| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
1 ? นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส उन भगवन्, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। โมคฺคลฺลานสุตฺตปาโฐ मोग्गल्लानसुत्तपाठ (๑) ปฐโม กณฺโฑ (สญฺญาทิ) (१) प्रथम काण्ड (संज्ञा आदि) ๑. ออาทโย [Pg.1] ติตาลีส วณฺณา. १. 'अ' आदि तैंतालीस वर्ण हैं। ๒. ทสา-โท สรา. २. आदि के दस स्वर हैं। ๓. ทฺเวทฺเว สวณฺณา. ३. दो-दो सवर्ण हैं। ๔. ปุพฺโพ รสฺโส. ४. पूर्व ह्रस्व है। ๕. ปโร ทีโฆ. ५. पर दीर्घ है। ๖. กาทโย พฺยญฺชนา. ६. 'क' आदि व्यंजन हैं। ๗. ปญฺจ ปญฺจกา วคฺคา. ७. पाँच-पाँच के पाँच वर्ग हैं। ๘. พินฺทุ นิคฺคหีตํ. ८. बिन्दु निग्गहीत है। ๙. อิยุวณฺณา ฌลา นามสฺสนฺเต. ९. इ-वर्ण और उ-वर्ण नाम के अन्त में 'झ' और 'ल' संज्ञक होते हैं। ๑๐. ปิตฺถิยํ. १०. स्त्रीलिंग में। ๑๑. ฆา. ११. 'घा'। ๑๒. โค สฺยาลปเน. १२. सम्बोधन में 'गो' शब्द। (สญฺญา) (संज्ञा) ๑๓. วิธิพฺพิเสสนนฺตสฺส. १३. विधि विशेषणान्त का होता है। ๑๔. สตฺตมิยํ ปุพฺพสฺส. १४. सप्तमी विभक्ति होने पर पूर्व के स्थान पर कार्य होता है। ๑๕. ปญฺจมิยํ ปรสฺส. १५. पञ्चमी विभक्ति होने पर पर के स्थान पर कार्य होता है। ๑๖. อาทิสฺส[Pg.2]. १६. आदि वर्ण के स्थान पर। ๑๗. ฉฏฺฐิยนฺตสฺส. १७. षष्ठी विभक्ति वाले के अन्त्य के स्थान पर। ๑๘. วานุพนฺโธ. १८. 'व' अनुबन्ध विकल्प के लिए है। ๑๙. ฏานุพนฺธา-เนกวณฺณา สพฺพสฺส. १९. 'ट' अनुबन्ध वाले और अनेक वर्ण वाले आदेश सम्पूर्ण के स्थान पर होते हैं। ๒๐. ญกานุพนฺธาทฺยนฺตา. २०. 'ञ' और 'क' अनुबन्ध वाले क्रमशः आदि और अन्त में होते हैं। ๒๑. มานุพนฺโธ สรานมนฺตา ปโร. २१. 'म' अनुबन्ध वाला अन्तिम स्वर के बाद होता है। ๒๒. วิปฺปฏิเสเธ. २२. विप्रतिषेध (विरोध) होने पर। ๒๓. สงฺเกโต-นวยโว-นุพนฺโธ. २३. अनुबन्ध संकेत मात्र है, वह अवयव नहीं है। ๒๔. วณฺณปเรน สวณฺโณ-ปิ. २४. 'वर्ण' शब्द बाद में होने पर सवर्ण का भी ग्रहण होता है। ๒๕. นฺตุ วนฺตุมนฺตฺวาวนฺตุตวนฺตุสมฺพนฺธี. २५. 'न्तु' का सम्बन्ध वन्तु, मन्तु, आवन्तु और तवन्तु से है। ปริภาสา परिभाषा ๒๖. สโร โลโป สเร. २६. स्वर के परे होने पर (पूर्व) स्वर का लोप होता है। ๒๗. ปโร กฺวจิ. २७. कहीं-कहीं पर (बाद वाला) स्वर लुप्त हो जाता है। ๒๘. น ทฺเว วา. २८. अथवा (लोप होने पर) द्वित्व नहीं होता। ๒๙. ยุวณฺณานเมโอ ลุตฺตา. २९. इ-ई और उ-ऊ वर्णों के स्थान पर क्रमशः ए और ओ हो जाते हैं (जब पूर्व स्वर का लोप हुआ हो)। ๓๐. ยวา สเร. ३०. स्वर के परे होने पर (इ-ई और उ-ऊ के स्थान पर) क्रमशः 'य' और 'व' हो जाते हैं। ๓๑. เอโอนํ. ३१. 'ए' और 'ओ' के स्थान पर (क्रमशः 'य' और 'व' होते हैं)। ๓๒. โคสฺสาวง. ३२. 'गो' शब्द के स्थान पर 'अव' आदेश होता है। ๓๓. พฺยญฺชเน ทีฆรสฺสา. ३३. व्यंजन के परे होने पर (स्वर) दीर्घ या ह्रस्व हो जाते हैं। ๓๔. สรมฺหา ทฺเว. ३४. स्वर के बाद (व्यंजन का) द्वित्व होता है। ๓๕. จตุตฺถทุติเยสฺเวสํ ตติยปฐมา. ३५. चौथे और दूसरे वर्णों के स्थान पर क्रमशः तीसरे और पहले वर्ण हो जाते हैं। ๓๖. วี-ติสฺเส-เว [Pg.3] โว. ३६. 'वि', 'ति', 'से' के स्थान पर 'वे' और 'वो' हो जाते हैं। ๓๗. เอโอนม วณฺเณ. ३७. 'ए' और 'ओ' के स्थान पर 'इ' और 'उ' वर्ण हो जाते हैं। ๓๘. นิคฺคหีตํ. ३८. निग्गहीत (अनुस्वार) का... ๓๙. โลโป. ३९. लोप होता है। ๔๐. ปรสรสฺส. ४०. पर स्वर के परे होने पर। ๔๑. วคฺเค วคฺคนฺโต. ४१. वर्ग के परे होने पर (निग्गहीत के स्थान पर) उसी वर्ग का अन्तिम वर्ण (पंचम वर्ण) हो जाता है। ๔๒. เยวหิสุ โญ. ४२. 'य', 'ए', 'व', 'हि' के परे होने पर (निग्गहीत का) 'ञ' हो जाता है। ๔๓. เย สํสฺส. ४३. 'य' के परे होने पर (निग्गहीत का) 'स्स' हो जाता है। ๔๔. มยทา สเร. ४४. स्वर के परे होने पर 'म', 'य', 'द' आगम होते हैं। ๔๕. วนตรคา จา-คมา. ४५. 'व', 'न', 'त', 'र', 'ग' का भी आगम होता है। ๔๖. ฉา โฬ. ४६. 'छ' के स्थान पर 'ळ' होता है। ๔๗. ตทมินาทีนิ. ४७. 'तद', 'अमिन' आदि (शब्दों के साथ)। ๔๘. ตวคฺควรณานํ เย จวคฺคพยญา. ४८. 'य' के परे होने पर 'त-वर्ग' के वर्णों के स्थान पर 'च-वर्ग' के वर्ण और 'ब', 'य', 'ञ' होते हैं। ๔๙. วคฺคลเสหิ เต. ४९. वर्ग, 'ल' और 'स' के साथ वे (परिवर्तित होते हैं)। ๕๐. หสฺส วิปลฺลาโส. ५०. 'ह' का विपर्यास (स्थान-परिवर्तन) होता है। ๕๑. เว วา. ५१. 'व' का विकल्प से (विपर्यास होता है)। ๕๒. ตถนรานํ ฏฐณลา. ५२. 'त', 'थ', 'न', 'र' के स्थान पर क्रमशः 'ट', 'ठ', 'ण', 'ल' होते हैं। ๕๓. สํโยคาทิโลโป. ५३. संयोग (व्यंजन गुच्छ) के आदि वर्ण का लोप होता है। ๕๔. วิจฺฉาภิกฺขญฺเญสุ ทฺเว. ५४. वीप्सा (दोहराव) और आभीक्ष्ण्य (बार-बार होना) के अर्थ में द्वित्व होता है। ๕๕. สฺยาทิโลโป ปุพฺพสฺเส-กสฺส. ५५. 'सि' आदि विभक्तियों का लोप होता है और पूर्व स्वर 'ए' हो जाता है। ๕๖. สพฺพาทีนํ วีติหาเร. ५६. सब्बादि शब्दों का व्यतिहार (विनिमय) के अर्थ में। ๕๗. ยาวโพธํ [Pg.4] สมฺภเม. ५७. सम्भ्रम (घबराहट) में बोध होने तक। ๕๘. พหุลํ. ५८. बहुलता से। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ สญฺญาทิกณฺโฑ ปฐโม. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण में संज्ञा आदि नामक प्रथम काण्ड समाप्त हुआ। (๒) ทุติโย กณฺโฑ (สฺยาทิ) (२) द्वितीय काण्ड (स्यादि)। ๑. ทฺเว ทฺเวกา-เนเกสุ นามสฺมา สิ โย, อํ โย, นา หิ, ส นํ, สฺมา หิ, ส นํ, สฺมึ สุ. १. नाम से परे एकवचन और बहुवचन में क्रमशः सि-यो, अं-यो, ना-हि, स-नं, स्मा-हि, स-नं, स्मिं-सु विभक्तियाँ होती हैं। ๒. กมฺเม ทุติยา. २. कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है। ๓. กาลทฺธานมจฺจนฺตสํโยเค. ३. काल और मार्ग के अत्यंत संयोग में। ๔. คติโพธาหารสทฺทตฺถากมฺมกภชฺชาทีนํ ปโยชฺเช. ४. गति, बोध, आहार, शब्दार्थक, अकर्मक और भज् आदि धातुओं के प्रयोज्य कर्ता में। ๕. หราทีนํ วา. ५. हृ आदि धातुओं के योग में विकल्प से। ๖. น ขาทาทีนํ. ६. खाद् आदि धातुओं के योग में नहीं। ๑. วหิสฺสา-นิยนฺตุเก (คณ). १. वह् धातु के योग में जब चालक कर्ता न हो। ๒. ภกฺขิสฺสาหึสายํ (คณ). २. भक्ष् धातु के योग में अहिंसा के अर्थ में। ๗. ธฺยาทีหิ ยุตฺตา. ७. अधि आदि उपसर्गों से युक्त होने पर। ๘. ลกฺขณิตฺตมฺภูตวิจฺฉาสฺวภินา. ८. लक्षण, इत्थंभूत और वीप्सा के अर्थ में 'अभि' के साथ। ๙. ปติปรีหิ ภาเค จ. ९. भाग के अर्थ में 'प्रति' और 'परि' के साथ भी। ๑๐. อนุนา. १०. 'अनु' के साथ। ๑๑. สหตฺเถ. ११. सह (साथ) के अर्थ में। ๑๒. หีเน. १२. हीन के अर्थ में। ๑๓. อุเปน. १३. 'उप' के साथ। ๑๔. สตฺตมฺยาธิกฺเย. १४. आधिक्य के अर्थ में सप्तमी होती है। ๑๕. สามิตฺเต-ธินา[Pg.5]. १५. स्वामित्व के अर्थ में 'अधि' के साथ। ๑๖. กตฺตุกรเณสุ ตติยา. १६. कर्ता और करण में तृतीया विभक्ति होती है। ๑๗. สหตฺเถน. १७. सह (साथ) के अर्थ में। ๑๘. ลกฺขเณ. १८. लक्षण के अर्थ में। ๑๙. เหตุมฺหิ. १९. हेतु के अर्थ में। ๒๐. ปญฺจมีเณ วา. २०. अथवा ऋण के अर्थ में पंचमी होती है। ๒๑. คุเณ. २१. गुण के अर्थ में। ๒๒. ฉฏฺฐี เหตฺวตฺเถหิ. २२. हेतु अर्थ वाले शब्दों के साथ षष्ठी विभक्ति होती है। ๒๓. สพฺพาทิโต สพฺพา. २३. सब्बादि से सभी विभक्तियाँ होती हैं। ๒๔. จตุตฺถี สมฺปทาเน. २४. सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है। ๒๕. ตาทตฺถฺเย. २५. तदर्थ (प्रयोजन) के अर्थ में। ๒๖. ปญฺจมฺยวธิสฺมา. २६. अवधि (सीमा) से पञ्चमी विभक्ति होती है। ๒๗. อปปรีหิ วชฺชเน. २७. 'अप' और 'परि' के साथ वर्जन (त्याग) के अर्थ में। ๒๘. ปฏินิธิปฏิทาเนสุ ปตินา. २८. 'प्रति' के साथ प्रतिनिधि और प्रतिदान के अर्थ में। ๒๙. ริเต ทุติยา จ. २९. 'ऋते' के योग में द्वितीया भी होती है। ๓๐. วินา-ญฺญตฺร ตติยา จ. ३०. 'विना' और 'अञ्ञत्र' के योग में तृतीया भी होती है। ๓๑. ปุถนานาหิ. ३१. 'पुथ' (पृथक्) और 'नाना' के साथ (तृतीया, द्वितीया और पञ्चमी होती हैं)। ๓๒. สตฺตมฺยาธาเร. ३२. आधार में सप्तमी विभक्ति होती है। ๓๓. นิมิตฺเต. ३३. निमित्त (प्रयोजन) के अर्थ में। ๓๔. ยพฺโภโว ภาวลกฺขณํ. ३४. जिसके होने से क्रिया का लक्षण लक्षित हो (भावलक्षण)। ๓๕. ฉฏฺฐี จา-นาทเร. ३५. अनादर के अर्थ में षष्ठी भी होती है। ๓๖. ยโต [Pg.6] นิทฺธารณํ. ३६. जिससे निर्धारण (समूह में से पृथक्करण) किया जाए। ๓๗. ปฐมา-ตฺถมตฺเต. ३७. अर्थ मात्र को बताने में प्रथमा विभक्ति होती है। ๓๘. อามนฺตเณ. ३८. आमन्त्रण (सम्बोधन) में। ๓๙. ฉฏฺฐี สมฺพนฺเธ. ३९. सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति होती है। ๔๐. ตุลฺยตฺเถน วา ตติยา. ४०. तुल्य अर्थ वाले शब्दों के योग में तृतीया भी होती है। ๔๑. อโต โยนํ ฏาเฏ. ४१. 'अ' कारान्त से परे 'यो' के स्थान पर 'आ' और 'ए' आदेश होते हैं। ๔๒. นินํ วา. ४२. 'नि' और 'न' आदेश विकल्प से होते हैं। ๔๓. สฺมาสฺมินฺนํ. ४३. 'स्मा' और 'स्मिं' के स्थान पर (आदेश)। ๔๔. สสฺสา-ย จตุตฺถิยา. ४४. चतुर्थी के 'स्स' के स्थान पर 'आय' आदेश होता है। ๔๕. ฆปเต-กสฺมึ นาทีนํ ยยา. ४५. 'घ' और 'प' संज्ञक शब्दों से परे एकवचन में 'ना' आदि के स्थान पर 'या' आदेश होता है। ๔๖. สฺสา วา เต-ติ-มามูหิ. ४६. 'ते', 'ति', 'मा', 'मु' आदि से परे 'स्स' विकल्प से होता है। ๔๗. นมฺหิ นุก ทฺวาทีนํ สตฺตรสนฺนํ. ४७. 'नं' परे होने पर 'द्वि' आदि सत्रह शब्दों को 'नुक' आगम होता है। ๔๘. พหุกตินฺนํ. ४८. 'बहु' और 'कति' शब्दों को भी। ๔๙. ณฺณํณฺณนฺนํ ติโต ฌา. ४९. 'ति' से परे 'णं' को 'ण्णं' और 'ण्णन्नं' आदेश होते हैं। ๕๐. อุภินฺนํ. ५०. 'उभ' शब्द को 'उभिण्णं' आदेश होता है। ๕๑. สุอุ สสฺส. ५१. 'सु' परे होने पर 'उ' और 'स्स' आदेश होते हैं। ๕๒. สฺสํสฺสาสฺสาเยสฺวิตเรกญฺเญติมานมิ. ५२. 'इतर', 'एक', 'अञ्ञ', 'एत', 'इम' आदि के 'स्स' के स्थान पर 'स्सं', 'स्सा', 'स्साय' आदि आदेश होते हैं। ๕๓. ตาย วา. ५३. 'ताय' आदेश विकल्प से होता है। ๕๔. เตติมาโต สสฺส สฺสาย. ५४. ते, इति और मा शब्दों से परे 'स' विभक्ति को 'स्साय' आदेश होता है। ๕๕. รตฺตฺยาทีหิ โฏ สฺมิโน. ५५. रत्ति आदि शब्दों से परे 'स्मि' विभक्ति को 'टो' आदेश होता है। ๕๖. สุหิสุ-ภสฺโส. ५६. 'सु' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'भ' और 'स्स' आदेश होते हैं। ๕๗. ลฺตุปิตาทีน [Pg.7] มา สิมฺหิ. ५७. पितु आदि शब्दों के ऋकार को 'सि' विभक्ति के परे होने पर 'आ' होता है। ๕๘. เค อ จ. ५८. 'ग' संज्ञक शब्दों के परे 'ए' और 'अ' भी होता है। ๕๙. อยูนํ วา ทีโฆ. ५९. 'अ' और 'यु' का विकल्प से दीर्घ होता है। ๖๐. ฆ พฺรหฺมาทิเต. ६०. 'घ' संज्ञक और ब्रह्म आदि शब्दों के परे। ๖๑. นา-มฺมาทีหิ. ६१. 'न' और 'म' आदि शब्दों से। ๖๒. รสฺโส วา. ६२. विकल्प से ह्रस्व होता है। ๖๓. โฆ สฺสํสฺสาสฺสายํตึสุ. ६३. 'घ' संज्ञक शब्दों को 'स्सं', 'स्सा', 'स्साय', 'तिं' और 'सु' विभक्तियों के परे होने पर। ๖๔. เอกวจนโยสฺวโฆนํ. ६४. एकवचन की विभक्तियों के परे होने पर 'अघ' संज्ञक शब्दों को। ๖๕. เค วา. ६५. 'ग' संज्ञक के परे विकल्प से। ๖๖. สิสฺมึนา-นปุํสกสฺส. ६६. नपुंसक लिंग को छोड़कर 'सि' और 'स्मिं' के स्थान पर 'ना' होता है। ๖๗. โคสฺสาคสิหินํสุ คาวควา. ६७. 'गो' शब्द को 'स्स', 'अ', 'ग', 'सि', 'हि', 'नं', 'सु' के परे 'गाव' और 'गव' आदेश होते हैं। ๖๘. สุมฺหิ วา. ६८. 'सु' विभक्ति के परे विकल्प से। ๖๙. ควํ เสน. ६९. 'स' विभक्ति के साथ 'गवं' होता है। ๗๐. คุนฺนํ จ นํนา. ७०. 'नं' विभक्ति के परे 'गुन्नं' भी होता है। ๗๑. นาสฺสา. ७१. 'ना' और 'स्सा' आदेश होते हैं। ๗๒. คาวุมฺหิ. ७२. 'म्हि' विभक्ति के परे 'गवु' आदेश होता है। ๗๓. ยํ ปีโต. ७३. 'इ' कारान्त से परे 'यं' होता है। ๗๔. นํฌีโต. ७४. 'झ' संज्ञक और 'ई' कारान्त से परे 'नं' होता है। ๗๕. โยนํ โนเน ปุเม. ७५. पुल्लिंग में 'यो' विभक्तियों के स्थान पर 'नो' और 'ने' होते हैं। ๗๖. โน. ७६. 'नो' आदेश होता है। ๗๗. สฺมึโน นิ. ७७. 'स्मिं' के स्थान पर 'नि' होता है। ๗๘. อมฺพฺวาทีหิ[Pg.8]. ७८. 'अम्बु' आदि शब्दों से। ๗๙. กมฺมาทิโต. ७९. 'कम्म' आदि शब्दों से। ๘๐. นาสฺเส-โน. ८०. 'ना' और 'स' के स्थान पर 'इनो' होता है। ๘๑. ฌลา สสฺส โน. ८१. 'झ' और 'ल' संज्ञक शब्दों से परे 'स' विभक्ति को 'नो' होता है। ๓. อิโต กฺวจิ สสฺส ฏานุพนฺโธ (คณ). ३. 'इ' कारान्त से परे कहीं-कहीं 'स' विभक्ति को 'ट' अनुबन्ध वाला आदेश होता है। ๘๒. นา สฺมาสฺส. ८२. 'ना' और 'स्मा' के स्थान पर 'स' होता है। ๘๓. ลา โยนํ โว ปุเม. ८३. पुल्लिंग में 'यो' विभक्ति के स्थान पर 'ला' और 'वो' होते हैं। ๘๔. ชนฺตฺวาทิโต โน จ. ८४. 'जन्तु' आदि शब्दों के बाद 'नो' भी होता है। ๘๕. กูโต. ८५. 'कू' शब्द के बाद। ๘๖. โลโป-มุสฺมา. ८६. 'मु' और 'स्मा' का लोप होता है। ๘๗. น โน สสฺส. ८७. 'स्स' विभक्ति के स्थान पर 'न' और 'नो' होते हैं। ๘๘. โยโลปนิสุ ทีโฆ. ८८. 'यो', लोप और 'नि' के परे होने पर पूर्व स्वर दीर्घ होता है। ๘๙. สุนํหิสุ. ८९. 'सु' और 'नं' के परे होने पर। ๙๐. ปญฺจาทีนํ จุทฺทสนฺนม. ९०. 'पञ्च' आदि चौदह संख्यावाचक शब्दों के लिए। ๙๑. ยฺวาโท นฺตุสฺส. ९१. 'यो' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'न्तु' प्रत्यय के स्थान पर। ๙๒. นฺตสฺส จ ฏ วํเส. ९२. और 'वंस' शब्द में 'न्तु' के स्थान पर 'ट' होता है। ๙๓. โยสุ ฌิสฺส ปุเม. ९३. पुल्लिंग में 'यो' विभक्तियों के परे होने पर 'झि' के स्थान पर। ๙๔. เวโวสุ ลุสฺส. ९४. 'वे' और 'वो' के परे होने पर 'लु' के स्थान पर। ๙๕. โยมฺหิ วา กฺวจิ. ९५. 'यो' विभक्ति में कहीं-कहीं विकल्प से। ๙๖. ปุมา-ลปเน เวโว. ९६. 'पुमा' शब्द के संबोधन में 'वे' और 'वो' होते हैं। ๙๗. สฺมาหิสฺมินฺนํ มฺหาภิมฺหิ. ९७. 'स्मा', 'हि' और 'स्मिं' के स्थान पर क्रमशः 'म्हा', 'भि' और 'म्हि' होते हैं। ๙๘. สุหิสฺวสฺเส[Pg.9]. ९८. 'अ' के बाद 'सु' और 'हि' के स्थान पर। ๙๙. สพฺพาทีนํ นํมฺหิ จ. ९९. 'सब्बादि' गण के शब्दों के लिए 'नं' विभक्ति में भी। ๔. ปุพฺพปราวรทกฺขิณุตฺตราธรานิ ววตฺถายมสญฺญายํ (คณ). ४. 'पुब्ब', 'पर', 'अवर', 'दक्खिण', 'उत्तर' और 'अधर' शब्द व्यवस्था के अर्थ में, संज्ञा न होने पर (सब्बादि गण के समान होते हैं)। ๑๐๐. สํสานํ. १००. 'सं' और 'सानं' होते हैं। ๑๐๑. ฆปา สสฺส สฺสา วา. १०१. 'घ' और 'पा' संज्ञक शब्दों के बाद 'स्स' के स्थान पर विकल्प से 'स्सा' होता है। ๑๐๒. สฺมิโน สฺสํ. १०२. 'स्मिं' के स्थान पर 'स्सं' होता है। ๑๐๓. ยํ. १०३. 'यं' होता है। ๑๐๔. ตึสภาปริสาย. १०४. 'तिंस', 'भा' और 'परिसा' शब्दों में। ๑๐๕. ปทาทีหิ สิ. १०५. 'पद' आदि शब्दों से 'सि' विभक्ति होती है। ๑๐๖. นาสฺส สา. १०६. 'ना' के स्थान पर 'सा' होता है। ๑๐๗. โกธาทีหิ. १०७. 'कोध' आदि शब्दों से। ๑๐๘. อเตน. १०८. 'अ' के द्वारा। ๑๐๙. สิสฺโส. १०९. 'सि' का 'सो' हो जाता है। ๑๑๐. กฺวเจ วา. ११०. कहीं-कहीं विकल्प से। ๑๑๑. อํ นปุํสเก. १११. नपुंसक लिंग में 'अं' होता है। ๑๑๒. โยนํ นิ. ११२. यो प्रत्ययों का 'नि' आदेश होता है। ๑๑๓. ฌลา วา. ११३. झ और ल (इ, ई, उ, ऊ) से परे विकल्प से। ๑๑๔. โลโป. ११४. लोप होता है। ๑๑๕. ชนฺตุเหตฺวีฆเปหิ วา. ११५. जन्तु, हेतु, ईघ और अपेहि शब्दों से विकल्प से। ๑๑๖. เย ปสฺสิวณฺณสฺส. ११६. य परे होने पर इ-वर्ण का। ๑๑๗. คสีนํ[Pg.10]. ११७. ग और सि प्रत्ययों का। ๑๑๘. อสงฺขฺเยหิ สพฺพาสํ. ११८. असंख्यावाची शब्दों से सभी का। ๑๑๙. เอกตฺถตายํ. ११९. एकार्थता होने पर। ๑๒๐. ปุพฺพสฺมา มาทิโต. १२०. पूर्व से 'म' आदि का। ๑๒๑. นา-โต-มปญฺจมิยา. १२१. अकारान्त से परे 'म' होता है, पञ्चमी को छोड़कर। ๑๒๒. วา ตติยาสตฺตมีนํ. १२२. तृतीया और सप्तमी विभक्तियों का विकल्प से। ๑๒๓. ราชสฺสิ นามฺหิ. १२३. राजन् शब्द के बाद 'सि' और 'ना' होने पर। ๑๒๔ สุนํหิสู. १२४ सु, नं, हि और सु प्रत्ययों के परे होने पर। ๑๒๕. อิมสฺสานิตฺถิยํ เฏ. १२५. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'इम' का 'अ' होता है 'ट' परे होने पर। ๑๒๖. นามฺห-นิมิ. १२६. ना और म्ही प्रत्ययों के परे होने पर। ๑๒๗. สิมฺห-นปุํสกสฺสายํ. १२७. नपुंसक लिंग में 'सि' और 'म्हि' के परे होने पर यह (अ) होता है। ๑๒๘. ตฺยเตตานํ ตสฺส โส. १२८. त्य और एत के 'त' का 'स' होता है। ๑๒๙. มสฺสา-มุสฺส. १२९. 'मस्स' और 'मुस्स' आदेश होते हैं। ๑๓๐. เก วา. १३०. क परे होने पर विकल्प से। ๑๓๑. ตตสฺส โน สพฺพาสุ. १३१. 'त' शब्द के 'त' का 'न' होता है सभी विभक्तियों में। ๑๓๒. ฏ สสฺมาสฺมึสฺสายสฺสํสฺสาสํมฺหามฺหิสฺวิมสฺส จ. १३२. ट, स, स्मा, स्मिं, सा, य, सं, सा, सं, म्हा, म्ही, सु प्रत्ययों के परे होने पर और इम का। ๑๓๓. เฏ สิสฺสิสิสฺมา. १३३. ट परे होने पर सि, सि, स्मा। ๑๓๔. ทุติยสฺส โยสฺส. १३४. द्वितीया के यो प्रत्यय का। ๑๓๕. เอกจฺจาทีห-โต. १३५. एकच्च आदि शब्दों से 'तो' प्रत्यय होता है। ๑๓๖. น นิสฺส ฏา. १३६. टा परे होने पर 'नि' का 'ना' नहीं होता। ๑๓๗. สพฺพาทีหิ. १३७. सब्ब आदि शब्दों से। ๑๓๘. โยนเมฏ[Pg.11]. १३८. यो प्रत्ययों का 'ए' आदेश होता है। ๑๓๙. นาญฺญํ-จ นามปฺปธานา. १३९. और अन्य नहीं, नाम की प्रधानता से। ๑๔๐. ตติยตฺถโยเค. १४०. तृतीया के अर्थ के योग में। ๑๔๑. จตฺถสมาเส. १४१. 'च' के अर्थ वाले समास में। ๑๔๒. เวฏ. १४२. 'वे' के स्थान पर 'ट' होता है। ๑๔๓. ปุพฺพาทีหิ ฉหิ. १४३. 'पुब्ब' आदि छह शब्दों से। ๑๔๔. มนาทีหิ สฺมึสํนาสฺมานํ สิโสโอสาสา. १४४. 'मनादि' शब्दों से 'स्मिं', 'सं', 'ना' और 'स्मा' के स्थान पर क्रमशः 'सि', 'सो', 'ओ' और 'सा' होते हैं। ๕. สุเมธาทีน มวุทฺธิจ (คณ). ५. 'सुमेध' आदि शब्दों की वृद्धि नहीं होती है। ๖. สรวยายวาสเจตา ชลาสยกฺขยโลหปฏมเนสุ (คณ). ६. 'सर', 'वय', 'आय', 'वास' और 'चेत' शब्द क्रमशः 'जलाशय', 'क्षय', 'लोह', 'पट' और 'मन' के अर्थ में होते हैं। ๑๔๕. สโตสพเภ. १४५. 'स' और 'भ' के परे होने पर 'स' का 'तो' होता है। ๑๔๖. ภวโต วา โภนฺโต คโยนาเส. १४६. 'भवन्त' शब्द के 'ग' (सम्बोधन), 'यो' और 'ना' के परे होने पर विकल्प से 'भोन्तो' होता है। ๑๔๗. สิสฺสคฺคิโต นิ. १४७. 'अग्गि' आदि शब्दों से परे 'सि' का 'नि' होता है। ๑๔๘. นฺตสฺสํ. १४८. 'न्त' के स्थान पर 'अं' होता है। ๑๔๙. ภูโต. १४९. 'भू' के स्थान पर 'तो' होता है। ๑๕๐. มหนฺตารหนฺตานํ ฏา วา. १५०. 'महन्त' और 'अरहन्त' शब्दों के 'न्त' का विकल्प से 'टा' होता है। ๑๕๑. นฺตุสฺส. १५१. 'न्त' के स्थान पर 'उ' होता है। ๑๕๒. อํงํ นปุํสเก. १५२. नपुंसक लिंग में 'अं' का 'अं' होता है। ๑๕๓. หิมวโต วา โอ. १५३. 'हिमवन्त' शब्द के 'न्त' का विकल्प से 'ओ' होता है। ๑๕๔. ราชาทิยุวาทิตฺวา. १५४. 'राज-आदि' और 'युव-आदि' होने के कारण। ๗. ธมฺโม วา-ญฺญตฺเถ (คณ). ७. 'धम्म' शब्द विकल्प से अन्य अर्थ में। ๘. อิโม [Pg.12] ภาเว (คณ). ८. 'इम' शब्द भाव अर्थ में। ๑๕๕. วา-มฺหานง. १५५. 'म्ह' और 'न' का विकल्प से 'आन' होता है। ๑๕๖. โยนมาโน. १५६. 'यो' और 'ना' के स्थान पर 'आनो' होता है। ๑๕๗. อาโยโน จ สขา. १५७. 'सखा' शब्द के 'यो' का 'आ' भी होता है। ๑๕๘. เฏ สฺมิโน. १५८. 'ट' परे होने पर 'स्मिं' का 'इ' होता है। ๑๕๙. โนนาเสสฺวิ. १५९. 'ना', 'सि' और 'सु' के परे होने पर 'नो' होता है। ๑๖๐ สฺมานํสุ วา. 'स्मा' और 'नं' के स्थान पर विकल्प से 'सु' होता है। ๑๖๑. โยสฺวํหิสุ จารง. १६१. 'यो', 'सु', 'अं' और 'हि' के परे होने पर 'आर' और 'अं' होता है। ๑๖๒. ลฺตุปิตาทีนมเส. १६२. 'पितृ' आदि शब्दों के 'ऋ' (लु) के स्थान पर 'अ' और 'से' होता है। ๑๖๓. นํมฺหิ วา. १६३. 'नं' के परे होने पर विकल्प से। ๑๖๔. อา. १६४. 'आ' होता है। ๑๖๕. สโลโป. १६५. 'स' का लोप होता है। ๑๖๖. สุหิสฺวารงฺ. १६६. 'सु' और 'हि' के परे होने पर 'आर' होता है। ๑๖๗. นชฺชาโยสฺวาม. १६७. 'नज्जा' शब्द के 'यो' और 'सु' के परे होने पर 'आम' होता है। ๑๖๘. ฏิ กติมฺหา. १६८. "कति" शब्द से परे "टि" आदेश होता है। ๑๖๙. ฏ ปญฺจาทีหิ จุทฺทสหิ. १६९. "पञ्च" आदि चौदह शब्दों से परे "ट" आदेश होता है। ๑๗๐. อุภโคหิ โฏ. १७०. "उभ" और "गो" शब्दों से परे "टो" आदेश होता है। ๑๗๑. อารงสฺมา. १७१. "स्मा" विभक्ति के स्थान पर "आर" आदेश होता है। ๑๗๒. โฏเฏ วา. १७२. विकल्प से "टो" और "टे" आदेश होते हैं। ๑๗๓. ฏา นาสฺมานํ. १७३. "ना" और "स्मा" विभक्तियों के स्थान पर "टा" आदेश होता है। ๑๗๔. ฏิ สฺมิโน. १७४. "स्मि" विभक्ति के स्थान पर "टि" आदेश होता है। ๑๗๕. ทิวาทิโต[Pg.13]. १७५. "दिवा" आदि शब्दों से। ๑๗๖. รสฺสารง. १७६. "आर" आदेश का ह्रस्व होता है। ๑๗๗. ปิตาทีนมนตฺวาทีนํ. १७७. "पितु" आदि शब्दों के "अन" आदि आदेश होते हैं। ๑๗๘. ยุวาทีนํ สุหิสฺวานง. १७८. "युव" आदि शब्दों के "सु" और "हि" विभक्तियों में "आन" आदेश होता है। ๑๗๙. โนนาเนสฺวา. १७९. "सु" विभक्ति में "नो" और "नान" आदेश होते हैं। ๑๘๐. สฺมาสฺมึนํ นาเน. १८०. "स्मा" और "स्मि" विभक्तियों के स्थान पर "ना" और "ने" आदेश होते हैं। ๑๘๑. โยนํ โนเน วา. १८१. "यो" विभक्तियों के स्थान पर विकल्प से "नो" और "ने" आदेश होते हैं। ๑๘๒. อิโต-ญฺญตฺเถ ปุเม. १८२. इससे भिन्न अर्थ में पुल्लिंग में। ๑๘๓. เน สฺมิโน กฺวจิ. १८३. "स्मि" विभक्ति के स्थान पर कहीं "ने" आदेश होता है। ๑๘๔. ปุมา. १८४. "पुम" शब्द। ๑๘๕. นามฺหิ. १८५. "ना" विभक्ति के परे होने पर। ๑๘๖. สุมฺหา จ. १८६. और "सु" विभक्ति के परे होने पर भी। ๑๘๗. คสฺสํ. १८७. "ग" के स्थान पर "सं" आदेश होता है। ๑๘๘. สาสฺสํ เส จานง. १८८. "स" विभक्ति के स्थान पर "अस्सं" और "से" के स्थान पर "आन" आदेश होता है। ๑๘๙. วตฺตหา สนนฺนํ โนนานํ. १८९. "स" और "नं" विभक्तियों के स्थान पर "नो" और "नान" आदेश होते हैं। ๑๙๐. พฺรหฺมสฺสุ วา. १९०. "ब्रह्म" शब्द के "सु" विभक्ति में विकल्प से। ๑๙๑. นามฺหิ. १९१. "ना" विभक्ति के परे होने पर। ๑๙๒. ปุมกมฺมถามทฺธานํ วา สสฺมาสุ จ. १९२. "पुम", "कम्म", "थाम" और "अद्धान" शब्दों के "स", "स्मा" और "सु" विभक्तियों में विकल्प से। ๑๙๓. ยุวา สสฺสิโน. १९३. "युव" शब्द के "स" और "स्मि" विभक्तियों में। ๑๙๔. โน-ตฺตาตุมา. १९४. "अत्ता" और "तुमा" शब्दों के स्थान पर "नो" आदेश होता है। ๑๙๕. สุหิสุ นก. १९५. "सु" और "हि" विभक्तियों में "नक" आदेश होता है। ๑๙๖. สฺมาสฺส [Pg.14] นา พฺรหฺมา จ. १९६. "स्मा" के स्थान पर "ना" होता है और "ब्रह्म" शब्द के साथ भी। ๑๙๗. อิเมตานเมนา-นฺวาเทเส ทุติยายํ. १९७. "इम" और "एत" शब्दों के स्थान पर अन्वादेश में द्वितीया विभक्ति में "एन" आदेश होता है। ๑๙๘. กิสฺส โก สพฺพาสุ. १९८. सभी विभक्तियों में 'कि' के स्थान पर 'क' (को) आदेश होता है। ๑๙๙. กิ สสฺมึสุ วา-นิตฺถิยํ. १९९. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'स' और 'स्मिं' विभक्तियों में 'कि' के स्थान पर विकल्प से 'कि' ही रहता है। ๒๐๐. กิมํสิสุ สห นปุํสเก. २००. नपुंसक लिंग में 'अं' और 'सि' विभक्तियों के साथ 'कि' के स्थान पर 'किं' होता है। ๒๐๑. อิมสฺสิทํ วา. २०१. 'इम' के स्थान पर विकल्प से 'इदं' आदेश होता है। ๒๐๒. อมุสฺสาทุํ. २०२. 'अमु' के स्थान पर 'अदुं' आदेश होता है। ๒๐๓. สุมฺหา-มุสฺสา-สฺมา. २०३. 'सु' और 'म्हा' विभक्तियों के परे होने पर 'अमु' के स्थान पर 'अमुस्सा' और 'अमुस्मा' होते हैं। ๒๐๔. นํมฺหิ ติจตุนฺนมิตฺถิยํ ติสฺสจตสฺสา. २०४. 'नं' विभक्ति के परे होने पर स्त्रीलिंग में 'ति' और 'चतु' के स्थान पर क्रमशः 'तिस्स' और 'चतस्स' आदेश होते हैं। ๒๐๕. ติสฺโส จตสฺโส โยมฺหิ สวิภตฺตีนํ. २०५. 'यो' विभक्ति के परे होने पर विभक्तियों सहित 'तिस्सो' और 'चतस्सो' आदेश होते हैं। ๒๐๖. ตีณิจตฺตาริ นปุํสเก. २०६. नपुंसक लिंग में 'तीणि' और 'चत्तारि' होते हैं। ๒๐๗. ปุเม ตโยจตฺตาโร. २०७. पुल्लिंग में 'तयो' और 'चत्तारो' होते हैं। ๒๐๘. จตุโร วา จตุสฺส. २०८. 'चतु' के स्थान पर विकल्प से 'चतुरो' और 'चतुस्स' होते हैं। ๒๐๙. มยมสฺมา-มฺหาสฺส. २०९. 'अम्ह' के स्थान पर 'मयं', 'अस्मा' और 'अम्हा' आदेश होते हैं। ๒๑๐. นํเสสฺว-สฺมากํมมํ. २१०. 'नं' और 'सु' विभक्तियों में 'अम्ह' के स्थान पर 'अस्माकं' और 'ममं' होते हैं। ๒๑๑. สิมฺห-หํ. २११. 'सि' विभक्ति में 'अहं' आदेश होता है। ๒๑๒. ตุมฺหสฺส ตุวํ ตฺวมมฺหิ จ. २१२. 'तुम्ह' के स्थान पर 'सि' विभक्ति में 'तुवं' और 'त्वं' होते हैं। ๒๑๓. ตยาตยีนํ ตฺว วา ตสฺส. २१३. 'तया' और 'तयि' के स्थान पर विकल्प से 'त्व' और 'तस्स' आदेश होते हैं। ๒๑๔. สฺมามฺหิ ตฺวมฺหา. २१४. 'स्मा' विभक्ति में 'त्वम्हा' आदेश होता है। ๒๑๕. นฺตนฺตูนํ นฺโต โยมฺหิ ปฐเม. २१५. प्रथमा 'यो' विभक्ति में 'न्त' और 'तु' प्रत्ययान्त शब्दों के स्थान पर 'न्तो' आदेश होता है। ๒๑๖. ตํ นํมฺหิ. २१६. 'नं' विभक्ति में 'तं' आदेश होता है। ๒๑๗. โตตาติตา [Pg.15] สสฺมาสฺมึนาสุ. २१७. 'स', 'स्मा', 'स्मिं', 'ना' और 'सु' विभक्तियों में 'तो', 'ता', 'ति', 'ता' आदि आदेश होते हैं। ๒๑๘. ฏฏาอํ เค. २१८. 'गे' (सम्बोधन) में 'ट', 'टा' और 'अं' आदेश होते हैं। ๒๑๙. โยมฺหิ ทฺวินฺนํ ทุเว ทฺเว. २१९. 'यो' विभक्ति में 'द्वि' के स्थान पर 'दुवे' और 'द्वे' होते हैं। ๒๒๐. ทุวินฺนํ นํมฺหิ วา. २२०. 'नं' विभक्ति में विकल्प से 'दुविन्नं' होता है। ๒๒๑. ราชสฺส รญฺญํ. २२१. 'राज' शब्द के स्थान पर 'रञ्ञं' आदेश होता है। ๒๒๒. นาสฺมาสุ รญฺญา. २२२. 'ना', 'स्मा' और 'सु' विभक्तियों में 'रञ्ञा' आदेश होता है। ๒๒๓. รญฺโญรญฺญสฺสราชิโน เส. २२३. 'स' विभक्ति में 'रञ्ञो', 'रञ्ञस्स' और 'राजिनो' आदेश होते हैं। ๒๒๔. สฺมึมฺหิ รญฺเญราชินิ. २२४. 'स्मिं' विभक्ति में 'रञ्ञे' और 'राजिनि' आदेश होते हैं। ๒๒๕. สมาเส วา. २२५. समास में विकल्प से आदेश होता है। ๒๒๖. สฺมึมฺหิ ตุมฺหมฺหานํ ตยิมยิ. २२६. 'स्मिं' विभक्ति में 'तुम्ह' और 'अम्ह' के स्थान पर क्रमशः 'तयि' और 'मयि' आदेश होते हैं। ๒๒๗. อํมฺหิ ตํ มํ ตวํ มมํ. २२७. 'अं' विभक्ति में 'तं', 'मं', 'तवं' और 'ममं' आदेश होते हैं। ๒๒๘. นาสฺมาสุ ตยามยา. २२८. अस्मासु (अस्मद् शब्द और सु विभक्ति) में 'तया' और 'मया' नहीं होते। ๒๒๙. ตว มม ตุยฺหํ มยฺหํ เส. २२९. सि (से) विभक्ति के स्थान पर 'तव', 'मम', 'तुय्हं' और 'मय्हं' होते हैं। ๒๓๐. วํวากํ นํมฺหิ. २३०. नं विभक्ति होने पर 'वं' और 'वाकं' होते हैं। ๒๓๑. ทุติเย โยมฺหิ วา. २३१. द्वितीया के 'यो' विभक्ति होने पर विकल्प से होते हैं। ๒๓๒. อปาทาโท ปทเตกวากฺเย. २३२. पाद के आदि में न होने पर, एक वाक्य में पद के बाद (ये आदेश होते हैं)। ๒๓๓. โยนํหิสฺม-ปญฺจมฺยา โวโน. २३३. यो, नं, हि, स्मा और पञ्चमी विभक्ति में 'वो' और 'नो' होते हैं। ๒๓๔. เตเม นาเส. २३४. ना और से (स) के स्थान पर 'ते' और 'मे' होते हैं। ๒๓๕. อนฺวาเทเส. २३५. अन्वादेश (कही हुई बात को फिर से कहने) में। ๒๓๖. สปุพฺพา ปฐมนฺตา วา. २३६. पूर्व पद के साथ प्रथमान्त होने पर विकल्प से। ๒๓๗. น จ วาหาเหวโยเค. २३७. न, च, वा, ह, अह और एव के योग में नहीं। ๒๓๘. ทสฺสนตฺเต-นาโลจเน[Pg.16]. २३८. दर्शन अर्थ में, किन्तु चक्षु से देखने (आलोचन) के अर्थ में नहीं। ๒๓๙. อามนฺตณํ ปุพฺพมสนฺตํว. २३९. सम्बोधन (आमन्त्रण) यदि पहले हो, तो वह अविद्यमान के समान होता है। ๒๔๐. น สามญฺญวจนเมกตฺเถ. २४०. एक ही अर्थ वाले सामान्य वचन में नहीं। ๒๔๑. พหูสุ วา. २४१. बहुवचन में विकल्प से। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ สฺยาทิกณฺโฑ ทุติโย. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण में दूसरा 'स्यादि' काण्ड समाप्त हुआ। (๓) ตติโย กณฺโฑ (สมาโส) (३) तीसरा काण्ड (समास) ๑. สฺยาทิ สฺยาทิเนกตฺถํ. १. विभक्त्यन्त पद अन्य विभक्त्यन्त पद के साथ एक अर्थ (समास) को प्राप्त होते हैं। ๒. อสงฺขฺยํ วิภตฺติสมฺปตฺติสมีปสากลฺยา-ภาวยถา ปจฺฉายุคปทตฺเถ. २. विभक्ति, समृद्धि, समीप, साकल्य, अभाव, यथा, पश्चात् और युगपत् के अर्थ में अव्ययीभाव (असंख्य) समास होता है। ๓. ยถา น ตุลฺเย. ३. यथा (सादृश्य) के अर्थ में नहीं। ๔. ยาวา-วธารเณ. ४. याव (अवधारण/सीमा) के अर्थ में। ๕. ปยฺยปาพหิติโรปุเรปจฺฉา วา ปญฺจมฺยา. ५. परि, अप, आ, बहि, तिरो, पुरे और पच्छा का पञ्चमी के साथ विकल्प से समास होता है। ๖. สมีปายาเมสฺวนุ. ६. समीप और आयाम (विस्तार) के अर्थ में 'अनु' का समास होता है। ๗. ติฏฺฐคฺวาทีนิ. ७. तिट्ठगु आदि शब्द (निपातन से सिद्ध होते हैं)। ๘. โอเร ปริ วติ ปาเร มชฺเฌ เหฏฺฐุทฺธา โธนฺโต วา ฉฏฺฐิยา. ८. ओरे, परि, वति, पारे, मज्झे, हेट्ठा और उद्धा का षष्ठी के साथ विकल्प से समास होता है। ๙. ตํ นปุํสกํ. ९. वह (अव्ययीभाव समास) नपुंसक लिंग होता है। ๑๐. อมาทิ. १०. अं आदि (आदेश होते हैं)। ๑๑. วิเสสนเมกตฺเถน. ११. विशेषण का समान अर्थ वाले (विशेष्य) के साथ समास होता है। ๑๒. นอุ. १२. न (नञ्) के साथ। ๑๓. กุปาทโย [Pg.17] นิจฺจมสฺยาทิวิธิมฺหิ. १३. कु आदि का अस्यादि विधि में नित्य समास होता है। ๙. ปาทโย คตาทฺยตฺเถ ปฐมาย. (คณ) ९. प्र आदि का गत आदि के अर्थ में प्रथमा विभक्ति के साथ समास होता है। ๑๐. อจฺจาทโย กนฺตาทฺยตฺเถ ทุติยาย. (คณ) १०. 'अति' आदि (उपसर्ग) 'क्रान्त' (पार किया हुआ) आदि अर्थों में द्वितीया विभक्ति के साथ (समास बनाते हैं)। ๑๑. อวาทโย กุฏฺฐาทฺยตฺเถ ตติยาย. (คณ) ११. 'अव' आदि (उपसर्ग) 'क्रुष्ट' (थका हुआ/दुखी) आदि अर्थों में तृतीया विभक्ति के साथ (समास बनाते हैं)। ๑๒. ปริยาทโย คิลานาทฺยตฺเถ จตุตฺถิยา. (คณ) १२. 'परि' आदि (उपसर्ग) 'ग्लान' (थका हुआ) आदि अर्थों में चतुर्थी विभक्ति के साथ (समास बनाते हैं)। ๑๓. นฺยาทโย กนฺตาทฺยตฺเถ ปญฺจมิยา. (คณ) १३. 'नि' आदि (उपसर्ग) 'क्रान्त' (निकला हुआ) आदि अर्थों में पञ्चमी विभक्ति के साथ (समास बनाते हैं)। ๑๔. จี กฺริยตฺเถหิ. १४. 'च्वि' प्रत्ययान्त शब्द 'कृ' आदि क्रियाओं के साथ (समास बनाते हैं)। ๑๕. ภูสนา-ทรา-นาทเรสฺวลํสาสา. १५. भूषण (आभूषण), आदर और अनादर के अर्थ में 'अलम्' और 'सासा' (समास बनाते हैं)। ๑๖. อญฺเญ จ. १६. और अन्य भी (समास होते हैं)। ๑๗. วา-เนกญฺญตฺเถ. १७. अनेक पद अन्य पद के अर्थ में विकल्प से (बहुव्रीहि समास होते हैं)। ๑๘. ตตฺถ คเหตฺวา เตน ปหริตฺวา ยุทฺเธ สรูปํ. १८. वहाँ (उसमें) पकड़कर और उससे प्रहार करके युद्ध होने पर समान रूप वाले शब्दों का (समास होता है)। ๑๙. จตฺเถ. १९. 'च' (और) के अर्थ में (द्वन्द्व समास होता है)। ๒๐. สมาหาเร นปุํสกํ. २०. समाहार (समूह) के अर्थ में नपुंसकलिङ्ग होता है। ๒๑. สงฺขฺยาทิ. २१. संख्या आदि में हो (तो वह द्विगु समास है)। ๒๒. กฺวเจ-กตฺตญฺจ ฉฏฺฐิยา. २२. षष्ठी विभक्ति के साथ कहीं-कहीं एकवचन भी होता है। ๒๓. สฺยาทีสุ รสฺโส. २३. 'सि' आदि विभक्तियों के परे होने पर ह्रस्व होता है। ๒๔. ฆปสฺสนฺตสฺสา-ปฺปธานสฺส. २४. अप्रधान (गौण) पद के अन्त में स्थित 'घ' और 'प' संज्ञक वर्णों को ह्रस्व होता है। ๒๕. โคสฺสุ. २५. 'गो' शब्द के अन्त में होने पर (ह्रस्व होता है)। ๒๖. อิตฺถิยมตฺวา. २६. स्त्रीलिङ्ग में 'अ'कार होता है। ๒๗. นทาทิโต งี. २७. 'नदी' आदि शब्दों से 'ङी' (ई) प्रत्यय होता है। ๑๔. โคโต วา. (คณ) १४. 'गो' शब्द से विकल्प से (ङी प्रत्यय होता है)। ๒๘. ยกฺขาทิตฺวินี [Pg.18] จ. २८. 'यक्ख' (यक्ष) आदि शब्दों से 'इनी' प्रत्यय भी होता है। ๒๙. อารามิกาทีหิ. २९. 'आरामिक' आदि शब्दों से (इनी प्रत्यय होता है)। ๑๕. สญฺญายํ มานุโส. (คณ) १५. संज्ञा (नाम) के अर्थ में 'मानुस' शब्द होता है। ๓๐. ยุวณฺเณหิ นี. ३०. 'उ' और 'ऊ' वर्णान्त शब्दों से 'नी' प्रत्यय होता है। ๓๑. กฺติมฺหา-ญฺญตฺเถ. ३१. 'क्ति' प्रत्ययान्त शब्दों से अन्य अर्थ में (प्रत्यय होता है)। ๓๒. ฆรณฺยาทโย. ३२. 'घरणी' आदि शब्द (निपातित होते हैं)। ๑๖. อาจริยา วา ยโลโป จ. (คณ) १६. 'आचरिय' शब्द से विकल्प से 'य' का लोप भी होता है। ๓๓. มาตุลาทิตฺวานี ภริยายํ. ३३. 'मातुल' आदि शब्दों से पत्नी के अर्थ में 'आनी' प्रत्यय होता है। ๑๗. อภริยายํ ขตฺติยา วา. (คณ) १७. पत्नी के अर्थ से भिन्न होने पर 'खत्तिय' शब्द से विकल्प से (आनी प्रत्यय होता है)। ๑๘. ปุนฺนามสฺมา โยคา อปาลกนฺตา. (คณ) १८. पुरुषवाचक शब्दों के सम्बन्ध से, 'पाल' शब्द अन्त में न होने पर (स्त्रीलिङ्ग प्रत्यय होते हैं)। ๓๔. อุปมาสํหิตสหิตสํยตสหสผวามลกฺขณาทิตูรุตู. ३४. उपमा, संहित, सहित, संयत, सह, शफ, वाम और लक्षण आदि शब्दों के परे 'ऊरु' शब्द के होने पर 'ऊ' प्रत्यय होता है। ๓๕. ยุวา ติ. ३५. युवा। ๓๖. นฺตนฺตูนํ งีมฺหิโต วา. ३६. न् और तु प्रत्ययान्त शब्दों से ङी प्रत्यय होता है या विकल्प से। ๓๗. ภวโต โภโต. ३७. भवत् शब्द का भो हो जाता है। ๓๘. โคสฺสา-วง. ३८. गो शब्द का अवण आदेश होता है। ๓๙. ปุถุสฺส ปถวปุถวา. ३९. पृथु शब्द के स्थान पर पथव और पुथव आदेश होते हैं। ๔๐. สมาสนฺตฺว. ४०. समास के अन्त में। ๔๑. ปาปาทีหิ ภูมิยา. ४१. पाप आदि शब्दों के बाद भूमि शब्द होने पर। ๔๒. สงฺขฺยาหิ. ४२. संख्याओं से। ๔๓. นทีโคทาวรีนํ. ४३. नदी और गोदावरी शब्दों का। ๔๔. อสงฺขฺเยหิ จางฺคุลฺยานญฺญาสงฺขฺยตฺเถสุ. ४४. असंख्य और अंगुलि शब्दों से अन्य अर्थों में। ๔๕. ทีฆาโหวสฺเสกเทเสหิ [Pg.19] จ รตฺตฺยา. ४५. दीर्घ, अह, वर्ष और एकदेश शब्दों के बाद रात्रि शब्द होने पर। ๔๖. โคตฺวจตฺเถ จาโลเป. ४६. गो शब्द के त्व प्रत्यय के अर्थ में और लोप होने पर। ๔๗. รตฺตินฺทิวทารควจตุรสฺสา. ४७. रात्रि, दिवा, दार, गव और चतुरस्र। ๔๘. อายาเม-นุควํ. ४८. आयाम (विस्तार) अर्थ में अनुगवम्। ๔๙. อกฺขิสฺมา-ญฺญตฺเถ. ४९. अक्षि शब्द से अन्य अर्थ में। ๕๐. ทารุมหฺยงฺคุลฺยา. ५०. दारु, मही और अंगुलि शब्दों का। ๕๑. จิ วีติหาเร. ५१. व्यतिहार (विनिमय) अर्थ में चि। ๕๒. ลฺตฺวิตฺถิยูหิ โก. ५२. इकारान्त और उकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों से क प्रत्यय होता है। ๕๓. วา-ญฺญโต. ५३. अन्यत्र विकल्प से। ๕๔. อุตฺตรปเท. ५४. उत्तरपद के होने पर। ๕๕. อิมสฺสิทํ. ५५. इम शब्द का इदम् होता है। ๕๖. ปุํ ปุมสฺส วา. ५६. पुं शब्द का विकल्प से पुम होता है। ๕๗. ฏ นฺตนฺตูนํ. ५७. न् और तु प्रत्ययान्तों का ट प्रत्यय। ๕๘. อ. ५८. अ। ๕๙. มนาทฺยาปาทีน โม มเยจ. ५९. मन आदि और आप आदि शब्दों का म और मय प्रत्यय परे होने पर। ๖๐. ปรสฺส สงฺขฺยาสุ. ६०. संख्याओं में पर (बाद वाले) शब्द का। ๖๑. ชเน ปุถสฺสุ. ६१. जन शब्द परे होने पर पृथु का। ๖๒. โส ฉสฺสา-หายตเน วา. ६२. आयतन शब्द परे होने पर छ (छह) का स विकल्प से होता है। ๖๓. ลฺตุปิตาทีน มารงฺครงฺค. ६३. ऋतु, पितृ आदि शब्दों का आरंग और रंग आदेश। ๖๔. วิชฺชาโยนิสมฺพนฺธานมา ตตฺร จตฺเถ. ६४. विद्या और योनि सम्बन्धों में उस अर्थ में आ होता है। ๖๕. ปุตฺเต. ६५. 'पुत्र' शब्द के परे होने पर। ๖๖. จิสฺมึ. ६६. 'चि' प्रत्यय के परे होने पर। ๖๗. อิตฺถิยํ [Pg.20] ภาสิตปุมิตฺถี ปุเมเว-กตฺเถ. ६७. स्त्रीलिङ्ग में, यदि वह पुंल्लिङ्ग के समान अर्थ वाला हो, तो वह पुंल्लिङ्ग के समान ही होता है। ๖๘. กฺวจิ ปจฺจเย. ६८. कहीं प्रत्यय के परे होने पर। ๖๙. สพฺพาทโย วุตฺติมตฺเถ. ६९. 'सब्ब' आदि शब्द वृत्ति के अर्थ में होते हैं। ๗๐. ชายาย ชยํ ปติมฺหิ. ७०. 'पति' शब्द परे होने पर 'जाया' के स्थान पर 'जय' आदेश होता है। ๗๑. สญฺญาย มุโททกสฺส. ७१. संज्ञा (नाम) में 'मुद' और 'उदक' का (विकार) होता है। ๗๒. กุมฺภาทีสุ วา. ७२. 'कुम्भ' आदि शब्दों में विकल्प से होता है। ๗๓. โสตาทีสู โลโป. ७३. 'सोत' आदि में लोप होता है। ๗๔. ฏ นอุสฺส. ७४. 'नउ' के स्थान पर 'ट' होता है। ๗๕. อน สเร. ७५. स्वर परे होने पर 'अन' होता है। ๗๖. นขาทโย. ७६. 'नख' आदि शब्द। ๗๗. นโค วา-ปฺปาณินิ. ७७. अप्राणी (अचेतन) के अर्थ में 'नग' विकल्प से होता है। ๗๘. สหสฺส โสญฺญตฺเถ. ७८. अन्य अर्थ में 'सह' के स्थान पर 'स' होता है। ๗๙. สญฺญายํ. ७९. संज्ञा (नाम) में। ๘๐. อปฺปจฺจกฺเข. ८०. परोक्ष (अप्रत्यक्ष) अर्थ में। ๘๑. อกาเล สกตฺเถ. ८१. असमय (अकाल) के अर्थ में 'स' अपने अर्थ में होता है। ๘๒. คนฺถนฺตา-ธิกฺเย. ८२. ग्रन्थ के अन्त और आधिक्य के अर्थ में। ๘๓. สมานสฺส ปกฺขาทีสุ วา. ८३. 'पक्ष' आदि शब्दों के परे होने पर 'समान' के स्थान पर विकल्प से (स) होता है। ๘๔. อุทเร อิเย. ८४. 'उदर' शब्द परे होने पर 'इय' होता है। ๘๕. รีริกฺขเกสุ. ८५. 'रि', 'इ' और 'खक' प्रत्ययों के परे होने पर। ๘๖. สพฺพาทีนมา. ८६. 'सब्ब' आदि के स्थान पर 'आ' होता है। ๘๗. นฺตกิมิมานํ ฏากีฏี. ८७. 'न्त', 'किं' और 'इम' के स्थान पर क्रमशः 'टा', 'की' और 'टी' होते हैं। ๘๘. ตุมฺหา-มฺหานํ ตาเมกสฺมึ. ८८. एकवचन में 'तुम्ह' और 'अम्ह' के स्थान पर 'तं' और 'मं' होते हैं। ๘๙. ตํ [Pg.21] มม-ญฺญตฺร. ८९. अन्यत्र 'तं' और 'मं' होते हैं। ๙๐. เว-ตสฺเสฏ. ९०. 'एत' के स्थान पर 'वे' और 'एत' आदेश होते हैं। ๙๑. วิธาทีสุ ทฺวิสฺส ทุ. ९१. 'विधा' आदि के परे होने पर 'द्वि' के स्थान पर 'दु' होता है। ๙๒. ทิ คุณาทีสุ. ९२. 'गुण' आदि के परे होने पर 'दि' होता है। ๙๓. ตีสฺว. ९३. 'ति' के स्थान पर 'तय' होता है। ๙๔. อา สงฺขฺยายาสตาโทนญฺญตฺเถ. ९४. संख्या में 'आ' होता है, सौ से कम और अन्य अर्थ में। ๙๕. ติสฺเส. ९५. "ति" के स्थान पर "तिस्स" होता है। ๙๖. จตฺตาลีสาโท วา. ९६. "चत्तालीस" (चालीस) आदि में विकल्प से। ๙๗. ทฺวิสฺสา จ. ९७. और "द्वि" के स्थान पर "बा" आदि होते हैं। ๙๘. พาจตฺตาลีสา โท. ९८. "बाचत्तालीस" आदि में "दो" होता है। ๙๙. วีสติทเสสุ ปญฺจสฺส ปณฺณปนฺนา. ९९. "वीसति" और "दस" के परे होने पर "पञ्च" के स्थान पर "पण्ण" और "पन्न" होते हैं। ๑๐๐. จตุสฺส จุโจ ทเส. १००. "दस" के परे होने पर "चतु" के स्थान पर "चु" और "चो" होते हैं। ๑๐๑. ฉสฺส โส. १०१. "छ" के स्थान पर "सो" होता है। ๑๐๒. เอกฏฺฐานมา. १०२. "एक" और "अट्ठ" के स्थान पर "आ" होता है। ๑๐๓. ร สงฺขฺยาโต วา. १०३. संख्या के परे होने पर विकल्प से "र" होता है। ๑๐๔. ฉตีหิ โฬ จ. १०४. "छ" और "ति" के परे होने पर "ळ" भी होता है। ๑๐๕. จตุตฺถตติยานมฑฺฒุฑฺฒภิยา. १०५. "चतुर्थ" और "तृतीय" के स्थान पर "अड्ढुड्ढ" और "अभिय" होते हैं। ๑๐๖. ทุติยสฺส สห ทิยฑฺฒทิวฑฺฒา. १०६. "द्वितीय" के साथ "दियड्ढ" और "दिवड्ढ" होते हैं। ๑๐๗. สเร กท กุสฺสุตฺตรตฺเถ. १०७. स्वर के परे होने पर "कु" के स्थान पर "कद" होता है, उत्तर पद के अर्थ में। ๑๐๘. กา-ปฺปตฺเถ. १०८. "पत्त" के परे होने पर "का" होता है। ๑๐๙. ปุริเส วา. १०९. "पुरिस" के परे होने पर विकल्प से। ๑๑๐. ปุพฺพา-ปรชฺชสายมชฺเฌหา-หสฺส ณฺโห. ११०. "पुब्ब", "अपर", "अज्ज", "साय", "मज्झ" और "अह" के परे होने पर "अह" के स्थान पर "ण्ह" होता है। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ สมาสกณฺโฑ ตติโย. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण में समास का तीसरा काण्ड समाप्त हुआ। (๔) จตุตฺโถ กณฺโฑ (ณาทิ) (४) चतुर्थ काण्ड (णादि)। ๑. โณ [Pg.22] วา ปจฺเจ. १. विकल्प से "ण" प्रत्यय होता है। ๒. วจฺฉาทิโต ณานณายนา. २. "वच्छ" आदि से "ण", "आण" और "आयन" प्रत्यय होते हैं। ๑๙. กตา ณิโยว. (คณ) १९. "कत" आदि से "णिय" ही होता है। (गण)। ๒๐. กณฺโห พฺราหฺมเณ. (คณ) २०. ब्राह्मण अर्थ में "कण्ह" शब्द। (गण)। ๓. กตฺติกาวิธวาทีหิ เณยฺยเณรา. ३. "कत्तिका", "विधवा" आदि से "णेय्य" और "णेर" प्रत्यय होते हैं। ๔. ณฺย ทิจฺจาทีหิ. ४. "दिच्च" आदि से "ण्य" प्रत्यय होता है। ๕. อา ณิ. ५. "आ" होने पर "णि" प्रत्यय होता है। ๖. ราชโต ญฺโญ ชาติยํ. ६. जाति अर्थ में "राज" शब्द से "ञ्ञ" प्रत्यय होता है। ๗. ขตฺตา ยิยา. ७. "खत्त" से "यिय" प्रत्यय होता है। ๘. มนุโต สฺสสณ. ८. "मनु" से "स्स" और "ण" प्रत्यय होते हैं। ๙. ชนปทนามสฺมา ขตฺติยา รญฺเญ จ โณ. ९. जनपद के नाम से, क्षत्रिय और राजा के अर्थ में "ण" प्रत्यय होता है। ๑๐. ณฺย กุรุสิวีหิ. १०. "कुरु" और "सिवि" शब्दों से "ण्य" प्रत्यय होता है। ๑๑. ณ ราคา เตน รตฺตํ. ११. 'ण' प्रत्यय होता है 'राग' (रंग) के अर्थ में जिससे वह रंगा गया हो। ๑๒. นกฺขตฺเต-นินฺทุยุตฺเตน กาเล. १२. नक्षत्र और चन्द्रमा से युक्त काल के अर्थ में। ๑๓. สา-สฺส เทวตา ปุณฺณมาสี. १३. वह उसकी देवता है, पूर्णिमा के अर्थ में। ๑๔. ตมธีเต ตํ ชานาติ กณิกา จ. १४. उसे पढ़ता है या उसे जानता है, इस अर्थ में 'क' और 'णिक' प्रत्यय होते हैं। ๑๕. ตสฺส วิสเย เทเส. १५. उसके विषय या देश के अर्थ में। ๑๖. นิวาเส ตนฺนาเม. १६. निवास के अर्थ में, यदि वह उसका नाम हो। ๑๗. อทูรภเว. १७. जो दूर न हो (समीप) होने के अर्थ में। ๑๘. เตน นิพฺพตฺเต. १८. उससे उत्पन्न होने के अर्थ में। ๑๙. ตมีธตฺถิ[Pg.23]. १९. वह यहाँ है, इस अर्थ में। ๒๐. ตตฺร ภเว. २०. वहाँ होने के अर्थ में। ๒๑. อชฺชาทีหิ ตโน. २१. 'अज्ज' आदि शब्दों से 'तन' प्रत्यय होता है। ๒๒. ปุราโต โณ จ. २२. 'पुरा' शब्द से 'ण' प्रत्यय भी होता है। ๒๓. อมาตฺวจฺโจ. २३. 'अमा' शब्द से 'त्वच्च' प्रत्यय होता है। ๒๔. มชฺฌาทิตฺวิโม. २४. 'मज्झ' आदि शब्दों से 'त्विम' प्रत्यय होता है। ๒๕. กณ เณยฺย เณยฺยก ยิยา. २५. 'क', 'ण', 'णेय्य', 'णेय्यक' और 'यिय' प्रत्यय होते हैं। ๒๖. ณิโก. २६. 'णिक' प्रत्यय होता है। ๒๗. ตมสฺส สิปฺปํ สีลํ ปณฺยํ ปหรณํ ปโยชนํ. २७. वह उसका शिल्प (कला), शील (स्वभाव), पण्य (व्यापार की वस्तु), प्रहरण (शस्त्र) या प्रयोजन है। ๒๘. ตํ หนฺต รหติ คจฺฉตุญฺฉติ จรติ. २८. उसे मारने वाला, योग्य, जाने वाला, उञ्छ (खोजने) वाला या विचरण करने वाला। ๒๙. เตน กตํ กีตํ พทฺธมภิสงฺขตํ สํสฏฺฐํ หตํ หนฺติ ชิตํ ชยติ ทิพฺพติ ขณติ ตรติ จรติ วหติ ชีวติ. २९. उसके द्वारा किया गया, खरीदा गया, बाँधा गया, संस्कारित किया गया, मिश्रित किया गया, मारा गया, मारता है, जीता गया, जीतता है, खेलता है, खोदता है, पार करता है, चलता है, ढोता है, जीता है। ๓๐. ตสฺส สํวตฺตติ. ३०. उसके लिए प्रवृत्त होता है। ๓๑. ตโต สมฺภูตมาคตํ. ३१. उससे उत्पन्न या आया हुआ। ๓๒. ตตฺถ วสติ วิทิโต ภตฺโต นิยุตฺโต. ३२. वहाँ बसता है, जाना जाता है, भक्त (अनुरक्त) है, नियुक्त है। ๓๓. ตสฺสิทํ. ३३. यह उसका है। ๓๔. โณ. ३४. 'ण' प्रत्यय होता है। ๓๕. ควาทีหิ โย. ३५. 'गो' आदि शब्दों से 'य' प्रत्यय होता है। ๓๖. ปิติโต ภาตริ เรยฺยณ. ३६. पिता की ओर से भाई के अर्थ में 'रेय्यण' प्रत्यय होता है। ๓๗. มาติโต จ ภคินิยํ โฉ. ३७. और माता की ओर से बहन के अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। ๓๘. มาตาปิตูสฺวา-มโห. ३८. माता और पिता के अर्थ में 'आमहो' प्रत्यय होता है। ๓๙. หิเต [Pg.24] เรยฺยณ. ३९. हित के अर्थ में 'रेय्यण' प्रत्यय होता है। ๔๐. นินฺทา-ญฺญาต-ปฺปปฏิภาครสฺส ทยาสญฺญาสุ โก. ४०. निन्दा, अज्ञात, अल्प, प्रतिरूप (समान), ह्रस्व, दया और संज्ञा के अर्थ में 'क' प्रत्यय होता है। ๒๑. วตฺถิโต อิวตฺเถ เอยฺโย. (คณ) २१. 'वत्थि' आदि शब्दों से 'इव' (समान) के अर्थ में 'एय्य' प्रत्यय होता है। (गण) ๒๒. สิลาย เณยฺโย จ. (คณ) २२. 'सिला' शब्द से 'णेय्य' प्रत्यय भी होता है। (गण) ๒๓. สาขาทีหิ อิโย. (คณ) २३. 'साखा' आदि शब्दों से 'इय' प्रत्यय होता है। (गण) ๒๔. มุขาทีหิ โย. (คณ) २४. 'मुख' आदि शब्दों से 'य' प्रत्यय होता है। (गण) ๒๕. อากสฺมิเก ภิเธเย อีโย. (คณ) २५. 'आकस्मिक' (अचानक) अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है। (गण) ๒๖. สกฺกราทีหิ โณ. (คณ) २६. 'सक्कर' आदि शब्दों से 'ण' प्रत्यय होता है। (गण) ๒๗. องฺคุลฺยาทีหิ ณิโก. (คณ) २७. 'अङ्गुलि' आदि शब्दों से 'णिक' प्रत्यय होता है। (गण) ๔๑. ตมสฺส ปริมาณํ ณิโก จ. ४१. 'उसका परिमाण' इस अर्थ में 'णिक' प्रत्यय भी होता है। ๔๒. ยเต-เตหิ ตฺตโก. ४२. 'यत' और 'एत' शब्दों से 'त्तक' प्रत्यय होता है। ๔๓. สพฺพา จา-วนฺถุ. ४३. 'सब्ब' शब्द से 'वन्तु' प्रत्यय होता है। ๔๔. กิมฺหา รติ รีว รีวตก ริตฺตกา. ४४. 'किं' शब्द से 'रति', 'रीव', 'रीवतक' और 'रित्तक' प्रत्यय होते हैं। ๔๕. สญฺชาตํ ตารกาทิตฺวิโต. ४५. 'तारा' आदि शब्दों से 'सञ्जात' (उत्पन्न) अर्थ में 'इत' प्रत्यय होता है। ๔๖. มาเน มตฺโต. ४६. 'मान' (माप) के अर्थ में 'मत्त' प्रत्यय होता है। ๔๗. ตคฺโฆ จุทฺธํ. ४७. 'ऊर्ध्व' (ऊपर) के अर्थ में 'तग्घ' प्रत्यय होता है। ๔๘. โณ จ ปุริสา. ४८. 'पुरिस' शब्द से 'ण' प्रत्यय भी होता है। ๔๙. อยุภทฺวิตีหํเส. ४९. 'आयु', 'उभ', 'द्वि' और 'ति' शब्दों से 'अंस' (भाग) अर्थ में प्रत्यय होते हैं। ๕๐. สงฺขฺยาย สจฺจุตีสา-ส, ทสนฺตา-ธิกา-สฺมึ สตสหสฺเส โฑ. ५०. संख्यावाचक शब्दों में, छह से लेकर तीस तक, और दस जिनके अंत में हो, लाख से अधिक होने पर 'ड' प्रत्यय होता है। ๕๑. ตสฺส ปูรเณ-กาทสาทิโต วา. ५१. 'पूरण' (क्रमवाचक) अर्थ में 'एकादस' आदि शब्दों से विकल्प से प्रत्यय होता है। ๕๒. ม [Pg.25] ปญฺจาทิกตีหิ. ५२. 'पञ्च' आदि शब्दों से 'म' प्रत्यय होता है। ๕๓. สตาทีนมิ จ. ५३. 'सत' आदि शब्दों से भी 'म' प्रत्यय होता है। ๕๔. ฉา ฏฺฐฏฺฐมา. ५४. 'छ' (छह) शब्द से 'ट्ठ' और 'ट्ठम' रूप होते हैं। ๕๕. เอกา กากฺย-สหาเย. ५५. 'एक' शब्द से 'असहाय' (अकेला) अर्थ में 'क' प्रत्यय होता है। ๕๖. วจฺฉาทีหิ ตนุตฺเต ตโร. ५६. 'वच्छ' आदि शब्दों से 'तनुत्त' (छोटापन) अर्थ में 'तर' प्रत्यय होता है। ๕๗. กิมฺหา นิทฺธารเณ รตร รตมา. ५७. 'किं' शब्द से 'निद्धारण' (छाँटने) के अर्थ में 'रतर' और 'रतम' प्रत्यय होते हैं। ๕๘. เตน ทตฺเต ลิยา. ५८. 'उसके द्वारा दिया गया' इस अर्थ में 'लिय' प्रत्यय होता है। ๕๙. ตสฺส ภาวกมฺเมสุ ตฺต ตา ตฺตน ณฺย เณยฺยณิย ณิยา. ५९. 'भाव' और 'कर्म' अर्थों में 'त्त', 'ता', 'त्तन', 'ण्य', 'णेय्य', 'णिय' और 'णिया' प्रत्यय होते हैं। ๖๐. พฺย วทฺธทาสา วา. ६०. 'वद्ध' और 'दास' शब्दों से विकल्प से 'ब्य' प्रत्यय होता है। ๖๑. นณ ยุวา โพ จ วสฺส. ६१. 'युव' शब्द से 'नण' और 'वस्स' शब्द से 'ब' प्रत्यय होता है। ๖๒. อณฺวาทิตฺวิโม. ६२. 'अणु' आदि शब्दों से 'इम' प्रत्यय होता है। ๖๓. ภาวา เตน นิพฺพตฺเต. ६३. 'भाव' वाचक शब्दों से 'उसके द्वारा निष्पन्न' अर्थ में प्रत्यय होता है। ๖๔. ตร ตมิ-สฺสิกิยิฏฺฐาติสเย. ६४. अतिशय (श्रेष्ठता) के अर्थ में 'तर', 'तम', 'इस्सिक', 'इय' और 'इट्ठ' प्रत्यय होते हैं। ๖๕. ตนฺนิสฺสิเต ลฺโล. ६५. उस पर आश्रित होने के अर्थ में 'ल' प्रत्यय होता है। ๖๖. ตสฺส วิการาวยเวสุ ณ ณิก เณยฺย มยา. ६६. उसके विकार (परिवर्तन) और अवयव (अंश) के अर्थ में 'ण', 'णिक', 'णेय्य' और 'मय' प्रत्यय होते हैं। ๖๗. ชตุโต สฺสณ วา. ६७. 'जतु' (लाख) शब्द से 'स्सण' प्रत्यय विकल्प से होता है। ๖๘. สมูเห กณ ณ ณิกา. ६८. समूह के अर्थ में 'कण', 'ण' और 'णिका' प्रत्यय होते हैं। ๖๙. ชนาทีหิ ตา. ६९. 'जन' आदि शब्दों से 'ता' प्रत्यय होता है। ๗๐. อิโย หิเต. ७०. हित (कल्याणकारी) के अर्थ में 'इय' प्रत्यय होता है। ๗๑. จกฺขฺวาทิโต สฺโส. ७१. 'चक्खु' (चक्षु) आदि शब्दों से 'स्स' प्रत्यय होता है। ๗๒. ณฺโย ตตฺถ สาธุ. ७२. 'उसमें कुशल' (तत्र साधु) के अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय होता है। ๗๓. กมฺมา [Pg.26] นิยญฺญา. ७३. 'कम्म' शब्द से 'निय' और 'अञ्ञ' प्रत्यय होते हैं। ๗๔. กถาทิตฺวิโก. ७४. 'कथा' आदि शब्दों से 'इको' (इक्क) प्रत्यय होता है। ๗๕. ปถาทีหิ เณยฺโย. ७५. 'पथ' आदि शब्दों से 'णेय्य' प्रत्यय होता है। ๗๖. ทกฺขิณายา-รเห. ७६. 'दक्षिणा' के योग्य (अर्ह) अर्थ में (प्रत्यय होता है)। ๗๗. ราโย ตุมนฺตา. ७७. 'तुमुन्' प्रत्ययान्त शब्दों से 'राय' प्रत्यय होता है। ๗๘. ตเมตฺถ-สฺส-ตฺถีติ มนฺตุ. ७८. 'वह इसमें है' या 'इसका वह है' (तदस्यास्ति) इस अर्थ में 'मन्तु' प्रत्यय होता है। ๗๙. วนฺตฺววณฺณา. ७९. अकारान्त और आकारान्त शब्दों से 'वन्तु' प्रत्यय होता है। ๘๐. ทณฺฑาทิตฺวิก อี วา. ८०. 'दण्ड' आदि शब्दों से 'इक्क' और 'ई' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। ๒๘. อุตฺตมีเณ ว ธนา อิโก. (คณ) २८. 'धन' शब्द से उत्तमर्ण (ऋणदाता) के अर्थ में 'इक्क' प्रत्यय होता है। ๒๙. อสนฺนิหิเต อตฺถา. (คณ) २९. सन्निहित न होने (असन्निहित) के अर्थ में 'अत्थ' प्रत्यय होता है। ๓๐. ตทนฺตา จ. (คณ) ३०. और तदन्त (उसके अन्त वाले) शब्दों से भी। ๓๑. วณฺณนฺตา อีเยว. (คณ) ३१. 'वण्ण' अन्त वाले शब्दों से 'ई' ही प्रत्यय होता है। ๓๒. หตฺถ ทนฺเตหิ ชาติยํ. (คณ) ३२. 'हत्थ' और 'दन्त' शब्दों से जाति के अर्थ में (प्रत्यय होता है)। ๓๓. วณฺณโต พฺรหฺมจาริมฺหิ. (คณ) ३३. 'वण्ण' शब्द से ब्रह्मचारी के अर्थ में (प्रत्यय होता है)। ๓๔. โปกฺขราทิโต เทเส. (คณ) ३४. 'पोक्खर' आदि शब्दों से देश (स्थान) के अर्थ में (प्रत्यय होता है)। ๓๕. นาวายิ-โก. (คณ) ३५. 'नावा' शब्द से 'इक्क' प्रत्यय होता है। ๓๖. สุขทุกฺขา อี. (คณ) ३६. 'सुख' और 'दुक्ख' शब्दों से 'ई' प्रत्यय होता है। ๓๗. พลา พาหูรุปุพฺพา จ. (คณ) ३७. 'बल' शब्द से और 'बाहु' या 'ऊरु' शब्द जिसके पूर्व में हों, उनसे (प्रत्यय होता है)। ๘๑. ตปาทีหิ สฺสี. ८१. 'तप' आदि शब्दों से 'स्सी' प्रत्यय होता है। ๘๒. มุขาทิโต โร. ८२. 'मुख' आदि शब्दों से 'र' प्रत्यय होता है। ๓๘. ทนฺตสฺสุ จ อุนฺนตทนฺเต. (คณ) ३८. 'दन्त' शब्द से उन्नत दाँत के अर्थ में 'सु' प्रत्यय होता है। ๘๓. ตุนฺทฺยาทีหิ โภ. ८३. 'तुण्डि' आदि शब्दों से 'भ' प्रत्यय होता है। ๘๔. สทฺธาทิตฺว[Pg.27]. ८४. 'श्रद्धा' आदि शब्दों से 'त्व' प्रत्यय होता है। ๘๕. โณ ตปา. ८५. 'तप' शब्द से 'ण' प्रत्यय होता है। ๘๖. อาลฺวภิชฺฌาทีหิ. ८६. 'अभिध्या' आदि शब्दों से 'आलु' प्रत्यय होता है। ๘๗. ปิจฺฉาทิตฺวิโล. ८७. 'पिच्छा' आदि शब्दों से 'इल' प्रत्यय होता है। ๘๘. สีลาทิโต โว. ८८. 'शील' आदि शब्दों से 'व' प्रत्यय होता है। ๓๙. อณฺณา นิจฺจํ. (คณ) ३९. 'अण्ण' प्रत्यय नित्य होता है। (गण) ๔๐. คาณฺฑิราชีหิ สญฺญายํ. (คณ) ४०. संज्ञा के अर्थ में 'गाण्डि' और 'राजि' शब्दों से (प्रत्यय) होते हैं। (गण) ๘๙. มายาเมธาหิ วี. ८९. 'माया' और 'मेधा' शब्दों से 'वी' प्रत्यय होता है। ๙๐. สิสฺสเร อามฺยุวามี. ९०. 'आमि', 'युव' और 'आमि' के स्थान पर 'सिस्' और 'रे' आदेश होते हैं। ๙๑. ลกฺขฺยา โณ อ จ. ९१. 'लक्ष्मी' शब्द से 'ण' और 'अ' प्रत्यय होते हैं। ๙๒. องฺคา โน กลฺยาเณ. ९२. कल्याण के अर्थ में 'अङ्ग' शब्द से 'न' प्रत्यय होता है। ๙๓. โส โลมา. ९३. 'लोम' शब्द से 'स' प्रत्यय होता है। ๙๔. อิมิยา. ९४. 'इम' प्रत्यय होता है। ๙๕. โต ปญฺจมฺยา. ९५. पञ्चमी विभक्ति के अर्थ में 'तो' प्रत्यय होता है। ๙๖. อิโต เตตฺโต กุโต. ९६. इतः, तेत्तो, कुतः (आदि शब्द बनते हैं)। ๙๗. อภฺยาทีหิ. ९७. 'अभि' आदि शब्दों से (प्रत्यय होते हैं)। ๙๘. อาทฺยาทีหิ. ९८. 'आदि' आदि शब्दों से (प्रत्यय होते हैं)। ๙๙. สพฺพาทิโต สตฺตมฺยา ตฺรตฺถา. ९९. 'सब्ब' आदि शब्दों से सप्तमी विभक्ति के अर्थ में 'त्र' और 'त्थ' प्रत्यय होते हैं। ๑๐๐. กตฺเถ-ตฺถกุตฺรา-ตฺรกฺเว-หิธ. १००. कत्थ, एत्थ, कुत्र, अत्र, क्व, इह, इध (आदि शब्द बनते हैं)। ๑๐๑. ธิ สพฺพา วา. १०१. 'सब्ब' शब्द से विकल्प से 'धि' प्रत्यय होता है। ๑๐๒. ยา หึ. १०२. 'य' शब्द से 'हिं' प्रत्यय होता है। ๑๐๓. ตา [Pg.28] หํ จ. १०३. 'त' शब्द से 'हं' प्रत्यय भी होता है। ๑๐๔. กุหึ กหํ. १०४. कुहिं, कहं (आदि शब्द बनते हैं)। ๑๐๕. สพฺเพ-กญฺญ ย เตหิ กาเล ทา. १०५. 'सब्ब', 'एक', 'अञ्ञ', 'य' और 'त' शब्दों से काल के अर्थ में 'दा' प्रत्यय होता है। ๑๐๖. กทา กุทา สทา-ธุเน-ทานิ. १०६. कदा, कुदा, सदा, अधुना, इदानि (आदि शब्द बनते हैं)। ๑๐๗. อชฺชสชฺชฺวปรชฺชฺเว-ตรหิกรหา. १०७. अज्ज, सज्ज्व, अपरेज्ज्व, एतरहि, करहि (आदि शब्द बनते हैं)। ๑๐๘. สพฺพาทีหิ ปกาเร ถา. १०८. 'सब्ब' आदि शब्दों से प्रकार के अर्थ में 'था' प्रत्यय होता है। ๑๐๙. กถมิตฺถํ. १०९. कथं, इत्थं (आदि शब्द बनते हैं)। ๑๑๐. ธา สงฺขฺยาหิ. ११०. संख्यावाचक शब्दों से 'धा' प्रत्यय होता है। ๑๑๑. เวกา ชฺฌํ. १११. वि के स्थान पर एक और ज्झं प्रत्यय होता है। ๑๑๒. ทฺวิตีเหธา. ११२. द्वि और ति से धा प्रत्यय होता है। ๑๑๓. ตพฺพติ ชาติโย. ११३. त प्रत्यय जाति (प्रकार) के अर्थ में होता है। ๑๑๔. วารสงฺขฺยาย กฺขตฺตุํ. ११४. आवृत्ति की संख्या में क्खत्तुं प्रत्यय होता है। ๑๑๕. กติมฺหา. ११५. कति शब्द से भी। ๑๑๖. พหุมฺหา ธา จ ปจฺจาสตฺติยํ. ११६. बहु शब्द से धा प्रत्यय और सामीप्य के अर्थ में। ๑๑๗. สกึ วา. ११७. सकिं विकल्प से होता है। ๑๑๘. โส วีจฺฉา ปกาเรสุ. ११८. सो प्रत्यय वीप्सा और प्रकार के अर्थों में होता है। ๑๑๙. อภูตตพฺภาเว กราสภูโยเค วิการา จี. ११९. अभूततद्भाव के अर्थ में कृ, अस् और भू धातुओं के योग में विकार होने पर ची प्रत्यय होता है। ๑๒๐. ทิสฺสนฺตญฺเญปิ ปจฺจยา. १२०. अन्य प्रत्यय भी देखे जाते हैं। ๑๒๑. อญฺญสฺมึ. १२१. अन्य अर्थ में। ๑๒๒. สกตฺเถ. १२२. स्वार्थ में। ๑๒๓. โลโป. १२३. लोप होता है। ๑๒๔. สรานมาทิสฺสา-ยุวณฺณสฺสา [Pg.29] เอ โอ ณานุพนฺเธ. १२४. ण अनुबन्ध होने पर आदि स्वर की वृद्धि और इ, उ वर्णों के स्थान पर ए, ओ होता है। ๑๒๕. สํโยเค กฺวจิ. १२५. संयोग होने पर कहीं-कहीं। ๑๒๖. มชฺเฌ. १२६. मध्य में। ๑๒๗. โกสชฺชาชฺชว ปาริสชฺช โสหชฺช มทฺทวาริสฺสาสภาชญฺญ เถยฺย พาหุสจฺจา. १२७. कोसज्ज, अज्जव, पारिसज्ज, सोहज्ज, मद्दव, आरिस्स, आसभ, आजञ्ञ, थेय्य और बाहुसच्च। ๑๒๘. มนาทีนํ สก. १२८. मन आदि शब्दों के साथ सक प्रत्यय होता है। ๑๒๙. อุวณฺณสฺสา-วง สเร. १२९. स्वर परे होने पर उ वर्ण का अवङ् आदेश होता है। ๑๓๐. ยมฺหิ โคสฺส จ. १३०. य परे होने पर गो शब्द का भी। ๑๓๑. โลโป-วณฺณิวณฺณานํ. १३१. इ और ई वर्णों का लोप होता है। ๑๓๒. รานุพนฺเธ-นฺตสราทิสฺส. १३२. र अनुबन्ध होने पर अन्त्य स्वर का लोप और आदि स्वर की वृद्धि होती है। ๑๓๓. กิสมหตมิเม กสมหา. १३३. किस और महत के स्थान पर क्रमशः कस और महा आदेश होते हैं। ๑๓๔. อายุสฺสา-ยส มนฺตุมฺหิ. १३४. मन्तु प्रत्यय परे होने पर आयु का आयस आदेश होता है। ๑๓๕. โช วุทฺธสฺสิยิฏฺเฐสุ. १३५. इय और इट्ठ प्रत्यय परे होने पर वृद्ध का ज आदेश होता है। ๑๓๖. พาฬฺหนฺติกปสตฺถานํ สาธ เนท สา. १३६. बाळ्ह, अन्तिक और पसत्थ के स्थान पर क्रमशः साध, नेद और सा आदेश होते हैं। ๑๓๗. กณกนา-ปฺปยุวานํ. १३७. अप्प और युव के स्थान पर क्रमशः कण और कन आदेश होते हैं। ๑๓๘. โลโป วีมนฺตุวนฺตูนํ. १३८. वी, मन्तु और वन्तु प्रत्ययों का लोप होता है। ๑๓๙. เฑ สติสฺส ติสฺส. १३९. डे परे होने पर सति का तिस्स आदेश होता है। ๑๔๐. เอตสฺเสฏ ตฺตเก. १४०. त्तक परे होने पर एत का एट आदेश होता है। ๑๔๑. ณิกสฺสิ โย วา. १४१. ṇi-प्रत्यय के परे होने पर 'क' का 'य' विकल्प से होता है। ๑๔๒. อธาตุสฺส เก-สฺยาทิโต เฆ-สฺสิ. १४२. अधातु के 'क' और 'सि' आदि के परे होने पर 'घ' का 'सि' होता है। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ กาทิกณฺโฑ จตุตฺโถ. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण में 'कादि' काण्ड चौथा है। (๕) ปญฺจโม กณฺโฑ (ขาทิ) (५) पाँचवाँ काण्ड (खादि) ๑. ติชมาเนหิ [Pg.30] ขสา ขมาวีมํสาสุ. १. 'तिज' और 'मान' धातुओं से क्षमा और मीमांसा के अर्थ में 'ख' और 'स' प्रत्यय होते हैं। ๒. กิตา ติกิจฺฉาสํสเยสุ โฉ. २. 'कित' धातु से चिकित्सा और संशय के अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। ๓. นินฺทายํ คุปพธา พสฺส โภจ. ३. निन्दा के अर्थ में 'गुप' और 'बध' धातुओं से 'ब' का 'भ' और 'छ' प्रत्यय होता है। ๔. ตุํสฺมา โลโป จิจฺฉายํ เต. ४. इच्छा के अर्थ में 'तुं' प्रत्यय का लोप होता है और 'ते' होता है। ๕. อีโย กมฺมา. ५. कर्म से 'ईय' प्रत्यय होता है। ๖. อุปมา-นาจาเร. ६. उपमा और आचार के अर्थ में। ๗. อาธารา. ७. आधार से। ๘. กตฺตุตา-โย. ८. कर्ता के अर्थ में 'य' प्रत्यय होता है। ๙. จฺยตฺเถ. ९. 'च्वि' के अर्थ में। ๑๐. สทฺทาทีนิ กโรติ. १०. 'शब्द' आदि करता है। ๑๑. นโมตฺวสฺโส. ११. 'नम' आदि के 'अ' का ह्रस्व होता है। ๑๒. ธาตฺวตฺเถ นามสฺมิ. १२. नाम के धातु के अर्थ में होने पर। ๑๓. สจฺจาทีหาปิ. १३. 'सच्च' आदि में भी। ๑๔. กฺริยตฺถา. १४. क्रिया के अर्थ में। ๑๕. จุราทิโต ณิ. १५. 'चुरादि' गण से 'णि' प्रत्यय होता है। ๑๖. ปโยชกพฺยาปาเร กาปิ จ. १६. प्रयोजक के व्यापार में 'का' और 'अपि' भी होते हैं। ๑๗. กฺโย ภาวกมฺเมสฺวปโรกฺเขสุ มานนฺตตฺยาทีสุ. १७. भाव और कर्म में, अपरोक्ष (वर्तमान) में, 'मान', 'तन्त' आदि धातुओं से 'क्य' प्रत्यय होता है। ๑๘. กตฺตริ โล. १८. कर्ता के अर्थ में 'ल' प्रत्यय होता है। ๑๙. มํ จ รุธาทีนํ. १९. 'रुधादि' गण की धातुओं को 'मं' आगम होता है। ๒๐. ณิณาปฺยาปีหิ วา. २०. 'णि', 'णाप्य' और 'आपि' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। ๒๑. ทิวาทีหิ [Pg.31] ยก. २१. 'दिवादि' गण से 'यक' प्रत्यय होता है। ๒๒. ตุทาทีหิ โก. २२. 'तुदादि' गण से 'क' प्रत्यय होता है। ๒๓. ชฺยาทีหิกฺนา. २३. 'ज्यादि' गण से 'क्ना' प्रत्यय होता है। ๒๔. กฺยาทีหิ กฺณา. २४. 'क्यादि' गण से 'क्णा' प्रत्यय होता है। ๒๕. สฺวาทีหิ กฺโณ. २५. 'स्वादि' गण से 'क्णो' प्रत्यय होता है। ๒๖. ตนาทิตฺโว. २६. 'तनादि' गण से 'उ' प्रत्यय होता है। ๒๗. ภาวกมฺเมสุ ตพฺพานียา. २७. भाव और कर्म अर्थों में 'तब्ब' और 'अनीय' प्रत्यय होते हैं। ๒๘. ฆฺยณ. २८. 'घ्य' और 'ण' प्रत्यय। ๒๙. อาสฺเส จ. २९. और 'आस्' धातु से। ๓๐. วทาทีหิ โย. ३०. 'वद्' आदि धातुओं से 'य' प्रत्यय होता है। ๔๑. ภุชานฺเน. (คณ) ४१. 'भुज्' धातु से 'अन्न' प्रत्यय (गण)। ๓๑. กิจฺจ ฆจฺจ ภจฺจ ภพฺพ เลยฺยา. ३१. किच्च, घच्च, भच्च, भब्ब, लेय्य। ๔๒. สญฺญายํ ภรา. (คณ) ४२. संज्ञा के अर्थ में 'भर' आदि (गण)। ๓๒. คุหาทีหิ ยก. ३२. 'गुह्' आदि धातुओं से 'यक' प्रत्यय होता है। ๓๓. กตฺตริ ลฺตุณกา. ३३. कर्ता अर्थ में 'लतु' और 'णक' प्रत्यय होते हैं। ๓๔. อาวี. ३४. 'आवी' प्रत्यय। ๓๕. อาสึสาย-มโก. ३५. आशा (आसिंसा) के अर्थ में 'मक' प्रत्यय होता है। ๓๖. กรา ณโน. ३६. 'कर्' धातु से 'णन' प्रत्यय होता है। ๓๗. หาโต วีหิกาเลสุ. ३७. 'हा' धातु से 'वी' प्रत्यय होता है। ๓๘. วิทา กู. ३८. 'विद्' धातु से 'कू' प्रत्यय होता है। ๓๙. วิโต ญาโต. ३९. 'विद्' से 'वित' और 'ज्ञा' से 'ज्ञात'। ๔๐. กมฺมา[Pg.32]. ४०. कर्म के अर्थ में। ๔๑. กฺว จณ. ४१. 'क्व' और 'ण' प्रत्यय। ๔๒. คมา รู. ४२. 'गम्' धातु से 'रू' प्रत्यय होता है। ๔๓. สมานญฺญภวนฺตยาทิตูปมานา ทิสา กมฺเมรีริกฺขากา. ४३. समान, अन्य, भवन्त, यादि आदि उपमानों के उपपद रहते 'दिस्' धातु से 'ईर', 'इक्ख' और 'आक' प्रत्यय होते हैं। ๔๔. ภาวการเก สฺวฆณฆกา. ४४. भाव और कारक अर्थों में 'घ', 'ण' और 'घक' प्रत्यय होते हैं। ๔๕. ทาธาตฺวิ. ४५. 'दा' धातु से 'इ' प्रत्यय होता है। ๔๖. วมาทีหฺยถุ. ४६. 'वम्' आदि धातुओं से 'अथु' प्रत्यय होता है। ๔๗. กฺวิ. ४७. 'क्वि' प्रत्यय। ๔๘. อโน. ४८. 'अन' प्रत्यय। ๔๙. อิตฺถิยมณ ตฺติ ก ยกยา จ. ४९. स्त्रीलिंग में 'अण', 'त्ति', 'क', 'यक' और 'या' प्रत्यय होते हैं। ๕๐. ชาหาหิ นิ. ५०. 'जा' और 'हा' धातुओं से 'नि' प्रत्यय होता है। ๕๑. กรา ริริโย. ५१. 'कर्' धातु से 'रि' और 'रिय' प्रत्यय होते हैं। ๕๒. อิ กิ ตี สรูเป. ५२. 'इ', 'कि' और 'ति' प्रत्यय स्वरूप में। ๕๓. สีลา-ภิกฺขญฺญา-วสฺสเกสุ ณี. ५३. शील (स्वभाव), भिक्षा, आज्ञा और आवश्यक अर्थों में 'णी' प्रत्यय होता है। ๕๔. ถาวริ-ตฺตร, ภงฺคุร, ภิทุร, ภาสุร, ภสฺสรา. ५४. थावर, इत्तर, भङ्गुर, भिदुर, भासुर, भस्सर। ๕๕. กตฺตริ ภูเต กฺตฺวนฺตุตฺตาวี. ५५. कर्ता अर्थ में, भूतकाल में 'क्तवन्तु' और 'तावी' प्रत्यय होते हैं। ๕๖. กฺโต ภาวกมฺเมสุ. ५६. 'क्त' प्रत्यय भाव और कर्म अर्थ में होता है। ๕๗. กตฺตริ จารมฺเภ. ५७. और आरम्भ अर्थ में कर्ता में भी (क्त प्रत्यय होता है)। ๕๘. ฐา-ส, วส, สิลิส, สี, รุห, ชร, ชนีหิ. ५८. ठा (स्था), आस, वस, सिलिस, सी, रुह, जर और जन धातुओं से (कर्ता में क्त प्रत्यय होता है)। ๕๙. คมนตฺถา กมฺมกาธาเร จ. ५९. गमनार्थक धातुओं से कर्म और आधार अर्थ में भी (क्त प्रत्यय होता है)। ๖๐. อาหารตฺถา[Pg.33]. ६०. आहारार्थक (भोजन अर्थ वाली) धातुओं से भी। ๖๑. ตุํ ตาเย ตเว ภาเว ภวิสฺสติ กฺริยายํ ตทตฺถายํ. ६१. भाव अर्थ में, भविष्यत् काल में, क्रिया के निमित्त क्रिया होने पर 'तुं', 'ताये' और 'तवे' प्रत्यय होते हैं। ๖๒. ปฏิเสเธ-ลํขลูนํ, ตุนกฺตฺวาน, กฺตฺวา วา. ६२. 'अलं' और 'खलु' शब्दों के साथ निषेध अर्थ में 'तुन', 'क्त्वान' और 'क्त्व' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। ๖๓. ปุพฺเพ-กกตฺตุกานํ. ६३. समान कर्ता वाली क्रियाओं में पूर्ववर्ती क्रिया में (क्त्व आदि प्रत्यय होते हैं)। ๖๔. นฺโต กตฺตริ วตฺตมาเน. ६४. वर्तमान काल में कर्ता अर्थ में 'अन्त' (न्त) प्रत्यय होता है। ๖๕. มาโน. ६५. 'मान' प्रत्यय भी (वर्तमान काल में कर्ता अर्थ में होता है)। ๖๖. ภาวกมฺเมสุ. ६६. भाव और कर्म अर्थ में भी (अन्त और मान प्रत्यय होते हैं)। ๖๗. เต สฺสปุพฺพา-นาคเต. ६७. भविष्यत् काल में वे (अन्त और मान) 'स्स' के बाद होते हैं। ๖๘. ณฺวาทโย. ६८. 'ण्वु' आदि प्रत्यय भी होते हैं। ๖๙. ขฉสานเมกสฺสโรทิ ทฺเว. ६९. 'ख', 'छ' और 'स' प्रत्ययों के परे होने पर एकाक्षर धातु का द्वित्व होता है। ๗๐. ปโรกฺขายญฺจ. ७०. और परोक्षा (लिट् लकार) में भी (द्वित्व होता है)। ๗๑. อาทิสฺมา สรา. ७१. आदि स्वर से (द्वित्व होता है)। ๗๒. น ปุน. ७२. पुनः (दोबारा) नहीं। ๗๓. ยถิฏฺฐํ สฺยาทิโน. ७३. 'सि' आदि प्रत्ययों के परे होने पर इच्छानुसार (कार्य होता है)। ๗๔. รสฺโส ปุพฺพสฺส. ७४. पूर्व (वर्ण) का ह्रस्व होता है। ๗๕. โลโป-นาทิพฺยญฺชนสฺส. ७५. आदि व्यंजन को छोड़कर अन्य व्यंजन का लोप होता है। ๗๖. ขฉเสสฺวสฺสิ. ७६. 'ख', 'छ' और 'स' प्रत्ययों के परे होने पर (अकार का) 'इ' होता है। ๗๗. คุปิสฺสุสฺส. ७७. 'गुप्' धातु के (अकार) का 'उ' होता है। ๗๘. จตุตฺถ ทุติยานํ ตติยปฐมา. ७८. (द्वित्व में) चौथे और दूसरे वर्णों के स्थान पर क्रमशः तीसरा और पहला वर्ण होता है। ๗๙. กวคฺคหานํ จวคฺคชา. ७९. क-वर्ग के वर्णों के स्थान पर च-वर्ग के वर्ण होते हैं। ๘๐. มานสฺส [Pg.34] วี ปรสฺส จ มํ. ८०. 'मान' (धातु) के स्थान पर 'वी' परे होने पर 'मं' होता है। ๘๑. กิตสฺสา-สํสเย ติ วา. ८१. 'कित' (धातु) के विषय में असंशय अर्थ में 'ति' विकल्प से होता है। ๘๒. ยุวณฺณานเม โอ ปจฺจเย. ८२. प्रत्यय परे होने पर इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर क्रमशः 'ए' और 'ओ' होता है। ๘๓. ลหุสฺสุปานฺตสฺส. ८३. लघु उपधा (अन्तिम से पहले वाला वर्ण) का (गुण होता है)। ๘๔. อสฺสา ณานุพนฺเธ. ८४. 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर 'अ' का (वृद्धि/आ) होता है। ๘๕. น เต กานุพนฺธนาคเมสุ. ८५. वे 'क' अनुबन्ध और आगमों में नहीं होते हैं। ๘๖. วา กฺวจิ. ८६. कहीं विकल्प से। ๘๗. อญฺญตฺรา ปิ. ८७. अन्यत्र भी। ๘๘. ปฺเย สิสฺสา. ८८. 'पि' में 'ए' शेष रहता है। ๘๙. เอโอนมยวา สเร. ८९. स्वर परे होने पर 'ए' और 'ओ' के स्थान पर क्रमशः 'अय' और 'अव' होते हैं। ๙๐. อายาวา ณานุพนฺเธ. ९०. 'ण' अनुबन्ध होने पर 'आय' और 'आव' होते हैं। ๙๑. อาสฺสา ณาปิมฺหิ ยุก. ९१. 'ण' और 'अपि' परे होने पर 'आ' को 'युक' आगम होता है। ๙๒. ปทาทีนํ กฺวจิ. ९२. पदादि के स्थान पर कहीं विकल्प से। ๙๓. มํ วา รุธาทีนํ. ९३. रुधादि धातुओं में विकल्प से 'म' आगम होता है। ๙๔. กฺวิมฺหิ โลโป-นฺต พฺยญฺชนสฺส. ९४. 'क्वि' प्रत्यय परे होने पर अन्त्य व्यञ्जन का लोप होता है। ๙๕. ปรรูปมยกาเร พฺยญฺชเน. ९५. व्यञ्जन परे होने पर 'अय' कार का पररूप होता है। ๙๖. มนานํ นิคฺคหีตํ. ९६. 'मन' आदि के स्थान पर निग्गहीत (अनुस्वार) होता है। ๙๗. น พฺรูสฺโส. ९७. 'ब्रू' धातु के लिए नहीं। ๙๘. กคา จชานํ ฆานุพนฺเธ. ९८. 'घ' अनुबन्ध होने पर 'च' और 'ज' के स्थान पर क्रमशः 'क' और 'ग' होते हैं। ๙๙. หนสฺส ฆาโต ณานุพนฺเธ. ९९. 'ण' अनुबन्ध होने पर 'हन' धातु का 'घात' आदेश होता है। ๑๐๐. กฺวิมฺหิ โฆ ปริปจฺจาสโมหิ. १००. 'क्वि' प्रत्यय में 'परि', 'पच्च', 'आ' और 'सम' के साथ 'घ' होता है। ๑๐๑. ปรสฺส [Pg.35] ฆํเส. १०१. 'घंस' परे होने पर परवर्ती का। ๑๐๒. ชิหรานํ คี. १०२. 'जि' और 'हर' धातुओं के स्थान पर 'गी' होता है। ๑๐๓. ธาสฺส โห. १०३. 'धा' धातु के स्थान पर 'ह' होता है। ๑๐๔. ณิมฺหิ ทีโฆ ทุสสฺส. १०४. 'णि' प्रत्यय होने पर 'दुस' का दीर्घ होता है। ๑๐๕. คุหิสฺส สเร. १०५. स्वर परे होने पर 'गुह' धातु का। ๑๐๖. มุหพหานญฺจ เต กานุพนฺเธ ตฺเว. १०६. 'क' अनुबन्ध होने पर 'मुह' और 'बह' धातुओं के स्थान पर 'त्वे' होता है। ๑๐๗. วหสฺสุสฺส. १०७. 'वह' धातु के 'व' के स्थान पर 'उ' होता है। ๑๐๘. ธาสฺส หิ. १०८. 'धा' धातु के स्थान पर 'हि' होता है। ๑๐๙. คมาทิรานํ โลโป-นฺตสฺส. १०९. 'गम' आदि धातुओं के अन्त्य वर्ण का लोप होता है। ๑๑๐. วจาทีนํ วสฺสุฏ วา. ११०. 'वच' आदि धातुओं के 'व' के स्थान पर विकल्प से 'उट' होता है। ๑๑๑. อสฺสุ. १११. 'अस' धातु के स्थान पर 'सु' होता है। ๑๑๒. วทฺธสฺส วา. ११२. 'वद्ध' के स्थान पर विकल्प से। ๑๑๓. ยชสฺส ยสฺส ฏิยี. ११३. 'यज' धातु के 'य' के स्थान पर 'टियी' होता है। ๑๑๔. ฐาสฺสิ. ११४. 'ठा' धातु के स्थान पर 'इ' होता है। ๑๑๕. คาปานมี. ११५. गा और पा धातुओं के स्थान पर 'मी' आदेश होता है। ๑๑๖. ชนิสฺสา. ११६. जन धातु के स्थान पर 'जा' आदेश होता है। ๑๑๗. สาสสฺส สิส วา. ११७. सास धातु के स्थान पर विकल्प से 'सिस' आदेश होता है। ๑๑๘. กรสฺสา ตเว. ११८. कर धातु के स्थान पर 'तवे' प्रत्यय के परे होने पर (आदेश) होता है। ๑๑๙. ตุํตุนตพฺเพสุ วา. ११९. तुं, तुन और तब्बस प्रत्ययों के परे होने पर विकल्प से (आदेश) होते हैं। ๑๒๐. ญาสฺส เน ชา. १२०. ञा धातु के स्थान पर 'ने' और 'जा' आदेश होते हैं। ๑๒๑. สกาปานํ กุณกู เณ. १२१. सक और पा धातुओं के स्थान पर 'कुण' और 'कू' आदेश होते हैं 'णे' प्रत्यय के परे होने पर। ๑๒๒. นิโต [Pg.36] จิสฺส โฉ. १२२. नि उपसर्ग के बाद चि धातु के स्थान पर 'छ' आदेश होता है। ๑๒๓. ชรสทานมีม วา. १२३. जर और सद धातुओं के स्थान पर विकल्प से 'मी' और 'म' आदेश होते हैं। ๑๒๔. ทิสสฺส ปสฺส ทสฺส ทส ท ทกฺขา. १२४. दिस धातु के स्थान पर 'पस्स', 'दस्स', 'दस', 'द' और 'दक्ख' आदेश होते हैं। ๑๒๕. สมานา โร รีริกฺขเกสุ. १२५. समान के स्थान पर 'रो', 'री', 'रिक्ख' और 'अक' प्रत्ययों के परे होने पर (आदेश) होते हैं। ๑๒๖. ทหสฺส ทสฺส โฑ. १२६. दह और दस धातुओं के स्थान पर 'ड' आदेश होता है। ๑๒๗. อนฆณสฺวาปรีหิ โฬ. १२७. अन, घण आदि के स्थान पर 'ळ' आदेश होता है। ๑๒๘. อตฺยาทินฺเตสฺวตฺถิสฺส ภู. १२८. अति आदि के परे होने पर 'अत्थि' के स्थान पर 'भू' आदेश होता है। ๑๒๙. ออาสฺสอาทีสุ. १२९. अ और आ के स्थान पर 'आदि' आदेश होते हैं। ๑๓๐. นฺตมานานฺติยิยุํ สฺวาทิโลโป. १३०. न्त, मान, अन्ति, इय, इयुं प्रत्ययों के परे होने पर 'सु' आदि का लोप होता है। ๑๓๑. ปาทิโต ฐาสฺส วา ฐโห กฺวจิ. १३१. पा के बाद ठा धातु के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'ठह' आदेश होता है। ๑๓๒. ทาสฺสิ ยง. १३२. दा धातु के स्थान पर 'य' आदेश होता है। ๑๓๓. กโรติสฺส โข. १३३. कर धातु के स्थान पर 'ख' आदेश होता है। ๑๓๔. ปุรา สฺมา. १३४. पुर के बाद 'स्मा' विभक्ति का (प्रयोग) होता है। ๑๓๕. นิโต กมสฺส. १३५. नि के बाद 'कम' धातु का (परिवर्तन) होता है। ๑๓๖. ยุวณฺณานมิยงุวง สเร. १३६. इ और उ वर्णों के स्थान पर स्वर के परे होने पर क्रमशः 'इय' और 'उव' आदेश होते हैं। ๑๓๗. อญฺญาทิสฺสาสฺสี กฺเย. १३७. अञ्ञ आदि के स्थान पर 'क्य' प्रत्यय के परे होने पर 'ई' आदेश होता है। ๑๓๘. ตนสฺสา วา. १३८. तन धातु के स्थान पर विकल्प से (आदेश) होता है। ๑๓๙. ทีโฆ สรสฺส. १३९. स्वर का दीर्घ होता है। ๑๔๐. สา-นนฺตรสฺส ตสฺส โฐ. १४०. स के तुरंत बाद आने वाले 'त' के स्थान पर 'ठ' आदेश होता है। ๑๔๑. กสสฺสิม จ วา. १४१. कस धातु के स्थान पर 'इम' आदेश भी विकल्प से होता है। ๑๔๒. ธสฺโตตฺรสฺตา. १४२. धस्त के स्थान पर 'त्रस्त' आदेश होता है। ๑๔๓. ปุจฺฉาทิโต. १४३. पुच्छ आदि धातुओं से। ๑๔๔. สาส[Pg.37], วส, สํส, สสา โถ. १४४. सास, वस, संस और सस धातुओं के स्थान पर 'थ' आदेश होता है। ๑๔๕. โธ ธหเภหิ. १४५. ध और ह (अन्त वाली धातुओं) के बाद (क्त के 'त' को) 'ध' होता है। ๑๔๖. ทหา โฒ. १४६. दह धातु के बाद (क्त के 'त' को) 'ढ' होता है। ๑๔๗. พหสฺสุม จ. १४७. बह धातु के (अकार को) 'उ' और (तकार को 'ढ') होता है। ๑๔๘. รุหาทีหิ โห ฬ จ. १४८. रुह आदि धातुओं के बाद (हकार को) 'ळ' और (तकार को 'ढ') होता है। ๑๔๙. มุหา วา. १४९. मुह धातु के बाद विकल्प से (हकार को 'ळ' और तकार को 'ढ') होता है। ๑๕๐. ภิทาทิโต โน กฺตกฺตวนฺตูนํ. १५०. भिद आदि धातुओं के बाद क्त और क्तवन्तु प्रत्ययों के (तकार को) 'न' होता है। ๑๕๑. ทาตฺวินฺโน. १५१. दा धातु के बाद (क्त के 'त' को) 'इन्न' होता है। ๑๕๒. กิราทีหิ โณ. १५२. किर आदि धातुओं के बाद (तकार को) 'ण' होता है। ๑๕๓. ตราทีหิ ริณฺโณ. १५३. तर आदि धातुओं के बाद (तकार को) 'रिण्ण' होता है। ๑๕๔. โค ภนฺชาทีหิ. १५४. भञ्ज आदि धातुओं के बाद (तकार को) 'ग' होता है। ๑๕๕. สุสา โข. १५५. सुस धातु के बाद (तकार को) 'ख' होता है। ๑๕๖. ปจา โก. १५६. पच धातु के बाद (तकार को) 'क' होता है। ๑๕๗. มุจา วา. १५७. मुच धातु के बाद विकल्प से (तकार को 'क') होता है। ๑๕๘. โลโป วฑฺฒา กฺติสฺส. १५८. वढ (वृध) धातु के बाद क्त प्रत्यय का लोप होता है। ๑๕๙. กฺวิสฺส. १५९. क्वि प्रत्यय का लोप होता है। ๑๖๐. ณิณาปีนํ เตสุ. १६०. उन (प्रत्ययों) के परे होने पर णि और णापि प्रत्ययों का लोप होता है। ๑๖๑. กฺวจิ วิกรณานํ. १६१. कहीं-कहीं विकरण प्रत्ययों का लोप होता है। ๑๖๒. มานสฺส มสฺส. १६२. मान प्रत्यय के (नकार) को 'म' होता है। ๑๖๓. ญิ ลสฺเส. १६३. ल-कार के परे होने पर (धातु के अन्त को) 'ञि' होता है। ๑๖๔. ปฺโย วา ตฺวาสฺส สมาเส. १६४. समास में त्वा प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'प्य' होता है। ๑๖๕. ตุํยานา. १६५. तुं और यान (प्रत्यय होते हैं)। ๑๖๖. หนา [Pg.38] รจฺโจ. १६६. हन धातु के बाद 'रच्च' प्रत्यय होता है। ๑๖๗. สาสาธิกรา จ จ ริจฺจา. १६७. शास आदि धातुओं के बाद 'रिच्च' प्रत्यय भी होता है। ๑๖๘. อิโต จฺโจ. १६८. इ धातु के बाद 'च्च' प्रत्यय होता है। ๑๖๙. ทิสา วานวาส จ. १६९. दिस धातु के बाद विकल्प से 'वान' और 'वास' प्रत्यय होते हैं। ๑๗๐. ญิ พฺยญฺชนสฺส. १७०. व्यंजन के परे होने पर 'ञि' होता है। ๑๗๑. รา นสฺส โณ. १७१. रकार के बाद नकार को 'णकार' होता है। ๑๗๒. น นฺตมานตฺยาทีนํ. १७२. न्त, मान, ति आदि के (नकार) को (णकार) नहीं होता। ๑๗๓. คมยมิสาสทิสานํ วา จฺฉง. १७३. गम, यम, इस और सद धातुओं के बाद विकल्प से 'च्छ' होता है। ๑๗๔. ชรมรานมียง. १७४. जर और मर धातुओं के स्थान पर 'ईय' होता है। ๑๗๕. ฐาปานํ ติฏฺฐ ปิวา. १७५. ‘ठा’ और ‘पा’ धातुओं के स्थान पर क्रमशः ‘तिट्ठ’ और ‘पिव’ आदेश होते हैं। ๑๗๖. คมวททานํ ฆมฺม วชฺช ทชฺชา. १७६. ‘गमु’, ‘वद’ और ‘दा’ धातुओं के स्थान पर क्रमशः ‘घम्म’, ‘वज्ज’ और ‘दज्ज’ आदेश होते हैं। ๑๗๗. กรสฺส โสสฺส กุพฺพ กุรุ กยิรา. १७७. ‘कर’ धातु के स्थान पर ‘सोस्स’, ‘कुब्ब’, ‘कुरु’ और ‘कयिर’ आदेश होते हैं। ๑๗๘. คหสฺส เฆปฺโป. १७८. ‘गह’ धातु के स्थान पर ‘घेप्प’ आदेश होता है। ๑๗๙. โณ นิคฺคหีตสฺส. १७९. निग्गहीत (अनुस्वार) के स्थान पर ‘ण’ आदेश होता है। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ ขาทิกณฺโฑ ปญฺจโม. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण में पाँचवाँ ‘खादि-काण्ड’ समाप्त हुआ। (๖) ฉฏฺโฐ กณฺโฑ (ตฺยาทิ) (६) छठा काण्ड (त्यादि)। ๑. วตฺตมาเน ติ อนฺติ, สิ ถ, มิ ม, เต อนฺเต, เส วฺเห, เอ มฺเห. १. वर्तमान काल (वत्तमाना) में प्रत्यय हैं: ति, अन्ति, सि, थ, मि, म; ते, अन्ते, से, व्हे, ए, म्हे। ๒. ภวิสฺสติ สฺสติ สฺสนฺติ, สฺสสิ สฺสถ, สฺสามิ สฺสาม, สฺสเต สฺสนฺเต, สฺสเส สฺสวฺเห, สฺสํ สฺสามฺเห. २. भविष्य काल (भविस्सती) में प्रत्यय हैं: स्सति, स्सन्ति, स्ससि, स्सथ, स्सामि, स्साम; स्सते, स्सन्ते, स्ससे, स्सव्हे, स्सं, स्साम्हे। ๓. นาเม [Pg.39] ครหาวิมฺหเยสุ. ३. निन्दा और विस्मय के अर्थ में नाम (संज्ञा) के प्रयोग होने पर। ๔. ภูเต อี อุํ, โอ ตฺถ, อึ มฺหา, อา อู, เส วฺหํ, อ มฺเห. ४. भूतकाल (अज्जतनी) में प्रत्यय हैं: ई, उं, ओ, त्थ, इं, म्हा; आ, ऊ, से, व्हं, अ, म्हे। ๕. อนชฺชตเน อา อู, โอ ตฺถ, อ มฺหา, ตฺถ ตฺถุํ, เส วฺหํ, อึ มุเส. ५. अनद्यतन भूतकाल (हियत्तनी) में प्रत्यय हैं: आ, ऊ, ओ, त्थ, अ, म्हा; त्थ, त्थुं, से, व्हं, इं, मुसे। ๖. ปโรกฺเข อ อุ, เอ ตฺถ, อ มฺห, ตฺถ เร, ตฺโถ วฺโห, อิ มฺเห. ६. परोक्ष भूतकाल (परोक्खा) में प्रत्यय हैं: अ, उ, ए, त्थ, अ, म्ह; त्थ, रे, त्थो, व्हो, इ, म्हे। ๗. เอยฺยาโท วา ติปตฺติยํ สฺสา สฺสํสุ, สฺเส สฺสถ, สฺสํ สฺสามฺหา, สฺสถ สฺสึสุ, สฺสเส สฺสวฺเห, สฺสึ สฺสามฺหเส. ७. ‘एय्य’ आदि के समान विकल्प से कालातिपत्ति (तिपत्ति) में प्रत्यय हैं: स्सा, स्संसु, स्से, स्सथ, स्सं, स्साम्हा; स्सथ, स्सिंसु, स्ससे, स्सव्हे, स्सिं, स्साम्हसे। ๘. เหตุผเลสฺเวยฺย เอยฺยุํ, เอยฺยาสิ เอยฺยาถ, เอยฺยามิ เอยฺยาม, เอถ เอรํ, เอโถ เอยฺยาวฺโห, เอยฺยํ เอยฺยามฺเห. ८. हेतु-फल (सत्तमी/विध्यर्थ) में प्रत्यय हैं: एय्य, एय्युं, एय्यासि, एय्याथ, एय्यामि, एय्याम; एथ, एरं, एथो, एय्याव्हो, एय्यं, एय्याम्हे। ๙. ปญฺจปตฺถนาวิธีสุ. ९. आज्ञा, प्रार्थना आदि पाँच अर्थों (पञ्चमी) में। ๑๐. ตุ อนฺตุ, หิ ถ, มิม, ตํ อนฺตํ, สฺสุ วฺโห, เอ อามธส. १०. पञ्चमी के प्रत्यय हैं: तु, अन्तु, हि, थ, मि, म; तं, अन्तं, स्सु, व्हो, ए, आमधस। ๑๑. สตฺยรเหสฺเวยฺยาที. ११. सत्य और योग्यता के अर्थ में ‘एय्य’ आदि प्रत्यय होते हैं। ๑๒. สมฺภาวเน วา. १२. संभावना के अर्थ में विकल्प से। ๑๓. มาโยเค อีอาอาที. १३. ‘मा’ के योग में ‘ई’, ‘आ’ आदि प्रत्यय होते हैं। ๑๔. ปุพฺพาปรจฺฉกฺกาน เมกาเนเกสุ ตุมฺหามฺหเสเสสุ ทฺเวทฺเว มชฺฌิมุตฺตมปฐมา. १४. पूर्व और पर के छह-छह प्रत्ययों में, एकवचन और बहुवचन में, ‘तुम्ह’, ‘अम्ह’ और अन्य के रहने पर क्रमशः मध्यम, उत्तम और प्रथम पुरुष के दो-दो प्रत्यय होते हैं। ๑๕. อาอีสฺสาทีสฺวอุ วา. १५. ‘आ’, ‘ई’, ‘स्स’ आदि के परे होने पर ‘अ’ और ‘उ’ विकल्प से होते हैं। ๑๖. ออาทีสฺวาโห พฺรูสฺส. १६. ‘अ’ आदि के परे होने पर ‘ब्रू’ धातु के स्थान पर ‘आहो’ आदेश होता है। ๑๗. ภูสฺส วุก. १७. ‘भू’ धातु के स्थान पर ‘वुक’ आदेश होता है। ๑๘. ปุพฺพสฺส อ. १८. पूर्व वर्ण ‘अ’ हो जाता है। ๑๙. อุสฺสํ สฺวาหา วา. १९. ‘उं’ के परे होने पर विकल्प से ‘स्वा’ और ‘हा’ आदेश होते हैं। ๒๐. ตฺยนฺตีนํ ฏฏู. २०. ‘ति’ और ‘अन्ति’ के स्थान पर ‘ट’ और ‘टू’ आदेश होते हैं। ๒๑. อีอาโท [Pg.40] วจสฺโสม. २१. ‘ई’ आदि के परे होने पर ‘वच’ धातु के स्थान पर ‘वोच’ आदेश होता है। ๒๒. ทาสฺส ทํ วา มิเมสฺวทฺวิตฺเต. २२. ‘मि’ और ‘म’ के परे होने पर, द्वित्व न होने पर, ‘दा’ धातु के स्थान पर विकल्प से ‘दं’ आदेश होता है। ๒๓. กรสฺส โสสฺส กุํ. २३. ‘कर’ धातु के स्थान पर ‘सोस्स’ और ‘कुं’ आदेश होते हैं। ๒๔. กา อีอาทีสุ. २४. क प्रत्यय ई आदि के परे होने पर। ๒๕. หาสฺส จาหง สฺเสน. २५. हा धातु के 'स्स' के स्थान पर 'अहं' और 'अ' होता है। ๒๖. ลภวสจฺฉิทภิทรุทานํ จฺฉง. २६. लभ्, वस्, छिद्, भिद् और रुद् धातुओं के 'स्स' के स्थान पर 'च्छ' होता है। ๒๗. ภุช มูจ วจ วิสานํ กฺขง. २७. भुज्, मुच्, वच् और विस् धातुओं के 'स्स' के स्थान पर 'क्ख' होता है। ๒๘. อาอีอาทีสุ หรสฺสา. २८. आ, ई आदि के परे होने पर ह्रस्व होता है। ๒๙. คมิสฺส. २९. गम् धातु के 'स्स' के स्थान पर। ๓๐. ฑํสสฺส จ ฉง. ३०. दंस् धातु के 'स्स' के स्थान पर 'छ' होता है। ๓๑. หูสฺส เห เหหิ โหหี สฺสตฺยาโท. ३१. हू धातु के 'स्स' के स्थान पर 'हे', 'हेहि', 'होहि' आदि होते हैं। ๓๒. ณานาสุ รสฺโส. ३२. णा और ना के परे होने पर ह्रस्व होता है। ๓๓. อาอีอูมฺหาสฺสาสฺสมฺหานํ วา. ३३. आ, ई, ऊ, म्हा, स्सा और स्सम्हा का विकल्प से। ๓๔. กุสรุเหหี-สฺส ฉิ. ३४. कुस् और रुह् धातुओं के 'स्स' के स्थान पर 'छि' होता है। ๓๕. ออีสฺสอาทีนํ พฺยญฺชนสฺสิอุ. ३५. अ, ई, स्स आदि के स्थान पर व्यंजन परे होने पर 'इ' और 'उ' होते हैं। ๓๖. พฺรูโต ติสฺสีอุ. ३६. ब्रू धातु से परे 'ति' और 'सि' के स्थान पर 'इ' और 'उ' होते हैं। ๓๗. กฺยสฺส. ३७. क्य प्रत्यय का। ๓๘. เอยฺยาถสฺเสออาอีถานํ โอออํตฺถตฺโถวฺโหก. ३८. एय्याथ आदि के स्थान पर ओ, अ, अं, त्थ, त्थो और व्हो होते हैं। ๓๙. อุํสฺสึ สฺวํสุ. ३९. उं और स्सिं के स्थान पर सु और अंसु होते हैं। ๔๐. เอโอตฺตา สุํ. ४०. ए और ओ के स्थान पर सुं होता है। ๔๑. หูโต เรสุํ. ४१. हू धातु से परे रेसुं होता है। ๔๒. โอสฺส ออิตฺถตฺโถ. ४२. ओ के स्थान पर इत्थ और त्थो होते हैं। ๔๓. สิ[Pg.41]. ४३. सि प्रत्यय। ๔๔. ทีฆา อีสฺส. ४४. दीर्घ के बाद ई और स्स का। ๔๕. มฺหาตฺถาน มฺห. ४५. म्हा और त्था के स्थान पर म्ह होता है। ๔๖. อึสฺส จ สิอุ. ४६. इं और स्स के स्थान पर सि और उ होते हैं। ๔๗. เอยฺยุํสฺสุํ. ४७. एय्युं के स्थान पर स्सुं होता है। ๔๘. หิสฺส-โต โลโป. ४८. हि और स्स का लोप होता है। ๔๙. กฺยสฺส สฺเส. ४९. क्य के स्थान पर स्से होता है। ๕๐. อตฺถิเตยฺยาทิจฺฉนฺนํ ส สุ ส สถ สํ สาม. ५०. अत्थि और एय्या आदि छह के स्थान पर स, सु, स, सथ, सं और साम होते हैं। ๕๑. อาทิทฺวินฺนมิยาอิยุํ. ५१. आदि के दो के स्थान पर इया और इयुं होते हैं। ๕๒. ตสฺส โถ. ५२. त के स्थान पर थो होता है। ๕๓. สิหิสฺวฏ. ५३. सि, हि और स्व के स्थान पर अ होता है। ๕๔. มิมานํ วา มิมฺหา จ. ५४. 'मि' और 'म' के स्थान पर 'मिम्ह' भी होता है। ๕๕. เอสุง. ५५. 'ए' और 'सुं' (आदेश) होते हैं। ๕๖. อีอาโท ทีโฆ. ५६. 'ई' आदि के परे होने पर दीर्घ होता है। ๕๗. หิมิเมสฺวสฺส. ५७. 'हि', 'मि' और 'मे' के परे होने पर 'अ' का (विकार) होता है। ๕๘. สกา ณาสฺส ข อีอาโท. ५८. 'सक' धातु से 'णा' के स्थान पर 'ख' होता है, 'ई' आदि के परे होने पर। ๕๙. สฺเส วา. ५९. 'स्से' विकल्प से होता है। ๖๐. เตสุ สุโต กฺโณกฺณานํ โรฏ. ६०. उनमें 'सु' से 'क्णो' और 'क्णा' का 'रो' और 'ट' होता है। ๖๑. ญาสฺส สนาสฺส นาโย ติมฺหิ. ६१. 'ञा' और 'सना' का 'नाय' होता है 'ति' के परे होने पर। ๖๒. ญามฺหิ ชํ. ६२. 'ञा' के परे होने पर 'जं' होता है। ๖๓. เอยฺยาสฺสิยาญา วา. ६३. 'एय्या' और 'इया' के स्थान पर 'ञा' विकल्प से होता है। ๖๔. อีสฺสตฺยาทีสุ กฺนาโลโป. ६४. 'इस्सति' आदि के परे होने पर 'क्ना' का लोप होता है। ๖๕. สฺสสฺส [Pg.42] หิ กมฺเม. ६५. कर्मवाच्य में 'स्स' का 'हि' होता है। ๖๖. เอติสฺมา. ६६. 'एति' धातु से। ๖๗. หนา ฉ ขา. ६७. 'हन' धातु से 'छ' और 'ख' (प्रत्यय) होते हैं। ๖๘. หโต ห. ६८. 'हत' का 'ह' होता है। ๖๙. ทกฺขขเหหิ โหหีหิ โลโป. ६९. 'दक्ख', 'ख' और 'ह' से 'हो' और 'ही' का लोप होता है। ๗๐. กยิเรยฺยสฺเสยฺยุมาทีนํ. ७०. 'कयिरेय्य', 'स्सेय्युं' आदि का। ๗๑. ฏา. ७१. 'टा' होता है। ๗๒. เอถสฺสา. ७२. 'एथ' का 'आ' होता है। ๗๓. ลภา อึอีนํ ถํถา วา. ७३. 'लभ' धातु से 'इं' और 'ई' का 'थं' और 'था' विकल्प से होता है। ๗๔. คุรุปุพฺพา รสฺสา เร-นฺเต-นฺตินํ. ७४. गुरु वर्ण के बाद 'रे', 'न्ते' और 'न्ति' का ह्रस्व होता है। ๗๕. เอยฺเยยฺยาเสยฺยนฺนํ เฏ. ७५. 'एय्ये', 'य्यासे' और 'य्यं' का 'टे' होता है। ๗๖. โอวิกรณสฺสุ ปรจฺฉกฺเก. ७६. 'ओ' विकरण का 'उ' होता है पर-षट्क के परे होने पर। ๗๗. ปุพฺพจฺฉกฺเก วา กฺวจิ. ७७. पूर्व-षट्क में कहीं-कहीं विकल्प से होता है। ๗๘. เอยฺยามสฺเส มุจ. ७८. 'मुच' धातु से 'एय्याम' का 'स्से' होता है। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ ตฺยาทิกณฺโฑ ฉฏฺโฐ. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण में छठा 'त्यादि काण्ड' समाप्त हुआ। (๗) สตฺตโม กณฺโฑ (ณฺวาทิ) (७) सातवाँ काण्ड (ण्वादि)। ๑. จร [Pg.43] ทร กร รห ชน สน ตล สาท สาธ กสาส จฏา ย วาหิ ณุ. १. चर, दर, कर, रह, जन, सन, तल, साद, साध, कस, आस, चट, य, वाह धातुओं से 'णु' प्रत्यय होता है। ๒. ภร มร จร ตร อร คร หน ตน มน ภม กิต ธน พํห กมฺพมฺพ จกฺข ภิกฺข สํกินฺทนฺท ยช ปฏาณาส วส ปส ปํส พนฺธา อุ. २. भर, मर, चर, तर, अर, गर, हन, तन, मन, भम, कित, धन, बंह, कम्ब, अम्ब, चक्ख, भिक्ख, संकि, दन्द, यज, पट, अण, आस, वस, पस, पंस, बन्ध धातुओं से 'उ' प्रत्यय होता है। ๓. พนฺธา อู วโธ จ. ३. 'बन्ध' धातु से 'ऊ' प्रत्यय होता है और 'वध' आदेश भी होता है। ๔. ชมฺพาทโย. ४. जम्बादि। ๕. ตปุส วิธ กุร ปุถ มุทา กุ. ५. तपुस, विध, कुर, पुथ और मुद से 'कु' प्रत्यय होता है। ๖. สินฺธาทโย. ६. सिन्धादि। ๗. อิ. ७. इ। ๘. ทธฺยาทโย. ८. दध्यादि। ๙. ยุวณฺณุปนฺตา กิ. ९. इवर्ण और उवर्ण उपान्त वाले से 'कि' प्रत्यय होता है। ๑๐. วป วร วส รส นภ หร หน ปณา อีณ. १०. वप, वर, वस, रस, नभ, हर, हन और पण से 'ईण' प्रत्यय होता है। ๑๑. ภู คมา อีณ. ११. भू और गम से 'ईण' प्रत्यय होता है। ๑๒. ตนฺท ลกฺขา อี. १२. तन्द और लक्ख से 'ई' प्रत्यय होता है। ๑๓. คมา โร. १३. गम से 'रो' प्रत्यय होता है। (อิติ สรปจฺจยา) (ये स्वर प्रत्यय हैं।) ๑๔. อิ ภี กา กราร วก สก วาหิ โก. १४. इ, भी, का, कर, अर, वक, सक और वाहि से 'को' प्रत्यय होता है। ๑๕. อูกาทโก. १५. ऊक आदि से 'को' प्रत्यय होता है। ๑๖. ภีตฺวา [Pg.44] นโก. १६. भी और त्वा से 'नको' प्रत्यय होता है। ๑๗. สิงฺฆา อาณิ กาฏกา. १७. सिङ्घ से 'आणि' और 'काटक' प्रत्यय होते हैं। ๑๘. กราทิตฺวโก. १८. कर आदि से 'त्वको' प्रत्यय होता है। ๑๙. พล ปเต หฺยาโก. १९. बल और पत से 'ह्याको' प्रत्यय होता है। ๒๐. สามากาทโย. २०. सामाक आदि। ๒๑. วิจฺฉา ล คม มุสา กิโก. २१. विच्छ, ल, गम और मुस से 'किको' प्रत्यय होता है। ๒๒. กึ กณิกาทโย. २२. किङ्कणिक आदि। ๒๓. อิ สา กีโก. २३. इ और सा से 'कीको' प्रत्यय होता है। ๒๔. กม ปทา ณุโก. २४. कम और पद से 'णुक' प्रत्यय होता है। ๒๕. มณฺฑ สลา ณูโก. २५. मण्ड और सल से 'णूको' प्रत्यय होता है। ๒๖. ลูกาทโย. २६. लूकादि। ๒๗. กสา สโก. २७. कस से 'सको' प्रत्यय होता है। ๒๘. กรา ติโก. २८. कर से 'तिको' प्रत्यय होता है। ๒๙. อิสา ฐกน. २९. इस से 'ठकन' प्रत्यय होता है। ๓๐. สมา โข. ३०. सम से 'खो' प्रत्यय होता है। ๓๑. มุขาทโย. ३१. मुखादि। ๓๒. อช วช มุท คท คมา คก. ३२. अज, वज, मुद, गद और गम से 'गक' प्रत्यय होता है। ๓๓. สิงฺคาทโย. ३३. सिङ्गादि। ๓๔. อคา คิ. ३४. ‘अग’ से ‘गि’ प्रत्यय होता है। ๓๕. ยาวลา คุ. ३५. ‘या’ और ‘वला’ से ‘गु’ प्रत्यय होता है। ๓๖. เผคฺวาทโย. ३६. फेग्वादि। ๓๗. ชนา โฆ. ३७. ‘जन’ से ‘घो’ प्रत्यय होता है। ๓๘. เมฆาทโย[Pg.45]. ३८. मेघादि। (อิติ กวคฺคปจฺจยา) (इस प्रकार क-वर्ग के प्रत्यय हैं।) ๓๙. จุสร วรา โจ. ३९. ‘चु’, ‘सर’ और ‘वर’ से ‘चो’ प्रत्यय होता है। ๔๐. มรา จุอีจีจ. ४०. ‘मर’ से ‘चु’, ‘ईचि’ और ‘च’ प्रत्यय होते हैं। ๔๑. กุส ปสา ฉิก. ४१. ‘कुस’ और ‘पस’ से ‘छिक’ प्रत्यय होता है। ๔๒. กสอุสา ฉุก. ४२. ‘कस’ और ‘उस’ से ‘छुक’ प्रत्यय होता है। ๔๓. อส มส วส กุจ กจา โฉ. ४३. ‘अस’, ‘मस’, ‘वस’, ‘कुच’ और ‘कच’ से ‘छो’ प्रत्यय होता है। ๔๔. คุจฺฉาทโย. ४४. गुच्छादि। ๔๕. อรา ชุ อุฏ จ. ४५. ‘अर’ से ‘जु’ प्रत्यय होता है और ‘उट’ भी। ๔๖. รชฺชาทโย. ४६. रज्जादि। ๔๗. คิธา ฌก. ४७. ‘गिध’ से ‘झक’ प्रत्यय होता है। ๔๘. วญฺจฺยาทโย. ४८. वञ्च्यादि। ๔๙. กม ยชา โญ. ४९. ‘कम’ और ‘यज’ से ‘ञो’ प्रत्यय होता है। ๕๐. ปุญฺญํ. ५०. पुण्यम्। ๕๑. อรหาญฺโญ หาสฺส หิร จ. ५१. ‘अरह’ से ‘ञो’ प्रत्यय होता है और ‘ह’ के स्थान पर ‘हिर’ आदेश होता है। (อิติ จวคฺคปจฺจยา) (इस प्रकार च-वर्ग के प्रत्यय हैं।) ๕๒. กิร ตรา กีโฏ. ५२. ‘किर’ और ‘तर’ से ‘कीट’ प्रत्यय होता है। ๕๓. สกาทีหฺยโฏ. ५३. ‘सक’ आदि से ‘अट’ प्रत्यय होता है। ๕๔. มกุฏาวาฏ กวาฏ กุกฺกุฏา. ५४. मकुट, आवाट, कवाट और कुक्कुट। ๕๕. กมุส กุส กสา โฐ. ५५. ‘कम’, ‘उस’, ‘कुस’ और ‘कस’ से ‘ठो’ प्रत्यय होता है। ๕๖. กุฏฺฐาทโย. ५६. कुट्ठादि। ๕๗. วร กรา อณฺโฑ. ५७. ‘वर’ और ‘कर’ से ‘अण्ड’ प्रत्यय होता है। ๕๘. มนนฺตา โฑ. ५८. ‘मन’ अन्त वाले शब्दों से ‘ड’ प्रत्यय होता है। ๕๙. กุณฺฑาทโย. ५९. कुण्डादि। ๖๐. ติช [Pg.46] กส ตส ทกฺขา กิโณ ชสฺส โข จ. ६०. ‘तिज’, ‘कस’, ‘तस’ और ‘दक्ख’ से ‘किण’ प्रत्यय होता है और ‘ज’ के स्थान पर ‘ख’ आदेश होता है। ๖๑. วีอาทิโต ณิ. ६१. "वी" आदि धातुओं से "णि" प्रत्यय होता है। ๖๒. คหาทีหฺย ณิ. ६२. "गह" आदि धातुओं से "णि" प्रत्यय होता है। ๖๓. รีวีภาหิ ณุ. ६३. "री", "वी" और "भा" धातुओं से "णु" प्रत्यय होता है। ๖๔. ขาณฺวาทโย. ६४. "खाणु" आदि शब्द। ๖๕. กฺวาทิโตโณ. ६५. "कु" आदि धातुओं से "णो" प्रत्यय होता है। ๖๖. สุวีหิ ณก. ६६. "सु" और "वी" धातुओं से "णक" प्रत्यय होता है। ๖๗. ติณาทโย. ६७. "तिण" आदि शब्द। ๖๘. รวณ วรณ ปูรณาทโย. ६८. "रवण", "वरण", "पूरण" आदि शब्द। (อิติ ฏวคฺคปจฺจยา) (इस प्रकार ट-वर्ग के प्रत्यय समाप्त हुए।) ๖๙. ปาวสา อติ. ६९. "पा" और "वस" धातुओं से "अति" प्रत्यय होता है। ๗๐. ธาหิสิ ตน ชน ชร คม สจา ตุ. ७०. "धा", "हि", "सि", "तन", "जन", "जर", "गम" और "सच" धातुओं से "तु" प्रत्यय होता है। ๗๑. อริสฺสุฏ จ. ७१. "अरि" धातु से "सुट्" आगम और "तु" प्रत्यय होता है। ๗๒. ปิตฺวาทโย. ७२. "पितु" आदि शब्द। ๗๓. ชน กรา รตุ. ७३. "जन" और "कर" धातुओं से "रतु" प्रत्यय होता है। ๗๔. สกา อุนฺโต. ७४. "सक" धातु से "उन्तो" प्रत्यय होता है। ๗๕. กปา โอโต. ७५. "कप" धातु से "ओतो" प्रत्यय होता है। ๗๖. วสาทีหฺยนฺโต. ७६. "वस" आदि धातुओं से "अन्तो" प्रत्यय होता है। ๗๗. หิสีนํ มุก จ. ७७. "हिसि" धातु से "मुक" आगम और "अन्तो" प्रत्यय होता है। ๗๘. หร รุห กุลา อิโต. ७८. "हर", "रुह" और "कुल" धातुओं से "इतो" प्रत्यय होता है। ๗๙. ภราทีหฺยโต. ७९. "भर" आदि धातुओं से "अतो" प्रत्यय होता है। ๘๐. กิราทีหฺยา-ตก. ८०. "किर" आदि धातुओं से "आतक" प्रत्यय होता है। ๘๑. อมาทีหฺย-ตฺโต. ८१. "अम" आदि धातुओं से "अत्तो" प्रत्यय होता है। ๘๒. วาทีหิ [Pg.47] โต. ८२. "वा" आदि धातुओं से "तो" प्रत्यय होता है। ๘๓. ฆราทีหิ ตก. ८३. "घर" आदि धातुओं से "तक" प्रत्यय होता है। ๘๔. เนตฺตาทโย. ८४. "नेत्त" आदि शब्द। ๘๕. สมาทีหฺยโถ. ८५. "सम" आदि धातुओं से "अथो" प्रत्यय होता है। ๘๖. อุปวสา วสฺโสฏ จ. ८६. "उपवस" धातु से "वस्साेट" आगम और "अथो" प्रत्यय होता है। ๘๗. รมา ถก. ८७. "रम" धातु से "थक" प्रत्यय होता है। ๘๘. ติตฺถาทโย. ८८. "तित्थ" आदि शब्द। ๘๙. วส มส กุสา ถุ. ८९. "वस", "मस" और "कुस" धातुओं से "थु" प्रत्यय होता है। ๙๐. สก วสา ถิ. ९०. 'सक' और 'वस' धातुओं से 'थि' प्रत्यय होता है। ๙๑. วีโต ถิก. ९१. 'वी' धातु से 'थिक' प्रत्यय होता है। ๙๒. สาริสฺมา รถิ. ९२. 'सर' धातु से 'रथि' प्रत्यय होता है। ๙๓. ตา ตา อิถิ. ९३. 'ता' और 'ता' धातुओं से 'इथि' प्रत्यय होता है। ๙๔. อิสา ถี. ९४. 'इस' धातु से 'थी' प्रत्यय होता है। ๙๕. รุท ขุท มุท มท ฉิท สูท สป กมา ทก. ९५. 'रुद', 'खुद', 'मुद', 'मद', 'छिद', 'सूद', 'सप' और 'कम' धातुओं से 'दक' प्रत्यय होता है। ๙๖. กุนฺทาทโย. ९६. कुन्द आदि शब्द। ๙๗. ททา ทุ. ९७. 'दा' धातु से 'दु' प्रत्यय होता है। ๙๘. ขนาน ทม รมา โธ. ९८. 'खन', 'दम' और 'रम' धातुओं से 'धो' प्रत्यय होता है। ๙๙. มุทฺธาทโย. ९९. मुद्धा आदि शब्द। ๑๐๐. สีโต ธุก. १००. 'सी' धातु से 'धुक' प्रत्यय होता है। ๑๐๑. วราร กร ตร ทร ยมอชฺช มิถสกา กุโน. १०१. 'वर', 'अर', 'कर', 'तर', 'दर', 'यम', 'अज्ज', 'मिथ' और 'सक' धातुओं से 'कुन' प्रत्यय होता है। ๑๐๒. อชา อิโน. १०२. 'अज' धातु से 'इन' प्रत्यय होता है। ๑๐๓. วิปินาทโย. १०३. विपिन आदि शब्द। ๑๐๔. กิรา [Pg.48] กโน. १०४. 'किर' धातु से 'कन' प्रत्यय होता है। ๑๐๕. ที ชิ อิ มีหิ นก. १०५. 'दी', 'जि', 'इ' और 'मी' धातुओं से 'नक' प्रत्यय होता है। ๑๐๖. สิ ธา วี วาหิ โน. १०६. 'सि', 'धा', 'वी' और 'वा' धातुओं से 'न' प्रत्यय होता है। ๑๐๗. อูนาทโย. १०७. ऊन आदि शब्द। ๑๐๘. วีปตา ตโน. १०८. 'वी' और 'पत' धातुओं से 'तन' प्रत्यय होता है। ๑๐๙. รมา ตนก. १०९. 'रम' धातु से 'तनक' प्रत्यय होता है। ๑๑๐. สู ภาหิ นุก. ११०. 'सू' और 'भा' धातुओं से 'नुक' प्रत्यय होता है। ๑๑๑. ธาสฺเส จ. १११. और 'धा' धातु के विषय में भी। ๑๑๒. วตฺตา ฏาว ธมาเสหฺยนิ. ११२. 'वत्त', 'टाव', 'धम' और 'अस' धातुओं से 'अनी' प्रत्यय होता है। ๑๑๓. ยุโต นิ. ११३. 'यु' धातु से 'नि' प्रत्यय होता है। (อิติ ตวคฺคปจฺจยา) (इस प्रकार 'त' वर्ग के प्रत्यय हैं) ๑๑๔. จมาป ปา วปา โป. ११४. 'चम', 'आप', 'पा' और 'वप' धातुओं से 'प' प्रत्यय होता है। ๑๑๕. ยุ ถุ กุนํ ทีโฆ จ. ११५. 'यु' और 'थु' धातुओं से 'कुन' प्रत्यय होता है और स्वर दीर्घ होता है। ๑๑๖. ขิป สุป นี สู ปูหิ ปก. ११६. 'खिप', 'सुप', 'नी', 'सू' और 'पू' धातुओं से 'पक' प्रत्यय होता है। ๑๑๗. สิปฺปาทโย. ११७. सिप्प आदि शब्द। ๑๑๘. สาสา อโป. ११८. 'सास' धातु से 'अप' प्रत्यय होता है। ๑๑๙. วิฏปาทโย. ११९. विटप आदि। ๑๒๐. คุปา โผ. १२०. 'गुप्' धातु से 'फ' प्रत्यय होता है। ๑๒๑. คร สราทีหิ โพ. १२१. 'गर' और 'सर' आदि धातुओं से 'ब' प्रत्यय होता है। ๑๒๒. นิมฺพาทโย. १२२. निम्ब आदि। ๑๒๓. ทรา พิ. १२३. 'दर' से 'बि' प्रत्यय होता है। ๑๒๔. กร สร สล กล วลฺล วสา อโภ. १२४. 'कर', 'सर', 'सल', 'कल', 'वल्ल' और 'वस' धातुओं से 'अभ' प्रत्यय होता है। ๑๒๕. คทา รโภ. १२५. 'गद' धातु से 'रभ' प्रत्यय होता है। ๑๒๖. อุสรา [Pg.49] สา กโต. १२६. 'उस' और 'रस' (स-कार का विपर्यय) से 'कत' प्रत्यय होता है। ๑๒๗. อิโต ภก. १२७. 'इ' धातु से 'भक' प्रत्यय होता है। ๑๒๘. คราวา โภ. १२८. 'गर' और 'अव' से 'भ' प्रत्यय होता है। ๑๒๙. โสพฺภาทโย. १२९. सोब्भ आदि। ๑๓๐. อุส กุส ปท สุขา กุโม. १३०. 'उस', 'कुस', 'पद' और 'सुख' से 'कुम' प्रत्यय होता है। ๑๓๑. วฏุมาทโย. १३१. वटुम आदि। ๑๓๒. คุธา อุโม. १३२. 'गुध' धातु से 'उम' प्रत्यय होता है। ๑๓๓. ปฐ จรา อมิมา. १३३. 'पठ' और 'चर' धातुओं से 'अमि' और 'म' प्रत्यय होते हैं। ๑๓๔. หิ ธูหิ มก. १३४. 'हि' और 'धू' धातुओं से 'मक' प्रत्यय होता है। ๑๓๕. ตีโต รีสโน จ. १३५. 'ति' से 'रीसन' प्रत्यय भी होता है। ๑๓๖. ขี สุ วี ยา คา หิ สา ลู ขุ หุ มร ธร กร ฆร ชมา ม สามา โม. १३६. 'खी', 'सु', 'वी', 'या', 'गा', 'हि', 'सा', 'लू', 'खु', 'हु', 'मर', 'धर', 'कर', 'घर', 'जम' और 'साम' धातुओं से 'म' प्रत्यय होता है। ๑๓๗. อสฺมาทโย. १३७. अस्म आदि। ๑๓๘. นีโต มิ. १३८. 'नी' धातु से 'मि' प्रत्यय होता है। ๑๓๙. อูมิ ภูมิ นิมิ รสฺมิ. १३९. ऊमि, भूमि, निमि और रश्मि। (อิติ ปวคฺคปจฺจยา) (इस प्रकार प-वर्ग प्रत्यय समाप्त हुए) ๑๔๐. มา ฉาหิ โย. १४०. 'मा' और 'छा' धातुओं से 'य' प्रत्यय होता है। ๑๔๑. ชนิสฺส ชา จ. १४१. 'जन' धातु के स्थान पर 'जा' आदेश होता है और 'य' प्रत्यय होता है। ๑๔๒. หทยาทโย. १४२. हृदय आदि। ๑๔๓. ขี สิ สินี สี สุ วี กุ สู หิ รก. १४३. 'खी', 'सि', 'सिनी', 'सी', 'सु', 'वी', 'कु', 'सू' और 'हि' धातुओं से 'रक' प्रत्यय होता है। ๑๔๔. หิจิ ทุ มินํ ทีโฆ จ. १४४. 'हि', 'चि' और 'दु' धातुओं से 'मिन' प्रत्यय होता है और स्वर दीर्घ हो जाता है। ๑๔๕. ธาตา นมี จ. १४५. 'धा' धातु से 'नमि' प्रत्यय भी होता है। ๑๔๖. ภทฺราทโย[Pg.50]. १४६. भद्र आदि। ๑๔๗. มนฺทงฺก สสา ส ม ธ จตา อุโร. १४७. 'मन्द', 'अङ्क', 'सस', 'स', 'म', 'ध' और 'चत' धातुओं से 'उर' प्रत्यय होता है। ๑๔๘. วิธุราทโย. १४८. विधुरादि। ๑๔๙. ติมรุหรุธพธมทมนฺทวชา ชรุจกสา กิโร. १४९. तिम, रुह, रुध, बध, मद, मन्द, वज, जर, उच और कस धातुओं से 'किर' प्रत्यय होता है। ๑๕๐. ถิราทโย. १५०. स्थिरादि। ๑๕๑. ททคเรหิ ทุร ภรา. १५१. द, द और गर धातुओं से 'दुर' और 'भर' प्रत्यय होते हैं। ๑๕๒. จร ทร ชร คร มเรหิเต. १५२. चर, दर, जर, गर और मर धातुओं से 'इत' प्रत्यय होता है। ๑๕๓. ปีโต กฺวโร. १५३. 'पा' धातु से 'क्वर' प्रत्यय होता है। ๑๕๔. จีวราทโย. १५४. चीवरादि। ๑๕๕. กุโต กฺรโร. १५५. 'कु' धातु से 'क्रर' प्रत्यय होता है। ๑๕๖. วสาสา ฉโร. १५६. 'वस' धातु से 'छर' प्रत्यय होता है। ๑๕๗. มสา เฉโร จ. १५७. 'मस' धातु से 'छेर' प्रत्यय भी होता है। ๑๕๘. ธูวาโต สโร. १५८. 'धू' और 'वात' से 'सर' प्रत्यय होता है। ๑๕๙. ภมาทีหฺยโร. १५९. भ्रमादि धातुओं से 'अर' प्रत्यय होता है। ๑๖๐. วทิสฺส พท จ. १६०. 'वद' धातु को 'बद' आदेश और 'अ' प्रत्यय होता है। ๑๖๑. วทชนานํ ฐง จ. १६१. 'वद' और 'जन' धातुओं से 'ठङ्' प्रत्यय भी होता है। ๑๖๒. ปจิสฺสิฐง จ. १६२. 'पच' धातु से 'इ' और 'ठङ्' प्रत्यय भी होते हैं। ๑๖๓. วกา อรณ. १६३. 'व' धातु से 'अरण' प्रत्यय होता है। ๑๖๔. สิคฺยงฺคาค มชฺชกลา ลา อาโร. १६४. सिगि, अङ्ग, अग, मज्ज, कल और ला धातुओं से 'आर' प्रत्यय होता है। ๑๖๕. กมิสฺส สฺสุ จ. १६५. 'कम' धातु से 'स्सु' प्रत्यय भी होता है। ๑๖๖. ภิงฺคา (งฺกา) ราทโย. १६६. भृङ्गादि। ๑๖๗. กรา มาโร. १६७. 'कर' धातु से 'मार' प्रत्यय होता है। ๑๖๘. ปุส [Pg.51] สเรหิ ขโร. १६८. 'पुस' और 'सर' धातुओं से 'खर' प्रत्यय होता है। ๑๖๙. สร วส กลา กีโร วสฺสุฏ จ. १६९. सर, वस और कल धातुओं से 'कीर' प्रत्यय होता है और 'वस' को 'उट' आदेश होता है। ๑๗๐. คพฺภีราทโย. १७०. गम्भीरादि। ๑๗๑. ขชฺช วลฺล มสา อูโร. १७१. खज्ज, वल्ल और मस धातुओं से 'ऊर' प्रत्यय होता है। ๑๗๒. กปฺปูราทโย. १७२. कर्पूरादि। ๑๗๓. กฐ จกา โอโร. १७३. 'कठ' और 'च' धातुओं से 'ओर' प्रत्यय होता है। ๑๗๔. โมราทโย. १७४. मोरादि। ๑๗๕. กุโต เอรก. १७५. 'कु' धातु से 'एरक' प्रत्यय होता है। ๑๗๖. ภูสูหิ ริก. १७६. 'भू' और 'सू' धातुओं से 'रिक' प्रत्यय होता है। ๑๗๗. มีกสีนีหิ รุ. १७७. मी, कस, ई और नी धातुओं से 'रु' प्रत्यय होता है। ๑๗๘. สินา เอรุ. १७८. सि धातु से 'eru' प्रत्यय होता है। ๑๗๙. ภีรุหิ รุก. १७९. भी आदि धातुओं से 'ruka' प्रत्यय होता है। ๑๘๐. ตมา พูโล. १८०. तम् धातु से 'būlo' प्रत्यय होता है। ๑๘๑. สิโต ลกวาลา. १८१. सि धातु से 'lakavālā' प्रत्यय होता है। ๑๘๒. มงฺค กม สมฺพ สพ สก วส วิส เกว กล ปลฺล กฐ ปฏ กุณฺฑ มณฺฑา อโล. १८२. मङ्ग, कम्, सम्ब, सब, सक, वस, विस, केव, कल, पल्ल, कठ, पट, कुण्ड और मण्ड धातुओं से 'alo' प्रत्यय होता है। ๑๘๓. มุสา กโล. १८३. मुस् धातु से 'kalo' प्रत्यय होता है। ๑๘๔. ถลาทโย. १८४. थलादि शब्द। ๑๘๕. กุลา กาโล จ. १८५. कुल धातु से 'kālo' प्रत्यय भी होता है। ๑๘๖. มุฬาลาทโย. १८६. मुलालादि शब्द। ๑๘๗. จณฺฑ ปตา ณาโล. १८७. चण्ड और पत् धातुओं से 'ṇālo' प्रत्यय होता है। ๑๘๘. มาทิโต โล. १८८. मा धातु से 'lo' प्रत्यय होता है। ๑๘๙. อน สน กล กุก สฐ มหา อิโล. १८९. अन्, सन्, कल, कुक्, सठ और महा धातुओं से 'ilo' प्रत्यय होता है। ๑๙๐. กุฏา [Pg.52] กิโล. १९०. कुट् धातु से 'kilo' प्रत्यय होता है। ๑๙๑. สิถิลาทโย. १९१. सिथिलादि शब्द। ๑๙๒. จฏ กณฺฑ วฏฺฏ ปุถา กุโล. १९२. चट्, कण्ड, वट्ट और पुथ धातुओं से 'kulo' प्रत्यय होता है। ๑๙๓. ตุมุลาทโย. १९३. तुमुल आदि शब्द। ๑๙๔. กลฺล กป ตกฺก ปฏา โอโล. १९४. कल्ल, कप, तक्क और पट धातुओं से 'olo' प्रत्यय होता है। ๑๙๕. องฺคา อุโล ลิ. १९५. अङ्ग धातु से 'ulo' और 'li' प्रत्यय होते हैं। ๑๙๖. อญฺชา ลิ. १९६. अञ्ज धातु से 'li' प्रत्यय होता है। ๑๙๗. ฉทา ลิ. १९७. छद धातु से 'li' प्रत्यय होता है। ๑๙๘. อลฺยาทโย. १९८. अल्यादि शब्द। ๑๙๙. ปิลาที หฺย โว. १९९. पिलादि धातुओं से 'vo' प्रत्यय होता है। ๒๐๐. สาฬวาทโย. २००. साळवादि शब्द। ๒๐๑. สรา อาโว. २०१. सर धातु से 'āvo' प्रत्यय होता है। ๒๐๒. อล มล พิลา ณุโว. २०२. अल, मल और बिल धातुओं से 'ṇuvo' प्रत्यय होता है। ๒๐๓. คาตฺวีโว. २०३. गा धातु से 'tvīvo' प्रत्यय होता है। ๒๐๔. สุโต กฺว กฺวา. २०४. सु धातु से 'kva' और 'kvā' प्रत्यय होते हैं। ๒๐๕. วิทฺวา. २०५. विद् धातु से 'vā' प्रत्यय होता है। ๒๐๖. ถุโต เร โว. २०६. थु धातु से 're' और 'vo' प्रत्यय होते हैं। ๒๐๗. สมา ริโว. २०७. सम् धातु से 'rivo' प्रत्यय होता है। ๒๐๘. ฉทา รวิ. २०८. 'छद' धातु से 'अवि' प्रत्यय होता है। ๒๐๙. ปูร ติมา กิโส รสฺโส จ. २०९. 'पूर' धातु से 'तिमा' प्रत्यय होता है और 'किस' का ह्रस्व होता है। ๒๑๐. กรา อีโส. २१०. 'कर' धातु से 'ईस' प्रत्यय होता है। ๒๑๑. สิรีสาทโย. २११. 'सिरीस' आदि शब्द सिद्ध होते हैं। ๒๑๒. กรา [Pg.53] ริพฺพิ โส. २१२. 'कर' धातु से 'रिब्बि' और 'सो' प्रत्यय होते हैं। ๒๑๓. สสาส วส วิส หน วน มนาน กมา โส. २१३. 'सस', 'अस', 'वस', 'विस', 'हन', 'वन' और 'मन' धातुओं से 'सो' प्रत्यय होता है। ๒๑๔. อามิ ถุ กุสีโต สก. २१४. 'आमि', 'थु' और 'कुसी' धातुओं से 'सक' प्रत्यय होता है। ๒๑๕. ผสฺสาทโย. २१५. 'फस्स' आदि शब्द सिद्ध होते हैं। ๒๑๖. สุโต ณิสก. २१६. 'सु' धातु से 'णिसक' प्रत्यय होता है। ๒๑๗. เว ตา ต ยุ ปนา ล กล จมา อโส. २१७. 'वे', 'ता', 'त', 'यु', 'पन', 'ल', 'कल' और 'चम' धातुओं से 'असो' प्रत्यय होता है। ๒๑๘. วย ทิว กร กเร หฺย สณสกปาส กสา. २१८. 'वय', 'दिव', 'कर', 'करे', 'ह्य', 'सण', 'सक' और 'पास' धातुओं से 'कसा' प्रत्यय होता है। ๒๑๙. สส มส ทํสา สา สุ. २१९. 'सस', 'मस' और 'दंस' धातुओं से 'सा' और 'सु' प्रत्यय होते हैं। ๒๒๐. วิทา ทสุก. २२०. 'विद' धातु से 'दसुक' प्रत्यय होता है। ๒๒๑. สสา รีโห. २२१. 'सस' धातु से 'रीह' प्रत्यय होता है। ๒๒๒. ชีวามา โห วมา จ. २२२. 'जीव' और 'मा' धातुओं से 'हो' और 'वमा' प्रत्यय होते हैं। ๒๒๓. ตณฺหาทโย. २२३. 'तण्हा' आदि शब्द सिद्ध होते हैं। ๒๒๔. ปณุสฺสหา หีหี โณลง จ. २२४. 'पणु' और 'उस्सह' धातुओं से 'हीही' और 'णोलङ' प्रत्यय होते हैं। ๒๒๕. ขี มิ ปี จุ มา วา กาหิ โฬ อุสฺส วา ทีโฆ จ. २२५. 'खी', 'मि', 'पी', 'चु', 'मा', 'वा' और 'का' धातुओं से 'हि' और 'ळो' प्रत्यय होते हैं और 'उस्स' का विकल्प से दीर्घ होता है। ๒๒๖. คุโต ฬก จ. २२६. 'गु' धातु से 'ळका' प्रत्यय होता है। ๒๒๗. ปงฺคุฬาทโย. २२७. 'पङ्गुळ' आदि शब्द सिद्ध होते हैं। ๒๒๘. ปาโต ฬิ. २२८. 'पा' धातु से 'ळि' प्रत्यय होता है। ๒๒๙. วีโต ฬุ. २२९. 'वी' धातु से 'ळु' प्रत्यय होता है। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ ณฺวาทิกณฺโฑ สตฺตโม. इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण में सातवाँ ण्वादि काण्ड समाप्त हुआ। นโม ตสฺส ภควโต อรหโต สมฺมาสมฺพุทฺธสฺส उन भगवान्, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ मोग्गल्लान व्याकरण। ๑. ปฐโม สญฺญาทิกณฺโฑ १. प्रथम संज्ञादि काण्ड। สิทฺธมิทฺธคุณํ สาธุ, นมสฺสิตฺวา ตถาคตํ; สธมฺมสงฺฆํ ภาสิสฺสํ, มาคธํ สทฺทลกฺขณํ. सिद्ध और समृद्ध गुणों वाले श्रेष्ठ तथागत, सद्धर्म और संघ को नमस्कार कर, मैं मागधी (पालि) व्याकरण कहूँगा। ๑. ออาทโย [Pg.54] ติตาลีส วณฺณา. १. 'अ' आदि तैंतालीस वर्ण हैं। อการาทโย นิคฺคหีตนฺตา เตจตฺตาลีส-กฺขรา วณฺณา นาม โหนฺติ. อ อา อิ อี อุ อู เอ เอ โอ โอ, ก ข ค ฆ ง จ ฉ ช ฌ ญฺญ, ฏ ฐ ฑ ฒ ณ, ต ถ ท ธ น, ป ผ พ ภ ม, ย ร ล ว ส ห ฬ อํ. เตน กฺวตฺโถ? ‘‘เอ โอ น มวณฺเณ’’ ๑. ๓๗. ติตาลีสาภิ วจนํ กตฺถจิ วณฺณโลปํ ญาเปติ. เตน ‘ปฏิสงฺขา โยนิโส’ติอาทิ สิทฺธํ. 'अ' कार से लेकर निग्गहीत (अं) तक के तैंतालीस अक्षर 'वर्ण' कहलाते हैं। अ आ इ ई उ ऊ ए ए ओ ओ, क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ, ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न, प फ ब भ म, य र ल व स ह ळ अं। इसका क्या प्रयोजन है? 'ए ओ न मवण्णे' (१.३७)। तैंतालीस का कथन कहीं वर्ण-लोप का ज्ञान कराने के लिए है। उससे 'पटिसङ्खा योनिसो' आदि सिद्ध होते हैं। ๒. ทสาโท สรา. २. (इनमें से) आदि के दस स्वर हैं। ตตฺถาทิมฺหิ ทส วณฺณา สรา นาม โหนฺติ. เตน กฺวตฺโถ? ‘‘สโร โลโป สเร’’ ๑, ๒๖ อิจฺจาทิ. वहाँ (वर्णमाला के) आदि में दस वर्ण 'स्वर' कहलाते हैं। उससे क्या प्रयोजन है? 'सरो लोपो सरे' (१, २६) इत्यादि। ๓. ทฺเวทฺเว สวณฺณา. เตสุ ทฺเวทฺเว สรา สวณฺณา นาม โหนฺติ. เตน กฺวตฺโถ? ‘‘วณฺณปเรน สวณฺโณปิ’’ ๑, ๒๔. ३. दो-दो सवर्ण हैं। उनमें से दो-दो स्वर 'सवर्ण' कहलाते हैं। उससे क्या प्रयोजन है? 'वण्णपरेन सवण्णोपि' (१, २४)। ๔. ปุพฺโพ รสฺโส. ४. पूर्व (पहला) ह्रस्व है। เตสุ [Pg.55] ทฺวีสุ โย โย ปุพฺโพ, โส โส รสฺสสญฺโญ โหติ. เตสุ เอ.โอ.สํโยคโต ปุพฺพาว ทิสฺสนฺติ. เตน กฺวตฺโถ? ‘‘รสฺโส วา’’ ๒,๖๒ อิจฺจาทิ. उन दो (सवर्णों) में से जो-जो पूर्व है, वह 'ह्रस्व' संज्ञक होता है। उनमें 'ए' और 'ओ' केवल संयोग से पूर्व ही दिखाई देते हैं। उससे क्या प्रयोजन है? 'रस्सो वा' (२, ६२) इत्यादि। ๕. ปโร ทีโฆ. ५. पर (बाद वाला) दीर्घ है। เต สฺเวว ทฺวีสุโย โย ปโร, โส โส ทีฆสญฺโญ โหติ. เตน กฺวตฺโถ? ‘‘โย โล ปนิสุ ทีโฆ’’ ๒,๘๘ อิจฺจาทิ. उन्हीं दो में से जो-जो पर है, वह 'दीर्घ' संज्ञक होता है। उससे क्या प्रयोजन है? 'यो लो पनिुसु दीघो' (२, ८८) इत्यादि। ๖. กาทโย พฺยญฺชนา. ६. 'क' आदि व्यंजन हैं। กการาทโย วณฺณา นิคฺคหีตปริยนฺตา พฺยญฺชนสญฺญาโหนฺติ. เตน กฺวตฺโถ? ‘‘พฺยญฺชเน ทีฆรสฺสา’’ ๑,๓๓ อิจฺจาทิ. 'क' कार आदि वर्ण, निग्गहीत (अं) तक, 'व्यंजन' संज्ञक होते हैं। उससे क्या प्रयोजन है? 'ब्यञ्जने दीघरस्सा' (१, ३३) इत्यादि। ๗. ปญฺจ ปญฺจกา วคฺคา. ७. पाँच-पाँच के (समूह) वर्ग हैं। กาทโย ปญฺจ ปญฺจกา วคฺค, นาม โหนฺติ. เตน กฺวตฺโถ? ‘‘วคฺเค วคฺคนฺโต’’ ๑,๔๑ อิจฺจาทิ. 'क' आदि पाँच-पाँच के समूह 'वर्ग' कहलाते हैं। उससे क्या प्रयोजन है? 'वग्गे वग्गन्तो' (१, ४१) इत्यादि। ๘. พินฺทุ นิคฺคหีตํ. ८. बिन्दु 'निग्गहीत' है। ยฺวายํ วณฺโณ พินฺทุมตฺโต, โส นิคฺคหีตสญฺโญ โหติ. เตน กฺวตฺโถ? ‘‘นิคฺคหีตํ’’ ๑,๓๘ อิจาทิ. ครุสญฺญากรณํ อนฺวตฺถสญฺญตฺถํ. जो यह केवल बिन्दु मात्र वर्ण है, वह 'निग्गहीत' संज्ञक होता है। उससे क्या प्रयोजन है? 'निग्गहीतं' (१, ३८) इत्यादि। 'गुरु' संज्ञा करना सार्थक संज्ञा के लिए है। ๙. อิยุวณฺณา [Pg.56] ฌลา นามสฺสนฺเต. ९. नाम (प्रातिपदिक) के अन्त में 'इ' और 'उ' वर्ण 'झ' और 'ल' कहलाते हैं। นามํ ปาฏิปทิกํ, ตสฺสอนฺเต วตฺตมานา อิวณฺณุวณฺณา ฌลสญฺญา โหนฺติ ยถากฺกมํ. เตน กฺวตฺโถ? ‘‘ฌลา วา’’ ๒,๑๑๑ อิจฺจาทิ. 'नाम' प्रातिपदिक है, उसके अन्त में विद्यमान 'इ' वर्ण और 'उ' वर्ण क्रमशः 'झ' और 'ल' संज्ञक होते हैं। उससे क्या प्रयोजन है? 'झला वा' (२, १११) इत्यादि। ๑๐. ปิตฺถิยํ. १०. स्त्रीलिंग में 'प'। อิตฺถิยํ วตฺตมานสฺส นามสฺส-นฺเต วตฺตมานา อิวณฺณุวณฺณา ปสญฺญา โหนฺติ. เตน กฺวตฺโถ? เย ปสฺสิวณฺณสฺส’’ ๒,๑๑๖ อิจฺจาทิ. स्त्रीलिंग में विद्यमान नाम के अन्त में रहने वाले 'इ' वर्ण और 'उ' वर्ण 'प' संज्ञक होते हैं। उससे क्या प्रयोजन है? 'ये पस्सिवण्णस्स' (२, ११६) इत्यादि। ๑๑. ฆา. ११. 'घा'। อิตฺถิยํ วตฺตมานสฺส นามสฺส-นฺเต วตฺถมาโน อากาโร ฆสญฺโญ โหติ. เตน กฺวตฺโถ? ‘‘ฆพฺรหฺมาทิเต’’ ๒,๖๐ อิจฺจาทิ. स्त्रीलिंग में विद्यमान नाम के अन्त में रहने वाला 'आ' कार 'घ' संज्ञक होता है। उससे क्या प्रयोजन है? 'घब्रह्मादिते' (२, ६०) इत्यादि। ๑๒. โค สฺยาลปเน. १२. सम्बोधन में 'सि' प्रत्यय 'ग' कहलाता है। อาลปเน สิ คสญฺโญ โหติ. सम्बोधन में 'सि' (विभक्ति) 'ग' संज्ञक होती है। เตน กฺวตฺโถ? ‘‘เควา’’ ๒,๖๕ อิจฺจาทิ. उससे क्या प्रयोजन है? 'गेवा' (२, ६५) इत्यादि। (สญฺญา) (संज्ञा) ๑๓. วิธิพฺพิเสสนนฺตสฺส. १३. विधि (नियम) विशेषण के अन्त वाले (शब्द) के लिए होती है। ยํ วิเสสนํ, ตทนฺตสฺส วิธิ ญาตพฺโพ ‘‘อโต โยนํ ฏาเฏ’’ ๒,๔๑ นรานเร. जो विशेषण है, उस (विशेषण) से अन्त होने वाले के लिए विधि जाननी चाहिए, जैसे 'अतो योनं टाटे' (२, ४१) 'नरानरे' में। ๑๔. สตฺตมิยํ ปุพฺพสฺส. १४. सप्तमी विभक्ति होने पर पूर्व (पहले वाले) का कार्य होता है। สตฺตมีนิทฺเทเส [Pg.57] ปุพฺพสฺเสว การิยํ ญาตพฺพํ ‘‘สโร โลโป สเร’’ ๑,๒๖ เวฬคฺคํ. ‘ตมห’นฺตีธ กสฺมา น โหติ?, สเรโตปสิเลสิกาธาโร ตตฺเถตาว วุจฺจเต ‘ปุพฺพสฺเสว โหติ น ปรสฺสา’ติ. सप्तमी के निर्देश में पूर्व का ही कार्य जानना चाहिए, जैसे 'सरो लोपो सरे' (१, २६) 'वेळग्गं' में। यहाँ 'तमहं' में क्यों नहीं होता? क्योंकि वहाँ 'सरे' में उपश्लेषिक आधार है, इसलिए वहाँ इतना ही कहा जाता है कि 'पूर्व का ही होता है, पर का नहीं'। ๑๕. ปญฺจมิยํ ปรสฺส. १५. पञ्चमी विभक्ति होने पर पर (बाद वाले) का कार्य होता है। ปญฺจมีนิทฺเทเส ปรสฺส การิยํ ญาตพฺพํ ‘‘อโตโยนํ ฏาเฏ’’ ๒,๔๑ นรานเร. อิธ น โหตํ ‘ชนฺตุโห อนตฺตา’. อิธ กสฺมา น โหติ? โอสขฺโย, อนนฺตเร กตตฺถตาย น พฺยวหิตสฺส การิยํ. पञ्चमी के निर्देश में पर का कार्य जानना चाहिए, जैसे 'अतो योनं टाटे' (२, ४१) 'नरानरे' में। यहाँ 'जन्तुहो अनत्ता' में यह नहीं होता। यहाँ क्यों नहीं होता? क्योंकि 'ओ' सख्य (सम्बन्ध) में है, और अव्यवहित (बिना व्यवधान के) में कार्य सिद्ध होने के कारण व्यवहित (व्यवधान युक्त) का कार्य नहीं होता। ๑๖. อาทิสฺส. १६. आदि (प्रारम्भिक वर्ण) का। ปรสฺส สฺสิสฺสมานํ การิยมาทิวณฺณสฺส ญาตพฺพํ ‘‘ร สงฺขฺยาโต วา’’ ๓,๑๐๓ เตรส. पर (बाद वाले) के लिए किया जाने वाला कार्य उसके आदि वर्ण का जानना चाहिए, जैसे 'र सङ्ख्यातो वा' (३, १०३) 'तेरस' में। ๑๗. ฉฏฺฐิยนฺตสฺส. १७. षष्ठी विभक्ति के द्वारा निर्दिष्ट कार्य अन्त्य (अन्तिम वर्ण) का होता है। ฉฏฺฐีนิทฺทิฏฺฐสฺส ยํ การิยํ, ตทนฺตสฺส วณฺณสฺส วิญฺเญยฺยํ ‘‘ราชสฺสิ นามฺหิ’’ ๒,๒๓ ราชินา. षष्ठी विभक्ति द्वारा निर्दिष्ट जो कार्य है, वह अन्त्य वर्ण का समझना चाहिए; जैसे- 'रार्जस्सि नाम्हि' (२.२३) सूत्र से 'राजिना' में। ๑๘. งานุพนฺโธ. १८. 'ङ' अनुबन्ध वाला (कार्य अन्त्य का होता है)। งกาโร อนุพนฺโธ ยสฺส, โส อนฺตสฺส โหติ ‘‘โคสฺสา วง’’ ๑,๓๒ ควาสฺสํ. जिसका 'ङ' कार अनुबन्ध है, वह अन्त्य का होता है; जैसे- 'गोस्सा वङ' (१.३२) सूत्र से 'गवास्सं' में। ๑๙. ฏานุพนฺธาเนกวณฺณา สพฺพสฺส. १९. 'ट' अनुबन्ध वाला और अनेक वर्णों वाला (आदेश) सम्पूर्ण के स्थान पर होता है। ฏกาโร-นุพนฺโธ [Pg.58] ยสฺส, โส-เนกกฺขโร จาเทโส สพฺพสฺส โหติ ‘‘อิมสฺสานิตฺถิยํ เฏ’’ ๒,๑๒๘ เอสุ, ‘‘นามฺห-นิมิ’’ ๒,๑๒๖ อเนน. जिसका 'ट' कार अनुबन्ध है, वह और अनेक अक्षरों वाला आदेश सम्पूर्ण के स्थान पर होता है; जैसे- 'इमस्सानित्थियं टे' (२.१२८) सूत्र से 'एसु' में, और 'नाम्ह-निमि' (२.१२६) इसके द्वारा। ๒๐. ญกานุพนฺธาทฺยนฺตา. २०. 'ञ' और 'क' अनुबन्ध वाले क्रमशः आदि और अन्त में होते हैं। ฉฏฺฐีนิทฺทิฏฺฐสฺส ญานุพนฺธกานุพนฺธา อาทฺยนฺตา โหนฺติ ‘‘พฺรูโต ติสฺสีญ’’ ๖,๓๖ พฺรวีติ, ‘‘ภูสฺส วุก’’ ๖,๑๗ พภูว. षष्ठी द्वारा निर्दिष्ट के 'ञ' अनुबन्ध वाला आदि में और 'क' अनुबन्ध वाला अन्त में होता है; जैसे- 'ब्रूतो तिस्सीञ' (६.३६) से 'ब्रवीति', 'भूस्स वुक' (६.१७) से 'बभूव'। ๒๑. มานุพนฺโธ สรานมนฺตา ปโร. २१. 'म' अनुबन्ध वाला स्वरों में अन्तिम स्वर के बाद होता है। มกาโร-นุพนฺโธ ยสฺส, โส สรา นมนฺตา สรา ปโร โหติ ‘‘มญฺจ รุธาทีนํ’’ ๕-๑๙ รุนฺธติ. जिसका 'म' कार अनुबन्ध है, वह स्वरों में अन्तिम स्वर के बाद होता है; जैसे- 'मञ्च रुधादीनं' (५.१९) से 'रुन्धति'। ๒๒. วิปฺปฏิเสเธ. २२. विप्रतिषेध (विरोध) होने पर। ทฺวินฺนํ สาวกาสานเมกตฺถปฺปสงฺเค ปโร โหติ. ยถา ทฺวินฺนํ ติณฺณํ วาปุริสานํ สหปฺปตฺติยํ ปโร, โส จ (คจฺฉติ) ตฺวํ จ (คจฺฉสิ, ตุมฺเห) คจฺฉถ. โส จ (คจฺฉติ,) ตฺวํ จ (คจฺฉสิ,) อหํ จ (คจฺฉามิ, มยํ) คจฺฉาม. दो सावकाश (नियमों) का एक ही स्थान पर प्रसंग होने पर पर (बाद वाला) होता है। जैसे दो या तीन पुरुषों के साथ प्राप्त होने पर पर (बाद वाला) होता है; 'सो च (गच्छति) त्वं च (गच्छसि)' होने पर 'तुम्हे गच्छथ'। 'सो च (गच्छति), त्वं च (गच्छसि), अहं च (गच्छामि)' होने पर 'मयं गच्छाम'। ๒๓. สงฺเกโต-นวยโว-นุพนฺโธ. २३. जो अवयव न हो ऐसा संकेत 'अनुबन्ध' है। โย นวยวภูโตสงฺเกโต, โส-นุพนฺโธติ ญาตพฺโพ, ‘‘ลุปิตาทีนมาสิมฺหิ’’ ๒-๕๗ กตฺตา. जो अनवयवभूत (अंश न होने वाला) संकेत है, उसे 'अनुबन्ध' जानना चाहिए; जैसे- 'लुपितादीनमासिम्हि' (२.५७) से 'कत्ता'। สงฺเกตคฺคหณํ กึ? ปกติยาทิสมุทายสฺสานุพนฺธตา มา โหตูติ, อนวยโวหิ สมุทาโย… สมุทายรูปตฺตาเยว. 'संकेत' ग्रहण क्यों? ताकि प्रकृति आदि समुदाय की अनुबन्धता न हो जाए, क्योंकि समुदाय अनवयव ही है... समुदाय रूप होने के कारण ही। อนวยวคฺคหณํ กึ? ‘‘อเตน’’ ๒-๑๐๘ ชเนน. อิมินาว โลปสฺสาวคตตฺตา นานุพนฺธโลปาย วจนมารทฺธํ. 'अनवयव' ग्रहण क्यों? 'अतेन' (२.१०८) से 'जनेन'। इसी से लोप के ज्ञात होने के कारण अनुबन्ध-लोप के लिए वचन आरम्भ नहीं किया गया। ๒๔. วณฺณปเรน สวณฺโณปิ. २४. 'वर्ण' शब्द पर (बाद में) होने पर सवर्ण का भी (ग्रहण होता है)। วณฺณสทฺโท [Pg.59] ปโร ยสฺมา เตน สวณฺโณปิ คยฺหติ สํจ รูปํ ‘‘ยุวณฺณานเมโอ ลุตฺตา’’ ๑-๒๙ วาเกริตํ, สโมนา. जिससे 'वर्ण' शब्द पर है, उसके द्वारा सवर्ण का भी ग्रहण होता है और अपने रूप का भी; जैसे- 'युवण्णानामेओ लुत्ता' (१.२९) से 'वाकेरितं', 'समोना'। ๒๕. นฺตุ วนฺตุมนฺตฺวาวนฺตุตวนฺตุสมฺพนฺธี. २५. 'न्तु' (प्रत्यय) वन्तु, मन्तु, आवन्तु और तवन्तु से सम्बद्ध है। วนฺตฺวาทิสมฺพนฺธีเยวนฺตุ คยฺหติ, ‘‘นฺตนฺตูนํ นฺโต โยมฺหิ ปฐเม’’ ๒-๒๑๕ คุณวนฺโต. वन्तु आदि से सम्बद्ध ही 'न्तु' ग्रहण किया जाता है; जैसे- 'न्तन्तूनं न्तो योम्हि पठमे' (२.२१५) से 'गुणवन्तो'। วนฺตฺวาทิสมฺพนฺธีติ กึ? ชนฺตู ตนฺตู. 'वन्तु आदि से सम्बद्ध' ऐसा क्यों? 'जन्तू', 'तन्तू' (में न हो)। (ปริภาสาโย.) (परिभाषाएँ।) ๒๖. สโร โลโป สเร. २६. स्वर के परे होने पर स्वर का लोप होता है। สเร สโร โลปนีโย โหติ. ตตฺริ-เม, สทฺธิ-นฺทฺริยํ, โนเห-ตํ, ภิกฺขุโน-วาโท, สเมตา-ยสฺมา, อภิภา-ยตนํ, ปุตฺตาม-ตฺถิ, อสนฺเต-ตฺถ. स्वर के परे होने पर स्वर लोप करने योग्य होता है। जैसे- तत्रि-मे (तत्र + इमे), सद्धि-न्द्रियं (सद्धिं + इन्द्रियं), नोहे-तं (नो + हेतं), भिक्खुनो-वादो (भिक्खुनो + ओवादो), समेता-यस्मा (समेतु + आयस्मा), अभिभा-यतनं (अभिभू + आयतनं), पुत्ताम-त्थि (पुत्ता + अत्थि), असन्ते-त्थ (असन्ते + एत्थ)। ๒๗. ปโร กฺวจิ. २७. कहीं पर (बाद वाला स्वर) भी। สรมฺหา ปโร สโร กฺวจิ โลปนีโย โหติ. โส-ปิ, สาว, ยโต-ทกํ, ตโต-ว. กฺวจีติกึ? สทฺธิ-นฺทฺริยํ, อยมธิกาโร อาปริจฺเฉทาวสานา, เตน นาติปฺปสงฺโค. स्वर से परे स्वर कहीं लोप करने योग्य होता है। जैसे- सो-पि (सो + अपि), साव (सा + इव), यतो-दकं (यतो + उदकं), ततो-व (ततो + इव)। 'क्वचि' (कहीं) क्यों? 'सद्धि-न्द्रियं'। यह अधिकार परिच्छेद की समाप्ति तक है, जिससे अतिप्रसंग नहीं होता। ๒๘. น ทฺเววา. २८. अथवा दोनों नहीं। ปุพฺพปรสรา ทฺเวปิ วา กฺวจิ น ลุปฺยนฺเต, ลตา อิว, ลเต-ว, ลตา-ว. पूर्व और पर दोनों स्वर भी कहीं विकल्प से लुप्त नहीं होते; जैसे- 'लता इव', 'लते-व', 'लता-व'। ๒๙. ยุวณฺณานเมโอ ลุตฺตา. २९. लुप्त (स्वर) के बाद इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर क्रमशः ए और ओ होते हैं। ลุตฺตา [Pg.60] สรา ปเรสํ อิวณฺณุวณฺณานํ เอโอ โหนฺติ วา ยถากฺกมํ. लुप्त स्वरों के बाद आने वाले इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर विकल्प से क्रमशः ए और ओ होते हैं। ตสฺเส-ทํ, วาเต-ริตํ, โน-เปติ, วาโม-รู, อเต-วญฺเญหิ, โว-ทกํ. กถํ ‘‘ปจฺโจรสฺมิ’’นฺติ? โยควิภาคา. วาตฺเวว? ตสฺสิทํ. इसके उदाहरण हैं - तस्सेदं (तस्स + इदं), वातेरितं (वात + ईरितं), नोपेति (न + उपेति), वामोरू (वाम + ऊरू), अतेवञ्ञेहि (अति + इव + अञ्ञेहि), वोदकं (उदकं)। 'पच्चोरस्मिं' कैसे सिद्ध होता है? योग-विभाग से। 'वा' (विकल्प से) ही क्यों? तस्सिदं (तस्स + इदं)। ลุตฺเตติ กึ? ลตา อิว. 'लुत्त' (लोप) ऐसा क्यों कहा? लता इव (यहाँ लोप नहीं हुआ)। ๓๐. ยวา สเร. ३०. स्वर परे होने पर 'य' और 'व' होते हैं। สเร ปเร อิวณฺณุวณฺณานํ ยการวการา โหนฺติ วา ยถากฺกมํ. พฺยากโต, อิจฺจสฺส, อชฺฌิณมุตฺโต, สฺวาคตํ, สฺวาปนลานิลํ, วาตฺเวว? อิติ-สฺส. กฺวจิตฺเวว? ยานี-ธ, สู-ปฏฺฐิตํ. स्वर परे होने पर इ-वर्ण (इ, ई) और उ-वर्ण (उ, ऊ) के स्थान पर क्रमशः य-कार और व-कार विकल्प से होते हैं। जैसे - ब्याकतो (वि + आगतो), इच्चस्स (इति + अस्स), अज्झिणमुत्तो (अधि + इणमुत्तो), स्वागतं (सु + आगतं), स्वापनलानिलं (सु + आपनलानिलं)। 'वा' (विकल्प से) ही क्यों? इतिस्स (इति + अस्स)। 'क्वचि' (कहीं-कहीं) ही क्यों? यानीध (यानि + इध), सूपट्ठितं (सु + उपट्ठितं)। ๓๑. เอโอนํ. ३१. ए और ओ का (परिवर्तन)। เอโอนํยวาโยนฺติ วา สเร ยถากฺกมํ. ตฺยชฺช เต-ชฺช, สฺวาหํ โส-หํ. กฺวจิตฺเวว? ปุตฺตาม-ตฺถิ, อสนฺเต-ตฺถ. स्वर परे होने पर 'ए' और 'ओ' के स्थान पर क्रमशः 'य' और 'व' विकल्प से होते हैं। जैसे - त्यज्ज (ते + अज्ज), तेज्ज (ते + अज्ज - यहाँ नहीं हुआ); स्वाहं (सो + अहं), सोहं (सो + अहं - यहाँ नहीं हुआ)। 'क्वचि' (कहीं-कहीं) ही क्यों? पुत्तामत्थि (पुत्ता मे अत्थि), असन्तेत्थ (असन्ते एत्थ)। ๓๒. โคสฺสา-วง. ३२. 'गो' शब्द को 'अवङ' आदेश। สเร โคสฺส อวง โหติ. ควา-สฺสํ. ‘ยถรีว, ตถริเว’ติ นิปาตาว, ‘ภุสามิเว’ติ อิวสทฺโท เอวตฺโถ. स्वर परे होने पर 'गो' शब्द को 'अवङ' (अव) आदेश होता है। जैसे - गवास्सं (गो + अस्सं)। 'यथरीव' और 'तथरीव' ये निपात ही हैं। 'भुसामिव' में 'इव' शब्द 'एव' के अर्थ में है। ๓๓. พฺยญฺชเน ทีฆรสฺสา. ३३. व्यंजन परे होने पर दीर्घ और ह्रस्व। รสฺสทีฆานํ [Pg.61] กฺวจิ ทีฆรสฺสา โหนฺติ พฺยญฺชเน. ตตฺรา-ยํ, มุนีจเร, สมฺมเทว, มาลภารี. व्यंजन परे होने पर ह्रस्व और दीर्घ स्वरों को कहीं-कहीं (क्वचि) क्रमशः दीर्घ और ह्रस्व हो जाता है। जैसे - तत्रायं (तत्र + अयं - यहाँ अ दीर्घ हुआ), मुनीचरे (मुनि + चरे - यहाँ इ दीर्घ हुआ), सम्मदेव (सम्मा + एव - यहाँ आ ह्रस्व हुआ), मालभारी (माला + भारी - यहाँ आ ह्रस्व हुआ)। ๓๔. สรมฺหา ทฺเว. ३४. स्वर के बाद (व्यंजन का) द्वित्व। สรมฺหา ปรสฺส พฺยญฺชนสฺส กฺวจิ ทฺเว รูปานิ โหนฺติ. ปคฺคโห. สรมฺหาติ กึ? ตํ ขณํ. स्वर से परे व्यंजन के कहीं-कहीं दो रूप (द्वित्व) हो जाते हैं। जैसे - पग्गहो (प + गहो)। 'स्वर से' ऐसा क्यों कहा? तं खणं (यहाँ अनुस्वार के बाद द्वित्व नहीं हुआ)। ๓๕. จตุตฺถทุติเยสฺเวสํ ตติยปฐมา. ३५. चौथे और दूसरे वर्णों के परे होने पर उनके स्थान पर (द्वित्व में) क्रमशः तीसरे और पहले वर्ण होते हैं। จตุตฺถทุติเยสุ ปเรสฺเวสํ จตุตฺถทุติยานํ ตพฺพคฺเค ตติย ปฐมา โหนฺติ. ปจฺจาสตฺถฺยา, นิคฺโฆโส, อกฺขนฺติ, โพชฺฌงฺคา, เสตจฺฉตฺตํ, ทฑฺโฒ, นิฏฺฐานํ, มหทฺธโน, ยสตฺเถโร, อปฺผุฏํ, อพฺภุคฺคโต. เอสฺวีติ กึ? เถโร. เอสนฺติ กึ? ปตฺโถ. चौथे और दूसरे वर्णों के परे होने पर, उन चौथे और दूसरे वर्णों के स्थान पर उनके ही वर्ग के क्रमशः तीसरे और पहले वर्ण (द्वित्व के रूप में) होते हैं। जैसे - पच्चासत्थ्या, निग्घोसो, अक्खन्ति, बोज्झङ्गा, सेतच्छत्तं, दड्ढो, निट्ठाणं, महद्धनो, यसत्थेरो, अप्फुटं, अब्भुग्गतो। 'एषु' (इनमें) ऐसा क्यों कहा? थेरो। 'एषां' (इनका) ऐसा क्यों कहा? पत्थो। ๓๖. วิติสฺเสเว วา. ३६. 'इति' के बाद 'एव' होने पर विकल्प से। เอวสทฺเท ปเร อิติสฺส โว โหติ วา. อิตฺเวว, อิจฺเจว. เอเวติ กึ? อิจฺจาห. 'एव' शब्द परे होने पर 'इति' के स्थान पर विकल्प से 'व' (इत्व) होता है। जैसे - इत्वेव, इच्चेव। 'एव' ही क्यों? इच्चाह (इति + आह)। ๓๗. เอโอนม วณฺเณ. ३७. वर्ण परे होने पर 'ए' और 'ओ' को 'अ' (आदेश)। เอโอนํ วณฺเณ กฺวจิ อ โหติ วา. ทิสฺวา ยาจก มาคเต, อกรมฺหส เต, เอส อตฺโถ, เอส ธมฺโม, อคฺคมกฺขายติ, สฺวาตนํ[Pg.62], หิยฺยตฺตนํ, กรสฺสุ. วาตฺเวว? ยาจเก อาคเต เอโส ธมฺโม. วณฺเณติ กึ? โส. वर्ण परे होने पर 'ए' और 'ओ' के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'अ' हो जाता है। जैसे - दिस्वा याचकम आगते (याचके + आगते), अकरम्हस ते (अकरम्हसे + ते), एस अत्थो (एसो + अत्थो), एस धम्मो (एसो + धम्मो), अग्गमक्खायति (अग्गो + अक्खायति), स्वातनं (स्वो + तनं), हिय्यत्तनं (हिय्यो + तनं), करस्सु (करो + सु)। 'वा' (विकल्प से) ही क्यों? याचके आगते, एसो धम्मो। 'वर्णे' (वर्ण परे होने पर) ही क्यों? सो। ๓๘. นิคฺคหีตํ. ३८. निग्गहीत (अनुस्वार)। นิคฺคหีตมาคโม โหติ วา กฺวจิ. จกฺขุํ อุทปาทิ จกฺขุอุทปาทิ, ปุริมํ ชาตึ ปุริมชาตึ, กตฺตพฺพํ กุสลํ พหุํ. อวํสิโรติอาทีสุ นิจฺจํ… ววตฺถิตวิภาสตฺตา วาธิการสฺส, สามตฺติเยนาคโมว, ส จ รสฺส สรสฺเสว โหติ… ตสฺส รสฺสานุคตตฺตา. कहीं-कहीं विकल्प से निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम होता है। जैसे - चक्खुं उदापादि (चक्खु + उदापादि), पुरिमं जातिं (पुरिम + जातिं), कत्तब्बं कुसलं बहुं। 'अवंसिरो' आदि में यह नित्य होता है... 'वा' के अधिकार की व्यवस्थित विभाषा होने के कारण, सामर्थ्य से आगम ही होता है, और वह ह्रस्व स्वर के बाद ही होता है... क्योंकि वह (निग्गहीत) ह्रस्व का अनुगामी है। ๓๙. โลโป. ३९. लोप (निग्गहीत का)। นิคฺคหีตสฺส โลโป โหติ วา กฺวจิ. กฺยาหํ กิมหํสารตฺโต สํรตฺโต. สลฺเล โข-คนฺตุกาโม คนฺตุมโนติ, อาทีสุ นิจฺจํ. निग्गहीत का कहीं-कहीं विकल्प से लोप होता है। जैसे - क्याहं (किं + अहं), सारत्तो (सं + रत्तो)। 'सल्ले खो', 'गन्तुकामो', 'गन्तुमनो' आदि में यह नित्य होता है। ๔๐. ปรสรสฺส. ४०. पर स्वर का (लोप)। นิคฺคหีตมฺหา ปรสฺส สรสฺส โลโป โหติ วา กฺวจิ. ตฺวํ-สิ ตฺวมสิ. निग्गहीत से परे स्वर का कहीं-कहीं विकल्प से लोप होता है। जैसे - त्वंसि (त्वं + असि)। ๔๑. วคฺเค วคฺคนฺโต. ४१. वर्ग परे होने पर वर्ग का अन्तिम वर्ण (पंचम वर्ण)। นิคฺคหีตสฺส โข วคฺเค วคฺคนฺโต วา โหติ ปจฺจาสตฺตฺยา. ตงฺกโรติ ตํ กโรติ, ตญฺจรติ ตํ จรติ, ตณฺฐานํ ตํ ฐานํ, ตนฺธนํ ตํ ธนํ, ตมฺปาติ ตํ ปาติ. นิจฺจํ ปทมชฺเฌ คนฺตฺวา, กฺวจญฺญาตฺรปิ สนฺติฏฺฐติ. वर्ग (क-वर्ग आदि) परे होने पर निग्गहीत के स्थान पर विकल्प से उसी वर्ग का अन्तिम वर्ण (पंचम वर्ण) होता है। जैसे - तङ्करोति (तं + करोति), तञ्चरति (तं + चरति), तण्ठानं (तं + ठानं), तन्धनं (तं + धनं), तम्पाति (तं + पाति)। पद के मध्य में यह नित्य होता है, जैसे - गन्त्वा; कहीं अन्यत्र भी होता है, जैसे - सन्तिट्ठति। ๔๒. เยวหิสุ โญ. ४२. 'य', 'एव' और 'हि' शब्दों के परे होने पर 'ञ' होता है। ย [Pg.63] เอว หิ สทฺเทสุ นิคฺคหีตสฺส วา โญ โหติ. ยญฺญเทว, ตญฺเญว, ตญฺหิ, วาตฺเวว? ยํ ยเทว. य, एव और हि शब्दों के परे होने पर निग्गहीत के स्थान पर विकल्प से 'ञ' होता है। जैसे - यञ्ञदेव (यं + यदेव), तञ्ञेव (तं + एव), तञ्हि (तं + हि)। 'वा' (विकल्प से) ही क्यों? यं यदेव। ๔๓. เย สํสฺส. ४३. 'य' परे होने पर 'सं' के (निग्गहीत) को। สํสทฺทสฺส ยํ นิคฺคหีตํ ตสฺส วา โญ โหติ ยกาเร. สญฺญโม สํยโม. 'सं' शब्द का जो निग्गहीत है, उसके स्थान पर य-कार परे होने पर विकल्प से 'ञ' होता है। जैसे - सञ्ञमो (सं + यमो)। ๔๔. มยทา สเร. ४४. स्वर के परे होने पर 'म', 'य', 'द' (आगम) होते हैं। นิคฺคหีตสฺส มยทา โหนฺติ วา สเร กฺวจิ. ตมหํ, ตยิทํ, ตทลํ. วา ตฺเวว? ตํ อหํ. निग्गहीत (अनुस्वार) के स्थान पर स्वर परे होने पर कहीं-कहीं 'म', 'य', 'द' होते हैं। जैसे- तमहं, तयिदं, तदलं। 'वा' (विकल्प) क्यों? तं अहं। ๔๕. วนตรคา จาคมา. ४५. 'व', 'न', 'त', 'र', 'ग' भी आगम होते हैं। เอเต มยทา จ อาคมา โหนฺติ สเร วา กฺวจิ. ติวงฺคิกํ, อิโต นายติ, จินิตฺวา, ตสฺมาติห, นิโรชํ, ปุถเคว, อิธมาหุ, ยถยิทํ, อตฺตทตฺถํ. วา ตฺเวว? อตฺตตฺถํ. ‘อติปฺปโค โข ตาวา’ติ-ปฐมนฺโต ปคสทฺโทว. ये (व, न, त, र, ग) और 'म', 'य', 'द' स्वर परे होने पर कहीं-कहीं आगम होते हैं। जैसे- तिवङ्गिकं, इतो नायति, चिनित्वा, तस्मातिह, निरोजं, पुथगेव, इधमाहु, यथयिदं, अत्तदत्थं। 'वा' क्यों? अत्तत्थं। 'अतिप्पगो खो तावा' यहाँ प्रथम 'पग' शब्द ही है। ๔๖. ฉา โฬ. ४६. 'छ' शब्द के बाद स्वर होने पर 'ळ' आगम होता है। ฉสทฺทา ปรสฺส สรสฺส ฬกาโร อาคโม โหติ วา. ฉฬงฺคํ, ฉฬายตนํ. วาตฺเวว? ฉอภิญฺญา. 'छ' शब्द से परे स्वर का 'ळ' कार आगम विकल्प से होता है। जैसे- छळङ्गं, छळायतनं। 'वा' क्यों? छअभिञ्ञा। ๔๗. ตทมินาทีนิ. ४७. 'तदमिना' आदि शब्द (निपातन से) सिद्ध होते हैं। ตทมินาทีนิ [Pg.64] สาธูนิ ภวนฺติ. ตํ อิมินา ตทมินา, สกึ อาคามี สกทาคามี, เอกํ อิธ อหํ เอกมิทาหํ, สํวิธาย อวหาโร สํวิทาวหาโร, วาริโน วาหโก วลาหโก, ชีวนสฺส มูโต ชีมูโต, ฉวสฺส สยนํ สุสานํ, อุทฺธํ ขมสฺส อุทุกฺขลํ, ปิสิตาโส ปิสาโจ, มหิยํ รวตีติ มยูโร, เอวมญฺเญปิ ปโยคโต-นุคนฺตพฺพา, ปเรสํ ปิโสทราทิมิเวทํ ทฏฺฐพฺพํ. 'तदमिना' आदि शब्द शुद्ध माने जाते हैं। तं इमिना = तदमिना, सकिं आगामी = सकदागामी, एकं इध अहं = एकमिदाहं, संविधाय अवहारो = संविदावहारो, वारिनो वाहको = वलाहको, जीवनस्स मूतो = जीमूतो, छवस्स सयनं = सुसानं, उद्धं खमस्स = उदुक्खलं, पिसितासो = पिसाचो, महियं रवतीति = मयूरो। इसी प्रकार अन्य शब्दों को भी प्रयोग के अनुसार समझना चाहिए, जैसे दूसरों के व्याकरण में 'पिपोदरादि' (पृषोदरादि) गण को देखा जाता है। ๔๘. ตวคฺควรณานํ เย จวคฺคพยญา. ४८. 'त' वर्ग के वर्णों के स्थान पर 'य' परे होने पर 'च' वर्ग, 'ब', 'य', 'ञ' होते हैं। ตวคฺควรณานํ กฺวจิ จวคฺคพยญา โหนฺติ ยถากฺกมํ ยกาเร. อปุจฺจณฺฑตาย, ตจฺฉํ, ยชฺเชวํ, อชฺฌตฺตํ, ถญฺญํ, ทิพฺพํ, ปยฺโยสนา, โปกฺขรญฺโญ. กฺวจิตฺเวว? รตฺตฺยา 'त' वर्ग के वर्णों के स्थान पर 'य' कार परे होने पर यथाक्रम 'च' वर्ग, 'ब', 'य', 'ञ' कहीं-कहीं होते हैं। जैसे- अपुच्चण्डताय, तच्छं, यज्जेवं, अज्झत्तं, थञ्ञं, दिब्बं, पय्योसना, पोक्खरञ्ञो। 'क्वचि' क्यों? रत्त्या। ๔๙. วคฺคลเสหิ เต. ४९. 'व', 'ग', 'ल', 'स' के बाद 'य' के स्थान पर वे ही (व, ग, ल, स) हो जाते हैं। วคฺคลเสหิ ปรสฺส ยการสฺส กฺวจิ เต วคฺคลสา โหนฺติ. 'व', 'ग', 'ल', 'स' से परे 'य' कार के स्थान पर कहीं-कहीं वे ही 'व', 'ग', 'ल', 'स' हो जाते हैं। สกฺกเต, ปจฺจเต, อฏฺฏเต, กุปฺปเต, ผลฺลเต, อสฺสเต. กฺวจิตฺเวว? กฺยาหํ. सक्कते, पच्चते, अट्ठते, कुप्पते, फल्लते, अस्सते। 'क्वचि' क्यों? क्याहं। ๕๐. หสฺส วิปลฺลาโส. ५०. 'ह' का विपर्यास (स्थान परिवर्तन) होता है। หสฺส วิปลฺลาโส โหติ ยกาเร. คุยฺหํ. 'य' कार परे होने पर 'ह' का विपर्यास होता है। जैसे- गुय्हं। ๕๑. เว วา. ५१. 'व' परे होने पर विकल्प से (विपर्यास होता है)। หสฺส วิปลฺลาโส โหติ วา วกาเร. พวฺหาพาโธ พวฺหาพาโธ. 'व' कार परे होने पर 'ह' का विपर्यास विकल्प से होता है। जैसे- बव्हाबाधो, बव्हाबाधो। ๕๒. ตถานรานํ ฏฐณลา ५२. 'त', 'थ', 'न', 'र' के स्थान पर 'ट', 'ठ', 'ण', 'ल' होते हैं। ตถนรานํ [Pg.65] ฏฐณลา โหนฺติ วา. ทุกฺกฏํ, อฏฺฐกถา, คหณํ, ปลิโฆ, ปลายติ. วาตฺเวว? ทุกฺกตํ. กฺวจิตฺเวว? สุคโต. 'त', 'थ', 'न', 'र' के स्थान पर विकल्प से 'ट', 'ठ', 'ण', 'ल' होते हैं। जैसे- दुक्कटं, अट्ठकथा, गहणं, पलिघो, पलायति। 'वा' क्यों? दुक्कतं। 'क्वचि' क्यों? सुगतो। ๕๓. สํโยคาทิ โลโป. ५३. संयोग के आदि (प्रथम वर्ण) का लोप होता है। สํโยคสฺส โย อาทีภูโต-วยโว ตสฺส วา กฺวจิ โลโป โหติ. ปุปฺผํ-สา ชายเต-คินิ. संयोग का जो आदि अवयव है, उसका विकल्प से कहीं-कहीं लोप होता है। जैसे- पुप्फं-सा, जायते-गिनी। ๕๔. วิจฺฉาภิกฺขญฺเญสุ ทฺเว. ५४. वीप्सा और आभीक्ष्ण्य के अर्थ में दो (द्वित्व) होते हैं। วิจฺฉายมาภิกฺขญฺเญ จ ยํ วตฺตเต, ตสฺส ทฺเว รูปานิ โหนฺติ. กฺริยาย คุเณน ทพฺเพน วา ภินฺเน อตฺเถ พฺยาปิตุมิจฺฉา วิจฺฉา. รุกฺขํ รุกฺขํ สิญฺจติ, คาโม คาโม รมณีโย, คาเม คาเม ปานียํ, เคเห เคเห อิสฺสโร, รสํ รสํ ภกฺขยติ, กิริยํ กิริยมารภเต. वीप्सा और आभीक्ष्ण्य के अर्थ में जो प्रयुक्त होता है, उसके दो रूप (द्वित्व) होते हैं। क्रिया, गुण या द्रव्य के द्वारा भिन्न अर्थों को व्याप्त करने की इच्छा 'वीप्सा' है। जैसे- रुक्खं रुक्खं सिञ्चति, गामो गामो रमणीयो, गामे गामे पानीयं, गेहे गेहे इस्सरो, रसं रसं भक्खयति, किरियं किरियमारभते। อตฺถิเยวา-นุปุพฺพิเยปิ วิจฺฉา มูเล มูเล ถูลา, อคฺเค อคฺเค สุขุมา, ยทิ หิ เอตฺถ มูลคฺคเภโท น สิยา, อานุปุพฺพิยมฺปิ น ภเวยฺย. มาสกํ มาสกํ อิมมฺหา กหาปณา ภวนฺถานํ ทฺวินฺนํ เทหีติ มาสกํ มาสกมิจฺเจตสฺมา วิจฺฉาคมฺยเต, สทฺทนฺตรโต ปน อิมมฺหา กหาปณาติ อวธารณํ. ปุพฺพํ ปุพฺพํ ปุปฺผนฺติ, ปฐมํ ปฐมํ ปจฺจนฺตีตฺยตฺราปิ วิจฺฉาว. อิเม อุโภ อฑฺฒา กตรา กตรา เอสํ ทฺวินฺนมฑฺฒตา, สพฺเพ อิเม อฑฺฒา กตมา กตมา อิเมสํ อฑฺฒุตา อิหาปิ [Pg.66] วิจฺฉาว. อาภิกฺขญฺญํ โปโนปุญฺญํ ปจติ ปจติ, ปปจติ ปปจติ, ลุนาหิ ลุนาหิตฺเววายํ ลุนาติ, ภุตฺวา ภุตฺวา คจฺฉติ, ปฏปฏา กโรติ, ปฏปฏายติ. आनुपूर्वी (क्रम) में भी वीप्सा होती ही है, जैसे- मूले मूले थूला, अग्गे अग्गे सुखुमा; यदि यहाँ मूल और अग्र का भेद न होता, तो आनुपूर्वी भी नहीं होती। 'मासकं मासकं इमम्हा कहापणा भवन्थानं द्विन्नं देहि' - यहाँ 'मासकं मासकं' से वीप्सा समझी जाती है, और दूसरे शब्द 'इमम्हा कहापणा' से निर्धारण होता है। 'पुब्बं पुब्बं पुप्फन्ति', 'पठमं पठमं पच्चन्ति' - यहाँ भी वीप्सा ही है। 'इमे उभो अढ्ढा कतरा कतरा एसं द्विन्नमढ्ढता', 'सब्बे इमे अढ्ढा कतमा कतमा इमेसं अढ्ढुता' - यहाँ भी वीप्सा ही है। आभीक्ष्ण्य का अर्थ है पौनःपुन्य, जैसे- पचति पचति, पपचति पपचति, लुनाहि लुनाहि, भुत्वा भुत्वा गच्छति, पटपटा करोति, पटपटायति। ๕๕. สฺยาทิโลโป ปุพฺพสฺเสกสฺส. ५५. द्वित्व होने पर पूर्व पद की 'सि' आदि विभक्तियों का लोप होता है। วิจฺฉายเมกสฺส ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส สฺยาทิโลโป โหติ. เอเกกสฺส. กถํ มตฺถกมตฺถเกนาติ? ‘สฺยาทิโลโป ปุพฺพสฺสา’ติ โยควิภาคา, นาจาติปฺปสงฺโค โยควิภาคา อิฏฺฐปฺปสิทฺธีติ. वीप्सा में एक शब्द के द्वित्व होने पर पूर्व पद की 'सि' आदि विभक्तियों का लोप होता है। जैसे- एकेकस्स। 'मत्थकमत्थकेन' कैसे सिद्ध हुआ? 'स्यादिलोपो पुब्बस्स' इस सूत्र के योग-विभाग से; योग-विभाग से अतिप्रसंग नहीं होता और इष्ट की सिद्धि होती है। ๕๖. สพฺพาทีนํ วีติหาเร. ५६. व्यतिहार के अर्थ में 'सर्वादि' शब्दों का द्वित्व होता है। สพฺพาทีนํ วีติหาเร ทฺเว ภวนฺติ ปุพฺพสฺส สฺยาทิโลโป จ. อญฺญมญฺญสฺส โภชกา, อิตรีตรสฺส โภชกา. व्यतिहार के अर्थ में 'सर्वादि' शब्दों के दो रूप (द्वित्व) होते हैं और पूर्व पद की 'सि' आदि विभक्तियों का लोप होता है। जैसे- अञ्ञमञ्ञस्स भोजका, इतरीतरस्स भोजका। ๕๗. ยาวโพธํ สมฺภเม. ५७. घबराहट (सम्भ्रम) में अर्थबोध होने तक (शब्दों की आवृत्ति होती है)। ตุริเตนาปายเหตุปทสฺสนํ สมฺภโม, ตสฺมึสติ วตฺถุ ยาวนฺเตหิ สทฺเทหิ โส-ตฺโถ วิญฺญายเต, ตาวนฺโต สทฺทา ปยุชฺชนฺเต. สปฺโป สปฺโป สปฺโป, พุชฺฌสฺสุ พุชฺฌสฺสุ พุชฺฌสฺสุ, ภินฺโน ภิกฺขุสงฺโฆ ภินฺโน ภิกฺขุสงฺโฆ. शीघ्रता के कारण अपाय (खतरे) के हेतु को दिखाना 'सम्भ्रम' है; उसके होने पर वस्तु का अर्थ जितने शब्दों से समझ में आ जाए, उतने शब्द प्रयुक्त किए जाते हैं। जैसे- सप्पो सप्पो सप्पो, बुज्झस्सु बुज्झस्सु बुज्झस्सु, भिन्नों भिक्खुसङ्घो भिन्नों भिक्खुसङ्घो। ๕๘. พหุลํ. ५८. बहुलता से। อยมธิกาโร อาสตฺถปริสมตฺติยา. เตน นาติปฺปสงฺโค อิฏฺฐปฺปสิทฺธิ จ. यह अधिकार शास्त्र की समाप्ति तक है। इससे अतिप्रसंग नहीं होता और इष्ट की सिद्धि होती है। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ วุตฺติยํ इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में। ปฐโม กณฺโฑ. प्रथम काण्ड। ๒. ทุติโย กณฺโฑ (สฺยาทิ) २. द्वितीय काण्ड (स्यादि)। ๑. ทฺเว [Pg.67] ทฺเว-กาเนเกสุ นามสฺมา สิ โย, อํ โย, นา หิ, ส นํ, สฺมา หิ, ส นํ, สฺมึ สุ. १. एक और अनेक अर्थों में नाम से परे दो-दो (प्रत्यय) होते हैं: सि यो, अं यो, ना हि, स नं, स्मा हि, स नं, स्मिं सु। เอเตสํ ทฺเว ทฺเว โหนฺติ เอกาเนกตฺเถสุ วตฺตมานโต นามสฺมา. มุนิ มุนโย, มุนึ มุนโย, มุนินา มุนีหิ, มุนิสฺส มุนีนํ, มุนิสฺมา มุนีหิ, มุนิสฺส มุนีนํ, มุนิสฺมึ มุนีสุ, เอวํ กุมารี กุมาริโย, กญฺญา กญฺญาโยติ. เอตานิ สตฺต ทุกานิ สตฺต วิภตฺติโย วิภาโค วิภตีติ กตฺวา, เอตฺถ สิอมิตี-การา-การา ‘‘กิมํ สิสุ’’ ๒,๒๐๐ ติ สํเกตตฺถา. एक और अनेक अर्थों में वर्तमान नाम से ये दो-दो होते हैं। मुनि मुनयो, मुनिं मुनयो, मुनिना मुनीहि, मुनिस्स मुनीनं, मुनिस्मा मुनीहि, मुनिस्स मुनीनं, मुनिस्मिं मुनीसू; इसी प्रकार कुमारी कुमारियो, कञ्ञा कञ्ञायो। ये सात द्विक सात विभक्तियाँ हैं, 'विभाग ही विभक्ति है' ऐसा मानकर। यहाँ 'सि' आदि में इ-कार और आ-कार 'किमं सिसु' (2,200) के अनुसार संकेत के लिए हैं। ๒. กมฺเม ทุติยา. २. कर्म में द्वितीया होती है। กรียติ กตฺตุ กิริยายา-ภิสมฺพนฺธียตีติ กมฺมํ, ตสฺมึ ทุติยาวิภตฺติ โหตํ. กฏํ กโรติ, โอทนํ ปจติ, อาทิจฺจํ ปสฺสติ. जो कर्ता की क्रिया द्वारा किया जाता है या जिससे संबंध जोड़ा जाता है, वह कर्म है; उसमें द्वितीया विभक्ति होती है। चटाई बनाता है, भात पकाता है, सूर्य को देखता है। ‘โอทโน ปจฺจตี’ติ โอทนสทฺทโต กมฺมตา นปฺปตียเต, กิญฺจรหิ? อาขฺยาตโต. ‘กฏํ กโรติ วิปุลํ ทสฺสนีย’นฺติ อตฺเถว คุณยุตฺตสฺส กมฺมตา, อิจฺฉิเตปิ กมฺมตฺตาว ทุติยา สิทฺธา คาวุํ ปโย โทหติ, โคมนฺตํ คาวํ ยาจติ, คาวมวรุนฺธติ วชํ, มาณวกํ มคฺคํ ปุจฺฉติ, โคมนฺตํ คาวํ ภิกฺขเต, รุกฺขมวจินาติ ผลานิ, สิสฺสํ ธมฺมํ พฺรูเต, สิสฺสํ ธมฺมมนุสาสตีติ. เอวํ อนิจฺฉิเตปิ อหึ ลงฺฆยติ, วิสํ ภกฺเขติ. ยํเนวิจฺฉิตํ นาปิ [Pg.68] อนิจฺฉิตํ, ตตฺถาปิ ทุติยา สิทฺธา. คามํ คจฺฉนฺโต รุกฺขมูลมุปสปฺปติ. 'ओदनो पच्चति' में ओदन शब्द से कर्मत्व प्रतीत नहीं होता, बल्कि आख्यात से होता है। 'कटं करोति विपुलं दस्सनीयं' में गुणयुक्त की भी कर्मता होती है। इच्छित होने पर भी कर्मत्व के कारण ही द्वितीया सिद्ध होती है: गाय से दूध दुहता है, गोमन्त से गाय माँगता है, बाड़े में गाय को रोकता है, बालक से मार्ग पूछता है, गोमन्त से गाय की भिक्षा माँगता है, वृक्ष से फल चुनता है, शिष्य को धर्म कहता है, शिष्य को धर्म का उपदेश देता है। इसी प्रकार अनिच्छित में भी: साँप को लाँघता है, विष खाता है। जो न इच्छित है और न ही अनिच्छित, वहाँ भी द्वितीया सिद्ध होती है: गाँव जाते हुए वृक्ष की जड़ के पास पहुँचता है। ปถวึ อธิเสสฺสติ, คามมธิติฏฺฐติ, รุกฺขมชฺฌาสเตติอธิสีฐาสานํปโยเค-ธิกรเณ กมฺมวจนิจฺฉา, วตฺติจฺฉาโต หิ การกานิ โหนฺติ. ตํ ยถา-วลาหกา วิชฺโชตเต, วลาหกสฺส วิชฺโชตเต, วลาหโก วิชฺโชตเต, วลาหเก วิชฺโชตเต, วลาหเกน วิชฺโชตเตติ. เอวมภินิวิสสฺส วา ธมฺมมภินิวิสเต ธมฺเม วา. पृथ्वी पर सोएगा, गाँव में ठहरता है, वृक्ष पर बैठता है - यहाँ अधि-शी, स्था और आस धातुओं के प्रयोग में अधिकरण में कर्म कहने की इच्छा है, क्योंकि वक्ता की इच्छा से ही कारक होते हैं। जैसे - बादलों से चमकता है, बादल का चमकता है, बादल चमकता है, बादल में चमकता है, बादल के द्वारा चमकता है। इसी प्रकार 'अभिनिविस' के प्रयोग में भी: धर्म में प्रवेश करता है या धर्म में। ตถา อุปนฺวชฺฌาวสสฺสาโภชน นิวุตฺติวจนสฺส คามมุปวสติ, ค, มมนุวสติ, ปพฺพตมธิวสติ, ฆรมาวสติ. อโภชนนิวุตฺติ วจนสฺสาติ กึ? คาเม อุปวสติ, โภชนนิวุตฺตึ กโรตีติ อตฺโถ. ตปฺปานาจาเรปิ กมฺมตฺตาว ทุติยา สิยา นทิมฺปิวติ, คามํ จรติ, เอวํ ‘สเจ มํ อาลปิสฺสตี’ติอาทีสุปิ. วิหิตาว ปติธโยเค ทุติยา – ‘ปฏิภนฺตุ ตํ จุนฺท โพชฺฌงฺคา’ติ. ตํ ปติ โพชฺฌงฺคา ภาสนฺตูติ อตฺโถ, ยทาตุ ธาตุนายุตฺโต ปติ, ตทา เตนา-โยคา สมฺพนฺเธ ฉฏฺฐีว ‘ตสฺส นปฺปฏิภาตี’ติ. อกฺเข ทิพฺพติ, อกฺเขหิ ทิพฺพติ, อกฺเขสุ ทิพฺพตีติ กมฺมกรณาธิกรณวจนิจฺฉา. उसी प्रकार उप, अनु, अधि और आ उपसर्ग पूर्वक 'वस' धातु के प्रयोग में, यदि भोजन त्याग अर्थ न हो: गाँव में रहता है, गाँव में रहता है, पर्वत पर रहता है, घर में रहता है। 'भोजन त्याग अर्थ न हो' ऐसा क्यों कहा? 'गामे उपवसति' का अर्थ है 'भोजन का त्याग करता है'। उसके पान और आचरण में भी कर्मत्व के कारण द्वितीया होगी: नदी पीता है, गाँव में विचरता है, इसी प्रकार 'यदि वह मुझसे बात करेगा' आदि में भी। 'पति' के योग में द्वितीया विहित ही है - 'हे चुन्द! तुम्हें बोध्यंग प्रतिभासित हों'। इसका अर्थ है 'तुम्हारे प्रति बोध्यंग भासित हों'। लेकिन जब 'पति' धातु से युक्त हो, तब उसके योग में संबंध में षष्ठी ही होती है, जैसे 'तस्स नप्पटिभाति'। 'पाँसों से खेलता है' (अक्खे दिब्बति, अक्खेहि दिब्बति, अक्खेसु दिब्बति) - यहाँ कर्म, करण और अधिकरण कहने की इच्छा है। ๓. กาลทฺธานมจฺจนฺตสํโยเค. ३. काल और मार्गवाची शब्दों में अत्यंत संयोग होने पर द्वितीया होती है। กิริยา, คุณ, ทพฺเพหิ สากลฺเลน กาลทฺธานํ สมฺพนฺโธ อจฺจนฺตสํโยโค. ตสฺมึ วิญฺญายมาเน กาลสทฺเทหิ อทฺธอทฺเทหิ จ ทุติยา โหติ. มาสมธีเต, มาสํ กลฺยาณิ, มาสํ [Pg.69] คุฬธานา, โกสมธีเต, โกสํ กุฏิลา นที, โกสํ ปพฺพโต. อจนฺตสํโยเคติ กึ? มาสสฺส ทฺวีหมธีเต, โกสสฺเสกเทเส ปพฺพโต. क्रिया, गुण और द्रव्य के साथ काल और मार्ग का पूर्ण संबंध 'अत्यंत संयोग' है। उसके ज्ञात होने पर कालवाची और मार्गवाची शब्दों से द्वितीया होती है। महीने भर पढ़ता है, महीने भर कल्याणकारी, महीने भर गुड़-धान्य, कोस भर पढ़ता है, कोस भर टेढ़ी नदी, कोस भर पर्वत। 'अत्यंत संयोग' में ही क्यों? महीने के दो दिन पढ़ता है, कोस के एक भाग में पर्वत है। ปุพฺพณฺหสมยํ นิวาเสตฺวา, เอกํ สมยํ ภควา, อิมํ รตฺตึ จตฺตาโร มหาราชาติ เอวมาทีสุ กาลวาจี หิ อจฺจนฺตสํโยคตฺตาว ทุติยา สิทฺธา. วิภตฺติวิปลฺลาเสนปิ วา พหุลํวิธานา. 'पूर्वाह्न समय में पहनकर', 'एक समय भगवान', 'इस रात्रि को चार महाराज' - इन आदि उदाहरणों में कालवाची शब्दों में अत्यंत संयोग के कारण ही द्वितीया सिद्ध है। अथवा विभक्ति के विपर्यय से भी बहुलता के विधान के कारण। ผลปฺปตฺติยํ กิริยาปริสมตฺตฺยปวคฺโค, ตสฺมึ วิญฺญายมาเน กาลทฺธานํ กิริยายาจฺจนฺตสํโยเค ตติยาภิมตา, สาปิ กรณตฺตาว สิทฺธา ‘มาเสนานุวาโก-ธีโต, โกเสนานุวาโก-ธีโต’ติ. อนปวคฺเคตุ อสาธกตมตฺตากรณตฺตาภาเว ทุติยาว ‘มาสมธีโต-นุวาโก, น จาเน น คหิโต’ติ. फल की प्राप्ति में क्रिया की समाप्ति 'अपवर्ग' है; उसके ज्ञात होने पर काल और मार्ग का क्रिया के साथ अत्यंत संयोग होने पर तृतीया अभीष्ट है, वह भी करणत्व के कारण ही सिद्ध है - 'महीने भर में अनुवाक पढ़ लिया', 'कोस भर में अनुवाक पढ़ लिया'। अपवर्ग न होने पर, करण न होने के कारण द्वितीया ही होती है - 'महीने भर अनुवाक पढ़ा, पर वह याद नहीं हुआ'। การกมชฺเฌ เย กาลทฺธานวาจิโน, ตโต สตฺตมีปญฺจมิโย อภิมตา ‘อชฺช ภุตฺวา เทวทตฺโต ทฺวิเห ภุญฺชิสฺสติ, ทฺวีหา ภุญฺชิสฺสติ, อตฺรฏฺโฐ-ยมิสฺสาโส โกเส ลกฺขํ วิชฺฌติ, โกสา ลกฺขํ วิชฺฌตี’ติ, ตาปีห สกสกการกวจนิจฺฉาเยว สิทฺธา. कारकों के मध्य जो काल और मार्गवाची शब्द हैं, उनसे सप्तमी और पंचमी अभीष्ट हैं - 'आज खाकर देवदत्त दो दिन में खाएगा', 'यहाँ खड़ा यह धनुर्धर कोस भर की दूरी पर लक्ष्य भेदता है'। वे भी यहाँ अपनी-अपनी कारक कहने की इच्छा से ही सिद्ध हैं। ๔. คติ โพธาหาร สทฺทตฺถากมฺมก ภชฺชาทีนํ ปโยชฺเช. ४. गति, बोध, आहार, शब्द-अर्थ वाली, अकर्मक और भज्ज आदि धातुओं के प्रयोज्य में द्वितीया होती है। คมนตฺถานํ โพธตฺถานํ อาหารตฺถานํ สทฺทตฺถานมกมฺมกานํ ภชฺชาทีนญฺจ ปโยชฺเช กตฺตริ ทุติยา โหติ. สามตฺถิยา จ ปโยชกพฺยาปาเรน กมฺมตาวสฺส โหตีติ ปตียเต. คมยติ มาณวกํ คามํ, ยาปยติ มาณวกํ คามํ, โพธยติ มาณวกํ ธมฺมํ, เวทยติ มาณวกํ ธมฺมํ, โภชยติ มาณ-วกํ [Pg.70] โมทกํ, อาสยติ มาณวกํ โมทกํ, อชฺฌาปยติ มาณวกํ เวทํ, ปาฐยติ มาณวกํ เวทํ, อาสยติ เทวทตฺตํ, สายยติ เทวทตฺตํ, อญฺญํ ภชฺชาเปติ, อญฺญํ โกฏฺฏาเปติ, อญฺญํ สนฺถราเปติ. เอเตสเมวาติ กึ? ปาเจติ โอทนํ เทวทตฺเตน ยญฺญทตฺโต. ปโยชฺเชติ กึ? คจฺฉติ เทวทตฺโต. ยทา จรหิ คมยติ เทวทตฺตํ ยญฺญทตฺโต, ตมปโร ปโยเชติ, ตทา คมยติ เทวทตฺตํ ยญฺญทตฺเตเนติ ภวิตพฺพํ … คมยติสฺสา-คมนตฺถตฺตา. गमनार्थक, बोधार्थक, आहारार्थक, शब्दार्थक, अकर्मक और भज्ज आदि धातुओं के प्रयोज्य कर्ता में द्वितीया होती है। सामर्थ्य से और प्रयोजक के व्यापार से उसकी कर्मता होती है। बालक को गाँव भेजता है, बालक को गाँव पहुँचाता है, बालक को धर्म समझाता है, बालक को धर्म का अनुभव कराता है, बालक को मोदक खिलाता है, बालक को मोदक खिलाता है, बालक को वेद पढ़ाता है, बालक को वेद पढ़ाता है, देवदत्त को बिठाता है, देवदत्त को सुलाता है, दूसरे से भुनवाता है, दूसरे से कुटवाता है, दूसरे से बिछवाता है। 'इन्हीं का' ऐसा क्यों? 'यज्ञदत्त देवदत्त से भात पकवाता है'। 'प्रयोज्य' क्यों? 'देवदत्त जाता है'। जब यज्ञदत्त देवदत्त को भेजता है और उसे कोई दूसरा प्रेरित करता है, तब 'गमयति देवदत्तं यञ्ञदत्तेन' ऐसा होना चाहिए, क्योंकि 'गमयति' गमनार्थक है। ๕. หราทีนํ วา. ५. 'हृ' आदि धातुओं के प्रयोज्य कर्ता में विकल्प से द्वितीया होती है। หราทีนํ ปโยชฺเช กตฺตริ ทุติยา โหติ วา. หาเรติ ภารํ เทวทตฺตํ เทวทตฺเตเนติ วา, อชฺโฌหาเรติ สตฺตุํ เทวทตฺตํ เทวทตฺเตเนติ วา, กาเรติ กฏํ เทวทตฺตํ เทวทตฺเตเนติ วา ทสฺสยเต ชนํ ราชํ ชเนเนติ วา, อภิวาทยเต คุรุํ เทวทตฺตํ เทวทตฺเตเนติ วา. 'हृ' आदि धातुओं के प्रयोज्य कर्ता में द्वितीया विभक्ति विकल्प से होती है। जैसे— देवदत्त से भार ढुलवाता है (देवदत्तं/देवदत्तेन), देवदत्त से शत्रु को खिलवाता है, देवदत्त से चटाई बनवाता है, लोगों को राजा दिखाता है (जनं राजं/राजेन), देवदत्त से गुरु का अभिवादन करवाता है। ๖. น ขาทาทีนํ. ६. 'खाद्' आदि धातुओं के साथ (द्वितीया) नहीं होती। ขาทาทีนํ ปโยชฺเช กตฺตริ ทุติยา น โหติ. ขาทยติ เทวทตฺเตน, อาทยติ เทวทตฺเตน, อวฺห, ปยติ เทวทตฺเตน, สทฺทายยติ เทวทตฺเตน, กนฺทยติ เทวทตฺเตน, นายยติ เทวทตฺเตน. 'खाद्' आदि धातुओं के प्रयोज्य कर्ता में द्वितीया विभक्ति नहीं होती है। जैसे— देवदत्त से खिलवाता है, देवदत्त से ग्रहण करवाता है, देवदत्त से आह्वान करवाता है, देवदत्त से शब्द करवाता है, देवदत्त से रुलाता है, देवदत्त से ले जाया जाता है। (๑) วหิสฺสานิยนฺตุเก. วาหยติ ภารํ เทวทตฺเตน อนิยนฺตุเกติ กึ? วาห-ยติ ภารํ พลีพทฺเท. (१) 'वह' धातु के साथ, यदि वह नियन्ता (चालक) न हो। 'अनियन्तृ' (जो चालक न हो) ऐसा क्यों कहा? (क्योंकि) बैलों से भार ढुलवाता है। (๒) ภกฺขิสฺสาหึ [Pg.71] สายํ. ภกฺขยติ โมทเก เทวทตฺเตน. อหึสายนฺติ กึ? ภกฺขยติ พลีพทฺเท สสฺสํ. (२) 'भक्ष्' धातु के साथ, यदि वह हिंसा के अर्थ में न हो। देवदत्त से मोदक खिलवाता है। 'अहिंसा' के लिए ऐसा क्यों कहा? (क्योंकि) बैलों से फसल खिलवाता है। ๗. ฌาทีหิ ยุตฺตา. ७. 'धि' आदि के योग में। ธีอาทีหิ ยุตฺตโต ทุติยา โหติ. ธิรตฺถุ มํ ปูติกายํ, อนฺตรา จ ราชคหํ อนฺตรา จ นาลนฺทํ, สมาธานมนฺตเรน, มุจลินฺทมภิโต สรมิจฺจาทิ, ฉฏฺฐิยาปวาโท-ยํ. 'धि' आदि के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे— धिक्कार है मुझको और इस दुर्गन्धित शरीर को, राजगृह और नालन्दा के बीच में, समाधि के बिना, मुचलिन्द सरोवर के चारों ओर आदि। यह षष्ठी विभक्ति का अपवाद है। ๘. ลกฺขณิตฺถมฺภูตวิจฺฉาสฺวภินา. ८. लक्षण, इत्थंभूत और वीप्सा के अर्थ में 'अभि' के योग में। ลกฺขณาทีสฺวตฺเถสฺวภินา ยุตฺตมฺหา ทุติยา มหาติ. รุกฺขมภิ วิชฺโชตเต วิชฺชุ, สาธุ เทวทตฺโต มาตรมภิ, รุกฺขํ รุกฺขมภิติฏฺฐติ. लक्षण आदि अर्थों में 'अभि' के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे— वृक्ष की ओर बिजली चमकती है, देवदत्त अपनी माता के प्रति साधु है, वह प्रत्येक वृक्ष के पास खड़ा होता है। ๙. ปติปรีหิ ภาเค จ. ९. 'प्रति' और 'परि' के योग में तथा 'भाग' अर्थ में भी। ปติปรีหิ ยุตฺตมฺหา ลกฺขณาทีสุ ภาเค จตฺเถ ทุติยา โหติ. รุกฺขํ ปติ วิชฺโชตเต วิชฺชุ, สาธุ เทวทตฺโต มาตรํ ปติ, รุกฺขํ รุกฺขํ ปติ ติฏฺฐติ, ยเทตฺถ มํ ปติ สิยา. รุกฺขํ ปริ วิชฺโชตเต วิชฺชุ, สาธุ เทวทตฺโต มาตรํ ปริ, รุกฺขํ รุกฺขํ ปริ ติฏฺฐติ, ยเทตฺถ มํ ปริ สิยา. 'प्रति' और 'परि' के योग में लक्षण आदि अर्थों में तथा 'भाग' अर्थ में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे— वृक्ष की ओर बिजली चमकती है (प्रति/परि), देवदत्त अपनी माता के प्रति साधु है, वह प्रत्येक वृक्ष के पास खड़ा होता है, यहाँ जो मेरा भाग हो। ๑๐. อนุนา. १०. 'अनु' के योग में। ลกฺขณาทีสฺวตฺเถสฺวนุนา ยุตฺตมฺหา ทุติยา โหติ. รุกฺขมนุ วิชฺโชตเต วิชฺชุ, สจฺจกิริยมนุ วุฏฺฐิ ปาวสฺสิ, เหตุ จ ลกฺขณํ ภวติ, สาธุ เทวทตฺโต มาตรมนุ, รุกฺขํ รุกฺขมนุ ติฏฺฐติ, ยเทตฺถ มํ อนุ สิยา. लक्षण आदि अर्थों में 'अनु' के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे— वृक्ष की ओर बिजली चमकती है, सत्य-क्रिया के कारण वर्षा हुई (यहाँ 'अनु' हेतु और लक्षण है), देवदत्त अपनी माता के प्रति साधु है, वह प्रत्येक वृक्ष के पास खड़ा होता है, यहाँ जो मेरा भाग हो। ๑๑. สหตฺเถ. ११. 'सह' (साथ) के अर्थ में। สหตฺเถ-นุนา [Pg.72] ยุตฺตมฺหา ทุติยา โหติ. ปพฺพตมนุ เสนา ติฏฺฐติ. 'सह' के अर्थ में 'अनु' के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे— पर्वत के साथ-साथ सेना खड़ी है। ๑๒. หีเน. १२. 'हीन' (कम) के अर्थ में। หีนตฺเถ-นุนา ยุตฺตมฺหา ทุติยา โหติ. อนุ สาริปุตฺตํ ปญฺญวนฺโต. 'हीन' के अर्थ में 'अनु' के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे— सारिपुत्त से कम प्रज्ञावान् (अन्य लोग)। ๑๓. อุเปน. १३. 'उप' के योग में। หีนตฺเถ อุเปน ยุตฺตมฺหา ทุติยา โหติ. อุป สาริปุตฺตํ ปญฺญวนฺโถ. 'हीन' के अर्थ में 'उप' के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे— सारिपुत्त से कम प्रज्ञावान्। ๑๔. สตฺตมฺยาธิกฺเย. १४. 'आधिक्य' (अधिकता) के अर्थ में सप्तमी विभक्ति। อาธิกฺยตฺเถ อุเปน ยุตฺตมฺหา สตฺตมี โหติ. อุป ขาริยํ โทโณ. 'आधिक्य' के अर्थ में 'उप' के योग में सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे— खारी से अधिक द्रोण है। ๑๕. สามิตฺเต-ธินา. १५. 'स्वामित्व' के अर्थ में 'अधि' के योग में। สามิภาวตฺเถ-ธินา ยุตฺตมฺหา สตฺตมี โหติ. อธิ พฺรหฺมทตฺเต ปญฺจาลา, อธิ ปญฺจาเลสุ พฺรหฺมทตฺโต. 'स्वामी-भाव' के अर्थ में 'अधि' के योग में सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे— ब्रह्मदत्त के अधीन पञ्चाल देश है, पञ्चालों पर ब्रह्मदत्त (अधिपति) है। ๑๖. กตฺตุกเรเณสุ ตติยา. १६. कर्ता और करण कारक में तृतीया विभक्ति होती है। กตฺตริ กรเณ จ การเก ตติยา โหติ. ปุริเสน กตํ, อสินา ฉินฺทติ. ปกติยา-ภิรูโป, โคตฺเถน โคตโม, สุเมโธ นาม นาเมน, ชาติยา สตฺตวสฺสิโกติ ภูธาตุสฺส สมฺภวา กรเณ เอว ตติยา. เอวํ สเมน ธาวติ วิสเมน [Pg.73] ธาวติ, ทฺวิโทเณน ธญฺญํ กิณาติ, ปญฺจเกน ปสโว กิณาตีติ. कर्ता और करण कारक में तृतीया विभक्ति होती है। जैसे— पुरुष द्वारा किया गया, तलवार से काटता है। स्वभाव से सुन्दर, गोत्र से गौतम, नाम से सुमेध, जन्म से सात वर्ष का— यहाँ 'भू' धातु के होने के कारण करण में ही तृतीया है। इसी प्रकार— समतल पर दौड़ता है, विषम पर दौड़ता है, दो द्रोण से अनाज खरीदता है, पाँच (मुद्राओं) से पशु खरीदता है। ๑๗. สหตฺเถน. १७. 'सह' के अर्थ में। สหตฺเถน โยเค ตติยา สิยา. ปุตฺเตน สห คโต, ปุตฺเตน สทฺธึ อาคโต, ตติยาปิ ฉฏฺฐีว อปฺปธาเน เอว ภวติ. 'सह' के योग में तृतीया विभक्ति होती है। जैसे— पुत्र के साथ गया, पुत्र के साथ आया। तृतीया भी षष्ठी की तरह अप्रधान (गौण) में ही होती है। ๑๘. ลกฺขเณ. १८. 'लक्षण' के अर्थ में। ลกฺขเณ วตฺตมานโต ตติยา สิยา. ติทณฺฑเกน ปริพฺพาชกมทฺทกฺขี, อกฺขินา กาโณ, เตน หิ องฺเคน องฺคิโน วิกาโร ลกฺขียเต. लक्षण के अर्थ में तृतीया विभक्ति होती है। जैसे— त्रिदण्ड से परिव्राजक को देखा, आँख से काणा। यहाँ उस अंग के द्वारा अंगी (व्यक्ति) का विकार लक्षित होता है। ๑๙. เหตุมฺหิ. १९. 'हेतु' (कारण) के अर्थ में। ตกฺกิริยา โยคฺเค ตติยา สิยา. อนฺเนน วสติ, วิชฺชาย ยโส. उस क्रिया के योग में तृतीया होती है। जैसे—अन्न से रहता है, विद्या से यश। ๒๐. ปญฺจมีเณ วา. २०. ऋण (कर्ज) के अर्थ में पंचमी भी होती है। อิเณ เหตุมฺหิ ปญฺจมี โหติ วา. สตสฺมา พทฺโธ, สเตน วา. ऋण रूपी हेतु में पंचमी विकल्प से होती है। जैसे—सौ (मुद्राओं) के कारण बँधा हुआ है (सतस्मा बद्धो), अथवा सौ से (सतेन वा)। ๒๑. คุเณ. २१. गुण के अर्थ में। ปรงฺคภูเต เหตุมฺหิ ปญฺจมี โหติ วา. ชฬตฺตา พทฺโธ ชฬตฺเตน วา, ปญฺญาย มุตฺโต, หุตฺวา อภาวโตอนิจฺจา, สงฺขารนิโรธา วิญฺญาณนิโรโธ. गौण (पर-अंग) भूत हेतु में पंचमी विकल्प से होती है। जैसे—जड़ता के कारण बँधा हुआ है (जळत्ता बद्धो) अथवा जड़ता से (जळत्तेन वा); प्रज्ञा से मुक्त; होकर अभाव होने के कारण अनित्य; संस्कारों के निरोध से विज्ञान का निरोध। ๒๒. ฉฏฺฐี [Pg.74] เหตฺวตฺเถหิ. २२. हेतु अर्थ वाले शब्दों के साथ षष्ठी होती है। เหตฺวตฺถวาจีหิ โยเค เหตุมฺหิ ฉฏฺฐี สิยา. อุทรสฺส เหตุ, อุทรสฺส การณา. हेतु अर्थ वाचक शब्दों के योग में हेतु में षष्ठी होती है। जैसे—उदर के हेतु, उदर के कारण। ๒๓. สพฺพาทิโต สพฺพา. २३. सब्ब (सर्व) आदि शब्दों से सभी विभक्तियाँ होती हैं। เหตฺวตฺเถหิ โยเค สพฺพาทีหิ สพฺพา วิภตฺติโย โหนฺติ. โก เหตุ, กํ เหตุํ, เกน เหตุนา, กสฺส เหตุสฺส, กสฺมา เหตุสฺมา, กสฺส เหตุสฺส, กสฺมึ เหตุสฺมึ, กึ การณํ, เกน การเณน, กึ นิมิตฺตํ, เกน นิมิตฺเตน, กึ ปโยชนํ, เกน ปโยชเนน อิจฺเจวมาทิ. เหตฺวตฺเถหีตฺเวว? เกน กตํ. हेतु अर्थ के योग में 'सब्ब' आदि शब्दों से सभी विभक्तियाँ होती हैं। जैसे—क्या हेतु है? किस हेतु को? किस हेतु से? किस हेतु का? किस हेतु से? किस हेतु का? किस हेतु में? क्या कारण है? किस कारण से? क्या निमित्त है? किस निमित्त से? क्या प्रयोजन है? किस प्रयोजन से? इत्यादि। 'हेतु अर्थ में' ही क्यों? किसके द्वारा किया गया (केना कतं)। ๒๔. จตุตฺถี สมฺปทาเน. २४. सम्प्रदान में चतुर्थी होती है। ยสฺส สมฺมา ปทียเต ตสฺมึ จตุตฺถี สิยา. สงฺฆสฺส ททาติ. อาธารวิวกฺขายํ สตฺตมีปิ สิยา สงฺเฆ เทหิ. जिसे भली-भांति दिया जाता है, उसमें चतुर्थी होती है। जैसे—संघ को देता है। आधार की विवक्षा होने पर सप्तमी भी होती है—संघ में दो। ๒๕. ตาทตฺถฺเย. २५. तदर्थ (उसके लिए होने) के भाव में। ตสฺเส-ทํ ตทตฺถํ, ตทตฺถภาเว โชตนีเย นามสฺมา จตุตฺถี สิยา. สีตสฺส ปฏิฆาตาย, อตฺถาย หิตาย (สุขาย) เทวมนุสฺสานํ, นาลํ ทารภรณาย, ยูปาย ทารุ, ปากาย วชตีตฺเววมาทิ. उसके लिए जो है वह 'तदर्थ' है; उस तदर्थ भाव को प्रकट करने के लिए संज्ञा से चतुर्थी होती है। जैसे—शीत के निवारण के लिए, देवों और मनुष्यों के अर्थ के लिए, हित के लिए (सुख के लिए), पत्नी के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं, यूप (खंभे) के लिए लकड़ी, पकाने के लिए जाता है, इत्यादि। กสฺส สาทุํ น รุจฺจภิ, มา-ยสฺมนฺตานมฺปิ สงฺฆเภโท รุจฺจิตฺถ, ขมติ สงฺฆสฺส, ภตฺตมสฺส นจฺฉาเทสีติ ฉฏฺฐี สมฺพนฺธวจนิจฺฉายํ, น เจวํ วิโรโธ สิยา สทิสรูปตฺตา, เอวํวิเธสุ จ สมฺพนฺธสฺส สทฺทิกานุมตตฺตา[Pg.75], กสฺส วา ตฺวํ ธมฺมํ โรเจสีติ อตฺถมตฺเต ปฐมา. किसे स्वाद अच्छा नहीं लगता, आयुष्मन्तों को भी संघ-भेद अच्छा न लगे, संघ को क्षमा (पसंद) है, उसे भात अच्छा नहीं लगा—यहाँ सम्बन्ध कहने की इच्छा में षष्ठी है; और इस प्रकार विरोध नहीं होगा क्योंकि रूप समान हैं, और इस प्रकार के प्रयोगों में सम्बन्ध वैयाकरणों द्वारा अनुमत है; अथवा तुम किसके धर्म को पसंद करते हो—यहाँ केवल अर्थ मात्र में प्रथमा है। เอวมญฺญาปิ วิธญฺญยฺยา, ปรโตปิ ยถาคมํ. इसी प्रकार अन्य भी जाननी चाहिए, और आगम के अनुसार आगे भी। รญฺโญ สตํ ธาเรติ, รญฺโญ ฉตฺตํ ธาเรตีติ สมฺพนฺเธ ฉฏฺฐี, เอวํ รญฺโญ สิลาฆเต, รญฺโญ หนุเต, รญฺโญ อุปติฏฺฐเต, รญฺโญ สปเต, เทวาปิ ตสฺส ปิหยนฺติ ตาทิโน, ตสฺส กุชฺฌ มหาวีร, ยทิหํ ตสฺส ปกุปฺเปยฺยํ, ทุหยติ ทิสานํ เมโฆ, โย มิตฺตานํ น ทูภติ, โย อปฺปทุฏฺฐสฺส นรสฺส ทุสฺสติ, กฺยาหํ อยฺยานํ อปรชฺฌามิ, อิสฺสยนฺติ สมณานํ ติตฺถิยา, ธมฺเมน นยมานานํ กา อุสูยา รญฺโญ ภาคฺยมารชฺฌติ, รญฺโญ ภาคฺยมิกฺขเต, เตน ยาจิโต อยาจิโต วา ตสฺส คาโว ปฏิสุณาติ, คาโว อาสุณาติ, ภควโต ปจฺจสฺโสสุํ, โหตุ ปติคิณาติ, โหตฺวนุคิณาติ, อาโรจยามิ โว ปติเวทยามิ โว, ธมฺมํ เต เทเสสฺสามิ, ยถา โว ภควา พฺยากเรยฺย, อลํ เต อิธ วาเสน, กึ เต ชฏาหิ ทุมฺเมธ, อรหติ มลฺโล มลฺลสฺสาติ. राजा का सौ (मुद्रा) धारण करता है (ऋणी है), राजा का छत्र धारण करता है—यहाँ सम्बन्ध में षष्ठी है; इसी प्रकार राजा की प्रशंसा करता है, राजा से छिपाता है, राजा की सेवा करता है, राजा को कोसता है, देवता भी उस (तादृश) की इच्छा करते हैं, हे महावीर! उस पर क्रोध करो, यदि मैं उस पर कुपित होऊँ, मेघ दिशाओं को दुहता है, जो मित्रों से द्रोह नहीं करता, जो निर्दोष मनुष्य से द्वेष करता है, मैं आर्यों का क्या अपराध करता हूँ?, तीर्थिक श्रमणों से ईर्ष्या करते हैं, धर्म से ले जाने वालों के प्रति क्या असूया? राजा का भाग्य सिद्ध होता है, राजा का भाग्य देखता है, उसके द्वारा याचित या अयाचित होने पर वह उसकी गायों के लिए प्रतिज्ञा करता है, गायों के लिए सुनता है, भगवान् को उत्तर दिया, होता (यज्ञकर्ता) स्वीकार करता है, होता अनुकरण करता है, मैं तुम्हें सूचित करता हूँ, तुम्हें प्रतिवेदित करता हूँ, तुम्हें धर्म का उपदेश दूँगा, जैसा भगवान् तुम्हें स्पष्ट करें, तुम्हारे लिए यहाँ रहने की आवश्यकता नहीं, हे दुर्बुद्धि! तेरी जटाओं से क्या प्रयोजन?, मल्ल मल्ल के योग्य है। ชีวิตํ ติณายปิ น มญฺญมาโนติ ตาทตฺถฺย จตุตฺถี, ติเณน โย อตฺโถ ตทตฺถายปีติ อตฺโถ, ‘‘โย จ สีตญฺจ อุณฺหญฺจ, ติณา ภิยฺโย น มญฺญติ’’ ติณมิว ชีวิตํ มญฺญมาโนติ สวิสยาว วิภตฺติโย. สคฺคาย คจฺฉตีติ ตาทตฺถฺเย จตุตฺถี, โย หิ สคฺคํ คจฺฉติ ตทตฺถํ ตสฺส คมนนฺติ, กมฺมวจนิจฺฉายนฺตุ ทุติยาว สคฺคํ คจฺฉตีติ. जीवन को तिनके के समान भी नहीं मानता—यहाँ तदर्थ चतुर्थी है, 'तिनके से जो अर्थ है, उस अर्थ के लिए भी' यह अर्थ है; 'जो शीत और उष्ण को तिनके से अधिक नहीं मानता'—जीवन को तिनके के समान मानते हुए ये अपने विषय की ही विभक्तियाँ हैं। स्वर्ग के लिए जाता है—यहाँ तदर्थ चतुर्थी है, क्योंकि जो स्वर्ग जाता है, उसका जाना उसी के लिए है; किन्तु कर्म कहने की इच्छा होने पर द्वितीया ही होती है—स्वर्ग को जाता है। อายุ [Pg.76] โภโต โหตุ, จิรํ ชีวิตํ, ภทฺทํ กลฺยาณํ อตฺถํ ปโยชนํ, กุสลํ อนามยํ, หิตํ ปถฺยํ สุขํ สาตํ โภโต โหตุ, สาธุ สมฺมุติ เมตสฺส, ปุตฺตสฺสาวิกเรยฺย คุยฺหมตฺถํ, ตสฺส เม สกฺโก ปาตุรโหสิ, ตสฺส ปหิเณยฺย, ภิกฺขูนํ ทุตํ ปาเหสิ, กปฺปติ สมณานํ อาโยโค, เอกสฺส ทฺวินฺนํ ติณฺณํ วา ปโหติ, อุปมํ เต กริสฺสามิ, อญฺชลึ เต ปคฺคณฺหามิ, ตสฺส ผาสุ, โลกสฺสตฺโถ, นโม เต ปุริสาชญฺญ, โสตฺถิ ตสฺส, อลํ มลฺโล มลฺลสฺส, สมตฺโถ มลฺโล มลฺลสฺส, ตสฺส หิตํ, ตสฺส สุขํ, สฺวาคตํ เต มหาราชาติ สพฺพตฺถ ฉฏฺฐี สมฺพนฺเธ, เอวํวิธมญฺญมฺเปว วิญฺเญยฺยํ ยถาคมํ. आपकी आयु हो, चिर जीवन हो, आपका भद्र, कल्याण, अर्थ, प्रयोजन, कुशल, अनामय, हित, पथ्य, सुख, सात (सुख) हो, यह इसके लिए श्रेष्ठ सम्मति है, पुत्र के लिए गुप्त बात प्रकट करे, उस मेरे सामने शक्र प्रकट हुए, उसे भेजे, भिक्षुओं के लिए दूत भेजा, श्रमणों के लिए उद्योग उचित है, एक, दो या तीन के लिए पर्याप्त है, तुम्हारे लिए उपमा दूँगा, तुम्हारे लिए अंजलि प्रगत करता हूँ, उसके लिए सुख, लोक का अर्थ, हे पुरुषश्रेष्ठ! तुम्हें नमस्कार, उसका कल्याण हो, मल्ल मल्ल के लिए पर्याप्त है, मल्ल मल्ल के लिए समर्थ है, उसका हित, उसका सुख, हे महाराज! आपका स्वागत है—इन सबमें सम्बन्ध में षष्ठी है; इसी प्रकार अन्य भी आगम के अनुसार जानना चाहिए। ๒๖. ปญฺจมฺยวธิสฺมา. २६. अवधि (सीमा) से पंचमी होती है। ปทตฺถาวธิสฺมา ปญฺจมีวิภตฺติ โหติ. คามสฺมา อาคจฺฉตุ, เอวํ โจรสฺมา ภายติ, โจรสฺมา อุตฺตสติ, โอรสฺมา ตายติ, โจรสฺมา รกฺขตีติ, สเจ ภายถ ทุกฺขสฺส, ปมาเท ภยทสฺสิวา, ตสนฺติ ทณฺฑสฺสาติ ฉฏฺฐี สตฺตมิโยปิ โหนฺเตว สมฺพนฺธาธารวจนิจฺฉายํ. पदार्थ की अवधि से पंचमी विभक्ति होती है। जैसे—गाँव से आए; इसी प्रकार चोर से डरता है, चोर से त्रस्त होता है, निकट से रक्षा करता है, चोर से रक्षा करता है; यदि तुम दुःख से डरते हो, प्रमाद में भय देखने वाला, दण्ड से डरते हैं—यहाँ सम्बन्ध और आधार कहने की इच्छा में षष्ठी और सप्तमी भी होती ही हैं। อชฺเฌนา ปราเชติ, ปฏิปกฺเข ปราเชตีติ สวิสยาว วิภตฺติโย. สเจ เกวฏฺฏสฺส ปรชฺชิสฺสามีติ ฉฏฺฐีปิ โหติ สมฺพนฺธวจนิจฺฉายํ. ยเวหิ คาโว วาเรติ, ปาปา จิตฺตํ นิวารเย, กาเก รกฺขติ ตณฺฑุลาติ สวิสเยว ปญฺจมี. จิตฺตํ รกฺเขถ เมธาวีติ ทุติยาว ทิสฺสติ กมฺมตฺเถ. อุปชฺฌายา อนฺตรธายติ[Pg.77], อุปชฺฌายา อธิเต, กามโต ชายเต โสโกติ สวิสเย ปญฺจมี. अध्ययन से पराजित होता है (थक जाता है), प्रतिपक्ष में पराजित करता है—ये अपने विषय की ही विभक्तियाँ हैं। यदि केवट से हार जाऊँगा—यहाँ सम्बन्ध की विवक्षा में षष्ठी भी होती है। जौ से गायों को रोकता है, पाप से चित्त को हटाए, कौओं से चावलों की रक्षा करता है—यहाँ अपने विषय में पंचमी ही है। मेधावी चित्त की रक्षा करे—यहाँ कर्म अर्थ में द्वितीया ही दिखाई देती है। उपाध्याय से छिपता है, उपाध्याय से पढ़ता है, काम से शोक उत्पन्न होता है—यहाँ अपने विषय में पंचमी है। ตตฺเถว-นฺตรธายิ สุ, นฏสฺส สุโณติ, ปทุมํ ตตฺถ ชาเยถาติ สตฺตมีฉฏฺฐิโยปิ โหนฺเตว สวิสเย. หิมวนฺตา ปภวติ คงฺคา, ปาณาติปาตา วิรมสฺสุ ขิปฺปํ, อญฺโญ เทวทตฺตา, ภินฺโน เทวทตฺตาติ สวิสเยว ปญฺจมี. เอวํ อารา โส อาสวกฺขยา, อิตโร เทวทตฺตา, อุทฺธํ ปาทตลา อโธ เกสมตฺถกา, ปุพฺโพ คามา, ปุพฺเพว สมฺโพธา, ตโต ปรํ, ตโต อปเรน สมเยน, ตตุตฺตรินฺติ. สมฺพนฺธวจนิจฺฉายํ ฉฏฺฐีปิ ปุรโต คามสฺส, ทกฺขิณโต คามสฺส, อุปริ ปพฺพตสฺส, เหฏฺฐา ปาสาทสฺสาติ. ปาสาทมารุยฺห เปกฺขติ ปาสาทา เปกฺขติ, อาสเน อุปวิสิตฺวา เปกฺขติ อาสนา เปกฺขตีติ อวธิวจนิจฺฉายํ ปญฺจมี. वहीं अंतर्धान हो गया, नट का सुनता है, वहाँ पद्म उत्पन्न हो—यहाँ सप्तमी और षष्ठी भी अपने विषय में होती हैं। हिमालय से गंगा निकलती है, प्राणातिपात से शीघ्र विरत हो, देवदत्त से अन्य, देवदत्त से भिन्न—यहाँ अपने विषय में पंचमी ही होती है। इसी प्रकार आस्रवक्षय से दूर, देवदत्त से इतर, पैर के तलवों से ऊपर, केशों के मस्तक से नीचे, गाँव से पूर्व, संबोधि से पूर्व ही, उसके बाद, उसके बाद के समय में, उसके उत्तर में। संबंध की विवक्षा में षष्ठी भी होती है—गाँव के सामने, गाँव के दक्षिण में, पर्वत के ऊपर, प्रासाद के नीचे। प्रासाद पर चढ़कर देखता है के अर्थ में 'प्रासाद से देखता है', आसन पर बैठकर देखता है के अर्थ में 'आसन से देखता है'—यहाँ अवधि की विवक्षा में पंचमी होती है। ปุจฺฉานาขฺยาเนสุ กุโต ภวํ? ปาตฏลิปุตฺตสฺมาติ. ตถา เทสกาลมาเนปิ ปาฏลิปุตฺตสฺมา ราชคหํ สตฺต โยชนานิ, สตฺตสุ โยชเนสูติ วา. เอวํ อิโต ติณฺณํ มาสาน-มจฺจเยนาติ, กิจฺฉาลทฺธนฺติ คุเณ ปญฺจมี. กิจฺเฉน เม อธิคตนฺติ เหตุมฺหิ กรเณ วา ตติยา. เอวํ โถกา มุตฺโต, โถเกน มุตฺโตติ. โถกํ จลตีติ กิริยาวิเสสเน กมฺมนิ ทุติยา. प्रश्न और आख्यान में—'आप कहाँ से हैं?' 'पाटलिपुत्र से।' इसी प्रकार देश, काल और माप में भी—पाटलिपुत्र से राजगृह सात योजन है, या सात योजनों में। इसी प्रकार 'यहाँ से तीन महीने बीतने पर', 'कठिनाई से प्राप्त'—यहाँ गुण में पंचमी है। 'मेरे द्वारा कठिनाई से प्राप्त किया गया'—यहाँ हेतु या करण में तृतीया है। इसी प्रकार 'थोड़े से मुक्त', 'थोड़े के द्वारा मुक्त'। 'थोड़ा चलता है'—यहाँ क्रियाविशेषण कर्म में द्वितीया है। ทูรนฺติ กตฺถโยเคปิ สวิสเยว ปญฺจมีฉฏฺฐิโย สิยุํ, ทูรํ คามสฺมา, อนฺติกํ คามสฺมา, ทูรํ คามสฺส, อนฺติกํ คามสฺสาติ, ทูรนฺติ กตฺเถหิ ตุ สพฺพาว สวิสเย สิยุํ พาธกาภาวา ทูโร คาโม, อนฺติโก คาโมตฺเววมาทิ. 'दूर' शब्द के योग में भी अपने विषय में पंचमी और षष्ठी होती हैं—गाँव से दूर, गाँव से समीप, गाँव के दूर, गाँव के समीप। 'दूर' आदि शब्दों के साथ तो बाधक के अभाव में सभी अपने विषय में होती हैं—दूर गाँव, समीप गाँव इत्यादि। เกจิ [Pg.78] ปนาหุ ‘อสตฺตวจนเหเตหิ ปาฏิปทิกตฺเถ ทุติยาตติยาปญฺจมีสตฺตมิโย, สตฺตวจเนหิ ตุ สพฺพาว สวิสเย’ติ, เต ปนญฺเญเหว ปฏิกฺขิตฺตา. ทูรํ มคฺโค, อนฺติกํ มคฺโคติ กิริยาวิเสสนํ… ภูธาตุสฺส คมฺมมานตฺตา. วิสุทฺโธ โลภนีเยหิ ธมฺเมหิ, ปริมุตฺโต โส ทุกฺขสฺมา วิวิจฺเจว กาเมหิ, คมฺภีรโต จ ปุถุลโต จ โยชนํ, อายาเมน โยชนํ, ตโต ปภุติ, ยโต สรามิ อตฺตานนฺติ สวิสเยว วิภตฺติโย. कुछ लोग कहते हैं कि 'असत्तावाचक हेतुओं में प्रातिपदिक के अर्थ में द्वितीया, तृतीया, पंचमी और सप्तमी होती हैं, और सत्तावाचक में तो सभी अपने विषय में होती हैं', लेकिन दूसरों ने इसका खंडन किया है। दूर मार्ग, समीप मार्ग—यहाँ क्रियाविशेषण है... 'भू' धातु के गम्यमान होने से। लोभनीय धर्मों से विशुद्ध, वह दुःख से मुक्त, कामों से विविक्त होकर ही, गहराई और चौड़ाई से एक योजन, लंबाई में एक योजन, तब से लेकर, जब से मैं स्वयं को याद करता हूँ—यहाँ अपने विषय में ही विभक्तियाँ हैं। ๒๗. อปปรีหิ วชฺชเน. २७. वर्जन (त्याग) के अर्थ में 'अप' और 'परि' के साथ (पंचमी होती है)। วชฺชเน วตฺตมาเนหิ อปปรีหิ โยเค ปญฺจมี โหติ. อป สาลาย อายนฺติ วาณิชา, ปริ สาลาย อายนฺติ วาณิชา, สาลํ วชฺเชตฺวาติ อตฺโถ. วชฺชเนติ กึ? รุกฺขํ ปริวิชฺโชตเต วิชฺชุ. อาปาฏลิปุตฺตสฺมา วสฺสิ เทโวติ มริยาทา-ภิวิธีสฺววธิ วิสเยว ปญฺจมี, วินา ปาฏลิปุตฺเตน สห เวติ วิเสโส, เอวํ ยาว ปาฏลิปุตฺตสฺมา วสฺสิ เทโวติ. वर्जन अर्थ में वर्तमान 'अप' और 'परि' के योग में पंचमी होती है। शाला को छोड़कर व्यापारी आते हैं (अप स़ालाय आयन्ति या परि सालाय आयन्ति)। वर्जन में क्यों? 'बिजली वृक्ष के चारों ओर चमकती है'। पाटलिपुत्र तक देव (बादल) बरसा—मर्यादा और अभिविधि में अवधि के विषय में पंचमी ही होती है, विशेष यह है कि पाटलिपुत्र के बिना या उसके साथ, इसी प्रकार 'जब तक पाटलिपुत्र तक देव बरसा'। ๒๘. ปฏินิธิปฏิทาเนสุ ปตินา. २८. प्रतिनिधि और प्रतिदान के अर्थ में 'पति' के साथ (पंचमी होती है)। ปฏินิธิมฺหิ ปฏิทาเน จ วตฺตมาเนน ปตินา โยเค นามสฺมา ปญฺจมี วิภตฺติ โหติ. พุทฺธสฺมา ปติ สาริปุตฺโต, ฆตมสฺส เตสสฺมา ปติ ททาติ, ปฏินิธิปฏิทาเนสูติ กึ? รุกฺขํ ปติ วิชฺโชตเต. प्रतिनिधि और प्रतिदान के अर्थ में वर्तमान 'पति' के योग में नाम से पंचमी विभक्ति होती है। बुद्ध के प्रतिनिधि सारिपुत्र हैं, घी के बदले में तेल देता है। प्रतिनिधि और प्रतिदान में क्यों? 'वृक्ष की ओर चमकता है'। ๒๙. ริเต ทุติยา จ. २९. 'ऋते' के योग में द्वितीया भी (और पंचमी) होती है। ริเตสทฺเทน [Pg.79] โยเค นามสฺมา ทุติยา โหติ ปญฺจมี จ. ริเต สทฺธมฺมํ, ริเต สทฺธมฺมา. 'ऋते' शब्द के योग में नाम से द्वितीया और पंचमी होती है। सद्धर्म के बिना (ऋते सद्धम्मं, ऋते सद्धम्मा)। ๓๐. วินา-ญฺญตฺร ตติยา จ. ३०. 'विना' और 'अन्यत्र' के योग में तृतीया भी (और द्वितीया, पंचमी) होती है। วินา-ญฺญตฺรสทฺเทหิ โยเค นามสฺมา ตติยา จ โหติ ทุติยา ปญฺจมิโย จ. วินา วาเตน, วินา วาตํ, วินา วาตสฺมา, อญฺญตฺร เอเกน ปิณฺฑปาตนีหารเกน, อญฺญตฺร ธมฺมํ, อญฺญตฺร ธมฺมา. 'विना' और 'अन्यत्र' शब्दों के योग में नाम से तृतीया, द्वितीया और पंचमी होती हैं। वायु के बिना (विना वातेन, विना वातं, विना वातस्मा), एक पिण्डपात ले जाने वाले के अतिरिक्त, धर्म के अतिरिक्त (अञ्ञत्र धम्मं, अञ्ञत्र धम्मा)। ๓๑. ปุถนานาหิ. ३१. 'पृथक्' और 'नाना' के साथ (तृतीया और पंचमी होती है)। เอเตหิ โยเค ตติยา โหติ ปญฺจมี จ. ปุถเคว ชเนน, ปุถเคว ชนสฺมา, ชเนน นานา, ชนสฺมา นานา. इनके योग में तृतीया और पंचमी होती है। जन से पृथक् ही, जन से पृथक् (पंचमी), जन से नाना (तृतीया), जन से नाना (पंचमी)। ๓๒. สตฺตมฺยาธาเร. ३२. आधार में सप्तमी होती है। กิริยาธาร ภูต กตฺตุ กมฺมานํ ธารเณน โย กิริยายาธาโร ตสฺมึ การเก นามสฺมา สตฺตมี โหติ. กเฏ นิสีทติ (เทวทตฺโต), ถาลิยํ โอทนํ ปจติ, อากาเส สกุนา, ภิเลสุ เตลํ, คงฺคายํ วโช. क्रिया के आधारभूत कर्ता और कर्म के धारण करने से जो क्रिया का आधार है, उस कारक में नाम से सप्तमी होती है। चटाई पर बैठता है (देवदत्त), बटलोई में भात पकाता है, आकाश में पक्षी, तिलों में तेल, गंगा में गोष्ठ (बस्ती)। ๓๓. นิมิตฺเต. ३३. निमित्त (प्रयोजन) में (सप्तमी होती है)। นิมิตฺตตฺเถ สตฺตมี โหติ. อชินมฺหิ หญฺญเต ทีปิ, มุสาวาเท ปาจิตฺถิยํ. निमित्त के अर्थ में सप्तमी होती है। चर्म के लिए चीता मारा जाता है, मृषावाद (झूठ बोलने) में पाचित्तिय है। ๓๔. ยพฺภาโวภาวลกฺขณํ. ३४. जिसके भाव से भाव का लक्षण (ज्ञान) हो (वहाँ सप्तमी होती है)। ยสฺส [Pg.80] ภาโว ภาวนฺตรสฺส ลกฺขณํ ภวติ, ตโต สตฺตมี โหติ. คาวีสุ ทุยฺหมานาสุ คโต, ทุทฺธาสุ อาคโต. ภาโวติ กึ? โย ชฏาหิ โส ภุญฺชติ. ภาวลกฺขณนฺติ กึ? โย ภุญฺชติ โส เทวทตฺโต, ‘‘อกาเล วสฺสติ ตสฺส, ตาเล ตสฺส น วสฺสตี’’ติ วิสยสตฺตมี. जिसका भाव (क्रिया) दूसरी क्रिया का लक्षण (परिचायक) होता है, उससे सप्तमी होती है। गायों के दुहे जाते समय वह गया, दुह लेने पर वह आया। 'भाव' क्यों? जो जटाओं से है, वह भोजन करता है। 'भावलक्षण' क्यों? जो भोजन करता है, वह देवदत्त है। 'अकाल में उसके लिए वर्षा होती है, ताल (वृक्ष) पर उसके लिए वर्षा नहीं होती'—यह विषय सप्तमी है। ๓๕. ฉฏฺฐี จานาทเร. ३५. अनादर में षष्ठी भी (और सप्तमी) होती है। ยสฺส ภาโว ภาวนฺตรสฺส ลกฺขณํ ภวติ, ตโต ฉฏฺฐี ภวติ สตฺตมี จ อนาทเร คมฺยมาเน. ‘‘อาโกฏยนฺโต โส เนติ, สิวิราชสฺส เปกฺขโต’’, ‘‘มจฺจุ คจฺฉติ อาทาย, เปกฺขมาเน มหาชเน’’. जिसका भाव दूसरी क्रिया का लक्षण होता है, उससे अनादर प्रतीत होने पर षष्ठी और सप्तमी होती है। 'राजा शिवि के देखते हुए ही वह (रोते हुए को) ले जाता है', 'महाजनों के देखते हुए मृत्यु लेकर चली जाती है'। คุนฺนํ สามีติ สมฺพนฺเธ ฉฏฺฐี, โคสุ สามีติ วิสยสตฺตมี, เอวํ คุนฺนมิสฺสโร, โคสฺวิสฺสโร, คุนฺนํ อธิปติ, โคสุ อธิปติ, คุนฺนํ ทายาโท, โคสุ ทาหาโท, ทุนฺนํ สกฺขิ, โคสุ สกฺขิ, คุนฺนํ ปติภู, โคสุ ปติภู, คุนฺนํ ปสูโต, โคสุ ปสูโต, กุสลา นจฺจคีตสฺส, กุสลา นจฺจคีเต, อายุตฺโต กฏกรณสฺส, อายุตฺโต กฏกรเณติ. 'गायों का स्वामी'—यहाँ संबंध में षष्ठी है, 'गायों में स्वामी'—यहाँ विषय सप्तमी है। इसी प्रकार गायों का ईश्वर, गायों में ईश्वर, गायों का अधिपति, गायों में अधिपति, गायों का दायाद, गायों में दायाद, दोनों का साक्षी, गायों में साक्षी, गायों का प्रतिभू, गायों में प्रतिभू, गायों से उत्पन्न, गायों में उत्पन्न, नृत्य-गीत में कुशल (षष्ठी), नृत्य-गीत में कुशल (सप्तमी), चटाई बनाने में लगा हुआ (षष्ठी), चटाई बनाने में लगा हुआ (सप्तमी)। ตถาธารวจนิจฺฉายํ สตฺตมี, ภิกฺขูสุ อภิวาเทนฺติ, มุทฺธนิ ธุมฺพิตฺวา, พาหาสุ คเหตฺวา, หตฺเถสุ ปิณฺฑาย จรนฺติ, ปเถสุ คจฺฉนฺติ, กทลีสุ คเช รกฺขนฺตีติ. ญาณสฺมึ ปสนฺโนติ วิสยสตฺตมี, ญาเณน ปสนฺโนติ กรเณ ตติยา, เอวํ ญาณสฺมึ อุสฺสุกฺโก ญาเณน อุสฺสุกฺโกติ. उसी प्रकार आधार की विवक्षा में सप्तमी होती है—भिक्षुओं को अभिवादन करते हैं, मस्तक पर चूमकर, बाँहों में पकड़कर, हाथों में भिक्षा के लिए चरते हैं, मार्गों पर चलते हैं, कदली (वनों) में हाथियों की रक्षा करते हैं। 'ज्ञान में प्रसन्न'—यह विषय सप्तमी है, 'ज्ञान से प्रसन्न'—यह करण में तृतीया है। इसी प्रकार 'ज्ञान में उत्सुक', 'ज्ञान से उत्सुक'। ๓๖. ยโต นิทฺธารณํ. ३६. जिससे निर्धारण (छाँटना) हो (वहाँ षष्ठी और सप्तमी होती है)। ชาติคุณกิริยาหิ [Pg.81] สมุทายเตกเทสสฺส ปุถกฺกรณํ นิทฺธารณํ. ยโต ตํ กรียติ, ตโต ฉฏฺฐีสตฺตมิโย โหนฺติ. สาลโย สูกธญฺญานํ ปถฺยตมา, สาลโย สูกธญฺเญสุ ปถฺยตมา, กณฺหา คาวีนํ สมฺปนฺนขีรตมา, กณฺหา คาวีสุ สมฺปนฺนขีรตมา, คจฺฉตํ ธาวนฺโต สีฆตโม, คจฺฉนฺเตสุ ธาวนฺโต สีฆตโม. สีลเมว สุตา เสยฺโยติ อวธิมฺหิเยว ปญฺจมี. जाति, गुण और क्रिया के द्वारा समुदाय के एक अंश को अलग करना 'निर्धारण' (niddhāraṇa) कहलाता है। जिससे वह (निर्धारण) किया जाता है, उसमें षष्ठी और सप्तमी विभक्तियाँ होती हैं। जैसे: 'शालि (चावल) शूकधान्यों में सबसे अधिक पथ्य हैं' (षष्ठी/सप्तमी), 'काली गाय गायों में सबसे अधिक दूध देने वाली है', 'चलने वालों में दौड़ने वाला सबसे तेज है'। 'शील ही श्रुत से श्रेष्ठ है' - यहाँ अवधि (सीमा) में ही पञ्चमी विभक्ति है। ๓๗. ปฐมาตฺถมตฺเต. ३७. केवल प्रथमा के अर्थ में। นามสฺสาภิเธยฺยมตฺเต ปฐมาวิภตฺติ โหติ. รุกฺโข. อิตฺถิ ปุมา นปุํสกนฺติ ลิงฺคมฺปิ สทฺทตฺโถว, ตถา โทโณ ขารี อาฬฺหกนฺติ ปริมาณมฺปิ สทฺทตฺโถว, เอโก ทฺเว พหโวติ สงฺขฺยาปิ สทฺทตฺโถว. नाम के केवल अभिधेय (अर्थ) मात्र में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे: 'रुक्खो' (वृक्ष)। 'स्त्री, पुरुष, नपुंसक' - यह लिंग भी शब्द का अर्थ ही है; वैसे ही 'दोण, खारी, आढक' - यह परिमाण भी शब्द का अर्थ ही है; 'एक, दो, बहुत' - यह संख्या भी शब्द का अर्थ ही है। ๓๘. อามนฺตเณ. ३८. आमन्त्रण (सम्बोधन) में। สโต สทฺเทนาภิมุขีกรณมามนฺตณํ. ตสฺมึ วิสเย ปฐมา วิภตฺติ โหติ. โภปุริส, โภกฺกตฺถิ, โภ นปุํสก. विद्यमान (व्यक्ति) को शब्द के द्वारा अभिमुख करना 'आमन्त्रण' है। उस विषय में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे: 'हे पुरुष!', 'हे कर्ता!', 'हे नपुंसक!'। ๓๙. ฉฏฺฐี สมฺพนฺเธ. ३९. सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति होती है। กิริยาการกสญฺชาโต อสฺเสทมฺภาวเหตุโก สมฺพนฺโธ นาม. ตสฺมึ ฉฏฺฐี วิภตฺติ โหติ. รญฺโญ ปุริโส, สรติ รชฺชสฺสาติ สมฺพนฺเธ ฉฏฺฐี, รชฺชสมฺพนฺธินึ สตึ กโรตีติ อตฺโถ, กมฺมวจนิจฺฉารนฺตุ ทุติยาว สรติ รชฺชํ. ตถา รชกสฺส วตฺถํ [Pg.82] ททาติ, ปหรโต ปิฏฺฐึ ททาติ, พาโล ปูรติ ปาปสฺส, อมจฺเจ ตาต ชานาหิ, ธีเร อตฺถสฺส โกวิเท, ทิวสสฺส ติกฺขตฺตุํ, สกึ ปกฺขสฺส, ปูรํ หิรญฺญสุวณฺณสฺส กุมฺภนฺตฺเววมาทิ. क्रिया और कारक से उत्पन्न 'यह इसका है' इस भाव का हेतु 'सम्बन्ध' कहलाता है। उसमें षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे: 'राजा का पुरुष'। 'राज्य को याद करता है' (sarati rajjassa) - यहाँ सम्बन्ध में षष्ठी है, इसका अर्थ है 'राज्य सम्बन्धी स्मृति करता है'; किन्तु कर्म कहने की इच्छा होने पर द्वितीया ही होती है - 'राज्यं सरति'। वैसे ही: 'धोबी को वस्त्र देता है', 'प्रहार करने वाले को पीठ देता है', 'बालक पाप से भरता है', 'हे तात! अमात्यों को जानो', 'अर्थ के कोविद (विद्वान) धीर पुरुष', 'दिन में तीन बार', 'पक्ष में एक बार', 'सोने-चाँदी से भरा घड़ा' इत्यादि। กิตกปฺปโยเค กกฺตุกมฺเมสุ พหุลํ สมฺพนฺธวจนิจฺฉายํ ฉฏฺฐี, สาธุ สมฺมโต พหุชนสฺส, สุปฺปฏิวิทฺธา พุทฺธานํ ธมฺมธาตุ, ธมฺมสฺส คุตฺโต เมธาวี, อมตํ เตสํ ปริภุตฺตํ, ตสฺส ภวนฺติ วตฺตาโร, อวิสํวาทโก โลกสฺส, อลชฺชีนํ นิสฺสาย, จตุนฺนํ มหาภูตานํ อุปาทาย ปสาโทตฺเววมาทิ. कृदन्त के प्रयोग में कर्ता और कर्म में सम्बन्ध कहने की इच्छा होने पर बहुलता से षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे: 'बहुजन द्वारा भली-भाँति सम्मत', 'बुद्धों द्वारा भली-भाँति प्रतिविद्ध धर्मधातु', 'धर्म द्वारा रक्षित मेधावी', 'उनके द्वारा अमृत का उपभोग किया गया', 'उसके कहने वाले होते हैं', 'लोक का विसंवाद न करने वाला', 'निर्लज्जों के आश्रय में', 'चार महाभूतों को उपादान कर (आश्रित) प्रसाद' इत्यादि। กตฺตุกมฺมวจนิจฺฉายนฺตุ ตติยา ทุติยาโย จ, สญฺจตฺโต ปิตรา อหํ, สรสิ ตฺวํ เอวรูปึ วาจํ ภาสิตา, ภควนฺตํ ทสฺสนายตฺเววมาทิ. किन्तु कर्ता और कर्म कहने की इच्छा होने पर तृतीया और द्वितीया विभक्तियाँ होती हैं। जैसे: 'मैं पिता द्वारा त्यागा गया हूँ', 'क्या तुम इस प्रकार की वाणी बोलने वाले को याद करते हो?', 'भगवान के दर्शन के लिए' इत्यादि। ๔๐. ตุลฺยตฺเถน วา ตติยา. ४०. 'तुल्य' (समान) अर्थ वाले शब्दों के योग में विकल्प से तृतीया विभक्ति होती है। ตุลฺยตฺเถน โยเค ฉฏฺฐี โหติ ตติยา วา, ตุลฺโย ปิตุ, ตุลฺโย ปิตรา, สทิโส ปิตุ, สทิโส ปิตรา, อิห กถํ ตติยา น โหติ? อชฺชุนสฺส ตุลา นตฺถิ, เกสวสฺสุปมา น เจติ, เนเต ตุลฺยตฺถา, กิญฺชรหิ ตุลฺยานโมปมฺมตฺถา. 'तुल्य' अर्थ वाले शब्दों के योग में षष्ठी अथवा तृतीया विभक्ति होती है। जैसे: 'पिता के समान' (tulyo pitu/pitarā), 'पिता के सदृश' (sadiso pitu/pitarā)। यहाँ तृतीया क्यों नहीं होती? 'अर्जुन की कोई तुलना नहीं है', 'केशव की कोई उपमा नहीं है' - ये 'तुल्य' अर्थ वाले नहीं हैं, बल्कि ये तुलना (उपमा) के अर्थ में हैं। ๔๑. อโต โยนํ ฏาเฏ. ४१. अकारान्त शब्द से परे 'यो' (प्रथमा और द्वितीया बहुवचन) के स्थान पर क्रमशः 'आ' और 'ए' आदेश होते हैं। อการนฺถโต นามสฺมา โยนํ ฏาเฏ โหนฺติ ยถากฺกมํ, ฏการา สพฺพเทสตฺถา, พุทฺธา พุทฺเธ, อโตติ กึ? กญฺญาโย, อิตฺถิโย, วธุโย, อิธ กสฺมา น ภวติ อคฺคโย. อวิธานสามตฺถิยา. अकारान्त नाम (प्रातिपदिक) से परे 'यो' विभक्तियों के स्थान पर क्रमशः 'आ' और 'ए' होते हैं। 'ट'कार सर्वादेश के लिए है। जैसे: 'बुद्धा' (प्रथमा बहुवचन), 'बुद्धे' (द्वितीया बहुवचन)। 'अकारान्त से' ऐसा क्यों कहा? 'कञ्ञायो', 'इत्थियो', 'वधुयो' (यहाँ नहीं होता)। यहाँ 'अग्गयो' क्यों नहीं होता? विधान की सामर्थ्य न होने के कारण। ๔๒. นินํ วา. ४२. 'नि' और 'नं' विकल्प से होते हैं। อการนฺตโต [Pg.83] นามสฺมา นินํ ฏาเฏ วา โหนฺติ ยถากฺกมํ. รูปา, รูเป, รูปานิ, อโตตฺเวว อฏฺฐีนิ. अकारान्त नाम से परे 'नि' और 'नं' के स्थान पर विकल्प से 'आ' और 'ए' होते हैं। जैसे: 'रूपा', 'रूपे', 'रूपानि'। 'अकारान्त से' ही क्यों? 'अट्ठीनि' (यहाँ नहीं)। ๔๓. สฺมาสฺมึนํ. ४३. 'स्मा' और 'स्मिं' के स्थान पर। อการนฺตโต นามสฺมา สฺมาสฺมินฺนํ ฏาเฏ วา โหนฺติ ยถากฺกมํ. พุทฺธา พุทฺธสฺมา, พุทฺเธ พุทฺธสฺมึ, อโตตฺเวว อคฺคิสฺมา อคฺคิสฺมึ. अकारान्त नाम से परे 'स्मा' और 'स्मिं' के स्थान पर विकल्प से क्रमशः 'आ' और 'ए' होते हैं। जैसे: 'बुद्धा' (बुद्धस्मा), 'बुद्धे' (बुद्धस्मिं)। 'अकारान्त से' ही क्यों? 'अग्गिस्मा', 'अग्गिस्मिं'। ๔๔. สสฺสาย จตุตฺถิยา. ४४. चतुर्थी विभक्ति के 'स' प्रत्यय के स्थान पर 'आय' होता है। อการนฺตโต ปรสฺส สสฺส จตุตฺถิยา อาโย โหติ วา. พุทฺธาย พุทฺธสฺส, ภิยฺโย ตาทตฺถฺเยเยวายมาโย ทิสฺสเต, กฺวจิเทวญฺญตฺถ, อโตตฺเวว อิสิสฺส, จตุตฺถิยาติ กึ? พุทฺธสฺส มุขํ, อตฺตตฺถนฺติ อตฺถสทฺเทน สมาโส. अकारान्त से परे चतुर्थी विभक्ति के 'स' के स्थान पर विकल्प से 'आय' होता है। जैसे: 'बुद्धाय', 'बुद्धस्स'। प्रायः 'तदर्थ' (उसके लिए) के अर्थ में ही यह 'आय' देखा जाता है, कहीं-कहीं अन्यत्र भी। 'अकारान्त से' ही क्यों? 'इसिस्स'। 'चतुर्थी में' ही क्यों? 'बुद्धस्स मुखं' (यहाँ षष्ठी है)। 'अत्तत्थं' - यहाँ 'अत्थ' शब्द के साथ समास है। สพฺพาทิโตปิ สฺมาสฺมึสานํ ฏาเฏอายา โหนฺเตว… นิรุตฺติการานุมตตฺตา พุทฺธวจเน สนฺทสฺสนวโต จ, ตตฺโรทมุทาหรณํ ‘อสฺมา โลกา ปรมฺหา จ, อุภยา ธํสเต นโร’, ‘ตฺยาหํ มนฺเต ปรตฺถทฺโธ’, ‘ยาเยว โข ปนตฺถาย อาคจฺเฉยฺยาโถ ตเมวตฺถํ สาธุกํ มนสิกเรยฺยาโถ’ติ. सर्वादि (सर्वनाम) शब्दों से भी 'स्मा', 'स्मिं' और 'स' के स्थान पर 'आ', 'ए' और 'आय' होते ही हैं... क्योंकि यह निरुक्तिकारों द्वारा अनुमत है और बुद्धवचनों में देखा जाता है। वहाँ यह उदाहरण है: 'इस लोक से और परलोक से, दोनों से मनुष्य भ्रष्ट हो जाता है', 'मैं उन मन्त्रों को परलोक के लिए कहता हूँ', 'जिस प्रयोजन के लिए तुम आए हो, उसी अर्थ को अच्छी तरह मन में करो'। ๔๕. ฆปเตกสฺมึ นาทีนํ ยยา. ४५. 'घ' और 'प' संज्ञक तथा 'नदी' आदि शब्दों से परे एकवचन में 'या' आदेश होता है। ฆปโต นาทีนเมกสฺมึ ยยา โหนิ ยถากฺกมํ. กญฺญาย, รตฺติยา, อิตฺถิยา, เธนุยา, วธุยา, เอกสฺมินฺติ กึ? กญฺญาหิ, รตฺตีหิ. 'घ' और 'प' संज्ञक तथा 'नदी' आदि शब्दों से परे एकवचन (विभक्तियों) के स्थान पर 'या' होता है। जैसे: 'कञ्ञाय', 'रत्तिया', 'इत्थिया', 'धेनुया', 'वधुया'। 'एकवचन में' ही क्यों? 'कञ्ञाहि', 'रत्तीहि'। ๔๖. สฺสา วา เตติมามูหิ. ४६. 'त', 'एत', 'इम' और 'अमु' शब्दों से परे 'स्सा' विकल्प से होता है। ฆปสญฺเญหิ [Pg.84] เตติมามูหิ นาทีนเมกสฺมึสฺสา วา โหติ, ตสฺสา กตํ, ตสฺสา ทียเต, ตสฺสา นิสฺสฏํ, ตสฺสา ปริคฺคโห, ตสฺสา ปติฏฺฐิตํ, ตาย วา, เอวํ เอติสฺสา เอตาย, อิมิสฺสา อิมาย, อมุสฺสา อมุยา, เอเตหีติ กึ? สพฺพาย, นาทีนํ ตฺเวว? สา, ฆปโตตฺเวว? ตาหิ อมูหิ. 'घ' और 'प' संज्ञक 'त', 'एत', 'इम' और 'अमु' शब्दों से परे (तथा नदी आदि शब्दों से परे) एकवचन में विकल्प से 'स्सा' होता है। जैसे: 'तस्सा कतं' (उसके द्वारा किया गया), 'तस्सा दीयते' (उसे दिया जाता है), 'तस्सा निस्सटं' (उससे निकला), 'तस्सा परिग्गहो' (उसका परिग्रह), 'तस्सा पतिट्ठितं' (उसमें प्रतिष्ठित); अथवा 'ताय'। इसी प्रकार 'एतिस्सा/एताय', 'इमिस्सा/इमाय', 'अमुस्सा/अमुया'। 'इनसे ही' क्यों? 'सब्बाय'। 'नदी आदि से ही' क्यों? 'सा'। 'घ-प संज्ञक से ही' क्यों? 'ताहि', 'अमूहि'। ๔๗. นํมฺหิ นุก ทฺวาทีนํ สตฺตรสนฺนํ. ४७. 'नं' विभक्ति होने पर 'द्वि' आदि सत्रह संख्याओं को 'नुक' (न्) आगम होता है। ทฺวาทีนํ สตฺตรสนฺนํ สงฺขฺยานํ นุก โหติ นํมฺหิ วิภตฺตมฺหิ, ทฺวินฺนํ จตุนฺนํ, ปญฺจนฺนํ, เอวํ ยาว อฏฺฐารสนฺนํ, อุกาโร อุจฺจารณตฺโถ, กกาโร อนฺตาวยวตฺโถ, เตน นํมฺหิ น ทีโฆ. 'नं' विभक्ति परे होने पर 'द्वि' आदि सत्रह संख्याओं को 'नुक' आगम होता है। जैसे: 'द्विन्नं', 'चतुन्नं', 'पञ्चन्नं', इसी प्रकार 'अट्ठारसन्नं' तक। 'उ'कार उच्चारण के लिए है, 'क'कार अन्त्यावयव (अन्त में जुड़ने) के लिए है, जिससे 'नं' परे होने पर दीर्घ नहीं होता। ๔๘. พสุกตินฺนํ. ४८. 'बहु' और 'कति' शब्दों को 'नुक' होता है। นํมฺหิ พหุโน กติสฺส จ นุก โหติ, พหุนฺนํ, กตินฺนํ. 'नं' विभक्ति परे होने पर 'बहु' और 'कति' शब्दों को 'नुक' आगम होता है। जैसे: 'बहुन्नं', 'कतिन्नं'। ๔๙. ณฺณํณฺณนฺนํ ติโต ฌา. ४९. 'ति' शब्द से परे 'झ' संज्ञा होने पर 'नं' के स्थान पर 'ण्णं' और 'ण्णन्नं' होते हैं। ฌสญฺญา ติโต นํวจนสฺส ณฺณํณฺณนฺนํ โหติ, ติณฺณํ, ติณฺณนฺนํ, ฌาติ กึ ติสฺสนฺนํ. 'झ' संज्ञा वाले 'ति' (तीन) शब्द से परे 'नं' वचन के स्थान पर 'ण्णं' और 'ण्णन्नं' होते हैं। जैसे: 'तिण्णं', 'तिण्णन्नं'। 'झ' संज्ञा होने पर ही क्यों? 'तिस्सन्नं' (स्त्रीलिंग में नहीं)। ๕๐. อุภินฺนํ. ५०. उभिण्णं। อุภา นํวจนสฺส อินฺนํ โหติ, อุภินฺนํ. 'उभ' शब्द के बाद 'नम्' विभक्ति के स्थान पर 'इन्नं' आदेश होता है, जिससे 'उभिण्णं' बनता है। ๕๑. สุญ สสฺส. ५१. 'स' विभक्ति के स्थान पर 'सुञ' होता है। นามสฺมา สสฺส สุญ โหติ, พุทฺธสฺส, ทฺวิสการปาเฐน สิทฺเธ ลาฆวตฺถมิทํ. प्रातिपदिक से परे 'स' विभक्ति को 'सुञ' होता है, जैसे 'बुद्धस्स'। दो 'स' कारों के पाठ से सिद्ध होने पर भी यह लाघव (संक्षेप) के लिए है। ๕๒. สฺสํสฺสาสฺสาเยสฺวิตเร กญฺเญภิมานมิ. ५२. 'स्सं', 'स्सा', 'स्साय' और 'एषु' विभक्तियों के परे होने पर 'इतर' आदि शब्दों के अन्त्य स्वर को 'इ' होता है। สฺสมาทีสฺวิตราทีนมิ [Pg.85] โหติ, อิตริสฺสํ, อิตริสฺสา, เอกิสฺสํ, เอกิสฺสา, อญฺญิสฺสํ, อญฺญิสฺสา, เอติสฺสํ, เอติสฺสา, เอติสฺสาย, อิมิสฺสํ, อิมิสฺสา, อิมิสฺสาย, เอสฺวิติ กึ? อิตราย, เอสนฺติ กึ? สพฺพสฺสํ, สพฺพสฺสา. 'स्सं' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'इतर' आदि शब्दों के अन्त्य स्वर को 'इ' होता है। जैसे: इतरिस्सं, इतरिस्सा, एकिस्सं, एकिस्सा, अञ्ञिस्सं, अञ्ञिस्सा, एतिस्सं, एतिस्सा, एतिस्साय, इमिस्सं, इमिस्सा, इमिस्साय। 'एषु' क्यों? इतरय। 'एसं' क्यों? सब्बस्सं, सब्बस्सा। ๕๓. ตาย วา. ५३. 'ता' शब्द के सम्बन्ध में विकल्प से। สฺสมาทีสุ ตสฺสา วา อิ โหติ, ติสฺสํ ตสฺสํ, ติสฺสา ตสฺสา, ติสฺสาย ตสฺสาย, สฺสํสฺสาสฺสาเยสฺวิตฺเวว? ตาย. 'स्सं' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'तस्सा' (तद् शब्द स्त्रीलिंग) के अकार को विकल्प से 'इ' होता है। जैसे: तिस्सं-तस्सं, तिस्सा-तस्सा, तिस्साय-तस्साय। 'स्सं, स्सा, स्साय' में ही क्यों? ताय। ๕๔. เตติมาโต สสฺส สฺสาย. ५४. 'त', 'एत', 'इम' शब्दों से परे 'स' विभक्ति को 'स्साय' होता है। ตาเอตาอิมาโต สสฺส สฺสาโย โหติ วา. ตสฺสาย ตาย, เอติสฺสาย เอตาย, อิมิสฺสาย อิมาย. 'ता', 'एता', 'इमा' शब्दों से परे 'स' विभक्ति को विकल्प से 'स्साय' होता है। जैसे: तस्साय-ताय, एतिस्साय-एताय, इमिस्साय-इमाय। ๕๕. รตฺยาทีหิ โฏ สฺมิโน. ५५. 'रति' आदि शब्दों से परे 'स्मिं' विभक्ति को 'टो' होता है। รตฺยาทีหิ สฺมิโน โฏ โหติ วา, รตฺโต รตฺติยํ, อาโท อาทิสฺมึ. 'रति' आदि शब्दों से परे 'स्मिं' विभक्ति को विकल्प से 'टो' होता है। जैसे: रत्तो-रत्तियं, आदो-आदिस्मिं। ๕๖. สุหิสุภสฺโส. ५६. 'सु' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'उभ' शब्द को 'ओ' होता है। อุภสฺส สุหิสฺโว โหติ. อุโภสุ, อุโภหิ. 'उभ' शब्द को 'सु' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'ओ' होता है। जैसे: उभोसु, उभोहि। ๕๗. ลฺตุปิตาทินมา สิมฺหิ. ५७. 'ल्तु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को 'सि' विभक्ति के परे होने पर 'आ' होता है। ลฺตุปฺปจฺจยนฺตานํ ปิตาทีนํ จ อา โหติ สิมฺหิ. กตฺตา, ปิตา. ปิตุ, มาตุ, ภาวุ, มีตุ, ทุหิตุ, ชามาตุ, นตฺตุ, โหตุ, โปตุ. 'ल्तु' प्रत्ययान्त शब्दों और 'पितृ' आदि शब्दों के अन्त्य स्वर को 'सि' विभक्ति के परे होने पर 'आ' होता है। जैसे: कत्ता, पिता। पितु, मातु, भावु, मीतु, दुहितु, जामातु, नत्तु, होतु, पोतु। ๕๘. เค อ จ. ५८. 'ग' (सम्बोधन) के परे होने पर 'अ' और 'आ' भी होते हैं। ลฺตุปิตาทีนํ [Pg.86] อ โหติ เค อา จ, โภ กตฺต, โภ กตฺตา, โภ ปิต, โภ ปิตา. 'ल्तु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को 'ग' (सम्बोधन) के परे होने पर 'अ' होता है और 'आ' भी होता है। जैसे: भो कत्त, भो कत्ता, भो पित, भो पिता। ๕๙. อยุนํ วา ทีโฆ. ५९. 'अ', 'इ', 'उ' का विकल्प से दीर्घ होता है। อ อิ อุ อิจฺเจสํ วา ทีโฆ โหติ เค ปเร ติลิงฺเค. โภ ปุริสา, โภ ปุริส, โภ อคฺคี, โภ อคฺคิ, โภ ภิกฺขู, โภ ภิกฺขู. तीनों लिंगों में 'ग' (सम्बोधन) के परे होने पर 'अ', 'इ', 'उ' का विकल्प से दीर्घ होता है। जैसे: भो पुरिसा, भो पुरिस; भो अग्गी, भो अग्गि; भो भिक्खू, भो भिक्खु। ๖๐. ฆพฺรหฺมาทิเต. ६०. 'घ' संज्ञक और 'ब्रह्म' आदि शब्दों से परे। ฆโต พฺรหฺมาทิโต จ คสฺเส วา โหติ. โภติ กญฺเญ, โภติ กญฺญา, โภ พฺรหฺเม, โภ พฺรหฺม, โภ ขตฺเต, โภ ขตฺต, โภ อิเส, โภ อิสิ, โภ สเข, โภ สข. สขิ สขีติ อิตฺถิยํ สิทฺธเมว. อากติคโณ-ยํ, เอวมญฺญตฺราปิ. 'घ' संज्ञक और 'ब्रह्म' आदि शब्दों से परे 'ग' (सम्बोधन) को विकल्प से 'ए' होता है। जैसे: भोति कञ्ञे, भोति कञ्ञा; भो ब्रह्म, भो ब्रह्म; भो खत्ते, भो खत्त; भो इसे, भो इसि; भो सखे, भो सख। 'सखि' और 'सखी' स्त्रीलिंग में सिद्ध ही हैं। यह आकृतिगण है, अन्यत्र भी इसी प्रकार समझना चाहिए। ๖๑. นมฺมาทีหิ. ६१. 'अम्मा' आदि शब्दों से परे। อมฺมาทีหิ คสฺเส น โหติ. โภติ อมฺมา, โภติ อนฺนา, โภติ อมฺพา. 'अम्मा' आदि शब्दों से परे 'ग' (सम्बोधन) को 'ए' नहीं होता है। जैसे: भोति अम्मा, भोति अन्ना, भोति अम्बा। ๖๒. รสฺโส วา. ६२. विकल्प से ह्रस्व होता है। อมฺมาทีนํ เค รสฺโส โหติ วา. โภติ อมฺม, โภติ อมฺมา. 'अम्मा' आदि शब्दों को 'ग' (सम्बोधन) के परे होने पर विकल्प से ह्रस्व होता है। जैसे: भोति अम्म, भोति अम्मा। ๖๓. โฆ สฺสํ, สฺสา, สฺสายํ ตึสุ. ६३. 'घ' संज्ञक शब्दों को 'स्सं', 'स्सा', 'स्साय' और 'तिं' के परे होने पर। สฺสมาทีสุ โฆ รสฺโส โหติ. ตสฺสํ, ตสฺสา, ตสฺสาย, ตํ, สภตึ, เอสฺวิติ กึ? ตาย, สภาย. 'स्सं' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'घ' संज्ञक शब्दों को ह्रस्व होता है। जैसे: तस्सं, तस्सा, तस्साय, तं, सभतिं। 'एषु' क्यों? ताय, सभाय। ๖๔. เอกวจน โยสฺว-โฆนํ. ६४. एकवचन और 'यो' विभक्तियों के परे होने पर 'अ' और 'घ' संज्ञक शब्दों को छोड़कर। เอกวจเน [Pg.87] โยสุ จ ฆโอการนฺตวชฺชิตา นํ นามานํ รสฺโส โหติ ติลิงฺเค. อิตฺถึ, อิตฺถิยา, อิตฺถิโย, วธุํ วธุยา, วธุโย, ทณฺฑึ, ทณฺฑินา, ทณฺฑิโน, สยมฺภุํ, สยมฺภุนา, สยมฺภุโว, อโฆ นนฺติ กึ? กญฺญาย, กญฺญาโย, โอคฺคหณมุตฺตรตฺถํ. तीनों लिंगों में एकवचन और 'यो' विभक्तियों के परे होने पर 'घ' संज्ञक और 'ओ' कारान्त शब्दों को छोड़कर अन्य शब्दों का ह्रस्व होता है। जैसे: इत्थिं, इत्थिया, इत्थियो; वधुं, वधुया, वधुयो; दण्डिं, दण्डिना, दण्डिनो; सयम्भुं, सयम्भुना, सयम्भुवो। 'अघोनं' क्यों? कञ्ञाय, कञ्ञायो। 'ओ' का ग्रहण आगे के लिए है। ๖๕. เค วา. ६५. गे (सम्बोधन) विभक्ति में विकल्प से। อโฆนํ เค วา รสฺโส โหติ ติลิงฺเค, อิตฺถิ, อิตฺถี, วธุ, วธู, ทณฺฑิ, ทณฺฑี, สยมฺภุ, สยมฺภู. อโฆนํตฺเวว? โภติ กญฺญา, โภ โค. अघो (दीर्घ स्वरों) को छोड़कर 'गे' (सम्बोधन) परे होने पर तीनों लिंगों में ह्रस्व होता है। जैसे- इत्थि, इत्थी, वधु, वधू, दण्डि, दण्डी, सयम्भु, सयम्भू। 'अघो' क्यों? भो कञ्ञा, भो गो। ๖๖. สิสฺมึ นานปุํสกสฺส. ६६. सि विभक्ति में नपुंसक लिंग को छोड़कर। นปุํสกวชฺชิตสฺส นามสฺส สิสฺมึ รสฺโส น โหติ. อิตฺถี, ทณฺฑี, วธู, สยมฺภู. สิสฺมินฺติ กึ? อิตฺถึ, อนปุํสกสฺสาติ กึ? ทณฺฑิ กุลํ. नपुंसक लिंग को छोड़कर अन्य शब्दों के 'सि' विभक्ति परे होने पर ह्रस्व नहीं होता है। जैसे- इत्थी, दण्डी, वधू, सयम्भू। 'सिस्मिं' क्यों? इत्थिं। 'अनपुंसकस्स' क्यों? दण्डि कुलं। ๖๗. โคสฺสาคสิหินํสุ คาวควา. ६७. ग, सि, हि और नं को छोड़कर गो शब्द के स्थान पर गाव और गव आदेश होते हैं। คสิหินํวชฺชิตาสุ วิภตฺตีสุ โคสทฺทสฺส คาวควา โหนฺติ. (คาวํ, ควํ), คาโว, คโว, คาเวน, คเวน, คาวสฺส, ควสฺส, คาวสฺมา, ควสฺมา, คาเว, คเว. อคสิหินํสูติ กึ? โภ โค, โค ติฏฺฐติ, โคหิ, โคนํ. ग, सि, हि और नं विभक्तियों को छोड़कर अन्य विभक्तियों के परे होने पर 'गो' शब्द के स्थान पर 'गाव' और 'गव' आदेश होते हैं। (गावं, गवं), गावो, गवो, गावेन, गवेन, गावस्स, गवस्स, गावस्मा, गवस्मा, गावे, गवे। 'अगसिहिनंसु' क्यों? भो गो, गो तिट्ठति, गोहि, गोनं। ๖๘. สุมฺหิ วา. ६८. सु विभक्ति में विकल्प से। โคสฺส สุมฺหิ คาวควา โหนฺติ วา. คาเวสุ, คเวสุ, โคสุ. 'गो' शब्द के 'सु' विभक्ति परे होने पर विकल्प से 'गाव' और 'गव' आदेश होते हैं। गावेसु, गवेसु, गोसु। ๖๙. ควํ เสน. ६९. से विभक्ति के साथ गंव। โคสฺส [Pg.88] เส วา ควํ โหติ สห เสน. ควํ, คาวสฺส, ควสฺส. 'गो' शब्द के 'से' विभक्ति परे होने पर 'से' के साथ विकल्प से 'गवं' होता है। गंव, गावस्स, गवस्स। ๗๐. คุนฺนํ จ นํนา. ७०. नं विभक्ति के साथ गुन्नं और गंव। นํวจเนน สห โคสฺส คุนฺนํ โหติ ควํจ วา. คุนฺนํ, ควํ, โคนํ. 'नं' विभक्ति के साथ 'गो' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'गुन्नं' और 'गवं' होता है। गुन्नं, गंव, गोनं। ๗๑. นาสฺสา. ७१. ना विभक्ति के स्थान पर आ। โคโต นาสฺส อา โหติ วา. คาวา, ควา, คาเวน, คเวน. 'गो' शब्द से परे 'ना' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'आ' होता है। गावा, गवा, गावेन, गवेन। ๗๒. คาวุมฺหิ. ७२. अं विभक्ति में गावु। อํวจเน โคสฺส คาวฺห วา โหติ. วาวฺหํ, คาวํ, ควํ. โคสฺส โคณาเทโส น กโต… สทฺทนฺตรตฺตา. 'अं' विभक्ति परे होने पर 'गो' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'गावु' होता है। गावुं, गावं, गंव। 'गो' शब्द को 'गोण' आदेश नहीं किया गया... शब्दान्तर होने के कारण। ๗๓. ยํ ปีโต. ७३. ई से परे यं। ปสญฺญีโต อํวจนสฺส ยํ วา โหติ. อิตฺถิยํ, อิตฺถึ. ปีโตติ กึ? ทณฺฑึ, รตฺตึ. 'प' संज्ञक 'ई' से परे 'अं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'यं' होता है। इत्थियं, इत्थिं। 'पीतो' क्यों? दण्डिं, रत्तिं। ๗๔. นํ ฌีโต. ७४. झ और ई से परे नं। ฌสญฺญีโต อํวจนสฺส นํ วา โหติ. ทณฺฑินํ, ทณฺฑึ. กถํ ‘พุทฺธํ อาทิจฺจพนฺธุน’นฺติ? โยควิภาวา. ฌาติ กึ? อิตฺถึ. อีติ กึ? อคฺคึ. 'झ' संज्ञक और 'ई' से परे 'अं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'नं' होता है। दण्डिनं, दण्डिं। 'बुद्धं आदिच्चबन्धुं' कैसे बना? योग-विभाग से। 'झ' क्यों? इत्थिं। 'ई' क्यों? अग्गिं। ๗๕. โยนํ โนเน ปุเม. ७५. पुल्लिङ्ग में यो विभक्ति के स्थान पर नो और ने। ฌีโต [Pg.89] โยนํ โนเน วา โหนฺติ ยถากฺกมํ ปุลฺลิงฺเค. ทณฺฑีโน, ทณฺฑิเน, ทณฺฑี, ฌีโต ตฺเวว? อิตฺถิโย, ปุเมติ กึ? ทณฺฑีนิ กุลานิ. पुल्लिङ्ग में 'झ' और 'ई' से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर यथाक्रम विकल्प से 'नो' और 'ने' होते हैं। दण्डीनो, दण्डीने, दण्डी। 'झीतो' ही क्यों? इत्थियो। 'पुमे' क्यों? दण्डीनि कुलानि। ๗๖. โน. ७६. नो। ฌีโต โยนํ โน วา โหติ ปุลฺลิงฺเค. ทณฺฑิโน ติฏฺฐนฺติ, ทณฺฑิโน ปสฺส, ทณฺฑี วา. पुल्लिङ्ग में 'झ' और 'ई' से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'नो' होता है। दण्डिनो तिट्ठन्ति, दण्डिनो पस्स, दण्डी वा। ๗๗. สฺมิโน นิ. ७७. स्मिं के स्थान पर नि। ฌีโต สฺมึวจนสฺส นิ โหติ วา, ทณฺฑินิ, ทณฺฑิสฺมึ, ฌีโต ตฺเวว? อคฺคิสฺมึ. 'झ' और 'ई' से परे 'स्मिं' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'नि' होता है। दण्डिनि, दण्डिस्मिं। 'झीतो' ही क्यों? अग्गिस्मिं। ๗๘. อมฺพฺวาทีหิ. ७८. अम्बु आदि शब्दों से। อมฺพุอาทีหิ สฺมิโนนิ โหติ วา, ผลํ ปตติ อมฺพุนิ, ปุปฺผํ ยถา ปํสุนิ อาตเป กตํ, วาตฺเวว? อมฺพุมฺหิ, ปํสุมฺหิ. 'अम्बु' आदि शब्दों से परे 'स्मिं' के स्थान पर विकल्प से 'नि' होता है। फलं पतति अम्बुनि, पुप्फं यथा पंसुनि आतपे कतं। 'वा' क्यों? अम्बुम्हि, पंसुम्हि। ๗๙. กมฺมาทิโต. ७९. कम्म आदि शब्दों से। กมฺมาทิโต สฺมิโน นิ โหติ วา. กมฺมนิ กมฺเม. กมฺม, จมฺม, เวสฺม, ภสฺม (อสฺม), พฺรหฺม, อตฺต, อาตุม, ฆมฺม, มุทฺธ. กมฺมาทิโตติ กึ? พุทฺเธ. 'कम्म' आदि शब्दों से परे 'स्मिं' के स्थान पर विकल्प से 'नि' होता है। कम्मनि, कम्मे। कम्म, चम्म, वेस्म, भस्म (अस्म), ब्रह्म, अत्त, आतुम, घम्म, मुद्ध। 'कम्मादितो' क्यों? बुद्धे। ๘๐. นาสฺเสโน. ८०. "ना" विभक्ति के स्थान पर "एन" आदेश। กมฺมาทิโต นาวจนสฺส เอโน วา โหติ. กมฺเมน, กมฺมนา, จมฺเมน, จมฺมนา, กมฺมาทิโตตฺเวว? พุทฺเธน. कर्मादि शब्दों से परे "ना" विभक्ति के स्थान पर "एन" विकल्प से होता है। जैसे- कम्मेन, कम्मना, चम्मेन, चम्मना। "कम्मादितो" (कर्मादि से) ही क्यों? बुद्धेन (यहाँ नित्य होता है)। ๘๑. ฌลา สสฺส โน. ८१. झ और ल संज्ञक वर्णों से परे "स" विभक्ति को "नो" आदेश होता है। ฌลโต [Pg.90] สสฺส โน วา โหติ. อคฺคิโน อคฺคิสฺส, ทณฺฑิโน ทณฺฑิสฺส, ภิกฺขุโน ภิกฺขุสฺส, สยมฺภุโน สยมฺภุสฺส, झ और ल संज्ञक वर्णों (इ, ई, उ, ऊ) से परे "स" विभक्ति के स्थान पर "नो" विकल्प से होता है। जैसे- अग्गिनो, अग्गिस्स; दण्डिनो, दण्डिस्स; भिक्खुनो, भिक्खुस्स; सयम्भुनो, सयम्भुस्स। กถํ ‘โย จ สิสฺโส มหามุเน’ ติ? (๓) ‘‘อิโต กฺวจิ สสฺส ฏานุพนฺโธ’’ติ พฺรหฺมาทีสุ ปาฐา สสฺส เอ ฏานุพนฺโธ. "यो च सिस्सो महामुने" यहाँ कैसे हुआ? "इतो क्वचि सस्स टानूबन्धो" इस सूत्र से ब्रह्मादि गण में पाठ होने के कारण "स" के स्थान पर "ए" आदेश होता है। ๘๒. นา สฺมาสฺส. ८२. "स्मा" विभक्ति के स्थान पर "ना" आदेश। ฌลโต สฺมาสฺส นา โหติ วา. อคฺคินา อคฺคิสฺมา, ทณฺฑินา ทณฺฑิสฺมา, ภิกฺขุนา ภิกฺขุสฺมา, สยมฺภุนา สยมฺภุสฺมา. झ और ल संज्ञक वर्णों से परे "स्मा" विभक्ति के स्थान पर "ना" विकल्प से होता है। जैसे- अग्गिना, अग्गिस्मा; दण्डिना, दण्डिस्मा; भिक्खुना, भिक्खुस्मा; सयम्भुना, सयम्भुस्मा। ๘๓. ลา โย นํ โว ปุเม. ८३. पुल्लिंग में "ल" संज्ञक वर्णों से परे "यो" विभक्ति के स्थान पर "वो" आदेश। ลโต โยนํ โว โหติ วา ปุลฺลิงฺเค. ภิกฺขโว ภิกฺขู, สยมฺภุโว สยมฺภูปุเมติ กึ? อายูนิ. पुल्लिंग में "ल" संज्ञक वर्णों (उ, ऊ) से परे "यो" विभक्ति के स्थान पर "वो" विकल्प से होता है। जैसे- भिक्खवो, भिक्खू; सयम्भुवो, सयम्भू। "पुमे" (पुल्लिंग में) ही क्यों? आयूनि (नपुंसक लिंग में नहीं)। ๘๔. ชนฺตฺวาทิโต โน จ. ८४. जन्तु आदि शब्दों से परे "नो" और "वो" आदेश। ชนฺตฺวาทิโต โยนํ โน โหติ โว จ วา ปุลฺลิงฺเค. ชนฺตุโน, ชนฺตโว ชนฺตุโย, โคตฺรภุโน, โคตฺรภุโว โคตฺรภู. สหภุโน, สหภุโว สหภู. पुल्लिंग में जन्तु आदि शब्दों से परे "यो" विभक्ति के स्थान पर "नो" और "वो" विकल्प से होते हैं। जैसे- जन्तुनो, जन्तवो, जन्तुयो; गोत्रभुनो, गोत्रभुवो, गोत्रभू; सहभुनो, सहभुवो, सहभू। ๘๕. กูโต. ८५. "कू" प्रत्ययान्त शब्दों से। กูปจฺจยนฺตโต โยนํ โน วา โหติ ปุลฺลิงฺเค, วิทุโน วิทู, วิญฺญุโน วิญฺญู, สพฺพญฺญุโน สพฺพญฺญู. पुल्लिंग में "कू" प्रत्ययान्त शब्दों से परे "यो" विभक्ति के स्थान पर "नो" विकल्प से होता है। जैसे- विदुनो, विदू; विञ्ञुनो, विञ्ञू; सब्बञ्ञुनो, सब्बञ्ञू। ๘๖. ธลาโป-มุสฺมา. ८६. "अमु" शब्द से परे लोप। อมุสทฺทโต โยนํ โลโปว โหติ ปุลฺลิงฺเค, อมู, ปุเมตฺเวว? อมุโย อมูนิ. โวปวาโทยํ. पुल्लिंग में "अमु" शब्द से परे "यो" विभक्ति का लोप ही होता है। जैसे- अमू। "पुमे" (पुल्लिंग में) ही क्यों? अमुयो, अमूनि। यह "वो" आदेश का अपवाद है। ๘๗. น โน สสฺส. ८७. "स" विभक्ति को "नो" आदेश नहीं होता। อมุสฺมา [Pg.91] สสฺส โน น โหติ, อมุสฺส, โนติ กึ? อมุยา. "अमु" शब्द से परे "स" विभक्ति के स्थान पर "नो" नहीं होता है। जैसे- अमुस्स। "नो" (नहीं होता) ऐसा क्यों कहा? अमुया (स्त्रीलिंग में होता है)। ๘๘. โยโลปนิสุ ทีโฆ. ८८. "यो" के लोप होने पर और "नि" विभक्ति के परे होने पर दीर्घ। โยนํ โลเป นิสุ จ ทีโฆ โหติ, อฏฺฐี อฏฺฐีนิ, โยโลปนิสูติ กึ? รตฺติโย. "यो" विभक्ति के लोप होने पर और "नि" विभक्ति के परे होने पर स्वर दीर्घ होता है। जैसे- अट्ठी, अट्ठीनि। "योलपनीसु" ऐसा क्यों कहा? रत्तियो। ๘๙. สุนํหิสุ. ८९. सु, नं और ही विभक्तियों के परे होने पर। เอสุ นามสฺส ทีโฆ โหติ. อคฺคีสุ, อคฺคีนํ, อคฺคีหิ. इन (सु, नं, ही) विभक्तियों के परे होने पर स्वर दीर्घ होता है। जैसे- अग्गीसु, अग्गीनं, अग्गीहि। ๙๐. ปญฺจาทีนํ จุทฺทสนฺนม. ९०. पञ्च आदि चौदह शब्दों को "अ" आदेश। ปญฺจาทีนํ จุทฺทสนฺนํ สุนํหิสฺว โหติ. ปญฺจสุ, ปญฺจนฺนํ, ปญฺจหิ, ฉสุ, ฉนฺนํ, ฉหิ, เอวํ ยาว อฏฺฐรสา. पञ्च आदि चौदह शब्दों के अन्त्य स्वर को "सु", "नं" और "ही" विभक्तियों के परे होने पर "अ" आदेश होता है। जैसे- पञ्चसु, पञ्चन्नं, पञ्चहि; छसु, छन्नं, छहि; इसी प्रकार अठारह (अट्ठारस) तक। ๙๑. ยฺวาโท นฺตุสฺส. ९१. "यो" आदि विभक्तियों के परे होने पर "न्तु" प्रत्यय को। ยฺวาทีสุ นฺตุสฺส อ โหติ. คุณวนฺตา, คุณวนฺตํ, คุณวนฺเต, คุณวนฺเตน อิจฺจาทิ, ยฺวา-โทติ กึ? คุณวา ติฏฺฐติ. "यो" आदि विभक्तियों के परे होने पर "न्तु" प्रत्यय के "उ" को "अ" आदेश होता है। जैसे- गुणवन्ता, गुणवन्तं, गुणवन्ते, गुणवन्तेन इत्यादि। "यवादो" ऐसा क्यों कहा? गुणवा तिट्ठति। ๙๒. นฺตสฺส จ ฏ วํเส. ९२. "अं" और "से" विभक्तियों के परे होने पर "न्तु" प्रत्यय को "ट" आदेश। อํเสสุ นฺตปฺปจฺจยสฺส ฏ โหติ วา นฺตุสฺส จ. ยํ ยํ หิ ราช ภชติ สนฺตํวายทิ วา อสํ, กิจฺจา-นกุพฺพสฺส กเรยฺย กิจฺจํ, หิมวํว ปพฺพตํ, สุชาติมนฺโตปิ อชาติมสฺส. โยควิภาเคนาญฺญตฺราปิ. จกฺขุมา อนฺธิตา โหนฺติ, วคฺคุมุทาตีริยา ปน ภิกฺขู วณฺณวา โหนฺติ. "अं" और "से" विभक्तियों के परे होने पर "न्तु" प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से "ट" आदेश होता है। (उदाहरण श्लोक...) योग-विभाग के कारण अन्यत्र भी होता है। जैसे- चक्खुमा अन्धिता होन्ति, वग्गुमुदातीरिया पन भिक्खू वण्णवा होन्ति। ๙๓. โยสุ ฌิสฺส ปุเม. ९३. पुल्लिंग में "यो" विभक्ति के परे होने पर "झ" संज्ञक वर्ण को। ฌสญฺญสฺส [Pg.92] อิสฺส โยสุ วา ฏ โหติ ปุลฺลิงฺเค. อคฺคโย อคฺคี, ฌคฺคหณํ กึ? อิการนฺตสมุทายสฺส ฏ มา สิยาภิ, รตฺติโย, อิคฺคหณํ กึ? ทณฺฑิโน, ปุเมติ กึ? อฏฺฐีนิ. पुल्लिंग में "झ" संज्ञक "इ" कार के स्थान पर "यो" विभक्ति के परे होने पर विकल्प से "अ" (ट-अनुबन्ध युक्त) आदेश होता है। जैसे- अग्गयो, अग्गी। "झ" ग्रहण क्यों? रत्तियो (यहाँ नहीं होता)। "इ" ग्रहण क्यों? दण्डिनो। "पुमे" क्यों? अट्ठीनि। ๙๔. เวโวสุ ลุสฺส. ९४. "वे" और "वो" विभक्तियों के परे होने पर "ल" संज्ञक वर्ण को। ลสญฺญสฺส อุสฺส เวโวสุ ฏ โหติ. ภิกฺขเว, ภิกฺขโว, เวโวสูติ กึ? ชนฺตุโย, อุคฺคหณํ กึ? สยมฺภุโว. 'ल' संज्ञक के 'उ' को 'वे' और 'वो' परे होने पर 'अ' (या 'ट') होता है। भिक्खवे, भिक्खवो। 'वे' और 'वो' परे होने पर क्यों? जन्तुयो। ग्रहण क्यों? सयम्भुवो। ๙๕. โยมฺหิ วา กฺวจิ. ९५. 'यो' परे होने पर विकल्प से कहीं-कहीं। โยมฺหิ กฺวจิ ลสญฺญสฺส อุสฺส วา ฏ โหติ. เหตโย, นนฺทนฺติ ตํ กุรโย ทสฺสเนน, อชฺเชว ตํ กุรโย ปาปยตุ. วาติ กึ? เหตุโย. जहाँ कहीं 'ल' संज्ञक के 'उ' को 'यो' विभक्ति परे होने पर 'अ' विकल्प से होता है। हे हेतुओं, वे उसे देखकर प्रसन्न होते हैं, आज ही उसे कुरुओं के पास पहुँचा दो। 'वा' क्यों? 'हेतुयो'। ๙๖. ปุมาลปเน เวโว. ९६. पुल्लिंग सम्बोधन में 'वे' और 'वो' होते हैं। ลสญฺญโต อุโต โยสฺสาลปเน เวโว โหนฺติ วา ปุลฺลิงฺเค. ภิกฺขเว, ภิกฺขโว ภิกฺขู, ปุเมติ กึ อายูนิ, อาลปเนติ กึ? ชนฺตุโย ติฏฺฐนฺติ, ลุโตตฺเวว? เธนุโย, สยมฺภุโว. 'ल' संज्ञक 'उ' कारान्त से परे 'यो' विभक्ति के स्थान पर पुल्लिंग सम्बोधन में 'वे' और 'वो' विकल्प से होते हैं। जैसे- भिक्खवे, भिक्खवो, भिक्खू। पुल्लिंग क्यों? आयूनि। सम्बोधन क्यों? जन्तुयो तिट्ठन्ति। 'उ' कारान्त ही क्यों? धेनुयो, सयम्भुवो। ๙๗. สฺมาหิสฺมึ นํ มฺหาภิมฺหิ. ९७. 'स्मा', 'हि' और 'स्मिं' के स्थान पर क्रमशः 'म्हा', 'भि' और 'म्हि' होते हैं। นามสฺมา ปเรสํ สฺมาหิสฺมินฺนํ มฺหา ภิมฺหิ วา โหนฺติ ยถากฺกมํ. พุทฺธมฺหา พุทฺธสฺมา, พุทฺเธภิ พุทฺเธหิ, พุทฺธมฺหิ พุทฺธสฺมึ, พหุลาธิการาอปวาทวิสเยปิ, ทสสหสฺสิมฺหิ ธาตุยา. नाम (प्रातिपदिक) से परे 'स्मा', 'हि' और 'स्मिं' के स्थान पर क्रमशः 'म्हा', 'भि' और 'म्हि' विकल्प से होते हैं। जैसे- बुद्धम्हा, बुद्धस्मा; बुद्धेभि, बुद्धेहि; बुद्धम्हि, बुद्धस्मिं। 'बहुला' अधिकार के कारण अपवाद विषयों में भी, जैसे- दससहस्सिम्हि धातुया। ๙๘. สุหิสฺวสฺเส. ९८. 'सु' और 'हि' परे होने पर 'अ' को 'ए' होता है। อการนฺตสฺส [Pg.93] สุหิสฺเว โหติ. พุทฺเธสุ พุทฺเธหิ. अकारान्त शब्द के 'अ' को 'सु' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'ए' होता है। जैसे- बुद्धेसु, बुद्धेहि। ๙๙. สพฺพาทีนํ นํมฺหีจ. ९९. 'सब्बादि' शब्दों के 'अ' को 'नं' विभक्ति परे होने पर भी 'ए' होता है। อการนฺตานํ สพฺพาทีนํ เอ โหติ นํมฺหิ สุหิสุ จ. สพฺเพสํ, สพฺเพสุ, สพฺเพหิ, สพฺพาทีนนฺติ กึ? พุทฺธานํ, อสฺเสตฺเวว? อมูสํ. สพฺพ กตร กตม อุภย อิตร อญฺญ อญฺญตร อญฺญตม (๔) ‘‘ปุพฺพปรา-วรทกฺขิณุตฺตรา-ธรานิ ววตฺถายมสญฺญายํ’’ (ปา,๑,๑,๓๔) ย ตฺย ต เอต อิม อมุ กึ เอก ตุมฺห อมฺห. अकारान्त 'सब्बादि' शब्दों के 'अ' को 'नं', 'सु' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'ए' होता है। जैसे- सब्बेसं, सब्बेसु, सब्बेहि। 'सब्बादि' क्यों? बुद्धानं। 'अ' कारान्त ही क्यों? अमूसं। सब्बादि शब्द हैं: सब्ब, कतर, कतम, उभय, इतर, अञ्ञ, अञ्ञतर, अञ्ञतम (4), 'पुब्ब-पर-अवर-दक्खिण-उत्तर-अधर' (व्यवस्था और असंज्ञा में), य, त्य, त, एत, इम, अमु, किं, एक, तुम्हा, अम्हा। ๑๐๐. สํสานํ. १००. 'सं' और 'सानं' आदेश होते हैं। สพฺพาทิโต นํวจนสฺส สํสานํ โหนฺติ. สพฺเพสํ, สพฺเพสานํ. 'सब्बादि' शब्दों से परे 'नं' विभक्ति के स्थान पर 'सं' और 'सानं' आदेश होते हैं। जैसे- सब्बेसं, सब्बेसानं। ๑๐๑. ฆปา สสฺส สฺสา วา. १०१. 'घ' और 'पा' संज्ञक शब्दों से परे 'स' विभक्ति को 'स्सा' विकल्प से होता है। สพฺพาทีนํ ฆปโต สสฺส สฺสา วา โหติ, สพฺพสฺสา สพฺพาย, ปคฺคหณมุตฺตรตฺถํ. 'सब्बादि' के 'घ' और 'पा' संज्ञक शब्दों से परे 'स' विभक्ति को 'स्सा' विकल्प से होता है। जैसे- सब्बस्सा, सब्बाय। यहाँ 'प' का ग्रहण उत्तर सूत्र के लिए है। ๑๐๒. สฺมิโน สฺสํ. १०२. 'स्मिं' विभक्ति को 'स्सं' होता है। สพฺพาทีนํ ฆปโต สฺมิโน สฺสํ วา โหติ, สพฺพสฺสํ สพฺพาย, อมุสฺสํ อมุยา. 'सब्बादि' के 'घ' और 'पा' संज्ञक शब्दों से परे 'स्मिं' विभक्ति को 'स्सं' विकल्प से होता है। जैसे- सब्बस्सं, सब्बाय; अमुस्सं, अमुया। ๑๐๓. ยํ. १०३. 'यं' आदेश होता है। ฆปโต สฺมิโน ยํ วา โหติ, กญฺญายํ กญฺญาย, รตฺติยํ รตฺติยา, วธุยํ วธุยา, สพฺพายํ สพฺพาย, อมุยํ อมุยา. 'घ' और 'पा' संज्ञक शब्दों से परे 'स्मिं' विभक्ति को 'यं' विकल्प से होता है। जैसे- कञ्ञायं, कञ्ञाय; रत्तियं, रत्तिया; वधुयं, वधुया; सब्बायं, सब्बाय; अमुयं, अमुया। ๑๐๔. ตึ สภาปริสาย. १०४. 'सभा' और 'परिसा' शब्दों से परे 'तिं' होता है। สภาปริสาหิ [Pg.94] สฺมิโน ตึ วา โหติ, สภตึ สภาย, ปริสตึ ปริสาย. 'सभा' और 'परिसा' शब्दों से परे 'स्मिं' विभक्ति को 'तिं' विकल्प से होता है। जैसे- सभतिं, सभाय; परिसतिं, परिसाय। ๑๐๕. ปทาทีหิ สิ. १०५. 'पद' आदि शब्दों से परे 'सि' होता है। เอหิ สฺมิโน สิ โหติ วา, ปทสิ ปทสฺมึ, พิลสิ พิลสฺมึ. इनसे (पद आदि से) परे 'स्मिं' विभक्ति को 'सि' विकल्प से होता है। जैसे- पदसि, पदस्मिं; बिलसि, बिलस्मिं। ๑๐๖. นาสฺส สา. १०६. 'ना' विभक्ति को 'सा' होता है। ปทาทีหิ นาสฺส สา โหติ วา, ปทสา ปเทน, พิลสา พิเลน. 'पद' आदि शब्दों से परे 'ना' विभक्ति को 'सा' विकल्प से होता है। जैसे- पदसा, पदेन; बिलसा, बिलेन। ๑๐๗. โกธาทีหิ. १०७. 'क्रोध' आदि शब्दों से भी। เอหิ นาสฺส สา โหติ วา, โกธสา โกเธน, อตฺถสา อตฺเถน. इनसे (क्रोध आदि से) परे 'ना' विभक्ति को 'सा' विकल्प से होता है। जैसे- कोधसा, कोधेन; अत्थसा, अत्थेन। ๑๐๘. อเตน. १०८. 'अ' के स्थान पर 'एन' होता है। อการนฺตโต ปรสฺส นาวจนสฺส เอนาเทโส โหติ, พุทฺเธน, อโตติ กึ? อคฺคินา. अकारान्त शब्द से परे 'ना' विभक्ति के स्थान पर 'एन' आदेश होता है। जैसे- बुद्धेन। 'अ' कारान्त से ही क्यों? अग्गिना। ๑๐๙. สิสฺโส. १०९. 'सि' विभक्ति को 'सो' होता है। อการนฺตโต นามสฺมา สิสฺส โอ โหติ, พุทฺโธ, อโตตฺเวว? อคฺคิ. अकारान्त नाम (प्रातिपदिक) से परे 'सि' विभक्ति को 'ओ' होता है; जैसे- बुद्धो। 'अकारान्त से' ही क्यों? (ताकि) अग्गि (में न हो)। ๑๑๐. กฺวเจ วา. ११०. कहीं-कहीं विकल्प से। อการนฺตโต นามสฺมา สิสฺส เอ โหติ วา กฺวจิ, วนปฺปคุมฺเพ ยถา ผุสฺสิตคฺเค. อปวาทวิสเยปิ พหุลํวีธานา-สุเข ทุกฺเข[Pg.95]. วาติ กึ? วนปฺปคุมฺโพ กฺวจีติ กึ? ปกฺเข สพฺพตฺถ มา โหตุ. अकारान्त नाम से परे 'सि' विभक्ति को कहीं-कहीं विकल्प से 'ए' होता है, जैसे- 'वनप्पगुम्बे यथा फुस्सितग्गे'। अपवाद के विषय में भी 'बहुलं' विधान के कारण (होता है)- 'सुखे दुक्खे'। 'वा' क्यों? (ताकि) 'वनप्पगुम्बो' (भी हो सके)। 'क्वचि' क्यों? (ताकि) पक्ष में सब जगह न हो जाए। ๑๑๑. อํ นปุํสเก. १११. नपुंसक लिंग में 'अं' होता है। อการนฺตโต นามสฺมา สิสฺส อํ โหติ นปุํสกลิงฺเค. รูปํ. अकारान्त नाम से परे नपुंसक लिंग में 'सि' विभक्ति को 'अं' होता है; जैसे- रूपं। ๑๑๒. โยนํ นิ. ११२. 'यो' विभक्तियों को 'नि' होता है। อการนฺตโต นามสฺมา โยนํ นิ โหติ นปุํสเก. สพฺพานิ รูปานิ, นิจฺจวิธาเน ผลํ เอกจฺจาทิสพฺพาทีนํ ปฐมายํ. अकारान्त नाम से परे नपुंसक लिंग में 'यो' विभक्तियों को 'नि' होता है; जैसे- सब्बानि रूपानि। नित्य विधान होने का फल 'एकच्च' आदि और 'सब्ब' आदि शब्दों की प्रथमा विभक्ति में (दिखता है)। ๑๑๓. ฌลา วา. ११३. 'झ' और 'ल' संज्ञक वर्णों से परे विकल्प से। ฌลโต โยนํ นิ โหติ วา นปุํสเก, อฏฺฐีนิ อฏฺฐี, อายูนิ อายู. 'झ' और 'ल' (इ, ई, उ, ऊ) से परे नपुंसक लिंग में 'यो' विभक्तियों को विकल्प से 'नि' होता है; जैसे- अट्ठीनि, अट्ठी; आयूनि, आयू। ๑๑๔. โลโป. ११४. लोप होता है। ฌลโต โยนํ โลโป โหติ, อฏฺฐี, อายู, อคฺคี, ภิกฺขู, ฌลาตฺเวว? อคฺคโย. ปเคว กสฺมา น โหติ? อนฺตรงฺคตฺตา อการสฺส. 'झ' और 'ल' से परे 'यो' विभक्तियों का लोप होता है; जैसे- अट्ठी, आयू, अग्गी, भिक्खू। 'झल' से ही क्यों? (ताकि) अग्गयो (में न हो)। पहले ही क्यों नहीं होता? अकार के अन्तरङ्ग होने के कारण। ๑๑๕. ชนฺตุเหตฺวีฆเปหิ วา. ११५. 'जन्तु', 'हेतु', ईकारान्त और 'घ', 'प' संज्ञक शब्दों से परे विकल्प से। ชนฺตุเหตูหิ อีการนฺเตหิ ฆป สญฺเญหิ จ ปเรสํ โยนํ วา โลโป โหติ, ชนฺตู ชนฺตุโย, เหตู เหตุโย, ทณฺฑี ทณฺฑิโย, กญฺญา กญฺญาโย, รตฺตี รตฺติโย, อิตฺถี อิตฺถิโย, เธนู เธนุโย, วธู วธุโย. 'जन्तु', 'हेतु', ईकारान्त और 'घ' एवं 'प' संज्ञक शब्दों से परे 'यो' विभक्तियों का विकल्प से लोप होता है; जैसे- जन्तू-जन्तुयो, हेतू-हेतुयो, दण्डी-दण्डियो, कञ्ञा-कञ्ञायो, रत्ती-रत्तियो, इत्थी-इत्थियो, धेनू-धेनुयो, वधू-वधुयो। ๑๑๖. เย ปสฺสิวณฺณสฺส. ११६. 'प' संज्ञक इवर्ण का 'य' परे होने पर। ปสญฺญสฺส [Pg.96] อิวณฺณสฺส โลโป โหติ วา ยกาเร, รตฺโย รตฺยา, รตฺยํ, โปกฺขรญฺโญ, โปกฺขรญฺญา, โปกฺขรญฺญํ, วา ตฺเวว? รตฺติโย, ปสฺสาติ กึ? ทณฺฑิโย, อิวณฺณสฺสาติ กึ? เธนุโย วธุโย. กถํ ‘อนุญฺญาโต อหํ มตฺยา’ติ? ‘เย ปสฺสา’ติ โยควิภาคา. 'प' संज्ञक इवर्ण (इ, ई) का यकार परे होने पर विकल्प से लोप होता है; जैसे- रत्यो, रत्या, रत्यं, पोक्खरञ्ञो, पोक्खरञ्ञा, पोक्खरञ्ञं। 'वा' क्यों? (ताकि) रत्तियो (भी हो)। 'प' संज्ञक का ही क्यों? (ताकि) दण्डियो (में न हो)। 'इवर्ण का' ही क्यों? (ताकि) धेनुयो, वधुयो (में न हो)। 'अनुञ्ञातो अहं मत्या' कैसे सिद्ध होगा? 'ये पस्सा' इस योग-विभाग से। ๑๑๗. คสีนํ. ११७. 'ग' और 'सि' का। นามสฺมา คสีนํ โลโป โหติ วิชฺฌนฺตราภาเว, โภ ปุริส, อยํ, ทณฺฑี. नाम से परे 'ग' (सम्बोधन) और 'सि' विभक्तियों का लोप होता है यदि कोई व्यवधान न हो; जैसे- भो पुरिस, अयं, दण्डी। ๑๑๘. อสงฺขฺเยหิ สพฺพาสํ. ११८. अव्ययों (असंख्यातों) से परे सभी (विभक्तियों) का। อวิชฺชมานสงฺขฺเยหิ ปราสํ สพฺพาสํ วิภตฺตีนํ โลโป โหติ, จ วา เอว เอวํ, เอตสฺมาเยว ลิงฺคา อสงฺขฺเยหิ สฺยาทฺยุปฺปตฺติ อนุมียเต. संख्या रहित (अव्यय) शब्दों से परे सभी विभक्तियों का लोप होता है; जैसे- च, वा, एव, एवं। इसी चिह्न से अव्ययों से 'सि' आदि विभक्तियों की उत्पत्ति का अनुमान किया जाता है। ๑๑๙. เอกตฺถตายํ. ११९. एकार्थीभाव (समास आदि) होने पर। เอกตฺถีภาเว สพฺพาสํ วิภตฺตีนํ โลโป โหติ พหุลํ, ปุตฺตียติ, ราชปุริโส, วาสิฏฺโฐ, กฺวจิ น โหติ พหุลํ วิธานา-ปรนฺตโป, ภคนฺทโร, ปรสฺสปทํ, อตฺตโนปทํ, ควมฺปติ, เทวานํปิยติสฺโส, อนฺเตวาสี, ชเนสุโต มมตฺตํ มามโก. एकार्थीभाव (समास, तद्धित आदि) होने पर सभी विभक्तियों का 'बहुलं' (विविधता से) लोप होता है; जैसे- पुत्तीयति, राजपुरिसो, वासेट्ठो। 'बहुलं' विधान के कारण कहीं-कहीं लोप नहीं भी होता है; जैसे- परन्तपो, भगन्दरो, परस्सपदं, अत्तनोपदं, गवम्पति, देवानम्पियतिस्सो, अन्तेवासी, जनेसुतो, ममत्तं, मामको। ๑๒๐. ปุพฺพสฺมามาทิโต. १२०. 'अं' आदि से पहले वाले (पूर्व पद) से। อมาเทกตฺถา ปุพฺพํ ยเทกตฺถํ ตโต ปราสํ สพฺพาสํ วิภตฺตีนํ โลโป โหติ. อธิตฺถิ. อิธ น โหติ พหุลํ 'अं' आदि एकार्थीभाव (अव्ययीभाव) में जो पूर्व पद है, उससे परे सभी विभक्तियों का लोप होता है; जैसे- अधित्थि। यहाँ 'बहुलं' विधान के कारण (लोप) नहीं होता है— วิธานา [Pg.97] ยถาปตฺถียา, ยถาปริสาย, ปุพฺพสฺมาติ กึ? คามคโต. जैसे- यथापत्थीया, यथापरिसय। 'पूर्व से' ही क्यों? (ताकि) गामगतो (में न हो)। ๑๒๑. นาโตม ปญฺจมิยา. १२१. अकारान्त से परे पञ्चमी को छोड़कर (लोप) नहीं होता। อมาเทกตฺถา ปุพฺพํ ยเทกตฺถมการนฺตํ, ตโต ปราสํ สพฺพาสํ วิภตฺตีนํ โลโป น โหติ, อนฺตุ, ภวตฺยปญฺจมฺยา, อุปกุมฺภํ, อปญฺจมิยาติ กึ? อุปกุมฺภา อานย. 'अं' आदि एकार्थीभाव में जो अकारान्त पूर्व पद है, उससे परे सभी विभक्तियों का लोप नहीं होता है, बल्कि पञ्चमी को छोड़कर 'अं' हो जाता है; जैसे- उपकुम्भं। 'अपञ्चमी' (पञ्चमी को छोड़कर) क्यों? (ताकि) 'उपकुम्भा आनय' (हो सके)। ๑๒๒. วา ตติยาสตฺตมินํ. १२२. तृतीया और सप्तमी विभक्तियों को विकल्प से। อมาเทกตฺถา ปุพฺพํ ยเทกตฺถมการนฺตํ, ตโต ปราสํ ตติยาสตฺถมีนํ วา อํ โหติ, อุปกุมฺเภน กตํ, อุปกุมฺภํ กตํ, อุปกุมฺเต นิเธหิ, อุปกุมฺภํ นิเธหิ. 'अं' आदि एकार्थीभाव में जो अकारान्त पूर्व पद है, उससे परे तृतीया और सप्तमी विभक्तियों को विकल्प से 'अं' होता है; जैसे- उपकुम्भेण कतं, उपकुम्भं कतं; उपकुम्भे निधेहि, उपकुम्भं निधेहि। ๑๒๓. ราชสี นามฺหิ. १२३. 'ना' विभक्ति परे होने पर 'राजस्सि' होता है। นามฺหิ ราชสฺสิ วา โหติ, สพฺพทตฺเตน ราชินา, วาตฺเวว? รญฺญา. 'ना' विभक्ति परे होने पर 'राज' शब्द को विकल्प से 'राजि' (राजस्सि) होता है; जैसे- सब्बदत्तेन राजिना। 'वा' (विकल्प) क्यों? (ताकि) रञ्ञा (भी हो)। ๑๒๔. สุนํหิสู. १२४. 'सु', 'नम्' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर। ราชสฺส อู โหติ วา สุนํหิสุ, ราชูสุ ราเชสุ, ราชูนํ รญฺญํ, ราชูหิ ราเชหิ. 'सु', 'नम्' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर 'राज' शब्द के (अन्त्य अकार) को विकल्प से 'ऊ' होता है; जैसे- 'राजूसु' (या) 'राजेसु', 'राजूनां' (या) 'रञ्ञं', 'राजूहि' (या) 'राजेहि'। ๑๒๕. อิมสฺสาทิตฺถิยํเฏ. १२५. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'इम' शब्द को 'ए' आदेश होता है। อิมสทฺทสฺสานิตฺถิยํ เฏ โหติ วา สุนํหิสุ, เอสุ อิเมสุ, เอสํ อิเมสํ, เอสิ อิเมหิ, อนิตฺถิยนฺติ กึ? อิมาสุ, อิมาสํ, อิมาหิ. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'इम' शब्द को 'सु', 'नम्' और 'हि' विभक्तियों के परे होने पर विकल्प से 'ए' आदेश होता है; जैसे- 'एसु' (या) 'इमेसु', 'एसं' (या) 'इमेसं', 'एहि' (या) 'इमेहि'। 'स्त्रीलिंग को छोड़कर' ऐसा क्यों कहा? (क्योंकि स्त्रीलिंग में) 'इमासु', 'इमासं', 'इमाहि' (होता है)। ๑๒๖. นามฺห นิมิ. १२६. 'ना' विभक्ति के परे होने पर 'अन' और 'इमि' आदेश होते हैं। อิมสทฺทสฺสานิตฺถิยํ [Pg.98] นามฺหิ อนอิมิอิจฺจาเทสา โหนฺติ, อเนน อิมีนา, อนิตฺถิยํตฺเวว? อิมาย. स्त्रीलिंग को छोड़कर 'इम' शब्द को 'ना' विभक्ति के परे होने पर 'अन' और 'इमि' आदेश होते हैं; जैसे- 'अनेन', 'इमिना'। 'स्त्रीलिंग को छोड़कर' ही क्यों? (क्योंकि स्त्रीलिंग में) 'इमाय' (होता है)। ๑๒๗. สิมฺห นปุํสกสฺสายํ. १२७. 'सि' विभक्ति के परे होने पर नपुंसक लिंग को छोड़कर 'अयं' आदेश होता है। อิมสทฺทสฺสานปุํสกสฺส อยํ โหติ สิมฺหิ, อยํ ปุริโส, อยํ อิตฺถี, อนปุํสกสฺสาติ กึ? อิมํ. 'सि' विभक्ति के परे होने पर नपुंसक लिंग को छोड़कर 'इम' शब्द को 'अयं' आदेश होता है; जैसे- 'अयं पुरिसो', 'अयं इत्थी'। 'नपुंसक लिंग को छोड़कर' ऐसा क्यों कहा? (क्योंकि नपुंसक लिंग में) 'इमं' (होता है)। ๑๒๘. ตฺยเตตานํ ตสฺส โส. १२८. 'त्य', 'त' और 'एत' शब्दों के 'त' को 'स' आदेश होता है। ตฺยเตตานมนปุํสกานํ ตสฺส โส โหติ สิมฺหิ, สฺโย ปุริโส, สฺยา อิตฺถี, เอวํ โส, สา, เอโส, เอสา, อนปุํสกสฺเสตฺเวว? ตฺยํ, ตํ, เอตํ. 'सि' विभक्ति के परे होने पर नपुंसक लिंग को छोड़कर 'त्य', 'त' और 'एत' शब्दों के 'त' को 'स' आदेश होता है; जैसे- 'स्यो पुरिसो', 'स्या इत्थी', इसी प्रकार 'सो', 'सा', 'एसो', 'एसा'। 'नपुंसक लिंग को छोड़कर' ही क्यों? (क्योंकि नपुंसक लिंग में) 'त्यं', 'तं', 'एतं' (होता है)। ๑๒๙. มสฺสามุสฺส. १२९. 'अमु' शब्द के 'म' को 'स' आदेश होता है। อนปุํสกสฺสามุสฺส มการสฺส โส โหติ สิมฺหิ, อสุ ปุริโส, อสุ อิตฺถี. 'सि' विभक्ति के परे होने पर नपुंसक लिंग को छोड़कर 'अमु' शब्द के मकार को 'स' आदेश होता है; जैसे- 'असु पुरिसो', 'असु इत्थी'। ๑๓๐. เก วา. १३०. विकल्प से 'क' आदेश होता है। อมุสฺส มสฺส เก วา โส โหติ, อสุโก อมุโก, อสุกา อมุกา, อสุกํ อมุกํ, อสุกานิ อมุกานิ. 'अमु' शब्द के 'म' को विकल्प से 'क' आदेश होता है और (मकार को) 'स' भी होता है; जैसे- 'असुको', 'अमुको', 'असुका', 'अमुका', 'असुकं', 'अमुकं', 'असुकानि', 'अमुकानि'। ๑๓๑. ตตสฺส โน ตพฺพาสุ. १३१. सभी विभक्तियों में 'त' शब्द के 'त' को 'न' आदेश होता है। ตสทฺทสฺส ตสฺส โน วา โหติ สพฺพาสุ วิภตฺตีสุ, เน เต นาโย ตาโย, นํ ตํ, นานิ ตานิ อิจฺจาทิ. सभी विभक्तियों में 'त' शब्द के 'त' को विकल्प से 'न' आदेश होता है; जैसे- 'ने' (या) 'ते', 'नायो' (या) 'तायो', 'नं' (या) 'तं', 'नानि' (या) 'तानि' इत्यादि। ๑๓๒. ฏ สสฺมาสฺมึสฺสายสฺสํสฺสาสํมฺหามฺหิสฺวิ มสฺส จ. १३२. 'स', 'स्मा', 'स्मिं', 'स्साय', 'स्सं', 'स्सा', 'सं', 'म्हा', 'म्हि' और 'सु' विभक्तियों के परे होने पर 'इम' और 'त' शब्दों को 'अ' आदेश होता है। สาทีสฺวิมสฺส [Pg.99] ตตสฺส จ โฏ วา โหติ, อสฺส อิมสฺส, อสฺมา อิมสฺมา, อสฺมึ อิมสฺมึ, อสฺสาย อิมิสฺสาย, อสฺสํ อิมิสฺสํ, อสฺสา อิมิสฺสา, อาสํ อิมาสํ, อมฺหา อิมมฺหา, อมฺหิ อิมมฺหิ, อสฺส ตสฺส, อสฺมา ตสฺมา, อสฺมึ ตสฺมึ, อสฺสาย ตสฺสาย, อสฺสํ ตสฺสํ, อสฺสา ตสฺสา, อาสํ ตาสํ, อมฺหา ตมฺหา, อมฺหิ ตมฺหิ, สฺสายาทิคฺคหณมาเทสนฺตเร มา โหตูติ. 'स' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'इम' और 'त' शब्दों को विकल्प से 'अ' आदेश होता है; जैसे- 'अस्स' (या) 'इमस्स', 'अस्मा' (या) 'इमस्मा', 'अस्मिं' (या) 'इमस्मिं', 'अस्साय' (या) 'इमिस्साय', 'अस्सं' (या) 'इमिस्सं', 'अस्सा' (या) 'इमिस्सा', 'आसं' (या) 'इमासं', 'अम्हा' (या) 'इमम्हा', 'अम्हि' (या) 'इमम्हि'; 'अस्स' (या) 'तस्स', 'अस्मा' (या) 'तस्मा', 'अस्मिं' (या) 'तस्मिं', 'अस्साय' (या) 'तस्साय', 'अस्सं' (या) 'तस्सं', 'अस्सा' (या) 'तस्सा', 'आसं' (या) 'तासं', 'अम्हा' (या) 'तम्हा', 'अम्हि' (या) 'तम्हि'। 'स्साय' आदि का ग्रहण अन्य आदेशों को रोकने के लिए है। ๑๓๓. เฏ สิสฺสิสิสฺมา. १३३. 'इसि' शब्द से परे 'स्मा' विभक्ति को 'ए' आदेश होता है। อิสิสฺมา สิสฺส เฏ วา โหติ, ‘โย นฺวชฺช วินเย กงฺขํ, อตฺถธมฺมวิทู อิเส’, วาตฺเวว? อิสิ. 'इसि' शब्द से परे 'स्मा' विभक्ति को विकल्प से 'ए' आदेश होता है; जैसे- 'यो न्वज्ज विनये कङ्खं, अत्थधम्मविदू इसे'। 'विकल्प से' ही क्यों? (क्योंकि विकल्प में) 'इसि' (होता है)। ๑๓๔. ทุติยสฺส โยสฺส. १३४. द्वितीया विभक्ति के 'यो' को 'ए' आदेश होता है। อิสิสฺมา ปรสฺส ทุติยาโยสฺส เฏ วา โหติ, ‘สมเณ พฺราหฺมเณ วนฺเท, สมฺปนฺนจรเณ อิเส’, วาตฺเวว? อิสโย ปสฺส, ทุติยสฺสาติ กึ? อิสโย ติฏฺฐนฺติ. 'इसि' शब्द से परे द्वितीया विभक्ति के 'यो' को विकल्प से 'ए' आदेश होता है; जैसे- 'समणे ब्राह्मणे वन्दे, सम्पन्नचरणे इसे'। 'विकल्प से' ही क्यों? (क्योंकि विकल्प में) 'इसयो पस्स' (होता है)। 'द्वितीया का' ऐसा क्यों कहा? (क्योंकि प्रथमा में) 'इसयो तिट्ठन्ति' (होता है)। ๑๓๕. เอกจฺจาทีห โต. १३५. 'एकच्च' आदि शब्दों से परे 'यो' को 'ए' आदेश होता है। อการนฺเตหิ เอกจฺจาทีหิ โยนํ เฏ โหติ, เอกจฺเจ ติฏฺฐนฺติ, เอกเจ ปสฺส, อโตติ กึ? เอกจฺจาโย, เอวํ เอส ส ปฐม. अकारान्त 'एकच्च' आदि शब्दों से परे 'यो' विभक्तियों को 'ए' आदेश होता है; जैसे- 'एकच्चे तिट्ठन्ति', 'एकच्चे पस्स'। 'अकारान्त से' ऐसा क्यों कहा? (क्योंकि आकारान्त में) 'एकच्चायो' (होता है)। इसी प्रकार 'एस', 'स', 'पठम' (के रूप होते हैं)। ๑๓๖. น นิสฺส ฏา. १३६. 'नि' विभक्ति को 'आ' आदेश नहीं होता। เอกจฺจาทีหิ ปรสฺส นิสฺส ฏา น โหติ, เอกจฺจานิ. 'एकच्च' आदि शब्दों से परे 'नि' विभक्ति को 'आ' आदेश नहीं होता है; जैसे- 'एकच्चानि'। ๑๓๗. สพฺพาทีหี[Pg.100]. १३७. 'सब्ब' आदि शब्दों से भी। สพฺพาทีหิ ปรสฺส นิสฺส ฏา น โหติ, สพฺพานิ. 'सब्ब' आदि शब्दों से परे 'नि' विभक्ति को 'आ' आदेश नहीं होता है; जैसे- 'सब्बानि'। ๑๓๘. โยนเมฏ. १३८. 'यो' विभक्तियों को 'ए' आदेश होता है। อการนฺเตหิ สพฺพาทีหิ โยนเมฏ โหติ, สพฺเพ ติฏฺฐนฺติ, สพฺเพ ปสฺส, อโตตฺเวว? สพฺพาโย. अकारान्त 'सब्ब' आदि शब्दों से परे 'यो' विभक्तियों को 'ए' आदेश होता है; जैसे- 'सब्बे तिट्ठन्ति', 'सब्बे पस्स'। 'अकारान्त से' ही क्यों? (क्योंकि आकारान्त में) 'सब्बायो' (होता है)। ๑๓๙. นาญฺญํ จนามปฺปธานา. १३९. और नाम तथा अप्रधान होने पर अन्य (कार्य) नहीं होते। นามภูเตหี อปฺปธาเนหิ จ สพฺพาทีหิ ยํ วุตฺตํ, ยญฺจาญฺญํ สพฺพาทิการิยํ, ตํ น โหติ, เต สพฺพา, เต ปิยสพฺพา, เต อติสพฺพา. नामभूत और अप्रधान 'सब्ब' आदि शब्दों से जो कहा गया है, और जो अन्य 'सब्ब' आदि कार्य हैं, वे नहीं होते हैं; जैसे—ते सब्बा, ते पियसब्बा, ते अतिसब्बा। ๑๔๐. ตติยตฺถโยเค. १४०. तृतीया विभक्ति के अर्थ के योग में। ตติยตฺเถน โยเค สพฺพาทีหิ ยํ วุตฺตํ, ยญฺจาญฺญํ สพฺพาทิ การิยํ, ตํ น โหติ, มาเสน ปุพฺพานํ มาสปุพฺพานํ. तृतीया विभक्ति के अर्थ के योग में 'सब्ब' आदि से जो कहा गया है, और जो अन्य 'सब्ब' आदि कार्य हैं, वे नहीं होते हैं; जैसे—मासेन पुब्बानं (महीने से पूर्व) का मासपुब्बानं। ๑๔๑. จตฺถสมาเส. १४१. 'च' अर्थ वाले (द्वन्द्व) समास में। จตฺถสมาสวิสเย สพฺพาทีหิ ยํ วุตฺตํ, ยญฺจาญฺญํ สพฺพาทิการิยํ, ตํ น โหติ, อิกฺขิณุตฺตรปุพฺพานํ, สมาเสติ กึ? อมุสญฺจ เตสญฺจ เทหิ. 'च' अर्थ वाले समास के विषय में 'सब्ब' आदि से जो कहा गया है, और जो अन्य 'सब्ब' आदि कार्य हैं, वे नहीं होते हैं; जैसे—इक्खिणुत्तरपुब्बानं। 'समास में' ऐसा क्यों कहा? अमुसञ्च तेसञ्च देहि (उन्हें और उन्हें दो)। ๑๔๒. เวฏ. १४२. 'ए' का विकल्प से 'अ' होता है। เอตฺถสมาสวิสธย สพฺพาทีหิ ยธสฺสฏ วุตฺโต, ตสฺส วา โหติ, ปุคฺคุตฺตเร, ปุพฺพุตฺตรา. इस समास के विषय में 'सब्ब' आदि के लिए जो कहा गया है, वह विकल्प से होता है; जैसे—पुग्गुत्तरे, पुब्बुत्तरा। ๑๔๓. ปุพฺพาทีหิ ฉหี. १४३. 'पुब्ब' आदि छह शब्दों से। เอเตหิ [Pg.101] ปุพฺพาทีหิ ฉหิ สวิสเย เอฏ วา โหติ, ปุพฺเพ ปุพฺพา, ปเร ปรา, อปเร อปรา, ทกฺขิเณ ทกฺขิณา, อุตฺตเร อุตฺตรา, อธเร อธรา, ฉหิติกึ? เย. इन 'पुब्ब' आदि छह शब्दों के अपने विषय में 'ए' विकल्प से होता है; जैसे—पुब्बे, पुब्बा; परे, परा; अपरे, अपरा; दक्खिणे, दक्खिणा; उत्तरे, उत्तरा; अधरे, अधरा। 'छह' ऐसा क्यों कहा? ये। ๑๔๔. มนาทีหิ สฺมึสํนาสฺมานํ สิโสโอสาสา. १४४. 'मनादि' शब्दों से परे 'स्मिं', 'सं', 'ना' और 'स्मा' के स्थान पर क्रमशः 'सि', 'सो', 'ओ' और 'सा' आदेश होते हैं। มนาทีหิ สฺมิมาทีนํ สิโสโอสาสา วา โหนฺติ ยถากฺกมํ, มนสิ มนสฺมึ, มนโส มนสฺส, มโน มนํ, มนสา มเนน, มนสา มนสฺมา, กถํ ‘ปุตฺโต ชาโต อเจตโส, หิตฺวา ยาติ สุเมธโส, สุทฺธุตฺตรวาสสา, เหมกปฺปนวาสเส’ติ? สกตฺเถณตฺถา. มนตม ตป เตช สิร อุร วจ โอช รชยส ปย (๖) ‘‘สรวยา-ยวาสเจตา ชลาสยากฺขยโลหปฏมเนสุ’’. 'मनादि' शब्दों से परे 'स्मिं' आदि के स्थान पर 'सि', 'सो', 'ओ' और 'सा' विकल्प से यथाक्रम होते हैं; जैसे—मनसि, मनस्मिं; मनसो, मनस्स; मनो, मनं; मनसा, मनेन; मनसा, मनस्मा। 'पुत्तो जातो अचेतसो, हित्वा याति सुमेधसो, सुद्धुत्तरवाससा, हेमकप्पनवाससे'—ये कैसे सिद्ध होते हैं? स्वार्थ में 'ण' प्रत्यय होने से। मन, तम, तप, तेज, सिर, उर, वच, ओज, रज, यस, पय (६) 'सरवया-यवासचेता जलासयाक्खयलोहपटमनेसु'। ๑๔๕. สโต สพ เภ. १४५. 'सन्त' शब्द के स्थान पर 'सबा' होता है 'भ' (भि) परे होने पर। สนฺถสทฺทสฺส สพ ภวติ ภกาเร, สพฺภิ. 'सन्त' शब्द के स्थान पर 'सबा' होता है 'भ' कार परे होने पर; जैसे—सब्भि। ๑๔๖. ภวโต วา โภนฺโต คโยนาเส. १४६. 'भवन्त' शब्द के स्थान पर 'भोन्त' आदेश विकल्प से होता है 'ग', 'यो', 'ना' और 'स' परे होने पर। ภวนฺตสทฺทสฺส โภนฺตาเทโส วา โหติ คโยนาเส, โภนฺต ภวํ, โภนฺโต ภวนฺโต, โภตา ภวตา, โภโต ภวโต, โภ อิติ อามนฺตเณ นิปาโต ‘กุโต นุ อาคจฺฉถ โภ ตโย ชนา’, เอวํ ภวนฺตติ, ภทฺเทติ สทฺทนฺถเรน สิทฺธํ, สทฺธนฺถอิติ ทสฺส ทฺวิภาเวน. 'भवन्त' शब्द के स्थान पर 'भोन्त' आदेश विकल्प से होता है 'ग', 'यो', 'ना' और 'स' परे होने पर; जैसे—भोन्त, भवं; भोन्तो, भवन्तो; भोता, भवता; भोतो, भवतो। 'भो' यह आमन्त्रण (सम्बोधन) में निपात है—'कुतो नु आगच्छथ भो तयो जना'। इसी प्रकार 'भवन्त' और 'भद्दे' अन्य शब्दों से सिद्ध होते हैं, 'सद्धन्थ' में 'द' के द्वित्व होने से। ๑๔๗. สิสฺสาคฺคิโต นิ. १४७. 'अग्गि' शब्द से परे 'सि' के स्थान पर 'नि' होता है। อคฺคิสฺมา สิสฺส นิ โยติ วา, อคฺคินิ อคฺคิ. 'अग्गि' शब्द से परे 'सि' के स्थान पर 'नि' या 'यो' विकल्प से होता है; जैसे—अग्गिनि, अग्गि। ๑๔๘. นฺตสฺสํ. १४८. 'न्त' के स्थान पर 'अं' होता है। สิมฺหิ [Pg.102] นฺตปฺปจฺจยสฺส อํ โหติ วา, คจฺฉํ คจฺฉนฺโต. 'सि' परे होने पर 'न्त' प्रत्यय के स्थान पर 'अं' विकल्प से होता है; जैसे—गच्छं, गच्छन्तो। ๑๔๙. ภูโต. १४९. 'भू' धातु से। ภูธาตุโต นฺตสฺส อํ โหติ สิมฺหิ นิจฺจํ ปุนพฺพิธานา, ภวํ. 'भू' धातु से परे 'न्त' के स्थान पर 'सि' परे होने पर 'अं' नित्य होता है (पुनर्विधान के कारण); जैसे—भवं। ๑๕๐. มหนฺตารหนฺตานํ ฏา วา. १५०. 'महन्त' और 'अरहन्त' शब्दों के 'न्त' के स्थान पर विकल्प से 'टा' होता है। สิมฺหิ มหนฺตารหนฺตานํ นฺตสฺส ฏา วา โหติ, มหา มหํ, อรหา อรหํ. 'सि' परे होने पर 'महन्त' और 'अरहन्त' के 'न्त' के स्थान पर विकल्प से 'टा' होता है; जैसे—महा, महं; अरहा, अरहं। ๑๕๑. นฺตุสฺส. १५१. 'न्तु' के स्थान पर। สิมฺหิ นฺตุสฺส ฏา โหติ, คุณวา. 'सि' परे होने पर 'न्तु' के स्थान पर 'टा' होता है; जैसे—गुणवा। ๑๕๒. อํงํ นปุํสเก. १५२. नपुंसक लिंग में 'अं' और 'अ' होते हैं। นฺตุสฺส อํงํ โหนฺติ สิมฺหิ นปุํสเก, คุณวํ กุลํ, คุณวนฺตํ กุลํ, นปุํสเกตึ กึ? สีลวา ภิกฺขุ. नपुंसक लिंग में 'सि' परे होने पर 'न्तु' के स्थान पर 'अं' और 'अ' होते हैं; जैसे—गुणवं कुलं, गुणवन्तं कुलं। 'नपुंसक लिंग में' ऐसा क्यों कहा? सीलवा भिक्खु। ๑๕๓. หิมวโต วา โอ. १५३. 'हिमवन्त' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'ओ' होता है। หิมวโต สิมฺหี นฺตุสฺส โอ วา โหติ, หิมวนฺโต หิมวา. 'हिमवन्त' शब्द के 'न्त' के स्थान पर 'सि' परे होने पर विकल्प से 'ओ' होता है; जैसे—हिमवन्तो, हिमवा। ๑๕๔. ราชาทิยุวาทิตฺวา. १५४. राजा आदि और युवा आदि शब्दों के विषय में। ราชาทีหิยุวาทีหิ จ สิสฺส อา โหติ, ราชา, ยุวา. ราช พฺรหฺม สข อตฺต อาตุม (๗) ‘‘ธมฺโม วาญฺญตฺเถ’’ ทฬฺหธมฺมา, อสฺม, (๘) ‘‘อิโม ภาเว’’ อณิมา, (มหิมา, คริมา) ลฆิมา, ยุว สา สุวา มฆว ปุม วตฺตห. राजा आदि और युवा आदि शब्दों से परे 'सि' प्रत्यय का 'आ' हो जाता है; जैसे- राजा, युवा। राज, ब्रह्म, सख, अत्त, आतुम (७), 'धम्मो वाञ्ञत्थे' (दृढ़धर्मा), अस्म (८), 'इमो भावे' (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा), युव, सा, सुवा, मघव, पुम, वत्तह। ๑๕๕. วามฺหานง. १५५. 'अं' प्रत्यय होने पर विकल्प से 'आनं' आदेश होता है। ราชาทีนํ [Pg.103] ยุวาทีนํ จ อานง โหติ วา อํมฺหิ, ราชานํ ราชํ, ยุวานํ ยุวํ. राजा आदि और युवा आदि शब्दों के बाद 'अं' प्रत्यय होने पर विकल्प से 'आनं' आदेश होता है; जैसे- राजानं, राजं; युवानं, युवं। ๑๕๖. โยนมาโน. १५६. 'यो' प्रत्यय का 'आनो' आदेश होता है। ราชาทีหิ ยุวาทีหิ จ โยนํ อาโน วา โหติ, ราชาโน ยุวาโน, วา ตฺเวว? ราชา ราเช, ยุวา ยุเว. राजा आदि और युवा आदि शब्दों से परे 'यो' प्रत्यय का विकल्प से 'आनो' आदेश होता है; जैसे- राजानो, युवानो। विकल्प से क्या होता है? राजा, राजे; युवा, युवे। ๑๕๗. อาโยโน จ สขา. १५७. 'सख' शब्द से परे 'यो' प्रत्यय का 'आयो' और 'नो' आदेश होता है। สขโต โยน มาโย โน โหนฺติ วา อาโน จ, สขาโย, สขิโน, สขาโน, วา ตฺเวว? สขา, สเข. 'सख' शब्द से परे 'यो' प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'आयो', 'नो' और 'आनो' आदेश होते हैं; जैसे- सखायो, सखिनो, सखानो। विकल्प से क्या होता है? सखा, सखे। ๑๕๘. เฏ สฺมิโน. १५८. 'स्मि' प्रत्यय का 'टे' आदेश होता है। สขโต สฺมิโน เฏ โหติ, สเข, นิจฺจตฺโถ-ยมารมฺโภ. 'सख' शब्द से परे 'स्मि' प्रत्यय का 'टे' आदेश होता है; जैसे- सखे। यह आरम्भ नित्य अर्थ के लिए है। ๑๕๙. โนนาเสสฺวิ. १५९. 'नो', 'ना', 'स' और 'इ' प्रत्ययों के परे होने पर। สขสฺส อิ โหติ โนนาเสสุ, สขิโน, สขินา, สขิสฺส. 'नो', 'ना' और 'स' प्रत्ययों के परे होने पर 'सख' शब्द के अन्त्य अकार को 'इ' होता है; जैसे- सखिनो, सखिना, सखिस्स। ๑๖๐. สฺมานํสุ วา. १६०. 'स्मा', 'नं' और 'सु' प्रत्ययों के परे होने पर विकल्प से। สขสฺส อิ วา โหติ สฺมานํสุ, สขิสฺมา สขสฺมา, สขีนํ สขานํ. 'स्मा', 'नं' और 'सु' प्रत्ययों के परे होने पर 'सख' शब्द के अन्त्य अकार को विकल्प से 'इ' होता है; जैसे- सखिस्मा, सखस्मा; सखीनं, सखानं। ๑๖๑. โยสฺวํหิสุ จารง. १६१. 'यो', 'सु', 'अं' और 'हि' प्रत्ययों के परे होने पर 'आरं' आदेश होता है। สขสฺส อารง วา โหติ โยสฺวํหิสุ สฺมานํสุ จ, สขาโร สขาโย, สขาเรสุ สเขสุ, สขารํ สขํ, สขาเรหิ สเขหิ, สขารา สขา, สขสฺมา, สขารานํ สขานํ. 'सख' शब्द को 'यो', 'सु', 'अं', 'हि', 'स्मा' और 'नं' प्रत्ययों के परे होने पर विकल्प से 'आरं' आदेश होता है; जैसे- सखारो, सखायो; सखारेसु, सखेसु; सखारं, सखं; सखारेहि, सखेहि; सखारा, सखा, सखस्मा; सखारानं, सखानं। ๑๖๒. ลฺถุปิตาทีนมเส. १६२. 'ल्तु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों के विषय में 'स' को छोड़कर। ลฺตุปฺปจฺจยนฺตานํ [Pg.104] ปิตาทีนํ จ อารง โหตี สโต-ญฺญตฺร, กตฺตาโร, ปิตโร, กตฺตารํ, ปิตรํ, กตฺตารา, ปิตรา, กตฺตริ, ปิตริ, อเสติ กึ? กตฺตุโน, ปิตุโน. 'ल्तु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को 'स' प्रत्यय को छोड़कर अन्यत्र 'आरं' आदेश होता है; जैसे- कत्तारो, पितरो; कत्तारं, पितरं; कत्तारा, पितरा; कत्तरि, पितरि। 'असे' (स को छोड़कर) क्यों कहा? कत्तुनो, पितुनो। ๑๖๓. นมฺหิ วา. १६३. 'नं' प्रत्यय के परे होने पर विकल्प से। นมฺหิ ลฺตุปิตาทีนุมานง วา โหติ, กตฺตารานํ กตฺตูนํ, ทิตรานํ ปิตุนฺนํ. 'नं' प्रत्यय के परे होने पर 'ल्तु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को विकल्प से 'उ' और 'आनं' आदेश होते हैं; जैसे- कत्तारानं, कत्तूनं; धीतरानं, पितुन्नं। ๑๖๔. อา. १६४. 'आ' आदेश होता है। นมฺหิ ลฺตุปิตาทีนมา วา โหตี, กตฺตานํ กตฺตูนํ, ปีตานํ ปิตุนฺนํ. 'नं' प्रत्यय के परे होने पर 'ल्तु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को विकल्प से 'आ' आदेश होता है; जैसे- कत्तानं, कत्तूनं; पीतानं, पितुन्नं। ๑๖๕. สโลโป. १६५. 'स' का लोप होता है। ลฺตุปิตาทิหิ สสฺส โลโป วา โหติ, กตฺถุ กตฺถุโน, สกมนฺตาตุ สกมนฺธาตุโน, ปีตุ ปิตุโน. 'ल्तु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों से परे 'स' प्रत्यय का विकल्प से लोप होता है; जैसे- कत्थु, कत्थुनो; सकमन्तातु, सकमन्धातुनो; पीतु, पितुनो। ๑๖๖. สุหิสฺวารงฺ. १६६. 'सु' और 'हि' प्रत्ययों के परे होने पर 'आरं' आदेश होता है। สุหิสุ ลฺตุปิตาทีนมารง วา โหติ, กตฺตาเรสุ กตฺตูสุ, ปิตเรสุ ปิตูสุ, กตฺตาเรหิ กตฺตูหิ, ปิตเรหิ ปีตูหี. 'सु' और 'हि' प्रत्ययों के परे होने पर 'ल्तु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को विकल्प से 'आरं' आदेश होता है; जैसे- कत्तारेसु, कत्तूसु; पितरेसु, पितूसु; कत्तारेहि, कत्तूहि; पितरेहि, पितूहि। ๑๖๗. นชฺชาโยสฺมาม. १६७. 'नदी' शब्द के 'यो' प्रत्यय का 'आम' आदेश होता है। โยสุ นทิสทฺทสฺส อาม วา โหติ, นชฺชาโย นทิโย. 'यो' प्रत्यय के परे होने पर 'नदी' शब्द को विकल्प से 'आम' आदेश होता है; जैसे- नज्जायो, नदियो। ๑๖๘. ฏิ กติมฺหา. १६८. 'कति' शब्द से परे। กติมฺหา ธยานํ ฏิ โหติ, กติ ติฏฺฐนฺติ, กติ ปสฺส. 'कति' शब्द से परे 'यो' प्रत्यय का 'टि' (लोप) होता है; जैसे- कति तिट्ठन्ति, कति पस्स। ๑๖๙. ฏ ปญฺจาทีหิ จุทฺทสหิ. १६९. 'पाँच' आदि चौदह (संख्याओं) से 'ट' (आदेश) होता है। ปญฺจาทีหิ [Pg.105] จุทฺทสหิ สํขฺยาหิ โยนํ โฏ โหติ ปญฺจ, ปญฺจ, เอวํ ยาว อฏฺฐารสา. ปญฺจาทีหีติ กึ? ทฺเว, ตโย, จตฺตาโร, จุทฺธสหีติ กึ? ทฺเว วิสติโย. 'पाँच' आदि चौदह संख्याओं से 'यो' विभक्ति का 'ओ' (ट) होता है - पञ्च, पञ्च, इसी प्रकार अठारह तक। 'पाँच आदि' क्यों? दो, तीन, चार। 'चौदह' क्यों? दो बीस (चालीस)। ๑๗๐. อุภโคหิ โฏ. १७०. 'उभ' और 'गो' शब्दों से 'ट' (ओ) होता है। อุภโคหิ โยนํ โฏ โหติ, อุโภ, อุโภ, คาโว, คาโว, กถํ ‘อิเมกรตฺถึ อุภโย วสามา’ติ? โฏมฺหิ ยการาคโม. 'उभ' और 'गो' शब्दों से 'यो' विभक्ति का 'ओ' (ट) होता है - उभो, उभो, गावो, गावो। 'इमेकरत्थिं उभयो वसाम' यहाँ कैसे? 'ओ' (ट) होने पर 'य' कार का आगम होता है। ๑๗๑. อารง สฺมา. १७१. 'आर' आदेश के बाद 'स्मा' विभक्ति से। อารวาเทสโต โยนํ โฏ โหติ, สขาโร, กตฺตาโร, ปิตโร. 'आर' आदेश के बाद 'यो' विभक्ति का 'ओ' (ट) होता है - सखारो, कत्तारो, पितरो। ๑๗๒. โฏเฏ วา. १७२. 'ओ' (ट) और 'ए' (टे) विकल्प से होते हैं। อารวาเทสมฺหา โยนํ โฏเฏ วา โหนฺติ ยถากฺกมํ, สขาโร, สขาเร สขาโย, โฏคฺคหณํ ลาฆวตฺถํ. 'आर' आदेश के बाद 'यो' विभक्ति के स्थान पर यथाक्रम 'ओ' (ट) और 'ए' (टे) विकल्प से होते हैं - सखारो, सखारे, सखायो। 'ट' का ग्रहण लाघव के लिए है। ๑๗๓. ฏา นาสฺมานํ. १७३. 'ना' और 'स्मा' के स्थान पर 'आ' (टा) होता है। อารวาเทสมฺหา นาสฺมานํ ฏา โหติ, กตฺตารา, กตฺตรา. กูจิ วา โหติ พยุลาธิการา, เอตาทิสา สขารมฺหา. 'आर' आदेश के बाद 'ना' और 'स्मा' के स्थान पर 'आ' (टा) होता है - कत्तारा, कत्तर। 'बाहुलाधिकार' से कहीं विकल्प से होता है, जैसे 'सखार' शब्द से। ๑๗๔. ฏิ สฺมิโน. १७४. 'स्मिं' के स्थान पर 'इ' (टि) होता है। อารวาเทสมฺหา สฺมิโน ฏิ โหติ, กตฺตริ, วิตริ. 'आर' आदेश के बाद 'स्मिं' के स्थान पर 'इ' (टि) होता है - कत्तरि, वितरि। ๑๗๕. ทิวาทิโต. १७५. 'दिव' आदि से। ทิวาทีหิ [Pg.106] นาเมหิ สฺมิโน ฏิ โหติ, ทิวิ, ภุวิ. นิจฺจํ วการาคโม. 'दिव' आदि शब्दों से 'स्मिं' के स्थान पर 'इ' (टि) होता है - दिवि, भुवि। 'व' कार का आगम नित्य होता है। ๑๗๖. รสฺสารง. १७६. 'आर' का ह्रस्व होता है। สฺมิมฺหิ อาโร รสฺโส โหติ, กตฺตริ, นตฺตริ. 'स्मिं' विभक्ति होने पर 'आर' ह्रस्व हो जाता है - कत्तरि, नत्तरि। ๑๗๗. ปิตาทีนมนตฺวาทีนํ. १७७. 'पितृ' आदि का, 'नप्तृ' आदि को छोड़कर। นตฺวาทิวชฺชิตานํ ปิตาทีนมาโร รสฺโส โหติ สพฺพาสุ วิภตฺตีสุ, ปิตโร, ปิตรํ, อนุตฺวาทีนนฺติ กึ? นตฺตาโร. 'नप्तृ' आदि को छोड़कर 'पितृ' आदि का 'आर' सभी विभक्तियों में ह्रस्व होता है - पितरो, पितरं। 'नप्तृ आदि को छोड़कर' क्यों? नत्तारो। ๑๗๘. ยุวาทีนํ สุหิสฺวานง. १७८. 'युव' आदि के 'सु' और 'हि' विभक्तियों में 'आन' (आनं) होता है। สุหิสุ ยุวาทีนํ อานง โหติ, ยุวาเนสุ, ยุวาเนหิ. 'सु' और 'हि' विभक्तियों में 'युव' आदि का 'आन' (आनं) होता है - युवानेसु, युवानेहि। ๑๗๙. โนนาเนสฺวา. १७९. 'नो', 'ना', 'ने' और 'आ' होते हैं। เอสุ ยุวาทีนมา โหติ, ยุวาโน, ยุวานา, ยุวาเน. इनमें 'युव' आदि का 'आ' होता है - युवानो, युवाना, युवाने। ๑๘๐. สฺมาสฺมินฺนํ นาเน. १८०. 'स्मा' और 'स्मिं' के स्थान पर 'ना' और 'ने' होते हैं। ยุวาทีหิ สฺมาสฺมินฺนํ นาเน โหนฺติ ยถากฺกมํ, ยุวานา, ยุวาเน. 'युव' आदि से 'स्मा' और 'स्मिं' के स्थान पर यथाक्रम 'ना' और 'ने' होते हैं - युवाना, युवाने। ๑๘๑. โยนํ โนเน วา. १८१. 'यो' के स्थान पर 'नो' और 'ने' विकल्प से होते हैं। ยุวาทีหิ โยนํ โนเน วา โหนฺติ ยถากฺกมํ, ยุวาโน, ยุวาเน, วาติ กึ? ยุเว ปสฺส, โนคฺคหณํ ลาฆวตฺถํ. 'युव' आदि से 'यो' के स्थान पर यथाक्रम 'नो' और 'ने' विकल्प से होते हैं - युवानो, युवाने। 'विकल्प से' क्यों? 'युवे पस्स' देखें। 'न' का ग्रहण लाघव के लिए है। ๑๘๒. อิโต ญฺญตฺเถ ปุเม. १८२. इ-कारान्त से, अन्य अर्थ में, पुल्लिंग में। อญฺญปทตฺเถ [Pg.107] วตฺตมานา อิการนฺตโต นามสฺมา โยนํ โนเน วา โหนฺติ ยถากฺกมํ ปุลฺลิงฺเค, โตมรงฺกุสปาณิโน, โตมรงฺกุสปาณิเน, วาตฺเวว? โตมรงฺกุสปาณโย, อญฺญตฺเถติ กึ? ปาณโย. अन्य पद के अर्थ में वर्तमान इ-कारान्त शब्द से पुल्लिंग में 'यो' के स्थान पर यथाक्रम 'नो' और 'ने' विकल्प से होते हैं - तोमरङ्कुसपाणिनो, तोमरङ्कुसपाणिने। 'विकल्प से' ही क्यों? तोमरङ्कुसपाणयो। 'अन्य अर्थ में' क्यों? पाणयो। ๑๘๓. เน สฺมิโน กฺวจิ. १८३. 'स्मिं' के स्थान पर 'ने' कहीं-कहीं होता है। อญฺญปทตฺเถ วตฺถมานา อิการนฺตโต นามสฺมา สฺมิโน เน โหติ วา กฺวจิ ปุลฺลิงฺเค, กตญฺญุมฺหิ จ โปสมฺหิ, สีลวนฺเต อริย วุตฺติเน, วาตฺเวว? อริยวุตฺติมฺหิ, ปุเมตฺเวว? อริยวุตฺติยา. अन्य पद के अर्थ में वर्तमान इ-कारान्त शब्द से पुल्लिंग में 'स्मिं' के स्थान पर कहीं-कहीं 'ने' होता है - 'कतञ्ञुम्हि च पोसम्हि, सीलवन्ते अरिय वुत्तिने'। 'विकल्प से' ही क्यों? अरियवुत्तिम्हि। 'पुल्लिंग में' ही क्यों? अरियवुत्तिया। ๑๘๔. ปุมา. १८४. पुमा। ปุมสทฺทโต สฺมิโน ยํ วุตฺตํ, ตํ วา โหติ, ปุมาเน ปุเม. 'पुम' शब्द से 'स्मि' विभक्ति के स्थान पर जो कहा गया है, वह विकल्प से होता है - पुमाने, पुमे। ๑๘๕. นามฺหิ. १८५. 'ना' विभक्ति में। ปุมสฺส นามฺหิ ยํ วุตฺตํ, ตํ วา โหติ, ปุมานา ปุเมน. 'पुम' शब्द के 'ना' विभक्ति में जो कहा गया है, वह विकल्प से होता है - पुमाना, पुमेन। ๑๘๖. สุมฺหา จ. १८६. और 'सु' विभक्ति में। ปุมสฺส สุมฺหิ ยํ วุตฺตํ, ตํ อา จ วา โหติ, ปุมาเนสุ, ปุมาสุ ปุเมสุํ. 'पुम' शब्द के 'सु' विभक्ति में जो कहा गया है, वह और 'आ' विकल्प से होता है - पुमानेसु, पुमासु, पुमेसुं। ๑๘๗. คสฺสํ. १८७. 'ग' के स्थान पर 'अं'। ปุมสทฺทโต คสฺส อํ วา โหติ, โภ ปุมํ โภ ปุม, โภ อิตฺติปุมํ โภ อิตฺถิปุม. 'पुम' शब्द से 'ग' (सम्बोधन) के स्थान पर विकल्प से 'अं' होता है - भो पुमं, भो पुम; भो इत्तिपुमं, भो इत्तिपुम। ๑๘๘. สาสฺสํเส จานง. १८८. 'सा' शब्द के 'अं', 'सि' और 'ग' में 'आनङ' होता है। สาสทฺทสฺส [Pg.108] อานง โหติ อํเส เค จ, สานํ, สานสฺส, จภา สาน. 'सा' शब्द के 'अं' और 'ग' विभक्ति में 'आनङ' होता है - सानं, सानस्स; और 'भा' में 'सान'। ๑๘๙. วตฺตหา สนํนํ โนนานํ. १८९. 'वत्तहा' के 'स' और 'नं' के स्थान पर 'नो' और 'नानं'। วตฺตหา สนํนํ โนนานํ โหนฺติ ยถากฺกมํ, วตฺตหาโน, วตฺตหานานํ. 'वत्तहा' शब्द के 'स' और 'नं' विभक्तियों के स्थान पर यथाक्रम 'नो' और 'नानं' होते हैं - वत्तहानो, वत्तहानानं। ๑๙๐. พฺรหฺมสฺสุ วา. १९०. 'ब्रह्म' शब्द के स्थान पर 'उ' विकल्प से। พฺรหฺมสฺส อุ วา โหติ สนํสุ, พฺรหฺมุโน พฺรหฺมสฺส, พฺรหฺมูนํ พฺรหฺมานํ. 'ब्रह्म' शब्द के 'स', 'नं' और 'सु' विभक्तियों में विकल्प से 'उ' होता है - ब्रह्मुनो, ब्रह्मस्स; ब्रह्मूनं, ब्रह्मानं। ๑๙๑. นามฺหิ. १९१. 'ना' विभक्ति में। พฺรหฺมสฺส อุ โหติ นามฺหิ, พฺรหฺมุนา. 'ब्रह्म' शब्द के 'ना' विभक्ति में 'उ' होता है - ब्रह्मुना। ๑๙๒. ปุมกมฺมถามทฺธานํ วา สสฺมาสุ จ. १९२. 'पुम', 'कम्म', 'थाम' और 'अद्धान' शब्दों के 'स', 'स्मा' और 'सु' विभक्तियों में भी (विकल्प से 'उ' होता है)। ปุมาทินมุ โหติ วา สสฺมาสุ นามฺหิ จ, ปุมุโน ปุมสฺส, ปุมุนา ปุมานา, ปุมุนา ปุมานา, กมฺมุโน กมฺมสฺส, กมฺมุนา กมฺมสฺมา, กมฺมุนา กมฺมนา, ถามุโน ถามสฺส, ถามุนา ถามสฺมา, ถามุนา ถาเมน, อทฺธุโน อทฺธสฺส, อทฺธุนา อทฺธสฺมา, อทฺธุนา อทฺธนา. 'पुम' आदि शब्दों के 'स', 'स्मा', 'सु' और 'ना' विभक्तियों में विकल्प से 'उ' होता है - पुमुनो, पुमस्स; पुमुना, पुमाना; पुमुना, पुमाना; कम्मुनो, कम्मस्स; कम्मुना, कम्मस्मा; कम्मुना, कम्मना; थामुनो, थामस्स; थामुना, थामस्मा; थामुना, थामेन; अद्धुनो, अद्धस्स; अद्धुना, अद्धस्मा; अद्धुना, अद्धना। ๑๙๓. ยุวา สสฺสิโน. १९३. 'युवा' शब्द के 'स' के स्थान पर 'इनो'। ยุวา สสฺส วา อิโน โหติ, ยุวิโน ยุวสฺส. 'युवा' शब्द के 'स' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'इनो' होता है - युविनो, युवस्स। ๑๙๔. โน-ตฺตาตุมา. १९४. 'अत्त' और 'आतुम' के 'स' के स्थान पर 'नो'। อตฺตาตุเมหิ [Pg.109] สสฺส โน โหติ วา, อตฺตโน อตฺตสฺส, อาตุมโน อาตุมสฺส. 'अत्त' और 'आतुम' शब्दों से 'स' विभक्ति के स्थान पर विकल्प से 'नो' होता है - अत्तनो, अत्तस्स; आतुमनो, आतुमस्स। ๑๙๕. สุหีสุ นก. १९५. 'सु' और 'हि' में 'नक'। อตฺตอาตุมานํ สุหิสุ วา นก โหติ, อตฺตเนสุ อตฺเตสุ อาตุมเนสุ อาตุเมสุ, อตฺตเนหิ อตฺเตหิ อาตุมเนหิ อาตุเมหิ, กถํ ‘เวริเนสุ’ติ? ‘นก’ อิติ โยควิภาคา. 'अत्त' और 'आतुम' शब्दों के 'सु' और 'हि' विभक्तियों में विकल्प से 'नक' होता है - अत्तनेसु, अत्तेसु; आतुमनेसु, आतुमेसु; अत्तनेहि, अत्तेहि; आतुमनेहि, आतुमेहि। 'वेरिनेसु' कैसे (सिद्ध होता) है? 'नक' इस योग-विभाग से। ๑๙๖. สฺมาสฺส นา พฺรหฺมา จ. १९६. 'स्मा' के स्थान पर 'ना' और 'ब्रह्म' से भी। พฺรหฺมา อตฺตอาตุเมหิ จ สฺวาสฺส นา โหติ, พฺรหฺมุนา, อตฺตนา, อาตุมนา. 'ब्रह्म', 'अत्त' और 'आतुम' शब्दों से 'स्मा' विभक्ति के स्थान पर 'ना' होता है - ब्रह्मुना, अत्तना, आतुमना। ๑๙๗. อิเมตานเมนานฺวาเทเส ทุติยายํ. १९७. 'इम' और 'एत' के स्थान पर 'एन' अन्वादेश में द्वितीया विभक्ति में। อิมเอตสทฺทานํ กถิตานุกถนวิสเย ทุติยายเมนาเทโส โหติ, อิมํ ภิกฺขุํ วินยมชฺฌาปย, อโถ เอนํ ธมฺมมชฺฌาปย, อิเม ภิกฺขู วินยมชฺฌาปย, อโถ เอเน ธมฺมมชฺฌาปย, เอวเมตสฺส จ โยชนิยํ. 'इम' और 'एत' शब्दों के कथित के पुनः कथन (अन्वादेश) के विषय में द्वितीया विभक्ति में 'एन' आदेश होता है - इस भिक्षु को विनय पढ़ाओ, फिर इसे (एनं) धर्म पढ़ाओ; इन भिक्षुओं को विनय पढ़ाओ, फिर इन्हें (एने) धर्म पढ़ाओ। इसी प्रकार 'एत' शब्द का भी प्रयोग करना चाहिए। ๑๙๘. กิสฺส โก สพฺพาสุ. १९८. 'किस' (किं) के स्थान पर 'को' सभी विभक्तियों में। สพฺพาสุ วิภตฺติสุ กิสฺส โก โหติ, โก, เอก, กา, กาโย, กํ, กานิ, เกเนจฺจามิ. सभी विभक्तियों में 'किस' (किं) शब्द के स्थान पर 'को' होता है - को, एक, का, कायो, कं, कानि, केनेच्चामि। ๑๙๙. กิ สสฺมึสุ วานิตฺถิยํ. १९९. कि शब्द को 'स' और 'स्मिं' विभक्तियों में विकल्प से 'कि' होता है, अनित्थी (पुल्लिंग और नपुंसक लिंग) में। อนิตฺถิยํ [Pg.110] กิสฺส กิ วา โหติ สสฺมึสุ, กิสฺส กสฺส, กิสฺมึ กสฺมึ, อนิตฺถิยนฺติ กึ? กสฺสา, กสฺสํ. अनित्थी (पुल्लिंग और नपुंसक लिंग) में 'कि' शब्द को 'स' और 'स्मिं' विभक्तियों में विकल्प से 'कि' होता है; (जैसे) 'किस्स', 'कस्स'; 'किस्मिं', 'कस्मिं'। 'अनित्थी' क्यों? (क्योंकि स्त्रीलिंग में) 'कस्सा', 'कस्सं' (होता है)। ๒๐๐. กิมํสิสุ สห นปุํสเก. २००. नपुंसक लिंग में 'सि' और 'अं' विभक्तियों के साथ 'कि' शब्द को 'किं' होता है। อํสิสุ สห เตหิ กึสทฺทสฺส กึ โหติ นปุํสเก. กึ, กึ, นปุํสเกติ กึ? โก, กํ. 'अं' और 'सि' विभक्तियों के साथ नपुंसक लिंग में 'किं' शब्द को 'किं' होता है। 'किं', 'किं'। 'नपुंसक लिंग' क्यों? (क्योंकि पुल्लिंग में) 'को', 'कं' (होता है)। ๒๐๑. อิมสฺสิทํ วา. २०१. 'इम' शब्द को विकल्प से 'इदं' होता है। อํสิสุ สห เตติ อิมสฺส อิทํ โหติ วา นปุํสเก, อิทํ อิมํ, อิทํ อิมํ. 'अं' और 'सि' विभक्तियों के साथ नपुंसक लिंग में 'इम' शब्द को विकल्प से 'इदं' होता है; 'इदं', 'इमं'; 'इदं', 'इमं'। ๒๐๒. อมุสฺสาทุํ. २०२. 'अमु' शब्द को 'अदुं' होता है। อํสิสุ สห เตหิ อมุสฺส อทุํ โหติ วา นปุํสเก, อทุํ อมุํ, อทุํ อมุํ. 'अं' और 'सि' विभक्तियों के साथ नपुंसक लिंग में 'अमु' शब्द को विकल्प से 'अदुं' होता है; 'अदुं', 'अमुं'; 'अदुं', 'अमुं'। ๒๐๓. สุมฺหามุสฺสาสฺมา. २०३. 'सु' विभक्ति में 'अम्ह' शब्द को 'अस्मा' होता है। อมฺหสฺส อสฺมา โหติ วา สุมฺหิ, ภตฺติรสฺมาสุ ยา ตว, วา ตฺเวว? อมฺเหสุ. 'सु' विभक्ति में 'अम्ह' शब्द को विकल्प से 'अस्मा' होता है; विभक्तियों में जो तुम्हारी 'अस्मा' है, क्या वह विकल्प से ही है? 'अम्हेसु'। ๒๐๔. นํมฺหิ ติจตุนฺนมิตฺถิยํ ติสฺสจตสฺสา. २०४. 'नं' विभक्ति में स्त्रीलिंग में 'ति' और 'चतु' शब्दों को क्रमशः 'तिस्स' और 'चतस्स' होता है। นํมฺหิ ติจตุนฺนํ ติสฺสจตสฺสา โหนฺติ อิตฺถิยํ ยถากฺกมํ, ติสฺสนฺนํ จตสฺสนฺนํ, อิตฺถิยนฺติ กึ? ติณฺณํ จตุนฺนํ. 'नं' विभक्ति में स्त्रीलिंग में 'ति' और 'चतु' शब्दों को क्रमशः 'तिस्स' और 'चतस्स' होता है; 'तिस्सन्नं', 'चतस्सन्नं'। 'स्त्रीलिंग' क्यों? (क्योंकि अन्यत्र) 'तिण्णं', 'चतुन्नं' (होता है)। ๒๐๕. ติสฺโสจตสฺโส โยมฺหิ สวิภตฺตีนํ. २०५. 'यो' विभक्ति में विभक्ति सहित (ति और चतु) को स्त्रीलिंग में 'तिस्सो' और 'चतस्सो' होता है। วิภตฺติสหิตานํ ติจตุนฺนํ โยมฺหิ ติสฺโส จตสฺโส โหนฺติ อิตฺถิยํ ยถากฺกมํ, ติสฺโส จตสฺโส. विभक्ति सहित 'ति' और 'चतु' शब्दों को 'यो' विभक्ति में स्त्रीलिंग में क्रमशः 'तिस्सो' और 'चतस्सो' होता है; 'तिस्सो', 'चतस्सो'। ๒๐๖. ตีณิจตฺตาริ นปุํสเก. २०६. नपुंसक लिंग में 'तीणि' और 'चत्तारि' होते हैं। โยมฺหิ [Pg.111] สวิภตฺตีนํ ติจตุนฺนํ ยถากฺกมํ ตีณิจตฺตาริ โหนฺติ นปุํสเก, ตีณิ. จตฺตาริ. 'यो' विभक्ति में विभक्ति सहित 'ति' और 'चतु' शब्दों को नपुंसक लिंग में क्रमशः 'तीणि' और 'चत्तारि' होता है; 'तीणि', 'चत्तारि'। ๒๐๗. ปุเม ตโย จตฺตาโร. २०७. पुल्लिंग में 'तयो' और 'चत्तारो' होते हैं। โยมฺหิ สวิภตฺตีนํ ติจตุนฺนํ ตโยจตฺตาโร โหนฺติ ยถากฺกมํ ปุลฺลิงฺเค, ตโย, จตฺตาโร. 'यो' विभक्ति में विभक्ति सहित 'ति' और 'चतु' शब्दों को पुल्लिंग में क्रमशः 'तयो' और 'चत्तारो' होता है; 'तयो', 'चत्तारो'। ๒๐๘. จตุโร วา จตุสฺส. २०८. 'चतु' शब्द को विकल्प से 'चतुरो' होता है। จตุสทฺทสฺส สวิภตฺติสฺส โยมฺหิ จตุโร วา โหติ ปุลฺลิงฺเค, จตุโร ชนา สํวิธาย, กถํ ‘จตุโร นิมิตฺเต นาทฺทสฺสาสิ’นฺติ? ลิงฺควิปลฺลาสา. विभक्ति सहित 'चतु' शब्द को 'यो' विभक्ति में पुल्लिंग में विकल्प से 'चतुरो' होता है; 'चतुरो जना संविधाय'। 'चतुरो निमित्ते नाद्दस्सासि' कैसे? लिंग-विपर्यास (लिंग परिवर्तन) से। ๒๐๙. มยมสฺมามฺหสฺส. २०९. 'अम्ह' शब्द को 'मयं' और 'अस्मा' होता है। โยสฺวมฺหสฺส สวิภตฺติสฺส มยมสฺมา วา โหนฺติ ยถากฺกมํ, มยํ, อสฺมา, อมฺเห. 'यो' और 'सु' विभक्तियों में विभक्ति सहित 'अम्ह' शब्द को क्रमशः विकल्प से 'मयं' और 'अस्मा' होता है; 'मयं', 'अस्मा', 'अम्हे'। ๒๑๐. นํเสสฺวสฺมากํมมํ. २१०. 'नं' और 'स' विभक्तियों में 'अम्ह' शब्द को 'अस्माकं' और 'ममं' होता है। นํเสสฺวมุสฺส สวิภตฺติสฺส อสฺมากํ มมํ โหนฺติ วา ยถากฺกมํ, อสฺมากํ, อมฺหากํ, มมํ มม. 'नं' और 'स' विभक्तियों में विभक्ति सहित उस (अम्ह) शब्द को विकल्प से क्रमशः 'अस्माकं' और 'ममं' होता है; 'अस्माकं', 'अम्हाकं', 'ममं', 'मम'। ๒๑๑. สิมฺห-หํ. २११. 'सि' विभक्ति में 'अम्ह' शब्द को 'अहं' होता है। สิมฺหิ อมฺหสฺส สวิภตฺติสฺส อหํ โหติ, อหํ. 'सि' विभक्ति में विभक्ति सहित 'अम्ह' शब्द को 'अहं' होता है; 'अहं'। ๒๑๒. ตุมฺหสฺส ตุวํตฺวมมฺหิ จ. २१२. 'अं' और 'सि' विभक्तियों में 'तुम्ह' शब्द को 'तुवं' और 'त्वं' होता है। อํมฺหิ สิมฺหิ จ ตุมฺหสฺส สวิภตฺติสฺส ตุวํตฺวํ โหนฺติ ยถากฺกมํ, ตุวํ, ตฺวํ. 'अं' और 'सि' विभक्तियों में विभक्ति सहित 'तुम्ह' शब्द को क्रमशः 'तुवं' और 'त्वं' होता है; 'तुवं', 'त्वं'। ๒๑๓. ตยาตยีนํ ตฺว วา ตสฺส. २१३. 'तया' और 'तयि' रूपों में 'त' के स्थान पर विकल्प से 'त्व' होता है। ตุมฺหสฺส [Pg.112] ตยาตยีนํ ตการสฺส ตฺว โหติ วา, ตฺวยา ตยา, ตฺวยิ ตยิ. 'तुम्ह' शब्द के 'तया' और 'तयि' रूपों में 'त' कार को विकल्प से 'त्व' होता है; 'त्वया', 'तया'; 'त्वयि', 'तयि'। ๒๑๔. สฺมามฺหิ ตฺวมฺหา. २१४. 'स्मा' (पञ्चमी एकवचन) विभक्ति के परे होने पर 'तुम्ह' को 'त्वम्ह' आदेश होता है। สฺวามฺหิ ตุมฺหสฺส สวิภตฺติสฺส ตฺวมฺหา โหติ วา, ปตฺตา นิสฺสํ สยํ ตฺวมฺหา, วา ตฺเวว? ตฺวยา. 'स्मा' विभक्ति के परे होने पर सविभक्तिक 'तुम्ह' शब्द को विकल्प से 'त्वम्ह' आदेश होता है। जैसे - त्वया। ๒๑๕. นฺตนฺตูนํนฺโตโยมฺหี ปฐเม. २१५. प्रथमा विभक्ति के 'यो' परे होने पर 'अन्त' (न्त्) अन्त वाले शब्दों को 'न्तो' आदेश होता है। ปฐเม โยมฺหิ นฺตนฺตูนํ สวิภตฺตีนํ นฺโตอิจฺจาเทโส วา โหติ, คจฺฉนฺโต, คจฺฉนฺตา, คุณวนฺโต คุณวนฺตา. प्रथमा विभक्ति के 'यो' परे होने पर 'अन्त' (न्त्) अन्त वाले सविभक्तिक शब्दों को विकल्प से 'न्तो' आदेश होता है। जैसे - गच्छन्तो, गच्छन्ता, गुणवन्तो, गुणवन्ता। ๒๑๖. ตํ นํมฺหิ. २१६. 'नं' (षष्ठी बहुवचन) विभक्ति के परे होने पर 'अन्त' (न्त्) अन्त वाले शब्दों को 'तं' आदेश होता है। นํมฺหิ นฺตนฺตูนํ สวิภตฺถีนํ ตํ วา โหติ, คจฺฉตํ คจฺฉนฺตานํ, คุณวตํ คุณวนฺตานํ. 'नं' विभक्ति के परे होने पर 'अन्त' (न्त्) अन्त वाले सविभक्तिक शब्दों को विकल्प से 'तं' आदेश होता है। जैसे - गच्छतं, गच्छन्तानं, गुणवतं, गुणवन्तानं। ๒๑๗. โตตาติตา สสฺมาสฺมึนาสุ. २१७. 'स', 'स्मा', 'स्मिं' और 'ना' विभक्तियों के परे होने पर 'अन्त' (न्त्) अन्त वाले शब्दों को यथाक्रम से 'तो', 'ता', 'ति' और 'ता' आदेश होते हैं। สาทีสุ นฺตนฺตูนํ สวิภตฺตีนํ โตตาติตา โหนฺติ วา ยถากฺกมํ, คจฺฉโต คจฺฉนฺตสฺส, คุณวโต คุณวนฺตสฺส, คจฺฉตา คจฺฉนฺตมฺหา, คุณวตา คุณวนฺถมฺหา, คจฺฉติ คจฺฉนฺเต, คุณวติ คุณวนฺเต, คจฺฉตา คจฺฉนฺเตน, คุณวตา คุณวนฺเตน. 'स' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'अन्त' (न्त्) अन्त वाले सविभक्तिक शब्दों को यथाक्रम से विकल्प से 'तो', 'ता', 'ति' और 'ता' आदेश होते हैं। जैसे - गच्छतो, गच्छन्तस्स; गुणवतो, गुणवन्तस्स; गच्छता, गच्छन्तम्हा; गुणवता, गुणवन्तम्हा; गच्छति, गच्छन्ते; गुणवति, गुणवन्ते; गच्छता, गच्छन्तेन; गुणवता, गुणवन्तेन। ๒๑๘. ฏฏาอํ เค. २१८. 'गे' (सम्बोधन एकवचन) विभक्ति के परे होने पर 'अन्त' (न्त्) अन्त वाले शब्दों को 'ट', 'टा' और 'अं' आदेश होते हैं। เค ปเร นฺตนฺตูนํ สวิภตฺตีนํ ฏฏาอํ อิจฺจาเทสา โหนฺติ, โภ คจฺฉ, โภ คจฺฉา, โภ คจฺฉํ, โต คุณว, โภ คุณวา, โภ คุณวํ. 'गे' विभक्ति के परे होने पर 'अन्त' (न्त्) अन्त वाले सविभक्तिक शब्दों को 'ट', 'टा' और 'अं' आदेश होते हैं। जैसे - भो गच्छ, भो गच्छा, भो गच्छं; भो गुणव, भो गुणवा, भो गुणवं। ๒๑๙. โยมฺหิ ทฺวินฺนํ ทุเวทฺเว. २१९. 'यो' विभक्ति के परे होने पर 'द्वि' शब्द को 'दुवे' और 'द्वे' आदेश होते हैं। โยมฺหี [Pg.113] ทฺวีสฺส สวิภตฺติสฺส ทุเวทฺเว โหนฺติ ปจฺเจกํ, ทุเว, ทฺเว. 'यो' विभक्ति के परे होने पर सविभक्तिक 'द्वि' शब्द को प्रत्येक 'दुवे' और 'द्वे' आदेश होते हैं। जैसे - दुवे, द्वे। ๒๒๐. ทุวินฺนํ นํมฺหิ วา. นํมฺหิ ทฺวิสฺส สวิภตฺติสฺส ทุวินฺนํ โหติ วา, ทุวินฺนํ, ทฺวินฺนํ. २२०. 'नं' विभक्ति के परे होने पर सविभक्तिक 'द्वि' शब्द को विकल्प से 'दुविन्नं' आदेश होता है। जैसे - दुविन्नं, द्विन्नं। ๒๒๑. ราชสฺส รญฺญํ. นํมฺหิ ราชสฺส สวิภตฺติสฺส รญฺญํ โหติ วา, รญฺญํ ราชานํ. २२१. 'नं' विभक्ति के परे होने पर सविभक्तिक 'राज' शब्द को विकल्प से 'रञ्ञं' आदेश होता है। जैसे - रञ्ञं, राजानं। ๒๒๒. นาสฺมาสุ รญฺญา. นาสฺมาสุ ราชสฺส สวิภตฺติสฺส รญฺญา โหติ, รญฺญา กตํ, รญฺญา นิสฺสฏํ. २२२. 'ना' और 'स्मा' विभक्तियों के परे होने पर सविभक्तिक 'राज' शब्द को 'रञ्ञा' आदेश होता है। जैसे - रञ्ञा कतं, रञ्ञा निस्सटं। ๒๒๓. รญฺโญ รญฺญสฺส ราชิโน เส. เส ราชสฺส สวิภตฺติสฺส รญฺโญ รญฺญสฺส ราชิโน โหนฺติ, รญฺโญ, รญฺญสฺส, ราชิโน. २२३. 'स' विभक्ति के परे होने पर सविभक्तिक 'राज' शब्द को 'रञ्ञो', 'रञ्ञस्स' और 'राजिनो' आदेश होते हैं। जैसे - रञ्ञो, रञ्ञस्स, राजिनो। ๒๒๔. สฺมิมฺหิ รญฺเญราชินิ. สฺมิมฺหิ ราชสฺส สวิภตฺติสฺส รญฺเญ ราชินิ โหนฺติ, รญฺเญ, ราชินิ. २२४. 'स्मिं' विभक्ति के परे होने पर सविभक्तिक 'राज' शब्द को 'रञ्ञे' और 'राजिनि' आदेश होते हैं। जैसे - रञ्ञे, राजिनि। ๒๒๕. สมาเส วา. สมาสวิสเย เอเต อาเทสา ราชสฺส วา โหนฺติ, กาสิรญฺญา กาสิราเชน, กาสิรญฺญา กาสิราชสฺมา, กาสิรญฺโญ กาสิราชสฺส, กาสิรญฺเญ กาสิราเช. २२५. समास के विषय में 'राज' शब्द के ये आदेश विकल्प से होते हैं। जैसे - कासिरञ्ञा, कासिराजेन; कासिरञ्ञा, कासिराजस्मा; कासिरञ्ञो, कासिराजस्स; कासिरञ्ञे, कासिराजे। ๒๒๖. สฺมิมฺหิ ตุมฺหามฺหานํ ตยิมยิ. สฺมิมฺหิ ตุมฺหอมุสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตยิมยิ โหนฺติ ยถากฺกมํ, ตยิ, มยิ. २२६. 'स्मिं' विभक्ति के परे होने पर सविभक्तिक 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों को यथाक्रम से 'तयि' और 'मयि' आदेश होते हैं। जैसे - तयि, मयि। ๒๒๗. อํมฺหิ ตํ มํ ตวํ มมํ. २२७. 'अं' विभक्ति के परे होने पर 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों को 'तं', 'मं', 'तवं' और 'ममं' आदेश होते हैं। อํมฺหิ [Pg.114] ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตํ มํ ตวํ มมํ โหนฺติ ยถากฺกมํ, ตํ, มํ, ตวํ, มมํ, 'अं' विभक्ति के परे होने पर सविभक्तिक 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों को यथाक्रम से 'तं', 'मं', 'तवं' और 'ममं' आदेश होते हैं। जैसे - तं, मं, तवं, ममं। ๒๒๘. นาสฺมาสุ ตยามยา. २२८. 'ना' और 'स्मा' विभक्तियों के परे होने पर 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों को 'तया' और 'मया' आदेश होते हैं। นาสฺมาสุ ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตยามยา โหนฺติ ยถากฺกมํ, ตยา กตํ, มยา กตํ, ตยา นิสฺสฏํ, มยา นิสฺสฏํ. 'ना' और 'स्मा' विभक्तियों के परे होने पर सविभक्तिक 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों को यथाक्रम से 'तया' और 'मया' आदेश होते हैं। जैसे - तया कतं, मया कतं, तया निस्सटं, मया निस्सटं। ๒๒๙. ตว มม ตุยฺหํ มยฺหํ เส. २२९. 'स' विभक्ति के परे होने पर 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों को 'तव', 'मम', 'तुय्हं' और 'मय्हं' आदेश होते हैं। เส ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ตว มม ตุยฺหํ มยฺหํ โหนฺติ ยถากฺกมํ, ตว, ตุยฺหํ, มม, มยฺหํ. 'स' विभक्ति के परे होने पर सविभक्तिक 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों को यथाक्रम से 'तव', 'तुय्हं', 'मम' और 'मय्हं' आदेश होते हैं। जैसे - तव, तुय्हं, मम, मय्हं। ๒๓๐. งํงากํ นํมฺหิ. २३०. 'नं' विभक्ति के परे होने पर 'ङं' और 'ङाकं' आदेश होते हैं। นํมฺหิ ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ งํงากํ โหนฺติ ปจฺเจกํ, ตุมฺหํ, ตุมฺหากํ, อมฺหํ, อมฺหากํ, ยถาสงฺขฺยมตฺร น วิวจฺฉเต. 'नं' विभक्ति के परे होने पर सविभक्तिक 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों को प्रत्येक 'ङं' और 'ङाकं' आदेश होते हैं। जैसे - तुम्हं, तुम्हाकं, अम्हं, अम्हाकं। यहाँ यथासंख्य विवक्षित नहीं है। ๒๓๑. ทุติเย โยมฺหิ วา. २३१. द्वितीया विभक्ति के 'यो' परे होने पर विकल्प से (ये आदेश) होते हैं। ตุมฺหอมฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ ปจฺเจกํ งํงากํ วา โหนฺติ โยมฺหิ ทุติเย, ตุมฺหํ, ตุมฺหากํ, ตุมฺเห, อมฺหํ, อมฺหากํ, อมฺเห. द्वितीया विभक्ति के 'यो' परे होने पर सविभक्तिक 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों को प्रत्येक विकल्प से 'ङं' और 'ङाकं' आदेश होते हैं। जैसे - तुम्हं, तुम्हाकं, तुम्हे; अम्हं, अम्हाकं, अम्हे। ๒๓๒. อปาทาโท ปทเตกวากฺเย. २३२. एक वाक्य में पद के आदि में (शुरुआत में) ये आदेश नहीं होते हैं। อิทมธิกตํ เวทิตพฺพํ. ปชฺชเต-เนนตฺโถติ ปทํ-สฺยาทฺยนฺตํ ตฺยาทฺยนฺตํ จ, ปทสมูโห วากฺยํ. इसे अधिकार (नियम) के रूप में जानना चाहिए। जिसके द्वारा अर्थ प्राप्त किया जाता है, वह 'पद' है—जो 'सि' आदि (सुप्) या 'ति' आदि (तिङ्) प्रत्ययों से अंत होने वाला है। पदों का समूह 'वाक्य' कहलाता है। ๒๓๓. โยนํหิสฺวปญฺจมฺยา โวโน. २३३. पंचमी विभक्ति को छोड़कर, 'यो', 'नम्' और 'हि' प्रत्ययों के स्थान पर 'वो' और 'नो' आदेश होते हैं। อปญฺจมิยา [Pg.115] โยนํหิสฺวปาทาโท วตฺตมานานํ ปทสฺมา ปเรสํ เอกวากฺเย ฐิตานํ ตุมฺหามฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ โวโน โหนฺติ วา ยถากฺกมํ, ติฏฺฐถ โว, ติฏฺฐถ ตุมฺเห, ติฏฺฐาม โน, ติฏฺฐาม มยํ, ปสฺสติ โว, ปสฺสติ ตุมฺเห, ปสฺสติ โน, ปสฺสติ อมฺเห, ทียเต โว, ทียเต ตุมฺหํ, ทียเต โน, ทียเต อมฺหํ, ธนํ โว, ธนํ ตุมฺหํ, ธนํ โน ธนํ อมฺหํ, กตํ โว, กตํ ตุมฺเหหิ, กตํ โน, กตํ อมฺเหหิ, อปญฺจมฺยาติ กึ? นิสฺสฏํ ตุมฺเหหิ, นิสฺสฏํ อมฺเหหิ, อปาทาโทตฺเวว? ‘พลญฺจ ภิกฺขูนมนุปฺปทินฺนํ, ตุมฺเหหิ ปุญฺญํ ปสุตํ อนปฺปกํ’, ปทโตตฺเวว? ตุมฺเห ติฏฺฐถ, เอกวากฺเยตฺเวว? เทวทตฺโต ติฏฺฐติ คาเม, ตุมฺเห ติฏฺฐถ นคเร, สวิภตฺตีนํตฺเวว? อรหติ ธมฺโม ตุมฺหาทิสานํ, อรหติ ธมฺโม อมฺหาทิสานํ. पंचमी विभक्ति के अतिरिक्त, पाद (चरण) के आदि में न रहने वाले पद से परे, एक ही वाक्य में स्थित, विभक्ति सहित 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'वो' और 'नो' विकल्प से होते हैं। जैसे—तिट्ठथ वो (तिट्ठथ तुम्हे), तिट्ठाम नो (तिट्ठाम मयं), पस्सति वो (पस्सति तुम्हे), पस्सति नो (पस्सति अम्हे), दीयते वो (दीयते तुम्हाकं), दीयते नो (दीयते अम्हं), धनं वो (धनं तुम्हाकं), धनं नो (धनं अम्हं), कतं वो (कतं तुम्हेहि), कतं नो (कतं अम्हेहि)। 'अपञ्चमिया' (पंचमी के बिना) क्यों? निस्सटं तुम्हेहि, निस्सटं अम्हेहि। 'अपादादो' (पाद के आदि में न हो) क्यों? 'बलञ्च भिक्खूनमनुप्पदिन्नं, तुम्हेहि पुञ्ञं पसुतं अनप्पकं'। 'पदतो' (पद से परे) क्यों? तुम्हे तिट्ठथ। 'एकवाक्ये' (एक ही वाक्य में) क्यों? देवदत्तो तिट्ठति गामे, तुम्हे तिट्ठथ नगरे। 'सविभत्तीनं' (विभक्ति सहित) क्यों? अरहति धम्मो तुम्हादिसानं, अरहति धम्मो अम्हादिसानं। ๒๓๔. เตเม นาเส. २३४. 'ना' (तृतीया एकवचन) और 'से' (चतुर्थी/षष्ठी एकवचन) के परे होने पर 'ते' और 'मे' आदेश होते हैं। นามฺหิ เส จ อปาทาโท วตฺตมานานํ ปทสฺมา ปเรสํ เอกวากฺเย ฐิตานํ ตุมฺหามฺหสทฺทานํ สวิภตฺตีนํ เตเม วา โหนฺติ ยถากฺกมํ, กตํ เต, กตํ ตยา, กตํ เม, กตํ มยา, ทียเต เต, ทียเต ตว ทียเต เม, ทียเต มม, ธนํ เต, ธนํ ตว, ธนํ เม, ธนํ มม. 'ना' और 'से' विभक्ति के परे होने पर, पाद के आदि में न रहने वाले पद से परे, एक ही वाक्य में स्थित, विभक्ति सहित 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'ते' और 'मे' विकल्प से होते हैं। जैसे—कतं ते (कतं तया), कतं मे (कतं मया), दीयते ते (दीयते तव), दीयते मे (दीयते मम), धनं ते (धनं तव), धनं मे (धनं मम)। ๒๓๕. อนฺวาเทเส. २३५. अन्वादेश (पुनः कथन) के विषय में। กถิตานุกถนวิสเย ตุมฺหอมฺห-สทฺทานมาเทสา นิจฺจํ ภวนฺติ ปุนพฺพิธานา, คาโม ตุมฺหํ ปริคฺคโห, อโถ ชนปโท โว ปริคฺคโห. कथित के पुनः कथन (अन्वादेश) के विषय में 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के आदेश पुनः विधान के कारण नित्य होते हैं। जैसे—गामो तुम्हाकं परिग्गहो, अथो जनपदो वो परिग्गहो। ๒๓๖. สปุพฺพา ปฐมนฺตา วา. २३६. पूर्व पद युक्त प्रथमान्त पद से परे विकल्प से होते हैं। วิชฺชมานปุพฺพสฺมา [Pg.116] ปฐมนฺตา ปเรสํ ตุมฺหอมฺหสทฺทานมาเทสา วา โหนฺติ อนฺวาเทเสปิ, คาเม ปโฏ ตุมฺหากํ, อโถ นคเร กมฺพโล โว, อโถ นคเร กมฺพโล ตุมฺหากํ, สปุพฺพาติ กึ? ปโฏ ตุมฺหากํ, อโถ กมฺพโล โว, ปฐมนฺตาติ กิ? ปโฏ นาคเร ตุมฺหากํ, อโถ กมฺพโล คาเม โว. विद्यमान पूर्व पद वाले प्रथमान्त पद से परे 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के आदेश अन्वादेश में भी विकल्प से होते हैं। जैसे—गामे पटो तुम्हाकं, अथो नगरे कम्बलो वो, अथो नगरे कम्बलो तुम्हाकं। 'सपुब्बा' क्यों? पटो तुम्हाकं, अथो कम्बलो वो। 'पठमन्ता' क्यों? पटो नागरे तुम्हाकं, अथो कम्बलो गामे वो। ๒๓๗. น จ วา หา เหวโยเค. २३७. 'च', 'वा', 'हा', 'हे', 'एव' के योग में (आदेश) नहीं होते हैं। จาทีหิ โยเค ตุมฺหอมฺหสทฺทานมาเทสา น โหนฺติ, คาโม ตว จ ปริคฺคโห, มม จ ปริคฺคโห, คาโม ตว วา ปริคฺคโห, มม วา ปริคฺคโห, คาโม ตว ห ปริคฺคโห, มม ห ปริคฺคโห, คาโม ตวาห ปริคฺคโห, มมาห ปริคฺคโห, คาโม ตเวว ปริคฺคโห, มเมว ปริคฺคโห, เอวํ สพฺพตฺถ อุทาหริตพฺพํ, โยเคติ กึ? คาโม จ เต ปริคฺคโห, นครญฺจ เม ปริคฺคโห. 'च' आदि के योग में 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के आदेश नहीं होते हैं। जैसे—गामो तव च परिग्गहो, मम च परिग्गहो; गामो तव वा परिग्गहो, मम वा परिग्गहो; गामो तव ह परिग्गहो, मम ह परिग्गहो; गामो तवाह परिग्गहो, ममाह परिग्गहो; गामो तवेव परिग्गहो, ममेव परिग्गहो। इसी प्रकार सर्वत्र उदाहरण देना चाहिए। 'योगे' क्यों? गामो च ते परिग्गहो, नगरञ्च मे परिग्गहो। ๒๓๘. ทสฺสนตฺเถ นาโลจเน. २३८. 'आलोचन' (सम्बोधन/अभिमुख करना) को छोड़कर 'दर्शन' अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में। ทสฺสนตฺเถสุ อาโลจนวชฺชิเตสุ ปยุชฺชมาเนสุ ตุมฺหอมฺหสทฺทานมาเทสา น โหนฺติ, คาโม ตุมฺเห อุทฺทิสฺสาคโต, คาโม อมฺเห อุทฺทิสฺสาคโต, อนาโลจเนติ กึ? คาโม โว อาโลเจติ, คาโม โน อาโลเจติ. 'आलोचन' को छोड़कर 'दर्शन' अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग होने पर 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के आदेश नहीं होते हैं। जैसे—गामो तुम्हे उद्दिस्सागतो, गामो अम्हे उद्दिस्सागतो। 'अनालोचने' क्यों? गामो वो आलोचेति, गामो नो आलोचेति। ๒๙๓. อามนฺตณํ ปุพฺพมสนฺตํว. อามนฺตณํ ปุพฺพมวิชฺชมานํ วิย โหติ ตุมฺหามฺหสทฺทานมาเทสวิสเย, เทวทตฺต ตว ปริคฺคโห, อามนฺตณนฺติ กึ? กมฺพโล เต ปริคฺคโห, ปุพฺพมิติ กึ? ‘มเยตํ สพฺพมกฺขาตํ, ตุมฺหากํ ทฺวิชปุงฺควา[Pg.117], ปรสฺส หิ อวิชฺชมานตฺเต ‘อปาทาโท’ติ ปฏิเสโธ น สิยา. อิวาติ กึ? สวนํ ยถา สิยา. २९३. 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के आदेश के विषय में पूर्व में स्थित संबोधन (आमंत्रण) अविद्यमान के समान होता है। जैसे—देवदत्त तव परिग्गहो। 'आमन्तणं' क्यों? कम्बलो ते परिग्गहो। 'पुब्बं' क्यों? 'मयेतं सम्ममक्खातं, तुम्हाकं द्विजपुङ्गवा'। क्योंकि पर (बाद वाले) के अविद्यमान होने पर 'अपादादो' (पाद के आदि में न हो) यह निषेध नहीं होगा। 'इव' क्यों? जिससे श्रवण (सुनना) हो सके। ๒๔๐. น สามญฺญวจนเมกตฺเถ. २४०. समान अर्थ (समानाधिकरण) में बाद में आने वाला सामान्य वाचक संबोधन अविद्यमान के समान नहीं होता है। สมานาธิกรเณ ปรโต สามญฺญวจนมามนฺตณมสนฺตํ วิย น โหติ, มาณวก ชฏิลก เต ปริคฺคโห. ปรสฺสาวิชฺชมานตฺเตปิ ปุพฺพรูปมุปาทายาเทโส โหติ, สามญฺญวจนนฺติ กึ? เทวทตฺต มาณวก ตว ปริคฺคโห, เอกตฺเถติ กึ? เทวทตฺต ยญฺญทตฺต ตุมฺหํ ปริคฺคโห. समानाधिकरण में बाद में आने वाला सामान्य वाचक संबोधन अविद्यमान के समान नहीं होता है। जैसे—माणवक जटिलक ते परिग्गहो। पर (बाद वाले) के अविद्यमान होने पर भी पूर्व रूप को लेकर आदेश होता है। 'सामञ्ञवचनं' क्यों? देवदत्त माणवक तव परिग्गहो। 'एकत्थे' क्यों? देवदत्त यञ्ञदत्त तुम्हं परिग्गहो। ๒๔๑. พหูสุ วา. २४१. बहुवचन में विकल्प से। พหูสุ วตฺตมานมามนฺตณํ สามญฺญวจนเมกตฺเถ อวิชฺชมานํ วิย วา น โหติ, พฺราหฺมณา คุณวนฺโต ตุมฺหากํ ปริคฺคโห, พฺราหฺมณา คุณวนฺโต โว ปริคฺคโห. बहुवचन में वर्तमान, समानाधिकरण वाला सामान्य वाचक संबोधन विकल्प से अविद्यमान के समान नहीं होता है। जैसे—ब्राह्मणा गुणवन्तो तुम्हाकं परिग्गहो, ब्राह्मणा गुणवन्तो वो परिग्गहो। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ วุตฺติยํ इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में। สฺยาทิกณฺโฑ ทุติโย. स्यादि-काण्ड (सुबन्त प्रकरण) द्वितीय है। (๓) ตติโย กณฺโฑ (สมาโส) (३) तृतीय काण्ड (समास)। ๑. สฺยาทิ สฺยาทิเนกตฺถํ. १. स्यादि-अन्त (सुबन्त) पद दूसरे स्यादि-अन्त पद के साथ एकार्थीभाव (समास) को प्राप्त होता है। สฺยาทฺยนฺตํ สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺถํ โหตีติ อิทมธิกตํ เวทิตพฺพํ, โส จ ภินฺนตฺถานเมกตฺถีภาโว สมาโสติ วุจฺจเต. स्यादि-अन्त पद स्यादि-अन्त पद के साथ मिलकर एक अर्थ वाला हो जाता है—इसे अधिकार (नियम) के रूप में जानना चाहिए। और वह भिन्न अर्थों वाले पदों का एक अर्थ हो जाना 'समास' कहलाता है। ๒. อสงฺขฺยํวิภตฺติ สมฺปตฺติ สมีป สากลฺยาภาว ยถา ปจฺฉายุคปทตฺเถ. २. संख्या रहित (अव्यय), विभक्ति, सम्पत्ति, समीप, साकल्य (सम्पूर्णता), अभाव, यथा, पश्चात् और युगपत् (एक साथ) के अर्थों में। อสงฺขฺยํ[Pg.118], สฺยาทฺยนฺตํ วิภตฺยาทีนมตฺเถ วตฺตมานํ สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺถํ ภวติ, ตตฺถ วิภตฺยตฺเถ ตาว อิตฺถีสุ กถา ปวตฺตา อธิตฺถิ. สมฺปตฺติ ทฺวิธา อตฺตสมฺปตฺติ สมิทฺธิ จ, สมฺปนฺนํ พฺรหฺมํ สพฺรหฺมํ ลิจฺฉวีนํ, สมิทฺธิ ภิกฺขานํ สุภิกฺขํ. สมีเป กุมฺภสฺส สมีปมุปกุมฺภํ. สากลฺเยสติณมชฺโฌหรติ, สาคฺยธีเต. อภาโว สมฺพนฺธิเภทา พหุวิโธ, ตตฺร อิทฺธาภาเว-วิคตา อิทฺธิ สทฺทิกานํ ทุสฺสทฺทิกํ, อตฺถาภาเว-อภาโว มกฺขิกานํ นิมฺมกฺขิกํ, อหิกฺกมาภาเว-อติคตานิ ติณานิ นิตฺติณํ, สมฺปตฺยาภาเว-อติคตํ ลหุปาวุรณํ อติลหุปาวุรณํ, ลหุปาวุรณสฺส นายมุปโภคกาโลติ อตฺโถ. ยถา เอตฺถา-เนกวิโธ, ตตฺร โยคฺคตายํ-อนุรูปํ สุรูโปวหติ, วิจฺฉายํ-อนฺวทฺธมาสํ, อตฺถานติวตฺติยํ-ยถาสตฺติ, สทิสตฺเต, สทิโส กิขิยา สกิขิ, อานุปุพฺพิเย-อนุเชฏฺฐํ, ปจฺฉาทตฺเถอนุรถํ, ยุคปทตฺเถ-สจกฺกํ นิเธหิ. संख्या रहित (अव्यय) स्यादि-अन्त पद, विभक्ति आदि के अर्थों में वर्तमान होने पर, दूसरे स्यादि-अन्त पद के साथ एक अर्थ वाला (समास) होता है। वहाँ पहले विभक्ति के अर्थ में—स्त्रियों के विषय में कथा प्रवृत्त हुई 'अधित्थि'। सम्पत्ति दो प्रकार की है—आत्म-सम्पत्ति और समृद्धि। जैसे—सम्पन्न ब्रह्म 'सब्रह्मं', लिच्छवियों की समृद्धि 'सुभिक्खं'। समीप में—कुम्भ के समीप 'उपकुम्भं'। साकल्य में—तिनके सहित सब कुछ खा जाता है 'सतिणमज्झोहरति', 'साग्यधीते'। अभाव सम्बन्धी भेद से अनेक प्रकार का है, वहाँ ऋद्धि के अभाव में—सद्दिकों की ऋद्धि चली गई 'दुस्सद्दिकं'; अर्थ के अभाव में—मक्खियों का अभाव 'निम्मक्खिकं'; अतिक्रमण के अभाव में—तिनकों का अतिक्रमण 'नित्तिणं'; सम्पत्ति के अभाव में—हल्के ओढ़ने का समय बीत गया 'अतिलहुपावुरणं', अर्थात् अब यह हल्के वस्त्र के उपभोग का काल नहीं है। 'यथा' यहाँ अनेक प्रकार का है, वहाँ योग्यता में—रूप के अनुरूप 'अनुरूपं', 'सुरूपो वहति'; वीप्सा में—प्रत्येक आधे महीने में 'अन्वद्धमासं'; अर्थ का अनतिक्रमण में—'यथासत्ति'; सादृश्य में—किकी के समान 'सकिकि'; आनुपूर्वी में—ज्येष्ठ के क्रम से 'अनुजेट्ठं'; पश्चात् के अर्थ में—रथ के पीछे 'अनुरथं'; युगपत् के अर्थ में—चक्र के साथ 'सचक्कं' रखो। ๓. ยถา น ตุลฺเย. ३. 'यथा' शब्द तुल्यता (समानता) के अर्थ में (समास) नहीं होता है। ยถาสทฺโท ตุลฺยตฺเถ วตฺตมาโน สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺโถ น ภวติ, ยถา เทวทตฺโต ตถา ยญฺญทตฺโต. 'यथा' शब्द जब तुल्यता (समानता) के अर्थ में प्रयुक्त होता है, तब वह सुबन्त (विभक्ति-युक्त शब्द) के साथ एकार्थी (समास) नहीं होता है; जैसे—यथा देवदत्तो तथा यज्ञदत्तो (जैसा देवदत्त वैसा यज्ञदत्त)। ๔. ยาวาวธารเณ. ४. 'याव' (शब्द) अवधारण (सीमा निर्धारण) के अर्थ में। ยาวสทฺโท-วธารเณ วตฺตมาโน สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺโถ ภวติ, อวธารณ เมตฺตกตา ปริจฺเฉโท, ยาวามตฺตํ พฺราหฺมเณ อามนฺตย, ยาวชีวํ, อวธารเณติ กึ? ยาว ทินฺนํ ตาว ภุตฺตํ, นาวธารยามิ กิตฺตกํ มยา ภุตฺตนฺติ. 'याव' शब्द अवधारण के अर्थ में प्रयुक्त होने पर सुबन्त के साथ एकार्थी (समास) होता है। अवधारण का अर्थ 'इतनी मात्रा' या 'परिच्छेद' (सीमा) है; जैसे—'यावामत्तं ब्राह्मणे आमन्तय' (जितने ब्राह्मण हों उतने को आमंत्रित करो), 'यावजीवं' (जीवन पर्यन्त)। 'अवधारण' क्यों कहा गया? 'याव दिन्नं ताव भुत्तं' (जितना दिया गया उतना खाया गया), यहाँ मैं यह निर्धारित (अवधारण) नहीं कर रहा हूँ कि मेरे द्वारा कितना खाया गया। ๕. ปยฺยปา [Pg.119] พหิ ติโร ปุเร ปจฺฉา วา ปญฺจมฺยา. ५. परि, अप, आ, बहि, तिरो, पुरे और पच्छा—ये शब्द पञ्चमी विभक्ति वाले शब्द के साथ विकल्प से एकार्थी (समास) होते हैं। ปริอาทโย ปญฺจมฺยนฺเตน สเหกตฺถา โหนฺติ วา, ปริปพฺพตํ วสฺสิ เทโว ปริปพฺพตา, อปปพฺพตํ วสฺสิ เทโว อปปพฺพตา, อาปาฏลิปุตฺตํ วสฺสิ เทโว อาปาฏลิปุตฺตา, พหิคามํ พหิ คามา, ติโรปพฺพตํ ติโรปพฺพตา, ปุเรภตฺตํ ปุเรภตฺตา, ปจฺฉาภตฺตํ ปจฺฉาภตฺตา, เวตาธิกาโร. परि आदि शब्द पञ्चमी विभक्ति के अन्त वाले शब्द के साथ विकल्प से एकार्थी होते हैं; जैसे—'परिपब्बतं वस्सि देवो' या 'परिपब्बता' (पर्वत के चारों ओर वर्षा हुई), 'अपपब्बतं वस्सि देवो' या 'अपपब्बता' (पर्वत से दूर वर्षा हुई), 'आपाटलपुत्तं वस्सि देवो' या 'आपाटलपुत्ता' (पाटलिपुत्र तक वर्षा हुई), 'बहिगामं' या 'बहि गामा' (गाँव के बाहर), 'तिरोपब्बतं' या 'तिरोपब्बता' (पर्वत के पार), 'पुरेभत्तं' या 'पुरेभत्ता' (भोजन से पूर्व), 'पच्छाभत्तं' या 'पच्छाभत्ता' (भोजन के बाद)। यहाँ 'वा' (विकल्प) का अधिकार है। ๖. สมีปายาเมสฺวนุ. ६. सामीप्य (निकटता) और आयाम (विस्तार/लम्बाई) के अर्थ में 'अनु' (शब्द)। อนุสทฺโท สามีปฺเย อายาเม จ วตฺตมาโน สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺโถ โหติ วา, อนุวนมสนิ คตา, อนุคงฺคํ พาราณสี, สมีปายาเมสฺวีติ กึ? รกฺขมนุวิชฺโชตเต วิชฺชุ. 'अनु' शब्द सामीप्य और आयाम के अर्थ में प्रयुक्त होने पर सुबन्त के साथ विकल्प से एकार्थी होता है; जैसे—'अनुवनमशनि गता' (वन के समीप बिजली गिरी), 'अनुगङ्गं बाराणसी' (गंगा के किनारे/विस्तार के साथ वाराणसी)। 'सामीप्य और आयाम' क्यों कहा गया? 'रुक्खमनुविज्जोतते विज्जु' (वृक्ष के पीछे बिजली चमकती है)। ๗. ติฏฺฐคฺวาทีนิ. ७. तिठ्ठगु आदि। ติฏฺฐคุปฺปภุตีนิ เอกตฺถีภาววิสเย นิปาตียนฺเต, ติฏฺฐนฺตี คาโว ยสฺมึ กาเล ติฏฺฐคุ กาโล, วหคฺคุ กาโล. อายตีควํ, ขเลยวํ, ลูนยวํ ลูยมานยวมิจฺจาทิ, จฺยนฺโต เปตฺถ เกสา เกสิ, ทณฺฑา ทณฺฑิ, ตถา เวลาปฺปภาวนตฺโถปิ, ปาโต นหานํ ปาตรหานํ, สายํ นยานํ สายนหานํ, ปาตกาลํ สายกาลํ, ปาตเมฆํ สายเมฆํ, ปาตมคฺคํ สายมคฺคํ. 'तिठ्ठगु' आदि शब्द एकार्थीभाव (समास) के विषय में निपातित किए जाते हैं; जैसे—जिस समय गाएँ खड़ी रहती हैं वह 'तिठ्ठगु' काल है, 'वहग्गु' काल। 'आयतीगवं', 'खलेयवं', 'लूनयवं' (काटा गया जौ), 'लूयमानयव' (काटा जा रहा जौ) इत्यादि। यहाँ 'इ' प्रत्ययान्त शब्द भी हैं जैसे 'केसाकेसि' (बालों को पकड़कर लड़ना), 'दण्डादण्डि' (डण्डों से लड़ना)। इसी प्रकार समय की अवधि के अर्थ में भी—'पातरहानं' (प्रातः स्नान), 'सायनहानं' (सायं स्नान), 'प्रातःकाल', 'सायंकाल', 'प्रातःमेघ', 'सायंमेघ', 'प्रातःमार्ग', 'सायंमार्ग'। ๘. โอเร ปริ ปฏิ ปาเร มชฺเฌ เหฏฺฐุทฺธาโธ-นฺโตวาฉฏฺฐิยา. โอราทโย สทฺทา ฉฏฺฐิยนฺเตน สเหกตฺถา วา โหนฺติ, เอการนฺตตฺตํ นิปาตนโต, โอเรคงฺคํ, ปริสิขรํ, ปฏิโสตํ, ปาเรยมุนํ, มชฺเฌคงฺคํ, เหฏฺฐาปาสาทํ, อุทฺธคงฺคํ, อโธคงฺคํ, อนฺโถปาสาทํ, ปุน วาวิธานา ‘คงฺคาโอร’ มิจฺจาทีปิ โหนฺติ. ८. ओरे, परि, पटि, पारे, मज्झे, हेट्ठा, उद्ध, अधो और अन्तो—ये शब्द षष्ठी विभक्ति वाले शब्द के साथ विकल्प से एकार्थी होते हैं। 'ए' कारान्त होना निपातन से है; जैसे—'ओरेगङ्गं' (गंगा के इस पार), 'परिसिखरं' (शिखर के चारों ओर), 'पटिसोतं' (धारा के प्रतिकूल), 'पारेयमुनं' (यमुना के उस पार), 'मज्झेगङ्गं' (गंगा के मध्य), 'हेट्ठापासादं' (प्रासाद के नीचे), 'उद्धगङ्गं' (गंगा के ऊपर), 'अधोगङ्गं' (गंगा के नीचे), 'अन्तोपासादं' (प्रासाद के भीतर)। पुनः 'वा' (विकल्प) के विधान से 'गङ्गाओर' इत्यादि रूप भी होते हैं। ๙. ตํ นปุํสกํ. ९. वह नपुंसक लिंग होता है। ยเทตมติกฺกนฺตเมกตฺถํ[Pg.120], ตํ นปุํสกลิงฺคํ เวทิตพฺพํ, ตถา เจโวทาหฏํ, วา กฺวจิ พหุลาธิการา, ยถาปริสํ ยถาปริสาย, สกาย สกาย ปริสายาติ อตฺโถ. जो यह एकार्थीभाव (समास) प्राप्त हुआ है, उसे नपुंसक लिंग समझना चाहिए; जैसा कि उदाहरणों में दिखाया गया है। कहीं-कहीं 'बहुलं' के अधिकार से विकल्प होता है, जैसे—'यथापरिसं' या 'यथापरिसाय', जिसका अर्थ है 'अपनी-अपनी परिषद (सभा) के अनुसार'। ๑๐. อมาทิ. १०. अम् आदि (द्वितीया आदि)। อมาทิ สฺยาทฺยนฺตํ สฺยาทฺยนฺเตน สห พหุลเมกตฺถํ โหติ คามํ คโต คามคโต, มุหุตฺตํ สุขํ มุหุตฺตสุขํ, วุตฺติเยโวปปทสมาเส กุมฺภกาโร, สปาโก, ตนฺตวาโย, วราหโร. นฺตมานกฺตวนฺตูติ วากฺยเมว, ธมฺมํ สุณนฺโต, ธมฺมํ สุณมาโน, โอทนํ ภุตฺตวา. 'अम्' आदि (द्वितीया आदि) सुबन्त, सुबन्त के साथ बहुलता से एकार्थी होते हैं; जैसे—'गामं गतो' = 'गामगतो' (गाँव को गया हुआ), 'मुहुत्तं सुखं' = 'मुहुत्तसुखं' (क्षण भर का सुख)। उपपद समास में केवल वृत्ति (समास) ही होती है—'कुम्भकारो' (घड़ा बनाने वाला), 'सपाको' (चाण्डाल), 'तन्तवायो' (जुलाहा), 'वराहारो'। 'न्त', 'मान' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के साथ केवल वाक्य ही रहता है (समास नहीं होता)—'धम्मं सुणन्तो' (धम्म सुनता हुआ), 'धम्मं सुणमानो' (धम्म सुनता हुआ), 'ओदनं भुत्तवा' (भात खा चुका)। รญฺญา หโต ราชหโต, อสินา ฉินฺโน อสิจฺฉินฺโน, ปิตุสทิโส, ปิตุสโม, สุขสหคตํ, ทธินา อุปสิตฺตํ โภชนํ ทธิโภชนํ, คุเฬน มิสฺโส โอทโน คุโฬทโน, วุตฺติปเทเนโวปสิตฺตาทิกิริยายาขฺยาปนโต นตฺถายุตฺตตฺถตา. กฺวจิ วุตฺติเยว อุรโค, ปาทโป. กฺวจิ วากฺยเมว ผรสุนา ฉินฺนวา, ทสฺสเนน ปหาตพฺพา. 'रञ्ञा हतो' = 'राजहतो' (राजा द्वारा मारा गया), 'असिना छिन्नों' = 'असिच्छिन्नो' (तलवार से कटा हुआ), 'पितुसदिसो' (पिता के समान), 'पितुसमो' (पिता के समान), 'सुखसहगतं' (सुख के साथ), 'दधिना उपसित्तं भोजनं' = 'दधिभोजनं' (दही मिला हुआ भोजन), 'गुळेन मिस्सो ओदनो' = 'गुळोदनो' (गुड़ मिला हुआ भात)। यहाँ वृत्ति (समास) पद से ही 'उपसित्त' (सिंचित/मिला हुआ) आदि क्रियाओं का बोध हो जाने से पुनरुक्ति नहीं होती। कहीं केवल वृत्ति (समास) ही होती है—'उरगो' (छाती के बल चलने वाला/सर्प), 'पादपो' (जड़ से पीने वाला/वृक्ष)। कहीं केवल वाक्य ही होता है—'फरसुना छिन्नवा' (कुल्हाड़ी से काटा), 'दस्सनेन पहातब्बा' (दर्शन से त्यागने योग्य)। พุทฺธสฺส เทยฺยํ พุทฺธเทยฺยํ, ยูปาย ทารุ ยูปาทารุ, รชนาย โทณิ รชนโทณิ. อิธ น โหติ สงฺฆสฺส ทาตพฺพํ. กถํ ‘เอตทตฺโถ เอตทตฺถา เอตทตฺถ’นฺติ? อญฺญปทตฺเถ ภวิสฺสติ. 'बुद्धस्स देय्यं' = 'बुद्धदेय्यं' (बुद्ध को देने योग्य), 'यूपाय दारु' = 'यूपादारु' (यूप के लिए लकड़ी), 'रजनाय दोणि' = 'रजनदोणि' (रंगने के लिए द्रोणी)। यहाँ 'सङ्घस्स दातब्बं' में समास नहीं होता। 'एतदत्थो', 'एतदत्था', 'एतदत्थं' कैसे सिद्ध होंगे? ये अन्यपदार्थ (बहुव्रीहि) के अर्थ में होंगे। สวเรหิ ภยํ สวรภยํ, คามนิคฺคโต, เมถุนาเปโต, กฺวจิ วุตฺติเยว กมฺมชํ, จิตฺตชํ, อิธ น โหติ รุกฺขา ปติโต. 'सवरेहि भयं' = 'सवरभयं' (शबरों से भय), 'गामनिग्गतो' (गाँव से निकला हुआ), 'मेथुनापेतो' (मैथुन से विरत)। कहीं केवल वृत्ति (समास) ही होती है—'कम्मजं' (कर्म से उत्पन्न), 'चित्तजं' (चित्त से उत्पन्न)। यहाँ 'रुक्खा पतितो' (वृक्ष से गिरा हुआ) में समास नहीं होता। รญฺโญ [Pg.121] ปุริโส ราชปุริโส. พหุลาธิการา นฺตมานนิทฺธาริยปูรณภาวติตฺตตฺเถหิ น โหติ-มมานุกุพฺพํ, มมานุกุรุมาโน, คุนฺนํ กณฺหา สมฺปนฺนขีรตมา, สิสฺสานํ ปญฺจโม, ปฏสฺส สุกฺกตา, กฺวจิ โหเตว-วตฺตมานสามีปฺยํ, กถํ ‘พฺราหฺมณสฺส สุกฺกา ทนฺตา’ติ? สาเปกฺขตาย น โหติ. อิธ ปน โหเตว ‘จนฺทนคนฺโธ, นทิโฆโส, กญฺญารูปํ, กายสมฺผสฺโส, ผลรโส’ติ, ผลานํ ติตฺโต, ผลานมาสิโต, ผสานํ สุหิโต. 'रञ्ञो पुरिसो' = 'राजपुरिसो' (राजा का पुरुष)। 'बहुलं' के अधिकार से 'न्त', 'मान', निर्धारण, पूरण, भाव और तृप्त अर्थ वाले शब्दों के साथ समास नहीं होता—'ममानुकुब्बं' (मेरा अनुकरण करता हुआ), 'ममानुकुरुमानो', 'गुन्नं कण्हा सम्पन्नखीरतमा' (गायों में काली गाय सर्वाधिक दूध देने वाली है), 'सिस्सानं पञ्चमो' (शिष्यों में पाँचवाँ), 'पटस्स सुक्कता' (कपड़े की सफेदी)। कहीं होता भी है—'वत्तमानसमीप्यं' (वर्तमान की निकटता)। 'ब्राह्मणस्स सुक्का दन्ता' (ब्राह्मण के सफेद दाँत) यहाँ क्यों नहीं हुआ? सापेक्षता के कारण नहीं होता। किन्तु यहाँ होता ही है—'चन्दनगन्धो' (चन्दन की गन्ध), 'नदिघोषो' (नदी का घोष), 'कञ्ञारूपं' (कन्या का रूप), 'कायसम्फस्सो' (काय-स्पर्श), 'फलरसो' (फल का रस)। 'फलानं तित्तो', 'फलानमासितो', 'फलानं सुहितो' (फलों से तृप्त)। พฺราหฺมณสฺส อุจฺจํ เคหนฺติ สาเปกฺขตาย น โหติ, ‘รญฺโญ ปาฏลิปุตฺตกสฺส ธน’นฺติ ธนสมฺพนฺเธ ฉฏฺฐีติ ปาฏลิปุตฺตเกน สมฺพนฺธาภาวา น เหสฺสติ, ‘รญฺโญ โค จ อสฺโส จ ปุริโส จา’ติ ภินฺนตฺถตาย วากฺยเมว, ‘รญฺโญ ควาสฺสปุริสา ราชควาสฺสปุริสา’ติ วุตฺติ โหเตเวกตฺติภาเว. 'ब्राह्मणस्स उच्चं गेहं' (ब्राह्मण का ऊँचा घर)—यहाँ सापेक्षता के कारण समास नहीं होता। 'रञ्ञो पाटलिपुत्तकस्स धनं' (पाटलिपुत्र के राजा का धन)—यहाँ धन के सम्बन्ध में षष्ठी है, पाटलिपुत्रक के साथ सम्बन्ध न होने से समास नहीं होगा। 'रञ्ञो गो च अस्सो च पुरिसो च' (राजा की गाय, घोड़ा और पुरुष)—यहाँ भिन्न अर्थ होने से वाक्य ही रहेगा। 'रञ्ञो गवास्सपुरिसा' = 'राजगवास्सपुरिसा'—यहाँ एकार्थीभाव होने पर वृत्ति (समास) हो जाती है। ทาเน โสณฺโฑ ทานโสณฺโฑ, ธมฺมรโต, ทานาภิรโต. กฺวจิ วุตฺติเยว กุจฺฉิสโย, ถลฏฺโฐ, ปงฺกชํ, สโรรุหํ. อิธ น โหติ โภชเน มตฺตญฺญุตา, อินฺทฺริเยสุ คุตฺตทฺวารตา, อาสเน นิสินฺโน, อาสเน นิสีทิตพฺพํ. 'दाने सोण्डो' = 'दानसोण्डो' (दान देने में कुशल/व्यसनी), 'धम्मरतो' (धम्म में रत), 'दानाभिरतो' (दान में अभिरत)। कहीं केवल वृत्ति (समास) ही होती है—'कुच्छिसयो' (गर्भ में सोने वाला), 'थलट्ठो' (स्थल पर स्थित), 'पङ्कजं' (कीचड़ में उत्पन्न/कमल), 'सरोरुहं' (सरोवर में उत्पन्न)। यहाँ समास नहीं होता—'भोजने मत्तञ्ञुता' (भोजन में मात्रा को जानना), 'इन्द्रियेसु गुत्तद्वारता' (इन्द्रियों में संयम), 'आसने निसिन्नो' (आसन पर बैठा हुआ), 'आसने निसीदितब्बं' (आसन पर बैठना चाहिए)। ๑๑. วิเสสนเมกตฺเถน. ११. विशेषण का एकार्थी (विशेष्य) के साथ। วิเสสนํ สฺยานฺตํ วิเสสฺเสน สฺยาทฺยนฺเตน สมานาธิกรเณน สเหกตฺถํ โหติ, นีลญฺจ ตํ อุปฺปลญฺเจติ นีลุปฺปลํ, ฉินฺนญฺจ ตํ ปรุฬฺหญฺเจติ ฉินฺนปรฬฺหํ, สตฺถีว สตฺถี, สตฺถี จ สา สามา เจติ สตฺถิสามา, สีโหว สีโห, มุนิ จ โส สีโห เจติ มุนิสีโห, สีลเมว ธนํ สีลธนํ. सुबन्त विशेषण का समान विभक्ति वाले सुबन्त विशेष्य के साथ एकार्थीभाव (समास) होता है; जैसे—'नीलञ्च तं उप्पलञ्च' = 'नीलुप्पलं' (नीला कमल), 'छिन्नञ्च तं परुळ्हञ्च' = 'छिन्नपरुळ्हं' (कटा हुआ और फिर से उगा हुआ), 'सत्थीव सत्थी' (जाँघ के समान), 'सत्थी च सा सामा च' = 'सत्थिसाम' (जाँघ के समान श्यामा), 'सीहोव सीहो' (सिंह के समान), 'मुनि च सो सीहो च' = 'मुनिसीहो' (मुनि-सिंह/मुनियों में सिंह के समान), 'सीलमेव धनं' = 'सीलधनं' (शील ही धन है)। กฺวจิ [Pg.122] วากฺยเมว ปุณฺโณ มนฺตาณิปุตฺโต, จิตฺโต คหปติ. กฺวจิ วุตฺติเยว กณฺหสปฺโป, โลหิตสาลิ, วิเสสนนฺติ กึ? ตจฺฉโก สปฺโป, เอกตฺเถเนติ กึ? กาฬมฺหา อญฺโญ. กถํ ‘ปตฺตชีวิโก, อาปนฺนชีวิโก, มาสชาโต’ติ? อญฺญปทตฺเถ ภวิสฺสติ. कहीं केवल वाक्य ही रहता है—'पुण्णो मन्ताणिपुत्तो', 'चित्तो गहपति'। कहीं केवल वृत्ति (समास) ही होती है—'कण्हसप्पो' (काला साँप), 'लोहितसालि' (लाल धान)। 'विशेषण' क्यों कहा गया? 'तच्छको सप्पो' (तक्षक साँप)। 'एकार्थी' (विशेष्य) के साथ क्यों कहा गया? 'काळम्हा अञ्ञो' (काले से अन्य)। 'पत्तजीविको', 'आपन्नजीविको', 'मासजातो'—ये कैसे सिद्ध होंगे? ये अन्यपदार्थ (बहुव्रीहि) के अर्थ में होंगे। ๑๒. นญ. १२. 'न' (नञ्)। นญิจฺเจตํ สฺยาทฺยนฺตํ สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺถํ โหติ, น พฺราหฺมโณ อพฺราหฺมโณ, พหุลาธิการโต อสมตฺถตฺเถหิ, เกหิจิ โหติ ‘อปุนเคยฺยา คาถา, อโนกาสํ กาเรตฺวา, อมูลา มูลํ คนฺตฺวา. อีสํกฬาโร, อีสํปิงฺคโลติ ‘สฺยาทิ สฺยาทิเน’ติ สมาโส, วากฺยเมว วาติปฺปสงฺคาภาวา. 'नञ्' यह सुबन्त के साथ मिलकर एक अर्थ वाला (समास) होता है। जैसे- न ब्राह्मणो अब्राह्मणो। 'बहुला' अधिकार के कारण असमर्थ शब्दों के साथ भी कहीं-कहीं होता है, जैसे- 'अपुनगेय्या गाथा', 'अनोकासं कारेत्वा', 'अमूला मूलं गन्त्वा'। 'ईसंकळारो', 'ईसंपिङ्गलो' - यहाँ 'सुबन्त का सुबन्त के साथ' समास है, क्योंकि वाक्य में ही विकल्प की अतिप्रसक्ति का अभाव है। ๑๓. กุปาทโย นิจฺจมสฺยาทิวิธิมฺหิ. १३. 'कु' आदि शब्द 'अ-स्यादि' (विभक्ति रहित) विधि में नित्य (समास) होते हैं। กุสทฺโท ปาทโย จ สฺยาทฺยนฺเตน สเหกตฺถา โหนฺติ นิจฺจํ สฺยาทิวิธิวิสยโต-ญตฺถ, กุจฺฉิโต พฺราหฺมโณ กุพฺราหฺมโณ, อีสกํ อุณฺหํ กทุณฺหํ, ปนายโก, อภิเสโก, ปกริตฺวา, ปกตํ, ทุปฺปุริโส, ทุกฺกฏํ, สุปุริโส, สุกตํ, อภิตฺถุตํ, อติตฺถุตํ, อากฬาโร, อาพทฺโธ. 'कु' शब्द और 'प्र' आदि (उपसर्ग) विभक्ति-अन्त (पदों) के साथ नित्य एक अर्थ वाले (समास) होते हैं, विभक्ति-विधि के विषय से अन्यत्र। जैसे: कुत्सित ब्राह्मण = कुब्राह्मण, थोड़ा गर्म = कदुष्ण, प्रनायक, अभिषेक, प्रकृत्य (पकरित्वा), प्रकृत (पकतं), दुष्ट पुरुष = दुष्पुरुष, दुष्कृत, सुपुरुष, सुकृत, अभित्थुत (अभिष्टुत), अतित्थुत (अतिष्टुत), आकलार, आबद्ध। (๙) ‘‘ปาทโย คตาทฺยตฺเถ ปฐมาย’’. ปคโต อาจริโย ปาจริโย, ปนฺเตวาสี. (9) "प्र आदि (उपसर्ग) 'गत' आदि अर्थों में प्रथमा (विभक्ति वाले पद) के साथ (समास बनाते हैं)"। जैसे: प्रगत आचार्य = प्राचार्य, प्रान्तेवासी। (๑๐) ‘‘อจฺจาทโย กนฺตาทฺยตฺเถ ทุติยาย’’. อติกฺกนฺโต มญฺจมติมญฺโจ, อติมาโล. (10) "अति आदि (उपसर्ग) 'क्रान्त' आदि अर्थों में द्वितीया (विभक्ति वाले पद) के साथ (समास बनाते हैं)"। जैसे: मंच को लांघ गया = अतिमंच, अतिमाल। (๑๑) ‘‘อวาทโย [Pg.123] กุฏฺฐาทฺยตฺเถ ตติยาย’’. อวกุฏฺฐํ โกกิลาย วนํ อวโกกิลํ, อวมยูรํ. (11) "अव आदि (उपसर्ग) 'कुष्ट' (घोषित/व्याप्त) आदि अर्थों में तृतीया (विभक्ति वाले पद) के साथ (समास बनाते हैं)"। जैसे: कोयल द्वारा कूजित वन = अवकोकिल, अवमयूर। (๑๒) ‘‘ปริยาทโย คิลานาทฺยตฺเถ จตุตฺถิยา’’. ปริคิลาโน อชฺเฌนาย ปริยชฺเฌโน. (12) "परि आदि (उपसर्ग) 'ग्लान' आदि अर्थों में चतुर्थी (विभक्ति वाले पद) के साथ (समास बनाते हैं)"। जैसे: अध्ययन के लिए ग्लान (थका हुआ) = पर्यध्ययन। (๑๓) ‘‘นฺยาทโย กนฺตาทฺยตฺเถ ปญฺจมิยา’’. (13) "नि आदि (उपसर्ग) 'क्रान्त' (निकला हुआ) आदि अर्थों में पञ्चमी (विभक्ति वाले पद) के साथ (समास बनाते हैं)"। นิกฺขนฺโต โกสมฺพิยา นิกฺโกสมฺปิ, อสฺยาทิวิธิมฺหีติ กึ? รุกฺขํ ปติ วิชฺโชตเต. कौशाम्बी से निकला हुआ = निष्कौशाम्बी। "विभक्ति-विधि के विषय से अन्यत्र" ऐसा क्यों कहा? (उदाहरण:) वृक्षं प्रति विद्योतते (वृक्ष की ओर चमकता है - यहाँ समास नहीं हुआ)। ๑๔. จี กฺริยตฺเถหิ. १४. 'च्वि' (प्रत्यय) क्रियार्थक (पदों) के साथ। จีปฺปจฺจยนฺโต กิริยตฺเถหิ สฺยาทฺยนฺเตหิ สเหกตฺโถ โหติ, มลินีกริย. च्वि-प्रत्ययान्त (शब्द) क्रियार्थक विभक्ति-अन्त (पदों) के साथ एक अर्थ वाला (समास) होता है। जैसे: मलिनीकृत्य (मैला करके)। ๑๕. ภูสนาทรานาทเรสฺวลํสาสา. १५. भूषण (आभूषण), आदर और अनादर अर्थों में 'अलम्' और 'स' (सत्) शब्द। ภูสนาทิสฺวตฺเถ สฺวลมาทโย สทฺทา กิริยตฺเถหิ สฺยาทฺยนฺเตหิ สเหกตฺถา โหนฺติ, อลํกริย, สกฺกจฺจ, อสกฺกจฺจ. ภูสนาทีสูติ กึ? อลํภุตฺวา คโต, สกฺกตฺวา คโต, อสกฺกตฺวา คโต, ปริยตฺตํ โสภนมโสภนนฺติ อตฺโถ. भूषण आदि अर्थों में 'स' (सत्), 'अलम्' आदि शब्द क्रियार्थक विभक्ति-अन्त (पदों) के साथ एक अर्थ वाले (समास) होते हैं। जैसे: अलंकृत्य (सजाकर), सत्कृत्य (आदर करके), असत्कृत्य (अनादर करके)। "भूषण आदि अर्थों में" ऐसा क्यों कहा? (उदाहरण:) अलंभुत्वा गतः (पर्याप्त होकर गया), सत्कृत्वा गतः, असत्कृत्वा गतः - यहाँ अर्थ है पर्याप्त, शोभन, अशोभन। ๑๖. อญฺเญ จ. १६. और अन्य भी। อญฺเญ จ สทฺทา กิริยตฺเถหิ สฺยาทฺยนฺเตหิ สห พหุลเมกตฺถา ภวนฺติ, ปุโรภูย, ติโรภูย, ติโรกริย, อุรสิกริย, มนสิกริย, มชฺเฌกริย, ตุณฺหีภูย. और अन्य शब्द भी क्रियार्थक विभक्ति-अन्त (पदों) के साथ बहुलता से एक अर्थ वाले (समास) होते हैं। जैसे: पुरोभूय (आगे होकर), तिरोभूय (ओझल होकर), तिरस्कृत्य, उरसिकृत्य (हृदय में रखकर), मनसिकृत्य (मन में रखकर), मध्येकृत्य (बीच में रखकर), तूष्णींभूय (मौन होकर)। ๑๗. วาเนกญฺญตฺเถ. १७. अन्य पद के अर्थ में अनेक (पद) विकल्प से (समास होते हैं)। [बहुव्रीहि समास] อเนกํ [Pg.124] สฺยาทฺยนฺตมญฺญสฺส ปทสฺสตฺเถ เอกตฺถํ วา โหติ, พหูนิ ธนานิ ยสฺส โส พหุธโน, ลมฺพา กณฺณา ยสฺส โส ลมฺพกณฺโณ, วชิรํ ปาณิมฺหิ ยสฺส โสยํ วชิรปาณิ, มตฺตา พหโว มาตงฺคา เอตฺถ มตฺตพหุมาตงฺคํ วนํ, อารุฬฺโห วานโร ยํ รุกฺขํ โส อารุฬฺหวานโร, ชิตานิ อินฺทฺริยานิ เยน โส ชิตินฺทฺริโย, ทินฺนํ โภชนํ ยสฺส โส ทินฺนโภชโน, อปคตํ กาฬกํ ยสฺมา ปฏา โส-ยมปคตกาฬโก, อุปคตา ทส เยสํ เต อุปทสา, อาสนฺนทสา, อทูรทสา, อธิกทสา, ตโย ทส ปริมาณเมสํ ติทสา, กถํ ทสสทฺโท สงฺขฺยาเน วตฺตเต? ปริมาณสทฺทสนฺนิธานา, ยถา ปญฺจ ปริมาณเมสํ ปญฺจกา สกุนาติ, ทฺเว วา ตโย วา ปริมาณเมสํ ทฺวตฺตโย วาสทฺทตฺเถ วา ทฺเว วา ตโย วา ทฺวตฺตโย. अनेक विभक्ति-अन्त पद किसी अन्य पद के अर्थ में विकल्प से एक अर्थ वाले (समास) होते हैं। जैसे: बहुत धन है जिसका वह = बहुधन; लंबे कान हैं जिसके वह = लम्बकर्ण; वज्र है हाथ में जिसके वह = वज्रपाणि; बहुत से मतवाले हाथी हैं जहाँ वह = मत्तबहुमातंग वन; चढ़ा है वानर जिस पर वह = आरूढवानर (वृक्ष); जीत ली हैं इन्द्रियाँ जिसने वह = जितेन्द्रिय; दिया गया है भोजन जिसे वह = दत्तभोजन; निकल गया है कालापन जिससे वह = अपगतकालक (वस्त्र); जो दस के समीप हैं वे = उपदश, आसन्नदश, अदूरदश, अधिकदश; तीन और दस जिनका परिमाण है वे = त्रिदश। 'दश' शब्द संख्यावाचक में कैसे प्रयुक्त होता है? परिमाण शब्द के सान्निध्य से, जैसे 'पाँच जिनका परिमाण है वे पाँच पक्षी'। अथवा 'दो या तीन' जिनका परिमाण है वे = द्वित्र। 'वा' शब्द के अर्थ में भी 'दो या तीन' = द्वित्र। ทกฺขิณสฺสา จ ปุพฺพสฺสา จ ทิสาย ยทนฺตราฬํ ทกฺขิณปุพฺพา ทิสา, ทกฺขิณา จ สา ปุพฺพา จาติ วา, สห ปุตฺเตนาคโต สปุตฺโต, สโลมโก วิชฺชมานโลมโกติ อตฺโถ, เอวํ สปกฺขโก, อตฺถี ขีรา พฺราหฺมณีติ อตฺถิสทฺโท วิชฺชมานตฺเถ นิปาโต, กฺวจิ คตตฺถตาย ปทนฺตรานมปฺปโยโค, กณฺฐฏฺฐา กาฬา อสฺส กณฺเฐกาโฬ, โอฏฺฐสฺส มุขมิว มุขมสฺส โอฏฺฐมุโข, เกสสงฺฆาโต จูฬา อสฺส เกสจูโฬ, สุวณฺณวิกาโร อลงฺกาโร อสฺส สุวณฺณาลงฺกาโร, ปปติตํ ปณฺณมสฺส ปปติตปณฺโณ, ปปณฺโณ, อวิชฺชมานา ปุตฺตา อสฺส อวิชฺชมานปุตฺโต, น สนฺติ ปุตฺตา อสฺส อปุตฺเต, กฺวจิ น โหติ ปญฺจ ภุตฺตวนฺโต อสฺส ภาตุโน ปุตฺโต อสฺส อตฺถีติ พหุลาธิการโต. दक्षिण और पूर्व दिशा के बीच का जो अंतराल है वह = दक्षिणपूर्वा दिशा; अथवा वह दक्षिण भी है और पूर्व भी। पुत्र के साथ आया हुआ = सपुत्र। सलोमक का अर्थ है 'विद्यमान लोम वाला'। इसी प्रकार सपक्ष। 'अस्ति क्षीरा ब्राह्मणी' में 'अस्ति' शब्द विद्यमान अर्थ में निपात है। कहीं-कहीं अर्थ स्पष्ट होने के कारण अन्य पदों का प्रयोग नहीं होता। कंठ में काल (कालापन) है जिसके वह = कण्ठेकाल; ऊँट के मुख जैसा मुख है जिसका वह = उष्ट्रमुख; केशों का समूह ही चूड़ा (शिखा) है जिसकी वह = केशचूड; सुवर्ण का विकार ही अलंकार है जिसका वह = सुवर्णांलकार; गिर गए हैं पत्ते जिसके वह = प्रपतितपर्ण, प्रपर्ण; नहीं हैं पुत्र जिसके वह = अविद्यमानपुत्र; नहीं हैं पुत्र जिसके वह = अपुत्र। कहीं-कहीं (समास) नहीं होता, जैसे 'पञ्च भुत्तवन्तो' (पाँच भोजन करने वाले), 'भ्रातुः पुत्रः' (भाई का पुत्र), 'अस्ति' (है) - यह 'बहुलाधिकार' के कारण है। ๑๘. ตตฺถ คเหตฺวา เตน ปหริตฺวา ยุทฺเธ สรูปํ. १८. वहाँ (उसमें) पकड़कर और उससे प्रहार करके युद्ध होने पर समान रूप वाले (पदों का समास)। สตฺตมฺยนฺตํ [Pg.125] ตติยนฺตญฺจ สรูปมเนกํ ตตฺถ คเหตฺวา เตน ปหริตฺวา ยุทฺเธ-ญฺญปทตฺเถ เอกตฺถํ วา โหติ, เกเสสุ จ เกเสสุ จ คเหตฺวา ยุทฺธํ ปวตฺตํ เกสาเกสิ, ทณฺเฑหิ จ ทณฺเฑหิ จ ปหริตฺวา ยุทฺธํ ปวตฺตํ ทณฺฑาทณฺฑิ, มุฏฺฐามุฏฺฐิ, ‘‘จิ วีติยาเร’’ (๓-๕๑) ติ จิ สมาสนฺโต, ‘‘จิสฺมึ’’ (๓.๖๖) ติ อกาโร. ตตฺถ เตเนติ กึ? กายญฺจ กายญฺจ คเหตฺวา ยุทฺธํ ปวตฺตํ. คเหตฺวา ปหริตฺวาติ กึ? รเถ จ รเถ จ ฐตฺวา ยุทฺธํ ปวตฺติ. ยุทฺเธติ กึ? หตฺเถ จ หตฺเถ จ คเหตฺวา สขฺยํ ปวตฺตํ. สรูปนฺติ กึ? ทณฺเฑหิ จ มุสเลหิ จ ปหริตฺวา ยุทฺธ ปวตฺตํ. सप्तमी-अन्त और तृतीया-अन्त अनेक समान रूप वाले पद 'वहाँ पकड़कर' और 'उससे प्रहार करके' युद्ध के अर्थ में अन्य पद के अर्थ में विकल्प से एक अर्थ वाले (समास) होते हैं। जैसे: बालों और बालों को पकड़कर जो युद्ध हुआ = केशाकेशि; डंडों और डंडों से प्रहार करके जो युद्ध हुआ = दण्डादण्डि; मुष्टामुष्टि। 'चि वीतियारे' सूत्र से 'चि' समासान्त प्रत्यय होता है और 'चिस्मिं' सूत्र से अकार होता है। "वहाँ (सप्तमी) और उससे (तृतीया)" ऐसा क्यों कहा? (उदाहरण:) 'कायञ्च कायञ्च गहेत्वा' (शरीर और शरीर को पकड़कर) युद्ध हुआ। "पकड़कर और प्रहार करके" ऐसा क्यों कहा? (उदाहरण:) 'रथे च रथे च ठत्वा' (रथ और रथ पर स्थित होकर) युद्ध हुआ। "युद्ध में" ऐसा क्यों कहा? (उदाहरण:) 'हत्थे च हत्थे च गहेत्वा' (हाथ और हाथ पकड़कर) मित्रता हुई। "समान रूप" ऐसा क्यों कहा? (उदाहरण:) 'दण्डेहि च मुसलेहि च' (डंडों और मूसलों से) प्रहार करके युद्ध हुआ। ๑๙. จตฺเถ. १९. 'च' के अर्थ में। [द्वन्द्व समास] อเนกํ สฺยาทฺยนฺตํ จตฺเถ เอกตฺถํ วา ภวติ. สมุจฺจโยนฺวาจโย อิตรีตรโยโค สมาหาโร จ จ สทฺทตฺถา, ตตฺถ สมุจฺจยานฺวาจเยสุ เนกตฺถีภาโว สมฺภวติ, เตสุ หิ สมุจฺจโย อญฺญมญฺญนิรเปกฺขา นมตฺตปฺปธานานํ กตฺถจิ กิริยาวิเสเส จียมานตา, ยถา ‘ธเว จ ขทิเร จ ปลาเส จ ฉินฺทา’ติ. อนฺวาจโย จ ยตฺเถโก ปธานภาเวน วิธียเต อปโร จ คุณภาเวน, ยถา ‘ภิกฺขญฺจร คาโว จานเย’ติ. อิตรทฺวเย ตุ สมฺภวติ, เตสุ หิ อญฺญมญฺญสาเปกฺขานมวยวภทานุคโต อิตรีตรโยโค, ยถา ‘สาริปุตฺตโมคฺคลฺลานา’ติ, อสฺสาวยวปฺปธานตฺตา พหุวจนเมว. อญฺญมญฺญสาเปกฺขานเมว ติโรหิตาวยวเภโท สมุทายปฺปธาโน สมาหาโร, ยถา ‘ฉตฺตุปาหน’นฺติ, อสฺส ปน สมุทายปฺปธานตฺตา เอกวจนเมว. अनेक सुबन्त पद 'च' (और) के अर्थ में एक पद (समास) हो जाते हैं। समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग और समाहार—ये 'च' शब्द के अर्थ हैं। उनमें से समुच्चय और अन्वाचय में एकार्थीभाव (समास) नहीं होता है। उनमें समुच्चय वह है जहाँ परस्पर निरपेक्ष और अपने अर्थ में प्रधान पदों का किसी क्रिया विशेष में संग्रह किया जाता है, जैसे 'धव, खदिर और पलाश को काटो'। अन्वाचय वह है जहाँ एक प्रधान रूप से विधान किया जाता है और दूसरा गौण रूप से, जैसे 'भिक्षा के लिए जाओ और गायों को ले आओ'। शेष दो (इतरेतरयोग और समाहार) में तो (एकार्थीभाव) होता है। उनमें परस्पर सापेक्ष अवयवों के भेद के साथ होने वाला इतरेतरयोग है, जैसे 'सारिपुत्त-मोग्गल्लान'; इसमें अवयवों की प्रधानता होने के कारण बहुवचन ही होता है। परस्पर सापेक्ष ही अवयवों का भेद छिप जाने पर समुदाय की प्रधानता वाला समाहार है, जैसे 'छत्रोपानह' (छाता और जूता); इसमें समुदाय की प्रधानता होने के कारण एकवचन ही होता है। เต [Pg.126] จ สมาหารีตรีตรโยคา พหุลํ วิธานา นิยตวิสยาเยว โหนฺติ, ตตฺรายํ วิสยวิภาโค นิรุตฺถิปิฏกาคโต-ปาณิตูริยโยคฺคเสนงฺคานํ, นิจฺจเวรีนํ, สงฺขฺยาปริมาณ-สญฺญานํ, ขุทฺทชนฺตุกานํ, ปจนจณฺฑาลานํ, จรณสาธารณานํ, เอกชฺฌายนปาวจนานํ, ลิงฺควิเสสานํ, วิวิธวิรุทฺธานํ ทิสานํ, นทีนญฺจ นิจฺจํ สมาหาเรกตฺตํ ภวติ, ติณรุกฺขปสุสกุนธนธญฺญพฺยญฺชนชนปฺปทานํ วา, อญฺเญสมิตรีตรโยโคว. वे समाहार और इतरेतरयोग बहुधा विधानों के कारण निश्चित विषयों में ही होते हैं। वहाँ यह विषय-विभाग निरुत्तिपिटक से आया है—प्राण्यंग, तूर्यांग, योग्यांग, सेनांग, नित्यवैरियों, संख्या-परिमाण-संज्ञाओं, क्षुद्र जन्तुओं, पचन-चाण्डालों, चरण-साधारणों, एक-अध्ययन-पावचनों, लिंग-विशेषों, विविध विरुद्धों, दिशाओं और नदियों का नित्य समाहार एकवचन होता है। तृण, वृक्ष, पशु, शकुन (पक्षी), धन, धान्य, व्यंजन और जनपदों का विकल्प से (समाहार या इतरेतरयोग) होता है, अन्यों का केवल इतरेतरयोग ही होता है। ปาณฺยงฺคานํ-จกฺขุโสตํ, มุขนาสิกํ, หนุคีวํ, ฉวิมํสโลหิตํ, นามรูปํ, ชรามรณํ. ตุริยงฺคานํ-อลสตาลมฺพรํ, มุรชโคมุขํ, สงฺขเทณฺฑิมํ, มทฺทวิกปาณวิกํ, คีตวาทิตํ, สมฺมตาลํ. โยคฺคงฺคานํ ผาลปาจนํ, ยุคนงฺคลํ. เสนงฺคานํ-อสิสตฺติโตมรปิณฺฑํ, อสิจมฺมํ, ธนุกลาปํ, ปหรณาวรณํ. นิจฺจเวรีนํ-อหินกุลํ, พีฬาลมูสิกํ, กาโกลูกํ, นาคสุปณฺณํ. สงฺขฺยาปริมาณ สญฺญานํ-เอกกทุกํ, ทุกติกํ, ติกจตุกฺกํ, จตุกฺกปญฺจกํ, ทเสกาทสกํ. ขุทฺทชนฺตุกานํ กีฏปฏงฺคํ, กุนฺถกิปิลฺลิกํ, ฑํสมกสํ, มกฺขิกกิปิลฺลิกํ. ปจนจณฺฑาลานํ-โอรพฺภิกสูกริกํ, สากุนฺติ กมาควิกํ, สปากจณฺฑาลํ, เวนรถการํ, ปุกฺกุส ฉวฑาหกํ. จรณสาธารณานํ-อติสภารทฺวาชํ, กฐกลาปํ, สีลปญฺญาณํ, สมถวิปสฺสนํ, วิชฺชาจรณํ. เอกชฺฌายนปาวจนานํ ทีฆมชฺฌิมํ, เอกุตฺตรสํยุตฺตกํ, ขนฺธกวิภงฺคํ. ลิงฺควิเสสานํ-อิตฺถิปุขํ, ทาสิทาสํ, จีวรปิณฺฑปาตเสนาสนคิลานปฺปจฺจยเภสชฺชปริกฺขารํ, ติณกฏฺฐสาขาปลาสํ, ‘ลาภี โหติ จีวรปิณฺฑปาตเสนา- สนคิลานปฺปจฺจยเภสชฺชปริกฺขาราน’นฺติปิ ทิสฺสติ. วิวิธวิรุทฺธานํ กุสลากุสลํ[Pg.127], สาวชฺชานวชฺชํ, หีนปฺปณีตํ, กณฺหสุกฺกํ, เฉกปาปกํ. ทิสานํ ปุพฺพาปรํ, ทกฺขิณุตฺตรํ, ปุพฺพทกฺขิณํ, ปุพฺพุตฺตรํ, อธรุตฺตรํ, อปรทกฺขิณํ, อปรุตฺตรํ. นทีนํ-คงฺคายมุนํ, มหิสรภุ. प्राण्यंगों का—चक्षु-श्रोत्र, मुख-नासिका, हनु-ग्रीवा, छवि-मांस-लोहित, नाम-रूप, जरा-मरण। तूर्यांगों का—अलस-तालम्बर, मुरज-गोमुख, शंख-डेण्डिम, मर्दविक-पाणविक, गीत-वादित, सम्मताल। योग्यांगों का—फाल-पाचन, युग-लांगुल। सेनांगों का—असि-सत्ति-तोमर-पिण्ड, असि-चर्म, धनु-कलाप, प्रहरण-आवरण। नित्यवैरियों का—अहि-नकुल, बिडाल-मूषिक, काक-उलूक, नाग-सुपर्ण। संख्या-परिमाण-संज्ञाओं का—एकक-द्विक, द्विक-त्रिक, त्रिक-चतुष्क, चतुष्क-पंचक, दश-एकादशक। क्षुद्र जन्तुओं का—कीट-पतंग, कुन्थ-किपिल्लिक, दंश-मशक, मक्षिका-किपिल्लिक। पचन-चाण्डालों का—औरभ्रक-सूकरिक, शाकुन्तिक-मागविक, श्वपाक-चाण्डाल, वेण-रथकार, पुक्कुस-छवदाहक। चरण-साधारणों का—अतिस-भारद्वाज, कठ-कलाप, शील-प्रज्ञा, शमथ-विपश्यना, विद्या-चरण। एक-अध्ययन-पावचनों का—दीघ-मज्झिम, एकुत्तर-संयुत्तक, खन्धक-विभंग। लिंग-विशेषों का—स्त्री-पुरुष, दासी-दास, चीवर-पिण्डपात-शयनासन-ग्लानप्रत्यय-भैषज्य-परिष्कार, तृण-काष्ठ-शाखा-पलाश; 'चीवर-पिण्डपात-शयनासन-ग्लानप्रत्यय-भैषज्य-परिष्कारों का लाभ लेने वाला होता है' ऐसा भी देखा जाता है। विविध विरुद्धों का—कुशल-अकुशल, सावद्य-अनवद्य, हीन-प्रणीत, कृष्ण-शुक्ल, छेक-पापक। दिशाओं का—पूर्वापर, दक्षिणोत्तर, पूर्वदक्षिण, पूर्वोत्तर, अधरोत्तर, अपरदक्षिण, अपरोत्तर। नदियों का—गंगा-यमुना, मही-सरभू। ติณวิเสสานํ-กาสกุสํ กาสกุสา, อุสีรพีรณํ อุสีรพีรณา, มุญฺชปพฺพชํ มุญฺชปพฺพชํ มุญฺชปพฺพชา. รุกฺขวิเสสานํ ขทิรปลาสํ ขทิรปลาสา, โวสฺสกณฺณํ ธวาสฺสกณฺณา, ปิลกฺขนิคฺโรธํ ปิลกฺขนิคฺโรธา, อสฺสตฺถกปิตฺถนํ อสฺสตฺถกปิตฺถนา, สากสาลํ สากสาลา. ปสุวิเสสานํ-คชควชํ คชควชา, โคมหิสํ โคมหิสา, เอเณยฺยโคมหิสํ เอเณยฺยโคมหิสา, เอเณยฺยวราหํ เอเณยฺยวราหา, อเชฬกํ อเชฬกา, กุกฺกุรสูกรํ กุกฺกุรสูกรา, หตฺถิควาสฺสวฬวํ หตฺถิควาสฺสวฬวา. สกุนวิเสสานํ-หํสพลาวํ หํสพลาวา, การณฺฑวจกฺกวากํ การณฺฑวจกฺกวากา, พกพลากํ พกพลากา. ธนานํ-หิรญฺญสุวณฺณํ หิรญฺญสุวณฺณา, มณิสงฺขมุตฺตาเวฬุริยํ มณิสงฺขมุตฺตาเวฬุริยา, ชาตรูปรชตํ ชาตรูปรชตา. ธญฺญานํ-สาลิยวกํ สาลิยวกา, ติลมุคฺคมาสํ ติลมุคฺคมาสา, นิปฺผาวกุลตฺถํ นิปฺผาวกุลตฺถา. พฺยญฺชนานํ-สากสุวํ สากสุวา, คพฺยมาหิสํ คพฺยมาหิสา, เอเณยฺยวาราหํ เอเณยฺยวาราหา, มิคมายูรํ มิคมายูรา. ชนปทานํ-กาสิโกสลํ กาสิโกสลา, วชฺชิมลฺลํ วชฺชิมลฺลา, เจติวํสํ เจติวํสา, มจฺฉสูรเสนํ มจฺฉสูรเสนา, กุรุปญฺจาลํ กุรุปญฺจาลา. อิตรีตรโยโค ยถา-จนฺทิมสูริยา, สมณพฺราหฺมณา มาตาปิตโร อิจฺจาทิ. तृण-विशेषों का—कास-कुश (समाहार) या कास-कुश (इतरेतर), उशीर-बीरण (समाहार) या उशीर-बीरण (इतरेतर), मुंज-पब्बज (समाहार) या मुंज-पब्बज (इतरेतर)। वृक्ष-विशेषों का—खदिर-पलाश (समाहार) या खदिर-पलाश (इतरेतर), धव-अश्वकर्ण (समाहार) या धव-अश्वकर्ण (इतरेतर), प्लक्ष-न्यग्रोध (समाहार) या प्लक्ष-न्यग्रोध (इतरेतर), अश्वत्थ-कपित्थ (समाहार) या अश्वत्थ-कपित्थ (इतरेतर), शाक-शाल (समाहार) या शाक-शाल (इतरेतर)। पशु-विशेषों का—गज-गवय (समाहार) या गज-गवय (इतरेतर), गो-महिष (समाहार) या गो-महिष (इतरेतर), एणेय-गो-महिष (समाहार) या एणेय-गो-महिष (इतरेतर), एणेय-वराह (समाहार) या एणेय-वराह (इतरेतर), अज-एलक (समाहार) या अज-एलक (इतरेतर), कुक्कुर-सूकर (समाहार) या कुक्कुर-सूकर (इतरेतर), हस्ति-गव-अश्व-वडवा (समाहार) या हस्ति-गव-अश्व-वडवा (इतरेतर)। शकुन-विशेषों का—हंस-बलावक (समाहार) या हंस-बलावक (इतरेतर), कारण्डव-चक्रवाक (समाहार) या कारण्डव-चक्रवाक (इतरेतर), बक-बलाका (समाहार) या बक-बलाका (इतरेतर)। धनों का—हिरण्य-सुवर्ण (समाहार) या हिरण्य-सुवर्ण (इतरेतर), मणि-शंख-मुक्ता-वैदूर्य (समाहार) या मणि-शंख-मुक्ता-वैदूर्य (इतरेतर), जातरूप-रजत (समाहार) या जातरूप-रजत (इतरेतर)। धान्यों का—शालि-यवक (समाहार) या शालि-यवक (इतरेतर), तिल-मुद्ग-माष (समाहार) या तिल-मुद्ग-माष (इतरेतर), निष्पाव-कुलत्थ (समाहार) या निष्पाव-कुलत्थ (इतरेतर)। व्यंजनों का—शाक-सूप (समाहार) या शाक-सूप (इतरेतर), गव्य-माहिष (समाहार) या गव्य-माहिष (इतरेतर), एणेय-वाराह (समाहार) या एणेय-वाराह (इतरेतर), मृग-मयूर (समाहार) या मृग-मयूर (इतरेतर)। जनपदों का—काशि-कोसल (समाहार) या काशि-कोसल (इतरेतर), वज्जि-मल्ल (समाहार) या वज्जि-मल्ल (इतरेतर), चेति-वंश (समाहार) या चेति-वंश (इतरेतर), मत्स्य-शूरसेन (समाहार) या मत्स्य-शूरसेन (इतरेतर), कुरु-पांचाल (समाहार) या कुरु-पांचाल (इतरेतर)। इतरेतरयोग जैसे—चन्द्र-सूर्य, श्रमण-ब्राह्मण, माता-पिता इत्यादि। เอตสฺมึ [Pg.128] เอกตฺถีภาวกณฺเฑ ยํ วุตฺตํ ปุพฺพํ, ตเทว ปุพฺพํ นิปตติ กมาติกฺกเม ปโยชนาภาวา. กฺวจิ วิปลฺลาโสปิ โหติ พหุลาธิการโต, ทนฺตานํ ราชา ราชทนฺโต, กตฺถจิ กมํ ปจฺจานาทรา ปุพฺพกาลสฺสาปิ ปรนิปาโต, ลิตฺตวาสิโต, นคฺคมุสิโต, สิตฺตสมฺมฏฺโฐ, ภฏฺฐลุญฺจิโต. จตฺเถ ยเทกตฺถํ ตตฺถ เกจิ ปุพฺพปทํ พหุธา นิยเมนฺติ, ตทิห พฺยภิจารทสฺสาน น วุตฺตนฺติ ทฏฺฐพฺพํ. इस एकार्थीभाव काण्ड में जो पहले कहा गया है, वही पहले आता है क्योंकि क्रम के उल्लंघन का कोई प्रयोजन नहीं है। 'बहुला' अधिकार के कारण कहीं-कहीं विपर्यास (क्रम परिवर्तन) भी होता है, जैसे 'दन्तानां राजा' का 'राजदन्तो'। कहीं-कहीं क्रम का अनादर होने से पूर्वकाल (भूतकालिक कृदन्त) का भी पर-निपात (बाद में प्रयोग) होता है, जैसे 'लित्तवासितो', 'नग्गमुसितो', 'सित्तसम्मट्ठो', 'भट्ठलुञ्चितो'। 'च' के अर्थ में जो एकार्थीभाव होता है, वहाँ कुछ लोग पूर्वपद को बहुत प्रकार से नियमबद्ध करते हैं, उसे यहाँ व्यभिचार (अनियम) दिखने के कारण नहीं कहा गया है, ऐसा समझना चाहिए। ๒๐. สมาหาเร นปุํสกํ. २०. समाहार में नपुंसक लिंग होता है। จตฺเถ สมาหาเร ยเทกตฺถํ, ตํ นปุํสกลิงฺคํ ภวติ, ตถาเจโวทาหฏํ, กตฺถจิ น โหติ ‘สภาปริสายา’ติ ญาปกา, อาธิปจฺจปริวาโร, ฉนฺทปาริสุทฺธิ, ปฏิสนฺธิปวตฺติยํ. और उस समाहार (द्विगु समास) में जो एकत्व (एक अर्थ) है, वह नपुंसक लिंग होता है, और वैसा ही उदाहरण दिया गया है, कहीं नहीं होता है जैसे 'सभापरिसया' (सभा-परिषद) ज्ञापक (नियम) से, आधिपत्य-परिवार, छन्द-पारिशुद्धि, प्रतिसन्धि-प्रवृत्ति में। ๒๑. สงฺขฺยาทิ. २१. संख्यादि। เอกตฺเถ สมาหาเร สงฺขฺยาทิ นปุํสกลิงฺคํ ภวติ, ปญฺจควํ, จตุปฺปถํ, สมาหารสฺเสกตฺตา เอกวจนเมว โหติ, สมาหาเรตฺเวว ปญฺจกาปาโล ปูโว, ติปุตฺโต. एकत्व अर्थ वाले समाहार में संख्यादि (द्विगु) नपुंसक लिंग होता है, जैसे- पञ्चगवं (पाँच गायों का समूह), चतुप्पथं (चार पथों का समूह), समाहार के एकत्व के कारण एकवचन ही होता है, किन्तु समाहार में ही 'पञ्चकपालो पूवो' (पाँच कपालों वाला पुआ), 'तिपुत्तो' (तीन पुत्रों वाला) [यहाँ नपुंसक लिंग नहीं हुआ]। ๒๒. กฺวเจกตฺตญฺจ ฉฏฺฐิยา. २२. षष्ठी (तत्पुरुष) में कहीं एकत्व और (नपुंसकत्व) होता है। ฉฏฺฐิเยกตฺเถ กฺวจิ นปุํสกตฺตํ โหเตกตฺถญฺจ, สลภานํ ฉายา สลภจฺฉายํ, เอวํ สกุนฺตานํ ฉายา สกุนฺตจฺฉายํ, ปาสาทจฺฉายํ ปาสาทจฺฉายา, ฆรจฺฉายํ ฆรจฺฉายา, อมนุสฺสสภาย นปุํสเกกตฺตํ ภวติ พฺรหฺมสภํ, เทวสภํ, อินฺทสภํ, ยกฺขสภํ, สรภสภํ, มนุสฺสสภายํ ปน ขตฺติยสภา, ราชสภา อิจฺเจวมาทิ, กฺวจีติ กึ ราชปุริโส. षष्ठी तत्पुरुष के एकत्व अर्थ में कहीं नपुंसकत्व और एकत्व होता है, जैसे- शलभों की छाया 'सलभच्छायं', इसी प्रकार शकुन्तों (पक्षियों) की छाया 'सकुन्तच्छायं', 'पासादच्छायं' या 'पासादच्छाया', 'घरच्छायं' या 'घरच्छाया'। अमानुष सभा के अर्थ में नपुंसकत्व और एकत्व होता है, जैसे- 'ब्रह्मसभं', 'देवसभं', 'इन्दसभं', 'यक्खसभं', 'सरभसभं'। किन्तु मनुष्य सभा में 'खत्तियसभा', 'राजसभा' इत्यादि। 'क्वचि' (कहीं) क्यों कहा? 'राजपुरिसो' (यहाँ नहीं हुआ)। ๒๓. สฺยาทีสุ รสฺโส. २३. 'सि' आदि विभक्तियों के परे होने पर ह्रस्व होता है। นปุํสเก [Pg.129] วตฺตมานสฺส รสฺโส โหติ สฺยาทีสุ. สลภจฺฉายํ, สฺยาทีสูติ กึ? สลภจฺฉาเย. नपुंसक लिंग में वर्तमान (शब्द) का 'सि' आदि विभक्तियों के परे होने पर ह्रस्व होता है। जैसे- 'सलभच्छायं'। 'सि' आदि विभक्तियों में क्यों? 'सलभच्छाये' (सप्तमी में नहीं)। ๒๔. ฆปสฺสนฺตสฺสาปฺปธานสฺส. २४. अन्त में स्थित अप्रधान 'घ' और 'प' संज्ञक (आ और ई/ऊ) का। อนฺตภูตสฺส อปฺปธานสฺส ฆปสฺส สฺยาทีสุ รสฺโส โหติ. พหุมาโล โปโส, นิกฺโกสมฺพิ, อติวาโมรุ, อนฺตสฺสาติ กึ? ราชา กญฺญาปิโย, อปฺปธานสฺสาติ กึ? ราชกุมารี พฺรหฺมพนฺธู. (समास के) अन्त में स्थित अप्रधान 'घ' और 'प' संज्ञक का 'सि' आदि विभक्तियों के परे होने पर ह्रस्व होता है। जैसे- 'बहुमालो पोसो' (बहुत मालाओं वाला पुरुष), 'निक्कोसम्बि' (कोशाम्बी से निकला हुआ), 'अतिवामोरु' (अत्यन्त सुन्दर जंघा वाली)। 'अन्त में' क्यों? 'राजा', 'कञ्ञापियो'। 'अप्रधान' क्यों? 'राजकुमारी', 'ब्रह्मबन्धू' । ๒๕. โคสฺสุ. २५. 'गो' शब्द को 'उ' होता है। อนฺตภูตสฺส อปฺปธานสฺส โคสฺส สฺยาทีสุ อุ โหติ. จิตฺตคุ, อปฺปธานสฺสาตฺเวว? สุโค, อนฺตสฺสาตฺเวว? โคกุลํ. (समास के) अन्त में स्थित अप्रधान 'गो' शब्द को 'सि' आदि विभक्तियों के परे होने पर 'उ' होता है। जैसे- 'चित्तगु' (चितकबरी गायों वाला)। 'अप्रधान' क्यों? 'सुगो'। 'अन्त में' क्यों? 'गोकुलं' । ๒๖. อิตฺถิยมตฺวา. २६. स्त्रीलिंग में 'अ' से 'आ' होता है। อิตฺถิยํ วตฺตมานโต อการนฺตโต นามสฺมา อาปจฺจโย โหติ. ธมฺมทินฺนา. स्त्रीलिंग में वर्तमान अकारान्त नाम (प्रातिपदिक) से 'आ' प्रत्यय होता है। जैसे- 'धम्मदिन्ना' । ๓๗. นทาทิโต วี. ३७. नद्यादि गण से 'ई' (वी) प्रत्यय होता है। นทาทีหิ อิตฺถิยํ วีปฺปจฺจโย โหติ. นที, มหี, กุมารี, ตรุณี, วารุณี, โคตมี. (๑๔) ‘‘โคโตวา’’ คาวี โค, อากติคโณ-ยํ, โกโร ‘‘นฺตนฺตูนํ วีมฺหิ โต วา’’ (๓-๓๖) ติ วิเสสนตฺโถ. नद्यादि गण के शब्दों से स्त्रीलिंग में 'ई' (वी) प्रत्यय होता है। जैसे- 'नदी', 'मही', 'कुमारी', 'तरुणी', 'वारुणी', 'गोतमी'। (१४) 'गो' शब्द से 'गावी' या 'गो' होता है, यह आकृतिगण है। 'कोरो' (सूत्र) के अनुसार 'न्त' और 'तु' प्रत्ययान्तों में 'ई' (वी) परे होने पर 'त' विकल्प से होता है, यह विशेष अर्थ के लिए है। ๒๘. ยกฺขาทิตินี จ. २८. यक्षादि गण से 'इनी' और 'ई' (वी) भी होता है। ยกฺขาทิโต [Pg.130] อิตฺถิยํ อินี โหติ วีจ. ยกฺขินี ยกฺขี, นาคินี นาคี, สีหินี สีหี. यक्षादि गण से स्त्रीलिंग में 'इनी' और 'ई' (वी) प्रत्यय होते हैं। जैसे- 'यक्खिनी', 'यक्खी'; 'नागिनी', 'नागी'; 'सीहिनी', 'सीही' । ๒๖. อารามิกาทีหิ. २६. आरामिक आदि शब्दों से। อารามิกาทิโต อินี โหติตฺถิยํ. อารามิกินี, อนนฺตรายิกินี, ราชินี (๑๕) ‘‘สญฺญายํ มานุโส’’ มานุสินี, อญฺญตฺร มานุสี. आरामिक आदि शब्दों से स्त्रीलिंग में 'इनी' प्रत्यय होता है। जैसे- 'आरामिकिनी', 'अनन्तरायकिनी', 'राजिनी'। (१५) संज्ञा अर्थ में 'मानुसो' से 'मानुसिनी' होता है, अन्यत्र 'मानुसी' । ๓๐. ยุวณฺเณหิ นี. ३०. इ-वर्ण और उ-वर्ण से 'नी' होता है। อิตฺถิยมิวณฺณุวณฺณนฺเตหิ นี โหติ พหุลํ. สทาปยตปาณินี, ทณฺฑินี, ภิกฺขุนี, ขตฺตพนฺธุนี, ปรจิตฺตวิทุนี, มาตุอาทิโต กสฺมา น โหติ? อิตฺถิปฺปจฺจยํ วินาปิ อิตฺถตฺตาภิธานโต. स्त्रीलिंग में इ-वर्णान्त और उ-वर्णान्त शब्दों से 'नी' प्रत्यय बहुलता से होता है। जैसे- 'सदापयतपाणिनी', 'दाण्डिनी', 'भिक्खुनी', 'खत्तबन्धुनी', 'परचित्तविदुनी'। 'मातु' आदि से क्यों नहीं होता? क्योंकि स्त्रीलिंग प्रत्यय के बिना भी स्त्रीलिंग का बोध हो जाता है। ๓๑. กฺติมฺหาญฺญตฺเถ. ३१. 'क्ति' प्रत्यय से अन्य अर्थ में। กฺติมฺหาญฺญตฺเถเยว อิตฺถิยํ นี โหติ พหุลํ. สาหํ อหึ สารตินี, ตสฺสา มุฏฺฐสฺสตินิยา, สา คาวี วจฺฉคิทฺธินี, อญฺญตฺเถติ กึ? ธมฺมรติ. 'क्ति' प्रत्ययान्त शब्द से अन्य अर्थ (मत्वर्थ) में ही स्त्रीलिंग में 'नी' प्रत्यय बहुलता से होता है। जैसे- 'सा अहं अहिं सारतिनी', 'तस्सा मुट्ठस्सतिनिया', 'सा गावी वच्छगिद्धिनी'। 'अन्य अर्थ में' क्यों? 'धम्मरति' । ๓๒. ฆรณฺยาทโย. ३२. घरणी आदि शब्द। ฆรณิปฺปภุตโย นีปฺปจฺจนฺตาสาธโว ภวนฺติ. ฆรณี, โปกฺขรณี, อีสฺส-ตฺตํ นิปาตนา, (๑๖) ‘‘อาจริยา วา ย-โลโป จ’’ อาจรินี, อาจริยา. घरणी आदि शब्द 'नी' प्रत्ययान्त होने पर साधु (शुद्ध) होते हैं। जैसे- 'घरणी', 'पोक्खरणी', यहाँ 'इ' का 'ई' निपातन से हुआ है। (१६) 'आचरिया वा य-लोपो च' के अनुसार 'आचरिनी' और 'आचरिया' रूप बनते हैं। ๓๓. มาตุลาทิตฺวานี ภริยายํ. ३३. मातुल आदि शब्दों से पत्नी अर्थ में 'आनी' प्रत्यय होता है। มาตุลาทิโต [Pg.131] ภริยายมานี โหติ. มาตุลานี, วารุณานี, คหปตานี, อาจริยานี, (๑๗) ‘‘อภริยายํ ขตฺติยา วา’’ ขตฺติยานี ขตฺติยา, นทาทิปาฐา ภริยายนฺตุ ขตฺติยี. मातुल आदि शब्दों से पत्नी अर्थ में 'आनी' प्रत्यय होता है। जैसे- 'मातुलानी', 'वारुणानी', 'गहपतानी', 'आचरियानी'। (१७) 'पत्नी अर्थ न होने पर खत्तिया वा' के अनुसार 'खत्तियानी' और 'खत्तिया' रूप होते हैं। नद्यादि पाठ से पत्नी अर्थ में 'खत्तियी' होता है। ๓๔. อุปมาสํหิต สหิต สญฺญต สห สผวาม ลกฺขณาทิตูรุตู. ३४. उपमा, संहित, सहित, संयत, सह, सफ, वाम और लक्षणादि शब्दों के बाद 'ऊरु' शब्द होने पर 'ऊ' प्रत्यय होता है। อูรุสทฺทา อุปมานาทิปุพฺพา อิตฺติยมู โหติ. กรโภรู, สํหิโตรู, สหิโตรู, สญฺญโตรู, สโหรู, สโผรู, วาโมรู, ลกฺขโณรู, อูติโยควิภาคา อู พฺรหฺมพนฺธู. उपमान आदि पूर्व में होने पर 'ऊरु' शब्द से स्त्रीलिंग में 'ऊ' प्रत्यय होता है। जैसे- 'करभोरू', 'संहितोरू', 'सहितोरू', 'सञ्ञतोरू', 'सहोरू', 'सफोरू', 'वामोरू', 'लक्खणोरू'। 'ऊ' के योग-विभाग से 'ब्रह्मबन्धू' में भी 'ऊ' होता है। ๓๕. ยุวา ติ. ३५. युव शब्द से 'ति' प्रत्यय होता है। ยุวสทฺทโต ติ โหติตฺถิยํ. ยุวติ. 'युव' शब्द से स्त्रीलिंग में 'ति' (प्रत्यय) होता है। युवति। ๓๖. นฺตนฺตูนํ วีมฺหิโต วา. ३६. 'न्' और 'तु' अन्त वाले शब्दों के बाद 'ई' (प्रत्यय) होने पर विकल्प से 'त्' होता है। วีมฺหิ นฺตนฺตูนํ โต วา โหติ. คจฺฉตี คจฺฉนฺตี, สีลวตี สีลวนฺตี. 'ई' प्रत्यय होने पर 'न्' और 'तु' अन्त वाले शब्दों को विकल्प से 'त्' होता है। जैसे: गच्छती, गच्छन्ती; शीलवती, शीलवन्ती। ๓๗. ภวโต โภโต. ३७. 'भवन्त' शब्द को 'भोत' आदेश। วีมฺหิ ภวโต โภตาเทโส โหติ วา. โภตี ภวนฺตี. 'ई' प्रत्यय होने पर 'भवन्त' शब्द को विकल्प से 'भोत' आदेश होता है। जैसे: भोती, भवन्ती। ๓๘. โคสฺสาวง. ३८. 'गो' शब्द को 'ई' प्रत्यय होने पर 'आव' आदेश। โคสทฺทสฺส วีมฺหาวง โหติ. คาวี. 'गो' शब्द को 'ई' प्रत्यय होने पर 'आव' आदेश होता है। जैसे: गावी। ๓๙. ปุถุสฺส ปถวปุถวา. ३९. 'पृथु' शब्द को 'पथव' और 'पुथव' आदेश। วีมฺหิ [Pg.132] ปุถุสฺส ปถวปุถวา โหนฺติ. ปถวี, ปุถวี, เฐ ปถวี. 'ई' प्रत्यय होने पर 'पृथु' शब्द को 'पथव' और 'पुथव' आदेश होते हैं। जैसे: पथवी, पुथवी; 'ठे' (स्थिर अर्थ में) पथवी। ๔๐. สมาสนฺตฺว. ४०. समासान्त (समास का अंत)। สมาสนฺตฺว อิติ จาธิกรียติ. 'समासान्त' यह अधिकार सूत्र है। ๔๑. ปาปาทีหิ ภูมิยา. ४१. पाप आदि के बाद 'भूमि' शब्द होने पर। ปาปาทีหี ปรา ยา ภูมิ ตสฺสา สมาสนฺโต อ โหติ. ปาปภูมํ, ชาติภูมํ. पाप आदि के बाद जो 'भूमि' शब्द आता है, उसका समासान्त 'अ' होता है। जैसे: पापभूमं, जातिभूमं। ๔๒. สงฺขฺยาหิ. ४२. संख्याओं के बाद। สงฺขฺยาหิ ปรา ยา ภูมิ ตสฺสา สมาสนฺโต อ โหติ. ทฺวิภูมํ, ติภูมํ. संख्याओं के बाद जो 'भूमि' शब्द आता है, उसका समासान्त 'अ' होता है। जैसे: द्विभूमं, त्रिभूमं। ๔๓. นทีโคทาวรีนํ. ४३. नदी और गोदावरी शब्दों के लिए। สงฺขฺยาหิ ปราสํ นทีโคทาวรีนํ สมาสนฺโต อ โหติ, ปญฺจนทํ, สตฺตโคทาวรํ, สงฺขฺยาหิตฺเวว? มหานที, นทีโคทาวรีนนฺติ กึ? ทสิตฺถิ. संख्याओं के बाद आने वाले 'नदी' और 'गोदावरी' शब्दों का समासान्त 'अ' होता है। जैसे: पञ्चनदं, सप्तगोदावरं। 'संख्याओं के बाद' ही क्यों? महानदी। 'नदी और गोदावरी' ही क्यों? दशित्थी। ๔๔. อสงฺขฺเยหิ จางฺคุลฺยานญฺญาสงฺขฺยตฺเถสุ. ४४. असंख्याओं और संख्याओं के बाद 'अङ्गुलि' शब्द होने पर, यदि वह अन्यपदार्थ और असंख्यात अर्थ में न हो। อสงฺขฺเยหิ สงฺขฺยาหิ จ ปราย องฺคุลฺยา สมาสนฺโต อ โหติ โน เจ อญฺญปทตฺเถ อสงฺขฺยตฺเถ จ สมาโส วตฺตเต. นิคฺคตมงฺคุลีหิ นิรงฺคุลํ, อจฺจงฺคุลํ, ทฺเว องฺคุลิโย สมาหฏา ทฺวงฺคุลํ, อนญฺญาสงฺขฺยตฺเถสูติ กึ? ปญฺจงฺคุลิ หตฺโถ, อุปงฺคุลิ, กถํ [Pg.133] ‘ทฺเว องฺคุลีมานมสฺสาติ ทฺวงฺคุล’นฺติ? นาตฺร สมาโสญฺญปทตฺเถ วิหิโต มตฺตาทีนํ โลเป กเต ตตฺถ วตฺตเต. องฺคุลสทฺโท วา ปมาณวาจิ สทฺทนฺตรํ, ยถา ‘เสนงฺคุลปฺปมาเณน องฺคุลานํ สตํ ปุณฺณํ จตุทฺทส วา องฺคุลานี’ติ. असंख्याओं और संख्याओं के बाद आने वाले 'अङ्गुलि' शब्द का समासान्त 'अ' होता है, यदि समास अन्यपदार्थ और असंख्यात अर्थ में न हो। जैसे: निरङ्गुलं, अत्यङ्गुलं, द्वङ्गुलं। 'अन्यपदार्थ और असंख्यात अर्थ में न हो' क्यों? पञ्चङ्गुलि हत्थो, उपङ्गुलि। 'द्वे अङ्गुलीमानमस्साति द्वङ्गुलं' कैसे सिद्ध होता है? यहाँ अन्यपदार्थ में समास विहित नहीं है, 'मात्रा' आदि का लोप होने पर वह वहाँ प्रयुक्त होता है। अथवा 'अङ्गुल' शब्द प्रमाणवाची दूसरा शब्द है, जैसे: 'सेनाङ्गुलप्रमाणेन...'। ๔๕. ทีฆาโหวสฺเสกเทเสหิ จ รตฺตฺยา. ४५. दीर्घ, अह, वस्स और एकदेश (पूर्व, अपर आदि) के बाद 'रत्ति' शब्द होने पर। ทีฆาทีหิ อสงฺขฺเยหิ สงฺขฺยาหิ จ ปรมสฺมา รตฺติยา สมาสนฺโต อ โหติ. ทีฆรตฺตํ, อโหรตฺตํ (ตฺโต), วสฺสารตฺตํ (ตฺโต), ปุพฺพรตฺตํ, อปรรตฺตํ, อฑฺฒุรตฺตํ, อติกฺกนฺโต รตฺตึ อติรตฺโต, ทฺเวรตฺตี สมาหฏา ทิรตฺตํ (ตฺโต), วา กฺวจิ พหุลาธิการา เอกรตฺตํ (ตฺโต), เอกรตฺติ, อนญฺญาสงฺขฺยตฺเถสุตฺเวว? ทีฆรตฺติเหมนฺโต, อุปรตฺติ, กฺวจิ โหเตว พหุลํ วิธานายถารตฺตํ. दीर्घ आदि असंख्याओं और संख्याओं के बाद आने वाले 'रत्ति' शब्द का समासान्त 'अ' होता है। जैसे: दीघरत्तं, अहोत्तं, वस्सारत्तं, पुब्बरत्तं, अपररत्तं, अद्धुरत्तं, अतिरत्तो, द्विरत्तं। 'बहुलाधिकार' से कहीं विकल्प से होता है: एकरत्तं, एकरत्ति। 'अन्यपदार्थ और असंख्यात अर्थ में न हो' क्यों? दीघरत्तिहेमन्तो, उपरत्ति। 'बहुलाधिकार' के कारण कहीं होता भी है: यथारत्तं। ๔๖. โคตฺวจตฺเถ จาโลเป. ४६. 'गो' शब्द के बाद, 'च' अर्थ में और अलोप होने पर। โคสทฺทา อโลปวิสยา สมาสนฺโต อ โหติ น เจ จตฺเถ สมาโส อญฺญปทตฺเถ อสงฺขฺยตฺเถ จ, ราชคโว, ปรมคโว, ปญฺจควธโน, ทสควํ, อโลเปติ กึ? ปญฺจหิ โคหิ กีโต ปญฺจคุ, อจตฺเถติ กิ? อชสฺสคาโว, อนญฺญาสงฺขฺยตฺเถสุตฺเวว? จิตฺตคุ, อุปคุ. अलोप के विषय में 'गो' शब्द का समासान्त 'अ' होता है, यदि समास 'च' अर्थ में, अन्यपदार्थ में और असंख्यात अर्थ में न हो। जैसे: राजगवो, परमगवो, पञ्चगवधनो, दशगवं। 'अलोप' क्यों? पञ्चगु। 'च-अर्थ में न हो' क्यों? अजस्सगावो। 'अन्यपदार्थ और असंख्यात अर्थ में न हो' क्यों? चित्तगु, उपगु। ๔๗. รตฺตินฺทิวทารควจตุรสฺสา. ४७. रत्तिन्दिव, दारगव और चतुरस्स। เอเต สทฺทา ออนฺตา นิปจฺจนฺเต. รตฺโต จ ทิวา จ รตฺตินฺทิวํ, รตฺติ จ ทิวา จ รตฺตินฺทิวํ, ทารา จ คาโว จ ทารควํ, จตสฺโส อสฺสิโย อสฺส จตุรสฺโส. ये शब्द 'अ' अन्त वाले निपातित होते हैं। जैसे: रत्तिन्दिवं (रात और दिन), दारगवं (स्त्री और गाय), चतुरस्सो (चार कोनों वाला)। ๔๘. อายาเมนุควํ. ४८. आयाम (लम्बाई) अर्थ में 'अनुगव'। อนุควนฺติ [Pg.134] นิปจฺจเต อายาเม คมฺยมาเน. อนุควํ สกฏํ, อายาเมติ กึ? คุนฺนํ ปญฺฉา อนุคุ. आयाम अर्थ प्रतीत होने पर 'अनुगवं' निपातित होता है। जैसे: अनुगवं सकटं। 'आयाम' क्यों? अनुगु। ๔๙. อกฺขิสฺมาญฺญตฺเถ. อกฺขิสฺมา สมาสนฺโต อ โหติ อญฺญตฺเถ เจ สมาธสา. วิสาลกฺโข, วิสาลกฺขี. ४९. अन्य अर्थ (अन्यपदार्थ) होने पर 'अक्खि' शब्द का समासान्त 'अ' होता है। जैसे: विसालक्खो, विसालक्खी। ๕๐. ทารุมฺยงฺคุลฺยา. ५०. लकड़ी के अर्थ में 'अङ्गुलि' शब्द होने पर। องฺคุลนฺตา อญฺญปทตฺเถ ทารุมฺหิ สมาสนฺโต อ โหติ. ทฺวงฺคุลํทารุ, ปญฺจงฺคุลํ, องฺคุลิสทิสาวยวํ ธญฺญาทีนํ วิกฺเขปกํ ทารุํ วุจฺจเต, ปมาเณ ตุ ปุพฺเพ วิย สิทฺธํ สขราชสทฺทา อการนฺตาว, สิสฺโสปิ น ทิสฺสติ, คาณฺฑี วธนฺวาติ ปกตนฺตเรน สิทฺธํ. अन्यपदार्थ में लकड़ी के अर्थ में 'अङ्गुलि' अन्त वाले शब्द का समासान्त 'अ' होता है। जैसे: द्वङ्गुलं दारु, पञ्चङ्गुलं। अङ्गुलि के समान अवयव वाली अनाज आदि फेंकने की लकड़ी को 'पञ्चङ्गुल' कहा जाता है। प्रमाण अर्थ में तो पहले की तरह ही सिद्ध है। सख, राज शब्द अकारान्त ही हैं। 'सिस्स' भी नहीं देखा जाता। 'गाण्डीव' और 'धन्वा' अन्य प्रकृति से सिद्ध होते हैं। ๕๑. จิ วีติหาเร. ५१. व्यतिहार (परस्पर क्रिया) अर्थ में 'इ' प्रत्यय। โอฆาพฺยติหาเร คมฺยมาเน อญฺญปทตฺเถ วตฺตมานโต จิ โหติ. เกสาเกสิ ทณฺฑาทณฺฑิ, จกาโร ‘‘จิสฺมิ’’นฺติ (๓.๖๖) วิเสสนตฺโถ, สุคนฺธิ, ทุคฺคนฺตีติ ปโยโค น ทิสฺสเต. व्यतिहार (परस्पर क्रिया) अर्थ प्रतीत होने पर अन्यपदार्थ में वर्तमान शब्द से 'इ' प्रत्यय होता है। जैसे: केसाकेसि, दण्डादण्डि। 'च' कार 'इ' प्रत्यय के विशेषण के लिए है। सुगन्धि, दुग्गन्धि—ऐसे प्रयोग नहीं देखे जाते। ๕๒. ลฺตฺวิตฺถิยูหิ โก. ५२. 'ल्तु' प्रत्ययान्त और स्त्रीलिंग 'ई' तथा 'ऊ' कारान्त शब्दों से 'क' प्रत्यय। ลฺตุปฺปจฺจยนฺเตหิ, อิตฺถิยมีการูการนฺเตหิ จ พหุลํ กปฺปจฺจโย โหติ อญฺญปทตฺเถ. พหุกตฺตุโก, พหุกุมาริโก, พหุพฺรหฺมพนฺธุโก, พหุลํตฺเวว? สุพฺภู. 'ल्तु' प्रत्ययान्त और स्त्रीलिंग ईकारान्त तथा ऊकारान्त शब्दों से अन्यपदार्थ में बहुलता से 'क' प्रत्यय होता है। जैसे: बहुकत्तुको, बहुकुमारिको, बहुब्रह्मबन्धुको। 'बहुलता' से क्यों? सुब्भू। ๕๓. วาญฺญโต. ५३. अन्य शब्दों से विकल्प से। อญฺเญหิ [Pg.135] อญฺญปทตฺเถ โก วา พหุลํ โหติ. พหุมาลโก, พหุมาโล. अन्य शब्दों से अन्यपदार्थ में 'क' प्रत्यय बहुलता से (विकल्प से) होता है। जैसे: बहुमालको, बहुमालो। ๕๔. อุตฺตรปเท. เอตมธิกตํ เวทิตพฺพํ. ५४. उत्तरपद होने पर। इसे अधिकार सूत्र समझना चाहिए। ๕๕. อิมสฺสิทํ. ५५. 'इम' को 'इद' आदेश। อุตฺตรปเท ปรโต อิมสฺส อิทํ โหติ. อิทมฏฺฐิตา, อิทปฺปจฺจยตา, นิคฺคหีตโลโป ปสฺส จ ทฺวิภาโว. उत्तरपद परे होने पर 'इम' शब्द को 'इद' आदेश होता है। जैसे: इदमट्ठिता, इदप्पच्चयता। यहाँ निग्गहीत का लोप और 'प' का द्वित्व हुआ है। ๕๖. ปุํ ปุมสฺส วา. ปุมสฺส ปุํ โหตุตฺตรปเท วิภาสา. ปุลฺลิงฺคํ, ปุมลิงฺคํ. ५६. 'पुम्' (pum) के स्थान पर 'पुम्' (puṃ) विकल्प से होता है। उत्तरपद के परे होने पर 'पुम' को 'पुम्' विकल्प से होता है। जैसे- पुल्लिंगं, पुमलिंगं। ๕๗. ฏนฺตนฺตูนํ. ५७. 'तन्त' और 'तू' के स्थान पर 'ट' होता है। เอสํ ฏ โหตุตฺตรปเท กฺวจิ วา. ภวมฺปติฏฺฐามยํ, ภควํมูลกา โน ธมฺมา, พหุลาธิการา ตราทีสุ จ ปเคว มหตฺตรี, รตฺตญฺญุมหตฺตํ. उत्तरपद के परे होने पर इनका 'ट' कहीं-कहीं विकल्प से होता है। जैसे- भवम्पतिट्ठामयं, भगवंमूलका नो धम्मा, बहुलाधिकार के कारण 'तरादि' प्रत्ययों में भी, जैसे- पगेव महत्तरी, रत्तञ्ञुमहत्तं। ๕๘. อ. เอสํ อ โหตุตฺตรปเท. คุณวนฺตปติฏฺโฐ-สฺมิ. ५८. 'अ'। उत्तरपद के परे होने पर इनका 'अ' होता है। जैसे- गुणवन्तपतिट्ठो-स्मि। ๕๙. มนาทฺยาปาทีนโม มเย จ. มนาทีนมาปาทีนํ จ โอ โหตุตฺตรปเท มเย จ. มโนเสฏฺฐา, มโนมยา, รโชชลฺลํ, รโชมยํ, อาโปคตํ, อาโปมยํ, อนุยนฺติ ทิโสทิสํ. ५९. 'मन' आदि और 'आप' आदि शब्दों को उत्तरपद और 'मय' प्रत्यय के परे होने पर 'ओ' होता है। जैसे- मनोसेट्ठा, मनोमया, रजोअल्लं, रजोमयं, आपोगतं, आपोमयं, अनुयन्ति दिसोदिसं। ๖๐. ปรสฺส สงฺขฺยาสุ. ६०. संख्याओं के परे होने पर 'पर' को (ओ होता है)। สงฺขฺยาสุตฺตรปเทสุ [Pg.136] ปรสฺส โอ โหติ. ปโรสตํ, ปโรสหสฺสํ, สงฺขฺยาสูติ กึ? ปรทตฺตูปชีวิโน. संख्यावाची उत्तरपदों के परे होने पर 'पर' को 'ओ' होता है। जैसे- परोसतं, परोसहस्सं। 'संख्याओं में' ऐसा क्यों कहा? जैसे- परदत्तूपजीविनो। ๖๑. ชเน ปุถสฺสุ. ६१. 'जन' शब्द के परे होने पर 'पुथ' को 'उ' होता है। ชเน อุตฺตรปเท ปุถสฺส อุ โหติ. อริเยหิ ปุถเควายํ ชโนติ ปุถุชฺชโน. 'जन' उत्तरपद के परे होने पर 'पुथ' को 'उ' होता है। जो आर्यों से पृथक जन है, वह 'पुथुज्जनो' है। ๖๒. โส ฉสฺสาหายตเน วา. ६२. 'अह' और 'आयतन' के परे होने पर 'छ' को 'स' विकल्प से होता है। อเห อายตเน จุตฺตรปเท ฉสฺส โส วา โหติ. สาหํ ฉาหํ, สฬายตนํ, ฉฬายตนํ. 'अह' और 'आयतन' उत्तरपद के परे होने पर 'छ' को 'स' विकल्प से होता है। जैसे- साहं, छाहं, सळायतनं, छळायतनं। ๖๓. ลฺตุปิตาทีนมารงรง. ६३. 'लतु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को 'आरं' और 'अरं' होता है। ลฺตุปฺปจฺจยนฺตานํ ปิตาทีนญฺจ ยถากฺกมมารงรง วา โหนฺตุตฺตรปเท, สตฺถารทสฺสนํ, กตฺตารนิทฺเทโส, มาตรปิตโร, วาตฺเวว? สตฺถุทสฺสนํ, มาตาปิตโร. उत्तरपद के परे होने पर 'लतु' प्रत्ययान्त और 'पितृ' आदि शब्दों को यथाक्रम 'आरं' और 'अरं' विकल्प से होते हैं। जैसे- सत्थारदस्सनं, कत्तारनिद्देसो, मातरपितरो। 'विकल्प से' क्यों? जैसे- सत्थुदस्सनं, मातापितरो। ๖๔. วิชฺชาโยนิสมฺพนฺธานมา ตตฺร จตฺเถ. ६४. विद्या और योनि (रक्त) सम्बन्ध वाले शब्दों में, 'च' के अर्थ में 'आ' होता है। ลฺตุปิตาทีนํ วิชฺชาสมฺพนฺธีนํ โยนิสมฺพนฺธีนํ จ เตสฺเวว ลฺตุปิตาทีสุ วิชฺชาโยนิสมฺพนฺธิสุตฺตรปเทสุ จตฺถวิสเย อา โหติ. โหตาโปตโร มาตาปิตโร, ลฺตุปิตาทีนํ ตฺเวว? ปุตฺตภาตโร, ตตฺเรติ กึ? ปิตุปิตามหา, จตฺเถติ กึ? มาตุภาตา, วิชฺชาโยนิสมฺพนฺธานนฺติ กึ? ทาตุภตฺตาโร. 'लतु' प्रत्ययान्त, पितृ आदि, विद्या-सम्बन्धी और योनि-सम्बन्धी शब्दों को, उन्हीं 'लतु', पितृ आदि विद्या-योनि सम्बन्धी उत्तरपदों के परे होने पर 'च' (द्वन्द्व समास) के विषय में 'आ' होता है। जैसे- होतापोतरो, मातापितरो। 'लतु-पितृ आदि' ही क्यों? जैसे- पुत्तभातरो। 'वहाँ' (उन्हीं के परे) क्यों? जैसे- पितुपितामहा। 'च' के अर्थ में क्यों? जैसे- मातुभाता। 'विद्या-योनि सम्बन्धी' क्यों? जैसे- दातुभत्तारो। ๖๕. ปุตฺเต. ६५. 'पुत्त' शब्द के परे होने पर। ปุตฺเต [Pg.137] อุตฺตรปเท จตฺถวิสเย ลฺตุปิตาทีนํ วิชฺชาโยนิ สมฺพนฺธานมา โหติ. ปิตาปุตฺตา, มาตาปุตฺตา. 'पुत्त' उत्तरपद के परे होने पर 'च' के विषय में 'लतु', पितृ आदि विद्या-योनि सम्बन्धी शब्दों को 'आ' होता है। जैसे- पितापुत्ता, मातापुत्ता। ๖๖. จิสฺมึ. ६६. 'चि' प्रत्यय के परे होने पर। จิปฺปจฺจยนฺเต อุตฺตรปเท อา โหติ. เกสาเกสิ, มุฏฺฐามุฏฺฐิ. 'चि' प्रत्ययान्त उत्तरपद के परे होने पर 'आ' होता है। जैसे- केसाकेसि, मुट्ठामुट्ठि। ๖๗. อิตฺถิยมฺภาสิตปุมิตฺถี ปุเมเวกตฺเถ. ६७. स्त्रीलिंग में प्रयुक्त होने वाला शब्द, यदि वह पहले पुल्लिंग में बोला गया हो, तो समान अर्थ वाले उत्तरपद के परे होने पर पुल्लिंग के समान ही होता है। อิตฺถิยํ วตฺตมาเน เอกตฺเถ สมานาธิกรเณ อุตฺตรปเท ปเร ภาสิตปุมา อิตฺถี ปุเมว โหติ. กุมารภริโย, ทีฆชงฺโฆ, ยุวชาโย, อิตฺถิยนฺติ กึ? กลฺยาณี ปธานเมสํ กลฺยาณิปฺปธานา, ภาสิตปุเมติ กึ? กญฺญาภริโย, อิตฺถีติ กึ? คามณิกุลํ ทิฏฺฐิ อสฺส คามณิทิฏฺฐิ, เอกตฺเถติ กึ? กลฺยาณิยา มาตา กลฺยาณิมาตา. स्त्रीलिंग में वर्तमान, एक ही अर्थ वाले (समानाधिकरण) उत्तरपद के परे होने पर, जो पहले पुल्लिंग में कहा गया हो, वह स्त्रीलिंग शब्द पुल्लिंग के समान हो जाता है। जैसे- कुमारभरियो, दीघजङ्घो, युवजायो। 'स्त्रीलिंग में' क्यों? जैसे- कल्याणीपधाना। 'पुल्लिंग में कहा गया' क्यों? जैसे- कञ्ञाभरियो। 'स्त्रीलिंग' क्यों? जैसे- गामणिदिट्ठि। 'एक ही अर्थ में' क्यों? जैसे- कल्याणिमाता। ๖๘. กฺวจิ ปจฺจเย. ६८. कहीं प्रत्यय होने पर। ภาสิตปุมิตฺถี ปจฺจเย กฺวจิ ปุเมว โมติ. พฺยตฺตตรา, พฺยตฺตตมา. प्रत्यय होने पर, कथित पुल्लिंग और स्त्रीलिंग शब्दों में कहीं पुल्लिंग ही होता है। जैसे- ब्यत्ततरा, ब्यत्ततमा। ๖๙. สพฺพาทโย วุตฺติมตฺเต. ६९. वृत्ति मात्र में 'सब्ब' आदि शब्द। อิตฺถิวาจกา สพฺพาทโย วุตฺติมตฺเต ปุเมว โหนฺติ. ตสฺสา มุขํ ตมฺมุขํ, ตสฺสํ ตตฺร, ตาย ตโต, ตสฺสํ เวลายํ ตทา. स्त्रीलिंग वाचक 'सब्ब' आदि शब्द वृत्ति मात्र में पुल्लिंग ही होते हैं। जैसे- तस्सा मुखं - तंमुखं, तस्सं - तत्र, ताय - ततो, तस्सं वेलायं - तदा। ๗๐. ชายาย ชยํ ปติมฺหิ. ७०. 'पति' शब्द परे होने पर 'जाया' के स्थान पर 'जय' होता है। ปติมฺหิ ปเร ชายาย ชยํ โหติ, ชยมฺปตี, ‘ชานิปตี’ติ ปกตนฺตเรน สิทฺธํ, ตถา ‘ทมฺปตี, ชมฺปตี’ติ. 'पति' शब्द परे होने पर 'जाया' के स्थान पर 'जय' होता है, जैसे- जयम्पती। 'जानिपती' यह अन्य प्रकृति से सिद्ध होता है, वैसे ही 'दम्पती' और 'जम्पती' भी। ๗๑. สญฺญายมุโททกสฺส. ७१. संज्ञा होने पर 'उदक' के स्थान पर 'उद' होता है। สญฺญายมุทกสฺสุตฺตรปเท [Pg.138] อุทาเทโส โหติ. อุทธิ, อุทปานํ. संज्ञा होने पर उत्तरपद में 'उदक' के स्थान पर 'उद' आदेश होता है। जैसे- उदधि, उदपानं। ๗๒. กุมฺภาทีสุ วา. ७२. 'कुम्भ' आदि शब्दों के परे होने पर विकल्प से (उद आदेश होता है)। กุมฺภาทีสุตฺตรปเทสุ อุทกสฺส อุทาเทโส วา โหติ. อุทกุมฺโภ อุทกกุมฺโภ, อุทปตฺโต อุทกปตฺโต, อุทพินฺธุ อุทกพินฺธุ, อากติคโณ-ยํ. 'कुम्भ' आदि उत्तरपदों के होने पर 'उदक' के स्थान पर विकल्प से 'उद' आदेश होता है। जैसे- उदकुम्भो या उदककुम्भो, उदपत्तो या उदकपत्तो, उदबिन्धु या उदकबिन्धु। यह आकृतिगण है। ๗๓. โสตาทีสูโลโป. ७३. 'सोत' आदि शब्दों के परे होने पर (उदक के 'उ' का) लोप होता है। โสตาทีสุตฺตรปเทสุ อุทกสฺส อุสฺส โลโป โหติ. ทกโสตํ, ทกรกฺขโส. 'सोत' आदि उत्तरपदों के होने पर 'उदक' के 'उ' का लोप होता है। जैसे- दकसोतं, दकरक्खसो। ๗๔. ฏ นญ สฺส. ७४. उत्तरपद होने पर 'नञ्' शब्द के स्थान पर 'अ' (ट) होता है। อุตฺตรปเท นญ สทฺทสฺส ฏ โหติ. อพฺราหฺมโณ, ญกาโร กึ? เกวลสฺส มา โหตุ ปามนปุตฺโต. उत्तरपद होने पर 'नञ्' शब्द के स्थान पर 'अ' होता है। जैसे- अब्राह्मणो। 'ञ' कार क्यों है? ताकि केवल (बिना उत्तरपद के) न हो, जैसे- पामनपुत्तो। ๗๕. อน สเร. ७५. स्वर परे होने पर (नञ् के स्थान पर) 'अन' होता है। สราโท อุตฺตรปเท นญ สทฺทสฺส อน โหติ. อนกฺขาตํ. स्वरादि उत्तरपद होने पर 'नञ्' शब्द के स्थान पर 'अन' होता है। जैसे- अनक्खातं। ๗๖. นขาทโย. ७६. 'नख' आदि शब्द। นขาทโย สทฺทา อนน ฏาเทสา นิปจฺจนฺเต. นาสฺส ขมตฺถีติ นโข, อขมญฺญํ, สญฺญาสทฺเทสุ จ นิปฺผตฺติมตฺตํ ยถากถญฺจิ กตฺตพฺพํนาสฺส กุลมถีติ นกุโล, อกุลมญฺญํ, นข นกุล นปุํสกนกฺขตฺต นาก เอวมาทิ. 'नख' आदि शब्द 'अन' और 'अ' आदेश के बिना निपातित होते हैं। 'जिसका क्षय नहीं है' वह 'नख' है, अथवा 'अखम' अन्य है। संज्ञा शब्दों में व्युत्पत्ति मात्र जैसे-तैसे करनी चाहिए। 'जिसका कुल नहीं है' वह 'नकुल' है, अथवा 'अकुल' अन्य है। नख, नकुल, नपुंसक, नक्खत्त, नाक इत्यादि। ๗๗. นโค วาปฺปาณินิ. ७७. अप्राणी अर्थ में विकल्प से 'नग' होता है। นคอิจฺจปฺปาณินิ [Pg.139] วา นิปจฺจเต. นโค รุกฺโข, นโค ปพฺพโต, อโค รุกฺโข, อโค ปพฺพโต, อปฺปาณินีติ กึ? อโค วสโล สีเตน. अप्राणी अर्थ में 'नग' शब्द विकल्प से निपातित होता है। जैसे- नगो रुक्खो, नगो पब्बतो, अगो रुक्खो, अगो पब्बतो। 'अप्राणी' क्यों? (प्राणी होने पर) अगो वसलो सीतेन। ๗๘. สหสฺส โส-ญฺญตฺเถ. ७८. अन्य अर्थ में 'सह' के स्थान पर 'स' होता है। อญฺญปทตฺถวุตฺถิมฺหิ สมาเส อุตฺตรปเท ปเร สหสฺส โส วา โหติ. สปุตฺโต, สหปุตฺโต, อญฺญตฺเถติ กึ? สห กตฺวา, สห ยุชฺฌิตฺวา. अन्यपदार्थ प्रधान समास में उत्तरपद परे होने पर 'सह' के स्थान पर विकल्प से 'स' होता है। जैसे- सपुत्तो, सहपुत्तो। 'अन्य अर्थ' में क्यों? सह कत्वा, सह युज्झित्वा। ๗๙. สญฺญายํ. ७९. संज्ञा होने पर। สหสฺสุตฺตรปเท โส โหติ สญฺญายํ. สาสฺสตฺถํ, สปลาสํ. संज्ञा होने पर उत्तरपद परे होने पर 'सह' के स्थान पर 'स' होता है। जैसे- सास्सत्थं, सपलासं। ๘๐. อปฺปจฺจกฺเข. ८०. अप्रत्यक्ष होने पर। อปฺปจฺจกฺเข คมฺยมาเน สหสฺส โส โหตุตฺตรปเท, สาคฺคิ กโปโต, สปิสาจา วาตมณฺฑลิกา. अप्रत्यक्ष अर्थ प्रतीत होने पर उत्तरपद परे होने पर 'सह' के स्थान पर 'स' होता है। जैसे- साग्गि कपोतो, सपिसाचा वातमण्डलिका। ๘๑. อกาเล สกตฺเถ. ८१. कालवाचक शब्द न होने पर और स्वार्थ में। สกตฺถปฺปธานสฺส สหสทฺทสฺส อกาเล อุตฺตรปเท โส โหติ. สมฺปนฺนํ พฺรหฺมํ สพฺรหฺมํ, สจกฺกํ นิเธหิ, สธุรํ ปาเชหิ, อกาเลติ กึ? สห ปุพฺพณฺหํ, สหาปรณฺหํ. स्वार्थ प्रधान 'सह' शब्द के स्थान पर, कालवाचक उत्तरपद न होने पर 'स' होता है। जैसे- सम्पन्नं ब्रह्मं - सब्रह्मं, सचक्कं निधेहि, सधुरं पाजेहि। 'अकाल' क्यों? सह पुब्बण्हं, सहापरण्हं। ๘๒. คนฺถนฺตาธิกฺเย. ८२. ग्रन्थ की समाप्ति और अधिकता के अर्थ में। คนฺถนฺเต [Pg.140] อาธิกฺเย จ วตฺตมานสฺส สหสฺส โส โหตุตฺตรปเท. สกลํ โชติมธีเต สมุหุตฺตํ, กาลตฺโถ อารมฺโภ, อาธิกฺเย-สโทณา ขารี, สมาสโก กหาปโณ, นิจฺจตฺโถยมารมฺโภ. ग्रन्थ की समाप्ति और अधिकता के अर्थ में वर्तमान 'सह' के स्थान पर उत्तरपद परे होने पर 'स' होता है। जैसे- सकलं जोतिमधीते समुहुत्तं, यह कालवाचक आरम्भ है। अधिकता में- सदोणा खारी, समासो कहापणो। यह नित्य अर्थ का आरम्भ है। ๘๓. สมานสฺส ปกฺขาทีสุ วา. ८३. 'पक्ष' आदि शब्दों के परे होने पर 'समान' को 'स' विकल्प से होता है। ปกฺขาทีสุตฺตรปเทสุ สมานสฺส โส โหติ วา. สปกฺโข สมานปกฺโข, สโชติ สมานโชติ, ปกฺขาทีสูติ กึ? สมานสีโล, ปกฺข, โชติ, ชนปท, รตฺติ, ปตฺตินี, ปตฺตี, นาภิ, พนฺธุ พฺรหฺมจารี, นาม, โคตฺต, รูป, ฐาน, วณฺณ, วโย, วจน, ธมฺม, ชาติย, ฆจฺจ. 'पक्ष' आदि उत्तरपदों के परे होने पर 'समान' को 'स' विकल्प से होता है। जैसे- सपक्षो-समानपक्षो, सजोति-समानजोति। 'पक्ष आदि' क्यों? जैसे- समानसीलो। पक्ष, जोति, जनपद, रत्ति, पत्तिनी, पत्ती, नाभि, बन्धु, ब्रह्मचारी, नाम, गोत्त, रूप, ठान, वण्ण, वयो, वचन, धम्म, जातिय, घच्च। ๘๔. อุทเร อิเย. ८४. 'उदर' और 'इय' प्रत्यय के परे होने पर। อุทเร อิเย ปเร ปรโต สมานสฺส โส วา โหติ. โสทริโย, สมาโนทริโย, อิเยติ กึ? สมาโนทรตา. 'उदर' और 'इय' प्रत्यय के परे होने पर 'समान' को 'स' विकल्प से होता है। जैसे- सोदरियो, समानोदरियो। 'इय' प्रत्यय क्यों? जैसे- समानोदरता। ๘๕. รีริกฺขเกสุ. ८५. 'री', 'रिक्ख' और 'क' (सदृश अर्थ वाले प्रत्ययों) के परे होने पर। เอเตสุ สมานสฺส โส โหติ. สรี, สริกฺโข, สริโส. इनके परे होने पर 'समान' को 'स' होता है। जैसे- सरी, सरिक्खो, सरिसो। ๘๖. สพฺพาทีนมา. ८६. 'सब्ब' आदि शब्दों को 'आ' होता है। รีริกฺขเกสุ สพฺพาทีนมา โหติ. ยาที, ยาทิกฺโข, ยาทิโส. 'री', 'रिक्ख' और 'क' (सदृश अर्थ वाले प्रत्ययों) के परे होने पर 'सब्ब' आदि शब्दों को 'आ' होता है। जैसे- यादी, यादिक्खो, यादिसो। ๘๗. นฺตกิมิมานํ ฏากีฏี. ८७. 'न्त', 'किं' और 'इम' शब्दों को क्रमशः 'टा', 'की' और 'टी' होता है। รีริกฺขเกสุ [Pg.141] นฺตสทฺท กึสทฺท อิมสทฺทานํ ฏากีฏี โหนฺติ ยถากฺกมํ. ภวาที, ภวาทิกฺโข, ภวาทิโส, กีที, กีทิกฺโข, กีทิโส, อีที, อีทิกฺโข, อีทิโส. 'री', 'रिक्ख' और 'क' प्रत्ययों के परे होने पर 'भवन्त' शब्द, 'किं' शब्द और 'इम' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'टा', 'की' और 'टी' आदेश होते हैं। जैसे- भवादी, भवादिक्खो, भवादिसो; कीदी, कीदिक्खो, कीदिसो; ईदी, ईदिक्खो, ईदिसो। ๘๘. ตุมฺหามฺหานํ ตาเมกสฺมึ. ८८. 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के स्थान पर एकवचन में 'ता' और 'म' आदेश होते हैं। รีริกฺขเกสุ ตุมฺหามฺหานํ ตามา โหนฺเตกสฺมึ ยถากฺกมํ. ตาที, ตาทิกฺโข, ตาทิโส, มาที, มาทิกฺโข, มาทิโส. เอกสฺมินฺติ กึ? ตุมฺหาที, อมฺหาที, ตุมฺหาทิกฺโข, อมฺหาทิกฺโข, ตุมฺหาทิโส, อมฺหาทิโส. 'री', 'रिक्ख' और 'क' प्रत्ययों के परे होने पर 'तुम्ह' और 'अम्ह' के स्थान पर एकवचन में क्रमशः 'ता' और 'मा' आदेश होते हैं। जैसे- तादी, तादिक्खो, तादिसो; मादी, मादिक्खो, मादिसो। 'एकवचन में' ऐसा क्यों कहा? तुम्हादी, अम्हादी, तुम्हादिक्खो, अम्हादिक्खो, तुम्हादिसो, अम्हादिसो। ๘๙. ตํ มมญฺญตฺร. ८९. अन्य उत्तरपद के परे होने पर 'तं' और 'मं' आदेश होते हैं। รีริกฺขกนฺตโต อญฺญสฺมึ อุตฺตรปเท ตุมฺหามฺหานเมกสฺมึ ตํมํ โหนฺติ ยถากฺกมํ, ตนฺทีปา, มนฺทีปา, ตํสรณา, มํสรณา, ตยฺโยโค, มยฺโยโคติ พินฺทุโลโป. 'री', 'रिक्ख' और 'क' के अतिरिक्त अन्य उत्तरपद के परे होने पर 'तुम्ह' और 'अम्ह' के स्थान पर एकवचन में क्रमशः 'तं' और 'मं' आदेश होते हैं। जैसे- तन्दीपा, मन्दीपा, तंसरणा, मंसरणा। 'तय्योगो', 'मय्योगो' में बिन्दु (अनुस्वार) का लोप हो जाता है। ๙๐. เวตสฺเสฏ. ९०. 'एत' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'ए' आदेश होता है। รีริกฺขเกสฺเวตสฺเสฏ วา โหติ, เอที, เอตาที, เอทิกฺโข, เอตาทิกฺโข, เอทิโส, เอตาทิโส. 'री', 'रिक्ख' और 'क' प्रत्ययों के परे होने पर 'एत' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'ए' आदेश होता है। जैसे- एदी, एतादी, एदिक्खो, एतादिक्खो, एदिसो, एतादिसो। ๙๑. วิธาทีสุ ทฺวิสฺส ทุ. ९१. 'विधा' आदि शब्दों के परे होने पर 'द्वि' के स्थान पर 'दु' होता है। ทฺวิสฺส ทุ โหติ วิธาทีสุ, ทุวิโธ, ทุปฏฺฏํ เอวมาทิ. 'विधा' आदि शब्दों के परे होने पर 'द्वि' के स्थान पर 'दु' होता है। जैसे- दुविधो, दुपट्टं इत्यादि। ๙๒. ทิ คุณาทีสุ. ९२. 'गुण' आदि शब्दों के परे होने पर 'द्वि' के स्थान पर 'दि' होता है। คุณาทีสุ ทฺวิสฺส ทิ โหติ, ทฺวิคุณํ, ทิรตฺติ, ทิคุ เอวมาทิ. 'गुण' आदि शब्दों के परे होने पर 'द्वि' के स्थान पर 'दि' होता है। जैसे- द्विगुणं, दिरत्ति, दिगु इत्यादि। ๙๓. ตีสฺว. ९३. 'ति' आदि के परे होने पर 'द्वि' के स्थान पर 'अ' होता है। ตีสุ [Pg.142] ทฺวิสฺส อโหติ. ทฺวตฺติกฺขตฺตุํ, ทฺวิตฺติปตฺตปุรา. 'ति' आदि के परे होने पर 'द्वि' के स्थान पर 'अ' होता है। जैसे- द्वत्तिक्खत्तुं, द्वित्तिपत्तपुरा। ๙๔. อา สงฺขฺยายาสตาโท-นญฺญตฺเถ. ९४. संख्यावाचक उत्तरपद के परे होने पर 'द्वि' के स्थान पर 'आ' होता है, 'सत' आदि को छोड़कर और अन्यार्थ (बहुव्रीहि) न होने पर। สงฺขฺยายมุตฺตรปเท ทฺวิสฺส อา โหติ อสตาโท อนญฺญธตฺถ. ทฺวาทส, ทฺวาวีสติ ทฺวตฺตึส, สงฺขฺยายนฺติ กึ? ทิรตฺตํ, อสตาโทติ กึ? ทิสตํ, ทิสหสฺสํ. อนญฺญตฺเถติ กึ? ทฺวิทสา. संख्यावाचक उत्तरपद के परे होने पर 'द्वि' के स्थान पर 'आ' होता है, 'सत' आदि को छोड़कर और अन्यार्थ न होने पर। जैसे- द्वादस, द्वावीसति, द्वत्तिंसा। 'संख्या' क्यों कहा? दिरत्तं। 'असत' आदि क्यों कहा? दिसतं, दिसहस्सं। 'अन्यार्थ' क्यों कहा? द्विदसा। ๙๕. ติสฺเส. ९५. 'ति' के स्थान पर 'ए' होता है। สงฺขฺยายมุตฺตรปเท ติสฺส เอ โหติ อสตาโท อนญฺญตฺเถ, เตรส, เตวีส, เตตฺตึส, สงฺขฺยายํตฺเวว? ติรตฺตํ, อสตาโทตฺเวว? ติสตํ, อนญฺญตฺเถตฺเวว? ติจตุกา. संख्यावाचक उत्तरपद के परे होने पर 'ति' के स्थान पर 'ए' होता है, 'सत' आदि को छोड़कर और अन्यार्थ न होने पर। जैसे- तेरस, तेवीस, तेत्तिंस। 'संख्या' क्यों कहा? तिरत्तं। 'असत' क्यों कहा? तिसतं। 'अन्यार्थ' क्यों कहा? तिचतुका। ๙๖. จตฺตาลีสาโท วา. ९६. 'चत्तालीस' आदि के परे होने पर विकल्प से 'ए' होता है। ติสฺเส วา โหติ จตฺตาลีสาโท, เตจตฺตาลาสํ ติจตฺตาลีสํ, เตปญฺญาสํ ติปญฺญาสํ, เตสฏฺฐิ ติสฏฺฐิ, เตสตฺตติ ติสตฺตติ, เตอสีติ ติยาสีติ, เตนวุติ ตินวุติ, อสตาโทตฺเวว? ติสตํ. 'चत्तालीस' आदि के परे होने पर 'ति' के स्थान पर विकल्प से 'ए' होता है। जैसे- तेचत्तालासं/तिचत्तालीसं, तेपञ्ञासं/तिपञ्ञासं, तेसट्ठि/तिसट्ठि, तेसत्तति/तिसत्तति, तेअसीति/तिय़ासीति, तेनवुति/तिनवुति। 'असत' क्यों कहा? तिसतं। ๙๗. ทฺวิสฺสา จ. ९७. और 'द्वि' के स्थान पर 'आ' भी होता है। อสตาโท-นญฺญตฺเถ จตฺตาลีสาโท ทฺวิสฺเส วา โหติ อา จ. ทฺเวจตฺตาลีสํ, ทฺวาจตฺตาลีสํ ทฺวิจตฺตาลีสํ, ทฺเวปญฺญาสํ, ทฺวาปญฺญาสํ ทฺวิปญฺญาสํ อิจฺจาทิ. 'सत' आदि को छोड़कर और अन्यार्थ न होने पर, 'चत्तालीस' आदि के परे होने पर 'द्वि' के स्थान पर विकल्प से 'ए' और 'आ' भी होते हैं। जैसे- द्वेचत्तालीसं, द्वाचत्तालीसं, द्विचत्तालीसं, द्वेपञ्ञासं, द्वापञ्ञासं, द्विपञ्ञासं इत्यादि। ๙๘. พาจตฺตาลีสาโท. ९८. 'चत्तालीस' आदि को छोड़कर 'द्वि' के स्थान पर 'बा' होता है। ทฺวิสฺส [Pg.143] พา วา โหติ อจตฺตาลีสาโท-นญฺญตฺเถ. พารส ทฺวาทส, พาวีสติ ทฺวาวีสติ, พตฺตึส ทฺวตฺตึส, อจตฺตาลีสาโทติ กึ? ทฺวิจตฺตาลีสํ. 'चत्तालीस' आदि को छोड़कर और अन्यार्थ न होने पर 'द्वि' के स्थान पर विकल्प से 'बा' होता है। जैसे- बारस/द्वादस, बावीसति/द्वावीसति, बत्तिंस/द्वत्तिंस। 'अचत्तालीस' आदि क्यों कहा? द्विचत्तालीसं। ๙๙. วีสติทเสสุ ปญฺจสฺส ปณฺณปนฺนา. ९९. 'वीसति' और 'दस' के परे होने पर 'पञ्च' के स्थान पर 'पण्ण' और 'पन्न' होते हैं। วีสติทเสสุ ปเรสุ ปญฺจสฺส ปณฺณปนฺนา โหนฺติ วา ยถากฺกมํ. ปณฺณวีสติ ปญฺจวีสติ, ปนฺนรสฺว ปญฺจทส. 'वीसति' और 'दस' के परे होने पर 'पञ्च' के स्थान पर विकल्प से क्रमशः 'पण्ण' और 'पन्न' होते हैं। जैसे- पण्णवीसति/पञ्चवीसति, पन्नरस/पञ्चदस। ๑๐๐. จตุสฺส จุโจ ทเส. १००. 'दस' शब्द के परे होने पर 'चतु' के स्थान पर 'चु' और 'चो' होते हैं। จตุสฺส จุโจ โหนฺติ วา ทสสทฺเท ปเร. จุทฺทส, โจทฺทส, จตุทฺทส. 'दस' शब्द के परे होने पर 'चतु' के स्थान पर विकल्प से 'चु' और 'चो' होते हैं। जैसे- चुद्दस, चोद्दस, चतुद्दस। ๑๐๑. ฉสฺส โส. १०१. 'छ' के स्थान पर 'सो' होता है। ฉสฺส โสอิจฺจยมาเทโส โหติ ทสสทฺเท ปเร. โสฬส. 'दस' शब्द के परे होने पर 'छ' के स्थान पर 'सो' यह आदेश होता है। जैसे- सोळस। ๑๐๒. เอกฏฺฐานมา. १०२. 'एक' और 'अट्ठ' के स्थान पर 'आ' होता है। เอกอฏฺฐานํ อา โหติ ทเส ปเร. เอกาทส, อฏฺฐารส. 'एक' और 'अट्ठ' के बाद 'दस' होने पर 'आ' होता है। एकादस (ग्यारह), अट्ठारस (अठारह)। ๑๐๓. ร สงฺขฺยาโต วา. १०३. संख्या में 'र' विकल्प से होता है। สงฺขฺยาโต ปรสฺส ทสสฺส ร โหติ วิภาสา. เอการส เอกาทส, พารส ทฺวาทส, ปนฺนรส ปญฺจทส, สตฺตรส สตฺตทส, อฏฺฐารส อฏฺฐาทส, ปนฺนพาเทเสสุ นิจฺจํ, อิธ น โหติ จตุทฺทส. संख्या के बाद 'दस' के स्थान पर 'र' विकल्प से होता है। एकारस-एकादस, बारस-द्वादस, पन्नरस-पञ्चदस, सत्तरस-सत्तदस, अट्ठारस-अट्ठ्ठादस। 'पन्न' और 'बा' आदेशों में यह नित्य होता है। यहाँ 'चतुद्दस' में नहीं होता। ๑๐๔. ฉตีหิ โฬ จ. १०४. 'छ' और 'ति' के बाद 'ळ' और 'र' भी होते हैं। ฉตีหิ [Pg.144] ปรสฺส ทสสฺส โฬ โหติ โร จ, โสฬส โสรส, เตฬส เตรส. 'छ' और 'ति' के बाद 'दस' के स्थान पर 'ळ' और 'र' होते हैं। सोळस-सोरस (सोलह), तेळस-तेरस (तेरह)। ๑๐๕. จตุตฺถ ตติยาน มฑฺฒุฑฺฒติยา. १०५. 'चतुर्थ' और 'तृतीय' के साथ 'अड्ढ' होने पर 'अड्ढुड्ढ' और 'अड्ढतिय' होते हैं। อฑฺฒา ปเรสํ จตุตฺถตติยานํ อุฑฺฒติยา โหนฺติ ยถากฺกมํ. อฑฺเฒน จตุตฺโถ อฑฺฒุฑฺโฒ, อฑฺเฒน ตติโย อฑฺฒติโย, กถํ อฑฺฒเตยฺโยติ? สกตฺเถ ณฺเย อุตฺตรปทวุฑฺฒิ. 'अड्ढ' के बाद 'चतुर्थ' और 'तृतीय' के स्थान पर यथाक्रम 'उड्ढ' और 'तिय' होते हैं। आधे के साथ चौथा 'अड्ढुड्ढ' (साढ़े तीन), आधे के साथ तीसरा 'अड्ढतिय' (ढाई)। 'अड्ढतेय्य' कैसे होता है? स्वार्थ में 'ण्य' प्रत्यय होने पर उत्तरपद की वृद्धि होती है। ๑๐๖. ทุติยสฺส สห ทิยฑฺฒทิวฑฺฒา. १०६. 'द्वितीय' के साथ 'दियड्ढ' और 'दिवड्ढ' होते हैं। อฑฺฒา ปรสฺส ทุติยสฺส สห อฑฺฒสทฺเทน ทิยฑฺฒทิวฑฺฒา โหนฺติ. อฑฺเฒน ทุติโย ทิยฑฺโฒ, ทิวฑฺโฒ วา. 'अड्ढ' शब्द के साथ 'द्वितीय' के स्थान पर 'दियड्ढ' और 'दिवड्ढ' होते हैं। आधे के साथ दूसरा 'दियड्ढ' या 'दिवड्ढ' (डेढ़) है। ๑๐๗. สเร กท กุสฺสุตฺตรตฺเถ. १०७. स्वर परे होने पर 'कु' के स्थान पर 'कद' होता है, यदि उत्तरपद का अर्थ कुत्सित हो। กุสฺสุตฺตรปทตฺเถ วตฺตมานสฺส สราโท อุตฺตรปเท กทาเทโส โหติ. กทนฺนํ, กทสนํ, สเรติ กึ? กุปุตฺโต, อุตฺตรตฺเถติ กึ? กุโอฑฺโฒ ราชา. कुत्सित अर्थ वाले उत्तरपद के रहते, स्वर आदि वाले उत्तरपद के परे होने पर 'कु' का 'कद' आदेश होता है। कदन्नं, कदसनं। 'स्वर' क्यों कहा? कुपुत्तो। 'उत्तरपद के अर्थ में' क्यों कहा? कुओड्ढो राजा। ๑๐๘. กาปฺปตฺเถ. १०८. 'अल्प' अर्थ में 'का' होता है। อปฺปตฺเถ วตฺตมานสฺส กุสฺส กา โหติ อุตฺตรปทตฺเถ, อปฺปกํ ลวณํ กาลวณํ. अल्प अर्थ में वर्तमान 'कु' का उत्तरपद के अर्थ में 'का' होता है। थोड़ा नमक 'कालवणं' । ๑๐๙. ปุริเส วา. १०९. 'पुरिस' शब्द परे होने पर विकल्प से होता है। กุสฺส ปุริเส กา โหติ วา. กาปุริโส กุปุริโส, อยมปฺปตฺตวิภาสา, อปฺปตฺเถ ตุ ปุพฺเพน นิจฺจํ โหติ อีสํ ปุริโส กาปุริโส. 'पुरिस' शब्द परे होने पर 'कु' का 'का' विकल्प से होता है। कापुरिसो, कुपुरिसो। यह अप्राप्त-विभाषा है। अल्प अर्थ में तो पूर्व सूत्र से नित्य होता है—थोड़ा पुरुष 'कापुरिसो' । ๑๑๐. ปุพฺพาปรชฺชสายมชฺเฌหาหสฺส ณฺโห. ११०. 'पुब्ब', 'अपर', 'अज्ज', 'साय' और 'मज्झ' के बाद 'अह' (दिन) का 'ण्ह' होता है। ปุพฺพาทีหุตฺตรปทสฺส [Pg.145] อหสฺส ณฺหาเทโส โหติ, ปุพฺพณฺโห, อปรณฺโห, อชฺชณฺโห, สายณฺโห, มชฺฌณฺโห (ปณฺโห). 'पुब्ब' आदि के बाद उत्तरपद 'अह' का 'ण्ह' आदेश होता है। पुब्बण्हो (पूर्वाह्न), अपरण्हो (अपराह्न), अज्जण्हो (आज का दिन), सायिण्हो (सायंकाल), मज्झण्हो (मध्याह्न)। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ วุตฺติยํ इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में। สมาสกณฺโฑ ตติโย. तीसरा समास काण्ड समाप्त हुआ। ๔. จตุตฺโถ กณฺโฑ (ณาทิ) ४. चतुर्थ काण्ड (णादि)। ๑. โณ วา ปจฺเจ. १. अपत्य (संतान) अर्थ में षष्ठ्यन्त नाम से विकल्प से 'ण' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา นามสฺมา วา ณปฺปจฺจโย โหติ อปจฺเจ-ภิเธยฺเย, ณกาโร วุทฺธฺยตฺโถ, เอวมญฺญตฺตาปิ, วสิฏฺฐสฺสาปจฺจํ วาสิฏฺโฐ, วาสิฏฺฐี วา, โอปคโว, โอปควี วา, เวติ วากฺยสมาสวิกปฺปนตฺถํ, ตสฺสาธิกาโร สกตฺถาวธิ. षष्ठ्यन्त नाम से अपत्य अर्थ में विकल्प से 'ण' प्रत्यय होता है। 'ण' कार वृद्धि के लिए है, अन्यत्र भी ऐसा ही है। वसिष्ठ की संतान 'वासिट्ठो' या 'वासिट्ठी', 'ओपगवो' या 'ओपगवी'। 'वा' शब्द वाक्य और समास के विकल्प के लिए है। इसका अधिकार स्वार्थ प्रत्यय तक है। ๒. วจฺฉาทิโต ณานณายนา. २. 'वच्छ' आदि से 'णान' और 'णायन' प्रत्यय होते हैं। วจฺฉาทีหิ อปจฺจปฺปจฺจยนฺเตหิ โคตฺตาทีหิ จ สทฺเทหิ ณานณายนปฺปจฺจยา วา โหนฺติ อปจฺเจ, วจฺฉาโน วจฺฉายโน, กจฺจาโน กจฺจายโน, ยาคเม กาติยาโน, โมคฺคลฺลาโน โมคฺคลฺลายโน, สากฏาโน สากฏายโน, กณฺหาโน กณฺหายโน อิจฺจาทิ. 'वच्छ' आदि अपत्य प्रत्ययान्त गोत्र आदि शब्दों से अपत्य अर्थ में 'णान' और 'णायन' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। वच्छानो-वच्छायनो, कच्चानो-कच्चायनो, 'य' आगम होने पर कातियानो, मोग्गल्लानो-मोग्गल्लायनो, साकटानो-साकटायनो, कण्हानो-कण्हायनो इत्यादि। ๓. กตฺติกาวิธวาทีหิ เณยฺยเณรา. ३. 'कत्तिका' और 'विधवा' आदि से 'णेय्य' और 'णेर' प्रत्यय होते हैं। กตฺติกาทีหิ วิธวาทีหิ จ เณยฺยเณรา วา ยถากฺกมํ โหนฺติ อปจฺเจ, กตฺติเกยฺโย, เวนเตยฺโย, ภาคิเนยฺโย อิจฺจาทิ[Pg.146], เวธเวโร, พนฺธเกโร, นาลิเกโร, สามเณโร อิจฺจาทิ. 'कत्तिका' आदि और 'विधवा' आदि से अपत्य अर्थ में यथाक्रम 'णेय्य' और 'णेर' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। कत्तिकेय्यो, वेनतेय्यो, भागिनेय्यो इत्यादि; वेधवेरो, बन्धकेरो, नालिकेरो, सामणेरो इत्यादि। ๔. ณฺยทิจฺจาทีหิ. ४. 'दिति' आदि से 'ण्य' प्रत्यय होता है। ทิติปฺปภุติหิ ณฺโย วา โหติ อปจฺเจ, เทจฺโจ, อาทิจฺโจ, โกณฺฑญฺโญ, คคฺคฺโย, ภาตพฺโพ อิจฺจาทิ. 'दिति' आदि से अपत्य अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय विकल्प से होता है। देच्चो, आदिच्चो, कोण्डञ्ञो, गग्ग्यो, भातब्बो इत्यादि। ๕. อา ณิ. ५. अकारान्त से 'णि' प्रत्यय होता है। อการนฺตโต ณิ วา โหติ อปจฺเจ, ทกฺขิ, ทตฺถิ, โทณิ. วาสวิ, วารุณิ อิจฺจาทิ. अकारान्त शब्द से अपत्य अर्थ में 'णि' प्रत्यय विकल्प से होता है। दक्खि, दत्थि, दोणि, वासवि, वारुणि इत्यादि। ๖. ราชโต ญฺโญ ชาติยํ. ६. 'राज' शब्द से जाति के अर्थ में 'ñño' प्रत्यय होता है। ราชสทฺทโต ญฺโญ วา โหติ อปจฺเจ ชาติยํ คมฺยมานายํ, ราชญฺโญ, ชาติยนฺติ กึ? ราชาปจฺจํ. 'राज' शब्द से अपत्य (संतान) और जाति का बोध होने पर 'ñño' प्रत्यय होता है, जैसे 'राजञ्ञो'। जाति के अर्थ में क्यों? 'राजापच्चं' (राजा की संतान)। ๗. ขตฺตา ยิยา. ७. 'खत्त' शब्द से 'य' और 'इय' प्रत्यय होते हैं। ขตฺตสทฺทา ยอิยา โหนฺติ อปจฺเจ ชาติยํ, ขตฺโย, ขตฺติโย, ชาติยํตฺเวว? ขตฺติ. 'खत्त' शब्द से अपत्य और जाति के अर्थ में 'य' और 'इय' प्रत्यय होते हैं, जैसे 'खत्यो', 'खत्तियो'। जाति के अर्थ में ही क्यों? 'खत्ति'। ๘. มนุโต สฺสสณ. ८. 'मनु' शब्द से 'स्स' और 'सण' प्रत्यय होते हैं। มนุสทฺทโต ชาติยํ สฺสสณ โหนฺติ อปจฺเจ, มนุสฺโส, มานุโส, อิตฺถิยํ มนุสฺสา, มานุสี, ชาติยํตฺเวว? มานโว. 'मनु' शब्द से जाति और अपत्य के अर्थ में 'स्स' और 'सण' प्रत्यय होते हैं, जैसे 'मनुस्सो', 'मानुसो'। स्त्रीलिंग में 'मनुस्सा', 'मानुसी'। जाति के अर्थ में ही क्यों? 'मानवो'। ๙. ชนปทนามสฺมา ขตฺติยา รญฺเญ จ โณ. ९. जनपद के नाम से क्षत्रिय और राजा के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। ชนปทสฺส ยํ นามํ, ตนฺนามสฺมา ขตฺติยา อปจฺเจ รญฺเญ จ โณ โหติ, ปญฺจาโล, โกสโล, มาคโธ, โอกฺกาโก, ชนปทนามสฺมาติ [Pg.147] กึ? ทาสรถิ, ขตฺติยาติ กึ? ปญฺจาลสฺส พฺราหฺมณสฺส อปจฺจํ ปญฺจาลิ. जो जनपद का नाम है, उस नाम से क्षत्रिय अपत्य और राजा के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, जैसे 'पञ्चालो', 'कोसलो', 'मागधो', 'ओक्काको'। जनपद के नाम से क्यों? 'दासरथि'। क्षत्रिय क्यों? पञ्चाल देश के ब्राह्मण की संतान 'पञ्चालि'। ๑๐. ณฺย กุรุสิวีหิ. १०. 'कुरु' और 'सिवि' शब्दों से 'ण्य' प्रत्यय होता है। กุรุสิวีหิ อปจฺเจ รญฺเญ จ ณฺโย โหติ. โกรพฺโย, เสพฺโย. 'कुरु' और 'सिवि' शब्दों से अपत्य और राजा के अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय होता है, जैसे 'कोरब्यो', 'सेब्यो'। ๑๑. ณ ราคา เตน รตฺตํ. ११. 'उससे रंगा हुआ' इस अर्थ में रंगवाचक शब्द से 'ण' प्रत्यय होता है। ราควาจิตติยนฺตโต รตฺตมิจฺเฉตสฺมึ อตฺเถ โณ โหติ, กสาเวน รตฺตํ กาสาวํ, โกสุมฺภํ, ยาลิทฺทํ, ราคาติ กึ? เทวทตฺเตน รตฺตํ วตฺถํ, อิธ กสฺมา น โหติ? ‘นีลํ ปีต’นฺติ, คุณวจนตฺตา วินาปิ เณน ณตฺถสฺสาภิธานโต. रंगवाचक तृतीयान्त शब्द से 'रंगा हुआ' इस अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, जैसे 'कसावेन रत्तं कासावं', 'कोसुम्भं', 'यालिद्दं'। रंग से क्यों? 'देवदत्तेन रत्तं वत्थं'। यहाँ क्यों नहीं होता? 'नीलं पीतं' आदि में गुणवाचक होने के कारण 'ण' के बिना ही उस अर्थ का बोध हो जाता है। ๑๒. นกฺขตฺเตนินฺทุยุตฺเตน กาเล. १२. नक्षत्रवाचक तृतीयान्त शब्द से, यदि वह चन्द्रमा से युक्त हो, तो काल के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। ตติยนฺตโต นกฺขตฺตา เตน ลกฺขิเต กาเล โณ โหติ, ตญฺเจ นกฺขตฺตมินฺทุยุตฺตํ โหติ, ผุสฺสี รตฺติ, ผุสฺสํ อหํ, นกฺขตฺเตเนติ กึ? คุรุนา ลกฺขิตา รตฺติ. อินฺทุยุตฺเตเนติ กึ? กตฺถิกาย ลกฺขิโต มุหุตฺโต, กาเลติ กึ? ผุสฺเสน ลกฺขิตา อตฺถสิทฺธิ, อชฺชกตฺติกาติ กตฺติกายุตฺเต จนฺเท กตฺติกาสทฺโท วตฺตเต. तृतीयान्त नक्षत्र शब्द से उसके द्वारा लक्षित काल के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, यदि वह नक्षत्र चन्द्रमा से युक्त हो, जैसे 'फुस्सी रत्ति', 'फुस्सं अहं'। नक्षत्र से क्यों? 'गुरुना लक्खिता रत्ति'। चन्द्रमा से युक्त क्यों? 'कत्थिकाय लक्खितो मुहुत्तो'। काल में क्यों? 'फुस्सेन लक्खिता अत्थसिद्धि'। 'अज्जकत्तिका' में कृत्तिका नक्षत्र से युक्त चन्द्रमा के लिए 'कत्तिका' शब्द प्रयुक्त होता है। ๑๓. สา-สฺส เทวตา ปุณฺณมาสี. १३. 'वह इसकी देवता है' या 'पूर्णिमा' के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। เสติ ปฐมนฺตา อสฺสาติ ฉฏฺฐฺยตฺเถ โณ ภวติ, ยํ ปฐมนฺตํ, สา เจ เทวตา ปุณฺณมาสีวา, สุคโต เทวตา อสฺสาภิ [Pg.148] โสคโต, มาหินฺโท, ยาโม, วารุโณ, ผุสฺสี ปุณฺณมาสี อสฺส สมฺพนฺธินีติ ผุสฺโส, มาโส, มาโย, ผคฺคุโน, จิตฺโต, เวสาโข. เชฏฺฐมูโล, อาสฬฺโห, สาวโณ, โปฏฺฐปาโท, อสฺสยุโช, กตฺติโก, มาคสิโร, ปุณฺณมาสีติ กึ? ผุสฺสี ปญฺจมี อสฺส, ปุณฺณมาสี จ ภตกมาสสมฺพนฺธินี น โหติ… ปุณฺโณ มา อสฺสนฺติ นิพฺพจนา, อโต เอว นิปาตนา โณ สาคโม จ, มาสสุติยาว น ปญฺจทส รตฺตาโท วิธิ. 'वह' इस प्रथमान्त शब्द से 'उसका' इस षष्ठ्यर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रथमान्त शब्द देवता या पूर्णिमा हो। जैसे 'सुगतो देवता अस्साति सोगतो', 'माहिन्दो', 'यामो', 'वारुणो'। 'फुस्सी पुण्णमासी अस्स सम्बन्धिनीति फुस्सो', 'मासो', 'मायो', 'फग्गुनो', 'चित्तो', 'वेसाखो', 'जेट्ठमूलो', 'आसळ्हो', 'सावणो', 'पोट्ठपादो', 'अस्सयुजो', 'कत्तिको', 'मागसिरो'। पूर्णिमा क्यों? 'फुस्सी पञ्चमी अस्स'। पूर्णिमा और मास के सम्बन्ध में 'पुण्णो मा अस्स' इस विग्रह से निपातन द्वारा 'ण' प्रत्यय और 'स' आगम होता है। ๑๔. ตมธีเต ตํ ชานาติ กณิกา จ. १४. 'उसको पढ़ता है' या 'उसको जानता है' इन अर्थों में 'ण' और 'णिक' प्रत्यय होते हैं। ทุติยนฺตโต ตมธีเต ตํ ชานาตีติ เอเตสฺวตฺเถสุ โณ โหติ โณ ณิโก จ, พฺยากรณมธีเต ชานาติ วา เวยฺยากรโณ, ฉนฺทโส, กมโก, ปทโก, เวนยิโก, สุตฺตนฺติโก, ทฺวิตคฺคหณํ ปุถเคว วิธานตฺถํ ชานนสฺส จ อชฺเฌนวิสยภาวทสฺสนตฺถํ ปสิทฺธูปสงฺคหตฺถํ จ. द्वितीयान्त शब्द से 'उसको पढ़ता है' या 'उसको जानता है' इन अर्थों में 'ण' और 'णिक' प्रत्यय होते हैं। जैसे 'ब्याकरणमधीते जानाति वा वेय्याकरणो', 'छन्दसो', 'कमको', 'पदको', 'वेनयिको', 'सुत्तन्तिको'। दो बार ग्रहण अलग-अलग विधान के लिए और ज्ञान के अध्ययन-विषय होने को दिखाने के लिए तथा प्रसिद्ध शब्दों के संग्रह के लिए है। ๑๕. ตสฺส วิสเย เทเส. १५. 'उसका विषय' इस अर्थ में देशवाचक शब्द से 'ण' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา วิสเย เทสรูเป โณ โหติ, วสาตีนํ วิสโย เทโส วาสาโต, เทเสติ กึ? จกฺขุสฺส วิสโย รูปํ, เทวทตฺตสฺส วิสโย-นุวาโก. षष्ठ्यन्त शब्द से देशरूपी विषय के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, जैसे 'वसातीनं विसयो देसो वासातो'। देश में क्यों? 'चक्खुस्स विसयो रूपं', 'देवदत्तस्स विसयो-नुवाको'। ๑๖. นิวาเส ตนฺนาเม. १६. 'निवास' के अर्थ में उस देश के नाम से 'ण' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา นิวาเส เทเส ตนฺนาเม โณ โหติ, สิวีนํ นิวาโส เทโส เสพฺโย, วาสาโต. षष्ठ्यन्त शब्द से निवास स्थान रूप देश के नाम के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, जैसे 'सिवीनं निवासो देसो सेब्यो', 'वासातो'। ๑๗. อทูรภเว. १७. 'समीप में होने वाले' के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา [Pg.149] อทูรภเว เทเส ตนฺนาเม โณ โหติ, วิทิสาย อทูรภวํ เวทิสํ. षष्ठ्यन्त शब्द से 'समीप में होने वाले' देश के नाम के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, जैसे 'विदिसाय अदूरभवं वेदिसं'। ๑๘. เตน นิพฺพตฺเต. १८. 'उसके द्वारा निर्मित' के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। ตติยนฺตา นิพฺพตฺเต เทเส ตนฺนาเม โณ โหติ, กุสมฺเพน นิพฺพตฺตา โกสมฺภี นครี, กากนฺที, มากนฺที, สหสฺเสน นิพฺพตฺตา สาหสฺสี ปรีขา, โหตุมฺหิ กตฺตริ กรเณ จ ยถาโยคํ ตติยา. तृतीयान्त शब्द से 'निर्मित' देश के नाम के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, जैसे 'कुसम्बेन निबत्ता कोसम्भी नगरी', 'काकन्दी', 'माकन्दी', 'सहस्सेन निबत्ता साहस्सी परीखा'। कर्ता और करण में यथासंभव तृतीया विभक्ति होती है। ๑๙. ตมีธตฺถิ. १९. 'वह यहाँ है' इस अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। ตนฺติ ปฐมนฺตา อิธาติ สตฺตมฺยตฺเถ เทเส ตนฺนาเม โณ โหติ, ยนฺตํ ปฐมนฺตมตฺถิ เจ, อุทุมฺพรา อสฺมึ เทเส สนฺตีติ โอทุมฺพโร, พาทโร, พพฺพโช. 'वह' इस प्रथमान्त शब्द से 'यहाँ' इस सप्तम्यर्थ में देश के नाम के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रथमान्त वस्तु वहाँ हो। जैसे 'उदुम्बरा अस्मिं देसे सन्तीति ओदुम्बरो', 'बादरो', 'बब्बजो'। ๒๐. ตตฺร ภเว. २०. 'वहाँ होने वाले' के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। สตฺตมฺยนฺตา ภวตฺเถ โณ โหติ, อุทเก ภโว โอทโก, โอรโส, ชานปโท, มาคโธ, กาปิลวตฺถโว, โกสมฺโพ. सप्तम्यन्त शब्द से 'होने वाले' के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, जैसे 'उदके भवो ओदको', 'ओरसो', 'जानपदो', 'मागधो', 'कापिलवत्थवो', 'कोसम्बो'। ๒๑. อชฺชาทีหิ ตโน. २१. "अज्ज" आदि शब्दों से "तनो" प्रत्यय होता है। ภวตฺเถ อชฺชาทีหิ ตโน โหติ, อชฺช ภโว อชฺชตโน, สฺวาตโน, หิยฺยตฺตโน. "होने" (भव) के अर्थ में "अज्ज" आदि शब्दों से "तनो" प्रत्यय होता है; जैसे- आज होने वाला "अज्जतनो", कल होने वाला "स्वातनो", बीते हुए कल का "हिय्यत्तनो"। ๒๒. ปุราโต โณ จ. २२. "पुरा" शब्द से "णो" और "तनो" प्रत्यय होते हैं। ปุราอิจฺจสฺมา ภวตฺเถ โณ โหติ ตโน จ, ปุราโณ, ปุราตโน. "पुरा" इस शब्द से "होने" के अर्थ में "णो" और "तनो" प्रत्यय होते हैं; जैसे- पुराणो, पुरातनो। ๒๓. อมาตฺวจฺโจ. २३. "अमा" शब्द से "अच्चो" प्रत्यय होता है। อมาสทฺทโต [Pg.150] อจฺโจ โหติ ภวตฺเถ, อมจฺโจ. "अमा" शब्द से "होने" के अर्थ में "अच्चो" प्रत्यय होता है; जैसे- अमच्चो। ๒๔. มชฺฌาทิตฺวิโม. २४. "मज्झ" आदि शब्दों से "इमो" प्रत्यय होता है। มชฺฌาทีหิ สตฺตมฺยนฺเตหิ ภวตฺเต อิโม โหติ, มชฺฌิโม, อนฺติโม. มชฺฌ, อนฺต, เหฏฺฐา, อุปริ, โอร, ปาร, ปจฺฉา, อพฺภนฺตร, ปจฺจนฺต (ปุรตฺถา, พาหิร). सप्तमी विभक्ति के अन्त वाले "मज्झ" आदि शब्दों से "होने" के अर्थ में "इमो" प्रत्यय होता है; जैसे- मज्झिमो, अन्तिमो। मज्झ, अन्त, हेट्ठा, उपरि, ओर, पार, पच्छा, अब्भन्तर, पच्चन्त (पुरत्था, बाहिर)। ๒๕. กณเณยฺยเณยฺยกยิยา. २५. "कण", "णेय्य", "णेय्यक", "य" और "इय" प्रत्यय होते हैं। สตฺตมฺยนฺตา เอเต ปจฺจยา โหนฺติ ภวตฺเถ, กณ-กุสินา รายํ ภโว โกสินารโก, มาคธโก, อารญฺญโก วิหาโร. เณยฺย-คงฺเคยฺโย, ปพฺพเตยฺโย, วาเนยฺโย. เณยฺยก-โกเลยฺยโก, พาราณเสยฺยโก, จมฺเปยฺยโก, มิถิเลยฺยโกติ เอยฺยโก. ย-คมฺโม, ทิพฺโพ. อิยคามิโย, อุทริ-โย, ทิวิโย, ปญฺจาลิโย, โพธิปกฺขิโย, โลกิโย. सप्तमी विभक्ति के अन्त वाले शब्दों से "होने" के अर्थ में ये प्रत्यय होते हैं; कण- कुसिनारा में होने वाला "कोसिनारको", मागधको, आरञ्ञको विहारो। णेय्य- गङ्गेय्यो, पब्बतेय्यो, वानेय्यो। णेय्यक- कोलेय्यको, बाराणसेय्यको, चम्पेय्यको, मिथिलेय्यको (यहाँ "एय्यको" भी होता है)। य- गम्मो, दिब्बो। इय- गामियो, उदरियो, दिवियो, पञ्चालियो, बोधिपक्खियो, लोकियो। ๒๖. ณิโก. २६. "णिको" प्रत्यय होता है। สตฺตมฺยนฺตา ภวตฺเถ ณิโก โหติ, สารทิโก ทิวโส, สารทิกา รตฺติ. सप्तमी विभक्ति के अन्त वाले शब्दों से "होने" के अर्थ में "णिको" प्रत्यय होता है; जैसे- सारदिको दिवसो, सारदिका रत्ति। ๒๗. ตมสฺส สิปฺปํ สีลํ ปณฺยํ ปหรณํ ปโยชนํ. २७. "वह उसका शिल्प, शील, पण्य (व्यापार की वस्तु), प्रहरण (शस्त्र) या प्रयोजन है" इस अर्थ में (णिको प्रत्यय होता है)। ปฐมนฺตา สิปฺปาทิวาจกา อสฺเสติฉฏฺฐิยตฺเถณิโก โหติ, วีณาวาทนํ สิปฺปมสฺส เวณิโก, โมทงฺคิโก, วํสิโก, ปํสุกู- ลธารณํ [Pg.151] สีลมสฺส ปํสุกูลิโก, เตจีวริเกว, คนฺโธปณฺยมสฺส คนฺธิโก, เตลิโก, โคฬิโก, จาโป ปหรณมสฺส จาปิโก, โตมริโก, มุคฺคริโก, อุปธิปฺปโยชนมสฺส โอปธิกํ, สาติกํ, สาหสฺสิกํ. प्रथमा विभक्ति के अन्त वाले शिल्प आदि वाचक शब्दों से "उसका" इस षष्ठी विभक्ति के अर्थ में "णिको" प्रत्यय होता है; जैसे- वीणा बजाना जिसका शिल्प है वह "वेणिको", मोदङ्गिको, वंसिको; पांसुकूल धारण करना जिसका शील है वह "पांसुकूलिको", तेचीवरिको; गन्ध जिसका पण्य है वह "गन्धिको", तेलिको, गोलिको; चाप जिसका प्रहरण है वह "चापिको", तोमरिको, मुग्गरिको; उपधि जिसका प्रयोजन है वह "ओपधिकं", सातिकं, साहस्सिकं। ๒๘. ตํ หนฺตรหติ คจฺฉตุญฺฉติ จรติ. २८. "उसको मारता है, योग्य है, जाता है, चुनता है, आचरण करता है" इन अर्थों में (णिको प्रत्यय होता है)। ทุติยนฺตา หนฺตีติ เอวมาทีสฺวตฺเถสุ ณีโก โหติ. ปกฺขีหิปกฺขิโน หนฺตีติ ปกฺขิโก, สากุนิโก, มายูริโก. มจฺเฉหิ-มจฺฉิโก, เมนิโก. มิเคหิ-มาควิโก หาริณิโก, ‘สูกริโก’ติ อิโก. สตมรหตีติ สาติกํ, สนฺทิฏฺฐิโก, เอหิปสฺสวิธึ อรหตีติ เอหิปสฺสิโก, สาหสฺสิโก, ‘สหสฺสิโย’ติ อิโย. ปรทารํ คจฺฉตีติ ปารทาริโก, มคฺคิโก, ปญฺญาสโยชนิโก. พทเร อุญฺฉตีติ พาทริโก, สามากิโก. ธมฺมํ จรตีติ ธมฺมิโก, อธมฺมิโก. द्वितीया विभक्ति के अन्त वाले शब्दों से "मारता है" आदि अर्थों में "णिको" प्रत्यय होता है। पक्षियों को मारने वाला "पक्खिको", साकुनिको, मायूरिको। मछलियों को मारने वाला "मच्छिको", मेनिको। मृगों को मारने वाला "मागविको", हारिणिको; "सूकरिको" यहाँ "इको" प्रत्यय है। सौ के योग्य "सातिकं", सन्दिठ्ठिको; "एहिपस्स" विधि के योग्य "एहिपस्सिको", साहस्सिकं; "सहस्सियो" यहाँ "इयो" प्रत्यय है। परस्त्री के पास जाने वाला "पारदारिको", मग्गिको, पञ्ञासयोजनिको। बेरों को चुनने वाला "बादरिको", सामाकिको। धर्म का आचरण करने वाला "धम्मिको", अधम्मिको। ๒๙. เตน กตํ กีตํ พทฺธมภิสงฺขตํ สํสฏฺฐํ หตํ หนฺติ ชิตํ ชยติ ทิพฺพติ ขณติ ตรติ จรติ วหติ ชีวติ. २९. "उसके द्वारा किया गया, खरीदा गया, बाँधा गया, तैयार किया गया, मिलाया गया, मारा गया, मारता है, जीता गया, जीतता है, खेलता है, खोदता है, तैरता है, चलता है, ढोता है, जीता है" इन अर्थों में (णिको प्रत्यय होता है)। ตติยนฺตา กตาทิสฺวตฺเถสุ ณิโก โหติ. กาเยน กตํ กายิกํ, วาจสิกํ, มานสิกํ, วาเตน กโต อาพาโธ วาติโก. สเตน กีตํ สาติกํ, สาหสฺสิกํ, มูลโตว, เทวทเตน กีตนฺติ น โหติ ตทตฺถาปฺปตีติยา. วรตฺตาย พทฺโธ วารตฺติโก, อายสิโก, ปาสิโก. ฆเตน อภิสงฺขตํ สํสฏฺฐํ วา ฆาติกํ, โคฬิกํ, ทาธิกํ, มาริจิกํ. ชาเลน หโต หนฺตีติ วา ชาลิโก, พาลีสิโก. อกฺเขหิ ชิตมกฺขิกํ, สาลากิกํ. อกฺเขหิ ชยติ ทิพฺพตีติ วา อกฺขิโก. ขณิตฺติยา [Pg.152] ขณตีติ ขาณิตฺติโก, กุทฺทาลิโก, เทวทตฺเตน ชิตํ, องฺคุลฺยา ขณตีติ น โหติ ตทตฺถานวคมา. อุฬุมฺเปน ตรตีติ โอฬุมฺปิโก, ‘อุฬุมฺปิโก’ติ อิโก โคปุจฺฉิโก, นาวิโก. สกเฏน จรตีติ สากฏิโก, ‘รถิโก, ปรปฺปิโก’ติ อิโก. ขนฺเธน วหตีติ ขนฺธิโก, อํสิโก, ‘สีสิโก’ติ อิโก. เวตเนน ชีวตีติ เวตนิโก, ‘ภติโก, กยิโก, วิกฺกยิโก, กยวิกฺกยิโก’ติ อิโก. तृतीया विभक्ति के अन्त वाले शब्दों से "किया गया" आदि अर्थों में "णिको" प्रत्यय होता है। काय से किया गया "कायिकं", वाचसिकं, मानसिकं; वायु से किया गया रोग "वातिको"। सौ से खरीदा गया "सातिकं", साहस्सिकं; मूलतो ही; देवदत्त द्वारा खरीदा गया यहाँ प्रत्यय नहीं होता क्योंकि वह अर्थ प्रतीत नहीं होता। वरत्ता से बाँधा गया "वारत्तिको", आयसिको, पासिको। घी से तैयार किया गया या मिलाया गया "घातिकं", गोलिको, दाधिकं, मारिचिकं। जाल से मारा गया या मारता है "जालिको", बालीसिको। पाँसों से जीता गया "अक्खिकं", सालाकिकं। पाँसों से जीतता है या खेलता है "अक्खिको"। खनित्र से खोदता है "खाणित्तिको", कुद्दालिको; देवदत्त द्वारा जीता गया, अंगुली से खोदता है यहाँ प्रत्यय नहीं होता क्योंकि वह अर्थ समझ में नहीं आता। उळुम्प से पार उतरता है "ओळुम्पिको"; "ओळुम्पिको" यहाँ "इको" प्रत्यय है, गोपच्छिको, नाविकों। छकड़े से चलता है "साकटिको"; "रथिको, परप्पिको" यहाँ "इको" प्रत्यय है। कंधे से ढोता है "खन्धिको", अंसिको; "सीसिको" यहाँ "इको" प्रत्यय है। वेतन से जीता है "वेतनिको"; "भतिको, कयिको, विक्कयिको, कयविक्कयिको" यहाँ "इको" प्रत्यय है। ๓๐. ตสฺส สํวตฺตติ. ३०. "उसके लिए संवर्तित होता है" इस अर्थ में (णिको प्रत्यय होता है)। จตุตฺถิยนฺตา สํวตฺตตีติ อสฺมึ อตฺเถ ณิโก โหติ, ปุนพฺภวาย สํวตฺตตีติ โปโนภวิโก, อิตฺถิยํ โปโน ภวิกา, โลกาย สํวตฺตตีติ โลกิโก สุฏฺฐุ อคฺโคติ สคฺโค, สคฺคาย สํวตฺตตีติ โสวคฺคิโก, สสฺโสวก ตทมินาทิปาฐา, ธนาย สํวตฺตตีติ ธญฺญํ, โย. चतुर्थी विभक्ति के अन्त वाले शब्दों से "संवर्तित होता है" इस अर्थ में "णिको" प्रत्यय होता है; जैसे- पुनर्जन्म के लिए संवर्तित होने वाला "पोनोभविको", स्त्रीलिंग में "पोनोभविका"; लोक के लिए संवर्तित होने वाला "लोकिको"; जो भली-भाँति श्रेष्ठ है वह "सग्गो", स्वर्ग के लिए संवर्तित होने वाला "सोवग्गिको"; सस्सोवक आदि पाठों से; धन के लिए संवर्तित होने वाला "धञ्ञं", यहाँ "यो" प्रत्यय है। ๓๑. ตโต สมฺภูตมาคตํ. ३१. "उससे उत्पन्न या आया हुआ" (इस अर्थ में प्रत्यय होता है)। ปญฺจมฺยนฺตา สมฺภูตมาคตนฺติ เอเตสฺวตฺเถสุ ณิโก โหติ, มาติโก สมฺภูตมาคตํ วา มตฺติกํ, เปตฺติกํ, ณฺยริยณ -ยาปิ ทิสฺสนฺติ, สุรภิโต สมฺภูตํ โสรภฺยํ, ถนโต สมฺภูตํ ถญฺญํ, ปิติโต สมฺภูโต เปตฺติโย, มาติโย, มตฺติโย, มจฺโจ วา. पंचमी विभक्ति के अन्त वाले शब्दों से 'उत्पन्न' (सम्भूत) और 'आया हुआ' (आगत) इन अर्थों में 'णिक' प्रत्यय होता है। जैसे- माता से उत्पन्न या आया हुआ 'मातिको' या 'मत्तिकं', पिता से 'पेत्तिकं'। 'ण्य', 'रिय', 'ण' भी देखे जाते हैं, जैसे- सुरभि से उत्पन्न 'सोरभ्यं', स्तन से उत्पन्न 'थञ्ञं', पिता से उत्पन्न 'पेत्तियो', 'मातियो', 'मत्तियो' या 'मच्चो'। ๓๒. ตตฺถ วสติ วิทิโต ภตฺโต นิยุตฺโต. ३२. वहाँ रहता है (वसति), जाना हुआ (विदित), भक्त (भत्त), नियुक्त (नियुत्त)। สตฺตมฺยนฺตา ตตฺถ วสตีตฺเววมาทีสฺวตฺเถสุ ณิโก โหติ. รุกฺขมูเล วสตีติ รุกฺขมูลิโก, อารญฺญิโก, โสสานิโก. โลเก วิทิโต โลกิโก. จตุมหาราเชสุ ภตฺตา จาตุมฺมหาราชิกา[Pg.153]. ทฺวาเร นิยุตฺโต โทวาริโก ทสฺโสก ตทมินาทิปาฐา, ภณฺฑาคาริโก, อิโก-นวกมฺมิโก, กิโยชาติกิโย, อนฺธกิโย. सप्तमी विभक्ति के अन्त वाले शब्दों से 'वहाँ रहता है' इत्यादि अर्थों में 'णिक' प्रत्यय होता है। जैसे- वृक्ष के मूल में रहता है - 'रुक्खमूलिको', 'आरञ्ञिको', 'सोसानिको'। लोक में विदित - 'लोकिको'। चातुमहाराजों में भक्त - 'चातुम्महाराजिका'। द्वार पर नियुक्त - 'दोवारिको'। 'दस्सोक' इत्यादि पाठों से 'भण्डागारिको', 'इको' से 'नवकम्मिको', 'कियो' से 'जातिकियो', 'अन्धकियो'। ๓๓. ตสฺสิทํ. ३३. यह उसका है (तस्सिदं)। ฉฏฺฐิยนฺตา อิทมิจฺจสฺมึ อตฺเถ ณิโก โหติ, สงฺฆสฺส อิทํ สงฺฆิกํ, ปุคฺคลิกํ, สกฺยปุตฺติโก, นาติปุตฺติโก, เชนทตฺติโก, กิเย-สกิโย, ปรกิโย, นิเย-อตฺตนิยํ, เก- สโก ราชกํ ภณฺฑํ. षष्ठी विभक्ति के अन्त वाले शब्दों से 'यह इसका है' इस अर्थ में 'णिक' प्रत्यय होता है। जैसे- संघ का यह - 'संघिकं', 'पुग्गलिकं', 'सक्यपुत्तिको', 'नातिपुत्तिको', 'जेनदत्तिको'। 'किये' से 'सकियो', 'परकियो'। 'निये' से 'अत्तलियं'। 'के' से 'सको', 'राजकं भण्डं'। ๓๔. โณ. ३४. 'ण' प्रत्यय। ฉฏฺฐิยนฺตา อิทมิจฺจสฺมึ อตฺเถ โณ โหติ, กจฺจายนสฺส อิทํ กจฺจายนํ พฺยากรณํ, โสคตํ สาสนํ, มาหิสํ มํสาทิ. षष्ठी विभक्ति के अन्त वाले शब्दों से 'यह इसका है' इस अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। जैसे- कच्चायन का यह - 'कच्चायनं' व्याकरण, 'सोगतं' शासन, 'माहिसं' मांस आदि। ๓๕. ควาทีหิ โย. ३५. 'गो' आदि शब्दों से 'य' प्रत्यय होता है। ควาทีหิ ฉฏฺฐิยนฺเตหิ อิทมิจฺจสฺมึ อตฺเถ โย โหติ, คุนฺนํ อิทํ คพฺยํ มํสาทิ, กพฺยํ, ทพฺพํ. 'गो' आदि षष्ठी विभक्ति के अन्त वाले शब्दों से 'यह इसका है' इस अर्थ में 'य' प्रत्यय होता है। जैसे- गायों का यह - 'गब्यं' मांस आदि, 'कब्यं', 'दब्बं'। ๓๖. ปิติโต ภาตริ เรยฺยณ. ३६. पिता शब्द से उसके भाई के अर्थ में 'रेय्यण' प्रत्यय होता है। ปิตุสทฺทา ตสฺส ภาตริ เรยฺยณ โหติ, ปิตุ ภาตา เปตฺเตยฺโย. पिता शब्द से उसके भाई के अर्थ में 'रेय्यण' प्रत्यय होता है; जैसे- पिता का भाई - 'पेत्तेय्यो'। ๓๗. มาติโต จ ภคินิยํ โฉ. ३७. माता और पिता शब्द से उनकी बहन के अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। มาติโต ปิติโต จ เตสํ ภคินิยํ โฉ โหติ, มาตุ ภคินี มาตุจฺฉา, ปิตุ ภคินี ปิตุจฺฉา, กถํ ‘มาตุโล’ติ ‘‘มาตุลาทิตฺวานี’’ติ นิปาตนา. माता और पिता शब्द से उनकी बहन के अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। जैसे- माता की बहन - 'मातुच्छा', पिता की बहन - 'पितुच्छा'। 'मातुलो' शब्द 'मातुलादित्वानी' इस निपातन से सिद्ध होता है। ๓๘. มาตาปิตูสฺวามโห. ३८. माता और पिता शब्दों से उनके माता-पिता के अर्थ में 'आमहो' प्रत्यय होता है। มาตาปิตูหิ [Pg.154] เตสํ มาตาปิตูสุ อามโห โหติ, มาตุ มาตา มาตามหี, มาตุ ปิตา มาตามโห, ปิตุ มาตา ปิตามหี, ปิตุ ปิตา ปิตามโห, น ยถาสงฺขฺยํ, ปจฺเจกาภิ สมฺพนฺธา. माता और पिता शब्दों से उनके माता-पिता के अर्थ में 'आमहो' प्रत्यय होता है। जैसे- माता की माता - 'मातामही', माता का पिता - 'मातामहो', पिता की माता - 'पितामही', पिता का पिता - 'पितामहो'। यहाँ यथासंख्य (क्रमशः) सम्बन्ध नहीं है, बल्कि प्रत्येक का अलग-अलग सम्बन्ध है। ๓๙. หิเต เรยฺยณ. ३९. 'हित' अर्थ में 'रेय्यण' प्रत्यय होता है। มาตาปิตูหิ หิเต เรยฺยณ โหติ, มตฺเตยฺโย, เปตฺเตยฺโย. माता और पिता शब्दों से 'हित' अर्थ में 'रेय्यण' प्रत्यय होता है। जैसे- माता के लिए हितकारी - 'मत्तेय्यो', पिता के लिए हितकारी - 'पेत्तेय्यो'। ๔๐. นินฺทาญฺญาตปฺปปฏิภาครสฺสทยาสญฺญาสุ โก. ४०. निन्दा, अज्ञात, अल्प, प्रतिभास (समानता), ह्रस्व, दया और संज्ञा इन अर्थों में 'क' प्रत्यय होता है। นินฺทาทีสฺวตฺเถยุ นามสฺมา โก โหติ, นินฺทายํ-มุณฺฑโก, สมณโก. อญฺญาเต-กสฺสายํ อสฺโสติ อสฺสโก, ปโยคสามตฺถิยา สมฺพนฺธิวิเสสานวคโมวคมฺยเต. อปฺปตฺเถเตลกํ, ฆตกํ. ปฏิภาคตฺเถ-หตฺถี วิย หตฺถิโก, อสฺสโก, พลีพทฺทโก. รสฺเส-มานุสโก, รุกฺขโก, ปิลกฺขโก. ทยายํ-ปุตฺตโก, วจฺฉโก. สญฺญายํ-โมโร วิย โมรโก. निन्दा आदि अर्थों में नाम (प्रातिपदिक) से 'क' प्रत्यय होता है। निन्दा में - 'मुण्डको', 'समणको'। अज्ञात में - 'कस्सायं अस्सोति अस्सको' (यह किसका घोड़ा है - अश्वक), प्रयोग की सामर्थ्य से विशेष सम्बन्ध का बोध न होने पर। अल्प अर्थ में - 'तेलकं', 'घतकं'। प्रतिभास (समानता) अर्थ में - हाथी के समान 'हत्थिको', 'अस्सको', 'बलीबद्दको'। ह्रस्व अर्थ में - 'मानुसको', 'रुक्खको', 'पिलक्खको'। दया अर्थ में - 'पुत्तको', 'वच्छको'। संज्ञा अर्थ में - मयूर के समान 'मोरको'। ๔๑. ตมสฺสปริมาณํ ณิโก จ. ४१. 'वह इसका परिमाण है' इस अर्थ में 'णिक' और 'क' प्रत्यय होते हैं। ปฐมนฺตา อสฺเสติ อสฺมึ อตฺเถ ณิโก โหติ โก จ ตญฺเจ ปฐมนฺตํ ปริมาณํ ภวติ, ปริมียเต เนเนติ ปริมาณํ, โทโณ ปริมาณมสฺส โทณิโก วีหิ, ขารสติโก, ขารสหสฺสิโก อาสีติโก วโย, อุปฑฺฒกายิกํ พิมฺโพหนํ, ปญฺจกํ, ฉกฺกํ. प्रथमान्त शब्द से 'यह इसका है' इस अर्थ में 'णिक' और 'क' प्रत्यय होते हैं, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण (माप) हो। जिससे मापा जाए वह परिमाण है। जैसे- द्रोण जिसका परिमाण है वह - 'दोणिको' वीहि (धान), 'खारसतिको', 'खारसहस्सिको'। अस्सी जिसकी आयु है - 'आसीतिको' वयो। आधा शरीर जिसका परिमाण है - 'उपड्ढकायिकं' बिम्बोहनं। 'पञ्चकं', 'छक्कं'। ๔๒. ยเตเตหิ ตฺตโก. ४२. 'य', 'त', 'एत' इन प्रथमान्त शब्दों से 'यह इसका है' इस षष्ठी के अर्थ में 'त्तक' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण हो। ยาทีหิ [Pg.155] ปฐมนฺเตหี อสฺเสติ ฉฏฺฐิยตฺเถ ตฺตโก โหติ, ตญฺเจ ปฐมนฺตํ ปริมาณํ ภวติ, ยํ ปริมาณมสฺส ยตฺตกํ, ตตฺตกํ, เอตฺตกํ, อาวตเก ยาวตโก, ตาวตโก (เอตาวตโก). 'य' आदि प्रथमान्त शब्दों से 'यह इसका है' इस षष्ठी के अर्थ में 'त्तक' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण हो। जैसे- जो इसका परिमाण है - 'यत्तकं', 'तत्तकं', 'एत्तकं'। 'आवतके' से 'यावतको', 'तावतको' (एतावतको)। ๔๓. สพฺพา จาวนฺตุ. ४३. 'सब्ब' और 'य' आदि प्रथमान्त शब्दों से 'यह इसका है' इस षष्ठी के अर्थ में 'आवन्तु' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण हो। สพฺพโต ปฐมนฺเตหิ ยาทีหิ จ อสฺเสติ ฉฏฺฐิยตฺเถ อาวนฺตุ โหติ, ตญฺเจ ปฐมนฺตํ ปริมาณํ ภวติ. สพฺพํ ปริมาณมสฺส สพฺพาวนฺตํ, ยาวนฺตํ, ตาวนฺตํ, เอตาวนฺตํ. 'सब्ब' और 'य' आदि प्रथमान्त शब्दों से 'यह इसका है' इस षष्ठी के अर्थ में 'आवन्तु' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण हो। जैसे- सब जिसका परिमाण है - 'सब्बावन्तं', 'यावन्तं', 'तावन्तं', 'एतावन्तं'। ๔๔. กิมฺหา รติรีวรีวตกริตฺตกา. ४४. 'किं' इस प्रथमान्त शब्द से 'यह इसका है' इस षष्ठी के अर्थ में 'रति', 'रीव', 'रीवतक' और 'रित्तक' प्रत्यय होते हैं, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण हो। กิมฺหา ปฐมนฺตา อสฺเสติ ฉฏฺฐิยตฺเถ รติรีวรีวตกริตฺตกา โหนฺติ, ตญฺเจ ปฐมนฺตํ ปริมาณํ ภวติ, กึ สงฺขฺยานํ ปริมาณเมสํ กติ เอเต, กีว, กีวตกํ, กิตฺตกํ. รีวนฺโต สภาวโต อสงฺขฺโย. 'किं' इस प्रथमान्त शब्द से 'यह इसका है' इस षष्ठी के अर्थ में 'रति', 'रीव', 'रीवतक' और 'रित्तक' प्रत्यय होते हैं, यदि वह प्रथमान्त शब्द परिमाण हो। जैसे- इनकी संख्या का परिमाण क्या है - 'कति' (रति), 'कीव' (रीव), 'कीवतकं' (रीवतक), 'कित्तकं' (रित्तक)। 'रीवन्तो' स्वभाव से असंख्यात है। ๔๕. สญฺชาตํ ตารกาทิตฺวิโต. ४५. 'तारका' आदि प्रथमान्त शब्दों से 'यह इसका है' इस षष्ठी के अर्थ में 'इत' प्रत्यय होता है, यदि वे उत्पन्न (सञ्जात) हुए हों। ตารกาทีหิ ปฐมนฺเตหิ อสฺเสติ ฉฏฺฐิยตฺเถ อิโต โหติ, เต เจ สญฺชาตา โหนฺติ, ตารกา สญฺชาตา อสฺส ตารกิตํ คคนํ, ปุปฺผิโต รุกฺโข, ปลฺลวิตา ลตา. 'तारका' आदि प्रथमान्त शब्दों से 'यह इसका है' इस षष्ठी के अर्थ में 'इत' प्रत्यय होता है, यदि वे उत्पन्न हुए हों। जैसे- तारे जिसमें उत्पन्न हुए हैं वह - 'तारकितं' गगनं, 'पुप्फितो' रुक्खो, 'पल्लविता' लता। ๔๖. มาเน มตฺโต. ४६. 'मान' (माप) अर्थ में 'मत्त' प्रत्यय होता है। ปฐมนฺตา มานวุตฺติโต อสฺเสติ อสฺมึอตฺเถ มตฺโต โหติ, ปลํ อุมฺมานมสฺส ปลมตฺตํ, หตฺโถ ปมาณมสฺส หตฺถมตฺตํ [Pg.156] สตํ มานมสฺส สตมตฺตํ, โทโณ ปริมาณมสฺส โทณมตฺตํ, อเภโทปจารา โทโณติปิ โหติ. प्रथमा विभक्ति के अन्त वाले माप-वाचक शब्दों से "उसका" इस अर्थ में "मत्तो" प्रत्यय होता है; जैसे- पल जिसका उन्मान है वह "पलमत्तं", हाथ जिसका प्रमाण है वह "हत्थमत्तं", सौ जिसका मान है वह "सतमत्तं", द्रोण जिसका परिमाण है वह "दोणमत्तं"; अभेदोपचार से "दोणो" भी होता है। ๔๗. ตคฺโฆ จุทฺธํ. ४७. ऊर्ध्व-माप के अर्थ में "तग्घो" और "मत्तो" प्रत्यय होते हैं। อุทฺธมานวุตฺติโห อสฺเสติ ฉฏฺฐิยตฺเถ ตคฺโฆ โหติ มตฺโต จ, ชณฺณุตคฺฆํ, ชณฺณุมตฺตํ. ऊर्ध्व-माप वाचक शब्दों से "उसका" इस षष्ठी विभक्ति के अर्थ में "तग्घो" और "मत्तो" प्रत्यय होते हैं; जैसे- जण्णुतग्घं, जण्णुमत्तं। ๔๘. โณ จ ปุริสา. ४८. "पुरिस" शब्द से "णो" प्रत्यय भी होता है। ปุริสา ปฐมนฺตา อุทฺธมานวุตฺติโต โณ โหติ มตฺตาทโย จ, โปริสํ, ปุริสมตฺตํ, ปุริสตคฺฆํ. प्रथमा विभक्ति के अन्त वाले "पुरिस" शब्द से ऊर्ध्व-माप के अर्थ में "णो" प्रत्यय होता है और "मत्त" आदि भी; जैसे- पोरिसं, पुरिसमत्तं, पुरिसतग्घं। ๔๙. อยูภทฺวิตีหํเส. ४९. "उभ", "द्वि" और "ति" शब्दों से "अयो" प्रत्यय होता है। อุภทฺวิตีหิ อวยววุตฺตีติ ปฐมนฺเตหิ อสฺเสติ ฉฏฺฐิยตฺเถ อโย โหติ. อุโภ อํสา อสฺส อุภยํ, ทฺวยํ, ตยํ. अवयव के अर्थ में प्रथमा विभक्ति के अन्त वाले "उभ", "द्वि" और "ति" शब्दों से "उसका" इस षष्ठी विभक्ति के अर्थ में "अयो" प्रत्यय होता है; जैसे- जिसके दोनों अंश हों वह "उभयं", द्वयं, तयं। ๕๐. สงฺขฺยาย สจฺจุตีสาสทสนฺตายาธิกาสฺมึ สวสหสฺเส โฑ. ५०. संख्यावाचक शब्दों से, जो 'स', 'चु', 'ति', 'सा', 'दस' के अन्त में न हों, 'सहस्र' के साथ अधिक होने पर 'डो' प्रत्यय होता है। สตฺยนฺตาย อุตฺยนฺตาย อีสนฺตาย อาสนฺตาย ทสนฺตาย จ สงฺขฺยาย ปฐมนฺตาย อสฺมินฺติ สตฺตมฺยตฺเถ โฑ โหติ, สา เจ สงฺขฺยา อธิกา โหติ, ยทสฺมินฺติ ตญฺเจ สตํ สหสฺสํ สตสหสฺสํ วา โหติ, วีสติ อธิกา อสฺมึ สเตติ วีสํ สตํ, เอกวีสํ สตํ, สหสฺสํ, สตสหสฺสํ วา, ตึสํ สตํ, เอกตึสํ สตํ. อุตฺยนฺตาย-นวุตํ สตํ สหสฺสํ สตสหสฺสํ วา. อีสนฺตาย จตฺตาลีสํ สตํ, สหสฺสํ, สตสหสฺสํ วา. อาสนฺตาย [Pg.157] ปญฺญาสํ สตํ, สหสฺสํ, สตสหสฺสํ วา. ทสนฺตายเอกาทสํ สตํ, สหสฺสํ, สตสหสฺสํ วา. สจฺจุตีสาสทสนฺตายาติ กึ? ฉาธิกา อสฺมึสเต. อธิเกติ กึ? ปญฺจทสหีนา อสฺมึสเต, อสฺมินฺติ กึ? วีสตฺยธิกา เอตสฺมา สตา, สตสหสฺเสติ กึ? เอกาทส อธิกา อสฺสํ วีสติยํ. सति, उति, ईसि, आसि और दसि के अंत वाली प्रथम विभक्ति की संख्याओं से 'अस्मिन्' (इसमें) इस सप्तमी के अर्थ में 'डो' प्रत्यय होता है, यदि वह संख्या अधिक हो, और जिसमें वह अधिक है, वह यदि शत (सौ), सहस्र (हजार) या शतसहस्र (लाख) हो। जैसे- 'वीसति अधिका अस्मिं सते' (इस सौ में बीस अधिक हैं) तो 'वीसं सतं' (एक सौ बीस), 'एकवीसं सतं', 'सहस्सं', 'सतसहस्सं' वा। 'तिंसं सतं', 'एकतिंसं सतं'। 'उत्यन्त' से- 'नवुतं सतं', 'सहस्सं', 'सतसहस्सं' वा। 'ईस्यन्त' से- 'चत्तालीसं सतं', 'सहस्सं', 'सतसहस्सं' वा। 'आस्यन्त' से- 'पञ्ञासं सतं', 'सहस्सं', 'सतसहस्सं' वा। 'दस्यन्त' से- 'एकादसं सतं', 'सहस्सं', 'सतसहस्सं' वा। 'सच्चुतीसासदसन्तायाति' क्यों? 'छाधिका अस्मिं सते'। 'अधिके' क्यों? 'पञ्चदसहीना अस्मिं सते'। 'अस्मिन्ति' क्यों? 'वीसत्यधिका एतस्मा सता'। 'सतसहस्सेति' क्यों? 'एकादस अधिका अस्सं वीसतियं'। ๕๑. ตสฺส ปูรเณกาทสาทิโต วา. ५१. उसके (संख्या के) पूरण (क्रमवाचक) अर्थ में 'एकादश' आदि से विकल्प से (डो प्रत्यय होता है)। ฉฏฺฐิยนฺถาเยกาทสาทิกาย สงฺขฺยาย โฑ โหติ (ตสฺส) ปูรณตฺเถ วิภาสา, สา สงฺขฺยา ปูรียเต เยน ตํ ปูรณํ, เอกาทสนฺนํ ปูรโณ เอกาทโส. เอกาทสโม, วีโส, วีสติโม, ตึโส, ตึสติโม, จตฺตาลีโส, ปญฺญาโส. षष्ठी विभक्ति वाली 'एकादश' आदि संख्याओं से उसके पूरण अर्थ में विकल्प से 'डो' प्रत्यय होता है। जिससे वह संख्या पूर्ण होती है, वह 'पूरण' है। जैसे- ग्यारह का पूरक 'एकादसो' (ग्यारहवाँ)। 'एकादसमो', 'वीसो', 'वीसतिमो', 'तिंसो', 'तिंसतिमो', 'चत्तालीसो', 'पञ्ञासो'। ๕๒. ม ปญฺจาทิกติหิ. ५२. पञ्च आदि और कति शब्द से 'म' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตาย ปญฺจาทิกาย สงฺขฺยาย กติสฺมา จ โม โหติ (ตสฺส) ปูรณตฺเถ, ปญฺจโม, สตฺตโม, อฏฺฐโม, กติโม, กติมี. षष्ठी विभक्ति वाली पञ्च आदि संख्याओं से और कति शब्द से उसके पूरण अर्थ में 'म' प्रत्यय होता है। जैसे- पञ्चमो, सत्तमो, अट्ठमो, कतिमो, कतिमी। ๕๓. สตาทีนมิจ. สตาทิกาย สงฺขฺยาย ฉฏฺฐิยนฺตาย (ตสฺส) ปูรณตฺเถ โมโหติ สตาทีนมิจานฺตาเทโส, สติโม, สหสฺสิโม. ५३. शत आदि संख्याओं से षष्ठी विभक्ति में उसके पूरण अर्थ में 'म' प्रत्यय होता है और शत आदि के अन्त्य स्वर का 'इ' आदेश होता है। जैसे- सतिमो, सहस्सिमो। ๕๔. ฉา ฏฺฐฏฺฐมา. ५४. छ (छह) शब्द से 'ट्ठ' और 'ट्ठम' प्रत्यय होते हैं। ฉสทฺทา ฏฺฐฏฺฐมา โหนฺติ ตสฺส ปูรณตฺเถ, ฉฏฺโฐ, ฉฏฺฐโม, อิตฺถิยํ ฉฏฺฐี, ฉฏฺฐมี, กถํ ‘ทุติยํ จตุตฺถ’นฺติ? ‘‘ทุติยสฺส, จตุตฺถ ตติยาน’’นฺติ นิปาตนา. छ शब्द से उसके पूरण अर्थ में 'ट्ठ' और 'ट्ठम' प्रत्यय होते हैं। जैसे- छट्ठो, छट्ठमो। स्त्रीलिंग में छट्ठी, छट्ठमी। 'दुतियं' और 'चतुत्थं' कैसे सिद्ध होते हैं? 'दुतियस्स, चतुत्थ ततियानं' इस सूत्र से निपातन से सिद्ध होते हैं। ๕๕. เอกา กากฺยสหาเย. ५५. एक शब्द से असहाय (अकेला) अर्थ में 'क' और 'आकी' प्रत्यय होते हैं। เอกสฺมา [Pg.158] อสหายตฺเถ กอากี โหนฺติ วา, เอกโก, เอกากี, เอโก. एक शब्द से असहाय अर्थ में 'क' और 'आकी' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। जैसे- एकको, एकाकी, एको। ๕๖. วจฺฉาทีหิ ตนุตฺเต ตโร. ५६. वत्स आदि शब्दों से तनुत्व (अल्पता) अर्थ में 'तर' प्रत्यय होता है। วจฺฉาทีนํ สภาวสฺส ตนุตฺเต คมฺยมาเน ตโร โหติ, สุสุตฺตสฺส ตนุตฺเต วจฺฉตโร, อิตฺถิยํ วจฺฉตรี, โยพฺพนสฺส ตนุตฺเต โอกฺขตโร, อสฺสภาวสฺส ตนุตฺเต อสฺสตโร, สามตฺถิยสฺส ตนุตฺเต อุสภตโร. वत्स आदि के स्वभाव की न्यूनता (तनुत्व) प्रतीत होने पर 'तर' प्रत्यय होता है। जैसे- सुप्त की न्यूनता में 'वच्छतरो' (बछड़ा), स्त्रीलिंग में 'वच्छतरी'। यौवन की न्यूनता में 'ओक्खतरो' (जवान बैल), अश्व-भाव की न्यूनता में 'अस्सतरो' (खच्चर), सामर्थ्य की न्यूनता में 'उसभतरो' (छोटा सांड)। ๕๗. กิมฺหา นิทฺธารเณ รตร รตมา. กึสทฺทา นิทฺธารเณ รตร รตมา โหนฺติ, กตโร ภวตํ เทวทตฺโต, กตโร ภวตํ กโฐ, กตโม ภวตํ เทวทตฺโต, กตโม ภวตํ กโฐ, ภารทฺวาชานํ กตโมสิ พฺรหฺเม. ५७. किं शब्द से निर्धारण (छाँटने) के अर्थ में 'रतर' और 'रतम' प्रत्यय होते हैं। जैसे- कतरो भवतां देवदत्तो (आप लोगों में देवदत्त कौन है?), कतरो भवतां कठो, कतमो भवतां देवदत्तो, कतमो भवतां कठो, भारद्वाजानं कतमोसि ब्रह्मे। ๕๘. เตน ทตฺเต ลิยา. ५८. तृतीयान्त शब्द से 'दत्त' (दिया गया) अर्थ में 'ल' और 'इय' प्रत्यय होते हैं। ตติยนฺตา ทตฺเต-ภิเธยฺเย ลอิยา โหนฺติ, เทเวน ทตฺโต เทวโล, เทวิโย, พฺรหฺมโล, พฺรหฺมิโย, สิวา สีวโล, สีวิโย, สิสฺส ทีโฆ. तृतीयान्त शब्द से दत्त अर्थ में 'ल' और 'इय' प्रत्यय होते हैं। जैसे- देवेन दत्तो (देव द्वारा दिया गया) - देवलो, देवियो। ब्रह्मलो, ब्रह्मियो। सिव से सीवलो, सीवियो (यहाँ इ को दीर्घ हुआ है)। ๕๙. ตสฺส ภาวกมฺเมสุ ตฺตตาตฺตนณฺยเณยฺยณิยณิยา. ५९. उसके (षष्ठी विभक्ति वाले शब्द के) भाव और कर्म अर्थ में त्त, ता, त्तन, ण्य, णेय्य, ण, इय, णिय और णिय प्रत्यय होते हैं। ฉฏฺฐิยนฺตา ภาเว กมฺเม จ ตฺตาทโย โหนฺติ พหุลํ, น จ สพฺเพ สพฺพโต โหนฺติ อญฺญตฺร ตฺตตาหิ, ภวนฺติ เอตสฺมา พุทฺธิสทฺทาภิ ภาโว สทฺทสฺส ปวตฺตินิมิตฺตํ, นีลสฺส ปฏสฺส ภาโว นีลตฺตํ [Pg.159] นีลตาภิ คุโณ ภาโว, นีลสฺส คุณสฺส ภาโว นีลตฺตํ นีลตาภิ นีลคุณชาติ, โคตฺตํ โคตาติ โคชาติ, ปาจกตฺตํ, ทณฺฑิตฺตํ, วิสาณิตฺตํ, ราชปุริสตฺตนฺติ กฺริยาทิสมฺพนฺธิตฺตํ, เทวทตฺตตฺตํ, จนฺทตฺตํ, สูริยตฺตนฺติ ตทวตฺถาวิเสสสามญฺญํ, อากาสตฺตํ, อภาวตฺตนฺติ อุปจริตเภทสามญฺญํ. ตฺตน-ปุถุชฺชนตฺตนํ, เวทนตฺตนํ, ชายตฺตนํ, ชารตฺตนํ. ณฺย-อาลสฺยํ, พฺรหฺมญฺญํ, จาปลฺยํ, เนปุญฺญํ, เปสุญฺญํ, รชฺชํ, อาธิปจฺจํ, ทายชฺชํ, เวสมฺมํ ‘เวสม’นฺติ, เกจิ, สขฺยํ, วาณิชฺชํ. เณยฺย-โสเจยฺยํ, อาธิปเตยฺยํ. ณคารวํ, ปาฏวํ, อชฺชวํ, มทฺทวํ. อิย-อธิปติยํ, ปณฺฑิติยํ, พหุสฺสุติยํ, นคฺคิยํ, สูริยํ. ณิย-อาลสิยํ, กาฬุสิยํ, มนฺทิยํทกฺขิยํ, โปโรหิติยํ, เวยฺยตฺติยํ. กถํ ‘รามณียก’นฺติ? สกตฺเถ กนฺตา เณน สิทฺธํ. กมฺมํ กิริยา, ตตฺถ อลสสฺส กมฺมํ อลสตฺตํ’ อลสตา, อลสตฺตนํ, อาลสฺยํ, อาลสิยํ วา, ‘‘สกตฺเถ’ (๔.๑๒๒) ติ สกตฺเถปิ, ยถาภุจฺจํ, การุญฺญํ, ปตฺตกลฺลํ, อากาสานญฺจํ, กายปาคุญฺญตา. षष्ठी विभक्ति वाले शब्दों से भाव और कर्म अर्थ में 'त्त' आदि प्रत्यय बहुलता से होते हैं। 'त्त' और 'ता' को छोड़कर अन्य सभी प्रत्यय सभी शब्दों से नहीं होते। शब्द की प्रवृत्ति का निमित्त ही 'भाव' कहलाता है। जैसे- नीलस्स पटस्स भावो (नीले वस्त्र का भाव) - नीलत्तं, नीलता (यहाँ गुण भाव है)। नीलस्स गुणस्स भावो - नीलत्तं, नीलता (यहाँ नील गुण की जाति भाव है)। गोत्तं, गोता (गो-जाति)। पाचकत्तं, दण्डित्तं, विसाणित्तं, राजपुरिसत्तं (क्रिया और सम्बन्ध का भाव)। देवदत्तत्तं, चन्दत्तं, सूरियत्तं (अवस्था विशेष का सामान्य भाव)। आकासत्तं, अभावत्तं (उपचारित भेद का सामान्य भाव)। त्तन से- पुथुज्जनत्तनं, वेदनत्तनं, जायत्तनं, जारत्तनं। ण्य से- आलस्यं, ब्रह्मञ्ञं, चापल्यं, नेपुञ्ञं, पेसुञ्ञं, रज्जं, आधिपच्चं, दायज्जं, वेसम्मं (कुछ लोग 'वेसम' कहते हैं), सख्यं, वाणिज्जं। णेय्य से- सोचेय्यं, आधिपतेय्यं। ण से- गारवं, पाटवं, अज्जवं, मद्दवं। इय से- अधिपतियं, पण्डितियं, बहुस्सुतियं, नग्गियं, सूरियं। णिय से- आलसियं, काळुसियं, मन्दियं, दक्खियं, पोरोहितियं, वेय्यत्तियं। 'रामणीयकं' कैसे सिद्ध होता है? स्वार्थ में 'क' और 'ण' प्रत्यय से सिद्ध होता है। 'कर्म' का अर्थ क्रिया है, जैसे- अलसस्स कम्मं (आलसी का कर्म) - अलसत्तं, अलसता, अलसत्तनं, आलस्यं या आलसियं। 'सकत्थे' (4.122) सूत्र से स्वार्थ में भी ये प्रत्यय होते हैं, जैसे- यथाभुच्चं, कारुञ्ञं, पत्तकल्लं, आकासानञ्चं, कायपागुञ्ञता। ๖๐. พฺย วทฺธทาสา วา. ६०. षष्ठी विभक्ति वाले वृद्ध और दास शब्दों से भाव और कर्म अर्थ में विकल्प से 'ब्य' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา วทฺธา ทาสา จ พฺโย วา โหติ ภาวกมฺเมสุ, วทฺธพฺยํ วทฺธตา, ทาสพฺยํ ทาสตา, กถํ ‘วทฺธว’นฺติ? เณ วาคโม. षष्ठी विभक्ति वाले वृद्ध और दास शब्दों से भाव और कर्म अर्थ में विकल्प से 'ब्य' प्रत्यय होता है। जैसे- वद्धब्यं, वद्धता। दासब्यं, दासता। 'वद्धवं' कैसे सिद्ध होता है? 'ण' प्रत्यय होने पर 'व' का आगम होता है। ๖๑. นณ ยุวา โพ จ วสฺส. ६१. युव शब्द से भाव और कर्म अर्थ में 'न' और 'ण' प्रत्यय होते हैं और उसके अन्त्य भाग का 'ब' आदेश होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา ยุวสทฺทา ภาวกมฺเมสุ นณ วา โหติ ตสฺส โพ จ, โยพฺพนํ, วาตฺเวว? ยุวตฺตํ, ยุวตา. षष्ठी विभक्ति वाले युव शब्द से भाव और कर्म अर्थ में 'न' और 'ण' प्रत्यय विकल्प से होते हैं और उसके अन्त्य भाग का 'ब' आदेश होता है। जैसे- योब्बनं। विकल्प होने से- युवत्तं, युवता। ๖๒. อณฺวาทิตฺวิโม. ६२. अणु आदि शब्दों से भाव अर्थ में विकल्प से 'इम' प्रत्यय होता है। อณุอาทีหิ [Pg.160] ฉฏฺฐิยนฺเตหิ ภาเว วา อิโม โหติ, อณิมา, ลฆิมา, มหิมา, (คริมา), กสิมา, วาตฺเวว? อณุตฺตํ อณุตา. षष्ठी विभक्ति वाले अणु आदि शब्दों से भाव अर्थ में विकल्प से 'इम' प्रत्यय होता है। जैसे- अणिमा, लघिमा, महिमा, (गरिमा), कसिमा। विकल्प होने से- अणुत्तं, अणुता। ๖๓. ภาวา เตน นิพฺพตฺเต. ६३. भाववाचक शब्दों से 'उससे उत्पन्न' अर्थ में 'इम' प्रत्यय होता है। ภาววาจกา สทฺทา เตน นิพฺพตฺเต-ภิเธยฺเย อิโม โหติ, ปาเกน นิพฺพตฺต ปาณิมํ, เสกิมํ. भाववाचक शब्दों से 'उससे उत्पन्न' अर्थ में 'इम' प्रत्यय होता है। जैसे- पाकेन निब्बत्तं (पाक से उत्पन्न) - पाणिमं, सेकिमं। ๖๔. ตรตมิสฺสิกิยิฏฺฐาติสเย. ६४. अतिशय (अधिकता) अर्थ में तर, तम, इस्सिक, इय और इट्ठ प्रत्यय होते हैं। อติสเย วตฺตมานโต โหนฺเตเต ปจฺจยา, อติสเยน ปาโป ปาปตโร, ปาปตโม, ปาปิสฺสิโก, ปาปิโย, ปาปิฏฺโฐ, อิตฺถิยํ ปาปตรา. อติสยนฺตาปิ อติสยปฺปจฺจโย, อติสเยน ปาปิฏฺโฐ ปาปิฏฺฐตโร. अतिशय अर्थ में वर्तमान शब्दों से ये प्रत्यय होते हैं। जैसे- अतिशयेन पापो (अत्यधिक पापी) - पापतरो, पापतमो, पापिस्सिको, पापियो, पापिट्ठो। स्त्रीलिंग में पापतरा। अतिशय अर्थ वाले शब्दों से भी पुनः अतिशय प्रत्यय हो सकता है, जैसे- अतिशयेन पापिट्ठो - पापिट्ठतरो। ๖๕. ตนฺนิสฺสิเต ลฺโล. ६५. उस पर आश्रित अर्थ में 'ल्ल' प्रत्यय होता है। ทุติยนฺตา ลฺลปฺปจฺจโย โหติ นิสฺสิตตฺเถ, เวทํ นิสฺสิตํ เวทลฺลํ, ทุฏฺฐุ นิสฺสิตํ ทุฏฺฐุลฺลํ. อิลฺเล-สงฺขาริลฺลํ. द्वितीयान्त शब्द से आश्रित अर्थ में 'ल्ल' प्रत्यय होता है। जैसे- वेदं निस्सितं (वेद पर आश्रित) - वेदल्लं। दुट्ठु निस्सितं - दुट्ठुल्लं। 'इल्ल' प्रत्यय से- सङ्खारिल्लं। ๖๖. ตสฺส วิการาวยเวสุ ณ ณิก เณยฺยมยา. ६६. उसके (षष्ठी विभक्ति वाले शब्द के) विकार और अवयव अर्थ में ण, णिक, णेय्य और मय प्रत्यय होते हैं। ปกติยา อุตฺตรมวตฺถนฺตรํ วิกาโร, ฉฏฺฐิยนฺตา นามสฺมา วิกาเร-วยเว จ ณาทโย โหนฺติ พหุลํ, ณ-อายสํ พนฺธนํ, โอทุมฺพรํ, ปณฺณํ, โอทุมฺพรํ ภสฺมํ, กาโปตํ มํสํ, กาโปตํ สตฺถิ. ณิก-กปฺปาสิกํ วตฺถํ. เณยฺย-เอเณยฺยํ มํสํ, เอเณยฺยํ สตฺถิ[Pg.161]. โกเสยฺยํ วตฺถํ. มย-ติณมยํ, ทารุมยํ, นฬมยํ, มตฺติกามยํ. ‘‘อญฺญสฺมิ’’นฺติ (๔.๑๒๑) คุนฺนํ กรีเสปิ มโย, โคมยํ. प्रकृति (मूल वस्तु) से उत्तर (बाद की) अवस्था का नाम 'विकार' है। षष्ठी-अन्त नाम (प्रातिपदिक) से विकार और अवयव अर्थ में 'ण' आदि प्रत्यय बहुलता से होते हैं। 'ण' प्रत्यय - लोहे का बंधन = आयस बन्धन; गूलर का (फल आदि) = औदुम्बर; पत्ता = पर्ण; गूलर की भस्म = औदुम्बर भस्म; कबूतर का मांस = कापोत मांस; कबूतर की हड्डी = कापोत अस्थि। 'णिक' प्रत्यय - कपास का वस्त्र = कार्पासिक वस्त्र। 'णेय्य' प्रत्यय - मृग (एण) का मांस = एणेय्य मांस; मृग की हड्डी = एणेय्य अस्थि; रेशमी वस्त्र = कौशेय वस्त्र। 'मय' प्रत्यय - तिनके से बना = तृणमय; लकड़ी से बना = दारुमय; नरकुल से बना = नलुमय; मिट्टी से बना = मृत्तिकामय। "अन्यस्मिन्" सूत्र से गाय के गोबर (करीष) में भी 'मय' प्रत्यय होता है = गोमय। ๖๗. ชตุโต สณ วา. ६७. 'जतु' (लाख) शब्द से विकल्प से 'सण' (प्रत्यय)। ฉฏฺฐิยนฺตา นามสฺมา ชตุโต วิการาวยเวสุ สณ วา โหติ. ชตุโน วิกาโร ชาตุสํ ชตุมยํ. ‘‘โลโป’’ติ (๔.๑๒๓) พหุลํ ปจฺจยโลโปปิ ผลปุปฺผมูเลสุ วิการาวยเวสุ, ปิยาลสฺส ผลานิ ปิยาลานิ, มลฺลิกาย ปุปฺผานิ มลฺลิกา, อุสิรสฺส มูลํ อุสีรํ, ตํ สทฺเทน วา ตทภิธานํ. षष्ठी-विभक्ति युक्त 'जतु' (लाख) शब्द से विकार (विकृति) और अवयव (अंश) के अर्थ में 'सण' प्रत्यय विकल्प से होता है। जतु का विकार = जातुसं, जतुमयं। 'लोपो' (4.123) सूत्र से फल, पुष्प और मूल रूपी विकार और अवयव के अर्थ में प्रत्यय का बहुलता से लोप भी होता है, जैसे - पियाल के फल = पियालानि, मल्लिका के पुष्प = मल्लिका, उशीर की जड़ = उशीरं, उस शब्द के द्वारा अथवा उसके कथन के द्वारा। ๖๘. สมูเห กณ ณ ณิกา. ६८. समूह के अर्थ में 'कण', 'ण' और 'णिक' प्रत्यय होते हैं। ฉฏฺฐิยนฺตา สมูเห กณ ณ ณิกา โหนฺติ โคตฺตปฺปจฺจยนฺตา. กณ-ราชญฺญกํ, มานุสฺสกํ, อุกฺขาทีหิ-โอกฺขกํ, โอฏฺฐกํ, โอรพฺภกํ, ราชกํ, ราชปุตฺตกํ, หตฺถิกํ, เธนุกํ. ณ-กากํ, ภิกฺขํ. อจิตฺตา ณิก-อาปูปิกํ, สํกุลิกํ. षष्ठी-विभक्ति युक्त शब्दों से और गोत्र प्रत्ययान्त शब्दों से समूह के अर्थ में 'कण', 'ण' और 'णिक' प्रत्यय होते हैं। कण - राज्ञक (राजाओं का समूह), मानुस्सक (मनुष्यों का समूह), उक्खादि गण से - ओक्खक, ओट्ठक, ओरब्भक, राजक, राजपुत्तक, हत्थिक, धेनुक। ण - काकं (कौओं का समूह), भिक्खं (भिक्षुओं का समूह)। अचित्त (अचेतन) शब्दों से णिक - आपूपिकं, संकुलिकं। ๖๙. ชนาทีหิ ตา. ६९. 'जन' आदि शब्दों से 'ता' प्रत्यय होता है। ชนาทีหิ ฉฏฺฐิยนฺเตหิ สมูเห ตา โหติ. ชนตา, คชตา, พนฺธุตา, คามตา, สหายตา, นาครตา. ตานฺตา สภาวโต อิตฺถิลิงฺคา, ‘มทนีย’นฺติ กรเณ-ธิกรเณ วา อนีเยน สิทฺธํ. ‘ธูมายิตตฺต’นฺติ กฺตานฺตา นามธาตุโต กฺเตน สิทฺธํ. षष्ठी-विभक्ति युक्त 'जन' आदि शब्दों से समूह के अर्थ में 'ता' प्रत्यय होता है। जनता, गज़ता, बंधुता, गामता, सहायता, नागरता। 'ता' प्रत्ययान्त शब्द स्वभाव से स्त्रीलिंग होते हैं। 'मदनीयं' शब्द करण या अधिकरण अर्थ में 'अनीय' प्रत्यय से सिद्ध होता है। 'धूमायितत्तं' शब्द नामधातु से 'क्त' प्रत्ययान्त होकर सिद्ध होता है। ๗๐. อิโย หิเต. ७०. 'हित' (कल्याण) के अर्थ में 'इय' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺตา หิเต อิโย โหติ. อุปาทานิยํ, อญฺญตฺราปิ สมาโนทเร สยิโต โสทริโย. षष्ठी-विभक्ति युक्त शब्दों से 'हित' के अर्थ में 'इय' प्रत्यय होता है। उपादानियं। अन्यत्र भी - समान उदर (पेट) में सोने वाला = सोदरियो। ๗๑. จกฺขฺวาทิโต สฺโส. ७१. 'चक्खु' (चक्षु) आदि शब्दों से 'स्स' प्रत्यय होता है। ฉฏฺฐิยนฺเตหิ [Pg.162] จกฺขุอาทีหิ หิเต สฺโส โหติ, จกฺขุสฺสํ, อายุสฺสํ. षष्ठी-विभक्ति युक्त 'चक्खु' आदि शब्दों से 'हित' के अर्थ में 'स्स' प्रत्यय होता है। चक्खुस्सं, आयुस्सं। ๗๒. ณฺโย ตตฺถ สาธุ. ७२. 'वहाँ साधु' (कुशल/योग्य) के अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय होता है। สตฺตมฺยนฺตา ตตฺถ สาธูติ อสฺมึ อตฺเถ ณฺโย โหติ. สพฺโภ, ปาริสชฺโช. สาธูติ กุสโล โยคฺโค หิโต วา. อญฺญตฺราปิ รถํ วหตีติ รจฺฉา. सप्तमी-विभक्ति युक्त शब्दों से 'वहाँ साधु' इस अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय होता है। सब्भो (सभा में साधु), पारिसज्जो (परिषद में साधु)। 'साधु' का अर्थ कुशल, योग्य या हितकारी है। अन्यत्र भी - रथ को ढोने वाली = रच्छा (रथ्या)। ๗๓. กมฺมา นิย ญฺญา. ७३. 'कम्म' (कर्म) शब्द से 'निय' और 'ञ्ञ' प्रत्यय होते हैं। สตฺตมฺยนฺตา กมฺมสทฺทา ตตฺถ สาธูภิ อสฺมึ อตฺเถ นิย ญฺญา โหนฺติ. กมฺเม สาธุ กมฺมนิยํ, กมฺมญฺญํ. सप्तमी-विभक्ति युक्त 'कम्म' शब्द से 'वहाँ साधु' इस अर्थ में 'निय' और 'ञ्ञ' प्रत्यय होते हैं। कर्म में साधु = कममनियं, कम्मञ्ञं। ๗๔. กถาทิตฺวิโก. ७४. 'कथा' आदि शब्दों से 'इक' प्रत्यय होता है। กถาทีหิ สตฺตมฺยนฺเตหิ ตตฺถ สาธูติ อสฺมึ อตฺเถ อิโก โหติ. กถิโก, ธมฺมกถิโก, สงฺคามิโก ปวาสิโก, อุปวาสิโก. सप्तमी-विभक्ति युक्त 'कथा' आदि शब्दों से 'वहाँ साधु' इस अर्थ में 'इक' प्रत्यय होता है। कथिको, धम्मकथिको, संगामिको, पवासिको, उपवासिको। ๗๕. ปถาทีหิ เณยฺโย. ७५. 'पथ' आदि शब्दों से 'णेय्य' प्रत्यय होता है। ปถาทีหิ สตฺตมฺยนฺเตหิ ตตฺถ สาธูติ อสฺมึ อตฺเถ เณ-ยฺโย โหติ, ปาเถยฺยํ สาปเตยฺยํ (อาติเถยฺยํ). सप्तमी-विभक्ति युक्त 'पथ' आदि शब्दों से 'वहाँ साधु' इस अर्थ में 'णेय्य' प्रत्यय होता है। पाथेय्यं, सापतेय्यं (आतिथेय्यं)। ๗๖. ทกฺขิณายารเห. ७६. 'दक्षिणा' के योग्य होने के अर्थ में। ทกฺขิณาสทฺทโต อรหตฺเถ เณยฺโย โหติ, ทกฺขิณํ อรหตีติ ทกฺขิเณยฺโย. 'दक्षिणा' शब्द से 'योग्य' (अर्ह) के अर्थ में 'णेय्य' प्रत्यय होता है। जो दक्षिणा के योग्य है = दक्खिणेय्यो। ๗๗. ราโย ตุมนฺตา. ७७. 'तुमन्त' (तुमुन् प्रत्ययान्त) शब्दों से 'राय' प्रत्यय होता है। ตุมนฺตโต [Pg.163] อรหตฺเถ ราโย โหติ. ฆาเตตายํ วา ฆาเตตุํ, ชาเปตายํ วา ชาเปตุํ, ปพฺพาเชตายํ วา ปพฺพาเชตุํ. 'तुमन्त' शब्दों से 'योग्य' के अर्थ में 'राय' प्रत्यय होता है। घातैतायं (मारने योग्य) या घातैतुं, जापैतायं या जापैतुं, पब्बाजैतायं या पब्बाजैतुं। ๗๘. ตเมตฺถสฺสตฺถีติ มนฺตุ. ७८. 'वह यहाँ है' या 'उसका यह है' के अर्थ में 'मन्तु' प्रत्यय होता है। ปฐมนฺตา เอตฺถ อสฺส อตฺถีติ เอเตสฺวตฺเถสุ มนฺตุ โหติ. คาโว เอตฺถ เทเส, อสฺส วา ปุริสสฺส สนฺตีติ โคมา. อตฺถีติ วตฺตมานกาโลปาทานโต ภูตาหิ ภวิสฺสนฺตีหิ วา โคหิ น โคมา. กถํ ‘โคมา อาสิ, โคมา ภวิสฺสตี’ติ? ตทาปิ วตฺตมานาหิเยว โคหิ โคมา, อาสิ ภวิสฺสตีติ ปทนฺตรา กาลนฺตรํ, อิติกรณโต วิสยนิยโม – प्रथमा-विभक्ति युक्त शब्दों से 'यहाँ है' या 'इसका है' इन अर्थों में 'मन्तु' प्रत्यय होता है। गायें इस देश में हैं, अथवा इस पुरुष की हैं = गोमा। 'अत्थि' (है) इस वर्तमान काल के ग्रहण से भूतकाल या भविष्यकाल की गायों के होने से 'गोमा' नहीं होगा। फिर 'गोमा आसि' (वह गोमान था), 'गोमा भविस्सति' (वह गोमान होगा) कैसे होता है? तब भी वर्तमान गायों के कारण ही 'गोमा' है, 'आसि' और 'भविस्सति' ये अन्य पद कालान्तर को बताते हैं। 'इति' शब्द के प्रयोग से विषय का नियम होता है - ปหูเต จ ปสํสายํ, นินฺทายญฺจาติสายเน; นิจฺจโยเค จ สํสคฺเค, โหนฺติเม มนฺตุอาทโย. प्रचुरता, प्रशंसा, निन्दा, अतिशयता, नित्ययोग और संसर्ग के अर्थ में ये 'मन्तु' आदि प्रत्यय होते हैं। โค อสฺโสติ ชาติสทฺทานํ ทพฺพาภิธานสามตฺถิยา มนฺตฺวาทโย น โหนฺติ, ตถา คุณสทฺทานํ ‘เสโต ปโฏ’ติ, เยสนฺตุ คุณสทฺทานํ ทพฺพาภิธานสามตฺถิยํ นตฺถิ, เตหิ โหนฺเตว ‘พุทฺธิมา, รูปวา, รสวา, คนฺธวา, ผสฺสวา, สทฺทวา, รสี, รสิโก, รูปี, รูปิโก, คนฺธี, คนฺธิโก’ติ. 'गो अस्सो' (गाय घोड़ा है) इत्यादि जातिवाचक शब्दों में द्रव्य के अभिधान की सामर्थ्य होने के कारण 'मन्तु' आदि प्रत्यय नहीं होते, उसी प्रकार 'सेतो पटो' (सफेद कपड़ा) इत्यादि गुणवाचक शब्दों में भी। किन्तु जिन गुणवाचक शब्दों में द्रव्य के अभिधान की सामर्थ्य नहीं है, उनसे प्रत्यय होते ही हैं, जैसे - बुद्धिमॉं, रूपवा, रसवा, गन्धवा, फस्सवा, सद्दवा, रसी, रसिको, रूपी, रूपिको, गन्धी, गन्धिको। ๗๙. วนฺตฺวาวณฺณา. ७९. अ-वर्णान्त शब्दों से 'वन्तु' प्रत्यय होता है। ปฐมนฺตโต อวณฺณนฺตา มนฺตฺวาตฺเถ วนฺตุ โหติ. สีลวา, ปญฺญวา, อวณฺณาติ กึ? สติมา พนฺธุมา. प्रथमा-विभक्ति युक्त अ-वर्णान्त (अ या आ अन्त वाले) शब्दों से 'मन्तु' के अर्थ में 'वन्तु' प्रत्यय होता है। सीलवा, पञ्ञवा। 'अ-वर्णान्त' क्यों कहा? सतिमा, बंधुमा (यहाँ इ और उ अन्त में हैं)। ๘๐. ทณฺฑาทิตฺวิกอี วา. ८०. 'दण्ड' आदि शब्दों से 'इक' और 'ई' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। ทณฺฑาทีหิ [Pg.164] อิก อี โหนฺติ วา มนฺตฺวาตฺเถ. พหุลํ วิธานา กุโตจิ ทฺเว โหนฺติ, กุโตเจกเมกํว ทณฺฑิโก ทณฺฑี ทณฺฑวา, คนฺธิโก คนฺธี คนฺธวา, รูปิโก รูปี รูปวา. (๒๘) ‘‘อุตฺตมีเณว ธนา อิโก’’, ธนิโก, ธนี ธนวา อญฺโญ. (๒๙) ‘‘อสนฺนิหิเต อตฺถา’’, อตฺถิโก อตฺถี, อญฺญตฺร อตฺถวา. (๓๐) ‘‘ตทนฺตา จ’’, ปุญฺญตฺถิโก, ปุญฺญตฺถี, (๓๑) ‘‘วณฺณนฺตา อีเยว’’ พฺรหฺมวณฺณี, เทววณฺณี, (๓๒) ‘‘หตฺถทนฺเตหิ ชาติยํ’’, หตฺถี, ทนฺตี, อญฺญตฺร หตฺถวา ทนฺตวา. (๓๓) ‘‘วณฺณโต พฺรหฺมจาริมฺหิ’’, วณฺณี พฺรหฺมจารี, วณฺณวา อญฺโญ. (๓๔) ‘‘โปกฺขราทิโต เทเส’’, โปกฺขรณี, อุปฺปลินี, กุมุทินี, ภิสินี, มุฬาลินี, สาลุกินี, กฺวจาเทเสปิ ปทุมิปิ ปทุมินี ปณฺณํ. อญฺญตฺร โปกฺขรวา หตฺถี, (๓๕) ‘‘นาวายิโก’’, นาวิโก. (๓๖) ‘‘สุขทุกฺขา อี’’, สุขี, ทุกฺขี. (๓๗) ‘‘สิขาทีหิ วา’’, สิขี, สิขาวา, มาลี, มาลาวา, สีลี, สีลวา, พลี, พลวา. (๓๘) ‘‘พลา พาหูรุปุพฺพา จ’’, พาหุพลี, อูรุพลี. दण्ड आदि शब्दों से मतुप् (अस्तित्व/स्वामित्व) के अर्थ में 'इक' और 'ई' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। बहुल विधान के कारण कहीं दो प्रत्यय होते हैं, कहीं एक-एक ही; जैसे- दण्डिको, दण्डी, दण्डवा; गन्धिको, गन्धी, गन्धवा; रूपिको, रूपी, रूपवा। (28) 'उत्तम ऋण के अर्थ में धन शब्द से इक होता है' - धनिको; धनवा, धनी अन्य अर्थों में। (29) 'असंनिहित (पास न होने) के अर्थ में' - अत्थिको, अत्थी; अन्यत्र अत्थवा। (30) 'तदन्त (उसके अन्त वाले) से भी' - पुञ्ञत्थिको, पुञ्ञत्थी। (31) 'वर्ण अन्त वाले शब्दों से ई ही होता है' - ब्रह्मवण्णी, देववण्णी। (32) 'जाति के अर्थ में हत्थ और दन्त शब्दों से' - हत्थी, दन्ती; अन्यत्र हत्थवा, दन्तवा। (33) 'ब्रह्मचारी के अर्थ में वर्ण शब्द से' - वण्णी (ब्रह्मचारी); वण्णवा अन्य अर्थों में। (34) 'देश (स्थान) के अर्थ में पोक्खर आदि से' - पोक्खरणी, उप्पलिनी, कुमुदिनी, भिसिनी, मुळालिनी, सालुकिनी; कहीं आदेश होने पर पदुमी भी, पदुमिनी (पर्ण)। अन्यत्र पोक्खरवा (हाथी)। (35) 'नाविक' - नाविको। (36) 'सुख और दुःख शब्दों से ई' - सुखी, दुक्खी। (37) 'शिखा आदि से विकल्प से' - सिखी, सिखावा; माली, मालाावा; सीली, सीलवा; बली, बलवा। (38) 'बाहु और ऊरु शब्द पूर्व में होने पर बल शब्द से' - बाहुबली, ऊरुबली। ๘๑. ตปาทีหิ สฺสี. ตปาทิโต มนฺตฺวตฺเถ วา สฺสี โหติ. ตปสฺสี, ยสสฺสี, เตชสฺสี, มนสฺสี, ปยสฺสี. วาตฺเวว? ยสวา. ८१. तप आदि शब्दों से मतुप् के अर्थ में विकल्प से 'स्सी' प्रत्यय होता है। तपस्सी, यसस्सी, तेजस्सी, मनस्सी, पयस्सी। विकल्प से क्यों? यसवा। ๘๒. มุขาทิโต โร. มุขาทีหิ มนฺตฺวตฺเถโร โหติ. มุขโร, สุสิโร, อูสโร, มธุโร, ขโร, กุญฺชโร, นครํ, (๓๙) ‘‘ทนฺตสฺสุ จ อุนฺนภทนฺเต’’, ทนฺตุโร. ८२. मुख आदि शब्दों से मतुप् के अर्थ में 'रो' प्रत्यय होता है। मुखरो, सुसिरो, ऊसरो, मधुरो, खरो, कुञ्जरो, नगरं। (39) 'उन्नत दाँत के अर्थ में दन्त शब्द से' - दन्तुरो। ๘๓. ตุนฺทฺยาทีหิ โภ. ८३. तुन्दि आदि शब्दों से 'भो' प्रत्यय होता है। ตุนฺทิอาทีหิ [Pg.165] มนฺตฺวตฺเถ โภ วา โหติ. ตุนฺทิโภ, วฏิโภ, วลิโภ. วาตฺเวว? ตุนฺทิมา. तुन्दि आदि शब्दों से मतुप् के अर्थ में विकल्प से 'भो' प्रत्यय होता है। तुन्दिभो, वटिभो, वलिभो। विकल्प से क्यों? तुन्दिमा। ๘๔. สทฺธาทิตฺวา. ८४. श्रद्धा आदि शब्दों से 'अ' प्रत्यय होता है। สทฺธาทีหิ มนฺตฺวตฺเถอ โหติ วา. สทฺโธ, ปญฺโญ, อิตฺถิยํ สทฺธา. วาตฺเวว? ปญฺญวา. श्रद्धा आदि शब्दों से मतुप् के अर्थ में विकल्प से 'अ' प्रत्यय होता है। सद्धो, पञ्ञो; स्त्रीलिंग में सद्धा। विकल्प से क्यों? पञ्ञवा। ๘๕. โณ ตปา. ८५. तप शब्द से 'ण' प्रत्यय होता है। ตปา โณ โหติ มนฺตฺวตฺเถ. ตาปโส, อิตฺถิยํ ตาปสี. तप शब्द से मतुप् के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। तापसो; स्त्रीलिंग में तापसी। ๘๖. อาลฺวภิชฺฌาทีหิ. ८६. अभिझ्झा आदि शब्दों से 'आलु' प्रत्यय होता है। อภิชฺฌาทีหิ อาลุ โหติ มนฺตฺวตฺเถ, อภิชฺฌาลุ, สีตาลุ, ธชาลุ, ทยาลุ. วาตฺเวว? ทยาวา. अभिझ्झा आदि शब्दों से मतुप् के अर्थ में 'आलु' प्रत्यय होता है। अभिझ्झालु, सीतालु, धजालु, दयालु। विकल्प से क्यों? दयावा। ๘๗. ปิจฺฉาทิตฺวิโล. ८७. पिच्छ आदि शब्दों से 'इलो' प्रत्यय होता है। ปิจฺฉาทีหิ อิโล โหติ วา มนฺตฺวตฺเถ. ปิจฺฉิโล ปิจฺฉวา, เผนิโล เผนวา, ชฏิโล ชฏาวา. กถํ ‘วาจาโล’ติ? นินฺทายมิลสฺสาทิโลเป ‘‘ปโร กฺวจี’’ติ (๑-๒๗). पिच्छ आदि शब्दों से मतुप् के अर्थ में विकल्प से 'इलो' प्रत्यय होता है। पिच्छिलो, पिच्छवा; फेनिलो, फेनवा; जटिलो, जटावा। 'वाचालो' कैसे बना? निन्दा के अर्थ में 'इल' प्रत्यय के आदि का लोप होने पर 'परो क्वचि' (1-27) सूत्र से। ๘๘. สีลาทิโต โว. ८८. शील आदि शब्दों से 'वो' प्रत्यय होता है। สีลาทีหิ โว โหติ วา มนฺตฺวตฺเถ. สีลโว สีลวา, เกสโว เกสวา, (๔๐) ‘‘อณฺณา นิจฺจํ’’ อณฺณโว. (๔๑) คาณฺฑี ราชีหิ สญฺญายํ’’ คาณฺฑีวํ ธนุ, ราชีวํ ปงฺกชํ. शील आदि शब्दों से मतुप् के अर्थ में विकल्प से 'वो' प्रत्यय होता है। सीलवो, सीलवा; केसवो, केसवा। (40) 'अण्ण शब्द से नित्य होता है' - अण्णवो। (41) 'गाण्डी और राजी शब्दों से संज्ञा के अर्थ में' - गाण्डीवं (धनुष), राजीवं (कमल)। ๘๙. มายา เมธาหิ วี. ८९. माया और मेधा शब्दों से 'वी' प्रत्यय होता है। เอเตหิ [Pg.166] ทฺวีหิ วี โหติ มนฺตฺวตฺเถ. มายาวี, เมธาวี. इन दोनों शब्दों से मतुप् के अर्थ में 'वी' प्रत्यय होता है। मायावी, मेधावी। ๙๐. สิสฺสเร อามฺยุวามี. สสทฺทา อามฺยุวามี โหนฺติ อิสฺสเร-ภิธายฺเย มนฺตฺวตฺเถ. สมสฺสตฺถีติ สามี, สุวามี. ९०. 'स' शब्द से स्वामी (ईश्वर) के अर्थ में 'आम्यु' और 'वामी' प्रत्यय होते हैं। 'स' का अर्थ 'स्व' (अपना) है, जिसका स्वामी हो वह - सामी, सुवामी। ๙๑. ลกฺขฺยา โณ อ จ. ลกฺขีสทฺทา โณ โหติ มนฺตฺวตฺเถ อ จานฺตสฺส. ณกาโรวยโว, ลกฺขโณ. ९१. लक्खी शब्द से मतुप् के अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है और अन्त्य वर्ण को 'अ' हो जाता है। 'ण' कार अवयव है - लक्खणो। ๙๒. องฺคา โน กลฺยาเณ. ९२. कल्याण (सुन्दरता) के अर्थ में अङ्ग शब्द से 'न' प्रत्यय होता है। กลฺยาเณ คมฺยมาเน องฺคสฺมา โน โหติ มนฺตฺวตฺเถ. องฺคนา. कल्याण के अर्थ में अङ्ग शब्द से मतुप् के अर्थ में 'न' प्रत्यय होता है। अङ्गना। ๙๓. โส โลมา. ९३. लोम शब्द से 'स' प्रत्यय होता है। โลมา โส โหติ มนฺตฺวตฺเถ. โลมโส, อิตฺถิยํ, โลมสา. लोम शब्द से मतुप् के अर्थ में 'स' प्रत्यय होता है। लोमसो; स्त्रीलिंग में लोमसा। ๙๔. อิมิยา. ९४. 'इम' और 'इय' प्रत्यय होते हैं। มนฺตฺวตฺเถ อิม อิยา โหนฺติ พหุลํ. ปุตฺติโม, กิตฺติโม, ปุตฺติโย, กปฺปิโย, ชฏิโย, หานภาคิโย, เสนิโย. मतुप् के अर्थ में 'इम' और 'इय' प्रत्यय बहुलता से होते हैं। पुत्तिमो, कित्तिमो, पुत्तियो, कप्पियो, जटियो, हानभागियो, सेनियो। ๙๕. โต ปญฺจมฺยา. ปญฺจมฺยนฺตา พหุลํ โต โหติ วา. คามโต อาคจฺฉติ คามสฺมา อาคจฺฉติ, โจรโต ภายติ โจเรหิ ภายติ, สตฺถโต ปริหีโน สตฺถา ปริหีโน. ९५. पञ्चमी विभक्ति के अर्थ में बहुलता से विकल्प से 'तो' प्रत्यय होता है। गामतो आगच्छति (गाँव से आता है) - गामस्मा आगच्छति; चोरतो भायति (चोर से डरता है) - चोरेहि भायति; सत्थतो परिहीनो (सार्थ/समूह से बिछुड़ा हुआ) - सत्था परिहीनो। ๙๖. อิโต-เตตฺโต กุโต. ९६. 'इतो', 'एत्तो' और 'कुतो' शब्द। โตมฺหิ [Pg.167] อิมสฺส ฏิ นิปจฺจเต, เอตสฺส ฏ เอต, กึสทฺทสฺส กุตฺตญฺจ. อิโต อิมสฺมา, อโต เอตฺโต เอตสฺมา, กุโต กสฺมา. 'तो' प्रत्यय होने पर 'इम' के स्थान पर 'इ' निपातित होता है, 'एत' के स्थान पर 'ए' और 'एत', तथा 'किं' शब्द के स्थान पर 'कु' होता है। इतो (इमस्मा), अतो, एत्तो (एतस्मा), कुतो (कस्मा)। ๙๗. อภฺยาทีหิ. อภิอาทีหิ โต โหติ. อภิโต, ปริโต, ปจฺฉโต เหฏฺฐโต. ९७. अभि आदि शब्दों से 'तो' प्रत्यय होता है। अभितो, परितो, पच्छतो, हेट्ठतो। ๙๘. อาทฺยาทีหิ. อาทิปฺปภุตีหิ โต วา โหติ, อาโท อาทิโต, มชฺฌโต อนฺตโต, ปิฏฺฐิโต, ปสฺสโต, มุขโต, ยโตทกํ ตทาทิตฺตํ, ยํ อุทกํ ตเทวาทิตฺตนฺติ อตฺโถ. ९८. आदि आदि शब्दों से विकल्प से 'तो' प्रत्यय होता है। आदो, आदितो; मज्झतो, अन्ततो, पिट्ठितो, पस्सतो, मुखतो। 'यतोदकं तदादित्तं' - जो जल है वही प्रदीप्त है, यह अर्थ है। ๙๙. สพฺพาทิโต สตฺตมฺยา ตฺรตฺตา. สพฺพาทีหิ สตฺตมฺยนฺเตหิ ตฺรตฺถา วา โหนฺติ. สพฺพตฺร สพฺพ. สพฺพสฺมึ, ยตฺร ยตฺถ ยสฺมึ. พหุลาธิการา น ตุมฺหามฺเหหิ. ९९. 'सब्बादि' (सब्ब आदि) शब्दों से सप्तमी विभक्ति के अर्थ में 'त्र' और 'त्ता' प्रत्यय होते हैं। 'सब्ब' आदि सप्तमी विभक्ति वाले शब्दों से 'त्र' और 'त्थ' विकल्प से होते हैं। 'सब्बत्र', 'सब्बत्थ' (सब्बस्मिं के अर्थ में)। 'यत्र', 'यत्थ' (यस्मिं के अर्थ में)। 'बहुला' के अधिकार के कारण 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों से ये प्रत्यय नहीं होते। ๑๐๐. กตฺเถตฺถ กุตฺราตฺร กฺเวหิธ. १००. कत्थ, एत्थ, कुत्र, अत्र, क्व, इह, इध। เอเตสทฺทา นิปจฺจนฺเต. กสฺมึ กตฺถ, กุตฺร, กฺว, เอตสฺมึ, เอตฺถ, อตฺร, อสฺมึ อิห, อิธ. ये शब्द निपातित होते हैं। 'कस्मिं' के अर्थ में 'कत्थ', 'कुत्र', 'क्व'; 'एतस्मिं' के अर्थ में 'एत्थ', 'अत्र'; 'अस्मिं' के अर्थ में 'इह', 'इध' होते हैं। ๑๐๑. ธิ สพฺพา วา. สตฺตมฺยนฺตโต สพฺพสฺมา ธิ วา โหติ. สพฺพธิ, สพฺพตฺถ. १०१. 'सब्ब' शब्द से सप्तमी के अर्थ में विकल्प से 'धि' प्रत्यय होता है। 'सब्बधि', 'सब्बत्थ'। ๑๐๒. ยา หึ. สตฺตมฺยนฺตโต ยโต หึ วา โหติ. ยหึ ยตฺร. १०२. 'य' शब्द से सप्तमी के अर्थ में विकल्प से 'हिं' प्रत्यय होता है। 'यहिं', 'यत्र'। ๑๐๓. ตา หํ จ. १०३. 'त' शब्द से 'हं' और 'हिं' भी होते हैं। สตฺตมฺยนฺตโต [Pg.168] ตโต วา หํ โหติ หึ จ. ตหํ, ตหึ, ตตฺร. सप्तमी विभक्ति के अर्थ में 'त' शब्द से विकल्प से 'हं' और 'हिं' प्रत्यय होते हैं। 'तहं', 'तहिं', 'तत्र'। ๑๐๔. กุหึ กหํ. १०४. कुहिं, कहं। กึสทฺทา สตฺตมฺยนฺตา หึ หํ นิปจฺจนฺเต กิสฺส กุกา จ. กุหึ, กหํ. กถํ ‘กุหิญฺจน’นฺติ? ‘จนํ’ อิติ นิปาตนฺตรํ ‘กุหิญฺจี’ติ เอตฺถ จิสทฺโท วิย. सप्तमी विभक्ति के अर्थ में 'किं' शब्द से 'हिं' और 'हं' प्रत्यय निपातित होते हैं और 'किं' को क्रमशः 'कु' और 'क' आदेश होते हैं। 'कुहिं', 'कहं'। 'कुहिञ्चन' कैसे बनता है? 'चनं' एक अन्य निपात है, जैसे 'कुहिञ्चि' में 'चि' शब्द है। ๑๐๕. สพฺเพกญฺญยเตหิ กาเล ทา. เอเตหิ สตฺตมฺยนฺเตหิ กาเล ทา โหติ. สพฺพสฺมึ กาเล สพฺพทา, เอกทา, อญฺญทา, ยทา, ตทา. กาเลติ กึ? สพฺพตฺถ เทเส. १०५. 'सब्ब', 'एक', 'अञ्ञ', 'य', 'त' शब्दों से काल (समय) के अर्थ में 'दा' प्रत्यय होता है। इन सप्तमी विभक्ति वाले शब्दों से काल के अर्थ में 'दा' होता है। 'सब्बस्मिं काले' (सब समय में) - 'सब्बदा', 'एकदा', 'अञ्ञदा', 'यदा', 'तदा'। 'काल' क्यों कहा गया? 'सब्बत्थ' (सब जगह) देश (स्थान) के अर्थ में है। ๑๐๖. กทา กุทา สทา ธุเนทานิ. १०६. कदा, कुदा, सदा, अधुना, इदानि। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต. กสฺมึ กาเล กทา, กุทา, สพฺพสฺมึ กาเล สทา, อิมสฺมึ กาเล อธุนา, อิทานิ. ये शब्द निपातित होते हैं। 'कस्मिं काले' के अर्थ में 'कदा', 'कुदा'; 'सब्बस्मिं काले' के अर्थ में 'सदा'; 'इमस्मिं काले' के अर्थ में 'अधुना', 'इदानि' होते हैं। ๑๐๗. อชฺช สชฺชฺวปรชฺชฺเวตรหิ กรหา. १०७. अज्ज, सज्जुक (सज्जु), अपरज्जु, एतरहि, करह। เอเตสทฺทา นิปจฺจนฺเต. ปกติปฺปจฺจโย อาเทโส กาลวิเสโสติ สพฺพเมตํ นิปาตนา ลพฺภติ, อิมสฺส โฏ ชฺโช ชาหนิ นิปจฺจเต, อสฺมึ อหนิ อชฺช. สมานสฺส สภาโว ชฺชุ จาหนิ, สมาเน อหนิ สชฺชุ. อปรสฺมา ชฺชุ, อปรสฺมึ อหนิ อปรชฺชุ. อิมสฺเสโต กาเล รหิ จ, อิมสฺมึ กาเล เอตรหิ. กึสทฺทสฺส โก รห จานชฺชตเน, กสฺมึ กาเล กรห. ये शब्द निपातित होते हैं। प्रकृति, प्रत्यय, आदेश और काल-विशेष—यह सब निपातन से प्राप्त होता है। 'इम' शब्द को 'अ' और 'अह' (दिन) के अर्थ में 'ज्ज' निपातित होता है—'अस्मिं अहनि' (आज) 'अज्ज'। 'समान' शब्द को 'स' भाव और 'अह' के अर्थ में 'ज्जु' होता है—'समाने अहनि' (उसी दिन) 'सज्जु'। 'अपर' शब्द से 'ज्जु' होता है—'अपरास्मिं अहनि' (दूसरे दिन) 'अपरज्जु'। 'इम' शब्द को 'एत' और काल के अर्थ में 'रहि' प्रत्यय होता है—'इमस्मिं काले' (इस समय) 'एतरहि'। 'किं' शब्द को 'क' आदेश और अनद्यतन (जो आज का न हो) काल में 'रह' प्रत्यय होता है—'कस्मिं काले' (किस समय) 'करह'। ๑๐๘. สพฺพาทีหิ ปยาเร ถา. १०८. 'सब्ब' आदि शब्दों से 'प्रकार' (तरह) के अर्थ में 'था' प्रत्यय होता है। สามญฺญสฺส [Pg.169] เภทโก วิเสโส ปกาโร, ตตฺถ วตฺตมาเนหิ สพฺพาทีหิ ถา โหติ. สพฺเพน ปกาเรน สพฺพถา, ยถา, ตถา. सामान्य का भेदक विशेष 'प्रकार' कहलाता है, उस अर्थ में वर्तमान 'सब्ब' आदि शब्दों से 'था' प्रत्यय होता है। 'सब्बेन पकारेण' (सब प्रकार से) 'सब्बथा', 'यथा', 'तथा'। ๑๐๙. กถมิตฺถํ. १०९. कथं, इत्थं। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต ปกาเร. กิมิเมหิ ถํ ปจฺจโย, กอิต จ เตสํ ยถากฺกมํ, กถํ, อิตฺถํ. ये शब्द 'प्रकार' के अर्थ में निपातित होते हैं। 'किं' और 'इम' शब्दों से 'थं' प्रत्यय होता है और उन्हें क्रमशः 'क' और 'इ' आदेश होते हैं—'कथं', 'इत्थं'। ๑๑๐. ธา สงฺขฺยาหิ. ११०. संख्याओं से 'प्रकार' के अर्थ में 'धा' प्रत्यय होता है। สงฺขฺยาวาจีหิ ปกาเร ธา ปรา โหติ. ทฺวีหิ ปกาเรหิ, ทฺเว วา ปกาเร กโรติ ทฺวิธา กโรติ, พหุธา กโรติ, เอกํ ราสึ ปญฺจปฺปการํ กโรติ ปญฺจธา กโรติ, ปญฺจปฺปการเมกปฺปการํ กโรติ เอกธา กโรติ. संख्यावाचक शब्दों से 'प्रकार' के अर्थ में 'धा' प्रत्यय बाद में आता है। 'द्वीहि पकारेहि' (दो प्रकारों से) या 'दो प्रकार करता है'—'द्विधा करोति', 'बहुधा करोति'। एक राशि को पाँच प्रकार का करता है—'पञ्चधा करोति'। पाँच प्रकारों को एक प्रकार का करता है—'एकधा करोति'। ๑๑๑. เวกา ชฺฌํ. १११. 'एक' शब्द से प्रकार के अर्थ में विकल्प से 'ज्झं' प्रत्यय होता है। เอกสฺมา ปกเร ชฺฌํ วา โหติ. เอกชฺฌํ กโรติ, เอกธา, กโรติ. 'एक' शब्द से प्रकार के अर्थ में विकल्प से 'ज्झं' प्रत्यय होता है। 'एकज्झं करोति', 'एकधा करोति'। ๑๑๒. ทฺวิตีเหธา. ११२. 'द्वि' और 'ति' शब्दों से प्रकार के अर्थ में विकल्प से 'एधा' प्रत्यय होता है। ทฺวิตีหิ ปกาเร เอธา วา โหติ. ทฺเวธา, เตธา, ทฺวิธา, ติธา. 'द्वि' और 'ति' शब्दों से प्रकार के अर्थ में विकल्प से 'एधा' प्रत्यय होता है। 'द्वेधा', 'तेधा', 'द्विधा', 'तिधा'। ๑๑๓. ตพฺพติ ชาติโย. ११३. 'तद्वति' (उस प्रकार वाले) अर्थ में 'जातियो' प्रत्यय होता है। ปการวติ ตํสามญฺญวาจกา สทฺทา ชาติโย โหติ, ปฏุชาติโย, มุทุชาติโย. प्रकार वाले अर्थ में उस सामान्य के वाचक शब्दों से 'जातियो' प्रत्यय होता है। 'पटुजातियो' (चतुर जैसा), 'मुदुजातियो' (कोमल जैसा)। ๑๑๔. วารสงฺขฺยาย กฺขตฺตุํ. ११४. बार (आवृत्ति) से संबंधित संख्या से 'क्खत्तुं' प्रत्यय होता है। วารสมฺพนฺธินิยา [Pg.170] สงฺขฺยาย กฺขตฺตุํ โหติ. ทฺเว วาเร ภุญฺชติ ทฺวิกฺขตฺตุํ ทิวสสฺส ภุญฺชติ. วารคฺคหณํ กึ? ปญฺจ ภุญฺชติ. สงฺขฺยายาติ กึ? ปหูเต วาเร ภุญฺชติ. बार (आवृत्ति) से संबंधित संख्या से 'क्खत्तुं' प्रत्यय होता है। 'द्वे वारे भुञ्जति' (दो बार खाता है)—'द्विक्खत्तुं दिवसस्स भुञ्जति' (दिन में दो बार खाता है)। 'वार' (बार) का ग्रहण क्यों किया गया? 'पञ्च भुञ्जति' (पाँच खाता है—यहाँ आवृत्ति नहीं है)। 'संख्या' क्यों कहा गया? 'पहूते वारे भुञ्जति' (बहुत बार खाता है—यहाँ संख्या नहीं है)। ๑๑๕. กติมฺหา. ११५. 'कति' शब्द से। วารสมฺพนฺธินิยา กติสงฺขฺยาย กฺขตฺตุํ โหติ, กติ วาเร, ภุญฺชถิ, กติกฺขตฺตุํ ภุญฺชติ. बार से संबंधित 'कति' संख्या से 'क्खत्तुं' प्रत्यय होता है। 'कति वारे भुञ्जति' (कितनी बार खाता है)—'कतिक्खत्तुं भुञ्जति'। ๑๑๖. พหุมฺหา ธา จ ปจฺจาสตฺติยํ. ११६. 'बहु' शब्द से 'धा' और 'क्खत्तुं' प्रत्यय होते हैं, जब आवृत्ति (निकटता) का अर्थ हो। วารสมฺพนฺธินิยา พหุสงฺขฺยาย ธา โหติ กฺขตฺถุํ จ, วารานญฺเจ ปจฺจาสตฺติ โหติ, พหุธา ทิวสสฺส ภุญฺชติ พหุกฺขตฺตุํ ภุญฺชติ. ปจฺจาสตฺติยนฺติ กึ? พหุวาเร มาสสฺส ภุญฺชติ. बार (आवृत्ति) से संबंधित 'बहु' संख्यावाचक शब्द से 'धा' और 'क्खत्तुं' प्रत्यय होते हैं, यदि बारों (अवसरों) की निकटता हो; जैसे—'बहुधा दिवसस्स भुञ्जति' (दिन में कई बार खाता है), 'बहुक्खत्तुं भुञ्जति' (अनेक बार खाता है)। 'पच्चासत्तियं' (निकटता) क्यों कहा? 'बहुवारे मासस्स भुञ्जति' (महीने में कई बार खाता है - यहाँ निकटता नहीं है)। ๑๑๗. สกึ วา. ११७. अथवा 'सकिं' (एक बार)। เอกํ วารมิจฺจสฺมึ อตฺเถ สกินฺติ วา นิปจฺจเต. เอกวารํ ภุญฺชติ สกึ ภุญฺชติ, วาติ กึ? เอกกฺขตฺตุํ ภุญฺชติ. 'एक बार' इस अर्थ में 'सकिं' शब्द निपातित होता है। 'एकवारं भुञ्जति' = 'सकिं भुञ्जति' (एक बार खाता है)। 'वा' (अथवा) क्यों? 'एकक्खत्तुं भुञ्जति' (एक बार खाता है)। ๑๑๘. โส วีจฺฉปฺปกาเรสุ. ११८. 'सो' प्रत्यय वीप्सा (व्याप्ति) और प्रकार के अर्थों में होता है। วีจฺฉายํ ปกาเร จ โส โหติ พหุลํ. วีจฺฉายํ-ขณฺฑโส, พิลโส. ปกาเร-ปุถุโส, สพฺพโส. वीप्सा और प्रकार के अर्थ में 'सो' प्रत्यय बहुलता से होता है। वीप्सा में—'खण्डसो' (टुकड़े-टुकड़े), 'बिलसो' (अंश-अंश)। प्रकार में—'पुथुसो' (पृथक-पृथक), 'सब्बसो' (सब प्रकार से)। ๑๑๙. อภูตตพฺภาเว กราสภูโยเค วิการา จี. ११९. जो पहले वैसा नहीं था, उसका वैसा हो जाना (अभूततद्भाव) अर्थ होने पर 'कृ', 'अस्' और 'भू' धातुओं के योग में विकारवाचक शब्द से 'ची' प्रत्यय होता है। อวตฺถาวโต-วตฺถนฺตเรนาภูตสฺส ตายาวตฺถาย ภาเวกราสภูหิ สมฺพนฺเธ สติ วิการวาจกา จี โหติ, อธวลํ ธวลํ [Pg.171] กโรติ ธวลี กโรติ, อธวโล ธวโล สิยา ธวลี สิยา, อธวโล ธวโล ภวติ ธวลี ภวติ. อภูต ตพฺภาเวติ กึ? ฆฏํ กโรติ, ทธิ อตฺถิ, ฆโฏ ภวติ. กราสภูโยเคติ กึ? อธวโลธวโล ชายเต. วิการาติ กึ? ปกติยา มาโหตุ, สุวณฺณํ กุณฺฑลํ กโรติ. एक अवस्था से दूसरी अवस्था में, जो पहले वैसा नहीं था, उस अवस्था के होने पर 'कृ', 'अस्' और 'भू' के साथ सम्बन्ध होने पर विकारवाचक शब्द से 'ची' प्रत्यय होता है; जैसे—जो सफेद नहीं था उसे सफेद करता है 'धवली करोति', जो सफेद नहीं था वह सफेद होवे 'धवली सिया', जो सफेद नहीं था वह सफेद होता है 'धवली भवति'। 'अभूततद्भाव' क्यों कहा? 'घटं करोति' (घड़ा बनाता है), 'दधि अत्थि' (दही है), 'घटो भवति' (घड़ा होता है)। 'कृ-अस्-भू' के योग में ही क्यों? 'अधवलों धवलो जायते' (यहाँ 'जायते' क्रिया है)। 'विकार' क्यों कहा? ताकि प्रकृति (मूल) में न हो; जैसे—'सुवण्णं कुण्डलं करोति' (सोने का कुण्डल बनाता है)। ๑๒๐. ทิสฺสนฺตญฺเญปิ ปจฺจยา. १२०. अन्य प्रत्यय भी देखे जाते हैं। วุตฺตโต-ญฺเญปิ ปจฺจยา ทิสฺสนฺติ วุตฺตาวุตฺตตฺเถสุ. วิวิธา มาตโร วิมาตโร, ตาสํ ปุตฺตา เวมาติกา-ริกณ. ปถํ คจฺฉตีติ ปถาวิโน-อาวี. อิสฺสา อสฺส อตฺถีติ อิสฺสุกี-อุกี. ธุรํ วหตีติ โธรยฺโห- ยฺหณ. कहे गए अर्थों के अतिरिक्त अन्य अर्थों में भी उक्त और अनुक्त प्रत्यय देखे जाते हैं। जैसे—विविध माताएँ 'विमातरो', उनके पुत्र 'वेमातिका' (रिकण प्रत्यय)। जो मार्ग पर चलता है 'पथाविनो' (आवी प्रत्यय)। जिसमें ईर्ष्या है 'इस्सुकी' (उकी प्रत्यय)। जो धुरा (बोझ) ढोता है 'धोरय्हो' (य्हण प्रत्यय)। ๑๒๑. อญฺญสฺมึ. १२१. अन्य अर्थों में भी। วุตฺตโต-ญฺญสฺมิมฺปิ อตฺเถ วุตฺตปฺปจฺจยา ทิสฺสนฺติ. มคธานํ อิสฺสโร มาคโธ-ธณา. กาสีติ สหสฺสํ, ตมคฺฆตีติ กาสิโย อิโย. कहे गए अर्थों से भिन्न अर्थों में भी उक्त प्रत्यय देखे जाते हैं। मगधों का स्वामी 'मागधो' (धण प्रत्यय)। 'कासी' नामक एक हजार (मुद्रा), उसके मूल्य के बराबर 'कासियो' (इयो प्रत्यय)। ๑๒๒. สกตฺเถ. १२२. स्वार्थ (अपने ही अर्थ) में। สกตฺเถปิ ปจฺจยา ทิสฺสนฺติ. หีนโก, โปตโก, กิจฺจยํ. स्वार्थ में भी प्रत्यय देखे जाते हैं। जैसे—'हीनको', 'पोतको', 'किच्चयं'। ๑๒๓. โลโป. १२३. लोप। ปจฺจยานํ โลโปปิ ทิสฺสติ. พุทฺเธ รตนํ ปณีตํ, จกฺขุํ สุญฺญํ อตฺเตน วา อตฺตริเยน วาติ ภาวปฺปจฺจยโลโป. प्रत्ययों का लोप भी देखा जाता है। जैसे—'बुद्धे रतनं पणीतं', 'चक्खुं सुञ्ञं अत्तेन वा अत्तरियेन वा'—यहाँ भाव प्रत्यय का लोप है। ๑๒๔. สรานมาทิสฺสายุวณฺณสฺสาเอโอ ณานุพนฺเธ. १२४. 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर, स्वरों के आदि में स्थित 'अ', 'इ-ई' और 'उ-ऊ' के स्थान पर क्रमशः 'आ', 'ए' और 'ओ' होते हैं। สรานมาทิภูตา [Pg.172] เย อการิวณฺณุวณฺณา, เตสํ อาเอโอ โหนฺติ ยถากฺกมํณานุพนฺเธ. ราฆโว, เวนเตยฺโย, เมนิโก, โอฬุมฺปิโก, โทภคฺคํ. ณานุพนฺเธติ กึ? ปุราตโน. स्वरों के आदि में स्थित जो 'अ', 'इ-ई' और 'उ-ऊ' हैं, उनके स्थान पर 'ण' अनुबन्ध परे होने पर क्रमशः 'आ', 'ए', 'ओ' होते हैं। जैसे—'राघवो', 'वेनतेय्यो', 'मेनिको', 'ओळुम्पिको', 'दोभग्गं'। 'ण' अनुबन्ध में ही क्यों? 'पुरात्तनो' (यहाँ वृद्धि नहीं हुई)। ๑๒๕. สํโยเค กฺวจิ. १२५. संयोग (संयुक्त व्यंजन) होने पर कहीं-कहीं। สรานมาทิภูตา เย อยุวณฺณา, เตสํ อาเอโอ โหนฺติ กฺวจิเทว สํโยควิสเย ณานุพนฺเธ. เทจฺโจ, โกณฺฑญฺโญ. กฺวจีติ กึ? กตฺติเกยฺโย. स्वरों के आदि में स्थित जो 'अ', 'इ-ई', 'उ-ऊ' हैं, उनके स्थान पर संयोग के विषय में 'ण' अनुबन्ध परे होने पर कहीं-कहीं ही 'आ', 'ए', 'ओ' होते हैं। जैसे—'देच्चो', 'कोण्डञ्ञो'। 'कहीं-कहीं' क्यों? 'कत्तिकेय्यो' (यहाँ वृद्धि नहीं हुई)। ๑๒๖. มชฺเฌ. १२६. मध्य में। มชฺเฌ วตฺตมานานมฺปิ อยุวณฺณานํ อา เอ โอ โหนฺติ กฺวจิ. อฑฺฒเตยฺโย, วาเสฏฺโฐ. मध्य में वर्तमान 'अ', 'इ-ई', 'उ-ऊ' के स्थान पर भी कहीं-कहीं 'आ', 'ए', 'ओ' होते हैं। जैसे—'अड्ढतेय्यो', 'वासेट्ठो'। ๑๒๗. โกสชฺชาชฺชว ปาริสชฺช โสหชฺช มทฺทวาริสฺสาสภาชญฺญเถยฺย พาหุสจฺจา. १२७. कोसज्ज, अज्जव, पारिसज्ज, सोहज्ज, मद्दव, आरिस्स, आसभ, आजञ्ञ, थेय्य, बाहुसच्च। เอเตสทฺทา นิปจฺจนฺเตณานุพนฺเธ. กุสี ตสฺส ภาโวโกสชฺชํ, อุชุโน ภาโว อชฺชวํ, ปริสาสุ สาธุ ปาริสชฺโช, สุหทโยว สุหชฺโช, ตสฺส ปน ภาโว โสหชฺชํ, มุทุโน ภาโว มทฺทวํ, อิสิโน อิทํ ภาโว วา อาริสฺสํ, อุสภสฺส อิทํ ภาโว [Pg.173] วา อาสภํ, อาชานียสฺส ภาโว โส เอว วา อาชญฺญํ, เถนสฺส ภาโว กมฺมํ วา เถยฺยํ, พหุสฺสตสฺส ภาโว พาหุสจฺจํ, เอเตสุ ยมลกฺขณิกํ, ตํ นิปาตนา. ये शब्द 'ण' अनुबन्ध परे होने पर निपातित होते हैं। कुसी (आलसी) का भाव 'कोसज्जं', ऋजु (सीधा) का भाव 'अज्जवं', परिषद् में साधु 'पारिसज्जो', सुहृदय ही सुहज्ज है, उसका भाव 'सोहज्जं', मृदु का भाव 'मद्दवं', ऋषि का यह अथवा भाव 'आरिस्सं', ऋषभ का यह अथवा भाव 'आसभं', आजानीय का भाव अथवा वही 'आजञ्ञं', स्तेन (चोर) का भाव अथवा कर्म 'थेय्यं', बहुश्रुत का भाव 'बाहुसच्चं'। इनमें जो 'य' आदि के लक्षण हैं, वे निपातन से हैं। ๑๒๘. มนาทีนํ สก. १२८. 'मन' आदि शब्दों के अन्त्य को 'सक' आदेश होता है। มนาทีนํ สก โหติ ณานุพนฺเธ. มนสิ ภวํ มานสํ, ทุมฺมนโส ภาโว โทมนสฺสํ, โสมนสฺสํ. 'ण' अनुबन्ध परे होने पर 'मन' आदि शब्दों के अन्त्य को 'सक' होता है। मन में होने वाला 'मानसं', दुर्मन का भाव 'दोमनस्सं', 'सोमनस्सं'। ๑๒๙. อุวณฺณสฺสาวง สเร. १२९. स्वर परे होने पर 'उ-ऊ' के स्थान पर 'अवण' (अव) होता है। สราโท ณานุพนฺเธ อุวณฺณสฺสาวง โหติ. ราฆโว, ชมฺพวํ. स्वरादि 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर 'उ-ऊ' के स्थान पर 'अवण' होता है। जैसे—'राघवो', 'जम्बवं'। ๑๓๐. ยมฺหิ โคสฺส จ. १३०. 'य' प्रत्यय परे होने पर 'गो' शब्द के (ओकार) को भी (अवण होता है)। ยการาโท ปจฺจเย โคสฺสุวณฺณสฺส จ อวง โหติ. คพฺยํ, ภาตพฺโย. यकारादि प्रत्यय परे होने पर 'गो' शब्द के और 'उ-ऊ' के स्थान पर 'अवण' होता है। जैसे—'गब्यं', 'भातब्यो'। ๑๓๑. โลโป-วณฺณิวณฺณานํ. १३१. अ-वर्ण और इ-वर्ण का लोप। ยการาโท ปจฺจเย อวณฺณิวณฺณานํ โลโป โหติ. ทายชฺชํ, การุญฺญํ, อาธิปจฺจํ, เทปฺปํ. พหุลํวิธานา กฺวจิ น โหติ กิจฺจยํ. यकार आदि प्रत्यय के परे होने पर अ-वर्ण और इ-वर्ण का लोप होता है। जैसे: दायज्जं, कारुञ्ञं, आधिपच्चं, देप्पं। 'बहुलं' विधान के कारण कहीं नहीं होता, जैसे: किच्चयं। ๑๓๒. รานุพนฺเธ-นฺต สราทิสฺส. १३२. र-अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर आदि स्वर वाले अन्त का लोप होता है। อนฺโต สโร อาทิมฺหิ ยสฺสาวยวสฺส, ตสฺส โลโป โหติ รานุพนฺเธ. กิตฺตกํ, เปตฺเตยฺยํ. जिस अवयव के आदि में अन्त स्वर हो, उसका र-अनुबन्ध के परे होने पर लोप होता है। जैसे: कित्तकं, पेत्तेय्यं। ๑๓๓. กิสมหตมิเม กส มหา. १३३. किस और महत को क्रमशः कस और महा आदेश होते हैं इम प्रत्यय के परे होने पर। กิสสฺส มหโต อิเม กสมหา โหนฺติ ยถากฺกมํ, กสิมา, มหิมา. किस और महत के स्थान पर इम प्रत्यय के परे होने पर यथाक्रम कस और महा होते हैं। जैसे: कसिमा, महिमा। ๑๓๔. อายุสฺสายส มนฺตุมฺหิ. १३४. मन्तु प्रत्यय के परे होने पर आयु को आयस आदेश होता है। อายุสฺส [Pg.174] อายสาเทโส โหติ มนฺตุมฺหิ. อายสฺมา. मन्तु प्रत्यय के परे होने पर आयु का आयस आदेश होता है। जैसे: आयस्मा। ๑๓๕. โช วุทฺธสฺสิยิฏฺเฐสุ. १३५. इय और इट्ठ प्रत्ययों के परे होने पर वुद्ध को ज आदेश होता है। วุทฺธสฺส โช โหติ อิยอิฏฺเฐสุ, เชยฺโย, เชฏฺโฐ. इय और इट्ठ प्रत्ययों के परे होने पर वुद्ध का ज होता है। जैसे: जेय्यो, जेट्ठो। ๑๓๖. พาฬฺหนฺติกปสตฺถานํ สาธ เนท สา. १३६. बाळ्ह, अन्तिक और पसत्थ को क्रमशः साध, नेद और स आदेश होते हैं। อิยอิฏฺเฐสุ พาฬฺหนฺติกปสตฺถานํ สาธ เนท สา โหนฺติ ยถากฺกมํ. สาธิโย, สาธิฏฺโฐ, เนทิโย, เนทิฏฺโฐ, เสยฺโย, เสฏฺโฐ. इय और इट्ठ प्रत्ययों के परे होने पर बाळ्ह, अन्तिक और पसत्थ के स्थान पर यथाक्रम साध, नेद और स होते हैं। जैसे: साधियो, साधिठ्ठो, नेदियो, नेदिठ्ठो, सेय्यो, सेट्ठो। ๑๓๗. กณกนาปฺปยุวานํ. १३७. अप्प और युव को क्रमशः कण और कन आदेश होते हैं। อิยอิฏฺเฐสุ อปฺปยุวานํ กณ กนา โหนฺติ ยถากฺกมํ. กณิโย กณิฏฺโฐ, กนิโย กนิฏฺโฐ. इय और इट्ठ प्रत्ययों के परे होने पर अप्प और युव के स्थान पर यथाक्रम कण और कन होते हैं। जैसे: कणियो, कणिठ्ठो, कनियो, कनिठ्ठो। ๑๓๘. โลโป วี มนฺตุ วนฺตูนํ. १३८. इय और इट्ठ प्रत्ययों के परे होने पर वी, मन्तु और वन्तु प्रत्ययों का लोप होता है। วี มนฺตุ วนฺตูนํ โลโป โหติ อิยอิฏฺเฐสุ. อติสเยน เมธาวี เมธิโย, เมธิฏฺโฐ, อติสเยน สติมา สติโย, สติฏฺโฐ, อติสเยน คุณวา คุณิโย, คุณิฏฺโฐ. इय और इट्ठ प्रत्ययों के परे होने पर वी, मन्तु और वन्तु का लोप होता है। जैसे: अतिशयेन मेधावी - मेधियो, मेधिठ्ठो; अतिशयेन सतिमा - सतियो, सतिठ्ठो; अतिशयेन गुणवा - गुणियो, गुणिठ्ठो। ๑๓๙. เฑ สติสฺส ติสฺส. १३९. ड प्रत्यय के परे होने पर सति के ति का लोप होता है। เฑปเร สตฺยนฺตสฺส ติการสฺส โลโป โหติ, วีสํ สตํ, ตึสํ สตํ. ड प्रत्यय परे होने पर सति के अन्त में स्थित ति-कार का लोप होता है। जैसे: वीसं सतं, तिंसं सतं। ๑๔๐. เอตสฺเสฏ ตฺตเก. १४०. त्तक प्रत्यय के परे होने पर एत को एट्ट आदेश होता है। ตฺตเก ปเร เอตสฺส เอฏ โหติ. เอตฺตกํ. त्तक प्रत्यय परे होने पर एत का एट्ट होता है। जैसे: एत्तकं। ๑๔๑. ณิกสฺสิโย วา. १४१. णिक प्रत्यय को विकल्प से इय आदेश होता है। ณิกสฺส [Pg.175] วา อิโย โหติ, สกฺยปุตฺติโย, สกฺยปุตฺติโก. णिक का विकल्प से इय होता है। जैसे: सक्यपुत्तियो, सक्यपुत्तिको। ๑๔๒. อธาตุสฺส กา-สฺยาทิโต เฆ-สฺสิ. १४२. अधातु के क-कार के पूर्ववर्ती अ-कार को इ-कार होता है यदि वह सि-आदि से परे न हो और घ प्रत्यय परे हो। เฆ ปเร อธาตุสฺส โย กกาโร, ตโต ปุพฺพสฺส อการสฺส พหุลํ อิ โหติ สเจ โฆ น สฺยาทิโต ปโร โหติ. พาลิกา, การิกา, อธาตุสฺสาติ กึ? สกา, เกติ กึ? นนฺทนา, อสฺยาทิโตติ กึ? พหุปริพฺพาชกา มถุรา, พหุจมฺมิกาติ กกาเรน สฺยาทิโน พฺยวหิตตฺตา สิทฺธํ, เฆติ กึ? พาลโก, อสฺสาติ กึ? พหุกตฺตุกา สาลา. घ प्रत्यय परे होने पर अधातु के जो क-कार है, उससे पूर्ववर्ती अ-कार का बहुलता से इ होता है यदि घ प्रत्यय सि-आदि से परे न हो। जैसे: बालिका, कारिका। 'अधातु' क्यों? सका। 'क' क्यों? नन्दना। 'असि-आदि' क्यों? बहुपरिब्बाजका मथुरा। 'बहुचम्मिका' में क-कार द्वारा सि-आदि के व्यवहित होने से सिद्ध होता है। 'घ' क्यों? बालको। 'अ' क्यों? बहुकत्तुका साला। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ วุตฺติยํ इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में। ณาทิกณฺโฑ จตุตฺโถ. णादि काण्ड चौथा है। ๕. ปญฺจโม กณฺโฑ (ขาทิ) ५. पाँचवाँ काण्ड (खादि)। ๑. ติช มาเนหิ ข สา ขมา วีมํสาสุ. १. तिज और मान धातुओं से क्रमशः ख और स प्रत्यय होते हैं क्षमा और मीमांसा अर्थों में। ขนฺติยํ ติชา วีมํสายํ มานา จ ขสปฺปจฺจยา โหนฺติ ยถากฺกมํ, ติติกฺขา, วีมํสา, ติติกฺขติ, วีมํสติ. ขมาวีมํสา, สูติ กึ? เตชนํ, เตโช, เตชยติ, มานนํ, มาโนมาเนติ. क्षमा अर्थ में तिज धातु से और मीमांसा अर्थ में मान धातु से यथाक्रम ख और स प्रत्यय होते हैं। जैसे: तितिक्खा, वीमंसा, तितिक्खति, वीमंसति। 'क्षमा और मीमांसा' अर्थों में क्यों? तेजनं, तेजो, तेजयति, माननं, मानो, मानेति। ๒. กิตา ติกิจฺฉาสํสเยสุ โฉ. २. कित धातु से चिकित्सा और संशय अर्थों में छ प्रत्यय होता है। ติกิจฺฉายํ สํสเย จ วตฺตมานา กิตา โฉ โหติ. ติกิจฺฉา, วิจิกิจฺฉา, ติกิจฺฉติ, วิจิกิจฺฉติ. อญฺญตฺร นิเกโต, สํเกโต, เกตนํ, เกโต, เกตยติ. 'चिकित्सा' (उपचार) और 'संशय' (संदेह) के अर्थ में 'कित्' धातु से 'छ' प्रत्यय होता है। जैसे- तिकिच्छा (चिकित्सा), विचिकिच्छा (विचिकित्सा), तिकिच्छति, विचिकिच्छति। अन्यत्र (इन अर्थों के बिना)- निकेतो, संकेतो, केतनं, केतो, केतयति। ๓. นินฺทายํ คุป พธา พสฺส โภ จ. ३. 'निंदा' के अर्थ में 'गुप्' और 'बध्' धातुओं से ('छ' प्रत्यय होता है) और 'ब' के स्थान पर 'भ' होता है। นินฺทายํ [Pg.176] วตฺตมาเนหิ คุป พเธหิ โฉ โหติ พสฺส โภ จ. ชิคุจฺฉา, พีภจฺฉา, ชิคุจฺฉติ, พีภจฺฉติ, อญฺญตฺร โคปนํ, โคโป, โคเปติ, พธโก. निंदा के अर्थ में वर्तमान 'गुप्' और 'बध्' धातुओं से 'छ' प्रत्यय होता है और 'ब' के स्थान पर 'भ' होता है। उदाहरण: जिगुच्छा, बीभच्छा, जिगुच्छति, बीभच्छति। अन्यत्र: गोपनं, गोपो, गोपेति, बाधको। ๔. ตุํสฺมา โลโป จิจฺฉายํ เต. ४. 'इच्छा' के अर्थ में 'ते' (ख, स, छ प्रत्यय) होने पर 'तुं' प्रत्यय का लोप होता है। ตุมนฺตโต อิจฺฉายมตฺเถ เต ขสฉา โหนฺติ พหุลํ, โลโป จ ตุํปจฺจยสฺส โหติ สุตตฺตา, พุภุกฺขา, ชิคีสาํ, ชิฆจฺฉา, พุภุกฺขติ, ชิคีสติ ชิฆจฺฉติ. อิธ กสฺมา น โหติ ‘โภตฺตุมิจฺฉตี’ติ? ปทนฺตเรนาภิธานา. ตุํสฺมาติ กึ? โภชนมิจฺฉติ. อิจฺฉายนฺติ กึ? ภุญฺชิตุํ คจฺฉติ. กถํ ‘กูลํ วิปติ สตี’ติ? ยถา กูลํ ปติตุ มิจฺฉตีติ วากฺยํ โหติ, เอวํ วุตฺติปิ โหสฺสติ. วากฺยเมว จรหิ กถํ โหติ? โลกสฺส ตถา วจนิจฺฉาย. 'तुं' प्रत्ययान्त शब्द से 'इच्छा' के अर्थ में 'ख', 'स', 'छ' प्रत्यय बहुलता से होते हैं, और सूत्र के अनुसार 'तुं' प्रत्यय का लोप होता है। उदाहरण: बुभुक्खा, जिगीसा, जिघच्छा, बुभुक्खति, जिगीसति, जिघच्छति। यहाँ 'भोत्तुमिच्छति' क्यों नहीं होता? क्योंकि अन्य पद द्वारा कथन है। 'तुंस्मा' (तुं से) क्यों कहा? 'भोजनमिच्छति' (भोजन की इच्छा करता है) के लिए। 'इच्छायां' (इच्छा में) क्यों कहा? 'भुञ्जितुं गच्छति' (खाने के लिए जाता है) के लिए। 'कूलं विपति सती' (किनारा गिरने वाला है) कैसे होता है? जैसे 'किनारा गिरना चाहता है' यह वाक्य होता है, वैसे ही यह प्रयोग भी होगा। तब वाक्य ही कैसे होता है? लोक की वैसी बोलने की इच्छा से। ๕. อีโย กมฺมา. ५. कर्म (पद) से 'इच्छा' के अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है। อิจฺฉากมฺมโต อิจฺฉายมตฺเถ อียปฺปจฺจโย โหติ. ปุตฺตมิจฺฉติ ปุตฺถียติ. กมฺมาติ กึ? อสิเนจฺฉติ. อิธ กสฺมา น โหติ ‘รญฺโญปุตฺตมิจฺฉตี’ติ? สาเปกฺขตฺตา, น หิ อญฺญมเปกฺขมาโน อญฺเญน สเหกตฺถิภาวมนุภวิตุํ สกฺโกติ. อิธาปิ จรหิ น สิยา ‘อตฺตโน ปุตฺต มิจฺฉตี’ติ? เนเวตฺถ ภวิตพฺพํ, น หิ ภวติ ‘อตฺตโน ปุตฺตียตี’ติ, กถํ จรหิ ปุตฺตสฺส อตฺตนิยตา-วคมฺยเต[Pg.177]? อญฺญสฺสาสุตตฺตา อิจฺฉาย จ ตพฺพิสยตฺตา. इच्छा के कर्म से 'इच्छा' के अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है। 'पुत्तमिच्छति' (पुत्र की इच्छा करता है) - 'पुत्तीयति'। 'कम्मा' (कर्म से) क्यों कहा? 'असिनेच्छति' (तलवार से इच्छा करता है) के लिए। यहाँ 'रञ्ञो पुत्तमिच्छति' (राजा के पुत्र की इच्छा करता है) में क्यों नहीं होता? सापेक्षता के कारण, क्योंकि दूसरे की अपेक्षा रखने वाला किसी अन्य के साथ एकार्थीभाव (समास/प्रत्यय) प्राप्त नहीं कर सकता। तो फिर यहाँ 'अत्तनो पुत्तमिच्छति' (अपने पुत्र की इच्छा करता है) भी नहीं होना चाहिए? यहाँ भी नहीं होना चाहिए, 'अत्तनो पुत्तीयति' ऐसा नहीं होता। तो फिर पुत्र की आत्मीयता कैसे समझी जाती है? किसी अन्य का उल्लेख न होने से और इच्छा का विषय वही होने से। ๖. อุปมานาจาเร. ६. उपमान (तुलना) से 'आचरण' के अर्थ में ('ईय' प्रत्यय होता है)। กมฺมโต อุปมานา อาจารตฺเถ อีโย โหติ. ปุตฺตมิ-วา-จรติ ปุตฺตียติ มาณวกํ, อุปมานาติ กึ? ปุตฺตมาจรติ. कर्म रूप उपमान से 'आचरण' के अर्थ में 'ईय' प्रत्यय होता है। 'पुत्तमिव आचरति' (पुत्र के समान आचरण करता है) - 'पुत्तीयति माणवकं' (माणवक के साथ पुत्र जैसा व्यवहार करता है)। 'उपमाना' क्यों कहा? 'पुत्तमाचरति' (पुत्र के प्रति आचरण करता है) के लिए। ๗. อาธารา. ७. आधार से। อาธารตู-ปมานา อาจารตฺเถ อีโย โยติ. กุฏิยมิวา-จรติ กุฏียตี ปาสาเท, ปาสาทียติ กุฏิยํ ภิกฺขุ. आधार रूप उपमान से 'आचरण' के अर्थ में 'ईय' और 'य' प्रत्यय होते हैं। 'कुटियमिव आचरति' (कुटिया के समान आचरण करता है) - 'कुटीयति पासादे' (महल में कुटिया जैसा आचरण करता है), 'पासादीयति कुटियं भिक्खु' (भिक्षु कुटिया में महल जैसा आचरण करता है)। ๘. กตฺตุตาโย. ८. कर्ता से 'आय' प्रत्यय होता है। กตฺตุตู-ปมานา อาจารตฺเถ อาโย โหติ. ปพฺพโต อิวาจรติ ปพฺพตายติ. कर्ता रूप उपमान से 'आचरण' के अर्थ में 'आय' प्रत्यय होता है। 'पब्बतो इव आचरति' (पर्वत के समान आचरण करता है) - 'पब्बतायति'। ๙. ยฺจตฺเถ. ९. अभूततद्भाव (जो वैसा नहीं था, वैसा होना) के अर्थ में। กตฺตุโต อภูตตพฺภาเว อาโย โหติ พหุลํ. ภุสายติ, ปฏปฏายติ, โลหิตายติ, กตฺตุโตตฺเวว? (อภุสํ) ภุสํ กโรตีหิ, อิห กสฺมา น โหติ ‘ภุสี ภวตี’ติ? วุตฺตตฺถตาย. कर्ता से 'अभूततद्भाव' (जो पहले वैसा नहीं था, वैसा हो जाना) के अर्थ में बहुलता से 'आय' प्रत्यय होता है। उदाहरण: भुसायति, पटपटायति, लोहितायति। 'कर्ता से' ही क्यों? 'भसं करोति' (तीव्र करता है) आदि के लिए। यहाँ 'भुसी भवति' क्यों नहीं होता? क्योंकि अर्थ पहले ही कहा जा चुका है। ๑๐. สทฺทาทีนิ กโรติ. १०. शब्द आदि करता है। สทฺทาทีหิ ทุติยนฺเตหิ กโรตีติ อสฺมึ อตฺเถ อาโย โหติ. สทฺทายติ, เวรายติ, กลหายติ, ธูปายติ. द्वितीयान्त 'शब्द' आदि शब्दों से 'करता है' इस अर्थ में 'आय' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सदायति (शब्द करता है), वेरायति (वैर करता है), कलहायति (कलह करता है), धुपायति (धुआँ करता है)। ๑๑. นุโมตฺว-สฺโส. ११. 'नमो' शब्द से 'अस्स' प्रत्यय होता है। นโมอิจฺจสฺมา [Pg.178] กโรตีติ อสฺมึ อตฺเถ อสฺโส โหติ. นมสฺสติ ตถาคฺตํ. 'नमो' इस शब्द से 'करता है' इस अर्थ में 'अस्स' प्रत्यय होता है। उदाहरण: नमस्सति तथागतं (तथागत को नमस्कार करता है)। ๑๒. ธาตฺวตฺเถ นามสฺมิ. १२. धातु के अर्थ में नाम (संज्ञा) से। นามสฺมา ธาตฺวตฺเถ พหุลมิโหติ. หตฺถินา อติกฺกมติ อติหตฺถยติ, วีณาย อุปคายติ อุปวีณยติ, ทฬฺหํ กโรติ วินยํ ทฬฺหยติ, วิสุทฺธา โหติ รตฺติ วิสุทฺธยติ, กุสลํ ปุจฺฉติ กุสลยติ. नाम (संज्ञा) से धातु के अर्थ में यहाँ बहुलता से (प्रत्यय) होते हैं। 'हत्थिना अतिक्कमति' (हाथी से अतिक्रमण करता है) - 'अतिहत्थयति', 'वीणाय उपगायति' (वीणा के साथ गाता है) - 'उपवीणयति', 'दळ्हं करोति विनयं' (विनय को दृढ़ करता है) - 'दळ्हयति', 'विसुद्धा होति रत्ति' (रात्रि विशुद्ध होती है) - 'विसुद्धयति', 'कुसलं पुच्छति' (कुशल पूछता है) - 'कुसलयति'। ๑๓. สจฺจาทีหาปิ. १३. 'सच्च' (सत्य) आदि से भी 'आपि' प्रत्यय होता है। สจฺจาทีหิ ธาตฺวตฺเถ อาปิ โหติ. สจฺจาเปติ, อตฺถาเปติ, เวทาเปติ, สุกฺขาเปติ, สุขาเปติ, ทุกฺขาเปติ. 'सच्च' आदि शब्दों से धातु के अर्थ में 'आपि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सच्चापेति, अत्थापेति, वेदापेति, सुक्खापेति, सुखापेति, दुक्खापेति। ๑๔. กฺริยตฺถา. १४. क्रियार्थक (धातु)। อยมธิกาโร อาสตฺถปริสมตฺติยา. กฺริยา อตฺโถ ยสฺส โส กฺริยตฺโถ ธาตุ. यह अधिकार शास्त्र की समाप्ति तक है। जिसकी क्रिया अर्थ हो, वह 'क्रियार्थ' धातु है। ๑๕. จุราทิโต ณิ. १५. 'चुरादि' गण की धातुओं से 'णि' प्रत्यय होता है। จุราทีหิ กฺริยตฺเถหิ สกตฺเถ ณิ ปโร โหติ พหุลํ. ณกาโร วุทฺธฺยตฺโถ, เอวมญฺญตฺราปิ, โจรยติ, ลาฬยติ, กถํ ‘รชฺชํ กาเรตี’ติ? โยควิภาคโต. 'चुरादि' गण की क्रियार्थक धातुओं से स्वार्थ (उसी अर्थ) में 'णि' प्रत्यय बहुलता से होता है। 'ण' कार वृद्धि के लिए है, जैसा कि अन्यत्र भी होता है। उदाहरण: चोरयति, लाळयति। 'रज्जं कारेति' (राज्य कराता है) कैसे होता है? योग-विभाग से। ๑๖. ปโยชกพฺยาปาเร ณาปิ จ. १६. प्रयोजक (प्रेरक) के व्यापार में 'णापि' भी होता है। กตฺตารํ โย ปโยชยติ, ตสฺส พฺยาปาเร กฺริยตฺถา ณิณาปี โหนฺติ พหุลํ, กาเรติ, การาเปติ. นนุ จ กตฺตาปิ กรณาทีนํ [Pg.179] ปโยชโกติ ตํพฺยาปาเรปิ ณิณาปี ปาปุณนฺติ? ปโยชกคฺคหณสามตฺถิยา น ภวิสฺสนฺติ จุราทีหิ วิสุํ วจนสามตฺถิยา จ. อโต ภิยฺโย ณาปิเยว, ณิเยวุวณฺณโต, ทฺวยเมวญฺเญหิ. जो कर्ता को प्रेरित करता है, उसके व्यापार में क्रियार्थक धातुओं से 'णि' और 'णापि' प्रत्यय बहुलता से होते हैं। उदाहरण: कारेति, कारापेति। क्या कर्ता भी करण आदि का प्रयोजक नहीं है, तो उसके व्यापार में भी 'णि' और 'णापि' प्राप्त होंगे? 'प्रयोजक' ग्रहण के सामर्थ्य से और चुरादि गण के लिए अलग से विधान होने के सामर्थ्य से ऐसा नहीं होगा। अतः 'अ' के बाद प्रायः 'णापि' ही होता है, 'उ/ऊ' वर्ण के बाद 'णि' ही, और अन्यों से दोनों होते हैं। ๑๗. กฺโย ภาวกมฺเมสฺว-ปโรกฺเขสุ มาน นฺต ตฺยาทีสุ. ภาวกมฺมวิหิเตสุ ปโรกฺขาวชฺชิเตสุ มานนฺตตฺยาทีสุ ปเรสุ กฺโย โหติ กฺริยตฺถา. นฺตคฺคหณมุตฺตรตฺถํ, กกาโร อวุทฺธฺยตฺโถ เอวมุตฺตรตฺราปิ. ฐียมานํ, ฐียเต, สูยมานํ, สูยเต, อปโรกฺเขสุ มานนฺตตฺยาทีสูติ กึ? พภูว เทวทตฺเตน, พิภิท กุสุโล. ภิชฺชเต กุสุโล สยเมวาติ ‘ภิชฺชเต’ติ สวนา กมฺมตา-วคมฺยเต, ‘สยเมวา’ติ สวนโต กตฺตุตา, กตฺตุตาวจนิจฺฉายนฺตุ ‘ภินฺทติ กุสุโล อตฺตาน’นฺติ ภวติ, เอวมญฺญมฺปิ ยถาคมมนุคนฺตพฺพํ. ‘อปโรกฺเขสุ มานนฺตตฺยาทีสู’ติ อยมธิกาโร อา ‘ตนาทิตฺโว’ติ ๕.๒๖. อปิจ เอเต กฺยาทโย ตฺยาทีสุ ปรภูเตสุ กตฺตุกมฺมภาว วิหิเตสุ กฺยลาทีนํ วิธานโต เตสฺเวว วิญฺญายนฺตีติ อกมฺมเกหิ ธาตูหิ กตฺตุภาเวสุ, สกมฺมเกหิ กตฺตุกมฺเมสุ, กมฺมาวจนิจฺฉายํ ภาเว จ ภวนฺตีติ เวทิตพฺพา. ยสฺส ปน ธาตุสฺส กิริยา กมฺมมเปกฺขเต, โส สกมฺมโก, ยสฺส ตุ กิริยา กตฺตุมตฺตมเปกฺขเต, สฺวากมฺมโกติ ญาตพฺพํ. १७. भाव और कर्म में विहित, परोक्ष (अतीत) से भिन्न 'मान', 'न्त', 'ति' आदि प्रत्ययों के परे होने पर क्रियार्थक धातुओं से 'क्य' प्रत्यय होता है। 'न्त' का ग्रहण आगे के लिए है, 'क' कार वृद्धि न होने के लिए है, जैसा कि आगे भी होगा। उदाहरण: ठीयमानं, ठीयते, सूयमानं, सूयते। 'अपरोक्ष मान-न्त-ति आदि में' क्यों कहा? 'बभूव देवदत्तेन', 'बिभिद कुसुलो' के लिए। 'भिज्जते कुसुलो सयमेव' (घड़ा अपने आप टूटता है) - यहाँ 'भिज्जते' सुनने से कर्मत्व समझा जाता है, और 'सयमेव' सुनने से कर्तृत्व। कर्तृत्व कहने की इच्छा होने पर 'भिन्दति कुसुलो अत्तानं' (घड़ा अपने आप को तोड़ता है) ऐसा होता है। इसी प्रकार अन्य प्रयोगों को भी आगम के अनुसार समझना चाहिए। 'अपरोक्ष मान-न्त-ति आदि में' यह अधिकार 'तनादित्वो' (5.26) तक है। इसके अतिरिक्त, ये 'क्य' आदि प्रत्यय 'ति' आदि के परे होने पर कर्ता, कर्म और भाव में विहित 'क्यल' आदि के विधान से उन्हीं में समझे जाते हैं। अतः अकर्मक धातुओं से कर्ता और भाव में, और सकर्मक धातुओं से कर्ता और कर्म में, तथा कर्म न कहने की इच्छा होने पर भाव में होते हैं, ऐसा जानना चाहिए। जिस धातु की क्रिया कर्म की अपेक्षा रखती है, वह 'सकर्मक' है, और जिसकी क्रिया केवल कर्ता की अपेक्षा रखती है, वह 'अकर्मक' है, ऐसा जानना चाहिए। ๑๘. กตฺตริ โล. १८. कर्ता (अर्थ) में 'ल' (प्रत्यय) होता है। กฺริยตฺถโต อปโรกฺเขสุ กตฺตุวิหิตมาน นฺตตฺยาทีสุ โล โหติ. ลกาโร, ‘‘ญิลสฺเส’’ติ ๕-๑๖๓ วิเสสนตฺโถ. ปจมาโน, ปจนฺโต, ปจติ. क्रियार्थ (धातु) से परोक्ष (लकारों) को छोड़कर, कर्ता अर्थ में विहित 'मान', 'अन्त' आदि प्रत्ययों के विषय में 'ल' होता है। 'ल'कार 'ञिलस्स' (5-163) सूत्र में विशेषण के लिए है। (जैसे) पचमानो, पचन्तो, पचति। ๑๙. มํ จ รุธาทีนํ. १९. और रुधादि (गण की धातुओं) को 'मं' (आगम) होता है। รุธาทิโต [Pg.180] กตฺตุวิหิตมานนฺต ตฺยาทีสุ โล โหติ มํ จ อนฺตสรา ปโร. มกาโร-นุพนฺโธ, อกาโร อุจฺจารณตฺโถ. รุนฺธมาโน, รุนฺธนฺโต, รุนฺธติ. रुधादि (धातुओं) से कर्ता अर्थ में विहित 'मान', 'अन्त' आदि के विषय में 'ल' होता है और अन्तिम स्वर के बाद 'मं' (आगम) होता है। 'म'कार अनुबन्ध है, 'अ'कार उच्चारण के लिए है। (जैसे) रुन्धमानो, रुन्धन्तो, रुन्धति। ๒๐. ณิณาปฺยาปีหิ วา. २०. 'णि', 'णाप्य', 'आपि' (प्रत्ययों) से विकल्प से (ल होता है)। ณิณาปฺยาปีหิ กตฺตุวิหิตมานนฺต ตฺยาทีสุ โล โหติ วิภาสา, โอรยนฺโต, โจเรนฺโต, การยนฺโต, กาเรนฺโต, การาปยนฺโต, การาเปนฺโต, สจฺจาปยนฺโต, สจฺจาเปนฺโต, โจรยติ, โจเรติ, การยติ, กาเรติ, การาปยติ, การาเปติ, สจฺจาปยติ, สจฺจาเปติ. ววตฺถิตวิภาสตฺโถ-ยํ วาสทฺโท, เตน มาเน นิจฺจํ, โจรยมาโน, การยมาโน, การาปยมาโน, สจฺจาปยมาโน. 'णि', 'णाप्य', 'आपि' प्रत्ययों से कर्ता अर्थ में विहित 'मान', 'अन्त' आदि के विषय में विकल्प से 'ल' होता है। (जैसे) ओरायन्तो, चोरेन्तो, कारयन्तो, कारेन्तो, कारापयन्तो, कारापेन्तो, सच्चापयन्तो, सच्चापेन्तो, चोरयति, चोरेति, कारयति, कारेति, कारापयति, कारापेति, सच्चापयति, सच्चापेति। यहाँ 'वा' शब्द व्यवस्थित विभाषा के अर्थ में है, इसलिए 'मान' प्रत्यय होने पर (यह कार्य) नित्य होता है, (जैसे) चोरयमानो, कारयमानो, कारापयमानो, सच्चापयमानो। ๒๑. ทิวาทีหิ ยก. २१. दिवादि (गण की धातुओं) से 'यक' (प्रत्यय) होता है। ทิวาทีหิ ลวิสเย ยก โหติ. ทิพฺพนฺโต, ทิพฺพติ. दिवादि (धातुओं) से 'ल' के विषय में 'यक' होता है। (जैसे) दिब्बन्तो, दिब्बति। ๒๒. ตุทาทีหิ โก. २२. तुदादि (गण की धातुओं) से 'क' (प्रत्यय) होता है। ตุทาทีหิ ลวิสเย โก โหติ. ตุทมาโน, ตุทนฺโต, ตุทติ. तुदादि (धातुओं) से 'ल' के विषय में 'क' होता है। (जैसे) तुदमानो, तुदन्तो, तुदति। ๒๓. ชฺยาทีหิ กฺนา. २३. ज्यादि (गण की धातुओं) से 'क्ना' (प्रत्यय) होता है। ชิอาทีหิ ลวิสเย กฺนา โหติ. ชินนฺโต, ชินาติ. กถํ ‘ชยนฺโต’ ชยตี, ติ? ภูวาทิปาฐา. ज्यादि (धातुओं) से 'ल' के विषय में 'क्ना' होता है। (जैसे) जिनन्तो, जिनाति। 'जयन्तो', 'जयति' कैसे (होता है)? भूवादि (गण) में पाठ होने से। ๒๔. กฺยาทีหิ กฺณา. २४. क्यादि (गण की धातुओं) से 'क्णा' (प्रत्यय) होता है। กีอาทีหิ [Pg.181] ลวิสเย กฺณา โหติ. กิณนฺโต, กิณาติ. क्यादि (धातुओं) से 'ल' के विषय में 'क्णा' होता है। (जैसे) किणन्तो, किणाति। ๒๕. สฺวาทีหิ กฺโณ. २५. स्वादि (गण की धातुओं) से 'क्णो' (प्रत्यय) होता है। สุอาทีหิ ลวิสเย กฺโณ โหติ. สุณมาโน, สุณนฺโต, สุโณติ. กถํ สุณาตีติ? กฺยาทิปาฐา. स्वादि (धातुओं) से 'ल' के विषय में 'क्णो' होता है। (जैसे) सुणमानो, सुणन्तो, सुणोति। 'सुणाति' कैसे (होता है)? क्यादि (गण) में पाठ होने से। ๒๖. ตนาทิตฺโว. २६. तनादि (गण की धातुओं) से 'ओ' (प्रत्यय) होता है। ตนาทิโต ลวิสเย โอ โหติ. ตโนติ. तनादि (धातुओं) से 'ल' के विषय में 'ओ' होता है। (जैसे) तनोति। ๒๗. ภาวกมฺเมสุ ตพฺพา-นียา. २७. भाव और कर्म (अर्थ) में 'तब्ब' और 'अनीय' (प्रत्यय होते हैं)। ตพฺพอนียา กฺริยตฺถา ปเร ภาวกมฺเมสุ พหุลํ ภวนฺติ. กตฺตพฺพํ, กรณียํ, กตฺตพฺโพ กโฏ, กรณีโย. พหุลาธิการา กรณาทีสุปิ ภวนฺติ, สินานียํ จุณฺณํ, ทานีโย พฺราหฺมโณ, สมฺมาวตฺตนีโย คุรุ, ปวจนีโย อุปชฺฌาโย, อุปฏฺฐานีโย สิสฺโส. 'तब्ब' और 'अनीय' प्रत्यय क्रियार्थ (धातु) से परे भाव और कर्म में बहुलता से होते हैं। (जैसे) कत्तब्बं, करणीयं, कत्तब्बो कटो, करणीयो। 'बहुलं' के अधिकार से करण आदि (कारकों) में भी होते हैं, (जैसे) सिनानीयं चुण्णं (स्नान का चूर्ण), दानीयो ब्राह्मणो (दान के योग्य ब्राह्मण), सम्मावत्तनीयो गुरु (सम्यक् व्यवहार के योग्य गुरु), पवचनीयो उपज्झायो (प्रवचन के योग्य उपाध्याय), उपट्ठानीयो सिस्सो (सेवा के योग्य शिष्य)। ๒๘. ฆฺยณ. २८. 'घ्यण' (प्रत्यय होता है)। ภาวกมฺเมสุ กฺริยตฺถา ปโร ฆฺยณ โหติ พหุลํ. วากฺยํ, การิยํ, เจยฺยํ, เชยฺยํ. भाव और कर्म में क्रियार्थ (धातु) से परे 'घ्यण' प्रत्यय बहुलता से होता है। (जैसे) वाक्यं, कारियं, चेय्यं, जेय्यं। ๒๙. อาสฺเส จ. २९. और 'आ' (अन्त वाली धातु) को 'ए' (होता है)। อาโตฆฺยณ โหติ ภาวกมฺเมสุ, อาสฺส เอ จ. เทยฺยํ. भाव और कर्म में आकारान्त (धातु) से 'घ्यण' होता है, और 'आ' को 'ए' होता है। (जैसे) देय्यं। ๓๐. วทาทีหิ โย. ३०. वदादि (धातुओं) से 'य' (प्रत्यय होता है)। วทาทีหิ [Pg.182] กฺริยตฺเถหิ โย โหติ พหุลํ ภาวกมฺเมสุ. วชฺชํ, มชฺชํ, คมฺมํ. (๔๒) ‘‘ภุชานฺเน’’, โภชฺโช โอทโน, โภชฺชา ยาคุ, โภคฺคมญฺญํ. वदादि क्रियार्थ (धातुओं) से भाव और कर्म में बहुलता से 'य' प्रत्यय होता है। (जैसे) वज्जं, मज्जं, गम्मं। (42) 'भुज' धातु से अन्न अर्थ में (य प्रत्यय होता है), (जैसे) भोज्जो ओदनो, भोज्जा यागु, भोग्गमञ्ञं। ๓๑. กิจฺจ ฆจฺจ ภจฺจ ภพฺพ เลยฺยา. ३१. किच्च, घच्च, भच्च, भब्ब, लेय्य (ये शब्द निपातित होते हैं)। เอเต สทฺทา ยปฺปจฺจยนฺตา นิปจฺจนฺเต. ये शब्द 'य' प्रत्ययान्त के रूप में निपातित किए जाते हैं। ๓๒. คุหาทีหิ ยก. ३२. गुहादि (धातुओं) से 'यक' (प्रत्यय होता है)। คุตาทีหิ กฺริยตฺเตหิ ภาวกมฺเมสุ ยก โหติ. คุยฺหํ, ทุยฺหํ, สิสฺโส. สิทฺธา เอเวเต ตพฺพาทโย เปสาติสคฺคปตฺตกาเลสุปิ คมฺยมาเนสุ สามญฺเญนวิธานโต, ตฺวยา ขลุ กโฏ กตฺตพฺโพ, กรณีโย, การิโย, กิจฺโจ, เอวํ ตฺวยา กโฏ กตฺตพฺโพ, โภตา กโฏ กตฺตพฺโพ, โภโต หิ ปตฺโต กาโล กฏกรเณ. เอวํ อุทฺธโมหุตฺติเกปิ วตฺตมานโต เปสาทีสุ สิทฺธา เอว. ตถา อรเห กตฺตริ สตฺติวิสิฏฺเฐ จ ปตียมาเน อาวสฺสกาธมีณตาวิสิฏฺเฐ จ ภาวาโท สิทฺธา, อุทฺธํมุหุตฺตโต-โภตา กโฏ กตฺตพฺโพ, โภตา รชฺชํ กตฺตพฺพํ. ภวํ อรโห, โภตา สาโร วหิตพฺโพ, ภวํ สกฺโก, โภตา อวสฺสํ กโฏ กตฺตพฺโพ, โภตา นิกฺโข ทาตพฺโพ. गुतादि क्रियार्थ (धातुओं) से भाव और कर्म में 'यक' प्रत्यय होता है। (जैसे) गुय्हं, दुय्हं, सिस्सो। ये 'तब्ब' आदि प्रत्यय प्रैष (आज्ञा), अतिसर्ग (अनुमति) और प्राप्तकाल (उचित समय) के अर्थों के प्रतीत होने पर भी सामान्य विधान से सिद्ध ही हैं; (जैसे) 'त्वया खलु कटो कत्तब्बो' (तुम्हें निश्चय ही चटाई बनानी चाहिए), करणीयो, कारियो, किच्चो; इसी प्रकार 'त्वया कटो कत्तब्बो', 'भोता कटो कत्तब्बो', क्योंकि आपके लिए चटाई बनाने का समय आ गया है। इसी प्रकार भविष्य काल में भी प्रैष आदि अर्थों में ये सिद्ध ही हैं। उसी प्रकार 'अर्ह' (योग्य) कर्ता में, शक्ति-विशिष्ट अर्थ प्रतीत होने पर, और आवश्यकता तथा ऋण (अधमर्णता) विशिष्ट भाव आदि में भी सिद्ध हैं; भविष्य काल में—'भोता कटो कत्तब्बो', 'भोता रज्जं कत्तब्बं'। आप योग्य हैं, 'भोता सारो वहितब्बो', आप समर्थ हैं, 'भोता अवस्सं कटो कत्तब्बो', 'भोता निक्खो दातब्बो'। ๓๓. กตฺตริ ลฺตุณกา. ३३. कर्ता अर्थ में 'ल्तु' और 'णक' प्रत्यय होते हैं। กตฺตริ การเก กฺริยตฺถา ลฺตุณกา โหนฺติ พหุลํ. ปฐิตา, ปาฐโก. พหุลมิตฺเวว? ปาเทหิ หรียตีติ ปาทหา-รโก[Pg.183], คเล จุปฺปเตติ คเลโจปโก. สิทฺโธว ลฺตุ, อรเห สีลสาธุธมฺเมสุ จ สามญฺญวิหิตตฺตา, ภวํ ขลุ กญฺญาย ปริคฺคหิตา, ภวเมตํ อรหติ. สีลาทีสุ-ขลฺวปิ อุปาทาตา กุมารเก, คนฺตา เขลํ, มุณฺฑยิตาโร สาวิฏฺฐายนา วธุํ กตปริคฺคหํ. कर्ता कारक में क्रिया के अर्थ में 'ल्तु' और 'णक' प्रत्यय बहुलता से होते हैं। पठिता, पाठको। 'बहुलता' से क्यों? पैरों से जो ले जाया जाता है = पादहारको, गले को जो कँपाता है = गलेचोपको। 'ल्तु' प्रत्यय तो सिद्ध ही है, क्योंकि अर्ह (योग्य), शील, साधु और धर्म के अर्थों में सामान्य रूप से विधान किया गया है। आप निश्चय ही कन्या द्वारा परिगृहीत हैं, आप इसके योग्य हैं। शील आदि अर्थों में भी - कुमारों को ग्रहण करने वाला, खेल के लिए जाने वाला, मुण्डित करने वाले साविष्ठायन वधू को परिगृहीत करते हैं। ๓๔. อาวี. ३४. आवी। กฺริยตฺถา อาวี โหติ พหุลํ กตฺตริ. ภยทสฺสาวี. อปฺปวิสยตญฺญาปนตฺถํ ภินฺนโยคกรณํ, สามญฺญวิหิตตฺตา สีลา ทีสุ จ โหเตว. क्रियार्थक धातु से कर्ता अर्थ में बहुलता से 'आवी' प्रत्यय होता है। जैसे: भयदस्सावी (भय देखने वाला)। अल्प विषय के ज्ञापन के लिए योग-विभाग किया गया है, सामान्य रूप से विहित होने के कारण 'शील' आदि अर्थों में भी यह होता ही है। ๓๕. อาสึสายมโก. ३५. आसिंसायमको। อาสึสายํ คมฺยมานายํ กฺริยตฺถา อโก โหติ กตฺตริ. ชีวตูติ ชีวโก, นนฺทตูติ นนฺทโก, ภวตูติ ภวโก. 'आसिंसा' (आशंसा/इच्छा) अर्थ के प्रतीत होने पर क्रियार्थक धातु से कर्ता अर्थ में 'अको' प्रत्यय होता है। जैसे: 'जीवे' इस अर्थ में 'जीवक', 'नन्दित हो' इस अर्थ में 'नन्दक', 'होवे' इस अर्थ में 'भवक'। ๓๖. กรา ณโน. ३६. करा णनो। กรโต กตฺตริ ณโน โหติ. กโรตีติ การณํ, กตฺตรีติ กึ? กรณํ. 'कर' (कृ) धातु से कर्ता अर्थ में 'णनो' प्रत्यय होता है। 'करता है' इस अर्थ में 'कारण'। कर्ता अर्थ में क्यों? (ताकि) 'करण' (साधन अर्थ में) न हो। ๓๗. หาโต วีหิกาเลสุ. ३७. हातो वीहिकालेसु। หาโต วีหิสฺมึ กาเล จ ณโน โหติ กตฺตริ. หายนา นาม วิหโย, หายโน สํวจฺฉโร, วีหิกาเลสูติ กึ? หาตา. 'हा' धातु से 'व्रीहि' (धान) और 'काल' (समय) अर्थ में कर्ता में 'णनो' प्रत्यय होता है। 'हायन' नाम का धान, 'हायन' अर्थात् संवत्सर (वर्ष)। 'व्रीहि' और 'काल' अर्थ में क्यों? (ताकि) 'हाता' (त्यागने वाला) न हो। ๓๘. วิทา กู. ३८. विदा कू। วิทสฺมา กู โหติ กตฺตริ. วิทู, โลกวิทู. 'विद' धातु से कर्ता अर्थ में 'कू' प्रत्यय होता है। जैसे: 'विदू' (जानने वाला), 'लोकविदू' (लोक को जानने वाला)। ๓๙. วิโต ญาโต. ३९. वितो ज्ञातो। วิปุพฺพา [Pg.184] ญาอิจฺจสฺมา กู โหติ กตฺตริ. วิญฺญู. วิโตติ กึ? ปญฺญา. 'वि' उपसर्ग पूर्वक 'ज्ञा' धातु से कर्ता अर्थ में 'कू' प्रत्यय होता है। जैसे: 'विञ्ञू' (विज्ञ/जानकार)। 'वि' उपसर्ग पूर्वक क्यों? (ताकि) 'पञ्ञा' (प्रज्ञा) न हो। ๔๐. กมฺมา. ४०. कम्मा। กมฺมโต ปรา ญาอิจฺจสฺมา กู โหติ กตฺตริ. สพฺพญฺญู, กาลญฺญู. कर्म उपपद होने पर 'ज्ञा' धातु से कर्ता अर्थ में 'कू' प्रत्यय होता है। जैसे: 'सब्बञ्ञू' (सर्वज्ञ), 'कालञ्ञू' (कालज्ञ)। ๔๑. กฺวจณ. ४१. क्वचण। กมฺมโต ปรา กฺริยตฺถา กฺวจิ อณ โหติ กตฺตริ. กุมฺภกาโร, สรลาโว, มนฺตชฺฌาโย, พหุลาธิการา อิธ น โหติ อาทิจฺจํ ปสฺสติ, หิมวนฺตํ สุโณติ, คามํ คจฺฉติ. กฺวจีติ กึ? กมฺมกโร. कर्म उपपद होने पर क्रियार्थक धातु से कहीं-कहीं कर्ता अर्थ में 'अण' प्रत्यय होता है। जैसे: 'कुम्भकारो' (कुम्हार), 'सरलावो', 'मन्तज्झायो'। 'बहुला' के अधिकार से यहाँ नहीं होता: 'आदिच्चं पस्सति' (सूर्य को देखता है), 'हिमवन्तं सुणोति' (हिमालय को सुनता है), 'गामं गच्छति' (गाँव जाता है)। 'क्वचि' (कहीं-कहीं) क्यों? (ताकि) 'कम्मकरो' (कर्म करने वाला) में न हो। ๔๒. คมา รู. ४२. गमा रू। กมฺมโต ปรา คมา รู โหติ กตฺตริ. เวทคู ปารคู. कर्म उपपद होने पर 'गम' धातु से कर्ता अर्थ में 'रू' प्रत्यय होता है। जैसे: 'वेदगू' (वेद को जानने वाला/गया हुआ), 'पारगू' (पार गया हुआ)। ๔๓. สมานญฺญ ภวนฺต ยาทิตู-ปมานา ทิสา กมฺเม รีริกฺขกา. ४३. समान, अन्य, भवन्त, यादृश आदि उपमानों के उपपद होने पर 'दिस' (दृश्) धातु से कर्म अर्थ में 'री', 'रिक्ख' और 'क' प्रत्यय होते हैं। สมานาทีหิ ยาทีหิ โจปมาเนหิ ปรา ทิสา กมฺมการเก รีริกฺขกา โหนฺติ. สมาโน วิย ทิสฺสตีติ สที สทิกฺโข สทิโส. อญฺญาที อญฺญาทิกฺโข อญฺญาทิโส. ภวาที ภวาทิกฺโข ภวาทิโส. ยาที ยาทิกฺโข ยาทิโส. ตฺยาที ตฺยาทิกฺโข ตฺยาทิโส. สมานาทีหีติ กึ? รุกฺโข วิย ทิสฺสติ. อุปมานาติ กึ? โส ทิสฺสติ. กมฺเมติ กึ? โส [Pg.185] วิย ปสฺสติ. รการา อนฺตสราทิโลปตฺถา, กกาโร เอการาภาวตฺโถ. 'समान' आदि और 'य' आदि उपमानों के बाद 'दिस' धातु से कर्मकारक में 'री', 'रिक्ख' और 'क' प्रत्यय होते हैं। 'समान' के समान दिखता है - 'सदि', 'सदिक्ख', 'सदिसो'। 'अञ्ञ' आदि - 'अञ्ञादिक्ख', 'अञ्ञादिसो'। 'भव' आदि - 'भवादिक्ख', 'भवादिसो'। 'य' आदि - 'यादिक्ख', 'यादिसो'। 'त' आदि - 'त्यादिक्ख', 'त्यादिसो'। 'समान' आदि क्यों? 'रुक्खो विय दिस्सति' (वृक्ष के समान दिखता है)। 'उपमान' क्यों? 'सो दिस्सति' (वह दिखता है)। 'कर्म' में क्यों? 'सो विय पस्सति' (उसके समान देखता है)। 'र' कार अन्त्य स्वर आदि के लोप के लिए है, 'क' कार 'ए' कार के अभाव के लिए है। ๔๔. ภาวการเกสฺว-ฆณ ฆกา. ४४. भाव और कारकों में 'अ', 'घण', 'घ' और 'क' प्रत्यय होते हैं। ภาเว การเก จ กฺริยตฺถา อ ฆณ ฆ กา โหนฺติ พหุลํ. อ-ปคฺคโห, นิคฺคโห, กโร, คโร, จโย, ชโย, รโว, ภโว, ปโจ, วโจ, อนฺนโท, ปุรินฺทโท, อีสกฺกโร, ทุกฺกโร, สุกโร. ฆณ-ภาเว ปาโก, จาโค, ภาโว, การเกปิ สญฺญายํ ตาว ปชฺชเตเนนาติ ปาโท, รุชตีติ โรโค, วิสตีติ เวโส, สรติ กาลนฺตรนฺติ สาโร ถิรํโส, ทรียนฺเต เอเตหีติ ทารา, ชีรยติ เอเตนาติ ชาโร, อสญฺญายมฺปิ ทาโย ทตฺโต, ลาโภ ลทฺโธ, ฆ-วโก, นิปโก, ก-ปิโย, ขิโป, ภุโช, อายุธํ. भाव और कारक में क्रियार्थक धातुओं से 'अ', 'घण', 'घ' और 'क' प्रत्यय बहुलता से होते हैं। 'अ' - अपग्गहो, निग्गहो, करो, गरो, चयो, जयो, रवो, भवो, पचो, वचो, अन्नदो, पुरिन्ददो, ईसक्करो, दुक्करो, सुकरो। 'घण' (भाव में) - पाको, चागो, भावो; कारक में भी संज्ञा होने पर - 'पज्जतेनेनाति' (जिससे चला जाता है) - पादो, 'रुजतीति' (जो पीड़ा देता है) - रोगो, 'विसतीति' (जो प्रवेश करता है) - वेसो, 'सरति कालन्तरन्ति' (जो कालान्तर तक चलता है) - सारो (स्थिर अंश), 'दरीयन्ते एतेहीति' (जिनके द्वारा विदीर्ण किया जाता है) - दारा, 'जीरायति एतेनाति' (जिसके द्वारा जीर्ण किया जाता है) - जारो; असंज्ञा में भी - दायो (दत्त), लाभो (लब्ध)। 'घ' - वको, निपको। 'क' - पियो, खिपो, भुजो, आयुधं। ๔๕. ทาธาตฺวิ. ४५. 'दा' और 'धा' धातुओं से 'इ' प्रत्यय होता है। ทาธาหิ พหุลมิ โหติ ภาวการเกสุ. อาทิ, นิธิ, วาลมิ. 'दा' और 'धा' धातुओं से भाव और कारकों में बहुलता से 'इ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आदि, निधि, वारि। ๔๖. วมาทียฺยถุ. ४६. 'वम' आदि धातुओं से 'अथु' प्रत्यय होता है। วมาทีหิ ภาวการเกสฺวถุ โหติ. วมถุ, เวปถุ, (อวถุ, สยถุ). 'वम' आदि धातुओं से भाव और कारकों में 'अथु' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वमथु, वेपथु, (अवथु, सयथु)। ๔๗. กฺวิ. ४७. 'क्वि' प्रत्यय। กฺริยตฺถา [Pg.186] กฺวิ โหติ พหุลํ ภาวการเกสุ. กกาโร กานุพนฺธการิยตฺโถ, อภิภู, สยมฺภู, ภตฺตคฺคํ, (ทานคฺคํ) สลากคฺคํ, สภา, ปภา. क्रियार्थक धातुओं से भाव और कारकों में बहुलता से 'क्वि' प्रत्यय होता है। 'क' कार 'क' अनुबन्ध के कार्य के लिए है। उदाहरण: अभिभू, सयम्भू, भत्तग्गं, (दानग्गं), सलाकग्गं, सभा, पभा। ๔๘. อโน. ४८. 'अन' प्रत्यय। กฺริยตฺตา ภาวการเกสฺวโน โหติ. คมนํ, ทานํ, สมฺปทานํ, อปาทานํ, อธิกรณํ, จลโน, ชลโน, โกธโน, โกปโน, มณฺฑโน, ภูสโน. क्रियार्थक धातुओं से भाव और कारकों में 'अन' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गमनं, दानं, सम्प्रदानं, अपादानं, अधिकरणं, चलनौ, जलनौ, कोधनो, कोपनो, मण्डनो, भूषणो। ๔๙. อิตฺถิยมณ ตฺติ ก ยก ยา จ. ४९. स्त्रीलिंग में 'अ', 'अन', 'ति', 'क', 'यक' और 'या' प्रत्यय होते हैं। อิตฺถิลิงฺเค ภาเว การเก จ กฺริยตฺถา ออาทโย โหนฺติ อโน จ พหุลํ. อ ติติกฺขา, วีมํสา, ชิคุจฺฉา, ปิปาสา, ปุตฺติยา อีหา ภิกฺขา, อาปทา, เมธา, โคธา, ณการา, หารา, ตารา, ธารา, อารา, กฺติ-อิฏฺฐิ, สิฏฺฐิ, ภิตฺติ, ภตฺติ, ตนฺติ ภูติ, ก-คุหา, รุชา, มุทา, ยก-วิชฺชา, อิชฺชา, ย-เสยฺยา, สมชฺชา, ปพฺพชฺชา, ปริจริยา, ชาคริยา, อนการณา, หารณา, เวทนา, วนฺทนา, อุปาสนา. स्त्रीलिंग में भाव और कारक में क्रियार्थक धातुओं से 'अ' आदि और 'अन' प्रत्यय बहुलता से होते हैं। 'अ' - तितिक्खा, वीमंसा, जिगुच्छा, पिपासा, पुत्तिया, ईहा, भिक्खा, आपदा, मेधा, गोधा। 'ण' कार वाले - हारा, तारा, धारा, आरा। 'ति' - इद्धि, सिद्धि, भित्ति, भत्ति, तन्ति, भूति। 'क' - गुहा, रुजा, मुदा। 'यक' - विज्जा, इज्जा। 'या' - सेय्या, समज्जा, पब्बज्जा, परिचरिया, जागरिया। 'अन' - कारणा, हारणा, वेदना, वन्दना, उपासना। ๕๐. ชาหาหิ นิ. ५०. 'जा' और 'हा' धातुओं से 'नि' प्रत्यय होता है। ชาหาอิจฺเจเตหิ นิ โหติตฺถิยํ. ชานิ, หานิ. 'जा' और 'हा' इन धातुओं से स्त्रीलिंग में 'नि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: जानि, हानि। ๕๑. กรา ริริโย. ५१. 'कर' धातु से 'रिरिय' प्रत्यय होता है। กรโต ริริโย โหติตฺถิยํ. กรณํ กิริยา. กถํ ‘กฺริยา’ติ? ‘‘กฺริยายํ’’ติ นิปาตนา. 'कर' धातु से स्त्रीलिंग में 'रिरिय' प्रत्यय होता है। 'करणं' से 'किरिया'। 'क्रिया' कैसे बना? 'क्रियायं' इस निपातन से। ๕๒. อิกิตี สรูเป. ५२. स्वरूप अर्थ में 'इ' और 'ति' प्रत्यय होते हैं। กฺริยตฺถสฺส [Pg.187] สรูเป-ภิเธยฺเย กฺริยตฺถา ปเร อิกิตี โหนฺติ, วจิ, ยุธิ, ปจติ, ‘อกาโร กกาโร’ติ อาทีสุ การสทฺเทน สมาโส, ยถา เอวกาโรติ. क्रियार्थक धातु के स्वरूप का अभिधान (कथन) करने के लिए क्रियार्थक धातु के बाद 'इ' और 'ति' प्रत्यय होते हैं। जैसे - वचि, युधि, पचति। 'अकारो', 'ककारो' आदि में 'कार' शब्द के साथ समास होता है, जैसे 'एवकारो'। ๕๓. สีลาภิกฺขญฺญา-วสฺสเกสุ ณี. ५३. शील (स्वभाव), आभीक्ष्ण्य (निरन्तरता) और आवश्यकता अर्थों में 'णी' प्रत्यय होता है। กฺริยตฺถา ณี โหติ สีลาทีสุ ปตียมาเนสุ, อุณฺหโภชี, ขีรปายี, อวสฺสการี, สตนฺทายี. शील आदि अर्थों के प्रतीत होने पर क्रियार्थक धातुओं से 'णी' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उण्हभोजी (गर्म भोजन करने वाला), खीरपायी (दूध पीने वाला), अवस्सकारी (अवश्य करने वाला), सतन्दायी (निरन्तर देने वाला)। ๕๔. ถาวริตฺตร ภงฺคุร ภิทุร ภาสุร ภสฺสรา. ५४. थावर, इत्तर, भङ्गुर, भिदुर, भासुर और भस्सर शब्द। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต สีเล คมฺยมาเน. शील (स्वभाव) अर्थ के गम्यमान होने पर ये शब्द निपातित होते हैं। ๕๕. กตฺตริ ภูเต กฺตวนฺตุ กฺตาวี. ५५. कर्ता अर्थ में और भूतकाल में 'क्तवन्तु' और 'क्तावी' प्रत्यय होते हैं। ภูเต-ตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา กฺตวนฺตุตฺตาวี โหนฺติ กตฺตริ. วิชิตวา, วิชิตาวี, ภูเตติ อธิกาโร ยาว ‘‘อาหารตฺถา’’ติ (๕-๖๐). भूतकाल के अर्थ में वर्तमान क्रियार्थक धातुओं से कर्ता में 'क्तवन्तु' और 'क्तावी' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: विजितवा, विजितावी। 'भूते' यह अधिकार 'आहारत्था' (सूत्र 5-60) तक चलता है। ๕๖. กฺโตภาวกมฺเมสุ. ५६. भाव और कर्म में 'क्त' प्रत्यय होता है। ภาเว กมฺเม จ ภูเต กฺโต โหติ. อาสิตํ ภวตา. กโต กโฏ ภวตา. भाव और कर्म में भूतकाल में 'क्त' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आसितं भवता (आपके द्वारा बैठा गया - भाव), कतो कटो भवता (आपके द्वारा चटाई बनाई गई - कर्म)। ๕๗. กตฺตริ จารมฺเภ. ५७. कर्ता में और क्रिया के आरम्भ में 'क्त' प्रत्यय होता है। กฺริยารมฺเภ กตฺตริ กฺโต โหติ ยถาปตฺตญฺจ. ปกโต ภวํ กฏํ, ปกโต กโฏ ภวตา, ปสุตฺโต ภวํ, ปสุตฺตํ ภวตา. क्रिया के आरम्भ में कर्ता में 'क्त' प्रत्यय होता है और यथाप्राप्त (भाव/कर्म में भी) होता है। उदाहरण: पकतो भवं कटं (आपने चटाई बनाना शुरू किया), पकतो कटो भवता, पसुत्तो भवं (आप सो गए), पसुत्तं भवता। ๕๘. ฐา-ส วส สิลิส สี รุห ชร ชนีหิ. ५८. ठा (स्था), स (सद), वस, सिलिस (श्लिष), सी (शी), रुह, जर और जनी धातुओं से। ฐาทีหิ [Pg.188] กตฺตริ กฺโต โหติ ยถาปตฺตญฺจ. อุปฏฺฐิโต คุรุํ ภวํ, อุปฏฺฐิโต คุรุ โภตา, อุปาสิโต คุรุํ ภวํ, อุปาสิโต คุรุ โภตา, อนุวุสิโต คุรุํ ภวํ, อนุวุสิโต คุรุ โภตา, อาสิลิฏฺโฐ คุรุํ ภวํ, อาสิลิฏฺโฐ คุรุ โภตา, อธิสฺสิโต ขโฏปิกํ ภวํ, อธิสฺสิตา ขโฏปิกา โภตา, อารฬฺโห รุกฺขํ ภวํ, อารุฬฺโห รุกฺโข โภตา, อนุชิณฺโณ วสลึ เทวทตฺโต, อนุชิณฺณา วสลี เทวทตฺเตน, อนุชาโต มาณวโก มาณวิกํ, อนุชาตา มาณวิกา มาณวเกน. 'स्था' आदि धातुओं से कर्ता अर्थ में 'क्त' प्रत्यय होता है और यथायोग्य (अन्य अर्थों में भी)। जैसे: 'उपट्टितो गुरुं भवं' (गुरु की सेवा में उपस्थित आप), 'उपट्टितो गुरु भोता' (आपके द्वारा गुरु की सेवा की गई), 'उपासितो गुरुं भवं', 'उपासितो गुरु भोता', 'अनुवुसितो गुरुं भवं', 'अनुवुसितो गुरु भोता', 'आसिलिट्ठो गुरुं भवं', 'आसिलिट्ठो गुरु bhotā', 'अधिस्सितो खटोपिकं भवं', 'अधिस्सिता खटोपिका भोता', 'आरुळ्हो रुक्खं भवं', 'आरुळ्हो रुक्खो भोता', 'अनुजिण्णो वसलिं देवदत्तो', 'अनुजिण्णा वसली देवदत्तेन', 'अनुजातो माणवको माणविकं', 'अनुजाता माणविका माणवकेन'। ๕๙. คมนตฺถากมฺมกาธาเร จ. ५९. गमनार्थक और अकर्मक धातुओं से आधार अर्थ में भी। คมนตฺถโต อกมฺมกโต จ กฺริยตฺถา อาธาเร กฺโต โหติ กตฺตริ จ ยถาปตฺตญฺจ, อิทเมสํ ยาตํ, อิห เต ยาตา, อิห เตหิ ยาตํ, อยํ เตหิ ยาโต ปโถ, อิทเมสมาสิตํ, อิห เต อาสิตา, อิหเตหิ อาสิตํ, ‘เทโว เจ วุฏฺโฐ สมฺปนฺนา สาลโย’ติ การณสามคฺคีสมฺปตฺติ เอตฺถาภิมตา. गमनार्थक और अकर्मक क्रियार्थक धातुओं से आधार अर्थ में और कर्ता अर्थ में यथायोग्य 'क्त' प्रत्यय होता है। जैसे: 'इदमेसं यातं' (यह इनका जाना है), 'इह ते याता' (यहाँ वे गए), 'इह तेहि यातं' (यहाँ उनके द्वारा जाया गया), 'अयं तेहि यातो पथो' (यह उनके द्वारा गया हुआ मार्ग है), 'इदमेसमासितं' (यह इनका बैठना है), 'इह ते आसिता', 'इह तेहि आसितं'। 'देवो चे वुट्ठो सम्पन्ना सालयो' यहाँ कारण-सामग्री की समाप्ति अभिप्रेत है। ๖๐. อาหารตฺถา. ६०. आहारार्थक धातुओं से। อชฺโฌหารตฺถา อาธาเร กฺโต โหติ ยถาปตฺตญฺจ, อิทเมสํ ภุตฺตํ, อิทเมสํ ปีตํ, อิห เตหิ ภุตฺตํ, อิห เตหิ ปีตํ, โอทโน เตหิ ภุตฺโต ปีตมุทกํ, อกตฺตตฺโถ โยควิภาโค, กถํ ‘ปีตา คาโว’ติ? ปีตเมสํ วิชฺชตีติ ปีตา, พาหุลกา วา, ‘ปสฺสินฺโน’ติ ยา เอตฺถ ภูตกาลตา, ตตฺร ตฺโต, เอวํ รญฺญํ มโต รญฺญํ อิฏฺโฐ, รญฺญํ พุทฺโธ, รญฺญํ ปูชิโต, เอวํ [Pg.189] สีลิโต, รกฺขิโต, ขนฺโต, อากุฏฺโฐ, รุฏฺโฐ, รุสิโต, อภิพฺยาหโฏ, ทยิโย, หฏฺโฐ, กนฺตา, สํยโต, อมโต, ‘กฏฺฐ’นฺติ ภูตตายเมว เหตุโน, ผลํ ตฺวตฺร ภาวิ. भक्षणार्थक धातुओं से आधार अर्थ में 'क्त' प्रत्यय होता है और यथायोग्य। जैसे: 'इदमेसं भुत्तं' (यह इनका भोजन है), 'इदमेसं पीतं' (यह इनका पीना है), 'इह तेहि भुत्तं', 'इह तेहि पीतं', 'ओदनो तेहि भुत्तो' (उनके द्वारा भात खाया गया), 'पीतमुदकं' (पानी पिया गया)। 'अकत्तत्थो' (अ-कर्ता अर्थ) के लिए योग-विभाग है। 'पीता गावो' (गायें पी चुकी हैं) कैसे सिद्ध होगा? 'पीतमेसं विज्जतीति पीता' (जिनका पीना विद्यमान है वे पीता), अथवा बाहुलक से। 'पस्सिन्नो' में जो भूतकालता है, वहाँ 'त्त' प्रत्यय है। इसी प्रकार 'रञ्ञं मतो' (राजा द्वारा सम्मत), 'रञ्ञं इट्ठो', 'रञ्ञं बुद्धो', 'रञ्ञं पूजितो'। इसी प्रकार 'सीलितो', 'रक्खितो', 'खन्तो', 'आकुट्ठो', 'रुट्ठो', 'रुसितो', 'अभिब्याहटो', 'दयियो', 'हट्ठो', 'कन्ता', 'संयतो', 'अमतो'। 'काष्ठ' में भूतकाल में ही हेतु है, फल तो यहाँ भविष्य में होगा। ๖๑. ตุํ ตาเย ตเว ภาเว ภวิสฺสติ กฺริยายํ ตทตฺถาย. ६१. भविष्यत् काल के अर्थ में वर्तमान क्रियार्थक धातु से भाव अर्थ में 'तुं', 'ताये' और 'तवे' प्रत्यय होते हैं, जब वह क्रिया उस (दूसरी) क्रिया के प्रयोजन के लिए हो। ภวิสฺสติ อตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา ภาเว ตุํ ตาเย ตเว โหนฺติ กฺริยายํ ตทตฺถายํ ปตียมานายํ. กาตุํ คจฺฉติ, กตฺตาเย คจฺฉติ, กาตเว คจฺฉติ, อิจฺฉติ โภตฺตุํ กาเมติ โภตฺตุนฺติ อิมีนาว สิทฺธํ, ปุนพฺพิธาเน ตฺวิหาปิ สิยา ‘อิจฺฉนฺโต กโรตี’ติ, เอวํ สกฺโกติ โภตฺตุํ, ชานาติ โภตฺตุํ, คิลายติ โภตฺตุํ, ฆฏเต โภตฺตุํ, อารภเต โภตฺตุํ, ลภเต โภตฺตุํ, ปกฺกมติ โภตฺตุํ, อุสฺสหติ โภตฺตุํ, อรหติ โภตฺตุํ, อตฺถิ โภตฺตุํ, วิชฺชติ โภตฺตุํ, วฏฺฏ ติโภตฺตุํ, กปฺปติ โภตฺตุนฺติ. ตถา ปารยติ โภตฺตุํ, ปหุ โภตฺตุํ, สมตฺโถ โภตฺตุํ, ปริยตฺโต โภตฺตุํ, อลํ โภตฺตุนฺติ ภวติสฺส สพฺพตฺถ สมฺภวา. ตถา กาโล โภตฺตุํ. สมโย โภตุํ, เวลา โภตุนฺติ, ยถา โภตฺตุํมโน, โสตฺตุํ โสโต, ทฏฺฐุํ จกฺขุ, ยุชฺฌิตุํ ธนุ, วตฺตุํ ชโฬ, คนฺตุมโน, กตฺตุมลโสติ, อุจฺจารณนฺตุ วตฺตายตฺตํ. ภาเวติ กึ? กริสฺสามีติ คจฺฉติ, กฺริยายนฺติ กึ? ภิกฺขิสฺสํ อิจฺจสฺส ชฏา, ตทตฺถายนฺติ กึ? คจฺฉิสฺสโต เต ภวิสฺสติ ภตฺตํ โภชนาย. भविष्यत् काल के अर्थ में वर्तमान क्रियार्थक धातु से भाव अर्थ में 'तुं', 'ताये' और 'तवे' प्रत्यय होते हैं, जब वह क्रिया उस क्रिया के प्रयोजन के लिए प्रतीत हो रही हो। जैसे: 'कातुं गच्छति' (करने के लिए जाता है), 'कत्ताये गच्छति', 'कातवे गच्छति'। 'इच्छति भोत्तुं' (खाने की इच्छा करता है), 'कामेति भोत्तुं' (खाने की कामना करता है) - यह इसी से सिद्ध है। पुनः विधान करने से यहाँ भी हो सकता है: 'इच्छन्तो करोति'। इसी प्रकार 'सक्कोति भोत्तुं' (खाने में समर्थ है), 'जानाति भोत्तुं', 'गिलायति भोत्तुं', 'घटते भोत्तुं', 'आरभते भोत्तुं', 'लभते भोत्तुं', 'पक्कमति भोत्तुं', 'उस्सहति भोत्तुं', 'अरहति भोत्तुं', 'अत्थि भोत्तुं', 'विज्जति भोत्तुं', 'वट्टति भोत्तुं', 'कप्पति भोत्तुं'। तथा 'पारयति भोत्तुं', 'पहु भोत्तुं', 'समत्थो भोत्तुं', 'परियत्तो भोत्तुं', 'अलं भोत्तुं' - यहाँ 'भवति' का सर्वत्र संभव होने से। तथा 'कालो भोत्तुं' (खाने का समय), 'समयो भोत्तुं', 'वेला भोत्तुं'। जैसे 'भोत्तुंमनो' (खाने का मन), 'सोत्तुं सोतो' (सुनने के लिए कान), 'दट्ठुं चक्खु' (देखने के लिए आँख), 'युज्झितुं धनु' (युद्ध के लिए धनुष), 'वत्तुं जळो' (बोलने में जड़), 'गन्तुमनो', 'कत्तुमलसो'। उच्चारण तो वक्ता के अधीन है। 'भावे' क्यों? 'करिस्सामीति गच्छति' (करूँगा, ऐसा सोचकर जाता है)। 'क्रियायां' क्यों? 'भिक्खिस्सं इच्चस्स जटा' (भीख माँगूँगा, इसलिए इसकी जटाएँ हैं)। 'तदत्थाय' क्यों? 'गच्छस्सतो ते भविस्सति भत्तं भोजनाय' (जाते हुए तुम्हारे लिए भोजन के लिए भात होगा)। ๖๒. ปฏิเสเธ-ลํขลูนํ ตุน ตฺวาน ตฺวา วา. ६२. निषेध अर्थ वाले 'अलं' और 'खलु' शब्दों के प्रयोग में भाव अर्थ में 'तुन', 'त्वान' और 'त्वा' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। อลํ [Pg.190] ขลุสทฺทานํ ปฏิเสธตฺถานํ ปโยเค ตุนาทโย วา โหนฺติ ภาเว. อลํ โสตุน, ขลุ โสตุน, อลํ สุตฺวาน, ธลุ สุตฺวาน, อลํ สุตฺวา, ขลุ สุตฺวา, อลํ สุเตน, ขลุ โสเตน, อลํ ขลูนนฺติ กึ? มา โหตุ, ปฏิเสเธติ กึ? อลงฺกาโร. निषेधार्थक 'अलं' और 'खलु' शब्दों के प्रयोग में भाव अर्थ में 'तुन' आदि प्रत्यय विकल्प से होते हैं। जैसे: 'अलं सोतुन' (सुनना बस करो), 'खलु सोतुन', 'अलं सुत्वान', 'खलु सुत्वान', 'अलं सुत्वा', 'खलु सुत्वा'। (विकल्प से) 'अलं सुतेन', 'खलु सोतेन'। 'अलं' और 'खलु' के लिए क्यों? (ताकि) 'मा होतु' (न हो) में न हो। 'निषेध' अर्थ में क्यों? (ताकि) 'अलङ्कारो' (आभूषण) में न हो। ๖๓. ปุพฺเพกกตฺถุกานํ. ६३. समान कर्ता वाली क्रियाओं में (पूर्व काल की क्रिया के लिए)। เอโก กตฺตา เยสํ พฺยาปารานํ, เตสุ โย ปุพฺโพ, ตทตฺถโต กฺริยตฺถา ตุนาทโย โหนฺติ ภาเว, โสตุน ยาติ, สุตฺวาน, สุตฺวา วา, เอกกตฺตุกานนฺติกึ? ภุตฺตสฺมึ เทวทตฺเต ยญฺญทตฺโต วชติ, ปุพฺพาติ กึ? ภุญฺชภิ จ ปจติ จ. ‘อปฺปตฺวา นทึ ปพฺพโต อติกฺกมฺม ปพฺพตํ นที’ติ ภูธาตุสฺส สพฺพตฺถ สมฺภวา เอกกตฺตุกตา ปุพฺพกาลตา จ คมฺยเต. ‘ภุตฺวา ภุตฺวา คจฺฉตีติ’ อิมินาว สิทฺธํ อาภิกฺขญฺญนฺตุ ทฺวิพฺพจนาวคมฺยเต. กถํ ‘ชีวคฺคาหํ อคาหยิ, กายปฺปจาลกํ คจฺฉนฺตี’ติ อาทิ? ฆณนฺเตน กฺริยาวิเสสเนน สิทฺธํ ยถา ‘โอทนปากํ สยตี’ติ. जिन व्यापारों (क्रियाओं) का कर्ता एक ही हो, उनमें जो पूर्वकालिक है, उस अर्थ में धातु से 'तुन' आदि प्रत्यय भाव अर्थ में होते हैं। जैसे- 'सोतुन याति' (सुनने के लिए जाता है), 'सुत्वान', 'सुत्वा' वा। 'एककर्तृक' क्यों कहा? 'भुत्तस्मिं देवदत्ते यज्ञदत्तो वजति' (देवदत्त के भोजन कर लेने पर यज्ञदत्त जाता है - यहाँ कर्ता भिन्न हैं)। 'पूर्व' क्यों कहा? 'भुञ्जति च पचति च' (खाता है और पकाता है - यहाँ क्रियाएँ साथ हैं)। 'अप्पत्वा नदिं पब्बतो अतिक्कम्म पब्बतं नदी' यहाँ 'भू' धातु की सर्वत्र संभावना से एककर्तृकता और पूर्वकालता समझी जाती है। 'भुत्वा भुत्वा गच्छति' इससे ही सिद्ध है, पौनःपुन्य (बार-बार होना) द्वित्व वचन से समझा जाता है। 'जीवग्गाहं अगाही', 'कायप्पचालकं गच्छन्ति' आदि कैसे सिद्ध होते हैं? 'घण' प्रत्ययान्त क्रिया-विशेषण से सिद्ध होते हैं, जैसे 'ओदनपाकं सयति' । ๖๔. นฺโต กตฺถริ วตฺตมาเน. ६४. वर्तमान काल में कर्ता अर्थ में 'न्त' प्रत्यय होता है। วตฺตมานตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺตา นฺโต โห ติ กตฺตริ, ติฏฺฐนฺโต. वर्तमान अर्थ में वर्तमान धातु से कर्ता अर्थ में 'न्त' प्रत्यय होता है। जैसे- 'तिट्ठन्तो' (खड़ा होता हुआ)। ๖๕. มาโน. ६५. 'मान' प्रत्यय। วตฺตมานตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา มาโน โหติ, กตฺตริ. ติฏฺฐมาโน. वर्तमान अर्थ में वर्तमान धातु से कर्ता अर्थ में 'मान' प्रत्यय होता है। जैसे- 'तिट्ठमानो' (खड़ा होता हुआ)। ๖๖. ภาวกมฺเมสุ. ६६. भाव और कर्म अर्थ में। วตฺตมานตฺเถ [Pg.191] วตฺตมานโต กฺรึยตฺถา ภาเว กมฺเมจ มาโน โหติ. ฐียมานํ, ปจฺจมาโน โอทโน. वर्तमान अर्थ में वर्तमान धातु से भाव और कर्म अर्थ में 'मान' प्रत्यय होता है। जैसे- 'ठीयमानं' (भाव), 'पच्चमानो ओदनो' (पकाया जाता हुआ भात - कर्म)। ๖๗. เต สฺสปุพฺพานาคเต. ६७. भविष्य काल में 'स्स' के बाद वे (न्त और मान) होते हैं। อนาคตตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา เตนฺตมานา สฺสปุพฺพา โหนฺติ. ฐสฺสนฺโต, ฐสฺสมาโน, ฐียิสฺสมานํ, ปจฺจิสฺสมาโน โอทโน. भविष्य अर्थ में धातु से 'न्त' और 'मान' प्रत्यय 'स्स' के बाद होते हैं। जैसे- 'ठस्सन्तो', 'ठस्समानो', 'ठीयिस्समानं', 'पच्चिस्समानो ओदनो' । ๖๘. ณฺวาทโย. ६८. 'णु' आदि प्रत्यय। กฺริยตฺถา ปเร พหุลํ ณฺวาทโย โหนฺติ. จารุ, ทารุ. धातुओं से परे बहुलता से 'णु' आदि प्रत्यय होते हैं। जैसे- 'चारु', 'दारु' । ๖๙. ขฉสาน เมกสฺสโรทิ ทฺเว. ६९. 'ख', 'छ' और 'स' प्रत्ययान्त धातुओं के प्रथम एकाक्षर का द्वित्व होता है। ขฉสปฺปจฺจยนฺตานํ กฺริยตฺถานํ ปฐเมกสฺสรํ สทฺทรูปํ ทฺเว ภวติ. ติติกฺขา, ชิคุจฺฉา, วีมํสา. 'ख', 'छ' और 'स' प्रत्ययान्त धातुओं के प्रथम एकाक्षर शब्द-रूप का द्वित्व होता है। जैसे- 'तितिक्खा', 'जिगुच्छा', 'वीमंसा' । ๗๐. ปโรกฺขายญฺจ. ७०. और परोक्षा (लिट् लकार) में भी। ปโรกฺขายํ ปฐเมกสฺสรํ สทฺทรูปํ ทฺเว ภวติ. ชคาม, จกาโร อนุตฺตสมุจฺจยตฺโถ, เตนญฺญตฺราปิ ยถาคมํ, ชหาติ, ชหิตพฺพํ, ชหิตุํ, ททฺทลฺลติ, จงฺกมติ. ‘โลลุโป, โมมูโหติ โอตฺตํ ตทมินาทิปาฐา. परोक्षा में प्रथम एकाक्षर शब्द-रूप का द्वित्व होता है। जैसे- 'जगाम'। 'च' कार अनुक्त के समुच्चय के लिए है, उससे अन्यत्र भी आगम के अनुसार द्वित्व होता है, जैसे- 'जहाति', 'जहितब्बं', 'जहितुं', 'दद्दल्लति', 'चङ्कमति'। 'लोलुपो', 'मोमूहोति' आदि 'तदमिनादि' पाठ से सिद्ध होते हैं। ๗๑. อาทิสฺมา สรา. ७१. आदि स्वर से। อาทิภูตา สรา ปรเมกสฺสรํ ทฺเว โหติ, อสิสิสติ, อาทิสฺมาติ กึ? ชชคาร, สราติ กึ? ปปาจ. आदि में स्थित स्वर से परे एकाक्षर का द्वित्व होता है। जैसे- 'असिसिसति'। 'आदि से' क्यों कहा? 'जजगार'। 'स्वर से' क्यों कहा? 'पपाच' । ๗๒. น ปุน. ७२. पुनः नहीं। ยํ [Pg.192] ทฺวิภูตํ, น ตํ ปุน ทฺวิตฺตมาปชฺชเต, ติติกฺขิสติ, ชิคุจฺฉิสติ. जो द्वित्व (दोहराया हुआ) हो गया है, वह पुनः द्वित्व को प्राप्त नहीं होता है; जैसे- titikkhisati, jigucchisati। ๗๓. ยถิฏฺฐํ สฺยาทิโน. ७३. 'स्यादि' (स-आदि) प्रत्ययों के परे होने पर इच्छानुसार (द्वित्व होता है)। สฺยาทฺยนฺตสฺส ยถิฏฺฐเมกสฺสรมาทิภูตมญฺญํ วา ยถาคมํ ทฺวิตฺตปชฺชเต, ปุปุตฺตียิสติ, ปุติตฺตียิสติ, ปุตฺตียิยิสติ. 'स्यादि' प्रत्यय जिसके अन्त में हो, उसके आदिभूत एक स्वर को अथवा आगम के अनुसार अन्य को इच्छानुसार द्वित्व प्राप्त होता है; जैसे- puputtīyisati, putittīyisati, puttīyiyisati। ๗๔. รสฺโส ปุพฺพสฺส. ७४. पूर्व (पहले वाले) का ह्रस्व होता है। ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส สโร รสฺโส โหติ. ททาติ. द्वित्व होने पर पूर्व (अभ्यास) का स्वर ह्रस्व होता है। जैसे- dadāti। ๗๕. โลโป-นาทิพฺยญฺชนสฺส. ७५. आदि व्यंजन को छोड़कर (अन्य) व्यंजन का लोप होता है। ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺสาทิโต-ญฺญสฺส พฺยญฺชนสฺส โลโป โหติ. อสิสิสติ. द्वित्व होने पर पूर्व (अभ्यास) के आदि व्यंजन से भिन्न व्यंजन का लोप होता है। जैसे- asisisati। ๗๖. ขฉเสสฺวสฺสิ. ७६. 'ख', 'छ', 'स' प्रत्ययों के परे होने पर 'अ' का 'इ' होता है। ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส อสฺส อิ โหติ ขฉเสสุ. ปิปาสติ, ชิฆํสติ, ขฉเสสูติ กึ? ชหาติ, อสฺสาติ กึ? พุภุกฺขติ. द्वित्व होने पर पूर्व (अभ्यास) के 'अ' का 'इ' होता है 'ख', 'छ', 'स' प्रत्ययों के परे होने पर। जैसे- pipāsati, jighaṃsati। 'ख, छ, स' में ही क्यों? jahāti। 'अ' का ही क्यों? bubhukkhati। ๗๗. คุปิสฺสุสฺส. ७७. 'गुप्' धातु के 'उ' का (इ होता है)। ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส คุปิสฺส อุสฺส อิ โหติ ขฉเสสุ, ชิคุจฺฉติ. द्वित्व होने पर 'ख, छ, स' प्रत्ययों के परे होने पर 'गुप्' धातु के पूर्व (अभ्यास) के 'उ' का 'इ' होता है; जैसे- jigucchati। ๗๘. จตุตฺถทุติยานํ ตติยปฐมา. ७८. चतुर्थ और द्वितीय वर्णों के स्थान पर क्रमशः तृतीय और प्रथम वर्ण होते हैं। ทฺวิตฺเต ปุเพสํ จตุตฺถทุติยานํ ตติยปฐมา โหนฺติ. พุภุกฺขติ, จิจฺเฉท. द्वित्व होने पर पूर्व (अभ्यास) के चतुर्थ और द्वितीय वर्णों के स्थान पर तृतीय और प्रथम वर्ण होते हैं। जैसे- bubhukkhati, ciccheda। ๗๙. กวคฺคหานํ จวคฺคชา. ७९. क-वर्ग और 'ह' के स्थान पर च-वर्ग के वर्ण होते हैं। ทฺวิตฺเต [Pg.193] ปุพฺเพสํ กวคฺคหานํ จวคฺคชา โหนฺติ ยถากฺกมํ. จุโกป, ชหาติ. द्वित्व होने पर पूर्व (अभ्यास) के क-वर्ग और 'ह' के स्थान पर यथाक्रम च-वर्ग के वर्ण होते हैं। जैसे- cukopa, jahāti। ๘๐. มานสฺส วี ปรสฺส จ มํ. ८०. 'मान्' धातु के (अभ्यास को) 'वी' और पर (धातु) को 'मं' होता है। ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส มานสฺส วี โหติ ปรสฺส จ มํ, วีมํสติ. द्वित्व होने पर 'मान्' धातु के पूर्व (अभ्यास) को 'वी' होता है और पर (धातु) को 'मं' होता है; जैसे- vīmaṃsati। ๘๑. กิตสฺสาสํสเย ติ วา. ८१. 'कित्' धातु के (अभ्यास को) 'ति' विकल्प से होता है, यदि संशय अर्थ न हो। สํสยโส-ญฺญสฺมึ วตฺตมานสฺส ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส กิตสฺส วา ติ โหติ. ติกิจฺฉติ, จิกิจฺฉติ, อสํสเยติ กึ? วิจิกิจฺฉติ. संशय से भिन्न अर्थ में वर्तमान 'कित्' धातु के द्वित्व होने पर पूर्व (अभ्यास) को विकल्प से 'ति' होता है। जैसे- tikicchati, cikicchati। 'असंशय' में ही क्यों? vicikicchati। ๘๒. ยุวณฺณานเมโอ ปจฺจเย. ८२. प्रत्यय परे होने पर 'इ' वर्ण और 'उ' वर्ण के स्थान पर 'ए' और 'ओ' होते हैं। อิวณฺณุวณฺณนฺตานํ กฺริยตฺถานํ เอโอโหนฺติ ยถากฺกมํ ปจฺจเย. เจตพฺพํ, เนตพฺพํ, โสตพฺพํ, ภวิตพฺพํ. प्रत्यय परे होने पर इ-वर्णान्त और उ-वर्णान्त धातुओं के स्थान पर यथाक्रम 'ए' और 'ओ' होते हैं। जैसे- cetabbaṃ, netabbaṃ, sotabbaṃ, bhavitabbaṃ। ๘๓. ลหุสฺสุปนฺตสฺส. ८३. लघु उपधा वाले (इ-वर्ण और उ-वर्ण) के स्थान पर (ए और ओ होते हैं)। ลหุภูตสฺส อุปนฺตสฺส ยุวณฺณสฺส เอโอ โหนฺติ ยถากฺกมํ. เอสิตพฺพํ, โกสิตพฺพํ, ลหุสฺสาติ กึ? ธูปิตา, อุปนฺตสฺสาติ กึ? รุนฺธติ. लघुभूत उपधा वाले इ-वर्ण और उ-वर्ण के स्थान पर यथाक्रम 'ए' और 'ओ' होते हैं। जैसे- esitabbaṃ, kositabbaṃ। 'लघु' का ही क्यों? dhūpitā। 'उपधा' का ही क्यों? rundhati। ๘๔. อสฺสา ณานุพนฺเธ. ८४. 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर 'अ' का 'आ' होता है। ณการานุพนฺเธ ปจฺจเย ปเร อุปนฺตสฺส อการสฺส อา โหติ. การโก. ण-कार अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर उपधा के 'अ' का 'आ' होता है। जैसे- kārako। ๘๕. น เต กานุพนฺธนาคเมสุ. ८५. 'क' अनुबन्ध वाले प्रत्यय और 'न' आगम के होने पर वे (ए, ओ, आ) नहीं होते हैं। เต [Pg.194] เอโออา กานุพนฺเธ นาคเม จ น โหนฺติ. จิโต, สุโต, ทิฏฺโฐ, ปุฏฺโฐ, นาคเม ‘วนา’ทินา (๑.๔๕) จินิตพฺพํ, จินิตุํ, สุณิตพฺพํ, สุณิตุํ ปาปุณิตพฺพํ, ปาปุณิตุํ, ธุนิตพฺพํ, ธุนิตุํ, ธุนนํ, ธุนยิตพฺพํ, ธุนาเปตพฺพํ, ธุนยิตุํ ธุนาเปตุํ, ธุนยนํ, ธุนาปนํ, ธุนยติ, ธุนาเปติ, ปีเนตพฺพํ, ปีนยิตุํ, ปีนนํ, ปีนิตุํ, ปีนยติ, สุโนติ, สิโนติ, ทุโนติ, หิโนติ, ปหิณิถพฺพํ, ปหิณิตุํ, ปหิณนํ. वे 'ए', 'ओ' और 'आ' क-अनुबन्ध वाले प्रत्यय और न-आगम के होने पर नहीं होते हैं। जैसे- cito, suto, diṭṭho, puṭṭho; न-आगम में 'वना' आदि सूत्र से- cinitabbaṃ, cinituṃ, suṇitabbaṃ, suṇituṃ, pāpuṇitabbaṃ, pāpuṇituṃ, dhunitabbaṃ, dhunituṃ, dhunanaṃ, dhunayitabbaṃ, dhunāpetabbaṃ, dhunayituṃ, dhunāpetuṃ, dhunayanaṃ, dhunāpanaṃ, dhunayati, dhunāpeti, pīnetabbaṃ, pīnayituṃ, pīnanaṃ, pīnituṃ, pīnayati, sunoti, sinoti, dunoti, hinoti, pahiṇitabbaṃ, pahiṇituṃ, pahiṇanaṃ। ๘๖. วา กฺวจิ. ८६. कहीं-कहीं विकल्प से (नहीं होते हैं)। เต กฺวจิ วา น โหนฺติ กานุพนฺธนาคเมสุ. มุทิโต, รุทิตํ, โรทิตํ. वे (ए, ओ, आ) कहीं-कहीं क-अनुबन्ध और न-आगम के होने पर विकल्प से नहीं होते हैं। जैसे- mudito, ruditaṃ, roditaṃ। ๘๗. อญฺญตฺราปิ. ८७. अन्यत्र भी (यही नियम लागू होते हैं)। กานุพนฺธนาคมโต-ญฺญสฺมิมฺปิ เต กฺวจิ, นุ โหนฺติ. ขิปโก, ปนูทนํ, วธโก. 'क' अनुबन्ध और आगम से भिन्न में भी वे (नु आदि) कहीं-कहीं होते हैं। जैसे- 'खिपको', 'पनूदनं', 'वधको' । ๘๘. ปฺเย สิสฺสา. ८८. 'प्य' प्रत्यय होने पर 'सिस्स' का 'आ' हो जाता है। สิสฺส อา โหติ ปฺยาเทเส, นิสฺสาย. 'प्य' आदेश होने पर 'सिस्स' का 'आ' हो जाता है। जैसे- 'निस्साय' । ๘๙. เอโอนมยวา สเร. ८९. स्वर परे होने पर 'ए' और 'ओ' के स्थान पर क्रमशः 'अय' और 'अव' हो जाते हैं। สเร ปเร เอโอนํ อยอวา โหนฺติ. ชโย, ภโว, สรติ กึ? เชติ, อนุโภติ. स्वर परे होने पर 'ए' और 'ओ' के स्थान पर 'अय' और 'अव' होते हैं। जैसे- 'जयो', 'भवो'। 'स्वर परे' क्यों कहा? 'जेति', 'अनुभोति' । ๙๐. อายาวา ณานุพนฺเธ. ९०. 'ण' अनुबन्ध होने पर 'आय' और 'आव' होते हैं। เอโอนํ [Pg.195] อายาวา โหนฺติ สราโท ณานุพนฺเธ. นายยติ, ภาวยติ, ‘สยาเปตฺวา’ติอาทีสุ รสฺสตฺตํ. स्वर आदि 'ण' अनुबन्ध होने पर 'ए' और 'ओ' के स्थान पर 'आय' और 'आव' होते हैं। जैसे- 'नाययति', 'भावयति'। 'सयापेत्वा' आदि में ह्रस्व होता है। ๙๑. อาสฺสาณาปิมฺหิ ยุก. ९१. 'आ' कारान्त धातु को 'णापि' और अन्य 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'युक' (य) आगम होता है। อาการนฺตสฺส กฺริยตฺถสฺส ยุก โหติ ณาปิโต-ญฺญสฺมึ ณานุพนฺเธ. ทายโก, ณานุพนฺเธตฺเวว? ทานํ, อณาปิมฺหีติ กึ? ทาปยติ. 'आ' कारान्त धातु को 'णापि' से भिन्न 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्यय परे होने पर 'युक' आगम होता है। जैसे- 'दायको'। 'ण' अनुबन्ध में ही क्यों? 'दानं'। 'णापि' से भिन्न क्यों? 'दापयति' । ๙๒. ปทาทีนํ กฺวจิ. ९२. 'पद' आदि धातुओं को कहीं-कहीं (युक आगम होता है)। ปทาทีนํ ยุก โหติ กฺวจิ. นิปชฺชิตพฺพํ, นิปชฺชิตุํ นิปชฺชนํ, ปมชฺชิตพฺพํ, ปมชฺชิตุํ, ปมชฺชนํ, กฺวจีติ กึ? ปาโท. 'पद' आदि धातुओं को कहीं-कहीं 'युक' आगम होता है। जैसे- 'निपज्जितब्बं', 'निपज्जितुं', 'निपज्जनं', 'पमज्जितब्बं', 'पमज्जितुं', 'पमज्जनं'। 'कहीं-कहीं' क्यों कहा? 'पादो' । ๙๓. มํ วา รุธาทีนํ. ९३. 'रुध' आदि धातुओं से विकल्प से 'मं' प्रत्यय होता है। รุธาทีนํ กฺวจิ มํ วา โหติ. รุนฺธิตุํ, รุชฺฌิตุํ, กฺวจิตฺเวว? นิโรโธ. 'रुध' आदि धातुओं से कहीं-कहीं 'मं' प्रत्यय विकल्प से होता है। जैसे: 'रुन्धितुं', 'रुज्झितुं'। 'कहीं-कहीं' ही क्यों? (ताकि) 'निरोधो' (निरोध) में न हो। ๙๔. กฺวิมฺหิ โลโป-นฺตพฺยญฺชนสฺส. ९४. 'क्वि' प्रत्यय होने पर अन्त्य व्यंजन का लोप होता है। อนฺตพฺยญฺชนสฺส โลโป โหติ กฺวิมฺหิ. ภตฺตํ คสนฺติ คณฺหนฺติ วา เอตฺถาติ ภตฺตคฺคํ. 'क्वि' प्रत्यय होने पर अन्त्य व्यंजन का लोप होता है। जहाँ भात (भोजन) खाते हैं या ग्रहण करते हैं, वह 'भत्तग्गं' (भोजनालय) है। ๙๕. ปรรูปมยกาเร พฺยญฺชเน. ९५. 'य' कार रहित व्यंजन के परे होने पर पररूप होता है। กฺริยตฺถานมนฺตพฺยญฺชนสฺส ปรรูปํ โหติ ยการโต-ญฺญสฺมึ พฺยญฺชเน. เภตฺตพฺพํ, พฺยญฺชเนติ กึ? ภินฺทิตพฺพํ, อยกาเรติ กึ? ภิชฺชติ. 'य' कार से भिन्न व्यंजन के परे होने पर क्रियार्थक (धातुओं) के अन्त्य व्यंजन का पररूप होता है। जैसे- भेत्तब्बं। 'व्यंजन' क्यों कहा? भिन्दितब्बं। 'अ-यकार' क्यों कहा? भिज्जति। ๙๖. มนานํ นิคฺคหีตํ. ९६. 'म' और 'न' (अन्त्य धातुओं) का निग्गहीत (अनुस्वार) होता है। มการนการนฺตานํ [Pg.196] กฺริยตฺถานํ นิคฺคหีตํ โหติ อยกาเร พฺยญฺชเน. คนฺตพฺพํ, ชงฺฆา, พฺยญฺชเนตฺเวว? คมนํ, อยกาเรตฺเวว? คมฺยเต. 'य' कार रहित व्यंजन के परे होने पर मकारान्त और नकारान्त क्रियार्थक (धातुओं) का निग्गहीत होता है। जैसे- गन्तब्बं, जङ्घा। 'व्यंजन' ही क्यों? गमनं। 'अ-यकार' ही क्यों? गम्यते। ๙๗. น พฺรูสฺโส. ९७. 'ब्रू' धातु के (ऊकार) को 'ओ' नहीं होता है। พฺรูสฺส โอ น โหติ พฺยญฺชเน. พฺรูมิ, พฺยญฺชเนตฺเวว? อพฺรวิ. व्यंजन के परे होने पर 'ब्रू' के (ऊकार) को 'ओ' नहीं होता है। जैसे- ब्रूमि। 'व्यंजन' ही क्यों? अब्रवि। ๙๘. กคา จชานํ ฆานุพนฺเธ. ९८. 'घ' अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर 'च' और 'ज' के स्थान पर क्रमशः 'क' और 'ग' होते हैं। ฆานุพนฺเธ จการชการนฺตานํ กฺริยตฺถานํ กคา โหนฺติ ยถากฺกมํ. วากฺยํ, ภาคฺยํ. 'घ' अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर चकारान्त और जकारान्त क्रियार्थक (धातुओं) के स्थान पर यथाक्रम 'क' और 'ग' होते हैं। जैसे- वाक्यं, भाग्यं। ๙๙. หนสฺส ฆาโต ณานุพนฺเธ. ९९. 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर 'हन' धातु के स्थान पर 'घात' होता है। หนสฺส ฆาโต โหติ ณานุพนฺเธ. อาฆาโต. 'ण' अनुबन्ध वाले प्रत्यय के परे होने पर 'हन' धातु के स्थान पर 'घात' होता है। जैसे- आघातो। ๑๐๐. กฺวิมฺหิ โฆ ปริปจฺจ-สโมหิ. १००. 'क्वि' प्रत्यय होने पर 'परि', 'पटि', 'सं' और 'ओ' उपसर्गों के बाद 'हन' के स्थान पर 'घ' होता है। ปยฺยาทีหิ ปรสฺส หนสฺส โฆ โหติ กฺวิมฺหิ. ปลิโฆ, ปฏิโฆ, อฆํ รสฺสตฺตํ นิปาตนา, สงฺโฆ, โอโฆ. 'परि' आदि के बाद 'हन' धातु के स्थान पर 'क्वि' प्रत्यय होने पर 'घ' होता है। जैसे- पलिघो, पटिघो, अघं (यहाँ निपातन से ह्रस्व हुआ है), सङ्घो, ओघो। ๑๐๑. ปรสฺส ฆํ เส. १०१. द्वित्व होने पर 'स' प्रत्यय के परे होने पर बाद वाले 'हन' के स्थान पर 'घं' होता है। ทฺวิตฺเต ปรสฺส หนสฺส ฆํ โหติ เส. ชิฆํสา. द्वित्व होने पर 'स' प्रत्यय के परे होने पर बाद वाले 'हन' के स्थान पर 'घं' होता है। जैसे- जिघंसा। ๑๐๒. ชิหรานํ คี. १०२. द्वित्व होने पर 'जि' और 'तर' (या हर) के स्थान पर 'गी' होता है। ทฺวิตฺเต ปเรสํ ชิตรานํ คี โหติ เส. วิชิคีสา, ชิคีสา. द्वित्व होने पर 'स' प्रत्यय के परे होने पर बाद वाले 'जि' और 'तर' के स्थान पर 'गी' होता है। जैसे- विजिगीसा, जिगीसा। ๑๐๓. ธาสฺส โห. १०३. द्वित्व होने पर बाद वाले 'धा' के स्थान पर 'ह' होता है। ทฺวิตฺเต [Pg.197] ปรสฺส ธาสฺส ห โหติ. ทหติ. द्वित्व होने पर बाद वाले 'धा' के स्थान पर 'ह' होता है। जैसे- दहति। ๑๐๔. ณิมฺหิ ทีโฆ ทุสสฺส. १०४. 'णि' प्रत्यय होने पर 'दुस' धातु का (स्वर) दीर्घ होता है। ทุสสฺส ทีโฆ โหติ ณิมฺหิ. ทุสิโต. ณิมฺหีติ กึ? ทุฏฺโฐ. 'णि' प्रत्यय होने पर 'दुस' धातु का (स्वर) दीर्घ होता है। जैसे- दूसितो। 'णि' प्रत्यय में ही क्यों? दुट्ठो। ๑๐๕. คุหิสฺส สเร. १०५. स्वर के परे होने पर 'गुह' धातु का (स्वर) दीर्घ होता है। คุหิสฺส ทีโฆ โหติ สเร. นิคูหนํ สเรติ กึ? คุยฺหํ. स्वर के परे होने पर 'गुह' धातु का (स्वर) दीर्घ होता है। जैसे- निगूहनं। 'स्वर' क्यों कहा? गुय्हं। ๑๐๖. มุหพหานญฺจ เต กานุพนฺเธ-ตฺเว. १०६. 'त' आदि 'क' अनुबन्ध वाले प्रत्ययों के परे होने पर, 'त्वान' और 'त्वा' को छोड़कर, 'मुह', 'बह' और 'गुह' धातुओं का (स्वर) दीर्घ होता है। มุหพหานํ คุหิสฺส จ ทีโฆ โหติ ตการาโท กานุพนฺเธ ตฺวานตฺวาวชฺชิเต, มูฬฺโห, พาฬฺโห, คูฬฺโห, เตติ กึ? มุยฺหติ, กานุพนฺเธติ-กึ? มุยฺหิตพฺพํ, อตฺเวติ กึ? มุยฺหิตฺวาน, มุยฺหิตฺวา, ‘เต กานุพนฺเธ-ตฺเว’ติ อยมธิกาโร ยาว ‘‘สาสสฺส สิสฺเว’’ติ -๑๑๗. 'मुह', 'बह' और 'गुह' धातुओं का 'त' कार आदि 'क' अनुबन्ध वाले प्रत्ययों के परे होने पर, 'त्वान' और 'त्वा' को छोड़कर, दीर्घ होता है। जैसे- मूळ्हो, बाळ्हो, गूळ्हो। 'त' क्यों कहा? मुय्हति। 'क' अनुबन्ध क्यों कहा? मुय्हितब्बं। 'अ-त्वे' (त्वा रहित) क्यों कहा? मुय्हित्वान, मुय्हित्वा। 'ते कानूबन्धे-त्वे' यह अधिकार 'सासस्स सिस्वे' (सूत्र 117) तक जाता है। ๑๐๗. วหสฺสุสฺส. १०७. 'वह' धातु के 'व' को 'उ' होकर दीर्घ होता है। วหสฺส อุสฺส ทีโฆ โหติ เต กานุพนฺเธ ตฺวานตฺวาวชฺชิเต. วุฏฺโฐ. 'त' आदि 'क' अनुबन्ध वाले प्रत्ययों के परे होने पर, 'त्वान' और 'त्वा' को छोड़कर, 'वह' धातु के 'व' को 'उ' होकर दीर्घ होता है। जैसे- वुट्ठो। ๑๐๘. ธาสฺส หิ. १०८. धा धातु के स्थान पर हि होता है। ธา=ธารเณตีมสฺส หิ โหติ เต กานุพนฺเธ ตฺวานตฺวาวชฺชิเต. นิหิโต, นิหิตวา. धा (धारण करना) धातु के स्थान पर हि होता है, क-अनुबन्ध वाले त प्रत्यय परे होने पर, त्वान और त्वा को छोड़कर। उदाहरण: निहितो, निहितवा। ๑๐๙. คมาทิรานํ โลโป-นฺตสฺส. १०९. गम आदि धातुओं के अन्त्य वर्ण का लोप होता है। คมาทีนํ [Pg.198] รการนฺตานํ จ อนฺตสฺส โลโป โหติ เต กานุพนฺเธ ตฺวานตฺวาวชฺชิเต. คโต, ขโต, หโต, มโต, ตโต, สญฺญโต, รโต, กโต, เตตฺเวว? คมฺยเต, กานุพนฺเธตฺเวว? คนฺตพฺพํ, อตฺเวตฺเวว? คนฺตฺวาน, คนฺตฺวา. गम आदि और र-कारान्त धातुओं के अन्त्य वर्ण का लोप होता है, क-अनुबन्ध वाले त प्रत्यय परे होने पर, त्वान और त्वा को छोड़कर। उदाहरण: गतो, खतो, हतो, मतो, ततो, सञ्ञतो, रतो, कतो। 'त' परे होने पर ही क्यों? गम्यते। 'क-अनुबन्ध' परे होने पर ही क्यों? गन्तब्बं। 'अत्व' (त्वान/त्वा) को छोड़कर क्यों? गन्त्वान, गन्त्वा। ๑๑๐. วจาทีนํ วสฺสุฏ วา. ११०. वच आदि धातुओं के व को विकल्प से उट होता है। วจาทีนํ วสฺส วา อุฏ โหติ กานุพนฺเธ-ตฺเว. อุตฺตํ, วุตฺตํ, อุฏฺฐํ, วุฏฺฐํ, ‘อตฺเวตฺเวว? วตฺวาน, วตฺวา. वच आदि धातुओं के व को विकल्प से उट होता है, क-अनुबन्ध वाले त प्रत्यय परे होने पर। उदाहरण: उत्तं, वुत्तं, उट्ठं, वुट्ठं। 'अत्व' को छोड़कर क्यों? वत्वान, वत्वा। ๑๑๑. อสฺสุ. १११. अ को उ होता है। วจาทีนมสฺส อุ โหติ กานุพนฺเธ-สฺเว. วุตฺตํ, วุฏฺฐํ. वच आदि धातुओं के अ को उ होता है, क-अनुबन्ध वाले त प्रत्यय परे होने पर। उदाहरण: वुत्तं, वुट्ठं। ๑๑๒. วทฺธสฺส วา. ११२. वद्ध (वृद्ध) के स्थान पर विकल्प से। วทฺธสฺส อสฺส วา อุ โหติ กานุพนฺเธ ตฺเว. วุทฺโธ. วทฺโธ. อตฺเวตฺเวว? วทฺธิตฺวาน, วทฺธิตฺวา, กถํ ‘วุตฺตี’ติ? ‘‘วุตฺตีมตฺเต’’ติ ๓-๖๙. นิปาตนา, ‘วตฺตี’ติ โหเตว ยถาลกฺขณํ. वद्ध धातु के अ को विकल्प से उ होता है, क-अनुबन्ध वाले त प्रत्यय परे होने पर। उदाहरण: वुद्धो, वद्धो। 'अत्व' को छोड़कर क्यों? वद्धित्वान, वद्धित्वा। 'वुत्ती' कैसे बना? 'वुत्तीमत्ते' (3-69) सूत्र से निपातन द्वारा, अन्यथा लक्षणानुसार 'वत्ती' ही होता है। ๑๑๓. ยชสฺส ยสฺส ฏิยี. ११३. यज धातु के य को इ और यि होता है। ยชสฺส [Pg.199] ยสฺส ฏิยี โหนฺติ กานุพนฺเธ-ตฺเว. อิฏฺฐํ, ยิฏฺฐํ, อตฺเวตฺเวว? ยชิตฺวาน, ยชิตฺวา. यज धातु के य को इ और यि होता है, क-अनुबन्ध वाले त प्रत्यय परे होने पर। उदाहरण: इट्ठं, यिट्ठं। 'अत्व' को छोड़कर क्यों? यजित्वान, यजित्वा। ๑๑๔. ฐาสฺสิ. ११४. ठा (स्था) को इ होता है। ฐาสฺสิ โหติ กานุพนฺเธ-ตฺเว. ฐิโต, อตฺเวตฺเวว? ฐตฺวาน, ฐตฺวา. ठा धातु के स्थान पर इ होता है, क-अनुबन्ध वाले त प्रत्यय परे होने पर। उदाहरण: ठितो। 'अत्व' को छोड़कर क्यों? ठत्वान, ठत्वा। ๑๑๕. คาปานมี. ११५. गा और पा को ई होता है। คาปานมี โหติ กานพนฺเธ-ตฺเว. คีตํ, ปีตํ, อตฺเวตฺเวว? คายิตฺวา นิจฺจํ ยาคโม, ปาสฺส ตุ ปีตฺวาติ พหุลาธิการา. गा और पा धातुओं को ई होता है, क-अनुबन्ध वाले त प्रत्यय परे होने पर। उदाहरण: गीतं, पीतं। 'अत्व' को छोड़कर क्यों? गायित्वा (यहाँ नित्य य आगम होता है), पा धातु के लिए पीत्वा बनता है, बहुलाधिकार के कारण। ๑๑๖. ชนิสฺสา. ११६. जन को आ होता है। ชนิสฺส อา โหติ กานุพนฺเธ-ตฺเว. ชาโต. อตฺเวตฺเวว? ชนิตฺวา. जन धातु को आ होता है, क-अनुबन्ध वाले त प्रत्यय परे होने पर। उदाहरण: जातो। 'अत्व' को छोड़कर क्यों? जनित्वा। ๑๑๗. สาสสฺส สิส วา. ११७. सास (शास) को विकल्प से सिस होता है। สาสสฺส สิส วา โหติ กานุพนฺเธ-ตฺเว. สิฏฺฐํ, สตฺถํ, สิสฺโส, สาสิโย อตฺเวตฺเวว? อนุสาสิตฺวาน. सास् (sāsa) धातु के स्थान पर 'सिस' (sisa) विकल्प से होता है 'क' अनुबन्ध और 'त्वे' प्रत्यय के परे होने पर। उदाहरण: सिट्ठं, सत्थं, सिस्सो, सासियो। 'अत्वे' (त्वे के अभाव में) क्या होगा? अनुसासित्वान। ๑๑๘. กรสฺสา ตเว. ११८. कर (kara) धातु के सम्बन्ध में 'तवे' प्रत्यय के परे होने पर। กรสฺส อา โหติ ตเว. กาตเว. कर (kara) धातु के (अकार) को 'आ' होता है 'तवे' प्रत्यय के परे होने पर। उदाहरण: कातवे। ๑๑๙. ตุํตุนตพฺเพสุ วา. ११९. तुं, तुन और तब्ब प्रत्ययों के परे होने पर विकल्प से। ตุมาทีสุ วา กรสฺสา โหติ. กาตุํ กตฺตุํ, กาตุน กตฺตุน, กาตพฺพํ กตฺตพฺพํ. तुं आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'कर' धातु के (अकार) को विकल्प से 'आ' होता है। उदाहरण: कातुं-कत्तुं, कातुन-कत्तुन, कातब्बं-कत्तब्बं। ๑๒๐. ญาสฺส เน ชา. १२०. ञा (ñā) धातु के स्थान पर 'जा' (jā) होता है 'न' के परे होने पर। ญาธาตุสฺส [Pg.200] ชา โหติ นกาเร. ชานิตุํ, ชานนฺโต, เนติ กึ? ญาโต. ञा धातु के स्थान पर 'जा' होता है 'नकार' के परे होने पर। उदाहरण: जानितुं, जानन्तो। 'न' के परे होने पर ही क्यों? (उत्तर:) ञातो (यहाँ 'त' परे है, 'न' नहीं)। ๑๒๑. สกาปานํ กุกกู เณ. १२१. सक और आप धातुओं को 'कुक' और 'कू' आगम होते हैं 'णे' के परे होने पर। สกอาปานํ กุกกุอิจฺเจเต อาคมา โหนฺติ ณกาเร. สกฺกุณนฺโต, ปาปุณนฺโต, สกฺกุโณติ, ปาปุโณติ, เณติ กึ? สกฺโกติ, ปาเปติ. सक और आप धातुओं को 'कुक' और 'कु' ये आगम होते हैं 'ण' कार के परे होने पर। उदाहरण: सक्कुणन्तो, पापुणन्तो, सक्कुणोति, पापुणोति। 'ण' के परे होने पर ही क्यों? (उत्तर:) सक्कोति, पापेति। ๑๒๒. นิโต จิสฺส โฉ. १२२. नि उपसर्ग के बाद 'चि' धातु के स्थान पर 'छो' होता है। นิสฺมา ปรสฺส จิสฺส โฉ โหติ. นิจฺฉโย. नि से परे 'चि' धातु के स्थान पर 'छ' (या छो) होता है। उदाहरण: निच्छयो। ๑๒๓. ชรสทานมีม วา. १२३. जर और सद धातुओं के सम्बन्ध में 'ईम' विकल्प से होता है। ชรสทานมนฺตสรา ปโร อีม โหติ วิภาสา. ชีรณํ, ชีรติ, ชีราเปติ, นิสีทิตพฺพํ, นิสีทนํ, นิสีทิตุํ, นิสีทติ, วาติ กึ? ชรา, นิสชฺชา, ‘อีม วา’ติ โยควิภาคา อญฺเญสมฺปิ, อหีรถ, สํโยคาทิ โลโปตฺถสฺส. जर और सद धातुओं के अन्त्य स्वर के परे 'ईम' विकल्प से होता है। उदाहरण: जीरणं, जीरति, जीरापेति, निसीदितब्बं, निसीदनं, निसीदितुं, निसीदति। 'वा' (विकल्प) क्यों? (उत्तर:) जरा, निसज्जा। 'ईम वा' इस योग-विभाग से अन्यों में भी होता है, जैसे- अहीरथ, जहाँ संयोग के आदि का लोप होता है। ๑๒๔. ทิสสฺส ปสฺส ทสฺส ทส ท ทกฺขา. १२४. दिस (disa) धातु के स्थान पर 'पस्स', 'दस्स', 'दस', 'द' और 'दक्खा' आदेश होते हैं। ทิสสฺส ปสฺสาทโย โหนฺติ วิภาสา. วิปสฺสนา, วิปสฺสิตุํ, วิปสฺสติ, สุทสฺสี, ปิยทสฺสี, ธมฺมทสฺสี, สุทสฺสํ, ทสฺสนํ, ทสฺเสติ, ทฏฺฐพฺพํ. ทฏฺฐา, ทฏฺฐุํ, ทุทฺทโส, อทฺทส, อทฺทา, อทฺทํ, อทฺทกฺขิ, ทกฺขิสฺสติ, วาตฺเวว? ทิสฺสนฺติ พาลา. दिस धातु के स्थान पर 'पस्स' आदि आदेश विकल्प से होते हैं। उदाहरण: विपस्सना, विपस्सितुं, विपस्सति, सुदस्सी, पियदस्सी, धम्मदस्सी, सुदस्सं, दस्सनं, दस्सेति, दट्ठब्बं, दट्ठा, दट्ठुं, दुद्दसो, अद्दस, अद्दा, अद्दं, अद्दक्खि, दक्खिस्सति। 'वा' (विकल्प) क्यों? (उत्तर:) दिस्सन्ति बाला। ๑๒๕. สมานา โร รีริกฺขเกสุ. १२५. समान शब्द के परे 'दिस' धातु के स्थान पर 'र' होता है 'री', 'रिक्ख' और 'क' प्रत्ययों के परे होने पर। สมานสทฺทโต [Pg.201] ปรสฺส ทิสสฺส ร โหติ วา รีวิกฺขเกสุ. สรี, สที, สริกฺโข, สทิกฺโข, สริโส, สทิโส. समान शब्द से परे 'दिस' धातु के स्थान पर विकल्प से 'र' होता है 'री', 'रिक्ख' आदि के परे होने पर। उदाहरण: सरी, सदी, सरिक्खो, सदिक्खो, सरिसो, सदिसो। ๑๒๖. ทหสฺส ทสฺส โฑ. १२६. दह (daha) धातु के 'द' के स्थान पर 'ड' (ḍa) होता है। ทหสฺส ทสฺส โฑ โหติ วา. ฑาโห, ทาโห, ฑหติ, ทหติ. दह धातु के 'द' के स्थान पर विकल्प से 'ड' होता है। उदाहरण: डाहो-दाहो, डहति-दहति। ๑๒๗. อนฆณ สฺวาปรีหิ โฬ. १२७. आ और परि उपसर्गों के बाद 'दह' धातु के 'द' के स्थान पर 'ळ' (ḷa) होता है, 'अघ' और 'ण' के परे न होने पर। อาปรีหิ ปรสฺส ทหสฺส ทสฺส โฬ โหติ อนฆณสุ. อาฬหนํ, ปริฬาโห. आ और परि से परे 'दह' धातु के 'द' के स्थान पर 'ळ' होता है 'अघ' और 'ण' के परे न होने पर। उदाहरण: आळहनं, परिळाहो। ๑๒๘. อตฺยาทินฺเตสฺวตฺถิสฺส ภู. १२८. ति आदि (विभक्तियों) को छोड़कर अन्य प्रत्ययों के परे होने पर 'अस' (अत्थि) धातु के स्थान पर 'भू' होता है। ตฺยาทินฺตวชฺชิเตสุ ปจฺจเยสุ ‘อส=ภุวิ’อิจฺจสฺส ภู โหติ. ภวิตพฺพํ. อาเทสวิธานมสสฺสาปฺปโยคตฺถเมตสฺมึ วิสเย, เอเตน กตฺถจิ กสฺสจิ ธาตุสฺส อปฺปโยคาปิ ญาปิโต โหติ. อตฺยาทินฺเตสูติ กึ? อตฺถิ, สนฺโต, อตฺถิสฺสาติ กึ? อสฺสติสฺส มา โหตุ. ति आदि को छोड़कर अन्य प्रत्ययों के परे होने पर 'अस' (सत्ता अर्थ में) धातु के स्थान पर 'भू' होता है। उदाहरण: भवितब्बं। इस विषय में 'अस' धातु के अप्रयोग के लिए यह आदेश विधान है, इससे यह भी ज्ञापित होता है कि कहीं-कहीं किसी धातु का प्रयोग नहीं होता। 'ति' आदि को छोड़कर ही क्यों? (उत्तर:) अत्थि, सन्तो। 'अत्थि' धातु का ही क्यों? (उत्तर:) अस्सति (खाना) धातु का न हो। ๑๒๙. ออาสฺสาอาทีสุ. १२९. अ, आ, स्सा आदि के परे होने पर (भी 'अस' को 'भू' होता है)। ออาโท, อาอาโท, สฺสาโท จ อตฺถิสฺส ภู โหติ. พภูว, อภวา, อภวิสฺสา, ภวิสฺสติ. अ आदि, आ आदि और स्सा आदि के परे होने पर 'अत्थि' (अस) धातु के स्थान पर 'भू' होता है। उदाहरण: बभूव, अभवा, अभविस्सा, भविस्सति। ๑๓๐. นฺตมานนฺติยิยุํสฺวาทิโลโป. นฺตาทิสูตฺถิสฺสาทิโลโป โหติ. สนฺโต, สมาโน, สนฺติ, สนฺตุ, สิยา, สิยุํ, เอเตสฺวีติ กึ? อตฺถิ. १३०. न्त, मान, अन्ति, यि, युं आदि के परे होने पर 'अत्थि' (अस) धातु के आदि (अकार) का लोप होता है। उदाहरण: सन्तो, समानो, सन्ति, सन्तु, सिया, सियुं। इनमें ही क्यों? (उत्तर:) अत्थि। ๑๓๑. ปาทิโต ฐาสฺส วา ฐโห กฺวจิ. १३१. प आदि (उपसर्गों) के बाद 'ठा' धातु के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'ठह' होता है। ปาทีหิ [Pg.202] กิริยาวิเสสโชตเกหิ สทฺเทหิ ปรสฺส ฐาสฺส กฺวจิ ฐโห วา โหติ. สณฺฐหนฺโต สนฺติฏฺฐนฺโต. สณฺฐหติ, สนฺติฏฺฐติ. ป ปรา อป สํ อนุ อว โอ นิ ทุ วิ อธิ อปิ อติสุ อุ อภิ ปติ ปริ อุป อา ปาที. กฺวจีติ กึ? สณฺฐิติ. प आदि क्रिया-विशेष-द्योतक शब्दों (उपसर्गों) से परे 'ठा' धातु के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'ठह' होता है। उदाहरण: सण्ठहन्तो-सन्तिट्ठन्तो, सण्ठहति-सन्तिट्ठति। प, परा, अप, सं, अनु, अव, ओ, नि, दु, वि, अधि, अपि, अति, सु, उ, अभि, पति, परि, उप, आ - ये 'पादि' हैं। 'कहीं-कहीं' क्यों? (उत्तर:) सण्ठिति। ๑๓๒. ทาสฺสิยง. १३२. दा धातु के स्थान पर 'इयङ' (iyaṅa) होता है। ปาทิโต ปรสฺส ทาสฺส อิยง โหติ กฺวจิ. อนาทิยิตฺวา, สมาทิยติ, กฺวจิตฺเวว? อาทาย. प आदि (उपसर्गों) से परे 'दा' धातु के स्थान पर कहीं-कहीं 'इयङ' होता है। उदाहरण: अनादियित्वा, समादियति। 'कहीं-कहीं' ही क्यों? (उत्तर:) आदाय। ๑๓๓. กโรติสฺส โข. १३३. करोति (कृ) धातु के स्थान पर ख होता है। ปาทิโต ปรสฺส กรสฺส กฺวจิ ข โหติ. สงฺขาโร, สงฺขรียติ, กรสฺสาติ อวตฺวา กโรติสฺสาติ วจนํ ติมฺหิ จ วิกรณุปฺปตฺติญาเปตุํ. प आदि उपसर्गों के बाद कर (कृ) धातु के स्थान पर कहीं-कहीं ख होता है। उदाहरण: सङ्खारो, सङ्खरीयति। 'करस्स' न कहकर 'करोतिस्स' कहना ति प्रत्यय और विकरण की उत्पत्ति को सूचित करने के लिए है। ๑๓๔. ปุราสฺมา. १३४. पुरा शब्द के बाद। ปุรา อิจฺจสฺมา นิปาตา ปรสฺส กรสฺส ข โหติ. ปุรกฺขตฺวา, ปุเรกฺขาโร-เอตฺตํ ตทมินาทิปาฐา. पुरा इस निपात के बाद कर धातु को ख होता है। उदाहरण: पुरक्खत्वा, पुरेक्खारो—यहाँ ए-भाव 'तदमिनादि' पाठ से होता है। ๑๓๕. นิโต กมสฺส. १३५. नि उपसर्ग के बाद कम (क्रम) धातु को। นิสฺมา ปรสฺส กมสฺส กฺวจิ ข โหติ, นิกฺขมติ, กฺวจิตฺเวว? นิกฺกโม. नि उपसर्ग के बाद कम धातु को कहीं-कहीं ख होता है। उदाहरण: निक्खमति। 'कहीं-कहीं' क्यों? निक्कमो। ๑๓๖. ยุวณฺณานมิยงุวง สเร. १३६. इ-वर्ण और उ-वर्ण को इयङ् और उवङ् होता है, स्वर परे होने पर। อิวณฺณุวณฺณตฺตานํ กฺริยตฺถานมิยงุวง โหติ สเร กฺวจิ. เวทิยติ, พฺรุวนฺติ, สเรติ กึ? นิเวเทติ, พฺรูติ, กฺวจิตฺเวว? ชยติ, ภวติ. इ-वर्ण और उ-वर्ण वाले क्रियापदों को स्वर परे होने पर कहीं-कहीं इयङ् और उवङ् होता है। उदाहरण: वेदियति, ब्रुवन्ति। 'स्वर परे होने पर' क्यों? निवेदेति, ब्रूति। 'कहीं-कहीं' क्यों? जयति, भवति। ๑๓๗. อญฺญาทิสฺสาสฺสี กฺเย. १३७. अञ्ञ आदि और दा आदि धातुओं के अ को ई होता है, क्य प्रत्यय परे होने पर। ญาทิโต-ญฺญสฺส [Pg.203] อาการนฺตสฺส กฺริยตฺถสฺส อี โหติ กฺเย. ทียติ, อญฺญาทิสฺสาติ กึ? ญายติ, ตายตึ. ज्ञा आदि से भिन्न आकारान्त धातुओं को क्य प्रत्यय परे होने पर ई होता है। उदाहरण: दीयति। 'अञ्ञादि' क्यों? ञायति, तायति। ๑๓๘. ตนสฺสา วา. १३८. तन धातु के स्थान पर विकल्प से आ होता है। ตนสฺส อา โหติ วา กฺเย. ตายเต, ตญฺญเต. 'तन्' धातु के (अन्त्य) को 'आ' होता है 'क्य' प्रत्यय परे होने पर विकल्प से। उदाहरण: तायते, तञ्ञते। ๑๓๙. ทีโฆ สรสฺส. १३९. स्वर का दीर्घ होता है। สรนฺตสฺส กฺริยตฺถสฺส ทีโฆ โหติ กฺเย, จียเต, สูยเต. स्वरान्त धातु का 'क्य' प्रत्यय परे होने पर दीर्घ होता है। उदाहरण: चीयते, सूयते। ๑๔๐. สานนฺตรสฺส ตสฺส โฐ. १४०. 'स' कार के अव्यवहित बाद आने वाले 'त' को 'ठ' होता है। สการนฺตโต กฺริยตฺถา ปรสฺสา-นนฺตรสฺส ตการสฺส ฐ โหติ. ตุฏฺโฐ, ตุฏฺฐวา, ตุฏฺฐพฺพํ, ตุฏฺฐิ, อนนฺตรสฺสาติ กึ? ตุสฺสิตฺวา. सकारान्त धातु से परे अव्यवहित तकार को 'ठ' होता है। उदाहरण: तुट्ठो, तुट्ठवा, तुट्ठब्बं, तुट्ठि। 'अव्यवहित' क्यों? तुस्सित्वा (यहाँ 'इ' आगम होने से व्यवधान है)। ๑๔๑. กสสฺสิม จ วา. १४१. 'कस्' धातु के (अन्त्य) को 'इम' भी होता है विकल्प से। กสสฺมา ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ฐ โหติ กสสฺส วา อิม จ. กิฏฺฐํ, กฏฺฐํ, อนนฺตรสฺสาตฺเวว? กสิตพฺพํ. 'कस्' धातु से परे अव्यवहित 'त' को 'ठ' होता है और 'कस्' के (अन्त्य) को विकल्प से 'इम' आदेश होता है। उदाहरण: किट्ठं, कट्ठं। 'अव्यवहित' ही क्यों? कसितब्बं। ๑๔๒. ธสฺโตตฺรสฺตา. १४२. धस्तो और त्रस्ता (ये शब्द निपातित हैं)। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต. ये शब्द निपातित किए जाते हैं। ๑๔๓. ปุจฺฉาทิโต. १४३. 'पुच्छ' आदि (धातुओं) से। ปุจฺฉาทีหิ [Pg.204] กฺริยตฺเถหิ ปรสฺสานนฺตรสฺส ตการสฺส ฐ โหติ. ปุฏฺโฐ, ภฏฺโฐ, ยิฏฺโฐ, อนนฺตรสฺสาตฺเวว? ปุจฺฉิตฺวา. 'पुच्छ' आदि धातुओं से परे अव्यवहित तकार को 'ठ' होता है। उदाहरण: पुट्ठो, भट्ठो, यिट्ठो। 'अव्यवहित' ही क्यों? पुच्छित्वा। ๑๔๔. สาส วส สํส สสา โถ. १४४. 'सास्', 'वस्', 'संस्' और 'सस्' धातुओं से परे 'त' को 'थ' होता है। เอเตหิ ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ถ โหติ, สตฺถํ, วตฺถํ, ปสตฺถํ, สตฺถํ. กถมนุสิฏฺโฐ (วุฏฺโฐ) ติ? ‘ตถนรานํ ฏฏฺฐณลา’ ๑-๕๒ ติ ฏฺโฐ, อนนฺตรสฺสาตฺเวว? สาสิตุํ. इनसे परे अव्यवहित 'त' को 'थ' होता है। उदाहरण: सत्थं, वत्थं, पसत्थं, सत्थं। 'अनुसिट्ठो' (या वुट्ठो) कैसे सिद्ध हुआ? 'तथनरानं टट्ठणला' (1-52) सूत्र से 'ट्ठ' होता है। 'अव्यवहित' ही क्यों? सासितुं। ๑๔๕. โธ ธหเภหิ. १४५. 'ध', 'ह' और 'भ' कारान्त धातुओं से परे 'त' को 'ध' होता है। ธการหการภการนฺเตหิ กฺริยตฺเถหิ ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ธ โหติ. วุทฺโธ, ทุทฺธํ, ลทฺธํ. धकार, हकार और भकार अन्त वाली धातुओं से परे अव्यवहित 'त' को 'ध' होता है। उदाहरण: वुद्धो, दुद्धं, लद्धं। ๑๔๖. ทหา โฒ. १४६. 'दह' धातु से परे 'त' को 'ढ' होता है। ทหา ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ฒ โหติ. ทฑฺโฒ. 'दह' धातु से परे अव्यवहित 'त' को 'ढ' होता है। उदाहरण: दड्ढो। ๑๔๗. พหสฺสุม จ. १४७. 'बह' धातु के (अन्त्य) को 'उ' भी होता है। พหา ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส โฒ โหติ, พหสฺสุม จ ฒสนฺนิโยเคน. พุฑฺโฒ. 'बह' धातु से परे अव्यवहित 'त' को 'ढ' होता है और 'ढ' के विधान के साथ 'बह' के (अन्त्य) को 'उ' भी होता है। उदाहरण: बुड्ढो। ๑๔๘. รุหาทีหิ โห ฬ จ. १४८. 'रुह' आदि धातुओं से परे 'त' को 'ह' होता है और (धातु के) अन्त को 'ळ' होता है। รหาทีหิ ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ห โหติ โฬ จานฺตสฺส. อารุฬฺโห, คูฬฺโห, วูฬฺโห, พาฬฺโห, (โอคาฬฺโห), อนนฺตรสฺสาตฺเวว? อาโรหิตุํ. 'रुह' आदि धातुओं से परे अव्यवहित 'त' को 'ह' होता है और (धातु के) अन्त को 'ळ' होता है। उदाहरण: आरुळ्हो, गूळ्हो, वूळ्हो, बाळ्हो, (ओगाळ्हो)। 'अव्यवहित' ही क्यों? आरोहितुं। ๑๔๙. มุหา วา. १४९. 'मुह' धातु से परे विकल्प से (यह कार्य होता है)। มุหา [Pg.205] ปรสฺสานนฺตรสฺส ตสฺส ห โหติ วา โฬ จานฺตสฺส หสนฺนิโยเคน. มูฬฺโห, มุทฺโธ. 'मुह' धातु से परे अव्यवहित 'त' को विकल्प से 'ह' होता है और 'ह' के विधान के साथ (धातु के) अन्त को 'ळ' होता है। उदाहरण: मूळ्हो, मुद्धो। ๑๕๐. ภิทาทิโต โน กฺตกฺตวนฺตูนํ. १५०. 'भिद' आदि धातुओं से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'न' होता है। ภิทาทิโต ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตูนํ ตสฺส โน โหติ. ภินฺโน ภินฺนวา, ฉินฺโน ฉินฺนวา, ฉนฺโน ฉนฺนวา, ฉินฺโน ขินฺนวา, อุปฺปนฺโน อุปฺปนฺนวา, สินฺโน, สินฺนวา, สนฺโน สนฺนวา, ปีโน ปีนวา, สูโน สูนวา, ทีโน ทีนวา, ฑีโน ฑีนวา, ลีโน ลีนวา, ลูโน ลูนวา, กฺตกฺตวนฺตูนนฺติ กึ? ภิตฺติ, ฉิตฺติ, เภตฺตุํ, เฉตฺตุํ. 'भिद' आदि धातुओं से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'न' होता है। उदाहरण: भिन्नों, भिन्नवा, छिन्नो, छिन्नवा, छन्नो, छन्नवा, खिन्नो, खिन्नवा, उप्पन्नो, उप्पन्नवा, सिन्नो, सिन्नवा, सन्नो, सन्नवा, पीनो, पीनवा, सूनो, सूनवा, दीनो, दीनवा, डीनो, डीनवा, लीनो, लीनवा, लूनो, लूनवा। 'क्त और क्तवन्तु' ही क्यों? भित्ति, छित्ति, भेत्तुं, छेत्तुं। ๑๕๑. ทาตฺวินฺโน. १५१. 'दा' धातु से परे (तकार को) 'इन्न' होता है। ทาโต ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตูนํ ตสฺส อินฺโน โหติ. ทินฺโน, ทินฺนวา. 'दा' धातु से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'इन्न' आदेश होता है। उदाहरण: दिन्नो, दिन्नवा। ๑๕๒. กิราทีหิ โณ. १५२. 'किर' आदि धातुओं से परे (तकार को) 'ण' होता है। กิราทีหิ ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตูนํ ตสฺสานนฺตรสฺส ณ โหติ, กิณฺโณ กิณฺณวา, ปุณฺโณ ปุณฺณวา, ขีโณ ขีณวา. 'किर' आदि धातुओं से परे 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के अव्यवहित 'त' को 'ण' होता है। उदाहरण: किण्णो, किण्णवा, पुण्णो, पुण्णवा, खीणो, खीणवा। ๑๕๓. ตราทีหิ ริณฺโณ. १५३. 'तर' आदि धातुओं से परे (तकार को) 'रिण्ण' होता है। ตราทีหิ ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตูนํ ตสฺส ริณฺโณ โหติ. ติณฺโณ ติณฺณวา, ชิณฺโณ ชิณฺณวา, จิณฺโณ จิณฺณวา. 'तर' आदि धातुओं के बाद 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'रिण्ण' आदेश होता है। जैसे- तिण्णो, तिण्णवा; जिण्णो, जिण्णवा; चिण्णो, चिण्णवा। ๑๕๔. โค สนฺชาทีหิ. १५४. 'सञ्ज' आदि धातुओं के बाद (त को) 'ग' आदेश होता है। ภนฺชาทีหิ ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตูนํ ตสฺสานนฺตรสฺส ค โหติ. ภคฺโค ภคฺควา, ลคฺโค ลคฺควา, นิมุคฺโค นิมุคฺควา, สํวิคฺโค สํวิคฺควา. 'भञ्ज' आदि धातुओं के बाद 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'ग' आदेश होता है। जैसे- भग्गो, भग्गवा; लग्गो, लग्गवा; निमुग्गो, निमुग्गवा; संविग्गो, संविग्गवा। ๑๕๕. สุสา โข. १५५. 'सुस' धातु के बाद (त को) 'ख' आदेश होता है। สุสา [Pg.206] ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตูนํ ตสฺส โข โหติ. สุกฺโข สุกฺขวา. 'सुस' धातु के बाद 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'ख' आदेश होता है। जैसे- सुक्खो, सुक्खवा। ๑๕๖. ปจา โก. १५६. 'पच' धातु के बाद (त को) 'क' आदेश होता है। ปจา ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตูนํ ตสฺส โก โหติ. ปกฺโก ปกฺกวา. 'पच' धातु के बाद 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को 'क' आदेश होता है। जैसे- पक्को, पक्कवा। ๑๕๗. มุจา วา. १५७. 'मुच' धातु के बाद (त को 'क' आदेश) विकल्प से होता है। มุจา ปเรสํ กฺตกฺตวนฺตูนํ ตสฺส โก วา โหติ. มุกฺโก มุตฺโต, มุกฺกวา มุตฺตวา. ‘สกฺโก’ติ ณฺวาทีสุ สิทฺธํ, กฺตกฺตวนฺตูสุ สตฺโต, สตฺตาวาตฺเวว โหติ. 'मुच' धातु के बाद 'क्त' और 'क्तवन्तु' प्रत्ययों के 'त' को विकल्प से 'क' आदेश होता है। जैसे- मुक्को, मुत्तो; मुक्कवा, मुत्तवा। 'सक्को' यह 'ण्वा' आदि में सिद्ध होता है, 'क्त' और 'क्तवन्तु' में 'सत्तो', 'सत्तवा' ही होता है। ๑๕๘. โลโป วฑฺฒา กฺติสฺส. १५८. 'वड्ढ' धातु के बाद 'क्ति' प्रत्यय का लोप होता है। วฑฺฒา ปรสฺส กฺติสฺส ตสฺส โลโป โหติ. วฑฺฒิ. 'वड्ढ' धातु के बाद आने वाले 'क्ति' प्रत्यय का लोप होता है। जैसे- वड्ढि। ๑๕๙. กฺวิสฺส. १५९. 'क्वि' प्रत्यय का (लोप होता है)। กฺริยตฺถา ปรสฺส กฺวิสฺส โลโป โหติ, อภิภู. धातु के बाद आने वाले 'क्वि' प्रत्यय का लोप होता है। जैसे- अभिभू। ๑๖๐. ณิณาปีนํ เตสุ. १६०. उन (णि, णा, आपि) के परे होने पर 'णि', 'णा' और 'आपि' का लोप होता है। ณิณาปีนํ โลโป โหติ เตสุ ณิณาปีสุ. กาเรนฺตํ ปโยชยติ กาเรติ การาปยติ. 'णि', 'णा' और 'आपि' प्रत्ययों के परे होने पर 'णि', 'णा' और 'आपि' का लोप होता है। जैसे- कारेन्तं पयोजयति - कारेति, कारापयति। ๑๖๑. กฺวจิ วิกรณานํ. १६१. कहीं-कहीं विकरणों का लोप होता है। วิกรณานํ กฺวจิ โลโป โหติ. อุทปาทิ, หนฺติ. विकरणों का कहीं-कहीं लोप होता है। जैसे- उदपादि, हन्ति। ๑๖๒. มานสฺส มสฺส. १६२. 'मान' प्रत्यय के मकार का (लोप होता है)। กฺริยตฺถา [Pg.207] ปรสฺส มานสฺส มการสฺส โลโป โหติ กฺวจิ. กราโณ, กฺวจีติ กึ? กุรุมาโน. धातु के बाद आने वाले 'मान' प्रत्यय के मकार का कहीं-कहीं लोप होता है। जैसे- कराणो। 'क्वचि' क्यों? कुरुमानो। ๑๖๓. อูลสฺเส. १६३. 'इ' और 'आ' के स्थान पर 'ए' होता है। ญิลานเม โหติ กฺวจิ. คเหตฺวา, อเทนฺติ, กฺวจิตฺเวว? วปิตฺวา. 'इ' और 'आ' के स्थान पर कहीं-कहीं 'ए' होता है। जैसे- गहेत्वा, अदेन्ति। 'क्वचि' क्यों? वपित्वा। ๑๖๔. ปฺโย วา ตฺวาสฺส สมาเส. १६४. समास में 'त्वा' प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'प्य' आदेश होता है। ตฺวาสฺส วา ปฺโย โหติ สมาเส. ปกาโร ‘‘ปฺเย สิสฺสา’’ ติ ๕-๘๘ วิเสสนตฺโถ. อภิภูย, อภิภวิตฺวา, สมาเสติ กึ? ปตฺวา, กฺวจาสมาเสปิ พหุลาธิการา ‘ลตํ ทนฺเตหิ ฉินฺทิย’. समास में 'त्वा' के स्थान पर विकल्प से 'प्य' होता है। 'प' कार 'प्ये सिस्सा' (५-८८) इस सूत्र के विशेषण के लिए है। जैसे- अभिभूय, अभिभावित्वा। 'समास में' क्यों? पत्वा। 'बहुलाधिकार' से कहीं-कहीं बिना समास के भी होता है, जैसे- 'लतं दन्तेहि छिन्दिय'। ๑๖๕. ตุํยานา. १६५. 'त्वा' के स्थान पर 'तुं' और 'यान' आदेश होते हैं। กฺตฺวาสฺส วา ตุํยานา โหนฺติ สมาเส กฺวจฺจิ. อภิหฏฺฐุํ อภิหริตฺวา, อนุโมทิยาน อนุโมทิตฺวา, อสมาเสปิ พหุลาธิ การา, ทฏฺฐุํ ทิสฺวา, เอสมปฺปวิสยตาญาปนตฺโถ โยควิภาโค. समास में 'त्वा' के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'तुं' और 'यान' आदेश होते हैं। जैसे- अभिहट्ठुं (अभिहरित्वा), अनुमोदियान (अनुमोदित्वा)। 'बहुलाधिकार' से बिना समास के भी होते हैं, जैसे- दट्ठुं (दिस्वा)। यह योग-विभाग इन आदेशों की अल्प विषयता को ज्ञापित करने के लिए है। ๑๖๖. หนา รจฺโจ. १६६. 'हन' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर 'रच्च' आदेश होता है। หนสฺมา ปรสฺส กฺตฺวาสฺส รจฺโจ วา โหติ สมาเส. อาหจฺจ, อาหนิตฺวา. 'हन' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर समास में विकल्प से 'रच्च' आदेश होता है। जैसे- आहच्च, आहनित्वा। ๑๖๗. สาสาธิกรา จจริจฺจา. १६७. 'स', 'अस' और 'अधि' उपसर्गों के बाद 'कर' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर 'चच्च' और 'रिच्च' आदेश होते हैं। สาสาธีหิ ปรา กรา ปรสฺส กฺตฺวสฺส จจริจฺจา โหนฺติ ยถากฺกมํ. สกฺกจฺจ สกฺกริตฺวา, อสกฺกจฺจ อสกฺกริตฺวา, อธิกิจฺจ อธิกริตฺวา. 'स', 'अस' और 'अधि' के बाद 'कर' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर यथाक्रम 'चच्च' और 'रिच्च' आदेश होते हैं। जैसे- सक्कच्च (सक्करित्वा), असक्कच्च (असक्करित्वा), अधिकिच्च (अधिकरित्वा)। ๑๖๘. อิโต จฺโจ. १६८. 'इ' धातु से परे 'त्वा' के स्थान पर 'च्च' आदेश होता है। อิอิจฺจสฺมา [Pg.208] ปรสฺส กฺตฺวาสฺส จฺโจ วา โหติ. อธิจฺจ อธียิตฺวา, สเมจฺจ สเมตฺวา. 'इ' (इकारान्त) धातु से परे 'क्त्वा' प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'च्च' होता है। जैसे- अधिच्च (अधीयित्वा), समेच्च (समेत्वा)। ๑๖๙. ทิสา วานวา ส จ. १६९. 'दिस्' धातु से 'वान' और 'व' प्रत्यय तथा 'स' आदेश होता है। ทิสโต กฺตฺวาสฺส วานวา โหนฺติ วา ทิสสฺส จ ส กาโร ตํสนฺนิโยเคน. สสฺส สวิธานํ ปรรูปพาธนตฺถํ. ทิสฺวาน, ทิสฺวา ปสฺสิตฺวา, กถํ ‘นาทฏฺฐา ปรโต โทส’นฺติ? ญาปกา ตฺวาสฺส วโลโป, เอวํ ‘ลทฺธา ธน’นฺติ อาทีสุ. 'दिस्' धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'वान' और 'वा' होते हैं, और उसके साथ 'दिस्' के स्थान पर 'स' कार होता है। 'स' का विधान पररूप के बाधन के लिए है। जैसे- दिस्वान, दिस्वा (पस्सित्वा)। 'नादट्ठा परतो दोसं' यहाँ कैसे? ज्ञापक से 'त्वा' के 'व' का लोप होता है, इसी प्रकार 'लद्धा धनं' आदि में भी। ๑๗๐. ญิ พฺยญฺชนสฺส. १७०. व्यञ्जन के परे होने पर 'ञि' (आगम) होता है। กฺริยตฺถา ปรสฺส พฺยญฺชนาทิปฺปจฺจยสฺส ญิ วา โหติ. ภุญฺชิตุํ โภตฺตุํ, พฺยญฺชนสฺสาติ กึ? ปาจโก. धातु से परे व्यञ्जनादि प्रत्यय होने पर विकल्प से 'ञि' होता है। जैसे- भुञ्जितुं, भोत्तुं। 'व्यञ्जन के' ऐसा क्यों? पाचको (यहाँ नहीं होता)। ๑๗๑. รา นสฺส โณ. १७१. 'र' से परे प्रत्यय के 'न' कार को 'ण' कार होता है। รนฺตโต กฺริยตฺถา ปรสฺส ปจฺจยนการสฺส โณ โหติ. อรณํ, สรณํ. रेफान्त धातु से परे प्रत्यय के 'न' कार को 'ण' कार होता है। जैसे- अरणं, सरणं। ๑๗๒. น นฺตมานตฺยาทีนํ. १७२. 'न्त', 'मान' और 'त्यादि' के (नकार) को (णकार) नहीं होता है। รนฺตโต ปเรสํ นฺตมานตฺยาทีนํ นสฺส โณ น โหติ, กโรนฺโต, กุรุมาโน, กโรนฺติ. रेफान्त धातु से परे 'न्त', 'मान' और 'त्यादि' के 'न' कार को 'ण' कार नहीं होता है। जैसे- करोन्तो, कुरुमानो, करोन्ति। ๑๗๓. คมยมิสาสทิสานํ วา จฺฉง. १७३. 'गम्', 'यम्', 'इस्', 'आस्' और 'दिस्' धातुओं को विकल्प से 'च्छ' आदेश होता है। เอเตสํ วา จฺฉง โหติ นฺตมานตฺยาทีสุ. คจฺฉนฺโต คจฺฉมาโน คจฺฉติ, ยจฺฉนฺโน ยจฺฉมาโน ยจฺฉติ, อิจฺฉนฺโต อิจฺฉมาโน อิจฺฉติ [Pg.209] อจฺฉนฺโต อจฺฉมาโน อจฺฉติ, ทิจฺฉนฺโต ทิจฺฉมาโน ทิจฺฉติ, วาติ กึ? คมิสฺสติ, ววตฺถิตวิภาสา-ยํ, เตนาญฺเญสุ จ กฺวจิ-อิจฺฉิตพฺพํ อิจฺฉา อิจฺฉิตุํ, อจฺฉิตพฺพํ อจฺฉตุํ, อญฺเญสญฺจ โยควิภาคา-ปเวจฺฉติ. 'न्त', 'मान' और 'त्यादि' प्रत्ययों के परे होने पर इन धातुओं को विकल्प से 'च्छ' आदेश होता है। जैसे- गच्छन्तो, गच्छमानो, गच्छति; यच्छन्तो, यच्छमानो, यच्छति; इच्छन्तो, इच्छमानो, इच्छति; अच्छन्तो, अच्छमानो, अच्छति; दिच्छन्तो, दिच्छमानो, दिच्छति। 'विकल्प से' क्यों? गमिस्सति। यह व्यवस्थित विभाषा है, इसलिए अन्यत्र भी कहीं-कहीं (च्छ होता है)- इच्छितब्बं, इच्छा, इच्छितुं; अच्छितब्बं, अच्छतुं। योग-विभाग से अन्य धातुओं को भी (च्छ होता है)- पवेच्छति। ๑๗๔. ชรมรานมียง. १७४. 'जर्' और 'मर्' धातुओं को विकल्प से 'ईय' आदेश होता है। เอเตสมียง วา โหติ นฺตมานตฺยาทีสุ. ชียนฺโต ชีรนฺโต, ชียมาโน ชีรมาโน, ชียติ ชีรติ, มียนฺโต มรนฺโต, มียมาโน มรมาโน, มียติ มรติ. 'न्त', 'मान' और 'त्यादि' प्रत्ययों के परे होने पर इन धातुओं को विकल्प से 'ईय' आदेश होता है। जैसे- जीयन्तो (जीरन्तो), जीयमानो (जीरमानो), जीयति (जीरति); मीयन्तो (मरन्तो), मीयमानो (मरमानो), मीयति (मरति)। ๑๗๕. ฐาปานํ ติฏฺฐ ปิวา. १७५. 'ठा' और 'पा' धातुओं को विकल्प से 'तिट्ठ' और 'पिव' आदेश होते हैं। ฐาปานํ ติฏฺฐปิวา โหนฺติ นฺตมานตฺยาทีสุ. ติฏฺฐนฺโต, ติฏฺฐมาโน, ติฏฺฐติ, ปิวนฺโต, ปิวมาโน, ปิวติ, วาตฺเววิ? ฐาติ, ปาติ. 'न्त', 'मान' और 'त्यादि' प्रत्ययों के परे होने पर 'ठा' और 'पा' धातुओं को 'तिट्ठ' और 'पिव' आदेश होते हैं। जैसे- तिट्ठन्तो, तिट्ठमानो, तिट्ठति; पिवन्तो, पिवमानो, पिवति। 'विकल्प से' क्यों? ठाति, पाति। ๑๗๖. คมวททานํ ฆมฺมวชฺชทชฺชา. १७६. 'गम्', 'वद्' और 'दद्' धातुओं को विकल्प से 'घम्म', 'वज्ज' और 'दज्ज' आदेश होते हैं। คมาทีนํ ฆมฺมาทโย วา โหนฺติ นฺตมานตฺยาทีสุ. ฆมฺมนฺโต, คจฺฉนฺโต, วชฺชนฺโต วทนฺโต, ทชฺชนฺโต ททนฺโต. 'न्त', 'मान' और 'त्यादि' प्रत्ययों के परे होने पर 'गम्' आदि धातुओं को 'घम्म' आदि आदेश विकल्प से होते हैं। जैसे- घम्मन्तो (गच्छन्तो), वज्जन्तो (वदन्तो), दज्जन्तो (ददन्तो)। ๑๗๗. กรสฺส โสสฺส กุพฺพกุรุกยิรา. १७७. 'स-ओकार' (ओकार सहित) 'कर्' धातु को विकल्प से 'कुब्ब', 'कुरु' और 'कयिर' आदेश होते हैं। กรสฺส สโอการสฺส กุพฺพาทโย วา โหนฺติ นฺตมานตฺยาทีสุ. กุพฺพนฺโต กยิรนฺโต กโรนฺโต, กุพฺพมาโน กุรุมาโน กยิรมาโน, กราโณ, กุพฺพติ กยิรติ กโรติ, กุพฺพเต กุรุเต, กยิรเต, ววตฺถิตวิภาสตฺตา วาธิการสฺส ภิยฺโย มานปรจฺฉกฺเกสุ กุรุ, กฺวจิเทว ปุพฺพฉกฺเก ‘อคฺฆํ กุรุตุ, โน ภวํ, โสสฺสาติ วุตฺตตฺตา กตฺตริเยวิเม. 'न्त', 'मान' और 'त्यादि' प्रत्ययों के परे होने पर ओकार सहित 'कर्' धातु को विकल्प से 'कुब्ब' आदि आदेश होते हैं। जैसे- कुब्बन्तो, कयिरन्तो, करोन्तो; कुब्बमानो, कुरुमानो, कयiramāno, कराणो; कुब्बति, कयिरति, करोति; कुब्बते, कुरुते, कयिराते। 'वा' (विकल्प) के अधिकार के व्यवस्थित विभाषा होने के कारण 'मान' और पर-षट्क में 'कुरु' अधिक होता है, और पूर्व-षट्क में कहीं-कहीं ही होता है, जैसे- 'अग्घं कुरुतु नो भवं'। 'स-ओकार' कहने के कारण ये केवल कर्तरि (कर्तृवाच्य) में ही होते हैं। ๑๗๘. คหสฺส เฆปฺโป. १७८. 'गह्' धातु को विकल्प से 'घेप्प' आदेश होता है। คหสฺส [Pg.210] วา เฆปฺโป โหติ นฺตมานตฺยาทีสุ. เฆปฺปนฺโต, เฆปฺปมาโน, เฆปฺปติ, วาตฺเวว? คณฺหติ. 'न्त', 'मान' और 'त्यादि' प्रत्ययों के परे होने पर 'गह्' धातु को विकल्प से 'घेप्प' आदेश होता है। जैसे- घेप्पन्तो, घेप्पमानो, घेप्पति। 'विकल्प से' क्यों? गण्हाति। ๑๗๙. โณ นิคฺคหีตสฺส. १७९. (गह् धातु के) निग्गहीत के स्थान पर 'ण' होता है। คหสฺส นิคฺคหีตสฺส โณ โหติ. คณฺหิตพฺพํ, คณฺหิตุํ, คณฺหนฺโต. 'गह्' धातु के निग्गहीत के स्थान पर 'ण' होता है। जैसे- गण्हितब्बं, गण्हितुं, गण्हन्तो। อิติโมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ วุตฺติยํ इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में। ขาทิกณฺโฑ ปญฺจโม. खादि-काण्ड पाँचवाँ है। ๖. ฉฏฺโฐ กณฺโฑ (ตฺยาทิ) ६. छठा काण्ड (त्यादि)। ๑. วตฺตมาเน ติ อนฺติ สิ ถ มิ ม เต อนฺเต เส วฺเห เอ มฺเห. १. वर्तमान काल में- ति, अन्ति, सि, थ, मि, म; ते, अन्ते, से, व्हे, ए, म्हे (प्रत्यय होते हैं)। วตฺตมาเน อารทฺธาปริสมตฺเต อตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา ตฺยาทโย โหนฺติ. คจฺฉติ, คจฺฉนฺติ, คจฺฉสิ คจฺฉถ, คจฺฉามิ คจฺฉาม, คจฺฉเต คจฺฉนฺเต, คจฺฉเส คจฺฉวฺเห, คจฺเฉ คจฺฉามฺเห. กถํ ‘ปุเร อธมฺโม ทิปฺปติ, ปุรา มรามี’ติ? วตฺตมานสฺเสววตฺตุมิฏฺฐตฺตา ตํสมีปสฺส ตคฺคหเณน คหณา, ปุเรปุราสทฺเทหิ วา อนาคตตฺตาวคเม ตทา ตสฺส วตฺตมานตฺตา, กาลพฺยตฺตโย วา เอโส, ภวนฺเตว หิ กาลนฺตเรปิ ตฺยาทโย พาหุลกา ‘สนฺเตสุ ปริคูหามิ, มา จ กิญฺจ อิโต อทํ’ ‘กายสฺส เภทา อภิสมฺปรายํ, สหพฺยตํ คจฺฉติ วาสวสฺส, ‘อเนกชาติสํสารํ สนฺธาวิสฺสํ’ อติเวลํ น มสฺสิสฺส’นฺติ. वर्तमान काल में, जो आरम्भ हो चुका है किन्तु समाप्त नहीं हुआ है, उस अर्थ में धातु से 'त्यादि' प्रत्यय होते हैं। जैसे- गच्छति, गच्छन्ति, गच्छसि, गच्छथ, गच्छामि, गच्छाम, गच्छते, गच्छन्ते, गच्छसे, गच्छव्हे, गच्छे, गच्छाम्हे। 'पुरे अधम्मो दिप्पति', 'पुरा मरामि' - यहाँ कैसे? क्योंकि वर्तमान को ही कहना इष्ट है, इसलिए उसके समीपवर्ती का भी उसी के ग्रहण से ग्रहण होता है। अथवा 'पुरे' और 'पुरा' शब्दों से अनागत (भविष्य) का बोध होने पर भी उस समय वह वर्तमान ही होता है। अथवा यह काल-व्यत्यय है; क्योंकि बाहुलक से अन्य कालों में भी 'त्यादि' प्रत्यय होते ही हैं, जैसे- 'सन्तेसु परिगूहामि, मा च किञ्च इतो अदं', 'कायस्स भेदा अभिसम्परायं, सहब्यतं गच्छति वासवस्स', 'अनेकजातिसंसारं सन्धाविस्सं', 'अतिवेलं न मस्सिस्सं' आदि। ๒. ภวิสฺสติ [Pg.211] สฺสติ สฺสนฺติ สฺสสิ สฺสถ สฺสามิ สฺสาม สฺสเต สฺสนฺเต สฺสเส สฺสวฺเห สฺสํ สฺสามฺเห. २. भविष्य काल में- स्सति, स्सन्ति, स्ससि, स्सथ, स्सामि, स्साम; स्सते, स्सन्ते, स्ससे, स्सव्हे, स्सं, स्साम्हे (प्रत्यय होते हैं)। ภวิสฺสติ อนารทฺเธ อตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา สฺสตฺยาทโย โหนฺติ. คมิสฺสติ คมิสฺสนฺติ, คมิสฺสสิ คมิสฺสถ, คมิสฺสามิ คมิสฺสาม, คมิสฺสเต คมิสฺสนฺเต, คมิสฺสเส คมิสฺสวฺเห, คมิสฺสํ คมิสฺสามฺเห. भविष्य काल में, जो अभी आरम्भ नहीं हुआ है, उस अर्थ में धातु से 'स्सत्यादि' प्रत्यय होते हैं। जैसे- गमिस्सति, गमिस्सन्ति, गमिस्ससि, गमिस्सथ, गमिस्सामि, गमिस्साम, गमिस्सते, गमिस्सन्ते, गमिस्ससे, गमिस्सव्हे, गमिस्सं, गमिस्साम्हे। ๓. นาเม ครหาวิมฺหเยสุ. ३. 'नाम' शब्द का प्रयोग निन्दा (गर्हा) और आश्चर्य (विस्मय) के अर्थ में होता है। นามสทฺเท นิปาเต สติ ครหายํ วิมฺหเย จ คมฺยมาเน สฺสตฺยาทโย โหนฺติ. อิเม หิ นาม กลฺยาณธมฺมา ปฏิชานิสฺสนฺติ, น หิ นาม ภิกฺขเว ตสฺส โมฆปุริสสฺส ปาเณสุ อนุทฺทยา ภวิสฺสติ, กถํ หิ นาม โส ภิกฺขเว โมฆปุริโส สพฺพมตฺติกามยํ กุฏิกํ กริสฺสติ? ตตฺถ นาม ตฺวํ โมฆปุริส มยา วิราคาย ธมฺเม เทสิเต สราคาย เจเตสฺสสิ? อตฺถิ นาม ตาต สุทินฺน อาภิโทสิกํ กุมฺมาสํ ปริภุญฺชิสฺสสิ, อตฺถิเยวิหาปิ นินฺทาวคโม. วิมุเย-อจฺฉริยํ วต โภ อพฺภุตํ วต โภ สนฺเตน วต โภ ปพฺพชิตา วิหาเรน วิหรนฺติ, ยตฺร หิ นาม สญฺญี สมาโน ชาคโร ปญฺจมตฺตานิ สกฏสตานิ นิสฺสาย นิสฺสาย อภิกฺกนฺตานิ เนว ทกฺขติ น ปน สทฺทํ โสสฺสติ, อจฺฉริยํ อนฺโธ นาม ปพฺพตมาโรหิสฺสติ, พธิโร นาม สทฺทํ โสสฺสติ. 'नाम' शब्द रूपी निपात के होने पर निन्दा और आश्चर्य के प्रतीत होने पर 'स्सति' आदि (भविष्यत् काल के प्रत्यय) होते हैं। जैसे— "क्या ये ही कल्याण-धर्म का प्रतिज्ञान करेंगे?", "हे भिक्षुओं, उस मोघपुरुष के प्राणों में दया नहीं होगी", "हे भिक्षुओं, वह मोघपुरुष कैसे मिट्टी की कुटिया बनाएगा?", "वहाँ, हे मोघपुरुष, मेरे द्वारा विराग के लिए धर्म उपदिष्ट होने पर क्या तुम रागयुक्त चित्त वाले होगे?", "हे तात सुदिन्न, क्या तुम बासी कुल्माष (जौ का भात) खाओगे?" यहाँ निन्दा का अभाव भी है। विस्मय (आश्चर्य) में— "अहो आश्चर्य! अहो अद्भुत! अहो शान्त विहार में प्रव्रजित विहार करते हैं, जहाँ संज्ञावान और जागृत होते हुए भी पाँच सौ छकड़ों के पास से गुजरने पर भी न देखता है और न शब्द सुनता है। आश्चर्य है, अंधा पर्वत पर चढ़ेगा, बहरा शब्द सुनेगा।" ๔. ภูเต อีอุํ โอตฺถ อึ มฺหา อา อู เส วฺหํ อ มฺเห. ४. भूतकाल में 'ई, उं, ओ, त्थ, इं, म्हा' और 'आ, ऊ, से, व्हं, अ, म्हे' प्रत्यय होते हैं। ภูเต ปริสมตฺเต อตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา อี อาทโย โหนฺติ. อคมี อคมุํ, อคโม อคมิตฺถ, อคมึ อคมิมฺหา[Pg.212], อคมา อคมู, อคมิเส อคมิวฺหํ, อคม อคมิมฺเห. ภูตสามญฺญวจนิจฺฉายมนชฺชตเนปิ ‘สุโว อโหสิ อานนฺโท’. भूतकाल में क्रिया की समाप्ति के अर्थ में 'ई' आदि प्रत्यय होते हैं। जैसे— अगमी, अगमुं, अगमो, अगमित्थ, अगमिं, अगमिम्हा, अगमा, अगमू, अगमिसे, अगमिव्हं, अगम, अगमिम्हे। भूत सामान्य की विवक्षा होने पर अनद्यतन (जो आज का न हो) में भी— "कल आनन्द था।" ๕. อนชฺชตเน อา อู โอ ตฺถ อ มฺหา ตฺถ ตฺถุํ เส วฺหํ อึ มฺหเส. ५. अनद्यतन (जो आज का न हो) भूतकाल के अर्थ में 'आ, ऊ, ओ, त्थ, अ, म्हा, त्थ, त्थुं, से, व्हं, इं, म्हासे' प्रत्यय होते हैं। อวิชฺชมานชฺชตเน ภูเต-ตฺเถ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา อาอาทโย โหนฺติ. अविद्यमान अद्यतन (अनद्यतन) भूतकाल के अर्थ में 'आ' आदि प्रत्यय होते हैं। อาญายฺยา จ อุฏฺฐานา, อาญายฺยา จ สํเวสนา; เอสชฺชตโน กาโล, อหรุภตฑฺฒรตฺตํ วา. जागने से लेकर सोने तक; यह अद्यतन काल है, अथवा दिन और आधी रात का समय। อคมา อคมู, อคโม, อคมตฺถ, อคม อคมมฺหา, อคมตฺถ อคมตฺถุํ, อคมเส อคมวฺหํ, อคมึ อคมมฺหเส. อญฺญปทตฺโถ กึ? อชฺช หิยฺโย วา อคมาสิ. अगमा, अगमू, अगमो, अगमत्थ, अगम, अगमम्हा, अगमत्थ, अगमत्थुं, अगमसे, अगमव्हं, अगमिं, अगमम्हासे। 'अन्य पदार्थ' (अनद्यतन) क्यों? आज या कल गया। ๖. ปโรกฺเข อ อุ เอ ตฺถ อ มฺห ตฺถ เร ตฺโถ วฺโห อิ มฺเห. ६. परोक्ष (जो आँखों के सामने न हुआ हो) अनद्यतन भूतकाल के अर्थ में 'अ, उ, ए, त्थ, अ, म्ह, त्थ, रे, त्थो, व्हो, इ, म्हे' प्रत्यय होते हैं। อปจฺจกฺเข ภูตานชฺชตเน-ตฺเถ วุตฺตมานโต กฺริยาตฺถา อ อาทโย โหนฺติ. ชคาม ชคมุ, ชคเม ชคปิตฺถ, ชคม ชคมิมฺห, ชคมิตฺถ ชคมิเร, ชคมิตฺโถ ชคมิวฺโห, ชคมิ ชคมิมฺเห. มูฬฺหวิกฺขิตฺตพฺยาสตฺตจิตฺเตน อตฺตนาปิ กฺริยากตาภินิพฺพตฺติตกาเล-นุปลทฺธา สมานา ผเลนา-นุมียมานา ปโรกฺขาว วตฺถุโต, เตนุตฺตมวิสเยปิ ปโยคสมโว. अपरोक्ष (परोक्ष) अनद्यतन भूतकाल के अर्थ में 'अ' आदि प्रत्यय होते हैं। जैसे— जगाम, जगमु, जगमे, जगपित्थ, जगाम, जगमिम्ह, जगमित्थ, जगमिरे, जगमित्थो, जगमिव्हो, जगमि, जगमिम्हे। मूढ़, विक्षिप्त या आसक्त चित्त वाले व्यक्ति द्वारा स्वयं की गई क्रिया भी, यदि फल के समय वह उपलब्ध न हो, तो वह वस्तुतः परोक्ष ही मानी जाती है, इसलिए उत्तम पुरुष में भी इसका प्रयोग संभव है। ๗. เอยฺยาโท วาติปตฺติยํ สฺสา สฺสํ สุ สฺเส สฺสถ สฺสํ สฺสามฺหา สฺสถ สฺสึสุ สสฺเส สฺสวฺเห สฺสึ สฺสามฺหเส. ७. क्रियातिपत्ति (हेतु-हेतुमद्भाव में क्रिया की असिद्धि) के अर्थ में 'स्सा, स्सं, सु, स्से, स्सथ, स्सं, स्साम्हा, स्सथ, स्सिंसु, सस्से, स्सव्हे, स्सिं, स्साम्हासे' प्रत्यय विकल्प से होते हैं। เอยฺยาโท [Pg.213] วิสเย กฺริยาติปตฺติยํ สฺสาทโย โหนฺติ วิภาสา. วิธุรปฺปจฺจโยปนิปาตโต การณเวกลฺลโต วา กฺริยายาติปตนมนิปฺผตฺติ กฺริยาติปตฺติ, เอเต จ สฺสาทโย สามตฺถิยาตีตานาคเตสฺเวว โหนฺติ น วตฺตมาเน ตตฺร… กฺริยาติปตฺยสมฺภวา, สเจ ปฐมวเย ปพฺพชฺชํ อลภิสฺสา อรหา อภวิสฺสา, ทกฺขิเณน เจ อคมิสฺสา น สกฏํ ปริยา ภวิสฺสา, ทกฺขิเณน เจ อคมิสฺสํสุ, อคมิสฺเส อคมิสฺสถ, อคมิสฺสํ อคมิสฺสามฺหา, อคมิสฺสถ อคมิสฺสึสุ, อคมิสฺสเส อคมิสฺสวฺเห, อคมิสฺสึ อคมิสฺสามฺหเส, น สกฏํ ปริยาภวิสฺสา, วาติกึ? ทกฺขิเณ น เจ คมิสฺสติ น สกฏํ ปริยา ภวิสฺสติ. 'एय्या' आदि के विषय में क्रियातिपत्ति होने पर 'स्सा' आदि प्रत्यय विकल्प से होते हैं। कारणों की कमी या बाधाओं के कारण क्रिया का सिद्ध न होना 'क्रियातिपत्ति' है। ये 'स्सा' आदि प्रत्यय सामर्थ्यवश अतीत और अनागत (भविष्य) में ही होते हैं, वर्तमान में नहीं, क्योंकि वहाँ क्रियातिपत्ति संभव नहीं है। "यदि वह प्रथम अवस्था (युवावस्था) में प्रव्रज्या प्राप्त कर लेता, तो अर्हत् हो जाता," "यदि वह दक्षिण दिशा से जाता, तो छकड़ा नहीं पलटता," "यदि वे दक्षिण दिशा से जाते," अगमिस्से, अगमिस्सथ, अगमिस्सं, अगमिस्साम्हा, अगमिस्सथ, अगमिस्सिंसु, अगमिस्ससे, अगमिस्सव्हे, अगमिस्सिं, अगमिस्साम्हासे, "छकड़ा नहीं पलटता।" 'वा' (विकल्प) क्यों? "यदि वह दक्षिण दिशा से जाएगा, तो छकड़ा नहीं पलटेगा।" ๘. เหตุผเลสฺเวยฺย เอยฺยุํ เอยฺยาสิ เอยฺยาถ เอยฺยามิ เอยฺยาม เอถ เอรํ เอโถ เอยฺยวฺโห เอยฺยํ เอยฺยามฺเห. ८. हेतु और फल (कारण-कार्य) के अर्थ में 'एय्य, एय्युं, एय्यासि, एय्याथ, एय्यामि, एय्याम, एथ, एरं, एथो, एय्यव्हो, एय्यं, एय्याम्हे' प्रत्यय होते हैं। เหตุภูตายํ เอลภูตายญฺจ กฺริยายํ วตฺตมานโต กฺริยตฺถา เอยฺยาทโย วา โหนฺติ, สเจ สงฺขารา นิจฺจา ภเวยฺยุํ น นิรุชฺเฌยฺยุํ, ทกฺขิเณน เจ คจฺเฉยฺย น สกฏํ ปริยาภเวยฺย, ทกฺขิเณน เจ คจฺเฉยฺยุํ, คจฺเฉยฺยาสิ คจฺเฉยฺยาถ, คจฺเฉยฺยามิ คจฺเฉยฺยาม, คจฺเฉถ คจฺเฉรํ, คจฺเฉโถ คจฺเฉยฺยวฺโห, คจฺเฉยฺยํ คจฺเฉยฺยามฺเห, น สกฏํ ปริยฺยาภเวยฺย, ภวนํ คมนํ จ เหตุ, อนิรุชฺฌนํ อปริยาภวนํ จ ผลํ, อิห กสฺมา น โหติ ‘หนฺตีหิ ปลายติ, วสฺสตีติ ธาวติ, หนิสฺสตีติ ปลายิสฺสตี’ติ? อิติ สทฺเทเนว เหตุเหตุมนฺตตาย โชติตตฺตา, วาติ กึ? ทกฺขิเณน เจ คมิสฺสติ น สกฏํ ปริยาภวิสฺสติ. हेतु (कारण) और फल के रूप में वर्तमान क्रिया के अर्थ में 'एय्य' आदि प्रत्यय विकल्प से होते हैं। यदि संस्कार नित्य होते, तो वे निरुद्ध नहीं होते। यदि वह दक्षिण की ओर जाता, तो गाड़ी नहीं पलटती। यदि वे दक्षिण की ओर जाते, तुम जाते, तुम सब जाते, मैं जाता, हम सब जाते, वह जाता, वे जाते, तुम जाते, तुम सब जाते, मैं जाता, हम सब जाते, तो गाड़ी नहीं पलटती। यहाँ होना और जाना हेतु है, और निरुद्ध न होना तथा न पलटना फल है। यहाँ 'मारता है इसलिए भागता है, वर्षा होती है इसलिए दौड़ता है, मारेगा इसलिए भागेगा' - ऐसा क्यों नहीं होता? क्योंकि 'इति' शब्द के द्वारा ही हेतु-हेतुमद् भाव प्रकट हो जाता है। 'वा' (विकल्प) क्यों? (क्योंकि) 'यदि वह दक्षिण की ओर जाएगा, तो गाड़ी नहीं पलटेगी' (ऐसा भी प्रयोग होता है)। ๙. ปญฺหปตฺถนาวิธีสุ. ९. प्रश्न, प्रार्थना और विधि (आदेश) के अर्थों में। ปญฺโห=สมฺปุจฺฉนํ [Pg.214] สมฺปธารณํ นิรูปณํ การิยานิจฺฉยนํ ปตฺถนา=ยาจนํ อิฏฺฐาสึ ภนญฺจ, วิธิ=วิธานํ นิโยชนํ กฺริยาสุ พฺยาปารณา, สา จ ทุวิธาว สาทรานาทรวเสน… วิสยเภเทน ภินฺนายปิ ตทุภยานติวตฺตนโต, เอเตสุ ปญฺหาทีสุ กฺริยตฺถโต เอยฺโยทโย โหนฺติ, ปญฺเห - กิมายสฺมา วินยํ ปริยาปุเณยฺย? อุทาหุ ธมฺมํ, คจฺเฉยฺยํ วาหํ อุโปสถํ น วา คจฺเฉยฺยํ, ปตฺถนายํ-ลเภยฺยา-หํ ภนฺเต ภควโต สนฺติเก ปพฺพชฺชํ ลเภยฺยํ อุปสมฺปทํ, ปสฺเสยฺยํ ตํ วสฺสสตํ อโรคํ, วิธิมฺหิ-ภวํ ปตฺตํ ปเจยฺย, ภวํ ปุญฺญํ กเรยฺย, อิห ภวํ ภุญฺเชยฺย, อิห ภวํ นิสีเทยฺย, มาณวกํ ภวํ อชฺฌาเปยฺย, อนุญฺญาปตฺตกาเลสุปิ สิทฺธาว… ตตฺถาปิ วิธิปฺปตีติโต, อนุญฺญายํ-เอวํ กเรยฺยาสิ, ปตฺตกาเล-กฏํ กเรยฺยาสิ, ปตฺโต เต กาโล กฏกรเณ, ยทิ สงฺฆสฺส ปตฺตกลฺลํ สงฺโฆ อุโปสถํ กเรยฺย, เอตสฺส ภควา กาโล เอตสฺส สุคต กาโล ยํ ภควา สาวกานํ สิกฺขาปทํ ปญฺญเปยฺย, เปสเนปิจฺฉนฺติ ‘คามํ ตฺวํ ภเณ คจฺเฉยฺยาสิ’. प्रश्न = पूछना, विचार करना, निरूपण करना, कार्य का निश्चय करना। प्रार्थना = याचना और इष्ट की आकांक्षा करना। विधि = विधान, नियोजन, क्रियाओं में प्रवृत्त करना; और वह आदर और अनादर के भेद से दो प्रकार की है... विषयों के भेद से भिन्न होने पर भी उन दोनों का उल्लंघन न करने के कारण, इन प्रश्न आदि अर्थों में क्रिया के अर्थ में 'एय्य' आदि होते हैं। प्रश्न में - 'क्या आयुष्मान् विनय का अध्ययन करेंगे? अथवा धर्म का?' 'क्या मैं उपोसथ जाऊँ या न जाऊँ?' प्रार्थना में - 'भन्ते! मैं भगवान के पास प्रव्रज्या प्राप्त करूँ, उपसम्पदा प्राप्त करूँ।' 'मैं आपको सौ वर्ष तक नीरोग देखूँ।' विधि में - 'आप चटाई बुनें।' 'आप पुण्य करें।' 'यहाँ आप भोजन करें।' 'यहाँ आप बैठें।' 'आप बालक को पढ़ाएँ।' अनुज्ञा (अनुमति) और प्राप्तकाल (उचित समय) में भी सिद्ध ही है... वहाँ भी विधि की प्रतीति होने से। अनुज्ञा में - 'तुम ऐसा करो।' प्राप्तकाल में - 'तुम चटाई बनाओ।' 'तुम्हारे लिए चटाई बनाने का समय आ गया है।' 'यदि संघ के लिए उचित समय हो, तो संघ उपोसथ करे।' 'भगवान के लिए यह समय है, सुगत के लिए यह समय है कि भगवान श्रावकों के लिए शिक्षापद प्रज्ञप्त करें।' प्रेषण (भेजने) में भी चाहते हैं - 'अरे! तुम गाँव जाओ'। ๑๐. ตุ อนฺตุ หิ ถ มิ ม ตํ อนฺตํ สฺสุ วฺโห เอ อามเส. १०. तु, अन्तु, हि, थ, मि, म, तं, अन्तम्, स्सु, व्हो, ए, आमसे। ปญฺหาทีสฺเวเต โหนฺติ กฺริยตฺถโต. คจฺฉตุ คจฺฉนฺตุ, คจฺฉาหิ คจฺฉถ, คจฺฉามิ คจฺฉาม, คจฺฉตํ คจฺฉนฺตํ, คจฺฉสฺสุ คจฺฉวฺโห, คจฺเฉ, คจฺฉามเส, ปญฺเห-กินฺนุ ขลุ โภ พฺยากรณมธียสฺสุ, ปตฺถนายํ-ททาหิ เม, ชีวตุ ภวํ, วิธิมฺหิ-กฏํ กโรตุ ภวํ, ปุญฺญํ กโรตุ [Pg.215] ภวํ, อิห ภวํ ภุญฺชตุ, อิห ภวํ นิสีทตุ, อุทฺทิสตุ ภนฺเต ภควา ภิกฺขูนํ ปาติโมกฺขํ, เปสเน-คจฺฉ ภเณ คามํ, อนุมติยํ - เอวํ กโรหิ, ปตฺตกาเล-กาโล-ยํ เต มหาวีร อุปฺปชฺช มาตุกุจฺฉิยํ. प्रश्न आदि अर्थों में क्रिया के अर्थ में ये (प्रत्यय) होते हैं। वह जाए, वे जाएँ, तुम जाओ, तुम सब जाओ, मैं जाऊँ, हम सब जाएँ, वह जाए, वे जाएँ, तुम जाओ, तुम सब जाओ, मैं जाऊँ, हम सब जाएँ। प्रश्न में - 'हे भद्र! क्या तुम व्याकरण पढ़ते हो?' प्रार्थना में - 'मुझे दो।' 'आप जीवित रहें।' विधि में - 'आप चटाई बनाएँ।' 'आप पुण्य करें।' 'यहाँ आप भोजन करें।' 'यहाँ आप बैठें।' 'भन्ते! भगवान भिक्षुओं के लिए पातिमोक्ख का निर्देश करें।' प्रेषण में - 'अरे! गाँव जाओ।' अनुमति में - 'ऐसा करो।' प्राप्तकाल में - 'हे महावीर! यह आपके लिए माता की कुक्षि में उत्पन्न होने का समय है'। ๑๑. สตฺยรเหสฺเวยฺยาที. ११. शक्ति और योग्यता (अर्हता) के अर्थ में 'एय्य' आदि होते हैं। สตฺติยํ อร หตฺเถ จ กฺริยตฺถา เอยฺยาทโย โหนฺติ. ภวํ ขลุ รชฺชํ กเรยฺย, ภวํ สตฺโต อรโห. शक्ति और योग्यता के अर्थ में क्रिया के अर्थ में 'एय्य' आदि होते हैं। 'आप निश्चय ही राज्य कर सकते हैं।' 'आप समर्थ और योग्य हैं'। ๑๒. สมฺภาวเน วา. १२. सम्भावना के अर्थ में विकल्प से। สมฺภาวเน คมฺยมาเน ธาตุนา วุจฺจมาเน จ เอยฺยาทโย โหนฺติ วิภาสา. อปิ ปพฺพตํ สิรสา ภินฺเทยฺย, กฺริยาติปตฺติยนฺตุ สฺสาที-อสนิยาปิ หโต นาปติสฺสา, สมฺภาเวมิ สทฺทหามิ อวกปฺเปมิ ภุญฺเชยฺย ภวํ ภุญฺชิสฺสติ ภวํ อภุญฺชิ ภวํ, กฺริยาติปตฺติยนฺตุ สฺสาที-สมฺภาเวมิ นาภุญฺชิสฺสา ภวํ. सम्भावना के प्रतीत होने पर और धातु द्वारा कहे जाने पर 'एय्य' आदि विकल्प से होते हैं। 'शायद वह पर्वत को सिर से तोड़ दे।' क्रिया की अतिपत्ति (असफलता) में तो 'स्सा' आदि होते हैं - 'वज्र से मारे जाने पर भी वह नहीं गिरा।' 'मैं सम्भावना करता हूँ, श्रद्धा करता हूँ, विश्वास करता हूँ कि आप भोजन करेंगे (भविष्य), आप भोजन करते हैं (वर्तमान), आपने भोजन किया (भूत)।' क्रिया की अतिपत्ति में तो 'स्सा' आदि होते हैं - 'मैं सम्भावना करता हूँ कि आप भोजन नहीं कर पाए'। ๑๓. มาโยเค อีอาอาที. १३. 'मा' के योग में 'ई', 'आ' आदि विकल्प से होते हैं। มา โยเค สติ อีอาทโย อาอาทโย จ วา โหนฺติ. มา สุ ปุนปิ เอวรูปมกาสิ, มา ภวํ อคมา วนํ, วาตฺเวว? มา เต กามคุเณ ภมสฺสุ จิตฺตํ, มา ตฺวํ กริสฺสสิ, มา ตฺวํ กเรยฺยาสิ, อสกกาลตฺโถยมารมฺโภ, พุทฺโธ ภวิสฺสตีติ ปทนฺตรสมฺพนฺเธนานาคตกาลตา ปตียเต, เอวํ กโต กโฏ สฺเว ภวิสฺสติ, ภาวิ กิจฺจมาสีติ. 'मा' का योग होने पर 'ई' आदि और 'आ' आदि विकल्प से होते हैं। 'फिर कभी ऐसा मत करना।' 'आप वन मत जाइए।' 'वा' (विकल्प) क्यों? 'तुम्हारा चित्त कामगुणों में न भटके।' 'तुम नहीं करोगे।' 'तुम नहीं करना चाहिए।' यह आरम्भ अपने काल के अर्थ में नहीं है। 'बुद्ध होंगे' - इस प्रकार अन्य पद के सम्बन्ध से भविष्यत् काल की प्रतीति होती है। इसी प्रकार 'बनाया हुआ चटाई कल होगा', 'होने वाला कार्य था'। ลุนาหิ [Pg.216] ลุนาหิตฺเววายํ ลุนาติ, ลุนสฺสุ ลุนสฺสุตฺเววายํ ลุนา-ตีติ ตฺวาทีนเมเวตํ มชฺฌิมปุริเสกวจนานมาภิกฺขญฺเญ ทฺวิพฺพวจนํ, อิทํ วุตฺตํ โหติ ‘เอว เมส ตุริโต อญฺเญปิ นิโยเชนฺโตวิย กิริยํ กโรตี’ติ, เอวํ ลุนาถ ลุนาถตฺเววายํ ลุนาติ, ลุนวฺโห ลุนวฺโหตฺเววายํ ลุนาติ, ตถา กาลนฺตเรสุปิ ลุนาหิ ลุนาหิตฺเววายํ อลุนิ, อลุนา, ลุลาว, ลุนิสฺสตีติ, เอวํ สฺสุมฺหิ จ โยชนียํ, ตถา สมุจฺจเยปิ มฐมฏ, วิหารมเฏตฺเววายมฏติ, มฐมฏสฺสุ, วิหารมฏสฺสุตฺเววายมฏติ, พฺยาปารเภเท ตุสามญฺญวจนสฺเสว พฺยาปกตฺตา อนุปฺปโยโค ภวติ, โอทนํ ภุญฺช, ยาคุํ ปิว, ธานา ขาเทตฺเววาย-มชฺโฌหรติ. 'काटो, काटो' इस प्रकार वह काटता है। 'काटो, काटो' इस प्रकार वह काटता है - यहाँ मध्यम पुरुष एकवचन का ही बार-बार होने (आभीक्ष्ण्य) के अर्थ में द्वित्व हुआ है। यह कहा गया है कि 'वह इस प्रकार शीघ्रता से दूसरों को भी नियुक्त करते हुए क्रिया करता है।' इसी प्रकार 'काटो, काटो' (बहुवचन) इस प्रकार वह काटता है। 'काटो, काटो' (आत्मनेपद) इस प्रकार वह काटता है। इसी प्रकार अन्य कालों में भी - 'काटो, काटो' इस प्रकार उसने काटा, वह काटता था, उसने काटा, वह काटेगा। इसी प्रकार 'स्सु' में भी जोड़ना चाहिए। उसी प्रकार समुच्चय (संग्रह) में भी - 'घूमो, घूमो, विहार में घूमो' इस प्रकार वह घूमता है। 'घूमो, घूमो, विहार में घूमो' इस प्रकार वह घूमता है। व्यापार के भेद होने पर 'तु' आदि सामान्य वचनों का ही व्यापक होने के कारण अनुप्रयोग होता है - 'भात खाओ, यवागू पियो, दाने खाओ' इस प्रकार वह खाता है। ๑๔. ปุพฺพปรจฺฉกฺกานเมกาเนเกสุ ตุมฺหามฺหเสเสสุ ทฺเว ทฺเว มชฺฌิมุตฺตมปฐมา. १४. पूर्व और पर के छह-छह (प्रत्ययों) में से एक और अनेक (एकवचन और बहुवचन) होने पर 'तुम्ह', 'अम्ह' और 'सेस' (शेष) के योग में क्रमशः दो-दो मध्यम, उत्तम और प्रथम पुरुष होते हैं। เอกาเนเกสุ ตุมฺหามฺหสทฺทวจนีเยสุ ตทญฺญสทฺทวจนีเยสุ จ การเกสุ ปุพฺพจฺฉกฺกานํ ปรจฺฉกฺกานํ มชฺฌิมุตฺตมปฐมา ทฺเว ทฺเว โหนฺติ ยถากฺกมํ กฺริยตฺถา, อุตฺตมสทฺโท-ยํ สภาวโต ตติยทุเก รุฬฺโห, ตฺวํ คจฺฉสิ, ตุมฺเห คจฺฉถ, ตฺวํ คจฺฉเส, ตุมฺเห คจฺฉวฺเห, อหํ คจฺฉามิ, มยํ คจฺฉาม, อหํ คจฺเฉ, มยํ คจฺฉามฺเห, โส คจฺฉติ, เต คจฺฉนฺติ, โส คจฺฉเต, เต คจฺฉนฺเต, สามตฺถิยา ลทฺธตฺตา อปฺปยุชฺชมาเนสุปิ ตุมฺหามฺหเสเสสุ ภวนฺติ. คจฺฉสิ, คจฺฉถ, คจฺฉเส, คจฺฉวฺเห, คจฺฉามิ, คจฺฉาม, คจฺเฉ, คจฺฉามฺเห, คจฺฉติ, คจฺฉนฺติ, คจฺฉเต, คจฺฉนฺเต. एकवचन और बहुवचन वाले 'तुम्ह' (तुम) और 'अम्ह' (मैं) शब्दों के प्रयोग में तथा उनसे भिन्न अन्य शब्दों (कारक) के प्रयोग में, पूर्व के छह (परस्मैपद) और पर के छह (आत्मनेपद) प्रत्ययों में क्रमशः मध्यम, उत्तम और प्रथम पुरुष के दो-दो प्रत्यय क्रिया के अर्थ में होते हैं। 'उत्तम' शब्द स्वभाव से तीसरे द्विक (जोड़े) के लिए रूढ़ है। तुम जाते हो (tvaṃ gacchasi), तुम सब जाते हो (tumhe gacchatha), तुम जाते हो (tvaṃ gacchase), तुम सब जाते हो (tumhe gacchavhe), मैं जाता हूँ (ahaṃ gacchāmi), हम जाते हैं (mayaṃ gacchāma), मैं जाता हूँ (ahaṃ gacche), हम जाते हैं (mayaṃ gacchāmhe), वह जाता है (so gacchati), वे जाते हैं (te gacchanti), वह जाता है (so gacchate), वे जाते हैं (te gacchante)। सामर्थ्य से प्राप्त होने के कारण 'तुम्ह' और 'अम्ह' शब्दों के प्रयोग न होने पर भी ये प्रत्यय होते हैं। जैसे—गच्छसि, गच्छथ, गच्छसे, गच्छवहे, गच्छामि, गच्छाम, गच्छे, गच्छाम्हे, गच्छति, गच्छन्ति, गच्छते, गच्छन्ते। ๑๕. อาอีสฺสาทีสฺวญ วา. १५. 'आ', 'ई', 'स्सा' आदि के परे होने पर विकल्प से 'अञ' होता है। อาอาโท [Pg.217] อีอาโท สฺสา อาโท จ กฺริยตฺถสฺส วา อญ โหติ. ญกาโร-นุพนฺโธ, อคมา, คมา, อคมี, คมี, อคมิสฺสา, คมิสฺสา. 'आ' आदि, 'ई' आदि और 'स्सा' आदि के परे होने पर क्रियार्थ (धातु) को विकल्प से 'अञ' होता है। 'ञ'कार अनुबन्ध है। उदाहरण: अगमा, गमा, अगमी, गमी, अगमिस्सा, गमिस्सा। ๑๖. ออาทีสฺวาโห พฺรูสฺส. १६. 'अ' आदि के परे होने पर 'ब्रू' धातु को 'आहो' आदेश होता है। พฺรูสฺส อาโห โหติ ออาทีสุ. อาห, อาหุ. 'अ' आदि के परे होने पर 'ब्रू' को 'आहो' होता है। उदाहरण: आह, आहु। ๑๗. ภูสฺส วุก. १७. 'भू' धातु को 'वुक' आगम होता है। ออาทีสุ ภูสฺส วุก โหติ. กกาโร-นุพนฺโธ, อุกาโร อุจฺจารณตฺโถ, พภูว. 'अ' आदि के परे होने पर 'भू' को 'वुक' होता है। 'क'कार अनुबन्ध है, 'उ'कार उच्चारण के लिए है। उदाहरण: बभूव। ๑๘. ปุพฺพสฺส อ. १८. पूर्व (अभ्यास) को 'अ' होता है। ออาทีสุ ทฺวิตฺเต ปุพฺพสฺส ภูสฺส อ โหติ, พภูว. 'अ' आदि के परे होने पर द्वित्व होने पर पूर्व 'भू' को 'अ' होता है। उदाहरण: बभूव। ๑๙. อุสฺสํสฺวาหา วา. १९. 'आह' आदेश के बाद 'उ' को विकल्प से 'अंसु' होता है। อาหาเทสา ปรสฺส อุสฺส อํสุวา โหติ. อหํสุ, อาหุ. 'आह' आदेश से परे 'उ' को विकल्प से 'अंसु' होता है। उदाहरण: अहंसु, आहु। ๒๐. ตฺยนฺตีนํ ฏฏู. २०. 'ति' और 'अन्ति' को 'ट' और 'टू' आदेश होते हैं। อาหา ปเรสํ ติอนฺตีนํ ฏฏู โหนฺติ. ฏการา สพฺพาเทสตฺถา, อาห, อาหุ, อโตเยว จ ญาปกา ติอนฺตีสุ จ พฺรูสฺสา-โห. 'आह' से परे 'ति' और 'अन्ति' को 'ट' और 'टू' होते हैं। 'ट'कार सर्वादेश के लिए है। उदाहरण: आह, आहु। इसी ज्ञापक से 'ति' और 'अन्ति' के परे होने पर भी 'ब्रू' को 'आहो' होता है। ๒๑. อีอาโท วจสฺโสม. २१. 'ई' आदि के परे होने पर 'वच' धातु को 'ओम' आदेश होता है। อีอาทีสุ วจสฺส โอม โหติ. มกาโร-นุพนฺโธ, อโวจ, อีอาโทติ กึ? อวจา. 'ई' आदि के परे होने पर 'वच' को 'ओम' होता है। 'म'कार अनुबन्ध है। उदाहरण: अवोच। 'ई' आदि क्यों? उदाहरण: अवचा। ๒๒. ทาสฺส ทํ วา มิเมสฺวทฺวิตฺเต. २२. द्वित्व न होने पर 'मि' और 'म' के परे होने पर 'दा' धातु को विकल्प से 'दं' होता है। อทฺวิเต [Pg.218] วตฺตมานสฺส ทาสฺส ทํ วา โหติ มิเมสุ. ทมฺมิ เทมิ, ทมฺม เทม, อทฺวิตฺเตติ กึ? ททาธิ ททาม. द्वित्व न होने पर 'मि' और 'म' के परे होने पर 'दा' को विकल्प से 'दं' होता है। उदाहरण: दम्मि, देमि; दम्म, देम। 'द्वित्व न होने पर' क्यों? उदाहरण: ददाधि, ददाम। ๒๓. กรสฺส โสสฺส กุํ. २३. 'स'कार सहित 'कर' धातु को 'कुं' होता है। กรสฺส สโอการสฺส กุํ วา โหติ มิเมสุ. กุมฺมิ กุมฺม, กโรมิ กโรม. 'स'कार सहित 'कर' धातु को 'मि' और 'म' के परे होने पर विकल्प से 'कुं' होता है। उदाहरण: कुम्मि, कुम्म; करोमि, करोम। ๒๔. กา อีอาทีสุ. २४. 'ई' आदि के परे होने पर 'का' होता है। กรสฺส สโอการสฺส กา โหติ วา อีอาทีสุ. อกาสิ อกริ, อกํสุ อกรึสุ, อกา อกรา. 'स'कार सहित 'कर' धातु को 'ई' आदि के परे होने पर विकल्प से 'का' होता है। उदाहरण: अकासि, अकरि; अकंसु, अकरिंसु; अका, अकरा। ๒๕. หาสฺส, จาหง สฺเสน. २५. 'कर' और 'हा' धातु को 'स्स' के साथ 'आहङ' होता है। กรสฺส โสสฺส หาสฺส จ อาหง วา โหติ สฺเสน สห. กาหติ กริสฺสติ, อกาหา อกริสฺสา, หาหติ หายิสฺสติ, อหาหา อหายิสฺสา. 'स'कार सहित 'कर' और 'हा' धातु को 'स्स' के साथ विकल्प से 'आहङ' होता है। उदाहरण: काहति, करिस्सति; अकाहा, अकरिस्सा; हाहति, हायिस्सति; अहाहा, अहायिस्सा। ๒๖. ลภวสจฺฉิทภิทรุทานํ จฺฉง. २६. 'लभ', 'वस', 'छिद', 'भिद' और 'रुद' धातुओं को 'च्छङ' होता है। ลภาทีนํ จฺฉง วา โหติ สฺเสนสห. อลจฺฉา อลภิสฺสา, ลจฺฉติ ลภิสฺสาติ, อวจฺฉา อวสิสฺสา, วจฺฉติ วสิสฺสติ, อจฺเฉจฺฉา อจฺฉินฺทิสฺสา, เฉจฺฉติ ฉินฺทิสฺสติ, อเภจฺฉา อภินฺทิสฺสา, เภจฺฉติ ภินฺทิสฺสติ, อรุจฺฉา อโรทิสฺสา, รุจฺฉติ โรทิสฺสตี[Pg.219], อญฺญสฺมิมฺปิ ฉิทสฺส วา จฺฉง โยควิภาคา, อจฺเฉจฺฉุํ อจฺฉนฺตึสุ, อญฺเญสญฺจ คจฺฉํ คจฺฉิสฺสํ. 'लभ' आदि धातुओं को 'स्स' के साथ विकल्प से 'च्छङ' होता है। उदाहरण: अलच्छा, अलभिस्सा; लच्छति, लभिस्सति; अवच्छा, अवसिस्सा; वच्छति, वसिस्सति; अच्छेच्छा, अच्छिन्दिस्सा; छेच्छति, छिन्दिस्सति; अभेच्छा, अभिन्दिस्सा; भेच्छति, भिन्दिस्सति; अरुच्छा, अरोदिस्सा; रुच्छति, रोदिस्सति। योगविभाग से अन्यत्र भी 'छिद' को विकल्प से 'च्छङ' होता है, जैसे—अच्छेच्छुं, अच्छन्तिंसु; और अन्यों को भी, जैसे—गच्छं, गच्छिस्सं। ๒๗. ภุช มุจ วจ วิสานํ กฺขง. २७. 'भुज', 'मुच', 'वच' और 'विस' धातुओं को 'क्खङ' होता है। ภุชาทีนํ กฺขง วา โหติ สฺเสน สห. อโภกฺขา อภุญฺชิสฺสา, โภกฺขติ ภุญฺชิสฺสติ, อโมกฺขา อมุญฺจิสฺสา, โมกฺขติมุญฺจิสฺสติ, อวกฺขา อวจิสฺสา, วกฺขติ วจฺจิสฺสติ, ปาเวกฺขา ปาวิสิสฺสา, ปเวกฺขติ ปวิสิสฺสติ, วิสสฺสา-ญฺญสฺมิมฺปิ วา กฺขง โยควิภาคา ปาเวกฺขิ, ปาวิสิ. 'भुज' आदि धातुओं को 'स्स' के साथ विकल्प से 'क्खङ' होता है। उदाहरण: अभोक्खा, अभुञ्जिस्सा; भोक्खति, भुञ्जिस्सति; अमोक्खा, अमुञ्चिस्सा; मोक्खति, मुञ्चिस्सति; अवक्खा, अवचिस्सा; वक्खति, वच्चिस्सति; पावेक्खा, पाविसिस्सा; पवेक्खति, पविस्सिस्सति। योगविभाग से 'विस' को अन्यत्र भी विकल्प से 'क्खङ' होता है, जैसे—पावेक्खि, पावििस। ๒๘. อาอีอาทีสุ หรสฺสา. २८. 'आ', 'ई' आदि के परे होने पर 'हर' धातु को 'आ' होता है। อาอาโท อีอาโท อ หรสฺส อา โหติ วา. อหา อหรา, อหาสิ อหริ. 'आ' आदि और 'ई' आदि के परे होने पर 'हर' के 'अ' को विकल्प से 'आ' होता है। उदाहरण: अहा, अहरा; अहासि, अहरि। ๒๙. คมิสฺส. २९. 'गमु' (जाना) धातु का। อาอาโท อีอาโท อ คมิสฺส อา โหติ วา. อคา อคมา, อคา อคมี. 'आ' और 'ई' (प्रत्ययों) के परे होने पर 'गम्' (धातु) के 'अ' को विकल्प से 'आ' होता है। जैसे: अगा, अगमा; अगा, अगमी। ๓๐. ฑํสสฺส จ ฉง. ३०. और 'दंस्' (धातु) के स्थान पर 'छङ' (आदेश) होता है। ฑํสสฺส คมิสฺส จ ฉง วา โหติ อาอีอาทีสุ. อฑญฺฉา อฑํสา, อฑญฺฉิ อฑํสี, อคญฺฉา อคจฺฉา, อคญฺฉิ อคจฺฉี. 'आ', 'ई' आदि (प्रत्ययों) के परे होने पर 'दंस्' और 'गम्' (धातुओं) के स्थान पर विकल्प से 'छङ' होता है। जैसे: अडञ्छा, अदंसा; अडञ्छि, अदंसी; अगञ्छा, अगच्छा; अगञ्छि, अगच्छी। ๓๑. หูสฺส เหเหหิโหหิ สฺสตฺยาโท. ३१. 'स्सति' आदि (प्रत्ययों) के परे होने पर 'हू' (धातु) के स्थान पर 'हे', 'हेहि', 'होहि' होते हैं। หูสฺส เหอาทโย โหนฺติ สฺสตฺยาโท. เหสฺสติ, เหหิสฺสติ, โหหิสฺสติ. 'स्सति' आदि के परे होने पर 'हू' के स्थान पर 'हे' आदि होते हैं। जैसे: हेस्सति, हेहिस्सति, होहिस्सति। ๓๒. ณานาสุ รสฺโส. ३२. 'णा' और 'ना' (प्रत्ययों) के परे होने पर ह्रस्व होता है। กฺณากฺนาสุ [Pg.220] กฺริยตฺถสฺส รสฺโส โหติ. กิณาติ, ธุนาติ. 'क्णा' और 'क्ना' (प्रत्ययों) के परे होने पर क्रियार्थ (धातु) का ह्रस्व होता है। जैसे: किणाति, धुनाति। ๓๓. อา อี ญุ มฺหา สฺสา สฺสมฺหานํ วา. ३३. 'आ', 'ई', 'ञु', 'म्हा', 'स्सा', 'स्सम्हा' का विकल्प से (ह्रस्व) होता है। เอสํ วา รสฺโส โหติ. คม คมา, คมิ คมี, คมุ คมู, คมิมฺห คมิมฺหา, คมิสฺส คมิสฺสา, คมิสฺสมฺห คมิสฺสมฺหา. इनका विकल्प से ह्रस्व होता है। जैसे: गम, गमा; गमि, गमी; गमु, गमू; गमिम्ह, गमिम्हा; गमिस्स, गमिस्सा; गमिस्सम्ह, गमिस्सम्हा। ๓๔. กุสรุเหหีสฺส ฉิ. ३४. 'कुस्' और 'रुह्' (धातुओं) से परे 'ई' के स्थान पर 'छि' होता है। กุสา รุหา จ ปรสฺส อีสฺส ฉิ วา โหติ. อกฺโกจฺฉิ อกฺโกสิ, อภิรุจฺฉิ อภิรุหิ. 'कुस्' और 'रुह्' से परे 'ई' के स्थान पर विकल्प से 'छि' होता है। जैसे: अक्कोच्छि, अक्कोसि; अभिरुच्छि, अभिरुहि। ๓๕. อ อี สฺสาอาทีนํ พฺยญฺชนสฺสิญ. ३५. 'अ', 'ई', 'स्सा' आदि के व्यञ्जन के स्थान पर 'इञ' होता है। กฺริยตฺถา ปเรสํ ออาทีนํ อีอาทีนํ สฺสอาทีนญฺจ-พฺยญฺชนสฺส อิญ โหติ วิภาสา. พภุวิตฺถ, อภวิตฺถา, อนุภวิสฺสา, อนุภวิสฺสติ อนุโภสฺสติ หริสติ หสฺสติ, เอเตสนฺติ กึ? ภวติ, พฺยญฺชนสฺสาติ กึ? พภูว. क्रियार्थ (धातु) से परे 'अ' आदि, 'ई' आदि और 'स्स' आदि के व्यञ्जन के स्थान पर विकल्प से 'इञ' होता है। जैसे: बभुवित्थ, अभवित्था, अनुभविस्सा, अनुभविस्सति, अनुभोसति, हरिसति, हस्सति। 'इनका' ऐसा क्यों कहा? (ताकि) 'भवति' (में न हो)। 'व्यञ्जन का' ऐसा क्यों कहा? (ताकि) 'बभूव' (में न हो)। ๓๖. พฺรูโต ติสฺสีญ. ३६. 'ब्रू' (धातु) से परे 'ति' के स्थान पर 'ईञ' होता है। พฺรูโต ปรสฺส ติสฺส อีญ วา โหติ. พฺรวีติ, พฺรูติ. 'ब्रू' से परे 'ति' के स्थान पर विकल्प से 'ईञ' होता है। जैसे: ब्रवीति, ब्रूति। ๓๗. กฺยสฺส. ३७. 'क्य' के स्थान पर (भी यही होता है)। กฺริยตฺถา ปรสฺส กฺยสฺส อีญ วา โหติ. ปจียติ, ปจฺจติ. क्रियार्थ (धातु) से परे 'क्य' के स्थान पर विकल्प से 'ईञ' होता है। जैसे: पचीयति, पच्चति। ๓๘. เอยฺยาถ สฺเส อ อา อีถานํ โอ, อ, อํ, ตฺถ, ตฺโถ, วฺโหก. ३८. 'एय्याथ', 'स्से', 'अ', 'आ', 'ईथ' के स्थान पर क्रमशः 'ओ', 'अ', 'अं', 'त्थ', 'त्थो', 'व्हो' होते हैं। เอยฺยาถาทีนํ โออาทโย วา โหนฺติ ยถากฺกมํ. ตุมฺเห ภเวยฺยาโถ ภเวยฺยาถ, ตฺวํ อภวิสฺส อภวิสฺเส, อหํ อภวํ [Pg.221] อภว, โส อภวิตฺถ อภวา, โส อภวิตฺโถ, อภวี, ตุมฺเห ภวถวฺโห ภวถ, อาสหจริโตว อกาโร คยฺหเต, โถ ปน-นฺเต นิทฺเทสา ตฺวาทิสมฺพนฺธีเยว, ตสฺเสว วา นิสฺสิตตฺตา, นิสฺสยกรณมฺปิ หิ สุตฺตการาจิณฺณํ. 'एय्याथ' आदि के स्थान पर यथाक्रम से 'ओ' आदि विकल्प से होते हैं। जैसे: तुम्हे भवेय्याथो, भवेय्याथ; त्वं अभविस्स, अभविस्से; अहं अभवं, अभव; सो अभवित्थ, अभवा; सो अभवित्थो, अभवी; तुम्हे भवथव्हो, भवथ। 'आ' के साथ चरित 'अ' ही ग्रहण किया जाता है। 'थो' का निर्देश अन्त में होने से वह 'त्वं' आदि से ही सम्बद्ध है, क्योंकि वह उसी पर आश्रित है; आश्रय करना सूत्रकारों की रीति है। ๓๙. อุํสฺสึ สฺวํสุ. ३९. 'उं' के स्थान पर 'इंसु' और 'अंसु' होते हैं। อุมีจฺจสฺส อึสุ อํสุ วา โหนฺติ. อคมึสุ, อคมํสุ, อคมุํ. 'उं' के स्थान पर विकल्प से 'इंसु' या 'अंसु' होते हैं। जैसे: अगमिंसु, अगमंसु, अगमुं। ๔๐. เอโอตฺตา สุํ. ४०. 'ए' और 'ओ' से परे ('उं' के स्थान पर) 'सुं' होता है। เออาเทสโต โออาเทสโต จ ปรสฺส อุมิจฺจสฺส สุํ วา โหติ. เนสุํ, นยึสุ, อสฺโสสุํ, อสฺสุํ, อาเทสตฺตาขฺยาปนตฺถํตฺตคฺคหณํ. 'ए' आदेश और 'ओ' आदेश से परे 'उं' के स्थान पर विकल्प से 'सुं' होता है। जैसे: नेसुं, नयिंसु; अस्सोसुं, अस्सुं। 'त्त' का ग्रहण आदेशत्व को बताने के लिए है। ๔๑. หูโต เรสุํ. ४१. 'हू' (धातु) से परे ('उं' के स्थान पर) 'रेसुं' होता है। หูโต ปรสฺส อุมิจฺจสฺส เรสุํ วา โหติ. อเหสุํ, อหวุํ. 'हू' से परे 'उं' के स्थान पर विकल्प से 'रेसुं' होता है। जैसे: अहेसुं, अहवुं। ๔๒. โอสฺส อ อิ ตฺถ ตฺโถ. ४२. 'ओ' के स्थान पर 'अ', 'इ', 'त्थ', 'त्थो' होते हैं। โอสฺส ออาทโย วา โหนฺติ. ตฺวํ อภว, อภวิ, อภวิตฺถ, อภวิตฺโถ อภโว. 'ओ' के स्थान पर विकल्प से 'अ' आदि होते हैं। जैसे: त्वं अभव, अभवि, अभवित्थ, अभवित्थो, अभवो। ๔๓. สิ. ४३. 'ओ' के स्थान पर 'सि' होता है। โอสฺส สิ วา โหติ. อโหสิ ตฺวํ อหุโว. 'ओ' के स्थान पर विकल्प से 'सि' होता है। जैसे: अहोसि, त्वं अहुवो। ๔๔. ทีฆา อีสฺส. ४४. दीर्घ से परे 'ई' का (ह्रस्व) होता है। ทีฆโต ปรสฺส อีสฺส สิ วา โหติ. อกาสิ อกา, อทาสิ อทา. दीर्घ स्वर के बाद 'ई' के स्थान पर विकल्प से 'सि' होता है। जैसे— अकासि, अका; अदासि, अदा। ๔๕. มฺหาตฺถานมุญ. ४५. 'म्हा' और 'त्थ' के स्थान पर 'म्ह' होता है। มฺหาตฺถานมฺหญ [Pg.222] วา โหติ. อคมฺหมฺหา อคมิมฺหา, อคมุตฺถ อคมิตฺถ. 'म्हा' और 'त्थ' के स्थान पर विकल्प से 'म्ह' होता है। जैसे— अगम्ह, अगमिम्हा; अगमुत्थ, अगमित्थ। ๔๖. อึสฺส จ สิญ. ४६. 'इं' के स्थान पर 'सि' होता है। อิมิจฺจสฺส สิญ วา โตติ มฺหาตฺถานญฺจ พหุลํ. อกาสึ อกรึ, อกาสิมฺหา อกริมฺหา อกาสิตฺถ อกริตฺถ. 'इं' के स्थान पर विकल्प से 'सि' होता है और 'म्हा' तथा 'त्थ' के स्थान पर बहुलता से (म्ह) होता है। जैसे— अकासिं, अकरिं; अकासिम्हा, अकरिम्हा; अकासित्थ, अकरित्थ। ๔๗. เอยฺยุํสฺสุํ. ४७. 'एय्युं' के स्थान पर 'स्सुं' होता है। เอยฺยุมิจฺจสฺส ญํ วา โหติ. คจฺฉุํ คจฺเฉยฺยุํ. 'एय्युं' के स्थान पर विकल्प से 'उं' होता है। जैसे— गच्छुं, गच्छेय्युं। ๔๘. หิสฺส-โต โลโป. ४८. 'अ' के बाद 'हि' का लोप होता है। อโต ปรสฺส หิสฺส โลโป วา โหติ. คจฺฉ คจฺฉาหิ, อโตติ กึ? กโรหิ. 'अ' के बाद 'हि' का विकल्प से लोप होता है। जैसे— गच्छ, गच्छाहि। 'अ' से क्यों? करोहि। ๔๙. กฺยสฺส สฺเส. ४९. 'स्से' के परे होने पर 'क्य' का लोप होता है। กฺยสฺส วา โลโป โหติ สฺเส. อนฺวภวิสฺสา อนฺวภูยิสฺสา, อนุภวิสฺสติ อนุฉูยิสฺสติ. 'स्से' के परे होने पर 'क्य' का विकल्प से लोप होता है। जैसे— अन्वभविस्सा, अन्वभूयिस्सा; अनुभवस्सति, अनुभूयिस्सति। ๕๐. อตฺถิเตยฺยาทิจฺฉนฺนํ ส สุ ส สถ สํ สาม. ५०. 'अत्थि' (अस् धातु) से परे 'एय्या' आदि छह प्रत्ययों के स्थान पर क्रमशः 'स, सु, स, सथ, सं, साम' होते हैं। อส=ภุวิจฺจสฺมา ปเรสํ เอยฺยาทิจฺฉนฺนํ สาทโย โหนฺติ ยถากฺกมํ. อสฺส, อสฺสุ, อสฺส, อสฺสถ, อสฺสํ, อสฺสาม. 'अस्' (होना) धातु से परे 'एय्या' आदि के स्थान पर क्रमशः 'स' आदि होते हैं। जैसे— अस्स, अस्सु, अस्स, अस्सथ, अस्सं, अस्साम। ๕๑. อาทิทฺวินฺนมิยาอิยุํ. ५१. (अत्थि से परे) आदि के दो प्रत्ययों के स्थान पर क्रमशः 'इया' और 'इयुं' होते हैं। อตฺถิเตยฺยาทิจฺฉนฺนํ อาทิภูตานํ ทฺวินฺนํ อิยา อิยุํ โหนฺติ ยถากฺกมํ. สิยา, สิยุํ. 'अत्थि' से परे 'एय्या' आदि के आदिभूत दो प्रत्ययों के स्थान पर क्रमशः 'इया' और 'इयुं' होते हैं। जैसे— सिया, सियुं। ๕๒. ตสฺส โถ. ५२. 'अत्थि' से परे 'त' के स्थान पर 'थो' होता है। อตฺถิโต [Pg.223] ปรสฺส ตการสฺส โถ โหติ. อตฺถิ, อตฺถุ. 'अत्थि' से परे 'त' कार के स्थान पर 'थो' होता है। जैसे— अत्थि, अत्थु। ๕๓. สิหิสฺวฏ. ५३. सि और हि प्रत्ययों के परे होने पर 'अस्' धातु को 'अट' आदेश होता है। อตฺถิสฺส อฏ โหติ สิหิสุ, โฏ สพฺพาเทสตฺโถ. อสิ อหิ. 'सि' और 'हि' प्रत्ययों के परे होने पर 'अस्' धातु के स्थान पर 'अट' आदेश होता है, 'ट' सम्पूर्ण आदेश के लिए है। उदाहरण: असि, अहि। ๕๔. มิมานํ วา มฺหิมฺหา จ. ५४. मि और म प्रत्ययों के स्थान पर विकल्प से 'म्हि' और 'म्हा' आदेश होते हैं। อตฺถิสฺมา ปเรสํ มิมานํ มฺหิมฺหา วา โหนฺติ, ตํสนฺนิโยเคนอตฺถิสฺส อฏ จ. อมฺหิ อสฺมิ, อมฺห อสฺม. 'अस्' धातु से परे 'मि' और 'म' प्रत्ययों के स्थान पर विकल्प से 'म्हि' और 'म्हा' आदेश होते हैं, और उस विधान से 'अस्' के स्थान पर 'अट' भी होता है। उदाहरण: अम्हि, अस्मि, अम्ह, अस्म। ๕๕. เอสุ สิ. ५५. इन (मि और म) प्रत्ययों के परे होने पर 'अस्' धातु का 'स' कार बना रहता है। เอสุ มิเมสุ อตฺถิสฺส สกาโร โหติ. อสฺมิ อสฺม, ปรรูปพาธนตฺถํ. इन 'मि' और 'म' प्रत्ययों के परे होने पर 'अस्' धातु का 'स' कार बना रहता है। उदाहरण: अस्मि, अस्म; यह पररूप के बाधन के लिए है। ๕๖. อีอาโท ทีโฆ. ५६. ई आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'अस्' धातु का स्वर दीर्घ होता है। อตฺถิสฺส ทีโฆ โหติ อีอาทิมฺหิ. อาสิ, อาสุํ, อาสิ, อาสิตฺถ, อาสึ, อาสึ มฺหา. 'अस्' धातु का 'ई' आदि प्रत्ययों के परे होने पर दीर्घ होता है। उदाहरण: आसि, आसुं, आसि, आसित्थ, आसिं, आसिं म्हा। ๕๗. หิมิเมสฺวสฺส. ५७. हि, मि और म प्रत्ययों के परे होने पर अ-कार दीर्घ होता है। อการสฺส ทีโฆ โหติ หิมิเมสุ. ปจาหิ, ปจามิ, ปจาม, มุยฺหามิ. अ-कार का 'हि', 'मि' और 'म' प्रत्ययों के परे होने पर दीर्घ होता है। उदाहरण: पचाही, पचामि, पचाम, मुय्हामि। ๕๘. สกา ณาสฺส ข อีอาโท. ५८. सक् धातु से परे 'णा' प्रत्यय को 'ई' आदि के परे होने पर 'ख' आदेश होता है। สกสฺมา กฺณาสฺสโขโหติ อีอาทีสุ. อสกฺขิ, อสกฺขึสุ. 'सक्' धातु से परे 'क्णा' के स्थान पर 'ई' आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'ख' आदेश होता है। उदाहरण: असक्खि, असक्खिंसु। ๕๙. สฺเส วา. ५९. स्से प्रत्यय के परे होने पर विकल्प से ('ख' आदेश) होता है। สกสฺมา [Pg.224] กฺณสฺสโข วา โหติ สฺเส. สกฺขิสฺสา สกฺกุณิสฺสา, สกฺขิสฺสติ, สกฺกุณิสฺสติ. 'सक्' धातु से परे 'क्णा' के स्थान पर 'स्से' के परे होने पर विकल्प से 'ख' आदेश होता है। उदाहरण: सक्खिस्सा, सक्कुणिस्सा, सक्खिस्सति, सक्कुणिस्सति। ๖๐. เตสุ สุโต กฺโณกฺณานํ โรฏ. ६०. उन (ई आदि) प्रत्ययों के परे होने पर 'सु' धातु से परे 'क्णो' और 'क्णा' को 'रो' आदेश होता है। เตสุ อีอาทิสฺเสสุ สุโต ปเรสํ กฺโณกฺณานํ โรฏ วา โหติ. อสฺโสสิ อสุณิ, อสฺโสสฺสา อสุณิสฺสา, โสสฺสติ สุณิสฺสติ. उन 'ई' आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'सु' धातु से परे 'क्णो' और 'क्णा' प्रत्ययों के स्थान पर विकल्प से 'रो' आदेश होता है। उदाहरण: अस्सोसि, असुणि, अस्सोस्सा, असुणिस्सा, सोस्सति, सुणिस्सति। ๖๑. ญาสฺส สนาสฺส นาโย ติมฺหิ. สนาสฺส ญาสฺส นาโย วา โหติ ติมฺหิ. นายติ, ชานาติ. ६१. ति प्रत्यय के परे होने पर 'सना' सहित 'ञा' धातु को 'नाय' आदेश होता है। उदाहरण: नायति, जानाति। ๖๒. ญามฺหิ ชํ. ६२. ञा आदेश होने पर 'सना' सहित 'ञा' धातु को 'जं' आदेश होता है। ญาเทเส สนาสฺส ญาสฺส ชํ (วา) โหติ. ชญฺญา (ชาเนยฺย). 'ञा' आदेश होने पर 'सना' सहित 'ञा' धातु के स्थान पर 'जं' आदेश (विकल्प से) होता है। उदाहरण: जञ्ञा (जानेय्य)। ๖๓. เอยฺยาสฺสิยาญา วา. ६३. एय्या प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'इयञ्ञा' आदेश होते हैं। ญาโต เอยฺยาสฺส อิยาญา โหนฺติ วา. ชานิยา, ชญฺญา ชาเนยฺย. 'ञा' धातु से परे 'एय्या' प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'इयञ्ञा' आदेश होते हैं। उदाहरण: जानिया, जञ्ञा, जानेय्य। ๖๔. อีสฺสตฺยาทีสุ กฺนาโลโป. ६४. ई और स्सति आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'क्ना' का लोप होता है। อีอาโท สฺสตฺยาโท จ ญาโต กฺนาโลโป วา โหติ. อญฺญาสิ อชานิ, ญสฺสติ ชานิสฺสติ. 'ई' आदि और 'स्सति' आदि प्रत्ययों के परे होने पर 'ञा' धातु से परे 'क्ना' प्रत्यय का विकल्प से लोप होता है। उदाहरण: अञ्ञासि, अजानि, ञस्सति, जानिस्सति। ๖๕. สฺสสฺส หิ กมฺเม. ६५. कर्मवाच्य में 'स्स' के स्थान पर 'हि' आदेश होता है। ญาโต ปรสฺส สฺสสฺส หิ วา โหติ กมฺเม. ปญฺญายิหิติ ปญฺญายิสฺสติ. कर्मवाच्य में 'ञा' धातु से परे 'स्स' के स्थान पर विकल्प से 'हि' आदेश होता है। उदाहरण: पञ्ञायिहिति, पञ्ञायिस्सति। ๖๖. เอติสฺมา. ६६. एति (इ) धातु से परे 'स्स' के स्थान पर 'हि' आदेश होता है। เอติสฺมา [Pg.225] ปรสฺส สฺสสฺส หิ โหติ วา. เอหิติ เอสฺสติ. 'इ' (ए) धातु से परे 'स्स' के स्थान पर विकल्प से 'हि' आदेश होता है। उदाहरण: एहिति, एस्सति। ๖๗. หนา ฉขา. ६७. हन् धातु से परे 'स्स' को 'छ' और 'ख' आदेश होते हैं। หนา สฺสสฺส ฉขา วา โหนฺติ. หญฺฉามิ หนิสฺสามิ, ปฏิหงฺขามิ ปฏิหนิสฺสามิ. 'हन्' धातु से परे 'स्स' के स्थान पर विकल्प से 'छ' और 'ख' आदेश होते हैं। उदाहरण: हञ्छामि, हनिस्सामि, पटिहङ्खामि, पटिहनिस्सामि। ๖๘. หาโต ห. ६८. हा धातु को 'ह' आदेश होता है। หาโต ปรสฺส สฺสสฺส ห โหติ วา. หาหติ ชหิสฺสติ. हा (hā) धातु से परे 'स्स' (ss) प्रत्यय को विकल्प से 'ह' (ha) होता है। उदाहरण: हाहाति (hāhati), जहिस्सति (jahissati)। ๖๙. ทกฺข ข เหหิ โหหีหิ โลโป. ६९. दक्ख (dakkha), ख (kha), हेहि (hehi) और होही (hohī) से परे (प्रत्यय का) लोप होता है। ทกฺขาทีหิ อาเทเสหิ ปรสฺส สฺสสฺส โลโป วา โหติ. ทกฺขติ ทกฺขิสฺสติ, สกฺขติ สกฺขิสฺสติ, เหหิติ เหหิสฺสติโหหิติ โหหิสฺสติ. दक्ख आदि आदेशों से परे 'स्स' (ss) का विकल्प से लोप होता है। उदाहरण: दक्खति (dakkhati) - दक्खिस्सति (dakkhissati), सक्खति (sakkhati) - सक्खिस्सति (sakkhissati), हेहिति (hehiti) - हेहिस्सति (hehissati), होहिति (hohiti) - होहिस्सति (hohissati)। ๗๐. กยิเรยฺยสฺเสยฺยุมาทีนํ. ७०. कयिर (kayira) से परे एय्युं (eyyuṃ) आदि के स्थान पर। กยิรา ปรสฺส เอยฺยุมาทีนํ เอยฺยสฺส โลโป โหติ. กยิรุํ, กยิราสิ, กยิราถ, กหิรามิ, กยิราม. कयिरा (kayirā) से परे एय्युं (eyyuṃ) आदि के 'एय्य' (eyya) का लोप होता है। उदाहरण: कयिरुं (kayiruṃ), कयिरासि (kayirāsi), कयिराथ (kayirātha), कयिरामि (kayirāmi), कयिरामा (kayirāma)। ๗๑. ฏา. ७१. टा (ṭā) आदेश होता है। กยิรา ปรสฺส เอยฺยสฺส ฏา โหติ. โส กยิรา. कयिरा (kayirā) से परे 'एय्य' (eyya) को 'टा' (ṭā) होता है। वह 'कयिरा' (kayirā) है। ๗๒. เอถสฺสา. ७२. एथ (etha) के स्थान पर 'आ' (ā) होता है। กยิรา ปรสฺส เอถสฺส อา โหติ. กยิราถ. कयिरा (kayirā) से परे 'एथ' (etha) को 'आ' (ā) होता है। उदाहरण: कयिराथ (kayirātha)। ๗๓. ลภา อึ อีนํ ถํ ถา วา. ७३. लभ (labha) धातु से परे 'इं' (iṃ) और 'ई' (ī) को विकल्प से 'थं' (thaṃ) और 'था' (thā) होते हैं। ลภสฺมา [Pg.226] อึอีอิจฺเจสํ ถํถา โหนฺติ วา. อลตฺถํ อลภึ, อลตฺถ อลภิ. लभ धातु से परे 'इं' और 'ई' इन प्रत्ययों को विकल्प से 'थं' और 'था' होते हैं। उदाहरण: अलत्थं (alatthaṃ) - अलभिं (alabhiṃ), अलत्थ (alattha) - अलभि (alabhi)। ๗๔. คุรุปุพฺพา รสฺสา เร นฺเตนฺตีนํ. ७४. गुरु-वर्ण पूर्व में हो ऐसे ह्रस्व (अकार) से परे 'न्ते' (nte) और 'न्ति' (nti) को विकल्प से 'रे' (re) होता है। คุรุปุพฺพสฺมา รสฺสา ปเรสํ นฺเตนฺตีนํ เร วา โหติ. คจฺฉเร คจฺฉนฺติ, คจฺฉเร คจฺฉนฺเต, คมิสฺสเร คมิสฺสนฺติ, คมิสฺสเร คมิสฺสนฺเต, คุรุปุพฺพาติ กึ? ปจ, รสฺสติ กึ? โหนฺติ. गुरु-वर्ण पूर्व में हो ऐसे ह्रस्व से परे 'न्ते' और 'न्ति' को विकल्प से 'रे' होता है। उदाहरण: गच्छरे (gacchare) - गच्छन्ति (gacchanti), गच्छरे (gacchare) - गच्छन्ते (gacchante), गमिस्सरे (gamissare) - गमिस्सन्ति (gamissanti), गमिस्सरे (gamissare) - गमिस्सन्ते (gamissante)। 'गुरुपुब्ब' (गुरु-पूर्व) क्यों? पच (paca)। 'रस्स' (ह्रस्व) क्यों? होन्ति (honti)। ๗๕. เอยฺเยยฺยาเสยฺยนฺนํ เฏ. ७५. एय्ये (eyye), एय्यासि (eyyāsi) और एय्यं (eyyaṃ) के स्थान पर 'टे' (ṭe) होता है। เอยฺยาทีนํ เฏ วา โหติ. โส กเร กเรยฺย, ตฺวํ กเร กเรยฺยาสิ, อหํ กเร กเรยฺยํ. एय्य आदि के स्थान पर विकल्प से 'टे' (ṭe) होता है। उदाहरण: सो करे (so kare) - करेय्य (kareyya), त्वं करे (tvaṃ kare) - करेय्यासि (kareyyāsi), अहं करे (ahaṃ kare) - करेय्यं (kareyyaṃ)। ๗๖. โอวิกรณสฺสุ ปรจฺฉกฺเก. ७६. परच्छक्क (परस्मैपद के प्रथम छह प्रत्ययों) के परे रहते 'ओ' विकरण के स्थान पर 'उ' होता है। โอวิกรณสฺส อุ โหติ ปรจฺฉกฺเก วิสเย. ตนุเต. परच्छक्क के विषय में 'ओ' विकरण के स्थान पर 'उ' होता है। उदाहरण: तनुते (tanute)। ๗๗. ปุพฺพจฺฉกฺเก วา กฺวจิ. ७७. पुब्बच्छक्क (आत्मनेपद के प्रथम छह प्रत्ययों) के परे रहते कहीं-कहीं विकल्प से (उ) होता है। โอวิกรณสฺส อุ โหติ วา กฺวจิ ปุพฺพจฺฉกฺเก. วนุติ วโนติ. पुब्बच्छक्क के परे रहते 'ओ' विकरण के स्थान पर कहीं-कहीं विकल्प से 'उ' होता है। उदाहरण: वनुति (vanuti) - वनोति (vanoti)। ๗๘. เอยฺยามสฺเสมุ จ. ७८. एय्याम (eyyāma) के स्थान पर 'एमु' (emu) और 'उ' (u) भी होता है। เอยฺยามสฺเสมุ วา โหติ อุ จ. ภเวมฺห, ภเวยฺยามุ ภเวยฺยาม. एय्याम के स्थान पर विकल्प से 'एमु' और 'उ' भी होता है। उदाहरण: भवेम्ह (bhavemha), भवेय्यामु (bhaveyyāmu), भवेय्याम (bhaveyyāma)। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ วุตฺติยํ इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में। ตฺยาทิกณฺโฑ ฉฏฺโฐ. त्यादि काण्ड छठा है। ๗. สตฺตโม กณฺโฑ (ณฺวาทิ) ७. सातवाँ काण्ड (ण्वादि)। ‘‘พหุลํ’’ [Pg.227] (๑.๕๘) ‘‘กฺริยตฺถา’’ติ (๕.๑๔) จ สพฺพตฺถ วตฺถเต. "बहुलं" (१.५८) और "क्रियत्था" (५.१४) ये पद सर्वत्र अनुवृत्त होते हैं। ๑. จร ทร กร รห ชน สน ตล สาท สาธ กสาส จฏาย วาหิ ณุ. १. चर, दर, कर, रह, जन, सन, तल, साद, साध, कस, अस, चट, अय और वा धातुओं से 'णु' (ṇu) प्रत्यय होता है। จร-คติภกฺขเณสุ, ทร-ทรเณ, กร-กรเณ, รห-จาเค, ชน-ชนเน, สน-สมฺภตฺติยํ, ตล-ปติฏฺฐายํ, สาท-อสฺสาทเน, สาธ-สํสิทฺธิยํ, กส-วิเลขเน, อส-เขปเน, จฏ-เภทเน, อย-อิติ คมนตฺโถ ทณฺฑโก ธาตุ, วา-คติคนฺธเนสุ, เอเตหิ กฺริยตฺเถหิ พหุลํ ณุ โหติ. ‘‘อสฺสา ณานุพนฺเธ’’ติ (๕.๘๔) อุปนฺตสฺส อสฺส อา, จรติ หทเย มนุญฺญภาเวนาติ จารุ=โสภนํ. ทรียตีติ ทาร=กฏฺฐํ. กโรตีติ การุ=สิปฺปี, มฆ วา, วิสุกมฺโม จ. รหติ จนฺทาทีนํ โสภาวิเสสํ นาเสตีติ ราหุ=อสุรินฺโท. ชายติ คมนาคมนํ อเนนาติชานุ=ชงฺโฆรูนํ สนฺธิ. สเนติ อตฺตนิ ภตฺตึ อุปฺปาเทตีติ สานุ=คิริปฺปเทโส. ตลนฺติ ปติฏฺฐหนฺติ เอตฺถ ทนฺตาติ ตาลุ=วทเนกเทโส. สา ทียติ อสฺสาทียตีติ สาทุ=มธุรํ. สาเธติ อตฺตปรหิตนฺติ สาธุ=สชฺชโน. กสียตีติ กาสุ=อาวาโฏ, อสติ สีฆภาเวน ปวตฺตตีติ อาสุ=สีฆํ. จฏติ ภินฺทติ อมนุญฺญภาวนฺติ จาฏุ=มนุญฺโญ. อยนฺติ ปวตฺตนฺติ สตฺตา เอเตนาติ อายุ=ชีวิตํ. ‘‘อสฺสา ณาปิมฺหิ ยุก’’ อิติ (๕.๙๑) ยุก- วาติ คจฺฉตีติ วายุ-วาโต. चर (गति और भक्षण में), दर (विदारण में), कर (करण में), रह (त्याग में), जन (उत्पत्ति में), सन (संभक्ति में), तल (प्रतिष्ठा में), साद (आस्वादन में), साध (सिद्धि में), कस (लेखन में), अस (क्षेपण में), चट (भेदन में), अय (गमन अर्थ वाली दण्डक धातु), वा (गति और गन्धन में) - इन क्रियार्थक धातुओं से बहुलता से 'णु' प्रत्यय होता है। "अस्सा णानुबन्धे" (५.८४) सूत्र से उपधा 'अ' को 'आ' होता है। जो हृदय में मनोज्ञ भाव से विचरण करता है, वह 'चारु' (सुन्दर) है। जो विदीर्ण किया जाता है, वह 'दारु' (लकड़ी) है। जो कार्य करता है, वह 'कारु' (शिल्पी, मघ या विश्वकर्मा) है। जो चन्द्रमा आदि की शोभा विशेष को नष्ट करता है, वह 'राहु' (असुरेन्द्र) है। जिससे गमनागमन उत्पन्न होता है, वह 'जानु' (घुटना) है। जो अपने में भक्ति उत्पन्न करता है, वह 'सानु' (पर्वत प्रदेश) है। जहाँ दाँत प्रतिष्ठित होते हैं, वह 'तालु' (मुख का भाग) है। जिसका आस्वादन किया जाता है, वह 'सादु' (मधुर) है। जो अपना और पराया हित सिद्ध करता है, वह 'साधु' (सज्जन) है। जो खोदा जाता है, वह 'कासु' (गड्ढा) है। जो शीघ्रता से प्रवृत्त होता है, वह 'आसु' (शीघ्र) है। जो अमनोज्ञ भाव को नष्ट करता है, वह 'चाटु' (मनोज्ञ) है। जिससे प्राणी प्रवृत्त होते हैं, वह 'आयु' (जीवन) है। "अस्सा णापिमहि युक" (५.९१) सूत्र से 'युक' आगम होने पर - जो गमन करता है, वह 'वायु' (हवा) है। ๒. ภร [Pg.228] มร จร ตร อร คร หน ตน มน ภม กิต ธน พํห กมฺพมฺพ จกฺข ภิกฺข สํกินฺทนฺท ยช ปฏาณาส วส ปส ปํส พนฺธา อุ. २. भर, मर, चर, तर, अर, गर, हन, तन, मन, भम, कित, धन, बंह, कम्ब, अम्ब, चक्ख, भिक्ख, संकि, दन्द, यज, पट, अण, अस, वस, पस, पंस और बन्ध धातुओं से 'उ' (u) प्रत्यय होता है। ภร-ภรเณ, มร-ปาณจาเค, จร-คติภกฺขเณสุ, ตร ตรเณ, อร-คมเน, คร ฆร-เสจเน, คิราติ วา นิปาตนา อกาโร, หน-หึ สายํ, ตน-วิตฺตาเร, มน-ญาเณ, ภม-อนวฏฺฐาเน, กิต-นิวาเส, ธน-สทฺเท, พํห พฺรห พฺรูห-วุทฺธิยํ, กมฺพ-สํวรเณ, อมฺพ-สทฺเท, จกฺข อิกฺข ทสฺสเน, ภิกฺข-ยาจเน, สํกสงฺกายํ, อินฺท-ปรมิสฺสริเย, อนฺท-พนฺธเน, ยช-เทวปูชายํ, อฏ ปฏ-คมนถา, อณ-สทฺทตฺโถ, อส-เขปเน, วส-นิวาเส, ปสพาธเน, ปํส-นาสเน, พนฺธ-พนฺธเน, เอเตหิ กฺริยตฺเถหิ อุ โหติ. ภรตีติ ภร=ภตฺตา. มรติ รูปกาเยน สเหวาติ มรุ=เทโว, นิชฺชลเทโส จ. จรียติ ภกฺขียตีติ จรุ=หพฺยปา โก. ตรนฺติ อเนนาติ ตรุ=รุกฺโข. อรติ สูนภาเวน อุทฺธํ คจฺฉตีติ อรุ=วโณ. ครติ สิญฺจติ, คิรติ วมติ วา สิสฺเสสุ สิเนหนฺติ ครุ=อาจริโย. หนติ โอทนาทีสุ วณฺณวิเสสํ นาเสตีติ หนุ=วทเนกเทโส. ตโนติ สํสาร ทุกฺขนฺติ ตนุ-สรีรํ. มญฺญติ สตฺตานํ หิตาหิตนฺติ มนุ=ปชาปติ. ภมติ จลตีติ ภมุ=นยโน ปติฏฺฐานํ. เกตติ อุทฺธํ คจฺฉติ, อุปริ นิวสตีติ วา เกตุ=ธโช. ธนติ สทฺทํ กโรตีติ ธนุ=จาโป. พํห อิติ นิทฺเทสา อุมฺหิ นิจฺจํ นิคฺคหีตโลโป, พํหติ วุทฺธึ คจฺฉตีติ พหุ=อนปฺปกํ. กมฺพติ สํวรํ กโรตีถิ กมฺพุ=วลโย, สงฺโข [Pg.229] จ. อมฺพติ นาทํกโรตีติ อมฺพุ=วาริ. จกฺขติ รูปนฺติ จกฺขุ=นยนํ. ภิกฺขตีติ ภิกฺขุ=สมโณ. สํกิรตีติ สํกุ=สูลํ. อินฺทติ นกฺขตฺตานํ ปรมิสฺสริยํ ปวตฺเตตีติ อินฺทุ=จนฺโท. อนฺทนฺติ พนฺธนฺติ สตฺตา เอตายาติ อนฺทุ=สงฺขลิกา. ยชนฺติ อเนนาติ ยชุ=เวโท. ปฏติ พฺยตฺตภาวํ คจฺฉตีติ ปฏุ=วิจกฺขโณ. อณติ สุขุมภาเวน ปวตฺตตีติ อณุ=สุขุโม, วีหิเภโท จ. อสนฺติ ปวตฺตนฺติ สตฺตา เอเตหีติ อสโว=ปาณา. สุขํ วสนฺตฺยเนนาติ วสุ=ธนํ. ปสียติ พาธียติ สามิเกหีติ ปสุ. จตุปฺปโท. ปํสติ โสภาวิเสสํ นาเสตีติ ปํสุ=เรณุ. พนฺธียติ สิเนหภาเวนาติ พนฺธุ=ญาติ. 'भर' (भरण में), 'मर' (प्राण त्याग में), 'चर' (गति और भक्षण में), 'तर' (तरने में), 'अर' (गमन में), 'गर' (सींचने में), 'गिर' (निपातन से 'अ' कार), 'हन' (हिंसा में), 'तन' (विस्तार में), 'मन' (ज्ञान में), 'भम' (अस्थिरता में), 'कित' (निवास में), 'धन' (शब्द में), 'बंह, ब्रह, ब्रूह' (वृद्धि में), 'कम्ब' (संवरण में), 'अम्ब' (शब्द में), 'चक्ख, इक्ख' (दर्शन में), 'भिक्ख' (याचना में), 'संक' (शंका में), 'इन्द' (परम ऐश्वर्य में), 'अन्द' (बन्धन में), 'यज' (देवपूजा में), 'अट, पट' (गमन अर्थ में), 'अण' (शब्द अर्थ में), 'अस' (फेंकने में), 'वस' (निवास में), 'पस' (बाधा पहुँचाने में), 'पंस' (नाश करने में), 'बन्ध' (बन्धन में) - इन क्रियार्थक धातुओं से 'उ' प्रत्यय होता है। जो भरण करता है वह 'भर' (भर्ता) है। जो रूपकाय के साथ मरता है वह 'मरु' (देवता या निर्जल देश) है। जिसका भक्षण किया जाता है वह 'चरु' (हव्य पाक) है। जिससे तरते हैं वह 'तरु' (वृक्ष) है। जो शून्य भाव से ऊपर जाता है वह 'अरु' (घाव) है। जो सींचता है या शिष्यों पर स्नेह करता है वह 'गरु' (गुरु/आचार्य) है। जो भोजन आदि में वर्ण विशेष का नाश करता है वह 'हनु' (ठोड़ी) है। जो संसार के दुःख को फैलाता है वह 'तनु' (शरीर) है। जो प्राणियों के हित-अहित को जानता है वह 'मनु' (प्रजापति) है। जो घूमता है वह 'भमु' (भ्रूं/नेत्र) है। जो ऊपर जाता है या ऊपर निवास करता है वह 'केतु' (ध्वज) है। जो शब्द करता है वह 'धनु' (धनुष) है। 'बंह' निर्देश से 'उ' प्रत्यय होने पर निग्गहीत का नित्य लोप होता है, जो वृद्धि को प्राप्त होता है वह 'बहु' (अनेक) है। जो संवरण करता है वह 'कम्बु' (कंगन या शंख) है। जो शब्द करता है वह 'अम्बु' (जल) है। जो रूप को देखता है वह 'चक्खु' (नेत्र) है। जो भिक्षा माँगता है वह 'भिक्खु' (श्रमण) है। जो संकीर्ण करता है वह 'संकु' (शूल) है। जो नक्षत्रों पर परम ऐश्वर्य रखता है वह 'इन्दु' (चन्द्रमा) है। जिससे प्राणियों को बाँधा जाता है वह 'अन्दु' (साँकल) है। जिससे यज्ञ करते हैं वह 'यजु' (वेद) है। जो स्पष्टता को प्राप्त होता है वह 'पटु' (चतुर) है। जो सूक्ष्म भाव से प्रवृत्त होता है वह 'अणु' (सूक्ष्म या धान का भेद) है। जिससे प्राणी प्रवृत्त होते हैं वे 'असवो' (प्राण) हैं। जिससे सुखपूर्वक निवास करते हैं वह 'वसु' (धन) है। जो स्वामियों द्वारा बाँधा या बाधित किया जाता है वह 'पसु' (पशु/चौपाया) है। जो शोभा विशेष का नाश करता है वह 'पंसु' (धूल) है। जो स्नेह भाव से बाँधा जाता है वह 'बन्धु' (सम्बन्धी) है। ๓. พนฺธา อู วโธ จ. ३. 'बन्ध' धातु से 'ऊ' प्रत्यय होता है और 'वध' आदेश होता है। พนฺธ-พนฺธเน ติมสฺมา อู โหติ, พนฺธสฺส วธาเทโส จ. ปญฺจหิ กามคุเณหิ อตฺตนิ สตฺเถ พนฺธตีติ วธู-สุณิสา, อิตฺถีจ. 'बन्ध' (बन्धन में) धातु से 'ऊ' प्रत्यय होता है और 'बन्ध' के स्थान पर 'वध' आदेश होता है। जो पाँच कामगुणों से अपने आप को शस्त्र में बाँधती है वह 'वधू' (पुत्रवधू या स्त्री) है। ๔. ชมฺพาทโย. ४. जम्बू आदि शब्द। ชมฺพูอาทโย สทฺทาอูปจฺจยนฺตา นิปจฺจนฺเต, นิปาตนํ อปฺปตฺตสฺส ปาปนํ ปตฺตสฺส ปฏิเสโธ จ. ชนิสฺมา อู, พุกาคโม, ‘‘มนานํ นิคฺคหีต’’นฺติ (๕.๙๖) นสฺส นิคฺคหีตํ, ‘‘วคฺเค วคฺคนฺโต’’ติ (๑.๔๑) นิคฺคหีตสฺส โม, ชายติ, ชนียตี วา ชมฺพู=รุกฺโข. ภมิสฺส อมโลโป, ภมติ กมฺปตีติ ภู=ภมุ. กโรติสฺมา อู, ตสฺส กนฺธุญ จ, ‘‘ปรรูปมยกาเร พฺยญฺชเน’’ติ (๕.๙๕) ธาตฺวนฺตสฺส พฺยญฺชนสฺส ปรรูปตฺตํ, รุธิรุปฺปาทํ กโรตีติ กกฺกนฺธู=พทรี. ลมฺพ-อวสํสเน[Pg.230], อาปุพฺโพ, สํโยคาทิโลปทีฆรสฺสา, อาลมฺพติ อวสํสตีติ อลาพู=ตุมฺพิ. สร-คติ หึสาจินฺตาสุ, อูมฺหิ อภุก อพุก จ, สรติ คจฺฉตีติ สรภู=เอกา มหานที. สรติ ปาเณ หึสตีติ สรพู=ขุทฺทชนฺตุกวิเสโส. จมอทเน, จมติ ภกฺขติ นิวาปนฺติ จมู=เสนา. ตน-วิตฺถาเร, ตโนติ สํสารทุกฺขนฺติ ตนุ=สรีรํ, เอวมญฺเญปิ ปโยคโต ทฏฺฐพฺพา. जम्बू आदि शब्द 'ऊ' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं; निपातन का अर्थ अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त का प्रतिषेध है। 'जन' धातु से 'ऊ' प्रत्यय, 'बुक' आगम, 'मन' के निग्गहीत का लोप और 'वग्गे वग्गन्तो' से निग्गहीत को 'म' होकर 'जम्बू' (वृक्ष) बनता है। 'भम' के 'अम' का लोप होकर 'भू' (भ्रूं) बनता है। 'कर' धातु से 'ऊ' प्रत्यय और 'कन्धु' आदेश होकर 'कक्कन्धू' (बेर) बनता है। 'लम्ब' (नीचे लटकने में) धातु से 'आ' उपसर्ग पूर्वक 'अलाबू' (लौकी) बनता है। 'सर' (गति, हिंसा, चिन्ता में) धातु से 'ऊ' प्रत्यय और 'अभुक/अबुक' आगम होकर 'सरभू' (एक महानदी) और 'सरब' (एक छोटा जीव) बनता है। 'चम' (भक्षण में) धातु से 'चमू' (सेना) बनता है। 'तन' (विस्तार में) धातु से 'तनु' (शरीर) बनता है; इसी प्रकार अन्य प्रयोगों को भी समझना चाहिए। ๕. ตปุส วิ ธ กุร ปุถ มุทา กุ. ५. तप, उस, वि, धा, कुर, पुथ, मुदा धातुओं से 'कु' प्रत्यय होता है। ตป-สนฺตาเป, อุส-ทาเห, วิธ-เวธเน, กุร-สทฺเท, ปุถ ปถ-วิตฺถาเร, มุท-โตเส, เอเตหิ กุ, โหติ. กกาโรนุพนฺโธ ‘‘น เต กานุพนฺธนาคเมสู’’ติ (๕.๘๕) เอโอนมภาวตฺโถ. ตป อิติ นิทฺเทสโตว อสฺส อิตฺตํ, ตาปียตีติ ติปุ=โลหวิเสโส. อุสติ ทาหํ กโรตีติ อุสุ=สโร. เวธติ รํสีหิ ติมิรนฺติ วิธุ=จนฺโท. กุรติ กิจฺจากิจฺจํ วทตีติ กุรุ=ราชา, กุรโว=ชนปโท. ปุถติ มหนฺถภาเวน ปตฺถิรตีติ ปุถุ=วิตฺถิณฺโณ, โมทนํ, มุทียตีติ วา มุทุ=อถทฺโธ. 'तप' (संताप में), 'उस' (दाह में), 'विध' (वेधन में), 'कुर' (शब्द में), 'पुथ/पथ' (विस्तार में), 'मुद' (संतोष में) - इन धातुओं से 'कु' प्रत्यय होता है। 'क' कार अनुबन्ध 'न ते कानुबन्धनागमेसु' सूत्र से 'ए' और 'ओ' के अभाव के लिए है। 'तप' के निर्देश से ही इसके 'अ' को 'इ' होकर 'तिपु' (राँगा) बनता है। जो दाह करता है वह 'उसु' (बाण) है। जो किरणों से अन्धकार को बेधता है वह 'विधु' (चन्द्रमा) है। जो उचित-अनुचित कहता है वह 'कुरु' (राजा या जनपद) है। जो विशालता से फैलता है वह 'पुथु' (विस्तृत या मोदक) है। जो कोमल है वह 'मुदु' (अकठोर) है। ๖. สินฺธาทโย. ६. सिन्धु आदि शब्द। สินฺธุ อาทโย กุปจฺจยนฺตา นิปจฺจนฺเต. สนฺท-ปสฺสวเน, อสฺส อิตฺตํ, โธจานฺตา เทโส นิปาตนา, สนฺทติ ปสฺสวตีติ สินฺธุ=นทิ, วหิสุปนฺตสฺส ทีฆาทิพตฺเต, พาธิสฺส วานฺตหตฺเต จ, วหนฺตฺยเนนาติ พาหุ, พาธติ อุปทฺทเว วาเรตี ติ วา พาหุ=ภุโช. รํฆ-คมเน, นิคฺคหีตโลโป, รงฺฆติ ปวตฺตหิ ราชธมฺเมติ รฆุ=ราชา. วิท-ลาเภ, นการาคโม, วสฺส โพ, วินฺทตฺยเนน นนฺทนนฺติ พินฺทุ=กณิกา. มน-ญาเณ, นสฺส โธ, มญฺญติ ญายติ [Pg.231] มธุรนฺติ มธุ=มธุกรีหิ กตมธุ, รป ลป ชป ชปฺป-วจเน, อสฺสอิตฺตํ, รปติ ชปฺปติ มนฺตนฺตี ริปุ=ปจฺจามิตฺโต. สส-คติ หึ สาปาณเนสุ, อสฺส อุตฺตํ, สสติ ชีวตีติ สุสุ=ยุวา. อร คมเน, อสฺสอุตฺต มูตฺตญฺจ, อรติ มหนฺตภาวํ คจฺฉตีติ อุรุ=มหา, อรติเนนาติ อูรุ-สตฺถิ. ขณ-อวทารเณ, อา ปุพฺโพ อนโลโป, อาขนตีติ อาขุ=อุนฺทูโร. ตรตรเณ, ตสฺส โถ, ตรตีติ ถรุ=ขคฺคาวยโว. ลํฆ-คติ โสสเนสุ ฆสฺส วา หตฺตํ, นิคฺคหีตโลโป จ, ลงฺฆติ ปวตฺตติ ลฆุภาเวนาติ ลฆุ ลหู เอกตฺถา, (ภํช-โอมทฺทเน, ป-ปุพฺโพ, ชสฺส คตฺตํ, ปภญฺชติ วิเสเสนาติ ปภงฺคุ=ภงฺคุโร.) ฐา-คตินิวตฺติยํ, สุปุพฺโพ, ฐาติ ปวตฺตติ สุนฺทรภาเวนาติ สุฏฺฐุ=โสภนํ, ทุปุพฺโพ ฐาติ ปวตฺตติ อสุนฺทรภาเวนาติ ทุฏฺฐุ=อโสภนํ. เอวมญฺเญปิ วิญฺเญยฺยา. 'सिन्धु' आदि शब्द 'कु' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'सन्द-पस्सवने' (बहना) धातु से, 'अ' को 'इ' आदेश, 'ध' और 'च' का अन्त में निपातन होने पर, जो बहती है वह 'सिन्धु' = नदी है। 'वहि' धातु के उपधा को दीर्घ आदि होने पर, अथवा 'बाध' धातु के अन्त्य वर्ण को 'ह' होने पर, जिससे वहन करते हैं वह 'बाहु' है, अथवा जो उपद्रवों को रोकती है वह 'बाहु' = भुजा है। 'रंघ-गमने' (जाना) धातु से, निग्गहीत (अनुस्वार) का लोप होने पर, जो राजधर्म में प्रवृत्त होता है वह 'रघु' = राजा है। 'विद-लाभे' (प्राप्त करना) धातु से, 'न' कार का आगम और 'व' को 'ब' होने पर, जिससे आनन्द प्राप्त करते हैं वह 'बिन्दु' = कणिका है। 'मन-ञाणे' (जानना) धातु से, 'न' को 'ध' होने पर, जो मधुर जानी जाती है वह 'मधु' = मधुमक्खियों द्वारा बनाया गया शहद है। 'रप, लप, जप, जप्प-वचने' (बोलना) धातुओं से, 'अ' को 'इ' होने पर, जो मन्त्र जपता (षड्यंत्र करता) है वह 'रिपु' = शत्रु है। 'सस-गति हिंसापाणेसु' (गति, हिंसा, प्राणन) धातु से, 'अ' को 'उ' होने पर, जो जीता है वह 'सुसु' = युवा है। 'अर-गमने' (जाना) धातु से, 'अ' को 'उ' और 'म' को 'उ' होने पर, जो महानता को प्राप्त होता है वह 'उरु' = महान है, जिससे गमन करते हैं वह 'ऊरु' = जाँघ है। 'खण-अवदारणे' (खोदना) धातु से, 'आ' उपसर्ग पूर्वक 'न' का लोप न होने पर, जो खोदता है वह 'आखु' = चूहा है। 'तर-तरणे' (पार करना) धातु से, 'त' को 'थ' होने पर, 'थरु' = तलवार की मूठ है। 'लंघ-गति सोसनेसु' (जाना, सुखाना) धातु से, 'घ' को विकल्प से 'ह' और निग्गहीत का लोप होने पर, जो लघुता से प्रवृत्त होता है वह 'लघु' और 'लहू' एक ही अर्थ में हैं। ('भंज-ओमद्दने' (मर्दन करना) धातु से, 'प' उपसर्ग पूर्वक, 'ज' को 'ग' होने पर, जो विशेष रूप से टूटता है वह 'पभंगु' = भंगुर है।) 'ठा-गतिनिवत्तियं' (रुकना/स्थित होना) धातु से, 'सु' उपसर्ग पूर्वक, जो सुन्दर भाव से स्थित होता है वह 'सुट्ठु' = शोभन है, 'दु' उपसर्ग पूर्वक जो असुन्दर भाव से स्थित होता है वह 'दुट्ठु' = असोभन है। इसी प्रकार अन्य भी जानने चाहिए। ๗. อิ. ७. १. กฺริยตฺถา พหุลํ อิ โหติ, อภ-เขปเน, อสียติ ขิปียตีติ อสิ=ขคฺโค. กส-วิเลขเน, กสียเต กสิ=กสนํ. มส-อามสเน, มสียตีติ มสิ=เมฬา. กุ-สทฺเท โอ อวาเทสา, กวติ กเถภีติ กวิ=กพฺพกาโร. รุสทฺเท, รวติ คชฺชตีติ รวิ=อาทิจฺโจ. สปฺป-คมเน, สปฺปติ ปวตฺตตีติ สปฺปิ=ฆตํ. คนฺถ-คนฺถเน, ‘‘ต ถ น รานํ ฏ ฐ ณลา’’ติ (๑.๒๕) นถานํ ณฐา, คนฺเถตีติ คณฺฐิ=ปพฺโพ, คณฺฐิจ. ราช-ทิตฺติยํ, ราชติ ปวตฺตตีติ ราชิ=ปาฬิ. กล-สงฺขฺยาเน, กลียติ ปริมียตีติ กลิ=ปาปํ. พล-ปาณเน, พลนฺติ ชีวนฺติ [Pg.232] อเนนาติ พลิ=กโร. ธน-สทฺเท, ธนติ นทตีติ ธนิ=สทฺโท. อจฺจ อญฺจ-ปูชายํ, อจฺจียติ ปูชียตีติ อจฺจิ=ชาลา. วล วลฺล-สํวรเณ, วลนํ สํโกจนํ วลิ=อุทราทีสุ ปลิ, วลฺลียนฺติ สํวรียนฺติ สตฺตา เอตายาติ วลฺลิ=ลตา. วิมฺหิ วลี วลฺลีติปิ โหติ, โสเยวตฺโถ, เอวมญฺเญปิ. क्रियार्थक धातुओं से बहुलता से 'इ' प्रत्यय होता है। 'अभ-खेपने' (फेंकना) धातु से, जिससे फेंका जाता है वह 'असि' = खड्ग (तलवार) है। 'कस-विलेखने' (जोतना) धातु से, जो जोता जाता है वह 'कसि' = कृषि है। 'मस-आमसने' (स्पर्श करना) धातु से, जो स्पर्श किया जाता है वह 'मसि' = स्याही है। 'कु-सद्दे' (शब्द करना) धातु से, 'ओ' और 'अव' आदेश होने पर, जो काव्य कहता है वह 'कवि' = काव्यकार है। 'रु-सद्दे' (शब्द करना) धातु से, जो गरजता है वह 'रवि' = सूर्य है। 'सप्प-गमने' (सर्पण करना) धातु से, जो प्रवृत्त (बहता) होता है वह 'सप्पि' = घृत (घी) है। 'गन्थ-गन्थने' (बाँधना) धातु से, 'त थ न र' को 'ट ठ ण ल' होने के नियम से 'न' और 'थ' को 'ण' और 'ठ' होने पर, जो बाँधता है वह 'गण्ठि' = गाँठ है, और 'गण्ठि' भी। 'राज-दित्तियं' (चमकना) धातु से, जो प्रवृत्त होती है वह 'राजि' = पंक्ति है। 'कल-संख्याने' (गिनना) धातु से, जो मापा जाता है वह 'कलि' = पाप है। 'बल-पाणने' (प्राण धारण करना) धातु से, जिससे लोग जीवित रहते हैं वह 'बलि' = कर (टैक्स) है। 'धन-सद्दे' (शब्द करना) धातु से, जो शब्द करता है वह 'धनि' = शब्द है। 'अच्च, अञ्च-पूजायां' (पूजा करना) धातु से, जिसकी पूजा की जाती है वह 'अच्चि' = ज्वाला है। 'वल, वल्ल-संवरणे' (ढकना/सकुचित करना) धातु से, संकुचन होना 'वलि' = उदर आदि पर पड़ने वाली सिलवटें हैं, जिससे प्राणी बँधते हैं वह 'वल्लि' = लता है। विस्मय में 'वली' और 'वल्ली' भी होता है, वही अर्थ है, इसी प्रकार अन्य भी। ๘. ทฌาทโย. ८. दधि आदि। ทธิอาทโย สทฺทา อิปจฺจยนฺตา นิปจฺจนฺเต. ธา-ธารเณ, ทฺวิภาโว นิปาตนา, ฆตมาทธาตีติ ทธิ=โคร สวิเสโส. อํห-คมเน, นิคฺคหีตโลโป, อํหติ คจฺฉตีติ อหิ=สปฺโป. กมฺป จลเน, สํโยคาทิโลโป, กมฺปติ จลตีติ กปิ=วานโร. มน-ญาเณ, อสฺส อุตฺตํ, มนติ ชานาตีติ มุนิ=สมโณ. นสฺส ณตฺตํ, มนติ มหคฺฆภาวํ คจฺฉตีตี มณิ=รตนํ. อิกฺข จกฺข-ทสฺสเน, อิสฺส อตฺตํ อิกฺขติ อเนนาติ อกฺขิ=นยนํ. กมปวิกฺเขเป, อสฺส อิตฺตํ, กมติ ยาตีติ กิมิ=ขุทฺทชนฺตุกวิเสโส. ตร ตรเณ, ติตฺติราเทโส, ตุริโต ตรติ ยาตีติ ติตฺติริ=ปกฺขิวิเสโส. กีฬ-วิหาเร, อีสฺส เอตฺตํ, กีฬนํ เกฬิ=กีฬา. อุสิสฺมา อิสฺส ขลุญ, อุสติ ทหตี อุกฺขลิ=ภาชนํ, เอวมญฺเญปิ. 'दधि' आदि शब्द 'इ' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'धा-धारणे' (धारण करना) धातु से, द्वित्व निपातन होने पर, जो घी को धारण करता है वह 'दधि' = दही (एक विशेष गोरस) है। 'अंह-गमने' (जाना) धातु से, निग्गहीत का लोप होने पर, जो जाता है वह 'अहि' = सर्प है। 'कम्प-चलने' (काँपना) धातु से, संयोग के आदि का लोप होने पर, जो काँपता है वह 'कपि' = वानर है। 'मन-ञाणे' (जानना) धातु से, 'अ' को 'उ' होने पर, जो जानता है वह 'मुनि' = श्रमण है। 'न' को 'ण' होने पर, जो बहुमूल्यता को प्राप्त होता है वह 'मणि' = रत्न है। 'इक्ख, चक्ख-दस्सने' (देखना) धातु से, 'इ' को 'अ' होने पर, जिससे देखते हैं वह 'अक्खि' = नयन (आँख) है। 'कम-पविक्खेपे' (पैर रखना) धातु से, 'अ' को 'इ' होने पर, जो चलता है वह 'किमि' = एक छोटा जन्तु विशेष (कीड़ा) है। 'तर-तरणे' (पार करना) धातु से, 'तित्तिर' आदेश होने पर, जो शीघ्रता से पार करता है वह 'तित्तिरि' = एक पक्षी विशेष (तीतर) है। 'कीळ-विहारे' (खेलना) धातु से, 'ई' को 'ए' होने पर, खेलना 'केळि' = क्रीड़ा है। 'उस्' धातु से 'इ' प्रत्यय और 'खलुञ' आगम होने पर, जो जलाता है वह 'उक्खलि' = बर्तन (बटलोई) है, इसी प्रकार अन्य भी। ๙. ยุวณฺณุปนฺตา กิ. ९. इ-वर्ण और उ-वर्ण उपधा वाले धातुओं से 'कि' प्रत्यय। อิวณฺณุปนฺเตหิ จ อุวณฺณุปนฺเตหิ จ กฺริยตฺเถหิ พหุลํ กิ โหติ. กกาโร-นุพนฺโธ, อิส สิส-อิจฺฉายํ, สิวํ อิจฺฉตีติ อิสิ=ตปสฺสี. คิร-นิคิรเณ, คิรติ ปสวติ ฉวิมํสสารภูตํ เภสชฺชาทินฺติ คิริ=เสโล. สุจ-โสจเน. โสจนํ [Pg.233] สุจิ=โสเจยฺยํ, รุจ-อภิลาเส รุจนฺติ เอตายาติ รุจิ=อาภิลาโส, เอวมญฺเญปิ. इ-वर्ण उपधा वाले और उ-वर्ण उपधा वाले क्रियार्थक धातुओं से बहुलता से 'कि' प्रत्यय होता है। 'क' कार अनुबन्ध है। 'इस, सिस-इच्छायं' (चाहना) धातु से, जो कल्याण चाहता है वह 'इसि' = तपस्वी (ऋषि) है। 'गिर-निगिरणे' (निकलना/उगलना) धातु से, जो त्वचा, मांस, सारभूत औषध आदि को उत्पन्न करता है वह 'गिरि' = पर्वत है। 'सुच-सोचने' (पवित्र होना) धातु से, पवित्र होना 'सुचि' = शुचिता है। 'रुच-अभिलासे' (चाहना/चमकना) धातु से, जिससे अभिलाषा करते हैं वह 'रुचि' = अभिलाषा है, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๐. วป วร วส รส นภ หร หน ปณา อิณ. १०. वप, वर, वस, रस, नभ, हर, हन, पण धातुओं से 'इण' प्रत्यय। วป-พีชนิกฺเขเป, วร-วรณสมฺภตฺตีสุ, วส-นิวาเส, รส-อสฺสาทเน, นภ-หึสายํ, หร หรเณ, หน หึสายํ, ปณ-พฺยวหารถุติสุ, เอเตหิ อิณ โหติ. วปนฺติ เอตายาติ วาปิ=ชลาสโย. วาเรนฺติ เอเตนาติ วาริ=ชลํ. วสนฺติ เอตายาติ วาสิ=ตจฺฉก ภณฺฑํ. รสียติ อสฺสาทนวเสน สโม สรียตีติ ราสิ=สมูโห. นภติ หึสตีติ นาภิ=สรีราวยโว. หาเรตีติ หาริ=มนุญฺญํ. ‘‘หนสฺส ฆาโต ณานุพนฺเธ’’ (๕.๙๙) ติ หนสฺส ฆาโต, หนนฺติ เอเตนาติ ฆาติ=ปหรณํ, ปณติ โวหรตีติ ปาณิ, ปณติ โวหรติ เอเตนาติ วา ปาณิ=กโร. 'वप-बीजनिक्खेपे' (बीज बोना), 'वर-वरणसम्भत्तीसु' (चुनना/भजना), 'वस-निवासे' (रहना), 'रस-अस्सादने' (स्वाद लेना), 'नभ-हिंसायं' (हिंसा करना), 'हर-हरणे' (ले जाना), 'हन-हिंसायं' (हिंसा करना), 'पण-ब्यवहारथुतिसु' (व्यवहार/स्तुति) - इन धातुओं से 'इण' प्रत्यय होता है। जिसमें बोते हैं वह 'वापि' = जलाशय (बावली) है। जिससे रोकते हैं वह 'वारि' = जल है। जिससे (लकड़ी) काटते हैं वह 'वासि' = बसूला (बढ़ई का औजार) है। स्वाद के वश में होकर जो इकट्ठा किया जाता है वह 'रासि' = समूह (राशि) है। जो कष्ट देती है वह 'नाभि' = शरीर का एक अंग है। जो मन को हर लेता है वह 'हारि' = मनोहर है। 'ण' अनुबन्ध होने पर 'हन' को 'घात' आदेश होता है, जिससे मारते हैं वह 'घाति' = प्रहार है। जो व्यवहार करता है वह 'पाणि' है, अथवा जिससे व्यवहार करते हैं वह 'पाणि' = हाथ है। ๑๑. ภูคมา อีณ. ११. 'भू' और 'गम' धातुओं से 'ईण' प्रत्यय। ภู-สตฺตายํ, อม คม-คมเน เอเตหิ อีณ โหติ ภวิสฺสติ กาเล. ภวิสฺสตีติ ภาวี=ภวิสฺสมาโน. คมิสฺสตีติ คามี=คมิสฺสามาโน. 'भू-सत्तायं' (होना), 'अम, गम-गमने' (जाना) - इन धातुओं से भविष्य काल में 'ईण' प्रत्यय होता है। जो होगा वह 'भावी' = होने वाला है। जो जाएगा वह 'गामी' = जाने वाला है। ๑๒. ตนฺทลกฺขา อี. १२. 'तन्द' और 'लक्ख' से 'ई' प्रत्यय। ตนฺท-อาลสิเย, ลกฺข-ทสฺสนงฺเกสุ, เอเตหิ อี โหติ. ตนฺทนํ ตนฺที=อาลสฺยํ, ลกฺขียนฺติ สตฺตา เอตายาติ ลกฺขี=สิรี. 'तन्द-आलसिये' (आलस्य), 'लक्ख-दस्सनङ्केसु' (देखना/चिह्नित करना) - इन शब्दों से 'ई' प्रत्यय होता है। आलस्य करना 'तन्दी' = आलस्य है। जिससे प्राणी लक्षित होते हैं वह 'लक्खी' = श्री (लक्ष्मी) है। ๑๓. คมา โร. १३. 'गम' धातु से 'रो' प्रत्यय। คมิสฺมา [Pg.234] โร โหติ. ‘‘รานุพนฺเธนฺตสราทิสฺสา’’ติ (๔.๑๓๒) อมโลโป, คจฺฉตีติ โค=ปสุ. 'गम' धातु से 'रो' प्रत्यय होता है। 'र' अनुबन्ध होने पर अन्त्य स्वर आदि का लोप होने के नियम से 'अम' का लोप होने पर, जो चलता है वह 'गो' = पशु (गाय) है। (อิติ สรปจฺจยวิธานํ). (इस प्रकार स्वर प्रत्यय विधान समाप्त हुआ)। ๑๔. อิ ภี กา กราร วก สก วาหิ โก. १४. इ, भी, का, कर, आर, वक, सक, वाहि शब्दों से 'को' प्रत्यय होता है। อิ-อชฺเฌน คตีสุ, ภี-ภเย, กา คา-สทฺเท, กร-กรเณ, อร-คมเน, กุก วก-อาทาเน, สก-สตฺติยํ, วา-คติพนฺธเนสุ, เอเตหิ กปจฺจโย โหติ. เอติ ปวตฺตตีติ เอโต=อสหาโย. ภายนฺติ เอตสฺมาติ เภโก=มณฺฑูโก. กายติ สทฺทํ กโรตีติ กาโก=วายโส. กโรติ วณฺณกนฺติ กกฺโก=วณฺณวิเสโส, ปิสิตทพฺพญฺจ. อรติ ยาตีติ อกฺโก=สูโร, วิฏปิวิเสโส จ. วกติ โอทนํ อาททาตีติ วกฺกํ=เทหโกฏฺฐาสวิเสโส, สกฺกตีติ สกฺโก-เทวินฺโท, สมตฺโถ จ. วาติ พนฺธติ เอเตนาติ วาโก=วกฺกลํ. 'इ' (अध्ययन और गति में), 'भी' (भय में), 'का' और 'गा' (शब्द में), 'कर' (करण में), 'अर' (गमन में), 'कुक' और 'वक' (आदान में), 'सक' (शक्ति में), 'वा' (गति और बंधन में) - इन धातुओं से 'क' प्रत्यय होता है। 'एति' (प्रवृत्त होता है) इसलिए 'एत' = असहाय। 'भायन्ति एतस्मा' (जिससे डरते हैं) इसलिए 'भेक' = मेंढक। 'कायति' (शब्द करता है) इसलिए 'काक' = कौआ। 'करोति' (वर्ण/रंग करता है) इसलिए 'कक्क' = वर्ण विशेष या मांस द्रव्य। 'अरति' (जाता है) इसलिए 'अक्क' = सूर्य या वृक्ष विशेष। 'वकति' (भोजन ग्रहण करता है) इसलिए 'वक्क' = देह का एक अंग विशेष। 'सक्कति' (समर्थ होता है) इसलिए 'सक्क' = देवेन्द्र या समर्थ। 'वाति' (जिससे बांधता है) इसलिए 'वाक' = वल्कल (पेड़ की छाल)। ๑๕. ญุกาทโย. १५. 'ञुका' आदि। ญุกาทโย กปจฺจยนฺตา นิปจฺจนฺเต. อูห-วิตกฺเก, หโลโป นิปาตนา อูหียติ วิจินียตีติ อูกา-โอโกทนี. อุนฺท กิเลทเน, สํโยคาทิ โลโป, อก จ. อุนฺทติ ทฺรวํ กโรตีติ อุทกํ=ชลํ. ภี-ภเย, เอตฺตาภาโว, ภายนฺติ เอตสฺมาติ ภีโก=ภีรุ. สก-สตฺติยํ, อุปนฺตสฺสิ, สกฺโกติ ธาเรตุนฺติ สิกฺกา=อุปกรณวิเสโส. หา-จาเค, หียติ สาธูหิ ชหียตีติ หาโก=โกโธ. สมฺพ-มณฺฑเน, กสฺส อุญ[Pg.235], สมฺพติ อุทกํ มณฺเฑตีติ สมฺพุโก=ชลชนฺตุวิเสโภ. ปุถ ปถ-วิตฺถาเร, โอตฺตาภาโว, กสฺส อุญ, ปุถติ ปตฺถรติ อตฺตโน พาลภาวนฺติ ปุถุโก=พาโล. สุจ-โสเก, โสจนฺติ เอเตนาติ สุกฺกํ=สมฺภโว, เสตญฺจ. จิ-จเย, อุปปุพฺโพ, เอตฺตาภาโว, อุปจินนฺตีติ อุปจิกา=วมฺมิก การา. กมฺป-จลเน, กมฺปิสฺส ปํ, กมฺปติ จลตีติ ปงฺโก=กทฺทโม. อุส-ทาเห, อุสตีติ อุกฺกา=ชาลา. กสฺส มุญ, อุสติ ทหตีภิ อุมฺมุกํ=อลาตํ. วม-อุคฺคิรเณ, กสฺส มิญ, วมียตีติ วมฺมิโก=อุปจิกากโต จโย, มส-อามสเน, สสฺส ตฺถง, มสียติ เปเมนาติ มตฺถกํ=สีสํ, เอวมญฺเญปิ. 'ञुका' आदि शब्द 'क' प्रत्ययान्त के रूप में निपातित होते हैं। 'ऊह' (वितर्क में), निपातन से 'ह' का लोप होता है; 'ऊहीयति' (विचार किया जाता है) इसलिए 'ऊका' = जूँ। 'उन्द' (गीला करने में), संयोग के आदि का लोप और 'अक' आदेश; 'उन्दति' (द्रव करता है) इसलिए 'उदक' = जल। 'भी' (भय में), 'ए' भाव का अभाव; 'भायन्ति एतस्मा' (जिससे डरते हैं) इसलिए 'भीक' = भीरु (डरपोक)। 'सक' (शक्ति में), उपान्त को 'इ'; 'सक्कोति धारेतुं' (धारण करने में समर्थ है) इसलिए 'सिक्का' = एक उपकरण विशेष (छींका)। 'हा' (त्याग में), 'हीयति' (सज्जनों द्वारा त्यागा जाता है) इसलिए 'हाक' = क्रोध। 'सम्ब' (मंडन में), 'क' को 'उञ'; 'सम्बति उदकं मण्डेति' (जल को अलंकृत करता है) इसलिए 'सम्बुक' = एक जलचर जीव विशेष (शंख/घोंघा)। 'पुथ' और 'पथ' (विस्तार में), 'ओ' भाव का अभाव, 'क' को 'उञ'; 'पुथति' (अपने बालपन को फैलाता है) इसलिए 'पुथुक' = बालक। 'सुच' (शोक में), 'सोचन्ति एतेन' (जिससे शोक करते हैं) इसलिए 'सुक्क' = वीर्य या श्वेत। 'चि' (संग्रह में), 'उप' उपसर्ग पूर्वक, 'ए' भाव का अभाव; 'उपचिनन्ति' (जो संग्रह करती हैं) इसलिए 'उपचिका' = दीमक। 'कम्प' (चलन में), 'कम्प' को 'प'; 'कम्पति' (चलता/कांपता है) इसलिए 'पङ्क' = कीचड़। 'उस' (दाह में), 'उसति' (जलता है) इसलिए 'उक्का' = ज्वाला (मशाल)। 'क' को 'मुञ'; 'उसति दहति' (जलाता है) इसलिए 'उम्मुक' = अंगारा। 'वम' (उगलने में), 'क' को 'मिञ'; 'वमीयति' (उगला जाता है) इसलिए 'वम्मिक' = दीमक द्वारा बनाया गया ढेर (बांबी)। 'मस' (स्पर्श में), 'स' को 'त्थङ'; 'मसीयति पेमेन' (प्रेम से स्पर्श किया जाता है) इसलिए 'मत्थक' = सिर। इसी प्रकार अन्य भी। ๑๖. ภีตฺวา นโก. १६. 'भी' धातु से 'आनक' होता है। ภี-ภเย ตีมสฺมา อานโก โหติ. ภายนฺติ เอตสฺมากิ ภยานโก=ภยชนโก. 'भी' (भय में) इस धातु से 'आनक' प्रत्यय होता है। 'भायन्ति एतस्मा' (जिससे डरते हैं) इसलिए 'भयानक' = भय उत्पन्न करने वाला। ๑๗. สิงฺฆา อาณิกาฏกา. १७. 'सिंघ' धातु से 'आणिक' और 'आटक' होते हैं। สิงฺฆ-ฆายเนตีมสฺมา อาณิก อาฏกา โหนฺติ. ‘‘อิตฺถิยมตฺวา’’ติ ๙๓.๒๖๐ อา, สิงฺฆยติ ปสฺสวตีติ สิงฺฆาณิกา=นาสาสฺสโว. สิงฺฆติ เอกีภาวํ ยาตีติ สิงฺฆาฏกํ=วีถิจตุกฺกํ. 'सिंघ' (सूंघने/नाक बहने में) इस धातु से 'आणिक' और 'आटक' प्रत्यय होते हैं। 'इत्थियं' सूत्र से 'आ' प्रत्यय होकर; 'सिंघयति' (बहता है) इसलिए 'सिंघाणिका' = नाक का मल (शेंट)। 'सिंघति' (एक भाव को प्राप्त होता है) इसलिए 'सिंघाटक' = चौराहा। ๑๘. กราทิตฺวโก. १८. 'कर' आदि से 'अक' होता है। กร-กรเณ, สร-คติหึสาจินฺตาสุ, นร-นเย, ตรตรเณ, วร-วรณ สมฺภตฺตีสุ, ชน-ชนเน, กร-ทิตฺติ คติกนฺตีสุ, กฏ-มนฺทเน, กุร-สทฺเท, ถุ-อภิตฺถเว, เอวมาทีหิ อโก [Pg.236] โหติ. กรียตีติ กรโก=กมณฺฑลุ. กโรตีติ กรกา=วสฺโสปลา. สรติ อุทกเมตฺถาติ สรโก=ปานภาชนํ. นรนฺติ ปาปุณนฺติ สตฺตา เอตฺถาติ นรโก=นิรโย. ตรนฺตฺยเนนาติ ตรโก=ตรณํ. วาเรตีติวรโก=วรโณ, ธญฺญวิเสโส จ. ชเนตีติ ชนโก=ปิตา. กนติ ทิพฺพตีติ กนกํ=สุวณฺณํ. กฏติ มทฺทติ ริปโวติ กฏกํ=นครํ. กุรตีติ โกรโก=กลิกา. ถวียตีติ ถวโก-คุจฺโฉ. 'कर' (करण में), 'सर' (गति, हिंसा और चिंता में), 'नर' (नयन/ले जाने में), 'तर' (तरने में), 'वर' (वरण और संभक्ति में), 'जन' (उत्पन्न करने में), 'कन' (दीप्ति, गति और कांति में), 'कट' (मंडन में), 'कुर' (शब्द में), 'थु' (स्तुति में) - इन आदि धातुओं से 'अक' प्रत्यय होता है। 'करीयति' (जो किया जाता है) इसलिए 'करक' = कमंडलु। 'करोति' (जो करता है) इसलिए 'करका' = ओला। 'सरति उदकं एत्थ' (जिसमें जल चलता है) इसलिए 'सरक' = पीने का पात्र। 'नरन्ति' (प्राणी जहाँ पहुँचते हैं) इसलिए 'नरक' = निरय। 'तरन्ति अनेन' (जिससे तैरते हैं) इसलिए 'तरक' = तैरना। 'वारेति' (जो रोकता है) इसलिए 'वरक' = वरण वृक्ष या धान्य विशेष। 'जनेति' (जो उत्पन्न करता है) इसलिए 'जनक' = पिता। 'कनति' (चमकता है) इसलिए 'कनक' = सुवर्ण। 'कटति' (शत्रुओं का मर्दन करता है) इसलिए 'कटक' = नगर। 'कुरति' (शब्द करता है) इसलिए 'कोरक' = कली। 'थवीयति' (स्तुति की जाती है) इसलिए 'थवक' = गुच्छा। ๑๙. พล ปเตหฺยาโก. १९. 'बल' और 'पत' धातुओं से 'आक' होता है। พล-ปาณเน, ปต ปถ-คมเน, เอเตหิ อาโก โหติ. พลติ ชีวตีติ พลากา=ปกฺขิวิเสโส. ปตติ ยาตีติ ปตากา=ธโช. 'बल' (प्राणन/जीवन में), 'पत' और 'पथ' (गमन में) - इन धातुओं से 'आक' प्रत्यय होता है। 'बलति' (जीता है) इसलिए 'बलाका' = पक्षी विशेष (बगुला)। 'पतति' (जाता है) इसलिए 'पताका' = ध्वज। ๒๐. สามากาทโย. २०. 'सामाक' आदि। สามากอาทโย อากนฺตา นิปจฺจนฺเต. สา-ตนุ กรณาวสาเนสุ, สาสฺส มุก, สาติ เทหํ ต นุํ กโรตีติ สามาโก=ติณธญฺญํ. ปา-ปาเน, อินง, ปิวติ รตฺตนฺติ ปินาโก=มหิสฺสรธนุ. คุ-สทฺเท, ‘‘ยุวณฺณาน มิยงุวง สเร’’ติ (๕.๑๓๖) อุวง, ควติ นทติ เอเตนาติ คุวโก=ปูคผลํ. อฏ ปฏ-คมนตฺถา, ปฏติ ยาตีติ ปฏากา=เวชยนฺตี. สล ปิล ปล หุล-คมนตฺถา, สลติ ยาตีติ สลากา=เวชฺโชปกรณทพฺพํ. วิท-ญาเณ, วิทติ ชานาตีติ วิทาโก=วิทฺวา. ปณพฺยวหารถุตีสุ อสฺส อิตฺตํ, อูก จ, ปณียติ โวหรียตีติ ปิญฺญาโก=ติลกกฺโก, เอวมญฺเญปิ. 'सामाक' आदि शब्द 'आक' प्रत्ययान्त के रूप में निपातित होते हैं। 'सा' (तनुकरण और अवसान में), 'सा' को 'मुक' आदेश; 'साति' (देह को क्षीण करता है) इसलिए 'सामाक' = तृण धान्य (साँवा)। 'पा' (पान में), 'इनङ' आदेश; 'पिवति रक्तं' (रक्त पीता है) इसलिए 'पिनाक' = महेश्वर का धनुष। 'गु' (शब्द में), 'उवङ' आदेश; 'गवति' (जिससे शब्द करता है) इसलिए 'गुवक' = सुपारी। 'अट' और 'पट' (गमन अर्थ में), 'पटति' (जाता है) इसलिए 'पटाका' = वैजयंती (पताका)। 'सल', 'पिल', 'पल', 'हुल' (गमन अर्थ में), 'सलति' (जाता है) इसलिए 'सलाका' = वैद्यकीय उपकरण विशेष (सलाई)। 'विद' (ज्ञान में), 'विदति' (जानता है) इसलिए 'विदाक' = विद्वान। 'पण' (व्यवहार और स्तुति में), 'अ' को 'इ' और 'ऊक' आदेश; 'पणीयति' (व्यवहार किया जाता है) इसलिए 'पिञ्ञाक' = तिल की खली। इसी प्रकार अन्य भी। ๒๑. วิจฺฉาลคมมุสา กิโก. २१. 'विच्छ', 'अल', 'गम' और 'मुस' धातुओं से 'किक' होता है। วิจฺฉา-คมเน[Pg.237], อล=พนฺธเน, อม คม-คมเน, มุส-เถยฺเย, เอเตหิ กิโก โหติ. วิจฺฉติ ยาตีติ วิจฺฉิโก=กีโฏ. อลติ พนฺธติ เอเตนาติ อลิกํ=อสจฺจํ. คจฺฉตีติ คมิโก=คนฺตา. มุสาติ นิทฺเทสา ทีโฆ, มุสติ เถเนตีติ มูสิโก=อุนฺทูโร. 'विच्छ' (गमन में), 'अल' (बंधन में), 'अम' और 'गम' (गमन में), 'मुस' (स्तेय/चोरी में) - इन धातुओं से 'किक' प्रत्यय होता है। 'विच्छति' (जाता है) इसलिए 'विच्छिक' = बिच्छू। 'अलति' (जिससे बांधता है) इसलिए 'अलिक' = असत्य। 'गच्छति' (जाता है) इसलिए 'गमिक' = जाने वाला। 'मुस' निर्देश से दीर्घ होकर; 'मुसति' (चोरी करता है) इसलिए 'मूसिक' = चूहा। ๒๒. กึกณิกาทโย. २२. 'किङ्कणिका' आदि। กึกณิกาทโย สทฺทา กิกนฺตา นิปจฺจนฺเต. กณอิติ ทณฺฑโก ธาตุ สทฺทตฺโถ, กสฺส ทฺวิตฺตํ, อสฺส อิตฺตํ, นิคฺคหีตาคโม จ, กณติ สทฺทํ กโรตี กึกณิกา=ฆณฺฑิกา. มุท-โตเส, ทสฺส ทฺวิตฺตํ, มุทนฺติ เอตมยาติ มุทฺทิกา=องฺคุลิยาเวฏฺฐนํ, ผลวิเสโส อ. มหียติ ปูชียตีติ มหิกา=หิมํ. กล-สงฺขฺยาเน, กลียติ ปริมีตยตีติ กลิกา=โกรโก. สปฺป-คมเน, อสฺส อิตฺตํ. สปฺปติ คจฺฉตีติ สิปฺปิกา=ชลชนฺตุวิเสโส, เอวมญฺเญปิ. 'किङ्कणिका' आदि शब्द 'किक' प्रत्ययान्त के रूप में निपातित होते हैं। 'कण' धातु शब्द अर्थ में है, 'क' का द्वित्व, 'अ' को 'इ' और निग्गहीत (अनुस्वार) का आगम; 'कणति' (शब्द करती है) इसलिए 'किङ्कणिका' = छोटी घंटी। 'मुद' (संतोष में), 'द' का द्वित्व; 'मुदन्ति एतया' (जिससे प्रसन्न होते हैं) इसलिए 'मुद्दिका' = अंगूठी या एक फल विशेष। 'महीयति' (पूजा की जाती है) इसलिए 'महिका' = ओस/बर्फ। 'कल' (संख्यान में), 'कलीयति' (मापी जाती है) इसलिए 'कलिका' = कली। 'सप्प' (गमन में), 'अ' को 'इ'; 'सप्पति' (जाता है) इसलिए 'सिप्पिका' = एक जलचर जीव विशेष (सीपी)। इसी प्रकार अन्य भी। ๒๓. อิสา กีโก. २३. 'इस' धातु से 'कीक' होता है। อิส สึส-อิจฺฉายํ, อิจฺจสฺมา กีโก โหติ. อิจฺฉียตีติ อิสีกา=ตูลนิสฺสโย. 'इस' और 'सिंस' (इच्छा में) इस धातु से 'कीक' प्रत्यय होता है। 'इच्छीयति' (चाही जाती है) इसलिए 'इसीका' = सरकंडा (या रुई का आधार)। ๒๔. กมปทา ณุโก. २४. 'कम' और 'पद' धातुओं से 'णुक' होता है। กม-อิจฺฉายํ, ปท-คมเน, เอเตหิ ณุโก โหติ. ‘‘ณิณาปีน’’นฺติ (๕.๑๖๐) โยควิภาคา ณิโลโป. กาเมตีติ กามุโก=กามยิตา[Pg.238]. ปชฺชติ ยาติ เอตายาติ ปาทุกา=ปาโทปกรณํ. 'कम' (इच्छा में), 'पद' (गमन में) - इन धातुओं से 'णुक' प्रत्यय होता है। 'णिणापीनं' सूत्र के योगविभाग से 'णि' का लोप होता है। 'कामेति' (जो कामना करता है) इसलिए 'कामुक' = कामी। 'पज्जति' (जिससे जाता है) इसलिए 'पादुका' = पैरों का उपकरण (खड़ाऊँ)। ๒๕. มณฺฑสลา ณูโก. २५. 'मण्ड' और 'सल' धातुओं से 'णूक' होता है। มณฺฑ-ภูสเน, สล-คมนตฺโถ ทณฺฑโก ธาตุ, เอเตหิ ณูโก โหติ. มณฺเฑติ ชลํ ภูเสตีติ มณฺฑูโก=เภโก, สลติ โคจรตฺต มุปยาตีติ สาลูกํ=อุปฺปลกณฺโฑ. 'मण्ड' (भूषण में), 'सल' (गमन अर्थ में) - इन धातुओं से 'णूक' प्रत्यय होता है। 'मण्डेति' (जल को सुशोभित करता है) इसलिए 'मण्डूक' = मेंढक। 'सलति' (गोचर/भोजन की ओर जाता है) इसलिए 'सालूक' = कमल की जड़। ๒๖. อุลูกาทโย. २६. 'उलूक' आदि। อุลูกาทโย สทฺทา ณูกนฺตา นิปจฺจนฺเต. อุล-คเวสเน, โอตฺตาภาโว นิปาตนา, อุลติ คเวสตีติ อุลูโก=โกสิโย. มน=ญาเณ, นสฺส ธตฺตํ, มญฺญตีติ มธูโก=รุกฺโข. ชล-ทิตฺติยํ, ชลตีติ ชลูกา=โลหิตโป, เอวมญฺเญปิ. ‘उलूक’ आदि शब्द ‘णूक’ प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। ‘उल’ (गवेषण/खोजने में), निपातन से ‘ओ’ का ‘उ’ भाव होता है, जो खोजता है वह ‘उलूक’ (उल्लू) है। ‘मन’ (ज्ञान में), ‘न’ का ‘ध’ होना, जो जानता है वह ‘मधूक’ (एक वृक्ष) है। ‘जल’ (दीप्ति/चमक में), जो चमकता है वह ‘जलूका’ (जोंक) है, इसी प्रकार अन्य भी। ๒๗. กสา สโก. २७. ‘कस’ धातु से ‘सको’ प्रत्यय होता है। กส-วิเลขเนตีมสฺมา สโก โหติ. กสตีติ กสฺสโก=กสิกมฺมกาโร. ‘कस’ (विलेखन/जोतने में) इस धातु से ‘सको’ प्रत्यय होता है। जो जोतता है वह ‘कस्सक’ (किसान) है। ๒๘. กรา ติโก. २८. ‘कर’ धातु से ‘तिको’ प्रत्यय होता है। กโรติสฺมา ติโก โหติ. กโรนฺติ กีฬํ เอตฺถาติ กตฺติโก=พาหุโล. ‘करोति’ (करने) अर्थ वाली धातु से ‘तिको’ प्रत्यय होता है। जिसमें क्रीड़ा (खेल) करते हैं वह ‘कत्तिक’ (कार्तिक मास) है। ๒๙. อิสา ฐกน. २९. ‘इस’ धातु से ‘ठकन’ प्रत्यय होता है। อิส สึส-อิจฺฉายํ, อิจฺจสฺมา ฐกน โหติ. อิจฺฉียตีติ อิฏฺฐกา=มตฺติกาวิกาโร. ‘इस’ (इच्छा करने में), इस धातु से ‘ठकन’ प्रत्यय होता है। जिसकी इच्छा की जाती है वह ‘इट्ठका’ (ईंट - मिट्टी का विकार) है। ๓๐. สมา โข. ३०. ‘सम’ धातु से ‘खो’ प्रत्यय होता है। สม-อุปสมเขเทสุ[Pg.239], เอตสฺมา โข โหติ. สเมติ อุปสเมตีติ สงฺโข=กมฺพุ. ‘सम’ (उपशम और खेद में), इससे ‘खो’ प्रत्यय होता है। जो शांत करता है वह ‘सङ्ख’ (शंख) है। ๓๑. มุขา ทโย. ३१. ‘मुख’ आदि शब्द। มุข อาทโย ขนฺตา นิปจฺจนฺเต. มุ-พนฺธเน, โอตฺตาภาโว นิปาตนา, มุนนฺติ พนฺธนฺติ เอเตนาติ มุขํ=ลปนํ. สิ-เสวายํ, เอตฺตา ภาโว นิปาตนา, สยนฺติ เอตฺถ อูกา กุสุม-ทโย จาติ สิขา=จูฬา. วิปุพฺพสฺส สิสฺส, วิสติสฺส วา, วิเสเสน สยนฺติ เอตฺถ, ปวิสนฺตีติ วิสิขา=รจฺฉา. กน-ทีตฺติ คติ กนฺตีสุ, นิปุพฺโพ, อนภาคโลโป, กนติ ทิพฺพตีติ นิกฺโข=สุวณฺณวิกาโร. มยอิติ คมนตฺโถ ทณฺฑโก ธาตุ, ขสฺส อูญ, มยติ ยาตีติ มยูโข-กิรโณ. ลู-เฉทเน, โอตฺถาภาโว, ลุนาติ ฉินฺทติ โสภนฺติ ลูโข=อสินิทฺโธ. อร-คมเน, อรนฺติ ยนฺติ เอเตนาติ อกฺโข=สกฏาวยวา, ปาสโก จ. ยส-ปยตเน, ยสฺสติ ปยตติ พลิมาหรณตฺถายาติ ยกฺโข=อมนุสฺโส, รุห-ชนเน, รุหติ ชายตีติ รุกฺโข=ปาทโป, อุส-ทาเห, อุสติ ทหติ กามคฺคินาติ อุกฺโข=พลีพทฺโท. สห-มริสเน ‘หโลโป, สหติ อตฺตนิ กตาปราธํ ขมตีติ สขา=สหาโย, เอวมญฺเญปิ. ‘मुख’ आदि शब्द ‘ख’ प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। ‘मु’ (बन्धन में), निपातन से ‘ओ’ का ‘उ’ भाव, जिससे बाँधते हैं वह ‘मुख’ (मुख) है। ‘सि’ (सेवा में), निपातन से ‘ए’ का ‘इ’ भाव, जिसमें जूँ या पुष्प आदि रहते हैं वह ‘सिखा’ (चोटी) है। ‘वि’ उपसर्ग पूर्वक ‘सि’ धातु से, अथवा ‘विस’ धातु से, जिसमें विशेष रूप से रहते हैं या प्रवेश करते हैं वह ‘विसिखा’ (गली) है। ‘कन’ (दीप्ति, गति, कान्ति में), ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक, ‘अ’ भाग का लोप, जो चमकता है वह ‘निक्ख’ (स्वर्ण का आभूषण) है। ‘मय’ (गमन अर्थ वाली दण्डक धातु), ‘ख’ का ‘ऊ’ आदेश, जो जाता है वह ‘मयूख’ (किरण) है। ‘लू’ (छेदन में), ‘ओ’ का ‘उ’ भाव, जो काटता है या रूखा है वह ‘लूख’ (रूखा/स्नेहहीन) है। ‘अर’ (गमन में), जिससे जाते हैं वह ‘अक्ख’ (धुरी/गाड़ी का अंग) और पासा है। ‘यस’ (प्रयत्न में), जो उपहार लाने के लिए प्रयत्न करता है वह ‘यक्ख’ (यक्ष/अमानुष) है। ‘रुह’ (उत्पन्न होने में), जो उगता है वह ‘रुक्ख’ (वृक्ष) है। ‘उस’ (दाह/जलाने में), जो कामाग्नि से जलता है वह ‘उक्ख’ (बैल) है। ‘सह’ (सहन करने में), ‘ह’ का लोप, जो अपने प्रति किए गए अपराध को सहता है वह ‘सखा’ (मित्र) है, इसी प्रकार अन्य भी। ๓๒. อช วช มุท คท คมา คก. ३२. ‘अज’, ‘वज’, ‘मुद’, ‘गद’ और ‘गम’ धातुओं से ‘गक’ प्रत्यय होता है। อช วช-คมเน, มุท-โตเส, คท-วจเน, อม คม-คมเน, เอเตหิ คก โหติ. อชติ คจฺฉติ เสฏฺฐภาวนฺติ อคฺโค-เสฏฺโฐ[Pg.240]. วชติ สมูหตฺตํ คจฺฉตีติ วคฺโค=สมูโห. มุทนฺติ เอเตนาติ มุคฺโค=ธญฺญวิเสโส. คทตีติ คคฺโค=อิสิ. ‘‘มนานํ นิคฺคหีต’’นฺติ (๕.๙๖) มสฺส นิคฺคหีตํ, คจฺฉตีติ คงฺคา=สุราปคา. ‘अज’ और ‘वज’ (गमन में), ‘मुद’ (संतोष में), ‘गद’ (वचन में), ‘अम’ और ‘गम’ (गमन में), इनसे ‘गक’ प्रत्यय होता है। जो श्रेष्ठ भाव को प्राप्त होता है वह ‘अग्ग’ (श्रेष्ठ) है। जो समूह भाव को प्राप्त होता है वह ‘वग्ग’ (वर्ग/समूह) है। जिससे प्रसन्न होते हैं वह ‘मुग्ग’ (मूँग - एक धान्य विशेष) है। जो बोलता है वह ‘गग्ग’ (एक ऋषि) है। ‘म’ का निग्गहीत (अनुस्वार) होकर, जो जाती है वह ‘गङ्गा’ (देवनदी) है। ๓๓. สิงฺคาทโย. ३३. ‘सिङ्ग’ आदि शब्द। สิงฺคอาทโย สทฺทา คกอนฺตา นิปจฺจนฺเต. สี-สเย, นิคฺคหีตาคโม, รสฺสตฺตญฺจ, สยติ ปวตฺตติ มตฺถเกติ สิงฺคํ=วิสาณํ. ผุร-จลเน, ลิมุง, ผุรติ จลตีติ ปุลิงฺโค=ชลิตงฺคา ราวยโว. จล-กมฺปเน, อุปุพฺโพ, จลสฺส จาลึ, อุจฺจลติ กมฺปตีติ อุจฺจาลิงฺโค=สุกฺกกีโฏ, กล-สทฺเท, อิมุก, กลติ อภินาทํ กโรติ พหุรชฺชตายา ติ กลิงฺโค=ทกฺขิณาปโถ. ภม-อนวฏฺฐาเน, อสฺส อิตฺตํ, ภมตีติ ภิงฺโค=ภมโร. ปฏ อฏ-คมเน, ปฏิสฺส อมุก, อก จ. ปฏติ ปตนฺโต คจฺฉตีติ ปฏงฺโค, ปฏโค=สลโภ, เอวมญฺเญปิ. ‘सिङ्ग’ आदि शब्द ‘गक’ प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। ‘सी’ (शयन में), निग्गहीत का आगम और ह्रस्व होना, जो मस्तक पर रहता है वह ‘सिङ्ग’ (सींग) है। ‘फुर’ (चलन में), ‘लिमुङ’ आदेश, जो फुरफुराता या चलता है वह ‘पुलिङ्ग’ (चिनगारी) है। ‘चल’ (काँपने में), ‘उ’ उपसर्ग पूर्वक, ‘चल’ का ‘चालि’ होना, जो ऊपर की ओर काँपता है वह ‘उच्चालिङ्ग’ (एक प्रकार का कीड़ा) है। ‘कल’ (शब्द में), ‘इमुक’ आदेश, जो बहुत शोर करता है वह ‘कलिङ्ग’ (दक्षिण भारत का एक प्रदेश) है। ‘भम’ (अनावस्थान/घूमने में), ‘अ’ का ‘इ’ होना, जो घूमता है वह ‘भिङ्ग’ (भ्रमर) है। ‘पट’ और ‘अट’ (गमन में), ‘पट’ को ‘अमुक’ और ‘अक’ आदेश, जो गिरते हुए जाता है वह ‘पटङ्ग’ या ‘पटग’ (टिड्डा/शलभ) है, इसी प्रकार अन्य भी। ๓๔. อคา คิ. ३४. ‘अग’ धातु से ‘गि’ प्रत्यय होता है। อค-กุฏิลคมเนตีมสฺมา คิ โหติ. อคติ กุฏิโล หุตฺวา คจฺฉตีติ อคฺคิ=ปาวโก. ‘अग’ (कुटिल गमन में) इस धातु से ‘गि’ प्रत्यय होता है। जो कुटिल होकर चलता है वह ‘अग्गि’ (अग्नि) है। ๓๕. ยาวลา คุ. ३५. ‘या’ और ‘वल’ धातुओं से ‘गु’ प्रत्यय होता है। ยา-ปาปุณเน, วล วลฺล-สํวรเณ, เอเตหิ คุ โหติ. ยาตีติ ยาคุ=เปยฺยา. วลียติ สํวรียตีติ วคฺคุ=มนุญฺโญ. ‘या’ (प्राप्त करने में), ‘वल’ और ‘वल्ल’ (संवरण/ढकने में), इनसे ‘गु’ प्रत्यय होता है। जो पीया जाता है वह ‘यागु’ (पेया/कांजी) है। जो संवरित (सुन्दर) है वह ‘वग्गु’ (मनोज्ञ/सुन्दर) है। ๓๖. เผคฺคาทโย. ३६. ‘फेग्गु’ आदि शब्द। เผคฺคุ [Pg.241] อาทโย คุอนฺตา นิปจฺจนฺเต. ผล-นิปฺผตฺติยํ, อสฺส เอตฺตํ, ผลติ นิฏฺฐานํ คจฺฉตีติ เผคฺคุ=อสาโร. ภร-ภรเณ, รโลโป. ภรตีติ ภคุ=อิสิ. หิ-คตียํ, นิคฺคหีตาคโม, หิโน ติ ปวตฺตตีติ หิงฺคุ=รามฐชํ. กม-อิจฺฉายํ, กามียตีติ กงฺคุ=ธญฺญวิเสโส, เอวมญฺเญปิ. ‘फेग्गु’ आदि शब्द ‘गु’ प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। ‘फल’ (निष्पत्ति में), ‘अ’ का ‘ए’ होना, जो फलित होकर अंत को प्राप्त होता है वह ‘फेग्गु’ (असार/निस्सार) है। ‘भर’ (भरण में), ‘र’ का लोप, जो भरण करता है वह ‘भगु’ (एक ऋषि) है। ‘हि’ (गति में), निग्गहीत का आगम, जो ‘हिन’ के रूप में प्रवृत्त होता है वह ‘हिङ्गु’ (हींग) है। ‘कम’ (इच्छा में), जिसकी कामना की जाती है वह ‘कङ्गु’ (कंगनी - एक धान्य विशेष) है, इसी प्रकार अन्य भी। ๓๗. ชนา โฆ. ३७. ‘जन’ धातु से ‘घो’ प्रत्यय होता है। ชน-ชนเนตีมสฺมา โฆ โหติ. ‘‘มนานํ นิคฺคหีต’’นฺติ (๕.๙๖) นสฺส นิคฺคหีตํ, ชายติ คมนเมตายาติ ชงฺฆา=ปาณฺยงฺควิเสโส. ‘जन’ (उत्पन्न होने में) इस धातु से ‘घो’ प्रत्यय होता है। ‘न’ का निग्गहीत होकर, जिससे गमन उत्पन्न होता है वह ‘जङ्घा’ (पैर का एक भाग) है। ๓๘. เมฆาทโย. ३८. ‘मेघ’ आदि शब्द। เมฆอาทโย ฆนฺตา นิปจฺจนฺเต. มิห-เสจเน, หโลโป, เมหติ สิญฺจตีติ เมโฆ=อมฺพุโท. มุห-มุจฺฉายํ, หโลโป, มุยฺหนฺติ สตฺตา เอตฺถาติ โมโฆ=ตุจฺโฉ. สี-สเย, เอตฺตาภาโว, เสติ ลหุ หุตฺวา ปวตฺตตีติ สีฆํ=อาสุ. อห-ภสฺมีกรเณ, นิปุพฺโพ, หโลปทีฆา, นิทหตีติ นิทาโฆ=คิมฺโห. มหีสฺส หโลโป, มหียติ ปูชียตีติ มฆา=นกฺขตฺตํ, เอวมญฺเญปิ. ‘मेघ’ आदि शब्द ‘घ’ प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। ‘मिह’ (सींचने में), ‘ह’ का लोप, जो सींचता है वह ‘मेघ’ (बादल) है। ‘मुह’ (मूर्च्छा में), ‘ह’ का लोप, जिसमें प्राणी मोहित होते हैं वह ‘मोघ’ (तुच्छ/व्यर्थ) है। ‘सी’ (शयन में), ‘ए’ का ‘इ’ भाव, जो शीघ्रता से प्रवृत्त होता है वह ‘सीघ’ (शीघ्र) है। ‘अह’ (भस्मीकरण में), ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक, ‘ह’ का लोप और दीर्घ होना, जो जलाता है वह ‘निदाघ’ (गर्मी/ग्रीष्म) है। ‘मही’ धातु के ‘ह’ का लोप, जिसकी पूजा की जाती है वह ‘मघा’ (एक नक्षत्र) है, इसी प्रकार अन्य भी। (อิติ กวคฺคปจฺจยวิธานํ). (इस प्रकार क-वर्ग प्रत्यय विधान समाप्त हुआ)। ๓๙. จุสรวรา โจ. ३९. ‘चु’, ‘सर’ और ‘वर’ धातुओं से ‘चो’ प्रत्यय होता है। จุ-จวเน, สร-คติ หึสา จินฺตาสุ, วร-วรณ สมฺภตฺตีสุ, เอเยหิ โจ โหติ. จวติ รุกฺขาติ โจจํ=อุปภุตฺตผล- วิเสโส[Pg.242]. สรติ อายตึ ทุกฺขํ หึสตีติ สจฺจํ=อวิตถํ. วาเรติ สุขนฺติ วจฺจํ=คูโถ. ‘चु’ (च्युत होने/गिरने में), ‘सर’ (गति, हिंसा और चिन्ता में), ‘वर’ (वरण और संभक्ति में), इनसे ‘चो’ प्रत्यय होता है। जो वृक्ष से गिरता है वह ‘चोच’ (एक प्रकार का फल) है। जो भविष्य के दुःख को नष्ट करता है वह ‘सच्च’ (सत्य/यथार्थ) है। जो सुख को रोकता है वह ‘वच्च’ (विष्ठा/गूथ) है। ๔๐. มรา จุอีจี จ. ४०. ‘मर’ धातु से ‘चु’, ‘ईची’ और ‘च’ प्रत्यय होते हैं। มร-ปาณจาเค ตีมสฺมา จุอีจี โหนฺติ โจ จ. มรณํ มจฺจุ=มรณํ. มาเรติ อนฺธการํ วินาเสตีติ มรีจิ=รํสิ, มิคตณฺหิกา จ. มรตีติ มจฺโจ=สตฺโต. ‘मर’ (प्राण त्यागने में) इस धातु से ‘चु’, ‘ईची’ और ‘च’ प्रत्यय होते हैं। मरना ‘मच्चु’ (मृत्यु) है। जो अंधकार को मारता या नष्ट करता है वह ‘मरीचि’ (किरण) और मृगतृष्णा है। जो मरता है वह ‘मच्च’ (प्राणी/सत्त्व) है। ๔๑. กุส ปสา ฉิก. ४१. 'कुस' और 'पस' धातुओं से 'छिक' प्रत्यय होता है। กุส-อกฺโกเส, ปส-พาธเน, เอเตหิ ฉิก โหติ. กุสียติ อกฺโกสียตีติ กุจฺฉิ=อุทรํ. ปสียติ พาธียติ เอตฺถาติ ปจฺฉิ=ภาชนวิเสโส. 'कुस' (आक्रोश/गाली देना) और 'पस' (बाधा डालना) धातुओं से 'छिक' प्रत्यय होता है। 'कुसीयति' (आक्रोश किया जाता है) इसलिए 'कुच्छि' (पेट/उदर)। 'पसीयति' (इसमें बाधा डाली जाती है) इसलिए 'पच्छि' (एक विशेष पात्र/टोकरी)। ๔๒. กส อุสา ฉุก. ४२. 'कस' और 'उस' धातुओं से 'छुक' प्रत्यय होता है। กส-วิเลขเน, อุส-ทาเห, เอเตหิ ฉุก โหติ. กสนฺติ วิเลขนฺติ เอตฺถาติ กจฺฉุ=ปามํ. อุสติ ทหติ สนฺตาปนฺติ อุจฺฉุ=รสาโล. 'कस' (कुरेदना/लिखना) और 'उस' (जलाना) धातुओं से 'छुक' प्रत्यय होता है। 'कसन्ति' (इसमें कुरेदते हैं) इसलिए 'कच्छु' (खुजली/पामा)। 'उसति' (जलाता है या संताप देता है) इसलिए 'उच्छु' (गन्ना/रसाल)। ๔๓. อส มส วท กุจ กจา โฉ. ४३. 'अस', 'मस', 'वद', 'कुच' और 'कच' धातुओं से 'छो' प्रत्यय होता है। อส-ขิปเน, มส-อามสเน, วท-วจเน, กุจ-สํโกจเน, กจ-พนฺธเน, เอเตหิ โฉ โหติ. อสติ ฉิปตีติ อจฺโฉ=ภลฺลูโก. มสติ ชลนฺติ มจฺโฉ=มีโน. วทตีติ วจฺโฉ=เนลโก. กุจียติ สํโกจียตีติ โกจฺโฉ=ภทฺทปีฏฺฐํ. กจียติ พนฺธียตีติ กจฺโฉ=ตนุปเทโส, อนูโป จ. 'अस' (फेंकना), 'मस' (स्पर्श करना), 'वद' (बोलना), 'कुच' (सिकुड़ना) और 'कच' (बाँधना) धातुओं से 'छो' प्रत्यय होता है। 'असति' (फेंकता है) इसलिए 'अच्छो' (भालू)। 'मसति' (जल को स्पर्श करता है) इसलिए 'मच्छो' (मछली)। 'वदति' (बोलता है) इसलिए 'वच्छो' (बछड़ा)। 'कुचीयति' (सिकुड़ा जाता है) इसलिए 'कोच्छो' (भद्रपीठ/कंघी)। 'कचीयति' (बाँधा जाता है) इसलिए 'कच्छो' (शरीर का एक भाग/कक्षा या अनूप देश)। ๔๔. คุจฺฉาทโย. ४४. गुच्छ आदि शब्द। คุจฺฉอาทโย [Pg.243] ฉนฺตา นิปจฺจนฺเต. คุป-โคปเน, โอตฺตาภาโว, โคปียตีติ คุจฺโฉ=ถวโก. ตุส-ตุฏฺฐิมฺหี, ตุสนฺติ เอเตนาติ ตุจฺฉํ=มุสา. ปุส-โปสเน, โปสนฺติ ตนุมเนนาติ ปุจฺโฉ=วาลธิ, เอวมญฺเญปิ. 'गुच्छ' आदि शब्द 'छ' अन्त वाले निपातित होते हैं। 'गुप' (रक्षा करना) धातु से, 'ओ' का अभाव होकर, 'गोपीयति' (रक्षा की जाती है) इसलिए 'गुच्छो' (गुच्छा/स्तबक)। 'तुस' (संतुष्टि) धातु से, 'तुसन्ति' (इससे संतुष्ट होते हैं) इसलिए 'तुच्छं' (झूठ/रिक्त)। 'पुस' (पोषण करना) धातु से, 'पोसन्ति' (इससे शरीर का पोषण करते हैं) इसलिए 'पुच्छो' (पूँछ/वालधि), इसी प्रकार अन्य भी। ๔๕. อรา ชุ ญฏ จ. ४५. 'अर' धातु से 'जु' प्रत्यय होता है और 'अर' के स्थान पर 'उट' आदेश होता है। อร-คมเนตีมสฺมา ชุ โหติ, อริสฺส อุฏ จ. ฏกาโร สพฺพาเทสตฺโถ, อรติ อกุฏิลภาเวน ปวตฺตตีติ อุชุ=อวงฺโก. 'अर' (जाना) धातु से 'जु' प्रत्यय होता है और 'अर' के स्थान पर 'उट' आदेश होता है। 'ट' कार सर्वादेश के लिए है। 'अरति' (अकुटिल भाव से प्रवृत्त होता है) इसलिए 'उजु' (सीधा/अवक)। ๔๖. รชฺชาทโย. ४६. रज्जु आदि शब्द। รชฺชุอาทโย ชุอนฺตา นิปจฺจนฺเต. รุธ-อาวรเณ, อุสฺส อตฺตํ, รุนฺธนฺติ เอเตนาติ รุชฺชุ-โยตฺตํ. มน-ญาเณ, อมญฺญิตฺถาติ มญฺชุ=มญฺชุลํ, เอวมญฺเญปิ. 'रज्जु' आदि शब्द 'जु' अन्त वाले निपातित होते हैं। 'रुध' (रोकना) धातु से, 'उ' को 'अ' होकर, 'रुन्धन्ति' (इससे बाँधते/रोकते हैं) इसलिए 'रज्जु' (रस्सी/योत्र)। 'मन' (ज्ञान) धातु से, 'अमञ्ञित्थ' (जाना गया) इसलिए 'मञ्जु' (मंजुल/सुन्दर), इसी प्रकार अन्य भी। ๔๗. คิธา ฌก. ४७. 'गिध' धातु से 'झक' प्रत्यय होता है। คิธ-อภิกงฺขายมิจฺจสฺมา ฌก โหติ. เคธตีติ คิชฺโฌ=ปกฺขิวิเสโส. 'गिध' (आकांक्षा/अभिलाषा) धातु से 'झक' प्रत्यय होता है। 'गेधति' (आकांक्षा करता है) इसलिए 'गिज्झो' (गिद्ध/एक विशेष पक्षी)। ๔๘. วญฺฌาทโย. ४८. वञ्झ आदि शब्द। วญฺจฺยาทโย ฌก อนฺตา นิปจฺจนฺเต. วน-ยาจเน, วโนติ อตฺตานํ อนุภวิตุํ ยาจตีติ วญฺโฌ=อผลรุกฺโข, วญฺฌา=อปสวา อิตฺถี, อสฺส อิตฺตํ วิญฺโฌ=ปพฺพโต, สํช-สงฺเค, นิคฺคหีตโลโป, สญฺชิยตีติ สชฺฌํ=รชตํ, เอวมญฺเญปิ. 'वञ्चि' आदि शब्द 'झक' अन्त वाले निपातित होते हैं। 'वन' (याचना करना) धातु से, 'वनोति' (स्वयं अनुभव करने के लिए याचना करता है) इसलिए 'वञ्झो' (फलहीन वृक्ष), 'वञ्झा' (बाँझ स्त्री), 'अ' को 'इ' होकर 'विञ्झो' (विन्ध्य पर्वत)। 'सञ्ज' (आसक्ति) धातु से, निग्गृहीत का लोप होकर, 'सञ्जीयति' (आसक्त होता है) इसलिए 'सज्झं' (चाँदी/रजत), इसी प्रकार अन्य भी। ๔๙. กมยชา โญ. ४९. 'कम' और 'यज' धातुओं से 'ञो' प्रत्यय होता है। กม-อิจฺฉายํ[Pg.244], ยช-เทวปูชาสงฺคติกรณทาเนสุ, เอเตหิ โญ โหติ, มสฺส นิคฺคหีตวคฺคนฺตา, กามียตีติ กญฺญา=กุมารี. ชสฺส ปรรูปตฺตํ, ยชนฺตฺยเนนาติ ยญฺโญ=ยาโค. 'कम' (इच्छा) और 'यज' (देवपूजा, संगतिकरण और दान) धातुओं से 'ञो' प्रत्यय होता है। 'म' को निग्गृहीत और वर्गान्त (ञ) होकर, 'कामीयति' (चाही जाती है) इसलिए 'कञ्ञा' (कुमारी/कन्या)। 'ज' को पररूप होकर, 'यजन्ति' (इसके द्वारा यज्ञ करते हैं) इसलिए 'यञ्ञो' (यज्ञ/याग)। ๕๐. ปุญฺญํ. ५०. पुण्य। ปุนาติ ปุณติสฺมา วา โญโอตฺตาภาโว จ นิปจฺจนฺเต. ปุนาติ, ปุณติ สุนฺทรตฺตํ กโรตีติ วา ปุญฺญํ=กุสลํ. 'पुनाति' (पवित्र करना) या 'पुणति' धातु से 'ञ' प्रत्यय होता है, 'उ' का अभाव और 'त' का लोप निपातन से होता है। जो पवित्र करता है या जो सुंदरता (कल्याण) करता है, वह 'पुण्य' है = कुशल। ๕๑. อร หาญฺโญ หาสฺส หิร จ. ५१. 'अर' और 'हा' धातुओं से 'ञ' प्रत्यय होता है, और 'हा' के स्थान पर 'हिर' आदेश होता है। อร-คมเน, วา-จาเค, เอเตหิ อญฺโญ โหติ, หาสฺส หิรญฺจาเทโส. อรียเต คมฺยเตติ อรญฺญํ=วนํ. ชหาติ สตฺตานํ หีนตฺตนฺติ หิรญฺญํ=ธนํ, สุวณฺณญฺจ. 'अर' (गमन अर्थ में) और 'हा' (त्याग अर्थ में) धातुओं से 'ञ' प्रत्यय होता है, और 'हा' के स्थान पर 'हिर' आदेश होता है। जहाँ जाया जाता है, वह 'अरण्य' है = वन। जो प्राणियों की हीनता को त्यागता है, वह 'हिरण्य' है = धन और सुवर्ण। (อิติ จวคฺคปจฺจยวิธานํ). (इस प्रकार च-वर्ग प्रत्यय विधान समाप्त हुआ)। ๕๒. กิร ตรา กีโฏ. ५२. 'किर' और 'तर' धातुओं से 'ईट' प्रत्यय होता है। กิร-วิกิรเณ, ตร-ตรเณ, เอเตหิ, กีโฏ โหติ. โสเภตุเมตฺถ รตนานิ วิกิรียนฺตีติ กิรีฏํ=มกุฏํ. ตรอิติ นิทฺเทสา อสฺส อิตฺตํ, ตรนฺติ ยนฺติ สุรูปตฺต มเนนาติ ติรีฏํ=เวฏฺฐนํ. 'किर' (विकीर्ण करने के अर्थ में) और 'तर' (तरने के अर्थ में) धातुओं से 'ईट' प्रत्यय होता है। शोभा के लिए जहाँ रत्न बिखेरे जाते हैं, वह 'किरीट' है = मुकुट। 'तर' के निर्देश से 'अ' को 'इ' होता है; जिसके द्वारा सुरूपता को प्राप्त करते हैं, वह 'तिरीट' है = पगड़ी (वेष्टन)। ๕๓. สกาทีหฺยโฏ. ५३. 'सक' आदि धातुओं से 'अट' प्रत्यय होता है। สก-สตฺติยํ, กส-คมเน, กร-กรเณ, มกฺก อิติ สุตฺติโย ธาตุ, เทว-เทวเน, กม-อิจฺฉายํ, เอวมาทิหิ อโฏ โหติ. สณฺโณติ ภารํ วหิตุนฺติ สกโฏ=ยานํ. อกสิ นิโรชตฺตํ อคมีติ กสฏํ=นิโรชํ. กโรติ อมนาปนฺติ กรโฏ=กาโก[Pg.245]. มกฺกติ จลตีติ มกฺกโฏ=วานโร. เทวียติ ปูชียตีติ เทวโฏ=อิสิ. กมติ อิจฺฉติ อาโรหตฺถนฺติ กมโฏ=วามโน. 'सक' (शक्ति अर्थ में), 'कस' (गमन अर्थ में), 'कर' (करण अर्थ में), 'मक्क' (गति अर्थ में), 'देव' (क्रीड़ा/पूजा अर्थ में), 'कम' (इच्छा अर्थ में) आदि धातुओं से 'अट' प्रत्यय होता है। जो भार ढोने में समर्थ है, वह 'सकट' है = यान (गाड़ी)। जो नीरसता को प्राप्त हुआ, वह 'कसाट' है = नीरस। जो अप्रिय कार्य करता है, वह 'करट' है = कौआ। जो चंचल है, वह 'मक्कट' है = वानर। जिसकी पूजा की जाती है, वह 'देवट' है = ऋषि। जो इच्छा करता है या आरोहण के लिए चाहता है, वह 'कमट' है = वामन (बौना)। ๕๔. มกุฏาวาฏ กวาฏ กุกฺกุฏา. ५४. मकुट, आवाट, कवाट और कुक्कुट। เอเต สทฺทา นิปจฺจนฺเต. มํกิสฺมา อุโฏ, นิคฺคหีตโลโป จ, มํเกติ โสเภตีติ มกุฏํ=กิรีฏํ. อวติสฺมา อาฏณ, อวฺยเต ขญฺญเตติ อาวาโฏ=กาสุ. กุ-สทฺเทตีมสฺมา อาโฏ, โออวาเทสา ยถาโยคํ, กวติ รวตีติ กวาฏํ=ทฺวารปิธานํ. กุก วก-อาทาเนตีมสฺมา กุฏก, กุกติ โคจรมาททาตีติ กุกฺกุโฏ=ตมฺพจูโฬ. ये शब्द निपातन से सिद्ध होते हैं। 'मंक' धातु से 'उट' प्रत्यय और अनुस्वार का लोप होता है; जो सुशोभित करता है, वह 'मकुट' है = किरीट। 'अव' धातु से 'आट' प्रत्यय; जहाँ खोदा जाता है, वह 'आवाट' है = गड्ढा। 'कु' (शब्द करना) धातु से 'आट' प्रत्यय और यथायोग्य 'ओ'/'अ' आदेश होते हैं; जो शब्द करता है, वह 'कवाट' है = द्वार का पल्ला। 'कुक' (ग्रहण करना) धातु से 'कुटक' प्रत्यय; जो चारा ग्रहण करता है, वह 'कुक्कुट' है = मुर्गा (ताम्रचूड़)। ๕๕. กมุส กุส กสา โฐ. ५५. 'कम', 'उस', 'कुस' और 'कस' धातुओं से 'ठ' प्रत्यय होता है। กม-อิจฺฉายํ, อุส-ทาเห, กุส-อกฺโกเส, กส-คมเน, เอเตหิโฐ โหติ, นิคฺคหีตวคฺคนฺตา, โอทนาทีนิ กาเมตีติ กณฺโฐ=คโล. โอกฺกปรรูปาทีนิ, โอทนาทีสุ อุณฺเหน อุสียตี ติ โอฏฺโฐ=ทนฺตจฺฉโท, กรโภ จ. กุสียติ อกฺโกสียตีติ โกฏฺโฐ=ธญฺญนิลโย. กสติ ยาติ วินาสนฺติ กฏฺฐํ=ทารุ. 'कम' (इच्छा), 'उस' (दाह), 'कुस' (आक्रोश), 'कस' (गमन) धातुओं से 'ठ' प्रत्यय होता है। अनुस्वार का वर्गान्त (ण) होने पर, जो भात आदि की इच्छा करता है, वह 'कण्ठ' है = गला। 'उ' को 'ओ' और पररूप आदि होने पर, जो भात आदि की उष्णता से जलता है, वह 'ओट्ठ' (ओष्ठ) है = होंठ, और हाथी का बच्चा (करभ)। जिसे कोसा जाता है, वह 'कोट्ठ' (कोष्ठ) है = अन्न का भंडार। जो विनाश को प्राप्त होता है, वह 'कट्ठ' (काष्ठ) है = लकड़ी। ๕๖. กุฏฺฐาทโย. ५६. कुट्ठ आदि। กุฏฺฐอาทโย สทฺทา ฐนฺตา นิปจฺจนฺเต. กุสิสฺมา โฐ, โอตฺตาภาโว จ, กุสียติ อกฺโกสียตีติ กุฏฺฐํ=ฉวิโรโค. กุณ-สทฺเท, ปรรูปาภาโว โอตฺตาภาโว จ, กุณติ นทตีติ กุณฺโฐ=อติขิโณ, กุณียติ อกฺโกสียตีติ กุณฺโฐ= ฉินฺนหตฺถปาทาทิโก[Pg.246]. ทํสิสฺส ทา, ทํสติ เอตายาติ ทาฐา=ทนฺตวิเสโส. กมิสฺส อก จ. กามียาติ ทีเนตีติ กมโฐ=ภิกฺขาภาชนํ, วามโน, กุมฺโม จ. ผสฺสิสฺส ผุโฏ, ผสฺสียตีติ ผุฏฺโฐ=ผสฺโส, เอวมญฺเญปิ. 'कुट्ठ' आदि शब्द 'ठ' प्रत्ययान्त निपातन से सिद्ध होते हैं। 'कुस' धातु से 'ठ' प्रत्यय और 'ओ' का अभाव होता है; जो त्वचा को कष्ट देता है, वह 'कुट्ठ' (कुष्ठ) है = चर्मरोग। 'कुण' (शब्द) धातु में पररूप और 'ओ' का अभाव होता है; जो शब्द करता है, वह 'कुण्ठ' है = अति तीक्ष्ण; जिसे कोसा जाता है, वह 'कुण्ठ' है = कटे हुए हाथ-पैर वाला। 'दंस' के स्थान पर 'दा' आदेश; जिससे डसा जाता है, वह 'दाठा' (दाढ़ा) है = विशेष दाँत। 'कम' धातु के स्थान पर 'अक' आदेश भी होता है; जिससे भिक्षा माँगी जाती है, वह 'कमठ' है = भिक्षा पात्र, वामन, और कछुआ। 'फस्स' के स्थान पर 'फुट' आदेश; जिसका स्पर्श किया जाता है, वह 'फुट्ठ' (स्पृष्ट) है = स्पर्श, इसी प्रकार अन्य भी। ๕๗. วร กรา อณฺโฑ. ५७. 'वर' और 'कर' धातुओं से 'अण्ड' प्रत्यय होता है। วร-วรเณ, กร-กรเณ, เอเตหิ อณฺโฑ โหติ. อตฺตนิ เปผํ วารยตีติ วรณฺโฑ=มุขโรโค. กรียตีติ กรณฺโฑ=ภณฺฑวิเสโส. 'वर' (रोकना) और 'कर' (करना) धातुओं से 'अण्ड' प्रत्यय होता है। जो अपने में कफ को रोकता है, वह 'वरण्ड' है = मुख का रोग। जो बनाया जाता है, वह 'करण्ड' है = विशेष पात्र (पिटारी)। ๕๘. มนนฺตา โฑ. ५८. म-कार और न-कार अन्त वाली धातुओं से 'ड' प्रत्यय होता है। มการ นการนฺเตหิ กฺริยตฺเถหิ พหุลํ ฑปฺปจฺจโย โหติ. สม-อุปสเม, สมนํ สณฺฑํ=สมูโห. กม-ปทวิกฺเขเป, กมติ ยาตีติ กณฺโฑ=สโร, ปริจฺเฉโท จ, ทม-ทมเน, ทมนฺตฺวฺยเนนาติ ทณฺโฑ=นิคฺคโห. อม คม-คมเน, อมนฺติ อุปฺปชฺชนฺติ เอตฺถาติ อณฺโฑ=ปกฺขิปสโว, โกโส จ. คจฺฉติ สูนภาวนฺติ คณฺโฑ=พฺยาธิ, วทเนกเทโส จ. รมุ-กีฬายํ, รมนฺติ เอตฺถาติ รุณฺฑา=วิธวา. มน-ญาเณ, มญฺญนฺติ เอเตนาติ มณฺโฑ=โอทนาทินิสฺสาโว. ขน ขณ=อวทารเณ, ขญฺญตีติ ขณฺโฑ=อุจฺฉุวิการ วิเสโส. ลม-หึสายํ, ลมติ หึสติ สุจิภาวนฺติ ลณฺโฑ=วจฺจํ, เอวมญฺเญปิ. म-कार और न-कार अन्त वाली धातुओं से बहुलता से 'ड' प्रत्यय होता है। 'सम' (उपशम) से 'सण्ड' = समूह। 'कम' (पग विक्षेप) से 'कण्ड' = बाण, और परिच्छेद। 'दम' (दमन) से 'दण्ड' = निग्रह। 'अम' और 'गम' (गमन) से; जिसमें उत्पन्न होते हैं, वह 'अण्ड' है = पक्षी का अंडा, और कोश। जो सूजन को प्राप्त होता है, वह 'गण्ड' है = व्याधि (फोड़ा), और मुख का एक भाग। 'रमु' (क्रीड़ा) से; जिसमें रमण करते हैं, वह 'रुण्डा' है = विधवा। 'मन' (ज्ञान) से; जिससे जानते हैं, वह 'मण्ड' है = मांड। 'खन'/'खण' (खोदना) से; जो खोदा जाता है, वह 'खण्ड' है = ईख का विकार विशेष। 'लम' (हिंसा) से; जो पवित्रता की हिंसा करता है, वह 'लण्ड' है = विष्ठा, इसी प्रकार अन्य भी। ๕๙. กุณฺฑา ทโย. ५९. कुण्ड आदि। กุณฺฑอาทโย ฑนฺตา นิปจฺจนฺเต. กม มน ตนานํ อสฺส อุตฺตํ, กามียตีติ กุณฺฑํ=ภาชนํ. มญฺญติ หิตาหิตนฺติ มุณฺโฑ= ฉินฺนเกโส[Pg.247]. ตโนติ เอเตนาติ ตุณฺฑํ=ลปนํ. อีร-เขเป, เอรํอาเทโส. อีรติ กมฺปตีติ เอรณฺโฑ=พฺยคฺฆปุจฺโฉ, สิ-เสวายํ, สิสฺส ขมุก, สุคนฺธํ เสวตีติ สิขณฺโฑ=จูฬา, เอวมญฺเญปิ. 'कुण्ड' आदि शब्द 'ड' प्रत्ययान्त निपातन से सिद्ध होते हैं। 'कम', 'मन' और 'तन' के 'अ' को 'उ' होता है; जिसकी इच्छा की जाती है, वह 'कुण्ड' है = पात्र। जो हित-अहित को जानता है, वह 'मुण्ड' है = मुँडा हुआ सिर। जिससे विस्तार करता है, वह 'तुण्ड' है = मुख। 'ईर' (फेंकना) धातु से 'एर' आदेश; जो काँपता है, वह 'एरण्ड' है = अरण्डी। 'सि' (सेवन) धातु से 'सि' को 'खमुक' आदेश; जो सुगंध का सेवन करता है, वह 'सिखण्ड' है = चोटी, इसी प्रकार अन्य भी। ๖๐. ติช กส ตส ทกฺขา กิโณ ชสฺส โข จ. ६०. 'तिज', 'कस', 'तस' और 'दक्ख' धातुओं से 'किण' प्रत्यय होता है, और 'ज' के स्थान पर 'ख' होता है। ติช-นิสาเน, กส-คมเน, ตส-ปิปาสายํ, ทกฺข-วุทฺธิยํ, เอเตหิ กิโณ โหติ, ชสฺส โข จ, เตชยิตฺถาติ ติขิณํ=นิสิตํ. กสติ ปวตฺตตีติ กสิณํ=อเสสํ. ตสนํ ตสิณา=ตณฺหา. ทกฺขติ วุทฺธึ คจฺฉติ เอตายาติ ทกฺขีณา=กุสลํ. 'तिज' (तीक्ष्ण करना), 'कस' (गमन), 'तस' (प्यास), 'दक्ख' (वृद्धि) धातुओं से 'किण' प्रत्यय होता है और 'ज' को 'ख' होता है। जो तीक्ष्ण किया गया, वह 'तिखिण' (तीक्ष्ण) है = पैना। जो प्रवृत्त होता है, वह 'कसिण' (कृत्स्न) है = संपूर्ण। प्यास लगना 'तसिणा' है = तृष्णा। जिससे वृद्धि को प्राप्त होता है, वह 'दक्खिणा' (दक्षिणा) है = कुशल। ๖๑. วีอาทิโต ณิ. ६१. 'वी' आदि से 'णि' प्रत्यय होता है। วี-ตนฺตสนฺตาเน, สิ-เสวาสํ, สู-ปสฺสวเน, ทุ-คมเน, กี-ทพฺพวินีมเย, สา-ตนุกรณาวสาเนสุ, เอวมาทีหิ ณิ โหติ. วียตีติ เวณิ=เกสกลาโป. เสวนํ เสณิ=สชาตีนํ การูนํ สมูโห. นิปุพฺโพ, นิเสวียตีติ นิเสณิ=โสปานํ. สวติ ปสฺสวตีติ โสณิ=กฏิ. ทวติ วหตีติ โทณิ=กฏฺฐมฺพุวาหนี, นาวา จ. นทาทิปาฐา วิมฺหิ โสณี โทณี ติปิ โหติ. กยนํ, กียเต เอตายาติ วา เกณิ=กโย สาติ ทุกฺขํ ตนุํ กโรตีติ สาณิ=ติโรกรณี, เอวมญฺเญปิ. 'वी' (तन्तु विस्तार), 'सि' (सेवन), 'सू' (प्रसव), 'दु' (गमन), 'की' (द्रव्य विनिमय), 'सा' (तनुकरण/अवसान) आदि धातुओं से 'णि' प्रत्यय होता है। जो बुनी जाती है, वह 'वेणि' है = केश-समूह। सेवन करना 'सेणि' (श्रेणी) है = सजातीय शिल्पियों का समूह। 'नि' उपसर्ग पूर्वक, जिसका सेवन किया जाता है, वह 'निसेणि' (निश्रेणी) है = सीढ़ी। जो बहती है, वह 'सोणि' (श्रोणि) है = कमर। जो बहती है या ले जाती है, वह 'दोणि' (द्रोणी) है = लकड़ी का जल-पात्र, और नाव। नदादि पाठ के कारण विकल्प से 'सोणी' और 'दोणी' भी होते हैं। खरीदना या जिसके द्वारा खरीदा जाता है, वह 'केणि' है = क्रय। जो दुःख को कम करती है, वह 'साणि' (शाणी) है = परदा, इसी प्रकार अन्य भी। ๖๒. คหาทีหฺยณิ. ६२. 'गह' आदि से 'अणि' प्रत्यय होता है। คห-อุปาทาเน, อร-คมเน, ธร-ธารเณ, สร-คติยึสา จินฺตาสุ, ตร-ตรเณ, เอวมาทีหิ อณิปฺปจฺจโย โหติ. คณฺหาตีติ คหณิ=อสิตาทิปาจโก อคฺคิ. อรียติ คมียตีติ อรณิ=อคฺคิมนฺถนกฏฺฐํ[Pg.248]. ธาเรตีติ ธรณิ=มหี. สรียติ คมียตีติ ภรณิ=มคฺโค. ตรนฺตฺยเนนาติ ตรณิ=นาวา, สูริโย จ. 'गह' (ग्रहण), 'अर' (गमन), 'धर' (धारण), 'सर' (गति/हिंसा/चिंता), 'तर' (तरना) आदि धातुओं से 'अणि' प्रत्यय होता है। जो ग्रहण करती है, वह 'गहणि' (ग्रहणी) है = पाचक अग्नि। जहाँ गमन किया जाता है, वह 'अरणि' है = अग्नि पैदा करने वाली लकड़ी। जो धारण करती है, वह 'धरणि' है = पृथ्वी। जहाँ गमन किया जाता है, वह 'भरणि' है = मार्ग। जिसके द्वारा तरते हैं, वह 'तरणि' है = नाव, और सूर्य। ๖๓. รีวีภาหิ ณุ. ६३. 'री', 'वी' और 'भा' धातुओं से 'णु' प्रत्यय होता है। รี-ปสฺสวเน, วี วา-คมเน, ภา-ทิตฺติยํ, เอเตหิณุ โหติ. รียติ ปสฺสวตีติ เรณุ=รโช. เวติ ปวตฺตตีติ เวณุ=เวฬุ. ภาติ ทิพฺพตีติ ภาณุ=รํสิ. ‘Rī’ (प्रस्रवण/बहना), ‘vī’ (गमन/जाना), ‘bhā’ (दीप्ति/चमकना) धातुओं से ‘ṇu’ प्रत्यय होता है। जो बहता है वह ‘reṇu’ (धूल) है। जो प्रवृत्त होता है वह ‘veṇu’ (बाँस) है। जो चमकता है वह ‘bhāṇu’ (किरण/सूर्य) है। ๖๔. ขาณฺวา ทโย. ६४. खाणु आदि। ขาณุอาทโย ณุอนฺตา นิปจฺจนฺเต. ขณ ขน-อวทารเณ, ณสฺส อา, ขญฺญติ อวทารียตีติ ขาณุ=ฉินฺนสาโข รุกฺโข. ชน-ชนเน, นสฺส วา อาตฺตํ, ชายติ คมน มเนนาติ ชาณุ, ชณฺณุ=ชงฺโฆรูนํ สนฺธิ. หร-หรเณ, เอก, หรียตีติ หเรณุ=คนฺธทพฺพ, เอวมญฺเญปิ. खाणु आदि ‘ṇu’ प्रत्ययान्त शब्द निपातन से सिद्ध होते हैं। ‘Khaṇa’ (खोदना) धातु से, ‘ṇ’ को ‘ā’ होकर, जो खोदा जाता है वह ‘khāṇu’ (शाखा कटा हुआ वृक्ष/ठूँठ) है। ‘Jana’ (उत्पन्न होना) धातु से, ‘n’ को विकल्प से ‘ā’ होकर, जिससे गमन उत्पन्न होता है वह ‘jāṇu’ या ‘jaṇṇu’ (जंघा और ऊरु की संधि/घुटना) है। ‘Hara’ (हरण करना) धातु से, जो हरण किया जाता है वह ‘hareṇu’ (एक सुगंधित द्रव्य) है। इसी प्रकार अन्य भी। ๖๕. กฺวาทิโต โณ. ६५. ‘Ku’ आदि से ‘ṇo’ प्रत्यय होता है। กุ-สทฺเท, สุ-สวเน, ทุ-คมเน, วร-วรเณ, กร-กรเณ, ปณ-พฺยวหารถุติสุ, ตา-ปาลเน, ลี-นิลียเน, เอวมาทีหิ โณ โหติ. กวติ นทติ เอตฺถาติ โกโณ=อสฺสิ, วีณาทิวาทนทณฺโฑ จ. สุโณตีติ โสโณ=สุนโข, นโร จ. ทวติ ปวตฺตตีติ โทโณ=ปริมาณวิเสโส. วิรูปตฺต วาเรตีติ วณฺโณ=นีลาทิ. สวนํ กโรตีติ กณฺโณ=สวนํ. ปณียติ โวหรียตีติ ปณฺโณ=ปลาโส. ลายตีติ ตาณํ=รกฺขา. นิลียนฺติ เอตฺถาติ เลณํ=นิลียนฏฺฐานํ. ‘Ku’ (शब्द), ‘su’ (सुनना), ‘du’ (जाना), ‘vara’ (रोकना), ‘kara’ (करना), ‘paṇa’ (व्यवहार और स्तुति), ‘tā’ (पालन), ‘lī’ (छिपना) आदि धातुओं से ‘ṇo’ प्रत्यय होता है। जहाँ शब्द होता है वह ‘koṇo’ (कोना या वीणा आदि बजाने का दण्ड) है। जो सुनता है वह ‘soṇo’ (कुत्ता या मनुष्य) है। जो प्रवृत्त होता है वह ‘doṇo’ (एक विशेष माप) है। जो विरूपता को रोकता है वह ‘vaṇṇo’ (नील आदि वर्ण) है। जो श्रवण करता है वह ‘kaṇṇo’ (कान) है। जिसका व्यवहार किया जाता है वह ‘paṇṇo’ (पत्ता/पलाश) है। जो रक्षा करता है वह ‘tāṇaṃ’ (रक्षा) है। जहाँ छिपते हैं वह ‘leṇaṃ’ (लयन/छिपने का स्थान) है। ๖๖. สุวีหิ ณก. ६६. ‘Su’ और ‘vī’ धातुओं से ‘ṇaka’ प्रत्यय होता है। สุ-สวเน[Pg.249], วี-ตนฺตสนฺตาเน, เอเตหิ ณก โหติ. สุโณตีติ สุโณ=สุนโข. วียตีติ วีณา=วลฺลกี. ‘Su’ (सुनना) और ‘vī’ (तन्तु-विस्तार) धातुओं से ‘ṇaka’ प्रत्यय होता है। जो सुनता है वह ‘suṇo’ (कुत्ता) है। जो बुना जाता है वह ‘vīṇā’ (वीणा) है। ๖๗. ติณาทโย. ६७. तृण (तिण) आदि। ติณอาทโย ณกนฺตา นิปจฺจนฺเต. ติช-เตชเน, ชโลโป, เตเชติ เอเตนาติ ติณํ=พีรณาทิ. ลี ลิห สาท กฺเลทานํ โล ลวา, ลียติ รสโต สพฺพตฺถ อลฺลียตีติ โลณํ ลวณํ, เลหียตีติ โลณํ ลวณํ, สาทียตีติ โลณํ ลวณํ, กฺเลทยตีติ โลณํ ลวณํ, คมิสฺส โอ, คจฺฉตีติ โคโณ=โค. หร-หรเณ, ณสฺสญฺชิ, หรียตีติ หริโณ=มิโค. อีร-กมฺปเน, รสฺสตฺตํ, ณสฺส ญิจ, อตฺตโน ลูขภาเว สมฺปตฺเต อีรติ กมฺปตีติ อิริณํ=อูสรํ. ถุ-อภิตฺถเว, ทีโฆ, อภิตฺถวียตีติ ถูณํ=นครํ, ถูโณ=ฆรตฺถมฺโภ, เอวมญฺเญปิ. तृण (तिण) आदि ‘ṇaka’ प्रत्ययान्त शब्द निपातन से सिद्ध होते हैं। ‘Tija’ (तेज करना) धातु से ‘j’ का लोप होकर, जिससे तेज किया जाता है वह ‘tiṇaṃ’ (तृण/घास) है। ‘Lī’, ‘liha’, ‘sāda’ और ‘kleda’ धातुओं से ‘lo’ और ‘lava’ आदेश होकर; जो रस के कारण सब जगह चिपकता है, जो चाटा जाता है, जो आस्वादन किया जाता है, जो गीला करता है वह ‘loṇaṃ’ (नमक) है। ‘Gamu’ धातु के ‘a’ को ‘o’ होकर, जो चलता है वह ‘goṇo’ (बैल) है। ‘Hara’ (हरण करना) धातु से, जो हरण किया जाता है वह ‘hariṇo’ (हिरण) है। ‘Īra’ (काँपना) धातु से, ह्रस्व होकर, अपने रूखेपन के कारण जो काँपता है वह ‘iriṇaṃ’ (ऊसर भूमि) है। ‘Thu’ (स्तुति करना) धातु से, दीर्घ होकर, जिसकी स्तुति की जाती है वह ‘thūṇaṃ’ (नगर) है और ‘thūṇo’ (घर का खंभा) है। इसी प्रकार अन्य भी। ๖๘. รวณ วรณ ปูรณา ทโย. ६८. रवण, वरण, पूरण आदि। รวณ วรณ ปูรณา ทโย อณปฺปจฺจเยน สิทฺธา. รวตีติ รวโณ=โกกิโล. วาเรตีติ วรโณ=ปากาโร. ปูรียเต อเนนาติ ปูรโณ=ปริปูรี. रवण, वरण, पूरण आदि ‘aṇa’ प्रत्यय से सिद्ध होते हैं। जो शब्द करता है वह ‘ravaṇo’ (कोयल) है। जो रोकता है वह ‘varaṇo’ (प्राकार/दीवार) है। जिससे भरा जाता है वह ‘pūraṇo’ (परिपूर्णता) है। (อิติ ฏวคฺคปจฺจยวิธานํ). (इस प्रकार ट-वर्ग प्रत्यय विधान समाप्त हुआ)। ๖๙. ปาวสา อติ. ६९. ‘Pā’ और ‘vasa’ धातुओं से ‘ati’ प्रत्यय होता है। ปา-รกฺขเณ, วส-นิวาเส, เอเตติ อติ โหติ. ปุพฺพสรโลโป, ปาติ รกฺขตีติ ปติ=สามี, วสนฺติ เอตฺถาติ วสติ=เคหํ. ‘Pā’ (रक्षा करना) और ‘vasa’ (निवास करना) धातुओं से ‘ati’ प्रत्यय होता है। पूर्व स्वर का लोप होकर, जो रक्षा करता है वह ‘pati’ (स्वामी) है। जहाँ निवास करते हैं वह ‘vasati’ (घर) है। ๗๐. ธา หิ สิ ตน ชน ชร คม สจา ตุ. ७०. ‘Dhā’, ‘hi’, ‘si’, ‘tana’, ‘jana’, ‘jara’, ‘gama’ और ‘saca’ धातुओं से ‘tu’ प्रत्यय होता है। ธา-ธารเณ[Pg.250], หิ-คติยํ, ตน-วิตฺถาเร, ชน-ชนเน, ชร-วโย-หานิยํ, อม คม-คมเน, สจ-สมวาเย, เอเตหิ ตุ โหติ. ธาเรตีติ ธาตุ=เครุกาทิ. หิโนติ ปวตฺตาติ ผลํ เอเตนาติ เหตุ=การณํ, เสวียติ ชเนหีติ เสตุ=พนฺธติ (ปทฺธติ). ตญฺญเตติ ตนฺตุ=สุตฺตํ. ชนียเต กมฺมกิเลเสหีติ ชนฺตุ, ชายติ กมฺมกิเลหีติ วา ชนฺตุ=สตฺโต. ชีรตีติ ชตฺตุ=อํสสนฺธิ. คจฺฉตีติ คนฺตุ=คมิโก, สจติ สเมตีติ สตฺตุ=ยวาทิจุณฺณํ. ‘Dhā’ (धारण करना), ‘hi’ (गति), ‘tana’ (विस्तार), ‘jana’ (उत्पन्न होना), ‘jara’ (अवस्था की हानि/बुढ़ापा), ‘gama’ (जाना), ‘saca’ (समवाय/मिलना) धातुओं से ‘tu’ प्रत्यय होता है। जो धारण करता है वह ‘dhātu’ (गेरू आदि धातु) है। जिससे फल प्रवृत्त होता है वह ‘hetu’ (कारण) है। जो लोगों द्वारा सेवित होता है वह ‘setu’ (बाँध या मार्ग) है। जो फैलाया जाता है वह ‘tantu’ (सूत/धागा) है। जो कर्म-क्लेशों से उत्पन्न होता है वह ‘jantu’ (प्राणी) है। जो जीर्ण होता है वह ‘jattu’ (कंधे की संधि) है। जो जाता है वह ‘gantu’ (जाने वाला) है। जो मिलता है वह ‘sattu’ (जौ आदि का चूर्ण/सत्तू) है। ๗๑. อริสฺสุฏ จ. ७१. ‘Ara’ धातु से ‘tu’ प्रत्यय होता है और ‘ara’ के स्थान पर ‘uṭa’ आदेश होता है। อร-คมเนตีมสฺมา ตุ โหติ, อริสฺส อุฏ อาเทโสจ. อรติ ปวตฺตตีติ อุตุ=เหมนฺตาทิ, जो प्रवृत्त होता है वह ‘utu’ (ऋतु/हेमंत आदि) है। ๗๒. ปิตฺวาทโย. ७२. पितु आदि। ปิตุอาทโย สทฺทา ตุอนฺตา นิปจฺจนฺเต. ปา-รกฺขเณ, อาสฺส อิตฺตํ, ปาติ รกฺขตีติ ปิตา=ชนโก. ปาติสฺเสวาทิสฺส โม, ปาเยตีติ มาตา=ชนนี. ภา-ทิตฺติยํ, ภาตีติ ภาตา=โสทริโย. ธา-ธารเณ, อาสฺส อีตฺตํ, ธารียตีติ ธีตา=ปุตฺตี. ทุห-ปปูรเณ, โอตฺตาภาโว, ตุสฺส ญฺฉิจ. ทุหติ ปสเว ปปูเรตีติ ทุหิตา=ปุตฺตี. ชน-ชนเน, อสฺส อาตฺตํ, มา จานฺตาเทโส. ปปุตฺเต ชเนตีติ ชามาตา=ทุหิตุปติ. นห-พนฺธเน, นหียติ พนฺธียติ เปเมนาติ นตฺตา-ปปุตฺโต. หุ-หวเน, หวติ ปูเชตีติ โหตา=ยญฺญโก. ปู-ปวเน, ปุนาติ [Pg.251] อายตึ ภวํ ปวิตฺตํ กโรตีติ โปตา=โสเยว. पितु आदि शब्द ‘tu’ प्रत्ययान्त निपातन से सिद्ध होते हैं। ‘Pā’ (रक्षा करना) धातु से, ‘ā’ को ‘i’ होकर, जो रक्षा करता है वह ‘pitā’ (पिता/जनक) है। ‘Pā’ (पिलाना/पोषण करना) धातु से ‘m’ आदेश होकर, जो पिलाती है वह ‘mātā’ (माता/जननी) है। ‘Bhā’ (दीप्ति) धातु से, जो चमकता है वह ‘bhātā’ (भाई/सहोदर) है। ‘Dhā’ (धारण करना) धातु से, ‘ā’ को ‘ī’ होकर, जो धारण की जाती है वह ‘dhītā’ (पुत्री) है। ‘Duha’ (पूर्ण करना/दुहना) धातु से, जो प्रसव को पूर्ण करती है वह ‘duhitā’ (पुत्री) है। ‘Jana’ (उत्पन्न करना) धातु से, ‘a’ को ‘ā’ और अंत में ‘mā’ आदेश होकर, जो प्रपौत्र को उत्पन्न करता है वह ‘jāmātā’ (दामाद) है। ‘Naha’ (बाँधना) धातु से, जो प्रेम से बँधा होता है वह ‘nattā’ (पोता/नाती) है। ‘Hu’ (हवन करना) धातु से, जो हवन या पूजा करता है वह ‘hotā’ (यज्ञ करने वाला) है। ‘Pū’ (पवित्र करना) धातु से, जो भविष्य के भव को पवित्र करता है वह ‘potā’ (पोता) है। ๗๓. ชน กรา รตุ. ७३. ‘Jana’ और ‘kara’ धातुओं से ‘ratu’ प्रत्यय होता है। ชน-ชนเน, กร-กรเณ, เอเตหิ รตุ โหติ, รกาโร อนฺตสราทิโลปตฺโถ. ชายตีติ ชตุ=ลาขา. กรียตีติ กตุ=สยูโป ยญฺโญ. ‘Jana’ (उत्पन्न होना) और ‘kara’ (करना) धातुओं से ‘ratu’ प्रत्यय होता है, ‘r’ का लोप अंत स्वर आदि के लोप के लिए है। जो उत्पन्न होता है वह ‘jatu’ (लाख) है। जो किया जाता है वह ‘katu’ (यज्ञ) है। ๗๔. สกา อุนฺโต. ७४. ‘Saka’ धातु से ‘unto’ प्रत्यय होता है। สก-สตฺติยมิจฺจสฺมา อุนฺโต โหติ. สกฺโกตีติ สกุนฺโต=ปกฺขี. ‘Saka’ (शक्ति/सामर्थ्य) धातु से ‘unto’ प्रत्यय होता है। जो समर्थ है वह ‘sakunto’ (पक्षी) है। ๗๕. กปา โอโต. ७५. ‘Kapa’ धातु से ‘oto’ प्रत्यय होता है। กป-อจฺฉาทเน อิจฺจสฺมา โอโต โหติ. กปตีติ กโปโต=ปาเรวโต. โฏ ตสฺส วา โหติ กโปโฏ=โสเยว. ‘Kapa’ (आच्छादन/ढकना) धातु से ‘oto’ प्रत्यय होता है। जो ढकता है वह ‘kapoto’ (कबूतर) है। ‘t’ के स्थान पर विकल्प से ‘ṭ’ होकर ‘kapoṭo’ भी होता है। ๗๖. วสาทีหฺยนฺโต. ७६. ‘Vasa’ आदि धातुओं से ‘anto’ प्रत्यय होता है। วส-นิวาเส, รุห-ชนเน, ภทฺท-กลฺยาเณ, นนฺท-สมิทฺธิยํ, ชีว-ปาณธารเณ, เอวมาทีติ อนฺโต โหหิ. วสนฺติ เอตสฺมึ กาเล กีฬาปสุตาติ วสนฺโต=อุตุ. รุหติ ชายตีติ รุหนฺโต=รุกฺโข, เอวํนามโก มิคราชา จ. ภทฺทิสฺส สํโยคาทิโลโป, ภชติ กลฺยาณธมฺมนฺติ ภทนฺโต=ปพฺพชิโต. นนฺทติ เอตายาติ นนฺทนฺตี=สขี, นทาทิปาฐา วี, เอวมุปริ จ. ชีวนฺติ เอตา- ยาติ [Pg.252] ชีวนฺตี=โอสธิ. สวตีติ สวนฺตี=นที. โรทาเปตีติ โรทนฺตี=โอสธิ. อวติ รกฺขตีติ อวนฺตี=ชนปโท. ‘Vasa’ (निवास), ‘ruha’ (उत्पन्न होना), ‘bhadda’ (कल्याण), ‘nanda’ (समृद्धि), ‘jīva’ (प्राण धारण करना) आदि धातुओं से ‘anto’ प्रत्यय होता है। जिस काल में क्रीड़ा में लगे लोग निवास करते हैं वह ‘vasanto’ (वसंत ऋतु) है। जो बढ़ता है वह ‘ruhanto’ (वृक्ष) है, और इसी नाम का एक मृगराज भी है। ‘Bhadda’ के संयोग आदि का लोप होकर, जो कल्याण धर्म का भजन करता है वह ‘bhadanto’ (भदंत/प्रव्रजित) है। जिससे आनंद मिलता है वह ‘nandantī’ (सखी) है। जिससे जीवित रहते हैं वह ‘jīvantī’ (औषधि) है। जो बहती है वह ‘savantī’ (नदी) है। जो रुलाती है वह ‘rodantī’ (औषधि) है। जो रक्षा करती है वह ‘avantī’ (अवंती जनपद) है। ๗๗. หิสีนํ มุก จ. ७७. ‘Hi’ और ‘sī’ धातुओं से ‘anto’ प्रत्यय और ‘muka’ आगम होता है। หิ-คติย, สี-สเย, เอเตหิ อนฺโต โหติ มุก จ. กกาโร อนฺตาวยวตฺโถ, หิมํ หิโนติ ปวตฺตติ เอตสฺมินฺติ เหมนฺโต=อุตุ, สยนฺติ เอตฺถ อูกา กุสุมาทโย จาติ สีมนฺโต=เกสมคฺโค. ‘Hi’ (गति) और ‘sī’ (शयन) धातुओं से ‘anto’ प्रत्यय और ‘muka’ आगम होता है। ‘k’ अंत अवयव के लिए है। जिसमें हिम प्रवृत्त होता है वह ‘hemanto’ (हेमंत ऋतु) है। जहाँ जूँ और पुष्प आदि रहते हैं वह ‘sīmanto’ (सीमंत/केश मार्ग) है। ๗๘. หร รุห กุลา อิโต. ७८. 'हर', 'रुह' और 'कुल' धातुओं से 'इतो' प्रत्यय होता है। หร-หรเณ, รุห-ชนเน, กุล-ปตฺถาเร, เอเตติ อิโต โหติ. อตฺตโน สิเนหํ หรตีติ หริโต=วณฺณวิเสโส. รุหตีติ โรหิโต=มจฺฉวิเสโส. รุหติ สรีเร พฺยาปนวเสนาติ โรหิตํ, รสฺส ลตฺเต โลหิตํ=รุธิรํ. อตฺตโน คุณํ กุลติ ปตฺถรตีติ โกลิโต=ทุติยคฺคสาวโก, เอวํ นามโก มรุ จ. 'हर' (हरण करना), 'रुह' (उत्पन्न होना) और 'कुल' (विस्तार करना) धातुओं से 'इतो' प्रत्यय होता है। 'अत्तनो सिनेहं हरति' (अपने स्नेह को हरता है) इसलिए 'हरितो' (एक विशेष वर्ण/हरा)। 'रुहति' (उत्पन्न होता है) इसलिए 'रोहितो' (एक विशेष मछली)। 'रुहति' (शरीर में व्याप्त होने के कारण) इसलिए 'रोहितं', 'र' को 'ल' होकर 'लोहितं' (रक्त/खून)। 'अत्तनो गुणं कुलति' (अपने गुणों का विस्तार करता है) इसलिए 'कोलितो' (द्वितीय अग्रश्रावक मोग्गल्लान का नाम और इसी नाम का एक देव)। ๗๙. ภราทีหฺยโต. ७९. 'भर' आदि धातुओं से 'अतो' प्रत्यय होता है। ภร รํช ยช ปจ เอวมาทีหิ อโต โหติ. ภรตีติ ภรโต=นโฏ. นิคฺคหีตโลโป, รญฺชนฺติ เอตฺถาหิ รชตํ=สชฺฌํ. ยชิตพฺโพติ ยชโต=อคฺคิ. ปจตีติ ปจโต=สูปกาโร. 'भर', 'रञ्ज', 'यज', 'पच' आदि धातुओं से 'अतो' प्रत्यय होता है। 'भरति' (भरण करता है) इसलिए 'भरतो' (नट/अभिनेता)। निग्गृहीत का लोप होकर, 'रञ्जन्ति' (इसमें प्रसन्न होते हैं) इसलिए 'रजतं' (चाँदी)। 'यजितब्बो' (यज्ञ के योग्य) इसलिए 'यजतो' (अग्नि)। 'पचति' (पकाता है) इसलिए 'पचतो' (रसोइया/सूपकार)। ๘๐. กิรา ทีหฺยาตก. ८०. 'किर' आदि धातुओं से 'आतक' प्रत्यय होता है। กิร-วิกิรเณ, อล-พนฺธเน, จิล-วสเน, เอวมาทีหิ อาตก โหติ, กิรตีติ กิราโต=สวโร, รสฺส ลกฺเก กิ- ลาโต=โสว[Pg.253]. อลตีติ อลาตํ=อุมฺมุกํ. จิลตีติ จิลาโต=มลจฺฉชาติ. 'किर' (बिखेरना), 'अल' (बाँधना), 'चिल' (पहनना) आदि धातुओं से 'आतक' प्रत्यय होता है। 'किरति' (बिखेरता है) इसलिए 'किरातो' (शबर/किरात), 'र' को 'ल' होकर 'किलातो' (खोआ/सोव)। 'अलति' (बाँधता है) इसलिए 'अलातं' (लुकाठी/उम्मुक)। 'चिलति' (पहनता है) इसलिए 'चिलातो' (एक म्लेच्छ जाति)। ๘๑. อมาทีหฺยตฺโต. ८१. 'अम' आदि धातुओं से 'अत्त' प्रत्यय होता है। อม มา วร กลาทีหิ อตฺโต โหติ. อมติ กาลนฺตรํ ปวตฺตตีติ อมตฺตํ=ภาชนํ. ปุพฺพสรโลโป, มานํ มตฺตํ=ปมาณํ ปริจฺเฉโท จ. วรนฺตุเนนาติ วรตฺตา=โยตฺตํ. กลติ ปริจฺฉินฺทตีติ กลตฺตํ=ภริยา. 'अम', 'मा', 'वर', 'कल' आदि धातुओं से 'अत्त' प्रत्यय होता है। 'अमति' (समय के साथ प्रवृत्त होता है) इसलिए 'अमत्तं' (बर्तन/भाजन)। पूर्व स्वर का लोप होकर, 'मानं' (माप) इसलिए 'मत्तं' (प्रमाण/परिच्छेद)। 'वरन्तुनेन' (इसके द्वारा चुनते/बाँधते हैं) इसलिए 'वरत्ता' (चमड़े की रस्सी/योत्र)। 'कलति' (परिच्छेद करता है) इसलिए 'कलत्तं' (पत्नी/भार्या)। ๘๒. วาทีหิ โต. ८२. 'वा' आदि धातुओं से 'तो' प्रत्यय होता है। วา-คมเน, ตา-ปาลเน, ตน-วิตฺถาเร, ทม-อุปสเม, อ-มคมเน, สิ-เสวายํ, สุ-สวเน, ปู ปวเน, คุป-โควเน, ยุช-สํยเม, คห-อุปาทาเน, อต-สาตจฺจคมาน, ขิป-เปรเณ, เอวมาทีหิ โต โหติ. วายตีติ วาโต=วายุ. ตายตีติ ตาโต=ปิตา. ตนุเตติ ตนฺตํ=ตนฺตโว. ทมตีติ อนฺโต=ทสโน. อมติ ยาตีติ อนฺโต=โอสานํ, โกฏฺฐาสสมีปาวยวา จ. เสวียตีติ เสโต=ธวโล. สุณนฺตุเนนาติ โสตํ=สวนํ. สวตีติ โสโต=ชลปฺปวาโห. ปุนียตีติ โปโต=พาโล. โคปียตีติ โคตฺถํ=กลาทิ. โยชนฺตฺยเนนาติ โยตฺตํ=รชฺชุ. มมายนฺเตหิ คยฺหตีติ คตฺตํ=สรีรํ. อพาธํ นิรนฺตรํ อตติ ปวตฺตตีติ อตฺตา=มนาทิ. ขิปียติ เอตฺถาติ เขตฺตํ=เกทารํ. 'वा' (जाना), 'ता' (पालन करना), 'तन' (विस्तार करना), 'दम' (उपशम करना), 'अम' (जाना), 'सि' (सेवा करना), 'सु' (सुनना), 'पू' (पवित्र करना), 'गुप' (रक्षा करना), 'युज' (संयम/जोड़ना), 'गह' (ग्रहण करना), 'अत' (निरन्तर जाना), 'खिप' (प्रेरणा/फेंकना) आदि धातुओं से 'तो' प्रत्यय होता है। 'वायति' (बहती है) इसलिए 'वातो' (वायु)। 'तायति' (रक्षा करता है) इसलिए 'तातो' (पिता)। 'तनुते' (विस्तार करता है) इसलिए 'तन्तं' (तन्तु/धागा)। 'दमति' (दमन करता है) इसलिए 'अन्तो' (दाँत)। 'अमति' (जाता है) इसलिए 'अन्तो' (अवसान/अन्त, हिस्सा या समीप का अवयव)। 'सेवीयति' (सेवा की जाती है) इसलिए 'सेतो' (सफेद/धवल)। 'सुणन्तुनेन' (इसके द्वारा सुनते हैं) इसलिए 'सोतं' (कान/श्रवण)। 'सवति' (बहता है) इसलिए 'सोतो' (जलप्रवाह/सोता)। 'पुनीयति' (पवित्र किया जाता है) इसलिए 'पोतो' (बालक/शावक)। 'गोपीयति' (रक्षा की जाती है) इसलिए 'गोत्थं' (कुल आदि)। 'योजन्ति' (इसके द्वारा जोड़ते हैं) इसलिए 'योत्तं' (रस्सी)। 'ममायन्तेहि गय्हति' (ममत्व करने वालों द्वारा ग्रहण किया जाता है) इसलिए 'गत्तं' (शरीर)। 'अबाधं निरन्तरं अतति' (बिना बाधा के निरन्तर प्रवृत्त होता है) इसलिए 'अत्ता' (आत्मा/मन आदि)। 'खिपीयति' (इसमें बोया/फेंका जाता है) इसलिए 'खेत्तं' (खेत/केदार)। ๘๓. ฆราทีหิ ตก. ८३. 'घर' आदि धातुओं से 'तक' प्रत्यय होता है। คร ฆร-เสจเน, สิ-เสวายํ, ทู-ปริตาปเน, มิท-สิเนเห, จิต-สญฺเจตเน, ปุส-โปสเน, วิท-ลาเภ, เอวมาทีหิ ตก [Pg.254]๔ โหติ, ฆรติ สิญฺจตีติ ฆตํ=สปฺปิ. เสวียตีติ สิโต=เสโต. ทุพฺพจตฺตา ทูยติ ปริตาเปตีติ ทูโต=เปสรกาโร. มิชฺชติ สิเนหตีติ มิตฺโต=สุหทโย. จินฺเตตีติ จิตฺตํ=วิญฺญาณํ จิตฺตกมฺมาทิ จ. โปสียตีติ ปุตฺโต=อตฺตโช. วินฺทนฺติ ปีติ มเนนาติ วิตฺตํ=ธนํ. วร-วรณสมฺภตฺตีสุ, วรณํ วตฺตํ=พฺรหฺมจริยาทิ. 'गर', 'घर' (सींचना), 'सि' (सेवा करना), 'दू' (परिताप देना), 'मिद' (स्नेह करना), 'चित' (सोचना), 'पुस' (पोषण करना), 'विद' (लाभ) आदि धातुओं से 'तक' प्रत्यय होता है। 'घरति' (सींचता है) इसलिए 'घतं' (घी/सर्पि)। 'सेवीयति' (सेवा की जाती है) इसलिए 'सितो' (सफेद)। 'दूयति' (परिताप देता है) इसलिए 'दूतो' (दूत/संदेशवाहक)। 'मिज्जति' (स्नेह करता है) इसलिए 'मित्तो' (मित्र/सुहृद)। 'चिन्तेति' (सोचता है) इसलिए 'चित्तं' (विज्ञान/चित्तकर्म आदि)। 'पोसीयति' (पोषण किया जाता है) इसलिए 'पुत्तो' (पुत्र/आत्मज)। 'विन्दन्ति' (इससे प्रीति प्राप्त करते हैं) इसलिए 'वित्तं' (धन)। 'वर' (वरण और सम्भक्ति) धातु से 'वरणं' (चुनना) इसलिए 'वत्तं' (व्रत/ब्रह्मचर्य आदि)। ๘๔. เนตฺตาทโย. ८४. नेत्तादयो। เนตฺตอาทโย ตก ปรา นิปจฺจนฺเต. นี-ปาปเน, เอตฺตํ, ตุก จ นิปาตนา. นยติ ปาเปตีติ เนตฺตํ=นยนํ, เนตา จ. กร-กร-เณ, อสฺสุ, กรณํ กุตฺตํ=กิริยา. กมิสฺส อสฺสุ, กมติ ยาตีติ กุนฺโต=อาวุธวิเสโส. รม-กีฬายํ, สุปุพฺโพ, สุสฺสนิจฺจํ ทีโฆ. สุฏฺฐุ รมณํ, สุฏฺฐุ รมตีติ วา สูรโต=สุขสํวาโส. มิหิสฺสอิสฺสุ, มิหติ สิญฺจตีติ มุตฺตํ=ปสฺสาโว. ปาล=รกฺขเณ อาสฺส รสฺสตฺตํ, ญิจ. ปาลียตีติ ปลิตํ=เกสโลมานํ ชราย กตํ เสตตฺตํ, สทฺธาทิตฺตา อกาเร ตํ ยสฺส อตฺถิ โส ปลิโต=ปุมา, ปลิตา=อิตฺถี. มฺหิสฺส สิ, มิหิ จ, มฺหยนํ สิตํ=มนฺทหสิตํ, มฺหยนํ มิหิตํ=ตเทว, กุส-อกฺโกเส ตสฺส อีญ, กุสียติ อกฺโกสียตีติ กุสีโต=อลโส, สิ=พนฺธเน, ทีโฆ, เสนฺติ พนฺธนฺติ ฆราวาสํ เอตายาติ สีตา=นงฺคลเลขา, เอวมญฺเญปิ. 'नेत्त' आदि शब्द 'तक' प्रत्यय परे होने पर निपातित होते हैं। 'नी' (प्रापण अर्थ में) धातु से 'एत्त' और 'तुक' का निपातन होता है। जो ले जाता है या पहुँचाता है, वह 'नेत्त' (नयन/आँख) और 'नेता' (ले जाने वाला) है। 'कर' (करण अर्थ में) धातु से 'अस्सु' होकर 'कुत्त' (क्रिया) बनता है। 'कम' धातु से 'अस्सु' होकर, जो चलता है वह 'कुन्त' (एक विशेष आयुध/भाला) है। 'रम' (क्रीड़ा अर्थ में) धातु से पहले 'सु' उपसर्ग हो, तो 'सु' का 'सू' (दीर्घ) होता है। अच्छी तरह रमण करना या जो अच्छी तरह रमता है, वह 'सूरत' (सुखद निवास) है। 'मिह' धातु से 'इस्सु' होकर, जो सींचता है वह 'मुत्त' (मूत्र/पेशाब) है। 'पाल' (रक्षण अर्थ में) धातु के 'आ' का ह्रस्व और 'णिच' प्रत्यय होता है। जिसका पालन किया जाता है, वह 'पलित' (बालों का सफेद होना) है; अकार के स्थान पर 'त' होने से जिसके पास वह सफेदी है, वह 'पलित' (पुरुष) और 'पलिता' (स्त्री) है। 'मिह' धातु से 'सि' और 'मिहि' होकर 'सित' (मंद मुस्कान) और 'मिहित' (वही) बनता है। 'कुस' (आक्रोश अर्थ में) धातु से 'ईण' होकर, जो कोसा जाता है वह 'कुसीत' (आलसी) है। 'सि' (बंधन अर्थ में) धातु का दीर्घ होकर, जिससे घर-वास को बाँधते हैं, वह 'सीता' (हल की रेखा) है। इसी प्रकार अन्य भी। ๘๕. สมาทีหฺยโถ. ८५. समादीह्यथो। สม-อุปสเม[Pg.255], ทร-ทรเณ, ทม-อุปสเม, กิลม กฺลม-เคลญฺเญ, สป-อกฺโกเส, วส-นิวาเส, อาปุพฺโพ, เอวมาทีหิ อโถ โหติ. สเมตีติ สมโถ=สมาธิ. ทรณํ ทรโถ=ปีฬา. ทมนํ ทมโถ=ทโม. กิลมนํ กิลมโถ=ปริสฺสโม. สปนํ สปโถ=สจฺจกรณํ. อาวสนฺติ เอตฺถาติ อาวสโถ=ฆรํ. 'सम' (उपशम), 'दर' (विदारण), 'दम' (उपशम), 'किलम/क्लम' (ग्लानि), 'सप' (आक्रोश), 'वस' (निवास - 'आ' उपसर्ग पूर्वक) आदि धातुओं से 'अथ' प्रत्यय होता है। जो शांत करता है, वह 'समथ' (समाधि) है। विदारण करना 'दरथ' (पीड़ा) है। दमन करना 'दमथ' (दम/संयम) है। थकना 'किलमथ' (परिश्रम/थकान) है। शपथ लेना 'सपथ' (सत्य-क्रिया/शपथ) है। जहाँ निवास करते हैं, वह 'आवसथ' (घर) है। ๘๖. อุปวสา วสฺโสฏ จ. ८६. उपवसा वस्सोठ च। อุปปุพฺพา วสติสฺมา อโถ โหติ, วสฺส โอฏ จาเทโส. อุปวสนฺติ เอตฺถาติ อุโปสโถ=ติถิวิเสโส, นวมหตฺถิ กุลญฺจ. 'उप' उपसर्ग पूर्वक 'वस' धातु से 'अथ' प्रत्यय होता है और 'वस' के स्थान पर 'ओठ' आदेश होता है। जहाँ उपवास करते हैं, वह 'उपोसथ' (एक विशेष तिथि) है, और नौवां हाथी कुल भी। ๘๗. รมา ถก. ८७. रमा थक। รมติสฺมา ถก โหติ, กานุพนฺธกรณสามตฺถิยา อต การาโทปิ มโลโป. รมนฺติ กีฬนฺติ เอเตนาติ รโถ=สนฺทโน. 'रम' धातु से 'थक' प्रत्यय होता है। 'क' अनुबन्ध के सामर्थ्य से 'अ' कार आदि का लोप और 'म' का लोप होता है। जिससे रमण या क्रीड़ा करते हैं, वह 'रथ' (रथ/वाहन) है। ๘๘. ติตฺถาทโย. ८८. तित्थादयो। ติตฺถอาทโย ถกปรา นิปจฺจนฺเต. ตร-ตรเณ, อสฺส อิตฺตํ, ปรรูปาทิ, ตรนฺตฺยเนนาติ ติตฺถํ=นชฺชาทึ เยนาวตรนฺติ ตํ. สิจ-รกฺขเณ, เสจตีติ สิตฺตํ=มธุจฺฉิฏฺฐํ. หส-หสเน, หสนฺตฺยเนนาติ หตฺโถ=กโร, นกฺขตฺตาญฺจ. คายตีติ คาถา=ปชฺชวิเสโส. อรนฺติ ปวตฺตนฺตฺยเนนาติ อตฺโถ=ธนํ. โรคํ ตุทติ ปีเฬตีติ ตุตฺถํ=โอสธํ. ยุ-มิสฺสเน, ทีโฆ, ยวตีติ ยู- โถ=สชาติกานํ [Pg.256] ติรจฺฉานานํสมูโห. คุป-โคปเน, ทีโฆ, ปโลโป, ปฏิกูลตฺตา โคปียตีติ คูโถ=วจฺจํ, เอวมญฺเญปิ. 'तित्थ' आदि शब्द 'थक' प्रत्यय परे होने पर निपातित होते हैं। 'तर' (तरण अर्थ में) धातु के 'अ' का 'इ' होना और पररूप आदि कार्य होते हैं; जिससे पार करते हैं, वह 'तित्थ' (तीर्थ - नदी आदि का वह स्थान जहाँ से उतरते हैं) है। 'सिच' (रक्षण/सिंचन) धातु से, जो सींचता है वह 'सित्त' (मोम) है। 'हस' (हँसना) धातु से, जिससे कार्य करते हैं वह 'हत्थ' (हाथ) है, और एक नक्षत्र भी। जो गाई जाती है, वह 'गाथा' (एक विशेष पद्य) है। जिससे प्रवृत्त होते हैं, वह 'अत्थ' (अर्थ/धन) है। जो रोग को व्यथित करता है, वह 'तुत्थ' (औषधि) है। 'यु' (मिश्रण) धातु का दीर्घ होकर, जो मिलता है वह 'यूथ' (सजातीय पशुओं का समूह) है। 'गुप' (गोपन) धातु का दीर्घ और 'प' का लोप होकर, जो प्रतिकूल होने के कारण छिपाया जाता है, वह 'गूथ' (विष्ठा/मल) है। इसी प्रकार अन्य भी। ๘๙. วส มส กุสา ถุ. ८९. वस मस कुसा थु। วส-นิวาเส, มส-อามสเน, กุส-อกฺโกเส, เอเตหิ ถุ โหติ. วสนฺติ เอตฺถาติ วตฺถุ=ปทตฺโถ. ทธึ อามสตีติ มตฺถุ=ทธิมณฺโฑ. กุสียติ อกฺโกสียติ เภร วนาทตฺตาติ โกตฺถุ=สิคาโล. 'वस' (निवास), 'मस' (स्पर्श), 'कुस' (आक्रोश) धातुओं से 'थु' प्रत्यय होता है। जहाँ निवास करते हैं, वह 'वत्थु' (वस्तु/पदार्थ) है। जो दही का मंथन करता है, वह 'मत्थु' (मट्ठा) है। जो भयानक होने के कारण कोसा जाता है, वह 'कोत्थु' (सियार) है। ๙๐. สก วสา ถิ. ९०. सक वसा थि। สก-สตฺติยํ, วส-นิวาเส, เอเตหิ ถิ โหติ. สกฺโกติ คนฺตุมเนนาติ สตฺถิ=อูรุ. วสียติ อจฺฉาทียตีติ วตฺถิ=นาภิยา อโธ. 'सक' (शक्ति) और 'वस' (निवास) धातुओं से 'थि' प्रत्यय होता है। जिससे चलने में समर्थ होते हैं, वह 'सत्थि' (जाँघ) है। जो ढका जाता है, वह 'वत्थि' (वस्ति/नाभि के नीचे का भाग) है। ๙๑. วีโต ถิก. ९१. वीतो थिक। วี วา-คมเนตีมสฺมา ถิก โหติ. วียนฺติ คจฺฉนฺติ เอตายาติ วีถิ=อาวลิ. 'वी' या 'वा' (गमन अर्थ में) धातु से 'थिक' प्रत्यय होता है। जिससे जाते हैं, वह 'वीथि' (गली/पंक्ति) है। ๙๒. สาริสฺมา รติ. ९२. सारिस्मा रति। สาริสฺมา ณฺยนฺตา รถิ โหติ. สาเรตีติ สารถิ=รถ-วาโห. 'सृ' धातु के ण्यन्त रूप (सारि) से 'थि' प्रत्यय होता है। जो रथ को चलाता है, वह 'सारथि' (रथ-वाहक) है। ๙๓. ตา-ตา อิถิ. ९३. ता-ता इथि। ตา-ปาลเน, อต-สาตจฺจคมเน, เอเตหิ อิถิ โหติ. ตายติ ปาเลตีติ ติถิ=ปฏิปทาทิ, อตติ คจฺฉตีติ อติถิ=อพฺภาคโต. 'ता' (पालन) और 'अत' (सतत गमन) धातुओं से 'इथि' प्रत्यय होता है। जो रक्षा करती है, वह 'तिथि' (प्रतिपदा आदि) है। जो आता है, वह 'अतिथि' (मेहमान) है। ๙๔. อิสา ถี. ९४. इसा थी। อิสติสฺมา [Pg.257] ถี โหติ. อิจฺฉติ อิจฺฉียตีติ วา อิตฺถี=นารี. 'इस' धातु से 'थी' प्रत्यय होता है। जो इच्छा करती है या जिसकी इच्छा की जाती है, वह 'ित्थी' (स्त्री/नारी) है। ๙๕. รุท ขุท มุท มท ฉิท สูท สป กมา ทก. ९५. रुद खुद मुद मद छिद सूद सप कमा दक। เอเตหิ ทก โหติ. รุทตีติ รุทฺโท=อุมาปติ. รสฺส ลตฺเต ลุทฺโท=เนสาโท. ขุทติ อสหตีติ ขุทฺโท=นีโจ. โมทนฺติ เอตายาติ มุทฺทา=สกฺขรมงฺคุลิยํ. มชฺชนฺติ อสฺมินฺติ มทฺโท=ชนปโท. ฉิชฺชตีติ ฉิทฺทํ=รนฺธํ. อูสฺส รสฺสตฺตํ, สูทติ สามิเกหิ ภตึ ปกฺขรตีติ สุทฺโท=วสโล. สปนฺตุเนนาติ สทฺโท=โสตวิสโย. กามียตีติ กนฺโท=มูลวิเสโส. इन धातुओं से 'दक' प्रत्यय होता है। जो रोता है, वह 'रुद्द' (रुद्र) है। 'र' का 'ल' होने पर 'लुद्द' (व्याध) बनता है। जो सहन नहीं करता, वह 'खुद्द' (नीच) है। जिससे प्रसन्न होते हैं, वह 'मुद्दा' (मुद्रा/अंगूठी) है। जिसमें लोग मग्न रहते हैं, वह 'मद्द' (मद्र जनपद) है। जो फट जाता है, वह 'छिद्द' (छिद्र) है। 'ऊ' का ह्रस्व होकर, जो स्वामियों द्वारा वेतन पाता है, वह 'सुद्द' (शूद्र) है। जिससे शाप दिया जाता है, वह 'सद्द' (शब्द) है। जिसकी कामना की जाती है, वह 'कन्द' (एक विशेष मूल) है। ๙๖. กุนฺทาทโย. ९६. कुन्दादयो। กุนฺทอาทโย ทกอนฺตา นิปจฺจนฺเต. กมิสฺส อสฺสุ, กามียตีติ กุนฺโท=ปุปฺผวิธสโส, มณิสฺส มน, มญฺญเตติ มนฺโท=ชโฬ. วุณาติสฺส พุน, วุณียติ สํวรียตีติ พุนฺโท=มูลปฺปเทโส. นินฺท-ครหายํ, นโลโป, นินฺทียตีติ นิทฺทา=โสปฺปํ. อุนฺท-กิเลทเน, นโลโป, อุนฺทติ กิเลทตีติ อุทฺโท=ชลพิฬาโล. สํปุพฺพสฺส อุนฺทิสฺส จ, สมฺมา อุนฺทติ กิเลทตีติ สมุทฺโท=สาคโร. ปุล-มหตฺตหึ สาญาเณสุ, อิมุญ, ปุลติ หึสตีติ ปุลินฺโท=สวโร. เอวํ-มญฺเญปิ. 'कुन्द' आदि शब्द 'दक' प्रत्यय के साथ निपातित होते हैं। 'कम' धातु के 'अ' का 'उ' होकर, जिसकी कामना की जाती है वह 'कुन्द' (एक पुष्प) है। 'मण' धातु से 'मन्द' (मूर्ख) बनता है। 'वु' धातु से 'बुन्द' (मूल भाग) बनता है। 'निन्द' धातु से 'न' का लोप होकर 'निद्दा' (निद्रा) बनता है। 'उन्द' धातु से 'न' का लोप होकर 'उद्द' (ऊदबिलाव) बनता है। 'सम्' उपसर्ग पूर्वक 'उन्द' धातु से 'समुद्द' (समुद्र) बनता है। 'पुल' (महत्व/हिंसा) धातु से 'पुलिन्द' (शबर) बनता है। इसी प्रकार अन्य भी। ๙๗. ททา ทุ. ९७. ददा दु। ทท-ทาเนตีมสฺมา ทุ โหติ. ทุกฺขํ ททาตีหิ ททฺทุ=กุฏฺฐวิเสโส. 'दद' (दान) धातु से 'दु' प्रत्यय होता है। जो दुःख देता है, वह 'दद्दु' (दाद/कुष्ठ) है। ๙๘. ขนาน ทม รมา โธ. ९८. खनान दम रमा धो। ขน [Pg.258] ขณ-อวทารเณ, อน-ปาณเน, ทม-อุปสเม, รม-กีฬายํ, เอเตหิ โธ โหติ. ญาเณน ธญฺญเตติ ขนฺโธ=ราสิ. อนติ ชีวติ เอเตนาติ อนฺโธ=อจกฺขุโก. ทเมตพฺโพติ ทนฺโธ=ชโฬ, รมนฺติ เอตฺถ สปฺปาทโยติ รนฺธํ=ฉิทฺทํ. 'खन/खण' (विदारण), 'अन' (प्राणन), 'दम' (उपशम), 'रम' (क्रीड़ा) धातुओं से 'ध' प्रत्यय होता है। ज्ञान से जो जाना जाता है, वह 'खन्ध' (स्कन्ध/राशि) है। जिससे जीता है (परन्तु देख नहीं सकता), वह 'अन्ध' (अंधा) है। जिसे दमित किया जाना चाहिए, वह 'दन्ध' (मन्द/जड़) है। जहाँ सर्प आदि रमण करते हैं, वह 'रन्ध' (छिद्र) है। ๙๙. มุทฺธา ทโย. ९९. 'मूर्द्धा' (Muddhā) आदि। มุทฺธอาทโย ธนฺตา นิปจฺจนฺเต. มุท-โตเส, โอตฺตาภาโว, โมทนฺติ เอตฺถ อูกาติ มุทฺธา=มตฺถโก. อร-คมเน, อรนฺติ ยนฺติ เอตฺถาติ อทฺธา=มคฺโค, กาโล จ, อทฺธํ=อุปทฺธํ. คิธ-อภิ กงฺขายํ, อิสฺส อตฺตํ, เคธตีติ คทฺโธ=คิชฺโฌ. วิธ-เวธเน, เอตฺตาภาโว, ปริวชฺฌตีติ วิทฺธํ=วิมลํ, เอวมญฺเญปิ. 'मूर्द्धा' आदि 'ध' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'मुद' (सन्तोष में), 'उ' को 'ऊ' भाव, जहाँ प्रसन्न होते हैं वह 'मूर्द्धा' (मस्तक) है। 'अर' (गमन में), जहाँ गमन करते हैं वह 'अद्धा' (मार्ग और काल), 'अद्धं' (आधा)। 'गिध' (अभिकांक्षा में), 'इ' को 'अ' भाव, जो लोभ करता है वह 'गद्धो' (गिद्ध)। 'विध' (वेधन में), 'ए' को 'इ' भाव, जो परिवर्जित है वह 'विद्धं' (विमल), इसी प्रकार अन्य भी। ๑๐๐. สีโต ธุก. १००. 'सी' (Sī) धातु से 'धुक' (dhuka) प्रत्यय होता है। เสติสฺมา ธุก โหติ. สยนฺติ เอตายาติ สีธุ=สุราวิเสโส. 'सि' धातु से 'धुक' होता है। जिससे सोते हैं वह 'सीधु' (मदिरा विशेष) है। ๑๐๑. วรารกรตรทรยมอชฺชมิถสกา กุโน. १०१. 'वर', 'अर', 'कर', 'तर', 'दर', 'यम', 'अज्ज', 'मिथ', 'सक' धातुओं से 'कुन' (kuna) प्रत्यय होता है। วร-วรณสมฺภตฺตีสุ, อร-คมเน, กร-กรเณ, ตร-ตร-เณ ทร-วิทารเณ, ยม-อุปรเม, อชฺช สชฺช-อชฺชเน, มิถ-สงฺคเม, สก-สตฺติยํ, เอเตหิ กุโน โหติ. ‘‘รา นสฺส โณ’’ติ (๕-๑๗๑) นสฺส ณตฺตํ, วาเรตีติ วรุโณ=เอวํนามโก อิสิ, เทวราชา, ปาทโป จ. อรติ คจฺฉตีติ อรุโณ=สูริโย, ตสฺส [Pg.259] สารถิ จ. ปรทุกฺเข สติ สาธูนํ หทยกมฺมนํ กโรตีติ กรุณา=ทยา. พาลภาวํ อตรีติ ตรุโณ=ยุวา. ‘‘ณิณาปิน’’นฺติ (๕.๑๖๐) โยควิภาคา ณิโลโป, วิทาเรตีติ ทารุโณ=กกฺขโฬ. ยเมติ ปาวํ นาเสตีติ ยมุนา=เอกา มหานที. อชฺชติ ธนสญฺจยํ กโรตีติ อชฺชุโน=ราชา, รุกฺขวิเสโส จ. มิโถ สงฺคโม มิถุนํ=ปุมิตฺถิยุคฬํ. สกฺโกตีติ สกุโน=ปกฺขี. นทาทิปาฐา วีมฺหิ=สกุนี. ‘‘ตถนรานํฏฏฺฐณลา’’ติ (๑-๒๗) วา ณตฺเต=สกุโณ, สกุณิ. 'वर' (वरण और सम्भक्ति में), 'अर' (गमन में), 'कर' (करण में), 'तर' (तरण में), 'दर' (विदारण में), 'यम' (उपरम में), 'अज्ज' (अर्जन में), 'मिथ' (संगम में), 'सक' (शक्ति में), इनसे 'कुन' प्रत्यय होता है। 'रा नस्स णो' (५-१७१) से 'न' को 'ण' होता है, जो वरण करता है वह 'वरुणो' (इस नाम का ऋषि, देवराज और वृक्ष)। जो गमन करता है वह 'अरुणो' (सूर्य और उसका सारथि)। परदुःख होने पर सज्जनों के हृदय में जो कम्पन करता है वह 'करुणा' (दया)। जो बालभाव को पार कर गया वह 'तरुणो' (युवा)। 'णिणापिनं' (५.१६०) योगविभाग से 'णि' का लोप, जो विदारण करता है वह 'दारुणो' (कठोर)। जो पाप का नाश करता है वह 'यमुना' (एक महानदी)। जो धन का संचय करता है वह 'अज्जुनों' (राजा और वृक्ष विशेष)। परस्पर संगम 'मिथुनं' (स्त्री-पुरुष का जोड़ा)। जो समर्थ है वह 'सकुनो' (पक्षी)। नदादि पाठ से स्त्रीलिंग में 'सकुनी'। 'तथनरानं...' से 'ण' होने पर 'सकुणो', 'सकुणि'। ๑๐๒. อชา อิโน. १०२. 'अज' (Aja) धातु से 'इन' (ina) प्रत्यय होता है। อช วช-คมเน ตีมสฺมา อิโน โหติ. อชติ วิกฺกยํ ยาตีติ อชินํ=จมฺมํ. 'अज' (गमन में) इस धातु से 'इन' होता है। जो विक्रय के लिए जाता है वह 'अजिनं' (चर्म/खाल) है। ๑๐๓. วิปินาทโย. १०३. 'विपिन' (Vipina) आदि। วิปินอาทโย อินนฺตา นิปจฺจนฺเต. วป-พีชนิกฺเขเป, อสฺส อิตฺตํ, วปนฺติ เอตฺถาติ วิปินํ=วนํ. สุป-สเย, สุปนฺติ เอเตนาติ สุปินํ=นิทฺทา, สุปนฺเตน ทิฏฺฐญฺจ. ตุท-พฺยถเน, ทสฺส โห, ตุทติ สตฺเต ปีเฬตีติ ตุหินํ=หิมํ. กปฺป-สามตฺถิเย, กปฺปติ ริปโว วิเชตุํ สมตฺเถตีติ กปฺปิโน=ราชา. กม-ปทวิกฺเขเป, อสฺส อุตฺตํ, กมนฺติ เอตฺถ มีนาทโย ปวิสนฺตีติ กุมินํ=มจฺฉพนฺธโนปกรณวิเสโส. ทา-ทาเน, เทนฺติ เอตสฺมินฺติ ทินํ=ทิวโส, เอวมญฺเญปิ. 'विपिन' आदि 'इन' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'वप' (बीज बोने में), 'अ' को 'इ' भाव, जहाँ बोते हैं वह 'विपिनं' (वन)। 'सुप' (शयन में), जिससे सोते हैं वह 'सुपिनं' (निद्रा और सोते हुए देखा गया स्वप्न)। 'तुद' (व्यथा देने में), 'द' को 'ह', जो प्राणियों को पीड़ित करता है वह 'तुहिनं' (हिम/ओस)। 'कप्प' (सामर्थ्य में), जो शत्रुओं को जीतने में समर्थ है वह 'कप्पिनो' (राजा)। 'कम' (पद-विक्षेप में), 'अ' को 'उ' भाव, जहाँ मछलियाँ आदि प्रवेश करती हैं वह 'कुमिनं' (मछली पकड़ने का उपकरण विशेष)। 'दा' (दान में), जिसमें देते हैं वह 'दिनं' (दिवस), इसी प्रकार अन्य भी। ๑๐๔. กิรา กโน. १०४. 'किर' (Kira) धातु से 'कन' (kana) प्रत्यय होता है। กิรติสฺมา [Pg.260] กโน โหติ. นสฺส โณ, กิรนฺติ วิกิรนฺตีติ กิรณา=รํสิโย. 'किर' धातु से 'कन' होता है। 'न' को 'ण', जो बिखरती हैं वे 'किरणा' (किरणें) हैं। ๑๐๕. ที ชิอิมีหิ นก. १०५. 'दी', 'जि', 'इ', 'मी' धातुओं से 'नक' (naka) प्रत्यय होता है। ที-ขเย, ชิ-ชเย, อิ-อชฺเฌนคตีสุ, มี-หึสายํ, เอเตหิ นก โหติ. อเทสิ ขยมคมาสีติ ทีโน=นิทฺธโน. ปญฺจมาเร อชินีติ ชิโน=พุทฺโธ. เอสิ อิสฺสรตฺตมคมาสีติ อิโน=สามี. มียเต หึสียเตติ มีโน=มจฺโฉ. 'Dī' (क्षय में), 'Ji' (विजय में), 'I' (अध्ययन और गति में), 'Mī' (हिंसा में), इनसे 'naka' प्रत्यय होता है। 'Adesi' (क्षय को प्राप्त हुआ) इसलिए 'dīno' = निर्धन। 'Pañcamāre ajinī' (पाँच मारों को जीता) इसलिए 'jino' = बुद्ध। 'Esi' (ऐश्वर्य को प्राप्त हुआ) इसलिए 'ino' = स्वामी। 'Mīyate' (हिंसा की जाती है) इसलिए 'mīno' = मछली। ๑๐๖. สิธาวีวาหิ โน. १०६. 'Si', 'Dhā', 'Vī', 'Vā' से 'no' प्रत्यय होता है। สิ-พนฺธเน, ธา-ธารเณ, วี วา-คมเน, เอเตหิ โน โหติ. เสติ พนฺธตีติ เสโน=สสาทโน เสนา=จมู. ธาเรตีติ ธานา=ภชฺชิตยโว. เวติ ปวตฺตตีติ เวโน=หีนชาติ. สตฺเตสุ วาติ ปวตฺตตีติ วานํ=ตณฺหา. 'Si' (बन्धन में), 'Dhā' (धारण करने में), 'Vī' और 'Vā' (गमन में), इनसे 'no' प्रत्यय होता है। 'Seti' (बाँधता है) इसलिए 'seno' = बाज (पक्षी), 'senā' = सेना। 'Dhāreti' (धारण करता है) इसलिए 'dhānā' = भुने हुए जौ। 'Veti' (प्रवृत्त होता है) इसलिए 'veno' = हीन जाति। 'Sattesu vāti' (प्राणियों में प्रवृत्त होती है) इसलिए 'vānaṃ' = तृष्णा। ๑๐๗. อูนาทโย. १०७. 'Ūna' आदि। อูนอาทโย นนฺตา นีปจฺจนฺเต. อูห-วิตกฺเก, หโลโป, อูหนํ อูโน=อปุณฺโณ. หิ-คติยํ, ทีฆตฺตํ, เหสิ หีนตฺตมคมีติ หีโน=นิหีโน. จิ-จเย, ทีฆตฺตํ, จยนฺติ เอตฺถ รตนานีติ จีโน=ชนปโท. หนิสฺส ชโฆ, หญฺญตีติ ชฆนํ=กฏิ. ฐาสฺส เถ ฐาติ ปวตฺตตีติ เถโน=โจโร. อุนฺทิสฺส โอโท, อุนฺทียตีติ โอทโน=อนฺนํ. อนฺนํ. รํชิสฺส นิคฺคหีตโลโป, อก จ, รํชเต อเนนาติ รชนํ=ราโค. รญฺชนฺติ เอตฺถาติ รชนี=รตฺติ. ปทิสฺส ชุนุก[Pg.261], ปชฺชติ คจฺฉตีติ ปชฺชุนฺโน=อินฺโท, เมโฆ จ. คมิสฺส คง, คจฺฉนฺติ เอตฺถ วิหงฺคาทโยติ คคนํ=อนฺตลิกฺขํ, เอวมญฺเญปิ. 'Ūna' आदि 'na' अन्त वाले शब्द निपातित होते हैं। 'Ūha' (वितर्क में), 'ha' का लोप, 'ūhana' से 'ūno' = अपूर्ण। 'Hi' (गति में), दीर्घत्व, 'hesi' (हीनता को प्राप्त हुआ) इसलिए 'hīno' = नीच। 'Ci' (संग्रह में), दीर्घत्व, जहाँ रत्न संचित किए जाते हैं वह 'cīno' = एक जनपद (चीन)। 'Han' का 'jagha', 'haññati' (मारा जाता है) इसलिए 'jaghanaṃ' = कटि (कमर)। 'Ṭhā' का 'the', 'ṭhāti' (प्रवृत्त होता है) इसलिए 'theno' = चोर। 'Und' का 'oda', 'undīyati' (गीला किया जाता है) इसलिए 'odano' = अन्न (भात)। 'Raṃj' का निगृहीत लोप और 'aka', जिससे रंगा जाता है वह 'rajanaṃ' = राग। जहाँ (लोग) अनुरक्त होते हैं वह 'rajanī' = रात्रि। 'Pad' का 'junuka', 'pajjati' (जाता है) इसलिए 'pajjunno' = इन्द्र और मेघ। 'Gam' का 'gaṅa', जहाँ पक्षी आदि जाते हैं वह 'gaganaṃ' = अन्तरिक्ष, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๐๘. วี ปตา ตโน. १०८. 'Vī' और 'Pata' से 'tano' प्रत्यय होता है। วี วา-คมเน, ปต ปถ-คมเน, เอเตหิ ตโน โหติ. เวติ ปวตฺตติ เอเตนาติ เวตนํ=ภติ. ปตนฺติ เอตฺถาติ ปตฺตนํ=นครํ. 'Vī' और 'Vā' (गमन में), 'Pata' और 'Patha' (गमन में), इनसे 'tano' प्रत्यय होता है। 'Veti' (जिसके द्वारा जीवन चलता है) वह 'vetanaṃ' = मजदूरी (भृति)। जहाँ (लोग) गिरते हैं वह 'pattanaṃ' = नगर। ๑๐๙. รมา ตนก. १०९. 'Rama' से 'tanaka' प्रत्यय होता है। รม กีฬายมิจสฺมา ตนก โหติ. ‘‘คมาทิรานํ โลโปนฺตสฺสา’’ติ (๕.๑๐๙) มโลโป, รมนฺติ เอตฺถาติ รตนํ=มณิ อาที, หตฺถมตฺตญฺจ. 'Rama' (क्रीड़ा में) इससे 'tanaka' प्रत्यय होता है। 'Gamādirānaṃ lopontassa' सूत्र से 'ma' का लोप होता है, जिसमें (लोग) रमण करते हैं वह 'ratanaṃ' = मणि आदि, और हाथ की एक माप। ๑๑๐., สู ภาหิ นุก, ११०. 'Sū' और 'Bhā' से 'nuka' प्रत्यय होता है। สู-ปสเว, ภา-ทิตฺติยํ, เอเตหิ นุก โหติ. ปสวียตีติ สูนุ=ปุตฺโต. ภาติ ทิพฺพตีติ ภานุ=สูริโย. 'Sū' (प्रसव में), 'Bhā' (दीप्ति में), इनसे 'nuka' प्रत्यय होता है। 'Pasavīyati' (जो उत्पन्न किया जाता है) वह 'sūnu' = पुत्र। 'Bhāti' (जो चमकता है) वह 'bhānu' = सूर्य। ๑๑๑. ธาสฺเส จ. १११. 'Dhā' से भी (nuka होता है) और (आ को) 'e' होता है। ธา-ธารเณตีมสฺมา นุก โหติ, ธาสฺส เอ จ. ธาเรตีติ เธนุ=คาวี. 'Dhā' (धारण करने में) इससे 'nuka' प्रत्यय होता है और 'dhā' के 'ā' को 'e' होता है। 'Dhāreti' (जो दूध धारण करती है) वह 'dhenu' = गाय। ๑๑๒. วตฺตา ฏาว ธมาเสหฺยนิ. ११२. 'Vatta', 'Aṭa', 'Ava', 'Dhama' और 'Asa' से 'ani' प्रत्यय होता है। วตฺต-วตฺตเน, อฏ-คมนตฺโถ, อว-รกฺขเณ, ธม-สทฺเท, อส-เขปเน, เอเตหิ อนิ โหติ. วตฺตนฺติ เอเตนาติ วตฺตนิ=ตสรทณฺฑํ. วีมฺหิ วตฺตนี=ปนฺโถ. อฏเต คมฺมเตติ อฏนิ= มญฺจงฺโค[Pg.262]. สตฺเต อวติ รกฺขตีติ อวนิ=มหี. ธมนฺติ เอเตน วีณาทโยติ ธมนิ=สีรา. ทณฺฑตฺถาย อสียเต ขิปียเตติ อสนิ=กุลิสํ. 'Vatta' (वर्तन में), 'Aṭa' (गमन अर्थ में), 'Ava' (रक्षण में), 'Dhama' (शब्द करने में), 'Asa' (क्षेपण में), इनसे 'ani' प्रत्यय होता है। 'Vattanti' (जिसके द्वारा घुमाया जाता है) वह 'vattani' = तकुआ। 'Vī' (स्त्रीलिंग) में 'vattanī' = मार्ग। 'Aṭate' (जहाँ जाया जाता है) वह 'aṭani' = चारपाई का पाया। 'Satte avati' (जो प्राणियों की रक्षा करती है) वह 'avani' = पृथ्वी। 'Dhamanti' (जिसके द्वारा वीणा आदि बजते हैं) वह 'dhamani' = नाड़ी (शिरा)। दण्ड देने के लिए जो 'asīyate' (फेंका जाता है) वह 'asani' = वज्र। ๑๑๓. ยุโต นิ. ११३. 'Yu' से 'ni' प्रत्यय होता है। ยุ-มิสฺสเนตีมสฺมา นิ โหติ. ยวนฺติ สตฺตา อเนน เอตีภาวํ คจฺฉนฺตีติ โยนิ=ภคํ, อณฺฑชาทิโยนิ จ. 'Yu' (मिश्रण में) इससे 'ni' प्रत्यय होता है। 'Yavanti' (जिसके द्वारा प्राणी एकता को प्राप्त होते हैं) वह 'yoni' = योनि, और अण्डज आदि योनियाँ। (อิติ ตวคฺคปจฺจยวิธานํ). (इस प्रकार त-वर्ग प्रत्यय विधान समाप्त हुआ)। ๑๑๔. จมาป ปา วปา โป. ११४. 'Cama', 'Apa', 'Pā' और 'Vapa' से 'po' प्रत्यय होता है। จม-อทเน, อป-ปาปุณเน, ปา-รกฺขเณ, วป-พีชนิกฺเขเป, เอเตหิ โป โหติ. จมนฺติ อทนฺติ เอตฺถาติ จมฺปา=นครํ, อเปสิ อีสกมตฺตมคมาสีติ อปฺปํ=อพหุ. อปายํ ปาติ รกฺขตีติ ปาปํ-กิพฺพิสํ. วปนฺติ เอตฺถาติ วปฺโป=เกทารํ. 'Cama' (भक्षण में), 'Apa' (प्राप्त करने में), 'Pā' (रक्षण में), 'Vapa' (बीज बोने में), इनसे 'po' प्रत्यय होता है। 'Camanti' (जहाँ भोजन करते हैं) वह 'campā' = चम्पा नगरी। 'Apesi' (जो थोड़ा ही प्राप्त हुआ) वह 'appaṃ' = अल्प। 'Apāyaṃ pāti' (जो अपाय से रक्षा करता है) वह 'pāpaṃ' = पाप। 'Vapanti' (जहाँ बोते हैं) वह 'vappo' = खेत। ๑๑๕. ยุ ถุ กูนํ ทีโฆ จ. ११५. 'Yu', 'Thu' और 'Ku' से 'po' प्रत्यय होता है और इनका दीर्घ भी होता है। ยุ-มิสฺสเน, ถุ-อภิตฺถเว, กุ-สทฺเท, เอเตหิ โป โหติ, เอเตสํ ทีโฆ จ. ทีฆวิธานสามตฺถิยา โอตฺตาภาโว. ยวนฺติ สห วตฺตนฺติ เอตฺถาติ ยูโป=ยญฺญยฏฺฐิ, ปาสาโท จ. ถวียตีติ ถูโป=เจติยํ. กวนฺติ นทนฺติ เอตฺถาติ กูโป=อุทปาโน. 'Yu' (मिश्रण में), 'Thu' (स्तुति में), 'Ku' (शब्द करने में), इनसे 'po' प्रत्यय होता है और इनका दीर्घ भी होता है। दीर्घ विधान के सामर्थ्य से 'o' भाव नहीं होता। 'Yavanti' (जहाँ साथ रहते हैं) वह 'yūpo' = यज्ञ-स्तम्भ, और प्रासाद। 'Thavīyati' (जिसकी स्तुति की जाती है) वह 'thūpo' = स्तूप। 'Kavanti' (जहाँ शब्द करते हैं) वह 'kūpo' = कुआँ। ๑๑๖. ขิป สุป นีสู ปูหิ ปก. ११६. 'Khipa', 'Supa', 'Nī', 'Sū' और 'Pū' से 'paka' प्रत्यय होता है। ขิป-เปรเณ, สุป-สเย, นี-นเย, สู-ปสเว, ปู-ปวเน, เอเตหิ ปก โหติ. ขปติ ขยํ คจฺฉตีติ ขิปฺปํ=สีฆํ. สุปนฺติ [Pg.263] เอตฺถ สุนขาทโยติ สุปฺปํ=ปปฺโผฏนํ. นยนฺติ เอตสฺมา ผลนฺติ นิโป=รกฺโข. สวติ รุจึ ชเนตีติ สูโป=พฺยญฺชนวิเสโส. ปวียติ มริจชีรกาทีหิ ปวิตฺตํ กรียตีติ ปูปํ=ขชฺชกํ. 'Khipa' (प्रेरण में), 'Supa' (शयन में), 'Nī' (ले जाने में), 'Sū' (प्रसव में), 'Pū' (पवित्र करने में), इनसे 'paka' प्रत्यय होता है। 'Khapati' (जो क्षय को प्राप्त होता है) वह 'khippaṃ' = शीघ्र। 'Supanti' (जहाँ कुत्ते आदि सोते हैं) वह 'suppaṃ' = सूप (सूपड़ा)। 'Nayanti' (जिससे फल प्राप्त होते हैं) वह 'nipo' = कदम्ब का वृक्ष। 'Savati' (जो रुचि उत्पन्न करता है) वह 'sūpo' = सूप (व्यंजन विशेष)। 'Pavīyati' (जो मिर्च-जीरा आदि से संस्कृत किया जाता है) वह 'pūpaṃ' = पुआ (खाद्य विशेष)। ๑๑๗. สิปฺปาทโย. ११७. 'Sippa' आदि। สิปฺปอาทโย ปกอนฺตา นิปจฺจนฺเต. สปิสฺส อสฺสอิตฺตํ, สปติ อเนนาติ สิปฺปํ=กลา. วปิสฺส อสฺสิ, วิชฺชํ วปตีติ วิปฺโป=พฺราหฺมโณ. วสฺส โพ, วปติ พหิ นิกฺขมติ หทยงฺคตโสเกนาติ พปฺปํ=อสฺสุ. ฉุป-สมฺผสฺเส, อุสฺเส, ฉุปติ อเนนาติ เฉปฺปํ=นงฺคุฏฺฐํ. รุป=รุปฺปเน, ปโลป ทีฆา, รุปฺปติ วิการมาปชฺชตีติ รูปํ-ภูตภูติกํ, เอวมญฺเญปิ. 'Sippa' आदि 'paka' अन्त वाले शब्द निपातित होते हैं। 'Sap' के 'a' को 'i', 'sapati' (जिसके द्वारा कार्य किया जाता है) वह 'sippaṃ' = शिल्प (कला)। 'Vap' का 'vi', जो विद्या बोता है वह 'vippo' = विप्र (ब्राह्मण)। 'Vap' का 'ba', जो हृदय के शोक से बाहर निकलता है वह 'bappaṃ' = आँसू। 'Chupa' (स्पर्श में), 'u' को 'e', 'chupati' (जिसके द्वारा स्पर्श करता है) वह 'cheppaṃ' = पूँछ। 'Rupa' (विकार में), 'pa' का लोप और दीर्घ, 'ruppati' (जो विकार को प्राप्त होता है) वह 'rūpaṃ' = रूप (भौतिक पदार्थ), इसी प्रकार अन्य भी। ๑๑๘. สาสา อโป. ११८. 'Sāsa' से 'apo' प्रत्यय होता है। สาส อนุสิฏฺฐิยมิจฺจสฺมา อโป โหติ. สาสียนฺติ เอเตนาติ สาสโป=วีหิวิเสโส. 'Sāsa' (अनुशासन में) इससे 'apo' प्रत्यय होता है। 'Sāsīyanti' (जिसके द्वारा अनुशासित किया जाता है) वह 'sāsapo' = सरसों। ๑๑๙. วิฏปาทโย. ११९. 'Viṭapa' आदि। วิฏปอาทโย อปนฺตา นิปจฺจนฺเต. วฏ-เวฏฺฐเน, อสฺส อิตฺตํ, วฏติ เวฏฺฐติ เอเตนาติวิฏโป=คุมฺพวิเสโส, กุถ-ปูติภาเว, ถสฺส โณ, อกุถิ ปูติภาวมคมีติ กุณโป=มตโก. มณฺฑ=ภูสเน, มณฺเฑติ ชนํ, มณฺฑียติ ชเนหีติ วา มณฺฑโป=ชนาลโย, เอวมญฺเญปิ. 'Viṭapa' आदि 'apa' अन्त वाले शब्द निपातित होते हैं। 'Vaṭa' (लपेटने में), 'a' को 'i', 'vaṭati' (जिसके द्वारा लपेटा जाता है) वह 'viṭapo' = झाड़ी। 'Kutha' (सड़ने में), 'tha' को 'ṇa', 'akuthi' (जो दुर्गन्ध को प्राप्त हुआ) वह 'kuṇapo' = शव। 'Maṇḍa' (सजाने में), जो लोगों को सजाता है वह 'maṇḍapo' = मण्डप, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๒๐. คุปา โผ. १२०. 'गुप' (Gupa) धातु से 'फ' (pha) प्रत्यय होता है। คุปิสฺมา โผ โหติ. โคปียตีติ โคปฺโผ=จรณคณฺฐิ. 'गुप' धातु से 'फ' होता है। जो रक्षित किया जाता है वह 'गोप्फो' (टखना) है। ๑๒๑. ครสราทีหิ โพ. १२१. 'गर', 'सर' आदि धातुओं से 'ब' (ba) प्रत्यय होता है। ครสราทีหิ [Pg.264] โพ โหติ. ครติ อญฺเญ อเนน ปีเฬตีติ คพฺโพ=อภิมาโน. สรติ ปวตฺตตีติ สพฺโพ=สกโล. ผลกาเมหิ ชเนหิ อมียติ คมียตีติ อมฺโพ=จูโต. ปุตฺเตน อมียติ คมียตีติ อมฺพา=มาตา. जिससे दूसरों को पीड़ित करता है वह 'गब्बो' (अभिमान)। जो प्रवृत्त होता है वह 'सब्बो' (सब/सकल)। फल चाहने वाले लोगों द्वारा जहाँ जाया जाता है वह 'अम्बो' (आम)। पुत्र द्वारा जिसके पास जाया जाता है वह 'अम्बा' (माता)। ๑๒๒. นิมฺพาทโย. १२२. 'निम्ब' (Nimba) आदि। นิมฺพอาทโย พนฺตา นิปจฺจนฺเต. นมิสฺส อสฺสิ, นมติ ผลภาเรนาติ นิมฺโพ=อริฏฺโฐ. วมิสฺส วสฺส พิตฺตํ. ปิตฺตาทโย วมติ อุคฺคิรตีติ พิมฺพํ=สรีรํ. กุสิสฺส อมุก, ติตฺเตน กุสียติ อกฺโกสียตีติ โกสมฺโพ=รุกฺโข. กทติสฺส อมุก, กทนฺติ เอเตน ทฺวาราทีนีติ กทมฺโพ=รุกฺโข. กุฏิสฺส อุมุก, ชเนหิ โกฏียติ ปวตฺตียตีติ กุฏุมฺพํ=จตุปฺปโท, เขตฺตํ, ฆรํ, กลตฺตํ, ทาสา จ. กณฺฑิสฺส กุฑุ. ตณฺฑุลาทโย อเนน กณฺฑนฺติ ปริจฺฉินฺทนฺตีติ กุฑุโพ=มานํ, เอวมญฺเญปิ. 'निम्ब' आदि 'ब' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'नम' के 'अ' को 'इ', जो फल के भार से झुकता है वह 'निम्बो' (नीम)। 'वम' के 'व' को 'ब' भाव। जो पित्त आदि को उगलता है वह 'बिम्बं' (शरीर)। 'कुसि' को 'अमुक', जो तीखेपन से कोसा जाता है वह 'कोसम्बो' (वृक्ष)। 'कदत' को 'अमुक', जिससे द्वार आदि को रोकते हैं वह 'कदम्बो' (वृक्ष)। 'कुटि' को 'उमुक', लोगों द्वारा जिसमें रहा जाता है वह 'कुटुम्बं' (चौपाया, खेत, घर, पत्नी और दास)। 'कण्डि' को 'कुडु'। जिससे चावल आदि को मापते हैं वह 'कुडुबो' (एक माप), इसी प्रकार अन्य भी। ๑๒๓. ทรา พิ. १२३. 'दर' (Dara) धातु से 'बि' (bi) प्रत्यय होता है। ทร วิทารเณตีมสฺมา พิ โหติ. โอทนาทีนิ ทาเรนฺติ ชตายาติ ทพฺพิ=กฏจฺฉุ, วีมฺหิ ทพฺพี. 'दर' (विदारण में) इस धातु से 'बि' होता है। जिससे भात आदि को निकालते (विदीर्ण करते) हैं वह 'दब्बि' (कलछी), स्त्रीलिंग में 'दब्बी'। ๑๒๔. กร สร สล กล วลฺล วสา อโภ. १२४. 'कर', 'सर', 'सल', 'कल', 'वल्ल', 'वस' धातुओं से 'अभ' (abha) प्रत्यय होता है। กร-กรเณ, สร-คติ หึสาจินฺตาสุ, สล-คมนตฺโถ, กล-สงฺขฺยาเน, วล วลฺล-สํวรเณ, วส-นิวาเส, เอเตหิ อโภ โหติ. กโรตีติ กรโภ=โอฏฺฐา, ปาณิปฺปเทโส จ. สรติ คจฺฉตีติ สรโภ=มิควิเสโส. สลติ คจฺฉตีติ สลโภ=ปฏงฺโค[Pg.265]. กลียติ ปริมียติ วยสาติ กลโภ=หตฺถิโปตโก. ตทมินาทิปาฐา ฬตฺเต กฬโภ=โสว. วลฺเลติ สํวรณํ กโรตีติ วลฺลโภ=ปิโย. วสนฺตฺยเนนาติ วสโภ=ปุงฺคโว. 'कर' (करण में), 'सर' (गति, हिंसा और चिन्ता में), 'सल' (गमन अर्थ में), 'कल' (संख्यान में), 'वल-वल्ल' (संवरण में), 'वस' (निवास में), इनसे 'अभ' प्रत्यय होता है। जो करता है वह 'करभो' (ऊँट और हथेली)। जो गमन करता है वह 'सरभो' (मृग विशेष)। जो गमन करता है वह 'सलभो' (पतंगा)। जो आयु से मापा जाता है वह 'कलभो' (हाथी का बच्चा)। 'तदमिनादि' पाठ से 'ल' को 'ळ' होने पर 'कळभो' भी वही है। जो संवरण (प्रेम) करता है वह 'वल्लभो' (प्रिय)। जिससे निवास करते हैं वह 'वसभो' (साँड)। ๑๒๕. คทา รโภ. १२५. 'गद' (Gada) धातु से 'रभ' (rabha) प्रत्यय होता है। คทติสฺมา รโภ โหติ. คทตีติ คทฺรโภ=ขโร. 'गद' धातु से 'रभ' होता है। जो बोलता है वह 'गद्रभो' (गधा) है। ๑๒๖. อุสราสา กโภ. १२६. 'उस' (Usa) और 'रास' (Rāsa) धातुओं से 'कभ' (kabha) प्रत्यय होता है। อุส-ทาเห, ราส-สทฺเท, เอเตหิ กโภ โหติ. อุสติ ปฏิปกฺเข ทหตีติ อุสโภ=เสฏฺโฐ. ราสติ นทตีติ ราสโภ=คทฺรโภ. 'उस' (दाह में), 'रास' (शब्द में), इनसे 'कभ' प्रत्यय होता है। जो विपक्षियों को जलाता है वह 'उसभो' (श्रेष्ठ/वृषभ)। जो शब्द करता है वह 'रासभो' (गधा)। ๑๒๗. อิโต ภก. १२७. 'इ' (I) धातु से 'भक' (bhaka) प्रत्यय होता है। อิ อิติสฺมา ภก โหติ. เอติ คจฺฉตีติ อิโภ=หตฺถี. 'इ' धातु से 'भक' होता है। जो जाता है वह 'इभो' (हाथी) है। ๑๒๘. คราวา โภ. १२८. 'गर' (Gara) और 'वा' (Vā) धातुओं से 'भ' (bha) प्रत्यय होता है। คร ฆร-เสจเน, อว-รกฺขเน, เอเตหิ โภ โหติ. ครติ พหิ นิกฺขมนวเสน สิญฺจตีติ คพฺโภ=ปสโว, โอวรโก จ. อวติ สตฺเต รกฺขตีติ อพฺภํ=เมโฆ. 'गर' (सिंचन/छिड़काव) और 'अव' (रक्षण) धातुओं से 'भ' प्रत्यय होता है। बाहर निकलने के कारण जो सिंचन करता है, वह 'गब्भ' (गर्भ/प्रसव) और 'ओवरक' (भीतरी कमरा) है। जो प्राणियों की रक्षा करता है, वह 'अब्भ' (मेघ) है। ๑๒๙. โสพฺภาทโย. १२९. सोब्भ आदि। โสพฺภอาทโย ภนฺตา นิปจฺจนฺเต. สทติสฺส อสฺส โอตฺตํ, สีทนฺติ เอตฺถาติ โสพฺภํ=วิวรํ, โสพฺโภ=ชลาสยวิเสโส. กมิสฺส อสฺสุ, กามียตีติ กุมฺโภ=ทสมฺพณมตฺโต, ฆโฏ [Pg.266] จ. (เกน ชเลน อุมฺภียติ ปูรียตีติ วา กุมฺโภ=ฆโฏ.) กุสิสฺส อุมุก, กุสติ อวฺหายตีติ กุสุมฺภํ=มหารชนํ. กุสุมฺโภ=กนกํ, เอวมญฺเญปิ. 'सोब्भ' आदि 'भ' प्रत्ययान्त शब्द निपातित होते हैं। 'सद्' धातु के 'अ' को 'ओ' होता है, जिसमें (प्राणी) बैठते/धँसते हैं, वह 'सोब्भ' (विवर/गड्ढा) या 'सोब्भ' (एक विशेष जलाशय) है। 'कम्' धातु के 'अ' को 'उ' होता है, जिसकी कामना की जाती है, वह 'कुम्भ' (दस अम्मण मात्र का माप) और 'घड़ा' है। (अथवा जो जल से भरा जाता है, वह 'कुम्भ' है।) 'कुस्' धातु को 'उमुक' आदेश होता है, जो पुकारता है, वह 'कुसुम्भ' (महारजन/कुसुम) है। 'कुसुम्भ' का अर्थ 'कनक' (सोना) भी है, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๓๐. อุส กุส ปท สุขา กุโม. १३०. 'उस', 'कुस', 'पद' और 'सुख' धातुओं से 'कुम' प्रत्यय होता है। อุสาทีหิ กุโม โหติ. อุสติ ทหตีติ อุสุมํ=อุณฺหํ. กุสติ อวฺหายตีติ สุกุมํ=ปุปฺผํ. ปชฺชติ เทวปูชาทึ ยาตีติ ปทุมํ=ปงฺกชํ. สุขยตีติ สุขุม=อณุ. 'उस' आदि से 'कुम' प्रत्यय होता है। जो जलाता है, वह 'उसुम' (उष्ण/गर्मी) है। जो पुकारता है (आकर्षित करता है), वह 'सुकुम' (पुष्प) है। जो देव-पूजा आदि के काम आता है, वह 'पदुम' (पंकज/कमल) है। जो सुख देता है (या सूक्ष्म है), वह 'सुखुम' (अणु/सूक्ष्म) है। ๑๓๑. วฏุมาทโย. १३१. वटुम आदि। วฏุมอาทโย กุมนฺตา นิปจฺจนฺเถ. วชิสฺส-นฺตสฺส โฏ, วชนฺติ เอตฺถาติ วฏุมํ=ปโถ. สิลิสสฺส ลิสฺเส, สิลิสฺสตีติ สิเลสุปํ=เสมฺหํ. กมิสฺส กุงฺกาเทโส, กามียตีติ กุงฺกมํ=กสฺมีรชํ, เอวมญฺเญปิ. 'वटुम' आदि 'कुम' प्रत्ययान्त शब्द निपातित होते हैं। 'वज्' धातु के अन्त्य वर्ण को 'ट' होता है, जिसमें चलते हैं, वह 'वटुम' (पथ/मार्ग) है। 'सिलिस्' धातु को 'लिस्स' आदेश होता है, जो चिपकता है, वह 'सिलेसुप' (श्लेष्मा/कफ) है। 'कम्' धातु को 'कुङ्क' आदेश होता है, जिसकी कामना की जाती है, वह 'कुङ्कुम' (कश्मीरज/केसर) है, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๓๒. คุธา อุโม. १३२. 'गुध' धातु से 'उम' प्रत्यय होता है। คุธ ปริเวฏฺฐเนตีมสฺมา อุโม โหติ. คุธติ ปริเวฏฺฐตีติ โคธุโม=ธญฺญวิเสโส. 'गुध' (लपेटना/वेष्टन) धातु से 'उम' प्रत्यय होता है। जो लपेटता है, वह 'गोधुम' (एक विशेष धान्य/गेहूँ) है। ๑๓๓. ปฐ จรา อมิมา. १३३. 'पठ' और 'चर' धातुओं से क्रमशः 'अम' और 'इम' प्रत्यय होते हैं। ปฐติจรติสฺมา อม อิมา โหนฺติ ยถากฺกมํ. ปฏฺฐียติ อุจฺจารียติ อุตฺตมภาเวนาติ ปฐมํ=เสฏฺฐํ. จรติ หีนตฺตํ ยาตีติ จริมํ=ปจฺฉิมํ. 'पठ' और 'चर' धातुओं से यथाक्रम 'अम' और 'इम' प्रत्यय होते हैं। जो उत्तम भाव से पढ़ा या उच्चारित किया जाता है, वह 'पठम' (प्रथम/श्रेष्ठ) है। जो चलता है (अन्त को प्राप्त होता है), वह 'चरिम' (पश्चिम/अन्तिम) है। ๑๓๔. หิธูหิ มก. १३४. 'हि' और 'धू' धातुओं से 'मक' प्रत्यय होता है। หิ-คติยํ[Pg.267], ธู-กมฺปเน, เอเตหิ มก โหติ. หิโนติ ปวตฺตหีติ หิมํ=ตุหินํ. ธุนาติ กมฺปตีติ ธูโม=อคฺคิปสโว. 'हि' (गति) और 'धू' (कंपन) धातुओं से 'मक' प्रत्यय होता है। जो चलता है (प्रवृत्त होता है), वह 'हिम' (तुहिन/बर्फ) है। जो कँपाता है, वह 'धूम' (अग्नि से उत्पन्न धुआँ) है। ๑๓๕. ภีโต รีสโน จ. १३५. 'भी' धातु से 'रीसन' और 'मक' प्रत्यय होते हैं। ภี-ภเยตีมสฺมา รีสโน โหติ มกจ. อนฺตสราทิโลโป, ภายนฺติ เอตสฺมาติ ภีสโน=ภยานโก. ภีโม=โสว. 'भी' (भय) धातु से 'रीसन' और 'मक' प्रत्यय होते हैं। अन्त्य स्वर आदि का लोप होता है, जिससे डरते हैं, वह 'भीसन' (भयानक) है। 'भीम' का अर्थ भी वही है। ๑๓๖. ขี สุ วี ยา คาหิ สา ลู ขุ หุ มร ธร ฆร ชมาม สมา โม. १३६. 'खी', 'सु', 'वी', 'या', 'गा', 'हि', 'सा', 'लू', 'खु', 'हु', 'मर', 'धर', 'घर', 'जम', 'अम', 'सम' धातुओं से 'म' प्रत्यय होता है। ขี-ขเย. สุ-สวเน, วี-ตนฺตสนฺตาเน, ยา-ปาปุณเน, คา-สทฺเท, หิ-คติยํ, สา-ตนุกรณาวสาเนสุ, ลู-เฉทเน, ขุ-สทฺเท, หุ-หวเน, มร-ปาณจาเค, ธร-ธารเณ, กร-กรเณ, ฆร-เสจเน, ชม-อทเน, อม คม-คมเน, สม-อุปเม, เอเตหิ ธาตูหิ โม โหติ. เขปนํ นิรุปทฺทวกรณตาย เขโม=นิรุปทฺทโว. สุโนตีติ โสโม=จนฺโท. วายนฺติ เอเตนาติ เวโม=ตนฺตวาโยปกรณํ. ยาตีติ ยาโม=ทินสฺส ฉฏฺโฐ ภาโค, อฏฺฐโม วา. คายนฺติ เอตฺถาติ คาโม=สํวสโถ. หิโนติ ปวตฺตตีติ เหมํ=สุวณฺณํ. สาติ สุนฺทรตฺตํ ตนุํ กโรตีติ สาโม=กาโฬ. ลูยเตติ โลมํ=ตนุรุหํ. ขูยเต อุตฺตมภาเวนาติ โขมํ=อตสิ. หวนํ, หูยเต วา โหมํ=หุติ. มรนฺตฺยเนนาติ มมฺพํ=ยสฺมึ ตาฬิเต น ชีวติ ตํ. อตฺตานํ ธาเรนฺเต อปาเย วฏฺฏทุกฺเข จ อปตมาเน กตฺวา ธาเรตีติ ธมฺโม=ปริยตฺยาทิ[Pg.268]. กรณํ, กรียตีติ วา กมฺมํ=สุขทุกฺขผลาทิ. เสโท ปคฺฆรติ อเนนาติ ฆมฺโม=นิทาโฆ. ชเมติ อภกฺขิ ตพฺพํ อทตีติ ชมฺโม=นิหีโน, อนิสมฺมการี จ. อเมติ เปเมน ปุตฺตเกสุ ปวตฺตตีติ อมฺมา=มาตา. สเมนฺติ อเนนาติ สมฺมา=ปิยสมุทาจาโร. 'खी' (क्षय), 'सु' (सुनना), 'वी' (तन्तु-विस्तार), 'या' (प्राप्त करना), 'गा' (शब्द), 'हि' (गति), 'सा' (तनुकरण/अवसान), 'लू' (छेदन), 'खु' (शब्द), 'हु' (हवन), 'मर' (प्राण-त्याग), 'धर' (धारण), 'कर' (करण), 'घर' (सिंचन), 'जम' (भक्षण), 'अम/गम' (गमन), 'सम' (उपमा) - इन धातुओं से 'म' प्रत्यय होता है। उपद्रव रहित करने के कारण जो क्षेपण (शान्ति) है, वह 'खेम' (निरुपद्रव/कुशल) है। जो सुनता है (या रस देता है), वह 'सोम' (चन्द्र) है। जिससे बुनते हैं, वह 'वेम' (जुलाहे का उपकरण/करघा) है। जो जाता है, वह 'याम' (दिन का छठा या आठवाँ भाग/प्रहर) है। जहाँ गाते हैं (या रहते हैं), वह 'गाम' (ग्राम/गाँव) है। जो प्रवृत्त होता है, वह 'हेम' (सुवर्ण/सोना) है। जो सुन्दरता को कम करता है, वह 'साम' (काला) है। जो काटा जाता है, वह 'लोम' (रोम/बाल) है। जो उत्तम भाव से शब्दित होता है, वह 'खोम' (अतसी/अलसी का वस्त्र) है। हवन करना या जो हवन किया जाता है, वह 'होम' (हुति) है। जिससे मरते हैं, वह 'मम्ब' (मर्म स्थल) है। जो स्वयं को धारण करने वालों को अपाय और संसार-दुःख में गिरने से बचाकर धारण करता है, वह 'धम्म' (परियत्ति आदि धर्म) है। करना या जो किया जाता है, वह 'कम्म' (सुख-दुःख फल आदि कर्म) है। जिससे पसीना बहता है, वह 'घम्म' (निदाघ/गर्मी) है। जो अभक्ष्य का भक्षण करता है, वह 'जम्म' (नीच/अविचारक) है। जो प्रेम से पुत्रों में प्रवृत्त होती है, वह 'अम्मा' (माता) है। जिससे शान्त होते हैं, वह 'सम्मा' (प्रिय व्यवहार/सम्यक्) है। ๑๓๗. อสฺมาทโย. १३७. अस्म आदि। อสฺมอาทโย มนฺตา นิปจฺจนฺเต, ปรรูปาทีนมภาโว นิปาตนา. อส-เขปเน, อสฺสเตติ อสฺมา=ปาสาโณ. ภส-ภสฺมีกรเณ, ภสติ ปกฺขรตีติ ภสฺมา=ฉาริกา. อุส-ทาเห, อุสติ ทหตีติ อุสฺมา=เตโชธาตุ. วิส-ปวิสเน, ปวิสนฺติ เอตฺถาติ เวสฺมํ=ฆรํ. ภี-ภเย, มสฺส สุญ, ภายนฺติ เอตสฺมาติ เภสฺมา=ภยานโก. อสติสฺส ธง, อสฺสติ ชเนหิ จชียตีติ อธโม=นิหีโน. กโรติสฺส อสฺส อุตฺตํ, กโรตีติ กุมฺโม=กจฺฉโป. เอวมญฺเญปิ. 'अस्म' आदि 'म' प्रत्ययान्त शब्द निपातित होते हैं, यहाँ पररूप आदि का अभाव निपातन से है। 'अस' (क्षेपण) धातु से, जो फेंका जाता है, वह 'अस्मा' (पाषाण/पत्थर) है। 'भस' (भस्मीकरण) धातु से, जो बिखरता है, वह 'भस्मा' (क्षारिका/राख) है। 'उस' (दाह) धातु से, जो जलाता है, वह 'उस्मा' (तेजोधातु/गर्मी) है। 'विस' (प्रवेश) धातु से, जिसमें प्रवेश करते हैं, वह 'वेस्म' (घर) है। 'भी' (भय) धातु से, 'म' को 'सुञ' (स) आदेश होकर, जिससे डरते हैं, वह 'भेस्मा' (भयानक) है। 'अस' धातु को 'धङ' आदेश होकर, जो लोगों द्वारा त्यागा जाता है, वह 'अधम' (नीच) है। 'कर' धातु के 'अ' को 'उ' होकर, जो करता है, वह 'कुम्म' (कच्छप/कछुआ) है। इसी प्रकार अन्य भी। ๑๓๘. นีโต มิ. १३८. 'नी' धातु से 'मि' प्रत्यय होता है। นยติสฺมา มิ โหติ. นยตีติ เนมิ=จกฺกนฺตํ. 'नी' धातु से 'मि' प्रत्यय होता है। जो ले जाता है (घूमता है), वह 'नेमि' (चक्र का घेरा) है। ๑๓๙. อูมิ ภูมินิมิ รสฺมิ. १३९. 'ऊमि', 'भूमि', 'निमि' और 'रस्मि' शब्द 'मि' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। เอเตสทฺทา มิอนฺตา นิปจฺจนฺเต. อูห-วิตกฺเก, หโลโป, อูหนฺติ วิตกฺเกนฺติ เอเตนาติ อูมิ=ตรงฺโค. ภู-สตฺตายํ โอตฺตาภาโว, ภวนฺติ เอตฺถาติ ภูมิ=มหี. นิ-ปาปเน, เอตฺตาภาโว, สุคตึ เนติ ปาเปตีติ นิมิ=ราชา. รส-อสฺสาทเน, ปรรูปาภาโว, รสนฺติ สตฺตา เอตายาติ รสฺมิ=รชฺชุ. ये शब्द 'मि' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'ऊह' (वितर्क) धातु से, 'ह' का लोप होकर, जिससे वितर्क करते हैं (या जो हिलता है), वह 'ऊमि' (तरंग/लहर) है। 'भू' (सत्ता) धातु में 'ओ' भाव के अभाव से, जिसमें (प्राणी) होते हैं, वह 'भूमि' (मही/पृथ्वी) है। 'नि' (प्रापण) धातु में 'ए' भाव के अभाव से, जो सुगति को ले जाता है, वह 'निमि' (राजा निमि) है। 'रस' (आस्वादन) धातु में पररूप के अभाव से, जिससे प्राणी शब्द करते हैं (या जो बाँधती है), वह 'रस्मि' (रज्जु/किरण) है। (อิติ ปวคฺคปจฺจยวิธานํ). (इस प्रकार प-वर्ग प्रत्यय विधान समाप्त हुआ)। ๑๔๐. มาฉาหิ โย. १४०. 'मा' और 'छा' धातुओं से 'य' प्रत्यय होता है। มา-มาเน-ฉา-ฉาทเน[Pg.269], เอเตหิ โย โหติ. เมติ ปริเมติ อญฺเญน อุตฺตเมน คุเณน อตฺตโน อคุณนฺติ มายา=สนฺตโทส ปฏิจฺฉาทน ลกฺขณา. เฉติ ฉินฺทติ สํสยนฺติ ฉายา=ปฏิพิมฺพํ. 'मा' (मान/मापना) और 'छा' (छादन/ढकना) धातुओं से 'य' प्रत्यय होता है। जो दूसरे के उत्तम गुण के द्वारा अपने अवगुण को मापता (छिपाता) है, वह 'माया' (विद्यमान दोष को छिपाने के लक्षण वाली) है। जो संशय को काटती है, वह 'छाया' (प्रतिबिम्ब) है। ๑๔๑. ชนิสฺส ชา จ. १४१. 'जन' धातु से 'य' प्रत्यय होता है और 'जन' को 'जा' आदेश होता है। ชนิสฺมา โย โหติ, ชนิสฺส ชา จ, ชเนตีติ ชายา=ภริยา. 'जन' धातु से 'य' प्रत्यय होता है और 'जन' को 'जा' आदेश होता है, जो जन्म देती है, वह 'जाया' (भार्या/पत्नी) है। ๑๔๒. หทยา ทโย. १४२. हृदय आदि। หทยอาทโย ยนฺตา นิปจฺจนฺเต. หริสฺส ทง, หรตีติ หทยํ=จิตฺตํ, มโนธาตุ มโนวิญฺญาณธาตุ นิสฺสโย จ, ตนิสฺสอก, อตฺตนิ เปมํ ตโนตีติ ตนโย=ปุตฺโต. สรติสฺส สุริ, สรติ คจฺฉตีติ สูริโย=อาทิจฺโจ. หรติสฺส มฺมิง, สุขมาหรตีติ หมฺมิยํ=มุณฺฑจฺฉทนปาสาโท. กส-คมเน, กสสฺส อลก, อสฺส อิ จ, กสติ วุทฺธึ ยาตีติ กิสลยํ=ปลฺลวํ, เอวมญฺเญปิ. 'हृदय' आदि 'य' प्रत्ययान्त शब्द निपातित होते हैं। 'हर' धातु को 'दङ' आदेश होकर, जो (विषयों को) हरण करता है, वह 'हृदय' (चित्त, जो मनोधातु और मनोविज्ञानधातु का आश्रय है) है। 'तन' धातु को 'अक' आदेश होकर, जो स्वयं में प्रेम का विस्तार करता है, वह 'तनय' (पुत्र) है। 'सर' धातु को 'सुरि' आदेश होकर, जो चलता है, वह 'सूरिय' (आदित्य/सूर्य) है। 'हर' धातु को 'म्मिङ' आदेश होकर, जो सुख को लाता है, वह 'हम्मिय' (समतल छत वाला महल) है। 'कस' (गमन) धातु को 'अलक' आदेश और 'अ' को 'इ' होकर, जो वृद्धि को प्राप्त होता है, वह 'किसलय' (पल्लव/कोंपल) है, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๔๓. ขี สิ สิ นี สี สุ วี กุสูหิ รก. १४३. 'खी', 'सि', 'सि', 'नी', 'सी', 'सु', 'वी', 'कु' और 'सू' धातुओं से 'रक' प्रत्यय होता है। ขี-ขเย, สิ-เสวายํ, สิ-พนฺธเน, นี-ปาปเน, สี-สเย, สุ-สวเน, วี วา-คมเน, กุ-สทฺเท, สู-ปสเว, เอเตหิ รก โหติ. ขยติ ทุหเนนาติ ขีรํ=ปโย. กุสุมาทีหิ เสวียตีติ สิโร=มุทฺธา. เสติ สรีรํ พนฺธตีติ สิรา=เทหพนฺธนี. เนติ, ปเรหิวานียตีติ นีรํ=ชลํ. สยตีติ สีโร=หลํ. อนิฏฺฐผล- ทายกตฺตํ [Pg.270] สวตีติ สุรา=มทิรา. สุโณติ อุตฺตมคีตาทินฺติ สุโร=เทโว. เวติ อุตฺตมภาวํ ยาตีติ วีโร=วิกฺกนฺโต. กวติ นทตีติ กุรํ=ภตฺตํ. ภยฏฺฏิตานํ ปฐมกปฺปิยานํ สูรตฺตํ ปสวตีติ สูโร=สูริโย, วิกฺกนฺโต จ. खी (क्षय अर्थ में), सि (सेवा अर्थ में), सि (बन्धन अर्थ में), नी (प्रापण अर्थ में), सी (शयन अर्थ में), सु (श्रवण अर्थ में), वी या वा (गमन अर्थ में), कु (शब्द अर्थ में), सू (प्रसव अर्थ में) - इन धातुओं से 'रक' प्रत्यय होता है। दोहन से जिसका क्षय होता है, वह 'खीरं' (दूध) है। पुष्प आदि से जिसकी सेवा की जाती है, वह 'सिरो' (मस्तक) है। जो शरीर को बाँधती है, वह 'सिरा' (नस) है। जो दूसरों के द्वारा ले जाया जाता है, वह 'नीरं' (जल) है। जो सोता है, वह 'सीरो' (हल) है। अनिष्ट फल देने के कारण जो बहती है, वह 'सुरा' (मदिरा) है। जो उत्तम गीत आदि सुनता है, वह 'सुरो' (देव) है। जो उत्तम भाव को प्राप्त होता है, वह 'वीरो' (विक्रान्त/वीर) है। जो शब्द करता है, वह 'कुरं' (भात) है। भयभीत प्रथम कल्प के मनुष्यों के लिए जो शूरता उत्पन्न करता है, वह 'सूरो' (सूर्य और वीर) है। ๑๔๔. หิ จิ ทุ มินํ ทีโฆ จ. १४४. 'हि', 'चि', 'दु' और 'मि' धातुओं से 'रक' प्रत्यय होता है और (अन्त्य स्वर) दीर्घ होता है। หิ-คติยํ, จิ-จเย, ทุ-คติยํ, มิ-ปกฺเขปเน, เอเตหิ รก โหติ, ทีโฆ จานฺตสฺส. หิโนติ ปวตฺตตีติ หีรํ=ตาลหีราทิ. จยตีติ จีรํ=วกฺกลํ. ทูยติ ทุกฺเขน คมียตีติ ทูรํ=อนาสนฺนํ. มียเต ปกฺขีปียเตติ มีโร=สมุทฺโท. 'हि' (गति अर्थ में), 'चि' (संग्रह अर्थ में), 'दु' (गति अर्थ में), 'मि' (प्रक्षेप अर्थ में) - इनसे 'रक' प्रत्यय होता है और अन्त्य स्वर दीर्घ होता है। 'हिनोति' (प्रवृत्त होता है) इस अर्थ में 'हीरं' (ताड़ का रेशा आदि)। 'चयति' (संग्रह करता है) इस अर्थ में 'चीरं' (वल्कल)। 'दूयति' (दुःख से जाया जाता है) इस अर्थ में 'दूरं' (जो निकट न हो)। 'मीयते' (प्रक्षिप्त किया जाता है) इस अर्थ में 'मीरो' (समुद्र)। ๑๔๕. ธา ตานมี จ. १४५. 'धा' और 'ता' धातुओं से भी (रक प्रत्यय होता है) और अन्त्य के स्थान पर 'ई' आदेश होता है। ธา-ธารเณ, ตา-ปาลเน, เอเตหิ รก โหติ, อี จานฺตาเทโส. ธาเรตีติธีโร=ธิติมา. ชลํ ตายตีติ ตีรํ=ตฏํ. 'धा' (धारण अर्थ में), 'ता' (पालन अर्थ में) - इनसे 'रक' प्रत्यय होता है और अन्त्य के स्थान पर 'ई' आदेश होता है। 'धारेति' (धारण करता है) इस अर्थ में 'धीरो' (धैर्यवान)। 'जलं तायति' (जल की रक्षा करता है) इस अर्थ में 'तीरं' (तट)। ๑๔๖. ภทฺราโย. १४६. 'भद्र' आदि शब्द (निपातित होते हैं)। ภทฺรอาทโย รกอนฺตา นิปจฺจนฺเต. ภทฺท-กลฺยาเณ, ทโลโป ปรรูปาภาโว, ภชียตีติ ภทฺรํ=กลฺยาณํ. ภี-ภเย, นทาทิปาฐา วี, ภายนฺติ เอตายาติ เภรี=ทุนฺทุภิ. จิต-สญฺเจตเน, วิปุพฺโพ, วิจินฺติตพฺพนฺติ วิจิตฺรํ=นานาการํ, ยา-ปาปุณเน, รสฺส ตุญ, คมนํ ยาตฺรา=ยานํ. คุป-โคปเน, อุสฺส โอ, ปสฺส ตญฺจ โคปียตีติ โคตฺรํ=กุลาทิ, ภส-ภสฺมีกรเณ, รสฺส ตุญ, ภสติ ภกฺขํ กโรติ โตยาติ ภสฺตา-กมฺมารคคฺครี. อุส=ทาเห, สโลโป, โสเกน ตาฬิเต อุสติ ทหตีติ อุโร=สรีเรกเทโส, เอวมญฺเญปิ. 'भद्र' आदि शब्द 'रक' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'भद्द' (कल्याण अर्थ में), 'द' का लोप और पररूप का अभाव होने पर, 'भजीयति' (सेवन किया जाता है) इस अर्थ में 'भद्रं' (कल्याण)। 'भी' (भय अर्थ में), नदादि पाठ से 'वी' होने पर, 'भायन्ति एताय' (जिससे डरते हैं) इस अर्थ में 'भेरी' (दुन्दुभि)। 'चित' (संकेतन/चिन्तन अर्थ में), 'वि' उपसर्ग पूर्वक, 'विचिन्तितब्बं' (जो विशेष रूप से चिन्तन करने योग्य हो) इस अर्थ में 'विचित्रं' (नाना प्रकार का)। 'या' (प्राप्ति अर्थ में), 'र' को 'तु' आदेश होने पर, 'गमनं' (जाना) इस अर्थ में 'यात्रा' (यान)। 'गुप' (गोपन/रक्षा अर्थ में), 'उ' को 'ओ' और 'प' को 'त' होने पर, 'गोपीयति' (रक्षा की जाती है) इस अर्थ में 'गोत्रं' (कुल आदि)। 'भस' (भस्मीकरण अर्थ में), 'र' को 'तु' आदेश होने पर, 'भसति' (भक्षण करता है) इस अर्थ में 'भस्ता' (लोहार की धौंकनी)। 'उस' (दाह अर्थ में), 'स' का लोप होने पर, शोक से ताड़ित होने पर 'उसति' (जलता है) इस अर्थ में 'उरो' (शरीर का एक भाग/हृदय), इसी प्रकार अन्य भी। ๑๔๗. มนฺทงฺก สสาส มถ จตา อุโร. १४७. मन्द, अङ्क, सस, अस, मथ और चत धातुओं से 'उर' प्रत्यय होता है। มนฺท-ชฬตฺเต[Pg.271], องฺก-ลกฺขเณ, สส-คติหึสาปาณเนสุ, อส-เขปเน, มถ มนฺถ-วิโลฬเน, จต-ยาจเน, เอเตหิ อุโร โหติ. อมนฺทิ อสุนฺทรตฺตา ชฬตฺถมคมีติ มนฺทุรา=วาชิสาลา. องฺกียติ ลกฺขียตีติ องฺกุโร=พีชปสโว. สสติ หึสตีติ สสุโร=ชยมฺปตีนํ ปิตา. อสียิตฺถาติ อสุโร=ทานโว, อรีหิ มถียติ อาโลฬียตีติ มถุรา=นครํ. จตียตีติ จตุโร=ทกฺโข. मन्द (जड़ता में), अङ्क (लक्षण में), सस (गति, हिंसा और प्राणन में), अस (क्षेपण में), मथ (मन्थन और विलोडन में), चत (याचना में) - इनसे 'उर' प्रत्यय होता है। जो सुन्दर न होने के कारण जड़ता को प्राप्त हो, वह 'मन्दुरा' (घुड़साल) है। जो अङ्कित या लक्षित किया जाता है, वह 'अङ्कुर' (बीज का अंकुर) है। जो हिंसा करता है, वह 'ससुर' (पति-पत्नी का पिता) है। जिसे फेंक दिया गया, वह 'असुर' (दानव) है। जो शत्रुओं द्वारा मन्थन या विलोडित किया जाता है, वह 'मथुरा' (नगर) है। जो याचना करता है, वह 'चतुर' (दक्ष) है। ๑๔๘. วิธุราทโย. १४८. विधुर आदि शब्द। วิธุรอาทโย อุรนฺตา นิปจฺจนฺเต. วิธ-เวธเน, เอตฺตาภาโว, เวธติ หึสตีติ วิธุโร=วิรุทฺโธ. อุนฺท-กิเลทเน, อุนฺทติ กิเลทตีติ อุนฺทุโร=อาขุ. มํก-มณฺฑเน, นิคฺคหีตโลโป, มงฺกติ อเนน อตฺตานํ อลงฺกโรตีติ มกุโร=อาทาโส, รโถ, กกฺโก, มจฺโฉ จ. กุก วก-อาทาเน, กสฺส ทฺวิตฺตํ. กุกติ สลาทโย อาททาตีติ กุกฺกุโร=สา. มงฺค-มงฺคลฺเย, อมงฺคิ ปสตฺถมคมีติ มงฺคุโร=มจฺฉวิเสโส, เอวมญฺเญปิ. विधुर आदि शब्द 'उर' प्रत्ययान्त के रूप में निपातित होते हैं। विध (वेधन में), यहाँ 'ए' भाव का अभाव होता है; जो वेधन या हिंसा करता है, वह 'विधुर' (विरुद्ध) है। उन्द (क्वेदन/गीला करने में); जो गीला करता है, वह 'उन्दुर' (चूहा) है। मङ्क (मण्डन में), यहाँ अनुस्वार का लोप होता है; जिससे स्वयं को अलंकृत किया जाता है, वह 'मकुर' (दर्पण, रथ, कली और मछली) है। कुक और वक (आदान में), 'क' का द्वित्व होता है; जो हड्डियों आदि को ग्रहण करता है, वह 'कुक्कुर' (कुत्ता) है। मङ्ग (मङ्गल में); जो प्रशस्त गति को प्राप्त होता है, वह 'मङ्गुर' (एक विशेष मछली) है; इसी प्रकार अन्य भी। ๑๔๙. ติม รุห รุธ พธ มท มนฺท วชาช รุจ กสา กิโร. १४९. तिम, रुह, रुध, बध, मद, मन्द, वज, अज, रुच और कस धातुओं से 'किर' प्रत्यय होता है। ติม-เตมเน, รุห-ชนเน, รุธ-อาวรเณ, พธ-พาธเน, มทอุมฺมาเท, มนฺท-โมทนถุติชฬตฺเตสุ, วช อช-คมเน, รุจ-ทิตฺติยํ, กส-คมเน, เอเตหิ กิโร โหติ. เตเมตีติ ติมิรํ=อนฺธการํ, อาโป จ. รุหติ ปวตฺตตีติ รุหิรํ=โลหิตํ. ชีวิตํ รุนฺธตีติ รุธิรํ=ตเทว. พาธียตีติ พธิโร=โสตวิกโล. ชนา มชฺชนฺติ เอตายาติ มทิรา=สุรา. โมทนฺติ เอตฺถาติ มนฺทิรํ= ฆรํ[Pg.272]. วชตีติ วชิรํ=กุลิสุํ. อชนฺติ คจฺฉนฺตี เอตฺถาติ อชิรํ=องฺคณํ ฆรวิสโยกาโส จ. โรจตีติ รุจิรํ=มนุญฺญํ. กสียติ ทุกฺเขน คมียตีติ กสิรํ=กิจฺฉํ. तिम (गीला करने में), रुह (उत्पन्न होने में), रुध (आवरण में), बध (बाधा पहुँचाने में), मद (उन्माद में), मन्द (प्रसन्नता, स्तुति और जड़ता में), वज और अज (गमन में), रुच (दीप्ति में), कस (गमन में) - इनसे 'किर' प्रत्यय होता है। जो गीला करता है, वह 'तिमिर' (अन्धकार और जल) है। जो बढ़ता या प्रवृत्त होता है, वह 'रुहिर' (रक्त) है। जो जीवन को रोकता है, वह 'रुधिर' (वही, रक्त) है। जो बाधित होता है, वह 'बधिर' (बहरा) है। जिससे लोग मदमस्त होते हैं, वह 'मदिरा' (सुरा) है। जहाँ लोग प्रसन्न होते हैं, वह 'मन्दिर' (घर) है। जो गमन करता है, वह 'वजिर' (वज्र) है। जहाँ लोग चलते-फिरते हैं, वह 'अजिर' (आँगन या घर का परिसर) है। जो अच्छा लगता है, वह 'रुचिर' (मनोज्ञ) है। जहाँ दुःख से गमन किया जाता है, वह 'कसिर' (कष्ट) है। ๑๕๐. ถิราทโย. १५०. थिर आदि शब्द। ถิรอาทโย กิรนฺตา นิปจฺจนฺเต. ฐา-คตินิวตฺติยํ, ฐสฺส ถตฺตํ, ฐาติ ปวตฺตตีติ ถิรํ=จิรฏฺฐายี. อิส สึส-อิจฺฉายํ, นิคฺคหีตโลโป, อิจฺฉียตีติ สิสิโร=อุตุวิเสโส. อท ขาท-ภกฺขเน, อาสฺส รสฺสตฺถํ, ขาทียติ ปาณเกหีติ ขทิโร=ทนฺตธาวโน, เอวมญฺเญปิ. थिर आदि शब्द 'किर' प्रत्ययान्त के रूप में निपातित होते हैं। ठा (गति की निवृत्ति में), 'ठा' को 'थ' आदेश होता है; जो स्थित रहता है, वह 'थिर' (चिरस्थायी) है। इस और सिंस (इच्छा में), अनुस्वार का लोप होता है; जिसकी इच्छा की जाती है, वह 'सिसिर' (एक विशेष ऋतु) है। अद और खाद (भक्षण में), 'आ' को ह्रस्व होता है; जिसे कीड़ों द्वारा खाया जाता है, वह 'खदिर' (खैर/दन्तधावन) है; इसी प्रकार अन्य भी। ๑๕๑. ทท คเรหิ ทุรภรา. १५१. दद और गर धातुओं से क्रमशः 'दुर' और 'भर' प्रत्यय होते हैं। ทท-ทาเน, คร ฆร-เสจเน, เอเตหิ ยถากฺกมํ ทุรภรา โหนฺติ. อนฺตานํ ททาตีติ ททฺทุโร=เภโก. ครติ สิญฺจตีติ คพฺภรํ=คุหา. दद (दान में) और गर/घर (सींचने में) धातुओं से क्रमशः 'दुर' और 'भर' प्रत्यय होते हैं। जो शब्दों को देता है, वह 'दद्दुर' (मेंढक) है। जो सींचता है, वह 'गब्भर' (गुफा) है। ๑๕๒. จร ทร ชร คร มเรหิ เต. १५२. चर, दर, जर, गर और मर धातुओं से 'ते' प्रत्यय होता है। จราทีหิ ธาตูหิ เต จราทโย โหนฺติ ยถากฺกมํ. จรคติภกฺขเนสุ จรนฺติ เอตฺถาติ จจฺจรํ=วีถิจตุกฺกํ, องฺคณญฺจ, ทร-วิทารเณ, ทรียตีติ ททฺทรํ=วาทิตฺตํ, เภรี จ. ชร-วโยหานิยํ, อชรีติ ชชฺชโร=ชิณฺโณ. คร ฆร-เสจเน, ครติ สิญฺจตีติ คคฺคโร=ภินฺนสฺสโร, หํสสฺสโร จ. มร-ปาณจาเค, มรตีติ มมฺมโร=สุกฺขปณฺณํ, ปตฺถปณฺณานํ สทฺโท จ. चर आदि धातुओं से वे 'चर' आदि शब्द क्रमशः होते हैं। चर (गति और भक्षण में); जहाँ लोग चलते हैं, वह 'चच्चर' (चौराहा और आँगन) है। दर (विदारण में); जो विदीर्ण किया जाता है, वह 'दद्दर' (वाद्ययंत्र और भेरी) है। जर (अवस्था की हानि में); जो जीर्ण हो गया है, वह 'जज्जर' (जीर्ण) है। गर/घर (सींचने में); जो सींचता है, वह 'गग्गर' (फटा हुआ स्वर और हंस का स्वर) है। मर (प्राण त्याग में); जो मरता है, वह 'मम्मर' (सूखे पत्ते और पत्तों की आवाज) है। ๑๕๓. ปีโต กฺวโร. १५३. पी धातु से 'क्वर' प्रत्यय होता है। ปี-ตปฺปเนตีมสฺมา [Pg.273] กฺวโร โหติ. อปฺปิณีติ ปีวรํ=ถูลํ. पी (तृप्त करने में) धातु से 'क्वर' प्रत्यय होता है। जो पुष्ट करता है, वह 'पीवर' (स्थूल/मोटा) है। ๑๕๔. จีวราทโย. १५४. चीवर आदि शब्द। จีวรอาทโย กฺวรนฺตา นิปจฺจนฺเต. จินาติสฺส ทีฆตฺตํ. จียตีติ จีวรํ=กาสาวํ. สม-อุปสเม, นทาทิตฺตา วี, ปริฬาหํ สเมตีติ สํวรี=รตฺติ. ธาสฺส อี, ชาลกุมินาทีนิ ธาเรตีติ ธีวโร=โกฏฺโฏ, ตายติสฺส อี, เยน เกนจิ อตฺตานํ ตายตีติ ตีวโร=หีนชาติ. นยติสฺสี, นยนฺติ เอตฺถ สตฺตาติ นีวรํ=ฆรํ, เอวมญฺเญปิ. चीवर आदि शब्द 'क्वर' प्रत्ययान्त के रूप में निपातित होते हैं। 'चि' धातु के इकार को दीर्घ होता है; जो संचित किया जाता है, वह 'चीवर' (काषाय वस्त्र) है। सम (उपशम में), 'नदादि' गण के कारण 'वी' प्रत्यय होता है; जो परिदाह को शान्त करती है, वह 'संवरी' (रात्रि) है। धा धातु को 'ई' होता है; जो जाल और कुमिन आदि धारण करता है, वह 'धीवर' (मछुआरा) है। ता धातु को 'ई' होता है; जो किसी भी प्रकार से अपनी रक्षा करता है, वह 'तीवर' (हीन जाति) है। नी धातु को 'ई' होता है; जहाँ प्राणी ले जाए जाते हैं, वह 'नīवर' (घर) है; इसी प्रकार अन्य भी। ๑๕๕. กุโต กฺริโร. १५५. कु धातु से 'क्रिर' प्रत्यय होता है। กุ-สทฺเทตีมสฺมา กฺริโร โหติ. กวติ นทตีติ กุรโร=ปกฺขี, อิตฺถิยํ วีมฺหิ กุรรี. जो शब्द करता है, वह 'कुरर' (पक्षी) है; स्त्रीलिंग में 'वी' प्रत्यय होने पर 'कुररी' होता है। ๑๕๖. วสาสา ฉโร. १५६. वस और अस धातुओं से 'छर' प्रत्यय होता है। วส-นิวาเส, อส-เขปเน, เอเตหิ ฉโร โหติ. วสนฺติ เอตฺถาติ วจฺฉโร=วสฺโส. สํปุพฺโพ, สํวสนฺติ เอตฺถาติ สํวจฺฉโร=โสว. อสติ วิสฺสชฺเชตีติ อจฺฉรา=เทวกญฺญา, องฺคุลิโผฏนญฺจ. वस (निवास में) और अस (क्षेपण में) धातुओं से 'छर' प्रत्यय होता है। जिसमें निवास करते हैं, वह 'वच्छर' (वर्ष) है। 'सम्' उपसर्ग पूर्वक, जिसमें सब साथ रहते हैं, वह 'संवच्छर' (संवत्सर/वर्ष) है। जो बिखेरती है, वह 'अच्छरा' (अप्सरा) है, और इसका अर्थ चुटकी बजाना भी है। ๑๕๗. มสา เฉโร จ. १५७. मस धातु से 'छेर' और 'छर' प्रत्यय होते हैं। มส-อมสเนตีมสฺมา เฉโร โหติ ฉโร จ. ตณฺหาย ปรามสนํ มจฺเฉรํ=สกสมฺปตฺตินิคุหนํ, มจฺฉรํ=ตเทว. मस (परामर्श में) धातु से 'छेर' और 'छर' प्रत्यय होते हैं। तृष्णा के कारण अपनी संपत्ति को छिपाना 'मच्छेर' (मत्सर/कृपणता) है, और 'मच्छर' का भी वही अर्थ है। ๑๕๘. ธู วาโต สโร. १५८. धू और वा धातुओं से 'सर' प्रत्यय होता है। ธุนาติ [Pg.274] วาตีหิ สโร โหติ. ธุนาตีติ ธูสโร=ลูโข อีสํปณฺฑุ จ. วาติ คจฺฉตีติ วาสโร=ทิวโส. जो कँपाता है, वह 'धूसर' (रूखा और हल्का पीला) है। जो चलता है, वह 'वासर' (दिवस) है। ๑๕๙. ภมาทีหฺยโร. १५९. भ्रम आदि धातुओं से 'अर' प्रत्यय होता है। ภม ตส มนฺท กนฺทาทีหิ อโร โหติ. ภมตีติ ภมโร=มธุกโร. ตสติ ตนฺตํ คณฺหาตีติ ตสโร=สุตฺตเวฏฺฐโน. มนฺทนฺติ โมทนฺติ เอตฺถาติ มนฺทโร=ปพฺพโต. กนฺทติ อวฺหายตีติ กนฺทโร=ทรี. ทิวสฺส เอตฺตํ, เทวนฺติ กีฬนฺติ เอเตนาติ เทวโร=ปติโร ภาตา. भ्रम, तस, मन्द, कन्द् आदि धातुओं से 'अर' प्रत्यय होता है। जो भ्रमण करता है, वह 'भमर' (भ्रमर) है। जो त्रस्त करता है या तन्तु को लपेटता है, वह 'तसर' (ढरकी) है। जहाँ लोग प्रसन्न होते हैं, वह 'मन्दर' (पर्वत) है। जो पुकारता है, वह 'कन्दर' (गुफा) है। 'दिव' धातु के इकार को एकार होता है; जिससे क्रीड़ा की जाती है, वह 'देवर' (पति का भाई) है। ๑๖๐. วทิสฺส พทจ. १६०. वद धातु से 'अर' प्रत्यय होता है और 'वद' को 'बद' आदेश होता है। วทติสฺมา อโร โยติ, วทติสฺส พทาเทโส จ. วทนฺติ เอเตนาติ พทโร=กกฺกนฺธูผลํ. วีมฺหิ พทรี=กกฺกนฺธู. जिससे बोलते हैं, वह 'बदर' (बेर का फल) है। स्त्रीलिंग में 'वी' प्रत्यय होने पर 'बदरी' (बेर का वृक्ष) होता है। ๑๖๑. วท ชนานํ ฐงจ. १६१. वद और जन धातुओं से 'अर' प्रत्यय होता है और 'ठ' तथा 'ङ' अन्तादेश होते हैं। วท ชเนหิ อโร โหติ, ฐง จานฺตาเทโส. วทตีติ วฐโร=มูโฬ วฐรํ=ถูลํ. ชายตีติ ชฐรํ=อุทรํ. जो बोलता है, वह 'वठर' (मूर्ख) है और 'वठर' का अर्थ स्थूल भी है। जो उत्पन्न होता है, वह 'जठर' (पेट) है। ๑๖๒. ปจิสฺสิฐงจ. १६२. 'पचि' धातु से 'अर' प्रत्यय होता है और अन्त्य के स्थान पर 'इठङ' आदेश होता है। ปจติสฺมา อโร โหติ อิฐงจานฺตาทโส. ปจนฺติ เอเตนาติ ปิฐโร=ถาลี. 'पच' धातु से 'अर' प्रत्यय होता है और अन्त्य के स्थान पर 'इठङ' आदेश होता है। 'पचन्ति एतेन' (जिससे पकाते हैं) इस अर्थ में 'पिठरो' (स्थाली/बर्तन)। ๑๖๓. วกา อรณ. १६३. 'वक' धातु से 'अरण' प्रत्यय होता है। วก กุก-อาทาเนติมสฺมา อรณโหติ. วเกติ อาททาติ เอตายาติ วากรา=มิคพนฺธนี. 'वक' (आदान/ग्रहण अर्थ में) इस धातु से 'अरण' प्रत्यय होता है। 'वकेति' (ग्रहण करता है जिससे) इस अर्थ में 'वाकरा' (मृग बाँधने का जाल)। ๑๖๔. สิงฺคฺยงฺคาค มชฺชกลาลา อาโร. १६४. 'सिङ्गि', 'अङ्ग', 'अग', 'मज्ज', 'कल' और 'अल' धातुओं से 'आर' प्रत्यय होता है। สิงฺคิอิติ [Pg.275] นามธาตุ, องฺค-คมนตฺโถ, อค-กุฏิลคมเน, มชฺชสํสุทฺธิยํ, กล-สงฺขฺยาเน, อล-พนฺธเน, เอเตหิ อาโร โหติ. วิชฺฌนตฺเถน สิงฺคํ วิย สิงฺคํ=นาคริกภาวสงฺขาตสฺส กิเลสสิงฺคสฺเสตํ นามํ, ตํกโรติ สิงฺคํ วา ปยุตฺตํ, ตํ กโรติ ราคีสุ ปภวตีติ วา, ‘‘ธาตฺวตฺเถ นานามสฺมี’’ติ (๕.๑๒) อิ, ปุพฺพ สรโลโป, สิงฺคิ, ตโต อาโร, ‘‘สโรโลโป สเร’’ติ (๑.๒๖) อิโลโป, ปุพฺเพ ‘‘วิปฺปฏิเสเธ’’ติ (๑.๒๒) อนิฏฺฐปฺปฏิเสโธ, เอตฺถ หิ อารโต อญฺญตฺถ สาวกาสปุพฺพสรโลโปว, อิปจฺจยโต อญฺญตฺถ จ, สิงฺคาโร=กิเลสสิงฺคกรณํ, วิลาโสติ วุตฺตํ โหติ. องฺคติ วินาสํ คจฺฉตีติ องฺคาโร=ทฑฺฒกฏฺฐํ. อคนฺติ คจฺฉนฺติ เอตฺถาติ อคารํ=ฆรํ. ลีหเนน อตฺตโน สรีรํ มชฺชติ นิมฺมลตฺตํ กโรตีติ มชฺชาโร=พิฬาโร. กลาติ นิทฺเทสา ลสฺส ฬตฺตํ, เอเตน คุณํ กลียติ ปริมียตีติ กฬาโร=ปิงฺคโล. ทีฆตฺตํ อลติ พนฺธตีติ อฬาโร=วงฺโก วิสาโล จ. 'सिङ्गि' यह नामधातु है, 'अङ्ग' (गति अर्थ में), 'अग' (कुटिल गति अर्थ में), 'मज्ज' (संशुद्धि अर्थ में), 'कल' (संख्यान अर्थ में), 'अल' (बन्धन अर्थ में) - इनसे 'आर' प्रत्यय होता है। बेधने के अर्थ में सींग के समान 'सिङ्गं' (नागरिक भाव संज्ञक क्लेश-रूपी सींग का यह नाम है), उसे जो करता है या प्रयुक्त करता है, अथवा जो रागियों में उत्पन्न होता है, 'धात्वत्थे नाना मस्मि' सूत्र से 'इ' प्रत्यय, पूर्व स्वर का लोप होकर 'सिङ्गि', फिर 'आर' प्रत्यय, 'सरोलोपो सरे' सूत्र से 'इ' का लोप, 'विप्पटिसेधे' सूत्र से अनिष्ट का प्रतिषेध, यहाँ 'आर' प्रत्यय के परे रहते पूर्व स्वर का लोप होता है, 'सिङ्गारो' (क्लेश रूपी सींग को करना), जिसे 'विलास' कहा गया है। 'अङ्गति' (विनाश को प्राप्त होता है) इस अर्थ में 'अङ्गारो' (जली हुई लकड़ी/कोयला)। 'अगन्ति' (जहाँ जाते हैं) इस अर्थ में 'अगारं' (घर)। चाटने से अपने शरीर को 'मज्जति' (निर्मल करता है) इस अर्थ में 'मज्जारो' (बिल्ली)। 'कल' इस निर्देश से 'ल' को 'ळ' होने पर, जिससे गुण 'कलीयति' (परिमाणित किया जाता है) इस अर्थ में 'कळारो' (पिङ्गल/भूरा)। दीर्घता को 'अलति' (बाँधता है) इस अर्थ में 'अळारो' (टेढ़ा और विशाल)। ๑๖๕. กมิสฺสสฺสุ จ. १६५. 'कम' धातु से 'आर' प्रत्यय होता है और 'अ' को 'उ' आदेश होता है। กม-อิจฺฉายมิจฺจสฺมา อาโร โหติ, อสฺส อุ จ. กามียตีติ กุมาโร=พาโล. 'कम' (इच्छा अर्थ में) इस धातु से 'आर' प्रत्यय होता है और 'अ' को 'उ' आदेश होता है। 'कामीयति' (चाहा जाता है) इस अर्थ में 'कुमारो' (बालक)। ๑๖๖. ภิงฺคาราทโย. १६६. 'भृङ्गार' आदि शब्द (निपातित होते हैं)। ภิงฺคารปฺปภุตโย อารนฺตา นิปจฺจนฺเต. ภร=ภรเณ, ภรณํ ธารณํ โปสนญฺจ, ธารณตฺถสฺส ภรติสฺส ภิงฺคาเทโส, ภรติ [Pg.276] ทธาติ อุทกนฺติ ภิงฺคาโร=เหมภาชนํ. กฺเลท กฺลิท-อลฺล ภาเว, ล โลโป, กฺเลทยตีติ เกทารํ=เขตฺตํ, (เก ชเล สติ ทาโร วิทารณมสฺสาติ วา เกทารํ=ตเทว, พหุลาธิการา สตฺตมิยา น โลโป.) วิท-ลาเภตีมสฺมา กุปุพฺพา อาโร ทสฺส ฬตฺตํ อิสฺส เอตฺตาภาโว สมาเส กุสฺส โอ จ นิปจฺจนฺเต, กุํ ปถวึ วินฺทติ ตตฺรุปฺปนฺนตายาติ โกวิฬาโร=ทิคุณปตฺโต. 'भृङ्गार' आदि शब्द 'आर' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'भर' (भरण अर्थ में), भरण का अर्थ धारण और पोषण है, धारण अर्थ वाली 'भर' धातु को 'भृङ्ग' आदेश होने पर, 'भरति' (जल धारण करता है) इस अर्थ में 'भृङ्गारो' (स्वर्ण पात्र)। 'क्लेद' या 'क्लिद' (आर्द्र भाव में), 'ल' का लोप होने पर, 'क्लेदयति' (गीला करता है) इस अर्थ में 'केदारं' (खेत), (अथवा 'के' यानी जल होने पर 'दार' यानी विदारण है जिसका, वह 'केदारं', बहुल अधिकार से सप्तमी का लोप नहीं होता)। 'विद' (लाभ अर्थ में) इस धातु से 'कु' उपसर्ग पूर्वक 'आर' प्रत्यय, 'द' को 'ळ', 'इ' को 'ए' का अभाव और समास में 'कु' को 'ओ' निपातित होते हैं, 'कुं' (पृथ्वी को) प्राप्त करता है वहाँ उत्पन्न होने के कारण, इस अर्थ में 'कोविळारो' (कचनार)। ๑๖๗. กรา มาโร. १६७. 'कर' धातु से 'मार' प्रत्यय होता है। กโรติสฺมา มาโร โหติ. โลหกิจฺจํ กโรตีติ กมฺมาโร=โลหกาโร. 'कर' धातु से 'मार' प्रत्यय होता है। 'लोहकिच्चं करोति' (लोहे का काम करता है) इस अर्थ में 'कम्मारो' (लोहार)। ๑๖๘. ปุส สเรหิ ขโร. १६८. 'पुस' और 'सर' धातुओं से 'खर' प्रत्यय होता है। ปุส สเรหิ ขโร โหติ. โปสียติ ชเลนาติ โปกฺขรํ=ปทุมํ. สรติ วิการํ คจฺฉตีติ สกฺขรา=อุจฺฉุวิกาโร. 'पुस' और 'सर' धातुओं से 'खर' प्रत्यय होता है। 'पोसीयति' (जल द्वारा पोषित होता है) इस अर्थ में 'पोक्खरं' (कमल)। 'सरति' (विकार को प्राप्त होता है) इस अर्थ में 'सक्खरा' (शक्कर/चीनी)। ๑๖๙. สร วส กลา กีโร วสฺสุฏ จ. १६९. इन ('सर', 'वस', 'कल') धातुओं से 'कीर' प्रत्यय होता है और 'वस' को 'उट' आदेश होता है। เอเตหิ กีโร โหติ วสฺส อุฏ จ. สรียตีติ สรีรํ=เทโห. วสนฺติ วาสํ กโรนฺติ เอเตนาติ อุสีรํ=พีรณมูลํ. อเนน ถูลาทิ กลียติ ปริมียติติ กลิโร=องฺกุโร. इनसे 'कीर' प्रत्यय होता है और 'वस' को 'उट' आदेश होता है। 'सरीियति' (क्षीण होता है) इस अर्थ में 'सरीरं' (देह)। 'वसन्ति' (जिससे निवास करते हैं) इस अर्थ में 'उसीरं' (खस की जड़)। जिससे स्थूल आदि 'कलीयति' (परिमाणित किया जाता है) इस अर्थ में 'कलिरो' (अंकुर)। ๑๗๐. คมฺภีราทโย. १७०. 'गम्भीर' आदि शब्द (निपातित होते हैं)। คมฺภีรอาทโย กีรนฺตา นิปจฺจนฺเต. คมิสฺส ภุก, มโลโป วา, ปถวึ, ภินฺทิตฺวา คจฺฉติ ปวตฺตตีติ คมฺภีโร, คภีโร= อคาโธ[Pg.277], กุลิสฺส ลสฺส โฬ, ปาเท กุลติ ปตฺถรตีติ กุฬีโร=กกฺกโฏ, เอวมญฺเญปิ. 'गम्भीर' आदि शब्द 'कीर' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'गमु' धातु को 'भुक' आदेश, अथवा 'म' का लोप होने पर, पृथ्वी को भेदकर जाता है या प्रवृत्त होता है इस अर्थ में 'गम्भीरो', 'गभीरो' (अगाध)। 'कुल' धातु के 'ल' को 'ळ' होने पर, पैरों से 'कुलति' (फैलता है) इस अर्थ में 'कुळीरो' (केकड़ा), इसी प्रकार अन्य भी। ๑๗๑. ขชฺช วลฺล มสา อูโร. १७१. 'खज्ज', 'वल्ल' और 'मस' धातुओं से 'ऊर' प्रत्यय होता है। ขชฺช-มชฺชเน, วล วลฺล-สํวรเณ, สม-อามสเน, เอเตหิ อูโร โหติ, ขชฺชียตีติ ขชฺชูโร, วีมฺหิ ขชฺชูรี=รุกฺขวิเสโส. วลฺลียติ สํวรียตีติ วลฺลูโร=สุกฺขมํโส. มสียตีติ มสูโร=วีหิวิเสโส. 'खज्ज' (मार्जन अर्थ में), 'वल' या 'वल्ल' (संवरण अर्थ में), 'सम' (आमर्शन अर्थ में) - इनसे 'ऊर' प्रत्यय होता है। 'खज्जीयति' इस अर्थ में 'खज्जूरों', स्त्रीलिंग में 'खज्जूरी' (एक विशेष वृक्ष)। 'वल्लीयति' (ढका जाता है) इस अर्थ में 'वल्लूरो' (सूखा मांस)। 'मसीयति' इस अर्थ में 'मसुरो' (एक विशेष धान्य/मसूर)। ๑๗๒. กปฺปูราทโย. १७२. 'कप्पूर' आदि शब्द (निपातित होते हैं)। กปฺปูรอาทโย อูรนฺตา นิปจฺจนฺเต. ตุฏฺฐิมุปฺปาเทตุํ กปฺปติ สกฺโกตีติ กปฺปูรํ=ฆนสาโร. กโรติสฺส อสฺสุ, กิพฺพิสํ กโรตีติ กุรูโร=ปาปการี. ปส-พาธเน, ปสติ ปีเฬตีติ ปสูโร=ทุฏฺโฐ, พฺยญฺชนํ, เอวํนามโก จ, เอวมญฺเญปิ. 'कप्पूर' आदि शब्द 'ऊर' प्रत्यय के साथ निपातित होते हैं। जो संतोष उत्पन्न करने में समर्थ है, वह 'कप्पूर' (कपूर) है। 'कर' धातु से 'अस्सु' आदेश होकर, जो पाप करता है, वह 'कुरूर' (क्रूर/पापकारी) है। 'पस' धातु बाधा पहुँचाने के अर्थ में है, जो पीड़ित करता है वह 'पसूर' (दुष्ट/व्यंजन विशेष) है, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๗๓. กฐ จกา โอโร. १७३. 'कठ' और 'चक' धातुओं से 'ओर' प्रत्यय होता है। กฐ-กิจฺฉชีวเน, จก-ปริวิตกฺกเน, เอเตหิ โอโร โหติ. กฐติ กิจฺเฉน ชีวตีติ กโฐโร=ถทฺโธ. จกติ ปริวิตกฺเกตีติ จโกโร=ปกฺขิวิเสโส. 'कठ' (कठिनता से जीवन यापन) और 'चक' (वितर्क करना) धातुओं से 'ओर' प्रत्यय होता है। जो कठिनता से जीता है, वह 'कठोर' (स्तब्ध/कठोर) है। जो वितर्क करता है, वह 'चकोर' (एक पक्षी विशेष) है। ๑๗๔. โมราทโย. १७४. 'मोर' आदि शब्द। โมรอาทโย โอรนฺตา นิปจฺจนฺเต. มี-หึสายํ, อีโลโป, มยติ หึสตีติ โมโร=มยูโร. กส-คมเน, อสฺสิ[Pg.278], กสติ คจฺฉตีติ กิโสโร=ปฐมวโย อสฺโส. มหียติ ปูชียตีติ มโหโร=วมฺมิโก, เอวมญฺเญปิ. 'मोर' आदि शब्द 'ओर' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'मी' (हिंसा) धातु से 'ई' का लोप होकर, जो हिंसा करता है वह 'मोर' (मयूर) है। 'कस' (गमन) धातु से 'अस्सि' होकर, जो चलता है वह 'किसोर' (प्रथम अवस्था का अश्व/किशोर) है। जिसकी पूजा की जाती है वह 'महोरो' (वल्मीक/बाँबी), इसी प्रकार अन्य भी। ๑๗๕. กุโต เอรก. १७५. 'कु' शब्द से 'एरक' प्रत्यय होता है। กุ-สทฺเทตีมสฺมา เอรก โหติ. ‘‘ยุวณฺณานมิยงุวง สเร’’ติ (๕.๑๓๖) อุวง, กวติ นทตีติ กุเวโร=เวสฺสวโณ. 'कु' (शब्द करना) इस धातु से 'एरक' प्रत्यय होता है। 'युवण्णानमियङ्ुवङ सरे' सूत्र से 'उवङ' आदेश होकर, जो शब्द करता है वह 'कुवेर' (वैश्रवण) है। ๑๗๖. ภู สูหิ ริก. १७६. 'भू' और 'सू' धातुओं से 'रिक' प्रत्यय होता है। ภูสตฺตายํ, สู-ปสวเน, เอเตหิ ริก โหติ. ภวตีติ ภูริ=ปหูตํ, งีมฺหิ ภูรี=เมธา. สวติ หิตํ ปสวตีติ สูริ=วิจกฺขโณ. 'भू' (सत्ता/होना) और 'सू' (उत्पन्न करना) धातुओं से 'रिक' प्रत्यय होता है। जो होता है वह 'भूरि' (प्रचुर/बहुत) है, 'ङी' प्रत्यय होने पर 'भूरी' (मेधा/बुद्धि) बनता है। जो हित उत्पन्न करता है वह 'सूरि' (विद्वान/विचक्षण) है। ๑๗๗. มี กสี นีหิ รุ. १७७. 'मी', 'कसि' और 'नी' धातुओं से 'रु' प्रत्यय होता है। มี-หึสายมิจฺจสฺมา, กปุพฺพา สยติสฺมา, นยติสฺมา จ รุ โหติ. รํสีหิ อนฺธการํ มียติ หึสตีติ เมรุ=สิเรรุ, เก ชเล สยติ ปวตฺตตีติ กเสรุ=ติณวิเสโส. อตฺตนิสฺสิเต สุนฺทรตฺตํ เนติ ปาเปตีติ เนรุ=ปพฺพโต. 'मी' (हिंसा), 'क' पूर्वक 'सय' (सोना/रहना) और 'नय' (ले जाना) धातुओं से 'रु' प्रत्यय होता है। जो किरणों से अंधकार का नाश करता है वह 'मेरु' (सिनेरु पर्वत) है। जो 'के' (जल) में रहता है वह 'कसेरु' (एक प्रकार का तृण) है। जो अपने आश्रितों को सुंदरता की ओर ले जाता है वह 'नेरु' (पर्वत) है। ๑๗๘. สินา เอรุ. १७८. 'सिना' धातु से 'एरु' प्रत्यय होता है। สินา-โสเจยฺเยตีมสฺมา เอรุ โหติ. สินาติ สุจึ กโรตีติ สิเนรุ=ปพฺพตราชา. 'सिना' (शुद्धि/स्नान) धातु से 'एरु' प्रत्यय होता है। जो स्नान कराता है या शुद्ध करता है वह 'सिनेरु' (पर्वतराज) है। ๑๗๙. ภี รุหิ รุก. १७९. 'भी' और 'रु' धातुओं से 'रुक' प्रत्यय होता है। ภี-สเย, รุ-สทฺเท, เอเตหิ รุก โหติ. ภายนฺติ เอตสฺมาติ ภีรุ=ภยานโก. รวตีติ รุรุ=มิโค. 'भी' (भय) और 'रु' (शब्द) धातुओं से 'रुक' प्रत्यय होता है। जिससे डरते हैं वह 'भीरु' (भयानक/डरपोक) है। जो शब्द करता है वह 'रुरु' (एक प्रकार का मृग) है। ๑๘๐. ตมา พูโล. १८०. 'तम' धातु से 'बूल' प्रत्यय होता है। ตม-ภูสเนตีมสฺมา [Pg.279] พูโล โหติ. มุขํ ตเมติ ภูเสตีติ ตมฺพูลํ=มุขภูสนํ. 'तम' (सजाना/भूषित करना) धातु से 'बूल' प्रत्यय होता है। जो मुख को सजाता है वह 'तम्बूल' (ताम्बूल/पान/मुखभूषण) है। ๑๘๑. สิโต ลกวาลา. १८१. 'सि' धातु से 'ल', 'क' और 'वाल' प्रत्यय होते हैं। สิ-เสวายมิจฺจสฺมา ลกวาลอิจฺเจเต ปจฺจยา โหนฺติ. สตฺเตหิ เสวียตีติ สิลา=ปาสาโณ, เสโล=ปพฺพโต. ชลํ เสวตีติ เสวาโล=ชลติณํ. 'सि' (सेवा/आश्रय) धातु से 'ल', 'क' और 'वाल' ये प्रत्यय होते हैं। जिसका प्राणियों द्वारा सेवन किया जाता है वह 'सिला' (शिला/पत्थर) या 'सेलो' (शैल/पर्वत) है। जो जल का सेवन करता है वह 'सेवालो' (शैवाल/काई) है। ๑๘๒. มงฺค กม สมฺพ สพ สก วส ปิส เกว กล ปลฺล กฐ ปฏ กุณฺฑ มณฺฑา อโล. १८२. 'मङ्ग', 'कम', 'सम्ब', 'सब', 'सक', 'वस', 'पिस', 'केव', 'कल', 'पल्ल', 'कठ', 'पट', 'कुण्ड' और 'मण्ड' धातुओं से 'अल' प्रत्यय होता है। มงฺค-มงฺคลฺเย, กม-อิจฺฉายํ, สมฺพ-มณฺฑเน, สพอิติ อสฺเสว กตมโลปสฺส นิทฺเทโส, สก-สตฺติย, วส-นิวาเส, ปิสคมเน, เกว-เสวเน, กล-สงฺขฺยาเน, ปลฺล-คมเน, กฐ กิจฺฉชีวเน, ปฏ-คมนตฺโถ, กุณฺฑ-ทาเห, มณฺฑ-ภูสเน, เอเตหิ อโล โหติ. มงฺคนฺติ สตฺตา เอเตน วุทฺธึ คจฺฉนฺตีติ มงฺคลํ=ปสตฺถํ. กามียตีติ กมลํ-ปงฺกชํ. สมฺปติ มณฺเฑตีติ สมฺพลํ=ปาเถยฺยํ. สพลํ=วิสภาค วณฺณวนฺตํ. สกฺโกติ วตฺตุนฺติ สกลํ=สพฺพํ. วสตีติ วสโล=สุทฺโท. ปิยภาวํ ปิสติ คจฺฉตีติ เปสโล=ปิยสีโล. เกวติ ปวตฺตตีติ เกวลํ=สกลํ. กลียติ ปริมียติ อุทกเมเตนาติ กลลํ=อปตฺถินฺนํ, ปลฺลติ อาคจฺฉติ อุทกเมตสฺมาติ ปลฺลลํ=อปฺโปทโก สโร. กฐนฺติ เอตฺถ ทุกฺเขน ยนฺตีติ กฐลํ=กปาลขณฺฑํ, ปฏติ วุทฺธึ คจฺฉตีติ ปฏลํ=สมู- โห[Pg.280]. ฆํเสน กุณฺฑติ ทหตีติ กุณฺฑลํ=กณฺณาภรณํ. มณฺฑียติ ปริจฺเฉทกรณวเสน ภูสียตีติ มณฺฑลํ=สมนฺตโต ปริจฺฉินฺนํ. 'मङ्ग' (मंगल), 'कम' (इच्छा), 'सम्ब' (मंडन), 'सब' (मकार लोप का निर्देश), 'सक' (शक्ति), 'वस' (निवास), 'पिस' (गमन), 'केव' (सेवन), 'कल' (संख्या), 'पल्ल' (गमन), 'कठ' (कठिन जीवन), 'पट' (गमन), 'कुण्ड' (दाह), 'मण्ड' (भूषण) - इन धातुओं से 'अल' प्रत्यय होता है। जिससे प्राणी वृद्धि को प्राप्त होते हैं वह 'मङ्गल' (प्रशस्त) है। जिसकी इच्छा की जाती है वह 'कमल' (पंकज) है। जो अच्छी तरह सजाता है वह 'सम्बल' (पाथेय/राह का भोजन) है। 'सबल' (विभिन्न रंगों वाला)। जो बोलने में समर्थ है वह 'सकल' (सब) है। जो निवास करता है वह 'वसल' (शूद्र) है। जो प्रिय भाव को प्राप्त होता है वह 'पेसल' (प्रियशील) है। जो प्रवृत्त होता है वह 'केवल' (सम्पूर्ण) है। जिससे जल मापा जाता है वह 'कलल' (कीचड़), जिससे जल आता है वह 'पल्लल' (अल्प जल वाला सरोवर) है। जहाँ दुःख से चलते हैं वह 'कठल' (खप्पर का टुकड़ा) है। जो बढ़ता है वह 'पटल' (समूह) है। जो घर्षण से जलता है वह 'कुण्डल' (कर्णाभूषण) है। जो परिच्छेद के कारण सजाया जाता है वह 'मण्डल' (चारों ओर से घिरा हुआ) है। ๑๘๓. มุสา กโล. १८३. 'मुस' धातु से 'अल' प्रत्यय होता है। มุสติสฺมา กโล โหติ. มุสติ เอเตนาติ มุสโล=อโยคฺโค. जिससे मूसते (कूटते) हैं वह 'मुसल' (मूसल/लोहे का डंडा) है। ๑๘๔. ถลาทโย. १८४. 'थल' आदि शब्द। ถลอาทโย กลนฺตา นิปจฺจนฺเต. ฐสฺส โถ, ปุพฺพสรโลโป, ติฏฺฐนฺติ เอตฺถาติ ถลํ=อุนฺนตปฺปเทโส. ปา-ปาเน, อุปุพฺโพ, ทฺวิภาวสรโลปา, อุทกํ ปิวตีติ อุปฺปลํ=กุวลยํ. ปติสฺส ปาฏํ, ปตติ คจฺฉติ ปริปากนฺติ ปาฏลํ=ผลํ, ตมฺพวณฺณํ กุสุมญฺจ. พํหิสฺส นิคฺคหีตโลโป, พํหติ วุทฺธึ คจฺฉตีติ พหลํ=ฆนํ. จุปิสฺส อุสฺส อตฺตํ, จุปติ เอกตฺถ น ติฏฺฐตีติ จปโล=อนวฏฺฐิโต, เอวมญฺเญปิ. 'थल' आदि शब्द 'अल' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'ठा' को 'थ' आदेश और पूर्व स्वर का लोप होकर, जहाँ स्थित होते हैं वह 'थल' (उन्नत प्रदेश) है। 'पा' (पीना) धातु से 'उ' उपसर्ग पूर्वक, द्वित्व और स्वर लोप होकर, जो जल पीता है वह 'उप्पल' (कुवलय/कमल) है। 'पत' को 'पाट' आदेश होकर, जो परिपाक को प्राप्त होता है वह 'पाटल' (फल, ताँबे के रंग का पुष्प) है। 'बंह' धातु के अनुस्वार का लोप होकर, जो वृद्धि को प्राप्त होता है वह 'बहल' (सघन/घना) है। 'चुप' धातु के 'उ' को 'अ' होकर, जो एक स्थान पर नहीं ठहरता वह 'चपल' (अस्थिर) है, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๘๕. กุลา กาโล จ. १८५. 'कुल' धातु से 'आल' और 'अल' प्रत्यय होते हैं। กุล-ปตฺถาเรตีมสฺมา กาโล โหติ กโล จ. กุลติ อตฺตโน สิปฺปํ ปตฺถรตีติ กุลาโล=กุมฺภกาโร. กุลติ ปกฺเข ปสาเรตีติ กุลโล=ปกฺขิชาติ. जो अपने शिल्प का विस्तार करता है वह 'कुलआल' (कुम्हार) है। जो पंखों को फैलाता है वह 'कुलल' (एक पक्षी जाति) है। ๑๘๖. มุฬาลาทโย. १८६. 'मुळाल' आदि शब्द। มุฬาลอาทโย กาลนฺตา นิปจฺจนฺเต. มีล-นิมีลเน, อุตฺตฬตานิ, อุทฺธฏมตฺเต นิมีลตีติ มุฬาลํ=ภิสํ. พล-ปาณเน, อิตฺต- ฬตฺตานิ[Pg.281], มูสิกาทิขาทเนน พลติ ชีวตีติ พิฬาโล=มชฺชาโร. กปฺปิสฺส สํโยคาทิโลโป, กปฺปนฺติ ชีวิกํ เอเตนาติ กปาลํ=ฆฏาทิขณฺฑํ. ปี ตปฺปเน. ‘‘ยุวณฺณานมิยงุวง สเร’’ติ (๕.๑๓๖) อิยง, อตฺตโน ผเลน สตฺเต สนฺตปฺเปตีติ ปิยาโล-รุกฺโข. กุณ-สทฺเท, วาตสมุฏฺฐิตา วีจิมาลา เอตฺถ กุณนฺติ นทนฺตีติ กุณาโล=เอโก มหาสโร. วิส-ปวิสเน, ปวิสนฺติ เอตฺถาติ วิสาโล=วิตฺถิณฺโณ. ปล-คมเน, วาเตน ปลติ คจฺฉตีติ ปลาลํ=สสฺสานมุปนีตธญฺญานํ นาฬปตฺตานิ. สรติสฺส สิโค, สสาทโย สรติ หึสตีติ สิคาโล=โกตฺถุ, เอวมญฺเญปิ. 'मुळाल' आदि शब्द 'आल' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'मील' (आँख मूँदना) धातु से, जो उखाड़ते ही कुम्हला जाता है वह 'मुळाल' (मृणाल/कमल की डंडी) है। 'बल' (प्राणन/जीना) धातु से, जो चूहों आदि को खाकर जीता है वह 'बिळाल' (बिल्ली/मार्जार) है। 'कप्प' धातु के संयोग के आदि का लोप होकर, जिससे जीविका चलाते हैं वह 'कपाल' (घड़े आदि का टुकड़ा) है। 'पी' (तृप्त करना) धातु से 'इयङ' आदेश होकर, जो अपने फल से प्राणियों को तृप्त करता है वह 'पियाल' (एक वृक्ष) है। 'कुण' (शब्द) धातु से, जहाँ वायु से उठी लहरें शब्द करती हैं वह 'कुणाल' (एक बड़ा सरोवर) है। 'विस' (प्रवेश) धातु से, जहाँ प्रवेश करते हैं वह 'विसाल' (विस्तृत) है। 'पल' (गमन) धातु से, जो वायु से उड़ता है वह 'पलाल' (पुआल/धान के डंठल) है। 'सर' धातु को 'सिग' आदेश होकर, जो खरगोश आदि की हिंसा करता है वह 'सिगाल' (सियार/कोत्थु) है, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๘๗. จณฺฑ ปตา ณาโล. १८७. 'चण्ड' और 'पत' धातुओं से 'णाल' प्रत्यय होता है। จณฺฑ-จณฺฑิกฺเย, ปต ปถ-คมเน, เอเตหิ ณาโล โหติ. จณฺเฑติ ปีเฬตีติ จณฺฑาโล=มาตงฺโค, ปตติ อโธคจฺฉตีติ ปาตาลํ=รสาตลํ. 'चण्ड' (क्रोध/हिंसा) और 'पत' (नीचे जाना) धातुओं से 'णाल' प्रत्यय होता है। जो पीड़ित करता है वह 'चण्डाल' (मातंग) है। जो नीचे गिरता है वह 'पाताल' (रसातल) है। ๑๘๘. มาทิโต โล. १८८. 'मा' आदि धातुओं से 'लो' प्रत्यय होता है। มา-มาเน, อิ-อชฺเฌนคตีสุ, ปี-ตปฺปเน, ทู-ปริตาเป, เอวมาทีหิ โล โหติ. มียติ ปริมียตีติ มาลา=ปนฺติ. เอติ คจฺฉตีติ เอลา=สุขุเมลา. ปิเณติ ตปฺเปติ เอตฺถาติ เปลา=อาสิตฺตกูปธานํ. ทูยติ ปริตาเปตีติ โทลา=กีฬนยานกํ. กลสงฺขฺยาเน, กลนํ กลฺลํ=ยุตฺตํ. 'मा' (मान), 'इ' (अध्ययन और गति), 'पी' (तृप्ति), 'दू' (परिताप) आदि धातुओं से 'लो' प्रत्यय होता है। जो मापी जाती है वह 'माला' (पंक्ति) है। जो जाती है वह 'एला' (इलायची) है। जिसमें तृप्त किया जाता है वह 'पेला' (पेटी/पात्र) है। जो हिलता या दुखी होता है वह 'दोला' (झूला) है। 'कल' (संख्यान) धातु से 'कल्ल' (युक्त/उचित) बनता है। ๑๘๙. อน สล กล กุก สฐ มหา อิโล. १८९. 'अन', 'सल', 'कल', 'कुक', 'सठ' और 'मह' धातुओं से 'इलो' प्रत्यय होता है। อน-ปาณเน, สล-คมเน, กล-สงฺขฺยาเน, กุก วก-อาทเน, สฐ-กิตเว, อรห มห-ปูชายํ, เอเตหิ อิโล โหติ. อนติ [Pg.282] ปวตฺตตีติอนิโล=มาลุโต. สลติ คจฺฉตีติ สลิลํ=ชลํ. กลติ ปวตฺตตีติ กลิลํ=คหนํ. กุกติ อตฺตโน นาเทน สตฺตานํ มนํ คณฺหาตีติ โกกิโล=ปรปุณฺโฑ. สฐติ วญฺเจตีติ สฐิโล=สโฐ. มหียติ ปูชียตีติ มยิลา=อิตฺถี. 'अन' (प्राणन), 'सल' (गमन), 'कल' (संख्यान), 'कुक' (आदान), 'सठ' (धूर्तता), 'मह' (पूजा) - इन धातुओं से 'इलो' प्रत्यय होता है। जो चलता है वह 'अनिल' (वायु) है। जो बहता है वह 'सलिल' (जल) है। जो व्याप्त होता है वह 'कलिल' (गहन/मिश्रण) है। जो अपनी ध्वनि से प्राणियों का मन मोह लेता है वह 'कोकिल' (कोयल) है। जो ठगता है वह 'सठिलो' (शठ/धूर्त) है। जिसकी पूजा की जाती है वह 'मयिला' (स्त्री) है। ๑๙๐. กุฏา กิโล. १९०. 'कुट' धातु से 'किलो' प्रत्यय होता है। กุฏ-โกฏิลฺเยตีมสฺมา กิโล โหติ. อกุฏิ กุฏิลตฺตมคมีติ กุฏิโล=วงฺโก. 'कुट' (कुटिलता) धातु से 'किलो' प्रत्यय होता है। जो कुटिलता को प्राप्त हुआ वह 'कुटिल' (टेढ़ा) है। ๑๙๑. สิถิลาทโย. १९१. 'सिथिल' आदि शब्द (इसी प्रकार सिद्ध होते हैं)। สิถิลอาทโย กิลนฺตา นิปจฺจนฺเต. สห ขมายํ, สหิสฺส สิถตฺตํ, สหิตุมลนฺติ สิถิลํ=อทฬฺหํ. กมฺปิสฺส สํโยคาทิโลโป, ปรทุกฺเข สติ กมฺปตีติ กปิโล=อิสิ. กพ-วณฺเณ, พสฺส โป, อกพิ นีลาทิวณฺณตฺตมคมีติ กปิโล=วณฺณวิเสโส. มถิสฺส มิโถ, มถียตีติ มิถิลา=ปูรี, เอวมญฺเญปิ. 'सिथिल' आदि 'इल' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'सह' धातु क्षमा अर्थ में, 'सह' का 'सिथ' भाव, जो सहन करने में समर्थ है वह 'सिथिल' = जो दृढ़ नहीं है। 'कम्पि' धातु के संयोग आदि का लोप, परदुःख होने पर जो काँपता है वह 'कपिल' = ऋषि। 'कब' वर्ण अर्थ में, 'ब' को 'प', जो नीले आदि वर्णों को प्राप्त हुआ वह 'कपिल' = वर्ण विशेष। 'मथि' को 'मिथ', जो मथी जाती है वह 'मिथिला' = नगरी, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๙๒. จฏ กณฺฑ วฏฺฏ ปุถา กุโล. १९२. 'चट', 'कण्ड', 'वट्ट' और 'पुथ' धातुओं से 'उलो' प्रत्यय होता है। จฏ-เภทเน, กณฺฑ-เฉทเน, วฏฺฏ-วตฺตเน, ปุถ ปถ-วิตฺถาเร, เอเตหิ กุโล โหติ. จฏติ มิตฺเต ภินฺทตีติ จฏุโล=จาฏุการี. กณฺฑียติ ฉินฺทียตีติ กณฺฑุโล=รุกฺโข. วฏฺฏตีติ วฏฺฏุโล=ปริมณฺฑโล. อปตฺถรีติ ปุถุโล=วิตฺถาโร. 'चट' भेद (तोड़ने) के अर्थ में, 'कण्ड' छेदन के अर्थ में, 'वट्ट' वर्तन (होने/घूमने) के अर्थ में, 'पुथ' और 'पथ' विस्तार के अर्थ में, इनसे 'उलो' प्रत्यय होता है। जो मित्रों में भेद डालता है वह 'चटुल' = चाटुकारी। जो काटा जाता है वह 'कण्डुल' = वृक्ष। जो वर्तता (घूमता) है वह 'वट्टुल' = परिमण्डल (गोल)। जो विस्तृत है वह 'पुथुल' = विस्तार। ๑๙๓. ตุมุลาทโย. १९३. 'तुमुल' आदि। ตุมุลอาทโย กุลนฺตา นิปจฺจนฺเต. ตม เขทเน, อสฺสุ, อตมิ วิตฺถิณฺณตฺตมคมีติ ตุมุโล=ปตฺถโฏ. ตมิสฺส ฑุก, ตมียติ [Pg.283] วิการมาปาทียตีติ ตณฺฑุโล=วีหิสาโร. นิปุพฺพสฺส จินาติสฺส อิโลโป, อตฺถิเกหิ นิจียเตติ นิจุโล=หิชฺชโล, เอวมญฺเญปิ. 'तुमुल' आदि 'उल' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'तम' खेद अर्थ में, 'अ' को 'उ', जो विस्तार को प्राप्त हुआ वह 'तुमुल' = विस्तृत। 'तम' को 'डुक', जो विकार को प्राप्त होता है वह 'तण्डुल' = धान का सार (चावल)। 'नि' पूर्वक 'चि' धातु के 'इ' का लोप, अर्थियों द्वारा जो संचित किया जाता है वह 'निचुल' = हिज्जल (एक वृक्ष), इसी प्रकार अन्य भी। ๑๙๔. กลฺล กป ตกฺก ปฏา โอโล. १९४. 'कल्ल', 'कप', 'तक्क' और 'पट' धातुओं से 'ओलो' प्रत्यय होता है। กลฺล-สทฺเท, กป-อจฺฉาทเน, ตกฺก-วิตกฺเก, ปฏ-คมเน, เอเตหิ โอโล โหติ. วาตเวเคน สมุทฺทโต อุฏฺฐหิตฺวา กลฺลติ นทตีติ กลฺโลโล=มหาวีจิ. กปติ ทนฺเต อจฺฉาทตีติ กโปโล=วทเนกเทโส. ตกฺกียตีติ ตกฺโกลํ=โกลกํ. ปฏติ พฺยาธิเมเตน คจฺฉตีติ ปโฏโล=ติตฺตโก. 'कल्ल' शब्द अर्थ में, 'कप' आच्छादन (ढकने) के अर्थ में, 'तक्क' वितर्क के अर्थ में, 'पट' गमन के अर्थ में, इनसे 'ओलो' प्रत्यय होता है। वायु के वेग से समुद्र से उठकर जो शब्द करता है वह 'कल्लोल' = महातरंग। जो दाँतों को ढकता है वह 'कपोल' = मुख का एक भाग (गाल)। जो तर्क किया जाता है वह 'तक्कोल' = कोलक। जिससे व्याधि दूर होती है वह 'पटोल' = तिक्त (परवल)। ๑๙๕. องฺคา อุโลลี. १९५. 'अङ्ग' धातु से 'उल' और 'उली' प्रत्यय होते हैं। องฺค-คมนตฺโถ, เอตสฺมา อุลอุลี โหนฺติ. องฺคนฺติ เอเตน ชานนฺตีติ องฺคุลํ=ปมาณํ. องฺคติ อุคฺคจฺฉตีติ องฺคลิ=กรสาขา. 'अङ्ग' गमन अर्थ में है, इससे 'उल' और 'उली' प्रत्यय होते हैं। जिससे जानते हैं वह 'अङ्गुल' = प्रमाण। जो ऊपर की ओर जाता है वह 'अङ्गुलि' = हाथ की शाखा (अँगुली)। ๑๙๖. อญฺชาลิ. १९६. 'अञ्ज' धातु से 'अलि' प्रत्यय होता है। อญฺช-พฺยตฺติ มกฺขน คติ กนฺตีสุ, เอตสฺมา อลิ โหติ. อญฺเชติ ภตฺติมเนน ปกาเสตีติ อญฺชลิ=กรปุโฏ. 'अञ्ज' व्यक्ति (प्रकट करना), मक्षण (लेपन), गति और कान्ति अर्थों में है, इससे 'अलि' प्रत्यय होता है। जिससे भक्ति प्रकट की जाती है वह 'अञ्जलि' = करपुट (जुड़े हुए हाथ)। ๑๙๗. ฉทา ลิ. १९७. 'छद' धातु से 'लि' प्रत्यय होता है। ฉท-สํวรเณ, เอตสฺมา ลิ โหติ. ฉาเทตีติ ฉลฺลี=สกลิกา. 'छद' संवरण (ढकने) के अर्थ में है, इससे 'लि' प्रत्यय होता है। जो ढकता है वह 'छल्ली' = छाल (शकलिका)। ๑๙๘. อลฺลฺยาทโย. १९८. 'अल्लि' आदि। อลฺลิอาทโย ลิอนฺตา นิปจฺจนฺเต. อร-คมเน, อรติ ปวตฺตตีติ อลฺลิ=รุกฺโข. นยติสฺส เอตฺตาภาโว, อตฺติเกหิ นียตีติ [Pg.284]๔ นีลิ, งีมฺหิ นีลี=คจฺฉชาติ. ‘‘สรมฺหา ทฺเว’’ติ (๑.๓๔) ลสฺส ทฺวิภาเว รสฺสตฺเต จ นิลฺลีติปิ โหติ. ปาลิสฺส ปา, ปาเลติ รกฺขตีติ ปาลิ, งีมฺหิ ปาลี=ปนฺติ. ปาลิสฺส ปโล, ปาเลติ รกฺขตีติ ปลฺลิ=กุฏิ. จุท-โจทเน, โอตฺตาภาโว, โจทียตีติ จุลฺลิ=อุทฺธนํ, เอวมญฺเญปิ. 'अल्लि' आदि 'लि' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'अर' गमन अर्थ में, जो प्रवृत्त होता है वह 'अल्लि' = वृक्ष। 'नी' धातु के 'ए' का अभाव, अर्थियों द्वारा जो ले जाई जाती है वह 'नीलि', 'ङी' प्रत्यय होने पर 'नीली' = एक प्रकार का पौधा। 'सरम्हा द्वे' सूत्र से 'ल' को द्वित्व और ह्रस्व होने पर 'निल्ली' भी होता है। 'पालि' के लिए 'पा' धातु, जो रक्षा करती है वह 'पालि', 'ङी' में 'पाली' = पंक्ति। 'पालि' के लिए 'पल' धातु, जो रक्षा करती है वह 'पल्लि' = कुटी। 'चुद' प्रेरण अर्थ में, 'ओ' का अभाव, जो प्रेरित की जाती है वह 'चुल्लि' = चूल्हा, इसी प्रकार अन्य भी। ๑๙๙. ปิลาทีหฺยโว. १९९. 'पिल' आदि से 'अवो' प्रत्यय होता है। ปิล-วตฺตเน, ปลฺล-คมเน, ปณ-พฺยวหารถุตีสุ, เอวมาทีหิ อโว โหติ. ปิลฺยเตติ เปลโว=ลหุ. ปลฺลตีติ ปลฺลโว=กิสลยํ. ปณียตีติ ปณโว=มุทงฺโค. เอวมญฺเญปิ. 'पिल' वर्तन अर्थ में, 'पल्ल' गमन अर्थ में, 'पण' व्यवहार और स्तुति अर्थ में, इन आदि से 'अवो' प्रत्यय होता है। जो वर्तता है वह 'पेलव' = लघु (कोमल)। जो गमन करता है वह 'पल्लव' = किसलय (नया पत्ता)। जिसकी स्तुति की जाती है वह 'पणव' = मृदङ्ग। इसी प्रकार अन्य भी। ๒๐๐. สาฬวาทโย. २००. 'साळव' आदि। สาฬวอาทโย อวนฺตา นิปจฺจนฺเต. สล-คมนตฺโถ, อุปนฺตสฺส ทีโฆ ฬตฺตญฺจ นิปาตนา. สลติ ปวตฺตตีติ สาฬ โว=อภิสงฺขตํ พทราทิผลขาทนียํ. กิต-นิวาเส, เอตฺตาภาโว, เกตตีติ กิตโว=ชูตกาโร, โจโร จ. มู-พนฺธเน, อูสฺส รสฺสตฺตํ, ตุญ จาวสฺส, มุนาติ พนฺธตีติ มุตโว=จณฺฑาโล. วล วลฺล-สํวรเณ, ฬตฺตํ, วลติ, วลฺยเตติ วา วฬวา=ตุรงฺคกนฺตา. มุร-สํเวฬเน, มุรียตีติ มุรโว=มุทงฺโค, เอวมญฺเญปิ. 'साळव' आदि 'अव' प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'सल' गमन अर्थ में, उपधा को दीर्घ और 'ल' को 'ळ' निपातन से होता है। जो प्रवृत्त होता है वह 'साळव' = बेर आदि फलों से बना हुआ खाद्य पदार्थ। 'कित' निवास अर्थ में, 'ए' का अभाव, जो निवास करता है वह 'कितव' = जुआरी और चोर। 'मू' बन्धन अर्थ में, 'ऊ' को ह्रस्व और 'व' को 'त' और 'अ' का आगम, जो बाँधता है वह 'मुतव' = चाण्डाल। 'वल' और 'वल्ल' संवरण अर्थ में, 'ल' को 'ळ', जो संवरण करती है वह 'वळवा' = घोड़ी। 'मुर' संवेष्टन अर्थ में, जो संवेष्टित किया जाता है वह 'मुरव' = मृदङ्ग, इसी प्रकार अन्य भी। ๒๐๑. สรา อาโว. २०१. 'सर' धातु से 'आवो' प्रत्यय होता है। สรติสฺมา อาโว โหติ. สรติ ปวตฺตตีติ สราโว=ภาชนวิเสโส. जो प्रवृत्त होता है वह 'सराव' = पात्र विशेष (सकोरा)। ๒๐๒. อล มล พิลา ณุโว. २०२. 'अल', 'मल' और 'बिल' धातुओं से 'णुवो' प्रत्यय होता है। อล-พนฺธเน[Pg.285], มล มลฺล-ธารเณ, พิล-เภทเน, เอเตหิ ณุโว โหติ. ลตาหิ อลียตีติ อาลุโว=คจฺฉชาติ. มลติ ธาเรตีติ มาลุโว=ปตฺตลตา. พิลติ ภินฺทตีติ เพลุโว=รุกฺโข. 'अल' बन्धन अर्थ में, 'मल' और 'मल्ल' धारण अर्थ में, 'बिल' भेदन अर्थ में, इनसे 'णुवो' प्रत्यय होता है। जो लताओं से बँधता है वह 'आलुव' = एक प्रकार का पौधा। जो धारण करता है वह 'मालुव' = पत्तों वाली लता। जो भेदता है वह 'बेलुव' = बिल्व वृक्ष। ๒๐๓. คาตฺวี โว. २०३. 'गा' शब्द अर्थ वाली धातु से 'ईवो' प्रत्यय होता है। กา คา-สทฺเทตีมสฺมา อีโว โหติ. คายนฺติ เอตายาติ คีวา=คโล. 'का' और 'गा' शब्द अर्थ वाली धातुओं से 'ईवो' प्रत्यय होता है। जिससे शब्द करते हैं वह 'गीवा' = गला (ग्रीवा)। ๒๐๔. สุโต กฺวตฺวา. २०४. 'सु' श्रवण अर्थ वाली धातु से 'क्व' और 'क्वा' प्रत्यय होते हैं। สุ-สวเนตีมสฺมา กฺว กฺวา โหนฺติ. สุณาตีติ สุโว=กีโร. สุวา=สุโณ. जो सुनता है वह 'सुव' = तोता। 'सुवा' = कुत्ता। ๒๐๕. วิทฺวา. २०५. 'विद्वा' (विद्वान)। วิทติสฺมา กฺวา ปรรูปาภาโว อ นิปจฺจนฺเต. วิทติ ชานาตีติ วิทฺวา=วิทู. 'विद' धातु से 'क्वा' प्रत्यय, पररूप का अभाव और 'अ' निपातित होते हैं। जो जानता है वह 'विद्वा' = विद्वान। ๒๐๖. ถุโต เรโว. २०६. 'थु' धातु से 'रेवो' प्रत्यय होता है। ถุ-อภิตฺถเว, เอตสฺมา เรโว โหติ. ถวติ สิญฺจตีติ เถโว=ผุสิตํ. 'थु' (स्तुति/सिंचन) धातु से 'रेवो' प्रत्यय होता है। जो टपकता है वह 'थेव' (बूँद) है। ๒๐๗. สมา ริโว. २०७. 'सम' धातु से 'रिवो' प्रत्यय होता है। สม-อุปสเม, เอตสฺมา ริโว โหติ. สเมติ อุปสเมตีติ สิโว=อุมาปติ, สิวา=สิคาโล, สิวํ=สนฺติ. 'सम' (उपशम/शांति) धातु से 'रिवो' प्रत्यय होता है। जो शांत करता है वह 'सिव' (शिव/उमापति) है, 'सिवा' (गीदड़) है, और 'सिवं' (शांति) है। ๒๐๘. ฉทา รวิ. २०८. 'छद' धातु से 'रवि' प्रत्यय होता है। ฉท-สํวรเณ[Pg.286], เอตสฺมา รวิ โหติ. ฉาเทตีติ ฉวิ=ชุติ. 'छद' (आवरण/ढकना) धातु से 'रवि' प्रत्यय होता है। जो ढकता है वह 'छवि' (दीप्ति/त्वचा) है। ๒๐๙. ปูร ติมา กิโส รสฺโส จ. २०९. 'पूर' और 'तिम' धातुओं से 'किसो' प्रत्यय होता है और (धातु के स्वर को) ह्रस्व होता है। ปูร-ปูรเณ, ติม-เตมเน, เอเตหิ กิโส โหติ อูสฺส รสฺโส จ. ปูเรตีติ ปุริโส=ปุมา. (ปุเร อุจฺจฏฺฐาเน เสติ ปวตฺตตีติ วา ปุริโส=โสว.) เตเมตีติ ติมิสํ=ตโม. 'पूर' (पूरण) और 'तिम' (गीला करना) धातुओं से 'किसो' प्रत्यय होता है और 'ऊ' को ह्रस्व होता है। जो पूर्ण करता है वह 'पुरिस' (पुरुष) है। (अथवा जो उच्च स्थान में रहता है वह 'पुरिस' है)। जो गीला करता है (अंधकारमय करता है) वह 'तिमिस' (अंधकार) है। ๒๑๐. กรา อีโส. २१०. 'कर' धातु से 'ईसो' प्रत्यय होता है। กโรติสฺมา อีโส โหติ. กรียตีติ กรีสํ=คูถํ. 'कर' धातु से 'ईसो' प्रत्यय होता है। जो किया जाता है (त्यागा जाता है) वह 'करीस' (विष्ठा/गोबर) है। ๒๑๑. สิรีสาทโย. २११. 'सिरीस' आदि शब्द (निपातित होते हैं)। สิรีสอาทโย อีสนฺตา นิปจฺจนฺเต. สรติสฺส อสฺสิ, สปฺปทฏฺฐกาลาทีสุ สรียตีติ สิรีโส=รุกฺโข. ปูริสฺส รสฺสตฺตํ, ปูเรตีติ ปุรีสํ=คูถํ. ตลิสฺส ทีโฆ, ตลติ สตฺตานํ ปติฏฺฐานํ ภวตีติ ตาลีสํ=โอสธิวิเสโส, เอวมญฺเญปิ. 'सिरीस' आदि शब्द 'ईस' प्रत्ययांत निपातित होते हैं। 'सर' धातु को 'अस्सि' आदेश होता है, जो सर्पदंश आदि काल में याद किया जाता है वह 'सिरीस' (वृक्ष) है। 'पूर' धातु के स्वर को ह्रस्व होता है, जो पूर्ण करता है वह 'पुरीस' (विष्ठा) है। 'तल' धातु के स्वर को दीर्घ होता है, जो प्राणियों का आधार होता है वह 'तालीसं' (एक औषधि विशेष) है; इसी प्रकार अन्य भी। ๒๑๒. กรา ริพฺพิโส. २१२. 'कर' धातु से 'रिब्बिसो' प्रत्यय होता है। กโรติสฺมา ริพฺพิโส โหติ. กรียตีติ กิพฺพิสํ=ปาปํ. 'कर' धातु से 'रिब्बिसो' प्रत्यय होता है। जो किया जाता है (बुरा कर्म) वह 'किब्बिस' (पाप) है। ๒๑๓. สสาส วส วิส หน วน มนาน กมา โส. २१३. 'सस', 'अस', 'वस', 'विस', 'हन', 'वन', 'मन', 'अन' और 'कम' धातुओं से 'सो' प्रत्यय होता है। สส-คติ หึสา วิสฺสส ปาณเนสุ, อส-เขปเน, วส-นิวาเส, วิส-ปวิสเน, หน-หึ สายํ, วน สน-สมฺภตฺติยํ, มน-ญาเณ, อน-ปาณเน, กม-อิจฺฉายํ, เอเตหิ โส โหติ, สสนฺติ ชีวนฺติ สตฺตา เอเตนาติ สสฺสํ=กลมาทิ, อสติ ขิปตีติ อสฺโส=หโย[Pg.287]. วสนฺติ เอตฺถาติ วสฺสํ=สํวจฺฉโร. วิสตีติ เวสฺโส=ตติยวณฺโณ. หญฺญเตติ หํโส=สิตจฺฉโท. วโนติ ปตฺถรตีติ วํโส=สนฺตาโน, เวฬุ จ. มญฺญเตติ มํสํ=ปิสิตํ, อนติ ชีวติ เอเตนาติ อํโส=เอกาฏฺฐาโส, ภุชสิโร จ. กามียตีติ กํโส=ปริมาณํ. 'सस' (गति, हिंसा, विश्वास, प्राणन), 'अस' (क्षेपण), 'वस' (निवास), 'विस' (प्रवेश), 'हन' (हिंसा), 'वन/सन' (संभक्ति), 'मन' (ज्ञान), 'अन' (प्राणन), 'कम' (इच्छा) - इन धातुओं से 'सो' प्रत्यय होता है। जिससे प्राणी जीवित रहते हैं वह 'सस्स' (धान आदि) है। जो फेंकता (तेज दौड़ता) है वह 'अस्स' (घोड़ा) है। जिसमें निवास करते हैं वह 'वस्स' (वर्ष) है। जो प्रवेश करता है वह 'वेस्स' (तीसरा वर्ण/वैश्य) है। जो मारा जाता है (या गमन करता है) वह 'हंस' है। जो फैलता है वह 'वंस' (वंश/बाँस) है। जो जाना जाता है वह 'मंस' (मांस) है। जिससे जीवित रहते हैं वह 'अंस' (कंधा/भाग) है। जिसकी इच्छा की जाती है वह 'कंस' (एक परिमाण/कांसा) है। ๒๑๔. อามิ ถุ กุ สีโต สก. २१४. 'आ' पूर्वक 'मि', 'थु', 'कु' और 'सी' धातुओं से 'सक' प्रत्यय होता है। อาปุพฺโพ มิ-ปกฺเขเป, ถุ-อภิตฺถเว กุ-สทฺเท, สี-สเย, เอเตหิ สก โหติ. อามียติ อนฺโต ปกฺขิปียตีติ อามิสํ=ภกฺขํ. ถวียตีติ ถุโส=วีหิตโจ. กวติ วาเตน นทตีติ กุโส=ติณวิเสโส. สยนฺติ เอตฺถ อูกาติ สีสํ=มุทฺธา, กาลติปุ จ. जो अंदर डाला जाता है वह 'आमिस' (भोज्य/मांस) है। जिसकी स्तुति की जाती है (या जो अलग किया जाता है) वह 'थुस' (भूसा) है। जो हवा से शब्द करता है वह 'कुस' (कुश घास) है। जहाँ जूएँ सोती हैं वह 'सीस' (सिर/मस्तक) है, और इसका अर्थ सीसा (धातु) भी है। ๒๑๕. ผสฺสาทโย. २१५. 'फस्स' आदि शब्द (निपातित होते हैं)। ผสฺสอาทโย สกอนฺตา นิปจฺจนฺเต. ผุส-สมฺผสฺเส, อุสฺสตฺถํ, ผุสตีติ ผสฺโส=กายวิญฺญาณวิสโย. ผุสฺโส=นกฺขตฺตํ. ปุส โปสเน, โปสียตีติ ปุสฺสํ=ผลวิเสโส. ภู-สตฺตายํ, ภูสฺส รสฺโส, อภวีติ ภุสํ=ตุจฺฉธญฺญํ, อํกิสฺส อุก, องฺเกติ อเนน อญฺเญติ องฺกุโส=คชปโตโท. ผาย-วุทฺธิยํ, ปปุพฺโพ, ยโลโป, ผายติ วุทฺธึ คจฺฉตีติ ปปฺผาสํ=เทหโกฏฺฐาสวิเสโส. กลิสฺมา สสฺส มาญ, กุลิสฺมา จ, กลียติ ปริมียตีติ กมฺมาโส=สพโล, กมฺมาสํ=ปาปํ. กุลติ ปตฺถรตีติ กุมฺมาโส=ภกฺขวิเสโส. มนิสฺส ชูก, มญฺญติ สธนตฺตํ เอตายาติ มญฺชูสา=กฏฺฐเปฬา. ปีสฺส ยูก, ปิเณตีติ ปียูสํ=อมตํ. กุล-สํวรเณ, อิก, กุลียติ สํวรียตีติ กุลิสํ=วชิรํ[Pg.288]. พล-สํวรเณ, อิก, ลสฺส ฬตฺตญฺจ, พลติ เอเตน มจฺเฉ คณฺหาตีติ พฬิโส=มจฺฉเวธนํ. มหิสฺส เอก, มหียตีติ มเหสี=กตาภิเสกา ปธานิตฺถี, เอวมญฺเญปิ. 'फस्स' आदि शब्द 'सक' प्रत्ययांत निपातित होते हैं। 'फुस' (स्पर्श) धातु से, जो स्पर्श करता है वह 'फस्स' (स्पर्श) है। 'फुस्स' एक नक्षत्र है। 'पुस' (पोषण) धातु से, जो पोषित होता है वह 'पुस्स' (एक फल विशेष) है। 'भू' (सत्ता) धातु से, 'भू' को ह्रस्व होकर 'भुस' (तुच्छ धान्य/भूसा) बनता है। 'अंक' धातु से 'उक' प्रत्यय होकर 'अंकुस' (हाथी को वश में करने का अंकुश) बनता है। 'फा' (वृद्धि) धातु से 'प' उपसर्ग पूर्वक 'पप्फास' (फेफड़ा) बनता है। 'कल' और 'कुल' धातु से 'कम्मास' (चितकबरा/पाप) और 'कुम्मास' (एक खाद्य विशेष) बनते हैं। 'मन' धातु से 'मंजूसा' (पेटी), 'पी' धातु से 'पीयूस' (अमृत), 'कुल' धातु से 'कुलिस' (वज्र), 'बल' धातु से 'बळिस' (मछली पकड़ने का काँटा) और 'मह' धातु से 'महेसी' (अग्रमहिषी/रानी) शब्द सिद्ध होते हैं। ๒๑๖. สุโต ณิสก. २१६. 'सु' धातु से 'णिसक' प्रत्यय होता है। สุณาติสฺมา ณิสก โหติ. สุณาตีติ สุณิสา=ปุตฺตภริยา. 'सु' (सुनना) धातु से 'णिसक' प्रत्यय होता है। जो (आज्ञा) सुनती है वह 'सुणिसा' (पुत्रवधू) है। ๒๑๗. เวตาต ยุ ปนาล กล จมา อโส. २१७. 'वेत', 'अत', 'यु', 'पन', 'अल', 'कल' और 'चम' धातुओं से 'असो' प्रत्यय होता है। เวต-สุตฺติโย ธาตุ, อต-สาตจฺจคมเน, ยุ-มิสฺสเน, ปนถุติยํ, อล-พนฺธเน, กล-สงฺขฺยาเน, จม-อทเน, เอเตหิ อโส โหติ. เวตติ ปวตฺตตีติ เวตโส=วานีโร. อตติ วาเตริโต นิจฺจํ เวธตฺตํ ยาตีติ อตโส=วนปฺปติวิเสโส วีมฺหิ อภสี=คจฺฉวิเสโส. ยวียติ มิสฺสียตีติ ยวโส=ปสุฆาโส. ปญฺญเต ถวียเตติ ปนโส=กณฺฑณีผโล. อลียติ พนฺธิยตีติ อลโส=มนฺทการี. กลียตีติ กลโส=กุมฺโภ. จมติ อทติ อเนนาติ จมโส=โหมภาชนํ. 'वेत' (गति), 'अत' (निरन्तर गमन), 'यु' (मिश्रण), 'पन' (स्तुति), 'अल' (बन्धन), 'कल' (संख्यान), 'चम' (भक्षण) - इन धातुओं से 'असो' प्रत्यय होता है। 'वेतति' (प्रवृत्त होता है) इति 'वेतसो' (बेंत)। 'अतति' (वायु से प्रेरित होकर सदा कम्पन को प्राप्त होता है) इति 'अतसो' (एक विशेष वनस्पति), स्त्रीलिंग में 'अतसी' (अलसी)। 'यवीयति' (मिश्रित किया जाता है) इति 'यवसो' (पशुओं का घास)। 'पञ्ञते' (स्तुति की जाती है) इति 'पनसो' (कटहल)। 'अलीयति' (बँध जाता है) इति 'अलसो' (आलसी)। 'कलीयति' (गिना जाता है) इति 'कलसो' (घड़ा)। 'चमति' (इसके द्वारा खाया जाता है) इति 'चमसो' (यज्ञ का पात्र)। ๒๑๘. วย ทิว กร กเรหฺยสณสกปาสกสา. २१८. 'वय', 'दिव', 'कर' और 'कर' धातुओं से क्रमशः 'असण', 'अस', 'कपास' और 'कस' प्रत्यय होते हैं। วยตฺยาทีหิ อสณอาทโย โหนฺติ ยถากฺกมํ. วยติ คจฺฉตีติ วายโส=กาโก. ทิพฺพนฺติ เอตฺถาติ ทิวโส=ทินํ. กรียตีติ กปฺปาโส=สุตฺตสมฺภโว. กิพฺพิสํ กโรตีติ กกฺกโส=ผรุโส. 'वय' आदि धातुओं से 'असण' आदि प्रत्यय यथाक्रम होते हैं। 'वयाति' (जाता है) इति 'वायसो' (कौआ)। 'दिब्बन्ति' (इसमें व्यवहार करते हैं) इति 'दिवसो' (दिन)। 'करीयति' (बनाया जाता है) इति 'कप्पासो' (कपास/सूत का स्रोत)। 'किब्बिसं करोति' (पाप/कठोर कार्य करता है) इति 'कक्कसो' (कठोर)। ๒๑๙. สส มส ทํสาสา สุ. २१९. 'सस', 'मस', 'दंस' और 'आस' धातुओं से 'सु' प्रत्यय होता है। สสาทีหิ [Pg.289] สุ โหติ. สสติ ชีวตีติ สสฺสุ=ชยมฺปตีนํ มาตา. มสียตีติ มสฺสุ=ปุริสมุเข ปวทฺธโลมานิ. ‘‘โลโป’’ติ (๑.๓๙) นิคฺคหีตโลโป, ทํสียติ พนฺธมเนนาติ ทสฺสุ=โจโร. อสียติ ขิปียตีติ อสฺสุ=พปฺโป. 'सस' आदि से 'सु' प्रत्यय होता है। 'ससति' (जीती है) इति 'सस्सु' (सास - पति-पत्नी की माता)। 'मसीयति' (मसा जाता है) इति 'मस्सु' (मूँछ-दाढ़ी)। 'लोपो' (१.३९) सूत्र से निग्गृहीत का लोप होकर, 'दंसीयति' (इसके द्वारा बाँधा जाता है) इति 'दस्सु' (दस्यु/चोर)। 'असीयति' (फेंका जाता है) इति 'अस्सु' (आँसू)। ๒๒๐. วิทา ทสุก. २२०. 'विद' धातु से 'दसुक' प्रत्यय होता है। วิทิสฺมา ทสุก โหติ. วิทติ ชานาตีติ วิทฺทสุ=วิทฺวา. 'विद' धातु से 'दसुक' प्रत्यय होता है। 'विदति' (जानता है) इति 'विद्दसु' (विद्वान)। ๒๒๑. สสา รีโห. २२१. 'सस' धातु से 'रीहो' प्रत्यय होता है। สสติสฺมา รีโห โหติ. สสติ หึสตีติ สีโห=เกสรี. 'सस' धातु से 'रीहो' प्रत्यय होता है। 'ससति' (हिंसा करता है) इति 'सीहो' (सिंह/केसरी)। ๒๒๒. ชีวามา โห วมา จ. २२२. 'जीव' और 'अम' धातुओं से 'हो' प्रत्यय होता है और 'व' तथा 'म' का अन्तादेश होता है। ชีว-ปาณธารเณ, อม-คมเน, เอเตหี โห โหติ, วมา จานฺตาเทสา ยถากฺกมํ, อาเทสวิธานํ ปน ปรรูปพาธนตฺถํ. ‘‘พฺยญฺชเน ทีฆรสฺสา’’ติ (๑.๓๙) รสฺสตฺตํ, ชีวนฺติ เอตายาติ ชิวฺหา=รสนา. อมติ ปวตฺตตีติ อมฺหํ=อสฺมา. ปปุพฺเพ อมติ ปวตฺตตีติ ปมฺหํ=ปขุมํ. 'जीव' (प्राण धारण करना) और 'अम' (गमन) धातुओं से 'हो' प्रत्यय होता है, और 'व' तथा 'म' का यथाक्रम अन्तादेश होता है; आदेश का विधान पररूप के बाधन के लिए है। 'ब्यञ्जने दीघरस्सा' (१.३९) से ह्रस्व होकर, 'जीवन्ति' (इसके द्वारा स्वाद लेते हैं) इति 'जिव्हा' (जीभ/रसना)। 'अमति' (प्रवृत्त होता है) इति 'अम्हं' (हम)। 'प' उपसर्ग पूर्वक 'अमति' (प्रवृत्त होता है) इति 'पम्हं' (पलक/पक्ष्म)। ๒๒๓. ตณฺหาทโย. २२३. 'तण्हा' आदि शब्द। ตณฺหอาทโย หนฺตา นิปจฺจนฺเต. ตส-ปิปาสายํ, สสฺส ณตฺตํ, เอวมุปริ จ, ตสติ ปาตุมิจฺฉติ เอตายาติ ตณฺหา=โล โภ. กส-วิเลขเน, กสตีติ กณฺโห=กาโฬ. ชุต-ทิตฺติยํ, ตสฺส ณตฺตํ, โอตฺตาภาโว จ, โชเตตีติ ชุณฺหา=จนฺท- ปภา[Pg.290]. มีลิสฺส โฬ, นิมีลนฺตฺยเนน อกฺขีนีติ มีฬฺหํ-คูถํ. คาหิสฺส โฬ, คยฺหตีติ คาฬฺหํ, ทหิสฺส โฬ, ทหตีติ ทฬฺหํ, พหิสฺส โฬ, ทีโฆ จ, พหติ วุทฺธึ วจฺฉตีติ พาฬฺหํ, เอเต ตโย ทฬฺหตฺถา. คมิสฺส อสฺสิ, คจฺฉตีติ คิมฺโห-นิทาโฆ. ปฏกลานํ อก จ, ปฏติ ยาตีติ ปฏโห=เภริวิเสโส. กลียติ ปริมียติ อเนน สูรภาโวติ กลโห=วิวาโท. กฏวรานํ อาก, กฏนฺติ เอตฺถ โอสธาทึ มทฺทนฺตีติ กฏาโห=ภาชนวิเสโส. วรียตีติ วราโห=สูกโร. ลุนาติสฺส โอ, ลุนาติ เอเตนาติ โลหํ=อยาทิ. เอวมญฺเญปิ. 'तण्हा' आदि शब्द 'ह' अन्त वाले निपातित होते हैं। 'तस' (पिपासा/प्यास) धातु में 'स' को 'ण' होता है, और आगे भी इसी प्रकार; 'तसति' (इसके द्वारा पीने की इच्छा करता है) इति 'तण्हा' (तृष्णा/लोभ)। 'कस' (लेखन/कर्षण) धातु से 'कसति' इति 'कण्हो' (कृष्ण/काला)। 'जुत' (दीप्ति) धातु में 'त' को 'ण' और 'ओ' का अभाव होकर 'जोतेति' इति 'जुण्हा' (चाँदनी)। 'मील' धातु में 'ल' को 'ळ' होकर, 'निमीलन्ति' (इसके द्वारा आँखें मूँदते हैं) इति 'मीळ्हं' (विष्ठा)। 'गाह' में 'ह' को 'ळ', 'गय्हति' इति 'गाळ्हं' (गाढ़ा)। 'दह' में 'ह' को 'ळ', 'दहति' इति 'दळ्हं' (दृढ़)। 'बह' में 'ह' को 'ळ' और दीर्घ होकर, 'बहति' (वृद्धि को प्राप्त होता है) इति 'बाळ्हं' (अत्यधिक); ये तीनों 'दृढ़' के अर्थ में हैं। 'गम' धातु से 'अस्सि' प्रत्यय होकर 'गच्छति' इति 'गिम्हो' (ग्रीष्म)। 'पट' और 'कल' धातुओं से 'अक' प्रत्यय होकर, 'पटति' (जाता है/बजता है) इति 'पटहो' (नगाड़ा)। 'कलीयति' (इसके द्वारा शूरवीरता मापी जाती है) इति 'कलहो' (विवाद)। 'कट' और 'वर' धातुओं से 'आक' प्रत्यय होकर, 'कटन्ति' (इसमें औषध आदि मर्दन करते हैं) इति 'कटाहो' (कड़ाह)। 'वरीयति' इति 'वराहो' (सूअर)। 'लु' धातु से 'ओ' प्रत्यय होकर 'लुनाति' (काटता है इसके द्वारा) इति 'लोहं' (लोहा आदि)। इसी प्रकार अन्य भी। ๒๒๔. ปณุสฺสหา หิหี โณฬง จ. २२४. 'पण' और 'उ' उपसर्ग पूर्वक 'सह' धातु से 'हि' और 'ही' प्रत्यय होते हैं, और क्रमशः 'ण' तथा 'ळ' अन्तादेश होते हैं। ปณา อุปุพฺพสหา จ หิหี โหนฺติ ยถากฺกมํ, ณโอฬง จานฺตาเทสา, อาเทสวิธานสามตฺถิยา ปรรูปาภาโว, ปณียติ โวหรียตีติ ปณฺหิ=ปาทสฺส ปจฺฉาภาโค. อุสฺสหตีติ อุสฺสาฬฺหี-วีริยํ. 'पण' और 'उ' उपसर्ग पूर्वक 'सह' धातु से यथाक्रम 'हि' और 'ही' प्रत्यय होते हैं, और 'ण' तथा 'ळ' अन्तादेश होते हैं; आदेश विधान के सामर्थ्य से पररूप का अभाव होता है। 'पणीयति' (व्यवहार किया जाता है) इति 'पण्हि' (एड़ी/पैर का पिछला भाग)। 'उस्सहिति' इति 'उस्साळ्ही' (वीर्य/उत्साह)। ๒๒๕. ขี มิ ปี จุ มา วากาหิ โฬ อุสฺส วา ทีโฆ จ. २२५. 'खी', 'मि', 'पी', 'चु', 'मा', 'वा' और 'का' धातुओं से 'ळो' प्रत्यय होता है और 'उ' का विकल्प से दीर्घ होता है। ขี-ขเย, มิ-ปกฺเขเป, ปี-ตปฺปเน, จุ-จวเน, มา-มาเน, วี วา-คมเน, กา คา-สทฺเท, เอเตหิ โฬ โหติ, อุการสฺส วา ทีโฆ จ. ขียตีติ เขโล=ลาลา. มียติ ปกฺขิปียตีติ เมฬา=มสิ. ปิเณตีติ เปฬา=ภาชนวิเสโส. จวตีติ จูฬา=สิขา. โจโฬ=ปิโลติโก. มียติ ปริมียตีติ มาโฬ=เอกกูฏสงฺคหิโต อเนกโกณวนฺโต ปฏิสฺสยวิเสโส. วาติ คจฺฉตีติ วาโฬ=จณฺฑมิโค. กายติ ผรุสํ วทตีติ กาโฬ=กณฺโห, วีมฺหิ กาฬี=กณฺหา. 'खी' (क्षय), 'मि' (प्रक्षेप), 'पी' (तृप्ति), 'चु' (च्युत होना), 'मा' (मान), 'वा' (गमन), 'का' (शब्द) - इन धातुओं से 'ळो' प्रत्यय होता है और उकार का विकल्प से दीर्घ होता है। 'खीयति' इति 'खेळो' (लार)। 'मीयति' (डाला जाता है) इति 'मेळा' (स्याही)। 'पिणेति' (तृप्त करता है) इति 'पेळा' (एक प्रकार का पात्र)। 'चवति' (च्युत होता है) इति 'चूळा' (शिखा/चोटी)। 'चोळो' (वस्त्र का टुकड़ा)। 'मीयति' (मापा जाता है) इति 'माळो' (माल/अट्टालिका)। 'वाति' (जाता है) इति 'वाळो' (हिंसक पशु)। 'कायति' (कठोर बोलता है) इति 'काळो' (काला), स्त्रीलिंग में 'काळी' (काली)। ๒๒๖. คุโต ฬก จ. २२६. 'गु' धातु से 'ळका' और 'ळ' प्रत्यय होते हैं। คุ-สทฺเทตีมสฺมา [Pg.291] ฬก โหติ โฬ จ. ควติ ปวตฺตติ เอเตนาติ คุโฬ=อุจฺฉุวิกาโร. โคโฬ=ลกุณฺฑโก. 'गु' (शब्द करना) इस धातु से 'ळका' और 'ळ' प्रत्यय होते हैं। 'गवति' (इसके द्वारा प्रवृत्त होता है) इति 'गुळो' (गुड़/ईख का विकार)। 'गोळो' (गोला/गेंद)। ๒๒๗. ปงฺคุฬาทโย. २२७. 'पङ्गुल' आदि शब्द। ปงฺคุฬอาทโย ฬก อนฺตา นิปจฺจนฺเต. ขญฺช-คติเวกลฺเล, ปงฺคุอาเทโส, อขญฺชิ คติเวกลฺลมาปชฺชีติ ปงฺคโฬ=ปีฐสปฺปี. กโรติสฺมา ฬสฺส ขญ, กิพฺพิสํ กโรตีติ กกฺขโฬ=กุรูโร. กุกติสฺส กุก, กุกฺยติ ปาปการีหิ อาทียตีติ กุกฺกุฬํ=สงฺกุ สํกิณฺโณ โสพฺโภ. กุกฺกุโฬ=ถุสคฺคี. มํกิสฺส อุก, พินฺทุ โลโป จ, มํเกติ วนํ มณฺเฑตีติ มกุโฬ=อวิกสิตกุสุมํ. 'पङ्गुल' आदि शब्द 'ळका' अन्त वाले निपातित होते हैं। 'खञ्ज' (गति वैकल्य) धातु में 'पङ्गु' आदेश होकर, 'अखञ्जि' (गति वैकल्य को प्राप्त हुआ) इति 'पङ्गळो' (लंगड़ा)। 'कर' धातु से 'ळ' के स्थान पर 'खञ' होकर, 'किब्बिसं करोति' इति 'कक्खळो' (क्रूर)। 'कुक' धातु से 'कुक' प्रत्यय होकर, 'कुक्यति' (पापियों द्वारा ग्रहण किया जाता है) इति 'कुक्कुळं' (शंकु संकीर्ण गड्ढा)। 'कुक्कुळो' (तुषाग्नि/भूसे की आग)। 'मङ्क' धातु से 'उक' प्रत्यय और बिन्दु (अनुस्वार) का लोप होकर, 'मङ्केति' (वन को अलंकृत करता है) इति 'मकुळो' (अधखिला फूल/मुकुल)। ๒๒๘. ปาโต ฬิ. २२८. 'पा' धातु से 'ळि' प्रत्यय होता है। ปาติสฺมา ฬิ โหติ. อตฺถํ ปาติ รกฺขตีติ ปาฬิ=ตนฺติ. 'पा' धातु से 'ळि' प्रत्यय होता है। 'अत्थं पाति' (अर्थ की रक्षा करती है) इति 'पाळि' (पालि/पङ्क्ति)। ๒๒๙. วีโต ฬุ. २२९. 'वी' धातु से 'ळु' प्रत्यय होता है। วีติสฺมา ฬุ โหติ. เวติ ปวตฺตตีติ เวฬุ=เวณุ. 'वी' धातु से 'ळु' प्रत्यय होता है। 'वेति' (प्रवृत्त होता है) इति 'वेळु' (बाँस)। (อิติ อวคฺคปจฺจยวิธานํ). (इस प्रकार अवर्ग प्रत्यय विधान समाप्त हुआ)। อิติ โมคฺคลฺลาเน พฺยากรเณ วุตฺติยํ इस प्रकार मोग्गल्लान व्याकरण की वृत्ति में— ณฺวาทิกณฺโฑ สตฺตโม. सातवाँ ण्वादि काण्ड समाप्त हुआ। สุตฺตํ ธาตุ คโณ ณฺวาทิ, นามลิงฺคานุสาสนํ; ยสฺส ติฏฺฐติ ชีวฺหคฺเค, ส พฺยากรณเกสรี. सूत्र, धातु, गण, ण्वादि और नाम-लिंग अनुशासन जिसके जिह्वाग्र पर स्थित हैं, वह व्याकरण का सिंह (केसरी) है। สมตฺตา จายํ โมคฺคลฺลานวุตฺติ यह मोग्गल्लान वृत्ति समाप्त हुई। สตฺตหิ ภาณวาเรหิ. सात भाणवारों के साथ। ๑. १. ยสฺส [Pg.292] รญฺโญ ปภาเวน, ภาวิตตฺตยมากุลํ; อนากุลํ ทุลทฺธีหิ, ปาปภิกฺขูหิ สพฺพโส. जिस राजा के प्रभाव से, कुदृष्टि वाले पाप-भिक्षुओं द्वारा पूरी तरह से व्याकुल किया गया (शासन) पूर्णतः अव्याकुल (व्यवस्थित) हो गया। ๒. २. ลงฺกาย มุนิราชสฺส, สาสนํ สาธุ สณฺฐิกํ; ปุณฺณจนฺทสมาโยคา, วาริธีว วิวทฺธเต. लंका में मुनिराज (बुद्ध) का शासन भली-भांति प्रतिष्ठित है; पूर्ण चन्द्रमा के संयोग से समुद्र की भाँति वह बढ़ रहा है। ๓. ३. ปรกฺกมภุเช ตสฺมึ, สทฺธาพุทฺธิคุโณทิเต; มนุวํสทฺธชากาเร, ลงฺกาทีปํ ปสาสติ. जब श्रद्धा और बुद्धि के गुणों से समृद्ध, मनुवंश के ध्वज स्वरूप वे पराक्रमबाहु लंका द्वीप पर शासन कर रहे हैं। ๔. ४. โมคฺคลฺลาเนน เถเรน, ธีมตา สุจิวุตฺตินา; รจิตํ ยํ สุวิญฺเญยฺย-มสนฺทิทฺธ’มนากุลํ. बुद्धिमान और शुद्ध आचरण वाले मोग्गल्लान स्थविर द्वारा रचित, जो (व्याकरण) सुविज्ञेय, असंदिग्ध और स्पष्ट है। ๕. ५. อเสสวิสยพฺยาปิ, ชินพฺยปฺปถ นิสฺสยํ; สทฺธสตฺถ’มนายาส-สาธิยํ พุทฺธิวทฺธนํ. समस्त विषयों में व्याप्त, जिन-वचनों (बुद्ध-वचनों) पर आधारित, यह शब्द-शास्त्र (व्याकरण) अनायास ही सिद्ध होने वाला और बुद्धि को बढ़ाने वाला है। ๖. ६. ตสฺส วุตฺติ สมาเสน, วิปุลตฺถปกาสนี; รจิตา ปุน เตเนว, สาสนุชฺโชตการินาติ. शासन को प्रकाशित करने वाली, उसके विस्तृत अर्थों को प्रकट करने वाली संक्षिप्त वृत्ति भी पुनः उन्हीं के द्वारा रचित है। โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ นิฏฺฐิตํ. मोग्गल्लान व्याकरण समाप्त हुआ। | |||
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
| Español | |||
| El Canon Pali | Los Comentarios | Los Subcomentarios | Otros |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |