा जाता है। क्योंकि 'इमेसं पच्चया इदप्पच्चया, इदप्पच्चया एव इदप्पच्चयता, इदप्पच्चयानं वा समूहो इदप्पच्चयता' ऐसा कहा गया है। और यहाँ 'इदप्पच्चया एव इदप्पच्चयता' में 'ता' शब्द से पद बढ़ाया गया है, कोई अर्थान्तर नहीं है, जैसे 'देवो एव देवता'। 'इदप्पच्चयानं समूहो इदप्पच्चयता' यहाँ समूह अर्थ में 'ता' शब्द कहा गया है, जैसे 'जनानं समूहो जनता'। चूलनिरुत्ति और निरुत्तिपिटक में 'इदं' शब्द ही प्रकृति भाव से कहा गया है। สมาเส อิทํสทฺทสฺส, สทฺธึ ปรปเทน เว; อิทปฺปจฺจยตาตฺเวว, รูปํ ทฺวิตฺตํ สิยุตฺตเร. समास में 'इदं' शब्द का पर-पद के साथ होने पर 'इदप्पच्चयता' ऐसा रूप होता है और उत्तर पद का द्वित्व हो जाता है। อิทานิ อมุสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'अमु' शब्द की नामिक पदमाला (रूप-रचना) कही जाती है - อสุ, อมุ, อมู. อมุํ, อมู. อมุนา, อมูหิ, อมูภิ. อมุสฺส, ทุสฺส, อมูสํ, อมูสานํ. อมุสฺมา, อมุมฺหา, อมูหิ, อมูภิ. อมุสฺส, ทุสฺส, อมูสํ, อมูสานํ. อมุสฺมึ, อมุมฺหิ, อมูสุ. อิทํ ปุลฺลิงฺคํ. असु, अमु, अमू। अमुं, अमू। अमुना, अमूहि, अमूभि। अमुस्स, दुस्स, अमूसं, अमूसानं। अमुस्मा, अमुम्हा, अमूहि, अमूभि। अमुस्स, दुस्स, अमूसं, अमूसानं। अमुस्मिं, अमुम्हि, अमूसु। यह पुल्लिंग है। อทุํ, อมูนิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. อิทํ นปุํสกลิงฺคํ. अदुं, अमूनि। शेष पुल्लिंग के समान है। यह नपुंसक लिंग है। อสุ, อมุ, อมู, อมุโย. อมูํ, อมู, อมุโย. อมุยา, อมูหิ, อมูภิ. อมุสฺสา, อมุยา, อมูสํ, อมูสานํ. อมุยา, อมูหิ, อมูภิ. อมุสฺสา, อมุยา, อมูสํ, อมูสานํ. อมุยา, อมุยํ, อมุสฺสํ, อมูสุ. อิทํ อิตฺถิลิงฺคํ. เอวํ อมุสทฺทสฺส นามิกปทมาลา ภวติ, สมาโส ปน อปฺปสิทฺโธ. असु, अमु, अमू, अमुयो। अमूं, अमू, अमुयो। अमुया, अमूहि, अमूभि। अमुस्सा, अमुया, अमूसं, अमूसानं। अमुया, अमूहि, अमूभि। अमुस्सा, अमुया, अमूसं, अमूसानं। अमुया, अमुयं, अमुस्सं, अमूसु। यह स्त्रीलिंग है। इस प्रकार 'अमु' शब्द की नामिक पदमाला होती है, समास तो पहले ही कहा जा चुका है। ตตฺร ‘‘ทุสฺส เม เขตฺตปาลสฺส, รตฺติภตฺตํ อปาภต’’นฺติ ปโยคทสฺสนโต ‘‘ทุสฺสา’’ติ ปทมมฺเหหิ ฐปิตํ. กการาคมวเสน อญฺญานิปิ อสพฺพนามิกรูปานิ ภวนฺติ. เตสํ [Pg.369] วเสน อยํ ลิงฺคตฺตยสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – वहाँ 'दुस्स मे खेत्तपालस्स, रत्तिभत्तं अपाभतं' (उस मुझ क्षेत्रपाल का रात्रि-भोजन लाया गया) इस प्रयोग के देखे जाने से 'दुस्सा' (दुस्स) यह पद हमारे द्वारा रखा गया है। क-कार के आगम के वश से अन्य भी असर्वनामिक रूप होते हैं। उनके अनुसार यह तीनों लिंगों की नामिक पदमाला कही जाती है - ‘‘อสุโก, อสุกา. อสุกํ, อสุเก’’ติอาทินา, ‘‘อมุโก, อมุกา. อมุกํ, อมุเก’’ติอาทินา จ ปุริสนโยปิ ลพฺภติ. ‘‘อสุกา, อสุกาโย’’ติอาทินา, ‘‘อมุกา, อมุกาโย’’ติอาทินา จ กญฺญานโยปิ ลพฺภติ. ‘‘อสุกํ, อสุกานี’’ติอาทินา, ‘‘อมุกํ, อมุกานี’’ติอาทินา จ จิตฺตนโยปิ ลพฺภติ. อิมาเนตฺถ ปทานิ อสพฺพนามิกานิปิ กการาคมวเสน นานตฺตทสฺสนตฺถํ วุตฺตานิ. 'असुको, असुका। असुकं, असुके' इत्यादि के द्वारा और 'अमुको, अमुका। अमुकं, अमुके' इत्यादि के द्वारा पुरुष-नय (पुल्लिंग) भी प्राप्त होता है। 'असुका, असुकायो' इत्यादि के द्वारा और 'अमुका, अमुकायो' इत्यादि के द्वारा कन्या-नय (स्त्रीलिंग) भी प्राप्त होता है। 'असुकं, असुकानी' इत्यादि के द्वारा और 'अमुकं, अमुकानी' इत्यादि के द्वारा चित्त-नय (नपुंसक लिंग) भी प्राप्त होता है। यहाँ ये पद असर्वनामिक होने पर भी क-कार के आगम के कारण विभिन्नता दिखाने के लिए कहे गए हैं। อิทานิ กึสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'किं' शब्द की नामिक पदमाला कही जाती है - โก, เก. กํ, เก. เกน, เกหิ, เกภิ. กสฺส, กิสฺส, เกสํ. กสฺมา, กมฺหา, เกหิ, เกภิ. กสฺส, กิสฺส, เกสํ. กสฺมึ, กิสฺมึ, กมฺหิ, กิมฺหิ, เกสุ. อิทํ ปุลฺลิงฺคํ. को, के। कं, के। केन, केहि, केभि। कस्स, किस्स, केसं। कस्मा, कम्हा, केहि, केभि। कस्स, किस्स, केसं। कस्मिं, किस्मिं, कम्हि, किम्हि, केसु। यह पुल्लिंग है। รูปวิเสโสเปตฺถ เวทิตพฺโพ ‘‘เก คนฺธพฺเพ จ รกฺขเส นาเค, เก กิมฺปุริเส จ มานุเส, เก ปณฺฑิเต สพฺพกามทเท, ทีฆํ รตฺตํ ภตฺตา เม ภวิสฺสติ, เก จ ฉเว ปาถิกปุตฺเต, กา จ ตถาคตานํ อรหนฺตานํ สมฺมาสมฺพุทฺธานํ อาสาทนา’’ติ ปาฬิทสฺสนโต. ยสฺมา ปน เก คนฺธพฺเพ จ รกฺขเส นาเค อิติอาทีสุ ปาฬีสุ ‘‘เก’’ติ ปจฺจตฺตวจนํ เอการนฺตมฺปิ ทิสฺสติ, ตสฺมา ‘‘เก’’ติ รูปเภโท เจตฺถ เญยฺโย. ตถา ‘‘กิสฺสสฺส เอกธมฺมสฺส, วธํ โรเจสิ โคตม. กิสฺมึ เม สิวโย กุทฺธา. กมฺหิ กาเล ตยา วีร, ปตฺถิตา โพธิมุตฺตมา’’ติอาทีนิ จ นิทสฺสนปทานิ เญยฺยานิ. อปิจ – यहाँ रूप-विशेष भी जानना चाहिए, जैसे पालि में देखा जाता है - 'के गन्धब्बे च रक्खसे नागे, के किम्पुरिसे च मानुसे, के पण्डिते सब्बकामददे, दीघं रत्तं भत्ता मे भविस्सति, के च छवे पाथिकपुत्ते, का च तथागतानं अरहन्तानं सम्मासम्बुद्धानं आसादना'। चूँकि 'के गन्धब्बे च रक्खसे नागे' इत्यादि पालि में 'के' यह प्रथमा विभक्ति का बहुवचन रूप एकवचन के समान भी दिखाई देता है, इसलिए यहाँ 'के' यह रूप-भेद जानना चाहिए। वैसे ही 'किस्सस्स एकधम्मस्स, वधं रोचेसि गोतम। किस्मिं मे सिवयो सुद्धा। कम्हि काले तया वीर, पत्थिता बोधिमुत्तमा' इत्यादि उदाहरण पद जानने चाहिए। और भी - ‘‘โก เต พลํ มหาราช’’, อิติอาทีสุ ปาฬิสุ; กฺวสทฺทตฺเถ วตฺตตีติ, เญยฺยา โก อิจฺจยํ สุติ. 'को ते बलं महाराज' इत्यादि पालि में; 'को' यह ध्वनि 'क्व' शब्द के अर्थ में प्रयुक्त होती है, ऐसा जानना चाहिए। เปตํ [Pg.370] ตํ สามมทฺทกฺขึ, โก นุ ตฺวํ สาม ชีวสิ; อิติ ปาเฐ กถํสทฺทา-ภิเธยฺเย วตฺตตีติ จ. 'पेतं तं साममदक्खिं, को नु त्वं साम जीवसि' (हे साम! मैंने तुम्हें मृत देखा था, तुम कैसे जीवित हो?); इस पाठ में 'को' शब्द 'कथं' शब्द के अर्थ में प्रयुक्त होता है। เอเตสุ ทฺวีสุ อตฺเถสุ, ทิฏฺโฐ โก อิจฺจยํ รโว; นิปาโตติ คเหตพฺโพ, สุติสามญฺญโต รุโต. इन दो अर्थों में यह 'को' शब्द देखा गया है; इसे ध्वनि की समानता के कारण निपात समझना चाहिए। นปุํสกลิงฺเค กํ, กานิ. กํ, กานิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ โยเชตพฺพํ. อถ วา ‘‘กึ จิตฺตํ. กึ รูปํ. กึ ปราภวโต มุขํ. กึ อิจฺฉสี’’ติอาทิปโยคทสฺสนโต ปน ‘‘กึ, กานิ. กึ, กานี’’ติ วตฺวา เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ โยเชตพฺพํ. อยํ นโย ยุตฺตตโร, อิทํ นปุํสกลิงฺคํ. नपुंसक लिंग में कं, कानि। कं, कानि। शेष पुल्लिंग के समान जोड़ना चाहिए। अथवा 'किं चित्तं। किं रूपं। किं पराभवतो मुखं। किं इच्छसि' इत्यादि प्रयोगों के देखे जाने से 'किं, कानि। किं, कानि' कहकर शेष पुल्लिंग के समान जोड़ना चाहिए। यह पद्धति अधिक युक्तियुक्त है, यह नपुंसक लिंग है। กา, กา, กาโย. กํ, กา, กาโย. กาย, กาหิ, กาภิ. กาย, กสฺสา, กาสํ, กาสานํ. กาย, กสฺสา, กาหิ, กาภิ. กาย, กสฺสา, กาสํ กาสานํ. กาย, กสฺสา, กายํ, กสฺสํ, กาสุ. का, का, कायो। कं, का, कायो। काय, काही, काभि। काय, कस्सा, कासं, कासानं। काय, कस्सा, काही, काभि। काय, कस्सा, कासं कासानं। काय, कस्सा, कायं, कस्सं, कासु। เอตฺถ ปน กาโยติ ปทสฺส อตฺถิภาเว ‘‘กาโย อโมฆา คจฺฉนฺตี’’ติ นิทสฺสนํ ทฏฺฐพฺพํ. อิทํ อิตฺถิลิงฺคํ. เอวํ กึสทฺทสฺส นามิกปทมาลา ภวติ. เอตฺเถตสฺส อตฺถุทฺธาโร วุจฺจเต – กึ สทฺโท ‘‘กึ ราชา โย โลกํ น รกฺขติ. กึ นุ โข นาม ตุมฺเห มํ วตฺตพฺพํ มญฺญถา’’ติอาทีสุ ครหเน อาคโต. ‘‘ยํ กิญฺจิ รูปํ อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺน’’นฺติอาทีสุ อนิยเม. ‘‘กินฺเต วกฺกลิ อิมินา ปูติกาเยน ทิฏฺเฐน, โย โข วกฺกลิ ธมฺมํ ปสฺสติ, โส มํ ปสฺสตี’’ติอาทีสุ นิปฺปโยชนตายํ. ‘‘กึ น กาหามิ เต วโจ’’ติอาทีสุ สมฺปฏิจฺฉเน. ‘‘กึสูธ วิตฺตํ ปุริสสฺส เสฏฺฐ’’นฺติอาทีสุ ปุจฺฉายํ, ปุจฺฉา จ นาม การณปุจฺฉาทิวเสน [Pg.371] อเนกวิธา, อโต การณปุจฺฉาทิวเสนปิ กึสทฺทสฺส ปวตฺติ วิตฺถารโต เญยฺยา. ตถา หิ อยํ ‘‘กึ นุ สนฺตรมาโนว, กาสุํ ขณสิ สารถิ. กึ นุ ชาตึ น โรเจสิ. เกน เตตาทิโส วณฺโณ’’ติอาทีสุ การณปุจฺฉายํ วตฺตติ. ‘‘กึ กาสุยา กริสฺสตี’’ติอาทีสุ กิจฺจปุจฺฉายํ. ‘‘กึ สีลํ. โก สมาธี’’ติอาทีสุ สรูปปุจฺฉายํ. ‘‘กึ ขาทสิ. กึ ปิวสี’’ติอาทีสุ วตฺถุปุจฺฉายํ. ‘‘ขาทสิ กึ ปิวสิ กิ’’นฺติอาทีสุ กฺริยาปุจฺฉายํ วตฺตติ. อทิฏฺฐโชตนาปุจฺฉาติ เอวมาทิกา ปน ปญฺจวิธา ปุจฺฉา กึสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาเร อนาหริตพฺพตฺตา อนาคตาติ ทฏฺฐพฺพํ. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – यहाँ 'कायो' (kāyo) शब्द के अस्तित्व के विषय में 'कायो अमोघा गच्छन्ति' (kāyo amoghā gacchantī) यह उदाहरण देखना चाहिए। यह स्त्रीलिंग है। इस प्रकार 'किं' (kiṃ) शब्द की नामिक पदमाला होती है। यहाँ इसका अर्थ-उद्धार (अर्थ का विस्तार) कहा जाता है - 'किं' शब्द 'किं राजा यो लोकं न रक्खति' (वह कैसा राजा जो लोक की रक्षा नहीं करता) इत्यादि में 'गर्हण' (निंदा) के अर्थ में आया है। 'यं किञ्चि रूपं अतीतानागतपच्चुप्पन्नं' (जो कुछ भी रूप अतीत, अनागत या प्रत्युत्पन्न है) इत्यादि में 'अनियम' (अनिश्चितता) के अर्थ में। 'किन्ते वक्खलि इमिना पूतिकायेन दिट्ठेन...' (हे वक्खलि! इस दुर्गन्धित शरीर को देखने से तुम्हें क्या लाभ...) इत्यादि में 'निष्प्रयोजनता' (निरर्थकता) के अर्थ में। 'किं न काहामि ते वचो' (मैं तुम्हारे वचन का पालन क्यों नहीं करूँगा) इत्यादि में 'सम्प्रतिच्छन' (स्वीकृति) के अर्थ में। 'किंसुध वित्तं पुरिसस्स सेट्ठं' (इस लोक में मनुष्य का श्रेष्ठ धन क्या है) इत्यादि में 'पृच्छा' (प्रश्न) के अर्थ में। और प्रश्न भी कारण-पृच्छा आदि के भेद से अनेक प्रकार के होते हैं, इसलिए कारण-पृच्छा आदि के अनुसार भी 'किं' शब्द की प्रवृत्ति विस्तार से जाननी चाहिए। जैसे कि यह 'किं नु सन्तरमानोव, कासुं खणसि सारथि' (हे सारथि! तुम इतनी जल्दी में गड्ढा क्यों खोद रहे हो), 'किं नु जातिं न रोचेसि' (तुम जन्म को क्यों पसंद नहीं करते), 'केन तेतादिसो वण्णो' (तुम्हारा वर्ण ऐसा क्यों है) इत्यादि में 'कारण-पृच्छा' में प्रयुक्त होता है। 'किं कासुया करिस्सति' (गड्ढे का क्या करेगा) इत्यादि में 'कृत्य-पृच्छा' (प्रयोजन) में। 'किं सीलं, को समाधि' (शील क्या है, समाधि क्या है) इत्यादि में 'स्वरूप-पृच्छा' में। 'किं खादसि, किं पिवसि' (क्या खाते हो, क्या पीते हो) इत्यादि में 'वस्तु-पृच्छा' में। 'खादसि किं पिवसि किं' (खाते क्या हो, पीते क्या हो) इत्यादि में 'क्रिया-पृच्छा' में प्रयुक्त होता है। 'अदिट्ठजोतनापृच्छा' (अदृष्ट-द्योतना-पृच्छा) इत्यादि पाँच प्रकार की पृच्छाएँ 'किं' शब्द के अर्थ-उद्धार में यहाँ नहीं ली गई हैं, ऐसा समझना चाहिए। यहाँ यह कहा गया है - ครหายํ อนิยเม, นิปฺปโยชนตาย จ; สมฺปฏิจฺฉนปุจฺฉาสุ, กึสทฺโท สมฺปวตฺตติ. गर्हण (निंदा), अनियम, निष्प्रयोजनता, सम्प्रतिच्छन (स्वीकृति) और पृच्छा (प्रश्न) में 'किं' शब्द प्रयुक्त होता है। ปรปเทน สทฺธึ สมาโสปิสฺส เวทิตพฺโพ ‘‘กึสมุทโย, กึเวทโน, กึสญฺโญชโน’’ติ. เอตฺถ ‘‘โก, เก. กา, กา, กาโย. กึ, กานี’’ติ เอวํ ลิงฺคตฺตยวเสน วิภตฺตานิ กึสทฺทมยานิ ปทานิ สมาสปทตฺเต ปุน กิมิติ ปกติภาเวเนว ติฏฺฐนฺติ. นามสทฺเทน ปน สมาเส เตสํ ทฺวิธา คติ ทิสฺสติ ‘‘กินฺนาโม, โกนาโม’’ติ. สพฺพานิ ปเนตานิ อิตฺถินปุํสกลิงฺควเสน พหุวจนวเสน จ โยเชตพฺพานิ. दूसरे पद के साथ इसका समास भी समझना चाहिए, जैसे 'किंसमुदयो' (किससे उत्पन्न), 'किंवेदनो' (कैसी वेदना वाला), 'किंसञ्ञोजनो' (कैसा संयोजन वाला)। यहाँ 'को, के; का, का, कायो; किं, कानि' इस प्रकार तीनों लिंगों के अनुसार विभक्त 'किं' शब्द से बने पद, समास होने पर पुनः 'किं' इस प्रकृति भाव में ही रहते हैं। 'नाम' शब्द के साथ समास होने पर उनकी दो प्रकार की गति (रूप) देखी जाती है - 'किन्नामो' और 'कोनामो'। इन सबको स्त्रीलिंग, नपुंसक लिंग और बहुवचन के अनुसार भी योजित करना चाहिए। กึสทฺทสฺส สมาสมฺหิ, สทฺธึ นามรเวน เว; ‘‘กินฺนาโม’’ อิติ ‘‘โกนาโม’’, อิติ เจวํ คติ ทฺวิธา. 'किं' शब्द का 'नाम' शब्द के साथ समास होने पर 'किन्नामो' और 'कोनामो' - इस प्रकार दो गतियाँ (रूप) होती हैं। ‘‘โกนาโม [Pg.372] เต อุปชฺฌาโย’’, อิจฺจาเทตฺถ นิทสฺสนํ; สหญฺเญน สมาสมฺหิ, ‘‘กึ กึ’’อิจฺเจว สุยฺยเต. 'कोनामो ते उपज्झायो' (तुम्हारे उपाध्याय का क्या नाम है) यहाँ इसका उदाहरण है। अन्य के साथ समास होने पर 'किं किं' ऐसा ही सुना जाता है। ตถา หิ ‘‘กึจิตฺโต ตฺวํ ภิกฺขุ. กึการปฏิสฺสาวินี’’ติอาทีสุ กึสทฺโท สรูปมวิชหนฺโต ติฏฺฐติ. ตตฺถ หิ กึจิตฺตํ ยสฺส โส กึจิตฺโต. ‘‘กึ กโรมิ สามี’’ติ เอวํ กินฺติ กาโร กรณํ สทฺทนิจฺฉารณํ กึกาโร, ตํ ปฏิสฺสาเวตีติ กึการปฏิสฺสาวินีติอาทิ นิพฺพจนมิจฺฉิตพฺพํ. ‘‘กินฺนโร. กึปกฺกมิว ภกฺขิต’’นฺติอาทีสุ ปน นิพฺพจนมปฺปสิทฺธํ, กึสทฺโทเยว ปทาวยวภาเวน สุโต. ตถา หิ โส กตฺถจิ ปทาวยวภาเวน กตฺถจิ นุ สุ นุโข การณาทิสทฺเทหิ สหจาริภาเวน จ สุยฺยติ. อตฺริเม ปโยคา – เอสา เต อิตฺถี กึ โหติ. เอเต มนุสฺสา ตุมฺหากํ กึ โหนฺติ. กิมฺปุริสานุจิณฺโณ. กึ นุ ภีโตว ติฏฺฐสิ. กึสุเฉตฺวา สุขํ เสติ. กึ นุโข การณํ. กึ การณา อมฺม ตุวํ ปมชฺชสิ, กิญฺหิ นาม จชนฺตสฺส, วาจาย อททมปฺปกนฺติ เอวมาทโย. อตฺริทํ วุจฺจติ – जैसे 'किञ्चित्तो त्वं भिक्खु' (हे भिक्षु! तुम किस चित्त वाले हो), 'किंकारपटिस्साविनी' (किस शब्द/पुकार का उत्तर देने वाली) इत्यादि में 'किं' शब्द अपने स्वरूप को न छोड़ते हुए स्थित रहता है। वहाँ 'किं चित्तं यस्स सो किञ्चित्तो' (जिसका चित्त क्या है, वह किञ्चित्तो)। 'किं करोमि सामी' (स्वामी! मैं क्या करूँ) इस प्रकार 'किं' और 'कारो' (करना या शब्द उच्चारण) मिलकर 'किंकारो' बनता है, उसका उत्तर देने वाली 'किंकारपटिस्साविनी' - ऐसा अर्थ समझना चाहिए। 'किन्नरो', 'किम्पक्कमिव भक्खितं' इत्यादि में अर्थ की प्रसिद्धि है, 'किं' शब्द ही पद के अवयव के रूप में सुना जाता है। वैसे ही वह कहीं पद के अवयव के रूप में और कहीं 'नु', 'सु', 'नु खो' आदि कारणवाची शब्दों के सहचर के रूप में सुना जाता है। यहाँ ये प्रयोग हैं - 'एसा ते इत्थी किं होति' (यह स्त्री तुम्हारी क्या लगती है), 'एते मनुस्सा तुम्हाकं किं होन्ति' (ये मनुष्य तुम्हारे क्या लगते हैं), 'किम्पुरिसानुचिण्णो' (किन्नरों द्वारा सेवित), 'किं नु भीतोव तिट्ठसि' (तुम डरे हुए से क्यों खड़े हो), 'किंसुछेत्वा सुखं सेति' (क्या काटकर सुख से सोता है), 'किं नुखो कारणं' (क्या कारण है), 'किं कारणा अम्म तुवं पमज्जसि' (हे माता! तुम किस कारण से प्रमाद करती हो), 'किञ्हि नाम चजन्तस्स, वाचाय अददमप्पकं' (त्याग करने वाले के लिए वाणी से थोड़ा भी न देना क्या है) इत्यादि। यहाँ यह कहा गया है - ‘‘วิสุํ ปทาวยโว วา, หุตฺวา นฺวาทีหิ วา ปน; ยุตฺโต สทฺเทหิ กึสทฺโท, ทิฏฺโฐ สุคตสาสเน. 'किं' शब्द सुगत के शासन (बुद्ध वचन) में या तो अलग से पद का अवयव होकर, या 'नु' आदि शब्दों से युक्त होकर देखा गया है। ปาฬินยานุสาเรน, เสสานํ สมฺภโวปิ จ; เญยฺโย วิญฺญูหิ สทฺธมฺม-นยญฺญูหิ ปเภทโต’’ติ. विद्वानों को, जो सद्धर्म की पद्धति के ज्ञाता हैं, पालि के नियमों के अनुसार अन्य भेदों की संभावना को भी जानना चाहिए। อิทานิ [Pg.373] สพฺพนามิกภาเว ฐิเตหิ โก กํสทฺเทหิ สมานสุติกานํ อญฺเญสํ โก กํสทฺทานํ นามิกปทมาลาวิเสโส วตฺตพฺโพ สิยา, โส เหฏฺฐา ลิงฺคตฺตยมิสฺสกปริจฺเฉเท วุตฺโต. อสพฺพนามิกตฺตา ปน ปุริส จิตฺตนเยเนว วิภตฺโต. ตถา หิ ยทา โกสทฺโท พฺรหฺมวาตกายตฺถวาจโก, กํสทฺโท ปน สิโรชลสุขตฺถวาจโก, ตทา ตานิ ปทานิ อสพฺพนามิกานิ, กสฺมา? อกึสทฺทมยตฺตา สพฺพนามิกรูปสงฺขาเตหิ อสาธารณรูเปหิ วิรหิตตฺตา ปุจฺฉตฺถโต อตฺถนฺตรวาจกตฺตา จ. เอตฺถ ปน สมานสุติวเสน อตฺถนฺตรวิญฺญาปนตฺถํ โกสทฺโท กํสทฺโทติ จ วุตฺตํ, เอกนฺตโต ปน สพฺพนามิกตฺเต กึสทฺโทเยว, สุทฺธนามตฺเต กสทฺโทเยวาติ คเหตพฺพํ. อิจฺเจวํ – अब सर्वनाम होने पर 'को' और 'कं' शब्दों के समान ध्वनि वाले अन्य 'को' और 'कं' शब्दों की नामिक पदमाला का विशेष बताया जाना चाहिए, वह नीचे 'लिंगत्रय-मिश्रक-परिच्छेद' में कहा गया है। सर्वनाम न होने के कारण वे 'पुरिस' और 'चित्त' के समान ही विभक्त होते हैं। जैसे कि जब 'को' शब्द ब्रह्मा, वायु और शरीर का वाचक हो, और 'कं' शब्द सिर, जल और सुख का वाचक हो, तब वे पद सर्वनाम नहीं होते। क्यों? क्योंकि वे 'किं' शब्द से उत्पन्न नहीं हैं, सर्वनाम रूपों के रूप में विख्यात असाधारण रूपों से रहित हैं और प्रश्न के अर्थ से भिन्न अर्थ के वाचक हैं। यहाँ समान ध्वनि होने के कारण भिन्न अर्थ बताने के लिए 'को सद्दो' और 'कं सद्दो' कहा गया है, किन्तु निश्चित रूप से सर्वनाम होने पर 'किं' शब्द ही है और शुद्ध नाम होने पर 'क' शब्द ही है, ऐसा ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार - กาเย พฺรหฺมนิ วาเต จ, สีเส ชลสุเขสุ จ; กสทฺโท วตฺตตี ตีสุ, ปุมา ตีสุ นปุํสโก. 'क' शब्द शरीर, ब्रह्मा और वायु के अर्थ में (पुल्लिंग में), तथा सिर, जल और सुख के अर्थ में (नपुंसक लिंग में) प्रयुक्त होता है। เอวํ สพฺพนามภูตานํ กึกสทฺทานํ ปวตฺติ เวทิตพฺพา. इस प्रकार सर्वनाम बने हुए 'किं' और 'क' शब्दों की प्रवृत्ति जाननी चाहिए। อิธ วุตฺตปฺปการานํ, อตฺถานํ ทานิ สงฺคโห; ปญฺญาเวปุลฺลกรโณ, เอกเทเสน วุจฺจเต. यहाँ कहे गए अर्थों का अब संग्रह, जो प्रज्ञा की प्रचुरता करने वाला है, एक अंश में कहा जाता है। กึ กึปกฺเกน สทิสํ, กาโย กึปภโว วท; กึปกฺกสทิโส กาโม, กาโย ตณฺหาทิสมฺภโว. 'किं' (क्या) 'किम्पक' (एक फल) के समान है? 'कायो' (शरीर) किससे उत्पन्न है, बताओ? 'काम' (इच्छा) 'किम्पक' फल के समान है, और शरीर 'तृष्णा' (तण्हा) से उत्पन्न है। อุณฺหกาเล ก’มิจฺฉนฺติ, ก’มิจฺฉนฺติ ปิปาสิตา; ปจฺจามิตฺตา ก’มิจฺฉนฺติ, ก’มิจฺฉนฺติ ทุขฏฺฏิตา. गर्मी के समय लोग क्या (कं - जल) चाहते हैं? प्यासे लोग क्या (कं - जल) चाहते हैं? शत्रु क्या (कं - सिर) चाहते हैं? दुःख से पीड़ित लोग क्या (कं - सुख) चाहते हैं? กายสฺส กสฺส โก อาโย,โก นาโถ กสฺส ภูตเล; กสฺส กํ ฌานชํ สาตํ,กสฺสงฺเคสุ จ กํ ปรนฺติ. किस शरीर की क्या आय (प्राप्ति) है? इस भूतल पर किसका कौन रक्षक (नाथ) है? किसका ध्यान से उत्पन्न सुख (कं) है? और अंगों में किसका कौन सा अंग प्रधान (कं) है? ยา [Pg.374] ปน ตา เหฏฺฐา อมฺเหหิ ลิงฺคตฺตยวเสน กึสทฺทสฺส สพฺพนามิกสญฺญิตสฺส นามิกปทมาลา วิภตฺตา, เอตาสุ ปุลฺลิงฺคนปุํสกลิงฺคฏฺฐาเน ‘‘เกภิ, กิสฺส, กสฺมา, กมฺหา, กมฺหี’’ติ อิมานิ ปทานิ ปหาย อิตฺถิลิงฺคฏฺฐาเน ‘‘กาโย, กาภิ, กาสานํ, กายํ, กสฺส’’นฺติ อิมานิ จ ปทานิ ปหาย ตโต ตโต เสสปทโต ยถาสมฺภวํ จิสทฺทํ จนสทฺทํ จนํสทฺทญฺจ นิปาเตตฺวา เอวรูปานิ รูปานิ คเหตพฺพานิ. เสยฺยถิทํ? जो हमने पहले तीनों लिंगों के अनुसार सर्वनाम संज्ञक 'किं' शब्द की पदमाला विभक्त की थी, उनमें पुल्लिंग और नपुंसक लिंग के स्थान पर 'केभि, किस्स, कस्मा, कम्हा, कम्ही' इन पदों को छोड़कर और स्त्रीलिंग के स्थान पर 'कायो, काभि, कासानं, कायं, कस्सा' इन पदों को छोड़कर, उन-उन शेष पदों से यथासंभव 'चि' शब्द, 'चन' शब्द और 'चनं' शब्द का प्रयोग करके इस प्रकार के रूप ग्रहण करने चाहिए। जैसे कि? โกจิ, เกจิ, เกจน. กิญฺจิ, กิญฺจนํ, เกจิ, เกจน. เกนจิ, เกหิจิ. กสฺสจิ, เกสญฺจิ. ปญฺจมิยา เอกวจนํ อูนํ ปาฬิยํ อนาคตตฺตา. เกหิจิ. กสฺสจิ, เกสญฺจิ. กสฺมิญฺจิ, กิสฺมิจิ, เกสุจิ. ปุลฺลิงฺคนปุํสกลิงฺควเสน ทฏฺฐพฺพานิ. อตฺร กิสฺมิจีติ อนุสารโลปวเสน วุตฺตํ. कोचि, केचि, केचन। किञ्चि, किञ्चनं, केचि, केचन। केनचि, केहिचि। कस्सचि, केसञ्चि। पञ्चमी विभक्ति का एकवचन पालि में न आने के कारण कम है। केहिचि। कस्सचि, केसञ्चि। कस्मिञ्चि, किस्मिचि, केसुचि। ये पुल्लिंग और नपुंसक लिंग के अनुसार देखने चाहिए। यहाँ 'किस्मिचि' यह अनुस्वार के लोप के कारण कहा गया है। อิตฺถิลิงฺควเสน ปน กาจิ อิตฺถี, กาจิ อิตฺถิโย. กาจิ, กาจิ. กิญฺจิ, กาจิ. กายจิ, กาหิจิ. กายจิ, กสฺสาจิ, กาสญฺจิ. กายจิ, กาหิจิ. กายจิ, กสฺสาจิ, กาสญฺจิ. กายจิ, กาสุจีติ รูปานิ. स्त्रीलिंग के अनुसार - काचि इत्थी, काचि इत्थियो। काचि, काचि। किञ्चि, काचि। कायचि, काहिचि। कायचि, कस्साचि, कासञ्चि। कायचि, काहिचि। कायचि, कस्साचि, कासञ्चि। कायचि, कासुचि - ये रूप होते हैं। เอตฺถ ‘‘อิติ ภาสนฺติ เกจน, น นํ หึสามิ กิญฺจน’’นฺติอาทโย ปโยคา เวทิตพฺพา. อิติ ลิงฺคตฺตยวเสน วุตฺตานิ โกจิ กาจิ กิญฺจีติอาทีนิ อปฺปมตฺตกานํ สงฺคาหกวจนานีติ เวทิตพฺพานิ. यहाँ 'इति भासन्ति केचन, न नं हिंसामि किञ्चनं' इत्यादि प्रयोग जानने चाहिए। इस प्रकार तीनों लिंगों के अनुसार कहे गए 'कोचि, काचि, किञ्चि' आदि अल्प मात्रा (कुछ) के संग्राहक वचन जानने चाहिए। ปุเนตานิเยว ยถารหํ ยํสทฺเทน โยเชตฺวา ทสฺเสสฺสามิ – पुनः इन्हीं को यथासंभव 'यं' शब्द के साथ जोड़कर दिखाऊँगा - โย โกจิ, เย เกจิ. ยํ กิญฺจิ, เย เกจิ. เยน เกนจิ, เยหิ เกหิจิ. ยสฺส กสฺสจิ, เยสํ เกสญฺจิ. ยสฺมา กสฺมาจิ, เยหิ เกหิจิ. ยสฺส กสฺสจิ, เยสํ เกสญฺจิ. ยสฺมึ กสฺมิญฺจิ, เยสุ เกสุจิ. यो कोचि, ये केचि। यं किञ्चि, ये केचि। येन केनचि, येहि केहिचि। यस्स कस्सचि, येसं केसञ्चि। यस्मा कस्माचि, yehi केहिचि। यस्स कस्सचि, येसं केसञ्चि। यस्मिं कस्मिञ्चि, येसु केसुचि। เอตฺถ [Pg.375] ‘‘โย โกจิ มํ อฏฺฐิ กตฺวา สุเณยฺย. เย เกจิเม อตฺถิ รสา ปถพฺยา, สจฺจํ เตสํ สาธุตรํ รสาน’’นฺติอาทโย ปโยคา เวทิตพฺพา. ปุลฺลิงฺครูปานิ. यहाँ 'यो कोचि मं अट्ठि कत्वा सुणेय्य। ये केचिमे अत्थि रसा पथब्या, सच्चं तेसं साधुतरं रसानं' इत्यादि प्रयोग जानने चाहिए। ये पुल्लिंग रूप हैं। ยํ กิญฺจิ, ยานิ กานิจิ. ยํ กิญฺจิ, ยานิ กานิจิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. เอตฺถ ‘‘ยํ กิญฺจิ รตนํ อตฺถิ, ธตรฏฺฐนิเวสเน. ยํ กิญฺจิ วิตฺตํ อิธ วา หุรํ วา. ยานิ กานิจิ รูปานี’’ติอาทโย ปโยคา เวทิตพฺพา. นปุํสกลิงฺครูปานิ. यं किञ्चि, यानि कानिचि। यं किञ्चि, यानि कानिचि। शेष पुल्लिंग के समान है। यहाँ 'यं किञ्चि रतनं अत्थि, धतरट्ठनिवेसने। यं किञ्चि वित्तं इध वा हुरं वा। यानि कानिचि रूपानि' इत्यादि प्रयोग जानने चाहिए। ये नपुंसक लिंग रूप हैं। ยา กาจิ อิตฺถี, ยา กาจิ อิตฺถิโย. ยํ กิญฺจิ, ยา กาจิ. ยาย กายจิ, ยาหิ กาหิจิ. ยาย กายจิ, ยาสํ กาสญฺจิ. ยาย กายจิ, ยาหิ กาหิจิ. ยาย กายจิ, ยาสํ กาสญฺจิ. ยาย กายจิ, ยาสุ กาสุจิ. या काचि इत्थी, या काचि इत्थियो। यं किञ्चि, या काचि। याय कायचि, याहि काहिचि। याय कायचि, यासं कासञ्चि। याय कायचि, याहि काहिचि। याय कायचि, यासं कासञ्चि। याय कायचि, यासु कासुचि। เอตฺถ ‘‘ยา กาจิ เวทนา อตีตานาคตปจฺจุปฺปนฺนา’’ติอาทโย ปโยคา เวทิตพฺพา. อิตฺถิลิงฺครูปานิ. อิติ ลิงฺคตฺตยวเสน วุตฺตานิ โย โกจิ, ยา กาจิ, ยํ กิญฺจีติอาทีนิ อนวเสสปริยาทานวจนานีติ เวทิตพฺพานิ. สพฺพานิ เจตานิ น นิปาตปทานิ, นิปาตปติรูปกา สทฺทคติโยติ เวทิตพฺพานิ. ยทิ นิปาตปทานิ สิยุํ, ตีสุ ลิงฺเคสุ สตฺตสุ วิภตฺตีสุ เอกากาเรน ติฏฺเฐยฺยุํ, น จ ติฏฺฐนฺติ, ตสฺมา น นิปาตปทานิ, นิปาตปติรูปกา สทฺทคติโยเยว. यहाँ 'या काचि वेदना अतीतानागतपच्चुप्पन्ना' इत्यादि प्रयोग जानने चाहिए। ये स्त्रीलिंग रूप हैं। इस प्रकार तीनों लिंगों के अनुसार कहे गए 'यो कोचि, या काचि, यं किञ्चि' आदि बिना किसी शेष के (जो कोई भी/जो कुछ भी) पूर्णता को बताने वाले वचन जानने चाहिए। और ये सभी निपात पद नहीं हैं, बल्कि निपात के समान रूप वाले शब्द-प्रकार (सद्दगति) जानने चाहिए। यदि ये निपात पद होते, तो तीनों लिंगों और सातों विभक्तियों में एक ही रूप में रहते, किन्तु वे नहीं रहते, इसलिए ये निपात पद नहीं हैं, बल्कि निपात के समान रूप वाले शब्द-प्रकार ही हैं। อปิจ ย ต กึ เอตอิจฺเจเตหิ สพฺพนาเมหิ ลิงฺคานุรูปโต ตฺตกตฺติกปจฺจเย กตฺวา วตฺติจฺฉายํ ยานิ ปทานิ สิชฺฌนฺติ, ตานิ ปริจฺเฉทวจนานิ อสพฺพนามิกานิเยว ภวนฺติ. เตสํ นามิกปทมาลา ปุริส จิตฺต กญฺญานเยน โยเชตพฺพา. ตํ ยถา? इसके अतिरिक्त य, त, किं, एत - इन सर्वनामों से लिंग के अनुसार 'त्तक' और 'त्तिक' प्रत्यय करके बोलने की इच्छा होने पर जो पद सिद्ध होते हैं, वे परिच्छेद (मात्रा) बताने वाले वचन सर्वनाम नहीं होते हैं। उनकी पदमाला 'पुरिस', 'चित्त' और 'कञ्ञा' के अनुसार जोड़नी चाहिए। वह कैसे? ยตฺตโก [Pg.376] ชโน, ยตฺตกํ จิตฺตํ, ยตฺติกา อิตฺถี. ตตฺตโก, ตตฺตกํ, ตตฺติกา. กิตฺตโก, กิตฺตกํ, กิตฺติกา. เอตฺตโก, เอตฺตกํ, เอตฺติกาติ. อิมานิ ปทานิ อสพฺพนามิกานิปิ ปจฺจยวเสน สมฺภูตตฺถนฺตเรสุ วิญฺญูนํ โกสลฺลตฺถํ วุตฺตานิ. यत्तको जनो, यत्तकं चित्तं, यत्तिका इत्थी। तत्तको, तत्तकं, तत्तिका। कित्तको, कित्तकं, कित्तिका। एत्तको, एत्तकं, एत्तिका। ये पद सर्वनाम न होने पर भी प्रत्यय के कारण भिन्न अर्थों में विद्वानों की कुशलता के लिए कहे गए हैं। อิทานิ สงฺขาทิวจนสฺส เอกสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब संख्या आदि बताने वाले 'एक' शब्द की पदमाला कही जाती है - เอกสทฺโท หิ สงฺขาวจโน จ โหติ อสทิสวจโน จ อสหายวจโน จ เอกจฺจวจโน จ มิสฺสีภูตวจโน จ. ยทา สงฺขา’สทิสา’สหายวจโน, ตทา เอกวจนโก ภวติ. 'एक' शब्द संख्यावाचक, अद्वितीयवाचक (असदिस), असहायवाचक (अकेला), 'कोई' (एकच्च) वाचक और मिश्रितवाचक होता है। जब यह संख्या, अद्वितीय और असहाय वाचक होता है, तब यह एकवचन में होता है। เอโก, เอกํ, เอเกน, เอกสฺส, เอกสฺมา, เอกมฺหา, เอกสฺส, เอกสฺมึ, เอกมฺหีติ. เอวํ สงฺขาทิวจโน เอกสทฺโท เอกวจนโก. ตถา หิ ‘‘เอโก ทฺเว ตโย’’ติ สงฺขาวิสเย เอกสทฺโท เอกวจนโกว. ‘‘เอโกมฺหิ สมฺมาสมฺพุทฺโธ. เอโก ราช นิปชฺชามี’’ติ อสทิสาสหายกถเนปิ เอกวจนโกว. อยํ เอกวจนิกา สพฺพนามิกปทมาลา. एको, एकं, एकेन, एकस्स, एकस्मा, एकम्हा, एकस्स, एकस्मिं, एकम्ही। इस प्रकार संख्या आदि वाचक 'एक' शब्द एकवचन वाला है। जैसे कि 'एको द्वे तयो' इस संख्या के विषय में 'एक' शब्द एकवचन ही है। 'एकोम्हि सम्मासम्बुद्धो। एको राज निपज्जामि' इस अद्वितीय और असहाय के कथन में भी एकवचन ही है। यह एकवचन वाली सर्वनाम पदमाला है। ยทา ปน สงฺขตฺถา จ อสหายา จ พหู วตฺตพฺพา สิยุํ, ตทา เอกสทฺทโต กการาคมํ กตฺวา เอกกา, เอกเก, เอกเกหิ, เอกเกภิ. ปุริสนเย พหุวจนวเสน นามิกปทมาลา โยเชตพฺพา. ตถา หิ สงฺขตฺถาปิ พหู โหนฺติ. ‘‘จตฺตาโร เอกกา สิยุ’’นฺติ หิ วุตฺตํ. อสหายาปิ พหู โหนฺติ. ตถา หิ ‘‘อยมฺปิ คหปติ เอโกว อาคโต, อยมฺปิ เอโกว อาคโต’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘อิเม คหปตโย เอกกา อาคตา’’ติ วตฺตพฺพตา ทิสฺสติ. อยํ นโย สพฺพนามิกปกฺขํ น ภชติ อสาธารณรูปาภาวโต, อตฺถนฺตรวิญฺญาปนตฺถํ ปน วุตฺโต. किन्तु जब संख्या अर्थ में और असहाय अर्थ में बहुतों को कहना हो, तब 'एक' शब्द से 'क' कार का आगम करके 'एकका, एकके, एककेहि, एककेभि' - इस प्रकार पुरुष के समान बहुवचन के अनुसार पदमाला जोड़नी चाहिए। क्योंकि संख्या अर्थ में भी बहुत होते हैं। जैसे कि 'चत्तारो एकका सियुं' कहा गया है। असहाय अर्थ में भी बहुत होते हैं। जैसे कि 'अयम्पि गहपति एकोव आगतो, अयम्पि एकोव आगतो' ऐसा कहने के स्थान पर 'इमे गहपतयो एकका आगता' ऐसा कहना देखा जाता है। यह नियम सर्वनाम पक्ष का अनुसरण नहीं करता क्योंकि इसमें असाधारण रूपों का अभाव है, किन्तु अन्य अर्थों को समझाने के लिए कहा गया है। ยทา [Pg.377] เอกจฺจวจโน, ตทา ‘‘เอเก, เอเก, เอเกหิ, เอเกภิ เอเกสํ, เอเกหิ, เอเกภิ, เอเกสํ, เอเกสู’’ติ วตฺตพฺพํ. อยมฺปิ พหุวจนิกา สพฺพนามิกปทมาลา. เอตฺถ เอเกติ เอกจฺเจ. เอส นโย เสเสสุปิ. ยทา ปน มิสฺสีภูตวจโน, ตทา ‘‘เอกา, เอเก, เอเกหิ, เอเกภิ, เอกาน’’นฺติ ปุริสนเย พหุวจนวเสน วตฺตพฺพํ. ‘‘ปญฺจาโล จ วิเทโห จ, อุโภ เอกา ภวนฺตุ เต’’ติ ปาฬิ ทิสฺสติ. อยํ นโย สพฺพนามิกปกฺขํ น ภชติ อสาธารณรูปาภาวโต, อตฺถนฺตรวิญฺญาปนตฺถํ ปน วุตฺโต. ตตฺถ เอกา ภวนฺตูติ เอกีภวนฺตุ มิสฺสีภวนฺตุ, คงฺโคทเกน ยมุโนทกํ วิย อญฺญทตฺถุ สํสนฺทนฺตุ สเมนฺตูติ วจนตฺโถ. जब 'एक' शब्द 'कुछ' (एकच्च) के अर्थ में होता है, तब 'एके, एके, एकेहि, एकेभि, एकेसं, एकेहि, एकेभि, एकेसं, एकेसु' ऐसा कहना चाहिए। यह भी सर्वनाम की बहुवचन वाली पदमाला है। यहाँ 'एके' का अर्थ 'एकच्चे' (कुछ) है। यही नियम शेष विभक्तियों में भी है। किन्तु जब यह मिश्रित वचन (मिश्रीभूतवचन) में होता है, तब 'एका, एके, एकेहि, एकेभि, एकानं' इस प्रकार 'पुरिस' शब्द के समान बहुवचन के रूप में कहना चाहिए। 'पञ्चालो च विदेहो च, उभो एका भवन्तु ते' (पञ्चाल और विदेह, ये दोनों एक हो जाएँ) - यह पालि देखी जाती है। यह नियम सर्वनाम पक्ष का अनुसरण नहीं करता क्योंकि इसमें असाधारण रूपों का अभाव है, किन्तु अन्य अर्थ (एकता) को समझाने के लिए कहा गया है। वहाँ 'एका भवन्तु' का अर्थ है 'एकीभवन्तु' (एक हो जाएँ), 'मिश्रीभवन्तु' (मिल जाएँ), जैसे गंगा के जल के साथ यमुना का जल पूर्णतः मिल जाता है और समान हो जाता है - यह शब्द का अर्थ है। อาจริยา ปน เอวํ วิภาคํ อทสฺเสตฺวา เอกสทฺทสฺส สพฺพนามตฺตเมว คเหตฺวา สพฺพสทฺทสฺส วิย นามิกปทมาลํ โยเชนฺติ. กถํ? आचार्य तो इस प्रकार का विभाग न दिखाकर 'एक' शब्द को केवल सर्वनाम मानकर 'सब्ब' शब्द के समान ही इसकी नामिक पदमाला का प्रयोग करते हैं। कैसे? เอโก, เอเก. เอกํ, เอเก. เอเกน, เอเกหิ, เอเกภิ. เอกสฺส, เอเกสํ, เอเกสานํ. เอกสฺมา, เอกมฺหา, เอเกหิ, เอเกภิ. เอกสฺส, เอเกสํ, เอเกสานํ. เอกสฺมึ, เอกมฺหิ, เอเกสูติ. อยํ สพฺพนามิกปทมาลาติ เวทิตพฺพา. एको, एके। एकं, एके। एकेन, एकेहि, एकेभि। एकस्स, एकेसं, एकेसानं। एकस्मा, एकम्हा, एकेहि, एकेभि। एकस्स, एकेसं, एकेसानं। एकस्मिं, एकम्हि, एकेसु। इसे सर्वनाम की पदमाला समझना चाहिए। เกจิ ‘‘เอกสทฺโท สงฺขฺยาตุลฺยาสหายญฺญวจโน. ยทา สงฺขฺยาวจโน, ตทา สพฺพตฺเถกวจนนฺโตว, อญฺญตฺถ พหุวจนนฺโตปิ, เอโก เอกา เอกํ อิจฺจาทิ สพฺพตฺถ สพฺพสทฺทสมํ. สํสาสฺเวว วิเสโส’’ติ ลิงฺคตฺตเย โยชนานยํ วทนฺติ. เอวํ วทนฺตา จ เต วิภาคํ อทสฺเสตฺวา วทนฺติ. มยํ ปน โสตูนํ ปโยเคสุ โกสลฺลุปฺปาทนตฺถํ วิภาคํ ทสฺเสตฺวา วทาม. कुछ आचार्य कहते हैं कि 'एक' शब्द संख्या, तुल्य (समान), असहाय (अकेला) और अन्य का वाचक है। जब यह संख्यावाचक होता है, तब सभी अर्थों में केवल एकवचनान्त ही होता है, अन्य अर्थों में बहुवचनान्त भी होता है; 'एको, एका, एकं' इत्यादि सभी लिंगों में 'सब्ब' शब्द के समान होता है। केवल 'संसा' (सप्तमी/षष्ठी बहुवचन के विशेष रूपों) में ही विशेष है - ऐसा वे तीनों लिंगों में योजना का नियम बताते हैं। और ऐसा कहते हुए वे विभाग को दिखाए बिना कहते हैं। हम तो श्रोताओं के प्रयोगों में कुशलता उत्पन्न करने के लिए विभाग दिखाकर कहते हैं। อปิเจตฺถ [Pg.378] อยํ วิเสโสปิ สลฺลกฺขิตพฺโพ ‘‘เอเก เอกฏฺเฐ สเม สมภาเค’ติ ปาฬิปฺปเทเส ปจฺจตฺเตกวจนสฺส เอกสทฺทสฺส เอการนฺตนิทฺเทโสปิ ทิสฺสตี’’ติ. ปุลฺลิงฺครูปานิ. यहाँ यह विशेषता भी ध्यान देने योग्य है कि 'एके एकट्ठे समे समभागे' - इस पालि अंश में प्रत्येक एकवचन वाले 'एक' शब्द का 'एकारान्त' निर्देश भी देखा जाता है। ये पुल्लिंग रूप हैं। เอกํ, เอกานิ. เอกํ, เอกานิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. ตตฺถ เอกานีติ เอกจฺจานิ. เอส นโย เสสพหุวจเนสุปิ, นปุํสกลิงฺครูปานิ. एकं, एकानि। एकं, एकानि। शेष पुल्लिंग के समान है। वहाँ 'एकानि' का अर्थ 'एकच्चानि' (कुछ) है। यही नियम शेष बहुवचनों में भी है। ये नपुंसक लिंग रूप हैं। เอกา, เอกา, เอกาโย. เอกํ, เอกา, เอกาโย. เอกาย, เอกาหิ, เอกาภิ. เอกาย, เอกิสฺสา, เอกาสํ. เอกาย, เอกาหิ, เอกาภิ. เอกาย, เอกิสฺสา, เอกาสํ. เอกาย, เอกายํ, เอกิสฺสํ, เอกาสุ. เอตฺถ พหุวจนฏฺฐาเน เอกาติ เอกจฺจา, เอกาหีติ เอกจฺจาหิ, เอกาสนฺติ เอกจฺจานํ เอกาสูติ เอกจฺจาสุ. อิตฺถิลิงฺครูปานิ. สพฺพาเนตานิ สพฺพนามานิ เอกวจนพหุวจนวเสน วุตฺตานิ. एका, एका, एकायो। एकं, एका, एकायो। एकाय, एकाहि, एकाभि। एकाय, एकिस्सा, एकासं। एकाय, एकाहि, एकाभि। एकाय, एकिस्सा, एकासं। एकाय, एकायं, एकिस्सं, एकासु। यहाँ बहुवचन के स्थान पर 'एका' का अर्थ 'एकच्चा' (कुछ स्त्रियाँ), 'एकाहि' का अर्थ 'एकच्चाहि', 'एकासं' का अर्थ 'एकच्चानं' और 'एकासु' का अर्थ 'एकच्चासु' है। ये स्त्रीलिंग रूप हैं। ये सभी सर्वनाम एकवचन और बहुवचन के भेद से कहे गए हैं। อปิจ เอกสทฺเท วิจฺฉาวเสน วตฺตพฺเพ ลิงฺคตฺตยรูปานิ เอกวจนาเนว ภวนฺติ. กถํ? इसके अतिरिक्त, जब 'एक' शब्द वीप्सा (पुनरावृत्ति) के अर्थ में कहा जाना हो, तब तीनों लिंगों के रूप केवल एकवचन में ही होते हैं। कैसे? เอเกโก, เอเกกํ, เอเกเกน, เอเกกสฺส, เอเกกสฺมา, เอเกกมฺหา, เอเกกสฺส, เอเกกสฺมึ, เอเกกมฺหีติ ปุลฺลิงฺครูปานิ. एकेको, एकेकं, एकेकेन, एकेकस्स, एकेकस्मा, एकेकम्हा, एकेकस्स, एकेकस्मिं, एकेकम्हि - ये पुल्लिंग रूप हैं। เอเกกํ, เอเกกํ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ, นปุํสกลิงฺครูปานิ. เอเกกา, เอเกกํ, เอเกกาย, เอเกกิสฺสา, เอเกกาย, เอเกกิสฺสา, เอเกกายํ, เอเกกิสฺสํ. อิตฺถิลิงฺครูปานิ. एकेकं, एकेकं। शेष पुल्लिंग के समान है, ये नपुंसक लिंग रूप हैं। एकेका, एकेकं, एकेकाय, एकेकिस्सा, एकेकाय, एकेकिस्सा, एकेकायं, एकेकिस्सं। ये स्त्रीलिंग रूप हैं। สพฺพาเนตานิ วิจฺฉาสพฺพนามานีติ วตฺตุํ วฏฺฏติ. พหุวจนานิ ปเนตฺถ น สนฺติ ปโยคาภาวโต. อิติ อิเมสุ วิจฺฉาวเสน วุตฺเตสุ ลิงฺคตฺตยรูเปสุ สมาสจินฺตา น อุปฺปาเทตพฺพา อนิพฺพจนียตฺตา วิจฺฉาสทฺทานํ. ตถา หิ ‘‘ปพฺพํ ปพฺพํ [Pg.379] สนฺธิ สนฺธิ โอธิ โอธิ หุตฺวา ตตฺตกปาเล ปกฺขิตฺตติลา วิย ตฏตฏายนฺตา สงฺขารา ภิชฺชนฺตี’’ติอาทีสุ ปพฺพปพฺพสทฺทาทีนํ สมาสกรณวเสน นิพฺพจนํ ปุพฺพาจริเยหิ น ทสฺสิตํ. ยสฺมา จ วิจฺฉายํ วตฺตมานานํ ทฺวิรุตฺติ โลกโต เอว สิทฺธา, น ลกฺขณโต, ตสฺมา ตตฺถ สมาสจินฺตา น อุปฺปาเทตพฺพา. इन सबको 'वीप्सा सर्वनाम' कहना उचित है। यहाँ प्रयोग के अभाव के कारण बहुवचन रूप नहीं हैं। इस प्रकार वीप्सा के अर्थ में कहे गए इन तीनों लिंगों के रूपों में समास का विचार नहीं करना चाहिए, क्योंकि वीप्सा शब्दों का निर्वचन नहीं किया जा सकता। जैसा कि 'पब्बं पब्बं सन्धि सन्धि ओधि ओधि' (पर्व-पर्व, सन्धि-सन्धि, सीमा-सीमा) होकर तप्त कड़ाह में डाले गए तिलों के समान 'तट-तट' शब्द करते हुए संस्कार टूटते हैं - इत्यादि में 'पब्ब-पब्ब' आदि शब्दों का समास करने के द्वारा निर्वचन पूर्वाचार्यों द्वारा नहीं दिखाया गया है। और चूँकि वीप्सा में वर्तमान शब्दों की द्विरुक्ति लोक-व्यवहार से ही सिद्ध है, व्याकरण के नियम से नहीं, इसलिए वहाँ समास का विचार नहीं करना चाहिए। อิทานิ เอกจฺจ เอกติย เอกจฺจิยสทฺทานํ นามิกปทมาลาโย วุจฺจนฺเต – ปุลฺลิงฺเค ตาว เอกจฺโจ, เอกจฺเจ. เอกจฺจํ, เอกจฺเจ. เสสํ ปุริสสทฺทสมํ. เอตฺถ เอกจฺเจติ ปจฺจตฺตพหุวจนเมว สพฺพนามิกรูปสมํ อสาธารณรูปตฺตา. ‘‘อิเธกจฺโจ กุลปุตฺโต. อิเธกจฺเจ โมฆปุริสา’’ติ นิทสฺสนปทานิ. अब 'एकच्च', 'एकतिय' और 'एकच्चिय' शब्दों की नामिक पदमालाएँ कही जाती हैं - पुल्लिंग में पहले 'एकच्चो, एकच्चे'। 'एकच्चं, एकच्चे'। शेष 'पुरिस' शब्द के समान है। यहाँ 'एकच्चे' यह प्रथमा बहुवचन ही सर्वनाम रूप के समान है, क्योंकि यह असाधारण रूप है। 'इधेकच्चो कुलपुत्तो' (यहाँ कोई कुलपुत्र), 'इधेकच्चे मोघपुरिसा' (यहाँ कुछ मूर्ख पुरुष) - ये उदाहरण पद हैं। เอกติโย, เอกติเย. เอกติยํ, เอกติเย. เสสํ ปุริสสทฺทสมํ. อิธาปิ เอกติเยติ ปจฺจตฺตพหุวจนเมว สพฺพนามิกรูปสมํ อสาธารณรูปตฺตา. เอกติเย มนุสฺสา. एकतियो, एकतिये। एकतियं, एकतिये। शेष 'पुरिस' शब्द के समान है। यहाँ भी 'एकतिये' यह प्रथमा बहुवचन ही सर्वनाम रूप के समान है, क्योंकि यह असाधारण रूप है। 'एकतिये मनुस्सा' (कुछ मनुष्य)। ‘‘น วิสฺสเส เอกติเยสุ เอว,อคาริสุ ปพฺพชิเตสุ จาปิ; สาธูปิ หุตฺวาน อสาธุ โหนฺติ; อสาธุ หุตฺวา ปุน สาธุ โหนฺตี’’ติ 'न विस्ससे एकतियेसु एव, अगारिसु पब्बजितेसु चापि; साधूपि हुत्वान असाधु होन्ति; असाधु हुत्वा पुन साधु होन्ति' (न गृहस्थों पर और न ही प्रव्रजितों पर, केवल कुछ लोगों पर ही विश्वास करना चाहिए; क्योंकि वे साधु होकर भी असाधु हो जाते हैं और असाधु होकर पुनः साधु हो जाते हैं) - นิทสฺสนปทานิ. เอกจฺจิยสทฺทสฺส อตฺถิตายํ ปน – ये उदाहरण पद हैं। 'एकच्चिय' शब्द के होने पर तो - ‘‘สจฺจํ กิเรวมาหํสุ, นรา เอกจฺจิยา อิธ; กฏฺฐํ นิปฺลวิตํ เสยฺโย, น ตฺเวเวกจฺจิโย นโร. 'सच्चं किरवमाहंसु, नरा एकच्चिया इध; कट्ठं निप्लवितं सेय्यो, न त्वेवेकच्चियो नरो' (सचमुच यहाँ कुछ मनुष्यों ने ऐसा कहा है - बहता हुआ काष्ठ श्रेष्ठ है, किन्तु कोई-कोई मनुष्य नहीं)। เอกจฺจิยํ อาหาร’’นฺติ นิทสฺสนปทานิ. เอกจฺจิโย, เอกจฺจิยา. เอกจฺจิยํ, เอกจฺจิเยติ สพฺพถาปิ ปุริสนโย. ปุลฺลิงฺครูปานิ. 'एकच्चियं आहारं' (कुछ आहार) - ये उदाहरण पद हैं। 'एकच्चियो, एकच्चिया। एकच्चियं, एकच्चिये' - इस प्रकार सर्वथा 'पुरिस' का नियम है। ये पुल्लिंग रूप हैं। เอกจฺจํ[Pg.380], เอกจฺจานิ. เอกจฺจํ, เอกจฺจานิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. เอกติยํ, เอกติยานิ. เอกติยํ, เอกติยานิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. เอกจฺจิยํ, เอกจฺจิยานิ. เอกจฺจิยํ, เอกจฺจิยานิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. นปุํสกลิงฺครูปานิ. एकच्चं, एकच्चानि। एकच्चं, एकच्चानि। शेष पुल्लिंग के समान है। एकतियं, एकतियानि। एकतियं, एकतियानि। शेष पुल्लिंग के समान है। एकच्चियं, एकच्चियानि। एकच्चियं, एकच्चियानि। शेष पुल्लिंग के समान है। ये नपुंसक लिंग रूप हैं। ‘‘เอกจฺจา, เอกจฺจา, เอกจฺจาโย’’ติ กญฺญานเยน, ตถา ‘‘เอกติยา, เอกติยา, เอกติยาโย. เอกติย’’นฺติ จ, ‘‘เอกจฺจิยา, เอกจฺจิยา, เอกจฺจิยาโย. เอกจฺจิย’’นฺติ จ กญฺญานเยน โยเชตพฺพํ. อิตฺถิลิงฺครูปานิ. 'एकच्चा, एकच्चा, एकच्चायो' - इस प्रकार 'कञ्ञा' के नियम से, वैसे ही 'एकतिया, एकतिया, एकतियायो। एकतियं' और 'एकच्चिया, एकच्चिया, एकच्चियायो। एकच्चियं' - इस प्रकार 'कञ्ञा' के नियम से जोड़ना चाहिए। ये स्त्रीलिंग रूप हैं। อิทานิ เอกากี เอกากิยสทฺทวเสน นามิกปทมาลา วุจฺจนฺเต – अब 'एकाकी' और 'एकाकिय' शब्दों के अनुसार नामिक पदमाला कही जाती है - เอกากี, เอกากี, เอกากิโน. เอกากึ, เอกากี, เอกากิโน. ทณฺฑีนเยน เญยฺยา. เอกากิโย, เอกากิยา. เอกากิยํ, เอกากิเย. เอกากิเยน. ปุริสนเยน เญยฺยํ. ปุลฺลิงฺครูปานิ. एकाकी, एकाकी, एकाकिनो। एकाकिं, एकाकी, एकाकिनो। 'दण्डी' शब्द के समान समझना चाहिए। एकाकियो, एकाकिया। एकाकियं, एकाकिये। एकाकियेन। 'पुरिस' शब्द के समान समझना चाहिए। ये पुल्लिंग रूप हैं। เอกากิ กุลํ, เอกากี, เอกากีนิ. เอกากึ, เอกากี, เอกากีนิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. เอกากิยํ, เอกากิยานิ. เอกากิยํ, เอกากิยานิ. เสสํ ปุลฺลิงฺคสทิสํ. นปุํสกลิงฺครูปานิ. एकाकि कुलम्, एकाकी, एकाकीनि। एकाकिं, एकाकी, एकाकीनि। शेष पुल्लिंग के समान है। एकाकियं, एकाकियानि। एकाकियं, एकाकियानि। शेष पुल्लिंग के समान है। ये नपुंसकलिङ्ग रूप हैं। เอกากินี, เอกากินี, เอกากินิโย. เอกากินึ, เอกากินี, เอกากินิโย. เอกากินิยาติ อิตฺถีสทิสํ. เอกากิยา, เอกากิยา, เอกากิยาโย. เอกากิยํ, เอกากิยา, เอกากิยาโย. เอกากิยายาติ กญฺญาสทิสํ. อิตฺถิลิงฺครูปานิ. สพฺพานิ ปเนตานิ อสพฺพนามิกรูปานิ อตฺถนฺตรวิญฺญาปนตฺถํ วุตฺตานีติ ทฏฺฐพฺพานิ. एकाकिनी, एकाकिनी, एकाकिनियो। एकाकिनिं, एकाकिनी, एकाकिनियो। 'एकाकिनिया' इत्यादि 'इत्थी' शब्द के समान हैं। एकाकिया, एकाकिया, एकाकियायो। एकाकियं, एकाकिया, एकाकियायो। 'एकाकियाया' इत्यादि 'कञ्ञा' शब्द के समान हैं। ये स्त्रीलिंग रूप हैं। ये सभी असर्वनामिक रूप अन्य अर्थों को बताने के लिए कहे गए हैं, ऐसा समझना चाहिए। อิทานิ ทฺวิสทฺทปริยายสฺส สทา พหุวจนนฺตสฺส สพฺพนามิกปทสฺส อุภสทฺทสฺส นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'द्वि' शब्द के पर्यायवाची, सदैव बहुवचनान्त सर्वनाम पद 'उभ' शब्द की शब्द-रूपावली (विभक्ति तालिका) कही जाती है - ‘‘อุโภ[Pg.381], อุโภ, อุโภหิ, อุโภภิ, อุภินฺนํ, อุโภหิ, อุโภภิ, อุภินฺนํ, อุโภสู’’ติ อยํ ปาฬินยานุรูเปน วุตฺตปทมาลา. อตฺริเม ปโยคา – อุโภ กุมารา นิกฺกีตา. อุโภ อิตฺถิโย ติฏฺฐนฺติ, อุโภ จิตฺตานิ ติฏฺฐนฺติ, อุโภ ปุตฺเต อทาสิ. อุโภ กญฺญาโย ปสฺสติ. อุโภ ปาทานิ ภินฺทิตฺวา, สญฺญมิสฺสามิ โว อหํ. อุโภหิ หตฺเถหิ. อุโภหิ พาหาหิ, อุโภหิ จิตฺเตหิ, อุภินฺนํ ชนานํ, อุภินฺนํ อิตฺถีนํ, อุภินฺนํ จิตฺตานํ, อุโภสุ ปุริเสสุ, อุโภสุ อิตฺถีสุ, อุโภสุ ปสฺเสสูติ, อยมสฺมากํ รุจิ. อาจริยา ปน ‘‘อุเภหิ, อุเภภิ, อุเภสู’’ติปิ อิจฺฉนฺติ. กจฺจายเนปิ หิ ‘‘อุเภ ตปฺปุริสา’’ติ วุตฺตํ. สพฺพานิปิ เอตานิ มนสิ กาตพฺพานิเยว. อุภสทฺทสฺส สมาโส อปฺปสิทฺโธ. ลิงฺคตฺตยสาธารณรูปานิ. "उभो, उभो, उभोहि, उभोभि, उभिन्नं, उभोहि, उभोभि, उभिन्नं, उभोसु" - यह पालि पद्धति के अनुसार कही गई शब्द-रूपावली है। यहाँ ये प्रयोग हैं - उभो कुमारा निक्कीता (दोनों कुमार खरीदे गए)। उभो इत्थियो तिट्ठन्ति (दोनों स्त्रियाँ खड़ी हैं), उभो चित्तानि तिट्ठन्ति (दोनों चित्त स्थित हैं), उभो पुत्ते अदासि (दो पुत्रों को दिया)। उभो कञ्ञायो पस्सति (दो कन्याओं को देखता है)। उभो पादानि भिन्दित्वा, सञ्ञमिस्सामि वो अहं (दोनों पैरों को तोड़कर, मैं तुम्हें वश में करूँगा)। उभोहि हत्थेहि (दोनों हाथों से)। उभोहि बाहाहि (दोनों बाहों से), उभोहि चित्तेहि (दोनों चित्तों से), उभिन्नं जनानं (दोनों जनों का), उभिन्नं इत्थीनं (दोनों स्त्रियों का), उभिन्नं चित्तानं (दोनों चित्तों का), उभोसु पुरिसेसु (दोनों पुरुषों में), उभोसु इत्थीसु (दोनों स्त्रियों में), उभोसु पस्सेसु (दोनों पार्श्वों में) - यह हमारी रुचि (मत) है। आचार्य तो "उभेहि, उभेभि, उभेसु" भी चाहते हैं। कच्चायन में भी "उभे तप्पुरिसा" कहा गया है। इन सभी को मन में धारण करना चाहिए। 'उभ' शब्द का समास दुर्लभ है। ये तीनों लिंगों के लिए साधारण (समान) रूप हैं। อิทานิ สงฺขาวจนานํ ทฺวิติ จตุสทฺทานํ สทา พหุวจนนฺตานํ สพฺพนามานํ นามิกปทมาลาโย วุจฺจนฺเต – अब संख्यावाचक 'द्वि', 'ति' और 'चतु' शब्दों की, जो सदैव बहुवचनान्त सर्वनाम हैं, शब्द-रूपावलियाँ कही जाती हैं - ทฺเว, ทฺเว, ทฺวีหิ, ทฺวีภิ, ทฺวินฺนํ, ทุวินฺนํ, ทฺวีหิ, ทฺวีภิ, ทฺวินฺนํ, ทุวินฺนํ, ทฺวีสุ. จูฬนิรุตฺติยํ ปน ‘‘ทฺวินฺนนฺน’’นฺติ ปทมาลา อาคตา. อิมานิ อหํสทฺทาทีนิ วิย อิตฺถิ ลิงฺคาทิภาววินิมุตฺตานิปิ ตีสุ ลิงฺเคสุ ยุชฺชนฺเต ‘‘ทฺเว ปุริสา, ทฺเว อิตฺถิโย, ทฺเว จิตฺตานิ’’อิจฺเจวมาทินา. อิมานิปิ ลิงฺคตฺตยสาธารณานิ รูปานิ. द्वे, द्वे, द्वीहि, द्वीभि, द्विन्नं, दुविन्नं, द्वीहि, द्वीभि, द्विन्नं, दुविन्नं, द्वीसु। चूलनिरुत्ति में तो "द्विन्नन्नं" यह रूपावली आई है। ये 'अहं' शब्द आदि के समान स्त्रीलिंग आदि भावों से मुक्त होने पर भी तीनों लिंगों में प्रयुक्त होते हैं, जैसे - "द्वे पुरिसा (दो पुरुष), द्वे इत्थियो (दो स्त्रियाँ), द्वे चित्तानि (दो चित्त)" इत्यादि। ये भी तीनों लिंगों के लिए साधारण रूप हैं। ‘‘ทฺเว’’ติ รูปํ ทฺวิสทฺทสฺส, ยํ สมาสมฺหิ ตํ ภเว; ทฺวิติปฺปกติกํเยว, นานาเทเสหิ สา สิยา. 'द्वि' शब्द का जो 'द्वे' रूप है, वह समास में होता है; वह 'द्वि' और 'ति' प्रकृति वाला ही है, जो विभिन्न स्थानों (प्रयोगों) से होता है। ทฺวิภาโว เจว ทฺเวภาโว, ทฺวิรตฺตญฺจ ทุวสฺสโก; โทหฬินี ทุปตฺตญฺจ, ตทฺธิตตฺเต ทฺวยํ ทฺวยํ. द्विभाव और द्वेभाव, द्विरत्त और दुवस्सक; दोहलिनि और दुपट्ट, तथा तद्धित में द्वय और द्वय। ตโย[Pg.382], ตโย, ตีหิ, ตีภิ, ติณฺณํ, ติณฺณนฺนํ, ตีหิ, ตีภิ, ติณฺณํ, ติณฺณนฺนํ, ตีสุ. อิมานิ ปุลฺลิงฺครูปานิ. तयो, तयो, तीहि, तीभि, तिण्णं, तिण्णन्नं, तीहि, तीभि, तिण्णं, तिण्णन्नं, तीसु। ये पुल्लिंग रूप हैं। ติสฺโส, ติสฺโส, ตีหิ, ตีภิ, ติสฺสนฺนํ, ตีหิ, ตีภิ, ติสฺสนฺนํ, ตีสุ. อิมานิ อิตฺถิลิงฺครูปานิ. จูฬนิรุตฺติยํ ‘‘ติสฺสนฺนนฺน’’นฺติ จตุตฺถีฉฏฺฐีนํ พหุวจนมาคตํ, นิรุตฺติปิฏเก ปน ‘‘ติณฺณนฺน’’นฺติ. ตานิ สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเน ปุนปฺปุนํ อุปปริกฺขิตฺวา ทิสฺสนฺติ เจ, คเหตพฺพานิ. तिस्सो, तिस्सो, तीहि, तीभि, तिस्सन्नं, तीहि, तीभि, तिस्सन्नं, तीसु। ये स्त्रीलिंग रूप हैं। चूलनिरुत्ति में चतुर्थी और षष्ठी बहुवचन में "तिस्सन्नन्नं" आया है, किन्तु निरुत्तिपिटक में "तिण्णन्नं" है। यदि वे अट्ठकथा सहित त्रिपिटक बुद्धवचन में बार-बार परीक्षा करने पर दिखाई दें, तो उन्हें ग्रहण करना चाहिए। ตีณิ, ตีณิ, ตีหิ, ตีภิ, ติณฺณํ, ติณฺณนฺนํ, ตีหิ, ตีภิ, ติณฺณํ, ติณฺณนฺนํ, ตีสุ. อิมานิ นปุํสกลิงฺครูปานิ. กตฺถจิ ปน ปาฬิปฺปเทเส ตีณิสทฺทสฺส ณิการโลโปปิ ภวติ ‘‘ทฺเว วาติ วา อุทกผุสิตานี’’ติ. ‘‘ติณฺณนฺนํ โข ภิกฺขเว อินฺทฺริยานํ ภาวิตตฺตา พหุลีกตตฺตา ปิณฺโฑลภารทฺวาเชน ภิกฺขุนา อญฺญา พฺยากตา’’ติ อิทํ ‘‘ติณฺณนฺน’’นฺติ ปทสฺส อตฺถิภาเว นิทสฺสนํ. तीणि, तीणि, तीहि, तीभि, तिण्णं, तिण्णन्नं, तीहि, तीभि, तिण्णं, तिण्णन्नं, तीसु। ये नपुंसकलिङ्ग रूप हैं। कहीं-कहीं पालि प्रदेशों में 'तीणि' शब्द के 'णि' कार का लोप भी होता है, जैसे - "द्वे वा ति वा उदकफुसितानि"। "भिक्षुओं! तीन इन्द्रियों के भावित होने से, बहुलीकृत होने से पिण्डोल भारद्वाज भिक्षु द्वारा आज्ञा (अर्हत्व) व्याकृत की गई" - यह 'तिण्णन्नं' पद के अस्तित्व का उदाहरण है। ยานิ รูปานิ วุตฺตานิ, ‘‘ติสฺโส ตีณิ ตโย’’อิติ; สมาสวิสเย ตานิ, ติติปฺปกติกา สิยุํ. जो रूप "तिस्सो, तीणि, तयो" कहे गए हैं; समास के विषय में वे 'ति' प्रकृति वाले होते हैं। ยสฺมา ติสฺส สมาสมฺหิ, สทฺธึ ปรปเทน เว; ‘‘ติเวทนํ ติจิตฺต’’นฺติ, ‘‘ติโลก’’นฺติ จ นิทฺทิเส. क्योंकि 'ति' का पर-पद के साथ समास होने पर "तिवेदनं, तिचित्तं" और "तिलोकं" ऐसा निर्देश करना चाहिए। เอตฺถ นปุํสกตฺตํว, ปาสํสํ ปายวุตฺติโต; ปุมตฺตมฺเปตฺถ อิจฺฉนฺติ, ‘‘ติภโว ขายเต’’อิติ. यहाँ प्रायः प्रयोग के कारण नपुंसकत्व ही प्रशंसनीय है; यहाँ पुल्लिंग भी चाहते हैं, जैसे - "तिभवो खायते" (तीन भव क्षीण होते हैं)। จตฺตาโร, จตุโร, จตฺตาโร, จตุโร, จตูหิ, จตูภิ, จตุพฺภิ, จตุนฺนํ, จตูหิ, จตูภิ, จตุพฺภิ, จตุนฺนํ, จตูสุ. อิมานิ ปุลฺลิงฺครูปานิ. चत्तारो, चतुरो, चत्तारो, चतुरो, चतूहि, चतूभि, चतुब्भि, चतुन्नं, चतूहि, चतूभि, चतुब्भि, चतुन्नं, चतूसु। ये पुल्लिंग रूप हैं। จตสฺโส[Pg.383], จตสฺโส, จตูหิ, จตูภิ, จตุพฺภิ, จตสฺสนฺนํ, จตุนฺนํ, จตูหิ, จตูภิ, จตุพฺภิ, จตสฺสนฺนํ, จตุนฺนํ, จตูสุ. อิมานิ อิตฺถิลิงฺครูปานิ. อิตฺถิลิงฺคฏฺฐาเน ‘‘จตุนฺน’’นฺติ ปทํ จูฬนิรุตฺติยํ นิรุตฺติปิฏเก ปาฬิยํ อฏฺฐกถาสุ จ ทสฺสนโต วุตฺตํ. ตถา หิ จูฬนิรุตฺติยํ อิตฺถิลิงฺคฏฺฐาเน ‘‘จตุนฺน’’นฺติ อาคตํ, นิรุตฺติปิฏเก ‘‘จตุนฺนํ กญฺญาน’’นฺติ อาคตํ. ปาฬิยํ ปน โสณทนฺตสุตฺตาทีสุ ‘‘สมโณ โคตโม จตุนฺนํ ปริสานํ ปิโย มนาโป’’ติ อาคตํ. อฏฺฐกถาสุ จ ปน สุตฺตนฺตฏฺฐกถายํ ‘‘จตูหิ อจฺฉริยพฺภุตธมฺเมหิ สมนฺนาคโต จตุนฺนํ ปริสานํ ปิโย มนาโป’’ติ อาคตํ. สตฺติลงฺฆชาตกฏฺฐกถายํ ‘‘อาจริโย ปนสฺส จตุนฺนํ สตฺตีนํ ลงฺฆนํ สิปฺปํ ชานาตี’’ติ อาคตํ. चतस्सो, चतस्सो, चतूहि, चतूभि, चतुब्भि, चतस्सन्नं, चतुन्नं, चतूहि, चतूभि, चतुब्भि, चतस्सन्नं, चतुन्नं, चतूसु। ये स्त्रीलिंग रूप हैं। स्त्रीलिंग के स्थान पर 'चतुन्नं' पद चूलनिरुत्ति, निरुत्तिपिटक, पालि और अट्ठकथाओं में दो प्रकार से कहा गया है। जैसे कि चूलनिरुत्ति में स्त्रीलिंग के स्थान पर 'चतुन्नं' आया है, निरुत्तिपिटक में 'चतुन्नं कञ्ञानं' आया है। पालि में तो सोणदन्त सुत्त आदि में "श्रमण गौतम चारों परिषदों के प्रिय और मनभावन हैं" ऐसा आया है। और अट्ठकथाओं में सुत्तन्त-अट्ठकथा में "चार आश्चर्यजनक अद्भुत धर्मों से युक्त चारों परिषदों के प्रिय और मनभावन हैं" ऐसा आया है। सत्तिलङ्घजातक-अट्ठकथा में "आचार्य तो उसकी चार शक्तियों को लाँघने की विद्या जानते हैं" ऐसा आया है। จตฺตาริ, จตฺตาริ, จตูหิ, จตูภิ, จตุพฺภิ, จตุนฺนํ, จตูหิ, จตูภิ, จตุพฺภิ, จตุนฺนํ, จตูสุ. อิมานิ นปุํสกลิงฺครูปานิ. चत्तारि, चत्तारि, चतूहि, चतूभि, चतुब्भि, चतुन्नं, चतूहि, चतूभि, चतुब्भि, चतुन्नं, चतूसु। ये नपुंसकलिङ्ग रूप हैं। ‘‘จตฺตาโร’’ติ ‘‘จตสฺโส’’ติ, ‘‘จตฺตารี’’ติ จ สทฺทิตํ; รูปํ สมาสภาวมฺหิ, จตุปฺปกติกํ ภเว. 'चत्तारो' (पुल्लिंग), 'चतस्सो' (स्त्रीलिंग) और 'चत्तारी' (नपुंसक लिंग) - ये शब्द रूप समास होने पर 'चतु' प्रकृति वाले हो जाते हैं। นิทสฺสนปทาเนตฺถ, กมโต กมโกวิโท; ‘‘จตุพฺพิธํ จตุสฺสาลํ, จตุสจฺจ’’นฺติ นิทฺทิเส. यहाँ उदाहरण पद हैं, क्रम के ज्ञाता को क्रम से; 'चतुर्विध' (चार प्रकार का), 'चतुश्शाल' (चार कमरों वाला), 'चतुस्सत्य' (चार सत्य) - इस प्रकार निर्देश करना चाहिए। อิมานิ ทฺเวอาทิกานิ สพฺพนามิกานิ พหุวจนานิเยว ภวนฺติ, น เอกวจนานิ. จูฬนิรุตฺติยํ ปน ตีสุ ลิงฺเคสุ ‘‘จตสฺสนฺน’’นฺติ วุตฺตํ, ตํ อนิชฺฌานกฺขมํ วิย ทิสฺสติ. ये 'द्वि' आदि सर्वनाम केवल बहुवचन में ही होते हैं, एकवचन में नहीं। किन्तु 'चूलनिरुत्ति' में तीनों लिंगों में 'चतस्सन्नं' कहा गया है, वह विचारणीय (असंगत) सा प्रतीत होता है। อิทานิ ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ นามิกปทมาลา วุจฺจนฺเต, เตสุ เยน กเถติ, ตสฺสาลปเน ตุมฺหวจนานิ ภวนฺติ. अब 'तुम्ह' (तुम) और 'अम्ह' (मैं) शब्दों की नामिक पदमाला (विभक्ति रूप) कही जाती है, उनमें जिससे बात की जाती है, उसके संबोधन में 'तुम्ह' के वचन होते हैं। ตฺวํ, ตุวํ, ตุมฺเห. ตํ, ตุวํ, ตฺวํ, ตวํ, ตุมฺเห. ตยา, ตฺวยา, ตุมฺเหหิ, ตุมฺเหภิ. ตุยฺหํ, ตว, ตุมฺหํ, ตุมฺหากํ. ตยา, ตฺวยา, ตุมฺเหหิ, ตุมฺเหภิ. ตุยฺหํ, ตว, ตุมฺหํ, ตุมฺหากํ. ตยิ, ตฺวยิ, ตุมฺเหสุ[Pg.384]. ตตฺร ‘‘ตฺวํ ปุริโส, ตฺวํ อิตฺถี, ตฺวํ จิตฺต’’นฺติอาทินา โยเชตพฺพานิ. त्वं, तुवं, तुम्हे (प्रथमा)। तं, तुवं, त्वं, तवं, तुम्हे (द्वितीया)। तया, त्वया, तुम्हेहि, तुम्हेभि (तृतीया)। तुय्हं, तव, तुम्हं, तुम्हाकं (चतुर्थी)। तया, त्वया, तुम्हेहि, तुम्हेभि (पञ्चमी)। तुय्हं, तव, तुम्हं, तुम्हाकं (षष्ठी)। तयि, त्वयि, तुम्हेसु (सप्तमी)। वहाँ 'त्वं पुरिसो' (तुम पुरुष हो), 'त्वं इत्थी' (तुम स्त्री हो), 'त्वं चित्तं' (तुम चित्त हो) आदि के रूप में योजन करना चाहिए। อตฺตโยเค อมฺหวจนานิ ภวนฺติ. अपने (स्वयं के) योग में 'अम्ह' के वचन होते हैं। อหํ, อหกํ, มยํ, อมฺเห. มํ, มมํ, อมฺเห. มยา, อมฺเหหิ, อมฺเหภิ. มยฺหํ, มม, อมฺหํ, อมฺหากํ, อสฺมากํ. มยา, อมฺเหหิ, อมฺเหภิ. มยฺหํ, มม, อมฺหํ, อมฺหากํ, อสฺมากํ. มยิ, อมฺเหสุ, อสฺเมสุ. अहं, अहकं, मयं, अम्हे (प्रथमा)। मं, ममं, अम्हे (द्वितीया)। मया, अम्हेहि, अम्हेभि (तृतीया)। मय्हं, मम, अम्हं, अम्हाकं, अस्माकं (चतुर्थी)। मया, अम्हेहि, अम्हेभि (पञ्चमी)। मय्हं, मम, अम्हं, अम्हाकं, अस्माकं (षष्ठी)। मयि, अम्हेसु, अस्मेसु (सप्तमी)। เอตฺถ ปน ‘‘กถํ อมฺเห กโรมเส’’ติ ปาฬิทสฺสนโต ‘‘ตุมฺเห’’ติ ปจฺจตฺตวจนสฺส วิย ‘‘อมฺเห’’ติ ปจฺจตฺตวจนสฺสปิ อตฺถิตา เวทิตพฺพา, ‘‘อหก’’นฺติ รูปนฺตรมฺปิ อิจฺฉิตพฺพํ. ตสฺส อตฺถิภาเว ‘‘อหกญฺจ จิตฺตวสานุคา ภาสิสฺส’’นฺติ เอสา ปาฬิ นิทสฺสนํ. เอตฺถ หิ อหกนฺติ อหํ อิจฺเจวตฺโถ. ตตฺร ‘‘อหํ ปุริโส, อหํ กญฺญา, อหํ จิตฺต’’นฺติอาทินา โยเชตพฺพานิ. อิมานิปิ ลิงฺคตฺตยสาธารณรูปานิ. यहाँ 'कथं अम्हे करोमसे' (हम कैसे करें) इस पालि प्रयोग को देखने से 'तुम्हे' इस प्रथमा विभक्ति के समान 'अम्हे' इस प्रथमा विभक्ति की भी सत्ता जाननी चाहिए, और 'अहकं' इस रूपान्तर को भी स्वीकार करना चाहिए। उसके अस्तित्व के विषय में 'अहकञ्च चित्तवसानुगा भासिस्सं' यह पालि उदाहरण है। यहाँ 'अहकं' का अर्थ 'अहं' (मैं) ही है। वहाँ 'अहं पुरिसो', 'अहं कञ्ञा', 'अहं चित्तं' आदि के रूप में योजन करना चाहिए। ये भी तीनों लिंगों में समान रूप वाले हैं। กจฺจายนจูฬนิรุตฺตินิรุตฺติปิฏเกสุ ปน ‘‘ตุมฺหากํ อมฺหาก’’นฺติ จ ทุติยาพหุวจนํ วุตฺตํ. กจฺจายเน ‘‘ตุมฺหานํ อมฺหาน’’นฺติ จ ปฐมาทุติยาพหุวจนํ, ‘‘ตุมฺหํ อมฺห’’นฺติ จ จตุตฺถีฉฏฺเฐกวจนํ, ปฐมาทุติยาพหุวจนญฺจ วุตฺตํ, จูฬนิรุตฺตินิรุตฺติปิฏเก ปน ‘‘ตุมฺหํ อมฺห’’นฺติ จ ทุติเยกวจนํ วุตฺตํ, ‘‘ตุมฺเห อมฺเห’’ติ จ จตุตฺถีฉฏฺฐีพหุวจนํ วุตฺตํ. เอตานิ อุปปริกฺขิตฺวา สาฏฺฐกเถสุ สุตฺตนฺเตสุ ทิสฺสนฺติ เจ, คเหตพฺพานิ. कच्चायन, चूलनिरुत्ति और निरुत्तिपिटक में 'तुम्हाकं' और 'अम्हाकं' को द्वितीया बहुवचन कहा गया है। कच्चायन में 'तुम्हानं' और 'अम्हानं' को प्रथमा और द्वितीया बहुवचन, तथा 'तुम्हं' और 'अम्हं' को चतुर्थी और षष्ठी एकवचन, एवं प्रथमा और द्वितीया बहुवचन कहा गया है। चूलनिरुत्ति और निरुत्तिपिटक में 'तुम्हं' और 'अम्हं' को द्वितीया एकवचन कहा गया है, और 'तुम्हे' और 'अम्हे' को चतुर्थी और षष्ठी बहुवचन कहा गया है। यदि ये अट्टकथाओं सहित सुत्तन्तों में दिखाई दें, तो इन्हें ग्रहण करना चाहिए। ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ ปน ปรปเทหิ สทฺธึ สมาเส ‘‘มํทีปา’’ติอาทโย ปโยคา ตถาคตาทิมุขโต สมฺภวนฺติ. ‘‘เอเต คามณิ มํทีปา มํเลณา มํสรณา’’ติ หิ ตถาคตมุขโต, ‘‘ตยฺโยโค มยฺโยโค’’ติ นิรุตฺตญฺญุมุขโต, กาพฺยาทาเส จ ‘‘ตฺวํมุขํ กมเลเนว, ตุลฺยํ นาญฺเญน [Pg.385] เกนจี’’ติ จ ‘‘จนฺเทน ตฺวํมุขํ ตุลฺย’’นฺติ จ กวิมุขโต. 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों का पर-पदों के साथ समास होने पर 'मंदीपा' आदि प्रयोग तथागत आदि के मुख से (वचनों में) प्राप्त होते हैं। जैसे तथागत के मुख से— 'एते गामणि मंदीपा मंलेणा मंसरणा' (हे ग्रामणी! ये मेरे द्वीप हैं, मेरी शरण हैं, मेरा आश्रय हैं); निरुक्ति के ज्ञाताओं के मुख से— 'तय्योगो मय्योगो'; और काव्यादर्श में कवियों के मुख से— 'त्वंमुखं कमलेनेव, तुल्यं नाञ्ञेन केनची' (तुम्हारा मुख कमल के समान है, किसी अन्य के समान नहीं) और 'चन्देन त्वंमुखं तुल्यं' (चन्द्रमा के समान तुम्हारा मुख है)। ตตฺถ หิ อหํ ทีโป เอเตสนฺติ มํทีปา, อหํ เลณํ เอเตสนฺติ มํเลณา, เอวํ มํสรณา. ตุมฺเหน โยโค ตยฺโยโค, ตุมฺหสทฺเทน โยโค อิจฺเจวตฺโถ. อมฺเหน โยโค มยฺโยโค, อมฺหสทฺเทน โยโค อิจฺเจวตฺโถ. ตว มุขํ ตฺวํมุขํ. พหุวจนวเสนปิ นิพฺพจนียํ ‘‘ตุมฺหากํ มุขํ ตฺวํมุข’’นฺติ. เอตฺถ จ ปาฬิยํ ‘‘มํทีปา’’อิจฺจาทิทสฺสนโต ‘‘ตฺวํทีปา’’ติอาทีนิ กาพฺยาทาเส จ ‘‘ตฺวํมุข’’นฺติ ทสฺสนโต ตฺวํวณฺโณ, ตฺวํสโร, มํมุขํ, มํวณฺโณ, มํสโรอาทีนิ คเหตพฺพานิ. ตตฺถ ตฺวํ ทีโป เอเตสนฺติ ตฺวํทีปา, ตุมฺเห วา ทีปา เอเตสนฺติ ตฺวํทีปา, ตว วณฺโณ ตฺวํวณฺโณ. มม มุขํ มํมุขํ, อมฺหากํ วา มุขํ มํมุขนฺติ นิพฺพจนานิ. เอส นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ. वहाँ 'अहं दीपो एतेसं' (मैं इनका द्वीप हूँ) इस अर्थ में 'मंदीपा', 'अहं लेणं एतेसं' (मैं इनका आश्रय हूँ) इस अर्थ में 'मंलेणा', इसी प्रकार 'मंसरणा' है। 'तुम्हेन योगो' (तुम्ह के साथ योग) इस अर्थ में 'तय्योगो' है, अर्थात् 'तुम्ह' शब्द के साथ योग। 'अम्हेन योगो' (अम्ह के साथ योग) इस अर्थ में 'मय्योगो' है, अर्थात् 'अम्ह' शब्द के साथ योग। 'तव मुखं' (तुम्हारा मुख) इस अर्थ में 'त्वंमुखं' है। बहुवचन के अनुसार भी 'तुम्हाकं मुखं त्वंमुखं' ऐसा विग्रह करना चाहिए। यहाँ पालि में 'मंदीपा' आदि के दर्शन से 'त्वंदीपा' आदि, और काव्यादर्श में 'त्वंमुखं' के दर्शन से 'त्वंवण्णो', 'त्वंसरो', 'मंमुखं', 'मंवण्णो', 'मंसरो' आदि ग्रहण करने चाहिए। वहाँ 'त्वं दीपो एतेसं' (तुम इनके द्वीप हो) इस अर्थ में 'त्वंदीपा', अथवा 'तुम्हे वा दीपा एतेसं' (तुम सब इनके द्वीप हो) इस अर्थ में 'त्वंदीपा', 'तव वण्णो' (तुम्हारा वर्ण) इस अर्थ में 'त्वंवण्णो' है। 'मम मुखं' (मेरा मुख) इस अर्थ में 'मंमुखं', अथवा 'अम्हाकं वा मुखं मंमुखं' (हमारा मुख) इस अर्थ में 'मंमुखं' - ऐसे विग्रह हैं। यही नियम अन्य इसी प्रकार के स्थानों में भी है। สมาเส ตุมฺหอมฺหากํ, โหนฺติ ปรปเทหิ เว; ‘‘ตฺวํมุข’’นฺติ จ ‘‘มํทีปา, ตยฺโยโค มยฺโยโค’’ติ จ. समास में 'तुम्ह' और 'अम्ह' के पर-पदों के साथ (ये रूप) होते हैं— 'त्वंमुखं', 'मंदीपा', 'तय्योगो' और 'मय्योगो'। เอตฺถาห ‘‘กึ เอตฺตกเมว ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ รูปํ, อุทาหุ อญฺญมฺปิ อตฺถี’’ติ? อตฺถิ ‘‘เต เม’’ อิจฺจาทีนิ. ยทิ เอวํ กสฺมา ปทมาลา วิสุํ น วุตฺตาติ? อวจเน การณมตฺถิ. อตฺริทํ การณํ – यहाँ कोई कहता है— "क्या 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के इतने ही रूप हैं, अथवा अन्य भी हैं?" उत्तर है— 'ते', 'मे' आदि (रूप) हैं। यदि ऐसा है, तो उनकी पदमाला अलग से क्यों नहीं कही गई? न कहने का एक कारण है। यहाँ वह कारण यह है— ‘‘เต เม โว โน’’ติ รูปานิ, ปรานิ ปทโต ยโต; ตโต นามิกปนฺตีสุ, น ตุ วุตฺตานิ ตานิ เม. चूँकि 'ते', 'मे', 'वो', 'नो' ये रूप (किसी अन्य) पद के बाद आते हैं, इसलिए मैंने उन्हें नामिक पंक्तियों (विभक्ति तालिकाओं) में नहीं कहा है। เอตฺถ จ มยํ เม โว โนสทฺทานมตฺถุทฺธาโร วุจฺจเต – เตสทฺทสฺส ปน วุตฺโตว. ยสฺมา อฏฺฐกถาจริยา มยํสทฺทฏฺฐาเนปิ มยาสทฺโท, มยาสทฺทฏฺฐาเนปิ จ มยํสทฺโท อิจฺเจว วทนฺติ, ตสฺมา มยมฺปิ ตเถว วทาม. มยํสทฺโท ‘‘อนุญฺญาตปฏิญฺญาตา, เตวิชฺชามยมสฺมุโภ’’ติอาทีสุ อสฺมทตฺเถ อาคโต[Pg.386]. ‘‘มยํ นิสฺสาย เหมาย, ชาตา มนฺโทสิสูปคา’’ติ เอตฺถ ปญฺญตฺติยํ. ‘‘มโนมยา ปีติภกฺขา สยํปภา’’ติอาทีสุ นิพฺพตฺติอตฺเถ. พาหิเรน ปจฺจเยน วินา มนสาว นิพฺพตฺตาติ มโนมยา. ‘‘ยํนูนาหํ สพฺพมตฺติกามยํ กุฏิกํ กเรยฺย’’นฺติอาทีสุ วิการตฺเถ. ‘‘ทานมยํ สีลมย’’นฺติอาทีสุ ปทปูรณมตฺเต. ‘‘ปีฐํ เต โสวณฺณมยํ อุฬาร’’นฺติ เอตฺถ วิการตฺเถ ปทปูรณมตฺเต วา ทฏฺฐพฺโพ. ยทา หิ สุวณฺณเมว โสวณฺณนฺติ อยมตฺโถ, ตทา สุวณฺณสฺส วิกาโร โสวณฺณมยนฺติ วิการตฺเถ มยสทฺโท ทฏฺฐพฺโพ. นิพฺพตฺติอตฺโถติปิ วตฺตุํ วฏฺฏติ. ยทา ปน สุวณฺเณน นิพฺพตฺตํ โสวณฺณนฺติ อยมตฺโถ, ตทา โสวณฺณเมว โสวณฺณมยนฺติ ปทปูรณมตฺเต มยสทฺโท ทฏฺฐพฺโพ. यहाँ 'मयं', 'मे', 'वो', 'नो' शब्दों का अर्थ-उद्धार (व्याख्या) कहा जाता है— 'ते' शब्द का तो कहा ही जा चुका है। चूँकि अट्टकथाचार्य 'मयं' शब्द के स्थान पर भी 'मया' शब्द, और 'मया' शब्द के स्थान पर भी 'मयं' शब्द कहते हैं, इसलिए हम भी वैसा ही कहते हैं। 'मयं' शब्द 'अनुञ्ञातपटिञ्ञाता, तेविज्जामयमस्मुभो' आदि में 'अस्मद्' (हम) के अर्थ में आया है। 'मयं निस्साय हेमाय, जाता मन्दोसिसूपगा' यहाँ यह प्रज्ञप्ति (नाम) के अर्थ में है। 'मनोमया पीतिभक्खा सयम्पभा' आदि में यह 'उत्पत्ति' (निर्वृत्ति) के अर्थ में है। बाहरी प्रत्यय के बिना केवल मन से ही उत्पन्न होने के कारण 'मनोमया' कहलाते हैं। 'यंनूनाहं सब्बमत्तिकामयं कुटिकं करेय्यं' आदि में यह 'विकार' के अर्थ में है। 'दानमयं सीलमयं' आदि में यह केवल 'पद-पूरण' (शब्द को पूरा करने) के अर्थ में है। 'पीठं ते सोवण्णमयं उळारं' यहाँ इसे 'विकार' के अर्थ में अथवा 'पद-पूरण' के अर्थ में देखना चाहिए। जब 'सुवर्ण' ही 'सोवण्ण' है, यह अर्थ हो, तब सुवर्ण का विकार 'सोवण्णमयं' है— इस प्रकार 'मय' शब्द विकार के अर्थ में देखना चाहिए। इसे 'उत्पत्ति' के अर्थ में भी कहा जा सकता है। किन्तु जब 'सुवर्ण से निर्मित' 'सोवण्ण' है, यह अर्थ हो, तब 'सोवण्ण' ही 'सोवण्णमयं' है— इस प्रकार 'मय' शब्द केवल पद-पूरण के अर्थ में देखना चाहिए। เมสทฺโท ‘‘กิจฺเฉน เม อธิคตํ, หลํ ทานิ ปกาสิตุ’’นฺติอาทีสุ กรเณ อาคโต. มยาติ อตฺโถ. ‘‘ตสฺส เม ภนฺเต ภควา สํขิตฺเตน ธมฺมํ เทเสตู’’ติอาทีสุ สมฺปทาเน, มยฺหนฺติ อตฺโถติ วทนฺติ. ‘‘ปุพฺเพว เม ภิกฺขเว สมฺโพธา อนภิสมฺพุทฺธสฺส โพธิสตฺตสฺเสว สโต’’ติอาทีสุ สามิอตฺเถ, มมาติ อตฺโถติ จ วทนฺติ. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – 'मे' शब्द 'kicchena me adhigataṃ, halaṃ dāni pakāsituṃ' (मैंने कठिनाई से प्राप्त किया है, अब इसे प्रकाशित करना व्यर्थ है) आदि में करण कारक में आया है। इसका अर्थ 'मया' (मेरे द्वारा) है। 'Tassa me bhante bhagavā saṃkhittena dhammaṃ desetū' (हे भदन्त, भगवान मुझे संक्षेप में धर्म उपदेश दें) आदि में सम्प्रदान कारक में है, वे कहते हैं कि इसका अर्थ 'मय्हं' (मेरे लिए/मुझको) है। 'Pubbeva me bhikkhave sambodhā anabhisambuddhassa bodhisattasseva sato' (हे भिक्षुओं, मेरे सम्बोधि प्राप्त करने से पहले, जब मैं अनभिसम्बुद्ध बोधिसत्व ही था) आदि में स्वामी अर्थ (षष्ठी) में है, और वे कहते हैं कि इसका अर्थ 'मम' (मेरा) है। यहाँ यह कहा गया है - กรเณ สมฺปทาเน จ, สามิอตฺเถ จ อาคโต; เมสทฺโท อิติ วิญฺเญยฺโย, วิญฺญุนา นยทสฺสินา. करण, सम्प्रदान और स्वामी अर्थ में आए हुए 'मे' शब्द को नीति के ज्ञाता विद्वान द्वारा इस प्रकार जानना चाहिए। เอตฺถ [Pg.387] ปน ฐตฺวา อฏฺฐกถาจริเยหิ กเต เต เมสทฺทานมตฺถวิวรเณ วินิจฺฉยํ พฺรูม เตสมธิปฺปายปฺปกาสนวเสน โสตูนํ สํสยสมุคฺฆาฏนตฺถํ. ตถา หิ อฏฺฐกถาจริยา เตเมสทฺทานํ สมฺปทานตฺถวเสน ‘‘ตุยฺหํ มยฺห’’นฺติ อตฺถํ สํวณฺเณสุํ, สามิอตฺถวเสน ปน ‘‘ตว มมา’’ติ. เอวํ ยฺวายํ เตหิ อสงฺกรโต นิยโม ทสฺสิโต, โส สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเน กุโต ลพฺภา. ตถา หิ เตเมสทฺทตฺถวาจกา ตุยฺหํ มยฺหํสทฺทา ตว มมสทฺทา จ สมฺปทานสามิอตฺเถสุ อนิยมโต ปวตฺตนฺติ. यहाँ रुककर, अट्ठकथाचार्यों द्वारा किए गए उन 'ते' और 'मे' शब्दों के अर्थ-विवरण के विषय में, श्रोताओं के संशय को दूर करने के लिए उनके अभिप्राय को प्रकट करते हुए हम निर्णय कहते हैं। क्योंकि अट्ठकथाचार्यों ने 'ते' और 'मे' शब्दों का सम्प्रदान अर्थ के रूप में 'तुय्हं' और 'मय्हं' अर्थ वर्णित किया है, और स्वामी अर्थ के रूप में 'तव' और 'मम'। इस प्रकार उनके द्वारा जो यह असंकर (स्पष्ट) नियम दिखाया गया है, वह अट्ठकथा सहित त्रिपिटक बुद्धवचन में कहाँ प्राप्त होता है? क्योंकि 'ते' और 'मे' शब्दों के अर्थवाचक 'तुय्हं', 'मय्हं' शब्द और 'तव', 'मम' शब्द सम्प्रदान और स्वामी अर्थों में अनियमपूर्वक (बिना किसी निश्चित नियम के) प्रयुक्त होते हैं। ตตฺริเม ปโยคา – อิทํ ตุยฺหํ ททามิ. ตุยฺหํ วิกปฺเปมิ. ตุยฺหํ มํเสน เมเทน, มตฺถเกน จ พฺราหฺมณ, อาหุตึ ปคฺคเหสฺสามิ. เอส หิ ตุยฺหํ ปิตา นรสีโห. ตุยฺหํ ปน มาตา กหนฺติ. มยฺหเมว ทานํ ทาตพฺพํ, น อญฺเญสํ, มยฺหเมว สาวกานํ ทานํ ทาตพฺพํ, น อญฺเญสํ. น มยฺหํ ภริยา เอสา. อสฺสโม สุกโต มยฺหํ. สพฺพญฺญุตํ ปิยํ มยฺหํ. ตาต มยฺหํ มาตุ มุขํ อญฺญาทิสํ, ตุมฺหากํ อญฺญาทิสํ. มยฺหํ สามิโก อิทานิ มริสฺสติ. ตว ทียเต, ตว สิลาฆเต, มม สิลาฆเต, ปพฺพชฺชา มม รุจฺจติ. ตว ปุตฺโต. อุโภ มาตาปิตา มมาติ เอวํ อนิยมโต ปวตฺตนฺติ. वहाँ ये प्रयोग हैं - 'idaṃ tuyhaṃ dadāmi' (यह मैं तुम्हें देता हूँ)। 'tuyhaṃ vikappemi' (तुम्हें अर्पित करता हूँ)। 'tuyhaṃ maṃsena medena, matthakena ca brāhmaṇa, āhutiṃ paggahessāmi' (हे ब्राह्मण, तुम्हारे मांस, मेद और मस्तक से आहुति दूँगा)। 'esa hi tuyhaṃ pitā narasīho' (यह तुम्हारे पिता नरसिंह हैं)। 'tuyhaṃ pana mātā kahanti' (तुम्हारी माता कहाँ हैं?)। 'mayhameva dānaṃ dātabbaṃ, na aññesaṃ, mayhameva sāvakānaṃ dānaṃ dātabbaṃ, na aññesaṃ' (मुझे ही दान देना चाहिए, अन्यों को नहीं; मेरे ही श्रावकों को दान देना चाहिए, अन्यों को नहीं)। 'na mayhaṃ bhariyā esā' (यह मेरी पत्नी नहीं है)। 'assamo sukato mayhaṃ' (मेरा आश्रम सुनिर्मित है)। 'sabbaññutaṃ piyaṃ mayhaṃ' (सर्वज्ञता मुझे प्रिय है)। 'tāta mayhaṃ mātu mukhaṃ aññādisaṃ, tumhākaṃ aññādisaṃ' (तात, मेरी माता का मुख और प्रकार का है, तुम्हारा और प्रकार का)। 'mayhaṃ sāmiko idāni marissati' (मेरा स्वामी अब मर जाएगा)। 'tava dīyate' (तुम्हें दिया जाता है), 'tava silāghate' (तुम्हारी प्रशंसा करता है), 'mama silāghate' (मेरी प्रशंसा करता है), 'pabbajjā mama ruccati' (प्रव्रज्या मुझे रुचती है)। 'tava putto' (तुम्हारा पुत्र)। 'ubho mātāpitā mama' (दोनों माता-पिता मेरे हैं) - इस प्रकार ये अनियमपूर्वक प्रयुक्त होते हैं। จูฬนิรุตฺติยญฺหิ ยมกมหาเถเรน จตุตฺถีฉฏฺฐีนํ อนญฺญรูปตฺตํ วุตฺตํ ‘‘จตุตฺถีฉฏฺฐีนํ สพฺพตฺถ อนญฺญํ, ตติยาปญฺจมีนํ พหุวจนญฺจา’’ติ[Pg.388]. ยทิ เอวํ อฏฺฐกถาจริยา ‘‘นโม เต ปุริสาชญฺญ. นโม เต พุทฺธ วีรตฺถู’ติอาทีสุ ตุยฺหํสทฺทสฺส วเสน สมฺปทาเน, ตุยฺหนฺติ หิ อตฺโถ. ‘กินฺเต วตํ กึ ปน พฺรหฺมจริย’นฺติอาทีสุ สามิอตฺเถ, ตวาติ หิ อตฺโถ’’ติอาทีนิ วทนฺตา ‘‘อยุตฺตํ สํวณฺณนํ สํวณฺเณสุ’’นฺติปิ, ‘‘ปสฺสิตพฺพํ น ปสฺสึสู’’ติปิ อาปชฺชนฺตีติ? ยุตฺตํเยว เต สํวณฺณยึสุ, ปสฺสิตพฺพญฺจ ปสฺสึสุ. ตถา หิ เต ‘‘สทฺทสตฺถมฺปิ เอกเทสโต สาสนานุกูลํ โหตี’’ติ ปเรสมนุกมฺปาย สทฺทสตฺถโต นยํ คเหตฺวา สมฺปทานตฺถวเสน เต เมสทฺทานํ ‘‘ตุยฺหํ มยฺห’’นฺติ อตฺถํ สํวณฺณยึสุ, สามิอตฺถวเสน ปน ‘‘ตว มมา’’ติ. สทฺทสตฺเถ หิ จตุตฺถีฉฏฺฐีรูปานิ สพฺพถา วิสทิสานิ, สาสเน ปน สทิสานิ. ตสฺมา สาสเน สามญฺเญน ปวตฺตานิ จตุตฺถีฉฏฺฐีรูปานิ สทฺทสตฺเถ วิเสเสน ปวตฺเตหิ จตุตฺถีฉฏฺฐีรูเปหิ สมานคติกานิ กตฺวา ปเรสมนุกมฺปาย สมฺปทานตฺเถ ตุยฺหํ มยฺหํสทฺทานํ ปวตฺตินิยโม, สามิอตฺเถ จ ตว มมสทฺทานํ ปวตฺตินิยโม ทสฺสิโต. ยสฺมา ปน ปเรสมนุกมฺปาย อยํ นิยโม, ตสฺมา กรุณาเยวายํปราโธ, น อฏฺฐกถาจริยานํ. ตาย เอว หิ เตหิ เอวํ สํวณฺณนา กตาติ. चूलनिरुत्ति में यमक महाथेर ने चतुर्थी और षष्ठी के समान रूप होने के बारे में कहा है - "चतुर्थी और षष्ठी सर्वत्र समान हैं, और तृतीया तथा पंचमी का बहुवचन भी।" यदि ऐसा है, तो क्या अट्ठकथाचार्य 'namo te purisājañña, namo te buddha vīratthu' आदि में 'तुय्हं' शब्द के आधार पर सम्प्रदान में 'तुय्हं' ही अर्थ है, और 'kinte vataṃ kiṃ pana brahmacariyaṃ' आदि में स्वामी अर्थ में 'तव' ही अर्थ है, ऐसा कहते हुए "अनुचित वर्णन किया" या "जो देखना चाहिए था वह नहीं देखा" के दोषी होते हैं? उन्होंने उचित ही वर्णन किया और जो देखना चाहिए था वह देखा। क्योंकि उन्होंने "शब्दशास्त्र भी एक अंश में शासन (बुद्ध-शिक्षा) के अनुकूल होता है" ऐसा मानकर दूसरों पर अनुकम्पा करते हुए शब्दशास्त्र से नियम लेकर सम्प्रदान अर्थ में 'ते' और 'मे' शब्दों का 'तुय्हं' और 'मय्हं' के रूप में वर्णन किया, और स्वामी अर्थ में 'तव' और 'मम' के रूप में। शब्दशास्त्र में चतुर्थी और षष्ठी के रूप सर्वथा भिन्न होते हैं, किन्तु शासन (पालि) में वे समान होते हैं। इसलिए शासन में सामान्य रूप से प्रवृत्त चतुर्थी-षष्ठी रूपों को शब्दशास्त्र में विशेष रूप से प्रवृत्त चतुर्थी-षष्ठी रूपों के समान मानकर, दूसरों पर अनुकम्पा के कारण सम्प्रदान अर्थ में 'तुय्हं-मय्हं' शब्दों का प्रयोग-नियम और स्वामी अर्थ में 'तव-मम' शब्दों का प्रयोग-नियम दिखाया गया है। चूँकि यह नियम दूसरों पर अनुकम्पा के कारण है, इसलिए यह केवल करुणा का ही 'अपराध' है, अट्ठकथाचार्यों का नहीं। उसी करुणा के कारण ही उनके द्वारा ऐसा वर्णन किया गया है। เกจิ ปเนตฺถ เอวํ วเทยฺยุํ – นนุ จ โภ อฏฺฐกถาจริเยหิ สทฺทนยํ นิสฺสาย เต เมสทฺทานํ สามิอตฺเถ วตฺตมานานํ ‘‘ตว มมา’’ติ อตฺถวจเนน ‘‘ตุยฺหํ มํเสน เมเทน, น มยฺหํ ภริยา เอสา’’ติอาทีสุ สามิวิสเยสุ วิภตฺติวิปลฺลาสนโย ทสฺสิโตติ สกฺกา วตฺตุํ, ตถา สทฺทนยญฺเญว นิสฺสาย เต เมสทฺทานํ สมฺปทานตฺเถ วตฺตมานานํ [Pg.389] ‘‘ตุยฺหํ มยฺห’’นฺติ อตฺถวจเนน ‘‘ภตฺตํ ตว น รุจฺจติ. ปพฺพชฺชา มม รุจฺจตี’’ติอาทีสุปิ สมฺปทานวิสเยสุ วิภตฺติวิปลฺลาสนโย ทสฺสิโตติ สกฺกา วตฺตุนฺติ? น สกฺกา, คาถาสุ วิย จุณฺณิยปทฏฺฐาเนปิ ตุยฺหํ มยฺหํ ตว มมสทฺทานํ อนิยเมน ทฺวีสุ อตฺเถสุ ปวตฺตนโต. น หิ อีทิเส ฐาเน คาถายํ วา จุณฺณิยปทฏฺฐาเน วา วิภตฺติวิปลฺลาโส อิจฺฉิตพฺโพ. ‘‘ตสฺส รชฺชสฺสหํ ภีโต. กึ นุ โข อหํ ตสฺส สุขสฺส ภายามี’’ติอาทีสุเยว ปน ฐาเนสุ อิจฺฉิตพฺโพ. यहाँ कुछ लोग ऐसा कह सकते हैं – "हे महानुभाव! क्या अट्ठकथाचार्यों ने व्याकरण के नियम (सद्दनय) का आश्रय लेकर 'ते' और 'मे' शब्दों के स्वामी अर्थ (षष्ठी) में प्रवृत्त होने पर 'तव' और 'मम' के अर्थ-वचन द्वारा 'तुय्हं मंसेन मेदेन' (तुम्हारे मांस और मेद से) और 'न मय्हं भरिया एसा' (यह मेरी पत्नी नहीं है) आदि स्वामी-विषयों में विभक्ति-विपर्यास (विभक्ति का उलट-फेर) का नियम दिखाया है, ऐसा कहा जा सकता है? उसी प्रकार व्याकरण के नियम का ही आश्रय लेकर 'ते' और 'मे' शब्दों के सम्प्रदान अर्थ (चतुर्थी) में प्रवृत्त होने पर 'तुय्हं' और 'मय्हं' के अर्थ-वचन द्वारा 'भत्तं तव न रुच्चति' (तुम्हें भात अच्छा नहीं लगता) और 'पब्बज्जा मम रुच्चति' (मुझे प्रव्रज्या अच्छी लगती है) आदि सम्प्रदान-विषयों में भी विभक्ति-विपर्यास का नियम दिखाया है, ऐसा कहा जा सकता है?" (उत्तर:) ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि गाथाओं के समान गद्य (चुण्णियपद) के स्थान पर भी 'तुय्हं', 'मय्हं', 'तव' और 'मम' शब्द बिना किसी नियम के दोनों अर्थों में प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार के स्थान पर, चाहे वह गाथा हो या गद्य, विभक्ति-विपर्यास इष्ट नहीं है। "तस्स रज्जस्स अहं भीतो" (मैं उस राज्य से डरा हुआ हूँ) और "किं नु खो अहं तस्स सुखस्स भायामि" (क्या मैं उस सुख से डरता हूँ?) आदि जैसे स्थानों पर ही (विभक्ति-विपर्यास) इष्ट है। ยทิ สทฺทนยํ นิสฺสาย ‘‘ตุยฺหํ มํเสน เมเทนา’’ติอาทีสุ วิภตฺติวิปลฺลาโส อิจฺฉิตพฺโพ สิยา, ‘‘พฺราหฺมณสฺส ปิยปุตฺตทานํ อทาสิ. พฺราหฺมณสฺส ปิตา อทาสี’’ติอาทีสุปิ สทฺทนยํ นิสฺสาย ‘‘พฺราหฺมณายา’’ติอาทินา วิภตฺติวิปลฺลาสตฺโถ วจนีโย สิยา จตุตฺถีฉฏฺฐีรูปานํ สตฺเถ วิสุํ วจนโต. เอวญฺจ สติ โก โทโสติ เจ? อตฺเถว โทโส, ยสฺมา ทานโยเค วา นโมโยเค วา อายาเทสสหิตานิ จตุตฺถีฉฏฺฐีรูปานิ สาฏฺฐกเถ เตปิฏเก พุทฺธวจเน นุปลพฺภนฺติ, ตสฺมา ‘‘พฺราหฺมณายา’’ติอาทินา วิภตฺติวิปลฺลาสตฺถวจเน อยํ โทโส ยทิทํ อวิชฺชมานคฺคหณํ. ยสฺมา ปน อีทิเสสุ ฐาเนสุ วิภตฺติวิปลฺลาสกรณํ สาวชฺชํ, ตสฺมา ‘‘ตุยฺหํ มํเสน เมเทนา’’ติอาทีสุปิ วิภตฺติวิปลฺลาโส น อิจฺฉิตพฺโพ. यदि व्याकरण के नियम का आश्रय लेकर 'तुय्हं मंसेन मेदेन' आदि में विभक्ति-विपर्यास इष्ट होता, तो 'ब्राह्मणस्स पियपुत्तदानं अदासि' (ब्राह्मण को प्रिय पुत्र का दान दिया) और 'ब्राह्मणस्स पिता अदासि' (ब्राह्मण के पिता ने दिया) आदि में भी व्याकरण के नियम का आश्रय लेकर 'ब्राह्मणाय' आदि के द्वारा विभक्ति-विपर्यास का अर्थ कहना पड़ता, क्योंकि चतुर्थी और षष्ठी के रूपों का अर्थ अलग-अलग बताया गया है। यदि ऐसा हो, तो इसमें क्या दोष है? इसमें दोष है ही, क्योंकि दान के योग में या 'नमो' के योग में 'आय' आदेश सहित चतुर्थी-षष्ठी के रूप अट्ठकथा सहित त्रिपिटक बुद्धवचन में नहीं पाए जाते हैं। इसलिए 'ब्राह्मणाय' आदि के द्वारा विभक्ति-विपर्यास का अर्थ कहने में यह दोष है कि यह अविद्यमान (जो नहीं है) का ग्रहण करना है। चूँकि ऐसे स्थानों पर विभक्ति-विपर्यास करना दोषपूर्ण है, इसलिए 'तुय्हं मंसेन मेदेन' आदि में भी विभक्ति-विपर्यास इष्ट नहीं है। จตุตฺถีฉฏฺฐีรูปานิ หิ อนญฺญานิ ทิสฺสนฺติ ‘‘ปุริสสฺส อทาสิ, ปุริสสฺส ธนํ พฺราหฺมณานํ อทาสิ, พฺราหฺมณานํ สนฺตก’’นฺติ. ตถา หิ ปาวจเน ส นํสทฺทา สมฺปทานสามิอตฺเถสุ สามญฺเญน [Pg.390] ปวตฺตนฺติ, ตปฺปวตฺติ ‘‘อคฺคสฺส ทาตา เมธาวี’’ติอาทีหิ ปโยเคหิ ทีเปตพฺพา. ‘‘อคฺคสฺส ทาตา เมธาวี’’ติ เอตฺถ หิ ‘‘อคฺคสฺสา’’ติ อยํ สทฺโท ยทา กฺริยาปฏิคฺคหณํ ปฏิจฺจ สมฺปทานตฺเถ ปวตฺตติ, ตทา ‘‘อคฺคสฺส รตนตฺตยสฺส ทาตา’’ติ อตฺถวเสน ปวตฺตติ. ยทา ปน กฺริยํ ปฏิจฺจ กมฺมภูเต สามิอตฺเถ ปวตฺตติ, ตทา ‘‘อคฺคสฺส เทยฺยธมฺมสฺส ทาตา’’ติ อตฺถวเสน ปวตฺตติ. เอวํ สพฺพถาปิ วิปลฺลาโส ตุมฺหากํ สรณํ น โหตีติ. ตถา สทฺทนยํ นิสฺสาย ‘‘สมฺปทานวจน’’นฺติ ตุมฺเหหิ ทฬฺหํ คหิตสฺส มยฺหํสทฺทสฺส สามิอตฺถวเสน ปณฺณตฺติยํ ทสฺสนโต วิภตฺติวิปลฺลาโส ตุมฺหากํ สรณํ น โหเตว. ตถา หิ – क्योंकि चतुर्थी और षष्ठी के रूप अभिन्न (एक जैसे) देखे जाते हैं, जैसे - 'पुरिसस्स अदासि' (पुरुष को दिया), 'पुरिसस्स धनं' (पुरुष का धन), 'ब्राह्मणानं अदासि' (ब्राह्मणों को दिया), 'ब्राह्मणानं सन्तकं' (ब्राह्मणों का स्वत्व)। उसी प्रकार बुद्धवचन में 'स' और 'नं' शब्द सम्प्रदान और स्वामी अर्थों में सामान्य रूप से प्रवृत्त होते हैं, उनकी यह प्रवृत्ति 'अग्गस्स दाता मेधावी' आदि प्रयोगों से स्पष्ट की जानी चाहिए। 'अग्गस्स दाता मेधावी' यहाँ 'अग्गस्स' यह शब्द जब क्रिया के प्रतिग्रहण (स्वीकार करने) की अपेक्षा से सम्प्रदान अर्थ में प्रवृत्त होता है, तब 'अग्गस्स रतनत्तयस्स दाता' (श्रेष्ठ रत्नत्रय को देने वाला) इस अर्थ में प्रवृत्त होता है। किन्तु जब क्रिया की अपेक्षा से कर्मभूत स्वामी अर्थ में प्रवृत्त होता है, तब 'अग्गस्स देय्यधम्मस्स दाता' (श्रेष्ठ देय धर्म का देने वाला) इस अर्थ में प्रवृत्त होता है। इस प्रकार सर्वथा विभक्ति-विपर्यास आपका शरण (आधार) नहीं होता। उसी प्रकार व्याकरण के नियम का आश्रय लेकर 'सम्प्रदान वचन' के रूप में आपके द्वारा दृढ़ता से ग्रहण किए गए 'मय्हं' शब्द का स्वामी अर्थ में प्रज्ञप्ति (नामकरण) में देखे जाने के कारण, विभक्ति-विपर्यास आपका शरण नहीं ही होता। जैसा कि – ‘‘สกุโณ มยฺหโก นาม, คิริสานุทรีจโร; ปกฺกํ ปิปฺผลิมารุยฺห, ‘มยฺหํ มยฺห’นฺติ กนฺทตี’’ติ "मय्हक नाम का एक पक्षी है, जो पर्वतों के शिखरों और गुफाओं में विचरता है; वह पकी हुई पीपल पर चढ़कर 'मेरा है, मेरा है' (मय्हं मय्हं) चिल्लाता है।" เอตฺถ มยฺหโกติ เอกาย สกุณชาติยา นามํ. โส หิ โลลุปฺปจาริตาย ‘‘อิทมฺปิ มยฺหํ, อิทมฺปิ มยฺห’’นฺติ กายติ รวตีติ มยฺหโกติ วุจฺจติ มยฺหสทฺทูปปทสฺส เก เร เค สทฺเทติ ธาตุสฺส วเสน. यहाँ 'मय्हक' एक पक्षी की जाति का नाम है। वह लोभ के कारण "यह भी मेरा है, यह भी मेरा है" ऐसा चिल्लाता (कायति) या बोलता है, इसलिए 'मय्ह' शब्द के उपपद होने पर 'के रे गे सद्दे' धातु के अनुसार उसे 'मय्हक' कहा जाता है। อตฺรายํ ปทโสธนา – ยทิ ตุยฺหํ มยฺหํสทฺทา ธุวํ สมฺปทานตฺเถ, ตว มมสทฺทา จ สามิอตฺเถ ภเวยฺยุํ, เอวํ สนฺเต โลกโวหารกุสเลน สพฺพญฺญุนา ตสฺส สกุณสฺส ‘‘มยฺหโก’’ติ ปณฺณตฺติ น วตฺตพฺพา สิยา อนนฺโตคธสมฺปทานตฺถตฺตา, อนฺโตคธสามฺยตฺถตฺตา ปน ‘‘มมโก’’ อิจฺเจว ปญฺญตฺติ วตฺตพฺพา สิยา. เอตฺถปิ ‘‘มยฺหโก’’ติ อิทํ วิภตฺติวิปลฺลาสวเสน วุตฺตนฺติ เจ? น, ปณฺณตฺติวิสเย วิภตฺติวิปริณามสฺส อฏฺฐานตฺตา อนวกาสตฺตา. यहाँ यह पद-शोधन है – यदि 'तुय्हं' और 'मय्हं' शब्द निश्चित रूप से सम्प्रदान अर्थ में हों, और 'तव' एवं 'मम' शब्द स्वामी अर्थ में हों, तो ऐसी स्थिति में लोक-व्यवहार में कुशल सर्वज्ञ (बुद्ध) द्वारा उस पक्षी की 'मय्हक' यह प्रज्ञप्ति (नाम) नहीं कही जानी चाहिए थी, क्योंकि इसमें सम्प्रदान अर्थ समाहित नहीं है, बल्कि स्वामी अर्थ समाहित होने के कारण 'ममक' ऐसी ही प्रज्ञप्ति कही जानी चाहिए थी। यदि कहें कि यहाँ भी 'मय्हक' यह विभक्ति-विपर्यास के कारण कहा गया है? तो (उत्तर है) नहीं, क्योंकि प्रज्ञप्ति के विषय में विभक्ति-विपरिणाम (परिवर्तन) का कोई स्थान या अवसर नहीं होता। อปิเจตฺถ มยฺหํสทฺโท สรูปโต วิภตฺยนฺตภาเวน ติฏฺฐติ กสทฺเทน เอกปทตฺตูปคมนโต, เอวํ สนฺเตปิ ‘‘มยฺหโก’’ติ [Pg.391] อยํ สกุณวิเสสวาจโก สทฺโท ปจฺจตฺตวจนภาเว ฐิโตเยว อีสกํ สามิอตฺถมฺปิ โชตยติ สุชมฺปติ ราชปุริสสทฺทา วิย. อิมินาปิ การเณน วิภตฺติวิปลฺลาโส ตุมฺหากํ สรณํ น โหติ. อิติ ‘‘มยฺหโก’’ติ ปณฺณตฺติยํ วตฺตมานสฺส ปทาวยวภูตสฺส มยฺหสทฺทสฺส อวิปลฺลาสวจนเลเสน ตุยฺหํ ตว มมสทฺเทสุปิ วิภตฺติวิปลฺลาโส น อิจฺฉิตพฺโพติ สิทฺธํ. ตสฺมา อฏฺฐกถาจริเยหิ สมฺปทานสามิอตฺเถสุ สามญฺเญน ปวตฺตานมฺปิ สมานานํ ตุยฺหํ มยฺหํ ตว มมสทฺทานํ สทฺทนยญฺเญว นิสฺสาย ปเรสมนุกมฺปาย วุตฺตปฺปกาโร นิยโม ทสฺสิโตติ อวคนฺตพฺพํ. อิจฺเจวํ – इसके अतिरिक्त, यहाँ 'मय्हं' शब्द स्वरूप से विभक्ति-अन्त के रूप में स्थित है क्योंकि 'क' शब्द के साथ वह एक पद बन गया है। ऐसा होने पर भी, 'मय्हक' यह पक्षी-विशेष का वाचक शब्द प्रथमा विभक्ति (पच्चत्तवचन) में स्थित होकर भी थोड़ा स्वामी अर्थ को भी प्रकाशित करता है, जैसे 'सुजम्पति' और 'राजपुरिस' शब्द। इस कारण से भी विभक्ति-विपर्यास आपका शरण नहीं होता। इस प्रकार 'मय्हक' इस प्रज्ञप्ति में विद्यमान पद के अवयव रूप 'मय्ह' शब्द के अविपर्यास वचन के तर्क से 'तुय्हं', 'तव' और 'मम' शब्दों में भी विभक्ति-विपर्यास इष्ट नहीं होना चाहिए, यह सिद्ध हुआ। इसलिए, यह समझना चाहिए कि अट्ठकथाचार्यों ने सम्प्रदान और स्वामी अर्थों में सामान्य रूप से प्रवृत्त होने वाले 'तुय्हं', 'मय्हं', 'तव' और 'मम' शब्दों के लिए व्याकरण के नियम का ही आश्रय लेकर दूसरों पर अनुकम्पा हेतु उक्त प्रकार का नियम दिखाया है। इस प्रकार – ‘‘ตุยฺหํ มยฺห’’นฺติเม สทฺเท, สมฺปทาเน ครู วทุํ; ‘‘ตว มมา’’ติ สามิมฺหิ, นยมาทาย สตฺถโต. "गुरुओं ने शास्त्रों से नय (नियम) लेकर 'तुय्हं' और 'मय्हं' इन शब्दों को सम्प्रदान अर्थ में और 'तव' एवं 'मम' को स्वामी अर्थ में कहा है।" เอวํ สนฺเตปิ เอเตสํ, นิยโม นตฺถิ ปาฬิยํ; โกจิ เตสํ วิเสโส จ, ทิฏฺโฐ อมฺเหหิ ตํ สุณ. "ऐसा होने पर भी, पालि (मूल पाठ) में इनका कोई (कठोर) नियम नहीं है; हमारे द्वारा उनमें जो कुछ विशेषता देखी गई है, उसे सुनें।" สามฺยตฺถสมฺปทานตฺถา, สมฺภวนฺติ ยหึ ทุเว; ‘‘ตุยฺหํ มยฺห’’นฺติเม สทฺทา, เต ปโยคา น ทุลฺลภา. "जहाँ स्वामी अर्थ और सम्प्रदान अर्थ दोनों संभव होते हैं, वहाँ 'तुय्हं' और 'मय्हं' इन शब्दों के प्रयोग दुर्लभ नहीं हैं।" ‘‘ตว มมา’’ติเม สทฺทา, ปายา สามิมฺหิ วตฺตเร; สมฺปทาเน ยหึ โหนฺติ, เต ปโยคา ปนปฺปกา. 'तव' और 'मम' ये शब्द प्रायः स्वामी अर्थ में प्रयुक्त होते हैं; जहाँ वे सम्प्रदान में होते हैं, वे प्रयोग कम हैं। ตวโต มมโต ตุยฺหํ-มยฺหํสทฺทาว สาสเน; ปาเฐ เนกสหสฺสมฺหิ, สามิอตฺเถ ปวตฺตเรติ. शासन (पालि साहित्य) में 'तव' और 'मम' की अपेक्षा 'तुय्हं' और 'मय्हं' शब्द ही हजारों पाठों में स्वामी अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। สพฺพาปิ อิมา นีติโย ปรมสุขุมา สุทุทฺทสา วีรชาตินา สาธุกํ มนสิ กาตพฺพา. ये सभी नीतियाँ अत्यंत सूक्ष्म और कठिनता से समझ आने वाली हैं, जिन्हें बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा अच्छी तरह मन में धारण करना चाहिए। โว โนสทฺเทสุ ปน โวสทฺโท ปจฺจตฺตอุปโยคกรณสมฺปทานสามิวจนปทปูรเณสุ ทิสฺสติ. ‘‘กจฺจิ โว [Pg.392] อนุรุทฺธา สมคฺคา สมฺโมทมานา’’ติอาทีสุ หิ ปจฺจตฺเต ทิสฺสติ. ‘‘คจฺฉถ ภิกฺขเว ปณาเมมิ โว’’ติอาทีสุ อุปโยเค. ‘‘น โว มม สนฺติเก วตฺถพฺพ’’นฺติอาทีสุ กรเณ. ‘‘วนปตฺถปริยายํ โว ภิกฺขเว เทเสสฺสามี’’ติอาทีสุ สมฺปทาเน. ‘‘สพฺเพสํ โว สาริปุตฺตา สุภาสิต’’นฺติอาทีสุ สามิวจเน. ‘‘เย หิ โวอริยา ปริสุทฺธา กายกมฺมนฺตา’’ติอาทีสุ ปทปูรณมตฺเต. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – 'वो' और 'नो' शब्दों में से 'वो' शब्द प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, षष्ठी और पदपूरण में देखा जाता है। 'kacci vo anuruddhā samaggā sammodamānā' आदि में यह प्रथमा में देखा जाता है। 'gacchatha bhikkhave paṇāmemi vo' आदि में द्वितीया में। 'na vo mama santike vatthabbaṃ' आदि में तृतीया में। 'vanapatthapariyāyaṃ vo bhikkhave desessāmi' आदि में चतुर्थी में। 'sabbesaṃ vo sāriputtā subhāsitaṃ' आदि में षष्ठी में। 'ye hi vo ariyā parisuddhā kāyakammantā' आदि में केवल पदपूरण में। यहाँ यह कहा गया है - ‘‘ปจฺจตฺเต อุปโยเค จ, กรเณ สมฺปทานิเย; สามิสฺส วจเน เจว, ตเถว ปทปูรเณ; อิเมสุ ฉสุ ฐาเนสุ, โวสทฺโท สมฺปวตฺตติ’’. "प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, सम्प्रदान (चतुर्थी), स्वामी वचन (षष्ठी) और वैसे ही पदपूरण में - इन छह स्थानों में 'वो' शब्द प्रयुक्त होता है।" โนสทฺโท ปจฺจตฺโตปโยคกรณสมฺปทานสามิวจนาวธารณนุสทฺทตฺเถสุ ปฏิเสเธ นิปาตมตฺเต จ วตฺตติ. อยญฺหิ ‘‘คามํ โน คจฺเฉยฺยามา’’ติ เอตฺถ ปจฺจตฺเต ทิสฺสติ. ‘‘มา โน อชฺช วิกนฺตึสุ, รญฺโญ สูทา มหานเส’’ติอาทีสุ อุปโยเค. ‘‘น โน วิวาโห นาเคหิ, กตปุพฺโพ กุทาจน’’นฺติอาทีสุ กรเณ. ‘‘สํวิภเชถ โน รชฺเชนา’’ติอาทีสุ สมฺปทาเน. ‘‘สตฺถา โน ภควา อนุปฺปตฺโต’’ติอาทีสุ สามิวจเน. ‘‘น โน สมํ อตฺถิ ตถาคเตนา’’ติ เอตฺถ อวธารเณ. ‘‘อภิชานาสิ โน ตฺวํ มหาราชา’’ติอาทีสุ นุสทฺทตฺเถ, ปุจฺฉายนฺติปิ วตฺตุํ วฏฺฏติ. ‘‘สุภาสิตญฺเญว ภาเสยฺย, โน จ ทุพฺภาสิตํ ภเณ’’ติอาทีสุ ปฏิเสเธ. ‘‘น โน สภายํ น กโรนฺติ กิญฺจี’’ติอาทีสุ นิปาตมตฺเต. เอตฺเถตํ วุจฺจติ – 'नो' शब्द प्रथमा (पच्चत्त), द्वितीया (उपयोग), तृतीया (करण), चतुर्थी (सम्प्रदान), षष्ठी (सामिवचन), अवधारण (निश्चय), 'नु' शब्द के अर्थ में, निषेध और केवल निपात के रूप में प्रयुक्त होता है। यह (नो) 'गामं नो गच्छेय्यामा' (हम गाँव जाएँ) यहाँ प्रथमा में देखा जाता है। 'मा नो अज्ज विकन्तिंसु, रञ्ञो सूदा महानसे' (राजा के रसोइयों ने आज हमें रसोई में न काटा हो) इत्यादि में द्वितीया में। 'न नो विवाहो नागेहि, कतपुब्बो कदाचनं' (नागों के साथ हमारा विवाह कभी पहले नहीं हुआ) इत्यादि में तृतीया में। 'संविभजेथ नो रज्जेना' (हमें राज्य के साथ हिस्सा दें) इत्यादि में चतुर्थी में। 'सत्था नो भगवा अनुप्पत्तो' (हमारे शास्ता भगवान आ गए हैं) इत्यादि में षष्ठी में। 'न नो समं अत्थि तथागतेना' (तथागत के समान हमारे लिए कोई नहीं है) यहाँ अवधारण में। 'अभिजानासि नो त्वं महाराजा' (हे महाराज, क्या आप जानते हैं?) इत्यादि में 'नु' शब्द के अर्थ में, प्रश्न में भी कहना उचित है। 'सुभासितञ्ञेव भासेय्य, नो च दुब्भासितं भणे' (सुभाषित ही बोले, दुर्भाषित न बोले) इत्यादि में निषेध में। 'न नो सभायं न करोन्ति किञ्ची' (हमारी सभा में वे कुछ नहीं करते) इत्यादि में केवल निपात के रूप में। यहाँ यह कहा गया है - ปจฺจตฺเต [Pg.393] จุปโยเค จ, กรเณ สมฺปทานิเย; สามฺยาวธารเณ เจว, นุสทฺทตฺเถ นิวารเณ; ตถา นิปาตมตฺตมฺหิ, โนสทฺโท สมฺปวตฺตติ. प्रथमा, द्वितीया, तृतीया और चतुर्थी में; षष्ठी, अवधारण, 'नु' शब्द के अर्थ में और निषेध में; तथा केवल निपात के रूप में 'नो' शब्द प्रयुक्त होता है। อิทานิ สพฺพนามานํ ยถารหํ สํขิตฺเตน มิสฺสกปทมาลา วุจฺจเต – अब सभी सर्वनामों की यथायोग्य संक्षेप में मिश्रित पदमाला (रूप-रचना) कही जाती है - โย โส, เย เต. ยํ ตํ, เย เต. เยน เตน. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. ยา สา, ยา ตา. ยํ ตํ, ยา ตา. ยาย ตาย. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. ยํ ตํ, ยานิ ตานิ. เสสํ วิตฺถาเรตพฺพํ. อิมินา นเยน ลิงฺคตฺตยโยชนา กาตพฺพา. यो सो (जो वह), ये ते (जो वे)। यं तं, ये ते। येन तेन। शेष का विस्तार करना चाहिए। या सा, या ता। यं तं, या ता। याय ताय। शेष का विस्तार करना चाहिए। यं तं, यानि तानि। शेष का विस्तार करना चाहिए। इस विधि से तीनों लिंगों में योजना करनी चाहिए। ‘‘เอโส โส, เอเต เต. อยํ โส, อิเม เต. โส อยํ เต อิเม’’ติอาทินา ยถาปโยคํ ปทมาลา โยเชตพฺพา. ตถา หิ ‘‘โย โส ภควา สยมฺภู อนาจริยโก. เอเต เต ภิกฺขเว อุโภ อนฺเต อนุปคมฺม มชฺฌิมา ปฏิปทา ตถาคเตน อภิสมฺพุทฺธา. อยํ โส สารถิ เอตี’’ติ เอวมาทโย วิจิตฺตปฺปโยคา ทิสฺสนฺติ. อิติ สพฺพนามิกปทานํ มิสฺสกปทมาลา โยเชตพฺพา. "एसो सो, एते ते। अयं सो, इमे ते। सो अयं ते इमे" इत्यादि के अनुसार प्रयोग के अनुसार पदमाला जोड़नी चाहिए। जैसे कि "यो सो भगवा सयम्भू अनाचरियको (जो वे भगवान स्वयंभू बिना आचार्य के हैं)। एते ते भिक्खवे उभो अन्ते अनुपगम्म मज्झिमा पटिपदा तथागतेन अभिसम्बुद्धा (हे भिक्षुओं, इन दोनों अन्तों के पास न जाकर तथागत द्वारा मध्यम प्रतिपदा का बोध किया गया है)। अयं सो सारथि एति (यह वह सारथि आ रहा है)" इत्यादि विविध प्रयोग देखे जाते हैं। इस प्रकार सर्वनाम पदों की मिश्रित पदमाला जोड़नी चाहिए। มยา สพฺพตฺถสิทฺธสฺส, สาสเน สพฺพทสฺสิโน; สพฺพตฺถ สาสเน สุฏฺฐุ, โกสลฺลตฺถาย โสตุนํ. मेरे द्वारा, सर्वार्थसिद्ध (सिद्धार्थ), सर्वदर्शी (बुद्ध) के शासन में; श्रोताओं के कौशल के लिए शासन में सर्वत्र भली-भांति (कहा गया है)। อสพฺพนามนาเมหิ, สพฺพนามปเทหิ เว; สห สพฺพานิ วุตฺตานิ, สพฺพนามานิ ปนฺติโต. अ-सर्वनाम नामों और सर्वनाम पदों के साथ, सभी सर्वनामों को क्रम से कहा गया है। เอเตสุ กตโยคานํ, สุขุมตฺถวิชานนํ; อกิจฺฉปฏิเวเธน, ภวิสฺสติ น สํสโย. इनमें जिन्होंने अभ्यास किया है, उन्हें सूक्ष्म अर्थों का विज्ञान बिना किसी कठिनाई के भेदन (बोध) से होगा, इसमें कोई संशय नहीं है। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार, अट्ठकथा सहित नौ अंगों वाले त्रिपिटक की वचन-पद्धतियों में विद्वानों के... โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कौशल के लिए रचित सद्दनीति प्रकरण में... สพฺพนามตํสทิสนามานํ นามิกปทมาลาวิภาโค นาม सर्वनाम और उनके समान नामों की नामिक पदमाला का विभाग नामक... ทฺวาทสโม ปริจฺเฉโท. बारहवाँ परिच्छेद। ๑๓. สวินิจฺฉยสงฺขฺยานามนามิกปทมาลา १३. विनिश्चय (निर्णय) सहित संख्या-नामों की नामिक पदमाला। อิโต [Pg.394] ปรํ ปวกฺขามิ, สงฺขฺยานามิกปนฺติโย; ภูธาตุเชหิ รูเปหิ, อญฺเญหิ จุปโยชิตุํ. इसके बाद, मैं संख्या-नामों की पंक्तियों को कहूँगा, जिन्हें 'भू' धातु से उत्पन्न रूपों और अन्यों के साथ प्रयुक्त किया जा सके। ยา หิ สา เหฏฺฐา อมฺเหหิ เอก ทฺวิติ จตุอิจฺเจเตสํ สงฺขฺยาสพฺพนามานํ นามิกปทมาลา กถิตา, ตํ ฐเปตฺวา อิธ อสพฺพนามานํ ปญฺจ ฉ สตฺตาทีนํ สงฺขฺยานามานํ นามิกปทมาลา ภูธาตุมเยหิ อญฺเญหิ จ รูเปหิ โยชนตฺถํ วุจฺจเต – जो वह नीचे हमारे द्वारा एक, द्वि, ति, चतु इन संख्या-सर्वनामों की नामिक पदमाला कही गई है, उसे छोड़कर यहाँ अ-सर्वनाम संख्या-नामों जैसे पञ्च, छ, सत्त आदि की नामिक पदमाला 'भू' धातु से बने और अन्य रूपों के साथ योजन के लिए कही जाती है - ปญฺจ, ปญฺจหิ, ปญฺจภิ, ปญฺจนฺนํ, ปญฺจสุ. สตฺตนฺนํ วิภตฺตีนํ วเสน เญยฺยํ. ‘‘ปญฺจ ภูตา, ปญฺจ อภิภวิตาโร, ปญฺจ ปุริสา, ปญฺจ ภูมิโย, ปญฺจ กญฺญาโย, ปญฺจ ภูตานิ, ปญฺจ จิตฺตานี’’ติอาทินา สพฺพตฺถ โยเชตพฺพํ. ฉ, ฉหิ, ฉภิ, ฉนฺนํ, ฉสุ, ฉสฺสุ อิติปิ. ‘‘ฉสฺสุ โลโก สมุปฺปนฺโน, ฉสฺสุ กฺรุพฺพติ สนฺถว’’นฺติ หิ ปาฬิ. สตฺต, สตฺตหิ, สตฺตภิ, สตฺตนฺนํ, สตฺตสุ. อฏฺฐ, อฏฺฐหิ, อฏฺฐภิ, อฏฺฐนฺนํ, อฏฺฐสุ. นว, นวหิ, นวภิ, นวนฺนํ, นวสุ. ทส, ทสหิ, ทสภิ, ทสนฺนํ, ทสสุ. เอวํ เอกาทส. ทฺวาทส, พารส. เตรส, เตทส, เตฬส. จตุทฺทส, จุทฺทส. ปญฺจทส, ปนฺนรส. โสฬส. สตฺตรส. อฏฺฐารส, อฏฺฐารสหิ, อฏฺฐารสภิ, อฏฺฐารสนฺนํ, อฏฺฐารสสุ. สพฺพเมตํ พหุวจนวเสน คเหตพฺพํ. पञ्च, पञ्चहि, पञ्चभि, पञ्चन्नं, पञ्चसु। सात विभक्तियों के अनुसार जानना चाहिए। "पञ्च भूता, पञ्च अभिभवितारो, पञ्च पुरिसा, पञ्च भूमियो, पञ्च कञ्ञायो, पञ्च भूतानि, पञ्च चित्तानि" इत्यादि सब जगह जोड़ना चाहिए। छ, छहि, छभि, छन्नं, छसु, छस्सु भी। "छस्सु लोको समुप्पन्नो, छस्सु कुब्बति सन्थवं" यह पालि है। सत्त, सत्तहि, सत्तभि, सत्तन्नं, सत्तसु। अट्ठ, अट्ठहि, अट्ठभि, अट्ठन्नं, अट्ठसु। नव, नवहि, नवभि, नवन्नं, नवसु। दस, दसहि, दसभि, दसन्नं, दससु। इसी प्रकार एकादस। द्वादस, बारस। तेरस, तेदस, तेळस। चतुद्दस, चुद्दस। पञ्चदस, पन्नरस। सोळस। सत्तरस। अट्ठारस, अट्ठारसहि, अट्ठारसभि, अट्ठारसन्नं, अट्ठारससु। यह सब बहुवचन के रूप में ग्रहण करना चाहिए। เอกูนวีสติ, เอกูนวีสํ อิจฺจาทิปิ. เอกูนวีสาย, เอกูนวีสายํ, เอกูนวีส ภิกฺขู ติฏฺฐนฺติ, เอกูนวีสํ ภิกฺขู ปสฺสติ, เอวํ ‘‘กญฺญาโย จิตฺตานี’’ติ จ อาทินา โยเชตพฺพํ. เอกูนวีสาย ภิกฺขูหิ ธมฺโม เทสิโต, เอกูนวีสาย กญฺญาหิ กตํ, เอกูนวีสาย จิตฺเตหิ กตํ, เอกูนวีสาย ภิกฺขูนํ จีวรํ เทติ, เอกูนวีสาย กญฺญานํ ธนํ เทติ, เอกูนวีสาย จิตฺตานํ รุจฺจติ, เอกูนวีสาย ภิกฺขูหิ อเปติ[Pg.395]. เอวํ กญฺญาหิ จิตฺเตหิ. เอกูนวีสาย ภิกฺขูนํ สนฺตกํ, เอวํ กญฺญานํ จิตฺตานํ. เอกูนวีสายํ ภิกฺขูสุ ปติฏฺฐิตํ. เอวํ ‘‘กญฺญาสุ จิตฺเตสู’’ติ โยเชตพฺพํ. เอกูนวีสติ, เอกูนวีสตึ, เอกูนวีสติยา, เอกูนวีสติยํ. ‘एकूनवीसति’ (उन्नीस), ‘एकूनवीसं’ इत्यादि भी। ‘एकूनवीसाय’, ‘एकूनवीसायं’, उन्नीस भिक्षु खड़े हैं (एकूनवीसा भिक्खू तिट्ठन्ति), उन्नीस भिक्षुओं को देखता है (एकूनवीसं भिक्खू पस्सति), इसी प्रकार ‘कन्याएँ, चित्त’ आदि के साथ जोड़ना चाहिए। उन्नीस भिक्षुओं द्वारा धर्म देशित किया गया, उन्नीस कन्याओं द्वारा किया गया, उन्नीस चित्तों द्वारा किया गया, उन्नीस भिक्षुओं को चीवर देता है, उन्नीस कन्याओं को धन देता है, उन्नीस चित्तों को अच्छा लगता है, उन्नीस भिक्षुओं से दूर होता है। इसी प्रकार कन्याओं और चित्तों के साथ। उन्नीस भिक्षुओं का (स्वत्व), इसी प्रकार कन्याओं और चित्तों का। उन्नीस भिक्षुओं में प्रतिष्ठित। इसी प्रकार ‘कन्याओं में, चित्तों में’ जोड़ना चाहिए। एकूनवीसति, एकूनवीसतिं, एकूनवीसतिया, एकूनवीसतियं। วีสติ, วีสตึ, วีสติยา, วีสติยํ. วีส, วีสํ, วีสาย, วีสายํ. ตถา เอกวีส ทฺวาวีส พาวีส เตวีส จตุวีส อิจฺจาทีสุปิ. ตึส, ตึสํ, ตึสาย, ตึสายํ. จตฺตาลีส, จตฺตาลีสํ, จตฺตาลีสาย, จตฺตาลีสายํ. จตฺตารีส อิจฺจาทิปิ. ปญฺญาส, ปญฺญาสํ, ปญฺญาสาย, ปญฺญาสายํ. ปณฺณาส, ปณฺณาสํ, ปณฺณาสาย, ปณฺณาสายํ. สฏฺฐิ, สฏฺฐึ, สฏฺฐิยา, สฏฺฐิยํ. สตฺตติ, สตฺตตึ, สตฺตติยา, สตฺตติยํ. สตฺตริ อิจฺจาทิปิ. อสีติ, อสีตึ, อสีติยา, อสีติยํ. นวุติ. นวุตึ, นวุติยา, นวุติยํ. वीसति, वीसतिं, वीसतिया, वीसतियं। वीस, वीसं, वीसाय, वीसायं। इसी प्रकार एकवीस, द्वावीस, बावीस, तेवीस, चतुवीस इत्यादि में भी। तिंस, तिंसं, तिंसाय, तिंसायं। चत्तालीस, चत्तालीसं, चत्तालीसाय, चत्तालीसायं। चत्तारिस इत्यादि भी। पञ्ञास, पञ्ञासं, पञ्ञासाय, पञ्ञासायं। पण्णास, पण्णासं, पण्णासाय, पण्णासायं। सट्ठि, सट्ठिं, सट्ठिया, सट्ठियं। सत्तति, सत्ततिं, सत्ततिया, सत्ततियं। सत्तरि इत्यादि भी। असीति, असीतिं, असीतिया, असीतियं। नवुति। नवुतिं, नवुतिया, नवुतियं। อิตฺถญฺจ อญฺญถาปิ สงฺขฺยารูปานิ คเหตพฺพานิ. เอกูนวีเสหิ, เอกูนวีสานํ, เอกูนวีเสสุ. ‘‘ฉนฺนวุตีน’’นฺติ จ อาทินาปิ สงฺขฺยารูปานํ กตฺถจิ ทสฺสนโต เกจิ สทฺทสตฺถวิทู อูนวีสติสทฺทํ สพฺพทาปิ เอกวจนนฺตมิตฺถิลิงฺคเมว ปยุญฺชนฺติ. เกจิ ‘‘วีสติอาทโย อานวุติ เอกวจนนฺตา อิตฺถิลิงฺคา’’ติ วทนฺติ. เกจิ ปนาหุ – इस प्रकार और अन्य प्रकार से भी संख्या-रूप ग्रहण करने चाहिए। एकूनवीसेहि, एकूनवीसानं, एकूनवीसेसु। ‘छन्नवुतीनं’ (छियानवे का) इत्यादि संख्या-रूपों के कहीं-कहीं देखे जाने से, कुछ शब्द-शास्त्र के ज्ञाता ‘ऊनवीसति’ शब्द को सदैव एकवचनान्त स्त्रीलिंग ही प्रयोग करते हैं। कुछ कहते हैं— ‘वीसति से लेकर नवुति तक एकवचनान्त स्त्रीलिंग हैं।’ कुछ कहते हैं— ‘‘สทฺทา สงฺขฺเยยฺยสงฺขาสุ, เอกตฺเต วีสตาทโย; สงฺขตฺเถ ทฺวิพหุตฺตมฺหิ, ตา ตุ จานวุติตฺถิโย’’ติ. ‘संख्या और संख्यय (गिने जाने वाले) में वीसति आदि शब्द एकवचन में होते हैं; किन्तु संख्यय के अर्थ में द्विवचन और बहुवचन होने पर भी वे नब्बे तक स्त्रीलिंग ही रहते हैं।’ เอตฺถ ทฺวิวจนํ ฉฑฺเฑตพฺพํ พุทฺธวจเน ตทภาวโต. สพฺเพสมฺปิ จ เตสํ ยถาวุตฺตวจนํ กิญฺจิ ปาฬิปฺปเทสํ ปตฺวา ยุชฺชติ, กิญฺจิ ปน ปตฺวา น ยุชฺชติ วีสติวีสํตึสํอิจฺจาทีนญฺหิ สงฺขตฺถานํ สทฺทานํ พหุวจนปฺปโยควเสนปิ ปาฬิยํ ทสฺสนโต[Pg.396], กจฺจายเน จ โยวจนสมฺภูตรูปวนฺตตาทสฺสนโต. ตสฺมา ยถาสมฺภวํ ยถาปาวจนญฺจ อิตฺถิลิงฺคภาเว เตสเมกวจนนฺตตา เวทิตพฺพา อตฺถิ นตฺถิสทฺทานํ วิย. यहाँ द्विवचन को छोड़ देना चाहिए क्योंकि बुद्ध-वचन (पालि) में उसका अभाव है। उन सभी का यथोक्त कथन किसी पालि अंश में घटित होता है, और किसी में नहीं; क्योंकि ‘वीसति’, ‘वीस’, ‘तिंस’ आदि संख्यय-वाचक शब्दों का बहुवचन में प्रयोग भी पालि में देखा जाता है, और कच्चायन व्याकरण में ‘यो’ विभक्ति से बने रूप भी दिखाई देते हैं। इसलिए, यथासम्भव और आगम (पावचन) के अनुसार स्त्रीलिंग होने पर उनकी एकवचनान्तता ‘अत्थि’ और ‘नत्थि’ शब्दों के समान समझनी चाहिए। อตฺถินตฺถิสทฺทา หิ นิปาตตฺตา เอกตฺเตปิ พหุตฺเตปิ ปวตฺตนฺติ ‘‘ปุตฺตา มตฺถิ ธนมฺมตฺถิ. นตฺถิ อตฺตสมํ เปมํ. นตฺถิ สมณพฺราหฺมณา’’ติอาทีสุ. อลิงฺคตฺเตปิ ปเนเตสํ กตฺถจิ อิตฺถิลิงฺคภาโว ทิฏฺโฐ. อภิธมฺเม หิ ธมฺมเสนาปตินา อนุธมฺมจกฺกวตฺตินา โวหารกุสเลน โวหารกุสลสาธเกน ‘‘อตฺถิยา นว. นตฺถิยา นวา’’ติ เอกวจนนฺตํ อิตฺถิลิงฺครูปํ ทสฺสิตํ, ตสฺมา วีสติวีสติมิจฺจาทีนมฺปิ ยถาสมฺภวํ ยถาปาวจนญฺจ อิตฺถิลิงฺคภาเว เอกวจนนฺตตา เวทิตพฺพา. ‘अत्थि’ और ‘नत्थि’ शब्द निपात होने के कारण एकवचन और बहुवचन दोनों में प्रयुक्त होते हैं, जैसे— ‘पुत्ता मत्थि धनम्मत्थि’ (मेरे पुत्र हैं, मेरा धन है), ‘नत्थि अत्तसमं पेमं’ (आत्म-समान प्रेम नहीं है), ‘नत्थि समणब्राह्मणा’ (श्रमण-ब्राह्मण नहीं हैं) इत्यादि में। लिंग-रहित होने पर भी इनका कहीं-कहीं स्त्रीलिंग भाव देखा गया है। अभिधम्म में धर्मसेनापति, अनुधम्मचक्रवर्ती, व्यवहार-कुशल और व्यवहार-कुशलता के साधक (सारिपुत्र स्थविर) द्वारा ‘अत्थिया नव, नत्थिया नवा’ इस प्रकार एकवचनान्त स्त्रीलिंग रूप दिखाया गया है, इसलिए ‘वीसति’, ‘वीसतिं’ आदि की भी यथासम्भव और आगम के अनुसार स्त्रीलिंग होने पर एकवचनान्तता समझनी चाहिए। ตตฺเถเก ‘‘เหตุยา อธิปติยา’’ติ จ อิทํ ลิงฺควิปลฺลาสวเสน คเหตพฺพํ มญฺญนฺติ. ตมฺมติวเสน ‘‘เหตุมฺหิ อธิปติมฺหี’’ติ ปุลฺลิงฺคภาโว ปฏิปาเทตพฺโพ, ‘‘เหตุปจฺจเย อธิปติปจฺจเย’’ อิจฺเจวตฺโถ. อถ วา ‘‘เหตุยา อธิปติยา’’ติ ทฺวยมิทํ อิตฺถิลิงฺครูปปฏิภาคํ ปุลฺลิงฺครูปนฺติ คเหตพฺพํ ‘‘เหตุโย ชนฺตุโย’’ติอาทีนํ อิตฺถิลิงฺครูปปฏิภาคานํ ปุลฺลิงฺครูปานมฺปิ วิชฺชมานตฺตา, ‘‘อตฺถิยา นตฺถิยา’’ติ อิทํ ปน ลิงฺควิปลฺลาสวเสน วุตฺตนฺติ น คเหตพฺพํ อตฺถิ นตฺถิสทฺทานํ อลิงฺคเภทตฺตา. น หิ อตฺถิ นตฺถิสทฺทา ตีสุ ลิงฺเคสุ เอกสฺมิมฺปิ อนฺโตคธา. เอเตสุ หิ อตฺถิสทฺโท อาขฺยาตนิปาตวเสน ภิชฺชติ ‘‘อตฺถิ สนฺติ สํวิชฺชติ. อตฺถิขีรา พฺราหฺมณี’’ติอาทีสุ[Pg.397], นตฺถิสทฺโท ปน นิปาโตเยว. อิจฺเจวํ อตฺถิ นตฺถิสทฺทานํ นิปาตานญฺจ ลิงฺควจนวเสน กถนํ ยุชฺชติ อิตฺถิลิงฺคาทิวเสน เอกตฺตาทิวเสน จ อปฺปวตฺตนโต. วุตฺตญฺจ – वहाँ कुछ लोग ‘हेतुया अधिपतिया’ इसे लिंग-विपर्यास (लिंग-परिवर्तन) के कारण ग्रहण करना चाहिए, ऐसा मानते हैं। उनके मत के अनुसार ‘हेतुम्हि अधिपतिम्हि’ इस प्रकार पुल्लिंग भाव प्रतिपादित करना चाहिए, जिसका अर्थ ‘हेतु-प्रत्यय में, अधिपति-प्रत्यय में’ ही है। अथवा, ‘हेतुया अधिपतिया’ इन दोनों को स्त्रीलिंग के समान दिखने वाले पुल्लिंग रूप समझना चाहिए, क्योंकि ‘हेतुयो जन्तुयो’ आदि स्त्रीलिंग के समान दिखने वाले पुल्लिंग रूप भी विद्यमान हैं। ‘अत्थिया नत्थिया’ इसे लिंग-विपर्यास के कारण कहा गया है, ऐसा नहीं समझना चाहिए क्योंकि ‘अत्थि’ और ‘नत्थि’ शब्द लिंग-भेद से रहित हैं। ‘अत्थि’ और ‘नत्थि’ शब्द तीनों लिंगों में से किसी एक में भी अन्तर्निहित नहीं हैं। इनमें ‘अत्थि’ शब्द आख्यात (क्रिया) और निपात के भेद से बदलता है, जैसे— ‘अत्थि सन्ति संविज्जति’, ‘अत्थि खीरा ब्राह्मणी’ इत्यादि में; किन्तु ‘नत्थि’ शब्द तो निपात ही है। इस प्रकार ‘अत्थि’ और ‘नत्थि’ शब्दों तथा निपातों का लिंग और वचन के अनुसार कथन युक्त है, क्योंकि वे स्त्रीलिंग आदि के रूप में या एकवचन आदि के रूप में प्रवृत्त नहीं होते। कहा भी गया है— ‘‘สทิสํ ตีสุ ลิงฺเคสุ, สพฺพาสุ จ วิภตฺติสุ; วจเนสุ จ สพฺเพสุ, ยํ น พฺเยติ ตทพฺยย’’นฺติ. ‘जो तीनों लिंगों में, सभी विभक्तियों में और सभी वचनों में समान रहता है, जिसका व्यय (परिवर्तन) नहीं होता, वह अव्यय है।’ เอตฺถ สิยา – นนุ จ โภ ‘‘อตฺถิ สกฺกา ลพฺภา อิจฺเจเต ปฐมายา’’ติ วจนโต อตฺถิสทฺโท ปฐมาย วิภตฺติยา ยุตฺโต, เอวํ สนฺเต กสฺมา ‘‘สทิสํ ตีสุ ลิงฺเคสู’’ติอาทิ วุตฺตนฺติ? สจฺจํ อตฺถิสทฺโท ปฐมาย วิภตฺติยา ยุตฺโต, ตถา นตฺถิสทฺโท อตฺถิสทฺทสฺส วจนเลเสน คเหตพฺพตฺตา ยุคฬปทตฺตา จ. อิทํ ปน ‘‘สทิสํ ตีสุ ลิงฺเคสู’’ติอาทิวจนํ อุปสคฺคนิปาตสงฺขาเต อสงฺขฺยาสทฺเท สนฺธาย วุตฺตํ, น เอเกกมสงฺขฺยาสทฺทํ สนฺธาย. ตถา หิ ‘‘อสงฺขฺยา’’ติ จ ‘‘อพฺยยา’’ติ จ ลทฺธโวหาเรสุ อุปสคฺคนิปาเตสุ อุปสคฺคา สพฺเพปิ สพฺพวิภตฺติวจนกา. นิปาตานํ ปน เอกจฺเจ ปฐมาทีสุ ยถารหํ วิภตฺติยุตฺตา, เอกจฺเจ อวิภตฺติยุตฺตา. ตตฺถ เย ยทคฺเคน วิภตฺติยุตฺตา, เต ตทคฺเคน ตพฺพจนกา. อุปสคฺคนิปาเตสุ หิ ปจฺเจกํ ‘‘อิทํ นาม วจน’’นฺติ ลทฺธุํ น สกฺกา, สพฺพสงฺคาหกวเสน ปน ‘‘สทิสํ ตีสุ ลิงฺเคสู’’ติอาทิ ปุพฺพาจริเยหิ วุตฺตํ. กจฺจายนาจริเยนปิ อิมเมวตฺถํ สนฺธาย ‘‘สพฺพาสมาวุโสปสคฺคนิปาตาทีหิ จา’’ติ วุตฺตํ. น หิ อาวุโสสทฺทโต สพฺพาปิ วิภตฺติโย ลพฺภนฺติ, อถ โข อาลปนตฺถวาจกตฺตา เอกวจนิกอเนกวจนิกา ปฐมาวิภตฺติโยเยว ลพฺภนฺติ. อยมสฺมากํ ขนฺติ. यहाँ यह शंका हो सकती है - "हे महानुभाव! क्या 'अत्थि सक्का लब्भा' ये प्रथमा में हैं" इस वचन के अनुसार 'अत्थि' शब्द प्रथमा विभक्ति से युक्त है, ऐसा होने पर "तीनों लिंगों में समान" इत्यादि क्यों कहा गया? सत्य है, 'अत्थि' शब्द प्रथमा विभक्ति से युक्त है, वैसे ही 'नत्थि' शब्द भी 'अत्थि' शब्द के साहचर्य और युगल पद होने के कारण (प्रथमा युक्त) ग्रहण करना चाहिए। परन्तु यह "तीनों लिंगों में समान" इत्यादि वचन उपसर्ग और निपात कहे जाने वाले अ-संख्या शब्दों के सम्बन्ध में कहा गया है, न कि एक-एक अ-संख्या शब्द के सम्बन्ध में। क्योंकि 'असंख्या' और 'अव्यय' संज्ञा प्राप्त उपसर्गों और निपातों में, सभी उपसर्ग सभी विभक्ति और वचनों वाले होते हैं। निपातों में कुछ प्रथमा आदि में यथायोग्य विभक्ति-युक्त होते हैं, कुछ विभक्ति-रहित होते हैं। वहाँ जो जिस सीमा तक विभक्ति-युक्त हैं, वे उस सीमा तक उस वचन वाले हैं। उपसर्गों और निपातों में प्रत्येक के लिए "यह अमुक वचन है" ऐसा निश्चित करना संभव नहीं है, परन्तु सबको सम्मिलित करने के विचार से पूर्वाचार्यों द्वारा "तीनों लिंगों में समान" इत्यादि कहा गया है। आचार्य कच्चायन ने भी इसी अर्थ को लक्ष्य करके "सब्बासमावुपसग्गनिपातादीहि चा" कहा है। 'आवुसो' शब्द से सभी विभक्तियाँ प्राप्त नहीं होतीं, बल्कि संबोधन अर्थ का वाचक होने के कारण केवल एकवचन और अनेकवचन की प्रथमा विभक्तियाँ ही प्राप्त होती हैं। यह हमारा मत है। เกจิ [Pg.398] ปน สพฺเพหิปิ นิปาเตหิ สพฺพวิภตฺติโลปํ วทนฺติ, ตํ น คเหตพฺพํ. ‘‘อตฺถิ สกฺกา ลพฺภา อิจฺเจเต ปฐมาย. ทิวา ภิยฺโย นโม อิจฺเจเต ปฐมาย จ ทุติยาย จา’’ติอาทิวจนโต, ปทปูรณมตฺตานญฺจ อวิภตฺติยุตฺตานํ อถ ขลุ วต วถ อิจฺจาทีนํ นิปาตานํ วจนโต. เอตฺถาปิ สิยา ‘‘นนุ จ โภ อวิภตฺติยุตฺตานมฺปิ นิปาตานํ สมฺภวโต อตฺถิ นตฺถิสทฺทานํ อวิภตฺติโก นิทฺเทโส กาตพฺโพ, อถ กิมตฺถํ ‘อตฺถิยา นว, นตฺถิยา นวา’ติ สวิภตฺติโก นิทฺเทโส กโต’’ติ? สพฺพถา วิภตฺตีหิ วินา อตฺถสฺส นิทฺทิสิตุมสกฺกุเณยฺยตฺตาติ. कुछ लोग तो सभी निपातों से सभी विभक्तियों का लोप कहते हैं, उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए। "अत्थि (है), सक्का (शक्य), लब्भा (लभ्य) ये प्रथमा में हैं। दिवा (दिन में), भिय्यो (अधिक), नमो (नमस्कार) ये प्रथमा और द्वितीया में हैं" इत्यादि वचनों से, और पदपूरण मात्र के लिए प्रयुक्त विभक्तियों से रहित 'अथ', 'खलु', 'वत', 'वथ' इत्यादि निपातों के वचन से (यह सिद्ध होता है)। यहाँ यह भी (शंका) हो सकती है कि "हे भो! यदि विभक्तियों से रहित निपातों का होना संभव है, तो 'अत्थि' और 'नत्थि' शब्दों का विभक्ति-रहित निर्देश करना चाहिए था, फिर किसलिए 'अत्थिया नव, नत्थिया नवा' (अत्थि के नौ, नत्थि के नौ) ऐसा सविभक्तिक निर्देश किया गया है?" (उत्तर है-) क्योंकि सभी प्रकार से विभक्तियों के बिना अर्थ का निर्देश करना असंभव होने के कारण। ยทิ เอวํ ‘‘อตฺถิ สกฺกา ลพฺภา อิจฺเจเต ปฐมายา’’ติ วจนโต อตฺถิ นตฺถิสทฺทา ลุตฺตาย ปฐมาย วิภตฺติยา วเสน ปฐมาวิภตฺติกาเยว นิทฺทิสิตพฺพา, เอวมกตฺวา กสฺมา สตฺตมฺยนฺตวเสน ‘‘อตฺถิยา นตฺถิยา’’ติ นิทฺทิฏฺฐาติ? สจฺจํ, อตฺถิ นตฺถิสทฺทา ปฐมาวิภตฺติยุตฺตาเยว นิทฺทิสิตพฺพา, ตถาปิ ‘‘อตฺถิปจฺจเย นว, นตฺถิปจฺจเย นวา’’ติ เอตสฺสตฺถสฺส ปริทีปเน ปฐมาย โอกาโส นตฺถิ, สตฺตมิยาเยว ปน อตฺถิ, ตสฺมา ‘‘อตฺถิยา นว, นตฺถิยา นวา’’ติ วุตฺตํ. อิติ อตฺถิยานตฺถิยาสทฺทานํ สตฺตมฺยนฺตภาเว สิทฺเธเยว ตติยาจตุตฺถีปญฺจมีฉฏฺฐิยนฺตภาโวปิ สิทฺโธเยว โหติ. ตสฺมา ‘‘อตฺถิภาโว อตฺถิตา’’ติอาทีสุปิ อตฺถิยา ภาโว อตฺถิภาโว, นตฺถิยา ภาโว นตฺถิภาโว, อตฺถิยา ภาโว อตฺถิตาภิอาทินา สมาสตทฺธิตวิคฺคโห อวสฺสมิจฺฉิตพฺโพ. ยทิทมมฺเหหิ วุตฺตํ, ตํ ‘‘ปาฬิยา วิรุชฺฌตี’’ติ น วตฺตพฺพํ ปาฬินยานุสาเรน วุตฺตตฺตาติ. यदि ऐसा है, तो "अत्थि, सक्का, लब्भा ये प्रथमा में हैं" इस वचन से 'अत्थि' और 'नत्थि' शब्दों को लुप्त प्रथमा विभक्ति के कारण प्रथमा विभक्ति के रूप में ही निर्दिष्ट करना चाहिए था, ऐसा न करके किसलिए सप्तमी विभक्ति के रूप में 'अत्थिया, नत्थिया' ऐसा निर्देश किया गया है? सत्य है, 'अत्थि' और 'नत्थि' शब्दों को प्रथमा विभक्ति युक्त ही निर्दिष्ट करना चाहिए, तथापि "अत्थि-प्रत्यय होने पर नौ, नत्थि-प्रत्यय होने पर नौ" इस अर्थ को प्रकाशित करने में प्रथमा का अवसर नहीं है, बल्कि सप्तमी का ही है, इसलिए 'अत्थिया नव, नत्थिया नवा' कहा गया है। इस प्रकार 'अत्थिया' और 'नत्थिया' शब्दों के सप्तम्यन्त होने के सिद्ध हो जाने पर तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी और षष्ठी विभक्ति के अन्त वाले होने का भाव भी सिद्ध ही हो जाता है। इसलिए 'अत्थिभावो', 'अत्थिता' इत्यादि में भी 'अत्थिया भावो अत्थिभावो', 'नत्थिया भावो नत्थिभावो', 'अत्थिया भावो अत्थिता' इत्यादि के द्वारा समास और तद्धित का विग्रह अवश्य स्वीकार करना चाहिए। जो यह हमारे द्वारा कहा गया है, उसे "पालि से विरुद्ध है" ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि यह पालि के नय (पद्धति) के अनुसार कहा गया है। เอวํ โหตุ, กสฺมา โภ ‘‘อตฺถิยา, นตฺถิยา’’ติ อิตฺถิลิงฺคนิทฺเทโส กโต, นนุ นิปาโตปสคฺคา อลิงฺคเภทาติ? สจฺจํ, อิทํ ปน ฐานํ อตีว สุขุมํ, ตถาปิ ปุพฺพาจริยานุภาวญฺเญว [Pg.399] นิสฺสาย วินิจฺฉยํ พฺรูม. ยถา หิ วีสติอิจฺจาทีนํ สงฺขฺยาสทฺทานํ สรูปโต อทพฺพวาจกตฺเตปิ ทพฺพวาจกานํ ลตามติรตฺติอิตฺถี ยาคุวธูสทฺทานํ วิย อิตฺถิลิงฺคภาโว สทฺทสตฺถวิทูหิ อนุมโต, เอวํ อทพฺพวาจกตฺเตปิ อตฺถิ นตฺถิสทฺทานํ กตฺถจิ อิตฺถิลิงฺคภาโว สทฺธมฺมวิทูหิ อนุมโต. เตนาห อายสฺมา ธมฺมเสนาปติ ‘‘อตฺถิยา นว, นตฺถิยา นวา’’ติ. อถ วา ‘‘อตฺถิยา, นตฺถิยา’’ติ อิมานิ ลิงฺคภาววินิมุตฺตานิ สตฺตมิยนฺตานิ นิปาตปทานีติปิ คเหตพฺพานิ, น เอตฺถ โจเทตพฺพํ, เอวรูปานิ นิปาตปทานิ ปุพฺพาจริเยหิ วุตฺตานิ น สนฺติ, ตสฺมา ฉฑฺเฑตพฺพมิทํ วจนนฺติ. ऐसा ही हो, (परन्तु) हे भो! 'अत्थिया, नत्थिया' ऐसा स्त्रीलिंग निर्देश क्यों किया गया है, क्या निपात और उपसर्ग लिंग-भेद से रहित नहीं होते? सत्य है, परन्तु यह स्थान अत्यंत सूक्ष्म है, तथापि पूर्वाचार्यों के प्रभाव का ही आश्रय लेकर हम निर्णय कहते हैं। जैसे 'वीसति' (बीस) इत्यादि संख्यावाचक शब्द स्वरूप से द्रव्यवाचक न होने पर भी, लता, मति, रत्ति, इत्थी, यागु, वधू शब्दों के समान स्त्रीलिंग होना शब्दशास्त्र के विद्वानों द्वारा मान्य है, वैसे ही द्रव्यवाचक न होने पर भी 'अत्थि' और 'नत्थि' शब्दों का कहीं-कहीं स्त्रीलिंग होना सद्धर्म के ज्ञाताओं द्वारा मान्य है। इसीलिए आयुष्मान् धम्मसेनापति ने "अत्थिया नव, नत्थिया नवा" कहा है। अथवा 'अत्थिया, नत्थिया' इन्हें लिंग-भाव से मुक्त सप्तम्यन्त निपात पद ही समझना चाहिए, यहाँ यह आक्षेप नहीं करना चाहिए कि इस प्रकार के निपात पद पूर्वाचार्यों द्वारा नहीं कहे गए हैं, इसलिए इस वचन को छोड़ देना चाहिए। ปาวจนสฺมิญฺหิ ครูหิ อนิทฺทิฏฺฐานิปิ อเนกวิหิตานิ นิปาตปทานิ สนฺทิสฺสนฺติ, นาปิ ‘‘เหตุยา, อธิปติยา, อตฺถิยา, นตฺถิยา’’ติ เอวมาทีสุ ‘‘อปสทฺทา อิเม’’ติ วิโรโธ อุปฺปาเทตพฺโพ. น หิ อจินฺเตยฺยานุภาเวน ปารมิตาปุญฺเญน นิปฺผนฺเนน อนาวรณญาเณน สพฺพํ เญยฺยมณฺฑลํ หตฺถตเล อามลกํ วิย ปจฺจกฺขํ กตฺวา ปสฺสโต พุทฺธสฺส วจเน อญฺเญสํ วาจาวิปฺปลาโป อวสฺสํ ลพฺภตีติ. นนุ จ โภ ‘‘เหตุยา, อธิปติยา, อตฺถิยา, นตฺถิยา’’ติ จ อิทํ สาริปุตฺตตฺเถรวจนํ เตน นิกฺขิตฺตตฺตา. ตถาคเตน หิ ตาวตึสภปเน เทสิตกาเล อิมานิ ปทานิ น สนฺติ, เอวํ สนฺเต กสฺมา ‘‘พุทฺธวจน’’นฺติ วทถาติ? พุทฺธวจนํเยว นาม. อายสฺมโต หิ สาริปุตฺตสฺส ตถาคเตน นโย ทินฺโน, เตนปิ ปภินฺนปฏิสมฺภิเทน สตฺถุกปฺเปน อคฺคสาวเกน สตฺถุ สนฺติกา นยํ ลภิตฺวา พฺยญฺชนํ สุโรปิตํ กตํ. สพฺเพปิ หิ ปฏิสมฺภิทปฺปตฺตา อริยา ทุนฺนิรุตฺตึ น วทนฺติ นิรุตฺติปเภทสฺมึ สุกุสลตฺตา, ตสฺมา อญฺเญสมวิสโย เอส อริยานํ โวหาโรติ ทฏฺฐพฺพํ. शासन (पावचन) में गुरुओं द्वारा अनिर्दिष्ट भी अनेक प्रकार के निपात पद देखे जाते हैं, और न ही 'हेतुया, अधिपतिया, अत्थिया, नत्थिया' इत्यादि में 'ये अपशब्द हैं' ऐसा विरोध उत्पन्न करना चाहिए। क्योंकि अचिन्त्य अनुभाव वाले, पारमिताओं के पुण्य से निष्पन्न, अनावरण ज्ञान के द्वारा समस्त ज्ञेय मण्डल को हथेली पर रखे आँवले के समान प्रत्यक्ष करके देखने वाले बुद्ध के वचनों में दूसरों का वाक्-प्रलाप (दोष) अवश्य ही प्राप्त नहीं होता है। हे महानुभाव! क्या 'हेतुया, अधिपतिया, अत्थिया, नत्थिया' यह आयुष्मान् सारिपुत्र स्थविर का वचन है क्योंकि उनके द्वारा यह स्थापित किया गया है? तथागत द्वारा तावतिंस भवन में देशना करते समय ये पद नहीं थे, ऐसा होने पर आप इसे 'बुद्धवचन' क्यों कहते हैं? यह बुद्धवचन ही है। क्योंकि आयुष्मान् सारिपुत्र को तथागत द्वारा नय (विधि) दिया गया था, उनके द्वारा भी प्रभिन्न-प्रतिसम्भिदा वाले, शास्ता के समान, अग्रश्रावक ने शास्ता के समीप से नय प्राप्त कर व्यञ्जन को सुस्थापित किया। प्रतिसम्भिदा प्राप्त सभी आर्य 'दुनिरुत्ति' (अशुद्ध भाषा) नहीं बोलते हैं क्योंकि वे निरुत्ति-प्रभेद में सुकुशल होते हैं, इसलिए यह आर्यों का व्यवहार दूसरों का विषय नहीं है, ऐसा समझना चाहिए। อิทานิ [Pg.400] สตาทีนํ นามิกปทมาลา วุจฺจเต – अब 'सत' (सौ) आदि की नामिक पदमाला (रूप-सिद्धि) कही जाती है - สตํ, สตานิ, สตา. สตํ, สตานิ, สเต. สเตน, สเตหิ, สเตภิ. สตสฺส, สตานํ. สตา, สตสฺมา, สตมฺหา, สเตหิ, สเตภิ. สตสฺส, สตานํ. สเต, สตสฺมึ, สตมฺหิ, สเตสุ. เอวํ สหสฺสํ, สหสฺสานีติ โยเชตพฺพํ. ทสสหสฺสํ สตสหสฺสํ ทสสตสหสฺสนฺติ เอตฺถาปิ เอเสว นโย. อยํ ปเนตฺถ ปโยโค ‘‘สตํ ภิกฺขู, สตํ อิตฺถิโย, สตํ จิตฺตานิ. ภิกฺขูนํ สตํ, อิตฺถีนํ สตํ, จิตฺตานํ สตํ. สหสฺสาทีสุปิ เอเสว นโย. อิตฺถญฺจ อญฺญถาปิ สทฺทรูปานิ ภวนฺติ. โกฏิ, โกฏี, โกฏิโย. รตฺตินเยน เญยฺยํ. सतं, सतानि, सता (प्रथमा)। सतं, सतानि, सते (द्वितीया)। सतेन, सतेहि, सतेभि (तृतीया)। सतस्स, सतानं (चतुर्थी)। सता, सतस्मा, सतम्हा, सतेहि, सतेभि (पञ्चमी)। सतस्स, सतानं (षष्ठी)। सते, सतस्मिं, सतम्हि, सतेसु (सप्तमी)। इसी प्रकार सहस्सं, सहस्सानीति (हजार) को जोड़ना चाहिए। दससहस्सं (दस हजार), सतसहस्सं (लाख), दससतसहस्सं (दस लाख) यहाँ भी यही विधि है। यहाँ यह प्रयोग है - 'सतं भिक्खू' (सौ भिक्षु), 'सतं इत्थियो' (सौ स्त्रियाँ), 'सतं चित्तानि' (सौ चित्त)। 'भिक्खूनं सतं' (भिक्षुओं का सौ), 'इत्थीनं सतं' (स्त्रियों का सौ), 'चित्तानं सतं' (चित्तों का सौ)। सहस्र आदि में भी यही विधि है। और यहाँ अन्य प्रकार से भी शब्द-रूप होते हैं। कोटि, कोटी, कोटियो। इसे 'रत्ति' (रात्रि) शब्द के समान समझना चाहिए। เอกปฺปภุติโต ยาว, ทสกา ยา ปวตฺตติ; สงฺขฺยา ตาว สา สงฺขฺเยยฺย-ปฺปธานาติ ครู วทุํ. एक से लेकर दस तक जो संख्या प्रवृत्त होती है, वह 'संख्येय-प्रधान' (विशेषण प्रधान) होती है, ऐसा गुरुओं ने कहा है। วีสติโต ยาว สตา, ยา สงฺขฺยา ตาว สา ปน; สงฺขฺยาปฺปธานา สงฺขฺเยยฺย-ปฺปธานาติ จ วณฺณยุํ. बीस से लेकर सौ तक जो संख्या है, वह 'संख्या-प्रधान' (संज्ञा प्रधान) और 'संख्येय-प्रधान' (विशेषण प्रधान) दोनों होती है, ऐसा वर्णन किया गया है। อปิจ – और भी - วีสโต ยาว โกฏิยา, สงฺขฺยา ตาว หิ สา ขลุ; สงฺขฺยาปฺปธานา สงฺขฺเยยฺย-ปฺปธานา จาติ นิทฺทิเส. बीस से लेकर कोटि (करोड़) तक जो संख्या है, वह निश्चय ही 'संख्या-प्रधान' और 'संख्येय-प्रधान' दोनों ही निर्दिष्ट करनी चाहिए। ตถา หิ ‘‘อสีติ โกฏิโย หิตฺวา, หิรญฺญสฺสาปิ ปพฺพชิ’’นฺติ, ‘‘ขีณาสวา วีตมลา, สมึสุ สตโกฏิโย’’ติ จ ปาฬิ ทิสฺสติ. तथा 'असीति कोटियो हित्वा, हिरञ्ञस्सापि पब्बजिं' (अस्सी करोड़ स्वर्ण को छोड़कर प्रव्रजित हुए) और 'खीणासवा वीतमला, समिंसु सतकोटियो' (क्षणास्रव और वीतमल सौ करोड़ [देवता] एकत्रित हुए) - ऐसी पालि देखी जाती है। อิมสฺมึ ปน ฐาเน สพฺเพสํ สงฺขฺยาสทฺทรูปานํ ปากฏีกรเณน วิญฺญูนํ สุขุมญาณปฏิลาภตฺถํ สาฏฺฐกถํ อุทานปาฬิปฺปเทสํ อญฺญญฺจ ปาฬิปฺปเทสมฏฺฐกถาวจนญฺจ อาหริตฺวา ทสฺสยิสฺสามิ – इस स्थान पर सभी संख्या-शब्दों के रूपों को स्पष्ट करने के द्वारा विद्वानों को सूक्ष्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए, अट्ठकथा सहित उदानपालि के अंश को और अन्य पालि अंश तथा अट्ठकथा के वचनों को लाकर दिखाऊँगा - ‘‘เยสํ [Pg.401] โข วิสาเข สตํ ปิยานิ, สตํ เตสํ ทุกฺขานิ, เยสํ นวุติ ปิยานิ, นวุติ เตสํ ทุกฺขานิ. เยสํ อสีติ…เป… เยสํ สตฺตติ. เยสํ สฏฺฐิ. เยสํ ปญฺญาสํ, เยสํ จตฺตารีสํ, เยสํ ตึสํ. เยสํ โข วิสาเข วีสํ ปิยานิ, วีสติ เตสํ ทุกฺขานิ. เยสํ ทส. เยสํ นว. เยสํ อฏฺฐ. เยสํ สตฺต. เยสํ ฉ. เยสํ ปญฺจ. เยสํ จตฺตาริ. เยสํ ตีณิ. เยสํ ทฺเว. เยสํ เอกํ ปิยํ, เตสํ เอกํ ทุกฺข’’นฺติ. “हे विशाखा! जिनके सौ प्रिय हैं, उनके सौ दुःख हैं; जिनके नब्बे प्रिय हैं, उनके नब्बे दुःख हैं। जिनके अस्सी... पे... जिनके सत्तर। जिनके साठ। जिनके पचास, जिनके चालीस, जिनके तीस। हे विशाखा! जिनके बीस प्रिय हैं, उनके बीस दुःख हैं। जिनके दस। जिनके नौ। जिनके आठ। जिनके सात। जिनके छह। जिनके पाँच। जिनके चार। जिनके तीन। जिनके दो। जिसका एक प्रिय है, उसका एक दुःख है।” ตตฺถ สตํ ปิยานีติ สตํ ปิยายิตพฺพวตฺถูนิ. ‘‘สตํ ปิย’’นฺติปิ เกจิ ปฐนฺติ. เอตฺถ จ ยสฺมา เอกโต ปฏฺฐาย ยาว ทส, ตาว สงฺขฺยาสงฺขฺเยยฺยปฺปธานา, ตสฺมา ‘‘เยสํ ทส ปิยานิ, ทส เตสํ ทุกฺขานี’’ติอาทินา ปาฬิ อาคตา. เกจิ ปน ‘‘เยสํ ทส ปิยานํ, ทส เตสํ ทุกฺขาน’’นฺติอาทินา ปฐนฺติ, ตํ น สุนฺทรํ. ยสฺมา ปน วีสติโต ปฏฺฐาย ยาว สตํ, ตาว สงฺขฺเยยฺยปฺปธานา สงฺขฺยาปฺปธานา จ, ตสฺมา ตตฺถาปิ สงฺขฺเยยฺยปฺปธานํเยว คเหตฺวา ‘‘เยสํ โข วิสาเข สตํ ปิยานิ, สตํ เตสํ ทุกฺขานี’’ติอาทินา ปาฬิ อาคตา. สพฺเพสมฺปิ จ เยสํ เอกํ ปิยํ, เอกํ เตสํ ทุกฺขนฺติ ปาโฐ, น ปน ทุกฺขสฺสาติ. เอกสฺมิญฺหิ ปทกฺกเม เอกรสาว ภควโต เทสนา โหตีติ. ตสฺมา ยถาวุตฺตนยาว ปาฬิ เวทิตพฺพา. อยํ ตาว สาฏฺฐกโถ อุทานปาฬิปฺปเทโส. वहाँ 'सतं पियानि' का अर्थ है सौ प्रिय वस्तुएँ। कुछ लोग 'सतं पियं' भी पढ़ते हैं। और यहाँ क्योंकि एक से लेकर दस तक संख्या 'संख्येय-प्रधान' होती है, इसलिए 'येसं दस पियानि, दस तेसं दुक्खानि' इत्यादि पालि आई है। कुछ लोग 'येसं दस पियानं, दस तेसं दुक्खानं' इत्यादि पढ़ते हैं, वह सुन्दर (सही) नहीं है। क्योंकि बीस से लेकर सौ तक संख्या 'संख्येय-प्रधान' और 'संख्या-प्रधान' दोनों होती है, इसलिए वहाँ भी संख्येय-प्रधान को ही ग्रहण करके 'येसं खो विसाखे सतं पियानि, सतं तेसं दुक्खानि' इत्यादि पालि आई है। और सभी के लिए 'येसं एकं पियं, एकं तेसं दुक्खं' ऐसा पाठ है, न कि 'दुक्खस्स' (दुःख का)। क्योंकि एक ही पद-क्रम में भगवान् की देशना एकरस ही होती है। इसलिए पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही पालि समझनी चाहिए। यह अट्ठकथा सहित उदानपालि का अंश है। อิทานิ อญฺโญ ปาฬิปฺปเทโส อฏฺฐกถาปาฐปฺปเทโส จ นียเต – अब अन्य पालि अंश और अट्ठकथा पाठ का अंश प्रस्तुत किया जाता है - ‘‘สตํ [Pg.402] หตฺถี สตํ อสฺสา, สตํ อสฺสตรีรถา; สตํ กญฺญา สหสฺสานิ, อามุกฺกมณิกุณฺฑลา; เอกสฺส ปทวีติหารสฺส, กลํ นาคฺฆนฺติ โสฬสิ’’นฺติ “सौ हाथी, सौ घोड़े, सौ खच्चरों वाले रथ, आभूषण और कुण्डल पहने हुए सौ हजार कन्याएँ; (ये सब) एक (धर्म के) पद के अभ्यास की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं।” ปาฬิ. เอตฺถ ‘‘สตํ หตฺถี’’ติอาทีนิ วิเสสิตานิ, ‘‘สหสฺสานี’’ติ วิเสสนํ, ตสฺมา สตํสทฺทํ สหสฺสสทฺเทน โยเชตฺวา ‘‘หตฺถี’’ติอาทีนิ ปน อุปปทํ กตฺวา อตฺโถ คเหตพฺโพ. หตฺถี สตํ สหสฺสานิ. อสฺสา สตํ สหสฺสานิ. อสฺสตรีรถา สตํ สหสฺสานิ. อามุกฺกมณิกุณฺฑลา กญฺญา สตํ สหสฺสานิ. อิทํ สงฺขฺเยยฺยปฺปธานวเสนตฺถคหณํ. สงฺขฺยาปฺปธานวเสน ปน อยมฺปิ อตฺโถ คเหตพฺโพ ‘‘หตฺถีนํ สตสหสฺสํ, อสฺสานํ สตสหสฺสํ, อสฺสตรีรถานํ สตสหสฺสํ, อามุกฺกมณิกุณฺฑลานํ กญฺญานํ สตสหสฺส’’นฺติ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. ‘‘โยชนานํ สตานุจฺโจ, หิมวา ปญฺจ ปพฺพโต’’ติ อยมฏฺฐกถาปาโฐ. เอตฺถ ‘‘ปญฺจา’’ติ สทฺทํ สตสทฺเทน สทฺธึ โยเชตฺวา ‘‘สิปฺปิกานํ สตํ นตฺถี’’ติ เอตฺถ วิย หิมวา ปพฺพโต โยชนานํ ปญฺจ สตานิ อุจฺโจติ สงฺขฺยาปฺปธานวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ. ‘‘ปญฺจ สตานี’’ติ จ อทฺธุโน อจฺจนฺตสํโยควเสน อุปโยควจนํ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. สตมิติ สทฺโท ‘‘สตํ โหมิ, สหสฺสํ โหมี’’ติอาทีสุ เอกวจโน. ‘‘อเถตฺเถกสตํ ขตฺยา, อนุยนฺตา ยสสฺสิโน’’ติอาทีสุ พหุวจโน. เอวํ สหสฺสาทีนมฺปิ เอกวจนพหุวจนตา ลพฺภติ. ตถา หิ ‘‘ภิยฺโย นํ สตสหสฺสํ, ยกฺขานํ ปยิรุปาสตี’’ติ เอตฺถ ‘‘สตสหสฺส’’นฺติ เอกวจนํ. ‘‘ปโรสหสฺสํ โข ปนสฺส ปุตฺตา ภวิสฺสนฺตี’’ติ เอตฺถ สหสฺสนฺติ พหุวจนนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. पालि। यहाँ 'सतं हत्थी' (सौ हाथी) इत्यादि विशेष्य हैं, 'सहस्सानी' (हजारों) विशेषण है, इसलिए 'सतं' शब्द को 'सहस्सं' शब्द के साथ जोड़कर और 'हत्थी' इत्यादि को उपपद बनाकर अर्थ ग्रहण करना चाहिए। हाथियों के सौ हजार (एक लाख)। घोड़ों के सौ हजार। खच्चरों वाले रथों के सौ हजार। मणि-कुण्डल पहने हुए कन्याओं के सौ हजार। यह संख्येय (गिने जाने वाले पदार्थ) की प्रधानता के कारण अर्थ ग्रहण है। संख्या की प्रधानता के कारण तो यह भी अर्थ ग्रहण करना चाहिए— "हाथियों का एक लाख, घोड़ों का एक लाख, खच्चरों वाले रथों का एक लाख, मणि-कुण्डल पहने हुए कन्याओं का एक लाख"। यह पद्धति अन्य ऐसे ही स्थानों पर भी ले जानी चाहिए। "योजनानं सतानुच्चो, हिमवा पञ्च पब्बतो" (हिमालय पर्वत पाँच सौ योजन ऊँचा है) यह अट्ठकथा का पाठ है। यहाँ 'पञ्च' शब्द को 'सत' शब्द के साथ जोड़कर, जैसे "सिप्पिकानं सतं नत्थि" यहाँ है, वैसे ही "हिमालय पर्वत पाँच सौ योजन ऊँचा है" ऐसा संख्या की प्रधानता के कारण अर्थ ग्रहण करना चाहिए। और 'पञ्च सतानी' यह मार्ग (अध्वा) के अत्यंत संयोग के कारण द्वितीया विभक्ति (उपयोगवचन) है। यह पद्धति अन्य ऐसे ही स्थानों पर भी ले जानी चाहिए। 'सतं' यह शब्द "सतं होमि, सहस्सं होमि" इत्यादि में एकवचन है। "अथेत्थेकसतं खत्या, अनुयन्ता यसस्सिनो" इत्यादि में बहुवचन है। इसी प्रकार 'सहस्स' आदि की भी एकवचन और बहुवचनता प्राप्त होती है। जैसे कि "भिय्यो नं सतसहस्सं, यक्खानं पयिरुपासती" यहाँ 'सतसहस्सं' एकवचन है। "परोसहस्सं खो पनस्स पुत्ता भविस्सन्ति" यहाँ 'सहस्सं' बहुवचन है, ऐसा देखना चाहिए। ‘‘กปฺเป [Pg.403] จ สตสหสฺเส, จตุโร จ อสงฺขิเย; อมรํ นาม นครํ, ทสฺสเนยฺยํ มโนรม’’นฺติ "सौ हजार (एक लाख) कल्पों और चार असंख्येयों में; अमर नामक नगर था, जो दर्शनीय और मनोरम था।" ปาฬิ. เอตฺถ ‘‘กปฺเป จ สตสหสฺเส จตุโร จ อสงฺขิเยติ สามิอตฺเถ อุปโยคพหุวจนํ, ตสฺมา ‘‘มหากปฺปานํ สตสหสฺสานํ จตุนฺนํ อสงฺขิยานํ มตฺถเก’’ติ อตฺโถ คเหตพฺโพ, ‘‘มตฺถเก’’ติ เจตฺถ วจนเสโส. ‘‘กปฺปสตสหสฺสาธิกานํ จตุนฺนํ อสงฺขิยานํ มตฺถเก’’อิจฺเจวตฺโถ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. पालि। यहाँ 'कप्पे च सतसहस्से चतुरो च असंखिये' यह षष्ठी (स्वामी) के अर्थ में द्वितीया (उपयोग) बहुवचन है, इसलिए "चार असंख्येय और सौ हजार महाकल्पों के मस्तक (अंत) पर" ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिए, और यहाँ 'मत्थके' (मस्तक पर/अंत में) यह वचन-शेष (अध्याहार) है। "कल्प-शत-सहस्र से अधिक चार असंख्येयों के अंत में" ऐसा ही अर्थ है। यह पद्धति अन्य ऐसे ही स्थानों पर भी ले जानी चाहिए। ‘‘กปฺเป จ สตสหสฺเส, จตุโร จ อสงฺขิเย; เอตฺถนฺตเร ยํ จริตํ, สพฺพํ ตํ โพธิปาจน’’นฺติ "सौ हजार कल्पों और चार असंख्येयों में; इस बीच जो भी चर्या (आचरण) की गई, वह सब बोधि को परिपक्व करने वाली थी।" ปาฬิ. เอตฺถ ‘‘กปฺเป’’ติ อจฺจนฺตสํโยควเสน อุปโยคพหุวจนํ. ‘‘สตสหสฺเส กปฺเป’’ติ กปฺปสทฺทสมฺพนฺเธน จายํ ปุลฺลิงฺคนิทฺเทโส อุปโยคนิทฺเทโส จ. สมานาธิกรณญฺหิ อิทํ กปฺปสทฺเทน. ‘‘จตุโร จ อสงฺขิเย’’ติ อจฺฉนฺตสํโยควเสน อุปโยคพหุวจนานิ. กสฺส ปน อสงฺขิเยติ? อญฺญสฺส อวุตฺตตฺตา กปฺปสฺส จ วุตฺตตฺตา ปกรณโต ‘‘กปฺปาน’’นฺติ อยมตฺโถ วิญฺญายเตว. น หิ วุตฺตํ วชฺเชตฺวา อวุตฺตสฺส กสฺสจิ คหณํ ยุตฺตนฺติ. จสทฺโท สมฺปิณฺฑนตฺโถ ‘‘มหากปฺปานํ จตุโร อสงฺขฺเยยฺเย สตสหสฺเส จ มหากปฺเป’’ติ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. पालि। यहाँ 'कप्पे' (कल्पों में) अत्यंत संयोग के कारण द्वितीया बहुवचन है। 'सतसहस्से कप्पे' (लाख कल्पों में) में 'कप्प' शब्द के संबंध से यह पुल्लिंग निर्देश और द्वितीया निर्देश है। क्योंकि यह 'कप्प' शब्द के साथ समानाधिकरण है। 'चतुरो च असंखिये' (और चार असंख्येय) अत्यंत संयोग के कारण द्वितीया बहुवचन हैं। किसके असंख्येय? अन्य किसी के न कहे जाने के कारण और कल्प के कहे जाने के कारण प्रकरण से 'कल्पों के' (कप्पानं) यह अर्थ ही समझा जाता है। क्योंकि जो कहा गया है उसे छोड़कर जो नहीं कहा गया है उसे ग्रहण करना उचित नहीं है। 'च' शब्द समुच्चय के अर्थ में है - 'चार असंख्येय महाकल्प और एक लाख महाकल्प'। यह नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘ฆฏาเนกสหสฺสานิ, กุมฺภีนญฺจ สตา พหู’’ติ ปาฬิ. เอตฺถ ฆฏาติ ฆฏานํ. สามิอตฺเถ หิ อิทํ ปจฺจตฺตวจนํ. ‘‘ฆฏานํ อเนกสหสฺสานิ’’ อิจฺเจวตฺโถ. กุมฺภีนญฺจ สตา พหูติ อเนกานิ จ กุมฺภีนํ สตานิ. เอตฺถ นิการโลโป ทฏฺฐพฺโพ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. 'घटानेकसहस्सानि, कुम्भीनञ्च सता बहू' - यह पालि है। यहाँ 'घटा' का अर्थ 'घटानां' (घड़ों का) है। क्योंकि यहाँ प्रथमा विभक्ति षष्ठी के अर्थ में है। 'घड़ों के अनेक हजार' - यही अर्थ है। 'कुम्भीनञ्च सता बहू' का अर्थ है कुम्भियों के अनेक सौ। यहाँ 'नि' कार का लोप देखना चाहिए। यह नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘ทสวีสสหสฺสานํ[Pg.404], ธมฺมาภิสมโย อหุ; เอกทฺวินฺนํ อภิสมโย, คณนาโต อสงฺขิโย’’ติ 'दस-बीस हजार (प्राणियों) का धम्माभिसमय (धर्म-साक्षात्कार) हुआ; एक-दो का अभिसमय गणना से असंख्येय है।' ปาฬิ. เอตฺถ ทสวีสสหสฺสานนฺติ ทสสหสฺสานํ วีสสหสฺสานญฺจ. ธมฺมาภิสมโยติ จตุสจฺจปฺปฏิเวโธ. เอกทฺวินฺนนฺติ สีสมตฺตกถนํ, เตน ‘‘เอกสฺส เจว ทฺวินฺนญฺจ ติณฺณํ จตุนฺนํ…เป… ทสนฺน’’นฺติอาทินา นเยน อสงฺขฺเยยฺโยติ อตฺโถ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. पालि। यहाँ 'दसवीससहस्सानं' का अर्थ है दस हजार और बीस हजार का। 'धम्माभिसमयो' का अर्थ है चार आर्य सत्यों का प्रतिवेध (साक्षात्कार)। 'एकद्विन्नं' (एक-दो का) यह केवल मुख्य रूप से कहना है, उससे 'एक का, दो का, तीन का, चार का... दस का' आदि नियम से 'असंख्येय' यह अर्थ है। यह नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘จตฺตาริ สตสหสฺสานิ, ฉฬภิญฺญา มหิทฺธิกา; ทีปงฺกรํ โลกวิทุํ, ปริวาเรนฺติ สพฺพทา’’ติ 'चार लाख महाऋद्धिमान षडभिज्ञ (भिक्षु) लोकविद् दीपङ्कर (बुद्ध) को सदा घेरे रहते हैं।' ปาฬิ. เอตฺถ จตฺตาริ สตสหสฺสานีติ อิทํ ลิงฺคเภทวเสน ‘‘ฉฬภิญฺญา มหิทฺธิกา’’ติ อิเมหิ ทฺวีหิ ปเทหิ สมานาธิกรณํ. อีทิเสสุ หิ ฐาเนสุ อสงฺขฺเยยฺย วาจโกปิ สทฺโท นปุํสโกว โหติ, ตสฺมา ‘‘จตฺตาริ สตสหสฺสานี’’ติ จ ‘‘ฉฬภิญฺญา’’ติ จ ‘‘มหิทฺธิกา’’ติ จ เอตํ ปทตฺตยํ สมานาธิกรณํ. อถ วา ฉฬภิญฺญา มหิทฺธิกาติ ฉฬภิญฺญานํ มหทฺธิกานนฺติ สามิอตฺเถ ปจฺจตฺตวจนํ ทฏฺฐพฺพํ. อิมสฺมึ ปนตฺเถ ‘‘จตฺตาริ สตสหสฺสานี’’ติ อยํ สงฺขฺยาวจโน ภวติ. ‘‘ตีณิ สตสหสฺสานิ, นาริโย สมลงฺกตา’’ติอาทีสุปิ อยํ นโย เนตพฺโพ. ‘‘ตา จ สตฺต สตา ภริยา, ทาสฺโย สตฺต สตานิ จา’’ติ ปาฬิ. เอตฺถ สตาติ ‘‘สตานี’’ติ นปุํสกวเสน คเหตพฺพํ, น อิตฺถิลิงฺควเสน. ‘‘สตา’’ติ หิ ‘‘ปญฺจ จิตฺตา วิปากา’’ติอาทีนิ วิย นปุํสกรูปํ. อิตฺถิลิงฺคภูตา หิ สตสทฺโท นตฺถิ, ตถา ปุลฺลิงฺคภูโต. ยทิ จ ทฺวิลิงฺโค สตสทฺโท สิยา[Pg.405], เอวญฺจ สติ ‘‘ปุริโส, กญฺญา’’ติ จ โอการนฺตปุลฺลิงฺคอาการนฺติตฺถิรูเปหิปิภวิตพฺพํ. รูปทฺวยมฺปิ สตสทฺทสฺส นตฺถิ, เตน ญายติ ‘‘สตสทฺโท เอกนฺตนปุํสโก’’ติ. पालि। यहाँ 'चत्तारी सतसहस्सानी' (चार लाख) यह लिंग-भेद के कारण 'छळभिञ्ञा महिद्धिका' इन दो पदों के साथ समानाधिकरण है। ऐसे स्थानों पर असंख्यात वाचक शब्द भी नपुंसक ही होता है, इसलिए 'चत्तारी सतसहस्सानी', 'छळभिञ्ञा' और 'महिद्धिका' ये तीनों पद समानाधिकरण हैं। अथवा 'छळभिञ्ञा महिद्धिका' को 'छळभिञ्ञानं महद्धिकानं' (छह अभिज्ञाओं वाले महाऋद्धिमानों का) इस षष्ठी अर्थ में प्रथमा विभक्ति समझना चाहिए। इस अर्थ में 'चत्तारी सतसहस्सानी' यह संख्यावाचक होता है। 'तीणि सतसहस्सानी, नारियो समलङ्कता' आदि में भी यही नियम लागू करना चाहिए। 'ता च सत्त सता भरिया, दास्यो सत्त सतानि चा' यह पालि है। यहाँ 'सता' को 'सतानी' के रूप में नपुंसक लिंग के अनुसार ग्रहण करना चाहिए, न कि स्त्रीलिंग के अनुसार। 'सता' यह 'पञ्च चित्ता विपाका' आदि की तरह नपुंसक रूप है। स्त्रीलिंग रूप 'सत' शब्द नहीं है, और न ही पुल्लिंग रूप। यदि 'सत' शब्द दो लिंगों वाला होता, तो 'पुरिसो, कञ्ञा' की तरह ओ-कारान्त पुल्लिंग और आ-कारान्त स्त्रीलिंग रूप भी होने चाहिए थे। 'सत' शब्द के ये दोनों रूप नहीं हैं, इसलिए यह ज्ञात होता है कि 'सत शब्द एकांततः नपुंसक' है। นนุ จ โภ ‘‘ตา เทวตา สตฺตสตา อุฬารา’’ติ เอตฺถ สตสทฺโท อิตฺถิลิงฺโค หุตฺวา ทิสฺสตีติ? น, นปุํสโกเยวาติ. นนุ จ โภ เทวตาสทฺเทน สมานาธิกรโณติ? สจฺจํ สมานาธิกรโณ, ตถาปิ นปุํสโกเยว. อีทิเสสุ หิ สงฺขฺยาวิสเยสุ สมานาธิกรณภาโว อปฺปมาโณ. ตถา หิ ‘‘ปญฺจ ปจฺเจกพุทฺธสตานิ อิมสฺมึ อิสิคิลิสฺมึ ปพฺพเต จิรวาสิโน อเหสุ’’นฺติ นปุํสกลิงฺเคน ปุลฺลิงฺคสฺส สมานาธิกรณตา ทิสฺสติ, ตสฺมา ‘‘ตา เทวตา สตฺตสตา อุฬารา’’ติ เอตฺถาปิ ‘‘สตฺตสตานี’’ติ นปุํสกภาโวเยวาติ อวคนฺตพฺโพ. ‘‘สตฺต หตฺถิสเต ทตฺวา’’ติอาทีสุปิ สตสทฺโท นปุํสโกเยว. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. क्या 'ता देवता सत्तसता उळारा' यहाँ 'सत' शब्द स्त्रीलिंग होकर नहीं दिख रहा है? नहीं, वह नपुंसक ही है। क्या वह 'देवता' शब्द के साथ समानाधिकरण नहीं है? सत्य है, वह समानाधिकरण है, फिर भी वह नपुंसक ही है। ऐसी संख्याओं के विषय में समानाधिकरण होना प्रमाण नहीं है। जैसे कि 'पञ्च पच्चेकबुद्धसतानि इमस्मिं इसिगिलिस्मिं पब्बते चिरवासिनो अहेसुं' में नपुंसक लिंग का पुल्लिंग के साथ समानाधिकरण देखा जाता है, इसलिए 'ता देवता सत्तसता उळारा' यहाँ भी 'सत्तसतानी' इस प्रकार नपुंसक भाव ही समझना चाहिए। 'सत्त हत्थिसते दत्वा' आदि में भी 'सत' शब्द नपुंसक ही है। यही नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘นวุติโกฏิสหสฺเสหิ, ปริวาเรสิ มหามุนี’’ติ ปาฬิ. เอตฺถ ‘‘นวุติโกฏิสหสฺเสหิ ภิกฺขูหี’’ติ วา ‘‘ภิกฺขูนํ นวุติโกฏิสหสฺเสหี’’ติ วา สงฺขฺเยยฺยสงฺขฺยาปธานวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. 'नवुतिकोटिसहस्सेहि, परिवारेसि महामुनी' यह पालि है। यहाँ 'नवुतिकोटिसहस्सेहि भिक्खूहि' (नब्बे हजार करोड़ भिक्षुओं के साथ) अथवा 'भिक्खूनं नवुतिकोटिसहस्सेहि' (भिक्षुओं के नब्बे हजार करोड़ के साथ) इस प्रकार संख्यय (गिने जाने वाले) और संख्या की प्रधानता के अनुसार अर्थ ग्रहण करना चाहिए। यही नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘สตสหสฺสวสฺสานิ, อายุ ตสฺส มเหสิโน’’ติ ปาฬิ. เอตฺถ ‘‘สตสหสฺสวสฺสานี’’ติ กาลสฺส อจฺจนฺตสํโยควเสน อุปโยควจนํ. ตถา ‘‘ทสวสฺสสหสฺสานิ, อคาร’มชฺฌ โส วสี’’ติ ปาฬิยมฺปิ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. 'सतसहस्सवस्सानी, आयु तस्स महेसिनो' यह पालि है। यहाँ 'सतसहस्सवस्सानी' काल के अत्यंत संयोग (निरंतरता) के कारण द्वितीया विभक्ति (उपयोगवचन) है। वैसे ही 'दसवस्ससहस्सानी, अगारमज्झ सो वसी' इस पालि में भी है। यही नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘อิโต [Pg.406] สตสหสฺสมฺหิ, กปฺเป อุปฺปชฺชิ นายโก’’ติ ปาฬิ, ‘‘เอกนวุเต อิโต กปฺเป’’ติ ปาฬิ จ. เอตฺถ สตสหสฺสมฺหิ กปฺเปติ สตสหสฺสานํ กปฺปานํ มตฺถเก. เอกนวุเต กปฺเปติ เอกนวุติยา กปฺปานํ มตฺถเกติ ภุมฺมวจนสฺส สามิภุมฺมวจนวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ. ตถา หิ ‘‘ภควติ พฺรหฺมจริยํ วุสฺสตี’’ติ เอตฺถ ภุมฺมวจนสฺส ‘‘ภควโต สนฺติเก’’ติ สามิภุมฺมวจนวเสน อตฺโถ คหิโต. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. 'इतो सतसहस्समि, कप्पे उप्पज्जि नायको' यह पालि है, और 'एकनवुते इतो कप्पे' यह पालि है। यहाँ 'सतसहस्समि कप्पे' का अर्थ 'लाख कल्पों के बीतने पर' है। 'एकनवुते कप्पे' का अर्थ 'इक्यानवे कल्पों के बीतने पर' है; इस प्रकार सप्तमी विभक्ति का अर्थ षष्ठी-सप्तमी (सामि-भुम्म) के रूप में ग्रहण करना चाहिए। जैसे कि 'भगवति ब्रह्मचरियं वुस्सती' यहाँ सप्तमी विभक्ति का अर्थ 'भगवतो सन्तिके' (भगवान के समीप) इस प्रकार षष्ठी-सप्तमी के रूप में लिया गया है। यही नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘ยทิ ตตฺถ สหสฺสานิ, สตานิ นหุตานิ จ; เนวมฺหากํ ภยํ โกจิ, วเน วาเฬสุ วิชฺชตี’’ติ "यदि वहाँ वन में हजारों, सैकड़ों और लाखों हिंसक पशु हों, तो भी हमें उन हिंसक पशुओं से कोई भय नहीं होता।" ปาฬิ. อยเมตสฺสา อตฺโถ – ตตฺถ วเน วาฬานํ สหสฺสานิ จ สตานิ จ นหุตานิ จ ยทิ วิชฺชนฺติ. อถ วา สหสฺสานิ สตานีติ สตสหสฺสานิ, วาฬานํ สตสหสฺสานิ จ นหุตานิ จ ยทิ วิชฺชนฺติ, เอวํ วิชฺชนฺเตสุปิ วาเฬสุ โกจีติ กฺวจิ. โกจิสทฺโท หิ ‘‘โก เต พลํ มหาราชา’’ติ เอตฺถ โกสทฺโท วิย กฺวสทฺทตฺเถ วตฺตติ, นิมิตฺตตฺเถ จายํ นิทฺเทโส. เตน ‘‘โกจิ กฺวจิ กิสฺมิญฺจิ วาเฬ เอกสฺสปิ วาฬมิคสฺส การณา เนวมฺหากํ ภยํ วิชฺชตี’’ติ อตฺโถ คเหตพฺโพ. อถ วา โกจีติ กิญฺจิ อปฺปมตฺตกมฺปิ. เอตฺถ ปน ‘‘วาเฬสู’’ติ นิมิตฺตตฺเถ ภุมฺมํ. วาฬานํ การณา อปฺปมตฺตกมฺปิ อมฺหากํ ภยํ น วิชฺชตีติ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. पालि। इसका यह अर्थ है - यदि उस वन में हिंसक पशुओं के हजारों, सैकड़ों और लाखों (समूह) विद्यमान हों। अथवा 'सहस्सानी सतानी' का अर्थ 'सतसहस्सानी' (लाख) है, यदि हिंसक पशुओं के लाखों और नहुत (दस हजार) विद्यमान हों, इस प्रकार हिंसक पशुओं के होने पर भी 'कोची' का अर्थ 'क्वचि' (कहीं भी) है। 'कोचि' शब्द यहाँ 'को ते बलं महाराज' में 'को' शब्द की तरह 'क्व' शब्द के अर्थ में प्रयुक्त है, और यह निर्देश निमित्त अर्थ में है। इसलिए 'कोचि क्वचि किस्मिञ्चि वाळे' (किसी भी एक हिंसक पशु के कारण) हमें भय नहीं होता, यह अर्थ ग्रहण करना चाहिए। अथवा 'कोचि' का अर्थ 'किञ्चि' (थोड़ा सा भी) है। यहाँ 'वाळेसु' निमित्त अर्थ में सप्तमी है। हिंसक पशुओं के कारण हमें थोड़ा सा भी भय नहीं होता। यही नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘สพฺพํ สตสหสฺสานิ, ฉตฺตึสปริมณฺฑลํ; ทสญฺเจว สหสฺสานิ, อฑฺฒุฑฺฒานิ สตานิ จา’’ติ "कुल मिलाकर छत्तीस लाख, दस हजार और साढ़े तीन सौ योजन का घेरा (परिमंडल) है।" อฏฺฐกถาปาโฐ[Pg.407]. เอตฺถ ยสฺมา สทฺทโต สมานวิภตฺติลิงฺควจนานํ ปทานํ อสมานวิภตฺติลิงฺควจนานํ วา อตฺถโต ปน สมานานํ ทูเร ฐิตานมฺปิ เอกสมฺพนฺโธ โหติ, อิตเรสํ สมีเป ฐิตานมฺปิ น โหติ, ตสฺมา ‘‘สพฺพ’’นฺติทํ ‘‘ปริมณฺฑล’’นฺติมินา สมฺพนฺธิตพฺพํ. ‘‘ฉตฺตึสา’’ติ อิทํ ปน ‘‘สตสหสฺสานี’’ติมินา สมฺพนฺธิตพฺพํ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. यह अट्ठकथा का पाठ है। यहाँ क्योंकि शब्दों से समान विभक्ति, लिंग और वचन वाले पदों का, अथवा असमान विभक्ति, लिंग और वचन वाले पदों का, अर्थ की दृष्टि से समान होने पर दूर स्थित होने पर भी एक संबंध होता है, और दूसरों का समीप होने पर भी नहीं होता, इसलिए 'सब्बं' इस पद को 'परिमण्डलं' इसके साथ जोड़ना चाहिए। 'छत्तिंसा' इसे 'सतसहस्सानी' के साथ जोड़ना चाहिए। यही नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘ทุเว สตสหสฺสานิ, จตฺตาริ นหุตานิ จ; เอตฺตกํ พหลตฺเตน, สงฺขาตายํ วสุนฺธรา’’ติ "दो लाख और चार नहुत (चालीस हजार), इतनी मोटाई वाली यह पृथ्वी कही गई है।" อฏฺฐกถาปาโฐ. เอตฺถ ‘‘ทุเว’’ติ วิเสสนํ, ‘‘สตสหสฺสานี’’ติ วิเสสิตพฺพํ. ตถา ‘‘จตฺตารี’’ติ วิเสสนํ, ‘‘นหุตานี’’ติ วิเสสิตพฺพํ. ตถา หิ ‘‘สตสหสฺสานิ นหุตานิ จา’’ติ อิมานิ ‘‘ทุเว จตฺตารี’’ติ อิเมหิ วิเสสิตพฺพตฺตา ‘‘ทฺวิสตสหสฺสํ จตุนหุต’’นฺติ อตฺถปฺปกาสนานิ ภวนฺติ. เอวํ สนฺเตปิ ‘‘ทุเว’’อิจฺจาทีนํ สงฺขฺยาสทฺทานํ ‘‘สตสหสฺสานี’’ติอาทีหิ สงฺขฺยาสทฺเทหิ สมานาธิกรณตา ปุพฺพาจริเยหิ น วุตฺตา. ยสฺมา ปน ยถา ‘‘ทุเว ปุถุชฺชนา วุตฺตา. สตสหสฺสํ ภิกฺขู’’ติอาทีสุ สมานาธิกรณตา ลพฺภติ ทพฺพวาจกตฺตา วิเสสิตพฺพปทานํ, น ตถา ‘‘ทุเว สตสหสฺสานี’’ติอาทีสุ อทพฺพวาจกตฺตา วิเสสิตพฺพปทานํ, ตสฺมา อีทิเสสุ ฐาเนสุ สมานาธิกรณตา น อิจฺฉิตพฺพา ยุตฺติยา อภาวโต. ยทิ เอวํ ‘‘กุสลา, รูปํ, จกฺขุมา’’ติอาทีนํ วิย อิเมสมญฺญมญฺญสมฺพนฺธรหิตา สิยาติ? น, วิเสสนวิเสสิตพฺพภาเวน คหิตตฺตา. ยชฺเชวํ สมานาธิกรณภาโว ลทฺธพฺโพติ? น, นิยมาภาวโต. เอกนฺเตน หิ [Pg.408] คุณคุณีนํเยว วิเสสนวิเสสิตพฺพานํ สมานาธิกรณภาโว, น อิตเรสํ วิเสสนวิเสสิตพฺพตฺเตปิ. अट्ठकथा पाठ। यहाँ 'दुवे' (दो) विशेषण है, 'सतसहस्सानी' (लाख) विशेष्य है। वैसे ही 'चत्तारि' (चार) विशेषण है, 'नहुतानी' (नहुत) विशेष्य है। क्योंकि 'सतसहस्सानी नहुतानी च' ये 'दुवे चत्तारि' इनके द्वारा विशेषित होने के कारण 'दो लाख चार नहुत' - इस अर्थ को प्रकाशित करने वाले होते हैं। ऐसा होने पर भी 'दुवे' आदि संख्यावाचक शब्दों की 'सतसहस्सानी' आदि संख्यावाचक शब्दों के साथ समानाधिकरणता पूर्वाचार्यों द्वारा नहीं कही गई है। क्योंकि जैसे 'दुवे पुथुज्जना' (दो पृथग्जन) या 'सतसहस्सं भिक्खू' (एक लाख भिक्षु) आदि में विशेष्य पदों के द्रव्यवाचक होने के कारण समानाधिकरणता प्राप्त होती है, वैसे 'दुवे सतसहस्सानी' आदि में विशेष्य पदों के अद्रव्यवाचक होने के कारण समानाधिकरणता प्राप्त नहीं होती, इसलिए ऐसे स्थानों पर युक्ति के अभाव में समानाधिकरणता नहीं माननी चाहिए। यदि ऐसा है, तो क्या 'कुसला, रूपं, चक्खुमा' आदि की तरह ये एक-दूसरे के संबंध से रहित होंगे? नहीं, क्योंकि इन्हें विशेषण-विशेष्य भाव से ग्रहण किया गया है। यदि ऐसा है, तो क्या समानाधिकरण भाव प्राप्त होना चाहिए? नहीं, क्योंकि इसका कोई नियम नहीं है। निश्चित रूप से केवल गुण और गुणी के विशेषण-विशेष्य होने पर ही समानाधिकरण भाव होता है, दूसरों के विशेषण-विशेष्य होने पर भी नहीं। ตตฺถ ‘‘เอตฺตก’’นฺติ ปมาณวจนํ. ‘‘พหลตฺเตนา’’ติ วิเสสเน ตติยา. อุภเยน อิมมตฺถํ ทสฺเสติ ‘‘อยํ วสุนฺธรา พหลตฺเตน โยชนานํ ทุเว สตสหสฺสานิ จตฺตาริ นหุตานิ จ เอตฺตกํ สงฺขาตา’’ติ. ‘‘เอตฺตก’’นฺติ ปทสฺส จ ‘‘ทุเว สตสหสฺสานิ จตฺตาริ นหุตานิ จา’’ติ อิเมหิ วา ‘‘วสุนฺธรา’’ติ อิมินา วา สมานาธิกรณตา น อิจฺฉิตพฺพา. เอตฺตกนฺติ หิ ภาวนปุํสกํ, ยํ สทฺทสตฺเถ กฺริยาวิเสสนนฺติ วทนฺติ. ตสฺส ‘‘เอตฺตเกน ปมาเณน’’อิจฺเจวตฺโถ. อปิจ ‘‘ทุเว สตสหสฺสานิ จตฺตาริ น หุตานิ จา’’ติ อิเมสมฺปิ ‘‘วสุนฺธรา’’ติ อิมินา สมานาธิกรณตา น อิจฺฉิตพฺพา ‘‘ภิกฺขูนํ สต’’นฺติ เอตฺถ สตสทฺทสฺส วิย สงฺขฺยาวจนมตฺตตฺตา. ตถา หิ ‘‘เอตฺตก’’นฺติ วุตฺตํ. ‘‘สงฺขาตา’’ติ ปน ‘‘อย’’นฺติ จ อิเมสํ ‘‘วสุนฺธรา’’ติ อิมินา สมานาธิกรณตา ลพฺภติ. สพฺโพปายํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. वहाँ 'एत्तकं' (इतना) परिमाणवाचक है। 'बहलत्तेन' (मोटाई से) यह विशेषण में तृतीया विभक्ति है। दोनों से यह अर्थ दिखाते हैं - 'यह वसुन्धरा मोटाई में दो लाख चार नहुत योजन इतनी कही गई है'। 'एत्तकं' इस पद की 'दुवे सतसहस्सानी चत्तारि नहुतानी च' इनके साथ अथवा 'वसुन्धरा' इसके साथ समानाधिकरणता नहीं माननी चाहिए। क्योंकि 'एत्तकं' भाव-नपुंसक है, जिसे शब्दशास्त्र में क्रिया-विशेषण कहते हैं। उसका अर्थ 'इतने परिमाण से' ही है। इसके अतिरिक्त 'दुवे सतसहस्सानी चत्तारि नहुतानी च' इनकी भी 'वसुन्धरा' के साथ समानाधिकरणता नहीं माननी चाहिए, जैसे 'भिक्खूनं सतं' (भिक्षुओं का सौ) यहाँ 'सत' शब्द की तरह केवल संख्यावाचक होने के कारण। इसीलिए 'एत्तकं' कहा गया है। 'संखाता' (कही गई) और 'अयं' (यह) - इन पदों की 'वसुन्धरा' के साथ समानाधिकरणता प्राप्त होती है। सभी प्रकार से यह नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘ทเสตฺถ ราชิโย เสตา, ทสฺสนียา มโนรมา; ฉ ปิงฺคลา ปนฺนรส, หลิทฺทา ตา จตุทฺทสา’’ติ 'यहाँ दस सफेद धारियाँ हैं, जो दर्शनीय और मनोरम हैं; छह भूरी, पन्द्रह पीली और वे चौदह (अन्य) हैं।' ปาฬิ. เอตฺถ ฉ ปิงฺคลา ปนฺนรสาติ ฉ จ ปนฺนรส จาติ เอกวีสติ ปิงฺคลา ราชิโยติ อตฺโถ คเหตพฺโพ. पालि। यहाँ 'छ पिंगला पन्नरसा' का अर्थ छह और पन्द्रह अर्थात् इक्कीस भूरी धारियाँ - यह अर्थ ग्रहण करना चाहिए। ตถา – वैसे ही - ‘‘ปุตฺตาปิ ตสฺส พหโว, ‘เอกนามา’ติ เม สุตํ; อสีติ ทส เอโก จ, อินฺทนามา มหพฺพลา’’ติ 'उसके बहुत से पुत्र भी हैं, जो एक ही नाम वाले हैं - ऐसा मैंने सुना है; अस्सी, दस और एक (अर्थात् इक्यानवे), इन्द्र नाम वाले महाबली हैं।' ปาฬิ[Pg.409]. เอตฺถ ปน ‘‘เอกนวุตี’’ติ วตฺตพฺเพ ‘‘อสีติ ทส เอโก จา’’ติ วุตฺตํ. วิจิตฺรสทฺทรจนญฺหิ ปาวจนํ. อยํ นโย อญฺเญสุปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. पालि। यहाँ 'एकनवुती' (इक्यानवे) कहना चाहिए था, किन्तु 'असीति दस एको च' (अस्सी, दस और एक) कहा गया है। क्योंकि बुद्ध-वचन विचित्र शब्द-रचना वाला होता है। यह नियम अन्य ऐसे स्थानों पर भी लागू करना चाहिए। ‘‘ตึสปุริสนาวุตฺโย, สพฺเพเวเกกนิจฺจิตา; เยสํ สมํ น ปสฺสามิ, เกวลํ มหิ’มํ จร’’นฺติ 'तीस हजार पुरुष, सभी एक-एक (निश्चय) पर टिके हुए; जिनके समान मैं इस पूरी पृथ्वी पर विचरते हुए किसी को नहीं देखता हूँ।' ปาฬิ. เอตฺถ ‘‘ปุริสานํ ตึสสหสฺสานิ นวุติ จ สตานิ ตึส นาวุตฺโย’’ติ วุจฺจนฺติ. อิมสฺมึ ปน ฐาเน ตึสสทฺทโต สหสฺสสทฺทสฺส นวุติสทฺทโต จ สตสทฺทสฺส โลปํ กตฺวา ‘‘ตึส นาวุตฺโย’’ติ วุตฺตนฺติ น คเหตพฺพํ. เอวญฺหิ คหเณ สติ ยตฺถ กตฺถจิปิ เอทิสี สทฺทรจนา กาตพฺพา สิยา, กตาย จ เอทิสาย สทฺทรจนาย อตฺถาวคโม วินา อุปเทเสน สุณนฺตานํ น สิยา, ตสฺมา เนวํ คเหตพฺพํ. เอวํ ปน คเหตพฺพํ – ‘‘ตึส นาวุตฺโย’’ติ อิทํ โลกสงฺเกตรูฬฺหํ วจนํ, สงฺเกตรูฬฺหสฺส ปน วจนสฺสตฺโถ ยสฺมา คหิตปุพฺพสงฺเกเตหิ สุตฺวา ญายเต, น อุปเทสโต, ตสฺมา พฺรหฺมทตฺเตน รญฺญา วุตฺตกาเลปิ สตฺถารา ตํ กถํ อาหริตฺวา วุตฺตกาเลปิ สพฺเพ มนุสฺสา วินาปิ อุปเทเสน วจนตฺถํ ชานนฺตีติ คเหตพฺพํ. पालि। यहाँ 'पुरुषों के तीस हजार और नब्बे सौ को तीस नब्बे (तिंस नावुत्यो)' कहा जाता है। परन्तु इस स्थान पर 'तिंस' शब्द से 'सहस्स' (हजार) शब्द का और 'नावुति' शब्द से 'सत' (सौ) शब्द का लोप करके 'तिंस नावुत्यो' कहा गया है, ऐसा नहीं समझना चाहिए। क्योंकि यदि ऐसा माना जाए, तो कहीं भी इस प्रकार की शब्द-रचना की जा सकती है, और ऐसी शब्द-रचना करने पर बिना उपदेश के सुनने वालों को अर्थ का बोध नहीं होगा, इसलिए ऐसा नहीं समझना चाहिए। बल्कि इसे इस प्रकार समझना चाहिए - 'तिंस नावुत्यो' यह लोक-संकेत में रूढ़ वचन है, और संकेत-रूढ़ वचन का अर्थ चूँकि पहले ग्रहण किए गए संकेतों को सुनकर जाना जाता है, न कि उपदेश से, इसलिए राजा ब्रह्मदत्त द्वारा कहे जाने के समय भी और शास्ता (बुद्ध) द्वारा उस कथा को उद्धृत कर कहे जाने के समय भी सभी मनुष्य बिना उपदेश के ही वचन का अर्थ जानते थे, ऐसा समझना चाहिए। ตึสญฺเจว สหสฺสานิ, นวุติ จ สตานิ ตุ; ตึส นาวุติโย นาม, วุตฺตา อุมงฺคชาตเก. तीस हजार और नब्बे सौ; उमंग जातक में 'तिंस नावुतियो' नाम से कहे गए हैं। ยสฺมา ปาวจเน สนฺติ, นยา เจว อจินฺติยา; โวหารา จ สุคุฬฺหตฺถา, ทยาปนฺเนน เทสิตา. चूँकि बुद्ध-वचन में दयावान (बुद्ध) द्वारा उपदिष्ट ऐसी विधियाँ (नय) और अत्यंत गूढ़ अर्थ वाले अचिन्त्य व्यवहार (प्रयोग) हैं। ตสฺมา สาฏฺฐกเถ ธีโร, คมฺภีเร ชินภาสิเต; อุปเทสํ สทา คณฺเห, ครุํ สมฺมา อุปฏฺฐหํ. इसलिए धीर पुरुष को चाहिए कि वह गुरु की सम्यक् सेवा करते हुए, अर्थकथा सहित गम्भीर जिन-वचन में सदा उपदेश ग्रहण करे। ครูปเทสหีโน หิ, อตฺถสารํ น วินฺทติ; อตฺถสารวิหีโน โส, สทฺธมฺมา ปริหายติ. गुरु के उपदेश से हीन व्यक्ति अर्थ के सार को प्राप्त नहीं करता; अर्थ के सार से विहीन वह सद्धर्म से पतित हो जाता है। ครูปเทสลาภี [Pg.410] จ, อตฺถสารสมายุโต; สทฺธมฺมํ ปริปาเลนฺโต, สทฺธมฺมสฺมา น หายติ. गुरु का उपदेश प्राप्त करने वाला और अर्थ के सार से युक्त व्यक्ति सद्धर्म का पालन करते हुए सद्धर्म से च्युत नहीं होता। สทฺธมฺมตฺถาย เม ตสฺมา, สงฺขฺยามาลาปิ ภาสิตา; สปฺปโยคา ยถาโยคํ, สเหวตฺถวินิจฺฉยา. इसलिए सद्धर्म के लिए मैंने अर्थ-विनिश्चय के साथ यथासंभव प्रयोगों वाली यह 'संख्यामाला' भी कही है। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार नौ अंगों वाले अर्थकथा सहित त्रिपिटक की वचन-पद्धतियों में विद्वानों की โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कुशलता के लिए रचित सद्दनीति प्रकरण में สวินิจฺฉโย สงฺขฺยานามานํ นามิกปทมาลาวิภาโค संख्या-नामों की नामिक पदमाला का विनिश्चय सहित विभाग। นาม नामक เตรสโม ปริจฺเฉโท. तेरहवाँ परिच्छेद। ๑๔. อตฺถตฺติกวิภาค १४. अर्थ-त्रिक विभाग ภูธาตุ ตาย นิปฺผนฺน-รูปญฺจาติ อิทํ ทฺวยํ; กตฺวา ปธานมมฺเหหิ, สพฺพเมตํ ปปญฺจิตํ. 'भू' धातु और उससे निष्पन्न रूप - इन दोनों को प्रधान मानकर हमने यह सब विस्तार से कहा है। ภวติสฺส วสา ทานิ, วกฺขามตฺถตฺติกํ วรํ; อตฺถุทฺธาโร ตุมนฺตญฺจ, ตฺวาทิยนฺตํ ติกํ อิธ. अब 'भवति' के वश से श्रेष्ठ अर्थ-त्रिक को कहेंगे; यहाँ अर्थ का उद्धार, 'तुमुन्' प्रत्ययान्त और 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त - यह त्रिक है। ตสฺมา ตาว ภูธาตุโต ปวตฺตสฺส ภูตสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร นียเต – इसलिए पहले 'भू' धातु से प्रवृत्त 'भूत' शब्द का अर्थ-उद्धार प्रस्तुत किया जाता है - ขนฺธสตฺตามนุสฺเสสุ, วิชฺชมาเน จ ธาตุยํ; ขีณาสเว รุกฺขาทิมฺหิ, ภูตสทฺโท ปวตฺตติ. स्कन्धों, सत्त्वों, अमनुष्यों, विद्यमानता, धातुओं, क्षीणास्त्रवों (अर्हतों) और वृक्ष आदि के अर्थ में 'भूत' शब्द प्रयुक्त होता है। อุปฺปาเท จาปิ วิญฺเญยฺโย, ภูตสทฺโท วิภาวินา; วิปุเล โสปสคฺโคยํ, หีฬเน วิธเมปิ จ; ปราชเย เวทิยเน, นาเม ปากฏตาย จ. बुद्धिमानों द्वारा 'भूत' शब्द को उत्पत्ति (उत्पाद) के अर्थ में भी समझना चाहिए; उपसर्ग के साथ यह प्रचुरता (विपुल), निंदा (हीनता), विनाश, पराजय, वेदन (अनुभव) और प्रकट होने (नाम की स्पष्टता) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। วุตฺตญฺเหตํ – ภูตสทฺโท ปญฺจกฺขนฺธามนุสฺสธาตุวิชฺชมานขีณาสวสตฺตรุกฺขาทีสุ ทิสฺสติ. ‘‘ภูตมิทนฺติ ภิกฺขเว สมนุปสฺสถา’’ติอาทีสุ หิ อยํ ปญฺจกฺขนฺเธสุ ทิสฺสติ. ‘‘ยานีธ [Pg.411] ภูตานิ สมาคตานี’’ติ เอตฺถ อมนุสฺเส. ‘‘จตฺตาโร โข ภิกฺขุ มหาภูตา เหตู’’ติ เอตฺถ ธาตูสุ. ‘‘ภูตสฺมึ ปาจิตฺติย’’นฺติอาทีสุ วิชฺชมาเน. ‘‘โย จ กาลฆโส ภูโต’’ติ เอตฺถ ขีณาสเว. ‘‘สพฺเพว นิกฺขิปิสฺสนฺติ, ภูตา โลเก สมุสฺสย’’นฺติ เอตฺถ สตฺเต. ‘‘ภูตคามปาตพฺยตายา’’ติ เอตฺถ รุกฺขาทีสูติ. มูลปริยายสุตฺตฏฺฐกถาย วจนํ อิทํ. ฏีกายมาทิสทฺเทน อุปฺปาทาทีนิ คยฺหเร. วุตฺตญฺเหตํ – ‘‘ชาตํ ภูตํ สงฺขต’’นฺติอาทีสุ ภูตสทฺโท อุปฺปาเท ทิสฺสติ. สอุปสคฺโค ปน ‘‘ปภูตมริโย ปกโรติ ปุญฺญ’’นฺติอาทีสุ วิปุเล. ‘‘เยภุยฺเยน ภิกฺขูนํ ปริภูตรูโป’’ติอาทีสุ หีฬเน. ‘‘สมฺภูโต สาณวาสี’’ติอาทีสุ ปญฺญตฺติยํ. ‘‘อภิภูโต มาโร วิชิโต สงฺคาโม’’ติอาทีสุ วิธมเน. ‘‘ปราภูตรูโปโข อยํ อเจโล ปาถิกปุตฺโต’’ติอาทีสุ ปราชเย. ‘‘อนุภูตํ สุขทุกฺข’’นฺติอาทีสุ เวทิยเน. ‘‘วิภูตํ ปญฺญายา’’ติอาทีสุ ปากฏีกรเณ ทิสฺสติ, เต สพฺเพ ‘‘รุกฺขาทีสู’’ติอาทิสทฺเทน สงฺคหิตาติ ทฏฺฐพฺพาติ. यह कहा गया है - 'भूत' शब्द पाँच स्कन्धों, अमनुष्यों, धातुओं, विद्यमान, क्षीणास्त्रव, सत्त्व और वृक्ष आदि के अर्थ में देखा जाता है। 'भूतमिदन्ति भिक्खवे समनुपस्सथ' आदि में यह पाँच स्कन्धों के अर्थ में है। 'यानीध भूतानि समागतानि' यहाँ अमनुष्यों के अर्थ में है। 'चत्तारो खो भिक्खु महाभूता हेतू' यहाँ धातुओं के अर्थ में है। 'भूतस्मिं पाचित्तियं' आदि में विद्यमान (सत्य) के अर्थ में है। 'यो च कालघसो भूतो' यहाँ क्षीणास्त्रव (अर्हत्) के अर्थ में है। 'सब्बेव निक्खिपिस्सन्ति, भूता लोके समुस्सयं' यहाँ सत्त्वों के अर्थ में है। 'भूतगामपातब्यताय' यहाँ वृक्ष आदि के अर्थ में है। यह मूलपरियायसुत्त की अट्ठकथा का वचन है। टीका में 'आदि' शब्द से उत्पाद आदि ग्रहण किए जाते हैं। यह कहा गया है - 'जातं भूतं सङ्खतं' आदि में 'भूत' शब्द उत्पाद (उत्पत्ति) के अर्थ में देखा जाता है। उपसर्ग के साथ 'पभूत' (प्रभूत) शब्द 'पभूतमरियो पकरोति पुञ्ञं' आदि में विपुल (प्रचुर) के अर्थ में है। 'येभुय्येन भिक्खूनां परिभूतरूपो' आदि में हीलन (निंदा) के अर्थ में है। 'सम्भूत साणवासी' आदि में प्रज्ञप्ति (नाम) के अर्थ में है। 'अभिभूतो मारो विजितो सङ्गामो' आदि में विधमन (विनाश/अभिभूत करना) के अर्थ में है। 'पराभूतरूपो खो अयं अचेलो पाथिकपुत्तो' आदि में पराजय के अर्थ में है। 'अनुभूतं सुखदुक्खं' आदि में वेदन (अनुभव) के अर्थ में है। 'विभूतं पञ्ञाय' आदि में प्रकटीकरण (स्पष्ट होना) के अर्थ में देखा जाता है, उन सबको 'वृक्ष आदि' शब्द से संगृहीत समझना चाहिए। อิทานิ ตุมนฺตปทานิ วุจฺจนฺเต – अब 'तुमन्' (तुं) प्रत्ययान्त पदों को कहा जाता है - ภวิตุํ, อุพฺภวิตุํ, สมุพฺภวิตุํ, ปภวิตุํ, ปราภวิตุํ, อติภวิตุํ, สมฺภวิตุํ, วิภวิตุํ, โภตุํ, สมฺโภตุํ, วิโภตุํ, ปาตุภวิตุํ, ปาตุพฺภวิตุํ วา, ปาตุโภตุํ. อิมานิ อกมฺมกานิ ตุมนฺตปทานิ. भवितुं (होने के लिए), उब्भवितुं, समुब्भवितुं, पभवितुं, पराभवितुं, अतिभवितुं, सम्भवितुं, विभवितुं, भोतुं, सम्भोतुं, विभोतुं, पातुभवितुं, पातुब्भवितुं वा, पातुभोतुं। ये अकर्मक 'तुमन्' प्रत्ययान्त पद हैं। ปริโภตุํ [Pg.412] ปริภวิตุํ, อภิโภตุํ อภิภวิตุํ, อธิโภตุํ อธิภวิตุํ, อติโภตุํ อติภวิตุํ, อนุโภตุํ อนุภวิตุํ, สมนุโภตุํ สมนุภวิตุํ, อภิสมฺโภตุํ อภิสมฺภวิตุํ. อิมานิ สกมฺมกานิ ตุมนฺตปทานิ, สพฺพาเนตานิ สุทฺธกตฺตริ ภวนฺติ. परिभोतुं-परिभवितुं (तिरस्कार करने के लिए), अभिभोतुं-अभिभवितुं (अभिभूत करने के लिए), अधिभोतुं-अधिभवितुं, अतिभोतुं-अतिभवितुं, अनुभोतुं-अनुभवितुं, समनुभोतुं-समनुभवितुं, अभिसम्भोतुं-अभिसम्भवितुं। ये सकर्मक 'तुमन्' प्रत्ययान्त पद हैं, ये सभी कर्तरि प्रयोग में होते हैं। ‘‘ภาเวตุํ, ปภาเวตุํ, สมฺภาเวตุํ, วิภาเวตุํ, ปริภาเวตุํ’’อิจฺเจวมาทีนิ เหตุกตฺตริ ตุมนฺตปทานิ, สพฺพานิปิ เหตุกตฺตริ ตุมนฺตปทานิ สกมฺมกานิเยว ภวนฺติ. อุทฺเทโสยํ. 'भावेतुं, पभावेतुं, सम्भावेतुं, विभावेतुं, परिभावेतुं' इत्यादि प्रयोजक (णिजन्त) 'तुमन्' प्रत्ययान्त पद हैं, सभी प्रयोजक 'तुमन्' प्रत्ययान्त पद सकर्मक ही होते हैं। यह निर्देश (उद्देश) है। ตตฺร สมานตฺถปเทสุ เอกเมวาทิปทํ คเหตฺวา นิทฺเทโส กาตพฺโพ – ภวิตุนฺติ โหตุํ วิชฺชิตุํ ปญฺญายิตุํ สรูปํ ลภิตุํ. เอตฺถ วุตฺตนยานุสาเรน เสสานมฺปิ ตุมนฺตานํ นิทฺเทโส วิตฺถาเรตพฺโพ, สพฺพานิ ตุมนฺตปทานิ จตุตฺถิยตฺเถ วตฺตนฺติ ‘‘ตฺวํ มม จิตฺตมญฺญาย, เนตฺตํ ยาจิตุมาคโต’’ติ เอตฺถ วิย. ยาจิตุนฺติ หิ ยาจนตฺถายาติ อตฺโถ. ตสฺมา ภวิตุนฺติอาทีนมฺปิ ‘‘ภวนตฺถายา’’ติ วา ‘‘ภวนตฺถ’’นฺติ วา ‘‘ภวนายา’’ติ วา อาทินา อตฺโถ คเหตพฺโพ. อปิจ ‘‘เนกฺขมฺมํ ทฏฺฐุ เขมโต’’ติ เอตฺถ ‘‘ทฏฺฐุ’’นฺติ ปทสฺส ‘‘ทิสฺวา’’ติ อตฺถทสฺสนโต ยถารหํ ตุมนฺตานิ ตฺวาสทฺทนฺตปทตฺถวเสนปิ คเหตพฺพานิ. เอตานิ จ นิปาตปเทสุ สงฺคหํคจฺฉนฺติ. วุตฺตญฺหิ นิรุตฺติปิฏเก นิปาตปทปริจฺเฉเท ‘‘ตุํ อิติ จตุตฺถิยา’’ติ. ตตฺรายมตฺโถ ‘‘ตุํ อิติ เอตทนฺโต นิปาโต จตุตฺถิยา อตฺเถ วตฺตตี’’ติ. वहाँ समानार्थक पदों में से एक ही आदि पद को लेकर निर्देश करना चाहिए - 'भवितुं' का अर्थ है होने के लिए (होतुं), विद्यमान होने के लिए (विज्जितुं), ज्ञात होने के लिए (पञ्ञायितुं), स्वरूप प्राप्त करने के लिए (सरूपं लभितुं)। यहाँ बताए गए नियम के अनुसार शेष 'तुमन्' प्रत्ययान्त पदों का भी विस्तार करना चाहिए, सभी 'तुमन्' प्रत्ययान्त पद चतुर्थी विभक्ति के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, जैसे 'त्वं मम चित्तमञ्ञाय, नेत्तं याचितुमागता' (तुम मेरे चित्त को जानकर नेत्र माँगने के लिए आए हो) यहाँ 'याचितुं' का अर्थ 'याचना के लिए' (याचनत्थाय) है। इसलिए 'भवितुं' आदि का भी 'होने के लिए' (भवनत्थाय) या 'भवनत्थं' या 'भवनाय' आदि के रूप में अर्थ ग्रहण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त 'नेक्खम्मं दट्ठु खेमतो' यहाँ 'दट्ठु' पद का 'देखकर' (दिस्वा) अर्थ देखे जाने के कारण, यथायोग्य 'तुमन्' प्रत्ययान्त पदों को 'त्वा' प्रत्ययान्त (पूर्वकालिक क्रिया) के अर्थ में भी ग्रहण करना चाहिए। और ये निपात पदों में संगृहीत होते हैं। निरुत्तिपिटक के निपातपद परिच्छेद में कहा गया है - 'तुं इति चतुत्थिया' (तुं चतुर्थी के लिए है)। वहाँ यह अर्थ है - 'तुं' इस अन्त वाला निपात चतुर्थी के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ตุมนฺตกถา สมตฺตา. 'तुमन्' प्रत्ययान्त कथा समाप्त हुई। อิทานิ [Pg.413] ตฺวาทิยนฺตปทานิ วุจฺจนฺเต – अब 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त पदों को कहा जाता है - ภวิตฺวา, ภวิตฺวาน, ภวิตุน, ภวิย, ภวิยาน. อุพฺภวิตฺวา, อุพฺภวิตฺวาน, อุพฺภวิตุน, อุพฺภวิย, อุพฺภวิยาน. เอส นโย ‘‘สมุพฺภวิตฺวา, ปราภวิตฺวา, สมฺภวิตฺวา, วิภวิตฺวา, ปาตุพฺภวิตฺวา’’ติ เอตฺถาปิ. อิมานิ อกมฺมกานิ อุสฺสุกฺกนตฺถานิ ตฺวาทิยนฺตปทานิ. भवित्वा, भवित्वान, भवितुन, भविय, भवियान। उब्भवित्वा, उब्भवित्वान, उब्भवितुन, उब्भविय, उब्भवियान। यही नियम 'समुब्भवित्वा, पराभवित्वा, सम्भवित्वा, विभवित्वा, पातुब्भवित्वा' यहाँ भी है। ये अकर्मक, पूर्वकालिक अर्थ वाले 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त पद हैं। ภุตฺวา, ภุตฺวาน, ปริภวิตฺวา, ปริภวิตฺวาน, ปริภวิตุน, ปริภวิย, ปริภวิยาน, ปริภุยฺย. อภิภวิตฺวา, อภิภวิตฺวาน, อภิภวิตุน, อภิภวิย, อภิภวิยาน, อภิภุยฺย. เอส นโย ‘‘อธิภวิตฺวา, อติภวิตฺวา, อนุภวิตฺวา’’ติ เอตฺถาปิ. อิทญฺเจตฺถ นิทสฺสนํ. ‘‘ตมโวจ ราชา อนุภวิยาน ตมฺปิ, เอยฺยาสิ ขิปฺปํ อหมปิ ปูชํ กสฺส’’นฺติ. อนุภุตฺวา, อนุภุตฺวาน. อธิโภตฺวา, อธิโภตฺวาน. भुत्वा, भुत्वान, परिभवित्वा, परिभवित्वान, परिभवितुन, परिभविय, परिभवियान, परिभुय्य। अभिभवित्वा, अभिभवित्वान, अभिभवितुन, अभिभविय, अभिभवियान, अभिभुय्य। यही नियम 'अधिभवित्वा, अतिभवित्वा, अनुभवित्वा' यहाँ भी है। यहाँ यह उदाहरण है - 'तमवोच राजा अनुभवियान तम्पि, एय्यासि खिप्पं अहमपि पूजं कस्सं' (राजा ने उसे भी अनुभव करके कहा, तुम शीघ्र आओ, मैं भी पूजा करूँगा)। अनुभुत्वा, अनुभुत्वान। अधिभोत्वा, अधिभोत्वान। ‘‘สฏฺฐิ กปฺปสหสฺสานิ, เทวโลเก รมิสฺสติ; อญฺเญ เทเว อธิโภตฺวา, อิสฺสรํ การยิสฺสตี’’ติ 'साठ हजार कल्पों तक देवलोक में रमण करेगा; अन्य देवों को अभिभूत (अधिभोत्वा) कर ऐश्वर्य प्राप्त करेगा।' อิทเมตฺถ ปาฬินิทสฺสนํ, อิมานิ สกมฺมกานิ อุสฺสุกฺกนตฺถานิ ตฺวาทิยนฺตปทานิ. อิมานิ จตฺตาริ สุทฺธกตฺตริเยว ภวนฺติ. यह यहाँ पालि उदाहरण है, ये सकर्मक, पूर्वकालिक अर्थ वाले 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त पद हैं। ये कर्तरि प्रयोग में ही होते हैं। ‘‘ภาเวตฺวา, ภาเวตฺวาน. ปภาเวตฺวา, ปภาเวตฺวาน. สมฺภาเวตฺวา, สมฺภาเวตฺวาน. วิภาเวตฺวา, วิภาเวตฺวาน. ปริภาเวตฺวา, ปริภาเวตฺวาน’’อิจฺเจวมาทีนิ สกมฺมกานิ อุสฺสุกฺกนตฺถานิ ตฺวาทิยนฺตปทานิ เหตุกตฺตริเยว ภวนฺติ. อุทฺเทโสยํ. 'भावेत्वा, भावेत्वान। पभावेत्वा, पभावेत्वान। सम्भावेत्वा, सम्भावेत्वान। विभावेत्वा, विभावेत्वान। परिभावेत्वा, परिभावेत्वान' इत्यादि सकर्मक, पूर्वकालिक अर्थ वाले 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त पद प्रयोजक (णिजन्त) ही होते हैं। यह निर्देश है। ตตฺร สมานตฺถปเทสุ เอกเมวาทิปทํ คเหตฺวา นิทฺเทโส กาตพฺโพ – ภวิตฺวาติ หุตฺวา ปญฺญายิตฺวา สรูปํ ลภิตฺวา. เอวํ วุตฺตนยานุสาเรน เสสานมฺปิ ตฺวาทิยนฺตปทานํ นิทฺเทโส วิตฺถาเรตพฺโพ. อยํ ปน วิเสโส [Pg.414] ภุตฺวาติ สมฺปตฺตึ อนุภุตฺวาติ สกมฺมกวเสน อตฺโถ คเหตพฺโพ. ภุตฺวา อนุภุตฺวาติ อิเมสญฺหิ สมานตฺถตํ สทฺธมฺมวิทู อิจฺฉนฺติ. อตฺริทํ วุจฺจติ – वहाँ समानार्थक पदों में एक ही आदि पद को लेकर निर्देश करना चाहिए - 'भवित्वा' अर्थात् 'हुत्वा' (होकर), 'पञ्ञायित्वा' (प्रकट होकर), 'सरूपं लभित्वा' (स्वरूप प्राप्त करके)। इस प्रकार कही गई विधि के अनुसार शेष 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त पदों का निर्देश भी विस्तार से करना चाहिए। परन्तु यहाँ यह विशेष है कि 'भुत्वा' का अर्थ 'सम्पत्ति का अनुभव करके' इस प्रकार लेना चाहिए। सद्धर्म के ज्ञाता 'भुत्वा' और 'अनुभुत्वा' की समानार्थकता चाहते हैं। इस विषय में यह कहा गया है - ‘‘ภุตฺวา ภุตฺวาน’’อิจฺเจเต, ‘‘อนุภุตฺวา’’ติมสฺส หิ; อตฺถํ สูเจนฺติ ‘‘หุตฺวา’’ติ, ปทสฺส ปน เนว เต. 'भुत्वा' और 'भुत्वान' - ये 'अनुभुत्वा' के अर्थ को सूचित करते हैं, परन्तु वे 'हुत्वा' पद के अर्थ को सूचित नहीं करते। เกจิ ‘‘ภูตฺวา’’ติ ทีฆตฺตํ, ตสฺส อิจฺฉนฺติ สาสเน; ทีฆตา รสฺสตา เจว, ทฺวยมฺเปตํ ปทิสฺสติ. कुछ लोग शासन में 'भूत्वा' ऐसा दीर्घ रूप चाहते हैं; दीर्घ और ह्रस्व - ये दोनों ही देखे जाते हैं। สทฺทสตฺเถ จ ‘‘ภูตฺวา’’ติ, ทีฆตฺตสญฺหิตํ ปทํ; ‘‘ภวิตฺวา’’ติ ปทสฺสตฺถํ, ทีเปติ น ตุ สาสเน. व्याकरण शास्त्र में दीर्घ युक्त 'भूत्वा' पद 'भवित्वा' पद के अर्थ को प्रकट करता है, परन्तु शासन में नहीं। ‘‘หุตฺวา’’อิติ ปทํเยว, ทีเปติ ชินสาสเน; ‘‘ภวิตฺวา’’ติ ปทสฺสตฺถํ, นตฺถิ อญฺญตฺถ ตํ ปทํ. जिन-शासन में 'हुत्वा' पद ही 'भवित्वा' पद के अर्थ को प्रकट करता है; अन्यत्र वह पद नहीं है। อิจฺเจวํ สวิเสสนฺตุ, วจนํ สารทสฺสินา; สาสเน สทฺทสตฺเถ จ, วิญฺญุนา เปกฺขิตพฺพกํ. इस प्रकार इस विशेष वचन को सार देखने वाले विद्वान द्वारा शासन और व्याकरण शास्त्र में देखा जाना चाहिए। เอวํ อุสฺสุกฺกนตฺเถ ปวตฺตานิ ตฺวาทิยนฺตปทานิปิ นิทฺทิฏฺฐานิ, สพฺพาเนตานิ อวิภตฺติกานีติ คเหตพฺพานิ. นิรุตฺติปิฏเก หิ นิปาตปริจฺเฉเท อวิภตฺติกานิ กตฺวา ตฺวาทิยนฺตปทานิ วุตฺตานิ. สทฺทตฺถวิทูนํ ปน มเต ปฐมาทิวิภตฺติวเสน สวิภตฺติกานิ ภวนฺติ. इस प्रकार उत्सुकता के अर्थ में प्रवृत्त 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त पद भी निर्दिष्ट किए गए हैं, इन सबको विभक्ति-रहित समझना चाहिए। निरुत्ति-पिटक में निपात-परिच्छेद में 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त पदों को विभक्ति-रहित करके कहा गया है। परन्तु व्याकरण के ज्ञाताओं के मत में प्रथमा आदि विभक्तियों के भेद से वे विभक्ति-युक्त होते हैं। อิมสฺมิญฺจ ปน ตฺวาทิยนฺตาธิกาเร อิทญฺจุปลกฺขิตพฺพํ – ภุตฺวา คจฺฉติ, ภุตฺวา คโต, ภุตฺวา คมิสฺสสิ, กสิตฺวา วปติ. อุมงฺคา นิกฺขมิตฺวาน, เวเทโห นาวมารุหิ. ภุตฺวาน ภิกฺขุ ภิกฺขสฺสุ อิจฺจาที สมานกตฺตุกานํ ธาตูนํ ปุพฺพกาเล ตฺวาทิสทฺทปฺปโยคา. ‘‘ภุตฺวา คจฺฉตี’’ติ เอตฺถ หิ ‘‘ภุตฺวา’’ติ อิทํ ปุพฺพกาลกฺริยาทีปกํ ปทํ. ‘‘คจฺฉตี’’ติ อิทํ ปน อุตฺตรกาลกฺริยาทีปกํ, สมานกตฺตุกานิ เจตานิ ปทานิ เอกกตฺตุกานํ กฺริยานํ วาจกตฺตา. ตถา เหตฺถ โย คมนกฺริยาย [Pg.415] กตฺตา, โส เอว ภุญฺชนกฺริยาย กตฺตุภูโต ทฏฺฐพฺโพ. อยํ นโย อญฺญตฺราปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. और इस 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त के अधिकार में यह भी ध्यान देना चाहिए - 'भुत्वा गच्छति' (खाकर जाता है), 'भुत्वा गतो' (खाकर गया), 'भुत्वा गमिस्ससि' (खाकर जाओगे), 'कसित्वा वपति' (जोतकर बोता है)। 'सुरंग से निकलकर विदेह नाव पर चढ़ा।' 'हे भिक्षु! खाकर (फिर) खाओ' इत्यादि समान कर्ता वाली धातुओं के पूर्वकाल में 'त्वा' आदि शब्दों का प्रयोग होता है। 'भुत्वा गच्छति' यहाँ 'भुत्वा' यह पूर्वकालिक क्रिया को बताने वाला पद है। 'गच्छति' यह उत्तरकालिक क्रिया को बताने वाला पद है, और ये पद समान कर्ता वाले हैं क्योंकि ये एक ही कर्ता की क्रियाओं के वाचक हैं। जैसे यहाँ जो गमन-क्रिया का कर्ता है, वही भोजन-क्रिया का कर्ता समझना चाहिए। यही विधि अन्यत्र भी ऐसे स्थानों पर अपनानी चाहिए। ‘‘อนฺธการํ นิหนฺตฺวาน, อุทิโตยํ ทิวากโร; วณฺณํ ปญฺญาวภาเสหิ, โอภาเสตฺวา สมุคฺคโต’’ 'अन्धकार का नाश करके यह सूर्य उदित हुआ है; प्रज्ञा के प्रकाश से वर्ण को प्रकाशित करके उदित हुआ है'। อิจฺจาทีนิปิ ปน สมานกตฺตุกานํ สมานกาเล ตฺวาทิสทฺทปฺปโยคา. เอตฺถ หิ ‘‘นิหนฺตฺวานา’’ติ ปทํ สมานกาลกฺริยาทีปกํ ปทํ. ‘‘อุทิโต’’ติ อิทํ ปน อุตฺตรกาลกฺริยาทีปกํ ปทนฺติ น วตฺตพฺพํ สมานกาลกฺริยาย อิธาธิปฺเปตตฺตา. ตสฺมาเยว สมานกาลกฺริยาทีปกํ ปทนฺติ คเหตพฺพํ. อยํ นโย อญฺญตฺราปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. इत्यादि में समान कर्ता वाली समानकालिक क्रियाओं में 'त्वा' आदि शब्दों का प्रयोग है। यहाँ 'निहन्त्वान' पद समानकालिक क्रिया को बताने वाला पद है। 'उदितो' यह उत्तरकालिक क्रिया को बताने वाला पद है, ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि यहाँ समानकालिक क्रिया ही अभिप्रेत है। इसलिए इसे समानकालिक क्रिया को बताने वाला पद ही समझना चाहिए। यही विधि अन्यत्र भी ऐसे स्थानों पर अपनानी चाहिए। เกจิ ปน ‘‘มุขํ พฺยาทาย สยติ, อกฺขึ ปริวตฺเตตฺวา ปสฺสตี’’ติ อุทาหรนฺติ. อปเร ‘‘นิสชฺช อธีเต, ฐตฺวา กเถตี’’ติ. ตตฺถ พฺยาทานปริวตฺตนุตฺตรกาโล พฺยาทานูปสมลกฺขณํ ปสฺสนกฺริยาย ลกฺขิยติ. ‘‘นิสชฺช อธีเต, ฐตฺวา กเถตี’’ติ จ สมานกาลตายปิ อชฺเฌนกถเนหิ ปุพฺเพปิ นิสชฺชฏฺฐานานิ โหนฺตีติ สกฺกา ปุพฺพุตฺตรกาลตา สมฺภาเวตุํ, ตสฺมา ปุริมานิเยว อุทาหรณานิ ยุตฺตานิ. อุทยสมกาลเมว หิ ตนฺนิวตฺตนียนิวตฺตนนฺติ. कुछ लोग तो 'मुँह खोलकर सोता है, आँखें घुमाकर देखता है' ऐसा उदाहरण देते हैं। अन्य 'बैठकर पढ़ता है, खड़े होकर बात करता है' (उदाहरण देते हैं)। वहाँ मुँह खोलने और आँख घुमाने के बाद का समय, मुँह खोलने की निवृत्ति (समाप्ति) के लक्षण के रूप में देखने की क्रिया द्वारा लक्षित होता है। 'बैठकर पढ़ता है, खड़े होकर बात करता है' में समान काल होने पर भी, अध्ययन और कथन से पहले भी बैठने और खड़े होने की स्थितियाँ होती हैं, इसलिए पूर्व-उत्तर काल की संभावना की जा सकती है, अतः पूर्वोक्त उदाहरण ही उचित हैं। क्योंकि उदय के समान काल में ही उसकी निवृत्ति होती है। ‘‘ทฺวารมาวริตฺวา ปวิสติ’’อิจฺจาทิ สมานกตฺตุกานํ อปรกาเล ตฺวาทิสทฺทปฺปโยโค. ยสฺมา ปเนตฺถ ปวิสนกฺริยา ปุริมา, อาวรณกฺริยา ปน ปจฺฉิมา, ตสฺมา ‘‘อาวริตฺวา’’ติ อิทํ อปรกาลกฺริยาทีปกํ ปทนฺติ เวทิตพฺพํ. ‘‘ปวิสตี’’ติ อิทํ ปน ปุพฺพกาลกฺริยาทีปกํ ปทนฺติ. อยํ นโย [Pg.416] อญฺญตฺราปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. อปเร ‘‘ธ’นฺติ กจฺจ ปติโต ทณฺโฑ’’ติ อุทาหรณนฺติ. อภิฆาตภูตสมาโยเค ปน อภิฆาตชสทฺทสฺส สมานกาลตา เอตฺถ ลพฺภตีติ อิธาปิ ปุริมานิเยว อุทาหรณานิ ยุตฺตานีติ. 'द्वार बंद करके प्रवेश करता है' इत्यादि समान कर्ता वाली क्रियाओं में उत्तर काल (बाद के समय) में 'त्वा' आदि शब्दों का प्रयोग है। क्योंकि यहाँ प्रवेश करने की क्रिया पहले है और बंद करने की क्रिया बाद में है, इसलिए 'आवरित्वा' (बंद करके) इसे उत्तरकालीन क्रिया का बोधक पद समझना चाहिए। 'पविसति' (प्रवेश करता है) इसे पूर्वकालीन क्रिया का बोधक पद समझना चाहिए। यही नियम अन्यत्र भी ऐसे स्थानों पर लागू करना चाहिए। अन्य लोग 'धप की ध्वनि करके डंडा गिरा' उदाहरण देते हैं। आघात रूपी संयोग में आघात से उत्पन्न शब्द की समकालीनता यहाँ प्राप्त होती है, इसलिए यहाँ भी पूर्वोक्त उदाहरण ही उचित हैं। ‘‘ปิสาจํ ทิสฺวา จสฺส ภยํ โหติ. ปญฺญาย จสฺส ทิสฺวา อาสวา ปริกฺขีณา’’อิจฺจาทิ อสมาเน กตฺตริ ปโยโค. เอตฺถ หิ ปิสาจํ ทิสฺวา ปุริสสฺส ภยํ โหติ, ปญฺญาย ทิสฺวา อสฺส ปุคฺคลสฺส อาสวา ปริกฺขีณา. เอวํ สมานกตฺตุกตา ธาตูนํ น ลพฺภติ ทสฺสนกฺริยาย ปุริเสสุ ปวตฺตนโต, ภวนาทิกฺริยาย จ ภยาทีสุ ปวตฺตนโตติ ทฏฺฐพฺพํ. อยํ นโย อญฺญตฺราปิ อีทิเสสุ ฐาเนสุ เนตพฺโพ. 'पिशाच को देखकर उसे भय होता है। प्रज्ञा से देखकर उसके आस्रव क्षीण हो गए' इत्यादि भिन्न कर्ता होने पर प्रयोग हैं। यहाँ पिशाच को देखकर पुरुष को भय होता है, प्रज्ञा से देखकर उस पुद्गल के आस्रव क्षीण हो गए। इस प्रकार धातुओं की समान कर्तृता प्राप्त नहीं होती है, क्योंकि देखने की क्रिया पुरुषों में प्रवृत्त होती है और होने आदि की क्रिया भय आदि में प्रवृत्त होती है, ऐसा समझना चाहिए। यही नियम अन्यत्र भी ऐसे स्थानों पर लागू करना चाहिए। อิทมฺปิ ปเนตฺถ อุปลกฺขิตพฺพํ ‘‘อปฺปตฺวา นทึ ปพฺพโต, อติกฺกมฺม ปพฺพตํ นที’’อิจฺจาทิ ปราปรโยโค. ‘‘สีหํ ทิสฺวา ภยํ โหติ, ฆตํ ปิวิตฺวา พลํ ชายเต, ‘ธ’นฺติ กตฺวา ทณฺโฑ ปติโต’’อิจฺจาทิ ลกฺขณเหตุอาทิปฺปโยโค. ‘‘นฺหตฺวา คมนํ, ภุตฺวา สยนํ. อุปาทาย รูป’’มิจฺจาปิ พฺยตฺตเยน สทฺทสิทฺธิปฺปโยโคติ. यहाँ यह भी ध्यान देना चाहिए कि 'नदी तक न पहुँचकर पर्वत, पर्वत को पार करके नदी' इत्यादि परापर (क्रमिक) प्रयोग हैं। 'सिंह को देखकर भय होता है, घी पीकर बल उत्पन्न होता है, धप शब्द करके डंडा गिरा' इत्यादि लक्षण-हेतु आदि के प्रयोग हैं। 'नहाकर जाना, खाकर सोना। रूप को उपादान करके' इत्यादि व्यत्यय (विपरीत क्रम) से शब्द-सिद्धि के प्रयोग हैं। อิจฺเจวํ สพฺพถาปิ สมานกตฺตุกานํ ธาตูนํ ปุพฺพกาเล ตฺวาทิสทฺทปฺปโยโค, สมานกตฺตุกานํ สมานกาเล ตฺวาทิสทฺทปฺปโยโค, สมานกตฺตุกานํ อปรกาเล ตฺวาทิสทฺทปฺปโยโค, อสมานกตฺตุกานํ ตฺวาทิสทฺทปฺปโยโค, ปราปรโยโค[Pg.417], ลกฺขณเหตุอาทิปฺปโยโค, พฺยตฺตเยน สทฺทสิทฺธิปฺปโยโคติ สตฺตธา ตฺวาทิยนฺตานํ ปทานํ ปโยโค เวทิตพฺโพ. इस प्रकार सर्वथा समान कर्ता वाली धातुओं के पूर्व काल में 'त्वा' आदि शब्दों का प्रयोग, समान कर्ता के समान काल में 'त्वा' आदि शब्दों का प्रयोग, समान कर्ता के उत्तर काल में 'त्वा' आदि शब्दों का प्रयोग, भिन्न कर्ता होने पर 'त्वा' आदि शब्दों का प्रयोग, परापर प्रयोग, लक्षण-हेतु आदि प्रयोग, और व्यत्यय से शब्द-सिद्धि का प्रयोग—इस प्रकार सात प्रकार से 'त्वा' प्रत्ययांत पदों का प्रयोग समझना चाहिए। ยทิ เอวํ กสฺมา กจฺจายเน ‘‘ปุพฺพกาเลกกตฺตุกานํ ตุน ตฺวาน ตฺวา วา’’ติ ปุพฺพกาเลเยว เอกกตฺตุกคฺคหณํ กตนฺติ? เยตุยฺเยน ตฺวาทิยนฺตานํ ปทานํ ปุริมกาลกฺริยาทีปนโต. กจฺจายเน หิ เยภุยฺเยน ปวตฺตึ สนฺธาย ‘‘ปุพฺพกาเลกกตฺตุกาน’’นฺติ วุตฺตํ. ยสฺมา ปน ‘‘อิติ กตฺวา’’ติอาทีนํ ปทานํ เหตุอตฺถวเสนปิ ปุพฺพาจริเยหิ อตฺโถ สํวณฺณิโต, ตสฺมา ‘‘ภวิตฺวา’’ติอาทีนํ ภูธาตุมยานํ ตฺวาทิสทฺทนฺตานํ ปทานํ อญฺเญสญฺจ ‘‘ปจิตฺวา’’ติอาทีนํ ยถาปโยคํ ‘‘ภวนเหตุ ปจนเหตู’’ติอาทินา เหตุอตฺโถปิ คเหตพฺโพ. อตฺริทํ วุจฺจติ – यदि ऐसा है, तो कच्चायन (व्याकरण) में 'पुब्बकालेककत्तुकानं तुन त्वान त्वा वा' इस सूत्र में केवल पूर्वकाल और एक कर्ता का ही ग्रहण क्यों किया गया है? क्योंकि प्रायः 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त पदों से पूर्वकाल की क्रिया का ही बोध होता है। कच्चायन में प्रायः होने वाली प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर 'पुब्बकालेककत्तुकानं' कहा गया है। चूँकि 'इति कत्वा' आदि पदों का अर्थ पूर्वाचार्यों द्वारा हेतु (कारण) के अर्थ में भी वर्णित किया गया है, इसलिए 'भवित्वा' आदि 'भू' धातु से बने 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त पदों और अन्य 'पचित्वा' आदि पदों का प्रयोग के अनुसार 'होने के कारण, पकाने के कारण' आदि हेतु अर्थ भी ग्रहण करना चाहिए। यहाँ यह कहा गया है - เหตุตฺเถปิ ยโต โหนฺติ, สทฺทา อุสฺสุกฺกนตฺถกา; ตสฺมา เหตุวเสนาปิ, วเทยฺยตฺถํ วิจกฺขโณ. चूँकि शब्द हेतु (कारण) के अर्थ में भी प्रयुक्त होते हैं और उत्साह (प्रयत्न) के अर्थ वाले होते हैं; इसलिए विद्वान को हेतु के अनुसार भी अर्थ कहना चाहिए। ‘‘อิติ กตฺวา’’ติ สทฺทสฺส, อตฺถสํวณฺณนาสุ หิ; ‘‘อิติ กรณเหตู’’ติ, อตฺโถ ธีเรหิ คยฺหติ. क्योंकि 'इति कत्वा' शब्द की अर्थ-व्याख्याओं में, विद्वानों द्वारा 'इस कारण से' (इति करणहेतु) ऐसा अर्थ ग्रहण किया जाता है। ‘‘คจฺฉามิ ทานิ นิพฺพานํ, ยตฺถ คนฺตฺวา น โสจติ’’; อิติ ปาเฐปิ เหตุตฺโถ, คยฺหเต ปุพฺพวิญฺญุภิ. 'अब मैं निर्वाण को जाता हूँ, जहाँ जाकर (जिसके प्राप्त होने के कारण) कोई शोक नहीं करता'; इस पाठ में भी पूर्ववर्ती विद्वानों द्वारा हेतु अर्थ ग्रहण किया जाता है। ‘‘ยสฺมึ นิพฺพาเน คมน-เหตู’’ติ หิ กถียเต; เหตุตฺเถวํ ยถาโยค-มญฺญตฺราปิ อยํ นโย. क्योंकि 'जिस निर्वाण में जाने के कारण' ऐसा कहा जाता है; इसी प्रकार अन्यत्र भी यथायोग्य हेतु अर्थ में यही नियम समझना चाहिए। เอวํ ภูตสทฺทสฺส อตฺถุทฺธาโร จ ตุมนฺตปทญฺจ ตฺวาทิยนฺตปทญฺจาติ อตฺถตฺติกํ วิภตฺตํ. इस प्रकार 'भूत' शब्द का अर्थ-उद्धार, 'तुमन्' प्रत्ययान्त पद और 'त्वा' आदि प्रत्ययान्त पद - यह 'अर्थ-त्रिक' (तीन अर्थों का समूह) व्याख्यायित किया गया। โย [Pg.418] อิมมตฺถติกํ สุวิภตฺตํ,กณฺณรสายนมาคมิกานํ; ธารยเต ส ภเว คตกงฺขา,ปาวจนมฺหิ คเต สุขุมตฺเถ. जो आगम के ज्ञाताओं के लिए कर्ण-रसायन (कानों के लिए अमृत) के समान इस सुविभक्त 'अर्थ-त्रिक' को धारण करता है, वह बुद्धवचन के सूक्ष्म अर्थों में संशयरहित हो जाता है। อิติ นวงฺเค สาฏฺฐกเถ ปิฏกตฺตเย พฺยปฺปถคตีสุ วิญฺญูนํ इस प्रकार नौ अंगों वाले, अट्ठकथा सहित त्रिपिटक की वचन-पद्धतियों में विद्वानों की โกสลฺลตฺถาย กเต สทฺทนีติปฺปกรเณ कुशलता के लिए रचित सद्दनीति प्रकरण में อตฺถตฺติกวิภาโค นาม 'अर्थ-त्रिक विभाग' नामक จุทฺทสโม ปริจฺเฉโท. चौदहवाँ परिच्छेद। เอวํ นานปฺปการโต ภูธาตุรูปานิ ทสฺสิตานิ. इस प्रकार 'भू' धातु के रूप विभिन्न प्रकार से प्रदर्शित किए गए हैं। ปทมาลา นิฏฺฐิตา. पदमाला समाप्त हुई। | |||
| Indonesia | |||
| Kanon Pali | Komentar | Sub-komentar | Lainnya |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |