| বাংলা | |||
| পালি | অট্ঠকথা | টীকা | অন্ন |
| 1101 পারাজিক পালি 1102 পাচিত্তিয় পালি 1103 মহাবগ্গ পালি (বিনয়) 1104 চূলবগ্গ পালি 1105 পরিবার পালি | 1201 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-১ 1202 পারাজিককণ্ড অট্ঠকথা-২ 1203 পাচিত্তিয় অট্ঠকথা 1204 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (বিনয়) 1205 চূলবগ্গ অট্ঠকথা 1206 পরিবার অট্ঠকথা | 1301 সারত্থদীপনী টীকা-১ 1302 সারত্থদীপনী টীকা-২ 1303 সারত্থদীপনী টীকা-৩ | 1401 দ্বেমাতিকাপালি 1402 বিনয়সংগহ অট্ঠকথা 1403 বজিরবুদ্ধি টীকা 1404 বিমতিবিনোদনী টীকা-১ 1405 বিমতিবিনোদনী টীকা-২ 1406 বিনয়ালংকার টীকা-১ 1407 বিনয়ালংকার টীকা-২ 1408 কঙ্খাবিতরণীপুরাণ টীকা 1409 বিনয়বিনিচ্ছয়-উত্তরবিনিচ্ছয় 1410 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-১ 1411 বিনয়বিনিচ্ছয় টীকা-২ 1412 পাচিত্যাদিযোজনাপালি 1413 খুদ্ধসিক্খা-মূলসিক্খা 8401 বিসুদ্ধিমগ্গ-১ 8402 বিসুদ্ধিমগ্গ-২ 8403 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-১ 8404 বিসুদ্ধিমগ্গ-মহাটীকা-২ 8405 বিসুদ্ধিমগ্গ নিদানকথা 8406 দীঘনিকায় (পু-বি) 8407 মজ্ঝিমনিকায় (পু-বি) 8408 সংযুত্তনিকায় (পু-বি) 8409 অঙ্গুত্তরনিকায় (পু-বি) 8410 বিনয়পিটক (পু-বি) 8411 অভিধম্মপিটক (পু-বি) 8412 অট্ঠকথা (পু-বি) 8413 নিরুত্তিদীপনী 8414 পরমত্থদীপনী সংগহমহাটীকাপাঠ 8415 অনুদীপনীপাঠ 8416 পট্ঠানুদ্দেস দীপনীপাঠ 8417 নমক্কারটীকা 8418 মহাপণামপাঠ 8419 লক্খণাতো বুদ্ধথোমনাগাথা 8420 সুতবন্দনা 8421 কমলাঞ্জলি 8422 জিনালংকার 8423 পজ্জমধু 8424 বুদ্ধগুণগাথাবলী 8425 চূলগন্থবংস 8426 মহাবংস 8427 সাসনবংস 8428 কচ্চায়নব্যাকরণং 8429 মোগ্গল্লানব্যাকরণং 8430 সদ্দনীতিপ্পকরণং (পদমালা) 8431 সদ্দনীতিপ্পকরণং (ধাতুমালা) 8432 পদরূপসিদ্ধি 8433 মোগ্গল্লানপঞ্চিকা 8434 পযোগসিদ্ধিপাঠ 8435 বুত্তোদয়পাঠ 8436 অভিধানপ্পদীপিকাপাঠ 8437 অভিধানপ্পদীপিকাটীকা 8438 সুবোধালংকারপাঠ 8439 সুবোধালংকারটীকা 8440 বালাবতার গণ্ঠিপদত্থবিনিচ্ছয়সার 8441 লোকনীতি 8442 সুত্তন্তনীতি 8443 সূরস্সতীনীতি 8444 মহারহনীতি 8445 ধম্মনীতি 8446 কবিদপ্পণনীতি 8447 নীতিমঞ্জরী 8448 নরদক্খদীপনী 8449 চতুরারক্খদীপনী 8450 চাণক্যনীতি 8451 রসবাহিনী 8452 সীমাবিসোধনীপাঠ 8453 বেস্সন্তরগীতি 8454 মোগ্গল্লান বুত্তিবিবরণপঞ্চিকা 8455 থূপবংস 8456 দাঠাবংস 8457 ধাতুপাঠবিলাসিনিয়া 8458 ধাতুবংস 8459 হত্থবনগল্লবিহারবংস 8460 জিনচরিতয় 8461 জিনবংসদীপং 8462 তেলকটাহগাথা 8463 মিলিদটীকা 8464 পদমঞ্জরী 8465 পদসাধনং 8466 সদ্দবিন্দুপকরণং 8467 কচ্চায়নধাতুমঞ্জুসা 8468 সামন্তকূটবণ্ণনা |
| 2101 সীলক্খন্ধবগ্গ পালি 2102 মহাবগ্গ পালি (দীঘ) 2103 পাথিকবগ্গ পালি | 2201 সীলক্খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 2202 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (দীঘ) 2203 পাথিকবগ্গ অট্ঠকথা | 2301 সীলক্খন্ধবগ্গ টীকা 2302 মহাবগ্গ টীকা (দীঘ) 2303 পাথিকবগ্গ টীকা 2304 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-১ 2305 সীলক্খন্ধবগ্গ-অভিনবটীকা-২ | |
| 3101 মূলপণ্ণাস পালি 3102 মজ্ঝিমপণ্ণাস পালি 3103 উপরিপণ্ণাস পালি | 3201 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-১ 3202 মূলপণ্ণাস অট্ঠকথা-২ 3203 মজ্ঝিমপণ্ণাস অট্ঠকথা 3204 উপরিপণ্ণাস অট্ঠকথা | 3301 মূলপণ্ণাস টীকা 3302 মজ্ঝিমপণ্ণাস টীকা 3303 উপরিপণ্ণাস টীকা | |
| 4101 সগাথাবগ্গ পালি 4102 নিদানবগ্গ পালি 4103 খন্ধবগ্গ পালি 4104 সলায়তনবগ্গ পালি 4105 মহাবগ্গ পালি (সংযুত্ত) | 4201 সগাথাবগ্গ অট্ঠকথা 4202 নিদানবগ্গ অট্ঠকথা 4203 খন্ধবগ্গ অট্ঠকথা 4204 সলায়তনবগ্গ অট্ঠকথা 4205 মহাবগ্গ অট্ঠকথা (সংযুত্ত) | 4301 সগাথাবগ্গ টীকা 4302 নিদানবগ্গ টীকা 4303 খন্ধবগ্গ টীকা 4304 সলায়তনবগ্গ টীকা 4305 মহাবগ্গ টীকা (সংযুত্ত) | |
| 5101 এককনিপাত পালি 5102 দুকনিপাত পালি 5103 তিকনিপাত পালি 5104 চতুক্কনিপাত পালি 5105 পঞ্চকনিপাত পালি 5106 ছক্কনিপাত পালি 5107 সত্তকনিপাত পালি 5108 অট্ঠকাদিনিপাত পালি 5109 নবকনিপাত পালি 5110 দশকনিপাত পালি 5111 একাদশকনিপাত পালি | 5201 এককনিপাত অট্ঠকথা 5202 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত অট্ঠকথা 5203 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত অট্ঠকথা 5204 অট্ঠকাদিনিপাত অট্ঠকথা | 5301 এককনিপাত টীকা 5302 দুক-তিক-চতুক্কনিপাত টীকা 5303 পঞ্চক-ছক্ক-সত্তকনিপাত টীকা 5304 অট্ঠকাদিনিপাত টীকা | |
| 6101 খুদ্ধকপাঠ পালি 6102 ধম্মপদ পালি 6103 উদান পালি 6104 ইতিবুত্তক পালি 6105 সুত্তনিপাত পালি 6106 বিমানবত্থু পালি 6107 পেতবত্থু পালি 6108 থেরগাথা পালি 6109 থেরীগাথা পালি 6110 অপদান পালি-১ 6111 অপদান পালি-২ 6112 বুদ্ধবংস পালি 6113 চরিয়াপিটক পালি 6114 জাতক পালি-১ 6115 জাতক পালি-২ 6116 মহানিদ্দেস পালি 6117 চূলনিদ্দেস পালি 6118 পটিসম্ভিদামগ্গ পালি 6119 নেত্তিপ্পকরণ পালি 6120 মিলিন্দপঞ্হ পালি 6121 পেটকোপদেস পালি | 6201 খুদ্ধকপাঠ অট্ঠকথা 6202 ধম্মপদ অট্ঠকথা-১ 6203 ধম্মপদ অট্ঠকথা-২ 6204 উদান অট্ঠকথা 6205 ইতিবুত্তক অট্ঠকথা 6206 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-১ 6207 সুত্তনিপাত অট্ঠকথা-২ 6208 বিমানবত্থু অট্ঠকথা 6209 পেতবত্থু অট্ঠকথা 6210 থেরগাথা অট্ঠকথা-১ 6211 থেরগাথা অট্ঠকথা-২ 6212 থেরীগাথা অট্ঠকথা 6213 অপদান অট্ঠকথা-১ 6214 অপদান অট্ঠকথা-২ 6215 বুদ্ধবংস অট্ঠকথা 6216 চরিয়াপিটক অট্ঠকথা 6217 জাতক অট্ঠকথা-১ 6218 জাতক অট্ঠকথা-২ 6219 জাতক অট্ঠকথা-৩ 6220 জাতক অট্ঠকথা-৪ 6221 জাতক অট্ঠকথা-৫ 6222 জাতক অট্ঠকথা-৬ 6223 জাতক অট্ঠকথা-৭ 6224 মহানিদ্দেস অট্ঠকথা 6225 চূলনিদ্দেস অট্ঠকথা 6226 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-১ 6227 পটিসম্ভিদামগ্গ অট্ঠকথা-২ 6228 নেত্তিপ্পকরণ অট্ঠকথা | 6301 নেত্তিপ্পকরণ টীকা 6302 নেত্তিবিভাবিনী | |
| 7101 ধম্মসংগণী পালি 7102 বিভঙ্গ পালি 7103 ধাতুকথা পালি 7104 পুগ্গলপঞ্ঞাত্তি পালি 7105 কথাবত্থু পালি 7106 যমক পালি-১ 7107 যমক পালি-২ 7108 যমক পালি-৩ 7109 পট্ঠান পালি-১ 7110 পট্ঠান পালি-২ 7111 পট্ঠান পালি-৩ 7112 পট্ঠান পালি-৪ 7113 পট্ঠান পালি-৫ | 7201 ধম্মসংগণি অট্ঠকথা 7202 সম্মোহবিনোদনী অট্ঠকথা 7203 পঞ্চপকরণ অট্ঠকথা | 7301 ধম্মসংগণী-মূলটীকা 7302 বিভঙ্গ-মূলটীকা 7303 পঞ্চপকরণ-মূলটীকা 7304 ধম্মসংগণী-অনুটীকা 7305 পঞ্চপকরণ-অনুটীকা 7306 অভিধম্মাবতারো-নামরূপপরিচ্ছেদো 7307 অভিধম্মত্থসংগহো 7308 অভিধম্মাবতার-পুরাণটীকা 7309 অভিধম্মমাতিকাপালি | |
| 中文 | |||
| 巴利 | 義註 | 複註 | 藏外典籍 |
| 1101 巴拉基咖(波羅夷) 1102 巴吉帝亞(波逸提) 1103 大品(律藏) 1104 小品 1105 附隨 | 1201 巴拉基咖(波羅夷)義註-1 1202 巴拉基咖(波羅夷)義註-2 1203 巴吉帝亞(波逸提)義註 1204 大品義註(律藏) 1205 小品義註 1206 附隨義註 | 1301 心義燈-1 1302 心義燈-2 1303 心義燈-3 | 1401 疑惑度脫 1402 律攝註釋 1403 金剛智疏 1404 疑難解除疏-1 1405 疑難解除疏-2 1406 律莊嚴疏-1 1407 律莊嚴疏-2 1408 古老解惑疏 1409 律抉擇-上抉擇 1410 律抉擇疏-1 1411 律抉擇疏-2 1412 巴吉帝亞等啟請經 1413 小戒學-根本戒學 8401 清淨道論-1 8402 清淨道論-2 8403 清淨道大複註-1 8404 清淨道大複註-2 8405 清淨道論導論 8406 長部問答 8407 中部問答 8408 相應部問答 8409 增支部問答 8410 律藏問答 8411 論藏問答 8412 義注問答 8413 語言學詮釋手冊 8414 勝義顯揚 8415 隨燈論誦 8416 發趣論燈論 8417 禮敬文 8418 大禮敬文 8419 依相讚佛偈 8420 經讚 8421 蓮花供 8422 勝者莊嚴 8423 語蜜 8424 佛德偈集 8425 小史 8427 佛教史 8426 大史 8429 目犍連文法 8428 迦旃延文法 8430 文法寶鑑(詞幹篇) 8431 文法寶鑑(詞根篇) 8432 詞形成論 8433 目犍連五章 8434 應用成就讀本 8435 音韻論讀本 8436 阿毗曇燈讀本 8437 阿毗曇燈疏 8438 妙莊嚴論讀本 8439 妙莊嚴論疏 8440 初學入門義抉擇精要 8446 詩王智論 8447 智論花鬘 8445 法智論 8444 大羅漢智論 8441 世間智論 8442 經典智論 8443 勇士百智論 8450 考底利耶智論 8448 人眼燈 8449 四護衛燈 8451 妙味之流 8452 界清淨 8453 韋桑達拉頌 8454 目犍連語釋五章 8455 塔史 8456 佛牙史 8457 詞根讀本注釋 8458 舍利史 8459 象頭山寺史 8460 勝者行傳 8461 勝者宗燈 8462 油鍋偈 8463 彌蘭王問疏 8464 詞花鬘 8465 詞成就論 8466 正理滴論 8467 迦旃延詞根注 8468 邊境山注釋 |
| 2101 戒蘊品 2102 大品(長部) 2103 波梨品 | 2201 戒蘊品註義註 2202 大品義註(長部) 2203 波梨品義註 | 2301 戒蘊品疏 2302 大品複註(長部) 2303 波梨品複註 2304 戒蘊品新複註-1 2305 戒蘊品新複註-2 | |
| 3101 根本五十經 3102 中五十經 3103 後五十經 | 3201 根本五十義註-1 3202 根本五十義註-2 3203 中五十義註 3204 後五十義註 | 3301 根本五十經複註 3302 中五十經複註 3303 後五十經複註 | |
| 4101 有偈品 4102 因緣品 4103 蘊品 4104 六處品 4105 大品(相應部) | 4201 有偈品義注 4202 因緣品義注 4203 蘊品義注 4204 六處品義注 4205 大品義注(相應部) | 4301 有偈品複註 4302 因緣品註 4303 蘊品複註 4304 六處品複註 4305 大品複註(相應部) | |
| 5101 一集經 5102 二集經 5103 三集經 5104 四集經 5105 五集經 5106 六集經 5107 七集經 5108 八集等經 5109 九集經 5110 十集經 5111 十一集經 | 5201 一集義註 5202 二、三、四集義註 5203 五、六、七集義註 5204 八、九、十、十一集義註 | 5301 一集複註 5302 二、三、四集複註 5303 五、六、七集複註 5304 八集等複註 | |
| 6101 小誦 6102 法句經 6103 自說 6104 如是語 6105 經集 6106 天宮事 6107 餓鬼事 6108 長老偈 6109 長老尼偈 6110 譬喻-1 6111 譬喻-2 6112 諸佛史 6113 所行藏 6114 本生-1 6115 本生-2 6116 大義釋 6117 小義釋 6118 無礙解道 6119 導論 6120 彌蘭王問 6121 藏釋 | 6201 小誦義注 6202 法句義注-1 6203 法句義注-2 6204 自說義注 6205 如是語義註 6206 經集義注-1 6207 經集義注-2 6208 天宮事義注 6209 餓鬼事義注 6210 長老偈義注-1 6211 長老偈義注-2 6212 長老尼義注 6213 譬喻義注-1 6214 譬喻義注-2 6215 諸佛史義注 6216 所行藏義注 6217 本生義注-1 6218 本生義注-2 6219 本生義注-3 6220 本生義注-4 6221 本生義注-5 6222 本生義注-6 6223 本生義注-7 6224 大義釋義注 6225 小義釋義注 6226 無礙解道義注-1 6227 無礙解道義注-2 6228 導論義注 | 6301 導論複註 6302 導論明解 | |
| 7101 法集論 7102 分別論 7103 界論 7104 人施設論 7105 論事 7106 雙論-1 7107 雙論-2 7108 雙論-3 7109 發趣論-1 7110 發趣論-2 7111 發趣論-3 7112 發趣論-4 7113 發趣論-5 | 7201 法集論義註 7202 分別論義註(迷惑冰消) 7203 五部論義註 | 7301 法集論根本複註 7302 分別論根本複註 7303 五論根本複註 7304 法集論複註 7305 五論複註 7306 阿毘達摩入門 7307 攝阿毘達磨義論 7308 阿毘達摩入門古複註 7309 阿毘達摩論母 | |
| English | |||
| Pali Canon | Commentaries | Sub-commentaries | Other |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
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| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| हिंदी | |||
| पाली कैनन | कमेंट्री | उप-टिप्पणियाँ | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळि 1102 पाचित्तिय पाळि 1103 महावग्ग पाळि (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळि 1105 परिवार पाळि | 1201 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-1 1202 पाराजिककण्ड अट्ठकथा-2 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-1 1302 सारत्थदीपनी टीका-2 1303 सारत्थदीपनी टीका-3 | 1401 द्वेमातिकापाळि 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-1 1405 विमतिविनोदनी टीका-2 1406 विनयालंकार टीका-1 1407 विनयालंकार टीका-2 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-1 1411 विनयविनिच्छय टीका-2 1412 पाचित्यादियोजनापाळि 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-1 8402 विसुद्धिमग्ग-2 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-1 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-2 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अङ्गुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी सङ्गहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवन्दना 8421 कमलाञ्जलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगन्थवंस 8427 सासनवंस 8426 महावंस 8429 मोग्गल्लानब्याकरणं 8428 कच्चायनब्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपञ्चिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गण्ठिपदत्थविनिच्छयसार 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमञ्जरी 8445 धम्मनीति 8444 महारहनीति 8441 लोकनीति 8442 सुत्तन्तनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8450 चाणक्यनीति 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8451 रसवाहिनी 8452 सीमविसोधनीपाठ 8453 वेस्सन्तरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपञ्चिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमञ्जरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिन्दुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमञ्जुसा 8468 सामन्तकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खन्धवग्ग पाळि 2102 महावग्ग पाळि (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळि | 2201 सीलक्खन्धवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खन्धवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-1 2305 सीलक्खन्धवग्ग-अभिनवटीका-2 | |
| 3101 मूलपण्णास पाळि 3102 मज्झिमपण्णास पाळि 3103 उपरिपण्णास पाळि | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-1 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-2 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळि 4102 निदानवग्ग पाळि 4103 खन्धवग्ग पाळि 4104 सळायतनवग्ग पाळि 4105 महावग्ग पाळि (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खन्धवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खन्धवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळि 5102 दुकनिपात पाळि 5103 तिकनिपात पाळि 5104 चतुक्कनिपात पाळि 5105 पञ्चकनिपात पाळि 5106 छक्कनिपात पाळि 5107 सत्तकनिपात पाळि 5108 अट्ठकादिनिपात पाळि 5109 नवकनिपात पाळि 5110 दसकनिपात पाळि 5111 एकादसकनिपात पाळि | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पञ्चक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळि 6102 धम्मपद पाळि 6103 उदान पाळि 6104 इतिवुत्तक पाळि 6105 सुत्तनिपात पाळि 6106 विमानवत्थु पाळि 6107 पेतवत्थु पाळि 6108 थेरगाथा पाळि 6109 थेरीगाथा पाळि 6110 अपदान पाळि-1 6111 अपदान पाळि-2 6112 बुद्धवंस पाळि 6113 चरियापिटक पाळि 6114 जातक पाळि-1 6115 जातक पाळि-2 6116 महानिद्देस पाळि 6117 चूळनिद्देस पाळि 6118 पटिसम्भिदामग्ग पाळि 6119 नेत्तिप्पकरण पाळि 6120 मिलिन्दपञ्ह पाळि 6121 पेटकोपदेस पाळि | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-1 6203 धम्मपद अट्ठकथा-2 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-1 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-2 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-1 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-2 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-1 6214 अपदान अट्ठकथा-2 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-1 6218 जातक अट्ठकथा-2 6219 जातक अट्ठकथा-3 6220 जातक अट्ठकथा-4 6221 जातक अट्ठकथा-5 6222 जातक अट्ठकथा-6 6223 जातक अट्ठकथा-7 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-1 6227 पटिसम्भिदामग्ग अट्ठकथा-2 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसङ्गणी पाळि 7102 विभङ्ग पाळि 7103 धातुकथा पाळि 7104 पुग्गलपञ्ञत्ति पाळि 7105 कथावत्थु पाळि 7106 यमक पाळि-1 7107 यमक पाळि-2 7108 यमक पाळि-3 7109 पट्ठान पाळि-1 7110 पट्ठान पाळि-2 7111 पट्ठान पाळि-3 7112 पट्ठान पाळि-4 7113 पट्ठान पाळि-5 | 7201 धम्मसङ्गणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पञ्चपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसङ्गणी-मूलटीका 7302 विभङ्ग-मूलटीका 7303 पञ्चपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसङ्गणी-अनुटीका 7305 पञ्चपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसङ्गहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळि | |
နမော တဿ ဘဂဝတော အရဟတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ उन भगवन्, अर्हत्, सम्यक्सम्बुद्ध को नमस्कार। သာသနဝံသပ္ပဒီပိကာ शासनवंशप्रदीपिका ဗုဒ္ဓံ [Pg.1] သုမာလီ ဒွိပဒုတ္တမော တမော,ဟန္တွာန ဗောဓေသိဓ ပင်္ကဇံ ကဇံ; မဂ္ဂဂ္ဂသေလမှိ သုဉဋ္ဌိတော ဌိတော,သော မံ စိရံ ပါတု သုခံ သဒါ သဒါ. जो बुद्ध श्रेष्ठ मालाधारी, मनुष्यों में उत्तम, अंधकार का नाश कर इस संसार रूपी कीचड़ में उत्पन्न प्राणियों को कमल के समान प्रबुद्ध करते हैं; जो मार्ग रूपी श्रेष्ठ पर्वत पर सुस्थित हैं, वे सदा-सदा के लिए चिरकाल तक मेरी और मेरे सुख की रक्षा करें। သီဟဠဒ္ဒီပတောယေဝ,အာဂတေဟိ ဒိသန္တရေ; ဘိက္ခူဟိ ယာစိတော ကဿံ,သာသ္နဝံသပ္ပဒီပိကံ. सिंहल द्वीप से ही अन्य दिशाओं में आए हुए भिक्षुओं द्वारा याचना किए जाने पर, मैं 'शासनवंशप्रदीपिका' की रचना करूँगा। ကာမဉ္စ ပေါရာဏေဟိ ယာ,သာသ္နဝံသပ္ပဒိပိကာ; ဝိတ္ထာရ ဝါစနာမဂ္ဂါ,ဝိရစိတာ ဝိနိစ္ဆယာ. यद्यपि प्राचीन आचार्यों द्वारा जो 'शासनवंशप्रदीपिका' रची गई है, वह विस्तारपूर्वक वाचन मार्ग और विनिश्चय से युक्त है। သာ [Pg.2] ပန မရမ္မဘာသာယ,ကတတ္တာယေဝ ဧတေသံ; ဒီပန္တရနိဝါသိနံ,ဝဟာတိ သုဋ္ဌုနာတ္ထံ. किन्तु वह ग्रन्थ म्यांमार भाषा में रचित होने के कारण, अन्य द्वीपों में रहने वाले इन लोगों के लिए पूर्णतः अर्थकारी नहीं है। တသ္မာ ဟိ မူလဘာသာယ,ကရိဿာမိ အဟံ ဟဝေ; သံသန္ဒိတွာန ဂန္ထေဟိ,တံ သလ္လက္ခေန္တု သာဓဝေါတိ. इसलिए, मैं निश्चित रूप से मूल भाषा (पालि) में, ग्रन्थों का मिलान करके इसकी रचना करूँगा; सज्जन पुरुष इस पर ध्यान दें। တတြာယံမာတိကာ – वहाँ यह मातृका (विषय-सूची) है – ၁. နဝဋ္ဌာနာဂတသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ, १. नौ स्थानों में आए शासन-वंश की कथा का मार्ग, ၂. သီဟဠဒီပိကသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ, २. सिंहल द्वीप के शासन-वंश की कथा का मार्ग, ၃. သုဝဏ္ဏဘူမိသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ, ३. सुवर्णभूमि के शासन-वंश की कथा का मार्ग, ၄. ယောနကရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ, ४. योनक राष्ट्र के शासन-वंश की कथा का मार्ग, ၅. ဝနဝါသီရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ, ५. वनवासी राष्ट्र के शासन-वंश की कथा का मार्ग, ၆. အပရန္တရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ, ६. अपरान्त राष्ट्र के शासन-वंश की कथा का मार्ग, ၇. ကသ္မီရဂန္ဓာရရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ, ७. कश्मीर-गन्धार राष्ट्र के शासन-वंश की कथा का मार्ग, ၈. မဟိံသကရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ, ८. महिंसक राष्ट्र के शासन-वंश की कथा का मार्ग, ၉. မဟာရဋ္ဌသာသနဝံသဝထာမဂ္ဂေါ, ९. महाराष्ट्र के शासन-वंश की कथा का मार्ग, ၁၀. စိနရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါစာတိ. १०. और चीन राष्ट्र के शासन-वंश की कथा का मार्ग। ၁. နဝဋ္ဌာနာဂတသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ १. नौ स्थानों में आए शासन-वंश की कथा का मार्ग ၁. တတ္ထ စ နဝဋ္ဌာနာဂတသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ ဧဝံ ဝေဒိတဗ္ဗော. အမှာကဉှိ ဘဂဝါ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ဝေနေယျာနံ ဟိတတ္ထာယ ဟတ္ထဂတံ သုခံ အနာဒိယိတွာ ဒီပင်္ကရဿ ဘဂဝတော ပါဒမူလေ ဗျာကရဏံ နာမ မဉ္ဇူသက ပုပ္ဖံ ပိလန္ဓိတွာ ကပ္ပသတသဟဿာဓိကာနိ စတ္တာရိ အသချေ ယာနိ အနေကာသု ဇာတီသု အတ္တနော ခေဒံ အနပေက္ခိတွာ သမတိံသပါရမိယော [Pg.3] ပူရေတွာ ဝေဿန္တရတ္တဘာဝတော စဝိတွာ တုသိတပုရေ ဒေဝသုခံ အနုဘဝိ. १. वहाँ नौ स्थानों में आए शासन-वंश की कथा के मार्ग को इस प्रकार समझना चाहिए। हमारे भगवान सम्यक्सम्बुद्ध ने विनेय जनों के हित के लिए हाथ में आए हुए सुख की परवाह न करते हुए, दीपंकर भगवान के चरणों में 'व्याकरण' (भविष्यवाणी) रूपी मंजूषक पुष्प को धारण कर, चार असंख्येय और एक लाख कल्पों तक अनेक जन्मों में अपने कष्ट की उपेक्षा करते हुए तीस पारमिताओं को पूर्ण किया और वेस्सन्तर के आत्मभाव से च्युत होकर तुषित पुर में देव-सुख का अनुभव किया। တဒါ ဒေဝေဟိ ဥယျောဇိယမာနော ဟုတွာ ကပိလဝတ္ထုမှိ ဟောသမတရညာ ပဘုတိ အသမ္ဘိန္နာတ္တိယဝံသိကဿ သုဒ္ဓေါ ဓနဿနာမ မဟာရညော အဂ္ဂမဟေသိယာ အသမ္ဘိန္နာတ္တိယဝံ သိကာယ မာယာယ ကုစ္ဆီသ္မိံ အာသာဠိမာသဿ ပုဏ္ဏမိယံ ဂုရုဝါရေ ပဋိသန္ဓိံ ဂဟေတွာ အသမာသစ္စယေန ဝေသာခမာသဿ ပုဏ္ဏမိယံ သုက္ကဝါရေ ဝိဇာယိတွာ သောဠသဝဿိကကာလေ ရဇ္ဇသမ္ပတ္တိံ ပတွာ ဧကူနတိံသဝဿာနိ အတိက္ကမိတွာ မင်္ဂလဥယျာနံ နိက္ခမနကာလေ ဒေဝေဟိ ဒဿိတာနိ စတ္တာရိ နိမိတ္တာနိ ပဿိတွာ သံဝေဂံ အာပဇ္ဇိတွာ မဟာဘိနိက္ခမနံ နိက္ခမိတွာ အနောမာယနာမ နဒိယာ တီရေ ဘမရ ဝဏ္ဏသန္နိဘာနိ ကေသာနိ ဆိန္ဒိတွာ ဒေဝဒတ္တိယကာသာဝံ ပဋိစ္ဆာဒေတွာ နေ ရဉ္ဇရာယနာမ နဒိယာ တီရေ ဝေသာခမာသဿ ပုဏ္ဏမိယံ ပစ္စူသကာလေ သုဇာတာယနာမ သေဋ္ဌိဓီတာယ ဒိန္နံ ပါယာသံ ဧကူနပဏ္ဏာသဝါရေန ပရိဘုဉ္ဇိတွာ ပုရိမိကာနံ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓါနံ ဓမ္မတာယ သုဝဏ္ဏပါတိံ နဒိယံ ဩတာရေတွာ မဟာဗောဓိမဏ္ဍံ ဥပသင်္ကမိတွာ အပရာဇိတပလ္လင်္ကေ နိသီဒိတွာ အနမတဂ္ဂသံ သာရတော ပဋ္ဌာယ အတ္တာနံ ဆာယာ ဝိယ အနုယန္တာနံ အနေကသတကိလေသဝေရီနံ သီသံ စတူဟိ မဂ္ဂသတ္ထေဟိ ဆိန္ဒိတွာ တိလောကဂ္ဂမဟာဓမ္မရာဇတ္တံ ပတွာ ပဉ္စတာလီသဝဿာနံ တေသု တေသု ဌာနေသု တေသံ တေသံ သတ္တာနံ မဟာကရုဏာသမာပတ္တိဇာလံ ပတ္ထာရေတွာ ဒေသနာဉာဏံ ဝိဇမ္ဘေတွာ ဓမ္မံ ဒေသေတွာ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. ပတိဋ္ဌာပေတွာ စ ပန အသီတိဝဿာယုကကာလေ ဝိဇ္ဇောတယိတွာ နိဗ္ဗာယနပ္ပ ဒါပဇာလံ ဝိယ အနုပါဒိသေသနိဗ္ဗာနဓာတုယာ ပရိနိဗ္ဗာယိ. မစ္စု ဓမ္မဿ စ နာမ တီသု လောကေသု အတိမမာယိတဗ္ဗော ဧသ, အတိဂရုကာတဗ္ဗော ဧသ, အတိဘာယိတဗ္ဗော ဧသာတိ ဝိဇာနနသဘာဝေါ နတ္ထိ. ဘဂဝန္တံယေဝ တာဝ တိလောကဂ္ဂပုဂ္ဂလံ အာဒါယ [Pg.4] ဂစ္ဆတိ, ကိံမင်္ဂံ ပန အမှေ ယေဝါ တေဝါ, အဟောဝတအစ္ဆရိယာ သင်္ခါရဓမ္မောတိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ– तब देवताओं द्वारा प्रेरित किए जाने पर, कपिलवस्तु में ओक्काक राजा से लेकर अविच्छिन्न क्षत्रिय वंश वाले शुद्धोदन नामक महाराज की अग्र-महिषी, अविच्छिन्न क्षत्रिय वंश वाली माया के गर्भ में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरुवार के दिन प्रतिसन्धि ग्रहण की। दस मास बीतने पर वैशाख मास की पूर्णिमा को शुक्रवार के दिन जन्म लेकर, सोलह वर्ष की आयु में राज्य-सम्पत्ति प्राप्त की। उनतीस वर्ष व्यतीत होने पर मंगल-उद्यान की ओर निकलते समय देवताओं द्वारा दिखाए गए चार निमित्तों को देखकर संवेग को प्राप्त हुए और महाभिनिष्क्रमण कर अनोमा नामक नदी के तट पर भँवरे के रंग के समान केशों को काटकर, देवताओं द्वारा दिए गए काषाय वस्त्रों को धारण किया। निरंजना नामक नदी के तट पर वैशाख मास की पूर्णिमा को प्रातःकाल सुजाता नामक श्रेष्ठि-पुत्री द्वारा दिए गए पायस को उनचास ग्रासों में खाकर, पूर्ववर्ती सम्यक्सम्बुद्धों की धर्मता के अनुसार स्वर्ण-पात्र को नदी में प्रवाहित किया। फिर महाबोधि मण्डप में जाकर अपराजित पर्यंक पर बैठकर, अनादि संसार से छाया के समान पीछे लगे हुए अनेक सौ क्लेश रूपी शत्रुओं के सिर को चार मार्ग रूपी शस्त्रों से काटकर तीनों लोकों के अग्र महाधर्मराज पद को प्राप्त किया। पैंतालीस वर्षों तक उन-उन स्थानों पर उन-उन सत्त्वों के लिए महाकरुणा-समापत्ति का जाल फैलाकर, देशना-ज्ञान को प्रकट कर धर्म का उपदेश दिया और शासन की प्रतिष्ठा की। शासन की प्रतिष्ठा कर अस्सी वर्ष की आयु में, प्रकाशित होकर बुझने वाले दीपक की लौ के समान, अनुपधिशेष निर्वाण धातु में परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। मृत्यु धर्म के विषय में तीनों लोकों में ऐसा कोई बोध नहीं है कि यह अत्यधिक ममता करने योग्य है, यह अत्यधिक गौरव करने योग्य है, या यह अत्यधिक भय करने योग्य है। जब वह तीनों लोकों के अग्र पुरुष भगवान को ही ले जाती है, तो फिर हमारे जैसे लोगों की क्या बिसात? अहो! आश्चर्य है, संस्कार धर्म अनित्य हैं। यहाँ ये गाथाएँ हैं– မစ္စုဓမ္မော စ နာမေသ,နိလ္လဇ္ဇော စ အနောတ္တပ္ပီ; တိလောကဂ္ဂံဝ အာဒါယ,ဂစ္ဆီ ပဂေဝ အညေသု. यह मृत्यु धर्म निर्लज्ज और निर्भय है; जो तीनों लोकों के अग्र को ही ले गया, तो अन्यों के विषय में क्या कहना। ယထာ ဂေါဃာတကော စောရော,မာရေတုံယေဝ အာရဘိ; ဂေါဏံ လဒ္ဓါန လောကမှိ,ပယောဇနံဝ ဧတ္တကံ. जैसे संसार में कोई कसाई चोर बैल को पाकर केवल उसे मारने का ही उपक्रम करता है, उसका इतना ही प्रयोजन होता है। တထေဝ မစ္စုရာဇာ စ,ဟိန္ဒဂူနံ ဂုဏံ ဣဓ; န ဝိဇာနာတိ ဧသော ဟိ,မာရေတုံယေဝ အာရဘီတိ. वैसे ही मृत्युराज भी यहाँ मनुष्यों के गुणों को नहीं जानता; वह तो केवल मारने का ही उपक्रम करता है। သတ္တာဟပရိနိဗ္ဗုတေ စ ဘဂဝတိ အာယသ္မာ မဟာကဿပေါ တိယဍ္ဎသတာဓိကေဟိ သဟဿမတ္တေဟိ ဘိက္ခူဟိ သဒ္ဓိ ပါဝါတော ကုသီနာရာယံ အာဂစ္ဆန္တော အန္တရာမဂ္ဂေ ဘဂဝါ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ပရိနိဗ္ဗုတောတိ သုတွာ အဝီတသောက ဘိက္ခူ ရောဒန္တေ ဒိသွာ ဝုဒ္ဓပဗ္ဗဇိတော သုဘဒ္ဒါနာမ ဘိက္ခု ဧဝံ ဝဒတိ– မာ အာဝုသော ပရိဒေဝိတ္ထ, နတ္ထေတ္ထ သောစိတဗ္ဗောနာမကောစိ, ပုဗ္ဗေ မယံ ဘဝါမ သမဏေန ဂေ,ဘမေန ဥပဒ္ဒုတာ– ဣဒံ ကရောထ ဣဒံ တုမှာကံ ကပ္ပတိ, မာ ဣဒံ ကရိတ္ထ န ဣဒံ တုမှာကံ ကပ္ပတီတိ, သေယျထာပိ ဣဏသာဓိကေန ဒါသောတိ, ဣဒါနိ ပန မယံ ယံ ယံ ဣစ္ဆာမ, တံ တံ သက္ကာ ကာတုံ, ယံ ယံ ပန န ဣစ္ဆာမ,တံ တံ သက္ကာ အကာတုန္တိ. တံ သုတွာ ဤဒိသံ ပန ဝေရီပုဂ္ဂလံ ပဋိစ္စ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော သာသနံ ခိပ္ပံ အန္တရဓာရေယျ, ဣဒါနိ သုဝဏ္ဏက္ခန္ဓသဒိသော သရီရော သံဝိဇ္ဇမာနော [Pg.5]ယေဝ ဒုက္ခေန နိပ္ဖာဒိတေ သာသနေ မဟာဘယံ ဥပ္ပဇ္ဇိ စ, ဤဒိသော ပုဂ္ဂလော အညံ ဤဒိသံ ပုဂ္ဂလံ သဟာယံ လဘိတွာ ဝုဒ္ဓိမာပဇ္ဇန္တော ဟာပေတုံ သက္ကုဏေယျ မညေတိ စိတ္တက္ခေဒံ ပတွာ ဓမ္မသံဝေဂံ လဘိတွာ ဣမံ ဘိက္ခုံ ဣဓေဝ သေတဝတ္ထံ နိဝါသာပေတွာ သရီရေ ဘသ္မေန ဝိကိရိတွာ ဗဟိဒ္ဓါ ကရိဿာမီတိ စိန္တေသိ. भगवान के परिनिर्वाण के सात दिन बाद, आयुष्मान महाकश्यप साढ़े तेरह सौ भिक्षुओं के साथ पावा से कुशीनारा आ रहे थे। मार्ग में भगवान सम्यक्सम्बुद्ध के परिनिर्वाण की बात सुनकर, शोक-रहित भिक्षुओं को रोते हुए देखकर, सुभद्द नामक वृद्ध-प्रव्रजित भिक्षु ने कहा— "आवुसो! विलाप मत करो, यहाँ शोक करने जैसा कुछ नहीं है। पहले हम उस श्रमण द्वारा पीड़ित थे— 'यह करो, यह तुम्हें कल्पित (उचित) है; यह मत करो, यह तुम्हें कल्पित नहीं है'। जैसे कोई ऋणदाता का दास हो। अब हम जो चाहेंगे वह कर सकेंगे, और जो नहीं चाहेंगे वह नहीं करेंगे।" यह सुनकर (महाकश्यप ने सोचा) कि ऐसे वैरी पुद्गल के कारण सम्यक्सम्बुद्ध भगवान का शासन शीघ्र ही अंतर्धान हो जाएगा। अभी सुवर्ण-स्कन्ध के समान शरीर विद्यमान ही है और दुःख से निष्पादित शासन में महान भय उत्पन्न हो गया है। ऐसा पुद्गल दूसरे ऐसे ही पुद्गल को सहायक प्राप्त कर वृद्धि पाते हुए (शासन को) नष्ट कर सकता है। ऐसा सोचकर चित्त में खेद और धर्म-संवेग प्राप्त कर उन्होंने सोचा कि इस भिक्षु को यहीं श्वेत वस्त्र पहनाकर, शरीर पर भस्म छिड़ककर बाहर कर दूँगा। တဒါ အာယသ္မတော မဟာကဿပတ္ထေရဿ ဧတဒဟောသိ,– ဣဒါနိ သမဏဿ ဂေါတမဿ သရီရံ သံဝိဇ္ဇမာနံယေဝ ပရိသာ ဝိဝါဒံ ကရောန္တီတိ မနုဿာ ဥပဝဒိဿန္တိတိ. တတော ပစ္ဆာ ဣမံ ဝိတက္ကံ ဝူပသမေတွာ ခမိတွာ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ဘဂဝါ ပရိနိဗ္ဗာယမာနောပိ တေန ပန ဒေသိတော ဓမ္မော သံဝိဇ္ဇတိ, တေန ဒေသိတဿ ဓမ္မဿ ထိရံ ပတိဋ္ဌာပနတ္ထာယ သင်္ဂါယိယမာနံ ဤဒိသေဟိ ပုဂ္ဂလေဟိ သာသနံ န အန္တရဓာယိဿတိ, စိရံ ဌဿတိ ယေဝါတိ မနသိကရိတွာ ဘဂဝတော ဒိန္နပံသု ကူလစီဝရာဒိဝသေန ဓမ္မာနုဂ္ဂဟံ အနုဿရိတွာ ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနတော တတိယေ မာသေ အာသာဠိမာသဿ ပုဏ္ဏမိတော ပဉ္စမေ ဒိဝသေ ရာဇဂဟေ သတ္တပဏ္ဏိဂုဟာယံ အာဇာတသတ္တုံနာမ ရာဇာနံ နိဿာယ ပဉ္စဟိ အရဟန္တ သတေဟိ သဒ္ဓိံ သတ္တမာသေဟိ ပဌမံ သင်္ဂါယနံ အကာသိ. तब आयुष्मान महाकश्यप स्थविर को यह विचार आया— "अभी श्रमण गौतम का शरीर विद्यमान ही है और परिषद् विवाद कर रही है, ऐसा कहकर मनुष्य निंदा करेंगे।" तब उस वितर्क को शांत कर और क्षमा कर (उन्होंने सोचा)— "सम्यक्सम्बुद्ध भगवान के परिनिर्वाण प्राप्त होने पर भी उनके द्वारा देशित धर्म विद्यमान है। उनके द्वारा देशित धर्म की स्थिर प्रतिष्ठा के लिए ऐसे पुद्गलों द्वारा शासन अंतर्धान न हो और चिरकाल तक टिका रहे, ऐसा मन में धारण कर, भगवान द्वारा दिए गए पांसुकुल चीवर आदि के माध्यम से धर्म-अनुग्रह का स्मरण करते हुए, भगवान के परिनिर्वाण के तीसरे महीने में, आषाढ़ मास की पूर्णिमा के पांचवें दिन, राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में राजा अजातशत्रु के आश्रय में पाँच सौ अर्हतों के साथ सात महीनों में प्रथम संगायन किया।" တဒါ အဋ္ဌစတ္တာလီသာဓိကသတကလိယုဂံ အနဝသေသတော အပနေတွာ ကလိယုဂေန သာသနံ သမံ ကတွာ ဌပေသိ. ယဒါ ပန အဇာတသတ္တု ရညော ရဇ္ဇံ ပတွာ အဋ္ဌဝဿာနိ အဟေသုံ, တဒါ မရမ္မရဋ္ဌေ တင်္ကောသင်္ဂတွပုရေ ဇမ္ဗုဒီပဓဇဿနာမ ရညော ရဇ္ဇံ ပတွာ အတိရေကပဉ္စဝဿာနိ အဟေသုန္တိ. तब एक सौ अड़तालीस वर्ष अधिक कलियुग को पूर्णतः हटाकर, कलियुग के साथ शासन को समान करके स्थापित किया। जब राजा अजातशत्रु के राज्य के आठ वर्ष हुए थे, तब मरामर राष्ट्र (म्यांमार) के तंकोसंगत्वपुर में राजा जम्बुदीपध्वज के राज्य के पाँच वर्ष से अधिक हुए थे। ဣမိဿဉ္စ ပဌမသင်္ဂီတိယံ အာယသ္မာ မဟာကဿပေါ အာယသ္မာ ဥပါလိ အာယသ္မာ အာနန္ဒော အာယသ္မာ အနုရုဒ္ဓေါ စာတိ ဧဝမာဒယော ပဉ္စသတပ္ပမာဏာ မဟာထေရာ ပဌမံ သင်္ဂါယိတွာ သာသနံ အနုဂ္ဂဟေသုံ. ဧဝံ [Pg.6] သုဘဒ္ဒဿ ဒုဋ္ဌပဗ္ဗဇိတဿ ဒုဋ္ဌဝစနံ သာသနဿ အနုဂ္ဂဟေ ကာရဏံနာမ အဟောသိ. သုဘဒ္ဒေါ စ နာမ ဒုဋ္ဌပဗ္ဗဇိတော အာတုမာနဂရဝါသီ အဟောသိ ကပ္ပကကုလိကော. သော ယဒါ ဘဂဝါ အာတုမာနဂရံ ဂစ္ဆတိ, တဒါ အတ္တေနော ပုတ္တေ ဒွေ သာမဏေရေ ကပ္ပကကမ္မံ ကာရာပေတွာ လဒ္ဓေဟိ တဏ္ဍုလတေလာဒီဟိ ဝတ္ထူဟိ ယာဂုံ ပစိတွာ သသံဃဿ ဗုဒ္ဓဿ အဒါသိ. ဘဂဝါ ပန တာနိ အပ္ပဋိဂ္ဂဟေတွာ ကာရဏံ ပုစ္ဆိတွာ ဝိဂရဟိတွာ အကပ္ပိယသမာဒါနဒုက္ကဋာပတ္တိံ ကပ္ပကပုဗ္ဗဿ ဘိက္ခုဿ ခုရဓာရဏဒုက္ကဋာပတ္တိဉ္စ ပညာပေသိ. တံ ကာရဏံ ပဋိစ္စ ဝေရံ ဗန္ဓိတွာ သာသနံ ဝိဒ္ဓံသိတုကာမတာယ တတ္တကအယောဂုဠံ ဂိလိတွာ ဥဂ္ဂီရန္တော ဝိယ ဤဒိသဒုဋ္ဌဝစနံ ဝဒီတိ. इस प्रथम संगीति में आयुष्मान महाकश्यप, आयुष्मान उपालि, आयुष्मान आनंद, आयुष्मान अनिरुद्ध आदि पाँच सौ महास्थविरों ने प्रथम संगायन कर शासन का अनुग्रह किया। इस प्रकार दुष्ट-प्रव्रजित सुभद्द के दुष्ट वचन शासन के अनुग्रह का कारण बने। सुभद्द नामक वह दुष्ट-प्रव्रजित आतुमा नगर का निवासी था और नापित (नाई) कुल का था। जब भगवान आतुमा नगर गए, तब उसने अपने दो पुत्रों (सामनेरों) से नापित-कर्म करवाकर प्राप्त चावल, तेल आदि वस्तुओं से यवागू पकाकर संघ सहित बुद्ध को दी। भगवान ने उन्हें ग्रहण न कर, कारण पूछकर और निंदा कर, अकल्पनीय ग्रहण करने का दुष्कृत अपराध और पूर्व में नापित रहे भिक्षु के लिए क्षुर (उस्तरा) धारण करने का दुष्कृत अपराध प्रज्ञप्त किया। उस कारण से वैर बांधकर, शासन को विनष्ट करने की इच्छा से, तप्त लोह-गोलक को निगलकर उगलने के समान उसने ऐसे दुष्ट वचन कहे। အဇာတသတ္တုရာဇာ စ တုမှာကံ ဓမ္မစက္ကံ ဟောတု, မမ အာဏာစက္ကံ ပဝတ္တိဿာမိ, ဝိဿဋ္ဌာ ဟုတွာ သင်္ဂါယန္တူတိ အနုဂ္ဂဟေသိ. တေနေသ ပဌမံ သာသနာနုဂ္ဂဟော ရာဇာတိ ဝေဒိတဗ္ဗော, မဟာကဿပါဒီနဉ္စ အရဟန္တာနံ ပဉ္စသတာနံ သိသာပရမ္ပရာ အနေကာ ဟောန္တိ, ဂဏနပထံ ဝီတိဝတ္တာ. ယမေတ္ထ ဣတော ပရံ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ အဋ္ဌကထာယံ ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗံ. တေ ပန မဟာထေရာ သင်္ဂါယိတွာ ပရိနိဗ္ဗာယိံသူတိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ– राजा अजातशत्रु ने भी अनुग्रह किया— "आपका धर्मचक्र हो, मैं अपना आज्ञाचक्र चलाऊँगा, आप निःशंक होकर संगायन करें।" इसलिए वह शासन का अनुग्रह करने वाला प्रथम राजा जानना चाहिए। महाकश्यप आदि पाँच सौ अर्हतों की शिष्य-परम्पराएँ अनेक हैं, जो गणना से परे हैं। इसके आगे जो कहना है, वह अट्ठकथा में कहे गए नय के अनुसार जानना चाहिए। वे महास्थविर संगायन कर परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। इस विषय में ये गाथाएँ हैं— ဣဒ္ဓိမန္တော စ ယေ ထေရာ,ပဌမဿင်္ဂီတိံ ကတွာ; သာသနံ ပဂ္ဂဟိတွာန,မစ္စူဝသံဝ သမ္ပတ္တာ. जो ऋद्धिमान स्थविर थे, उन्होंने प्रथम संगीति कर और शासन को सुरक्षित कर, मृत्यु के वश को प्राप्त हुए। ကိဉ္စာပိ ဣဒ္ဓိယော သန္တိ,တထာပိ တာ ဇဟိတွာန; နိဗ္ဗာယိံသု ဝသံ မစ္စု,ပတွာ တေ ဆိန္နပက္ခာဝ. यद्यपि उनके पास ऋद्धियाँ थीं, तथापि उन्हें त्यागकर, वे मृत्यु के वश में होकर वैसे ही निर्वाण को प्राप्त हुए जैसे कटे हुए पंखों वाले पक्षी। ကာ [Pg.7] ကထာဝ စ အမှာကံ,အမှာကံ ဂဟဏေ ပန; မစ္စုနော နတ္ထိ သာရော စ,ဧဝံ ဓာရေယျ ပဏ္ဍိတောတိ. फिर हमारी तो क्या कथा? हमें पकड़ने में मृत्यु का कोई सार नहीं है। विद्वान को ऐसा धारण करना चाहिए। အယံ ပဌမသင်္ဂီတိကထာ သင်္ခေပေါ. यह प्रथम संगीति की कथा का संक्षेप है। တတော ပရံ ဝဿသတံ တေသံ သိဿပရမ္ပရာ သာသနံ ဓာရေတွာ အာဂမံသု. အထာနုက္ကမေန ဂစ္ဆန္တေသု ရတ္တိဒိဝေသု ဝဿသတပရိနိဗ္ဗုတေ ဘဂဝတိ ဝေသာလိကာ ဝဇ္ဇိပုတ္တကာ ဘိက္ခူ ဝေသာလိယံ ကပ္ပတိ သိင်္ဂိလောဏကပ္ပာ, ကပ္ပတိ ဒွင်္ဂုလကပ္ပော, ကပ္ပတိ ဂါမန္တရကပ္ပော, ကပ္ပတိ အာဝါသကပ္ပော, ကပ္ပတိ အနုမတိကပ္ပော, ကပ္ပတိ အာစိဏ္ဏကပ္ပော, ကပ္ပတိ အာမထိတကပ္ပော, ကပ္ပတိ ဇဠောဂိံ ပါတုံ, ကပ္ပတိ အဒသကံ နိသီဒနံ, ကပ္ပတိ ဇာတရူပရဇတန္တိ ဣမာနိ ဒသဝတ္ထူနိ ဒီပေသုံ. उसके बाद सौ वर्षों तक उनकी शिष्य-परम्परा शासन को धारण कर आई। फिर क्रमशः दिन-रात बीतने पर, भगवान के परिनिर्वाण के सौ वर्ष बाद, वैशाली के वज्जीपुत्तक भिक्षुओं ने वैशाली में दस वस्तुओं को प्रकाशित किया— शृंगिलवण-कल्प, द्व्यंगुल-कल्प, ग्रामान्तर-कल्प, आवास-कल्प, अनुमति-कल्प, आचीर्ण-कल्प, अमथित-कल्प, जलोर्गी-पान, अदशक-निषीदन, और जातरूप-रजत। တေသံ သုသုနာဂပုတ္တော ကာဠာသောကောနာမ ရာဇာ ပက္ခော အဟောသိ. တေန ခေါ ပန သမယေန အာယသ္မာ ယသော ကာကဏ္ဍကပုတ္တော ဝဇ္ဇီသု စာရိကံ စရမာနော ဝေသာလိကာ ကိရ ဝဇ္ဇိပုတ္တကာ ဘိက္ခူ ဝေသာလိယံ ဒသဝတ္ထူနိ ဒိပေန္တီတိ သုတွာ န ခေါ ပနေတံ ပ္ပတိရူပံ, ယွာဟံ ဒသဗလဿ သာသနဝိပတ္တိံ သုတွာ အပ္ပောဿုက္ကော ဘဝေယျံ, သန္ဓာဟံ အဓမ္မဝါဒိနော နိဂ္ဂဟေတွာ ဓမ္မံ ဒီပေဿာမီတိ စိန္တယန္တော ယေန ဝေသာလီ, တဒဝသရိ. တဒါ အာယသ္မာ မဟာယသော ရေဝတသဗ္ဗကာမိအာဒီဟိ သတ္တသတေဟိ အရဟန္တေဟိ သဒ္ဓိံ သင်္ဂါယိဿာမီတိ ဝေသာလိယံ ဝါလုကာရာမံ အာဂစ္ဆိ. ဝဇ္ဇိပုတ္တကာစ ဘိက္ခူ ဥပါရမ္ဘစိတ္တာ ကာဠာသောကံနာမ ရာဇာနံ ဥပသင်္ကမိတွာ မယံ ခေါ မဟာရာဇ ဣမသ္မိံ မဟာဝနာရာမေ ဂန္ဓကုဋိံ ရက္ခိတွာ ဝဿာမ, ဣဒါနိ မဟာရာဇ အဓမ္မဝါဒိနော အညေ ဘိက္ခူ ဝိလုမ္ပိတုကာမာ ဝိဒ္ဓံသိတုကာမာ အာဂတာတိ အာရောစေသုံ. ကာဠာသောကော [Pg.8] စ မဟာရာဇာ အာဂန္တုကာနံ ဘိက္ခူနံ အပ္ပဝိသနတ္ထာယ နိဝါရေထာတိ အမစ္စေ ပေသေသိ. အမစ္စာစ နိဝါရေတုံ ဂစ္ဆန္တာ ဒေဝတာနံ အာနုဘာဝေန ဘိက္ခူ န ပဿန္တိ. တဒဟေဝ စ ရတ္တိဘာဂေ ကာဠာသောကမဟာရာဇာ လောဟကုမ္ဘီနိရယေ ပတနာကာရေန သုပိနံ ပဿိ. တဿ ရညော ဘဂိနိ နန္ဒာနာမ ထေရီ အာကာသေန အာဂစ္ဆန္တိ ဓမ္မဝါဒိနော မဟာထေရေ နိဂ္ဂဏှိတွာ အဓမ္မဝါဒီနံ ဘိက္ခူနံ ပဂ္ဂဟဏေ ဒေါသဗဟုလတံ ပကာသေတွာ သာသနဿ ပဂ္ဂဟဏတ္ထာယ ဩဝါဒံ အကာသိ. उनका (वज्जिपुत्तक भिक्षुओं का) पक्षधर शिशुनाग का पुत्र कालाशोक नामक राजा था। उस समय आयुष्मान यश काकण्डकपुत्र वज्जि देश में चारिका करते हुए, यह सुनकर कि वैशाली के वज्जिपुत्तक भिक्षु वैशाली में दस वस्तुओं (नियमों) का प्रतिपादन कर रहे हैं, यह सोचा कि "यह उचित नहीं है कि मैं दशबल (बुद्ध) के शासन की विपत्ति को सुनकर उदासीन रहूँ, मैं अधर्मवादियों का निग्रह कर धर्म को प्रकाशित करूँगा," ऐसा सोचते हुए वे वैशाली पहुँचे। तब आयुष्मान महायश, रेवत, सर्वकामी आदि सात सौ अर्हतों के साथ संगायन करने के लिए वैशाली के वालुकाराम आए। वज्जिपुत्तक भिक्षुओं ने द्वेषपूर्ण चित्त से राजा कालाशोक के पास जाकर कहा, "महाराज, हम इस महावनाराम में गन्धकुटी की रक्षा करते हुए निवास करते हैं, अब महाराज, अधर्मवादी अन्य भिक्षु हमें लूटने और नष्ट करने की इच्छा से आए हैं।" महाराज कालाशोक ने अमात्यों को भेजा कि "आगन्तुक भिक्षुओं को प्रवेश करने से रोकें।" अमात्य रोकने के लिए गए, किन्तु देवताओं के अनुभाव से वे भिक्षुओं को नहीं देख सके। उसी रात महाराज कालाशोक ने लोहकुम्भी नरक में गिरने जैसा स्वप्न देखा। उस राजा की बहन नन्दा नामक थेरी ने आकाश मार्ग से आकर, धर्मवादी महास्थविरों का निग्रह करने और अधर्मवादी भिक्षुओं का पक्ष लेने में बहुत दोष प्रकट करते हुए, शासन के उत्थान के लिए उपदेश दिया। ကာဠာသောကရာဇာ စ သံဝေဂပ္ပတ္တော ဟုတွာ အာယသ္မန္တာနံ မဟာယသတ္ထေရာဒီနံ ခမာပေတွာ အဇာတသတ္တုရာဇာ ဝိယ သင်္ဂါယနေ ပဂ္ဂဟံ အကာသိ. राजा कालाशोक ने संवेग (पश्चाताप) प्राप्त कर आयुष्मान महायश स्थविर आदि से क्षमा माँगी और राजा अजातशत्रु की भाँति संगायन में सहायता प्रदान की। မဟာယသတ္ထေရာဒယော စ ကာဠာသောကံ ရာဇာနံ နိဿာယ ဝါလုကာရာမေ ဝဇ္ဇိပုတ္တကာနံ ဘိက္ခူနံ ပကာသိတာနိ အဓမ္မဝတ္ထူနိ ဘိန္ဒိတွာ အဋ္ဌတိ မာသေဟိ ဒုတိယသင်္ဂါယနံ အကံသု. महायश स्थविर आदि ने राजा कालाशोक के आश्रय में वालुकाराम में वज्जिपुत्तक भिक्षुओं द्वारा प्रतिपादित अधर्म-वस्तुओं का खण्डन कर आठ महीनों में द्वितीय संगायन सम्पन्न किया। တဒါ စ မဇ္ဈိမဒေသေ ပါတလိပုတ္တနဂရေ သုသုနာဂရညော ပုတ္တဘူတဿ ကာဠာသောကရညော အတိသေကံ ပတွာ ဒသဝဿာနိ အဟေသုံ. ပရမ္မရဋ္ဌေ ပန သိရိခေတ္တနဂရေ ဒွတ္တဂေါင်္ကဿနာမ ရညော အဘိသိတ္တကာလတော ပုရေ ဧကဝဿံ အဟောသိ. ဇိနသာသနံ ပန ဝဿသတံ အဟောသိ. उस समय मध्यदेश के पाटलिपुत्र नगर में शिशुनाग राजा के पुत्र कालाशोक राजा के राज्य के दस वर्ष बीत चुके थे। पर-राष्ट्र (दूसरे देश) के श्रीक्षेत्र नगर में द्वत्तगोङ्क नामक राजा के अभिषेक काल से एक वर्ष पूर्व का समय था। और जिन-शासन (बुद्ध शासन) को सौ वर्ष बीत चुके थे। ဣမိဿဉ္စ ဒုတိယသင်္ဂီတိယံ မဟာယသ ရေဝတ သဗ္ဗကာမိပ္ပမုခါ သတ္တသတပ္ပမာဏာ မဟာထေရာ ဒုတိယံ သင်္ခါယိတွာ ဒုတိယံ သာသနံ ပဂ္ဂဟေသုံ. इस द्वितीय संगीति में महायश, रेवत, सर्वकामी प्रमुख सात सौ महास्थविरों ने द्वितीय बार संगायन कर द्वितीय बार शासन का उत्थान किया। အာယသ္မာ မဟာယသတ္ထေရောစနာမ ပဉ္စဟိ ဧတဒဂ္ဂဠာနေ ဟိ ဘဂဝတာ ထောမိတဿ အာနန္ဒတ္ထေရဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကော အဟောသိ. ဝဇ္ဇိပုတ္တကာနံ ဘိက္ခူနံ အဓမ္မဝတ္ထုဒီပနံ ဒုတိယသင်္ဂီတိယံ ကာရဏမေဝ. ကာဠာသောကရာဇာစ ပဂေဝ အဓမ္မဝါဒီဘိက္ခူနံ သဟာယောပိ သမာနော ပုန ဓမ္မဝါဒိဘိက္ခူနံ သဟာယော [Pg.9] ဟုတွာ အနုဂ္ဂဟံ အကာသိ. တသ္မာ ဒုတိယသာသနပဂ္ဂဟော ရာဇာတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. आयुष्मान महायश स्थविर, भगवान द्वारा पाँच एतदग्र पदों से प्रशंसित आनन्द स्थविर के सार्धविहारिक (शिष्य) थे। वज्जिपुत्तक भिक्षुओं द्वारा अधर्म-वस्तुओं का प्रतिपादन ही द्वितीय संगीति का कारण था। राजा कालाशोक पहले अधर्मवादी भिक्षुओं का सहायक होते हुए भी, पुनः धर्मवादी भिक्षुओं का सहायक बनकर अनुग्रह किया। इसलिए उन्हें द्वितीय शासन-उत्थान का राजा जानना चाहिए। ဒုတိယသင်္ဂီတိယံ ပန မဟာယသတ္ထေရ ရေဝတ သဗ္ဗကာမိပ္ပမုခါနံ သတ္တသတာနံ မဟာထေရာနံ သိဿပရမ္ပရာ အနေကာ ဟောန္တိ, ဂဏနပထံ ဝီတိဝတ္တာ. ယမေတ္ထ ဣတော ပရံ ဝတ္တဗ္ဗ, တံ အဋ္ဌကထာယံ ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗံ. တေ ပန မဟာထေရာ ဒုတိယံ သင်္ဂါယိတွာ ပရိနိဗ္ဗာယိံသူတိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ– द्वितीय संगीति में महायश स्थविर, रेवत, सर्वकामी प्रमुख सात सौ महास्थविरों की शिष्य-परम्पराएँ अनेक हैं, जो गणना से परे हैं। इसके आगे जो कुछ कहना है, उसे अट्ठकथा में कहे गए तरीके से जानना चाहिए। वे महास्थविर द्वितीय संगायन कर परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। यहाँ ये गाथाएँ हैं— ဗုဒ္ဓိမန္တော စ ယေ ထေရာ,ဒုတိယဿင်္ဂိတိံ ကတွာ; သာသနံ ပဂ္ဂဟိတွာန,မစ္စူဝသံဝ သမ္ပတ္တာ. जो बुद्धिमान स्थविर द्वितीय संगीति कर और शासन का उत्थान कर मृत्यु के वश में हो गए। ဣဒ္ဓိမန္တောပိ ယေ ထေရာ,မစ္စုနော တာဝ ဝသံ ဂမုံ; ကထံယေဝ မယံ မုတ္တာ,တတော အာရက မုစ္စနာတိ; जो ऋद्धिमान स्थविर भी मृत्यु के वश में चले गए; तो फिर हम कैसे मुक्त हो सकते हैं, उससे दूर कैसे छूट सकते हैं? အယံ ဒုတိယသင်္ဂီတိကထာသင်္ခေပေါ. यह द्वितीय संगीति कथा का संक्षेप है। တတော ပရံ အဋ္ဌတိံသာဓိကာနိ ဒွေဝဿသတာနိ သမ္မာသဗ္ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော သာသနံ နိရာကုလံ အဟောသိ နိရဗ္ဗုဒံ. အဋ္ဌတိံသာဓိကေ ပန ဒွိဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ပါဋလိပုတ္တ နဂရေ [Pg.10] သိရိဓမ္မာသောကဿနာမ ရညော ကာလေ နိဂြောဓသာမဏေရံ ပဋိစ္စ ဗုဒ္ဓသာသနေ ပသီဒိတွာ ဘိက္ခုသံဃဿ လာဘသက္ကာရံ ဗာဟုလ္လံ အဟောသိ. တဒါ သဋ္ဌိသဟဿမတ္တာ တိတ္ထိယာ လာဘသက္ကာရံ အပေက္ခိတွာ အပဗ္ဗဇိတာပိ ပဗ္ဗဇိတာဝိယ ဟုတွာ ဥပါသထပဝါရဏာဒိကမ္မေသု ပဝိသန္တိ, သေယျထာပိနာမ ဟံသာနံ မဇ္ဈေ ဗကာ, ယထာ စ ဂုန္နံ မဇ္ဈေ ဂဝဇာ, ယထာ စ သိန္ဓဝါနံ မဇ္ဈေ ဂဒြဘာတိ. उसके बाद दो सौ अड़तीस वर्षों तक सम्यक्सम्बुद्ध भगवान का शासन व्याकुलता और उपद्रव रहित रहा। किन्तु दो सौ अड़तीस वर्ष बीतने पर पाटलिपुत्र नगर में श्रीधर्माशोक नामक राजा के काल में, निग्रोध सामणेर के कारण बुद्ध शासन में प्रसन्न होकर भिक्षु संघ का लाभ-सत्कार बहुत बढ़ गया। तब लगभग साठ हजार तीर्थक (अन्य मतावलम्बी) लाभ-सत्कार की इच्छा से, प्रव्रजित न होते हुए भी प्रव्रजितों के समान होकर उपोसथ-पवारणा आदि कर्मों में प्रविष्ट होने लगे, जैसे हंसों के बीच बगुले, गायों के बीच नीलगाय और सिन्धु घोड़ों के बीच गधे हों। တဒါ ဘိက္ခုသံဃော ဣဒါနိ အပရိသုဒ္ဓါ ပရိသာတိ မနသိ ကရိတွာ ဥပေါသထံ န အကာသိ. သာသနေ အဗ္ဗုဒံ ဟုတွာ သတ္တဝဿာနိ ဥပေါသထပဝါရဏာနိ ဆိဇ္ဇန္တိ. သိရိဓမ္မာသော ကော စ ရာဇာ တံ သုတွာ တံ အဓိကရဏံ ဝူပသမေဟိ ဥပေါသထံ ကာရာပေဟီတိ ဧကံ အမစ္စံ ပေသေသိ. အမစ္စော စ ဘိက္ခူ ဥပေါသထံ အကတ္တုကာမေ ကိံ ကရိဿာမီတိ ရာဇာနံ ပဋိပုစ္ဆိတုံ အဝိသဟတာယ သယံ မူဠော ဟုတွာ အညေန မူဠေန မန္ထေတွာ သစေ ဘိက္ခုသံဃော ဥပေါသထံ န ကရေယျ, ဘိက္ခုသံဃံ ဃာတေတုကာမော မဟာရာဇာတိ သယံ မူဠော ဟုတွာ မူဠဿ သန္တိကာ မူဠဝစနံ သုတွာ ဝိဟာရံ ဂန္တွာ ဥပေါသထံ အကတ္တုကာမံ ဘိက္ခုသံဃံ ဃာတေသိ. तब भिक्षु संघ ने "अब परिषद अपरिशुद्ध है" ऐसा मन में विचार कर उपोसथ नहीं किया। शासन में उपद्रव होने के कारण सात वर्षों तक उपोसथ और पवारणा रुक गए। श्रीधर्माशोक राजा ने यह सुनकर एक अमात्य को भेजा कि "उस विवाद को शान्त कर उपोसथ कराओ।" वह अमात्य, भिक्षुओं के उपोसथ न करने की इच्छा होने पर "मैं क्या करूँ" ऐसा राजा से पूछने का साहस न होने के कारण स्वयं मूढ़ होकर और दूसरे मूढ़ से सलाह लेकर कि "यदि भिक्षु संघ उपोसथ न करे, तो महाराज भिक्षु संघ का वध करना चाहते हैं," स्वयं मूढ़ होकर मूढ़ के पास से मूढ़ वचन सुनकर विहार गया और उपोसथ न करने की इच्छा रखने वाले भिक्षु संघ का वध कर दिया। ရာဇာ စ တံ သုတွာ အယံ ဗာလော မယာ အနာဏတ္တောဝ ဟုတွာ ဤဒိသံ လုဒ္ဒကမ္မံ အကာသိ, အဟံ ပါပကမ္မတော မုစ္စိဿာမိဝါ မာဝါတိ ဒွဠကဇာတော ဟုတွာ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တ တိဿတ္ထေရံ ဂင်္ဂါယ ပတိသောတတော အာနေတွာ တံ ကာရဏံ ထေရံ ပုစ္ဆိ. ထေရော စ ဒီပကတိတ္တိရဇာတကေန အစေတနတာယ ပါပကမ္မတော မောစေဿသိတိ ဝိဿဇ္ဇေသိ, သတ္တာဟမ္ပိ တိတ္ထိယာနံ ဝါဒံ သိရိဓမ္မာသောကရညော သိက္ခာပေသိ, ဝါဒေန ဝါဒံ တုလယိတွာ သဋ္ဌိသဟဿမတ္တေ တိတ္ထိယေ သာသနဗာဟိရံ အကာသိ. တဒါ ပန ဥပေါသထံ အကာသိ. ဘဂဝတာ ဝုတ္တနိယာမေနေဝ ကထာဝတ္ထုဉ္စ ဘိက္ခုသံဃမဇ္ဈေ ဗျာကာသိ[Pg.11]. အသောကာရာမေ စ သဟဿမတ္တာ မဟာထေရာ နဝဟိ မာသေဟိ သင်္ဂါယိံသုံ. राजा ने यह सुनकर कि "इस मूर्ख (अमात्य) ने मेरी आज्ञा के बिना ही ऐसा क्रूर कर्म किया है, क्या मैं इस पापकर्म से मुक्त होऊँगा या नहीं?" इस प्रकार संशय में पड़कर महामोग्गलिपुत्त तिस्स थेर को गंगा की उल्टी धारा से लाकर उस कारण के विषय में स्थविर से पूछा। स्थविर ने 'दीपकतित्तिर जातक' के माध्यम से यह समाधान दिया कि अचेतन होने के कारण आप पापकर्म से मुक्त हैं। उन्होंने सात दिनों तक राजा श्रीधर्माशोक को तीर्थिकों के मतों की शिक्षा दी, और वाद से वाद की तुलना करके लगभग साठ हजार तीर्थिकों को शासन से बाहर कर दिया। तब उन्होंने उपोसथ किया। भगवान द्वारा बताए गए नियम के अनुसार ही भिक्षु संघ के मध्य 'कथावत्थु' की व्याख्या की। अशोकराम में एक हजार महास्थविरों ने नौ महीनों में संगीति की। တဒါ မဇ္ဈိမဒေသေ ပါဋလိပုတ္တနဂရေ သိရိဓမ္မာသောကရညော ရဇ္ဇံ ပတွာ အဋ္ဌာရသဝဿာနိ အဟေသုံ. မရမ္မရဋ္ဌေ ပန သိရိခေတ္တနဂရေ ရမ္ဗောင်္ကဿနာမ ရညော ရဇ္ဇံ ပတွာ ဒွါဒသ ဝဿာနိ အဟေသုန္တိ. उस समय मध्यदेश के पाटलिपुत्र नगर में राजा श्रीधर्माशोक के राज्य के अठारह वर्ष हुए थे। मरम्म देश के श्रीक्षेत्र नगर में राजा रम्बोङ्क के राज्य के बारह वर्ष हुए थे। ဣမိဿဉ္စ တတိယသင်္ဂီတိယံ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရောနာမ ဒုတိယသင်္ဂါယကေဟိ မဟာထေရေဟိ ဗြဟ္မလော ကံ ဂန္တွာ သာသနဿ ပဂ္ဂဟဏတ္ထံ တိဿနာမ မဟာဗြဟ္မာနံ အာယာစိတ နိယာမေန တတော စဝိတွာ ဣဓ မောဂ္ဂလိယာနာမ ဗြာဟ္မဏိယာ ကုစ္ဆိမှိ နိဗ္ဗတ္တသတ္တော. इस तृतीय संगीति में महामोग्गलिपुत्त तिस्स थेर, जो द्वितीय संगीति के महास्थविरों द्वारा शासन की उन्नति के लिए प्रार्थना किए जाने पर तिस्स नामक महाब्रह्मा के रूप में ब्रह्मलोक से च्युत होकर यहाँ मोग्गली नामक ब्राह्मणी के गर्भ में उत्पन्न हुए थे। လာဘသက္ကာရံ အပေက္ခိတွာ သဋ္ဌိသဟဿမတာနံ တိတ္ထိယာနံ သမဏာလယံ ကတွာ ဥပေါသထပဝါရဏာဒီသု ကမ္မေသု ပဝေသနံ ပရိသာယ အသုဒ္ဓတ္တာ သတ္တဝဿာနိ ဥပေါသထဿ အကရဏဉ္စ သာသနဿ ပဂ္ဂဟဏေ ကာရဏမေဝ. မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿ မဇ္ဈန္တိက မဟာရေဝပ္ပမုခါ မဟာထေရာ တတိယံ သင်္ဂါယိတွာ တတိယံ သာသနံ ပဂ္ဂဟေသုံ. लाभ-सत्कार की इच्छा से लगभग साठ हजार तीर्थिकों के श्रमणों का वेष धारण कर लेने और परिषद के अशुद्ध होने के कारण उपोसथ-पवारणा आदि कर्मों में प्रवेश के कारण सात वर्षों तक उपोसथ न होना ही शासन की उन्नति का कारण बना। महामोग्गलिपुत्त तिस्स, मज्झन्तिक, महारेव आदि प्रमुख महास्थविरों ने तृतीय संगीति करके तृतीय शासन को उन्नत किया। သိရိဓမ္မာသောကရာဇာ စ တိတ္ထိယာနံ ဝါဒံ သလ္လက္ခေတွာ တိတ္ထိယေ ဗဟိသာသနကရဏာဒီဟိ သာသနဿ ပဂ္ဂဟော ရာဇာတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿ မဇ္ဈိန္တိက မဟာရေဝပ္ပမုခါနံ သဟဿမတ္တာနံ မဟာထေရာနံ သိဿပရမ္ပရာ အနေကာ ဟောန္တိ, ဂဏနပထံ ဝီတိဝတ္တာ. ယမေတ္ထ ဣတော ပရံ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ အဋ္ဌကထာယံ ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗံ. တေ ပန မဟာထေရာ တတိယံ သင်္ဂါယိတွာ ပရိနိဗ္ဗာယိံသူတိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ– राजा श्रीधर्माशोक ने तीर्थिकों के मतों को जानकर तीर्थिकों को शासन से बाहर करने आदि के द्वारा शासन की उन्नति की, ऐसा जानना चाहिए। महामोग्गलिपुत्त तिस्स, मज्झन्तिक, महारेव आदि प्रमुख एक हजार महास्थविरों की शिष्य-परम्पराएँ अनेक हैं, जो गणना से परे हैं। इसके आगे जो कुछ कहना है, वह अट्ठकथा में बताए गए तरीके से जानना चाहिए। वे महास्थविर तृतीय संगीति करके परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। यहाँ ये गाथाएँ हैं— မဟိဒ္ဓိကာပိ ယေ ထေရာ,သင်္ဂါယိတွာန သာသနေ; မစ္စူဝသံဝ ဂစ္ဆိံသု,အဗ္ဘဂဗ္ဘံဝ ဘာကရော. वे महाऋद्धिमान स्थविर भी, जिन्होंने शासन में संगीति की; मृत्यु के वश में वैसे ही चले गए, जैसे सूर्य बादलों के भीतर अस्त हो जाता है। ယထာ [Pg.12] ဧတေစ ဂစ္ဆန္တိ,တထာ မယမ္ပိ ဂစ္ဆာမ; ကောနာမ မစ္စုနာ မုစ္စေ,မစ္စူပရာယနာ သတ္တာ. जैसे वे जाते हैं, वैसे ही हम भी जाएँगे; मृत्यु से कौन मुक्त हो सकता है, सभी प्राणी मृत्यु-परायण हैं। တသ္မာ ဟိ ပဏ္ဍိတော ပေါသော,နိဗ္ဗာနံ ပန အစ္စုတံ; တဿေဝ သစ္ဆိကတ္ထာယ,ပုညံ ကရေယျ သဗ္ဗဒါတိ. इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को उस अच्युत निर्वाण के साक्षात्कार के लिए सदैव पुण्य करना चाहिए। အယံ တတိယသင်္ဂီတိကထာသင်္ခေပေါ. यह तृतीय संगीति की कथा का संक्षेप है। တတော ပရံ ကတ္ထ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော သာသနံ သုဋ္ဌု ပတိဋ္ဌဟိဿတီတိ ဝိမံသိတွာ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရော ပစ္စန္တဒေသေ ဇိနသာသနဿ သုပ္ပတိဋ္ဌိယမာနဘာဝံ ပဿိတွာ နဝဋ္ဌာနာနိ ဇိနသာသနဿ ပတိဋ္ဌာပနတ္ထာယ ဝိသုံ ဝိသုံ မဟာထေရေ ပေသေသိ. သေယျထိဒံ. မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရံ သီဟဠဒီပံ ပေသေသိ-တွံ ဧတံ ဒီပံ ဂန္တွာ တတ္ထ သာသနံ ပတိဋ္ဌပေဟီတိ, သောဏတ္ထေရံ ဥတ္တရတ္ထေရဉ္စသုဝဏ္ဏဘူမိံ, မဟာရက္ခိတတ္ထေရံ ယောနကလောကံ, ရက္ခိတတ္ထေရံ ဝနဝါသီရဋ္ဌံ, ယောနကဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရံ အပရန္တရဋ္ဌံ, မဇ္ဈန္တိ ကတ္ထေရံ ကသ္မီရဂန္ဓာ ရရဋ္ဌံ, မဟာရေဝတ္ထေရံ မဟိံသကမဏ္ဍလံ, မဟာဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရံ မဟာရဋ္ဌံ, မဇ္ဈိမတ္ထေရံ စီနရဋ္ဌန္တိ. တတ္ထ စ ဥပသမ္ပဒပဟောနကေန သံဃေန သဒ္ဓိံ ပေသေသိ. တေ စ မဟာထေရာ ဝိသုံ ဝိသုံ ဂန္တွာ သာသနံ တတ္ထ တတ္ထ ပတိဋ္ဌာပေသုံ. ပတိဋ္ဌာပေတွာ စ တေသု တေသု ဌာနေသု ဘိက္ခူနံ ကာသာဝပဇ္ဇောတေန ဝိဇ္ဇောတမာနာ အဗ္ဘဟိမဓူရဇောရာဟုသင်္ခါတေဟိ ဝိမတ္တော ဝိယ နိသာနာထော ဇိနသာသနံ အနန္တရာယံ ဟုတွာ ပတိဋ္ဌာသိ. उसके बाद, "सम्यक्सम्बुद्ध भगवान का शासन कहाँ अच्छी तरह प्रतिष्ठित होगा?" ऐसा विचार कर महामोग्गलिपुत्त तिस्स थेर ने प्रत्यन्त देशों में जिन-शासन की सुप्रतिष्ठित होने की अवस्था को देखकर, जिन-शासन की प्रतिष्ठा के लिए नौ स्थानों पर अलग-अलग महास्थविरों को भेजा। जैसे कि—महामहिन्द थेर को सिंहल द्वीप भेजा कि "तुम उस द्वीप में जाकर वहाँ शासन प्रतिष्ठित करो", सोण थेर और उत्तर थेर को सुवर्णभूमि, महारक्खित थेर को योनक लोक, रक्खित थेर को वनवासी राष्ट्र, योनकधम्मरक्खित थेर को अपरान्त राष्ट्र, मज्झन्तिक थेर को कश्मीर-गन्धार राष्ट्र, महारेवत थेर को महिंसक मण्डल, महाधम्मरक्खित थेर को महाराष्ट्र, और मज्झिम थेर को चीन राष्ट्र। वहाँ उन्होंने उपसम्पदा करने में समर्थ संघ के साथ भेजा। वे महास्थविर अलग-अलग जाकर वहाँ-वहाँ शासन प्रतिष्ठित करने लगे। प्रतिष्ठित करने पर उन-उन स्थानों पर भिक्षुओं के काषाय वस्त्रों की आभा से चमकते हुए, बादलों, कोहरे और राहु से मुक्त चन्द्रमा के समान जिन-शासन बिना किसी बाधा के प्रतिष्ठित हो गया। တေသု ပန နဝသု ဌာနေသု သုဝဏ္ဏဘူမိနာမ အဓုနာ သုဓမ္မနဂရမေဝ. ကသ္မာ ပနေတံ ဝိညာယတီတိ စေ. မဂ္ဂါနုမာနတော ဌာနာနုမာနတော [Pg.13] ဝါ. ကထံ မဂ္ဂါနုမာနတော. ဣတော ကိရ သုဝဏ္ဏဘူမိ သတ္တမတ္တာနိ ယောဇနသတာနိ ဟောန္တိ, ဧကေန ဝါတေ န ဂစ္ဆန္တီ နာဝါ သတ္တဟိ အဟောရတ္တေဟိ ဂစ္ဆတိ, အထေကသ္မိံ သမယေ ဧဝံ ဂစ္ဆန္တိ နာဝါ သတ္တာဟမ္ပိ နဒိယာ ဝဋ္ဋမစ္ဆ ပိဋ္ဌေ နေဝ ဂတာတိ အဋ္ဌကထာယံ ဝုတ္တေန သီဟဠဒီပတော သုဝဏ္ဏဘူမိံ ဂတမဂ္ဂပ္ပမာဏေန သုခမ္မပုရတော သီဟဠဒီပံ ဂတမဂ္ဂပ္ပမာဏံ သမေတိ. သုဓမ္မေ ပုရတော ကိရ ဟိ ဟိံသဠဒီပံ သတ္တမတ္တာနိ ယောဇနသတာနိ ဟောန္တိ, ဥဇုံ ဝါယုအာဂမနကာလေ ဂစ္ဆန္တိ ဝါယုနာဝါ သတ္တဟိ အဟောရတ္တေဟိ သမ္ပာပုဏာတိ. ဧဝံမဂ္ဂါနုမာနတော ဝိညာယတိ. उन नौ स्थानों में सुवर्णभूमि नाम का स्थान वर्तमान में सुधम्म नगर ही है। यह कैसे जाना जाता है? मार्ग के अनुमान से या स्थान के अनुमान से। मार्ग के अनुमान से कैसे? यहाँ से सुवर्णभूमि लगभग सात सौ योजन है, अनुकूल वायु होने पर नौका सात दिन-रात में पहुँचती है, जैसा कि अट्ठकथा में कहा गया है कि सिंहल द्वीप से सुवर्णभूमि जाने वाले मार्ग का परिमाण सुधम्मपुर से सिंहल द्वीप जाने वाले मार्ग के परिमाण के समान है। सुधम्मपुर से सिंहल द्वीप लगभग सात सौ योजन है, सीधी वायु चलने के समय वायु-नौका सात दिन-रात में पहुँचती है। इस प्रकार मार्ग के अनुमान से जाना जाता है। ကထံ ဌာနာနုမာနတော. သုဝဏ္ဏဘူမိ ကိရ မဟာသမုဒ္ဒသမီပေ တိဋ္ဌတိ, နာနာဝေရဇ္ဇကာနမ္ပိ ဝါဏိဇာနံ ဥပသင်္ကမနဋ္ဌာနဘူတံ မဟာတိတ္ထံ ဟောတိ. တေနေဝ မဟာဇနကကုမာရာဒယော စမ္ပာနဂရာဒိတော သံဝေါဟာရတ္ထာယ နာဝါယ သုဝဏ္ဏဘူမိံ အာဂမံသူတိ. သုဓမ္မပုရမ္ပိ အဓုနာ မဟာသမုဒ္ဒသမီပေယေဝ တိဋ္ဌတိ. ဧဝံ ဌာနာနုမာသတော ဝိညာယတီတိ. स्थान के अनुमान से कैसे? सुवर्णभूमि महासमुद्र के समीप स्थित है, जो विभिन्न देशों के व्यापारियों के आने का स्थान और एक महान पत्तन है। इसीलिए महाजनक कुमार आदि चम्पा नगर से व्यापार के लिए नौका द्वारा सुवर्णभूमि आए थे। सुधम्मपुर भी वर्तमान में महासमुद्र के समीप ही स्थित है। इस प्रकार स्थान के अनुमान से जाना जाता है। အပရေ ပန သုဝဏ္ဏဘူမိနာမ ဟရိဘုဉ္ဇရဋ္ဌံယေဝ, တတ္ထ သု ဝဏ္ဏဿ ဗာဟုလ္လတ္တာတိ ဝဒန္တိ. အညေ ပန သိယာမရဋ္ဌံယေဝါတိ ဝဒန္တိ. တံ သဗ္ဗံ ဝိမံသိတဗ္ဗံ. दूसरे लोग कहते हैं कि सुवर्णभूमि नाम का स्थान हरिभुञ्ज राष्ट्र ही है, क्योंकि वहाँ सुवर्ण (सोने) की बहुलता है। अन्य लोग कहते हैं कि वह स्याम (थाईलैंड) राष्ट्र ही है। उस सब की जाँच की जानी चाहिए। အပရန္တံ နာမ ဝိသုံ ဧကရဋ္ဌမေဝါတိ အပရေ ဝဒန္တိ. အညေ ပန အပရန္တံနာမ သုနာပရန္တရဋ္ဌမေဝါတိ ဝဒန္တိ. တံ ယုတ္တမေဝ. ကသ္မာ အပရန္တံ နာမ သုနာပရန္တရဋ္ဌမေဝါတိ ဝိညာယတီတိ စေ. အဋ္ဌကထာသု ဒွီဟိ နာမေဟိ ဝုတ္တတ္တာ. ဥပရိပဏ္ဏာသအဋ္ဌကထာယဉှိ သဠာယတနသံယုတ္တဋ္ဌကထာယဉ္စ အဋ္ဌကထာစရိယေဟိ သုနာပရန္တရဋ္ဌေ ကောဏ္ဍဓာနတ္ထေရေန သလာကာဒါနာဓိကာရေ လဒ္ဓေတဒဂ္ဂဋ္ဌာနတံ ဒဿန္တေဟိ အပရန္တရဋ္ဌံ သုန သဒ္ဒေန ယောဇေတွာ ဝုတ္တံ. ဓမ္မပဒဋ္ဌကထာယံ ပန အင်္ဂုတ္တရဋ္ဌကထာယဉ္စ တမေဝ ရဋ္ဌံ ဝိနာ သုနသဒ္ဒေန ဝုတ္တံ. သုနသဒ္ဒေါ စေတ္ထ ပုတ္တပရိယာယော. မန္ဓာတုရညော ဇေဋ္ဌပုတ္တော စတုဒ္ဒီပဝါသိ နော [Pg.14] ပက္ကောသိတွာ တေသံ ဝိသုံ ဝိသုံ နိဝါသဋ္ဌာနံ နိယျာဒေသိ. တတ္ထ ဥတ္တရဒီပဝါသီနံ ဌာနံ ကုရုရဋ္ဌံနာမ, ပုဗ္ဗဒီပဝါသီနံ ပန ဝေဒေဟရဋ္ဌံနာမ, ပစ္ဆိမဒီပဝါသီနံ အပရန္တံ နာမ. ဘတ္တပစ္ဆိမဒီပေ ဇာတတ္တာ တေ သုနသဒ္ဒေန ဝုတ္တာ. တတြ ဇာတာပိ ဟိ တေသံ ပုတ္တာတိဝါ သုနာတိဝါ ဝုတ္တာ, ယထာ ဝဇ္ဇိပုတ္တကာ ဘိက္ခူတိ. ဝတ္တိစ္ဆာဝသေန ဝါ ဝါစာသိလိဋ္ဌဝသေန စ ဣဒမေဝ သုနသဒ္ဒေန ဝိသေသေတွာ ဝေါဟရန္တီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. दूसरे लोग कहते हैं कि अपरान्त नाम का एक अलग ही राष्ट्र है। अन्य लोग कहते हैं कि अपरान्त नाम सुनापरान्त राष्ट्र ही है। वह उचित ही है। यदि पूछा जाए कि अपरान्त को सुनापरान्त राष्ट्र के रूप में क्यों जाना जाता है, तो इसका उत्तर है कि अट्ठकथाओं में इसे दो नामों से कहा गया है। उपरिपण्णास अट्ठकथा और सळायतनसंयुत्त अट्ठकथा में अट्ठकथाचार्यों ने सुनापरान्त राष्ट्र में कोण्डधान स्थविर द्वारा शलाका-दान के अधिकार में प्राप्त एतदग्र स्थान को दिखाते हुए, अपरान्त राष्ट्र को 'सुन' शब्द के साथ जोड़कर कहा है। धम्मपद अट्ठकथा और अङ्गुत्तर अट्ठकथा में उसी राष्ट्र को 'सुन' शब्द के बिना कहा गया है। यहाँ 'सुन' शब्द 'पुत्र' का पर्यायवाची है। राजा मान्धाता के ज्येष्ठ पुत्र ने चारों द्वीपों के निवासियों को बुलाकर उन्हें अलग-अलग निवास स्थान सौंपे। वहाँ उत्तर द्वीप के निवासियों का स्थान कुरु राष्ट्र, पूर्व द्वीप के निवासियों का विदेह राष्ट्र और पश्चिम द्वीप के निवासियों का अपरान्त नाम पड़ा। पश्चिम द्वीप में उत्पन्न होने के कारण उन्हें 'सुन' शब्द से कहा गया। वहाँ उत्पन्न होने वाले उनके पुत्रों को 'पुत्र' या 'सुन' कहा जाता है, जैसे वज्जिपुत्तक भिक्षु। यह समझना चाहिए कि बोलने की इच्छा या वाणी की सुगमता के कारण ही इसे 'सुन' शब्द से विशेषित कर व्यवहार किया जाता है। ယောနကရဋ္ဌံနာမ ယဝနမနုဿာနံ နိဝါသဋ္ဌာနမေဝ, ယံဇင်္ဂမင်္ဃဣတိ ဝုစ္စတိ. योनक राष्ट्र यवन मनुष्यों का निवास स्थान ही है, जिसे जङ्गमङ्घै (Jangamanghai) कहा जाता है। ဝနဝါသီရဋ္ဌံနာမ သိရိခေတ္တနဂရဋ္ဌာနမော. ကေစိ ပန ဝနဝါသီရဋ္ဌံနာမ ဧကံ ရဋ္ဌမေဝ, န သိရိခေတ္တနဂရဋ္ဌာနန္တိ ဝဒန္တိ. တံ န သုန္ဒရံ. သိရိခေတ္တနဂရဋ္ဌာနမေဝ ဟိ ဝနဝါသီရဋ္ဌံ နာမ. ကသ္မာ ပနေတံ ဝိညာယတီတိစေ. ဣမဿ အမှာကံ ရညော ဘာတိကရညော ကာလေ သိရိခေတ္တနဂရေ ဂုမ္ဘေဟိ ပဋိစ္ဆာဒိတေ ဧကသ္မိံ ပထဝိပုဉ္ဇေ အန္တော နိမ္မုဇ္ဇိတွာ ဌိတံ ပေါရာဏိကံ ဧကံ လောဟမယဗုဒ္ဓပဋိပိဗ္ဗံ ပဋိလဘိ, တဿ စ ပလ္လင်္ကေ ဣဒံ ဝနဝါသီရဋ္ဌဝါသီနံ ပူဇနတ္ထာယာတိအာဒိနာ ပေါရာဏလေခနံ ဒိဿတိ, တသ္မာ ယေဝေတံ ဝိညာယတီတိ. वनवासी राष्ट्र श्रीक्षेत्र नगर का स्थान है। कुछ लोग कहते हैं कि वनवासी राष्ट्र एक अलग राष्ट्र है, न कि श्रीक्षेत्र नगर का स्थान। वह सही नहीं है। श्रीक्षेत्र नगर का स्थान ही वनवासी राष्ट्र है। यह कैसे जाना जाता है? हमारे इस राजा के भाई राजा के समय में, श्रीक्षेत्र नगर में झाड़ियों से ढके हुए एक मिट्टी के ढेर के भीतर दबी हुई एक प्राचीन लोहे की बुद्ध प्रतिमा प्राप्त हुई थी, और उसके आसन पर 'यह वनवासी राष्ट्र के निवासियों की पूजा के लिए है' आदि प्राचीन लेख दिखाई देता है, इसलिए यह जाना जाता है। ကသ္မီရဂန္ဓာရရဋ္ဌံနာမ ကသ္မီရရဋ္ဌံ ဂန္ဓာရရဋ္ဌဉ္စ. တာနိ ပန ရဋ္ဌာနိ ဧကာဗဒ္ဓါနိ ဟုတွာ တိဋ္ဌန္တိ. တေနေဝ မဇ္ဈန္တိ ကတ္ထေရံ ဧကံ ဒွီသု ရဋ္ဌေသု ပေသေသိ. ဇနပဒတ္တာ ပန နပုံသကေကတ္တံ ဘဝတိ. တဒါ ပန ဧကဿ ရညော အာဏာယ ပတိဋ္ဌာနဝိသယတ္တာ ဧကတ္တဝစနေန အဋ္ဌကထာယံ ဝုတ္တန္တိပိ ဝဒန္တိ. कश्मीर-गन्धार राष्ट्र का अर्थ है कश्मीर राष्ट्र और गन्धार राष्ट्र। वे राष्ट्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसीलिए स्थविर मज्झन्तिक अकेले को ही इन दो राष्ट्रों में भेजा गया था। जनपद होने के कारण यह नपुंसक लिंग एकवचन में है। वे यह भी कहते हैं कि उस समय एक ही राजा की आज्ञा के अधीन होने के कारण अट्ठकथा में इसे एकवचन में कहा गया है। မဟိံသကမဏ္ဍလံနာမ အန္ဓကရဋ္ဌံ, ယံ ယက္ခပုရရဋ္ဌန္တိ ဝုစ္စတိ. महिंसक मण्डल अन्धक (आन्ध्र) राष्ट्र है, जिसे यक्खपुर राष्ट्र कहा जाता है। မဟာရဋ္ဌံနာမ မဟာနဂရရဋ္ဌံ. အာဓုနာ ဟိ မဟာရဋ္ဌမေဝ န ဂရသဒ္ဒေန ယောဇေတွာ မဟာနဂရရဋ္ဌန္တိ ဝေါဟရန္တီတိ. သိယာမရဋ္ဌန္တိပိ ဝဒန္တိ အာစရိယာ. महारट्ट (महाराष्ट्र) महाननगर राष्ट्र है। आजकल महारट्ट को ही 'नगर' शब्द के साथ जोड़कर महाननगर राष्ट्र के रूप में व्यवहार करते हैं। आचार्य इसे स्याम (थाईलैंड) राष्ट्र भी कहते हैं। စိနရဋ္ဌံနာမ [Pg.15] ဟိမဝန္တေန ဧကာဗဒ္ဓံ ဟုတွာ ဌိတံ စီနရဋ္ဌံ ယေ ဝါတိ. चीन राष्ट्र वह चीन राष्ट्र ही है जो हिमवन्त (हिमालय) से जुड़ा हुआ है। ဣဒံ သာသနဿ နဝသု ဌာနေသု ဝိသုံ ဝိသုံ ပတိဋ္ဌာနံ. यह शासन की नौ अलग-अलग स्थानों में स्थापना है। ဣဒါနိ အာဒိတော ပဋ္ဌာယ ထေရပရမ္ပရကထာ ဝတ္တဗ္ဗာ. သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဟိ ဘဂဝတော သဒ္ဓိဝိဟာရိကော ဥပါလိတ္ထေ ရော,တဿ သိဿော ဒါသကတ္ထေရော, တဿ သိဿော သောဏကတ္ထေရော, တဿ သိဿော သိဂ္ဂဝတ္ထေရော စန္ဒဝဇ္ဇိတ္ထေ ရော စ, တေသံ သိဿော မောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရောတိ ဣမေ ပဉ္စမဟာထေရာ သာသနဝံသေ အာဒိဘူတာ အာစရိယပရမ္ပရာနာမ. တေသဉှိ သိဿပရမ္ပရဘူတာ ထေရပရမ္ပရာ ယာဝဇ္ဇတနာ န ဥပစ္ဆိန္ဓန္တိ. အာစရိယပရမ္ပရာယ စ လဇ္ဇိဘိက္ခူ ယေဝ ပဝေသေတွာ ကထေတဗ္ဗာ နော အလဇ္ဇိဘိက္ခူ. အလဇ္ဇီဘိက္ခူ နာမ ဟိ ဗဟုဿုတာပိ သမာနာ လာဘဂရုလောကဂရုအာဒိဟိ ဓမ္မတန္တိ နာသေတွာ သာသနဝရေ မဟာဘယံ ဥပ္ပာဒေန္တီတိ. သာသနရက္ခနကမ္မံနာမ ဟိ လဇ္ဇီနံယေဝ ဝိသယော နော အလဇ္ဇီနံ. တေနာဟု ပေါရာဏာ ထေရာ, အနာဂတေ သာသနံ ကော နာမ ရက္ခိဿတီတိ အနုပေက္ခိတွာ အနာဂတေ သာသနံ လဇ္ဇိနော ရက္ခိဿန္တိ, လဇ္ဇိနော ရက္ခိဿန္တိ, လဇ္ဇိနော ရက္ခိဿန္တီတိ တိက္ခာတ္တုံ ဝါစံ နိစ္ဆာရေသုံ. ဧဝံ မဇ္ဈိမဒေသေပိ အလဇ္ဇီပုဂ္ဂလာ ဗဟု သန္တီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. अब आरम्भ से स्थविर-परम्परा की कथा कही जानी चाहिए। सम्यक्सम्बुद्ध भगवान के सद्धिविहारिक उपालि स्थविर थे, उनके शिष्य दासक स्थविर थे, उनके शिष्य सोणक स्थविर थे, उनके शिष्य सिग्गव स्थविर और चन्दवज्जी स्थविर थे, उनके शिष्य मोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर थे। ये पाँच महास्थविर शासन-वंश में आदिभूत आचार्य-परम्परा के नाम से जाने जाते हैं। उनकी शिष्य-परम्परा रूपी स्थविर-परम्परा आज तक अविच्छिन्न है। आचार्य-परम्परा में केवल लज्जी (शीलवान) भिक्षुओं को ही सम्मिलित कर कहना चाहिए, अलज्जी भिक्षुओं को नहीं। क्योंकि अलज्जी भिक्षु बहुश्रुत होते हुए भी लाभ और लोक-सत्कार आदि के प्रति आसक्त होकर धर्म-तन्तु को नष्ट कर देते हैं और श्रेष्ठ शासन में महान भय उत्पन्न करते हैं। शासन की रक्षा का कार्य लज्जी भिक्षुओं का ही विषय है, अलज्जी भिक्षुओं का नहीं। इसीलिए प्राचीन स्थविरों ने 'भविष्य में शासन की रक्षा कौन करेगा?' ऐसा विचार कर तीन बार यह वचन कहा— 'भविष्य में लज्जी ही रक्षा करेंगे, लज्जी ही रक्षा करेंगे, लज्जी ही रक्षा करेंगे।' इस प्रकार यह जानना चाहिए कि मध्यम देश में भी बहुत से अलज्जी व्यक्ति हैं। ပရိနိဗ္ဗာနတော ဟိ ဘဂဝတော ဝဿသတာနံ ဥပရိ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ ဝဇ္ဇိပုတ္တကာ ဘိက္ခူ အဓမ္မဝတ္ထူနိ ဒီပေတွာ ပဌမသင်္ဂီတိကာလေ ဗဟိကတေဟိ ပါပဘိက္ခူဟိ သဒ္ဓိံ မန္တေတွာ သဟာယံ ဂဝေသေတွာ မဟာသင်္ဂီတိဝေါဟာရေန မဟာထေရာ ဝိယ သင်္ဂီတိံ အကံသု. ကတွာ စ ဝိသုံ ဂဏာ အဟေသုံ. အဟောဝတ ဣဒံ ဟာသိတဗ္ဗကမ္မံ, သေယျထာပိ နာမ ဇရသိင်္ဂါလော စတုပဒသာမညေန မာနံ ဇပ္ပေတွာ အတ္တာနံ သီဟံ ဝိယ မညိတွာ သီဟော ဝိယ သီဟနာဒံ နဒီတိ. တေ ပါဝစနံ ယထာ ဘူတံ [Pg.16] အဇာနိတွာ သဒ္ဒစ္ဆာယာမတ္တေန ယထာဘူတံ အတ္ထံ နာမ သိံသု. ကိဉ္စိ ပါဝစနမ္ပီ အပနေသုံ. တဉ္စ သကဂဏေယေဝ ဟောတိ, န ဓမ္မဝါဒီဂဏေ. ဓမ္မဝိနယံ ဝိကောပေတွာ ယထိစ္ဆိတ ဝသေနေဝ စရိံသု. အယံ ပန မဟာသင်္ဂီတိနာမ ဧကော အဓမ္မဝါဒီဂဏော. भगवान के परिनिर्वाण के सौ वर्ष बाद, पूर्वोक्त रीति से ही वज्जिपुत्तक भिक्षुओं ने अधर्म-वस्तुओं को प्रकाशित कर, प्रथम संगीति के समय बहिष्कृत किए गए पापी भिक्षुओं के साथ मंत्रणा कर और सहायता खोजकर, 'महासंगीति' के नाम से महास्थविरों की भाँति संगीति की। ऐसा करके वे अलग गण (समूह) बन गए। अहो! यह हँसने योग्य कार्य था, जैसे कोई बूढ़ा सियार चौपाया होने की समानता के कारण अभिमान कर स्वयं को सिंह मानकर सिंह की भाँति गर्जना करता है। उन्होंने बुद्ध-वचन को यथार्थ रूप में न जानकर केवल शब्दों की छाया मात्र से यथार्थ अर्थ को नष्ट कर दिया। उन्होंने कुछ बुद्ध-वचनों को हटा भी दिया। और वह केवल उनके अपने गण में ही हुआ, धर्मवादी गण में नहीं। धर्म और विनय को विकृत कर वे अपनी इच्छानुसार चलने लगे। यह 'महासंगीति' नाम का एक अधर्मवादी गण है। တတော ပစ္ဆာ ကာလံ အတိက္ကန္တေ တတောယေဝ အညမညံ ဝါဒတော ဘိဇ္ဇိတွာ ဂေါကုလိကောနာမ ဧကော ဂဏော ဧကဗျောဟာရောနာမ ဧကောတိ ဒွေ ဂဏာ ဘိဇ္ဇိံသု. တတော ပစ္ဆာ ဂေါကုလိကဂဏဂဏတောယေဝ အညမညံ ဘိဇ္ဇိတွာ ဗဟုဿုတိကောနာမ ဧကော ဂဏော ပညတ္တိဝါဒေါနာမ ဧကောတိ ဒွေ ဂဏာ ဘိဇ္ဇိံသု. ပုနပိ တေဟိယေဝ ဂဏေဟိ စေတိယဝါဒေါနာမ ဧကော ဂဏော ဘိဇ္ဇိ. इसके बाद, समय बीतने पर, उसी (महासांघिक) से परस्पर वाद के कारण अलग होकर गोकुलिक नामक एक गण और एकब्योहारिक नामक एक गण—ये दो गण विभाजित हुए। उसके बाद गोकुलिक गण से ही परस्पर विभाजित होकर बहुश्रुतीय नामक एक गण और प्रज्ञप्तिवादी नामक एक गण—ये दो गण विभाजित हुए। फिर उन्हीं गणों से चैत्यवादी नामक एक गण विभाजित हुआ। တတော ပစ္ဆာ စိရကာလံ အတိက္ကန္တေ ဓမ္မဝါဒီဂဏေဟိ ဝိသဘာဂဂဏံ ပဝိသိတွာ မဟိံသာသကောနာမ ဧကောဂဏော ဝဇ္ဇိပုတ္တကောနာမ ဧကောတိ ဒွေ ဂဏာ ဘိဇ္ဇိံသု. တတော ပစ္ဆာပိ ဝဇ္ဇိပုတ္တကဂဏတောယေဝ အညမညံ ဘိဇ္ဇိတွာ ဓမ္မုတ္တရိကောနာမ ဧကော ဂဏော, ဘဒ္ဒယာနိကောနာမ ဧကော, ဆန္နာဂါရိကောနာမ ဧကော, သမုတိကောနာမ ဧကောတိ စတ္တာရော ဂဏာ ဘိဇ္ဇိံသု. उसके बाद, बहुत समय बीतने पर, धर्मवादी गणों से विजातीय गण में प्रवेश कर महीशासक नामक एक गण और वज्जिपुत्तक नामक एक गण—ये दो गण विभाजित हुए। उसके बाद भी वज्जिपुत्तक गण से ही परस्पर विभाजित होकर धर्मोत्तरीय नामक एक गण, भद्रयाणिक नामक एक गण, छन्नागारिक नामक एक गण और सम्मितीय नामक एक गण—ये चार गण विभाजित हुए। ပုနပိ မဟိံသာသကဂဏတော အညမညံ ဘိဇ္ဇိတွာ သဗ္ဗတ္ထိဝါဒေါနာမ ဧကော ဂဏော, ဓမ္မဂုတ္တိကောနာမ ဧကော, ကဿပိယောနာမ ဧကော, သင်္ကန္တိကောနာမ ဧကော, သုတ္တဝါဒေါ နာမ ဧကောတိ ပဉ္စ ဂဏာ ဘိဇ္ဇိံသု. फिर महीशासक गण से परस्पर विभाजित होकर सर्वास्तिवादी नामक एक गण, धर्मगुप्तिक नामक एक गण, काश्यपीय नामक एक गण, संक्रान्तिक नामक एक गण और सूत्रवादी नामक एक गण—ये पाँच गण विभाजित हुए। ဧဝံ မဇ္ဈိမဒေသေ ဒုတိယသင်္ဂီတိံ သင်္ဂါယန္တာနံ မဟာထေရာနံ ဓမ္မဝါဒီထေရဝါဒဂဏတော ဝိသုံ ဝိသုံ ဘိဇ္ဇမာနာ အဓမ္မဝါဒီဂဏာ သတ္တရသ အဟေသုံ. တေ စ အဓမ္မဝါဒီဂဏာ သာသနေ ထေရပရမ္ပရာယ အနန္တော ဂဓာ. တေ ဟိ သာသနေ ဥပကာရာ န ဟောန္တိ, ထေရပရမ္ပရာယ စ ပဝေသေတွာ ဂဏှိတုံ န သက္ကာ, ယထာ ဟံသဂဏေ ဗကော, ယထာ စ ဂေါ ဂဏေ [Pg.17] ဂဝဇော, ယထာ စ သုဝဏ္ဏဂဏေ ဟာရကုဋောတိ. इस प्रकार मध्यम देश में द्वितीय संगीति करने वाले महास्थविरों के धर्मवादी-स्थविरवाद गण से अलग-अलग विभाजित होकर सत्रह अधर्मवादी गण हुए। वे अधर्मवादी गण शासन में स्थविर-परम्परा के भीतर समाहित नहीं हैं। वे शासन में उपकारी नहीं होते और उन्हें स्थविर-परम्परा में प्रविष्ट कर स्वीकार नहीं किया जा सकता, जैसे हंसों के झुंड में बगुला, गायों के झुंड में नीलगाय, और स्वर्ण के समूह में पीतल। မဟာကဿပတ္ထေရာဒိတော ပန အာဂတာ ထေရပရမ္ပရာ ဥပါလိ ဒါသကော စေဝါတိအာဒိနာ ပရိဝါရခန္ဓကေ သမန္တပါသာဒိကဋ္ဌကထာယဉ္စ အာဂတနယေနေဝ ဝေဒိတဗ္ဗာ. महाकाश्यप स्थविर आदि से आई हुई स्थविर-परम्परा को 'उपालि, दासक' इत्यादि के रूप में परिवार खन्धक और समन्तपासादिका अट्ठकथा में आए हुए तरीके से ही जानना चाहिए। ဥပါလိတ္ထေရာဒီနံ ပရိသုဒ္ဓါစာရာဒီနိ အနုမာနေတွာ ယာဝ မောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရာ, တာဝ တေသံ ထေရာနံ ပရိသုဒ္ဓါ စာရာဒီနီတိ သက္ကာ ဉာတုံ, သေယျထာပိ နဒိယာ ဥပရိသောတေ မေဃဝဿာနိ အနုမာနေတွာ အဓောသောတေ နဒိယာ ဥဒကဿ ဗာဟုလ္လဘာဝေါ ဝိညာတုံ သက္ကာတိ အယံ ကာရဏာနုမာနနယော နာမ. उपालि स्थविर आदि के परिशुद्ध आचरण आदि का अनुमान करके मोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर तक उन स्थविरों के परिशुद्ध आचरण आदि को जाना जा सकता है, जैसे नदी के ऊपरी प्रवाह में मेघ-वर्षा का अनुमान करके नदी के निचले प्रवाह में जल की प्रचुरता को जाना जा सकता है; इसे 'कारण-अनुमान नय' कहा जाता है। ယာဝ ပန မောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရာ, တာဝ ထေရာနံ ပရိသုဒ္ဓါစာရာဒီနိ အနုမာနေတွာ ဥပါလိတ္ထေရဿ ပရိသုဒ္ဓါစာရာဒီနီတိ သက္ကာ ဉာတုံ, သေယျထာပိ နာမ ဥပရိဓူမံ ပဿိတွာ အနုမာနေတွာ အဂ္ဂိ အတ္ထီတိ သက္ကာ ဉာတုန္တိ အယံ ဖလာနုမာနန ယော နာမ. मोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर तक के स्थविरों के परिशुद्ध आचरण आदि का अनुमान करके उपालि स्थविर के परिशुद्ध आचरण आदि को जाना जा सकता है, जैसे ऊपर उठते धुएँ को देखकर अनुमान करके यह जाना जा सकता है कि अग्नि है; इसे 'फल-अनुमान नय' कहा जाता है। အဒိဘူတဿ ပန ဥပါလိတ္ထေရဿ အဝသာနဘူတဿ စ မောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရဿ ပရိသုဒ္ဓါစာရာဒီနိ အနုမာနေတွာ မဇ္ဈေ ဒါသကသောဏသိဂ္ဂဝါဒီနံ ထေရာနံ ပရိသုဒ္ဓါစာရာဒီနိတိ သက္ကာ ဉာတုံ, သေယျထာပိ နာမ သိလာပဋ္ဋဿ ဩရဘာဂေ ပါရဘာဂေ စ မိဂပဒဝဠဉ္ဇနံ ဒိသွာ အနုမာနေတွာ မဇ္ဈေ အပါကဋံ ပဒဝဠဉ္စနံ အတ္ထီတိ သက္ကာ ဉာတုန္တိ အယံ မိဂပဒဝဠဉ္ဇန နယော နာမ. आदि-भूत उपालि स्थविर और अवसान-भूत मोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर के परिशुद्ध आचरण आदि का अनुमान करके मध्य के दासक, सोण, सिग्गव आदि स्थविरों के परिशुद्ध आचरण आदि को जाना जा सकता है, जैसे शिलापट्ट के इस ओर और उस ओर मृग के पद-चिह्नों को देखकर अनुमान करके मध्य में अदृश्य पद-चिह्नों के होने को जाना जा सकता है; इसे 'मृग-पद-चिह्न नय' कहा जाता है। ဧဝံ တီဟိ နယေဟိ အယံ ထေရဝါဒဂဏော ဓမ္မဝါဒီလဇ္ဇိပေသလောတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. ဧဝမုပရိပိ နယော နေတဗ္ဗော. ထေရပရမ္ပရာ စ ယာဝ ပေါတ္ထကာရုဠာ ပရိဝါရခန္ဓကေ သမန္တ ပါသာဒိကာယဉ္စ တတော မဟိန္ဒော ဣဋ္ဋိယောတိအာဒိနာ ဝုတ္တ နယေန ဝေဒိတဗ္ဗာတိ. इस प्रकार इन तीन नयों से यह स्थविरवाद गण धर्मवादी, लज्जी और पेशल (शीलवान) समझना चाहिए। इसी प्रकार आगे भी नय ले जाना चाहिए। और पुस्तकों में लिपिबद्ध होने तक की स्थविर-परम्परा को परिवार खन्धक और समन्तपासादिका में, तथा उसके बाद 'महिन्द, इट्टिय' आदि के रूप में बताए गए तरीके से जानना चाहिए। ဣတိ သာသနဝံသေ နဝဋ္ဌာနာဂတသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ इस प्रकार शासनवंश में नौ स्थानों में आए शासनवंश की कथा का मार्ग समाप्त हुआ। နာမ ပဌမော ပရိစ္ဆေဒေါ. नामक प्रथम परिच्छेद। ၂. သီဟဠဒီပိကသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ २. सिंहलद्वीप के शासनवंश की कथा का मार्ग। ၂. ဣဒါနိ [Pg.18] သီဟဠဒီပသာသနကထာမဂ္ဂံ ဝတ္တုံ ဩကာသော အနုပ္ပတ္တော, တသ္မာ တံ ဝက္ခာမိ. २. अब सिंहलद्वीप के शासन की कथा का मार्ग कहने का अवसर प्राप्त हुआ है, इसलिए उसे कहूँगा। သီဟဠဒီပဉှိ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနဘူတတ္တာ စေတိယဂဗ္ဘသဒိသံ ဟောတိ. သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ကိရ သီဟဠဒီပံ ဓရမာနကာလေပိ တိက္ခတ္တုံ အဂမာသိ. ပဌမံ ယက္ခာနံ ဒမနတ္ထံ ဧကကောဝ ဂန္တွာ ယက္ခေ ဒမေတွာ မယိ ပရိနိဗ္ဗုတေ သီဟဠဒီပေ သာသနံ ပတိဋ္ဌဟိဿတီတိ တမ္ဗပဏ္ဏိဒီပေ အာရက္ခံ ကရောန္တော တိက္ခတ္တုံ ဒီပံ အာဝိဉ္ဆိ. ဒုတိယံ မာတုလဘာဂိနေယျာနံ နာဂရာ ဇူနံ ဒမနတ္ထာယ ဧကကောဝ ဂန္တွာ တေ ဒမေတွာ အဂမာသိ. တတိယံ ပဉ္စဘိက္ခုသတပရိဝါရော ဂန္တွာ မဟာစေတိယဋ္ဌာနေ စ ထူပါရာမစေတိယဋ္ဌာနေ စ မဟာဗောဓိပတိဋ္ဌိတဋ္ဌာနေ စ မဟိယင်္ဂဏစေတိယဋ္ဌာနေ စ မုဒိင်္ဂဏစေတိယဋ္ဌာနေ စ ဒီဃဝါပိ စေတိယဋ္ဌာနေ စ ကလျာဏိယစေတိယဋ္ဌာနေ စ နိရောဓသမာပတ္တိံ သမာပဇ္ဇိတွာ နိသီဒိ. सिंहलद्वीप शासन का प्रतिष्ठा-स्थान होने के कारण चैत्य-गर्भ के समान है। कहा जाता है कि सम्यक्सम्बुद्ध अपने जीवनकाल में भी तीन बार सिंहलद्वीप गए थे। पहली बार यक्षों के दमन के लिए अकेले ही जाकर और यक्षों का दमन करके, 'मेरे परिनिर्वाण के बाद सिंहलद्वीप में शासन प्रतिष्ठित होगा'—ऐसा सोचकर ताम्रपर्णी द्वीप की रक्षा करते हुए तीन बार द्वीप को स्पर्श किया। दूसरी बार मामा और भांजे नागराजों के दमन के लिए अकेले ही जाकर उन्हें दमित कर लौट आए। तीसरी बार पाँच सौ भिक्षुओं के परिवार के साथ जाकर महाचैत्य स्थान, थूपाराम चैत्य स्थान, महाबोधि प्रतिष्ठित स्थान, महियंगण चैत्य स्थान, मुदिंगण चैत्य स्थान, दीघवापी चैत्य स्थान और कल्याणी चैत्य स्थान पर निरोध-समापत्ति में समाहित होकर बैठे। တဒါ စ ပန သာသနံ ဩဂါဟေတွာန တာဝ တိဋ္ဌတိ. ပစ္ဆာ ပန ယထာဝုတ္တတ္ထေရပရမ္ပရာယ သမဘိနိဝိဋ္ဌေန မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရေန ပေသိတော မဟိန္ဒတ္ထေရော ဇိနစက္ကေ ပဉ္စတိံသာဓိကေ ဒွိသတေ သမ္ပတ္တေ ဒုတိယကတ္တိကမာသေ ဣဋ္ဋိယေန ဥတ္တိယေန သမ္ဗုလေန ဘဒ္ဒသာလေန စာတိ ဧတေဟိ ထေရေဟိ သဒ္ဓိံ သီဟဠဒီပံ အဂမာသိ. သောဏုတ္တရတ္ထေရာဒယော ဇိနစက္ကေ ပဉ္စတိံသာဓိကေ ဒွိသတေ သမ္ပတ္တေ ဒုတိယကတ္တိကမာသေယေဝ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာပနတ္ထာယ အတ္တနော အတ္တနော သမ္ပတ္တဘာရဘူတံ တံ တံ ဌာနံ အဂမံသု. तब तक शासन वहाँ गहराई से स्थापित नहीं हुआ था। बाद में, पूर्वोक्त स्थविर-परम्परा में प्रतिष्ठित महामोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर द्वारा भेजे गए महिन्द स्थविर, जिन-चक्र (बुद्ध संवत) के २३५ वर्ष बीतने पर, द्वितीय कार्तिक मास में इट्टिय, उत्तिय, सम्बल और भद्रशाल—इन स्थविरों के साथ सिंहलद्वीप गए। सोण और उत्तर स्थविर आदि भी जिन-चक्र के २३५ वर्ष बीतने पर द्वितीय कार्तिक मास में ही शासन की प्रतिष्ठा के लिए अपने-अपने उत्तरदायित्व वाले उन-उन स्थानों पर गए। မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရော ပန သတ္တမာသာနိ အာဂမေတွာ ဇိနစက္ကေ ဆတ္တိံသာဓိကေ ဒွိသတေ သမ္ပတ္တေ ဇေဋ္ဌမာသဿ ပုဏ္ဏမိယံ သီဟဠဒီပံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာပနတ္ထာယ အဂမာသိ. တေနေဝ တေသု နဝသု ဌာနေသု သီဟဠဒီပံ ဆတ္တိံသာဓိကေ ဒွိသ တေ [Pg.19] အဂမာသိ. အညာနိ ပန အဋ္ဌ ဌာနာနိ ပဉ္စတိံသာဓိကဒွိသတေယေဝ အဂမာသီတိ ဝိသုံဝ ဝတ္ထပေတဗ္ဗော. महामहिन्द थेर ने सात महीने प्रतीक्षा करने के बाद, बुद्ध संवत (जिनचक्र) के २३६ वर्ष पूरे होने पर, ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को सिंहल द्वीप में शासन (बुद्ध धर्म) की स्थापना के लिए प्रस्थान किया। इसलिए उन नौ स्थानों में से सिंहल द्वीप में वे २३६वें वर्ष में गए। अन्य आठ स्थानों पर वे २३५वें वर्ष में ही गए थे, ऐसा अलग से समझना चाहिए। ကသ္မာ ပန မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရော သတ္တမာသာနိ အာဂမေတွာ သဗ္ဗပစ္ဆာ သီဟဠဒီပံ ဂစ္ဆတီတိ. သီဟဠဒီပေ မုဋဘိဝေါ နာမ ရာဇာ ဇရာဒုဗ္ဗလော အဟောတိ, သာသနံ ပဂ္ဂဟေတုံ အသမတ္ထော, တဿ ပန ပုတ္တော ဒေဝါနံ ပိယ တိဿော နာမ ရာဇကုမာရော ဒဟရော သာသနံ ပဂ္ဂဟေတုံ သမတ္ထော ဘဝိဿတိ, သော စ ဒေဝါနံ ဝိယတိဿော ရဇ္ဇံ တာဝ လဘတု ဝေဒိဿကဂိရိနဂရေ မာတုယာ သဒ္ဓိံ ဉာတကေ တာဝ ပဿာမီတိ အပေက္ခိတွာ သတ္တမာသာနိ အာဂမေတွာ ဆတ္တိံသာဓိကဒွိသတေယေဝ ဇိနစက္ကေ မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရော သီဟဠဒီပံ ဂစ္ဆတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. महामहिन्द थेर सात महीने प्रतीक्षा करके सबसे अंत में सिंहल द्वीप क्यों गए? सिंहल द्वीप में मुटशिव (मुटभीवो) नामक राजा वृद्ध और दुर्बल था, वह शासन को संभालने में असमर्थ था। उसका पुत्र देवानांपिय तिस्स नामक राजकुमार युवा था और शासन को संभालने में समर्थ होगा। वह देवानांपिय तिस्स तब तक राज्य प्राप्त कर ले और तब तक मैं वेदिस्सगिरि नगर में माता के साथ संबंधियों को देख लूँ—ऐसी प्रतीक्षा करते हुए सात महीने बाद बुद्ध संवत के २३६वें वर्ष में ही महामहिन्द थेर सिंहल द्वीप गए, ऐसा जानना चाहिए। မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရော စ ဣဋ္ဋိယာဒီဟိ ထေရေဟိ စတူဟိ ဘာဂိနေယျေန သုမနသာမဏေရေန ဘဏ္ဍုကေန နာမ ဥပါသကေ န စာတိ ဧတေဟိ သဒ္ဓိံ ဆတ္တိံသာဓိကေ ဒွိသတေ ဇိနစက္ကေ ဇေဋ္ဌမာသပုဏ္ဏမိယံ သုဝဏ္ဏဟံသာ ဝိယ ဇေဋ္ဌမာသေ နဘံ ဥဂ္ဂန္တွာ အာကာသမဂ္ဂေန အနုရာဓပုရဿ ပုရတ္ထိမဒိသာဘာဂေ မိဿ ကပဗ္ဗတကူဋေ ပတိဋ္ဌာသိ. महामहिन्द थेर, इट्टिय आदि चार थेरों, भानजे सुमन सामणेर और भण्डुक नामक उपासक के साथ, बुद्ध संवत के २३६वें वर्ष में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को स्वर्ण हंसों की तरह ज्येष्ठ मास में आकाश में उड़कर, आकाश मार्ग से अनुराधापुर के पूर्व दिशा में स्थित मिस्सक पर्वत के शिखर पर उतरे। ဇေဋ္ဌမာသဿ စ ပုဏ္ဏမိယံ လင်္ကာဒီပေ ဇေဋ္ဌမူလနက္ခတ္တသဘာ ဟုတွာ မနုဿာ ဆဏံ အကံသု. တေနေဝါဟ သာရတ္ထဒီပနိယံ နာမ ဝိနယဍီကာယံ, ဇေဋ္ဌမာသဿ ပုဏ္ဏမိယံ ဇေဋ္ဌနက္ခတ္တံ မူလနက္ခတ္တံ ဝါ ဟောတီတိ. တတ္ထ စ ပုဏ္ဏမိနက္ခတ္တံ ရာဇမတ္တန္တေ ပုဏ္ဏမိနက္ခတ္တဝိစာရဏနယေန ဝုတ္တန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को लंका द्वीप में ज्येष्ठ-मूल नक्षत्र की सभा (उत्सव) होने के कारण मनुष्यों ने उत्सव मनाया। इसीलिए विनय-टीका 'सारत्थदीपनी' में कहा गया है—ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को ज्येष्ठ नक्षत्र या मूल नक्षत्र होता है। वहाँ पूर्णिमा नक्षत्र के विषय में राजमत्तन्त (राज-मत) के अनुसार पूर्णिमा नक्षत्र के विचार की विधि से कहा गया है, ऐसा देखना चाहिए। ဒေဝါနံ ပိယ တိဿော စ ရာဇာ နက္ခတ္တံ နာမ ဃောသာပေတွာ ဆဏံ ကာရေထာတိ အမစ္စေ အာဏာပေတွာ စတ္တာလီ သပုရိသသဟဿပရိဝါရော နဂရမှာ နိက္ခမိတွာ ယေန မိဿ ကပဗ္ဗတော, တေန ပါယာသိ မိဂဝံ ကီဠိတုကာမော. အထ တသ္မိံ ပဗ္ဗတေ အဓိဝတ္ထာ ဧကာ ဒေဝတာ မိဂရူပေန ရာဇာနံ ဖလောဘေတွာ ပက္ကောသိတွာ ထေရဿ အဘိမုခံ အကာသိ. राजा देवानांपिय तिस्स ने नक्षत्र (उत्सव) की घोषणा करवाकर अमात्यों को उत्सव मनाने की आज्ञा दी और चालीस हजार पुरुषों के साथ नगर से निकलकर, जहाँ मिस्सक पर्वत था, वहाँ शिकार खेलने की इच्छा से प्रस्थान किया। तब उस पर्वत पर रहने वाले एक देवता ने मृग का रूप धारण कर राजा को प्रलोभित किया और उसे बुलाकर थेर के सामने कर दिया। ထေရော [Pg.20] ရာဇာနံ အာဂစ္ဆန္တံ ဒိသွာ မမံယေဝ ရာဇာ ပဿတု မာ ဣတရေတိ အဓိဋ္ဌဟိတွာ တိဿ တိဿ ဣတော ဧဟီတိ အာဟ. ရာဇာ တံ သုတွာ စိန္တေသိ, ဣမသ္မိံ ဒီပေ ဇာတော သကလောပိ မနုဿော မံ တိဿောတိ နာမံ ဂဟေတွာ အာလပိတုံ သမတ္ထော နာမ နတ္ထိ, အယံ ပန ဘိန္နဘိန္နပဋဓရော ဘဏ္ဍုကာသာဝ ဝသနော မံ နာမေန အာလပတိ, ကော နုခေါ အယံ ဘဝိဿတိ, မနုဿော ဝါ အမနုဿော ဝါတိ. ထေရော အာဟ,– थेर ने राजा को आते हुए देखकर यह अधिष्ठान किया कि राजा केवल मुझे ही देखे, दूसरों को नहीं, और कहा—"तिस्स, तिस्स, इधर आओ।" राजा ने उसे सुनकर सोचा—"इस द्वीप में जन्मा कोई भी मनुष्य मुझे 'तिस्स' नाम से पुकारने में समर्थ नहीं है। लेकिन यह फटे-पुराने वस्त्र (चीवर) धारण करने वाला, मुण्डित और काषाय वस्त्र पहने हुए मुझे नाम से पुकार रहा है। यह कौन हो सकता है, मनुष्य या अमानुष?" थेर ने कहा— သမဏာ မယံ မဟာရာဇ, ဓမ္မရာဇဿ သာဝကာ; တဝေဝ အနုကမ္ပာယ, ဇမ္ဗုဒီပါ ဣဓာဂတာတိ. "हे महाराज! हम श्रमण हैं, धर्मराज (बुद्ध) के श्रावक हैं। आप पर अनुकम्पा करने के लिए ही हम जम्बुद्वीप से यहाँ आए हैं।" တဒါ စ ဒေဝါနံ ပိယတိဿော ရာဇာ အသောကရညာ ပေသိတေန အဘိသေကေန ဧကမာသာဘိသိတ္တော အဟောသိ. ဝိသာခပုဏ္ဏမာယံ ဟိဿ အဘိသေကမကံသု. သော စ အသောကရညာ ပေသိတေ ဓမ္မပဏ္ဏာကာရေ ရတနတ္တယဂုဏပ္ပဋိသံယုတ္တံ သာသနပ္ပဝတ္တိံ အစိရသုတံ အနုဿရမာနော တံ ထေရဿ သမဏာ မယံ မဟာရာဇ, ဓမ္မရာဇဿ သာဝကာတိ ဝစနံ သုတွာ အယျာ နုခေါ အာဂတာတိ တာဝဒေဝ အာဝုဓံ နိက္ခိပိတွာ ဧကမန္တံ နိသီဒိ သမ္မောဒနီယံ ကထံ ကထယမာနော. ယထာဟ,– उस समय राजा देवानांपिय तिस्स को राजा अशोक द्वारा भेजी गई अभिषेक सामग्री से अभिषेक हुए एक महीना हुआ था। वैशाख पूर्णिमा को उनका अभिषेक किया गया था। राजा अशोक द्वारा भेजे गए धर्म-उपहारों में रत्नत्रय के गुणों से संबंधित शासन की प्रवृत्ति को हाल ही में सुनकर याद करते हुए, थेर के "हे महाराज! हम श्रमण हैं, धर्मराज के श्रावक हैं" इन वचनों को सुनकर (राजा ने सोचा)—"क्या आर्य आ गए हैं?" और तुरंत ही शस्त्र रखकर एक ओर बैठ गया और कुशल-क्षेम की बातें करने लगा। जैसा कि कहा गया है— အာဝုဓံ နိက္ခိပိတွာန, ဧကမန္တံ ဥပါဝိသိ; နိသဇ္ဇ ရာဇာ သမ္မောဒိ, ဗဟုံ အတ္ထူပသဉှိတန္တိ. "शस्त्रों को त्यागकर वह एक ओर बैठ गया। बैठकर राजा ने बहुत से अर्थपूर्ण विषयों पर प्रसन्नतापूर्वक चर्चा की।" သမ္မောဒနီယံ ကထဉ္စ ကုရုမာနေယေဝ တသ္မိံ တာနိပိ စတ္တာလီသပုရိသသဟဿာနိ အာဂန္တွာ သမ္ပရိဝါရေသုံ. တဒါထေရော ဣတရေပိ ဆ ဇနေ ဒဿေသိ. ရာဇာ ဒိသွာ ဣမေ ကဒါ အာဂတာတိ အာဟ. မယာ သဒ္ဓိံယေဝ မဟာရာဇာတိ. ဣဒါနိ ပန ဇမ္ဗုဒီပေ အညေပိ ဧဝရူပါ သမဏာ သန္တီတိ. သန္တိ [Pg.21] မဟာရာဇ ဧတရဟိဇမ္ဗုဒီပေါ ကာလာဝပဇ္ဇောတော ဣသိဝါတပဋိဝါတော, တသ္မိံ– जब वे कुशल-क्षेम की बातें कर रहे थे, तभी वे चालीस हजार पुरुष भी आ गए और उन्हें घेर लिया। तब थेर ने अन्य छह जनों को भी प्रकट किया। राजा ने उन्हें देखकर पूछा—"ये कब आए?" (थेर ने कहा)—"महाराज! मेरे साथ ही।" (राजा ने पूछा)—"क्या इस समय जम्बुद्वीप में ऐसे अन्य भी श्रमण हैं?" (थेर ने कहा)—"महाराज! हैं। इस समय जम्बुद्वीप काषाय वस्त्रों से प्रकाशित है और ऋषियों के आवागमन से युक्त है। वहाँ—" တေဝိဇ္ဇာ ဣဒ္ဓိပတ္တာ စ, စေတောပရိယကောဝိဒါ; ခီဏာသဝါ အရဟန္တော, ဗဟူ ဗုဒ္ဓဿ သာဝကာတိ. "त्रिविद्या प्राप्त, ऋद्धि-सिद्धियों से युक्त, दूसरों के चित्त को जानने में कुशल, क्षीणास्त्रव (जिनके आस्रव नष्ट हो गए हैं) और अर्हत्—ऐसे बुद्ध के बहुत से श्रावक हैं।" ဘန္တေ ကေန အာဂတတ္ထာတိ. နေဝ မဟာရာဇ ဥဒကေန, န ထလေနာတိ. ရာဇာ အာကာသေန အာဂတာတိ အညာသိ. ထေရော အတ္ထိ နုခေါ ရညော ပဿာဝေယျတ္တိကန္တိ ဝီမံသနတ္ထာယ အာသန္နံ အမ္ဗရုက္ခံ အာရဗ္ဘ ပဉှံ ပုစ္ဆိ, – (राजा ने पूछा)—"भन्ते! आप किस मार्ग से आए हैं?" (थेर ने कहा)—"महाराज! न जल मार्ग से, न स्थल मार्ग से।" राजा समझ गया कि वे आकाश मार्ग से आए हैं। थेर ने राजा की बुद्धिमत्ता की परीक्षा लेने के लिए पास के एक आम के पेड़ को लेकर प्रश्न पूछा— ကိန္နာမော မဟာရာဇ အယံ ရုက္ခောတိ. အမ္ဗရုက္ခော နာမ ဘန္တေတိ. ဣမံ ပန မဟာရာဇ အမ္ဗံ မုဉ္စိတွာ အညော အမ္ဗော အတ္ထိ ဝါ နတ္ထိ ဝါတိ. အတ္ထိ ဘန္တေ အညေပိ ဗဟူ အမ္ဗရုက္ခာတိ. ဣမဉ္စ အမ္ဗံ တေ စ အမ္ဗေ မုဉ္စိတွာ အတ္ထိ နုခေါ မဟာရာဇ အညေ ရုက္ခာတိ. အတ္ထိ ဘန္တေ, တေ ပန န အမ္ဗရုက္ခာတိ. အညေ စ အမ္ဗေ အနမ္ဗေ စ မုဉ္စိတွာ အတ္ထိ ပန အညော ရုက္ခောတိ. အယမေဝ ဘန္တေ အမ္ဗ ရုက္ခောတိ. သာဓု မဟာရာဇ ပဏ္ဍိတောသီတိ. "महाराज! इस वृक्ष का क्या नाम है?" "भन्ते! यह आम का वृक्ष है।" "महाराज! इस आम को छोड़कर क्या कोई दूसरा आम है या नहीं?" "भन्ते! अन्य भी बहुत से आम के वृक्ष हैं।" "महाराज! इस आम और उन आमों को छोड़कर क्या कोई अन्य वृक्ष हैं?" "भन्ते! हैं, पर वे आम के वृक्ष नहीं हैं।" "अन्य आमों और गैर-आमों को छोड़कर क्या कोई और वृक्ष है?" "भन्ते! यही आम का वृक्ष है।" "साधु महाराज! आप बुद्धिमान हैं।" အတ္ထိ ပန မဟာရာဇ တေ ဉာတကာတိ. အတ္ထိ ဘန္တေ ဗဟူဇနာတိ. တေ မုဉ္စိတွာ ကေစိ အညာတကာပိ အတ္ထိ မဟာရာဇာတိ. အညာတကာ ဘန္တေ ဉာတကေဟိ ဗဟုတရာတိ. တဝဉာတကေ စ အညာတကေ စ မုဉ္စိတွာ အတ္ထညော ကောစိ မဟာရာဇာတိ. အဟမေဝ ဘန္တေတိ. သာဓု မဟာရာဇ အတ္တာ နာမ အတ္တနော နေဝ ဉာတကော န အညာတကောတိ. "महाराज! क्या आपके कोई संबंधी हैं?" "भन्ते! बहुत से लोग हैं।" "महाराज! उन्हें छोड़कर क्या कोई गैर-संबंधी भी हैं?" "भन्ते! संबंधियों से अधिक तो गैर-संबंधी हैं।" "महाराज! आपके संबंधियों और गैर-संबंधियों को छोड़कर क्या कोई और भी है?" "भन्ते! मैं स्वयं हूँ।" "साधु महाराज! स्वयं व्यक्ति अपने लिए न संबंधी है और न ही गैर-संबंधी।" အထ ထေရော ပဏ္ဍိတော ရာဇာ သက္ခိဿတိ ဓမ္မံ အညာတုန္တိ စူဠဟတ္ထိပဒေါပမသုတ္တံ ကထေသိ. ကထာပရိယောသာနေ ရာဇာ တီသု သရဏေသု ပတိဋ္ဌဟိ သဒ္ဓိံ စတ္တာလီသာယ ပါဏသဟဿေဟီတိ. တတော ပရံ ယံ ယံ ဝတ္တဗ္ဗံ, တံ တံ သမန္တပါသာဒိကာဒီသု ဝုတ္တနယေန ဝေဒိတဗ္ဗံ. तब विद्वान स्थविर ने यह सोचकर कि 'राजा धर्म को समझने में समर्थ होगा', चूलहत्थिपदोपम सुत्त का उपदेश दिया। उपदेश के अंत में, राजा चालीस हजार प्राणियों के साथ त्रिशरण में प्रतिष्ठित हो गया। इसके बाद जो कुछ भी कहना है, उसे समन्तपासादिका आदि में बताए गए तरीके से जानना चाहिए। ဣစ္စေဝံ သီဟဠဒီပေ သာသနာနုဂ္ဂဟဏ မဟိန္ဒတ္ထေရတော အာဂတာ [Pg.22] သိဿပရမ္ပရာ ဗဟူ ဟောန္တိ, ဂဏနပထံ ဝီတိ ဝတ္တာ. ကထံ. မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရဿ သိဿော အရိဋ္ဌော နာမ ထေရော, တဿ သိဿော တိဿဒတ္တော, တဿ သိဿော ကာဠသုမနော, တဿ သိဿော ဒီဃော, တဿ သိဿော ဒီဃ သုမနော, တဿ သိဿော ကာဠသုမနော, တဿ သိဿော နာဂေါ, တဿ သိဿော ဗုဒ္ဓရက္ခိတော, တဿ သိဿော တိဿော, တဿ သိဿော ရေဝေါ, တဿ သိဿော သုမနော, တဿ သိဿော စူဠနာဂေါ, တဿ သိဿော ဓမ္မပါလိ ဧတာ, တဿ သိဿော ခေမော, တဿ သိဿော ဥပလိဿော, တဿ သိဿော ဖုဿဒေဝေါ, တဿ သိဿော သုမနော, တဿ သိဿော မဟာပဒုမော, တဿ သိဿော မဟာသီဝေါ, တဿ သိဿော ဥပါလိ, တဿ သိဿော မဟာနာဂေါ, တဿ သိဿော အဘယော, တဿ သိဿော တိဿော, တဿ သိဿော သုမနော, တဿ သိဿော စူဠာဘယော, တဿ သိဿော တိဿော, တဿ သိဿော စူဠဒေဝေါ, တဿ သိဿော သီဝေါတိ. အယံ ယာဝ ပေါတ္ထကာရုဠသင်္ခါတာ စတုတ္ထသင်္ဂီတိကာ, တာဝ ထေရပရမ္ပရာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. इस प्रकार सिंहल द्वीप में शासन के अनुग्रह के लिए स्थविर महिन्द से आई हुई शिष्य-परम्पराएँ बहुत हैं, जो गणना से परे हैं। कैसे? महामहिन्द स्थविर के शिष्य अरिट्ठ नामक स्थविर थे, उनके शिष्य तिस्सदत्त, उनके शिष्य कालसुमन, उनके शिष्य दीघ, उनके शिष्य दीघसुमन, उनके शिष्य कालसुमन, उनके शिष्य नाग, उनके शिष्य बुद्धरक्खित, उनके शिष्य तिस्स, उनके शिष्य रेव, उनके शिष्य सुमन, उनके शिष्य चूलनाग, उनके शिष्य धम्मपालि, उनके शिष्य खेम, उनके शिष्य उपलिस्स, उनके शिष्य फुस्सदेव, उनके शिष्य सुमन, उनके शिष्य महापदुम, उनके शिष्य महासीव, उनके शिष्य उपाली, उनके शिष्य महानाग, उनके शिष्य अभय, उनके शिष्य तिस्स, उनके शिष्य सुमन, उनके शिष्य चूलाभय, उनके शिष्य तिस्स, उनके शिष्य चूलदेव, उनके शिष्य सीव थे। यह परम्परा पुस्तकों में लिखे जाने (पोत्थकारूळ्ह) तक, जिसे चौथी संगीति कहा जाता है, तब तक की स्थविर-परम्परा समझनी चाहिए। ဝုတ္တဉှေတံ အဋ္ဌကထာယံ,– ယာဝဇ္ဇဘနာ တေသံယေဝ အန္တေဝါသိကပရမ္ပရဘူတာယ အာစရိယပရမ္ပရာယ အာဘတန္တိတိ ဝေဒိတဗ္ဗန္တိ. अट्ठकथा में यह कहा गया है— "आज तक उन्हीं की अन्तेवासी परम्परा स्वरूप आचार्य-परम्परा द्वारा यह लाया गया है", ऐसा जानना चाहिए। ဧဝံ တေသံ သိဿပရမ္ပရဘူတာ အာစရိယပရမ္ပရာ ယာဝဇ္ဇတနာ သာသနေ ပါကဋာ ဟုတွာ အာဂစ္ဆန္တီတိ ဝေဒိတဗ္ဗ. इस प्रकार उनकी शिष्य-परम्परा स्वरूप आचार्य-परम्परा आज तक शासन में प्रकट होकर चली आ रही है, ऐसा जानना चाहिए। သာသနေ ဝိနယဓရေဟိ နာမ တိလက္ခဏသမ္ပန္နေဟိ ဘဝိတဗ္ဗံ. တီဏိ ဟိ ဝိနယဓရဿ လက္ခဏာနိ ဣစ္ဆိ တဗ္ဗာနိ. ကတမာနိ တီဏိ. သုတ္တဉ္စဿ သွာဂတံ ဟောတိ သုပ္ပဝတ္တိ သုဝိနိစ္ဆိတံ သုတ္တတော အနုဗျဉ္ဇနတောတိ ဣဒမေကံ လက္ခဏံ, ဝိနယေ ခေါ ပန ဌိတော ဟောတိ အသံဟီရောတိ ဣဒံ ဒုတိယံ, အာစရိယပရမ္ပရာ ခေါ ပနဿ သုဂ္ဂဟိတာ ဟောတိ သုမနသိကတာ သုပဓာရိတာတိ ဣဒံ တတိယံ. शासन में विनयधरों को तीन लक्षणों से सम्पन्न होना चाहिए। विनयधर के तीन लक्षण अपेक्षित हैं। वे तीन कौन से हैं? उसका सुत्त भली-भांति कंठस्थ, भली-भांति प्रवृत्त और सुत्त तथा अनुव्यंजन के अनुसार भली-भांति विनिश्चित होता है—यह पहला लक्षण है। वह विनय में स्थित और अडिग होता है—यह दूसरा लक्षण है। उसकी आचार्य-परम्परा भली-भांति ग्रहण की हुई, भली-भांति मनन की हुई और भली-भांति धारण की हुई होती है—यह तीसरा लक्षण है। တတ္ထ [Pg.23] အာစရိယပရမ္ပရာ ခေါ ပနဿ သုဂ္ဂဟိတာ ဟောတီတိ ထေရပရမ္ပရာ ဝံသပရမ္ပရာ စဿ သုဋ္ဌုဂဟိတာ ဟောတိ. သုမနသိကတာတိ သုဋ္ဌု မနသိကတာ, အာဝဇ္ဇိတမတ္တေ ဉဇ္ဇလိ တပ္ပဒီပေါ ဝိယ ဟောတိ. वहाँ "आचार्य-परम्परा भली-भांति ग्रहण की हुई होती है" का अर्थ है कि उसकी स्थविर-परम्परा और वंश-परम्परा भली-भांति ग्रहण की हुई होती है। "सुमनसिकता" का अर्थ है भली-भांति मनन की हुई, जो केवल स्मरण करने मात्र से तेल के दीपक की तरह प्रज्वलित हो उठती है। သုပဓာရိတာတိ သုဋ္ဌု ဥပဓာရိတာ, ပုဗ္ဗာပရာနုသန္ဓိတော အတ္ထတော ကာရဏတော စ ဥပ ဓာရိတာ. အတ္တနော မတိံ ပဟာယ အာစရိယသုဒ္ဓိယာ ဝတ္တာ ဟောတိ, မယှံ အာစရိယော အသုကာစရိယဿ သန္တိကေ ဥဂ္ဂဏှိ, သော အသုကဿာတိ ဧဝံ သဗ္ဗံ အာစရိယပရမ္ပရံ ထေရ ဝါဒင်္ဂံ အာဟရိတွာ ယာဝ ဥပါလိတ္ထေရော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ သန္တိကေ ဥဂ္ဂဏှီတိ ပါပေတွာ ဌပေတိ. တတောပိ အာဟရိတွာ ဥပါလိတ္ထေရော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ သန္တိကေ ဥဂ္ဂဏှိ, ဒါသကတ္ထေရော အတ္တနော ဥပဇ္ဈာယဿ ဥပါလိတ္ထေရဿ, သောဏကတ္ထေရော အတ္တနော ဥပဇ္ဈာယဿ ဒေါသကတ္ထေရဿ, သိဂ္ဂဝတ္ထေရော အတ္တနော ဥပဇ္ဈာယဿ သောဏကတ္ထေရဿ, မောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရော အတ္တနော ဥပဇ္ဈာယဿ သိဂ္ဂဝတ္ထေရဿ စဏ္ဍ ဝဇ္ဇိတ္ထေရဿ စာတိ ဧဝံ သဗ္ဗံ အာစရိယပရမ္ပရံ ထေရဝါဒင်္ဂံ အာဟရိတွာ အတ္တနော အာစရိယံ ပါပေတွာ ဌပေတိ. ဧဝံ ဥဂ္ဂဟိတာ ဟိ အာစရိယပရမ္ပရာ သုဂ္ဂဟိတာ ဟောတိ. "सुपधारिता" का अर्थ है भली-भांति धारण की हुई, जो पूर्वापर सन्दर्भ, अर्थ और कारण से धारण की गई हो। अपनी मति को छोड़कर आचार्य की शुद्धि के अनुसार बोलने वाला होता है— "मेरे आचार्य ने अमुक आचार्य के पास सीखा, उन्होंने अमुक के पास"—इस प्रकार पूरी आचार्य-परम्परा और थेरवाद के अंगों को लाकर उपालि स्थविर तक पहुँचाता है कि उन्होंने सम्म-सम्बुद्ध के पास सीखा था। वहाँ से भी लाकर—उपालि स्थविर ने सम्म-सम्बुद्ध के पास सीखा, दासक स्थविर ने अपने उपाध्याय उपालि स्थविर से, सोणक स्थविर ने अपने उपाध्याय दासक स्थविर से, सिग्गव स्थविर ने अपने उपाध्याय सोणक स्थविर से, मोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर ने अपने उपाध्याय सिग्गव स्थविर और चण्डवज्जी स्थविर से—इस प्रकार पूरी आचार्य-परम्परा और थेरवाद के अंगों को लाकर अपने आचार्य तक पहुँचाकर स्थापित करता है। इस प्रकार ग्रहण की गई आचार्य-परम्परा ही भली-भांति ग्रहण की हुई होती है। ဧဝံ အသက္ကောန္တေန ပန ဒွေ တယော ပရိဝဋ္ဋာ ဥဂ္ဂဟေတဗ္ဗာ. သဗ္ဗပစ္ဆိမေန ဟိ နယေန ယထာ အာစရိယော စ အာစရိယာစရိယော စ ပါဠိဉ္စ ပရိပုဉ္ဆဉ္စ ဝဒန္တိ, တထာ ဉာတုံ ဝတ္တတီတိ. यदि ऐसा करने में असमर्थ हो, तो दो या तीन पीढ़ियों को ग्रहण करना चाहिए। सबसे अंतिम उपाय के रूप में, जैसे आचार्य और आचार्यों के आचार्य पालि और उसकी व्याख्या (परिपृच्छा) कहते हैं, वैसा जानना उचित है। ယထာ ဝုတ္တတ္ထေရပရမ္ပရာ ပန ဘဂဝတော ဓရမာနကာလတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ပေါတ္ထကာရုဠာ မုခပါဌေနေဝ ပိဋကတ္တယံ ဓာရေသုံ, ပရိပုဏ္ဏံ ပန ကတွာ ပေါတ္ထကေ လိခိတွာ န ဌပေန္တိ. ဧဝံ မဟာထေရာ ဒုက္ကရကမ္မံ ကတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိံသု. တတြိဒံ ဝတ္ထု,– यथाकथित स्थविर-परम्परा ने भगवान के जीवित काल से लेकर पुस्तकों में लिखे जाने तक मुखपाठ द्वारा ही त्रिपिटक को धारण किया, उन्होंने उसे पूर्ण रूप से पुस्तकों में लिखकर नहीं रखा था। इस प्रकार महास्थविरों ने दुष्कर कार्य करके शासन को संभाला। इस विषय में यह कथा है— သီဟဠဒီပေ ကိရ စဏ္ဍာလတိဿဘယေန သင်္ခုဗ္ဘိတွာ ဒေဝေါ [Pg.24] စ အဝဿိတွာ ဒုဗ္ဘိက္ခဘယံ ဥပ္ပဇ္ဇိ. တဒါ အက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော အာဂန္တွာ တုမှေ ဘန္တေ ပိဋကံ ဓာရေတုံ န သက္ခိဿထ, နာဝံ ပန အာရူဟိတွာ ဇမ္ဗုဒီပံ ဂစ္ဆထ, သစေ နာဝါ အပ္ပဟောနကာ ဘဝေယျ, ကဋ္ဌေန ဝါ ဝေဠုနာ ဝါ တရထ, အဘယတ္ထာယ ပန မယံ ရက္ခိဿာမာတိ အာဟ. कहा जाता है कि सिंहल द्वीप में चण्डाल-तिस्स के भय से क्षोभ उत्पन्न हो गया और वर्षा न होने के कारण अकाल का भय पैदा हो गया। तब देवराज इन्द्र ने आकर कहा— "भन्ते! आप लोग पिटक को धारण नहीं कर सकेंगे, इसलिए नाव पर चढ़कर जम्बुद्वीप चले जाएँ; यदि नाव पर्याप्त न हो, तो लकड़ी या बाँस के सहारे पार कर जाएँ, हम आपकी सुरक्षा के लिए रक्षा करेंगे।" တဒါ သဋ္ဌိမတ္တာ ဘိက္ခူ သမုဒ္ဒတီရံ ဂန္တွာ ပုန ဧတဒဟောသိ,– မယံ ဇမ္ဗုဒီပံ န ဂစ္ဆိဿာမ, ဣဓေဝ ဝသိတွာ တေပိဋကံ ဓာရိဿာမာတိ. တတော ပစ္ဆာ နာဝါ တိတ္ထတော နိဝတ္တိတွာ သီဟဠဒီပေကဒေသံ မလယဇနပဒံ ဂန္တွာ မူလဖလာဒီဟိယေဝ ယာပေတွာ သဇ္ဈာယံ အကံသု. ဆာတကဘယေန အတိပီဠိတာ ဟုတွာ ဧဝမ္ပိ ကာတုံ အသက္ကောန္တော ဝါဠုကတလေ ဥရံ ဌပေတွာ သီသေန သီသံ အဘိမုခံ ကတွာ ဝါစံ အနိစ္ဆာရေတွာ မနသာယေဝ အကံသု. ဧဝံ ဒွါဒသဝဿာနိ သဒ္ဓိံ အဋ္ဌကထာယ တေပိဋကံ ရက္ခိတွာ သာသနံ အနုဂ္ဂဟေသုံ. तब लगभग साठ भिक्षु समुद्र तट पर गए और फिर उन्हें यह विचार आया— "हम जम्बुद्वीप नहीं जाएँगे, यहीं रहकर त्रिपिटक को धारण करेंगे।" उसके बाद वे घाट से नाव लौटाकर सिंहल द्वीप के एक भाग मलय जनपद में चले गए और कंद-मूल-फल आदि पर ही जीवन निर्वाह करते हुए स्वाध्याय करने लगे। भूख के भय से अत्यंत पीड़ित होने पर, जब वे ऐसा करने में भी असमर्थ हो गए, तो बालू पर छाती के बल लेटकर और सिर से सिर सटाकर, बिना वाणी निकाले मन ही मन स्वाध्याय करने लगे। इस प्रकार बारह वर्षों तक अट्ठकथा के साथ त्रिपिटक की रक्षा करके उन्होंने शासन का उपकार किया। ဒွါဒသဝဿေသု ပန အတိက္ကန္တေသု တံ ဘယံ ဝူပသမိတွာ ပုဗ္ဗေ ဇမ္ဗုဒီပံ ဂစ္ဆန္တာ သတ္တဘိက္ခုသတာ အာဂန္တွာ သီဟဠဒီပေကဒေသံ ရာမဇနပဒေ မဏ္ဍလာရာမဝိဟာရံ အာပဇ္ဇိံသု. တေပိ သဋ္ဌိမတ္တာ ဘိက္ခူ တမေဝ ဝိဟာရံ ဂန္တွာ အညမညံ သမ္မန္တေတွာ သဇ္ဈာယိံသု. တဒါ အညမညံ သမေန္တိ, န ဝိရုဇ္ဈန္တိ, ဂင်္ဂါဒကေန ဝိယ ယမုနောဒကံ သံသန္ဒေန္တိ. ဧဝံ ပိဋကတ္တယံ မုခပါဌေနေဝ ဓာရေတွာ မဟာထေရာ ဒုက္ကရကမ္မံ ကရောန္တီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. बारह वर्ष बीत जाने पर, वह भय (दुर्भिक्ष) शांत हो गया और पहले जम्बुद्वीप जाने वाले सात सौ भिक्षु लौटकर सिंहलद्वीप के एक भाग राम जनपद के मण्डलाराम विहार में पहुँचे। वे साठ (मात्र) भिक्षु भी उसी विहार में गए और आपस में विचार-विमर्श कर सज्झाय (पाठ) करने लगे। तब वे एक-दूसरे से सहमत हुए, विरोध नहीं किया, जैसे गंगा के जल के साथ यमुना का जल मिल जाता है। इस प्रकार मुखपाठ (कंठस्थ) द्वारा ही त्रिपिटक को धारण कर महास्थविरों ने दुष्कर कार्य किया, ऐसा जानना चाहिए। ယမ္ပိ ပရိယတ္တိံ ဧကပဒမတ္တမ္ပိ အဝိရဇ္ဈိတွာ ဓာရေန္တိ, တံ ဒုက္ကရကမ္မမေဝ. जो वे पर्यप्ति (बुद्धवचन) को एक पद मात्र भी बिना त्रुटि के धारण करते हैं, वह दुष्कर कार्य ही है। သီဟဠဒီပေ ကိရ ပုနဗ္ဗသုကဿ နာမ ကုဋုမ္ဗိကဿ ပုတ္တော တိဿတ္ထေရော ဗုဒ္ဓဝစနံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ ဣမံ ဇမ္ဗုဒီပံ အာဂန္တွာ ယောနကဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရဿ သန္တိကေ ဗုဒ္ဓဝစနံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ ဂစ္ဆန္တော နာဝံ အဘိရူဟနတိတ္ထေ ဧကသ္မိံ ပဒေ ဥပ္ပန္နကင်္ခေါ ယောဇနသတမဂ္ဂံ နိဝတ္တိတွာ အာစရိယဿ သန္တိကံ အာဂစ္ဆန္တော [Pg.25] အန္တရာမဂ္ဂေ ဧကဿ ကုဋုမ္ဗိကဿ ပဉှံ ကထေသိ. သော ပသီဒိတွာ သတသဟဿဂ္ဃနကံ ကမ္ပလံ အဒါသိ. သောပိ တံ အာဟရိတွာ အာစရိယဿ အဒါသိ. ထေရော ဝါ သိယာ ကောဋ္ဋေတွာ နိသီဒနဋ္ဌာနေ ပရိဘဏ္ဍံ ကာရေသိ. ကိမတ္ထာယာတိ. ပစ္ဆိမာယ ဇနတာယ အနုဂ္ဂဟတ္ထာယ. ဧဝံ ကိရဿ အဟောသိ,– အမှာကံ ဂတမဂ္ဂံ အာဝဇ္ဇိတွာ အနာဂတေ သဗြဟ္မစာရိနော ပဋိပတ္တိံ ပူရေတဗ္ဗံ မညိဿန္တီတိ. တိဿတ္ထေရောပိ အာစရိယဿ သန္တိကေ ကင်္ခံ ဆိန္ဒိတွာ သီဟဠဒီပမေဝ သကဋ္ဌာနံ အာဂမာသီတိ. ဣစ္စေဝံ ပရိယတ္တိံ ဧကပဒမတ္တမ္ပိ အဝိရဇ္ဈိတွာ ဓာရဏမ္ပိ ဒုက္ကရကမ္မမေဝါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. सिंहलद्वीप में पुनब्बसु नामक कुटुम्बी का पुत्र तिस्स स्थविर बुद्धवचन सीखकर इस जम्बुद्वीप में आया और योनक धम्मरक्खित स्थविर के पास बुद्धवचन सीखकर लौटते समय, नौका पर चढ़ने के घाट पर एक पद के विषय में शंका उत्पन्न होने पर सौ योजन का मार्ग लौटकर आचार्य के पास आया। मार्ग में उसने एक कुटुम्बी को उपदेश दिया। उसने प्रसन्न होकर एक लाख मूल्य का कम्बल दिया। उसने भी उसे लाकर आचार्य को दे दिया। स्थविर ने उसे कूटकर (टुकड़े कर) बैठने के स्थान पर बिछाने का वस्त्र (परिभण्ड) बनवा लिया। किसलिए? भावी जनता के अनुग्रह के लिए। ऐसा उनका विचार था— 'हमारे द्वारा तय किए गए मार्ग का विचार कर भविष्य के सब्रह्मचारी प्रतिपत्ति को पूर्ण करना आवश्यक समझेंगे।' तिस्स स्थविर भी आचार्य के पास शंका का निवारण कर सिंहलद्वीप में अपने स्थान पर लौट आए। इस प्रकार पर्यप्ति को एक पद मात्र भी बिना त्रुटि के धारण करना दुष्कर कार्य ही है, ऐसा देखना चाहिए। ယမ္ပိ ယေဘုယျေန ပဂုဏံ န ကရောန္တိ, တဿ အနန္တရဓာနတ္ထာယ အသမ္မောသတ္ထာယ ဥဂ္ဂဟဓာရဏာဒိဝသေန ရက္ခနမ္ပိ ကရောန္တိ, တံ ဒုက္ကရကမ္မမေဝ. जो (विषय) प्रायः अभ्यस्त नहीं होते, उनके लुप्त न होने और विस्मृत न होने के लिए उद्ग्रहण (सीखने) और धारण आदि के द्वारा जो रक्षा करते हैं, वह दुष्कर कार्य ही है। သီဟဠဒီပေယေဝ ကိရ မဟာဘယေ ဧကဿေဝ ဘိက္ခုနော မဟာနိဒ္ဒေသော ပဂုဏော အဟောသိ. အထ စတုနိကာယိကတိဿတ္ထေရဿ ဥပဇ္ဈာယော မဟာတိပိဋကတ္ထေရော နာမ မဟာရက္ခိတတ္ထေရံအာဟ,– အာဝုသော မဟာရက္ခိတ အသုကဿ သန္တိကေ မဟာနိဒ္ဒေသံ ဂဏှာဟီတိ. ပါပေါကိရာယံ ဘန္တေ န ဂဏှာမီတိ. ဂဏှာဝုသော အဟံ တေ သန္တိကေ နိသီဒိဿာမီတိ. သာဓု ဘန္တေ တုမှေသု နိသိန္နေသု ဂဏှိဿာမီတိ ပဋ္ဌပတွာ ရတ္တိန္ဒိဝံ နိရန္တရံ ပရိယာပုဏန္တော ဩသာနဒိဝသေ ဟေဋ္ဌာမဉ္စေ ဣတ္ထိံ ဒိသွာ ဘန္တေ သုတံယေဝ မေ ပုဗ္ဗေ, သစာဟံ ဧဝံ ဇာနေယျံ, န ဤဒိသဿ သန္တိကေ ဓမ္မံ ပရိယာပုဏေယျန္တိ အာဟ. တဿ ပန သန္တိကေ ဗဟူ မဟာထေရာ ဥဂ္ဂဏှိတွာ မဟာနိဒ္ဒေသံ ပတိဋ္ဌာပေသုံ. ဧဝံ ယံ ယေဘုယျေန ပဂုဏံ န ကရောန္တိ, တဿ အနန္တရဓာနတ္ထာယ အသမ္မောသတ္တာယ ဥဂ္ဂဟဓာရဏာဒိဝသေန ရက္ခနမ္ပိ ဒုက္ကရကမ္မံ ယေဝါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. सिंहलद्वीप में ही महान भय (दुर्भिक्ष) के समय केवल एक ही भिक्षु को 'महानिद्देस' कंठस्थ था। तब चतुर्निकायिक तिस्स स्थविर के उपाध्याय महात्रिपिटक स्थविर ने महारक्खित स्थविर से कहा— 'आयुष्मान महारक्खित! अमुक (भिक्षु) के पास जाकर महानिद्देस सीखो।' (महारक्खित ने कहा—) 'भन्ते! वह पापी (दुराचारी) सुना जाता है, मैं नहीं सीखूँगा।' (उपाध्याय ने कहा—) 'आयुष्मान! सीखो, मैं तुम्हारे पास बैठूँगा।' (महारक्खित ने कहा—) 'साधु भन्ते! आपके बैठने पर मैं सीखूँगा।' ऐसा आरम्भ कर रात-दिन निरंतर सीखते हुए अंतिम दिन मंच (पलंग) के नीचे एक स्त्री को देखकर उन्होंने कहा— 'भन्ते! मैंने पहले सुना ही था, यदि मैं ऐसा जानता तो इस प्रकार के व्यक्ति के पास धर्म नहीं सीखता।' किन्तु उनके पास बहुत से महास्थविरों ने सीखकर महानिद्देस को प्रतिष्ठित किया। इस प्रकार जो प्रायः अभ्यस्त नहीं है, उसके लुप्त न होने और विस्मृत न होने के लिए उद्ग्रहण और धारण आदि के द्वारा रक्षा करना भी दुष्कर कार्य ही है, ऐसा देखना चाहिए। ဣစ္စေဝံ ဘဂဝတော ဓရမာနကာလတော ပဘုတိ စိရကာလံ ယထာဝုတ္တမဟာထေရပရမ္ပရာ ပရိယတ္တိံ မုခပါဌေနေဝ ဓာရေသုံ[Pg.26]. အဟောဝတ ပေါရာဏိကာနံ မဟာထေရာနံ သတိပညာသမာဓိဝေပုလ္လတာယ ဟိ တေ မုခပါဌေနေဝ ဓာရေတု သက္ကာတိ. မုခပါဌေနေဝ ပေါရာဏကတ္ထေရာနံ ပရိယတ္တိဓာရဏံ ပဉ္စနဝုတာဓိကာနိ စတုသတာနိ အဟောသိ. इस प्रकार भगवान के विद्यमान काल से लेकर लंबे समय तक पूर्वोक्त महास्थविरों की परंपरा ने पर्यप्ति को मुखपाठ (कंठस्थ) द्वारा ही धारण किया। अहो! प्राचीन महास्थविरों की स्मृति, प्रज्ञा और समाधि की प्रचुरता के कारण ही वे मुखपाठ द्वारा धारण करने में समर्थ हुए। प्राचीन स्थविरों द्वारा मुखपाठ से ही पर्यप्ति को धारण करना चार सौ पचानवे (४९५) वर्षों तक रहा। ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနတော မဟာဝံသသာရတ္ထသင်္ဂဟေသု အာဂတနယေန ဇိနစက္ကေ ပဏ္ဏာဿာဓိကေ စတုသတေ သမ္ပတ္တေ တမ္ဗပဏ္ဏိဒီပေ ရာဇူနံ အဋ္ဌာရသမကော’သဒ္ဓါတိဿဿ နာမ ရညော ပုတ္တော ဝဋ္ဋဂါမဏိ နာမ ရာဇာ ရဇ္ဇံ ပတွာ ဆဝဿကာလေ အနာဂတေ သတ္တာ ဟီနသတိပညာသမာဓိကာ ဟုတွာ န သက္ခိဿန္တိ မုခပါဌေန ဓာရေတုန္တိ ဥပပရိက္ခိတွာ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တေဟိ မဟာထေရေဟိ အနုပုဗ္ဗေန အာဂတာ ပဉ္စမတ္တာ မဟာထေရသတာ ဝဋ္ဋဂါမဏိရာဇာနံ နိဿာယ တမ္ဗပဏ္ဏိဒီပေကဒေသေ မလယဇနပဒေ အာလောကလေဏေ အဋ္ဌကထာယ သဟပိဋကတ္တယံ ပေါတ္ထကေ အာရောပေသုံ. भगवान के परिनिर्वाण के बाद महावंश और सारत्थसंग्रह में आए हुए वृत्तांत के अनुसार, जब जिन-चक्र (बुद्ध शासन) के चार सौ पचास (४५०) वर्ष पूरे हुए, तब ताम्रपर्णी द्वीप (श्रीलंका) के राजाओं में अठारहवें, राजा सद्धातिस्स के पुत्र वट्टगामणि नामक राजा ने राज्य प्राप्त किया। राज्य के छठे वर्ष में, यह विचार कर कि भविष्य में प्राणी हीन स्मृति, प्रज्ञा और समाधि वाले होकर मुखपाठ द्वारा धारण नहीं कर सकेंगे, पूर्वोक्त महास्थविरों की परंपरा से आए हुए लगभग पाँच सौ महास्थविरों ने राजा वट्टगामणि के आश्रय में ताम्रपर्णी द्वीप के एक भाग मलय जनपद की आलोक-लेण (आलोक गुफा) में अट्ठकथा सहित त्रिपिटक को पुस्तकों में लिपिबद्ध किया। တဉ္စ ယထာဝုတ္တသင်္ဂီတိယော ဥပနိဓာယ စတုတ္ထသင်္ဂီတိယေဝ နာမာတိ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဝုတ္တဉှေတံ သာရတ္ထဒီပနိယံ နာမ ဝိနယဋီကာယံ,– စတုတ္ထသင်္ဂီတိသဒိသာ ဟိ ပေါတ္ထကာရောဟသင်္ဂီတီတိ. और उसे पूर्वोक्त संगीति के सदृश 'चतुर्थ संगीति' ही नाम से जानना चाहिए। विनय-टीका 'सारत्थदीपनी' में यह कहा गया है— 'पुस्तकों में लिपिबद्ध करने वाली संगीति चतुर्थ संगीति के समान ही है।' သီဟဠဒီပေ ပန ဝဋ္ဋဂါမဏိရာဇာ မရမ္မရဋ္ဌေ သိရိခေတ္တနဂရေ ဧကော နာမ ကုက္ကုဋသီသရာဇာ စ ဧကကာလေန ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. အမရပုရမာပကဿ ရညော ကာလေ သီဟဠဒီပဘိက္ခုဟိ ဣဓ ပေသိတသန္ဒေသကထာယံ ပန တေတ္တိံသာဓိကစတုသတေ သမ္ပတ္တေ ပေါတ္ထကာရုဠံ အကံသူတိ အာဂတံ. ဝုတ္တဉှေတံ တတ္ထ,– တေတ္တိံသာဓိကစတုဝဿသတပရိမာဏကာလန္တိ. सिंहलद्वीप में राजा वट्टगामणि और म्यांमार (मरम्मरठ्ठ) के श्रीक्षेत्र नगर में कुक्कुटसीस नामक एक राजा ने एक ही समय में राज्य किया। अमरपुर के संस्थापक राजा के समय सिंहलद्वीप के भिक्षुओं द्वारा यहाँ भेजे गए संदेश-लेख में आया है कि चार सौ तैंतीस (४३३) वर्ष पूरे होने पर पुस्तकों में लिपिबद्ध किया गया। वहाँ यह कहा गया है— 'चार सौ तैंतीस वर्ष की अवधि का समय।' ဣဒံ သီဟဠဒီပေ ယာဝ ပေါတ္ထကာရုဠှာ यह सिंहलद्वीप में पुस्तकों में लिपिबद्ध होने तक (का वृत्तांत है)। သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. शासन की प्रतिष्ठा। အထာပရံ [Pg.27] ဇမ္ဗုဒီပေ သီဟဠဒီပေ စ ဘိက္ခူ ဝိသုံ ဝိသုံ ဂဏဝသေန ဘိဇ္ဇိံသု, ယထာ အနောတတ္တဒဟတော နိက္ခမနနဒိယာ ဂင်္ဂါယမုနာဒိဝသေန ဘိဇ္ဇန္တီတိ. တတ္ထ ဇမ္ဗုဒီပေ ဂဏာနံ ဘိဇ္ဇမာနတံ ဥပရိယေဝ ဝက္ခာမ. इसके बाद जम्बुद्वीप और सिंहलद्वीप में भिक्षु अलग-अलग गणों (निकायों) के रूप में विभाजित हो गए, जैसे अनवतप्त दह (झील) से निकलने वाली नदियाँ गंगा, यमुना आदि के रूप में विभाजित हो जाती हैं। वहाँ जम्बुद्वीप में गणों के विभाजन के विषय में हम आगे कहेंगे। သီဟဠဒီပေ ပန ဂဏာနံ ဘိဇ္ဇမာနတာ ဧဝံ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. ကထံ. သီဟဠဒီပေ ဟိ သာသနဿ ပတိဋ္ဌမာနကာလတော အဋ္ဌာရသာဓိ ကဒွိဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ဝဋ္ဋဂါမဏိရညာ ကာရာဝိတေ အဘယဂိရိဝိဟာရေ ပရိဝါရခန္ဓကံ ပါဌတော စ အတ္ထတော စ ဝိပလ္လာသံ ကတွာ မဟာဝိဟာရဝါသိဂဏတော ပုထု ဟုတွာ ဧကော ဂဏော ဘိဇ္ဇိ, သော အဘယဂိရိဝါသိဂဏော နာမ, ဓမ္မရုစိဂဏောတိ စ တဿေဝ နာမံ. श्रीलंका में निकायों (गणों) के विभाजन को इस प्रकार देखा जाना चाहिए। कैसे? श्रीलंका में शासन की स्थापना के समय से दो सौ अठारह (218) वर्ष बीत जाने पर, राजा वट्टगामणी द्वारा निर्मित अभयगिरि विहार में, 'परिवार' और 'खन्धक' के पाठ और अर्थ में विपर्यास (परिवर्तन) करके, महाविहारवासी निकाय से अलग होकर एक निकाय विभाजित हुआ; उसका नाम अभयगिरिवासी निकाय है, और 'धम्मरुचि निकाय' भी उसी का नाम है। အဘယဂိရိဝါသိဂဏဿ ဘိဇ္ဇမာနတော ဒွေစတ္တာလီသာဓိကတိဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ မဟာသေနေန နာမ ရညာ ကာရာပိတေ ဇေတဝနဝိဟာရေ ဘိက္ခူ ဥဘတောဝိသင်္ဂပါဌေ ဝိပရီတဝသေန အဘိသင်္ခရိတွာ အဘယဂိရိဝါသိဂဏတော ဝိသုံ ဧကော ဂဏော အဟောသိ, သော ဇေတဝနဝါသိဂဏော နာမ, သာဂလိယဂဏောတိ စ တဿေဝ နာမံ. अभयगिरिवासी निकाय के विभाजन से तीन सौ बयालीस (342) वर्ष बीत जाने पर, महासेन नामक राजा द्वारा निर्मित जेतवन विहार में, भिक्षुओं ने दोनों (विभंगों) के पाठों को विपरीत रूप से संस्कारित (परिवर्तित) करके अभयगिरिवासी निकाय से अलग एक निकाय बनाया; उसका नाम जेतवनवासी निकाय है, और 'सागलिय निकाय' भी उसी का नाम है। ဇေတဝန ဝါသိဂဏဿ ဘိဇ္ဇမာနကာလတော ဧကပညာသဝဿာဓိကာနံ တိဏ္ဏံ ဝဿသတာနံ ဥပရိ ကုရုန္ဒဝါသိနော စ ကောလမ္ဗဝါသိနော စ ဘိက္ခူ ဘာဂိနေယျံ ဒါဌာပတိံ နာမ ရာဇာနံ နိဿာယ ဥဘတောဝိဘင်္ဂပရိဝါရခန္ဓကပါဌေ ဝိပရီတဝသေန အဘိသင်္ခရိတွာ ဝုတ္တေဟိ ဒွီဟိ ဂဏေဟိ ဝိသုံ ဟုတွာ မဟာဝိဟာရ ဝါသိဂဏှတ္တမံ တုလယိတွာ ဥပဓာရေတွာ မဟာဝိဟာရနာမံ ဂဟေတွာ ဧကော ဂဏော ဘိဇ္ဇိ. ဧဝံ သီဟဠဒီပေ မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရာဒီနံ ဝံသဘူတေန မဟာဝိဟာရဝါသိ ဂဏေန သဒ္ဓိံ စတ္တာရော ဂဏာ ဘိဇ္ဇိံသု. जेतवनवासी निकाय के विभाजन काल से तीन सौ इक्यावन (351) वर्ष बाद, कुरुन्दवासी और कोलम्बवासी भिक्षुओं ने अपने भानजे दाठापति नामक राजा के आश्रय में, दोनों विभंगों, परिवार और खन्धक के पाठों को विपरीत रूप से संस्कारित करके, पूर्वोक्त दो निकायों से अलग होकर और महाविहारवासी निकाय के सार की तुलना और विचार करके, 'महाविहार' नाम ग्रहण कर एक निकाय विभाजित किया। इस प्रकार श्रीलंका में महामहिन्द थेर आदि के वंशभूत महाविहारवासी निकाय के साथ (कुल) चार निकाय विभाजित हुए। တတ္ထ မဟာဝိဟာရဝါသိ ဂဏောယေဝ ဧကော ဓမ္မဝါဒီ အဟောသိ, သေသာ ပန အဓမ္မဝါဒိနော. တေ စ တယော အဓမ္မဝါဒိနော ဂဏာ ဘူတတ္ထံ ပဟာယ အဘူတတ္ထေန ဓမ္မံ အဂရုံ ကတွာ စရိံသူတိ [Pg.28] ဝစနတော သီဟဠဒီပေ အဓမ္မဝါဒိနော တယောပိ အလဇ္ဇိနော ဂဏာ ပရိမဏ္ဍလသုပ္ပဋိစ္ဆန္နာဒိသိက္ခာပဒါနိ အနာဒိယိတွာ ဝိစရိံသု. တတော ပဋ္ဌာယ သာသနေ ဧကစ္စာနံ ဘိက္ခူနံ နာနပ္ပကာရဝသေန နိဝါသနပါရုပနာဒီနိ ဒိဿန္တိတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. उनमें महाविहारवासी निकाय ही एकमात्र धम्मवादी (धर्म का पालन करने वाला) था, जबकि शेष अधम्मवादी थे। और वे तीन अधम्मवादी निकाय सत्य अर्थ को त्यागकर असत्य अर्थ के साथ धर्म का अनादर करते हुए चले, इस कथन के अनुसार श्रीलंका में वे तीनों अधम्मवादी निर्लज्ज निकाय 'परिमण्डल' और 'सुप्पटिच्छन्न' आदि शिक्षापदों की उपेक्षा करके विचरण करने लगे। तब से शासन में कुछ भिक्षुओं के पहनावे और ओढ़ने आदि में विभिन्न प्रकार के भेद देखे जाते हैं, ऐसा जानना चाहिए। အဓမ္မဝါဒိဂဏာနံ ဘိဇ္ဇမာနကာလတော သတ္တဝီသာဓိကာနံ ပဉ္စသတာနံ ဝဿာနဉ္စ ဥပရိ သိရိသံဃဗောဓိ နာမ ရာဇာ မဟာဝိဟာရ ဂဏဿ ပက္ခော ဟုတွာ အဓမ္မဝါဒိနာ တယော ဂဏေ နိဂ္ဂဟိတွာ ဇိနသာသနံ ပဂ္ဂဟေသိ. သော စ သိရိသံဃ ဗောဓိရာဇာ အမှာကံ မရမ္မရဋ္ဌေ အရိမန္ဒနနဂရေ အနုရုဒ္ဓေန နာမ ရညာ သမကာလဝသေန ရဇ္ဇသမ္ပတ္တိံ အနုဘဝိ. अधम्मवादी निकायों के विभाजन काल से पाँच सौ सत्ताईस (527) वर्ष बाद, सिरिसंघबोधि नामक राजा ने महाविहार निकाय का पक्ष लेकर तीनों अधम्मवादी निकायों का निग्रह किया और जिन-शासन को उन्नत किया। वह राजा सिरिसंघबोधि हमारे म्यांमार देश के अरिमन्दन नगर (पगान) में अनुरुद्ध नामक राजा के समकालीन होकर राज्य-सम्पत्ति का उपभोग करता था। တတော ပစ္ဆာ သီဟဠဒီပေ ဝေါဟာရကတိဿဿ နာမ ရညော ကာလေ ကပိလေန နာမ အမစ္စေန သဒ္ဓိံ မန္တေတွာ မဟာဝိဟာရ ဝါသိနော ဘိက္ခူ နိဿာယ အဓမ္မဝါဒိဂဏေ နိဂ္ဂဏှိတွာ ဇိနသာသနံ ပဂ္ဂဏှာတိ. उसके बाद श्रीलंका में वोहारकतिस्स नामक राजा के समय में, कपिल नामक अमात्य (मंत्री) के साथ मंत्रणा करके, महाविहारवासी भिक्षुओं के आश्रय से अधम्मवादी निकायों का निग्रह कर जिन-शासन को उन्नत किया गया। တတော ပစ္ဆာ စ ဂေါဋ္ဌာဘယဿ နာမ ရညော ကာလေ အဘယဂိရိ ဝါသိနော ဘိက္ခူ ပရသမုဒ္ဒံ ပဗ္ဗာဇေတွာ မဟာဝိဟာရ ဝါသိနော ဘိက္ခူ နိဿာယ သာသနံ ဝိသောဓယိ. और उसके बाद गोठाभय नामक राजा के समय में, अभयगिरिवासी भिक्षुओं को समुद्र पार निर्वासित करके, महाविहारवासी भिक्षुओं के आश्रय से शासन का शोधन किया। တတော ပစ္ဆာပိ ဂေါဋ္ဌာဘယရညော ပုတ္တဘူတဿ မဟာသေနဿ နာမ ရညော ကာလေ အဘယဂိရိဝါသီနံ ဘိက္ခူနံ အဗ္ဘန္တရေ သံဃမိတ္တော နာမ ဧကော ဘိက္ခု ရညော ပဓာနာစရိယော ဟုတွာ မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရာဒီနံ အရဟန္တာနံ နိဝါသဋ္ဌာနဘူတံ မဟာဝိဟာရာရာမံ ဝိနဿိတုံ မဟာသေနရညာ မန္တေတွာ အာရဘိ. တဒါ နဝဝဿာနိ မဟာဝိဟာရေ ဘိက္ခု သညော အဟောသိ. အဟောဝတ မဟာထေရာနံ မဟိဒ္ဓိကာနံ နိဝါသဋ္ဌာနံ အလဇ္ဇိနော ဘိက္ခူ ဝိနဿာပေသုံ, သုဝဏ္ဏဟံဿာနံ နိဝါသဋ္ဌာနံ ကာကာ ဝိယာတိ. उसके बाद भी, राजा गोठाभय के पुत्र महासेन नामक राजा के समय में, अभयगिरिवासी भिक्षुओं के बीच संघमित्त नामक एक भिक्षु राजा का प्रधान आचार्य बनकर, महामहिन्द थेर आदि अर्हतों के निवास स्थान महाविहार को नष्ट करने के लिए राजा महासेन के साथ मंत्रणा कर आरम्भ किया। तब नौ वर्षों तक महाविहार में भिक्षुओं का नामोनिशान नहीं रहा। अहो! महान ऋद्धिमान महास्थविरों के निवास स्थान को निर्लज्ज भिक्षुओं ने नष्ट करवा दिया, जैसे कौवे स्वर्णहंसों के निवास स्थान को (नष्ट कर देते हैं)। ဇေတဝနဝါသီနဉ္စ ဘိက္ခူနံ အဗ္ဘန္တရေ ဧကော တိဿော နာမ ဘိက္ခု တေနေဝ ရညာ မန္တေတွာ မဟာဝိဟာရေ သီမံ သမူဟနိ[Pg.29]. အဆေကတ္တာ ပန တေသံ သီမသမူဟနကမ္မံ န သမ္ပဇ္ဇီတိ. အဟောဝတ ဒုဿီလာနံ ပါပကာနံ ကမ္မံ အစ္ဆရိယံ, သေယျထာပိ နာမ သာခမိဂေါ အဂ္ဂဂ္ဃော ကာသိဝတ္ထံ မဟဂ္ဃံ ဘိန္နတိ, ဧဝမေဝ ဘိန္ဒိတဗ္ဗဝတ္ထုနာ ဘေဒကပုဂ္ဂလော အတိဝိယ ဒူရော အဟောသီတိ. ဘဝန္တိ စေတ္ထ, – और जेतवनवासी भिक्षुओं के बीच तिस्स नामक एक भिक्षु ने उसी राजा के साथ मंत्रणा करके महाविहार की सीमा को समाप्त (समुद्घात) कर दिया। किन्तु अकुशलता के कारण उनका सीमा-समुद्घात का कार्य सफल नहीं हुआ। अहो! दुःशील पापियों का कर्म आश्चर्यजनक है, जैसे कोई बंदर बहुमूल्य काशी-वस्त्र को फाड़ देता है, वैसे ही भेदन करने वाला व्यक्ति भेदन की जाने वाली वस्तु से अत्यंत दूर था। इस विषय में ये गाथाएँ हैं— ယထာ သာခမိဂေါ ပါပေါ, အပ္ပဂ္ဃောယေဝ ကာသိကံ; မဟဂ္ဃံ ကစ္စ ဘိန္နံဘိန္နံ, မဟုဿာဟေန ဆိန္ဒတိ. जैसे एक नीच बंदर, जो स्वयं अल्पमूल्य का है, बहुमूल्य काशी-वस्त्र को बड़े उत्साह से फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर देता है। ဧဝံ အဓမ္မဝါဒီ ပါပေါ, ဓမ္မဝါဒိဂဏံ သုဘံ; မဟုဿာဟေန ဘိန္ဒယိ, အဟော အစ္ဆရိယော အယံ. वैसे ही पापी अधम्मवादी ने शुभ धम्मवादी निकाय को बड़े उत्साह से विभाजित किया, अहो! यह आश्चर्यजनक है। အာရကာ ဒူရတော အာသုံ, ဘိန္ဒိတဗ္ဗေဟိ ဘေဒကာ; ဘူမိတောဝ ဘဝဂ္ဂန္တော, အဟော ကမ္မံ အဇာနတန္တိ. भेदन करने वाले, भेदन की जाने वाली वस्तुओं से वैसे ही दूर थे जैसे पृथ्वी से भवाग्र (ब्रह्मलोक का उच्चतम शिखर); अहो! अज्ञानियों का कर्म! ဣစ္စေဝံ အဓမ္မဝါဒိဂဏာနံ ဗလဝတာယ ဓမ္မဝါဒိဂဏော ပရိဟာယတိ. ယထာ ဟိ ဂိဇ္ဈသကုဏဿ ပက္ခဝါတေန သုဝဏ္ဏဟံသာ ပကတိယာ ဌာတုံ န သက္ကောန္တိ, ဧဝမေဝ အဓမ္မဝါဒီနံ ဗလဝတာယ ဓမ္မဝါဒီ ပရိဟာယတိ. ဗျဂ္ဃဝနေ ဝိယ သုဝဏ္ဏမိဂေါ နိလ္လယိတွာ ဂေါစရံ ဂဏှာတိ, ယထာရုစိဝသေန ဓမ္မံ စရိတုံ ဩကာသံ န လဘိ. इस प्रकार अधम्मवादी निकायों की प्रबलता के कारण धम्मवादी निकाय का ह्रास होता है। जैसे गिद्ध पक्षी के पंखों की हवा से स्वर्णहंस स्वाभाविक रूप से नहीं रह पाते, वैसे ही अधम्मवादियों की प्रबलता से धम्मवादी का ह्रास होता है। जैसे बाघों के वन में स्वर्णमृग छिपकर विचरण करता है, वैसे ही (धम्मवादियों को) अपनी रुचि के अनुसार धर्म का आचरण करने का अवसर नहीं मिला। သီဟဠဒီပေ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနတော ဒွိသတ္တတာဓိကာနံ စတုသတာနံ ဝဿသဟဿာနဉ္စ ဥပရိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ပရိနိဗ္ဗာနတော အဋ္ဌသတ္တသတာဓိကာနံ ဝဿသဟဿာနံ ဥပရိ မဟာရာဇာ နာမ ဘူပါလော ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. သော ပန ရာဇာ ဉဒုမ္ဗရဂိရိဝါသိကဿပတ္ထေရဂ္ဂမုခါ မဟာဝိဟာရဝါသိနော ဘိက္ခူ တမေဝ ရာဇာနံ နိဿာယ သာသနေ မလံ ဝိသောဓေသုံ, ယထာ ဟေရညိကော ဟိရညေ မလန္တိ. श्रीलंका में शासन की स्थापना से एक हजार चार सौ बहत्तर (1472) वर्ष बाद और सम्यक्सम्बुद्ध के परिनिर्वाण से एक हजार सात सौ अठहत्तर (1778) वर्ष बाद, 'महाराजा' (परामक्रमबाहु प्रथम) नामक भूपाल ने राज्य किया। उस राजा और उदुम्बरगिरिवासी कस्सप थेर के नेतृत्व में महाविहारवासी भिक्षुओं ने उसी राजा के आश्रय से शासन के मल को शुद्ध किया, जैसे स्वर्णकार सुवर्ण के मल को शुद्ध करता है। မဟာဝိဟာရဝါသိဂဏတော အညေ အဓမ္မဝါဒိနာ ဥပ္ပဗ္ဗာ ဇေတွာ [Pg.30] ဝိသောဓေသုံ. သော စ မဟာရာဇာ အမှာကံ မရမ္မရဋ္ဌေ အရိမဒ္ဒနနဂရေ နရပတိစညိသူနာ နာမ ရညာ သမကာလ ဝသေန ရဇ္ဇံ ကာရေသီတိ ဝေဒိတဗ္ဗော. महाविहारवासी गण से भिन्न अन्य अधर्मवादियों को निष्कासित कर (शासन को) शुद्ध किया। यह ज्ञात होना चाहिए कि उस महाराज ने हमारे मरम्म राष्ट्र के अरिमद्दन नगर के नरपतिचञ्ञिसून नामक राजा के समकालीन शासन किया था। တတော ပစ္ဆာ ဝိ ဝိဇယဗာဟုရာဇာနံ ပရက္ကမဗာဟုရာဇာနဉ္စ နိဿာယ မဟာဝိဟာရ ဝါသိနော ဘိက္ခူ သာသနံ ပရိသုဒ္ဓံ အကံသု, အဓမ္မဝါဒိနော သဗ္ဗေပိ ဥပ္ပဗ္ဗာဇေတွာ မဟာဝိဟာရဝါသိဂဏောယေဝ ဧကော ပတိဋ္ဌဟိ, ယထာ အဗ္ဘာဒိဥပက္ကိလေသမလေဟိ ဝိမုတ္တော နိသာနာထောတိ. उसके पश्चात भी राजा विजयबाहु और राजा पराक्रमबाहु के आश्रय से महाविहारवासी भिक्षुओं ने शासन को परिशुद्ध किया, सभी अधर्मवादियों को निष्कासित कर केवल एक महाविहारवासी गण ही प्रतिष्ठित हुआ, जैसे बादलों आदि उपक्लेशों के मल से मुक्त चन्द्रमा हो। သိရိသံဃဗောဓိရာဇာ ဝေါဟာရိကတိဿရာဇာ ဂေါဋ္ဌာဘယရာဇာတိ ဧတေ ရာဇာနော သာသနံ ဝိသောဓေန္တောပိ သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ အဓမ္မဝါဒိဂဏာနံ အဝိနဿနတော သာသနံ ပရိသုဒ္ဓံ န တာဝ အဟောသိ. သိရိသံဃဗောဓိရညော မဟာရညော ဝိဇယဗာဟုရညော ပရက္ကမဗာဟုရညောတိ ဧတေသံယေဝ ရာဇူနံ ကာလေ သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ အဓမ္မဝါဒီနံ ဝိနဿနတော သာသနံ ပရိသုဒ္ဓံ အဟောသိ. တဒါ ပန အဓမ္မဝါဒိနာ သီသမ္ပိ ဥဋ္ဌဟိတုံ န သက္ကာ, ယထာ အရုဏုဂ္ဂေ ကောသိယာတိ. राजा सिरिसंघबोधि, राजा वोहारिकतिस्स और राजा गोठ्ठायभय—इन राजाओं ने शासन को शुद्ध करते हुए भी, अधर्मवादी गणों का पूर्णतः विनाश न होने के कारण शासन तब तक परिशुद्ध नहीं हुआ था। राजा सिरिसंघबोधि, महाराज विजयबाहु और राजा पराक्रमबाहु—इन्हीं राजाओं के काल में अधर्मवादियों के पूर्णतः विनाश से शासन परिशुद्ध हुआ। तब अधर्मवादी अपना सिर भी नहीं उठा सकते थे, जैसे सूर्योदय होने पर उल्लू। အပရဘာဂေ ပန စိရံ ကာလံ အတိက္ကန္တေ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိကာနံ ဝိဇာတိယာနံ ဘယေန လင်္ကာဒီပေ သာသနံ ဩသက္ကိတွာ ဂဏပူရဏမတ္တဿပိ ဘိက္ခုသံဃဿ အဝိဇ္ဇမာနတာယ မဟာဝိဇယဗာဟုရညော ကာလေ ရာမညဒေသတော သံဃံ အာနေတွာ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. बाद के समय में, बहुत काल बीत जाने पर, मिथ्यादृष्टि विजातियों के भय से लंका द्वीप में शासन का ह्रास हो गया और गण-पूर्ति (कोरम) के लिए भी भिक्षु संघ के न होने के कारण, राजा महाविजयबाहु के काल में रामञ्ञ देश से संघ को लाकर शासन प्रतिष्ठित किया गया। တတော ပစ္ဆာ စ ဝိမလဓမ္မသူရိယဿ နာမ ရညော ကာလေ ရက္ခာပုရရဋ္ဌတော သံဃံ အာနေတွာ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. တတော ပစ္ဆာ စ ဝိမလဿ နာမ ရညော ကာလေ တတောယေဝ သံဃံ အာနေတွာ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. တတော ပစ္ဆာ စ ကိတ္တိဿိရိရာဇသီဟဿ နာမ ရညော ကာလေ သျာမရဋ္ဌတော သံဃံ အာနေတွာ တထေဝ အကာသီတိ. उसके पश्चात राजा विमलधम्मसूरिय के काल में रक्खापुर राष्ट्र से संघ को लाकर शासन प्रतिष्ठित किया गया। उसके पश्चात राजा विमल के काल में वहीं से संघ को लाकर शासन प्रतिष्ठित किया गया। उसके पश्चात राजा कित्तिसिरिराजसीह के काल में स्याम राष्ट्र से संघ को लाकर वैसा ही किया गया। အယံ သီဟဠဒီပေ သာသနဿ ဩသက္ကနကထာ. यह सिंहल द्वीप में शासन के ह्रास की कथा है। တတော [Pg.31] ပစ္ဆာ ဇိနသာသနေ နဝုတာဓိကေ အဋ္ဌဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ဗုဒ္ဓဒါသဿ နာမ ရညော ကာလေ ဧကော ဓမ္မ ကထိကတ္ထေရော ဌပေတွာ ဝိနယပိဋကံ အဘိဓမ္မပိဋကဉ္စ အဝသေသံ သုတ္တန္တပိဋကံ သီဟဠဘာသာယ ပရိဝတ္တိတွာ အဘိသင်္ခရိတွာ ဌပေသိ. တဉ္စ ကာရဏံ စူဠဝံသေ ဝုတ္တံ. उसके पश्चात जिन-शासन के ८९० वर्ष बीतने पर, राजा बुद्धदास के काल में एक धर्मकथिक स्थविर ने विनयपिटक और अभिधम्मपिटक को छोड़कर शेष सुत्तन्तपिटक को सिंहल भाषा में अनूदित और संस्कारित कर स्थापित किया। यह वृत्तांत चूलवंस में कहा गया है। တဿ ကိရ ဗုဒ္ဓဒါသဿ ရညော ပုတ္တာ အသီတိမတ္တာ အသီတိမဟာသာဝကာနံ နာမေနေဝ ဝေါဟာရိတာ အဟေသုံ. တေသု ပုတ္တေသု သာရိပုတ္တတ္ထေရဿ နာမေန ဝေါဟာရိတော ဧကော ဥပတိဿော နာမ ရာဇကုမာရော ပိတရိ ဒေဝင်္ဂတေ ဒွေစတ္တာလီသဝဿာနိ ရဇ္ဇံ ကရေသိ. सुना जाता है कि उस राजा बुद्धदास के अस्सी पुत्र थे, जो अस्सी महाश्रावकों के नाम से ही पुकारे जाते थे। उन पुत्रों में सारिपुत्त स्थविर के नाम से पुकारे जाने वाले उपतिस्स नामक एक राजकुमार ने पिता के स्वर्गवासी होने पर बयालीस वर्षों तक राज्य किया। တတော ပစ္ဆာ ကနိဋ္ဌော မဟာနာမော နာမ ရာဇကုမာရော ဒွါဝီသဝဿာနိ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. တဿ ရညော ကာလေ ဇိန စက္ကေ တေတ္တိံသာဓိကနဝသတဝဿေ သီဟဠဒီပေ ဆသဋ္ဌိမတ္တာနံ ရာဇူနံ ပူရဏကာလေ ဗုဒ္ဓဃောသော နာမ ထေရော သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ သီဟဠဘာသာယ လိခိတေ အဋ္ဌကထာဂန္ထေ မာဂဓဘာသာယ ပရိဝတ္တိတွာ လိခိ. उसके पश्चात छोटे भाई महानाम नामक राजकुमार ने बाईस वर्षों तक राज्य किया। उस राजा के काल में जिन-चक्र के ९३३वें वर्ष में, सिंहल द्वीप में लगभग ६६ राजाओं की संख्या पूर्ण होने के समय, बुद्धघोष नामक स्थविर ने सिंहल द्वीप जाकर सिंहल भाषा में लिखे गए अट्ठकथा ग्रंथों को मागधी भाषा में अनूदित कर लिखा। သော ပန မဟာနာမ ရာဇာ အမှာကံ မရမ္မရဋ္ဌေ သိရိပစ္စယနဂရေ သဝိလညိကြောဝိ နာမကေန ရညာ သမကာလော ဟုတွာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. ပရိတ္တနိဒ္ဒါနေ ပန ဗြူမဝိ?ထီ? နာမကေန ရညာ သမကာလော ဟုတွာ ရဇ္ဇံ ကာရေသီတိ ဝုတ္တံ. တံ န ယုဇ္ဇတိယေဝ. उस राजा महानाम ने हमारे मरम्म राष्ट्र के सिरिपच्चय नगर के सविलञ्ञिक्रोवि नामक राजा के समकालीन होकर राज्य किया। किन्तु 'परित्तनिद्दान' में ब्रूमवीथी नामक राजा के समकालीन होकर राज्य करने की बात कही गई है। वह उचित नहीं है। သီဟဠဒီပေ ပန ကိတ္တိဿိရိမေဃော နာမ ရာဇာ ဟုတွာ နဝမေ ဝဿေ တသ္မိံယေဝ ဒီပေ ရာဇူနံ ဒွါသဋ္ဌိမတ္တာနံ ပူရဏကာလေ ဇိနစက္ကေ တိံသာဓိကေ အဋ္ဌသတဝဿေ ဇမ္ဗုဒီပေ ကလိင်္ဂပုရတော ကုဟသိဝဿ နာမ ရညော ဇာမာတာ ဒန္တကုမာရော ဟေမမာလံ နာမ ရာဇဓီတံ ဂဟေတွာ ဒါဌာဓာတုံ ထေနေတွာ နဝါယ တရိတွာ သီဟဠဒီပံ အဂမာသိ. ဇိနစက္ကေ တိံသာဓိကအဋ္ဌဝဿသတေ ဇေဋ္ဌတိဿရာဇာ နဝဝဿာနိ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. सिंहल द्वीप में राजा कित्तिसिरिमेघ के नौवें वर्ष में, उसी द्वीप में ६२ राजाओं की संख्या पूर्ण होने के समय, जिन-चक्र के ८३०वें वर्ष में, जम्बुद्वीप के कलिंगपुर से राजा कुहसिव के जामाता दन्तकुमार, हेममाला नामक राजकुमारी को लेकर और दाठाधातु (दन्त धातु) को गुप्त रूप से लेकर, नौका द्वारा पार कर सिंहल द्वीप आए। जिन-चक्र के ८३०वें वर्ष में राजा जेट्ठतिस्स ने नौ वर्षों तक राज्य किया। ဗုဒ္ဓဒါသရာဇာ [Pg.32] ဧကူနတိံသတိ ဝဿာနိ ဥပလိဿရာဇာ စဒွိစတ္တာလီသဝဿာနိ မဟာနာမရာဇာ ဒွါဝီသဝဿာနီတိ သဗ္ဗာနိ သမ္ပိဏ္ဍိတွာ ဇိနသာသနံ ဒွတ္တိံသာဓိကနဝဝဿသတပ္ပမာဏံ ဟောတိ. राजा बुद्धदास के २९ वर्ष, राजा उपतिस्स के ४२ वर्ष और राजा महानाम के २२ वर्ष—इन सबको जोड़ने पर जिन-शासन का समय ९३२ वर्ष होता है। တသ္မိဉ္စ ကာလေ ယဒါ ဒွီဟိ ဝဿေဟိ ဦနံ အဟောသိ, တဒါ မဟာနာမရညော ကာလေ တိံသာဓိကနဝဝဿသတမတ္တေ သာသနေ ဗုဒ္ဓဃောသော နာမ ထေရော လင်္ကာဒီပံ အဂမာသိ. उस समय जब (९३२ वर्ष में) दो वर्ष कम थे, तब राजा महानाम के काल में शासन के लगभग ९३०वें वर्ष में बुद्धघोष नामक स्थविर लंका द्वीप गए। အမရပုရမာပကဿ ရညော ကာလေ သီဟဠဒီပိကေဟိ ဘိက္ခူဟိ ပေသိတသန္နေသပဏ္ဏေ ပန ဆပဏ္ဏာသာဓိကနဝဝဿသတာတိက္ကန္တေ သူတိ ဝုတ္တံ. अमरपुर के संस्थापक राजा के काल में सिंहल द्वीप के भिक्षुओं द्वारा भेजे गए सन्देश-पत्र में तो ९५६ वर्ष बीत जाने पर (बुद्धघोष के आने की बात) कही गई है। ဧတ္ထ ဌတွာ ဗုဒ္ဓဃောသတ္ထေရဿ အဋ္ဌုပ္ပတ္တိံသင်္ခေပမတ္တံ ဝက္ခာမ. ကထံ. သီဟဠဘာသက္ခရေဟိ ပရိဝတ္တိတံ ပရိယတ္တိသာသနံ မာဂဓသာသက္ခရေန ကော နာမ ပုဂ္ဂလော ပရိဝတ္တိတုံ သက္ခိဿတီတိ မဟာထေရာ နိမန္တယိတွာ တာဝတိံသဘဝနံ ဂန္တွာ ဃောသံ ဒေဝပုတ္တံ ဒိသွာ သဒ္ဓိံ သက္ကေန ဒေဝါနမိန္ဒေန တံ ယာစိတွာ ဗောဓိရုက္ခသမီပေ ဃောသဂါမေ ကေသဿ နာမ ဗြာဟ္မဏဿ ကေသိယာ နာမ ဗြာဟ္မဏိယာ ကုစ္ဆိမှိ ပဋိသန္ဓိံ ဂဏှာပေသုံ. ခါဒထ ဘောန္တော ပိဝထ ဘောန္တောတိအာဒိနာ ဗြာဟ္မဏာနံ အညမညံ ဃောသကာလေ ဝိဇာယနတ္တာ ဃောသောတိ နာမံ အကာသိ. သတ္တဝဿိကကာလေ သော တိဏ္ဏံ ဝေဒါနံ ပါရဂူ အဟောသိ. यहाँ रुककर हम स्थविर बुद्धघोष की संक्षिप्त जीवनी कहेंगे। कैसे? "सिंहल भाषा के अक्षरों में अनूदित परियत्ति-शासन को मागधी भाषा के अक्षरों में कौन व्यक्ति अनूदित कर सकेगा?"—ऐसा विचार कर महास्थविरों ने निमन्त्रण दिया और तावतिंस भवन जाकर घोष नामक देवपुत्र को देखा और देवराज सक्क के साथ उससे याचना की, और बोधिवृक्ष के समीप घोष नामक गाँव में केस नामक ब्राह्मण की पत्नी केशिया नामक ब्राह्मणी के गर्भ में उसका प्रतिसन्धि ग्रहण कराया। "हे महानुभावों! खाइए, हे महानुभावों! पीजिए" आदि कहते हुए ब्राह्मणों के परस्पर शोर (घोष) करने के समय जन्म लेने के कारण उसका नाम 'घोष' रखा गया। सात वर्ष की आयु में वह तीनों वेदों का पारंगत हो गया। အထ ခေါ ဧကေန အရဟန္တေန သဒ္ဓိံ ဝေဒကထံ သလ္လပန္တော တံ ကထံ နိဋ္ဌာပေတွာ ကုသလာ ဓမ္မာ အကုသလာ ဓမ္မာ အဗျာကတာ ဓမ္မာတိအာဒိနာ ပရမတ္ထဝေဒံ နာမ ဗုဒ္ဓမန္တံ ပုစ္ဆိ. တဒါ သော သုတွာ ဥဂ္ဂဏှိတုကာမော ဟုတွာ တဿ အရဟန္တဿ သန္တိကေ ပဗ္ဗဇိတွာ ဒေဝသိကံ ဒေဝသိကံ ပိဋကတ္တယံ သဋ္ဌိမတ္တေဟိ ပဒသဟဿေဟိ သဇ္ဈာယံ အကာသိ, ဝါစုဂ္ဂတံ အကာသိ. ဧကမာသေနေဝ တိဏ္ဏံ ပိဋကာနံ ပါရဂူ အဟောသိ. तब एक अरहंत के साथ वेद-कथा करते हुए, उस चर्चा को समाप्त कर, 'कुशल धर्म, अकुशल धर्म, अव्याकृत धर्म' आदि के माध्यम से 'परमार्थ वेद' नामक बुद्ध-मन्त्र के विषय में पूछा। तब उसने सुनकर, उसे सीखने का इच्छुक होकर, उस अरहंत के पास प्रव्रजित होकर प्रतिदिन साठ हजार पदों के साथ त्रिपिटक का स्वाध्याय किया, उसे कंठस्थ किया। एक महीने में ही वह तीनों पिटकों का पारगामी हो गया। တတော [Pg.33] ပစ္စာ ရဟော ဧကကောဝ နိသိန္နဿ ဧတဒဟောသိ,– ဗုဒ္ဓဘာသိတေ ပိဋကတ္တယေ မမ ဝါ ပညာ အဓိကာ, ဥဒါဟု ဥပဇ္ဈာယဿ ဝါတိ. တံ ကာရဏံ ဉတွာ ဥပဇ္ဈာစရိယော နိဂ္ဂဟံ ကတွာ ဩဝဒိ. သော သံဝေဂပ္ပတ္တော ဟုတွာ ခမာပေတုံ ဝန္ဒိ. ဥပဇ္ဈာစရိယော တွံ အာဝုသော သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ ပိဋကတ္တယံ သီဟဠဿာသက္ခရေန လိခိတံ မာဂဓဘာသက္ခရေန လိခါဟိ, ဧဝံ သတိ အဟံ ခမိဿာမီတိ အာဟ. उसके बाद, एकांत में अकेले बैठे हुए उसे यह विचार आया— "बुद्ध-भाषित त्रिपिटक में मेरी प्रज्ञा अधिक है या उपाध्याय की?" उस कारण को जानकर उपाध्याय आचार्य ने उसे निरुत्तर कर उपदेश दिया। वह संवेग को प्राप्त होकर क्षमा माँगने के लिए वन्दना करने लगा। उपाध्याय आचार्य ने कहा— "आयुष्मान्, तुम सिंहलद्वीप जाकर सिंहल अक्षरों में लिखे गए त्रिपिटक को मागधी भाषा के अक्षरों में लिखो, ऐसा होने पर ही मैं तुम्हें क्षमा करूँगा।" ဗုဒ္ဓဃောသော စ ပိတရံ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိဘာဝတော မောစေတွာ အာစရိယဿ ဝစနံ သိရသာ ပဋိဂ္ဂဟေတွာ ပိဋကတ္တယံ လိခိတုံ သီဟဠဒီပံ နာဝါယ အဂမာသိ. တဒါ သမုဒ္ဒမဇ္ဈေ တီဟိ ဒိဝသေဟိ တရန္တေ ဗုဒ္ဓဒတ္တတ္ထေရော စ သီဟဠဒီပတော နာဝါယ အာဂစ္ဆန္တော အန္တရာမဂ္ဂေ ဒေဝါန အာနုဘာဝေန အညမညံ ပဿိတွာ ကာရဏံ ပုစ္ဆိတွာ ဇာနိ. ဇာနိတွာ စ ဗုဒ္ဓဒတ္တတ္ထေရော ဧဝမာဟ,- မယာ အာဝုသော ကတော ဇိနာလင်္ကာရော အပ္ပဿာရောတိ မညိတွာ ပိဋကတ္တယံ ပရိဝတ္တိတုံ လိခိတုံ ဩကာသံ နာဒါသုံ, တွံ ပန ပိဋကတ္တယံ သံဝဏ္ဏေဟီတိ ဝတွာ အတ္တနော သက္ကေန ဒေဝါနမိန္ဒေန ဒိန္နံ ဟရိတကိဖလံ အယောမယလေခန ဒဏ္ဍံ နိသိတသိလဉ္စ ဗုဒ္ဓဃောသတ္ထေရဿ အဒါသိ. ဧဝံ တေသံ ဒွိန္နံ ထေရာနံ အညမညံ သလ္လပန္တာနံယေဝ နာဝါ သယမေဝ အပနေတွာ ဂစ္ဆိံသု. और बुद्धघोष ने अपने पिता को मिथ्यादृष्टि से मुक्त कर, आचार्य के वचन को सिर झुकाकर स्वीकार किया और त्रिपिटक लिखने के लिए नाव से सिंहलद्वीप चले गए। तब समुद्र के बीच में तीन दिनों तक यात्रा करते समय, सिंहलद्वीप से नाव द्वारा आ रहे बुद्धदत्त स्थविर और (बुद्धघोष) ने मार्ग के बीच में देवताओं के अनुभाव से एक-दूसरे को देखा और कारण पूछकर जाना। जानकर बुद्धदत्त स्थविर ने इस प्रकार कहा— "आयुष्मान्, मेरे द्वारा रचित 'जिनालंकार' को अल्प-सार मानकर उन्होंने मुझे त्रिपिटक का अनुवाद करने और लिखने का अवसर नहीं दिया, किन्तु तुम त्रिपिटक की व्याख्या करो।" ऐसा कहकर उन्होंने शक्र देवेन्द्र द्वारा दिए गए हरड़ के फल, लोहे की लेखनी और सान को बुद्धघोष स्थविर को दे दिया। इस प्रकार उन दोनों स्थविरों के आपस में बातचीत करते समय ही नावें स्वयं ही दूर हटकर चली गईं। ဗုဒ္ဓဃောသတ္ထေရော စ သီဟဠဒီပံ ပတွာ ပဌမံ သံဃပါလတ္ထေရံ ပဿိတွာ ပိဋကတ္တယံ မာဂဓဘာသက္ခရေန ပရိဝတ္တေတုံ အာဂတောမှီတိ ကာရဏံ အာရောစေတွာ သီဟဠဘိက္ခူ စ သီလေ ပတိဋ္ဌာယာတိအာဒိဂါထံ နိယျာဒေတွာ ဣမိဿာ ဂါထာယ အတ္ထံ ပိဋကတ္တယံ အာလောလေတွာ သံဝဏ္ဏေဟီတိ ဥယျောဇေသုံ, တသ္မိံယေဝ ဒိဝသေ သာယနှကာလတော ပဋ္ဌာယ ယထာဝုတ္တဂါထံ ပမုခံ ကတွာ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂံ အကာသိ. ကတွာ တံ ကမ္မံ နိပ္ဖာဒေတွာ တဿ ဉာဏပ္ပဘဝံ ဝီမံသေတုကာမော ဒေဝါနမိန္ဒော တဉ္စ ဂန္ထံ အန္တရဓာပေသိ. ပုနာပိ ထေရော အကာသိ[Pg.34]. တထေဝ ဒေဝါနမိန္ဒော အန္တရဓာပေသိ. ပုနာပိ ထေရော အကာသိ. ဧဝံ တိက္ခတ္တုံ ကာရာပေတွာ ပုဗ္ဗဂန္ထေပိ ဒဿေသိ. တိဏ္ဏမ္ပိ ဂန္ထာနံ အညမညံ ဧကပဒမတ္တေနပိ ဝိသေသတာ နတ္ထိ သံဃပါလတ္ထေရော စ တံ အာရာဓယိတွာ ပိဋကတ္တယံ နိယျာဒေသိ. ဧဝံ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေ သံဃပါလတ္ထေရဿ ယာစနံ အာရဗ္ဘ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂေါ ကတောတိ အာဂတံ. ဗုဒ္ဓဃောသုပ္ပတ္တိကထာယံ ပန သံဃရာဇတ္ထေရဿ အာယာစနံ အာရဗ္ဘာတိ အာဂတံ. बुद्धघोष स्थविर ने सिंहलद्वीप पहुँचकर पहले संघपाल स्थविर से भेंट की और कारण बताया कि "मैं त्रिपिटक को मागधी भाषा के अक्षरों में अनुवाद करने आया हूँ।" सिंहल भिक्षुओं ने 'सीले पतिट्ठाय' आदि गाथा उन्हें दी और कहा— "इस गाथा के अर्थ को त्रिपिटक के साथ मथकर व्याख्या करो।" उसी दिन सायंकाल से ही उन्होंने उक्त गाथा को प्रमुख बनाकर 'विशुद्धिमग्ग' की रचना की। उस कार्य को पूरा करने के बाद, उनके ज्ञान के प्रभाव की परीक्षा लेने के इच्छुक देवेन्द्र ने उस ग्रन्थ को अंतर्धान कर दिया। स्थविर ने पुनः रचना की। देवेन्द्र ने उसे भी अंतर्धान कर दिया। स्थविर ने तीसरी बार रचना की। इस प्रकार तीन बार लिखवाकर उन्होंने पिछले ग्रन्थों को भी प्रदर्शित किया। तीनों ही ग्रन्थों में परस्पर एक पद मात्र का भी अंतर नहीं था। संघपाल स्थविर ने प्रसन्न होकर उन्हें त्रिपिटक सौंप दिया। इस प्रकार 'विशुद्धिमग्ग' में आया है कि संघपाल स्थविर की याचना पर 'विशुद्धिमग्ग' रचा गया। किन्तु 'बुद्धघोषुप्पत्तिकथा' में आया है कि संघराज स्थविर की प्रार्थना पर (रचा गया)। အယံ ဗုဒ္ဓဃောသုပ္ပတ္တိကထာယံ အာဂတနယေန ဒဿိတဗုဒ္ဓဃောသုပ္ပတ္တိကထာသင်္ခေပေါ. यह 'बुद्धघोषुप्पत्तिकथा' में आए हुए वृत्तांत के अनुसार दिखाया गया बुद्धघोष की उत्पत्ति की कथा का संक्षेप है। စူဠဝံသေ ပနေဝံ အာဂတော. ဗုဒ္ဓဃောသတ္ထေရော နာမ မဟာဗောဓိရုက္ခသမီပေ ဧကသ္မိံ ဗြာဟ္မဏဂါမေ ဝိဇာတော တိဏ္ဏမ္ပိ ဝေဒါနံ ပါရဂူ အဟောသိ တေသု တေသု ဝါဒေသု စ အတိဆေကော. သော အညေဟိ စ သဒ္ဓိံ ပုစ္ဆာဗျာကရဏကမ္မံ ကတ္တုကာမော ဇမ္ဗုနီပတလေ အာဟိဏ္ဍန္တော ဧကံ ဝိဟာရံ ပတွာ တသ္မိံ ဝါ အာဂန္တုကဘာဝေန နိသီဒိ. တသ္မိဉ္စ ဝိဟာရေ ရေဝတော နာမ ထေရော ဝသိ. တေန ထေရေန သဒ္ဓိံ ဘလ္လပန္တော သော ဗြာဟ္မဏမာဏဝေါ တီသု ဝေဒေသု အလောလေတွာ ပဉှံ ပုစ္ဆိ. ပုစ္ဆိတံ ပုစ္ဆိတံ ထေရော ဗျာကာသိ. ထေရဿ ပန ပုစ္ဆိတံ ပဉှံ မာဏဝေါ န သက္ကာ ဗျာကာတုံ. အထ မာဏဝေါ ပုစ္ဆိ,–ကော နာမာယံ ဘန္တေ မန္တောတိ. ဗုဒ္ဓမန္တော နာမာယန္တိ ဝုတ္တေ ဥဂ္ဂဏှိတုကာမော ဟုတွာ ထေရဿ သန္တိကေ ပဗ္ဗဇိတွာ ပိဋကတ္တယံ ဥဂ္ဂဏှိ. အစိရနေဝ တိဏ္ဏမ္ပိ ပိဋကာနံ ပါရဂူ အဟောသိ. ဗုဒ္ဓဿေဝ ဃောသော ယဿ အတ္ထီတိ ဗုဒ္ဓဃောသောတိ နာမေန ပါကဋော အဟောသိ. 'चूलवंस' में इस प्रकार आया है— बुद्धघोष स्थविर नामक व्यक्ति महाबोधि वृक्ष के समीप एक ब्राह्मण गाँव में उत्पन्न हुए थे, वे तीनों वेदों के पारगामी थे और विभिन्न वाद-विवादों में अत्यंत निपुण थे। वे दूसरों के साथ प्रश्न-उत्तर का कार्य करने के इच्छुक होकर जम्बूद्वीप के धरातल पर भ्रमण करते हुए एक विहार में पहुँचे और वहाँ एक आगंतुक के रूप में बैठ गए। उस विहार में रेवत नामक स्थविर रहते थे। उन स्थविर के साथ चर्चा करते हुए उस ब्राह्मण युवक ने तीनों वेदों को मथकर प्रश्न पूछे। स्थविर ने पूछे गए प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दिया। किन्तु स्थविर द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर वह युवक नहीं दे सका। तब युवक ने पूछा— "भन्ते, यह कौन सा मन्त्र है?" "यह बुद्ध-मन्त्र है"— ऐसा कहे जाने पर, उसे सीखने का इच्छुक होकर उसने स्थविर के पास प्रव्रजित होकर त्रिपिटक का अध्ययन किया। शीघ्र ही वह तीनों पिटकों का पारगामी हो गया। "बुद्ध के समान ही जिसका घोष है", इस कारण वह 'बुद्धघोष' नाम से प्रसिद्ध हुआ। ဗုဒ္ဓဃောသော စ အာယသ္မတော ရေဝတဿ သန္တိကေ နိသီဒန္တော ဉာဏောဒယံ နာမ ဂန္ထံ အဋ္ဌဿာလိနိဉ္စ နာမ ဂန္ထံ အကာသိ. တတော ပစ္ဆာ ပရိတ္တဋ္ဌကထံ ကတ္တုကာမော ဟုတွာ အာရဘိ. တဒါ အာစရိယော ဧဝမာဟ,– ဇမ္ဗုဒီပေ ပန အာဝုသော ပါဠိမတ္တံယေဝ အတ္ထိ, အဋ္ဌကထာ ပန နတ္ထိ, အာစရိယဝါဒေါ စ [Pg.35] ဘိန္နော ဟုတွာ အတ္ထိ, တေနေဝ မဟာမဟိန္ဓတ္ထေရေန အာနိတာ အဋ္ဌကထာ တီသု စ သင်္ဂီတီသု အာရုဠော ပါဠိယော သာရိပုတ္တတ္ထေရာဒီဟိ ဒေသိတော ကထာမဂ္ဂေါ သီဟဠဒီပေ အတ္ထိ, တွံ ဂန္တွာ မာဂဓဘာသက္ခရေန လိခေဟီတိ ဥယျောဇိယမာနော ဗုဒ္ဓဃောသတ္ထေရော သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ အနုရာဓပုရေ မဟာဝိဟာရံ ပဝိသိတွာ သံဃပါလတ္ထေရဿ သန္တိကေ သဒ္ဓိံ သီဟဠဋ္ဌကထာယ ထေရဝါဒေ သုတွာ အဋ္ဌကထံ ကရိဿမီတိ အာရောစေသိ. သီဟဠဘိက္ခူ စ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ သီလေ ပတိဋ္ဌာယာတိအာဒိ ဂါထာ နိယျာဒေသုံ. ဗုဒ္ဓဃောသော စ သဒ္ဓိံ အဋ္ဌကထာယ ပိဋကတ္တယံ သင်္ခိပိတွာ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂံ အကာသိ. बुद्धघोष ने आयुष्मान् रेवत के पास रहते हुए 'ज्ञानोदय' नामक ग्रन्थ और 'अट्ठसालिनी' नामक ग्रन्थ की रचना की। उसके बाद उन्होंने संक्षिप्त अट्ठकथा बनाने की इच्छा से कार्य आरम्भ किया। तब आचार्य ने इस प्रकार कहा— "आयुष्मान्, जम्बूद्वीप में तो केवल पालि मात्र ही है, अट्ठकथा नहीं है, और आचार्यों के मत भी भिन्न-भिन्न हो गए हैं। महामहिन्द स्थविर द्वारा ले जाई गई अट्ठकथा, जो तीनों संगीतियों में आरूढ़ पालि के अनुसार है और सारिपुत्त स्थविर आदि द्वारा उपदिष्ट कथा-मार्ग है, वह सिंहलद्वीप में है। तुम वहाँ जाकर उसे मागधी भाषा के अक्षरों में लिखो।" इस प्रकार भेजे जाने पर बुद्धघोष स्थविर सिंहलद्वीप गए और अनुराधापुर के महाविहार में प्रवेश कर संघपाल स्थविर के पास सिंहल अट्ठकथा के साथ थेरवाद को सुनकर "मैं अट्ठकथा की रचना करूँगा"— ऐसा निवेदन किया। सिंहल भिक्षुओं ने पूर्वोक्त रीति से ही 'सीले पतिट्ठाय' आदि गाथा उन्हें सौंपी। बुद्धघोष ने अट्ठकथा के साथ त्रिपिटक को संक्षेपित कर 'विशुद्धिमग्ग' की रचना की। ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေနေဝ သက္ကော အန္တရဓာပေတွာ တိက္ခတ္တုံ ကာရာပေသိ. သံဃပါလတ္ထေရောပိ အရာဓယိတွာ ပိဋကတ္တယံ နိယျာဒေသီတိ. पूर्वोक्त विधि के अनुसार ही शक्र ने (उसे) अंतर्धान कराकर तीन बार करवाया। स्थविर संघपाल ने भी आराधना (प्रार्थना) कर त्रिपिटक को समर्पित कर दिया। ကိဉ္စာပိ နာနာ ဂန္ထေသု နာနာကာရေဟိ ဗုဒ္ဓဃောသုပ္ပတ္တိ အာဂတာ, တထာပိ ဗုဒ္ဓဃောသတ္ထေရဿ သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ ပိဋကတ္တယဿ လိခနံ အဋ္ဌကထာနဉ္စ ကရဏမေဝ ပမာဏန္တိ မနောကိလိဋ္ဌံ န ဥပ္ပာဒေတဗ္ဗန္တိ. ဗုဒ္ဓဃောသတ္ထေရော ဝိကဋတ္တယံ လိခိတွာ ဇမ္ဗုဒီပံ ပစ္စာဂမာသိ. यद्यपि विभिन्न ग्रंथों में विभिन्न प्रकार से बुद्धघोष की उत्पत्ति (जीवन-वृत्त) आई है, तथापि स्थविर बुद्धघोष का सिंहलद्वीप जाकर त्रिपिटक का लेखन और अट्ठकथाओं का निर्माण करना ही प्रमाण है, (इस विषय में) मन में संशय उत्पन्न नहीं करना चाहिए। स्थविर बुद्धघोष त्रिपिटक (ग्रंथत्रय) लिखकर जम्बुद्वीप लौट आए। ဣစ္စေဝံ ပါဠိဘာသာယ ပရိယတ္တိံ ပရိဝတ္တိတွာ ပစ္ဆာ အာစရိယပရမ္ပရသိဿာနုသိဿဝသေန သီဟဠဒီပေ ဇိနစက္ကံ မဇ္ဈန္တိ ကံသုမာသီ ဝိယ အတိဒိဗ္ဗတိ, အနေကကောဋိပ္ပမာဏေဟိ သောတာပန္နသကဒါဂါမိအနာဂါမိအရဟန္တေဟိ လင်္ကာဒီပံ အတိသောဘတိ, သဗ္ဗပါလိဖုလ္လေန တိယောဇနိကပါရိစ္ဆတ္တကရုက္ခေန တာဝတိံသဘဝနံ ဝိယ သတပတ္တပဒုမာဒီဟိ မဟာပေါက္ခရဏီ ဝိယ တေသု တေသု ဌာနေသု မဂ္ဂမဟာမဂ္ဂအာပကဃရဒွါရတိတ္ထဝနပဗ္ဗတဂုဟမန္ဒိရဝိဟာရသာလာဒီသု အလဒ္ဓမဂ္ဂဖလဋ္ဌာနံ နာမ ကိဉ္စိ နတ္ထိ, ထောကံ အာဂမေတွာ ပိဏ္ဍာယ ပတိဋ္ဌမာနပဒေသေပိ မဂ္ဂဖလာနိ လဘိံသုယေဝ. इस प्रकार पालि भाषा में पर्यत्ति (धर्म-शिक्षा) को परिवर्तित कर, बाद में आचार्य-परम्परा और शिष्य-प्रशिष्यों के माध्यम से सिंहलद्वीप में जिन-चक्र (बुद्ध-शासन) मध्याह्न के सूर्य के समान अत्यधिक देदीप्यमान हुआ। अनेक करोड़ों की संख्या में स्रोतापन्न, सकदागामी, अनागामी और अर्हतों से लंकाद्वीप अति सुशोभित हुआ। जैसे पूर्णतः प्रफुल्लित तीन योजन वाले पारिजात वृक्ष से तावतिंस भवन और शतदल कमलों आदि से महापुष्करिणी सुशोभित होती है, वैसे ही उन-उन स्थानों में—मार्गों, महामार्गों, दुकानों, घरों के द्वारों, घाटों, वनों, पर्वतों, गुफाओं, मंदिरों, विहारों और शालाओं आदि में—ऐसा कोई स्थान नहीं था जहाँ मार्ग-फल प्राप्त न हुआ हो। थोड़ी देर रुककर भिक्षा के लिए खड़े होने वाले स्थानों पर भी उन्होंने मार्ग-फल प्राप्त किए। မဂ္ဂဖလာနိ သစ္ဆိကရောန္တာနံ ပုဂ္ဂလာနံ ဗာဟုလ္လတာယ အယံ [Pg.36] ပုထုဇ္ဇနော အယံ ပုထုဇ္ဇနောတိ အင်္ဂုလိံ ပသာရေတွာ ဒဿေတဗ္ဗော ဟောတိ. ဧကသ္မိံ ကာလေ သီဟဠဒီပေ ပုထုဇ္ဇန ဘိက္ခု နာမ နတ္ထိ. တထာ ဟိ ဝုတ္တံ ဝိဘင်္ဂဋ္ဌကထာယံ, ဧကဝါရံ ပုထုဇ္ဇနဘိက္ခု နာမ နတ္ထီတိ. मार्ग-फलों का साक्षात्कार करने वाले पुद्गलों (व्यक्तियों) की बहुलता के कारण, "यह पृथग्जन है, यह पृथग्जन है" ऐसा उँगली फैलाकर दिखाना पड़ता था। एक समय सिंहलद्वीप में पृथग्जन भिक्षु नाम की कोई चीज़ नहीं थी। जैसा कि विभंग-अट्ठकथा में कहा गया है—"एक समय (वहाँ) पृथग्जन भिक्षु नहीं थे।" အဘိညာလာဘီနံ ကိရ မဟိဒ္ဓိကာနံ ဂမနာဂမနဝသေန သူရိယောဿာသံ အလဘိတွာ ဓညကောဋ္ဋကာ မာတုဂါမာ ဓညကောဋ္ဋိတုံ ဩကာသံ န လဘိံသု. कहा जाता है कि अभिज्ञा-प्राप्त महा-ऋद्धिमानों के (आकाश मार्ग से) आने-जाने के कारण सूर्य का प्रकाश न मिल पाने से अनाज कूटने वाली महिलाओं को अनाज कूटने का अवसर नहीं मिला। ဒေဝလောကတော သုမနသာမဏေရော ဒက္ခိဏက္ခကံ သီဟဠဒီပံ အနေတွာ တဿ ပါဋိဟာရိယံ ဒဿနဝသေန ဥဒ္ဓကဗိန္ဓူဟိ တိယောဇနသတံ သကလမ္ပိ လင်္ကာဒီပံ ဗျာပတွာ ဘဂဝတာ ပရိဘုတ္တစေတိယင်္ဂဏံ ဝိယ ဟုတွာ နဝါယ ဂစ္ဆန္တာ မဟာသမုဒ္ဒေ ဥဒကတော နာဠိကေရမတ္တမ္ပိ ဒိသွာ သကလင်္ကာဒီပံ ပူဇေန္တိ, မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရဿ သန္တိကေ အရိဋ္ဌတ္ထေရေန သဒ္ဓိံ ပဉ္စမတ္တာ ဘိက္ခုသတာ ပဌမံ တာဝ ဝိနယပိဋကံ ဥဂ္ဂဏှိံသူတိ ဣမေဟိ ကာရဏေဟိ လင်္ကာဒီပံ ဇိနစက္ကဿ ပတိဋ္ဌာနံ ဟုတွာ ဝရဒီပန္တိ နာမံ ပဋိလဘိ. देवलोक से सुमन सामणेर द्वारा दक्षिण जत्रु-अस्थि (हँसली की हड्डी) को सिंहलद्वीप लाने और उसके प्रातिहार्य के दर्शन के प्रभाव से, जल की बूंदों द्वारा तीन सौ योजन वाले संपूर्ण लंकाद्वीप में व्याप्त होकर, वह भगवान द्वारा परिभुक्त चैत्य-प्रांगण के समान हो गया। समुद्र में नौका से जाने वाले लोग जल से नारियल के आकार का (द्वीप) देखकर भी संपूर्ण लंकाद्वीप की पूजा करते हैं। महामहिन्द स्थविर के पास अरिट्ठ स्थविर के साथ लगभग पाँच सौ भिक्षुओं ने सर्वप्रथम विनयपिटक का अध्ययन किया। इन कारणों से लंकाद्वीप जिन-चक्र का प्रतिष्ठान बनकर 'वरद्वीप' नाम से प्रसिद्ध हुआ। သီဟဠဒီပေယေဝ ပိဋကတ္တယံ ပေါတ္ထကာရုဠဝသေန ပတိဋ္ဌာပေတွာ တတော ပစ္ဆာ စောရနာဂဿ နာမ ရညော ကာလေ သကလလင်္ကာဒီပံ ဒုဗ္ဘိက္ခဘယေန ပီဠေတွာ ပိဋကတ္တယံ ဓာရေန္တာ ဘိက္ခူ ဇမ္ဗုဒီပံ အာဂမံသု. အနာဂန္တွာ တတ္ထေဝ ဌိတာပိ ဘိက္ခူ ဆာတကဘယေန ပီဠေတွာ ဥဒရပဋလံ ဗန္ဓိတွာ ကုစ္ဆိံ ဝါလုကရာသိမှိ ဌပေတွာ ပိဋကတ္တယံ ဓာရေသုံ. सिंहलद्वीप में ही त्रिपिटक को पुस्तक-आरूढ़ (लिखित) रूप में प्रतिष्ठित कर, उसके बाद चोरनाग नामक राजा के काल में संपूर्ण लंकाद्वीप के दुर्भिक्ष (अकाल) के भय से पीड़ित होने पर, त्रिपिटक को धारण करने वाले भिक्षु जम्बुद्वीप आ गए। जो भिक्षु नहीं आए और वहीं रहे, उन्होंने भूख के भय से पीड़ित होने पर भी पेट पर पट्टी बाँधकर और पेट को बालू के ढेर पर रखकर त्रिपिटक को सुरक्षित रखा। ကုဋ ကဏ္ဏတိဿဿ ရညော ကာလေယေဝ ဒုဗ္ဘိက္ခဘယံ ဝူပသမိတွာ ဇမ္ဗုဒီပတော ဘိက္ခူ ပုန ဂန္တွာ သီဟဠဒီပေ ဌိတေဟိ ဘိက္ခူဟိ သဒ္ဓိံ မဟာဝိဟာရေ ပိဋကတ္တယံ အဝိရောဓာပေတွာ သမသမံ ကတွာ ဌပေသုံ. ဌပေတွာ စ ပန သီဟဠဒီပေယေဝ သုဋ္ဌု ဓာရေသုံ. राजा कुट कण्णतिस्स के काल में ही दुर्भिक्ष का भय शांत होने पर, जम्बुद्वीप से भिक्षु पुनः गए और सिंहलद्वीप में स्थित भिक्षुओं के साथ महाविहार में त्रिपिटक का मिलान कर, उसे निर्दोष और समान बनाकर स्थापित किया। और स्थापित करके सिंहलद्वीप में ही उसे भली-भाँति सुरक्षित रखा। တတ္ထေဝ အဋ္ဌကထာယော ဗုဒ္ဓဃောသတ္ထေရော မာဂဓဘာသာယ ပရိဝတ္တေတွာ ဝိရစိ. ပစ္ဆာ စ ယေဘုယျေန တတ္ထေဝ အဋ္ဌကထာဋီကာအနုမဓုလက္ခဏဂဏ္ဌိဂန္ထန္တရာနိ [Pg.37] အကံသု. ပုန သာသနံ နဘေ ရဝိန္ဒုဝ ပါကဋန္တိ. वहीं स्थविर बुद्धघोष ने अट्ठकथाओं को मागधी भाषा में अनूदित कर उनकी रचना की। बाद में अधिकांशतः वहीं अट्ठकथा, टीका, अनुटीका, मधुलक्षण, गण्ठि और अन्य ग्रंथों की रचना की गई। पुनः शासन आकाश में सूर्य और चन्द्रमा के समान प्रकट हुआ। တတ္ထ ဗုဒ္ဓဝံသဋ္ဌကထံ ဗုဒ္ဓဒတ္တတ္ထေရေ အကာသိ. ဣတိဝုတ္တောဒါနစရိယာပိဋကထေရာထေရီဝိမာနဝတ္ထုပေတဝတ္ထုနေတ္တိအဋ္ဌကထာယော အာစရိယဓမ္မပါလတ္ထေရော အကာသိ. သော စ အာစရိယဓမ္မပါလတ္ထေရော သီဟဠဒီပဿ သမီပေ ဒမိလရဋ္ဌေ ဗဒရတိတ္ထမှိ နိဝါသိတတ္တာ သီဟဠဒီပေယေဝ သင်္ဂဟေတွာ ဝတ္တဗ္ဗော. वहाँ बुद्धवंश की अट्ठकथा स्थविर बुद्धदत्त ने बनाई। इतिवुत्तक, उदान, चरियापिटक, थेरगाथा, थेरीगाथा, विमानवत्थु, पेतवत्थु और नेत्ति की अट्ठकथाएँ आचार्य धम्मपाल स्थविर ने बनाईं। वे आचार्य धम्मपाल स्थविर सिंहलद्वीप के समीप दमिल राष्ट्र के बदरतिथ में निवास करने के कारण सिंहलद्वीप की परम्परा में ही सम्मिलित कहे जाने चाहिए। ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂဋ္ဌကထံ မဟာနာမော နာမ ထေရော အာကာသိ. မဟာနိဒ္ဒေသဋ္ဌကထံ ဥပသေနော နာမ ထေရော အကာသိ. အဘိဓမ္မဋီကံ ပန အာနန္ဒတ္ထေရော အကာသိ. သာ စ သဗ္ဗာသံ ဋီကာနံ အာဒိဘူတတ္တာ မူလဋီကာတိ ပါကဋာ. प्रतिसम्भिदामग्ग की अट्ठकथा महानाम नामक स्थविर ने बनाई। महानिद्देस की अट्ठकथा उपसेन नामक स्थविर ने बनाई। अभिधम्म की टीका स्थविर आनन्द ने बनाई। वह सभी टीकाओं में आदि होने के कारण 'मूलटीका' के नाम से प्रसिद्ध है। ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂဿ မဟာဋီကံ ဒီဃနိကာယဋ္ဌကထာယ ဋီကံ မဇ္ဈိမနိကာယဋ္ဌကထာယ ဋီကံ သံယုတ္တနိကာယဋ္ဌကထာယ ဋီကဉှာတိ ဣမာယော အာစရိယဓမ္မပါလတ္ထေရော အကာသိ. विशुद्धिमग्ग की महाटीका, दीघनिकाय-अट्ठकथा की टीका, मज्झिमनिकाय-अट्ठकथा की टीका और संयुत्तनिकाय-अट्ठकथा की टीका—इनकी रचना आचार्य धम्मपाल स्थविर ने की। သာရတ္ထဒီပနိံ နာမ ဝိနယဋီကံ အင်္ဂုတ္တရနိကာယဋီကဉ္စ ပရက္ကမဗာဟုရညာ ယာစိတော သာရိပုတ္တတ္ထေရော အကာသိ. ဝိမတိဝိနောဒနိံ နာမ ဝိနယဋီကံ ဒမိလရဋ္ဌဝါသိကဿပတ္ထေရော အကာသိ. 'सारत्थदीपनी' नामक विनय-टीका और अंगुत्तरनिकाय की टीका, राजा पराक्रमबाहु द्वारा प्रार्थना किए जाने पर स्थविर सारिपुत्र ने बनाई। 'विमतिविनोदनी' नामक विनय-टीका दमिल राष्ट्र के निवासी स्थविर कस्सप ने बनाई। အနုဋီကံ ပန အာစရိယဓမ္မပါလတ္ထေရော. သာ စ မူလဋီကာယ အနုတ္တာနတ္ထာနိ ဥတ္တာနာနိ သံဝဏ္ဏိတတ္တာ အနုဋီကာ တိဝုစ္စတိ. अनुटीका की रचना आचार्य धम्मपाल स्थविर ने की। मूलटीका के अस्पष्ट अर्थों को स्पष्ट रूप से व्याख्यायित करने के कारण इसे 'अनुटीका' कहा जाता है। ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂဿ စူဠဋီကံ မခုဒီပနိဉ္စ အညေတရာ ထေရာ အကံသု. သာ စ မူလဋီကာယ အတ္ထာဝသေသာတိ စ အနုတ္တာနတ္ထာတိ စ ကတွာ မူလဋီကာယ သဒ္ဓိံ သံသန္ဒိတွာ ကတတ္တာ မဓုရ သတ္တာ စ မဓုဒီပနိန္တိ ဝုစ္စတိ. မောဟဝိစ္ဆေဒနိံ ပန လက္ခဏဂန္ထံ ကဿပတ္ထေရော အကာသိ. विशुद्धिमग्ग की चूलटीका और 'मधुदीपनी' की रचना अन्य स्थविरों ने की। मूलटीका के शेष अर्थों और अस्पष्ट अर्थों को लेकर, मूलटीका के साथ मिलान करके बनाए जाने के कारण और मधुर होने से इसे 'मधुदीपनी' कहा जाता है। 'मोहविच्छेदनी' नामक लक्षण-ग्रंथ की रचना स्थविर कस्सप ने की। အာဘိဓမ္မာဝတာရံ ပန ရုပါရူပဝိဘာဂံ ဝိနယဝိနိစ္ဆယဉ္စ ဗုဒ္ဓ ဒတ္တတ္ထေရော. ဝိနယသင်္ဂဟံ သာရိပုတ္တတ္ထေရော. ခုဒ္ဒသိက္ခံ ဓမ္မသိရိတ္ထေရော[Pg.38]. ပရမတ္ထဝိနိစ္ဆယံ နာမရူပပရိစ္ဆေဒံ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဉ္စ အနုရုဒ္ဓတ္ထေရော. သစ္စသင်္ခေပံ ဓမ္မပါလတ္ထေရော. ခေမံ ခေမတ္ထေရော. တေ စ သင်္ခေပတော သံဝဏ္ဏိတတ္တာ သုခေန စ လက္ခဏိယတ္တာ လက္ခဏဂန္ထာတိ ဝုစ္စန္တိ. अभिधम्मावतार, रूपारूपविभाग और विनयविनिच्चय बुद्धदत्त स्थविर द्वारा रचित हैं। विनयसंग्रह सारिपुत्त स्थविर द्वारा। खुद्दसिक्खा धम्मसिरि स्थविर द्वारा। परमत्थविनिच्चय, नामरूपपरिच्छेद और अभिधम्मत्थसंग्रह अनुरुद्ध स्थविर द्वारा। सच्चसंखेप धम्मपाल स्थविर द्वारा। खेम खेम स्थविर द्वारा। संक्षेप में व्याख्यायित होने और सुगमता से लक्षणों को बताने के कारण इन्हें 'लक्षणग्रन्थ' कहा जाता है। တေသံ ပန သံဝဏ္ဏနာသု အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဿ ပေါရာဏဋီကံ နဝဝိမလဗုဒ္ဓိတ္ထေရော အကာသိ. သစ္စံသင်္ခေပနာမရူပပရိစ္ဆေဒခေမာအဘိဓမ္မာဝတာရာနံ ပေါရာဏဋီကံ ဝါစိဿရမဟာသာမိတ္ထေရော. ပရမတ္ထဝိနိစ္ဆယဿ ပေါရာဏဋီကံ မဟာဗောဓိတ္ထေရော. उनकी व्याख्याओं में, अभिधम्मत्थसंग्रह की पुरानी टीका (पोराणटीका) नवविमलबुद्धि स्थविर ने की। सच्चसंखेप, नामरूपपरिच्छेद, खेम और अभिधम्मावतार की पुरानी टीका वाचिस्सर महासामि स्थविर ने की। परमत्थविनिच्चय की पुरानी टीका महाबोधि स्थविर ने की। အဘိဓမတ္ထသင်္ဂဟာဘိဓမ္မာဝတာရာဘိနဝ ဋီကာယော သုမင်္ဂလသာမိတ္ထေရော. သစ္စသင်္ခေပါဘိနဝဋီကံ အရညဝါသိတ္ထေရော. နာမရူပပရိစ္ဆေဒါဘိနဝဋီကံ မဟာသာမိတ္ထေရော. ပရမတ္ထဝိနိစ္ဆယာဘိနဝဋီကံ အညတရတ္ထေရော. ဝိနယဝိနိစ္ဆယဋီကံ ရေဝတတ္ထေရော. ခုဒ္ဒသိက္ခာယ ပုရာဏဋီကံ မဟာယသတ္ထေရော. တာယယေဝ အဘိနဝဋီကံ သံဃရက္ခိတတ္ထေရောတိ. अभिधम्मत्थसंग्रह और अभिधम्मावतार की अभिनव टीकाएँ सुमंगलसामि स्थविर ने कीं। सच्चसंखेप की अभिनव टीका अरण्यवासी स्थविर ने की। नामरूपपरिच्छेद की अभिनव टीका महासामि स्थविर ने की। परमत्थविनिच्चय की अभिनव टीका किसी अन्य स्थविर ने की। विनयविनिच्चय की टीका रेवत स्थविर ने की। खुद्दसिक्खा की पुरानी टीका महायस स्थविर ने की। उसी की अभिनव टीका संघरक्षित स्थविर ने की। ဝဇိရဗုဒ္ဓိံ နာမ ဝိနယဂဏ္ဌိပဒတ္ထံ ဝဇိရဗုဒ္ဓိတ္ထေရော. စူဠဂဏ္ဌိံ မဇ္ဈိမဂဏ္ဌိံ မဟာဂဏ္ဌိဉ္စ သီဟဠဒီပဝါသိနော ထေရာ. တေ စ ပဒက္ကမေန အသံဝဏ္ဏေတွာ အနုတ္တာနတ္ထာယေဝ သံဝဏ္ဏိတတ္တာ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထာတိ ဝုစ္စန္တိ. वजिरबुद्धि नामक विनय-गण्ठिपद की रचना वजिरबुद्धि स्थविर ने की। चूलगण्ठि, मज्झिमगण्ठि और महागण्ठि सिंहलद्वीप के स्थविरों ने की। पद-क्रम के अनुसार व्याख्या न करके केवल कठिन अर्थों की व्याख्या करने के कारण इन्हें 'गण्ठिपदत्थ' कहा जाता है। အဘိဓာနပ္ပဒီပိကံ ပန မဟာမောဂ္ဂလာနတ္ထေရော. အတ္ထဗျက္ခာနံ စူဠဗုဒ္ဓတ္ထေရော. ဝုတ္တောဒယံ သမ္ဗန္ဓစိန္တနံ သုဗောဓာလင်္ကာရဉ္စ သံဃရက္ခိတတ္ထေရော. ဗျာကရဏံ မောဂ္ဂလာနတ္ထေရော. अभिधानप्पदीपिका महामोग्गलान स्थविर ने रची। अत्थब्याक्खान चूलबुद्ध स्थविर ने। वुत्तोदय, सम्बन्धचिन्तना और सुबोधालंकार संघरक्षित स्थविर ने। व्याकरण मोग्गलान स्थविर ने। မဟာဝံသံ စူဠဝံသံ ဒီပဝံသံ ထူပဝံသံ ဗောဓိဝံသံ ဓာတုဝံ သဉ္စ သီဟဠဒီပဝါသိနော ထေရာ. ဒါဌာဓာတုဝံသံ ပန ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရော အကာသိ. ဧတေ စ ပါဠိမုတ္တကဝသေန ဝုတ္တတ္တာ ဂန္ထန္တရာတိ ဝုစ္စန္တိ. महावंश, चूलवंश, दीपवंश, थूपवंश, बोधिवंश और धातुवंश सिंहलद्वीप के स्थविरों ने रचे। दाठाधातुवंश धम्मकित्ति स्थविर ने रचा। पालि (मूल पाठ) से मुक्त शैली में कहे जाने के कारण इन्हें 'ग्रन्थान्तर' कहा जाता है। ဣစ္စေဝံ ဗုဒ္ဓဃောသာဒယော ထေရ ဝရာ ယထာဗလံ ယထာသတ္တိံ ပရိယတ္တိံ သာသနံ ဥပတ္ထမ္ဘေတွာ ဗဟူဟိ မူလေဟိ ဗဟုဟိသာခါဟိ ဗဟူဟိ စ ဝိဋပေဟိ ဥပတ္ထမ္ဘိယမာနော ဝေပုလ္လမာ ပဇ္ဇမာနော [Pg.39] မဟာနိဂြောဓရုက္ခော ဝိယ ထိရံ ဟုတွာ စိရကာလံ တိဋ္ဌတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗံ. इस प्रकार बुद्धघोष आदि श्रेष्ठ स्थविरों ने अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार परियत्ति शासन को सहारा दिया, जिससे यह शासन अनेक जड़ों, शाखाओं और टहनियों से पुष्ट होकर, एक विशाल बरगद के वृक्ष की भाँति स्थिर होकर चिरकाल तक बना रहे, ऐसा जानना चाहिए। ဣဒံ သီဟဠဒီပေ ပေါတ္ထကာရုဠှတော ပစ္ဆာ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह सिंहलद्वीप में पुस्तकों के लेखन के पश्चात शासन की प्रतिष्ठा है। ဧတေပိ စ မဟာထေရော, ယထာသတ္တိံ ယထာဗလံ; အဋ္ဌကထာဒယော ကတွာ, မစ္စုမုခံ ဥပါဂမုံ. इन महास्थविरों ने भी अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार अट्ठकथा आदि की रचना कर मृत्यु के मुख में प्रवेश किया। သေယျထာပိ စ လောကသ္မိံ, ဩဘာသိတွာန စန္ဒိမာ; အာဝဟိတွာန သတ္တာနံ, ဟိတံ အတ္ထံဝ ဂစ္ဆတိ. जैसे इस लोक में चंद्रमा प्रकाशित होकर प्राणियों के लिए हित और कल्याण लाकर चला जाता है। ဧဝမေဝ မဟာထေရာ, ဉာဏောဘာသေဟိ ဘာသိယ; အာဝဟိတွာန သတ္တာနံ, ဟိတံ အတ္ထံဝ ဂစ္ဆတိ. वैसे ही महास्थविर ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित होकर प्राणियों के लिए हित और कल्याण लाकर चले जाते हैं। ဣတိ သာသနဝံသေ သီဟဠဒီပိကသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ इस प्रकार शासनवंश में सिंहलद्वीप के शासन के इतिहास का मार्ग समाप्त हुआ। နာမ ဒုတိယော ပရိစ္ဆေဒေါ. नामक दूसरा परिच्छेद। ၃. သုဝဏ္ဏဘူမိသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ ३. सुवर्णभूमि के शासन के इतिहास का मार्ग। ၃. ဣဒါနိ ယထာဌပိတမာတိကာဝသေန သုဝဏ္ဏဘူမိ ရဋ္ဌေ သာသနဝံသကထာမဂ္ဂဿ ဝတ္ထုံ ဩကာသော အနုပ္ပတ္ထော, တသ္မာ သုဝဏ္ဏဘူမိရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂံ အာရဘိဿာမိ. ३. अब स्थापित मातृका (विषय-सूची) के अनुसार सुवर्णभूमि राष्ट्र में शासन के इतिहास के मार्ग की विषय-वस्तु का अवसर प्राप्त हुआ है, इसलिए मैं सुवर्णभूमि राष्ट्र के शासन के इतिहास के मार्ग का आरम्भ करूँगा। တတ္ထ သုဝဏ္ဏဘူမီတိ တီသု ရာမညရဋ္ဌေသု ဧကဿ နာမံ. တီဏိဟိ ရာမညရဋ္ဌာနိ ဟောန္တိ ဟံသာဝတီမုတ္တိမသုဝဏ္ဏဘူမိဝသေန ဧကဒေသေန သဗ္ဗမ္ပိ ရာမညရဋ္ဌံ ဂဟေတဗ္ဗံ. တတ္ထ ပန ဥက္ကလာပဇနပဒေ တပုဿဘလ္လိကေ အာဒိံ ကတွာ ဘဂဝတော အဘိသမ္ဗုဇ္ဈိတွာ သတ္တသတ္တာဟေသု အတိက္ကန္တေသုယေဝ အာသာဠှိမာသဿ ဇုဏှပက္ခပဉ္စမဒိဝသတော ပဋ္ဌာယ ရာမညရဋ္ဌေ သာသနံ ပတိဋ္ဌတိ. वहाँ सुवर्णभूमि तीन रामञ्ञ राष्ट्रों में से एक का नाम है। तीन रामञ्ञ राष्ट्र हैं: हंसावती, मुत्तिम और सुवर्णभूमि; एक भाग के नाम से सम्पूर्ण रामञ्ञ राष्ट्र को ग्रहण करना चाहिए। वहाँ उक्क्लाप जनपद में तपुस्स और भल्लिक से आरम्भ कर, भगवान के बुद्धत्व प्राप्त करने के सात सप्ताह बीत जाने पर, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष के पाँचवें दिन से रामञ्ञ राष्ट्र में शासन प्रतिष्ठित हुआ। ဣဒံ ရာမညရဋ္ဌေ ပဌမံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह रामञ्ञ राष्ट्र में शासन की प्रथम प्रतिष्ठा है। ဘဂဝတော [Pg.40] အဘိသမ္ဗုဒ္ဓကာလတော ပုဗ္ဗေယေဝ အပရဏ္ဏကရဋ္ဌေ သုဘိန္နနဂရေ တိဿရညော ကာလေ ဧကဿ အမစ္စဿ တိဿော ဇယော စာတိ ဒွေပုတ္တာ အဟေသုံ. တေ ဂိဟိဘာဝေ သံဝေဂံ လဘိတွာ မဟာသမုဒ္ဒဿ သမီပေ ဂဇ္ဇဂိရိမှိ နာမ ပဗ္ဗတေ ဣတ္ထုသိပဗ္ဗံ ပဗ္ဗဇိတွာ နိသီဒိသုံ. တဒါ နာဂိယာ ဝိဇ္ဇာဓရော သန္တဝံ ကတွာ ဒွေ အဏ္ဍာနိ ဝိဇာယိတွာ သာ နာဂီ လဇ္ဇာယ တာနိ ဝိဇဟိတွာ ဂစ္ဆိ. भगवान के बुद्धत्व प्राप्त करने के काल से पूर्व ही, अपरण्णक राष्ट्र के सुभिन्न नगर में राजा तिस्स के समय में, एक अमात्य के तिस्स और जय नामक दो पुत्र थे। उन्होंने गृहस्थ जीवन में संवेग प्राप्त कर महासमुद्र के समीप गज्जगिरि नामक पर्वत पर ऋषियों की भाँति प्रव्रजित होकर निवास किया। तब एक विद्याधर ने नागिन के साथ संसर्ग किया और उस नागिन ने दो अंडे दिए, जिन्हें वह लज्जावश त्याग कर चली गई। တဒါ ဇေဋ္ဌော တိဿကုမာရော တာနိ လဘိတွာ ကနိဋ္ဌေန သဒ္ဓိံ ဝိဘဇိတွာ ဧကံ ဧကဿ သန္တိကေ ဌပေသိ. ကာလေ အတိက္ကန္တေ တေဟိ အဏ္ဍေဟိ ဒွေ မနုဿာ ဝိဇာယိံသု. တေ ဒသ ဝဿဝယေ သမ္ပတ္တေ ကနိဋ္ဌဿ အဏ္ဍတော ဝိဇာယနဒဟရော ကာလံ ကတွာ မဇ္ဈိမဒေသေ မိထိလနဂရေ ဂဝံပတိ နာမ ကုမာရော ဥပဇ္ဇိ. သော သတ္တဝဿိကကာလေ ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော သန္တိကေ နိယျာဒေတွာ ပဗ္ဗာဇေတွာ အစိရေနေဝ အရဟာ အဟောသိ. तब ज्येष्ठ तिस्स कुमार ने उन्हें प्राप्त किया और कनिष्ठ के साथ बाँटकर एक-एक अपने पास रखा। समय बीतने पर उन अंडों से दो मनुष्य उत्पन्न हुए। उनके दस वर्ष की आयु प्राप्त करने पर, कनिष्ठ के अंडे से उत्पन्न बालक की मृत्यु हो गई और वह मध्यदेश के मिथिला नगर में गवम्पति नामक कुमार के रूप में उत्पन्न हुआ। उसने सात वर्ष की आयु में भगवान बुद्ध के पास समर्पित होकर प्रव्रज्या ली और शीघ्र ही अर्हन्त हो गया। ဇေဋ္ဌဿ ပန အဏ္ဍတော ဝိဇာယနဒဟရော ဒွါဒသဝဿိကကာလေ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော အာဂန္တွာ ရာမညရဋ္ဌေ သုဓမ္မပုရံ နာမ နဂရံ မာပေတွာ သီဟရာဇာတိ နာမေန တတ္ထ ရဇ္ဇံ ကာရာပေသိ. သိလာလောနေ ပန သိရိမာသောကောတိ နာမေနာတိ ဝုတ္တံ. ဂဝံပတိတ္ထေရော စ အတ္တနာ မာတရံ ဒဋ္ဌုကာမော မိထိလနဂရတော အာဂန္တုံ အာရဘိ. တဒါ ဒိဗ္ဗစက္ခုနာ မာတုယာ ကာလင်္ကတဘာဝံ ဉတွာ ဣဒါနိ မေ မာတာ ကုဟိံ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ အာဝဇ္ဇန္တော ဗာဟုလ္လေန နေသာဒကေဝဋ္ဋာနံ နိဝါသနဋ္ဌာနဘူတေ ဒေသေ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ ဉတွာ သစာဟံ ဂန္တွာ န ဩဝါဒေယျံ, မာတာ မေ အပါယဂမနိယံ အပုညံ ဝိစိနိတွာ စတူသု အပါယေသု ဥပ္ပဇ္ဇေယျာတိ စိန္တေတွာ ဘဂဝန္တံ ယာစိတွာ ရာမညရဋ္ဌံ ဝေဟာသမဂ္ဂေန အာဂစ္ဆိ. ရာမညရဋ္ဌေ သုဓမ္မပရံ ပတွာ အတ္တနော [Pg.41] ဘာတုနာ သီဟရာဇေန သဒ္ဓိံ ရဋ္ဌဝါသီနံ ဓမ္မံ ဒေသေတွာ ပဉ္စသု သီလေသု ပတိဋ္ဌာပေသိ. ज्येष्ठ (बड़े भाई) के अंडे से उत्पन्न होने के समय, जब वह बारह वर्ष का था, तब देवराज शक्र ने आकर रामण्य राष्ट्र में सुधम्मपुर नामक नगर का निर्माण किया और वहाँ सिंहराज नाम से राज्य करवाया। शिलालेख में उसे सिरिमासोक नाम से कहा गया है। और गवम्पति स्थविर अपनी माता को देखने की इच्छा से मिथिला नगर से आने लगे। तब दिव्यचक्षु से माता की मृत्यु को जानकर, 'अब मेरी माता कहाँ उत्पन्न हुई है?' ऐसा विचार करते हुए, उन्होंने जाना कि वह अधिकांशतः व्याधों और मछुआरों के निवास स्थान वाले देश में उत्पन्न हुई है। उन्होंने सोचा कि 'यदि मैं जाकर उपदेश न दूँ, तो मेरी माता अपायगामी अपुण्य (पाप) संचित कर चारों अपायों में उत्पन्न हो सकती है', ऐसा सोचकर भगवान से याचना कर वे आकाश मार्ग से रामण्य राष्ट्र आए। रामण्य राष्ट्र के सुधम्मपुर पहुँचकर अपने भाई सिंहराज के साथ राष्ट्रवासियों को धर्मोपदेश दिया और उन्हें पंचशील में प्रतिष्ठित किया। အထ သီဟရာဇာ အာဟ, လောကေသု ဘန္တေ တွမသိ အဂ္ဂတရော ပုဂ္ဂလောတိ. န မဟာရာဇ အဟံ အဂ္ဂတရော, တီသု ပန ဘဝေသု သဗ္ဗေသံ သတ္တာနံ မကုဋသင်္ကာသော ဂေါတမော နာမ မယှံ သတ္ထာ အတ္ထိ, ဣဒါနိ မဇ္ဈိမဒေသံ ရာဇဂဟံ ပဋိဝသတီတိ. ဧဝံ ပန ဘန္တေ သတိ တုမှာကံ အာစရိယံ မယံ ဒဋ္ဌုံ အရဟာမ ဝါ နော ဝါတိ ပုစ္ဆိ. ဂဝံပတိတ္ထေရောစ အာမ မဟာရာဇ အရဟထ ဘဂဝန္တံ ဒဋ္ဌုံ, အဟံ ယာစိတွာ အာဂစ္ဆာမီတိ ဝတွာ ဘဂဝန္တံ ယာစိ. ဘဂဝါ စ အဘိသမ္ဗုဇ္ဈိတွာ အဋ္ဌမေ ဝဿေ သဒ္ဓိံ အနေကသတဘိက္ခူဟိ ရာမညရဋ္ဌေ သုခမ္မပုရံ အာကာသေန အာဂမာသိ. ရာဇဝံသေ ပဉ္စဟိ ဘိက္ခုသတေဟိ အာဂမာသီတိ ဝုတ္တံ. သိလာလေခနေ ပန ဝီသတိသဟဿမတ္တေဟိ ဘိက္ခူဟီတိ ဝုတ္တံ. ဧတ္ထ စ ယသ္မာ ဘဂဝါ သပရိသောယေဝ အာဂစ္ဆိ, န ဧကကောတိ ဧတ္တကမေဝ ဣစ္ဆိတဗ္ဗံ, တသ္မာ နာနာ ဝါဒတံ ပဋိစ္စ စိတ္တဿာကုလိတာ န ဥပ္ပာဒေတဗ္ဗာတိ. तब सिंहराज ने कहा, 'भन्ते! लोकों में आप ही श्रेष्ठ पुरुष हैं।' (स्थविर ने कहा) 'महाराज! मैं श्रेष्ठ नहीं हूँ, बल्कि तीनों भवों में सभी सत्त्वों के मुकुट के समान गौतम नाम के मेरे शास्ता हैं, जो इस समय मध्यम देश के राजगृह में निवास करते हैं।' 'भन्ते! यदि ऐसा है, तो क्या हम आपके आचार्य के दर्शन के योग्य हैं या नहीं?' ऐसा उसने पूछा। गवम्पति स्थविर ने कहा, 'हाँ महाराज! आप भगवान के दर्शन के योग्य हैं, मैं याचना करके आता हूँ', ऐसा कहकर उन्होंने भगवान से याचना की। और भगवान बुद्धत्व प्राप्ति के आठवें वर्ष में अनेक सौ भिक्षुओं के साथ आकाश मार्ग से रामण्य राष्ट्र के सुधम्मपुर आए। राजवंश (ग्रंथ) में कहा गया है कि वे पाँच सौ भिक्षुओं के साथ आए। शिलालेख में कहा गया है कि लगभग बीस हजार भिक्षुओं के साथ आए। यहाँ चूँकि भगवान सपरिषद ही आए, अकेले नहीं, इतना ही स्वीकार करना चाहिए, इसलिए विभिन्न मतों के कारण चित्त में व्याकुलता उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। အထ အာဂန္တွာ ရတနမဏ္ဍပေ နိသီဒိတွာ သရာဇိကာနံ ရဋ္ဌဝါသီနံ အမတရသံ အဒါသိ. တီသု သရဏေသု ပဉ္စသု စ သီလေသု ပတိဋ္ဌာပေသိ. အထ ဘဂဝါ ဒဿနတ္ထာယ အာဂတာနံ ဆန္နံ တာပသာနံ ဆ ကေသဓာတုယော ပူဇနတ္ထာယ အဒါသိ. တတော ပစ္ဆာသတ္တတိံသဝဿာနိ ပူရေတွာ ပရိနိဗ္ဗာနကာလေပိ ဘဂဝတော အဓိဋ္ဌာနာနုရူပေန စိတကဋ္ဌာနတော တေတ္တိံသ ဒန္တေ ဂဟေတွာ ဂဝံပတိတ္ထေရော သုဓမ္မပုရံ အာနေတွာ သီဟရညော ဒတွာ တေတ္တိံသစေတိယာနိ ပတိဋ္ဌာပေသိ. ဧဝံ ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနတော အဋ္ဌမေယေဝ ဝဿေ ဂဝံပတိတ္ထေရော ရာမည ရဋ္ဌေ သုဓမ္မပုရေ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. तब आकर रत्नमण्डप में बैठकर राजा सहित राष्ट्रवासियों को अमृत रस (धर्म) प्रदान किया। उन्हें त्रिशरण और पंचशील में प्रतिष्ठित किया। तब भगवान ने दर्शन के लिए आए छह तापसों को पूजा के लिए छह केश-धातुएँ दीं। उसके बाद सैंतीस वर्ष पूर्ण कर परिनिर्वाण के समय भी भगवान के अधिष्ठान के अनुरूप चिता-स्थान से तैंतीस दाँत लेकर गवम्पति स्थविर सुधम्मपुर लाए और सिंहराज को देकर तैंतीस चैत्यों की स्थापना की। इस प्रकार भगवान के परिनिर्वाण के आठवें वर्ष में ही गवम्पति स्थविर ने रामण्य राष्ट्र के सुधम्मपुर में शासन की प्रतिष्ठा की। ဣဒံ ရာမညရဋ္ဌေ ဒုတိယံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह रामण्य राष्ट्र में शासन की दूसरी प्रतिष्ठा है। ဘဂဝတော [Pg.42] ပရိနိဗ္ဗုတပဉ္စတိံသာဓိကာနံ ဒွိန္နံ သတာနံ ဥပရိသုဝဏ္ဏဘူမိံ နာမ ရာမညရဋ္ဌံ အာဂန္တွာ သောဏတ္ထေရော ဥတ္တရတ္ထေရောစာတိ ဒွေ ထေရာ ပဉ္စဝဂ္ဂကမ္မာရဟေဟိ ဘိက္ခူဟိ သဒ္ဓိံ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသုံ. တေ စ ထေရာ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကာတိ အဋ္ဌကထာယံ အာဂတာ. भगवान के परिनिर्वाण के दो सौ पैंतीस वर्ष बाद सुवर्णभूमि नामक रामण्य राष्ट्र में आकर सोण स्थविर और उत्तर स्थविर—इन दो स्थविरों ने पंचवर्गीय कर्म के योग्य भिक्षुओं के साथ शासन की प्रतिष्ठा की। वे स्थविर महामोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर के सार्धविहारी (शिष्य) थे, ऐसा अट्ठकथा में आया है। တပုဿဘလ္လိကေ ဂဝံပတိတ္ထေရဉ္စ ပဋိစ္စ သာသနံ တာဝ ပတိဋ္ဌဟိ. တဉ္စ န သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ ဩဂါဟေတွာ ယေ ယေ ပန သဒ္ဓါ ပသန္နာ, တေ တေ အတ္တနော ဣစ္ဆာဝသေနေဝ သာသနံ ပသီဒိံသု. ပစ္ဆာ ပန သောဏုတ္တရတ္ထေရာ မဟုဿာဟေန အာစရိယ အာဏတ္တိယာ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာပနတ္ထာယ ဥဿုက္ကံ အာပန္နာ ပတိဋ္ဌာပေသုံ. တေန အဋ္ဌကထာယံ ဧတံ ရဋ္ဌံ ဂန္တွာ ဧတ္ထ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေဟီတိ ကာရိတပစ္စယဝသေန အာဏတ္တိဝိဘတ္တိဝသေနစ ဝုတ္တံ. तपुस्स और भल्लिक तथा गवम्पति स्थविर के माध्यम से शासन तब तक प्रतिष्ठित हुआ। और वह पूरी तरह से व्याप्त नहीं हुआ था, बल्कि जो-जो श्रद्धावान और प्रसन्न थे, वे अपनी इच्छा के अनुसार ही शासन में प्रसन्न हुए। बाद में सोण और उत्तर स्थविरों ने महान उत्साह के साथ आचार्य की आज्ञा से शासन की प्रतिष्ठा के लिए प्रयत्नशील होकर उसे प्रतिष्ठित किया। इसीलिए अट्ठकथा में 'इस राष्ट्र में जाकर यहाँ शासन प्रतिष्ठित करो'—ऐसा कारित प्रत्यय और आज्ञा विभक्ति के कारण कहा गया है। တဒါ ပန သုဝဏ္ဏဘူမိရဋ္ဌေ သုဓမ္မပုရေ သိရိမာသောကော နာမ ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. တဉ္စ သုဓမ္မပုရံ နာမ ကေလာသပဗ္ဗတမုဒ္ဓနိ ဒက္ခိဏာယ အနုဒိသာယ ပုဗ္ဗဍ္ဎဘာဂေန ပဗ္ဗတမုဒ္ဓနိ အပရဍ္ဎဘာဂေန ဘူမိတလေ တိဋ္ဌတိ. တံယေဝ ဂုဠပါစကာနံ မဿာနံ ဂေဟသဒိသာနိ ဂေဟာနိ ယေဘုယျေန, တေနေဝ ဂေါဠမိတ္တိက နာမေနာပိ ဝေါဟာရိယတိ. တဿ ပန နဂရဿ မဟာသမုဒ္ဒသမီပေ ဌိတတ္တာ ဒကယက္ခိနီ သဗ္ဗဒါ အာဂန္တွာ ရာဇဂေဟေ ဇာတေ ဇာတေ ကုမာရေ ခါဒိ. उस समय सुवर्णभूमि राष्ट्र के सुधम्मपुर में सिरिमासोक नामक राजा राज्य करता था। वह सुधम्मपुर कैलास पर्वत के शिखर पर दक्षिण दिशा में, पूर्व के आधे भाग में पर्वत शिखर पर और पश्चिम के आधे भाग में समतल भूमि पर स्थित है। वहाँ के घर प्रायः गुड़ पकाने वाले 'मस्स' जाति के लोगों के घरों के समान थे, इसलिए उसे 'गोळमृत्तिका' नाम से भी जाना जाता है। उस नगर के महासमुद्र के समीप स्थित होने के कारण, एक जल-यक्षिणी हमेशा आकर राजभवन में उत्पन्न होने वाले प्रत्येक राजकुमार को खा जाती थी। သောဏုတ္တရတ္ထေရာနံ သမ္ပတ္တဒိဝသယေဝ ရာဇဂေဟေ ဧကံ ပုတ္တံ ဝိဇာယိ. ဒကယက္ခိနီစ ခါဒိဿာမီတိ သဟ ပဉ္စဟိ ယက္ခိနိသတေဟိ အာဂတာ. တံ ဒိသွာ မနုဿာ ဘာယိတွာ မဟာဝိရဝံ ရဝန္တိ. တဒါ ထေရာ ဘယာနကံ သီဟသီသဝသေန ဧကသီသသရီရဒွယသမ္ဗန္ဓသဏ္ဌာနံ မနုသီဟရူပံ မာပေတွာ ဒဿေတွာ တံ ယက္ခိနိံ သပရိသံ ပလာပေသုံ. सोण और उत्तर स्थविरों के पहुँचने के दिन ही राजभवन में एक पुत्र का जन्म हुआ। जल-यक्षिणी भी 'खा जाऊँगी' ऐसा सोचकर पाँच सौ यक्षिणियों के साथ आई। उसे देखकर मनुष्य डरकर जोर-जोर से चिल्लाने लगे। तब स्थविरों ने भयानक सिंह के सिर वाले और एक सिर तथा दो शरीरों के जुड़ाव वाली आकृति वाले 'मनुसिंह' रूप का निर्माण कर दिखाया और उस यक्षिणी को उसके परिवार सहित भगा दिया। ထေရာ စ ပုန ယက္ခိနိယာ အနာဂမနတ္ထာယ ပရိတ္တံ အကံသုတသ္မိဉ္စ သမာဂမေ အာဂတာနံ မနုဿာနံ ဗြဟ္မဇာလသုတ္တံ အဒေသယျုံ[Pg.43]. သဋ္ဌိမတ္တသဟဿာ သောတာပန္နာဒိပရာယနာ အဟေသုံ. ကုလဒါရကာနံ အဍ္ဎုဍ္ဎာနိ သဟဿာနိ ပဗ္ဗဇိံသု. ကုလဓီတာနံ ပန ဒိဃဍ္ဎသဟဿံ. ရာဇကုမာရာနံ ပဉ္စသတာဓိကသဟဿမတ္တံ ပဗ္ဗဇိံသု. အဝသေသာပိ မနုဿာ သရဏေ ပတိဋ္ဌဟိံသု. ဧဝံ သော တတ္ထ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသီတိ. ဝုတ္တဉ္စ အဋ္ဌကထာယံ,– स्थविरों ने यक्षिणी के पुनः न आने के लिए परित्राण किया और उस समागम में आए हुए मनुष्यों को ब्रह्मजाल सुत्त का उपदेश दिया। लगभग साठ हजार लोग स्रोतापन्न आदि (मार्ग-फल) को प्राप्त हुए। कुलीन परिवारों के साढ़े तीन हजार बालकों ने प्रव्रज्या ली। कुलीन कन्याओं में से ढाई हजार ने। लगभग पंद्रह सौ राजकुमारों ने प्रव्रज्या ली। शेष मनुष्य भी शरण में प्रतिष्ठित हुए। इस प्रकार उन्होंने वहाँ शासन की प्रतिष्ठा की। अट्ठकथा में कहा गया है— သုဝဏ္ဏဘူမိံ ဂန္တွာန, သောဏုတ္တရာ မဟိဒ္ဓိကာ; ပိသာစေ နိဒ္ဓမိတွာန, ဗြဟ္မဇာလေ မဒေသိသုန္တိ. सुवर्णभूमि जाकर, महाऋद्धिमान सोण और उत्तर ने पिशाचों को भगाकर ब्रह्मजाल (सुत्त) का उपदेश दिया। တတော ပဋ္ဌာယ ရာဇကုမာရာနံ သောဏုတ္တရနာမေဟိယေဝ နာမံ အကံသု. အဝသေသဒွါရကာနမ္ပိ ရက္ခသဘယတော ဝိမောစနတ္ထံ တာလပတ္တဘုဇပတ္တေသု ထေရေဟိ မာပိတံ မနုသီဟရူပံ ဒဿေတွာ မတ္ထကေ ဌပေသုံ. မနုဿာစ သိလာမယံ မနုသီဟရူပံ ကတွာ သုဓမ္မပုရဿ ဧသန္နေ ပဒေသေ ဌပေသုံ. တံ ယာဝဇ္ဇတနာ အတ္ထီတိ. ဣစ္စေဝံ ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနတော ပဉ္စတိံသာဓိကေ ဒွိဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ သောဏုတ္တရတ္ထေရာ အာဂန္တွာ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေတွာ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေတွာ အနုဂ္ဂဟံ အကံသူတိ. तब से लेकर उन्होंने राजकुमारों का नाम 'सोण' और 'उत्तर' ही रखा। शेष बालकों को भी राक्षसों के भय से मुक्त करने के लिए, स्थविरों द्वारा ताड़पत्रों और भोजपत्रों पर बनाए गए 'मनुसीह' (नर-सिंह) के रूप को दिखाकर उनके मस्तक पर रखा गया। मनुष्यों ने भी पत्थर का मनुसीह रूप बनाकर सुधम्मपुर के ईशान कोण में स्थापित किया। वह आज भी विद्यमान है। इस प्रकार भगवान के परिनिर्वाण के दो सौ पैंतीस (235) वर्ष बीतने पर सोण और उत्तर स्थविरों ने आकर शासन (धर्म) की स्थापना की और अनुग्रह किया। ဣဒံ ရာမညရဋ္ဌေ တတိယံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह रामञ्ञ देश में शासन की तीसरी स्थापना है। တတော ပစ္ဆာ ဆသတာဓိကေ သဟဿေ သမ္ပတ္တေ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တေဟိ တီဟိ ကာရဏေဟိ သာသနဿ ဥပ္ပတ္တိဋ္ဌာနဘူတံ ရာမညရဋ္ဌံ ဒါမရိကစောရဘယေန ပဇ္ဇရရောဂဘယေန သာသနပစ္စတ္ထိကဘယေနစာတိ တီဟိ ဘယေဟိ အာကုလိတံ အဟောသိ. တဒါ စ တတ္ထ သာသနံ ဒုဗ္ဗလံ အဟောသိ, ယထာ ဥဒကေ မန္ဒေ တတြဇာတံ ဥပ္ပလံ ဥပ္ပလံ ဒုဗ္ဗလန္တိ. တတ္ထ ဘိက္ခူပိ သာသနံ ယထာ ကာမံ ပူရေတုံ န သက္ကာ. उसके बाद एक हजार छह सौ (1600) वर्ष बीतने पर, पूर्वोक्त तीन कारणों से शासन का उत्पत्ति-स्थान बना रामञ्ञ देश—विद्रोही चोरों के भय, महामारी (ज्वर) के भय और शासन के शत्रुओं के भय—इन तीन भयों से व्याकुल हो गया। तब वहाँ शासन दुर्बल हो गया, जैसे जल कम होने पर उसमें उत्पन्न कमल दुर्बल हो जाता है। वहाँ भिक्षु भी इच्छानुसार शासन की मर्यादाओं को पूरा करने में समर्थ नहीं थे। သူရိယကုမာရဿ နာမ မနောဟရိရညော ပန ကာလေ သာသနံ အတိဝိယ ဒုဗ္ဗလံ အဟောသိ. ဇိနစက္ကေ ဧကဆသတာဓိကေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ ကလိယုဂေစ ဧကူနဝီသတာဓိကေ [Pg.44] စတုဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ အရိမဒ္ဒနနဂရေ အနုရုဒ္ဓါ နာမ ရာဇာ တတော သဟ ပိဋကေန ဘိက္ခုသံဃံ အာနေသိ. सूर्यकुमार नामक राजा मनोहरि के समय में शासन अत्यंत दुर्बल हो गया था। जिन-चक्र (बुद्ध संवत्) के 1600 वर्ष बीतने पर और कलियुग के 419 वर्ष बीतने पर, अरिमद्दन नगर में अनुरुद्ध नामक राजा ने वहाँ से त्रिपिटक सहित भिक्षु संघ को बुलवाया। တတော ပစ္ဆာ ဇိနစက္ကေ နဝါဓိကေ သတ္တသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ လင်္ကာဒီပေ သိရိသံဃဗောဓိပရက္ကမဗာဟုမဟာရာဇာ သာသနံ သောဓေသိ. उसके बाद जिन-चक्र के 1709 वर्ष बीतने पर, लंका द्वीप में महाराज श्री संघबोधि पराक्रमबाहु ने शासन का शोधन किया। တတော ဆန္နံ ဝဿာနံ ဥပရိ ကလိယုဂေ ဒွတ္တိံသာဓိကေ ပဉ္စသတေ သမ္ပတ္တေ ဥတ္တရာဇီဝေါ နာမ ထေရော သာသနေ ပါကဋော အဟောသိ. उसके छह वर्ष बाद, कलियुग के 532 वर्ष बीतने पर, उत्तराजीव नामक स्थविर शासन में प्रसिद्ध हुए। သော ပန ရာမညရဋ္ဌဝါသိနော အရိယာဝံသတ္ထေရဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကော. အရိယာဝံသတ္ထေရော ပန ကပ္ပုင်္ဂနဂရဝါသိနော မဟာကာဠတ္ထေရဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကော. မဟာကာဠတ္ထေရော ပန သုဓမ္မပုရဝါသိနော ပြာနဒဿိတ္ထေရဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကော. အယံ ပန ဥတ္တရာဇီဝဆပ္ပဒတ္ထေရာနံ ဝံသဒီပနတ္ထံ ဝုတ္တာ. वे रामञ्ञ देश के निवासी अरियवंस स्थविर के सार्धविहारिक (शिष्य) थे। अरियवंस स्थविर कप्पुङ्ग नगर के निवासी महाकाल स्थविर के सार्धविहारिक थे। महाकाल स्थविर सुधम्मपुर के निवासी प्राणदस्सी स्थविर के सार्धविहारिक थे। यह विवरण उत्तराजीव और छप्पद स्थविरों की वंशावली स्पष्ट करने के लिए कहा गया है। သော ပန ပြာနဒဿိတ္ထေရော လောကိယာဘိညာယော လဘိတွာ နိစ္စံ အဘိဏှံ ပါတောဝ မဂဓရဋ္ဌေ ဥရုဝေလနိဂမေ မဟာဗောဓိံ ဂန္တွာ မဟာဗောဓိယင်္ဂဏံ သမ္မဇ္ဇိတွာ ပုန အာဂန္တွာ သုဓမ္မပုရေ ပိဏ္ဍာယ စရိ. ဣဒံ ထေရဿ နိဗဒ္ဓဝတ္တုံ. အယဉ္စ အတ္ထော သုဓမ္မပုရတော မဂဓရဋ္ဌံ ဂန္တွာ ဥရုဝေလနိဂမေ ဝါဏိဇကမ္မံ ကရောန္တာ တဒါကာရံ ပဿိတွာ ပစ္စာဂမနကာလေ သုဓမ္မပုရ ဝါသီနံ ကထေသုံ, တသ္မာ ဝိညာယတိ. उन प्राणदस्सी स्थविर ने लौकिक अभिज्ञाएँ प्राप्त की थीं और वे नित्य प्रति प्रातःकाल मगध देश के उरुवेल निगम में महाबोधि जाकर, महाबोधि प्रांगण की बुहारी (सफाई) करके पुनः लौट आते थे और सुधम्मपुर में भिक्षाटन करते थे। यह स्थविर की नित्य की चर्या थी। यह बात तब ज्ञात हुई जब सुधम्मपुर से मगध देश जाकर उरुवेल निगम में व्यापार करने वाले व्यापारियों ने उन्हें इस प्रकार देखा और वापस आने पर सुधम्मपुर के निवासियों को बताया। တသ္မိဉ္စ ကာလေ ဥတ္တရာဇီဝတ္ထေရော ပရိပုဏ္ဏဝီသတိဝဿေန ဆပ္ပဒေန နာမ သာမဏေရေန သဒ္ဓိံ သီဟဠဒီပံ ဂစ္ဆိ. သီဟဠဒီပဝါသိနော စ ဘိက္ခူ မယံ မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရဿ ဝံသိကာ ဘဝါမ, တုမှေပိ သောဏုတ္တရတ္ထေရာနံ ဝံသိကာ ဘဝထ, တသ္မာ မယံ ဧကဝံသိကာ ဘဝါမ သမာန ဝါဒိကာတိ ဝတွာ ဆပ္ပဒသာမဏေရဿ ဥပသမ္ပဒကမ္မံ အကံသု. တတော ပစ္ဆာ စေတိယ ဝန္ဒနာဒီနိ ကမ္မာနိ နိဋ္ဌာပေတွာ ဥတ္တရာဇီဝတ္ထေရော သဒ္ဓိံ ဘိက္ခုသင်္ခေန အရိမဒ္ဒနနဂရံ ပစ္စာဂမာဟိ. उसी समय उत्तराजीव स्थविर बीस वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके छप्पद नामक श्रामणेर के साथ सिंहल द्वीप (श्रीलंका) गए। सिंहल द्वीप के भिक्षुओं ने कहा— "हम महामहिन्द स्थविर के वंशज हैं और आप सोण तथा उत्तर स्थविरों के वंशज हैं, इसलिए हम एक ही वंश और समान विचारधारा के हैं।" ऐसा कहकर उन्होंने छप्पद श्रामणेर का उपसंपदा संस्कार किया। उसके बाद चैत्य वंदना आदि कार्य संपन्न कर उत्तराजीव स्थविर भिक्षु संघ के साथ अरिमद्दन नगर लौट आए। ဆပ္ပဒဿ ပန ဧတဒဟောသိ,- သစာဟံ အာစရိယေန သဟ ဇမ္ဗုဒီပံ [Pg.45] ဂစ္ဆေယျံ, ဗဟူဟိ ဉာတိဗလိဗောဓေဟိ ပရိယတ္တုဂ္ဂဟဏေ အန္တရာယော ဘဝေယျ, တေန ဟိ သီဟဠဒီပေယေဝ ဝသိတွာ ပရိယတ္တိမုဂ္ဂဟေတွာ ပစ္စာဂမိဿာမီတိ. छप्पद के मन में यह विचार आया— "यदि मैं आचार्य के साथ जम्बुद्वीप (भारत) जाऊँगा, तो बहुत से संबंधियों और बाधाओं के कारण आगम (परियत्ति) के अध्ययन में विघ्न होगा; इसलिए मैं सिंहल द्वीप में ही रहकर परियत्ति का अध्ययन करूँगा और फिर वापस जाऊँगा।" တတော အာစရိယဿ ဩကာသံ ယာစိတွာ သီဟဠဒီပေယေဝ ပဋိဝသိ. သီဟဠဒီပေ ဝသိတွာ ယာဝ လဒ္ဓတ္ထေရသမ္မုတိကာ ပရိယတ္တိံ ပရိယာပုဏိတွာ ပုန ဇမ္ဗုဒီပံ ပစ္စာဂန္တုကာမော အဟောသိ. အထ တဿ ဧတဒဟောသိ,– အဟံ ဧကကောဝ ဂစ္ဆန္တော သစေ မမ အာစရိယော နတ္ထိ, သစေပိ ဇမ္ဗုဒီပဝါသိနာ ဘိက္ခုသံဃေန သဒ္ဓိံ ဝိနယကမ္မံ ကာတုံ န ဣစ္ဆေယျံ, ဧဝံ သတိ ဝိသုံ ကမ္မံ ကာတုံ န သက္ကူဏေယျံ, တသ္မာ ပိဋကဓရေဟိ စတူဟိ ထေရေဟိ သဒ္ဓိံ ဂစ္စေယျံ, ဣစ္စေတံ ကုသလန္တိ. तब आचार्य से अनुमति लेकर वे सिंहल द्वीप में ही रह गए। सिंहल द्वीप में रहकर, स्थविर की पदवी प्राप्त करने तक परियत्ति का अध्ययन करने के बाद, उन्होंने पुनः जम्बुद्वीप लौटने की इच्छा की। तब उनके मन में यह विचार आया— "यदि मैं अकेला जाता हूँ और मेरे आचार्य वहाँ नहीं हैं, और यदि मैं जम्बुद्वीप के भिक्षु संघ के साथ विनय-कर्म करना न चाहूँ, तो ऐसी स्थिति में मैं अलग से (विनय) कर्म नहीं कर पाऊँगा। इसलिए मुझे त्रिपिटक के ज्ञाता चार अन्य स्थविरों के साथ जाना चाहिए, यही उचित होगा।" ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ တာမလိတ္တိဂါမဝါသိနာ သိဝလိတ္ထေရေန ကမ္ဗောဇရညော ပုတ္တဘူတေန တာမလိန္ဒတ္ထေရေန ကိဉ္စိပုရဝါသိနာ အာနန္ဒတ္ထေရေန ရာဟုလတ္ထေရေနစာတိ ဣမေဟိ စတူဟိ ထေရေဟိ သဒ္ဓိံ နာဝါယ ပစ္စာဂစ္ဆိ. တေ စ ထေရာ ပိဋကဓရာ အဟေသုံ ဒက္ခာ ထာမသမ္ပန္နာ စ. တေသု ဝိသေသတော ရာဟုလတ္ထေရော ထာမသမ္ပန္နော. ကုသိမနဂရံ သမ္ပတ္တကာလေ ဥပကဋ္ဌဝဿူပဂမနကာလော ဟုတွာ အရိမဒ္ဒနနဂရေ အာစရိယဿ သန္တိကံ အသမ္ပာပုဏိတွာ ကုသိမနဂရယေဝ ဝဿံ ဥပဂမိံသု. တေသံ ဝဿူပဂမနဝိဟာရဝတ္ထု အာရာမပါကာရော စ ကုသိမနဂရဿ ဒက္ခိဏဒိသာသာဂေ ယာဝဇ္ဇတနာ အတ္ထိ. ऐसा सोचकर वे तामलित्ति ग्राम के निवासी सीवलि स्थविर, कम्बोज राजपुत्र तामलिन्द स्थविर, काञ्चीपुर निवासी आनन्द स्थविर और राहुल स्थविर—इन चार स्थविरों के साथ नौका द्वारा वापस आए। वे सभी स्थविर त्रिपिटक के ज्ञाता, दक्ष और सामर्थ्यवान थे। उनमें विशेष रूप से राहुल स्थविर अत्यंत सामर्थ्यवान थे। कुसिम नगर पहुँचते समय वर्षावास का समय निकट आ गया था, इसलिए अरिमद्दन नगर में आचार्य के पास न पहुँच पाने के कारण उन्होंने कुसिम नगर में ही वर्षावास किया। उनके वर्षावास का विहार और उद्यान की चहारदीवारी कुसिम नगर के दक्षिण दिशा में आज भी विद्यमान है। ဝဿံဝုဋ္ဌကာလေ ပန မဟာပဝါရဏာယ ပဝါရေတွာ တေ ပဉ္စ ထေရာ အရိမဒ္ဒနနဂရံ အဂမံသု. ဥတ္တရာဇီဝတ္ထေရောစ အရိမဒ္ဒနနဂရ ဝါသီဟိ ဘိက္ခူဟိ ဝိသုံ ဟုတွာ သံဃကမ္မာနိ အကာသိ. ကိဉ္စာပိ စေတ္ထ ဥတ္တရာဇီဝတ္ထေရာဒယော သီဟဠဒီပတော ပစ္စာဂန္တွာ အရိမဒ္ဒနနဂရေ ဝသိတွာ သာသနံ အနုဂ္ဂဟေသုံ, ရာမညရဋ္ဌေ ပန ဇာတတ္တာ ပုဗ္ဗေ စ တတ္ထ နိဝါသတ္တာ ဣဓ ဒဿိတာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. वर्षावास की समाप्ति पर महाप्रवारणा के बाद, वे पाँचों थेर अरिमद्दन नगर चले गए। उत्तरजीव थेर ने अरिमद्दन नगर के निवासी भिक्षुओं से अलग होकर संघकर्म किए। यद्यपि यहाँ उत्तरजीव थेर आदि सिंहल द्वीप से लौटकर अरिमद्दन नगर में रहकर शासन का अनुग्रह किया, फिर भी रामञ्ञ राष्ट्र में जन्म लेने और पहले वहाँ निवास करने के कारण उन्हें यहाँ दिखाया गया है, ऐसा समझना चाहिए। တသ္မိဉ္စ [Pg.46] ကာလေ ဒလနဂရေ ပဒီပဇေယျဂါမေ ဇာတော သာရိပုတ္တော နာမ မဟလ္လကဿမဏေရော ဧကော အရိမဒ္ဒနနဂရံ ဂန္တွာ အာနန္ဒတ္ထေရဿ သန္တိကေ ဥပသမ္ပဇ္ဇိတွာ ပရိယတ္တိ ပရိယပုဏိ. သော ဗဟုဿုတော အဟောသိ ဒက္ခော ထာမသမ္ပန္နော စ. တမတ္ထံ သုတွာ နရပတိစညိသူရာဇာ စိန္တေသိ,- သစေသော အင်္ဂပစ္စင်္ဂသမ္ပန္နော ဘဝေယျ, အာစရိယံ ကတွာ ဌပေဿာမိ အနုဂ္ဂဟေဿာမီတိ. ရာဇာ ဧဝံ စိန္တေတွာ ရာဇပုရိသေ ပေသေတွာ ဝီမံသာပေသိ. ရာဇပုရိသာ စ တဿ ဆိန္နပါဒင်္ဂုဋ္ဌဂ္ဂတံ ပဿိတွာ တမတ္ထံ ရညော အာရောစေသုံ. ရာဇာ တံ သုတွာ ဧဝံ ဝိကလင်္ဂပစ္စင်္ဂေါ ဘဝေယျ, ပဓာနာစရိယဋ္ဌာနေ ဌပေတုံ န ယုတ္တောတိ ကတွာ ပဓာနာစရိယဘာဝံ န အကာသိ. ပူဇာသက္ကာ ရမတ္တေနေဝ အနုဂ္ဂဟံ အကာသိ. ဧကသ္မိဉ္စ ကာလေ ဓမ္မဝိလာသောတိ လဉ္ဆံ ဒတွာ ရာမညရဋ္ဌေ သာသနံ သောဓေတွာ ပရိသုဒ္ဓံ ကရောဟီတိ ရာမညရဋ္ဌံ ပေသေသိ. उस समय दल नगर के प्रदीपजेय गाँव में उत्पन्न सारिपुत्त नामक एक वृद्ध श्रामणेर अरिमद्दन नगर जाकर आनन्द थेर के पास उपसम्पदा ग्रहण कर पर्यत्ति (शास्त्रों) का अध्ययन किया। वह बहुश्रुत, दक्ष और सामर्थ्यवान था। उस बात को सुनकर नरपति चञ्ञिसूर राजा ने सोचा— 'यदि यह अंग-प्रत्यंग से संपन्न हो, तो मैं इसे आचार्य बनाकर स्थापित करूँगा और अनुग्रह करूँगा।' राजा ने ऐसा सोचकर राजपुरुषों को भेजकर जाँच करवाई। राजपुरुषों ने उसके पैर के अंगूठे का अग्र भाग कटा हुआ देखकर राजा को यह बात बताई। राजा ने यह सुनकर कि 'ऐसा विकलाङ्ग प्रधान आचार्य के पद पर स्थापित करने योग्य नहीं है', उसे प्रधान आचार्य नहीं बनाया। केवल पूजा-सत्कार मात्र से अनुग्रह किया। एक समय 'धम्मविलास' की उपाधि देकर 'रामञ्ञ राष्ट्र में शासन को शुद्ध और परिशुद्ध करो' कहकर उसे रामञ्ञ राष्ट्र भेज दिया। သောစ ရာမညရဋ္ဌံ ဂန္တွာ ဒလနဂရေ ဗဟုနံ ဘိက္ခူနံ ဓမ္မ ဝိနယံ ဝါစေတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဟေသိ. တတ္ထ စ ရာမညမနုဿာ တဿ ဓမ္မဝိလာသတ္ထေရဿ သိဿာနုသိဿာ သီဟဠဘိက္ခု ဂဏာတိ ဝေါဟာရန္တိ. ဣစ္စေဝံ သီဟဠဒီပိကဿ အာနန္ဒတ္ထေရဿ သိဿံ ဓမ္မဝိလာသံ ပဋိစ္စ ရာမညရဋ္ဌေ သီဟဠဒီပတော သာသနဿ အာဂတမဂ္ဂေါတိ. उसने रामञ्ञ राष्ट्र जाकर दल नगर में बहुत से भिक्षुओं को धम्म और विनय पढ़ाकर शासन की उन्नति की। वहाँ रामञ्ञ के लोग उस धम्मविलास थेर के शिष्यों और प्रशिष्यों को 'सिंहल भिक्षु गण' कहते हैं। इस प्रकार सिंहल द्वीप के आनन्द थेर के शिष्य धम्मविलास के माध्यम से रामञ्ञ राष्ट्र में सिंहल द्वीप से शासन के आने का मार्ग है। ဣဒံ ရာမညရဋ္ဌေ စတုတ္ထံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह रामञ्ञ राष्ट्र में शासन की चौथी प्रतिष्ठापना है। တသ္မိဉ္စ ကာလေ မုတ္တိမနဂရေ အဂ္ဂမဟေသိယာ အာစရိယာ ဗုဒ္ဓဝံသတ္ထေရမဟာနာဂတ္ထေရာ သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ မဟာဟာရဝါသိဂဏဝံသဘူတာနံ ဘိက္ခူနံ သန္တိကေ ပုန သိက္ခံ ဂဏှိတွာ မုတ္တိမနဂရံ ပစ္စာဂန္တွာ မုတ္တိမနဂရဝါသီတိ ဘိက္ခူဟိ ဝိသုံ ဟုတွာ သံဃကမ္မာနိ ကတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဟေသုံ. တေစ ထေရေ [Pg.47] ပဋိစ္စ ရာမညရဋ္ဌေ ပုန သီဟဠဒီပတော သာသနံ အာဂတန္တိ. उस समय मुत्तिम नगर में अग्र-महिषी के आचार्य बुद्धवंस थेर और महानाग थेर सिंहल द्वीप जाकर महाविहारवासी गण के वंशज भिक्षुओं के पास पुनः शिक्षा ग्रहण कर मुत्तिम नगर लौट आए और मुत्तिम नगर के निवासी भिक्षुओं से अलग होकर संघकर्म करते हुए शासन की उन्नति की। उन थेरों के माध्यम से रामञ्ञ राष्ट्र में पुनः सिंहल द्वीप से शासन आया। ဣဒံ ရာမညရဋ္ဌေ ပဉ္စမံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह रामञ्ञ राष्ट्र में शासन की पाँचवीं प्रतिष्ठापना है। တတော ပစ္ဆာစ မုတ္တိမနဂရေ သေတိဘိန္ဒဿ ရညော မာတုယာ အာစရိယော မေဓင်္ကရော နာမ ထေရော သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ သီဟဠဒီပေ အရညဝါသီနံ မဟာထေရာနံ သန္တိကေ ပုန သိက္ခံ ဂဟေတွာ ပရိယတ္တိံ ပရိယာပုဏိတွာ သုဝဏ္ဏရဇတမယေ တိပုသီသစ္ဆန္နေ သေတိဘိန္ဒဿ ရညော မာတုယာ ကာရာဝိတေ ဝိဟာရေ နိသိဒိတွာ သာသနံ အနုဂ္ဂဟေသိ. လောကဒီပကသာရဉ္စ နာမ ဂန္ထံ အကာသိ. အထာပရိမ္ပိ မုတ္တိမနဂရေယေဝ သုဝဏ္ဏသောဘဏော နာမ ထေရော သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ မဟာဝိဟာရဝါသိဂဏဝံသဘူတာနံ ထေရာနံ သန္တိကေ ပုန သိက္ခံ ဂဟေတွာ မုတ္တိမနဂရမေဝ ပစ္စာဂစ္ဆိ. उसके बाद मुत्तिम नगर में राजा सेतिभिन्द की माता के आचार्य मेधंकर नामक थेर सिंहल द्वीप गए और सिंहल द्वीप के अरण्यवासी महाथेरों के पास पुनः शिक्षा ग्रहण कर और पर्यत्ति का अध्ययन कर, राजा सेतिभिन्द की माता द्वारा निर्मित सोने-चाँदी से युक्त और रांगे व सीसे से ढके हुए विहार में रहकर शासन का अनुग्रह किया। उन्होंने 'लोकदीपकसार' नामक ग्रंथ की रचना की। इसके बाद फिर मुत्तिम नगर के ही सुवण्णसोभण नामक थेर सिंहल द्वीप गए और महाविहारवासी गण के वंशज थेरों के पास पुनः शिक्षा ग्रहण कर मुत्तिम नगर ही लौट आए। သော ပန ထေရော အရညေယေဝ ဝသိ. ဓုတင်္ဂဓရော စ အဟောသိ အပ္ပိစ္ဆော သန္တုဋ္ဌော လဇ္ဇီ ကုက္ကုစ္စကော သိက္ခာ ကာမော ဒက္ခော ထာမသမ္ပန္နော စ. သီဟဠဒီပေ ကလမ္ဗုမှိ နာမ ဇာတဿရေ ဥဒကုက္ခေပသီမာယံ အတိရေကပဉ္စဝဂ္ဂေန ဝနရတနံ နာမ သံဃရာဇံ ဥပဇ္ဈာယံ ကတွာ ရာဟုလဘဒ္ဒံ နာမ ဝိဇယဗာဟုရညော အာစရိယဘူတံ ထေရံ ကမ္မဝါစာစရိယံ ကတွာ ဥပသမ္ပဇ္ဇိ. သောစ ထေရော ပုနာဂန္တွာ မုတ္တိမနဂရေယေဝ ဝသိတွာ ဂဏံ ဝဍ္ဎေတွာ သာသနံ အနုဂ္ဂဟေသိ. ဧတေ စ ဒွေ ထေရေ ပဋိစ္စ ရာမညရဋ္ဌေ သီဟဠဒီပတော သာသနံ အာဂတံ. वह थेर अरण्य में ही रहते थे। वे धुतंगधारी, अल्पेच्छ, संतुष्ट, लज्जाशील, विनय के प्रति सचेत, शिक्षा-प्रेमी, दक्ष और सामर्थ्यवान थे। सिंहल द्वीप के कलम्बु नामक प्राकृतिक सरोवर में उदकुक्खेप सीमा में पाँच से अधिक भिक्षुओं के गण के साथ वनरतन नामक संघराज को उपाध्याय बनाकर और राजा विजयबाहु के आचार्य राहुलभद्र नामक थेर को कर्मवाचाचार्य बनाकर उन्होंने उपसम्पदा ग्रहण की। वह थेर पुनः लौटकर मुत्तिम नगर में ही रहकर गण की वृद्धि की और शासन का अनुग्रह किया। इन दो थेरों के माध्यम से रामञ्ञ राष्ट्र में सिंहल द्वीप से शासन आया। ဣဒံ ရာမညရဋ္ဌေ ဆဋ္ဌံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह रामञ्ञ राष्ट्र में शासन की छठी प्रतिष्ठापना है। တတော ပစ္ဆာ သာသနဝသေန ဒွိဝဿာဓိကေ ဒွိသဟဿေ ကလိယုဂတော ဧကာသီတိကေ သမ္ပတ္တေ ဟံသာဝတီနဂရေ သိရိပရမမဟာဓမ္မရာဇာတိ [Pg.48] လဒ္ဓနာမော ဓမ္မစေတိယရာဇာ ကုသိမမဏ္ဍလေ ဟံသာဝတီမဏ္ဍလေ မုတ္တိမမဏ္ဍလေ စ ရဋ္ဌဝါသိနော သပဇံဝိယ ဓမ္မေန သမေန ရက္ခိတွာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. သော စ ရာဇာ တီသု ပိဋကေသု စတူသု စ ဝေဒေသု ဗျာကရဏစ္ဆန္ဒာလင်္ကာရာဒီသု စ ဆေကော သိက္ခိတနာနာသိပ္ပော နာနာဘာသာသု စ ပသုတော သဒ္ဓါသီလာဒိဂုဏောပေတော ကုမုဒကုန္ဒသရဒစန္ဒိကာသမာနသိတပဇပတိဘူတော စ သာသနေ စ အတိပ္ပသန္နော အဟောသိ. उसके बाद शासन वर्ष 2002 और कलियुग वर्ष 81 प्राप्त होने पर, हंसावती नगर में 'सिरिपरममहाधम्मराजा' की उपाधि प्राप्त धम्मचेतिय राजा ने कुसिम मण्डल, हंसावती मण्डल और मुत्तिम मण्डल के राष्ट्रवासियों की अपनी संतान के समान धर्म और न्यायपूर्वक रक्षा करते हुए राज्य किया। वह राजा तीनों पिटकों, चारों वेदों, व्याकरण, छंद, अलंकार आदि में निपुण, विभिन्न शिल्पों में शिक्षित, अनेक भाषाओं में पारंगत, श्रद्धा और शील आदि गुणों से युक्त, कुमुद, कुन्द और शरद ऋतु की चाँदनी के समान उज्ज्वल कीर्ति वाले और शासन में अत्यंत श्रद्धालु थे। ဧကသ္မိံ ကာလေ သော စိန္တေသိ, ဘဂဝတော သာသနံ နာမ ပဗ္ဗဇ္ဇဥပသမ္ပဒတာဝေန သမ္ဗန္ဓံ, ဥပသမ္ပဒဘာဝေါ စ သီမပရိသဝတ္ထု ဉတ္တိကမ္မဝါစာသမ္ပတ္တီဟိ သမ္ဗန္ဓောတိ. ဧဝဉ္စ ပန စိန္တေတွာ သီမဝိနိစ္ဆယံ တဿံ ဝဏ္ဏနံ ဝိနယသင်္ဂဟံ တဿံဝဏ္ဏနံ သီမာလင်္ကာရ သီမသင်္ဂဟဉ္စ သဒ္ဒတော အတ္ထတော စ ပုနပ္ပုနံ ဥပပရိက္ခိတွာ အညမညံ သံသန္ဒိတွာ ပုဗ္ဗာပရံ တုလယိတွာ ဘဂဝတော အဓိပ္ပာယော ဤဒိသော ဂန္ထကာရာနံ အဓိပ္ပာယော ဤဒိသောတိ ပဿိတွာ အမှာကံ ရာမညရဋ္ဌေ ဗဒ္ဓနဒီသမုဒ္ဒဇာတေဿရာဒယော သီမာယော ဗဟုကာပိ သမာနာ အယံ ပရိသုဒ္ဓါတိ ဝဝတ္ထပေတုံ ဒုက္ကရံ, ဧဝံ သတိ သီမပရိသာပရိသုဒ္ဓါ ဘဝိတုံ ဒုက္ကရာတိ ပဋိဘာတိ. एक समय उन्होंने (राजा ने) विचार किया कि भगवान का शासन प्रव्रज्या और उपसंपदा से संबंधित है, और उपसंपदा की स्थिति सीमा, परिषद्, वस्तु और ज्ञप्ति-कर्म-वाचा की पूर्णता (सम्पत्ति) से संबंधित है। ऐसा विचार कर, सीमा-विनिर्णय और उसकी व्याख्या, विनय-संग्रह और उसकी व्याख्या, सीमा-अलंकार और सीमा-संग्रह का शब्दशः और अर्थतः बार-बार परीक्षण कर, परस्पर तुलना कर, पूर्व और अपर का मिलान कर, 'भगवान का अभिप्राय ऐसा है' और 'ग्रंथकारों का अभिप्राय ऐसा है' - यह देखकर (उन्होंने पाया कि) हमारे रामण्य राष्ट्र में बद्ध-नदी, समुद्र और प्राकृतिक झील आदि सीमाएँ बहुत होने पर भी, 'यह शुद्ध है' ऐसा निश्चित करना कठिन है; ऐसा होने पर सीमा और परिषद् की परिशुद्धता होना कठिन प्रतीत होता है। တတော ပစ္ဆာ ရာမညရဋ္ဌေ တိပိဋကဓရဗျတ္တပ္ပဋိဗလတ္ထေရေဟိ မန္တေတွာ ရညော ပဋိဘာနာနုရူပံ သီမပရိသာ ပရိသုဒ္ဓါ ဘဝိတုံ ဒုက္ကရာတိ ထေရာ ဝိနိစ္ဆနိံသု. उसके पश्चात, रामण्य राष्ट्र के त्रिपिटकधारी, विद्वान और समर्थ स्थविरों के साथ परामर्श करने पर, राजा की बुद्धि के अनुरूप ही स्थविरों ने यह निर्णय दिया कि सीमा और परिषद् का परिशुद्ध होना कठिन है। အထ ရာဇာ ဧဝမ္ပိ စိန္တေသိ,– အဟောဝတ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ သာသနံ ပဉ္စဝဿသဟဿာနိ ပတိဋ္ဌတိဿတီတိ ဂန္ထေသု ဝုတ္တောပိ သမာနော အဘိသမ္ဗုဒ္ဓတော စတုသဋ္ဌာဓိကဒွိသဟဿမတ္တေနေဝ ကာလေန သာသနေ မလံ ဟုတွာ ဥပသမ္ပဒကမ္မေ ကင်္ခါဋ္ဌာနံ တာဝ ဥပ္ပဇ္ဇိ, ကထံ ပန ပဉ္စဝဿသဟဿာနိ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ ဘဝိဿတီတိ. ဧဝံ ဓမ္မသံဝေဂံ ဥပ္ပာဒေတွာ ပုနာပိ ဧဝံ စိန္တေသိ,- ဧဝံ ဧတ္တကံ သာသနေ မလံ ဒိဿမာနောပိ [Pg.49] သမာနော ဥပသမ္ပဒကမ္မေ ကင်္ခါဋ္ဌာနံ ဒိဿမာနောပိ သမာနော ပရိသုဒ္ဓတ္ထာယ အနာရဘိတွာ မာဒိသော အပ္ပောဿုက္ကော မဇ္ဈတ္တော နိသီဒိတုံ အယုတ္တော, ဧဝဉှိ သတိ ဘဂဝတိ သဒ္ဓေါ ပသန္နောမှီတိ ဝတ္တဗ္ဗတံ အနာပဇ္ဇေယျံ, တသ္မာ သာသနံ နိမ္မလံ ကာတုံ အာရဘိဿာမီတိ. तब राजा ने ऐसा भी विचार किया— 'अहो! यद्यपि ग्रंथों में कहा गया है कि सम्यक्सम्बुद्ध का शासन पाँच हजार वर्षों तक टिका रहेगा, फिर भी बुद्धत्व प्राप्ति के केवल दो हजार चौंसठ (2064) वर्षों के समय में ही शासन में दोष उत्पन्न हो गया है और उपसंपदा कर्म में संदेह का स्थान बन गया है, तो फिर पाँच हजार वर्षों तक शासन की स्थिति कैसे होगी?' इस प्रकार धर्म-संवेग उत्पन्न कर उन्होंने फिर से ऐसा विचार किया— 'शासन में इतना दोष दिखाई देने पर भी और उपसंपदा कर्म में संदेह का स्थान दिखाई देने पर भी, परिशुद्धि के लिए प्रयास न कर मेरे जैसा व्यक्ति उदासीन और तटस्थ होकर बैठा रहे, यह अनुचित है। यदि ऐसा हुआ, तो मैं 'भगवान में श्रद्धालु और प्रसन्न हूँ' ऐसा कहने का अधिकारी नहीं रहूँगा। इसलिए, मैं शासन को निर्मल करने का प्रयास आरम्भ करूँगा।' ကုတော နုခေါ ဒါနိ သာသနံ အာဟရိတွာ ထိရံ ပတိဋ္ဌာ ပေယျန္တိ အာဝဇ္ဇန္တော ဧဝံ စိန္တေသိ,- ဘဂဝတော ကိရ ပရိနိဗ္ဗာနတော ဆတ္တိံသာဓိကေ ဒွိသတေ သမ္ပတ္တေ မဟာမောဂ္ဂလိ ပုတ္တတိဿတ္ထေရော မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရံ ပေသေတွာ သီဟဠဒီပေ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ, တဒါ ဒေဝါနံ ပိယတိဿရာဇာ မဟာဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ အဒါသိ, သာသနဝရဉ္စ ဧကာသိတာဓိကာနိ ဒွိဝဿသတာနိ ဝိမလံ ဟုတွာ ပတိဋ္ဌဟိ, ဘိက္ခုသံဃောပိ မဟာဝိဟာရ ဝါသိဂဏဝသေန ဧကတောဝ အဋ္ဌာသိ, တတော ပစ္ဆာ အဘယဂိရိဝါသိဇေ တဝနဝါသိဝသေန ဒွေဓာ ဟုတွာ ဘိဇ္ဇိ, ဇိနစက္ကေ အဋ္ဌသတ္တသတာဓိကေ သဟဿေ သမ္ပတ္တေ သိရိသံဃဗောဓိပရက္ကမဗာဟုမဟာရာဇာ ဥဒုမ္ဗရဂိရိဝါသိ မဟာကဿပတ္ထေရပ္ပမုခံ မဟာဝိဟာရ ဝါသိဂဏံ အနုဂ္ဂဟေတွာ ယထာဝုတ္တေ ဒွေဂဏေ ဝိသောဓေသိ, သာသနံ နိမ္မလံ အကာသိ, တတော ပစ္ဆာ ဝိဇယဗာဟုပရက္ကမဗာဟုရာဇူနံ ဒွိန္နံ ကာလေပိ သာသနံ နိမ္မလံ ဟုတွာယေဝ အဋ္ဌာသိ, တေနေဝ ဗျတ္တပ္ပဋိဗလဘိက္ခူ အာယာစိတွာ သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ ပုန သိက္ခံ ဂဏှာ ပေဿာမိ, တေသံ ပန ပရမ္ပရဝသေန ပဝတ္တာနံ ဘိက္ခူနံ ဝသေန အမှာကံ ရာမညရဋ္ဌေ သာသနံ နိမ္မလံ ဟုတွာ ပတိဋ္ဌဟိဿတီတိ. ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ မောဂ္ဂလာနတ္ထေရံ သောမတ္ထေရဉ္စ သီဟဠဒီပံ ဂမနတ္ထာယ ယာစိ. ထေရာစ သာသနပ္ပဋိယတ္တကမ္မမိဒန္တိ မနသိကရိတွာ ပဋိညံ အကံသု. 'अब कहाँ से शासन को लाकर स्थिर रूप से प्रतिष्ठित किया जाए?' ऐसा विचार करते हुए उन्होंने सोचा— 'सुना है कि भगवान के परिनिर्वाण के दो सौ छत्तीस (236) वर्ष बीतने पर महामोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर ने महामहिन्द स्थविर को भेजकर सिंहल द्वीप में शासन प्रतिष्ठित किया था। तब देवानांपिय तिस्स राजा ने महाविहार बनवाकर दान किया था, और वह श्रेष्ठ शासन दो सौ इक्यासी (281) वर्षों तक निर्मल होकर प्रतिष्ठित रहा। भिक्षु संघ भी महाविहारवासी गण के रूप में एक ही रहा। उसके बाद अभयगिरिवासी और जेतवनवासी के रूप में दो भागों में विभाजित हो गया। बुद्ध संवत के एक हजार सात सौ अठहत्तर (1778) वर्ष बीतने पर श्री संघबोधि पराक्रमबाहु महाराज ने उदुम्बरगिरिवासी महाकस्सप स्थविर के नेतृत्व में महाविहारवासी गण का अनुग्रह कर उक्त दोनों गणों का शोधन किया और शासन को निर्मल किया। उसके बाद विजयबाहु और पराक्रमबाहु इन दोनों राजाओं के काल में भी शासन निर्मल ही रहा। इसलिए, विद्वान और समर्थ भिक्षुओं से प्रार्थना कर, उन्हें सिंहल द्वीप भेजकर पुनः उपसंपदा ग्रहण करवाऊँगा। उन परंपरा से चले आ रहे भिक्षुओं के माध्यम से हमारे रामण्य राष्ट्र में शासन निर्मल होकर प्रतिष्ठित होगा।' ऐसा विचार कर उन्होंने मोग्गलान स्थविर और सोम स्थविर से सिंहल द्वीप जाने की प्रार्थना की। स्थविरों ने भी 'यह शासन की सेवा का कार्य है' ऐसा मानकर अपनी सहमति दे दी। ရာဇာ စ ဒါဌာဓာတုပူဇနတ္ထာယ ဘိက္ခုသံဃဿ ပူဇနတ္ထာယ ဘူဝနေကဗာဟုရညော ပဏ္ဏာကာရတ္ထာယ ဒေယျဓမ္မပဏ္ဏာကာရဝတ္ထူနိ ပဋိယာဒေတွာ စိတြဒူတံ ရာမဒူတန္တိ ဣမေ ဒွေ အမစ္စေ ဒွီသု နာဝါသု နာယကဋ္ဌာနေ ဌပေတွာ ကလိယုဂေ သတ္တတိံသာဓိကေ အဋ္ဌဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ မာဃမာသဿ ပုဏ္ဏမိတော ဧကာဒသမိယံ သူရဝါရေ စိတြဒူတံ သဒ္ဓိံ မောဂ္ဂလာနတ္ထေရပ္ပမုခေဟိ ဘိက္ခူဟိ ဧကာယ နာဝါယ ဂမာပေသိ. ဖဂ္ဂုဏမာသဿ အဋ္ဌမိယံ သီဟဠဒီပေ ကလမ္ဗုတိတ္ထံ ပါယာသိ. राजा ने दन्त-धातु की पूजा के लिए, भिक्षु संघ की पूजा के लिए और राजा भुवनेकबाहु के लिए उपहार स्वरूप देय-वस्तुएँ और भेंट तैयार कीं। उन्होंने चित्रदूत और रामदूत नामक दो अमात्यों को दो नौकाओं का नायक नियुक्त किया। कलियुग के आठ सौ सैंतीस (837) वर्ष बीतने पर, माघ मास की पूर्णिमा के ग्यारहवें दिन (एकादशी), रविवार को चित्रदूत को मोग्गलान स्थविर आदि भिक्षुओं के साथ एक नौका से रवाना किया। वह फाल्गुन मास की अष्टमी को सिंहल द्वीप के कलम्बु तीर्थ (कोलंबो) पहुँचा। ရာမဒူတံ ပန တသ္မိံယေဝ ဝဿေ မာဃမာသဿ ပုဏ္ဏမိတော ဒွါဒသမိယံ စန္ဒဝါရေ သဒ္ဓိံ သောမတ္ထေရပ္ပမုခေဟိ ဘိက္ခူဟိ ဧကာယ နာဝါယ ဂမာပေသိ. ဥဇုကံ ပန ဝါတံ အလဘိတွာ စိတြမာသဿ ဇုဏှပက္ခနဝမိယံ သီဟဠဒီပေ ဝလ္လိဂါမံ ပါယာသိ. रामदूत को उसी वर्ष माघ मास की पूर्णिमा के बारहवें दिन (द्वादशी), सोमवार को सोम स्थविर आदि भिक्षुओं के साथ एक नौका से रवाना किया। अनुकूल हवा न मिलने के कारण वह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को सिंहल द्वीप के वल्लिग्राम पहुँचा। တတော ပစ္ဆာ တေပိ ဒွေ အမစ္စာ ဒွီသု နာဝါသု အာဘတာနိ ဒါတဗ္ဗပဏ္ဏာကာရဝတ္ထူနိ သန္ဒေသပဏ္ဏာနိ စ ဘူဝနေကဗာဟုရညော ဘိက္ခူသံဃဿ စ အဒါသိ. ရညာ ပေသိတဘိက္ခူနဉ္စ သန္ဒေသပဏ္ဏေ ကထိတနိယာမေနေဝ ကလျာဏိယံ နာမ နဒိယံ ဥဒကုက္ခေပသီမာယံ သာမဏေရဘူမိယံ ပတိဋ္ဌာပေတွာ ပုန ဥပသမ္ပဒကမ္မံ အကံသု. उसके बाद उन दोनों अमात्यों ने दो नौकाओं में लाई गई भेंट की वस्तुएँ और संदेश-पत्र राजा भुवनेकबाहु और भिक्षु संघ को दिए। राजा द्वारा भेजे गए भिक्षुओं को संदेश-पत्र में वर्णित विधि के अनुसार ही कल्याणी नामक नदी में उदकुक्खेप-सीमा (जल-सीमा) में श्रामणेर भूमि में प्रतिष्ठित कर पुनः उपसंपदा कर्म संपन्न किया गया। ဥပသမ္ပဇ္ဇိတွာ စ ဘူဝနေကဗာဟုရာဇာ နာနာပ္ပကာရေ ဘိက္ခူနံ သာရုပ္ပေ ပရိက္ခာရေ ဒတွာ ဣဒံ ပန အာမိသဒါနံ ယာဝ ဇီဝိတပရိယောသာနာယေဝ ပရိဘုဉ္ဇိတဗ္ဗံ ဘဝိဿတိ, နာမလဉ္ဆံ ပန န ဇီရိဿတီတိ ကတွာ ရာမဒူတဿ နာဝါယ ပခါနဘူတဿ သောမတ္ထေရဿ သိရိသံဃဗောဓိသာမီတိ နာမံ အဒါသိ. အဝသေသာနံ ပန ဒသန္နံ ထေရာနံ ကိတ္တိသိရိမေဃသာမိ ပရက္ကမဗာဟုသာမိ ဗုဒ္ဓဃောသသာမိ သီဟဠဒီပဝိသုဒ္ဓသာမိ ဂုဏရတနဓရသာမီ ဇိနာလင်္ကာရသာမိ ရတနမာလိသာမိ သဒ္ဓမ္မတေဇသာမိ ဓမ္မရာမသာမိ ဘူဝနေကဗာဟုသာမီတိ နာမာနိ အဒါသိ. उपसम्पदा प्राप्त करने के बाद, राजा भुवनेकबाहु ने भिक्षुओं को विभिन्न प्रकार के उपयुक्त परिष्कार (उपकरण) प्रदान किए और यह विचार करते हुए कि "यह आमिष दान तो केवल जीवन के अंत तक ही उपभोग किया जाएगा, किन्तु नाम की छाप कभी नष्ट नहीं होगी", उन्होंने 'रामदूत' नामक नौका के प्रमुख सोम थेर को 'सिरिसङ्घबोधिसामी' नाम दिया। शेष दस थेरों को उन्होंने कित्तिसिरिमेघसामी, परक्कमबाहुसामी, बुद्धघोससामी, सीहलदीपविसुद्धसामी, गुणरतनधरसामी, जिनालङ्कारसामी, रतनमालिसामी, सद्धम्मतेजसामी, धम्मरामसामी और भुवनेकबाहुसामी नाम दिए। စိတြဒူတဿ [Pg.51] နာဝါယ ပခါနဘူတဿ မောဂ္ဂလာနတ္ထေရဿ ဓမ္မကိတ္တိလောကဂရုသာမီတိ နာမံ အဒါသိ. အဝသေသာနံ ပန သိရိဝနရတနသာမိ မင်္ဂလတ္ထေရဿာမိ ကလျာဏတိဿဿာမိ စန္ဒဂိရိသာမိ သိရိဒန္တဓာတုသာမိ ဝနဝါသိတိဿသာမိ ရတနလင်္ကာရသာမိ မဟာဒေဝသာမိ ဥဒုမ္ဗရဂိရိသာမိ စူဠာဘယတိဿသာမီတိ နာမာနိ အဒါသိ. ဗာဝီသတိယာ ပန ပစ္ဆာ သမဏာနံ နာမံ န အဒါသိ. အဘိနဝသိက္ခံ ပန သဗ္ဗေသံယေဝ အဒါသိ. चित्रदूत नामक नौका के प्रमुख मोग्गलान थेर को उन्होंने 'धम्मकित्तिलोकगरुसामी' नाम दिया। शेष (दस) को सिरिवनरतनसामी, मङ्गलत्थेरसामी, कल्याणतिस्ससामी, चन्दगिरिसामी, सिरिदन्तधातुसामी, वनवासितिस्ससामी, रतनलङ्कारसामी, महादेवसामी, उदुम्बरगिरिसामी और चूळाभयतिस्ससामी नाम दिए। बाद के बाईस श्रमणों को उन्होंने (विशेष) नाम नहीं दिए। किन्तु, उन सभी को नवीन शिक्षा (उपसम्पदा) प्रदान की। တတော ပစ္ဆာ စေတိယပူဇနာဒီနိ ကတွာ တံတံကိစ္စံ နိပ္ဖာဒေတွာ ပုန အာဂမံသု. ဘူဝနေကဗာဟုရာဇာ စိတြဒူတံ ဧဝမာဟ, ရာမာဓိပတိရညော ပဏ္ဏာကာရံ ပဋိဒါတုံ ဣစ္ဆာမိ, ပဋိဒူတဉ္စ ပေသေတုံ တာဝ တွံ အာဂမေဟီတိ. ဧဝံ ပန ဝတွာ ပစ္ဆာ အာဂမနကာလေ စဏ္ဍဝါတဘယေန မဟာသမုဒ္ဒမဇ္ဈေ နာဝါ အဝဂစ္ဆတိ. တေန သီဟဠရညာ ပေသိတနာဝါယ သဗ္ဗေ သန္နိပတိတွာ အာရုဟိတွာ အာဂစ္ဆန္တာ တီဏိ ဒိဝသာနိ အတိက္ကမိတွာ ပုန စဏ္ဍဝါတဘယေန အဂမ္ဘီရဋ္ဌာနေ သိလာယ ဃဋ္ဋေတွာ လဂ္ဂိတွာ ဂန္တုံ အသက္ကုဏိတွာ ဧကံ ဥဠုမ္ပံ ဗန္ဓိတွာ ဇင်္ဃေနေဝ အဂမံသု. သီဟဠရညော စ ဒူတော ပဏ္ဏာကာရံ ဒတွာ ပစ္စာဂမာသိ. ဘိက္ခူသု စ ဘိက္ခူ အန္တရာမဂ္ဂေယေဝ မစ္စု အာဒါယ ဂစ္ဆတိ. အဟော အနိစ္စာ ဝတ သင်္ခါရာတိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ,– उसके बाद, चैत्य-पूजा आदि करके और अपने-अपने कार्यों को पूरा करके वे पुनः लौटे। राजा भुवनेकबाहु ने चित्रदूत से इस प्रकार कहा, "मैं राजा रामाधिपति को उपहार प्रत्यर्पित करना चाहता हूँ और प्रतिदूत भेजना चाहता हूँ, तब तक तुम प्रतीक्षा करो।" ऐसा कहकर, बाद में लौटने के समय, प्रचंड वायु के भय से महासमुद्र के बीच में नौका डूबने लगी। उस सिंहल राजा द्वारा भेजी गई नौका में सभी एकत्रित होकर सवार होकर आ रहे थे, तीन दिन बीतने के बाद पुनः प्रचंड वायु के भय से उथले स्थान पर शिला से टकराकर फंस जाने के कारण आगे बढ़ने में असमर्थ होकर, एक बेड़ा (उळुम्प) बांधकर वे पैदल ही चले गए। सिंहल राजा का दूत उपहार देकर वापस लौट आया। भिक्षुओं में से कुछ भिक्षुओं को मार्ग के बीच में ही मृत्यु ने ग्रस लिया। अहो! संस्कार निश्चित ही अनित्य हैं। यहाँ ये (गाथाएं) हैं— ဣမေသံ ပန အာရဒ္ဓံ, န ကိစ္စံ ယာဝ နိဋ္ဌိတံ; န တာဝ အာဒိယိဿန္တိ, မစ္စု နတ္ထိ အာပေက္ခနာ. इनका कार्य अभी आरम्भ ही हुआ था, अभी समाप्त नहीं हुआ था; तब तक वे उसे ग्रहण नहीं कर पाएंगे, क्योंकि मृत्यु किसी की प्रतीक्षा नहीं करती। နိက္ကာရုဏိကော ဟိ ဧသ, ဗလက္ကာရေန အာဒိယ; ရောဒမာနံဝ ဉာတီနံ အနိစ္ဆန္တံဝ ဂစ္ဆတီတိ. वह (मृत्यु) निश्चित ही करुणाहीन है, जो बलपूर्वक पकड़कर; सम्बन्धियों के रोते रहने पर भी, अनिच्छुक व्यक्ति को ले जाती है। ရာမာဓိပတိရာဇာစ တေသံ ဘိက္ခူနံ ပတ္တကာလေ ဟံသာဝတီနဂရဿ ပစ္ဆိမသ္မိံ ဒိသာဘာဂေ နရသူရေန နာမ အမစ္စေန ပရိဘုတ္တေ ဂါမခေတ္တေ ပါဠိအဋ္ဌကထာဠီကာဒယော ပုနပ္ပုနံ ပဿိတွာ ဥပပရိက္ခိတွာ သီမသမူဟနသီမသမ္မုတိကမ္မာနိ ကာရပေသိ. သီဟဠဒီပေ ဘဂဝတာ နှာယိတပုဗ္ဗာယ ကလျာဏိယာ နာမ နဒိယံ ဥဒကုက္ခေပသီမံ ကတွာ တတ္ထ မဟာဝိဟာရဝါသီနံ ဘိက္ခူနံ သန္တိကေ ဥပလဒ္ဓဥပသမ္ပဒဘာဝေဟိ ဘိက္ခူဟိ ကတတ္တာ ကလျာဏီသီမာတိ သမညံ အကာသိ. ဣစ္စေဝံ ရာမာဓိပတိရာဇာ ပတ္တလင်္ကေ ဘိက္ခူ နိဿာယ သာသနံ သုဋ္ဌု ပတိဋ္ဌိတံ အကာသိ. ကလိယုဂဿ အဋ္ဌတိံသာဓိကအဋ္ဌဝဿသတကာလတော ယာဝ ဧကစတ္တာလီသာဓိကအဋ္ဌဝဿသတာ တေသံ ဘိက္ခူနံ ဝံသေ အသီတိမတ္တာ ဂဏပါမောက္ခတ္ထေရာ အဟေသုံ. တေသံ သိဿဇာတာနိ ပန ဆဗ္ဗိသာဓိကာနိ ဒွိသတာနိ စတုသဟဿာနိ ဒသသဟဿာနိ အဟေသုံ. ဧဝံ ဘဂဝတော သာသနံ ရာမညရဋ္ဌေ ဝုဍ္ဎိံ ရာမညရဋ္ဌေ ဝုဍ္ဎိံ ဝိရူဠိံ ဝေပုလ္လမာပဇ္ဇိတိ. और राजा रामाधिपति ने उन भिक्षुओं के आगमन के समय, हंसावती नगर के पश्चिम दिशा में नरसूर नामक अमात्य द्वारा उपभोग किए जाने वाले ग्राम-क्षेत्र में पालि, अट्ठकथा और टीका आदि को बार-बार देखकर और परीक्षण करके सीमा-समुहन (सीमा हटाना) और सीमा-सम्मति (सीमा निर्धारण) के कार्य करवाए। सिंहल द्वीप में भगवान बुद्ध द्वारा पूर्व में स्नान की गई कल्याणी नामक नदी में उदकुक्खेप-सीमा बनाकर, वहाँ महाविहारवासी भिक्षुओं के सान्निध्य में प्राप्त उपसम्पदा वाले भिक्षुओं द्वारा किए जाने के कारण, इसे 'कल्याणी सीमा' नाम दिया गया। इस प्रकार राजा रामाधिपति ने लंका से लौटे भिक्षुओं के आश्रय से शासन को भली-भांति प्रतिष्ठित किया। कलियुग के ८३८ वर्ष से लेकर ८४१ वर्ष के काल तक, उन भिक्षुओं के वंश में लगभग अस्सी गणप्रमुख थेर हुए। उनके शिष्यों की संख्या चौदह हजार दो सौ छब्बीस (१४२२६) थी। इस प्रकार भगवान का शासन रामञ्ञ राष्ट्र में वृद्धि, प्रगति और विस्तार को प्राप्त हुआ। ဣဒံ ရာမညရဋ္ဌေ သတ္တမံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह रामञ्ञ राष्ट्र में शासन की सातवीं प्रतिष्ठापना है। ယဒါ ပန အရိမဒ္ဒနနဂရေ အနုရုဒ္ဓေါ နာမ ရာဇာ သုဓမ္မပုရံ သရာဇိကံ အဘိဘဝိတွာ ဝိဒ္ဓံသိ, တဒါ ရာမညရဋ္ဌံ ရာဇသုညံ ဟုတွာ ပတိဋ္ဌဟိ. ရာမညရဋ္ဌေ မုတ္တိမနဂရေ သောဏုတ္တရဝံသော ဧကော ဂဏော, သိဝလိဝံသော ဧကော, တာမလိန္ဒဝံသော ဧကော, အာနန္ဒဝံသော ဧကော, ဗုဒ္ဓဝံသော ဧကော, မဟာနာဂဝံသော ဧကောတိ ဆဂ္ဂဏာ ဝိသုံ ဝိသုံ ဟုတွာ အဋ္ဌံသု နာနာသံဝါသကာ နာနာနိကာယာ. जब अरिमर्दन नगर में अनुरुद्ध नामक राजा ने राजा सहित सुधम्मपुर को पराजित कर नष्ट कर दिया, तब रामञ्ञ राष्ट्र राजा विहीन होकर स्थित रहा। रामञ्ञ राष्ट्र के मुत्तिम नगर में सोणुत्तर-वंश का एक गण, शिवलि-वंश का एक, तामलिन्द-वंश का एक, आनन्द-वंश का एक, बुद्ध-वंश का एक और महानाग-वंश का एक—इस प्रकार छह गण अलग-अलग होकर नाना-संवासक और नाना-निकायों के रूप में रहे। ဓမ္မစေတိယရညာ ပန ကာရာပိတသာသနမ္ပိ အဘိဇ္ဇမာနံ ဟုတွာ အဋ္ဌာသိ. သမာနသံဝါသော ဧကနိကာယောယေဝ အဟောသိ. ဟံသာဝတီမုတ္တိမသုဝသေန တီဏိပိ ရာမညရဋ္ဌာနိ သုနာပရန္တ သင်္ခါတေန ဧကာဗဒ္ဓါနိ ဟုတွာ တိဋ္ဌန္တိ. ပုဗ္ဗေစ မရမ္မရဋ္ဌိန္ဒရာဇူနံ အာဏာပဝတ္တနဋ္ဌာနာနိ အဟေသုံ[Pg.53]. တသ္မာ မရမ္မရဋ္ဌတော ဧကစ္စေ ဘိက္ခူ ရာမညရဋ္ဌံ ဂန္တွာ ကလျာဏီသီမာယံ ပုန သိက္ခံ ဂဏှိံသု. ဓမ္မစေတိယရညာကာရာဝိတသာသနံ သကလံ မရမ္မရဋ္ဌမ္ပိ ဗျာပေတွာ ဩဂါဟေတွာ တိဋ္ဌတိ. राजा धम्मचेति द्वारा स्थापित शासन भी अक्षुण्ण होकर बना रहा। वह समान संवास वाला एक ही निकाय हो गया। हंसावती और मुत्तिम के भेद से तीनों ही रामञ्ञ राष्ट्र 'सुनापरन्त' नाम से एकबद्ध होकर स्थित हैं। पूर्व में ये मरम्म राष्ट्र के राजाओं के आज्ञा-प्रवर्तन के स्थान थे। इसलिए मरम्म राष्ट्र से कुछ भिक्षुओं ने रामञ्ञ राष्ट्र जाकर कल्याणी सीमा में पुनः शिक्षा (उपसम्पदा) ग्रहण की। राजा धम्मचेति द्वारा स्थापित शासन समस्त मरम्म राष्ट्र में भी व्याप्त होकर और समाहित होकर स्थित है। ရာမညရဋ္ဌေ သောဏုတ္တရတ္ထေရာနံ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပိတကာလတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ သုဓမ္မပုရေ မနောဟရိရညာ အရဟန္တာနံ သံဝိဇ္ဇမာနတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. တတော ပစ္ဆာ ပန ဥတ္တရာ ဇီဝါရိယာဝံသမဟာကာဠပြာနဒဿိတ္ထေရာနံ ကာလေ လောကိယဇ္ဈာနာဘိညာလာဘိယောယေဝ သံဝိဇ္ဇံသူတိ. အဓုနာ ပန တီသုပိ ရာမညရဋ္ဌေသု ဓမ္မစေတိယရညာ ကာရာဝိတသာသနံယေဝ တိဋ္ဌတိ. ဧတ္ထစ ဟေတုဖလသမ္ဗန္ဓဝသေန အာဒိအန္တဝသေနေ စ သာသနဝံသံ ပညာယ တုလယိတွာ အာဒိတောဝ ဒဿိတေဟိ တီဟိ နယေဟိ ယထာပဝေဏီ ဃဋ္ဋိယတိ, တထာ ဂဏှေယျာတိ. အယဉ္စ သာသနဝံသော လဇ္ဇိပေသလသိက္ခာကာမာနံယေဝ ဝသေန ဝုတ္တော, နာလဇ္ဇီနံ ဝသေနာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. रामञ्ञ देश में सोणुत्तर स्थविरों द्वारा शासन की स्थापना के समय से लेकर सुधम्मपुर में राजा मनोहरि के समय तक अर्हतों की विद्यमानता जाननी चाहिए। उसके बाद, उत्तर, जीवारिय, महाकाल और प्राणदस्सी स्थविरों के समय में केवल लौकिक ध्यान और अभिज्ञा प्राप्त करने वाले ही विद्यमान थे। अब तो तीनों रामञ्ञ देशों में राजा धम्मचेतिय द्वारा कराया गया शासन ही स्थित है। यहाँ हेतु-फल के सम्बन्ध और आदि-अन्त के वश से शासनवंश को प्रज्ञा से तौलकर, आदि में दिखाए गए तीन नयों से जैसे परम्परा घटित होती है, वैसे ही ग्रहण करना चाहिए। और यह शासनवंश लज्जावान, शीलवान और शिक्षा के प्रेमियों के लिए ही कहा गया है, निर्लज्जों के लिए नहीं, ऐसा समझना चाहिए। တာယ စ ထေရပရမ္ပရာယ မုတ္တိမနဂရဝါသိမေဓင်္ကရတ္ထေရော လောကဒီပကသာရံ နာမ ဂန္ထံ အကာသိ. ဟံသာဝတီနဂရဝါသီ ပန အာနန္ဒတ္ထေရော မဓုသာရတ္ထဒီပနိံ နာမ အဘိဓမ္မဋီကာယ သံဝဏ္ဏနံ, ဟံသာဝတီနဂရဝါသီယေဝ ဓမ္မဗုဒ္ဓတ္ထေရော ကဝိဿာရံ နာမ ဆန္ဒောဝဏ္ဏနံ, ဟံသာဝတီနဂရဝါသီယေဝ သဒ္ဓမ္မာလင်္ကာရတ္ထေရော ပဋ္ဌာနသာရဒီပနိံ နာမ ပကရဏံ, တထေဝ အညတရော ထေရော အဖေဂ္ဂုသာရံ နာမ ဂန္ထံ အကာသိ. ဧဝံ အနေကပ္ပကာရာနံ ဂန္ထကာရာနံ မဟာထေရာနံ ဝသနဋ္ဌာနံ ဟုတွာ သာသနံ ဩဂါဟေတွာ ဝိရူဠဋ္ဌာနံအဟောသီတိ. उस स्थविर परम्परा में मुत्तिम नगर निवासी मेधङ्कर स्थविर ने 'लोकदीपकसार' नामक ग्रन्थ की रचना की। हंसवती नगर निवासी आनन्द स्थविर ने अभिधम्म-टीका की व्याख्या 'मधुसारत्थदीपनी' नामक ग्रन्थ की रचना की, हंसवती नगर निवासी ही धम्मबुद्ध स्थविर ने 'कविस्सार' नामक छन्द-व्याख्या की, हंसवती नगर निवासी ही सद्धम्मलङ्कार स्थविर ने 'पट्ठानसारदीपनी' नामक प्रकरण की, और उसी प्रकार एक अन्य स्थविर ने 'अफेग्गुसार' नामक ग्रन्थ की रचना की। इस प्रकार अनेक प्रकार के ग्रन्थकार महास्थविरों का निवास स्थान होकर शासन गहराई तक पहुँचकर विकसित हुआ। ဣတိ သာသနဝံသေ သုဝဏ္ဏဘူမိသာသနဝံသကထာမဂ္ဂါ နာမ इस प्रकार शासनवंश में सुवण्णभूमि शासनवंश की कथा का मार्ग समाप्त हुआ। တတိယော ပရိစ္ဆေဒေါ. तृतीय परिच्छेद। ၄. ယောနကရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ ४. योनक राष्ट्र शासनवंश कथा मार्ग ၄. ဣဒါနိ ပန ယောနကရဋ္ဌေ သာသနဿုပ္ပတ္တိံ ကထေဿာမိ[Pg.54]. ဘဂဝါ ဟိ ဝေနေယျဟိတာဝဟော ယောနကရဋ္ဌေ မမသာသနံ စိရကာလံ ပဘိဋ္ဌဟိဿတီတိ အာပေက္ခိတွာ သဒ္ဓိံ ဘိက္ခု သံဃေန ဒေသစာရိကံ အာဟိဏ္ဍန္တော လဘုဉ္ဇံ နာမ နဂရံ အဂမာသိ. တဒါ ဧကော နေသာဒေါ ဟရိဖလံ ဒတွာ တံ ပရိဘုဉ္ဇိတွာ ဟရိဗီဇေ ခိပိတေ ပထဝိယံ အပတိတွာ အာကာသေယေဝ ပတိဋ္ဌာသိ. တံ ဒိသွာ သိတံ ပတွာကာသိ. တမတ္ထံ ဒိသွာ အာနန္ဒတ္ထေရော ပုစ္ဆိ. အနာဂတေ ခေါ အာနန္ဒ ဣမသ္မိံ ဌာနေ မမ ဓာတုစေတိယံ ပတိဋ္ဌဟိဿတိ, သာသနံ ဝိရူဠမာပဇ္ဇိဿတီတိ ဗျာကာသိ. ဘဂဝတာ ပန ဟရိဖလဿ ဘုဉ္ဇိတဋ္ဌာနတ္တာဟရိဘုဉ္ဇောတိ တဿ ရဋ္ဌဿ နာမံ အဟောသိ. ဒွိန္နံ တာပသာနံ ဌပိတံ ဇလသုတ္တိကံ ပဋိစ္စ ယောနကာနံ ဘာသာယ လဘုဉ္ဇောတိ နာမံ အဟောသိ. ४. अब मैं योनक राष्ट्र में शासन की उत्पत्ति कहूँगा। विनेय जनों के हितकारी भगवान् ने "योनक राष्ट्र में मेरा शासन चिरकाल तक प्रतिष्ठित रहेगा" ऐसी अपेक्षा करते हुए भिक्षु संघ के साथ देश-चारिका करते हुए लभुञ्ज नामक नगर में गए। तब एक व्याध ने हरड़ का फल दिया, उसे खाकर जब हरड़ की गुठली फेंकी गई, तो वह पृथ्वी पर न गिरकर आकाश में ही स्थित हो गई। उसे देखकर उन्होंने मुस्कान प्रकट की। उसका अर्थ देखकर आनन्द स्थविर ने पूछा। "आनन्द! भविष्य में इस स्थान पर मेरा धातु-चैत्य स्थापित होगा, शासन वृद्धि को प्राप्त होगा" ऐसा उन्होंने व्याकृत (भविष्यवाणी) किया। भगवान् द्वारा हरड़ का फल खाए जाने के स्थान होने के कारण उस राष्ट्र का नाम 'हरिभुञ्ज' हुआ। दो तपस्वियों द्वारा रखे गए जल-सूत्र के कारण योनक भाषा में 'लभुञ्ज' नाम हुआ। တဒါ တတ္ထ မပိန္နာယ နာမ ဧကိဿာ မာတိကာယ သမီပေ နိသိန္နော ဧကော လဝကုလိကဇေဋ္ဌကော အတ္တနော ပုတ္တံ သတ္တဝဿိကံ ဘဂဝတော နိယျာဒေတွာ ပဗ္ဗာဇေသိ. ကမ္မဋ္ဌာနာနုယောဂဝသေန အစိရေနေဝ အရဟတ္တံ ပါပုဏိ. သတ္တဝဿိ ကဿစ သာမဏေရဿ အရဟတ္တံ သစ္ဆိကတဋ္ဌာနတံ ပဋိစ္စ ယောနကဘာသာယ ဧတံ ဌာနံ စင်္ဂမင်္ဃ ဣတိ ဝုစ္စတိ. စိရကာလ ဝသေန ဇင်္ဂမင်္ဃ ဣတိ ဝုစ္စတိ. တတော ပဋ္ဌာယယေဝ ယောနကရဋ္ဌေ သာသနံ ပတိဋ္ဌာတီတိ. तब वहाँ मपिन्ना नामक एक नहर के समीप बैठे हुए एक लवकुलिक जेठक ने अपने सात वर्षीय पुत्र को भगवान् को सौंपकर प्रव्रजित कराया। कर्मस्थान के अनुयोग के कारण उसने शीघ्र ही अर्हत्त्व प्राप्त कर लिया। सात वर्षीय श्रमण द्वारा अर्हत्त्व साक्षात्कार करने के स्थान होने के कारण योनक भाषा में उस स्थान को 'चङ्गमङ्घ' कहा जाता है। चिरकाल के बीतने पर उसे 'जङ्गमङ्घ' कहा जाता है। तब से ही योनक राष्ट्र में शासन प्रतिष्ठित हुआ। ဣဒံ ယောနကရဋ္ဌေ ပဌမံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह योनक राष्ट्र में शासन की प्रथम प्रतिष्ठा है। သာသနေ ပန ပဉ္စတိံသာဓိကေ ဒွိဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ မဟာရက္ခိတတ္ထေရော ယောနကရဋ္ဌံ ဂန္တွာ ကမ္ဗောဇခေမာဝရ ဟရိဘုဉ္ဇာယုဒ္ဓယာဒီသု အနေကေသု ရဋ္ဌေသု သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေတိ. တာနိ ဟိ သဗ္ဗာနိ ရဋ္ဌာနိ သင်္ဂဟေတွာ ဒဿေန္တေဟိ အဋ္ဌကထာစရိယေဟိ ယောနကလောကန္တိ ဩကာသကာလောကဝါစကေန သာမညသဒ္ဒေန ဝုတ္တံ. ပကတိ ဟေသာ ဂန္ထကာရာနံ ယေန [Pg.55] ကေနစာကာရေန အတ္ထန္တရဿ ဝိညာပနာတိ. शासन के दो सौ पैंतीस वर्ष बीतने पर महारक्खित स्थविर ने योनक राष्ट्र जाकर कम्बोज, खेमावर, हरिभुञ्जय, युद्धय आदि अनेक राष्ट्रों में शासन प्रतिष्ठित किया। उन सभी राष्ट्रों को सम्मिलित कर दिखाते हुए अट्ठकथाचार्यों ने 'योनकलोक' इस स्थानवाचक सामान्य शब्द से कहा है। ग्रन्थकारों का यह स्वभाव ही है कि वे किसी भी प्रकार से अन्य अर्थ का बोध कराते हैं। မဟာရက္ခိတတ္ထေရော စ သဒ္ဓိံ ပဉ္စဟိ ဘိက္ခူဟိ ပါဋလိပုတ္တတော အနိလပထမဂ္ဂေန ယောနကလောကံ အာဂန္တွာ ကာဠကာရာမသုတ္တေန ယောနကေ ပသာဒေသိ. သတ္တတိသဟဿာဓိကပါဏသတသဟဿံ မဂ္ဂဖလာလင်္ကာရံ အဒါသိ. သန္တိကေ စဿ ဒသသဟဿာနိ ပဗ္ဗဇိံသု. ဧဝံ သော တတ္ထသာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. တထာ စ ဝုတ္တံ အဋ္ဌကထာယံ,– महारक्खित स्थविर पाँच भिक्षुओं के साथ पाटलिपुत्र से आकाश मार्ग (अनिलपथ) से योनकलोक आए और कालकाराम सुत्त के द्वारा योनक वासियों को प्रसन्न (दीक्षित) किया। एक लाख सत्तर हजार प्राणियों को मार्ग-फल का अलङ्कार प्रदान किया। उनके पास दस हजार लोगों ने प्रव्रज्या ली। इस प्रकार उन्होंने वहाँ शासन प्रतिष्ठित किया। जैसा कि अट्ठकथा में कहा गया है— ယောနကရဋ္ဌံ တဒါ ဂန္တွာ, သော မဟာရက္ခိတော ဣသိ; ကာဠကာရာမသုတ္တေန, တေ ပသာဒေသိ ယောနကေတိ. "तब योनक राष्ट्र जाकर, उन महारक्खित ऋषि ने कालकाराम सुत्त के द्वारा उन योनक वासियों को प्रसन्न किया।" တတော ပဋ္ဌာယ တေသံ သိဿပရမ္ပရာ ဗဟူ ဟောန္တိ, ဂဏနပထံ ဝီတိဝတ္တာ. तब से उनकी शिष्य-परम्परा बहुत हुई, जो गणना से परे है। ဣဒံ ယောနကရဋ္ဌေ မဟာရက္ခိတတ္ထေရာဒယော ပဋိစ္စ यह योनक राष्ट्र में महारक्खित स्थविर आदि के आश्रय से— ဒုတိယံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. शासन की द्वितीय प्रतिष्ठा है। ယောနကရဋ္ဌေ လကုန္နနဂရေ ဇိနစက္ကေ ပဉ္စဝဿသတေ မဏိမယံ ဗုဒ္ဓပ္ပဋိမံ မာပေတွာ ဝိသုကမ္မဒေဝပုတ္တော နာဂသေနတ္ထေရဿ အဒါသိ. နာဂေသေနတ္ထေရော စ တသ္မိံ ပဋိမမှိ ဓာတု အာဂန္တွာ ပတိဋ္ဌာတူတိ အဓိဋ္ဌာသိ. အဓိဋ္ဌာနဝသေနေဝ သတ္တဓာတုယော အာဂန္တွာ တတ္ထ ပတိဋ္ဌဟိတွာ ပါဋိဟာရိယံ ဒဿေသုန္တိ ရာဇဝံသေ ဝုတ္တံ. योनक राष्ट्र के लकुन्न नगर में जिन-चक्र (बुद्ध संवत्) के पाँच सौ वर्ष होने पर विसुकम्म देवपुत्र ने मणिमय बुद्ध-प्रतिमा का निर्माण कर नागसेन स्थविर को दिया। नागसेन स्थविर ने अधिष्ठान किया कि इस प्रतिमा में धातुएँ आकर प्रतिष्ठित हों। अधिष्ठान के वश से ही सात धातुएँ आकर वहाँ प्रतिष्ठित हुईं और प्रातिहार्य दिखाया, ऐसा राजवंश में कहा गया है। တဉ္စ ဝစနံ မမ ပရိနိဗ္ဗာနတော ပဉ္စဝဿသတေ အတိက္ကန္တေ ဧတေ ဥပ္ပဇ္ဇိဿန္တီတိ မိလိန္ဒပဉှာယံ ဝုတ္တဝစနေန ကာလပရိမာဏဝသေန စ သမေတိ. ယောနကရဋ္ဌေ မိလိန္ဒရညော ကာလေ ဇိနစက္ကေ ပဉ္စဝဿသတေယေဝ နာဂသေနတ္ထေရံ ပဋိဿ ဇိနစက္ကံ ဝိရူဠံ ဟုတွာ ပတိဋ္ဌာသိ. और वह वचन "मेरे परिनिर्वाण से पाँच सौ वर्ष बीतने पर ये उत्पन्न होंगे" इस मिलिन्दपञ्ह में कहे गए वचन और काल-परिमाण के वश से मेल खाता है। योनक राष्ट्र में राजा मिलिन्द के समय में जिन-चक्र के पाँच सौ वर्ष में ही नागसेन स्थविर के आश्रय से जिन-चक्र विकसित होकर प्रतिष्ठित हुआ। ဣဒံ ယောနကရဋ္ဌေ နာဂသေနတ္ထေရံ ပဋိစ္စ တတိယံ यह योनक राष्ट्र में नागसेन स्थविर के आश्रय से तृतीय— သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. शासन की प्रतिष्ठा है। ကလိယုဂေ [Pg.56] ပဉ္စသဋ္ဌိဝဿေလဘုဉ္ဇနဂရတော သင်္ကမိတွာ ကျုင်္ဂရနဂရေ မာပိကဿ ဗညာစောမင်္ဂရ နာမကဿ ရညော ကာလေ မဇ္ဈိမဒေသတော ကဿပတ္ထေရော ပဉ္စဟိ ထေရေဟိ သဒ္ဓိံ အာဂစ္ဆိ. कलियुग के पैंसठवें वर्ष में, लभुञ्ज नगर से प्रस्थान कर क्युङ्गर नगर के निर्माता बञ्ञाचोमङ्गर नामक राजा के काल में, मज्झिमदेस (मध्यदेश) से कस्सप थेर पाँच अन्य थेरों के साथ आए। တဒါ သော ရာဇာ ဝိဟာရံ ကတွာ တေသံ အဒါသိ. သီဟဠဒီပတော စ ဓာတုယော အာနေတွာ ဧကော ထေရော အာဂစ္ဆိ. ဓာတုတော ပါဋိဟာရိယံ ဒိသွာ ပသီဒိတွာ လဘုဉ္ဇစေတိယ နိဓာနံ အကာသိ. တေ စ ထေရေ ပဋိစ္စ ယောနကရဋ္ဌေ သာသန ဝံသော အာဂတော. तब उस राजा ने विहार बनवाकर उन्हें दान दिया। और सीहलदीप (श्रीलंका) से धातुएँ (अवशेष) लेकर एक थेर आए। धातुओं से चमत्कार देखकर प्रसन्न होकर (राजा ने) लभुञ्ज चैत्य में निधान (प्रतिष्ठा) किया। उन थेरों के आश्रय से योनक राष्ट्र में शासन-वंश का आगमन हुआ। ဣဒံ ယောနကရဋ္ဌေ စတုတ္ထံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह योनक राष्ट्र में शासन की चौथी प्रतिष्ठा है। ကလိယုဂေ ဒွါသဋ္ဌာဓိကေ သတ္တသတေ သမ္ပတ္ထေ စိနရဋ္ဌိန္ဒော ရာဇာ အဘိဘဝိတွာ သကလမ္ပိ ယောနကရဋ္ဌံ သင်္ခုဗ္ဘိတံ ဟောတိ. တဒါ မဟာဓမ္မဂမ္ဘီရတ္ထေရော မဟာမေဓင်္ကရတ္ထေ ရောစာတိ ဒွေ ထေရော ယောနကရဋ္ဌတော သဒ္ဓိံ ဗဟူဟိ ဘိက္ခူဟိ သီဟဠဒီပံ အဂမံသု. တဒါ စ သီဟဠဒီပေ ဒုဗ္ဘိက္ခဘယေန အဘိဘူတော ဟုတွာ တတော သျာမရဋ္ဌေ သောက္ကတယနဂရံ ပုန အဂမံသု. कलियुग के सात सौ बासठवें (७६२) वर्ष के आने पर, चीन राष्ट्र के राजा द्वारा अभिभूत किए जाने पर सम्पूर्ण योनक राष्ट्र क्षुब्ध (अशांत) हो गया। तब महाधम्मगम्भीर थेर और महामेधङ्कर थेर नामक दो थेर योनक राष्ट्र से बहुत से भिक्षुओं के साथ सीहलदीप गए। और तब सीहलदीप में दुर्भिक्ष (अकाल) के भय से अभिभूत होकर वहाँ से पुनः स्याम राष्ट्र के सोक्कतय नगर चले गए। တတော ပစ္ဆာ လကုန္နနဂရံ ဂန္တွာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှန္တာနံ လဇ္ဇိပေသလာနံ ဘိက္ခူနံ သန္တိကေ ပုန သိက္ခံ ဂဏှိံသု. တေ စ ထေရော သျာမရဋ္ဌေ ယောနကရဋ္ဌေ စ သဗ္ဗတ္ထ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသုန္တိ. उसके पश्चात लकुन्न नगर जाकर शासन का प्रग्रह (उत्थान) करने वाले लज्जी-पेसल (शीलवान) भिक्षुओं के सान्निध्य में पुनः शिक्षा ग्रहण की। उन थेरों ने स्याम राष्ट्र और योनक राष्ट्र में सर्वत्र शासन को प्रतिष्ठित किया। ဣဒံ ယောနကရဋ္ဌေ ပတ္တလင်္ကေ ဒွေ ထေရေ ပဋိစ္စ ပဉ္စမံ यह योनक राष्ट्र में पत्तलङ्क के दो थेरों के आश्रय से पाँचवीं— သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. शासन की प्रतिष्ठा है। ကလိယုဂေ ပဉ္စဝီသာဓိကေ အဋ္ဌဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ သိရိသဒ္ဓမ္မလောကပတိစက္ကဝတ္တိရာဇာ လဘုဉ္ဇစေတိယံ ပုန မဟန္တံ ကတွာ [Pg.57] တဿ စေတိယဿ သမီပေ စတ္တာရော ဝိဟာရေ ကာရာပေတွာ မဟာမေဓင်္ကရတ္ထေရဿ သာရိပုတ္တတ္ထေရဿ စ အဒါသိ. တဒါပိ တေ ဒွေ ထေရာ သာသနံ ပရိသုဒ္ဓံ ကတွာ ပတိဋ္ဌာပေသုန္တိ. कलियुग के आठ सौ पच्चीसवें (८२५) वर्ष के आने पर, राजा सिरिसद्धम्मलोकपतिचक्कवत्ति ने लभुञ्ज चैत्य को पुनः विशाल बनवाकर, उस चैत्य के समीप चार विहार बनवाए और उन्हें महामेधङ्कर थेर तथा सारिपुत्त थेर को प्रदान किया। तब भी उन दो थेरों ने शासन को परिशुद्ध कर प्रतिष्ठित किया। ဣဒံ ယောနကရဋ္ဌေ မဟာမေဓင်္ကရသာရိပုတ္တတ္ထေရေ यह योनक राष्ट्र में महामेधङ्कर और सारिपुत्त थेरों के— ပဋိစ္စ ဆဋ္ဌံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. आश्रय से शासन की छठी प्रतिष्ठा है। ကလိယုဂေ တေစတ္တာလီသာဓိကေ နဝဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ဟံသာဝတီနဂရေ အနေကသေတိဘိန္ဒော နာမ ရာဇာ ယောနကရဋ္ဌံ အဘိဘဝိတွာ အတ္တနော ဟတ္ထဂတံ ကတွာ ဗလိ ဘုဉ္ဇနတ္ထာယ ဇေဋ္ဌပုတ္တဿ အနုရုဒ္ဓဿ နာမ ရာဇကုမာရဿ ဒတွာ ဗဟူဟိ အမစ္စေဟိ သဒ္ဓိံ တတ္ထ ဂန္တွာ အနုရာဇတာဝေန ရဇ္ဇံ ကာရာပေသိ. သာသနဉ္စ ဝိသောဓာပေတုံ သဒ္ဓမ္မစက္ကသာမိတ္ထေရံ တေန သဒ္ဓိံ ပဟိဏိ. कलियुग के नौ सौ तैंतालीसवें (९४३) वर्ष के आने पर, हंसावती नगर में अनेकसेतिभिन्द नामक राजा ने योनक राष्ट्र को जीतकर अपने वश में कर लिया और कर (बलि) भोगने के लिए अपने ज्येष्ठ पुत्र अनुरुद्ध नामक राजकुमार को दे दिया, तथा बहुत से अमात्यों के साथ वहाँ जाकर उसे अनुराज (उप-राजा) के रूप में राज्य कराया। और शासन को विशुद्ध करने के लिए सद्धम्मचक्कसामी थेर को उसके साथ भेजा। အနေကသေတိဘိန္နော ကိရ ရာဇာ ယောနကရဋ္ဌံ ဝိဇယကာလေ ပဌမံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနဘူတမိဒန္တိ ကတွာ တံရဋ္ဌဝါသိနော ကရမရာနီတဘာဝေန န အဂ္ဂဟေသီတိ. कहा जाता है कि राजा अनेकसेतिभिन्द ने योनक राष्ट्र की विजय के समय "यह शासन की प्रथम प्रतिष्ठा का स्थान है" ऐसा मानकर, उस राष्ट्र के निवासियों को युद्ध-बंदी (करमरानीत) के रूप में नहीं पकड़ा। ယထာဝုတ္တတ္ထေရဝံသေသု စ ဧကော လကုန္နနဂရေ အရညဝါသီ ထေရော တတ္ထ နဂရေ အဇ္ဇ အသုကသ္မိံ ဌာနေ ဧကော မတောတိ ဂိဟီနံ ကထေတွာ ယထာကထိတံ ဘူတံ ဟုတွာ အယံ အဘိညာလာဘီတိ ပါကဋော အဟောသိ. पूर्वोक्त थेर-वंशों में से लकुन्न नगर के एक अरण्यवासी (वनवासी) थेर ने वहाँ नगर में गृहस्थों से कहा कि "आज अमुक स्थान पर एक व्यक्ति की मृत्यु हुई है", और जैसा कहा गया था वैसा ही होने पर, वे "ये अभिज्ञा-प्राप्त (सिद्ध) हैं" इस रूप में प्रसिद्ध हुए। တသ္မိံယေဝ စ နဂရေ မဟာမင်္ဂလော နာမ ထေရော အနေကသေတိဘိန္ဒဿ ရညော ယုဇ္ဈိတုံ အာဂတကာလေ အနေကသေတိဘိန္ဒော ရာဇာ မံ ပက္ကောသိဿတိ, သမာနဇာတိကံ ဒူတံ ပေဿေဿတီတိ ပက္ကောသိတကာလတော ပဌမမေဝဝဒိ. ယထာဝုတ္တနိယာမေနေဝ ပက္ကောသနတော အယံ အဘိညာ လာဘီတိ ကိတ္တိ ဃောသော အဟောသိ. उसी नगर में महामङ्गल नामक थेर ने राजा अनेकसेतिभिन्द के युद्ध के लिए आने के समय, बुलाए जाने से पहले ही कह दिया था कि "राजा अनेकसेतिभिन्द मुझे बुलाएगा और समान जाति के दूत को भेजेगा।" कहे गए नियम के अनुसार ही बुलाए जाने के कारण "ये अभिज्ञा-प्राप्त हैं" ऐसी उनकी कीर्ति फैल गई। တတ္ထ နဂရေ ဉာဏဝိလာသတ္ထေရော သင်္ချာပကာသကံ နာမ [Pg.58] ပကရဏံ အကာသိ. တံဠီကံ ပန ပတ္တလင်္ကတ္ထေရဿ ဝိဟာရေ ဝသန္တော သိရိမင်္ဂလောနာမ ထေရော အကာသိ. वहाँ नगर में ञाणविलास थेर ने 'संख्याप्रकाशक' नामक प्रकरण (ग्रंथ) की रचना की। उसकी टीका तो पत्तलङ्क थेर के विहार में रहते हुए सिरिमङ्गल नामक थेर ने की। ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂဒီပနိံ ပန သံညွတ္တအရညဝါသီ ဥတ္တရာရာမော နာမ ဧကော ထေရော. မင်္ဂလဒီပနိံ သိရိမင်္ဂလတ္ထေရော. ဥပ္ပာတသန္တိံ အညတရော ထေရော. တံ ကိရ ဥပ္ပာတသန္တိံ သဇ္ဈာယိတွာ စီနရညော သေနံ အဇိနီတိ. ဣစ္စေဝံ ယောနကရဋ္ဌေ အဘိညာလာဘီနံ ဂန္ထကာရာနဉ္စ ထေရာနံ အာနုဘာဝေန ဇိနသာသနံ ပရိသုဒ္ဓံ ဟုတွာ ပတိဋ္ဌာတိ. ဧဝံ ဟေတုဖလသမ္ဗန္ဓဝသေန အာဒိ အန္တ သမ္ဗန္ဓဝသေန စ ယထာဝုတ္တေဟိ တီဟိ နယေဟိ ထေရပရမ္ပရာ ဃဋ္ဋေတွာ ဂဟေတဗ္ဗာ. ‘विशुद्धिमग्गदीपनी’ की रचना सञ्ञवत्त के अरण्यवासी उत्तराराम नामक एक थेर ने की। ‘मङ्गलदीपनी’ की सिरिमङ्गल थेर ने। ‘उप्पातसन्ति’ की किसी अन्य थेर ने। कहा जाता है कि उस ‘उप्पातसन्ति’ का स्वाध्याय करके उन्होंने चीन के राजा की सेना को जीत लिया था। इस प्रकार योनक राष्ट्र में अभिज्ञा-प्राप्त और ग्रंथकार थेरों के अनुभाव (प्रभाव) से जिन-शासन परिशुद्ध होकर प्रतिष्ठित हुआ। इस प्रकार हेतु-फल के संबंध से और आदि-अंत के संबंध से, यथोक्त तीन विधियों द्वारा थेर-परम्परा को जोड़कर समझना चाहिए। ဣတိ သာသနဝံသေ ယောနကရဋ္ဌသာသနဝံသကထာ इस प्रकार शासन-वंश में योनक राष्ट्र के शासन-वंश की कथा— မဂ္ဂေါ နာမ စတုတ္ထော ပရိစ္ဆေဒေါ. 'मग्ग' नामक चौथा परिच्छेद समाप्त हुआ। ၅. နဝဝါသီရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ ५. वनवासी राष्ट्र के शासन-वंश की कथा का मार्ग। ၅. ဣဒါနိ ဝနဝါသီရဋ္ဌေ သိရိခေတ္တနဂရသာသနဝံသံ ဝက္ခာမိ. ဇိနစက္ကေ ဟိ ဧကာဓိကေ ဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ဇဋိလော သက္ကော နာဂေါ ဂရုဠော ကုမ္ဘဏ္ဍော စန္ဒီ ပရမီသွရောစာတိ ဣမေ သတ္တ သိရိခေတ္တံ နာမ နဂရံ မာပေသုံ. တတ္ထ ဒွတ္တပေါင်္ကော နာမ ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. တဿ ကိရ တီဏိ အက္ခီနိ သန္တီတိ. တဒါ ဘဂဝတော သာဝကာ အရဟန္တာ တိသဟဿမတ္တာ တတ္ထ ဝသိံသု. သော ရာဇာ တေသံ အရဟန္တာနံ ဒေဝသိကံ စတူဟိ ပစ္စယေဟိ ဥပတ္ထမ္ဘိ. ဆ သရီရဓာတုယော စ ဧကေကံ ဧကေကသ္မိံ နိဒဟိတွာ ဆ စေတိဣယာနိ ကာရာပေသိ. ဒက္ခိဏဗာဟုံ ပန နိဒဟိတွာ ဧကမ္ပိ စေတိယံ ကာရာပေသိ. ५. अब मैं वनवासी राष्ट्र के सिरिखेत्त नगर के शासन-वंश को कहूँगा। जिन-चक्र (बुद्ध संवत) के एक सौ एक (१०१) वर्ष पूर्ण होने पर, जटिल, सक्क (शक्र), नाग, गरुड़, कुम्भाण्ड, चण्डी और परमेश्वर—इन सातों ने सिरिखेत्त नामक नगर का निर्माण किया। वहाँ द्वत्तपोङ्क नामक राजा ने राज्य किया। कहा जाता है कि उसकी तीन आँखें थीं। तब भगवान के लगभग तीन हजार अर्हन्त श्रावक वहाँ रहते थे। वह राजा उन अर्हन्तों की प्रतिदिन चार प्रत्ययों (आवश्यकताओं) से सेवा करता था। उसने छह शरीर-धातुओं में से एक-एक को एक-एक में स्थापित कर छह चैत्य बनवाए। और दक्षिण बाहु (दाहिनी भुजा) को स्थापित कर एक और चैत्य बनवाया। ဥဏှီသဓာတုံ ပန ကင်္ဂရန္နဂရတော အာနေတွာ ဧကမ္ပိ စေတိယံ ကာရာပေသိ. တံ ပန တာဝ န နိဋ္ဌိတံ. ပစ္ဆာ အနုရုဒ္ဓရာဇာ ဂဟေတွာ အရိမဒ္ဒနနဂရံ အာနေတွာ စညိင်္ခု နာမ စေတိယေ နိဓာနံ [Pg.59] အကာသိ. တသ္မာ ရက္ခိတတ္ထေရဿ အာဂမနတော ပုဗ္ဗေပိ သာသနံ ပတိဋ္ဌာသီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. တတော ပစ္ဆာ သာသနံ ဒုဗ္ဗလံ ဟုတွာ အဋ္ဌာသိ. कङ्गरन नगर से उष्णीष-धातु लाकर भी एक चैत्य बनवाया। किन्तु वह तब तक पूर्ण नहीं हुआ था। बाद में राजा अनुरुद्ध ने उसे लेकर अरिमद्दन नगर लाकर चञ्ञिङ्खु नामक चैत्य में स्थापित किया। इसलिए, यह देखा जाना चाहिए कि रक्खित थेर के आगमन से पूर्व भी शासन प्रतिष्ठित था। उसके पश्चात शासन दुर्बल होकर स्थित रहा। ဣဒံ ဝနဝါသီရဋ္ဌေ ပဌမံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह वनवासी राष्ट्र में शासन की प्रथम प्रतिष्ठा है। မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရေန ပန ပေသိတော ရက္ခိတတ္ထေရော ဝနဝါသီရဋ္ဌံ ဂန္တွာ အာကာသေ ဌတွာ အနမတဂ္ဂပရိယာယကထာယ ဝနဝါသိကေ ပသာဒေသိ. ကထာပရိယောသာနေ ပနဿ သဋ္ဌိသဟဿာနံ ဓမ္မာဘိသမယော အဟောသိ. သတ္တတိသဟဿမတ္တာ ပဗ္ဗဇိံသု. ပဉ္စဝိဟာရသတာနိ ပတိဋ္ဌာပေသုံ. ဧဝံ သော တတ္ထ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. တေနေဝ အဋ္ဌ ကထာယံ – महामोग्गलिपुत्ततिस्स थेर द्वारा भेजे गए रक्खित थेर ने वनवासी राष्ट्र जाकर आकाश में स्थित होकर अनमतग्ग-परियाय-कथा (अनादि संसार की कथा) से वनवासियों को प्रसन्न किया। कथा की समाप्ति पर साठ हजार लोगों को धम्माभिसमय (धर्म का साक्षात्कार) हुआ। लगभग सत्तर हजार लोगों ने प्रव्रज्या ग्रहण की। पाँच सौ विहारों की स्थापना की गई। इस प्रकार उन्होंने वहाँ शासन (बुद्ध धर्म) की स्थापना की। इसीलिए अट्ठकथा में कहा गया है – ဂန္တွာန ရက္ခိတတ္ထေရော,ဝနဝါသိံ မဟိဒ္ဓိကော; အန္တလိက္ခေ ဌိတော တတ္ထ,ဒေသေသိ အနမတဂ္ဂိယန္တိ ဝုတ္တံ. "महान ऋद्धि वाले रक्खित थेर ने वनवासी (राष्ट्र) जाकर, वहाँ अंतरिक्ष (आकाश) में स्थित होकर अनमतग्गिय (अनादि संसार संबंधी) उपदेश दिया।" ဧဝံ ဝနဝါသီရဋ္ဌေ ပုဗ္ဗေယေဝ သာသနံ ဩဂါဟေတွာ ပတိဋ္ဌဟိ. န ပန တာဝ သကလံ ဗျာပေတွာ ပတိဋ္ဌဟိ. इस प्रकार वनवासी राष्ट्र में पहले ही शासन ने प्रवेश कर अपनी जड़ें जमा ली थीं। किंतु तब तक वह संपूर्ण रूप से व्याप्त होकर प्रतिष्ठित नहीं हुआ था। ဣဒံ တာဝ ဝနဝါသီရဋ္ဌေ သိရိခေတ္တနဂရေ ဒုတိယံ यह वनवासी राष्ट्र के श्रीक्षेत्र नगर में दूसरी बार (का) သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. शासन की प्रतिष्ठापना है। ဇိနစက္ကေ ပန တေတ္တိံသာဓိကေ စတုဝဿသတေ ကုက္ကုဋ သီသော နာမ ဧကော ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. တဿ ရညော ကာလေ ဘဂဝတော သာဝကာ အရဟန္တာ ပဉ္စသတမတ္တာ အဟေသုံ. တေသမ္ပိ သော ရာဇာ ဒေဝသိကံ စတူဟိ ပစ္စယေဟိ ဥပတ္ထမ္ဘေသိ. သောတာပန္နသကဒါဂါမိအနာဂါမိနော ပန ဂဏနပထံ [Pg.60] ဝီတိဝတ္တာ အဟေသုံ. जिन-चक्र (बुद्ध संवत) के चार सौ तैंतीस (433) वर्ष बीतने पर कुक्कुटसीस नामक एक राजा ने राज्य किया। उस राजा के काल में भगवान के श्रावक लगभग पाँच सौ अर्हत् थे। उन (अर्हतों) की भी वह राजा प्रतिदिन चार प्रत्ययों (चीवर, पिण्डपात, शयनासन, औषध) से सेवा करता था। स्रोतापन्न, सकृदागामी और अनागामी तो गणना से परे (असंख्य) थे। ဣဒံ ဝနဝါသီရဋ္ဌေ သိရိခေတ္တနဂရေ ပရမ္ပရာဘတဝသေန यह वनवासी राष्ट्र के श्रीक्षेत्र नगर में परंपरा से प्राप्त होने के कारण တတိယံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. शासन की तीसरी प्रतिष्ठापना है। ဣစ္စေဝံ ဝနဝါသီရဋ္ဌေ အနေကသတေဟိ အရဟန္တတ္ထေရေဟိ သာသနံ ပုဏ္ဏိန္ဒုသင်္ကာသံ ဟုတွာ အတိဝိယ ဝိဇ္ဇောတေသိ. သာသနိက ဂန္ထကာရာ ပန မဟာထေရာ တတ္ထ န သန္ဒိဿန္တိ. အရဟန္တတ္ထေရာ ပန ရာဇူနံ အာယာစနံ အာရဗ္ဘ ဓမ္မသတ္ထံ ဧကံ ဝိရစယိံသူတိ ပေါရာဏာ ဝဒန္တီတိ. ဣစ္စေဝံ– इस प्रकार वनवासी राष्ट्र में अनेक सौ अर्हत् थेरों के द्वारा शासन पूर्ण चंद्रमा के समान होकर अत्यंत प्रकाशित हुआ। किंतु वहाँ शासन संबंधी ग्रंथकार महाथेर नहीं दिखाई देते। प्राचीन लोग कहते हैं कि अर्हत् थेरों ने राजाओं की प्रार्थना पर एक धर्मशास्त्र की रचना की थी। इस प्रकार – တေစ ထေရာ မဟာပညာ,ပဂ္ဂဟေတွာန သာသနံ; သူရိယော ဝိယ အတ္ထင်္ဂေါ,ဥပဂါ မစ္စုသန္တိကံ. "वे महाप्रज्ञावान् थेर शासन को उन्नत कर, सूर्य के समान अस्त होकर मृत्यु के समीप चले गए (निर्वाण प्राप्त हुए)।" တသ္မာ ဟိ ပဏ္ဍိတော ပေါသော,ယာဝ မစ္စု နစာဂတော; တာဝ ပုညံ ကရေ နိစ္စံ,မာ ပမဇ္ဇေယျ သဗ္ဗဒါတိ. "इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को, जब तक मृत्यु नहीं आ जाती, तब तक निरंतर पुण्य करना चाहिए और कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए।" ဣတိ သာသနဝံသေ ဝနဝါသီရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ इस प्रकार शासनवंश में वनवासी राष्ट्र के शासनवंश की कथा का मार्ग နာမ ပဉ္စမော ပရိစ္ဆေဒေါ. नामक पाँचवाँ परिच्छेद (समाप्त हुआ)। ၆. အပရန္တရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ ६. अपरान्त राष्ट्र के शासनवंश की कथा का मार्ग। ၆. ဣဒါနိ ပန မရမ္မမဏ္ဍလေ အပရန္တရဋ္ဌေ သာသနဝံသံ ဝက္ခာမိ. အမှာကဉှိ မရမ္မရဋ္ဌေ သုပ္ပာဒကတိတ္ထေ ဝါဏိဇဂါမေ ဝသန္တေ စူဠပုဏ္ဏ မဟာပုဏ္ဏေဒွေ ဘာတိကေ ပဋိစ္စ ဘဂဝတော ဓရမာနဿေဝ အတိရေကဝီသတိဝဿကာလတော ပဘုတိ သာသနံ ပတိဋ္ဌာသိ. န ပန တာဝ ဗျာပေတွာ ပတိဋ္ဌာသိ. တေနေဝ ပုန သာသနဿ ပတိဋ္ဌာပနတ္ထာယ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရော [Pg.61] ယောနကဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရံ ပေသေသီတိ. ६. अब मैं मरम्म-मण्डल (बर्मा) के अपरान्त राष्ट्र में शासनवंश का वर्णन करूँगा। हमारे मरम्म राष्ट्र के सुप्पादक तीर्थ के वाणिज्य ग्राम में रहने वाले चूलपुण्ण और महापुण्ण नामक दो भाइयों के कारण, भगवान के जीवित रहते समय ही, (बुद्धत्व प्राप्ति के) बीस वर्ष से अधिक समय से शासन प्रतिष्ठित हो गया था। किंतु तब तक वह व्यापक रूप से प्रतिष्ठित नहीं हुआ था। इसीलिए शासन की पुनः प्रतिष्ठापना के लिए महामोग्गलिपुत्ततिस्स थेर ने योनक धम्मरक्खित थेर को भेजा। ဘဂဝါ ပန လောဟိတစန္ဒနဝိဟာရံ ပဋိဂ္ဂဟေတွာ သတ္တသတ္တာဟာနိ နိသီဒိတွာ သမာဂတာနံ ဒေဝမနုဿာနံ ဓမ္မရသံ အဒါသိ. သတ္တာဟေသု စ ဧကသ္မိံ အဟု စတုရာသီတိပါဏသဟဿာနံ ဓမ္မာဘိသမယော အဟောသိ. ပဉ္စသတမတ္တေဟိ စ ပါသာဒေဟိ အာဂစ္ဆန္တော အန္တရာမဂ္ဂေ သစ္စဗန္ဓပဗ္ဗတေ နိသိန္နဿ သစ္စဗန္ဓဿ နာမ ဣသိနော ဓမ္မံ ဒေသေတွာ ဆဟိ အဘိညာဟိ သဒ္ဓိံ အရဟတ္တံ ပါပေသိ. ဝါဏိဇဂါမေ စ ဣသိဒိန္နသေဋ္ဌိ အာဒီနမ္ပိ ဓမ္မရသံ ပါယေသိ. ဣစ္စေဝံ သစ္စဗန္ဓဣသိဒိန္နမဟာပုဏ္ဏာဒယော ပဋိစ္စ အမှာကံ မရမ္မမဏ္ဍလေ သာသနံ ပတိဋ္ဌာသိ. भगवान ने लोहित-चन्दन विहार को स्वीकार कर सात सप्ताह तक वहाँ निवास करते हुए आए हुए देवों और मनुष्यों को धर्म-रस प्रदान किया। उन सात सप्ताहों में से एक दिन चौरासी हजार प्राणियों को धम्माभिसमय हुआ। पाँच सौ प्रासादों (विमानों) के साथ आते हुए मार्ग के बीच में सच्चबन्ध पर्वत पर स्थित सच्चबन्ध नामक ऋषि को धर्मोपदेश देकर छह अभिज्ञाओं के साथ अर्हत् पद तक पहुँचाया। वाणिज्य ग्राम में इसिदिन्न श्रेष्ठी आदि को भी धर्म-रस पिलाया। इस प्रकार सच्चबन्ध, इसिदिन्न, महापुण्ण आदि के कारण हमारे मरम्म-मण्डल में शासन प्रतिष्ठित हुआ। ဣဒံ မရမ္မမဏ္ဍလေ အပရန္တရဋ္ဌေ ပဌမံ သာသနဿ यह मरम्म-मण्डल के अपरान्त राष्ट्र में शासन की पहली ပတိဋ္ဌာနံ. प्रतिष्ठापना है। ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗုတတော ပဉ္စတိံသာဓိကေ ဒွိဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ တတိယသင်္ဂီတိံ သင်္ဂါယိတွာ အဝသာနေ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရော အတ္တနော သဒ္ဓိဝိဟာရိကံ ယောနကဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရံ သဒ္ဓိံ စတူဟိ ဘိက္ခူဟိ အပရန္တရဋ္ဌံ ပေသေသိ. အပရန္တရဋ္ဌဉ္စ နာမ အမှာကံ မရမ္မမဏ္ဍလေ သုနာပရန္တရဋ္ဌမေဝ. တမတ္ထံ ပန ဟေဋ္ဌာ အဝေါစုမှာ. भगवान के परिनिर्वाण के दो सौ पैंतीस (235) वर्ष बीतने पर, तृतीय संगीति के आयोजन के अंत में, महामोग्गलिपुत्ततिस्स थेर ने अपने सार्धविहारी (शिष्य) योनक धम्मरक्खित थेर को चार भिक्षुओं के साथ अपरान्त राष्ट्र भेजा। अपरान्त राष्ट्र हमारे मरम्म-मण्डल का सुनापरान्त राष्ट्र ही है। उस विषय में हमने पहले ही कहा है। ယောနကဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရောပိ အပရန္တရဋ္ဌံ အာဂန္တွာ အဂ္ဂိက္ခန္ဓောပမသုတ္တေန ရဋ္ဌဝါသီနံ ပသာဒေသိ. သတ္တတိမတ္တာနံ ပါဏသဟဿာနံ ဓမ္မရသံ ပါယေသိ. ရဋ္ဌဝါသိနော စ ဗဟဝေါ သာသနေ ပဗ္ဗဇိံသု. ရာဇကုလတောပိ သဟဿမတ္တာ ပဗ္ဗဇိံသု. ဣတ္ထီနံ ပန အတိရေကသဋ္ဌိသဟဿမတ္တာ ပဗ္ဗဇိံသု. တဉ္စ န အဂ္ဂိက္ခန္ဓောပမသုတ္တန္တံ သုတွာ ပဗ္ဗဇန္တီနံ ဣတ္ထီနံ ဝသေန ဝုတ္တံ, အထ ခေါ အာဒိတော ပဋ္ဌာယ ယာဝစိရကာလာ သာသနံ ပသီဒိတွာ ပဗ္ဗဇန္တီနံ ဣတ္ထီနံ ဝသေန ဝုတ္တန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ကသ္မာတိ စေ, ဣတ္ထီနံ ဘိက္ခုနီနံ သန္တိကေယေဝ ပဗ္ဗဇိတုံ ယုတ္တတ္တာ ယောနကဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရေန [Pg.62] စ သဒ္ဓိံ ဘိက္ခုနီနံ အနာဂတတ္တာ. ဧဝံ စိရကာလံ အတိက္ကမိတွာ ပစ္ဆာ ဘိက္ခုနိယော အာဂန္တွာ တာသံ သန္တိကေ ပဗ္ဗဇိတာနံ ဝသေန ဝုတ္တန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. သီဟဠဒီပေ အနုဠာဒေဝိယော ပဗ္ဗဇိတကာလေ မဟာမဟိန္ဒတ္ထေရဿ သံဃမိတ္တာထေရိယာ ပက္ကောသနတာ ဣဓ ဉာပကာတိ. ဧဝံ ယောနကဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရံ ပဋိစ္စ အပရန္တရဋ္ဌေ သတ္တာနံ ဗဟုပကာရော အဟောသိ. တေနေဝဋ္ဌကထာယံ– योनक धम्मरक्खित थेर ने भी अपरान्त राष्ट्र आकर 'अग्गिक्खन्धोपम सुत्त' के द्वारा राष्ट्रवासियों को प्रसन्न किया। लगभग सत्तर हजार प्राणियों को धर्म-रस पिलाया। राष्ट्र के बहुत से लोगों ने शासन में प्रव्रज्या ली। राजकुल से भी लगभग एक हजार लोगों ने प्रव्रज्या ली। स्त्रियों में साठ हजार से अधिक ने प्रव्रज्या ली। इसे केवल अग्गिक्खन्धोपम सुत्त सुनकर प्रव्रजित होने वाली स्त्रियों के संदर्भ में नहीं कहा गया है, बल्कि प्रारंभ से लेकर लंबे समय तक शासन में प्रसन्न होकर प्रव्रजित होने वाली स्त्रियों के संदर्भ में समझना चाहिए। ऐसा क्यों? क्योंकि स्त्रियों के लिए भिक्षुणियों के पास ही प्रव्रजित होना उचित है और योनक धम्मरक्खित थेर के साथ भिक्षुणियाँ नहीं आई थीं। इसलिए, इसे लंबे समय के बाद जब भिक्षुणियाँ आईं और उनके पास जो स्त्रियाँ प्रव्रजित हुईं, उनके संदर्भ में समझना चाहिए। सिंहल द्वीप में अनुला देवी के प्रव्रजित होने के समय महामहिन्द थेर द्वारा संघमित्ता थेरी को बुलाना यहाँ प्रमाण है। इस प्रकार योनक धम्मरक्खित थेर के कारण अपरान्त राष्ट्र के प्राणियों का बहुत उपकार हुआ। इसीलिए अट्ठकथा में कहा गया है – အပရန္တံ ဝိဂါဟိတွာ, ယောနကော ဓမ္မရက္ခိတော; အဂ္ဂိက္ခန္ဓူပမေနေတ္ထ, ပသာဒေသိ ဇနေ ဗဟူတိ. "अपरान्त (राष्ट्र) में प्रवेश कर, योनक धम्मरक्खित ने यहाँ अग्गिक्खन्धोपम (सुत्त) के द्वारा बहुत से लोगों को प्रसन्न किया।" တတ္ထာယံ အဓိပ္ပာယ ဝိသေသော ဂဟေတဗ္ဗော. ကထံ. အဂ္ဂိက္ခန္ဓောပမသုတ္တန္တံ နာမ ဘိက္ခူနံ ပဋိပတ္တိဝသေန ဝုတ္တံ, တံ ဘိက္ခူနံယေဝ ဒေသေတုံ ဝဋ္ဋတိ, ထေရောပိ တတ္ထ တံ ဒေသေသိ, တသ္မာ ပုဏ္ဏသစ္စဗန္ဓာဒယော ပဋိစ္စ ဘဂဝတော ဓရမာနဿ ဝီသတိဝဿကာလေယေဝ သာသနံ အပရန္တရဋ္ဌေ ပတိဋ္ဌဟိတွာ ကသ္မိဉ္စိ ကသ္မိဉ္စိ ဌာနေ ဘိက္ခူနံ သံဝိဇ္ဇမာနတ္တာ တေသံ ဘိက္ခူနံ သင်္ဂဟေတွာ ဒေသေတုံ ပစ္ဆာ အာဂတာနဉ္စ ဘိက္ခူနံ ပရိသုဒ္ဓါစာရတံ ဝိညာပေတုံ အဂ္ဂိက္ခန္ဓောပမသုတ္တံ ထေရော ဒေသေသီတိ. ဧဝဉ္စ သတိ အရိမဒ္ဒနနဂရေ သမဏကုတ္တကာနံ သံဝိဇ္ဇမာနဘာဝံ ဝက္ခမာနေန ဝစနေန သမေတိ. यहाँ यह विशेष अभिप्राय समझना चाहिए। कैसे? 'अग्गिक्खन्धोपम सुत्तन्त' नामक सुत्त भिक्षुओं के प्रतिपत्ति (आचरण) के वश से कहा गया है, उसे भिक्षुओं को ही उपदेश देना उचित है, स्थविर ने भी वहाँ उसे उपदेश दिया, इसलिए पुण्ण और सच्चबन्ध आदि के कारण भगवान के जीवित रहते हुए बीसवें वर्ष में ही शासन अपरान्त राष्ट्र में प्रतिष्ठित होकर कहीं-कहीं भिक्षुओं के विद्यमान होने से उन भिक्षुओं का संग्रह करने के लिए और बाद में आए हुए भिक्षुओं को परिशुद्ध आचरण का ज्ञान कराने के लिए स्थविर ने 'अग्गिक्खन्धोपम सुत्त' का उपदेश दिया। और ऐसा होने पर अरिमद्दन नगर में 'समणकुत्तकों' की विद्यमानता के बारे में कहे जाने वाले वचन के साथ यह मेल खाता है। ဣဒံ မရမ္မမဏ္ဍလေ အပရန္တရဋ္ဌေ ဒုတိယံ यह मरम्म मण्डल के अपरान्त राष्ट्र में दूसरा (है)। သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. शासन की प्रतिष्ठा। ယသ္မာ ပန ဗုဒ္ဓေ, ဘဂဝါ ပုဏ္ဏတ္ထေရဿ ယာစနမာရဗ္ဘ အပရန္တရဋ္ဌံ အာဂန္တွာ ဝါဏိဇေ ဟိ ကာရိတေ စန္ဒနဝိဟာရေ ဝသိတွာ ဧကသ္မိံ သမယေ အာနန္ဒေန ပစ္ဆာသမဏေန တမ္ဗဒီပရဋ္ဌမ္ပိ ဒေသစာရိကံ အာဟိဏ္ဍိ. အာဟိဏ္ဍိတွာ အရိမဒ္ဒနနဂရဋ္ဌာနသမီပံ ပတွာ ပဗ္ဗတမုဒ္ဓနိ ဌတွာ အနာဂတေ ခေါ အာနန္ဒ ဣမသ္မိံ ပဒေသေ သမ္မုတိ နာမ ရာဇာ အရိမဒ္ဒနံ နာမ နဂရံ မာပေဿတိ[Pg.63], တသ္မိဉ္စ နဂရေ မမ သာသနံ ဝိရူဠံ ဟုတွာ ပတိဋ္ဌဟိဿတီတိ ဗျာကာသိ. အယမတ္ထော ပေါရာဏဝေဒပါတ္ထကေသု ဝုတ္တော. क्योंकि बुद्ध, भगवान ने पुण्ण स्थविर की याचना के कारण अपरान्त राष्ट्र में आकर व्यापारियों द्वारा बनवाए गए चन्दन विहार में निवास किया और एक समय आनन्द के साथ, जो उनके पीछे चलने वाले श्रमण थे, तम्बदीप राष्ट्र में भी धर्म-प्रचार के लिए भ्रमण किया। भ्रमण करते हुए अरिमद्दन नगर के स्थान के समीप पहुँचकर पर्वत के शिखर पर खड़े होकर भविष्यवाणी की कि "हे आनन्द! भविष्य में इस प्रदेश में सम्मुति नामक राजा अरिमद्दन नामक नगर बसाएगा, और उस नगर में मेरा शासन विकसित होकर प्रतिष्ठित होगा।" यह अर्थ प्राचीन ग्रन्थों में कहा गया है। ယောနကဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရော စ အပရန္တရဋ္ဌံ အာဂန္တွာ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌမ္ပိ အာဟိဏ္ဍိတွာ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌဝါသီနမ္ပိ ဓမ္မရသံ ပါယေသိယေဝ. အယမတ္ထော ခတ္တိယကုလတော ဧဝ ပုရိသသဟဿာနိ ပဗ္ဗဇိံသူတိ အဋ္ဌကထာယံ ဝုတ္တတ္တာ ဝိညာယတိ. တဒါ ဟိ အပရန္တရဋ္ဌေ ခတ္တိယော နတ္ထိ, တမ္ဗဒီပရဋ္ဌိန္ဒောယေဝ တံ အနုသာသေတွာ အတိ ဝသတိ, ခတ္တိယေ စ အာသန္တေ ကုတော ခတ္တိယကုလာနိ ဘဝိဿန္တိ, တေနေဝ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌတော ပုရိသသဟဿာနိ ပဗ္ဗဇိံသူတိ ဝိညာတဗ္ဗံ. တသ္မာ တမ္ဗဒီပိကသာသနဝံသမ္ပိ ဣဓ ဝတ္တုံ ယုဇ္ဇတိ. योनक धम्मरक्खित स्थविर ने भी अपरान्त राष्ट्र में आकर तम्बदीप राष्ट्र में भी भ्रमण किया और तम्बदीप राष्ट्र के निवासियों को भी धर्म-रस का पान कराया। यह अर्थ अट्ठकथा में इस बात से जाना जाता है कि "क्षत्रिय कुल से ही हजारों पुरुषों ने प्रव्रज्या ग्रहण की।" उस समय अपरान्त राष्ट्र में कोई क्षत्रिय नहीं था, तम्बदीप राष्ट्र का स्वामी ही वहाँ शासन करता था, और क्षत्रियों के न होने पर क्षत्रिय कुल कहाँ से होंगे? इसलिए यह समझना चाहिए कि तम्बदीप राष्ट्र से ही हजारों पुरुषों ने प्रव्रज्या ली थी। इसलिए यहाँ तम्बदीप के शासन-वंश को कहना भी उचित है। တေနိဒါနိ တမ္ဗဒီပိကာသာသနဝံသံ ပဝက္ခာမိ. အမှာကဉှိ မရမ္မမဏ္ဍလေ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌေ အရိမဒ္ဒနနဂရေ သမ္မုတိရာဇာ နာမ ဘူပါလော ရဇ္ဇံ ကရေသိ. တတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ အနုရုဒ္ဓရညာ သမထိ နာမကေ ဒေသေ နိသိန္နာနံ တိံသမတ္တာနံ သမဏကုတ္တကာနံ သဋ္ဌိသဟဿမတ္တာနံ သိဿာနံ ဩဝါဒံ ဒတွာ စရိံသု. इसलिए अब मैं तम्बदीप के शासन-वंश को कहूँगा। हमारे मरम्म मण्डल के तम्बदीप राष्ट्र के अरिमद्दन नगर में सम्मुति राजा नामक भूपाल ने राज्य किया। तब से लेकर अनुरुद्ध राजा के समय तक, समथि नामक स्थान में रहने वाले लगभग तीस 'समणकुत्तकों' ने अपने लगभग साठ हजार शिष्यों को उपदेश देते हुए विचरण किया। တေသံ ပန သမဏကုတ္တကာနံ အယံ ဝါဒေါ,- သစေ ယော ပါဏာတိပါတံ ကရေယျ, သော ဤဒိသံ ပရိတ္တံ ဘဏန္တော တမှာ ပါပကမ္မာ ပရိမုစ္စေယျ, သစေ ပန ယော မာတာပိတရံ ဟန္တွာ အနန္တရိယကမ္မတော ပရိမုစ္စိတုကာမော ဘဝေယျ, ဤဒိသံ ပရိတ္တံ ဘဏေယျ, သစေပိ ပုတ္တဓိတာနံ အာဝါဟဝိဝါဟကမ္မံ ကတ္တုကာမော ဘဝေယျ, အာစရိယာနံ ပဌမံ နိယျာဒေတွာ အာဝါဟဝိဝါဟကမ္မံ ကာတဗ္ဗံ, ယော ဣဒံ စာရိတ္တံ အတိက္ကမေယျ, ဗဟု အပုညံ ပသဝေယျာတိ ဧဝမာဒီဟိ မိစ္ဆာဝါဒေဟိ အတ္တနော အတ္တနော ဥပဂတာနံ ဩဝါဒံ အဒံသု. တမတ္ထံ သုတွာ အနုရုဒ္ဓရာဇာ ပရိစိတပုညော တေသံ ဝါဒံ န ရုစိ. အယံ တေသံ မိစ္ဆာဝါဒေါတိ. उन 'समणकुत्तकों' का यह मत था— "यदि कोई प्राणातिपात (हत्या) करे, तो वह इस प्रकार के परित्त का पाठ करते हुए उस पापकर्म से मुक्त हो सकता है; यदि कोई माता-पिता की हत्या करके आनन्तर्य कर्म से मुक्त होना चाहे, तो उसे इस प्रकार के परित्त का पाठ करना चाहिए; यदि पुत्र-पुत्रियों का विवाह करना चाहे, तो पहले आचार्यों को समर्पित करके ही विवाह करना चाहिए, जो इस परम्परा का उल्लंघन करेगा, वह बहुत अपुण्य (पाप) अर्जित करेगा"—इन जैसे मिथ्या वचनों से वे अपने पास आए हुए लोगों को उपदेश देते थे। उस बात को सुनकर, संचित पुण्यों वाले अनुरुद्ध राजा को उनका मत अच्छा नहीं लगा। यह उनका मिथ्यावाद था। တဒါ [Pg.64] စ အရိမဒ္ဒနနဂရေ အရဟန္တော နာမ ထေရော အာဂန္တွာ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. အယံ အရဟန္တတ္ထေရဿ အဋ္ဌုပ္ပတ္တိ,– ရာဇဝံသာဂတပရိတ္တနိဒါနာဂတသာသနပ္ပဝေဏိယာဂတဝသေန တိဝိဓာ ဟောတိ. और तब अरिमद्दन नगर में 'अरहन्त' नामक स्थविर ने आकर शासन को प्रतिष्ठित किया। यह अरहन्त स्थविर की उत्पत्ति (वृत्तान्त)—राजवंश से प्राप्त, परित्त-निदान से प्राप्त और शासन-परम्परा से प्राप्त होने के भेद से तीन प्रकार की है। တတ္ထာယံ ရာဇဝံသာဂတဋ္ဌုပ္ပတ္တိ,– တဒါ ဟိ သုနာပရန္တတမ္ဗဒီပရဋ္ဌေသု သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ သဗ္ဗဒါ ထိရံ သာသနံ န တာဝ ပတိဋ္ဌာသိ. တေနေဝ ဘဂဝတော ဗျာကတနိယာမေန သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေဿာမာတိ စိန္တေတွာ မဟာထေရာ သက္ကဿ ဒေဝါနမိန္ဒဿ သန္တိကံ ဂန္တွာ သာသနံ အနုဂ္ဂဟိတုံ သမတ္ထံ ပုဂ္ဂလံ ဒေဟီတိ ယာစိံသု. သက္ကောစ ဒေဝါနမိန္ဒော တာဝတိံသဘဝနေ ဧကံ ဒေဝပုတ္တံ ယာစိတွာ ဧကိဿာ ဗြာဟ္မဏိယာ ကုစ္ဆိမှိ ပဋိသန္ဓိံ ဂဏှာပေသိ. ဒသမာသစ္စယေန ဝိဇာယနကာလေ သီလဗုဒ္ဓိ နာမ ထေရော အနုရက္ခိတွာ ဝယေ သမ္ပတ္တေ ပဗ္ဗာဇေသိ. တီသု ပိဋကေသု အတိဝိယ ဆေကော ဟုတွာ အရဟတ္တံ ပါပုဏိ. အရဟန္တောတိ နာမေန ပါကဋော အဟောသိ. वहाँ यह राजवंश से प्राप्त उत्पत्ति है—उस समय सुनापरान्त और तम्बदीप राष्ट्रों में पूरी तरह से और हमेशा के लिए स्थिर शासन तब तक प्रतिष्ठित नहीं हुआ था। इसलिए "भगवान की भविष्यवाणी के अनुसार शासन को प्रतिष्ठित करेंगे" ऐसा सोचकर महास्थविरों ने देवराज इन्द्र (सक्क) के पास जाकर याचना की कि "शासन का अनुग्रह करने में समर्थ व्यक्ति प्रदान करें।" देवराज इन्द्र ने भी तावतिंस भवन में एक देवपुत्र से प्रार्थना कर उसे एक ब्राह्मणी के गर्भ में प्रतिसन्धि ग्रहण करवाई। दस महीने बीतने पर जन्म के समय सीलबुद्धि नामक स्थविर ने उसकी रक्षा की और आयु पूर्ण होने पर प्रव्रजित किया। वह तीनों पिटकों में अत्यंत निपुण होकर अर्हत्व को प्राप्त हुआ। वह 'अरहन्त' नाम से प्रसिद्ध हुआ। သောစ ထေရော မရမ္မမဏ္ဍလေ ဇိနသာသနံ ဝိဇ္ဇောတာပေတုံ အရိမဒ္ဒနနဂရံ အာဂန္တွာ နဂရတော အဝိဒူရေ ဧကသ္မိံ အရညေ နိသီဒိ. တဒါ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော ဧကံ နေသာဒံ ပလောဘေတွာ တဿ ထေရံ ဒဿေသိ. အထ နေသာဒဿ ဧတဒဟောသိ,– အယံ ပန အမနုဿော ယက္ခော ဘဝေယျ, သစေ ပန မနုဿော ဘဝေယျ, ဧဝံ သတိ မိလက္ခုဇာတိကော ဘဝေယျာတိ. ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ ရညော ဒဿနတ္ထာယ နဂရံ အာနေသိ. ထေရော စ အဋ္ဌပရိက္ခာရေ ဂဟေတွာ အနုဂစ္ဆိ. နေသာဒါ စ ထေရံ အာနေတွာ ရညော ဒဿေသိ. वह स्थविर मरम्म मण्डल में जिन-शासन को प्रकाशित करने के लिए अरिमद्दन नगर में आए और नगर से कुछ दूर एक अरण्य (जंगल) में बैठ गए। तब देवराज इन्द्र ने एक शिकारी को प्रलोभित कर उसे स्थविर के दर्शन कराए। तब शिकारी को यह विचार आया— "यह कोई अमनुष्य यक्ष हो सकता है, यदि मनुष्य है, तो इस स्थिति में यह कोई म्लेच्छ जाति का होगा।" ऐसा सोचकर वह राजा को दिखाने के लिए उन्हें नगर ले आया। स्थविर भी आठ परिष्कारों को लेकर उनके पीछे चल दिए। शिकारी ने स्थविर को लाकर राजा को दिखाया। ရာဇာ ဒိသွာ သန္တိန္ဒြိယော အယံ, န မိလက္ခုဇာတိကော, ဣမဿ အဗ္ဘန္တရေ သာရဓမ္မော အတ္ထိ မညေတိ လဒ္ဓသူရိယောဘာသံဝိယ ပဒုမံ ဖုလ္လစိတ္တံ ဟုတွာ ဝီမံသေတုကာမော ထေရံ အာဟ,– အတ္တနော သာရုပ္ပံ အာသနံ ဉတွာ နိသီဒါဟီတိ. राजा ने उन्हें देखकर सोचा— "ये शान्त इन्द्रियों वाले हैं, म्लेच्छ जाति के नहीं हैं, इनके भीतर सार-धर्म है," ऐसा मानकर, सूर्य के प्रकाश को प्राप्त कमल के समान खिले हुए चित्त वाला होकर, परीक्षा करने की इच्छा से स्थविर से कहा— "अपने योग्य आसन जानकर बैठिए।" ထေရော စ ရာဇပလ္လင်္ကံ အာရုဟိတွာ နသီဒိ. ရာဇာ စ အယံ အဂ္ဂါသနေ [Pg.65] နိသီဒိ, အဝဿံ အဂ္ဂပုဂ္ဂလော ဘဝေယျာတိ စိန္တေတွာ တွံ ကဿ ဉာတိ, ကဿ ဘိဿော, ကုတော အာဂတောသီတိ ပုစ္ဆိ. ထေရော စ ဧဝမာဟ,– လောကသ္မိံ ယော နဝဂုဏသမ္ပန္နော ဘဂဝါ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ, တဿာဟံ ဉာတိ, သောဘဂဝါယေဝ မမာစရိယော, ဘိက္ခုသံဃဿ နိသိန္နဋ္ဌာနတော အာဂတောမှီတိ. स्थविर राज-पलंग पर चढ़कर बैठ गए। राजा ने सोचा, 'यह श्रेष्ठ आसन पर बैठा है, अवश्य ही यह कोई श्रेष्ठ पुरुष होगा,' और पूछा, 'आप किसके संबंधी हैं, किसके शिष्य हैं, और कहाँ से आए हैं?' स्थविर ने इस प्रकार कहा, 'संसार में जो नौ गुणों से संपन्न भगवान सम्यक्संबुद्ध हैं, मैं उनका संबंधी हूँ, वे भगवान ही मेरे आचार्य हैं, और मैं भिक्षु संघ के निवास स्थान से आया हूँ।' ရာဇာ စ သောမနဿပ္ပတ္တော ဟုတွာ အာဟ, တဝ အာစရိယေန ဒေသိတံ ဓမ္မံ ဧကဒေသတော ဒေသေဟီတိ. အထ ယထာ သိရိဓမ္မာသောကရညော နိဂြောဓသာမဏေရေန အပ္ပမာဒဓမ္မော ဒေသိတော, ဧဝံ အပ္ပမာဒဓမ္မံယေဝ ထေရော ဒေသေသိ. राजा प्रसन्न होकर बोला, 'अपने आचार्य द्वारा उपदिष्ट धर्म का एक अंश मुझे सुनाएँ।' तब, जैसे राजा श्रीधर्माशोक को निग्रोध सामणेर ने अप्रमाद धर्म का उपदेश दिया था, वैसे ही स्थविर ने अप्रमाद धर्म का ही उपदेश दिया। ရာဇာ စ ပုန အာဟ,– ကုဟိံ ဒါနိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ နိသီဒတိ, တေန ပန ဒေသိတော ဓမ္မော ကတိပ္ပမာဏော, တဿ သာဝကာ ပန ကတိပ္ပမာဏာ, တုမှာဒိသာ အညေ အတ္ထိ ဝါ မာ ဝါတိ. ဣဒါနိ အမှာကံ အာစရိယော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ ပရိနိဗ္ဗုတော, ဓာတုယောယေဝ ဣဒါနိ အတ္ထိ, တေန ပန ဒေသိတော ဓမ္မော စတုရာသီတိဓမ္မက္ခန္ဓသဟဿပ္ပမာဏော, သုဓမ္မပုရေ ပိဋကတ္တယံ ယုဂဠဝသေန တိံသဝိဓာ အတ္ထိ, မယာ အညော ပရမတ္ထ သမ္မုတိဝသေန ဒုဝိဓောပိ သံဃော အတ္ထီတိ. राजा ने फिर पूछा, 'अब सम्यक्संबुद्ध कहाँ विराजमान हैं? उनके द्वारा उपदिष्ट धर्म का परिमाण कितना है? उनके श्रावक कितने हैं? क्या आपके जैसे अन्य भी हैं या नहीं?' (स्थविर ने कहा), 'अब हमारे आचार्य सम्यक्संबुद्ध परिनिर्वाण को प्राप्त हो चुके हैं, अब केवल उनकी धातुएँ ही शेष हैं। उनके द्वारा उपदिष्ट धर्म चौरासी हजार धर्मस्कंधों के परिमाण वाला है। सुधम्मपुर में त्रिपिटक युगल के रूप में तीस प्रकार के हैं। मेरे अतिरिक्त परमार्थ और सम्मति के भेद से दो प्रकार का संघ भी है।' တံ သုတွာ ရာဇာ ဘိယျောသောမတ္တာယ ပသန္နော ဟုတွာ ပုန အာရောစေသိ,– မမ ဘန္တေ ဣမသ္မိံ ပစ္စက္ခေ နတ္ထိ တယာ အညော နာထော, အဇ္ဇဘဂ္ဂေ ပါဏုပေတံ မံ ဥပါသကောတိ ဓာရေဟိ, တဝ ဩဝါဒံ အဟံ သိရသာ ပဋိဂ္ဂဏှိဿာမီတိ. यह सुनकर राजा और भी अधिक प्रसन्न हुआ और फिर निवेदन किया, 'भन्ते! इस प्रत्यक्ष (राज्य) में आपके अतिरिक्त मेरा कोई अन्य नाथ नहीं है। आज से मुझे प्राण रहने तक अपना उपासक स्वीकार करें। मैं आपके उपदेश को सिर झुकाकर ग्रहण करूँगा।' တတော ပစ္ဆာ အရညကင်္ဂါရဟေ ဌာနေ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ အဒါသိ. သမဏကုတ္တကာနမ္ပိ ဝါဒံ ဘိန္ဒိ, ယထာ ပန သုဝဏ္ဏပါတိံ လဘိတွာ သုဝဏ္ဏဘာဇနံ လဘိတွာ မတ္တိကာဘာဇနန္တိ. သကလေပိ စ ရဋ္ဌေ သမဏကုတ္တကာနံ ဝါဒံ ဇဟာပေသိ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ သမဏကုတ္တကာ ဟီနလာဘာ ဟုတွာ ထေရဿ ဥပနာဟံ ဗန္ဓိံသု. တေ ပန သမဏကုတ္တကာ အရညေ နိဿာမိကာဝိယ [Pg.66] ကောလေယကာ သုနခါ အနာထာ ဟုတွာ ကာယိကစေတသိကဒုက္ခံ လဘိံသု. उसके बाद, (राजा ने) अरण्य के अंगारह नामक स्थान पर विहार बनवाकर दान दिया। उसने श्रमणकुत्तकों (छद्म श्रमणों) के मत का भी खंडन किया, जैसे कोई स्वर्णपात्र या स्वर्णभाजन पाकर मिट्टी के बर्तन को त्याग देता है। उसने संपूर्ण राष्ट्र में श्रमणकुत्तकों के मत को छुड़वा दिया। उस समय श्रमणकुत्तक लाभहीन होकर स्थविर के प्रति द्वेष पालने लगे। वे श्रमणकुत्तक जंगल में बिना स्वामी के आवारा कुत्तों की तरह अनाथ होकर कायिक और चैतसिक दुःख भोगने लगे। ရာဇာ စ တမတ္ထံ ဉတွာ ယထာ သမဏကုတ္တကာ နာဘိဘဝန္တိ, တထာ အာရက္ခံ ဌပေသိ. တေ စ သမဏကုတ္တကေ သေတဝတ္ထံ နိဝါသာပေတွာ အာဝုဓဂါဟယောဓဘာဝေန ရာဇကမ္မေ နိယောဇာပေသိ. ထေရော စ သာသနေ ပသန္နေ ဇနေ ပဗ္ဗာဇေတွာ ဥပသမ္ပာဒေတွာ သာသနံ ဝိသောဓာပေသိ. ရာဇာ စ ဣမသ္မိံ ရဋ္ဌေ ပေါရာဏိကာ ရာဇာနော သမဏကုတ္တကာနံ ဝါဒံ ဂဟေတွာ ရဇ္ဇံ ကာရေသုံ, သစေ ဟိ ပန တေသံ အနတ္ထကရဇ္ဇံ ပုန ဂဏှာပေတုံ သက္ကုဏေယျံ, ဧဝံ သတိ အဟံ တေသံ အနတ္ထကရဇ္ဇံ အပနေတွာ သာတ္ထကရဇ္ဇံ ဂဏှာပေတုမိစ္ဆာမီတိ အနုသောစီတိ. राजा ने उस बात को जानकर, श्रमणकुत्तक उन्हें अभिभूत न कर सकें, इसके लिए सुरक्षा की व्यवस्था की। उसने उन श्रमणकुत्तकों को श्वेत वस्त्र पहनाकर शस्त्रधारी योद्धाओं के रूप में राजकीय कार्यों में नियुक्त कर दिया। स्थविर ने शासन (धर्म) में श्रद्धा रखने वाले लोगों को प्रव्रजित और उपसंपन्न कर शासन को शुद्ध किया। राजा ने विचार किया, 'इस राष्ट्र में प्राचीन राजाओं ने श्रमणकुत्तकों के मत को मानकर राज्य किया था। यदि मैं उन्हें फिर से वह अनर्थकारी राज्य दिला सकूँ, तो मैं उनके उस अनर्थकारी राज्य को हटाकर उन्हें सार्थक राज्य दिलाना चाहता हूँ,' ऐसा उसने चिंतन किया। အယံ ပန ပရိတ္တနိဒါနာဂတဋ္ဌုပ္ပတ္တိ, – यह परित्त-निदान में आई हुई कथा की उत्पत्ति है — သီဟဠဒီပေ ကိရ ဝိပ္ပဝါသီနဂရေ နိသိန္နော ဧကော ဘိက္ခုဥပဒွါရာဝတီနဂရံ ဂန္တွာ ပရိယတ္တိံ ဥဂ္ဂဏှိ. တတော ပစ္ဆာ သုဓမ္မ ပုရံ ဂန္တွာ ပရိယတ္တိံ ဥဂ္ဂဏှိ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ သိရိခေတ္တနဂရေ ပါဋလိရုက္ခေ ဧကော ဂန္ထော အတ္ထီတိ သုတွာ သုဓမ္မပုရတော သိရိခေတ္တနဂရံ အဂမာသိ. အန္တရာမဂ္ဂေ လုဒ္ဓကော ထေရံ ပဿိတွာ အယံ ယက္ခောတိ မညိတွာ ဂဟေတွာ အနုရုဒ္ဓရညော ဒဿေသိ. कहते हैं कि सिंहल द्वीप के विप्पवासी नगर में रहने वाला एक भिक्षु उपद्वारवती नगर जाकर पर्यत्ति (शास्त्र) का अध्ययन करने लगा। उसके बाद वह सुधम्मपुर गया और वहाँ पर्यत्ति सीखी। उस समय श्रीक्षेत्र नगर में पाटल वृक्ष के पास एक ग्रंथ होने की बात सुनकर वह सुधम्मपुर से श्रीक्षेत्र नगर गया। रास्ते में एक शिकारी ने स्थविर को देखा और उन्हें यक्ष समझकर पकड़ लिया और राजा अनुरुद्ध को सौंप दिया। တဒါ ရာဇာ ထေရံ ပုစ္ဆိ,– ကော ပန တွန္တိ. အဟံ မဟာရာဇ ဂေါဘမဿ သာဝကောတိ. ပုန ရာဇာ ပုစ္ဆိ,–တိဏ္ဏံ ပန ရတနာနံ ကီဒိသောတိ. ထေရော အာဟ,– မဟောသဓပဏ္ဍိတောဝိယ မဟာရာဇ ဗုဒ္ဓေါ ဒဋ္ဌဗ္ဗော, ဥမင်္ဂေါဝိယ ဓမ္မော, ဝိဒေဟသေနာ ဝိယ သံဃောတိ. ဧဝံ ဥပမာဟိ ပကာသိတော ရာဇာ ပုန ပုစ္ဆိ,–ကိံ နုခေါ ဣမေ ဂေါတမဿ သာဝကာတိ. န ခေါ မဟာရာဇ ဣမေ ဂေါတမဿ သာဝကာ, ဣမေ ပန အမှေဟိ ဝိသဘာဂါ သမဏကုတ္တကာယေ ဝါတိ. ဧဝံ ဝုတ္တေ တတော ပဋ္ဌာယ တေ သမဏကုတ္တကေ ဝိဇဟိ, တိဏံ ဝိယ နာတိမညိ. ပါဋလိရုက္ခသု သိရတောပိ [Pg.67] လဒ္ဓံ တေသံ ဂန္ထံ လဒ္ဓဋ္ဌာနေယေဝ အဂ္ဂိနာ ဈာပေသိ. တမ္ပိ ဌာနံ ယာဝဇ္ဇတနာ အဂ္ဂိဈာပနထလန္တိ ပါကဋန္တိ. तब राजा ने स्थविर से पूछा, 'आप कौन हैं?' 'महाराज! मैं गोभम का श्रावक हूँ।' राजा ने फिर पूछा, 'तीनों रत्नों के प्रति आपकी कैसी दृष्टि है?' स्थविर ने कहा, 'महाराज! बुद्ध को महौषध पंडित के समान देखना चाहिए, धर्म को उमंग (सुरंग) के समान और संघ को विदेह की सेना के समान।' इस प्रकार उपमाओं द्वारा स्पष्ट किए जाने पर राजा ने फिर पूछा, 'क्या ये (श्रमणकुत्तक) गौतम के श्रावक हैं?' 'नहीं महाराज, ये गौतम के श्रावक नहीं हैं, ये तो हमसे भिन्न श्रमणकुत्तक ही हैं।' ऐसा कहने पर, तब से उसने उन श्रमणकुत्तकों को त्याग दिया और उन्हें तिनके के समान भी नहीं समझा। पाटल वृक्ष के पास से प्राप्त उनके ग्रंथ को उसी स्थान पर अग्नि में जलवा दिया। वह स्थान आज भी 'अग्नि-दाह-स्थल' के नाम से प्रसिद्ध है। ထေရော စ ဝိမာန ဝတ္ထုံ ရညော ဒေသေသိ. ရာဇာ စ ပသီဒိတွာ သိရိခေတ္တနဂရတော အရိမဒ္ဒနနဂရံ ပစ္စာဂမနကာလေ အာနေသိ. स्थविर ने राजा को विमानवत्थु का उपदेश दिया। राजा प्रसन्न होकर श्रीक्षेत्र नगर से अरिमद्दन नगर लौटते समय उन्हें अपने साथ ले आया। ဣဒံ ပန ပါဋလိသုသိရေ လဒ္ဓဂန္ထဿ ကာရဏံ,- တေသဉှိ သမဏကုတ္တကာနံ အဗ္ဘန္တရေ ဧကော ဥပါယစ္ဆေကော သမဏကုတ္တကော အတ္တနော ဝါဒါနုရူပံ ဂန္ထံ ကတွာ သိရိခေတ္တနဂရေ ဒွတ္တိံသရတနက္ခန္ဓဿ ပါဋလိရုက္ခဿ သုသိရေ ပဝေသေတွာ ပုနပ္ပုနံ ဥဒကေန တေမေတွာ မတ္တိကာယ လိမ္ပေတွာ ပုန တစံ ဥပ္ပာဒေတွာ ဥဋ္ဌာပေသိ. တဒါ မယံ သုပိနေ ပါဋလိရုက္ခေ သာရဂန္ထော အတ္ထဗျဉ္ဇနသမ္ပန္နော ဧကော အတ္ထီတိဣ ပဿာမာတိ ကောလာဟလံ ဥပ္ပာဒေသုံ. တံ သုတွာ ရာဇာ သိရိခေတ္တနဂရံ ဂန္တွာ တံ ပါဋလိရုက္ခံ ဘိန္ဒိတွာ ဂဝေသေန္တော တံ ဂန္ထံ လဘိ. ဂန္ထေ ပန သကဝါဒဝသေန သမဏကုတ္တကသာမညတာ ဤဒိသာယေဝ, ဧတေ ဂေါတမာသာဝကာ ဟောန္တိဣ, ဧတေသံယေဝ အာစာရော သဂ္ဂမဂ္ဂပထဘူတောတိ ဧဝမာဒီဟိ ကာရဏေဟိ ဝုတ္တံ. ရာဇာ စ ပသီဒိတွာ သမဏကုတ္တကာနံ ဗဟူနိ ဒါတဗ္ဗာနိ အဒါသိ. တတော ပစ္ဆာ ထေရဿ ဓမ္မကထံ သုတွာ တံ အဂ္ဂိနာ ဈာပေသီတိ ဧဝံ သမဏကုတ္တကာနံ ဝစနံ သုတွာ သိရိခေတ္တနဂရံ ဂန္တွာ အရိမဒ္ဒနနဂရံ ပစ္စာဂစ္ဆန္တော ထေရံ အာနေသီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. အရိမဒ္ဒနနဂရံ သမ္ပတ္တကာလေ ဇေတဝနံ နာမ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ အဒါသိ. ထေရော စ တတ္ထ သာသာနံ ဝိသောဓေတွာ နိသီဒိ. ရာဇာ ဒေဝသိကံ ဥဒကံ အာနေတွာ အဂ္ဂမဟေသီ ပန ဒေဝသိကံယေဝ ပိဏ္ဍပါတံ အာနေတွာ ဘောဇေသိ. ဥပ္ပန္နကင်္ခါ ကာလေပိ တံတံကင်္ခါဋ္ဌာနံ ပုစ္ဆီတိ. यह पाटलि वृक्ष के खोखले में ग्रंथ प्राप्त होने का कारण है - उन श्रमणकुत्तकों (छद्म-भिक्षुओं) के बीच एक उपाय-कुशल श्रमणकुत्तक ने अपने मत के अनुरूप एक ग्रंथ लिखकर सिरीखेत्त नगर में बत्तीस हाथ के घेरे वाले पाटलि वृक्ष के खोखले में डाल दिया, उसे बार-बार पानी से भिगोया, मिट्टी से लीपा और फिर से छाल उगाकर उसे खड़ा कर दिया। तब उन्होंने कोलाहल मचाया कि 'हमने स्वप्न में देखा है कि पाटलि वृक्ष में अर्थ और व्यंजन से संपन्न एक सार-ग्रंथ है'। उसे सुनकर राजा सिरीखेत्त नगर गया और उस पाटलि वृक्ष को काटकर खोजते हुए उस ग्रंथ को प्राप्त किया। ग्रंथ में अपने मत के अनुसार श्रमणकुत्तकों की सामान्यता के विषय में इस प्रकार कहा गया था - 'ये गौतम के श्रावक हैं, इनका ही आचार स्वर्ग मार्ग का पथ है' इत्यादि कारणों से। राजा प्रसन्न हुआ और श्रमणकुत्तकों को बहुत दान दिया। उसके बाद स्थविर की धर्मकथा सुनकर उसे अग्नि में जलवा दिया - इस प्रकार श्रमणकुत्तकों के वचन सुनकर सिरीखेत्त नगर जाकर अरिमद्दन नगर लौटते समय स्थविर को ले आया, ऐसा समझना चाहिए। अरिमद्दन नगर पहुँचने पर जेतवन नामक विहार बनवाकर दिया। स्थविर वहाँ शासन का शोधन करते हुए ठहरे। राजा प्रतिदिन जल लाता था और अग्र-महिषी (रानी) प्रतिदिन पिण्डपात लाकर भोजन कराती थी। शंका उत्पन्न होने पर वे उस-उस शंका के स्थान के विषय में पूछते थे। အယံ ပန သာသနပ္ပဝေဏိယာဂတဋ္ဌုပ္ပတ္တိ,– यह शासन-परंपरा से प्राप्त वृत्तांत है - သုဓမ္မပုရေ ဟိ သမာပတ္တိလာဘီ အနောမဒဿီ နာမ ထေရော [Pg.68] သောဏုတ္တရတ္ထေရာနံ ဝံသာနုရုက္ခဏဝသေန သဒ္ဓိံ ပဉ္စဟိ ဘိက္ခု သတေဟိ နိသီဒိ. တဿ ပန ပဓာနသိဿော အဓိသီလောနာမ, တဿ ပဓာနသိဿော ပြာနဒဿီ နာမ, တဿ ပဓာနသိဿော ကာဠော နာမ, တဿ ပဓာနသိဿော အရဟန္တော နာမ, တဿ ပဓာနသိဿော အရိယဝံသော နာမာတိ. सुधम्मपुर में समापत्ति-लाभी अनोमदस्सी नामक स्थविर सोणुत्तर स्थविरों के वंश की रक्षा के क्रम से पाँच सौ भिक्षुओं के साथ रहते थे। उनके प्रधान शिष्य अधिसील नामक थे, उनके प्रधान शिष्य प्राणदस्सी नामक थे, उनके प्रधान शिष्य काल नामक थे, उनके प्रधान शिष्य अरहंत नामक थे, उनके प्रधान शिष्य अरियवंस नामक थे। ဣဒဉ္စ ဝစနံ-ကော ပနေသ ဥတ္တရာဇီဝမဟာထေရောတိ. အယဉှိ ထေရော ရာမညဒေသိယပုတ္တော အရိယဝံသတ္ထေရဿ သိဿော. အရိယဝံသတ္ထေရော ပန ကပ္ပုင်္ဂနဂရဝါသီ မဟာကာဠတ္ထေရဿ သိဿော. သော ပန သုဓမ္မနဂရဝါသိနော ပြာနဒဿီ မဟာထေရဿ သိဿောတိ ကလျာဏီ သိလာလေခနေ ဝုတ္တဝစနေန န သမေတိ. ဧဝမ္ပိ သတိ ယထိစ္ဆိတ အဓိပ္ပာယော န နဿတီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. और यह वचन - 'यह उत्तराजीव महास्थविर कौन हैं?' यह स्थविर रामञ्ञ देश के पुत्र और अरियवंस स्थविर के शिष्य थे। अरियवंस स्थविर कप्पुङ्ग नगर निवासी महाकाल स्थविर के शिष्य थे। वे सुधम्म नगर निवासी प्राणदस्सी महास्थविर के शिष्य थे - यह बात कल्याणी शिलालेख में कहे गए वचनों से मेल नहीं खाती। ऐसा होने पर भी, इच्छित अभिप्राय नष्ट नहीं होता, ऐसा समझना चाहिए। ဧဝံ နာနာစရိယာနံ ဝါဒေါ နာနာကာရေန ဒိဿမာနောပိ အရဟန္တတ္ထေရဿ အရိမဒ္ဒနနဂရေ သာသနံ အနုဂ္ဂဟေတွာ ပတိဋ္ဌာနတာယေဝေတ္ထ ပမာဏန္တိ ကတွာ နာဝမညိတဗ္ဗော. သဗ္ဗေသဉှိ အာစရိယာနံ ဝါဒေပိ အရဟန္တတ္ထေရော အရိမဒ္ဒနနဂရံ အာဂန္တွာ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသီတိ အတ္ထော ဣစ္ဆိတဗ္ဗောယေဝါတိ. इस प्रकार विभिन्न आचार्यों के मत विभिन्न रूपों में दिखाई देने पर भी, अरहंत स्थविर द्वारा अरिमद्दन नगर में शासन का अनुग्रह कर उसे प्रतिष्ठित करना ही यहाँ प्रमाण है, ऐसा मानकर अनादर नहीं करना चाहिए। सभी आचार्यों के मत में भी 'अरहंत स्थविर ने अरिमद्दन नगर आकर शासन प्रतिष्ठित किया' - यही अर्थ स्वीकार किया जाना चाहिए। အရဟန္တတ္ထေရော ပန မူလနာမေန ဓမ္မဒဿီတိ ပါကဋော သုဓမ္မပုရဝါသီ သီလဗုဒ္ဓိတ္ထေရဿ သိဿောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. သော စ ထေရော ပုဗ္ဗေဝ ပဗ္ဗဇ္ဇကာလတော စတူသု ဝေဒေသု သိက္ခိတသိပ္ပော. ပဗ္ဗဇိတွာ ပန သာဠကထံ ပိဋကတ္တယံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ ပါရံ ဂန္တွာ သဗ္ဗတ္ထ ပါကဋော. သောက္ကတယနဂရံ အနေတွာ မနုဿာ ပူဇေန္တိ. တတ္ထ ဒသဝဿာနိ ဝသိတွာ ပုန သုဓမ္မပုရံ အာဂန္တွာ အရညဝါသံ သမာဒိယိ. अरहंत स्थविर अपने मूल नाम 'धम्मदस्सी' से प्रसिद्ध थे और सुधम्मपुर निवासी सीलबुद्धि स्थविर के शिष्य थे, ऐसा समझना चाहिए। वे स्थविर प्रव्रज्या के समय से पहले ही चारों वेदों में शिक्षित थे। प्रव्रजित होकर उन्होंने व्याख्या सहित त्रिपिटक का अध्ययन कर उसमें पारंगत हुए और सर्वत्र प्रसिद्ध हुए। सोक्कतय नगर ले जाकर लोग उनकी पूजा करते थे। वहाँ दस वर्ष रहकर पुनः सुधम्मपुर आए और अरण्यवास स्वीकार किया। တတော ပစ္ဆာ ဇိနစက္ကေ ဧကသဋ္ဌာဓိကေ ပဉ္စသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ ကလိယုဂေ ဧကူနာသီတာဓိကေ တိသတေ သမ္ပတ္တေ အနုရုဒ္ဓရာဇာ ရဇ္ဇံ ပါပုဏိ. တဒါ အရိမဒ္ဒနနဂရေ သမဏကုတ္တကာ [Pg.69] မယံ ဂေါတမသာဝကာတိ ဝတွာ တိံသတိံသဝဂ္ဂါ ဟုတွာ နိသီဒိံသု. ဝဂ္ဂဝသေန ကိရ သဟဿမတ္တာတိ. အနုရုဒ္ဓရာဇာ စ တေသံ သမဏကုတ္တကာနံ အာဂါရိယာဗြဟ္မစရိယာဒီနိ သုတွာ န ပသီဒိ. ဧဝမ္ပိ ပဝေဏိယာ အာဂဘတ္တာ န ပဇဟိ. အရဟန္တံ ပန ထေရံ ပဿိတွာ တတော ပဋ္ဌာယ တေသံ သမဏကုတ္တကာနံ နိဗဒ္ဓဝတ္တာနိ ဘိန္ဒိတွာ သာသနေ ပသီဒိ. उसके बाद बुद्ध संवत के एक हजार पाँच सौ इकसठ वर्ष बीतने पर और कलियुग के तीन सौ उनासी वर्ष बीतने पर अनुरुद्ध राजा ने राज्य प्राप्त किया। तब अरिमद्दन नगर में श्रमणकुत्तक 'हम गौतम के श्रावक हैं' ऐसा कहकर तीस-तीस के समूह में रहते थे। समूहों के अनुसार वे लगभग एक हजार थे। अनुरुद्ध राजा उन श्रमणकुत्तकों के गृहस्थ-ब्रह्मचर्य आदि के आचरण को सुनकर प्रसन्न नहीं हुआ। फिर भी परंपरा से चले आने के कारण उन्हें नहीं छोड़ा। अरहंत स्थविर को देखने के बाद, तब से उन श्रमणकुत्तकों के निरंतर चलने वाले नियमों को तोड़कर शासन में प्रसन्न हुआ। ဣဒံ မရမ္မမဏ္ဍလေ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌေ အရိမဒ္ဒနနဂရေ အရဟန္တံ. यह मरम्म-मण्डल के तम्बदीप राष्ट्र के अरिमद्दन नगर में अरहंत (स्थविर के विषय में है)। နာမ ထေရံ ပဋိစ္စ တတိယံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. नामक स्थविर के कारण शासन की तीसरी स्थापना है। တသ္မိဉ္စ ကာလေ အရဟန္တတ္ထေရော အနုရုဒ္ဓရာဇာနံ အာဟ,-တီသု သာသနေသု ပရိယတ္တိသာသနေ တိဋ္ဌန္တေယေဝ ပဋိပတ္တိ သာသနံ တိဋ္ဌတိ, ပဋိပတ္တိသာသနေ တိဋ္ဌန္တေယေဝ ပဋိဝေဓသာသနံ တိဋ္ဌတိ, ယထာ ဟိ ဂုန္နံ သတေပိ သဟဿေပိ ဝိဇ္ဇမာနေ ပဝေဏိပ,လိကာယ ဓေနုယာ အသတိ သော ဝံသော သာပဝေဏီ န ဃဠီယတိဣ, ဧဝမေဝံ ဓုတင်္ဂဓရာနံ ဘိက္ခူနံ သတေပိ သဟဿေပိ ဝိဇ္ဇမာနေ ပရိယတ္တိယာ အန္တရဟိတာယ ပဋိဝေဓော နာမ န ဟောတိ, ယထာ ပန နိမိကုမ္ဘိယော ဇာနနတ္ထာယ ပါသာဏ ပိဋ္ဌေ အက္ခရေသု ဌပိတေသု ယာဝ အက္ခရာနိ ဓရန္တိ, တာဝ နိဓိကုမ္ဘိယော နဋ္ဌာ နာမ န ဟောန္တိ, ဧဝမေဝံ ပရိယတ္တိယာ ဓရမာနာယ သာသနံ အနန္တရဟိတံ နာမ ဟောတိ, ယထာ စ မဟတော တဠာကဿ ပါဠိယာ ထိရာယ ဥဒကံ န ဌဿတီတိ န ဝတ္တဗ္ဗံ, ဥဒကေ သတိ ပဒုမာဒီနိ ပုပ္ဖာနိ န ပုပ္ဖိဿန္တီတိ န ဝတ္တဗ္ဗံ, ဧဝမေဝံ မဟာတဠာကဿ ထိရပါဠိသဒိသေ တေပိဋကေ ဗုဒ္ဓဝစနေ သတိ ဥဒကသဒိသာ ပဋိပတ္တိပူရကာ ကုလပုတ္တာ နတ္ထီတိ န ဝတ္တဗ္ဗံ, တေသု သတိ ပဒုမာဒိပုပ္ဖသဒိသော ပဋိဝေဓော နတ္ထီတိ န ဝတ္တဗ္ဗံ, ဧဝံ ဧကန္တတော ပရိယတ္တိမေဝ ပမာဏံ, တသ္မာ အန္တမသော ဒွီသု ပါတိမောက္ခသု ဝတ္တမာနေသုပိ သာသနံ အနန္တရဟိတမေဝ, ပရိယတ္တိယာ အန္တရဟိတာယ သုပ္ပဋိပန္နဿာပိ ဓမ္မာဘိသမယော နတ္ထိ, အနန္တရဟိတာယ ဧဝ ဓမ္မာဘိသမယော အတ္ထိ[Pg.70], ဣဒါနိပိ အမှာကံ ပရိယတ္တိသာသနံ ပရိပုဏ္ဏံ နတ္ထိ, သရီရဓာတုယော စ နတ္ထိ, တသ္မာ ယတ္ထ ပရိယတ္တိသာသနံ သရီရဓာတုယော စ အတ္ထိ, တတ္ထ ပဏ္ဏာကာရေန သဒ္ဓိံ ဒူတံ ပေသေတွာ အာနေတဗ္ဗာ, ဧဝံ သတိ အမှာကံ ရဋ္ဌေ ဇိနသာသနံ စိရကာလံ ပတိဋ္ဌဟိဿတီတိ. उस समय अरहंत स्थविर ने राजा अनुरुद्ध से कहा—तीनों शासनों में से पर्यत्ति शासन के स्थित रहने पर ही प्रतिपत्ति शासन स्थित रहता है, प्रतिपत्ति शासन के स्थित रहने पर ही प्रतिवेध शासन स्थित रहता है। जैसे सौ या हजार गायों के होने पर भी यदि वंश की रक्षा करने वाली धेनु (गाय) न हो, तो वह वंश और उसकी परंपरा नहीं चलती, उसी प्रकार धुतंगधारी सौ या हजार भिक्षुओं के होने पर भी यदि पर्यत्ति (शास्त्र) लुप्त हो जाए, तो प्रतिवेध (साक्षात्कार) नहीं होता। जैसे निधि के घड़ों को जानने के लिए पत्थर की पीठ पर अक्षर अंकित कर दिए जाने पर, जब तक वे अक्षर रहते हैं, तब तक निधि के घड़े नष्ट नहीं माने जाते, वैसे ही पर्यत्ति के विद्यमान रहने पर शासन लुप्त नहीं माना जाता। और जैसे किसी बड़े तालाब की पाल (तटबंध) के सुदृढ़ होने पर यह नहीं कहा जा सकता कि पानी नहीं ठहरेगा, और पानी होने पर यह नहीं कहा जा सकता कि कमल आदि फूल नहीं खिलेंगे, वैसे ही विशाल तालाब की सुदृढ़ पाल के समान त्रिपिटक बुद्धवचन के होने पर यह नहीं कहा जा सकता कि जल के समान प्रतिपत्ति को पूर्ण करने वाले कुलपुत्र नहीं हैं, और उनके होने पर यह नहीं कहा जा सकता कि कमल आदि फूलों के समान प्रतिवेध नहीं है। इस प्रकार एकांततः पर्यत्ति ही प्रमाण है, इसलिए कम से कम दो प्रातिमोक्षों के प्रवर्तमान रहने पर भी शासन लुप्त नहीं होता। पर्यत्ति के लुप्त होने पर सुप्रतिपन्न (अच्छी तरह अभ्यास करने वाले) के लिए भी धर्माभिसमय (सत्य का साक्षात्कार) नहीं होता, उसके लुप्त न होने पर ही धर्माभिसमय होता है। अभी हमारे पास पर्यत्ति शासन पूर्ण नहीं है और न ही शरीर धातुएँ हैं। इसलिए जहाँ पर्यत्ति शासन और शरीर धातुएँ हैं, वहाँ उपहारों के साथ दूत भेजकर उन्हें मँगवाना चाहिए। ऐसा होने पर हमारे राष्ट्र में जिन-शासन चिरकाल तक प्रतिष्ठित रहेगा। ဧဝံ ပန ဘန္တေ သတိ ကတ္ထ ယာစိဿာမာတိ. သုဝဏ္ဏဘူမိရဋ္ဌေ မဟာရာဇ သုဓမ္မပုရေ တီဟိ ဝါရေဟိ ပိဋကတ္တယံ လိခိတွာ ဌပေသိ, သရီရဓာတုယော စ ဗဟူ တတ္ထ အတ္ထီတိ. ရာဇာ ဧဝံ ဘန္တေတိ ပဋိဂ္ဂဏှိတွာ ဗဟူ ပဏ္ဏာကာရေ ပဋိယာဒေတွာ ရာဇလေခနံ လိခိတွာ အဋ္ဌင်္ဂသမန္နာဂတံ ဧကံ အမစ္စံ ဒူတံ ကတွာ ပေသေသိ. ऐसा होने पर भन्ते! हम कहाँ से याचना करें? (स्थविर ने कहा—) महाराज! सुवर्णभूमि राष्ट्र के सुधम्मपुर में तीन बार त्रिपिटक को लिखकर रखा गया है और वहाँ बहुत सी शरीर धातुएँ भी हैं। राजा ने 'एवं भन्ते' (ठीक है भन्ते) कहकर स्वीकार किया और बहुत से उपहार तैयार करवाकर, राजलेख लिखकर, आठ गुणों से युक्त एक अमात्य को दूत बनाकर भेजा। သုဓမ္မပုရိန္ဒော မနောဟရိ နာမ ရာဇာပိ မစ္ဆေရစိတ္တော ဟုတွာ တုမှာဒိသာနံ မိစ္ဆာဒိဋ္ဌီနံ ဌာနေ ပိဋကတ္တယံ သရီရဓာတုယော စ ပဟိဏိတုံ န ယုတ္တာ, တိလောကဂ္ဂဿ ဟိ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ သာသနံ သမ္မာဒိဋ္ဌီနံ ဌာနေယေဝ ပတိဋ္ဌဟိဿတိ, ယထာ နာမ ကေသရသီဟရာဇဿ ဝသာ သုဝဏ္ဏပါတိယံယေဝ, န မတ္တိကာဘာဇနေတိ. सुधम्मपुर के स्वामी मनोहरि नामक राजा ने भी मत्सर (ईर्ष्या) चित्त वाला होकर कहा—तुम जैसे मिथ्यादृष्टियों के स्थान पर त्रिपिटक और शरीर धातुओं को भेजना उचित नहीं है। त्रिलोक के अग्र सम्यक्सम्बुद्ध का शासन सम्यग्दृष्टियों के स्थान पर ही प्रतिष्ठित होगा, जैसे केसरिया सिंह की वसा (चर्बी) स्वर्णपात्र में ही रहती है, मिट्टी के बर्तन में नहीं। ဒူတာ ပစ္စာဂန္တွာ အနုရုဒ္ဓရညော တမတ္ထံ အာရောစေသုံ. တံ သုတွာ အနုရုဒ္ဓရာဇာ ကုဇ္ဈိ, တတ္တကကပါလေ ပက္ခိတ္တတိလံဝိယ တဋ တဋာယိ. दूतों ने वापस आकर राजा अनुरुद्ध को वह बात बताई। उसे सुनकर राजा अनुरुद्ध क्रोधित हो गया और तप्त कड़ाह में डाले गए तिल की तरह तड़तड़ाने लगा। အထ ရာဇာ နဒီမဂ္ဂေန နာဝါနံ အသီတိသတသဟဿေဟိ နာဝိကာနံ ယောဓာနံ အဋ္ဌကောဋီဟိ သေနံ ဗျူဟိတွာ ထလမဂ္ဂေန သဒ္ဓိံ စတူဟိ မဟာယောဓနာယကေဟိ ဟတ္ထီနံ အသီတိ သဟဿေဟိ အဿာနံ နဝုတိဣသတသဟဿေဟိ ယောဓာနံ အသီတိကောဋိယာ သေနံ ဗျူဟိတွာ သယမေဝ ယုဇ္ဈိတုံ သုဓမ္မပရံ ဂစ္ဆိ. तब राजा ने नदी मार्ग से अस्सी लाख नौकाओं, आठ करोड़ नाविकों और योद्धाओं की सेना का व्यूह बनाकर, और थल मार्ग से चार महायोधनायकों के साथ अस्सी हजार हाथियों, नौ लाख घोड़ों और अस्सी करोड़ योद्धाओं की सेना का व्यूह बनाकर स्वयं युद्ध करने के लिए सुधम्मपुर की ओर प्रस्थान किया। တံ သုတွာ မနောဟရိရာဇာ သီတတသိတော ဟုတွာ အတ္တနော [Pg.71] ဗဟူ ယောဓေ သံဝိဒဟိတွာ သုဓမ္မပုရယေဝ ပဋိသေနံ ကတွာ နိသီဒိ. यह सुनकर राजा मनोहरि भयभीत हो गया और अपने बहुत से योद्धाओं को संगठित कर सुधम्मपुर में ही प्रति-सेना तैयार कर बैठ गया। အထ အထဗ္ဗဏဝေဒေ အာဂတပ္ပယောဂဝသေန ပုနပ္ပုနံ ဝါယမန္တာပိ နဂရမူလံ ဥပသင်္ကမိတုံ န သက္ကာ. တဒါ ရာဇာ ဝေဒညုနော ပုစ္ဆိ,–ကသ္မာ ပနေတ္ထ နဂရမူလံ ဥပသင်္ကမိတုံ န သက္ကောမာတိ. ဝေဒညုနော အာဟံသု,-အထဗ္ဗဏဝေဒဝိဓာနံ မဟာရာဇ အတ္ထိ မညေတိ. အထ ရာဇာ ပထဝိယံ နိဒဟိတွာ မတကဠေဝရံ ဥဒ္ဓရိတွာ မဟာသမုဒ္ဒေ ခိပေသိ. तब अथर्ववेद में आए प्रयोगों के कारण बार-बार प्रयास करने पर भी वे नगर के समीप नहीं पहुँच सके। तब राजा ने वेदज्ञों से पूछा—हम यहाँ नगर के समीप क्यों नहीं पहुँच पा रहे हैं? वेदज्ञों ने कहा—महाराज! यहाँ अथर्ववेद का विधान (तंत्र-मंत्र) है। तब राजा ने पृथ्वी में गड़े हुए मृत शरीरों को खोदकर निकाला और उन्हें महासमुद्र में फेंक दिया। ဧကံ ကိရ မနုဿံ ဟိန္ဒုကုလံ ဇေင်္ဂုနာမကံ ကီဋံ ခါဒါပေတွာ တံ မာရေတွာ ဟတ္ထပါဒါဒီနိ အင်္ဂပစ္စင်္ဂါနိ ဂဟေတွာ ဆိန္နဆိန္နာနိ ကတွာ နဂရဿ သာမန္တာ ပထဝိယံ နဒဟိတွာ ဌပေသိ. တဒါ ပန နဂရံ ဥပသင်္ကမိတုံ သက္ကာ. နဂရဉ္စ ပဝိသိတွာ အနုရုဒ္ဓရာဇာ မနောဟရိရာဇာနံ ဇီဝဂ္ဂါဟံ ဂဏှိ. သုဓမ္မပုရေ ပေါရာဏိကာနံ ရာဇူနံ ပဝေဏီအာဂတဝသေန ရတနမယမဉ္ဇူသာယံ ဌပေတွာ ပူဇိတံ သဟဓာတူဟိ ပိဋကတ္တယံ ဂဟေတွာ မနောဟရိရညော သန္တကာနံ ဒွတ္တိံသဟတ္ထီနံ ပိဋ္ဌိယံ အာရောပေတွာ အာနေသိ. कहते हैं कि एक हिंदू कुल के जेंगु नामक मनुष्य को कीड़े खिलाकर और उसे मारकर, उसके हाथ-पैर आदि अंगों-प्रत्यंगों को लेकर, उन्हें काट-काटकर नगर के चारों ओर पृथ्वी में गाड़ दिया गया था। तब नगर के समीप पहुँचना संभव हुआ। नगर में प्रवेश कर राजा अनुरुद्ध ने राजा मनोहरि को जीवित पकड़ लिया। सुधम्मपुर के प्राचीन राजाओं की परंपरा के अनुसार रत्नमय मंजूषा में रखकर पूजित धातुओं सहित त्रिपिटक को लेकर, राजा मनोहरि के बत्तीस हाथियों की पीठ पर लादकर वह ले आया। အရိမဒ္ဒနနဂရံ ပန ပတွာ ဓာတုယော ရတနမယမဉ္ဇူသာယံ ဌပေတွာ သိရိသယနဂဗ္ဘေ ရတနမဉ္စေ သီသောပဒေသဿ သမီပေ ဌပေသိ. ပိဋကတ္တယမ္ပိ ရတနမယေ ပါသာဒေ ဌပေတွာ ဘိက္ခုသံဃဿ ဥဂ္ဂဟဓာရဏာဒိအတ္ထာယ နိယျာဒေသိ. တတော ကိရ အာနီတံ ပိဋကတ္တယံ ဥဂ္ဂဏှန္တာနံ အရိယာနံ သဟဿမတ္တံ အဟောသီတိ. अरिमर्दन नगर पहुँचकर धातुओं को रत्नमय मंजूषा में रखकर, श्रीशयनकक्ष में रत्नमय मंच पर सिरहाने के पास स्थापित किया। त्रिपिटक को भी रत्नमय प्रासाद में रखकर भिक्षु संघ के अध्ययन और धारण आदि के लिए समर्पित कर दिया। कहते हैं कि वहाँ से लाए गए त्रिपिटक का अध्ययन करने वाले आर्यों (भिक्षुओं) की संख्या लगभग एक हजार थी। သုဓမ္မနဂရံ ဝိဇယိတွာ ပိဋကေန သဒ္ဓိံ ဘိက္ခုသံဃံ အာနေတွာ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာပနံ ဇိနစက္ကေ ဧကာဓိကေ ဆသတေ ဝဿသဟဿေ ကလိယုဂေ စ သောဠသာဓိကေ စတုသတေ သမ္ပတ္တေတိ သိလာလေခနေသု ဝုတ္တံ. सुधम्म नगर को जीतकर त्रिपिटक के साथ भिक्षु संघ को लाकर शासन की स्थापना करना, जिन-चक्र (बुद्ध संवत) के एक हजार छह सौ एक वर्ष और कलियुग के चार सौ सोलह वर्ष बीतने पर हुआ, ऐसा शिलालेखों में कहा गया है। အနုရုဒ္ဓရညော ကာလေ ပုညာနုဘာဝေန တိဣဏ္ဏံ ရတနာနံ ပရိပုဏ္ဏတ္တာ [Pg.72] ပုဏ္ဏဂါမောတိ သမညာ အဟောသိ. စိရကာလံ အတိက္ကန္တေ ဏ္ဏကာရံ လောပဝသေန မကာရဿ စ နိဂ္ဂဟိတ ဝသေန ပုဂမီတိ မရမ္မဘာသာယ ဝေါဟာရီယတီတိ အနာဂတဝံသရာဇဝံသေသု ဝုတ္တံ. राजा अनुरुद्ध के समय में, पुण्यों के प्रभाव से तीन रत्नों की परिपूर्णता के कारण 'पुण्णगाम' (पुण्यग्राम) नाम की संज्ञा हुई। लंबे समय के बीतने पर 'ण्ण' अक्षर के लोप होने और 'म' कार के निग्गहीत (अनुस्वार) होने के कारण म्यांमार भाषा में इसे 'पुगम' कहा जाता है, ऐसा अनागतवंश और राजवंशावली में कहा गया है। အနုရုဒ္ဓရာဇာယေဝ စတ္တာရော မဟာယောဓေ သီဟဠဒီပံ ပေသေတွာ တတောပိ ပိဋကတ္တယံ အာနေသိ. သီဟဠဒီပတော အာနီတပိဋကတ္တယေန သုဓမ္မပုရတော အာနီတပိဋကတ္တယံ အညမညံ ယောဇေတွာ သံသန္ဒေတွာ အရဟန္တတ္ထေရော ဝီမံသေသိ. တဒါ ဂင်္ဂါဒကေနဝိယ ယမုနောဒကံ အညမညံ အနူနံ အနဓိကံ အဟောသိ. တေဟိ ပိဋကေဟိ အညာနိပိ ဝဍ္ဎေတွာ တိပိဋကဂဗ္ဘေ ဌပေတွာ ပူဇေသိ. တေသု တေသု ဌာနေသုပိ ပတိဋ္ဌာပေသိ. राजा अनुरुद्ध ने ही चार महायोद्धाओं को सिंहल द्वीप भेजकर वहाँ से भी त्रिपिटक मँगवाया। सिंहल द्वीप से लाए गए त्रिपिटक और सुधम्मपुर से लाए गए त्रिपिटक को आपस में मिलाकर और तुलना करके अरहंत थेर ने उनकी परीक्षा की। तब वे गंगा के जल और यमुना के जल की तरह एक-दूसरे के समान, न कम और न अधिक थे। उन पिटकों से अन्य प्रतियों को भी बढ़ाकर त्रिपिटक-गर्भ (पुस्तकालय) में रखकर उनकी पूजा की। उन्हें उन-उन स्थानों पर भी प्रतिष्ठित किया। မနောဟရိရာဇာနမ္ပိ မြင်္ကပါ နာမ ဒေသေ ဥပဋ္ဌာကေဟိ သဟ ဌပေသိ. တဿ စ ကိရ ရညော မုခံ ဝိရဝိတွာ ကထံ သလ္လာပေန္တဿ မုခတော ဩဘာသော ပဇ္ဇလိတွာ နိက္ခမိ. သော ကဒါစိ ကဒါစိ အနုရုဒ္ဓရညော သန္တိကံ အာဂန္တွာ ဂါရဝဝသေန ဝန္ဒနာဒီနိ အကာသိ. တဒါ အနုရုဒ္ဓရညော လောမဟံသော ဥပ္ပဇ္ဇိ ဥဗ္ဗိဂ္ဂေါ စ. တသ္မာ တဿ ရညော နိတ္ထေဇတ္ထာယ ဗုဒ္ဓရူပဿ စေတိယဿ ဘတ္တံ ပူဇေတွာ တံ ဂဟေတွာ မနောဟရိရညော ဘာဇေသိ. တဒါ တဿ တဒါနုဘာဝေါ အန္တရဓာယိ. မနောဟရိရာဇာ သံဝေဂံ အာပဇ္ဇိတွာ သံသာရေ သံသရန္တော ယာဝ နိဗ္ဗာနံ န ပါပုဏာမိ, တာဝ ပရဝသေ နာနုဝတ္တေယျန္တိ ပတ္ထနံ အကာသိ. သုဓမ္မပုရတော အာဘတံ အတ္တနော သန္တကံ မနောမယ မဏိံ ဧကဿ သေဋ္ဌိနော သန္တိကေ ဝိက္ကိဏိတွာ လဒ္ဓမူလေန ပဉ္စဝါဟရဇတေန အဘုဇိတပလ္လင်္ကဝသေန ဧကံ မဟန္တံ ဗုဒ္ဓ ဗိမ္ဗံ ပရိနိဗ္ဗာနာကာရေန ဧကန္တိ ဒွေ ဗုဒ္ဓပ္ပဋိဗိမ္ဗာနိ ကာရာပေသိ. ယာဝဇ္ဇတနာ တာနိ သန္တီတိ. ဣစ္စေဝံ အနုရုဒ္ဓရာဇာ သုဓမ္မပုရတော [Pg.73] သီဟဠဒီပတော စ သာသနံ အာနေတွာ အရိမဒ္ဒနနဂရေ ပတိဋ္ဌာပေသီတိ. राजा मनोहरि को भी 'म्रंकपा' नामक देश में सेवकों के साथ रखा। कहा जाता है कि उस राजा के मुख खोलकर बात करते समय मुख से प्रकाश प्रज्वलित होकर निकलता था। वह कभी-कभी राजा अनुरुद्ध के पास आकर गौरववश वंदना आदि करता था। तब राजा अनुरुद्ध को रोमांच और उद्वेग उत्पन्न होता था। इसलिए उस राजा के तेज को कम करने के लिए बुद्ध प्रतिमा और चैत्य को भोजन अर्पित कर, उसे लेकर राजा मनोहरि को खिलाया। तब उसका वह प्रभाव लुप्त हो गया। राजा मनोहरि ने संवेग प्राप्त कर यह प्रार्थना की— 'संसार में संसरण करते हुए जब तक मैं निर्वाण प्राप्त न कर लूँ, तब तक दूसरों के वश में न रहूँ।' सुधम्मपुर से लाई गई अपनी 'मनोमय मणि' को एक सेठ के पास बेचकर, प्राप्त पाँच भार चाँदी के मूल्य से, एक बड़ी बुद्ध प्रतिमा 'अभुजित पलंग' (पद्मासन) की मुद्रा में और एक परिनिर्वाण की मुद्रा में—ये दो बुद्ध प्रतिमाएँ बनवाईं। वे आज भी विद्यमान हैं। इस प्रकार राजा अनुरुद्ध ने सुधम्मपुर और सिंहल द्वीप से शासन लाकर अरिमद्दन नगर में प्रतिष्ठित किया। ဣဒံ အမှာကံ မရမ္မမဏ္ဍလေ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌေ အရိမဒ္ဒနနဂရေ यह हमारे म्यांमार मंडल के तम्बदीप राष्ट्र के अरिमद्दन नगर में— အနုရုဒ္ဓရာဇာနံ ပဋိစ္စ စတုတ္ထံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. राजा अनुरुद्ध के आश्रय से शासन की चौथी प्रतिष्ठा है। ဥတ္တရာဇီဝတ္ထေရောပိ သောဏုတ္တရာနံ ဝံသတော သာသနံ ဂဟေတွာ သုဓမ္မပုရတော အရိမဒ္ဒနနဂရံ အာဂန္တွာ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. उत्तरजीव थेर ने भी सोण और उत्तर की परंपरा से शासन ग्रहण कर सुधम्मपुर से अरिमद्दन नगर आकर शासन प्रतिष्ठित किया। ဣဒံ အမှာကံ မရမ္မမဏ္ဍလေ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌေ အရိမဒ္ဒနနဂရေ ဥတ္တရာဇီဝတ္ထေရံ ပဋိစ္စ ပဉ္စမံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह हमारे म्यांमार मंडल के तम्बदीप राष्ट्र के अरिमद्दन नगर में उत्तरजीव थेर के आश्रय से शासन की पाँचवीं प्रतिष्ठा है। ဥတ္တရာဇီဝတ္ထေရဿ သီဟဠဒီပံ ဂတကာလေ တေန သဒ္ဓိံ ဂတံ ဆပ္ပဒံ နာမ သာမဏေရံ သီဟဠဒီပေယေဝ သီဟဠဒီပိကာ ပဗ္ဗဇိံသု. ပဗ္ဗဇိတွာ စ ဆပ္ပဒသာမဏေရော ပရိယတ္တိံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ ဒသဝဿံ တတ္ထ ဝသိတွာ အရိမဒ္ဒနနဂရံ ပစ္စာဂစ္ဆိ. သိဝလိတ္ထေရဉ္စ တာမလိန္ဒတ္ထေရဉ္စ အာနန္ဒတ္ထေရဉ္စ ရာဟုလတ္ထေ ရဉ္စ အနေသိ. တေ ပန ထေရာ တိပိဋကဓရာ ဟောန္တိ ဗျတ္တာ ဒက္ခာ စ. အယဉ္စတ္ထော ဝိတ္ထာရေန ဟေဋ္ဌာ ဝုတ္တော. उत्तरजीव थेर के सिंहल द्वीप जाने के समय उनके साथ गए 'छप्पद' नामक सामणेर को सिंहल द्वीप में ही सिंहल द्वीप की परंपरा के अनुसार प्रव्रजित किया गया। प्रव्रजित होकर छप्पद सामणेर ने पर्यत्ति (शास्त्र) का अध्ययन किया और वहाँ दस वर्ष रहकर अरिमद्दन नगर वापस आए। वे सीवलि थेर, तामलिन्द थेर, आनंद थेर और राहुल थेर को भी साथ लाए। वे थेर त्रिपिटकधारी, विद्वान और दक्ष थे। यह अर्थ विस्तार से पहले कहा जा चुका है। အရိမဒ္ဒနနဂရံ ပတွာ အရိမဒ္ဒန ဝါသီဟိ ဘိက္ခူဟိ သဒ္ဓိံ ဝိနယကမ္မာနိ အကတွာ ပုထု ဟုတွာ နိသီဒိံသု. နရပတိရာဇာ စ တေသု ထေရေသု အတိဝိယ ပသီဒိ. ဧရာဝတီနဒိယံ ဥဠုမ္ပံ ဗန္ဓိတွာ တတ္ထေဝ ဥပသမ္ပဒကမ္မံ ကာရာပေသိ. စိရကာလံ အတိက္ကမိတွာ သော ဂဏော ဝုဍ္ဎိ ဟုတွာ ဥပ္ပဇ္ဇိ. अरिमद्दन नगर पहुँचकर उन्होंने अरिमद्दन के निवासी भिक्षुओं के साथ विनय-कर्म न करते हुए पृथक होकर निवास किया। राजा नरपति उन थेरों पर अत्यंत प्रसन्न हुए। इरावती नदी में बेड़ा बाँधकर वहीं उपसंपदा कर्म करवाया। लंबे समय के बाद वह गण (संप्रदाय) वृद्धिंगत होकर उत्पन्न हुआ। နရပတိရာဇာ စ တေ ထေရေ သဒ္ဓိံ သံဃေန နိမန္တေတွာ မဟာဒါနံ အဒါသိ. တဒါ ဆဏေ အာကပ္ပသမ္ပန္နံ ရူပသောဘဂ္ဂပ္ပက္ကံ ဧကံ နာဋကိတ္တိံ ဒိသွာ ရာဟုလတ္ထေရော ပဋိဗဒ္ဓစိတ္တော လေပေ လဂ္ဂိတဝါနရောဝိယ ကဒ္ဒမေ လဂ္ဂိတမာတင်္ဂေါဝိယ စ ကာမ ဂုဏလေပကဒ္ဒမေသု လဂ္ဂိတော သာသနေ ဝိရမိတွာ ဟီ နာယာဝတ္တီတုံ အာရဘိ. မရဏန္တိ ကရောဂေန အဘိဘူတော ဝိယ [Pg.74] အတေကိစ္ဆော ဟုတွာ သေသတ္ထေရေသု ဩဝါဒံ ဒိန္နေသု ပိနာဒိယိ. တဒါ သေသတ္ထေရာ တံ ဧဝမာဟံသု,-မာ တွံ ဧကံ တံ ပဋိစ္စ သဗ္ဗေပိ အမှေ လဇ္ဇာပေတုံ န အရဟသိ, မာ ဣဓ ဟီနာယာ ဝတ္တေဟိ, မလ္လာရုဒီပံ ဂန္တွာ ယထာရုစိံ ကရောဟီတိ ပေသေသုံ. ရာဟုလတ္ထေရော စ ကုသိမတိတ္ထတော နာဝံ အာရုယှ မလ္လာရုဒီပံ အဂမာသိ. မလ္လာရုဒီပံ ပတ္တကာလေ မလ္လာရုရာဇာ ဝိနယံ ဇာနိတုကာမော သဟ ဋီကာယ ခုဒ္ဒသိက္ခာပကရဏံ တဿ သန္တိကေ ဥဂ္ဂဏှိတွာ ဧကပတ္တမတ္တံ မဏိံ အဒါသိ. သောစ တံ လဘိတွာ ဟီနာယာဝတ္တီတိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ,- राजा नरपति ने उन थेरों को संघ के साथ निमंत्रित कर महादान दिया। तब उत्सव में आचार-संपन्न और रूप-सौंदर्य से युक्त एक नर्तकी को देखकर राहुल थेर का चित्त उस पर आसक्त हो गया; जैसे गोंद में फँसा बंदर या कीचड़ में फँसा हाथी, वैसे ही काम-गुण रूपी लेप और कीचड़ में फँसकर उन्होंने शासन से विरत होकर हीन अवस्था में लौटने का उपक्रम किया। जैसे कोई असाध्य रोग से ग्रस्त हो, वैसे ही अन्य थेरों द्वारा उपदेश दिए जाने पर भी उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। तब अन्य थेरों ने उनसे ऐसा कहा— 'तुम्हें उस एक स्त्री के कारण हम सभी को लज्जित नहीं करना चाहिए; यहाँ हीन अवस्था में न लौटें, मल्लारु द्वीप जाकर अपनी रुचि के अनुसार करें'—ऐसा कहकर उन्हें भेज दिया। राहुल थेर कुसिम तीर्थ से नाव पर चढ़कर मल्लारु द्वीप चले गए। मल्लारु द्वीप पहुँचने पर, मल्लारु राजा ने विनय जानने की इच्छा से उनके पास टीका सहित 'खुद्दसिक्खा' प्रकरण का अध्ययन किया और उन्हें एक पात्र भर मणि दी। उन्होंने उसे प्राप्त कर हीन अवस्था अपना ली। इस विषय में ये गाथाएँ हैं— အတိဒူရေဝ ဟောတဗ္ဗံ, ဘိက္ခုနာ နာမ ဣတ္ထိဘိ; ဣတ္ထိယော နာမ ဘိက္ခူနံ, ဘဝန္တိ ဣဓ ဝေရိနော. भिक्षु को स्त्रियों से बहुत दूर ही रहना चाहिए; क्योंकि इस लोक में स्त्रियाँ भिक्षुओं की वैरी होती हैं। တာဝ တိဋ္ဌန္တု ဒုပ္ပညာ, မယံ ပေါရာဏိကာပိ စ; မဟာပညာ ဝိနာသံ, ပတ္တာ ဟရိတစာဒယော. अल्पबुद्धि वालों की तो बात ही क्या, प्राचीन काल के हरितच आदि महाबुद्धिमान भी विनाश को प्राप्त हुए। တသ္မာ ဟိ ပဏ္ဍိတော ဘိက္ခု, အန္တမသောဝ ဣတ္ထိဘိ; ဝိဿာသံ န ကရေ လောကေ, ရာဂေါ စ ဒုပ္ပဝါရိတောတိ. इसलिए बुद्धिमान भिक्षु को इस लोक में स्त्रियों के साथ कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि राग को रोकना अत्यंत कठिन है। သေသေသု စ ထေရေသု ဆပ္ပဒေါ နာမ ထေရော ပဌမံ ကာလင်္ကတော. သိဝလိတာမလိန္ဒာနန္ဒတ္ထေရာယေဝ တယော ပရိယတ္တိဥဂ္ဂဟဏဓာရဏာဒိဝသေန သာသနံ ဥပတ္ထမ္ဘေတွာ အရိမဒ္ဒနနဂရေ နိသီဒိံသု. ဧကသ္မိဉ္စ ကာလေ ရာဇာ တေသံ တိဏ္ဏံ ထေရာနံ ဧကေကံ ဟတ္ထိံ အဒါသိ. သိဝလိတာမလိန္ဒတ္ထေရာ ပဋိဂ္ဂဟေတွာ ဝနေ ဝိဿဇ္ဇာပေသုံ. အာနန္ဒတ္ထေရော ပန ကိဉ္စိပုရနဂရံ ပဟိဏိတွာ ဉာတကာနံ ဒေဟီတိ ကုသိမတိတ္ထံ ဂန္တွာ နာဝံ အာရောပေသိ. တံ ကာရဏံ ဉတွာ သိဝလိတာမလိန္ဒတ္ထေရာတံ ဧဝမာဟံသု,– မယံ ပန အာဝုသော ဟတ္ထီနံ သုခတ္ထာယ ဝနေ ဝိဿဇ္ဇေမ,တွံ ပန အဓမ္မိကံ ကရောသီတိ. ကိန္နာမ ဘန္တေ ဉာဘကာနံ သင်္ဂဟော န ဝဋ္ဋတိ, နနု ဉာတကာနဉ္စ သင်္ဂဟောတိ ဘဂဝတာ ဝုတ္တန္တိ. शेष स्थविरों में छप्पद नामक स्थविर की पहले मृत्यु हुई। शिवलि, तामलिन्द और आनन्द—इन तीनों स्थविरों ने ही पर्यप्ति (शास्त्र) के उद्ग्रहण और धारण आदि के द्वारा शासन को सहारा देते हुए अरिमर्दन नगर में निवास किया। एक समय राजा ने उन तीनों स्थविरों को एक-एक हाथी दिया। शिवलि और तामलिन्द स्थविरों ने उन्हें स्वीकार कर वन में छुड़वा दिया। किन्तु आनन्द स्थविर ने किञ्चिपुर नगर भेजकर "अपने सम्बन्धियों को दे दो" ऐसा कहकर कुसिमतीर्थ जाकर उन्हें नाव पर चढ़ा दिया। उस बात को जानकर शिवलि और तामलिन्द स्थविरों ने उनसे ऐसा कहा— "आयुष्मन्! हम तो हाथियों के सुख के लिए उन्हें वन में छोड़ते हैं, किन्तु तुम अधार्मिक कार्य कर रहे हो।" (आनन्द स्थविर ने कहा) "भन्ते! क्या सम्बन्धियों की सहायता करना उचित नहीं है? क्या भगवान ने ज्ञाति-संग्रह के बारे में नहीं कहा है?" ထေရာ [Pg.75] အာဟံသု,-သစေ တွံ အမှာကံ ဝစနံ နကရေယျာသိ,ဘဝ ဣစ္ဆာနုရူပံ ကရောဟိ, မယံ ပန တယာ သဒ္ဓိံ သံဝါသံ န ကရိဿာမာတိ ဝိသုံ နိသီဒိံသု. स्थविरों ने कहा— "यदि तुम हमारी बात नहीं मानोगे, तो अपनी इच्छानुसार करो, किन्तु हम तुम्हारे साथ संवास नहीं करेंगे।" ऐसा कहकर वे अलग रहने लगे। တတော ပဋ္ဌာယ ဒွေ ဂဏာ ဘိဇ္ဇိံသု. တတော ပစ္ဆာကာလေ အတိက္ကန္တေ တာမလိန္ဒတ္ထေရော ဗဟုဿုတာနံ ဗျတ္တိဗလာနံ သိဿာနံ အနုဂ္ဂဟတ္ထာယ ဂဟဋ္ဌာနံ သန္တိကေ အယံ ဗဟုဿုတော အယံ မဟာပညောတိ ဧဝမာဒိနာ ဝစီဝိညတ္တိံ သမုဋ္ဌာပေတိ, ဧဝံ ကတေ ကုလပုတ္တာ သုလဘပစ္စယဝသေန သာသနဿ ဟိတံ အာဝဟိဘုံသက္ခိဿန္တီတိ ကတွာ. တံ ကာရဏံ သုတွာ သိဝလိတ္ထေရော ဧဝမာဟ,- ကသ္မာ တွံ ဝစီဝိညတ္တိံ သမုဋ္ဌာပေတွာ ဗုဒ္ဓပ္ပဋိကုစ္ဆိတံ ကမ္မံ ကရောသီတိ. ဘဂဝတာ အတ္တနော အတ္ထာယယေဝ ဝစီဝိညတ္တိံ ပဋိက္ခိတ္တာ, အဟံ ပန ပရေသံယေဝ အတ္ထာယ ဝစီဝိညတ္တိံသမုဋ္ဌာပေမိ, နာတ္တနော အတ္ထာယ, သာသနဿ ဟိ ဝေပုလ္လတ္ထာယ ဧဝံ ဝစီဝိညတ္တိံသမုဋ္ဌာပေမိ. သိဝလိတ္ထေရောပိ န တွံ မမ ဝစနံ ကရောသိ, ယံ ယံ တွံ ဣစ္ဆသိ, တံ တံ ကရောဟိ, အဟံ ပန တယာ သဒ္ဓိံ သံဝါသံ နကရိဿာမီတိ ဝိသုံ ဟုတွာ သဒ္ဓိံ သကပက္ခေန နိသီဒိ. တတော ပဋ္ဌာယ တယော ဂဏာ ဘိဇ္ဇိံသု. तब से दो गण विभाजित हो गए। उसके बाद कुछ समय बीतने पर, तामलिन्द स्थविर ने बहुश्रुत और विद्वान शिष्यों के अनुग्रह के लिए गृहस्थों के पास "यह बहुश्रुत है, यह महाप्रज्ञावान है" आदि कहकर वचिविज्ञप्ति आरम्भ की, यह सोचकर कि ऐसा करने से कुलपुत्र सुलभ प्रत्ययों के कारण शासन का हित करने में समर्थ होंगे। उस बात को सुनकर शिवलि स्थविर ने ऐसा कहा— "तुम क्यों वचिविज्ञप्ति आरम्भ कर बुद्ध द्वारा निषिद्ध कर्म कर रहे हो?" (तामलिन्द ने कहा) "भगवान ने अपने स्वयं के लाभ के लिए वचिविज्ञप्ति का निषेध किया है, किन्तु मैं दूसरों के लाभ के लिए वचिविज्ञप्ति कर रहा हूँ, अपने लिए नहीं; शासन की वृद्धि के लिए मैं ऐसा कर रहा हूँ।" शिवलि स्थविर ने भी कहा— "तुम मेरी बात नहीं मान रहे हो, जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो, किन्तु मैं तुम्हारे साथ संवास नहीं करूँगा।" ऐसा कहकर वे अपने पक्ष के साथ अलग हो गए। तब से तीन गण विभाजित हो गए। ဧဝံ အရိမဒ္ဒနနဂရေ အရဟန္တတ္ထေရဿ ဧကော ဝံသော, သိဝလိတ္ထေရဿ ဧကော, တာမလိန္ဒတ္ထေရဿ ဧကော, အာနန္ဒတ္ထေရဿ ဧကောတိ စတ္တာရော ဂဏာ အဟေသုံ. इस प्रकार अरिमर्दन नगर में अरहन्त स्थविर का एक वंश, शिवलि स्थविर का एक, तामलिन्द स्थविर का एक और आनन्द स्थविर का एक—ऐसे चार गण हो गए। တေသု အရဟန္တတ္ထေရဂဏော သုဓမ္မပုရတော ပဌမံ အာဂတတ္တာ ပုရိမဂဏောတိ ဝေါဟာရိယတိ, အညေ ပန ပစ္ဆာ အာဂတတ္တာ ပစ္ဆာဂဏာတိ. उनमें से अरहन्त स्थविर का गण सुधम्मपुर से पहले आने के कारण 'पुरिम गण' (पूर्व गण) कहलाता है, और अन्य बाद में आने के कारण 'पच्छा गण' (पश्चात गण) कहलाते हैं। သိဝလိတ္ထေရော အရိမဒ္ဒနနဂရေ ယာဝီဇီဝံ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိတွာ ကလိယုဂေ နဝုတာဓိကေ ပဉ္စဝဿသတေ ကာလေ ကာလမကာသိ. शिवलि स्थविर ने अरिमर्दन नगर में जीवन भर शासन की सेवा की और कलियुग के पाँच सौ नब्बे (590) वर्ष बीतने पर उनका देहान्त हुआ। အာနန္ဒတ္ထေရော ပန အရိမဒ္ဒနနဂရေယေဝ စတုစတ္တာလီသ ဝဿာနိ [Pg.76] သာသနံ ပဂ္ဂဏှိတွာ ဆနဝုတာဓိကေ ပဉ္စဝဿသတေ ကာလေ ကာလမကာသိ. आनन्द स्थविर ने अरिमर्दन नगर में ही चौवालीस वर्षों तक शासन की सेवा की और पाँच सौ छियानवे (596) वर्ष बीतने पर उनका देहान्त हुआ। တာမလိန္ဒတ္ထေရောပိ ယာဝဇီဝံ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိတွာ အဋ္ဌန ဝုတာဓိကေ ပဉ္စဝဿသတေ ကာလေ ကာလမကာသီတိ. အဟော သင်္ခါရသဘာဝေါတိ. तामलिन्द स्थविर ने भी जीवन भर शासन की सेवा की और पाँच सौ अट्ठानवे (598) वर्ष बीतने पर उनका देहान्त हुआ। अहो! संस्कारों का स्वभाव ऐसा ही है। သေယျထာဇဂရဿေဝ, နာဘိယာ စက္ကမဏ္ဍလေ; လဂ္ဂေါ သသော သမိတွာပိ, ဒိသံ ဂစ္ဆတိ တံ မုခံ. जैसे अजगर के मुख के समान, चक्र के नाभि मण्डल में फँसा हुआ खरगोश शान्त होने पर भी उसी मुख की दिशा में जाता है। တထေဝ သဗ္ဗသတ္တာပိ, မစ္စုစက္ကေသု လဂ္ဂိတာ; ယာဝဇီဝမ္ပိ ဓာဝိတွာ, မစ္စုမုခံ ဥပါဂမုန္တိ. वैसे ही सभी प्राणी भी मृत्यु-चक्र में फँसे हुए हैं; वे जीवन भर दौड़कर भी अन्ततः मृत्यु के मुख में ही समा जाते हैं। ဣစ္စေဝံ အရိမဒ္ဒနပုရေ အရဟန္တေဟိ စ ဂန္ထကာရေဟိ စ ပုထုဇ္ဇနေဟိ ဇိနသာသနံ နဘေ စန္ဒောဝိယ ဝိဇ္ဇောတတိ. इस प्रकार अरिमर्दनपुर में अरहन्तों, ग्रन्थकारों और पृथग्जनों द्वारा जिन-शासन आकाश में चन्द्रमा के समान प्रकाशित होता है। တတ္ထ ဟိ ယဒါ အနုရုဒ္ဓရာဇာ သုဓမ္မပုရတော သာသနံ အာနေသိ, တဒါ အရဟန္တာ ဆသတသဟဿမတ္တာ အာဂတာ, သောတာပန္နသကဒါဂါမိအနာဂါမိနော ပန ဂဏနပထံ ဝီတိ ဝတ္တာတိ. वहाँ जब राजा अनुरुद्ध सुधम्मपुर से शासन को लाए, तब लगभग छह लाख अरहन्त आए थे, और स्रोतापन्न, सकृदागामी तथा अनागामी तो गणना से परे थे। ဆတ္တဂုဟိန္ဒဿ နာမ ရညော ကာလေပိ ဟိမဝန္တေ ဂန္ဓမာဒနပဗ္ဗတတော အဋ္ဌ အရဟန္တာ ပိဏ္ဍာယ ရာဇဂေဟံ အာဂမံသု. ရာဇာ စ ပတ္တံ ဂဟေတွာ ပိဏ္ဍပါတေန ဘောဇေတွာ ဣဒါနိ ကုတော အာဂတတ္ထာဘိ ပုစ္ဆိ. ဟိမဝန္တေ မဟာရာဇ ဂန္ဓ မာဒနပဗ္ဗတတောတိ. အထ ရာဇာ အတိပ္ပသန္နော ဟုတွာ ဣဓ တေမာသံ ဝဿံ ဥပဂစ္ဆထာတိ ယာစိတွာ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ အဒါသိ. တေမာသမ္ပိ အန္တောဂေဟေ နိမန္တေတွာ ပိဏ္ဍပါတေန ဘောဇေသိ. छत्तगुहिन्द नामक राजा के समय में भी हिमवन्त के गन्धमादन पर्वत से आठ अरहन्त भिक्षा के लिए राजभवन आए। राजा ने पात्र लेकर उन्हें पिण्डपात से भोजन कराया और पूछा— "आप अभी कहाँ से आए हैं?" (उन्होंने कहा) "महाराज! हिमवन्त के गन्धमादन पर्वत से।" तब राजा ने अत्यन्त प्रसन्न होकर प्रार्थना की— "यहाँ तीन महीने वर्षावास व्यतीत करें" और उनके लिए विहार बनवाकर दिया। तीन महीने तक उन्हें अन्तःपुर में निमन्त्रित कर पिण्डपात से भोजन कराया। ဧကံ သမယံ အရဟန္တာနံ ဂန္ဓမာဒနပဗ္ဗတေ နန္ဒမူလဂုဟံ ဝိယ ဧကံ ဂုဟံ မာပေတွာ ဒဿေဟီတိ ယာစိ. တေ စ အရဟန္တာ နန္ဒမူလဂုဟံဝိယ ဧကံ ဂုဟံ ဣဒ္ဓိယာ မာပေတွာ ဒဿေသုံ[Pg.77]. ရာဇာ စ တာယ ဂုဟာယ သဒိသံ ဧကံ ဂုဟံ ကာရာပေသိ. နန္ဒမူလဂုဟာကာရေန ပန ကတတ္တာ နန္ဒာတိ နာမမ္ပိ အကာသိ. ဣစ္စေဝံ ဆတ္တဂုဟိန္ဒဿ ရညော ကာလေ ဂန္ဓမာဒနပဗ္ဗတေ နန္ဒမူလဂုဟတော အာဂန္တွာ အရဟန္တာ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသုံ. एक समय उसने अरहन्तों से प्रार्थना की— "गन्धमादन पर्वत की नन्दमूल गुफा के समान एक गुफा का निर्माण कर दिखाएँ।" उन अरहन्तों ने ऋद्धि से नन्दमूल गुफा के समान एक गुफा का निर्माण कर दिखाया। राजा ने उस गुफा के सदृश एक गुफा बनवाई। नन्दमूल गुफा के आकार में बनी होने के कारण उसका नाम 'नन्दा' रखा। इस प्रकार राजा छत्तगुहिन्द के समय में गन्धमादन पर्वत की नन्दमूल गुफा से आकर अरहन्तों ने शासन की प्रतिष्ठा की। အရဟန္တဘာဝေါ စ နာမေသ ယထာဘူတံ ဇာနိတုံ ဒုက္ကရော, အနုပသမ္ပန္နာနံ ဥတ္တရိမနုဿဓမ္မဒဿနဿ ပဋိက္ခိတ္တတ္တာ, အရဟတ္တံ ဝါ ပတွာပိ ဝါသနာယ အပ္ပဇဟိတတ္တာ. အရဟာပိ ဟိ သမာနော အဟံ အရဟာတိ အနုပသမ္ပန္နာနံ ကထေတုံ န ဝဋ္ဋတိ, အရဟတ္တံ ပတွာပိ ဧကစ္စော ဝါသနံ ပဇဟိတုံ န သက္ကာ, ပိလိန္ဒဝစ္ဆတ္ထေရဝတ္ထုစေတ္ထ ဉာပကံ. ဧဝံ လောကေ အရဟန္တ ဘာဝေါ ဇာနိတုံ ဒုက္ကရော. တေနေဝ မဟာကဿပတ္ထေရဿ ဥပဋ္ဌာကော ဧကော ဘိက္ခု အတ္တနော ဥပဇ္ဈာယဿ မဟာကဿပတ္ထေရဿ သန္တိကေ ဝသိတွာပိ တဿ အရဟန္တ ဘာဝံ န ဇာနိ. अरहन्त-भाव को यथार्थ रूप में जानना कठिन है, क्योंकि अनुपसम्पन्नों को उत्तर-मनुष्य धर्म का प्रदर्शन करना निषिद्ध होने के कारण, और अरहन्त पद प्राप्त करने पर भी वासना का त्याग न होने के कारण भी। अरहन्त होने पर भी "मैं अरहन्त हूँ" ऐसा अनुपसम्पन्नों से कहना उचित नहीं है, और अरहन्त पद प्राप्त करने पर भी कोई-कोई अपनी वासना को छोड़ने में समर्थ नहीं होता, इसमें पिलिन्दवच्छ स्थविर की कथा प्रमाण है। इस प्रकार लोक में अरहन्त-भाव को जानना कठिन है। इसीलिए महाकाश्यप स्थविर का उपस्थाक एक भिक्षु अपने उपाध्याय महाकाश्यप स्थविर के पास रहकर भी उनके अरहन्त-भाव को नहीं जान सका। မဟာကဿပတ္ထေရဉှိ ဧကေန သဒ္ဓိဝိဟာရိကေန သဒ္ဓိံ အရညဝိဟာရတော ဂါမံ ပိဏ္ဍာယ စရန္တံ အန္တရာမဂ္ဂေ ပတ္တာ ဒိပရိက္ခာရေ ဂဟေတွာ ပစ္ဆာ ဂစ္ဆန္တောယေဝ ဧကောသဒ္ဓိ ဝိဟာရိကော ဧဝမာဟ,–လောကသ္မိံ ဘန္တေ အရဟာ အရဟာတိ ပါကဋော, သုတမတ္တောဝါဟံ ဘဝါမိ, န ကဒါစိ ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗောတိ. တံ သုတွာ ထေရော ပစ္ဆာ ပရိဝတ္တတွာ ဩလောကေန္တော ပရိက္ခာရေ အာဝုသော ဂဟေတွာ အရဟန္တဿ ပစ္ဆာဂစ္ဆန္တောယေဝ အရဟန္တဘာဝံ န ဇာနာတီတိ အာဟာတိ. महाकस्सप स्थविर अपने एक सद्धिविहारिक के साथ अरण्य-विहार से गाँव में पिण्डपात के लिए जा रहे थे। मार्ग में पात्र और परिष्कारों को लेकर पीछे चलते हुए उस सद्धिविहारिक ने ऐसा कहा— 'भन्ते! लोक में अर्हत्, अर्हत् ऐसा प्रसिद्ध है, मैं केवल सुनने वाला ही हूँ, पहले कभी देखा नहीं है।' उसे सुनकर स्थविर ने पीछे मुड़कर देखते हुए कहा— 'आयुष्मन्! परिष्कारों को लेकर अर्हत् के पीछे चलते हुए भी तुम अर्हत्-भाव को नहीं जानते हो।' အရိမဒ္ဒနနဂရေပိ သီလဗုဒ္ဓိပေါလ္လောင်္ကသုမေဓတ္ထေရာဒယောပိ အရဟန္တာယေဝ အဟေသုံ. နရပတိရာဇာ ဟိ ခဏိတ္တိ ပါဒပဗ္ဗတံ ဂန္တွာ ပစ္စာဂမနကာလေ အန္တရာမဂ္ဂေ ဧကိဿာ မာတိကာယ မဏောဘာသံ ဒိသွာ ဣဓ ပုညံ ကာရေတုကာမော သက္ကော ဒဿေတိ မညေတိ မနသိကရိတွာ စေတိယံ ကာရာပေဿာမီတိ [Pg.78] တတ္ထ ရဋ္ဌဝါသီတိ သမံ ဘူမိဘာဂံ ကာရာပေသိ. अरिमद्दन नगर में भी शीलबुद्धि, पोल्लोङ्क और सुमेध स्थविर आदि अर्हत् ही थे। राजा नरपति खानित्ति पादपर्वत पर जाकर लौटते समय मार्ग में एक नहर में मणि के समान प्रकाश देखकर, 'यहाँ पुण्य कराने की इच्छा से शक्र संकेत दिखा रहे हैं' ऐसा मन में विचार कर, 'मैं यहाँ चैत्य बनवाऊँगा' ऐसा सोचकर वहाँ के निवासियों से भूमि को समतल करवाया। အထ ဧကော သီလဗုဒ္ဓိ နာမ ထေရော ဧဝမာဟ,– ပုညံ မဟာရာဇ ကရိဿမီတိ ဣဒံ ဘူမိပရိကမ္မံ ကာရာပေသိ, ဧဝံ ကာရာပေန္တဿ တေ အပုညံယေဝ ဘဝတိ, နောပုညန္တိ ဝတွာ ဗဟူ သတ္တာ မာ ကိလမန္တူတိ မနသိကတွာ ရညော ဒဏ္ဍကမ္မေန တဇ္ဇနတ္ထာယ ရညာ ဒိန္နံ ပိဏ္ဍပါတံ နဘုဉ္ဇိ. ရာဇာ စ သစေ တွံ မယာ ဒိန္နံ ပိဏ္ဍပါတံ အဘုဉ္ဇိတုကာမော ဘဝေယျာသိ, မမ ဝိဇိတေ ဝသန္တောယေဝ တွံ မမ ပိဏ္ဍပါတာ န မုစ္စေယျာသိ, ရဋ္ဌဝါသီဟိပိ ဒိန္နပိဏ္ဍပါတော မယှမေဝ သန္တကော, နနု နာမ မမ ပိဏ္ဍပါတံယေဝ တွံ ဘုဉ္ဇသီတိ အာဟ. तब शीलबुद्धि नामक एक स्थविर ने ऐसा कहा— 'महाराज! पुण्य करूँगा ऐसा सोचकर आपने यह भूमि-परिकर्म करवाया है, किन्तु इस प्रकार करवाने से आपको अपुण्य ही होता है, पुण्य नहीं।' ऐसा कहकर, 'बहुत से प्राणी कष्ट न पायें' यह मन में रखकर, राजा के दण्ड-कर्म से उन्हें रोकने के लिए राजा द्वारा दिए गए पिण्डपात को ग्रहण नहीं किया। राजा ने कहा— 'यदि आप मेरे द्वारा दिए गए पिण्डपात को नहीं खाना चाहते, तो मेरे राज्य में रहते हुए आप मेरे पिण्डपात से मुक्त नहीं हो सकते; राष्ट्रवासियों द्वारा दिया गया पिण्डपात भी मेरा ही है, क्या आप मेरा ही पिण्डपात नहीं खाते हैं?' သီလဗုဒ္ဓိတ္ထေရောပိ သစေ အဟံ ဧဝံ ဘဝေယျာမိ, သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ ဝသိဿာမီတိ စိန္တေတွာ အရညေ ဝသိ. शीलुबुद्धि स्थविर ने भी 'यदि ऐसा है, तो मैं सिंहलद्वीप जाकर रहूँगा' ऐसा सोचकर अरण्य में निवास किया। အထ တမတ္ထံ ဇာနိတွာ နဂရဒွါရေ အာရက္ခော ဧကော ယက္ခော ရညော အာဂတကာလေ အဘိမုခံ ဌိတောဝ ဘယာနကရူပံ နိသီဒိ. အထ နာနာဝိဇ္ဇာကမ္မေဟိ အပနေန္တောပိ န သက္ကာ အပနေတုံ. तब उस बात को जानकर नगर-द्वार का रक्षक एक यक्ष, राजा के आने के समय सामने खड़ा होकर भयानक रूप धारण कर बैठ गया। तब अनेक विद्या-कर्मों से हटाने पर भी उसे हटाया नहीं जा सका। အထ ရာဇာ နိမိတ္တပါဌကေ ပက္ကောသာပေတွာ ပုစ္ဆိ,-ကေန ကာရဏေန အယံ ယက္ခော ဣဓ နိသိန္နောတိ. တွံ မဟာရာဇ သီလဗုဒ္ဓိတ္ထေရံ အဂါရဝဝသေန ပုဗ္ဗေ ကထေသိ, ယက္ခာပိ ထေရေ အတိဝိယ ပသန္နာတိ အမှေဟိ သုတပုဗ္ဗာ, တံ ပဋိစ္စ ယက္ခော ဘယာနကရူပံ ဒဿေတွာ နိသိန္နော ဘဝိဿတီတိ အာဟ. तब राजा ने निमित्त-पाठकों को बुलाकर पूछा— 'किस कारण से यह यक्ष यहाँ बैठा है?' उन्होंने कहा— 'महाराज! आपने पहले शीलबुद्धि स्थविर के प्रति अनादर भाव से बात की थी; यक्ष भी स्थविरों के प्रति अत्यन्त श्रद्धालु होते हैं, ऐसा हमने पहले सुना है; उसी के कारण यक्ष भयानक रूप दिखाकर बैठा होगा।' ရာဇာပိ အမစ္စေ အာဏာပေသိ ထေရံ ပက္ကာသထာတိ. ထေရော နာဂစ္ဆိ. သီဟဠဒီပံယေဝ ဂမိဿာမီတိ အာရဘိ. တမတ္ထံ သုတွာ ရာဇာ ဧကံ စတုရင်္ဂပစ္စယံ နာမ အမစ္စံ ပက္ကောသာပေတွာ တွံ ဂန္တွာ ထေရံ ပက္ကောသာဟီတိ ပေသေသိ. စတုရင်္ဂပစ္စယော စ ဆေကတာယ ဧကံ သုဝဏ္ဏမယံ ဗုဒ္ဓပ္ပဋိဗိမ္ဗံ နာဝါယ ဌပေတွာ မဟာသမုဒ္ဒတိတ္ထံ အဂမာသိ. အထ ထေရံ သမ္ပာပုဏိတွာ [Pg.79] ဣဒါနိ ဣဓ ဘဂဝါ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓေါ အဂမာသိ, သီလဗုဒ္ဓိတ္ထေရော ဘဂဝတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဒဿနတ္ထာယ အာဂစ္ဆတူတိ ဒူတံ ပေသေသိ. ထေရောပိ ဘဂဝတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဒဿနတ္ထာယ အာဂစ္ဆတူတိ ဝစနံ ပဋိက္ခိပိတုံ ဗုဒ္ဓဂါရဝဝသေန အဝိသဟတာယ အာဂစ္ဆီတိ. राजा ने भी अमात्यों को आज्ञा दी— 'स्थविर को बुलाओ।' स्थविर नहीं आए। उन्होंने सिंहलद्वीप जाने का ही उपक्रम किया। उस बात को सुनकर राजा ने चतुरङ्गपच्चय नामक एक अमात्य को बुलाकर भेजा कि 'तुम जाकर स्थविर को बुला लाओ।' चतुरङ्गपच्चय ने चतुराई से एक स्वर्णमयी बुद्ध-प्रतिमा को नौका में रखकर महासमुद्र के तट पर गया। तब स्थविर के पास पहुँचकर दूत भेजा कि 'इस समय यहाँ भगवान् सम्यक्सम्बुद्ध आए हैं, शीलबुद्धि स्थविर भगवान् सम्यक्सम्बुद्ध के दर्शन के लिए आएँ।' स्थविर भी बुद्ध के प्रति गौरव होने के कारण 'भगवान् सम्यक्सम्बुद्ध के दर्शन के लिए आएँ' इस वचन को टालने में असमर्थ होकर आए। ပေါရာဏိကာနံဝ ထေရာနံ, ဗုဒ္ဓေ သဂါရဝံ ဣဓ; ပဏ္ဍိတော ဂါရဝံ ဗုဒ္ဓေ, ကရေ ပသန္နစေတသာတိ. 'जैसे प्राचीन स्थविरों का बुद्ध के प्रति यहाँ गौरव था, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति को प्रसन्न चित्त से बुद्ध के प्रति गौरव करना चाहिए।' နာဝံ အဘိရူဟိတွာ ထေရော ဘဂဝတော သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဝန္ဒနာမာနပူဇာသက္ကာရဒီနိ အကာသိ. ထေရဿ ဧဝံ ဝန္ဒနာမာနပူဇာသက္ကာရာဒီနိ ကရောန္တဿေဝ ဝေဂေန နာဝံ အာနေတွာ ဂစ္ဆိ. အထ စတုရင်္ဂပစ္စယော ဧဝမာဟ,– ဣဒါနိ ဘန္တေ တုမှာကံ အာစရိယဿ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိတုံ ယုတ္တောတိ. ရာဇာ စ အမစ္စေဟိ ပရိဝါရိတော ပစ္စုဂ္ဂစ္ဆိ. နာဝါယ ထေရဿ ဟတ္ထေ ဂဟေတွာ ရာဇဂေဟံ အာနေသိ. ဒွါရံ ပတ္တကာလေ ယက္ခော ပထဝိယံ နိသီဒိတွာ ထေရံ ဝန္ဒိ. नौका पर चढ़कर स्थविर ने भगवान् सम्यक्सम्बुद्ध की वन्दना, मान, पूजा और सत्कार आदि किया। स्थविर के इस प्रकार वन्दना-पूजा आदि करते समय ही वह वेग से नौका को ले आया। तब चतुरङ्गपच्चय ने ऐसा कहा— 'भन्ते! अब आपको अपने आचार्य सम्यक्सम्बुद्ध के शासन को उन्नत करना उचित है।' राजा भी अमात्यों के साथ अगवानी के लिए आया। नौका पर स्थविर का हाथ पकड़कर राजभवन ले आया। द्वार पर पहुँचने के समय यक्ष ने पृथ्वी पर बैठकर स्थविर की वन्दना की। ရာဇာ ရာဇဂေဟံ ပတွာ ထေရံ နာနာဘောဇနေဟိ ဘောဇေသိ. ဧဝဉ္စ အဝေါစ,–အဇ္ဇတဂ္ဂေ ဘန္တေ တွမသိ မမာစရိယော, ဘဂဝတောဝ ဩဝါဒံ သိရသာ ပဋိဂ္ဂဟေတွာ အနုဝတ္တိဿာမာတိ အတ္တနော ပဉ္စပုတ္တေပိ ထေရဿ အဒါသိ. တေ စ ပဉ္စကုမာရာ ထေရေန သဒ္ဓိံ အနုဝတ္တိံသု. ထေရော တေ ပက္ကောသေတွာ ဝိဟာရံ အဂမာသိ. အန္တရာမဂ္ဂေ ကပ္ပိယပထဝိယံ ပဉ္စ ပရိမဏ္ဍလာကာရာနိ လိခိတွာ တေသံ ရာဇကုမာရာနံ ဒဿေတွာ နိဝတ္တာပေသိ. ရာဇကုမာရာ ပဋိနိဝတ္တိတွာ တံ ကာရဏံ ရညော အာရောစေသုံ. ရာဇာ စ တုမှာကံ ပုညံ ကာရာပနတ္ထာယ ဒဿေတီတိ ဝတွာ တုလာဝသေန တေဟိ ရာဇကုမာရေဟိ သုဝဏ္ဏံ သမံ ကတွာ တေန သုဝဏ္ဏေန မူလံ ကတွာ ဘဂဝတော ဓရမာနကာလေ [Pg.80] ပဿေနဒိကောသလရညာ ကာရာပိတံ စန္ဒနပ္ပဋိဗိမ္ဗံဝိယ ဝိသုံ ဝိသုံ ပဋိဗိမ္ဗံ ကာရာပေသိ. राजा ने राजभवन पहुँचकर स्थविर को अनेक प्रकार के भोजनों से तृप्त किया। और ऐसा कहा— 'भन्ते! आज से आप मेरे आचार्य हैं, भगवान् के ही उपदेश को शिरोधार्य कर अनुवर्तन करूँगा।' ऐसा कहकर अपने पाँच पुत्रों को भी स्थविर को दे दिया। वे पाँचों कुमार स्थविर के साथ रहने लगे। स्थविर उन्हें बुलाकर विहार गए। मार्ग में कप्पिय-भूमि पर पाँच मण्डलाकार वृत्त खींचकर उन राजकुमारों को दिखाकर वापस भेज दिया। राजकुमारों ने लौटकर वह बात राजा को बताई। राजा ने कहा— 'वे तुम्हारे पुण्य कराने के लिए ऐसा दिखा रहे हैं।' राजा ने उन राजकुमारों के भार के बराबर स्वर्ण तुलवाकर, उस स्वर्ण से मूल्य चुकाकर, भगवान् के जीवित काल में राजा प्रसेनजित कोसल द्वारा बनवाई गई चन्दन-प्रतिमा के समान अलग-अलग प्रतिमाएँ बनवाईं। တေသံ နိဓာနဋ္ဌာနဘူတာနိ ပဉ္စ စေတိယာနိပိ သက္ကော ကမ္မ ဝိဓာယကော ဟုတွာ ပတိဋ္ဌာပေသိ. ဧတ္ထ စ ပုဗ္ဗေ ရညာ ပသီဒိတွာ ထေရဿ ရာဇကုမာရာ ဒိန္နာ, မူလံ ရတနတ္တယဿ ဒတွာ ပုန ရာဇကုမာရေ ဘူဇိဿေ ကာရေတုကာမတာယ ထေရော ဧဝံ သညံ အဒါသီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. उनके निधान-स्थान स्वरूप पाँच चैत्यों को भी शक्र ने स्वयं व्यवस्थापक बनकर प्रतिष्ठित किया। यहाँ यह समझना चाहिए कि पहले राजा ने प्रसन्न होकर स्थविर को राजकुमार दिए थे, रत्नत्रय को मूल्य देकर पुनः राजकुमारों को स्वतंत्र कराने की इच्छा से स्थविर ने ऐसा संकेत दिया था। သော စ သီလဗုဒ္ဓိတ္ထေရော အရဟန္တဂဏဝံသောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. उन शीलबुद्धि स्थविर को अर्हत्-गणों के वंश का समझना चाहिए। အရိမဒ္ဒနနဂရေယေဝ နရပတိ ရညော ကာလေ ကဿပေါ နာမ ထေရော ဒေသစာရိကံ စရမာနော ပေါလ္လောင်္ကနာမကံ ဒေသံ, တဒဝသရိ. အထ ဒွေ မဟလ္လကပေါလ္လောင်္ကာ မနုဿာ ထေရေ အတိပ္ပသန္နတာယ ဒွေ ပုတ္တေ ဥပဋ္ဌာကတ္ထာယ နိယျာဒေသုံ. अरिमद्दन नगर में ही नरपति राजा के काल में कस्सप नामक स्थविर देश-चारिका करते हुए पोल्लोंक नामक देश में पहुँचे। तब दो वृद्ध पोल्लोंक मनुष्यों ने स्थविर के प्रति अत्यधिक प्रसन्नता के कारण अपने दो पुत्रों को उनकी सेवा के लिए समर्पित कर दिया। ပေါလ္လောင်္ကမနုဿာနံ အတိပ္ပသန္နတံ ပဋိစ္စ ထေရောပိ ပေါလ္လောင်္ကတ္ထေရောတိ ဝေါဟာရိယတိ. ယဒါ စ ပန သော ထေရော သီဟဠဒီပံ ဂန္တုကာမော အဟောသိ, တဒါ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော ဗျဂ္ဃရူပံ မာပေတွာ ပိဋ္ဌိယာ ယာဝ မဟာသမုဒ္ဒတီရံ အာနေသိ. မဟာသမုဒ္ဒတီရံ ပန ပတွာ နာဝံ အဘိရူဟိတွာ ဝါဏိဇေဟိ သဒ္ဓိံ တရိ. पोल्लोंक के मनुष्यों की अत्यधिक प्रसन्नता (श्रद्धा) के कारण स्थविर को भी 'पोल्लोंक स्थविर' कहा जाने लगा। और जब वह स्थविर सिंहल द्वीप जाने के इच्छुक हुए, तब देवराज शक्र ने व्याघ्र (बाघ) का रूप धारण कर उन्हें अपनी पीठ पर बैठाकर महासमुद्र के तट तक पहुँचाया। महासमुद्र के तट पर पहुँचकर, वे नाव पर सवार होकर व्यापारियों के साथ (समुद्र) पार कर गए। မဟာသမုဒ္ဒမဇ္ဈေ ပန ပတွာ သာ နာဝါ န ဂစ္ဆိ, နိစ္စလာဝ အဋ္ဌာသိ. အထ ဝါဏိဇာ မန္တေသုံ,-အမှာကံ နာဝါယ အလက္ခီ ပါပဇနော အတ္ထိ မညေတိ. ဧဝံ ပန မန္တေတွာ သလာကာဒါနံ အကံသု. ယာဝ တတိယမ္ပိ ထေရဿေဝ ဟတ္ထေ သလာကာ ပုဗ္ဗေ ကတကမ္မဝိပါကဝသေန နိပတိ. ဣဒံ ပန ထေရဿ ပုဗ္ဗေ ကတကမ္မံ,-ထေရော ဟိ တတော အတ္တဘာဝတော သတ္တမေ ဘဝေ ဧကသ္မိံ ဂါမေ ကုလဒါရကော ဟုတွာ ကီဠနတ္ထာယ ဧကံ သုနခံ နဒိယံ ဩတာရေတွာ ဥဒကေ ကီဠမာပေသိ. ဧဝံ ကီဠမန္တံ သုနခံ သယမေဝ ဥရေန ဥဂ္ဂဟေတွာ တီရံ အာနေသီတိ ဧဝံ [Pg.81] ပုဗ္ဗေ ကတကမ္မဝိပါကဝသေန ထေရဿေဝ ဟတ္ထေ သလာကာ နိပတိ. महासमुद्र के बीच में पहुँचकर वह नाव आगे नहीं बढ़ी, बल्कि निश्चल खड़ी हो गई। तब व्यापारियों ने विचार किया—"लगता है हमारी नाव में कोई अभागा पापी व्यक्ति है।" ऐसा विचार कर उन्होंने शलाका (पर्ची) डाली। पूर्व में किए गए कर्म के विपाक के कारण तीसरी बार भी स्थविर के हाथ में ही शलाका गिरी। स्थविर का पूर्वकृत कर्म यह था—स्थविर उस जन्म से सातवें जन्म पहले एक गाँव में कुल-पुत्र थे और उन्होंने खेलने के लिए एक कुत्ते को नदी में उतारकर पानी में खिलाया था। इस प्रकार खेलते हुए कुत्ते को स्वयं अपनी छाती से पकड़कर वे तट पर ले आए थे—इस प्रकार पूर्वकृत कर्म के विपाक के कारण स्थविर के हाथ में ही शलाका गिरी। တဒါ ဝါဏိဇာ ဥဒကပိဋ္ဌေ ခိပိံသု. အထ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော ကုမ္ဘီလရူပံ မာပေတွာ ပိဋ္ဌိယံ အာရောပေတွာ အာနေသိ. ထေရော ယက္ခဒီပံ ပတွာ အန္ဓစက္ခုကာနံ ယက္ခာနံ မေတ္တာနုဘာဝေန စက္ခုံ လဘာပေသိ. ယက္ခာ စ ထေရဿ ဂုဏံ ဉတွာ ဒွေ ယက္ခဘာတိကေ အဒံသု. ထေရော စ သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ မဟာစေတိယရူပံ လောဟပါသာဒရူပံ သရီရဓာတုံ မဟာဗောဓိဗိဇာနိ စ အာနေတွာ ပစ္စာဂမာသီတိ. तब व्यापारियों ने उन्हें जल के ऊपर फेंक दिया। तब देवराज शक्र ने मगरमच्छ का रूप धारण कर उन्हें अपनी पीठ पर चढ़ाकर (तट पर) ले आए। स्थविर ने यक्ष-द्वीप पहुँचकर अंधे यक्षों को अपनी मैत्री के प्रभाव से दृष्टि (आँखें) प्रदान करवाई। यक्षों ने स्थविर के गुणों को जानकर दो यक्ष भाइयों को (उनकी सेवा में) दे दिया। स्थविर सिंहल द्वीप जाकर महाचैत्य का प्रतिरूप, लोहप्रासाद का प्रतिरूप, शरीर-धातु और महाबोधि के बीज लेकर वापस लौट आए। သုမေဓတ္ထေရော စ ဟလင်္ကဿ နာမ နဂရဿ ဒက္ခိဏဒိသာဘာဂေ မှတ္တိပါမေ ပုရတ္ထိမာယ အနုဒိသာယ ဒိန္နနာမိကေ ဝိဟာရေ ဝသိ. ဌာနဿ ပန နာမဝသေန ထေရဿောပိ ဒိန္နဝိဟာရော တွေဝ နာမံ အဟောသိ. သောပိ ထေရော ပံသုကူလိကော လဇ္ဇီပေသလော သိက္ခာကာမော ဈာနလာဘီ အရဟာယေဝ. သော ဟိ ဒေဝသိကံ ဒေဝသိကံ အဋ္ဌနဝယောဇနပ္ပမာဏေ ပါဒစေတိယံ ဂန္တွာ ဝန္ဒိ. စေတိယင်္ဂဏဝတ္တဉ္စ အကာသိ. တတော အာဂန္တွာ မှတ္တိဂါမေ ပိဏ္ဍာယ စရိ. ဣဒံ ထေရဿ နိဗဒ္ဓဝတ္တံ. सुमेध स्थविर हलंक नामक नगर के दक्षिण दिशा में स्थित मत्ति (Mhatti) ग्राम के पूर्व की उप-दिशा में 'दिन्न' नामक विहार में रहते थे। स्थान के नाम के कारण स्थविर का नाम भी 'दिन्नविहार' ही हो गया। वे स्थविर भी पांशुकूलिक (फटे-पुराने वस्त्र धारण करने वाले), लज्जाशील, शीलवान, शिक्षा के प्रेमी, ध्यान-लाभी और अर्हत् ही थे। वे प्रतिदिन आठ-नौ योजन की दूरी पर स्थित पाद-चैत्य (चरण-चिह्न) पर जाकर वंदना करते थे और चैत्य-प्रांगण के कर्तव्यों का पालन करते थे। वहाँ से लौटकर वे मत्ति ग्राम में भिक्षाटन करते थे। यह स्थविर का नित्य का नियम था। အပရာနိပိ ဝတ္ထူနိ ဗဟူနိ သန္တိ, သဗ္ဗာနိ ပန တာနိ ဝိတ္ထာရေတွာ ဝတ္တဗ္ဗာနိပိ ဂန္ထပါရဝဘယေန န ဝက္ခာမ. သဗ္ဗာနိပိ ဟိ ဝုစ္စမာနာနိ အယံ သာသနဝံသပ္ပဒီပိကာ အတိပ္ပပဉ္စာ ဘဝိဿတိ. अन्य भी बहुत सी कथाएँ हैं, परंतु उन सभी का विस्तार से वर्णन किए जाने योग्य होने पर भी ग्रंथ के विस्तार के भय से हम उन्हें नहीं कहेंगे। क्योंकि यदि उन सभी को कहा जाए, तो यह 'शासनवंसप्पदीपिका' अत्यधिक विस्तृत हो जाएगी। သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဟိ ပရိနိဗ္ဗာနတော ယာဝဇ္ဇတနာ ထေရာနံ ပရမ္ပရဝသေန သံဃဋ္ဋေတွာ အာနယနမေဝေတ္ထ အဓိပ္ပေတံ. ယထာဝုတ္တာနိ ပန ဝတ္ထူနိ အဓုနာ အဘိညာလာဘီနံ ပုဂ္ဂလာနံ အခေတ္တဘာဝေန ပသင်္ဂဉာဏပ္ပဋိဗာဟဏတ္ထံ အရိမဒ္ဒနနဂရေ စ ဗဟူနံ အဘိညာလာဘီနံ ပုဂ္ဂလာနံ နိဝါသဋ္ဌာနတာ ဒဿနတ္ထံ ဝုတ္တာနိ. ဝုတ္တဉ္စေတံ ဘိက္ခုနီခန္ဓကဋ္ဌကထာယံ,– सम्यक्सम्बुद्ध के परिनिर्वाण से लेकर आज तक स्थविरों की परंपरा के अनुसार (इतिहास को) जोड़कर लाना ही यहाँ अभिप्रेत है। उपर्युक्त कथाएँ तो वर्तमान में अभिज्ञा-प्राप्त (सिद्धियों वाले) व्यक्तियों के अभाव के संबंध में होने वाली शंकाओं के निवारण के लिए और अरिमद्दन नगर में अनेक अभिज्ञा-प्राप्त व्यक्तियों के निवास-स्थान को दर्शाने के लिए कही गई हैं। और यह भिक्षुणी-खन्धक की अट्ठकथा में कहा गया है— ပဋိသမ္ဘိဒါပတ္တေဟိ ဝဿသဟဿံ သုက္ခဝိပဿကေဟိ ဝဿသဟဿံ [Pg.82] အနာဂါမီဟိ ဝဿသဟဿံ သကဒါဂါမီဟိ ဝဿသဟဿံ သောတာပန္နေဟိ ဝဿသဟဿန္တိ ဧဝံ ပဉ္စဝဿသဟဿာနိ ပဋိဝေဓဓမ္မော ဌဿတီတိ. "प्रतिसंविदा-प्राप्त (अर्हतों) के द्वारा एक हजार वर्ष, शुद्ध-विपश्यकों के द्वारा एक हजार वर्ष, अनागामियों के द्वारा एक हजार वर्ष, सकृदागामियों के द्वारा एक हजार वर्ष और स्रोतापन्नों के द्वारा एक हजार वर्ष—इस प्रकार पाँच हजार वर्षों तक प्रतिवेध-धर्म (साक्षात्कार का धर्म) टिका रहेगा।" ဒီဃနိကာယဋ္ဌကထာယံ ပန သံယုတ္တနိကာယဋ္ဌကထာယဉ္စ ပဋိသမ္ဘိဒါပတ္တေဟိ ဝဿသဟဿံ ဆဠာဘိညေဟိ ဝဿသဟဿံ တေဝိဇ္ဇေဟိ ဝဿသဟဿံ သုက္ခဝိပဿကေဟိ ဝဿသဟဿံ ပါတိမောက္ခေန ဝဿသဟဿန္တိ ဝုတ္တံ. दीघ-निकाय की अट्ठकथा और संयुत्त-निकाय की अट्ठकथा में तो कहा गया है—"प्रतिसंविदा-प्राप्तों के द्वारा एक हजार वर्ष, षडभिज्ञों (छह अभिज्ञाओं वाले) के द्वारा एक हजार वर्ष, त्रिविद्य (तीन विद्याओं वाले) के द्वारा एक हजार वर्ष, शुद्ध-विपश्यकों के द्वारा एक हजार वर्ष और पातिमोक्ख (अनुशासन) के द्वारा एक हजार वर्ष।" အင်္ဂုတ္တရနိကာယဋ္ဌကထာယံ ပန ဝိဘင်္ဂကထာယဉ္စ ဗုဒ္ဓါနံ ပရိနိဗ္ဗာနတော ဝဿသဟဿမေဝ ပဋိသမ္ဘိဒါ နိဗ္ဗတ္တေတုံ သက္ကောန္တိ, တတော ပရံ ဆ အဘိညာ, တတောပိ အသက္ကောန္တာ တိဿော ဝိဇ္ဇာ နိဗ္ဗတ္တိံသု. ဂစ္ဆန္တေ ကာလေ တာပိ နိဗ္ဗတ္တေတုံ အသက္ကောန္တာ သုက္ခဝိပဿကာ ဟောန္တိ. ဧတေနေဝ နယေန အနာဂါမိနော သကဒါဂါမိနော သောတာပန္နာတိ ဝုတ္တံ. अंगुत्तर-निकाय की अट्ठकथा और विभंग-कथा में कहा गया है कि बुद्धों के परिनिर्वाण से एक हजार वर्ष तक ही प्रतिसंविदा उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं, उसके बाद छह अभिज्ञाएँ, उसके बाद असमर्थ होने पर तीन विद्याएँ उत्पन्न हुईं। समय बीतने के साथ उन्हें भी उत्पन्न करने में असमर्थ होने पर वे शुद्ध-विपश्यक होते हैं। इसी पद्धति से अनागामी, सकृदागामी और स्रोतापन्नों के विषय में कहा गया है। ဧဝံ နာနာနယေဟိ အဋ္ဌကထာယပိ အာဂတတ္တာ အဓုနာ လောကေ အရိယပုဂ္ဂလာ ဘဝိတုံ န သက္ကာတိ န ဝတ္တဗ္ဗံ. အရိယာနမေဝ ခေတ္တဿ အဓုနာပိ သမ္ဘဝတော, သစေ အာရဒ္ဓဝိပဿကော ဘဝေယျ သော အရဟာ ဘဝိတုံ သက္ကာယေဝါတိ နိဋ္ဌမေတ္ထာဝဂန္တဗ္ဗံ. အဋ္ဌကထာသု ပန နာနာဘာဏကတ္ထေရာနံ နာနာဝါဒဝသေန ဝုတ္တန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဧတ္တကေနေဝ ပန နာနာကာရေန ဝါဒေါ ဘိန္နောပိ သာသနံ ဘိဇ္ဇတိယေဝ. သာသနဿ အဘိန္နံယေဝ ဟိ ဧတ္ထ ပမာဏန္တိ. इस प्रकार अट्ठकथाओं में विभिन्न विधियों के आने के कारण यह नहीं कहना चाहिए कि अब संसार में आर्य पुद्गल (श्रेष्ठ व्यक्ति) नहीं हो सकते। क्योंकि आर्यों का क्षेत्र अब भी संभव है, यदि कोई दृढ़ता से विपश्यना करने वाला हो, तो वह अर्हत् हो ही सकता है—ऐसा यहाँ निष्कर्ष समझना चाहिए। अट्ठकथाओं में तो विभिन्न भाणक (वाचक) स्थविरों के विभिन्न मतों के अनुसार कहा गया है, ऐसा देखना चाहिए। इतने मात्र विभिन्न प्रकारों से मत भिन्न होने पर भी शासन (धर्म) छिन्न-भिन्न ही होता है। यहाँ शासन का अभिन्न (अविभाजित) होना ही प्रमाण है। ဧဝံ မရမ္မမဏ္ဍလေ အရိမဒ္ဒနနဂရေ အနေကေဟိ အရဟန္တသတေဟိ သာသနံ ဝိဇ္ဇောတတိ. ဘဂဝတော ပန ပရိနိဗ္ဗာနတော တိံသာဓိကာနံ နဝဝဿသတာနံ ဥပရိ ပရမ္မရဋ္ဌေ သေဉိလညိကြောဓိနာမေန ရညာ သမကာလဝသေန သီဟဠဒီပေ ရဇ္ဇံ ပတ္တဿ မဟာနာမရညော ကာလေ ဗုဒ္ဓဃောသဗုဒ္ဓဒတ္တတ္ထေရေဟိ ပဘုတိ တေတေမဟာထေရာ တေတေဂန္ထေ အကံသု. इस प्रकार म्यानमार मंडल के अरिमद्दन नगर में अनेक सौ अर्हतों के द्वारा शासन प्रकाशित हो रहा है। भगवान के परिनिर्वाण के नौ सौ तीस वर्ष बाद, म्यानमार राष्ट्र में सेणिलञ्ञिक्रोधि (Señilaññikrodhi) नामक राजा के समकालीन, सिंहल द्वीप में राज्य प्राप्त करने वाले राजा महानाम के काल में, बुद्धघोष और बुद्धदत्त आदि उन-उन महास्थविरों ने उन-उन ग्रंथों की रचना की। တတော ပစ္ဆာ သတိသမာဓိပညာမန္ဒဝသေန သုခါဝဗောဓနတ္ထံ [Pg.83] ဋီကာယော အကံသု. အရိမဒ္ဒနနဂရေ ဇိနစက္ကေသတ္တနဝုတာဓိကေ ဆသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ တိဏ္ဏံ ပိဋကာနံ မူလဘူတေသု သဒ္ဒနယေသု သောတာရာနံ ဆေကတ္ထာယ မဟာသမုဒ္ဒေဝိယ အာနန္ဒော နာမ မဟာမစ္ဆော တီသု ပိဋကေသု သာဋ္ဌကထေသု ဝိလောလေတွာ အဂ္ဂဝံသော နာမ ထေရော သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ အကာသိ. အရိမဒ္ဒနနဂရေ ဟိ ဥတ္တရာဇီဝတ္ထေရာဒီနံ သီဟဠဒီပံ ဂမနတော ပုဗ္ဗေယေဝ တယော မဟာထေရာ ပရိယတ္တိဝိသာရဒါ, မဟာအဂ္ဂပဏ္ဍိတော, တဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကော ဒုတိယအဂ္ဂပဏ္ဍိတော, တဿ ဘာဂိနေယျော တတိယအဂ္ဂပဏ္ဍိတောတိ. တတိယအဂ္ဂပဏ္ဍိတော ပန အဂ္ဂဝံသောတိပိ ဝေါဟာရိယတိ. उसके बाद स्मृति, समाधि और प्रज्ञा की मन्दता के कारण सुखपूर्वक बोध के लिए टीकाएँ बनाई गईं। अरिमद्दन नगर में बुद्ध संवत के सोलह सौ संतानवे (1697) वर्ष बीतने पर, तीनों पिटकों के मूल स्वरूप शब्द-नयों में श्रोताओं की कुशलता के लिए, महासमुद्र में आनन्द नामक महामत्स्य की तरह तीनों पिटकों और उनकी अट्ठकथाओं का मन्थन करके, अग्गवंस नामक स्थविर ने 'सद्दनीति' नामक प्रकरण की रचना की। अरिमद्दन नगर में उत्तराजीव स्थविर आदि के सिंहल द्वीप जाने से पहले ही तीन महास्थविर पर्यत्ति में विशारद थे—महाअग्गपण्डित, उनके सद्धिविहारिक द्वितीय अग्गपण्डित, और उनके भानजे तृतीय अग्गपण्डित। तृतीय अग्गपण्डित को अग्गवंस भी कहा जाता है। တသ္မိဉ္စ ကာလေ အရိမဒ္ဒနနဂရဝါသိနော သဒ္ဒကောဝိဒါ ဗဟဝေါ သန္တီတိ ယာဝ လင်္ကာဒီပါ ကိတ္တိဃောသော ပတ္ထရိ. တသ္မာ သီဟဠဒီပိကာ သဒ္ဒကောဝိဒါ ဝီမံသေတုကာမာ ဟုတွာ အရိမဒ္ဒနနဂရံ အာဂမံသု. တဒါ အရိမဒ္ဒနနဂရဝါသိနော ဘိက္ခူ သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ ဒဿေသု. उस समय अरिमद्दन नगर के निवासी व्याकरण के बहुत बड़े विद्वान हैं, ऐसी कीर्ति लंका द्वीप तक फैल गई। इसलिए सिंहल द्वीप के व्याकरण के विद्वान परीक्षा करने की इच्छा से अरिमद्दन नगर आए। तब अरिमद्दन नगर के निवासी भिक्षुओं ने उन्हें 'सद्दनीति' प्रकरण दिखाया। သီဟဠဒီပိကာ စ တံ ဒိသွာ ဥပဓာရေန္တာ သဒ္ဒဝိသယေ အယံ ဂန္ထောဝိယ သီဟဠဒီပေ ဂန္ထော ဣတ္ထိ, ဣမသ္မိံ ပကရဏေ အာဂတဝိနိစ္ဆယမ္ပိ သကလံ န ဇာနိမှာတိ နာနာပ္ပကာရေဟိ ထောမေသုန္တိ ယာဝဇ္ဇဘနာ ကထာမဂ္ဂေါ န ဥပစ္ဆိန္နောတိ. सिंहल द्वीप के विद्वानों ने उसे देखकर और विचार करके कहा—"व्याकरण के विषय में इस ग्रन्थ जैसा ग्रन्थ सिंहल द्वीप में नहीं है, इस प्रकरण में आए हुए सम्पूर्ण विनिश्चय को हम भी नहीं जानते थे।" इस प्रकार उन्होंने अनेक प्रकार से प्रशंसा की, और यह कथा-मार्ग आज तक अविच्छिन्न चला आ रहा है। အရိမဒ္ဒနနဂရေ သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ ပစ္စာဂတော ဆပ္ပဒေါ နာမ သဒ္ဓမ္မဇောတိပါလတ္ထေရော သဒ္ဒနယေ ဆေကတာယ သုတ္တနိဒ္ဒေသံ အကာသိ. ပရမတ္ထဓမ္မေ စ ဆေကတာယ သင်္ခေပဝဏ္ဏနံ နာမစာရဒီပကဉ္စ. ဝိနယေ ဆေကတာယ ဝိနယဂူဠတ္ထဒီပနိံ သီမာလင်္ကာရဉ္စ အကာသိ. အတ္တနာ ကထာနံ ဂန္ထာနံ နိဂမေ သဒ္ဓမ္မ ဇောတိပါလောတိ မူလနာမေန ဝုတ္တံ. ကုသိမနဂရေ ပန ဆပ္ပဒ ဂါမေ ဇာတတ္တာ ဌာနဿ နာမေန ဆပ္ပဒေါတိ ပါကဋော. अरिमद्दन नगर में सिंहल द्वीप जाकर लौटे हुए छप्पद नामक सद्धम्मजोतिपाल स्थविर ने व्याकरण के नयों में कुशलता के कारण 'सुत्तनिद्देस' की रचना की। परमार्थ धर्म में कुशलता के कारण 'संखेपवण्णना' और 'नामचारदीपक' की रचना की। विनय में कुशलता के कारण 'विनयगूळ्हत्थदीपनी' और 'सीमालंकार' की रचना की। उन्होंने अपने द्वारा रचित ग्रन्थों के निगम (उपसंहार) में अपना मूल नाम 'सद्धम्मजोतिपाल' बताया है। कुसिम नगर के छप्पद गाँव में जन्म लेने के कारण वे स्थान के नाम से 'छप्पद' नाम से प्रसिद्ध हुए। ကုခနနဂရေ ပန ဆပ္ပဒေါတိ ဝေါဟာရိတောပိ ဧကော ထေရော အတ္ထိ. သော အလဇ္ဇီ ဒုဿီလော. ဧကစ္စေ ပန နာမသာမညလေသမတ္တေန ပတ္တလင်္ကံ သီလဝန္တံ ပေသလံ သိက္ခာကာမံ ဆပ္ပဒတ္ထေရံ အလဇ္ဇိဒုဿီလဘာဝေန ဥပဝဒန္တိ, ယထာ နာမ သာမညလေသမတ္တေန မလ္လပုတ္တံ အာယသ္မန္တံ ဒဗ္ဗံ အသမာစာရေနာတိ. कुखन नगर में भी 'छप्पद' नाम से पुकारे जाने वाले एक स्थविर थे। वे निर्लज्ज और दुःशील थे। कुछ लोग केवल नाम की समानता मात्र से, लंका पहुँचे हुए, शीलवान, प्रिय और शिक्षा के प्रेमी छप्पद स्थविर पर निर्लज्ज और दुःशील होने का दोषारोपण करते हैं, जैसे केवल नाम की समानता मात्र से आयुष्मान दब्ब मल्लपुत्त पर दुराचार का आरोप लगाया गया था। အရိမဒ္ဒနနဂရယေဝ အလောင်္ဂစညိသူနာမကဿ ရညော ကာလေ မဟာဝိမလဗုဒ္ဓိတ္ထေရော စူဠဝိမလဗုဒ္ဓိတ္ထေရောတိ ဒွေ ထေရာ ပရိယတ္တိဝိသာရဒါ အဟေသုံ. တေသု မဟာဝိမလဗုဒ္ဓိတ္ထေရော ကစ္စာယနဿ သံဝဏ္ဏနံ နျာသဂန္ထမကာသိ. अरिमद्दन नगर में ही अलोगंचञ्ञिसु नामक राजा के काल में महाविमलबुद्धि स्थविर और चूलविमलबुद्धि स्थविर नामक दो स्थविर पर्यत्ति में विशारद थे। उनमें से महाविमलबुद्धि स्थविर ने कच्चायन व्याकरण की व्याख्या 'न्यास' ग्रन्थ की रचना की। ကေစိ ပန သီဟဠဒီပဝါသီ ဝိမလဗုဒ္ဓိတ္ထေရော တမကာသီတိ ဝဒန္တိ. စူဠဝိမလဗုဒ္ဓိတ္ထေရော ပန ဝုတ္တောဒယဿ ပေါရာဏဋီကမကာသိ. ဆန္ဒောသာရတ္ထဝိကာသိနိံ သဒ္ဓမ္မဉာဏတ္ထေရော အကာသိ. ဝစနတ္ထဇောတိံ ပန ဝေပုလ္လတ္ထေရော အကာသိ. နျာသဂန္ထဿပေါရာဏဋီကံ နရပတိရညော ကာလေ ဧကော အမစ္စော အကာသိ. कुछ लोग कहते हैं कि सिंहल द्वीप निवासी विमलबुद्धि स्थविर ने उसकी रचना की थी। चूलविमलबुद्धि स्थविर ने 'वुत्तोदय' की पुरानी टीका बनाई। 'छन्दोसारत्थविकासिनी' की रचना सद्धम्मञाण स्थविर ने की। 'वचनत्थजोति' की रचना वेपुल्ल स्थविर ने की। 'न्यास' ग्रन्थ की पुरानी टीका नरपति राजा के काल में एक अमात्य ने की। သော ဟိ ရညော ဧကံ ဩရောဓံ ပဋိစ္စ ဇာတံ ဧကံ ဓီတရံ ဒိသွာ ဝါနရောဝိယ လေပေ လဂ္ဂိတော တိဿံ ပဋိဗန္ဓစိတ္တော ဟုတွာ လဂ္ဂိ. တမတ္ထံ ဇာနိတွာ ရာဇာ ဧဝမာဟ,– သစေ ဧတံ ဣစ္ဆေယျာသိ, ဧကံ ဂန္ထံ ပရိပုဏ္ဏဝိနိစ္ဆယံ ဂူဠတ္ထံ ကရောဟိ, သစေ တွံ တာဒိသံ ဂန္ထံ ကာတုံ သက္ကုဏေယျာသိ, ဧတံ လဘိဿသီတိ. အထ သော နျာသဿ သံဝဏ္ဏနံ ပေါရာဏဋီကံ အကာသိ. उसने राजा की एक अन्तःपुर की स्त्री से उत्पन्न एक पुत्री को देखकर, गोंद में फँसे बन्दर की तरह उसमें आसक्त होकर अपना चित्त लगा लिया। उस बात को जानकर राजा ने इस प्रकार कहा—"यदि तुम इसे चाहते हो, तो एक ऐसा ग्रन्थ बनाओ जो पूर्ण विनिश्चय वाला और गूढ़ अर्थ वाला हो। यदि तुम ऐसा ग्रन्थ बनाने में समर्थ होगे, तो इसे प्राप्त करोगे।" तब उसने 'न्यास' की व्याख्या स्वरूप पुरानी टीका की रचना की। တတော ပစ္ဆာ ဟီနာယာဝတ္တိတွာ ဓီတရံ ဒတွာ ရဇ္ဇုဂ္ဂါဟာမစ္စဋ္ဌာနေ ဌပေသိ, ယံ မရမ္မဝေါဟာရေန သံပျင်္ဂဣတိ ဝုစ္စတိ. တေန ပန ကတတ္တာ သောပိ ဂန္ထော တံ နာမေန ဝုစ္စတိ. ကာရိကံ တဿာ စ သံဝဏ္ဏနံ ဆတ္တဂုဟိန္ဒဿ နာမ ရညော ကာလေဓမ္မသေနာပတိတ္ထေရော အကာသိ. တေန ကိရ ကာရပိတေ နန္ဒဂုဟာယ သမီပေ နန္ဒဝိဟာရေ နိသီဒိတွာ အကာသိ. उसके बाद गृहस्थ जीवन में लौटकर राजा द्वारा पुत्री दिए जाने पर उसे 'रज्जुग्गाह' अमात्य के पद पर नियुक्त किया गया, जिसे बर्मी भाषा में 'संप्यंग' कहा जाता है। उसके द्वारा रचित होने के कारण वह ग्रन्थ भी उसी के नाम से जाना जाता है। 'कारिका' और उसकी व्याख्या की रचना छत्तगुहिन्द नामक राजा के काल में धम्मसेनापति स्थविर ने की। उन्होंने इसे अपने द्वारा बनवाए गए नन्दगुहा के समीप नन्दविहार में बैठकर रचा था। တသ္မိဉ္စကာလေ [Pg.85] ဂန္ထမာဒနပဗ္ဗတေ နန္ဒမူလဂုဟတော အရဟန္တာ အာဂန္တွာ တသ္မိံ ဝိဟာရေ ဝဿံ ဥပဂစ္ဆိံသု. တေသံ သမ္မုခေ ကတတ္တာ တေ စ ဂန္ထာ ပဏ္ဍိတေဟိ သာရတော ပစ္စေတဗ္ဗာတိ အာစရိယာ ဝဒန္တိ. उस समय गन्धमादन पर्वत की नन्दमूल गुफा से अर्हन्त आकर उस विहार में वर्षावास करते थे। उनके सम्मुख रचित होने के कारण विद्वानों को उन ग्रन्थों को प्रामाणिक मानना चाहिए, ऐसा आचार्य कहते हैं। ဝါစ္စဝါစကံ ပန ဓမ္မဒဿီ နာမ သာမဏေရော အကာသိ. 'वाच्चवाचक' की रचना धम्मदस्सी नामक सामणेर ने की। သဒ္ဒတ္ထဘေဒစိန္တံ ပန အရိမဒ္ဒနနဂရသမီပေ ဌိတဿ ခဏိတ္တိပါဒပဗ္ဗတဿ သမီပေ ဧကသ္မိံ ဂါမေ ဝသန္တော သဒ္ဓမ္မသိရိ နာမ ထေရော အကာသိ. သောယေဝ ထေရော ဗြဟဇံ နာမ ဝေဒသတ္ထမ္ပိ မရမ္မဘာသာယ ပရိဝတ္တေသိ. 'सद्दत्थभेदचिन्ता' की रचना अरिमद्दन नगर के समीप स्थित खणित्तिपाद पर्वत के पास एक गाँव में रहने वाले सद्धम्मसिरि नामक स्थविर ने की। उन्हीं स्थविर ने 'ब्रहज' नामक वेद-शास्त्र का भी बर्मी भाषा में अनुवाद किया। ဧကက္ခရကောသံ ပန သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရော အကာသိ. သော ဟိ ကလိယုဂေ သတ္တာသီတာဓိကေ အဋ္ဌသတေ သမ္ပတ္တေ မိစ္ဆာ ဒိဋ္ဌိကာနံ ဇလုမသညိတာနံ ကုလာနံ ဘယေန သကလေပိ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌေ သာသနောဘာသော မိလာယတိ. ဗဟူနိပိ ပေါတ္ထကာနိ အဂ္ဂိဘယေန နဿေသုံ. 'एकक्खरकोस' की रचना सद्धम्मकित्ति स्थविर ने की। कलियुग के आठ सौ सतासी (887) वर्ष बीतने पर, 'जलुम' कहे जाने वाले मिथ्यादृष्टि कुलों के भय से सम्पूर्ण तम्बदीप राष्ट्र में शासन का प्रकाश मन्द पड़ गया था। अग्नि के भय से बहुत सी पुस्तकें भी नष्ट हो गई थीं। တဒါ တံ ပဝတ္တိံ ပဿိတွာ သစေ ပရိယတ္တိဓမ္မောဝိနဿေယျ, ပဋိပတ္တိဓမ္မောပိ နဿိဿတိ, ပဋိပတ္တိဓမ္မေ နဿန္တေ ကုတော ပဋိဝေဓဓမ္မော ဘဝိဿတီတိ သံဝေဂံ အပဇ္ဇိတွာ ဣမံ ဂန္ထံ အကာသီတိ တဋ္ဋိကာယံ ဝုတ္တံ. तब उस स्थिति को देखकर—"यदि पर्यत्ति धर्म नष्ट हो जाएगा, तो प्रतिपत्ति धर्म भी नष्ट हो जाएगा; प्रतिपत्ति धर्म के नष्ट होने पर प्रतिवेध धर्म कहाँ से होगा?"—ऐसा संवेग प्राप्त कर उन्होंने इस ग्रन्थ की रचना की, ऐसा उसकी टीका में कहा गया है। မုခမတ္တသာရံ သာဂရတ္ထေရော အကာသိ. 'मुखमत्तसार' की रचना सागर स्थविर ने की। ကလိယုဂေ ဧကာသီတာဓိကေ ပဉ္စသတေ သမ္ပတ္တေ ဧကံ ဒဟရပုတ္တံ ကာလင်္ကတံ ပဋိစ္စ သံဝေဂံ အာပဇ္ဇိတွာ ပစ္စေကဗုဒ္ဓတ္တံ ပတ္ထယန္တဿ ဇေယျသိင်္ခနာမကဿ ရညော ပုတ္တော ကျစွာနာမကော ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. ဓမ္မရာဇာတိပိ နာမလဉ္ဆံ ပဋိဂ္ဂဏှိ. တီသု ပန ပိဋကေသု ယထာဘူတံ ဝိဇာနကတာယ မရမ္မဝေါဟာရေန ကျစွာတိ ဝေါဟာရိယတိ. कलियुग के पाँच सौ इक्यासी (581) वर्ष बीतने पर, एक छोटे पुत्र की मृत्यु के कारण संवेग प्राप्त कर प्रत्येकबुद्धत्व की प्रार्थना करने वाले जयसिंह (जेय्यसिङ्ख) नामक राजा के पुत्र क्यच्वा (क्यस्वा) नामक राजा ने राज्य किया। उन्होंने 'धर्मराजा' की उपाधि भी ग्रहण की। तीनों पिटकों के यथार्थ ज्ञान के कारण उन्हें बर्मी भाषा (मरम्म-भाषा) में 'क्यच्वा' कहा जाता है। သော စ ကိရ ရာဇာ ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု အတိဆေကတာယ ပိဋကတ္တယေ သာကစ္ဆမတ္တမ္ပိ ကာတုံ သမတ္ထော [Pg.86] နာမ နတ္ထီတိ ဥဂ္ဂဟိတတိပိဋကော ဟုတွာ ဘိက္ခုသံဃမ္ပိ ဒိဝသေ သတ္တဟိ ဝါရေဟိ ဂန္ထံ ဝါစေတိ. वे राजा पालि, अट्ठकथा, टीका आदि ग्रन्थों में इतने निपुण थे कि त्रिपिटक पर उनके साथ चर्चा करने में भी कोई समर्थ नहीं था। त्रिपिटक के ज्ञाता होकर वे भिक्षु संघ को भी दिन में सात बार ग्रन्थ पढ़ाते थे। ခဏိတ္တိပါဒပဗ္ဗတဿ သမီပေပိ ဧကံ တဠာကံ ကာရာပေတွာ တတ္ထ ရာဇာဂါရံ ကာရာပေတွာ တတ္ထ နိသီဒိတွာ ဂန္ထံ ဝါစေတိ. သဗ္ဗာနိ ပန ရာဇူနံ ကိစ္စာနိ ပုတ္တဿေဝ ဥပရာဇဿ နိယျာဒေသိ. ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှန္တာနံ ဩရောဓာနမတ္ထာယ သင်္ခေပတော သဒ္ဒဗိန္ဒုံ နာမ ပကရဏံ ပရမတ္ထဗိန္ဒုဉ္စ နာမ ပကရဏံ အကာသိ. တဿ ဟိ စိတ္တံ ပရိယတ္တိယံယေဝ ရမတိ. အညံ ပန ရာဇကိစ္စံ သုဏိတုမ္ပိ န ဣစ္ဆိ. အနုရုဒ္ဓရာဇာ အနာဂတေ အဟံ ရာဇာ ဘဝေယျာမိ, တဒါယေဝ ဣမာနိ တာဠိဗီဇာနိ ဥဋ္ဌဟန္တူတိ အဓိဋ္ဌဟိတွာ ရောပေသိ. တာနိ တဿ ရညော ကာလေ ဥဋ္ဌဟိံသု. တေနေဝ အနုရုဒ္ဓရာဇာယေဝါယန္တိ ရဋ္ဌဝါသိနော သဉ္ဇာနိံသု. သမ္မုတိရာဇာ ဟိ အနုရုဒ္ဓရာဇာ ကျစွာရာဇာတိ ဣမေ တယော ဧကသန္တာနာတိ ဝဒန္တိ. खणित्तिपाद पर्वत के समीप एक तालाब बनवाकर और वहाँ राजभवन बनवाकर, वहाँ बैठकर वे ग्रन्थ पढ़ाते थे। उन्होंने राजा के सभी कार्यों को अपने पुत्र उपराज को सौंप दिया था। ग्रन्थ सीखने वाली अन्तःपुर की स्त्रियों के लिए उन्होंने संक्षेप में 'सद्दबिन्दु' और 'परमत्थबिन्दु' नामक प्रकरण ग्रन्थों की रचना की। उनका चित्त केवल पर्यत्ति (शास्त्रों) में ही रमता था। वे अन्य राजकार्यों को सुनना भी नहीं चाहते थे। राजा अनुरुद्ध ने भविष्य में 'मैं राजा बनूँगा, तभी ये ताड़ के बीज अंकुरित हों' ऐसा अधिष्ठान करके उन्हें रोपा था। वे बीज इस राजा के काल में अंकुरित हुए। इसी कारण देशवासियों ने उन्हें अनुरुद्ध राजा ही माना। लोग कहते हैं कि सम्मुति राजा, अनुरुद्ध राजा और क्यच्वा राजा—ये तीनों एक ही संतान (परम्परा) के हैं। သော ရာဇာ ဧကမ္ပိ စေတိယံ အကာသိ, န တံ နိဋ္ဌံ အဂမာသိ, ပရိယတ္တိယံယေဝ ပရိစာရကတ္တာတိ ရာဇဝံသေ အာဂတံ. လောကသမ္မုတိဝသေန ကက္ခဠဒိနေ ဣဋ္ဌကာနိ ကာရာပေတွာ တသ္မိံယေဝ ဒိနေ ဘူမိသမံ ကတွာ တသ္မိံယေဝ ဒိနေ အညမ္ပိ သဗ္ဗံ ကာရာပေသိ. တေန မရမ္မဝေါဟာရေန ပြဿဒါ စေတိယန္တိ ယာဝဇ္ဇဘနာ ပါကဋံ. उस राजा ने एक चैत्य भी बनवाया, किन्तु वह पूर्ण नहीं हुआ, क्योंकि वे पर्यत्ति की सेवा में ही लगे रहते थे—ऐसा राजवंश में आया है। लोक-मान्यता के अनुसार एक 'कठोर दिन' (अशुभ दिन) में ईंटें बनवाकर, उसी दिन भूमि को समतल कर, उसी दिन अन्य सब कार्य भी करवा लिए। इसी कारण बर्मी भाषा में उसे 'प्रस्सदा चैत्य' के नाम से आज भी जाना जाता है। တဿ ရညော ဧကာ ဓိဘာ ဝိဘတျတ္ထံ နာမ ဂန္ထံ အကာသီတိ. उस राजा की एक पुत्री ने 'विभत्त्यत्थ' नामक ग्रन्थ की रचना की। ပုဗ္ဗေ ကိရ အရိမဒ္ဒနနဂရေ ဥဂ္ဂဟဓာရဏာဒိဝသေန သာသနံ အတိဝိယ ဝိရူဠမာပဇ္ဇိ. အရိမဒ္ဒနနဂရေယေဝ ဟိ ဧကော ဝုဍ္ဎပဗ္ဗဇိတော ဘိက္ခု ဂန္ထံ လိခိတုံ သိလာလေခနဒဏ္ဍေန ဣစ္ဆန္တော ရာဇဂေဟံ ပါဝိသိ. ရာဇာ ကေန အာဂတောသီတိ ပုစ္ဆိ. ဂန္ထံ လိခိတုံ သိလာလေခနဒဏ္ဍေန ဣစ္ဆန္တော အာဂတော မှီတိ. ဧဝံ မဟလ္လကော တွံ ဂန္ထံ မဟုဿာဟေန ပရိယာပုဏန္တောပိ [Pg.87] ဂန္ထေသု ဆေကဿ ဩကာသံ န ပဿာမိ, သစေ ဟိမုသလော အင်္ကုရံ ဥဋ္ဌာပေတွာ ရူဟေယျ, ဧဝံ သတိ တွံ ဂန္ထေသု ဆေကတံ အာပဇ္ဇေယျာသီတိ အာဟ. प्राचीन काल में अरिमद्दन नगर में सीखने और धारण करने आदि के द्वारा शासन की अत्यधिक वृद्धि हुई। अरिमद्दन नगर में ही एक वृद्ध-प्रव्रजित भिक्षु ग्रन्थ लिखने के लिए पत्थर की लेखनी (स्लेट पेंसिल) की इच्छा से राजभवन में प्रविष्ट हुए। राजा ने पूछा—"किसलिए आए हो?" उन्होंने कहा—"ग्रन्थ लिखने के लिए पत्थर की लेखनी की इच्छा से आया हूँ।" राजा ने कहा—"तुम इतने वृद्ध हो, महान उत्साह से ग्रन्थ सीखते हुए भी मैं तुम्हारे ग्रन्थों में निपुण होने का कोई अवसर नहीं देखता; यदि यह मूसल अंकुरित होकर बढ़ जाए, तभी तुम ग्रन्थों में निपुणता प्राप्त कर सकोगे।" တတော ပစ္ဆာ ဝိဟာရံ ဂန္တွာ ဒေဝသိကံ ဒေဝသိကံ ဧကဒန္တကဋ္ဌပ္ပမာဏတ္တံ လေခနံ ဥဂ္ဂဟေတွာ ကစ္စာယနအဘိဓမ္မေတ္ထသင်္ဂဟပ္ပကရဏံ အာဒိံ ကတွာ အာစရိယဿ သန္တိကေ ဥဂ္ဂဏှိ. သော အစိရေနေဝ ဂန္ထေသု ဆေကတံ ပတွာ မုသလေ ဇမ္ဗုရုက္ခင်္ကုရံ ဗန္ဓိတွာ ဥဿာပေတွာ ရာဇဂေဟံ ပါဝိသိ. उसके बाद विहार जाकर, प्रतिदिन एक दातून के परिमाण के बराबर लेखन सीखकर, कच्चायन और अभिधम्मत्थसंग्रह आदि प्रकरणों से आरम्भ कर आचार्य के पास अध्ययन किया। उन्होंने शीघ्र ही ग्रन्थों में निपुणता प्राप्त कर ली और मूसल में जामुन के वृक्ष का अंकुर बाँधकर उसे ऊपर उठाकर राजभवन में प्रवेश किया। အထ တံ ရာဇာ ပုစ္ဆိ,-ကေနအာဂတောသီတိ. အယံ မဟာရဇ မုသလော အင်္ကုရံ ဥဋ္ဌာပေတွာ ရူဟတီတိ အာစိက္ခိတုံ အာဂတောမှီတိ ဝုတ္တေ ရာဇာ ဧတဿ ဂန္ထေသု ဆေကတံ ပတ္တောမှီတိ ဝုတ္တံ ဟောတီတိ ဇာနာသိ. တံ သစ္စံ ဝါ အလိကံ ဝါတိ ဝီမံသနတ္ထာယ မဟာထေရာနံ သန္တိကံ ပဟိဏိ. မဟာထေရာပိ ဂူဠဋ္ဌာနံ ပုစ္ဆိံသု. သောပိ ပုစ္ဆိတံ ပုစ္ဆိတံ ဗျာကာသိ. तब राजा ने उनसे पूछा—"किसलिए आए हो?" उन्होंने कहा—"महाराज! यह मूसल अंकुरित होकर बढ़ रहा है, यह बताने के लिए आया हूँ।" राजा समझ गए कि इसका अर्थ है कि इन्होंने ग्रन्थों में निपुणता प्राप्त कर ली है। वह सत्य है या मिथ्या, इसकी परीक्षा के लिए उन्होंने उन्हें महास्थविरों के पास भेजा। महास्थविरों ने भी गूढ़ विषयों के बारे में पूछा। उन्होंने भी पूछे गए प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दिया। အထ သော ဘိက္ခု မဟာထေရေ ဧဝမာဟ,-တုမှေ ဘန္တေ မံ ဗဟူ ပုစ္ဆထ, အဟမ္ပိ တုမှေ ပုစ္ဆိတုံ ဣစ္ဆာမိ, ဩကာသံ ဒေထာတိ ယာစိတွာ အညသမာနစေတသိကန္တိ ဧတ္ထ အညသဒ္ဒဿ အဝဓျာပေက္ခတ္တာ အဝဓိပဒံ ဥဒ္ဓရိတွာ ဒဿေထာတိ ပုစ္ဆိ. မဟာထေရာပိ ပုဗ္ဗေ အမနသိကတတ္တာ သီဃံ ဝိဿဇ္ဇိတုံ န သက္ခိံသု. ရာဇာ တမတ္ထံ သုတွာ တုဋ္ဌစိတ္တော ဟုတွာ ဒိသာ ပါမောက္ခနမေန အာစရိယဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. သော ပန ဘိက္ခု အဂန္ထကာရကောပိ ဂန္ထကာရကောဝိယ ပစ္ဆိမာနံ ဇနတာနံ ဒိန္နောပဒေသဝသေန ဥပကာရံ ကတွာ သာသနေ ဥပ္ပဇ္ဇီတိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ,– तब उस भिक्षु ने महास्थविरों से ऐसा कहा—"भन्ते! आप लोगों ने मुझसे बहुत पूछा, मैं भी आपसे पूछना चाहता हूँ, अवसर दें।" ऐसी याचना कर उन्होंने पूछा—"'अञ्ञसमान-चेतसिक' (अन्यसमान-चैतसिक) में 'अञ्ञ' शब्द की अवधि-अपेक्षा होने के कारण अवधि-पद को उद्धृत करके दिखाएँ।" महास्थविर भी पहले मनन न करने के कारण शीघ्र उत्तर नहीं दे सके। राजा यह बात सुनकर प्रसन्न हुए और उन्हें 'दिसापामोक्ख' (दिशाप्रमुख) नाम से आचार्य के पद पर स्थापित किया। वह भिक्षु ग्रन्थकार न होते हुए भी, ग्रन्थकार के समान ही बाद की पीढ़ियों को दिए गए उपदेशों के माध्यम से उपकार करके शासन में उत्पन्न हुए। इस विषय में ये गाथाएँ हैं— အဟံ မဟလ္လကော ဟောမိ, ဒုပ္ပညော ပရိယတ္တိကံ; ဥဂ္ဂဟံ မဟုဿာဟေန, န သက္ခိဿာမိ ဇာနိတုံ. "मैं वृद्ध हूँ, मन्दबुद्धि हूँ, महान उत्साह के साथ भी पर्यत्ति का अध्ययन नहीं जान पाऊँगा।" ဧဝဉ္စ [Pg.88] နာတိမညေယျ,နာပ္ပောဿုက္ကတမာပဇ္ဇေ; သဒ္ဓမ္မေ ဆေကကာမောဝ,ဥဿာဟံဝ ကရေ ပေါသော. इस प्रकार स्वयं का अपमान न करे और न ही निरुत्साहित हो; सद्धर्म में निपुणता चाहने वाले मनुष्य को उत्साह (प्रयत्न) ही करना चाहिए। ဝုဍ္ဎပဗ္ဗဇိတော ဘိက္ခု,မဟလ္လကောပိ ဒုပ္ပညော; အာပဇ္ဇိ ဆေကတံ ဓမ္မေ,တမပေက္ခန္တု သောတာရောတိ. वृद्ध-प्रव्रजित भिक्षु, वृद्ध और मन्दबुद्धि होते हुए भी धर्म में निपुणता को प्राप्त हुए; श्रोतागण इस पर ध्यान दें। ပုဗ္ဗေ ကိရ အရိမဒ္ဒနနဂရေ မာတုဂါမာပိ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှိံသု. ယေဘုယျေန ဥဂ္ဂဟဓာရဏာဒိဝသေန ပရိယတ္တိသာသနံ ပဂ္ဂဟေသုံ. မာတုဂါမာ ဟိ အညမညံ ပဿန္တာ တုမှေ ကိတ္တကံ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှထ, ကိတ္တကံ ဂန္ထံ ဝါစုဂ္ဂတံ ကရောထာတိ ပုစ္ဆိ သုန္တိ. प्राचीन काल में अरिमद्दन नगर में स्त्रियाँ भी ग्रन्थ पढ़ती थीं। वे प्रायः सीखने और धारण करने आदि के द्वारा पर्यत्ति-शासन को धारण करती थीं। स्त्रियाँ एक-दूसरे से मिलने पर पूछती थीं—"आप कितने ग्रन्थ पढ़ रही हैं? कितने ग्रन्थ आपको कण्ठस्थ हैं?" ဧကော ကိရ မာတုဂါမော ဧကံ မာတုဂါ,မံ ပုစ္ဆိ,-တွံ ဣဒါနိ ကိတ္တကံ ဂန္ထံ ဝါစုဂ္ဂတံ ကရောသီတိ. အဟံ ပန ဣဒါနိ ဒဟရပုတ္တေဟိ ဗလိဗောဓတ္တာ ဗျာကုလံ ပတွာ ဗဟုံ ဂန္ထံ ဝါစုဂ္ဂတံ ကာတုံ နသက္ကာ,သမန္တမဟာပဋ္ဌာနေ ပန ကုသလတ္တိကမတ္တံဝ ဝါစုဂ္ဂတံ ကရောမီတိ အာဟာတိ. एक स्त्री ने दूसरी स्त्री से पूछा—"तुम इस समय कितने ग्रन्थ कण्ठस्थ कर रही हो?" उसने कहा—"मैं तो इस समय छोटे बच्चों के बोझ (पालन-पोषण) के कारण व्याकुल होने से बहुत ग्रन्थ कण्ठस्थ नहीं कर पा रही हूँ, केवल 'समन्त-महापट्ठान' के 'कुसल-त्तिक' (कुशल-त्रिक) मात्र को ही कण्ठस्थ कर रही हूँ।" ဣဒမ္ပိ အရိမဒ္ဒနနဂရဝါသီနံ မာတုဂါမာနမ္ပိ ပရိယတ္တုဂ္ဂဟဏေ ဧကံ ဝတ္ထု,– अरिमद्दन नगर में रहने वाली स्त्रियों के पर्यत्ति-अध्ययन के विषय में यह भी एक वृत्तांत है। ဧကံ ကိရ ဘိက္ခုံ ပိဏ္ဍာယ စရန္တံ ဧကာ ဒွါဒသဝဿိကာ ဒဟရိတ္ထီ ပုစ္ဆိ,-ကိန္နာမောသိ တွံ ဘန္တေတိ. ခေမာနာမာဟန္တိ. ကထဉှိ ဘန္တေ ပုမာဝ သမာနော ဣတ္ထိလိင်္ဂေန နာမံ အကာသီတိ အာဟ. အထ အန္တောဂေဟေ နိသိန္နာ မာတာ သုတွာ ဓီတရံ အာဟ,-တွံ ရာဇာဒိဂဏဿ လက္ခဏံ န ဇာနာသီတိ. အာမ ဇာနာမိ, အယံ ပန ခေမသဒ္ဒေါ န ရာဇာဒိဂဏပက္ခံ ဘဇတီတိ. အထ [Pg.89] မာတာ ဧဝမာဟ,-အယံ ပန ခေမသဒ္ဒေါ ဧကဒေသေနေဝ ရာဇာဒိဂဏပက္ခံ ဘဇတီတိ. कहते हैं कि भिक्षाटन करते हुए एक भिक्षु से एक बारह वर्षीय युवती ने पूछा—"भन्ते! आपका नाम क्या है?" उन्होंने कहा—"मेरा नाम खेमा है।" उसने कहा—"भन्ते! पुरुष होते हुए भी आपने स्त्रीलिंग वाला नाम कैसे रखा?" तब घर के भीतर बैठी माता ने यह सुनकर पुत्री से कहा—"तुम राजादि-गण के लक्षण को नहीं जानती हो।" (पुत्री ने कहा)—"हाँ, जानती हूँ, परन्तु यह 'खेम' शब्द राजादि-गण के पक्ष का अनुसरण नहीं करता है।" तब माता ने इस प्रकार कहा—"यह 'खेम' शब्द एक अंश (विशेष स्थिति) में राजादि-गण के पक्ष का अनुसरण करता है।" အယံ ပနေတ္ထ ဓီတု အဓိပ္ပာယော,-န ရာဇာဒိသဒ္ဒေါ ကဒါစိ ရာဇောတိ ပစ္စတ္တဝစနဝသေန ဩကာရန္တော ဒိဿတိ ဝိနာ ဒေဝရာဇောတိအာဒိသမာသဝိသယံ, ခေမသဒ္ဒေါ ပန ကတ္ထစိ ခေမောတိ စ ခေမန္တိ စ လိင်္ဂန္တရဝသေန ရူပန္တရံ ဒိဿတိ, တေနေဝ ခေမသဒ္ဒေါ န ရာဇာဒိဂဏောတိ ဝေဒိတဗ္ဗောတိ. यहाँ पुत्री का अभिप्राय यह है—'राजा' आदि शब्द कभी भी 'राजो' के रूप में प्रथमा विभक्ति (पच्चत्तवचन) में ओ-कारान्त नहीं देखे जाते, सिवाय 'देवराजो' आदि समास के विषयों के; परन्तु 'खेम' शब्द कहीं 'खेमो' और कहीं 'खेमं' के रूप में लिंग-भेद के कारण रूपान्तरित देखा जाता है, इसलिए 'खेम' शब्द राजादि-गण का नहीं है, ऐसा समझना चाहिए। အယံ ပန မာတု အဓိပ္ပာယော,-ခေမသဒ္ဒေါ အဘိဓေယျလိင်္ဂတ္တာ တိလိင်္ဂကော,ယဒါ ပန သညာသဒ္ဒါဓိကာရေ ပစ္စတ္တဝစနဝသေန ခေမာတိ အာကာရန္တော ဒိဿတိ, တဒါ ဧကဒေသေန ခေမသဒ္ဒေါ ရာဇာဒိဂဏပက္ခံ ဘဇတီတိ. परन्तु माता का अभिप्राय यह है—'खेम' शब्द अभिधेय-लिंग (विशेष्य के लिंग के अनुसार) होने के कारण त्रिलिंगी है; परन्तु जब संज्ञा शब्दों के अधिकार में प्रथमा विभक्ति के रूप में 'खेमा' ऐसा आ-कारान्त देखा जाता है, तब 'खेम' शब्द एक अंश में राजादि-गण के पक्ष का अनुसरण करता है। ဣဒမ္ပိ ဧကံ ဝတ္ထု,– यह भी एक कथा है— အရိမဒ္ဒနနဂရေ ကိရ ဧကဿ ကုဋုမ္ဗိကဿ ဧကော ပုတ္တော ဒွေ ဓီတရော အဟေသုံ. ဧကသ္မိဉ္စ ကာလေ ဃမ္မာဘိဘူတတ္တာ ဂေဟဿ ဥပရိတလေ နဟာယိတွာ နိသီဒိ. အထ ဧကာ ဒါသီ ဂေဟဿ ဟေဋ္ဌာ ဌတွာ ကိဉ္စိ ကမ္မံ ကရောန္တီ တဿ ကုဋုမ္ဗိကဿ ဂုယှဋ္ဌာနံ ဩလောကေသိ. တမတ္ထံ ဇာနိတွာ ကုဋုမ္ဗိကော သာခံ ဩလောကေသီတိ ဧကံ ဝါကျံ ဗန္ဓိတွာ ပုတ္တဿ ဒဿေသိ,ဣမဿ အတ္ထယောဇနံ ကရောဟီတိ. အထ ပုတ္တော အတ္ထယောဇနံ အကာသိ,-သာခံ ရုက္ခသာခံ ဩလေကေသိ ဥဒိက္ခတီတိ. အထ ပစ္ဆာ ဧကာယ ဓီတုယာ ဒဿေသိ, ဣမဿ အတ္ထယောဇနံ ကရောဟီတိ. သာပိ အတ္ထယောဇနံ အကာသိ,- သာ သုနခေါ ခံ အာကာသံ ဩလောကေသိ ဥဒိက္ခတီတိ. အထ ပစ္ဆာ ဧကာယ ဓီတုယာ ဒဿေသိ, ဣမဿ အတ္ထ ယောဇနံ ကရောဟီတိ. သာပိ အတ္ထယောဇနံ အကာသိ,-သာ ဣတ္ထီ ခံ အင်္ဂဇာတံ ဩလောကေသိ မုခံ ဥဒ္ဓံ ကတွာ ဩလောကေသီတိ. कहते हैं कि अरिमर्दन नगर में एक गृहपति के एक पुत्र और दो पुत्रियाँ थीं। एक समय गर्मी से व्याकुल होकर वह घर की ऊपरी मंजिल पर स्नान करके बैठा था। तब घर के नीचे खड़ी होकर कुछ काम करती हुई एक दासी ने उस गृहपति के गुप्त अंग को देखा। उस बात को जानकर गृहपति ने 'साखं ओलोकेसि' (उसने शाखा को देखा) ऐसा एक वाक्य बनाकर पुत्र को दिखाया और कहा—"इसकी अर्थ-योजना (व्याख्या) करो।" तब पुत्र ने अर्थ-योजना की—"साखं (शाखा को) अर्थात् वृक्ष की शाखा को ओलोकेसि (देखा) अर्थात् निहारा।" फिर बाद में एक पुत्री को दिखाया—"इसकी अर्थ-योजना करो।" उसने भी अर्थ-योजना की—"सा (वह) सुनखो (कुत्ता) खं (आकाश) ओलोकेसि (देखा) अर्थात् निहारा।" फिर बाद में (दूसरी) पुत्री को दिखाया—"इसकी अर्थ-योजना करो।" उसने भी अर्थ-योजना की—"सा (उस) इत्थी (स्त्री) ने खं (अंग-विशेष/गुप्त अंग) ओलोकेसि (देखा), मुख ऊपर करके देखा।" ဣဒမ္ပိ ဧကံ ဝတ္ထု,– यह भी एक कथा है— ဧကော ကိရ သာမဏေရော ရတနပူရဝါသီ အရိမဒ္ဒနနဂရေ မာတုဂါမာပိ [Pg.90] သဒ္ဒနယေသု အတိကောဝိဒါတိ သုတွာ အဟံ တတ္ထ ဂန္တွာ ဇာနိဿာမီတိ အရိမဒ္ဒနနဂရံ ဂတော. အထ အန္တရာမဂ္ဂေ အရိမဒ္ဒနနဂရဿ သမီပေ ဧကံ ဒဟရိတ္ထိံ ကပ္ပာသဝတ္ထုံ ရက္ခိတွာ နိသိန္နံ ပဿိ. အထ သာမဏေရော တဿာ သန္တိကံ မဂ္ဂပုစ္ဆနတ္ထာယ ဂစ္ဆိ. အထ ဒဟရိတ္ထီ သာမဏေရံ ပုစ္ဆိ,-ကုတော အာဂတောသီတိ. कहते हैं कि रतनपुर निवासी एक श्रामणेर ने यह सुनकर कि "अरिमर्दन नगर में स्त्रियाँ भी शब्द-नीति (व्याकरण) में अत्यंत कुशल हैं", यह सोचा कि "मैं वहाँ जाकर देखूँगा" और वह अरिमर्दन नगर गया। तब मार्ग के बीच में अरिमर्दन नगर के समीप उसने एक युवती को कपास के खेत की रक्षा करते हुए बैठे देखा। तब श्रामणेर मार्ग पूछने के लिए उसके पास गया। तब युवती ने श्रामणेर से पूछा—"आप कहाँ से आए हैं?" သာမဏေရော အာဟ,-ရတနပူရတော အဟံ အာဂစ္ဆတီတိ. ကုဟိံ ဂတောသီတိ ဝုတ္တေ အရိမဒ္ဒနနဂရံ ဂစ္ဆတီတိ အာဟ. အထ ဒဟရိတ္ထီ ဧဝမာဟ,-တွံ ဘန္တေ သဒ္ဒယောဂဝိနိစ္ဆယံ အနုပဓာရေတွာ ကထေသိ, အမှယောဂဋ္ဌာနေ ဟိ တွံ နာမ ယောဂသဒ္ဒေန ယောဇေတွာ ကထေသိ, နနု ပဏ္ဍိတာနံ ဝစနေန နာမ ပရိပုဏ္ဏတ္ထေန အဝိရုဒ္ဓသဒ္ဒနယေန ပုဏ္ဏိန္ဒုသင်္ကာသေန ဘဝိတဗ္ဗန္တိ. အထ သာမဏေရော ခေတ္တဝတ္ထူနိ ရက္ခန္တီ ဒုဂ္ဂတာ ဒဟရိတ္ထီပိ တာဝ သဒ္ဒနယကောဝိဒါ ဟောတိ, ကိမင်္ဂံ ပန ဘောဂသမ္ပန္နာ မဟလ္လကိတ္ထိယောတိ လဇ္ဇိတွာ တတောယေဝ ပဋိနိဝတ္တိတွာ ပစ္စာဂမာသီတိ. श्रामणेर ने कहा—"मैं रतनपुर से आ रहा हूँ (आगच्छति)।" "कहाँ जा रहे हैं?" पूछने पर उसने कहा—"अरिमर्दन नगर जा रहा हूँ (गच्छति)।" तब युवती ने इस प्रकार कहा—"भन्ते! आपने शब्द-योग के निश्चय पर विचार किए बिना बात की है; 'अम्ह' (अस्मद्) योग के स्थान पर आपने 'नाम' योग के शब्द से जोड़कर बात की है। क्या विद्वानों के वचन को पूर्ण अर्थ वाला, अविरुद्ध शब्द-नीति वाला और पूर्ण चन्द्रमा के समान नहीं होना चाहिए?" तब श्रामणेर यह सोचकर लज्जित हो गया कि "खेत की रक्षा करने वाली एक निर्धन युवती भी जब शब्द-नीति में इतनी कुशल है, तो फिर ऐश्वर्यशाली कुलीन स्त्रियों का क्या कहना!" और वह वहीं से लौटकर वापस आ गया। ဣဒံ မရမ္မမဏ္ဍလေ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌေ အရိမဒ္ဒနနဂရေ ထေရပရမ္ပရဝသေန သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह म्यानमार मण्डल के तम्बदीप राष्ट्र के अरिमर्दन नगर में थेर-परम्परा के माध्यम से शासन (बुद्ध धर्म) की प्रतिष्ठा है। ဣဒါနိ မရမ္မမဏ္ဍလေယေဝ ဇေယျဝဍ္ဎနရဋ္ဌေ ကေတုမတီနဂရေ သာသနဝံသံ ဝက္ခာမိ. अब मैं म्यानमार मण्डल के ही जेय्यवड्ढन राष्ट्र के केतुमती नगर में शासन-वंश का वर्णन करूँगा। ကလိယုဂေ ဟိ ဒွိသတ္တတာဓိကေ အဋ္ဌဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ဇေယျဝဍ္ဎနရဋ္ဌေ ကေတုမတီနဂရေ မဟာသိရိဇေယျသူရော နာမ ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. ဧကံ အတိဆေကံ ဒေဝနာဂ နာမကံ ဧကံ ဟတ္ထိံ နိဿာယ ဝိဇိတံ ဝိတ္ထာရမကာသိ. တဿ ပန ရညော ကာလေ ကလိယုဂေ ဒွိနဝုတာဓိကေ အဋ္ဌဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ မဟာပရက္ကမော နာမ ထေရော သီဟဠဒီပတော နာဝါယ အာဂန္တွာ ကေတုမတီနဂရံ သမ္ပတ္တော. ရာဇာ စ ဒွါရာ ဝတီနဂရဿ [Pg.91] ဒက္ခိဏဒိသာဘာဂေ မဟာဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တဿ အဒါသိ နိစ္စဘတ္တမ္ပိ. တသ္မိဉ္စ ဝိဟာရေ သီမံ သမ္မန္နိတွာ တိဿံ သီမာယံ တုလာဝသေန အတ္တနာ သမံ ကတွာ လောဟမယဗုဒ္ဓပ္ပဋိဗိမ္ဗံ ကာရာပေသိ. တဉ္စ ဗုဒ္ဓပ္ပဋိဗိမ္ဗိံ သမ္ပတ္တလင်္ကာဒီပန္တိ နာမေန ပါကဋံ အဟောသိ. कलियुग के ८७२ वर्ष बीतने पर जेय्यवड्ढन राष्ट्र के केतुमती नगर में महासिरिजेय्यसूरो नामक राजा ने राज्य किया। उसने 'देवनाग' नामक एक अत्यंत चतुर हाथी के सहारे अपने विजित क्षेत्र का विस्तार किया। उस राजा के समय में, कलियुग के ८९२ वर्ष बीतने पर, महापरक्कम नामक थेर सिंहल द्वीप से नौका द्वारा आकर केतुमती नगर पहुँचे। राजा ने द्वारवती नगर के दक्षिण दिशा के भाग में एक महाविहार बनवाकर उन्हें दान दिया और नित्य भोजन (नित्यभत्त) की व्यवस्था भी की। उस विहार में सीमा का निर्धारण करके, उस सीमा में तुला (तराजू) के द्वारा अपने वजन के बराबर लोहे की बुद्ध-प्रतिमा बनवाई। वह बुद्ध-प्रतिमा 'सम्पत्तलंकादीप' के नाम से प्रसिद्ध हुई। တဿ ရညော ကာလေ သုရာမေရယသိက္ခာပဒံ ပဋိစ္စ ဝိပါဒေါ အဟောသိ. ကထံ. ဗီဇတော ပဋ္ဌာယာတိ သမ္ဘာရေ ပဋိယာ ဒေတွာ စာဋိယံ ပက္ခိတ္တကာလတော ပဋ္ဌာယ တာလနာလိကေရာဒီနံ ပုပ္ဖရသော ပုပ္ဖတော ဂလိတာဘိနဝကာလတော ပဋ္ဌာယ စ န ပါတဗ္ဗောတိ ကင်္ခါဝိတရဏီဋီကာဒီသု ဝုတ္တဝစနေ အဓိပ္ပာယံ ဝိပလ္လာသတော ဂဟေတွာ တာလနာလိကေရာဒီနံ ရသော ဂလိတာဘိနဝတော ပဋ္ဌာယ ပိဝိတုံ န ဝဋ္ဋတီတိ ဧကစ္စေ ဝဒန္တိ. ဧကစ္စေ ပန ဧဝံ ဝဒန္တိ,–တာလနာလိကေရာဒီနံ ရသော ဂလိတာဘိနဝကာလေ ပိဝိတုံ ဝဋ္ဋတီတိ. उस राजा के समय में सुरा-मेरय (मद्यपान निषेध) शिक्षापद को लेकर विवाद हुआ। कैसे? "बीज से लेकर" अर्थात् सामग्री तैयार करके बर्तन में डालने के समय से लेकर, और ताड़-नारियल आदि का पुष्प-रस पुष्प से टपकने के एकदम नए समय से लेकर नहीं पीना चाहिए—'कंखावितरणी-टीका' आदि में कहे गए वचनों के अभिप्राय को विपरीत रूप से ग्रहण करके कुछ लोग कहते हैं कि ताड़-नारियल आदि का रस टपकने के एकदम नए समय से ही पीना उचित नहीं है। परन्तु कुछ लोग इस प्रकार कहते हैं—ताड़-नारियल आदि का रस टपकने के एकदम नए समय में पीना उचित है। တတ္ထ ပုဗ္ဗပက္ခေ အာစရိယာနံ အယမဓိပ္ပာယော,– वहाँ पूर्वपक्ष के आचार्यों का यह अभिप्राय है— ဗီဇတော ပဋ္ဌာယာတိ ဧတ္ထ သမ္ဘာရေ ပဋိယာဒေတွာ စာဋိယံ ပက္ခိတ္တကာလတော ပဋ္ဌာယ န ပါတဗ္ဗော. တာလနာလိကေရာဒီနံ ပုပ္ဖရသော စ ဂလိတာဘိနဝကာလတောယေဝ န ပါတဗ္ဗောတိ. "बीज से लेकर" यहाँ सामग्री तैयार करके बर्तन में डालने के समय से लेकर नहीं पीना चाहिए। और ताड़-नारियल आदि का पुष्प-रस टपकने के एकदम नए समय से ही नहीं पीना चाहिए। အယံ ပန အပရပက္ခေ အာစရိယာနမဓိပ္ပာယော,– यह तो दूसरे पक्ष के आचार्यों का अभिप्राय है— ဗီဇတော ပဋ္ဌာယာတိ ဧတ္ထ သမ္ဘာရေ ပဋိယာဒေတွာ စာဋိယံ ပက္ခိတ္တကာလတော ပဋ္ဌာယ န ပါတဗ္ဗော. တာလနာလိကေရာဒီနံ သမ္ဘာရေဟိ ပဋိယာဒိတော ပုပ္ဖရသော ပုပ္ဖတော ဂလိတာဘိနဝကာလတော န ပါတဗ္ဗောတိ. "बीज से लेकर" (बीजतो पट्ठाय) यहाँ सामग्री तैयार कर घड़े में डालने के समय से लेकर नहीं पीना चाहिए। ताड़, नारियल आदि की सामग्रियों से तैयार पुष्प-रस (फूलों का रस) फूल से ताज़ा टपकने के समय से ही नहीं पीना चाहिए। ဧဝံ တာလနာလိကေရာဒီနံ ရသော ဂလိတာဘိနဝကာလတော ပဋ္ဌာယ ပါတုံ ဝဋ္ဋတိ န ဝဋ္ဋတီတိ ဝိဝါဒံ ကရောန္တာနံ မဇ္ဈေ နိသီဒိတွာ သမ္ပတ္တလင်္ကော မဟာပရက္ကမတ္ထေရော တာဒိသော ပိဝိတုံ ဝဋ္ဋတီတိ ဝိနိစ္ဆိန္ဒိ, သုရာဝိနိစ္ဆယဉ္စ နာမ ဂန္ထံ အကာသိ[Pg.92]. ဧဝံ ကေတုမတီနဂရံ မာပေန္တံ မဟာသိရိဇေယျသူရံ နာမ ရာဇာနံ နိဿာယ ကေတုမတိယံ သာသနံ ပတိဋ္ဌဟိ. इस प्रकार ताड़, नारियल आदि का रस ताज़ा टपकने के समय से पीना उचित है या नहीं, इस विषय पर विवाद करने वालों के बीच बैठकर लंका से आए महापरक्कम थेर ने निर्णय दिया कि वैसा (रस) पीना उचित है, और उन्होंने 'सुराविनिच्छय' नामक ग्रंथ की रचना की। इस प्रकार केतुमती नगर का निर्माण करने वाले महासिरिजेय्यसूर नामक राजा के आश्रय में केतुमती में शासन प्रतिष्ठित हुआ। ဣဒံ မရမ္မမဏ္ဍလေယေဝ ကေတုမတီနဂရေ यह मरम्म मण्डल के केतुमती नगर में ही— သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. शासन की प्रतिष्ठा है। ဣဒါနိ မရမ္မမဏ္ဍလေ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌေယေဝ ခန္ဓပုရသာသနဝံသံ ဝက္ခာမိ. अब मैं मरम्म मण्डल के तम्बदीप राष्ट्र में ही खन्धपुर के शासन-वंश का वर्णन करूँगा। ကလိယုဂေ ဟိ စတုသဋ္ဌာဓိကေ ဆဝဿသတေ တယော ဘာတိကာ ကိတ္တိတရနာမကံ ရာဇာနံ ရဇ္ဇတော စာဝေတွာ ခန္ဓပုရနဂရေ ရဇ္ဇံ ကာရေသုံ. တဒါ ကိတ္တိတရနာမကဿ ရညော ဧကော ပုတ္တော စီနရဋ္ဌိန္ဒရာဇာနံ ယာစိတွာ ဗဟူဟိ သေနင်္ဂေဟိ ခန္ဓပုရနဂရံ သမ္ပရိဝါရေတွာ အဋ္ဌာသိ. အထ တီသု ပိဋကေသု ဆေကံ ဧကံ မဟာထေရံ ပက္ကောသေတွာ မန္တေသုံ. ထေရော ဧဝမာဟ,– ဇနပဒါယတ္တမိဒံ ကမ္မံ သမဏာနံ န ကပ္ပတိ ဝိစာရေတုံ, အဟမ္ပိ သမဏော, နာဋကေဟိ ပန သဒ္ဓိံ မန္တေထာတိ. အထ နာဋကေ ပက္ကောသေတွာ မန္တေသုံ. နာဋကာပိ သစေ ကာရဏံ နတ္ထိ, ဧဝံ သတိ ဖလံ န ဘဝေယျ, သစေ ပူတိ နတ္ထိ, မက္ခိကာ န သန္နိပတေယျုန္တိ ဂီတံ ဂါယိတွာ ဥဒကေ ကီဠန္တိ. कलियुग ६६४ में तीन भाइयों ने कित्तितर नामक राजा को राज्य से च्युत कर खन्धपुर नगर में राज्य किया। तब राजा कित्तितर के एक पुत्र ने चीन देश के राजा से याचना कर बहुत सी सेना के साथ खन्धपुर नगर को घेर लिया। तब उन्होंने तीनों पिटकों में कुशल एक महाथेर को बुलाकर परामर्श किया। थेर ने ऐसा कहा— "यह कार्य जनपद (जनता) के अधीन है, श्रमणों के लिए इस पर विचार करना उचित नहीं है, मैं भी श्रमण हूँ, अतः आप नटों (अभिनेताओं) के साथ परामर्श करें।" तब उन्होंने नटों को बुलाकर परामर्श किया। नटों ने भी यह गीत गाते हुए जल-क्रीड़ा की— "यदि कारण नहीं है, तो फल नहीं होगा; यदि सड़न नहीं है, तो मक्खियाँ एकत्र नहीं होंगी।" အထ တေစ တယော ဘာတိကာ တံ သုတွာ ကိတ္တိတရနာမကံ ရာဇာနံ ဗန္ဓနာဂါရတော ဂဟေတွာ မာရေတွာ ဣဒါနိ ယံ ရဇ္ဇေ ဌပယိဿာမာတိ စိန္တေတွာ တုမှေ ဂစ္ဆထ, အယံ တဿ သီသော, ဣဒါနိ ဧသ ပရလောကံ ဂတောတိ သီသံ ဒဿေသုံ. အထ စီနရဋ္ဌသေနာယောပိ ဣဒါနိ ရာဇဝံသိကော နတ္ထိ, တေ နဟိ ယုဇ္ဈိတုံ န ဣစ္ဆာမ, ယံ ရဇ္ဇေ ဌပယိဿာမာတိ ကတွာ မယံ အာဂတာ, ဣဒါနိ သော နတ္ထီတိ ဝတွာ နိဝတ္တေတွာ အဂမံသု. तब उन तीनों भाइयों ने वह सुनकर राजा कित्तितर को कारागार से निकालकर मार दिया और यह सोचकर कि "अब हम किसे राज्य पर बिठाएँगे?", उन्होंने (चीनी सेना से) कहा— "तुम जाओ, यह उसका सिर है, अब वह परलोक सिधार गया है" और सिर दिखाया। तब चीन देश की सेना ने भी कहा— "अब कोई राजवंशी नहीं बचा है, हम युद्ध करना नहीं चाहते, हम जिसे राज्य पर बिठाने आए थे, अब वह नहीं रहा," ऐसा कहकर वे लौट गए। သော စ ထေရော နာဋကေဟိ သဒ္ဓိံ မန္တေထာတိ ဧတ္တကမေဝ ဝုတ္တတ္တာ ဘိက္ခုဘာဝတော န မောစေတီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ဝုတ္တဉ္စေတံ,– और उस थेर ने "नटों के साथ परामर्श करें" केवल इतना ही कहा था, इसलिए उन्हें भिक्षु-भाव से च्युत नहीं माना जाना चाहिए। और यह कहा गया है— ပရိယာယောစ အာဏတ္တိ, တတိယေ ဒုတိယေ ပန; အာဏတ္တိယေဝ သေသေသု, ဒွယမေတံ န လဗ္ဘတီတိ. "पर्याय (परोक्ष) और आज्ञप्ति (प्रत्यक्ष आदेश) तीसरे और दूसरे (पाराजिका) में होते हैं; शेष में केवल आज्ञप्ति होती है, ये दोनों (पाराजिका के संदर्भ में) यहाँ प्राप्त नहीं होते।" တသ္မိံ ပန ခန္ဓပုရေ အရိမဒ္ဒနနဂရေ အရဟန္တဂဏဝံသိကာ ဆပ္ပဒဂဏဝံသိကာ အာနန္ဒ ဂဏဝံသိကာ စ ထေရာ ဗဟဝေါ ဝသန္တိ. တေဟိ ပန ကတဂန္ထော နာမ ကောစိ နတ္ထီတိ. उस खन्धपुर में अरिमद्दन नगर के अरहन्त-गण-वंशीय, छप्पद-गण-वंशीय और आनन्द-गण-वंशीय बहुत से थेर रहते थे। किन्तु उनके द्वारा रचित कोई ग्रन्थ नहीं है। ဣဒံ ခန္ဓပုရေ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह खन्धपुर में शासन की प्रतिष्ठा है। ဣဒါနိ မရမ္မမဏ္ဍလေ တမ္ဗဒီပရေဋ္ဌေယေဝ ဝိဇယပုရေ သာသနဝံသံ ဝက္ခာမိ. अब मैं मरम्म मण्डल के तम्बदीप राष्ट्र में ही विजयपुर के शासन-वंश का वर्णन करूँगा। ကလိယုဂေ ဟိ စတုသတ္တတာဓိကေ ဆဝဿသတေ သီဟသူရော နာမ ရာဇာ ဝိဇယပုရံ မာပေသိ. တတော ပစ္ဆာ ဒွီသု သံဝစ္ဆရေသု အတိက္ကန္တေသု စမုံနဒိယံ မတသေတိဘံ ဧကံ လဘိတွာ ဧကသေတိဘိန္နောတိ တဿ နာမံ ပါကဋံ အဟောသိ. တဿ ရညော ကာလေ ဝိဇယပုရေ သီလဝန္တာ လဇ္ဇီပေသလာ ဘိက္ခူ ဗဟဝေါ နတ္ထိ. အရိမဒ္ဒနနဂရတော အနုရုဒ္ဓရာဇကာလေ ရာဇဘယေန နိလီယိတွာ အဝသေသာ သမဏကုတ္တကာယေဝ ဗဟဝေါ အတ္ထိ. ပစ္ဆာ စူဠအရဟန္တတ္ထေရဒိဗ္ဗစက္ခုတ္ထေရာနံ အာဂတကာလေယေဝ လဇ္ဇီပေသလာ ဘိက္ခူ ဗလဝန္တာ ဟုတွာ ဂဏံ ဝဍ္ဎာပေသုံ. ရာဇာ စ ဒိဗ္ဗစက္ခုတ္ထေရံ အန္တေပုရံ ပဝေသေတွာ ဒေဝသိကံ ပိဏ္ဍပါတေန ဘောဇေသိ. အနုရုဒ္ဓရညာ တမ္ဗုလမဉ္ဇူသာယံ ဌပေတွာ ပူဇိတာ သတ္တ ဓာတုယော လဘိတွာ တာသံ ပဉ္စဓာတုယော စညိင်္ခုစေတိယေ နိဓာနံ အကာသိ. အဝသေသာ ပန ဒွေ ဓာတုယော ပုညဿ နာမ အမစ္စဿ ပူဇနတ္ထာယ နိယျာဒေသိ. သောစ အမစ္စော ဇေယျပုရေ ပုညစေတိယေ နိဓာနံ အကာသိ. कलियुग ६७४ में सीहसूर नामक राजा ने विजयपुर का निर्माण कराया। उसके दो वर्ष बीतने के बाद, चमु नदी में एक मृत श्वेत हाथी पाकर उसका नाम 'एकसेतिभिन्' (एक श्वेत हाथी वाला) प्रसिद्ध हुआ। उस राजा के काल में विजयपुर में शीलवान, लज्जी और प्रियशील भिक्षु बहुत नहीं थे। अरिमद्दन नगर से अनुरुद्ध राजा के समय में राजा के भय से छिपकर आए हुए शेष 'श्रमण-वेषधारी' (श्रमणकुत्तक) ही बहुत थे। बाद में चूल-अरहन्त थेर और दिब्बचक्खु थेर के आने पर ही लज्जी और प्रियशील भिक्षु बलवान हुए और उन्होंने गण की वृद्धि की। राजा ने दिब्बचक्खु थेर को अन्तःपुर में प्रवेश कराकर प्रतिदिन पिण्डपात से भोजन कराया। राजा अनुरुद्ध द्वारा ताम्बूल-मंजूषा (पान के डिब्बे) में रखकर पूजित सात धातुएँ (अवशेष) प्राप्त कर, उनमें से पाँच धातुओं को चञ्ञिङ्खु चेतिय में प्रतिष्ठित किया। शेष दो धातुएँ पुञ्ञ नामक अमात्य को पूजा के लिए प्रदान कीं। उस अमात्य ने जेय्यपुर के पुञ्ञ चेतिय में उन्हें प्रतिष्ठित किया। တဒါ စ ကိရ သမဏကုတ္တကာ ဂဟဋ္ဌာဝိယ ရာဇရာဇမဟာမတ္တာနံ [Pg.94] သန္တိကေ ဥပဋ္ဌာနံ အကံသု. ကလိယုဂေ စတုအသီတာဓိကေ ဆဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ သီသသူရရညော ဇေဋ္ဌ ပုတ္တော ဥဇနော နာမ ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. သော ပန အဝပင်္ကျာ နာမကေ ဒေသေ စမ္ပကကဋ္ဌမယေ သတ္တဝိဟာရေ ကာရာပေသိ. ဒွိ ဝဿာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ ကာလေ တေ ဝိဟာရာ နိဋ္ဌံ အဂမံသု. और उस समय कहते हैं कि श्रमण-वेषधारी गृहस्थों की भाँति राजा और राज-महामात्यों की सेवा करते थे। कलियुग ६८४ आने पर राजा सीहसूर के ज्येष्ठ पुत्र उजन नामक राजा ने राज्य किया। उसने अवपङ्क्या नामक देश में चम्पक की लकड़ी से बने सात विहार बनवाए। ७०२ वर्ष के समय में वे विहार पूर्ण हुए। တေသု ဝိဟာရေသု စမ္ပကံ နာမ ပဓာနဝိဟာရံ အမစ္စပုတ္တဿ သုဓမ္မမဟာသာမိတ္ထေရဿ အဒါသိ. သော ပန ထေရော အရိမဒ္ဒနနဂရေ အရဟန္တတ္ထေရဿ ဝံသိကောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. उन विहारों में से 'चम्पक' नामक प्रधान विहार अमात्य-पुत्र सुधम्म-महासामि थेर को दिया। वह थेर अरिमद्दन नगर के अरहन्त थेर के वंशज माने जाने चाहिए। ဝေဠူဝနံ နာမ ပရိဝါရဝိဟာရံ ပန အာဘိဓမ္မိကဿ ဉာဏဓဇဿ နာမ ထေရဿ အဒါသိ. သောပိ အရဟန္တတ္ထေရဿ ဝံသိကော. 'वेळुवन' नामक अनुचर-विहार (परिवारा विहार) आभिधार्मिक ञाणधज नामक थेर को दिया। वे भी अरहन्त थेर के वंशज थे। ဇေတဝနံ နာမ ပရိဝါရဝိဟာရံ ပန သကလဝိနယပိဋကံ ဝါစုဂ္ဂတံ ကရောန္တဿ ဂုဏာရာမတ္ထေရဿ အဒါသိ. သော ပန ထေရော အရိမဒ္ဒနနဂရေယေဝ အာနန္ဒတ္ထေရဿ ဝံသိကော. 'जेतवन' नामक अनुचर-विहार सकल विनयपिटक को कण्ठस्थ करने वाले गुणाराम थेर को दिया। वह थेर अरिमद्दन नगर के ही आनन्द थेर के वंशज थे। ကုလဝိဟာရံ နာမ ပရိဝါရဝိဟာရံ အာဒိစ္စရံသိနော နာမ ထေရဿ အဒါသိ. သောပိ အာနန္ဒတ္ထေရဿ ဝံသိကောယေဝ. 'कुलविहार' नामक अनुचर-विहार आदिच्चरंसि नामक थेर को दिया। वे भी आनन्द थेर के ही वंशज थे। သုဝဏ္ဏဝိဟာရံ နာမ ပရိဝါရဝိဟာရံ သုဓမ္မာလင်္ကာရဿ နာမ ထေရဿ အဒါသိ. သောပိ အာနန္ဒတ္ထေရဝံသိကောယေဝ. 'सुवण्णविहार' नामक अनुचर-विहार सुधम्मालंकार नामक थेर को दिया। वे भी आनन्द थेर के वंशज ही थे। နီစဂေဟံ နာမ ပရိဝါရဝိဟာရံ ဝရပတ္တဿ နာမ ထေရဿ အဒါသိ. သော ပန သုဓမ္မမဟာသာမိတ္ထေရဿ အန္တေဝါသိကော. नीचगेह नामक परिवार-विहार वरपत्त नामक स्थविर को दिया। वे सुधम्म महासामी स्थविर के अन्तेवासी थे। ဒက္ခိဏကောဋိံ နာမ ပရိဝါရဝိဟာရံ သိရိပုညဝါသိနော နာမ ထေရဿ အဒါသိ. သောပိ သုဓမ္မမဟာသာမိတ္ထေရဿ အန္တေဝါသိကောတိ. (उन्होंने) सिरिपुञ्ञवासी नामक स्थविर को दक्खिणकोटि नामक परिवार-विहार प्रदान किया। वे भी सुधम्ममहास्वामि-स्थविर के अन्तेवासी (शिष्य) थे। တေသံ ဝိဟာရာနံ ဧသန္နဋ္ဌာနေ ရာဇာ သယမေဝ ဟတ္ထေန ဂဟေတွာ မဟာဗောဓိရုက္ခံ ရောပေသိ. တေသံ ဝိဟာရာနံ ပဋိ ဇဂ္ဂနတ္ထာယ ဗဟူနိပိ ခေတ္တဝတ္ထူနိ အဒါသိ အာရာမဂေါပက ကုလာနိ စ. उन विहारों के समीपवर्ती स्थान पर राजा ने स्वयं अपने हाथों से महाबोधि वृक्ष का रोपण किया। उन विहारों की देख-रेख के लिए उन्होंने बहुत से खेत-मैदान और आराम-रक्षक (बगीचे की रक्षा करने वाले) कुल भी प्रदान किए। တေသံ [Pg.95] ပန ထေရာနံ သုဓမ္မပုရာရိမဒ္ဒနပုရဘိက္ခုဝံသိကတ္တာလဇ္ဇိပေသလတာ ဝိညာတဗ္ဗာ. တေနေဝ ဝိဇယပုရေ သာသနံ အတိဝိယ ပရိသုဒ္ဓံ အဟောသီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. उन स्थविरों की सुधम्मपुर और अरिमद्दनपुर के भिक्षु-वंश से होने के कारण लज्जी-पेसलता (विनयशील और शीलवान होना) जाननी चाहिए। इसी कारण विजयपुर में शासन (बुद्ध शासन) अत्यंत परिशुद्ध हुआ, ऐसा समझना चाहिए। တေသမ္ပိ သိဿပရမ္ပရာ အနေကသဟဿပ္ပမာဏာ အဟေသုံ. ဧဝံ လဇ္ဇီပေသလာနံယော ဘိက္ခူနံ သန္တိကာ ကေစိ သဒ္ဓိဝိဟာရိကာ ကီဋာဂိရိမှိ အဿဇိပုနဗ္ဗသုကာဝိယ အလဇ္ဇီ ဒုဿီလာ ဥပ္ပဇ္ဇိံသု, သေယျထာပိ နာမ မဓုရမ္ဗရုက္ခတော အမ္ဗိလဖလန္တိ. တေ ပန ဗဟုအနာစာရံ စရိံသုယေဝ. ဣဒံ ပန တေသံ မူလဥပ္ပတ္တိ ဒဿနံ. उनकी शिष्य-परम्परा भी अनेक सहस्रों की संख्या में थी। इस प्रकार उन लज्जी और शीलवान भिक्षुओं के पास से कुछ सार्धविहारिक (शिष्य), कीटागिरि के अस्सजि और पुनब्बसु की भाँति, निर्लज्ज और दुःशील उत्पन्न हुए, जैसे मधुर आम के वृक्ष से खट्टा फल। उन्होंने बहुत से अनाचार किए। यह उनकी उत्पत्ति का मूल विवरण है। ရာဇာ ဟိ တဒါ တေသံ ဝိဟာရာနံ ပဋိဇဂ္ဂနတ္ထာယ ဗဟူနိ ခေတ္တဝတ္ထူနိ အဒါသိ. တေသု ခေတ္တဝတ္ထူသု ဗလိဝိစာရဏတ္ထာယ သုဓမ္မမဟာသာမိတ္ထေရော ဧကစ္စေ ဘိက္ခူ အာရက္ခဏဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. အာရက္ခဏဘိက္ခူ ပန ဓမ္မာနုလောမဝသေန ကဿကာနံ ဩဝါဒါပေသိ, ခေတ္တဝတ္ထုသာမိဘာဂမ္ပိ ပဋိဂ္ဂဏှာပေသိ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ ခေတ္တဝတ္ထူနိ ပဋိစ္စ ဘိက္ခူ ဝိဝါဒံ အကံသု. အထ တံ ဝိဝါဒံ သုတွာ သာသနဓရတ္ထေရော စ ဒွေ ပရက္ကမတ္ထေရာ စ တတော နိက္ခမိံသု. နိက္ခမိတွာ သာသနဓရတ္ထေရော ခဏိတ္တိ ပါဒပဗ္ဗတေ နိသီဒိ. ဒွေ ပရက္ကမတ္ထေရာ စ စင်္ဂကိင်္ဂပဗ္ဗတကန္ဒရေ နိသီဒိံသု. တေသဉှိ နိဝါသဋ္ဌာနတ္တာ ယာဝဇ္ဇတနာ တံ ဌာနံ ပရက္ကမဋ္ဌာနန္တိ ပါကဋံ အဟောသိ. တေ ပန ထေရာ ဧကစာရာတိ ဝေါဟာရိံသု. အဝသေသာ ပန ဘိက္ခူ ဂါမဝါသီဗဟုစာရာတိ ဝေါဟာရိံသု. တတော ပဋ္ဌာယ အရညဝါသီဂါမဝါသီဝသေန ဝိသုံ ဂဏာ ဟောန္တိ. ဝိဟာရဿ နိန္နာနံ ခေတ္တဝတ္ထူနံ ဗလိပ္ပဋိဂ္ဂါဟကဘိက္ခူနမ္ပိ သံဃဇာတိသမညာ အဟောသိ. राजा ने तब उन विहारों की देख-रेख के लिए बहुत से खेत और मैदान दिए। उन खेतों में उपज (बलि) के प्रबंधन के लिए सुधम्ममहास्वामि-स्थविर ने कुछ भिक्षुओं को रक्षक के रूप में नियुक्त किया। रक्षक भिक्षुओं ने धर्म के अनुसार किसानों को उपदेश दिया और खेतों के स्वामी का हिस्सा भी ग्रहण करवाया। उस समय खेतों को लेकर भिक्षुओं में विवाद हो गया। तब उस विवाद को सुनकर शासनधर-स्थविर और दो पराक्रम-स्थविर वहाँ से निकल गए। निकलकर शासनधर-स्थविर खणित्ति पर्वत की तलहटी में रहने लगे। और दो पराक्रम-स्थविर चङ्गकिङ्ग पर्वत की कन्दरा (गुफा) में रहने लगे। उनके निवास स्थान होने के कारण आज तक वह स्थान 'पराक्रम-स्थान' के नाम से प्रसिद्ध है। वे स्थविर 'एकचारी' (अकेले रहने वाले) कहलाए। शेष भिक्षु 'ग्रामवासी-बहुचारी' कहलाए। तब से आरण्यवासी (वनवासी) और ग्रामवासी के रूप में अलग-अलग गण हो गए। विहार के विभिन्न खेतों की उपज ग्रहण करने वाले भिक्षुओं की 'संघजाति' संज्ञा हुई। ကလိယုဂေ စတုဝဿာဓိကေ သတ္တသတေ ဥဇနဿ ရညော ဓရမာနဿေဝ ကနိဋ္ဌဘာတိကော ကျေစွာ နာမ ရာဇာ ကုမာရော ရဇ္ဇံ ဂဏှိ. कलियुग के सात सौ चार (704) वर्ष बीतने पर, राजा उजन के जीवित रहते हुए ही, उनके छोटे भाई क्येच्वा नामक राजकुमार ने राज्य ग्रहण किया। အယံ ပန တဿ အဋ္ဌုပ္ပတ္တိ,– ဥဇနော နာမ ရာဇာ တွံ သမုဒ္ဒမဇ္ဈံ [Pg.96] နာမ ဂါမံ ဂန္တွာ တတ္ထ နိသီဒိတွာ တတြုပ္ပာဒဗလိံ ဘုဉ္ဇာဟီတိ နိယျာဒေသိ. သော ပန ရာဇကုမာရော လုဒ္ဒကမ္မေသုယေဝ အဘိရမ္မဏသီလော. ဧကသ္မိံ သမယေ ပိဂဝံ ဂန္တွာ ပစ္စာဂတကာလေ ရတ္တိယံ သုပိနံ ပဿိ,– သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော အာဂန္တွာ ဥပေါသထသီလံ သမာဒိယာဟိ, ဧဝံ သတိ အစိရေနေဝ သေတိဘေ လဘိဿသတီတိ ဝတွာ တာဝတိံသဘဝနံ ပုန ဂတောတိ. यह उसकी कथा की उत्पत्ति है—उजन नामक राजा ने (उससे) कहा कि तुम समुद्रमज्झ नामक गाँव में जाकर वहाँ रहो और वहाँ की उपज का उपभोग करो। वह राजकुमार शिकार (लुब्धक कर्मों) में ही रुचि रखने वाला था। एक समय शिकार पर जाकर लौटते समय उसने रात में एक स्वप्न देखा—देवराज शक्र ने आकर कहा, "उपोसथ शील ग्रहण करो, ऐसा करने पर शीघ्र ही तुम्हें श्वेत हाथी प्राप्त होंगे," ऐसा कहकर वे पुनः तावतिंस भवन चले गए। သောစ ရာဇကုမာရော တတော ပဋ္ဌာယ ဥပေါသထသီလံ သမာဒိယိ. ပစ္ဆာ ကာလေပိ အတ္တနော ဟတ္ထေ ဂုထေန ကိလိန္နံ ဘဝတီတိ ပုန သုပိနံ ပဿိ. သော အစိရေနေဝ ပဉ္စ သေတိဘေ လဘိ. အထ ဧကော အမစ္စော ဂန္တွာ ရညော တမတ္ထံ အာရောစေသိ. ရာဇာ တုဋ္ဌစိတ္တော ဟုတွာ မမ ကိရ ဘောန္တော ကနိဋ္ဌဘာတိကော ပဉ္စ သေတိဘေ လဘီတိ ရာဇပုရိသာနံ မဇ္ဈေ သံဝဏ္ဏေသိ. အမစ္စော ပုန ရာဇကုမာရဿ သန္တိကံ ဂန္တွာ တမတ္ထံ အာရောစေသိ. ရာဇကုမာရောပိ မမ ဘာတိကော ရာဇာ အကထိတပုဗ္ဗံ ဝါစာပေယျံ ဝဒတီတိ အာရာဓယိတွာ ပုန ဂန္တွာ တမတ္ထံ ရညော အာရောစာပေသိ. ရာဇာပိ တထေဝ ဝဒတီတိ. တံ သုတွာ ရာဇကုမာရော ဘိယျောသော ပသီဒိ. उस राजकुमार ने तब से उपोसथ शील ग्रहण किया। बाद में उसने फिर स्वप्न देखा कि उसका अपना हाथ विष्ठा (मल) से सना हुआ है। उसे शीघ्र ही पाँच श्वेत हाथी प्राप्त हुए। तब एक अमात्य ने जाकर राजा को यह बात बताई। राजा ने प्रसन्नचित्त होकर राजपुरुषों के बीच प्रशंसा की, "हे महानुभावों! मेरे छोटे भाई को पाँच श्वेत हाथी प्राप्त हुए हैं।" अमात्य ने पुनः राजकुमार के पास जाकर यह बात बताई। राजकुमार ने भी यह सोचकर कि "मेरे भाई राजा ने पहले कभी न कही गई प्रिय वाणी कही है," प्रसन्न होकर पुनः राजा को यह बात कहलवाई। राजा ने भी वैसा ही कहा। यह सुनकर राजकुमार और भी अधिक प्रसन्न हुआ। ကသ္မာ ပန ဥဇနော ရာဇာ ကိတ္တိတရံ နာမ ရာဇကုမာရံ ကနိဋ္ဌဝေါဟာရေန န ဝဒတီတိ. ဧကသေတိဘိန္ဒော ဟိ ရာဇာ အပရဿ ရညော ဒေဝိံ ဂဗ္ဘိနိံ အာနေတွာ အဂ္ဂမဟေသိဋ္ဌာနေ ဌပေသိ, ဌပေတွာ အစိရေနေဝ ဥဇနံ ဝိဇာယိ, တေနေဝ န ဥဇနော ဧကသေတိဘိန္ဒဿ ပုတ္တော, ကိတ္တိတရော နာမ ရာဇကုမာရောယေဝ ဧကသေတိဘိန္ဒဿ ပုတ္တော, တသ္မာ တံ ကာရဏံ ပဋိစ္စ သော တံ ကနိဋ္ဌဝေါဟာရေန န ဝဒတီတိ. राजा उजन, कित्तितर नामक राजकुमार को 'छोटा भाई' कहकर क्यों नहीं बुलाते थे? क्योंकि राजा एकसेतिभिन्द ने दूसरे राजा की गर्भवती देवी (रानी) को लाकर अग्र-महिषी के पद पर प्रतिष्ठित किया था, और प्रतिष्ठित करने के शीघ्र बाद ही उन्होंने उजन को जन्म दिया था, इसलिए उजन एकसेतिभिन्द के पुत्र नहीं थे, बल्कि कित्तितर नामक राजकुमार ही एकसेतिभिन्द के पुत्र थे; इसी कारण से वे उन्हें 'छोटा भाई' कहकर नहीं बुलाते थे। ကနိဋ္ဌော ပဉ္စသေတိဘေ လဘတီတိ သုတွာ ရာဇာ ဘာယိတွာ ကနိဋ္ဌဿ ရဇ္ဇံ ဥပနိယျာဒေသိ. ရာဇာ ရာဇဂေဟဿ ပစ္ဆိမဒွါရေန နိက္ခမိ. ကနိဋ္ဌော ပုရိမဒွါရေန ပါဝိသိ. ပဉ္စန္နံ ပန သေတိဘာနံ လဒ္ဓတ္တာ ပဉ္စသေတိဘိန္ဒောတိ ပါကဋော. မူလနာမံ ပနဿ [Pg.97] သီဟသူရောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. တဿ ရညော ကာလေ ဗဟူ အလဇ္ဇိနော ဂါမသာမန္တ ဝိဟာရေ ဝသိတွာ အနေကဝိဓံ အာနာစာရံ စရိံသု. သုဓမ္မပုရအရိမဒ္ဒနပုရတော ပရမ္ပရဝသေန အာဂတာ ဘိက္ခူပိ ဗဟူ လဇ္ဇိနော သိက္ခာကာမာ သန္တိ. "छोटा भाई पाँच श्वेत हाथी प्राप्त कर रहा है," यह सुनकर राजा ने डरकर छोटे भाई को राज्य सौंप दिया। राजा राजभवन के पश्चिमी द्वार से निकल गए और छोटा भाई मुख्य द्वार से प्रविष्ट हुआ। पाँच श्वेत हाथी प्राप्त करने के कारण वह 'पञ्चसेतिभिन्द' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसका मूल नाम 'सीहसूर' समझना चाहिए। उस राजा के काल में बहुत से निर्लज्ज भिक्षु गाँवों के समीपवर्ती विहारों में रहकर अनेक प्रकार के अनाचार करते थे। सुधम्मपुर और अरिमद्दनपुर से परम्परागत रूप से आए हुए बहुत से लज्जी और शिक्षा-प्रेमी भिक्षु भी थे। အထ တဿ ရညော ဘတ္တံ ပရိဘုဉ္ဇနကာလေ ဧကော သမဏကုတ္တကော အဋ္ဌ ပရိက္ခာရေ ဂဟေတွာ အာဂန္တွာ ရညော သမ္မုခေ အဋ္ဌာသိ. ကိမတ္ထာယ အာဂတောသီတိ ပုစ္ဆိတေ ပိဏ္ဍပါတတ္ထာယ အာဂတောမှီတိ အာဟ. အထ ရာဇာ သယံ ဘုဉ္ဇိဿာမီတိ အာရဘိတွာပိ အတိပ္ပသန္နတာယ ပန သုဝဏ္ဏပါတိယာ ပဋိယာဒိတံ သကလမ္ပိ ဘတ္တံ အဒါသိ. အထ ရာဇာ ဧဝံ စိန္တေသိ,– အယံ ဘိက္ခု ပိဏ္ဍပါတတ္ထာယ ဥပမဇ္ဈန္တိ ကယေဝ အာဂန္တွာ အဋ္ဌာသိ, န သော ပုထုဇ္ဇနဘိက္ခု, အထ ခေါ အဘိညာလာဘီ အရဟာ ဘဝေယျ, မမ ပုညတ္ထာယ အာဂတော ဘဝေယျ မံ အနုကမ္ပံ ဥပါဒါယာတိ. तब उस राजा के भोजन करने के समय एक ढोंगी श्रमण (श्रमणकुत्तक) आठ परिष्कारों को लेकर आया और राजा के सामने खड़ा हो गया। 'किसलिए आए हो?' पूछने पर उसने कहा, 'पिंडपात के लिए आया हूँ।' तब राजा ने स्वयं भोजन करने का आरम्भ करने पर भी, अत्यधिक प्रसन्नता के कारण सोने के पात्र में तैयार किया हुआ सारा भोजन उसे दे दिया। तब राजा ने ऐसा सोचा— 'यह भिक्षु पिंडपात के लिए दोपहर के समय ही आकर खड़ा हो गया है, यह कोई साधारण भिक्षु नहीं है, बल्कि अभिज्ञा प्राप्त अर्हत् होगा, मेरे पुण्य के लिए और मुझ पर अनुकम्पा करने के लिए आया होगा।' ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ ဧကံ ရာဇပုရိသံ အာဏာပေသိ တဿ ပစ္ဆာ အနုဂန္တွာ ဩလောကေတုံ. သော ပန သမဏကုတ္တကော သယံ အလဇ္ဇိဘူတတ္တာဝ အတ္တနော ဘရိယာ ပစ္စုဂ္ဂန္တွာ ပတ္တံ ဂဏှိ. တံ ဒိသွာ ရာဇပုရိသော ရညော သန္တိကံ ဂန္တွာ ပဌမမေဝ ဧဝံ စိန္တေသိ,– သစေ ယထာဘူတံ အာရောစေယျံ, ရညော ပသာဒေါ ဝိနဿေယျ, ဧဝံ ပန အနာရောစေတွာ ယထာ ရညော ပဿာဒေါ ဘိယျောသောမတ္တာယ ဘဝေယျ, မယှမ္ပိ လာဘော ဥပ္ပဇ္ဇေယျ, သမဏကုတ္တကောပိ ရာဇပရာဓတော ဝိမုစ္စေယျ, ဧဝံ အာရောစေဿာမီတိ. ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ အဟံ မဟာရာဇ တံ အနုဂန္တွာ ဩလောကေသိ, အထ မမ ဧဝံ ဩလောကေန္တဿဝ အန္တရဓာယီတိ အာရောစေသိ. ရာဇာ ဘိယျောသောမတ္တာယ ပသီဒိတွာ ဟတ္ထံ ပသာရေတွာ ယထာဟံ မညမိ, တထာ အဝိရဇ္ဈနမေဝတန္တိ တိက္ခတ္တုံ ဝါစံ နိစ္ဆာရေသိ, ရာဇပုရိသဿ စ ဒါတဗ္ဗံ အဒါသိ. ऐसा सोचकर उसने एक राजपुरुष को उसके पीछे जाकर देखने की आज्ञा दी। वह ढोंगी श्रमण स्वयं निर्लज्ज होने के कारण अपनी पत्नी के पास गया जिसने आगे आकर उसका पात्र ले लिया। उसे देखकर राजपुरुष ने राजा के पास जाकर पहले ऐसा सोचा— 'यदि मैं यथातथ्य बता दूँ, तो राजा की श्रद्धा नष्ट हो जाएगी; यदि मैं ऐसा न बताकर इस प्रकार बताऊँ जिससे राजा की श्रद्धा और अधिक बढ़ जाए, तो मुझे भी लाभ होगा और वह ढोंगी श्रमण भी राज-अपराध से मुक्त हो जाएगा, मैं ऐसा ही कहूँगा।' ऐसा सोचकर उसने कहा— 'महाराज! मैंने उसका पीछा किया और देखा, किन्तु मेरे देखते-देखते ही वह अंतर्धान हो गया।' राजा और अधिक प्रसन्न होकर हाथ फैलाकर तीन बार यह वचन बोला— 'जैसा मैंने सोचा था, वैसा ही हुआ (वह अचूक था)।' और उसने राजपुरुष को देने योग्य पुरस्कार दिया। တသ္မိံယေဝ ဒိဝသေ ဧကော အမစ္စော ရညော ပဏ္ဏာကာရတ္ထာယ [Pg.98] ဝေလာဟကံ နာမ ဧကံ တုရင်္ဂမံ အဒါသိ. အထ ရာဇာ မမ ပုညာနုဘာဝေန ဧသ လဒ္ဓေါတိ သမ္ပဟံသိ. တံ ပန တုရင်္ဂမံ အာရောဟိတွာ ဧကံ ဟတ္ထာရောဟံ ပါဇာပေသိ. အထ မဟာဇနဿ ဩလောကေန္တဿ ဟတ္ထာရောဟဿ သီသေဝေဋ္ဌနဒုဿံယေဝ ပဿိတွာ အာကာသေ ပက္ခန္ဓော ဗကောဝိယ ပညာယတိ. သော ပန တုရင်္ဂမော ပါတောဝ ဝိဇယပုရတော ဂစ္ဆန္တော ပဗ္ဗတဗ္ဘန္တရနဂရံ သာယနှသမယေ ပါပုဏိ. အဗ္ဘ ဝိဇဗ္ဘနအဿောတိပိ နာမံ အကာသိ. उसी दिन एक अमात्य ने राजा को उपहार स्वरूप 'बलाहक' नामक एक घोड़ा दिया। तब राजा ने हर्षित होकर सोचा कि यह मेरे पुण्यों के प्रभाव से प्राप्त हुआ है। उस घोड़े पर एक घुड़सवार को बिठाकर उसने उसे दौड़ाया। तब देखते हुए जनसमूह को घुड़सवार के सिर की पगड़ी का कपड़ा ही दिखाई दे रहा था और वह आकाश में उड़ते हुए बगुले के समान प्रतीत हो रहा था। वह घोड़ा प्रातःकाल विजयपुर से चलकर सायंकाल पर्वत के भीतर स्थित नगर में पहुँच गया। उसका नाम 'अभ्रविजृम्भण अश्व' (बादलों में छलाँग लगाने वाला घोड़ा) भी रखा गया। ဣစ္စေဝံ သမဏကုတ္တကာ ဒါရမ္ပိ ပေါသေသုံ, ပဂေဝ ဣတရံ အနာစာရံ. တေနေဝ တေ သမဏကုတ္တကာ ရညော မလ္လရင်္ဂမ္ပိ ပဝိသိတွာ မလ္လံ ယုဇ္ဈေသုံ. တေသု ပန သမဏကုတ္တကေသု ဩဝိစင်္ဂါခုံသံဃဇော နာမ သမဏကုတ္တကော မလ္လကမ္မေ အတိဝိယ ဆေကော အဓိကော. သော ကိရ သံဝစ္ဆရေ သံဝစ္ဆရေ ရညော မလ္လရင်္ဂေ ဇယိတွာ ပန္နရသ ဝါ ဝီသတိ ဝါ အဿေ ပဋိလဘီတိ. इस प्रकार वे ढोंगी श्रमण अपनी पत्नियों का भी भरण-पोषण करते थे, अन्य अनाचारों की तो बात ही क्या। इसी कारण वे ढोंगी श्रमण राजा के मल्ल-रंग (कुश्ती के अखाड़े) में प्रवेश कर कुश्ती भी लड़ते थे। उन ढोंगी श्रमणों में 'ओविचंगाखुं संघज' नामक ढोंगी श्रमण मल्ल-विद्या में अत्यंत कुशल और श्रेष्ठ था। वह प्रतिवर्ष राजा के मल्ल-रंग में जीतकर पंद्रह या बीस घोड़े प्राप्त करता था। ရတနပူရနဂရေ မလ္လကမ္မေ အတိဆေကော အဓိကော ဧကော ကမ္ဗောဇကုလော အတ္ထိ. သော ရတနပူရနဂရေ ဇေယျပုရနဂရ စ အတ္တနာ သမထာမံ မလ္လပုရိသံ အသဘိတွာ ဝိဇယ ပုရံ အာဂန္တွာ စမ္ပကဝိဟာရဿ ဒွါရသမီပေ မလ္လသဘာမဏ္ဍပေ ပဝိသိတွာ မလ္လကမ္မံ ကာတုံ ဣစ္ဆာမီတိ ရညော အာရောစေသိ. အထ ရာဇာ တံ သံဃဇံ အာမန္တေတွာ ဧဝမာဟ,- ဣဒါနိ ဘော တွံ ဣမိနာ သဒ္ဓိံ မလ္လယုဒ္ဓံ ကာတုံ သက္ခိဿသီတိ. အာမမဟာရာဇ ပုဗ္ဗေ အဟံ ဒဟရေ ဟုတွာ ကီဠနတ္ထာယယေဝ မလ္လကမ္မံ အကာသိံ, ဣဒါနိ ပန ဧကူနသတ္တတိဝဿော အဟံ ဣတော ပစ္ဆာ မလ္လယုဒ္ဓံ ကာတုံ သက္ခိဿာမိ ဝါ မာ ဝါတိ န ဇာနာမိ, ဣဒါနိ ပရပက္ခံ မလ္လပုရိသံ မလ္လကမ္မေန မာရေဿာမီတိ ဝဒတိ. रत्नपुर नगर में मल्ल-विद्या में अत्यंत निपुण और श्रेष्ठ एक कम्बोज कुल का व्यक्ति था। वह रत्नपुर नगर और जयपुर नगर में अपने समान बलशाली मल्ल न पाकर विजयपुर आया और चम्पक विहार के द्वार के समीप मल्ल-सभा मण्डप में प्रवेश कर राजा से निवेदन किया कि मैं कुश्ती लड़ना चाहता हूँ। तब राजा ने उस संघज को बुलाकर इस प्रकार कहा— 'हे भद्र! क्या अब तुम इसके साथ मल्ल-युद्ध कर सकोगे?' उसने कहा— 'हाँ महाराज! पहले मैं युवा होने के कारण केवल खेल के लिए मल्ल-युद्ध करता था, किन्तु अब मैं उनहत्तर (69) वर्ष का हूँ, इसके बाद मैं मल्ल-युद्ध कर पाऊँगा या नहीं, यह मैं नहीं जानता; अब मैं विपक्षी मल्ल को मल्ल-विद्या से मार डालूँगा।' အထ ရာဇူနံ မလ္လကမ္မံ နာမ ကီဠနတ္ထာယယေဝ ဘဝတိ, မာ မာရေတုံ ဥဿာဟံ ကရောဟီတိ ဝတွာ အညမညံ မလ္လယုဒ္ဓံ ကာရာပေသိ[Pg.99]. သပရိသဿ ရညော ဩလောကေန္တဿေဝ တေ မလ္လာကာရေန နစ္စိတွာ အညမညံ သမီပံ ဥပဂစ္ဆိံသု. အထ သံဃဇော မလ္လော ကမ္ဗောဇမလ္လဿ ပါဒေန ပဟရဏာကာရံ ဒဿေတွာ ဒက္ခိဏဟတ္ထမုဋ္ဌိနာ ကပါလေ ပဟာရံ အဒါသိ. အထ ကမ္ဗောဇမလ္လဿ မုခံ ပစ္ဆတော အဟောသိ. တဒါ သပရိသော ရာဇာ ဤဒိသာ ပန ဝိမုခတော မရဏမေဝ သေယျော ဣဒါနိ ပန ဣမံ ပဿိတုံ န ဝိသဟာမီတိ ဝဒတိ. ပုန သံဃဇော ဝါမဟတ္ထ မုဋ္ဌိနာ ပဟာရံ အဒါသိ. အထ ကမ္ဗောဇမလ္လဿ မုခံ ပရိဝဋ္ဋေတွာ ယထာ ပုဗ္ဗေ, တထာ ပတိဋ္ဌာသိ. तब राजा ने कहा— 'मल्ल-युद्ध केवल मनोरंजन के लिए होता है, मारने का प्रयास मत करो' और उन दोनों के बीच मल्ल-युद्ध करवाया। सपरिषद् राजा के देखते ही वे मल्लों की तरह नाचते हुए एक-दूसरे के समीप आए। तब संघज मल्ल ने कम्बोज मल्ल को पैर से प्रहार करने का अभिनय दिखाकर दाहिने हाथ की मुट्ठी से उसकी कनपटी पर प्रहार किया। तब कम्बोज मल्ल का मुख पीछे की ओर हो गया। तब सपरिषद् राजा ने कहा— 'ऐसी विकृति से तो मृत्यु ही श्रेष्ठ है, अब मैं इसे देख नहीं सकता।' पुनः संघज ने बाएँ हाथ की मुट्ठी से प्रहार किया। तब कम्बोज मल्ल का मुख घूमकर पहले की तरह (सीधा) हो गया। တသ္မိဉ္စ ကာလေ သပရိသော ခတ္တိယော တံ အစ္ဆရိယံ ဒိသွာ ဒွေ အဿေ တိံသမတ္တာနိ ဝတ္တာနိ သတကဟာပဏဉ္စ အဒါသီတိ. ဣဒဉ္စ ဝစနံ ပေါရာဏပေါတ္ထကေသု အာဂတတ္တာ သာဓုဇနာနဉ္စ သံဝေဇနိယဋ္ဌာနတ္တာ ဝုတ္တံ. ဌပေတွာ ဟိ သံဝေဂလာဘံ နတ္ထိ အညံ ကိဉ္စိ ပယောဇနန္တိ. उस समय सपरिषद् क्षत्रिय (राजा) ने उस आश्चर्य को देखकर दो घोड़े, लगभग तीस वस्त्र और सौ कार्षापण दिए। यह वृत्तांत प्राचीन पुस्तकों में आने के कारण और सज्जनों के लिए संवेग (वैराग्य) का स्थान होने के कारण कहा गया है। क्योंकि संवेग की प्राप्ति के अतिरिक्त इसका अन्य कोई प्रयोजन नहीं है। ကလိယုဂေ တေရသာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ ဝိဇယပုရေယေဝ တဿ ပုတ္တော ကိတ္တိတရနာမကော ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. ဝိတရာ သဒိသနာမဝသေနေဝ သီဟသူရောတိ နာမံ ပဋိဂ္ဂဏှိ. ပိတု ရညော ကာလေ လဒ္ဓေသု ပဉ္စသု သေတိဟေသု စတုန္နံယေဝ အဝသေသတ္တာ စတုသေတိဘိန္ဒောတိ နာမံ ပါကဋံ. တေနေ ဝါဟ အဘိဓာနပ္ပဒီပိကာဋီကာယံ စတုသေတိဘိန္ဒောတိ. တဿ ရညော ကာလေ စတုရင်္ဂဗလော နာမ မဟာအမစ္စော ဂန္ထကောဝိဒေါ အဘိဓာနပ္ပဒီပိကာသံ ဝဏ္ဏနံ အကာသိ. သော ပန သကလဗျာကရဏဝနာသင်္ဂဉာဏာစာရီ အဟောသိ. कलियुग के सात सौ तेरह (713) वर्ष बीतने पर विजयपुर में ही उसका पुत्र 'कीर्तिधर' नामक राजा राज्य करता था। 'वितरा' के समान नाम होने के कारण उसने 'सिंहशूर' नाम ग्रहण किया। पिता राजा के समय प्राप्त पाँच श्वेत हाथियों में से केवल चार के ही शेष रहने के कारण वह 'चतुःसेतिभिन्द' (चार श्वेत हाथियों का स्वामी) नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसीलिए अभिधानप्पदीपिका-टीका में उसे 'चतुःसेतिभिन्द' कहा गया है। उस राजा के समय में 'चतुरंगबल' नामक महाअमात्य, जो ग्रंथों के विद्वान थे, उन्होंने 'अभिधानप्पदीपिका-संवरण' (टीका) की रचना की। वे संपूर्ण व्याकरण रूपी वन में निर्बाध ज्ञान और आचरण वाले थे। ဧကသ္မိဉ္စ သမယေ ရာဇာ ဧကံ မဟန္တံ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ အသုကရညာ အယံ ဝိဟာရော ကာရာပိတော, ဣမသ္မိံ ဝိဟာရေ သီလဝန္တာယေဝ နိသီဒန္တူတိ ကောလာဟလံ ဥပ္ပာဒေသိ. အထ သာစညိနာမဂါမဝါသီ ဧကော ထေရော အာဂန္တွာ နိသီဒိ. एक समय राजा ने एक विशाल विहार बनवाया और यह घोषणा करवाई कि "यह विहार अमुक राजा द्वारा बनवाया गया है, इस विहार में केवल शीलवान ही बैठें (निवास करें)।" तब साचञ्ञि नामक गाँव के निवासी एक स्थविर आकर वहाँ बैठ गए। အယံ [Pg.100] ပန တဿ ထေရဿ အဋ္ဌုပ္ပတ္တိ,– यह उन स्थविर की उत्पत्ति (पृष्ठभूमि) है— သာစညိဂါမေ ကိရ ဧကော ဂဟပတိ အတ္တနော ပုတ္တံ သိပ္ပုဂ္ဂဟဏတ္ထာယ ဝိဟာရေ ဧကဿ ဘိက္ခုဿ သန္တိကေ နိယျာဒေသိ. ပုတ္တဿ ပန ဝိဟာရံ အဂန္တုကာမဿ တဇ္ဇနတ္ထာယ သကဏ္ဋကဂစ္ဆဿ ဥပရိ ခိပတိ. သော စ ဒဟရော နိက္ခမိတွာ ဂေဟံ အနာဂတွာ ဝိဟာရေယေဝ နိသီဒိ. မာတာပိတူနံ သန္တိကံ အနာဂန္တွာ ထောကံ ထောကံ ဒူရံ ဂန္တွာ သာမဏေရ ဘူမိတော ဥပသမ္ပဒဘူမိံ ပတွာ အရိမဒ္ဒနနဂရံ ဂစ္ဆိ. အတိပညဝန္တတာယ ပန ပတ္တပ္ပတ္တဋ္ဌာနေ မဟာထေရော သင်္ဂဏှိံသု. တေနေဝေသ သကလမရမ္မရဋ္ဌေ ပါကဋော အဟောသိ. အထ မာတာပိတရော ပုတ္တဿ အာဂမနံ အပေက္ခိတွာယေဝ နိသီဒိံသု. တမတ္ထံ ပန သုတွာ ဧသ အမှာကံ ပုတ္တော ဘဝိဿတိ ဝါ နော ဝါတိ ဝီမံသိတုကာမော ပိတာ အနုဂစ္ဆိ. အရိမဒ္ဒနနဂရေ တံ သမ္ပာပုဏိတွာ ဥပဋ္ဌပေတွာ နိသီဒိ. သောပိ ဘိက္ခု ယထာဥပဋ္ဌာနေနေဝ သန္တပ္ပေတွာ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှိ. အပရသ္မိံ ပန ကာလေသော ဘိက္ခု အဇ္ဇ သူပေါ အပ္ပလောဏောတိအာဒိနာ ပုနပ္ပုနံ ဘဏတိ. साचञ्ञि गाँव में एक गृहपति ने अपने पुत्र को शिल्प सीखने के लिए विहार में एक भिक्षु के पास सौंपा। पुत्र के विहार न जाने की इच्छा होने पर, उसे डराने के लिए (पिता) उसे काँटेदार झाड़ी के ऊपर फेंक देता था। वह बालक घर न लौटकर विहार में ही रहने लगा। माता-पिता के पास न जाकर, धीरे-धीरे दूर जाते हुए, श्रामणेर अवस्था से उपसंपदा अवस्था को प्राप्त कर वह अरिमद्दन नगर चला गया। अत्यंत बुद्धिमान होने के कारण, जहाँ-जहाँ वह गया, महास्थविरों ने उसे स्वीकार किया। इसी कारण वह संपूर्ण मरम्म राष्ट्र में प्रसिद्ध हो गया। तब माता-पिता पुत्र के आगमन की प्रतीक्षा करते रहे। उस बात को सुनकर, "क्या यह हमारा पुत्र होगा या नहीं?" ऐसी परीक्षा करने की इच्छा से पिता उसके पीछे गया। अरिमद्दन नगर में उसे पाकर, उसकी सेवा करते हुए वहीं ठहर गया। वह भिक्षु भी वैसी ही सेवा से संतुष्ट होकर ग्रंथों का अध्ययन करने लगा। बाद में किसी समय वह भिक्षु बार-बार कहने लगा— "आज सूप में नमक कम है" इत्यादि। အထ ပိတာ ဧဝမာဟ,- န ပုဗ္ဗေ ပိယပုတ္တက တယာ ဤဒိသံ ဝစနံ ကထိတံ, ဣဒါနိ ပန တွံ အဘိဏှံ ဤဒိသံ ဝစနံ ဆဏသိ, ကာရဏမေတ္ထ ကိန္တိ ပုစ္ဆိ. ပုဗ္ဗေ ဂန္ထေသု ဆေကတ္တံ အပ္ပတွာ ဂန္ထေသု ဆေကတ္ထံ ဗျာပန္နစိတ္တတာယ န ဝုတ္တံ, ဣဒါနိ ပန မယာ ဣစ္ဆိတော အတ္ထော မတ္ထကံ ပတ္တော, တသ္မာ ကာယဗလပရိဂ္ဂဟဏတ္ထာယ မယာ ဤဒိသံ ဝစနံ ဝုတ္တန္တိ ဝဒတိ. တံ ဝစနံ သုတွာ ပိတာ မာတုယာ သန္တိကံ ဂမနတ္ထာယ ဩကာသံ ယာစိတွာ ပိတရာ သဒ္ဓိံ သကဋ္ဌာနံ အာဂစ္ဆန္တော ဝိဇယပုရံ စေတိယဝန္ဒနတ္ထာယ ပါဝိသိ. तब पिता ने इस प्रकार कहा— "हे प्रिय पुत्र! पहले तुम्हारे द्वारा ऐसा वचन नहीं कहा गया था, किन्तु अब तुम बार-बार ऐसे वचन कहते हो, इसका क्या कारण है?" (भिक्षु ने) कहा— "पहले ग्रंथों में निपुणता प्राप्त न होने के कारण और ग्रंथों में निपुणता के लिए चित्त के व्याकुल होने के कारण नहीं कहा था, किन्तु अब मेरा इच्छित अर्थ पूर्ण हो गया है, इसलिए शरीर के बल को बनाए रखने के लिए मैंने ऐसा वचन कहा है।" उस वचन को सुनकर पिता ने माता के पास जाने की अनुमति माँगी और पिता के साथ अपने स्थान को लौटते हुए चैत्य वंदना के लिए विजयपुर में प्रवेश किया। တဒါ ရညာ ဝုတ္တဝစနံ သုတွာ တသ္မိံ ဝိဟာရေ အရုဟိတွာ နိသီဒိ[Pg.101]. အာရက္ခပုရိသာ စ တံ ဘိက္ခုံ ဝိဟာရေ နိသိန္နံ ဒိသွာ တမတ္ထံ ရညော အာရောစေသုံ. ရာဇာ စ စတုရင်္ဂဗလံ အမစ္စံ အာဏေပေသိ,-ဂန္တွာ တဿ ဘိက္ခုဿ ဉာဏထာမံ ဥပဓာရေဟီတိ. စတုရင်္ဂဗလော စ ဂန္တွာ တံ ဘိက္ခုံ ဂူဠဂူဠဋ္ဌာနံ ပုစ္ဆိ. သောပိ ပုစ္ဆိတံ ပုစ္ဆိတံ ဝိဿဇ္ဇေသိ. စတုရင်္ဂဗလော စ တမတ္ထံ ရညော အာရောစေသိ. ရာဇာ တုဋ္ဌစိတ္တော ဟုတွာ တံ ဝိဟာရံ တဿ ဘိက္ခုဿ အဒါသိ. တဿ ပန ဘိက္ခုဿ ဒဟရကာလေ သကဏ္ဋကဂစ္ဆေ ပိတုနော ခိပနံ ပဋိစ္စ ကဏ္ဍကခိပတ္ထေရောတိ သမညာ အဟောသိ, မူလနာမံ ပနဿ နာဂိတောတိ. သောတသ္မိံ ဝိဟာရေ နိသီဒိတွာ သဒ္ဒသာရတ္ထဇလိနိံ နာမ ဂန္ထံ အကာသိ. တဿ ကိရ ထေရဿ ကာလေ တသ္မိံ နဂရေ အာရဒ္ဓ ဝိပဿနာဓုရာ မဟလ္လကာ ဘိက္ခူ သဟဿမတ္တာ အဟေသုံ. အာရဒ္ဓဂန္ထဓုရာ ပန ဒဟရဘိက္ခူ ဂဏနပထံ ဝီတိဝတ္တာ. तब राजा द्वारा कहे गए वचनों को सुनकर वह उस विहार में जाकर बैठ गया। रक्षकों ने उस भिक्षु को विहार में बैठा देख राजा को यह बात बताई। राजा ने चतुरंगबल नामक अमात्य को आज्ञा दी— "जाकर उस भिक्षु की ज्ञान-शक्ति की परीक्षा करो।" चतुरंगबल ने जाकर उस भिक्षु से अत्यंत गूढ़ प्रश्न पूछे। उसने भी पूछे गए प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दिया। चतुरंगबल ने वह बात राजा को बताई। राजा ने प्रसन्न होकर वह विहार उस भिक्षु को दे दिया। उस भिक्षु के बचपन में पिता द्वारा काँटेदार झाड़ी में फेंके जाने के कारण उनका नाम 'कण्टकखिपत्थेर' प्रसिद्ध हुआ, किन्तु उनका मूल नाम 'नागित' था। उन्होंने उस विहार में रहकर 'सद्दसारत्थजालिनी' नामक ग्रंथ की रचना की। उन स्थविर के समय में उस नगर में विपश्यना-धुरा में लगे हुए वृद्ध भिक्षु लगभग एक हजार थे। ग्रंथ-धुरा में लगे हुए युवा भिक्षुओं की संख्या तो गणना से परे थी। တဿ ပန ပိတရမ္ပိ သေဋ္ဌိဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. တေနေဝ တံ ဂါမံ သေဋ္ဌိဂါမောတိ နာမေန ဝေါဟရိံသု. राजा ने उनके पिता को भी श्रेष्ठी के पद पर स्थापित किया। इसी कारण उस गाँव को 'सेठ्ठिगाम' के नाम से पुकारा जाने लगा। ကစ္စာယနဝဏ္ဏနံ ပန ဝိဇယပုရေယေဝ အဘယဂိရိပဗ္ဗတေ နိသိန္နော မဟာဝိဇိတာပီ နာမ ထေရော အကာသိ. ဝါစကော ပဒေသမ္ပိ သောယေဝ အကာသိ. သဒ္ဒဝုတ္တိံ ပန သဒ္ဓမ္မဂုရုတ္ထေရော အကာသိ. 'कच्चायनवण्णना' की रचना विजयपुर में ही अभयगिरि पर्वत पर स्थित महाविजितापी नामक स्थविर ने की। 'वाचकोपदेस' की रचना भी उन्होंने ही की। 'सद्दवुत्ति' की रचना सद्धम्मगुरु स्थविर ने की। ဣစ္စေဝံ ဝိဇယပုရေ အနေကေဟိ ဂန္ထကာရေဟိ သာသနံ ဝိပုလံ အဟောသိ. इस प्रकार विजयपुर में अनेक ग्रंथकारों द्वारा शासन विस्तृत हुआ। ကလိယုဂေ ပန ပဉ္စာသီတာဓိကေ ဆဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ အသင်္ခယာစောယောန္နာမကော ရာဇာ ဇေယျပုရနဂရံ မာပေတွာ တတ္ထ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. တတ္ထ ပန ရာဇူနံ ကာလေ ထေရေဟိ ကတဂန္ထော နာမ နတ္ထိ. कलियुग के ६८५ वर्ष बीतने पर असंखयाचोयोन नामक राजा ने जेय्यपुर नगर बसाया और वहाँ राज्य किया। वहाँ के राजाओं के काल में स्थविरों द्वारा रचित कोई ग्रंथ नहीं है। ကလိယုဂေ ဆဗ္ဗိသာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ ဝေသာခမာသေ ဇေယျပုရနဂရံ ဝိနဿိ. တသ္မိံယေဝ သံဝစ္ဆရေ ဇေဋ္ဌမာသေ ဝိဇယပုရံ ဝိနဿိ. တသ္မိံယေဝ သံဝစ္ဆရေ ဖဂ္ဂုနမာသေ သတွိဝရာဇာ [Pg.102] ရတနပူရံ နာမ နဂရံ မာပေတွာ ရဇ္ဇံ ကာရေသီတိ. कलियुग के ७२६ वर्ष में वैशाख मास में जेय्यपुर नगर नष्ट हो गया। उसी वर्ष ज्येष्ठ मास में विजयपुर नष्ट हो गया। उसी वर्ष फाल्गुन मास में सत्विव राजा ने रतनपुर नामक नगर बसाया और राज्य किया। ဣဒံ ဝိဇယပုရဇေယျပုရေသု သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह विजयपुर और जेय्यपुर में शासन की प्रतिष्ठा का वर्णन है। ဣဒါနိ မရမ္မမဏ္ဍလေ တမ္ဗနီပရဋ္ဌေယေဝ ရတနပူရနဂရေ သာသနဝံသံ ဝက္ခာမိ. अब मैं मरम्म मंडल के तम्बनीप राष्ट्र में ही रतनपुर नगर में शासन-वंश का वर्णन करूँगा। ကလိယုဂေ ဟိ အဋ္ဌာသီတာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ နရပတိရညော ဓိတာယ သဒ္ဓိံ အလောင်္ဂစညိသူရညော ပုတ္တော အာနန္ဒသူရိယော နာမ သန္ထဝံ ကတွာ ဧကံ (သိဒ္ဓိကံ နာမ ပုတ္တံ ဝိဇာယိ. သော ဝယေ သမ္ပတ္တေ ရဇ္ဇသမ္ပတ္တိံ လဘိ. တတော ပဘုတိ ယာဝ မြေနစောဒိဃာ ရညာ အရိမဒ္ဒနနဂရေ ရဇ္ဇံ အကံသု). တတော ပစ္ဆာ သိရိသုဓမ္မရာဇာဓိပတီတိ လဒ္ဓနာမော သတွိဝရာဇာ ရတနပူရနဂရေ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. တဿ ရညော ကာလေ ကလိယုဂေ ဧကနဝုတာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ လင်္ကာဒီပတော သိရိသဒ္ဓမ္မာလင်္ကာရတ္ထေရော သီဟဠမဟာသာမိတ္ထေရောစာတိ ဣမေ ဒွေ ထေရာ ပဉ္စ သရီရဓာတုယော အာနေတွာ နာဝါယ ကုသိမတိတ္ထံ ပါပုဏိတွာ ရာမညရဋ္ဌေ ဗညာရနိ နာမေန ရညာ နိဝါရိတာ အနိသီဒိသွာ တတော သောယေဝ ရာဇာ ထေရေ ယာဝ သိရိခေတ္တနဂရာ ပဟိဏိ. တမတ္ထံ ဉတွာ ရတနပူရိန္ဒော ရာဇာ စတ္တာလီသာယ နာဝါဟိ ယာဝ သိရိခေတ္တနဂရံ ပစ္စုဂ္ဂန္တွာ အာနေသိ. အာနေတွာ စ မဟာနဝဂါမံ ပတ္တကာလေ သဟ ဩရောဓေဟိ အမစ္စေဟိ စ သယမေဝ ရာဇာ ပစ္စုဂ္ဂစ္ဆိ. ရတနပူရံ ပ္ပန ပတ္တကာလေ မဟာပထဝီ စလိ, ပဋိနာဒဉ္စ နဒိ. တဒါ ရာဇာ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ တိလောကဂ္ဂဿ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိဿာမီတိ စိန္တေတွာ သရီရဓာတုံ အာနေတွာ ဣဓ ပတ္တကာလေ အယံ မဟာပထဝီ စလတိ, ပဋိနာဒဉ္စ နဒတိ, ဣဒံ [Pg.103] အမှာကံ ရဋ္ဌေ ဇိနသာသနဿ စိရကာလံ ပတိဋ္ဌာနဘာဝေ ပုဗ္ဗနိမိတ္တန္တိ သယမေဝ နိမိတ္တပါဌံ အကာသိ. कलियुग ७८८ में, नरपति राजा की पुत्री के साथ अलौंगचञ्ञिसूर राजा के पुत्र आनन्दसूरिय नामक ने संबंध बनाकर एक (सिद्धिक नामक पुत्र को जन्म दिया। उसने वयस्क होने पर राज्य संपत्ति प्राप्त की। तब से लेकर म्रेणचोदिघा राजा तक अरिमद्दन नगर में राज्य किया)। उसके पश्चात सिरिसुधम्मराजाधिपति नाम प्राप्त सत्विव राजा ने रतनपुर नगर में राज्य किया। उस राजा के काल में कलियुग ७९१ प्राप्त होने पर लंका द्वीप से सिरिसद्धम्मलंकार थेर और सीहल महासामि थेर—इन दो थेरों ने पाँच शरीर-धातुओं को लाकर, नौका से कुसिम तीर्थ पहुँचकर, रामञ्ञ राष्ट्र में बञ्ञारनि नामक राजा द्वारा रोके जाने पर न रुकते हुए, उसी राजा ने थेरों को सिरिखेत्त नगर तक भेजा। उस बात को जानकर रतनपुर के स्वामी राजा ने चालीस नौकाओं के साथ सिरिखेत्त नगर तक जाकर अगवानी की और उन्हें ले आए। उन्हें लाकर महानवग्राम पहुँचने के समय रानियों और अमात्यों के साथ राजा स्वयं अगवानी के लिए गया। रतनपुर पहुँचने के समय महापृथ्वी काँप उठी और प्रतिध्वनि गूँजी। तब राजा ने सोचा कि मैं त्रिलोक के अग्र सम्यक्सम्बुद्ध के शासन को ग्रहण करूँगा, शरीर-धातु को यहाँ लाने के समय यह महापृथ्वी काँपती है और प्रतिध्वनि गूँजती है, यह हमारे राष्ट्र में जिन-शासन की चिरकाल तक प्रतिष्ठा होने का पूर्वनिमित्त है—ऐसा स्वयं निमित्त-पाठ किया। တာဝ တိဋ္ဌတု ဇီဝမာနဿ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ အာနုဘာဝေါ, အဟောဝတ သရီရဓာတုယာယေဝ အနုဘာဝေါတိ ဗဟုရဋ္ဌ ဝါသိနော ပသိဒိံသု. ဟောန္တိ စေတ္ထ, – जीवित सम्यक्सम्बुद्ध का अनुभाव तो रहने ही दें, अहो! यह तो शरीर-धातु का ही अनुभाव है—ऐसा कहकर बहुत से राष्ट्रवासियों ने प्रसन्नता व्यक्त की। इस विषय में ये (गाथाएँ) हैं— သရီရဓာတုယာ တာဝ, မဟန္တောစ္ဆရိယော ဟောတိ; ကာ ကထာ ပန ဗုဒ္ဓဿ, ဇီဝမာနဿ သေဋ္ဌဿ. शरीर-धातु का ही इतना महान आश्चर्य होता है; फिर उन श्रेष्ठ जीवित बुद्ध के विषय में तो कहना ही क्या! ဧဝံ အနုဿရိတွာန, ဥပ္ပာဒေယျ ပသာဒကံ; ဗုဒ္ဓဂုဏေသု ဗာဟုလ္လံ, ဂါရဝဉ္စံ ကရေ ဇနောတိ. इस प्रकार अनुस्मरण करके प्रसन्नता उत्पन्न करनी चाहिए; मनुष्य को बुद्ध के गुणों में अत्यधिक गौरव करना चाहिए। ကလိယုဂေ ဒွေနဝုတာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ တာ ပဉ္စ ဓာတုယော နိဒဟိတွာ ဇေယျပုရနဂရတော ပစ္ဆိမဒိသာဘာဂေ သမဘူမိဘာဂေ စေတိယံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. တဉ္စ စေတိယံ ရတနစေတိယန္တိ ပညာပေသိ, ဟတ္ထိရူပဗာဟုလ္လတာယ ပန အနေကိဘိန္ဒောတိ ပါကဋံ ဟောတိ. တီဟိ သိရိဂဗ္ဘေဟိ သတ္တဟိ ဒွါရေဟီ စ အလင်္ကတံ နာမ မဟာဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ ဒွိန္နံ သီဟဠဒီပိကတ္ထေရာနံ အဒါသိ. တတော ပစ္ဆာ တေသု မဟန္တတ္ထေရော သကဝိဟာရသမီပေ ပဗ္ဗတမုဒ္ဓနိ အတ္တနော သိဿေပိ အပ္ပဝေသေတွာ လဇ္ဇီပေသလဗဟုဿုတသိက္ခာကာမေဟိ သဗ္ဗေဟိ တီဟိ ထေရေဟိ သဒ္ဓိံ သီမံ သမ္မန္နတိ. ဣစ္စေဝံ သီမသမ္မုတိပရိယတ္တိဝါစနာဒိကမ္မေဟိ မရမ္မရဋ္ဌေ သာသနံ ဝိရူဠံ ကတွာ ပတိဋ္ဌာပေသိ. कलियुग ७९२ में उन पाँच धातुओं को स्थापित कर जेय्यपुर नगर के पश्चिम दिशा के भाग में समतल भूमि पर एक चैत्य की प्रतिष्ठा की। उस चैत्य को 'रतन चैत्य' नाम दिया, किन्तु हाथी की मूर्तियों की अधिकता के कारण वह 'अनेकिभिन्दो' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तीन श्रीगर्भों (गर्भगृहों) और सात द्वारों से अलंकृत एक महाविहार बनवाकर उन दो सिंहल-द्वीपीय थेरों को दान दिया। उसके पश्चात, उनमें से ज्येष्ठ थेर ने अपने विहार के समीप पर्वत के शिखर पर अपने शिष्यों को भी प्रवेश न करने देते हुए, लज्जी, पेशल और बहुश्रुत शिक्षाकामी सभी तीन थेरों के साथ मिलकर सीमा का निर्धारण किया। इस प्रकार सीमा-निर्धारण और पर्यत्ति-वाचन आदि कार्यों से मरम्म राष्ट्र में शासन को विकसित कर प्रतिष्ठित किया। ဣဒံ မရမ္မမဏ္ဍလေ ရတနပူရနဂရေ သီဟဠဒီပိကေ यह मरम्म मण्डल के रतनपुर नगर में सिंहल-द्वीपीय ဒွေ ထေရေ ပဋိစ္စ ပဌမံ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. दो थेरों के कारण शासन की प्रथम प्रतिष्ठा है। ကလိယုဂေ ဆဗ္ဗီသာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ဖဂ္ဂုနမာသေ သတွဝရာဇာ ရတနပူရနဂရံ မာပေသိ. တဿ ရညော [Pg.104] ကာလေ ဇေယျပုရနဂရေ ဧကာ ပူပိကာ ဣတ္ထီ အလဇ္ဇိနော ဧကဿ ဘိက္ခုဿ သန္တိကေ ဓနံ ဥပနိဒဟိ. အပရဘာဂေသာ တံ ဓနံ ယာစိ. အထ သော ဘိက္ခု တဝ ဓနံ အဟံ န ပဋိဂ္ဂဏှာမီတိ မုသာ ဘဏတိ. ဧဝံ ဝိဝါဒံ ကတွာ တံ ကာရဏံ ရညော အာရောစေသိ. ရာဇာ ပက္ကောသာပေတွာ သယမေဝ တံ ဘိက္ခုံ ပုစ္ဆိ,-တွံ ဘန္တေ တဿာ ဣတ္ထိယာ ဓနံ ပဋိဂ္ဂဏှာသိ ဝါ မာ ဝါတိ. အဟံ မဟာရာဇ သမဏော အလိကံ ဘဏိတုံ န ဝဋ္ဋတိ, န ပဋိဂ္ဂဏှာမီတိ ဝဒတိ. တံ ကာရဏံ ရာဇာ စ ပုနပ္ပုနံ ပုစ္ဆိတွာ ဝီမံသန္တော ဘိက္ခုဿ ကေရာဋိကဘာဝံ ဇာနိတွာ တံ သမဏော သမာနော ဘဂဝတော ပညတ္တံ သိက္ခာပဒံ အက္ကမိတွာ မုသာ ဘဏတီတိ ကုဇ္ဈိတွာ သယမေဝ အပရာဓာနုရူပံ သီယံ ဆိန္ဒိတွာ ရာဇဂေဟတော ဟေဋ္ဌာ ခိပိ. कलियुग ७२६ प्राप्त होने पर फाल्गुन मास में सत्वव राजा ने रतनपुर नगर का निर्माण कराया। उस राजा के काल में जेय्यपुर नगर में एक पूपिका (मालपुआ बेचने वाली) स्त्री ने एक निर्लज्ज भिक्षु के पास धन धरोहर के रूप में रखा। बाद में उसने वह धन माँगा। तब उस भिक्षु ने 'मैंने तुम्हारा धन स्वीकार नहीं किया' ऐसा झूठ बोला। इस प्रकार विवाद होने पर उसने वह मामला राजा को बताया। राजा ने बुलवाकर स्वयं उस भिक्षु से पूछा—'भन्ते! क्या आपने उस स्त्री का धन स्वीकार किया था या नहीं?' उसने कहा—'महाराज! मैं श्रमण हूँ, झूठ बोलना उचित नहीं है, मैंने स्वीकार नहीं किया।' राजा ने उस कारण को बार-बार पूछकर और जाँच करके भिक्षु की धूर्तता को जानकर, 'श्रमण होते हुए भी भगवान द्वारा प्रज्ञप्त शिक्षापद का उल्लंघन कर झूठ बोलता है'—ऐसा क्रोधित होकर स्वयं अपराध के अनुरूप उसका सिर काटकर राजभवन से नीचे फेंक दिया। တဉ္စ ကာရဏံ သကလမရမ္မရဋ္ဌေ ပါကဋံ. အလဇ္ဇီဘိက္ခူပိ အညေ ပါပကမ္မံ ကာတုံ န ဝိသဟိံသု. ရညာ ဘာယိတွာယေဝ သိက္ခာပဒံ န အက္ကမေသုံ. वह घटना पूरे मरम्म राष्ट्र में प्रसिद्ध हो गई। अन्य निर्लज्ज भिक्षुओं ने भी पाप कर्म करने का साहस नहीं किया। राजा के डर से ही उन्होंने शिक्षापदों का उल्लंघन नहीं किया। ကလိယုဂေ တိံသာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ မင်္ဂကြိစွာစောင်္က နာမ ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. သော ပန ရာဇာ ရဋ္ဌဝါသီနံ သုခတ္ထာယ နိမိတ္တံ ဂဟေတွာ တာလဝဏ္ဋံ ဂဟေတွာ ရာဇဂေဟံ ပဋိဂ္ဂဏှိ. သော စ ရာဇာ သက္ကရာဇေ ပဉ္စစတ္တာလီသာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ စညိင်္ခုံ နာမ စေတိယံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. ယင်္ဂရနာမကဿ သိလာပဗ္ဗတဿ သမီပေ ပေါရာဏိကံ ဧကံ စေတိယံ နဒီဥဒကံ ဘိန္ဒိ. တဒါ သကရဏ္ဍကာ ပဉ္စ ဓာတုယော ဥဒကေ နိမ္မုဇ္ဇန္တိယော ဧရာပထော နာမ နာဂေါ ဂဟေတွာ ပစ္ဆာ စညိင်္ခုံ နာမ စေတိယံ ပတိဋ္ဌာပေဿာမီတိ ရညာ အာရဒ္ဓကာလေယေဝ ဒါဌာနာဂဿ နာမ ထေရဿ သဟ ကရဏ္ဍကေန ပဉ္စ ဓာတုယော နိယျာဒေသိ. သော စ ထေရော ရညော အဒါသိ. ရာဇာ ဒွေ ဓာတုယော မုဋ္ဌောစေတိယေ နိဓာနံ အကာသိ. တိဿော ပန စညိင်္ခုံ စေတိယေတိ ပေါရာဏပေါတ္ထကေသု ဝုတ္တံ. कलियुग ७३० प्राप्त होने पर मङ्गक्रिच्वाचोङ्क नामक राजा ने राज्य किया। उस राजा ने राष्ट्रवासियों के सुख के लिए निमित्त ग्रहण कर, ताड़ का पंखा लेकर राजभवन स्वीकार किया। उस राजा ने शक संवत ७४५ प्राप्त होने पर चञ्ञिङ्खु नामक चैत्य की प्रतिष्ठा की। यङ्गर नामक शिला-पर्वत के समीप एक प्राचीन चैत्य को नदी के जल ने तोड़ दिया था। तब मंजूषा सहित पाँच धातुएँ जल में डूब रही थीं, जिन्हें एरापथ नामक नाग ने पकड़ लिया और बाद में जब राजा ने चञ्ञिङ्खु नामक चैत्य की प्रतिष्ठा का कार्य आरम्भ किया, तब दाठाननाग नामक थेर को मंजूषा सहित पाँच धातुएँ सौंप दीं। उस थेर ने वे धातुएँ राजा को दे दीं। राजा ने दो धातुओं को मुट्ठो चैत्य में स्थापित किया और तीन को चञ्ञिङ्खु चैत्य में—ऐसा प्राचीन पुस्तकों में कहा गया है। သော [Pg.105] ရာဇာ ကုမာရကာလေ သိက္ခာပကဿ အာစရိယဿ သေတစ္ဆတ္တံ ဒတွာ သံဃနာယကဋ္ဌာနံ နိယျာဒေသိ. ခေမာစာရော နာမ ဧကော ထေရော ရတ္တိဘာဂေ မဇ္ဈန္တိကကာလေ စေတိယင်္ဂဏေ ဩလမ္ဗေတွာ ဌပိတံ ဘေရိံ အနေကဝါရံ ပဟရိ. အထ ရာဇာ ရာဇဂေဟတောယေဝ သုတွာ ယထာဌပိတန္တိယာမဝသေန ဝိဟာရေ ကောစိ ဘိက္ခု ကာလံ ကတော ဘဝေယျာတိ မညိတွာ ဝိဟာရံ ဂန္တွာ ပုစ္ဆာဟီတိ ဒူတံ ပေသေသိ. ဒူတော ဝိဟာရံ ဂန္တွာ ကာရဏံ ပုစ္ဆိ. ဘိက္ခူ စ ဧဝမာဟံသု,- န အမှေသု ကာလင်္ကတဘိက္ခု နာမ အတ္ထိ, အထ ခေါ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော ဣဒါနိ ကာလင်္ကတောတိ ဗဟူနံ မနုဿာနံ ဉာပနတ္ထာယ ဘေရိံ ပဟရိမှာတိ. ပုန ရာဇာ ဘိက္ခူ ပက္ကောသာပေတွာ ပုစ္ဆိ,-ကသ္မာ ပန ဘန္တေ တုမှေ သက္ကဿ ဒေဝါနမိန္ဒဿ ကာလင်္ကတဘာဝံ ဇာနာထာတိ. အထ ဘိက္ခူ ဧဝမာဟံသု,-ဘဂလတော ပရိနိဗ္ဗာနကာလေ သာသနံ ရက္ခိဿာမီတိ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော ပဋိညံ ကတွာပိ ဣဒါနိ သာသနေ ဝသန္တာနံ အမှာကံ အနုပါလနကမ္မံ နာမ ကိဉ္စိ န အကာသိ, သစေ ပန သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော ဇီဝမာနော ဘဝေယျ, သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ သန္တိကေ ပဋိညံ ဒဠံ ကတွာ ဣဒါနိ အပ္ပောဿုက္ကော န ဘဝေယျ. ဣဒါနိ ပန သက္ကဿ ဒေဝါနမိန္ဒဿ အာရက္ခဏကမ္မံ နာမ ကိဉ္စိ န ဒိဿတိ, တသ္မာ ဣဒါနိ သက္ကော ဒေဝါနမိန္ဒော ကာလင်္ကတောတိ ဇာနိမှာတိ. उस राजा ने अपने कुमार काल (बचपन) के शिक्षक आचार्य को श्वेत छत्र देकर संघनायक के पद पर नियुक्त किया। खेमाचार नामक एक स्थविर ने रात्रि के मध्य भाग में चैत्य के आंगन में लटकी हुई भेरी को अनेक बार बजाया। तब राजा ने राजभवन से ही उसे सुनकर, नियत समय के अनुसार विहार में किसी भिक्षु की मृत्यु हो गई होगी, ऐसा मानकर विहार जाकर पूछने के लिए दूत भेजा। दूत ने विहार जाकर कारण पूछा। भिक्षुओं ने इस प्रकार कहा— "हमारे बीच कोई मृत भिक्षु नहीं है, बल्कि शक्र देवेन्द्र अब मर चुके हैं, यह बहुत से मनुष्यों को सूचित करने के लिए हमने भेरी बजाई है।" फिर राजा ने भिक्षुओं को बुलवाकर पूछा— "भन्ते! आप शक्र देवेन्द्र की मृत्यु के बारे में कैसे जानते हैं?" तब भिक्षुओं ने इस प्रकार कहा— "भगवान के परिनिर्वाण के समय 'मैं शासन की रक्षा करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करने पर भी शक्र देवेन्द्र ने अब शासन में रहने वाले हम लोगों के पालन-पोषण का कोई कार्य नहीं किया। यदि शक्र देवेन्द्र जीवित होते, तो सम्यक्सम्बुद्ध के पास दृढ़ प्रतिज्ञा करके अब वे उदासीन न होते। अब शक्र देवेन्द्र का कोई रक्षा कार्य नहीं दिखाई देता, इसलिए हमने जाना कि अब शक्र देवेन्द्र मर चुके हैं।" ရာဇာ တံ သုတွာ ခေမာစာရတ္ထေရဿ ပသီဒိတွာ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ အဒါသိ. သော စ ထေရော သုဓမ္မပုရဝါသီနံ သီဟဠဝံသိကာနံ မဟာထေရာနံ ဝံသေ ဘဝတိ လဇ္ဇီ ပေသလော ဟောတီတိ. राजा ने वह सुनकर खेमाचार स्थविर पर प्रसन्न होकर विहार बनवाकर दिया। और वह स्थविर सुधम्मपुर के निवासी सिंहलवंशीय महास्थविरों के वंश में हुए, जो लज्जावान और प्रियशील थे। ရတနပူရနဂရေယေဝ အဓိကရညော ကာလေ ရတနပူရနဂရဿ ဒက္ခိဏဒိသာဘာဂေ မဟာသေတုံ ကာရာပေသိ. တဿ [Pg.106] ပန အာစရိယော သံဃရာဇာ လဇ္ဇီပက္ခံ န ဘဇတိ. တေနေဝ ထေရပရမ္ပရာယ ဧသ န သင်္ဂဟိတဗ္ဗော. रतनपुर नगर में ही अधिकराज के समय में रतनपुर नगर के दक्षिण दिशा के भाग में एक महासेतु (बड़ा पुल) बनवाया गया। उनके आचार्य संघराज लज्जावान पक्ष का साथ नहीं देते थे। इसलिए स्थविर परम्परा में उन्हें सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए। တဿ ရညော ကာလေ ဆသဋ္ဌာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ ကလိယုဂေ ရာဇာဓိရာဇာ နာမ ရာမညရဋ္ဌိန္ဒော ဘူပါလောတိ သဟဿပ္ပမာဏာသု နာဝါသု သဋ္ဌိသတသဟဿေဟိ ယောဓေဟိ သဒ္ဓိံ နဒီမဂ္ဂေန ယုဇ္ဈနတ္ထာယ ရတနပူရာဘိမုခံ အာဂတော. उस राजा के समय में, कलियुग के सात सौ छियासठवें (766) वर्ष में, राजाधिराज नामक रामण्य राष्ट्र के स्वामी भूपाल, एक हजार नौकाओं में साठ लाख योद्धाओं के साथ नदी मार्ग से युद्ध करने के लिए रतनपुर की ओर आए। အထ အဓိကရာဇာ ဗဟဝေါ အမစ္စေစ ဘိက္ခူ စ သန္နိပါတာပေတွာ မန္တေသိ,-ဣဒါနိ ရာမညရဋ္ဌိနော ရာဇာ ယုဇ္ဈနတ္ထာယ ဣဓ အာဂစ္ဆတိ, ယုဒ္ဓံ အကတွာ ကေနုပါယေန တံ ပဋိနိဝတ္တာပေတုံ သက္ခိဿာမာတိ. အထ သဗ္ဗေ ကိဉ္စိ အကထေတွာ တုဏှီဘာဝေနေဝ နိသီဒိံသု. तब अधिकराज ने बहुत से अमात्यों और भिक्षुओं को एकत्रित कर मंत्रणा की— "अब रामण्य राष्ट्र का राजा युद्ध के लिए यहाँ आ रहा है, बिना युद्ध किए किस उपाय से हम उसे वापस लौटा सकेंगे?" तब सभी कुछ न कहकर मौन होकर बैठ गए। အထ ဇာတဝဿေန ဧကတ္တိံသဝဿိကော ဥပသမ္ပဒါဝသေန ပန ဧကာဒသဝဿိကော ဧကော ဘိက္ခု ဧဝမာဟ,-ဧကော ပန ရာမညရဋ္ဌိန္ဒော ရာဇာဓိရာဇာ တာဝ တိဋ္ဌတု, သစေ သကလေပိ ဇမ္ဗုဒီပေ သဗ္ဗေ ရာဇာနော အာဂစ္ဆေယျုံ, ဧဝမ္ပိ ကထာသလ္လာပေနေဝ ယုဒ္ဓံ အကတွာ ပဋိနိဝတ္တာပေသုံ သက္ကောမီတိ. तब जन्म से इकतीस वर्ष के और उपसम्पदा से ग्यारह वर्ष के एक भिक्षु ने इस प्रकार कहा— "अकेले रामण्य राष्ट्र के स्वामी राजाधिराज की तो बात ही क्या, यदि सम्पूर्ण जम्बूद्वीप के सभी राजा भी आ जाएँ, तो भी मैं केवल वार्तालाप से ही बिना युद्ध किए उन्हें वापस लौटाने में समर्थ हूँ।" အထ အဓိကရာဇာ တုဋ္ဌစိတ္တော ဟုတွာ အာဟ,- ယထာ ဘန္တေ တွံ သက္ကောသိ ရာဇာဓိရာဇံ ယထာသလ္လာပေန ပဋိနိ ဝတ္ထာပေတုံ, တထာ ကရောဟီတိ. तब अधिकराज ने प्रसन्नचित्त होकर कहा— "भन्ते! जैसे आप राजाधिराज को वार्तालाप से वापस लौटाने में समर्थ हैं, वैसा ही करें।" အထ သော ဘိက္ခု မေတ္တာသန္ဒေသပဏ္ဏံ ပေသေတွာ ဩကာသံ ယာစိ တဿ ရာဇာဓိရာဇဿ သန္တိကံ ပဝိသိတုကာမော. ရာဇာဓိရာဇာ စ တဿ ဘိက္ခုဿ မေတ္တာသန္ဒေသပဏ္ဏံ ပဿိတွာ တံ ဘိက္ခုံ သီင်္ဃံ အာနေထာတိ ဒူတံ ပေသေသိ. ဒူတော အာနေတွာ ရညော ဒဿေသိ. အထ သော ဘိက္ခု ရာဇာဓိရာဇံ ဓမ္မဒေသနာယ ဩဝါဒံ ဒတွာ သကဋ္ဌာနံ ပဋိနိဝတ္တာပေသိ. အယဉ္စ [Pg.107] ဘိက္ခု အရိမဒ္ဒနနဂရေ စတူသု ဂဏေသု အရဟန္တဂဏဝံသော သိက္ခာကာမော လဇ္ဇီ ပေသလော. အရိမဒ္ဒနနဂရေ စာဂဟေ နာမ ဒေသေ ပန ဇာတတ္တာ စာဂြုဟိ ဘိက္ခူတိ ဝေါဟာရိယတိ. तब उस भिक्षु ने मैत्री सन्देश पत्र भेजकर उस राजाधिराज के पास प्रवेश करने की अनुमति माँगी। राजाधिराज ने उस भिक्षु का मैत्री सन्देश पत्र देखकर "उस भिक्षु को शीघ्र लाओ" ऐसा कहकर दूत भेजा। दूत उसे लाकर राजा के सामने ले आया। तब उस भिक्षु ने राजाधिराज को धम्मदेशना द्वारा उपदेश देकर अपने स्थान पर वापस लौटा दिया। और यह भिक्षु अरिमर्दन नगर के चार गणों में अरहन्त गण वंश के, शिक्षा के इच्छुक, लज्जावान और प्रियशील थे। अरिमर्दन नगर के चागह नामक देश में जन्म लेने के कारण उन्हें 'चाग्रुही भिक्षु' कहा जाता है। ကလိယုဂေ အဋ္ဌာသီတာဓိကေ သတ္တဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ မိညှင်္ဂ ဓမ္မရာဇာ ရတနပူရေယေဝ ရဇ္ဇံ သမ္ပတ္တော. တဿ ရညော ကာလေ သီဟဠဒီပတော ဒွေ မဟာထေရာ ရတနပူရံ အာဂန္တွာ သာသနံ အနုဂ္ဂဟေတွာ နိသီဒိံသု. कलियुग के सात सौ अठासीवें (788) वर्ष के आने पर मिञ्हंग धर्मराज रतनपुर में ही राज्य को प्राप्त हुए। उस राजा के समय में सिंहल द्वीप से दो महास्थविर रतनपुर आकर शासन का अनुग्रह करते हुए ठहरे। တဒါ ကလိယုဂေ အဋ္ဌသတေ သမ္ပုဏ္ဏေ ပေါရာဏကံ ကလိယုဂံ အပနေတွာ အဘိနဝံ ဌပေတုံ ဩကာသော အနုပ္ပတ္တော. အထ စာဂြိဟိ ထေရော စ ရာဇဝိဟာရဝါသိတ္ထေရော စ ဧဝမာဟံသု,- အပနီတဗ္ဗကာလေ မဟာရာဇ သမ္ပတ္တေ အနပနေတုံ န ဝဋ္ဋတီတိ. तब कलियुग के आठ सौ वर्ष पूर्ण होने पर, पुराने कलियुग को हटाकर नया स्थापित करने का अवसर आया। तब चाग्रिही स्थविर और राजविहारवासी स्थविर ने इस प्रकार कहा— "महाराज! हटाने का समय आने पर न हटाना उचित नहीं है।" အထ ရာဇာ ပုန ဧဝမာဟ,-အပနီတဗ္ဗေ သမ္ပတ္တေ အနပနေတွာ အဇ္ဈုပေက္ခိတွာ ဝသန္တဿ ကော ဒေါသောတိ. သစေ အပနီတဗ္ဗေ သမ္ပတ္တေ အနပနေတွာ အဇ္ဈုပေက္ခိတွာ နိသီဒေယျ, ရဋ္ဌဝါသီနံ ဒုက္ခံ ဘဝိဿတီတိ ဝေဒသတ္ထေသု အာဂတံ, သက္ကရာဇံ အပနေန္တောပိ ရာဇာ တသ္မိံယေဝ ဝဿေ ဒိဝင်္ဂတော ဘဝေယျာတိ အာဟံသု. तब राजा ने फिर इस प्रकार कहा— "हटाने का समय आने पर न हटाकर उपेक्षा करते हुए रहने में क्या दोष है?" उन्होंने कहा— "यदि हटाने का समय आने पर न हटाकर उपेक्षा करके बैठें, तो राष्ट्रवासियों को दुःख होगा, ऐसा वेद शास्त्रों में आया है; और शक संवत को हटाने वाला राजा भी उसी वर्ष स्वर्गवासी हो जाता है।" အထ ရာဇာ သတ္တာနံ သုခံ လဘီယမာနတံ ဇာနန္တောယေဝ မာဒိသော အတ္တနော ဘယံ အပေက္ခိတွာ အပနီတဗ္ဗံ အနပနေတွာ နိသီဒိတုံ န ဝဋ္ဋတိ, ကမ္မံ ခီယိတွာပိ မမ အဂုဏံ လောကေ ပတ္ထရိတွာ ပတိဋ္ဌဟိဿတီတိ မနသိကရိတွာ သက္ကရာဇေ အဋ္ဌဝဿသတေ သမ္ပုဏ္ဏေ ဗသျုဆိဒြမုနိသချံ အပနေတွာ စမ္မာဝသေသံ ဌပေသိ. အထ မဟာမဏ္ဍပံ ကာရာပေတွာ မဟာဆဏံ ကတွာ မဟာဒါနမ္ပိ အဒါသိ. तब राजा ने प्राणियों के सुख की प्राप्ति को जानते हुए ही, "मुझ जैसे व्यक्ति को अपने भय की अपेक्षा करके हटाने योग्य को न हटाकर बैठना उचित नहीं है, कर्म के क्षीण होने पर भी मेरा अवगुण लोक में फैलकर प्रतिष्ठित होगा," ऐसा मन में विचार कर शक संवत के आठ सौ वर्ष पूर्ण होने पर 'बस्युछिद्रमुनिसख्य' को हटाकर 'चम्मावशेष' (दो शेष) रखा। तब महामण्डप बनवाकर बड़ा उत्सव किया और महादान भी दिया। စာဂြိဟိထေရော ရာဇဝိဟာရ ဝါသိတ္ထေရောစာတိ အရိမဒ္ဒန နဂရေ [Pg.108] အရဟန္တဂဏာံသိကော လဇ္ဇီ ပေသလော သိက္ခာကာမော. चाग्रिही स्थविर और राजविहारवासी स्थविर अरिमर्दन नगर में अरहन्त गण के वंशज, लज्जावान, प्रियशील और शिक्षा के इच्छुक थे। ဤဒိသံ ပန ဝစနံ သာသနပ္ပဋိယတ္တတ္တာ စ ရဋ္ဌဝါသိကာယတ္တတ္တာ စ ဓမ္မာနုလောမဝသေန ဝုတ္တံ. ऐसा वचन शासन की व्यवस्था और राष्ट्रवासियों की अधीनता के कारण धर्म के अनुकूल कहा गया है। ကလိယုဂေ စတုဝဿာဓိကေ အဋ္ဌသတေ မဟာနရပတိ ရာဇာ ရတနပူရနဂရေ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. သော စ ရာဇာ ထူပါရာမစေတိယံ ကာရာပေသိ. တဿ ပန အာစရိယော မဟာသာမိတ္ထေရော နာမ. သော ပန ထေရော သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ သီဟဠိန္ဒဿ ရညော အာစရိယဿ သာရိပုတ္တတ္ထေရဿ သန္တိကေ သိက္ခံ ဂဟေတွာ ပစ္စာဂတတ္ထေရဝံသိကောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. တဿ ရညော ကာလေ ရတနပူရနဂရေ မဟာအရိယဝံသော နာမ ဧကော ထေရော အတ္ထိ. သော ပန ပရိယတ္တိဝိသာရဒေါ အရိမဒ္ဒနနဂရေ ဆပ္ပဒဂဏတော အာဂတဝံသိကော. कलियुग के आठ सौ चार (804) वर्ष में महानरपति राजा ने रतनपुर नगर में राज्य किया। उस राजा ने थूपाराम चैत्य का निर्माण करवाया। उनके आचार्य महासामिथेर नाम के थे। उन स्थविर को श्रीलंका जाकर श्रीलंका के राजा के आचार्य सारिपुत्त थेर के पास शिक्षा ग्रहण कर लौटे हुए स्थविरों के वंश का समझना चाहिए। उस राजा के काल में रतनपुर नगर में महाआरियवंस नाम के एक स्थविर थे। वे पर्यत्ति में विशारद थे और अरिमद्दन नगर में छप्पद गण से आए हुए वंश के थे। ဧကသ္မိံ သမယေ ဇေယျပုရနဂရံ ဂန္တွာ ရေင်္ဂ ဣတိ ပါကဋဿ မဟာထေရဿ သန္တိကေ သဒ္ဒနယံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ နိသီဒိ. သော ပန ကိရ မဟာထေရော အညေဟိ သဒ္ဓိံ ယံဝါ တံဝါ ကထံ အသလ္လပိတုကာမတာယ မုခေ ဥဒကံ ဌပေတွာ ယေဘုယျေန နိသီဒတိ. တေနေဝေသ မရမ္မဝေါဟာရေန ရေင်္ဂု ဣတိ ပါကဋော အဟောသိ. एक समय वे जेय्यपुर नगर जाकर 'रेंग' नाम से प्रसिद्ध महास्थविर के पास व्याकरण की पद्धति सीखने के लिए ठहरे। वे महास्थविर दूसरों के साथ व्यर्थ की बातें न करने की इच्छा से मुँह में पानी भरकर प्रायः बैठा करते थे। इसी कारण वे म्यांमार भाषा में 'रेंगु' नाम से प्रसिद्ध हुए। သော ကိရ အရိယဝံသတ္ထေရော ရေင်္ဂုံ ထေရဿ သန္တိကံ ဂန္ထံ ဝါစာပေတု ဩကာသံ ယာစိဿာမီတိ ဥပဂစ္ဆန္တောပိ ကထာသလ္လာပံ အကတွာ ဒွေ အဟာနိ ဝတ္တံ ပရိပူရေတွာယေဝ ပစ္စာဂစ္ဆိ. တတိယဒိဝသေ ပန စမ္မခဏ္ဍံ အာကောဋုနတ္တာ သဒ္ဒံ သုတွာ မုခတော ဥဒကံ ဥဂ္ဂိရိတွာ ကာရဏံ ပုစ္ဆိ. ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဟဏတ္ထာယ အာဂတဘာဝံ အာရောစေသိ. वे आरियवंस स्थविर, रेंगु स्थविर के पास ग्रंथ पढ़ाने का अवसर माँगने के लिए जाते हुए भी, बिना कोई बातचीत किए दो दिनों तक केवल अपने कर्तव्यों को पूरा कर वापस लौट आए। तीसरे दिन चर्म-खण्ड को झाड़ने की आवाज़ सुनकर (रेंगु स्थविर ने) मुँह से पानी थूक दिया और कारण पूछा। उन्होंने ग्रंथ सीखने के लिए आने की बात बताई। အထ ထေရော ဧဝမာဟ,-အဟံ အာဝုသော ဒိဝသေ ဒိဝဝသေ တိက္ခတ္တုံ ဂန္ထံ ဝါစေမိ, မဇ္ဈန္တိ ကာတိက္ကမကာလေပိ ပညစေတိယံ ဂန္တွာ စေတိယင်္ဂဏေ သမ္မဇ္ဇနကိစ္စံ ကရောမိ, ဩကာသံ [Pg.109] န လဘာမိ, ဧဝမ္ပိ တွံ ဗဟူဂန္ထေ ဥဂ္ဂဟေတွာပိ အာစရိယေဟိ ဒိန္နောပဒေသံ အလဘိတွာ ပုန မမ သန္တိကံ အာဂစ္ဆသိ, တသ္မာယင်္ဂဏေ သမ္မဇ္ဇနဝတ္တံ တာဝကာလိကံ ဝိကောပေတွာ ဂန္ထုဂ္ဂဟဏတ္ထာယ ဩကာသံ ဒဿာမီတိ ဝတွာ အဘိဓမ္မတ္ထဝိသာဝိနိံ နာမ လက္ခဏဋီကံ ဥဂ္ဂဏှာပေသိ. နာနာနယေဟိ ဥပဒေသံ ဒတွာ ဝါစေသိ. ဝါစေတွာ စ တတိယဒိဝသေ အာစရိယဿ သန္တိကံ နာဂစ္ဆိ. မဟာထေရောပိ ကာရဏံ အကလ္လတာယ အနာဂတော ဘဝေယျာတိ မညိတွာ ပုစ္ဆနတ္ထာယ ဘိက္ခူ ပေသေသိ. तब स्थविर ने ऐसा कहा— 'हे आयुष्मान! मैं प्रतिदिन तीन बार ग्रंथ पढ़ाता हूँ, दोपहर बीतने के समय भी पञ्ञ-चैत्य जाकर चैत्य के आँगन में बुहारने का कार्य करता हूँ, मुझे अवसर नहीं मिलता। फिर भी तुम बहुत से ग्रंथ सीखकर भी आचार्यों द्वारा दिए गए उपदेश को न पाकर पुनः मेरे पास आए हो, इसलिए उस आँगन को बुहारने के कर्तव्य को कुछ समय के लिए छोड़कर तुम्हें ग्रंथ सीखने का अवसर दूँगा।' ऐसा कहकर उन्होंने 'अभिधम्मत्थविभाविनी' नामक लक्षण-टीका पढ़ाई। अनेक विधियों से उपदेश देकर पढ़ाया। पढ़ाने के बाद तीसरे दिन वे आचार्य के पास नहीं आए। महास्थविर ने भी यह सोचकर कि शायद अस्वस्थता के कारण नहीं आए होंगे, पूछने के लिए भिक्षुओं को भेजा। အရိယဝံသတ္ထေရောစ အာစရိယဿ သန္တိကံ ဂမိဿာမီတိ အာဂတော, အန္တရာမဂ္ဂေယေဝ ဒူတဘိက္ခူ ပဿိတွာ တေဟိ သဒ္ဓိံ မဟာထေရဿ သန္တိကံ အာဂမံသု. အာစရိယဿ သန္တိကံ ပတွာ အာစရိယာ အရိယဝံသတ္ထေရံ ပုစ္ဆိ,-ကသ္မာ ပန တွံ န ဥဂ္ဂဟဏတ္ထာယ အာဂတောသီတိ. အဟံ ဘန္တေ တုမှေဟိ ဒိန္နောပဒေသံ နိဿာယ ဣဒါနိ သဗ္ဗံ နယံ ဇာနာမီတိ. အထ အာစရိယော အာဟ, ယံ ပန ဂန္ထံ နိဿာယ တွံ ဆေကတံ ပတ္တောသိ, တဿ သံဝဏ္ဏနံ ကတွာ ဥပကာရံ ကရောဟီတိ. အထ အရိယဝံသတ္ထေရော အာစရိယဿ ဝစနံ သိရသာ ပဋိဂ္ဂဟေတွာ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝိနိယာ မဏိသာရမဉ္ဇူသံ နာမ အနုသံဝဏ္ဏနံ အကာသိ. နိဋ္ဌိတနိဋ္ဌိတပါဠံ ဥပေါသထဒိဝသေ ဥပေါသထဒိဝသေ ပုညစေတိယဿ စေတိယင်္ဂဏေ ဘိက္ခုသံဃံ သန္နိပါတာပေတွာ ဘိက္ခုသံဃဿ မဇ္ဈေ ဝါစာပေတွာ သုဏာပေသိ,- သစေ ကောစိ ဒေါသော အတ္ထိ, တံ ဝဒထာတိ. आरियवंस स्थविर भी 'आचार्य के पास जाऊँगा' ऐसा सोचकर निकले, रास्ते में ही दूत भिक्षुओं को देखकर उनके साथ महास्थविर के पास आए। आचार्य के पास पहुँचने पर आचार्य ने आरियवंस स्थविर से पूछा— 'तुम सीखने के लिए क्यों नहीं आए?' (उन्होंने कहा—) 'भन्ते! आपके द्वारा दिए गए उपदेश के सहारे अब मैं सभी विधियों को जान गया हूँ।' तब आचार्य ने कहा— 'जिस ग्रंथ के सहारे तुमने कुशलता प्राप्त की है, उसकी व्याख्या करके उपकार करो।' तब आरियवंस स्थविर ने आचार्य के वचन को सिर माथे स्वीकार कर 'अभिधम्मत्थविभाविनी' की 'मणिसारमञ्जूसा' नामक अनु-व्याख्या की। वे प्रत्येक उपोसथ के दिन पुण्य-चैत्य के आँगन में भिक्षु-संघ को एकत्रित कर, भिक्षु-संघ के बीच में पूर्ण हुए पाठों को पढ़वाकर सुनाते थे और कहते थे— 'यदि कोई दोष हो, तो उसे बताएँ'। အထ အရိမဒ္ဒနနဂရတော စေတိယဝန္ဒနတ္ထာယ ဧကော ဘိက္ခု အာဂန္တွာ ပရိသကောဋိယံ သုဏိတွာ နိသီဒိ. အထ သော ဘိက္ခု ဒွေ ဝါရံ ဧဧဣတိ သဒ္ဒံ အကာသိ. တံ ဌာနံ သလ္လက္ခေတွာ ဌပေသိ. နိဝါသနဋ္ဌာနဉ္စ ပုစ္ဆိ. အရိယဝံသတ္ထေရောပိ သကဝိဟာရံ ပတွာ တသ္မိံ ဌာနေ ဥပဓာရောန္တော ဧကသ္မိံ ဌာနေ ဧကဿ အတ္ထဿ ဒွိက္ခတ္တုံ ဝုတ္တတ္တာ ပုနရုတ္တိဒေါသော ဒိဿတိ, ဧကသ္မိံ [Pg.110] ဌာနေ ဣမံ ဂန္ထန္တိ ပုလ္လိင်္ဂရူပေန ဝတ္တဗ္ဗဋ္ဌာနေ ဣဒံ ဂန္ထန္တိ နပုံသကလိင်္ဂေန ဝုတ္တတ္တာ လိင်္ဂဝိရောဓိဒေါသော ဒိဿတိ. तब अरिमद्दन नगर से चैत्य वंदना के लिए आए एक भिक्षु सभा के एक कोने में बैठकर सुन रहे थे। तब उस भिक्षु ने दो बार 'ई-ई' की आवाज़ की। (स्थविर ने) उस स्थान को चिह्नित कर लिया और उनके निवास स्थान के बारे में पूछा। आरियवंस स्थविर ने भी अपने विहार पहुँचकर उस स्थान पर विचार करते हुए पाया कि एक स्थान पर एक ही अर्थ को दो बार कहे जाने के कारण 'पुनरुक्ति दोष' दिखाई देता है, और एक स्थान पर जहाँ 'इमं गन्थं' पुल्लिंग रूप में कहना चाहिए था, वहाँ 'इदं गन्थं' नपुंसक लिंग में कहे जाने के कारण 'लिंग-विरोध दोष' दिखाई देता है। အထ တံ ပုဂ္ဂလံ ပက္ကောသာပေတွာ ဧဝမာဟ,-အဟံ အာဝုသော ဣမံ ဂန္ထံ မဟုဿာဟေန ကရောမိ, တဉ္စ ဝိဝေကကာလေ ရတ္တိဘာဂေယေဝ ပေါတ္ထကံ ပတ္ထရိတွာ လိခါမိ, ဧဝံ မဟုဿာဟေန ကရောန္တမ္ပိ တွံ အရုစ္စနာကာရေန သဒ္ဒံ ကရောသိ, ကီဒိသံ ပန ဒေါသံ သုတွာ ဧဝံ ကရောသီတိ ပုစ္ဆိ. အထ သော ဘိက္ခု ဧဝမာဟ,- တယော ဘန္တေ မဟုဿာဟေန ကတေ ဂန္ထေ ဒေါသဝသေန ဗဟုဝတ္တဗ္ဗဋ္ဌာနံ နတ္ထိ, သဒ္ဒတောစေဝ အတ္ထတော စ ပရိပုဏ္ဏောယေဝေသ ဂန္ထော, အထ ခေါ ပန ဧကသ္မိံ ဌာနေ ဧကဿ အတ္ထဿ ဒွိက္ခတ္တုံ ဝုတ္တတ္တာ ပုရနုတ္တိဒေါသော ဒိဿတိ, ဧကသ္မိံ ပန ဣမံ ဂန္ထန္တိ ပုလ္လိင်္ဂေန ဝတ္တဗ္ဗဋ္ဌာနေ ဣဒံ ဂန္ထန္တိ နပုံသကလိင်္ဂေန ဝုတ္တတ္တာ လိင်္ဂဝိရောဓိဒေါသော ဒိဿတိ, ဧဝံ ဧတ္တကံယေဝ ဒေါသံ ဒိသွာ ဤဒိသံ အရုစ္စနာကာရံ ဒဿေမီတိ. तब उस व्यक्ति को बुलवाकर उन्होंने ऐसा कहा— 'हे आयुष्मान! मैं इस ग्रंथ को बड़े उत्साह से बना रहा हूँ, और इसे एकांत के समय रात में ही पुस्तक फैलाकर लिखता हूँ। इस प्रकार बड़े उत्साह से कार्य करते हुए भी तुम अरुचि प्रकट करने वाली आवाज़ करते हो, तुमने कैसा दोष सुनकर ऐसा किया?' तब उस भिक्षु ने ऐसा कहा— 'भन्ते! आपके द्वारा बड़े उत्साह से बनाए गए इस ग्रंथ में दोष के रूप में अधिक कुछ कहने योग्य नहीं है, यह ग्रंथ शब्द और अर्थ दोनों से परिपूर्ण ही है। फिर भी, एक स्थान पर एक ही अर्थ को दो बार कहे जाने के कारण पुनरुक्ति दोष दिखाई देता है, और एक स्थान पर जहाँ 'इमं गन्थं' पुल्लिंग में कहना चाहिए था, वहाँ 'इदं गन्थं' नपुंसक लिंग में कहे जाने के कारण लिंग-विरोध दोष दिखाई देता है। इस प्रकार केवल इतना ही दोष देखकर मैंने ऐसी अरुचि प्रकट की थी'। အထ အရိယဝံသတ္ထေရော တုဋ္ဌစိတ္တော ဟုတွာ အတ္တနော သရီရပါရုပိတံ ဒုပဋ္ဋစီဝရံ ဣမိနာဟံ တဝ ဉာဏံ ပူဇေမီတိ ဝတွာ အဒါသိ. ပစ္ဆာကာလေ အဓိကရာဇာ တမတ္ထံ သုတွာ နာမ လဉ္ဆံ အဒါသိ. तब आरियवंस स्थविर ने प्रसन्नचित्त होकर अपने शरीर पर धारण किया हुआ दुपट्ठा चीवर यह कहते हुए दे दिया कि 'इससे मैं आपके ज्ञान की पूजा करता हूँ।' बाद में अधिराज ने इस बात को सुनकर उन्हें नाम और उपाधि प्रदान की। သော စ အရိယဝံသတ္ထေရော မဏိဒီပံ နာမ ဂန္ထံ ဂန္ထာ ဘရဏဉ္စေဝ ဇာတကဝိသောဓနဉ္စ ပါဠိဘာသာယ အကာသိ. အနုဋီကာယ ပန အတ္ထယောဇနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. और उन आरियवंस स्थविर ने 'मणिदीप' नामक ग्रंथ, 'गंधाभरण' और 'जातकविसोधन' की रचना पालि भाषा में की। किंतु अनु-टीका की अर्थ-योजना म्यांमार भाषा में की। ဧကံ သမယံ အဓိကရာဇာ ဝိဟာရံ ဂန္တွာ ဓမ္မံ သုဏိ. ထေရော ဓမ္မံ ဒေသေတွာ နိဋ္ဌိတကာလေ ယာနဗလိံ သုခတ္ထာယ ယာစိ. ရာဇာ အဒတွာ နာဝံ အဘိရူဟိတွာ ပစ္စာဂစ္ဆိ. အန္တရာမဂ္ဂေ နာဝါယ ဖိယံ ဧကော သံသုမာရော မုခေန ဂဏှိတွာ နိစ္စလံ ကတွာ ဌပေသိ. ထေရေန ယာစိတံ ယာနဗလိံ ဒဒါမီတိ မဟာသဒ္ဒံ ကတွာ ရာဇပုရိသေ တိက္ခတ္တုံ နိစ္ဆာရေသိ. အထ သံသုမာရော နာဝံ မုဉ္စိတွာ ဂစ္ဆိ. ဧကသ္မိဉ္စ ကာလေ ရာဇာ ဝိဟာရံ နိက္ခမိ. အထ [Pg.111] ဧကော ဟတ္ထိနီ ဝိဟာရသမီပေ ဗန္ဓိတွာ ဌပေသိ. သာ ဗောဓိရုက္ခသာခံ ဆိန္ဒိတွာ ခါဒိ. သာ တတ္ထေဝ ဘူမိယံ ပတိ. အထ ထေရော သစ္စကိရိယံ ကတွာ မေတ္တာဘာဝနံ ဘာဝေတွာ မေတ္တောဒကေန ဘိဉ္စိ. တံ ခဏညေဝ သာ ဥဋ္ဌဟိ. ရာဇာ စ တံ အစ္ဆရိယံ ဒိသွာ တဿာ အဂ္ဃနကမူလံ ဒတွာ ဝိဟာရတော နဒီ တိတ္ထံ ဂမနမဂ္ဂေ သိလာပဋ္ဋံ စိနိတွာ သေတုံ အကာသီတိ. एक समय अधिराज विहार जाकर धर्म सुना। स्थविर ने धर्म उपदेश देकर समाप्त होने के समय सुख के लिए यान-बलि (वाहन कर/दान) माँगी। राजा ने न देकर नाव पर चढ़कर लौट गया। रास्ते में नाव के पतवार को एक मगरमच्छ ने मुँह से पकड़कर स्थिर कर दिया। स्थविर द्वारा माँगी गई यान-बलि देता हूँ, ऐसा कहकर राजा ने राजपुरुषों को तीन बार जोर से चिल्लाकर आदेश दिया। तब मगरमच्छ नाव छोड़कर चला गया। एक समय राजा विहार से निकला। तब एक हथिनी विहार के समीप बाँधकर रखी गई थी। उसने बोधिवृक्ष की शाखा तोड़कर खा ली। वह वहीं भूमि पर गिर पड़ी। तब स्थविर ने सत्य-क्रिया करके और मैत्री-भावना भाकर मैत्री-जल से सींचा। उसी क्षण वह उठ खड़ी हुई। राजा ने उस आश्चर्य को देखकर उसका मूल्य देकर विहार से नदी के घाट तक जाने के मार्ग में शिलापट्टों को चुनकर एक सेतु (पुल) बनवाया। သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရော ပန အရိယဝံသတ္ထေရဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကော ဇေတဝနဝိဟာရဝါသီ. တေ ပန ထေရာ ဆပ္ပဒဂဏဝံသိကာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. सद्धम्मकित्ति स्थविर तो अरियवंस स्थविर के सद्धिविहारिक (शिष्य) और जेतवन विहार के निवासी थे। उन स्थविरों को छप्पदगणवंशीय समझना चाहिए। ကလိယုဂေ ဒွေစတ္တာလီသာဓိကေ အဋ္ဌဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ရတနပူရနဂရေယေဝ သိရိသုဓမ္မရာဇာဓိပတိ နာမ ဒုတိယာဓိကရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ ပဗ္ဗတဗ္ဘန္တရနဂရတော မဟာသီလဝံသော နာမ ထေရော ပဉ္စစတ္တာလီသာဓိကေ အဋ္ဌဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ သုမေဓကထံ ကဗျာလင်္ကာရဝသေန ဗန္ဓိတွာ ဗုဒ္ဓါလင်္ကာရဉ္စ နာမ ကဗျာလင်္ကာရံ ပဗ္ဗတဗ္ဘန္တရပ္ပဋိသံယုတ္တဉ္စေဝ ကဗျာလင်္ကာရံ ဗန္ဓိတွာ တေ ဂဟေတွာ ရတနပူရနဂရံ အာဂစ္ဆိ. कलियुग के ८४२ वर्ष बीतने पर रतनपुर नगर में ही सिरिसुधम्मराजाधिपति नामक द्वितीय अधिराज ने राज्य किया। उस समय पर्वत-अभ्यन्तर नगर से महासीलवंस नामक स्थविर ८४५ वर्ष बीतने पर सुमेध-कथा को काव्यालंकार के रूप में रचकर, और बुद्धालंकार नामक काव्यालंकार तथा पर्वत-अभ्यन्तर से संबंधित काव्यालंकार रचकर, उन्हें लेकर रतनपुर नगर आए। အထ ရာဇာ ထူပါရာမစေတိယဿ ဧသန္နဋ္ဌာနေ ရတနဝိမာနဝိဟာရေ နိသီဒါပေသိ. သော စ ထေရော တတ္ထ သောတာရာနံ ပရိယတ္တိံ ဝါစေတွာ နိသီဒိ. သော စ ထေရော တတ္ထ နိသိန္နာနံ ထေရာနံ အဋ္ဌမကော ဟောတိ. သော စ မဟာသီလဝံသတ္ထေရော ကလိယုဂဿ ပန္နရသာဓိကေ အဋ္ဌဝဿသတေ ဇာတော. တိံသဝဿကာလေ ရတနပူရနဂရံ အာဂတောတိ ပေါရာဏပေါတ္ထကေသု ဝုတ္တံ. သော ပန ထေရော နေတ္တိပါဠိယာ အတ္ထ ယောဇနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ ပါရာယနဝတ္ထုဉ္စ. तब राजा ने थूपाराम चैत्य के समीप रत्नविमान विहार में उन्हें ठहराया। वह स्थविर वहाँ श्रोताओं को परियत्ति (धर्म-ग्रन्थ) पढ़ाते हुए रहे। वह स्थविर वहाँ बैठे हुए स्थविरों में आठवें थे। वह महासीलवंस स्थविर कलियुग के ८१५ वर्ष में जन्मे थे। तीस वर्ष की आयु में वे रतनपुर नगर आए, ऐसा प्राचीन पुस्तकों में कहा गया है। उस स्थविर ने नेत्तिपालि की अर्थ-योजना (व्याख्या) और पारायण-वस्तु को बर्मी भाषा में रचा। ရတနပူရနဂရေယေဝ ရဋ္ဌသာရော နာမ ဧကော ထေရော အတ္ထိ, မဟာသီလဝံသတ္ထေရေန သမညာဏထာမော. သော ပန ရတနပူရနဂရေယေဝ [Pg.112] ကလိယုဂဿ တိံသာဓိကေ အဋ္ဌဝဿသတေ ကာလေ ဇာတော. ဘူရိဒတ္တဇာတကံ ဟတ္ထိပါလဇာတကံ သံဝရဇာတကဉ္စ ကဗျာလင်္ကာရဝသေန ဗန္ဓိ အညဉ္စ အနေကဝိဓံ ကဗျာလင်္ကာရံ. တေ ပန ဒွေ ထေရာ ကဗျာလင်္ကာရကာ ရကာတိ ထေရပရမ္ပရာယ ပဝေသေတွာ န ဂဏေန္တိ ပေါရာဏာ. रतनपुर नगर में ही रट्ठसार नामक एक स्थविर थे, जो महासीलवंस स्थविर के समान ज्ञान और शक्ति वाले थे। वे रतनपुर नगर में ही कलियुग के ८३० वर्ष के समय में जन्मे थे। उन्होंने भूरिदत्त जातक, हत्थिपाल जातक और संवर जातक को काव्यालंकार के रूप में रचा और अन्य अनेक प्रकार के काव्यालंकार भी रचे। उन दोनों स्थविरों को काव्यालंकार रचने वाले होने के कारण प्राचीन लोग स्थविर-परम्परा में सम्मिलित कर नहीं गिनते हैं। ဧတ္ထ စ ကိဉ္စာပိ သမဏာနံ ဥပေါသထိကာနဉ္စ ကဗျာလင်္ကာရံ ဗန္ဓိတုံ ဝါစေတုံ ဝါ ကပ္ပာကပ္ပဝိစာရဏံ ဝတ္တုံ ဩကာသော လဒ္ဓေါ, သာသနဝံသံ ပန ဝတ္တုံ ဩကာသဿ အတိဝိတ္ထာရောဝသေသတ္တာ တံ အဝတွာ အဇ္ဈုပေက္ခိဿာမ. ဥပေါသထဝိနိစ္ဆယေ ပန နစ္စဂီတာဒိသိက္ခာပဒဿ ဝိသယေ ဝိတ္ထာရေန မယံ အဝေါစုမှာ. यहाँ यद्यपि श्रमणों और उपोसथिकों के लिए काव्यालंकार रचने या पढ़ाने के कल्प्य-अकल्प्य के विचार को कहने का अवसर प्राप्त है, किन्तु शासनवंश को कहने के अवसर के अत्यधिक विस्तार के शेष होने के कारण, उसे न कहकर हम उपेक्षा करेंगे। उपोसथ-विनिश्चय में तो हमने नृत्य-गीत आदि शिक्षापदों के विषय में विस्तार से कहा है। ကလိယုဂဿ ဂတေ တေသဋ္ဌာဓိကေ အဋ္ဌဝဿသတေ ရတနပူရနဂရေယေဝ သိရိတြိဘဝနာဒိတျနရပတိပဝရမဟာဓမ္မ ရာဇာဓိပတိရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. တဿ ရညော ကာလေတိသာသနဓဇော နာမ ဘိက္ခု သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရဿ သန္တိကေ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှိ. အထ အရိမဒ္ဒနနဂရတော ဧကော မဟာထေရောသောတုနံ ဝါစိတွာ ရတနပူရနဂရေ နိသီဒိဿာမီတိ အာဂတော. အထ သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရဿ ဂန္ထံ ဝါစေန္တဿေဝ ဝိဟာရဿ ဟေဋ္ဌာ နိသီဒိတွာ သော မဟာထေရော သဒ္ဒံ သုဏိတွာ ဧဝံ စိန္တေသိ,-ဧတဿ သန္တိကေ အဟံ နဝကဋ္ဌာနေ ဌတွာ ထောကံ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှိဿာမီတိ. အထ သော မဟာထေရော သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရဿ သန္တိကံ ပဝိသိတွာ ဂန္ထံ ဝါစာပေတုံ ဩကာသံ ယာစိ. အထ သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရော ဝဿပမာဏံ ပုစ္ဆိတွာ တွံ ဘန္တေ မယာ ဝုဍ္ဎတရောသီတိ အာဟ. အဟံ တယာ ဝုဍ္ဎတရောပိ သမာနော နဝကဋ္ဌာနေ ဌတွာ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှိဿာမီတိ အာဟ. အထ သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရော တဿ ဂန္ထံ ဝါစေသိ. အတိပသီဒိတွာ ပန တံ မဟာထေရံ မဟာသာဓုဇ္ဇနောတိ နာမေန ဝေါဟာရတိ. कलियुग के ८६३ वर्ष बीतने पर रतनपुर नगर में ही सिरित्रिभवनादित्यनरपतिपवरमहाधम्म राजाधिपति राजा ने राज्य किया। उस राजा के समय में तिसासनधज नामक भिक्षु ने सद्धम्मकित्ति स्थविर के पास ग्रन्थों का अध्ययन किया। तब अरिमद्दन नगर से एक महास्थविर श्रोताओं को पढ़ाते हुए 'रतनपुर नगर में रहूँगा' ऐसा सोचकर आए। तब सद्धम्मकित्ति स्थविर के ग्रन्थ पढ़ाते समय ही विहार के नीचे बैठकर उस महास्थविर ने शब्द सुनकर ऐसा सोचा—'इनके पास मैं नवागन्तुक के स्थान पर रहकर थोड़ा ग्रन्थ अध्ययन करूँगा।' तब उस महास्थविर ने सद्धम्मकित्ति स्थविर के पास प्रवेश कर ग्रन्थ पढ़ाने का अवसर माँगा। तब सद्धम्मकित्ति स्थविर ने वर्षा का प्रमाण पूछकर कहा—'भन्ते! आप मुझसे वृद्ध हैं।' उन्होंने कहा—'मैं आपसे वृद्ध होते हुए भी नवागन्तुक के स्थान पर रहकर ग्रन्थ अध्ययन करूँगा।' तब सद्धम्मकित्ति स्थविर ने उन्हें ग्रन्थ पढ़ाया। अत्यधिक प्रसन्न होकर उन्होंने उस महास्थविर को 'महासाधुज्जन' नाम से पुकारा। အထ [Pg.113] ပစ္ဆာ မရမ္မရဋ္ဌံ ကလိယုဂဿ ပဉ္စာသီတာဓိကအဋ္ဌသတကာလတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ အဋ္ဌာသီတာဓိကအဋ္ဌသတဝဿကာလံ နာနာဘယေဟိ သင်္ခုဗ္ဘိတံ အဟောသိ. တဒါ ကမ္ဗောဇရဋ္ဌတော သိဟနိသွာ နာမ ဘိန္နကုတော အာဂန္တွာ ရတန ပူရနဂရေ ရဇ္ဇံ ဂဏှိ. အထ သော ဧဝံ စိန္တေသိ,- ဘိက္ခူ အဒါရာ အပုတ္တိကာ ဟုတွာ ပုန သိဿေ ပေါသေတွာ ပရိဝါရံ ဂဝေသန္တိ, သစေ ဘိက္ခူ ပရိဝါရံ ဝိစိနိတွာ ရာဇဘာဝံ ဂဏှေယျုံ, ဧဝံ သတိ ရဇ္ဇံ ဂဟေတုံ သက္ခိဿန္တိ, ဣဒါနေဝ ဘိက္ခူ ဂဟေတွာ မာရေတုံ ဝဋ္ဋတီတိ. ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ တောဝိသီလူ နာမကေ ခေတ္တဝနေ ဗဟူ မဏ္ဍပေ ကာရာပေတွာ ဂေါမဟိသကုက္ကုဋသူကရာဒယော မာရာပေတွာ ဘိက္ခူ ဘောဇေဿာမီတိ ဝတွာ ဇေယျပုရဝိဇယပုရရတနပူရနဂရေသု သဗ္ဗေ မဟာထေရေ ဗဟူဟိ အန္တေဝါသိကေဟိ သဒ္ဓိံ ပက္ကောသာပေတွာ တေသု မဏ္ဍပေသု နိသီဒါပေတွာ ဟတ္ထိအဿာဒိသေနင်္ဂေဟိ ပရိဝါရေတွာ မာရေသိ. တဒါ ကိရ တိသဟဿပ္ပမာဏာ ဘိက္ခူ မရိံသူတိ. ဘိက္ခူ စ မာရေတွာ ဗဟူပိ ပေါတ္ထကေ အဂ္ဂိနာ ဈာပေသိ, စေတိယာနိပိ ဘေဒါပေသိ. အဟောဝတ ပါပဇနဿ ပါပကမ္မန္တိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ,- इसके बाद, म्यांमार (मरम्मरट्ठ) देश कलियुग के ८८५ (आठ सौ पचासी) वर्ष से लेकर ८८८ (आठ सौ अठासी) वर्ष तक विभिन्न भयों से क्षुब्ध रहा। तब कम्बोज देश से सिंहनिस्वा नामक एक विद्रोही ने आकर रतनपुर नगर में राज्य ग्रहण किया। तब उसने ऐसा सोचा—भिक्षु बिना पत्नी और बच्चों के होकर पुनः शिष्यों का पालन कर परिवार (अनुयायी) खोजते हैं, यदि भिक्षु परिवार जुटाकर राजा बन जाएँ, तो वे राज्य छीनने में सक्षम होंगे, इसलिए अभी भिक्षुओं को पकड़कर मार देना ही उचित है। ऐसा सोचकर उसने तोविसीलू नामक खेत-वन में बहुत से मण्डप बनवाए और गाय, भैंस, मुर्गे, सूअर आदि को मरवाकर 'मैं भिक्षुओं को भोजन कराऊँगा' ऐसा कहकर जेय्यपुर, विजयपुर और रतनपुर नगरों के सभी महास्थविरों को उनके बहुत से अन्तेवासियों (शिष्यों) के साथ बुलवाया और उन मण्डपों में बिठाकर हाथी, घोड़े आदि सेना के अंगों से घेरकर उन्हें मार डाला। कहते हैं कि तब लगभग तीन हजार भिक्षु मारे गए। भिक्षुओं को मारकर उसने बहुत सी पुस्तकों को भी अग्नि में जलवा दिया और चैत्यों को भी तुड़वा दिया। अहो! उस पापी मनुष्य का कैसा पापकर्म था। यहाँ ये गाथाएँ हैं— သာသနံ နာမ ရာဇာနံ, နိဿာယ တိဋ္ဌတေ ဣဓ; မိစ္ဆာဒိဋ္ဌိကရာဇာနော, သာသနံ ဒူသေန္တိ သတ္ထုနော. शासन (धर्म) यहाँ राजा के आश्रित होकर ही टिकता है; मिथ्यादृष्टि राजा शास्ता (बुद्ध) के शासन को दूषित करते हैं। သမ္မာဒိဋ္ဌီ စ ရာဇာနော, ပဂ္ဂဏှန္တေဝ သာသနံ; ဧဝဉ္စ သတိ အာကာသေ, ဥလူရာဇာဝ ဒိဗ္ဗတီတိ. और सम्यग्दृष्टि राजा शासन का प्रग्रह (समर्थन) करते हैं; और ऐसा होने पर वह (शासन) आकाश में चन्द्रमा के समान प्रकाशित होता है। အထ ကလိယုဂေ ဧကဝဿာဓိကေ နဝဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ အာကာသေ ဗဟူဟိ တာရကာဟိ ဓူမာ နိက္ခမိံသု. စညိင်္ခုစေတိယေပိ ဗုဒ္ဓပ္ပဋိဗိမ္ဗဿ အက္ခိကူပတော ဥဒကဓာရာနေတ္တဇလာနိဝိယ နိက္ခမိံသူတိ ရာဇဝံသေ ဝုတ္တံ. इसके बाद कलियुग के ९०१ (नौ सौ एक) वर्ष पूरे होने पर आकाश में बहुत से तारों से धुआँ निकला। चञ्ञिङ्खु चैत्य में भी बुद्ध प्रतिमा के नेत्र-कोटरों से जल की धाराएँ आँसुओं की तरह निकलीं, ऐसा राजवंश में कहा गया है। အထ [Pg.114] သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရော သဒ္ဓိံ မဟာသာဓုဇ္ဇနတိသာယ နဓဇတ္ထေရေဟိ ကေတုမတီနဂရံ အဂမာသိ. ရဋ္ဌသာရတ္ထေရောပိ သိရိခေတ္တနဂရံ သယမေဝ အဂမာသီတိ ပေါရာဏပေါတ္ထကေသု ဝုတ္တံ. တံ ပန ရာဇဝံသေ သိရိခေတ္တနဂရိန္ဒော သတွ ဝရာဇာ တံ အာနေသီတိ ဝုတ္တဝစနေန န သမေတိ. इसके बाद सद्धम्मकित्ति स्थविर महासाधुज्जन और तिसय नधज स्थविरों के साथ केतुमती नगर गए। रट्ठसार स्थविर भी स्वयं ही सिरिखेत्त नगर गए, ऐसा पुरानी पुस्तकों में कहा गया है। किन्तु वह राजवंश के इस कथन से मेल नहीं खाता कि सिरिखेत्त नगर के स्वामी सत्वव राजा ने उन्हें बुलवाया था। သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရောပိ ကေတုမတီနဂရေ ကာလင်္ကတော. တတော ပစ္ဆာ ထောကံ ကာလံ အတိက္ကမိတွာ မဟာသာဓုဇ္ဇနတ္ထေရော တတ္ထေဝ ကာလမကာသိ. सद्धम्मकित्ति स्थविर का भी केतुमती नगर में देहान्त हो गया। उसके बाद कुछ समय बीतने पर महासाधुज्जन स्थविर ने भी वहीं प्राण त्याग दिए। တိသာသနဓဇတ္ထေရော ပန ကလိယုဂေ ဒွါဒသာဓိကေ နဝဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ဟံသာဝတီနဂရေ အနေကသေတိဘိန္ဒဿ ရညော ကာလေ ကေတုမတီနဂရတော ဟံသာဝတီနဂရံ အဂမာသိ. तिससनधज स्थविर तो कलियुग के ९१२ (नौ सौ बारह) वर्ष पूरे होने पर हंसावती नगर के राजा अनेकसेतिभिन्द के समय में केतुमती नगर से हंसावती नगर चले गए। တတော ပစ္ဆာ တိစတ္တာလီသဝဿိကော ဟုတွာ ကလိယုဂေ တေရသာဓိကေ နဝဝဿသတေ မိင်္ဃ ဗြဟ္မနရပတိရညောကာလေ ပုန ဇေယျပုရနဂရံ သမ္ပတ္တော ဟုတွာ ဇေတဝနဝိဟာရသမီပေ ဧကိဿံ ဂုဟာယံ ဒိသီဒိ. မဟာအရိယဝံသဂဏိကဿ ဇေတဝနတ္ထေရဿ သန္တိကေ ဥပသင်္ကမိ. उसके बाद तैंतालीस वर्ष की आयु में, कलियुग के ९१३ (नौ सौ तेरह) वर्ष में मिङ्घ ब्रह्म नरपति राजा के समय में पुनः जेय्यपुर नगर पहुँचकर जेतवन विहार के समीप एक गुफा में निवास किया। वे महाअरियवंश गण के जेतवन स्थविर के पास गए। တသ္မိဉ္စ ကာလေ ဇေတဝနတ္ထေရော ဂိလာနော ဟုတွာ မယိ ကာလင်္ကတေ မမ ဌာနံ အဓုနာ ဟံသာဝတီနဂရတော အာဂတော တိသာသနဓဇော နာမ ထေရော ပရိဂ္ဂဏှိတုံ သမတ္ထော ဘဝိဿတိ, တဿ နိယျာဒေဿာမီတိ စိန္တေသိ. တသ္မိံ ခဏေ တိသာသနဓဇတ္ထေရော ပုရိမယာမေ သုပိနံ မဿိ,– မတကဠေဝရံ သမီပံ အာဂစ္ဆတီတိ, မဇ္ဈိမယာမေ ပန တံ မတကဠေဝရံ ဂုဟာယံ ပဝိသတီတိ, ပစ္ဆိမယာမေ မတကဠေဝရဿ မံသံ သတ္ထေန ဆိန္ဒတီတိ. အထ သုပိနံ ပဿိတဘာဝံ အတ္တနော သမီပေ သယန္တဿ ဧကဿ သာမဏေရဿ အာရောစေသိ. အာရောစေတွာ စ ပရိတ္တံ ဘဏေတွာ နိသီဒန္တဿေဝ ဇေတဝနတ္ထေရော တံ ပက္ကောသိတွာ ဇေတဝနဝိဟာရံ တဿ နိယျာဒေသိ. တိသာသနဓဇတ္ထေရော စ ဇေတဝနဝိဟာရေ နိသီဒိတွာ [Pg.115] ဂန္ထံ ဝါစေတွာ နိသီဒိ. မိင်္ဃ ဗြဟ္မနရပတိရာဇာ စ တဿ အနုဂ္ဂဟိတံ အကာသိ. उस समय जेतवन स्थविर बीमार थे और उन्होंने सोचा कि मेरे मरने के बाद मेरा स्थान अभी हंसावती नगर से आए हुए तिससनधज नामक स्थविर सँभालने में समर्थ होंगे, मैं उन्हें यह सौंप दूँगा। उसी क्षण तिससनधज स्थविर ने रात्रि के प्रथम पहर में स्वप्न देखा कि—एक मृत शरीर समीप आ रहा है, मध्य पहर में वह मृत शरीर गुफा में प्रवेश कर रहा है, और अन्तिम पहर में वह मृत शरीर का मांस शस्त्र से काट रहा है। तब उन्होंने स्वप्न देखने की बात अपने पास सो रहे एक सामणेर को बताई। बताने के बाद और परीत्त पाठ कर बैठते ही जेतवन स्थविर ने उन्हें बुलवाकर जेतवन विहार उन्हें सौंप दिया। तिससनधज स्थविर जेतवन विहार में रहकर ग्रन्थों का अध्यापन कराने लगे। और मिङ्घ ब्रह्म नरपति राजा ने उनकी सहायता की। ပစ္ဆာ ကလိယုဂေ သောဠသာဓိကေ နဝဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ဟံသာဝတီနဂရိန္ဒော အနေကသေတိဘိန္ဒော နာမ ရာဇာ ရတနပူရနဂရံ ဝိဇယိတွာ ဧကံ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တဿ အဒါသိ. बाद में कलियुग के ९१६ (नौ सौ सोलह) वर्ष पूरे होने पर हंसावती नगर के स्वामी अनेकसेतिभिन्द नामक राजा ने रतनपुर नगर को जीतकर एक विहार बनवाया और उन्हें दान कर दिया। သော စ တိသာသနဓဇတ္ထေရော အရိမဒ္ဒနနဂရေ အရဟန္တ ဂဏဝံသိကောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. उन तिससनधज स्थविर को अरिमद्दन नगर के अरहन्त गणवंश का समझना चाहिए। တဿ ပန သိဿာ အနေကသတပ္ပမာဏာ လဇ္ဇိနော အဟေသုံ. တေသု ပန သိဿေသု ဝရဗာဟုတ္ထေရော ဘူမိနိခါနေန ဂရဝါသိတ္ထေရော မဟာရဋ္ဌဂါမဝါသိနော တယော မဟာထေရာတိ ဣမေ ပဉ္စ ထေရာ ဝိသေသတော ပရိယတ္တိကောဝိဒါတိ. उनके अनेक सौ शिष्य लज्जी (विनयशील) थे। उन शिष्यों में वरबाहु स्थविर, भूमिनिखान के गरवासी स्थविर और महारट्ठग्राम के निवासी तीन महास्थविर—ये पाँच स्थविर विशेष रूप से पर्यत्ति (शास्त्र) के विद्वान थे। တိသာသနဓဇတ္ထေရော စ မဟလ္လကကာလေ အနာပါန သတိကမ္မဋ္ဌာနံ ဂဟေတွာ အရညံ ပဝိသိတွာ ဝိဝေကဋ္ဌာနံ ဂဏှိ. တဒါ ဇေတဝနဂဏာဒယော အရဟန္တ ဂဏဝံသာယေဝ. အပရဘာဂေယေဝ တေသံ သိဿာနုသိဿပရမ္ပရာသု ကေစိ ဘိက္ခူ သိရစ္ဆာဒနံ နာနာဝဏ္ဏပ္ပဋိမဏ္ဍိတဉ္စ တာလဝဏ္ဋံ ဂဟေတွာ အာစာရဝိကာရံ အာပဇ္ဇိံသု. तिससनधज स्थविर ने वृद्धावस्था में आनापानस्मृति कर्मस्थान ग्रहण कर अरण्य में प्रवेश किया और विवेक-स्थान (एकान्त) का आश्रय लिया। तब जेतवन गण आदि अरहन्त गणवंश के ही थे। बाद के समय में ही उनके शिष्यों और प्रशिष्यों की परम्पराओं में कुछ भिक्षुओं ने सिर ढकना और विभिन्न रंगों से अलंकृत ताड़ के पंखे (तालवृन्त) लेकर आचरण में विकार उत्पन्न कर लिया। ကလိယုဂေ ဧကဝဿာဓိကေ သဟဿေ သမ္ပတ္တေ ဥက္ကံသိကော နာမ ရာဇာ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တိသာသနဓဇတ္ထေရဿ သိဿဘူတဿ ဝရဗာဟုတ္ထေရဿ သိဿဘူတဿ မဟာရတနာကရဿ နာမ ထေရဿ အဒါသိ. कलियुग के १००१ (एक हजार एक) वर्ष पूरे होने पर उक्कंसिक नामक राजा ने एक विहार बनवाकर तिससनधज स्थविर के शिष्य वरबाहु स्थविर के शिष्य महारतनाकर नामक स्थविर को प्रदान किया। သော စ မဟာရတနာကရတ္ထေရော ဥက္ကံသိကရညော သိရိသုဓမ္မရာဇာမဟာဓိပတီတိ နာမလဉ္ဆံ ဆန္ဒာလင်္ကာရသဒ္ဒနေတ္တိ နယေဟိ အလင်္ကရိတွာ ဒဿိတံ ရဇိန္ဒရာဇနာမာဘိဓေယျာဒီပနိံ နာမ ဂန္ထံ အကာသိ. उन महारतनाकर स्थविर ने उक्कंसिक राजा के 'सिरिसुधम्मराजामहाधिपति' नामक विरुद (उपाधि) को छन्द, अलंकार और सद्दनेत्ति (व्याकरण) की विधियों से अलंकृत कर 'राजिन्दराजनामाभिधेय्यदीपनी' नामक ग्रन्थ की रचना की। တဉ္စ ဂန္ထံ ပရိဝိသောဓနတ္ထာယ တိရောပဗ္ဗတာဘိဓေယျဿ မဟာထေရဿ နိယျာဒေသိ. တိသာသနဓဇတ္ထေရဿ သိဿဘူတေသု [Pg.116] မဟာရဋ္ဌဂါမဝါသီသု တီသု ဘာတိကတ္ထေရေသု ဇေဋ္ဌော တိံသဂုဟာသုဝသန္တော ပရိယတ္တိံ ဝါစေတွာ နိသီဒိ. သတွဝရာဇာ စ တသ္မိံ ထေရေ အတိဝိယ ပသန္နော အဟောသိ. ညောင်္ကရမိ နာမကဿ ရညော ကာလေပိ စူဠပိတာ ဧကံ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တဿေဝ အဒါသိ. ဥက္ကံသိကရညော ကာလေပိ မင်္ဂဝံနာမကေ ပဗ္ဗတေ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တဿေဝ အဒါသိ. और उस ग्रंथ को शोधन के लिए तिरोपब्बत (पर्वत के पार) नामक महास्थविर को सौंप दिया। तिसासनध्वज स्थविर के शिष्यों में, महारट्ठगाम के निवासी तीन भाई स्थविरों में से ज्येष्ठ, जो तीस गुफाओं में रहते थे, पर्यत्ति (शास्त्र) का अध्यापन करते हुए निवास करते थे। सत्वव राजा उन स्थविर पर अत्यंत प्रसन्न हुए। ञोङ्करमि नामक राजा के समय में भी छोटे चाचा ने एक विहार बनवाकर उन्हीं को दिया। उक्कंसिक राजा के समय में भी मङ्गव नामक पर्वत पर एक विहार बनवाकर उन्हीं को दिया। တေသု မဟာရဋ္ဌဂါမဝါသိတ္ထေရေသု မဇ္ဈိမတ္ထေရောပိ တိသာသနဓဇတ္ထေရဿ ဇေဋ္ဌဘာတိကတ္ထေရဿ စ နိဝါသဋ္ဌာနဘူတေ ဇေတဝနဝိဟာရေယေဝ ဂန္ထံ ဝါစေတွာ နိသီဒိ. ကနိဋ္ဌတ္ထေရောပိ တေသံ နိဝါသဋ္ဌာနဘူတေသုယေဝ ဝိဟာရေသု ဂန္ထံ ဝါစေတွာ နိသီဒိ. ဧတ္ထ စ တိသာသနဓဇတ္ထေရော နာမ လဇ္ဇိအလဇ္ဇိဝသေန ဒုဗ္ဗိဓော. ယထာဝုတ္တတ္ထေရော ပန လဇ္ဇီယေ ဝါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. အလဇ္ဇီ ပန ဣမသ္မိံ ထေရပရမ္ပရာဒဿနေ န ဣစ္ဆိ တဗ္ဗော. အလဇ္ဇီဘူတဿ ပန တိသာသနဓဇတ္ထေရဿ ဝတ္ထုံ ဣဓ အဝတွာ အဇ္ဈုပေက္ခိဿာမ, ပယောဇနာဘာဝါ ဂန္ထဿ စ ပပဉ္စူပဂမနတ္တာတိ. उन महारट्ठगामवासी स्थविरों में से मध्यम स्थविर भी तिसासनध्वज स्थविर और ज्येष्ठ भ्राता स्थविर के निवास स्थान जेतवन विहार में ही ग्रंथ का अध्यापन करते हुए रहे। कनिष्ठ स्थविर भी उन्हीं के निवास स्थान वाले विहारों में ही ग्रंथ का अध्यापन करते हुए रहे। यहाँ तिसासनध्वज स्थविर लज्जी और अलज्जी के भेद से दो प्रकार के हैं। पूर्वोक्त स्थविर को लज्जी ही समझना चाहिए। अलज्जी को इस स्थविर-परम्परा के वर्णन में नहीं चाहा जाना चाहिए। अलज्जी हुए तिसासनध्वज स्थविर की कथा को यहाँ न कहकर हम उपेक्षा करेंगे, क्योंकि इसका कोई प्रयोजन नहीं है और इससे ग्रंथ का विस्तार होगा। ယောဂိရင်္ဂ နာမကဿ ရညော ကာလေ ဇေယျပုရေ သုဝဏ္ဏဂုဟဝါသီ မဟာထေရော ဒက္ခိဏာရာမဝိဟာရဝါသီ မဟာထေရော စတုဘူမိကဝိဟာရဝါသီ မဟာထေရော တောင်္ဂဘီလူ ဝိဟာရဝါသီ မဟာထေရော စ တိသာသနဓဇမဟာထေရဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကာယေဝ. တေသံ ပန ဝတ္ထုမ္ပိ ဂန္ထဝိတ္ထာရဘယေန န ဝဒါမ. လဇ္ဇိဂဏဝံသိကာ ဧတေတိ ဝိဇာနနမေဝ ဟေတ္ထ ပမာဏန္တိ. योगिरङ्ग नामक राजा के समय में जेय्यपुर में सुवर्णगुहावासी महास्थविर, दक्षिणाराम विहारवासी महास्थविर, चतुर्भूमिका विहारवासी महास्थविर और तोङ्गभीलू विहारवासी महास्थविर, ये सभी तिसासनध्वज महास्थविर के सार्धविहारिक ही थे। ग्रंथ के विस्तार के भय से हम उनकी कथा भी नहीं कहते हैं। वे लज्जी गण की वंशावली के हैं, इतना जानना ही यहाँ पर्याप्त है। ကလိယုဂေ ဧကသဋ္ဌာဓိကေ နဝဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ဖဂ္ဂုနမာသဿ ဇုဏှပက္ခဒုတိယဒိဝသေ သုက္ကဝါရေ ရတနပူရနဂရံ ဒုတိယံ မာပေတွာ ညောဂီရင်္ဂ နာမ ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. သီဟသူရဓမ္မရာဇာတိပိ နာမလဉ္ဆံ ပဋိဂ္ဂဏှိ. တောစဘီလူ ဝိဟာရဝါသီမဟာထေရံ [Pg.117] ဥဒ္ဒိဿ စတုဘူမိကဝိဟာရံ ကာရာပေသိ. စတ္တာရိ မဟာမုနိစေတိယာနိပိ ကာရာပေသိ. ဝိဟာရ စေတိယေသု အနိဋ္ဌိတေသုယေဝ သိန္နီနဂရံ နိက္ခမိတွာ တတ္ထ ဝေရံ ဝူပသမာပေတွာ ပစ္စာဂတကာလေ သင်္ခါရသဘာဝံ အနတိက္ကမနတော ဒိဝင်္ဂတော အဟောသိ. အဟောဝတ သင်္ခါရဓမ္မာတိ. ဟောန္တိ စေတ္ထ,– कलियुग के नौ सौ इकसठ वर्ष बीतने पर, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष के द्वितीय दिन, शुक्रवार को रत्नपुर नगर का दूसरी बार निर्माण करवाकर ञोगीरङ्ग नामक राजा ने राज्य किया। उन्होंने 'सिंहसूरधर्मराजा' की उपाधि भी ग्रहण की। उन्होंने तोचभीलू विहारवासी महास्थविर के उद्देश्य से चतुर्भूमिका विहार बनवाया। चार महामुनि चैत्यों का भी निर्माण करवाया। विहार और चैत्यों के अधूरे रहते ही सिन्नी नगर की ओर प्रस्थान कर, वहाँ वैर को शांत कर लौटते समय, संस्कारों के स्वभाव का अतिक्रमण न कर पाने के कारण वे स्वर्गवासी हो गए। अहो! संस्कार धर्म ऐसे ही हैं। इस विषय में ये गाथाएँ हैं— သေယျထာ ဝါဏိဇာနံဝ, ဃရဂေါဠိကရူပကံ; တံတံဒိသံ ဘမိတွာဝ, သီသံ ဌပေတိ ဥတ္တရံ; जैसे व्यापारियों के घर की छिपकली के समान, जो विभिन्न दिशाओं में घूमकर अंत में अपना सिर उत्तर की ओर रखती है; ဧဝံ လောကမှိ သတ္တာ စ, သန္ဓိစုတီနမန္တရေ; ယထာ တထာ ဘမိတွာဝ, အန္တေ ဌပေန္တိ သန္တနုန္တိ; वैसे ही इस लोक में प्राणी प्रतिसंधि और च्युति के बीच जैसे-तैसे भटककर अंत में अपनी संतति को स्थापित करते हैं। ကလိယုဂေ သတ္တသဋ္ဌာဓိကေ နဝဝဿသတေ ဖဂ္ဂုနမာသဿ ကာဠပက္ခတေရသမိယံ တဿ ဇေဋ္ဌပုတ္တော ပိတု သန္တကံ ရဇ္ဇံ ဂဏှိ. မဟာဓမ္မရာဇာတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ ပဋိဂ္ဂဏှိ. ပိတု ကာလေ အနိဋ္ဌိတာနိ စေတိယာနိ ပုန ကာရာပေသိ. စတုဘူမိကဝိဟာရဉ္စ နိဋ္ဌံ ဂမာပေတွာ တောဝိဘီလူ မဟာထေရဿ ပရလောကံ ဂန္တွာ အဝိဇ္ဇမာနတာယ စတုဘူမိကဝိဟာရဝါသီ မဟာထေရဿ ဒဿာမီတိ အန္တေပုရံ ပက္ကောသာပေသိ. ထေရော ဒွေ ဝါရာနိ ပက္ကောသိယမာနောပိ နာဂစ္ဆိ. တတိယ ဝါရေ ပန ဗဟူ သဒ္ဓိဝိဟာရိကာ အန္တေပုရံ ဂန္တွာ ပဝိသထ, န ဟိ သက္ကာ ရညာ ပက္ကောသိတေ ပဋိက္ခိပိတုန္တိ အာဟံသု. कलियुग के नौ सौ सड़सठ वर्ष में फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को उनके ज्येष्ठ पुत्र ने पिता का राज्य ग्रहण किया। उन्होंने 'महाधर्मराजा' की उपाधि भी ग्रहण की। पिता के समय में जो चैत्य अधूरे रह गए थे, उन्हें पुनः बनवाया। चतुर्भूमिका विहार को पूरा करवाकर, तोविभीलू महास्थविर के परलोक सिधार जाने के कारण अनुपस्थित होने पर, 'मैं इसे चतुर्भूमिका विहारवासी महास्थविर को दूँगा' ऐसा सोचकर उन्हें अंतःपुर में बुलवाया। दो बार बुलाए जाने पर भी स्थविर नहीं आए। तीसरी बार बहुत से सार्धविहारिकों ने कहा कि अंतःपुर में जाकर प्रवेश करें, क्योंकि राजा द्वारा बुलाए जाने पर मना करना संभव नहीं है। အထ ထေရော ဧဝမာဟ,- အဟံ အာဝုသော ရဋ္ဌပီဠနပိဏ္ဍပါတံ ဘုဉ္ဇိတုံ န ဣစ္ဆာမိ, ဧဝမ္ပိ သစေ တုမှေ ဣစ္ဆထ ရညော သန္တိကံ ဂန္တုံ, ဧဝံ သတိ ဣဒါနိ ရညော သန္တိကံ အဟံ ဂမိဿာမီတိ အန္တေပုရံ ပါဝိသိ. ပဝိသိတွာ ရညာ သဒ္ဓိံ သလ္လာပံ ကတွာ အယံ ဝိဟာရော အရညဝါသီနံ ဘိက္ခူနံ အသပ္ပာယောတိ ပဋိက္ခိပိ. ဧဝံ ပန ဘန္တေ သတိ တသ္မိံ ဝိဟာရေ နိသီဒိယမာနံ ထေရံ ဥပဒိဿထာတိ[Pg.118]. ခဏိတ္တိပါဒဝိဟာရဝါသီ မဟာရာဇ ထေရော ပရိယတ္တိဝိဿာရဒေါ သိက္ခာကာမော, တဿ ဒါတုံ ဝဋ္ဋတီတိ. အထ ရာဇာ တဿ ဝိဟာရံ အဒါသိ. မဟာသံဃနာထောတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ အဒါသိ. သော တတ္ထ ပရိယတ္တိံ ဝါစေတွာ နိသီဒိ. तब स्थविर ने ऐसा कहा— 'आयुष्मन्तों! मैं राष्ट्र को पीड़ित कर प्राप्त किए गए पिंडपात को भोगना नहीं चाहता, फिर भी यदि तुम राजा के पास जाना चाहते हो, तो ऐसी स्थिति में अब मैं राजा के पास जाऊँगा' और वे अंतःपुर में प्रविष्ट हुए। प्रवेश कर राजा के साथ वार्तालाप किया और यह कहकर मना कर दिया कि 'यह विहार अरण्यवासी भिक्षुओं के लिए अनुपयुक्त है।' 'भन्ते! यदि ऐसा है, तो उस विहार में रहने योग्य किसी स्थविर का निर्देश करें।' 'महाराज! खणित्तिपाद विहारवासी स्थविर पर्यत्ति में निपुण और शिक्षा के प्रेमी हैं, उन्हें देना उचित है।' तब राजा ने उन्हें वह विहार दे दिया। उन्हें 'महासंघनाथ' की उपाधि भी दी। वे वहाँ पर्यत्ति का अध्यापन करते हुए रहने लगे। တဿ ပန ဝိဟာရဿ ပရိဝါရဘူတေသု စတ္တာလီသာယ ဝိဟာရေသု ဥတ္တရာယ အနုဒိသာယ ဧကသ္မိံ ဝိဟာရေ ဝသန္တော ဝရာဘိသံဃနာထော နာမ ထေရော မဏိကုဏ္ဍလဝတ္ထုံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. ပစ္ဆိမာယ အနုဒိသာယ ဧကသ္မိံ ဝိဟာရေ ဝသန္တော ဧကော ထေရော သတ္တရာဇဓမ္မဝတ္ထုံ အကာသိ. उस विहार के परिवार स्वरूप चालीस विहारों में से उत्तर दिशा के एक विहार में रहने वाले वराभिसंघनाथ नामक स्थविर ने 'मणिकुंडल वस्तु' की रचना बर्मी भाषा में की। पश्चिम दिशा के एक विहार में रहने वाले एक स्थविर ने 'सप्तराजधर्म वस्तु' की रचना की। တသ္မိဉ္စ ကာလေ ဘာမအင်္ကျော အာစာရအင်္ကျောတိ ဒွိန္နံ ဘိက္ခူနဉ္စ လောကဓမ္မေသု ဆေကတာယ ဒွေ ဝိဟာရေ ကတွာ အဒါသိ. တေ ပန ဒွေ ထေရာ ဝေဒသတ္ထကောဝိဒါ, ပရိယတ္တိပဋိပတ္တီသု ပန မန္ဒာ, ရာမညရဋ္ဌတော အာဂတာ. တေ ပန ထေရပရမ္ပရာယ န ဂဏန္တိ ပေါရာဏာ. और उस समय भामअङ्क्यो और आचारअङ्क्यो नामक दो भिक्षुओं की लोक-धर्मों में निपुणता के कारण दो विहार बनवाकर दिए। वे दोनों स्थविर वेद-शास्त्रों के ज्ञाता थे, किंतु पर्यत्ति और प्रतिपत्ति में मंद थे, और रामण्य राष्ट्र से आए थे। प्राचीन लोग उन्हें स्थविर-परम्परा में नहीं गिनते हैं। ကလိယုဂေ တိသတ္တတာဓိကေ နဝဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ မဟာမုနိစေတိယဿ ပုရတ္ထိမဒိသာဘာဂေ စတ္တာရော ဝိဟာရေ ကာရာပေတွာ စတုန္နံ ထေရာနံ အဒါသိ. တေ စ ထေရာ တတ္ထ နိသီဒိတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိံသု. कलियुग के नौ सौ तिहत्तर वर्ष बीतने पर, महामुनि चैत्य के पूर्व दिशा के भाग में चार विहार बनवाकर चार स्थविरों को दिए। वे स्थविर वहाँ रहकर शासन की उन्नति करने लगे। တသ္မိံယေဝ ကာလေ ဗဒရဝနဝါသီ နာမ ဧကောပိ ထေရော အတ္ထိ. သောပိ ပရိယတ္တိဝိသာရဒေါ ဆပ္ပဒဝံသိကော. သော စ ထေရော ယာဝဇီဝံ ယထာဗလံ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိတွာ ဒုတိယဘဝေ စလင်္ဂနဂရေ ဧကိဿာ ဣတ္ထိယာ ကုစ္ဆိမှိ ပဋိသန္ဓိံ ဂဏှိ. ဒသမာသစ္စယေန ကလိယုဂေ စတ္တာလီသာဓိကေ နဝဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ဗုဓဝါရေ ဝိဇာယိတွာ တေရသဝဿိကကာလေ သာသနေ ပဗ္ဗဇိတွာ ပရိယတ္တိံ ဥဂ္ဂဏှိ. သိရိခေတ္တနဂရိန္ဒော ရာဇာ သိရိခေတ္တနဂရံ အာနေတွာ သိရိခေတ္တနဂရေ သာမဏေရောတိ နာမေန ပါကဋော ဟုတွာ ကလိယုဂေ စတုပဏ္ဏာသာဓိကေ [Pg.119] နဝဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ပန္နရသဝဿိကကာလေ ဝေဿန္တရဇာဘကံ ကဗျာလင်္ကာရဝသေန ဗန္ဓိ. ပရိပုဏ္ဏဝီသတိဝဿကာလေ သိရိခေတ္တနဂရေယေဝ သိရိခေတ္တနဂရိန္ဒော ဝေရဝိဇယော နာမ ရာဇာ အနုဂ္ဂဟေတွာ ဥပသမ္ပဒဘူမိယံ ပတိဋ္ဌာတိ. ပစ္ဆိမပက္ခာဓိကော နာမ ရာဇာ သိရိခေတ္တနဂရံ အတ္တနော ဟတ္ထဂတံ အကာသိ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ တံ ထေရံ အာနေတွာ ရတနပူရနဂရေ ဝသာပေသိ. သူရကိတ္တိ နာမ ရညော ကနိဋ္ဌဘာတိကော ဧရာဝတီနဒီတီရေ စတုဘူမိကဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တဿ ထေရဿ အဒါသိ. ရာဇာ စ တိပိဋကာလင်္ကာရောတိ နာမလဉ္ဆံ အဒါသိ. उसी समय बदरवनवासी नामक एक स्थविर भी थे। वे भी पर्यत्ति (शास्त्र) में विशारद और छप्पदवंश के थे। उस स्थविर ने जीवन भर यथाशक्ति शासन की सेवा की और दूसरे जन्म में चलङ्ग नगर में एक स्त्री की कोख में प्रतिसन्धि ग्रहण की। दस मास बीतने पर कलियुग के नौ सौ चालीस (940) वर्ष पूरे होने पर बुधवार को जन्म लेकर, तेरह वर्ष की आयु में शासन में प्रव्रजित होकर पर्यत्ति का अध्ययन किया। श्रीक्षेत्र नगर के राजा ने उन्हें श्रीक्षेत्र नगर लाकर, श्रीक्षेत्र नगर में 'सामणेर' नाम से प्रसिद्ध होने पर, कलियुग के नौ सौ चौवन (954) वर्ष पूरे होने पर पन्द्रह वर्ष की आयु में वेस्सन्तर जातक को काव्य अलंकार के रूप में रचा। पूरे बीस वर्ष की आयु में श्रीक्षेत्र नगर में ही श्रीक्षेत्र नगर के राजा वेरविजय नामक राजा ने अनुग्रह कर उन्हें उपसम्पदा भूमि में प्रतिष्ठित किया। पश्चिमपक्खाधिक नामक राजा ने श्रीक्षेत्र नगर को अपने हाथ में कर लिया। उस समय उस स्थविर को लाकर रतनपुर नगर में बसाया। राजा के छोटे भाई सूरकित्ति ने इरावती नदी के तट पर चतुर्भूमिक विहार बनवाकर उस स्थविर को दिया। राजा ने उन्हें 'तिपिटकालंकार' की उपाधि दी। ကလိယုဂေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ ဖဂ္ဂုနမာသဿ ပုဏ္ဏမိယံ သဋ္ဌိဝဿိကော ဟုတွာ တိရိယပဗ္ဗတံ ဂန္တွာ အရညဝါသံ ဝသိ. ဒွေ ဝဿာဓိကေ ဝဿသဟဿေ ရာဇာ တသ္မိံ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တဿေဝ ထေရဿ အဒါသိ. သော ပန တိပိဋကာလင်္ကာရတ္ထေရော သိရိခေတ္တနဂရေ နဝင်္ဂကန္ဒရေ ပတ္တလင်္ကဿ အတုလဝံသတ္ထေရဿ ဝံသိကော. သိရိခေတ္တနဂရေ နဝင်္ဂကန္ဒရေ သုဝဏ္ဏဝိဟာရေ ဝသန္တဿ ထေရဿ ကိတ္တိဃောသော သဗ္ဗတ္ထ ပတ္ထရိ. ဇေယျပုရေ ဧရာဝတီနဒီတီရေ စတုဘူမိကဝိဟာရေ ဝသနကာလေ အဋ္ဌသာလိနိယာ အာဒိတော ဝီသတိ ဂါထာနံ သံဝဏ္ဏနံ အကာသိ. သူရကိတ္တိနာမကဿ ကနိဋ္ဌဘာတိကဿ ယာစနမာရဗ္ဘ ယသဝဍ္ဎနဝတ္ထုဉ္စ အကာသိ. တိရိယပဗ္ဗတေ ဝသနကာလေ ဝိနယာလင်္ကာရဋီကံ အကာသိ. ပစ္ဆိမပက္ခာဓိကရညော ကာလေ မဟာသံဃနာထတ္ထေရံ သံဃရာဇဘာဝေ ဌပေသိ. သော စ သံဃရာဇာ အတိဝိယ ပရိယတ္တိ ဝိသာရဒေါ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ ရတနပူရနဂရေပိ အရိယာလင်္ကာရတ္ထရော နာမ ဧကော အတ္ထိ. သော ပန တိပိဋကာလင်္ကာရတ္ထေရေန သမညာဏထာမော. ဝယသာပိ သမာနဝဿိကာ. कलियुग के एक हजार (1000) वर्ष पूरे होने पर फाल्गुन मास की पूर्णिमा को साठ वर्ष की आयु में तिरिय पर्वत पर जाकर अरण्यवास में रहे। एक हजार दो (1002) वर्ष होने पर राजा ने वहाँ विहार बनवाकर उसी स्थविर को दिया। वे तिपिटकालंकार स्थविर श्रीक्षेत्र नगर के नवङ्गकन्दर में पत्तलंकार के अतुलवंश स्थविर के वंशज थे। श्रीक्षेत्र नगर के नवङ्गकन्दर के सुवर्ण विहार में रहने वाले स्थविर की कीर्ति सब जगह फैल गई। जेय्यपुर में इरावती नदी के तट पर चतुर्भूमिक विहार में रहने के समय उन्होंने अट्ठसालिनी के आरम्भ की बीस गाथाओं की व्याख्या की। सूरकित्ति नामक छोटे भाई की याचना पर 'यसवड्ढनवत्थु' की भी रचना की। तिरिय पर्वत पर रहने के समय 'विनयालंकार टीका' की रचना की। पश्चिमपक्खाधिक राजा के समय में महासंघनाथ स्थविर को संघराज के पद पर स्थापित किया गया। वे संघराज पर्यत्ति में अत्यन्त विशारद थे। उस समय रतनपुर नगर में भी अरियालंकार नामक एक स्थविर थे। वे तिपिटकालंकार स्थविर के समान ज्ञान और शक्ति वाले थे। आयु में भी वे समान वर्ष के थे। တေသု တိပိဋကာလင်္ကာရတ္ထေရော ဂန္ထန္တရဗဟုဿုတဋ္ဌာနေ [Pg.120] အဓိကော, အရိယာလင်္ကာရတ္ထေရော ပန ဓာတုပစ္စယဝိဘာဂဋ္ဌာနေ အဓိကောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. ပစ္ဆာ ပန ဥက္ကံသိကရညောကာလေ တေပိ ဒွေ ထေရာ ရညော အာစရိယာ ဟုတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိံသု. တေသု အရိယာလင်္ကာရတ္ထေရော အပရဘာဂေ ကာလင်္ကရိတွာ တဿ ထေရဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကဿ ဒုတိယာရိယာလင်္ကာရတ္ထေရဿ ရာဇမဏိစူဠစေတိယဿ သမီပေ ဒက္ခိဏဝနာရာမံ နာမ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ အဒါသိ. उनमें तिपिटकालंकार स्थविर ग्रन्थान्तरों के बहुश्रुत होने में श्रेष्ठ थे, जबकि अरियालंकार स्थविर धातु-प्रत्यय विभाग के स्थान में श्रेष्ठ थे, ऐसा समझना चाहिए। बाद में उक्कंसिक राजा के समय में वे दोनों स्थविर राजा के आचार्य होकर शासन की उन्नति की। उनमें से अरियालंकार स्थविर के बाद में काल कर जाने पर, उस स्थविर के सार्धविहारिक द्वितीय अरियालंकार स्थविर के लिए राजमणिचूळ चैत्य के समीप दक्षिणवनाराम नामक विहार बनवाकर दिया। ဥက္ကံသိကော နာမ ရာဇာ ပန သာသနေ ဗဟုပ္ပကာရော. သော စ ကလိယုဂေ ဆနဝုတာဓိကေ နဝဝဿသတေ ရဇ္ဇံ ပတ္တော. ရဇ္ဇံ ပန ပတွာ သိရိဓမ္မာသောကရာဇာဝိယ စတ္တာရိ ဝဿာနိ အတိက္ကမိတွာ မုဒ္ဓါဘိသေကံ ပဋိဂ္ဂဟေတွာ သိရိသုဓမ္မ ရာဇာမဟာဓိပတီတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ ပဋိဂ္ဂဏှိ. ဧကသ္မိံ ပန သမယေ ဟံသာဝတီနဂရံ ဂန္တွာ တတ္ထ နိသီဒိ. အထ ရာမညရဋ္ဌဝါသိနော ဧဝမာဟံသု,- မရမ္မိကဘိက္ခူ နာမ ပရိယတ္တိကောဝိဒါ ဝေဒသတ္ထညုနော နတ္ထီတိ. တံ သုတွာ ရာဇာ စတုဘူမိကဝိဟာရဝါသိတ္ထေရဿ သန္တိကံ သာသနံ ပေသေသိ,-တိံသဝဿိကာ စတ္တာလီသဝဿိကာ ဝါ ပရိယတ္တိကောဝိဒါ ဝေဒသတ္ထညုနော ဘိက္ခူ ရာမညရဋ္ဌံ မမ သန္တိကံ ပေသေထာတိ. အထ စတုဘူမိ ကဝိဟာရဝါသိတ္ထေရော တိပိဋကာလင်္ကာရံ တိလောကာလင်္ကာရံ တိသာသနာလင်္ကာရဉ္စ သဒ္ဓိံ တိံသမတ္ထေဟိ ဘိက္ခူဟိ ပေသေသိ. ဟံသာဝတီနဂရံ ပန ပတွာ မောဓောစေတိယဿ ပုရတ္ထိမဘာဂေ ဝိဟာရေ ကာရာပေတွာ တေသံ အဒါသိ. उक्कंसिक नामक राजा शासन के लिए बहुत उपकारी थे। वे कलियुग के नौ सौ छियानवे (996) वर्ष में राज्य को प्राप्त हुए। राज्य प्राप्त कर श्रीधर्माशोक राजा की तरह चार वर्ष बीतने पर मूर्धाभिषेक ग्रहण किया और 'सिरिसुधम्म राजा महाधिपति' की उपाधि भी ग्रहण की। एक समय वे हंसावती नगर जाकर वहाँ ठहरे। तब रामण्य राष्ट्र के निवासियों ने ऐसा कहा— 'मरम्म (बर्मी) भिक्षु पर्यत्ति में कोविद और वेद-शास्त्रों के ज्ञाता नहीं हैं।' यह सुनकर राजा ने चतुर्भूमिक विहार में रहने वाले स्थविर के पास संदेश भेजा— 'तीस वर्ष या चालीस वर्ष के पर्यत्ति-कोविद और वेद-शास्त्रों के ज्ञाता भिक्षुओं को रामण्य राष्ट्र में मेरे पास भेजें।' तब चतुर्भूमिक विहारवासी स्थविर ने तिपिटकालंकार, तिलोकालंकार और तिसासनालंकार को तीस अन्य भिक्षुओं के साथ भेजा। हंसावती नगर पहुँचकर मोधो चैत्य के पूर्व भाग में विहार बनवाकर उन्हें दिया। ဥပေါသထဒိဝသေသု သုဓမ္မသာလာယံ ရာမညရဋ္ဌဝါသိနော ပရိယတ္တိကောဝိဒေ ဝေဒသတ္ထညုနော သန္နိပါတာပေတွာ တေဟိ တီဟိ ထေရေဟိ သဒ္ဓိံ ကထာသလ္လာပံ ကာရာပေသိ. အထ ရာမညရဋ္ဌဝါသိနော ဘိက္ခူ ဧဝမာဟံသု,– ပုဗ္ဗေ ပန မယံ မရမ္မရဋ္ဌေ ပရိယတ္တိကောဝိဒါ ဝေဒသတ္တညုနော နတ္ထီတိ မညာမ, ဣဒါနိ မရမ္မရဋ္ဌဝါသိနော အတိဝိယ ပရိယတ္တိ ကောဝိဒါ [Pg.121] ဝေဒသတ္ထညုနောတိ. အပရဘာဂေ ကလိယုဂေ ဆနဝုတာဓိကေ နဝဝဿသတေ သမ္ပတ္တေ ရာဇာ ရတနပူရနဂရံ ပစ္စာဂစ္ဆိ. उपोसथ के दिनों में सुधर्मा शाला में रामण्य राष्ट्र के पर्यत्ति-कोविद और वेद-शास्त्रों के ज्ञाताओं को एकत्रित कर उन तीन स्थविरों के साथ चर्चा कराई। तब रामण्य राष्ट्र के भिक्षुओं ने ऐसा कहा— 'पहले हम मानते थे कि मरम्म राष्ट्र में पर्यत्ति-कोविद और वेद-शास्त्रों के ज्ञाता नहीं हैं, अब जानते हैं कि मरम्म राष्ट्र के निवासी पर्यत्ति में अत्यन्त कोविद और वेद-शास्त्रों के ज्ञाता हैं।' बाद में कलियुग के नौ सौ छियानवे (996) वर्ष पूरे होने पर राजा रतनपुर नगर वापस आ गए। တေပိ ထေရာ ပစ္စာဂန္တုကာမာ ရာမညရဋ္ဌေ ပဓာနဘူတဿ တိလောကဂရူတိ နာမဓေယျဿ မဟာထေရဿ သန္တိကံ ဝန္ဒနတ္ထာယ အဂမံသု. वे स्थविर भी वापस आने की इच्छा से रामण्य राष्ट्र के प्रधान 'तिलोकगुरू' नामक महास्थविर के पास वन्दना के लिए गए। တဒါ တိလောကဂရုတ္ထေရောပိ တေဟိ သဒ္ဓိံ သလ္လာပံ ကတွာ ဧဝမာဟ,-တုမှေသု ပန တိပိဋကာလင်္ကာရတ္ထေရော ပဌမံ အာဝါသဝိဟာရံ လဘိဿတီတိ. ကသ္မာ ပန ဘန္တေ ဧဝမ ဝေါစာတိ ဝုတ္တေ အယံ ပန ပိဏ္ဍာယ စရန္တောပိ အန္တရာမဂ္ဂေ ဝေဠုဝေတ္တာဒီနိ လဘိတွာ ဂဟေတွာ ဝိဟာရေ ပဋိသင်္ခရဏံ အကာသိ, တသ္မာဟံ ဧဝံ ဝဒါမိ, လောကေ ဝိဟာရေ ပဋိသင်္ခရဏသီလာ ဘိက္ခူ သီဃမေဝ အာဝါသဝိဟာရံ လဘန္တီတိ ဟိ ပေါရာဏတ္ထေရာ အာဟံသူတိ အာဟ. तब तिलोकगुरु स्थविर ने भी उनके साथ बातचीत करते हुए ऐसा कहा—"तुममें से त्रिपिटकालंकार स्थविर सबसे पहले आवास-विहार प्राप्त करेंगे।" "भन्ते, आपने ऐसा क्यों कहा?" ऐसा पूछे जाने पर उन्होंने कहा—"यह भिक्षाटन के लिए जाते समय भी रास्ते में बाँस, बेंत आदि पाकर उन्हें ले लेते थे और विहार की मरम्मत करते थे, इसलिए मैं ऐसा कहता हूँ। संसार में विहारों की मरम्मत करने के स्वभाव वाले भिक्षु शीघ्र ही आवास-विहार प्राप्त करते हैं, ऐसा प्राचीन स्थविरों ने कहा है।" တေပိ ရတနပူရနဂရံ ပစ္စာဂစ္ဆိံသု. တိလောကဂရုတ္ထေရဿ ဝစနာနုရူပမေဝ တိပိဋကာလင်္ကာရတ္ထေရော သဗ္ဗပဌမံ အာဝါသဝိဟာရံ လဘီတိ. वे भी रतनपुर नगर लौट आए। तिलोकगुरु स्थविर के वचनों के अनुसार ही त्रिपिटकालंकार स्थविर ने सबसे पहले आवास-विहार प्राप्त किया। ကလိယုဂေ ပန နဝဝဿာဓိကေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ ရညော ကနိဋ္ဌော ကာလမကာသိ. အထံ ရညော ပုတ္တော ဥစ္စနဂရဘောဇကော ဗာလဇနေဟိ သန္ထဝံ ကတွာ တေသံ ဝစနံ အာဒိယိတွာ ပစ္စူသကာလေ ပိတရံ ဃာတေတုကာမော အန္တေပုရံ သဟသာ ပါဝိသိ. कलियुग में एक हजार नौ वर्ष बीतने पर राजा के छोटे भाई की मृत्यु हो गई। तब उच्चनगर के शासक राजा के पुत्र ने मूर्ख लोगों से मित्रता की और उनकी बातों में आकर, भोर के समय अपने पिता को मारने की इच्छा से अचानक अन्तःपुर में प्रवेश किया। ရာဇာဝ အနဂ္ဃံ မုဒ္ဒိကံ ဂဟေတွာ နန္ဒဇေယျေန နာမ အမစ္စေန ရာဇယောဓေန နာမ အမစ္စေနစ သဒ္ဓိံ အညတရဝေသေန နဂရတော နိက္ခမိတွာ ရဇတဝါလုကနဒိံ သမ္ပတ္တော. राजा एक बहुमूल्य मुद्रिका लेकर नन्दजेय नामक अमात्य और राजयोध नामक अमात्य के साथ छद्म वेश में नगर से निकलकर रजतवालुका नदी पर पहुँचा। တသ္မိဉ္စ ကာလေ ဧကော သာမဏေရော မာတာပိတူနံ ဂေဟေ ပိဏ္ဍပါတံ အာနေဿာမီတိ ခုဒ္ဒကနာဝါယ နဒိယံ အာဂစ္ဆိ. အထ [Pg.122] တံ သာမဏေရံ ဒိသွာ ရာဇာ ဧဝမာဟ,- အမှေ ဘန္တေ ပရတီရံ နာဝါယ အာနေဟီတိ. သာမဏေရော စ အာဟ,-သစေ ဥပါသက တုမှေ ပရတီရံ အာနေယျံ, ဘတ္တကာလံ အတိက္ကမေယျန္တိ. အထ ရာဇာ အမှေယေဝ သီဃံ အာနေဟိ, ဣမံ မုဒ္ဒိကံ ဒဿာမီတိ အဿာသေတွာ အာနေတုံ ဩကာသံ ယာစိ. အထ သာမဏေရော ကာရုညပ္ပတ္တံ ဝစနံ သုတွာ ပရတီရံ အာနေသိ. उसी समय एक श्रामणेर अपने माता-पिता के घर से भिक्षा लाने के लिए एक छोटी नाव से नदी में आया। तब उस श्रामणेर को देखकर राजा ने ऐसा कहा—"भन्ते, हमें नाव से दूसरे किनारे ले चलें।" श्रामणेर ने कहा—"उपासक, यदि मैं तुम्हें दूसरे किनारे ले जाऊँगा, तो भोजन का समय निकल जाएगा।" तब राजा ने उसे आश्वासन देते हुए कहा—"हमें शीघ्र ले चलो, मैं तुम्हें यह मुद्रिका दूँगा" और ले जाने की प्रार्थना की। तब श्रामणेर ने करुणापूर्ण वचनों को सुनकर उन्हें दूसरे किनारे पहुँचा दिया। အထ စတုဘူမိကဝိဟာရံ ပတွာ တသ္မိံ ဝိဟာရေ ထေရဿ သဗ္ဗမ္ပိ ကာရဏံ အာရောစေတွာ ဧဝမာဟ,-သစေ ဘန္တေ အမှေ ဂဏှိတုံ အာဂစ္ဆယျ, တေ နိဝါရေထာတိ. ထေရောစ မယံ မဟာရာဇ သမဏာ န သက္ကာ ဧဝံ နိဝါရေတုံ, ဧဝမ္ပိ ဧကော ဥပါယော အတ္ထိ,-နိသိန္နဝိဟာရဝါသိတ္ထေရော ပန ဂိဟိကမ္မေသု အတိဝိယ ဆေကော, တံ ပက္ကောသေတွာ ကာရဏံ စိန္တေတုံ ယုတ္တန္တိ. အထ တံ ပက္ကောသေတွာ တမတ္ထံ အာရောစေတွာ ရာဇာ ဣဒမဝေါ စ,- သစေ ဘန္တေ အမှေ ဂဏှိတုံ အာဂစ္ဆေယျုံ, အထ ကေနစိဒေဝ ဥပါယေန တေ နိဝါရေထာတိ. အထ သော ထေရော ဧဝမာဟ,-တေန ဟိ မဟာရာဇ မာ ကိဉ္စိ သောစိ မာဘာယိ ဝိဟာရမဇ္ဈေ သိရိဂဗ္ဘံ ပဝိသိတွာ နိသီဒထာတိ ဝတွာ ပိဏ္ဍာယ အစရန္တေ ဘိက္ခုသာမဏေရေ သန္နိပါတာပေတွာ ဝိသုံ ဝိသုံ ဒဏ္ဍဟတ္ထာ ဟုတွာ ဧကဿပိ ပုရိသဿ ဝိဟာရံ ပဝိသိတုံ ဩကာသံ မာ ဒေထာတိ ဝတွာ သေနံဝိယ ဗျူဟေသိ. သာမန္တဝိဟာရေသုပိ ဝသန္တေ ဘိက္ခုသာမဏေရေ ပက္ကောသိ. တဒါ ကိရ အာဂန္တွာ သန္နိပါတာနံ ဘိက္ခုသာမဏေရာနံ အတိရေကသဟဿမတ္တံ အဟောသိ. ထေရော တေ ဝိဟာရေ ဒွါရကောဋ္ဌကေသု အာဂတမဂ္ဂေ စ ဝိသုံ ဝိသုံ ဒဏ္ဍဟတ္ထာ ဟုတွာ အာရက္ခဏတ္ထာယ ဌပေသိ, ယထာ ဝဍ္ဎကီ သူကရော ဗျဂ္ဃဿ နိဝါရဏတ္ထာယ ဝိသုံ ဝိသုံ သူကရေ သံဝိဓာယ ဌပေသီတိ. အထ ပုတ္တဿ ယောဓာပိ ရာဇာနံ ဂဟေတုံ န သက္ကာ, ဘိက္ခု သာမဏေရာနံ [Pg.123] ဂါရဝဝသေန ဗလက္ကာရေန မာရေတွာ ပဝိသိတုံ န ဝိသဟန္တိ, ဘိက္ခု သာမဏေရာနံ ဗာဟုလ္လတာယ စ. फिर चतुर्भूमिका विहार पहुँचकर, उस विहार के स्थविर को सारी घटना बताकर राजा ने कहा—"भन्ते, यदि वे हमें पकड़ने आएँ, तो आप उन्हें रोकें।" स्थविर ने कहा—"महाराज, हम श्रमण हैं, हम इस प्रकार नहीं रोक सकते, फिर भी एक उपाय है—निसिन्नविहार में रहने वाले स्थविर गृहस्थों के कार्यों में बहुत कुशल हैं, उन्हें बुलाकर इस विषय में सोचना उचित है।" तब उन्हें बुलाकर और सारा वृत्तांत बताकर राजा ने यह कहा—"भन्ते, यदि वे हमें पकड़ने आएँ, तो किसी भी उपाय से उन्हें रोकें।" तब उस स्थविर ने कहा—"तो महाराज, चिन्ता न करें, डरें नहीं, विहार के बीच श्रीगर्भ में प्रवेश कर बैठ जाएँ।" ऐसा कहकर उन्होंने भिक्षा के लिए न गए हुए भिक्षुओं और श्रामणेरों को इकट्ठा किया और उन्हें अलग-अलग हाथों में डंडे देकर "किसी भी व्यक्ति को विहार में प्रवेश करने का अवसर न दें" कहकर सेना की तरह व्यूह रचना की। उन्होंने आस-पास के विहारों में रहने वाले भिक्षुओं और श्रामणेरों को भी बुलाया। तब वहाँ आए हुए भिक्षुओं और श्रामणेरों की संख्या एक हजार से अधिक हो गई। स्थविर ने उन्हें विहार के द्वारों और आने वाले रास्तों पर अलग-अलग हाथों में डंडे देकर रक्षा के लिए तैनात किया, जैसे एक बढ़ई सूअर बाघ को रोकने के लिए अलग-अलग सूअरों को व्यवस्थित कर खड़ा करता है। तब पुत्र के योद्धा भी राजा को पकड़ने में असमर्थ रहे, क्योंकि वे भिक्षुओं और श्रामणेरों के प्रति गौरव के कारण उन्हें बलपूर्वक मारकर प्रवेश करने का साहस नहीं कर सके और भिक्षुओं तथा श्रामणेरों की संख्या भी बहुत अधिक थी। တသ္မိံယေဝ သံဝစ္ဆရေ အဿယုဇမာသဿ ကာဠပက္ခပဉ္စမိတော ယာဝ ကတ္တိကမာသဿ ကာဠပက္ခပဉ္စမီ ဝိဟာရေယေဝ ရာဇာ နိလီယိတွာ နိသီဒိ. အထ အန္တေပုရဝါသိကာ အမစ္စာ ပုတ္တံ အပနေတွာ ရာဇာနံ အာနေတွာ ရဇ္ဇေ ဌပေသုံ. ရာဇာ စ ပုန ရဇ္ဇံ ပတွာ ဝိဟာရေ နိသိန္နကာလေ မာ ဘာယိ မဟာရာဇ တွံ ဇိနေဿတီတိ ရညော အာရောစေန္တဿ ဝေဒသတ္ထညုနော ဧကဿ ဘိက္ခုဿ စညိင်္ခုစေတိယဿ ဧသန္နဋ္ဌာနေ ဧကံ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ အဒါသိ. ဓမ္မနန္ဒရာဇဂုရူတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ အဒါသိ. တဿ ပန ဝိဇာတဋ္ဌာနဘူတံ ဂါမံ နိဿာယ မရမ္မဝေါဟာရေန ‘ယေ နေ နာ သေ ယာံ ဝ’ ဣတိ သမညာ အဟောသိ. उसी वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी से लेकर कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तक राजा विहार में ही छिपकर बैठा रहा। तब अन्तःपुर में रहने वाले अमात्यों ने पुत्र को हटाकर राजा को वापस लाकर राज्य पर बैठाया। राजा ने पुनः राज्य प्राप्त कर, विहार में बैठे रहने के समय "महाराज, डरो मत, तुम जीतोगे" ऐसा कहने वाले वेदशास्त्र के ज्ञाता एक भिक्षु के लिए चञ्ञिङ्खु चैत्य के समीप एक विहार बनवाकर दिया। उन्हें 'धम्मनन्द राजगुरु' की उपाधि भी दी। उनके जन्मस्थान वाले गाँव के आधार पर बर्मी भाषा में उन्हें 'ये ने ना से यां व' के नाम से जाना गया। ရာဇာ စ ပုန ရဇ္ဇံ ပတွာ တသ္မိံယေဝ သံဝစ္ဆရေ ကတ္တိကမာသဿ ကာဠပက္ခစုဒ္ဒသမိယံ သဗ္ဗေပိ မဟာထေရေ နိမန္တေတွာ ရာဇဂေဟံ ပဝေသေတွာ ပိဏ္ဍပါတေန ဘောဇေသိ. အထ ရာဇာ ဧဝမာဟ,-စတုဘူမိကဝိဟာရဝါသိတ္ထေရော သမ္ပရာယိကတ္ထာဝဟော အာစရိယော, နိသိန္နဝိဟာရဝါသိတ္ထေရော ပန ဒိဋ္ဌဓမ္မိကတ္ထာဝဟောတိ ဧဝံ ရာဇာဝံသေ ဝုတ္တံ. ပေါရာဏပေါတ္ထကေသု ပန စတုဘူမိကဝိဟာရ ဝါသိတ္ထေရော ဧကန္တသမဏော အာစရိယော, နိသိန္နဝိဟာရဝါသိတ္ထေရော ပန ယောဓာရဟော ယောဓကမ္မေ ဆေကောတိ ရာဇာ အဟာတိ ဝုတ္တံ. ရာဇာ ကိရ သမ္ပရာယိကတ္ထံ အနုပေက္ခိတွာ ဒိန္နကာလေ နိသိန္နဝိဟာရတ္ထေရဿ န အဒါသိ, ကဒါစိ ကဒါစိ ပန ဒိဋ္ဌဓမ္မိကတ္ထံ အနုပ္ပေက္ခိတွာ တဿ ဝိသုံ အဒါသီတိ. ဧတ္ထ စ ယသ္မာ နိသိန္နဝိဟာရ ဝါသိတ္ထေရော ရညော ဘီယေဟိ နိဝါရဏတ္ထာယ အာရက္ခံ အကာသိ, န ပရေသံ ဝိဟေဌနတ္ထာယ, အာဏတ္တိကပ္ပယောဂါ စ န ဒိဿတိ, တသ္မာ နတ္ထိ အာပတ္တိဒေါသော. သဒ္ဓါတိဿရညော ဘယေဟိ [Pg.124] နိဝါရဏတ္ထံ အရဟန္တေဟိ ထေရေဟိ ကတပ္ပယောဂေါဝိယ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. राजा ने पुनः राज्य प्राप्त कर उसी वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को सभी महास्थविरों को निमंत्रित कर राजभवन में प्रवेश कराया और उन्हें भोजन कराया। तब राजा ने ऐसा कहा—"चतुर्भूमिका विहार में रहने वाले स्थविर पारलौकिक कल्याण लाने वाले आचार्य हैं, जबकि निसिन्नविहार में रहने वाले स्थविर इहलौकिक कल्याण लाने वाले हैं," ऐसा राजवंश में कहा गया है। प्राचीन पुस्तकों में कहा गया है कि राजा ने कहा—"चतुर्भूमिका विहार के स्थविर पूर्णतः श्रमण आचार्य हैं, जबकि निसिन्नविहार के स्थविर योद्धा के योग्य और युद्ध-कर्म में कुशल हैं।" राजा ने पारलौकिक कल्याण का विचार करते हुए दान के समय निसिन्नविहार के स्थविर को नहीं दिया, किन्तु कभी-कभी इहलौकिक कल्याण का विचार करते हुए उन्हें अलग से दान दिया। और यहाँ, चूँकि निसिन्नविहार के स्थविर ने राजा की भयों से रक्षा के लिए सुरक्षा की थी, न कि दूसरों को कष्ट पहुँचाने के लिए, और इसमें किसी को आज्ञा देने का प्रयोग भी नहीं दिखता, इसलिए इसमें कोई दोष नहीं है। इसे राजा सद्धातिस्स की भयों से रक्षा के लिए अर्हन्त स्थविरों द्वारा किए गए प्रयास के समान देखा जाना चाहिए। စတုဘူမိကဝိဟာရ ဝါသိတ္ထေရော ပန ခဏိတ္တိပါဒဂါမေ ဇာတော, အရိမဒ္ဒနပုရေ အရဟန္တတ္ထေရဂဏပ္ပဘဝေါ, ယတ္ထ ကတ္ထစိ ဂန္တွာ အညေသံ ဘိက္ခူနံ အာစာရံ ယထာဘူတံ ဇာနိတွာ တေဟိ စတုပစ္စယသမ္ဘောဂေါ န ကဘပုဗ္ဗော, အန္တမသော ဥဒကမ္ပိ န ပိဝိတပုဗ္ဗော, တံတံဋ္ဌာနမ္ပိ စမ္မခဏ္ဍံ ဂဟေတွာယေဝ ဂမနသီလော. ဥက္ကံသိကရာဇာ ပန သိရိခေတ္တနဂရေ ဒွတ္တပေါင်္ကရညာ ကာရာဝိတစေတိယသဏ္ဌာနံ ဂဟေတွာ ရာဇမဏိစူဠံ နာမ စေတိယံ အကာသိ. တံ ပန စေတိယံ ပရိမဏ္ဍလတော တိဟတ္ထသတပ္ပမာဏံ, ဥဗ္ဗေဓတောပိ ဧတ္တကမေဝ. တဿ ပန စေတိယဿ စတူသု ပဿေသု စတ္တာရော ဝိဟာရေပိ ကာရာပေသိ, ပုရတ္ထိမပဿေ ပုဗ္ဗဝနာရာမော နာမ ဝိဟာရော, ဒက္ခိဏပဿေ ပန ဒက္ခိဏဝနာရာမော နာမ, ပစ္ဆိမပဿေ ပစ္ဆိမဝနာရာမော နာမ, ဥတ္တရပဿေ ဥတ္တရဝနာရာမော နာမ. တေသု စတူသု ဝိဟာရေသု ဥတ္တရဝနာရာမော နာမ ဝိဟာရော အသနိပါဘဂ္ဂိနာ ဍယှိတွာ ဝိနဿိ. အဝသေသေ ပန တယော ဝိဟာရေ ပရိယတ္တိကောဝိဒါနံ တိဏ္ဏံ မဟာထေရာနံ အဒါသိ. နာမ လဉ္ဆမ္ပိ တေသံ အဒါသိ. ပစ္ဆိမဿ ရညော ကာလေယေဝ ဥတ္တရပဿေ ဝိဟာရံ ကာရာပေသိ. चतुभूमिक विहार के निवासी स्थविर खणित्तिपाद ग्राम में उत्पन्न हुए थे, जो अरिमद्दनपुर में अरहंत स्थविरों के गण से उद्भूत थे। वे जहाँ कहीं भी जाते थे, अन्य भिक्षुओं के आचरण को यथार्थ रूप से जानकर उनके साथ चार प्रत्ययों का उपभोग पहले कभी नहीं किया था, यहाँ तक कि पानी भी नहीं पिया था। वे उन-उन स्थानों पर चर्मखण्ड (चमड़े का आसन) लेकर ही जाने के स्वभाव वाले थे। राजा उक्कंसिक ने श्रीक्षेत्र नगर में राजा द्वत्तपोंग द्वारा बनवाए गए चैत्य के आकार के समान 'राजमणिचूळ' नामक चैत्य बनवाया। वह चैत्य परिधि में तीन सौ हाथ का था और ऊँचाई में भी उतना ही था। उस चैत्य के चारों ओर उन्होंने चार विहार भी बनवाए—पूर्व दिशा में 'पुब्बवनाराम' नामक विहार, दक्षिण दिशा में 'दक्खिणवनाराम' नामक, पश्चिम दिशा में 'पच्छिमवनाराम' नामक और उत्तर दिशा में 'उत्तरवनाराम' नामक। उन चार विहारों में से उत्तरवनाराम नामक विहार बिजली गिरने से लगी आग में जलकर नष्ट हो गया। शेष तीन विहार उन्होंने पर्यत्ति (शास्त्र) के विद्वान तीन महास्थविरों को दे दिए। उन्हें नाम की मुहर (उपाधि) भी प्रदान की। पश्चिम के राजा के समय में ही उत्तर दिशा में विहार बनवाया गया था। တသ္မိံ ပန စေတိယေ ဆတ္တံ အနာရောပေတွာယေဝ သော ရာဇာ ဒိဝင်္ဂတော. တေသု ပန စတူသု ဝိဟာရေသု နိသိန္နာနံ ထေရာနံ ဒက္ခိဏဝနာရာမဝိဟာရဝါသီမဟာထေရော ကစ္စာယနဂန္ထဿ အတ္ထံ ဆဗ္ဗိဓေဟိ သံဝဏ္ဏနာနယေဟိ အလင်္ကရိတွာ မရမ္မဘာသာယ သံဝဏ္ဏေသိ. ပစ္ဆိမဝနာရာမဝိဟာရ ဝါသိတ္ထေရော ပန နျာသဿ သံဝဏ္ဏနံ ဆဟိ နယေဟိ အလင်္ကရိတွာ အကာသိ. उस चैत्य पर छत्र चढ़ाए बिना ही वह राजा स्वर्गवासी हो गया। उन चार विहारों में निवास करने वाले स्थविरों में से दक्खिणवनाराम विहार के निवासी महास्थविर ने कच्चायन ग्रन्थ के अर्थ को छह प्रकार की व्याख्या पद्धतियों से अलंकृत कर मरम्म (बर्मी) भाषा में व्याख्यायित किया। पच्छिमवनाराम विहार के निवासी स्थविर ने 'न्यास' की व्याख्या छह पद्धतियों से अलंकृत कर की। ကလိယုဂေ ပန ဒသဝဿာဓိကေ သဟဿေ သမ္ပတ္တေ တဿ [Pg.125] ရညော ပုတ္တော သိရိနန္ဒသုဓမ္မရာဇာပဝရာဓီပတိ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. ပိတုနော ရာဇဂေဟံ ဘိန္ဒိတွာ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တိလောကာလင်္ကာရဿ နာမ မဟာထေရဿ အဒါသိ. တိလောကာလင်္ကာရတ္ထေရော စ နာမ တိပိဋကာလင်္ကာရတ္ထေရေန သမညာဏထာမဿ အရိယာလင်္ကာရတ္ထေရဿ သိဿောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. အယဉ္စတ္ထော ဟေဋ္ဌာ ဒဿိတော. ဇေယျပုရေ စတုဘူမိကအတုလဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ ဒါဋ္ဌာနာဂရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ. သော စ ထေရော နိရုတ္တိသာရမဉ္ဇူသံ နာမ နျာသသံဝဏ္ဏနံ အကာသီ. कलियुग के एक हजार दस वर्ष बीतने पर, उस राजा के पुत्र सिरीनन्दसुधम्मराजापवराधिपति ने राज्य किया। उन्होंने अपने पिता के राजभवन को तुड़वाकर वहाँ विहार बनवाया और तिलोकालंकार नामक महास्थविर को दान कर दिया। तिलोकालंकार स्थविर को त्रिपिटकालंकार स्थविर के समान ज्ञान और शक्ति वाले अरियालंकार स्थविर का शिष्य समझना चाहिए। यह अर्थ नीचे दिखाया गया है। जेय्यपुर में चतुभूमिक अतुल विहार बनवाकर उन्होंने दाट्ठानगर राजगुरु स्थविर को दिया। उस स्थविर ने 'निरुत्तिसारमञ्जूसा' नामक न्यास-व्याख्या की रचना की। ကလိယုဂေ ဒွါဒသာဓိကေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ ဖဂ္ဂုနမာသေ သောတာပန္နာ နာမ အာရက္ခဒေဝတာ အညတ္ထ ဂမိဿာမာတိ အာဟံသူတိ နဂရာ သုပိနံ ပဿန္တာ ဟုတွာ ဗဟူသန္နိပတိတွာ ဒေဝပူဇံ အကံသု. ဒေဝတာနံ ပန သင်္ကမနံ နာမ နတ္ထိ, ပုဗ္ဗနိမိတ္တမေဝတန္တိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. कलियुग के एक हजार बारह वर्ष बीतने पर, फाल्गुन मास में 'सोतापन्ना' नामक आरक्षक देवताओं ने कहा कि "हम अन्यत्र जाएँगे"—ऐसा नगरवासियों ने स्वप्न में देखा और बहुत संख्या में एकत्रित होकर देव-पूजा की। देवताओं का वास्तव में संक्रमण (प्रस्थान) नहीं होता, इसे केवल पूर्व-निमित्त ही समझना चाहिए। တသ္မိဉ္စ ကာလေ စိနရညော ယောဓာ အာဂန္တွာ မရမ္မရဋ္ဌံ ဒူသေသုံ. သာသနံ အဗ္ဘပ္ပဋိစ္ဆန္နော ဝိယ စန္ဒော ဒုဗ္ဗလံ အဟောသိ. उस समय चीन के राजा के योद्धाओं ने आकर मरम्म (बर्मा) राष्ट्र को क्षतिग्रस्त कर दिया। बुद्ध शासन बादलों से ढके हुए चंद्रमा के समान दुर्बल हो गया। ကလိယုဂေ တေဝီသာဓိကေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ တဿ ရညော ကနိဋ္ဌော မဟာပဝရဓမ္မရာဇာလောကာဓိပတိ နာမ ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ လောကသင်္ကေတဝသေန ပုညံ မန္ဒံ ဘဝိဿတီတိ ဝေဒသတ္ထညူဟိ အာရောစိတတ္တာ လောကသင်္ကေတဝသေနေဝ အဘိနဝပုညုပ္ပာဒနတ္ထံ ခန္ဓဝါရဂေဟံ ကာရာပေတွာ တာဝကာလိကဝသေန သင်္ကမိတွာ နိသီဒိ. တတော အပရဘာဂေ ဥတ္တရဂေဟံ ဘိန္ဒိတွာ တသ္မိံယေဝ ဌာနေ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ ဧကဿ မဟာထေရဿ အဒါသိ. कलियुग के एक हजार तेईस वर्ष बीतने पर, उस राजा के छोटे भाई महापवरधम्मराजालोकाधिपति नामक राजा ने राज्य किया। उस समय लोक-संकेत (ज्योतिष) के अनुसार पुण्य मंद होगा—ऐसा वेद-शास्त्र के ज्ञाताओं द्वारा बताए जाने पर, लोक-संकेत के अनुसार ही नवीन पुण्य उत्पन्न करने के लिए उन्होंने एक स्कन्धावार (शिविर) गृह बनवाया और अस्थायी रूप से वहाँ जाकर रहने लगे। उसके बाद, उन्होंने उत्तर गृह को तुड़वाकर उसी स्थान पर विहार बनवाया और एक महास्थविर को दान कर दिया। ဒက္ခိဏဂေဟံ ပန နဂရဿ ပုရတ္ထိမဒိသာဘာဂေ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ အဂ္ဂဏမ္မာလင်္ကာရတ္ထေရဿ အဒါသိ. သော စ ထေရော ကစ္စာယနဂန္ထဿစေဝ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဿ စ မာတိကာဓာတုကထာယမကပဋ္ဌာနာနဉ္စ [Pg.126] အတ္ထံ မရမ္မဘာသာယ ယောဇေသိ. दक्षिण गृह के स्थान पर नगर के पूर्व दिशा के भाग में विहार बनवाकर अग्गणम्मालंकार स्थविर को दे दिया। उस स्थविर ने कच्चायन ग्रन्थ, अभिधम्मत्थसंग्रह, मातृका, धातुकथा, यमक और पट्ठान के अर्थ को मरम्म (बर्मी) भाषा में व्याख्यायित किया। ဥပရာဇာ စ မဟာသေတုနော ပမုခေ ဌာနေ သောဝဏ္ဏမယဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ ဥတ္တရဂေဟဝိဟာရ ဝါသိတ္ထေရဿ အန္တေဝါသိကဿ ဇိနာရာမတ္ထေရဿ အဒါသိ. တသ္မိံယေဝ ဌာနေ နာနာရတနဝိစိတြံ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တဿေဝ ထေရဿ အန္တေဝါသိကဿ ဂုဏဂန္ဓတ္ထေရဿ အဒါသိ. उपराजा ने महासेतु के सामने के स्थान पर स्वर्णमय विहार बनवाकर उत्तरगेह विहार के निवासी स्थविर के अन्तेवासी (शिष्य) जीनाराम स्थविर को दिया। उसी स्थान पर नाना रत्नों से सुसज्जित विहार बनवाकर उन्हीं स्थविर के अन्तेवासी गुणगन्ध स्थविर को दिया। သော ပန ထေရော ‘ဆိန ဝ္ဍိန’ ဂါမေ ဝိဇာတော. ဝယေ ပန သမ္ပတ္တေ ရတနပူရနဂရံ ဂန္တွာ ပရိယတ္တိံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ တတော ပုန နိဝတ္တိတွာ ဗဒုနနဂရေ ဗဒရဂါမေ နိသီဒိတွာ ပစ္ဆာ ‘ဆိန ဝ္ဍိန’ ဂါမေ စတူဟိ ပစ္စယေဟိ ကိလမထော ဟုတွာ ဝသတိ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ ဂါမေ မောက္ခဿ နာမ ပုရိသဿ သန္တိကေ ဧကံ အနဂ္ဃံ မဏိံ ရာဇာ လဘိတွာ အတိဝ မမာယိ. ‘ဆိန ဝ္ဍိန’ မောက္ခမဏီတိ ပါကဋော အဟောသိ. वे स्थविर 'छिन वड़िन' ग्राम में उत्पन्न हुए थे। आयु प्राप्त होने पर रतनपुर नगर जाकर पर्यत्ति (शास्त्र) का अध्ययन किया, फिर वहाँ से लौटकर बदुन नगर के बदर ग्राम में रहे और बाद में 'छिन वड़िन' ग्राम में चार प्रत्ययों के अभाव में कष्टपूर्वक रहने लगे। उस समय उस ग्राम में मोक्ख नामक व्यक्ति के पास से राजा ने एक बहुमूल्य मणि प्राप्त की और उसे बहुत प्रिय माना। वह 'छिन वड़िन मोक्ख-मणि' के नाम से प्रसिद्ध हुई। အထ ဥတ္တရဂေဟဝိဟာရဝါသိတ္ထေရော အာဟ,- ‘ဆိန ဝ္ဍိန’ ဂါမကေ န မဏိယေဝ အနဂ္ဃံ, အထ ခေါ ဧကောပိ ထေရော ဂုဏဂန္ဓော နာမ ပရိယတ္တိကောဝိဒေါ အနဂ္ဃောယေဝါတိ. तब उत्तरगेह विहार के निवासी स्थविर ने कहा— "'छिन वड़िन' ग्राम में केवल मणि ही बहुमूल्य नहीं है, बल्कि गुणगन्ध नामक एक पर्यत्ति-विद्वान स्थविर भी बहुमूल्य ही हैं।" အထ တံ သုတွာ ရာဇာ တံ ပက္ကောသေတွာ စတူဟိ ပစ္စယေဟိ ဥပတ္ထမ္ဘေတွာ ပူဇံ အကာသိ. तब यह सुनकर राजा ने उन्हें बुलवाया और चार प्रत्ययों से सहायता कर उनका सम्मान किया। သဟဿောရောဓဂါမေ ဂုဏသာရော နာမ ထေရော ပလိဏဂါမေ သုဇာတော နာမ ထေရော စ ဂုဏဂန္ဓတ္ထေရဿ သိဿာယေဝ အဟေသုံ. सहस्सोरध ग्राम के गुणसार नामक स्थविर और पलिण ग्राम के सुजात नामक स्थविर गुणगन्ध स्थविर के ही शिष्य थे। ဧကသ္မိဉ္စ ကာလေ တိရိယပဗ္ဗတဝိဟာရဝါသီမဟာထေရော ဘိက္ခုသံဃမဇ္ဈေ အဂ္ဂဓမ္မာလင်္ကာရတ္ထေရံ ကီဠနဝသေန ဧဝမာဟ,- အမှေသု အာဝုသော အန္တရဓာရယမာနေသု တွံ လောကေ ဧကော ဂန္ထကောဝိဒတ္ထေရော ဘဝိဿသိ မညေတိ. အထ အဂ္ဂဓမ္မာလင်္ကာရော စ ဧဝမာဟ,-တုမှေသု ဘန္တေ အန္တရဓာရယမာနေသု မယံ ဂန္ထကောဝိဒါန ဘဝေယျာမကော နာမ [Pg.127] ပုဂ္ဂလော လောကေ ဂန္ထကောဝိဒေါ ဘဝိဿတီတိ. ပေါရာဏပေါတ္ထကေသု ပန အရိယာလင်္ကာရတ္ထေရော နနု ပနိဒါနိ မယံ ဂန္ထကောဝိဒါ န တာဝ ဘဝါမာတိ ဧဝမာဟာတိ ဝုတ္တံ. သော အဂ္ဂဓမ္မာလင်္ကာရတ္ထေရောယေဝ ရညာ ယာစိတော ရာဇဝံသ. သင်္ခေပမ္ပိ အကာသိ. သော ပ္ပန ထေရော အမစ္စပုတ္တော. और एक समय तिरियपब्बत विहार के निवासी महाथेर ने भिक्षु संघ के मध्य में अग्गधम्मलंकार थेर से परिहास में इस प्रकार कहा— "हे आयुष्मान्! हमारे अंतर्धान होने पर, मुझे लगता है कि तुम संसार में अकेले ग्रंथ-कोविद थेर होगे।" तब अग्गधम्मलंकार ने भी इस प्रकार कहा— "भन्ते! आपके अंतर्धान होने पर यदि हम ग्रंथ-कोविद न होंगे, तो संसार में कौन व्यक्ति ग्रंथ-कोविद होगा?" प्राचीन पुस्तकों में तो यह कहा गया है कि अरियलंकार थेर ने कहा था— "क्या हम अभी ग्रंथ-कोविद नहीं हैं?" उसी अग्गधम्मलंकार थेर ने राजा द्वारा याचना किए जाने पर 'राजवंश संक्षेप' की भी रचना की। वह थेर एक अमात्य के पुत्र थे। ဧကသ္မိဉ္စ ကာလေ ဟီနာယာဝတ္တကော ဧကော မဟာအမစ္စော ရညော သန္တိကာ အတ္တနာ ဥပလဒ္ဓပရိဘောဂံ သဗ္ဗံ ဂဟေတွာ ဝိဟာရံ အာဂန္တွာ အဂ္ဂဓမ္မာလင်္ကာရတ္ထေရေန သဒ္ဓိံ သလ္လာပံ အကာသိ. သလ္လာပံ ပန ကတွာ သဗ္ဗံ ပရိဘောဂံ ထေရဿ ဒဿေတွာ သစေ ဘန္တေ တွံ ဂိဟိ ဘဝေယျာသိ, ဧတ္တကံ ပရိဘောဂံ လဘိဿတီတိ အာဟ. ထေရောပိ ဧဝမာဟ,-တုမှာကံ ပန ဧတ္တကော ပရိဘောဂေါ အမှာကံ သမဏာနံ ဝစ္စကုဋိံ အသုဘဘာဝနံ ဘာဝေတွာ ပဝိသန္တာနံ ပုညံ ကလံ နာဂ္ဃတိ သောဠသိန္တိ. ကိဉ္စာပိ ဣဒဉ္စ ပန ဝစနံ သာသနဝံသေ အပ္ပဓာနံ ဟောတိ, ပုဗ္ဗာစရိယသီဟေဟိ ပန ဝုတ္တ ဝစနံ ယာဝ အပါဏကောဋိကာ သရိတဗ္ဗမေဝါတိ မနသိကရောန္တေန ဝုတ္တန္တိ. और एक समय, गृहस्थ जीवन की ओर लौटने वाला एक महा-अमात्य राजा के पास से स्वयं को प्राप्त सभी भोग-सामग्रियों को लेकर विहार आया और अग्गधम्मलंकार थेर के साथ वार्तालाप किया। वार्तालाप करने के बाद, थेर को सभी भोग-सामग्रियाँ दिखाकर उसने कहा— "भन्ते! यदि आप गृहस्थ हो जाएँ, तो आपको इतनी भोग-सामग्रियाँ प्राप्त होंगी।" थेर ने भी इस प्रकार कहा— "तुम्हारा यह इतना भोग, हम श्रमणों के लिए, जो अशुभ-भावना का ध्यान करते हुए शौचालय में प्रवेश करते हैं, उस पुण्य के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं है।" यद्यपि यह वचन 'सासनवंस' में गौण है, फिर भी पूर्वाचार्यों द्वारा कहे गए वचनों को प्राणों के अंत तक स्मरण रखना चाहिए, ऐसा मन में विचार कर यह कहा गया है। ကလိယုဂေ ပန စတုတ္တိံသာဓိကေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ တဿ ပုတ္တော နရာဝရော နာမ ရာဇာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. မဟာသီဟသူရဓမ္မရာဇာတိ နာမလဉ္ဆံ ပဋိဂ္ဂဏှိ. တဿ ရညော ကာလေ ‘သီ ခေါံ’ စေတိယဿ သမီပေ ဇေတဝနဝိဟာရေ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှန္တော ဧကော ဒဟရဘိက္ခု ဂန္ထဆေကောပိ သမာနော ဗာလကာလေ ဗာလစိတ္တေန အာကုလိတော ဟုတွာ ဝစ္စကူပေ ဝါတာတပေဟိ ဗဟိသုက္ခဘာဝေန ပဋိစ္ဆာဒိတေ ဒဏ္ဍေန အာလုလိတွာ ဒုဂ္ဂန္ဓောဝိယ စိတ္တသန္တာနေ ပရိယတ္တိဝါတာတပေဟိ ဗဟိသုက္ခဘာဝေန ပဋိစ္ဆာဒိတေ ကေနစိဒေဝ ရူပါရမ္မဏာဒိနာ အာလုလိတွာ ကိလေသသတ္တိသင်္ခါတော ဒုဂ္ဂန္ဓော ဝါယိတွာ ဟီနာယာဝတ္တိဿာမီတိ စိန္တေတွာ ဂိဟိဝတ္ထာနိ ဂဟေတွာ သဒ္ဓိံ သဟာယဘိက္ခုဟိ နဒီတိတ္ထံ အဂမာသိ. အန္တရာမဂ္ဂေ [Pg.128] တာဝ ဘိက္ခုဘာဝေနေဝ စေတိယံ ဝန္ဒိဿာမီတိ ဂိဟိဝတ္ထာနိ သဟာယကာနံ ဟတ္ထေ ဌပေတွာ စေတိယပ္ပမုခေ လေဏံ ပဝိသိတွာ ဝန္ဒိတွာ နိသီဒိ. အထ ဧကာ ဒဟရိတ္ထီ စေတိယင်္ဂဏံ အာဂန္တွာ ဗဟိ လေဏံ နိသီဒိသွာ ဥဒကံ သိဉ္စိတွာ ပတ္ထနံ အကာသိ,-ဣမိနာ ပုညကမ္မေန သဗ္ဗေဟိ အပါယာဒိနုက္ခေဟိ မောစေယျာမိ, ဘဝေ ဘဝေ စ ဟီနာယာဝတ္တကဿ ပုရိသဿ ပါဒစာရိကာ န ဘဝေယျာမီတိ. कलियुग के एक हजार चौंतीस वर्ष बीतने पर, उसका पुत्र नरावर नाम का राजा राज्य करने लगा। उसने 'महासीहसूरधम्मराजा' की उपाधि धारण की। उस राजा के समय में, 'सी खों' चैत्य के समीप जेतवन विहार में ग्रंथों का अध्ययन करने वाला एक युवा भिक्षु, जो ग्रंथों में निपुण था, युवावस्था के कारण चंचल चित्त से व्याकुल हो गया। जैसे धूप और हवा से ऊपर से सूखा हुआ मल-कुंड डंडे से हिलाने पर दुर्गंध देता है, वैसे ही उसके चित्त-संतान में पर्यत्ति रूपी धूप और हवा से ऊपर से ढके हुए क्लेश, किसी रूपादि आलंबन से विचलित होकर दुर्गंध की तरह प्रकट हुए। उसने सोचा— "मैं गृहस्थ जीवन में लौट जाऊँगा।" उसने गृहस्थ के वस्त्र लिए और अपने साथी भिक्षुओं के साथ नदी के तट पर गया। मार्ग में उसने सोचा— "अभी भिक्षु भाव में रहते हुए ही चैत्य की वंदना कर लूँ।" उसने गृहस्थ के वस्त्र साथियों के हाथ में दे दिए और चैत्य के सामने एक गुफा में प्रवेश कर वंदना करके बैठ गया। तब एक युवती चैत्य के प्रांगण में आई और गुफा के बाहर बैठकर जल छिड़कते हुए प्रार्थना की— "इस पुण्य कर्म से मैं सभी अपाय आदि दुखों से मुक्त होऊँ, और जन्म-जन्मांतर में कभी भी गृहस्थ जीवन की ओर लौटने वाले पुरुष की पत्नी न बनूँ।" အထ တံ သုတွာ ဒဟရဘိက္ခု ဧဝံ စိန္တေသိ,-ဣဒါနိ အဟံဟီနာယာဝတ္တိဿာမီတိ စိန္တေတွာ အာဂတော, အယမ္ပိ ဒဟရိတ္ထီ ဟီနာယာဝတ္တကဿ ပုရိသဿ ပါဒစာရိကာ န ဘဝေယျာ မီတိ ပတ္ထနံ အကာသိ, ဣဒါနိ တံ ဒဟရိတ္ထိံ ကာရဏံ ပုစ္ဆိဿာမီတိ. ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ ဗဟိ လေဏံ နိက္ခမိတွာ တံ ဒဟရိတ္ထိံကာရဏံ ပုစ္ဆိ,-ကသ္မာ ပန တွံ ဟီနာယာဝတ္တကဿ ပုရိသဿ ပါဒစာရိကာ န ဘဝေယျာမီတိ ပတ္ထနံ ကရောသီတိ. ဟီနာယာဝတ္တကဿ ဘန္တေ ပုရိသဿ ပါဒစာရိကာ န ဘဝေယျာမီတိ ဝုတ္တဝစနံ ဗာလပုရိသဿ ပါဒစာရိကာ န ဘဝေယျာမီတိ ဝုတ္တဝစနေန နာနာ န ဟောတိ, သဒိသတ္ထကမေဝါတိ နနု ဟီနာယာ ဝတ္တကော ဗာလောယေဝ နာမ, သစေ ပန ဘန္တေ ဟီနာယာဝတ္တကော ဗာလော နာမ န ဘဝေယျ, ကော နာမ လောကေ ဗာလော ဘဝေယျ, ဘိက္ခု နာမ ဟိ ပရေဟိ ဒိန္နံ စီဝရပိဏ္ဍပါတသေနာသနံ ပရိဘုဉ္ဇိတွာ သုခံ ဝသတိ, သစေ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှိတု ကာမော ဘဝေယျ, ယထာကာမံယေဝ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှိတုံ ဩကာသံ လဘတိ, ဧဝံ ပန အဟုတွာ အလသိကောယေဝ ဘုဉ္ဇိတွာ သယိတွာ နိသီဒိတုံ ဣစ္ဆေယျ, ဧဝမ္ပိ ယထာကာမံ ဘုဉ္ဇိတုံ သယိတုံ ဩကာသံ လဘတိ, ဧဝမ္ပိ သမာနော ပရဿ ဒါသော ဘဝိဿာမိ, ဒါရဿ ကိံကရော ဘဝိဿာမီတိ အကထေန္တောပိ ကထေန္တောဝိယ ဟုတွာ ဟီနာယာဝတ္တေယျ, သော လောကေ အညေဟိ ဗာလေဟိ အဓိကော ဗာလောတိ အဟံ မညာမိ, သစေ ပန ဗာလတရဿ ဘရိယာ ဘဝေယျ, အဟံ ဗာလတရီ ဘဝေယျန္တိ [Pg.129] ဝုတ္တေ သော ဒဟရဘိက္ခု သံဝေဂံ အာပဇ္ဇိတွာ ဗဟိနဂရဒွါရံ နိက္ခမိတွာ ဝါနရဂဏေန ဝိနာ ဈာယန္တောဝိယ ဝါနရော ဈာယိတွာ နိသီဒိ. तब उसे सुनकर युवा भिक्षु ने ऐसा सोचा— "अभी मैं गृहस्थ जीवन में लौटने का विचार कर यहाँ आया हूँ, और इस युवती ने प्रार्थना की है कि वह गृहस्थ जीवन में लौटने वाले पुरुष की पत्नी न बने। अब मैं इस युवती से इसका कारण पूछूँगा।" ऐसा सोचकर वह गुफा से बाहर निकला और उस युवती से कारण पूछा— "तुम ऐसी प्रार्थना क्यों कर रही हो कि तुम गृहस्थ जीवन में लौटने वाले पुरुष की पत्नी न बनो?" उसने कहा— "भन्ते! 'गृहस्थ जीवन में लौटने वाले पुरुष की पत्नी न बनूँ' यह कहना और 'मूर्ख पुरुष की पत्नी न बनूँ' यह कहना अलग नहीं है, दोनों का अर्थ समान ही है। क्या गृहस्थ जीवन में लौटने वाला मूर्ख नहीं है? भन्ते! यदि गृहस्थ जीवन में लौटने वाला मूर्ख नहीं है, तो संसार में मूर्ख कौन होगा? भिक्षु दूसरों द्वारा दिए गए चीवर, पिंडपात और शयनासन का उपभोग कर सुख से रहता है। यदि वह ग्रंथों का अध्ययन करना चाहे, तो उसे इच्छानुसार अध्ययन का अवसर मिलता है। यदि ऐसा न होकर वह आलसी होकर केवल खाना, सोना और बैठना चाहे, तो भी उसे इच्छानुसार खाने और सोने का अवसर मिलता है। ऐसा होने पर भी, 'मैं दूसरे का दास बनूँगा, पत्नी का सेवक बनूँगा'—ऐसा न कहते हुए भी वैसा ही आचरण करते हुए जो गृहस्थ जीवन में लौटता है, वह संसार के अन्य मूर्खों से भी बड़ा मूर्ख है, ऐसा मैं मानती हूँ। यदि मैं उस महामूर्ख की पत्नी बनूँ, तो मैं उससे भी बड़ी मूर्ख होऊँगी।" यह सुनकर वह युवा भिक्षु संवेग को प्राप्त हुआ और नगर के द्वार से बाहर निकलकर, वानर समूह से बिछुड़े हुए और ध्यानमग्न वानर की तरह एकांत में बैठकर चिंतन करने लगा। အထ သဟာယကာ အာဂန္တွာ ဂိဟိဝတ္ထာနိ ဂဏှာဟီတိ ပက္ကောသိံသု. တသ္မိံ ကာလေ သော ဒဟရဘိက္ခု အာဂစ္ဆထ ဘဝန္တောတိ ဝတွာ သဗ္ဗံ ကာရဏံ တေသံ အာစိက္ခိတွာ ဣဒါနိ ပန ဘဝန္တော ဟီနာယာဝတ္တေဟီတိ သစေ ယော ကောစိ အာဂန္တွာ မမ သီသံ မုဂ္ဂရေန ပဟာရေယျ, ဧဝံ သန္တေပိ ဟီနာယာဝတ္တိတုံ န ဣစ္ဆာမိ, ဣတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ဇီဝိတပရိယန္တာ ဟီနာယာဝတ္တိတုံ မနသာပိ န စိန္တယိဿာမီတိ ဝတွာ ဧရာဝတီနံဒိံ တရိတွာ ဇေယျပုရံ အဂမာသိ. တဒါ ကိရ ဒဟရိတ္ထီ ဒေဝလာဘဝယျ, န မနုဿိတ္ထီတိ ဝဒန္တိ ပဏ္ဍိတာတိ. तब उसके साथी आए और उसे पुकारा— "गृहस्थ के वस्त्र ले लो।" उस समय उस युवा भिक्षु ने कहा— "आप लोग आएँ," और उन्हें सारा कारण बताकर कहा— "अब आप लोग ही गृहस्थ जीवन में लौटें। यदि कोई आकर मेरे सिर पर मुग्दर से प्रहार भी करे, तो भी मैं गृहस्थ जीवन में लौटना नहीं चाहता। आज से लेकर जीवन के अंत तक मैं गृहस्थ जीवन में लौटने का मन से भी विचार नहीं करूँगा।" ऐसा कहकर वह इरावती नदी पार कर जेय्यपुर चला गया। विद्वान कहते हैं कि वह युवती वास्तव में कोई देवी थी, मनुष्य स्त्री नहीं। ဇေယျပုရံ ပန ပတွာ ပရိယတ္တိကောဝိဒါနံ မဟာထေရာနံ သန္တိကေ နယံ ဂဟေတွာ ပုညစေတိယဿ ဒက္ခိဏဒိသာဘာဂေ ဧကသ္မိံ ဝိဟာရေ နိသီဒိ. ပရိယတ္တိံ ဝါစေတွာ အထ ကမေန တံတံဒိသာဟိ ဘိက္ခုသာမဏေရာ အာဂန္တွာ တဿ သန္တိကေ ပရိယတ္တိံ ဥဂ္ဂဏှိံသု. အာဝါသံ ပန အလဘိတွာ ကေစိ ဘိက္ခုသာမဏေရာ ဆတ္တာနိပိ ဆာဒိတွာ နိသီဒိံသု. जेय्यपुर पहुँचकर, पर्यप्ति (शास्त्र) के विद्वान महास्थविरों के पास विधि (नय) ग्रहण कर, पुण्यचैत्य के दक्षिण दिशा के भाग में एक विहार में वे ठहरे। पर्यप्ति का अध्यापन करते हुए, फिर क्रमशः विभिन्न दिशाओं से भिक्षु और सामणेर आकर उनके पास पर्यप्ति सीखने लगे। आवास न मिलने के कारण कुछ भिक्षु और सामणेर छाते तानकर भी बैठ गए। ဧကသ္မိံ ကာလေ ရာဇာ နိက္ခမိတွာ ပုညစေတိယံ ဝန္ဒိဿာမီတိ စေတိယင်္ဂဏံ ပါဝိသိ. အထ ဆတ္တာနိ ဆာဒေတွာ နိသိန္နေ ဘိက္ခူ ဒိသွာ ဂုဟာယ သဒ္ဓိံ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တဿ ဘိက္ခုဿ အဒါသိ. တိလောကဂရူတိပိ နာမလဉ္ဆံ အဒါသိ. သုခဝေါဟာရတ္ထံ ပန ကကာရလောပံ ကတွာ တိလောဂရူတိ ဝေါဟရိံသု. एक समय राजा निकलकर 'पुण्यचैत्य की वन्दना करूँगा' ऐसा सोचकर चैत्य के प्रांगण में प्रविष्ट हुए। तब छाते तानकर बैठे हुए भिक्षुओं को देखकर, गुफा के साथ विहार बनवाकर उस भिक्षु को दे दिया। 'तिलोकगुरु' (त्रिलोकगुरु) यह नाम-उपाधि भी दी। सुखद उच्चारण के लिए 'क' कार का लोप करके 'तिलोगुरु' ऐसा व्यवहार करने लगे। တဿ ပန သဒ္ဓိဝိဟာရိကော သတ္တဝဿိကော တေဇောဒီပေါ နာမ ဘိက္ခု ပရိတ္တဋီကံ အကာသိ. အပရဘာဂေ ပန တိလောကာလင်္ကာရောတိ နာမလဉ္ဆံ အဒါသိ. ဧဝံ တေဇေဒီပေါ နာမ ဘိက္ခု နရာဝရရညော ကာလေ ပရိတ္တဋီကံ အကာသီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. ကေစိ ပန ပစ္ဆိမပက္ခာဓိကရညော ကာလေတိ ဝဒန္တိ. उनके सार्धविहारिक (शिष्य) सात वर्ष के (दीक्षित) तेजोदीप नामक भिक्षु ने 'परित्त-टीका' की रचना की। बाद में उन्हें 'तिलोकालंकार' (त्रिलोकालंकार) की उपाधि दी गई। इस प्रकार, तेजोदीप नामक भिक्षु ने नरावर राजा के काल में 'परित्त-टीका' की रचना की, ऐसा समझना चाहिए। कुछ लोग इसे 'पश्चिमपक्ष-अधिकार' राजा के काल में कहते हैं। ဧကသ္မိံ [Pg.130] ပန ကာလေ တိရိယပဗ္ဗတဝိဟာရဝါသီမဟာထေရော ပါဒစေတိယံ ဝန္ဒနတ္ထာယ ဂန္တွာ ပစ္စာဂတကာလေ ကုခနနဂရေ သုဝဏ္ဏဂုဟာယံ ဇမ္ဗုဓဇတ္ထေရဿ သန္တိကံ ပဝိသိတွာ တေန သဒ္ဓိံ သလ္လာပံ အကာသိ. တေ စ မဟာထေရာ အညမညံ ပဿိတွာ သလ္လပိတွာ အတိဝိယ ပမောဒိံသု. လောကသ္မိဉှိ ဗာလော ဗာလေန ပဏ္ဍိတော ပဏ္ဍိတေန သဒ္ဓိံ အတိဝိယ ပမောဒတီတိ. တေ စ ဒွေ ထေရာ သမာနဝဿိကာ. တိရိယပဗ္ဗတဝိဟာရ ဝါသီမဟာထေရော တေန သဒ္ဓိံ သလ္လာပံ ကတွာ ပစ္စာဂစ္ဆိ. ဇမ္ဗုဓဇတ္ထေရော စ မဂ္ဂံ အစိက္ခိတုံ အနုဂစ္ဆိ. အထ တိရိယပဗ္ဗတဝိဟာရဝါသီမဟာထေရော ဇမ္ဗုဓဇတ္ထေရံ အာဟ,- အဟံ ဘန္တေ ရာဇဝလ္လဘော ဟောမိ ရာဇဂုရု,တွံယေဝ မမ ပုရတော ဂစ္ဆာဟီတိ. အထ ဇမ္ဗုဓဇတ္ထေရောပိ တိရိယပဗ္ဗတဝိဟာရဝါသိတ္ထေရံ အာဟ,-တွံ ဘန္တေ ရာဇဝလ္လဘော ဘဝသိရာဇဂုရု, လောကေ ရာဇဂုရု နာမ ပဓာနဘာဝေ ဌိတော, တသ္မာ တွံယေဝ မမ ပုရတော ဂစ္ဆာဟီတိ. ဧတ္ထ စ ဒွေပိ မဟာထေရာ အညမညံ ဂါရဝဝသေန လောကဝတ္တံ အပေက္ခိတွာ ဧဝမာဟံသူတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. တိရိယပဗ္ဗတဝိဟာရဝါသီမဟာထေရောပိ ရတနပူရနဂရံ ပတွာ ရာဇဝံသပဗ္ဗတံ ဂန္တွာ အရညဝါသံ ဝသိ. एक समय तिरियपर्वत विहार के निवासी महास्थविर पादचैत्य की वन्दना के लिए गए और लौटते समय कुखन नगर की सुवर्णगुफा में जम्बुध्वज स्थविर के पास जाकर उनके साथ वार्तालाप किया। वे दोनों महास्थविर एक-दूसरे को देखकर और वार्तालाप कर अत्यन्त प्रसन्न हुए। क्योंकि लोक में मूर्ख मूर्ख के साथ और पण्डित पण्डित के साथ अत्यन्त प्रसन्न होता है। वे दोनों स्थविर समान वर्षा (दीक्षा आयु) वाले थे। तिरियपर्वत विहार के निवासी महास्थविर उनके साथ वार्तालाप कर लौट आए। जम्बुध्वज स्थविर मार्ग बताने के लिए पीछे-पीछे गए। तब तिरियपर्वत विहार के निवासी महास्थविर ने जम्बुध्वज स्थविर से कहा— "भन्ते! मैं राजवल्लभ राजगुरु हूँ, आप ही मेरे आगे चलें।" तब जम्बुध्वज स्थविर ने भी तिरियपर्वत विहार के निवासी स्थविर से कहा— "भन्ते! आप राजवल्लभ राजगुरु हैं, लोक में राजगुरु प्रधान पद पर स्थित होता है, इसलिए आप ही मेरे आगे चलें।" यहाँ यह समझना चाहिए कि दोनों महास्थविरों ने एक-दूसरे के प्रति गौरववश लोक-मर्यादा की अपेक्षा करते हुए ऐसा कहा। तिरियपर्वत विहार के निवासी महास्थविर भी रतनपुर नगर पहुँचकर राजवंश पर्वत पर जाकर अरण्यवास में रहने लगे। အထ ဥက္ကံသိကရာဇာ ကနိဋ္ဌေန သူရကိတ္တိနာမေန သဒ္ဓိံ မန္တေသိ,-သစေ တွံ ဝနေ ထေရံ ပဌမံ ပဿသိ, တွံယေဝ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ ထေရဿ ဒဒါဟိ, သစေ ပနာဟံ ပဌမံ ပဿေယျ, အဟံ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ ဒဒါမီတိ. तब उक्कंसिक राजा ने अपने छोटे भाई सूरकित्ति के साथ मंत्रणा की— "यदि तुम वन में स्थविर को पहले देखो, तो तुम ही विहार बनवाकर स्थविर को देना; और यदि मैं पहले देखूँ, तो मैं विहार बनवाकर दूँगा।" အထ ကနိဋ္ဌာ ပဌမံ ပဿိတွာ တိရိယပဗ္ဗတကန္ဒရေ ဇေတဝနံ နာမ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ အဒါသိ. ဣဒဉ္စ ဝစနံ သာဓုဇ္ဇနာနံ ဂုဏံ ဧဝကာရံ ပီတိသောမနဿံ ဥပ္ပဇ္ဇိ, တေန ပုညကမ္မေန တေန ပီတိသောမနဿေန သတ္တက္ခတ္တုံ ဒေဝရဇ္ဇသမ္ပတ္တိံ သတ္တက္ခတ္တုံ မနုဿရဇ္ဇသမ္ပတ္တိံ ပဋိလဘီတိ ဝုတ္တတ္တာ သာဓုဇ္ဇနာနံ ဂုဏံ အနုဿရိတွာ ပုညဝိသေသလာဘတ္ထာယ ဝုတ္တံ. तब छोटे भाई ने पहले देखकर तिरियपर्वत की कन्दरा में जेतवन नामक विहार बनवाकर दान दिया। सज्जनों के गुणों के प्रति इस प्रकार की प्रीति और सौमनस्य उत्पन्न हुआ, उस पुण्यकर्म और उस प्रीति-सौमनस्य से सात बार देवराज की सम्पत्ति और सात बार मनुष्यराज की सम्पत्ति प्राप्त की— ऐसा कहे जाने के कारण, सज्जनों के गुणों का अनुस्मरण कर विशेष पुण्य लाभ के लिए यह कहा गया है। တိရိယပဗ္ဗတဝိဟာရဝါသီမဟာထေရော စ ဇမ္ဗုဓဇတ္ထေရဿ [Pg.131] ဂုဏံ ဥက္ကံသိကရညော အာရောစေသိ. ရာဇာ စ အတိဝိယ ပသီဒိတွာ ဇမ္ဗုဓဇောတိ မူလနာမေ ဒီပသဒ္ဒေန ယောဇေတွာ ဇမ္ဗုဒီပဓဇောတိ နာမလဉ္ဆံ အဒါသိ. तिरियपर्वत विहार के निवासी महास्थविर ने जम्बुध्वज स्थविर के गुणों के बारे में उक्कंसिक राजा को बताया। राजा ने अत्यन्त प्रसन्न होकर 'जम्बुध्वज' इस मूल नाम में 'दीप' शब्द जोड़कर 'जम्बुदीपध्वज' (जम्बूद्वीपध्वज) की उपाधि प्रदान की। ဇမ္ဗုဓဇတ္ထေရော စ နာမ ဓမ္မနန္ဒတ္ထေရဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကာ. ဓမ္မနန္ဒတ္ထေရော စ ဇောတိပုညတ္ထေရဿ သဒ္ဓိဝိဟာရိကော. တေ စ ထေရာ အရဟန္တဂဏဝံသိကာ. जम्बुध्वज स्थविर धम्मानन्द स्थविर के सार्धविहारिक (शिष्य) थे। धम्मानन्द स्थविर जोतिपुञ्ज स्थविर के सार्धविहारिक थे। वे स्थविर अर्हन्त गण के वंशज थे। ဇမ္ဗုဓဇတ္ထေရော ပန ဝိနယပါဠိယာ အဋ္ဌကထာယ စ အတ္ထ ယောဇနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. မဏိရတနော နာမ ပန ထေရော အဋ္ဌသာလိနီသမ္မောဟဝိနောဒနီကင်္ခါဝိတရဏီအဋ္ဌကထာနံ အဘိဓမ္မတ္ထဝိဘာဝနီသင်္ခပဝဏ္ဏနာဠီကာနဉ္စ အတ္ထံ မရမ္မ ဘာသာယ ယောဇေသိ. जम्बुध्वज स्थविर ने विनयपालि और उसकी अट्ठकथा की अर्थ-योजना मरम्म (बर्मी) भाषा में की। मणिरतन नामक स्थविर ने अट्ठसालिनी, सम्मोहविनोदनी, कंखावितरणी अट्ठकथाओं तथा अभिधम्मत्थविभावनी और संखपवण्णना-टीकाओं का अर्थ मरम्म भाषा में योजित किया। မူလာဝါသဂါမေ စ ပုဗ္ဗာရာမဝိဟာရဝါသိတ္ထေရော ဂူဠတ္ထ ဒီပနိံ နာမ ဂန္ထံ ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂဂဏ္ဌိပဒတ္ထဉ္စ မူလဘာသာယ အကာသိ, နေတ္တိပါဠိယာ စ အတ္ထံ မရမ္မဘာသာယ ယောဇေသိ. သော ပန ထေရော ပုဗ္ဗေ ဂါမဝါသီ ဟုတွာ သီသဝေဌနတာလပတ္တာနိ ဂဟေတွာ အာစရိယပ္ပဝေဏီဝသေန ဝိနယဝိလောမာစာရံ စရိ. ပစ္ဆာ ပန တံ အာစာရံ ဝိဿဇ္ဇိတွာ အရညဝါသံ ဝသိ. သောပိ ထေရော ဂမ္ဘီရဉာဏိကော သဒ္ဒတ္ထနယေသု အတိဝိယ ဆေကော. मूलावास ग्राम के पुब्बाराम विहार के निवासी स्थविर ने 'गूळत्थदीपनी' नामक ग्रन्थ और 'विसुद्धिमग्ग-गण्ठिपदत्थ' की रचना मूल भाषा (पालि) में की, और नेत्तिपालि का अर्थ मरम्म भाषा में योजित किया। वह स्थविर पहले ग्रामवासी थे और सिर पर पगड़ी तथा ताड़पत्र लेकर आचार्य-परम्परा के अनुसार विनय के विपरीत आचरण करते थे। बाद में उस आचरण को छोड़कर वे अरण्यवास में रहने लगे। वे स्थविर भी गम्भीर ज्ञानी और शब्द-अर्थ की विधियों में अत्यन्त निपुण थे। ကလိယုဂေ ပန ပဉ္စတိံသာဓိကေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ ကနိဋ္ဌော သိရိပဝရမဟာဓမ္မရာဇာ နာမ ဘူပါလော ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. ဒဗ္ဗိမုခဇာတဿရေ ပန ဂေဟံ ကာရာပေတွာ နိသီဒနတော ဒဗ္ဗိမုခဇာတဿရောတိ နာမံ ပါကဋံ အဟောသိ. တသ္မိံ ပန ဇာတဿရေ ဇေယျဘူမိကိတ္တိံ နာမ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ သိရိသဒ္ဓမ္မပါလတ္ထေရဿ အဒါသိ. ဗဟူနမ္ပိ ဂါမဝါသီ အရညဝါသီ ဘိက္ခူနံ အနုဂ္ဂဟံ အကာသိ. ရတနပူရနဂရသ္မိဉှိ ဒသသု ‘ဉျ္ौံ ယာံ’ ရာဇာံသေသု ပ္ပစ္ဆိမာ ပဉ္စ ရာဇာနော အဝိစိနိတွာယေဝ အလဇ္ဇီလဇ္ဇီမိဿကဝသေန သာသနံ ပဂ္ဂဏှိံသု. တဒါ [Pg.132] ဇိနသာသနံ အဗ္ဘန္တရေ စန္ဒောဝိယ အတိပရိသုဒ္ဓံ န အဟောသိ. ဧဝမ္ပိ လဇ္ဇိနော အတ္တနော အတ္တနော ဝံသာနုရက္ခဏဝသေန ဓမ္မံ ပူရေတုံ အနိဝါရိတတ္တာ လဇ္ဇီဂဏဝံသော န ဆိဇ္ဇတိ. တထာ အလဇ္ဇိနောပိ အတ္တနော အတ္တနော အာစရိယပ္ပဝေဏီဝသေန ဝိစရိံသု, တေန အလဇ္ဇီဂဏဝံသောပိ န ဆိဇ္ဇတီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. တဿ ရညော ကာလေ ဒေဝစက္ကောဘာသော နာမ ဧကော ထေရော အတ္ထိ, ဝေဒသတ္ထညူ ပိဋကေသု ပန မန္ဒောတိ. कलियुग में एक हजार पैंतीस वर्ष (१०३५) बीतने पर, कनिष्ठ सिरिपवरमहाधम्मराजा नामक राजा ने राज्य किया। दब्बिमुख जातस्सर (झील) में घर बनवाकर रहने के कारण वह 'दब्बिमुखजातस्सर' नाम से प्रसिद्ध हुआ। उस जातस्सर के पास जेय्यभूमिकित्ति नामक विहार बनवाकर उसने सिरिसद्धम्मपाल थेर को प्रदान किया। उसने बहुत से ग्रामवासी और अरण्यवासी भिक्षुओं का अनुग्रह किया। रतनपुर नगर में दस 'न्यौंग यान' (ñyौṃ yāṃ) राजवंशों में से अंतिम पांच राजाओं ने बिना विचार किए ही अलज्जी और लज्जी (निर्लज्ज और लज्जावान) के मिश्रण के साथ शासन को प्रश्रय दिया। तब जिन-शासन भीतर से चंद्रमा के समान अत्यंत शुद्ध नहीं था। फिर भी, लज्जी भिक्षुओं द्वारा अपने-अपने वंश की रक्षा के वश धर्म का पालन करने से विरत न होने के कारण, लज्जी-गण का वंश विच्छिन्न नहीं हुआ। उसी प्रकार अलज्जी भी अपनी-अपनी आचार्य-परम्परा के अनुसार विचरण करते रहे, इसलिए यह समझना चाहिए कि अलज्जी-गण का वंश भी विच्छिन्न नहीं हुआ। उस राजा के काल में देवचक्कोभास नामक एक थेर थे, जो वेद-शास्त्रों के ज्ञाता थे परंतु पिटकों में अल्पज्ञ थे। ကလိယုဂေ ပန အဋ္ဌတိံသာဓိကေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ ဝေသာခမာသဿ ကာဠပက္ခအဋ္ဌမိတော ပဋ္ဌာယ လောကသင်္ကေတဝသေန ဥပ္ပဇ္ဇမာနံ ဘယံ နိဝါရေတုံ နဝဂုဟာယံ တေန ဒေဝစက္ကောဘာသတ္ထေရေန ကထိတနိယာမေန ပဌမံ မရမ္မိကဘိက္ခူ ပဋ္ဌာနပ္ပကရဏံ ဝါစာပေသိ. တတော ပစ္ဆာ ဇေဋ္ဌမာသဿ ဇုဏှပက္ခပါဋိပဒဒိဝသတော ရာမညရဋ္ဌဝါသိကေ ဘိက္ခူ ပဋ္ဌာနပ္ပကရဏံ ဝါစာပေသိ. မဟာဆဏဉ္စ ကာရာပေသိ. ရဋ္ဌဝါသိနောပိ ဗဟုပူဇာသက္ကာရံ ကာရာပေသိ. တဿ ကိရ ရညော ကာလေ ပေါတ္ထကံ အဋ္ဌိဘလ္လိကရုက္ခနိယျာသေဟိ ပရိမဋ္ဌံ ကတွာ မနောသိလာယ လိခိတွာ သုဝဏ္ဏေန လိမ္ပေတွာ ပိဋကံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. တတော ပဋ္ဌာယ ယာဝဇ္ဇတနာ ဣဒံ ပေါတ္ထကကမ္မံ မရမ္မရဋ္ဌေ အကံသူတိ. कलियुग में एक हजार अड़तीस वर्ष (१०३८) बीतने पर, वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से लेकर, लोक-संकेत के कारण उत्पन्न होने वाले भय को दूर करने के लिए, उस देवचक्कोभास थेर द्वारा बताए गए निर्देशानुसार, पहले बर्मी भिक्षुओं से पट्ठान-प्रकरण का पाठ करवाया। उसके बाद ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से रामण्य राष्ट्र के निवासी भिक्षुओं से पट्ठान-प्रकरण का पाठ करवाया। और महान उत्सव आयोजित किया। राष्ट्रवासियों से भी बहुत पूजा-सत्कार करवाया। कहा जाता है कि उस राजा के काल में पुस्तकों को अस्थि-भल्लिक वृक्ष के गोंद से परिमार्जित कर, मनःशिला से लिखकर और स्वर्ण से लेपित कर पिटक को स्थापित किया। तब से लेकर आज तक बर्मी राष्ट्र में यह ग्रंथ-निर्माण का कार्य किया जाता है। ကလိယုဂေ သဋ္ဌာဓိကေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ (အဿယုဇမာသဿ ကာဠပက္ခဆဋ္ဌမိယံ အင်္ဂါရဝါရေ) တဿ ပုတ္တော ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. သိရိဟာသီဟသူရသုဓမ္မရာဇာတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ ပဋိဂ္ဂဏှိ. ပိတု ရညော ဂေဟဋ္ဌာနေ စေတိယံ ကာရာပေသိ. တဿ ပန မာရဇေယျရတနန္တိ သမညာ အဟောသိ. တဿ ပန ရညော ကာလေ သလ္လာဝတိယာ နာမ နဒိယာ ပစ္ဆိမဘာဂေ တုန္နနာမကေ ဂါမေ ဂုဏာဘိလင်္ကာရော နာမ ထေရော သာမဏေရာနံ ဂါမဂ္ဂဝေသနကာလေ ဧကံသံ ဥတ္တရာသင်္ဂံ ကာရာပေတွာ [Pg.133] သီသဝေဌနတာလပတ္တာနိ ပန န ဂဏှာပေတွာ တာလဝဏ္ဋမေဝ ဂဏှာပေသိ. ဧကော ဂဏော ဟုတွာ သပရိဝါရေန သဒ္ဓိံ တုန္နဂါမေ နိသီဒိ. တုန္နဂဏောတိ တဿ သမညာ အဟောသိ. သော ပန ထေရော ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု အဓိပ္ပာယံ ယထာဘူတံ န ဇာနာတိ, အဘိဓမ္မပိဋကံယေဝ သိဿာနံ ဝါစေတွာ နိသီဒိ. कलियुग में एक हजार साठ वर्ष (१०६०) बीतने पर (आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी, मंगलवार को) उसके पुत्र ने राज्य किया। उसने 'सिरिहासीहसूरसुधम्मराजा' की उपाधि धारण की। उसने अपने पिता राजा के गृह-स्थान पर एक चैत्य बनवाया, जिसका नाम 'मारजेय्य रतन' प्रसिद्ध हुआ। उस राजा के काल में सल्लावती नामक नदी के पश्चिमी भाग में तुन्न नामक गाँव में गुणाभिलङ्कार नामक थेर ने, श्रामणेरों के गाँव में प्रवेश के समय, उत्तरासंग को एक कंधे पर रखवाया, किन्तु सिर ढंकने के लिए ताड़-पत्र नहीं पकड़वाए, बल्कि केवल ताड़ का पंखा ही पकड़वाया। वह एक गण होकर अपने अनुयायियों के साथ तुन्न गाँव में रहने लगा। उसकी संज्ञा 'तुन्न-गण' हुई। वह थेर पालि, अट्ठकथा और टीका ग्रंथों के यथार्थ अभिप्राय को नहीं जानता था; वह केवल अभिधम्म पिटक ही शिष्यों को पढ़ाकर रहता था। တသ္မိဉ္စ ကာလေ ကေတုမတီနဂရေ နိသိန္နာ ဗဒ္ဓန္နာ ဗုဒ္ဓင်္ကုရတ္ထေရ စိတ္တတ္ထေရာ, ဒီပယင်္ဂနဂရေ ဥဠုဂါမေ နိသိန္နော သုနန္ဒတ္ထေရော, တလုပ္ပနဂရေ ဇေယျဗဟုအန္ဓဂါမေ ကလျာဏတ္ထေရောတိ ဣမေ စတ္တာရော ထေရာ သာမဏေရာနံ ဂါမပ္ပဝေသနကာလေ ဧကံသံ ဥတ္တရာသင်္ဂံ အကာရာပေတွာ သီသဝေဌနတာလပတ္တာနိ အဂ္ဂဏှာပေတွာ စီဝရံ ပါရုပါပေတွာ တာလဝဏ္ဋံ ဂဏှာပေတွာ သကလကဂဏံ ဩဝါဒံ ကတွာ နိသီဒိံသု. တေ ပန ထေရာ ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု အဓိပ္ပာယံ ယထာဘူဘံ ဇာနိံသု, တီသုပိ ပိဋကေသု ကောဝိဒါ အဟေသုံ. ဣစ္စေဝံ သိရိမဟာသီဟသူရသုဓမ္မရညော ကာလေ ပါရုပနဘိက္ခူဟိ နာနာ ဟုတွာ ဝိရူပံ အာပဇ္ဇိတွာ ဧကံသိကဂဏော နာမ ဝိသုံ ဘိဇ္ဇိ, ယထာ ပန အယမလံ အယတော ဥဋ္ဌဟိတွာ ဝိသဒိသံ ဟုတွာ ဝိရုဒ္ဓံ ဟောတီတိ. ဧဝံ ဘိဇ္ဇမာနာပိ ဂဏာ ရာဇာ ပမာဒေါ အနုဿုက္ကော ဟုတွာ အတ္တနော အတ္တနော ရုစိဝသေနေဝ စရိတွာ နိသီဒိံသု. उस समय केतुमती नगर में स्थित बद्धन्ना बुद्धङ्कुर थेर और चित्त थेर, दीपयंग नगर के उलुगाँव में स्थित सुनन्द थेर, और तलुप्प नगर के जेय्यबहुअन्ध गाँव में स्थित कल्याण थेर—इन चारों थेरों ने श्रामणेरों के गाँव में प्रवेश के समय उत्तरासंग को एक कंधे पर न रखवाकर, सिर ढंकने के ताड़-पत्र न पकड़वाकर, चीवर ओढ़वाकर और ताड़ का पंखा पकड़वाकर, संपूर्ण गण को उपदेश देते हुए निवास किया। वे थेर पालि, अट्ठकथा और टीका ग्रंथों के यथार्थ अभिप्राय को जानते थे और तीनों पिटकों में निपुण थे। इस प्रकार सिरिमहासीहसूरसुधम्म राजा के काल में, पारुपन (चीवर ओढ़ने वाले) भिक्षुओं से भिन्न होकर और विकृति को प्राप्त होकर 'एकंसिक-गण' (एक कंधे पर चीवर रखने वाला समूह) नामक एक अलग गुट बन गया, जैसे लोहे का मैल लोहे से ही उत्पन्न होकर उसके विपरीत और विरुद्ध हो जाता है। इस प्रकार गणों के विभाजित होने पर भी, राजा के प्रमादी और उदासीन होने के कारण, वे अपनी-अपनी रुचि के अनुसार आचरण करते रहे। တေသု စ ဒွီသု ဂဏေသု ပါရုပနဂဏေ ထေရာ ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု နီတတ္ထဝသေန ဝုတ္တံ ဝစနံ နိဿာယ နိက္ကင်္ခါ နိဒ္ဒေါသာဝ ဟုတွာ နိသီဒိံသု. ဧကံသိကဂဏေ ပန ထေရာ အတ္တနော အတ္တနော ဝါဒေါ န ပါဠိယံ န စ အဋ္ဌကထာသု နေဝ ဋီကာသု နာပိ ဂန္ထန္တေရေသု ဒိဿတိ, ဣမမတ္ထံ အဇာနန္တာ ဣဒမေဝ သစ္စံ မောဃမညန္တိ ဝတွာ ကေစိ ပန သကသကသိဿာနံ ဩဝါဒံ အဒံသု. ဧဝရူပါပိ သိဿာ ဩဝါဒံ ပဋိဂ္ဂဏှိံသု. उन दो गणों में से, पारुपन-गण के थेर पालि, अट्ठकथा और टीका ग्रंथों में स्पष्ट अर्थ (नीतार्थ) के अनुसार कहे गए वचनों का आश्रय लेकर निःशंक और निर्दोष होकर रहने लगे। किन्तु एकंसिक-गण के थेरों का अपना मत न पालि में, न अट्ठकथाओं में, न टीकाओं में और न ही अन्य ग्रंथों में मिलता है; इस अर्थ को न जानते हुए 'यही सत्य है, अन्य सब व्यर्थ है' ऐसा कहकर कुछ ने अपने-अपने शिष्यों को उपदेश दिया। और शिष्यों ने भी उस उपदेश को ग्रहण कर लिया। ကေစိ ပန ပါဠိယာဒီသု သကဝါဒဿ အနာဂတဘာဝံ ဉတွာယေဝ [Pg.134] အပရိသုဒ္ဓစိတ္တာ ဟုတွာ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော မုခံ အနောလောကေတွာ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿေဝ ဘဂဝတော ဂုဏံ အနုဿရိတွာ သကဝါဒေ အာကာသေ ပသာရိတ ဟတ္ထောဝိယ အပ္ပတိဋ္ဌာနောတိ ဇာနိတွာယေဝ အမှာကံ ဝါဒေါ သမ္ပတ္တလင်္ကဿ သဒ္ဓမ္မစာရိတ္ထေရဿ ဝံသပ္ပဘဝေါတိ အနိဿာယဘူဘမ္ပိ နိဿယံ အကံသု. အဘူတေန မဟာထေရံ သီလဝန္တံ အဗ္ဘာစိက္ခိံသု. ဖျသီနာမကေ ဂါမေ ဒိဋ္ဌဓမ္မိကသမ္ပရာယိ ကတ္ထံ အနပေက္ခန္တဿ ဟီနာယာဝတ္တကဿ ဒုဿီလဿ ဥပါသကဿ လဉ္ဇံ ဒတွာ အမှာကံ ဝါဒါနုရူပံ ဧကံ ဂန္ထံ ကရောဟီတိ ဥယျောဇေတွာ အနာဂတေ အနုဘဝိယမာနဒုက္ခတော အဘာယိတွာ နိဿယံ ဂဝေသိံသူတိ. कुछ ने तो पालि आदि में अपने मत का अभाव जानकर, अशुद्ध चित्त वाले होकर, सम्म्यासम्बुद्ध भगवान के वचनों की उपेक्षा कर, भगवान के गुणों का स्मरण न कर, और यह जानते हुए भी कि उनका अपना मत आकाश में फैलाए गए हाथ के समान निराधार है, 'हमारा मत लंका से आए सद्धम्मचारि थेर के वंश से उत्पन्न है' ऐसा कहकर असत्य आधार को ही आधार बनाया। उन्होंने असत्य के द्वारा शीलवान महाथेर पर झूठा दोषारोपण किया। फ्यसी नामक गाँव में, इस लोक और परलोक के कल्याण की उपेक्षा करने वाले, पतित और दुःशील उपासक को रिश्वत देकर, 'हमारे मत के अनुरूप एक ग्रंथ लिखो' ऐसा कहकर उसे प्रेरित किया और भविष्य के दुखों से न डरते हुए उन्होंने (झूठा) आधार खोजा। တသ္မိံဉ္စ ကာလေ နိဂြောဓပါဠိသုဝဏ္ဏဝိဟာရဝါသိတ္ထေရော ဂါမဝါသီဘိက္ခု ဂဏံ သမိတိံ ကတွာ တဿ နာယကော ဟုတွာ သီသဝေဌနံ အဓာရေန္တာ အမင်္ဂလဘိက္ခူ သာသနေ မာတိဋ္ဌန္တူတိ အရညဝါသီနံ ဘိက္ခူနံ ဂန္ထံ ဝိကောပေတွာ တတော တတော ပဗ္ဗဇေသုံ. အထ ဟတ္ထိသာလဂါမဿ ပုရတ္ထိမာယ အနုဒိသာယ သေဋ္ဌိတဠာကဿ ဒက္ခိဏာယ အနုဒိသာယ ဝိဟာရေ နိသိန္နေ အတိရေကပဏ္ဏာသဘိက္ခူပိ ပဗ္ဗာဇေဿာမာသိ စိန္တေတွာ ဂါမဝါသီဘိက္ခူ သန္နဟိတွာ အဂမာသိ. အထ ရာဇာ တမတ္ထံ သုတွာ ဂါမဝါသီဂဏောပိ ဧကော, အရညဝါသီဂဏောပိ ဧကော, ဂါမဝါသီဘိက္ခူ အရညဝါသီဘိက္ခူ ဝိဟေဌေသုံ န သက္ကာ, သကသကဝါဒဝသေန သကသကဋ္ဌာနေ နိသီဒိ တဗ္ဗန္တိ ရာဇလေခနံ ပေသေသိ. အထ အရညဝါသီဘိက္ခူ သုခံ ဝသိတုံ ဩကာသံ လဘိံသု. उस समय निग्रोधपालि-सुवर्णविहारवासी स्थविर, जो ग्रामवासी भिक्षु थे, ने एक गण (समूह) की सभा की और उसके नायक बनकर, "सिर पर पगड़ी धारण करने वाले अमंगल भिक्षु शासन में न रहें" ऐसा कहकर अरण्यवासी भिक्षुओं के ग्रंथों को नष्ट कर उन्हें वहाँ-वहाँ से निकाल दिया। फिर हस्तिशाल ग्राम के पूर्व की ओर और श्रेष्ठि-तड़ाग (सेठ के तालाब) के दक्षिण की ओर के विहार में बैठे पचास से अधिक भिक्षुओं को भी निकाल देंगे, ऐसा सोचकर ग्रामवासी भिक्षु तैयार होकर गए। तब राजा ने उस बात को सुनकर राजलेख भेजा कि "ग्रामवासी गण भी एक है, अरण्यवासी गण भी एक है; ग्रामवासी भिक्षु अरण्यवासी भिक्षुओं को प्रताड़ित नहीं कर सकते, अपने-अपने वाद (सिद्धांत) के अनुसार अपने-अपने स्थान पर निवास करें।" तब अरण्यवासी भिक्षुओं को सुखपूर्वक रहने का अवसर प्राप्त हुआ। ကလိယုဂေ ဆသတ္တတာဓိကေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ တဿ ရညော ပုတ္တော မဟာသီဟသူရဓမ္မရာဇာဓိရာဇာ နာမ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. သောယေဝ သူရဇ္ဇရာဇာတိ စ သေတိဘိန္ဒောတိ စ ဝေါဟာရိယတိ. कलियुग के एक हजार छिहत्तर (1076) वर्ष बीतने पर, उस राजा के पुत्र महासिंहसूरधम्मराजाधिराज नामक राजा ने राज्य किया। उन्हें ही 'सूरज्जराजा' और 'सेतिभिन्दो' भी कहा जाता है। တဿ [Pg.135] ရညော ကာလေ သုဝဏ္ဏယာနောလောကနဂါမဝါသီဥက္ကံသမာလံ နာမ ထေရံ အန္တောယုဓနာယကော ဧကော အမစ္စော အာနေတွာ ရတနပူရနဂရံ ပတွာ သုဝဏ္ဏကုက္ကုဋာစလေ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ ဌပေသိ. उस राजा के समय में, सुवर्णयानोलक ग्राम के निवासी उक्कंसमाल नामक स्थविर को एक अंतोयुद्धनायक (सेनापति) अमात्य लेकर आया और रत्नपुर नगर पहुँचकर सुवर्णकुक्कुटाचल पर विहार बनवाकर उन्हें वहाँ स्थापित किया। သော ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု အတိဝိယ ဆေကော. ဝဏ္ဏဗောဓနံ နာမ လိခနနယဉ္စ အကာသိ. တဿ ဂါမဿ ရာဇူဟိ ဒိန္နဝသေန စေတိယဇဂ္ဂနကမ္မေ ယုတ္တကုလတ္တာ ပန ရညော အာစရိယဋ္ဌာနေ အဋ္ဌပေတွာ အန္တောယုဓနာယ ကဿေဝ ပူဇနတ္ထာယ နိယျာဒေသိ. တဿာပိ ရညော ကာလေ သာမဏေရေဟိ ဂါမပ္ပဝသနကာလေ ပါရုပေတွာ ပဝိသိတဗ္ဗန္တိ ဧကစ္စေ ဝဒိံသု. ဧကစ္စေ ပန ဧကံသံ ဥတ္တရာသင်္ဂံ ကတွာ ပဝိသိတဗ္ဗန္တိ ဝဒိံသု. ဧဝံ အညမညံ ကလဟံ အကံသု. वे पालि, अट्ठकथा, टीका और अन्य ग्रंथों में अत्यंत कुशल थे। उन्होंने 'वर्णबोधन' नामक लेखन-विधि की रचना की। उस ग्राम के राजाओं द्वारा दिए जाने के कारण चैत्य की देखभाल के कार्य में लगे कुल से होने के कारण, राजा ने उन्हें आचार्य के पद पर न रखकर केवल अंतोयुद्धनायक की पूजा (सम्मान) के लिए ही समर्पित कर दिया। उस राजा के समय में भी, कुछ लोगों ने कहा कि श्रामणेरों को गाँव में प्रवेश करते समय (दोनों कंधों को) ओढ़कर प्रवेश करना चाहिए। जबकि कुछ ने कहा कि एक कंधे पर उत्तरासंग (चीवर) रखकर प्रवेश करना चाहिए। इस प्रकार उन्होंने आपस में कलह किया। တတ္ထ ဥက္ကံသမာလာနာမကော ထေရော ပါရုပနဂဏေ ပဓာနော ဟုတွာ နာနာဂန္ထေသု ပါရုပနဝတ္တမေဝ အာဂတန္တိ ပကာသိံသု. ဧကံသိကဂဏေ ပန တိရိယပဗ္ဗတဝိဟာရဝါသီမဟာထေရာ အာစရိယပ္ပဝေဏီဒဿနဝသေန ပါရုပနဝါဒံ ပဋိက္ခိပိံသု. वहाँ उक्कंसमाल नामक स्थविर 'पारुपन' (ओढ़ने वाले) गण के प्रधान हुए और उन्होंने घोषित किया कि विभिन्न ग्रंथों में ओढ़ने का ही नियम आया है। परंतु 'एकांसिक' (एक कंधे वाले) गण में तिरीयपर्वत विहार के निवासी महास्थविरों ने आचार्य-परंपरा को दिखाते हुए 'पारुपन' वाद का खंडन किया। အထ ရာဇာ စ ဖလိကခစိတဝိဟာရဝါသိတ္ထေရံ မေဃုစ္စနဝိဟာရဝါသိတ္ထေရံ သုဟတ္ထတ္ထေရံ ဗုဒ္ဓင်္ကုရတ္ထေရဉ္စာတိ ဣမေ စတ္တာရော ထေရေ ဝိနယဝိနိစ္ဆကဋ္ဌာနေ ဌပေတွာ ဒွေ ပက္ခာ အတ္တနော အတ္တနော ဝါဒံ ဒဿေန္တူတိ အာဟ. तब राजा ने फलिकखचित विहार के निवासी स्थविर, मेघोच्चन विहार के निवासी स्थविर, सुहत्थ स्थविर और बुद्धंकुर स्थविर—इन चार स्थविरों को विनय-विनिश्चय (विनय के निर्णय) के स्थान पर नियुक्त किया और कहा कि दोनों पक्ष अपना-अपना वाद (पक्ष) प्रस्तुत करें। တေ စ စတ္တာရော ထေရာ ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု အကောဝိဒါ. တေသဉှိ ဌပေတွာ ရာဇဝလ္လဘမတ္တံ အညော ကောစိ ဂုဏဝိသေသော နတ္ထိ ရာဇဂုရုဘာဝတ္ထာယ, ယထာ ဗျဂ္ဃာ ရုက္ခဂစ္ဆလတာဒိပ္ပဋိစ္ဆန္နေ ဒုဂ္ဂဋ္ဌာနေ နိသိန္နေ မိဂေ ခုဒ္ဒကတ္တာ ဒုဗ္ဗလေပိ ဂဏှေတုံ န သက္ကောန္တိ, ဧဝမေဝ တေ ဧကံသိကတ္ထေရေ [Pg.136] ရာဇာနံ နိဿာယ ဌိတေ ဂန္ထေသု အနာဂတတ္တာ ဒုဗ္ဗလေပိ ဝါဒဝသေန အဘိဘဝိတုံ န သက္ခိံသု. တေနေဝ ပရသေနာယ ဗလဝတံ ဇာနိတွာ နိပစ္စကာရံ ဒဿေတွာ ဝေရံ သမေတွာ နိသိန္နော ပဏ္ဍိတယောဓောဝိယ ဝါဒံ နိဋ္ဌံ အပ္ပာပေတွာယေဝ ပါရုပနဂဏာ နိသီဒိံသူတိ. वे चारों स्थविर पालि, अट्ठकथा, टीका और अन्य ग्रंथों में कुशल नहीं थे। राजगुरु होने के लिए राजप्रिय होने के अतिरिक्त उनमें और कोई विशेष गुण नहीं था। जैसे बाघ वृक्षों, झाड़ियों और लताओं आदि से ढके हुए दुर्गम स्थान में बैठे मृगों को, उनके छोटा और दुर्बल होने पर भी पकड़ नहीं पाते, वैसे ही वे (चारों स्थविर) राजा के आश्रय में स्थित उन एकांसिक स्थविरों को, ग्रंथों में (प्रमाण) न होने के कारण दुर्बल होने पर भी, वाद के द्वारा पराजित नहीं कर सके। इसीलिए, शत्रु सेना के बल को जानकर, विनम्रता दिखाकर और वैर को शांत कर बैठे हुए किसी विद्वान योद्धा की तरह, वाद को बिना किसी निष्कर्ष पर पहुँचाए ही पारुपन गण के लोग बैठ गए। ကလိယုဂေ ပန ပဉ္စနဝုတာဓိကေ ဝဿသဟဿေ သမ္ပတ္တေ တဿ ပုတ္တော မဟာရာဇာဓိပတိ နာမ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. ပစ္ဆာ ပန ကာလေ တေရသာဓိကေ သတေ ဝဿသဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ ရာမညရဋ္ဌိနော ရာဇာ တံ အဘိဘဝိတွာဝ အနီတတ္တာ ပတ္တဟံသာဝတီတိ ပါကဋံ အဟောသိ. कलियुग के एक हजार पचानवे (1095) वर्ष बीतने पर, उनके पुत्र महाराजाधिपति नामक राजा ने राज्य किया। बाद के समय में, एक हजार एक सौ तेरह (1113) वर्ष बीतने पर, रामण्य राष्ट्र के राजा ने उन्हें पराजित कर ले जाने के कारण वह 'पत्तहंसावती' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। တဿ ရညော ကာလေ ကုခနနဂရေ ဇာလယုတ္တ ဂါမတော ဉာဏဝရံ နာမ ထေရံ အာနေတွာ အာစရိယဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. သော ပန ထေရော ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု အတိဝိယ ဆေကော. သုဓမ္မသဘာယံ ပရိယတ္တိဝါစကာနံ သောတာရာနံ အတ္ထာယ အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟပ္ပကရဏဿ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထံ ပဌမံ အကာသိ. တတော ပစ္ဆာ အဋ္ဌသာလိနိယံ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထံ သုရာဝိနိစ္ဆယဉ္စ အကာသိ. တတော ပစ္ဆာ တေန ရညာ ယာစိတော အဘိဓာနပ္ပဋီပိကာယ အတ္ထံ မရမ္မဘာသာယ ယောဇေသိ. ရညော နာမလဉ္ဆံ ဆန္ဒောလင်္ကာရသဒ္ဒနေတ္တိဝိဒဂ္ဂဒဏ္ဍီဗျဉ္ဇီနနယေဟိ အလင်္ကရိတွာ ရာဇာဓိရာဇနာမတ္ထပ္ပကာသိနိံ နာမ ဂန္ထမ္ပိ အကာသိ. उस राजा के समय में, कुखन नगर के जालयुक्त ग्राम से ज्ञानवर नामक स्थविर को लाकर आचार्य के पद पर स्थापित किया गया। वे स्थविर पालि, अट्ठकथा, टीका और अन्य ग्रंथों में अत्यंत कुशल थे। उन्होंने सुधर्मा सभा में पर्यति (शास्त्र) पढ़ने वाले श्रोताओं के लाभ के लिए सबसे पहले 'अभिधम्मत्थसंगह' प्रकरण का 'गण्ठिपदत्थ' (कठिन पदों की व्याख्या) रचा। उसके बाद 'अट्ठसालिनी' का 'गण्ठिपदत्थ' और 'सुराविनिश्चय' की रचना की। तत्पश्चात, उस राजा द्वारा प्रार्थना किए जाने पर उन्होंने 'अभिधानप्पदीपिका' का अर्थ म्यांमार (मरम्म) भाषा में संयोजित किया। राजा के नाम की मुहर को छंद, अलंकार, सद्दनीति, विदग्धमुखमंडन और दण्डी के व्यञ्जन नियमों से अलंकृत कर 'राजाधिराजनामत्थप्पकासिनी' नामक ग्रंथ की भी रचना की। ရာဇာ ဟတ္ထိသာလနာမကေ ဒေသေ ကာရာပိတဂေဟံ ဘိန္ဒိတွာ သတပ္ပမာဏေ ဝိဟာရေ ကာရာပေတွာ သဗ္ဗေသမ္ပိ ဝိဟာရာနံ ကိတ္တိဇေယျဝါသဋ္ဌာပနန္တိ နာမာနိ ပညာပေတွာ တဿေဝ ထေရဿ အဒါသိ. ဝိဟာရနာမေနေဝ စ ထေရဿာပိ တံသမညာ အဟောသိ. राजा ने हस्तिशाल नामक प्रदेश में बने हुए घरों को तुड़वाकर सौ की संख्या में विहार बनवाए और उन सभी विहारों का नाम 'कीर्तिजयवासस्थापन' रखकर उन्हें उसी स्थविर को दान कर दिया। विहार के नाम से ही उन स्थविर की भी वही संज्ञा (नाम) हो गई। တသ္မိဉ္စ ကာလေ အကျကရညော ပိတုရညော စ ကာလေ တေသံ [Pg.137] ဒွိန္နံ ဂဏာနံ ဝိဝါဒဝသေန အဝိပ္ပကတဝစနံ ပုန ဝိဝါဒဿ ဝူပသမနတ္ထာယ အတ္တနော အတ္တနော ဝါဒံ ကထာပေသိ. ပါရုပနဂဏေ သော ထေရော ပဓာနော ဟုတွာ ဧကံသိကဂဏေ ပန ပါသံသတ္ထေရော ပဓာနော ဟုတွာ ယထာယုဒ္ဓံ အကာသိ. အထ ရာဇာ အတိဝိယ ရာဇဝလ္လဘံ ဇေယျဘူမိသုဝဏ္ဏဝိဟာရဝါသိတ္ထေရံ တေသံ ဝါဒဿ ဝိနိစ္ဆိန္ဒနတ္ထာယ ဝိနယစရေဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. उस समय, अक्यक राजा और उनके पिता राजा के काल में उन दोनों गणों के विवाद के कारण जो वचन अनिर्णीत रह गए थे, उस विवाद को पुनः शांत करने के लिए उन्होंने अपना-अपना पक्ष कहलवाया। पारुपन गण में वे स्थविर प्रधान हुए और एकांसिक गण में पासंस स्थविर प्रधान होकर युद्ध (शास्त्रार्थ) की तरह वाद किया। तब राजा ने अपने अत्यंत प्रिय जयभूमिसुवर्णविहार के निवासी स्थविर को उनके विवाद का निर्णय करने के लिए 'विनयचर' के पद पर नियुक्त किया। ကိဉ္စာပိ သော ပန ထေရော ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု ထောကံယေဝ ဇာနကတ္တာ ပရိယတ္တိကောဝိဒေသု အဗ္ဗောဟာရိကောယေဝ အဟောသိ, ရာဇဝလ္လဘတ္တာ ပန ရာဇာ ယထာဘူတံ အဇာနိတွာ ဝိနယဓရဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. ယထာ ပန အယံ ပုရတ္ထိမဒိသာ, အယံ ပန ပစ္ဆိမဒိသာဘိ ဧဝမာဒိနာ ဒိသာဝဝတ္ထာနမတ္တံယေဝ ကာတုံ သမတ္ထံ နင်္ဂလကောဋိယာ သံဝဍ္ဎန္တံ ပရိသုံ ရာဇာဂါရေ ဓမ္မဝိနိစ္ဆကာမပစ္စဋ္ဌာနေ ဌပေတိ, ဧဝမေဝ ရာဇာ အယံ ဤဒိသော အယံ ဤဒိသောတိ အဇာနိတွာ ဝိနယဓရဋ္ဌာနေ ဌပိတတ္တာ သော ဇေယျဘူမိသုဝဏ္ဏဝိဟာရဝါသိတ္ထေရော တေသံ ဒွိန္နံ ပက္ခာနံ ဒွီသု ဝါဒေသု အယံ ဘူတော အယံ အဘူတောတိ ဝတ္တုံ န သက္ကာ, အဒွါရဃရေ ပဝိဋ္ဌကာလေဝိယ တဒါ အဟောသိ. သေယျထာပိ နာမ မဟိသော အတ္တနော သမီပေ ဌတွာ ဒေဝဂီတံ ဂါယိတွာ ဒေဝဝီဏံ ဝါဒေန္တဿ ဒေဝဂန္ဓဗ္ဗဿ ဝေဠုသလာကံ ပဟရန္တဿ စ ဂါမဒါရကဿ သဒ္ဒေသု ကိဉ္စိ ဝိသေသံ န ဇာနာတိ, ဧဝမိဒံ သမ္ပဒံ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. အထ ရာဇာ မမ ဝိဇိတေ ယေယေဘိက္ခူ ယံယံဣစ္ဆန္တိ, တေတေဘိက္ခူ တံတံစရိတွာ ယထာကမ္မံ နိသီဒန္တူတိ ရာဇလေခနံ ဌပေသိ. တေသံ ဝိဝါဒေါ တဒါ န ဝူပသမိ. यद्यपि वह स्थविर पालि, अट्ठकथा, टीका और अन्य ग्रन्थों में अल्पज्ञ होने के कारण शास्त्र-विद्वानों के बीच नगण्य ही था, किन्तु राजा का प्रिय होने के कारण राजा ने यथार्थ को न जानते हुए उसे विनयधर के पद पर स्थापित कर दिया। जैसे कोई राजा हल की नोक से जीवन-यापन करने वाले किसी ऐसे व्यक्ति को, जो केवल पूर्व दिशा और पश्चिम दिशा आदि दिशाओं का निर्धारण करने में ही समर्थ हो, राजभवन में धर्म-विनिर्णय की इच्छा से निर्णायक के पद पर स्थापित कर दे, वैसे ही राजा ने 'यह ऐसा है, वह वैसा है' यह न जानते हुए उसे विनयधर के पद पर स्थापित किया, इसलिए जेय्यभूमि सुवर्णविहार निवासी वह स्थविर उन दोनों पक्षों के दो वादों में 'यह सत्य है, यह असत्य है' कहने में समर्थ नहीं हुआ; उस समय उसकी स्थिति वैसी ही थी जैसे किसी द्वारहीन घर में प्रवेश करने पर होती है। जैसे कोई भैंसा अपने समीप खड़े होकर देव-गीत गाते हुए और देव-वीणा बजाते हुए देव-गन्धर्व के शब्दों और बेंत की छड़ी से प्रहार करने वाले गाँव के बालक के शब्दों में कोई विशेष अन्तर नहीं जानता, वैसे ही इसे यहाँ समझना चाहिए। तब राजा ने राज-लेख जारी किया कि 'मेरे राज्य में जो-जो भिक्षु जो-जो चाहते हैं, वे-वे भिक्षु वैसा-वैसा आचरण करते हुए कर्मानुसार निवास करें।' उस समय उनका विवाद शान्त नहीं हुआ। အပရဘာဂေ တေရသာဓိကေ သတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ ရတနပူရနဂရံ ဝိနဿိ. बाद में, एक हजार एक सौ तेरह (१११३) वर्ष बीतने पर रतनपुर नगर नष्ट हो गया। တတော ပစ္ဆာ ဒုတိယေ သံဝစ္ဆရေ ရတနသိခနဂရမာပကော ရာဇာ ရာမညရဋ္ဌိန္ဒဿ ရညော သေနံ ယဝခေတ္တတော စာတကသကုဏံဝိယ [Pg.138] အတ္တနော ပုညနုဘာဝေန မရမ္မရဋ္ဌတော နီဟရိတွာ သကလမ္ပိ ရာမညရဋ္ဌံ အတ္တနော ဟတ္ထဂတံ ကတွာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. उसके बाद दूसरे वर्ष में, रतनसिख नगर के संस्थापक राजा ने रामञ्ञ देश के अधिपति राजा की सेना को, जौ के खेत से चातक पक्षी की भाँति, अपने पुण्य के प्रभाव से मरम्म राष्ट्र से बाहर निकाल दिया और सम्पूर्ण रामञ्ञ राष्ट्र को अपने अधिकार में लेकर शासन किया। တသ္မိဉ္စ ကာလေ သကလမရမ္မရဋ္ဌဝါသီနံ စိတ္တံ ပသာဒေသိ, ယထာ နာမ သူရိယာတပေန မိလာယန္တာနံ ကုမုဒါနံ အနောတတ္တောဒကေန သိဉ္စိတွာ ဟရိတတ္တံ ပါပေတိ, ဧဝမေဝ ရာမညရဋ္ဌိန္ဒဿ သေနာဗလာတပေဟိ ဒုက္ခပ္ပတ္တာနံ မရမ္မရဋ္ဌဝါသီနံ ဂဟဋ္ဌာနဉ္စေဝ ဘိက္ခူနဉ္စ အတ္တနော ပုညာနောတတ္တောဒကေန ဆိဉ္စိတွာ ကာယိကစေတသိကဝသေန ဒုဝိဓမ္ပိ သုခံ ဥပ္ပာဒေသိ. उस समय उसने समस्त मरम्म राष्ट्र के निवासियों के चित्त को प्रसन्न किया; जैसे सूर्य के ताप से कुम्हलाते हुए कुमुदों को अनवतप्त झील के जल से सींचकर हरा-भरा कर दिया जाता है, वैसे ही रामञ्ञ देश के अधिपति की सेना के बल रूपी ताप से दुःख प्राप्त मरम्म राष्ट्र के निवासियों—गृहस्थों और भिक्षुओं—को अपने पुण्य रूपी अनवतप्त जल से सींचकर कायिक और चैतसिक दोनों प्रकार का सुख प्रदान किया। သကလမရမ္မရဋ္ဌဝါသိနော စ အယံ အမှာကံ ရာဇာ ဗောဓိသတ္တောတိ ဝေါဟာရိံသု. အထ ဧကသ္မိံ မာသေ စတူသု ဥပေါသထဒိဝသေသု ဘိက္ခုသံဃံ နိမန္တေတွာ အန္တေပုရေ ပဝေသေတွာ ပိဏ္ဍပါတေန ဘောဇေသိ. ရာဇောရောဓာမစ္စေဟိ သဒ္ဓိံ ဥပေါသထံ ဥပဝသိ. သဗ္ဗေသမ္ပိ ရာဇောရောဓာမစ္စာနံ ဂုဏတ္တယပါဌံ သဟ အတ္ထယောဇနာနယေန ဝါစဂ္ဂတံ ကာရာပေသိ. समस्त मरम्म राष्ट्र के निवासियों ने 'यह हमारे राजा बोधिसत्व हैं' ऐसा कहना आरम्भ किया। तब उसने एक मास के चारों उपोसथ दिनों में भिक्षु-संघ को निमन्त्रित कर अन्तःपुर में प्रवेश कराकर पिण्डपात से भोजन कराया। राजा ने अन्तःपुर की स्त्रियों और अमात्यों के साथ उपोसथ व्रत का पालन किया। उसने सभी अन्तःपुर की स्त्रियों और अमात्यों को अर्थ-योजना की विधि के साथ 'गुणत्रय' का पाठ कण्ठस्थ कराया। အထ ဗေလုဝဂါမဝါသီယသတ္ထေရံ အနေတွာ အတ္တနော အာစရိယဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. မဟာအတုလယသဓမ္မရာဇဂုရူတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ အဒါသိ. တတော ပဋ္ဌာယ ပန အတုလတ္ထေရောတိ နာမေန ပါကဋော အဟောသိ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ ပါရုပနဂဏပက္ခာပလိဏဂါမဝါသီသုဇာတတ္ထေရာဒယော သာမဏေရာနံ ဂါမပ္ပဝေသနကာလေ စီဝရံ ပါရုပိတွာ ပဝိသိတဗ္ဗန္တိ အက္ခရံ လိခိတွာ ရညော သန္တိကံ သန္ဒေသပဏ္ဏံ ပဝေသေတိ. तब उसने बेलुवग्राम निवासी यश स्थविर को लाकर अपने आचार्य के पद पर स्थापित किया। उन्हें 'महाअतुलयशधम्मराजगुरु' की उपाधि भी प्रदान की। तब से वे 'अतुल स्थविर' के नाम से प्रसिद्ध हुए। उस समय पारुपण गण के पलिणग्राम निवासी सुजात स्थविर आदि ने 'सामणेरों को गाँव में प्रवेश करते समय चीवर ओढ़कर प्रवेश करना चाहिए' ऐसा लिखकर राजा के पास सन्देश-पत्र भेजा। အထ ဧကံသိကဂဏပက္ခာပိ အတုလတ္ထေရာဒယော ပုဗ္ဗေသံ ရာဇူနံ ကာလေ အဓိကရဏံ ဝူပသမိ, ဣဒါနိ ဝူပသမိတကမ္မံ ပုန န ဥပ္ပာဒေတဗ္ဗန္တိ လေခနံ လိခိတွာ ရညော သန္တိကံ ပေသေသိ. तब एकंसिक गण के अतुल स्थविर आदि ने भी 'पूर्व राजाओं के समय में इस विवाद का निपटारा हो चुका है, अब निपटाए गए कार्य को पुनः उत्पन्न नहीं करना चाहिए' ऐसा लेख लिखकर राजा के पास भेजा। အထ ရာဇာ ဒွိန္နံ ပက္ခာနံ သကသကဝါဒံ ကထေတုကာမောပိ [Pg.139] ဣဒါနိ ရာဇပ္ပဋိသံယုတ္တံ ကမ္မံ ဗဟု အတ္ထိ, တိဋ္ဌသု တာဝ သာသနပ္ပဋိသံယုတ္တံ ကမ္မံ, ရာဇပ္ပဋိသံယုတ္တမေဝ ကမ္မံ ပဌမံ အာရဘိဿာမိ, ပစ္ဆာ သာသနပ္ပဋိသံယုတ္တံ ကမ္မံ ကရိဿာမီတိ ရာဇလေခနံ ဌပေသိ. အပရဘာဂေ ပန ရာဇာ ဧဝံ အာဏံ ဌပေသိ,-ဣဒါနိ မမ ဝိဇိတေ သဗ္ဗေပိ ဘိက္ခူ မမ အာစရိယဿ မတိံ အနုဝတ္တိတွာ စရန္တူတိ. तब राजा ने, यद्यपि वह दोनों पक्षों के अपने-अपने मतों को सुनना चाहता था, यह राज-लेख जारी किया—'अभी राज-सम्बन्धी कार्य बहुत हैं, शासन-सम्बन्धी कार्य अभी रहने दें, पहले मैं राज-सम्बन्धी कार्य ही आरम्भ करूँगा, बाद में शासन-सम्बन्धी कार्य करूँगा।' किन्तु बाद में राजा ने यह आज्ञा दी—'अब मेरे राज्य में सभी भिक्षु मेरे आचार्य के मत का अनुसरण करते हुए आचरण करें'। အထ ပါရုပနဂဏဘိက္ခူပိ ဧကံသိကဂဏံ အနုဝတ္တေသုံ ရညော အာဏာဝသေန. သဟဿောရောဓဂါမေ ပန ဒွေ မဟာထေရာ အတ္တနော ပရိသံ ပါရုပနဝသေနေဝ ဂါမပ္ပဝေသနဝတ္တံ ပရိပူရိတဗ္ဗန္တိ ဩဝဒိတွာ နိသီဒိံသု. तब पारुपण गण के भिक्षुओं ने भी राजा की आज्ञा के कारण एकंसिक गण का अनुसरण किया। किन्तु सहस्सरोध ग्राम में दो महास्थविरों ने अपने शिष्यों को यह उपदेश देकर कि 'पारुपण की विधि से ही गाँव में प्रवेश करने के व्रत का पालन करना चाहिए', वे वहीं रहे। တဒါ ရညော အာစရိယော ယသတ္ထေရော တမတ္ထံ သုတွာတေ ပက္ကောသာပေသိ. တေ စ အာဂန္တွာ နဂရံ သမ္ပတ္တကာလေ ဧကော ဥပါသကော ပသန္နော ဟုတွာ တေသံ ထေရာနံ ပိဏ္ဍပါတေန ဥပဋ္ဌဟိ. အထ အတုလတ္ထေရော တေ မဟာထေရေ ဒူရဋ္ဌာနတော ဝါလုကံ အာနေတွာ တဿ ဥပါသကဿ ဂေဟသမီပေ ဩကိရာပေသိ. ဣဒံ ဝိနယဓမ္မဿ အနနုလောမဝသေန စရန္တာနံ ဒဏ္ဍကမ္မန္တိ ကောလာဟလမ္ပိ ဥပ္ပာဒေသိ. အထ တေသံ ဝါလုကံ အာဟရန္တာနံယေဝ အညမညံ သလ္လပေသုံ,-ဣဒါနိ ဘန္တေ ဝိနယဓမ္မာနုလောမဝသေန အာစရန္တာနံ အမှာကံ ဤဒိသံ ကမ္မံ အသာရုပ္ပံ, အဟော အစ္ဆရိယဓမ္မော လောကောတိ ဧကော ထေရော အာဟ. အထ ပန ဧကော ထေရော ဧဝမာဟ,-ဣဒါနိ အာဝုသော လောကပါလာ ဒေဝါ ဤဒိသံ အဓမ္မကမ္မံ ဒိသွာယေဝ အဇ္ဈုပေက္ခိတွာ အပ္ပောဿုကာ နိသီဒိတုံ န သက္ကာ, ဣဒါနိ လောကပါလာ ဒေဝါ ပမဇ္ဇိတွာ နိသီဒန္တိ မညေတိ. तब राजा के आचार्य यश स्थविर ने उस बात को सुनकर उन्हें बुलवाया। उनके आने पर और नगर पहुँचने पर, एक उपासक ने प्रसन्न होकर उन स्थविरों की पिण्डपात से सेवा की। तब अतुल स्थविर ने उन महास्थविरों से दूर स्थान से बालू मँगवाकर उस उपासक के घर के समीप डलवाई। 'यह विनय-धर्म के प्रतिकूल आचरण करने वालों के लिए दण्ड-कर्म है'—ऐसा कहकर उन्होंने कोलाहल भी मचाया। तब बालू लाते हुए ही उन्होंने आपस में चर्चा की—'भन्ते! विनय-धर्म के अनुसार आचरण करने वाले हमारे लिए इस प्रकार का कार्य अनुचित है, अहो! संसार का स्वभाव भी आश्चर्यजनक है', ऐसा एक स्थविर ने कहा। तब दूसरे स्थविर ने ऐसा कहा—'आयुष्मन्! अब लोकपाल देवता इस प्रकार के अधर्म-कार्य को देखकर उपेक्षा करते हुए उदासीन होकर नहीं बैठ सकते, मुझे लगता है कि अब लोकपाल देवता प्रमाद में पड़कर बैठे हैं'। တသ္မိံယေဝ ခဏေ ဝေဂေန မေဃော ဥဋ္ဌဟိတွာ အတုလတ္ထေရဿ ဝိဟာရေ ရာဇဂေဟေ စ ဧကက္ခဏေ အသနိယော နိပတိံသု. ဧဝံ သမာနောပိ သော ထေရော အတိမာနထဒ္ဓတာယ သတိံ န လဘိ. उसी क्षण वेग से मेघ उमड़ आए और अतुल स्थविर के विहार तथा राजभवन पर एक ही क्षण में बिजलियाँ गिरीं। ऐसा होने पर भी वह स्थविर अपने अति-अभिमान की जड़ता के कारण सचेत नहीं हुआ। ပုန [Pg.140] ရာဇာ ဣဒါနိ မမ ဝိဇိတေ သဗ္ဗေပိ ဘိက္ခူ မမ အာစရိယဿ မတိံ အနုဝတ္တန္တိ ဝါ မာ ဝါတိ အမစ္စေ ပုစ္ဆိ. အမစ္စာပိ ဧဝံ ရညော အာရောစေသုံ,-ဣဒါနိ မဟာရာဇ ကုခနနဂရေ နီပဂါမေ နိသိန္နော ဧကော မဟာထေရော မုနိန္ဒဃောသော နာမ အတ္ထိ, သော ပါရုပနဝသေန အတ္တနော ပရိသံ ဩဝါဒေတွာ ဗဟုဂုဏံ ဥပ္ပာဒေတွာ နိသီဒတီတိ. फिर राजा ने मंत्रियों से पूछा—क्या अब मेरे राज्य में सभी भिक्षु मेरे आचार्य के मत का अनुसरण करते हैं या नहीं? मंत्रियों ने भी राजा को इस प्रकार सूचित किया—महाराज, इस समय कुखन नगर के नीप गाँव में मुनिन्दघोस नाम के एक महाथेर रहते हैं, वे ओढ़ने की विधि (पारुपण) के विषय में अपने परिषद को उपदेश देकर और बहुत गुण उत्पन्न कर वहाँ निवास कर रहे हैं। အထ ရာဇာ ဧဝမာဟ,-တံ ပက္ကောသေတွာ သုဓမ္မသသာယံ မဟာထေရေ သန္နိပါဘာပေတွာ တဿ ထေရဿ ဝိနယ ပဏ္ဏတ္တိံ ယထာဘူတံ အဇာနန္တဿ ယထာဘူတံ သဘာဝံ ဒဿေတွာ ဩဝါဒေန္တူတိ. तब राजा ने ऐसा कहा—उन्हें बुलाकर सुधम्मा सभा में महाथेरों को एकत्रित करें और उस थेर को, जो विनय प्रज्ञप्ति को यथार्थ रूप में नहीं जानते, यथार्थ स्वभाव दिखाकर उपदेश दें। အထ အမစ္စာ တထာ အကံသု. မဟာထေရာ စ သုဓမ္မသဿယံ သန္နိပတိတွာ တံ ပက္ကောသေတွာ ဩဝဒိံသု. တေသု ပန မဟာထေရေသု ဧကော ထေရော ဘူပါလဿ သံဃရညော စ မုခံ ဩလောကေတွာ ဘဂဝတော ပန သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ မုခံ အနောလောကေတွာ မုနိန္ဒဃောသတ္ထေရံ ဧဝမာဟ,- ဣဒါနိ အာဝုသော ဣမသ္မိံ မရမ္မရဋ္ဌေ သဗ္ဗေပိ ဘိက္ခူ ဘူပါလဿ သံဃဿ ရညော စ အာဏံ အနုဝတ္တိတွာ ဧကံသိကာယေဝ အဟေသုံ, တွံယေဝ ဧကော သဒ္ဓိံ ပရိသာယ ပါရုပနဝတ္ထံ စရိတွာ နိသီဒသိ, ကသ္မာ ပန တွံ မာနထဒ္ဓေါ ဟုတွာ ဤဒိသံ အနာစာရံ အဝိဇဟိတွာ တိဋ္ဌသီတိ. तब मंत्रियों ने वैसा ही किया। महाथेरों ने सुधम्मा सभा में एकत्रित होकर उन्हें बुलाकर उपदेश दिया। उन महाथेरों में से एक थेर ने राजा और संघराज के मुख की ओर देखते हुए, किन्तु भगवान सम्यक्सम्बुद्ध के मुख की ओर न देखते हुए, मुनिन्दघोस थेर से इस प्रकार कहा—आयुष्मान, इस समय इस मराम्र राष्ट्र में सभी भिक्षु राजा और संघराज की आज्ञा का अनुवर्तन करते हुए एक कंधे पर चीवर धारण करने वाले (एकांसिक) ही हो गए हैं, केवल तुम ही अपनी परिषद के साथ ओढ़ने के वस्त्र (पारुपण) का आचरण करते हुए रहते हो, तुम क्यों मान से स्तब्ध होकर ऐसे अनाचार को बिना छोड़े स्थित हो? အထ မုနိန္ဒဃောသတ္ထေရော တဿ ထေရဿ မုခံ ဥဇုကံ ဩလောကေတွာ ဧဝမာဟ,- တွံ လဇ္ဇီပေသလော သိက္ခာကာမောတိ ပုဗ္ဗေ မယာ သုတပုဗ္ဗော, ဤဒိသော ပန ပုဂ္ဂလော ဤဒိသံ ဝစနံ ဝတ္တုနံ ယုတ္တော,ဤဒိသဿ ဟိ ပုဂ္ဂလဿ ဤဒိသံ ဝစနံ အဿာရုပ္ပံ, သစေ တွံ အယံ အပ္ပပုညော နိတ္တေဇော အနာထောတိ မံ မညိတွာ အဂါရဝဝသေန ဝတ္တုံ ဣစ္ဆေယျာသိ, ဧဝံ သန္တေပိ မမာစရိယဿ မုခံ ဩလောကေတွာ မမာစရိယဿ ဂုဏံ ဇာနိတွာ တဿ သိဿောယန္တိ အနုဿရိတွာ ဤဒိသံ ဝစနံ အဓမ္မိကံ ဝတ္တုံ န သက္ကာတိ. तब मुनिन्दघोस थेर ने उस थेर के मुख की ओर सीधे देखते हुए इस प्रकार कहा—आप लज्जावान, शीलवान और शिक्षा के प्रेमी हैं, ऐसा मैंने पहले सुना था; ऐसा व्यक्ति ऐसा वचन कहने के योग्य है, किन्तु ऐसे व्यक्ति के लिए ऐसा वचन अशोभनीय है। यदि आप मुझे अल्प-पुण्य वाला, निस्तेज और अनाथ मानकर अनादरवश बोलना चाहते हैं, तो भी मेरे आचार्य के मुख की ओर देखकर, मेरे आचार्य के गुणों को जानकर और 'यह उनका शिष्य है' ऐसा स्मरण कर, ऐसा अधार्मिक वचन कहना संभव नहीं है। အထ [Pg.141] သော ထေရော တံ ပုစ္ဆိ,-ကော ပန တဝါစရိယောတိ. အထ သုခမ္မသဘာယံ ဌပိတံ ဗုဒ္ဓရူပံ ဝဒ္ဒိတွာ အယံ မမာစရိယောတိ အာဟ. မမာသရိယောတိ ဝတွာ ပန ဘိက္ခုသံဃမဇ္ဈေ ဥဋ္ဌဟိတွာ ဧကံသံ ဥတ္တရာသင်္ဂံ ကတွာ ဥက္ကုဋိကံ နိသီဒိတွာ အဉ္ဇလိံ ပဂ္ဂဟေတွာ အဟံ ဘန္တေ ယာဝ ဇီဝိတပရိယောသာနာ မမ ဇီဝိတံယေဝ ပရိစ္စဇိဿာမိ, ဘဂဝတော ပနတိ လောကဂ္ဂဿ သိက္ခာပဒံ န ဝိဇဟိဿာမီတိ အာရောစေသိ. तब उस थेर ने उनसे पूछा—तो तुम्हारा आचार्य कौन है? तब सुधम्मा सभा में स्थापित बुद्ध प्रतिमा की वंदना कर उन्होंने कहा—यह मेरे आचार्य हैं। 'यह मेरे आचार्य हैं' ऐसा कहकर भिक्षु संघ के मध्य उठकर, उत्तरासंग को एक कंधे पर कर, उकड़ूँ बैठकर और अंजलिबद्ध होकर उन्होंने निवेदन किया—भन्ते, मैं जीवन के अंत तक अपने जीवन का ही त्याग कर दूँगा, किन्तु लोक-अग्र भगवान के शिक्षापद का त्याग नहीं करूँगा। အထ ရာဇာ တမတ္ထံ သုတွာ မာနထဒ္ဓေါ ဧသော မမ ဝိဇိတေ နိသီဒါပေတုံ ဝဋ္ဋတိ, ရဋ္ဌန္တရံ ပဗ္ဗာဇေတဗ္ဗောတိ ရာဇာဏာယ ရဋ္ဌန္တရံ ပေသေသိ. तब राजा ने उस बात को सुनकर कहा—यह मान से स्तब्ध व्यक्ति मेरे राज्य में रहने योग्य नहीं है, इसे देश निकाला दिया जाना चाहिए और राजा की आज्ञा से उसे दूसरे देश भेज दिया। ရာဇပုရိသာ စ တံ ပက္ကောသေတွာ ရဋ္ဌန္တရံ အာနေသိ. ဗဟင်္ဂံ နာမ ဒေသံ ပတွာ ဗဟင်္ဂနာယကော ပုရိသော ရာဇပုရိသာနံ လဉ္ဇံ ဒတွာ ဧဝမာဟ,- အယံ ပန ဘောန္တော မရမ္မရဋ္ဌဿ ပရိယန္တပ္ပဒေသော, ဣဓေဝ ဌပေတွာ တုမှေ နိဝတ္တထာတိ. राजपुरुषों ने उन्हें बुलाकर दूसरे देश ले गए। बहंग नामक स्थान पर पहुँचकर, बहंग के नायक ने राजपुरुषों को रिश्वत देकर कहा—महानुभावों, यह मराम्र राष्ट्र का सीमावर्ती प्रदेश है, इन्हें यहीं छोड़कर आप लौट जाएँ। ရာဇ ပုရိသာပိ လဉ္ဇံ ဂဟေတွာ တတ္ထေဝ ဌပေတွာ နိဝတ္တိံသု. ထေရောပိ စတူဟိ ဒိသာဟိ အာဂတာနံ ဘိက္ခုသာမဏေရာနံ ပါရုပနဝသေန ဩဝါဒံ ဒတွာ ပရိယတ္တိံ ဝါစေတွာ တတ္ထ နိသီဒိ. အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟဂန္ထဿ အတ္ထယောဇနမ္ပိ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. राजपुरुषों ने भी रिश्वत लेकर उन्हें वहीं छोड़ दिया और लौट गए। थेर भी चारों दिशाओं से आए भिक्षुओं और श्रामणेरों को ओढ़ने की विधि (पारुपण) के विषय में उपदेश देते हुए और पर्यत्ति (शास्त्र) पढ़ाते हुए वहाँ रहने लगे। उन्होंने अभिधम्मत्थसंग्रह ग्रंथ की अर्थयोजना भी मराम्र भाषा में की। အပရဘာဂေ ရာဇာ တမတ္ထံ သုတွာ ဣဒါနိ သော ထေရော မမ ဝိဇိတပရိယန္တေယေဝ နိသီဒိတွာ အမှေဟိ အနိစ္ဆိတံ နိဝါရိတံ ကမ္မံ ကတွာ နိသီဒိ, တံ ပက္ကောသထာတိ အာဟ. बाद में राजा ने उस बात को सुनकर कहा—अब वह थेर मेरे राज्य की सीमा पर ही रहकर हमारे द्वारा अनचाहे और निषिद्ध कार्य को करते हुए रह रहा है, उसे बुलाओ। ရာဇဒူတာ စ တတ္ထ ဂန္တွာ ပက္ကောသိံသု. ထေရော စ ဣဒါနိ မံ ရာဇာ မာရေတုကာမောတိ မညိတွာ သိက္ခံ ပစ္စက္ခိတွာ ဂိဟိဝတ္ထံ နိဝါသေတွာ တေဟိ သဒ္ဓိံ အာဂစ္ဆိ. နဂရံ ပန အာဂန္တွာ ပတ္တကာလေ ရညော သန္တိကံ အာနေသိ. राजदूतों ने वहाँ जाकर उन्हें बुलाया। थेर ने यह सोचकर कि 'अब राजा मुझे मारना चाहता है', शिक्षा का प्रत्याख्यान कर दिया, गृहस्थ के वस्त्र धारण किए और उनके साथ चल दिए। नगर पहुँचने पर उन्हें राजा के पास लाया गया। အထ ရာဇာ ဧဝမာဟ,-တွံ ဘိက္ခု ဟုတွာ ဂဏံ ဝဍ္ဎာပေတွာ နိသီဒသီတိ မယာ သုတံ, ကသ္မာ ပနိဒါနိ ဂိဟိ ဘဝသီတိ. သစေ [Pg.142] တွံ မဟာရာဇ မံ မာရေတုကာမော ပက္ကောသေယျာသိ, ဧဝံ သတိ ယဒိ သိက္ခံ အပ္ပစ္စက္ခာယ ဌိတံ မံ မာရေယျာသိ, တဝ ဘာရိယံ ကမ္မံ ဘဝိဿတီတိ မနသိကရိတွာ တဝ ကမ္မဿ အဘာရိယတ္ထာယ သိက္ခံ ပစ္စက္ခိတွာ အာဂတောမှိ, သစေ မံ မာရေတုကာမောသိ, မာရေဟီဟိ. ရာဇာ စ တံ ဗန္ဓနာဂါရေ ဌပေတွာ သျာမရဋ္ဌံ ယုဇ္ဈနတ္ထာယဂစ္ဆိ. ယဇ္ဈနတ္ထာယ ပန ဂန္တွာ ပစ္စာဂတကာလေ အန္တရာမဂ္ဂေဝ ဒိဝင်္ဂတော အဟောသီတိ. तब राजा ने इस प्रकार कहा—मैंने सुना है कि तुम भिक्षु होकर समूह को बढ़ाते हुए रह रहे थे, तो अब गृहस्थ क्यों हो गए हो? (उन्होंने उत्तर दिया) महाराज, यदि आप मुझे मारने की इच्छा से बुलाते, और ऐसी स्थिति में यदि आप मुझे शिक्षा का प्रत्याख्यान किए बिना मार देते, तो यह आपके लिए भारी पाप कर्म होता; ऐसा विचार कर आपके कर्म को भारी न होने देने के लिए मैं शिक्षा का प्रत्याख्यान करके आया हूँ, यदि आप मुझे मारना चाहते हैं, तो मार दें। राजा ने उन्हें कारागार में डाल दिया और स्याम राष्ट्र युद्ध के लिए चला गया। युद्ध के लिए जाकर लौटते समय मार्ग में ही उसकी मृत्यु हो गई। ကလိယုဂေ ပန ဒွါဝီသာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ တဿ ဇေဋ္ဌပုတ္တော သိရိပဝရမဟာဓမ္မရာဇာ နာမ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. ရတနသိခနဂရတော သင်္ကမေတွာ ဇေယျပုရံ ဒုတိယံ မာပိတတ္တာ ဇေယျပုရမာပေကော ရာဇာတိပိ တဿ သမညာ အဟောသိ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ မဟာပဗ္ဗတဗ္ဘန္တရနဂရဝါသိံ ဉာဏတ္ထေရံ အာနေတွာ အာစရိယဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. သောကိရ ထေရော ဂမ္ဘီရပညော ဧကသ္မိံ ဒိဝသေ နဝ ဝါ ဒသ ဝါ ဘာဏဝါရေ ဝါစုဂ္ဂတံ ကာတုံ သမတ္ထော အဟောသိ. အဘိနဝေါပသမ္ပန္နကာလေယေဝ ပဒဝိဘာဂဂန္ထံ နျာသသံ ဝဏ္ဏနံ ယမကသံဝဏ္ဏနံ မဟာပဋ္ဌာနသံဝဏ္ဏနဉ္စ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. ရာဇာ မဟာဘူမိရမ္မဏိယဝိဟာရံ နာမ ကာရာပေတွာ တဿေဝ အဒါသိ. ဉာဏာလင်္ကာရမဟာဓမ္မရာဇဂုရူ တိပိ နာမလဉ္ဆံ အဒါသိ. कलियुग के एक हजार एक सौ बाईस वर्ष बीतने पर, उसके ज्येष्ठ पुत्र सिरिपवरमहाधम्मराजा ने राज्य किया। रतनसिख नगर से स्थानांतरित होकर जेय्यपुर को दूसरी बार बसाने के कारण उसे 'जेय्यपुरमापेक' राजा के नाम से भी जाना जाता था। उस समय उसने महापब्बतब्भन्तर नगर के निवासी ज्ञान थेर को लाकर आचार्य के पद पर स्थापित किया। वे थेर गंभीर प्रज्ञा वाले थे और एक दिन में नौ या दस भाणवारों को कंठस्थ करने में समर्थ थे। उन्होंने अपनी नई उपसंपदा के समय ही पदविभाग ग्रंथ, न्यास-संवरण, यमक-संवरण और महापट्ठान-संवरण की रचना मराम्र भाषा में की। राजा ने महाभूमिरामणीय विहार बनवाकर उन्हें ही दान दिया। उन्हें 'ज्ञानालंकारमहाधम्मराजगुरु' की उपाधि भी प्रदान की। တသ္မိဉ္စ ကာလေ ပါရုပနဂဏေ ထေရာ ဧဝံ စိန္တေသုံ,- ဣဒါနိ ပန အမှာကံ ပက္ခိကော ထေရော ရညော အာစရိယော အဟောသိ, ဣဒါနိ မယံ ပတိဋ္ဌာနံ လဘာမာတိ. ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ သာမဏေရာနံ ဂါမပ္ပဝေသနကာလေ စီဝရံ ပါရုပေတွာ ပဝိသိတဗ္ဗန္တိ သန္ဒေသပဏ္ဏံ ရညော သန္တိကံ ပဝေသေသိ. အထ အတုလတ္ထေရော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေန ဝူပသမိတံ ကမ္မမိဒန္တိ သန္ဒေသပဏ္ဏံ ရညော သန္တိကံ ပဝေသေသိ. တေနေဝ အညမညံ ပဋိဝစနဝသေန ဒဿေတုံ ဩကာသံ န လဘိံသူတိ. और उस समय पारुपण (दोनों कंधों को ढकने वाले) समूह के स्थविरों ने ऐसा सोचा— "अब हमारे पक्ष के स्थविर राजा के आचार्य हो गए हैं, अब हमें आश्रय प्राप्त होगा।" ऐसा सोचकर उन्होंने राजा के पास एक संदेश पत्र भेजा कि "सामणेरों को गाँव में प्रवेश करते समय चीवर ओढ़कर (दोनों कंधों को ढककर) प्रवेश करना चाहिए।" तब अतुल स्थविर ने राजा के पास यह संदेश पत्र भेजा कि "यह मामला पहले बताए गए तरीके से शांत किया जा चुका है।" इसी कारण से वे एक-दूसरे को प्रतिवचन (उत्तर) देने का अवसर प्राप्त नहीं कर सके। တတော ပစ္ဆာ ကလိယုဂေ ပဉ္စဝီသဝဿာဓိကေ သတေ သဟဿေ [Pg.143] စ သမ္ပတ္တေ တဿ ရညော သိရိပဝရသုဓမ္မမဟာရာဇိန္ဒာဓိပတိ နာမ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. ရတနပူရံ ပန တတိယံ မာပကတ္တာ ရတနပူရမာပကောတိ ဧကဿ ပန ဆဒ္ဒန္တနာဂရာဇဿ သာမိဘူတတ္တာ သေတိဘိန္ဒောတိ စ သမညာ အဟောသိ. စရစ္စ ဂါမဝါသီစန္ဒာဝရံ နာမ ထေရံ အာနေတွာ အတ္တနော အာစရိယဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. သူမိကိတ္တိအတုလံ နာမ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တဿ အဒါသိ. ဇမ္ဗုဒီပအနန္တဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရူတိပိ နာမလဉ္ဆံ အဒါသိ. တဿ ရညော ကာလေ ဧကစ္စေ မနုဿာ ဒိဋ္ဌိဝိပလ္လာသာ အဟေသုံ, တေပိ ပက္ကောသာပေတွာ သမ္မာဒိဋ္ဌိံ ဂဏှာပေသိ. တဿ ပန ရညော ကာလေ ဧကံသိကဂဏံ အဘိဘဝိတုံ ဩကာသံ န လဘိံသူတိ. उसके बाद कलियुग में एक हजार एक सौ पच्चीस वर्ष (1125) बीतने पर, उस राजा के (पुत्र) श्रीप्रवरसुधर्ममहाराजेन्द्राधिपति नामक राजा ने राज्य किया। रत्नपुर को तीसरी बार बसाने के कारण उन्हें 'रत्नपुरमापक' और एक छद्दन्त नागराज (हाथी) के स्वामी होने के कारण 'सेतिभिन्दो' (श्वेत हाथी का स्वामी) के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने चरच्च गाँव के निवासी चन्दावर नामक स्थविर को लाकर अपने आचार्य के पद पर स्थापित किया। उन्होंने सूमिकित्तिअतुल नामक विहार बनवाकर उन्हें दान दिया। उन्हें 'जम्बुदीपअनन्तध्वजमहाधर्मराजगुरु' की उपाधि भी प्रदान की। उस राजा के समय में कुछ लोग दृष्टि-विपर्यास (मिथ्या दृष्टि) वाले हो गए थे, उन्हें भी बुलवाकर उन्होंने सम्यक् दृष्टि ग्रहण करवाई। उस राजा के समय में भी (पारुपण पक्ष वाले) एकंसिक (एक कंधे को खुला रखने वाले) समूह को पराजित करने का अवसर प्राप्त नहीं कर सके। တတော ပစ္ဆာ ကလိယုဂေ အဋ္ဌတိံသာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ တဿ ရညော ပုတ္တော မဟာဓမ္မေ ရာဇာဓိရာဇာ နာမ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. နဂရဿ ဒက္ခိဏဒိသာဘာဂေ ပဉ္စဘူမိကဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ ဇေယျဘူမိဝါသာတုလနာမေန ပညာပေတွာ မာရာဝဋ္ဋနဿ နာမ ထေရဿ အဒါသိ. ဂုဏမုနိန္ဒာဘိသာသနဓဇမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရူတိပိ နာမလဉ္ဆံ အဒါသိ. उसके बाद कलियुग में एक हजार एक सौ अड़तीस वर्ष (1138) बीतने पर, उस राजा के पुत्र महाधर्म राजाधिराज नामक राजा ने राज्य किया। उन्होंने नगर के दक्षिण दिशा में पाँच मंजिला विहार बनवाकर, उसे 'जेय्यभूमिवसअतुल' नाम से प्रसिद्ध कर मारावट्टन नामक स्थविर को दान दिया। उन्हें 'गुणमुनीन्द्राभिशासनध्वजमहाधर्मराजाधिराजगुरु' की उपाधि भी प्रदान की। တသ္မိဉ္စ ကာလေ နန္ဒမာလော နာမ ထေရော စလင်္ဂနဂရဿ ပုရတ္ထိမဒိသာဘာဂေ ဝိဟာရေ နိသီဒိတွာ ဗဟူနံ ဘိက္ခုသာမဏေရာနံ ဂန္ထံ ဝါစေသိ. သာမဏေရာနံ ဂါမပ္ပဝေသနကာလေ ပါရုပနဝတ္တမေဝ ပရိပူရေတွာ ပဝိသိတဗ္ဗံ, ဧကံသိကဝတ္တံ ပန နေဝ ပါဠိယံ န အဋ္ဌကထာယံ န စ ဋီကာသု နာပိ ဂန္ထန္တရေသု ဒိဿတိ, န ဓမ္မာနုလောမန္တိ ဩဝါဒံ အဘိဏှံ အဒါသိ. ပါဠိအဋ္ဌကထာဒီသု အာဂတဝိနိစ္ဆယံ ဒဿေတွာ ဧကမ္ပိဂန္ထံ အကာသိ. और उस समय नन्दमाल नामक स्थविर चलङ्ग नगर के पूर्व दिशा में स्थित विहार में रहकर बहुत से भिक्षुओं और सामणेरों को ग्रंथों का अध्यापन कराते थे। वे निरंतर यह उपदेश देते थे कि "सामणेरों को गाँव में प्रवेश करते समय पारुपण-व्रत (दोनों कंधों को ढकने का नियम) का ही पालन करते हुए प्रवेश करना चाहिए; एकंसिक-व्रत (एक कंधे को खुला रखने का नियम) न तो पालि में, न अट्ठकथा में, न टीकाओं में और न ही अन्य ग्रंथों में दिखाई देता है, और न ही यह धर्म के अनुकूल है।" उन्होंने पालि-अट्ठकथा आदि में आए हुए निर्णयों को दर्शाते हुए एक ग्रंथ की भी रचना की। အထ ဧကံသိကဂဏိကာ ဘိက္ခူ တံ ဂန္ထံ ရညော သန္တိကံ ပဝေသိံသု ဒေါသာဝိကရဏတ္ထာယ. တသ္မိဉ္စ ကာလေ ရာဇာ ဧဝရူပံ သုပိနံ ပဿိ, -သက္ကော ဟိ ဒေဝရာဇာ သေတဝတ္ထံ နိဝါသေတွာ [Pg.144] သေတာလင်္ကာရေဟိ အလင်္ကရိတွာ သေတကုသုမာနိ ပိလန္ဒိတွာ ရညော သန္တိကံ အာဂန္တွာ ဧဝမာဟ,- အပရန္တရဋ္ဌေဟိ မဟာရာဇ နမ္ပဒါနဒီတီရေ ပါဒစေတိယေ ဗဟူနိ တိဏာနိ ဥဋ္ဌဟိတွာ အညမညံ မူလေန မူလံ ခန္ဓေန ခန္ဓံ ပတ္တေန ပတ္တံ သမ္ပန္ဓိတွာ ပဋိစ္ဆာဒေတွာ ဌိတာနိ, တာနိ ပန ပုဗ္ဗရာဇူဟိ ယထာဘူတံ အဇာနန္တေဟိ အဝိသောဓိတာနိ, ဣဒါနိ ပန တယာ ယထာဘူတံ ဇာနန္တေန ပရိသုဒ္ဓံ ကတ္တုကာမေန ဝိသောဓိတဗ္ဗာနိ, တတ္ထစ ဧကော ဘိက္ခု အာဂန္တွာ ဥပဒေသနယံ ဒဿတီတိ. तब एकंसिक समूह के भिक्षुओं ने उस ग्रंथ में दोष निकालने के लिए उसे राजा के पास भेजा। उसी समय राजा ने इस प्रकार का स्वप्न देखा— देवराज शक्र श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, श्वेत अलंकारों से अलंकृत और श्वेत पुष्पों को पहने हुए राजा के पास आए और बोले— "महाराज! अपरान्त राष्ट्र में नम्पदानदी के तट पर स्थित पादचैत्य (चरण-चिह्न) पर बहुत सी घास उग आई है, जो एक-दूसरे से जड़ से जड़, तने से तना और पत्ते से पत्ता जुड़कर उसे ढके हुए खड़ी है। पूर्व के राजाओं ने यथार्थ को न जानते हुए उसे साफ नहीं किया, किन्तु अब यथार्थ को जानने वाले और परिशुद्ध करने की इच्छा रखने वाले आपके द्वारा उसे साफ किया जाना चाहिए; और वहाँ एक भिक्षु आकर आपको उपदेश की विधि दिखाएगा।" ဧဝံ ပန သုပိနံ ပဿိတွာ နန္ဒမာလံ နာမ ထေရံ ပက္ကောသာပေတွာ ရတနပူရနဂရဿ ဧသန္နဋ္ဌာနေ ဥဒကကီဠနတ္ထာယ ကာရာပိတေ ရာဇဂေဟေ ဝသာပေသိ. ऐसा स्वप्न देखकर उन्होंने नन्दमाल नामक स्थविर को बुलवाया और रत्नपुर नगर के ईशान कोण में जल-क्रीड़ा के लिए बनवाए गए राजभवन में उन्हें ठहराया। အထ ထေရော သာမဏေရာနံ ဂါမပ္ပဝေသနကာလေ ပါရုပနဝသေန ပဝိသိတဗ္ဗန္တိ ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေဟိ ရာဇာနံ ဇာနာပေသိ, ယထာ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရော သိရိဓမ္မာသောကရာဇာနံ သမ္မာဝါဒန္တိ. အထ ရာဇာ ပရိစိတ ပါရမီပုညသမ္ဘာရော မဟာဉာဏော ဇာနာသိ,-ပါရုပနဝါဒေါယေဝ ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု အာဂတော, ဧကံသိကဝါဒေါ ပန တေသု ကတ္ထစိပိ န အာဂတောတိ. ဧဝံ ပန ဇာနိတွာ ရညော ဂေဟေ ဒွေ ပက္ခေ ထေရေ သန္နိပါတာပေတွာ အတ္တနော အတ္တနော ဝါဒံ ကထာပေသိ. तब स्थविर ने पालि, अट्ठकथा, टीका और अन्य ग्रंथों के माध्यम से राजा को यह समझाया कि सामणेरों को गाँव में प्रवेश करते समय पारुपण (दोनों कंधों को ढककर) ही प्रवेश करना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे महामोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर ने राजा श्रीधर्माशोक को सम्यक् वाद समझाया था। तब पारमिताओं और पुण्यों के संचय से युक्त महान ज्ञानी राजा ने जान लिया कि— "पारुपण-वाद ही पालि, अट्ठकथा, टीका और अन्य ग्रंथों में आया है, जबकि एकंसिक-वाद उनमें कहीं भी नहीं आया है।" ऐसा जानकर राजा ने अपने भवन में दोनों पक्षों के स्थविरों को एकत्रित करवाया और उनसे अपने-अपने मत को कहने के लिए कहा। အထ ဧကံသိကတ္ထေရော ဧဝမာဟံသု,-တုမှာကံ ပါရုပနဝါဒေါ ကတ္ထ အာဂတောတိ. တဒါ ပါရုပနတ္ထေရာ ပရိမဏ္ဍလံ ပါရုပိဿာမီတိအာဒိနာ နယေန ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု ပါရုပနဝါဒေါ အာဂတောတိ အာဟံသု. တတော ပစ္ဆာ ပါရုပနတ္ထေရာ ဧဝမာဟံသု,-တုမှာကံ ပန ဧကံသိကဝါဒေါ ကတ္ထ အာဂတောတိ. တဒါ တေ ဧကံသိကတ္ထေရာ အဒွါရဃရံ ပဝိဋ္ဌကာလောဝိယ ရတ္တိဘာဂေ မဟာဝနမဂ္ဂေ ဂမနကာလောဝိယ စ ဟုတွာ ကိဉ္စိ ဝတ္တုံ န သက္ကာ. မုခံ နာမ ကထနတ္ထာယ ဘုဉ္ဇနတ္ထာယ ဟောတီတိ [Pg.145] ဝုတ္တတ္တာ ယံ ဝါ တံ ဝါ ဝဒန္တာပိ ရာဇာနံ အာရာဓေတုံ န သက္ခိံသု. तब एकंसिक स्थविरों ने इस प्रकार कहा— "आपका पारुपण-वाद कहाँ आया है?" तब पारुपण स्थविरों ने "परिमण्डलं पारुपिस्सामि" (चारों ओर से गोलाई में ओढूँगा) आदि विधि से बताया कि पारुपण-वाद पालि, अट्ठकथा, टीका और अन्य ग्रंथों में आया है। उसके बाद पारुपण स्थविरों ने पूछा— "आपका एकंसिक-वाद कहाँ आया है?" तब वे एकंसिक स्थविर बिना द्वार वाले घर में प्रवेश करने वाले के समान और रात्रि के समय महावन के मार्ग पर चलने वाले के समान होकर कुछ भी कहने में समर्थ नहीं हुए। "मुख कहने और खाने के लिए होता है"—ऐसा कहे जाने के कारण वे जो कुछ भी बोलते रहे, उससे राजा को संतुष्ट नहीं कर सके। ရာဇာ စ ထေရံ နိဿာယ ဝိနယေ ကောသလ္လတာယ ပါဠိယံ ဤဒိသောယေဝ အာဂတော, အဋ္ဌကထာဒီသု ဤဒိသောယေဝါတိ ဝတွာ တုမှာကံ ဧကံသိကဝါဒေါ ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရေသု န ဒိဿတိ, ဧဝမ္ပိ သမာနာ ကသ္မာ ဤဒိသံ ဝတ္တံ အကံသူတိ ပုစ္ဆိ. အထ တေ ဧကံသိကတ္ထေရာ စတုဟတ္ထဂဗ္ဘေ သဟောဍ္ဍေန ဂဟိတစောရာဝိယ မနုဿေဟိ ဂတိတကာကာဝိယ စ ကိဉ္စိ ဝတ္တုံ အသက္ကုဏေယျတာယ သဗ္ဗဒိသာသု ဩလောကေတွာယေဝ အမှာကံ စာရိတ္တံ ပါဠိအာဒီသု န ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗံ, အထ ခေါ ပန အာစရိယပ္ပဝေဏီဝသေနေဝ စရိမှာတိ ဝတွာ ပရာဇယံ ပတွာ ပါရုပနပက္ခေယေဝ ပဝိသိံသူတိ. ရာဇာ စ ဣတော ပဋ္ဌာယ ဘိက္ခူ ပါရုပနဝတ္တမေဝ ကာရာပေတုံ သာမဏေရာနံ ဩဝဒန္တူတိ ရာဇာဏံ ဌပေသိ. တတော ပဋ္ဌာယ ဧကံသိကပက္ခာထေရာ အရုဏုဂ္ဂမနကာလေ ကောသိယာဝိယ သီသံ ဥဋ္ဌဟိတုမ္ပိ န သက္ကာတိ. राजा ने स्थविर (थेर) का आश्रय लेकर विनय में कुशलता के कारण कहा कि पालि में ऐसा ही आया है, अट्ठकथा आदि में भी ऐसा ही है, और पूछा कि "आपका एक-अंश (एक कंधे पर चीवर धारण करने का) वाद पालि, अट्ठकथा, टीका और अन्य ग्रंथों में नहीं दिखाई देता है, ऐसा होने पर भी आपने ऐसा व्रत क्यों किया?" तब वे एक-अंशवादी स्थविर, चार हाथ के कमरे में चोरी के माल के साथ पकड़े गए चोर की तरह और मनुष्यों द्वारा पकड़े गए कौवे की तरह, कुछ भी कहने में असमर्थ होने के कारण सभी दिशाओं में देखते हुए बोले— "हमारा यह आचरण पालि आदि में पहले नहीं देखा गया है, बल्कि हम तो आचार्य परंपरा के अनुसार ही चले हैं।" ऐसा कहकर वे पराजय को प्राप्त हुए और चीवर ओढ़ने के पक्ष में ही प्रविष्ट हो गए। राजा ने इसके बाद से भिक्षुओं को चीवर ओढ़ने का ही व्रत कराने के लिए और श्रामणेरों को उपदेश देने के लिए राजाज्ञा स्थापित की। तब से एक-अंश पक्ष के स्थविर अरुणोदय के समय उल्लू की तरह सिर उठाने में भी समर्थ नहीं हुए। သောကသရဘူမဟာစေတိယဿ ပုရတ္ထိမဒိသာဘာဂေ ဒွီဟိ ပါသာဒေဟိ အလင်္ကတံ စတုဘူမိကံ ဘူမိကိတ္တိဝိရာမံ နာမ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ နန္ဒမာလတ္ထေရဿ အဒါသိ, နရိန္ဒာဘိဓဇမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရူတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ အဒါသိ. သော ပန ထေရော ဆပ္ပဒဝံသိကောတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗော. အဘိနဝေါပသမ္ပန္နကာလေယေဝ ဝိနယဝိနိစ္ဆယဿ သုတ္တသင်္ဂဟဿ မဟာဝဂ္ဂဋ္ဌကထာယ စ အတ္ထယောဇနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ, သာသနသုဒ္ဓိဒီပိကံ နာမ ဂန္ထမ္ပိ အကာသီတိ. सोकसरभू महाचैत्य के पूर्व दिशा के भाग में दो प्रासादों से अलंकृत चार मंजिला 'भूमिकित्तिविराम' नामक विहार बनवाकर नन्दमाल स्थविर को दिया, और 'नरिन्दाभिधज महाधम्मराजाधिराजगुरु' नामक उपाधि भी दी। वह स्थविर 'छप्पदवंश' के समझे जाने चाहिए। उन्होंने अभिनव उपसम्पदा के समय ही विनयविनिच्चय, सुत्तसंग्रह और महावग्ग-अट्ठकथा की अर्थयोजना बर्मी भाषा (मरम्म भाषा) में की, और 'सासनसुद्धिदीपिका' नामक ग्रंथ भी रचा। တတော ပစ္ဆာ ကလိယုဂေ တေစတ္တာလီသာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ ဖဂ္ဂုနမာသဿ ကာဠပက္ခပန္န ရသမိယံ ရတနသိခမာပကဿ ရညော မဇ္ဈိမပုတ္တော ရဇ္ဇံ ကာရေသိ[Pg.146]. उसके बाद कलियुग में एक हजार एक सौ तैंतालीस (1143) वर्ष बीतने पर, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की पन्द्रहवीं तिथि (अमावस्या) को रतनसिखमापक राजा के मंझले पुत्र ने राज्य किया। တဒါ ရာဇာ ဧဝံ စိန္တေသိ,-ဧကံသိကပါရုပနဝသေန ဥပ္ပန္နော ဝိဝါဒေါ ပုဗ္ဗေသံ ရာဇူနံ ကာလေ ဝူပသမိတုံ န သက္ကာ, သိရိပဝရသုဓမ္မမဟာရာဇိန္ဒာဓိပတိနော ကာလေပိ ရာဇဂေဟေ သန္နိပါတာပေတွာ ရညော သမ္မုခေ ကထာပိတတ္တာ ဝိဿဋ္ဌေန ကထေတုံ ဩကာသဿ အလဒ္ဓတ္တာ ယထာကာမံ ဝတ္တုံ အဝိသဟတ္တာ ပရာဇယော အဟောသီတိ လေသံ ဩဍ္ဍတုံ ဩကာသော ဘဝေယျမယှံ ပန ကာလေ ဤဒိသံ အကတွာ တေသံ တေသံ ထေရာနံ ဝိဟာရေ ဒူတံ ပေသေတွာ သကသကဝါဒံ ကထာ ပေဿာမိ, ဧဝဉှိ သတိ တေတေထေရာ ဝိဿဋ္ဌာ ဟုတွာ ကထေဿန္တီတိ. तब राजा ने ऐसा सोचा— "एक-अंश चीवर धारण करने के कारण उत्पन्न विवाद पूर्व राजाओं के समय में शांत नहीं किया जा सका। सिरिपवरसुधम्ममहाराजिन्दाधिपति के समय में भी राजभवन में सभा बुलाकर राजा के सम्मुख कहलवाने के कारण, खुलकर बोलने का अवसर न मिलने से और इच्छानुसार बोलने में असमर्थ होने से पराजय हुई— ऐसा बहाना बनाने का अवसर हो सकता है। मेरे समय में ऐसा न करके, उन-उन स्थविरों के विहारों में दूत भेजकर उनके अपने-अपने मत को कहलवाऊँगा, क्योंकि ऐसा होने पर वे स्थविर नि:संकोच होकर कहेंगे।" ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ အန္တောယုဓနာယကံ အမစ္စံ ပဓာနံ ကတွာ တေသံ တေသံ ထေရာနံ သန္တိကံ ဂန္တွာ အာရောစာပေသိ,-သကသကဝါဒံ ဝိဿဋ္ဌာ ဟုတွာ ဝဒထာတိ. အထ ဧကံသိကဂဏိကာ ထေရာ အမှေဟိ ဝုတ္တဝစနံ ပါဠိအာဒီသု န ဒိဿတိ, အထ ခေါ ပန အာစရိယပ္ပဝေဏီဝသေနေဝ မယံ စရိမှာတိ အနုဇာနိံသု. ऐसा सोचकर, अन्तोयुधनायक अमात्य को प्रधान बनाकर उन-उन स्थविरों के पास जाकर कहलाया— "अपने-अपने मत को नि:संकोच होकर कहें।" तब एक-अंश पक्ष के स्थविरों ने स्वीकार किया कि "हमारे द्वारा कही गई बात पालि आदि में नहीं दिखाई देती है, बल्कि हम तो आचार्य परंपरा के अनुसार ही चले हैं।" မဟာရာဇာ စ ဧဝံ ထေရာနံ အနုဇာနနေ သတိ ကိဉ္စိ ကတ္တဗ္ဗံ နတ္ထိ, ဣဒါနိ ပရိမဏ္ဍလသုပ္ပဋိစ္ဆန္နသိက္ခာပဒါနိ အဝိကောပေတွာ သာမဏေရာ ဂါမံ ပဝိသန္တူတိ ရာဇလေခနံ တတ္ထ တတ္ထ ပေသေသိ. और महाराज ने (सोचा कि) स्थविरों के ऐसा स्वीकार कर लेने पर अब कुछ (विवाद) करने योग्य नहीं है, "अब श्रामणेर 'परिमण्डल' और 'सुप्पटिच्छन्न' (भली-भाँति ढके हुए) शिक्षापदों का उल्लंघन न करते हुए गाँव में प्रवेश करें"— ऐसी राज-आज्ञा (राजलेख) जगह-जगह भेजी। အပရဘာဂေ ပန သဟဿောရောဓဂါမတော ဥပသမ္ပဒါ ဝဿေန သတ္တဝဿိကံ ဉာဏံ နာမ ဘိက္ခုံ အာနေတွာ အန္တောယုဓဝိဟာရံ နာမ ကာရာပေတွာ တဿ အဒါသိ, ဉာဏာဘိသာသနဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရူတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ အဒါသိ. အထ ရညာ ယာစိတော ရာဇာဘိသေကဂန္ထံ ပရိသောဓေတွာ မရမ္မဘာသာယ အတ္ထံ ယောဇေသိ. बाद में, सहस्सोरध गाँव से उपसम्पदा की आयु से सात वर्ष के 'ज्ञान' नामक भिक्षु को लाकर 'अन्तोयुधविहार' नामक विहार बनवाकर उन्हें दिया, और 'ज्ञानाभिसासनधज महाधम्मराजगुरु' नामक उपाधि भी दी। फिर राजा द्वारा प्रार्थना किए जाने पर उन्होंने राज्याभिषेक ग्रंथ का शोधन करके बर्मी भाषा में उसका अर्थ लगाया। အပရဘာဂေ ဘဂဝါ ဓရမာနောယေဝ အာဂန္တွာ စတုန္နံ ယက္ခာနံ ဒမေတွာ တေဟိ ဒိန္နံ မံသောဒနံ ပဋိဂ္ဂဟေတွာ ပဗ္ဗတသာမန္တဒေသံ [Pg.147] ဂန္တွာ ပရိဘုဉ္ဇိတွာ တံ ဌာနံ ဩလောကေတွာ သိတံ ပါတွာကာသိ. အထ အာနန္ဒတ္ထေရော ကာရဏံ ပုစ္ဆိ. အနာဂတေ ခေါ အာနန္ဒ ဣမသ္မိံ ဒေသေ မဟာနဂရံ ဘဝိဿတိ, စတ္တာရော စ ဣမေ ယက္ခာ တသ္မိံ နဂရေ ရာဇာနော ဘဝိဿန္တီတိ ဗျာကာသိ. बाद में, भगवान (बुद्ध) ने जीवित रहते हुए ही यहाँ आकर चार यक्षों का दमन किया, उनके द्वारा दिए गए मांस-ओदन (मांस-भात) को ग्रहण किया, पर्वत के समीपवर्ती प्रदेश में जाकर उसका परिभोग किया और उस स्थान को देखकर मुस्कान प्रकट की। तब आनन्द स्थविर ने कारण पूछा। (भगवान ने) व्याकरण किया— "आनन्द! भविष्य में इस प्रदेश में एक महानगर होगा, और ये चार यक्ष उस नगर में राजा होंगे।" ယထာဗျာကတနိယာမေနေဝ ကလိယုဂေ စတုစတ္တာလီသာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ မာဃမာသဿ ကာဠပက္ခဒွါဒသမိယံ အင်္ဂါရဝါရေ ဥတ္တရဖဂ္ဂုနီနက္ခတ္တေန ယောဂေ အမရပုရံ နာမ မဟာရာဇဋ္ဌာနီနဂရံ မာပေသိ. जैसा व्याकरण (भविष्यवाणी) किया गया था, उसी नियम के अनुसार कलियुग में एक हजार एक सौ चौवालीस (1144) वर्ष बीतने पर, माघ मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को मंगलवार के दिन उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के योग में 'अमरपुर' नामक महाराजधानी नगर का निर्माण कराया। သိရိပရဝိဇယာနန္တယသတြိဘဝနာဒိတျာဓိပတိပဏ္ဍိတမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇာတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ ပဋိဂ္ဂဏှိ. 'सिरिपरविजय अनन्तयस त्रिभवनादित्य अधिपति पण्डित महाधम्मराजाधिराज' नामक उपाधि भी ग्रहण की। အဂ္ဂမဟေသိယာ ကာရာပိတံ ဇေယျဘူမိဝိဟာရကိတ္တိနာမကံ ဝိဟာရံ ဂုဏာဘိလင်္ကာရသဒ္ဓမ္မမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ, ယော ‘မေ ဩ သယာဍော’ ဣတိ ဝုစ္စတိ. अग्र-महिषी (पटरानी) द्वारा बनवाए गए 'जेय्यभूमिविहारकित्ति' नामक विहार को गुणाभिलङ्कार सद्धम्म महाधम्मराजाधिराजगुरु स्थविर को दिया, जिन्हें 'मे ओ सयाडो' कहा जाता है। ကန္နီနဂရဘောဇကာယ ရာဇကညာယ ကာရာပိတံ ဝိဟာရရမဏီယဝိရာမံ နာမ ဝိဟာရံ ဂုဏမုနိန္ဒာဓိပတိ မဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ, ယော ‘မာံ လေ သယာဍော’ ဣတိ ဝုစ္စတိ. कन्नीनगर की भोजिका राजकन्या द्वारा बनवाए गए 'विहाररमणीयविराम' नामक विहार को गुणमुनिन्दाधिपति महाधम्मराजाधिराजगुरु स्थविर को दिया, जिन्हें 'मांग ले सयाडो' कहा जाता है। ဥပရညော ဒေဝိယာ ကာရာပိတံ မင်္ဂလာဝိရာမံ နာမ ဝိဟာရံ တိပိဋကသဒ္ဓမ္မသာမိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ, ယော ‘သောံ ဌာ သယာဍော’ ဣတိ ဝုစ္စတိ. उपराज की देवी (पत्नी) द्वारा बनवाए गए 'मङ्गलाविराम' नामक विहार को टिपिटकसद्धम्मसामी महाधम्मराजाधिराजगुरु स्थविर को दिया, जिन्हें 'सोंग ठा सयाडो' कहा जाता है। မဇ္ဈိမဂေဟဝါသိဒေဝိယာ ကာရာပိတံ မင်္ဂလာဝါသာတုလံ နာမ ဝိဟာရံ ဉာဏဇမ္ဗုဒီပအနန္တဓဇမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ, ယော ‘မေံ ဇွာ သယာဍော’ ဣတိ ဝုစ္စတိ. मझ्झिमगेहवासिनी देवी द्वारा बनवाए गए 'मङ्गलावासअतुल' नामक विहार को ज्ञानजम्बुदीप अनन्तधज महाधम्मराजाधिराजगुरु स्थविर को दिया, जिन्हें 'मेंग ज्वा सयाडो' कहा जाता है। ဣမေ ပ္ပန စတ္တာရော မဟာထေရေ သံဃရာဇဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. इन चार महास्थविरों को संघराज के पद पर स्थापित किया। ဥတ္တရဂေဟဝါသိဒေဝိယာ ကာရာပိတံ မင်္ဂလဘူမိကိတ္တိံ နာမ [Pg.148] ဝိဟာရံ ကဝိန္ဒာဘိသဒ္ဓမ္မဓရဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ, ယော ‘ဉျောံ ကာံ သယာဍော’ ဣတိ ဝုစ္စတိ. उत्तरगेहवासिनी देवी द्वारा बनवाए गए 'मङ्गलभूमिकित्ति' नामक विहार को कविन्दाभिसद्धम्मधरधज महाधम्मराजगुरु स्थविर को दिया, जिन्हें 'न्योंग कांग सयाडो' कहा जाता है। သိရိခေတ္တနဂရဘောဇကေန ရာဇကုမာရေန ကာရာပိတံ အတုလဘူမိဝါသံ နာမ ဝိဟာရံ ကဝိန္ဒာဘိသဒ္ဓမ္မပဝရမဟာဓမ္မ ရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ, ယော ‘သွေ ဋောံ သယာဍော’ ဣတိ ဝုစ္စတိ. श्रीक्षेत्र नगर के शासक राजकुमार द्वारा निर्मित 'अतुलभूमिकास' नामक विहार को कविन्दाभिसद्धम्मपवरमहाधम्मराजगुरु स्थविर को दिया गया, जिन्हें 'स्वे टोम सयाडो' कहा जाता है। အန္တောအမစ္စေန ဧကေန ကာရာပိတံ ဝိဟာရံ ဉာဏာလင်္ကာရသဒ္ဓမ္မဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ, ယော ‘သေံ ဋေ သယာဍော’ ဣတိ ဝုစ္စတိ. एक अंतःअमात्य (आंतरिक मंत्री) द्वारा निर्मित विहार को ज्ञानालंकारसद्धम्मध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर को दिया गया, जिन्हें 'सें टे सयाडो' कहा जाता है। ဝါမဗလနာယကေနာမစ္စေန ကာရာပိတံ ဝိဟာရံ ပရမသိရိဝံသဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ, ယော ‘မေ ဌီ သယာဍော’ ဣတိ ဝုစ္စတိ. वामबलनायक अमात्य द्वारा निर्मित विहार को परमधम्मसिरिवंसध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर को दिया गया, जिन्हें 'मे थी सयाडो' कहा जाता है। ဓမ္မဝိနိစ္ဆကေန ဧကေနာမစ္စေန ကာရာပိတံ ဝိဟာရံ ကဝိန္ဒ သာရဓဇမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ, ယော ‘လောကာ မှာံ ကေံ သယာဍော’ ဣတိ ဝုစ္စတိ. एक धम्मविनिच्छक (धर्म-निर्णायक) अमात्य द्वारा निर्मित विहार को कविन्दसारध्वजमहाधम्मराजाधिराजगुरु स्थविर को दिया गया, जिन्हें 'लोका म्हाम कें सयाडो' कहा जाता है। ဣစ္စေဝံ ပရိယတ္တိကောဝိဒါနံ အနေကာနံ မဟာထေရာနံ သဒ္ဓိံ နာမလဉ္ဆေန ဝိဟာရံ ဒတွာ အနုဂ္ဂဟံ အကာသိ. ယသ္မာ ပန သဗ္ဗေသံ ထေရာနံ နာမံ ဥဒ္ဓရိတွာ ဝိသုံ ဝိသုံ ကထိတေ အယံ သာသနဝံသပ္ပဒီပိကကထာ အတိပ္ပပဉ္စာ ဘဝိဿတိ, တသ္မာ ဣဓ အဇ္ဈုပေက္ခိတွာ ဝတ္တဗ္ဗမေဝ ဝက္ခာမာတိ. इस प्रकार पर्यप्ति-कोविद (शास्त्र-विशारद) अनेक महास्थविरों को उपाधियों के साथ विहार देकर उन्होंने अनुग्रह किया। चूँकि सभी स्थविरों के नामों का अलग-अलग उल्लेख करने पर यह 'सासनवंसप्पदीपिका' कथा अत्यधिक विस्तृत हो जाएगी, इसलिए यहाँ उनकी उपेक्षा कर (उन्हें छोड़कर) केवल कहने योग्य बातों को ही कहूँगा। ပစ္ဆာဘာဂေ စတ္တာရော မဟာထေရာ ရာဇာဒုဗ္ဗလတာယ ယထာကာမံ သာသနံ ဝိသောဓေတုံ သက္ခိဿန္တီတိ မညိတွာ ပုန အဋ္ဌ ထေရေ ဧတေဟိ စတူဟိ မဟာထေရေဟိ သဒ္ဓိံ သာသနံ ဝိသောဓာပေတုံ သံဃနာယကဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. သေယျထိဒံ, ကဝိန္ဒာဘိသဒ္ဓမ္မပဝရမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရော, တိပိဋကာလင်္ကာရဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရော, စက္ကိန္ဒာဘိဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရာ, ပရမသိရိဝံသဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရော, ဇနိန္ဒာဘိပဝရမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရော, မဟာဉာဏာဘိဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရော[Pg.149], ဉာဏာလင်္ကာရသဒ္ဓမ္မဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုထေရော, ဉာဏာဘိသာသနဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရောတိ. बाद में, यह सोचकर कि राजा की दुर्बलता के कारण चार महास्थविर इच्छानुसार शासन का शोधन नहीं कर सकेंगे, उन्होंने पुनः इन चार महास्थविरों के साथ आठ अन्य स्थविरों को शासन का शोधन करने के लिए संघनायक के पद पर स्थापित किया। वे इस प्रकार हैं— कविन्दाभिसद्धम्मपवरमहाधम्मराजगुरु स्थविर, त्रिपिटकालंकारध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर, चक्किन्दाभिध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर, परमधम्मसिरिवंसध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर, जनिन्दाभिपवरमहाधम्मराजगुरु स्थविर, महाज्ञानाभिध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर, ज्ञानालंकारसद्धम्मध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर और ज्ञानाभिसासनध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर। အထ အရဟာပိ သမာနော နိဿယမုစ္စကင်္ဂဝိကလော ဝိနာနိဿယာစရိယေန ဝသိတုံ န ဝဋ္ဋတီတိ ဇာနိတွာ နိဿယာ စရိယပ္ပဟောနကာနံ ထေရာနံ နိဿယင်္ဂါနိ နိဿယမုစ္စကာရဟာနံ နိဿယမုစ္စကင်္ဂါနိ ပရိပူရာပေတွာ နိဿိတကာနံ နိဿယံ ဂဏှိတွာဝ နိသီဒါပေသိ. तब, यह जानकर कि अर्हत् होते हुए भी यदि कोई 'निसय-मुच्चक' (निश्रय-मुक्ति) के अंगों से रहित है, तो उसे निश्रय-आचार्य के बिना रहना उचित नहीं है, उन्होंने निश्रय-आचार्य बनने योग्य स्थविरों के निश्रय-अंगों को और निश्रय-मुक्त होने योग्य स्थविरों के निश्रय-मुक्ति-अंगों को पूर्ण कराकर, आश्रितों का निश्रय ग्रहण कराकर ही उन्हें स्थापित किया। တတော ပစ္ဆာ ကလိယုဂေ ပညာသာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေဝ သမ္ပတ္တေ ဉာဏာဘိသာသနဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရံယေဝ ဧကံ သံဃရာဇဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. တတော ပဋ္ဌာယ သောယေဝ ဧကော သံဃနာယကော ဟုတွာ သာသနံ ဝိသောဓယိ. उसके बाद, कलियुग के एक हजार एक सौ पचास (1150) वर्ष बीतने पर, उन्होंने केवल ज्ञानाभिसासनध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर को ही संघराज के पद पर स्थापित किया। तब से वे ही अकेले संघनायक होकर शासन का शोधन करने लगे। တတော ပစ္ဆာ ဧကပဏ္ဏာသာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ ဖဂ္ဂုနမာသေ မဟာမုနိစေတိယဿ ဒက္ခိဏဒိသာဘာဂေ ဒွီဟိ ဣဋ္ဌကမယေဟိ ပါကာရေဟိ ပရိက္ခိတ္တံ ပဉ္စဘူမိကံ အသောကာရာမေ ရတနဘူမိကိတ္တိံ နာမ ဝိဟာရံ အတိမဟန္တံ ကာရာပေတွာ ဉာဏာဘိသာသနဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရဿ အဒါသိ. ဉာဏာဘိဝံသဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရူတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ ပုန အဒါသိ. တတော အညာနိ ဇေယျဘူမိဝိဟာရကိတ္တိမင်္ဂလဝိရာမာဒယော အနေကေပိ ဝိဟာရေ တဿေဝ အဒါသိ. उसके बाद, एक हजार एक सौ इक्यावन (1151) वर्ष बीतने पर, फाल्गुन मास में, महामुनि चैत्य के दक्षिण दिशा में दो ईंटों की दीवारों से घिरे हुए अशोकराम में 'रतनभूमिकित्ति' नामक एक अत्यंत विशाल पाँच मंजिला विहार बनवाकर ज्ञानाभिसासनध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर को दिया। उन्हें पुनः 'ज्ञानाभिवंसधम्मसेनापतिमहाधम्मराजाधिराजगुरु' की उपाधि भी प्रदान की। उसके बाद, जेय्यभूमिविहारकित्तिमंगलविराम आदि अन्य अनेक विहार भी उन्हीं को दिए। သော ပန တေသု ဝိဟာရေသု ဝါရေန နိသီဒိတွာ ပရိယတ္တိံ ဝါစေသိ. ဥဘတောဝိဘင်္ဂါနိပိ ဝါစုဂ္ဂတံ အကာသိ. နိစ္စံယေဝ ဧကာသနိကဓုဇင်္ဂံ သမာဒိယိ. उन्होंने उन विहारों में बारी-बारी से रहकर पर्यप्ति (शास्त्र) का अध्यापन किया। उन्होंने दोनों विभंगों (भिक्षु और भिक्षुणी विभंग) को भी कंठस्थ किया। वे सदैव 'एकासनिक' धुतंग का समादान (पालन) करते थे। သော ပန ထေရော ဥပသမ္ပဒါဝဿေန ပဉ္စဝဿိကော ဟုတွာ ပုဗ္ဗေဝ သံဃရာဇဘာဝတော ပေဋကာလင်္ကာရ နာမ နေတ္တိသံဝဏ္ဏနံ အဘိနဝဋီကံ အကာသိ. အဋ္ဌဝဿိဣကကာလေ သံဃရာဇာ အဟောသိ. သံဃရာဇာ ဟုတွာ သာဓုဇ္ဇနဝိလာသိနိံ နာမ [Pg.150] ဒီဃနိကာယဋီကံ အကာသိ. အရိယဝံသာလင်္ကာရံ နာမ ဂန္ထဉ္စ အကာသိ. မဟာဓမ္မရညာ ယာစိတော ဇာတကဋ္ဌကထာယ အတ္ထယောဇနံ စတုသာမဏေရဝတ္ထုံ ရာဇောဝါဒဝတ္ထုံ တိဂုမ္ဘထောမနံ ဆဒ္ဒန္တနာဂရာဇုပ္ပတ္တိကထံ ရာဇာဓိရာဇ ဝိလာသိနိံ နာမ ဂန္ထဉ္စာတိ ဧဝမာဒယောပိ အကာသိ. उन स्थविर ने उपसंपदा के पाँच वर्ष पूरे होने पर, संघराज बनने से पूर्व ही, 'पेटकालंकार' नामक नेत्ति-संवरण (नेत्तिप्पकरण की व्याख्या) की अभिनव टीका लिखी। आठ वर्ष की उपसंपदा होने पर वे संघराज बने। संघराज होकर उन्होंने 'साधुज्जनविलासिनी' नामक दीघनिकाय की टीका लिखी। उन्होंने 'अरियवंसालंकार' नामक ग्रंथ भी लिखा। महाधम्मराज द्वारा याचना किए जाने पर उन्होंने जातक-अट्ठकथा की 'अत्थयोजना', 'चतुसामणेरवत्थु', 'राजोवादवत्थु', 'तिगुम्भथोमन', 'छद्दन्तनगराजुप्पत्तिकथा' और 'राजाधिराजविलासिनी' नामक ग्रंथ आदि की भी रचना की। ကလိယုဂေ ပန ဒွါသဋ္ဌာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ သီဟဠဒီပတော အမ္ပဂဟပတိဿော, မဟာဒမ္ပော, ကောစ္ဆ ဂေါဓော, ဗြာဟ္မဏဝတ္တော, ဘောဂဟဝတ္တော, ဝါတုရဂမ္မောတိ ဣမေ ဆ သာမဏေရာ ဒသ ဓာတုယော ဓမ္မပဏ္ဏာ ကာရတ္ထာယ အာနေတွာ အမရပုရံ နာမ မဟာရာဇဋ္ဌာနီနဂရံ အာဂတာ သဒ္ဓိံ ဧကေန ဥပါသကေန. कलियुग के एक हजार एक सौ बासठ (1162) वर्ष बीतने पर, सिंहल द्वीप (श्रीलंका) से अम्पागहपतिस्सो, महादम्पो, कोच्छ गोधो, ब्राह्मणवत्तो, भोगहवत्तो और वातुरगम्मो—ये छह श्रामणेर दस धातुएँ और धर्म-पर्ण (पाण्डुलिपियाँ) तैयार करवाने के लिए एक उपासक के साथ अमरपुर नामक राजधानी नगर में आए। အထ ဉာဏာဘိဝံသဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုနာ သံဃရညာ ဥပဇ္ဈာယေန ကဝိန္ဒာဘိသဒ္ဓမ္မဓရဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရေန ဇနိန္ဒာဘိဓဇမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရေန မုနိန္ဒဃောသမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရေနာတိ ဧဝမာဒီဟိ ရာဇဂုရုတ္ထေ ရေဟိ ကမ္မဝါစရိယေဟိ ဟတ္ထိရဇ္ဇုသုဝဏ္ဏဂုဟသီမာယံ ဥပသမ္ပဒကမ္မံ ကာရာပေသိ, ဥပါသကဉ္စ သာမဏေရဘူမိယံ ပတိဋ္ဌာပေသိ, တတော ပစ္ဆာ စ အနေကဝါရံ အာဂတာနံ ဘိက္ခူနံ ပုန သိက္ခံ ဂဏှာပေသိ, သာမဏေရာနဉ္စ ဥပသမ္ပဒကမ္မံ ကာရာပေသိ, ဥပါသကာနဉ္စ ပဗ္ဗဇ္ဇကမ္မန္တိ. तब संघराज ज्ञानाभिवंसधम्मसेनापतिमहाधम्मराजाधिराजगुरु को उपाध्याय बनाकर तथा कविन्दाभिसद्धम्मधरध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर, जनिन्दाभिध्वजमहाधम्मराजगुरु स्थविर, मुनिन्दघोषमहाधम्मराजगुरु स्थविर आदि राजगुरु स्थविरों को कर्मवाचाचार्य बनाकर 'हत्थिरज्जुसुवण्णगुहा' सीमा में उपसंपदा कर्म संपन्न कराया, और उपासक को श्रामणेर भूमि में प्रतिष्ठित किया। उसके बाद अनेक बार आए हुए भिक्षुओं को पुनः शिक्षा ग्रहण कराई, श्रामणेरों का उपसंपदा कर्म और उपासकों का प्रव्रज्या कर्म संपन्न कराया। အပရဘာဂေ ပန ကလိယုဂေ ဆစတ္တာလီသာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ ပိတုရညော အာစရိယပုဗ္ဗော အတုလော နာမ ထေရော စီဝရပဋလံ ဥပရိသံဃာဋိံ ကတွာ ဥရဗန္ဓနဝတ္ထံ ဗန္ဓိတဗ္ဗန္တိ စူဠဂဏ္ဌိပဒေ ဝုတ္တတ္တာ သာမဏေရာနံ ဂါမပ္ပဝသေနကာလေ ဧကံသံ ဥတ္တရာသင်္ဂံ ကတွာ ဥရဗန္ဓနဝတ္ထံ ဗန္ဓိတွာယေဝ ပဝိသိတဗ္ဗန္တိ ဒဠံ ကတွာ ရညော သန္တိကံ လေခနံ ပဝေသေသိ. बाद में कलियुग में एक हजार एक सौ छियालीस (1146) वर्ष बीतने पर, राजा के पिता के पूर्व आचार्य अतुल नामक स्थविर ने, 'चूलगण्ठिपद' में यह कहे जाने के कारण कि चीवर के पटल को संघाटी के ऊपर रखकर उर-बन्धन (सीने की पट्टी) बाँधना चाहिए, यह दृढ़ निश्चय करते हुए कि सामणेरों को गाँव में प्रवेश करते समय उत्तरासङ्ग को एक कंधे पर (एकांश) रखकर और उर-बन्धन बाँधकर ही प्रवेश करना चाहिए, राजा के पास एक पत्र भेजा। အထ ရာဇာ တံ သုတွာ မဟာထေရေ သုဓမ္မသဘာယံ သန္နိပါတာပေတွာ [Pg.151] အတုလတ္ထေရေန သဒ္ဓိံ သာကစ္ဆံ ကာရာပေသိ. အထ အတုလတ္ထေရော စီဝရပဋလံ ဥပရိသံဃာဋိံ ကတွာ ဥရဗန္ဓနဝတ္ထံ ဗန္ဓိတဗ္ဗန္တိ စူဠဂဏ္ဌိပဒေ အာဂတပါဌံ ဒဿေတွာ သာမဏေရာနံ ဂါမပ္ပဝေသနကာလေ ဧကံသံ ဥတ္တရာသင်္ဂံ ကတွာ ဥရဗန္ဓနဝတ္ထံ ဗန္ဓိတွာ ပဝိသိတဗ္ဗန္တိ အာဟ. तब राजा ने उसे सुनकर महास्थविरों को सुधर्मा सभा में एकत्रित करवाया और अतुल स्थविर के साथ चर्चा करवाई। तब अतुल स्थविर ने 'चूलगण्ठिपद' में आए इस पाठ को दिखाते हुए कि चीवर के पटल को संघाटी के ऊपर रखकर उर-बन्धन बाँधना चाहिए, कहा कि सामणेरों को गाँव में प्रवेश करते समय उत्तरासङ्ग को एक कंधे पर रखकर और उर-बन्धन बाँधकर प्रवेश करना चाहिए। အထ မဟာထေရာ တံ ပုစ္ဆိံသု,-ဤဒိသော အဓိပ္ပာယော အညတ္ထ ဒိဿတိ ဝါ မာ ဝါတိ. အထ အတုလတ္ထေရော ဧဝမာဟ,-အညတ္ထ ပန ဤဒိသော အဓိပ္ပာယော န ဒိဿတီတိ. ဧဝံ ဟောတု, အယံ ဂန္ထော ကေန ကတောတိ. သီဟဠဒီပေ အနုရာဓပုရဿ ဒက္ခိဏဒိသာဘာဂေ ပေါက္ကန္တိ ဂါမေ အရဟန္တေန မောဂ္ဂလာနတ္ထေရေနာတိ. အယမတ္ထော ကထံ ဇာနိတဗ္ဗောတိ. ပိဋကတ္တယလက္ခဏဂန္ထေ အာဂတတ္တာတိ. အယဉ္စ ပိဋကတ္တယ လက္ခဏဂန္ထော ကုတော လဒ္ဓေါတိ. ဗုဒ္ဓဃောသတ္ထေရေန ကိရ သီဟဠဒီပတော အာနီတတ္တာ တတော, အယဉှိ ဂန္ထော သီဟဠဒီပတော အတ္တနာ အာနီတေသု ဂန္ထေသု အသုကော ဂန္ထော အသုကေန ထေရေန ကတောတိ ဝိညာပနတ္ထာယ ဗုဒ္ဓဃောသတ္ထေရေန ကတော, ဣဒါနာယံ ဂန္ထော အမှာကံ ဟတ္ထေ သံဝိဇ္ဇတီတိ. သစေ ဣဒါနာယံ ဂန္ထော တုမှာကံ ဟတ္ထေ သံဝိဇ္ဇတိ, အမှာကံ ဒဿေဟီတိ. ပဿထာဝုသော အယမမှာကံ ဟတ္ထေ ဂန္ထောတိ ဒဿေသိ. အထ မဟာထေရေဟိ သံဃရာဇပ္ပမုခေဟိ တသ္မိံ ဂန္ထေ ပဿိတေ ဝိနယဂဏ္ဌိပဒံ သီဟဠဒီပေ ပရက္ကမဗာဟုရညော ကာလေ မောဂ္ဂလာနတ္ထေရော အကာသီတိ အာဂတံ, န စူဠဂဏ္ဌိပဒံ သီဟဠဒီပေ အနုရာဓပုရဿဒက္ခိဏဒိသာဘာဂေ ပေါက္ကန္တိဂါမေ အရဟာ မောဂ္ဂလာနတ္ထေရော အကာသီတိ. तब महास्थविरों ने उससे पूछा— "क्या ऐसा अभिप्राय अन्यत्र कहीं दिखाई देता है या नहीं?" तब अतुल स्थविर ने इस प्रकार कहा— "अन्यत्र तो ऐसा अभिप्राय नहीं दिखाई देता।" "ऐसा ही हो, यह ग्रन्थ किसके द्वारा रचा गया है?" "सिंहल द्वीप में अनुराधापुर के दक्षिण दिशा के पोक्कन्ति गाँव में अरहन्त मोग्गल्लान स्थविर द्वारा।" "यह बात कैसे जानी जाए?" "पिटकत्तयलक्खण ग्रन्थ में आने के कारण।" "और यह पिटकत्तयलक्खण ग्रन्थ कहाँ से प्राप्त हुआ?" "कहते हैं कि बुद्धघोष स्थविर द्वारा सिंहल द्वीप से लाए जाने के कारण वहाँ से; क्योंकि यह ग्रन्थ बुद्धघोष स्थविर द्वारा सिंहल द्वीप से स्वयं लाए गए ग्रन्थों में से 'अमुक ग्रन्थ अमुक स्थविर द्वारा रचा गया है'—यह बताने के लिए रचा गया था, और अब यह ग्रन्थ हमारे पास उपलब्ध है।" "यदि अब यह ग्रन्थ आपके पास उपलब्ध है, तो हमें दिखाएँ।" "आयुष्मानों! देखो, यह ग्रन्थ हमारे पास है"—कहकर उसने दिखाया। तब संघराज प्रमुख महास्थविरों द्वारा उस ग्रन्थ को देखे जाने पर (उसमें) यह आया कि 'विनयगण्ठिपद' को सिंहल द्वीप में पराक्रमबाहु राजा के काल में मोग्गल्लान स्थविर ने रचा था, न कि 'चूलगण्ठिपद' को सिंहल द्वीप के अनुराधापुर के दक्षिण दिशा के पोक्कन्ति गाँव में अरहन्त मोग्गल्लान स्थविर ने रचा था। အထ ထေရာ ဧဝမာဟံသု,-ကသ္မာ ပန ပိဋကတ္တယလက္ခဏဂန္ထေ အနာဂတမ္ပိ အာဂတံဝိယ ကတွာ မုသာ ဝဒထ, န နု တုမှာကမ္ပိ ဧကံသိကဘိက္ခူနံ မုသာဝါဒသိက္ခာပဒံ အတ္ထီတိ. အထ အတုလတ္ထေရော ဥတ္တရိံ ဝတ္တုံ အသက္ကုဏေယျတ္တာ လုဒ္ဒကဿ [Pg.152] ဝါကုရေ ဗန္ဓမိဂေါဝိယ ဖန္ဒမာနော ဟုတွာ အဋ္ဌာသိ, သဟောဍ္ဍေန ဂဟိတောဝိယ စောရော သဟမုသာဝါဒကမ္မေန သော ထေရော ဂဟိတော အဟောသီတိ. तब स्थविरों ने इस प्रकार कहा— "आप पिटकत्तयलक्खण ग्रन्थ में न आई हुई बात को भी आई हुई की तरह बताकर झूठ क्यों बोल रहे हैं? क्या आप एकांशिक भिक्षुओं के लिए भी मृषावाद (झूठ बोलने) का शिक्षापद नहीं है?" तब अतुल स्थविर आगे कुछ कहने में असमर्थ होने के कारण, शिकारी के जाल में बँधे मृग की तरह छटपटाते हुए रह गए; चोरी के माल के साथ पकड़े गए चोर की तरह वह स्थविर अपने मृषावाद के कर्म के साथ पकड़े गए। ဣဒံ ဣမဿ အတ္ထဿ အာဝိဘာဝတ္ထာယ ဝတ္ထု, – इस विषय को स्पष्ट करने के लिए यह कथा है— ဣမသ္မိံ ကိရ ရဋ္ဌေ ဧကော ဇနပဒဝါသီပုရိသော ကေနစိဒေဝ ကရဏီယေန အမရပုရံ နာမ မဟာရာဇဋ္ဌာနီနဂရံ အာဂစ္ဆိ. အာဂန္တွာ စ ပစ္စာဂတကာလေ အန္တရာမဂ္ဂေ ပါထေယျံ ခယံ အဟောသိ. အထဿ ဧတဒဟောသိ,- ဣဒါနိ မမ ပါထေယျံ ခယံ အဟောသိ, ဣမသ္မိံ ကိရ ရဋ္ဌေ သဟဿောရောဓဂါမေ လဒ္ဓဝရော နာမ မဟာသေဋ္ဌိ သဗ္ဗတ္ထ ဘူတလေ အတိဝိယ ပါကဋော. တဿာဟံ ဉာတီတိ ဝဉ္စေတွာ ကထေဿာမိ, ဧဝံ သတိ တေန မဟာသေဋ္ဌိနာ မိတ္တသန္ထဝံ ကာတုံ တေတေဂါမိကာ မနုဿာ မမ ဗဟု လာဘံ ဒဿန္တိ, တဒါ ပါထေယျေန အကိစ္ဆော ဘဝိဿာမီတိ. ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ အန္တရာမဂ္ဂေ သမ္ပတ္တသမ္ပတ္တဂါမေသု မဟာဘောဂါနံ ဂေဟံ ဝိစိနေတွာ မဟာဘောဂါနံ သန္တိကံ ပဝိသိတွာ ကထာသလ္လာပံ အကာသိ. कहते हैं कि इस देश में एक जनपदवासी पुरुष किसी कार्यवश अमरपुर नामक राजधानी नगर में आया। आकर लौटते समय रास्ते में उसका पाथेय (यात्रा का भोजन) समाप्त हो गया। तब उसे यह विचार आया— "अब मेरा पाथेय समाप्त हो गया है; इस देश के सहस्सरोध गाँव में लद्धवर नामक एक महासेठ है जो पूरी पृथ्वी पर अत्यंत प्रसिद्ध है। मैं उसका संबंधी हूँ—ऐसा झूठ बोलूँगा; ऐसा होने पर उस महासेठ के साथ मित्रता करने के लिए उन-उन गाँवों के मनुष्य मुझे बहुत लाभ (दान) देंगे, तब पाथेय के कारण मुझे कष्ट नहीं होगा।" ऐसा सोचकर उसने रास्ते में आने वाले गाँवों में बड़े धनवानों के घरों को खोजा और धनवानों के पास जाकर बातचीत की। အထ တေတေဂါမိကာ တွံ ကုတော အာဂတော, ကုဟိံ ဂမိဿသိ, ကဿ ဉာတိ,ကော ဝါ တွန္တိ ပုစ္ဆိံသု. အမရပူရမဟာရာဇဋ္ဌာနီနဂရတော အာဂတော, သဟဿောရောဓဂါမံ ဂမိဿာမိ, သဟဿောရောဓဂါမေ လဒ္ဓဝရဿ နာမ မဟာသေဋ္ဌိနော ဇာမာတာ ဓနဝဍ္ဎကော နာမာဟန္တိ အာဟ. तब उन गाँवों के लोगों ने पूछा— "तुम कहाँ से आए हो? कहाँ जाओगे? किसके संबंधी हो? और तुम कौन हो?" उसने कहा— "अमरपुर राजधानी नगर से आया हूँ, सहस्सरोध गाँव जाऊँगा; मैं सहस्सरोध गाँव के लद्धवर नामक महासेठ का दामाद हूँ और मेरा नाम धनवड्ढक है।" အထ တေတေဂါမိကာ လဒ္ဓဝရေန မဟာသေဋ္ဌိနာ မိတ္တသန္ထဝံ ကာတုံ နာနာဘောဇနေဟိ ဘောဇေသုံ. အညေဟိပိ ဗဟူဟိ ပဏ္ဏာကာရေဟိ သင်္ဂဟံ အကံသု. ဣမိနာဝ နယေန သမ္ပတ္တ သမ္ပတ္တဂါမေသု ဝဉ္စေတွာ အတ္တနော ဂုဏံ ကထေတွာ အဒ္ဓါန မဂ္ဂံ တရိ. ပစ္ဆာ ပန သဟဿောရောဓဂါမံ သမ္ပတ္တော. သော သဟဿောရောဓဂါမံ န သမ္ပတ္တပုဗ္ဗော. လဒ္ဓဝရော မဟာသေဋ္ဌိ တေန န ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗော. သဟဿောရောဓဂါမံ သမ္ပတ္တေယေဝ အယံ ကိံ နာမ ဂါမောတိ အပုစ္ဆိတွာယေဝ တသ္မိံ ဂါမေ မဟာဘောဂတရဿ [Pg.153] မဟာဂေဟံ ဝိစိနန္တော တဿေဝ လဒ္ဓဝရဿ သေဋ္ဌိနော မဟန္တံ ဂေဟံ ပဿိတွာ လဒ္ဓဝရဿ သေဋ္ဌိနော သန္တိကံ ပဝိသိတွာ တေန သဒ္ဓိံ ကထာသလ္လာပံ အကာသိ. तब उन गाँवों के लोगों ने लद्धवर महासेठ के साथ मित्रता करने के लिए उसे अनेक प्रकार के भोजनों से भोजन कराया। अन्य भी बहुत से उपहारों से उसका सत्कार किया। इसी प्रकार रास्ते में आने वाले गाँवों में धोखा देकर और अपनी प्रशंसा करके उसने लंबी यात्रा पार की। बाद में वह सहस्सरोध गाँव पहुँचा। वह पहले कभी सहस्सरोध गाँव नहीं आया था। उसने लद्धवर महासेठ को पहले कभी नहीं देखा था। सहस्सरोध गाँव पहुँचते ही, "यह कौन सा गाँव है"—यह पूछे बिना ही उस गाँव में सबसे बड़े धनवान के घर को खोजते हुए, उसने उसी लद्धवर सेठ का विशाल घर देखा और लद्धवर सेठ के पास जाकर उससे बातचीत की। အထ မဟာသေဋ္ဌိ တံ ပုစ္ဆိ,-တွံ ကုတော အာဂတော, ကုဟိံ ဂမိဿသိ, ကဿ ဉာတိ,ကော တွန္တိ. အမရပုရမဟာရာဇဋ္ဌာနီနဂရတော သာမိ အာဂတော, သဟဿောရောဓဂါမံ ဂမိဿာမိ, သဟဿောရောဓဂါမေ လဒ္ဓဝရဿ နာမ မဟာသေဋ္ဌိနော ဇာမာတာ, ဓနဝဍ္ဎကော နာမာဟန္တိ အာဟ. तब महासेठ ने उससे पूछा— "तुम कहाँ से आए हो? कहाँ जाओगे? किसके संबंधी हो? तुम कौन हो?" उसने कहा— "स्वामी! अमरपुर राजधानी नगर से आया हूँ, सहस्सरोध गाँव जाऊँगा; मैं सहस्सरोध गाँव के लद्धवर नामक महासेठ का दामाद हूँ और मेरा नाम धनवड्ढक है।" အထ မဟာသေဋ္ဌိ တဿ မုခံ ဥဇုံ ဩလောကေတွာ အယံ မာဏဝ သဟဿောရောဓဂါမောယေဝ, အဟမ္ပိ လဒ္ဓဝရော နာမ မဟာသေဋ္ဌိ, မမ ဓီတရော သန္တိ, တာပိ သဿာမိကာယေဝ ဟောန္တိ, ဣဒါနိ တာ သကသကဿာမိကာနံယေဝ သန္တိကေ ဝသန္တိ, န တွံ ကဒါစိ မယာ ဒိဋ္ဌပုဗ္ဗော, ကေန ကာရဏေန ကုတော အာဂန္တွာ မမ ဇာမာတာ ဘဝသီတိ ပုစ္ဆိ. तब महासेठ ने उसके मुख की ओर सीधे देखते हुए पूछा— "हे माणवक! यह सहस्सोरध गाँव ही है, मैं भी लद्धवर नामक महासेठ हूँ। मेरी पुत्रियाँ हैं, वे भी विवाहित ही हैं और इस समय वे अपने-अपने पतियों के पास ही रहती हैं। मैंने तुम्हें पहले कभी नहीं देखा, तुम किस कारण से और कहाँ से आकर मेरे दामाद बन रहे हो?" အထ သော မ္မနုဿေဟိ အနုဗန္ဓိယမာနောဝိယ မိဂေါ သကလမ္ပိ ကာယံ ဖန္ဒာပေတွာ ကိဉ္စိ ဝတ္တဗ္ဗံ ဝစနံ အဇာနိတွာ အလဒ္ဓပ္ပတိဋ္ဌာနတာယ ဧဝံ သတိ ကုတော အာဂတော, ကုဟိံ ဂမိဿာမိ, ကဿ ဉာတိ, ကော ဝါ အဟန္တိ ဣဒါနိ န ဇာနာမိ, သဗ္ဗဒိသာ သမ္မုယှာမိ, ခမာဟိ မမ အပရာဓံ, ဣတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ ဇီဝိတပရိယောသာနာ န ဝဉ္စေဿာမိ, ဝဉ္စေတုံ န ဝိသဟာမိ, ဣဒါနိ အတိဝိယ ဘာယာမိ, မာ ကိဉ္စိ ဒဏ္ဍကမ္မံ ကရောဟီတိ ဝတွာ ဝေဂေန ဥဋ္ဌဟိတွာ ပလာယီတိ. तब वह मनुष्यों द्वारा पीछा किए जा रहे मृग की तरह अपने पूरे शरीर को कँपाते हुए, कुछ कहने योग्य वचन न जानकर और कोई सहारा न मिलने के कारण—"ऐसा होने पर मैं कहाँ से आया हूँ, कहाँ जाऊँगा, किसका संबंधी हूँ, या मैं कौन हूँ, यह अब मैं नहीं जानता, सब दिशाओं में मोहित हो रहा हूँ, मेरे अपराध को क्षमा करें, आज से लेकर जीवन के अंत तक मैं धोखा नहीं दूँगा, धोखा देने का साहस नहीं करूँगा, अब मैं बहुत डर रहा हूँ, मुझे कोई दंड न दें"—ऐसा कहकर तेजी से उठकर भाग गया। ဣစ္စေဝံ အတုလတ္ထေရော ဒုမ္မုခေါ ဟုတွာ ယံဝါတံဝါ မုခါရူဠံ ဝိလပိတွာ သံဃမဇ္ဈေ နိသီဒိ. इस प्रकार अतुल थेर उदास मुख वाले होकर, जो कुछ भी मुँह में आया उसे प्रलाप करते हुए संघ के बीच बैठ गए। အယံ အတုလတ္ထေရဿ ပဌမော ပရာဇယော. यह अतुल थेर की पहली पराजय थी। တတော ပစ္ဆာ ခလိတွာ ကဒ္ဒမေ ပတိတံ ပုရိသံ ပုန ဥပရိ အက္ကမန္တာဝိယ ပုန မဟာထေရာ ဧဝံ ပုစ္ဆိံသု,-ဣဒံ ဘန္တေ တဝ စူဠဂဏ္ဌိပဒံ နာမ တီသု ဝိနယမဟာဋီကာသု သာဓကဝသေန ဒဿိတံ [Pg.154] စူဠဂဏ္ဌိပဒံ ဥဒါဟု အပရန္တိ. တီသု ဝိနယမဟာဋီကာသု သာဓကဝသေန ဒဿိတံ စူဠဂဏ္ဌိပဒံယေဝ ဣဒန္တိ. ဧဝံသတိ ကသ္မာ တဝ စူဠဂဏ္ဌိပဒေယေဝ ဝုတ္တဉှိ ဝဇိရဗုဒ္ဓိဋီကာယံ, ဝုတ္တဉှိ သာရတ္ထဒီပနီဋီကာယံ, တထာ ဟိ ဝုတ္တံ ဝိမတိ ဝိနောဒနီဋီကာယန္တိ တာသံ ဝိနယမဟာဋီကာနံ ပစ္ဆာ ဟုတွာ တိဿော ဝိနယမဟာဋီကာယော သာဓကဝသေန ဒဿိတာတိ. ဧဝံ ပန ပုစ္ဆန္တော သော မယာ ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တံ တီသု ဝိနယမဟာဋီကာသု သာဓကဝသေန ဒဿိတံ စူဠဂဏ္ဌိပဒံယေဝ ဣဒန္တိ ဝစနံ သစ္စမေဝါတိ မုခါသုညတ္ထာယ ပုနပ္ပုနံ ဝဒိ. उसके बाद, जैसे कीचड़ में गिरे हुए व्यक्ति को फिर से ऊपर से कुचल रहे हों, वैसे ही महाथेरों ने फिर से इस प्रकार पूछा—"भन्ते! क्या यह आपका 'चूलगण्ठिपद' नामक ग्रंथ वही चूलगण्ठिपद है जो तीन विनय-महाटीकाओं में प्रमाण के रूप में दिखाया गया है, या कोई दूसरा?" "यह वही चूलगण्ठिपद है जो तीन विनय-महाटीकाओं में प्रमाण के रूप में दिखाया गया है।" "यदि ऐसा है, तो आपके चूलगण्ठिपद में ही ऐसा क्यों कहा गया है—'वजिरबुद्धि-टीका में कहा गया है', 'सारत्थदीपनी-टीका में कहा गया है', 'विमतिविनोदनी-टीका में वैसा ही कहा गया है'—इस प्रकार उन विनय-महाटीकाओं के बाद होकर तीनों विनय-महाटीकाओं को प्रमाण के रूप में दिखाया गया है?" ऐसा पूछने पर, उसने अपने मुँह की लाज बचाने के लिए (व्यर्थ ही) बार-बार कहा—"मेरे द्वारा पहले कहा गया वचन कि यह वही चूलगण्ठिपद है जो तीन विनय-महाटीकाओं में प्रमाण के रूप में दिखाया गया है, सत्य ही है।" ဣဒဉ္စ ဣမဿ အတ္ထဿ အာဝိဘာဝတ္ထာယ ဝတ္ထု, – और इस अर्थ को स्पष्ट करने के लिए यह कथा है— ဧကော ကိရ ပုရိသော ဧကေန သဟာယေန သဒ္ဓိံ ပုတ္တဒါရပေါသနတ္ထာယ ရညော ဘတိံ ဂဟေတွာ ယုဒ္ဓကမ္မံ ကာတုံ သင်္ဂါမံ ဂစ္ဆတိ. အထ ပရသေနာယ ယုဇ္ဈိတွာ ပရသေနာ အဘိဘဝိတွာ သဗ္ဗေ မနုဿာ အတ္တနော အတ္တနော အဘိမုခဋ္ဌာနံ ပလာယိံသု. အထ သောပိ ပုရိသော တေန သဟာယေန သဒ္ဓိံ အတ္တနော အဘိမုခဋ္ဌာနံ ပလာယိ. တောကံ ပလာယိတွာ အန္တရာမဂ္ဂေ ပရသေနာဟိ ပဟရိတဒဏ္ဍေန မုစ္ဆိတော ဟုတွာ သော ပုရိသော တေန သဒ္ဓိံ ဂန္တုံ န သက္ကာ, အန္တမသော နိသီဒိတုမ္ပိ န သက္ကာ. कहते हैं कि एक पुरुष अपने एक मित्र के साथ पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण के लिए राजा से वेतन लेकर युद्ध करने के लिए संग्राम में गया। तब शत्रु सेना से युद्ध करने पर, शत्रु सेना द्वारा पराजित होने पर, सभी मनुष्य अपनी-अपनी दिशाओं में भाग गए। तब वह पुरुष भी उस मित्र के साथ अपनी दिशा में भागा। थोड़ा भागने के बाद, रास्ते में शत्रु सेना द्वारा मारे गए डंडे से मूर्छित होकर वह पुरुष उसके साथ जाने में असमर्थ हो गया, यहाँ तक कि बैठने में भी असमर्थ हो गया। အထ သဟာယဿ ဧတဒဟောသိ,-ဣဒါနိ အယံ အတိဝိယ ဗာဠဂိလာနော ဟောတိ မရဏာသန္နော, သစာဟံ တဿ ဥပဋ္ဌဟိတွာ ဣဓေဝ နိသီဒေယျံ, ဝေရိနော အာဂန္တွာ မံ ဂဏှိဿန္တီတိ. ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ ဂိလာနဿ သန္တကာနိ ကဟာပဏဝတ္ထာဒီနိ ဂဟေတွာ တံ တတ္ထေဝ ဌပေတွာ ဂစ္ဆတိ. သကဋ္ဌာနသမီပံ ပန ပတ္တဿ တဿ ဧတဒဟောသိ,- သစေ တံ အန္တရာမဂ္ဂေ ဌပေတွာ အာဂစ္ဆာမီတိ ဝဒေယျံ, တဿ ဉာတကာ မမ ဥပရိ ဒေါသံ ရောပေဿန္တိ, ဣဒါနိ သော မရိတွာ အဟံ ဧကကောဝ အာဂစ္ဆာမီတိ ဝဒိဿာမီတိ. သကဋ္ဌာနံ ပန ပတွာ တဿ ဘရိယာ တဿ သန္တိကံ အာဂန္တွာ မယှံ ပန သာမိကော [Pg.155] ကုဟိံ ဂတော, ကတ္ထ ဌပေတွာ တွံ ဧကကောဝ အာဂစ္ဆသီတိ ပုစ္ဆိ. တဝ အယျေ သာမိကော ပရေသံ အာဝုဓေန ပဟရိတွာ ကာလင်္ကတော, ဣမာနိ တဝ သာမိကဿ သန္တကာနီတိ ဝတွာ ကဟာပဏဝတ္ထာဒီနိ ဒတွာ မာ သောစိ မာ ပရိဒေဝိ, ဣဒါနိ မတကဘတ္တံ ဒတွာ ပုညဘာဂံယေဝ ဘာဇေဟီတိ သမဿာသေသိ. အထ သာ တာနိ ဂဟေတွာ ရောဒိတွာ မတကဘတ္တံ ဒတွာ ပုညဘာဂံ ဘာဇေသိ. तब मित्र को यह विचार आया—"अब यह बहुत अधिक बीमार और मरणासन्न है, यदि मैं इसकी सेवा करते हुए यहीं बैठूँ, तो शत्रु आकर मुझे पकड़ लेंगे।" ऐसा सोचकर, बीमार के पास रखे कार्षापण (सिक्के), वस्त्र आदि लेकर उसे वहीं छोड़कर चला गया। अपने स्थान के समीप पहुँचने पर उसे यह विचार आया—"यदि मैं कहूँ कि उसे रास्ते में छोड़कर आया हूँ, तो उसके संबंधी मुझ पर दोष लगाएँगे, अब मैं कहूँगा कि वह मर गया और मैं अकेला ही आया हूँ।" अपने स्थान पर पहुँचने पर उसकी पत्नी उसके पास आई और पूछा—"मेरे स्वामी कहाँ गए, उन्हें कहाँ छोड़कर तुम अकेले आए हो?" "आर्ये! तुम्हारे स्वामी शत्रुओं के शस्त्र के प्रहार से कालगत (मृत) हो गए, ये तुम्हारे स्वामी की वस्तुएँ हैं"—ऐसा कहकर कार्षापण, वस्त्र आदि देकर उसे सांत्वना दी—"शोक मत करो, विलाप मत करो, अब मृतक-भोज (दान) देकर पुण्य का भाग बाँटो।" तब उसने वे वस्तुएँ लेकर, रोकर, मृतक-भोज देकर पुण्य का भाग बाँटा। အပရဘာဂေ ပန ထောကံ ကာလံ အတိက္ကန္တေ ဂိလာနာ ဝုဋ္ဌိတော သကဂေဟံ အာဂစ္ဆတိ. ဘရိယာပိ တံ န သဒ္ဒဟိ. အဟံ န ကာလင်္ကတော, ဂိလာနံယေဝ မံ ဌပေတွာ သော မမ သန္တကာနိ ဂဟေတွာ ဂတော, သစေ မံ တွံ န သဒ္ဒဟသိ, အဟံ အန္တောဂဗ္ဘေ နိလီယိတွာ နိသီဒိဿာမိ, တံ ပက္ကောသေတွာ ပုစ္ဆာဟီတိ အာဟ. बाद में कुछ समय बीतने पर, बीमारी से उठकर वह अपने घर आया। पत्नी ने भी उसका विश्वास नहीं किया। "मैं मरा नहीं हूँ, मुझे बीमार ही छोड़कर वह मेरा सामान लेकर चला गया, यदि तुम मेरा विश्वास नहीं करती हो, तो मैं भीतर के कमरे में छिपकर बैठ जाऊँगा, तुम उसे बुलाकर पूछना"—उसने कहा। အထ သာ တံ ပက္ကောသေတွာ ဗဟိ ဂဗ္ဘေ နိသီဒိတွာ ပုစ္ဆိ,-မမ သာမိ သာမိကော ကာလင်္ကတောတိ တံ သစ္စံ ဝါ အလိကံ ဝါတိ. သစ္စမေဝေတံ, ယံ တဝ သာမိကော ကာလင်္ကတောတိ. तब उसने उसे बुलाकर, बाहरी कमरे में बैठकर पूछा—"मेरे स्वामी कालगत हो गए, यह सच है या झूठ?" "यह सच ही है कि तुम्हारे स्वामी कालगत हो गए।" အထ သော ပုရိသော ဗဟိ ဂဗ္ဘံ နိက္ခမိတွာ အင်္ဂုလိံ ပသာရေတွာ န ဣဒါနိ ဘောသမ္မ အဟံ ကိဉ္စိ မတ္တောပိ မရာမိ, ကသ္မာ ပန အမရန္တံယေဝ မံ မတော ဧသောတိ ဝဒေသီတိ. အထ ကိဉ္စိ ဝတ္တဗ္ဗဿ ကာရဏဿ အဒိဿနတော မုခါသုညတ္ထာယ အင်္ဂုလိံ ပသာရေတွာ ဥဇုံ ဩလောကေတွာ ဣဒါနိ တွံ ဣဓ အာဂန္တုံ သမတ္ထောပိ မတောယေဝ, မတောတိ မယာ ဝုတ္တ ဝစနံ သစ္စံယေဝ, နာဟံ ကိဉ္စိ အလိကံ ဝဒါမီတိ အာဟ. ဧဝံ သော ပုနပ္ပုနံ ဝဒန္တောပိ ဇီဝမာနကဿ သံဝိဇ္ဇမာနတ္တာ ပစ္စက္ခေယေဝ စ တဿ ဌိတတ္တာ ကောစိပိ တဿ ဝစနံ န သဒ္ဒဟိ, ပရာဇယံယေဝ သော ပတ္တောတိ. तब वह पुरुष बाहरी कमरे से निकलकर उँगली दिखाते हुए बोला—"अरे भले आदमी! मैं तो थोड़ा भी नहीं मरा हूँ, फिर तुम न मरने वाले मुझे मरा हुआ क्यों कह रहे हो?" तब कहने के लिए कोई कारण न दिखने पर, मुँह की लाज बचाने के लिए उँगली फैलाकर सीधे देखते हुए उसने कहा—"भले ही तुम अब यहाँ आने में समर्थ हो, फिर भी तुम मरे हुए ही हो, मेरे द्वारा कहा गया वचन कि तुम मर गए हो, सत्य ही है, मैं कुछ भी झूठ नहीं बोल रहा हूँ।" इस प्रकार उसके बार-बार कहने पर भी, उसके जीवित होने और प्रत्यक्ष सामने खड़े होने के कारण किसी ने भी उसके वचन पर विश्वास नहीं किया, वह पराजय को ही प्राप्त हुआ। ဣစ္စေဝံ [Pg.156] အတုလတ္ထေရော မုခါသုညတ္ထာယ ဝဒန္တောပိ ကောစိ န သဒ္ဒဟိ, ပရာဇယံယေဝ သော ပတ္တောတိ. इसी प्रकार अतुल थेर के मुँह की लाज बचाने के लिए बोलने पर भी किसी ने विश्वास नहीं किया, वे पराजय को ही प्राप्त हुए। အယံ အတုလတ္ထေရဿ ဒုတိယော ပရာဇယော. यह अतुल थेर की दूसरी पराजय थी। ပုနပိ သေယျထာပိ လုဒ္ဒကော ကုဉ္ဇရံ ဒိသွာ ဧကေန ဝါရေန ဥသုနာ ဝိဇ္ဈိတွာ ပတန္တမ္ပိ ကုဉ္ဇရံ ပုန အနုဋ္ဌာဟနတ္ထာယ ကတိပယဝါရေဟိ ဥသူဟိ ဝိဇ္ဈတိ, ဧဝမေဝ ဧကဝါရေနေဝ ပရာဇယံ ပတ္တံ ပန ဝါဒဿ အနုက္ခိပနတ္ထာယ ကတိပယဝါရေဟိ ပရာဇယံ ပါပေတုံ ပါရုပနဝါဒိနော မဟာထေရာ ဧဝမာဟံသု,- တဝ စူဠဂဏ္ဌိပဒေယေဝ သာမဏေရာနံ ပရိမဏ္ဍလသုပ္ပဋိစ္ဆန္နာဒီနိ ဝတ္တာနိ အဘိန္ဒိတွာယေဝ ပဝိသိတဗ္ဗောတိ ပုဗ္ဗေ ဝတွာ စီဝရပဋလဥပရိသံဃာဋိံ ကတွာ ဥရဗန္ဓနဝတ္ထံ ဗန္ဓိတဗ္ဗန္တိ ပန ဝုတ္တံ, ကသ္မာ ပန ပုဗ္ဗေန အပရံ အသံသန္ဒိတွာ ဝုတ္တံ, တုမှာကံ ဝါဒေ ပဋိသရဏဘူတာနံ ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာဂန္ထန္တရာနံ နတ္ထိတာယ အမှာကံ ပဋိသရဏဘူတံ စူဠဂဏ္ဌိပဒန္တိ ဝဒထ, တုမှာကံ ပဋိသရဏဘူတာ စူဠဂဏ္ဌိပဒတောယေဝ ဘယံ ဥပ္ပဇ္ဇတီတိ ဝတွာ သဟ နိလီယနဋ္ဌာနေန ဂဟိတံ စောရံ ဝိယ သဟ နိဿယေန အဓမ္မဝါဒိနော ဂဏှိံသု. फिर जैसे कोई शिकारी हाथी को देखकर एक ही बार बाण से बींधकर गिरते हुए हाथी को फिर से न उठने देने के लिए कई बार बाणों से बींधता है, वैसे ही एक ही बार में पराजय प्राप्त करने वाले के वाद को फिर से न उठने देने के लिए, कई बार पराजय दिलाने हेतु पारुपणवादी महास्थविरों ने ऐसा कहा— 'तुम्हारे चूलगण्ठिपद में ही पहले यह कहकर कि सामणेरों को परिमण्डल और सुप्रतिच्छन्न आदि व्रतों को बिना तोड़े ही प्रवेश करना चाहिए, फिर यह कहा गया है कि चीवर की तह के ऊपर संघाटी रखकर उरबन्धन वस्त्र बाँधना चाहिए। पहले और बाद की बातों में सामंजस्य न बिठाकर ऐसा क्यों कहा गया है? तुम्हारे वाद में शरणभूत पालि, अट्ठकथा, टीका और अन्य ग्रन्थों के न होने के कारण तुम कहते हो कि चूलगण्ठिपद ही हमारा शरण है, अब तुम्हारे शरणभूत चूलगण्ठिपद से ही भय उत्पन्न हो रहा है।' ऐसा कहकर उन्होंने अधर्मवादियों को उनके आश्रय (ग्रन्थ) के साथ वैसे ही पकड़ लिया जैसे छिपने के स्थान के साथ चोर को पकड़ा जाता है। ဣဒံ ဣမဿ အတ္ထဿ အဝိဘာဝတ္ထာယ ဝတ္ထု, – इस अर्थ को स्पष्ट करने के लिए यह कथा है— အတီတေ ကိရ ဗာရာဏသိတော အဝိဒူရေ နဒီတီရေ ဂါမကေ ပါဋလိ နာမ နဋမစ္စော ဝသတိ. သော ဧကသ္မိံ ဥဿဝ ဒိဝသေ ဘရိယမာဒါယ ဗာရာဏသိံ ပဝိသိတွာ နစ္စိတွာ ဝီဏံ ဝါဒိတွာ ဂါယိတွာ ဓနံ လဘိတွာ ဥဿဝပရိယောသာနေ ဗဟု သုရာဘတ္တံ ဂါဟာပေတွာ အတ္တနော ဂါမံ ဂစ္ဆန္တော နဒီတီရံ ပတွာ နဝေါဒကံ အာဂစ္ဆန္တံ ဒိသွာ ဘတ္တံ ဘုဉ္ဇန္တော သုရံ ဝိဝန္တော နိသီဒိတွာ မတ္တော ဟုတွာ အတ္တနော ဗလံ အဇာနန္တော မဟာဝီဏံ ဂီဝါယ ဗန္ဓိတွာ နဒိံ ဩတရိတွာ ဂမိဿာမီတိ ဘရိယံ ဟတ္ထေ ဂဟေတွာ နဒိံ ဩတရိ. ဝီဏာဆိဒ္ဒေဟိ ဥဒကံ [Pg.157] ပါဝိသိ. အထ နံ သာ ပီဏာ ဥဒကေ ဩသီဒါပေသိ. ဘရိယာ ပနဿ ဩသီဒနဘာဝံ ဉတွာ တံ ဝိဿဇ္ဇိတွာ ဥတ္တရိတွာ နဒီတီရေ အဋ္ဌာသိ. နဋပါဋလိ သကိံ ဥမ္မုဇ္ဇတိ, သကိံ နိမ္မုဇ္ဇတိ, ဥဒကံ ပဝိသိတွာ ဥဒ္ဓုမာတဥဒရော အဟောသိ. အထဿ ဘရိယာ စိန္တေသိ,-မယှံ သာမိကော ဣဒါနိ မရိဿတိ, ဧကံ ဂီတံ ယာစိတွာ ပရိသမဇ္ဈေ တံ ဂါယန္တီ ဇီဝိတံ ကပ္ပေဿာမီတိ စိန္တေတွာ သာမိ တွံ ဥဒကေ နိမ္မုဇ္ဇသိ, ဧကံ မေ ဂီတံ ဒေဟိ, တေန ဇီဝိတံ ကပ္ပေဿာမီတိ ဝတွာ– प्राचीन काल में वाराणसी के पास नदी के किनारे एक गाँव में पाटलि नामक एक नट रहता था। वह एक उत्सव के दिन अपनी पत्नी के साथ वाराणसी गया, वहाँ नाचकर, वीणा बजाकर और गाकर धन प्राप्त किया। उत्सव की समाप्ति पर बहुत सी मदिरा और भोजन लेकर अपने गाँव लौटते समय नदी के किनारे पहुँचा। नई बाढ़ का पानी आते देख, भोजन करते और मदिरा पीते हुए वह बैठ गया। मतवाला होकर अपनी शक्ति को न जानते हुए, उसने बड़ी वीणा को गले में बाँध लिया और 'नदी पार करूँगा' कहकर पत्नी का हाथ पकड़कर नदी में उतर गया। वीणा के छेदों से पानी भीतर चला गया। तब उस वीणा ने उसे पानी में डुबो दिया। उसकी पत्नी ने उसे डूबते देख, उसे छोड़ दिया और बाहर निकलकर नदी के किनारे खड़ी हो गई। नट पाटलि कभी ऊपर आता, कभी डूबता; पानी पीकर उसका पेट फूल गया। तब उसकी पत्नी ने सोचा— 'मेरा पति अब मर जाएगा, इससे एक गीत माँग लेती हूँ, जिसे सभा के बीच गाकर मैं अपना जीवन निर्वाह करूँगी।' ऐसा सोचकर उसने कहा— 'स्वामी! आप पानी में डूब रहे हैं, मुझे एक गीत दे दीजिए, जिससे मैं अपना जीवन निर्वाह कर सकूँ।' ऐसा कहकर— ဗဟုဿုတံ စိတ္တကထံ, ဂင်္ဂါ ဝဟတိ ပါဋလိံ; ဝုယှမာနကံ ဘဒ္ဒန္တေ, ဧကံ မေ ဒေဟိ ဂါထကန္တိ. हे भदन्त! जो बहुश्रुत और विचित्र कथाएँ कहने वाला है, उस पाटलि को गंगा बहाए जा रही है। बहते हुए आप मुझे एक गाथा (गीत) दे दीजिए। အထ နံ နဋပါဋလိ ဘဒ္ဒေ ကထံ တဝ ဂီတံ ဒဿာမိ, ဣဒါနိ မဟာဇနဿ ပတိသရဏဘူတံ ဥဒကံ မံ မာရေတီတိ ဝတွာ– तब नट पाटलि ने कहा— 'भद्रे! मैं तुम्हें गीत कैसे दूँ? अब वह जल, जो जनसाधारण का शरण (जीवनदाता) है, वही मुझे मार रहा है।' ऐसा कहकर— ယေန သိဉ္စန္တိ ဒုက္ခိတံ, ယေန သိဉ္စန္တိ အာတုရံ; တဿ မဇ္ဈေ မရိဿာမိ, ဇာတံ သရဏတော ဘယန္တိ. जिससे दुखी को सींचते हैं, जिससे रोगी को सींचते हैं, उसी के बीच में मैं मरूँगा; शरण से ही भय उत्पन्न हो गया है। အထ အတုလတ္ထေရော အတ္တနော ပတိသရဏဘူတာ စူဠဂဏ္ဌိပဒတော ဘယံ ဥပ္ပဇ္ဇိတွာ ကိဉ္စိ ဝတ္တဗ္ဗံ အဇာနိတွာ အဓောမုခေါ ဟုတွာ ပရာဇာယံ ပတ္တောတိ. तब अतुल स्थविर को अपने शरणभूत चूलगण्ठिपद से ही भय उत्पन्न हो गया और कुछ भी कहने योग्य न जानकर, सिर झुकाकर वे पराजित हो गए। အယံ အတုလတ္ထေရဿ တတိယော ပရာဇယော. यह अतुल स्थविर की तीसरी पराजय थी। အထ ရာဇာ တေသံ ဒွိန္နံ ပက္ခာနံ ဝစနံ သုတွာ စူဠဂဏ္ဌိပဒဿ ပုဗ္ဗာပရဝိရောဓိဒေါသဟိ အာကုလတ္တာ သုတ္တသုတ္တာနုလောမာဒီသု အပ္ပဝိဋ္ဌတ္တာ အာဂမသုဒ္ဓိယာ စ အဘာဝတော ပရောဝဿသတံ စိရံ ဌိတဿ ဂေဟဿဝိယ အတိဒုဗ္ဗလဝသေန အထိရတံ ဇာနိတွာ ဣဒါနိ သာသနံ ပရိသုဒ္ဓံ ဘဝိဿတီတိ သောမနဿပ္ပတ္တော ဟုတွာ မမ ဝိဇိတေ သဗ္ဗေပိ ဘိက္ခူ ပါရုပနဝသေန သမာနဝါဒိကာ ဟောန္တူတိ အာဏံ ဌပေသိ. တတော [Pg.158] ပဋ္ဌာယ ယာဝဇ္ဇတနာ သကလေပိ မရမ္မရဋ္ဌေ ပါရုပနဝသေန သမာနဝါဒိကာ ဘဝန္တီတိ. तब राजा ने उन दोनों पक्षों की बात सुनकर, चूलगण्ठिपद के पूर्वापर विरोध दोषों से व्याकुल होने, सूत्र और सूत्रानुलोम आदि में प्रविष्ट न होने तथा आगम की शुद्धि के अभाव के कारण, सौ वर्षों से अधिक पुराने घर की तरह उसकी अत्यधिक दुर्बलता और अस्थिरता को जानकर, 'अब शासन परिशुद्ध होगा' ऐसा सोचकर प्रसन्नता प्राप्त की और आज्ञा दी— 'मेरे राज्य में सभी भिक्षु पारुपण (चीवर धारण करने की विधि) के विषय में समानवादी हों।' तब से लेकर आज तक संपूर्ण म्यांमार देश में पारुपण के विषय में सभी समानवादी हैं। အယမေတ္ထ သင်္ခေပေါ,-တေသဉှိ ဒွိန္နံ ပက္ခာနံ သန္နိပတိတွာ ဝစနပ္ပဋိဝစန ဝသေန ဝိဝါဒကထာ ဝိတ္ထာရေန ဝုစ္စမာနာ ဆပဉ္စသာဏဝါရမတ္တမ္ပိ ပတွာ နိဋ္ဌံ န ပါပုဏေယျ. ယသ္မာ ပန သဗ္ဗံ အနဝသေသေတွာ ဝုစ္စမာနံ အယံ သာသနဝံသပ္ပဋီပိကာ အတိပ္ပပဉ္စာ ဘဝိဿတိ, တသ္မာ ဧတ္ထ ဣစ္ဆိတမတ္တမေဝ ဒဿယိတွာ အဇ္ဈုပေက္ခာမာတိ. यहाँ यह संक्षेप है— उन दोनों पक्षों के एकत्रित होकर वचन-प्रतिवचन के माध्यम से होने वाली विवाद-कथा यदि विस्तार से कही जाए, तो पाँच-छह बार दोहराने पर भी समाप्त नहीं होगी। चूँकि सब कुछ बिना छोड़े कहने पर यह सासनवंसप्पदीपिका अत्यधिक विस्तृत हो जाएगी, इसलिए यहाँ केवल वांछित अंश को ही दिखाकर हम आगे बढ़ते हैं। ဉာဏာဘိဝံသဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇ ဂုရု ပန သံဃရာဇာ မဟာထေရော သီဟဠဒီပေ အမရပုရနိကာယိကာနံ ဘိက္ခူနံ အာဒိဘူတော အာစရိယော ဗဟူပကာရော. အမရပုရနိကာယောတိ တတ္ထေရပ္ပဘဝေါတိ. ज्ञानभिवंश धम्मसेनापति महाधर्मराजाधिराज गुरु संघराज महास्थविर श्रीलंका के अमरपुर निकाय के भिक्षुओं के आदि आचार्य और बहुत उपकारी थे। अमरपुर निकाय उन्हीं स्थविर से उत्पन्न हुआ है। ကလိယုဂေ ပန ဧကာသီတာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ တဿ ရညော နတ္တာ သိရိတြိဘဝနာဒိတျပဝရပဏ္ဍိတမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇာ နာမ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. သော ပန အမရပုရတော သင်္ကမိတွာ ရတနပူရံ စတုတ္ထံ မာပေသိ. တဿ ရညော ကာလေ ဂုဏမုနိန္ဒာဓိပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရဿ သီဿံ သဇီဝဂါမဝါသိံ သီလာစာရံ နာမ ထေရံ အရညဝါသီနံ ဘိက္ခူနံ ပါမောက္ခဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. ရာဇာဂါရနာမကေ ဒေသေ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တဿေဝ အဒါသိ. कलियुग के एक हजार एक सौ इक्यासी (1181) वर्ष बीतने पर, उस राजा के पौत्र श्रीत्रिभुवनादित्य प्रवरपण्डित महाधर्मराजाधिराज नामक राजा ने राज्य किया। उन्होंने अमरपुर से हटकर चौथी बार रत्नपुर को बसाया। उस राजा के समय में गुणमुनीन्द्राधिपति महाधर्मराजाधिराज गुरु स्थविर के शिष्य, सजीवग्रामवासी शीलाचार नामक स्थविर को अरण्यवासी भिक्षुओं के प्रमुख पद पर नियुक्त किया गया। राजागार नामक स्थान पर विहार बनवाकर उन्हें ही दान दिया। ကလိယုဂေ ဧကာသီတာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ စလင်္ဂပုရတော ပညာသီဟံ နာမ ထေရံ အာနေတွာ အသောကာရာမေ ရတနဘူမိကိတ္တိဝိဟာရေ ပတိဋ္ဌာပေသိ, မုနိန္ဒာဘိသိရိသဒ္ဓမ္မဓဇမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရူတိ နာမလဉ္ဆမ္ပိ အဒါသိ. कलियुग के एक हजार एक सौ इक्यासी (1181) वर्ष बीतने पर, चुलंगपुर से प्रज्ञासिंह नामक स्थविर को लाकर अशोकाराम के रत्नभूमिकीर्ति विहार में प्रतिष्ठित किया और उन्हें 'मुनीन्दाभिश्री सद्धम्मध्वज महाधर्मराजाधिराज गुरु' की उपाधि भी प्रदान की। ကလိယုဂေ စတူသီသာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ မုနိန္ဒာဘိဝံသဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရူတိ နာမလဉ္ဆံ ဒတွာ မဟာဇေယျဘူမိဝိဟာရရမ္မဏီယံ နာမ ဝိဟာရံ [Pg.159] ဒတွာ တံယေဝ မဟာထေရံ သံဃရာဇဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. कलियुग के एक हजार एक सौ चार वर्ष बीतने पर, 'मुनिन्दाभिवंसधम्मसेनापतिमहाधम्मराजाधिराजगुरु' नामक उपाधि देकर और 'महाजेय्यभूमिविहाररमणीय' नामक विहार देकर, उसी महाथेर को संघराज के पद पर स्थापित किया। ဧကသ္မိဉ္စ သမယေ မဟာထေရေ ရာဇာ ပုစ္ဆိ,-စတဿော ဒါဌာ နာမ စတ္တာလီသာယ ဒန္တေသု အန္တောဂဓာ ဝါ, ဥဒါဟု စတ္တာလီသာယ ဒန္တေဟိ ဝိသုံ ဘူတာတိ ပုစ္ဆိ. और एक समय राजा ने महाथेर से पूछा— "क्या चार दाढ़ें चालीस दाँतों के अंतर्गत हैं, अथवा वे चालीस दाँतों से अलग हैं?" အထ ဧကစ္စေ ထေရာ ဧဝမာဟံသု,-စတဿော ဒါဌာ နာမ စတ္တာလီသာယ ဒန္တေသု အန္တောဂဓာတိ. ဧကစ္စေ ပန စတဿော ဒါဌာ နာမ စတ္တာလီသာယ ဒန္တေဟိ ဝိသုံ ဘူတာတိ အာဟံသု. အထ ရာဇာ ဂန္ထံ အာဟရထာတိ အာဟ. အထ အန္တောဂဓဝါဒိကာ ထေရာ ဂန္ထံ အာဟရိံသု,- အညေသံ ပရိပုဏ္ဏဒန္တာနမ္ပိ ဒွတ္တိံသဒန္တာ ဟောန္တိ, ဣမဿ ပန စတ္တာလီသံ ဘဝိဿန္တီတိ စ. तब कुछ थेरों ने ऐसा कहा— "चार दाढ़ें चालीस दाँतों के अंतर्गत ही हैं।" परंतु कुछ अन्य ने कहा— "चार दाढ़ें चालीस दाँतों से अलग हैं।" तब राजा ने कहा— "ग्रंथ (प्रमाण) लाओ।" तब 'अंतर्गत' कहने वाले थेरों ने ग्रंथ प्रस्तुत किया— "अन्य पूर्ण दाँतों वालों के भी बत्तीस दाँत होते हैं, परंतु इनके (बुद्ध के) चालीस होंगे।" ဒန္တာတိ ပရိပုဏ္ဏဒန္တဿ ဒွတ္တိံသဒန္တဋ္ဌိကာနိ. တေပိ ဝဏ္ဏတော သေတာ, သဏ္ဌာနတော အနေကသဏ္ဌာနာ. တေသဉှိ ဟေဋ္ဌိမာယ တာဝ ဒန္တပါဠိယာ မဇ္ဈေ စတ္တာရော ဒန္တာ မတ္တိကာပိဏ္ဍေ ပဋိပါဋိယာ ဌပိတအာလာဗုဗီဇသဏ္ဌာနာ, တေသံ ဥဘောသု ပဿေသု ဧကေကော ဧကမူလကော ဧကကောဋိကော မလ္လိကမကုဠသဏ္ဌာနော, တတော ဧကေကော ဒွိမူလကော ဒွိကောဋိကော ယာနကဥပတ္ထမ္ဖိနိသဏ္ဌာနော, တတော ဒွေ ဒွေ တိမူလကာ တိကောဋိကာ, တတော ဒွေ ဒွေ စတုမူလကာ စတုကောဋိကာတိ. ဥပရိမာယ ဒန္တပါဠိယာပိ ဧသေဝ နယောတိ စ. 'दाँत' का अर्थ है पूर्ण दाँतों वाले व्यक्ति की बत्तीस दाँतों की हड्डियाँ। वे भी वर्ण से श्वेत और आकार से अनेक प्रकार के होते हैं। उनमें से नीचे की दंत-पंक्ति के मध्य में चार दाँत मिट्टी के पिंड में क्रम से रखे हुए लौकी के बीज के आकार के होते हैं; उनके दोनों ओर एक-एक दाँत एक मूल (जड़) और एक नोक वाला मल्लिका (मोगरे) की कली के आकार का होता है; उसके बाद एक-एक दाँत दो मूल और दो नोक वाला पालकी के आधार (उपस्तम्भ) के आकार का होता है; उसके बाद दो-दो दाँत तीन मूल और तीन नोक वाले, और उसके बाद दो-दो दाँत चार मूल और चार नोक वाले होते हैं। ऊपर की दंत-पंक्ति का भी यही नियम है। တဿ ကိရ ဥတ္တရောဋ္ဌအပ္ပကတာယ တိရိယံ ဖာလေတွာ အပနီတဒ္ဓံဝိယ ခါယတိ, စတ္တာရော ဒန္တေ ဒွေ စ ဒါဌာ န ဆာဒေတိ, တေန နံ ဩဋ္ဌဒ္ဓေါတိ ဝေါဟရန္တီတိ စ. सुना जाता है कि उसके ऊपरी होंठ की अपूर्णता के कारण, वह तिरछा फटा हुआ और आधा हटा हुआ सा दिखाई देता है, वह चार दाँतों और दो दाढ़ों को नहीं ढकता है, इसलिए उसे 'ओट्ठद्ध' (कटे होंठ वाला) कहा जाता है। တတ္ထ တဿာတိ လိစ္ဆဝိနော နာမ ရာဇကုမာရဿ, ဥတ္တရောဋ္ဌအပ္ပကတာယာတိ ဥပရိ ဩဋ္ဌဿ အပ္ပကတာယ. အပနီတဒ္ဓံ ဝိယာတိ ဥပရိ ဩဋ္ဌဿ ဥပဍ္ဎဘာဂံ အပနီတံ ဝိယ ခါယတီတိ အတ္ထော. န ဆာဒေတီတိ ဥပရိ ဩဋ္ဌဿ ဥပဍ္ဎဘာဂေ ပန န ပဋိစ္ဆာဒေတိ. တေနာဟိ ယေန စတ္တာရော ဒန္တေ ဒွေ စ ဒါဌာ န ဆာဒေတိ, တေန နံ လိစ္ဆဝီရာဇကုမာရံ ဩဋ္ဌဒ္ဓေါတိ ဝေါဟရန္တီတိ[Pg.160]. ဧဝံ အန္တောဂဓဝါဒေဟိ ထေရေဟိ ဂန္ထံ အာဟရိတွာ ဒဿိတေ သဗ္ဗေပိ တသ္မိံ ဝါဒေ ပတိဋ္ဌဟိံသူတိ. वहाँ 'तस्स' का अर्थ है— लिच्छवि नामक राजकुमार का। 'उत्तरीट्ठअप्पकताय' का अर्थ है— ऊपरी होंठ की अपूर्णता से। 'अपनीतद्धं विय' का अर्थ है— ऊपरी होंठ का आधा भाग हटा हुआ सा दिखाई देता है। 'न छादेति' का अर्थ है— ऊपरी होंठ के आधे भाग को नहीं ढकता है। चूँकि वह चार दाँतों और दो दाढ़ों को नहीं ढकता है, इसलिए उस लिच्छवि राजकुमार को 'ओट्ठद्ध' कहते हैं। इस प्रकार 'अंतर्गत' वाद वाले थेरों द्वारा ग्रंथ लाकर दिखाने पर, सभी उस वाद पर स्थिर हो गए। ဧကသ္မိဉ္စ ကာလေ ရာဇာ မန္တိနိံ အမစ္စံ ပုစ္ဆိ,-ပုဗ္ဗရာဇူဟိ ဝိဟာရဿ စေတိယဿ ဝါ ဒိန္နာနိ ခေတ္တဝတ္ထုအာဒီနိ ပစ္ဆိမရာဇူနံ ကာလေ ယထာဒိန္နံ တာနိ ပတိဋ္ဌဟန္တိ ဝါ မာ ဝါတိ. और एक समय राजा ने मंत्री-अमात्य से पूछा— "पूर्व राजाओं द्वारा विहार या चैत्य के लिए दिए गए खेत-वस्तु (भूमि-संपत्ति) आदि क्या बाद के राजाओं के काल में वैसे ही बने रहते हैं या नहीं?" အထ မန္တိနိအာမစ္စော ဧဝံ ကထေသိ,- သံဃိကာယ ဘူမိယာ ပုဂ္ဂလိကာနိ ဗီဇာနိ ရောပယန္တိ, ဘာဂံ ဒတွာ ပရိဘုဉ္ဇိတဗ္ဗာနီတိ ဒသကောဋ္ဌာသေ ကတွာ ဧကော ကောဋ္ဌာသော ဘူမိဿာမိကာနံ ဒါတဗ္ဗောတိ စ ဝိနယပါဠိအဋ္ဌကထာသု ဝုတ္တတ္တာ ပုဗ္ဗေ ဧကေန ရညာ ဒိန္နာနိ ခေတ္တဝတ္ထုအာဒီနိ ပစ္ဆာ ဧကဿ ရညော ကာလေ ယထာဒိန္နံ ဌိတာနိ. ဧတ္ထ ဟိ သံဃိကာယ ဘူမိယာတိ ဝုတ္တတ္တာ လာဘသီမာယံဝိယ ဗလိံယေဝ အဒတွာ သဟ ဘူမိယာ ဒိန္နတ္တာ ပဝေဏီဝသေန သံဃိကာ ဘူမိ အတ္ထီတိ ဝိညာယတိ. ဧတ္ထစ ပဋိဂ္ဂါဟကေသု မတေသု တဒညော စတုဒ္ဒိသသံဃော အနာဂတသံဃော စ ဣဿရော, တဿ သန္တကော, တေန ဝိစာရေတဗ္ဗောတိ. तब मंत्री-अमात्य ने इस प्रकार कहा— "सांघिक भूमि पर व्यक्तिगत बीज बोते हैं, तो भाग देकर उपभोग करना चाहिए— ऐसा कहकर दस भाग करके एक भाग भू-स्वामी को देना चाहिए, यह विनयपालि और अट्ठकथाओं में कहा गया है; इसलिए पूर्व में एक राजा द्वारा दिए गए खेत-वस्तु आदि बाद के राजा के काल में भी वैसे ही स्थित रहते हैं। यहाँ 'सांघिक भूमि' कहने से यह ज्ञात होता है कि लाभ-सीमा की तरह केवल कर न देकर, भूमि के साथ ही दान दिए जाने के कारण परंपरा से वह सांघिक भूमि है। और यहाँ दान लेने वालों की मृत्यु हो जाने पर, अन्य चातुर्दिश संघ और अनागत संघ उसका स्वामी होता है, वह उसकी संपत्ति है, और उसी के द्वारा उसका प्रबंध किया जाना चाहिए।" စေတိယ ပဒီပတ္ထာယ ပဋိသင်္ခါရဏတ္ထာယ ဝါ ဒိဣန္နအာရာမောပိ ဇဂ္ဂိတဗ္ဗော, ဝေတ္တနံ အတွာပိ ဇဂ္ဂါပေတဗ္ဗောတိ စေတိယေ ဆတ္တံ ဝါ ဝေဒိကံ ဝါ ဇိဏ္ဏံ ဝါ ပဋိသင်္ခရောန္တေန သုဓာကမ္မာဒီနိ ဝါ ကရောန္တေန စေတိယဿ ဥပနိက္ခေပတော ကာရေတဗ္ဗန္တိ စ အဋ္ဌကထာယံ ဝုတ္တတ္တာ ပုဗ္ဗရာဇူဟိ စေတိယဿ ဒိန္နာနိ ခေတ္တဝတ္ထုအာဒီနိ ပစ္ဆိမရာဇူနံ ကာလေပိ စေတိယသန္တကသာဝေနေဝ ဌိတာနီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. "चैत्य के दीप के लिए या मरम्मत के लिए दिया गया आराम (उपवन) भी संरक्षित किया जाना चाहिए, वेतन देकर भी उसकी रक्षा करवानी चाहिए; चैत्य में छत्र या वेदिका के जीर्ण होने पर उसकी मरम्मत करने वाले या सफेदी आदि का कार्य करने वाले को चैत्य के निक्षेप (कोष) से कार्य करवाना चाहिए"— ऐसा अट्ठकथा में कहे जाने के कारण, पूर्व राजाओं द्वारा चैत्य को दिए गए खेत-वस्तु आदि बाद के राजाओं के काल में भी चैत्य की संपत्ति के रूप में ही स्थित रहते हैं, ऐसा जानना चाहिए। အထာပရမ္ပိ ပုစ္ဆိ,- ကဒါ ကဿ ရညော ကာလေ အာဒိံ ကတွာ ခေတ္တဝတ္ထုအာဒီနိ ဝိဟာရဿ စေတျဿ ဝါ ဒိန္နာနီတိ. फिर उसने एक और प्रश्न पूछा— "कब और किस राजा के काल से आरंभ होकर विहार या चैत्य को खेत-वस्तु आदि दिए गए?" အထ မန္တိနမစ္စော ဧဝမာဟ,-ပုရိမကပ္ပေသု ပုရိမာနံ ရာဇူနံ ကာလေပိ ဝိဟာရဿ စေတိယဿ ဝါ ဒိန္နာနီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ, တေနေဝ သုဇာတဿ နာမ ဘဂဝတော အမှာကံ ဗောဓိသတ္တော [Pg.161] စက္ကဝတ္တိရာဇာ သဒ္ဓိံ သတ္တဟိ ရတနေဟိ ဒွိသဟဿေ ခုဒ္ဒကဒီပေ စတ္တာရော မဟာဒီပေ စ အဒါသိ, ရဋ္ဌဝါသိနော စ အာရာမဂေါပကကိစ္စံ ကာရာပေသီတိ ဂန္ထေသု အာဂတံ, တသ္မာ စိရကာလတောယေဝ ပဋ္ဌာယ ပုဗ္ဗရာဇူဟိ ခေတ္တဝတ္ထုအာဒိနိ ဒိန္နာနီတိ ဝေဒိတဗ္ဗာနိ. तब मंत्री-अमात्य ने इस प्रकार कहा— "पूर्व कल्पों में पूर्व राजाओं के काल में भी विहार या चैत्य को दान दिए गए थे, ऐसा जानना चाहिए। इसीलिए सुजात नामक भगवान के समय हमारे बोधिसत्व चक्रवर्ती राजा ने सात रत्नों के साथ दो हजार छोटे द्वीपों और चार महाद्वीपों को दान में दिया था, और राष्ट्रवासियों से आराम-रक्षक का कार्य करवाया था— ऐसा ग्रंथों में आया है। इसलिए प्राचीन काल से ही पूर्व राजाओं द्वारा खेत-वस्तु आदि दिए गए हैं, ऐसा जानना चाहिए।" ရာဇဝံသေသုပိ ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနတော ဝဿသတာနံ ဥပရိ သိရိခေတ္တနဂရေ ဧကာယ အာပူပိကာယ ပဉ္စကရီသ မတ္တံ ခေတ္တံ ဧကဿ ထေရဿ ဒိန္နံ, တံ ဒွတ္တပေါင်္ကော နာမ ရာဇာ ဝိလုမ္ပိတွာ ဂဏှိ. အထ ပဟာရဃဏ္ဋဘေရိယော ပဟရိတာပိ သဒ္ဒံ န အကံသု. ရညော ကုန္တစက္ကမ္ပိ ယထာ ပုဗ္ဗေ, တထာ ပေသိတဋ္ဌာနံ န ဂစ္ဆိ. အထ တံ ကာရဏံ ဉတွာ အာပူပိကာယ ယထာဒိန္နမေဝ ထေရဿ နိယျာဒေသီတိ. राजवंशों में भी, भगवान के परिनिर्वाण के सौ वर्षों से अधिक समय बाद, श्रीक्षेत्र नगर में एक मालपुआ बेचने वाली (आपूपिका) द्वारा एक थेर को लगभग पाँच करीस खेत दान में दिया गया था, जिसे द्वत्तपोंक नामक राजा ने छीन लिया। तब प्रहार करने पर भी घंटों और भेरियों ने शब्द नहीं किया। राजा का कुन्त-चक्र (भाला-चक्र) भी पहले की तरह भेजे गए स्थान पर नहीं गया। तब उस कारण को जानकर, उसने मालपुआ बेचने वाली द्वारा दिए गए दान के अनुसार ही वह खेत थेर को वापस लौटा दिया। ကလိယုဂေ ပန နဝနဝုတာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ တဿ ကနိဋ္ဌော သိရိပဝရာဒိတျလောကာပေတိ ဝိဇယမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာနာ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ, သော ပန ရာဇာ ရတနပူရတော သင်္ကမိတွာ အမရပုရံ ဒုတိယံ မာပေသိ. တဿ ရညော ရဇ္ဇံ ပတ္တသံဝစ္ဆရေယေဝ ဇေဋ္ဌမာသဿ ဇုဏှပက္ခပဉ္စမိယံ ရတနပူရနဂရေ မာရဝိဇယရတနသုဓမ္မာယ နာမ ပိဋကသာလာယ သူရိယဝံသဿ နာမ ထေရဿ ပရိသမဇ္ဈေ ရာဇလေခနံ ဝါစာပေတွာ သံဃရဇ္ဇံ နိယျာဒေသိ. သူရိယဝံသာဘိသိရိပဝရာလင်္ကာရဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရူတိ နာ မလဉ္ဆမ္ပိ အဒါသိ. कलियुग के एक हजार एक सौ निन्यानवे (११९९) वर्ष बीतने पर, उनके छोटे भाई सिरिपवरादित्यलोकापेति विजयमहाधम्मराजाधिराज ने राज्य किया। उस राजा ने रतनपुर से हटकर दूसरी बार अमरपुर का निर्माण किया। उस राजा के राज्य प्राप्ति के वर्ष में ही, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को रतनपुर नगर में मारविजयरतनसुधम्मा नामक पिटकशाला में सूरियवंस नामक स्थविर की परिषद के मध्य राजलेख पढ़वाकर संघराज्य उन्हें सौंप दिया। उन्हें 'सूरियवंसाभिसिरिपवरालङ्कारधम्मसेनापतिमहाधम्मराजाधिराजगुरु' की उपाधि भी प्रदान की। သော ပန ထေရော ကလိယုဂေ ပဉ္စဝီသာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေ စ သမ္ပတ္တေ မိဂသိရမာသဿ ဇုဏှပက္ခသတ္တမိယံ သုတ္တဝါရေ ဝါလုကဝါပိဂါမေ ပဋိသန္ဓိယာ ဝိဇာတောတိသတ္တတိဝယံ သမ္ပတ္တေ သံဃရဇ္ဇံ ပတ္တော သန္တိန္ဒြိယော ခန္တီ ဓမ္မော သိက္ခာကာမော ပရိယတ္တိဝိဟာရဒေါ တိပိဋကာလင်္ကာရမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရဿ သိဿော. သော ပန ကလိယုဂေ ပန္နရသာဓိကေ [Pg.162] ဒွိဝဿသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ တဿ ရညော ကာလေယေဝ မစ္စုဝသံ ပတ္တော. वह स्थविर कलियुग के एक हजार एक सौ पच्चीस (११२५) वर्ष बीतने पर मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को शनिवार के दिन वालुकवापि ग्राम में उत्पन्न हुए थे। तिहत्तर (७३) वर्ष की आयु प्राप्त करने पर वे संघराज्य के पद पर पहुँचे। वे शान्त इन्द्रियों वाले, क्षमावान्, शिक्षा के प्रेमी, पर्यत्ति (शास्त्र) में निपुण और टिपिटकालङ्कारमहाधम्मराजगुरु स्थविर के शिष्य थे। वे कलियुग के एक हजार दो सौ पन्द्रह (१२१५) वर्ष बीतने पर उसी राजा के काल में ही मृत्यु के वश में हो गए। အထ ရာဇာ အနေကသဟဿေဟိ ပါသာဒေဟိ အဘူတပုဗ္ဗေဟိ အစ္ဆရိယကမ္မေဟိ သရီရဈာပနကိစ္စံ အကာသိ. အထ ကလိယုဂေ သေဠသာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ တဿ မဟာထေရဿ သိဿံ ဉေယျဓမ္မံ နာမ ထေရံ ပုန သံဃရာဇဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. ပဌမံ ဉေယျဓမ္မာလင်္ကာရဓမ္မ သေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရူတိ နာမလဉ္ဆံ အဒါသိ. တတော ပစ္ဆာ ဒုတိယံ ဉေယျဓမ္မာဘိဝံသသိရိပဝရာလင်္ကာရဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇ- ဂုရူတိ နာမလဉ္ဆံ အဒါသိ. तब राजा ने हजारों प्रासादों (मंडपों) और अभूतपूर्व आश्चर्यजनक कार्यों के साथ उनके शरीर का दाह-संस्कार किया। इसके बाद कलियुग के एक हजार एक सौ सोलह (१११६) वर्ष बीतने पर, उस महास्थविर के शिष्य 'ज्ञेयधम्म' नामक स्थविर को पुनः संघराज के पद पर स्थापित किया। पहले उन्हें 'ज्ञेयधम्मलङ्कारधम्मसेनापतिमहाधम्मराजाधिराजगुरु' की उपाधि प्रदान की। उसके बाद दूसरी बार 'ज्ञेयधम्माभिवंससिरिपवरालङ्कारधम्मसेनापतिमहाधम्मराजाधिराजगुरु' की उपाधि प्रदान की। သော ပန ထေရော ကလိယုဂေ ဧကသဋ္ဌာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေစ ဒေဝသူရဂါမေ ပဋိသန္ဓိယာ ဝိဇာတော ဟုတွာ အသီတာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေစ ပဌမအာသာဠိမာသဿ ဇုဏှပက္ခစုဒ္ဒသမိယံ ဥပသမ္ပဒဘူမိံ ပတ္တော. वे स्थविर कलियुग के एक हजार एक सौ इकसठ (११६१) वर्ष बीतने पर देवसूरग्राम में उत्पन्न हुए थे और एक हजार एक सौ अस्सी (११८०) वर्ष बीतने पर प्रथम आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उपसम्पदा के पद को प्राप्त हुए। တဿ ရညော ကာလေ ကလိယုဂေ နဝနဝုတာဓိကေ ဝဿသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ သီဟဠဒီပတော ပညာတိဿော နာမ ထေရော သဒ္ဓိံ သုနန္ဒေန နာမ ဘိက္ခုနာ ဣန္ဒသာရေန နာမ သာမဏေရေန ဧကေန ဥပါသကေန ဧကေန ဒါရကေနစ အမရပုရံ နာမ နဂရံ သမ္ပတ္တော. အထ သံဃရာဇာ တေသံ ပစ္စယာနုဂ္ဂဟေန ဓမ္မာနုဂ္ဂဟေစ အနုဂ္ဂဟေသိ. တေသု အပရဘာဂေ ကလိယုဂေ ဒွိဝဿာဓိကေ ဒွိသတေ ဝဿသဟဿေစ သမ္ပတ္တေ ပညာတိဿတ္ထေရော ဇရရောဂေန အဘိဘူတတ္တာ သင်္ခါရဓမ္မာနံ သဘာဝံ အနတိဝတ္တတ္တာ ကာလမကာသိ. တဿ ပုန သိက္ခံ ဂဏှိဿာမီတိ ပရိဝိတက္ကော မတ္ထကံ အပ္ပတ္တော ဟုတွာ ဝိနဿယိ. တေနာဟဘဂဝါ, – उस राजा के काल में कलियुग के एक हजार एक सौ निन्यानवे (११९९) वर्ष बीतने पर सिंहल द्वीप से पञ्ञातिस्स नामक स्थविर, सुनन्द नामक भिक्षु, इन्दसार नामक सामणेर, एक उपासक और एक बालक के साथ अमरपुर नगर पहुँचे। तब संघराज ने प्रत्ययों और धर्म के अनुग्रह से उनकी सहायता की। उनमें से बाद में कलियुग के एक हजार दो सौ दो (१२०२) वर्ष बीतने पर, पञ्ञातिस्स स्थविर वृद्धावस्था और रोग से अभिभूत होने के कारण, संस्कारों के स्वभाव को न लाँघ पाने के कारण काल कर गए। उनकी 'पुनः शिक्षा ग्रहण करूँगा' यह सोच पूर्णता तक नहीं पहुँच पाई और नष्ट हो गई। इसीलिए भगवान ने कहा है— အစိန္တိတမ္ပိ [Pg.163] ဘဝတိ, စိန္တိ တမ္ပိ ဝိနဿတိ; န ဟိ စိန္တာမယာ ဘောဂါ, ဣတ္ထိယာ ပုရိသဿ ဝါတိ. "अचिन्तित भी हो जाता है और चिन्तित भी नष्ट हो जाता है; स्त्री या पुरुष के भोग केवल चिन्तन मात्र से सिद्ध नहीं होते।" ဣမသ္မိံ ပန လောကေ ပဏ္ဍိတော ပုညံ ကတ္တုကာမော အဘိတ္ထရေဝ ကရေယျ. ကော နာမ ဇညာ အဇ္ဇေ ဝါ သုဝေ ဝါ ပရသုဝေ ဝါ မရဏံ ဘဝိဿဘီတိ. တေနာဟ ဘဂဝါ, – इस लोक में पुण्य करने का इच्छुक पण्डित व्यक्ति शीघ्रता से पुण्य करे। कौन जानता है कि मृत्यु आज होगी, कल होगी या परसों होगी। इसीलिए भगवान ने कहा है— အဘိတ္ထရေထ ကလျာဏေ, ပါပါ စိတ္တံ နိဝါရယေ; ဒန္ဒဉှိ ကရတော ပုညံ, ပါပသ္မိံ ရမတီ မနောတိ. "कल्याण करने में शीघ्रता करें, पाप से चित्त को रोकें; क्योंकि पुण्य करने में सुस्ती करने वाले का मन पाप में रमने लगता है।" အထ မဟာရာဇာ တဿ သရီရဈာပနကိစ္စံ ဗဟူဟိ သာဓုကီဠနသဘာယေဟိ အကာသိ. တတော ပစ္ဆာ သုနန္ဒဿ နာမ ဘိက္ခုဿ ပုန သိက္ခံ အဒါသိ. သာမဏေရံ ပန ဥပသမ္ပဒဘူမိယံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. ဒါရကဉ္စ သာမဏေရဘူမိယန္တိ. तब महाराज ने अनेक उत्सवों के साथ उनके शरीर का दाह-संस्कार किया। उसके बाद सुनन्द नामक भिक्षु को पुनः शिक्षा दी। सामणेर को उपसम्पदा के पद पर और बालक को सामणेर के पद पर प्रतिष्ठित किया। တေ ပန မဟာရာဇာ ကလိယုဂေ တိဝဿာဓိကေ ဒွိသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ မာဃမာသေ ဗဟူဟိ ပစ္စယေဟိ ဥပတ္ထမ္ဘေတွာ တာနိတာနိ သဗ္ဗာနိ ကမ္မာနိ တီရေတွာ ကုသိမနဂရဇေဋ္ဌဿ ဧကဿ အမစ္စဿ ဘာရံ ကတွာ တဿေဝ သဗ္ဗာနိ ကိစ္စာနိ နိယျာဒေတွာ သီဟဠဒီပံ ပဟိဏီတိ. उन सबको महाराज ने कलियुग के एक हजार दो सौ तीन (१२०३) वर्ष बीतने पर माघ मास में अनेक प्रत्ययों से उपकृत कर, उन सभी कार्यों को पूरा कर, कुसिमनगर के एक प्रधान अमात्य को भार सौंपकर और उन्हें ही सभी कार्यों की जिम्मेदारी देकर सिंहल द्वीप भेज दिया। သံဃရာဇာမဟာထေရော ပန သာသနဿ စိရဋ္ဌိတတ္ထာယ သောတာရာနံ သုခပ္ပဋိဗောဓနတ္ထာယ နာနာဂန္ထေဟိ ပါဌံ ဝိသောဓေတွာ သဒ္ဓမ္မပ္ပဇ္ဇောတိကာယ နာမ မဟာနိဒ္ဒေသဋ္ဌကထာယ အတ္ထယောဇနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. ဗဟူနံ သိဿာနံ ပရိယတ္တိဝါစနဝသေန ဇိနသာသနဿ အနုဂ္ဂဟံ အကာသီတိ. संघराज महास्थविर ने शासन की चिरस्थायित्व के लिए और श्रोताओं के सुखपूर्वक बोध के लिए अनेक ग्रन्थों से पाठ का शोधन कर 'सद्धम्मप्पज्जोतिका' नामक महानिद्देस-अट्ठकथा की 'अत्थयोजना' मरम्म भाषा में की। उन्होंने बहुत से शिष्यों को पर्यत्ति पढ़ाने के माध्यम से जिन-शासन का अनुग्रह किया। အပရဘာဂေ ကလိယုဂေ အဋ္ဌဝဿာဓိကေ ဒွိသကေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ မိဂသိရမာသဿ ဇုဏှပက္ခအဋ္ဌမိယံ တဿ ပုတ္တော သီရိပဝရာဒိတျဝိဇယာနန္တယသမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇာ နာမ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. တဒါ သူရိယဝံသာဘိသိရိပဝရာလင်္ကာရဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရု- မဟာထေရဿ သိဿံ ပညာဇောတာဘိဓဇမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရံ [Pg.164] သံဃရာဇဋ္ဌာနေ ဌပေသိ. बाद में कलियुग के एक हजार दो सौ आठ (१२०८) वर्ष बीतने पर मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को उनके पुत्र सिरिपवरादित्यविजयानन्तयसमहाधम्मराजाधिराज ने राज्य किया। तब उन्होंने सूरियवंसाभिसिरिपवरालङ्कारधम्मसेनापतिमहाधम्मराजाधिराजगुरु महास्थविर के शिष्य पञ्ञाजोताभिधजमहाधम्मराजाधिराजगुरु स्थविर को संघराज के पद पर स्थापित किया। သောပိ သီလဝါ ပရိယတ္တိကောဝိဒေါ သိက္ခာကာမော လဇ္ဇီပေသလော. အင်္ဂုတ္တရနိကာယပါဠိယာ တဒဋ္ဌကထာယစ အတ္ထ ယောဇနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. वे भी शीलवान्, पर्यत्ति में निपुण, शिक्षा के प्रेमी, लज्जावान् और शीलवान् थे। उन्होंने अङ्गुत्तरनिकाय पालि और उसकी अट्ठकथा की 'अत्थयोजना' मरम्म भाषा में की। တဿ ရညော ကာလေ ဉေယျဓမ္မာဘိဝံသသိရိပဝရာလင်္ကာရဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇ- ဂုရုတ္ထေရော သဒ္ဓမ္မဝိလာသိနိယာ နာမ ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂဋ္ဌကထာယ အတ္ထယောဇနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. उस राजा के काल में ज्ञेयधम्माभिवंससिरिपवरालङ्कारधम्मसेनापतिमहाधम्मराजाधिराजगुरु स्थविर ने 'सद्धम्मविलासिनी' नामक पटिसम्भिदामग्ग-अट्ठकथा की 'अत्थयोजना' मरम्म भाषा में की। မဏိဇောတသဒ္ဓမ္မာလင်္ကာရမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရောသံယုတ္တ- နိကာယပါဠိယာ တဒဋ္ဌကထာယစ အတ္ထယောဇနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. मणिजोतसद्धम्मलङ्कारमहाधम्मराजाधिराजगुरु स्थविर ने संयुत्तनिकाय पालि और उसकी अट्ठकथा की 'अत्थयोजना' मरम्म भाषा में की। မေဓာဘိဝံသသဒ္ဓမ္မဓဇမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရော ဒီဃနိကာယပါဠိယာ တဒဋ္ဌကထာယစ အတ္ထယောဇနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. मेधाभिवंस सद्धम्मध्वज महाधम्मराजाधिराजगुरु स्थविर ने दीघनिकाय पालि और उसकी अट्ठकथा की 'अत्थयोजना' (अर्थ-योजना) बर्मी भाषा में की। ဉေယျဓမ္မာဘိဝံသသိရိပဝရာလင်္ကာရဓမ္မသေနာပတိမဟာ ဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရဿ သိဿော ဥပသမ္ပဒါဝသေန ပဉ္စဝဿိကော ပညာသာမိ နာမာဟံ သဒ္ဒတ္ထဘေဒစိန္တာနာမကဿဂန္ထဿ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝဏ္ဏနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိံ. ဒသဝဿိကကာလေ ပန အဘိဓာနပ္ပဒီပိကာသံဝဏ္ဏနာယ အတ္ထယောဇနံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိံ. တဿာစ ပါဌံ ဗဟူဟိ ဂန္ထေဟိ သံသဒ္ဒိတွာ ဝိသောဓေသိန္တိ. ज्ञेयधम्माभिवंस सिरिपवर अलङ्कार धम्मसेनापति महाधम्मराजाधिराजगुरु स्थविर के शिष्य, उपसम्पदा से पाँच वर्ष के (पञ्चवस्सिक), मुझ पञ्ञासामि नामक (भिक्षु) ने 'सद्दत्थभेदचिन्ता' नामक ग्रन्थ की 'गण्ठिपदत्थवण्णना' (कठिन पदों की व्याख्या) बर्मी भाषा में की। फिर दस वर्ष की आयु (दीक्षा काल) में 'अभिधानप्पदीपिका-संवण्णना' की 'अत्थयोजना' बर्मी भाषा में की। और उसके पाठ को अनेक ग्रन्थों से मिलाकर संशोधित किया। အပရဘာဂေ သက္ကရာဇေ စုဒ္ဒသာဓိကေ ဒွိသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ အယံ အမှာကံ ဓမ္မိကော ရာဇာ အနေကသတဇာတီသု ဥပစိတပုညာနုဘာဝေန ဇိနသာသနဿ ပဂ္ဂဏှနတ္ထာယ သမ္မာဒေဝလောကပါလေဟိ ဥယျောဇိယနောဝိယရဇ္ဇသမ္ပတ္တိံ ပဋိလဘိ. ဒသဗလဿသာသနံ ပဂ္ဂဏှိတုကာမဿ ဓမ္မရာဇဿ မနောရထော မတ္ထကံ ပတ္တော အဟောသိ. မရိယာဒံ ဘိန္ဒိတွာ ဒိန္နကတမဂ္ဂံဝိယ ဥဒကံ လဒ္ဓေါကာသတာယ သဒ္ဓါ မဟောဃော [Pg.165] အဝတ္ထရိတွာ တိဋ္ဌတိ. စတ္တာရိစ ဝဿာနိ အတိက္ကမိတွာ ဗေသာခမာသေ ပဉ္စကကုဓဘဏ္ဍာဒီဟိ အနေကေဟိ ရာဇဘောဂ္ဂဘဏ္ဍေဟိ ပရိဝါရေတွာ ဥဒုမ္ဗရဘဒ္ဒပိဋ္ဌေ သဒ္ဓိံ မဟေသိယာ အဘိသေကံ ပတ္တော. တေနာဝေါစုမှာ နာဂရာဇုပ္ပတ္တိကထာယံ,- बाद में, जब सकराज (बर्मी संवत) एक हजार दो सौ चौदह (१२१४) हुआ, तब हमारे इस धार्मिक राजा ने अनेक सौ जन्मों में संचित पुण्यों के प्रभाव से, जिन-शासन (बुद्ध शासन) की उन्नति के लिए, मानो सम्यक् लोकपालों द्वारा प्रेरित होकर राज्य-सम्पत्ति प्राप्त की। दशबल (बुद्ध) के शासन की उन्नति चाहने वाले उस धर्मराज का मनोरथ पूर्ण हुआ। मर्यादा तोड़कर मार्ग पा लेने वाले जल के समान, अवसर पाकर श्रद्धा का महावेग उमड़ पड़ा। चार वर्ष बीतने पर, वैशाख मास में, पाँच राज-चिह्नों (ककुधभण्ड) आदि अनेक राजभोग्य वस्तुओं से घिरे हुए, उदुम्बर (गूलर) की भद्रपीठ पर अपनी महर्षि (पटरानी) के साथ उन्होंने अभिषेक प्राप्त किया। इसीलिए हमने 'नागराजुप्पत्तिकथा' में कहा है— မဟာပုညောဝ ရာဇာယံ, ကဋ္ဌဋဃေဝ အာဂတေ; သက္ကရာဇေ ဟိ သမ္ပတ္တိံ, ပတွာ ဒါနေ ရတော ဝတေ. यह राजा महान पुण्यात्मा है, जो कठिन समय बीत जाने पर आया है; सकराज (संवत) में सम्पत्ति प्राप्त कर, वह निश्चय ही दान में लीन है। တဒါ စတ္တာရိ ဝဿာနိ, အတိက္ကမိတွာ ဝိသာဓိကေ; သဒ္ဓိံ မဟေသိယာ သေကံ, ပတ္တော ဟုတွာ မဟာတလေ. तब (संवत १२१४ के बाद) चार वर्ष बीतने पर, उस महान पृथ्वीतल पर अपनी महर्षि (पटरानी) के साथ उन्होंने अभिषेक प्राप्त किया। ဇိနစက္ကဉ္စ ဇောတေသိ, မဟာသောကာဒယော ယထာ; အလဇ္ဇိနောစ နိဂ္ဂယှ, ပဂ္ဂဟေတွာန လဇ္ဇိနော. उन्होंने जिन-चक्र (बुद्ध-शासन) को उसी प्रकार प्रकाशित किया जैसे महाशोक (अशोक) आदि ने; निर्लज्ज (दुःशील) भिक्षुओं का निग्रह कर और लज्जावान (शीलवान) भिक्षुओं का प्रग्रह (सम्मान) कर। ရဋ္ဌေစ ဒါနသီလေသု, ဘာဝနာယာဘိယုဉ္စယေ; နိမိရာဇာဒယော ယထာတိ. और राष्ट्र में दान, शील और भावना में (प्रजा को) उसी प्रकार नियुक्त किया जैसे निमिराज आदि ने। တဒါ ယသ္မာ အလဇ္ဇိနော နိဂ္ဂဟိတဗ္ဗပုဂ္ဂလေ အဝီစိနရကေ နိက္ခိပန္တောဝိယ နိဂ္ဂဟကမ္မံ အကာသိ, တသ္မာ တေ အလဒ္ဓေါကာသာ နိလီယန္တိ, ယထာ အရုဏုဂ္ဂမနကာလေ ကောသိယာတိ. တေနာဝေါစုမှာ နာဂရာဇုပ္ပတ္တိကထာယံ,- तब चूँकि उन्होंने निर्लज्ज और निग्रह के योग्य व्यक्तियों का, मानो उन्हें अवीचि नरक में फेंकते हुए, निग्रह-कर्म किया, इसलिए वे अवसर न पाकर वैसे ही छिप गए जैसे सूर्योदय के समय उलूक (उल्लू)। इसीलिए हमने 'नागराजुप्पत्तिकथा' में कहा है— တဒါ ပန ဇိနစက္ကံ, နဘေ စန္ဒောဝ ပါကဋံ; အလဇ္ဇိနော နိလီယန္တိ, အရုဏုဂ္ဂေဝ ကောသိယာတိ. तब जिन-चक्र आकाश में चन्द्रमा के समान प्रकट हुआ; निर्लज्ज वैसे ही छिप गए जैसे सूर्योदय होने पर उलूक। ယသ္မာစ လဇ္ဇိနော ပဂ္ဂဟိတဗ္ဗပုဂ္ဂလေ ဘဝဂ္ဂေဥက္ခိပန္တောဝိယ ပဂ္ဂဟကမ္မံ ကရောတိ, တသ္မာ တေ လဒ္ဓေါကာသာ ဥဋ္ဌိတသီသာ နိရာသင်္ကာ ဟုတွာ တိဋ္ဌန္တိ, ယထာ စန္ဒိမသူရိယာလောကာနံ ပဋိလဒ္ဓကာလေ အာဒိကပ္ပိကာတိ. တေနာဝေါစုမှာ, – और चूँकि उन्होंने लज्जावान और प्रग्रह (सम्मान) के योग्य व्यक्तियों का, मानो उन्हें भवाग्र (ब्रह्मलोक) में उठाते हुए, प्रग्रह-कर्म किया, इसलिए वे अवसर पाकर, सिर उठाकर और नि:शंक होकर वैसे ही स्थित हुए जैसे चन्द्रमा और सूर्य का प्रकाश प्राप्त होने पर आदिकल्पिक (सृष्टि के आरम्भिक मनुष्य)। इसीलिए हमने कहा— တဒါပိစ [Pg.166] ဇိနစက္ကံ, ခေ ဘာဏုမာဝ ပါကဋံ; လဇ္ဇိနောပိ ဥဋ္ဌဟန္တိ, ဩဘာလဒ္ဓေဝ ကပ္ပိကာတိ. और तब जिन-चक्र आकाश में सूर्य के समान प्रकट हुआ; लज्जावान (शीलवान) भी वैसे ही उठ खड़े हुए जैसे प्रकाश पाने पर कल्पिक (आदिकल्पिक मनुष्य)। တေပိဋကမ္ပိ နဝင်္ဂံ ဗုဒ္ဓဝစနံ စိရဋ္ဌိတိကံ ကတ္တုကာမော ပရိယတ္တိဝိဿရဒေဟိ မဟာထေရေဟိ ဝိသောဓာပေတွာ လေခကာနံ ဘတိံ ဒတွာ ကဏ္ဌဇမုဒ္ဓဇာဒိဝိဓာနံ သိထိလဓနိတာဒိဝိဓာနဉ္စ ပုနပ္ပုနံ ဝိစာရေတွာ အန္တမသော ပရိစ္ဆေဒလေခမတ္တမ္ပိ အဝိရာဓေတွာ အန္တေပုရံ ပဝိသေတွာ သုဝဏ္ဏမယေသု လောဟမယေသုစ ပေါတ္ထကေသု လိခါပေသိ. ဉာဏထာမသမ္ပန္နေစ ဘိက္ခူ ဝိစိနေတွာ ယထာဗလံ ဝိနယပိဋကံ ဝိသုံ ဝိသုံ ဓာရေတိ ဝါစုဂ္ဂတံ ကာရာပေတိ. အဂ္ဂမဟေသိံ အာဒိံ ကတွာ သကလ ဩရောဓာဒယော ဗဟူ ရာဇသေဝကာ အမစ္စာဒယော နာဂရိကေစ ယထာဗလံ သုတ္တန္တပိဋကံ အဘိဓမ္မပိဋကဉ္စ ဝိသုံ ဝိသုံ ဧကေကသုတ္တမာတိကာပဒဘာဇနီစိတ္တဝါရာဒိဝသေန ဝိဘာဇေတွာ ဓာရေတိ ဝါစုဂ္ဂတံ ကာရာပေတိ. သယဉ္စ အနတ္တလက္ခဏာဒိကံ အနေကဝိဓံ သုတ္တံ ဒေဝသိကံ သဇ္ဈာယံ ကရောတိ. ဇိနသာသနဿ စိရဋ္ဌိတတ္ထာယသကလဝိဇိတေစ အရညဝါသီနံ ဘိက္ခူနံ အဿမဿ သမန္တတော ပဉ္စဓနုသတပ္ပမာဏေ ဌာနေထလဒကစရာနံ သဗ္ဗေသံ သတ္တာနံ အဘယံ အဒါသိ. ပရိယတ္တိ ဝိသာရဒါနဉ္စ ထေရာနုထေရာနံ မာတာပိတာဒယော ဉာတကေ သဗ္ဗရာဇကိစ္စတော ဗလိကမ္မတောစ မောစာပေတွာ ယထာသုခံ ဝသာပေတိ. ဧကာဟေနေဝါပိ သဟဿမတ္တေ ကုလပုတ္တေ ပဗ္ဗဇူပသမ္ပဒဘူမီသု ပတိဋ္ဌာပေတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိ. အညာနိပိ ဗဟူနိ ပုညကမ္မာနိ ကရောတိ. ကတွာစ ဝိဝဋ္ဋမေဝ ပတ္ထေတိ, နော ဝဋ္ဋံ. အညေစ ဩရောဓာဒယော တုမှေ ယာနိ ကာနိစိ ပုညကမ္မာနိ ကတွာ ဝိဝဋ္ဋမေဝ ပတ္ထေတ, မာ ဝဋ္ဋန္တိ အဘိဏှံ ဩဝဒတိ. အနိစ္စလက္ခဏာဒိသံယုတ္တာယ ဓမ္မကထာယ နိစ္စံ ဩဝဒတိ. သယမ္ပိ သမထဝိပဿနာသု နိစ္စာရဒ္ဓံ အကာသိ. ရာဇူနံ ပန ရဋ္ဌသာမိကာနံ ဓမ္မတာယ ကိစ္စဗာဟုလ္လတာယ ကဒါစိ ကဒါစိ ဩကာသံ န လဘတိ ကမ္မဋ္ဌာနမနုယုဉ္ဇိတုံ, ဧဝမ္ပိ သမာနော သရီရမလပရိဇဂ္ဂနကာလေပိ ကမ္မဋ္ဌာနမနုယုဉ္ဇတိယေဝ, န မောဃဝသေန ကာလံ ခေပေတိ. လောကေ ဟိ အမင်္ဂလသမ္မတာနိပိ မနုဿသီသကပါလဋ္ဌိအာဒီနိ သုသာသနတော အာနေတွာ ဒန္တကဋ္ဌာဒီနိ ဝါ တံသဒိသာနိ ကာရာပေတွာ အတ္တနော သမီပေ ဌပေတွာ အဋ္ဌိကာဒိဘာဝနာမယပုညံ ဝိစိနာတိ. त्रिपिटक और नौ अंगों वाले बुद्ध-वचन को चिरस्थायी बनाने की इच्छा से, उन्होंने पर्यत्ति-विशारद महास्थविरों द्वारा उसका शोधन कराया, लेखकों को पारिश्रमिक दिया, और कण्ठज-मूर्धन्य आदि वर्णों के विधान तथा शिथिल-धणित (अल्पप्राण-महाप्राण) आदि के विधानों पर बार-बार विचार कर, यहाँ तक कि एक विराम-चिह्न की भी त्रुटि न छोड़ते हुए, अन्तःपुर में प्रवेश कर उन्हें स्वर्णमयी और लौहमयी पुस्तकों (पत्रों) पर लिखवाया। ज्ञान और सामर्थ्य से सम्पन्न भिक्षुओं को चुनकर, उनकी शक्ति के अनुसार विनयपिटक को अलग-अलग कण्ठस्थ कराया और उसका पाठ करवाया। अग्र-महिषी (पटरानी) से लेकर समस्त अन्तःपुर की स्त्रियों, अनेक राजसेवकों, अमात्यों और नगरवासियों को उनकी शक्ति के अनुसार सुत्तन्तपिटक और अभिधम्मपिटक को अलग-अलग एक-एक सुत्त, मातृका, पदभाानीय, चित्तवार आदि के अनुसार विभाजित कर कण्ठस्थ कराया और पाठ करवाया। वे स्वयं भी अनत्तलक्षण (अनत्म-लक्षण) आदि अनेक प्रकार के सूत्रों का प्रतिदिन स्वाध्याय करते थे। जिन-शासन की चिर-स्थिति के लिए उन्होंने अपने सम्पूर्ण राज्य में अरण्यवासी भिक्षुओं के आश्रमों के चारों ओर पाँच सौ धनुष के परिमाण वाले स्थान में रहने वाले थलचर और जलचर सभी प्राणियों को अभयदान दिया। पर्यत्ति-विशारद स्थविरों और अनुस्थविरों के माता-पिता आदि सम्बन्धियों को समस्त राजकीय कार्यों और कर (बलि) से मुक्त कर उन्हें सुखपूर्वक बसाया। एक ही दिन में लगभग एक हजार कुलपुत्रों को प्रव्रज्या और उपसम्पदा की भूमि में प्रतिष्ठित कर शासन की उन्नति की। वे अन्य भी अनेक पुण्यकर्म करते थे। और उन्हें करके केवल विवर्त (निर्वाण) की ही प्रार्थना करते थे, वर्त (संसार) की नहीं। वे अन्तःपुर की स्त्रियों आदि को भी निरन्तर यह उपदेश देते थे कि "तुम जो भी पुण्यकर्म करो, उससे विवर्त की ही प्रार्थना करो, वर्त की नहीं।" वे अनित्य-लक्षण आदि से युक्त धम्म-कथा द्वारा नित्य उपदेश देते थे। वे स्वयं भी शमथ और विपश्यना में नित्य संलग्न रहते थे। राजाओं और राष्ट्र-स्वामियों के स्वभाव के अनुसार कार्यों की अधिकता के कारण कभी-कभी उन्हें कर्मस्थान (ध्यान) के अभ्यास का अवसर नहीं मिलता था, फिर भी वे शरीर की शुद्धि (शौच आदि) के समय भी कर्मस्थान का अभ्यास करते ही थे, व्यर्थ में समय नहीं बिताते थे। लोक में अमंगल माने जाने वाले मनुष्यों के कपाल और अस्थियों आदि को श्मशान से मँगवाकर, उनसे दातून आदि बनवाकर या वैसी ही वस्तुएँ बनवाकर अपने पास रखते थे और अस्थि-भावना (अशुभ भावना) रूपी पुण्य का संचय करते थे। တဒါ ပန အမှာကံ အာစရိယဝရံ ပရိယတ္တိဝိသာရဒံ တိက္ခ ဇဝနဂစ္ဆိရာဒိဉာဏောပေတံ ဝိစိတြဓမ္မဒေသနာကထံ သကလ မရမ္မိကဘိက္ခူနံ ဩနမိတဋ္ဌာနဘူတံ ဝုဒ္ဓါပစာယိံ ရူပသောဘဂ္ဂပတ္တံ ယုတ္တဝါဒိကံ ဉေယျဓမ္မာဘိမုနိဝရဉာဏကိတ္တိသိရိဓဇဓမ္မသေနာပတိ- မဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရူတိ တတိယံ လဒ္ဓလဉ္ဆံ တံ ဘိက္ခုသံဃာနံ သကလရဋ္ဌဝါသီနံ ပါမောက္ခဘာဝေ ပတိဋ္ဌာပေသိ အသောကမဟာရာဇာဝိယ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရံ. တေနာဝေါစုမှာ နာဂရာဇုပ္ပတ္တိကထာယံ,– तब हमारे श्रेष्ठ आचार्य, जो पर्यत्ति (शास्त्रों) में विशारद, तीक्ष्ण और तीव्र प्रज्ञा से युक्त, विचित्र धर्मदेशना करने वाले, समस्त म्यांमार (मरम्म) के भिक्षुओं के लिए आदरणीय स्थान, वृद्धों का सम्मान करने वाले, रूप-सौन्दर्य से युक्त, युक्तवादी (तर्कसंगत बोलने वाले) थे, उन्हें 'ज्ञेयधम्माभिमनिवरज्ञानकीर्तिश्रीध्वजधम्मसेनापति-महाधम्मराजाधिराजगुरु' नामक तीसरी उपाधि प्रदान कर, भिक्षु संघ और समस्त राष्ट्रवासियों के प्रमुख के पद पर उसी प्रकार प्रतिष्ठित किया, जैसे महाराज अशोक ने महामोग्गलिपुत्त तिस्स थेर को किया था। इसीलिए हमने 'नगर-उत्पत्ति कथा' में कहा है— တဒါစ ဘိက္ခုသံဃာနံ, ထေရံ ပါမောက္ခဘာဝကေ; ဉေယျာဒိလဒ္ဓလဉ္ဆံ တံ, ပတိဋ္ဌာပေသိ သာဓုကန္တိ. "तब भिक्षु संघ के प्रमुख पद पर, 'ज्ञेय' आदि उपाधि प्राप्त उन थेर को भली-भांति प्रतिष्ठित किया।" တဒါစ အမှာကံ ဓမ္မိကမဟာရာဇာ သက္ကရာဇေ ဧကူနဝီသတာဓိကေ သဟဿေ ဒွိသတေစ သမ္ပတ္တေ မန္တလာချာတာစလဿ သမီပေ သုဘူမိလက္ခဏောပေတံ ဧကနိပါတတိတ္ထမိဝ ဗဟုဇနနယနဝိဟင်္ဂါနံ သဗ္ဗနဂရာလင်္ကာရေဟိ ပရိက္ခိတ္တံ မနုဿာနံ စက္ခုလောလတာဇနကံ နာနာရတနေဟိ သမ္ပုဏ္ဏံ နာနာ ဝေရဇ္ဇဝါဏိဇာနံ ပုဋဘေဒနဋ္ဌာနဘူတံ ရတနပုဏ္ဏနာမကံ မဟာရာဇဋ္ဌာနိကံ မာပေသိ, မန္ဓာတုဝိယ ရာဇဂဟံ, သုဒဿနော ဝိယစ ကုသာဝတီနဂရန္တိ. တေနာဝေါစုမှာ နာဂရာဇုပ္ပတ္တိကထာယံ,– तब हमारे धार्मिक महाराज ने शक संवत १२१९ (1219) प्राप्त होने पर, मण्डले (मन्तल) नामक पर्वत के समीप, शुभ भूमि के लक्षणों से युक्त, अनेक मनुष्यों के नेत्र-रूपी पक्षियों के लिए एक विश्राम स्थल के समान, सभी नगर-अलंकारों से घिरे हुए, मनुष्यों की आँखों में कौतूहल उत्पन्न करने वाले, नाना रत्नों से परिपूर्ण, विभिन्न देशों के व्यापारियों के व्यापारिक केंद्र (पुटभेदन), 'रत्नपुण' (रतनपुण्ण) नामक राजधानी का निर्माण किया, जैसे मान्धाता ने राजगृह का और सुदर्शन ने कुसावती नगर का किया था। इसीलिए हमने 'नगर-उत्पत्ति कथा' में कहा है— တဒါ ကဋ္ဌဋဈေ သမ္ပတ္တေ, မန္တလာချာစလဿစ; ဧရာဝတီတိ နာမာယ, မာပေသိ သမီပေ နဂရံ. "तब १२१९ (काट्ठठझ) वर्ष आने पर, मण्डले नामक पर्वत और इरावती (नदी) के समीप नगर का निर्माण किया।" သုဘူမိလက္ခဏောပေတံ[Pg.168], ရတနပုဏ္ဏနာမကံ; ရာဇဂဟံဝ မန္ဓာတု, အကိရမ္မဏိယံ သုဘန္တိ. "शुभ भूमि के लक्षणों से युक्त, 'रत्नपुण' नामक वह नगर, मान्धाता के राजगृह के समान अत्यंत रमणीय और शुभ था।" သေယျထာပိ နာမ လောကေ အာလောကတ္ထိကာနံ သတ္တာနံ ပီတိသောမနဿံ ဥပ္ပာဒေန္တော ဥပကရောန္တော ဥဒယပဗ္ဗတတော သဟဿရံသီ ဒိဝါကရော ဥဋ္ဌဟတိ, ဧဝမေဝံ မရမ္မရဋ္ဌိကာနံ လဇ္ဇီပေသလာနံ သိက္ခာကာမာနံ ဘိက္ခူနံ ဂိဟီနဉ္စ ပီတိသောမနဿံ ဥပ္ပာဒေန္တော ဥပကာရောန္တော အယံ ဓမ္မိကောရာဇာ ဣမသ္မိံ မရမ္မရဋ္ဌေ ဥပ္ပဇ္ဇတိ. जैसे संसार में प्रकाश की इच्छा रखने वाले प्राणियों के लिए प्रीति और सौमनस्य उत्पन्न करते हुए और उपकार करते हुए उदयाचल पर्वत से सहस्र किरणों वाला सूर्य उदित होता है, वैसे ही म्यांमार (मरम्म) राष्ट्र के लज्जाशील, शीलवान और शिक्षा के अभिलाषी भिक्षुओं तथा गृहस्थों के लिए प्रीति और सौमनस्य उत्पन्न करते हुए और उपकार करते हुए यह धार्मिक राजा इस म्यांमार राष्ट्र में उत्पन्न हुए हैं। ဣမဉ္စ ဓမ္မိကရာဇာနံ နိဿာယ မရမ္မရဋ္ဌေ သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓဿ သာသနံ အတိဝိယ ဇောတေတိ. ဝုဍ္ဎိံ ဝိရူဠိံ ဝေပုလ္လံ အာပဇ္ဇတိ. और इन धार्मिक राजा के आश्रय से म्यांमार राष्ट्र में सम्यक्सम्बुद्ध का शासन अत्यंत प्रकाशित हो रहा है। वह वृद्धि, विरूढ़ि (प्रगति) और विपुलता को प्राप्त हो रहा है। သာသနဉ္စ နာမေတံ ရာဇာနံ နိဿာယ တိဋ္ဌတီတိ. အယံ ဓမ္မိကရာဇာယေဝ န သာသနဿူပကာရော ဓမ္မစာရီ ဓမ္မမာနီ, အပိစ ခေါ ဓမ္မိကရာဇာနံ နိဿိတာပိ သဗ္ဗရဋ္ဌဝါသိကာ သာသနဿူပကာရာယေဝ ဓမ္မစာရိနော ဓမ္မမာနိနော ရာဇာနုဂတာ ဟုတွာ. တေနေဝါဟ မဟာဗောဓိဇာတကာဒီသု, – शासन राजा के आश्रय में ही टिका रहता है। केवल यह धार्मिक राजा ही शासन के उपकारक, धर्मचारी और धर्म को मानने वाले नहीं हैं, अपितु धार्मिक राजा के आश्रित सभी राष्ट्रवासी भी राजा का अनुसरण करते हुए शासन के उपकारक, धर्मचारी और धर्म को मानने वाले हो गए हैं। इसीलिए महाबोध जातक आदि में कहा गया है— ဂဝဉ္စေ တရမာနာနံ, ဥဇုံ ဂစ္ဆတိ ပုင်္ဂဝေါ; သဗ္ဗာ ဂါဝီ ဥဇုံ ယန္တိ, နေတ္တေ ဥဇုံ ဂတေ သတိ. "यदि (नदी) पार करती हुई गायों में बैल (नेता) सीधा चलता है, तो नेता के सीधा चलने पर सभी गाएँ सीधी चलती हैं।" ဧဝမေဝ မနုဿေသု, ယော ဟောတိ သေဋ္ဌသမ္မတော; သော စေပိ ဓမ္မံ စရတိ, ပဂေဝ ဣတရာ ပဇာ; သဗ္ဗရဋ္ဌံ သုခံ သေတိ, ရာဇာ စေ ဟောတိ ဓမ္မိကောတိ. "इसी प्रकार मनुष्यों में जो श्रेष्ठ माना जाता है, यदि वह धर्म का आचरण करता है, तो अन्य प्रजा भी वैसा ही करती है; यदि राजा धार्मिक हो, तो सारा राष्ट्र सुखपूर्वक रहता है।" ဝိသေသတော ပန ဒုတိယံ အမရပုရံ မာပေန္တဿ မဟာဓမ္မရညော အဂ္ဂမဟေသိယာ အဇ္ဇဝမဒ္ဒဝသောဟဇ္ဇာဒိဂုဏယုတ္တာယ ဓိတာ အမှာကံ ရညော အဂ္ဂမဟေသီ သမ္မာစာရိနီ ပတိဗ္ဗတာ. သဗ္ဗနာရီနံ အဂ္ဂဘာဝံ ပတ္တာပိ သမာနာ ကာမဂုဏသင်္ခါတေန သုရာမဒေန အပ္ပမဇ္ဇိတွာ ပုညကမ္မေသု အပ္ပမာဒဝသေန နိစ္စာရဒ္ဓဝီရိယာ ဟောတိ. နိစ္စံ ပရိယတ္တိယာ ဥဂ္ဂဟဏံ အကာသိ. ဝေဒပါရဂူစ [Pg.169] အဟောသိ. သမ္မာသမ္ဗုဒ္ဓသာသနေ အတိဝိယ ပသန္နာ အညာပိ ဩရောဓာဒယော မဟာဓမ္မရညော ဩဝါဒေ ဌတွာ ဓမ္မံ စရိံသု. သာသနံ ပသီဒိံသုယေဝ. ဥပရာဇာပိ မဟာဓမ္မရာဇဿ ဧကမာတာပီတိကော မဟာဓမ္မရာဇိစ္ဆာယ အဝိရောဓေတွာယေဝ သကလရဋ္ဌဝါသီနံ ဂိဟီနံ ဘိက္ခူနဉ္စ အတ္ထဟိတမာဝဟတိ, သေယျထာပိ စက္ကဝတ္တိရညော သန္တိကေ ဇေဋ္ဌပုတ္တော ထာမဇဝသမ္ပန္နော အတိသူရော ဥဋ္ဌာနဝီရိယော. အညေပိ အမစ္စာ အနေကသဟဿပ္ပမာဏာ မဟာဓမ္မရညာ လဒ္ဓေသု လဒ္ဓေသု ဌာနန္တရေသု ဌိတာ မဟာဓမ္မရညော တံ တံ ကိစ္စမာဝဟန္တိ ပုညကမ္မေသု အဘိရမန္တိ. သကလရဋ္ဌဝါသိနောစ မနုဿာ ဒါနသီလဘာဝနာသုယေဝ စိတ္တံ ဌပေန္တိ. ဘိက္ခူစ သံဃရာဇပ္ပမုခါဒယော ထေရနဝမဇ္ဈိမာ ဂန္ထဓုရဝိပဿနာဓုရေသု အဘိယုဉ္ဇန္တိ. विशेष रूप से, द्वितीय अमरपुर का निर्माण करने वाले महाधर्मराज की अग्र-महिषी (मुख्य रानी), जो आर्जव (सरलता), मार्दव (कोमलता) और सौहार्द आदि गुणों से युक्त थीं, उनकी पुत्री हमारे राजा की अग्र-महिषी हैं, जो सदाचारिणी और पतिव्रता हैं। समस्त नारियों में श्रेष्ठ पद प्राप्त होने पर भी, वे कामगुणों और सुरा-मद से प्रमाद न करते हुए, पुण्य कर्मों में अप्रमाद के कारण निरंतर वीर्यवान (प्रयत्नशील) रहती हैं। उन्होंने निरंतर पर्यत्ति (शास्त्रों) का अध्ययन किया और वे वेदों (ज्ञान) में पारंगत हुईं। वे सम्यक्सम्बुद्ध के शासन में अत्यंत प्रसन्न (श्रद्धावान) हैं। अन्य रानियाँ आदि भी महाधर्मराज के उपदेशों में स्थित होकर धर्म का आचरण करती थीं और शासन में श्रद्धा रखती थीं। उपराज भी, जो महाधर्मराज के ही सहोदर (एक ही माता-पिता की संतान) हैं, महाधर्मराज की इच्छा का विरोध न करते हुए समस्त राष्ट्रवासियों, गृहस्थों और भिक्षुओं के अर्थ और हित का संपादन करते हैं, जैसे चक्रवर्ती राजा के पास उनका ज्येष्ठ पुत्र, जो बल और वेग से संपन्न, अत्यंत शूरवीर और उत्थान-वीर्य वाला होता है। अन्य हजारों की संख्या में अमात्य (मंत्री) भी, जो महाधर्मराज द्वारा दिए गए विभिन्न पदों पर स्थित हैं, महाधर्मराज के उन-उन कार्यों को करते हैं और पुण्य कर्मों में रमण करते हैं। समस्त राष्ट्रवासी मनुष्य दान, शील और भावना में ही अपना चित्त लगाते हैं। और संघराज के प्रमुखता में थेर, नव और मध्यम भिक्षु ग्रन्थ-धुर (अध्ययन) और विपश्यना-धुर (साधना) में संलग्न रहते हैं। ဧဝမေကဿ သာဓုဇ္ဇနဿ ဂုဏံ မဟန္တေန ဥဿာဟေန ကထေန္တောပိ ဒုက္ကရံတာဝ နိဋ္ဌံ ပါပေတုံ, ဘဂဝတော ပန တိလောကဂ္ဂဿ အနေကသဟဿပါရမိတာနုဘာဝေန ပဝတ္တံ ဂုဏံ ကော နာမ ပုဂ္ဂလော သက္ခိဿတိ နိဋ္ဌံ ပါပေတွာ ကထေတုန္တိ. ဧဝံ မဟာဓမ္မရာဇဿစ အဂ္ဂမဟေသိယာစေဝ ဥပရာဇာဒီနဉ္စ ဂုဏေ ဝိဿဋ္ဌေန ဝိတ္ထာရတော ကထိယမာနေ ဣမိဿာ သာသနဝံသပ္ပဒီပိကာယ အနေကသတဘာဏဝါရမတ္တမ္ပိ ပတွာ ပရိယန္တော န ပညာယေယျ, ယသ္မာစ အတိပ္ပပဉ္စာ ဘဝေယျ, တသ္မာ သင်္ခေပေနေဝါယံ ကထိတာ သာဓုဇ္ဇနာနံ မဟာပုညမယာယ ပီတိယာ အနုမောဒနတ္ထာယ. ဣဒဉှိ သုဏန္တေဟိ သာဓုဇ္ဇနေဟိ အနုမောဒိတဗ္ဗံ,- အသုကသ္မိံ ကိရ ကာလေ အသုကသ္မိံ ရဋ္ဌေ အသုကော နာမ ရာဇာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိတွာ ဝုဍ္ဎိံ ဝိရူဠိံ ဝေပုလ္လမာပဇ္ဇိ, သေယျထာပိ နာမ ရုက္ခော ဘူမောဒကာနံ နိဿာယ ဝုဍ္ဎိံ ဝိရူဠိံ ဝေပုလ္လမာပဇ္ဇီတိ. इस प्रकार एक सज्जन पुरुष के गुणों को महान उत्साह के साथ कहते हुए भी उनका अंत पाना कठिन है, तो फिर तीनों लोकों में श्रेष्ठ भगवान के, अनेक सहस्र पारमिताओं के प्रभाव से प्रवृत्त गुणों को कौन व्यक्ति अंत तक कह पाने में समर्थ होगा? इसी प्रकार यदि महाधर्मराज, अग्र-महिषी और उपराज आदि के गुणों को स्पष्ट रूप से विस्तारपूर्वक कहा जाए, तो इस 'शासनवंशप्रदीपिका' के अनेक सौ भाणवार (पाठ की इकाइयाँ) हो जाने पर भी इनका अंत नहीं जाना जा सकेगा, और क्योंकि यह बहुत अधिक विस्तार (प्रपंच) हो जाएगा, इसलिए सज्जनों की महापुण्यमयी प्रीति और अनुमोदन के लिए इसे संक्षेप में ही कहा गया है। इसे सुनने वाले सज्जनों को यह सोचकर अनुमोदन करना चाहिए कि— "अमुक समय में, अमुक राष्ट्र में, अमुक नाम के राजा ने शासन का संरक्षण कर उसे वृद्धि, विरूढ़ि और विपुलता तक पहुँचाया, जैसे कोई वृक्ष भूमि और जल के आश्रय से वृद्धि, विरूढ़ि और विपुलता को प्राप्त होता है।" ဣမဿ ရညော ကာလေ ဉေယျဓမ္မာဘိမုနိဝရညာဏကိတ္တိ သိရိဓဇဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရု နာမ သံဃရာဇာ [Pg.170] မဟာထေရော ရညာ အဘိယာစိတော သုရာဇမဂ္ဂဒီပနိံ နာမ ဂန္ထံ အကာသိ. မဇ္ဈိမနိကာယဋ္ဌကထာယ အတ္ထံ သိဿာနံ ဝါစေတွာ ယထာဝါစိတနိယာမေန အတ္ထယောဇနာနယံ ပေါတ္ထကေ အာရောပါပေသိ. इस राजा के काल में 'ज्ञेयधम्माभिमनिवरञ्ञाणकित्ति सिरिधजधम्मसेनापतिमहाधम्मराजाधिराजगुरु' नामक संघराज महाथेर ने राजा द्वारा याचना किए जाने पर 'सुराजमग्गदीपनी' नामक ग्रंथ की रचना की। मज्झिमनिकाय की अट्ठकथा के अर्थ को शिष्यों को पढ़ाकर, जिस प्रकार पढ़ाया गया था उसी रीति से अर्थयोजना के नियम को पुस्तकों में लिखवाया। မေဓာဘိဝံသသဒ္ဓမ္မဓဇမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရု နာမ မဟာထေရော ဇာတကပါဠိယာ အတ္ထယောဇနာနယံ မရမ္မဘာသာယ အကာသိ. 'मेधाभिवंससद्धम्मधजमहाधम्मराजाधिराजगुरु' नामक महाथेर ने जातकपालि की अर्थयोजना की पद्धति को बर्मी भाषा में रचा। သံဃရာဇဿ သိဿော ပညာသာမိသိရိကဝိဓဇမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရူတိ ရညာ လဒ္ဓနာမလဉ္ဆော သောယေဝါဟံ ဓမ္မ ရညာ အဂ္ဂမဟေသိယာစ အဘိယာစိတော သီလကထံ နာမ ဂန္ထံ ဥပါယကထံ နာမ ဂန္ထဉ္စ အကာသိံ. ရညော အာစရိယဘူတေန ဒိသာပါမောက္ခေန နာမ ဥပါသကေန အဘိယာစိတော သောယေဝါတံ အက္ခရဝိသောဓနိံ နာမ ဂန္ထံ အာပတ္တိဝိနိစ္ဆယံ နာမ ဂန္ထဉ္စ. တထာ သံဃရညာ စောဒိတော သောယေ ဝါဟံ နာဂရာဇုပ္ပတိကထံ ဝေါဟာရတ္ထဘေဒဉ္စ ဝိဝါဒဝိနိစ္ဆယဉ္စ အကာသိံ. တထာ ပဉ္စဇမ္ဗုဂါမဘောဇကေန လေခကာမစ္စေန ဒွီဟိစ အာရောစနလေခကာမစ္စေဟိ အဘိယာစိတော သော ယေဝါဟံ ရာဇသေဝကဒီပနိံ နာမ ဂန္ထံ အကာသိံ. တထာ ဒီဃနာဝါနဂရဘောဇကေန မဟာအမစ္စေန အဘိယာစိတော သောယေဝါဟံ နိရယကထာဒီပကံ နာမ ဂန္ထံ အကာသိံ. တထာ သိလာလေဍ္ဍုကနာမကေန ဥပါသကေန အဘိယာစိတော သောယေဝါဟံ ဥပေါသထဝိနိစ္ဆယံ နာမ ဂန္ထံ အကာသိံ. တထာ ဗဟူဟိ သောတုဇနေဟိ အဘိယာစိတော သောယေဝါဟံ သဒ္ဒနီတိယာ သံဝဏ္ဏနံ ပါဠိဘာသာယ အကာသိန္တိ. संघराज के शिष्य, जिन्हें राजा से 'पञ्ञासामिसिरिकविधजमहाधम्मराजाधिराजगुरु' यह नाम और उपाधि प्राप्त हुई थी, वही मैं (पञ्ञासामि), राजा और अग्र-महिषी द्वारा याचना किए जाने पर 'शीलकथा' नामक ग्रंथ और 'उपायकथा' नामक ग्रंथ की रचना की। राजा के आचार्य स्वरूप 'दिसापामोक्ख' नामक उपासक द्वारा याचना किए जाने पर मैंने 'अक्खरविसोधनी' नामक ग्रंथ और 'आपत्तिविनिच्छय' नामक ग्रंथ की रचना की। उसी प्रकार संघराज द्वारा प्रेरित किए जाने पर मैंने 'नागराजुप्पतिकथा', 'वोहारत्थभेद' और 'विवादविनिच्छय' की रचना की। उसी प्रकार पञ्चजम्बुग्राम के भोजक लेखक-अमात्य और दो आवेदन-लेखक अमात्यों द्वारा याचना किए जाने पर मैंने 'राजसेवकदीपनी' नामक ग्रंथ की रचना की। उसी प्रकार दीघनावा नगर के भोजक महा-अमात्य द्वारा याचना किए जाने पर मैंने 'निरयकथादीपक' नामक ग्रंथ की रचना की। उसी प्रकार 'सिलालेड्डुक' नामक उपासक द्वारा याचना किए जाने पर मैंने 'उपोसथविनिच्छय' नामक ग्रंथ की रचना की। उसी प्रकार बहुत से श्रोताओं द्वारा याचना किए जाने पर मैंने 'सद्दनीति' की व्याख्या पालि भाषा में की। ဧကသ္မိဉ္စ သမယေ ကလိယုဂေ ဝီသာဓိကေ ဒွိသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ ရညော ဧတဒဟောသိ,- ဣဒါနိ ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော သာသနေ ကေသဉ္စိ ဘိက္ခူနံ သာမဏေရာနဉ္စ ကုလဒူသနာဒိအသာရုပ္ပကမ္မေဟိ ဥပ္ပာဒိတာ စတ္တာရော ပစ္စယာ ဗဟူ ဒိဿန္တိ[Pg.171], ကေစိပိ အလဇ္ဇီ ပုဂ္ဂလာ ဇာတရူပါဒိနိဿဂ္ဂိယဝတ္ထုမ္ပိသာဒိယန္တိ, ကေစိပိ ဝိနာ ပစ္စယံ ဝိကာလေ တမ္ဗုလံ ခါဒန္တိ, သန္နိဓိဉ္စ ကတွာ ဓူမာနိစ ပိဝန္တိ, အဂိလာနာ ဟုတွာ သဥပါဟနာ ဂါမံ ပဝိသန္တိ, ဆတ္တံ ဓာရေန္တိ, အညေပိ အဝိနယာနုလောမာစာရေ စရန္တိ, ဣဒါနိ ဘိက္ခူနံ သာမဏေရာနဉ္စ ဗုဒ္ဓဿ သမ္မုခေ ဗုဒ္ဓံ သက္ခိံ ကတွာ ဣမေ အနာစာရေ န စရိဿာမာတိ ပဋိညံ ကာရာပေတွာ ဘဂဝတော သိက္ခာပဒါနိ ရက္ခာပေတုံ ဝဋ္ဋတိ, ဧဝဉ္စ သတိ ဘိက္ခူ သာမဏေရာစ မယံ ဗုဒ္ဓဿ သမ္မုခေ ဧဝံ ပဋိညံ ကရောမ, ပဋိညဉ္စ ကတွာ ဝိကာရံ အာပဇ္ဇန္တာနံ အမှာကံ ဣမသ္မိံယေဝ အတ္တဘာဝေ ဣမသ္မိံယေဝ ပစ္စက္ခေ ကိဉ္စိ ဘယံ ဥပ္ပဇ္ဇေယျာတိ ပစ္စက္ခဘယံ အပေက္ခိတွာ တေ သိက္ခာပဒံ ရက္ခိဿန္တီတိ. ဧဝံ ပန စိန္တေတွာ ဘိက္ခူနံ သာမဏေရာနဉ္စ ဧဝံ ပဋိညံ ကာရာပေတုံ ယုဇ္ဇတိ ဝါ မာ ဝါတိ မယံ န ဇာနာမ, ဣဒါနိ သံဃရာဇာဒယော မဟာထေရေ သန္နိပါတာပေတွာ ပုစ္ဆိဿာမီတိ ပုန စိန္တေသိ. और एक समय कलियुग के एक हजार दो सौ बीस (१२२०) वर्ष बीत जाने पर राजा के मन में यह विचार आया— "इस समय भगवान बुद्ध के शासन में कुछ भिक्षुओं और श्रामणेरों के कुल-दूषण आदि अयोग्य कर्मों से उत्पन्न चारों प्रत्यय बहुत दिखाई देते हैं; कुछ निर्लज्ज व्यक्ति स्वर्ण-रजत आदि निस्सग्गिय वस्तुओं को भी स्वीकार करते हैं; कुछ बिना कारण के विकाल में ताम्बूल (पान) खाते हैं, और संग्रह करके धूम्रपान भी करते हैं; अस्वस्थ न होने पर भी जूते पहनकर गाँव में प्रवेश करते हैं, छाता धारण करते हैं, और अन्य विनय के विरुद्ध आचरण करते हैं। अब भिक्षुओं और श्रामणेरों से बुद्ध के सम्मुख बुद्ध को साक्षी मानकर 'हम इन अनाचारों को नहीं करेंगे' ऐसी प्रतिज्ञा करवाकर भगवान के शिक्षापदों की रक्षा करवाना उचित है। ऐसा होने पर भिक्षु और श्रामणेर यह सोचकर कि 'हमने बुद्ध के सम्मुख ऐसी प्रतिज्ञा की है, और प्रतिज्ञा करके विकार को प्राप्त होने वाले हमें इसी जन्म में, इसी प्रत्यक्ष जीवन में कोई भय उत्पन्न हो सकता है', प्रत्यक्ष भय की अपेक्षा रखते हुए वे शिक्षापदों की रक्षा करेंगे।" ऐसा सोचकर फिर उसने विचार किया— "भिक्षुओं और श्रामणेरों से ऐसी प्रतिज्ञा करवाना उचित है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। अब संघराज आदि महाथेरों को एकत्रित करवाकर पूछूँगा।" အထ သဗ္ဗေပိ မဟာထေရေ သံဃရာဇဿ ဝိဟာရေ သန္နိပါတာပေတွာ ဣမံ ကာရဏံ ပုစ္ဆထာတိ အမစ္စေ အာဏာပေသိ. အထ အမစ္စာ မဟာထေရေ သန္နိပါတာပေတွာ ပုစ္ဆိံသု,-ဣဒါနိ ဘန္တေ သာသနေ ဘိက္ခူနံ သာမဏေရာနဉ္စ အဝိနယာနုလောမာစာရာနိ ဒိသွာ ဗုဒ္ဓဿ သမ္မုခေ ဗုဒ္ဓံ သက္ခိံ ကတွာ ရာဇာ ယထာ ဣမေ အနာစာရေ န စရိဿာမာတိ ပဋိညံ ကာရာပေတွာ ဘဂဝတော သိက္ခာပဒါနိ ရက္ခာပေတုံ ဣစ္ဆတိ, တထာ ကာရာပေတုံ ယုဇ္ဇတိ ဝါ မာ ဝါတိ. तब उसने अमात्यों को आज्ञा दी— "सभी महाथेरों को संघराज के विहार में एकत्रित करवाकर इस विषय में पूछो।" तब अमात्यों ने महाथेरों को एकत्रित करवाकर पूछा— "भन्ते! इस समय शासन में भिक्षुओं और श्रामणेरों के विनय-विरुद्ध आचरणों को देखकर, राजा बुद्ध के सम्मुख बुद्ध को साक्षी मानकर 'हम इन अनाचारों को नहीं करेंगे' ऐसी प्रतिज्ञा करवाकर भगवान के शिक्षापदों की रक्षा करवाना चाहते हैं। क्या ऐसा करवाना उचित है या नहीं?" အထ သံဃရာဇပ္ပမုခါဒယော မဟာထေရာ ဧဝမာဟံသု,- ယသ္မာ သာသနဿ ပရိသုဒ္ဓဘာဝံ ဣစ္ဆန္တော ဧဝံ ကရောတိ, တသ္မာ တထာ ကာရာပေတုံ ယုဇ္ဇတီတိ. तब संघराज प्रमुख महाथेरों ने ऐसा कहा— "चूँकि वह शासन की परिशुद्धता की इच्छा से ऐसा कर रहे हैं, इसलिए वैसा करवाना उचित है।" ပဏ္ဍိတာဘိဓဇမုနိန္ဒဃောသမဟာဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရာဒယော ပန ကတိပယတ္ထေရာ ဧဝမာဟံသု, – ဣဒါနိ ဘိက္ခူ နာမ သဒ္ဓါဗလာဒီနံ [Pg.172] ထောကတာယ ဘဂဝတော အာဏာသင်္ခါတံ သစိတ္တကာစိတ္တကာပတ္တိဣံ အာပဇ္ဇိတွာ ဘဂဝတာယေဝ အနုညာတေဟိ ဒေသနာဝုဋ္ဌာနကမ္မေဟိ ပဋိကရိတွာ သီလံ ပရိသုဒ္ဓံ ကတွာ လဇ္ဇီပေသလဘာဝံ ကရောန္တိ, န ကဒါစိ အာပတ္တိံ အနာပဇ္ဇိတွာ, တသ္မာ ဘဂဝတာ ပဋိက္ခိတ္တံ ကမ္မံ သဉ္စိစ္စန ဝီတိက္ကမိဿာမာတိ ဗုဒ္ဓဿ သမ္မုခေ ပဋိညာကရဏံ အတိဘာရိယံ ဟောတိ, သစေပိ ပုဗ္ဗေ ပဋိညံ ကတွာ ပစ္ဆာ ဝိသံဝါဒေယျ, ဧဝံ သတိ ပဋိဿဝဝိသံဝါဒေ သုဒ္ဓစိတ္တဿ ဒုက္ကဋံ ပဋိဿဝက္ခဏေဧဝ ပါစိတ္တိ ဣတရဿစာတိ ဝစနတော တံ တံ အာပတ္တိံ ပဋိဿဝဝိသံဝါဒနဒုက္ကပေတ္တိယာ သဟေဝ အာပဇ္ဇေယျ, အထ ပဋိညာကရဏတောယေဝ အာပတ္တိဗဟုလတာ ဘဝေယျ, ယထာ ပန ရောဂံ ဝူပသမိတုံ အသပ္ပာယဘေသဇ္ဇံ ပဋိသေဝတိ, အထဿ ရောဂေါ အဝူပသမိတွာ အတိက္ကမေယျ, ဧဝံ အာပတ္တိံ အနာပဇ္ဇိတုကာမော ဗုဒ္ဓဿ သမ္မုခေ ပဋိညံ ကရောတိ, အထဿ အာပတ္တိဗဟုလာယေဝ ဘဝေယျာတိ, ကိဉ္စ ဘိယျော အဘယဒဿာဝိနော ဘိက္ခူ အနေကသတဗုဒ္ဓဿ သမ္မုခေ အနေကသတဝါရာနိပိ ပဋိညံ ကတွာ သိက္ခာပဒံ ဝီတိက္ကမိတုံ ဝိသဟိဿန္တိယေဝါတိ. किन्तु पण्डिताभिधजमुनिन्दघोस महाधम्मराजगुरु थेर आदि कुछ थेरों ने ऐसा कहा— "इस समय भिक्षु श्रद्धा-बल आदि की अल्पता के कारण भगवान की आज्ञा रूपी सचित्तक और अचित्तक आपत्तियों को प्राप्त होकर, भगवान द्वारा ही अनुमत देशना और वुट्ठान कर्मों द्वारा उनका प्रतिकार कर, शील को शुद्ध कर लज्जावान और प्रियशील बने रहते हैं, ऐसा नहीं है कि वे कभी आपत्ति को प्राप्त न हों। इसलिए 'भगवान द्वारा निषिद्ध कर्म का हम जानबूझकर उल्लंघन नहीं करेंगे' ऐसी बुद्ध के सम्मुख प्रतिज्ञा करना अत्यंत कठिन है। यदि पहले प्रतिज्ञा करके बाद में उसका उल्लंघन करें, तो ऐसी स्थिति में 'प्रतिज्ञा-भंग होने पर शुद्ध चित्त वाले को दुष्कृत और प्रतिज्ञा के क्षण में ही दूसरे को पाचित्तिय होता है' इस वचन के अनुसार, वह उस-उस आपत्ति के साथ प्रतिज्ञा-भंग के दुष्कृत आदि को भी प्राप्त करेगा। तब प्रतिज्ञा करने के कारण ही आपत्तियों की बहुलता हो जाएगी। जैसे रोग को शांत करने के लिए कोई अनुपयुक्त औषधि का सेवन करे और उसका रोग शांत न होकर बढ़ जाए, वैसे ही आपत्ति को प्राप्त न होने की इच्छा से वह बुद्ध के सम्मुख प्रतिज्ञा करता है, किन्तु उससे उसकी आपत्तियाँ और बढ़ ही जाएँगी। और भी, निर्भय भिक्षु तो अनेक सौ बुद्धों के सम्मुख अनेक सौ बार भी प्रतिज्ञा करके शिक्षापदों का उल्लंघन करने का साहस करेंगे ही।" အထ သံဃရာဇာ မဟာထေရော အတ္တနော သိဿံ ပညာသာမိသိရိကဝိဓဇမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုံ နာမ မံ ဥယျောဇေသိ, တဿ ထေရဿ ဝစနေ ပဋိဝစနံ ဒါတုံ. तब संघराज महाथेर ने अपने शिष्य, प्रज्ञास्वामी श्रीकविध्वज महाधर्मराजाधिराजगुरु नामक मुझे, उन थेर के वचनों का उत्तर देने के लिए नियुक्त किया। အထာဟံ ဧဝံ ဝဒါမိ,- ဒွေ ပုဂ္ဂလာ အဘဗ္ဗာ သဉ္စိစ္စ အာပတ္တိံ အာပဇ္ဇိတုံ ဘိက္ခူစ ဘိက္ခုနိယောစ အရိယာ ပုဂ္ဂလာ, ဒွေ ပုဂ္ဂလာ သဗ္ဗာ သဉ္စိစ္စ အာပတ္တိံ အာပဇ္ဇိတုံ ဘိက္ခူစ ဘိက္ခုနိယောစ ပုထုဇ္ဇနာတိ ပရိဝါရပါဠိယံ ဝုတ္တတ္တာ အရိယပုဂ္ဂလာနံဝိယ ပုထုဇ္ဇနာနံ ဝိဿဋ္ဌေန ပဋိညံ ကာတုံ န ဝဋ္ဋတီတိ မနသိကရိတွာ ပုထုဇ္ဇနဘိက္ခူနံ ပဋိညာကရဏံ အတိဘာရိယန္တိ ဝေဒေယျစေ, သဗ္ဗေဟိပိ အရိယပုထုဇ္ဇနေဟိ ဘိက္ခူဟိ ဥပသမ္ပဒါမာဠကေ အာဒိတောဝ [Pg.173] စတ္တာရိ အကရဏီယာနိ အာစိက္ခိတဗ္ဗာနီတိ ဝုတ္တေသု စတူသု အကရဏီယေသု အန္တမသော တိဏသလာကံ ဥပါဒါယ ယော ဘိက္ခု ပါဒံ ဝါ ပါဒါရဟံ ဝါ အတိရေကပါဒံ ဝါ အဒိန္နံ ထေယျသင်္ခါတံ အာဒိယတိ, အဿမဏော ဟောတိ အသကျပုတ္တိယောတိ, အန္တမသော ကုန္တကိပိလ္လိကံ ဥပါဒါယ ယော ဘိက္ခု သဉ္စိစ္စ မနုဿဝိဂ္ဂဟံ ဇီဝိတံ ဝေါရောပေသိ, အန္တမသော ဂဗ္ဘပါတနံ ဥပါဒါယ အဿမဏော ဟောတိ အသကျပုတ္တိယောတိ, အန္တမသော သုညာဂါရေ အဘိရမာမီတိ ယော ဘိက္ခုပါပိစ္ဆော ဣစ္ဆာပကတော အသန္တံ အဘူတံ ဥတ္တရိမနုဿဓမ္မံ ဥလ္လပတိ, အဿမဏော ဟောတိ အသကျပုတ္တိယောတိစ ဥပဇ္ဈာစရိယေန ဩဝဒိယမာနေဟိ အဘိနဝေါပသမ္ပန္နေဟိ အာမ ဘန္တေတိ ပဋိညာကထာယေဝ. သာမဏေရေဟိပိ ပဗ္ဗဇ္ဇက္ခဏေယေဝ ဥပဇ္ဈာယဿ သန္တိကေ ပါဏာတိပါတာဝေရမဏိသိက္ခာပဒံ သမာဒိယာမီတိအာဒိနာ ပဌမံ ပဋိညာ ကတာယေဝ. တထာ ဘိက္ခူဟိ တံတံအာပတ္တိံ အာပဇ္ဇိတွာ ဒေသနာယ ပဋိကရဏကာလေ သာဓု သုဋ္ဌု ဘန္တေ သံဝရိဿာမီတိ အဘိဏှံ ပဋိညာ ကတာယေဝ. သာမဏေရေဟိပိ ဥပဇ္ဈာစရိယဿ သန္တိကေ သိက္ခာဂ္ဂဟဏကာလေပိ ပါဏာတိပါတာဝေရ မဏိသိက္ခာပဒံ သမာဒိယာမီတိအာဒိနာ အဘိဏှံ ပဋိညာ ကတာယေဝ. တာဟိ ပန ပဋိညာဟိ အဘာယိတွာ ဣတောယေဝ ဘာယာမီတိ ဝုတ္တဝစနံ အစ္ဆရိယံဝိယ ဟုတွာ ခါယတိ. ဣမာယ ဟိ ပဋိညာယ တာသံ ပဋိညာနံ ဝိသေသတာ န ဒိဿတီတိ. तब मैं ऐसा कहता हूँ— 'दो पुद्गल जानबूझकर आपत्ति (दोष) करने में असमर्थ हैं: भिक्षु और भिक्षुणी जो आर्य पुद्गल हैं; दो पुद्गल सभी आपत्तियों को जानबूझकर करने में समर्थ हैं: भिक्षु और भिक्षुणी जो पृथग्जन हैं'—परिवारपालि में ऐसा कहे जाने के कारण, आर्य पुद्गलों की तरह पृथग्जनों के लिए स्पष्ट प्रतिज्ञा करना उचित नहीं है, ऐसा मानकर यदि पृथग्जन भिक्षुओं द्वारा प्रतिज्ञा करना अत्यंत भारी (कठिन) समझा जाए, तो सभी आर्य और पृथग्जन भिक्षुओं द्वारा उपसंपदा-मालक में प्रारंभ से ही चार अकरणीय (न करने योग्य कार्य) बताए जाने चाहिए। उन चार अकरणीयों में—'यहाँ तक कि तिनके के बराबर भी, जो भिक्षु एक पाद (मुद्रा) या पाद के बराबर या एक पाद से अधिक बिना दिया हुआ चोरी की नीयत से लेता है, वह अश्रमण और अशाक्यपुत्रीय हो जाता है'; 'यहाँ तक कि कुन्तक-चींटी (छोटी चींटी) तक, जो भिक्षु जानबूझकर मनुष्य के शरीर से जीवन को नष्ट करता है, यहाँ तक कि गर्भपात कराने तक, वह अश्रमण और अशाक्यपुत्रीय हो जाता है'; 'यहाँ तक कि शून्य घर में मैं रमण करता हूँ, ऐसा जो पापी इच्छा वाला, बुरी इच्छाओं से ग्रस्त भिक्षु असत्य और अभूत उत्तर-मनुष्य धर्म का आलाप (दावा) करता है, वह अश्रमण और अशाक्यपुत्रीय हो जाता है'—इस प्रकार उपाध्याय और आचार्य द्वारा उपदेश दिए जाने पर नए उपसंपन्न भिक्षुओं द्वारा 'हाँ भन्ते' कहना प्रतिज्ञा ही है। सामणेरों द्वारा भी प्रव्रज्या के समय ही उपाध्याय के पास 'प्राणातिपात से विरत रहने का शिक्षापद ग्रहण करता हूँ' आदि के द्वारा पहली प्रतिज्ञा की ही जाती है। उसी प्रकार भिक्षुओं द्वारा उस-उस आपत्ति को प्राप्त कर देशना (प्रायश्चित) द्वारा सुधार करते समय 'साधु, सुष्ठु भन्ते, मैं संवर (संयम) करूँगा' ऐसी बार-बार प्रतिज्ञा की ही जाती है। सामणेरों द्वारा भी उपाध्याय और आचार्य के पास शिक्षा ग्रहण करते समय 'प्राणातिपात से विरत रहने का शिक्षापद ग्रहण करता हूँ' आदि के द्वारा बार-बार प्रतिज्ञा की ही जाती है। उन प्रतिज्ञाओं से न डरकर 'केवल इसी से डरता हूँ' ऐसा कहना आश्चर्य जैसा प्रतीत होता है। क्योंकि इस प्रतिज्ञा में उन प्रतिज्ञाओं की तुलना में कोई विशेषता नहीं दिखाई देती। အယံ ပနေတ္ထ သန္နိဋ္ဌာနတ္ထော,- ပဋိဿဝဒုက္ကဋာပတ္တိ နာမ သာဝတ္ထိယံ ပဿေနဒိကောသလရညာ ဣမသ္မိံ ဝိဟာရေ ဝဿံ ဥပဂစ္ဆာဟီတိ အာယာစိတေ သာဓူတိ ပဋိဇာနိတွာ လာဘဗဟုလတံ ပဋိစ္စ အန္တရာမဂ္ဂေ အညသ္မိံ ဝိဟာရေ ဝဿံ ဥပဂန္တွာ ပဋိဿဝဝိသံဝါဒနပစ္စယာ ဥပနန္ဒံ နာမ ဘိက္ခုံ အာရဗ္ဘ ပညတ္တာ. သမန္တပါသာဒိကဉ္စ နာမ ဝိနယဋ္ဌကထာယ ဝဿူပနာယိကက္ခန္ဓကဝဏ္ဏနာယံ [Pg.174] ပဋိဿဝေစ အာပတ္တိ ဒုက္ကဋဿာတိ ဧတ္ထ န ကေဝလံ ဣမံ တေမာသံ ဣဓ ဝဿံ ဝသထာတိ ဧတဿေဝ ပဋိဿဝေ အာပတ္တိ, ဣမံ တေမာသံ ဘိက္ခံ ဂဏှထ, ဥဘောပိ မယံ ဝဿံ ဝသိဿာမ, ဧကတော ဥဒ္ဒိဿာပေဿာမာတိ ဧဝမာဒိနာပိ တဿ တဿ ပဋိဿဝေ ဒုက္ကဋံ, တဉ္စ ခေါ ပဌမံ သုဒ္ဓစိတ္တဿ ပစ္ဆာ ဝိသံဝါဒနပစ္စယာ, ပဌမမ္ပိ အသုဒ္ဓ စိတ္တဿ ပန ပဋိဿဝေ ပါစိတ္တိယန္တိ ဝုတ္တံ. यहाँ यह निष्कर्ष का अर्थ है— 'प्रतिश्रव-दुष्कृत आपत्ति' (प्रतिज्ञा भंग का दोष) श्रावस्ती में राजा प्रसेनजित कोसल द्वारा 'इस विहार में वर्षावास करें' ऐसी प्रार्थना करने पर 'साधु' (ठीक है) कहकर प्रतिज्ञा करने के बाद, लाभ की अधिकता के कारण रास्ते में दूसरे विहार में वर्षावास करने के कारण, प्रतिज्ञा भंग के प्रत्यय से उपनन्द नामक भिक्षु को आधार बनाकर प्रज्ञप्त की गई थी। समन्तपासादिका नामक विनय-अट्ठकथा के 'वस्सूपनायिक खन्धक' के वर्णन में 'प्रतिज्ञा करने पर दुष्कृत की आपत्ति होती है'—यहाँ न केवल 'इन तीन महीनों में यहाँ वर्षावास करें' इसी प्रतिज्ञा में आपत्ति है, बल्कि 'इन तीन महीनों में भिक्षा ग्रहण करें, हम दोनों वर्षावास करेंगे, एक साथ (भोजन के लिए) निर्दिष्ट करेंगे' इत्यादि प्रकार की उस-उस प्रतिज्ञा में भी दुष्कृत दोष होता है। और वह भी पहले शुद्ध चित्त वाले के लिए बाद में प्रतिज्ञा भंग के कारण होता है, लेकिन पहले से ही अशुद्ध चित्त वाले की प्रतिज्ञा में तो 'पाचित्तिय' (प्रायश्चित्त) कहा गया है। ဣစ္စေဝံ ဘိက္ခူနံ အညမညံ ဒါယကေဟိစ သဒ္ဓိံ ပဋိဇာနိတွာ ဝိသံဝါဒနပစ္စယာ အညေသံ အတ္ထဟိတဘေဒေယေဝ ဒုက္ကဋာပတ္တိ ဝုတ္တာ, န အတ္တနော ဣစ္ဆာဝသေန သယမေဝ အဟံ ဘုဉ္ဇိဿာမိ သယိဿာမီတိ ဧဝမာဒိနာ ဝတွာ ယထာဝုတ္တာနုရူပံ အကတွာ ဝိသံဝါဒနေတိ. သစေ ပန ဘိက္ခုသာမဏေရာနံ ပဌမမေဝ အာမ ဘန္တေတိအာဒိနာ ပဋိညံ ကတွာ ပစ္ဆာ ကေနစိဒေဝ ကရဏီယေန တံတံအာပတ္တိံ အာပဇ္ဇန္တော သဟ ပဋိဿဝဝိသံဝါဒေန ဒုက္ကဋာပတ္တိယာ အာပဇ္ဇေယျ, ဧဝံ သတိ တတ္ထ တတ္ထ သိက္ခာပဒေသု ဒွေ ဒွေ အာပတ္တိယော ပညာပေယျ, န စ ဧဝမ္ပိ ပညတ္တာ, တေနေဝ ပဋိဿဝဒုက္ကဋာပတ္တိ နာမ ပရေသံ သန္တိကေ ပရေသံ မတိံ ဂဟေတွာ ပဋိဇာနိတွာ ဝိသံဝါဒနဋ္ဌာနေယေဝ ပညတ္တာတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗာ. इस प्रकार भिक्षुओं के आपस में और दानदाताओं के साथ प्रतिज्ञा करके उसे तोड़ने के कारण दूसरों के हित और लाभ की हानि होने पर ही दुष्कृत आपत्ति कही गई है, न कि अपनी इच्छा से स्वयं ही 'मैं खाऊँगा, मैं सोऊँगा' इत्यादि कहकर कहे अनुसार न करने (प्रतिज्ञा भंग) पर। यदि भिक्षुओं और सामणेरों द्वारा पहले ही 'हाँ भन्ते' आदि कहकर प्रतिज्ञा करने के बाद, बाद में किसी कार्यवश उस-उस आपत्ति को प्राप्त करने पर प्रतिज्ञा भंग के साथ दुष्कृत आपत्ति भी होती, तो ऐसा होने पर उन-उन शिक्षापदों में दो-दो आपत्तियाँ प्रज्ञप्त की जातीं, किंतु ऐसा प्रज्ञप्त नहीं किया गया है। इसलिए, 'प्रतिश्रव-दुष्कृत आपत्ति' दूसरों के पास दूसरों की मति (विचार) को स्वीकार कर प्रतिज्ञा करने के बाद उसे तोड़ने के स्थान पर ही प्रज्ञप्त की गई है, ऐसा समझना चाहिए। ဣဒါနိ ရာဇာ သာသနဿ သုဒ္ဓိံ ဣစ္ဆန္တော ဣမိနာ ဥပါယေန ဘိက္ခုသာမဏေရာနံ သီလံ သံဝရာပေန္တော ပစ္စက္ခသမ္ပရာယိကဘယံ အနုပေက္ခိတွာ သံဝရံ အာပဇ္ဇေယျုန္တိ စိန္တေတွာ ဗုဒ္ဓဿ သမ္မုခေ ပဋိညံ ကာရာပိတတ္တာ န ကောစိ ဒေါသော ဒိဿတိ. ဘိက္ခုသာမဏေရာနမ္ပိ ဘိယျောသောမတ္တာယသီလံ သံဝရိတွာ သီလပရိသုဒ္ဓိ ဘဝေယျာတိ. အထ ရာဇာ သဗ္ဗေသံ ဘိက္ခုသာမဏေရာနံ ဗုဒ္ဓဿ သမ္မုခေ ပဋိညံ ကာရာပေတွာ သီလံ ရက္ခာပေသီတိ. अब राजा शासन की शुद्धि चाहते हुए, इस उपाय से भिक्षुओं और सामणेरों के शील का संवर (संयम) कराते हुए, यह सोचकर कि वे प्रत्यक्ष और पारलौकिक भय की उपेक्षा न करते हुए संवर को प्राप्त करें, बुद्ध के सम्मुख प्रतिज्ञा करवाई गई है, इसमें कोई दोष नहीं दिखता। भिक्षुओं और सामणेरों के लिए भी शील का और अधिक संवर होकर शील की परिशुद्धि होगी। तब राजा ने सभी भिक्षुओं और सामणेरों से बुद्ध के सम्मुख प्रतिज्ञा करवाकर शील की रक्षा करवाई। ဣစ္စေဝံ ဣမဿ ရညော ကာလေ ပုဗ္ဗေ အလဇ္ဇိနောပိ သမာနာ ဘယံ အနုပေက္ခိတွာ ယေဘုယျေန လဇ္ဇိနောဝ ဘဝန္တီတိ. इस प्रकार इस राजा के काल में, जो पहले निर्लज्ज थे, वे भी भय की उपेक्षा न करते हुए अधिकतर लज्जावान (शीलवान) ही हो गए। ဗုဒ္ဓဿ [Pg.175] ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနတော တိသတာဓိကာနံ ဒွိဝဿသဟဿာနံ ဥပရိ နဝုတိမေ သံဝစ္ဆရေ ဗဟိနဒီတီရေ ဂါမသီမတော ပဋ္ဌာယ ယာဝ အန္တောဥဒကုက္ခေပါ, တာဝ ကမ္မံ ကရောန္တာနံ ဘိက္ခူနံ သုခေန ဂမနတ္ထာယ ဂဟဋ္ဌာ ဂါမသီမာယ ဥဒကုက္ခေပသီမံ သမ္ဗန္ဓိတွာ သေတုံ အကံသု. बुद्ध भगवान के परिनिर्वाण से दो हजार तीन सौ नब्बे (2390) वर्ष बीतने पर, नदी के बाहरी तट पर ग्राम-सीमा से लेकर जल-उत्क्षेप (उदकुक्खेप) सीमा तक, कर्म (विनय कर्म) करने वाले भिक्षुओं के सुखपूर्वक जाने के लिए गृहस्थों ने ग्राम-सीमा को जल-उत्क्षेप सीमा से जोड़ते हुए एक सेतु (पुल) का निर्माण किया। အထ တတ္ထ ဉာဏာလင်္ကာရသုမနမဟာဓမ္မရာဇဂုရုဂဏာ စရိယနာမကော ထေရော ဥပသမ္ပဒါဒိဝိနယကမ္မာနိ ကတိပယ ဝဿေသု အကာသိ. तब वहाँ ज्ञानालंकार सुमन महाधर्मराजगुरु गणाचार्य नामक थेर ने कुछ वर्षों तक उपसंपदा आदि विनय कर्म किए। ဓီရာနန္ဒတ္ထေရော ပန တတ္ထ သင်္ကရဒေါသော ဟောတီတိ ကမ္မံ ကာတုံ န ဣစ္ဆတိ. တထာ ပဋ္ဌာယ ယေ ယေ ဉာဏာလင်္ကာရသုမနမဟာဓမ္မရာဇဂုရုဂဏာစရိယဿ မတိံ ရုစ္စန္တိ, တေ တေ တဿ ပက္ခိကာ ဘဝန္တိ. ယေ ယေ ပန ဓီရာနန္ဒတ္ထေရဿမတိံ ရုစ္စန္တိ, တေတေ တဿ ပက္ခိကာ ဘဝန္တိ. ဧဝံလင်္ကာဒီပေ အမရပုရနိကာယိကာ ဘိက္ခူ. ဒွေဓာ ဘိန္ဒိတွာ တိဋ္ဌန္တိ. धीरानन्द स्थविर वहाँ 'संकर दोष' (मिश्रण का दोष) होने के कारण कर्म (विनय कर्म) करना नहीं चाहते थे। तब से लेकर जो-जो लोग ज्ञानालंकार सुमन महाधर्मराजगुरु गणाचार्य के मत को पसंद करते थे, वे उनके पक्ष के हो गए। और जो-जो धीरानन्द स्थविर के मत को पसंद करते थे, वे उनके पक्ष के हो गए। इस प्रकार लंका द्वीप में अमरपुर निकाय के भिक्षु दो भागों में विभाजित होकर रहने लगे। အထ ဓီရာနန္ဒပက္ခေ ဘိက္ခု တပ္ပက္ခိကဿ သီလက္ခန္ဓတ္ထေရဿ သိဿေ ဓမ္မက္ခန္ဓဝနရတနဘိက္ခူ အမှာကံ ဇမ္ဗုဒီပေ ရတနပုဏ္ဏနဂရံ ပေသေသုံ သံဃရာဇမဟာထေရဿ သန္တိကေ ဩဝါဒဿ ပဋိဂ္ဂါဟဏတ္ထာယ. တေ စ ကလိယုဂေ အဋ္ဌာရသာဓိကေ ဒွိဝဿသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ ကတ္တိကမာသဿ ဇုဏှပက္ခအဋ္ဌမိယံ သီဟဠဒီပတော နိက္ခမိတွာ အာဂစ္ဆန္တာ ဧကူနဝီသာဓိကေ ဒွိဝဿသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ ဖဂ္ဂုနမာသဿ ဇုဏှပက္ခသတ္တမိယံ ရတနပုဏ္ဏနဂရံ သမ္ပတ္တာ. तब धीरानन्द पक्ष के भिक्षुओं ने अपने पक्ष के शीलस्कन्ध स्थविर के शिष्यों, धम्मक्खन्ध और वनरतन भिक्षुओं को हमारे जम्बुद्वीप के रतनपुण्ण नगर में संघराज महास्थविर के पास उपदेश ग्रहण करने के लिए भेजा। वे कलियुग के एक हजार दो सौ अठारह (1218) वर्ष बीतने पर, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को सिंहल द्वीप से निकलकर आए और एक हजार दो सौ उन्नीस (1219) वर्ष बीतने पर फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को रतनपुण्ण नगर पहुँचे। အထ ဓမ္မရာဇာ သံဃရာဇဿ အာရာမေ စတုဘူမိကံ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တတ္ထ တေ ဝသာပေသိ. စတူဟိ ပစ္စယေဟိစ သင်္ဂဟံ အကာသိ. သံဃရာဇာစ တေသံ ဒွိန္နံ ပက္ခိကာနံ ဝစနံ သုတွာ ဗဟူဟိ ဂန္ထေဟိ သံသန္ဒိတွာ ဝိဝါဒံ ဝိနိစ္ဆိန္ဒိ. တာဒိသေ ဌာနေ သင်္ကရဒေါသဿ အတ္ထိဘာဝံ ပကာသေတွာ သန္ဒေသပဏ္ဏမ္ပိ တေသံ အဒါသိ. तब धर्मराज ने संघराज के आराम (विहार) में एक चार मंजिला विहार बनवाकर उन्हें वहाँ ठहराया। और चार प्रत्ययों से उनका सत्कार किया। संघराज ने उन दोनों पक्षों की बातों को सुनकर और बहुत से ग्रंथों से मिलान कर विवाद का निर्णय किया। उस स्थान पर संकर दोष के होने की बात स्पष्ट करते हुए उन्हें एक सन्देश-पत्र भी दिया। မဟာဓမ္မရာဇာစ [Pg.176] တေသံ ပုန သိက္ခံ သံဃရာဇဿ သန္တိကေ ဂဏှာပေတွာ ပိဋကတ္တယပေါတ္ထကာဒီနိ ဒါတဗ္ဗဝတ္ထူနိ ဒတွာ တသ္မိံယေဝ သံဝစ္ဆရေ ပဌမအာသာဠိမာသဿ ကာဠပက္ခဒသမိယံ နာဝါယ တေ ပေသေသိ. महाधर्मराज ने उन्हें संघराज के पास पुनः शिक्षा ग्रहण करवाई और त्रिपिटक की पुस्तकें आदि दान योग्य वस्तुएँ देकर उसी वर्ष प्रथम आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की दशमी को उन्हें नौका से भेज दिया। တတော ပစ္ဆာစ ဉာဏာလင်္ကာရသုမနမဟာဓမ္မရာဇဂုရုဂဏာစရိယပက္ခေ ဘိက္ခူပိ တပ္ပက္ခိကဿ ပညာမောလိတ္ထေရဿ သိဿေ ဝိမလဇောတိဓမ္မနန္ဒဘိက္ခူ ပေသေသုံ သဒ္ဓိံ အရိယာလင်္ကာရေန နာမ သာမဏေရေန စတူဟိစ ဥပါသကေဟိ. တေစ ကလိယုဂေ ဝီသာဓိကေ ဒွိသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ ကတ္တိကမာသဿ ဇုဏှပက္ခပဉ္စမိယံ သမ္ပတ္တာ. उसके पश्चात ज्ञानालंकार सुमन महाधर्मराजगुरु गणाचार्य पक्ष के भिक्षुओं ने भी अपने पक्ष के प्रज्ञामौलि स्थविर के शिष्यों, विमलजोति और धम्मानन्द भिक्षुओं को आर्यलंकार नामक श्रामणेर और चार उपासकों के साथ भेजा। वे कलियुग के एक हजार दो सौ बीस (1220) वर्ष बीतने पर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को पहुँचे। တဒါပိ သံဃရာဇဿ အာရာမေယေဝ ဧကံ ဝိဟာရံ ကာရာပေတွာ တေ ဝသာပေသိ. စတူဟိ ပစ္စယေဟိစ သင်္ဂဟံ အကာသိ. သံဃရာဇာပိ ပုန ဝိနိစ္ဆယံ အဒါသိ ယထာဝုတ္တနယေန. ဓမ္မရာဇာ တေသမ္ပိ ဘိက္ခူနံ သံဃရာဇဿ သန္တိကေ ပုန သိက္ခံ ဂဏှာပေတွာ သာမဏေရဉ္စ ဥပသမ္ပာဒေတွာ စတူဟိ ပစ္စယေဟိ သင်္ဂဟံ ကတွာ ပဟိဏိ. तब भी संघराज के आराम में ही एक विहार बनवाकर उन्हें ठहराया गया। और चार प्रत्ययों से उनका सत्कार किया। संघराज ने पुनः पूर्वोक्त रीति से निर्णय दिया। धर्मराज ने उन भिक्षुओं को भी संघराज के पास पुनः शिक्षा ग्रहण करवाई और श्रामणेर को उपसम्पदा दिलाकर, चार प्रत्ययों से सत्कार कर उन्हें विदा किया। တတော ပစ္ဆာစ ကလိယုဂေ ဗာဝီသာဓိကေ ဒွိဝဿသတေ သဟဿေစ သမ္ပတ္တေ မာဃမာသဿ ကာဠပက္ခဧကာဒသမိယံ သီဟဠဒီပတောယေဝ ဒွေ ဘိက္ခူ တယော သာမဏေရာ စတ္တာရော ဥပါသကာ သရဇတသုဝဏ္ဏကရဏ္ဍကံ သရဇတသုဝဏ္ဏစေတိယဒါတုံ ဟတ္ထိဒန္တမယံ ဗုဒ္ဓရူပံ မဟာဗောဓိပတ္တာနိ မဟာဗောဓိတစံ မဟာဗောဓိပတိဋ္ဌာနသူမိံ သီဟဠဒက္ခိဏသာခါဗောဓိပတ္တာနိ ဒုတိယသတ္တာဟအနိမိသဋ္ဌာနဘူမိဉ္စ ဓမ္မပဏ္ဏာကာရတ္ထာယ ဂဟေတွာ ရတနပုဏ္ဏံ နာမ မဟာရာဇဋ္ဌာနီနဂရံ သမ္ပတ္တာ. တေသမ္ပိ ဓမ္မရာဇာ စတူဟိ ပစ္စယေဟိ သင်္ဂဟံ ကတွာ သံဃရညော အာရာမေ ဝသာပေသိ. ဘိက္ခုနဉ္စ ပုန သိက္ခံ ဂဏှာပေသိ. သာမဏေရာနဉ္စ ဥပသမ္ပဒကမ္မံ ဂဟဋ္ဌာနဉ္စ ပဗ္ဗဇ္ဇကမ္မံ ဂဏှာပေသိ. उसके पश्चात कलियुग के एक हजार दो सौ बाईस (1222) वर्ष बीतने पर माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को सिंहल द्वीप से ही दो भिक्षु, तीन श्रामणेर और चार उपासक; रजत-स्वर्ण मंजूषा सहित, रजत-स्वर्ण चैत्य धातु, हाथीदांत की बुद्ध प्रतिमा, महाबोधि के पत्ते, महाबोधि की छाल, महाबोधि के अधिष्ठान की मिट्टी, सिंहल की दक्षिण शाखा बोधि के पत्ते और द्वितीय सप्ताह के अनिमेश स्थान की मिट्टी को धर्म-उपहार के रूप में लेकर रतनपुण्ण नामक महाराजधानी नगर पहुँचे। धर्मराज ने उनका भी चार प्रत्ययों से सत्कार कर उन्हें संघराज के आराम में ठहराया। भिक्षुओं को पुनः शिक्षा ग्रहण करवाई, श्रामणेरों को उपसम्पदा कर्म और गृहस्थों को प्रव्रज्या कर्म करवाया। ဣစ္စေဝံ မရမ္မရဋ္ဌေ ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနတော ပဋ္ဌာယ ယာဝဇ္ဇတနာ [Pg.177] သာသနဿ ထေရပရမ္ပရဝသေန ပတိဋ္ဌာနတာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. इस प्रकार म्यांमार राष्ट्र (मरम्म राष्ट्र) में भगवान के परिनिर्वाण से लेकर आज तक स्थविर परम्परा के माध्यम से शासन की प्रतिष्ठा जाननी चाहिए। ဣစ္စေဝံ မရမ္မမဏ္ဍလေ အရိမဒ္ဒနပုရေ အရဟန္တတ္ထေရဂဏော ဥတ္တရာဇီဝတ္ထေရဆပ္ပဒတ္ထေရဂဏော သိဝလိတ္ထေရဂဏော အာနန္ဒတ္ထေရဂဏော တာမလိန္ဒတ္ထေရဂဏောတိ ပဉ္စ ဂဏာ အဟေသုံ. इस प्रकार म्यांमार मण्डल के अरिमर्दनपुर में अरहन्त स्थविर गण, उत्तराजीव स्थविर-छप्पद स्थविर गण, सीवलि स्थविर गण, आनन्द स्थविर गण और तामलिन्द स्थविर गण—ये पाँच गण हुए। ဣဒါနိ အရိမဒ္ဒနနဂရေ ပဉ္စဂဏတော ပဋ္ဌာယ ဝိဇယပုရဇေယျပုရရတနပူရေသု ထေရပရမ္ပရဝသေန သာသနဿ အနုက္ကမေန အာဂတဘာဝံ ဒဿယိဿာမိ. သိရိခေတ္တနဂရေ ဟိ ‘သော ယာံ နောံ’ နာမ ရာဇာ ပရက္ကမဝံသိကဿ သာရဒဿိတ္ထေရဿ အန္တေဝါသိကံ သဒ္ဓမ္မဋ္ဌိတိတ္ထေရံ အတ္တနော အာစရိယံ ကတွာ ပူဇေသိ. अब अरिमर्दन नगर के पाँच गणों से लेकर विजयपुर, जेय्यपुर और रतनपुर में स्थविर परम्परा के माध्यम से शासन के क्रमशः आने के भाव को दिखाऊँगा। श्रीक्षेत्र नगर में 'सो यां नों' नामक राजा ने पराक्रमवंशीय सारदर्शी स्थविर के अन्तेवासी सद्धर्मस्थिति स्थविर को अपना आचार्य बनाकर उनकी पूजा की। ကလိယုဂဿ စတုဝဿာဓိကအဋ္ဌသတကာလေ သိရိခေတ္တနဂရတော အာဂန္တွာ သော ရတနပူရေ ရဇ္ဇံ ကာရေသိ. အထ အတ္တနော ပုတ္တံ အနေကိဘံ နာမ ရာဇကုမာရံ မဟာရာဇ နာမေန သိရိခေတ္တနဂရံ ဘုဉ္ဇာပေသိ. ဒက္ခိဏဒိသာဘာဂေ ‘ကူ ဝ္ဌေ ဋ-ယော မော’ နဂရံ, ပစ္ဆိမဒိသာဘာဂေ ‘ဖော ခေါံ’ နာမ ဌာနံ, ဥတ္တရဒိသာဘာဂေ ‘မ လောံ’ နဂရံ, ပုရတ္ထိမဒိသာဘာဂေ ‘ကောံ ခေါံ’ နာမ ဌာနံ, ဧတ္ထန္တရေ နိသိန္နာနံ ဂိဟီနံ မမ ပုတ္တဿ အာဏာ ပဝတ္တတု, ဘိက္ခူနံ မမာစရိယဿ သဒ္ဓမ္မဋ္ဌိတိတ္ထေရဿ အာဏာ ပဝတ္တတူတိ နိယျာဒေသိ. कलियुग के आठ सौ चार (804) वर्ष के समय में श्रीक्षेत्र नगर से आकर उसने रतनपुर में राज्य किया। तब अपने पुत्र अनेकिभ नामक राजकुमार को 'महाराज' नाम से श्रीक्षेत्र नगर का उपभोग कराया। दक्षिण दिशा में 'कू वठे ट-यो मो' नगर, पश्चिम दिशा में 'फो खों' नामक स्थान, उत्तर दिशा में 'मा लों' नगर, पूर्व दिशा में 'कों खों' नामक स्थान—इनके बीच स्थित गृहस्थों पर मेरे पुत्र की आज्ञा चले और भिक्षुओं पर मेरे आचार्य सद्धर्मस्थिति स्थविर की आज्ञा चले—ऐसा उसने निर्देश दिया। တဿစ သဒ္ဓမ္မဋ္ဌိတိတ္ထေရဿ အရိယဝံသတ္ထေရော မဟာသာမိတ္ထေရောတိ ဒွေ သိဿာ အဟေသုံ. တေသု မဟာသာမိတ္ထေရော ပုဗ္ဗေ ဝုတ္တနယေန သာသနဝံသံ အာနေဿာမီတိ သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ သီဟဠဒီပတော သဒ္ဓိံ ပဉ္စဟိ ဘိက္ခူဟိ သဒ္ဓမ္မစာရိံ နာမ ထေရံ အာနေတွာ အဘိနဝသိက္ခံ ဂဏှိတွာ သိရိခေတ္တနဂရေ သီဟဠဒီပဝံသိကံ သာသနံ ဝဍ္ဎာပေတွာ နိသီဒိ. တဿ မဟာသာရိတ္ထေရဿ သိဿော အတုလဝံသော နာမ ထေရော စတူသု ဒိသာသု အဟိဏ္ဍိတွာ ပရိယတ္တိံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ သိရိခေတ္တနဂရေယေဝ [Pg.178] တမ္ဗုလဘုဉ္ဇမာတိကာသမီပေ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိတွာ နိသီဒိ. တဿ အတုလဝံသတ္ထေရဿ သိဿော ရတနရံသီ နာမ ထေရောစ ပရိယတ္တိဝေသာရဇ္ဇံ ပတွာ သိရိခေတ္တနဂရေယေဝ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိတွာ နိသီဒိ. တဿစ ရတနရံ သိတ္ထေရဿ သိဿော သတွဝဓမ္မရာဇဿ အာစရိယော အဘိသင်္ကေတော နာမ ထေရော ပရိယတ္တိဝေသာရဇ္ဇံ ပတွာ သိရိခေတ္တနဂရယေဝ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိတွာ နိသီဒိ. တဿ ပန သိဿော မုနိန္ဒဃောသော နာမ ထေရော အတ္ထိ. ကလိယုဂေ သတ္တတာဓိကေ နဝသတေ သမ္ပတ္တေ ပစ္ဆိမပက္ခာဓိကရာဇာ သိရိခေတ္တနဂရံ အဘိဘဝိတွာ နန္ဒယောဓေန နာမ အမစ္စေန သဒ္ဓိံ တံ မုနိန္ဒဃောသတ္ထေရံ အာနေတွာ ရတနပူရေ ပတိဋ္ဌာပေသိ. उस सद्धम्मट्ठिति स्थविर के दो शिष्य थे - अरियवंस स्थविर और महासामि स्थविर। उनमें से महासामि स्थविर ने पूर्वोक्त विधि से 'मैं शासन-वंश को लाऊँगा' ऐसा सोचकर सिंहलद्वीप जाकर, सिंहलद्वीप से पाँच भिक्षुओं के साथ सद्धम्मचारी नामक स्थविर को लाकर, अभिनव शिक्षा ग्रहण कर, श्रीक्षेत्र नगर में सिंहलद्वीप-वंशीय शासन को बढ़ाते हुए निवास किया। उस महासारि स्थविर के शिष्य अतुलवंस नामक स्थविर ने चारों दिशाओं में भ्रमण कर पर्यत्ति का अध्ययन किया और श्रीक्षेत्र नगर में ही तम्बुलभुञ्जमातिका के समीप शासन की उन्नति करते हुए निवास किया। उस अतुलवंस स्थविर के शिष्य रतनरंसी नामक स्थविर ने भी पर्यत्ति में निपुणता प्राप्त कर श्रीक्षेत्र नगर में ही शासन की उन्नति करते हुए निवास किया। उस रतनरंसी स्थविर के शिष्य, सत्ववधम्मराज के आचार्य, अभिसंकेत नामक स्थविर ने पर्यत्ति में निपुणता प्राप्त कर श्रीक्षेत्र नगर में ही शासन की उन्नति करते हुए निवास किया। उनके शिष्य मुनिन्दघोस नामक स्थविर हैं। कलियुग के ९७० वर्ष बीतने पर, पश्चिमपक्ष के राजा ने श्रीक्षेत्र नगर को जीतकर नन्दयोध नामक अमात्य के साथ उन मुनिन्दघोस स्थविर को लाकर रतनपुर में प्रतिष्ठित किया। သော ကိရ ပစ္ဆိမပက္ခာဓိကရာဇာ ဧဝံ ကထေသိ,- အဟံ သိရိခေတ္တနဂရံ လဘိတွာ ဧကံယေဝ ဘိက္ခုံ ဧကံယေဝ ဂိဟိံ လဘာမီတိ. सुना जाता है कि उस पश्चिमपक्ष के राजा ने ऐसा कहा - 'मैंने श्रीक्षेत्र नगर को प्राप्त कर केवल एक ही भिक्षु और एक ही गृहस्थ को प्राप्त किया है।' သော ပန ထေရော သာမဏေရနာမေန မုနိန္ဒဃောသော နာမ. ဥပသမ္ပန္နကာလေ ပန မာတုလဘူတဿ ထေရဿ နာမေန ဥပါလိ နာမ. ဒိန္နနာမေန ပန တိပိဋကာလင်္ကာရော နာမ. တိရိယပဗ္ဗတဝိဟာရေ ပန ဝါသတ္တာ ဌာနနာမေန တိရိယပဗ္ဗတတ္ထေရော နာမ. वे स्थविर श्रामणेर अवस्था में 'मुनिन्दघोस' नाम से जाने जाते थे। उपसम्पदा के समय अपने मामा स्थविर के नाम पर उनका नाम 'उपालि' पड़ा। दिए गए नाम से वे 'तिपिटकालंकार' कहलाए। तिरियपब्बत विहार में निवास करने के कारण स्थान के नाम से वे 'तिरियपब्बत स्थविर' कहलाए। သော ကိရ ဧရာဝတီနဒီတီရေ စတုဘူမိကဝိဟာရေ ပဌမံ နိသီဒိတွာ ပစ္ဆာ ကလိယုဂဿ ဝဿသဟဿေ ကာလေသဋ္ဌိဝဿာယုကော ဟုတွာ တိရိယပဗ္ဗတဝိဟာရေ နိသီဒိ. သာမဏေရကာလေ သော ဇလုမသျာမဘယေန ရတနပူရတော နိက္ခမိတွာ ကေတုမတီနဂရံ ပတွာ တတ္ထ တိသာသနဓဇတ္ထေရဿ သိဿဘူတဿ ဓမ္မရာဇဂုရုတ္ထေရဿ သန္တိကေ ဂန္ထံ ဥဂ္ဂဏှိံ. ပါဠိအဋ္ဌကထာဋီကာသု အတိဆေကတာယ ဒဟရကာလေယေဝစ ဝေဿန္တရဇာတကံ ကဗျာလင်္ကာရေန ဗန္ဓိတွာ ကထနတော အတိဝိယ ပါကဋော အဟောသိ. တဿ ပန [Pg.179] ထေရဿ သိဿော ဥစ္စနဂရဝါသီ မဟာတိဿတ္ထေရောတိ သင်္ဂိရဇနပဒေ အရညဝါသံ ဝသိတွာ ပရိယတ္တိံ ဝါစေတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိ. တဿ ပန သိဿော ရေမိနဂါမေ ဂါမဝါသီ စန္ဒတ္ထေရော နာမ. တဿ သိဿော တံဂါမဝါသီ ဂုဏသိရိတ္ထေရော နာမ. တဿ သိဿော တံဂါမဝါသီ ကလျာဏဓဇတ္ထရော နာမ. သော ပန ထေရော ပဒုမနဂရေ သဟဿောရောဓဗောဓောဒဓိဂါမေသု ပရိယတ္တိံ ဝါစေတွာ နိသီဒိ. တဿ သိဿော ဗောဓောဒဓိဂါမဝါသိနော ဣန္ဒောဘာသကလျာဏစက္ကဝိမလာစာရတ္ထေရာ သဟဿောရောဓဂါမဝါသိနော ဂုဏသာရစန္ဒသာရတ္ထေရာ ဝံတုမဂါမဝါသီ ဝရဧသိတ္ထေရော ကန္နိနဂရေ ဇရရာဇဂါမ ဝါသီ ဂုဏသိရိတ္ထေရောစာတိ ဣမေ ထေရာ ကလျာဏဓဇတ္ထေရဿ သန္တိကေ ပုန သိက္ခံ ဂဟေတွာ ပရိယတ္တိံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ ကောဝိဒါ အဟေသုံ. वे इरावती नदी के तट पर चतुभूमिका विहार में पहले रहे, बाद में कलियुग के १०६० वर्ष बीतने पर तिरियपब्बत विहार में रहे। श्रामणेर काल में वे जलुम-स्याम के भय से रतनपुर से निकलकर केतुमती नगर पहुँचे और वहाँ तिससनधज स्थविर के शिष्य धम्मराजगुरु स्थविर के पास ग्रन्थों का अध्ययन किया। पालि, अट्ठकथा और टीकाओं में अत्यंत निपुण होने के कारण और युवावस्था में ही वेस्सन्तर जातक को काव्यालंकार में रचकर सुनाने के कारण वे अत्यंत प्रसिद्ध हुए। उन स्थविर के शिष्य उच्चनगर निवासी महातिस्स स्थविर ने संगिर जनपद में अरण्यवास करते हुए पर्यत्ति का अध्यापन कर शासन की उन्नति की। उनके शिष्य रेमि ग्राम के ग्रामवासी चन्द स्थविर थे। उनके शिष्य उसी ग्राम के गुणसिरि स्थविर थे। उनके शिष्य उसी ग्राम के कल्याणधज स्थविर थे। उन स्थविर ने पदुमनगर के सहस्सरोध और बोधोदधि ग्रामों में पर्यत्ति का अध्यापन करते हुए निवास किया। उनके शिष्य बोधोदधि ग्राम निवासी इन्दोभास, कल्याणचक्क और विमलाचार स्थविर; सहस्सरोध ग्राम निवासी गुणसार और चन्दसार स्थविर; वन्तुम ग्राम निवासी वरएसि स्थविर और कन्नि नगर के जरराज ग्राम निवासी गुणसिरि स्थविर - इन सभी स्थविरों ने कल्याणधज स्थविर के पास पुनः शिक्षा ग्रहण कर और पर्यत्ति का अध्ययन कर विद्वत्ता प्राप्त की। တဿေဝ ကလျာဏဓဇတ္ထေရဿ သိဿော သင်္ဂိရဇနပဒေ သမိဝနဂါမေ နိသိန္နော ဓမ္မဓရော နာမ ထေရော မဟလ္လကကာလေ ပဒုမနဂရေ ကုသုမမူလဂါမေ နိသီဒိတွာ ဂန္ထံ ဝါစေတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိ. उन्हीं कल्याणधज स्थविर के शिष्य, संगिर जनपद के समिवन ग्राम में रहने वाले धम्मधर नामक स्थविर ने वृद्धावस्था में पदुमनगर के कुसुममूल ग्राम में रहकर ग्रन्थों का अध्यापन करते हुए शासन की उन्नति की। တေသု ဂုဏသိရိတ္ထေရော အမရပုရမာပကဿ ရညော ကာလေ ဂုဏာဘိလင်္ကာရသဒ္ဓမ္မမဟာရာဇာဓိရာဇဂုရူတိ နာမလဉ္ဆံ ဂဏှိတွာ ဇေယျဘူမိဝါသကိတ္တိဝိဟာရေ ပဋိဝသိ. उनमें से गुणसिरि स्थविर ने अमरपुर के संस्थापक राजा के काल में 'गुणाभिलङ्कारसद्धम्ममहाराजाधिराजगुरु' की उपाधि प्राप्त कर जेय्यभूमिवास-कित्ति विहार में निवास किया। တဿ ပန ထေရဿ သိဿော ဉာဏာဘိဝံသဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဂုရု နာမ မဟာထေရော. တဿေဝ ရညော ကာလေ သံဃရာဇာ အဟောသိ. သော ပန ထေရော သီဟဠဒီပေ အမရပုရနိကာယိကာနံ ပဘဝေါ. ဂုဏာဘိလင်္ကာရသဒ္ဓမ္မမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရဿေဝ သိဿော တိပိဋကာလင်္ကာရမဟာဓမ္မရာဇဂုရု နာမ ထေရော. တဿ သိဿော သူရိယဝံသာဘိသိရိပဝရာလင်္ကာရဓမ္မသေနာပတိ မဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရု နာမ ထေရော အမရပုရဒုတိယမာပကဿ ရညော ကာလေ [Pg.180] သံဃရာဇာ အဟောသိ. တဿ ပန သိဿော ဉေယျ ဓမ္မာဘိဝံသမုနိဝရဉာဏကိတ္တိသိရိပဝရာလင်္ကာရဓမ္မသေနာပတိ- မဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရု မဟာထေရော ဒုတိယံ အမရပုရမာပကဿ ရတနပုဏ္ဏမာပကဿစ ရညော ကာလေသု သံဃ ရာဇာ အဟောသိ. သော ပန ဉာဏာဘိဝံသဓမ္မသေနာပတိမဟာဓမ္မရာဇာဓိရာဇဂုရုတ္ထေရဿ သံဃရညော သိဿောပိ ဝရဧသိတ္ထေရဿ သိဿောစ အဟောသိ. उन स्थविर के शिष्य ञाणाभिवंसधम्मसेनापतिमहाधम्मराजगुरु नामक महास्थविर थे। वे उसी राजा के काल में संघराज हुए। वे स्थविर सिंहलद्वीप के अमरपुर निकाय के प्रवर्तक थे। गुणाभिलङ्कारसद्धम्ममहाधम्ममहाराजाधिराजगुरु स्थविर के ही शिष्य तिपिटकालंकारमहाधम्मराजगुरु नामक स्थविर थे। उनके शिष्य सूरियवंसाभिसिरिपवरालङ्कारधम्मसेनापति महाधम्ममहाराजाधिराजगुरु नामक स्थविर अमरपुर के द्वितीय संस्थापक राजा के काल में संघराज हुए। उनके शिष्य ञेय्यधम्माभिवंसमुनिवरञाणकित्तिसिरिपवरालङ्कारधम्मसेनापति-महाधम्ममहाराजाधिराजगुरु महास्थविर द्वितीय अमरपुर संस्थापक और रतनपुण्ण संस्थापक राजाओं के काल में संघराज हुए। वे संघराज ञाणाभिवंसधम्मसेनापतिमहाधम्ममहाराजाधिराजगुरु स्थविर के भी शिष्य थे और वरएसि स्थविर के भी शिष्य थे। အယံ သီဟဠဒီပတော သဗ္ဗပစ္ဆိမာဂတေဟိ သဒ္ဓမ္မစာရီမဟာသာမိတ္ထေရေဟိ ယာဝ အမှာကံ အာစရိယာ ထေရပရမ္ပရာ ဒဿနကထာ. यह सिंहलद्वीप से सबसे अंत में आए सद्धम्मचारी महासामि स्थविरों से लेकर हमारे आचार्यों तक की स्थविर-परम्परा को दर्शाने वाला वृत्तांत है। အယမ္ပိ အပရာ ထေရပရမ္ပရာ ဝေဒိတဗ္ဗာ. ဆပ္ပဒတ္ထေရဝံသိကော သဒ္ဓမ္မကိတ္တိ နာမ ထေရော ဇေယျပုရံ အာဂန္တွာ စတုဒီပဘူမိဋ္ဌာနေ နိသီဒိတွာ မဟာအရိယဝံသတ္ထေရဿ သန္တိကေ ပရိယတ္တိံ ဥဂ္ဂဏှိတွာ တတော ပစ္ဆာ ဇေတဝနဝိဟာရံ သင်္ကမိတွာ တတ္ထ နိသီဒိတွာ ပရိယတ္တိံ ဝါစေတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိ. यह एक अन्य स्थविर-परम्परा भी जाननी चाहिए। छप्पद स्थविर के वंश के सद्धम्मकित्ति नामक स्थविर ने जेय्यपुर आकर चतुदीपभूमि स्थान में रहकर महाअरियवंस स्थविर के पास पर्यत्ति का अध्ययन किया, उसके पश्चात जेतवन विहार जाकर वहाँ रहते हुए पर्यत्ति का अध्यापन कर शासन की उन्नति की। တဿ သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရဿ သိဿော တိသာသနဓဇော နာမ. တဿ သိဿော ဓမ္မရာဇဂုရု နာမ. တဿ သိဿော မုနိန္ဒဃောသော နာမ. တဿ သိဿော မဟာတိဿော နာမ. တဿ သိဿော စန္ဒပညော နာမ. တဿ သိဿော ဂုဏသိရိ နာမ. တဿ သိဿော ဉာဏဓဇော နာမ. တဿ သိဿော ဓမ္မဓရော နာမ. တဿ သိဿော ဣန္ဒောဘာသော နာမ. တတော ပဋ္ဌာယ ကလျာဏစက္က ဝိမလာစာရ ဂုဏသာရ စန္ဒသာရ ဝရဧသီ ဂုဏသိရိ ဉာဏာဘိဝံသ ဉေယျဓမ္မာဘိဝံသတ္ထေရာနံ ဝသေန သာသနဝံသော ဝေဒိတဗ္ဗောတိ. उन सद्धम्मकित्ति स्थविर के शिष्य तिसासनधज नाम के थे। उनके शिष्य धम्मराजगुरु नाम के थे। उनके शिष्य मुनिन्दघोस नाम के थे। उनके शिष्य महातिस्स नाम के थे। उनके शिष्य चन्दपञ्ञ नाम के थे। उनके शिष्य गुणसिरि नाम के थे। उनके शिष्य ञाणधज नाम के थे। उनके शिष्य धम्मधर नाम के थे। उनके शिष्य इन्दोभास नाम के थे। वहाँ से लेकर कल्याणचक्क, विमलाचार, गुणसार, चन्दसार, वरएसी, गुणसिरि, ञाणाभिवंस, और ञेय्यधम्माभिवंस स्थविरों के माध्यम से शासनवंश को जानना चाहिए। အယံ ပတ္တလင်္ကဿ ဆပ္ပဒတ္ထေရဿ သိဿဘူတာ သဒ္ဓမ္မကိတ္တိတ္ထေရတော ပဋ္ဌာယ ထေရပရမ္ပရဒဿနကထာ. यह पत्तलङ्क के छप्पद स्थविर के शिष्य हुए सद्धम्मकित्ति स्थविर से लेकर स्थविर-परम्परा को दर्शाने वाली कथा है। ဣဒံ ရတနပုဏ္ဏနဂရေ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနံ. यह रतनपुण्ण नगर में शासन की प्रतिष्ठा (स्थापना) है। ဧဝံ အပရန္တရဋ္ဌသင်္ခါတေန ဧကဒေသေန သကလမ္ပိ မရမ္မရဋ္ဌံ [Pg.181] ဂဟေတွာ သာသနဝံသော ဒဿေတဗ္ဗော. ဘဂဝါပိ ဟိ အပရန္တရဋ္ဌေ စန္ဒနဝိဟာရေ ဝသိတွာ တမ္ဗဒီပရဋ္ဌေ တံတံဒေသမ္ပိ ဣဒ္ဓိယာ စရိတွာ သတ္တာနံ ဓမ္မံ ဒေသေသိယေဝါတိ. इस प्रकार अपरान्त राष्ट्र कहे जाने वाले एक देश के साथ सम्पूर्ण मरम्म राष्ट्र को लेकर शासनवंश दिखाया जाना चाहिए। भगवान ने भी अपरान्त राष्ट्र के चन्दन विहार में रहकर तम्बदीप राष्ट्र के उन-उन प्रदेशों में ऋद्धि से विचरण कर प्राणियों को धर्म का उपदेश दिया था। ဣတိ သာသနဝံသေ အပရန္တရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ इस प्रकार शासनवंश में अपरान्त राष्ट्र के शासनवंश की कथा का मार्ग (समाप्त हुआ)। နာမ ဆဋ္ဌော ပရိစ္ဆေဒေါ. नामक छठा परिच्छेद। ၇. ကသ္မိရဂန္ဓာရရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ ७. कश्मीर-गन्धार राष्ट्र के शासनवंश की कथा का मार्ग। ၇. ဣဒါနိ ယထာဝုတ္တမာတိကာဝသေန ကသ္မီရဝန္ဓာရရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂံ ဝတ္တုံ ဩကာသော အနုပ္ပတ္တော, တသ္မာ တံ ဝက္ခာမိ. ७. अब पूर्वोक्त मातृका के अनुसार कश्मीर-गन्धार राष्ट्र के शासनवंश की कथा के मार्ग को कहने का अवसर प्राप्त हुआ है, इसलिए मैं उसे कहूँगा। တတိယသင်္ဂီတာဝသာနေ ဟိ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရော မဇ္ဈန္တိ ကတ္ထေရံ ကသ္မီရဂန္ဓာရရဋ္ဌံ ပေသေသိ,-တွံ ဧတံ ရဋ္ဌံ ဂန္တွာ ဧတ္ထ သာသနံ ပဘိဋ္ဌာပေဟီတိ. ဧတ္ထ စ ကသ္မီရဂန္ဓာရရဋ္ဌံ နာမ စီနရဋ္ဌသမီပေ တိဋ္ဌတိ. တေနေဝ ဟိ အဓုနာ ကသ္မီရဂန္ဓာရရဋ္ဌဝါသိနော စိနရဋ္ဌဝါသိနောစ မနုဿာ အရဝါဠဿ နာမ နာဂရာဇဿ ဥပ္ပဇ္ဇနကာလတော ပဋ္ဌာယ ယာဝဇ္ဇတနာ နာဂရူပံ ကတွာ မာနေန္တိ ပူဇေန္တိ သက္ကရောန္တိ, ဝတ္ထဘာဇနာဒီသုပိ နာဂရူပမေဝ တေ ယေဘုယျေန ကရောန္တီတိ. तृतीय संगीति के अंत में महामोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर ने मज्झन्तिक स्थविर को कश्मीर-गन्धार राष्ट्र भेजा—"तुम इस राष्ट्र में जाकर यहाँ शासन को प्रतिष्ठित करो।" और यहाँ कश्मीर-गन्धार राष्ट्र चीन राष्ट्र के समीप स्थित है। इसी कारण से आज भी कश्मीर-गन्धार राष्ट्र के निवासी और चीन राष्ट्र के निवासी मनुष्य, अरावळ नामक नागराज के उत्पन्न होने के समय से लेकर आज तक नाग का रूप बनाकर सम्मान करते हैं, पूजा करते हैं और सत्कार करते हैं; वे वस्त्रों और बर्तनों आदि पर भी प्रायः नाग का ही रूप बनाते हैं। သောစ မဇ္ဈန္တိကတ္ထေရောပိ စတူဟိ ဘိက္ခူဟိ သဒ္ဓိံ အတ္ထ ပဉ္စမော ဟုတွာ ပါဋလိပုတ္တတော ဝေဟာသံ အဗ္ဘုဂ္ဂန္တွာ ဟိမဝတိ အရဝါဠဒဟဿ ဥပရိ ဩတရိ. တေန ခေါ ပန သမယေန ကသ္မီရဂန္ဓာရရဋ္ဌေ သဿပါကသမယေ အရဝါဠော နာမ နာဂရာဇာ အရဝါဠဒဟေ နိသီဒိတွာ ကရကဝဿံ နာမ ဝဿာပေတွာ သဿံ ဟရာပေတွာ မဟာသမုဒ္ဒံ ပါပေသိ. တေရောစ အရဝါဠဒဟဿ ဥပရိ ဩတရိတွာ အရဝါဠဒဟပိဋ္ဌိကံ စင်္ကမတိပိ တိဋ္ဌတိပိ နိသီဒတိပိ သေယျမ္ပိ ကပ္ပေတိ. နာဂမာဏဝကာ တံ ဒိသွာ အရဝါဠဿ နာဂရာဇဿ အာရောစေသုံ, - မဟာရာဇ ဧကော ဆိန္နဘိန္နပဋဓရော ဘဏ္ဍုကာသာဝဝသနော အမှာကံ ဥဒကံ ဒူသေတီတိ. တဒါ ပန ထေရော အတ္တာနံယေဝ [Pg.182] နာဂါနံ ဒဿေတိ. နဂရာဇာ တာဝဒေဝ ကောဓာဘိဘူတော နိက္ခမိတွာ ထေရံ ဒိသွာ မက္ခံ အဿဟမာနော အန္တလိက္ခေ အနေကာနိ ဘိံသနကာနိ နိမ္မိနိ. တတော တတော ဘုသာဝါတာ ဝါယန္တိ, ရုက္ခာ ဆိဇ္ဇန္တိ, ပဗ္ဗတကူဋာ ပတန္တိ မေဃာဂဇ္ဇန္တိ, ဝိဇ္ဇုံလတာ နိစ္ဆရန္တိ, အသနိယော ဖလန္တိ, ဘိန္နံ ဝိယ ဂဂနံ ဥဒကံ ပဂ္ဃရတိ, ဘယာနကရူပါ နာဂကုမာရာ သန္နိပတန္တိ, သယမ္ပိ ဓူမာယတိ ပဇ္ဇလတိ, ပဟရဏဝုဋ္ဌိယော ဝိဿဇ္ဇေတိ, ကော အယံမုဏ္ဍကော ဆိန္နဘိန္နပဋဓရောတိအာဒီဟိ ဖရုသဝစနေဟိ ထေရံ သန္တဇ္ဇေတိ, ဧထ ဂဏှထ ဟနထ နိဒ္ဓမထ ဣမံ သမဏန္တိ နာဂဗလံ အာဏာပေသိ. वे मज्झन्तिक स्थविर भी चार भिक्षुओं के साथ पाँचवें होकर पाटलिपुत्र से आकाश में उड़कर हिमालय में अरावळ दह (झील) के ऊपर उतरे। उस समय कश्मीर-गन्धार राष्ट्र में फसल पकने के समय अरावळ नामक नागराज अरावळ दह में बैठकर करक-वृष्टि (ओले) बरसाकर फसल को नष्ट करवाकर महासमुद्र में पहुँचा देता था। स्थविर अरावळ दह के ऊपर उतरकर अरावळ दह के तट पर चंक्रमण करते थे, खड़े होते थे, बैठते थे और शयन भी करते थे। नाग-कुमारों ने उन्हें देखकर अरावळ नागराज को सूचित किया—"महाराज! एक फटे-पुराने वस्त्र धारण करने वाला, मुण्डित और काषाय वस्त्र पहने हुए व्यक्ति हमारे जल को दूषित कर रहा है।" तब स्थविर ने स्वयं को नागों को दिखाया। नागराज तुरंत क्रोध से अभिभूत होकर निकला और स्थविर को देखकर, ईर्ष्या को सहन न करते हुए, अंतरिक्ष में अनेक भयानक दृश्य उत्पन्न किए। वहाँ-वहाँ से तेज हवाएँ चलने लगीं, वृक्ष कटने लगे, पर्वत शिखर गिरने लगे, मेघ गरजने लगे, बिजलियाँ चमकने लगीं, वज्र गिरने लगे, आकाश जैसे फट गया हो वैसे जल बरसने लगा, भयानक रूप वाले नाग-कुमार एकत्र हो गए, वह स्वयं भी धुआँ छोड़ने लगा और जलने लगा, शस्त्रों की वर्षा करने लगा, "यह मुण्डित फटे-पुराने वस्त्र वाला कौन है?" आदि कठोर वचनों से स्थविर को डराने लगा, और नाग-सेना को आज्ञा दी—"आओ, इसे पकड़ो, मारो, इस श्रमण को यहाँ से निकाल दो।" ထေရော သဗ္ဗံ တံ ဘိံသနကံ အတ္တနော ဣဒ္ဓိဗလေန ပဋိဗာဟိတွာ နာဂရာဇာနံ အာဟ,– स्थविर ने उन सभी भयानक दृश्यों को अपने ऋद्धि-बल से रोककर नागराज से कहा— သဒေဝကောပိ စေ လောကော, အာဂန္တွာ တာသယေယျ မံ; န မေ ပဋိဗလော အဿ, ဇနေတုံ ဘယဘေရဝံ. "यदि देवों सहित सम्पूर्ण लोक भी आकर मुझे डराए, तो भी वह मुझमें भय और त्रास उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होगा।" သစေပိ တွံ မဟိံ သဗ္ဗ, သသမုဒ္ဒံ သပဗ္ဗတံ; ဥက္ခိပိတွာ မဟာနာဂ, ခိပေယျာသိ မမူပရိ. "हे महानाग! यदि तुम समुद्र और पर्वतों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को भी उठाकर मेरे ऊपर फेंक दो," နေဝ မေ သက္ကုဏေယျာသိ, ဇနေတုံ ဘယဘေရဝံ; အညဒတ္ထု တဝေဝဿ, ဝိဃာတော ဥရဂါဓိပါတိ. "तो भी तुम मुझमें भय और त्रास उत्पन्न नहीं कर सकोगे; हे सर्पराज! इसके विपरीत तुम्हारा ही विनाश होगा।" ဧဝံ ဝုတ္တေ နာဂရာဇာ ဝိဟတာနုဘာဝေါ နိပ္ဖလဝါယာမော ဒုက္ခီ ဒုမ္မနော အဟောသိ. ऐसा कहने पर नागराज का प्रभाव नष्ट हो गया, उसका प्रयास निष्फल रहा और वह दुखी एवं उदास हो गया। တံ ထေရော တင်္ခဏာနုရူပါယ ဓမ္မိယာ ကထာယ သန္ဒဿေတွာ သမာဒပေတွာ သမုတ္တေဇေတွာ သမ္ပဟံသေတွာ တီသု သရဏေသု ပဉ္စသုစ သီလေသု ပတိဋ္ဌာပေသိ သဒ္ဓိံ စတုရာသီတိယာ နာဂသဟဿေဟိ. အညေပိ ဗဟူ ဟိမဝန္တဝါသိနော ယက္ခာစ ဂန္ဓဗ္ဗာစ ကုမ္ဘဏ္ဍာစ ထေရဿ ဓမ္မကထံ သုတွာ သရဏေသုစ သီလေသုစ ပတိဋ္ဌဟိံသု. ပဉ္စကောပိ ယက္ခော သဒ္ဓိံ ဘရိယာယ ယက္ခိနိယာ ပဉ္စဟိစ ပုတ္တသတေဟိ ပဌမေ [Pg.183] ဖလေ ပတိဋ္ဌိတော. အထာယသ္မာ မဇ္ဈန္တိ ကတ္ထေရော သဗ္ဗေနာဂယက္ခရက္ခသေ အာမန္တေတွာ ဧဝမာဟ,- स्थविर ने उसे उस क्षण के अनुरूप धार्मिक कथा से समझाकर, समादपित कर, उत्साहित कर और प्रसन्न कर चौरासी हजार नागों के साथ तीन शरणों और पाँच शीलों में प्रतिष्ठित किया। अन्य भी बहुत से हिमालय निवासी यक्ष, गन्धर्व और कुम्भाण्ड स्थविर की धर्म-कथा सुनकर शरणों और शीलों में प्रतिष्ठित हुए। पञ्चक यक्ष भी अपनी पत्नी यक्षिणी और पाँच सौ पुत्रों के साथ प्रथम फल (स्रोतपत्ति) में प्रतिष्ठित हुआ। तब आयुष्मान मज्झन्तिक स्थविर ने सभी नागों, यक्षों और राक्षसों को संबोधित कर ऐसा कहा— မာဒါနိ ကောဓံ ဇနယိတ္ထ, ဣတော ဥဒ္ဓံ ယထာ ပုရေ; သဿဃာတဉ္စ မာ ကတ္ထ, သုခကာမာ ဟိ ပါဏိနော; ကရောထ မေတ္တံ သတ္တေသု, ဝသန္တု မနုဇာ သုခန္တိ. "अब से पहले की तरह क्रोध उत्पन्न मत करो; फसलों का विनाश मत करो, क्योंकि सभी प्राणी सुख की कामना करते हैं; प्राणियों के प्रति मैत्री करो, जिससे मनुष्य सुखपूर्वक रह सकें।" တေ သဗ္ဗေပိ သာဓု ဘန္တေတိ ထေရဿ ဝစနံ ပဋိဿုဏိတွာ ယထာနုသိဋ္ဌံ ပဋိပဇ္ဇိံသု. တံ ဒိဝသမေဝ နာဂရာဇဿ ပူဇာသမယော ဟောတိ. အထ နာဂရာဇာ အတ္တနော ရတနမယံ ပလ္လင်္ကံ အာဟရာပေတွာ ထေရဿ ပညပေသိ. နိသီဒိ ထေရော ပလ္လင်္ကေ. နာဂရာဇာပိ ထေရံ ဗီဇယမာနော သမီပေ အဋ္ဌာသိ. တသ္မိံ ခဏေ ကသ္မီရဂန္ဓာရရဋ္ဌဝါသိနော အာဂန္တွာ ထေရံ ဒိသွာ အမှာကံ နာဂရာဇတောပိ ထေရော မဟိဒ္ဓိကတရောတိ ထေရမေဝ ဝန္ဒိတွာ နိသိန္နာ. ထေရော တေသံ အာသိဝိသောပမသုတ္တံ ကထေသိ. သုတ္တပရိယောသာနေ အသီတိယာပါဏသဟဿာနံ ဓမ္မာဘိသမယော အဟောသိ. ကုလသတသဟဿဉ္စ ပဗ္ဗဇိ. တတော ပဘုတိ စ ကသ္မီရဂန္ဓာရော ယာဝဇ္ဇေတနာ ကာသာဝပဇ္ဇောတာ ဣသိဝါတပဋိဝါတာဧဝ. उन सभी ने "साधु भन्ते" कहकर स्थविर के वचनों को स्वीकार किया और उपदेशानुसार आचरण किया। उसी दिन नागराज की पूजा का समय था। तब नागराज ने अपना रत्नमय पलंग मँगवाकर स्थविर के लिए बिछाया। स्थविर पलंग पर बैठ गए। नागराज भी स्थविर को पंखा झलते हुए पास में खड़ा रहा। उसी क्षण कश्मीर-गंधार देश के निवासी आकर और स्थविर को देखकर, "हमारे नागराज से भी स्थविर अधिक ऋद्धिमान हैं" ऐसा कहकर स्थविर को वन्दना कर बैठ गए। स्थविर ने उन्हें 'आसीविसोमपसुत्त' (आशीविषोपम सूत्र) सुनाया। सूत्र के अंत में अस्सी हजार प्राणियों को धम्म का बोध (धम्माभिसमय) हुआ। एक लाख कुलों ने प्रव्रज्या ग्रहण की। तब से लेकर आज तक कश्मीर-गंधार काषाय वस्त्रों से प्रकाशित और ऋषियों की वायु से सुवासित है। ဂန္တွာ ကသ္မီရဂန္ဓာရံ, ဣသိ မဇ္ဈန္တိကော တဒါ; ဒုဋ္ဌံ နာဂံ ပသာဒေတွာ, မောစေသိ ဗန္ဓနာ ဗဟူတိ. तब ऋषि मज्झन्तिक ने कश्मीर-गंधार जाकर, दुष्ट नाग को विनीत कर, बहुतों को (संसार के) बंधनों से मुक्त किया। အဓုနာ ပန ကသ္မီရဂန္ဓာရရဋ္ဌေ သာသနဿ အတ္ထင်္ဂတဿဝိယ သူရိယဿ ဩဘာသော န ပညာယတိ, တသ္မာ တတ္ထ သာသနဿ ပတိဋ္ဌာနေ ဝိတ္ထာရေန ဝတ္တဗ္ဗကိစ္စံ နတ္ထီတိ. किन्तु अब कश्मीर-गंधार देश में शासन का प्रकाश अस्त हुए सूर्य के समान दिखाई नहीं देता है, इसलिए वहाँ शासन की स्थापना के विषय में विस्तार से कहने की आवश्यकता नहीं है। ဣတိ သာသနဝံသေ ကသ္မီရဂန္ဓာရရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ इस प्रकार शासनवंश में कश्मीर-गंधार देश के शासनवंश की कथा का मार्ग। နာမ သတ္တမော ပရိစ္ဆေဒေါ. सातवाँ परिच्छेद समाप्त। ၈. မဟိံသကရဋ္ဌဿာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ ८. महिंसक राष्ट्र के शासनवंश की कथा का मार्ग। ၈. ဣဒါနိ [Pg.184] ယထာဝုတ္တမာတိကာဝသေန မဟိံသကရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂံ ဝတ္တုံ ဩကာသော အနုပ္ပတ္တော, တသ္မာ တံ ဝက္ခာမိ. ८. अब पूर्वोक्त मातृका के अनुसार महिंसक राष्ट्र के शासनवंश की कथा कहने का अवसर प्राप्त हुआ है, इसलिए उसे कहूँगा। တတိယသင်္ဂီတာဝသာနေ ဟိ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရော မဟာရေဝတ္ထေရံ မဟိံသကမဏ္ဍလံ ပေသေသိ,- တွံ ဧတံ ရဋ္ဌံ ဂန္တွာ ဧတ္ထ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေဟီတိ. तृतीय संगीति के अंत में महामोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर ने महारेवत स्थविर को महिंसक मण्डल भेजा— "तुम उस राष्ट्र में जाकर वहाँ शासन की स्थापना करो।" သောစ အတ္တပဉ္စမော ဟုတွာ မဟိံသကမဏ္ဍလံ အဂမာသိ ပစ္စန္တိမေသု ဇနပဒေသု ပဉ္စဝဂ္ဂေါ ဂဏော အလံ ဥပသမ္ပဒကမ္မာယာတိ မညမာနော. ထေရော မဟိံသကမဏ္ဍလံ ဂန္တွာ ဒေဝဒူတသုတ္တံ ကထေသိ. သုတ္တပရိယောသာနေ စတ္တာလီသပါဏသဟဿာနိ ဓမ္မစက္ခုံ ပ္ပဋိလဘိံသု. စတ္တာလီသံယေဝ ပါဏသဟဿာနိ ပဗ္ဗဇိံသု. वे स्वयं पाँचवें (पाँच भिक्षुओं के साथ) होकर महिंसक मण्डल गए, यह मानते हुए कि प्रत्यंत जनपदों में पाँच सदस्यों का गण उपसंपदा कर्म के लिए पर्याप्त है। स्थविर ने महिंसक मण्डल जाकर 'देवदूत सुत्त' सुनाया। सूत्र के अंत में चालीस हजार प्राणियों ने धम्म-चक्षु प्राप्त किया। चालीस हजार ने ही प्रव्रज्या ग्रहण की। ဂန္တွာန ရဋ္ဌံ မဟိံသံ, မဟာရေဝေါ မဟိဒ္ဓိကော; စောဒေတွာ ဒေဝဒူတေဟိ, မောစေသိ ဗန္ဓနာ ဗဟူတိ. महाऋद्धिमान महारेवत ने महिंसक राष्ट्र जाकर, देवदूतों (के उपदेश) से प्रेरित कर, बहुतों को बंधनों से मुक्त किया। အဓုနာ ပန တတ္ထ သာသနဿ အဗ္ဘေဟိဝိယ ပဋိစ္ဆန္နဿ သူရိယဿ ဩကာသော ဒုဗ္ဗလော ဟုတွာ ပညာယတိ. किन्तु अब वहाँ शासन का प्रभाव बादलों से ढके हुए सूर्य के समान दुर्बल होकर दिखाई देता है। ဣတိ သာသနဝံသေ မဟိံသကရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ इस प्रकार शासनवंश में महिंसक राष्ट्र के शासनवंश की कथा का मार्ग। နာမ အဋ္ဌမော ပရိစ္ဆေဒေါ. आठवाँ परिच्छेद समाप्त। ၉. မဟာရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ ९. महाराष्ट्र के शासनवंश की कथा का मार्ग। ၉. ဣတော ပရံ မဟာရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂံ ကထယိဿာမိ ယထာဝုတ္တမာတိကာဝသေန. ९. इसके बाद मैं पूर्वोक्त मातृका के अनुसार महाराष्ट्र के शासनवंश की कथा कहूँगा। တတိယသင်္ဂီတာဝသာနေ ဟိ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရော မဟာဓမ္မရက္ခိတ္ထေရံ မဟာရဋ္ဌံ ပေသေသိ,-တွံ ဧတံ ရဋ္ဌံ ဂန္တွာ ဧတ္ထ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသီတိ. तृतीय संगीति के अंत में महामोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर ने महाधम्मरक्खित स्थविर को महाराष्ट्र भेजा— "तुम उस राष्ट्र में जाकर वहाँ शासन की स्थापना करो।" မဟာဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရောစ အတ္တပဉ္စမော ဟုတွာ မဟာရဋ္ဌံ ဂန္တွာ မဟာနာရဒကဿပဇာတကကထာယ မဟာရဋ္ဌကေ ပသာဒေတွာ [Pg.185] စတုရာသီတိပါဏသဟဿာနိ မဂ္ဂဖလေသု ပတိဋ္ဌာပေသိ. တေရသသဟဿာနိ ပဗ္ဗဇိံသု. ဧဝံ သော တတ္ထ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. महाधम्मरक्खित स्थविर भी स्वयं पाँचवें होकर महाराष्ट्र गए और 'महा नारद कस्सप जातक' की कथा से महाराष्ट्र के निवासियों को प्रसन्न कर चौरासी हजार प्राणियों को मार्ग और फल में प्रतिष्ठित किया। तेरह हजार ने प्रव्रज्या ग्रहण की। इस प्रकार उन्होंने वहाँ शासन की स्थापना की। မဟာရဋ္ဌံ ဣသိ ဂန္တွာ, သော မဟာ ဓမ္မရက္ခိတော; ဇာတကံ ကထယိတွာန, ပသာဒေသိ မဟာဇနန္တိ. उन महाधम्मरक्खित ऋषि ने महाराष्ट्र जाकर, जातक कथा सुनाकर, महाजन (जनसमूह) को प्रसन्न किया। တတ္ထ ကိရ မနုဿာ ပုဗ္ဗေ အဂ္ဂိဟုတာဒိမိစ္ဆာကမ္မံ ယေဘုယျေန အကံသု. တေနေဝ ထေရော မဟာနာရဒကဿပဇာတကကထံ ဒေသေသိ. တတော ပဋ္ဌာယ တတ္ထ မနုဿာ ဇာတက ကထံ ယေဘုယျေန သောတုံ အတိဝိယ ဣစ္ဆန္တိ. ဘိက္ခူစ ယေဘုယျေန ဂဟဋ္ဌာနံ ဇာတကကထံယေဝ ဒေသေန္တိ. ဝိသေသတော ပန ဝဿန္တရဇာတကကထံ တေ မနုဿာ ဗဟူဟိ ဒါတဗ္ဗဝတ္ထူဟိ ပူဇေတွာ သုဏန္တိ. वहाँ के मनुष्य पहले प्रायः अग्निहोत्र आदि मिथ्या कर्म करते थे। इसीलिए स्थविर ने 'महा नारद कस्सप जातक' की कथा का उपदेश दिया। तब से वहाँ के मनुष्य प्रायः जातक कथा सुनने की अत्यधिक इच्छा रखते हैं। और भिक्षु भी प्रायः गृहस्थों को जातक कथा ही सुनाते हैं। विशेष रूप से वे मनुष्य 'वेस्सन्तर जातक' की कथा को बहुत सी दान की वस्तुओं से पूजा करके सुनते हैं। တဉ္စ မဟာရဋ္ဌံ နာမ သျာမရဋ္ဌသမီပေ ဌိတံ, တေနေဝ သျာမရဋ္ဌဝါသိနောပိ ဘိက္ခူ ဂဟဋ္ဌာစ ယေဘုယျေန သောတုံ ဣစ္ဆန္တီတိ. မဟာဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရောပိ မဟာရဋ္ဌဝါသီဟိ သဒ္ဓိံ သကလသျာမရဋ္ဌဝါသီနံ ဓမ္မံ ဒေသေသိ, အမတရသံ ပါယေသိ, ယထာ ယောနကဓမ္မရက္ခိတတ္ထေရော အပရန္တရဋ္ဌံ ဂန္တွာ သကလမရမ္မရဋ္ဌဝါသီနန္တိ. वह महाराष्ट्र श्याम राष्ट्र (थाईलैंड) के समीप स्थित है, इसीलिए श्याम राष्ट्र के निवासी भिक्षु और गृहस्थ भी प्रायः (इसे) सुनने की इच्छा रखते हैं। महाधम्मरक्खित स्थविर ने भी महाराष्ट्र के निवासियों के साथ-साथ समस्त श्याम राष्ट्र के निवासियों को धम्म का उपदेश दिया, उन्हें अमृत रस पिलाया, जैसे योनक धम्मरक्खित स्थविर ने अपरान्त राष्ट्र जाकर समस्त मरम्म (बर्मा) राष्ट्र के निवासियों को (उपदेश दिया था)। ယံ ပန ယောနကရဋ္ဌသာသနဝံသကထာယံ ဝုတ္တံ, တမ္ပိ သဗ္ဗံ ဧတ္ထာပိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံယေဝ, တေဟိ တဿ ဧကသဒိသတ္တေန ဌိတတ္တာတိ. တထာ ဟိ နာဂသေနတ္ထေရောပိ ယောနကရဋ္ဌေ ဝသိတွာ သျာမရဋ္ဌာဒီသုပိ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသိ. ယောနကရဋ္ဌဝါသိနော မဟာဓမ္မဂမ္ဘီရတ္ထေရမဟာမေဓင်္ကရတ္ထေရာစ သဒ္ဓိံ ဗဟူဟိ ဘိက္ခူဟိ သီဟဠဒီပံ ဂန္တွာ တတော ပုနာဂန္တွာ သျာမရဋ္ဌေ သောက္ကတယနဂရံ ပတွာ တတ္ထ နိသီဒိတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိတွာ ပစ္ဆာ လကုန္နနဂရေ နိသီဒိတွာ သာသနံ ပဂ္ဂဏှိ. ဧဝံ ယောနကရဋ္ဌေ သာသနံ ဌိတံ သျာမာဒီသုပိ ဌိတံယေဝါတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. जो कुछ योनक राष्ट्र के शासनवंश की कथा में कहा गया है, वह सब यहाँ भी देखा जाना चाहिए, क्योंकि वे उसके समान ही स्थित हैं। जैसे नागसेन स्थविर ने भी योनक राष्ट्र में रहकर श्याम राष्ट्र आदि में भी शासन की स्थापना की। योनक राष्ट्र के निवासी महाधम्मगम्भीर स्थविर और महामेधंकर स्थविर बहुत से भिक्षुओं के साथ सिंहल द्वीप (श्रीलंका) गए और वहाँ से पुनः लौटकर श्याम राष्ट्र के सोक्कतय नगर पहुँचे और वहाँ रहकर शासन की उन्नति की, बाद में लकुन्न नगर में रहकर शासन की उन्नति की। इस प्रकार योनक राष्ट्र में स्थित शासन श्याम आदि देशों में भी स्थित ही है, ऐसा समझना चाहिए। ဗုဒ္ဓဿ ဘဂဝတော ပရိနိဗ္ဗာနတော ဒွိသတာဓိကာနံ ဒွိန္နံ ဝဿသဟဿာနံ [Pg.186] ဥပရိ နဝုတိမေ ဝဿ သီဟဠဒီပေ ရဇ္ဇံ ပတ္တဿ ကိတ္တိဿိရိရာဇသီဟမဟာရာဇဿ အဘိသေကတော တတိယေ ဝဿေ တေနေဝ ကိတ္တိဿိရိရာဇသီဟမဟာရညာ ပဟိတပဏ္ဏာကာရသာသနံ အာဂမ္မ သရာမာဓိပတိဓမ္မိကမဟာရာဇာဓိရာဇေနာဏတ္တေဟိ လင်္ကာဒီပံ အာဂတေဟိ ဥပါလိတ္ထေ ရာဒီဟိ ပတိဋ္ဌာပိတော ဝံသော ဥပါလိဝံသောတိ ပါကဋော. သောစ ဒုဝိဓော ပုဗ္ဗာရာမဝိဟာရဝါသီအဘယဂိရိဝိဟာရဝါသီဝသေနာတိ. ဧဝံ မဟာနဂရယောနကလျာမရဋ္ဌေသု သာသနံ ထိရံ ဟုတွာ တိဋ္ဌတီတိ ဝေဒိတဗ္ဗန္တိ. भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के दो हजार दो सौ नब्बे (2290) वर्ष बाद, सिंहल द्वीप में राज्य प्राप्त करने वाले कीर्ति श्री राजसिंह महाराज के अभिषेक के तीसरे वर्ष में, उन्हीं कीर्ति श्री राजसिंह महाराज द्वारा भेजे गए उपहार और संदेश के कारण, सराम (स्याम) के अधिपति धार्मिक महाराजधिराज द्वारा आज्ञापित होकर लंका द्वीप आए उपालि स्थविर आदि के द्वारा जो वंश स्थापित किया गया, वह 'उपालि वंश' के नाम से प्रसिद्ध है। वह दो प्रकार का है: पुब्बाराम विहार निवासी और अभयगिरि विहार निवासी के भेद से। इस प्रकार महानगरी, योनक और कल्याण राष्ट्रों में शासन स्थिर होकर स्थित है, ऐसा जानना चाहिए। ဣတိ သာသနဝံသေ မဟာရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ နာမ इस प्रकार शासनवंश में 'महारट्ट शासनवंश कथा मार्ग' समाप्त हुआ। နဝမော ပရိစ္ဆေဒေါ. नौवां परिच्छेद। ၁၀. စိနရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ १०. चीन राष्ट्र शासनवंश कथा मार्ग ၁၀. တတော ပရံ ပဝက္ခာမိ စီနရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂံ ယထာဋ္ဌဝိတမာတိကာဝသေန. १०. इसके बाद, मैं चीन राष्ट्र के शासनवंश की कथा के मार्ग को पूर्व-निर्धारित मातृका (विषय-सूची) के अनुसार कहूँगा। တတိယသင်္ဂီတာဝသာနေ ဟိ မဟာမောဂ္ဂလိပုတ္တတိဿတ္ထေရော မဇ္ဈိမတ္ထေရံ စိနရဋ္ဌံ ပေသေသိ,-တွံ ဧတံ ရဋ္ဌံ ဂန္တွာ ဧတ္ထ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေဟီတိ. तृतीय संगीति के अंत में, महामोग्गलिपुत्त तिस्स स्थविर ने मज्झिम स्थविर को चीन राष्ट्र भेजा—"तुम इस राष्ट्र में जाकर वहाँ शासन की प्रतिष्ठा करो।" မဇ္ဈိမတ္ထေရောစ ကဿပဂေါတ္တရေန အဠကရေဝတ္ထေရေန ဒုန္ဒဘိယတ္ထေရေန မဟာရေဝတ္ထေရေနစ သဒ္ဓိံ ဟိမဝန္တပ္ပဒေသေ ပဉ္စစီနရဋ္ဌံ ဂန္တွာ ဓမ္မစက္ကပ္ပဝတ္တနသုတ္တန္တကထာယတံ ဒေသံ ပသာဒေတွာ အသီတိပါဏကောဋိယော မဂ္ဂဖလရတနာနိ ပဋိလာဘေသိ. ပဉ္စပိစ တေ ထေရာ ပဉ္စရဋ္ဌာနိ ပသာဒေသုံ. ဧကမေကဿ သန္တိကေ သဟဿမတ္တာ ပဗ္ဗဇိံသု. ဧဝံ တေ တတ္ထ သာသနံ ပတိဋ္ဌာပေသုံ. मज्झिम स्थविर ने कस्सपगोत्त, अलक-रेवत स्थविर, दुन्दभिय स्थविर और महा-रेवत स्थविर के साथ हिमवंत प्रदेश के पाँच चीन राष्ट्रों में जाकर 'धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त' की कथा से उस देश को प्रसन्न किया और अस्सी करोड़ प्राणियों को मार्ग-फल रूपी रत्नों की प्राप्ति कराई। उन पाँचों स्थविरों ने पाँच राष्ट्रों को प्रसन्न किया। प्रत्येक के पास लगभग एक-एक हजार लोगों ने प्रव्रज्या ग्रहण की। इस प्रकार उन्होंने वहाँ शासन की प्रतिष्ठा की। ဂန္တွာ မဇ္ဈိမတ္ထေရော, ဟိမဝန္တံ ပသာဒယိ; ယက္ခသေနံ ပကာသေန္တော, ဓမ္မစက္ကပ္ပဝတ္တနန္တိ. मज्झिम स्थविर ने जाकर हिमवंत को प्रसन्न किया; यक्ष सेना को धम्मचक्कप्पवत्तन (धर्मचक्रप्रवर्तन) का उपदेश देते हुए। တတ္ထ ကိရ မနုဿာ ယေဘုယျေန စန္ဒီပရမီသွာရာနံ ယက္ခာနံ ပူဇံ [Pg.187] ကရောန္တိ. တေနေဝ တေ ပဉ္စ ထေရာ တေသံ ယက္ခသေနံ ပကာသယိတွာ ဓမ္မံ ဒေသေသုံ. ကသ္မီရဂန္ဓာရရဋ္ဌံ ပန ကဒါစိ ကဒါစိ စီနရဋ္ဌိန္ဒဿ ဝိဇိတံ ဟောတိ, ကဒါစိ ကဒါစိ ပန ဝိသုံ ဟောတိ. တဒါ ပန ဝိသုံယေဝ အဟောသီတိ ဒဋ္ဌဗ္ဗံ. वहाँ के मनुष्य प्रायः चंडी और परमेश्वर (जैसे) यक्षों की पूजा करते थे। इसलिए उन पाँच स्थविरों ने उनकी यक्ष सेना को (सत्य) प्रकाशित करते हुए धर्म का उपदेश दिया। कश्मीर-गंधार राष्ट्र कभी-कभी चीन के राजा के अधीन होता था, और कभी-कभी अलग होता था। उस समय वह अलग ही था, ऐसा समझना चाहिए। စီရနဋ္ဌေ ပန ဘဂဝတော သာသနံ ဒုဗ္ဗလံယေဝ ဟုတွာ အဋ္ဌာသိ, န ထိရံ ဟုတွာ. တေနေဝ ဣဒါနိ တတ္ထ ကတ္ထစိယေဝ သာသနံ ဆာယာမတ္တံဝ ပညာယတိ, ဝါတဝေဂေန ဝိကိဏ္ဏအဗ္ဘံဝိယ တိဋ္ဌတီတိ. चीन राष्ट्र में भगवान का शासन दुर्बल होकर ही रहा, स्थिर होकर नहीं। इसी कारण अब वहाँ कहीं-कहीं ही शासन छाया मात्र ही दिखाई देता है, जो वायु के वेग से बिखरे हुए बादलों की तरह स्थित है। ဣတိ သာသနဝံသေ စီနရဋ္ဌသာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ နာမ इस प्रकार शासनवंश में 'चीन राष्ट्र शासनवंश कथा मार्ग' समाप्त हुआ। ဒသမော ပရိစ္ဆေဒေါ. दसवाँ परिच्छेद। ဧဝံ သဗ္ဗေန သဗ္ဗံ သာသနဝံသကထာမဂ္ဂေါ နိဋ္ဌိတော. इस प्रकार पूर्ण रूप से शासनवंश कथा मार्ग समाप्त हुआ। ဧတ္တာဝတာစ – और यहाँ तक— လင်္ကာဂတေန သန္တေန, စိတြဉာဏေန ဘိက္ခုနာ; သရဏင်္ကရနာမေန, သဒ္ဓမ္မဋ္ဌိတိကာမိနာ. लंका से आए हुए, शांत, विचित्र ज्ञान वाले, सद्धर्म की स्थिति चाहने वाले सरणंकर नामक भिक्षु द्वारा; ဒူရတောယေဝ ဒီပမှာ, သုမင်္ဂလေန ဇောတိနာ; ဝိသုဒ္ဓသီလိနာစေဝ, ဒီပန္တရဋ္ဌဘိက္ခုနာ. द्वीप से दूर से ही, सुमंगल ज्योति वाले, विशुद्ध शील वाले और अन्य द्वीप राष्ट्र के भिक्षुओं द्वारा; အညေဟိစာဘိယာစိတော, ပညာသာမီတိ နာမကော; အကာသိံ သုဋ္ဌုကံ ဂန္ထံ, သာသနဝံသပ္ပဒီပိကံ. और अन्यों द्वारा भी याचित होकर, पञ्ञासामी (प्रज्ञास्वामी) नामक (मुझ) ने इस 'शासनवंशप्पदीपिका' नामक ग्रंथ की भली-भांति रचना की। ဒွိသတေစ သဟဿေစ, တေဝီသာဓိကေ ဂတေ; ပုဏ္ဏာယံ မိဂသီရဿ, နိဋ္ဌံ ဂတာဝ သဗ္ဗသော. एक हजार दो सौ तेईस (1223) वर्ष बीतने पर, मृगशिरा की पूर्णिमा को यह पूरी तरह समाप्त हुआ। ကောစိ ဧတ္ထေဝ ဒေါသော စေ, ပညာယတိ သုစိတ္တကာ; တံ ခမန္တု စ သုဒ္ဓိယာ, ဂဏှန္တု ယုတ္တိကံ ဟဝေတိ. यदि इसमें कोई दोष दिखाई दे, तो हे सुधीजन! उसे क्षमा करें और जो युक्तियुक्त (उचित) हो उसे ही ग्रहण करें। | |||
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| 日文 | |||
| パーリ仏典 | 註釈書 | 副註釈書 | その他 |
| 1101 パーラージカ・パーリ 1102 パーチッティヤ・パーリ 1103 マハーヴァッガ・パーリ(ヴィナヤ) 1104 チューラヴァッガ・パーリ 1105 パリヴァーラ・パーリ | 1201 パーラージカカンダ・アッタカター-1 1202 パーラージカカンダ・アッタカター-2 1203 パーチッティヤ・アッタカター 1204 マハーヴァッガ・アッタカター(ヴィナヤ) 1205 チューラヴァッガ・アッタカター 1206 パリヴァーラ・アッタカター | 1301 サーラッタディーパニー・ティーカー-1 1302 サーラッタディーパニー・ティーカー-2 1303 サーラッタディーパニー・ティーカー-3 | 1401 ドヴェマーティカー・パーリ 1402 ヴィナヤサンガハ・アッタカター 1403 ヴァジラブッディ・ティーカー 1404 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-1 1405 ヴィマティヴィノーダニー・ティーカー-2 1406 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-1 1407 ヴィナヤーランカーラ・ティーカー-2 1408 カンカーウィタラニープラーナ・ティーカー 1409 ヴィナヤヴィニッチャヤ-ウッタラヴィニッチャヤ 1410 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-1 1411 ヴィナヤヴィニッチャヤ・ティーカー-2 1412 パーチッティヤーディヨージャナー・パーリ 1413 クッダシッカー-ムーラシッカー 8401 ヴィスッディマッガ-1 8402 ヴィスッディマッガ-2 8403 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-1 8404 ヴィスッディマッガ・マハーティーカー-2 8405 ヴィスッディマッガ・ニダーナカター 8406 ディーガニカーヤ(プ・ヴィ) 8407 マッジマニカーヤ(プ・ヴィ) 8408 サンユッタニカーヤ(プ・ヴィ) 8409 アングッタラニカーヤ(プ・ヴィ) 8410 ヴィナヤピタカ(プ・ヴィ) 8411 アビダンマピタカ(プ・ヴィ) 8412 アッタカター(プ・ヴィ) 8413 ニルッティディーパニー 8414 パラマッタディーパニー・サンガハマハーティカーパータ 8415 アヌディーパニーパータ 8416 パッターヌッデーサ・ディーパニーパータ 8417 ナマッカラ・ティーカー 8418 マハーパナーマ・パータ 8419 ラッカナート・ブッダトーマナーガーター 8420 スタヴァンダナー 8421 カマラーニャジャリ 8422 ジナランカーラ 8423 パッジャマドゥ 8424 ブッダグナガーター・ヴァリー 8425 チューラガンタヴァンサ 8427 サーサナヴァンサ 8426 マハーヴァンサ 8429 モッガラーナ・ビャーカラナン 8428 カッチャーヤナ・ビャーカラナン 8430 サッダニーティッパカラナン(パダマーラー) 8431 サッダニーティッパカラナン(ダートゥマーラー) 8432 パダルーパシッディ 8433 モッガラーナ・パンチカー 8434 パヨーガシッディ・パータ 8435 ヴットーダヤ・パータ 8436 アビダーナッパディーピカー・パータ 8437 アビダーナッパディーピカー・ティーカー 8438 スボーダーランカーラ・パータ 8439 スボーダーランカーラ・ティーカー 8440 バーラーヴァターラ・ガンティパダッタヴィニッチャヤサーラ 8446 カヴィダッパナニーティ 8447 ニーティマンジャリー 8445 ダンマニーティ 8444 マハーラハニーティ 8441 ローカニーティ 8442 スタンタニーティ 8443 スーラッサティニーティ 8450 チャーナキャニーティ 8448 ナラダッカディーパニー 8449 チャトゥラーラッカディーパニー 8451 ラサヴァーヒニー 8452 シーマヴィソーダニー・パータ 8453 ヴェッサンタラ・ギーティ 8454 モッガラーナ・ヴッティヴィヴァラナパンチカー 8455 トゥーパヴァンサ 8456 ダーターヴァンサ 8457 ダートゥパータヴィラーヴィシニヤー 8458 ダートゥヴァンサ 8459 ハッタヴァナッガラヴィハーラヴァンサ 8460 ジナチャリタヤ 8461 ジナヴァンサディーパン 8462 テーラカターガーター 8463 ミリダ・ティーカー 8464 パダマンジャリー 8465 パダサーダナン 8466 サッダビンドゥパカラナン 8467 カッチャーヤナ・ダートゥマンジューサー 8468 サーマンタクータ・ヴァンナナー |
| 2101 シーラッカンダワッガ・パーリ 2102 マハーワッガ・パーリ(ディーガ) 2103 パーティカワッガ・パーリ | 2201 シーラッカンダワッガ・アッタカター 2202 マハーワッガ・アッタカター(ディーガ) 2203 パーティカワッガ・アッタカター | 2301 シーラッカンダワッガ・ティーカー 2302 マハーワッガ・ティーカー(ディーガ) 2303 パーティカワッガ・ティーカー 2304 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-1 2305 シーラッカンダワッガ・アビナワティーカー-2 | |
| 3101 ムーラパンナーサ・パーリ 3102 マッジマパンナーサ・パーリ 3103 ウパリパンナーサ・パーリ | 3201 ムーラパンナーサ・アッタカター-1 3202 ムーラパンナーサ・アッタカター-2 3203 マッジマパンナーサ・アッタカター 3204 ウパリパンナーサ・アッタカター | 3301 ムーラパンナーサ・ティーカー 3302 マッジマパンナーサ・ティーカー 3303 ウパリパンナーサ・ティーカー | |
| 4101 サガーター・ワッガ・パーリ 4102 ニダーナ・ワッガ・パーリ 4103 カンダ・ワッガ・パーリ 4104 サラーヤタナ・ワッガ・パーリ 4105 マハーワッガ・パーリ(サンユッタ) | 4201 サガーター・ワッガ・アッタカター 4202 ニダーナ・ワッガ・アッタカター 4203 カンダ・ワッガ・アッタカター 4204 サラーヤタナ・ワッガ・アッタカター 4205 マハーワッガ・アッタカター(サンユッタ) | 4301 サガーター・ワッガ・ティーカー 4302 ニダーナ・ワッガ・ティーカー 4303 カンダ・ワッガ・ティーカー 4304 サラーヤタナ・ワッガ・ティーカー 4305 マハーワッガ・ティーカー(サンユッタ) | |
| 5101 エーカカニパータ・パーリ 5102 ドゥカニパータ・パーリ 5103 ティカニパータ・パーリ 5104 チャトゥッカニパータ・パーリ 5105 パンチャカニパータ・パーリ 5106 チャッカニパータ・パーリ 5107 サッタカニパータ・パーリ 5108 アッタカーディニパータ・パーリ 5109 ナヴァカニパータ・パーリ 5110 ダサカニパータ・パーリ 5111 エーカーダサカニパータ・パーリ | 5201 エーカカニパータ・アッタカター 5202 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・アッタカター 5203 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・アッタカター 5204 アッタカーディニパータ・アッタカター | 5301 エーカカニパータ・ティーカー 5302 ドゥカ・ティカ・チャトゥッカニパータ・ティーカー 5303 パンチャカ・チャッカ・サッタカニパータ・ティーカー 5304 アッタカーディニパータ・ティーカー | |
| 6101 クッダカパータ・パーリ 6102 ダンマパダ・パーリ 6103 ウダーナ・パーリ 6104 イティヴッタカ・パーリ 6105 スッタニパータ・パーリ 6106 ヴィマーナヴァットゥ・パーリ 6107 ペーヴァットゥ・パーリ 6108 テーラガーター・パーリ 6109 テーリーガーター・パーリ 6110 アパダーナ・パーリ-1 6111 アパダーナ・パーリ-2 6112 ブッダヴァンサ・パーリ 6113 チャリヤーピタカ・パーリ 6114 ジャータカ・パーリ-1 6115 ジャータカ・パーリ-2 6116 マハーニッデーサ・パーリ 6117 チューラニッデーサ・パーリ 6118 パティサンビダーマッガ・パーリ 6119 ネッティッパカラナ・パーリ 6120 ミリンダパンハ・パーリ 6121 ペータコーパデーサ・パーリ | 6201 クッダカパータ・アッタカター 6202 ダンマパダ・アッタカター-1 6203 ダンマパダ・アッタカター-2 6204 ウダーナ・アッタカター 6205 イティヴッタカ・アッタカター 6206 スッタニパータ・アッタカター-1 6207 スッタニパータ・アッタカター-2 6208 ヴィマーナヴァットゥ・アッタカター 6209 ペータヴァットゥ・アッタカター 6210 テーラガーター・アッタカター-1 6211 テーラガーター・アッタカター-2 6212 テーリーガーター・アッタカター 6213 アパダーナ・アッタカター-1 6214 アパダーナ・アッタカター-2 6215 ブッダヴァンサ・アッタカター 6216 チャリヤーピタカ・アッタカター 6217 ジャータカ・アッタカター-1 6218 ジャータカ・アッタカター-2 6219 ジャータカ・アッタカター-3 6220 ジャータカ・アッタカター-4 6221 ジャータカ・アッタカター-5 6222 ジャータカ・アッタカター-6 6223 ジャータカ・アッタカター-7 6224 マハーニッデーサ・アッタカター 6225 チューラニッデーサ・アッタカター 6226 パティサンビダーマッガ・アッタカター-1 6227 パティサンビダーマッガ・アッタカター-2 6228 ネッティッパカラナ・アッタカター | 6301 ネッティッパカラナ・ティーカー 6302 ネッティヴィバーヴィニー | |
| 7101 ダンマサンガニー・パーリ 7102 ヴィバンガ・パーリ 7103 ダートゥカター・パーリ 7104 プッガラパンニャッティ・パーリ 7105 カター・ヴァットゥ・パーリ 7106 ヤマカ・パーリ-1 7107 ヤマカ・パーリ-2 7108 ヤマカ・パーリ-3 7109 パッターナ・パーリ-1 7110 パッターナ・パーリ-2 7111 パッターナ・パーリ-3 7112 パッターナ・パーリ-4 7113 パッターナ・パーリ-5 | 7201 ダンマサンガニ・アッタカター 7202 サンモーハヴィノーダニー・アッタカター 7203 パンチャパカラナ・アッタカター | 7301 ダンマサンガニー・ムーラティーカー 7302 ヴィバンガ・ムーラティーカー 7303 パンチャパカラナ・ムーラティーカー 7304 ダンマサンガニー・アヌティーカー 7305 パンチャパカラナ・アヌティーカー 7306 アビダンマーヴァターロ・ナーマルーパパリッチェード 7307 アビダンマッタ・サンガホ 7308 アビダンマーヴァターラ・プラーナティーカー 7309 アビダンマ・マーティカーパーリ | |
| ខ្មែរ | |||
| ព្រះត្រៃបិដកបាលី | អដ្ឋកថា | ដីកា | ផ្សេងទៀត |
| 1101 បារាជិកបាឡិ 1102 បាចិត្តិយបាឡិ 1103 មហាវគ្គបាឡិ (វិន័យ) 1104 ចូឡវគ្គបាឡិ 1105 បរិវារបាឡិ | 1201 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-១ 1202 បារាជិកកណ្ឌអដ្ឋកថា-២ 1203 បាចិត្តិយអដ្ឋកថា 1204 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (វិន័យ) 1205 ចូឡវគ្គអដ្ឋកថា 1206 បរិវារអដ្ឋកថា | 1301 សារត្ថទីបនីដីកា-១ 1302 សារត្ថទីបនីដីកា-២ 1303 សារត្ថទីបនីដីកា-៣ | 1401 ទ្វេមាតិកាបាឡិ 1402 វិនយសង្គហអដ្ឋកថា 1403 វជិរពុទ្ធិដីកា 1404 វិមតិវិនោទនីដីកា-១ 1405 វិមតិវិនោទនីដីកា-២ 1406 វិនយាលង្ការដីកា-១ 1407 វិនយាលង្ការដីកា-២ 1408 កង្ខាវិតរណីបុរាណដីកា 1409 វិនយវិនិច្ឆយ-ឧត្តរវិនិច្ឆយ 1410 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-១ 1411 វិនយវិនិច្ឆយដីកា-២ 1412 បាចិត្យាទិយោជនាបាឡិ 1413 ខុទ្ទសិក្ខា-មូលសិក្ខា 8401 វិសុទ្ធិមគ្គ-១ 8402 វិសុទ្ធិមគ្គ-២ 8403 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-១ 8404 វិសុទ្ធិមគ្គ-មហាដីកា-២ 8405 វិសុទ្ធិមគ្គ និទានកថា 8406 ទីឃនិកាយ (បុ-វិ) 8407 មជ្ឈិមនិកាយ (បុ-វិ) 8408 សំយុត្តនិកាយ (បុ-វិ) 8409 អង្គុត្តរនិកាយ (បុ-វិ) 8410 វិនយបិដក (បុ-វិ) 8411 អភិធម្មបិដក (បុ-វិ) 8412 អដ្ឋកថា (បុ-វិ) 8413 និរុត្តិទីបនី 8414 បរមត្ថទីបនី សង្គហមហាដីកាបាឋ 8415 អនុទីបនីបាឋ 8416 បដ្ឋានុទ្ទេស ទីបនីបាឋ 8417 នមក្ការដីកា 8418 មហាបណាមបាឋ 8419 លក្ខណាតោ ពុទ្ធថោមនាគាថា 8420 សុតវន្ទនា 8421 កមលាញ្ជលិ 8422 ជិនាលង្ការ 8423 បជ្ជមធុ 8424 ពុទ្ធគុណគាថាវលី 8425 ចូឡគន្ថវង្ស 8427 សាសនវង្ស 8426 មហាវង្ស 8429 មោគ្គល្លានព្យាករណំ 8428 កច្ចាយនព្យាករណំ 8430 សទ្ទនីតិប្បករណំ (បទមាលា) 8431 សទ្ទនីតិប្បករណំ (ធាតុមាលា) 8432 បទរូបសិទ្ធិ 8433 មោគ្គល្លានបញ្ចិកា 8434 បយោគសិទ្ធិបាឋ 8435 វុត្តោទយបាឋ 8436 អភិធានប្បទីបិកាបាឋ 8437 អភិធានប្បទីបិកាដីកា 8438 សុពោធាលង្ការបាឋ 8439 សុពោធាលង្ការដីកា 8440 បាលាវតារ គណ្ឋិបទត្ថវិនិច្ឆយសារ 8446 កវិទប្បណនីតិ 8447 នីតិមញ្ជរី 8445 ធម្មនីតិ 8444 មហារហនីតិ 8441 លោកនីតិ 8442 សុត្តន្តនីតិ 8443 សូរស្សតិនីតិ 8450 ចាណក្យនីតិ 8448 នរទក្ខទីបនី 8449 ចតុរារក្ខទីបនី 8451 រសវាហិនី 8452 សីមវិសោធនីបាឋ 8453 វេស្សន្តរគីតិ 8454 មោគ្គល្លាន វុត្តិវិវរណបញ្ចិកា 8455 ថូបវង្ស 8456 ទាឋាវង្ស 8457 ធាតុបាឋវិលាសិនិយា 8458 ធាតុវង្ស 8459 ហត្ថវនគល្លវិហារវង្ស 8460 ជិនចរិតយ 8461 ជិនវង្សទីបំ 8462 តេលកដាហគាថា 8463 មិលិទដីកា 8464 បទមញ្ជរី 8465 បទសាធនំ 8466 សទ្ទពិន្ទុបករណំ 8467 កច្ចាយនធាតុមញ្ជុសា 8468 សាមន្តកូដវណ្ណនា |
| 2101 សីលក្ខន្ធវគ្គបាឡិ 2102 មហាវគ្គបាឡិ (ទីឃ) 2103 បាថិកវគ្គបាឡិ | 2201 សីលក្ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 2202 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (ទីឃ) 2203 បាថិកវគ្គអដ្ឋកថា | 2301 សីលក្ខន្ធវគ្គដីកា 2302 មហាវគ្គដីកា (ទីឃ) 2303 បាថិកវគ្គដីកា 2304 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-១ 2305 សីលក្ខន្ធវគ្គ-អភិនវដីកា-២ | |
| 3101 មូលបណ្ណាសបាឡិ 3102 មជ្ឈិមបណ្ណាសបាឡិ 3103 ឧបរិបណ្ណាសបាឡិ | 3201 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-១ 3202 មូលបណ្ណាសអដ្ឋកថា-២ 3203 មជ្ឈិមបណ្ណាសអដ្ឋកថា 3204 ឧបរិបណ្ណាសអដ្ឋកថា | 3301 មូលបណ្ណាសដីកា 3302 មជ្ឈិមបណ្ណាសដីកា 3303 ឧបរិបណ្ណាសដីកា | |
| 4101 សគាថាវគ្គបាឡិ 4102 និទានវគ្គបាឡិ 4103 ខន្ធវគ្គបាឡិ 4104 សឡាយតនវគ្គបាឡិ 4105 មហាវគ្គបាឡិ (សំយុត្ត) | 4201 សគាថាវគ្គអដ្ឋកថា 4202 និទានវគ្គអដ្ឋកថា 4203 ខន្ធវគ្គអដ្ឋកថា 4204 សឡាយតនវគ្គអដ្ឋកថា 4205 មហាវគ្គអដ្ឋកថា (សំយុត្ត) | 4301 សគាថាវគ្គដីកា 4302 និទានវគ្គដីកា 4303 ខន្ធវគ្គដីកា 4304 សឡាយតនវគ្គដីកា 4305 មហាវគ្គដីកា (សំយុត្ត) | |
| 5101 ឯកកនិបាតបាឡិ 5102 ទុកនិបាតបាឡិ 5103 តិកនិបាតបាឡិ 5104 ចតុក្កនិបាតបាឡិ 5105 បញ្ចកនិបាតបាឡិ 5106 ឆក្កនិបាតបាឡិ 5107 សត្តកនិបាតបាឡិ 5108 អដ្ឋកាទិនិបាតបាឡិ 5109 នវកនិបាតបាឡិ 5110 ទសកនិបាតបាឡិ 5111 ឯកាទសកនិបាតបាឡិ | 5201 ឯកកនិបាតអដ្ឋកថា 5202 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតអដ្ឋកថា 5203 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតអដ្ឋកថា 5204 អដ្ឋកាទិនិបាតអដ្ឋកថា | 5301 ឯកកនិបាតដីកា 5302 ទុក-តិក-ចតុក្កនិបាតដីកា 5303 បញ្ចក-ឆក្ក-សត្តកនិបាតដីកា 5304 អដ្ឋកាទិនិបាតដីកា | |
| 6101 ខុទ្ទកបាឋបាឡិ 6102 ធម្មបទបាឡិ 6103 ឧទានបាឡិ 6104 ឥតិវុត្តកបាឡិ 6105 សុត្តនិបាតបាឡិ 6106 វិមានវត្ថុបាឡិ 6107 បេតវត្ថុបាឡិ 6108 ថេរគាថាបាឡិ 6109 ថេរីគាថាបាឡិ 6110 អបទានបាឡិ-១ 6111 អបទានបាឡិ-២ 6112 ពុទ្ធវង្សបាឡិ 6113 ចរិយាបិដកបាឡិ 6114 ជាតកបាឡិ-១ 6115 ជាតកបាឡិ-២ 6116 មហានិទ្ទេសបាឡិ 6117 ចូឡនិទ្ទេសបាឡិ 6118 បដិសម្ភិទាមគ្គបាឡិ 6119 នេត្តិប្បករណបាឡិ 6120 មិលិន្ទបញ្ហាបាឡិ 6121 បេដកោបទេសបាឡិ | 6201 ខុទ្ទកបាឋអដ្ឋកថា 6202 ធម្មបទអដ្ឋកថា-១ 6203 ធម្មបទអដ្ឋកថា-២ 6204 ឧទានអដ្ឋកថា 6205 ឥតិវុត្តកអដ្ឋកថា 6206 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-១ 6207 សុត្តនិបាតអដ្ឋកថា-២ 6208 វិមានវត្ថុអដ្ឋកថា 6209 បេតវត្ថុអដ្ឋកថា 6210 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-១ 6211 ថេរគាថាអដ្ឋកថា-២ 6212 ថេរីគាថាអដ្ឋកថា 6213 អបទានអដ្ឋកថា-១ 6214 អបទានអដ្ឋកថា-២ 6215 ពុទ្ធវង្សអដ្ឋកថា 6216 ចរិយាបិដកអដ្ឋកថា 6217 ជាតកអដ្ឋកថា-១ 6218 ជាតកអដ្ឋកថា-២ 6219 ជាតកអដ្ឋកថា-៣ 6220 ជាតកអដ្ឋកថា-៤ 6221 ជាតកអដ្ឋកថា-៥ 6222 ជាតកអដ្ឋកថា-៦ 6223 ជាតកអដ្ឋកថា-៧ 6224 មហានិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6225 ចូឡនិទ្ទេសអដ្ឋកថា 6226 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-១ 6227 បដិសម្ភិទាមគ្គអដ្ឋកថា-២ 6228 នេត្តិប្បករណអដ្ឋកថា | 6301 នេត្តិប្បករណដីកា 6302 នេត្តិវិភាវិនី | |
| 7101 ធម្មសង្គណីបាឡិ 7102 វិភង្គបាឡិ 7103 ធាតុកថាបាឡិ 7104 បុគ្គលបញ្ញត្តិបាឡិ 7105 កថាវត្ថុបាឡិ 7106 យមកបាឡិ-១ 7107 យមកបាឡិ-២ 7108 យមកបាឡិ-៣ 7109 បដ្ឋានបាឡិ-១ 7110 បដ្ឋានបាឡិ-២ 7111 បដ្ឋានបាឡិ-៣ 7112 បដ្ឋានបាឡិ-៤ 7113 បដ្ឋានបាឡិ-៥ | 7201 ធម្មសង្គណិអដ្ឋកថា 7202 សម្មោហវិនោទនីអដ្ឋកថា 7203 បញ្ចបករណអដ្ឋកថា | 7301 ធម្មសង្គណី-មូលដីកា 7302 វិភង្គ-មូលដីកា 7303 បញ្ចបករណ-មូលដីកា 7304 ធម្មសង្គណី-អនុដីកា 7305 បញ្ចបករណ-អនុដីកា 7306 អភិធម្មាវតារោ-នាមរូបបរិច្ឆេទោ 7307 អភិធម្មត្ថសង្គហោ 7308 អភិធម្មាវតារ-បុរាណដីកា 7309 អភិធម្មមាតិកាបាឡិ | |
| 한국인 | |||
| 팔리 대장경 | 주석서 | 부주석서 | 기타 |
| 1101 빠라지카 빨리 1102 빠찟띠야 빨리 1103 마하왁가 빨리 (비나야) 1104 출라왁가 빨리 1105 빠리와라 빨리 | 1201 빠라지까깐다 앗타카타-1 1202 빠라지까깐다 앗타카타-2 1203 빠찟띠야 앗타카타 1204 마하왁가 앗타카타 (비나야) 1205 출라왁가 앗타카타 1206 빠리와라 앗타카타 | 1301 사랏타디빠니 띠까-1 1302 사랏타디빠니 띠까-2 1303 사랏타디빠니 띠까-3 | 1401 드베마띠까빨리 1402 위나야상가하 앗타카타 1403 와지라붓디 띠까 1404 위마띠위노다니 띠까-1 1405 위마띠위노다니 띠까-2 1406 위나야랑까라 띠까-1 1407 위나야랑까라 띠까-2 1408 깡카위따라니뿌라나 띠까 1409 위나야위닛차야-웃따라위닛차야 1410 위나야위닛차야 띠까-1 1411 위나야위닛차야 띠까-2 1412 빠찟땨디요자나빨리 1413 쿳닷시카-물라시카 8401 위숟디막가-1 8402 위숟디막가-2 8403 위숟디막가-마하띠까-1 8404 위숟디막가-마하띠까-2 8405 위숟디막가 니다나까타 8406 디가니까야 (뿌-위) 8407 맛지마니까야 (뿌-위) 8408 삼윳따니까야 (뿌-위) 8409 앙굳따라니까야 (뿌-위) 8410 위나야삐따까 (뿌-위) 8411 아비담마삐따까 (뿌-위) 8412 앗타카타 (뿌-위) 8413 니룻띠디빠니 8414 빠라맛타디빠니 상가하마하띠까빠타 8415 아누디빠니빠타 8416 빳타누ㄸ데사 디빠니빠타 8417 나막까라띠까 8418 마하빠나마빠타 8419 락카나또 붓다토마나가타 8420 수타완다나 8421 까말란자리 8422 지나랑까라 8423 빳자마두 8424 붓다구나가타왈리 8425 출라간타왕사 8427 사사나왕사 8426 마하왕사 8429 목갈라나뱌까라낭 8428 깟차야나뱌까라낭 8430 삿다니띠빠까라낭 (빠다말라) 8431 삿다니띠빠까라낭 (다두말라) 8432 빠다루빠싣디 8433 목갈라나빤찌까 8434 빠요가싣디빠타 8435 붇또다야빠타 8436 아비다나빠디피까빠타 8437 아비다나빠디피까띠까 8438 수보다랑까라빠타 8439 수보다랑까라띠까 8440 발라와따라 간티빠닷타위닛차야사라 8446 까위닷빠나니띠 8447 니띠만자리 8445 담마니띠 8444 마하라하니띠 8441 로까니띠 8442 숫딴따니띠 8443 수랏사띠니띠 8450 짜낙야니띠 8448 나라닥카디빠니 8449 짜뚜라락카디빠니 8451 라사와히니 8452 시마위소다니빠타 8453 웨산따라기띠 8454 목갈라나 붇띠위와라나빤찌까 8455 투빠왕사 8456 다타왕사 8457 다두빠타윌라시니야 8458 다두왕사 8459 핟타와나갈라위하라왕사 8460 지나짜리따야 8461 지나왕사디빵 8462 떼라까타하가타 8463 밀리다띠까 8464 빠다만자리 8465 빠다사다낭 8466 삿다빈두빠까라낭 8467 깟차야나다두만주사 8468 사만따꿋타완나나 |
| 2101 실락칸다왁가 빨리 2102 마하왁가 빨리 (디가) 2103 빠티까왁가 빨리 | 2201 실락칸다왁가 앗타카타 2202 마하왁가 앗타카타 (디가) 2203 빠티까왁가 앗타카타 | 2301 실락칸다왁가 띠까 2302 마하왁가 띠까 (디가) 2303 빠티까왁가 띠까 2304 실락칸다왁가-아비나와띠까-1 2305 실락칸다왁가-아비나와띠까-2 | |
| 3101 물라빤나사 빨리 3102 맛지마빤나사 빨리 3103 우빠리빤나사 빨리 | 3201 물라빤나사 앗타카타-1 3202 물라빤나사 앗타카타-2 3203 맛지마빤나사 앗타카타 3204 우빠리빤나사 앗타카타 | 3301 물라빤나사 띠까 3302 맛지마빤나사 띠까 3303 우빠리빤나사 띠까 | |
| 4101 사가타왁가 빨리 4102 니다나왁가 빨리 4103 칸다왁가 빨리 4104 살라야따나왁가 빨리 4105 마하왁가 빨리 (삼윳따) | 4201 사가타왁가 앗타카타 4202 니다나왁가 앗타카타 4203 칸다왁가 앗타카타 4204 살라야따나왁가 앗타카타 4205 마하왁가 앗타카타 (삼윳따) | 4301 사가타왁가 띠까 4302 니다나왁가 띠까 4303 칸다왁가 띠까 4304 살라야따나왁가 띠까 4305 마하왁가 띠까 (삼윳따) | |
| 5101 에까까니빠따 빨리 5102 두까니빠따 빨리 5103 띠까니빠따 빨리 5104 짜뚝까니빠따 빨리 5105 빤짜까니빠따 빨리 5106 착까니빠따 빨리 5107 삿따까니빠따 빨리 5108 앗타까디니빠따 빨리 5109 나와까니빠따 빨리 5110 다사까니빠따 빨리 5111 에까다사까니빠따 빨리 | 5201 에까까니빠따 앗타카타 5202 두까-띠까-짜뚝까니빠따 앗타카타 5203 빤짜까-착까-삿따까니빠따 앗타카타 5204 앗타까디니빠따 앗타카타 | 5301 에까까니빠따 띠까 5302 두까-띠까-짜뚝까니빠따 띠까 5303 빤짜까-착까-삿따까니빠따 띠까 5304 앗타까디니빠따 띠까 | |
| 6101 쿳닥까빠타 빨리 6102 담마빠다 빨리 6103 우다나 빨리 6104 이띠웃따까 빨리 6105 숫따니빠따 빨리 6106 위마나왓투 빨리 6107 베따왓투 빨리 6108 테라가타 빨리 6109 테리가타 빨리 6110 아빠다나 빨리-1 6111 아빠다나 빨리-2 6112 붓다왕사 빨리 6113 짜리야삐따까 빨리 6114 자따까 빨리-1 6115 자따까 빨리-2 6116 마하닷데사 빨리 6117 출라닷데사 빨리 6118 빠티삼비다막가 빨리 6119 넷띠빠까라나 빨리 6120 밀린다빤하 빨리 6121 뻬따꼬빠데사 빨리 | 6201 쿳닥까빠타 앗타카타 6202 담마빠다 앗타카타-1 6203 담마빠다 앗타카타-2 6204 우다나 앗타카타 6205 이띠웃따까 앗타카타 6206 숫따니빠따 앗타카타-1 6207 숫따니빠따 앗타카타-2 6208 위마나왓투 앗타카타 6209 베따왓투 앗타카타 6210 테라가타 앗타카타-1 6211 테라가타 앗타카타-2 6212 테리가타 앗타카타 6213 아빠다나 앗타카타-1 6214 아빠다나 앗타카타-2 6215 붓다왕사 앗타카타 6216 짜리야삐따까 앗타카타 6217 자따까 앗타카타-1 6218 자따까 앗타카타-2 6219 자따까 앗타카타-3 6220 자따까 앗타카타-4 6221 자따까 앗타카타-5 6222 자따까 앗타카타-6 6223 자따까 앗타카타-7 6224 마하닷데사 앗타카타 6225 출라닷데사 앗타카타 6226 빠티삼비다막가 앗타카타-1 6227 빠티삼비다막가 앗타카타-2 6228 넷띠빠까라나 앗타카타 | 6301 넷띠빠까라나 띠까 6302 넷띠위바비니 | |
| 7101 담마상가니 빨리 7102 위방가 빨리 7103 다뚜까타 빨리 7104 뿍갈라빤냣띠 빨리 7105 까타왓투 빨리 7106 야마까 빨리-1 7107 야마까 빨리-2 7108 야마까 빨리-3 7109 빳타나 빨리-1 7110 빳타나 빨리-2 7111 빳타나 빨리-3 7112 빳타나 빨리-4 7113 빳타나 빨리-5 | 7201 담마상가니 앗타카타 7202 삼모하위노다니 앗타카타 7203 빤짜빠까라나 앗타카타 | 7301 담마상가니-물라띠까 7302 위방가-물라띠까 7303 빤짜빠까라나-물라띠까 7304 담마상가니-아누띠까 7305 빤짜빠까라나-아누띠까 7306 아비담마와따로-나마루빠빠릳체도 7307 아비담맛타상가호 7308 아비담마와따라-뿌라나띠까 7309 아비담마마띠까빨리 | |
| ອັກສອນລາວ | |||
| ປາລີ | ອັດຖະກະຖາ | ຏີກາ | ອັນຍາ |
| 1101 ປາຣາຊິກະ ປາລີ 1102 ປາຈິດຕິຍະ ປາລີ 1103 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ວິໄນ) 1104 ຈູລະວັກຄະ ປາລີ 1105 ປະລິວາລະ ປາລີ | 1201 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-1 1202 ປາຣາຊິກະກັນທະ ອັດຖະກະຖາ-2 1203 ປາຈິດຕິຍະ ອັດຖະກະຖາ 1204 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ວິໄນ) 1205 ຈູລະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 1206 ປະລິວາລະ ອັດຖະກະຖາ | 1301 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-1 1302 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-2 1303 ສາຣັດຖະທີປະນີ ຏີກາ-3 | 1401 ທເວມາຕິກາປາລີ 1402 ວິນະຍະສັງຄະຫະ ອັດຖະກະຖາ 1403 ວະຊິລະພຸດທິ ຏີກາ 1404 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-1 1405 ວິມະຕິວິໂນທະນີ ຏີກາ-2 1406 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-1 1407 ວິນະຍາລັງກາລະ ຏີກາ-2 1408 ກັງຂາວິຕະຣະນີປຸຣານະ ຏີກາ 1409 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ-ອຸຕຕະຣະວິນິດສະຍະ 1410 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-1 1411 ວິນະຍະວິນິດສະຍະ ຏີກາ-2 1412 ປາຈິຕະຍາທິໂຍຊະນາປາລີ 1413 ຂຸທະທະສິກຂາ-ມູລະສິກຂາ 8401 ວິສຸດທິມັກຄະ-1 8402 ວິສຸດທິມັກຄະ-2 8403 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-1 8404 ວິສຸດທິມັກຄະ-ມະຫາຏີກາ-2 8405 ວິສຸດທິມັກຄະ ນິທານະກະຖາ 8406 ທີຆະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8407 ມັດຊິມະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8408 ສັງຍຸຕຕະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8409 ອັງຄຸຕຕະລະນິກາຍະ (ປຸ-ວິ) 8410 ວິນະຍະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8411 ອະພິທັມມະປິຕະກະ (ປຸ-ວິ) 8412 ອັດຖະກະຖາ (ປຸ-ວິ) 8413 ນິລຸຕຕິທີປະນີ 8414 ປະຣະມັດຖະທີປະນີ ສັງຄະຫະມະຫາຏີກາປາຖະ 8415 ອະນຸທີປະນີປາຖະ 8416 ປັດຖານຸທເທສະ ທີປະນີປາຖະ 8417 ນະມັກກາລະຏີກາ 8418 ມະຫາປະຖາມະປາຖະ 8419 ລັກຂະນາໂຕ ພຸດທະຖະມະນາຄາຖາ 8420 ສຸຕະວັນທະນາ 8421 ກະມະລາຍຈະລິ 8422 ຊິນາລັງກາລະ 8423 ປັດຊະມະທຸ 8424 ພຸດທະຄຸນະຄາຖາວະລີ 8425 ຈູລະຄັນຖະວັງສະ 8426 ມະຫາວັງສະ 8427 ສາສະນະວັງສະ 8428 ກັດຈາຍະນະພະຍາກະລະນັງ 8429 ມົກຄັນທານະພະຍາກະລະນັງ 8430 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ປະທະມາລາ) 8431 ສັດທະນີຕິປະກະລະນັງ (ຘາຕຸມາລາ) 8432 ປະທະຣູປະສິດທິ 8433 ໂມຄັນທານະປັນຈິກາ 8434 ປະໂຍຄະສິດທິປາຖະ 8435 ວຸຕະໂທຍະປາຖະ 8436 ອະພິທານະປະປະທີປິກາປາຖະ 8437 ອະພິທານະປະປະທີປິກາຏີກາ 8438 ສຸໂພທາລັງກາລະປາຖະ 8439 ສຸໂພທາລັງກາລະຏີກາ 8440 ພາລາວະຕາລະ ຄັນຖິປະທັດຖະວິນິດສະຍະສາລະ 8441 ໂລກະນີຕິ 8442 ສຸດຕັນຕະນີຕິ 8443 ສູລັດສະຕິນີຕິ 8444 ມະຫາລະຫະນີຕິ 8445 ທັມມະນີຕິ 8446 ກະວິທັບປະຖານີຕິ 8447 ນີຕິມັນຊະລີ 8448 ນະລະທັກຂະທີປະນີ 8449 ຈະຕຸຣາລັກຂະທີປະນີ 8450 ຈານັກຍະນີຕິ 8451 ລະສະວາຫິນີ 8452 ສີມາວິໂສທະນີປາຖະ 8453 ເວສສັນຕະລະຄີຕິ 8454 ໂມຄັນທານະ ວຸຕຕິວິວະລະນະປັນຈິກາ 8455 ຖູປະວັງສະ 8456 ທາຐາວັງສະ 8457 ຘາຕຸປາຖະວິລາສິນີຍາ 8458 ຘາຕຸວັງສະ 8459 ຫັດຖະວະນະຄັນລະວິຫາລະວັງສະ 8460 ຊິນະຈະລິຕະຍະ 8461 ຊິນະວັງສະທີປັງ 8462 ເຕລະກະຕາຫາຄາຖາ 8463 ມິລິທະຏີກາ 8464 ປະທະມັນຊະລີ 8465 ປະທະສາຘະນັງ 8466 ສັດທະພິນທຸປະກະລະນັງ 8467 ກັດຈາຍະນະຘາຕຸມັນຊຸສາ 8468 ສາມັນຕະກູຏະວັນນະນາ |
| 2101 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 2102 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ທີຆະ) 2103 ປາຖິກະວັກຄະ ປາລີ | 2201 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 2202 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ທີຆະ) 2203 ປາຖິກະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ | 2301 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 2302 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ທີຆະ) 2303 ປາຖິກະວັກຄະ ຏີກາ 2304 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-1 2305 ສີລັກຂັນທະວັກຄະ-ອະພິນະວະຏີກາ-2 | |
| 3101 ມູລະປັນຍາສະ ປາລີ 3102 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ປາລີ 3103 ອຸປະລິປັນຍາສະ ປາລີ | 3201 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-1 3202 ມູລະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ-2 3203 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ 3204 ອຸປະລິປັນຍາສະ ອັດຖະກະຖາ | 3301 ມູລະປັນຍາສະ ຏີກາ 3302 ມັດຊິມະປັນຍາສະ ຏີກາ 3303 ອຸປະລິປັນຍາສະ ຏີກາ | |
| 4101 ສະຄາຖາວັກຄະ ປາລີ 4102 ນິທານະວັກຄະ ປາລີ 4103 ຂັນທະວັກຄະ ປາລີ 4104 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ປາລີ 4105 ມະຫາວັກຄະ ປາລີ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4201 ສະຄາຖາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4202 ນິທານະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4203 ຂັນທະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4204 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ 4205 ມະຫາວັກຄະ ອັດຖະກະຖາ (ສັງຍຸຕຕະ) | 4301 ສະຄາຖາວັກຄະ ຏີກາ 4302 ນິທານະວັກຄະ ຏີກາ 4303 ຂັນທະວັກຄະ ຏີກາ 4304 ສະຫຼາຍາຕະນະວັກຄະ ຏີກາ 4305 ມະຫາວັກຄະ ຏີກາ (ສັງຍຸຕຕະ) | |
| 5101 ເອກະກະນິປາຕະ ປາລີ 5102 ທຸກະນິປາຕະ ປາລີ 5103 ຕິກະນິປາຕະ ປາລີ 5104 ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ປາລີ 5105 ປັຈຈະກະນິປາຕະ ປາລີ 5106 ຉັກກະນິປາຕະ ປາລີ 5107 ສັດຕະກະນິປາຕະ ປາລີ 5108 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ປາລີ 5109 ນະວະກະນິປາຕະ ປາລີ 5110 ທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ 5111 ເອກາທະສະກະນິປາຕະ ປາລີ | 5201 ເອກະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5202 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5203 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ 5204 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ | 5301 ເອກະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5302 ທຸກະ-ຕິກະ-ຈະຕຸກກະນິປາຕະ ຏີກາ 5303 ປັຈຈະກະ-ຉັກກະ-ສັດຕະກະນິປາຕະ ຏີກາ 5304 ອັດຖະກາທິນິປາຕະ ຏີກາ | |
| 6101 ຂຸທະທະກະປາຖະ ປາລີ 6102 ທຳມະປະທະ ປາລີ 6103 ອຸທານະ ປາລີ 6104 ອິຕິວຸຕຕະກະ ປາລີ 6105 ສຸດຕະນິປາຕະ ປາລີ 6106 ວິມານະວັດຖຸ ປາລີ 6107 ເປຕະວັດຖຸ ປາລີ 6108 ເຖລະຄາຖາ ປາລີ 6109 ເຖລີຄາຖາ ປາລີ 6110 ອະປະທານະ ປາລີ-1 6111 ອະປະທານະ ປາລີ-2 6112 ພຸດທະວັງສະ ປາລີ 6113 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ປາລີ 6114 ຊາຕະກະ ປາລີ-1 6115 ຊາຕະກະ ປາລີ-2 6116 ມະຫານິທເທສະ ປາລີ 6117 ຈູລະນິທເທສະ ປາລີ 6118 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ປາລີ 6119 ເນຕຕິປະກະລະນະ ປາລີ 6120 ມິລິນທະປັນຫາ ປາລີ 6121 ເປຏະກົປເທສະ ປາລີ | 6201 ຂຸທະທະກະປາຖະ ອັດຖະກະຖາ 6202 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-1 6203 ທຳມະປະທະ ອັດຖະກະຖາ-2 6204 ອຸທານະ ອັດຖະກະຖາ 6205 ອິຕິວຸຕຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6206 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-1 6207 ສຸດຕະນິປາຕະ ອັດຖະກະຖາ-2 6208 ວິມານະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6209 ເປຕະວັດຖຸ ອັດຖະກະຖາ 6210 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-1 6211 ເຖລະຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ-2 6212 ເຖລີຄາຖາ ອັດຖະກະຖາ 6213 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-1 6214 ອະປະທານະ ອັດຖະກະຖາ-2 6215 ພຸດທະວັງສະ ອັດຖະກະຖາ 6216 ຈະຣິຍາປິຕະກະ ອັດຖະກະຖາ 6217 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-1 6218 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-2 6219 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-3 6220 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-4 6221 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-5 6222 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-6 6223 ຊາຕະກະ ອັດຖະກະຖາ-7 6224 ມະຫານິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6225 ຈູລະນິທເທສະ ອັດຖະກະຖາ 6226 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-1 6227 ປະຕິສັມພິທາມັກຄະ ອັດຖະກະຖາ-2 6228 ເນຕຕິປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 6301 ເນຕຕິປະກະລະນະ ຏີກາ 6302 ເນຕຕິວິພາວິນີ | |
| 7101 ທຳມະສັງຄະນີ ປາລີ 7102 ວິພັງຄະ ປາລີ 7103 ຘາຕຸກະຖາ ປາລີ 7104 ປຸກຄະລະປັນຍັດຕິ ປາລີ 7105 ກະຖາວັດຖຸ ປາລີ 7106 ຍະມະກະ ປາລີ-1 7107 ຍະມະກະ ປາລີ-2 7108 ຍະມະກະ ປາລີ-3 7109 ປັດຖານະ ປາລີ-1 7110 ປັດຖານະ ປາລີ-2 7111 ປັດຖານະ ປາລີ-3 7112 ປັດຖານະ ປາລີ-4 7113 ປັດຖານະ ປາລີ-5 | 7201 ທຳມະສັງຄະນິ ອັດຖະກະຖາ 7202 ສັມໂມຫະວິໂນທະນີ ອັດຖະກະຖາ 7203 ປັຈຈະປະກະລະນະ ອັດຖະກະຖາ | 7301 ທຳມະສັງຄະນີ-ມູລະຏີກາ 7302 ວິພັງຄະ-ມູລະຏີກາ 7303 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ມູລະຏີກາ 7304 ທຳມະສັງຄະນີ-ອະນຸຏີກາ 7305 ປັຈຈະປະກະລະນະ-ອະນຸຏີກາ 7306 ອະພິທັມມາວະຕາໂຣ-ນາມະຣູປະປະຣິຈເທໂທ 7307 ອະພິທັມມັດຖະສັງຄະໂຫ 7308 ອະພິທັມມາວະຕາລະ-ປຸຣານະຏີກາ 7309 ອະພິທັມມາມາຕິກາປາລີ | |
| मराठी | |||
| पाळी | अट्ठकथा | टीका | अन्य |
| 1101 पाराजिक पाळी 1102 पाचित्तिय पाळी 1103 महावग्ग पाळी (विनय) 1104 चूळवग्ग पाळी 1105 परिवार पाळी | 1201 पाराजिककंड अट्ठकथा-१ 1202 पाराजिककंड अट्ठकथा-२ 1203 पाचित्तिय अट्ठकथा 1204 महावग्ग अट्ठकथा (विनय) 1205 चूळवग्ग अट्ठकथा 1206 परिवार अट्ठकथा | 1301 सारत्थदीपनी टीका-१ 1302 सारत्थदीपनी टीका-२ 1303 सारत्थदीपनी टीका-३ | 1401 द्वेमातिकापाळी 1402 विनयसंगह अट्ठकथा 1403 वजिरबुद्धि टीका 1404 विमतिविनोदनी टीका-१ 1405 विमतिविनोदनी टीका-२ 1406 विनयालंकार टीका-१ 1407 विनयालंकार टीका-२ 1408 कंखावितरणीपुराण टीका 1409 विनयविनिच्छय-उत्तरविनिच्छय 1410 विनयविनिच्छय टीका-१ 1411 विनयविनिच्छय टीका-२ 1412 पाचित्यादियोजनापाळी 1413 खुद्दसिक्खा-मूलसिक्खा 8401 विसुद्धिमग्ग-१ 8402 विसुद्धिमग्ग-२ 8403 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-१ 8404 विसुद्धिमग्ग-महाटीका-२ 8405 विसुद्धिमग्ग निदानकथा 8406 दीघनिकाय (पु-वि) 8407 मज्झिमनिकाय (पु-वि) 8408 संयुत्तनिकाय (पु-वि) 8409 अंगुत्तरनिकाय (पु-वि) 8410 विनयपिटक (पु-वि) 8411 अभिधम्मपिटक (पु-वि) 8412 अट्ठकथा (पु-वि) 8413 निरुत्तिदीपनी 8414 परमत्थदीपनी संगहमहाटीकापाठ 8415 अनुदीपनीपाठ 8416 पट्ठानुद्देस दीपनीपाठ 8417 नमक्कारटीका 8418 महापणामपाठ 8419 लक्खणातो बुद्धथोमनागाथा 8420 सुतवंदना 8421 कमलांजलि 8422 जिनालंकार 8423 पज्जमधु 8424 बुद्धगुणगाथावली 8425 चूळगंथवंस 8426 महावंस 8427 सासनवंस 8428 कच्चायनव्याकरणं 8429 मोग्गल्लानव्याकरणं 8430 सद्दनीतिप्पकरणं (पदमाला) 8431 सद्दनीतिप्पकरणं (धातुमाला) 8432 पदरूपसिद्धि 8433 मोग्गल्लानपंचिका 8434 पयोगसिद्धिपाठ 8435 वुत्तोदयपाठ 8436 अभिधानप्पदीपिकापाठ 8437 अभिधानप्पदीपिकाटीका 8438 सुबोधालंकारपाठ 8439 सुबोधालंकारटीका 8440 बालावतार गंठिपदत्थविनिच्छयसार 8441 लोकनीति 8442 सुत्तंतनीति 8443 सूरस्सतीनीति 8444 महारहनीति 8445 धम्मनीति 8446 कविदप्पणनीति 8447 नीतिमंजरी 8448 नरदक्खदीपनी 8449 चतुरारक्खदीपनी 8450 चाणक्यनीति 8451 रसवाहिनी 8452 सीमाविसोधनीपाठ 8453 वेस्संतरगीति 8454 मोग्गल्लान वुत्तिविवरणपंचिका 8455 थूपवंस 8456 दाठावंस 8457 धातुपाठविलासिनिया 8458 धातुवंस 8459 हत्थवनगल्लविहारवंस 8460 जिनचरितय 8461 जिनवंसदीपं 8462 तेलकटाहगाथा 8463 मिलिदटीका 8464 पदमंजरी 8465 पदसाधनं 8466 सद्दबिंदुपकरणं 8467 कच्चायनधातुमंजुसा 8468 सामंतकूटवण्णना |
| 2101 सीलक्खंधवग्ग पाळी 2102 महावग्ग पाळी (दीघ) 2103 पाथिकवग्ग पाळी | 2201 सीलक्खंधवग्ग अट्ठकथा 2202 महावग्ग अट्ठकथा (दीघ) 2203 पाथिकवग्ग अट्ठकथा | 2301 सीलक्खंधवग्ग टीका 2302 महावग्ग टीका (दीघ) 2303 पाथिकवग्ग टीका 2304 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-१ 2305 सीलक्खंधवग्ग-अभिनवटीका-२ | |
| 3101 मूलपण्णास पाळी 3102 मज्झिमपण्णास पाळी 3103 उपरिपण्णास पाळी | 3201 मूलपण्णास अट्ठकथा-१ 3202 मूलपण्णास अट्ठकथा-२ 3203 मज्झिमपण्णास अट्ठकथा 3204 उपरिपण्णास अट्ठकथा | 3301 मूलपण्णास टीका 3302 मज्झिमपण्णास टीका 3303 उपरिपण्णास टीका | |
| 4101 सगाथावग्ग पाळी 4102 निदानवग्ग पाळी 4103 खंधवग्ग पाळी 4104 सळायतनवग्ग पाळी 4105 महावग्ग पाळी (संयुत्त) | 4201 सगाथावग्ग अट्ठकथा 4202 निदानवग्ग अट्ठकथा 4203 खंधवग्ग अट्ठकथा 4204 सळायतनवग्ग अट्ठकथा 4205 महावग्ग अट्ठकथा (संयुत्त) | 4301 सगाथावग्ग टीका 4302 निदानवग्ग टीका 4303 खंधवग्ग टीका 4304 सळायतनवग्ग टीका 4305 महावग्ग टीका (संयुत्त) | |
| 5101 एककनिपात पाळी 5102 दुकनिपात पाळी 5103 तिकनिपात पाळी 5104 चतुक्कनिपात पाळी 5105 पंचकनिपात पाळी 5106 छक्कनिपात पाळी 5107 सत्तकनिपात पाळी 5108 अट्ठकादिनिपात पाळी 5109 नवकनिपात पाळी 5110 दसकनिपात पाळी 5111 एकादसकनिपात पाळी | 5201 एककनिपात अट्ठकथा 5202 दुक-तिक-चतुक्कनिपात अट्ठकथा 5203 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात अट्ठकथा 5204 अट्ठकादिनिपात अट्ठकथा | 5301 एककनिपात टीका 5302 दुक-तिक-चतुक्कनिपात टीका 5303 पंचक-छक्क-सत्तकनिपात टीका 5304 अट्ठकादिनिपात टीका | |
| 6101 खुद्दकपाठ पाळी 6102 धम्मपद पाळी 6103 उदान पाळी 6104 इतिवुत्तक पाळी 6105 सुत्तनिपात पाळी 6106 विमानवत्थु पाळी 6107 पेतवत्थु पाळी 6108 थेरगाथा पाळी 6109 थेरीगाथा पाळी 6110 अपदान पाळी-१ 6111 अपदान पाळी-२ 6112 बुद्धवंस पाळी 6113 चरियापिटक पाळी 6114 जातक पाळी-१ 6115 जातक पाळी-२ 6116 महानिद्देस पाळी 6117 चूळनिद्देस पाळी 6118 पटिसंभिदामग्ग पाळी 6119 नेत्तिप्पकरण पाळी 6120 मिलिंदपंह पाळी 6121 पेटकोपदेस पाळी | 6201 खुद्दकपाठ अट्ठकथा 6202 धम्मपद अट्ठकथा-१ 6203 धम्मपद अट्ठकथा-२ 6204 उदान अट्ठकथा 6205 इतिवुत्तक अट्ठकथा 6206 सुत्तनिपात अट्ठकथा-१ 6207 सुत्तनिपात अट्ठकथा-२ 6208 विमानवत्थु अट्ठकथा 6209 पेतवत्थु अट्ठकथा 6210 थेरगाथा अट्ठकथा-१ 6211 थेरगाथा अट्ठकथा-२ 6212 थेरीगाथा अट्ठकथा 6213 अपदान अट्ठकथा-१ 6214 अपदान अट्ठकथा-२ 6215 बुद्धवंस अट्ठकथा 6216 चरियापिटक अट्ठकथा 6217 जातक अट्ठकथा-१ 6218 जातक अट्ठकथा-२ 6219 जातक अट्ठकथा-३ 6220 जातक अट्ठकथा-४ 6221 जातक अट्ठकथा-५ 6222 जातक अट्ठकथा-६ 6223 जातक अट्ठकथा-७ 6224 महानिद्देस अट्ठकथा 6225 चूळनिद्देस अट्ठकथा 6226 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-१ 6227 पटिसंभिदामग्ग अट्ठकथा-२ 6228 नेत्तिप्पकरण अट्ठकथा | 6301 नेत्तिप्पकरण टीका 6302 नेत्तिविभाविनी | |
| 7101 धम्मसंगणी पाळी 7102 विभंग पाळी 7103 धातुकथा पाळी 7104 पुग्गलपंयत्ति पाळी 7105 कथावत्थु पाळी 7106 यमक पाळी-१ 7107 यमक पाळी-२ 7108 यमक पाळी-३ 7109 पट्ठान पाळी-१ 7110 पट्ठान पाळी-२ 7111 पट्ठान पाळी-३ 7112 पट्ठान पाळी-४ 7113 पट्ठान पाळी-५ | 7201 धम्मसंगणि अट्ठकथा 7202 सम्मोहविनोदनी अट्ठकथा 7203 पंचपकरण अट्ठकथा | 7301 धम्मसंगणी-मूलटीका 7302 विभंग-मूलटीका 7303 पंचपकरण-मूलटीका 7304 धम्मसंगणी-अनुटीका 7305 पंचपकरण-अनुटीका 7306 अभिधम्मावतारो-नामरूपपरिच्छेदो 7307 अभिधम्मत्थसंगहो 7308 अभिधम्मावतार-पुराणटीका 7309 अभिधम्ममातिकापाळी | |
| မြန်မာ | |||
| ပါဠိတော် | အဋ္ဌကထာ | ဋီကာ | အခြား |
| 1101 ပါရာဇိက ပါဠိ 1102 ပါစိတ္တိယ ပါဠိ 1103 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဝိနယ) 1104 စူဠဝဂ္ဂ ပါဠိ 1105 ပရိဝါရ ပါဠိ | 1201 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၁ 1202 ပါရာဇိကကဏ္ဍ အဋ္ဌကထာ-၂ 1203 ပါစိတ္တိယ အဋ္ဌကထာ 1204 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဝိနယ) 1205 စူဠဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 1206 ပရိဝါရ အဋ္ဌကထာ | 1301 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၁ 1302 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၂ 1303 သာရတ္ထဒီပနီ ဋီကာ-၃ | 1401 ဒွေမာတိကာပါဠိ 1402 ဝိနယသင်္ဂဟ အဋ္ဌကထာ 1403 ဝဇိရဗုဒ္ဓိ ဋီကာ 1404 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၁ 1405 ဝိမတိဝိနောဒနီ ဋီကာ-၂ 1406 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၁ 1407 ဝိနယာလင်္ကာရ ဋီကာ-၂ 1408 ကင်္ခာဝိတရဏီပုရာဏ ဋီကာ 1409 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ-ဥတ္တရဝိနိစ္ဆယ 1410 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၁ 1411 ဝိနယဝိနိစ္ဆယ ဋီကာ-၂ 1412 ပါစိတျာဒိယောဇနာပါဠိ 1413 ခုဒ္ဒသိက္ခာ-မူလသိက္ခာ 8401 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၁ 8402 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-၂ 8403 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၁ 8404 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ-မဟာဋီကာ-၂ 8405 ဝိသုဒ္ဓိမဂ္ဂ နိဒါနကထာ 8406 ဒီဃနိကာယ (ပု-ဝိ) 8407 မဇ္ဈိမနိကာယ (ပု-ဝိ) 8408 သံယုတ္တနိကာယ (ပု-ဝိ) 8409 အင်္ဂုတ္တရနိကာယ (ပု-ဝိ) 8410 ဝိနယပိဋက (ပု-ဝိ) 8411 အဘိဓမ္မပိဋက (ပု-ဝိ) 8412 အဋ္ဌကထာ (ပု-ဝိ) 8413 နိရုတ္တိဒီပနီ 8414 ပရမတ္ထဒီပနီ သင်္ဂဟမဟာဋီကာပါဌ 8415 အနုဒီပနီပါဌ 8416 ပဋ္ဌာနုဒ္ဒေသ ဒီပနီပါဌ 8417 နမက္ကာရဋီကာ 8418 မဟာပဏာမပါဌ 8419 လက္ခဏာတော ဗုဒ္ဓထောမနာဂါထာ 8420 သုတဝန္ဒနာ 8421 ကမလာဉ္ဇလိ 8422 ဇိနာလင်္ကာရ 8423 ပဇ္ဇမဓု 8424 ဗုဒ္ဓဂုဏဂါထာဝလီ 8425 စူဠဂန္ထဝံသ 8427 သာသနဝံသ 8426 မဟာဝံသ 8429 မောဂ္ဂလ္လာနဗျာကရဏံ 8428 ကစ္စာယနဗျာကရဏံ 8430 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ပဒမာလာ) 8431 သဒ္ဒနီတိပ္ပကရဏံ (ဓါတုမာလာ) 8432 ပဒရူပသိဒ္ဓိ 8433 မောဂလ္လာနပဉ္စိကာ 8434 ပယောဂသိဒ္ဓိပါဌ 8435 ဝုတ္တောဒယပါဌ 8436 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာပါဌ 8437 အဘိဓါနပ္ပဒီပိကာဋီကာ 8438 သုဗောဓါလင်္ကာရပါဌ 8439 သုဗောဓါလင်္ကာရဋီကာ 8440 ဗာလာဝတာရ ဂဏ္ဌိပဒတ္ထဝိနိစ္ဆယသာရ 8446 ကဝိဒပ္ပဏနီတိ 8447 နီတိမဉ္ဇရီ 8445 ဓမ္မနီတိ 8444 မဟာရဟနီတိ 8441 လောကနီတိ 8442 သုတ္တန္တနီတိ 8443 သူရဿတိနီတိ 8450 စာဏကျနီတိ 8448 နရဒက္ခဒီပနီ 8449 စတုရာရက္ခဒီပနီ 8451 ရသဝါဟိနီ 8452 သီမဝိသောဓနီပါဌ 8453 ဝေဿန္တရဂီတိ 8454 မောဂ္ဂလ္လာန ဝုတ္တိဝိဝရဏပဉ္စိကာ 8455 ထူပဝံသ 8456 ဒါဌာဝံသ 8457 ဓါတုပါဌဝိလာသိနိယာ 8458 ဓါတုဝံသ 8459 ဟတ္ထဝနဂလ္လဝိဟာရဝံသ 8460 ဇိနစရိတယ 8461 ဇိနဝံသဒီပံ 8462 တေလကဋာဟဂါထာ 8463 မိလိဒဋီကာ 8464 ပဒမဉ္ဇရီ 8465 ပဒသာဓနံ 8466 သဒ္ဒဗိန္ဒုပကရဏံ 8467 ကစ္စာယနဓါတုမဉ္ဇုသာ 8468 သာမန္တကူဋဝဏ္ဏနာ |
| 2101 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 2102 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (ဒီဃ) 2103 ပါထိကဝဂ္ဂ ပါဠိ | 2201 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 2202 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (ဒီဃ) 2203 ပါထိကဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ | 2301 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 2302 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (ဒီဃ) 2303 ပါထိကဝဂ္ဂ ဋီကာ 2304 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၁ 2305 သီလက္ခန္ဓဝဂ္ဂ-အဘိနဝဋီကာ-၂ | |
| 3101 မူလပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3102 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ပါဠိ 3103 ဥပရိပဏ္ဏာသ ပါဠိ | 3201 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၁ 3202 မူလပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ-၂ 3203 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ 3204 ဥပရိပဏ္ဏာသ အဋ္ဌကထာ | 3301 မူလပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3302 မဇ္ဈိမပဏ္ဏာသ ဋီကာ 3303 ဥပရိပဏ္ဏာသ ဋီကာ | |
| 4101 သဂါထာဝဂ္ဂ ပါဠိ 4102 နိဒါနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4103 ခန္ဓဝဂ္ဂ ပါဠိ 4104 သဠာယတနဝဂ္ဂ ပါဠိ 4105 မဟာဝဂ္ဂ ပါဠိ (သံယုတ္တ) | 4201 သဂါထာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4202 နိဒါနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4203 ခန္ဓဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4204 သဠာယတနဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ 4205 မဟာဝဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ (သံယုတ္တ) | 4301 သဂါထာဝဂ္ဂ ဋီကာ 4302 နိဒါနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4303 ခန္ဓဝဂ္ဂ ဋီကာ 4304 သဠာယတနဝဂ္ဂ ဋီကာ 4305 မဟာဝဂ္ဂ ဋီကာ (သံယုတ္တ) | |
| 5101 ဧကကနိပါတ ပါဠိ 5102 ဒုကနိပါတ ပါဠိ 5103 တိကနိပါတ ပါဠိ 5104 စတုက္ကနိပါတ ပါဠိ 5105 ပဉ္စကနိပါတ ပါဠိ 5106 ဆက္ကနိပါတ ပါဠိ 5107 သတ္တကနိပါတ ပါဠိ 5108 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ပါဠိ 5109 နဝကနိပါတ ပါဠိ 5110 ဒသကနိပါတ ပါဠိ 5111 ဧကာဒသကနိပါတ ပါဠိ | 5201 ဧကကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5202 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5203 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ အဋ္ဌကထာ 5204 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ အဋ္ဌကထာ | 5301 ဧကကနိပါတ ဋီကာ 5302 ဒုက-တိက-စတုက္ကနိပါတ ဋီကာ 5303 ပဉ္စက-ဆက္က-သတ္တကနိပါတ ဋီကာ 5304 အဋ္ဌကာဒိနိပါတ ဋီကာ | |
| 6101 ခုဒ္ဒကပါဌ ပါဠိ 6102 ဓမ္မပဒ ပါဠိ 6103 ဥဒါန ပါဠိ 6104 ဣတိဝုတ္တက ပါဠိ 6105 သုတ္တနိပါတ ပါဠိ 6106 ဝိမာနဝတ္ထု ပါဠိ 6107 ပေတဝတ္ထု ပါဠိ 6108 ထေရဂါထာ ပါဠိ 6109 ထေရီဂါထာ ပါဠိ 6110 အပဒါန ပါဠိ-၁ 6111 အပဒါန ပါဠိ-၂ 6112 ဗုဒ္ဓဝံသ ပါဠိ 6113 စရိယာပိဋက ပါဠိ 6114 ဇာတက ပါဠိ-၁ 6115 ဇာတက ပါဠိ-၂ 6116 မဟာနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6117 စူဠနိဒ္ဒေသ ပါဠိ 6118 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ ပါဠိ 6119 နေတ္တိပ္ပကရဏ ပါဠိ 6120 မိလိန္ဒပဉှ ပါဠိ 6121 ပေဋကောပဒေသ ပါဠိ | 6201 ခုဒ္ဒကပါဌ အဋ္ဌကထာ 6202 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၁ 6203 ဓမ္မပဒ အဋ္ဌကထာ-၂ 6204 ဥဒါန အဋ္ဌကထာ 6205 ဣတိဝုတ္တက အဋ္ဌကထာ 6206 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၁ 6207 သုတ္တနိပါတ အဋ္ဌကထာ-၂ 6208 ဝိမာနဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6209 ပေတဝတ္ထု အဋ္ဌကထာ 6210 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၁ 6211 ထေရဂါထာ အဋ္ဌကထာ-၂ 6212 ထေရီဂါထာ အဋ္ဌကထာ 6213 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၁ 6214 အပဒါန အဋ္ဌကထာ-၂ 6215 ဗုဒ္ဓဝံသ အဋ္ဌကထာ 6216 စရိယာပိဋက အဋ္ဌကထာ 6217 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၁ 6218 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၂ 6219 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၃ 6220 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၄ 6221 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၅ 6222 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၆ 6223 ဇာတက အဋ္ဌကထာ-၇ 6224 မဟာနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6225 စူဠနိဒ္ဒေသ အဋ္ဌကထာ 6226 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၁ 6227 ပဋိသမ္ဘိဒါမဂ္ဂ အဋ္ဌကထာ-၂ 6228 နေတ္တိပ္ပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 6301 နေတ္တိပ္ပကရဏ ဋီကာ 6302 နေတ္တိဝိဘာဝိနီ | |
| 7101 ဓမ္မသင်္ဂဏီ ပါဠိ 7102 ဝိဘင်္ဂ ပါဠိ 7103 ဓါတုကထာ ပါဠိ 7104 ပုဂ္ဂလပညတ္တိ ပါဠိ 7105 ကထာဝတ္ထု ပါဠိ 7106 ယမက ပါဠိ-၁ 7107 ယမက ပါဠိ-၂ 7108 ယမက ပါဠိ-၃ 7109 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၁ 7110 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၂ 7111 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၃ 7112 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၄ 7113 ပဋ္ဌာန ပါဠိ-၅ | 7201 ဓမ္မသင်္ဂဏိ အဋ္ဌကထာ 7202 သမ္မောဟဝိနောဒနီ အဋ္ဌကထာ 7203 ပဉ္စပကရဏ အဋ္ဌကထာ | 7301 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-မူလဋီကာ 7302 ဝိဘင်္ဂ-မူလဋီကာ 7303 ပဉ္စပကရဏ-မူလဋီကာ 7304 ဓမ္မသင်္ဂဏီ-အနုဋီကာ 7305 ပဉ္စပကရဏ-အနုဋီကာ 7306 အဘိဓမ္မာဝတာရော-နာမရူပပရိစ္ဆေဒေါ 7307 အဘိဓမ္မတ္ထသင်္ဂဟော 7308 အဘိဓမ္မာဝတာရ-ပုရာဏဋီကာ 7309 အဘိဓမ္မမာတိကာပါဠိ | |
| português | |||
| Páli | Aṭṭhakathā | Ṭīkā | Outro |
| 1101 Ofensas Graves (Pārājika) 1102 Ofensas Leves (Pācittiya) 1103 Grande Seção do Vīnaya (Mahāvagga) 1104 Pequena Seção do Vīnaya (Cūḷavagga) 1105 Apêndice do Vīnaya (Parivāra) | 1201 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 1 1202 Comentário das Ofensas Graves - Vol. 2 1203 Comentário das Ofensas Leves 1204 Comentário da Grande Seção do Vīnaya 1205 Comentário da Pequena Seção do Vīnaya 1206 Comentário do Apêndice do Vīnaya | 1301 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 1 1302 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 2 1303 Subcomentário que Elucida o Sentido Essencial - Vol. 3 | 1401 Texto das Duas Matrizes 1402 Comentário do Compêndio do Vīnaya 1403 Subcomentário de Vajirabuddhi 1404 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 1 1405 Subcomentário que Dissipa Dúvidas - Vol. 2 1406 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 1 1407 Subcomentário do Ornamento do Vīnaya - Vol. 2 1408 Antigo Subcomentário que Supera Dúvidas 1409 Decisão sobre o Vīnaya e Decisão Superior 1410 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 1 1411 Subcomentário da Decisão sobre o Vīnaya - Vol. 2 1412 Texto da Aplicação das Regras 1413 Pequeno Treinamento e Treinamento Fundamental 8401 Caminho da Purificação - Vol. 1 8402 Caminho da Purificação - Vol. 2 8403 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 1 8404 Grande Subcomentário do Caminho da Purificação - Vol. 2 8405 História da Origem do Caminho da Purificação 8406 Coleção dos Longos Discursos (índice Pāli-Vietnamita) 8407 Coleção dos Discursos Médios (índice Pāli-Vietnamita) 8408 Coleção dos Discursos Agrupados (índice Pāli-Vietnamita) 8409 Coleção dos Discursos Numerados (índice Pāli-Vietnamita) 8410 Cesto da Disciplina (índice Pāli-Vietnamita) 8411 Cesto do Abhidhamma (índice Pāli-Vietnamita) 8412 Comentários (índice Pāli-Vietnamita) 8413 Elucidação da Etimologia 8414 Grande Subcomentário do Compêndio que Elucida o Sentido Supremo 8415 Texto do Subcomentário Elucidativo 8416 Texto Elucidativo sobre a Exposição das Condições 8417 Subcomentário da Saudação 8418 Grande Texto de Saudação 8419 Versos de Louvor a Buda pelos Sinais 8420 Saudação com Recitação 8421 Oferenda de Lótus 8422 Ornamento dos Vencedores 8423 Mel dos Versos 8424 Coleção de Versos sobre as Qualidades de Buda 8425 Pequena Crônica dos Livros 8427 Crônica do Ensinamento 8426 Grande Crônica 8429 Gramática de Moggallāna 8428 Gramática de Kaccāyana 8430 Tratado sobre a Gramática - Série de Palavras 8431 Tratado sobre a Gramática - Série de Raízes 8432 Realização das Formas das Palavras 8433 Comentário de Moggallāna 8434 Texto sobre a Realização da Aplicação 8435 Texto sobre a Origem dos Versos 8436 Texto do Dicionário Iluminado 8437 Subcomentário do Dicionário Iluminado 8438 Texto sobre o Ornamento da Boa Compreensão 8439 Subcomentário do Ornamento da Boa Compreensão 8440 Essência da Decisão sobre os Termos do Glossário de Bālāvatāra 8446 Ética do Poeta 8447 Coleção de Ética 8445 Ética do Dhamma 8444 Grande Ética Secreta 8441 Ética do Mundo 8442 Ética dos Suttas 8443 Ética do Herói 8450 Ética de Cāṇakya 8448 Elucidação sobre os Perigos para os Homens 8449 Elucidação sobre as Quatro Proteções 8451 O Fluxo do Sabor - Histórias Edificantes 8452 Texto sobre a Purificação dos Limites 8453 Canto de Vessantara 8454 Explicação do Comentário de Moggallāna 8455 Crônica das Estupas 8456 Crônica da Relíquia do Dente 8457 O Esplendor da Leitura dos Elementos 8458 Crônica das Relíquias 8459 Crônica do Mosteiro de Hatthavanagalla 8460 História do Vencedor 8461 Ilha da Linhagem dos Vencedores 8462 Versos da Panela de Óleo 8463 Subcomentário de Milinda 8464 Cacho de Flores de Palavras 8465 Realização das Palavras 8466 Tratado sobre os Pontos da Gramática 8467 Coleção de Raízes de Kaccāyana 8468 Descrição do Pico de Sāmantakūṭa |
| 2101 Seção da Moralidade - Dīgha 2102 Grande Seção - Dīgha 2103 Seção de Pāthika - Dīgha | 2201 Comentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2202 Comentário da Grande Seção - Dīgha 2203 Comentário da Seção de Pāthika - Dīgha | 2301 Subcomentário da Seção da Moralidade - Dīgha 2302 Subcomentário da Grande Seção - Dīgha 2303 Subcomentário da Seção de Pāthika - Dīgha 2304 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 1 2305 Novo Subcomentário da Seção da Moralidade - Vol. 2 | |
| 3101 Cinquenta Discursos Fundamentais - Majjhima 3102 Cinquenta Discursos Médios - Majjhima 3103 Cinquenta Discursos Superiores - Majjhima | 3201 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 1 3202 Comentário dos Cinquenta Fundamentais - Vol. 2 3203 Comentário dos Cinquenta Médios 3204 Comentário dos Cinquenta Superiores | 3301 Subcomentário dos Cinquenta Fundamentais 3302 Subcomentário dos Cinquenta Médios 3303 Subcomentário dos Cinquenta Superiores | |
| 4101 Seção com Versos - Saṃyutta 4102 Seção das Causas - Saṃyutta 4103 Seção dos Agregados - Saṃyutta 4104 Seção das Seis Bases dos Sentidos - Saṃyutta 4105 Grande Seção - Saṃyutta | 4201 Comentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4202 Comentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4203 Comentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4204 Comentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4205 Comentário da Grande Seção - Saṃyutta | 4301 Subcomentário da Seção com Versos - Saṃyutta 4302 Subcomentário da Seção das Causas - Saṃyutta 4303 Subcomentário da Seção dos Agregados - Saṃyutta 4304 Subcomentário da Seção das Seis Bases - Saṃyutta 4305 Subcomentário da Grande Seção - Saṃyutta | |
| 5101 Grupos de Um - Aṅguttara 5102 Grupos de Dois - Aṅguttara 5103 Grupos de Três - Aṅguttara 5104 Grupos de Quatro - Aṅguttara 5105 Grupos de Cinco - Aṅguttara 5106 Grupos de Seis - Aṅguttara 5107 Grupos de Sete - Aṅguttara 5108 Grupos de Oito, etc. - Aṅguttara 5109 Grupos de Nove - Aṅguttara 5110 Grupos de Dez - Aṅguttara 5111 Grupos de Onze - Aṅguttara | 5201 Comentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5202 Comentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5203 Comentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5204 Comentário dos Grupos de Oito, etc. | 5301 Subcomentário dos Grupos de Um - Aṅguttara 5302 Subcomentário dos Grupos de Dois, Três e Quatro 5303 Subcomentário dos Grupos de Cinco, Seis e Sete 5304 Subcomentário dos Grupos de Oito, etc. | |
| 6101 Pequena Leitura (Khuddakapāṭha) 6102 Versos do Dhamma (Dhammapada) 6103 Exclamações Inspiradas (Udāna) 6104 Assim Foi Dito (Itivuttaka) 6105 Coleção de Discursos (Suttanipāta) 6106 Histórias das Mansões Celestiais 6107 Histórias dos Fantasmas 6108 Versos dos Monges Anciãos 6109 Versos das Monjas Anciãs 6110 Histórias Passadas - Vol. 1 6111 Histórias Passadas - Vol. 2 6112 História dos Budas (Buddhavaṃsa) 6113 Cesto das Condutas (Cariyāpiṭaka) 6114 Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6115 Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6116 Grande Exposição (Mahāniddesa) 6117 Pequena Exposição (Cūḷaniddesa) 6118 Caminho da Discriminação Analítica 6119 O Guia (Nettippakaraṇa) 6120 As Perguntas de Milinda 6121 Instrução do Cesto (Peṭakopadesa) | 6201 Comentário da Pequena Leitura 6202 Comentário do Dhammapada - Vol. 1 6203 Comentário do Dhammapada - Vol. 2 6204 Comentário do Udāna 6205 Comentário do Itivuttaka 6206 Comentário do Suttanipāta - Vol. 1 6207 Comentário do Suttanipāta - Vol. 2 6208 Comentário das Histórias das Mansões 6209 Comentário das Histórias dos Fantasmas 6210 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 1 6211 Comentário dos Versos dos Monges - Vol. 2 6212 Comentário dos Versos das Monjas 6213 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 1 6214 Comentário das Histórias Passadas - Vol. 2 6215 Comentário da História dos Budas 6216 Comentário do Cesto das Condutas 6217 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 1 6218 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 2 6219 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 3 6220 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 4 6221 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 5 6222 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 6 6223 Comentário das Histórias de Nascimentos - Vol. 7 6224 Comentário da Grande Exposição 6225 Comentário da Pequena Exposição 6226 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 1 6227 Comentário do Caminho da Discriminação - Vol. 2 6228 Comentário do Guia | 6301 Subcomentário do Guia 6302 Elucidação do Guia | |
| 7101 Enumeração dos Fenômenos (Dhammasaṅgaṇī) 7102 Análise (Vibhaṅga) 7103 Discurso sobre os Elementos (Dhātukathā) 7104 Designação das Pessoas (Puggalapaññatti) 7105 Pontos da Discussão (Kathāvatthu) 7106 O Livro dos Pares - Vol. 1 7107 O Livro dos Pares - Vol. 2 7108 O Livro dos Pares - Vol. 3 7109 Condições de Originação - Vol. 1 7110 Condições de Originação - Vol. 2 7111 Condições de Originação - Vol. 3 7112 Condições de Originação - Vol. 4 7113 Condições de Originação - Vol. 5 | 7201 Comentário da Enumeração dos Fenômenos 7202 Comentário que Dissipa a Confusão 7203 Comentário dos Cinco Tratados | 7301 Subcomentário Principal da Enumeração dos Fenômenos 7302 Subcomentário Principal da Análise 7303 Subcomentário Principal dos Cinco Tratados 7304 Subcomentário Secundário da Enumeração dos Fenômenos 7305 Subcomentário Secundário dos Cinco Tratados 7306 Introdução ao Abhidhamma - Análise de Nome e Forma 7307 Compêndio do Abhidhamma 7308 Antigo Subcomentário da Introdução ao Abhidhamma 7309 Matriz do Abhidhamma | |
| русский | |||
| Палийский канон | Комментарии | Субкомментарии | Другое |
| 1101 Параджика-пали 1102 Пачиттия-пали 1103 Махавагга-пали (Виная) 1104 Чулавагга-пали 1105 Паривара-пали | 1201 Параджиканда-аттхакатха-1 1202 Параджиканда-аттхакатха-2 1203 Пачиттия-аттхакатха 1204 Махавагга-аттхакатха (Виная) 1205 Чулавагга-аттхакатха 1206 Паривара-аттхакатха | 1301 Сараттхадипани-тика-1 1302 Сараттхадипани-тика-2 1303 Сараттхадипани-тика-3 | 1401 Двематика-пали 1402 Винаясангаха-аттхакатха 1403 Ваджирабуддхи-тика 1404 Вимативинодани-тика-1 1405 Вимативинодани-тика-2 1406 Винаяланкара-тика-1 1407 Винаяланкара-тика-2 1408 Канкхавитаранипурана-тика 1409 Винаявиниччая-уттаравиниччая 1410 Винаявиниччая-тика-1 1411 Винаявиниччая-тика-2 1412 Пачиттиядийоджана-пали 1413 Кхуддасиккха-муласиккха 8401 Висуддхимагга-1 8402 Висуддхимагга-2 8403 Висуддхимагга-махатика-1 8404 Висуддхимагга-махатика-2 8405 Висуддхимагга-ниданакатха 8406 Дигханикая (пу-ви) 8407 Мадджхиманикая (пу-ви) 8408 Самъюттаникая (пу-ви) 8409 Ангуттараникая (пу-ви) 8410 Винаяпитака (пу-ви) 8411 Абхидхаммапитака (пу-ви) 8412 Аттхакатха (пу-ви) 8413 Нируттидипани 8414 Параматтхадипани Сангахамахатикапатха 8415 Анудипанипатха 8416 Паттхануддеса дипанипатха 8417 Намаккаратика 8418 Махапанамапатха 8419 Лаккханато буддхатхоманагатха 8420 Сутавандана 8421 Камаланджали 8422 Джиналанкара 8423 Паджамадху 8424 Буддхагунагатхавали 8425 Чулагантхавамса 8427 Сасанавамса 8426 Махавамса 8429 Моггалланабьякарана 8428 Каччаянабьякарана 8430 Садданитиппакарана (падамала) 8431 Садданитиппакарана (дхатумала) 8432 Падарупасиддхи 8433 Могалланапанчика 8434 Пайогасиддхипатха 8435 Вуттодаяпатха 8436 Абхидханаппадипикапатха 8437 Абхидханаппадипикатика 8438 Субодхаланкарапатха 8439 Субодхаланкаратика 8440 Балаватара гантхипадаттхавиниччаясара 8446 Кавидаппананити 8447 Нитиманджари 8445 Дхамманити 8444 Махараханити 8441 Локанити 8442 Суттантанити 8443 Сурассатинити 8450 Чанакьянити 8448 Нарадаккхадипани 8449 Чатурараккхадипани 8451 Расавахини 8452 Симависодханипатха 8453 Вессантарагити 8454 Моггаллана вуттививаранапанчика 8455 Тхупавамса 8456 Датхавамса 8457 Дхатупатхавиласиния 8458 Дхатувамса 8459 Хаттхаванагаллавихаравамса 8460 Джиначаритая 8461 Джинавамсадипа 8462 Телакатахагатха 8463 Милидатика 8464 Падаманджари 8465 Падасадхана 8466 Саддабиндупакарана 8467 Каччаянадхатуманджуса 8468 Самантакутаваннана |
| 2101 Силаккхандхавагга-пали 2102 Махавагга-пали (Дигха) 2103 Патхикавагга-пали | 2201 Силаккхандхавагга-аттхакатха 2202 Махавагга-аттхакатха (Дигха) 2203 Патхикавагга-аттхакатха | 2301 Силаккхандхавагга-тика 2302 Махавагга-тика (Дигха) 2303 Патхикавагга-тика 2304 Силаккхандхавагга-абхинаватика-1 2305 Силаккхандхавагга-абхинаватика-2 | |
| 3101 Мулапаннаса-пали 3102 Мадджхимапаннаса-пали 3103 Упарипаннаса-пали | 3201 Мулапаннаса-аттхакатха-1 3202 Мулапаннаса-аттхакатха-2 3203 Мадджхимапаннаса-аттхакатха 3204 Упарипаннаса-аттхакатха | 3301 Мулапаннаса-тика 3302 Мадджхимапаннаса-тика 3303 Упарипаннаса-тика | |
| 4101 Сагатхавагга-пали 4102 Ниданавагга-пали 4103 Кхандхавагга-пали 4104 Салаятанавагга-пали 4105 Махавагга-пали (Самъютта) | 4201 Сагатхавагга-аттхакатха 4202 Ниданавагга-аттхакатха 4203 Кхандхавагга-аттхакатха 4204 Салаятанавагга-аттхакатха 4205 Махавагга-аттхакатха (Самъютта) | 4301 Сагатхавагга-тика 4302 Ниданавагга-тика 4303 Кхандхавагга-тика 4304 Салаятанавагга-тика 4305 Махавагга-тика (Самъютта) | |
| 5101 Экаканипата-пали 5102 Дуканипата-пали 5103 Тиканипата-пали 5104 Чатукканипата-пали 5105 Панчаканипата-пали 5106 Чхакканипата-пали 5107 Саттаканипата-пали 5108 Аттхакадинипата-пали 5109 Наваканипата-пали 5110 Дасаканипата-пали 5111 Экадасаканипата-пали | 5201 Экаканипата-аттхакатха 5202 Дука-тика-чатукканипата-аттхакатха 5203 Панчака-чхакка-саттаканипата-аттхакатха 5204 Аттхакадинипата-аттхакатха | 5301 Экаканипата-тика 5302 Дука-тика-чатукканипата-тика 5303 Панчака-чхакка-саттаканипата-тика 5304 Аттхакадинипата-тика | |
| 6101 Кхуддакапатха-пали 6102 Дхаммапада-пали 6103 Удана-пали 6104 Итивуттака-пали 6105 Суттанипата-пали 6106 Виманаваттху-пали 6107 Петаваттху-пали 6108 Тхерагатха-пали 6109 Тхеригатха-пали 6110 Ападана-пали-1 6111 Ападана-пали-2 6112 Буддхавамса-пали 6113 Чарияпитака-пали 6114 Джатака-пали-1 6115 Джатака-пали-2 6116 Маханиддеса-пали 6117 Чуланиддеса-пали 6118 Патисамбхидамагга-пали 6119 Неттиппакарана-пали 6120 Милиндапаньха-пали 6121 Петакопадеса-пали | 6201 Кхуддакапатха-аттхакатха 6202 Дхаммапада-аттхакатха-1 6203 Дхаммапада-аттхакатха-2 6204 Удана-аттхакатха 6205 Итивуттака-аттхакатха 6206 Суттанипата-аттхакатха-1 6207 Суттанипата-аттхакатха-2 6208 Виманаваттху-аттхакатха 6209 Петаваттху-аттхакатха 6210 Тхерагатха-аттхакатха-1 6211 Тхерагатха-аттхакатха-2 6212 Тхеригатха-аттхакатха 6213 Ападана-аттхакатха-1 6214 Ападана-аттхакатха-2 6215 Буддхавамса-аттхакатха 6216 Чарияпитака-аттхакатха 6217 Джатака-аттхакатха-1 6218 Джатака-аттхакатха-2 6219 Джатака-аттхакатха-3 6220 Джатака-аттхакатха-4 6221 Джатака-аттхакатха-5 6222 Джатака-аттхакатха-6 6223 Джатака-аттхакатха-7 6224 Маханиддеса-аттхакатха 6225 Чуланиддеса-аттхакатха 6226 Патисамбхидамагга-аттхакатха-1 6227 Патисамбхидамагга-аттхакатха-2 6228 Неттиппакарана-аттхакатха | 6301 Неттиппакарана-тика 6302 Неттивибхавини | |
| 7101 Дхаммасангани-пали 7102 Вибханга-пали 7103 Дхатукатха-пали 7104 Пуггалапаннятти-пали 7105 Катхаваттху-пали 7106 Ямака-пали-1 7107 Ямака-пали-2 7108 Ямака-пали-3 7109 Паттхана-пали-1 7110 Паттхана-пали-2 7111 Паттхана-пали-3 7112 Паттхана-пали-4 7113 Паттхана-пали-5 | 7201 Дхаммасангани-аттхакатха 7202 Саммохивинодани-аттхакатха 7203 Панчапакарана-аттхакатха | 7301 Дхаммасангани-мулатика 7302 Вибханга-мулатика 7303 Панчапакарана-мулатика 7304 Дхаммасангани-анутика 7305 Панчапакарана-анутика 7306 Абхидхаммаватаро-намарупапариччхедо 7307 Абхидхамматтхасангахо 7308 Абхидхаммаватара-пуранатика 7309 Абхидхаммаматика-пали | |
| සිංහල | |||
| පාලි කැනනය | විවරණ | අටුවා | වෙනත් |
| 1101 පාරාජික පාළි 1102 පාචිත්තිය පාළි 1103 මහාවග්ග පාළි (විනය) 1104 චූළවග්ග පාළි 1105 පරිවාර පාළි | 1201 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-1 1202 පාරාජිකකණ්ඩ අට්ඨකථා-2 1203 පාචිත්තිය අට්ඨකථා 1204 මහාවග්ග අට්ඨකථා (විනය) 1205 චූළවග්ග අට්ඨකථා 1206 පරිවාර අට්ඨකථා | 1301 සාරත්ථදීපනී ටීකා-1 1302 සාරත්ථදීපනී ටීකා-2 1303 සාරත්ථදීපනී ටීකා-3 | 1401 ද්වෙමාතිකාපාළි 1402 විනයසංගහ අට්ඨකථා 1403 වජිරබුද්ධි ටීකා 1404 විමතිවිනෝදනී ටීකා-1 1405 විමතිවිනෝදනී ටීකා-2 1406 විනයාලංකාර ටීකා-1 1407 විනයාලංකාර ටීකා-2 1408 කඞ්ඛාවිතරණීපුරාණ ටීකා 1409 විනයවිනිච්ඡය-උත්තරවිනිච්ඡය 1410 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-1 1411 විනයවිනිච්ඡය ටීකා-2 1412 පාචිත්යාදියෝජනාපාළි 1413 ඛුද්දසික්ඛා-මූලසික්ඛා 8401 විසුද්ධිමග්ග-1 8402 විසුද්ධිමග්ග-2 8403 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-1 8404 විසුද්ධිමග්ග-මහාටීකා-2 8405 විසුද්ධිමග්ග නිදානකථා 8406 දීඝනිකාය (පු-වි) 8407 මජ්ඣිමනිකාය (පු-වි) 8408 සංයුත්තනිකාය (පු-වි) 8409 අඞ්ගුත්තරනිකාය (පු-වි) 8410 විනයපිටක (පු-වි) 8411 අභිධම්මපිටක (පු-වි) 8412 අට්ඨකථා (පු-වි) 8413 නිරුත්තිදීපනී 8414 පරමත්ථදීපනී සඞ්ගහමහාටීකාපාඨ 8415 අනුදීපනීපාඨ 8416 පට්ඨානුද්දේස දීපනීපාඨ 8417 නමක්කාරටීකා 8418 මහාපණාමපාඨ 8419 ලක්ඛණාතෝ බුද්ධථෝමනාගාථා 8420 සුතවන්දනා 8421 කමලාඤ්ජලි 8422 ජිනාලඞ්කාර 8423 පජ්ජමධු 8424 බුද්ධගුණගාථාවලී 8425 චූළගන්ථවංස 8427 සාසනවංස 8426 මහාවංස 8429 මොග්ගල්ලානබ්යාකරණං 8428 කච්චායනබ්යාකරණං 8430 සද්දනීතිප්පකරණං (පදමාලා) 8431 සද්දනීතිප්පකරණං (ධාතුමාලා) 8432 පදරූපසිද්ධි 8433 මොග්ගල්ලානපඤ්චිකා 8434 පයෝගසිද්ධිපාඨ 8435 වුත්තෝදයපාඨ 8436 අභිධානප්පදීපිකාපාඨ 8437 අභිධානප්පදීපිකාටීකා 8438 සුබෝධාලඞ්කාරපාඨ 8439 සුබෝධාලඞ්කාරටීකා 8440 බාලාවතාර ගණ්ඨිපදත්ථවිනිච්ඡයසාර 8446 කවිදප්පණනීති 8447 නීතිමඤ්ජරී 8445 ධම්මනීති 8444 මහාරහනීති 8441 ලෝකනීති 8442 සුත්තන්තනීති 8443 සූරස්සතිනීති 8450 චාණක්යනීති 8448 නරදක්ඛදීපනී 8449 චතුරාරක්ඛදීපනී 8451 රසවාහිනී 8452 සීමවිසෝධනීපාඨ 8453 වෙස්සන්තරගීති 8454 මොග්ගල්ලාන වුත්තිවිවරණපඤ්චිකා 8455 ථූපවංස 8456 දාඨාවංස 8457 ධාතුපාඨවිලාසිනියා 8458 ධාතුවංස 8459 හත්ථවනගල්ලවිහාරවංස 8460 ජිනචරිතය 8461 ජිනවංසදීපං 8462 තේලකටාහගාථා 8463 මිලිදටීකා 8464 පදමඤ්ජරී 8465 පදසාධනං 8466 සද්දබින්දුපකරණං 8467 කච්චායනධාතුමඤ්ජුසා 8468 සාමන්තකූටවණ්ණනා |
| 2101 සීලක්ඛන්ධවග්ග පාළි 2102 මහාවග්ග පාළි (දීඝ) 2103 පාථිකවග්ග පාළි | 2201 සීලක්ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 2202 මහාවග්ග අට්ඨකථා (දීඝ) 2203 පාථිකවග්ග අට්ඨකථා | 2301 සීලක්ඛන්ධවග්ග ටීකා 2302 මහාවග්ග ටීකා (දීඝ) 2303 පාථිකවග්ග ටීකා 2304 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-1 2305 සීලක්ඛන්ධවග්ග-අභිනවටීකා-2 | |
| 3101 මූලපණ්ණාස පාළි 3102 මජ්ඣිමපණ්ණාස පාළි 3103 උපරිපණ්ණාස පාළි | 3201 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-1 3202 මූලපණ්ණාස අට්ඨකථා-2 3203 මජ්ඣිමපණ්ණාස අට්ඨකථා 3204 උපරිපණ්ණාස අට්ඨකථා | 3301 මූලපණ්ණාස ටීකා 3302 මජ්ඣිමපණ්ණාස ටීකා 3303 උපරිපණ්ණාස ටීකා | |
| 4101 සගාථාවග්ග පාළි 4102 නිදානවග්ග පාළි 4103 ඛන්ධවග්ග පාළි 4104 සළායතනවග්ග පාළි 4105 මහාවග්ග පාළි (සංයුත්ත) | 4201 සගාථාවග්ග අට්ඨකථා 4202 නිදානවග්ග අට්ඨකථා 4203 ඛන්ධවග්ග අට්ඨකථා 4204 සළායතනවග්ග අට්ඨකථා 4205 මහාවග්ග අට්ඨකථා (සංයුත්ත) | 4301 සගාථාවග්ග ටීකා 4302 නිදානවග්ග ටීකා 4303 ඛන්ධවග්ග ටීකා 4304 සළායතනවග්ග ටීකා 4305 මහාවග්ග ටීකා (සංයුත්ත) | |
| 5101 එකකනිපාත පාළි 5102 දුකනිපාත පාළි 5103 තිකනිපාත පාළි 5104 චතුක්කනිපාත පාළි 5105 පඤ්චකනිපාත පාළි 5106 ඡක්කනිපාත පාළි 5107 සත්තකනිපාත පාළි 5108 අට්ඨකාදිනිපාත පාළි 5109 නවකනිපාත පාළි 5110 දසකනිපාත පාළි 5111 එකාදසකනිපාත පාළි | 5201 එකකනිපාත අට්ඨකථා 5202 දුක-තික-චතුක්කනිපාත අට්ඨකථා 5203 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත අට්ඨකථා 5204 අට්ඨකාදිනිපාත අට්ඨකථා | 5301 එකකනිපාත ටීකා 5302 දුක-තික-චතුක්කනිපාත ටීකා 5303 පඤ්චක-ඡක්ක-සත්තකනිපාත ටීකා 5304 අට්ඨකාදිනිපාත ටීකා | |
| 6101 ඛුද්දකපාඨ පාළි 6102 ධම්මපද පාළි 6103 උදාන පාළි 6104 ඉතිවුත්තක පාළි 6105 සුත්තනිපාත පාළි 6106 විමානවත්ථු පාළි 6107 පේතවත්ථු පාළි 6108 ථේරගාථා පාළි 6109 ථේරීගාථා පාළි 6110 අපදාන පාළි-1 6111 අපදාන පාළි-2 6112 බුද්ධවංස පාළි 6113 චරියාපිටක පාළි 6114 ජාතක පාළි-1 6115 ජාතක පාළි-2 6116 මහානිද්දේස පාළි 6117 චූළනිද්දේස පාළි 6118 පටිසම්භිදාමග්ග පාළි 6119 නෙත්තිප්පකරණ පාළි 6120 මිලින්දපඤ්හ පාළි 6121 පේටකෝපදේස පාළි | 6201 ඛුද්දකපාඨ අට්ඨකථා 6202 ධම්මපද අට්ඨකථා-1 6203 ධම්මපද අට්ඨකථා-2 6204 උදාන අට්ඨකථා 6205 ඉතිවුත්තක අට්ඨකථා 6206 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-1 6207 සුත්තනිපාත අට්ඨකථා-2 6208 විමානවත්ථු අට්ඨකථා 6209 පේතවත්ථු අට්ඨකථා 6210 ථේරගාථා අට්ඨකථා-1 6211 ථේරගාථා අට්ඨකථා-2 6212 ථේරීගාථා අට්ඨකථා 6213 අපදාන අට්ඨකථා-1 6214 අපදාන අට්ඨකථා-2 6215 බුද්ධවංස අට්ඨකථා 6216 චරියාපිටක අට්ඨකථා 6217 ජාතක අට්ඨකථා-1 6218 ජාතක අට්ඨකථා-2 6219 ජාතක අට්ඨකථා-3 6220 ජාතක අට්ඨකථා-4 6221 ජාතක අට්ඨකථා-5 6222 ජාතක අට්ඨකථා-6 6223 ජාතක අට්ඨකථා-7 6224 මහානිද්දේස අට්ඨකථා 6225 චූළනිද්දේස අට්ඨකථා 6226 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-1 6227 පටිසම්භිදාමග්ග අට්ඨකථා-2 6228 නෙත්තිප්පකරණ අට්ඨකථා | 6301 නෙත්තිප්පකරණ ටීකා 6302 නෙත්තිවිභාවිනී | |
| 7101 ධම්මසංගණී පාළි 7102 විභඞ්ග පාළි 7103 ධාතුකථා පාළි 7104 පුග්ගලපඤ්ඤත්ති පාළි 7105 කථාවත්ථු පාළි 7106 යමක පාළි-1 7107 යමක පාළි-2 7108 යමක පාළි-3 7109 පට්ඨාන පාළි-1 7110 පට්ඨාන පාළි-2 7111 පට්ඨාන පාළි-3 7112 පට්ඨාන පාළි-4 7113 පට්ඨාන පාළි-5 | 7201 ධම්මසංගණි අට්ඨකථා 7202 සම්මෝහවිනෝදනී අට්ඨකථා 7203 පඤ්චපකරණ අට්ඨකථා | 7301 ධම්මසංගණී-මූලටීකා 7302 විභඞ්ග-මූලටීකා 7303 පඤ්චපකරණ-මූලටීකා 7304 ධම්මසංගණී-අනුටීකා 7305 පඤ්චපකරණ-අනුටීකා 7306 අභිධම්මාවතාරෝ-නාමරූපපරිච්ඡේදෝ 7307 අභිධම්මත්ථසංගහෝ 7308 අභිධම්මාවතාර-පුරාණටීකා 7309 අභිධම්මමාතිකාපාළි | |
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| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Vinaya) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-1 1202 Pārājikakaṇḍa Aṭṭhakathā-2 1203 Pācittiya Aṭṭhakathā 1204 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Vinaya) 1205 Cūḷavagga Aṭṭhakathā 1206 Parivāra Aṭṭhakathā | 1301 Sāratthadīpanī Ṭīkā-1 1302 Sāratthadīpanī Ṭīkā-2 1303 Sāratthadīpanī Ṭīkā-3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Vinayasaṅgaha Aṭṭhakathā 1403 Vajirabuddhi Ṭīkā 1404 Vimativinodanī Ṭīkā-1 1405 Vimativinodanī Ṭīkā-2 1406 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-1 1407 Vinayālaṅkāra Ṭīkā-2 1408 Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa Ṭīkā 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Vinayavinicchaya Ṭīkā-1 1411 Vinayavinicchaya Ṭīkā-2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Visuddhimagga-1 8402 Visuddhimagga-2 8403 Visuddhimagga-mahāṭīkā-1 8404 Visuddhimagga-mahāṭīkā-2 8405 Visuddhimagga nidānakathā 8406 Dīghanikāya (pu-vi) 8407 Majjhimanikāya (pu-vi) 8408 Saṃyuttanikāya (pu-vi) 8409 Aṅguttaranikāya (pu-vi) 8410 Vinayapiṭaka (pu-vi) 8411 Abhidhammapiṭaka (pu-vi) 8412 Aṭṭhakathā (pu-vi) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Namakkāraṭīkā 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Abhidhānappadīpikāṭīkā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Subodhālaṅkāraṭīkā 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8445 Dhammanīti 8444 Mahārahanīti 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8450 Cāṇakyanīti 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Milidaṭīkā 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Dīgha) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Sīlakkhandhavagga Aṭṭhakathā 2202 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Dīgha) 2203 Pāthikavagga Aṭṭhakathā | 2301 Sīlakkhandhavagga Ṭīkā 2302 Mahāvagga Ṭīkā (Dīgha) 2303 Pāthikavagga Ṭīkā 2304 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-1 2305 Sīlakkhandhavagga-abhinavaṭīkā-2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-1 3202 Mūlapaṇṇāsa Aṭṭhakathā-2 3203 Majjhimapaṇṇāsa Aṭṭhakathā 3204 Uparipaṇṇāsa Aṭṭhakathā | 3301 Mūlapaṇṇāsa Ṭīkā 3302 Majjhimapaṇṇāsa Ṭīkā 3303 Uparipaṇṇāsa Ṭīkā | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Saṃyutta) | 4201 Sagāthāvagga Aṭṭhakathā 4202 Nidānavagga Aṭṭhakathā 4203 Khandhavagga Aṭṭhakathā 4204 Saḷāyatanavagga Aṭṭhakathā 4205 Mahāvagga Aṭṭhakathā (Saṃyutta) | 4301 Sagāthāvagga Ṭīkā 4302 Nidānavagga Ṭīkā 4303 Khandhavagga Ṭīkā 4304 Saḷāyatanavagga Ṭīkā 4305 Mahāvagga Ṭīkā (Saṃyutta) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Ekakanipāta Aṭṭhakathā 5202 Duka-tika-catukkanipāta Aṭṭhakathā 5203 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Aṭṭhakathā 5204 Aṭṭhakādinipāta Aṭṭhakathā | 5301 Ekakanipāta Ṭīkā 5302 Duka-tika-catukkanipāta Ṭīkā 5303 Pañcaka-chakka-sattakanipāta Ṭīkā 5304 Aṭṭhakādinipāta Ṭīkā | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi-1 6111 Apadāna Pāḷi-2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi-1 6115 Jātaka Pāḷi-2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Khuddakapāṭha Aṭṭhakathā 6202 Dhammapada Aṭṭhakathā-1 6203 Dhammapada Aṭṭhakathā-2 6204 Udāna Aṭṭhakathā 6205 Itivuttaka Aṭṭhakathā 6206 Suttanipāta Aṭṭhakathā-1 6207 Suttanipāta Aṭṭhakathā-2 6208 Vimānavatthu Aṭṭhakathā 6209 Petavatthu Aṭṭhakathā 6210 Theragāthā Aṭṭhakathā-1 6211 Theragāthā Aṭṭhakathā-2 6212 Therīgāthā Aṭṭhakathā 6213 Apadāna Aṭṭhakathā-1 6214 Apadāna Aṭṭhakathā-2 6215 Buddhavaṃsa Aṭṭhakathā 6216 Cariyāpiṭaka Aṭṭhakathā 6217 Jātaka Aṭṭhakathā-1 6218 Jātaka Aṭṭhakathā-2 6219 Jātaka Aṭṭhakathā-3 6220 Jātaka Aṭṭhakathā-4 6221 Jātaka Aṭṭhakathā-5 6222 Jātaka Aṭṭhakathā-6 6223 Jātaka Aṭṭhakathā-7 6224 Mahāniddesa Aṭṭhakathā 6225 Cūḷaniddesa Aṭṭhakathā 6226 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-1 6227 Paṭisambhidāmagga Aṭṭhakathā-2 6228 Nettippakaraṇa Aṭṭhakathā | 6301 Nettippakaraṇa Ṭīkā 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi-1 7107 Yamaka Pāḷi-2 7108 Yamaka Pāḷi-3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi-1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi-2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi-3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi-4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi-5 | 7201 Dhammasaṅgaṇi Aṭṭhakathā 7202 Sammohavinodanī Aṭṭhakathā 7203 Pañcapakaraṇa Aṭṭhakathā | 7301 Dhammasaṅgaṇī-mūlaṭīkā 7302 Vibhaṅga-mūlaṭīkā 7303 Pañcapakaraṇa-mūlaṭīkā 7304 Dhammasaṅgaṇī-anuṭīkā 7305 Pañcapakaraṇa-anuṭīkā 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Abhidhammāvatāra-purāṇaṭīkā 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |
| แบบไทย | |||
| บาลีแคน | ข้อคิดเห็น | คำอธิบายย่อย | อื่น |
| 1101 ปาราชิกปาฬิ 1102 ปาจิตติยปาฬิ 1103 มหาวคฺคปาฬิ (วินัย) 1104 จูฬวคฺคปาฬิ 1105 ปริวารปาฬิ | 1201 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๑ 1202 ปาราชิกกณฺฑอฏฺฐกถา-๒ 1203 ปาจิตฺติยอฏฺฐกถา 1204 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (วินัย) 1205 จูฬวคฺคอฏฺฐกถา 1206 ปริวารอฏฺฐกถา | 1301 สารตฺถทีปนีฏีกา-๑ 1302 สารตฺถทีปนีฏีกา-๒ 1303 สารตฺถทีปนีฏีกา-๓ | 1401 ทเวมาติกาปาฬิ 1402 วินยสํคหอฏฺฐกถา 1403 วชิรพุทฺธิฏีกา 1404 วิมติวิโนทนีฏีกา-๑ 1405 วิมติวิโนทนีฏีกา-๒ 1406 วินยาลงฺการฏีกา-๑ 1407 วินยาลงฺการฏีกา-๒ 1408 กงฺขาวิตรณีปุราณฏีกา 1409 วินยวินิจฉย-อุตฺตรวินิจฉย 1410 วินยวินิจฉยฏีกา-๑ 1411 วินยวินิจฉยฏีกา-๒ 1412 ปาจิตฺยาทิโยชนาปาฬิ 1413 ขุทฺทสิกฺขา-มูลสิกฺขา 8401 วิสุทฺธิมคฺค-๑ 8402 วิสุทฺธิมคฺค-๒ 8403 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๑ 8404 วิสุทฺธิมคฺค-มหาฏีกา-๒ 8405 วิสุทฺธิมคฺค-นิทานกถา 8406 ทีฆนิกาย (ปุ-วิ) 8407 มชฺฌิมนิกาย (ปุ-วิ) 8408 สํยุตฺตนิกาย (ปุ-วิ) 8409 องฺคุตฺตรนิกาย (ปุ-วิ) 8410 วินยปิฎก (ปุ-วิ) 8411 อภิธมฺมปิฎก (ปุ-วิ) 8412 อฏฺฐกถา (ปุ-วิ) 8413 นิรุตฺติทีปนี 8414 ปรมตฺถทีปนี สงฺคหมหาฏีกาปาฐ 8415 อนุทีปนีปาฐ 8416 ปฎฺฐานุทฺเทสทีปนีปาฐ 8417 นมกฺการฏีกา 8418 มหาปณามปาฐ 8419 ลกฺขณาโต พุทฺธโถมนาคาถา 8420 สุตวทน 8421 กมลาญฺชลิ 8422 ชินาลงฺการ 8423 ปชฺชมธุ 8424 พุทฺธคุณคาถาวลี 8425 จูฬคนฺถวํส 8427 สาสนวํส 8426 มหาวํส 8429 โมคฺคลฺลานพฺยากรณํ 8428 กจฺจายนพฺยากรณํ 8430 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ปทมาลา) 8431 สทฺทานีติปฺปกรณํ (ธาตุมาลา) 8432 ปทรูปสิทฺธิ 8433 โมคคฺลานปญฺจิกา 8434 ปโยคสิทฺธิปาฐ 8435 วุตฺโตทยปาฐ 8436 อภิธานปฺปทีปิกาปาฐ 8437 อภิธานปฺปทีปิกาฏีกา 8438 สุโพธาลงฺการปาฐ 8439 สุโพธาลงฺการฏีกา 8440 พาลาวตาร คณฺฐิปทตฺถวินิจฺฉยสาร 8446 กวิทปฺปณนีติ 8447 นีติมญฺชรี 8445 ธมฺมนีติ 8444 มหารหนีติ 8441 โลกนีติ 8442 สุตฺตนฺตนีติ 8443 สูรสฺสตินีติ 8450 จาณกฺยนีติ 8448 นรทกฺขทีปนี 8449 จตุราวรกฺขทีปนี 8451 รสวาหินี 8452 สีมวิโสธนีปาฐ 8453 เวสฺสนฺตรคีติ 8454 โมคฺคลฺลาน วุตฺติวิวรณปญฺจิกา 8455 ถูปวํส 8456 ทาฐาวํส 8457 ธาตุปาฐวิลาสินิยา 8458 ธาตุวํส 8459 หตฺถวนคัลลวิหารวํส 8460 ชนจริตย 8461 ชนวํสทีปํ 8462 เตลกฏาหคาถา 8463 มิลิทฏีกา 8464 ปทมญฺชรี 8465 ปทสาธนํ 8466 สทฺทพินฺทุปกรณํ 8467 กจฺจายนธาตุมญฺชุสา 8468 สามนฺตกูฏวณฺณนา |
| 2101 สีลกฺขนฺธวคฺคปาฬิ 2102 มหาวคฺคปาฬิ (ทีฆ) 2103 ปาถิกวคฺคปาฬิ | 2201 สีลกฺขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 2202 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (ทีฆ) 2203 ปาถิกวคฺคอฏฺฐกถา | 2301 สีลกฺขนฺธวคฺคฏีกา 2302 มหาวคฺคฏีกา (ทีฆ) 2303 ปาถิกวคฺคฏีกา 2304 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๑ 2305 สีลกฺขนฺธวคฺค-อภินวฏีกา-๒ | |
| 3101 มูลปณฺณาสปาฬิ 3102 มชฺฌิมปณฺณาสปาฬิ 3103 อุปริปณฺณาสปาฬิ | 3201 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๑ 3202 มูลปณฺณาสอฏฺฐกถา-๒ 3203 มชฺฌิมปณฺณาสอฏฺฐกถา 3204 อุปริปณฺณาสอฏฺฐกถา | 3301 มูลปณฺณาสฏีกา 3302 มชฺฌิมปณฺณาสฏีกา 3303 อุปริปณฺณาสฏีกา | |
| 4101 สคาถาวคฺคปาฬิ 4102 นิทานวคฺคปาฬิ 4103 ขนฺธวคฺคปาฬิ 4104 สฬายตนวคฺคปาฬิ 4105 มหาวคฺคปาฬิ (สํยุตฺต) | 4201 สคาถาวคฺคอฏฺฐกถา 4202 นิทานวคฺคอฏฺฐกถา 4203 ขนฺธวคฺคอฏฺฐกถา 4204 สฬายตนวคฺคอฏฺฐกถา 4205 มหาวคฺคอฏฺฐกถา (สํยุตฺต) | 4301 สคาถาวคฺคฏีกา 4302 นิทานวคฺคฏีกา 4303 ขนฺธวคฺคฏีกา 4304 สฬายตนวคฺคฏีกา 4305 มหาวคฺคฏีกา (สํยุตฺต) | |
| 5101 เอกกนิปาตปาฬิ 5102 ทุกนิปาตปาฬิ 5103 ติกนิปาตปาฬิ 5104 จตุกฺกนิปาตปาฬิ 5105 ปญฺจกนิปาตปาฬิ 5106 ฉกฺกนิปาตปาฬิ 5107 สตฺตกนิปาตปาฬิ 5108 อฏฺฐกาทินิปาตปาฬิ 5109 นวกนิปาตปาฬิ 5110 ทสกนิปาตปาฬิ 5111 เอกาทสกนิปาตปาฬิ | 5201 เอกกนิปาตอฏฺฐกถา 5202 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตอฏฺฐกถา 5203 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตอฏฺฐกถา 5204 อฏฺฐกาทินิปาตอฏฺฐกถา | 5301 เอกกนิปาตฏีกา 5302 ทุก-ติก-จตุกฺกนิปาตฏีกา 5303 ปญฺจก-ฉกฺก-สตฺตกนิปาตฏีกา 5304 อฏฺฐกาทินิปาตฏีกา | |
| 6101 ขุทฺทกปาฐปาฬิ 6102 ธมฺมปทปาฬิ 6103 อุทานปาฬิ 6104 อิติวุตฺตกปาฬิ 6105 สุตฺตนิบาตปาฬิ 6106 วิมานวตฺถุปาฬิ 6107 เปตวตฺถุปาฬิ 6108 เถรคาถาปาฬิ 6109 เถรีคาถาปาฬิ 6110 อปทานปาฬิ-๑ 6111 อปทานปาฬิ-๒ 6112 พุทธวงฺสปาฬิ 6113 จริยาปิฏกปาฬิ 6114 ชาตกปาฬิ-๑ 6115 ชาตกปาฬิ-๒ 6116 มหานิทฺเทสปาฬิ 6117 จูฬนิทฺเทสปาฬิ 6118 ปฏิสมฺภิทามคฺคปาฬิ 6119 เนตฺติปฺปกฺรณปาฬิ 6120 มิลินฺทปญฺหาปาฬิ 6121 เปฏโกปเทสปาฬิ | 6201 ขุทฺทกปาฐอฏฺฐกถา 6202 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๑ 6203 ธมฺมปทอฏฺฐกถา-๒ 6204 อุทานอฏฺฐกถา 6205 อิติวุตฺตกอฏฺฐกถา 6206 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๑ 6207 สุตฺตนิบาตอฏฺฐกถา-๒ 6208 วิมานวตฺถุอฏฺฐกถา 6209 เปตวตฺถุอฏฺฐกถา 6210 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๑ 6211 เถรคาถาอฏฺฐกถา-๒ 6212 เถรีคาถาอฏฺฐกถา 6213 อปทานอฏฺฐกถา-๑ 6214 อปทานอฏฺฐกถา-๒ 6215 พุทธวงฺสอฏฺฐกถา 6216 จริยาปิฏกอฏฺฐกถา 6217 ชาตกอฏฺฐกถา-๑ 6218 ชาตกอฏฺฐกถา-๒ 6219 ชาตกอฏฺฐกถา-๓ 6220 ชาตกอฏฺฐกถา-๔ 6221 ชาตกอฏฺฐกถา-๕ 6222 ชาตกอฏฺฐกถา-๖ 6223 ชาตกอฏฺฐกถา-๗ 6224 มหานิทฺเทสอฏฺฐกถา 6225 จูฬนิทฺเทสอฏฺฐกถา 6226 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๑ 6227 ปฏิสมฺภิทามคฺคอฏฺฐกถา-๒ 6228 เนตฺติปฺปกฺรณอฏฺฐกถา | 6301 เนตฺติปฺปกฺรณฏีกา 6302 เนตฺติวิภาวินี | |
| 7101 ธมฺมสงฺคณีปาฬิ 7102 วิภงฺคปาฬิ 7103 ธาตุกถาปาฬิ 7104 ปุคฺคลปญฺญตฺติปาฬิ 7105 กถาวตฺถุปาฬิ 7106 ยมกปาฬิ-๑ 7107 ยมกปาฬิ-๒ 7108 ยมกปาฬิ-๓ 7109 ปฎฺฐานปาฬิ-๑ 7110 ปฎฺฐานปาฬิ-๒ 7111 ปฎฺฐานปาฬิ-๓ 7112 ปฎฺฐานปาฬิ-๔ 7113 ปฎฺฐานปาฬิ-๕ | 7201 ธมฺมสงฺคณิอฏฺฐกถา 7202 สมฺโมหวินิทนีอฏฺฐกถา 7203 ปญฺจปกรณอฏฺฐกถา | 7301 ธมฺมสงฺคณีมูลฏีกา 7302 วิภงฺคมูลฏีกา 7303 ปญฺจปกรณมูลฏีกา 7304 ธมฺมสงฺคณีอนุฏีกา 7305 ปญฺจปกรณอนุฏีกา 7306 อภิธมฺมาวตาโร-นามรูปปริจฺเฉโท 7307 อภิธมฺมตฺถสงฺคโห 7308 อภิธมฺมาวตาร-ปุราณฏีกา 7309 อภิธมฺมมาติกาปาฬิ | |
| བོད་མི | |||
| པཱ་ལི་གསུང་རབ། | འགྲེལ་བཤད། | འགྲེལ་བཤད་ཕྲན། | གཞན། |
| 1101 ཕ་ར་ཇི་ཀ་པཱ་ལི། 1102 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་པཱ་ལི། 1103 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (ཝི་ན་ཡ) 1104 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 1105 པ་རི་ཝཱ་ར་པཱ་ལི། | 1201 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 1202 ཕ་ར་ཇི་ཀ་ཀཎྜ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 1203 པཱ་ཙི་ཏི་ཡ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1204 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (ཝི་ན་ཡ) 1205 ཙཱུ་ལ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1206 པ་རི་ཝཱ་ར་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 1301 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1302 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1303 སཱ་རཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༣ | 1401 དྭེ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། 1402 ཝི་ན་ཡ་སངྒ་ཧ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 1403 ཝ་ཇི་ར་བུད་དྷི་ཊཱི་ཀཱ། 1404 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1405 ཝི་མ་ཏི་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1406 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1407 ཝི་ན་ཡཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1408 ཀངྑཱ་ཝི་ཏ་ར་ཎཱི་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 1409 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཨུ་ཏྟ་ར་ཝི་ནི་ཙ་ཡ། 1410 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 1411 ཝི་ན་ཡ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 1412 པཱ་ཙི་ཏྱཱ་དི་ཡོ་ཇ་ནཱ་པཱ་ལི། 1413 ཁུད་ད་སིཀྑཱ་མཱུ་ལ་སིཀྑཱ། 8401 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༡ 8402 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ-༢ 8403 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 8404 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ-༢ 8405 ཝི་སུད་དྷི་མགྒ་ནི་དཱ་ན་ཀ་ཐཱ། 8406 དཱི་གྷ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8407 མཛྷི་མ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8408 སཾ་ཡུཏྟ་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8409 ཨངྒུ་ཏྟ་ར་ནི་ཀཱ་ཡ། (པུ་ཝི) 8410 ཝི་ན་ཡ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8411 ཨ་བྷི་དྷམྨ་པི་ཊ་ཀ། (པུ་ཝི) 8412 ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (པུ་ཝི) 8413 ནི་རུཏྟི་དཱི་པ་ནཱི། 8414 པ་ར་མཏྠ་དཱི་པ་ནཱི་སངྒ་ཧ་མ་ཧཱ་ཊཱི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8415 ཨ་ནུ་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8416 པཊྛཱ་ནུདྡེ་ས་དཱི་པ་ནཱི་པཱ་ཋ། 8417 ན་མཀྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8418 མ་ཧཱ་པ་ཎཱ་མ་པཱ་ཋ། 8419 ལཀྑ་ཎཱ་ཏོ་བུདྡྷ་ཐོ་མ་ནཱ་གཱ་ཐཱ། 8420 སུ་ཏ་ཝནྡ་ནཱ། 8421 ཀ་མ་ལཱཉྫ་ལི། 8422 ཇི་ནཱ་ལངྐཱ་ར། 8423 པཛྫ་མ་དྷུ། 8424 བུདྡྷ་གུ་ཎ་གཱ་ཐཱ་ཝ་ལཱི། 8425 ཙཱུ་ལ་གནྠ་ཝཾ་ས། 8427 སཱ་ས་ན་ཝཾ་ས། 8426 མ་ཧཱ་ཝཾ་ས། 8429 མོགྒ་ལླཱ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8428 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་བྱཱ་ཀ་ར་ཎཾ། 8430 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (པ་ད་མཱ་ལཱ) 8431 སདྡ་ནཱི་ཏི་པྤ་ཀ་ར་ཎཾ། (དྷཱ་ཏུ་མཱ་ལཱ) 8432 པ་ད་རཱུ་པ་སིད་དྷི། 8433 མོ་ག་ལླཱ་ན་པཉྩ་ཀཱ། 8434 པ་ཡོ་ག་སིད་དྷི་པཱ་ཋ། 8435 བུཏྟོ་ད་ཡ་པཱ་ཋ། 8436 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་པཱ་ཋ། 8437 ཨ་བྷི་དྷཱ་ན་པྤ་དཱི་པི་ཀཱ་ཊཱི་ཀཱ། 8438 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་པཱ་ཋ། 8439 སུ་བོ་དྷཱ་ལངྐཱ་ར་ཊཱི་ཀཱ། 8440 བཱ་ལཱ་ཝ་ཏཱ་ར་གཎྛི་པ་དཏྠ་ཝི་ནི་ཙ་ཡ་སཱ་ར། 8446 ཀ་ཝི་དཔྤ་ཎ་ནཱི་ཏི། 8447 ནཱི་ཏི་མཉྫ་རཱི། 8445 དྷམྨ་ནཱི་ཏི། 8444 མ་ཧཱ་ར་ཧ་ནཱི་ཏི། 8441 ལོ་ཀ་ནཱི་ཏི། 8442 སུཏྟནྟ་ནཱ་ཏི། 8443 སཱུ་རསྶ་ཏི་ནཱི་ཏི། 8450 ཙཱ་ཎཀྱ་ནཱི་ཏི། 8448 ན་ར་དཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8449 ཙ་ཏུ་རཱ་རཀྑ་དཱི་པ་ནཱི། 8451 ར་ས་ཝཱ་ཧི་ནཱི། 8452 སཱི་མ་ཝི་སོ་ད་ནཱི་པཱ་ཋ། 8453 ཝེསྶནྟ་ར་གཱི་ཏི། 8454 མོགྒ་ལླཱ་ན་བུཏྟི་ཝི་ཝ་ར་ཎ་པཉྩ་ཀཱ། 8455 ཐཱུ་པ་ཝཾ་ས། 8456 དཱ་ཊྷཱ་ཝཾ་ས། 8457 དྷཱ་ཏུ་པཱ་ཋ་ཝི་ལཱ་སི་ནི་ཡཱ། 8458 དྷཱ་ཏུ་ཝཾ་ས། 8459 ཧཏྠ་ཝ་ན་གལླ་ཝི་ཧཱ་ར་ཝཾ་ས། 8460 ཇི་ན་ཙ་རི་ཏ་ཡ། 8461 ཇི་ན་ཝཾ་ས་དཱི་པཾ། 8462 ཏེ་ལ་ཀ་ཊཱ་ཧ་གཱ་ཐཱ། 8463 མི་ལི་ད་ཊཱི་ཀཱ། 8464 པ་ད་མཉྫ་རཱི། 8465 པ་ད་སཱ་ད་ནཾ། 8466 སདྡ་བིནྡུ་པ་ཀ་ར་ཎཾ། 8467 ཀཙྩཱ་ཡ་ན་དྷཱ་ཏུ་མཉྫུ་སཱ། 8468 སཱ་མནྟ་ཀཱུ་ཊ་ཝཎྞ་ནཱ། |
| 2101 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 2102 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (དཱི་གྷ) 2103 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་པཱ་ལི། | 2201 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 2202 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (དཱི་གྷ) 2203 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 2301 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2302 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (དཱི་གྷ) 2303 པཱ་ཐི་ཀ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 2304 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༡ 2305 སཱི་ལཀྑནྡྷ་ཝག་ག་ཨ་བྷི་ན་ཝ་ཊཱི་ཀཱ-༢ | |
| 3101 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3102 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། 3103 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་པཱ་ལི། | 3201 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 3202 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 3203 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 3204 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 3301 མཱུ་ལ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3302 མཛྷི་མ་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། 3303 ཨུ་པ་རི་པཎྞཱ་ས་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 4101 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4102 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4103 ཁནྡྷ་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4104 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་པཱ་ལི། 4105 མ་ཧཱ་ཝག་ག་པཱ་ལི། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4201 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4202 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4203 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4204 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 4205 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | 4301 ས་གཱ་ཐཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4302 ནི་དཱ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4303 ཁནྡྷ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4304 ས་ལཱ་ཡ་ཏ་ན་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། 4305 མ་ཧཱ་ཝག་ག་ཊཱི་ཀཱ། (སཾ་ཡུཏྟ) | |
| 5101 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5102 དུ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5103 ཏི་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5104 ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5105 པཉྩ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5106 ཆཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5107 སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5108 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5109 ན་ཝ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5110 ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 5111 ཨེ་ཀཱ་ད་ས་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། | 5201 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5202 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5203 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 5204 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 5301 ཨེ་ཀ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5302 དུ་ཀ་ཏི་ཀ་ཙ་ཏུཀྐ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5303 པཉྩ་ཀ་ཆཀྐ་སཏྟ་ཀ་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། 5304 ཨཊྛ་ཀཱ་དི་ནི་པཱ་ཏ་ཊཱི་ཀཱ། | |
| 6101 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་པཱ་ལི། 6102 དྷམྨ་པ་ད་པཱ་ལི། 6103 ཨུ་དཱ་ན་པཱ་ལི། 6104 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་པཱ་ལི། 6105 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་པཱ་ལི། 6106 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6107 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 6108 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6109 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་པཱ་ལི། 6110 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 6111 ཨ་པ་དཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 6112 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་པཱ་ལི། 6113 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་པཱ་ལི། 6114 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 6115 ཛཱ་ཏ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 6116 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6117 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་པཱ་ལི། 6118 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་པཱ་ལི། 6119 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་པཱ་ལི། 6120 མི་ལིནྡ་པཉྷ་པཱ་ལི། 6121 པེ་ཊ་ཀོ་པ་དེ་ས་པཱ་ལི། | 6201 ཁུད་ད་ཀ་པཱ་ཋ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6202 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6203 དྷམྨ་པ་ད་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6204 ཨུ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6205 ཨི་ཏི་ཝུཏྟ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6206 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6207 སུཏྟ་ནི་པཱ་ཏ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6208 ཝི་མཱ་ན་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6209 པེ་ཏ་ཝཏྠུ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6210 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6211 ཐེ་ར་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6212 ཐེ་རཱི་གཱ་ཐཱ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6213 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6214 ཨ་པ་དཱ་ན་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6215 བུདྡྷ་ཝཾ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6216 ཙ་རི་ཡཱ་པི་ཊ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6217 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6218 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6219 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༣ 6220 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༤ 6221 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༥ 6222 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༦ 6223 ཛཱ་ཏ་ཀ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༧ 6224 མ་ཧཱ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6225 ཙཱུ་ལ་ནི་དྡེ་ས་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 6226 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༡ 6227 པ་ཊི་སམ་བྷི་དཱ་མགྒ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ-༢ 6228 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 6301 ནེཏྟི་པྤ་ཀ་ར་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 6302 ནེཏྟི་ཝི་བྷཱི་ནཱི། | |
| 7101 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་པཱ་ལི། 7102 ཝི་བྷངྒ་པཱ་ལི། 7103 དྷཱ་ཏུ་ཀ་ཐཱ་པཱ་ལི། 7104 པུགྒ་ལ་པཉྙཏྟི་པཱ་ལི། 7105 ཀ་ཐཱ་ཝཏྠུ་པཱ་ལི། 7106 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༡ 7107 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༢ 7108 ཡ་མ་ཀ་པཱ་ལི-༣ 7109 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༡ 7110 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༢ 7111 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༣ 7112 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༤ 7113 པཊྛཱ་ན་པཱ་ལི-༥ | 7201 དྷམྨ་སངྒ་ཎི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7202 སམྨོ་ཧ་ཝི་ནོ་ད་ནཱི་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། 7203 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨཊྛ་ཀ་ཐཱ། | 7301 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7302 ཝི་བྷངྒ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7303 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་མཱུ་ལ་ཊཱི་ཀཱ། 7304 དྷམྨ་སངྒ་ཎཱི་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7305 པཉྩ་པ་ཀ་ར་ཎ་ཨ་ནུ་ཊཱི་ཀཱ། 7306 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་རོ་ནཱ་མ་རཱུ་པ་པ་རི་ཙྪེ་དོ། 7307 ཨ་བྷི་དྷམྨཏྠ་སངྒ་ཧོ། 7308 ཨ་བྷི་དྷམྨཱ་ཝ་ཏཱ་ར་པུ་རཱ་ཎ་ཊཱི་ཀཱ། 7309 ཨ་བྷི་དྷམྨ་མཱ་ཏི་ཀཱ་པཱ་ལི། | |
| Tiếng Việt | |||
| Kinh điển Pali | Chú giải | Phụ chú giải | Khác |
| 1101 Pārājika Pāḷi 1102 Pācittiya Pāḷi 1103 Mahāvagga Pāḷi (Tạng Luật) 1104 Cūḷavagga Pāḷi 1105 Parivāra Pāḷi | 1201 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 1 1202 Chú Giải Pārājikakaṇḍa - 2 1203 Chú Giải Pācittiya 1204 Chú Giải Mahāvagga (Tạng Luật) 1205 Chú Giải Cūḷavagga 1206 Chú Giải Parivāra | 1301 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 1 1302 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 2 1303 Phụ Chú Giải Sāratthadīpanī - 3 | 1401 Dvemātikāpāḷi 1402 Chú Giải Vinayasaṅgaha 1403 Phụ Chú Giải Vajirabuddhi 1404 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 1 1405 Phụ Chú Giải Vimativinodanī - 2 1406 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 1 1407 Phụ Chú Giải Vinayālaṅkāra - 2 1408 Phụ Chú Giải Kaṅkhāvitaraṇīpurāṇa 1409 Vinayavinicchaya-uttaravinicchaya 1410 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 1 1411 Phụ Chú Giải Vinayavinicchaya - 2 1412 Pācityādiyojanāpāḷi 1413 Khuddasikkhā-mūlasikkhā 8401 Thanh Tịnh Đạo - 1 8402 Thanh Tịnh Đạo - 2 8403 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 1 8404 Đại Phụ Chú Giải Thanh Tịnh Đạo - 2 8405 Lời Tựa Thanh Tịnh Đạo 8406 Trường Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8407 Trung Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8408 Tương Ưng Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8409 Tăng Chi Bộ Kinh (Vấn Đáp) 8410 Tạng Luật (Vấn Đáp) 8411 Tạng Vi Diệu Pháp (Vấn Đáp) 8412 Chú Giải (Vấn Đáp) 8413 Niruttidīpanī 8414 Paramatthadīpanī Saṅgahamahāṭīkāpāṭha 8415 Anudīpanīpāṭha 8416 Paṭṭhānuddesa dīpanīpāṭha 8417 Phụ Chú Giải Namakkāra 8418 Mahāpaṇāmapāṭha 8419 Lakkhaṇāto buddhathomanāgāthā 8420 Sutavandanā 8421 Kamalāñjali 8422 Jinālaṅkāra 8423 Pajjamadhu 8424 Buddhaguṇagāthāvalī 8425 Cūḷaganthavaṃsa 8426 Mahāvaṃsa 8427 Sāsanavaṃsa 8428 Kaccāyanabyākaraṇaṃ 8429 Moggallānabyākaraṇaṃ 8430 Saddanītippakaraṇaṃ (padamālā) 8431 Saddanītippakaraṇaṃ (dhātumālā) 8432 Padarūpasiddhi 8433 Mogallānapañcikā 8434 Payogasiddhipāṭha 8435 Vuttodayapāṭha 8436 Abhidhānappadīpikāpāṭha 8437 Phụ Chú Giải Abhidhānappadīpikā 8438 Subodhālaṅkārapāṭha 8439 Phụ Chú Giải Subodhālaṅkāra 8440 Bālāvatāra gaṇṭhipadatthavinicchayasāra 8441 Lokanīti 8442 Suttantanīti 8443 Sūrassatinīti 8444 Mahārahanīti 8445 Dhammanīti 8446 Kavidappaṇanīti 8447 Nītimañjarī 8448 Naradakkhadīpanī 8449 Caturārakkhadīpanī 8450 Cāṇakyanīti 8451 Rasavāhinī 8452 Sīmavisodhanīpāṭha 8453 Vessantaragīti 8454 Moggallāna vuttivivaraṇapañcikā 8455 Thūpavaṃsa 8456 Dāṭhāvaṃsa 8457 Dhātupāṭhavilāsiniyā 8458 Dhātuvaṃsa 8459 Hatthavanagallavihāravaṃsa 8460 Jinacaritaya 8461 Jinavaṃsadīpaṃ 8462 Telakaṭāhagāthā 8463 Phụ Chú Giải Milinda 8464 Padamañjarī 8465 Padasādhanaṃ 8466 Saddabindupakaraṇaṃ 8467 Kaccāyanadhātumañjusā 8468 Sāmantakūṭavaṇṇanā |
| 2101 Sīlakkhandhavagga Pāḷi 2102 Mahāvagga Pāḷi (Trường Bộ) 2103 Pāthikavagga Pāḷi | 2201 Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2202 Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2203 Chú Giải Pāthikavagga | 2301 Phụ Chú Giải Sīlakkhandhavagga 2302 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Trường Bộ) 2303 Phụ Chú Giải Pāthikavagga 2304 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 1 2305 Phụ Chú Giải Mới Sīlakkhandhavagga - 2 | |
| 3101 Mūlapaṇṇāsa Pāḷi 3102 Majjhimapaṇṇāsa Pāḷi 3103 Uparipaṇṇāsa Pāḷi | 3201 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 1 3202 Chú Giải Mūlapaṇṇāsa - 2 3203 Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3204 Chú Giải Uparipaṇṇāsa | 3301 Phụ Chú Giải Mūlapaṇṇāsa 3302 Phụ Chú Giải Majjhimapaṇṇāsa 3303 Phụ Chú Giải Uparipaṇṇāsa | |
| 4101 Sagāthāvagga Pāḷi 4102 Nidānavagga Pāḷi 4103 Khandhavagga Pāḷi 4104 Saḷāyatanavagga Pāḷi 4105 Mahāvagga Pāḷi (Tương Ưng Bộ) | 4201 Chú Giải Sagāthāvagga 4202 Chú Giải Nidānavagga 4203 Chú Giải Khandhavagga 4204 Chú Giải Saḷāyatanavagga 4205 Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | 4301 Phụ Chú Giải Sagāthāvagga 4302 Phụ Chú Giải Nidānavagga 4303 Phụ Chú Giải Khandhavagga 4304 Phụ Chú Giải Saḷāyatanavagga 4305 Phụ Chú Giải Mahāvagga (Tương Ưng Bộ) | |
| 5101 Ekakanipāta Pāḷi 5102 Dukanipāta Pāḷi 5103 Tikanipāta Pāḷi 5104 Catukkanipāta Pāḷi 5105 Pañcakanipāta Pāḷi 5106 Chakkanipāta Pāḷi 5107 Sattakanipāta Pāḷi 5108 Aṭṭhakādinipāta Pāḷi 5109 Navakanipāta Pāḷi 5110 Dasakanipāta Pāḷi 5111 Ekādasakanipāta Pāḷi | 5201 Chú Giải Ekakanipāta 5202 Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5203 Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5204 Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | 5301 Phụ Chú Giải Ekakanipāta 5302 Phụ Chú Giải Duka-tika-catukkanipāta 5303 Phụ Chú Giải Pañcaka-chakka-sattakanipāta 5304 Phụ Chú Giải Aṭṭhakādinipāta | |
| 6101 Khuddakapāṭha Pāḷi 6102 Dhammapada Pāḷi 6103 Udāna Pāḷi 6104 Itivuttaka Pāḷi 6105 Suttanipāta Pāḷi 6106 Vimānavatthu Pāḷi 6107 Petavatthu Pāḷi 6108 Theragāthā Pāḷi 6109 Therīgāthā Pāḷi 6110 Apadāna Pāḷi - 1 6111 Apadāna Pāḷi - 2 6112 Buddhavaṃsa Pāḷi 6113 Cariyāpiṭaka Pāḷi 6114 Jātaka Pāḷi - 1 6115 Jātaka Pāḷi - 2 6116 Mahāniddesa Pāḷi 6117 Cūḷaniddesa Pāḷi 6118 Paṭisambhidāmagga Pāḷi 6119 Nettippakaraṇa Pāḷi 6120 Milindapañha Pāḷi 6121 Peṭakopadesa Pāḷi | 6201 Chú Giải Khuddakapāṭha 6202 Chú Giải Dhammapada - 1 6203 Chú Giải Dhammapada - 2 6204 Chú Giải Udāna 6205 Chú Giải Itivuttaka 6206 Chú Giải Suttanipāta - 1 6207 Chú Giải Suttanipāta - 2 6208 Chú Giải Vimānavatthu 6209 Chú Giải Petavatthu 6210 Chú Giải Theragāthā - 1 6211 Chú Giải Theragāthā - 2 6212 Chú Giải Therīgāthā 6213 Chú Giải Apadāna - 1 6214 Chú Giải Apadāna - 2 6215 Chú Giải Buddhavaṃsa 6216 Chú Giải Cariyāpiṭaka 6217 Chú Giải Jātaka - 1 6218 Chú Giải Jātaka - 2 6219 Chú Giải Jātaka - 3 6220 Chú Giải Jātaka - 4 6221 Chú Giải Jātaka - 5 6222 Chú Giải Jātaka - 6 6223 Chú Giải Jātaka - 7 6224 Chú Giải Mahāniddesa 6225 Chú Giải Cūḷaniddesa 6226 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 1 6227 Chú Giải Paṭisambhidāmagga - 2 6228 Chú Giải Nettippakaraṇa | 6301 Phụ Chú Giải Nettippakaraṇa 6302 Nettivibhāvinī | |
| 7101 Dhammasaṅgaṇī Pāḷi 7102 Vibhaṅga Pāḷi 7103 Dhātukathā Pāḷi 7104 Puggalapaññatti Pāḷi 7105 Kathāvatthu Pāḷi 7106 Yamaka Pāḷi - 1 7107 Yamaka Pāḷi - 2 7108 Yamaka Pāḷi - 3 7109 Paṭṭhāna Pāḷi - 1 7110 Paṭṭhāna Pāḷi - 2 7111 Paṭṭhāna Pāḷi - 3 7112 Paṭṭhāna Pāḷi - 4 7113 Paṭṭhāna Pāḷi - 5 | 7201 Chú Giải Dhammasaṅgaṇi 7202 Chú Giải Sammohavinodanī 7203 Chú Giải Pañcapakaraṇa | 7301 Phụ Chú Giải Gốc Dhammasaṅgaṇī 7302 Phụ Chú Giải Gốc Vibhaṅga 7303 Phụ Chú Giải Gốc Pañcapakaraṇa 7304 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Dhammasaṅgaṇī 7305 Phụ Chú Giải Tiếp Theo Pañcapakaraṇa 7306 Abhidhammāvatāro-nāmarūpaparicchedo 7307 Abhidhammatthasaṅgaho 7308 Phụ Chú Giải Cổ Điển Abhidhammāvatāra 7309 Abhidhammamātikāpāḷi | |